श्रीकृष्ण कहते हैं कि अयुक्त (अस्थिर) मनुष्य में बुद्धि और भावना दोनों नहीं होती है और परिणामस्वरूप, उसे शांति नहीं मिलेगी और अशांत व्यक्ति के लिए कोई खुशी नहीं है (2.66)। श्रीकृष्ण ने समत्व (2.38 एवं 2.48) पर जोर दिया और यह श्लोक एक अलग दृष्टिकोण से उसी पर प्रकाश डालता है। जब तक व्यक्ति मध्य में केंद्रित नहीं होता, तब तक वह मित्र, शत्रु, कार्य, जीवनसाथी, संतान, धन, सुख, शक्ति, संपत्ति आदि जैसे कुछ केंद्रों में स्वयं को स्थिर कर लेता है और यही अयुक्त की पहचान है। यदि कोई धन पर केंद्रित है तो उसकी सभी योजनाएँ  रिश्ते, स्वास्थ्य जैसी चीजों की कीमत पर धन को अधिकतम करने के इर्द-गिर्द घूमते हैं। सुख जिसका केंद्र है वह सुख प्राप्त करने के लिए धोखा देने से लेकर कुछ भी करने से नहीं हिचकिचाता है। एक जीवनसाथी उन्मुख व्यक्ति उनके जीवनसाथी के साथ लोगों के व्यवहार के आधार पर रिश्तों का मूल्यांकन करता है। जो शत्रु केंद्रित है वह अपने शत्रुओं को नुकसान पहुंचाने के बारे में सोचता रहता है भले ही इससे उसका खुद का नुकसान हो रहा हो। जब हम दूसरों से बंधे (जुड़े) होते हैं, तो हमारी शांति उनके हाथों में होती है और हमें पराधीन बनाती है। इसलिए श्रीकृष्ण समत्व पर जोर देते हैं जहां हम मध्य में केंद्रित होते हैं जो कि परम स्वतंत्रता (मोक्ष) है। श्रीकृष्ण भाव ‘शब्द’ का प्रयोग करते हैं, जिसकी तुलना हम हमारी भावनाओं से करते हंै परन्तु यह दोनों भिन्न हैं। कोई भी व्यक्ति या वस्तु, जब ‘मैं’ से बंधा होता है, तो गहरी भावनाओं का आह्वान करता है, अन्यथा, वे हमारे दिल को छू भी नहीं सकते। इसका तात्पर्य यह है कि हमारी सभी भावनाएँ व्यक्तिपरक हैं। लेकिन श्रीकृष्ण समत्व से उत्पन्न होने वाले भाव का उल्लेख कर रहे हैं, जो  सब के लिए समान है, चाहे उसमें ‘मैं’ या ‘मेरा’ शामिल हो या नहीं। हमारा परिवेश अप्रिय, अराजक और परेशान करने वाला हो सकता है, लेकिन येे मध्य में रहकर आंतरिक समन्वय प्राप्त करने वाले को प्रभावित नहीं कर सकते हैं और श्रीकृष्ण इसे शांति प्राप्त करना कहते हैं, जो हमें आनन्दित करता है।