भोर से पहले...

तैश में आकर भभक उठे दीपक
आखिर अपनी बाती की कालिख देख रहे हैं,
जो उनसे आशना होकर आए थे
वो सब पतंगे आसपास मृत पड़े है।
वायुवेग से दौड़ पड़े अश्व
अपने घुड़सवारों के रक्तरंजित शव,
अपनी काठी पर सजाए
गर्दन लटकाए अस्तबल को लौट चले हैं।
लहरें अपना खेल दिख कर
समुद्र के शून्य को लौट चलीं हैं
तट पर विनाश को अब
कुछ भी शेष नही है।
स्वयं अपने वेग से थककर
पवन, अब शयन को चली है,
उसकी चाल से उन्माद लेने वाले
ये वन, खलिहान, जलाशय सब सो चुके हैं।
देवालय सब शांत हैं
पटाक्षेप, निशक्त हैं;
उनके अहातों के सभी प्रार्थी
स्वप्न विहीन नींद में खोए है।
एक निर्वात सा है, शून्य सा
मानो प्रकृति पराजित सा महसूस करती हो
एक युग खो दिया हो उसने जैसे
और भोर से कुछ पहले आस लगाए बैठी हो
की सूर्य की पहली किरण के साथ,
युगांधर आएगा।

-विदित