रंग

कौनसे रंग का दिल है तेरा
क्या चाहता है?

कभी पर्वत चढ़कर सुस्ताना
उड़ जाना बिना सांस लिए
कभी आंसू से ब्रश भीगोकर
पूरा दिन रंग जाना अपना
कौन से रंग का दिल है तेरा....

दौड़ पड़ना कभी
कोई कटी पतंग लूटने
कभी बस निहारते रहना आसमान को
शाम में ढलते हुए
कौन से रंग का दिल है तेरा....

कभी धड़कना हर धड़कन के लिए
कभी किसी की मुस्कान पे थम जाना
कभी हठ करना मन से ही
कभी खुद को उसे सौंप जाना
कौनसे रंग का दिल है तेरा...

हैं इतने रंग समाये इसमें
खुद इससे भी न सँभलते अक्सर
खुद को समेटना इसे आया नहीं कभी
और बिखर कर घुलना भी रास न आया

सूखने तक जो बाकि रह जाये..
शायद वही रंग हो इसका
वैसे तब तक
नए रंग तलाशने में मसरूफ जरूर है ये।

-विदित