महावीर बिनवउँ हनुमाना: Recent Episodes

Bhola Krishna

व्ही एन श्रीवास्तव "भोला" का आत्मकथात्मक ब्लॉग

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 व्यास पूर्णिमा 2025 के अवसर पर श्री राम शरणम् के गुरुजनों को भजनांजलि ओ मतवारे योगी, तुमने हमको दिव्य प्रकाश दिया।नाम की ज्योति जगाई मन में, श्रद्धा और विश्वास दिया॥ओ मतवारे योगी ......अंधकार में भटक रहे थे, यहाँ वहाँ सिर पटक रहे थे।अति दुलार कर, बाँह पकड़ कर, सत्य डगर पर डाल दिया॥ओ मतवारे योगी .......शरण हीन थे, अति मलीन थे, सत्कर्मो प्रति उदासीन थे।महामंत्र दे राम नाम का, हम सबका

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राजा जनक राजधिराज के सभी गुणों के धनी है, ग्यानी हैं, ध्यानी हैं, धर्मशील हैं, संत स्वभाव है, पवित्र आचरण से युक्त हैं, प्रजापालक हैं, आसक्ति रहित होने से विदेह कहलाते हैं उनकी प्रजा सद्विवेकी है, सदाचारी है, सर्वगुण सम्पन्न है फिर भी उनके राज्य काल में ऐसी त्रासदीआई जिसने त्राहि त्राहि मचा दी । मिथिलेश नगरी में वर्षा नहीं हुई। भयंकर अकाल पड़ गया ।महाराज विदेह ने अपने गुरुदेव शतानंद जी से विचार

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ये भजन १९६३-६५ के लंदन प्रवास के दौरान लिख और टेप कर के घरवालों को इंडिया भेजा था। कुछ शब्द फेर बदल के, इसका संशोधित रूप अंतरध्वनि में छापा गया था। लीजिए, अब आप भी इसे सुनिए । मेरा राम, सब दुखियों का सहारा है ... उसके पास वो दौड़ के जाता,आरत जन जो उसे बुलाता, गीध अजामिल गज गणिका को, उसने पार उतारा है, उतारा है,मेरा राम, सब दुखियों का सहारा है ...देश-विदेश जहाँ जो

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स्वामी अखंडानंद जी की मान्यता है कि "अनन्य भक्ति का प्रतीक है, सर्वदा सर्वत्र ईश दर्शन ! साधक के हृदय में भक्ति का उदय होते ही उसे सर्व रूप में अपने प्रभु का ही दर्शन होता है !"२००८ का अंत, कोमा में, अस्पताल में, आई सी यू में पड़ा हुआ था, एक मध्य रात्रि थोड़ा होश आया, रात्रि की नीरवता में मेरे कान में सस्वर इस भजन की एक पंक्ति सुनायी दे रही थी! कहाँ से आ रही थी वह आवाज़ मुझे नहीं मालूम, पर

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 हनुमान जयंती के उपलक्ष्य में सुनिए हनुमान वंदना - अंजनिसुत हे पवनदुलारे 

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आज परम पूज्यनीय स्वामी सत्यानंद जी महाराज का प्राकट्य दिवस है।सबको स्वामी जी महाराज के प्राकट्य दिवस की बधाइयाँ व राम राम।लीजिए,आप भी इस अवसर पर गुरु आज्ञा एवं गुरु कृपा पर लिखे और गाएमेरे भजनों को निम्न प्लेलिस्ट से सुनिए एवं आनंद उठाइए ।   गुरुजन ऐसी कृपा करें कि मैं आजीवन भजन कीर्तन से रामजी को रिझाता रहूँ । Guru Bhajans Playlist from @bholakrishna -&nbsp

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सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके। शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणि नमोऽस्तुते। जगदंबिके जय जय जगजननी माँ क्या मनहर नाम सुहाया है वारूँ सब कुछ माँ चरणों पर मेरे मन को ये भाया है जगदंबिके जय जय जगजननी माँ जय माँ .....जय माँ .. जय माँ .....जय माँ ..जगदंबिके जय जय जगजननी माँ श्रीराम तू ही श्रीकृष्ण तू ही दुर्गा काली श्रीराधा तू हे

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 श्री राम नवमी के पावन अवसर पर सब को बहुत बहुत बधाई । इस अवसर पर हमारे १९७३  में बने एल पी सेट 'श्री राम गीत गुंजन' के ये बधाई गीत सुनिए । 

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जिस जीव पर प्रभु की असीम कृपा होती है उन्हें परम सिद्ध महापुरुषों के दर्शन स्वयमेव होते रहते हैं ! आवश्यकता पड़ने पर ये संत प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप में उपस्थित होकर 'जीव' के भौतिक और आध्यात्मिक समस्याओं का समाधान करते हैं और उस जीव के मानवीय व्यक्तित्व को उत्तरोत्तर विकसित करते रहते हैं !

फेरो न कृपा की नज़र, हे गुरुवर.......

नयन कटोरे भर भर तुमने, दिव्य प्रेम रस पान कराया।

जलते मरुथल से अन्तर पर ,तुमने अमृत रस बरसाया।।

झरने दो निर्झर।

फेरो न कृपा की नज़र,हे गुरुवर।

भटकूंगा दर दर हे स्वामी ,यदि तुमने निज हाथ छुड़ाया ।

शरण कहाँ पाऊंगा जग में ,यदि न मिली चरणों की छाया।।

हूं तुम पर निर्भर ।

फेरो न कृपा की नज़र,हे गुरुवर।

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ये तीनों सद्गुरु अपनी कृपा दृष्टि से हमारे ऊपर और हमारे परिवार के ऊपर परम कृपालु रहे, सहायक रहे, पथ-प्रदर्शक रहे, भक्ति-भाव से भरे भजन से प्रभु की उपासना का साधन साधने के प्रेरक रहे, हमारे लौकिक और दैवी जीवन के निर्माणकर्ता रहे । 

सद्गुरु स्वामीजी महाराज की अहैतुकी कृपा ने हमारे हृदय में नाम की ज्योति जगाई, उसके दिव्य प्रकाश में हमारा आध्यात्मिक पथ प्रशस्त किया और उन्होंने नामयोग के अंतर्गत नाम दीक्षा दे कर हमारा उद्धार किया; 

प्रेमसिन्धु पूज्य प्रेमजी महाराज ने हमें कर्तव्य-परायणता का पाठ पढाया, निष्ठापूर्वक ईमानदारी से सेवा भाव की कर्तव्य भूमि पर हमें चलाया और जब कहीं पर भयावह परिस्थितियों ने हमें दबोचा, मीलों दूर रहने पर भी, अपनी संकल्प शक्ति से प्रगट हो कर हमे उबारा;

महर्षि डॉ विश्वामित्तरजी ने भजन-कीर्तन के आनंद की मस्ती में डुबो कर प्रेम-प्रीति की अमृतधार प्रवाहित करने में हमारी मदद की ।

निवेदक -- व्ही एन  श्रीवास्तव 

सहयोगिनी - डॉ  कृष्णा श्रीवास्तव 

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श्री रामशरणम के सदगुरु प्रेमजी महाराजजी की महनीय कृपा का वर्णन करना मेरे सामर्थ्य से परे है, जिनसे आत्मशक्ति पा कर मैंने अवस्थानुसार जीवन भर विवेक बुद्धि से कार्य किया, कर्मयोग की साधना में कर्म से सृष्टिकर्ता का पूजन किया । आजीविका अर्जन के विहित कर्म अपनी सरकारी नौकरी में, मैं उच्चतम शिखर पर पहुँच गया । स्वेच्छा से साठ वर्ष की उम्र में सेवानिवृत्त हो कर कुछ वर्षों में सब बच्चों के विवाह-संस्कार सम्पन्न कर और उनको आजीविका अर्जन के लिए स्वावलम्बी बना कर, उनके भरण-पोषण के उत्तरदायित्व से मैं मुक्त हो गया । फिर रह गया एक ही ध्येय, एक ही कार्य, एक ही लगन, एक ही चिंतन - "सर्व शक्तिमान परम पुरुष परमात्मा के गुणों का गान करना, उनकी महिमा का बखान करना, भक्तिभाव से भजन-कीर्तन करना और मगन रहना"

परम पूज्य श्री प्रेमजी महाराज के निर्वाण दिवस २९ जुलाई मांगलिक अवसर पर मेरा उनके श्री चरणों में कोटिश नमन !

मन मंदिर में अपने "प्यारे प्रेमजी महाराज " का विग्रह प्रतिष्ठित कर, बंद नेत्रों से "प्यारे" की छवि निरंतर निहारते हुए, सुध बुध खोकर "उनका" गुणगान कर गीत संगीत द्वारा "उनकी" अनंत कृपाओं के लिए अपनी हार्दिक कृतज्ञता व्यक्त करना, यह है मेरा प्रणाम उन्हें कोटिश प्रणाम

उनकी महिमा का बखान करना, भक्तिभाव से भजन-कीर्तन करना और मगन रहना"

मन मंदिर में अपने "प्यारे प्रेमजी महाराज " का विग्रह प्रतिष्ठित कर, बंद नेत्रों से "प्यारे" की छवि निरंतर निहारते हुए, सुध बुध खोकर "उनका" गुणगान कर गीत संगीत द्वारा "उनकी" अनंत कृपाओं के लिए अपनी हार्दिक कृतज्ञता व्यक्त करना, यह है मेरा प्रणाम उन्हें कोटिश प्रणाम

निवेदक एक साधक

व्ही ,एन श्रीवास्तव "भोला"

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हमारे पौराणिक ग्रंथों में सुख दुःख के तीन भेद बताए हैं ; इन्हें "त्रयताप" कहा गया है !


(१). आधिदैहिक , (२). आधिभौतिक और (३).आधिदैविक( आध्यात्मिक )

(१) आधिदैहिक ताप -विषय -वासनाओं से निसृत शारीरिक सुख दुःख : है . (२) आधिदैविक ताप देवताओं की कृपा या कोप से प्राप्त सुख दुःख है जो कभी दुखदायी और कभी आनंददायी कल्याणकारी और हितकारी प्रतीत होते हैं (३) आधिभौतिक ताप सृष्टि के बाहरी साधनों के संयोग से , मानव द्वारा निर्मित सुविधाओं से उत्पन्न होने वाले दुःख -सुख है !
पर सच पूछो तो आज समस्त संसार की ही दशा दयनीय है .! ब्रह्मानंदजी ने अपनी एक रचना में आज के मानव की दुखद मनःस्थिति ,इन शब्दों में अभिव्यक्त की है :

सताया राग द्वेषों का, तपाया तीन तापों का ,
दुखाया जन्म म्रत्यु का ,हुआ है हाल तंग मेरा!!

दुखों को मेटने वाला तुम्हारा नाम सुन कर मैं
सरन में आ गिरा अब तो भरोसा नाथ है तेरा !!
आज मानवता एक के बाद एक विविध प्रकार की प्राकृतिक आपदाओं को झेल रही है ! कहीं सुनामी और भूकम्प ,कहीं "आयरीन" (विनाशकारी समुद्री तूफ़ान) तथा कहीं पर भयंकर महामारिया और संक्रामक रोग हमे आये दिन त्रस्त करते रहते है ! दूसरी ओर अधिभौतिक प्रगति के फलस्वरूप मिले न्यूक्लिअर विध्वंसक अस्त्र शस्त्र , तथा मानव की सेवा के लिए आविष्कृत वायुयानों जैसे उपकरणों का दुरुपयोग कर के मानव ही दानव बना मानवता को मिटाने का संकल्प किये बैठा है ! आज परिस्थिति यह है कि ----

काम रूप जानहि सब माया ,सपनेहु जिनके धरम न दाया !
करहि उपद्रव असुर निकाया , नाना रूप धरहि कर माया !!

तामसी दुष्प्रवृत्तियों से अपनी आधिभौतिक शक्ति और तकनीकी ज्ञान तथा आधुनिक उपकरणों के दुरूपयोग से मानवता को नष्ट भ्रष्ट करने की आसुरी प्रवृत्ति वाले दानव कब तलक हमें सताते रहेंगे ? अब तो यही लगता है कि उनका अंत करने के लिए "श्री राम" जैसी परम सात्विक शक्तियों को अवतरित होना होगा और समस्त विश्व में राम राज लाना ही होगा क्योंकि
देहिक दैविक भौतिक तापा !
रामराज नहीं काहुहि व्यापा !!

इस विषय में संत कबीर ने तो यहाँ तक कह डाला कि
राम बिनु तन को ताप न जाई
चलिये आप को सुना दूँ यह भजन स्वयम गा कर



राम बिनु तन को ताप न जाई
जल में अगनि रही अधिकाई
राम बिनु तन को ताप न जाई
तुम जल निधि मैं जल कर मीना
जल में रहहि जलहि बिनु जीना
राम बिनु तन को ताप न जाई

तुम पिंजरा मैं सुवना तोरा
दर्शन देहु भाग बड मोरा
राम बिनु तन को ताप न जाई

तुम सद्गुरु मैं प्रीतम चेला
कहे कबीर राम रमूं अकेला
राम बिनु तन को ताप न जाई
जल में अगनि रही अधिकाई

राम बिनु तन को ताप न जाई
(कबीर)
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निवेदक : व्ही . एन. श्रीवास्तव "भोला"
सहयोग: श्रीमती डॉक्टर कृष्णा भोला श्रीवास्तव
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निवेदक : व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"सहयोग : श्रीमती कृष्णा भोला श्रीवास्तव ============================

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शक्रिुया गुरुदेव तरा े शक्रिु या ,मझको ु अपनी बंदगी मेँलेलिया॥पाप कर्मों सेहुई मलै ी चनर ु , ग्यान का साबनु लगाकर धो दिया॥टेक॥भटकता रहता यहुींबेलौस मैं.तमनु ेउंगली थाम मग दर्शनर्श किया॥टेक॥रामनामाकार देकर आपने, दिव्य जीवन का हमेंदर्शनर्श दिया ॥टेक॥या इलाही, आपकी नज़रेकरम ,लम्हेमेँकंकड को कंचन कर दियाहैप्रभूआपकी येमहती कृपा ,एकपल मेँसकल सकं ट हर लि या !!

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भजन: जय जय जगदीश्वरी माँयह रचना - "सर्वेश्वरी जय जय जगदीश्वरी माँ", मेरे परम प्रिय मित्र एवं गुरुभाई श्री हरि ओम् शरण जी" के एक पुरातन भजन की धुन पर आधारित है.सर्वेश्वरी, जय जय जगदीश्वरी माँ, तेरा ही एक सहारा है तेरी आंचल की छाहँ छोड़ अब नहीं कहीं निस्तारा है सर्वेश्वरी जय जय ------------मैं अधमाधम, तू अघ हारिणी ! मैं पतित अशुभ, तू शुभ कारिणी हें ज्योतिपुंज, तूने मेरे मन का मेटा अंधियारा है !!सर्वेश्वरी, जय जय --------------तेरी ममता पाकर किसने ना अपना भाग्य सराहा है कोई भी खाली नहीं गया जो तेरे दर पर आया है !!सर्वेश्वरी, जय जय --------------अति दुर्लभ मानव तन पाकर आये हैं हम इस धरती पर, तेरी चौखट ना छोड़ेंगे ,अपना ये अंतिम द्वारा है !!सर्वेश्वरी, जय जय ---------===================रचनाकार एवं गायक "भोला "See Video on youtube athttp://www.youtube.com/watch?v=ZCPEhHrNV2w

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जय शिव शंकर औघड़दानी
जय शिव शंकर औघड़दानी , विश्वनाथ विश्वम्भर स्वामी

सकल बिस्व के सिरजन हारे , पालक रक्षक 'अघ संघारी'
जय शिव शंकर औघड़दानी , विश्वनाथ विश्वम्भर स्वामी

हिम आसन त्रिपुरारि बिराजें , बाम अंग गिरिजा महरानी
जय शिव शंकर औघड़दानी , विश्वनाथ विश्वम्भर स्वामी

औरन को निज धाम देत हो , हमसे करते आनाकानी
जय शिव शंकर औघड़दानी , विश्वनाथ विश्वम्भर स्वामी

सब दुखियन पर कृपा करत हो हमरी सुधि काहे बिसरानी
जय शिव शंकर औघड़दानी , विश्वनाथ विश्वम्भर स्वामी

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साधक का ईश्वर के प्रति अनन्य प्रेम ही भक्ति है ! मानव हृदय में जन्म से ही उपस्थित प्रभुप्रदत्त "प्रेमप्रीति" की मात्रा जब बढ़ते बढ़ते निज पराकाष्ठा तक पहुँच जाए , जब जीव को सर्वत्र एक मात्र उसका इष्ट ही नजर आने लगे (चाहे वह इष्ट राम हो रहीम हो अथवा कृष्ण या करीम हो ) जब उसे स्वयम उसके अपने रोम रोम में तथा परमेश्वर की प्रत्येक रचना में, हर जीव धारी में,  प्रकति में, वृक्षों की डाल डाल में , पात पात में केवल उसके इष्ट का ही दर्शन होने लगे, जब उसे पर्वतों की घटियों में,कलकल नाद करती नदियों के समवेत स्वर में मात्र ईश्वर का नाम जाप ही सुनाई देने लगे , जब उसे आकाश में ऊंचाई पर उड़ते पंछियों के कलरव में और नीडों में उनके नवजात शिशुओं की आकुल चहचआहट में एकमात्र उसके इष्ट का नाम गूँजता सुनाई दे तब समझो कि जीवात्मा को उसके इष्ट से "परमप्रेमरूपा -भक्ति" हो गयी है ! स्वामी अखंडानंद जी की भी मान्यता है कि " अनन्य भक्ति का प्रतीक है, सर्वदा सर्वत्र ईश दर्शन ! साधक के हृदय में भक्ति का उदय होते ही उसे सर्व रूप में अपने प्रभु का ही दर्शन होता है !


दे दो राम !! दे दो राम !!

हे राम ! 
मेरे राम ! मेरे राम !

सतगुरु से तव नाम सुयश सुन, जाना तुमको राम !
अविरल भक्ति, शक्ति अतुलित दे ,करवाओ निज काम !!

मेरे राम ! मेरे राम !

दे दो राम ! दे दो राम !
दे दो राम ! दे दो राम !

अविरल भक्ति दे दो राम ! अतुलित शक्ति दे दो राम !
अविरल भक्ति दे दो राम ! अतुलित शक्ति दे दो राम !

जपते जपते तव शुभ नाम !
मेरे राम, मेरे राम, मेरे राम, मेरे राम !

जपते जपते तव शुभ नाम, चलूं धर्मपथ, करूँ सुकाम !
जपते जपते तव शुभ नाम, चलूं धर्मपथ, करूँ सुकाम !

दे दो राम ! दे दो राम ! अविरल भक्ति दे दो राम !
 दे दो राम ! दे दो राम ! अतुलित शक्ति दे दो राम ! 

दे दो राम ! दे दो राम ! मीठी वाणी दे दो राम !
दे दो राम ! दे दो राम ! मीठी वाणी दे दो राम !
दे दो राम ! दे दो राम ! मीठी वाणी दे दो राम !

सच बोलूं पर दिल न दुखाऊँ, सुयश गान कर प्रीति लुटाऊँ !
मैं प्रीति लुटाऊँ !
सच बोलूं पर दिल न दुखाऊँ, सुयश गान कर प्रीति लुटाऊँ !
मैं प्रीति लुटाऊँ !

अक्षर ब्रह्म शब्द में झलके, मुखरे स्वर में ईश्वर नाम !
अक्षर ब्रह्म शब्द में झलके, मुखरे स्वर में ईश्वर नाम !
मुखरे स्वर में ईश्वर नाम ! मुखरे स्वर में ईश्वर नाम !

दे दो राम ! दे दो राम ! दे दो राम ! दे दो राम !
मीठी वाणी दे दो राम ! मीठी वाणी दे दो राम !
दे दो राम ! दे दो राम ! 
मीठी वाणी दे दो राम ! 

सद् विवेक पावन वृत्ति दो ! सात्विक रहनी दृढ़ भक्ति दो !
सद् विवेक पावन वृत्ति दो ! सात्विक रहनी दृढ़ भक्ति दो !
हृदय शुद्ध दो ! मति प्रबुद्ध दो ! हृदय शुद्ध दो ! मति प्रबुद्ध दो ! 

नाम प्रीति रस भरी आंख में ऐसी दृष्टि दे दो राम !
नाम प्रीति रस भरी आंख में ऐसी दृष्टि दे दो राम !

दे दो राम ! दे दो राम ! अविरल भक्ति दे दो राम !
दे दो राम ! दे दो राम ! अतुलित शक्ति दे दो राम !
दे दो राम ! दे दो राम ! 

ऐसी भक्ति हो मेरे राम, सब में देखूं तुमको राम !
सब में देखूं तुमको राम, सब में देखूं तुमको राम !
ऐसी दृष्टि दो मेरे राम ! 

सब में देखूं तुमको राम, सब में पाऊं तुमको राम !
ऐसी दृष्टि हो मेरे राम ! सब में देखूं तुमको राम ! 

दे दो राम ! दे दो राम ! ऐसी दृष्टि दे दो मेरे राम !
सब में देखूं तुमको राम, सब में पाऊं तुमको राम !

नतमस्तक हो करूँ प्रणाम, सब में देख तुम्ही को राम !
नतमस्तक हो करूँ प्रणाम, सब में देख तुम्ही को राम !

दे दो राम ! दे दो राम ! अतुलित शक्ति दे दो राम !
दे दो राम ! दे दो राम ! अविरल भक्ति दे दो राम !

राम राम राम राम राम राम, राम राम राम राम राम राम !
मेरे राम मेरे राम मेरे राम मेरे राम मेरे राम मेरे राम !!


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प्रेरणा स्रोत : परम पूज्य श्री महाराजजी द्वारा गायी धुन


निवेदक: व्ही . एन. श्रीवास्तव "भोला"

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रामलला के प्यारे भक्तो ,

अयोध्या नगरी में रामलला के भुवन में पधारने की कोटिश बधाई।

सर्व विदित है कि सौभाग्यवश गुरुजन के गुरुमंत्र से, उनकी करुणा और कृपा से, उनके आशीर्वाद से मुझे ऐसा लग रहा है कि मेरी हरेक सांस, मेरे हृदय की प्रत्येक धडकन, मेरा रोम रोम, मेरी शिराओं में प्रवाहित रक्त की एक एक बूंद, जो कुछ भी इस समय मेरे पास है वह सब ही "उनका" कृपा प्रसाद है । यदि उर्दू शायरों की जुबान में कहूँ तो शायद ऐसी तस्वीर बनेगी --

मुझको मुंदी नजर से ही सब कुछ दिखा दिया ।
तेरे खयाल ने मुझे तुझ से मिला दिया ।।

मुझको दिखा के चकित किया रंग सृष्टि का ।
आनंद भरा रूप प्रभु का दिखा दिया ।।

चेहरा राम का खेंच कर मन की किताब पर ।मेरे हृदय को प्यार का गुलशन बना दिया ।। मन मंदिर में अपने "प्यारे प्रभु" का विग्रह प्रतिष्ठित कर, बंद नेत्रों से "प्यारे" की छवि निरंतर निहारते हुए, सुध बुध खोकर "उनका" गुणगान करना, गीत संगीत द्वारा "उनकी" अनंत कृपाओं के लिए अपनी हार्दिक कृतज्ञता व्यक्त करना, यह है मेरा भजन कीर्तन ।

रामलला घर आया रे ,मेरा रामलला घर आया रे ।

चहु दिसि आनंद छाया रे ,मेरा रोम रोम हर्षाया रे ।।

मेरा रामलला घर आया रे ।

पलक झार अंसुअन फुहार सों ,आँगन स्वच्छ बनाया रे ।

चहु दिसि आनंद छाया रे ,मेरा रोम रोम हर्षाया रे ।।

मेरा रामलला घर आया रे ।

शिवरंजनी बेला गुलाब सो,वन्दनवार सजाया रे ।

चहु दिसि आनंद छाया रे ,मेरा रोम रोम हर्षाया रे ।।

मेरा रामलला घर आया रे ।

आओ री सखियों नाचो गाओ ।

मंगल अवसर आया रे ।।

मेरा रामलला घर आया रे ।

निवेदक - विश्वंभर नाथ श्रीवास्तव 'भोला'

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सत्रहवीं शताब्दी के प्रारम्भ में ( लगभग १६२१ वीं ईस्वी में ), तीर्थयात्रियों की तरह अपनी आस्थाओं को एकाग्रता एवं दृढ़ता से निभाने के लिए किसी नयी धरती की खोज में ,जल- पोतों पर सवार हो कर कुछ पुर्तगाली योरप से अमेरिका के इस भू भाग में आये और जिस स्थान पर वे अपने जहाज़ से उतरे वह USA का यह MASSACHUSETTS मैसच्यूसेट्स राज्य है , जिसमे संयोगवश ,इन दिनों ,हम रह रहे हैं !

यू.एस.ए. वालों के लिए आज का दिन विशेष महत्व का है! नेटिव अमेरिकन्स (रेड इंडीयंस) और सागरपार से आये इन यात्रियों ने अपने आपसी सम्बन्ध सुदृढ़ करने की शुभेच्छा से १६७६ के नवेम्बर मास के किसी बृहस्पतिवार को एक सहभोज का आयोजन किया ! उस दिन औपचारिक रीति से दोनों पक्षों ने परस्पर मित्रता का हाथ मिलाया ! मूल अमेरिका वासियों नें प्रवासी योरोपिंअंस को इस भोज में "टर्की" नामक पक्षी का मांस खिलाया तथा कुछ अन्य खाद्यान्न जैसे मक्का ,शकरकंदी से बने पकवान ,(जिनसे ,तब तक ,वे विदेशी आगंतुक परिचित नहीं थे) उन्हें परोसे तथा आगे चल कर उन्हें इनकी खेती करने के गुर भी सिखाए !

१८६३ में अमेरिका के तत्कालीन प्रेसिडेंट अब्राहम लिंकन ने मूल निवासियों तथा यूरोप से आये प्रवासियों के बीच की आपसी सद्भावना को सुदृढ़ करने के उद्देश्य से नवम्बर के अंतिम गुरूवार को राष्ट्रीय पर्व घोषित किया और इस पर्व को "धन्यवाद दिवस" का नाम दिया ! इस दिन देश के सभी मूल ,धर्म, जाति,रंग के निवासी एकत्रित हो कर एक साथ भोजन करते हैं और एक दूसरे के प्रति, अपना आभार प्रदर्शन करते हैं ! आज के दिन स्कूल कालेज, दफ्तर , कारखाने बंद रहते हैं और यू. एस. ए . के निवासी परम्परागत रीति से इस दिवस को बड़े हर्षोल्लास के साथ राष्ट्रीय-पर्व के रूप में मनाते हैं !

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दीपावली के इस मंगलमय शुभ पर्व पर
हमारी हार्दिक शुभ कामनाएं स्वीकारें


प्रियजन,
 
मेरी माने तो इस दीपावली,

मनमंदिर में ज्योति जगाकर, औरों के घर दीप जलाओ !!
जगमग दीप जगा कर चहुदिश, निज पथ का तम दूर भगाओ !
निर्भय आगे बढ़ते जाओ,
दीप जलाओ दीप जलाओ

गहन अँधेरे में जग डूबा, चहु दिसि उजियारा फैलाओ !
अपना घर चमका के प्रियजन, दुखी जनों के मन चमकाओ !!
उनके घर भी दीप जलाओ ,
दीप जलाओ ,दीप जलाओ !!

किसकी झुग्गी अन्धियारी है, कौन कहाँ है भूखा प्यासा ?
देवालय से पहिले, प्रियजन उस दरिद्र को भोग लगाओ !!
उस भूखे की भूख मिटाओ ,
दीप जलाओ ,दीप जलाओ !!

'अर्थ' नहीं है फिर क्या ? अपना अंतर घट तो प्रेम भरा है !
अक्षय है वह, प्यारे तुम बस, वही 'प्रेमरस' पियो पिलाओ !!
स्वयम छको औ उन्हें छ्काओ ,
दीप जलाओ ,दीप जलाओ !!

तरस रहें जो 'खील बताशे' को वे प्यारे प्यारे बच्चे !
बुझे हुए चेहरे,जरजर तन वाले ये दुखियारे बच्चे !
फुटपाथों पर भटक रहे हैं जो अनाथ मनमारे बच्चे !
उनके मुखड़ों पर प्रियजन तुम प्यारे प्रभु का नूर खिलाओ !!

गुरुजन ने जो दिया "नामरस", स्वयम पियो औ उन्हें पिलाओ
प्रेम प्रीति की अलख जगाओ ,
दीप जलाओ , दीप जलाओ !!


[ भोला ]

"दीपावली'

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निज गृह की बगिया में खिले सुमनों की प्राकृतिक सुंदरता में परम सत्य के दर्शन के भाव से ध्वनित गीत----------------

ये हरियाली ये विविध रंग

ये चपल पवन ये जलतरंग ॥

ये दृष्य सभी नयनाभिराम ।

हर शय मेँ दीखे राम राम ॥

राम राम राम राम राम राम राम बस राम ..॥

ये स्वर्णिम दिनकर तेजवान

चंदा। मामा अति रूपवान ॥

ऊर्जा करता है रयि प्रदान

शीतलता शशि का है सुदान ॥

शशि रवि दोनौँ कर रहे गान

राम राम राम राम राम राम राम बस राम...॥

ये हरित धरनि ये नील गगन

बहुरंगी यै सुंदर उपवन

है डोल रही मदमस्त पवन

पूरी फुलवारी झूम झूम ,

कर रही मगन हो नाम जपन ।

राम राम राम राम राम राम राम बस राम ॥

अमृत बरसाते मेघ सघन

पुलकित होता धरती का तन ।

भर गये सभी सूखे पलवल

नदियोँ का जल करता कलकल

कलकल मेँ गूँजे राम नाम

राम राम राम राम राम राम राम बस ...॥

राम राम बस राम राम बस राम राम ।

ये हरित धरनि यै नील गगन

स्वच्छंद बिहररते बिहंग मगन

कलरव मेँ करते नाम जपन.

स्वच्छंद बिहरते बिहंग। मगन

राम राम राम राम राम राम राम बस

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शब्द और स्वर संयोजक एवं गायक श्री व्ही एन श्रीवास्तव :भोला"

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निज गृह की बगिया में खिले सुमनों की प्राकृतिक सुंदरता में परम सत्य के दर्शन के भाव से ध्वनित गीतनिज गृह की बगिया में खिले सुमनों की प्राकृतिक सुंदरता में परम सत्य के दर्शन के भाव से ध्वनित गीत

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श्री प्रेमजी महाराज के महानिर्वाण दिवस पर समर्पित भजन - निवेदक : व्ही एन श्रीवास्तव 'भोला'

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"ओम नमः शिवाय"

कर्पूरगौरम करुणावतारम संसारसारं भुजगेंद्रहारम सदावसंतम हृदयारविन्दे भवम भवानी सहितं नमामि कर्पूर के समान चमकीले गौर वर्णवाले ,करुणा के साक्षात् अवतार, इस असार संसार के एकमात्र सार, गले में भुजंग की माला डाले, भगवान शंकर जो माता भवानी के साथ भक्तों के हृदय कमलों में सदा सर्वदा बसे रहते हैं ,हम उन देवाधिदेव की वंदना करते हैं !!"
!! महामहिमामय देवों के देव महादेव का स्वरूप तेजोमय और कल्याणकारी है !
"शिव" का शब्दार्थ है " कल्याण" !!

पुरातन काल से ओंकार" के मूल ,विभु ,व्यापक , तुरीय शिव के निराकार ब्रह्म स्वरूप को हमारे धर्माचार्यों ने एक अनूठा वैरागी स्वरूप दिया है ; जिसमें उनके शरीर को भस्म से विभूषितकिया है , उनके गले में सर्प और रुंड मुंड की माला डाली है,उनकी जटाजूट ने पतित पावनी "गंगधारा" को विश्राम प्रदान किया है ,उनके भाल को दूज के चाँद से अलंकृत किया है ! "

एक हाथ से डम डम डमरू बजाते तथा दूसरे में त्रिशूल लहराते "शिव शंकर" कभी ललितकला सम्राट नटराज , तो कभी पापियों के संहारक् ,कभी तांडव नृत्य की लीला से प्रलयंकारी तो कभी भक्त को मनमांगा वरदान देने वाले औघडदानी लगते हैं ! अपने सभी स्वरूपों में वह वन्दनीय हैं !

उनके गुण , स्वभाव और क्रिया -कलाप के कारण श्रद्धालु भक्तजन शिव ,शंकर ,भोला ,महादेव ,नीलकंठ , ,नटराज, त्रिपुरारी , अर्धनारीश्वर ,विश्वनाथ आदि अनेकानेक नामों से उनका नमन करते है ! आइये आज हम आप सब प्रियजनों के साथ मिल कर समवेत स्वरों में पूरी श्रद्धा एवं निष्ठां से ,गुरुजनों के भी सद्गुरु ,सर्व गुण सम्पन्न ,सर्व शास्त्रों के ज्ञाता ,सर्वकला पारंगत , राम भक्त , देवाधिदेव , भोले नाथ शिव शंकर की वन्दना करें :ओम नमः शिवाय

शिव वन्दना

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Bhajan: jay shiv shankar aughaddani

(Words/Voice - Shri V N S 'Bhola')
Text and link taken from Mahavir Binavau Hanumana

जय शिव शंकर औघड़दानी
जय शिव शंकर औघड़दानी , विश्वनाथ विश्वम्भर स्वामी

सकल बिस्व के सिरजन हारे , पालक रक्षक 'अघ संघारी'
जय शिव शंकर औघड़दानी , विश्वनाथ विश्वम्भर स्वामी

हिम आसन त्रिपुरारि बिराजें , बाम अंग गिरिजा महरानी
जय शिव शंकर औघड़दानी , विश्वनाथ विश्वम्भर स्वामी

औरन को निज धाम देत हो , हमसे करते आनाकानी
जय शिव शंकर औघड़दानी , विश्वनाथ विश्वम्भर स्वामी

सब दुखियन पर कृपा करत हो हमरी सुधि काहे बिसरानी
जय शिव शंकर औघड़दानी , विश्वनाथ विश्वम्भर स्वामी

View and Listen to the bhajan on BholaKrishna youtube channel at https://www.youtube.com/watch?v=GjozaYcXoOE

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ओम् नमः शिवाय

वर्षों पूर्व (कदाचित १९५९ में ) इस दासानुदास ने , सुप्रासिद्ध पौराणिक सूत्र "राम रामेति रामेति रमे रामे मनोरमे सहस्त्र नाम ततुल्यम राम नाम वरानने" से प्रेरित होकर निम्नांकित रचना की और गाया :"राम नाम मधुबन का भ्रमर बना मन शिव का निशदिन सुमिरन करता 'नाम' पुण्यकारी" कौन सा नाम और कौन है वह नामोपासक ?
नाम है "राम राम राम राम"
और
नामोपासक है

"शंकर शिव शम्भु", साधु संतन सुखकारीसतत जपत राम नाम अतिशय शुभ कारी !!============
विश्वम्भर नाथ श्रीवास्तव "भोला"
द्वारा
१९६०-६१ में रचित
"शंकर वन्दना"
========
यू ट्यूब पर सुनने के लिए लिंक : http://youtu.be/KzoJ7isIxfs
लीजिए आप यहीं सुन लीजिए
शंकर शिव शम्भु साधु संतन सुखकारीसतत जपत राम नाम अतिशय शुभ कारी !!लोचन त्रय अति विशाल, सोहे नव् चन्द्र भाल !रुंड मुंड ब्याल माल, जटा-गंग-धारी !! शंकर शिव शम्भु साधु संतन सुखकारी !!

शंकर शिव शम्भु साधु संतन सुखकारी !!
पार्वती पति सुजान, प्रमथराज, बृषभ यान !
सुर नर मुनि सेव्यमान, त्रिविधि ताप हारी !!
शंकर शिव शम्भु साधु संतन सुखकारी !!

औघड दानी महान, काल कूट कियो पान !
आरत-हर, तुम समान को है त्रिपुरारी !?!
शंकर शिव शम्भु साधु संतन सुखकारी !!
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(शब्दशिल्पी एवं गायक "भोला")
==============-

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मेरे अतिशय प्रिय सभी स्वजन

दीपावली के इस मंगलमय शुभ पर्व पर

*नमोस्तेsस्तु महामाये श्रीपीठे सुर पूजिते !शंख चक्र गदा हस्ते महालक्ष्मी नमोस्तुते!!नमस्ते गरुड़ारूढे कोलासुर भयंकरि !सर्व पाप हरे देवि महा लक्ष्मी नमोस्तु ते !!*अष्ट लक्ष्मी दक्षिण भारत में माँ के निम्नांकित आठ नाम १. आदि लक्ष्मी २. धान्य लक्ष्मी ३ .धैर्य लक्ष्मी ४. गज लक्ष्मी५. सन्तान लक्ष्मी ६. विजय लक्ष्मी ७. विद्या लक्ष्मी ८. धन लक्ष्मीमाँ के नामों के उच्चारण में ही माँ के भिन्न गुण निहित हैं ! नाम ही उनके मंत्र हैं ! माँ लक्ष्मी के ८ नामों में से "धन लक्ष्मी" को ही लीजिए : माँ "धन लक्ष्मी" की आराधना से , स्वधर्म समझ कर कर्म करने वाला साधक , निश्चित ही धनोपार्जन करेगा ! मनमंदिर में ज्योति जगाकर , औरों के घर दीप जलाओ !!

जगमग दीप जगा कर चहुदिश ,निज पथ का तम दूर भगाओ !

निर्भय आगे बढ़ते जाओ , दीप जलाओ दीप जलाओ

गहन अँधेरे में जग डूबा , चहु दिसि उजियारा फैलाओ !

अपना घर चमका के प्रियजन , दुखी जनों के मन चमकाओ !!

उनके घर भी दीप जलाओ ,दीप जलाओ ,दीप जलाओ !!

किसकी झुग्गी अन्धियारी है , कौन कहाँ है भूखा प्यासा ?

देवालय से पहिले ,प्रियजन उस दरिद्र को भोग लगाओ !!

उस भूखे की भूख मिटाओ , दीप जलाओ ,दीप जलाओ !!

'अर्थ' नहीं है फिर क्या ? अपना अंतर घट तो प्रेम भरा है !

अक्षय है वह , प्यारे तुम बस , वही 'प्रेमरस' पियो पिलाओ !!

स्वयम छको औ उन्हें छ्काओ ,दीप जलाओ ,दीप जलाओ !!

तरस् रहें जो 'खील बताशे' को वे प्यारे प्यारे बच्चे !

बुझे हुए चेहरे ,जरजर तन वाले ये दुखियारे बच्चे !

फुटपाथों पर भटक रहे हैं जो अनाथ मनमारे बच्चे !

उनके मुखड़ों पर प्रियजन तुम प्यारे प्रभु का नूर खिलाओ !!

गुरुजन ने जो दिया "नामरस", स्वयम पियो औ उन्हें पिलाओ

प्रेम प्रीति की अलख जगाओ , दीप जलाओ , दीप जलाओ !!दीपावली के इस मंगलमय शुभ पर्व पर

हमारी हार्दिक शुभ कामनाएं विश्वम्भरनाथ “भोला”

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विजयदशमी की बधाई ------- विजयदशमी का यह गौरवपूर्ण पर्व , सात्विक=दैवी-शक्ति के हाथों तामसी-आसुरी- शक्ति की पराजय का एक जीवंत कथानक है ! नंगे पाँव बनवासी राम ने रथारूढ़ लंकापति रावण को पराजित कर के यह साबित कर दिया कि छोटी से छोटी दिखने वाली , दैवी शक्ति भी बड़ी से बड़ी आसुरी शक्ति को बात ही बात में पराजित कर सकती है ! राम चरितमानस में गोस्वामी तुलसीदास ने श्री राम की वाणी से ऐसे धर्ममय "विजय रथ" के गुणों की उद्घोषणा करवाई है जिस पर सवार हो कर एक साधारण पैदल सिपाही बड़े बड़े अभेद सैन्य उपकरणों से सुसज्जित ,अजेय रिपुओं को भी पराजित कर सकता है ! - सफलता की कुंजी. विजय रथ रामचरित मानस से विजय प्राप्रि.हेतु श्रीराम द्वारा विभीषण का मार्ग दर्शन. रावण रथी विरथ रचुवीरा देखि विभीषण भयउ अधीरा ** चिंतित हो.विभीषण ने श्री राम सै कहा नाथ न.रथ नहिं पग पदत्राना केहि बिधि जितब बीर बलवान । मुस्कुराते हुए.श्रीराम ने विभीषण का मार्गदर्शन करते हुए. कहा , . श्री राम ने बताया कि " इस धर्म मय ,विजय रथ के पहिये हैं -शौर्य और धैर्य ; ध्वजा पताका हैं सत्य और शील ! इस रथ के घोड़े हैं : बल , विवेक , इन्द्रीय दमन और परोपकार - इन घोड़ों को क्षमा , दया और समता रूपी डोरी से जोडा गया है ! ईश्वर का भजन इस रथ का सारथी है ! वैराग्य उसकी ढाल है और संतोष तलवार है ; दान फरसा है, बुद्धि शक्ति है तथा विज्ञानं धनुष है ; निर्मल मन तरकस है जिस में संयम , अहिंसा ,पवित्रता के वाण पड़े हैं !सद्गुरु का आधार कवच है ! श्री राम ने अंततः कहा कि जिस वीर के पास इन दिव्य सनातन जीवन मूल्यों से लैस रथ है , उसे कोई सांसारिक शत्रु परास्त नहीं कर सकता !"

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औषधि राम नाम की खाइये!
मृत्यु-जन्म के रोग मिटाइये!

(अमृतवाणी)

मेरे वैद्य परमगुरु स्वामी, 2005 में पहले हार्ट अटैक के समय, हौस्पिटल में स्ट्रेचर ट्राली से इमरजैंसी थियेटर में प्रवेश करते समय ये शब्द स्वतः मन में स्फुरित हुए । कदाचित ऐडमिशन की लिखा पढी में किसी ने अभिभावक से रेफरिंग डौक्टर का नाम पूछा होगा और मेरे मन से यही उत्तर निकला ।

मेरे वैद्य परमगुरु स्वामीतन के सारे रोग मिटावेँमन मेँ परमानंद बसावेँभय पीडायेँ दूर भगावेँगुरु मेरे विग्यानी !!!टेक!!भूत भविष सब जन के जानैकष्ट भोग सबके अनुमानेऔषधि मूल सबै पहिचाने सतगुरु अंतरयामी !!!टेक!!कल क्या होगा किसे ग्यात हैजन्मोँ का प्रारब्ध साथ हैअगला पल श्री राम हाथ हैकहते ग्यानी ध्यानी !!!टेक!!जब रोगी थक हार बुलावैरामबाण गुरुदेव चलावैरोग लंकपति मार गिरावैपल में सतगुरु स्वामी !वैद्य परमगुरु स्वामी!शब्द-स्वरकार गायक : श्री व्ही.एन श्रीवास्तव, भोला अंकलजी USAभजन सुनने के लिए यहां क्लिक करें.

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प्रातः.प्रेरणा हुई, मदर्स डे पर कुछ लिखूँ। लिखने बैठा, जो लिख पाया प्रस्तुत है:

मैया, तुझ पर क्या लिक्खूँ क्या गाऊँ ?

कलम उठा कर कुछ लिखता हूँ , तेरा लेख नजर आता है ।

जब गाता हूँ तेरा ही स्वर, मेरे कानो में आता है ।

मैं तेरे ही बोल तुझे माँ, क्यों कर आज सुनाऊँ?

क्या लिक्खूँ क्या गाऊँ?

जब प्रतिबिंब लखूँ निज का छवि तेरी पड़े दिखाई ।

मंन्दिर की हर दैवमूर्ति में जोत मात तव आई ।

तेरा अंश तुझी को मैया कैसे कहो चढाऊँ ?

क्या लिक्खूँ क्या गाऊँ?

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हरवंशी भोलाबाबा द्वाराइस नवरात्रि के तीसरे दिन रचित और आज माता को समर्पित(भजन डाउनलोड / सुनने के लिये लिंक)जय अंबे, जय जय दुर्गे,दयामयी कल्याण करो।शांति करो माँ, शांति करो माँ,शांति करो माँ, शांति करो ।कब से द्वार तिहारे ठारे,बालक दीन दुखी बेचारे।मैया, अब दो खोल किवाड़े,दरशन दो और विपति हरो ॥शांति करो माँ -------त्रासदि ऐसी फैली हैमाँ आज तेरे संसार में,झुलस रही है मानवतादैविक देहिक भवजार में,आंचलतर शीतल बयार भरजगती का संताप हरो ॥शांति करो माँ -------मरणासन्न सकल मानवता,जीत रही बर्बर दानवता,सत्यमेव जय मंत्र सत्य हो,कर दो माँ वह पुण्य व्यवस्था,त्रासदि मेट मनुज-मन में माँपुनः प्रीति संचार करो ॥शांति करो माँ --------ओम शांति शांति शांति ॥भीतर शान्ति, बाहर शान्ति, सर्वत्र शान्ति ॥

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विक्रम नव संवत्सर 2079 के आगमन की
कोटिश बधाई और अनन्त मंगलकामनायें ॥
संवत दो हजार उन्यासीमैरिमैक वैली के वासी ।भोलाजी को गीत लिखायाबाबा ने फिर उसे गवाया ॥चैत्र नवरात्रि के प्रथम दिवस पर सद्गुरुत्रय की प्रेरणा से उपजी यह शब्द रचना:(भजन डाउनलोड / सुनने के लिये लिंक)मैया मुझे दरशन दो,दरशन दो, दरशन दो ।एक बार फिर मम अंतरघटआनंद अमृत से भर दो।मैया मुझे दरशन दो,दरशन दो, दरशन दो ।याद मुझे है कैसे इक दिन मैया तुमने भेज बुलायाकोटिक भक्तों के आगे माँतुमने अपने पास बिठाया भरी सभा में उस दिन मैयाकेवल मुझसे ही बतियाया ।आज पुनः निज बालक को माँ गोदी ले उत्संग भरो ।मैया मुझे दरशन दो,दरशन दो, दरशन दो ।वर्षों बाद पुनः जब मन में तव दर्शन की आस जगीप्रगट हुईं तुम सहसा मैयाअमृत रस की झड़ी लगी ।आज पुनः मम जगी पिपासाको दरशन दे शांत करो ।मैया मुझे दरशन दो,दरशन दो, दरशन दो ।_____________________श्री श्री माँ आनंदमयी की कृपा एवं दर्शन का सौभाग्य कई बार प्राप्त हुआ। ये प्रसंग मैंने ब्लोग में पहले भी लिखे हैं। निम्न लिंक और इसकी शृखला में आगे के पोस्ट पढ़ें । श्री श्री माँ आनंदमयी - प्रेरणा स्रोत - पूर्ण समर्पण

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चैत्र नवरात्रि के दूसरे दिन के लिए मां का भजन

(Youtube BholaKrishna Channel)(भजन डाउनलोड / सुनने के लिये लिंक)सर्वेश्वरी, जय जय जगदीश्वरी माँतेरा ही एक सहारा हैतेरी आंचल की छाहँ छोड़ अब नहीं कहीं निस्तारा है सर्वेश्वरी जय जय जगदीश्वरी माँमैं अधमाधम, तू अघहारिणी ! मैं पतित अशुभ, तू शुभकारिणीहे ज्योतिपुंज, तूने मेरे मन का मेटा अंधियारा है !!सर्वेश्वरी, जय जय जगदीश्वरी माँतेरी ममता पाकर किसने ना अपना भाग्य सराहा हैकोई भी खाली नहीं गया जो तेरे दर पर आया है !!सर्वेश्वरी, जय जय जगदीश्वरी माँअति दुर्लभ मानव तन पाकर आये हैं हम इस धरती पर,तेरी चौखट ना छोड़ेंगे,अपना ये अंतिम द्वारा है !!सर्वेश्वरी, जय जय जगदीश्वरी माँ

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एक आस्तिक की आत्म कहानी१ - भैया ये आत्म कहानी है२ - मै अकल खिलौनाहमारे पूर्वज - संक्षिप्त परिचय१ - हनुमत-कृपा के अनुभव२ - हनुमानजी की प्रत्यक्ष कृपा३ - बाबा-दादी की तीर्थयात्रा४ - मंगल-दर्शन समग्र-समर्पण५ - श्री हनुमानजी का आदेशजीवन के अविस्मरणीय क्षणों की गाथा१ - संकट मोचन महावीर से प्रथम परिचय२ - मेरी प्यारी माँ३ - जन्मदात्री माँ ही गुरु माँ४ - अम्मा की अंतिम यात्रा५ - पिताश्री की छत्रछाया में६ - समय का फेर७ - पिताश्री पर हनुमत कृपा८ - आजीविका अर्जन के क्षेत्र का चुनाव९ - हनुमत-कृपा का अनूठा अनुभवहनुमत-कृपा-आख्यान१ - शैशव की झलक२ - प्रारंभिक शिक्षा एवं काव्य रचना३ - मेरे बड़े भैया और उनका अंकुश४ - बड़े भैया के जीवन से सीखशिक्षण संस्थानों की देन१ - बनारस हिन्दू युनिवर्सिटी प्रवास२ - संगीत-रस भीनी प्रसिद्धि का प्रभाव३ - कटु सत्य की चपेट में४ - मेरी प्रथम प्रेयसी - मोटर कार५ - कडुए-मीठे फलों का मधुर अनुभव६ - असफलता में भी हनुमत-कृपा का दर्शनसंगीत-साधना से आत्मानंद की रसानुभूति१ - संगीत-साधना की प्रेरणा२ - स्वर ही ईश्वर है३ - सुगम-संगीत क्षेत्र में पायी आत्मतुष्टिअर्थोपार्जन की कर्मभूमि१ - हार्नेस फेक्ट्री में पदार्पण२ - लन्दन में पढाई३ - एकाकी "लन्दन प्रवास"४ - लन्दन प्रवास की स्मृतियों की झलक५ - हार्नेस फेक्ट्री की पुरानी डगरअर्थोपार्जन की राह का नया मोड़१ - एक्सपोर्ट एजेंसी की छाँव तले२ - महानगरी मुम्बई की महामाया का वरदान३ - गयाना देश की मधुर यादें४ - प्रतिनिधि नियुक्ति - दिल्ली, आगरा, जालन्धर, कानपुर५ - सरकारी नौकरी का अंतिम पड़ाव - कोचीन६ - सिडको लैदर्स - एक और अनुभवधर्म-कर्म की पीठिका पर गृहस्थाश्रम१ - गृहस्थाश्रम में प्रवेश२ - सद्गुरु से मिलन और नाम दीक्षा३ - मेरा पहिला पंचरात्रि सत्संग४ - सुख-शांतिमय पारिवारिक जीवनवानप्रस्थ की ओर बढ़ते कदम१ - बिन हरि कृपा मिलहिं नहीं संता२ - परम कृपालु गुरुजन३ - दिव्य शान्ति आनंद छकूँ मैं

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हिंद महासागर से अटलांतिक की गोद में लहराते नील वर्ण उत्तुंग तरंगो वाले करेबियन सागर तट तक की यात्रा जिस हरि की शुभेच्छा से हुई, वह कृपालु पालनहार प्रभु हमें और हमारे परिवार को अवश्य कोई विशेष लाभ दिलाने के लिए ही गयाना देश में लाया है । हमें लाभ ही लाभ होगा, हमारा कोई अनर्थ नहीं हो सकता, यह हमारा विशवास था । हमें अपने इष्टदेव पर पूरा भरोसा था ।

गयाना पहुँचने पर हमारा भव्य स्वागत हुआ, एक सप्ताह पैगेशस होटल में ठहराया, शीघ्र ही कार खरीदने का आदेश मिला और उसके लिए सरकार से ऋण भी मिल गया । पीले रंग की ट्योटा कैरोला कार भी आगयी । होटल में जब रेडियो चलाया तो सुनायी दिया साउथ अमेरिका के एक देश के रेडियो स्टेशन के "सिग्नेचर ट्यून" में स्वरचित और अपनी पारिवारिक भजन मण्डली द्वारा गाया हुआ भजन शंकर शिव शम्भु साधु सन्तान हितकारी। आश्चर्य हुआ हमें ही क्या, हमारे परिवार को भी ।

सन १९७५ से १९७८ तक हम अपने परिवार के साथ, साउथ अमेरिका के एक छोटे से देश (ब्रिटिश) गयाना की राजधानी जॉर्जटाउन में ,१८ एचलीबार विला, केम्पवैलविल, जॉर्जटाउन में रहे । इस एरिया में २० घर थे जिनमें विदेशों से आये विशेषज्ञ, डॉक्टर, जज, आदि रहते थे । डायरेक्टर जनरल ऑफ़ बॉर्डर रोड संगठन के उच्चाधिकारी कर्नल टी. पी श्रीवास्तव और उनकी टीम के सात भारतीय अधिकारी, जो भारत सरकार से वहां सड़कें बनाने के लिए भेजे गए थे, वहीं रहते थे । हमारे पडौसी डॉ. चैनी और डॉ. उषा जयपाल थे। ऑफिस जॉर्ज टाउन में था, उससे ७० मील दूर स्थित न्यू एम्स्टर्डम में मुझे टेनरी और बूट प्लांट लगवाना था, जहां सप्ताह में तीन दिन जाना रहता था ।

नयी जगह, नए लोग, नयी परिस्थितियाँ, नया वातावरण । घर के कामकाज में कृष्णा जी की मददगार गायनीज़ स्त्री 'राधिका' मिल गयी थी। राधिका ने ही हमे उस देश के निवासियों की विशेष संस्कृति से अवगत कराया था । उसने बताया था कि सभी हिन्दू गायनीज़ के पूर्वज भारतीय थे, जिन्हें डलहौज़ी के शासन काल में अँगरेज़ पानी के जहाजों पर बैठा कर गन्ने और चावल के खेतों में काम कराने के लिए ले आये थे । वे सब जहाजी कहे जाते थे । भारत में वे किस शहर के थे, उनका धर्म, उनकी जाति क्या थी, आज उनके वंशज नहीं जानते हैं । उन्होंने तो बचपन से अपने ही घर परिवार में रुचि के अनुसार किसी सदस्य को मंदिर जाते देखा है, किसी को चर्च, तो किसी को नमाज़ अदा करते देखा है ।

गयाना के किसी घर के आंगन के एक छोर पर आप देखेंगे दादी की तुलसी का बिरवा, उनका शिवाला और उसके सन्मुख ही दूसरी ओर साफ़ सुथरी जमीन पर बड़े करीने से फैली खानदान की बड़ी बहूबेगम के नमाज़ पढ़ने की इरानी कालीन । कभी कोई झगड़ा नहीं कोई शोरो गुल नहीं । किसी पर कोई पाबंदी नहीं, कोई जोर जबरदस्ती नहीं । जिसको जो भाये जिस पर जिसकी आस्था जम जाए ; वही उसका धर्म-कर्म बन जाता है । यहाँ के निवासियों की रहनी में जो एक चीज़ मुझे बहुत ही पसंद आई, वह थी, वहाँ की विभिन्न जातियों और विभिन्न धर्मावलंबियों के बीच की अटूट एकता और उनका अद्भुत भाई चारा ।

यहां के गायनीज़ हिंदुओं की प्रार्थना, उनके भजन, उनके कीर्तन वही थे जिन्हें डेढ़ दो शताब्दी पहले उनके पूर्वज भारत में गाते बजाते थे। रामायण पाठ में आज उनके बाल बच्चे, सभी स्त्री पुरुष अपने सामने रामायण का पृष्ठ खोल कर रख लेते थे और बड़े भाव से दोहे चौपाइयां गाते थे । हिन्दी पढ़ना तो ये लोग जानते न थे इसलिए चाहे पृष्ठ कोई भी खुला हो, वे गाते वही थे जो उन्होंने अपने पूर्वजों से सुन कर याद कर रखा था । उनकी मुंदी हुई आँखें, भाव भरी मुद्रा और गवंयी गाँव की चौपाली शैली में रामायण पाठ हमे आज भी उनकी सहजता तथा उनकी एकनिष्ठ निष्काम भक्ति की याद दिलाता है और मन को छू जाता है।

गयाना में सांस्कृतिक कार्यक्रम के आयोजन, उत्सव, समारोह, आदि को सम्पन्न करने की गायनीज़ हिंदुओं की अपनी ही रीति थी । इन कार्यक्रमों में, विवाहोत्सव में, मन्दिर में, शराब पीना वर्जित था । यहां की हिंदू महिलाएं मंदिर में पाश्चात्य वेश भूषा में भी अपना सिर एक दुपट्टे (ओढनी ) से ढके रहतीं थीं । ऐसा प्रतीत होता था कि प्राप्त सुविधाओं के ढाँचे में भारतीय संस्कृति और परम्पराओं को ढाल कर इन्होंने पीढ़ी दर पीढ़ी से जीवित रखा है । भारतीय संस्कृति के प्रति वहाँ के निवासियों के हृदय में अपार श्रद्धा थी । वहाँ उतनी ही हर्षोल्लास से शिवरात्रि, दशहरा, दिवाली, होली, ईद, बकरीद मनाई जाती थी जितनी जोश से कानपुर, लखनऊ और दिल्ली के शिवालयों और ईदगाहों में ।

काली घटाओं में जैसे कभी कभी दामिनी की दमक जगमगाहट भर देती है वैसे ही वहाँ के भारतीय मूल के दो विशिष्ट नागरिकों, कस्टम ऑफिसर सूरजबली, उनकी पत्नी कानन और पुरोहित श्री रतनजी से मिलने के बाद हमारा वहाँ का शुष्क जीवन रसमय हो गया। ये दोनों ही सज्जन, दो तीन शताब्दियों पूर्व उस देश में भारत से आये पूर्वजों के वंशज थे। ये दोनों ही अपनी भारतीय हिन्दू संस्कृति को अपने जीवन से विलग नहीं कर पाए थे। उनके साथ जो सत्संग का सौभाग्य मिला वह अविस्मरणीय है.।

आदिकाल से सभी धर्म ग्रंथों में इस सम्पूर्ण सृष्टि के सर्जक, उत्पादक, पालक, संहांरक, सर्वशक्तिमान भगवान को "पिता" कह कर पुकारा गया है। हिन्दू धर्म ग्रन्थों में उन्हें "परमपिता" की संज्ञा दी गयी है । ईसाई धर्मावलंबी उन्हें अतीव श्रद्धा सहित "होली फादर" कह कर संबोधित करते हैं । हमारी "ब्रह्मकुमारी" बहनें उसी परम आनन्द दायक, अतुलित शक्ति प्रदायक, ज्योतिर्मय, शान्तिपुंज को "शिवबाबा" की उपाधि से विभूषित करके, सर्वशक्तिमान निराकार परब्रह्म परमेश्वर से साधकों के साथ पिता और सन्तान सा सम्बन्ध दृढ़ करतीं हैं ।

सांस्कृतिक परिवेश में हमें गयाना में सन १९७६ में ब्रह्मकुमारी मोहिनी दीदी और उनकी सर्वेसर्वा तेजोमयी दिव्य स्वरुपा “दादी” के सान्निध्य का, उनके दर्शन और प्रवचन सुनने का, ध्यानवस्थित मुद्रा में अविरल अश्रुधारा प्रवाहित करती हुई छवि को निहारने का तथा प्रेम विव्हल मन से अपने स्वरचित स्वागत गान से उन्हें पुष्पांजलि अर्पित करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ ---

धन्य अवसर आज का है स्वागतम, शुभागमन ।
आपका दर्शन हुआ है स्वागतम शुभागमन।।

आपके आने से जो सुख शांति हमको मिल रही ।
कर नहीं सकते बयाँ, प्रीती जो मन में भरी ।।

आपकी शिक्षामयी वाणी सदा हम सुन सकें ।
ब्रह्मा पिता की हम सदा आराधना भी कर सकें ।।

राह ऐसी दो दिखा जा सकें शिव बाबा के धाम ।
पूज्य दादी और भैया आपको शत शत प्रणाम ।।

वहां रहते हुए गयाना के कल्चरल सेंटर से जुड़े नृत्य प्रवीण पण्डित दुर्गालाल, तबला वादक श्री मिश्राजी, सरोद वादक श्री भास्करजी, संगीतज्ञ श्रीमती गुहा और गयाना की गायिका सिल्विया एवं पण्डित गोकरण शर्मा के सम्मेल और सौजन्य से हमने रामचरित मानस के चुने प्रसंग और सन्तों के भजन से भारतीय दर्शन को उजागर करता हुआ एक लॉन्ग प्लेइंग रिकॉर्ड ‘भजन माला’ बनाया ।

यहां पूरे देश की आबादी भारत के एक बड़े शहर की आबादी से भी कम थी । देश की ५५ प्रतिशत आबादी भारतीय मूल की थी। मौलिक सुविधाओं पर उस सरकार ने ऐसे नियन्त्रण लगा रखे थे कि बहु संख्यक अधिक समृद्ध भारतीय मूल के नागरिकों को मजबूर हो कर अतिरिक्त मूल के अल्पसंख्यक नागरिकों के शासन में अपनी प्राचीन संस्कृति वेशभूषा खानपान और धर्म तक बदलना पड़ रहा था ।

भारतीय मूल के निवासी अधिकतर शाकाहारी थे । उस देश की सरकार ने आलू, प्याज तथा गेंहूँ की काश्तकारी तक पर निषेध लगा रखा था, इनका आयात भी वर्जित था । गाय का दूध तक मिलना दूभर था । बीफ हर चौराहे पर मिल जाता था। प्रत्यक्ष रूप में वह सरकार भारतीयों के प्रति भेद भाव रखती थी । परिस्थिति अति विषम थी। हमें भी इससे समस्या थी। पर छोडिये इन दुखदायी बातों को, डिप्लोमेटिक श्रेणी के विदेशी नागरिक होने के कारण हमारे हाई कमिश्नर पी. जौहरी, हाई कमीशन के अन्य अफसर श्री प्रभाकर, श्री बिसारिया, श्री चावला, और श्री बोस आदि ने हमें सब सुविधाएं प्रदान कर दी थी अतएव हमारा काम तो किसी तरह चल ही गया ।

टैनरी और बूट प्लांट बनाने की परियोजना में भारत सरकार द्वारा निर्धारित हमारी पोस्टिंग की अवधि में एम्स्टर्डम में बूट प्लांट की बिल्डिंग बन गयी थी, मशीने आ गयी थी पर चालू नहीं हो पायी थीं ।

रामजी का एडमीशन मेरिट लिस्ट के आधार पर आई. आई. टी. दिल्ली में हो चुका था । उन दिनों प्रेसीडेंट कॉमरेड बर्नहम की कूटनीतियों से गयाना में राजनैतिक और सामाजिक हालात बिगड़ रहे थे, लूटमार, अराजकता, छुरे की नोक पर घात प्रतिघात, बलात्कार जैसी घटनाएं घट रहीं थीं । अतः हमने और अधिक वहां न रुक कर, भारत वापिस जाने का निश्चय कर लिया ।

गायनीज़ मित्रों की प्रेम भीनी स्मृतियों को समेटे हम परिवार सहित पोर्ट ऑफ़ स्पेन, डिज़्नी वर्ल्ड, फ्लोरिडा, न्यूयॉर्क और लन्दन के दर्शनीय स्थानों को देखते हुए घुमते घामते २६ मई १९७८ को भारत पहुँच गए ।

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स्वदेश आने पर हमने विदेश मंत्रालय को छोड़ पुनः अपने पैतृक विभाग एक्सपोर्ट इंस्पेक्शन कौंसिल में जॉइंट डायरेक्टर के पद पर अधिष्ठित हो पहिली जून १९७८ से राजेन्द्र नगर, दिल्ली के ऑफिस में काम करना प्रारम्भ कर दिया । स्नेही स्वजन प्रमोद गीता के सहयोग से अशोक विहार फेज़ ३, नयी दिल्ली में यथोचित किराए के मकान में हम रहने लगे। जैसे ही घर गृहस्थी की गाड़ी पटरी पर आई, हमारा फिर ट्रांसफर हो गया ।

मैं फिर से प्रतिनिधि-नियुक्ति पर २-८-७९ से ११-६-८१ तक भारत लैदर कॉर्पोरेशन, आगरा में कार्यरत रहा जहां लैदर उद्योग के विकास और उससे निर्मित वस्तुओं के बाज़ार के लिए "मान मछेरी" प्रोजेक्ट तैयार किया, जो सर्व सम्मति से मान्य रहा ।

परम प्रभु की अहैतुकी कृपा से व्यापार वाणिज्य मंत्रालय ने पंजाब टैनरी लिमिटेड और पंजाब फुटवियर लिमिटेड जालन्धर, इन दोनों इकाइयों का मैनेजिंग डायरेक्टर और जनरल मैनेजर के पद पर आसीन करके मुझे प्रतिनिधि-नियुक्ति पर जालन्धर, पंजाब भेज दिया । १२-६-८१ से २३-११-८२ तक मैंने उसके विकास का, उसके प्रशासनिक और आर्थिक पहलुओं के उन्नयन का उत्तरदायित्व सम्भाला ।

जालन्धर में, कम्पनी की ओर से हमारी रहने की व्यवस्था मोतासिंह नगर में हो गयी, जहां हमारी भेंट हुई स्वामी सत्यानंदजी महाराज के एक अति प्रिय साधक प्रोफेसर महावीर अग्निहोत्री जी से एवं उनके भाई श्री बलदेवजी से, जो घर के पास चार कदम की दूरी पर ही रहते थे । उनके यहां रविवार को साप्ताहिक सत्संग होता था । प्रोफेसर साहेब के पिताजी के निवास स्थान गुरुदासपुर में, स्वामी सत्यानंदजी जी महाराज अक्सर आते जाते थे, राम राम जपने की प्रेरणा देते रहते थे । गुरुदेव प्रेम नाथ जी महराज भी प्रोफेसर साहेब पर बहुत कृपालु थे, उनका बहुत सम्मान करते थे । ऐसे वरिष्ठ साधक बड़े भाई-तुल्य प्रोफेसर महावीरजी के सम्पर्क में आने पर वर्षों से 'श्री राम शरणं' से भटका हमारा मन पुनः 'गुरु मंत्र' में लग गया । उनके सत्संग में हमें श्रद्धेय श्री प्रेम नाथ जी महाराज के निकट आने का, उनके सन्मुख भजन की स्वरांजलि प्रस्तुत करने का सौभाग्य मिला । हमारे जीवन में प्रेमाभक्ति की एक अविरल धारा प्रवाहित हो गई ।

जालन्धर में अमृतवाणी सत्संग में सम्मिलित होने के फलस्वरूप हमारा परिचय श्रीरामशरणम के सिद्ध साधकों और उनके परिवारों से हो गया, जिन्होंने बरसाया निःस्वार्थ भाव से अनंत प्यार, बढाया हमारा भक्ति भाव, कराया आनंद-रस का पान । उनमें से कुछ परिवार -- श्री राणा परिवार, श्री केवल कृष्ण परिवार, नरेंद्र साही परिवार, प्रदीप भारद्वाज परिवार आज भी निरंतर प्रगाढ़ प्रेम की वर्षा कर रहे हैं । उनके अपार स्नेह को, आदर-भाव को, आत्मीय सम्बन्ध को और भजन-सन्ध्या में राम-रस बरसाने को कैसे व्यक्त करूँ, कैसे अपना आभार प्रकट करूँ, किन शब्दों में मोल चुकाऊं ? केवल सत्संग की महिमा गाऊँ और मुझे कुछ भी न आता, दाता राम दिए ही जाता ।

हमारी धार्मिक और आध्यात्मिक रुचि को निरख कर और परख कर हमारे ड्राईवर श्री ज्ञानसिंह हमें ले गये जालन्धर के निकट स्थित गाँव के आश्रम में और दर्शन कराये योगप्रवर बाबा मोहनदासजी के । ये हठयोगी बाबा नवरात्रि भर समाधिस्थ रहते थे, इनकी योगसिद्धि का प्रभाव भी अद्भुत था । हमने इन्हें न तो कभी दान दिया न दक्षिणा, न कभी इन्होंने हमसे माँगा, न हम उनके कभी शिष्य बने और न कभी किसी आयोजन को व्यवस्थित करने में साझीदार बने । फिर भी पाया उनका असीम प्यार, लाड-दुलार, पाया उनके आशीष भरे वरद हस्त का अहसास और पाया उनके मन्दिर के सन्मुख बैठ कर मन्दिर का महाप्रसाद । उनके सामीप्य में जो अनिर्वचनीय आत्मिक आनंद मिला उसे अपना या अपने परिवार के पूर्वजन्मो के संचित पुण्यों का प्रताप कहूँ या जन्म जन्मातर का उनसे पुराना कोई सम्बन्ध कहूँ या आध्यात्मिक चेतनाओं को जागृत रखने की अपने आराध्यदेव की कृपा कहूँ, यह हमारी समझ के बाहर है ।

आजीविका अर्जन का कार्य लगन से करते हुए, भजन-सत्संग से प्रभु को रिझाना हमारा और हमारे परिवार का सहज स्वभाव रहा है । हमारा सदा का अनुभव रहा है कि समय समय पर जीवन में सम-विषम भाव से उत्पन्न समस्याएं अपनी जटिलता लिए हुए पग पग पर खड़ी रहतीं हैं, विघ्न बाधाओं से भरी घटनाएं भी घटित होती रहती हैं, ऐसे में सर्वशक्तिमान प्रभु की कृपा अनेकों रूप धारण करके आत्मशक्ति जागृत करती है, निराश मन में आशा का संचार करती है, आगे बढ़ने का सही मार्ग प्रशस्त करती है ।

सन्त शिरोमणि सद्गुरु स्वामी सत्यानंदजी महाराज के निर्वाण दिवस, १३-११-८१ को धनतेरस के दिन, कुछ ऐसी ही परिस्थिति आ खड़ी हुई । चीफ एक्ज़ीक्यूटिव की हैसियत से पंजाब टेनरी और फुटवियर की तकनीकी और आर्थिक इकाइयों के विकास और उनकी प्रगति के लिए मैं योजना तैयार कर रहा था, उद्योग मंत्रालय में इस पर विचार विमर्श हो रहा था, कि अनायास ही राजनीतिक दबाब से हताहत हो, मुझे पंजाब सरकार के उद्योग विभाग, चंडीगढ़ में धनतेरस के त्यौहार पर स्तीफा देना पड़ा । उस समय श्रीदेवी टाटा बरॉज, बम्बई में कार्य रत थी और रामजी आई. आई. टी. दिल्ली में और राघव बी. एच. यू. आई. टी. में, प्रार्थना और माधव केंद्रीय विद्यालय, जालन्धर में पढ़ रहे थे । सभी बच्चे दीपावली की छुट्टियों में घर आये थे । उनसे अपना सुख दुःख बाँटा फिर तत्काल ही हम परिवार सहित अपने सद्गुरु के निर्वाण दिवस पर आयोजित सत्संग में पहुँच गए, वहां, भजन-कीर्तन किया, प्रसाद ग्रहण किया, सब साधकों को दस दिन के अंतराल में पंजाब टेनरी छोड़ कर जाने की सूचना भी दे दी ।

अब प्रश्न था, अब अगली पोस्टिंग कहाँ होगी, कहा करूँ कित जाऊं? जब मैं अपने पैतृक विभाग ई. आई. सी. दिल्ली के ऑफिस पुनः कार्यरत होने की अर्जी देने पहुंचा तो अद्भुत घटना घटी, चमत्कार सा हुआ । उद्योग मंत्रालय, व्यापार-वाणिज्य मंत्रालय, रक्षा मंत्रालय के परिचित उच्चस्तरीय वरिष्ठ अधिकारियों से ज्ञात हुआ कि टेनरी फुटवियर कॉर्पोरेशन, कानपुर के चेयरमेन और मैनेजिंग डायरेक्टर के पद पर मेरी नियुक्ति करने के मुद्दे पर केबिनेट में विचार-विमर्श हो रहा है । केबिनेट में मेरे प्रमाण-पत्र, योग्यता और कार्यक्षमता को, विभिन्न विभाग के कार्यकाल की गतिविधियों को आंका और परखा जा रहा है । कौन कर रहा है, कौन करवा रहा है, क्या हो रहा है, क्या निर्णय होगा, मैं इन सबसे अनभिज्ञ था । मेरी तकनीकी दक्षता, कार्यकुशलता, नीतिबद्धता, कर्तव्यनिष्ठता एवं सत्याचरण और सरकारी नौकरी के कार्यकाल के उत्तम रेकॉर्डों के आधार पर मुझे चुन लिया गया ।

परम प्रभु और मेरे कुलदेवता की ऐसी कृपा हुई कि भारत के राष्ट्रपति के आदेशानुसार मुझे दो वर्ष की अवधि के लिए टेनरी और फुटवियर कॉर्पोरेशन ऑफ़ इंडिया लिमिटेड, कानपुर, जिसका अतीत के इतिहास में नाम फ़्लेक्स (FLEX ) था, का चैयरमेन और मैनेजिंग डायरेक्टर नियुक्त कर दिया । मेरी इस नियुक्ति से मैं ही नहीं, मेरे सभी सम्बन्धी, हितैषी, अभिन्न मित्र गौरवान्वित हो गए ।

है न मेरे प्रभु की अपार कृपा, उनकी विचित्र संयोजना । मैंने न कोई प्रयास किया, न किसी की चापलूसी की, न किसी को रिश्वत दी, न कोई लिखा-पढ़ी की । उद्योग मंत्रालय की मेहरबानी से मैं अपने ही शहर कानपुर में टेफ्को कम्पनी के मैनेजिंग डायरेक्टर के पद पर आसीन हो गया । अपने प्रभु की असीम अनुकम्पा का महाप्रसाद समझ कर मैंने इस पद को स्वीकार किया, और उनकी आज्ञा को मान कर १-१२-८२ से इसका कार्य-भर सम्भाला ।

कितनी विचित्र है प्रभु की लीला । बचपन में स्कूल आते जाते, अपने घर के पोर्टिको से फ्लैक्स कम्पनी के कार्यकर्ताओं को आते जाते जब देखता था तब मन में विचार उठता था इसमें काम करने का, स्वप्न देखता था इसका अधिकारी बनने का । मैं नही जानता था कि मेरे कुलदेवता, मेरे आराध्यदेव मेरे ऊपर इतने दयालु होंगे कि बिना मांगे ही मुझे इस पद पर आसीन करेंगे । सांसारिक वैभव, मान-प्रतिष्ठा, राजसी ठाठ, टेफ्को हाउस नामी बड़ा बंगला, नौकर-चाकर, बाग़-बगीचा, बाहरी ताम-झाम, द्वारपाल, क्या क्या न दिया मेरे प्रभु, तुमने सबको अनुभव करा दिया कि जो प्रभु के आश्रित रहता है, उसकी झोली बिना मांगे ही भरते रहते हैं ।

वाह रे मेरे प्रभु, कौन कौन गुण गाऊँ मैं तेरे, सामर्थ्य से अधिक दिया, सांसारिक व्यवहार और परमार्थ को साथ साथ चलाया, व्यवहार से सुख और परमार्थ से परम सुख दिया, सांसारिक कार्य-कलाप करते हुए परमार्थ की साधना करते रहने का अनमोल वरदान दिया ।

जालन्धर छोड़ने और कानपुर में मैनेजिंग डायरेक्टर के पद को ग्रहण करने से पूर्व जब मैं श्रीराम शरणं, दिल्ली में प्रेमजी महाराज का आशीर्वाद लेने गया तब उन्होंने "कानपुर में सत्संग लगाओ" का आदेश दिया । आदेश देते समय यह भी चेतावनी दी कि सत्संग में अपनी कम्पनी के अनइच्छित लोगों को मत बुलाना । यह चेतावनी मेरे बहुत काम आयी।

कभी कभी जब सत्संग के बहाने मेरे पास आकर मेरे मित्र और सम्बन्धी अक्सर मुझे याद दिलाते रहते कि मेरे मातहत मकान बना रहे थे और मेरा कहीं कोई अपना मकान नहीं था । शुभचिंतक बताते कि मातहतों की बीवियों के पास रत्नजडित आभूषण हैं लेकिन हमारी बीवी के पास विवाह में मिले आभूषणों के अतिरिक्त और कोई ढंग का नया आभूषण नहीं । जन सहानुभूति जताते, कहते "पांच पांच बच्चों को पढाना है, दो दो लड़कियों का उद्धार करना है और भोला बाबू तुम इस कुर्सी पर बैठ कर भी दौलत कमाने की जगह, 'नाम ' की कमाई में जुटे हो"। तब प्रेमजी महाराज का आदेश कवच का काम करता, मुझे अपने धर्म पथ पर अडिग रहने की आत्म शक्ति प्रदान करता ।

टेफ्को हाउस में अभी तक जहां राजनैतिक मौज-मस्ती होती थी, वहां अब साप्ताहिक अमृतवाणी सत्संग होने लगा । प्रसिद्ध भजन गायक हरिओम शरणजी सपत्नीक आये, श्रीमती नीलम साहनी आईं, डागर बंधु और विनोद चैटर्जी आये । संगीतप्रेमियों और संगीत मर्मज्ञों के मधुर स्वरों की सरगम से टेफ्को हाउस का वातावरण सात्विक ऊर्जा से भर गया । आध्यात्मिक, धार्मिक और सांस्कृतिक आयोजन होने लगे। स्वामी चिन्मयानन्दजी, जालन्धर के योगप्रवर बाबा मोहनदासजी, इसकोन के भक्त एवम प्रेमी गणों ने टेफ्को हाउस में पधार कर, आशीर्वाद दे कर हमारा जीवन आत्मिक आनंद से भर दिया । साधिका शांता दयाल, अंजना, वीरा प्रधान, मधुरिमा, मेघना, कल्पना, मधुलता विद्द्यार्थी, साधक संतू, श्री विचित्र नारायण निगम, गूबा कम्पनी के मालिक विजय भाई आदि के सहयोग से एच. बी. टी. आई. मरचेंट चैम्बर, प्रयाग नारायण शिवाला, तुलसी उद्द्यान, फूलबाग कानपुर में भजन-सन्ध्या के आयोजन होने लगे ।

हमारे इस कार्यकाल में उत्तर प्रदेश के राज्यपाल माननीय चंद्रेश्वर प्रसाद सिंह ने हमारे बंगले टेफ्को हाउस में आने की और भजन सनने की इच्छा प्रकट की । राजकीय स्तर पर सारी तैयारियां हुईं । परम प्रभु ने अद्भुत लीला रची । राज्यपाल तो नहीं आए, कानपुर के जागेश्वर मन्दिर में विराजे जागेश्वर नाथ स्वयं पधारे । ऐसी अनहोनी हुई, जो कभी सम्भव नहीं थी । कहीं किसी मन्दिर से प्राण प्रतिष्ठित मूर्ति किसी गृहस्थ के घर जाती है ? जागेश्वर मंदिर के देवता श्री जागेश्वर नाथ पधारे, तीन दिन रहे, भजन-सेवा स्वीकार की। पूजा,अर्चन, वन्दन, कुछ नहीं आता है हमें, यह तो उन्हें पता ही था । शबरी के झूठे बेरों का आस्वादन करने आये उसके आराध्यदेव । हमें कृतकृत्य करने आये श्री जागेश्वरनाथ । उसकी अनंत कृपा है, अनोखी लीला है । उनकी माया वही जाने ।

जब मैं ई. आई. ए. से प्रतिनिधि नियुक्ति (डेप्यूटेशन) पर टेफ्को कानपुर में कार्यरत हुआ तब मेरे परम हितैषी कर्तव्यनिष्ठ उच्चाधिकारियों ने सचेत किया था कि टेफ्को की दुर्दशा का कारण उसमें फैला हुआ भ्रष्टाचार है, जो मिस्त्री और कर्मचारी से लेकर वरिष्ठ अधिकारियों के बीच पनप रहा है, उससे सावधान रहना ।

अतएव इसके विरुद्ध मैंने पहिला कदम उठाया, बन्दूक धारी अंगरक्षकों से स्वयं को मुक्त किया, दूसरा कदम तकनीकी सुधार की ओर बढाया, तीसरा कदम आर्थिक संकट से इसे उबारने की कोशिश की । टेफ्को के विकास और सुधार के लिए सख्ती बरती, योजना बनाई, उन्हें कार्यान्वित करने की ओर ज्यों ही कदम बढाया, त्यों ही उद्योग मंत्रालय के सचिव गणों ने फैक्ट्री के विभिन्न विभागों की कार्यप्रणाली में हस्तक्षेप करना प्रारम्भ कर दिया ।

मैं असहाय था, न मुझे रिश्वत देना आता था, न लेना, न मुझमें मंत्रालय के अधिकारियों को निःशुल्क उपहार देने का सामर्थ्य था, न कम्पनी के खाते से उन्हें उपहार देना मुझे मंजूर था । न तो मैंने ऊपरी कमाई की और न मंत्रियों को पार्टी फंड के लिए दी । फलस्वरूप उनके छल-बल के सामने, मंत्रालय की कूटनीतियों के सामने घुटने टेक देने पड़े । अंजाम आप जानते ही हो, ९-११-८४ को स्तीफा दे कर मैं अपने पैतृक ऑफिस इ. आई. ए. दिल्ली वापिस चला गया ।

यह परम सत्ता की अदृश्य शक्ति की अपार कृपा ही थी, जिससे मुझे कठिन से कठिन परिस्थिति से जूझने की क्षमता मिली और विषम से विषम कठिनाइयों में भी मैं अपने धर्म पथ से विलग नहीं हुआ । मुझे तो इन सभी क्रिया कलापों में अपने ऊपर प्यारे प्रभु की अनंत कृपा की वर्षा के दर्शन होते हैं, परमानंद का आभास होता है ।

यह अहैतुकी "कृपा" उसे ही मिलती है जो सब प्रकार से अपने इष्ट पर निर्भर हो, जिसे किसी और का आश्रय न हो । जैसे माँ अपने नादान शिशु को उंगली पकड़ कर उसे इधर उधर भटकने से रोकती है, उसे पथ भ्रष्ट नहीं होने देती, वैसे ही हमारा "प्यारा प्रभु" ऐसे कर्तव्य परायण जीव का पग पग पर मार्गदर्शन करता रहता है । और, जिस जन पर उसका इष्ट ऐसी कृपा दृष्टि डालता है उसका तो बस कल्याण ही कल्याण, मंगल ही मंगल होता है ।

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गुरुजन के आशीर्वाद एवं प्यारे प्रभु की अहेतुकी कृपा के कारण, हमारे पूरे परिवार का यह दृढ विश्वास है कि ईमानदारी के साथ, सच्ची लगन से, पूर्ण मनोयोग से, अपनी सम्पूर्ण क्षमताओं का यथोचित उपयोग करते हुए, अपने निर्धारित काम करते रहने वाले को उसके "इष्ट" कभी निराश नहीं होने देते । प्यारे प्रभु, समय आने पर, उनकी सभी जायज़ आवश्यकताओं की पूर्ति कर देते हैं । सच पूछिए तो भगवत कृपा से आज तक मुझे अपने 'प्यारे प्रभु' के अतिरिक्त किसी और से कुछ भी माँगने की आवश्यकता ही नहीं पड़ी और मेरे ही क्यूँ मेरे सभी प्रियजनों के भी सारे न्यायसंगत कार्य सिद्ध होते गए ।

टेफ्को कम्पनी छूटने के बाद, जब तक मेरी आगे की पोस्टिंग के बारे में, एक्सपोर्ट इंस्पेक्शन कौंसिल का निर्णय पारित नहीं हुआ तब तक मैं कानपुर में अपने पैतृक घर ११ /२२६ सूटर गंज में ही रहा । देखा आपने हमारे "प्यारे प्रभु" ने अपने इस प्रेमी सेवक 'भोला" को सरकारी नौकरी के अंतिम पड़ाव में उसको अपने पैतृक घर में ही पहुँचा दिया और श्री प्रेमजी महाराज की आज्ञानुसार नियमित सत्संग लगाने की व्यवस्था भी कर दी ।

हमारा यह घर पूरे मोहल्ले का सबसे सुंदर घर था । उस एरिया के बाकी सब घर किराये पर उठाने की दृष्टि से बनाये गए थे । जहां एक एक प्लाट पर ६ से ८ छोट छोटे फ्लेट बने थे वहीं उतनी ही जमीन पर हमारा वह दुमंजिला घर बना था । हमारे घर का front elevation भी उस नगर में उन दिनों बन रहे अन्य मकानों से बहुत भिन्न और बड़ा ही आकर्षक था । सुनते हैं आस पास के नगरों से शौकीन लोग हमारे घर का नक्शा देखने को आया करते थे।

बलिया में "हरबंस भवन" और पुश्तैनी गाँव बाजिदपुर में खानदानी ऊंचे ऊंचे २४ नक्काशीदार सागौनऔर देवदार की लकड़ी के भव्य खम्भों पर खड़ी विशाल मर्दानी कचहरी और दो बड़े बड़े आंगनों वाले ज़नानखाने के २० कमरे होते हुए कानपुर में मकान बनाने की क्या ज़रूरत है, ऐसा सभी बुज़ुर्गों का विचार था । लेकिन फिर भी सब स्वजन-सम्बधियों की बातें अनसुनी करके, अम्मा ने वह घर कानपुर में बाबूजी के पीछे पड़कर ज़बरदस्ती बनवा ही लिया था । आज भी विरासत में मिला यह घर हमारी पैतृक सम्पदा है ।

गयाना से वापसी के बाद हमारी पोस्टिंग, ११ वर्षों तक देश के विभिन्न नगरों - नयी दिल्ली, कोचीन, आगरा, जालंधर, कानपुर, कोचीन आदि में होती रही । हमारे परिवार के लिए ये स्थानांतर कितने कष्टप्रद रहे होंगे, आप अनुमान लगा सकते हैं । परन्तु यहाँ यह उल्लेखनीय है कि हमारे परिवार के किसी भी सदस्य ने ऐसे तबादलों के कारण कभी कोई क्षोभ प्रगट नहीं किया और न किसी ने कभी कोई एतराज़ ही किया । हम भी और अपने पाँचों बच्चों की टीम के साथ स्वदेश-विदेश भ्रमण करते रहे । हंसते गाते मौज मनाते सर्वत्र आनंद ही आनंद लूटते रहे ।

हमारी एहिक प्रगति और आध्यात्मिक उत्थान की गतिविधि के पहिये साथ साथ चलते रहे । जब हमारे पैतृक ऑफिस से यह आदेश पारित हो गया कि हमारी पोस्टिंग जॉइंट डायरेक्टर के पद पर ई. आई. ए. कोचीन हो गयी है, हम सपत्नीक तिरुपति बालाजी का दर्शन करते हुए कोचीन पहुंचे ।

कोचीन ऑफिस ज्वाइन करने के एक सप्ताह बाद ही अपने सहकर्मी जॉइंट डायरेक्टर श्री स्वयंप्रकाश और उनकी पत्नी के साथ दक्षिण भारतीय मीनाक्षी मन्दिर के दर्शनार्थ चल दिए। हम चारों में न कोई आडम्बर था न दिखावा, सहज सुगम योजना के अनुसार वहां से त्रिवेंद्रम, कन्याकुमारी और श्री रामेश्वरम तीर्थ स्थानों के दर्शन करके तीर्थ यात्रा का स्वर्गिक आनद लेते हुए पन्द्रह दिन में वापिस आ गए। उसके बाद एक सप्ताह वहां और रहे फिर कानपुर वापिस आ गए ।

हमारी प्यारी बेटी श्रीदेवी का विवाह संस्कार यू. एस. ए. के तिरुपति मंदिर, पिट्सबर्ग में १०-५-८५ को सम्पन्न होना निश्चित था । अतएव उसकी तैयारियां करने के लिए हमने छुट्टियां ले लीं । अन्ततः स्वेच्छा से सरकारी नौकरी से २०-४-१९८५ को जॉइंट डायरेक्टर, एक्सपोर्ट इंस्पेक्शन एजेंसी, कोचीन के पद से सेवा निवृत हो कर निश्चिन्त हो कर अमेरिका गया ।

आजीविका अर्जन के लिए मैंने छत्तीस वर्ष सरकारी नौकरी की । १९५० में अस्थायी लिपिक से अर्थोपार्जन के क्षेत्र में प्रवेश करके १९८९ में उत्तर प्रदेश के एक सेन्ट्रल पी. एस. यू. के सी. एम. डी. के विशिष्ट पद से रिटायर हुआ । इसमें मेरा सामर्थ्य कुछ नहीं, केवल मेरे प्यारे प्रभु की अनंत कृपा का प्रसाद रहा, जिसके फलस्वरूप मैं अपने जीविकोपर्जन के सभी साधन, "राम काज" समझ कर, अपनी पूरी क्रिया शक्ति लगाकर सम्पूर्ण निष्ठा एवं समर्पण के साथ निर्भयता से करता रहा ।

प्यारे प्रभु की अनन्य कृपा आजीवन मुझ पर बनी रही और मैंने अपने आपको अपने किसी भी कर्म का कर्ता समझा ही नहीं । जीवन में पल भर को भी यह भुला ना पाया कि वह "सर्वशक्तिमान यंत्री", मुझे संचालित कर रहे हैं ।

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श्रीदेवी के विवाहोपरांत कानपुर पहुँचने पर अगस्त के महीने कानपुर में यू. पी. एस. आई. डी. सी. के अंतर्गत बनी जॉइंट वेंचर में सिडको लैदर्स लिमिटेड में मैनेजिंग डायरेक्टर के पद पर आसीन हो मैंने अगस्त १९८५ से काम करना प्रारम्भ कर दिया जो लगभग चार वर्ष तक करता रहा ।

इसमें सिडको लैदर्स के अधिकारियों श्री जफर उल्ला साहिब और इरशाद साहिब के साथ बड़ी लगन, निष्ठा और पुरुषार्थ से मैंने दिन रात एक करके काम किया । लेकिन दुनियावी दांव-पेच और छल-कपट के सामने मेरी सत्यनिष्ठ और कर्तव्यपरायण जीवन पद्धति उनको रास नहीं आई । राजकीय नियमों को तोड़ कर, धोखा धडी, भ्रष्टाचार और अनुशासन हीन कार्य पद्धिति को मैं सहमति नहीं दे सका । मेरे अनुभव, मंत्रालय के उच्च अधिकारियों से आत्मीय संबंध, चमड़े के क्षेत्र में पायी प्रसिद्धि और कार्य कुशलता का उन्होंने भरपूर लाभ उठाया । जब तक सिडको लैदर्स चलाने के लिये सब क्षेत्रों से धनराशि प्राप्त कराने और उसको एकत्रित कराने में मैं सहायक रहा तब तक उन्होंने मुझे मान-सम्मान दिया, प्रतिष्ठा दी, मेरा आदर-सत्कार किया, मेरे यश और पद का लाभ उठाया, फिर जब आर्थिक सम्पदा मिल गयी तब २८-२-१९८९ को मुझे दूध में गिरी मक्खी की भाँति निकाल दिया ।

परमात्मा प्रतिपल हमारे साथ है, इसका अनुभव हम सभी को जीवन में हर क्षण होने वाली विविध घटनाओं के साथ होता रहता है, पर उसे हम नजरंदाज़ कर जाते हैं ।

जब हमारे जीवन में कोई ऐसी घटना घटती है जहाँ हमारा सामर्थ्य, हमारा बल, हमारा विवेक, हमारा विचार सभी निष्फल हो जाता है तब उस समय कोई अनजान अदृश्य शक्ति हमें उस आपत्ति से निकाल कर हमारी रक्षा करती है, गिरने से पहिले ही हमारा हाथ पकड़ कर हमें सम्भाल लेती है, भयंकर आपदाओं की मार से बचा लेती है। ऐसी दशा में ही हमें उसअदृश्य परम दिव्य शक्ति में अपने इष्ट या सद्गुरु की कृपा का दर्शन होता है । उसमें हमें भगवान की, अपने अपने कुलदेव की छवि दिखाई देती है।

एक मात्र "वह"- हमारा प्यारा सर्वशक्तिमान, परमकृपालु परमात्मा ऐसा औघड उपकारी है जो हमारी पात्रता के अनुरूप हमे आवश्यक सभी प्रेरणाएँ तथा सुविधाएँ प्रदान कर देता है । अर्थोपार्जन के चालीस वर्षों के कार्यकाल में काजल की कोठरी में से कैसे बिना दाग लगाए मैं उसमें से बाहर निकल आया, यही उसकी अनंत कृपा का प्रत्यक्ष दर्शन है ।

प्यारे प्रभु की कृपा तो देखिये, आजीविका-अर्जन के कार्यकाल मे जब जब किसी प्रतिद्वंदी ने मुझे प्रगति की सीढ़ी से उतारने का प्रयत्न किया, परम सत्ता की अदृश्य शक्ति ने मुझे उससे भी अधिक ऊंची सीढ़ी पर आरूढ़ करके मेरा किसी अन्य विभाग में उसका विकास करने के लिए स्थानांतर कर दिया ।

इस भय और आशंका से कि कहीं किसी दूषित कार्य पद्धति के चक्र व्यूह में न घिर जाऊं, मैंने साठ वर्ष की आयु में ही आगे किसी भी प्रकार की नौकरी न करने का निश्चय ले लिया । मुझे पूर्ण विश्वास है कि मेरे द्वारा भूत काल में जो कर्म हुए हैं, जो वर्तमान काल में हो रहे हैं तथा जो कर्म भविष्य में होंने वाले हैं, वे सब के सब ही "इष्टदेवों" की कृपा से, "उनकी" आज्ञा से और "उनकी शक्ति" के द्वारा ही संचालित हो रहे हैं । वह "सर्वशक्तिमान यंत्री", मुझे संचालित कर रहे हैं ।

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जब परमपिता परमात्मा की अहैतुकी कृपा हो, जन्म जन्मातरों के पुण्य और सत्कर्मों का परिपाक हो, अहम और मम को गृहस्थाश्रम की वेदी पर चढाने की क्षमता हो, विश्वास और सन्तोष हो, तो गृहस्थाश्रम में स्वर्गिक आनंद मिलता है, आत्मिक सुख-शान्ति मिलती है । जीवन में पूर्णत: सफल होने के लिए प्रत्येक दंपत्ति को पूरी निर्भयता से, अविचल संकल्प तथा दृढ़ निश्चय के साथ, अपनी सम्पूर्ण क्षमता का उपयोग करते हुए, गृहस्थ जीवन की सुख-समृद्धि के लिए, निर्धारित कर्तव्य कर्म-धर्म अति प्रसन्न मन से करते रहना चाहिये ।

अपने सुख-शांतिमय दाम्पत्य जीवन के विषय में स्वयं अपने मुख से कुछ भी कहना अहंकार व दम्भ से प्रेरित हो अपने मुँह मियाँ मिटठू होने जैसा प्रयास ही कहा जायेगा । हम दोनों हैं तो साधारण मानव ही, अतः शंकाओं से घिरना, चिंता से घबराना, क्रोध करना और छोटी से छोटी बात पर दुखी होना हमारा भी जन्म सिद्ध अधिकार है । परन्तु परम प्रभु की अहेतुकी कृपा हम दोनों पर सदैव ऐसी बरसती रही है कि उससे प्राप्त आत्मशक्ति से जीवन की विषम और प्रतिकूल परिस्थितियों में एवं आपसी मतभेद होते हुए भी मानसिक संतुलन बना रहा और हमे इनसे जूझने की शक्ति मिलती रही ।

महापुरुषों का कथन है कि गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने के बाद ऐसा जीवन जियो जिससे परिवार में "सद्गुणों" एवं 'सद्-धर्म" का प्रचार-प्रसार-विस्तार हो, कथनी और करनी में सबका कल्याण करने की भावना हो, अपने इष्ट का अनन्य आश्रय हो, परस्पर प्रगाढ़ प्रीति हो । हम दोनों ने सदा इन्हीं मूल्यों को अपने जीवन में उतारने का यथासम्भव प्रयत्न किया है ।

निज आत्मकथा में अब तक मैंने अपने ऊपर प्यारे प्रभु के द्वारा की हुई अनंत कृपाओं की संदर्भानुसार चर्चा की है जिनकी अनुभूति के रोमांचक क्षणों की स्मृति का वर्णन करते समय वर्षों पूर्व के अविस्मणीय क्षण और चिरन्तन दृश्य मेरे सन्मुख जीवन्त हो उठते हैं । आज स्मृति की बीथियों में विचरती हमारी आँखों के सामने हमारे दाम्पत्य जीवन के पिछले ६० वर्ष के वे मनोहारी चित्र जीवंत हो रहे हैं जो उस "महान-अदृश्य-चित्रकार" ने बड़े प्यार से हमारे जीवन के कैनवैस पर चित्रित किये और जिनका सुदर्शन हमे आज भी आनंदरस प्रदान किये जा रहा है ।

इनमें १९५६ के "२७ नवम्बर" के दिन गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने पर जो विशेष कृपा "उन्होंने" "भोला-कृष्णा" नव दंपत्ति पर की, वह अति महती थी, अनमोल थी ।

गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने के लिए वैदिक और लौकिक रीति से मन्त्रोच्चारण के साथ वैवाहिक प्रक्रिया सम्पन्न करने-कराने का भारतीय संस्कृति में बड़ा महत्व है । विवाह को जन्म-जन्म के सम्बन्ध का प्रतीक माना जाता है । दाम्पत्य जीवन और आजीविका अर्जन के सम्मेल में गृहस्थाश्रम के नियम-धर्म के प्रतिपालन से जीवन दिव्य बनता है । इसलिए मुझे गृहस्थाश्रम में प्रविष्ट कराने की विधा में मेरे माता-पिता की सम्मति से मेरा विवाह-संस्कार ग्वालियर निवासी श्री शिवदयाल, एडवोकेट, सुप्रीम कोर्ट की बहिन, स्वर्गीय श्री परमेश्वरदयाल की आयुष्मती कन्या "कृष्णा" के साथ २७-११-१९५६ को होना निश्चित हुआ ।

मेरे बाबूजी श्री बदरीनाथ जी स्वजन-सम्बन्धियों, बड़का बाबूजी श्री केदारनाथ, भैया श्री जगन्नाथ प्रसाद, श्री गजाधर प्रसाद, मेरे मित्र सतपाल और रमेश रस्तोगी, मेरे भतीजे रवि, छवि, शशि को लेकर ग्वालियर रवाना हुए । झांसी पर श्री शिवदयालजी के धर्म-भतीजे प्रकाश शर्मा ने बरात का स्वागत सत्कार किया, स्वादिष्ट भोजन कराया, फिर जब हम सब बाराती ग्वालियर पहुचे, तब आगवानी करके हमें बिरला गेस्ट हाउस में ठहराया गया, जिसे उस ज़माने में जनवासा कहा जाता था ।

सन्ध्या काल गो धूलि की बेला में, मैं दूल्हा बन कर, 'सिंधिया राज' की चार सफेद घोड़ों वाली शानदार बग्गी पर सवार होकर "बोले कि भाई 'बम', बोले के भाई 'बम'-भोले", "बम बम भोले" का कानपुरी नारा लगाते अपने इष्ट- मित्रों और सगे सम्बन्धियों सहित के साथ हर्षोल्लास के साथ परमेश्वर भवन की ओर चला । मेरे जीजाजी श्री कृष्णपाल सिंह तथा अन्य मान्य स्वजन हाथी पर सवार थे । बेंड बाजे की धुन के साथ घुड़सवार अपने करतब दिखाकर बरात की रौनक और उसकी उमंग-उल्लास में चार चाँद लगा रहे थे । बाराती उनका तथा आतिशबाजी का मज़ा ले रहे थे ।

मार्ग में पण्डित राम अवतार शर्मा, श्री मुरारीलाल पवैया आदि गणमान्य मित्रों का केसर युक्त दूध और मिष्ठान का स्वागत सम्मान स्वीकार करते हुए हम सब मुरार के 'कोतवाली सन्तर में स्थित परमेश्वर भवन के द्वार पर पहुँच गए ।

यह घर मेरे दिवंगत स्वसुर श्री परमेश्वर दयाल जी का निवास स्थान है । वह ग्वालियर राज्य के सीनियर एडवोकेट थे तथा राज्य के मजलिसे आम [लोक सभा] तथा मजलिसे कानून [लेजिस्लेटिव कौंसिल] के सदस्य भी थे । स्वतंत्रता संग्राम में उन्होंने खुल कर गांधीजी का सहयोग किया, हाथ ठेले पर लाद कर वह घर घर जाकर "खादी" बेचते थे । वह आजीवन हेतुरहित समाज सेवा करते रहें । अति गोपनीय रख कर उन्होंने कितने ही निर्धन विद्यार्थियों की पढाई की व्यवस्था की तथा अनेकों निर्धन कुमारियों के विवाह में आर्थिक सहायता की । उन्होंने निजी बल बूते से "मुरार" में पब्लिक लाइब्रेरी व रीडिंग रूम की स्थापना की परन्तु इन संस्थानों के साथ उन्होंने स्वयं अपना अथवा अपने परिवार के किसी सदस्य का नाम नहीं जोड़ा ।

उनके निवासस्थान परमेश्वर-भवन के आगे विलक्षण मण्डप सजा हुआ था, वहां स्वागत-सत्कार हुआ, मन्त्रोच्चारण की गूंज के साथ द्वारचार हुआ, चांदी के बर्तनों में स्वादिष्ट पकवानों के अमृत-तुल्य स्वाद के साथ रात्रि भोज हुआ, फिर सब बराती मुझे नाऊ के साथ बैठक में बिठा कर जनवासे वापिस चले गए, क्योकि भाँवर का महूर्त दो बजे प्रातः का था ।

अब मेरा हाल सुनिये । अनजानी जगह, सभी अपरिचित, अकेला बैठक में बैठा, इधर उधर झाँका, लघुशंका के लिए उठा तो नगाड़ा बजने लगा, समझ न आये कि क्या करूँ, कहाँ जाऊं । महूर्त का समय निकट आया, सामने बिछे पाँवड़े पर चलकर घर के मण्डप की ओर बढा, मंगलगान के साथ पूज्य जनों ने परिछन किया, मंगलद्रव्य से स्वागत हुआ, मन्त्रोच्चारण के साथ पूजा-पाठ प्रारम्भ हुआ ।

मण्डप में सुबह दो बजे प्रविष्ट हुई पीली साड़ी पहिने, घूंघट निकाले सजी धजी कन्या, जो मेरी सहधर्मिणी बनने वाली थी । फिर वैदिक-लौकिक रीति के अनुसार मन्त्रोच्चारण की गूंज के साथ विवाह-संस्कार सम्पन्न हुआ, पाणिग्रहण संस्कार हुआ, भाँवरें पड़ी, सिन्दूर-दान हुआ, आशीर्वचन के साथ हम दो जाने-अनजाने पंछी को विस्तृत आकाश में अपना नीड़ बनाने के लिए तैयार कर दिया गया । अभी तक एक दूसरे ने अपने चिर साथी को देखा नहीं था । फिर भी इस दाम्पत्य बन्धन से हम दोनों सहचर और सहधर्मी बने और हम दोनों के गृहस्थाश्रम का श्रीगणेश हो गया । दूल्हे के रूप में क्या कर्म-धर्म है, मैं इससे अनभिज्ञ था ।

दूसरे दिन २८-११-१९५६ की शाम को विवाहोपरांत आयोजित रिसेप्शन से पहिले मेरी बड़ी साली मनोरमा जीजी ने मुझे मेरी पत्नी कृष्णा से मिलवाया, परिचय कराया, कहा "ठीक से पहिचान लीजिये " । पहिचानना तो दूर की बात है, ठीक से देखा भी नहीं, मुलाक़ात हुई, पर बात नहीं हुई, आरज़ू मन मसोस कर रह गयी ।

इस प्रीतिभोज की आलीशन व्यवस्था, आवभगत देख कर, इसमें अजेय-अनिल द्वारा प्रस्तुत कार्यक्रम देख कर सारे बाराती आल्हादित थे, इससे पहिले सुबह में वे ग्वालियर के दर्शनीय स्थल और आगरा भी घूम कर आये थे अतः बहुत प्रसन्न थे । मैं तो सुबह कुवँर कलेवे की रस्म का आनंद ले रहा था ।

प्रीतिभोज में पधारे मध्यभारत के भूतपूर्व राज प्रमुख महाराज जीवाजी राव सिंधिया और महारानी विजया राजे सिंधिया । उन से तथा ग्वालियर राज्य के गणमान्य प्रतिष्ठित स्वजनों से मेरी और मेरे पूज्यनीय पिताश्री एवं स्वजनों की भेंट हुई, फोटो भी खीचीं गईं । ग्वालियर बुधवार २८-११-५६ के दैनिक नवप्रभात में भोला-कृष्णा नवदम्पति की फोटो वहां के स्वजनों की शुभकामनाओं के साथ छपी ।

फोटो की बात करते करते सहसा मुझे अभी अभी उसकी भी कहानी याद आ गयी । आपको भी सुना ही दूँ । प्रियजन, जब हम विवाह के बाद पहली बार ग्वालियर गये, हमे पेलेस [महल] से खाने पर आने का निमंत्रण मिला । खाने की मेज़ पर राजमाता ने, वही उनके साथ वाला मेरा चित्र दिखा कर हंसते हंसते कहा था, "भोला बाबू यह फोटो कृष्णाजी को नहीं दिखाइयेगा, हम दोनों की ऐसी हंसी देख कर वह न जाने क्या सोचे" । राजमाता के इस कथन पर कृष्णाजी तो हंसी हीं, मेज़ पर बैठे सभी लोग हँस पड़े ।

एक और उल्लेखनीय बात याद आयी । हम भोजन कर ही रहे थे कि राजमाता के पास एक अति आवश्यक टेलीफोन काल आया जिसे सुनने के बाद उन्होंने मुझसे कहा, "भोला बाबू, आज के दिन आपका यहाँ आना हमारे लिए बड़ा शुभ रहा, इंदिरा जी का फोन था, नेहरू जी हमसे मिलना चाहते हैं, वह हमे ग्वालियर से लोक सभा का सदस्य बनवाना चाहते हैं ।" हम सब ने उन्हें खूब खूब बधाई दी । शायद उस बार वह पहली बार चुनाव में कांग्रेस के टिकट पर जीत कर "एम पी" बनीं । आगे का इतिहास दुहराने से क्या लाभ ? हाँ, एक बात अवश्य बताऊंगा कि उस महल के भोजन के बाद राजमाता विजयराजे सिंधिया के जीवन काल में मैं उनसे या उनके पुत्र माधव राव से एक बार भी नहीं मिला ।

सारी वेद रीति, लोक रीति, कुलरीति सम्पन्न होने ने अनन्तर २९-११-५६ को अंतरतम छू देने वाली मङ्गलमयी बिदा बेला आई । सभी आत्मीय जन विकल हो गए, मेरे पूज्य साले श्री शिवदयालजी ने अश्रुपूरित ममता सजोये आशीर्वचनों के साथ बिदा करते हुए मेरी जीवन संगिनी को मुझे सौंप दिया । फिर रेलवे स्टेशन पर कृष्णा के साथ ही मुझे सौंपा मनोरमा जीजी ने एक चश्मा और हिदायत दी कि सम्भाल कर रखियेगा, कृष्णा का चश्मा है । आशाओं और आशंकाओं से प्रकम्पित भावनाओं ने ज़ोर मारा, यह क्या --चश्मा -- अरे मेरी तो एक ही आकांक्षा थी कि जीवन संगिनी चश्मे वाली न हो । मेरे कुलदेव ने मुझे सद्बुद्धि प्रदान की, मैं मौन रहा, चश्मे की सहज सम्भाल की । फिर यह भाव प्रबल हुआ कि मुझे आशाओं से कहीं अधिक मिला तो इस नगण्य अनिच्छा को क्यों भाव दूं ? प्रकृति के विधान के साये में निकट आते हुए दो हृदय के बीच इसे क्यूँ स्थान दूं ?

जब झांसी स्टेशन के प्रतीक्षालय में अपनी चिर संगिनी की छवि निहारी, कुछ बातचीत हुई तो मन में शंका आशंका मिट गयी, मेरी जीवनसंगिनी मुझे काल्पनिक आशाओं से अधिक मनमोहक और सौम्य लगी । ऐसा लगा कि हम जन्मजन्मातरों से सद्भावनाओं, स्नेह के बन्धन में बंधे एक हैं । मन ही मन अपनी प्यारी अम्मा को धन्यवाद दिया, उनके प्रति अपना आभार व्यक्त किया जिन्होंने अपने हाथ का कंगन उतार कर शुभाशीष के साथ कृष्णा को पहिना कर मेरी सहधर्मिणी बनने के लिये चुना था । उनकी सूझ-बूझ को शत शत नमन ।

एक और पते की बात बताऊं, मैंने बातों ही बातों में कृष्णा से रामचरितमानस के शिव-पार्वती प्रसंग की चर्चा की और उसके परिवेश में कृष्णा को समझा दिया कि मुझे दुराव-छिपाव, झूठा व्यवहार पसन्द नहीं है, सत्य की राह पर चलना ही मेरा जीवन मूल्य है । मुझे गर्व है कि कृष्णा ने आज तक इसका ध्यान रखा, पालन किया, कभी कहने सुनने का मौका नहीं दिया । दाम्पत्य जीवन ही तो गृहस्थाश्रम के धर्म-कर्म की साधना का क्षेत्र है ।

अतीत के इन पन्नों को पलटते हुए दृश्यगत हुआ, विवाहोपरांत ससुराल से मिला अध्यात्म-पथ प्रशस्त करनेकी क्षमता रखने वाला अनूठा उपहार "उत्थान-पथ" ।

जब मैं अपनी नयी नयी बनी धर्मपत्नी को पहली बार ग्वालियर से विदा करवा कर ला रहा था, चलते चलते ससुराल पक्ष के किसी विशिष्ट व्यक्ति ने मेरे हाथ में एक पुस्तिका पकड़ाई थी जिसका नाम था "उत्थान पथ" । यह पुस्तिका हमारे राम परिवार के मुखिया धर्म पत्नी कृष्णा जी के पितृतुल्य बड़े भाई दिवंगत माननीय श्री शिवदयालजी, भूत पूर्व, चीफ जस्टिस ऑफ एम. पी. हाईकोर्ट ने प्रभु श्रीराम की प्रेरणा से रामचरितमानस की चौपईयो और श्रीमद भगवदगीता के श्लोकों में निहित सूत्रों का चयन करके गृहस्थों को दिव्य जीवन जीने की कला को सिखाने के लिए प्रकाशित की थी ।

उन्होंने यह मुझको ही नहीं अपितु सभी स्वजन-सम्बन्धियों को उपहार स्वरूप दी थी । इसे पा कर मुझे इस सर्वमान्य जीवन-मूल्य का आभास हुआ कि गृहस्थ के लिए जीवन-निर्वाह के साधन और आत्मोत्थान के साधन एक ही सिक्के के दो पहलू है ।

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महापुरुष कहते हैं कि सच्चे साधक का एक ध्येय, एक इष्ट और एक गुरु होना चाहिए । आसरा-आश्रय भी मात्र एक का ही लेना उचित है । सागर पार करने को केवल एक सुदृढ़ नौका चाहिए, अनेकों नौकाये हो कर भी काम नही आयेंगी । लेकिन क्या करें ? जब तक हमारी अपनी सद्वृत्तियों के अनुरूप हमें हमारी मंजिल तक ले जाने वाला या हमारा पथ प्रशस्त करने वाला सद्गुरु नहीं मिलता, तब तक हम डगमगाते रहते हैं ।

बचपन में और विद्याध्ययन के शुरूआती वर्षों में पारिवारिक संस्कारों के प्रभाव में सबके साथ नगर के हर हिंदू मदिर में जाना, उसमे स्थापित देवता की मूर्ति के सन्मुख प्रणाम करना, आरती में सब के साथ तालियाँ बजाना, शब्द याद न हो तों भी होठ हिलाकर यह जतलाना कि आरती गा रहा हूँ वाला नाटक बखूबी मैं करता रहता था । हमारे पूर्वज मूर्ति पूजक थे । वे गंगास्नान, देवालयों में दर्शन, आरती वंदन करते थे और समय समय पर, कठिनाइयाँ झेल कर भी कष्टप्रद एवं दुर्गम "तीर्थ यात्राओं" पर जाते थे । मैं उस समय मान्यताओं और मत मतान्तरों के जटिल जाल में इतना उलझ गया कि यह नहीं समझ पाया था कि उनमें से कौन सा रास्ता मेरे लिए कारगर होगा; मैं निज आध्यात्मिक उत्त्थान के लिए इनमें से कौन सा मार्ग चुनूँ? पुरातन वैदिक विधि पालन करूँ या समय समय पर बदलती परिस्थिति के कारण बदले विधि विधान को निभाऊं ।

समय बताता है कि जीव अपने जीवन के अनुभवों से ही सीखता है, चुनता है । मैं अपना अनुभव सुनाऊँ ।

१९५० के दशक के उत्तरार्ध नवम्बर १९५६ में मेरा विवाह ग्वालियर के एक ऐसे धार्मिक परिवार में हुआ जिसका बच्चा बच्चा, श्री राम शरणम् के संस्थापक स्वामी सत्यानन्द जी महाराज के सानिध्य से प्रभावित था । स्वामीजी महाराज की "नामयोग " साधना में, पानीपत की माता शकुन्तलाजी, गुहाना के पिताजी श्री भगत हंसराज जी, बम्बई के ईश्वरदास जी, दिल्ली के श्री भगवान दास जी कत्याल एवं मुरार के ही श्री राम अवतार शर्मा जी और श्री मुरारीलाल पवैया जी के साथ वे सत्संग एवं साधना-सत्संग में पूर्णतः समर्पित थे ।

परिवार के मुखिया दिवंगत गृहस्थ संत भूतपूर्व चीफ जस्टिस, म. प्र., माननीय शिव दयालजी ने घर को श्री राम शरणम् के सत्संग भवन सा बना रखा था । परिवार के सभी सदस्य, जितना उनसे बन पाता था, अपने दैनिक जीवन में भी 'पंचरात्रि' सत्संग के नियमों का पालन करते थे । प्रातः ५ बजे नाम जाप ध्यान आदि होता था और दिन भर के अपने कार्य निपटाने के बाद, रात्रिकाल में "अमृतवाणी जी" का तथा स्वामी जी के अन्य ग्रंथों का पाठ होता था । दैनिक रहनी सहनी, खान पान भी साधना-सत्संगों के समान होता था । प्रातः में दलिया दूध, भोजन अति सात्विक पर सरस, भोजन से पूर्व एवं उसके उपरान्त की प्रार्थना, सामूहिक प्रार्थना, आदि आदि, ।

संत शिरोमणि श्री स्वामी सत्यानन्द जी महाराज इस युग के महानतम धर्मवेत्ताओं में से एक थे जो लगभग ६४ वर्षों तक जैन धर्म तथा आर्यसमाज की सेवा करते रहे । अपने प्रवचनों द्वारा वह जन जन की आध्यात्मिक उन्नति के साथ साथ सामाजिक उत्थान के लिए भी प्रयत्नशील रहे । इन सम्प्रदायों से सम्बन्ध रखने पर तथा उनकी विधि के अनुसार साधना करने पर भी जब उन्हें उस आनंद का अनुभव नहीं हुआ जो परमेश्वर मिलन से होना चाहिए तो उन्होंने इन दोनों मतों के प्रमुख प्रचारक बने रहना निरर्थक जाना और १९२५ में हिमालय की सुरम्य एकांत गोद में जा कर उस निराकार ब्रह्म की (जिसकी महिमा वह आर्य समाज के प्रचार मंचों पर लगभग ३० वर्षों से अथक गाते रहे थे) इतनी सघन उपासना की कि वह निर्गुण "ब्रह्म" स्वमेव उनके सन्मुख "नाद" स्वरूप में प्रगट हुआ और उसने स्वामीजी को "परम तेजोमय, प्रकाश रूप, ज्योतिर्मय, परमज्ञानानंद स्वरूप, देवाधिदेव श्री 'राम नाम' " के प्रचार प्रसार में लग जाने की दिव्य प्रेरणा दी ।

सिद्ध संत स्वामी सत्यानंदजी महाराज की "नामोपासना" की नियम बद्ध अनुशासित पद्धति जो मेरे ससुराल के सदस्यों द्वारा अपनायी गयी थी, मुझे बहुत अच्छी लगी । इन सब आत्मीय स्वजनों की साधना के प्रभाव से, अपने परम सौभाग्य और सर्वोपरि "प्यारे प्रभु " की अनंत कृपा से, वर्षों भ्रम भूलों में भटकने के बाद मूर्ति पूजन तथा निराकार ब्रह्म की उपासना के बीच का यह सहज सरल साधना पथ मुझे भा गया ।

मेरा भाग्योदय हुआ, मुझ जैसे खोजी को सतगुरु का ठिकाना मिल गया, स्वामी जी महाराज से दीक्षित होने की इच्छा प्रबल हो उठी । मेरी धर्मपत्नी कृष्णा जी तो सद्गुरु स्वामीजी महाराज से १४ वर्ष की अवस्था में १९५१ से ही दीक्षित थीं हीं; मुझे भी मेरे कुलदेव महावीर हनुमानजी की कृपा से ही विवाहोपरांत मिल गया "राम परिवार", अनमोल पुस्तिका "उत्थान पथ "और सद्गुरु स्वामी सत्यानन्द जी महाराज का दर्शन, फिर प्रसाद में उनसे मिली अनमोल निधि "नाम दीक्षा"

प्यारे प्रभु की विशेष कृपा से ३ नवम्बर १९५९ को मुझे अपने जन्म जन्मान्तर के संचित पुण्य के फलस्वरूप कृपा से परम दिव्य आकर्षक व्यक्तित्व वाले श्रद्धेय स्वामी श्री सत्यानन्द जी महाराज के प्रथम बार दर्शन हुए । क्योंकि मैंने अपने जीवन में कभी इतने निकट से, एकदम एकांत में स्वामी जी के समान तेजस्वी देव पुरुष के दर्शन नहीं किये थे, नवोदित सूर्य की स्वर्णिम किरणों के समान जगमगाते उस देवतुल्य महापुरुष के दिव्य स्वरूप ने मुझे इतना सम्मोहित कर लिया कि मैं अपनी सुध बुध ही खो बैठा, मुझे न तो समय का भान रहा न वस्तुस्थिति का ज्ञान । दर्शन मात्र से ही मुझे एक शब्दातीत आत्मिक शान्ति की अनुभूति हुई । इस प्रथम दिव्य मिलन में ही प्रातः स्मरणीय पूज्यपाद स्वामी श्री सत्यानन्द सरस्वती जी महाराज ने अपने सन्मुख सहमे से बैठे धृति धारणा हीन, धर्म-कर्म में अतिशय दीन, मुझ ३० वर्षीय नवयुवक को मुरार, ग्वालियर के, सौदागर सन्तर में अपने परम स्नेही साधक श्री देवेन्द्र सिंह बैरी के 'पूजा-प्रकोष्ठ' में परम मंगलमय राम नाम का 'मन्त्र रत्न' प्रदान कर दिया ।

इस दास पर विशेष अनुकम्पा कर, उस प्रकोष्ठ के एकांत में स्वामी जी महाराज ने वाणी, स्पर्श एवं अपनी दिव्य कृपा दृष्टि द्वारा मुझे दीक्षित कर के मेरा जन्म सार्थक कर दिया । मैं स्वामी जी महाराज की औपचारिक साधना पद्धति से पूर्णतः अनभिज्ञ था । उस पूजा प्रकोष्ठ में मेरे गुरुदेव थे और कोई नहीं था । मेरा प्यासा मन स्वामी जी की मधुर वाणी से नि:सृत अमृत वर्षा से सिंचित हो रहा था, मेरा रिक्त अंतरघट 'नामामृत' से शनै: शनै: भर रहा था । उनकी वाणी से नि:सृत मधुर 'राम नाम' ने मेरे रोम रोम में "राम" को रमा दिया था । मुझे अपने मस्तक पर श्री स्वामी जी महाराज के वरद हस्त का कल्याणकारी स्पर्श महसूस हुआ और उस दिव्य स्पर्शानुभूति से मेरी सम्पूर्ण काया रोमांचित हो गयी । मैं कृतार्थ हो गया ।

सच पूछो तो मेरा यह मानव जन्म सार्थक हो गया क्योंकि स्वामी जी जैसे सिद्ध महापुरुष से, "राम नाम" का मंगलकारी तारक मंत्र पाना स्वयमेव एक अनमोल उपलब्धि थी । सद्गुरु दर्शन से, मिलन से मुझे जो उत्कृष्ट उपलब्धि हुई वह अविस्मरणीय है ।

हमने बस एक नज़र ही लखा था वह जलवाजन्मजन्मांतरों को कर दिया रोशन जिसनेधन्य हो गया मैं ।

मैं यद्यपि स्वामीजी के सन्मुख रहा फिर भी उनके तेजस्वी मुखमंडल से निस्तरित विलक्षण ज्योति पुंज की चकाचौंध से ऐसा सकपकाया हुआ था कि मुझे उस पूजास्थल में बिराज रहे महाराज की ओर आँख उठा कर देखने का साहस ही नहीं हुआ । नाम दीक्षा के अंतराल में, मैं मंत्र मुग्ध सा उनके नव विकसित कमल कलिकाओं जैसे गुलाबी श्री चरणों की ओर लालची भंवरे के समान निहारता रहा । अतः उनके गुलाबी गुलाबी श्री चरणों के अलावा मैं और कुछ देख नहीं सका ।

एक चमत्कार - सन २००७ में, भारत से यू. एस. ए. वापस आने से पहले गुरुदेव श्री श्री विश्वामित्र जी महाराज के दर्शनार्थ श्री राम शरणम् गया । महाराज जी से आशीर्वाद प्राप्त कर, प्रकोष्ठ से बाहर निकला ही था कि ऐसा लगा जैसे महाराज जी ने कुछ कहा । पलट कर उनके निकट गया । महाराज जी अलमारी से निकाल कर कुछ लाए और उसे मेरे हाथों में देते हुए कुछ इस प्रकार बोले, "श्रीवास्तव जी, आपके हृदय में श्री गुरुचरणों की मधुर स्मृति सतत बनी रहती है । मैं बाबा गुरु के वही श्रीचरण आपको दे रहा हूँ ।"

महर्षि विश्वामित्र जी ने मुझे सद्गुरु चरणों का वह चित्र देकर, मानो मुझे जीवन का एक सुदृढ़ अवलंबन सौंपा । धन्य हुआ मैं सद्गुरु पा के । उस चित्र के अवलोकन से ऐसा लगा मानो ------

समय शिला पर खिली हुई है "गुरु"-चरणों की दिव्य धूप ।
आंसूँ पोछो, आँखें खोलो, देखो चहुँदिश "गुरु" का स्वरूप ।।

सद्गुरु कभी निकट आते हैं मिलकर पुनःबिछड जाते हैं ।
प्रियजन अब वह दूर नहीं हैं "वह" हर ओर नजर आते हैं ।।

वो अब हम सब के अंतर में बैठे हैं बन कर यादें ।
केवल एक नाम लेने से, पूरी होंगी सभी मुरादें ।।

राम कृपा से सद्गुरु पाओ आजीवन आनंद मनाओ ।
उंगली कभी न उनकी छोडो जीवन पथ पर बढ़ते जाओ ।।

कितना सत्य है यह सूत्र कि जिस व्यक्ति को उसका सद्गुरु मिल गया उसके जीवन का अन्धकार सदा सदा के लिये मिट गया और उसके सौभाग्य का भानु उदय हो गया । गहन अन्धकार में डूबे मेरे अन्तःकरण में "नाम" ज्योति प्रज्वलित हुई ।

आज इस पल भी मेरा जीवन उस सौभाग्य सूर्य के दिव्य प्रकाश से जगमगा रहा है । उनकी अनंत करुणा आज भी मुझे प्राप्त है । हृदय परमानंद में सराबोर है । मुझे आज इस पल भी उस दिव्य घड़ी के स्मरण मात्र से सिहरन हो रही है - वह शुभ घड़ी जब मेरे जैसे कुपात्र की खाली झोली में, स्वामी जी महाराज ने अपनी वर्षों की तपश्चर्या दारा अर्जित " राम नाम " की बहुमूल्य निधि डाल दी थी, उस घड़ी के असीम आनंद का वर्णन करने की क्षमता मुझमे नहीं है पर उनकी छत्र छाया में अब भोला-कृष्णा दम्पति की जीवन गाड़ी के दोनों दृढ़ पहिये उनके नामयोग की साधना के पथ पर चलने को सक्षम हो गए हैं । जिस प्रकार पारस पत्थर के स्पर्श मात्र से "लोहा""सोना" बन जाता है, उस प्रकार ही सद्गुरु के संसर्ग से आपका यह अति साधारण स्वजन -"भोला"- माटी का कच्चा घड़ा, आज परिपक्व हो अपने प्यारे सद्गुरुजन का एक सुदृढ़ कृपा पात्र बन गया है ।

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यह मेरा परम सौभाग्य रहा कि स्वामीजी महाराज ने नाम दीक्षा वाले दिन ही मुझे 'अधिष्ठान जी' भी प्रदान कर दिए और उन्होंने मुझे अगले दिन ग्वालियर में लगने वाले 'पंचरात्रीय साधना सत्संग' में सम्मिलत होने की अनुमति भी दे दी ।

१९५९ में मैंने पहिली बार ग्वालियर में आयोजित श्री रामशरणम् के पंचरात्रि सत्संग में भाग लिया । यह मेरे जीवन का यह पहिला साधना-सत्संग था और उस सत्संग का मेरा प्रत्येक अनुभव अनूठा था । यह सत्संग ग्वालियर में पूज्यपाद श्री स्वामी जी महाराज की छत्रछाया में हुआ था । सत्संग के मोटे मोटे नियम मुझे मेरे स्वजनों ने बता दिये थे और इसकी पृष्ठभूमि में मुझसे यह भी कहा था कि मैं वहां गाने के लिए भजन भी तैयार कर लूँ ।

आज की तरह उन दिनों भी प्रातः कालीन सभा और रात्रि की सभा में साधकों के भजन होते थे और गुरुदेव ही इशारा करके उस साधक को आमंत्रित करते थे जिसका भजन वह सुनना चाहते थे । श्री स्वामी जी महाराज के सानिध्य में होने वाले उस पंचरात्रि सत्संग की सभी बैठकों में मैं अपनी गायकी की प्रवीणता प्रदर्शित करने को उतावला रहता था, सोचता था कि स्वामी जी महाराज की दृष्टि मुझ पर पड़े और अपने आसन पर बैठे बैठे वह मुझे पुकार कर अपने निकट बैठा लें और मुझे भजन गाने का आदेश दें !!

नित्य प्रति हर सभा में मैं उतनी ही तैयारी के साथ जाता, उचक उचक कर स्वामी जी की ओर देखता लेकिन अवसर नहीं मिलता । प्रियजन, अपने आप को सर्व श्रेष्ठ समझने वाले अहंकारी व्यक्तियों की अंततः ऐसी ही गति होती है । सम्भवतः उन दिनों मेरे स्वर में अंतरात्मा की अगम्य गहराई में बसे भावों की प्रस्तुति में उतना माधुर्य नहीं रहा होगा, जितना स्वामीजी चाहते थे ।

आखिर एक दिन महाराज जी की कृपा दृष्टि पड़ ही गयी, महाराज जी की उंगली मेरी ओर उठी । मैं पुलकित हुआ, महाराज जी की उंगली उनके बगल में बैठे किसी और साधक की ओर घूम कर रुक गयी और उन्होंने किसी अन्य साधक भजन सुनाने का आदेश दे दिया । काफी देर बाद समझ पाया कि उस सभा में, पंडित राम अवतार शर्मा जी, श्री मुरारीलाल पवैया जी, श्री गुप्ता जी, श्री बंसल जी, श्री बेरी जी, श्री शिवदयाल जी तथा श्री जगन्नाथ प्रसाद जी जैसे महान साधकों के होते हुए, मेरा यह सोचना कि श्री स्वामी जी महाराज मेरे जैसे नये साधक को आगे बुलाकर अपने निकट बैठाएंगे, कितनी बड़ी मूर्खता थी ? एक दिवा स्वप्न के अतिरिक्त और कुछ न था ।

ऐसा नहीं है कि मैं पाँचों दिन उपेक्षित ही पड़ा रहा । अंततः महाराज जी ने हमें मौका दिया पर काफी लम्बी प्रतीक्षा के बाद । यूं कहिये कि मन ही मन बहुत रोने धोने के बाद मुझ पर विशेष कृपा कर के हमारे इष्ट देव श्री राम ने ही मुझे वह अवसर प्रदान किया कि मैं नैवेद्य सरीखा अपना भजन उनके श्री चरणों पर अर्पित कर सकूं । मैं तैयार तो था ही, बड़े भाव से पूरी श्रद्धा भक्ति के साथ, मैंने भजन गाया । स्वामीजी मेरी ओर देख कर थोड़ा मुस्कुराए, मुझे रोमांच हो आया, मैं गदगद हो गया, मेरी आँखे सजल हो गयीं । मुझे विश्वास हो गया कि नैवेद्य स्वरूप अर्पित मेरी भजन-भेंट मेरे गुरुदेव ने स्वीकार कर ली ।

संरक्षण जिसको गुरु का हो वह साधक ना कभी डरा है ।मेरे नयन सजल हैं प्रियजन मेरा मन आनंद भरा है ।।एक और संस्मरण स्वामी जी के अपनत्व का --

नित्यप्रति साधकों को भोजन परोसने की सेवा करते देख मन में उमंग उठी कि मैं भी यह सेवा करूं । कभी काम किया नहीं था, कैसे कर पाता यह सेवा । मेरे गुरुदेव मेरे अंतःकरण की भावना को समझ गए और विनोद पूर्वक बोले मुरार और शिवदयालजी के बहनोई के नाते आप तो हमारे दामाद हैं, आपसे कैसे सेवा लें? ऐसे होते हैं सद्गुरु, साधक के मन को परख कर उनकी सहज-सम्भार करने वाले ।

पूर्णाहुति की अंतिम बैठक के बाद विदाई के समय मुझे गले लगाकर मेरी पीठ पर हाथ फेरते फेरते उन्होंने मेरे तन-मन और मेरे अन्तःकरण पर प्यार और आशीर्वाद का शीतल सुगंधमय चन्दन लेप लगाया था, उसकी गमक अभी भी मेरे आन्तरिक और बाह्य जीवन को पवित्र कर रही है । गुरु कृपा ही तो श्री रामकृपा है । गुरु कृपा में आनंद ही आनंद है ।

गुरुजन साधारण मानव को उसकी उसमें ही निहित क्षमताओं का ज्ञान कराते हैं और उसे अनुशासित जीवन जीने की कला बता कर उसका उचित मार्ग दर्शन करते हैं । मेरे सद्गुरु ने भी मुझे दीक्षा दे कर मुझ पर महत कृपा की, मेरा पथ प्रदर्शित कर मुझे सत्य, प्रेम और सेवा के मार्ग पर चलना सिखाया, सात्विक जीवन जीने की कला सिखाई, अनुशासन पालन करते हुए जगत में व्यवहार करना सिखाया ।

मैं कभी कभी सोचता हूँ कि मेरा क्या हुआ होता यदि मुझे मेरे "सद्गुरु स्वामी सत्यानन्द जी महाराज " इस जीवन में मुझे नहीं मिलते और इतनी कृपा करके उन्होंने मुझे अपना न बनाया होता या मुझे अपने श्री राम शरणम् के "राम नाम उपासक परिवार" में सम्मिलित न किया होता ?

मेरी संन १९५९ की डायरी का एक पृष्ठ ---

मंगलवार - कार्तिक - शु. ३, वि. २०१६- तदनुसार ३. नवम्बर १९५९ ई.

ग्वालियर

हम 'जनता' से ग्वालियर आये । दोपहर बाद दादा के साथ, (शर्मा बिल्डिंग, लश्कर से परमेश्वर भवन), मुरार गये श्री स्वामी जी के दर्शन करने तथा पंच रात्रि सत्संग में सम्मिलित होने की आज्ञा प्राप्त करने ।

आज्ञा मिल गयी । आज सायंकाल श्री स्वामी सत्यानन्द जी महाराज ने हमे "नाम दीक्षा" दी । कितना "सुख" मिला ? कौन वर्णन कर सकता है ?

गुरु दर्शन में ही तो है उस आनंदघन परम का दर्शन ।

मेरी डायरी का पृष्ठ ---

९ नवंबर १९५९---अक्षयनवमी

सत्संग से बिदाई

प्रातःकाल में बिदाई के समय गुरुदेव ने आरती की, सत्संग समाप्त हुआ । पूज्य दादा के साथ श्री गुरु महाराज को विदा करने स्टेशन गया । स्वप्नवत सत्संग की आनंदपूर्ण और सुखद घड़ियाँ समाप्त हुईं । कितनी विलक्षण प्रसन्नता तथा अद्भुत आनंद मिला है कि वर्णन नहीं कर सकता ।

परम पूज्यनीय, प्रातः स्मरणीय पूज्यपाद स्वामी श्री सत्यानन्द सरस्वती जी महाराज के दर्शन मुझे उस पंच रात्रि सत्संग के बाद दुबारा नहीं हुए । एक वर्ष में ही महाराज अपने इष्ट परमप्रभु श्री राम के "परम धाम" सिधार गये । मैं कानपुर से हरिद्वार भी नहीं पहुँच पाया । मन मसोस कर रह गया ।

सद्गुरु स्वामीजी महाराज स्वामी जी महांराज ही नहीं वरन उनके बाद एक एक करके, गुरुदेव प्रेम जी महाराज तथा मेरे अतिशय प्रिय गुरुदेव डॉक्टर विश्वामित्तर जी महाराज हमारे जीवन के आध्यात्मिक अन्धकार को परमानंद की ज्योति से भरने को आये और चले भी गये । स्थूल रूप में हमसे दूर होते हुए भी उनमें से कोई भी हमसे एक पल को भी विलग नहीं हुआ । सद्गुरु स्वामीजी महाराज आज भी हमारे अंग संग हैं । वह हमारी मनोभावनाओं में, हमारे चिंतन और विचारों में इस क्षण भी उतने ही जीवंत और क्रियाशील हैं जितने वे आज से ६० वर्ष पूर्व मेरे दीक्षांत की घड़ी में थे । आध्यात्म के क्षेत्र में हमारे प्रथम मार्ग दर्शक थे, हैं, और जीवन पर्यन्त रहेंगे । उनके गुलाबी गुलाबी आभायुक्त श्रीचरण आज भी मेरे जीवन का सम्बल हैं उसी तरह जिस तरह भरत के लिए श्री राम की पादुकाएं थीं ।

सद्गुरु चरण सरोज रज जो जन लावें माथ ।
श्री हरि की करुणा-कृपा तजे न उनका साथ ।।

ऐसे प्रिय जन पर सदा कृपा करे "रघुनाथ" ।
सुख समृद्धि सद्बुद्धि भी कभी न छोड़े साथ ।।

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यह सर्वमान्य सत्य है कि गार्हस्थ्य जीवन ऐहिक एवं पारलौकिक सुख-समृद्धि-शान्ति का साधना क्षेत्र है । पारिवारिक, आर्थिक, धार्मिक और सामाजिक उन्नति के लिए लोक कल्याण की दृष्टि से जगत व्यवहार करते हुए प्रभु का स्मरण करते रहना; गृहस्थके जीवन का सार है । महापुरुषों से ये सूत्र सुन कर, यह धारणा मेरे और कृष्णा के मन में बसी हुई थी कि गृहस्थी का परिपालन ही कर्मयोग की साधना है अतएव जीवन निर्वाह हेतु पूर्वजन्म के संस्कारों एवं कार्मिक लेखा जोखा-"बेलेंस शीट" के अनुसार निर्धारित सभी कर्तव्य कर्मों को हम दोनों अपनी दैनिक साधना समझ कर ईमानदारी से सदा करते रहे, परिस्थिति वश आयी अनुकूल-प्रतिकूल घटनाओं का स्वागत करते रहे; पारिवारिक जीवन की कभी अवहेलना नहीं की; जिसके फलस्वरूप जिया सुख-शांतिमय पारिवारिक जीवन ।

हमने जब जब अतीत के पृष्ठों को पलटा, पाया कि हमारी हर उपलब्धि के पीछे "प्रभु" की अहैतुकी कृपा का अदृश्य हाथ रहा है । हमारा सारा जीवन, इसी प्रकार की प्रभुकृपा-जानित चमत्कारिक सफलताओं से भरपूर है । फिर भी जब कभी उन उपलब्धियों को याद करने का प्रयास करते हैं तब मानव-स्वभाव के कारण उनमे से एक भी ऐसी नहीं लगती जो मेरे निजी प्रयास के कारण न प्राप्त हुई हो । हर सफलता का श्रेय हम अपने आप को ही देते हैंऔर हम उन अदृश्य हाथों को भूल जाते हैं जिनकी सहायता से हमें वह सफलता मिली । मेरी आत्म कथा में ऐसी अनेकों घटनाओं का विवरण है ।

अपने गृहस्थजीवन में हमने पुरुषार्थ और परमार्थ के नियत कर्तव्यों का पालन विधिवत किया, "उनकी इच्छा" और "उनसे मिली प्रेरणा "के कारण । कृष्णा को जब प्रसूति घर जाना होता था, सन्तान को जन्म देने के लिए, तब जाने से पहिले सुंदरकांड का पाठ, श्री अमृतवाणी का पाठ करके हम सब जाते थे । महापुरुषों और सिद्ध संतों के चित्र और उनकी वाणी के सुभाषित घर में टँगे रहते थे ।

इस संदर्भ में मुझे अपने जीवन की एक घटना याद आ रही है । नवंबर १९५६ में हमारा विवाह सम्पन्न हुआ; हम दोनों ने बड़े चाव से अपने कमरे में लगाने के लिए गीताप्रेस गोरखपुर में मुद्रित देवी देवताओं के चित्रों में से दो चित्र चुने, एक रामजी का और दूसरा कृष्ण का । हमने उन्हें अपने बेड रूम के निजी मंदिर में बड़े प्रेम से प्रस्थापित भी कर दिया ।

कुछ माह उपरान्त एक अद्भुत घटना घटी ।

मैं उन दिनों कानपूर में हार्नेस फेक्ट्री में कार्यरत था और बहुत सबेरे घर से निकल कर देर शाम तक घर लौटता था । जब की यह घटना है उन दिनों मेरी धर्मपत्नी कृष्णा जी भी एम. ए. की परीक्षा में बैठने के लिए ग्वालियर अपने मायके गयी हुईं थीं ।

एक दिन मैंने फैक्ट्री से वापिस आकर देखा कि हमारे बेड रूम के मंदिर में श्रीकृष्ण का वह चित्र नहीं है । पूछताछ करने पर मेरी भाभी ने बतलाया कि उस दिन दोपहर में बेवख्त ही घर के द्वार पर दस्तक हुई । द्वार खोला तो देखा कि एक अपरिचित महिला बहुत सकुचायी और डरी हुई दरवाजे पर खड़ी थी । उसके साथ उसका एक चार पांच वर्ष का बहुत ही सुंदर बालक था, गूंगा था । बच्चा महिला का पल्लू पकडे हुए खड़ा था । दोनों ही देखने में किसी धनाढ्य, भद्र वणिज परिवार के लगते थे ।

भाभी ने आगे बताया कि अभी उसकी माँ अपना परिचय दे ही रही थी कि वह बालक माँ का हाथ छुड़ा कर घर के अंदर ऐसे घुसा जैसे कि बहुत पहिले से हमारे घर के चप्पे चप्पे से अच्छी तरह से वाकिफ हो । घर के अंदर घुस कर वह सारे खुले हुए कमरे छोड़ कर, सीधे हमारे बंद बेड रूम की ओर ही गया ।

घर के सभी सदस्य आश्चर्य चकित थे कि वह बालक बंद कमरे की ओर ही क्यों गया ? कमरा खुलते ही वह सीधे उसी ओर ही कैसे चला गया जहां मंदिर में श्रीकृष्ण जी का वह चित्र लगा हुआ था ? मंदिर के निकट पहुंच कर, बिना मुंह से कुछ बोले, केवल संकेत से ही उसने श्री कृष्णजी के उस चित्र विशेष को पाने के लिए जिद करना चालू कर दिया । जब तक उसने वह चित्र अपने हाथ में थाम नहीं लिया तब तक वह शांत नहीं हुआ । उसे पा लेने पर उसकी खुशी का ठिकाना न रहा; उसने एक पल को भी उस चित्र से अपनी नजर नहीं हटायी, वह अपलक एक टक बड़े आनंद से कृष्णजी की मनमोहिनी छवि को अतीव श्रद्धा से निहारता रहा । उसे अपने साथ ले गया । फिर कभी वह दोनों नहीं दिखे ।

सारी घटना एक अमिट छाप छोड़ गयी, अदृश्य शक्ति के रहस्यमय चमत्कारी क्रियाओं की ।

ऐसे तो मुझे कई बार इस प्रकार के स्वप्न आये हैं कि मैं किसी शिखर पर मन्दिर में विराजे हनुमानजी के दर्शन कर रहा हूँ । एक बार तो स्वप्न देखा कि मेरे ऊपर किसी जानवर ने हमला किया है, मुझे इधर उधर भगा रहा है, मैं भय से काँप रहा हूँ, डर से घिग्घी बन्ध रही है, प्रार्थना कर रहा हूँ मेरे ईश्वर मुझे बचाओ । तभी देखता हूँ कि मेरे सामने काले रंग के हनुमानजी खड़े हैं मैं उन्हें "friend friend" कह कह कर उनसे रक्षा करने को कह रहा हूँ, और वे मेरी रक्षा कर रहे हैं; लेकिन उस नादान अनजाने गूंगे बालक की श्रीकृष्ण के चित्र के प्रेम और अनुरक्ति को क्या कहूँ ?

आज जब मन के दर्पण में पिछले साठ साल के जीवन के रहन सहन को आंका और परखा तो पाया कि रुचि, योग्यता सामर्थ्य और इच्छाशक्ति से सुख-शान्ति से पारिवारिक जीवन जीने का इच्छुक मैं "भोला "कभी अकेला रहने का आदी नहीं रहा । अकेले घर से बाहर रहना मुझे प्रिय नहीं रहा । सदा कोई न कोई स्वजन सम्बन्धी को साथ रखा । हाँ, लन्दन में पढाई के लिए परिवार को छोड़ कर अकेले रहना पड़ा, जो मजबूरी थी । किसी साहित्य या संगीत की गोष्ठी में जाना हो या किसी सम्मेलन में, चलचित्र देखने जाना हो या दर्शनीय स्थलों को देखने जाना हो, परिवार के साथ ही जाना स्वीकृत रहा, अकेले जाना मुझे मंजूर नहीं रहा ।

परिवार साथ हो तभी आनंद आता है । अपने बच्चों के साथ ही नहीं कुटुंब के सभी बच्चों से परिहासमयी वार्ता करना, आपबीती सुनाना, हंसना-हंसाना, नाचना-गाना, बच्चों में बच्चा बन जाना, शिशु के साथ किलकारी मारना मेरा जन्मजात स्वभाव रहा । आजीविका अर्जन के कार्यक्षेत्र में जब जब स्थानान्तर हुए, चाहे देश में या विदेश में, परिवार के साथ ही रहा । देश विदेश के भ्रमण से श्रीदेवी, राम, राघव, प्रार्थना और माधव को विविध प्रदेशों की सभ्यता और संस्कृति का बोध हुआ । विविध वेश-भूषा, रहन-सहन, खान-पान से परिचय हुआ जिससे उनकी विचारधारा संकीर्णता के घेरे से बाहर निकली, भेदभाव रहित सौहार्द पूर्ण व्यवहार की नीव पड़ी । परिवार की हँसी, खुशी, प्रगति, उन्नति, समृद्धि ही तो मेरे गृहस्थाश्रम के साफल्य की निशानी है ।

ऐसा नहीं है कि हमारे जीवन में कष्ट आये ही नहीं अथवा जटिल समस्याओं ने हमें नहीं घेरा । भारतीय सामाजिक प्रचलन के अनुसार जब किसी गृहस्थ को उलझनें सतत सताती हैं, तब उन सब समस्याओं के समाधान के लिए वह ज्योतिषियों का द्वार खटखटाता हैं । हम भी गए, पर अनुभव ने सिखाया कि इस विज्ञान का आदर करो पर इस पर निर्भर नहीं रहो ।

हमारे परिवार के कई ज्योतिषियों से घने पारस्परिक सम्बन्ध थे । हमारे बड़े भैया की इस विज्ञान में रुचि थी, उन्होंने अध्ययन किया, कोर्स किया, प्रमाण-पत्र पाया, इस नाते उनके साथी ज्योतिष भाई हमारे घर आते जाते रहते थे । उन सबकी मेरे जीवन के सम्बन्ध में की गयी भविष्यवाणियाँ सच निकली, केवल एक छोड़ कर, वह भी सन्तानोत्पत्ति के सम्बन्ध में । ग्रहों के अनुसार सबका निर्णय था कि मेरी सन्तान जीवित नहीं रहेंगी, जिसे सुन सुन कर मन ही मन एक भय पनप रहा था लेकिन कालांतर में प्रभु कृपा से उनका कथन खरा नहीं उतरा ।

हुआ कुछ ऐसा कि गृहस्थाश्रम में प्रवेश करने पर विवाह के दो वर्ष बाद १५ अगस्त १९५८ में एक मृत कन्या का जन्म हुआ । इत्तफाक से उस दिन हमारे घर में दिन भर लखनऊ से आये राज ज्योतिषी बैठे थे । २९ वर्ष की उम्र में उसका गंगा-प्रवाह करने के बाद इस अनहोनी से मन और अधिक भयभीत हो गया, ज्योतिषियों के कथन तड़पाते रहे । यह प्रारब्ध और पूर्वजन्म के कर्मों का प्रभाव है, इसी भावना से मन शांत हुआ । फिर उसके बाद हमारी पांच संतान हुईं जो प्रभु के आशीर्वाद से आज भी अपने आचार, विचार, व्यवहार तथा अपनी कार्यक्षमता से हमें गौरवान्वित कर रही हैं । जीवन ने यह सूत्र सिखा दिया कि ईश्वर पर अचल आस्था रखने वालों को ज्योतिषियों और जन्मपत्रियों के निर्णयों पर तभी तक महत्व देना चाहिए जब तक वे सकारात्मक ऊर्जा को बढाने में सहायक हों अन्यथा उसकी अनदेखी और अनसुनी कर दें ।

यहां उल्लेखनीय महत्वपूर्ण तथ्य यह है कि ज्योतिषों के चक्कर में न फंस कर इस बात पर अडिग विश्वास रखो कि तुम्हारा इष्ट, तुम्हारा कुलदेवता जिसका तुमने आश्रय लिया है प्रति क्षण तुम्हारे अंग संग है और तुम्हे उचित मंत्रणा और आवश्यक प्रेरणा दे रहा है, उसकी छत्रछाया में कभी आश्रित का अकल्याण हो ही नहीं सकता ।

अपने सभी कार्य करते हुए "उसको" याद करते रहो, "उसका" नाम जपते रहो और उसका काम समझ कर अपना काम करते रहो । हमारे गुरुजन का कथन है कि सोते-जगते, खाते-पीते, उठते-बैठते, आते-जाते, यहाँ तक कि दफ्तर में काम करते समय भी एक पल को भी अपनी यह सहज एवं सरलतम साधना "नाम जाप" छोडो नहीं, सतत करते रहो ।

प्रियजन, असम्भव नहीं है उपरोक्त गुरु आज्ञा का पालन । मेरे जीवन का अनुभव है कि सद्गुरु की दी हुई नाम दीक्षा ने और इष्टदेव की परम कृपा ने जीवन में पग पग पर आयी हुई सभी बाधाओं, आपदाओं, पीड़ाओं, कष्टों से हमें बचाया है । दीक्षा के शुभ दिन से आज तक सद्गुरु से मिला 'नाम' का अभेद कवच सभी देहिक, दैविक, भौतिक तापों में हमारे परिवार की रक्षा करता रहा है ।

परमेश्वर की असीम अनुकम्पा, गुरुजनों के आशीर्वाद, पूज्यजनों की पुण्याई और हमारे एवं कृष्णा के पूर्वजन्म के कर्मों के फलस्वरूप हमारी पाँचों सन्तान -- श्रीदेवी, राम, राघव, प्रार्थना, और माधव, तथा उनके जीवन साथी और हमारे पौत्र-पौत्रियां, सभी संस्कारी, सदाचारी, शीलवान, सुयोग्य और आस्तिक भावनाओं के धनी हैं । वर्षों से स्थान स्थान पर उन सबके साथ हम दोनों रह रहे हैं, गृहस्थाश्रम से वानप्रस्थ की ओर जाते हुए अनासक्त भाव से रहने का प्रयत्न कर रहे हैं, जिसकी साधना में सब बच्चों का सहयोग मिल रहा है । वे हम दोनों के स्वास्थ्य की देख भाल, सुख-सुविधा, खान-पान, मनो-विनोद आदि का ज़रूरत से भी ज़्यादा ध्यान रख रहे हैं, यह उस परमपिता की अनंत कृपा नहीं तो और क्या है ?

जितने भी संकट आ घेरें, जितनी भी विपदाएं आयें,
जिसको प्यार मिला है इतना, उसको कोई और चाह क्यों ?

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इस संसार में साधारण मानव का जीवनपथ अनगिनत अवरोधों से भरा हुआ है । जीवन के इस अँधेरे कंटकों एवं चुभते कंकड़ पत्थरों से भरे मार्ग पर सुविधा से चल पाना आज के मानव के लिए बड़ा कठिन है । बिना किसी हादसे के गन्तव्य तक पहुंचना मानव की क्षमता से परे है । इसके लिए जीव को एक कुशल मार्ग दर्शक और संचालक की आवश्यकता होती है ।

गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन का मार्ग दर्शन करते हुए कहा "योग: कर्मसु कौशलम" अर्थात कुशलता से, युक्तिसंगत विधि से कल्याणकारी कर्म करना ही योग है । इस "युक्ति" का ज्ञान या बोध और उसका अभ्यास "गुरु" ही कराते हैं, चाहे सामाजिक गुरु हों या राजनैतिक, धार्मिक गुरु हों या पारिवारिक, शिक्षा गुरु हों या दीक्षा गुरु, । ये गुरु हमें गृहस्थाश्रम के शास्त्रोक्त कर्तव्य कर्मोंको अपनी क्षमता और योग्यता के बल पर प्रसन्न मन से करने की प्रेरणा देते हैं, सत्य और धर्म पर चलने की राह दिखाते हैं और वानप्रस्थ जीवन की ओर बढ़ने का सन्देश देते हैं । जिनके मार्गदर्शन से आत्मोन्नति की राह नजर आती है, अपने जीवन को साधनामय बनाने की प्रेरणा मिलती है, सिद्ध संतों के सामीप्य का सुअवसर मिलता है, ऐसे सद्गुरु का सान्निध्य भी हमें हमारे परम सौभाग्य से एकमात्र उस प्यारे परमेश्वर की कृपा से ही मिलता है ।

प्रभु की असीम कृपा से ही मुझे मिले संत शिरोमणि श्री श्री स्वामी सत्यानन्द जी महाराज जी, जो १९वीं सदी के एक शांत, दान्त, सिद्ध, उच्च कोटि के महान संत थे । एक सच्चे अनुभवी, पहुंचे हुए पूरे सतगुरु एवं महान योगी थे । इन्हीं पूज्यपाद स्वामीजी ने नाम दीक्षा के द्वारा अपनी संकल्प शक्ति से मेरे अन्तःकरण में एक जाग्रत चैतन्य मन्त्र "राम नाम" स्थापित कर दिया और पढाया नामयोग का पाठ । "सद्गुरु दर्शन" और मिलन के उपरांत मेरी सर्वोच्च उपलब्धि रही, सद्गुरु के "कृपा पात्र" बन पाने का सौभाग्य, जो बिरले साधकों को मिलता है । मुझे उनकी वाणी से, उनके दृष्टिपात से तथा उनके सानिध्य से मिली उनकी हार्दिक शुभ कामनाएं और उनका वरदायक आशीर्वाद । उनकी दिव्य शक्ति से मेरे रुग्ण तन को सुदृढ़ आत्मिक बल मिला और मिला अनिवर्चनीय आनंद, ऐसा आनंद जिसे पाने के लिए ऋषि मुनि गृह त्यागते हैं और अथक साधना करते हैं । उनके सामीप्य से पाए साधन की साधना से मेरा मन जड़ता से दूर जाने के लिए और चिन्मयता की प्राप्ति के लिए आकुल हो उठा, मेरे मन में संत दर्शन तथा सत्संगों में सम्मिलित होने की लालसा तीव्रता से जाग्रत हो गयी ।

मेरी संत-दर्शन और दिव्य विभूतियों के सत्संग की इच्छा अनुचित नहीं थी क्योकि श्री स्वामी जी महाराज द्वारा रचित (अवतरित) ग्रंथो मे यही पावन ऊर्जा तरंगित हो रही है कि संसार की दिव्य विभूतियों के जीवन से जब भी जहाँ कहीं भी जो सार तत्व, जो सत्व गुण सीखने को मिले, उसे तत्क्षण अपने जीवन में उतारें और साधन धाम मानव जीवन को सार्थक बनाएँ । उनकी वाणी है ---

मिले रत्न गुण जहाँ से, लेवे हाथ पसार ।
काढ़े कंचन पंक से, हीरा मणि सँवार ।।

(भक्ति-प्रकाश से संकलित)

अतएव यूँ समझिये कि अपने सद्गुरु प्रातः स्मरणीय पूज्यपाद स्वामी श्री सत्यानन्दजी महाराज की "कृपा-प्रसाद" से ही हमें समय समय पर अनेकानेक परमहंस संतों के दर्शन हुए और उनके सान्निध्य के सुअवसर भी मिले ।

इनमें "विपुल" मुम्बई के सर्वस्व श्री अनंत स्वामी अखंडानंदजी, गणेशपुरी के संस्थापक स्वामी मुक्तानंद जी, चिन्मय मिशन के संरक्षक स्वामी चिन्मयानंदजी, श्री श्री माँ आनंदमयी, श्री श्री माँ निर्मला देवी, योगीराज श्री श्री देवराहा बाबा, अनंत श्री श्री राधाबाबा, जगद्गुरु श्री रामकृपालु महाराज, आदि अति उल्लेखनीय हैं । इनके समक्ष हमें परिवार सहित भजन-कीर्तन की प्रस्तुति करने का, उनके श्री चरणों पर अपने श्रद्धा सुमन अर्पित करने का अवसर मिला है ।

इस संदर्भ में यह बताना अनिवार्य सा है कि उपरोक्त संतजनों के अतिरिक्त मानस मर्मज्ञ अंजनी नंदन शरण जी, मानस के अमर प्रेमी श्री राम किंकर जी महाराज, स्वामी ध्यानानन्दजी, बाबा नीम करोली, संत शिरोमणि डोंगरे जी महाराज, गायत्री परिवार शांति निकुंज हरिद्वार के संस्थापक श्री राम शर्मा जी, स्वर्गाश्रम के विभिन्न संतजन, कहाँ तक नाम गिनूँ, समकालीन सभी दिव्य आत्म विभूतियों से आध्यात्मिक विचारों का आदान-प्रदान करने का सुअवसर मिला, जीवन-मूल्यों के विचार रत्न मिले, साधना प्रशस्त करने का पथ मिला, जीवन में चरितार्थ करके जीवन का सर्वांगीण विकास करने वाले अनमोल सूत्रों का बोध हुआ । यह सर्वशक्तिमान प्रभु की असीम अनुकम्पा ही तो है जिसकी प्रेरणा से इन संत-महात्माओं ने अपनी दिव्य दृष्टि से औरअपने स्नेहिल आशीर्वाद से हमें और हमारे परिवार को कृतकृत्य किया है ।

यह मेरी अनुभूत मान्यता है कि सिद्ध संतों और सद्गुरु की दृष्टि से, शब्द से और स्पर्श से साधक की आत्मिक शक्ति जगती है । साधक जहां भी जाए, जो भी करे, जो भी सोचे, गुरु सदैव उसके साथ रहते हैं ।

एक विलक्षण एवं अद्वितीय सद्गुरु पूज्यपाद स्वामी सत्यानंदजी महाराज के सानिध्य में, उनकी छत्रछाया में मैंने जीवन में प्रथम बार पंचरात्रि साधना सत्संग का अनिर्वचनीय आत्मिक आनंद उठाया । जगत-व्यवहार में उनका हमारा साथ उतना ही था क्योंकि उसके एक वर्ष बाद ही वह ब्रह्मलीन हो गए, मेरा दुबारा मिलना नहीं हुआ । लेकिन मैंने अपने जीवन में अनेकों बार अपने हृदय की गहरायी से महसूस किया है, कि हमारे सद्गुरु भौतिक चोला छोड़ने के बाद भी सूक्ष्म रूप से हमारे अंग-संग रहे, और आज भी हैं ।

मानस -पटल पर अंकित एक अनुपम अविस्मरणीय आत्मानुभव; जिसके याद आते ही आभार के अश्रु कण आँखों से छलकने लगते है, एक दिव्य आनंद से हृदय छलछला उठता है -- वह है, "परमधाम डलहौज़ी" में आयोजित त्रिदिवसीय साधना-सत्संग ।

आइये; आपका परिचय करा दूँ "परमधाम डलहौज़ी" से यानी कि परम पूज्य श्री स्वामी सत्यानन्द जी महाराज की तपस्थली से, प्रभु से साक्षात्कार का ऐतिहासिक व नीरव, शांत असीम ऊर्जा व तेज के अनुपम स्थल से ।

यह वह पुण्यस्थली है जहाँ सर्वशक्तिमान परम सत्ता का "राम राम "की ध्वनि में अवतरण हुआ, जो कालांतर में श्री रामशरणम नामक संस्था की स्थापना का मूल स्रोत रहा । योगसिद्ध स्वामीजी महाराज ने चौसठ वर्ष की आयु में परमात्म-मिलन की इच्छा से हिमालय के डलहौज़ी नामक निर्जन स्थान पर अनवरत साधना की । एक माह के अनंतर ७-७-१९२५ व्यास पूर्णिमा के मांगलिक पर्व के दिन उनकी चित्तवृत्तियाँ सविकल्पक समाधि से ऊर्ध्वगामी हुईं, परमात्मा से साक्षात्कार हुआ, ज्योति स्वरूप परमात्मा के दर्शन हुए, एक दिव्य ध्वनि में "राम राम" निनादित हुआ, आदेशात्मक स्वर गूंजा "राम भज, राम भज" । स्वामीजी को राम नाद द्वारा आस्तिकता का प्रचार-प्रसार करने का भी सन्देश मिला । स्वामीजी महाराज अपने इष्ट भगवान श्री राम को ही अपना परमगुरु बताते थे और अक्सर "परमगुरु जय जय राम " की धुन लगाते थे ।

महाराज जी ने परमात्मा के साक्षात्कार के विषय में अपने श्रीमुख से कहा है "मुझे उस स्थान पर साधना करते एक मास बीत गया । एक दिन जब मैं आँखे बंद किये प्रार्थना कर रहा था, मुझे "राम" शब्द बहुत ही सुंदर और आकर्षक स्वरों में सुनाई दिया, मैंने समझा कि कोई प्राणी इधर उधर राम-नाम का उच्चारण कर रहा है । ऑंखें खोलीं तो दूर दूर तक कोई दृष्टिगोचर नहीं हुआ । फिर आँखें बंद की तो उसी मधुर स्वर में पुनः वही "राम", "राम" सुनाई दिया, साथ ही आदेश "राम भज, राम भज“, "राम", "राम" ।

"मेरे प्रार्थना करने पर वह शब्द जब पुनः आया फिर दर्शन की मांग करने पर यह प्रश्न उठा " किस रूप का दर्शन चाहते हो ?" मैंने कहा, " जो तेरा रूप हो मैं क्या बताऊँ ?" तब यह "रा" और "म" अक्षरमयी "राम" रूप का तेजोमयी दर्शन हुआ ।

सन्त कुल दिवाकर स्वामी सत्यानंदजी महाराज की इस तपोभूमि को खोज निकाला श्रीरामशरणम गोहाना के प्रतिपालक; स्वामीजी के अतिप्रिय वरिष्ठ साधक, परमपूज्य श्री हंसराज भगतजी ने और उनके सहयोगियों साधकों ने ।

यहां यह बताना चाहता हूँ कि श्री हंसराजजी की अध्यात्म में रुचि और निष्ठा को आंक कर उनकी बाल्यावस्था में ही स्वामी जी ने उनका नाम “भगत” रख दिया था । स्वामीजी ने १९३६ में राम नाम के प्रचार के लिए पांच सदस्यों का जो राम सेवक संघ बनाया था, उसके एक सदस्य (पिताजी) हँस राज भी थे जो १९४६ में पाकिस्तान बनने से पूर्व ही भारत आ गये थे ।

इन्हीं के अथक प्रयास और पुरुषार्थ से डलहौज़ी के नारवुड के शिखर पर बादलों से आवृत पहाड़ियों और नीचे की आकर्षक मनमोहक प्राकृतिक सौंदर्य से अवगुंठित गहरी घाटियों के बीच स्वामीजी के तपस्थल पर निर्मित हो गया, अखण्ड जाप का कमरा और सत्संग-भवन, साथ ही साधकों के निवास के लिए सुविधाजनक कमरे को समेटे एक भव्य प्रासाद । इसे नाम दिया गया "श्री रामशरणम, परमधाम डलहौज़ी" । यहां लगने लगे साधना-सत्संग । यहाँ पहुँचने के लिए पहिली संकेतक सीढ़ी पर अंकित किया गया "परमधाम स्वामी श्री सत्यानंदजी महाराज डलहौज़ी" । इस परमधाम का साधना सत्संग कैसे और किस अदृश्य प्रेरणा और दिग्दर्शन से संभव हुआ से हुआ, गुरुदेव की कैसी कृपा हुई, कैसे हुआ यह चमत्कार ? सबके लिए हम पूज्य पिताजी के आजन्म ऋणी हैं ।

प्रियजन ! हमारा परम सौभाग्य रहा कि मुझे और मेरी पत्नी कृष्णा को श्रीरामशरणम गोहाना के प्रतिपालक; स्वामीजी के अतिप्रिय वरिष्ठ साधक परम पूज्य हंसराज "भगत"(पिताजी") की छत्रछाया में २००३ में "परमधाम" डलहौज़ी में आयोजित त्रिदिवसीय साधना-सत्संग में सम्मिलित होने की अनुमति मिल गयी ।

दिल्ली से पठानकोट तक की यात्रा का ट्रेन में रिज़र्वेशन हो गया, उसके आगे तो टैक्सी या बस से जाना था । जब ट्रेन में बैठे तब पता चला कि जो साधक हमारे साथ यात्रा करने वाले थे, उनका कार्यक्रम किसी कारणवश स्थगित हो गया । अनजान नगर, अनजान डगर, चक्की बैंक उतरना है या पठानकोट, इसका भी बोध नहीं, अवस्था जन्य शारीरिक शिथिलता, हम अवरोध के पर्वतों से घिर गए; चिंता होना स्वाभाविक ही था ।

अनुभूतियों के आधार पर कहता हूँ जीवन में बहुत यात्राएं कीं, चारों धाम की यात्रा भी की, पर इस पावन तीर्थस्थल की यात्रा अनुपम, अनूठी रही जिसने अहसास दिला दिया कि सिद्ध संत सद्गुरु हमारी समस्याओं के अवतरण से पूर्व, हमारी भविष्य में आने वाली समस्याओं के निराकरण की व्यवस्था कर देते हैं । ये अदृश्य रीति से साधकों पर किस भाव से और कैसे अहेतुकी कृपा कर देते हैं, कैसे कृपा अवतरित होती है; यह सब समझना हमारी मानवीय बुद्धि से परे है । हमारी यात्रा के दौरान कब, कैसे, किस रूप में किस किस को निमित्त बना कर प्रगट हुए हमारे सद्गुरु स्वामी सत्यानन्दजी महाराज जो हमारे सहायक बने, जिन्होंने ट्रेन में हमारा पथ प्रदर्शित किया । गुरुदेव की कैसी कृपा हुई; कैसे हुआ यह चमत्कार ? सब सपना सा लगता है, हमारी बुद्धि से परे है ।

कौन होगा उन जैसा कृपालु सहायक, जिनका आश्रय ले कर हम दोनों ने त्रिदिवसीय सत्संग का अपूर्व लाभ उठाया । वहाँ के साधना सत्संग में दिन हो या रात, अखंड जाप के कमरे में जा कर कभी भी जप कर सकते थे । वर्षा खूब हो रही थी, रात्रि में जाप करने का सुअवसर मिला, प्रेरणा स्वामी जी की थी, जाप तो हुआ ही साथ ही अखंड ज्योति में ज्योति बदलने का सौभाग्य भी मिल गया, इसी बहाने से स्वामीजी ने सत्संग में इस सेवा को करने का अनमोल अवसर प्रदान किया । हमें सद्गुरु स्वामी जी महाराज की प्रेम से परिपूर्ण, भावनाओं से भीगा और अपनत्व से ओतप्रोत आशीर्वाद मिल गया, और क्या चाहिए ।

एक दिन दोपहर की धूप का आनंद लेते हुए श्री पिताजी साधकों पर अपनी वाणी और दृष्टि से कृपा वृष्टि कर रहे थे उसी समय उनको प्रणाम करते समय जितना प्यार और आशीर्वाद मिला, जितनी शक्ति प्रदान की, उसे हम लोग आजीवन भुला नहीं सकते । हमारे पीठ पर हाथ फेरते फेरते जो आनंद दिया, उस दिव्य अनुभूति का अहसास आजीवन बना रहेगा ।

यहां एक और चमत्कारिक अनुभव हुआ, कई साधकों से सुना था कि स्वामीजी की साधना की सात्विक तरंगों के प्रभाव से शिवालिक की पहाड़ियों के नीरव वातावरण में "राम नाम" की ध्वनि गुंजायमान है जिसे प्रातःकालीन सैर करते समय सुन सकते है । हम दोनों शारीरिक अस्वस्थता के कारण सैर के लिए नहीं जा सके लेकिन हमने वहाँ रात्रि में "राम" नाम अनुरागी साधको के स्वर में स्वर मिलाये परम धाम में नीड़ बनाये पंछी की "राम राम" धुन अवश्य सुनी । केवल मैंने ही नहीं कृष्णा जी ने तथा अन्य साधको ने भी आकाश के पंछियों को वहाँ "राम राम" प्रतिध्वनित करते हुए सुना ।

इस क्षण स्मृति पटल पर चलचित्र के समान प्रगट हो गई है "परम धाम" में बितायी उस रात्रि की कहानी जब सत्संग की अंतिम सभा की समाप्ति पर, रात्रि की नीरवता को चीरती एक अनोखी राम धुन सुनायी पड़ी, "रा s s s म, रा s s s म, रा s s s म, रा s s s म " । अंतरतम छू लिया इस स्वर लहरी ने, और व्यक्त हुए ये उदगार----

बर्फ गिरती, पानी जमता, उसका नाम जपन नहीं थमता ।
वह तो, राम राम ही बोले रे, मेरे परमधाम में डोले रे ।।

बाबा ने जो मन्त्र गुंजाया, उसने अब तक न बिसराया ।
वह तो अनहद स्वर में बोले रे, कानों में अमृत घोले रे ।।

बोले बोले रे राम चिरैया, मेरे बाबा की कुटिया में बोले रे ।
कानों में अमृत रस घोले रे, वह परम धाम में डोले रे ।।

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हमारा परम सौभाग्य रहा कि हम दोनों को (कृष्णा जी और मुझे) आज से लगभग छै दशक पूर्व ही मिल गये थे, हमारे सद्गुरु परम श्रद्धेय श्री स्वामी सत्यानन्द जी महाराज और उन्हीं की श्रंखला के अंतर्गत स्वामी जी के बाद श्रद्धेय श्री प्रेमजी महाराज और उनके बाद आस्तिक भाव की अभिवृद्धि की परंपरा में पूर्णतः समर्पित डॉक्टर विश्वामित्र जी महाराज ।

स्वामी जी ने नाम दान दे कर किया था मनुजता का उद्धार, श्री प्रेमजी महाराज ने निःस्वार्थ सेवा का संकल्प लेकर, घर घर जाकर, दवा खिलाकर किया था रोगियों का उपचार और डाक्टर विश्वामित्र महाजन जी ने विश्व के मित्र बन कर सौहार्दपूर्ण व्यवहार किया और बरसायी सभी साधकों पर प्रेम प्रीति की अमृत धार ।

ये सभी गुरुजन अतीन्द्रिय शक्तियों से सम्पन्न थे, उनके आशीर्वाद में, उनकी दया दृष्टि में अपार शक्ति निहित थी । श्रीरामशरणम लाजपत नगर, दिल्ली के इन तीनों सद्गुरु की निराली छवि, मन मोहिनी मुस्कान, आल्हादित मुखमण्डल, दिव्य तेज; आज भी सब साधकों के उर-अंतर में बसा है । अनजान, अपरिचित व्यक्ति भी यदि इनके दर्शन कर लेता था तो इनकी छवि को भुला नहीं पाता था, फिर साधक जनों के तो कहने ही क्या ।

अपनी आपबीती बताऊँ ; जब जब मैं अपनी आत्मकथा के पृष्ठ पलटता हूँ, मुझे तीनों गुरुजनों के स्नेहिल स्पर्श का अहसास ही होता है । ये तीनों सद्गुरु अपनी कृपा दृष्टि से हमारे ऊपर और हमारे परिवार के ऊपर परम कृपालु रहे, सहायक रहे, पथ-प्रदर्शक रहे, भक्ति-भाव से भरे भजन से प्रभु की उपासना का साधन साधने के प्रेरक रहे, हमारे लौकिक और दैवी जीवन के निर्माणकर्ता रहे ।

सद्गुरु स्वामीजी महाराज की अहैतुकी कृपा ने हमारे हृदय में नाम की ज्योति जगाई, उसके दिव्य प्रकाश में हमारा आध्यात्मिक पथ प्रशस्त किया और उन्होंने नामयोग के अंतर्गत नाम दीक्षा दे कर हमारा उद्धार किया; प्रेमसिन्धु पूज्य प्रेमजी महाराज ने हमें कर्तव्य-परायणता का पाठ पढाया, निष्ठापूर्वक ईमानदारी से सेवा भाव की कर्तव्य भूमि पर हमें चलाया और जब कहीं पर भयावह परिस्थितियों ने हमें दबोचा, मीलों दूर रहने पर भी, अपनी संकल्प शक्ति से प्रगट हो कर हमे उबारा;और महर्षि डॉ विश्वामित्तरजी ने भजन-कीर्तन के आनंद की मस्ती में डुबो कर प्रेम-प्रीति की अमृतधार प्रवाहित करने में हमारी मदद की ।

परम कृपालु सहायक हैं वे, बिन कारण सुखदायक हैं वे ।केवल एक उन्हीं के आगे साधक बांह पसार रे ।।जैसा मैंने पहिले भी बताया है, कि ये तीनों सद्गुरु सर्वदा हमारे ऊपर बड़े दयालु, कृपालु रहे ।

सेवा, विनम्रता, और प्रेम की प्रतिमूर्ति श्री प्रेमजी महाराज जी ने राम मन्त्र सिद्ध कर लिया था । अतः वे अपनी संकल्प शक्ति से हजारों मील दूर रहते हुए भी हमारी सच्ची पुकार सुन कर तत्क्षण हमारा मार्गदर्शन करते थे, कल्याण करते थे । दक्षिणी अमेरिका में स्थित गयाना में वे हमें मुसीबत से उबारने आये । मौन रहकर भी साधक के मन के विचारों को जानकर उसका समाधान कर देना, पूज्य प्रेमजी महाराज की बहुत बड़ी विशेषता थी । श्रीदेवी का विवाह संस्कार सम्पन्न करने से पूर्व जब हम दोनों उनका आशीर्वाद लेने श्री रामशरणम, दिल्ली गए, उनके दर्शन किये, उनसे मिले पर हमने अपनी कुछ इच्छा प्रगट नहीं की, कुछ माँगा भी नहीं, उनकी कुपालुता देखिये, दर्शन करके जब हम एक आध कदम ही चले थे तो हमें बुलवाया और कहा 'बेटी का विवाह करने जा रहे हो, गले नहीं मिलोगे’ । कैसे हमारे मन की बात जान ली, हम उनके पास इसीलिए तो गए थे । फिर गले लगाया, अमृतवाणी पर श्रीदेवी के लिए आशीर्वचन लिखकर उसके लिए अमूल्य उपहार दिया और फ़िलेडैल्फ़िया अमेरिका में स्वामीजी के साथ मेरी बेटी श्रीदेवी को आशीर्वाद देने उसके घर भी पधारे; अदृश्य रूप से, स्वप्न में । उन्होंने निराली कृपा की, झोली तो हमारी छोटी रही, उनकी कृपा अपरम्पार थी ।

श्री प्रेमजी महाराज के महानिर्वाण के बाद सर्वसम्मति से ट्रस्ट ने डाक्टर विश्वामित्र महाजनजी को, जिन्होंने श्री प्रेमजी महाराज के आदेशानुसार मनाली में रह कर पाँच वर्ष तक प्रबल तपस्या की थी; श्रीरामशरणम् रिंग रोड दिल्ली के आध्यात्मिक उत्तराधिकारी के पद पर प्रतिष्ठित किया । यद्यपि डॉ महाजन ने देवी शक्ति के आशाीष से बहुत सिद्धियां पायीं थीं जिनका प्रयोग उन्होंने अपने जीवन काल मे साधको की मुक्ति और कष्ट निवारण के लिये किया था लेकिन वे उन सिद्धियों के अधिकारी है, यह न तो किसी को बताया न जताया सिर्फ बोलते रहे कि परम प्रभु श्री राम और “बाबा गुरु” स्वामी जी महाराज की कृपा से हो रहा है, वे ही प्रतिपालक हैं, सहायक हैं । परम पूज्यनीय श्री विश्वामित्र जी महाराज जी ने दोनों गुरुजनों से विरासत मे मिले अक्षत आध्यात्मिक कोष में कई गुना वृद्धि करते हुए देश विदेश मे जन जन तक राम नाम के अमृत प्रसाद को बांटा I एक सच्चा, सरल, विनम्र, निष्काम, निराभिमानी भक्त व गुरुमुखी, अनुशासनप्रिय शिष्य ही गुरुजनों द्वारा अपनाई गई सीधी राह पर चलकर उनके द्वारा रोपे गये बीज को विशाल वट वृक्ष बना सकता है, अपने जीवन से यह अनुपम उदाहरण उन्होने हम सब के समक्ष रखा है I

श्री रामकृपा से प्रेमजी महाराज के आदेशानुसार सूटर गंज कानपुर के अपने पैतृक घर में हम प्रति रविवार सत्संग नियमित रूप से लगा रहे थे, उसके संचालन के सिलसिले में पत्र-व्यवहार से डॉ विश्वामित्र महाजन से हमारा आत्मीय सम्बन्ध जुड़ा ।

शायद 1980 के दशक के मध्य में मुझे "एम्स नयी दिल्ली" में कार्यरत डॉक्टर विश्वामित्र महाजन के प्रथम दर्शन का सौभाग्य जालंधर के साधक, मेरे परम स्नेही श्री नरेंद्र साही जी, श्री केवल वर्मा जी एवं श्री प्रदीप भारद्धाज जी के अनुग्रह से हुआ था । जालंधर के ये तीनों साधक डॉक्टर महाजन की आध्यात्मिक ऊर्जा से पूर्व परिचित थे । "एम्स" में डॉ महाजन से हमारी यह भेंट क्षणिक ही थी, सच पूछें तो हमारी केवल राम राम ही हो पाई थी । जो भी हो, मेरे तथा गुरुदेव विश्वामित्र जी के अटूट सम्बन्ध की वह प्रथम कड़ी थी ।

अब् आगे की सुनिए, 'सेवानिवृत' हो जाने के बाद हम और कृष्णा बहुधा कानपुर के अपने स्थायी निवास स्थान से बाहर अपने बच्चों के पास, कभी माधव के पास देवास अथवा अहमदाबाद में, तो कभी राघव के पास नासिक में, कभी प्रार्थना के पास जालंधर में, तो कभी श्रीदेवी के पास पिट्सबर्ग में अथवा रामजी के पास यूरोप में लम्बे प्रवास करते रहते थे ।

९० के दशक की बात है, हम दोनों प्रार्थना के पास, जम्मू पहुंचे, उन दिनों मेरे दामाद आलोक वही कार्यरत थे, उसने बताया कि उसके पास जालंधर से श्री साहीजी, प्रदीपजी और श्री केवलजी के अनेक फोन आ रहे हैं, सब आपको खोज रहे हैं, उनके यहां श्रीमद्भगवद्गीता पर प्रवचन हो रहे है, जिसमें शामिल होने के लिए जल्द से जल्द जालंधर बुला रहे हैं । ये प्रवचन मनाली में पाँच वर्ष की गहन तपस्या करने के बाद जालन्धर के साधकों को उसका अमृतमय प्रसाद बांटने के लिए पूज्यनीय डॉक्टर विश्वामित्र जी महाजन जी कर रहे थे, मैं तो समाप्ति के दिन अंतिम सभा में ही शामिल हो सका; पर मेरे तथा गुरुदेव विश्वामित्र जी के अटूट सम्बन्ध की यह दूसरी कड़ी थी ।

फिर तो हमारा परम सौभाग्य रहा कि सर्वशक्तिमान श्री राम की असीम कृपा से नित निरन्तर यह प्रेम-सम्बन्ध दृढ़ होता गया, कालान्तर में "प्रेम भक्ति" के मिलन का यह नन्हा बीज विकसित होकर कितना हरिआया; कितना फूला फला; कितना दिव्य रसानुभूति का मूल स्रोत्र बना, उसका अनुमान इस दासानुदास का अंतर मन ही लगा सकता है । रसना अथवा लेखनी के द्वारा उसकी चर्चा कर पाना कठिन ही नहीं, असंभव भी है ; फिर भी मुझ जैसे साधारण प्राणी के प्रति उनके सद्भाव और अथाह प्रेम को दर्शाने वाले कुछ संस्मरण प्रस्तुत करने का प्रयत्न कर रहा हूँ ।

सन २००५ में जब मैं भारत से बॉस्टन लौटने के पहले गुरुदेव पूज्यनीय डॉक्टर विश्वामित्र जी महाजन का आशीर्वाद लेने श्री रामशरणम् गया तब भेंट हो जाने के बाद महाराज जी मुझे आश्रम के मुख्य द्वार तक स्वयं पहुँचाने आये । यह ही नहीं, उन्होंने इशारे से वाचमेन को पास बुलाकर दूर खड़ी मेरी गाड़ी को आश्रम के द्वार पर लगवाने का आदेश दिया और जब तक गाड़ी नही आई, महाराजजी वहीं खड़े रहे । उनके स्नेह को कैसे व्यक्त करू, फाटक तक ही नहीं अपितु गाड़ी तक आकर स्वयं दरवाज़ा खोल कर उन्होंने, मुझे बिठाया और यह कह कर बिदा किया "अपनी सेहत का ख्याल रखियेगा" । मेरे साथ ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था, मेरे जैसे साधारण साधक को श्री महाराज जी ने इतना स्नेह और सम्मान; अपने मुख से बखानना अच्छा नहीं लगता । आज भी उस क्षण की याद आते ही मेरा मन कृतज्ञता से भर जाता है, अहसास होता है कि मैं कितना भग्यशाली हूँ ?

अब सुनिए प्रियजन, यहाँ बॉस्टन पहुंचते ही मुझे मेरे जीवन का पहला हार्ट अटेक हुआ, दो बार एन्जिओप्लस्टी हुई, तीन "स्टंट" लगे । जीवन रक्षा हुई, प्रभु की अपार कृपा का दर्शन हुआ । गुरुदेव श्री विश्वमित्र जी द्वारा चलते समय दिया हुआ अपने स्वास्थ्य के प्रति सावधानी बरतने के सुझाव का महत्व सहसा समझ में आ गया ।

२००८ की बात है, याद आ रहा है वह दिन जब दिल्ली में महाराज जी ने कृष्णा जी का हाथ पकड़ कर बड़े आग्रह से कहा था कि वह मुझे शीघ्रातिशीघ्र अमेरिका वापस ले जाएँ, मेरा स्वास्थ्य वहीं ठीक रहेगा । सत्संग की सभा में, भजन गाते हुए बीच में खांसी आ जाने के कारण मुझे कई बार रुकना पड़ा ; परम कृपालु श्री महाराज जी मेरी दशा निकट से देख रहे थे । वे जानते थे कि भारत के प्रदूषण भरे वातावरण में मेरे स्वास्थ्य में कोई सुधार नहीं होगा, उल्टा वह अधिक बिगड़ ही सकता है । मैंने अति दुखी हो कर पूछा कि "महाराज जी, मुझे क्यों अपने से दूर करना चाहते हैं ?" । महाराज जी ने मुस्कुरा कर कहा था " श्रीवास्तव जी, आप यहाँ नहीं आ पाएंगे तो क्या मैं ही वहाँ आ जाऊँगा, आपजी के दर्शन करने" । महाराज जी का उपरोक्त कथन, उनकी शब्दावली । प्रियजन, इतनी 'प्रेम-पगी" भाषा केवल दिव्य आत्माएं हीं बोल सकतीं हैं । मुझे इस समय भी रोमांच हो रहा है, मेरी आँखें भर आयीं हैं उस क्षण के स्मरण मात्र से ।

महाराज जी के कथन का एक एक शब्द सत्य हुआ, यहाँ आकर मैं स्वस्थ हुआ । महाराज जी ने अतिशय कृपा करके हमे प्रति वर्ष यहाँ यू. एस. ए. में दर्शन दिया । भाग्यशाली हूँ, स्थानीय साधकों ने बताया कि यहाँ पहुचने पर महाराज श्री एयर पोर्ट से ही अन्य साधकों के साथ साथ, मेरी भी खोज चालू कर देते थे । हाँ, आप सब जानते हैं अस्वस्थता के कारण यहाँ सत्संग के दौरान भी मैं महाराज जी से केवल एक दो बार ही मिल पाता था परन्तु नित्य उनके सन्मुख बैठ कर, कुछ पलों तक, खुली-बंद-आँखों से उन्हें लगातार निहारते रहने का आनंद दोनों हाथों से बटोरता था ।

आपको याद होगा, २०१२ के अंतिम यू. एस. सत्संग में, बहुत चाह कर भी मैं महाराज जी के निदेशानुसार उन्हें भजन नहीं सुना सका था । न जाने क्यूँ उस समय कंठ से बोल निकल ही नहीं पाए । कदाचित कोई पूर्वाभास था, जिसका दर्शन करवाकर महाराजश्री ने मुझे भविष्य से अवगत करवाया था । धन्य धन्य हैं हम, महाराजश्री हम सब पर सदा ऐसी ही कृपा बनाये रखें । 2 जुलाई 2012 को उन्होने देह त्याग दिया, किन्तु वह सब के दिलो में विराजमान है, ओजस्वी दिव्य वाणी से सबको राह दिखा रहे है I सब की समस्याओं का निदान साधकों को मिल जाता है, यह सभी की अनुभूति है I

आत्मकथा में गुरुजनों की कृपालुता और उनके आत्मीय सम्बन्ध के संस्मरण के सन्दर्भ में स्मृति पटलपर जीवंत हो उठा है परम पूज्य पिताजी हंसराज भगत जी की छत्रछाया में निर्मित ३४ सेक्टर नोएडा का श्री राम शरणम्, गोहाना का श्रीराम शरणम् और माँ शकुन्तला जी की तपस्या का प्रतीक पानीपत का श्रीरामशरणम्, जिसका उद्घाटन करते हुए स्वामीजी ने अपने उदगार व्यक्त किये कि ”यह हृदय का उद्घाटन है “ । अनुभूत हुआ परम पूज्य स्वामीजी की दिव्य स्पर्श और आशीर्वाद । इस पावन पुण्यमयी स्थली में, एक पंचरात्रि-साधना सत्संग में साधननिष्ठ दर्शी बहिनजी का जो प्यार-दुलार मिला, वह अविस्मरणीय है ।

जब माधव ३४ सेक्टर नोएडा में रहता था, हम लोग के घर के पास ही पिताजी द्वारा संस्थापित श्री रामशरणम् था जहां सुबह-शाम हम दोनों टहलते हुए चले जाते थे, या प्रातः ५-६ बजे अमृतवाणी में जाते थे, अखण्ड जाप और सत्संग में सम्मिलित हो जाते थे और समय समय पर परम पूज्य पिताजी के दर्शन और सत्संग का सौभाग्य प्राप्त करते रहते थे ।

सन २००३ की बात है, कृष्णा के भतीजे अतुल ने बतलाया कि गोहाना श्री रामशरणम् में तीन माह अखंड ज्योति जलती है, अखंड जाप होता है, आप दर्शन कर आओ । उसकी प्रेरणा से और स्वामीजी की आज्ञा से एक दिन के लिए साधकों के साथ हम दोनों वहाँ गये । उस दिन अखंड ज्योति के दर्शन के साथ साथ पिताजी के दर्शन किये, उनसे कुछ वार्ता भी हुई, जिससे स्वामीजी के प्रिय साधक माननीय श्री शिवदयालजी और उनके आपसी संबंध की घनिष्ठता का बोध हुआ, गुड का प्रसाद भी मिला । कौन कौन गुण गाऊ---

सन २०१४ में प्रार्थना के साथ गये थे तब व्हील चेयेर पर बैठे पिताजी के दर्शन हुए थे; यही उनसे अंतिम मिलन था; अंतिम दर्शन था ।

मैंने अपनी आत्म कथा में अनेको बार दिव्य विभूतियों के, सिद्ध गुरुजनों की स्नेहिल क्षणों की मधुर स्मृतियों को बयान करने का प्रयास किया है; किसी अहंकार से नहीं वरन इस स्वार्थ से कि मुझे आज भी उन मधुर पलों की स्मृति मात्र से रोमांच हो जाता है; वर्षों पूर्व के वे अविस्मृत चिरंतन दृश्य मेरे सन्मुख जीवंत हो उठते हैं । गुरुजन के आशीर्वाद से मुझे पुनः उस "नित्य-नूतन-रसोत्पाद्क" दिव्य आनन्द की अनुभूति होती है जो उनके सानिद्ध्य में बिताये क्षणों में मिली थी ।

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प्रियजन !

सर्व विदित है कि आपका यह "भोला" न तो संत है, न ग्यानी, न विरागी, न जोगी । सौभाग्यवश गुरुजन के गुरुमंत्र से, उनकी करुणा और कृपा से, उनके आशीर्वाद से इसे अनेकानेक उपलब्धिया हुईं । ज़िक्र करूँगा, तो कदाचित अभिमानी अहंकारी कहा जाऊँगा । अस्तु केवल यह बताऊंगा कि गुरुजन के आदेशानुसार साधना पथ पर मंत्र जाप, सिमरन, ध्यान एवं स्वर साधना करने से मुझे, उनके आशीर्वाद ने, इस स्थूल जगत में जहां एक तरफ धरती से उठाकर आकाश तक पहुंचाया, वहीं मेरी अंतरात्मा को जिस परमानंद का रसास्वादन करवाया, वह अवर्णनीय है ।

सर्वशक्तिमान परम प्रभु का आदेश है कि आत्म कथा के अन्तिम छोर में "कृपा" के दृष्टांत प्रस्तुत करूं और मैं वैसा ही कर रहा हूँ । समस्या यह है कि इस अंतिम पडाव में मुझे अपने आस पास ऐसा कुछ भी नहीं दिख रहा है जो "उनकी" कृपा के बिना मुझे प्राप्त हुआ हो ।

मुझे ऐसा लग रहा है कि मेरी हरेक सांस, मेरे हृदय की प्रत्येक धडकन, मेरा रोम रोम, मेरी शिराओं में प्रवाहित रक्त की एक एक बूंद, जो कुछ भी इस समय मेरे पास है वह सब ही "उनका" कृपा प्रसाद है । तर्क करने वाले तर्क करते रहते हैं लेकिन वे व्यक्ति जिन्होंने "परम" की अदृश्य शक्ति का अनुभव अपने दैनिक जीवन की गतिविधियों में किया है वे भली भांति जानते हैं कि भगवत्कृपा अनुभवगम्य है; उसके आनंद का अनुभव करो ।

अपनी आत्मकथा में अब तक मैंने कुछ निजी अनुभवों की झलक प्रस्तुत की है, जीवन की ढलती अवस्था में अपने जीवन का एक विलक्षण अनूठा अनुभव का वर्णन करने का प्रयास करने जा रहा हूँ । न तब समझ पाया था, न आज कि वह स्वप्न था अथवा जाग्रत अवस्था का सच्चा अनुभव । जो भी रहा हो, अब भी उसकी याद आते ही पूरे शरीर में आनंद की लहर दौड़ जाती है ।

मेरे अतीत की स्मृतियों में जीवन्त है, नवम्बर २००८ का वह दिन, जब मैं नोएडा के मेट्रो अस्पताल में इंटेन्सिव केयर यूनिट में अचेतन अवस्था में अपनी जिंदगी गुज़ार रहा था, हॉस्पिटल के आई. सी. यू. में मैं कितने दिन अचेत पड़ा रहा और कितने दिन मेरी भौतिक आँखें बंद रहीं थीं, मुझे याद नहीं । पर उतने दिन मुझे किसी प्रकार की कोई मानसिक अथवा शारीरिक पीड़ा महसूस ही नहीं हुई, मेरा बाह्य जगत से कोई भी सम्बन्ध नहीं रहा, यह पक्का है । उन दिनों जो चमत्कारिक अनुभव मुझे वहाँ हुआ, वह अविस्मरणीय है ।

प्रियजन ! वह अनुभव ही हमारे इस मानव जीवन की सबसे सार्थक उपलब्धि है ।

अतीत की स्मृतियाँ याद दिला रहीं है, नवम्बर २००८ की एक रात्रि, जब मैं जन्म-मरण के झूले में झूल रहा था, डॉक्टर क्रिटिकल अवस्था की घोषणा कर चुके थे, उस अचेत अवस्था में मुझे दिखा खुला हुआ विशाल सिंहद्वार और धवल प्रकाश पुन्ज से आवृत वैभवशाली प्रासाद जिसकी चमक धमक मेरी बन्द आँखो को भी चकाचौन्ध कर रही थी और मैंने सुना था सुमधुर "श्रुति" का गान ।

तन निश्चेष्ट था, ऐसे में, मेरी बंद आँखों के रजतपट पर जो प्रकाश पुंज था वह कदाचित भगवान् की कृपा का स्वरूप ही रहा होगा । वास्तव में वह था क्या ? मैं कहाँ था ? मैं अभी भी इसका निर्णय नहीं कर पा रहा हूँ । तब से ही मैं इस सोच में पड़ा हूँ कि अचेनता, बेहोशी, मदहोशी को मैं किस नाम से पुकारूँ ? इतना तो मुझे अच्छी तरह याद है कि अस्पताल में भर्ती होने से पहले घर में ही स्वजनो के बीच मैं कितने घंटों तक उसी अर्ध सुप्त अवस्था मे पड़ा रहा था । अस्पताल में शायद वह तन्द्रा अधिक गहन हो गयी होगी ।

अपनी अचेतन अवस्था में आई, सी. यू . में ही मैंने देखा कि मैं एक राज प्रासाद के विशाल सिंहद्वार के बाहर खडा हूँ । प्रासाद की प्राचीर के बाहर घनघोर अँधेरा है । हाथ को हाथ नहीं सूझता है । लेकिन खुले द्वार के आगे इतना धवल प्रकाश पुँज है कि आखें चका चौंध हो रहीं हैं । मैं देख रहा था उस प्रासाद के घेरे को, जिसमें संपूर्ण सृष्टि का विशिष्ट वैभव और सौन्दर्य समाहित था । इतना मनमोहक था वह दृश्य कि उससे नज़रे हटाने की इच्छा ही नहीं होती थी । उस राज प्रासाद का वैभव, उसकी विलक्षण सुन्दरता, उसके नन्दन बन के समान कुसुमित, सुरभित और सुगन्धित उद्यान और उसमे कूकती कोयल तथा चहचहाती अन्य चिड़ियों का मधुर कलरव; मेरी आत्मा के नेत्र खुले के खुले रह गये, पल भर को भी मेरी पलके नहीं झपकी । कितना निराला खेल चल रहा था ।

उस बुलन्द दरवाजे के आगे मैं निर्बल, बेबस, निराश्रय प्राणी अवाक् खडा था, उस विलक्षण प्रासाद में प्रवेश पाने को मेरा मन व्याकुल हो रहा था । मैं उस दूधिया प्रकाश पुंज को निकट से देखना चाहता था और उस मे समाहित सात रंगी किरणो से अपने रोम रोम को नहला देना चाहता था l अचेतन अवस्था में बिल्कुल सफ़ेद, चान्दी की तरह चमकीले, आँखो को चकाचौंध कर देने वाले रोशनी के गोले देखने के बाद मैं इतना संम्मोहित हो गया था कि उस निन्द्रा से जागना ही नहीं चाहता था । मेरा अन्तर जिस परमानन्द का रसास्वादन कर रहा था, उसको खोना नहीं चाहता था । मेरी दशा उस प्यासे राही के समान थी जिसे तपते मरुस्थल में दूर से ही एक हरा भरा ओएसिस दिखायी पड़ रहा हो, पर उसके पग इतने शक्तिहीन हो कि आगे बढ़ पाना उसे दुष्कर हो रहा हो ।

उठते नहीं चरन, निर्बल मैं, कैसे आ पाऊँगा अन्दर ।
मैं हूं वह, प्यासा राही जो, मूर्छित हुआ द्वार पर आकर ।।

प्रीतम प्यारे आगे आओ, गिर जाऊँगा हाथ बढ़ाओ ।
भरलो मुझे अङ्क में अपने, जनम जनम की प्यास बुझाओ ।।

मैं दरवाजे के बाहर ही खड़ा रहा । मैं उतना साहस बटोर न पाया कि बिना आज्ञा के भीतर घुस जाऊं और न कोई भीतर से आया मुझे अन्दर ले जाने को । मैं खड़ा का खड़ा रह गया । पर ये क्या हुआ, अचानक वह द्वार धीरे धीरे बन्द होने लगा । उसके बाहर झांकती प्रकाश की किरणें क्षीण होने लगी और मेरी बन्द आँखो के आगे से शनै : शने: अन्धकार उतरने लगा । मेरे कानों में मुरली की मधुर धुन के समान एक धुन बजने लगी, ऐसा लगा जैसे कोई कह रहा हो, "अभी समय नहीं हुआ, लौट जाओ । यात्रा पुन: शून्य से प्रारम्भ करो" मेरे कान में वह एक शब्द "शून्य" तब तक गूंजता रहा जब तक मैं पूरी तरह सचेत नहीं हो गया ।

इस दृश्य की सुन्दरता और मनोहरता का शब्दों में वर्णन कर पाना मेरे जैसे निरक्षर प्राणी के लिए असंभव है । कोई भी भाषा, शैली, कोई भी लिपि उतनी सक्षम नही कि उस विलक्ष्ण आनंद दायक सुन्दरता का वास्तविक शब्द चित्र खींच सके । मुझे उस मदहोशी में वो तस्कीने दिल मिल रहा था जो चिलमन के सरक जाने पर पर्दे के पीछे से छुप छुप कर अपनी महबूबा का दीदार करने वाले दीवाने आशिक को होता है, जो उस पल तक केवल तसव्वुर में ही उसकी तस्वीर देखता रहा है । यदि उर्दू शायरों की जुबान में कहूँ तो शायद ऐसी तस्वीर बनेगी --

मुझको मुंदी नजर से ही सब कुछ दिखा दिया ।
तेरे खयाल ने मुझे तुझ से मिला दिया ।।

मुझको दिखा के चकित किया रंग सृष्टि का ।
आनंद भरा रूप प्रभु का दिखा दिया ।।

चेहरा पिया का खेंच कर मन की किताब पर ।
मेरे हृदय को प्यार का गुलशन बना दिया ।।

मेरी दशा वैसी थी जैसे प्रेयसी का घूँघट उठ जाने पर उसका सुंदर मुखड़ा एकटक निहारते किसी प्रेमी की होती है । शायद बिलकुल ऐसा ही सुख, ऐसा ही आनंद, जीवन भर की लम्बी प्रतीक्षा के बाद, दर्शनाभिलाषी भक्त को अपने प्रियतम इष्ट देव के दर्शन से प्राप्त होती है ।

प्रियजन! उस दिव्य प्रकाश और श्रुति का समग्र दर्शन, उसके तुरन्त बाद ही परम पूज्य डॉ विश्वामित्र का दर्शन, मेरे मस्तक पर उनका वरद हस्त और उसके साथ साथ अकस्मात ही मेरा आई. सी. यू. से कमरे में आ जाना और स्वस्थ होना प्रारम्भ हो जाना क्या दर्शाता है ? यह मेरे चिंतन मनन का विषय रहा । कितनी अनहोनी बातें हुईं इसमें; पर विश्वास कीजिए वह सब घटनाएँ सचमुच ही घटीं थीं । और वैसे ही घटीं थीं जैसे मैंने बयाँ की ।

उस समय तो अशक्त था पर पुन : चेतनता पा जाने के बाद भी मैं अपने कृपण मन की गुप्त तिजोरी मे वह सारा आनन्द जो अचेतन अवस्था मे मुझे प्राप्त हुआ था, सन्जोये रहा । मैंने किसी से इस विषय मे वार्ता भी नही की । प्रश्न यह था कि जिस विषय को मैं स्वयं नही समझता उस विषय मे किसी अन्य से क्या चर्चा कऱता । अतएव सचेत होने के बाद भी, मैं बहुत समय तक इस चिन्तन मे व्यस्त रहा कि पुरातन काल से आज तक सिद्ध आत्माओं ने कठिन तपश्चर्या के पश्चात जिस "परम" का अनुभव किया वह कैसा था ? और मैंने, इस मरणासन्न साधारण मनुज ने, जो अपने क्षणिक अनुभव में देखा, वह स्वरुप (यदि सच्चा परम था) तो वह उन महात्माओं को दीखे परम से कितना भिन्न था ? वैदिक ऋषियों ने उद्घोषणा की है "ब्रह्मलोक प्रकाशमयम" ।

२००८ के हॉस्पिटल प्रवास के दौरान क्या क्या हुआ मुझे अब वो भी पूरा पूरा याद नहीं है । आपसे एक प्रार्थना है कि मेरे इस कथन को "मेरा अनुभव" मान कर पढ़ें । इस पर कोई अनावश्यक चर्चा न करें । मैं ये अनुभव इस लिए बता रहा हूँ कि इष्ट-कृपा पर भरोसा रखने वाले मेरे प्रियजन भी अपने अपने इष्ट के उतने ही कृपा पात्र बन सकें जितना यह अति साधारण नामानुरागी दासानुदास बन पाया है. ।

इस सन्दर्भ में बॉस्टन में रहते हुए अभी हाल ही में, मुझे एक विचित्र जानकारी मिली, मुझे ज्ञात हुआ है, कि आध्यात्मिक विषयों के शोध कर्ता एक अमेरिकन ने अनेको ऐसे अनुभवी साधकों से साक्षात्कार किया जिन्हें ध्यानावस्था में ऐसा प्रकाश दिखायी दिया था । उन्होंने यह देखा कि उन साधको में से लगभग पचास प्रतिशत ऐसे थे जो प्रकाश के उस दिव्य सौन्दर्य से ऐसे सम्मोहित हुए कि उस पर से नज़र हटा पाना उनके लिये मृत्यु को आलिंगन करने जैसा लगा । उस सुन्दर दृश्य को वह किसी भी कीमत पर अपनी आँखो से दूर नहीं करना चाहते थे ।

मैं उस अमरीकी शोधकर्ता के उन दस प्रतिशत अनुभवी साधको में शामिल हो गया हूँ जिनका जीवन उस विलक्षण "ज्योति-श्रुति" दर्शन के बाद एकदम बदल गया । कदाचित् आपको भी मेरे जीवन का यह बदलाव नज़र आया होगा ।

मुझे भी याद आ रहा है कि अचेतावस्था के उस अनुभव के बाद जब मैं उठा तो मुझे ऐसा लगा जैसे मैं अब वह व्यक्ति ही नहीं हूँ जो मैं रुग्णावस्था से पहले था । द्वार बन्द हो जाने के कारण मैं "परम-धाम" में प्रवेश नहीं कर पाया और जीवन यात्रा समाप्त करते करते मैं पुनः यात्रा शुरू करने को मजबूर हो गया । मैं स्वस्थ हो जाने के बाद, बहुत दिनो तक अपने स्वजनो से कहता रहा कि "परमधाम" के स्वामी "उन्होंने" मुझे द्वार से ही वापस कर दिया पर यह नहीं बताया कि मेरे नये जीवन मे अब "वह" मुझसे नया क्या करवाना चाहते हैं? "जीवन दान" मिलने के बाद मैं सोचा करता था कि क्या किया जाये । इस प्रश्न का उत्तर मिल गया - भजन-कीर्तन और सिमरन ।

श्री राम शरणम के संस्थापक सद्गुरु श्री स्वामी सत्यानन्द जी महाराज की महनीय कृपा से मैंने राम नाम की जो अमूल्य निधि पायी थी उसकी साधना के लिए मैंने भाव-भक्ति भरे भजन-कीर्तन और जप-सिमरन जैसे साधन को अपनाया । दिव्य गुरु जनों के प्रोत्साहन से मैंने अपनी "साधना" को संगीतमय "नारदीय" मोड़ दे दिया ।

स्वामीजी ने अनुमोदन किया, प्रेमजी महाराज की प्रेरणा रही, डॉ विश्वामित्तर जी ने उत्साह बढाया और मैंने दृढ़ निश्चय किया कि जब तक जीवन है, अपनी शब्द-रचना, स्वर संयोजना और स्वरलहरी में अपनी आत्मा को उंडेल कर अपने आराध्य देव को रिझाता रहूंगा । अब तो प्रियजन "मोहिं भजन तजि काज न आना", भजन के अतिरिक्त और कुछ न मैं जानता हूँ, न जानने का प्रयास करता हूँ । मुझे नवजीवन देकर हॉस्पिटल के क्रिटिकल केयर यूनिट में ही प्रभु ने सूक्ष्म रूप मे मेरे चिन्तन और मेरी भावनाओं में प्रगट होकर मुझे आदेश दिया था कि मैं उनसे प्राप्त जीवन दान के समय को बिताने के लिए अपनी आध्यात्मिक अनुभूतियों का लेखन कर डालूँ और भजन-कीर्तन-सिमरन में मगन रहूँ । अब तो बस "सर्व शक्तिमय नाम जपूँ मैं, दिव्य शक्ति आनंद छकूँ मैं"

श्री रामशरणम के गुरुजनों की महनीय कृपा का वर्णन करना मेरे सामर्थ्य से परे है, जिनसे आत्मशक्ति पा कर मैंने अवस्थानुसार जीवन भर विवेक बुद्धि से कार्य किया, कर्मयोग की साधना में कर्म से सृष्टिकर्ता का पूजन किया । आजीविका अर्जन के विहित कर्म अपनी सरकारी नौकरी में, मैं उच्चतम शिखर पर पहुँच गया । स्वेच्छा से साठ वर्ष की उम्र में सेवानिवृत्त हो कर कुछ वर्षों में सब बच्चों के विवाह-संस्कार सम्पन्न कर और उनको आजीविका अर्जन के लिए स्वावलम्बी बना कर, उनके भरण-पोषण के उत्तरदायित्व से मैं मुक्त हो गया । फिर रह गया एक ही ध्येय, एक ही कार्य, एक ही लगन, एक ही चिंतन - "सर्व शक्तिमान परम पुरुष परमात्मा के गुणों का गान करना, उनकी महिमा का बखान करना, भक्तिभाव से भजन-कीर्तन करना और मगन रहना" । सद्गुरु स्वामीजी की आदेशात्मक वाणी है--

भक्तों भजिये नाम को भाव भक्ति में आय ।
आत्मज्ञान का है यह उत्तम परम उपाय ।।

(भक्ति -प्रकाश से संकलित)

भक्ति का एकमात्र साधन जो मैंने बचपन से आज तक किया (या यूं कहें कि, मैं कर पाया) वह है "भजन गायन" और "कीर्तन" । मन मंदिर में अपने "प्यारे प्रभु" का विग्रह प्रतिष्ठित कर, बंद नेत्रों से "प्यारे" की छवि निरंतर निहारते हुए, सुध बुध खोकर "उनका" गुणगान करना, गीत संगीत द्वारा "उनकी" अनंत कृपाओं के लिए अपनी हार्दिक कृतज्ञता व्यक्त करना, यह है मेरा भजन कीर्तन ।

कीर्तन आत्मा से निकली हुई झंकार है । कीर्तन में मोहक शक्ति है । कीर्तन में गायक साधकों के स्वरों के अतिशय मधुर नाद एवं वाद्यों की झंकार तथा करतल ध्वनि के संयोग से एक अद्भुत दिव्यता अवतरित होती है जिससे गायकों एवं श्रोताओं को परमानंद स्वरूप में "परब्रह्म"के दर्शन की अनुभूति होती है । श्री राम शरणम के सत्संगों में इसे मैंने स्वयं देखा और अनुभव किया है । श्रद्धेय स्वामी जी महाराज तथा श्री प्रेमजी महाराज और डॉक्टर विश्वामित्र जी महाराज मस्ती में झूम झूम कर गाते और नाचते थे और अपने साथ साथ साधकों को भी गवाते और नचाते थे । इन सभी को मैंने उनकी ही धुनों पर मस्ती से नाचते हुए साधकों के हृदय में राम नाम की लौ लगा कर उनके मन मन्दिर की सुषुप्त भक्ति भवानी को जगाते हुए देखा है । मेरा अनुभव है कि कीर्तन में तल्लीनता "मैं-तुम" का भेद मिटा देती है, मन मीठे नाद में ऐसा रम जाता है, इतना मस्त हो जाता है कि उसे तन मन की सुधि नहीं रहती, ऑंखें भर आतीं हैं, गला अवरुद्ध हो जाता है, मुंह से बोल नहीं निकलते, तन रोमांचित हो जाता है ।

प्रियजन, न कवि हूँ, न शायर हूँ, न लेखक हूँ, न गायक हूँ, फिर भी ईश्वरीय प्रेरणा से अनवरत लिख रहा हूँ । परम सत्ता ने प्रेरणास्रोत्र बन कर जब जो कुछ भी लिखवाया, वही लिखा, जो कुछ शब्द रचना करायी, स्वर-संयोजना कराई, वही स्वयं गा रहा हूँ, बच्चों से गवा रहा हूँ । आप ज्ञानी हैं, आप जानते हैं "कर्ता राम है ", फिर हम कहाँ ? वह ही गवाता है, वह ही गाता है, वह ही सुनता है । सीखा नहीं ? अभिमन्यू ने व्यूह भेदन कब, कहाँ सीखा ? यह दास क्या प्रोफेशनल गायक है ? क्या इसने किसी से विधिवत गायन सीखा ? नहीं । गुरुजन ने प्रोत्साहित किया, जैसी उनकी आज्ञा हुई, वही किया । उनको अच्छा लगता है, जब तक शक्ति है, जब तक सांसे हैं, गाऊंगा । परम दयालु हैं वह ? किसके शब्द ? किसकी धुन ? किसने किसको सिखाया ? किसकी वाणी में रेकॉर्ड हुआ ? भूल गया ।

प्रियजन, अधिकतर भजनों का सृजन यूं होता है --- मध्य रात्रि में, मेरे प्यारे सद्गुरु कहूँ या परमगुरु, इस दास के कानों में धुन सहित शब्द फूंक देते हैं । उसके बाद नींद तब तक नहीं आती जब तक तकिये के नीचे पड़ी डायरी में शब्द और छोटे से केसेट रेकॉर्डर पर वह, आकाश से मध्य रात्रि में अवतरित शब्द व धुन रेकॉर्ड नही हो जाती । उनके" शब्द "उनकी" धुन, सबको पसन्द आती है, श्रेय में "परमानन्द प्रसाद" इस दास "भोला" को दिला देते हैं "मेरे प्यारे" । कितने दयालु हैं वह !!

लगभग मेरे जीवन की यह यात्रा युवावस्था में ही प्रारंभ हुई थी, आज भी यह यात्रा उसी प्रकार आगे बढ रही है । कभी मध्य रात्रि में तो कभी प्रातः काल की अमृत बेला में अनायास ही किसी पारंपरिक भजन की धुन आप से आप मेरे कंठ से मुखरित हो उठती है और कभी कभी किसी नयी भक्ति रचना के शब्द सस्वर अवतरित हो जाते हैं । धीरे धीरे पूरे भजन बन जाते हैं । मेरे मानस से स्वतः प्राक्रतिक निर्झरों के समान, श्री राम शरणम के तीनों गुरुजनों के आध्यात्मिक चिंतन संजोये भजनों की रचना एवं गायन का प्राकट्य होने लगता है ।

मुझे अपने इन समग्र क्रिया कलापों में अपने ऊपर प्यारे प्रभु की अनंत कृपा के दर्शन होते हैं, परमानंद का आभास होता है । हमे आनंद आता है अपने इष्ट के गुण गाने में । ऐसा क्यूँ न हो, उन्होंने हमें शब्द एवं स्वर रचने की क्षमता दी, गीत गाने के लिए कंठ और वाद्य बजाने के लिए हाथों में शक्ति दी । "उनसे" प्राप्त इस क्षमता का उपयोग कर और पत्र पुष्प सदृश्य अपनी रचनायें "उनके" श्री चरणों पर अर्पित कर हम संतुष्ट होते हैं, परम शान्ति का अनुभव करते हैं, आनंदित होते हैं ।

संत महापुरुषों का कथन है कि जीव को यह सूत्र निरंतर याद रखना चाहिए कि उसे कभी, किसी एक निश्चित पल में इस नश्वर शरीर को जिसे वह भूले से चिरस्थायी माने हुए हैं एक न एक दिन, इस संसार रूपी रैन बसेरे में, निर्जीव छोड़ कर जाना ही पडेगा । उसका अपना कहा जाने वाला 'बोरिया बिस्तर' यहाँ ही रह जाएगा । उसके अपने कहे जाने वाले सब सम्बन्धी यहीं रह जायेंगे ।

निर्विवाद सत्य तो यही है कि जन्म से लेकर आज तक हम केवल उस प्रभु की कृपा के सहारे ही जी रहे हैं और उस पल तक जीते रहेंगे जिस पल तक वह पालनहार हमें जीवित रखना चाहता है । परमात्मा द्वारा निश्चित पल के बाद हम एक सांस भी नहीं ले पाएंगे, प्राण पखेरू अविलम्ब नीड़ छोड़ उड़ जायेगा, सब हाथ मलते रह जायेंगे । सर्व शक्तिमान परम पुरुष दयालु देवाधिदेव के अहसानों की लम्बी दासताँ हैं, जब तलक सांस है, तब तक चलती रहेगी ---

तेरा तुझको करूं समर्पित, कल का नहीं ठिकाना है ।मैं हूँ शून्य, शून्य से आया, शीघ्र शून्य में जाना है ।।आत्म कथा है यह मेरी इसलिए पहले यह ही सुनिए कि मेरी यही इच्छा है कि मैं सदा प्यारे प्रभु को धन्यवाद देता रहूँ, उन क्षणों के लिए जिसमें वे हमें परमानंद की अनुभूति कराते रहे, हमें दिव्य प्रकाश की ओर ले जाते रहे, अपने स्पर्श का, अंग-संग रहने का बोध कराते रहे ।

मेरी हार्दिक इच्छा है कि परम शान्ति की धारा अंतरतम तक प्रवाहित होती रहे, मैं दिव्य शक्ति का आनंद छकता रहूं, अंतिम श्वास तक प्रभु मेरे अंग-संग रहें और मैं हर पल उनका सिमरन करता रहूँ।

आखिरी सांस तक बस तू मेरे साथ रहे ।एक तू और तेरा नाम मुझे याद रहे ।।अब सुनिये कि मैंने स्वयं अपने लिए क्या शुभकामना की, क्या प्रार्थना की और प्यारे प्रभु से अपने लिए क्या 'वर' माँगा । मेरे प्रभु । मेरे नाथ । मुझे और कुछ भी नहीं चाहिए । बस जब तक जीवन है, आपके सन्मुख, आपसे ही प्राप्त क्षमताओं के संबल से, मैं आपके ही शब्द, आपकी ही धुनों से सजा कर, आपके ही कंठ से मुखर कर, आपकी ही प्रेरणा से, उन्हें अपनी स्वरांजलि बनाकर आपके श्री चरणों पर अर्पित करता रहूँ । मेरे प्यारे मुझे जनम जनम तक "अपने श्रीचरणों" के प्रति अखंड प्रीति प्रदान करो, मैं 'आपको' अनंतकाल तक न भूलूं, ऐसा वरदान दो ।

बाक़ी हैं जो थोड़े से दिन, व्यर्थ न हो इनका इक भी छिन ।अंतकाल करूं तेरा सिमरन, मिले शान्ति विश्राम ।।

प्रेम-भक्ति दो दान, यही वर दो मेरे राम ।रहे जन्म जन्म तेरा ध्यान, यही वर दो मेरे राम ।।

विश्वम्भरनाथ “भोला”

मकर संक्रांति

१४-१ १७

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अपने कुलदेव और इष्टदेव की अहैतुकी कृपा से एक्सपोर्ट इंस्पेक्शन एजेंसी मुम्बई और एक्सपोर्ट इंस्पेक्शन कौंसिल मुम्बई के डिप्टी चीफ एक्ज़ीक्यूटिव पद पर आसीन हो कर मैं फरवरी १९७० से दो नवम्बर १९७५ तक मुम्बई में रहते हुए भारत सरकार की सेवा बड़ी निष्ठा और ईमानदारी से करता रहा ।

दिल्ली से मुम्बई स्थानांतर होने पर अपने रोगी पिताश्री, पत्नी तथा पाँचों बच्चों की टीम के साथ जब मैं महानगरी मुम्बई आया, तब अपनी छोटी बहिन माधुरी और बहनोई फिल्म्स डिवीज़न के डायरेक्टर, श्री विजय बहादुर चन्द्र के साथ, उनके सरकारी फ्लेट, ३६ हैदराबाद हाउस, नेपियन्सी रोड में लगभग एक वर्ष तक रहा ।

मई १९७१ में जब पूज्य बाबूजी को उनके आदेशानुसार कानपुर पहुंचा दिया, तब मैं परिवार सहित १६, गिरी अपार्टमेंट, जे. बी. नगर, अंधेरी पूर्व में किराए के मकान में रहने लगा । सभी बच्चे आई. आई. टी. पवई के केन्द्रीय विद्यालय में भर्ती हो गए और बी. ई. एस. टी. की बस से स्कूल जाने लगे और मैं अपने सहकर्मियों के साथ बस और लोकल ट्रेन की यात्रा करके ऑफिस जाने लगा ।

इस सन्दर्भ मे मैं आप सबको एक बात बताना चाहता हूँ कि मुम्बई में कार्यरत होने पर यदि मेरी अनुमति होती तो कोई भी एक्सपोर्टर हमारे परिवार की सुख-सुविधा का और रहने का अच्छे से अच्छा प्रबन्ध करवा देता, परन्तु वे जानते थे कि उनका यह कदम मेरी मन मर्ज़ी ही नहीं, मेरे सिद्धांतों के भी विरुद्ध होगा । यहां मैं तत्कालीन समाज के मन में बसी एक अवधारणा से अवगत कराना चाहता हूँ । जब मैंने एक्सपोर्ट इंस्पेक्शन एजेंसी, दिल्ली में नौकरी करनी प्रारम्भ की थी तब मेरे स्वजन-सम्बधी और हितैषी मित्रों ने बधाई देते हुए यह भी कहा था कि इस विभाग में ऊपरी कमाई करने के अच्छे आसार हैं । उनकी यह धारणा मेरे मन को बहुत चुभी थी, उनके इस तीर से बहुत चोट पहुंची थी क्योंकि उनकी यह धारणा मेरे सहज स्वभाव और सिद्धांतों के विरुद्ध थी । उस समय मेरी अंतरात्मा ने प्रभु को पुकारा और अपना कर्तव्य पूरी लगन, उत्साह और ईमानदारी से करने के लिए विवेक बुद्धि और बल को प्रदान करने की उनसे याचना की ।

मुझे गर्व है कि मेरे बच्चों और उनकी माँ ने कभी भी अपनी मांगों की पूर्ति के लिए मुझे मेरा ईमानदारी का रास्ता छोड़कर, किसी ठेकेदार या एक्सपोर्टर के सामने हाथ फैलाने के लिए मजबूर नहीं किया । धर्मपत्नी कृष्णा जी के सहयोग से हमारी गृहस्थी की गाड़ी खिंचती रहती । मेरी आर्थिक मदद करने के लिए उन्होंने एक सत्र मलाबार हिल पर स्थित बिरला स्कूल में, फिर अस्थायी स्वरूप में भारत सरकार के हिन्दी टीचिंग स्कीम में अहिन्दी भाषी केन्द्रीय गजेटेड अफसरों को हिन्दी सिखाने का काम शुरू कर दिया ।

विडम्बना देखें, जहां मैं निजी कार पर सवार हो कर दफ्तर जाता था और दिन भर एयरकंडीशन्ड केबिन में बैठता था, वहाँ बेचारी कृष्णा जी दिन भर मुम्बई की उमस भरी गर्मी में, कभी पैदल चल कर तथा कभी बस और लोकल ट्रेन में धक्के खाती हुई, अंधेरी से चर्चगेट और कोलाबा में स्थित सरकारी दफ्तरों तक दौड लगाती रहती थीं । पांचो छोटे छोटे बच्चे, बेस्ट की दो "बसें" बदल कर घर से पवई के 'सेंट्रल स्कूल' जाते थे । जरा सोचिये, हमारी सबसे बड़ी बच्ची श्रीदेवी जो तब लगभग ११ वर्ष की थी, उनकी लीडर बन कर उनकी देखभाल करती थी । सहपाठी उसे "दीदी की रेल गाड़ी" का इंजन कह कर चिढाते थे ।

मैंने किसी दुःख, पीड़ा या निराशा से व्यथित हो कर उपरोक्त कथन नहीं किया है । मैं यह वर्णन, अति प्रसन्नता से और गर्व के साथ कर रहा हूँ क्योकि मेरी बीवी बच्चों को छोड़ कर मेरे घनिष्ट से घनिष्ट पारिवारिक सम्बन्धियों को यकीन नहीं होता है कि "इतनी आमदनी वाली कुर्सी" पर बैठ कर भी मैं "ऊपरी कमाई" से परहेज़ करता रहा हूँ ।

सच पूछिये, तो मुम्बई के कार्यकाल में हमें और हमारे परिवार को मिला है श्री विघ्न विनायक का आशीर्वाद और माँ मुम्बा देवी की कृपा का अद्भुत चमत्कारिक महाप्रसाद ।

शास्त्र कहते हैं कि मानव जीवन का अभ्युदय है श्रेय और प्रेय अर्थात आध्यात्मिक और सांसारिक प्रगति । इस महानगरी की माया ने दिया हमें और हमारे परिवार को अपनी प्रतिभाएं निखारने का और उन्हें उजागर करने का सुयोग और सुअवसर, और साथ ही साथ दिया सिद्ध संतों का सान्निध्य एवं उनके आशीर्वचन सुनने का सौभाग्य, स्वार्थ और परमार्थ दोनों ही राहों पर चलने की सुख-सुविधा ।

कैसे, सुनिये और विचार करिये ।

कृष्णा, जो विवाह के बाद घर-गृहस्थी की जिम्मेदारी के कारण कभी अकेले घर से बाहर नहीं निकली, उन्होंने मालाबार हिल पर स्थित बिरला स्कूल में एक सत्र तक अध्यापिका का कार्य किया, फिर अस्थायी रूप से जब भी सुअवसर मिला हिन्दी टीचिंग स्कीम के अंतर्गत कार्यरत हो कर अहिन्दी गजटेड ऑफिसर्स को हिन्दी पढाने का कार्य जिम्मेदारी से किया । तदनंतर १९७२-७३ के सत्र में बम्बई यूनिवर्सिटी में हिंदी में पी. एच. डी करने के लिए जब उनका नाम दर्ज हो गया, तब खालसा कॉलेज के प्रोफेसर डॉ श्रीधर मिश्र के निर्देशन में “रामचरित मानस का सांस्कृतिक अध्ययन“ पर शोध कार्य प्रारम्भ किया और १५ वर्षों के बाद पुनः कॉलेज जाना शुरू किया । कड़ी मेहनत के बाद, गयाना, दिल्ली, जालंधर आदि जगहों में परिवार के साथ रहते हुए, घर-गृहस्थी निभाते हुए, १९८१ में डिग्री प्राप्त कर ली ।

हमने, मुम्बई के पांच वर्षीय कार्यकाल में अपने सामर्थ्य और योग्यता से अधिक ही पाया, अपनी हैरल्ड कार, जो दिल्ली में खरीदी थी बेच कर और सरकार से ऋण ले कर सरकारी कोटे से नयी फीएट कार खरीद ली । कौंसिल के डायरेक्टर श्री चन्द्रनारायण मुडावल के सहयोग से अपने भतीजे अनुराग कुमार (छवि ) को कॉटेज इंडस्ट्री में सेल्समेन के पद पर नियुक्त करवा दिया ।

अभिनय के क्षेत्र में तो चमत्कार सा हुआ । जो हुआ वह कभी स्वप्न में भी नहीं सोचा था । बात ऐसी है कि उन दिनों लाइफ इंश्यूरेंस कॉर्पोरेशन अपनी बीमा एजेंसी को प्रशिक्षित करने के लिए एक डॉक्युमेंट्री फिल्म “प्रोसपेक्टिंग" बना रहा था । फिल्म्स डिवीज़न के डायरेक्टर तिरुमलाई, जो दक्षिण भारत की प्रयोगात्मक फिल्मों के प्रसिद्ध डायरेक्टर थे, इसे बना रहे थे और उन्हें ऐसे पात्र की आवश्यकता और खोज थी जो सरकारी मुलाज़िम हो, ईमानदार, स्पष्टवादी और आकर्षक व्यक्तिव का धनी हो । उन्होंने मुझे खोज निकाला । मुझे अभिनय करना था राष्ट्रपति द्वारा पुरुस्कृत आदर्श विज्ञ बीमा अधिकारी का, जिसके समझाने से बीमा जनित लाभ की लालसा में जनता जीवन बीमा कराने लगे । इस किरदार को निभा कर मैंने अपने सांस्कृतिक जीवन की विधाओं में एक और विधा को जोड़ दिया । अभिनय के क्षेत्र में कामयाबी हासिल करना, यह मुम्बई नगरी की महामाया का चमत्कारिक प्रसाद नहीं तो और क्या है ?

संगीत-कला के क्षेत्र में वीणापाणि माँ शारदा की असीम कृपा से माधुरी, बबुआजी (विजयबहादुर चन्द्र)और छवि (अनुराग) के सम्मेल से बम्बई नगरी के उच्चस्तरीय रंगमंचों और सभागृहों में भजन-संध्या के कार्यक्रम सम्पन्न हुए । श्री दुर्गाप्रसाद मण्डेलिया के अनुरोध पर श्री राम गीत गुंजन, श्री डालमियाजी के आग्रह पर आरती गीत माला, रामाय नमः के लॉन्ग प्लेइंग रेकॉर्ड के अल्बम बने । माँ सरस्वती की कृपा से जहां ये पांच वर्ष गाते-बजाते कार्यक्रमों में स्वरांजलि अर्पित करते हुए व्यतीत हुए वहीं इनके माध्यम से अदृश्य स्वरूप में जाने अनजाने में हम सबका आध्यात्मिक चेतना का मार्ग भी प्रशस्त होता रहा ।

सिद्ध सन्तों के सत्संग के आयोजनों में भजन-सुमन अर्पित करने से मिला । श्री श्री माँ आनंदमयी, अनंत श्री स्वामी अखंडानंदजी, सत्य साईं बाबा,आदि का सान्निद्ध्य, उनका आशीर्वाद भरा प्यार, उनके आशीर्वचन, उनकी दिव्य दृष्टि से झरती हुई ईश कृपा का महाप्रसाद, उनकी यज्ञभूमि से संचरित ऊर्जा के स्पर्श की अनिर्वचनीय अनुभूति, जीवन सार्थक हो गया । बाजी (मधु ), बबुआजी, छवि, हम और हमारा परिवार मुम्बई के निकट स्थित गणेशपुरी में सिद्ध सन्त बाबा मुक्तानंद के दर्शन कर उनके आश्रम की सात्विक दिव्य तरंगों से स्नान कर और, शिरडी में साईबाबा के दरबार में अपने भजन-सुमन को अर्पित कर उनकी कृपा की अनुभूति का स्वर्गिक आनंद उठा कर धन्य हुए । कहाँ तक बताऊँ मुम्बई महानगरी की उपलब्धियाँ; द्वारका में विराजे द्वारकाधीश के भी दर्शन करा दिए ।

मुम्बई के कार्यकाल में कुलदेव, आराध्य देव और गुरुजनों के आशीर्वाद से हमारे जीवन के आध्यात्मिक सांस्कृतिक, सामाजिक, पारिवारिक क्षेत्रों में आनंद ही आनंद बरस रहा था कि अचानक ऑफिस में आया एक तूफ़ान, जिसने सबकी नैया को डगमगा दिया ।

एक्सपोर्ट इंस्पेक्शन कौंसिल के जॉइंट डायरेक्टर श्री पद्मनाभन अपना मानसिक संतुलन खो बैठे । उन्होंने निर्यात से सम्बंधित कार्यालयों में सरक्यूलर भिजवा दिया कि ई. आई. ए. का ऑफिस बन्द हो गया है । सूचना पाते ही व्यापारियों, उद्धयोगियों, एक्सपोर्टरों के संसार में खलबली मच गयी, उनके पैरो तले से ज़मीन सरक गयी । उसके निदान के लिए हमने उच्चस्तरीय कर्मचारियों की मीटिंग करके सर्व सम्मति से कार्यवाही की, तो मंत्रालय ने मुझ पर ही आरोप लगा दिए।

ऐसी विषम स्थिति में किसने मेरी डूबती नैया को बचाया, किसने इस तूफ़ान के थपेड़ों से हमें उबारा ? वही सर्वेसर्वा सर्वसमर्थ परमात्मा ही तो था जिसके सहारे हमारे जीवन की नाव आगे बढ़ रही थी ।

महाभारत के युद्ध में द्रौपदी को अभयदान देते हुए पितामह भीष्म ने कहा था “द्रौपदी, जब तक कृष्णमुरारी तेरा संरक्षक है, कोई भी तेरा अनिष्ट नही कर सकता । ’ जहँ जहँ दुसह कष्ट भगतन पर, तहँ तहँ सार करे ;सूरजदास श्याम सेवें ते दुस्तर पार करे; जो घट अंतर हरी सुमिरे'। यदि सर्वशक्तिमान का आश्रय लिया है, तो "वह" और केवल "वह" ही इतना उदार है जो "बिनु सेवा हम जैसे दीन जनों पर कृपालु रहता है" । मुझ पर भी कृपा की, सहकर्मी श्री पद्मनाभम की असन्तुलित मनः स्थिति से आये आपत्तिजनक समस्याओं के तूफ़ान से मेरी नैया को उबारा, मेरा बेड़ा पार किया ।

कैसे ? नवम्बर १९७५ में भारत सरकार के विदेश मंत्रालय के अनुरोध पर मुझे “लैदर एक्सपर्ट टू द गवर्नमेंट ऑफ़ गयाना” के पद पर प्रतिष्ठित करके ई. आई. कौंसिल ने डेप्युटेशन पर बूट प्लांट लगाने के लिए ढाई वर्ष के लिए गयाना भेज दिया, सारे बच्चों के डिप्लोमेटिक पासपोर्ट बनवा दिए । यह है प्यारे प्रभु की कृपा । यह "कृपा" उसे ही मिलती है जो सब प्रकार से अपने इष्ट पर निर्भर हो ।

जाका मीत राम सुखदाता, उस जन को दुःख नहीं सताता ।

चाहे कितनी विपदा आये, विविध ताप भव रोग सताये ।राम सखा हर पल मुस्काता, उस जन को दुःख नहीं सताता ।।रामकृपा पर निर्भर रहता, प्रभु उसके सारे दुःख हरता ।अपनी कृपा जिस पर बरसाता, उस जन को दुःख नहीं सताता ।।गज सम अहंकार मद त्यागो, निर्बल हो प्रभु से बल मांगो ।सबल करेगा तुरत विधाता, उस जन को दुःख नहीं सताता ।।

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"मेरे प्यारे प्रभु" ने मुझे जो काम सौंपा, मैंने उसे शिरोधार्य किया ।

कानपुर से दिल्ली आने पर मै कुछ दिनों तक अपने मौसेरे भाई श्री आनंद स्वरूप सिन्हा के परिवार के साथ किदवई नगर में रहा । फिर १९६७ की विजयदशमी पर कॄष्णा और बच्चों के आ जाने पर, बाबूजी के साथ इंद्रपुरी में मकानमालिक श्री सचदेव के मकान में, फिर ६ महीने बाद एक सरकारी अफसर श्री आहूजा जी के मकान में किरायेदार की भाँति रहा ।

गंगाराम हॉस्पिटल रोड पर २२/५ राजेन्द्र नगर के घर से हमारा ऑफिस और श्रीदेवी, राम, राघव, प्रार्थना, माधव का बाल भारतीय पब्लिक स्कूल एकदम पास में ही था, सबको आने जाने में पांच-सात मिनट लगते थे । दिल्ली का प्रसिद्ध बाज़ार करौल बाग़ भी हम सब पैदल दस मिनट में पहुँच जाते थे । हमारे पालनहार, रक्षक प्रभु ने सभी प्रकार की सुख-सुविधा प्रदान कर दीं । कहो उरिन कैसे हो पाऊँ, किस मुद्रा में मोल चुकाऊँ, केवल तेरी महिमा गाऊँ ।

दिल्ली में कार्यरत रहते हुए, श्री चन्द्रनारायण मुडावल, जो व्यापार-उद्योग मंत्रालय के डायरेक्टर थे और क्वालिटी एन्ड इंसपैक्शन विभाग से सम्बद्ध भारत सरकार की ओर से एक्सपोर्ट इंस्पैक्शन कौंसिल के सेक्रेटरी थे, उनसे मेरा घनिष्ठ मित्र भाव दृढ़ हो गया और मैं समय समय पर उनसे सलाह भी लेता रहा ।

बिना किसी आर्थिक लाभ की आशा से या बिना किसी रिश्वत की कमाई किये एक्सपोर्टर की समस्या को हल करना और उन्हें उपयोगी सुझाव देना मेरा सहज स्वभाव रहा । आस्तिक विचारों के धनी एक्सपोर्टर श्री गुलाबरायजी, श्री वैष्णवदासजी, फुटवियर के एक्सपोर्टर सरदार जीवन्त सिंह जी से परस्पर सदव्यवहार के नाते हमारे आत्मीय सम्बन्ध स्थापित हो गए ।

मेरा प्रमोशन हुआ, फिर फरवरी १९७० में मेरा स्थानांतर मुम्बई हो गया ।

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जीवन हर दिन नए लक्ष्य, नए आयाम, नयी चनौती ले कर कभी भी आ सकता है, यदि सही दिशा चुनने का साहस हो, संकल्प हो, दृढ़ निश्चय हो, पुरुषार्थ करने का आत्मबल हो, वह भी ऐसा बल और संकल्प हो जो तेज हवाओं से न बिखरे, चट्टानों से न रुके, तो सकारात्मक कार्यों में सफलता अवश्य मिलती है ।

अपने इष्टदेव की असीम अनुकम्पा से अगस्त १९६७ में मैं एक्सपोर्ट इंस्पेक्शन एजेंसी, दिल्ली के ऑफिस में डिप्टी डायरेक्टर के पद पर नियुक्त हुआ और परम पिता परमात्मा की आज्ञा से पूरी निष्ठा और ईमानदारी के साथ अपनी जिम्मेदारियों को सम्भालने लगा । कानपुर के हार्नेस फैक्ट्री के माहौल से भिन्न इस ऑफिस का माहौल, नया मोड़, नया लक्ष्य, नयी कार्यप्रणाली, नयी विधाएँ । किसने दी विवेक बुध्दि, किसने दिखायी सही राह, किसने किया यथोचित मार्ग-दर्शन, किसका आश्रय ले कर मैं इस अफसरी की दुनिया में निरन्तर प्रगति-पथ पर बढा, किसने मजबूत ढाल बन कर, कवच बन कर सदा मेरी रक्षा की ।

वह मेरा सर्वसमर्थ सर्वशक्तिमान आराध्यदेव ही तो था, जिसके सहारे और जिसके प्रताप से मैं आजीविका अर्जन की कर्मभूमि पर १९५० में एक लिपिक से अस्थायी काम प्रारम्भ कर विभिन्न सीढियां चढ़ते हुए उत्तर प्रदेश का एक प्रसिद्ध नागरिक बनने का श्रेय पा कर रिटायर्ड हुआ ।

नया मोड़, हाँ नया मोड़ ही तो था । सरकारी नौकरी में १६ वर्ष गवर्नमैंट हार्नेस एंड सैडलरी फेक्ट्री, कानपुर से आगे के १६ वर्ष एक्सपोर्ट इंस्पेक्शन कौंसिल की सेवा का मोड़, रक्षा मंत्रालय से वाणिज्य-व्यापार उद्योग मंत्रालय से सम्बद्ध होने पर, फेक्ट्री की गतिविधियों और कार्य प्रणाली से मंत्रालय के काम काज में नया मोड़, कानपुर में स्थापित मिलों के धुंए और धूल से भरी हवाओं की जगह पर दिल्ली के महानगररीय वातावरण में परिवर्तन, अपने पैतृक घर को छोड़ कर किराए के घर में परिवार सहित रहने के अनुभव का नया मोड़, साइकिल से फैक्ट्री जाने की जगह पर अपनी कर से ऑफिस जाने और गंगातट पर गंगा जी को निहारते हुए पारिवारिक आमोद-प्रमोद में बदलाव, दिल्ली में बाल भारतीय पब्लिक स्कूल में एडमीशन मिलने से उनकी प्रारम्भिक शिक्षा में महत्वपूर्ण मोड़ -- हमारे और हमारे परिवार पर बरसती हुई आराध्य देव, कुलदेव की अनवरत कृपा का ही प्रसाद है ।

मुझे गर्व है इसका कि हमारे प्यारेइष्ट ने जो, "कारण बिनु कृपालु हैं " और जो स्वभाव वश ही, "करहि सदा सेवक सन प्रीती", उन्होंने मेरी सेवकाई स्वीकार की और आजीवन हम पर कृपालु बने रहे । "वह" सर्वदा मुझे सुबुद्धी और विवेक प्रदान करते रहे ।

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प्यारे प्रभु की अनन्य कृपा ही थी कि लन्दन से स्वदेश लौटने पर अगस्त १९६५ में जब लैदर सैलर्स कॉलेज से लैदर टेक्नॉलॉजी का पोस्ट ग्रजुएट डिप्लोमा प्राप्त कर बिना किसी हिचकचाहट के मैं साइकिल से हार्नेस फैक्ट्री गया और पुनः अपने विभाग में असिस्टेंट फोरमेन के पद पर मैंने कार्य सम्भालना प्रारम्भ किया तब सभी अफसरों, कर्मचारियों, हितैषी मित्र, के. के. तनेजा, धर्मसिंह, तिलकराज खुल्लर ने मेरा हार्दिक स्वागत किया । मेरे बड़े भाई समान मित्रा साहिब की खुशी का तो ठिकाना ही नहीं था । जनरल मेनेजर वर्मा साहिब भी गौरवान्वित थे । सब खुश थे पर मेरे मन में कहीं न कहीं यह तड़पन जीवन्त थी कि लन्दन के डिप्लोमा की पढाई के लिए छुट्टियाँ लेने से तरक्की की दौर में मैं पीछे रह गया, ज़रूर कुछ खो बैठा ।

कानपुर की हार्नेस फेक्ट्री में टरनर कम्पनी की पुरानी मशीनें थीं, जो सस्ते दामों पर रशिया से आईं थीं, जिन्हें चलाने की ट्रेनिंग हासिल करने के लिए कुछ अधिकारी वहां भेजे गए थे, जो वहां से मौज मस्ती कर, अर्थ लाभ उठा कर वापिस तो आगये परन्तु दक्षता प्राप्त न कर सके । अतः मशीनों पर काम कराने करने में असमर्थ रहे, इस प्लांट में चल रही परेशानियों को दूर करने में असफल रहे, । जैसा मैंने पहिले ही बताया है कि लन्दन में समर ट्रेनिंग के दौरान टरनर मशीन्स, लीड्स में मैंने चमड़े की इस विधा से सम्बन्धित एक और विधा की भी दक्षता प्राप्त कर ली थी । इसका लाभ उठाते हुए मेरे जनरल मेनेजर वर्मा साहिब ने और मेरे वरिष्ठ अधिकारी ने मुझे बूट प्लांट चलाने का कार्य भार सौंप दिया । मुझसे कहा गया "तुम इसमें विज्ञ हो कर आये हो, इसकी सभी विधाओं को सम्भालना और उन्नत करना तुम्हारा कार्य है "।

सृष्टिकर्ता की लीला निराली है । मैंने दक्षता प्राप्त की थी चमड़ा बनाने में और दे दिया गया बूट प्लांट चलाने को । इस सन्दर्भ में मुझे एक गाने की यह पंक्ति याद आ रही है -- "अजब विधि का लेख किसी से पढा नहीं जाए" । मैंने इस चुनौती को स्वीकारा और अपने इष्ट देव की कृपा से तीन चार महीने के अंदर बूट प्लांट की समस्याओं का हल निकाल कर उसे जीवन्त कर दिया ।

इससे मुझे एक अनूठा अनुभव हुआ कि प्रगति-पथ उसी का प्रशस्त होता है जो चुनौतियों को स्वीकार करने का साहस रखता है । बचपन से सुनता आया था जो होता है, भले के लिए होता है । चमड़े के क्षेत्र में अभी तक केवल एक ही क्षेत्र में दक्षता प्राप्त करने का विधि-विधान रहा था । बूट प्लांट चलाने की जिम्मेदारी ने मुझे चमड़ा बनाने और जूता बनाने की विभिन्न विधाओं का अनुभव करा दिया, ऐसा अनुभव जो भारत में किसी के पास न था । मेरा भला हो गया, लाभ यह हुआ कि इस अनुभव के आधार पर बिना किसी प्रयास के अगस्त १९६७ में एक्सपोर्ट एजेंसी दिल्ली में मेरी नियुक्ति डिप्टी डायरेक्टर के पद पर हो गयी । रक्षा मंत्रालय को छोड़ कर मैं वाणिज्य-व्योपार, उद्योग मंत्रालय से सम्बद्ध हो गया ।।

प्यारे प्रभु की अनन्य कृपा सदैव मुझपर बनी रही और मैंने अपने आपको अपने किसी भी कर्म का कर्ता समझा ही नहीं । पल भर को भी यह भुला ना पाया कि वह "सर्वशक्तिमान यंत्री", मुझे संचालित कर रहे हैं । "मेरे प्यारे प्रभु" ने मुझे जो काम सौंपा, मैंने उसे शिरोधार्य किया क्योकि करनेवाला यंत्री प्रभु ही है, हम सब तो उनके मात्र यंत्र ही हैं ।

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एक के बाद एक लंदन प्रवास से जुड़ी "प्रभु-कृपा" की असंख्य मधुर स्मृतियाँ अन्तर पट पर उमड़ने लगी हैं । मेरे वार्डन अनुशासनप्रिय कुशल व्यवस्थापक थे । उन्होंने ने मेरी आयु, स्वभाव और रुचि को जान कर, मेरा परिचय पांच वर्ष से ऑर्गेनिक केमिस्ट्री में पी एच डी कर रही डॉ. अरनवाज़ माणिक शाह बारिया से करवाया । यह विदुषी महिला स्टूडेंट यूनियन की सर्वे सर्वा और कार्यकर्ता थी । इन्होने समय समय पर मुझे उचित और उपयोगी सलाह दी । इन्होंने विभिन्न आयोजित संगीत कार्यक्रम के आयोजकों से मेरी जान-पहिचान करवा कर मुझे उनमें भारतीय गायकी में गीत प्रस्तुत करने का अवसर प्रदान करवाया ।

प्रो के. जॉर्ज हम्फ्रीज, प्रो. आर. इन. साइक्स (सैक्स), प्रो. के. सी. टक मेरे आचार्य थे । डॉ. ई. सी. लीज़ मेरे विज़िटिंग प्रोफेसर थे, जो मैनेजमेंट पढ़ाने हावर्ड यूनिवर्सिटी से आया करते थे । डॉ. रे प्रिंसिपल और मेरे वार्डन मेरा बहुत ध्यान और मान रखते थे । भारत से जब कोई विशेष गणमान्य अतिथि आता था तो उनकी आगवानी और साथ चाय-पानी के समय मुझे बुला लेते थे । उनके स्नेह के कारण गणतंत्र दिवस पर प्रधान मंत्री लाल बहादुर शास्त्री आये, उनके साथ फोटो भी खींची, इंग्लैंड और सारे कॉमनवैल्थ देशों की महारानी एलिज़ाबेथ से हाथ मिलाने का अवसर मिला, बेल्जियम में भारत के राजदूत नियुक्त डॉ. के. बी. लाल से भेंट हुई ।

गरमी के अवकाश काल के समय मैंने हार्नेस फैक्ट्री से जुड़े हुए टर्नर मशीन्स, लीड्स में समर ट्रेनिंग ले ली और प्रभु की आस्था तथा हनुमानजी द्वारा दी बल-बुद्धि से त्रि-वर्षीय कोर्स को दो सत्र में समाप्त कर लिया । अगस्त १९६५ में "जर्नल ऑफ़ सोसाइटी ऑफ़ लैदर ट्रेड केमिस्ट ऑफ़ यू. के." में मेरा लेख छपा ।

एडमीशन अधिकारियों ने मुझे एम. बी. ए. के कोर्स करने के लिए चुन लिया था, परन्तु मैं परिवार के उत्तरदायित्त्व की बेड़ियों में जकड़ा हुआ था, विवश था । नवम्बर १९६३ में अपने बाबूजी, पत्नी कृष्णा और प्यारे बच्चे श्रीदेवी, रामजी, राघव को छोड़ कर लन्दन पढ़ने आया था, प्रार्थना को अभी तक देखा भी नहीं था, मन आकुल था, मैंने भारत लौटने का निर्णय ले लिया ।

भारत-पाकिस्तान में परस्पर युद्ध चल रहा था, फिर भी पानी के जहाज से सुरक्षित अपने स्वदेश लौट आया । जहाज में यात्रा करते समय एक ओर तूफान के थपेड़े से जहाज कील रहा था और दूसरी ओर मन विचारों के झंझावत में फंसा हुआ था । घर लौटने की खुशी थी, पर दो वर्ष के अंतराल में पनपी जीवन की गुत्थियां अंदर ही अंदर उलझ रही थी । शिक्षा विभाग से लिया ऋण चुकाना होगा, कानपुर में हार्नेस फैक्ट्री के उसी माहौल में, उसी असिस्टेंट फोरमेन की पोस्ट पर काम करना होगा, तरक्की मिलेगी या नहीं, वरिष्ठ उच्चाधिकारी कैसा व्यवहार करेंगे, आदि, आदि ।

मेरी ये यात्राएं आशाओं और सफलताओं के साथ साथ आशंकाओं की घबराहट और भविष्य की योजनाओं से घिरी हुई थीं ,साथ ही आर्थिक सीमाओं में बंध कर हुईं थीं । क्योंकि मैं अपने खर्चे पर पढ़ने गया था, धन राशि के अभाव में मैं इंग्लैंड से अपने परिवार और हितैषी मित्रों के लिए कुछ भी नहीं ला सका, केवल एक फ्रिज कानपुर भेजा था जो कराची में कहीं गायब हो गया । उसका बीमा कराया था । प्रभु की कृपा देखिये, बीमा कम्पनी से उसकी धनराशी उस समय मिली जब बाबूजी की कूल्हे की हड्डी टूट जाने के कारण मकराबर्ट अस्पताल में भर्ती थे और मुझे उसका बिल चुकाने के लिए धन की अतीव आवश्यकता थी । कहते हैं कि जब चारों ओर से आशा दम तोड़ देती है तो प्रभु किसी न किसी रूप में मदद करता है । सत्य सिद्ध हुआ यह सूत्र । प्रश्न उठा, क्या सचमुच कुछ नहीं लाया ? अंतरात्मा से उत्तर मिला, लाया हूँ, सच्चे मित्रों की दुआएँ, उनकी यादें, अपनी प्रथम विदेश यात्रा के और लन्दन-प्रवास के अनुभव तथा अध्ययन की विविध विधाओं से पाया ऐसा ज्ञान जिसके आधार पर भावी जीवन की उपलब्धियों की नीव पड़ी ।

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माँ का आशीर्वाद और अपना स्वप्न साकार हुआ, चमत्कार सरीखी “राम कृपा” थी यह । मेरी प्यारी अम्मा का संसार छोड़ते समय मुझे दिया वह आशीर्वाद, “तुम विलायत जाओगे बेटा, ज़रूर जाओगे”, सच हो रहा था । साइकिल रिक्शे, पब्लिक बस, और रेल के इंटर क्लास में यात्रा करने वाला “भोला“, लंदन जाने के लिए, जीवन में पहली बार एयर इंडिआ के ७०७ “जम्बो जेट” की सवारी करने जा रहा था ।

२ नवंबर १९६३ को दिल्ली से लंदन तक की लगभग १०-१२ घंटे की एयर इंडिआ की हमारी फ्लाइट उड़ी और मैं धीरे धीरे सहयात्रियों की देखा देखी आश्वस्त हो कर ऊपरी दिखावटी सहजता से यात्रा करता रह, लेकिन मन ही मन घबराता रहा । बुरी तरह नर्वस था । एयर होस्टेस के एलान के अनुसार, पास में बैठा यात्री जो जो करता रहा, उसे चोरी चोरी देख पर मैं उसका अनुसरण करता रहा । कुर्सी सीधी कर ली, सेफ्टी बेल्ट बांधली । ट्रे में नाना प्रकार की टॉफी चॉकलेट लिए हुए होस्टेस जब निकट आने लगी, मैंने आँखें मूंद ली, जैसे सो रहा हूँ । मुझे यह डर सता रहा था कि कहीं टॉफी ले लेने पर वह बड़ा बिल पेश कर देगी तो पेमेंट कैसे करूँगा । जेब में अधिक धन राशि नहीं थी । पहली बार जा रहा हूँ, कैसे सब व्यवस्था होगी, कहाँ ठहरूँगा, आदि प्रश्न उठ रहे थे । मन ही मन गुनगुना रहा था "कौन सो संकट मोर गरीब को जो तुमसे नहीं जात है टारो "। प्रभु की कृपा पर अटूट भरोसा था मुझे, फिर भी मानव मन?

लंदन के GMT समयानुसार शाम के ४ बजे हीथरो एयर पोर्ट पर हमारा जम्बो जेट उतरा । चार बजे तो दिन होता है, ये क्या ? यहां तो रात हो चुकी थी । इस अनजान नए शहर में रात के अन्धकार में कैसे पहुँच पाउँगा अपने पहले गंतव्य - “इंडिआ हाउस”, और यदि पहुंच भी गया तो वहां इतनी रात तक कौन मेरी प्रतीक्षा कर रहा होगा । पांच बजे दफ्तर बंद हो गया होगा । किसी से कुछ पूछने का मौका नहीं था, सब जल्दी जल्दी भाग रहे थे अपने अपने घरों की और कौन रुकेगा मुझे राह बताने को । टैक्सी लेने का साहस नहीं कर सकता, न जाने कितना घुमाए फिराए और उतरने के बाद मीटर दिखा कर पर्स का सारा फॉरेन एक्सचेंज निकलवा ले । भारत के अपने अनुभूवों के आधार पर शंकाओं का बवंडर झकझोर रहा था मेरे मन को ।

इन शंकाओं से जूझता हुआ मैं उस समय लंदन की नवंबर मास की सर्दी में पसीने से तर हो रहा था । एक सूटकेस, एक खचा खच भरा सूटकेस से भी भारी हैंड बैग और भारी भारी ऊनी कपड़े शरीर पर लादे हुए, भय युक्त शंकाओं से थर थर कांपते ब्रिटिश इमीग्रेशन, कस्टम पार करके, केवल मार्ग दर्शाते बोर्डों को पढ़ते पढ़ते, एयर पोर्ट के बस अड्डे तक पहुंच गया और वहां से विक्टोरिया बस टर्मिनस जाने वाली बस में सवार हो गया । इतना सुन रखा था की विक्टोरिया बस अड्डे से लंदन नगर के सब भाग तक पहुंचाने के लिए बसें मिलतीं हैं । सो एयरपोर्ट से बस ले कर विक्टोरिया बस अड्डे, फिर वहां से दूसरी बस ले कर “इंडिया हाउस” पहुंचा, । मूख्य द्वार के “वाच मैन” ने नाम पूछ कर मुझे हाई कमीशन के शिक्षा-विभाग के अध्यक्ष श्री ए. आर. किदवई तक पहुंचा दिया । किदवई जी ने बताया की कमीशन के एक अधिकारी (कदाचित उनका नाम श्री साठे था), एयरपोर्ट गए थे, मुझे रिसीव करने और वह वहां पर मेरी प्रतीक्षा कर रहे थे । उन्होंने कई बार पब्लिक एड्रेस सिस्टम पर मेरा नाम कई बार पुकारा भी था । किदवई जी को कैसे बताता की एयर पोर्ट में घबड़ाहट के कारण मैं कुछ सुन ही नहीं सका और बस द्वारा वहां पहुंच गया । किदवई जी ने वाई. एम. सी. ए. के इंडियन स्टूडेंट हॉस्टल के वार्डन श्री मलय पेरूमन से बात करके मुझे वहां रहने की व्यवस्था करवा दी थी ।

व्यक्ति का संकल्प दृढ़ हो, प्रभु पर अटल विश्वास हो और वह स्वधर्म के अनुसार अपने कर्तव्यों का पालन करता रहे तो उसे "प्यारे प्रभु की अहेतुकी कृपा" बिन मांगे ही प्राप्त हो जाती है । आवश्यकता पड़ने पर ऐसे व्यक्ति को उसकी समस्याओं एवं विषम परिस्थितियों से निपटने के लिए उसके “इष्ट देव”, उसके “प्यारे प्रभु” आवश्यकतानुसार समुचित शारीरिक, मानसिक एवं आत्मिक बल भी प्रदान करते रहते हैं ।

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बचपन से मेरी माँ मुझे दुलराते हुए अक्सर कहा करती थी कि "हमार भोला ता विलायत में पढ़ी, ओकरा पासे बड़ा बड़ा गाड़ी होखी, और ऊ बड़का चुक्के सीसा के बंगला में रही, देख लीहा तू सब लोग" । बचपन में मुझे दिया हुआ वह आशीर्वाद १९६२ में अम्मा ने अपने जीवन की अंतिम घड़ी में फिर दिया, "होखी बबुआ कुल होखी, तू पढ़े खातिर बिलायत जइब, तोहार सीसा के बडका चुका बंगला होखी, बड़का बडका बिलायती कार पर तू घुमबा" । अम्मा के निधन के साल भर के अंदर ही उनका आशीर्वाद फलीभूत हो गया । कार भी आ गयी और लंदन यात्रा भी हो गयी । तत्कालीन परिस्थितियों में असंभव लगने वाली पढ़ायी के लिए मेरी लंदन यात्रा की घटना अचानक कैसे घट गयी, इस यात्रा की कल्पना और उसके विषय में मेरे मन में तीव्र उत्कंठा कब और कैसे जागृत हुई, सब माँ की झोली से मिला आशीर्वाद का चमत्कार ही तो है ।

मैं अपनी आजीविका प्रदायक हार्नेस फैक्ट्री का काम जी जान लगा कर अपनी क्षमता और सामर्थ्य से किया करता था, लेकिन तरक्की की सूची के नियमानुसार अपना ग्रेड बढ़ते हुए नहीं देखता था तो दुखी हो जाता था । पिछले दस वर्षों में सीढ़ियां चढ़ते हुए सुपरवायजर से चार्जमैन, चार्जमैन से असिस्टेंट फोरमेन ही हो पाया था । इसके अतिरिक्त मेरे उच्च अधिकारी मेरी इच्छा के विरुद्ध, कच्चा चमड़ा पास करने के लिए मेरे अंतर्गत कार्यरत कर्मचारियों के माध्यम से मेरे नाम पर रिश्वत लिया करते थे, जिसके कारण मेरा अंतर्मन पीड़ित था, निरुत्साहित था ।

मुझसे एक ग्रेड ऊंचे पद पर कार्यरत मेरे हितैषी श्री विजय कुमार मित्रा ने मेरी पीड़ा को आंका, मेरे अंतर्द्वन्द को समझा और उन्होंने मुझे लंदन के "लैदर सैलरस कॉलेज" से पोस्ट ग्रेजुएट डिप्लोमा की पढ़ाई करने के लिए प्रोत्साहित किया । तत्संबंधी जानकारी हासिल करने में उन्होंने मेरी मदद भी की । अपने प्रयास एवं पुरुषार्थ से मैंने कॉलेज के प्रिंसिपल के साथ पत्र-व्यवहार शुरू किया और एक दिन मेरे पास उस कॉलेज के प्रिंसिपल डॉ डैनबी का पत्र आया कि मेरा एडमिशन लैदर टेक्नोलॉजी में डिप्लोमा लेने के लिए तीन वर्षीय कोर्स में नैशनल लैदर सैलर्स कॉलेज में हो गया है और मुझे शीघ्रातिशीघ्र लन्दन पहुँच कर कॉलेज में दाखिल होना है ।

उन दिनों चीन और पाकिस्तान से भारत का युद्ध चल रहा था । चीन ने धोखे से भारत की पीठ में छुरा घोंप दिया था । “हिन्दी चीनी भाई भाई“ के नारे लगाने वालों के मुंह बंद हो गए थे । भारत को अपनी अखंडता कायम रखने और अपनी स्वतंत्रता की रक्षा के लिए चीन से युद्ध करने की तैयारियों में जुटना पडा । भारत के सरकारी आयुध निर्माणी कारखाने, जो स्वतंत्रता के बाद से धीरे धीरे निष्क्रिय हो गए थे पुनः जीवित किये जाने लगे । रक्षा मंत्रालय के जिस आयुध बनाने वाले कारखाने में मैं काम करता था वहां मुझे स्टडी लीव मिल सकती थी लेकिन इस युद्ध के कारण कर्मचारियों की छुट्टियाँ रद्द हो गयी, पुराने रिटायड कर्मचारियों को काम पर वापस बुलाया जाने लगा, नये लोगों की भर्ती शुरू हो गयी । ऐसे में मुझे स्टडी लीव कौन देता? नीचे से ऊपर तक मैं जिन जिन से कह सकता था, मैंने कहा, पूरी कोशिश कर ली, पर कुछ नहीं हुआ । सब ने मना कर दिया ।

छुट्टियां मिलनी मुश्किल थीं, फिर भी मुझे अपने कुलदेवता और इष्ट देवता पर दृढ़ विश्वास था, अम्मा के आशीर्वाद पर भरोसा था, सोचता रहता था कि अम्मा का एक वचन सत्य हुआ, कार खरीद ली, तो लन्दन में पढ़ाई का कथन भी सच होगा । हुआ भी ऐसा ही । एक दिन कारखाने के जनरल मेनेजर श्री आर. सी. वर्मा ने सूचना दी कि मुझे अध्ययन-कार्यकाल की छुटियां भारत सरकार ने दे दी है । सभी आश्चर्यचकित थे कि इतनी विषम परिस्थिति में यह सब हुआ कैसे? इसका उत्तर न मेरे पास था न मेरे जनरल मेनेजर वर्मा के पास ।

मुझे टेक्नीकल एज्यूकेशन विभाग कानपुर से इस अध्ययन कार्य के लिए ऋण भी मिल गया जिसके लिए पूज्य बाबूजी एवं पड़ौसी चाचा प्रो. सी. पी. श्रीवास्तव का घर गिरवी रखना पड़ा । मैं दुविधा ग्रस्त था, जाऊँ कि न जाऊं । अंतर्द्वन्द गहन था क्योकि बाबूजी की ढलती उम्र थी, राघव अस्वस्थ था, श्रीदेवी, रामजी छोटी उम्र के अबोध बच्चे थे, कृष्णा गर्भवती थी, फिर सरकारी छुट्टियां वेतन रहित थी । केवल दस माह तक ही आधा वेतन मिलने वाला था, जिससे फैक्ट्री की सहकारी समिति से लिया ऋण चुकाना था, लंदन की पढ़ाई अपने बलबूते पर करनी थी, आदि आदि । इन सभी जिम्मेदारियों को छोड़ कर कोर्स करना उचित है या नहीं । मेरे पास तो हवाई-यात्रा की कौन कहे, कानपुर से दिल्ली जाने का रेल-टिकिट खरीदने की भी धन-राशि नहीं थी । जब गया तो पहली तारीख को वेतन मिलने पर टिकिट खरीद कर दिल्ली से उड़ान भरने दिल्ली गया ।

किसने की यह सारी व्यवस्था ? किसने मेरी जिम्मेदारियों का बोझ उठाया ? मेरे इष्टदेव सर्वशक्तिमान सर्वसमर्थ श्री राम ने, उनके प्रिय भक्त महाबीर हनुमान ने, मेरे प्यारे सद्गुरु महाराज ने, मेरी माँ के आशीर्वाद ने ? किस किस को धन्यवाद दूँ, किस किस को सराहूं, किस किस का उपकार मानूं? कौन होगा उनके जैसा भक्तवत्सल, कृपानिधान ?

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मेरे जीवन में आजीविका के लिए धनोपार्जन की कर्मभूमि उस सत्य अनुभूति की कहानी है जिसने मेरे जैसे 'लौह खंड' को "सुवर्ण" में परिवर्तित कर दिया । धनोपार्जन का जो साधन मुझे पूर्वजन्मो के कार्मिक लेखा-जोखा के विधान से, कुलदेवता महावीर हनुमानजी की कृपा से, तत्कालीन पारिवारिक परिस्थिति तथा माता-पिता के आशीर्वाद से एवं अपनी क्षमता से मिला वह था "चर्मकारी" । आजीविका के लिए धनोपार्जन के क्षेत्र में मेरा पदार्पण हुआ उस क्षेत्र में जो मेरी प्रकृति, रुचि, शब्द-स्वर-गायन संयोजन के बिलकुल विपरीत था । आयल टेक्नोलोजिस्ट्, संगीतनिदेशक, सिने कलाकार बनने का स्वप्न संजोये "भोला" बन गया "रैदास"की भांति चर्मकार । रैदास जी तो पके हुए चमड़े के जूते बनाते थे लेकिन मुझे गाय-भैंस और भेड-बकरियों की कच्ची खाल को पका कर उसमे रंग रोगन लगा कर उसे जूता बनाने लायक चमकदार चमडे का स्वरूप प्रदान करने का काम मिला था ।

सोचा था क्या, क्या हो गया ? आये थे हरि भजन को ओटन लगे कपास । सोच यह थी कि बनारस हिंदु विश्व विद्यालय' के 'कोलेज ऑफ टेक्नोलोजी' से ऑयल [तेल] टेक्नोलोजी पढ़ी है, स्नातक की डिग्री प्राप्त की है तो अब "केंथरायोडीन " जैसा खुशबूदार हेयर आयल और "पियर्स" जैसा ट्रांसपेरेंट बाथ सोप बनाने का कारखाना लगाएंगे पर विधि के विधान का मारा "भोला" रोज़ी रोटी कमाने के लिए पकाने लगा चमड़ा ।

प्रथम और द्वितीय विश्व युद्ध के भारतीय तथा अन्य महाद्वीपों के सैनानियों को जूते और कपड़ों की आपूर्ति करने के लिए अंग्रेज़ी शासन काल में टेक्सटाईल मिलों' के शहर 'कानपुर' में एक सरकारी 'आयुध निर्माणी' [ऑर्डिनेंस फैक्टरी'] गवर्नमेन्ट हार्नेस एन्ड सैडलरी फैक्ट्री कानपुर, जो आज “ऑर्डिनेन्स ईक्यूपमैंट फैक्ट्री “के नाम से प्रख्यात है, की स्थापना हुई थी । २१ अप्रैल १९५१ से ३० अक्टूबर १९५३ तक उसमें मैंने सिविलियन नॉन गजटेड ऑफिसर्स एप्रैन्टिसशिप की ढाई साल की ट्रेनिंग ली । इसमें ८५ रु. बुनियादी और ६५ रु. भत्ता मिला कर १५० रूपये मुझे मासिक आय के रूप में मिलते थे । ट्रेनिंग पूरी होने पर इसी फैक्ट्री में मेरी नियुक्ति सुपरवाइज़र ग्रेड "A " के पद पर हो गयी ।

ट्रेनिंग चमड़ा पकाने के उद्योग की थी अतः जानवरों के कच्चे चमड़े का निरीक्षण करना, उसे पकाने की प्रक्रिया का निरीक्षण करना, उससे उमड़ते दुर्गन्धमय वातावरण में अल्पशिक्षित मजदूर वर्ग की गाली-गलौज से पगी आपसी बातचीत को सुनते हुए उनसे कार्य करवाना, मेरा कार्य था । सप्ताह के छः दिन, प्रात ७ बजे से शाम के ५ बजे तक मैं उस आयुध निर्माणी की ऊंची ऊंची दीवारों के बीच फौजियों के लिए 'आर्मी बूट' बनाने और उन बूट्स के लिए, गाय भैंस की कच्ची 'खालों' [hides and skins] का शोधन [Tanning] करवाकर, उनसे 'चमडा' [leather] बनवाने के काम में व्यस्त रहने लगा।

जीवन में मैंने किसी भी परिस्थिति का तिरस्कार नहीं किया । प्रभु ने जो भी अवसर मुझे दिए, उन्हें मैंने उनका वरदान माना, उनका सदुपयोग किया । हनुमानजी की कृपा से जो भी कार्य करने को मिला, उसे पूरी लगन और ईमानदारी से "राम काज" समझ कर किया । मैंने अपने सभी कर्मों का करने वाला कर्ता या "यंत्री "अपने इष्ट को ही माना और स्वयं को अपने "इष्ट देव" के हाथों द्वारा संचालित औज़ार । मुझे अपने इष्टदेव से प्राप्त प्रेरणाओं पर पूरा भरोसा था, इसलिये में सदैव आज्ञाकारी सेवक बन कर उनके द्वारा दिए निदेशों को पालन करने का भरसक प्रयत्न करता रहा ।

हार्नेस फैक्ट्री घर से तीन मील दूरी पर थी, सायकिल से आया जाया करता था । एक दिन मनोरंजक घटना घटी, जो अब तक याद है । मैं हार्नेस फैक्ट्री जा रहा था, सम्भवतः उस दिन सोमवती अमावस्या थी । सरसैया घाट से ले कर फैक्ट्री तक मार्ग फल-फूल की दुकानों, भिखारियों की कतारों और गंगा स्नान के लिए आने जाने वाले श्रद्धालुओं से भरा हुआ था । मैं सावधानी से साईकिल चलाते हुए एक टोली के भक्ति भाव से भरे गीतों की स्वरलहरी के आनंद लेते हुए चला जा रहा था कि प्रसाद पाने का इच्छुक एक लंगूर मेरी सायकिल के पीछे वाली सीट पर बैठ गया । उसे आशा थी कि मुझसे कुछ भोज्य पदार्थ उसे मिल जाएगा । मेरा भोजन तो डिब्बेवाला फैक्ट्री पहुंचाता था, मेरे पास तो कुछ था ही नहीं । कुछ क्षण बाद वह मेरे कंधे पर सवार हो गया । अपने हाथ मेरे सिर पर रख दिये और दुम हिला कर इधर-उधर, दाएं-बाएं देखना शुरू किया जिससे मेरा संतुलन बिगड़ा, मैं भय भीत हो गया । चारों ओर आसपास से, राहगीरों की आवाज़ें सुनायी देने लगीं "घबड़ाना नहीं, घबड़ाना नहीं "। इतने में पास से एक रिक्शा निकला जिसमें गंगास्नान करके लौट रहीं महिलाएं सवार थीं । लंगूर महाशय प्रसाद पाने के लिए उस रिक्शे पर कूद गये, मेरी जान बच गयी । आज भी यह संस्मरण सिहरन दे जाता है ।

हार्नेस फैक्ट्री में उस ज़माने में तरक्की पाने का आधार कार्यक्षमता या पुरुषार्थ नहीं था । किसी वरिष्ठ अधिकारी के सेवा निवृत्त हो जाने पर ही तरक्की की सूची आगे बढ़ती थी । ऐसे में उन दिनों मेरी मनः स्थिति कैसी होगी, आप ज़रूर ही अंदाजा लगा सकते हैं । कभी कभी जी में आता था कि मैं भी अर्जुन के समान हथियार डाल दूँ । अर्जुन को माध्यम बनाकर श्रीकृष्ण ने समग्र मानवता को निष्काम कर्मयोग का संदेश दिया और क्रियाशील व्यक्तियों को निज विवेक के प्रकाश में हाथ में लिए कार्य की पूर्ति तक पूर्ण समर्पण के साथ सतत कर्तव्य परायण बने रहने तथा पलायनवाद से बचने का उपदेश दिया । योगेश्वर श्री कृष्ण ने कुरुक्षेत्र में अपने प्रिय सखा 'अर्जुन' को गीता सुना कर तथा अपने वास्तविक विराट स्वरूप का दर्शन करवाकर उसकी सुषुप्त आत्मचेतना को जाग्रत किया; उसे अपना निर्धारित कर्म करने को प्रेरित किया । उनकी तरह मेरे सम्पर्क मे तब तक कोई ऐसा प्रबुद्ध महापुरुष नहीं था जो मेरा मार्ग दर्शन करता, फिर भी मुझे मिले मेरे पथ-प्रदर्शक, मेरे वरिष्ठ अधिकारी, मित्र की भांति मुझसे प्रेम करने वाले, श्री विजय कुमार मित्रा । उन्होंने मेरे अंतर्मन में उफनते तूफ़ान को देखा, मेरी आत्मपीड़ा को आंका और मेरा पथ प्रदर्शित किया ।

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हमारी भारतीय भूमि पर प्रागैतिहासिक काल से लेकर आज तक देशकाल और धर्म के अनुरूप तत्कालीन प्रचलित गायन पद्धति पर आधारित कंठ एवं वाद्य संगीत की धुनें सदा ही गूंजीं हैं । वैदिक काल के ऋषि मुनियों के मंत्रोच्चारण, ऋषि वाल्मीकि के रामायण गायन तथा योगेश्वर श्रीकृष्ण के गीता के गायन में जहां शास्त्रीय संगीत की स्वरलहरी लहरायी है वहीं इस कृषि प्रधान देश में खेतिहर किसानों के खेत खलियानों में काम करते समय के गायन में तथा गृहस्थ स्त्रियों के घर के काम काज के मध्य मसाले और अनाज कूटते समय, खाना बनाते समय अथवा दही बिलोते समय स्थानीय बोलचाल की भाषा में गाये गीतों में सदा से सुगम संगीत जीवंत रहा है । शास्त्रीय संगीत से सरल, भावना-प्रधान स्वर में सराबोर गायकी ही सुगम संगीत है, जिसकी विधाएँ हैं - गीत, ग़ज़ल, कव्वाली, लोकगीत, भजन, आदि । ये ऐसी गरिमामयी सांस्कृतिक धरोहर है जो पुरातन एवम नवीनतम संगीत को संजोये, हल्के-फुल्के गायन से हृदयगत भावों को स्वरित कर श्रोताओं को आत्मानंद की रसानुभूति कराती है ।

१९५०-६० के दशक में आकाशवाणी के प्रबन्धक और संगीत-विभाग के अधिकारियों ने मेरी धुन बनाने तथा गीत लिखने की प्रतिभा को पहिचान कर, मुझे आकाशवाणी के लिए गीत-ग़ज़ल लिखने को आमंत्रित किया, जिसमें मुझे भाव-गीत के अतिरिक्त पंचायत-कार्यक्रम के लिए तत्कालीन सामाजिक पहलू जैसे बचत, परिवार नियोजन, दहेज उन्मूलन, आदि विषयों पर भी गीत लिखने का कार्य मिला । इसके लिए संगीत विभाग से प्रति गीत २५ रुपया भी मिलने लगा । कृष्णा-भोला के नाम से प्रसार-गीत विभाग ने मेरी जिन रचनाओं को चुना, उन्हें गाया सुधा मल्होत्रा, संध्या मुखेर्जी, शान्ति माथुर, यमन मानसिंह, ईरा निगम, लक्ष्मीबाई राठौड़, माधुरी श्रीवास्तव जैसी प्रख्यात गायिकाओं ने । मेरे लिखे गीतों में से चुन कर मुज़ददित नियाज़ी ने "साँझ के रुसले रसिया हो "गीत की धुन बनायी और उसे माधुरी से गवाया ।

सुगम संगीत के लिए रचित गीतों में से कुछ लोकप्रिय रहे गीत हैं ---

१- सांझ के रुसले रसिया हो

२- सुन मेरे सजना, मैं दुखड़ा कैसे कहूं

३- चंदनिया बैरिन भई

४- ठुमुक चली मद मस्त

५- उनकी बाट निहार थकी मैं

६- साथी सुनाना वो गम का फ़साना

७- सपनों में आना, सुरतिया दिखाना

८- संदेसा ले जा रे बादल

९- रंग बदलता है जग अपना

१०- सूनी सूनी लागे नज़रिया

११- मैं तेरा जीवन मीत नहीं

१२- हम किसान हल हाथ हमारे

"बांटन वारे को लगे ज्यों मेहंदी को रंग" कहावत चरितार्थ हो गयी । परमात्मा की इच्छा से गीत-भजन लेखन, स्वर संयोजन, संगीत निर्देशन और गायन के क्षेत्र में मुझे उमंग-उत्साह के साथ आगे बढ़ते रहने के सुअवसर मिलते रहे । श्री अरोराजी की “हिन्दुस्तान स्टार कम्पनी” ने सूरीनाम के अफ्रीकन मूल के वादक अक्क्ल अकॉर्डियन के सहयोग से ८ जनवरी १९६० को दो भजन, एक तो संत तुलसीदास कृत "गाइए गणपति जगवंदन"और दूसरा मेरे द्वारा रचित एवं स्वर बद्ध भजन "शंकर शिव शम्भु साधु" को रिकॉर्ड किया, जिसने देश के ही नहीं अपितु विदेश के श्रोताओं का भी मन मोह लिया । जब १९७५ में भारत सरकार की सेवा करते हुए मेरी नियुक्ति दक्षिण अमेरिका के एक राज्य (ब्रिटिश ) गयाना में हुई तब मुझे वहां "साउथ अमेरिका" के एक देश के रेडियो स्टेशन के "सिग्नेचर ट्यून" में नित्य प्रति स्वरचित शिव-वंदना "शंकर शिव शम्भु साधु"और गणपति वंदना "गाइए गणपति जगवंदन" (विनयपत्रिका का पद ), जिनकी धुन मैंने ही बनायी थी, सुनाई पडी, । ये दोनों भजन उसी देश के हिंदू मंदिर में गायनीज बालिकाओं को इन्हीं धुनों में गाते भी सुना । मैं क्या मेरा पूरा परिवार ही भौचक्का रह गया ।

१९५१ से प्रारम्भ हुई संगीत की इस यात्रा में अहम पड़ाव आया जब १९७४ में पौलीडोर कम्पनी ने “राम गीत गुंजन” के दो एल पी, १९७५ में, "आरती गीत माला" के दो एल पी अलबम बनाये और मैंने १९७६-१९७८ में "गयाना साउथ अमेरिका" प्रवास में वहाँ के हिंदू मंदिर के पुरोहित पंडित गोकर्ण शर्मा के अनुरोध पर गायनीज़ गायकों सिल्विया, गोकर्ण आदि के सहयोग से अपने निर्देशन में उस देश का सर्व प्रथम एल पी “भजन माला “ बनाया । भारत लौटने पर १९७९ में "रामाय नमः" एल पी अलबम बना, तदन्तर १९८३ में “हे राम” कैसेट की लखनऊ स्टूडियो में रेकॉर्डिंग हुई जिसमें प्रमुख कलाकार थीं अंजना भट्टाचार्य और श्रीमती प्रेमजीत कौर । फिर सरकारी नौकरी से सेवामुक्त होने पर १९९५ सितंबर में “अंतर्ध्वनि“, मई १९९७ में “गांधी प्रेरणा“, १९९८ में ”प्रीती की रीति“ कैसेट बने, जिसके पश्चात, हनुमत कृपा से और परम प्रभु श्री राम की आज्ञा से, श्री राम शरणम में समर्पित करने के लिए यथा सम्भव ”बोलो राम“ आदि कैसेट और सी डी बनते रहे ।

मैं श्री दुर्गाप्रसाद मण्डेलिया, श्री डाल्मियाजी, श्री घनश्यामदास बिड़ला का अंतरतम से आभारी हूँ, जिनके प्रोत्साहन से मुझे इन लॉन्ग प्लेइंग रिकॉर्ड में संगीत निर्देशक का कार्य करने का सुअवसर मिला। मैं महाराजा लाल एन्ड संस, दिल्ली के मालिक श्री रमेश बिहारी का भी चिर ऋणी हूँ, जिन्होंने मेरे निर्देशन में बने कैसेट्स को, मेरी शब्द-स्वर-संयोजना को सराहा और अपने दिल में इतना बसाया कि डॉ से अनुनय-विनय करके अस्पताल में अपनी अंतिम श्वास अंतर्ध्वनि कैसेट के भजन "पायो निधि राम नाम" सुनते हुए ली । उनके परिवार ने शांति-हवन तक नित्य प्रति इस कैसेट को ही बजा कर उनकी आत्मा को सुनाया । शत शत नमन है इस दिवंगत पुण्यात्मा को ।

यद्यपि जीवन की आपाधापी में नियमितता से शास्त्रीय संगीत सीखने का अवसर मुझे नहीं मिला फिर भी "स्वर द्वारा ईश्वर सिमरन" करने की शिक्षा पा कर संगीत का रियाज़ करते समय प्रत्येक "षड्ज" के उच्चारण में उस परम प्रभु परमेश्वर को पुकारते रहने का जो अभ्यास किया, उससे मधुर आनंद रस की अनुभूति हुई । हमारे उपनिषद कहते है "रसो वै सः", ईश्वर का स्वरूप रस है । भजन-कीर्तन में वह आनंद-रस के रूप में प्रकट होता है ।

माँ शारदा की अपार कृपा से शब्द-स्वर-गायन के संयोजन से आत्मानंद की रसानुभूति प्राप्त करने की यह यात्रा आज भी, इस शर्त के साथ कि इस कार्य से मैं किसी प्रकार कोई धन न कमाऊँ, उसी प्रकार आगे बढ रही है । कभी मध्य रात्रि में, तो कभी प्रातः काल की अमृत बेला में अनायास ही किसी पारंपरिक भजन की धुन आप से आप मेरे कंठ से मुखरित हो उठती है और कभी कभी किसी नयी भक्ति रचना के शब्द सस्वर अवतरित हो जाते हैं, धीरे धीरे पूरे भजन बन जाते हैं । न कवि हूँ, न शायर हूँ, न लेखक हूँ न गायक हूँ, लेकिन पिछले साठ साल से अनवरत लिख रहा हूँ । आस्तिकता के प्रचार और प्रसार हेतु अपनी रचनाओं के स्वर संजो रहा हूँ स्वयं गा रहा हूँ, बच्चों से गवा रहा हूँ । मैं जो लिखता हूँ, उसमें शब्द "उनके" है, भाव "उनका "है ", इसमें सबको जो लुभा रहा है, आनंद-रस प्रदान कर रहा है वह स्वरूप उनका है ।

हाथ पकड़ कर "वे "लिखवाते हैं, मैं बस लिखता जाता हूँ ।राग छेड़ देते हैं "वे" जो, मैं उन्हीं सुरों पर गाता हूँ ।।

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अपने "संगीत-गुरु गुलाम मुस्तफा खान साहेब" से पायी शिक्षा से जाना और पाया कि स्वर ही ईश्वर है और स्वर साधना ही ईश्वर की पूजा है । हमने पहली बार उनसे ही सुना था कि केवल एक स्वर "सा"( षड्ज) को ठीक से साध लेने से गायक के कंठ में सप्तक के सभी स्वर भली भांति सध जाते हैं । उनसे पायी शिक्षा के कुछ विशेष अंशों में सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यह रहा कि प्रथम पाठ में ही उस्ताद ने हमें "स्वर साधना" का महत्व बता दिया था । उन्होंने मेरा उत्साह बढ़ाते हुए कहा था " भोला भाई, मुश्किल नहीं है यह । तानपुरा उठाओ, अपने स्वर से मिलाओ, और फिर पूरे भाव-चाव से स्वर से स्वर मिला कर "सा" या "ॐ" स्वर का उच्चारण करो ।"

"एकै साधे सब सधे, सब साधे सब जाय“ उक्ति "गुरु मन्त्र" के समान मेरे मन बुद्धि पटल पर, सदा सदा के लिए, फौलादी अक्षरों में अंकित हो गयी और उस्तादजी का कथन जीवन भर मेरी संगीत साधना का मूलाधार बना रहा। मैं उस्ताद जी के बताये महान सूत्र के सहारे, "स्वर में ही ईश्वर" के दर्शन करता कराता अपनी संगीत साधना में जुटा रहा । जब जब भी मैंने कोई उत्तम संगीत सुना अथवा किसी 'पहुंचे हुए' सिद्ध गायक के कंठ से स्वरित "सा" मेरे कानों में पड़ा, मुझे रोमांच हो गया, मेरी आँखें नम हो कर मुंद गयी और मन आनंद रस से रसमय हो गया । वास्तविक सत्य तो यह है कि समर्थ संगीतज्ञों के अंतर्घट से उठे "षड्ज" स्वर की तरंगों के कानों में पड़ते ही जिस परमानन्द की प्राप्ति होती है वह साक्षात "हरिदर्शन" से कम नहीं होती है । संगीत हमारे अंदर समाये हृदयगत भावों के आत्मिक स्वरूप का दर्पण ही तो है सम्भवतः इसीलिये "स्वर ही ईश्वर है" की सत्यता का सदैव ही मैंने निजी स्तर पर अनुभव किया है ।

इस महनीय पाठ के बाद उस्ताद जी की देख रेख में अधिक से अधिक स्वरसाधना करने का हमारा अभ्यास कुछ समय तक ही यथावत चला । जब उस्तादजी के "जति गायन" का शोध कार्य समाप्त हो गया, उनका कानपुर आना जाना धीरे धीरे कम हो गया और वे मुंबई निवासी हो गए । तब वर्षों तक उनसे मुलाक़ात नहीं हुई । संयोग से सन १९९७ में हम भी मुंबई पहुंच गए, तब उनसे मेरी भेंट हुई । इस समय तक उस्ताद जी की प्रसिद्धि एवं सफलता आकाश छू रही थी । वह विश्वविख्यात हो चुके थे । भारत सरकार द्वारा "पद्मश्री" उपाधि के लिए मनोनीत हो चुके थे, एक फिल्म में "बैजू बावरा" का किरदार निभा चुके थे, एक में "उमरावजान" के उस्ताद बनने का मौका भी पा चुके थे, अनेक फिल्मों में संगीत निर्देशन करने के प्रस्ताव भी उनके सन्मुख थे ।

यह उस्ताद जी की महान उदारता थी और मेरे लिए अत्यंत सौभाग्य की बात थी कि मेरे जैसे साधारण शागिर्द को उन्होंने याद रखा । उन्होंने फोन पर मेरी आवाज़ पहचान ली और मुझसे भेंट करने के लिए वह खुद ही बांदरा से अल्टामाऊंट रोड तक हमारे घर आने को तैयार हो गये। गुरु परम्परा के अनुसार यह अनुचित होता, इसलिए मैं स्वयं उनके घर गया । उन्होंने मुझे गले लगाया । "मेरे भोला भाई" कहकर उन्होंने मेरा परिचय घर में सबसे कराया । अनेकों पीढ़ियों से संगीत की सेवा करने वाले बदायूं के इस होनहार संगीतज्ञ का भाई या मित्र कहला पाना, आत्मीय स्नेह पाना मेरे लिए बड़े गर्व की बात थी, तब भी थी और आज भी है ।

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प्रकृति में व्याप्त ध्वनियाँ जो मनुष्य के जन्मते ही उसके मन-मस्तिष्क को स्पर्श कर उल्लसित करती हैं वही स्वर और लय में बंधकर मधुर रस की अनुभूति करा के गायन बन जाती हैं । १९२९ में जब मेरा इस जगत में पदार्पण हुआ, तब भारत में ब्रह्म महूर्त में घर घर का वायुमण्डल प्रणवाक्षर ॐ के नाद से और भारतीय नारियों के भाव भरे लोकगीत और भजन से गुंजायमान रहा करता था । मैं शैशव में अपनी बूढ़ी दादीमाँ "ईया" के साथ उनके बिस्तर पर ही सोये हुए उनसे प्रतिदिन भोर-बेला में भजन सुना करता था, जिनमें असाधारण करुणा, पीड़ा और कृपा प्राप्ति की पिपासा समायी रहती थी । जब वह संत सूरदास का पद "हे गोविन्द राखो सरन" गाती थीं, तब उनके गायन से, उनकी वाणी से ऐसा प्रतीत होता था जैसे वह किसी परिचित को पुकार रही हैं । वह नित्य ही अपने ठेठ भोजपुरी लहजे में मीराबाई का एक पद गातीं थीं "जागाहे बंसी वारे लाला जागाहे नन्द दूलारे" । उनके इस भजन के गायन की विशेषता यह थी कि शब्दों के फेर बदल के साथ वह इस भजन को किसी एक विशेष राग में गातीं थीं, जिसे वह "परभाती" कहतीं थीं ।

उस छोटी उम्र में उनसे सुने वे गीत, वे पद, उनके स्वर, उनकी गायकी, मेरे मन मस्तिष्क में इतनी गहराई से पैठ गये कि जब १९५१ में छोटी बहन माधुरी के रेडियो प्रोग्राम में गाने के लिए रेडियो स्टेशन से "शेड्यूल" किया मीराबाई का वही पद आया जिसका भोजपुरी रूपान्तर मैंने अपनी दादी से बहुत बचपन में सुना था, तुरंत ही मुझे दादी की वह प्रभाती राग की बंदिश याद आई और मीराबाई का वह पद उस बंदिश में 'चूल ब चूल' बैठ गया, जिसे सभी ने सराहा ।

हमारी अम्मा बिहार की थीं, वह भी बिहार के भोजपुरी लोकगीत, बंगाली पारम्परिक भक्ति गीत बाउल" एवं "मीराबाई" के पद बहुत शौक से गाती थीं । उनकी भी विशेष धुनें और "प्रभाती राग" की बंदिश जो उस समय मेरे मन में समा गयी थी, आज तक मेरे मन मंदिर में गुंजायमान है । गायन के लिए मधुर कंठ तथा एक बार सुन कर राग रागनियों को सदा के लिए मन में बसा लेने की क्षमता एवं प्रतिभा कदाचित प्रभु ने मुझे जन्म से ही प्रदान कर रखी थी । अतएव ईश्वरप्रदत्त नैसर्गिक प्रतिभा के अतिरिक्त संगीत-कला के प्रति मेरी रुचि, निष्ठा और प्रेम का श्रेय मेरी ईया और अम्मा को जाता है ।

अपने जन्मजात सस्कारों और स्वभाव के कारण संगीत-प्रेमी हम चारों भाई बहनों को हमारे कुछ मित्र और सम्बन्धी 'गन्धर्व' कह कर पुकारते थे और आस पास के कुछ प्रबुद्ध जन और पड़ोसी "पिता श्री" द्वारा बनवाए हमारे घर 'लाल विला' को "गन्धर्व लोक" कहा करते थे । क्यूँ ? क्योंकि नित्यप्रति प्रातः काल की अमृत बेला से शुरू होकर, मध्य रात्रि तक हमारे घर की प्राचीरों के बीच उठतीं मधुर संगीत की तरंगें आस पास के सभी घरों को आच्छादित और पड़ोसियों को आनंदित करती थीं । पुराण कहते हैं कि इन्द्रदेव की सभा में गन्धर्व गाते थे, अप्सरा नृत्य करती थीं और किन्नर वाद्य बजाते थे । हमारे यहाँ कुछ ऐसा ही माहौल था । प्रातः सूर्योदय से पहले ही उस घर की प्राचीरें तानपूरे की झंकार से गूँज उठती थी और भैरवी के दिव्य स्वर से मोहल्ले का वातावरण तरंगित हो जाता था । नित्य प्रति अमृत बेला में शुरू हो जाती थी एक विशेष पद्धति में हमारे घर में संगीत की साधना । बड़े भइया अँधेरे में ही उठ कर हम सब को जगाते थे । सुबह पाँच बजे तानपूरा छिड़ जाता था । तानपूरा छेड़ कर हम खरज के "सा" के स्थान पर "ॐ" का उच्चारण करते थे । प्रातः काल में हमारे घर से निःसृत "प्रणवाक्षर" का मधुर नाद न केवल हमारे घर आँगन का माहौल वरन पूरे मोहल्ले के वातावरण को ही पवित्र कर देता था । ओंकार की ध्वनि ही ब्रह्म रूप है । ॐ कार का रियाज़ संगीत-साधना है, समर्पण है, पूजा है । स्वर और शब्द की उत्पत्ति ओंकार से ही हुई है।

दिसम्बर जनवरी की भयंकर ठंढ में भी पड़ोसियों के खिडकी दरवाजे खुल जाते थे, वे कान लगाकर अति श्रद्धा से हम चारों के भजन "जागो बंशीवारे ललना, जागो मोरे प्यारे" आदि सुनते थे और इसी बोल को दुहरा कर अपने लल्ला लल्ली को जगाते थे । मेरे बड़े भैया प्रसिद्ध गायक स्वर्गीय कुंदनलाल सैगल के अनन्य भक्त थे । वह उनकी भैरवी राग की ठुमरी "बाबुल मोरा नैहर छूटो जाय" गाकर मुहल्ले की सभी भौजाइयों को उनके नैहर की याद दिला कर रुलाया करते थे । घर में फिल्मी गीत, लोक-गीत के साथ साथ ठाकुर ओंकार नाथ जी, पंडित विनायक राव पटवर्धन जी, पंडित डी. वी. पलुस्कर जी तथा बिस्मिल्लाह खां साहब के शास्त्रीय संगीत के भी एच. एम. वी. के तवे (रिकॉर्ड ) थे, जो बजते रहते थे । रात्रि के समय मालकोंस, बागेश्वरी और दरबारी रागों के ख्याल, भजन और पारम्परिक रचनाएँ गाते गाते उस घर के निवासी, चारों बच्चों ने, "गन्धर्वत्व" (यदि ऐसा कुछ है तो वह) प्राप्त कर लिया था और हमारा घर बन गया था "गन्धर्व लोक"

१९४५-४६ में "पहली नजर" फिल्म आयी । मैं सोलह वर्ष का था, इंटर में पढता था । हमने फिल्म देखी । फिल्म मे मोतीलाल साहेब की एक्टिंग बहुत स्वाभाविक थी और उनके द्वारा गायी गजल तो कमाल ही कर गयी । वह गजल थी, "दिल जलता है तो जलने दे, आँसू न बहा फ़रियाद न कर "। मैं उस समय से ही इस गजल के गायक मुकेशजी का मुरीद हो गया । यह गजल दिलदार मुकेशजी की दिल सम्बन्धी पहली दिलकश देन थी । इसके बाद भी मुकेशजी ने दिल से सम्बंधित अनेक रचनाएँ गाईं जो मुझे बहुत ही पसंद आयीं थीं और जिन्हें मैं अक्सर गाता भी था । उनमें से कुछ मुझे अभी भी याद रह गयी हैं :-

कभी दिल दिल से टकराता तो होगा, उन्हें मेरा खयाल आता तो होगा।

और

दिल जो भी कहेगा मानेंगे, दुनिया में हमारा दिल ही तो है।
हर हाल में जिसने साथ दिया, वो एक बिचारा दिल ही तो है।।

सारा जमाना जानता है कि मैं मुकेशजी का कितना जबर्दस्त फैन हूँ । अच्छी तरह याद है बी. एच. यू. में मेरे सामने दरी पर सिर झुकाए बैठीं देश विदेश से विद्याध्यन हेतु काशी पधारी भारतीय मूल की बालिकाओं की रुचि और उनके पीछे विभिन्न छात्रावासों से आये मद्रासी, पंजाबी, गुजराती, बंगाली तथा उत्तर भारत के सभी प्रदेशों के बालकों के चेहरे और उनका मेरे हर गाने के बाद ज़ोरदार ताली बजाकर, मुझे एक के बाद एक मुकेशजी के गीत गाते रहने का प्रोत्साहन देना, कार्यक्रम के संचालक "रंगनाथ " की फरमाईश पर महफिल का माहौल तब्दील करने के लिए मुकेशजी का एक दूसरा ओज भरा गाना गाना --

मंजिल की धुन में झूमते गाते चले चलो
बिछड़े हुए दिलों को मिलाते चले चलो

इंसानियत तो प्यार ओ मोहब्बत का नाम है ...

इसी सन्दर्भ से जुड़ी मानस पटल पर संचित अनंत स्मृतियों में से वाराणसी प्रवास १९४७-४९ की मधुर स्मृतियाँ, बरबस ही उभर कर साकार हो रहीं हैं। संगीत मार्तण्ड पन्डित ओमकारनाथ जी बी. एच. यू. के संगीत महाविद्यालय के संस्थापक और प्रथम प्राचार्य थे । उन्होंने महामना मालवीयजी की मन्त्रणा से भारतीय शास्त्रीय संगीत के प्रचार प्रसार हेतु इस विद्यालय की स्थापना करवायी थी । मुझे बी. एच. यू . में आयोजित उनके एक शास्त्रीय संगीत के कार्यक्रम में वॉलंटीअरिंग के बहाने शामिल होने का अवसर मिला । मेरे जीवन का यह पहिला अवसर था जब मुझे ऐसे दिव्य गायक के इतने निकट बैठकर उनका संगीत सुनने का सुअवसर मिला । जाड़े की वह पूरी रात मैंने शून्य से उतरती पूर्ण चन्द्र की शीतल ओस सनी सजल किरणों में भींजते, उनका दिव्य संगीत सुनते हुए काटी ।

पंडित जी के गायन में जो एक प्रमुख विशेषता मुझे उस समय लगी, वह यह थी कि वह कोई भी ख्याल-भजन, कुछ भी शुरू करने के पूर्व कुछ समय को आँखें बंद कर के "ध्यान" लगाते थे और जो पहिली ध्वनि उनके कंठ से निकलती थी, वह प्रणवाक्षर "ॐ" जैसी थी । उनके दिव्य संगीत का आकर्षण था जिसने सैकड़ों संगीत प्रेमियों को विश्वविद्यालय के रुइया हॉस्टल के सामने वाले घास के मैदान में बिना किसी तम्बू-कनात के "नीले गगन के तले, तारों की छैयां में" शीतकाल की शीतल ओस में भींगते हुए बिना किसी शिकवा शिकायत के सारी रात बिठाये रखा । ठाकुरजी के स्वरों की गर्माहट ने उस शीतल रात्रि को इतना गरमा दिया था कि किसी को भी कोई ठिठुरन नहीं हुई । उनके सधे हुए स्वरों के उतार चढ़ाव से हम सब श्रोताओं के रोम रोम एक विचित्र सिहरन से थिरक गये और हम सबकी आँखों से झरती गर्म अश्रु धारा से वह सारी महफिल गरमा गयी । प्रातः कालीन सूर्य की सुनहरी किरणें नीलाकाश में पूर्व दिशा से झाँकनें को उद्धत हो रहीं थीं पर संगीत प्रेमी पंडाल से उठने को तैयार न थे । समापन तो होना ही था । श्रोताओं के विशेष अनुरोध पर पंडित जी ने सूरदास जी का पद गाया --

मैया मोरी मैं नहीं माखन खायो

भोर भयो गैयन के पाछे मधुबन मोहि पठायो ।

चार पहर बंसी बन भटक्यो साँझ परे घर आयो ।।

...

यह ले अपनी लकुटी कमरिया बहुत ही नाच नचायो,

सूरदास तब बिहंसि जसोदा, ले उर कंठ लगायो ।।

सूरदास जी की इस रचना में माता यशोदा और बालक कृष्ण के बीच हुई नोक झोंक में जो जो भाव प्रगट हुए, पंडित जी ने अपने कंठ से उन सब भावों का अलग अलग शास्त्रीय राग-रागिनियों और पारंपरिक धुनों द्वारा ऐसा सजीव चित्रण किया कि श्रोतागण को ऐसा लगा जैसे वे "नंदालय" के आंगन में बैठे हैं और वह "बाल लीला" उनके सन्मुख ही हो रही है । वहां का सारा वातावरण परमानन्द मग्न हो गया । सभी अपनी सुध-बुध भूल गये ।

अनुमान लगाओ प्रियजन, कि उस पल वहां उपस्थित हम सब संगीत प्रेमियों की मनः स्थिति कैसी रही होगी ? सबकी छोडिये, मेरी सुनिए । मुझे तत्काल जो आनंद मिला था वह प्रत्यक्ष कृष्ण दर्शन से किसी भांति कम न था । इसके अतिरिक्त पंडित जी के उस कार्यक्रम ने मेरे मन में भजन गायन के भाव जागृत करा दिए और संगीत के लिए एक नयी उमंग ऊर्जा मुझमें प्रवाहित हो गयी । १८ वर्ष की अवस्था में हिन्दू विश्वविद्यालय में अध्ययन के दौरान शुरू में मैं केवल मुकेशजी और जनाब रफी साहेब के फिल्मी गाने ही गाता था । पर पंडित ओम्कारनाथ ठाकुर के संगीत के प्रभाव से मुझमें एक चमत्कारिक परिवर्तन हुआ, गायन के क्षेत्र में फिल्मी गीतों के साथ ही भजनों को और पारम्परिक गीतों को प्राथमिकता देनी शुरू कर दी । मेरी संगीत साधना में पंडित नारायण राव व्यास, पटवर्धनजी एवं डी वी पलुस्करजी की गायकी का समावेश हो गया ।

अपने बनारस-प्रवास के दो वर्षों में काशी विश्वविद्यालय में पढ़ाई के दौरान विभिन्न तत्कालीन विषयों को संजोते हुए समय समय पर जो शब्द-संरचना हुई और उन्हें स्वरबद्ध करके मैंने वहां गाया जैसे -- गणतन्त्र-दिवस पर लिखा और गाया “प्रजातंत्र बन गया, मिट गयी दुःख विपदा की रात“, स्वतंत्रता दिवस से संबंधित रचना ”बन ठन के आ गयी हमारी आज़ादी की रानी", गीत गोष्ठी में स्वरचित गीत गाया -- ”अरे मानिनी मान छोड़ दे” । ये सभी लोकप्रिय रचना रहीं, गुनगुनाई गयीं । इसके अतिरिक्त अपनी छोटी बहिन माधुरी के लिए उसके विद्यालय के सांस्कृतिक कार्यक्रमों तथा संगीत प्रतियोगिताओं में भाग लेने के लिए गीत लिखे, उन्हें स्वरबद्ध किया, जिन्हें माधुरी ने भावपूर्ण सुरीले स्वरों में प्रस्तुत किया, तब उसे जिसने सुना, उसे सराहा, उसे पुरुस्कार भी मिले । इन सब प्रशंसाओं के फलस्वरूप मुझे संगीत-कला के क्षेत्र में कुछ विशिष्ट कर जाने की प्रेरणा हुई ।

उन दिनों मैं कानपुर के प्रथम संगीत विद्यालय [ College of Music and Fine Arts] के संस्थापक मंडल से जुड़ा हुआ था, जिसके सौजन्य से बालक-बालिकाओं को संगीत एवं नृत्य में प्रशिक्षित करने की भावना से "कॉलेज ऑफ़ म्यूजिक एंड फाइन आर्ट्स, माल रोड" की एक शाखा को अपने मोहल्ले में खोलने की प्रेरणा हुई । १९५० के दशक में ग्वालटोली बाज़ार के मकान के निचले हिस्से में अपने परिचित कला-पारखी सज्जनों के सहयोग से संगीत विद्यालय खोला । म्युनिस्पल गर्ल्स स्कूल के नृत्य के अध्यापक श्री शिशिर रंजन चक्रवर्ती, श्री शरदचंद्र कौशिक, प्राचार्य अवस्थी हमारे सहयोगी और प्रबंधक रहे । इसका उद्घाटन प्रसिद्ध सितारवादक श्री रविशंकरजी ने और संगीत विज्ञ पुरुषोत्तम दास जलौटा और संगीतज्ञ विद्यानाथ सेठ ने किया । पर तत्कालीन सामाजिक परिस्थिति के कारण उस समय संगीत-कला का प्रदर्शन और उसकी गोष्ठी में बालक-बालिकाओं का भाग लेना समाज की संकीर्ण विचार धारा के कारण अभिनंदनीय नहीं समझा जाता था, अतः विद्यार्थियों की संख्या नगण्य सी रही और चार-पांच वर्ष में ही वह निष्प्राण हो गया, बंद हो गया ।

इसके साथ साथ १९५० में कानपुर में घर में रह कर अपनी प्रैक्टिकल परीक्षा देने की तैयारी करते हुए, मैंने माधुरी को आकाशवाणी लखनऊ का कलाकार बनाने की मन में ठान ली । ऑल इंडिया रेडियो लखनऊ से गीत, लोकगीत, भजन के कार्यक्रम को प्रसारित करने के लिए निर्धारित परीक्षाओं में जब प्रथम प्रयास में ही माधुरी अपनी ध्वनि परीक्षा में (ऑडिशन में) उत्तीर्ण हो गयी, चुन ली गयी तो उसकी सफलता पर मैं फूला नहीं समाया । आर्थिक कठिनाइयों के कारण सुयोग्य निर्देशक नियुक्त करना सम्भव न था, इसलिए मैंने ही संगीत निर्देशक की भूमिका निबाही । न हारमोनियम बजाना आता था, न तबला, न माइक था, न अन्य अपेक्षित साज । एक लकड़ी के डंडे को झूठ मूठ माईक की तरह हाथ में ले कर कैसे गाना है, कहाँ, कब और कैसे सांस लेना है और छोड़ना है आदि का समुचित अभ्यास कराया । स्वर, लय और भावों के साथ शब्दों का सही उच्चारण करके उसके समवेत सामंजस्य से भावात्मक गायन के प्रस्तुतिकरण के लिए माधुरी को प्रशिक्षित किया । इस प्रकार स्वर साधना और अभ्यास की नयी विलक्षण रीति कायम की । उन दिनों पहिले से रिकॉर्डिंग नहीं होती थी, वाद्य-वृंदों के साथ तत्काल ही कार्यक्रम प्रस्तुत करना होता था । जून १९५१ में उसका पहिला कार्यक्रम हुआ । माधुरी के मधुर सुरीले भाव भरे गायन ने और उसके मृदुल स्वभाव ने रेडियो स्टेशन के अधिकारियों का और श्रोताओं का मन जीत लिया। मेरी संगीत-साधना ने सफलता के चरण चूमे ।

वीणापाणि माँ सरस्वती की महनीय कृपा से मेरा सपना साकार हुआ । प्रति मास माधुरी के पास आकाशवाणी के सुगम संगीत विभाग से भजन और गीत की पाण्डुलिपि आने लगी, जिन्हें मैं चौबीसों घंटे अपनी जेब में रख कर, घर में, ऑफिस में, काम करते समय, खाना खाते समय, हर जगह, हर समय स्वरबद्ध करने के अभियान में जुट गया । क्योंकि ये भजन और गीत अम्मा दादी आदि से सुने हुए मीरा, तुलसी, सूर आदि के भजन ही नहीं अपितु उनके समकालीन अन्य भक्त जैसे सहजोबाईजी, युगलप्रियाजी, रानी रूपकुंवरि जी तथा मंजुकेशी जी, संत मलूकदास आदि के पद और महादेवी, निराला, जयशंकर प्रसाद, हरबन्स राय बच्चन आदि महा कवियों के गीत, जिन्हें हमने पहले कभी सुना भी नहीं होता था, वहाँ से आते थे, इनके बोल कठिन होते थे, अर्थ आसानी से समझ में नहीं आते थे । मुझे असंख्य बार उनकी पंक्तियों को गुनगुनाना पड़ता था । उनके भाव समझने के लिए एक प्रकार से शोध करना पड़ता था । कभी कभी उनके गूढ़ार्थ को समझ कर मैं आत्मिक आनंद सागर में डुबकियां लगाने लगता था । धुन बनाने में अपनी आत्मा को उंडेल देने के फलस्वरूप इस अंतराल में जितनी धुनें बनायीं, वे आज तक बनी धुनों में सबसे हृदयग्राही और रसमयी रहीं ।

माधुरी के संगीत निदेशन का, आकाशवाणी से आये हुए गीत के स्वर-संयोजन का और नियुक्त अवधि में वाद्य-वृंदों के साथ कार्यक्रम की रसमयी सुंदर प्रस्तुति का भार मेरे ही कन्धों पर था । इसलिए मैं माधुरी का अभिभावक और संगीत शिक्षक बनकर प्रति मास सुगम संगीत के कार्यक्रम के प्रस्तुतिकरण के लिए उसके साथ आकाशवाणी लखनऊ जाया करता था । धीरे धीरे सुगम-संगीत विभाग में कार्यरत अधिकारियों से मेरी जान-पहिचान हो गयी । संगीत विभाग में सुगम-संगीत के अध्यक्ष मुज़ददित नियाज़ी, पंचायती कार्यक्रम के बाबाजी जंग बहादुर जी, गायक हरीश भारद्वाज, वंशीवादक श्री रघुनाथ सेठ तथा श्री विनोद चैटर्जी आदि से हमारे आत्मीय सम्बन्ध स्थापित हो गए । शफाअत अली सिद्दीकी तो मुझे अभिन्न मित्र जैसा भरपूर स्नेह देकर "भोला भाई" कहने लगे और अपनी छोटी बहिन की तरह माधुरी की संरक्षा का पूरा ध्यान रखने लगे । इन सबकी प्रेम भावना का क्या बखान करूँ, परिवार के स्वजन की भाँति सभी हम दोनों पर आशीष बरसाते रहते थे । उनके आत्मीय व्यवहार के फलस्वरूप ही मुझे आकाशवाणी में अनेको गण्यमान विशिष्ट संगीतज्ञों के साथ बैठने का सौभाग्य मिला और उनका भी स्नेहाशीर्वाद प्राप्त हुआ ।

१९५०-६० के दशक में सुगम-संगीत और उससे संबंधित साहित्य के प्रसारण-विभाग के अधिकारी हिन्दी-विज्ञ श्री शफाअत अली सिद्दीकी थे, जिन्होंने हमारी मुलाक़ात बदायूं के (मरहूम) उस्ताद इनायत हुसैन खान के बेटे और रामपुर के (मरहूम) फिदा हुसैन साहेब के नाती गुलाम मुस्तफ़ा साहिब से करायी । उस्ताद तब कानपुर के संगीत महाविद्यालय के प्रोफेसर बृहस्पति जी के साथ मिलकर, आज से लगभग ८०० वर्ष पूर्व मतंग ऋषि द्वारा रचित नाट्य शास्त्र में वर्णित "जति गायन" की भूली बिसरी पद्धति का व्यावहारिक प्रयोग करके उस गायन पद्धति को पुनर्जीवित करने का प्रयास कर रहे थे । अतः इस शोध-कार्य के कारण उनका कानपुर आना जाना होता ही रहता था ।

मेरे पुरज़ोर अनुरोध पर उस्ताद गुलाम मुस्तफा ने कानपुर में अपने प्रथम शागिर्द के रूप में मुझे और मेरे छोटे भाई जैसे सुगम संगीत प्रेमी संतू श्रीवास्तव को स्वीकार किया । पारम्परिक हिन्दू गुरुजन जिस प्रकार रोली टीका कर के कलाई में 'कलावा' बांधते हैं, सहसवान-रामपुर-ग्वालियर घरानो से सम्बन्धित मुस्लिम काल के संगीत घरानों की परंपरा के अनुसार वैसे ही हमारी कलाई में मुस्तफा साहेब ने "गण्डा" बाँधा, जो मेरे लिए बड़े गर्व की बात थी । यह मेरा सौभाग्य था कि हम उनके शागिर्द हो गये । औपचारिक विधि से बाकायदा मेरी वास्तविक संगीत शिक्षा शुरू हुई ।

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परिवार के साथ संगीत संध्या, विवाह-प्रस्ताव, विविध मनोरंजन की मौज मस्ती में दिन बिताते हुए धीरे धीरे गरमी की छुटियाँ खत्म होने को आईं, पर मेरा परीक्षाफल नहीं आया । लोगों ने राय दी कि बनारस कौन दूर है, मैं वहीं जा कर रिजल्ट देखूँ और आगे "एम टेक " की पढाई के लिए वहीं एडमिशन फॉर्म भर कर सबमिट कर दूँ ।

बनारस पहुंच कर सबसे पहले हनुमान जी के दर्शन करने संकटमोचन मन्दिर गया । उस दिन मैंने बहुत श्रद्धा भक्ति से संकटमोचन की आराधना की । पूरे जोर शोर से हनुमान चालीसा का पाठ पूरा करके जब मैंने आँखें खोली तो देखा कि मन्दिर के महंत जी हाथों में एक माला और प्रसाद का दोना लिए मेरे सन्मुख खड़े हैं । मेरे सिर पर आशीर्वाद का हाथ फेरते हुए उन्होंने मुझसे कहा "बेटा । तुम ने बड़ी श्रुद्धा से पाठ किया । बेटे, ये देखो मेरे रोंगटे अभी तक खड़े हैं, इतना रोमांच हुआ है मुझे । अवश्य ही संकटमोचन हनुमान जी तुम पर बहुत प्रसन्न हैं । वह असीम कृपालु हैं, तुम्हारा कल्याण सुनिश्चित है । तुम्हारी मनोकामना अवश्य पूरी होगी ।" इतना कह कर उन्होंने मूर्ति के चरणों से उठाई गेंदे के फूलों की माला मेरे गले में ड़ाल दी और अपने हाथ से पेड़े का मधुर प्रसाद मुझे दिया । मैं गदगद हो गया ।

परीक्षा में उत्तीर्ण होने के लिए और सुपर डीलक्स "कार"वाली देवी से, "उसने कहा था" के लेखक गुलेरी जी के शब्दों में, "कुडमाई" के लिए यानी कि अपनी और उनकी "सगाई" के लिए मुझे इन दुआओं और आशीर्वादों की सख्त ज़रूरत थी । परीक्षा में प्रेक्टिकल और लिखित सारे पर्चे बहुत ही अच्छे हुए थे । संकटमोचन महाबीर जी की कृपा से उच्च श्रेणी में सफल होने की पूरी आशा थी और उसी के साथ जुडा था मेरा उन देवीजी का जीवन साथी बन जाना इसलिए मन्दिर में मिले आशीर्वादों ने मेरे मन को प्रसन्नता से भर दिया था । मेरी सारी मनोकामनाएं अवश्य ही पूरी होंगी, मुझे इसका पूरा भरोसा हो गया ।

भयंकर भूख लग रही थी, मन्दिर से निकल कर सीधे यूनिवर्सिटी के गेट के पास मद्रासी अइयर जी की नयी केन्टीन में गया । गर्म साम्भर, गरी की चटनी, शुद्ध देसी घी और गन पाउडर के साथ इडली और मसाल दोसा खाकर, मिर्ची की जलन मिटाने के लिए पश्चिमी पंजाब से बटवारे के बाद भारत आये पुरुषार्थी रिफ्यूजी गुरुचरण सिंह के ठेले पर बड़े वाले अमृतसरी गिलास भर लस्सी का सेवन किया । आत्मा और उदर दोनों ही तृप्त हो गये । खा पीकर साईकिल यूनिवर्सिटी के सेन्ट्रल ऑफिस की और बढा दी । रजिस्ट्रार ऑफिस के नोटिस बोर्ड पर उस दिन B. Met., B.Pharm, B Sc. (Geology) के रिजल्ट तो लग गये थे, कॉलेज ऑफ़ टेक्नोलोजी के रिज़ल्ट नहीं थे । निराश हो कर कमरे में लौट आया । कल तक इंतज़ार करना पड़ेगा ।

हम मोर्वी हॉस्टल के कमरे में, चौकीदार को पटा कर गैर कानूनी ढंग से ठहरे थे । उस कमरे में बिना पंखे के जून की गर्मी को झेलते हुए गरम रात कितनी मुश्किल से कटी यह बयान करना कठिन है । लकड़ी के तख्त पर करवटें बदलते बदलते, मेरी आँखों के सामने यूनिवरसिटी में बिताये पिछले दो वर्षों में घटीं सभी महत्वपूर्ण घटनाएँ एकएक कर, चलचित्र के समान आती जाती रहीं । नयी रिलीज़ होने जा रही फिल्म के प्रोमोज की तरह, कानपुर में उन "कार" वाली कन्या के साथ अपने इंटरव्यू के दृश्य तथा उनकी कार का दृश्य बार बार सामने आता जाता रहा ।

जितना मैंने चाहा कि वो कत्ल की रात जल्दी कट जाये वह उतनी ही लम्बी हो गयी । उस समय मन में बस एक आकांक्षा थी कि जल्दी से सबेरा हो जाये और मैं बी. एच. यू. के रजिस्ट्रार ऑफिस के नोटिस बोर्ड पर अपना रिजल्ट देख लूं, तार से बाबूजी को खुशखबरी भेजूँ और बाबूजी उस "कार वाली" बिना बाप की बिटिया का उद्धार करने के लिए उसके घर समाचार भेजें, मगनी और ब्याह की, तारीखें फटाफट तय हो जाएँ, और कार वाली कन्या के पोलिटीशियंन भैया मुझे विवाह से पहले ही दिल्ली में सरकार के किसी मिनिस्टर पर जोर डाल कर कोई जबरदस्त जॉब दिलवा दें और फिर मुझे एक इम्पोर्टेड मौरिस मायनर, हिलमन, या वौक्स्हाल कार के साथ वह कार वाली कन्या भी मिल जाये । घंटे दो घंटे को जो नींद आयी उसमें भी सपने में इम्पोर्टेड गाड़ियाँ और उनमें मेरे बगल में बैठीं वो कन्या दिखाई देती रहीं । कितना लालची और मतलबी होता है मानव ? अपनी किशोरावस्था में मैं भी वैसा ही था ।

जैसे तैसे सबेरा हुआ । नहा धोकर सबसे पहले, बी. एच. यू. के प्रांगण में बने बाबा विश्वनाथ के मन्दिर की ओर दोनों हाथ जोड़ कर प्रणाम किया और फिर ब्रोचा हॉस्टल के साथ वाली केन्टीन में चाय टोस्ट का नाश्ता कर के सीधे रजिस्ट्रार ऑफिस की ओर चल दिया । नोटिस बोर्ड के आगे भीड़ लगी थी । धक्कम धुक्का मची थी वहां । मैं एक खाली बेच पर बैठ कर भीड़ छटने की प्रतीक्षा करने लगा ।

अवसर पाते ही इस आशा में कि मेरा रोल नम्बर फर्स्ट डिवीजन वालों में छपा होगा मैंने अपनी लिस्ट का ऊपरी हिस्सा बार बार पढ़ा - उसमे मेरा नम्बर नहीं मिला । थोड़ी निराशा हुई । लिस्ट में नीचे सेकण्ड डिवीज़न वालों की लम्बी नामावली में अपना नम्बर ढूढने का प्रयास किया, एक बार फिर निराश हुआ । बार बार, अनेकों बार उस लिस्ट को खंघाला, पर उस लिस्ट में मेरा रोल नम्बर कहीं भी नहीं मिला ।

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रिजल्ट देखते ही मेरे पैरों तले की धरती सरक गयी । उस समय ऐसा लगा जैसे किसी ने क़ुतुब मीनार की सबसे ऊपरी मंजिल से धक्का देकर मुझे नीचे फेंक दिया । इस सुनामी के पीछे आये भयंकर भूचाल के एक झटके में मेरी कल्पना का सुनहरा महल पल भर में टूट कर चकनाचूर हो गया । फेल होने के कारण मैंने दोनों प्रेयसियों को खो दिया -- एक "कारवाली" और दूसरी "कार" । एक महत्वाकांक्षी बीस वर्षीय नवयुवक की मनः स्थिति ऐसी हालत में कितनी निराश और दुखी रही होगी, उसका अनुमान शायद ही आज के हमारे युवा वर्ग लगा पायें । युद्ध में हारा सिपाही "मैं" खाली हाथ बनारस से कानपुर लौट आया ।

इस प्रसंग का स्मरण होते ही मुझे गीता राय जी का एक बहुत पुराना गीत याद आया - "मेरा सुंदर सपना बीत गया, मैं प्रेम में सब कुछ हार गयी, बेदर्द जमाना जीत गया " । कानपुर वापिस लौटने पर कुछ दिनो के बाद आकाशवाणी लखनऊ से छोटी बहिन माधुरी के पास, "स्वप्न लोक" शीर्षक से, सुगम संगीत कार्यक्रम में गाने के लिए गीत आये - "सपनों के महल बने बिगड़े " और "सपने मेरे टूट रहे हैं ", मैंने उन गीतों की धुनें बनायी और इत्तेफाक से धुनें अंतरंग में व्याप्त पीड़ा के कारण इतनी भाव भरी और पीड़ामय बनी कि रेडिओ स्टेशन के सम्बंधित पारखी अधिकारिओं को कहना पड़ा "अवश्य ही ये धुनें किसी टूटे सपने वाले दुखिया ने बनाई होंगी !! "

कष्ट के क्षण मानव के मन को विचलित कर देते हैं और सत्य और धर्म की राह पर बढते हुए उसके कदम डगमगा जाते हैं । कुछ समय बाद जब मैं उस धक्के से उबर गया तो पाया कि मेरे मन में रह रह कर यह प्रश्न बार बार उठ रहा था कि सभी विषयों में उच्च श्रेणी से अधिक अंक प्राप्त हुए थे फिर कहाँ, किस विषय में और, कैसे कमी रह गयी । अन्ततः इस झंझावात के थमने पर मैंने केवल एक विषय में ही परीक्षा देने का निश्चय किया और बी. एच. यू. फिर से विद्याध्ययन के लिए चला गया ।

जब पहले दिन क्लास में पहुंचा, हाजिरी के लिए मेरा नाम पुकारा गया और मैं अपना परिचय देने को खड़ा हुआ तो प्रोफेसर राजू आश्चर्यचकित रह गये और बोले "तुम तो फेल नहीं हुए, फिर तुम यहाँ कैसे ? तुम्हें तो एम टेक में होना चाहिए ।" डॉक्टर राजू उस वर्ष की हमारी प्रेक्टिकल परीक्षा के इंटरनल एक्जामिनेर (internal examiner ) थे । यह जान कर मेरे प्रोफेसर राजू स्तब्ध रह गए कि वह "विश्वम्भर" नामक विद्यार्थी (जिसने साल भर में एक दिन भी क्लास में अपनी शकल नहीं दिखाई थी) वास्तव में मैं ही था "भोला" जिसने सभी क्लास attend किये थे । मेरा रजिस्टर का नाम "विश्वम्भर" है और प्यार दुलार का नाम nick name "भोला" है और "भोला" नाम से ही विश्वविद्यालय में सब मुझे जानते थे और बुलाते थे । इसके ही कारण उन्हें कन्फ्यूजन हुआ था, यह जान कर वे दुखी भी हुए । मैं बड़ी मुश्किल से उन्हें विश्वास दिला पाया कि उनके ही विषय में एक अंक की कमी से फेल होने के कारण रिपीट कर रहा था । जो होना था वह तो हो ही चुका था । "होनी प्रबल होती है ।" आज तक बी. एच. यू. के इतिहास में इस विषय की मौखिक परीक्षा में कोई फेल नहीं हुआ था । मेरे नाम का कमाल तो देखिये जिसने एक नया इतिहास लिख दिया । अगले वर्ष, पूरी तैयारी के साथ १९५० के सत्र में परीक्षा दे कर मैं अच्छे अंकों से उत्तीर्ण हुआ और बनारस हिंदू विश्व विद्यालय' के 'कॉलेज ऑफ टेक्नोलोजी' से स्नातक की डिग्री प्राप्त कर ली ।

बी.एच .यू के प्रवास के दौरान संकटमोचन हनुमान मंदिर में की गयी मेरी प्रार्थनाओं के फलस्वरूप मेरे कुलदेव ने मुझे परीक्षा में उत्तीर्ण न कर कडुए-मीठे फलों से मिश्रित वही कृपा प्रसाद मुझे दिया जो मेरे लिए सर्वथा लाभप्रद था । वह कारवाली देवी जिनके सपनें मैंने देखने शुरू कर दिए थे उनका विवाह हो गया इसलिए वह मेरे हाथ से ठीक वैसे ही निकल गयीं जैसे विष्णु भगवान की कृपा से नारद जी के हाथ से विश्वमोहिनी ।

रामावतार में देवर्षि नारद जी ने जब अपने प्रभु से पूछा कि "आपने मेरे साथ ये अत्याचार क्यों किया ? मुझे अपने जैसा सुंदर स्वरूप न देकर आपने मुझे बन्दर क्यों बना दिया ?" नारद जी की शंका का समाधान करते हुए श्री राम ने उन्हें बताया --

सुनु मुनि तोहि कहहुं सह रोसा । भजहिं जे मोहिं तज सकल भरोसा ।।
करहु सदा तिन्हकै रखवारी । जिमि बालक राखहिं महतारी ।।

नारदजी की रक्षा जैसे श्री हरि ने की उसी भांति मेरे कुलदेव हनुमानजी ने मेरी रक्षा की । मेरी झूठी निरर्थक कामनाओं के जाल से मुझे छुडाया । मेरे भावी जीवन को सुखद-सार्थक बनाया और मुझे वही दिया जो मेरे हित में था ।

मैंने कारवाली कन्या और कार खोई थी, उनके स्थान पर इष्ट देव की कृपा से जो "कन्या" मुझे छः वर्ष बाद मिलीं, आप उनसे परिचित हैं - मेरी जीवन संगिनी श्रीमती कृष्णा जी । लगभग ६० वर्षों से वह मेरा साथ निभा रही हैं । नहीं जानता, उन कारवाली देवी के साथ मेरा गार्हस्थ जीवन कैसा होता, पर "इष्टदेव" की असीम अनुकम्पा से आज मैं कृष्णा जी के साथ जो आनंदमय, सुखी और शांतिपूर्ण जीवन जी रहा हूँ, उससे उत्तम गृहस्थ जीवन की मैं कल्पना भी नहीं कर सकता हूँ ।

धीरे धीरे मुझे अहसास हुआ कि उस दिन यूनिवर्सिटी के रजिस्ट्रार ऑफिस में रिजल्ट देखने के बाद "जो" टूटा था, वह वास्तव में मेरा "स्वप्न महल" नहीं था, बल्कि वह था मेरे मन की गहराइयों में कुछ दिनों से बसा हुआ, बिना श्रम किये ही प्राप्त होने वाले सुखों का मोह, कार का आकर्षण और समृद्ध परिवार से सम्बन्ध का लोभ । मैं लोभी बन गया था । मेरे मन में अपनी पढाई लिखाई का तथा मुझे शीघ्र ही मिलने वाली टेक्नोलोजी की डिग्री का अहंकार भर गया था और उसके अतिरिक्त अपने ही आइने में मैं स्वयं को उस जमाने के प्रसिद्ध फिल्म स्टार - भारत भूषण, देवानंद, सुरिंदर, प्रेम अदीब, आदि के समानांतर समझने लगा था । मुझे अपने स्वरूप पर भी शायद कुछ नाज़ हो गया था । गायकी में जहां मेरे बड़े भैया को लोग श्री के. एल. सहगल का प्रतिरूप मानते थे, मैं भी अपने आपको मुकेश जी से कम नहीं समझता था । मेरे मन में बरबस आ बैठे अतिथि श्री "माया मोह जी " ने मुझे इतना बेबस कर लिया कि मैंने वह सब तत्काल हथिया लेने का सपना संजो लिया । नही समझ पाया कि यह मेरी किशोर अवस्था जन्य मूर्खता थी अथवा विधि का कोई अदृश्य विधान । मुझे फेल करके "जिमि प्रतिलाभ लोभ अधिकाई "के अनुपात में बढ़ते हुए मेरे लोभ और अहंकार पर मेरे कुलदेव ने अंकुश लगा दिया ।

असफलता कभी कभी जीवन के लिए वरदान सिद्ध हो जाती है । जो होता है अच्छे के लिए होता है । पुन: परीक्षा देने की तैयारी करते हुए उस वर्ष मैंने आर्थिक कठिनाइयों से जूझते हुए बाबूजी के कार्य में उनका हाथ बटाने की भावना से लिपिक का कार्य करना प्रारम्भ कर दिया ।

काशी विश्वविद्यालय में संगीत के क्षेत्र में पायी प्रसिद्धि से मुझे प्रेरणा मिली कि सुरीली और मधुर कंठ की धनी अपनी छोटी बहिन माधुरी को लखनऊ आकाशवाणी का कलाकार बनाऊं । संगीत-कला की अधिष्ठात्री देवी सरस्वती की महत अनुकम्पा से जून १९५१ में मैं उसका प्रथम कार्यक्रम आकाशवाणी लखनऊ से करा कर उसे कलाकार बनाने में सफल हुआ ।

जीवन में समय समय पर आयी अनुकूल-प्रतिकूल परिस्थितियों के कारण मनुष्यों को सुख, दुःख, आनंद तथा ताप-संताप का अनुभव होता है । वाराणसी-प्रवास में पहिले दो वर्षों में मेरे जीवन में ऐसी अनूठी रोमांचकारी घटनाएँ घटतीं रहीं जिनसे मुझे जीवन के कड़वे सत्य का अविस्मरणीय मधुर अनुभव हुआ, जिनकी आनंदमयी अनुभूतियों के साथ इस श्रंखला से जुडी अवसाद के क्षणों की अनुभूति ने किशोर अवस्था में ही मुझे जीवन के कडुए और मधुर सत्यों के साथ जीना सिखा दिया ।

सत्य तो यह है कि इन पर विश्वास करना स्वयं मेरे लिए कठिन होता यदि मैं खुद ही उसका गवाह न होता । स्वभावतः यह विश्वास और भरोसा दिन प्रति दिन दृढ़ ही होता गया कि परमात्मा प्रतिपल हमारे साथ है जिसका अनुभव हमें सदा ही जीवन में हर क्षण होने वाली विविध अनहोनी घटनाओं के घटने पर ही होता है पर हमें अपनी नादानी के कारण अधिकतर उसका अहसास नही हो पाता इसलिए हम उसे नजरंदाज़ कर जाते हैं ।

नहीं गिन सकूगा मैं उपकार "उनके",
दया इस कदर "वह " किये जा रहे हैं ।

हरिक सांस मेरी है सौगात "उनकी",
उन्हीं के सहारे जिये जा रहे हैं ।।

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विक्रम बजरंगी महावीर जी से मेरा परिचय, मेरे जन्मते ही, मेरी प्यारी माँ की गोद में १६ जुलाई १९२९ के प्रातःकाल की मंगलमय ब्रहम मुहूर्त में हुआ । मंगलवार की भोर थी, हमारे जन्मस्थल के स्थान से ही महावीरी ध्वजा का जुलूस नगाडों की टंकार के साथ “जय श्री राम, जय हनुमान” का उद्घोष करते निकल रहा था । कदाचित मेरी अम्मा ने तत्काल ही मुझे श्री हनुमान जी के सुपुर्द कर दिया और तब से आज तक वह बिक्रम बजरंगी महावीर जी ही मेरे "परम आश्रय" बने हुए हैं ।

मेरा जन्म हरबंस-भवन, स्टेशन टाउन हॉल रोड, बलिया में हुआ था । बलिया सिटी में बिजली नही थी और उसके बाद भी १०-१२ वर्षो तक वहां बिजली नहीं आयी । अपना परिवार वकीलों और जज मजिस्ट्रेटों का था । अपनी बैठक आगन्तुको से भरी रहती थी, दरबार सा लगा रहता था । इसलिए रात के समय बाहर मर्दानखाने में तो लेन्टर्न और पेट्रोमेक्स की रोशिनी होती थी पर भीतर जनानखाने के कमरों में या तो मिटटी के तेल की ढिबरियां या सरसों के तेल के मिटटी के दिए ही जलाये जाते थे । आंगन गलियारा बिलकुल अँधेरा रहता था । पर बच्चों का भीतर बाहरआना जाना लगा ही रहता था । बेचारे कभी दादी जी का संदेश दादा जी को देने जाते तो कभी चाची के आदेश से चाचा को जर्देवाला पान पहुंचाते । उन्हें घने अँधेरे में जाना होता था । बचपन में हम हर गर्मी के अवकाश में बलिया सिटी जाते थे । और वहां कभी कभार मुझे भी यह ड्यूटी बजानी पडती थी । हम कानपूर से जाते थे जहाँ बिजली ही बिजली थी (आज नही, उन दिनों) । आप समझ सकते हैं कि एक शहरी बालक उस अँधेरे घर में कैसे बिना डरे रह सकता था । सो मैं भी अंधकार से भयभीत हो कर उस प्रकार से सेवा करने से कतराता था ।

मेरी प्यारी अम्मा मेरी कमजोरी भांप गयीं । उनके भोला की बदनामी हो रही थी । गोरखपुर, इलाहबाद, मैंनपुरी से आये अपने ही परिवार के बच्चे दौड़-दौड़ कर बड़ों की सेवा कर रहे हैं, भोला डरकर अम्मा से चिपके बैठे हैं ।

अम्मा ने तभी हमारा परिचय हमारे "कुलदेवता" महावीर जी से कराया । उँगली पकड़ कर वह हमे घर के एक पक्के आँगन में ले गयीं । जहाँ चबूतरे के बीचोबीच एक बहुत ऊँचा हरे बांस का झंडा गडा था जो अपने घर की ऊँचाई से भी ऊँचा था । उस बांस की चोटी पर लहरा रही थी एक लाल रंग की पताका जिस पर हनुमान जी का अति चमकीला सुनहरा कट आउट सिला हुआ था ।

अम्मा ने कहा, जिस घर में ऐसी महाबीरी ध्वजा लहराती है उस घर मे "भूत पिशाच निकट नहीं आते, महावीर जी के सिमिरन मात्र से रोग और भय दूर हो जाते हैं - "नाशे रोग हरे सब पीरा, जपत निरंतर हनुमत वीरा"और उस दिन हीअम्मा ने हमे कंठस्थ कराया "जय हनुमान ज्ञान गुन सागर, जय कपीश तिहुँ लोक उजागर" । श्री हनुमान चालीसा के पाठ से हमारी अम्मा ने ही महाबीर विक्रम बजरंगी से मेरा परिचय कराया और मुझे उनके आश्रय में सदा सुरक्षित रहने का आश्वासन दिया ।

इस प्रकार बाल्यावस्था में ही मेरी पहली गुरु, मेरी मार्ग दर्शिका माँ ने मुझे निर्भयता का पाठ पढ़ा कर मुझे अपने पैरों पर खड़ा कर के मुझे हरबंस भवन के प्रांगण में विराजे महाबीरी ध्वजा वाले श्री हनुमानजी के सुपुर्द कर दिया ।

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परदादी जी की आतंरिक पीडाओं का बाँध बलिया पहुंच कर शुरू शुरू में टूट गया था, पर धीरे धीरे उन्होंने अपने आपको पुन सम्हाल लिया । हरबंस बाबू और गोपाल जी को तलब किया गया और आदेश हुआ कि परदादा जी की तिजोरी मिश्रा जी और चाचा लोगों के सामने तुरंत खोली जाये, दादी जी के आदेशानुसार तिज़ोरी खोली गयीं, तिजोरी में दादाजी का रोजनामचा, खर्चा बही, ज़मींदारी और लेनदेन के कागजात के बीच एक पोटली में परिवार के सदस्यों की जन्मं कुण्डलियाँ थीं । उसमें ना तो जेवरात थे और न कोई धनराशि ही । सबके सामने जब कुंडलियों की पोटली खोली गयी, तब उसमे एक लम्बी चिट्ठी मिली, जो परदादाजी के हाथ की लिखी हुई थी और परिवार के सभी लोगों को संबोधित थी । उसमें लिखा था-------

अचानक कार्यक्रम बदल गया, मलकिन को भी साथ लेना पड़ा । तुम सब अचरज में होगे । वह बात ही कुछ ऎसी थी जिस पर मुझे तब खुद यकीन नही हो रहा था । फिर मै तुम लोगों को कैसे बताता । मगर आज अगर मेरी जगह तुम तिज़ोरी खोल रहे हो, तो समझ लो कि वह बात सच्ची साबित हो गयी । पितामह दादा ने ख़त में लिखा था कि अगर तिजोरी उनकी जगह किसी और ने खोली तो यह विश्वास करना ही होगा कि जो कुछ उस अजनबी आगंतुक ने उनसे यात्रा प्रारंभ करने से पहले कहा था उसका एक एक अक्षर सत्य था ।

उन्होंने आगे लिखा :

वह अजनबी उन्हें बैठक के एक कोने में ले गया और भोजपुरी भाषा में, बड़ा अपनत्व दिखाते हुए बोला " मालिक आप हम के ना चीन्ह्भ, ब़र हम ता तोहार सातो पीढी के जानेली तोहार बाबूजी ब़रजोर दास, उनके पाचो भाई और तोहार बाबा राम प्रसाद दासो के हम देखले रहनी । आगन के महाबीरी धजा के नीचे तू लोग जौन रोजे गावेला हम कूल सुनले बानी । आच्छा लागेला हम के ई कूल । " उसकी बातें विचित्र थीं । उसका स्वरुप भी कुछ विचित्र ही था । उजली लुंगी और उजले अंगौछे से उसने अपना लम्बा चौड़ा तन ढक रखा था । उसके चेहरे पर एक अनोखी आभा थी । । उसने हमसे गंगोत्री की जगह गंगासागर और पुरी धाम जाने की सलाह दी और यह भी कहा कि अपने साथ मैं मलकिन को जरुर ले जाऊं । मुझे दुविधा में देख कर उसने कहा । "मालिक तोहार बोलउआ पुरी धाम से आईल बा । उहें उनके दरबार में आपके मुक्ती लीखल बा । दरसन दे के ऊ आप के बिमान पे चढा के आपन परम धाम ले जैहें । इहाँ के कूल बेबस्था करके निकलिहा " उसकी बात ने मुझे चौका दिया । अभी मैं सम्हल भी ना पाया था कि वह फिर बोला कि "बाबू हम बड़ा दूर से अइनी हां । कुछ पन पियाव ना करइबा का ? "

मैं भीतर गया उसके लिए कुछ नाश्ता मंगवाने और जब लौट के आया तब तक वो गायब हो चुका था । कितना खोजवाया मैने उसे पर वह कहीं नह़ी मिले अचरज तो यह है कि वह हमारे कुलदेव हनुमानजी की तरह "अति लघु रूप " तथा "सूक्ष्म रूप धारी " वायुमंडल में कहाँ समा गये । उनकी बात झूठलाने अथवा जग जाहिर करने का साहस मैं नह़ी कर सका अस्तु यह पत्र लिखा । लेकिन जब तुम लोग यह खत पढ़ रहे होगे, तब तक तो जो होना है हो चुका होगा ।

पितामह की परहित भक्ति से श्री हनुमान जी प्रसन्न हुए और स्वयम साक्षात प्रगट हो कर पितामह का मार्ग दर्शन किया और उनकी परमधाम यात्रा सुगम कर दी । पितामह का पार्थिव शरीर, विश्व-रंगमंच पर अपना किरदार भली भांति निभा कर नेपथ्य में विलीन हो चुका था । साक्षात महाबीर जी की प्रेरणा से हुई इस मंगलमयी तीर्थ यात्रा में पितामह की विशुद्ध पुण्यमयी आत्मा परमपिता परमात्मा के निज-धाम में प्रवेश पा चुकी थी । संसार सागर की उत्तुंग तरंगों पर थिरकने वाला चन्द्र-प्रतिबिम्ब, किरणो की सवारी कर वापस चंद्रमा में समा चुका था । अब धरती पर परिजनों के स्मृति पटल पर अंकित थी उनके साथ बितायी हुई अत्यंत सुखद और शिक्षाप्रद पलों की यादें । उनका अनुशासित जीवन, उनकी पूजा, उनकी आराधना, उनकी उपासना, उनकी परसेवा का वह अनोखा ढंग जो आज भी अनुकरणीय है ।

प्रपितामह की तीर्थ यात्रा की कथा, अटल विश्वास से समग्र समर्पण तक पहुँचने की कथा है। विश्वास से प्रेम, प्रेम से भक्ति, भक्ति से कृपा, कृपा से "समग्र समर्पण" अन्ततोगत्वा "दर्शन" अथवा परम शांति की प्राप्ति । कब किस रूप में, कहाँ और कैसे जीवन की महा यात्रा अंतिम विश्राम लेगी यह तो कोई नहीं जानता । मेरे प्रपितामह को अपने इष्ट हनुमान जी की प्रेरणा से श्री जगन्नथजी के श्री चरणों में परम विश्राम प्राप्त हुआ । मन ही मन उन्हें अटल विश्वास था कि अजनबी आगंतुक कोई और नहीं उनके इष्ट देव हनुमानजी ही थे ।

तत्व की बात यह है कि सच्चा भगत सदैव अपने इष्ट देव के आश्रित ही रहता है । सत्कर्म और सत्संग से वह परमात्मा के परमधाम में पहुँच कर परम आनंद को प्राप्त करता है । मानव जन्म का लक्ष्य है - श्रीहरी के श्री चरणों का आश्रय लेना (श्रीमद भागवत अध्याय ७/६२ )

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मिसिर जी आगे बोले:

"अन्ततोगत्वा वह मंगल दिवस आ ही गया, सूर्योदय से पहले ही सब जग कर उठ बैठे । विश्राम चट्टी पर काफी पहले से ही चहल पहल मची हुई थी । गौडिया वैष्णव भगत ढोल मजीरा बजा बजा कर "हरे कृष्ण" मन्त्र का कीर्तन, और भजन गायन कर रहे थे । गाते बजाते, हम लोगों ने भी चट्टी से प्रस्थान किया । मंदिर के पूर्व दिशा वाले सिंघद्वार से हमने उस भव्य प्रांगण में प्रवेश किया । मंदिर का विशाल प्रांगण श्री जगन्नाथ, बलभद्र एवं सुभद्रा जी के जय कारों से गूंज गया । कहाँ कहाँ के भगत वहां एक प्रांगण में इकठ्ठा खड़े थे हमारे ही जत्थे में जहाँ एक तरफ अवध के गंगा किनारे यू पी के दोकती बाजिदपुर बलिया के निवासी और कहाँ सुदूर पूर्व में मेघना-ब्रम्हपुत्र तट वाले, बालुरघाट-दिनाजपुर बंगाल के यात्री एक जुट होकर, एक ही परमेश्वर की कृपा प्राप्ति हेतु, मिलजुल कर एक साथ समवेत स्वरों में एक ही भगवान को आवाज़ लगा रहे थे । कितने एकांकियों का एकीकरण श्री जगन्नाथ पुरी धाम में हो रहा था ।

बालूरघाट वाले मन्मथ सेन बाबू मालिक का हाथ पकड कर गर्भ-गृह की ओर बढ़ रहे थे, मालिक मलकिन का हाथ थामे थे और मलकिन हमारी वाली का, हम पीछे पीछे पूजा की सामिग्री लेकर चल रहे थे, मालिक बिलकुल स्वस्थ थे । मालिक ने मन्मथ बाबू से कहा, "अरे वह महाप्रभु का आसन तो आपने अभी तक दिखाया ही नही । " मन्मथ बाबू ने इशारे से उन्हें वह स्थान दिखाया और वहीं से उस आसन को साष्टांग प्रणाम किया । मालिक ने भी वहीं से प्रणाम किया, त्रिमूर्ति के सामने खड़े होकर अपनी प्रार्थना की । कुछ समय तक वह खुली आँखों से त्रिमूर्ति के मनमोहक स्वरुप का दर्शन मंत्रमुग्ध हो करते रहे फिर धीरे धीरे उनकी आँखें मुद गयीं और मन्मथ नाथ का हाथ पकड़े वह वहीं भूमि पर बैठ गये । उनकी बंद आँखों के कोनो से टप टप कर आंसुओं की बूंदें नीचे गिरने लगीं । पर उनके मुख मंडल पर चिंता या कष्ट का कोई चिन्ह नही था । उनका चेहरा एक अनोखे तेज से चमचमा रहा था ।

पितामह उस स्थान पर थे जहाँ पर खड़े हो कर निमाई ठाकुर (चैतन्य महाप्रभु ) अपनी पूजा करते थे । धीरे धीरे उनका शरीर शिथिल पड़ने लगा । मन्मथ बाबू चिंतित हो कर जोर से बोले " दादा मोशाई की होच्चे आपोनाय, चोख्ह टा खोलून । कीछू बोलूँन ना मोशायी " (दादाजी आपको क्या हो रहा है, आँखे खोलिए, कुछ बोलिए तो श्रीमान ) इस बीच पृथ्वी पर शांति से पड़े पितामह के शरीर को अन्य यात्रियों ने घेर लिया, दादी माँ मूर्छित हो गयीं । दर्शनार्थी कहीं से एक डॉक्टर खोज के ले आये । डॉक्टर ने जांच कर के पितामह को मृत घोषित कर दिया ।

मंदिर में मौजूद सभी यात्री और पंडे पुरोहित उदास हो गये । होश आने पर दादी माँ पहले तो जोर जोर से रोईं फिर आश्वस्त हो कर उन्होंने आदेश दिया कि दादा जी का दाह एवं अंतिम सारे संस्कार विधि विधान से वही जगन्नाथपुरी धाम में ही होगा । यात्रिओं की मदद से उन का अंतिम संस्कार विधिवत सम्पन्न हुआ ।"

आप आश्चर्य चकित होंगे कि अपने पितामह के देहावसान की यह करुण कथा मैं एक झटके में बिना किसी संकोच के कैसे कह गया । प्रियजन, उसी परिस्थिति में आपने हमारी परदादी माँ का गम्भीर करुण रूप भी देखा और उनके सन्तुलित विचारों से अवगत हुए । किस प्रकार उन्होंने उस विषम समय में अपनी निजी पीड़ा को नज़रंदाज़ कर, पूरी सूझ बूझ से, पितामह का " क्रिया कर्म" संपन्न करवाया, सराहनीय है ।

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तीर्थ यात्रा उन दिनो बडी दुर्गम होती थी। भाग्यशाली ही जा पाते थे । जो सकुशल लौट आता था, परम भाग्यशाली और सच्चा भगत माना जाता था। इस कारण यात्री गण और उनके परिवार वाले चिन्तित और आशन्कित रहते थे। घर मे पूजा पाठ की मात्रा अधिक हो जाती थी। मनौतिया मानी जाती थी। प्रति मास की जगह प्रति सप्ताह सत्य नारायण देव की कथा चालू हो जाती थी। वैसी ही आशंका हरवन्श भवन के सदस्यों को भी हो रही थी। आशंका का विशेष कारण था, यात्रा के कार्यक्रम मे अन्तिम क्षण का हेर फेर । बाबाजी जैसे दृढ निश्चयी व्यक्ति का अपना महीनो पहले बना कार्यक्रम रद्द कर के तुरन्त ही नयी योजना बनाना और एकाएक दादीजी तथा मनेजर मिसिर जी और मिसिराइन को साथ लेने का निश्चय करना, गंगा के उद्गमस्थान गन्गोत्री न जा कर गङ्गासागर जाने का संकल्प करना, सबको आश्चर्य चकित कर रहा था । कुछ लोगो को तो विदाई के समय उस विचित्र स्वरूपवाले अजनबी केअचानक आने और फिर उतनी ही शीघ्रता से गायब हो जाने की बात रहस्यमयी लग रही थी । जो भी कारण रहा हो, बाबा दादी तो अब जा ही चुके थे। अब क्या हो सकता था ? केवल प्रार्थना और शुभकामनाये के सिवाय ।

लगभग चार सप्ताह बीत गये, बाबा जी की यात्रा के विषय मे कोई समाचार नही मिला। सब जानते थे इतनी जल्दी कोई खबर नही मिल सकती । फिर भी चिन्ता करना मानव का जन्म सिद्ध अधिकार मान कर, केवल घर वाले ही नही वरन सभी गाँव वाले भी बाबाजी की चिन्ता कर रहे थे। गाँव के नन्हे नन्हे बालक अपनी माँ से रात मे पूछते "ए माई, घोड़ा वाला बाबा कहा चल गैले, कब अइ हइ ? " फिर एक दिन एक कार्ड आया, इस शुभ समाचार के साथ कि यात्री श्री गंगासागर पहुँच गये, वहाँ सागर मे स्नान किया और विधिवत पितरो का तर्पण भी कर लिया। एक गन्गाजली मे गंगा सागर का पवित्र जल भी भर लिया है । अब चारों यात्री श्री जगन्नाथ पुरी की ओर प्रस्थान करने वाले हैं। सबकी कुशलता का समाचार जान कर सारा परिवार या यूँ कहिये सारा गाँव ही खुश हो गया । पर इसके बाद बहुत दिनो तक कोई समाचार नही मिला । इसलिए महाबीरी ध्वजा के नीचे रोज़ रोज़ की पूजा, हनुमानचालीसा का पाठ और साप्ताहिक सत्य नारायण व्रत कथा विधिवत होती रही ।

एक दिन रेलवे स्टेशन के तार बाबू के पास बडका स्टेशन से तार आया था कि दोक्ती-बाजिदपुर-बलिया के यात्री स्टीमर से गंगा पार कर के अब रेल गाड़ी पर सवार हो चुके हैं । स्टेशन के बड़े बाबू ने आदमी दौड़ा कर हमारे डेरे पर खबर करवायी थी । यात्रिओं को घर लाने के लिए घोडा गाड़ी रवाना की गयी । एक गाड़ी में पर्दा लगाया गया जनानी सवारिओं के लिए । बाबाजी जी के साईस गिरधर उनकी बग्घी जोत कर ले गये । डेरा पर मेला सा लग गया । सब सांस रोके प्रतीक्षा करने लगे । स्टेशन से परदे वाली सवारी पहिले आयी। नियमानुसार वो ज़नानखाने के दरवाज़े पर कोठी के पिछले भाग मे लगायी गयी। अपनी ईया (दादी माँ) से हमने सुना है कि दादी माँ के उतरते ही ज़नाने दालान मे जैसे कोहराम सा मच गया । औरतो के रोने की आवाज़ दूरदूर तक सुनायी दे रही थी । बाहर का सब जन समुदाय सुन्न हो गया था ।

तब् तक मेनेजर मिसिर जी भी माल असबाब लिये स्टेशन से आगये । बाहर बारामदे मे उनके साथ बहुत से टोळे मोहल्ले के लोग जमा हो गये। इस बीच दोनो बेटे हरबन्स बाबू और गोपाल सरन जो काम काज से कही बाहर गये थे वापस आये । दूर से ही मिसिर जी को राम राम कह कर दोनो ने घर के अन्दर प्रवेश किया। आँगन का नज़ारा बहुत ही दर्दनाक था । उनके आते ही दादी माँ ज़ोर से सिसक सिसक कर रोने लगी। दोनो को उन्होने गले से लगाया और विलाप करती हुई बोली "ए बाबू तोहार बाबुजी त चल गैले। हम सब के अनाथ करि गैले। अब त कुल तोहरे कन्धा पर बा। तोहरे के सम्हारे के बा।" इतना कह कर दादी माँ बेहोश हो गयी । वह अपनी अम्मा से बाबू जी के आकस्मिक निधन का कारण जानना चाहते थे । लेकिन माँ कुछ भी बात करने से पहले ही फफक फफक कर रोने लगती थी । वह कुछ बोल ही नही पाती थी । बेटों ने इसलिए अति दुखी मन से मिसिर जी से ही पूछ लेना मुनासिब समझा ।

हरबंस बाबू और गोपाल सरन ने उनसे भी वही सवाल किये । "बाबूजी अच्छे खासे यहाँ से गए थे, अचानक क्या हो गया उन्हें ? और आपने कोई खबर भी नही भेजी, एक तार ही दे देते हम सब कितने खुश थे कि गंगा सागर में बाबूजी ने अपना सब संकल्प पूरा कर लिया । बोलिए न फिर क्या हो गया " ।

बड़े संकोच के साथ, दुखी मन, डबडबायी आँखे और रुंधे कंठ से मिसिर जी ने कहना शुरू किया । " क्या कहें भैया, मालिक यात्रा के श्री गणेश से आखरी पड़ाव तक पूरी तरह स्वस्थ और सानंद थे । उन्होंने बड़ी श्रद्धा के साथ अम्मा जी का हाथ पकड़ कर, सभी मंदिरों में देव-दर्शन किया, चढावा चढाया, प्रसाद पाया। वह नज़ारा देखने लायक था लेकिन हमें ऐसा लगा जैसे सबसे अधिक आनंद उन्हें गंगा सागर में मलकिन के हाथ में हाथ डाले, गिन कर सात डुबकी लगाते समय ही आया था । दोनों जन बिलकुल बच्चो की तरह पानी से खेलते रहे, पानी से निकल कर वह वही सागर तट पर शीतल पाटी बिछवा कर मलकिन के साथ बैठ गये और जोर जोर से समवेत स्वर में रामायण का पाठ करने लगे, गद गद स्वर में वह प्रभु को उनकी अनंत कृपा के लिए धन्यवाद देते रहे । भोजपुरी पारम्परिक गीत रास्ते में गुनगुनाते रहे।"

जय जय जगन्नाथ सुरधामबहिनी संग पुऱी चलि आये किशन और बलराम । तीनों के आये से बनि गयि जगन्नाथ सुखधाम ॥गोकुल मथुरा बिंद्राबन तज गये द्वारिका धाम ।सब के छोड़ इहाँ चलि आये काहे हे घनश्याम ॥तनिको सुचला नाहि कि कैसे अइहें भगत तोहार ।जम्मू कोची मारवाड़ के सबल अबल नर नार ॥नीलचक्र पर ध्वजा सुहाए मस्तक साजे तीरा ।गऊरंग चेतन नाचे बाह उठाय नयन भर नीरा ॥हमरो ऊपर कृपा करा प्रभु दर्शनं दे द हमके ।बहुत दूर से हम अइनीहा आस पूरावह मन के ॥

"क्या बताएं भैया गंगासागर में मालिक-मलकिन की जोड़ी इतनी दिव्य और सुंदर लग रही थी कि हम सब रोमांचित हो गये थे । शायद वहीं उन्हें हमारी नजर लग गई । " इतना कह कर मिसिर जी फूटफूट कर रो पड़े । वार्तालाप का क्रम तोडना पड़ा । परिवार के जो सदस्य वहा थे वह भी रो पड़े ।

सुबह होते ही मिसिर जी को फिर बुलाया गया, चाचा लोग भी आगये । मिसिर जी ने कहना शरू किया:" भैया, गंगासागर के तट पर मालिक ने रौनक लगा दी । उस दिन हम लोगो के अलावा देश विदेश के अनेक जगन्नाथ भक्त वही रेती पर बैठकर उनका सारगर्भित भजन मन लगा कर सुन रहे थे । उनमे से एक उड़िया भगत ने मालिक से अर्ज किया कि भजन का सरल भावार्थ बताने की कृपा करें । भैया, मालिक पर तो जैसे भगवान जी ने अपनी सारी ज्ञान-गगरी एक साथ ही उड़ेल दी थी ।

मालिक ने कहा था " प्रभु हम सब प्राणियों पर, हमारे जन्म से लेकर मृत्यु तक अपनी कृपा वर्षा करता रहता है- जरा सोचो, हमे पेड़ पौधे कीड़े मकोड़े और जानवरों का रूप न देकर मानव देह देने वाले परमपिता परमात्मा ने हम पर कितनी मेहरबानी की है, यह कितना बड़ा अनुग्रह है, उनका हम पर ? अब वह ही, अपनी अहेतुकी कृपा से दर्शन दे कर हमारे माया मोह के बन्धनों को काटेंगे और हमे आवागमन के चक्कर से मुक्त करवाएंगे"

अगले दिन सुबह हमे श्री जगन्नाथ जी के मन्दिर जाना था सोने से पहले देर रात तक मालिक ने हरिचर्चा की और बहुत ज़ोरदार भजन कीर्तन किया तभी एक बंगाली भक्त ने बताया कि मंदिर में, ठीक जगन्नाथ जी के गर्भ गृह के सामने ही वह पत्थर का चबूतरा है जहाँ खड़े होकर चैतन्य महाप्रभु बंद नेत्रों से ही जगन्नाथ जी के विग्रह का दर्शन करते थे । कहते हैं कि महाप्रभु के प्रेमाश्रु की झड़ी से उस चबूतरे के पत्थर में अनेकों छिद्र हो गये हैं और गौरांग के श्री चरणों के चिन्ह अभी भी उस पर अंकित हैं । मालिक ने उन संत से अनुरोध किया कि वह उन्हें उस पत्थर का दर्शन अवश्य कराये । "

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प्रत्यक्ष हनुमंत-कृपा दर्शाती, उन्नीसवीं शताब्दी के अंतिम दशक में हुई उपरोक्त चमत्कारिक घटना के अतिरिक्त एक अदभुत घटना जो मेरे प्रपितामह लाला रामहितदास जी के जीवन की अति महत्वपूर्ण तीर्थ यात्रा से जुडी हुई है, उसकी स्मृति आज भी मुझे अपने कुलदेवता की अहैतुकी कृपा का अहसास कराती रहती है ।

यह अदभुत घटना अक्षरश: सत्य है, इसकी सत्यता के जीवंत प्रमाण मैंने स्वयं अपनी आँखों से देखे हैं । बचपन में हरबंस भवन बलिया की कचहरी में मैंने प्रपितामह के चित्र के साथ, एक दूसरे फ्रेम में जुडी हुई उनकी वह अंतिम चिट्ठी साक्षात प्रमाण-पत्र के रूप में देखी ही नहीं अपितु पढ़ी भी है ।

कचहरी में गरमी की छुट्टियाँ हो गयी थी, अग्रेज़ी सरकार के देशी मुलाजिम भी छुट्टियाँ बिताने इधर उधर जा रहे थे, कोई अपने गाँव, तो कोई अपनी रिश्तेदारी की शादी में शामिल होने और कोई सुसराल जाने की योजना बना रहा था । अपनी कोठी हरवंश भवन के मरदानखाने में जहाँ हमारे बाबा-परबाबा तहसील वसूली के लिए दरबार लगाते थे ,वहाँ रोनक इसलिए थी कि बड़े मालिक तहसीलदार साहब अपने चंद मित्रों के साथ तीरथ यात्रा पर निकलने वाले थे ।

मेरे बडे बाबा, श्री महाबीर जी की ध्वजा के नीचे, हनुमानजी के श्री चरणो पर मत्था टेके प्रार्थना कर रहे थे, अपनी यात्रा की सफ़लता और अपनी सकुशल वापसी के लिये। उधर दादीमाँ दूर कोने मे खम्भे के सहारे खड़ी, गद-गद स्वर में, अश्रु पूरित नैनो से प्रार्थना कर रही थी, " हे महाबीर जी, मालिक, हमके इस बार अपना साथे काहे नैखन ले जात ? हमके बहुत डर लागता, भोरे से हमार बयकी अन्खिया फरकत बा । रच्छा करिह इनकर, हे महाबीर जी "। एक ही समय मे, एक ही आँगन से श्री महावीर जी की सेवा मे दो अर्ज़िया भेजी गयी । देखना है किसकी सुनते हैं वह, किसकी अर्ज़ी मंजूर करते है ?

एक तरफ दादीजी ने बाबा के साथ न जा पाने के कारण दुखी मन से आंसू भींगी अर्ज़ी भेजी थी और साथ में बाबाजी की यात्रा की सफलता तथा उनकी सकुशल वापसी के लिये मंगल कामना भी की थी दूसरी ओर अपनी तीर्थ यात्रा की सफ़लता और सकुशल लौट आने की स्वार्थ से प्रेरित मनोकामना के साथ बाबाजी की अर्ज़ी औपचारिक थी । पूजा के बाद, बाबाजी की पारम्परिक विधि से घर के ज़नानखाने से विदाई हुई, दही-गुड़ से मुह मीठा कराया गया । माथे पर रोली चन्दन का टीका लगाये, वह बाहर बैठक में आये ।

और तभी बाहर से खडाऊं की खटरपटर की आवाज़ आयी और एक अजनबी बैठक मे दाखिल हुआ। आज तक उस शहर में किसी ने इस व्यक्ति को पहले कभी नही देखा था । पर वह बहुत अपनापन दिखाते हुए बाबाजी से एकान्त मे कुछ खुसुर पुसुर करने लगा। उसकी पूरी बात सुनकर बाबा जी के चेहरे पर चिन्ता की रेखाये उभर आयी। वह् आगन्तुक से केवल इतना कह कर कि "महाराज अभी आता हूँ " घर के अन्दर चले गये । थोड़ी देर बाद जब वह लौटे उनके हाथ में एक नए अंगोछे में बंधा कुछ "सीधा" था जो वह उस अजनबी को देने के लिए भीतर से लाये थे । लेकिन जब वह पंहुचे तब तक वह अजनबी आगंतुक वहां से जा चका था ।

बाबाजी उस अजनबी व्यक्ति के अचानक गायब हो जाने के कारण काफी चिंतित हो गये थे, वह बेचैनी से इधर उधर टहल रहे थे और एक के बाद एक सेवक तथा घर के बच्चों को बाहर रेलवे स्टेशन और घोड़ागाड़ी तथा बैल गाड़ी के अड्डों तक दौड़ा रहे थे, उनको खोजने के लिए, पर वह नहीं मिले । आखिर थक कर उस अनजान व्यक्ति की खोज का अभियान बंद कर दिया गया ।

बाबाजी की सवारी तैयार थी, साथ जाने वाले सभी यात्री भी प्रतीक्षा कर रहे थे। इस बीच बाबाजी का सामान भी बाहर आ गया था । पर उस समय सब चौंक गये जब अचानक बाबाजी वहां से उठ कर कोठी में ही अपने दफ्तर की ओर चल दिए । जाते जाते उन्होंने सब से कहा कि अब वह बद्री-केदार-गंगोत्री नहीं जायेंगे अब उनका इरादा शाम वाली गाड़ी से पूरब की ओर जगन्नाथ पुरी-गंगा सागर जाने का बन गया है । दादीजी, मेनेजर मिसिरजी और उनकी पत्नी भी अब उनके साथ यात्रा पर जायेंगे । सब आश्चर्य चकित थे कि दादी जी को साथ ले जाने को कैसे राजी हो गये वह ? क्यों बाबाजी ने अपना निर्णय बदल दिया ? यह रहस्य कोई समझ न पाया ।

अपने ऑफिस में बाबाजी ने दरवाज़ा अंदर से बंद कर लिया और लगभग दो घंटे बाद बाहर निकले । आम दिनों की तरह मुस्कुराते हुए वह पुन: बैठक में आ कर अपनी आराम कुर्सी पर बैठ गये । सुबह से आने जाने वालों के शोर शराबे में और उस अजनबी व्यक्ति के अचानक गायब हो जाने से बाबाजी का चित्त कुछ उचटा उचटा था, थोड़ा एकांत मिला तो वह मन ही मन गुनगुना उठे "होइहि सोई जो राम रचि राखा, को करि तर्क बढ़ावे साखा" ।

गंतव्य बदल गया । पश्चिमोत्तर हिमांचल में गंगोत्री न जा कर बाबा-दादी अब पूर्वांचल में बंगाल की खाड़ी तट पर स्थित, मां गंगा और हिंद महासागर के संगम पर स्थित मौक्ष प्रदायक तीर्थ "गंगासागर" जाने का अपना स्वप्न साकार कर रहे थे । दोनों गंगासागर में एक साथ एक दूसरे का सहारा लिए, डुबकी लगाकर, सात जन्मो तक पति पत्नी बने रहने की अपनी चिर कामना सत्य करवाना चाहते थे । साथ ही वह पुरी स्थित श्रीजगन्नाथजी के मंदिर में श्री कृष्ण, श्री बलराम एवं सुश्री सुभद्रा जी की सर्व मंगलकारिनी त्रिमूर्ति का दर्शन करना चाहते थे । ।

हाँ, एक अन्य संकल्प भी उनके मन में उठा था । श्री चैतन्य महाप्रभु के प्रेमाश्रु से पवित्र हुई कलिंग की उस पावन धूलि को अपने मस्तक पर लगा कर वह प्रेम-योग द्वारा अपने कुटुंब के प्रियतम इष्ट श्री महाबीर जी को रिझाना चाहते थे ।

यात्रा की व्यवस्था कुछ परिवर्तित हुई । ऊनी कपड़ों की जगह सूती कपड़ों ने ली । गर्मी में बिगड़ने वाले खाद्य पदार्थों की जगह ठेकुआ, मठरी, सेव, दालमोठ, तेलवाले अचार, सत्तू, लईया, चबेना, चूरन और अमृतांजन के साथ साथ कुछ अन्य दवाइयाँ भी पोटलियों में बाँध ली गयीं । अब अधिक यात्रा रेल और पानी के जहाज़ से करनी थी ।

हनुमान मंदिर के पुरोहित पंडित गणेश मिसिर जी ने पंचांग बांच कर यात्रा की नयी साइत निकाली । तदनुसार महाबीर जी की ध्वजा के नीचे सारा परिवार जमा हुआ, चालीसा का पाठ हुआ, आरती हुई, प्रसाद चढ़ाया गया, सारे परिवार और अडोस पडोस में प्रेम से बांटा गया । सब ने मिल कर जयकार क "जय श्री राम- जय हनुमान"। शुभ मुहूर्त में, मेनेजर मिसिर जी और मिसराइन के साथ बाबा-दादी विदा किये गये । यात्रा प्रारम्भ हुई ।

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हमारे परिवार में ऐसा अनेक बार हुआ है कि किसी सर्वथा अपरिचित तथा अनजाने व्यक्ति ने न जाने कहां से अचानक ही प्रगट होकर हमारे पूर्वजों की जटिल से जटिल समस्याओं का समाधान किया और उनका मार्ग दर्शन कर वह ऐसे अंतर्ध्यान हुए कि फिर कभी कहीं मिले ही नहीं ।

भारत पर उन दिनों ब्रिटेन की महारानी विक्टोरिया का शासन था । तब बलिया जिला नहीं था, वह गाजीपुर जिले की एक तहसील थी और बलिया वालों के लिए कचहरी, अदालत, हस्पताल, आदि सब कुछ गाजीपुर नगर में ह़ी था । हमारे प्रपितामह लाला रामहितदासजी बलिया के एक छोटे से गाँव के एक सीधे सादे समृद्ध-सम्पन्न बड़े काश्तकार थे। उनको किसीने एक झूठे फौजदारी मुकद्दमे में फंसा दिया । वह बिना किसी वकील मुख्तियार से सलाह लिए डर के मारे घबड़ा कर घरबार छोड़ कर गाँव से भाग निकले । चलते चलते शाम हो गयी। दिया बत्ती का समय हो गया । गाजीपुर नगर निकट आ रहा था । वहाँ के सिविल लाइन के सरकारी बंगलो में और नील के कारखानेदारों की बड़ी बड़ी कोठियों के बाहर पेट्रोमेक्स में हवा पम्प करते वर्दी पगड़ी धारी कर्मचारी नजर आने लगे। दिनभर के भूखे प्यासे दादाजी सडक के किनारे वाले बागीचे में एक पेड़ के नीचे बैठ कर सुस्ताने लगे।

शायद पल भर को उनकी आँख लगी होगी कि उनके कान में कुछ खटर पटर की आवाज़ आयी, जैसे कोई भारी भरकम शरीर वाला व्यक्ति लकड़ी के खडाऊं पहने उनकी ओर आ रहा है । वह घर से भागे थे इसलिए इस आशंका से कि कोई पुलिस वाला पकड़ने आ रहा है, काँप उठे और अपने को झाड़ों के पीछे छुपाने के निष्फल प्रयास करने में लग गये । तभी एक भारी सी आवाज़ उनके कान में पड़ी । कोई ठेठ भोजपूरी भाषा में उनसे कह रहा था "का बबुआ काहे ऐसे भागत बाड़ा एन्ने ओन्ने ? बुडबक हमार बात मान । तोर कौनो दोष नइखे, तू झूट्ठे घबड़ाता रे "।

इतना सुन कर हमारे दादाजी कौतुहल वश इधर उधर घूम कर उस अनजान व्यक्ति को खोजने की कोशिश कर ही रहे थे कि उन्हें कन्धों पर किसी की भारी हथेलियों का मधुर स्पर्श महसूस हुआ । आगंतुक ने ठेठ भोजपुरी में उनसे कहा ( आपकी सुविधा के लिए मैं उसे खड़ी हिंदुस्तानी बोली में यहाँ लिख रहा हूँ ) "बच्चे । तूने कोई जुर्म नही किया है ,तू झूठमूठ के लिए ही इतना परेशान क्यों हो रहा है । ऐसे घर बार छोड़ कर दर बदर भटकने और अपने नित्य कर्म त्यागने से क्या लाभ?" फिर उसने अपने बड़े से झोले में से पीतल का एक चमचमाता हुआ लोटा और मोटे गाढे का धुला हुआ गमछा निकाल कर दादा जी को दिया और कहा, "आज मंगलवार है, सामने के कुँए पर जा कर मुंह हाथ धो कर आओ, महाबीर जी का प्रसाद पाओ उसके बाद आगे बात होगी । " आश्चर्य चकित हो दादाजी यह सोचने लगे क़ि वह अनजान व्यक्ति कैसे जान गया क़ि वह गिरफ्तारी के भय से फरार एक अपराधी हैं।

कुँए से लौटने के बाद दादाजी को प्रसाद खिला कर अनजान आगंतुक ने अपने झोले में से एक जोड़ा धुला धुलाया वस्त्र निकाल कर दादाजी को दिया और कहा कि भोर होते ह़ी वह नहा धो कर, ठीक से तैयार हो कर सामने के बड़े बंगले में जायें जहाँ उनकी सुनवायी की पूरी व्यवस्था हो गयी है और वह "जय श्रीराम" का उद्घोष कर जैसे आया था वैसे ही खडाऊं खड़खड़ाते हुए अन्धकार में अदृश्य हो गया ।

अगली सुबह दादाजी तैयार होकर उस बंगले की ओर गये जिसकी तरफ उस अनजाने व्यक्ति ने इशारा किया था । बंगले के मेन गेट पर खड़े बंदूकधारी पुलिस के सिपाही को देखते ही दादाजी के पैरों तले की धरती खिसक गयी, उनके हाथ पाँव फूल गये और जुबान लडखडाने लगी, उनके मन में नाना प्रकार की आशंकाएं एक साथ उठ खड़ी हुईं । वह समझ नही पा रहे थे कि आगे उन्हें क्या करना चाहिए । तभी दादाजी को आगंतुक द्वारा कही एक विशेष बात याद आई । सम्हल कर वह प्रबल आत्मविश्वास के साथ उस बंदूक धारी सिपाही की ओर बढ़े और उसे वास्तविक श्रद्धा से प्रणाम करने के बाद उससे धीरे से कहा कि वह कोठी की मालकिन से मिलना चाहते हैं । सिपाही खिलखिला कर हंसा और बोला " केकरा से मिलबा ? कौन मलकिन ? ई कौनों मरवाड़ी सेठ के कोठी ना हा भैया, ई कप्तान साहेब के कोठी हा । इहाँ कौनो मलकिन मालिक ना बा । इहाँ इन्ग्रेज़ साहिब बहादुर अपना मेंमसाहेब के साथे रहेले, चला रस्ता छोडा, साहेब निकले के बाड़ें"।

प्रियजन, आप समझ सकते हैं हमारे दादाजी पर उस समय क्या गुजर रही होगी । सिपाही ने धक्का देकर उन्हें एक किनारे खड़ा कर दिया । घोड़े पर सवार अंग्रेज साहिब अपने लश्कर के साथ दादाजी के सामने से निकल गये । सिपाही ने जूता पटक कर ज़ोरदार सलाम ठोका । दादाजी सडक के किनारे जमे खड़े रहे । अपने साहेब के चले जाने के बाद सिपाहीजी ने फुर्सत की सांस ली । दादाजी को छेड़ते हुए और उनका मजाक उड़ाते हुए कहा "अब मौक़ा है बाबू बतियाय लो गोरी मेंम साहेब से, अब्बे बिल्कुल अकेली बैठीं हैं " दरबान ने तो मजाक मे यह बात कही थी लेकिन दादाजी ने शाम वाले अजनबी आगंतुक के कथन को स्मरण कर के उससे प्रार्थना की कि वह किसी प्रकार भी उनकी भेंट मेंम साहेब से करवा ही दे । दरबान कुछ देर को अन्दर गया और लौटने पर बोला । " जाओ बाबू मेंम साहेब से बतियाय लेउ।"

गाजीपुर में उस अज्ञात अति प्रभावशाली व्यक्तित्व वाले देवस्वरूपी पुरुष से प्रेरणा और मार्ग दर्शन पाकर केवल भोजपुरी बोलने वाले हमारे दादाजी बड़ी निर्भयता के साथ जिले के सर्वोच्च अंग्रेज अधिकारी की पत्नी के समक्ष अपनी व्यथा सुनाने जा रहे थे । उनकी चाल ढाल में कोई शिथिलता नहीं थी । वह भर पूर आत्म- विश्वास के साथ मन में हनुमान चालीसा का पाठ करते हुए आगे बढ़ते जा रहे थे । कोठी के पिछवाड़े के बरामदे में मेमसाहेब की झलक मिली । वह मिले जुले सफेद और लाल रंग का बिलायती सूट पहने हुए थीं और उनके सर पर उतनी ही चटक रंग की टोपी सोह रही थी । बरामदे के सामने वाले घास के मैदान में अन्य प्रार्थियों के बीच दादाजी को भी बैठाया गया ।

सामने से मेमसाहेब को देखते ही दादाजी को ऐसे लगा जैसे वह किसी बड़े दुर्गा पूजा पंडाल में देवी माँ की भव्य मुर्ति के सन्मुख बैठे हैं । श्रद्धा से उनकी आँखें आप से आप बंद हो गयी और वह मन ही मन माँ दुर्गा को मनाने लगे । जब उनकी बारी आई तब उन्होंने भोजपुरी भाषा में ही मेंमसाहिब को बतलाया कि उनके पडोस के दबंग जमीदार के अन्याय, अनाचार और अत्याचार से गरीब गाँव वाले अत्याधिक उत्पीड़ित हैं । इस उत्पीड़ित समाज से दादाजी की सहानुभूति होने के कारण से उपजे बैमनस्य से बाबू साहेब ने दादाजी को निजी तौर पर सताने के लिए उन्हें एक झूठे फौजदारी मामले में फंसा दिया है और स्थानीय दारोगा को खिला पिला कर उनके नाम से गिरफ्तारी का वारंट जारी करवा दिया है । दादाजी ने आगे अपने वंश और बिहार सूबे के डुमराओं राज के परम्परागत मधुर सम्बन्ध का वास्ता देते हुए मेमसाहिबा को बताया कि लगभग एक सौ वर्षों से उनके वंशज अपने क्षेत्र में, उस राज्य का तहसील वसूल करते आये हैं और कभी कोई शिकायत कहीं से नहीं आयी । बाबू सज्जनसिंह हमारे परिवार की बढ़ती ख्याति के कारण ईर्ष्यावश हमें नीचा दिखाना चाहते हैं जबकि मैंने कोई अपराध नहीं किया है ।

लेडी साहिबा को दादाजी की बात तर्कसंगत लगी, उन्होंने मुंशी जी को आदेश दिया कि मोहम्दाबाद के मुख्तियार खानसाहेब अब्दुल शकूर को दादाजी के साथ बलिया भेज कर थानेदार को चेतावनी दी जाय कि ईमानदारी से तहकीकात कर के जल्द से जल्द उचित कारवायी करें अन्यथा स्वयं न्याय की तेज़ धार झेलने को तैयार रहें । खानसाहेब के साथ उनकी घोड़ा गाड़ी पर सवार हो कर दादाजी गाजीपुर से सीधे बलिया के पुलिस थाने आये और वहाँ वही हुआ जो होना चाहिए था--- "सत्य की विजय"।

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आज से लगभग एक डेढ़ शताब्दी पहले की बात है, हमारे पूर्वज बलिया सिटी में बस चुके थे । शताब्दियों पहले यह खेतिहर परिवार किसी श्रीनगर नामक स्थान से विस्थापित होकर बलिया के परगना " दोआब "- दीय्रर में (जो तब यू पी प्रोविन्स के गाजीपूर ज़िले मे पड़ता था) आकर बस गये थे । ये काश्तकार थे, बाद में डुमराव नरेश द्वारा तहसीलदार के पद पर नियुक्त हुए थे ।

मेरे प्रपितामह लाला रामहितदास परोपकारी, प्रेमी कर्मयोगी, गृहस्थ और हनुमान-भक्त थे। यद्यपि वह काम काज से अवकाश ले चुके थे, फिर भी एक काम वह आजीवन करते रहे । वह था - रात्रि का भोजन पाने से पहले नित्य प्रति घोड़े पर सवार हो पूरे गाँव का चक्कर लगाना और गाँव मे सभी का कुशलक्षेम पूछना-जानना, विशेष कर यह जानना कि सबने भर पेट खाना खाया या नहीं । गांव के हर घर मे जब तक चूल्हा नही जला उन्होने स्वयं भोजन नहीं किया। उनकी प्रजा कभी भूखी नहीं सोयी । "परहित सरिस धरम नहि भाई" को चरितार्थ करते हुए उन्होंने अपना पूरा जीवन जिया। उन्होंने एक मात्र यही धर्म निभाया, यही उनकी पूजा थी, यही आराधना ।

एक क्रम और उन्होंने आजीवन निभाया - वह था रोज़ प्रातः महावीर जी की ध्वजा के नीचे यह प्रार्थना करना कि 'हे महावीरजी हमरा के कुछू और ना चाही, बस हमरा के राम जी के भक्ती दे द, सब बचवन के सुबुद्धी द कि लगन मन लगाके प्रेम से आपन काम काज करें ।' वह आजीवन श्रद्धा विश्वास सहित परम पिता परमात्मा से केवल उनकी कृपा दृष्टि ही मांगते रहे ।

उनका दृढ़ विश्वास था कि :

"बिनु बिस्वास "प्रीति" ना होई, सघन"प्रेम"कहु "भगती" सोई "।

भगति बिना न मिलें भगवाना, बिनु उन "कृपा" न हो कल्याना "। ।

उनके पुत्रों में दो पुत्र हरवन्श सहाय और गोपाल शरण लाल, अपने पिता के समान ही सदाचारी और अपने कुलदेवता श्री हनुमानजी के भक्त थे। संयोगवश श्री गोपालसरन का देहान्त कच्ची उम्र में ही हो गया था इसलिए तत्कालीन परिस्थिति में लगभग ५०-६० प्राणियों से भरे-पूरे परिवार की परवरिश का सारा भार ज्येष्ठ भाई हरबंस सहाय के कंधों पर आ पड़ा । श्री गोपालसरन के पुत्र, मेरे पिताजी श्री बदरीनाथ का लालन-पालन, शिक्षा-दीक्षा, विवाह आदि बलिया में अपने भाइयों के संरक्षण में हुआ । संयुक्त परिवार की प्रथा और परम्परा के अनुसार मेरे इन्हीं बड़े बाबा के नाम पर बलिया के घर का नाम हरबंस-भवन रखा गया ।

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भैया, ये आत्म-कहानी है।

इसमें, मुझ को प्रिय-जन तुम को इक सच्ची बात बतानी है ।
करने वाला "यंत्री प्रभु" है, हम सब हैं मात्र यंत्र "उनके" ।
अपने जीवन के अनुभव से यह बात तुम्हें समझानी है ।।

भैया, ये आत्म-कहानी है।

हमसे ज्यादा है फ़िक्र "उसे" हम सबकी ये तुम सच मानो ।
हम इस जीवन की सोच रहे "वह" तीन काल का ज्ञानी है ।।

भैया, ये आत्म-कहानी है।

जो भी प्रभु इच्छा से होगा वह हितकर होगा हम सब को ।
मत समझो उसको ही हित-कर जो तुमने मन में ठानी है ।।

भैया, ये आत्म-कहानी है।

बाहर से जो मीठा लगता वह कड़वा भी हो सकता है ।
मानव बाहर की देख सकें, अंतर की किसने जानी है ।।

भैया, ये आत्म-कहानी है।

मुझ को दोषी मत कहो स्वजन, है सारा दोष मदारी का ।
भोला बंदर मैं क्या जानूँ अंतर "मयका-ससुरारी" का ।
रस्सी थामे मेरी, मुझसे वह करवाता मनमानी है ।।

भैया, ये आत्म-कहानी है।

करता हूँ केवल उतना ही जितना "मालिक" करवाता है ।
लिखता हूँ केवल वो बातें जो "वह" मुझसे लिखवाता है ।
मेरा कुछ भी है नहीं यहाँ सब "उसकी" कारस्तानी है ।।

भैया, ये आत्म-कहानी है।

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मैं क्या हूँ ? किस योग्य हूँ ? मेरी क्षमता क्या है ?

मैं, सर्वशक्तिमान परमात्मा और उनकी सहमति से नियुक्त विगत शताब्दियों से हमारी वंशावली के कुल-देवता श्री हनुमानजी द्वारा नियंत्रित एक अकल खिलौना मात्र हूँ ।

इस आत्मकहानी को प्रकाशित करने की सम्मति और प्रेरणा मुझे इन्ही यंत्री से प्राप्त हुई और आज भी अविरल प्राप्त हो रही है । जीवन में प्रति पल मेरी एक एक हरकत को संचालित कर सफलता प्रदान करवाने वाले उस अदृश्य करुणा सागर कृपा निधान सर्वशक्तिमान यंत्री की असंख्य अहेतुकी कृपाओं के सम्बन्ध में यहाँ कुछ कह पाऊँ यह मेरी क्षमता के परे है । फिर भी जितना “वह" लिखवायेंगे, लिखूँगा मैं ।

अपने कुल-देवता हनुमानजी से मेरी प्रार्थना है -- हे संकटमोचन, विक्रम, बजरंगी, महावीर हनुमानजी, तुमने जीवन भर मुझ पर अपनी अहैतुकी कृपा की अमृत वर्षा की है, मैं पल पल केवल तुम्हारी करुणा के सहारे ही जिया हूँ, एक एक क्षण स्मरणीय है, उनमें से किन किन को याद करूँ, किन्हें भुलाऊं, समझ नहीं पा रहा हूँ, अस्तु हे कुलदेव, अपनी कृपा बनाये रहो, हे नाथ, मेरा मार्ग दर्शन करते रहो, मुझे याद दिलाते रहो, मुझे प्रेरणा देते रहो । कृपा करो कुलदेव हम पर कृपा करो ।

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"ओम नमः शिवाय" कर्पूरगौरम करुणावतारम संसारसारं भुजगेंद्रहारम सदावसंतम हृदयारविन्दे भवम भवानी सहितं नमामि कर्पूर के समान चमकीले गौर वर्णवाले ,करुणा के साक्षात् अवतार, इस असार संसार के एकमात्र सार, गले में भुजंग की माला डाले, भगवान शंकर जो माता भवानी के साथ भक्तों के हृदय कमलों में सदा सर्वदा बसे रहते हैं ,हम उन देवाधिदेव की वंदना करते हैं !!"
!! महामहिमामय देवों के देव महादेव का स्वरूप तेजोमय और कल्याणकारी है !
"शिव" का शब्दार्थ है " कल्याण" !!

पुरातन काल से ओंकार" के मूल ,विभु ,व्यापक , तुरीय शिव के निराकार ब्रह्म स्वरूप को हमारे धर्माचार्यों ने एक अनूठा वैरागी स्वरूप दिया है ; जिसमें उनके शरीर को भस्म से विभूषितकिया है , उनके गले में सर्प और रुंड मुंड की माला डाली है,उनकी जटाजूट ने पतित पावनी "गंगधारा" को विश्राम प्रदान किया है ,उनके भाल को दूज के चाँद से अलंकृत किया है ! "

एक हाथ से डम डम डमरू बजाते तथा दूसरे में त्रिशूल लहराते "शिव शंकर" कभी ललितकला सम्राट नटराज , तो कभी पापियों के संहारक् ,कभी तांडव नृत्य की लीला से प्रलयंकारी तो कभी भक्त को मनमांगा वरदान देने वाले औघडदानी लगते हैं ! अपने सभी स्वरूपों में वह वन्दनीय हैं !

उनके गुण , स्वभाव और क्रिया -कलाप के कारण श्रद्धालु भक्तजन शिव ,शंकर ,भोला ,महादेव ,नीलकंठ , ,नटराज, त्रिपुरारी , अर्धनारीश्वर ,विश्वनाथ आदि अनेकानेक नामों से उनका नमन करते है ! आइये आज हम आप सब प्रियजनों के साथ मिल कर समवेत स्वरों में पूरी श्रद्धा एवं निष्ठां से ,गुरुजनों के भी सद्गुरु ,सर्व गुण सम्पन्न ,सर्व शास्त्रों के ज्ञाता ,सर्वकला पारंगत , राम भक्त , देवाधिदेव , भोले नाथ शिव शंकर की वन्दना करें :ओम नमः शिवाय

शिव वन्दना ओम नमः तुभ्यम महेशान , नमः तुभ्यम तपोमय ,प्रसीद शम्भो देवेश, भूयो भूयो नमोस्तुते !==========================

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हे प्यारे पिता तेरे चरण कमलों में शत शत नमन ----------------तेरे चरणों में प्यारे 'हे पिता' ,मुझे ऐसा दृढ विश्वास होकि मन में मेरे सदा आसरा तेरी दया व मेहर की आस हो [ राधा स्वामी सत्संग - द्यालबाग ]------------------------------------- आदिकाल से सभी धर्म ग्रंथों में इस सम्पूर्ण सृष्टि के सर्जक , उत्पादक,पालक,-संहांरक सर्वशक्तिमान भगवान को "पिता" क़ह कर पुकारा गया है! हिन्दू धर्म ग्रन्थों में उन्हें "परमपिता" की संज्ञा दी गयी है ! ईसाई धर्मावलंबी उन्हें अतीव श्रद्धा सहित "होलीफादर" कह कर संबोधित करते हैं ! हमारी "ब्रह्माकुमारी" बहनें उसी परम आनन्द दायक , अतुलित शक्ति प्रदायक , ,ज्योतिर्मय ,शान्तिपुंज को "शिवबाबा" की उपाधि से विभूषित करके ,सर्वशक्तिमान निराकार परब्रह्म परमेश्वर से साधको के साथ पिता और सन्तान सा सम्बन्ध दृढ़ करतीं हैं !
कविश्रेष्ठ श्री प्रताप नारायणजी के समर्पण -भाव से भरी यह पंक्ति कितनी सार्थक है --पितु मात सहायक स्वामी सखा तुम्ही इक नाथ हमारे हो -------उपकारन को कछु अंत नहीं छिन ही छिन जो विस्तारे हो [ हे पिता ! तुम्हारे उपकार इतने विस्तृत हैं कि उनसे उऋण हो पाना असम्भव है ]
----------------------------------------------------------- https://youtu.be/jjd67BJ9X64
निवेदक: व्ही. एन . श्रीवास्तव "भोला"
सहयोग : श्रीमती कृष्णा भोला श्रीवास्तव

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परम पिता परमात्मा बिनती एक न आन !सब की विपदाएं हरो ,करो विश्व कल्यान !पिताश्री ,परम शांति दो दान !!*("भोला")*========*हे प्यारे पिता* तेरे चरण कमलों में शत शत नमन ----------------*आदिकाल से सभी धर्म ग्रंथों में इस सम्पूर्ण सृष्टि के सर्जक , उत्पादक,पालक,-संहांरक सर्वशक्तिमान भगवान को "पिता" क़ह कर पुकारा गया है! हिन्दू धर्म ग्रन्थों में उन्हें "परमपिता" की संज्ञा दी गयी है ! ईसाई धर्मावलंबी उन्हें अतीव श्रद्धा सहित "होलीफादर" कह कर संबोधित करते हैं ! हमारी "ब्रह्माकुमारी" बहनें उसी परम आनन्द दायक , अतुलित शक्ति प्रदायक , ,ज्योतिर्मय ,शान्तिपुंज को "शिवबाबा" की उपाधि से विभूषित करके ,सर्वशक्तिमान निराकार परब्रह्म परमेश्वर से साधको के साथ पिता और सन्तान सा सम्बन्ध दृढ़ करतीं हैं !*

कविश्रेष्ठ श्री प्रताप नारायणजी के समर्पण -भाव से भरी यह पंक्ति कितनी सार्थक है -- पितु मात सहायक स्वामी सखा तुम्ही इक नाथ हमारे हो -------*उपकारन को कछु अंत नहीं छिन ही छिन जो विस्तारे हो* [ हे पिता ! तुम्हारे उपकार इतने विस्तृत हैं कि उनसे उऋण हो पाना असम्भव है ]
----------------------------------------------------------- O Divine Father we have just a single prayer to make*Vanish miseries and bless the entire humanity with peace and prosperity.)* ==========
परम पिता परमात्मा से हमारी नित्य प्रति की अनुरोधात्मक प्रार्थना-*श्री स्वामी सत्यानन्द जी महराज के शब्दों में* मेरे प्यारे हे पिता ,परम पुरुष भगवान ,*तुझसे बिछड़ा विषम बन मैं भूला निज ज्ञान !!* जन्म जन्म भूला फिर ,पाया राम न नाम ,*अबकी यदि संयोग हो , सिमरूं आठों याम !!* बालक बिछड़ा भूल से ,चल कर उलटे पंथ ,*अब तो मार्ग दीजिये , पढूँ नाम मय ग्रन्थ !!*
अपने जन की सार ले, अपना बिरद बिचार ,*भूल चूक को कर क्षमा , पूरी करो सम्भार !!*
रोये बिरही रातदिन ले ले लम्बी साँस ,*परम पिता से दूर कर ,लिया काल ने फांस !!इस अटवी अति घोर में ,भटक भटक दुःख पाय ,तुम बिन मेरा कौन है, पथ जो मुझे बताय !!(रचयिता : ब्रह्मलीन , गुरुदेव श्री स्वामी सत्यानंदजी महराज)प्रियजन अब पिताश्री के* श्रीचरणों की वन्दना में एक पद तेरे चरणों में प्यारे ऐ पिता मुझे ऐसा दृढ बिस्वास हो*कि मन में मेरे सदा आसरा तेरी दया व मैहर की आस हो."Beloved Father Bless me with an unfaltering FAITH in your GRACEso that I always depend upon your kindness."चढ़ आये जो कभी दुःख की घटा या पाप करम की होये तपनतेरा नाम रहे मेरे मन बसा ,तेरी दया व मेहर की आस हो.तेरे चरणों में प्यारे ऐ पिता -----------------------"If clouds of misery compel me to adopt unholy practices .O my Beloved Father May I be reminded to remember your name inviting your GRACE"यह काम जो हमने है सर लिया करें मिल के ह्म तेरे बाल सब,तेरा हाथ जो ह्म पर रहे सदा तेरी दया व मैहर की आस हो.तेरे चरणों में प्यारे ऐ पिता -------------------"We-Your loving children be enabled to carry out the jobs assigned to us,as a team, and your BLESSINGS be always available to us."मनसा वाचा कर्मना सब को सुख पहुचायअपने मतलब कारने दुक्ख न दे तू काहुयदि सुख तू नहीं दे सके तो दुःख काहू मत देऎसी रहनी जो रहे सो ही आत्म सुख ले"May we be enabled to serve, with our heart and soul, the needy,to make them feel happy. Our acts should not cause pain to any one.If we are not able to provide the unhappy ones with happiness
we have no right to cause pain to any one.*Those who follow this divine principle will be blessed "

(आभार - राधास्वामी सत्संग दयालबाग आगरा )
=============================================निवेदक: व्ही . एन . श्रीवास्तव "भोला"

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योगेश्वर भगवान श्री कृष्ण की अमर वाणी ......
श्रीमदभगवत गीता ( श्री गीताजी )
के पाठ से क्या सीखा ?


मानवता,हर काल में , महाभारत काल के अर्जुन के समान विभिन्न विषम परिस्थितियों से जूझती है ! आज भी सामान्य मानव के मन में धर्म-अधर्म ,सत्य-असत्य तथा ज्ञान-अज्ञान के बीच महायुद्ध चल रहा है !,

सत्य तो यह है कि आज भी भारत का "धर्म क्षेत्र" ,"कुरु क्षेत्र" ही बना हुआ है ! नीति न्याय हींन दुर्बुद्धि मानव दुर्योधन के समान प्रत्येक न्यायसंगत कार्य के मार्ग में रोडे अटकाता हुआ सर्वत्र व्याप्त है और उसका मुकाबिला करने वाला सक्षम पराक्रमी न्यायशील मानव महाबाहु अर्जुन के समान सांसारिक मोह माया की जाल में फसा हुआ , मानव मूल्यों को भूल कर अज्ञानता का शिकार बन कर कायरता के वशीभूत हो कर अपना गांडीव धरती पर डालने को मजबूर हो रहा है !

ज्ञानियों,मनीषियों तथा महात्माओं का कथन है कि अर्जुन की सी कायरता व निष्क्रियता के भाव से बचने के ध्येय से ,आज की मानवता के लिए भी,योगेश्वर श्रीकृष्ण की गीता के कल्याणकारी मूल्यों को अपनाना अपेक्षित है !
याद रखें कि ,गीता भगवान कृष्ण की वंशी से निकला वह गीत है जो कायर से कायर मानव के सुप्त पौरुष को जगा कर, उसमें उत्साह आनंद और कर्म करने की प्रेरणा जगाता है और उसे धर्मयुद्ध करने को प्रेरित करता है
सद्गुरुजन का सुझाव है कि हमे भी अपने शौर्य, अपने पौरुष ,अपनी बुद्धिमत्ता ,अपनी व्यवहार -कुशलता का अहंकार त्याग कर पूर्णतः समर्पित भाव से योगेश्वर की मुरली के शब्द अपने मानसपटल पर अंकित करें और उसमे उल्लेखित मार्गदर्शन के आधार पर अपने आचार -विचार व व्यवहार में उन जीवन -मूल्यों को उतारें !

मूल सन्देश यह है कि सर्वप्रथम हम , यह स्वीकारें कि सांसारिक परिस्थितियों से घबरा कर हम भी अर्जुन के सामान कायर हो गये हैं ! इस निष्क्रियता से मुक्त होने के लिए हमे पूर्णतः शरणागत हो कर प्यारे प्रभु से प्रार्थना करनी चाहिए कि वह हमारा उचित मार्ग दर्शन करें ! अर्जुन ने अपनी प्रार्थना में कहा था

कायर बना मैं आज करके नष्ट सत्य स्वभाव को ,
भ्रमित मति ने है भुलाया धार्मिक शुभभाव को !!मैं शिष्य शरणागत हुआ अब मार्गदर्शन कीजिए,
हें नाथ बतलायें मुझे, जो उचित करने के लिए !![ श्रीगीताजी - अध्याय २ ,श्लोक ७ ]
( यहाँ धार्मिक भाव से तात्पर्य लोक कल्याणकारी कर्मों से है )
श्रीमद गीता के प्रारम्भ में निज दुर्गुणों को स्वीकारते हुए अर्जुन ने श्री कृष्ण के शरणागत हो कर धर्मसंगत न्यायोचित कर्म पथ पर चलने का मार्ग प्रदर्शित करने की विनती की !,वास्तव में आज हमें भी यही करना है! कायरता ,अकर्मण्यता एवं निष्क्रियता को त्याग कर कर्मठ हो कर सही राह पर प्रगतिशील रहने के लिए योगेश्वर से विनती करनी है कि वह कृपा करें और हमारे सभी अवगुण हर लें !

उपरोक्त भावनाओं को संजोये है निवेदक की स्वरचित प्रार्थना -----

अपराधी अवगुण भरा पापीऔर सकाम
क्षमा करो अवगुण हरो प्यारे प्रभु श्री राम !!प्रभु हर लो सब अवगुण मेरे , चरण पड़े हम बालक तेरे
प्रभु हर लो ------- व्यर्थ गंवाया जीवन सारा पड़ा रहा दुर्मति के फेरे,चिंता क्रोध लोभ ईर्ष्या वश अनुचि त काम किये बहुतेरे !!
प्रभु हर लो ------भीख माँगता दर दर भटका ,झोली लेकर डेरे डेरे ! तेरा द्वार खुला था पर मैं पंहुचा नही द्वार तक तेरे !!
प्रभु हर लो ------( ई मेल से ब्लॉग पढ़ने वालों के लिए यू ट्यूब का लिंक :
https://youtu.be/d9NaUblXy0I
ठगता रहा जनम भर सबको रचता रहा कुचक्र घनेरे ! नेक चाल नही चला, सदा ही रहा कुमति माया के नेरे !!
प्रभु हर लो -----मैं अपराधी जनम जनम से झेल रहा हूँ घने अँधेरे !तमसो मा ज्योतिर्गमय कर अन्धकार हरलो प्रभु मेरे !!
प्रभु हर लो सब अवगुण मेरे ------------------------------ निवेदक : व्ही, एन, श्रीवास्तव "भोला" सहयोग : श्रीमती कृष्णा भोला श्रीवास्तव ----------------------------------------------

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शिरडी के साईँ बाबा की उपसना हेतु एक नया मंगल मंत्र =================शब्दकार - वरिष्ठ साई भक्त - श्री महेंद्र सिन्हा स्वरकार व गायक = शिरडी के बाबा के गायक उपासक -श्री कीर्ति अनुराग ( अनुराग श्रीवास्तव एवं समवेत गायक वृन्द )-------------------------साईँ बाबा के दिव्य दर्शन के साथ देखें और सुने -
नया साई मंत्र
=========================== निवेदक - व्ही. एन. श्रीवास्तव "भोला"वीडियो शिल्पी - श्रीमती कृष्णा भोला श्रीवास्तव ----------------------------------------------------