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जलवायु परिवर्तन के खतरों में वैश्विक स्तर पर भारत का स्थान पांचवां है। यह देश को पारिस्थितिकी रूप से कमजोर देशों की सूची में ले आता है। हाल ही में जोशीमठ के कुछ हिस्सों से निवासियों की आपातकालीन निकासी देश के संवेदनशील हिस्सों के लिए डिजाइन की गई बुनियादी सुविधाओं और निर्माण योजनाओं के पुनर्विचार को प्रेरित करती है।
आर्थिक और मानवीय नुकसान की इस चेतावनी को कुछ बिंदुओं में देखने का प्रयत्न करते हैं .
इसका कारण है कि समय के साथ आउटपुट और एक अतिरिक्त यूनिट के उत्पादन की गिरती कीमत कम होते उत्सर्जन के सापेक्ष हो गई है। इसके चलते भारत में भी अब पारिस्थितिकी अनुकूल विकास कार्यों की उम्मीद की जा सकती है।
इस कदम के लिए सबसे पहले सरकारों को खुद का डेटाबेस बनाना चाहिए। इसके अनुसार ही सरकार के विभिन्न स्तरों पर नीति निर्माण में ग्रीन जीडीपी के प्रसार का प्रयत्न करना चाहिए। इस प्रकार के ठोस प्रयासों से शायद हम जोशीमठ एवं अन्य संवेदनशील क्षेत्रों में आने वाली आपदाओं को नियंत्रित कर पाएंगे।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 10 जनवरी, 2023
The post परियोजनाओं और राष्ट्रीय उत्पादन में पर्यावरणीय लागत appeared first on AFEIAS.