पिछले सात सालों में भारत में प्राइवेट संस्थानों की संख्या लगभग दोगुनी हो गई है. लेकिन छात्रों का कहना है कि भारी फीस लेने के बावजूद, वे अव्वल दर्जे की शिक्षा, प्लेसमेंट और सुविधाएं देने में विफल रहे हैं.