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चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति संबंधी याचिका पर उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ की सुनवाई को लेकर चर्चा जोरों पर बनी हुई है। हमने भी अपने एक लेख में इससे संबंधित कुछ तथ्य साझा किए थे। इस लेख में आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया को लेकर दी गई विशेषज्ञों की टिप्पणीयों के बारे में जानते हैं। कुछ बिंदु –
उदाहरण के लिए, आयुक्तों को 65 वर्ष तक ही पद पर बने रहने का अधिकार है। सरकार ने इस बिंदु का लाभ उठाते हुए इतने वरिष्ठ लोगों की नियुक्ति की परंपरा बना ली है कि वे एक या दो वर्ष में ही सेवामुक्त हो जाते हैं। सरकार आखिर ऐसा क्यों करती है ?
नियमों के अनुसार प्रशासनिक सेवा के किसी व्यक्ति को ही आयुक्त पद पर नियुक्त करने की बाध्यता नहीं है। चूंकि जिलों में लंबे समय तक काम करते हुए इन अधिकारियों को चुनाव करवाने का अनुभव ज्यादा होता है, इसलिए इनको प्राथमिकता दी जाती है। इन अधिकारियों की नियुक्ति 58.59 वर्ष में न करने की परंपरा इसलिए पड़ी कि सरकार इन्हें छः वर्षों तक चुनाव आयुक्त बने रहकर अपनी मनमानी करने की शक्ति नहीं देना चाहती है। इस परंपरा के चलते वरिष्ठ अधिकारियों को ही आयुक्त बनने का मौका मिलने लगा है। लेकिन संविधान में कहीं ऐसा कोई उल्लेख नहीं है।
न्यायपालिका तो संविधान की रक्षक है, और उसने इस मामले को गंभीरता से लेकर सही कदम उठाया है। दूसरी ओर, स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव, हमारे संविधान का मूल आधार है। अतः इसे सुलझाया जाना बहुत जरूरी है। उम्मीद की जा सकती है कि देश के प्रबुद्धजन और संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ इस मामले में कोई सही हल निकाल सकेंगे।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित चर्चा पर आधारित। 2 दिसंबर, 2022
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