कोरोना से लड़ाई सिर्फ तालाबंदी और टेस्ट के मोर्चे पर नहीं लड़ी जा रही. एक मोर्चा वह भी है जहां इसके इलाज के लिए वैक्सीन की खोज हो रही है. यहां पर दुनिया भर की बड़ी यूनिवर्सिटी जुटी हुई हैं उनके साथ रिसर्च संस्थान, सरकारें, दवा बनाने वाली कंपनियां अपना ज्ञान, अपना पैसा लगा रही हैं ताकि कम से कम समय टीके की खोज कर ली जाए. विज्ञान की बहुत महत्वपूर्ण पत्रिका है 'नेचर'. पत्रिका ने 7 अप्रैल को लिखा कि दुनिया में इस तरह के 78 प्रोजेक्ट चल रहे हैं. साथ ही 37 ऐसे और प्रोजेक्ट अभी आगे आने वाले वक्त में होंगे. इन प्रोजेक्ट में टीके को खोज निकालने की कोशिश होगी.
पूरी दुनिया में तालाबंदी को लेकर बहस चल रही है. क्या तालाबंदी से संक्रमण को रोका जा सकता है? या संक्रमण रोकने के दूसरे उपाय नहीं कर पाने के कारण तालाबंदी की जा रही है. पहले मुर्गी या अंडा वाला सवाल हो गया है. अमेरिका जो कह रहा था कि लॉकडाउन हटा देगा, उसने तीन हफ्ते के लिए बढ़ा दिया है. अमेरिका के ग्रमीण क्षेत्रों में संक्रमण फैल गया है. भारत में 3 मई तक के लिए लॉकडाउन है. भारत के 737 जिले में से 377 जिले संक्रमण से प्रभावित हैं. कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने टेस्टिंग पर सवाल उठाया है. उन्होंने कहा कि 10 लाख की आबादी पर बहुत कम ही टेस्ट हो पा रहा है. उन्होंने कहा कि जबतक हम टेस्ट को नहीं बढ़ा रहे हैं तब तक हम इससे नहीं निपट सकते. वायरस से हम तालाबंदी से नहीं निपट सकते हैं. लेकिन अर्थव्यस्था को लेकर भी सोचने का समय है. अगर हम तालाबंदी कर रहे हैं तो बेरोजगारी की सुनामी जो आ रही है उसके लिए भी योजना बननी चाहिए. कोरोना से लड़ने का ताइवान मॉडल काफी कुछ सीखने लायक है ताइवान ने बिना लॉकडाउन के इन बीमारी को अपनी देश से बहुत हद तक दूर रखा है.
शुरुआत एक ऐसे डॉक्टर की कहानी से करना चाहता हूं, जिन्होंने सेवा के लिए अपनी जिंदगी दाव पर लगा दी. डॉक्टर जेपी यादव सोमवार को अपनी क्लिनिक के लिए निकल रहे थे तो गाड़ी खराब हो गई. घरवालों ने कहा कि गाड़ी खराब है ठीक होने के बाद ही वो जाएं. डॉक्टर ने कहा कि उनका जाना बहुत जरूरी है, क्योंकि वो जाकर ही PPE किट डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मियों को दे सकते हैं जिनकी जिंदगी ज्यादा खतरे में है. यह कहकर वह अपने बेटे की साइकिल लेकर क्लिनिक की तरफ निकल पड़े. डॉक्टर यादव दक्षिण दिल्ली नगर निगम के पॉली क्लिनिक में CMO इंचार्ज थे. शाम को जब वो वापस अपने घर की तरफ लौट रहे थे तो एक सफेद रंग की कार ने उन्हें टक्कर मार दी, जिससे उनकी मौत हो गयी. डॉक्टर यादव ने 1995 में MBBS की पढाई की थी बिहार के सुपौल के रहने वाले थे. उम्मीद है बिहार सरकार उन्हें उचित सम्मान देगी. बुधवार की सुबह उनका परिवार उनका शव लेकर गांव गया है. जेपी यादव को हमारी श्रद्धांजलि. दूसरी तस्वीर मुरादाबाद से है जहां स्वास्थ्य विभाग की टीम पर हमला किया गया. वहीं एक और बात जो सामने आ रही है वो यह है कि अब सब्जियां भी हिंदू और मुसलमान में बंट रही है.
भारत में तालाबंदी 3 मई तक के लिए बढ़ा दी गयी है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने तालाबंदी के असर को सकारत्मक बताते हुए कहा कि तालाबंदी के कारण ही भारत में कोरोना से संक्रमित मरीजों की संख्या में बहुत ज्यादा बढ़ोतरी नहीं हुई. डेढ़ महीना पहले भारत के साथ कई देश एक दूसरे के बराबर थे लेकिन वर्तमान में भारत संख्या के मामले में अब उन सब से काफी पीछे है. उन देशो में जो संसाधनों से मजबूत हैं लेकिन वहां मरीजों की संख्या में काफी बढ़ोतरी हो चुकी है. प्रधानमंत्री ने कहा कि अगर समय से पहले तालाबंदी का फैसला नहीं लिया जाता तो हालात भयावह हो सकते थे. साथ ही उन्होंने कहा कि 20 अप्रैल से कुछ जगहों पर जहां मरीज नहीं पाए जाएंगे वहां तालबंदी में कुछ छूट दी जा सकती है. लॉकडाउन में छूट इस कारण दी जा रही है कि दिहाड़ी पर कमाने वालों को कुछ राहत मिल सके.
http://cms24 मार्च को जब भारत में लॉकडाउन की घोषणा हुई थी तो भारत में कोरोना संक्रमितों की संख्या 562 थी जबकि 9 लोगों की मौत हुई थी. 13 अप्रैल की सुबह तक भारत में कोरोना से संक्रमित मरीजों की संख्या 9152 हो गयी और मरने वालों की संख्या 308 हो गयी. तालाबंदी के इन हफ्तों में अगर आप देखें आंकड़ों में तो संक्रमित मरीजों की संख्या में बहुत वृद्धि नहीं हुई है जैसी अमेरिका, इटली जैसे देशों में हुई थी. इसका मतलब ये है कि आप तालाबंदी के नियमों का पालन करें. जब भी बाहर जाएं किसी से भी 6 फीट की दूरी बना कर रखें. हाथों की सफाई पर ध्यान दें, मास्क लगाकर रखें. क्योंकि इन सब आदतों से ही हम कोरोना से बच सकते हैं. 29 मार्च को कोविड-19 के मरीजों की संख्या 979 थी 23 लोगों की मौत हुई थी. 12 अप्रैल तक मरीजों की संख्या 8356 हो गयी और मरने वालों की संख्या 273 हो गयी. 24 घंटे में 796 नए मामले सामने आ गए. दुनिया भर में 6 प्रतिशत मरीजों को गंभीर माना जाता है भारत में गंभीर मरीजों का औसत 20 प्रतिशत निकला है. 8356 में से 1671 मरीज गंभीर हैं. भारत में 42 हजार लोगों की व्यवस्था की गयी है. भारत में सैंपल टेस्ट में तेजी आयी है. लेकिन अब भी हम कम ही टेस्ट कर रहे हैं. उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसे राज्य जांच करवाने में पीछे हैं..videos.ndtv.com/admin/entities/map-entities/vid/545589
वैश्विक महामारी के समय सिर्फ महामारी ही नहीं मूर्खता भी फैलती है. वायरस यानी विषाणु नया हो सकता है लेकिन मूर्खता ऐतिहासिक होती है. कई बार कई देशों में सेम टू सेम होती है. इंडिया में भी वही होती है अमेरिका में भी वही होती है. कई बार कुछ मूर्खता समय के हिसाब से नई भी होती है. इंसान कई बार वायरस का इंजेक्शन तो खोज लेता है मगर इन मूर्खताओं का इलाज नहीं खोज पाता. हमने आपके लिए एक सामान्य कैटेगरी बनाई है लेकिन इसके भीतर भी कई श्रेणियां हैं. नफरत की श्रेणी है, भेदभाव की श्रेणी है और कई प्रकार की होता क्रूरता की श्रेणी है. जिसके बारे में आज हम बात करने जा रहे हैं.
महामारी या किसी बड़े संकट के समय व्यवस्था और इंसान की कुछ अनजानी खुबियां भी सामने आ जाती है. लेकिन इसका ही फायदा उठा कर कुछ पुरानी कमियां या लापरवाही एक बार फिर जगह बनाना शुरु कर देता है. आप देखिए कि कोरोना का संक्रमण किसी से भेदभाव नहीं करता है. न अमीर से न गरीब से न भारत से न पाकिस्तान से न अमेरिका से न फ्रांस से. लेकिन इस संकट के वक्त भी लोग कुछ लोग कुछ व्यवस्था फर्क बनाने में लगे हैं. आप देखिए राजधानियों में भी सुविधा में फर्क है दिल्ली में अधिक सुविधा हो तो उसके मुकाबले पटना या अन्य राज्यों की राजधानियों में कम सुविधा हो. इसतरह ही आप अस्पतालों में भी फर्क देखेंगे बड़े अस्पतालों में तो सुविधा है लेकिन छोटे अस्पतालों में सुविधा की कमी है. दिल्ली के लोकनायक अस्पताल में हमेशा नेताओं का दौरा होता रहता है लेकिन वहां के स्वास्थ्यकर्मियों को अपनी बात यूनियन से कहना पड़ रहा है. डॉक्टरों के लिए तो व्यवस्था की गयी है लेकिन अन्य के लिए व्यवस्था अच्छी नहीं की गयी है.
दुनिया भर में जो कोरोना से लड़ रहे हैं वे डॉक्टर,नर्स,फार्मेसिस्ट,लैब टेक्नीशियन और स्वास्थ्य कर्मी हैं. हर युद्ध में सिपाही के पास गोली चलाने का मौका रहता है, गोली आएगी तो वह भी जवाब में गोली चला सकता है लेकिन यहां डॉक्टरों को मालूम है कि इलाज नहीं है. लेकिन उन्हें संक्रमण हो गया तो उनकी जान भी खतरे में पड़ जाएगी. सिर्फ डॉक्टर ही नहीं तमाम कर्मचारी भी अस्पताल के भीतर अपने कर्तव्यों का निर्वहन कर रहे हैं. इसलिए बार-बार फ्रंटलाइन की बात होती है क्योंकि युद्ध के दिनों में सीमा का मतलब वह होता है जहां जवान खड़ा होता है. लेकिन इस महामारी में सीमा का मतलब वह है जो अस्पताल के भीतर है.
भारत में चली आ रही बेरोजगारी की दर तालाबंदी के कारण और अधिक बढ़ गयी है. सेंटर फॉर मॉनीटरिंग इंडियन इकोनॉमी के महेश व्यास ने कहा है कि उन्हें लगता था कि तालाबंदी के कारण मार्च महीने में बेरोजगारी की दर 23 प्रतिशत से अधिक हुई है. लेकिन आंकड़े बता रहे हैं कि जनवरी 2020 से ही इसमें गिरावट शुरु हो गयी थी. मार्च महीने में इसका ग्राफ चरम पर पहुंच गया. लोग मार्केट में काम मांगने कम जाने लगे. यानी काम ही नहीं था तो काम मांगने जाने से क्या फायदा. इसे लेबर फोर्स पार्टीसिपेशन रेट LPR कहते हैं. पहली बार LPR 42 प्रतिशत से नीचे आ गयी है. महेश व्यास का कहना है कि लेबर फोर्स में 90 लाख की कमी आ गयी है. जनवरी 2020 में लेबर फोर्स 44 करोड़ 30 लाख थी जो मार्च 2020 में 43 करोड़ 40 लाख हो गयी है. जनवरी और मार्च के बीच रोजगारों की संख्या 41 करोड़ 10 लाख से घटकर 39 करोड़ 60 लाख हो गयी है. बेरोजगारों की संख्या 3 करोड़ 20 लाख से बढ़कर 3 करोड़ 80 लाख हो गयी है. 23 प्रतिशत से अधिक की बेरोजगारी दर बहुत ज्यादा है. अमेरिका में मार्च के महीने में फरवरी के 3 प्रतिशत की तुलना में 17 प्रतिशत हो गयी लेकिन भारत में 23 प्रतिशत हो गयी.
भारत में 5 अप्रैल तक कोरोना से संक्रमित मामलों की संख्या 4067 हो गई है. पिछले 24 घंटे में 693 नए मामले आए हैं. किसी भी 24 घंटे में अब तक की यह सबसे अधिक वृद्धि है. पिछले 24 घंटे में 32 लोगों की मौत हुई है और इसी के साथ मरने वालों की संख्या 109 पार कर गई है. संख्या को लेकर एक बात हमेशा ध्यान में रखें। जब तक हम बोल रहे हैं या आप सुन रहे हैं संख्या पुरानी हो चुकी होती है. 67 दिनों में भारत में अधिकृत रूप से 4067 मामले ही सामने आए हैं. क्या वाकई भारत में कोरोना का संक्रमण उस तरह से नहीं फैला है जैसा की दुनिया के बाकी हिस्सों में फैला है? संख्या तो यही बताती है लेकिन एक सवाल आता है. टेस्ट की संख्या का. अगर कम टेस्ट ही समझदारी है तो फिर दुनिया के कई विकसित देशों में टेस्ट पर क्यों ज़ोर दिया जा रहा है. कोरोना से लड़ाई के मामले में आप देखेंगे कि हर देश करीब करीब एक ही फार्मूले पर चल रहा है. फिर भारत का टेस्ट के मामले में अलग होना इतना प्रमाणिक है.