यहां ज़िक्र उस इस्लाम का नहीं जो एक आस्था है, बल्कि उस सियासी इस्लाम का है जहां आस्था मुल्क का मज़हब है और एक राष्ट्र को परिभाषित करता है और/ या उसके ज्यादातर अनिर्वाचित नेताओं को सत्ता में बनाए रखता है.