दस्तक

मैं कब तक रह सकता हूँ
अपने इस छोटे से कमरे में
जहाँ कुछ देर में काफी सवाल
दस्तक देने वाले हैं।
सोचूँ,
यही रुकूँ, बुलाऊँ उन्हें अंदर बड़े अदब से
बैठाउँ, बातें करूँ उनसे
और फिर रवाना कर दूं;
या फिर के के खोलूँ ही ना दरवाज़ा
लौटा दूँ बाहर से के फिर कभी आना,
बुरा मान जाएंगें मगर
बड़ी बेशर्मी से दुबारा आ जाएंगे।
या फिर उन्हें खटखटाने दूँ दरवाज़ा
और खिड़की से निकल जाऊँ
किसको पता चलने वाला है;
पता बदल लूं अपना ?
लेकिन कभी कभी लगता है,
मेज़ पर रखे जवाब उठाऊँ
और सरका दूँ उनकी तरफ
जब तक वो पढ़ेंगे उन्हें
मैं चल पडूंगा इस कमरे से बाहर
नए सवालों तक।

-विदित