इस पर्दे के पार से थोड़े
धुंधले दिखते हो तुम
पर्दा तो ये सूती है पर
रेशम लगते हो तुम ।
तुम आते हो और
रंग बदल जाता है मेरे चेहरे का
है जिसमे मेरी दुनिया खुश
वो मौसम लगते हो तुम।
मुझतक आती है हवा जो अब
सुगंध सुहानी लाती है
हवा का अपना इत्र है या
महकते रहते हो तुम ?
मैं छत पर बैठा रातों में
जब ऊपर देखा करता हूँ
तारे से तारा जोड़ता हूँ और
बनते रहते हो तुम।
नपी-तुली एक दूरी पर
हम रहते है एक दूजे से
मुझे बताओ, क्या तब भी
मेरी धड़कन सुनते हो तुम?
मैं शायद तुमसे कभी नही
कह सकूँगा ये बातें मिलकर
मेरे सिरहाने दबी हुई
डायरी में रहते हो तुम।
-विदित