हंसते हंसते सत्य उजागर हो गया प्रकृति से आगे, समय के साथ होड़ में है ,समय के साथ होड़ लगाइए और समय से दौड़ते हुए आगे निकल जाना चाहता यह वर्तमान मानव, ठीक है कि आज के समय में औसत आयु पहले के हिसाब से अधिक हैलेकिन रोग कितने अधिक हैं इसका कभी अंदाजा लगाया, हम नित्य प्रार्थना करते हैं कभी अनमने मन से और कभी सच्चे मन से कितनी प्रार्थनायें स्वीकार होती हैं ,हमारा आधार कितना सशक्त हो रहा है हमें नहीं मालूम हमें तो हर दो-तीन महीने में आने वाले नए-नए मोबाइल की भूख रहती है नए चैनल और हर कोई सिर्फ अमीर नहीं होना चाहता बल्कि बहुत अमीर होना चाहता है इसमें वह अपने जीवन की सच्चाई का आधार खोता जा रहा है, मैं यह नहीं कहूंगा कि मानव को न जाने क्या होता जा रहा है क्योंकि मानव को तो हो चुका है. इस युग के अंत के लिए इंसानों के मस्तिष्क का खोखला होना जरूरी है शायद ?वेद कबीर कहता है मन का मन में तब रहता हैजब मन चाहे, मन मनमानी तब करता है जब हम चाहे, मन के घोड़े की ढीली की जो लगाम तूने मनमर्जियां करेगा तुझको ही ले उड़ेगा