मैसूर के मूर्तिकार ने जब 2008 में अपनी कॉर्पोरेट नौकरी छोड़ी तो उनकी मां काफी निराश हो गईं थीं. लेकिन उसके बाद उन्हें मूर्ति बनाने के कई बड़े बड़े ऑफर मिले हैं, जिसमें नेताजी की प्रतिमा बनाने का काम सबसे कठिन था.