तुम तक...

कोई रोकता है पीछे से,
कोई बाजू से कमीज खींच लेता है
तुम तक आते आते, आखिर रुक जाता हूँ मैं।

कभी बत्ती गुल हो जाती है
कभी कभी रोशनी ढंक देती है
तुम्हे दिखते दिखते, आखिर छुप जाता हूं मैं।

तुम इमारतों से नीचे नही उतरते
मैंने कभी पर्वत नही चढ़े
तुमसा ऊंचा उठते उठते, आखिर झुक जाता हूँ मैं।

मैं नक्शों का एक्सपर्ट नहीं
ना दिशाओं का ही भान है
तुम्हे ढूंढते ढूंढते कोई, राह भटक जाता हूँ मैं।

तेरे इत्र से महके महके
रहते मेरे सपने अक्सर
अपने सपनों में खोए खोये , बीच में उठ जाता हूँ मैं।

हो दूर मगर तुम उतने ही,
जितना मृग कस्तूरी के
तुम तक आने की ख़्वाहिश में, आखिर थक जाता हूँ मैं।

कुछ दिन बीतेंगे ऐसे ही
रुकते, छुपते, झुकते, थकते
कोई और तुम्हारी जगह ले तब तक, तुमपर ही टिक जाता हूँ मैं।

विदित