इस तरह की परिस्थिति में राजनीतिक सत्तातंत्र अगर यह फैसला करता है कि एक कॉर्पोरेट और बाज़ार आपस में निबट लें तो यह माना जाएगा कि भारत में पूंजीवाद समझदार हो गया है.
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