खुद काम करना आसान है, किसी से करवाना कठिन। किसी से काम लेना हो तो पहले समझाना पड़ता है। यदि हमें समझाना नहीं आता तो करना क्या है, यह वह समझ नहीं पाएगा। इस अधूरी समझ में उसकी योग्यता भी शामिल हो जाती है। यदि व्यक्ति अधिक योग्य है तो उस अधूरी जानकारी को पूरी कर लेगा, लेकिन योग्यता कम है तो काम का नुकसान होगा, इसलिए कई लोग खुद काम करना पसंद करते हैं; लेकिन हमेशा ऐसा नहीं हो सकता। समाज में सभी व्यवस्थाएं सहयोग से चलती हैं, इसलिए लोगों का योगदान लेना ही पड़ता है। दूसरों से कैसे काम लिया जाए इसमें हनुमानजी माहिर थे। सीताजी की खोज के लिए वानर भेजने का निर्णय सुग्रीव ने लिया। उसका क्रियान्वयन हनुमानजी को कराना था। हनुमानजी ने जो किया उसके लिए तुलसीदासजी ने लिखा है, 'तब हनुमंत बोलाए दूता। सब कर करि सनमान बहूता।।' तब हनुमानजी ने दूतों को बुलाया और बहुत सम्मान किया।' भय अरु प्रीति नीति देखराई। चले सकल चरनन्हि सिर नाई।।' सबको भय, प्रीति और नीति दिखलाई। सब बंदर चरणों में सिर नवाकर चले। हनुमानजी ने चार काम किए- पहला, सबको बुलाकर सम्मान दिया। काम लेना हो तो सम्मान में कमी मत रखिए। सम्मान एक तरह का प्रोत्साहन है। दूसरा काम, सबको भय दिखाया। यहां भय दिखाने का अर्थ केवल डराना नहीं बल्कि अनुशासन के दायरे में लाना है। तीसरा काम, सबको प्रेम से समझाया। जब किसी को प्रेम से बताया जाता है तो उसके साथ समानता प्रदर्शित की जाती है। चौथा, नीति का कोई भी काम कायदे से बाहर जाकर नहीं किया। प्रबंधन से जुड़े लोगों के लिए यह अच्छा संदेश है कि यदि आप किसी समूह का नेतृत्व कर रहे हों तो हनुमानजी की तरह सम्मान, भय, प्रीति और नीति का प्रयोग कीजिए।