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हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने केरल के संरक्षित वनों के आसपास एक किलोमीटर के बफर जोन के सीमांकन का निर्देश दिया है। पारिस्थितिकीय रूप से संवेदनशील क्षेत्रों के आसपास बफर जोन का निर्माण व रखरखाव आवश्यक माना जाता है। जमीनी-स्तर के डेटा की अनुपलब्धता के कारण यह अक्सर संभव नहीं हो पाता है।
क्लाइमेट चेंज एण्ड लैंड-समरी फॉर पॉलिसी मेकर्स, 2019 की अपनी विशेष रिपोर्ट में इंटरनेशलन पैनल फॉर क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) ने धारणीय भूमि प्रबंधन हेतु डेटा की उपलब्धता और उस तक पहुंच पर बहुत जोर दिया है। हमारे देश में ऐसे आंकड़े अधिकाशंत अनुमानित है। अगर केवल केरल की ही बात करें, तो 1980 के दशक की शुरूआत में सेंटर फॉर अर्थ साइंस ने इस बात का खुलासा किया था कि वहाँ की वास्तविक वन भूमि और कागजों पर दिए गए आंकड़ों में बडा अंतर है। वन-भूमि का बहुत सा भाग वास्तव में गैरवानिकी कार्यों के लिए उपयोग में लाया जा रहा है। केरल ही नहीं, बल्कि पूरे देश में वन-भूमि का ऐसा ही दुरूपयोग हो रहा है। यही कारण है कि न्यायालय ने सीमांकन का निर्देश दिया है।
प्राकृतिक वन और मानव बस्ती के बीच की सीमा तय करना जरूरी
बफर जोन मैपिंग कैसी हो ?
‘द हिंदू’ में प्रकाशित श्रीकुमार चट्टोपाध्याय के लेख पर आधारित। 9 जनवरी, 2023
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