श्रीकृष्ण अर्जुन को सावधान करते हुए कहते हैं कि, ‘‘अशांत इंद्रियां यत्न करते हुए बुद्धिमान पुरुष के मन को भी बलपूर्वक हर लेती हैं’’ (2.60)। यह श्लोक उत्तेजना से भरी इंद्रियों की स्वचालितता के बारे में है। सबसे अच्छा उदाहरण एक धूम्रपान करने वाले का है जो धूम्रपान के नुकसान से अच्छी तरह अवगत है, लेकिन इसे छोडऩा बेहद मुश्किल है और असलियत यह है कि जब तक उसे पता चलता है, सिगरेट पहले ही जल चुकी होती है। कोई भी जो सडक़ पर हिंसक रोष में (रोड रेज) या अपराध में शामिल है, यह प्रमाणित करता है कि यह क्षण भर के क्रोध में हुआ न कि जानबूझकर। ऐसा किसी के भी साथ होता है जो कार्यस्थल पर या परिवार में कठोर शब्द बोलता है और उसके बारे में पछताता रहता है क्योंकि उनका ऐसा करने का इरादा नहीं था। इन उदाहरणों का अर्थ यह है कि इंद्रियांहमें अपने वश में ले लेती हैं और हमें कर्मबंधन में बांध देती हैं। हमारे प्रारंभिक वर्षों के दौरान, मस्तिष्क में अप्रयुक्त न्यूरॉन चलने जैसी स्वचालित गतिविधियों की देखभाल करने के लिए हार्ड वायरिंग नामक जोड़ बनाते हैं क्योंकि यह मस्तिष्क की बहुत सारी ऊर्जा को बचाता है। जीवन के उत्तरार्ध में कौशल और आदतों को हासिल करने के मामले में भी ऐसा ही होता है। मेहनत और ऊर्जा खर्च करके बनाया हुआ आवश्यक हार्ड वायरिंग इतना शक्तिशाली हो जाता है कि इसके आधार पर बनी आदतों को दूर करना बेहद मुश्किल होता है। न्यूरोसाइंस का कहना है कि हार्ड वायरिंग को तोडऩा असंभव है परन्तु एक नया हार्ड वायरिंग बनाना आसान है। श्रीकृष्ण इसी प्रक्रिया का जिक्र करते हुए कहते हैं कि इंद्रियां इतनी शक्तिशाली हैं कि वे एक बुद्धिमान व्यक्ति के दिमाग को भी हर सकती हैं। श्रीकृष्ण कहते हैं कि व्यक्ति को सर्वशक्तिमान के सामने आत्मसमर्पण करना चाहिए ताकि इंद्रियों की स्वचालितता पर काबू पाया जा सके (2.61)। इंद्रियों से संघर्ष किए बिना जागरूकता के साथ सर्वशक्तिमान परमात्मा को समर्पण करना है, जिससे इन्द्रियों की स्वचालितता को नियंत्रित करने हेतु आवश्यक ऊर्जा प्राप्त होती है।