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भारत में मोटे अनाज को बहुत अधिक बढ़ावा दिया जा रहा है। इसी दिशा में भारत को विश्व.हब बनाने के उद्देश्य से सरकार ने बजट में भी इस पर प्रकाश डाला है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि मोटे अनाज का उत्पादन और घरेलू उपभोग बढ़ाने से पोषण और पर्यावरण, दोनों को ही लाभ पहुंच सकता है। साथ ही, निर्यात भी बढ़ सकता है।
इस उद्देश्य को लेकर आने वाली चुनौतियों पर कुछ बिंदु –
हालांकि इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है, क्योंकि 2013 में सरकार ने खेती को विविध करने के उद्देश्य से पंजाब, हरियाणा और पश्चिम उत्तर प्रदेश जैसे मुख्य हरित क्रांति वाले राज्यों को धान के रकबे से दूर कर दिया था। हरियाणा सरकार ने भी धान से भिन्न फसल के लिए 7000/प्रति एकड़ नकद सब्सिडी का प्रस्ताव दिया था। ये तरीके विफल रहे थे।
अतः जब तक किसानों को मोटे अनाज के लिए सही मूल्य मिलने की गारंटी नहीं दी जाती है, तब तक वे इसकी पैदावार क्यों करना चाहेंगे। सरकार को चाहिए कि भारत को मोटे अनाज का वैश्विक हब बनाने के लिए किसानों को आर्थिक प्रोत्साहन देना शुरू करे।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 6 फरवरी, 2023
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