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उलझन में पड़ गया हूँ ….!

उलझन में पड़ गया हूँ, ख़ुद ही समझ न पाऊँ,

मेरे दिल की धड़कने मैं, क्या गाऊँ क्या सुनाऊँ…….!.

हमसब का दिल है गहरा, जैसे अथाह सागर,

सबकुछ छिपा यहीं है, अपने ही मन के अन्दर,

हीरे हैं मोती भी हैं, इन्हें खोज क्यूँ न पाऊँ,

मेरे दिल की धड़कने मैं, क्या गाऊँ क्या सुनाऊँ…….!.

करते नहीं भरोसा इक दूसरे पे क्यूँ कर,

बेकार लड़ते मरते, सुंदर सी इस जमीं पर ,

मानव के गर्व का घर खाली न क्यूँ मैं पाऊँ,

मेरे दिल की धड़कने मैं, क्या गाऊँ क्या सुनाऊँ…….!.

क्यूँ झूठ बोलकर हम, देते हैं ख़ुद को धोखा,

यूं झूठ बन गया है, सच से भी और सच्चा,

बुनियाद जो बुरी है, उसे खोद क्यूँ न पाऊँ,

मेरे दिल की धड़कने मैं, क्या गाऊँ क्या सुनाऊँ…….!.

क्यूँ भूलते चले हम, इंसानियत का ज़रिया,

क्यूँ बेचते चले हैं, अच्छी नियत का पहिया,

ये कटी पतंग की मैं, क्यूँ न डोर खींच पाऊँ,

मेरे दिल की धड़कने मैं, क्या गाऊँ क्या सुनाऊँ…….!.

क्यूँ न गीत लिख सका मैं, अबतक कोई भी ऐसा,

जो हर ह्रदय में भर दे, आदर्श, जोश नारा,

सच्चाई की डगर पर, हर दिल को मैं मिला दूँ,

मेरे दिल की धड़कने मैं, क्या गाऊँ क्या सुनाऊँ…….!.

ये सब जो चल रहा अब, कुछ भी समझ न आए,

बेकार घर उजड़ते, कितनों की जान जाए,

आतंकवादियों को, कैसे खुदा दिखाऊँ,

मेरे दिल की धड़कने मैं, क्या गाऊँ क्या सुनाऊँ…….!..

उलझन में पड़ गया हूँ, ख़ुद ही समझ न पाऊँ,

मेरे दिल की धड़कने मैं, क्या गाऊँ क्या सुनाऊँ…….!.

” विश्व नन्द “