[Know, assume, identity and fulfil the needs of your self and your body]

शरीर की आवश्यकताएं आती हैं , जाती है - अस्थायी हैं, समय के साथ बदलती रहती हैं | जीवन की आवश्यकता स्थायी है - वो है नित्य सुख | शरीर और शारीरिकता की सारी आवश्यकताएं गुणात्मक (quantitative) हैं, मात्रा में नापी जा सकती हैं | जीवन की आवश्यकता feeling (अनुभूति) में है - मूल्यात्मक (qualitative) है - मात्रा में नहीं नापी जा सकती | मात्रा से जीवन नहीं, शरीर की ही ज़रूरतें पूरी हो सकती हैं | जीवन हर क्षण सुख मूल्य की अपेक्षा रखता है |

आवश्यकताओं का निर्वाह जानने, मानने , पहचानने और निर्वाह करने के क्रम से होता है | अपना को बिना जाने, कल्पनाशीलता से मंगरंथ आवश्यकताओं व लक्ष्यों को मान के आज मानव जी रहा है| इसलिए तैरने का सतत प्रयास कर तो रहा है पर सुखी होने के लिए चटपटा ही रहा है | इसलिए दुःख और परेशानियों के सागर में डूबा हुआ है | पता नहीं क्या करना है, क्या पाना है जिससे मन को शांति मिले |