दोष इस युग का है या मानव ही कलियुगी है कि इस वैश्विक महामारी में भी अधिकारों के नाम पर मानवीयता को ही लहूलुहान किया जा रहा है? प्रश्न ज्वलंत है परन्तु प्रकृति के उत्तर का आरम्भ भी प्रचंड है!