जिस हिसाब से बीते कुछ सालों में शिक्षा महंगी हुई है और गरीब तथा मध्यमवर्ग के पहुंच से बाहर होती जा रही है उसे देखकर आज अगर मैथिली शरण गुप्त जिंदा होते तो लिखते “शिक्षे, तेरा नाश हो तू पैसे के हित बनी”