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संयुक्त राष्ट्र ने दुनिया भर के देशों में विकास कार्यक्रमों की जांच के लिए मानव विकास सूचकांक बनाया है। जीडीपी जैसे पारंपरिक आर्थिक मानदंडों के अलावा इस सूचकांक में मानव विकास को व्यापक पहलू पर नापा जाता है। इसके निम्न आधार हैं – (1) एक लंबा और स्वस्थ जीवन (2) ज्ञान (3) उचित जीवन स्तर। 20210-22 के इस सूचकांक में 191 देश शामिल थे, जिसमें भारत का स्थान 132वां रहा है। विडंबना यह है कि बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे देशों की तुलना में हम नीचे हैं।
सच्चाई यह है कि भारत के विशाल भौगोलिक क्षेत्र और राज्यों की भिन्नताओं को देखते हुए इस विकास को दूसरी तरह से भी मापा जा सकता है। यूनाइटेड नेशन्स डेवलपमेन्ट प्रोग्राम और एनएसओ या नेशनल स्टेटिस्टिकल ऑफिस की सुझाई गई इस नई पद्धति से 2019-20 के मानव विकास को उप-राष्ट्रीय स्तर पर मापने का प्रयत्न किया गया है।
मानव विकास को यहाँ चार बिंदुओं पर मापा गया –
1) जन्म के समय जीवन-प्रत्याशा
2) स्कूली शिक्षा के औसत वर्ष
3) स्कूली शिक्षा के अपेक्षित वर्ष
4) प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय
प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय के आंकड़े उप राष्ट्रीय स्तर पर उपलब्ध नहीं थे। अतः सकल राज्य घरेलू उत्पाद प्रति व्यक्ति को जीवन स्तर मापन के लिए प्रॉक्सी संकेतक के रूप में लिया गया।
विसंगतियों के कारण –
आर्थिक विकास के साथ-साथ मानव विकास के लिए बहुआयामी दृष्टिकोण की जरूरत है। यह आय और लैंगिक असमानता को ठीक करने वाला होना चाहिए। साथ ही गुणवत्तापूर्ण सामाजिक और बुनियादी सेवाओं तक पहुंच बननी चाहिए। पर्यावरण की चुनौतियों को संबोधित किया जाना चाहिए। कुल मिलाकर मानव विकास और रोजगार सृजन को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित नंदलाल मिश्रा के लेख पर आधारित। 21 मार्च, 2023
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