सफ़र में कभी
जो ट्रेन के सफ़र में कभी-कभी
एक नदी बीच में आती है और
वो पतले-से पुल पर बड़े-बड़े लोहे के खाँचों से
हवा के कटने की जो आवाज़ें थरथरा देती हैं;
तुम उस वक़्त भी खिड़की से बाहर
एकटक, उस नदी का आख़िरी नज़ारा देखते रहते हो,
जैसे एक किनारा उसका तुमसे ही बाँध दिया हो
और मैं फ़क़त तुम्हे देखता रहता हूँ।
थरथराहट बाक़ी मुसाफ़िरों के लिए है
तुम्हारे लिए नदी है,
मेरे लिए तुम हो।
विदित