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The post योजना : भारतीय संविधान का विकास : संवैधानिक संशोधन appeared first on AFEIAS.
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Date: 16-11-24
आबादी के अनुपात में मधुमेह रोगी क्यों बढ़ रहे?संपादकीय
पिछले तीन दशकों में भारत में डायबिटीज के रोगियों का प्रतिशत दूना हो गया है जबकि इस दौरान तमाम पैमानों- शिक्षा, आय, स्वास्थ्य संरचना – आदि पर काफी विकास हुआ है। लांसेट के ताजातरीन अध्ययन के अनुसार ‘बगैर इलाज मधुमेह रोगियों की संख्या में भारत दुनिया की राजधानी बन गया है। वर्ष 2022 के आंकड़ों पर आधारित इस रिपोर्ट के अनुसार भारत का लगभग हर चौथा व्यक्ति (21.2%) इस बीमारी से पीड़ित है। चिंता इस बात की है कि इन तीन दशकों में इलाज कराने वाले मरीजों के प्रतिशत में मात्र 5-8 की वृद्धि हुई है। दुनिया के देशों के बीच आर्थिक असंतुलन को लेकर आरोप लगाए जाते हैं और गरीब-अमीर की बढ़ती खाई पर सरकारों की निंदा की जाती है लेकिन मधुमेह जैसी बीमारियों के पीछे सामाजिक चेतना की बड़ी भूमिका है। असंतुलित भोजन, शारीरिक श्रम के अभाव वाली जीवन-शैली इस रोग को बढ़ाने में बड़े फैक्टर हैं। आबादी के अनुपात में जापान, कनाडा, फ्रांस, स्पेन, चीन में कम लोग इस बीमारी के शिकार हैं। सिंगापुर, जापान, दक्षिण कोरिया में अच्छा स्वास्थ्य सुनिश्चित करने को लेकर सरकारें मदद करती हैं। रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में पिछले तीन दशकों में इस बीमारी के रोगियों का प्रतिशत पुरुषों में 6.8 से बढ़कर 14.3 और महिलाओं में 6.9 से बढ़कर 13.9 हो गया है, जबकि भारत में यह क्रमशः 11 से 21 और 12 से 24 हो गया है।
Date: 16-11-24
राजनीतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र का अभावराहुल वर्मा, ( लेखक सेंटर फार पालिसी रिसर्च में फेलो एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं )
समकालीन भारतीय राजनीति में दलबदल एक ऐसी दलदल है जिसमें लगभग हर कोई राजनीतिक दल धंसा हुआ है। ज्यादा दूर न जाएं तो चाहे अप्रैल से जून तक चले लोकसभा के चुनाव हों या बीते दिनों हुए हरियाणा और जम्मू-कश्मीर के विधानसभा चुनाव से लेकर इन दिनों चुनावी प्रक्रिया का सामना कर रहे महाराष्ट्र-झारखंड का उदाहरण लें तो कुछ नेताओं को लेकर आपको दुविधा हो सकती है कि वे इन दिनों किस पार्टी के साथ जुड़े हैं। दोनों राज्यों में सभी दल असंतुष्ट और बागी प्रत्याशियों से जूझ रहे हैं। असल में नेताओं और दलों ने दलबदल को इतना सामान्य बना दिया है कि मानो यह कोई मुद्दा ही नहीं है। हालांकि ऐसा है नहीं। चाहे नैतिकता का तकाजा हो या फिर आदर्श राजनीतिक व्यवस्था की बात करें तो दलबदल की यह परिपाटी राजनीतिक तंत्र में भरोसे और विश्वसनीयता का सवाल निश्चित रूप से उठाती है। इस बहस में पहला प्रश्न तो यही कौंधता है कि आखिर हमारी व्यवस्था में यह सिलसिला क्यों कायम है? इसके उत्तर की पड़ताल करें तो उसमें राजनीतिक एवं चुनाव सुधारों का अभाव दिखेगा। हमारे कुछ नेताओं की निहित स्वार्थ से प्रेरित वह मानसिकता भी इसके मूल में है जो किसी भी स्थिति में सत्ता में भागीदार न सही तो कम से कम उसके करीब जरूर रहना चाहती है।
दलबदल अमूमन दो तरह से होता है। एक तो चुनाव से पहले और दूसरा चुनाव के बाद। स्वाभाविक है कि चुनाव में टिकट से वंचित रह जाने की स्थिति में लोग पाला बदल लेते हैं। हालांकि इसके उतने खतरे नहीं, क्योंकि चुनाव से पहले ही मतदाताओं के समक्ष स्थिति स्पष्ट रहती है कि कौन किसके पाले में है। दोनों स्थितियों में चुनाव बाद होने वाला दलबदल कहीं अधिक गंभीर प्रकृति का है, क्योंकि उसमें मतदाताओं के साथ छल होने का जोखिम अधिक रहता है। शायद यही कारण रहा कि चुनाव बाद होने वाले दलबदल पर अंकुश के लिए वर्ष 1985 में राजीव गांधी सरकार ने दलबदल निरोधक कानून बनाया, जिसे 2002 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने और सशक्त बनाने का काम किया। इससे चुनाव बाद दलबदल की समस्या का कुछ हद तक समाधान अवश्य हुआ, लेकिन उसका पूरी तरह निराकरण नहीं हो पाया। नेताओं ने इसका भी तोड़ निकाल लिया है। चूंकि दलबदल के लिए एक निश्चित संख्या की आवश्यकता होती है तो उसका बंदोबस्त करने के बाद अब यह कहीं अधिक संस्थागत रूप से होने लगा है। यहां तक कि निर्वाचन के बाद जनप्रतिनिधियों द्वारा सदन की अपनी सदस्यता से इस्तीफा देकर बहुमत के आंकड़े को ही विरूपित कर दिया जाता है। उसके बाद उपचुनाव से चुनावी प्रक्रिया और भी बोझिल होने लगी है। वहीं एक साथ मिलकर चुनाव लड़ने वाले गठबंधन के दल भी जब सत्ता की खातिर अपनी राह अलग कर लेते हैं तो वह भी जनमत और जनादेश के साथ एक प्रकार का छल होता है।
दलबदल की समस्या समय के साथ और विकराल हुई है तो उसके सबसे अधिक दोषी हमारे राजनीतिक दल हैं। छोटी पार्टियां तो निजी जागीरों की तरह चलाई ही जा रही हैं, मगर बड़े दलों की स्थिति भी बहुत अच्छी नहीं। बड़ी पार्टियों का नेतृत्व भी हद से अधिक केंद्रीकृत हो चला है। आंतरिक लोकतंत्र भी आदर्श अवस्था में नहीं है। प्रत्याशी चयन की सुनिश्चित प्रक्रिया नहीं है। टिकट वितरण में पार्टी कार्यकर्ता की कर्मठता एवं समर्पण सरीखे पहलू अक्सर गौण हो जाते हैं। उसमें केवल जिताऊ कोण पर ही पूरा जोर दिया जाता है। ऐसे में निष्ठावान कार्यकर्ताओं को किनारे करके धनबल, बाहुबल और जातीय-धार्मिक पहलुओं को प्राथमिकता दी जाने लगी है। खासतौर से चुनाव जितने खर्चीले होते जा रहे हैं, उसे देखते हुए धनबल की महत्ता बढ़ती जा रही है। ऐसे में धनाढ्य प्रत्याशियों को तरजीह मिलने लगी है। ऐसे दावेदारों को अगर कुछ कारणों से अपने दल से टिकट नहीं मिलता तो प्रतिद्वंद्वी दल उन्हें हाथोंहाथ अपना लेता है। कई मामलों में यह भी देखा गया है कि दल की सदस्यता लेने के पांच मिनट में ही उक्त व्यक्ति को पार्टी द्वारा प्रत्याशी घोषित कर दिया जाता है। आधे घंटे पहले तक किसी के पक्ष में रैली कर रहा नेता एकाएक दूसरे दल के मंच पर पहुंचकर उसकी पैरवी करने लगता है। यह भारतीय राजनीतिक परिदृश्य की विडंबनाओं को ही उजागर करता है।
दलबदल पर विराम लगाने के लिए कोई कानूनी पहल अनिवार्य रूप से कारगर नहीं हो सकती। दलबदल निरोधक कानून के दुष्परिणामों को ही देख लीजिए। उसके लागू होने के बाद जनप्रतिनिधियों के व्यक्तिगत अधिकार बहुत सीमित हो गए हैं कि कई मुद्दों पर वे अपना पक्ष भी नहीं रख सकते। कई राजनीतिक प्रेक्षक इस स्थिति की व्याख्या ऐसे करते हैं कि दलबदल निरोधक कानून लागू होने के बाद जनप्रतिनिधि एक प्रकार से राजनीतिक दलों के ‘बंधुआ’ बनकर रह गए हैं। इसलिए बेहतर यही होगा कि जनता स्वयं इस मामले में जागरूक होकर राजनीतिक दलों को जिम्मेदार एवं जवाबदेह बनाने के लिए बाध्य करे। सभी दल हमारी राजनीतिक व्यवस्था से जुड़ी ढांचागत कमियों को दुरुस्त करने का काम करें और अर्से से लंबित राजनीतिक एवं चुनाव सुधारों की दिशा में कदम बढ़ाएं।
अमेरिका और पश्चिमी यूरोप के देशों से इस मामले में कोई सीख ली जा सकती है। हमारे राजनीतिक दल पश्चिम की सुगठित एवं सुव्यस्थित राजनीतिक व्यवस्था के सकारात्मक बिंदुओं को आत्मसात करते हुए आगे बढ़ सकते हैं। इसमें प्रत्याशी चयन की प्रक्रिया से लेकर चुनावी फंडिंग और राजनीतिक समायोजन की व्यवस्था को बेहतर बनाया जा सकता है। हालांकि ऐसा नहीं है कि पश्चिम के परिपक्व लोकतांत्रिक देशों में दलबदल जैसी कोई समस्या नहीं, लेकिन वह इतनी विकराल नहीं है। वहां नेताओं से लेकर राजनीतिक दल अपने वैचारिक आग्रह को लेकर खासे मुखर रहते हैं और विचारधारा की राजनीति ऐसी नहीं कि उसे एकाएक केंचुली की तरह बदल दिया जाए। जबकि भारत में विचारधारा की पालकी ढोने का दावा करने वाले नेता भी इस मामले में उसे कपड़ों की तरह बदल लेने से परहेज नहीं करते। ऐसे में यदि विचारधारा, आंतरिक लोकंतत्र और प्रत्याशी चयन की प्रक्रिया को पारदर्शी बना दिया जाए तो दलबदल की बेलगाम होती समस्या पर एक बड़ी हद तक अंकुश लगाया जा सकता है।
Date: 16-11-24
सहकारी संघवाद की भ्रामक अवधारणाएम गोविंद राव , ( लेखक 14वें वित्त आयोग के सदस्य और एन आईपीएफपी के निदेशक रह चुके हैं। लेख में उनके निजी विचार हैं )
भारतीय संघ को लेकर गंभीर अध्ययन करने वाले विद्वान अक्सर उसे ‘सहकारी संघवाद’ वाला देश कहते हैं। इस बारे में गत 10 नवंबर को सेवानिवृत्त हुए देश के मुख्य न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ ने 26 अक्टूबर को मुंबई में दिए एक भाषण में दिलचस्प बातें कही थीं। उनके आधार पर हमें यह देखना चाहिए कि हम भारतीय संघवाद को किस दृष्टि से देखते हैं।
यह कहते हुए कि ‘सहकारी संघवाद’ भारत के लोकतांत्रिक शासन के मूल में नहीं है, उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि हमारे यहां राज्य सरकारों के लिए यह आवश्यक नहीं है कि वे केंद्र सरकार की नीतियों का पूरी तरह अनुकरण करें। उन्होंने सर्वोच्च न्यायालय के 1977 के निर्णय का हवाला दिया जिसमें कहा गया था कि भारत में संघवाद का मॉडल ‘बुनियादी तौर पर सहकारी है जहां केंद्र और राज्य अपने मतभेदों को विचार विमर्श के जरिये दूर करते हैं और साझा विकास लक्ष्यों को हासिल करते हैं।’ उन्होंने कहा कि संघीय सिद्धांतों को चर्चा और संवाद के जरिये आगे बढ़ाना चाहिए और सहयोग तो इन्हें बरकरार रखने का एक जरिया भर होना चाहिए। इसके अलावा चर्चाएं भी समान रूप से महत्त्व रखती हैं जो एक सिरे पर सहयोग तो दूसरे सिरे पर प्रतियोगिता तक विस्तारित हो सकती हैं। एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए दोनों आवश्यक हैं। निश्चित तौर पर प्रतियोगिता में प्रतिस्पर्धा भी शामिल हो सकती है।
‘सहकारी संघवाद’ शब्द को अक्सर अकादमिक मान लिया जाता है, भले ही ऐसा न हो। इसे परोपकारी राज्य की अवधारणा के साथ जोड़कर देखा जाता है। अल्बर्ट ब्रेटन नामक अर्थशास्त्री जो रॉयल कमीशन ऑन द इकनॉमिक यूनियन ऐंड डेवलपमेंट प्रॉस्पेक्ट्स ऑफ कनाडा के सदस्य भी थे, वह बार-बार दोहराए जाने वाले इस शब्द को लेकर उत्सुक रहते थे। उन्होंने इस विषय पर विचार शुरू किया कि क्या विभिन्न इकाइयों के बीच क्षैतिज और उर्ध्वाधर हस्तक्षेप वास्तव में सहकारी तथा प्रतिस्पर्धी थे। उन्होंने इस विषय पर एक कमीशन को एक रिपोर्ट भी लिखी जिसका शीर्षक था ‘टुवर्ड्स अ कंपटीटिव फेडरलिज्म ।’ यह बाद में यूरोपियन जर्नल ऑफ पॉलिटिकल इकॉनमी में प्रकाशित हुई। भारत में विद्वानों के बीच ‘सहकारी संघवाद’ को लेकर अलग किस्म का लगाव है, भले ही वह अस्तित्व में भी न हो । नियोजित विकास की रणनीति के दौर में यह खूब सुनने को मिलता था जब बाजार और राज्य सरकारों दोनों की संसाधनों के आवंटन में सीमित भूमिका हुआ करती थी। इसके अलावा लंबे समय तक देश में मौजूद रहे एक दलीय शासन ने राज्यों पर यह दबाव डाला कि वे केंद्र सरकार के आवंटन निर्णयों का पालन करें। एक तरह से देखें तो यह सहयोग का चरम रूप था जो दबाव बनने की सीमा पर पहुंच गया था। इसके दो प्रभाव हुए। सहमति बनाने के लिए दबाव का इस्तेमाल एकात्मक रुख है। जैसा कि राज चेलैया ने अपने एल के झा स्मृति व्याख्या में कहा, ‘केंद्रीयकृत नियोजन में संघवाद का निषेध है। दूसरा शुरुआती वर्षों के दौरान एकदलीय शासन के दौर में अनौपचारिक व्यवस्था के जरिये सहमति कायम करने की व्यवस्था के चलते अंतरसरकारी सहयोग, सौदेबाजी और विवाद निपटारे की औपचारिक व्यवस्था नहीं कायम हो सकी।’ यकीनन सहकारी संघवाद उन मामलों में उपयुक्त है जहां संबंधित पक्षों को लाभ हो रहा हो । परंतु जहां लाभ असमान हों या जहां कुछ को लाभ तथा अन्य को नुकसान हो वहां विभिन्न पक्ष केवल तभी सहयोग करेंगे जब अधिक लाभ अर्जित करने वाले कम लाभ पाने या नुकसान सहने वालों की भरपाई करें। इसके लिए मुक्त सूचना, और बातचीत, सौदेबाजी तथा विवाद निस्तारण की सुविधा प्रदान करने वाली व्यवस्थाओं और संस्थाओं की आवश्यकता होती है। यकीनन सहयोग के उदाहरण भी हैं मसलन, केंद्र और राज्यों द्वारा कई खपत करों को मिलाकर वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) का निर्माण केंद्र और राज्य दोनों ने देखा कि एक राष्ट्रीय बाजार बनाने के आर्थिक लाभ भी हैं और भले ही राजस्व स्वायत्तता को हानि हुई लेकिन करों को इस प्रकार सुसंगत बनाने से मध्यम अवधि में राजस्व उत्पादकता में भी इजाफा होगा। इसके बावजूद सुधार प्रक्रिया को गति देने के लिए जीएसटी परिषद जो केंद्र और राज्यों की एक सहकारी संस्था है, का निर्माण किया गया। बहरहाल सुधार को लागू करने में एक अहम कारक था केंद्र सरकार द्वारा राज्यों को राजस्व नुकसान की भरपाई करने का वादा | ऐसा करके आधार वर्ष से हर वर्ष 14 फीसदी की वृद्धि सुनिश्चित की गई।
महामारी आने के बाद जब केंद्र सरकार ने समझौते की शर्तों को निरस्त किया तो राज्यों में भारी असंतोष फैल गया। इससे यह रेखांकित होता है कि जिन मामलों में सहकारी संघवाद व्यावहारिक है वहां भी संबद्धता के स्पष्ट निश्म, सूचना की निःशुल्क उपलब्धता और मजबूत व्यवस्थाएं और संस्थान जरूरी हैं ताकि समन्वित कदम उठाए जा सकें और विवादों को हल किया जा सके।
हम जितना सहकारी संघवाद की कामना करते हैं यह उतना ही मायावी नजर आता है और हमें अक्सर प्रतिस्पर्धा देखने को मिलती है। केंद्र और राज्यों के बीच आपसी अंतरसरकारी प्रतिस्पर्धा मौजूद है। जब राजनीतिक दल नियंत्रण हासिल करने के लिए एक दूसरे से जूझ रहे हों तो प्रतिस्पर्धा चुनावी हो सकती है। यह प्रतिस्पर्धा संसाधनों या राजकोषीय गुंजाइश की या फिर निवेश आकर्षित करने की भी हो सकती है। यहां तक कि प्रतिस्पर्धी संघवाद में भी प्रभावी लाभ केवल तभी मिल सकता है जब कुछ महत्वपूर्ण पूर्व शर्त हों। उदाहरण के लिए प्रतिस्पर्धी समानता और लागत लाभ उपयुक्तता।
यद्यपि संघ और राज्यों के बीच विषम शक्ति, ‘प्रतिस्पर्धी समानता’ को बनाए रखने को मुश्किल बनाती है। इस संदर्भ में निष्पक्ष और स्थिर संघीय भागीदारी के लिए प्रतिस्पर्धा को विनियमित करने, आक्रामक प्रथाओं से सुरक्षा करने और विवादों को हल करने के लिए भागीदारी के नियम, व्यवस्थाएं और संस्थान आवश्यक हैं।
अंतरसरकारी सहयोग, सौदेबाजी और विवाद निस्तारण के लिए औपचारिक व्यवस्था की अनुपस्थिति भारतीय संघ में एक अहम कमी है। सौहार्द की बढ़ती कमी, कटुता और अनियमित प्रतिस्पर्धा को देखते हुए ऐसे संस्थान की सख्त जरूरत है। केंद्र और राज्यों के बीच के संघर्ष तथा राज्यों के आपसी विवादों को न्यायपालिका को हल करना चाहिए लेकिन वह पहले ही काम के बोझ और देरी से जूझ रही है। राष्ट्रीय विकास परिषद है। लेकिन उसकी शायद ही कभी बैठक होती है और जब होती है तो कुछ खास निष्कर्ष नहीं निकल पाता।
जब योजना आयोग था तब वार्षिक योजनाओं पर चर्चा होती थी। हालांकि 1991 के बाद राज्यों की भागीदारी मोटे तौर पर अनुदान सुरक्षित करने तक सिमट गई। पहला प्रशासनिक सुधार आयोग 1966 में बना था और उसने यह अनुशंसा की थी कि एक अंतरराज्यीय परिषद बनाई जानी चाहिए। केंद्र राज्य संबंधों को लेकर 1983 में बने आर एस सरकारिया आयोग ने भी यह बात दोहराई। 63 वें संविधान संशोधन की मदद से अंतरराज्यीय परिषद का गठन किया गया लेकिन विडंबना ही है कि इसे केंद्रीय गृह मंत्रालय के अधीन कर दिया गया और इसे स्वतंत्र एवं निष्पक्ष भूमिका नहीं दी गई। केंद्र और राज्यों के बीच सामंजस्य की बढ़ती कमी तथा राज्य स्तर पर क्षेत्रीय दलों के नेतृत्व में गठबंधन सरकारों के उभार के बीच यह महत्त्वपूर्ण है कि अंतरसरकारी सहयोग, विनियमित प्रतिस्पर्धा तथा विवाद निस्तारण सुनिश्चित करने के लिए एक प्रभावी संस्थान का गठन किया जाए। विकसित भारत का लक्ष्य हासिल करने के लिए ऐसे संस्थान जरूरी हैं।
Date: 16-11-24
ग्रामीण क्षेत्रों को ऋण चक्र के जाल से मिले मुक्तितमाल बंद्योपाध्याय
भारत के एफएमसीजी क्षेत्र में जुलाई-सितंबर तिमाही में मूल्य के हिसाब से 5.7 प्रतिशत और कारोबार के हिसाब से 4.1 प्रतिशत की वृद्धि हुई है जो ग्रामीण क्षेत्रों की मांग की बदौलत संभव हुआ है। कंज्यूमर इंटेलिजेंस फर्म नील्सनआईक्यू ने हाल ही में अपनी तिमाही रिपोर्ट में यह जानकारी दी। लेकिन कई लोगों का मानना है कि भारत की ग्रामीण अर्थव्यवस्था में विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्र में ऋण का बढ़ता स्तर चिंता का विषय है। कुछ गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां (एनबीएफसी) ऐसी स्थिति के बावजूद दांव आजमाने की कोशिश करते हुए हालात को और जटिल बना रही हैं।
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने ‘दबाव देकर दिए जाने वाले ऋण’ के बढ़ते मामले पर अब ध्यान देना शुरू किया है। ऐसे ऋणों की मार्केटिंग बेहद आक्रामक तरीके से ऐसे की जाती है कि ऋण लेने वाले इनके दीर्घकालिक वित्तीय परिणामों से वाकिफ नहीं हो पाते हैं।
ऋण संकट के मूल कारणों में से एक, देश के ग्रामीण क्षेत्र में रोजगार के पर्याप्त अवसरों का अभाव है। आर्थिक वृद्धि का लाभ भी पर्याप्त रूप से रोजगार सृजन में नहीं दिखा है, खासतौर पर गैर-कृषि क्षेत्रों में। ऋण की आसान पहुंच और चौबीस घंटे डिलिवरी सेवाओं के प्रसार से ग्रामीण क्षेत्रों में खपत की स्थिति बढ़ी है। लोगों को गैर-जरूरी वस्तुओं और सेवाओं के वास्ते ऋण लेने के लिए लुभाया जा रहा है जिससे वे और अधिक कर्ज के जंजाल में फंस रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों के परिवार, रोजमर्रा की अपनी जरूरतों के लिए भी ऋण की राशि पर निर्भर हो रहे हैं।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था में आय के स्रोत अनिश्चित हैं और यह मुख्य रूप से कृषि पर निर्भर है। यह अप्रत्याशित मॉनसून, जिंसों की उतार-चढ़ाव वाली कीमतों और बढ़ती इनपुट लागत से भी प्रभावित होती है। कुछ एनबीएफसी इस अंतर का फायदा उठा रहे हैं और रोजमर्रा की खपत के लिए ऋण अधिक ब्याज दरों पर देते हैं। इसमें ऋणों का रॉलओवर चक्र एक अहम हिस्सा है। इसका सबसे बड़ा संस्थागत उदाहरण फसल ऋण है। सरकार हर वर्ष, किसानों को फसल ऋण का वितरण करने के लिए बैंकों के लिए महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित करती है। इन लक्ष्यों को पूरा करने के लिए बैंकों पर दबाव होता है जिसके कारण अक्सर ऋणों का वितरण तेजी से यह सुनिश्चित किए बिना ही कर दिया जाता है कि इनका उपयोग उत्पादक तरीके से किया जाएगा या नहीं। इस ऋण का इस्तेमाल उत्पादक कृषि निवेश के लिए किए जाने के बजाय, तत्काल जरूरतों को पूरा करने या पुराने ऋण का भुगतान करने के लिए किया जाता है जिससे ग्रामीण ऋण संकट गहरा जाता है।
अब यह प्रथा सामान्य एनबीएफसी के साथ-साथ माइक्रोफाइनैंस से जुड़े लोगों तक फैल गई है। वे ऋण का रॉलओवर कर रहे हैं, जिससे उधारकर्ताओं को और अधिक कर्ज में धकेला जा रहा है।
एनबीएफसी ने ग्रामीण क्षेत्रों में औपचारिक बैंकिंग क्षेत्र की सीमित पहुंच के कारण बनी अंतराल जैसी स्थिति को भरने के मकसद से यह कदम बढ़ाया है। हालांकि, उनकी ब्याज दरें अक्सर बैंकों द्वारा लगाए जाने वाली ब्याज दरों से कहीं अधिक होती हैं और यह ऋणकर्ताओं पर अतिरिक्त बोझ डाल रही हैं।
आरबीआई ने अधिक ब्याज दरों को लेकर चिंता जताई है खासतौर पर सूक्ष्म ऋणों के संदर्भ में। जब बैंकिंग नियामक ने मार्च 2022 में ब्याज दरों को मुक्त कर दिया, उसके बाद पिछले कुछ वर्षों से ऐसा हुआ है क्योंकि पहले ऋण दरें, फंड की लागत से जुड़ी हुई थी। एक बार जब इसे मुक्त कर दिया गया तब लगभग सभी सूक्ष्म ऋणदाताओं ने दरों में बढ़ोतरी की। शुरुआत में, यह बहाना दिया गया था कि कोविड की अवधि के दौरान हुए नुकसान की भरपाई करने के लिए कुछ और कमाई करने की जरूरत थी। इस वक्त ऐसा कोई बहाना नहीं है।
इत्तफाक से कुछ बैंक जिनकी सार्वजनिक जमाओं तक कम लागत के साथ पहुंच है वे भी एनबीएफसी की तुलना में कभी-कभी सूक्ष्म ऋण पर, उच्च ब्याज दर वसूल रहे हैं। अगर एनबीएफसी की जांच-पड़ताल उनके ब्याज दरों के लिए की जा रही है तब क्या इस लिहाज से बैंकों की जांच नहीं की जानी चाहिए? ग्रामीण क्षेत्रों में ऋण की लागत कर्ज लेने वाले की भुगतान क्षमता के मुकाबले गैर-आनुपातिक तरीके से बढ़ रही है जिसके चलते ऋण का चक्र और जटिल हो रहा है।
ग्लोबल डेवलपमेंट इन्क्यूबेटर (जीडीआई) की एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक ग्रामीण क्षेत्र के 50 प्रतिशत से अधिक लोगों की आमदनी का प्राथमिक स्रोत खेती है लेकिन इनमें से अधिकांश लोग बेहतर मौके पाने के लिए खेती छोड़ने के लिए तैयार हैं। ग्लोबल ऑपर्च्युनिटी यूथ नेटवर्क डेवलपमेंट इंटेलिजेंस यूनिट और ट्रांसफॉर्म रूरल इंडिया फाउंडेशन की साझेदारी से तैयार की गई, ‘स्टेट ऑफ रूरल यूथ इंम्प्लॉयमेंट-2024’ की रिपोर्ट में कहा गया है कि देश के ग्रामीण हिस्से में तकरीबन 5,000 लोगों का सर्वेक्षण किया गया जिनमें से 70-85 फीसदी लोगों का कहना है कि वे किसी विनिर्माण, रिटेल या कारोबारी क्षेत्र में नौकरी करना चाहते हैं। रिपोर्ट लॉन्च करते हुए भारत सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार वी अनंत नागेश्वरन ने कहा, ‘कृषि को वृद्धि का इंजन होना चाहिए और फिर से इसका चलन बढ़ना चाहिए।’ गैर लाभकारी संस्थानों, उद्योग और अकादमिक जगत के लोगों को सहयोग कर इस क्षेत्र को रोजगार के लिहाज से व्यवहारिक विकल्प के तौर पर पेश करना चाहिए।
देश के ग्रामीण क्षेत्र में बढ़ते ऋण के संकट को लेकर कुछ बातों पर ध्यान देने की आवश्यकता है और इसके लिए विचार करने के लिए कुछ प्रमुख मुद्दों पर ध्यान देना जरूरी है।
अगर इन मसलों का हल व्यापक तरीके से नहीं किया जाता है तब ग्रामीण क्षेत्र की ऋण वृद्धि जारी रह सकती है और इसके दूरगामी आर्थिक और सामाजिक परिणाम हो सकते हैं। ऐसे में ग्रामीण क्षेत्र के इस संकट के समाधान पर विचार करने की आवश्यकता है।
Date: 16-11-24
शिक्षा में अड़ंगेसंपादकीय
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने एमफिल या पीएचडी डिग्री कोर्सेज को ओपन या डिस्टेंस या ऑनलाइन मोड से चलाने पर प्रतिबंध लगा दिया है। मेडिकल, इंजीनियरिंग समेत 18 कोर्सेज को भी ओपन डिस्टेंस मोड या ऑनलाइन मोड से चलाने पर रोक लगा दी है। फीजियोथेरेपी, फार्मेसी, नर्सिंग, डेंटल, आर्किटेक्चर, कानून, कृषि, हॉर्टिकल्चर, होटल प्रबंधन, कैटरिंग, पाक विज्ञान, दृश्य कला, योगा जैसे कोर्स अब ऑनलाइन या डिस्टेंस से नहीं चलाए जा सकेंगे। डॉक्टर ऑफ फिलॉसफी या मास्टर ऑफ फिलॉसफी उन्नत शोध डिग्री योग्यता हैं। उच्चतम शिक्षा पाने वाले चुनिंदा छात्र ही इन अति विशिष्ट कोर्स तक पहुंचते हैं। सरकार ने दूरदराज या अन्य क्षेत्रों में व्यस्त छात्रों के लिए घर से बैठ कर ये शिक्षा लेने की व्यवस्था की थी। मगर विश्वविद्यालयों की धांधली या निरंतर मिलने वाली शिकायतों के चलते यूजीसी को सख्त निर्णय लेने पड़ते हैं । प्रति वर्ष तमाम विश्वविद्यालयों को प्रतिबंधित करने या पाबंदियां लगाने संबंधी नोटिस जारी करता रहता है। कहना गलत नहीं है कि कुछ जरूरतमंद और उच्चतम शिक्षा प्राप्त करने को इच्छुक छात्रों को इससे असुविधा भी हो सकती है। आर्थिक तौर पर कमजोर वर्ग के ढेरों विद्यार्थी हैं, जो कोई रोजगार या नौकरी करते हुए अतिरिक्त शिक्षा प्राप्त करने के लिहाज से ओपन या ऑनलाइन कोर्स में दाखिला लेने को मजबूर होते हैं। ऐसे जरूरतमंदों के लिए भी आयोग को रास्ता सुझाना चाहिए। आयोग का काम मान्यता की जांच करने की सलाह पर ही खत्म नहीं हो जाता । उसे सख्तीपूर्वक ऐसे किसी भी विश्वविद्याल पर पूर्ण प्रतिबंध लगाना चाहिए क्योंकि इससे न केवल छात्रों का भविष्य चौपट होता है। बल्कि उनका बहुत सारा पैसा भी बर्बाद हो जाता है। विज्ञापनों द्वारा ऐसे संस्थान जब प्रचार कर रहे होते हैं, उसी वक्त इन पर कार्रवाई की जानी चाहिए। दूसरे, दुनिया जब तकनीक और संचार व्यवस्था द्वारा शिक्षा को सुविधाजनक बना रही हैं, ऐसे में विवि की लापरवाही का खमियाजा छात्रों को भुगतने से बचाना भी आयोग का ही जिम्मा है।
Date: 16-11-24
जनजातीय गौरवसंपादकीय
देश भर में जनजातीय गौरव दिवस का आयोजन सुखद और स्वागतयोग्य है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने महान स्वतंत्रता सेनानी बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती पर झारखंड की सीमा से लगे बिहार के जमुई जिले में एक सभा को संबोधित करने के साथ ही 6,000 करोड़ रुपये से अधिक की आदिवासी कल्याण परियोजनाओं की शुरुआत की है। बिरसा मुंडा को देश के एक बड़े क्षेत्र में भगवान की तरह माना जाता है। और उनकी जयंती को जनजातीय गौरव दिवस के रूप में मनाने का फैसला वाकई सराहनीय है। जिस देश में 700 से अधिक जनजातीय समूहों के दस करोड़ से ज्यादा लोग रहते हों, वहां ऐसे प्रेरक आयोजनों के महत्व को बखूबी समझा जा सकता है। कोई दोराय नहीं है कि जनजातीय समूहों ने अपने संरक्षण और सुरक्षा के लिए सतत संघर्ष किया है। देश की आजादी के समय उनके विकास की रफ्तार अपेक्षाकृत धीमी थी, पर विगत वर्षों में विभिन्न योजनाओं के माध्यम से उनके विकास में आई तेजी को नजरंदाज नहीं किया जा सकता। देश के विकास में इतनी बड़ी आबादी का पूरा योगदान लेने के लिए उसे और पुरजोर ढंग से मुख्यधारा में लाना समय की जरूरत है।
बेशक, यह उम्मीद रखनी चाहिए कि 6,000 करोड़ रुपये से ज्यादा के बजट का सही उपयोग होगा। प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में उचित ही | रेखांकित किया है कि एक समय आदिवासी बहुल जिलों में अधिकारियों को बतौर सजा नियुक्ति दी जाती थी। इस रवैये में अब बदलाव आया है, सक्षम अधिकारियों को ऐसे जिलों में लगाया जा रहा है और इनको आकांक्षी जिले कहा जा रहा है। आदिवासी बहुल जिलों में वाकई तमाम बुनियादी योजनाओं को जमीन पर साकार करने की जरूरत है। प्रधानमंत्री ने आदिवासियों के साथ होने वाली राजनीति को भी रेखांकित किया है, तो आश्चर्य नहीं। वास्तव में, आदिवासी इस देश की मुख्यधारा को ही मजबूत करते रहे हैं। देश के संसाधनों और संस्कृतियों को बचाने में उनका अनुपम योगदान है। पूर्वोत्तर के राज्यों में आदिवासियों की बेहतर स्थिति है, पर महाराष्ट्र, झारखंड, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में बहुत काम की जरूरत है। गौर करने की बात है कि मध्य प्रदेश में देश के 14 प्रतिशत से ज्यादा और महाराष्ट्र में देश के 10 प्रतिशत से ज्यादा आदिवासी रहते हैं। ध्यान रहे, गुजरात जैसे अपेक्षाकृत विकसित राज्य में भी देश के आठ प्रतिशत से ज्यादा और ओडिशा जैसे अपेक्षाकृत पिछड़े राज्य में नौ प्रतिशत से ज्यादा आदिवासी रहते हैं। कुछ आदिवासियों की आर्थिक-सामाजिक स्थिति सुदृढ़ हो गई है, पर ज्यादातर आदिवासियों तक बुनियादी सुविधाओं को पूरी तरह से पहुंचाने का कार्य शेष है।
भूलना नहीं चाहिए, जनजातीय विकास सरकार ही नहीं, पूरे समाज की जिम्मेदारी है, पर स्वयं इस समाज को पहले की तुलना में ज्यादा सजग रहना होगा। जनजातीय समाज से आने वाले जन प्रतिनिधियों की सर्वाधिक जिम्मेदारी है। पूर्वोत्तर में जनजातीय समाजों के बीच आक्रामकता चिंता जगाती है। संविधान सभा में भी यह चर्चा हुई थी और माना गया था कि जैसे-जैसे शिक्षा का प्रसार होगा, समाजों में | समझदारी और सद्भाव की शक्ति बढ़ेगी। निस्संदेह, अनावश्यक राजनीति से भी बचना होगा। यह बहुत प्रेरक बात है कि देश के सर्वोच्च पद पर आज एक जनजातीय महिला द्रौपदी मुर्मु विराजमान हैं, यहां से | जनजातीय समाज को पीछे मुड़कर नहीं देखना चाहिए।
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परिचय –
इस साल भारत की एक्ट ईस्ट नीति यानि पूर्वी डोर को साधने की पहल के दस वर्ष पूरे होने के कारण आसियान शिखर सम्मेलन बहुत अहम है। वर्ष 2014 में मोदी सरकार ने 1992 की लुक ईस्ट नीति को एक्ट ईस्ट नीति में बदला था।
एक्ट ईस्ट से संबंधित कुछ तथ्य –
इस नीति के कारण एशिया-प्रशांत हिंद प्रशांत में तब्दील हुआ है, अब इस अवधारणा को सफल बनाने के लिए भारत को अपनी हिंद-प्रशांत सागर पहल और अन्य देशों के बीच हिंद प्रशांत दृष्टिकोणों के बीच तालमेल बैठाना होगा।
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16 November 2024
प्रश्न -486 – देश में पिछले दिनों से साइबर अरेस्ट की घटनाओं की बाढ़ सी आ गई हैं। यह साइबर अरेस्ट क्या है? इस पर किस तरह से नियंत्रण प्राप्त किया जा सकता है। (250 शब्द)
Question -486- There has been a flood of incidents of cyber arrests in the country in the recent past. What is this cyber arrest? How can it be controlled? (250 words)
नोट : इसका उत्तर आपको हमें नहीं भेजना है, यह आपके स्वयं के अभ्यास के लिए है।
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Date: 15-11-24
Our Cities Need Real Mayors With Real JobLeverage knowledge of local issuesET Editorials
In ‘If Mayors Ruled the World: Dysfunctional Nations, Rising Cities’, political theorist Benjamin R Barber argues that nation-states, bogged down by ideological disputes and sovereign rivalries, are failing to address global challenges such as climate change, terrorism and poverty. In contrast, cities and their mayors are performing better, leveraging their knowledge of local issues, public participation, and a democratic inclination for creativity, innovation and collaboration. Former NYC mayor Michael Bloomberg, for instance, made significant strides in public health, while Buenos Aires mayor H R Larreta has created green jobs.
In India, however, de facto mayors are a rarity, despite the 74th Constitutional Amendment Act (CAA) of 1992, which aimed to enhance the capacity and effectiveness of urban local bodies (ULBs). CAA sought to transfer specific responsibilities from state governments to ULBs, encouraging public participation and improving local administrative capacities. Yet, while states pay lip service to devolution, mayors in India are largely powerless. There is no uniformity in tenure or elections, and their roles have been reduced to ceremonial positions with minimal control over funds and responsibilities. ULBs, including prominent ones like MCD, operate below par. Delayed elections, such as the MCD polls that finally took place on Thursday after a delay of seven months, underscore fragility of these structures.
With states reluctant to transfer real power and resources to ULBs, local governments lack planning capabilities, transparency and accountability, and are under-resourced. In practice, cities are often managed by district magistrates and municipal commissioners — officials whose focus may not align with long-term needs of urban planning. India’s mayors need to be empowered. Then they can tackle pressing local — real — issues, ranging from public health to climate resilience. To be truly viksit, transform the mayor’s job from ceremonial to substantive. The buck starts here.
Date: 15-11-24
Money Makes the World Go RoundET Editorials
Tackling climate change is expensive business, especially for developing countries that are not only bearing the brunt of impacts, but must also ensure a green and just transition of their economies, all while maintaining growth. The agenda at the ongoing COP29 in Baku is significant for the ‘global south’: reaching an outcome on a newly negotiated climate finance target, the New Collective Quantified Goal (NCQG). NCQG will define future annual finance flows from developed to developing countries. It’s set to replace commitments made by developed countries in 2009 to provide $100 bn a year by 2020 to support climate action in developing countries, a target that has only been met once in 2022.
Climate finance has always been a sticky issue. Monday’s backroom agenda fight over whether the dialogue on implementing last year’s global stocktake outcomes should prioritise finance demonstrates how contentious this topic is. The global situation — Trump in the White House, collapse of the German government, the war in Ukraine — adds layers of difficulty.
Without a finance agreement, developing countries will find it difficult to raise their climate ambition. Their estimated needs requirement is $6.8 tn by 2030. Baku must deliver and signal to the broader financial system. But differences persist on key elements like who pays, whether support should be in grants or loans, and if sources should be public or private. Meeting this challenge will require out-of-the-box approaches, flexibility and compromise, as well as a willingness to move beyond long-held national and group positions. Failure to do so will create a two-speed global energy transition that leaves developing countries behind yet again. And that is not an option.
Date: 15-11-24
विस्तारित आयुष्मान को आसान बनाने की जरूरतसंपादकीय
गुजरात में सात आयुष्मान कार्डधारकों के नाम पर बीमा का भारी क्लेम वसूलने के लिए एक निजी अस्पताल ने बगैर जरूरत के उनकी एंजियोप्लास्टी कर दी। इससे दो मरीजों की जान चली गई। उधर, सरकार ने विस्तारित आयुष्मान योजना के तहत 70 साल से ऊपर के सभी पांच करोड़ वृद्धों को इस मुफ्त स्वास्थ्य योजना से जोड़ने की प्रक्रिया शुरू कर दी है। पांच लाख लोगों ने अपना पंजीकरण भी करा लिया है। देखना होगा कि भ्रष्ट सिस्टम और नैतिक पतन के बीच यह योजना कैसे अमल में लाई जाएगी। इस विस्तारित आयुष्मान योजना के लिए अलग से किसी बजट का प्रावधान नहीं हुआ है, ना ही इन पांच करोड़ नए लोगों के लिए कोई अतिरिक्त व्यवस्था हुई है। स्वास्थ्य सेवा के पहले से ही लचर ढांचे का विस्तार न करने की स्थिति में योजना के पंजीयन के बाद भी बुजुगों के लिए चुनौतियां बरकरार रहेंगी। केंद्र सरकार की योजना सोच के स्तर पर अद्वितीय है लेकिन राज्यों की ढिलाई, सरकारी अस्पतालों में साधनहीनता और इससे उपजी उदासीनता, निजी अस्पतालों का भ्रष्टाचार और कई वृद्धों का अशिक्षित और शारीरिक रूप से अक्षम होना इस योजना पर नजर लगा सकता है। बेहतर होता कि केंद्र पंजीयन प्रक्रिया खत्म करके आधार कार्ड को ही एक मात्र दस्तावेज मानते हुए इलाज की छूट देता।
Date: 15-11-24
कब थमेगी साइबर ठगीसंपादकीय
डिजिटल अरेस्ट का भय दिखाकर लोगों के साथ ठगी करने के मामले जिस तरह थमने का नाम नहीं ले रहे हैं, उससे यही स्पष्ट होता है कि पिछले दिनों प्रधानमंत्री की ओर से लोगों को साइबर ठगों के इस हथकंडे के प्रति चेताने और संबंधित एजेंसियों की ओर से सक्रियता दिखाए जाने की सूचनाएं आने के बाद भी नतीजा ढाक के तीन पात वाला है। यह चिंताजनक है कि न केवल डिजिटल अरेस्ट की धमकी देकर ठगने के मामले बढ़ रहे हैं, बल्कि ठगी की राशि भी बढ़ती जा रही है। अब तो लोगों से करोड़ों रुपये की ठगी की जा रही है। ठगी का शिकार होने वालों मे पढ़े-लिखे और जानकार समझे जाने वाले लोग भी बढ़ रहे हैं। कई मामलों में यह भी देखने में आया है कि साइबर ठगी के शिकार लोग शर्मिंदगी के कारण पुलिस के पास शिकायत दर्ज कराने से हिचकते हैं। सरकारी एजेंसियां चाहे जो दावे करें, बहुत कम मामलों में ठगी गई राशि बरामद होती है और ठगों को गिरफ्तार किया जाता है। यह तब है, जब ठगी गई राशि देश के ही खातों में ट्रांसफर कराई जाती है। इससे संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता कि सरकार की ओर से यह स्पष्ट किया जा चुका है कि सीबीआइ, ईडी, आयकर विभाग आदि उसकी किसी भी एजेंसी की ओर से डिजिटल अरेस्ट जैसी कार्रवाई नहीं की जाती।
इसमें संदेह है कि आम लोग साइबर ठगों की चालबाजी से भली तरह जागरूक हो चुके हैं। जागरूकता के अभाव का एक कारण यह भी है कि सरकार ने साइबर ठगों और उनकी ठगी के नित-नए तरीकों के प्रति लोगों को सही तरह सतर्क नहीं किया है। यदि यह समझा जा रहा है कि समाचार पत्रों में एक-दो विज्ञापन जारी करने अथवा प्रधानमंत्री की ओर से मन की बात कार्यक्रम में इस समस्या को रेखांकित करने से लोग डिजिटल अरेस्ट के बहाने की जा रही ठगी के काले कारोबार से अवगत हो गए हैं तो यह सही नहीं। सरकार को न केवल साइबर ठगों की कमर तोड़ने के लिए और अधिक सख्ती का परिचय देना होगा, बल्कि लोगों को जागरूक करने का कोई व्यापक अभियान भी चलाना होगा। अच्छा हो कि इस पर विचार किया जाए कि कुछ दिनों के लिए मोबाइल कालर ट्यून के जरिये लोगों को चेताया जाए कि इस-इस तरह की फोन काल आए तो सावधान हो जाएं। साइबर ठगी के बढ़ते मामले केवल देश को डिजिटल करने के अभियान को ही चोट नहीं पहुंचा रहे हैं, बल्कि भारत की छवि भी खराब कर रहे हैं। साइबर ठग पहले लोगों को लालच देकर ठगते थे। अब वे लोगों को धमकाकर अथवा उनका मोबाइल फोन हैक करके यही काम कर रहे हैं। साफ है कि उनका दुस्साहस बढ़ रहा है। उनका बढ़ता दुस्साहस सुरक्षा एजेंसियों की नाकामी का ही परिचायक है। यह नाकामी निराश करने वाली है।
Date: 15-11-24
मजबूत हों स्थानीय निकायसंपादकीय
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने स्थानीय निकायों की राजकोषीय स्थिति पर अध्ययन की शुरुआत करके तथा उसके निष्कर्षों को प्रकाशित करके अच्छी शुरुआत की है। नगर निकायों की वित्तीय स्थिति पर पहली ऐसी रिपोर्ट नवंबर 2022 में प्रकाशित की गई थी। उसके बाद पंचायती राज संस्थाओं की वित्तीय स्थिति पर एक अध्ययन पेश किया गया। रिजर्व बैंक ने अब 2019-20 से 2023-24 के बजट अनुमानों के आधार पर नगर निकायों की वित्तीय स्थिति पर आधारित एक रिपोर्ट प्रकाशित की है। अध्ययन में देश भर के 232 नगर निकायों को शामिल किया गया है। भारत में अक्सर स्थानीय निकायों पर सीमित नीतिगत ध्यान दिया जाता है। आंशिक तौर पर ऐसा इसलिए हुआ कि तुलनात्मक स्वरूप में आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं। यह भी उम्मीद की जानी चाहिए कि रिजर्व बैंक का यह अध्ययन जरूरी नीतिगत ध्यान आकृष्ट करेगा और सार्वजनिक बहस को समृद्ध करेगा।
स्थानीय निकायों को मजबूत बनाना अत्यधिक आवश्यक है। नगर निकायों के संदर्भ में यह बात ध्यान देने लायक है कि भारत का तेजी से शहरीकरण हो रहा है और उसे नागरिक क्षमताएं विकसित करने की आवश्यकता है। फिलहाल जो हालात हैं उनके मुताबिक भारत का करीब 60 फीसदी सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) शहरी इलाकों में उत्पन्न हो रहा है और 2050 तक उसकी करीब 50 फीसदी आबादी शहरी इलाकों में रहने लगेगी। बहरहाल अधिकांश नगर निकाय इस बदलाव से निपटने के लिए तैयार नहीं हैं, मोटे तौर पर ऐसा इसलिए कि उनके पास संसाधन नहीं हैं। जैसा कि रिजर्व बैंक की रिपोर्ट दिखाती है, नगर निकायों की राजस्व प्राप्तियां जीडीपी का केवल 0.6 फीसदी हैं। यह मामूली आंकड़ा भी चुनिंदा नगर निकायों के पक्ष में झुका हुआ है। केवल 10 नगर निकाय कुल राजस्व प्राप्तियों में 60 फीसदी के हिस्सेदार हैं। नगर निकायों का कुल व्यय जिसमें राजस्व और पूंजीगत व्यय शामिल है, वह 2023-24 के बजट अनुमान में जीडीपी के 1.3 फीसदी के बराबर था। नगर निकायों के राजस्व में संपत्ति कर, कुछ शुल्क और उपयोग शुल्क आदि शामिल होते हैं। संपत्ति कर उसके कुल राजस्व में करीब 60 फीसदी होता है।
नगर निकाय केंद्र और राज्य सरकारों के अनुदान पर बहुत अधिक निर्भर होते हैं। राज्य सरकारों, राज्यों के वित्त आयोग के अनुदान तथा अन्य जगहों से आने वाली राशि की बात करें तो 2019-20 और 2022-23 में वह इनकी राजस्व प्राप्तियों में 30 फीसदी की हिस्सेदार रही। केंद्र सरकार का हस्तांतरण उनके राजस्व में 2.5 फीसदी का हिस्सेदार रहा। नगर निकाय बाजार से भी उधारी लेते हैं, हालांकि यह उनके जीडीपी का केवल 0.05 फीसदी है। नगर निकायों की वित्तीय स्थिति दुरुस्त करने की जरूरत है। इसके साथ ही उन्हें बेहतर प्रदर्शन करने लायक बनाना होगा। अधिकांश विकसित और विकासशील देशों में सामान्य सरकारी राजस्व और व्यय में स्थानीय निकायों की हिस्सेदारी बहुत अधिक है। राजकोषीय शक्तियों में इजाफा तथा सामाजिक जवाबदेही, आर्थिक और सामाजिक परिणामों को बेहतर बनाने में मदद करेंगे। लोकतांत्रिक व्यवस्था में मतदाताओं के लिए यह हमेशा आसान होता है कि वे अपने स्थानीय राजनीतिक नेतृत्व को जिम्मेदार ठहराएं।
नगर निकायों की वित्तीय स्थिति में सुधार के लिए विभिन्न स्तरों पर हस्तक्षेप की जरूरत होगी। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि निकायों को खुद अपना राजस्व बढ़ाने पर काम करना होगा। उदाहरण के लिए संपत्ति कर में सुधार की जरूरत है क्योंकि संपत्तियों का मूल्यांकन बढ़ रहा है। कराधान का दायरा और गुंजाइश बढ़ाने के लिए तकनीक का भी इस्तेमाल करना होगा। इन निकायों को उपयोगकर्ता शुल्क को भी समुचित बनाना होगा। कुल मिलाकर सरकार के उच्च स्तरों पर निर्भरता कम करने की जरूरत है जिससे राजस्व के बारे में एक अनुमान लग सकेगा। एक संभावना यह है कि जरूरी कानूनी बदलावों के बाद स्थानीय निकायों को वस्तु एवं सेवा कर में हिस्सा दिया जाए। इससे न केवल इन निकायों को विकास परियोजनाओं को बेहतर बनाने में मदद मिलेगी बल्कि वे अधिक अनुकूल शर्तों पर ऋण भी जुटा सकेंगे। कुछ नगर निकायों ने बॉन्ड बाजार का रुख भी किया है। अब वक्त आ गया है कि भारत स्थानीय निकायों की स्थिति और भूमिका पर नए सिरे से विचार करे।
Date: 15-11-24
बुलडोजर पर लक्ष्मण रेखासंपादकीय
सुप्रीम कोर्ट ने बुलडोजर से की जा रही कार्रवाई पर दूरदर्शी फैसला सुनाते हुए इसे असंवैधानिक बताया है, जिसका स्वागत किया जाना चाहिए। कुछ महीनों से उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान, गुजरात, झारखंड और दिल्ली में बुलडोजर न्याय के तहत आपराधिक मामलों में आरोपियों के मकानों और अन्य संपत्तियों को ध्वस्त किया जा रहा है। शीर्ष अदालत ने इस कार्रवाई पर लक्ष्मण रेखा खींच दी है। जस्टिस बीआर गवई और केवी विश्वनाथन की बेंच ने अपने फैसले में कहा है कि किसी आरोपी का घर सिर्फ इसलिए नहीं गिराया जा सकता कि उस पर किसी अपराध का आरोप है। विद्वान जजों ने फ्रांस में प्रबुद्धता युग के राजनीतिक विचारक और न्यायविद् चार्ल्स डी मॉन्टेस्क्यू के शक्तियों के पृथक्करण सिद्धांत के तहत कहा कि आरोपों पर फैसला करना न्यायपालिका का काम है, कार्यपालिका का नहीं। जाहिर है कि भारतीय संविधान में सरकार के तीनों अंगों के कार्यों के विभाजन का प्रावधान है। न्यायाधीश और न्यायपालिका का काम पुलिस और प्रशासन के अधिकारी कैसे कर सकते हैं। उदार लोकतांत्रिक राजनीतिक व्यवस्था नागरिकों के राजनीतिक अधिकारों के साथ-साथ व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करने के उद्देश्य से राज्य की शक्तियों को सीमित करती है। यह फैसला राज्य के कार्यों को सीमित करने और कानून का शासन स्थापित करने वाला है। अदालत कहा है कि विधि का शासन लोकतांत्रिक शासन का मूल आधार है जो सुनिश्चि करता है कि कोई व्यक्ति जघण्य अपराध का दोषी पाया भी जाता है, तो भी राज्य कानून की उचित प्रक्रिया का पालन किए बिना उसके घर पर बुलडोजर नहीं चला सकता। अदालत ने बुलडोजर कार्रवाई के संबंध में सख्त गाइडलाइं जारी की हैं। कोई अधिकारी अदालत के निर्देशों का पालन नहीं करता है और किसी के घर पर बुलडोजर चलाता है तो उस पर अवमानना और अभियोजन की कार्रवाई की जाएगी और ध्वस्त संपत्ति की लागत उसकी जेब से वसूली जाएगी। अतिक्रमण के आरोपी को नोटिस भेजने, जवाब देने का मौका आदि प्रावधान बनाए गए हैं। लेकिन अदालत ने सार्वजनिक स्थलों पर अवैध निर्माण को इन निर्देशों के दायरे से मुक्त रखा है। उम्मीद की जानी चाहिए कि विधि शासन को मजबूत करने की दिशा में यह फैसला मील का पत्थर साबित होगा।
Date: 15-11-24
जागरूकता भी जरूरीसंपादकीय
केंद्र सरकार ने कोचिंग इंस्टीट्यूट्स के विज्ञापनों को लेकर गाइडलाइंस जारी की हैं। अब कोचिंग सेंटर 100% चयन या नौकरी का वादा नहीं कर सकेंगे। भ्रामक और गुमराह करने वाले विज्ञापनों पर जुर्माना लगाया जा सकता है। कोचिंग सेंटर अब अवधि, फैकल्टी, रैंकिंग, रिफंड पॉलिसी को लेकर झूठे वादे नहीं कर सकते । शुल्क संरचना, परीक्षा में चयन की दर, चयन की गारंटी जैसे भ्रामक वादे भी नहीं कर सकते। केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण द्वारा तैयार दिशा-निर्देश ढेरों शिकायतें मिलने के बाद जारी किए गए हैं। ‘कोचिंग सेंटरों में भ्रामक विज्ञापन की रोकथाम’ वाले शीर्षक द्वारा कोचिंग को अकादमिक सहायता, शिक्षा, मार्गदर्शन, अध्ययन कार्यक्रम और ट्यूशन को शामिल करने के लिए परिभाषित किया गया है। वे किसी भी टॉपर का नाम उसकी लिखित अनुमति के बगैर अपने प्रमोशन के लिए नहीं प्रयोग कर सकेंगे। सेंटर को अपने मान्यताप्राप्त होने या न होने का विवरण भी स्पष्ट तौर पर देना होगा। देश में कोचिंग सेंटर संपूर्ण व्यवसाय के तौर पर काम कर रहे हैं जो बेहतरीन भविष्य के सपने देखने वाले छात्रों को लुभाने के लिए विज्ञापनों का भरसक प्रयोग करते हैं। छोटे से लेकर बड़े शहरों तक इनका जंजाल फैला हुआ है। ये भ्रामक प्रचार द्वारा प्रलोभन देते हैं, और मोटी रकम वसूलने का काम करते हैं। राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन पर इनकी शिकायतें बढ़ती जा रही हैं। प्राधिकरण ने 54 कोचिंग सेंटर को पिछले दिनों नोटिस जारी किया जिन पर साढ़े चौव्वन लाख रुपये का जुर्माना भी लगाया है। असल में तो यह सरकारी लापरवाही का नतीजा है। कोई भी उपभोक्ता सेवा सरकार के संज्ञान में आए गैर कैसे प्रचलित हो सकती है। उस पर भी कोचिंग सेंटरों जैसी सेवाएं, जिनके विशाल होर्डिंग्स सड़कों पर नजर आते हैं तथा बड़े-बड़े विज्ञापनों से समाचार-पत्र भरे पड़े होते हैं। कहा जा सकता है, देरी से ही सही आखिर व्यवस्था चेती तो है। मगर यह सवाल भी बड़ा है कि इन दिशा-निर्देशों की अवहेलना करने वालों पर सख्ती कैसे और कितनी देर की जाएगी? छात्रों को भी इन नियमों का ख्याल रखते हुए प्रवेश लेना सीखना होगा। ख्याल रखें, आसान मार्ग के लोभ में झूठे वायदों और भ्रामक विज्ञापनों के भरोसे रहना जोखिम भरा साबित हो सकता है।
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परिचय –
देश का 75% व्यापार विनिर्मित वस्तुओं पर निर्भर है। गुणवत्ता युक्त विनिर्माण से निर्यात बढ़ता है। ‘मेक इन इंडिया’ पहल के कारण 99% मोबाइल, जो भारत में उपयोग हो रहे हैं, भारत में निर्मित हैं। हम विनिर्मित स्टील के विशुद्ध निर्यातक तथा नवीकरणीय ऊर्जा के चौथे उत्पादक हैं।
लेकिन 2014-2024 तक G.D.P. में विनिर्माण की हिस्सेदारी 15 से घटकर 13% हो गई। विनिर्माण निर्यात की हिस्सेदारी भी 78.1 से घटकर 64.6% हो गई है।
विनिर्माण की घटती भूमिका और निर्यात में कम योगदान के कारण –
कच्चे माल की अधिक लागत –
जटिल श्रम कानून –
इसके विपरीत चीन, वियतनाम और बांग्लादेश के श्रम कानूनों में लचीलापन है।
लॉजिस्टिक का ऊँचा खर्च –
हम इसीलिए असेंबलिंग (मोबाइल आदि) पर अधिक ध्यान देते हैं। 90% पुर्जे आयात करते हैं। ऊँची लागत और कारोबारी सुगमता की कमी भी परिधान, समुद्री उत्पादों तथा रत्नाभूषण जैसे अधिक श्रम वाले निर्यात को हानि पहुँचाती है।
आगे की राह –
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Date: 14-11-24
Bulldazed no more?SC read the riot act on ‘bulldozer justice’. But will officials fear courts or netas? We don’t knowTOI Editorial
In defining a penalty for officials responsible for ‘bulldozer justice’, Supreme Court yesterday did good in its attempt to demolish the brazen lawlessness by state govts, including UP, MP, Rajasthan, Assam, Gujarat, Jharkhand, and Delhi. SC made three main points. One, essentiality of rule of law “as a safeguard against arbitrary use of state power”. All important is the “distinction between exercise of power in good faith and misuse in bad faith”. Two, on separation of powers, it said govts step on judiciary’s toes when they randomly pronounce any individual ‘guilty’. Thus, state govts better stand down. Three, SC correctly realised guidelines on razing houses won’t suffice: it included “restitution of demolished property at…(officials’) personal cost in addition to payment of damages”, in pursuit of its goal of “no scope for arbitrariness by officials”.
SC reiterated there’s no place for collective punishment, which is what insta-justice of pulling down houses of so-called accused, or even convicts, is. There’s enough due process even to raze illegal constructions. SC has made that more granular and pan-India. Point is, there never had to be a legitimate reason for netas. The ‘wrong’ could be imagined. For, what but distorted politics can ever explain, or attempt to justify, demolishing the house of a schoolboy in a scuffle with another? Clearly, Udaipur administration had viewed the two boys not as children but from some twisted notion of culprit and victim.
Will govts pay serious heed? Administrations are staffed by officials timid, or fearful, or both. Question is who would they fear more? Courts or political bosses? Bully govts may be a sign of weakness, but when politics is to be done – almost 800 houses govt razed in Haryana’s Nuh belonged to Muslims – this counts as strategy. SC guidelines are unlikely to altogether stop ‘bulldozer justice’. Accountability, for one, is a quantity most nebulous in govt machinery. When personal monetary loss is involved, accountability will be passed around like the ball in football. SC’s order is superb. Let’s see what the executive does.
Date: 14-11-24
कोर्ट का फैसला राज्यों की मनमानी पर लगाम हैसंपादकीय
लुडविग लेविसन ने कहा था, ‘प्रजातंत्र अस्तित्व में तो जनता को राजनीतिक स्वतंत्रता दिलाने के लिए आया था, लेकिन कालांतर में इसने उसी जनता को अपने जनमत की ताकत से एक नए किस्म की गुलामी में जकड़ लिया।’ भारत में यह गुलामी राज्य शक्तियों के कानूनेतर विस्तार के रूप में पहले ‘एनकाउंटर’ के नाम पर उभरी और हाल के वर्षों में ‘बुलडोजर न्याय’ में इसका विद्रूप चेहरा दिखा। बुलडोजर न्याय राज्य शक्ति का वह विस्तार था, जिसमें ‘न्याय’ ही नदारद था। नियमतः निर्माण ढाने के पूर्व कम से कम 15 दिन का नोटिस देना और जवाब से असंतुष्ट होने पर आर्डर जारी करना होता है। लेकिन पिछली तारीख में आदेश देकर अचानक दावा किया जाता है कि जवाब नहीं मिला और जितना गैर-कानूनी निर्माण है उसे गिराने की जगह पूरा मकान जमींदोज कर दिया जाता है। देर से ही सही, पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले ने इस पर प्रभावी रोक लगाई है। फैसले में ध्वस्तीकरण की प्रक्रिया को इतना जटिल और विस्तारित कर दिया है कि प्रशासन और निकायों के लगभग सभी अफसर शामिल होंगे। यानी कोई भी एक अफसर अब जिम्मेदारी नहीं लेगा। जाहिर है ऐसे ‘गलत’ आदेश अमल में लाना अब दुरूह होगा। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला राज्य के निरंकुश होने के स्वभाव पर एक प्रभावी लगाम है।
Date: 14-11-24
बुलडोजर कार्रवाईसंपादकीय
सुप्रीम कोर्ट ने बुलडोजर कार्रवाई पर दिशा-निर्देश जारी करके यह सुनिश्चित करने का काम किया कि अतिक्रमण, अवैध निर्माण के साथ-साथ अपराध के खिलाफ मनमानी कार्रवाई न होने पाए। ऐसा किया जाना आवश्यक था, क्योंकि बुलडोजर कार्रवाई अपराध में लिप्त तत्वों के खिलाफ भी होती थी और इस आधार पर होती थी कि उन्होंने अपना मकान, दुकान या अन्य कोई इमारत अवैध रूप से बना रखी है। शासन-प्रशासन को ऐसी कार्रवाई करने में इसलिए आसानी होती थी, क्योंकि प्रायः लोग अपने भवनों का निर्माण स्वीकृत मानचित्र या तय मानकों के हिसाब से नहीं कराते। बुलडोजर कार्रवाई को इसलिए जनता का समर्थन मिलता था, क्योंकि उसकी यह आकांक्षा रहती है कि अपराधी तत्वों को यथाशीघ्र दंड मिले। इसी कारण बुलडोजर कार्रवाई की सराहना होती थी, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि इस तरह की कार्रवाई में संदिग्ध अपराधी-अभियुक्त का घर-दुकान ध्वस्त होने से उसके स्वजन भी सजा पाते थे। इसीलिए सुप्रीम कोर्ट ने यह कहा कि किसी आरोपित की सजा उसके परिवार वालों को नहीं दी जा सकती। सुप्रीम कोर्ट ने बुलडोजर कार्रवाई को लेकर जो दिशानिर्देश जारी किए, उनके आधार पर इस नतीजे पर भी नहीं पहुंचा जाना चाहिए कि अवैध निर्माण और अतिक्रमण करने वालों के खिलाफ बुलडोजर कार्रवाई का रास्ता बंद होने जा रहा है।
सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों से यह स्पष्ट है कि अनधिकृत निर्माण के खिलाफ नोटिस भेजने और मामले की सुनवाई करने के बाद बुलडोजर कार्रवाई संभव है। इसी के चलते सुप्रीम कोर्ट के फैसले की व्याख्या इस रूप में भी की जा रही है कि इससे माफिया तत्वों और पेशेवर अपराधियों पर नियंत्रण करना आसान हो जाएगा। देखना है कि ऐसा होता है या नहीं? जो भी हो, सुप्रीम कोर्ट के फैसले का असर अतिक्रमण हटाने और जमीनों पर कब्जे रोकने पर नहीं पड़ना चाहिए। इसी तरह अपराधी तत्वों का दुस्साहस भी नहीं बढ़ना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट ने यह सही कहा कि बिना फैसले किसी को दोषी न माना जाए और अपराधी को दंड देना अदालत का काम है, लेकिन प्रश्न यह है कि क्या अदालतें यह काम सही तरह से कर पा रही हैं? अच्छा होता कि सुप्रीम कोर्ट पर इस प्रश्न पर भी गौर करता, क्योंकि यह किसी से छिपा नहीं कि अपराधी और माफिया तत्वों को उनके किए की सजा मुश्किल से ही मिलती है। मिलती भी है, तो बहुत विलंब से। बाहुबली, धनबली किस्म के या फिर राजनीतिक असर वाले अपराधी तत्वों के मामलों में यही अधिक देखने को मिलता है कि वे अपने खिलाफ चल रहे मुकदमों को लंबा खींचने में सफल हो जाते हैं। यह भी किसी से छिपा नहीं कि संगीन अपराध में लिप्त तत्वों को भी शीघ्र सजा नहीं मिल पाती। इसी कारण लोग बुलडोजर कार्रवाई को न्याय की संज्ञा देते हैं। अच्छा होता कि सुप्रीम कोर्ट यह देख पाता कि बुलडोजर कार्रवाई न्याय में देरी की उपज है।
Date: 14-11-24
समस्याओं के हल की राह देखते शहरहितेश वैद्य, ( लेखक नेशनल इंस्टीट्यूट आफ अर्बन अफेयर्स के पूर्व निदेशक हैं )बहुत पहले एक कहानी सुनी थी, जिसमें एक माँ भी अपने बच्चे को केवल यह भरोसा दिलाने के लिए पत्थरों का सूप बनाने का अभिनय करती हैं कि जल्द ही उनकी भूख मिट जाएगी। इसके लिए वह चूल्हे पर रखे पानी के बर्तन में पड़े पत्थरों को चम्मच से हिलाती रहती है आज अपने देश में शहरी विकास की चुनौतियों से निपटने के तौर-तरीकों को देखने पर लगता है कि हमारे नीति नियंताओं द्वारा शहरों के विकास के नाम पर पत्थरों का सूप बनाने की कोशिश जारी है। हम एक ऐसी जगह फंस गए हैं, जहां योजनाओं का निर्माण और सुधार की प्रक्रिया सूप बनाने के इसी अभिनय में सिमट गई है। हमें पता ही नहीं है कि हमारी शहरी विकास की भूख कब मिटेगी ? शहरी ढांचे में सुधार के लिए अनगिनत रिपोर्ट, समितियां और नीतियों के निर्माण के बावजूद हालात जस के तस ही हैं इसे देखते हुए शहरी विकास के लिए नवीन दृष्टिकोण अपनाने का समय आ गया है, पुराने तौर-तरीकों से अब काम नहीं चलेगा। वैसे हमारे पास शहरी विकास के लिए योजनाओं और नीतियों की कमी नहीं है। सचिवों की समिति राष्ट्रीय शहरी नीति इंडिया हैबिटेट-3 रिपोर्ट, अर्बन प्लानिंग कैपेसिटी रिफार्म रिपोर्ट और हाल में अमृतकाल की राह के रूप में अन्य कई रिपोर्ट इसके गवाह हैं। अब जरूरत है कि हम इन योजनाओं पर अमल करें और अपने शहरों को वास्तव में बदलें।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने शहरी विकास को जरूरत पर जोर देते हुए जलवायु परिवर्तन और सर्कुलर इकोनमी की बात कही है। इसी तरह वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण भी अपने बजट भाषण में शहरों को आर्थिक विकास के इंजन के रूप में रूपांतरित करने की जरूरत जता चुकी हैं। शहरों का विकास एक जटिल प्रक्रिया है। इसमें सिर्फ इमारतें और सड़कें ही नहीं बनतीं, बल्कि लोगों के जीवन भी बदलते हैं। भारत में तेजी से बढ़ती शहरी आबादी के साथ हमें यातायात जाम, प्रदूषण और गरीबी जैसी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। इसलिए शहरी विकास के लिए हमें सभी पहलुओं- आर्थिक विकास, सामाजिक समावेश, पर्यावरण संरक्षण और लोगों की भागीदारी को समग्र रूप से देखना चाहिए ताकि शहरों का विकास समावेशी, टिकाऊ और सभी के लिए फायदेमंद हो समस्या यह है कि जमीन पर वास्तविक काम करने के बजाय अभी भी रस्म अदायगी की जा रही है। यह गत दिनों यूएन हैबिटेट ग्लोबल स्टेट आफ नेशनल अर्बन पालिसी (एनयूपी) की रिपोर्ट में हमारी अनुपस्थिति से साफ नजर आया। 78 देशों ने अपना शहरी दृष्टिकोण दुनिया के सामने रखा, लेकिन दुनिया को दूसरी सबसे अधिक शहरी आबादी वाला देश भारत का पन्ना खाली रहा। हम इस मामले में और अधिक देरी सहन करने की स्थिति में नहीं हैं। शहरों के सिस्टम एवं नेटवर्क में सुधार, समावेशी विकास पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों का मुकाबला, कार्य क्षमता एवं निगरानी तथा आकलन, इन्फास्ट्रक्चर का वित्त पोषण, आर्थिक विकास, कौशल और नवाचार एनयूपी की एक साझा श्रीम रही। हम भी इन मोर्चों पर बदलाव के दौर से गुजर रहे हैं और हमारी तमाम रपटों में ये विषय प्रमुखता से उठे हैं। सवाल हैं कि आखिर हम इन मामलों में विश्लेषण के दौर से आगे बढ़ने और सही मायने में काम शुरू करने में हिचकिचाहट क्यों दिखा रहे हैं? क्यों हम केवल प्रतीकात्मक सुधारों से ही संतुष्ट हैं और ठोस प्रगति करने के बजाय केवल छानबीन करने के उपायों में ही लगे हैं? इस रवैये से तो यही लगता है कि हम बड़े सुधार शुरू करने के लिए जरूरी राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव से जूझ रहे हैं अथवा हमें एजेंसियों के बीच समन्वय कायम करने के तौर-तरीके ही नहीं सूझ रहे हैं।
आज जरूरत अपनी प्राथमिकताएं फिर से तय करने की है। समय आ गया है जब हम प्रतीकात्मक कामकाज करने के बजाय स्पष्ट नजर आने वाली प्रगति की दिशा में काम करें। इससे भी अधिक जरूरी यह है कि हम सबसे पहले शहरी सुधार के लिए आवश्यक पहलों और उनके पीछे के संपूर्ण परिदृश्य को भलीभांति समझ लें। निःसंदेह इनमें से तमाम अच्छी भावना के साथ शुरू की गई हैं, लेकिन यह सवाल पूछा जाना जरूरी है कि इनके पीछे जो दृष्टिकोण हैं, उसका लक्षित वर्ग क्या है, उनसे क्या लाभ होने हैं? यह इसलिए आवश्यक है, क्योंकि हर कोई यह महसूस कर रहा है कि केवल कागजी और कोरी बातों से काम चलने वाला नहीं है कारण चाहे जो भी रहा हो, लेकिन कुछ ठोस न करने की हमें भारी कीमत चुकानी पड़ रही है। इस निष्क्रियता के दुष्परिणामों को आज हमारे शहर भोग रहे हैं। हमारे शहरों की क्षमता और उनकी संभावना ही समाप्त होती नजर आ रही है। लोगों का भरोसा टूट रहा है कि हम जरूरी शहरी सुधार करने की वास्तविक इच्छाशक्ति रखते हैं। शहरों के ढांचे में सुधार की इच्छाशक्ति का अभाव दूर होना आवश्यक है।
हमें शहरी विकास के लिए एक ऐसे एकीकृत राष्ट्रीय विजन की जरूरत है, जो स्थानीय सरकारों को शक्तियां दे और लोगों की सहभागिता को प्रोत्साहन प्रदान करने का काम करे और हमारा ध्यान उनके क्रियान्वयन पर होना चाहिए, न कि समितियां गठित करने के अंतहीन सिलसिले पर भारत का शहरी भविष्य इस बात पर निर्भर करेगा कि हम शहरीकरण प्रक्रिया को कितना प्रभावशाली और नतीजे देने वाली बना पाते हैं। हमारे पास ज्ञान, संसाधनों और क्षमता की कमी नहीं है। इस सबके साथ यदि कुछ और सबसे अधिक जरूरी है तो वह है जेहन में काम करने की ललक पैदा करना हमें ऐसे शहर बनाने होंगे, जो अपने नागरिकों का पूरी तरह खयाल रखने में सक्षम हों।
Date: 14-11-24
बुलडोजर न्याय पर निर्णायक फैसलाकमलेश जैन, ( अधिवक्ता, सुप्रीम कोर्ट )
सुप्रीम कोर्ट द्वारा बुधवार को बुलडोजर कार्रवाई की सीमा तय करना एक दूरदर्शी फैसला माना जाएगा। अदालत ने साफ कर दिया है कि किसी संपत्ति को ने सिर्फ इसलिए नहीं तोड़ा जा सकता, क्योंकि उस संपत्ति
का मुखिया कथित आरोपी है। साथ ही, अदालत ने बिंदुवार दिशा-निर्देश जारी करके ऐसे मामलों की सांविधानिक स्थिति भी साफ कर दी है। दरअसल, पिछले कुछ महीनों से कई राज्य सरकारों पर ये आरोप लग रहे थे ऐसी कार्रवाइयों में पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाया जा रहा है, जिससे न्याय की मूल अवधारणा खंडित हो रही है। हालांकि, खबर यह भी है कि इन कार्रवाइयों का नुकसान अल्पसंख्यकों की तुलना में बहुसंख्यक समुदाय को ज्यादा हुआ है।
बहरहाल, माना यही जाता है कि देश में कुल भूमि का करीब 20 प्रतिशत हिस्सा अतिक्रमणकारियों के कब्जे में है। दिल्ली में ही एमसीडी और डीडीए की जमीनों पर, जो फुटपाथ या अन्य उपयोग के लिए तय हैं, पक्के निर्माण करके होटल, गैराज, टैक्सी स्टैंड तक बना लिए गए हैं। इससे आम नागरिकों को होने वाली परेशानियों का बस अंदाजा ही लगाया जा सकता है। ऐसे अतिक्रमण दुर्घटना तक को न्योता देते हैं। इसी तरह, देश में कहीं भी थोड़ी सी खाली सरकारी जगह पर कोई न कोई निर्माण कर लिया गया है। नहीं कुछ तो, धार्मिक ढांचा ही खड़ा कर दिया जाता है, जिसको हटाने में तंत्र के हाथ-पांव फूलने लगते हैं। वक्फ अधिनियम के तहत तो किसी की जमीन वक्फ की संपत्ति घोषित की जा सकती है, जिस पर कोई अन्य दावा भी नहीं कर सकता।
इस पृष्ठभूमि में यदि सुप्रीम कोर्ट के नए दिशा- निर्देशों को पढ़ा जाए, तो नई राह बनती दिख रही है। होता यह है कि कानून की दृष्टि से या आम लोगों की नजर से भी अवैध अतिक्रमण चुभते हैं और उस पर कार्रवाई की मांग की जाती है, लेकिन मुमकिन है कि कार्रवाई करने वाली सरकारी एजेंसियों से भी चूक हो या दस्तावेज का सावधानी से अध्ययन न करना बुलडोजर को लिवा लाए, इसलिए ऐसी कार्रवाइयों में प्रक्रिया के पालन की बात अदालत ने कही है। अदालत का स्पष्ट मानना है कि तंत्र और आम आदमी, यहां तक कि जिसकी संपत्ति ध्वस्त की जानी है, सभी को न्याय मिलना चाहिए। यही कारण है कि अपने दिशा- निर्देश में अदालत ने ऐसी कार्रवाई के लिए समय- सीमा तय करने, नोटिस भेजने, जवाब देने का मौका देने और समझौता योग्य होने पर जुर्माना अदा करके समझौता करने जैसे प्रावधान बताए हैं।
ऐसे मामलों का मानवीय पक्ष कहीं अधिक मजबूत है। यदि किसी आरोपी का घर ध्वस्त कर दिया जाता है, तो बिना किसी गलती के उसके परिजन भी सजा पा जाते हैं, जो हृदयविदारक दृश्य पैदा कर सकता है। हालांकि, दबंगई में किए गए अतिक्रमण पर कार्रवाई उचित जान पड़ती है। जिन मामलों में शक सुबहा हो, वहां पूरे दस्तावेज का बारीकी से अध्ययन होना ही चाहिए, लेकिन जिन मामलों में पहली नजर में ही
तस्वीर साफ हो जाए, उनमें जल्द से जल्द कार्रवाई सुनिश्चित करना आवश्यक है। अगर ऐसा नहीं किया गया, तो एक दिन अव्यवस्था चरम पर पहुंच सकती है। वाकई, अगर किसी ने सही तरीके से जमीन खरीदा है और उसके पास हर दस्तावेज मौजूद हैं, तो उसे ध्वस्त करना तंत्र के लिए गले की फांस बन सकता जनता में भी आक्रोश पैदा होता है, क्योंकि आदमी सब कुछ सह लेता है, पर यह नहीं सह सकता कि जिस मकान को उसने अपने खून-पसीने से सींचा है, जिसकी एक-एक ईंट जोड़ने के लिए मेहनत की है, उसे सिर्फ शक के बिना पर कोई ध्वस्त कर दे।
वास्तव में, अतिक्रमण के मामले में तंत्र कहीं अधिक कुसूरवार नजर आता है, क्योंकि अवैध निर्माण को रोकना उसकी जिम्मेदारी होती है, लेकिन उसके अधिकारी इसे अनदेखा करते हैं। कभी-कभी तो इसके लिए पैसों का भी लेन-देन होता है। ऐसा ही एक मामला मुझे याद है, जब दिल्ली हाईकोर्ट में अवैध अतिक्रमण का एक मामला इसलिए नहीं टिक सका, क्योंकि संबंधित विभाग के अधिकारियों ने लीपापोती कर दी। नतीजतन, उस जगह पर आज अतिक्रमण कहीं अधिक तेजी से हो रहा है।
यह पूरा प्रकरण भूमि सुधार की तरफ भी इशारा कर रहा है। यह सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि हर संपत्ति मालिक अपनी संपत्ति का ब्योरा सार्वजनिक करे और उस पर उचित कर चुकाए । अतिक्रमणकारियों की संख्या चूंकि अपने देश में कम नहीं है, इसलिए ऐसी जमीनों से सरकारी खजाने को चूना लग रहा है। मगर होता यह है कि यह सब एक लंबी प्रक्रिया है और बुलडोजर चलाने का आदेश तुरंत मिल जाता है, इसलिए आसान रास्ता अपना लिया जाता है। जबकि, ऐसी कार्रवाइयों में जमीन के एक टुकड़े को छोड़कर सब कुछ ध्वस्त हो जाता है। इसीलिए, सुप्रीम कोर्ट उचित ही इसके लिए प्राधिकरण के माध्यम से सुनवाई करने की बात कही है। अपेक्षा रहेगी कि यह फास्ट ट्रैक कोर्ट से भी अधिक तेजी से काम करेगा और अंतिम आदेश पारित करके अनधिकृत संरचना के भाग्य का उचित फैसला करेगा। इससे सरकारों के पास कितनी जमीन निकल सकती है और जनता के हित में कितने काम हो सकते हैं, इसका महज अनुमान ही लगाया जा सकता है।
अपराधशास्त्र का एक महत्वपूर्ण और स्थापित सद्धांत है कि जिसने अपराध किया है, सजा उसी को दी जाए। लिहाजा, अतिक्रमणकारियों को ही जेल मिलनी चाहिए, उनके परिजनों को नहीं। हां, यदि पूरी जांच के बाद जमीन अतिक्रमित साबित हो, तो उस पर बुलडोजर चलाने से ऐतराज नहीं होना चाहिए। इसमें शायद ही न्याय के सिद्धांत की अवहेलना होगी। विशेषकर भू माफियाओं के मामले में यही दिखा है कि उनके पास अपने दावे से संबंधित सही कागजात नहीं थे। जब कागज दुरुस्त न हो, तब कानूनी कार्रवाई से किसी को क्यों ऐतराज होगा ? अगर ऐसे मामलों में बुलडोजर नहीं चलेगा, तो जिसने उस पर कब्जा जमा रखा है, वह तो अपना हक बढ़ाता चला जाएगा और निर्दोषों को तंग करता रहेगा। इससे सरकार पर भी उंगली उठेगी और देश का अस्तित्व ही खतरे में पड़ सकता है। हालांकि, यह पूरी कार्रवाई कानून और व्यवस्था के तहत ही हो, जिसको बनाए रखने की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सुप्रीम कोर्ट ने उचित ही सरकारों पर डाल दी है।
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भारत की अर्थव्यवस्था में विकास के साथ ही वास्तविक और साइबर खतरे बढ़ रहे हैं। ये खतरे आतंकी समूहों से लेकर स्थानीय बदमाशों के कारण हैं।
साइबर हमलों की खबरें अक्सर आती रहती हैं। ऐसे हमले डिजिटल डेटा पर होते हैं, जिसके साथ जुड़े बुनियादी ढांचे पर इसका गहरा प्रभाव पड़ता है। इसके माध्यम से किसी संयत्र की आंतरिक प्रणाली को नियंत्रण में लेकर किये जाने वाले विस्फोट या अन्य नुकसान से निपटने के लिए हमारे पास कोई विधायी ढांचा या संस्थागत क्षमता नहीं है।
सुरक्षा में खामियां – हाल के कुछ वर्षों में रेलवे और टेलीकॉम टावर पर भीड़ के हमले बढ़े हैं। इस हेतु केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल को सुरक्षा-दायित्व सौंपा गया है। लेकिन इसकी सीमा महत्वपूर्ण सरकारी बुनियादी ढांचे की सुरक्षा तक ही है।
दूसरी ओर, निजी सुरक्षा एजेंसियों के पास सीमित हथियार लाइसेंस होते हैं। सम्पत्तियों की सुरक्षा के लिए बनाए गए नियम भी बहुत कड़े हैं। वास्तविक हमले के समय ऐसी निजी सुरक्षा बेकार हो जाती है।
भारत को एक व्यापक महत्पूर्ण बुनियादी ढांचा संरक्षण अधिनियम की जरूरत है। साथ ही अमेरिका की साइबर सुरक्षा और बुनियादी ढांचा सुरक्षा एजेंसी जैसी एक नोडल एजेंसी की जरूरत है। बुनियादी ढांचे की सुरक्षा में सरकारी और निजी सुरक्षा एजेंसियों के लिए स्पष्ट प्रोटोकॉल के नियम होने चाहिए।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 25 अक्टूबर, 2024
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Date: 13-11-24
The Original PeopleThe indigenous, often courted for votes in India, want both inclusion & autonomyTOI Editorial
Jharkhand, where the first-phase polling happens today, has seen fierce competition for tribal votes. Parties have variously invoked tribal rights to jal, jangal and zameen, a distinct religious and cultural identity under the Sarna code, or their fear of being engulfed by ‘outsiders’. Variations of these issues play out globally, wherever there’s a substantial indigenous population, who are all different. Central Indian adivasis are a world away from isolated Sentinelese in Nicobars, or Native Americans, the Maori or the Inuit. But there are broad themes in their predicament: tensions over land, resources, and identity, clashing visions of the good life and future. They are 6% of the world’s population but account for 19% of extremely poor.
Many indigenous tribes have been uprooted by European colonialism. Their autonomy over their own life choices was denied. Today, while their autonomy is accepted, it is easier said than done. Native Americans are citizens of their own ‘domestic dependent nations’ as well as US, with rights under both systems. In New Zealand, Maori are seen as sovereign people, with guaranteed political voice and representation. In Australia, indigenous Australians were seen as a lesser race, with terrible consequences. In India, indigenous people have endured colonial expropriation, constitutional paternalism and religious interference, they are displaced in the name of conservation as well as industrial and commercial projects, they have suffered the sharpest edge of the security state in central India.
Indigenous people’s rights are individual and collective. Cultural protection cannot be disentangled from land and ecology. Here, we often frame adivasis either as stewards of a pristine wilderness and lost wisdom, or as deprived but aspiring Indians who want a bigger piece of the extraction and consumption economy. Neither is correct. As individuals embedded into this political economy, they, like any of us, seek a dignified life. But as groups, they occupy a different angle to capitalism and the mainstream order. Indigenous groups have led environmental justice movements, from Standing Rock protests over the Dakota oil pipeline, or against mining projects in central India. Their customs often spring from a different relationship with the earth and other living beings, different from calculations of conventional economics. Their store of knowledge enriches human inheritance. Indigenous or otherwise, we should have access to the same range of choices – and the world should be big enough for our differences too.
Date: 13-11-24
सीओपी के एजेंडे में भारत चीन को साथ आना होगासंपादकीय
बाकू ( अजरबैजान में जारी सीओपी – 29 की सार्थकता ट्रम्प के अमेरिकी राष्ट्रपति बनने के बाद स्वयं संकट में है। आर्थिक मदद के पेरिस समझौते को ट्रम्प पहले ही ठेंगा दिखा चुके हैं। कुल लड़ाई इस बात पर है कि तमाम सदियों के विकास के इतिहास में सबसे ज्यादा प्रदूषण विकसित देशों यानी अमेरिका और यूरोप के देशों ने किया। अब जब अस्तित्व का संकट आया तो ये देश विकास के अलग-अलग पायदान पर खड़े देशों पर दबाव डाल रहे हैं कि वे विकास की कीमत पर जीरो कार्बन उत्सर्जन करें, ऊर्जा के अन्य महंगे लेकिन साफ स्रोतों पर शिफ्ट करें। एक आकलन के अनुसार भारत को कोयला संयंत्र बंद कर दूसरे स्वच्छ ऊर्जा स्रोत पर जाने में अगले 30 वर्षों तक हर वर्ष 2.50 लाख करोड़ से ज्यादा रुपए खर्च करने होंगे। चूंकि अमेरिका और यूरोप की कुल जीडीपी विश्व की कुल जीडीपी की करीब आधी है, लिहाजा इस आर्थिक मदद की नैतिक जिम्मेदारी भी उन्हीं की बनती है। लेकिन ट्रम्प के चार साल के कार्यकाल के कारण दुनिया को बचाने का संयुक्त प्रयास बाधित नहीं होना चाहिए। उधर आशंका है। कि ट्रम्प के अलावा यूरोप भी कार्बन फुटप्रिंट वाले उत्पाद जैसे स्टील, सीमेंट, एल्युमीनियम और खाद पर कार्बन टैक्स लगा सकता है। पिछले दिनों में भारत के स्टील को लेकर यह विवाद उठा था। चीन भी इस बैठक में लगातार यह मुद्दा उठा रहा है। दरअसल समाधान निकलना भावी पीढ़ी की सुरक्षा के लिए अपरिहार्य है- फिर चाहे अमेरिका के साथ हो या अमेरिका के बगैर। इसकी चिंता भारत और चीन को साथ मिलकर करनी होगी, क्योंकि यही दोनों देश विकास के उस मुकाम पर हैं, जहां इसे न रोका जा सकता है न गरीबों के कल्याण के प्रयास कम किए जा सकते हैं। समस्या का हल नए नजरिए से निकालेंगे तो अमेरिका साथ आने को मजबूर होगा।
Date: 13-11-24
‘मिडिल इनकम ट्रैप’ में फंसता जा रहा है भारतरतिन रॉय, ( प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के पूर्व सदस्य )
पिछले 15 वर्षों से आम भारतीयों की आय स्थिर है। ये आबादी के शीर्ष 15% से 50% के बीच के लोग हैं। सबसे गरीब 20% लोगों की आय में बढ़ती सब्सिडी और दूसरी सौगातों के कारण वृद्धि देखी जा रही है। लेकिन 8 से 35 वर्ष के बीच के 12 करोड़ से अधिक लोग न तो शिक्षा पा रहे हैं और न ही रोजगार की तलाश कर रहे हैं।
कृषि में ‘रोजगार’ करने वाली आबादी अपने उच्चतम स्तर पर है, जबकि जीडीपी में मैन्युफैक्चरिंग का हिस्सा 30 वर्षों में सबसे निचले स्तर पर है। उत्पादन का डिफॉल्ट तरीका अनौपचारिक और असंगठित क्षेत्र बना हुआ है। यूपी और बिहार के औसत निवासी किसी औसत बांग्लादेशी या नेपाली से भी कम कमाते हैं।
ये सब एक ऐसी बीमारी के लक्षण हैं, जिसका अ
गर इलाज नहीं किया गया तो भारत ‘मिडिल इनकम ट्रैप’ में फंस जाएगा, यानी हमारी ग्रोथ मध्य-आय के स्टेटस पर पहुंचकर थम जाएगी। कई देश इसके शिकार बन चुके हैं। भारत संरचनात्मक मांग में एक बाधा का सामना कर रहा है।
इसका समाधान केवल उन चीजों का उत्पादन करके किया जा सकता है, जिनका भारत के शीर्ष आधे लोग (सिर्फ शीर्ष 15% लोग ही नहीं) उपभोग करना चाहते हैं। ऐसा इन चीजों का उत्पादन करते हुए गरीब भौगोलिक क्षेत्रों में रोजगार पैदा करके किया जा सकता है। अगर ऐसा नहीं होता है तो 1991 के बाद से शीर्ष 15 करोड़ भारतीयों की समृद्धि की प्रेरणा अंततः लड़खड़ा जाएगी।
निजी अंतिम उपभोग-व्यय में वृद्धि महामारी से पहले के स्तरों से नीचे है। शीर्ष 15% आबादी की समृद्धि में वृद्धि के कारण भारतीय विकास को आधार देने वाली चीजें अब नहीं बिक रहीं। वाहनों से लेकर एफएमसीजी (फास्ट मूविंग कंज्यूमर गुड्स) और (गैर-आईफोन) स्मार्टफोन तक- बहुत अमीर लोगों के अलावा हर किसी की खपत स्थिर हो रही है। आयकरदाता (जो भारत की प्रति व्यक्ति आय का कम से कम 350% कमाते हैं) करों के असह्य बोझ की शिकायत करते हैं।
हमारे लड़खड़ाते आर्थिक इंजन के चार मायने हैं। एक, शेयर बाजार की कहानी भारत की समृद्धि की कहानी नहीं है। हाल के दिनों में शेयर बाजार में संरचनात्मक मंदी के बावजूद उछाल आया है, क्योंकि सूचीबद्ध कम्पनियों के कुल राजस्व के अनुपात में उनके मुनाफे का हिस्सा बढ़ा है, जबकि : 1. वास्तविक वेतन स्थिर हैं या घट रहे हैं, 2. आपूर्तिकर्ताओं के मार्जिन कम हो गए हैं 3. कम्पनियों ने कर्ज-मुक्त होने के लिए करों में छूट और प्रोत्साहन का उपयोग किया है।
यही कारण है कि निवेश कम होने के बावजूद मुनाफा ज्यादा है। निकट भविष्य में भी यही हालात रहने की उम्मीद की जा सकती है, उलटे बाहरी झटकों के कारण और अस्थिरता आएगी। अगर सरकार विनिवेश में इतनी अक्षम नहीं होती तो शेयर बाजार और बेहतर प्रदर्शन करता। लेकिन शेयर बाजार की कहानी अब भारत की समृद्धि की कहानी से अलग है।
दो, मांग आपूर्ति से जुड़ी है। भारत अमीर लोगों के लिए कमीजें बना सकता है, लेकिन आम लोगों के लिए वह कमीजों का आयात करता है। वह आलीशान भवन बनाने के लिए जमीन और पूंजी जुटा सकता है, लेकिन आमोदमी के आवास पर सब्सिडी दी जाती है। ऐसा इसलिए है क्योंकि भारत उत्पादकता के चौंकाने वाले निम्न स्तर से ग्रस्त है।
हमारी इकोनॉमी मुगल-काल के जैसी हो गई है। भारत अमीरों के लिए तो महंगा सामान बना पाता है, लेकिन कम उत्पादकता के कारण आम भारतीयों की मांग को पूरा करने में असमर्थ है। अधिकांश उद्यमियों का लक्ष्य ‘रेंट-सीकिंग’ हो गया है यानी नीतियों-संसाधनों के दोहन से अपनी सम्पत्ति को बढ़ाना।
तीन, अनौपचारिक क्षेत्र अपनी पकड़ बनाए हुए है। एक समृद्ध अर्थव्यवस्था वह होती है, जिसमें लोग अनौपचारिक क्षेत्र में उत्पादित सस्ते, निम्न-गुणवत्ता वाले उत्पादों का उपभोग करने से हटकर औपचारिक अर्थव्यवस्था में उत्पादित बेहतर-गुणवत्ता वाले सामान का उपभोग करते हैं। लेकिन भारत में, सबसे अमीर क्षेत्रों में भी अधिकतर लोगों को तीसरी दुनिया के दामों पर किसी अनौपचारिक रेस्तरां में एक कप चाय और नाश्ता प्रदान किया जाता है, जबकि चुनिंदा लोग औपचारिक ईटरीज़ पर आधिपत्य जमाए हुए होते हैं।
अधिकांश क्षेत्रों में ऐसा ही है। अनौपचारिक अर्थव्यवस्था का इतने व्यापक पैमाने पर बने रहना ब्राजील और थाईलैंड जैसी विफल अर्थव्यवस्थाओं को दक्षिण कोरिया और चीन जैसी सफल अर्थव्यवस्थाओं से अलग करता है।
चार, राज्यसत्ता का हमेशा मुआवजा देने वाले की स्थिति में बने रहना। यहां निराश्रितों को सब्सिडी दी जाती है, लेकिन आम लोग भी भोजन, परिवहन, आवास और जरूरी चीजों के लिए भारी सरकारी सब्सिडी के बिना अपनी कमाई से आवश्यक वस्तुएं खरीदने में सक्षम नहीं हैं। यही कारण है कि सार्वजनिक निवेश और गुणवत्तापूर्ण सामान देने की क्षमता घुट जाती है, क्योंकि राज्यसत्ता व्यापक समृद्धि लाने में अपनी विफलता के ऐवज में सब्सिडी और सौगातों की भरपाई करती रहती है।
ये तमाम एक मध्यम आय वाले देश के संकेत हैं। यह विशेष रूप से चिंता का विषय है कि ये प्रति व्यक्ति आय के इतने कम स्तर पर भारतीय अर्थव्यवस्था की विशेषता बन चुके हैं। लेकिन स्थिति चाहे जितनी गम्भीर हो, वह सुधार योग्य है। इसके लिए नीति-निर्माताओं को हकीकत का सामना करना चाहिए, न कि केवल शेखी बघारना चाहिए।
उत्पादकता का निम्न-स्तर हम अमीर लोगों के लिए कमीजें बना सकते हैं, लेकिन आम लोगों के लिए कमीजों का आयात करते हैं। आलीशान भवन बनाने के लिए जमीन और पूंजी जुटा सकते हैं, लेकिन आम आदमी के आवास पर सब्सिडी दी जाती है। हम उत्पादकता के निम्न स्तर से ग्रस्त हैं।
Date: 13-11-24
असहाय नगर निकायसंपादकीय
इस पर हैरानी नहीं कि नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक यानी कैग ने यह पाया कि देश के अधिकांश नगर निकाय न तो अपने स्रोतों से धन जुटाने में समर्थ हैं और न ही आवंटन के जरिये मिले पैसे का पूरा उपयोग कर पाने में। स्पष्ट है कि ऐसे में शहरों की स्थिति सुधरने की जो आशा की जा रही है, वह पूरी होने वाली नहीं है। कैग की रिपोर्ट से यह भी पता चलता है कि राज्य सरकारें अपने नगर निकायों को वांछित अधिकार देने को तैयार नहीं। वे इस पर भी ध्यान नहीं दे रही हैं कि नगर निकाय कर्मचारियों की कमी का सामना कर रहे हैं। यह विचित्र है कि जो राज्य सरकारें संघीय ढांचे का हवाला देकर केंद्र पर यह आरोप लगाती रहती हैं कि वह उन्हें पूरी स्वतंत्रता से काम नहीं करने देती, वे अपने नगर निकायों को 74वें संविधान संशोधन अधिनियम के तहत मिलीं आवश्यक शक्तियां देने को तैयार नहीं।
आखिर आवश्यक अधिकारों के अभाव में नगर निकाय अपना काम सही तरह से कैसे कर पाएंगे? ऐसा लगता है कि राज्य सरकारें यह बुनियादी बात समझने को तैयार नहीं कि शहरी निकाय एक तरह से शासन की तीसरी इकाई हैं और उनका समर्थ होना आवश्यक है। निःसंदेह उन्हें समर्थ बनाने के साथ ही इसकी भी आवश्यकता है कि उन्हें उनके कार्यों के लिए जवाबदेह बनाया जाए। यह ठीक नहीं कि राज्य सरकारें इनमें से भी कोई काम नहीं कर रही हैं। उचित यह होगा कि केंद्र सरकार केंद्र शासित प्रदेशों के जरिये राज्यों के समक्ष ऐसा कोई उदाहरण पेश करे कि शहरी निकायों को किन अधिकारों से लैस होना चाहिए, उन्हें अपना काम कैसे करना चाहिए और खुद को आर्थिक रूप से सक्षम कैसे बनाना चाहिए?
यह समझा जाना चाहिए कि शहरों की सूरत तब तक नहीं संवर सकती, जब तक नगर निकाय प्रशासनिक और आर्थिक रूप से सक्षम बनने के साथ ही शहरों के विकास की ऐसी योजनाएं बनाने में समर्थ नहीं होते, जो दीर्घकालिक और भविष्य की जरूरतों को पूरी करने वाली हों। चूंकि आम तौर पर शहरी विकास की ज्यादातर योजनाएं समस्याओं का फौरी समाधान करती दिखती हैं, इसलिए तमाम विकास कार्यों के बाद भी शहरों में विभिन्न समस्याएं सदैव सिर उठाए हुए दिखती हैं। क्या यह किसी से छिपा है कि किस तरह नए बने रास्ते, फ्लाईओवर, बाईपास आदि किस तरह कुछ समय बाद अपर्याप्त सिद्ध होने लगते हैं? पता नहीं क्यों आज भी शहरी योजनाएं यह ध्यान में रखकर नहीं बनाई जातीं कि आज से 50-60 साल बाद आबादी क्या होगी और उसके लिए कैसा आधारभूत ढांचा चाहिए होगा? कभी-कभी तो यह लगता है कि इस पर कोई विचार ही नहीं करता कि आज जो बुनियादी ढांचा बनाया जा रहा है, वह भविष्य की चुनौतियों का सामना कर सकेगा या नहीं? यह स्थिति तब है, जब देश के सभी छोटे-बड़े शहरों की आबादी बढ़ती जा रही है।
Date: 13-11-24
परमाणु ऊर्जा के लिए अनुकूल हालात की जरूरतअजय शाह और अक्षय जेटली, ( शाह एक्सकेडीआर फोरम में शोधकर्ता और जेटली स्ट्रैटजी एवं पॉलिसी एडवाइजर हैं )
हम भारतीय यह मानते आए हैं कि अंतरिक्ष में कोई भी गतिविधि केवल सरकार करती है। परंतु अंतरिक्ष यात्रा को लेकर बेहतरीन वैश्विक ज्ञान में स्पेसएक्स जैसी निजी कंपनियों की जबरदस्त हिस्सेदारी है।
एक बार जब निजी क्षेत्र गति पकड़ लेता है तो वह गुणवत्तापूर्ण ऊर्जा और नवाचार लाता है जो सरकारी संस्थानों में नहीं पाया जाता है। परमाणु ऊर्जा पर भी यही बात लागू होती है। अब निजी कंपनियां दुनिया का सबसे सुरक्षित, किफायती और नवोन्मेषी परमाणु रिएक्टर बना रही हैं।
भारत-अमेरिका परमाणु समझौते के समय यह स्पष्ट था कि बड़े उत्पादन संयंत्र फ्रांस, जापान और अमेरिका से आयात किए जाएंगे और यह बड़ा आरक्षण होगा। हाल के दिनों में गूगल और मेटा ने निजी कंपनियों से ‘स्मॉल मॉड्युलर रिएक्टर्स’ (एसएमआर) के लिए ऑर्डर दिया है जो 50 मेगावॉट क्षमता वाले संयंत्र होंगे। हम केंद्रीय नियोजक नहीं होना चाहते और न ही हम वे महान नेता बनना चाहते हैं जो भारत के लिए चयन करेंगे।
भारत की ऊर्जा नीति को ऐसे हालात बनाने चाहिए जहां निजी कंपनियां इस बात पर विचार करें कि क्या उनके लिए ऐसे उपकरण खरीदना उचित होगा? यह कैसे हासिल किया जा सकता है? नीतिगत माहौल के कौन से तत्त्व जरूरी हैं ताकि यह क्षेत्र विवेकपूर्ण तरीके से विकसित हो सके? यह एक ऐसा क्षेत्र है जिसने बाजार की विफलता देखी है।
सार्वजनिक अर्थशास्त्र के उपायों को अपनाया जाना चाहिए। यानी बाजार की नाकामी को समझना और भारतीय हालात तथा राज्य क्षमता के अधीन उपयुक्त नीतिगत राह तैयार करना। इसके अलावा उन प्रतिबंधों को हटाने की जरूरत है जिनका बाजार की विफलता से कोई संबंध नहीं। नीति निर्माताओं की कार्य योजना पांच तत्वों में निहित है।
1. अगर देश में कोई व्यक्ति किसी विदेशी विक्रेता से परमाणु रिएक्टर खरीदना चाहता है तो उस पर कोई आयात प्रतिबंध या ऐसा सीमा शुल्क नहीं लगेगा जो लेनदेन में हस्तक्षेप करता हो। बशर्ते कि ऑपरेटर पर सुरक्षा प्रतिबंध लागू हों।
2. वितरण कंपनियां आमतौर पर उच्च लागत वाले स्रोत मसलन तटीय पवन या परमाणु ऊर्जा में रुचि नहीं लेतीं। ऐसे में परमाणु ऊर्जा के लिए भी नीति ऐसी होनी चाहिए जैसी पवन ऊर्जा आदि के लिए है। इसमें उत्पादकों के लिए स्पष्ट व्यवस्था होनी चाहिए कि वे अपने लिए वाणिज्यिक और औद्योगिक उपभोक्ता खोजें।
3. परमाणु ऊर्जा संयंत्रों में इस्तेमाल किया जाने वाला ईंधन बम बनाने में भी इस्तेमाल हो सकता है। इससे सुरक्षा के लिए चुनौतियां उत्पन्न होती हैं। ये चुनौतियां अन्य क्षेत्रों में भी नजर आती हैं। उदाहरण के लिए हवाई यात्रा की सुरक्षा में राज्य की भूमिका नेतृत्वकारी होती है। इससे निजी हवाई अड्डों, कंपनियों और विमान निर्माताओं वाले इस क्षेत्र में उसका विशिष्ट योगदान सुनिश्चित होता है। निजी परमाणु संयंत्रों की सुरक्षा के लिए घरेलू नियमन, अंतरराष्ट्रीय सुरक्षा उपायों और प्रवर्तन प्रोटोकॉल की जरूरत है। देश में परमाणु सुरक्षा के नियामकीय ढांचे में आमूलचूल बदलाव की जरूरत है।
परमाणु ऊर्जा अधिनियम में बदलाव की जरूरत है ताकि देश में परमाणु सामग्री के की साज-संभाल, भंडारण और परिवहन को निजी लोगों द्वारा संभाला जा सके जो अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी की जरूरतों के मुताबिक हो। केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल के विशेष कैडर की जरूरत होगी ताकि निजी परमाणु संयंत्रों की देखभाल की जा सके।
गृह मंत्रालय और परमाणु ऊर्जा नियामक बोर्ड को निजी परिचालकों और नियामकीय निगरानी की सुरक्षा मंजूरी देनी होगी ताकि निजी परमाणु संयंत्रों की रखरखाव हो सके।
4. असैन्य परमाणु जवाबदेही की वैश्विक व्यवस्था के अनुसार पूरी जवाबदेही परिचालक की होती है और इसके मुताबिक आपूर्तिकर्ता के खिलाफ मुकदमा केवल परिचालक ही कर सकता है। इस डिजाइन में पूरा ध्यान परिचालक पर केंद्रित है कि वह अच्छे से संयंत्र चलाए। इसमें वे परिस्थितियां भी परिभाषित हैं जिनके तहत बेहतरीन वैश्विक कंपनियां भारत में बिक्री का चयन करेंगी। भारत में सिविल लाइबिलिटी फॉर न्यूक्लियर डैमेज ऐक्ट, 2010 बना हुआ है जो रिएक्टर के विदेशी आपूर्तिकर्ताओं पर जवाबदेही डालकर उन्हें रोकता है। इससे बीमा खरीदने की संभावनाएं भी जटिल हुईं क्योंकि बीमाकर्ता आपूर्तिकर्ता जवाबदेही की निजी कवरेज को लेकर हिचक होती है। इन चिंताओं को दूर करने के लिए सरकार ने 2015 में एफएक्यू यानी अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्नों की सूची जारी की थी जो इस अधिनियम के विभिन्न पहलुओं को सामने लाता है।
बहरहाल इन एफएक्यू को अधिनियम के अधीन विधान नहीं माना जाता और इसलिए ये राज्य पर बाध्यकारी नहीं हैं। भारतीय विधिक व्यवस्था में जब एफएक्यू विधान के साथ विरोधाभासी रहे हैं तो अदालतों ने उनकी अनदेखी कर दी है। विदेशी आपूर्तिकर्ता इनसे आश्वस्त नहीं होते और उन्होंने भारत में बिक्री से परहेज किया। विधायी संशोधन ही इकलौती व्यवहार्य विकल्प है।
5. भारतीय ऊर्जा उद्योग का आधार मूल्य व्यवस्था में बदलाव में निहित है जहां निजी लोग आपूर्ति और मांग को लेकर विकेंद्रीकृत निर्णय लेते हैं और सरकारी अधिकारियों या कंपनियों का इन पर कोई नियंत्रण नहीं होता। यह ऐसा आधार है जिसके तहत आपूर्ति और मांग को लेकर विविध ऊर्जा तकनीक (परमाणु ऊर्जा सहित) ऊर्जा व्यवस्था में सटीक बैठेंगे। निजी व्यक्ति भविष्य की कीमतों में उतार-चढ़ाव को लेकर अटकलबाजी का नजरिया रखते हैं। इसमें शाम के पीक समय को लेकर उच्च कीमतों का अनुमान शामिल होता है। ऐसा इसलिए कि परमाणु रिएक्टर खरीदने की बात को उचित ठहराया जा सके।
परमाणु बिजली के क्षेत्र में दुनिया भर में लागत और सुरक्षा के मोर्चे पर सुधार हो रहे हैं। भारत में परमाणु ऊर्जा बेस लोड और ग्रिड स्थिरता की दिक्कतों को समाप्त करने में अहम योगदान कर सकती है। इन संयंत्रों को खरीदने का जोखिमभरा निवेश निजी व्यक्ति ही कर सकते हैं। हम एक ऐसी दुनिया की ओर बढ़ रहे हैं जहां नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन और तमाम भंडारण तकनीक हैं जो शाम को कीमतों में इजाफे को नियंत्रित रख सकें।
ऐसे में भंडारण पर सटोरिया नजरिया रखने वाले लोगों को मुश्किल होगी और वे परमाणु रिएक्टर खरीदने पर विचारक र सकते हैं। विजेताओं का चयन और प्रौद्योगिकी का चयन ऐसे ही लोगों का काम है न कि सरकार का।
हमारी समस्या बिजली और परमाणु ऊर्जा के क्षेत्र में राज्य की गहन संबद्धता में निहित हैं। ऐसे में इन दोनों क्षेत्रों में सरकार की भूमिका के बारे में एक स्पष्टीकरण आवश्यक है क्योंकि इनमें सरकार का ध्यान बाजार विफलता में उसकी भूमिका और हर लिहाज से आर्थिक स्वतंत्रता सुनिश्चित करने पर केंद्रित है।
उपरोक्त पांचों क्षेत्रों में आर्थिक सुधारों को लेकर एक कार्यक्रम की आवश्यकता है। अगर इन क्षेत्रों में अगले कुछ सालों में ठीकठाक प्रगति होती है तो इसका सबसे बड़ा परिणाम यह होगा कि देश में परमाणु रिएक्टर ऐसा विकल्प बन जाएंगे जिनका निजी कंपनियां आकलन कर सकेंगी।
Date: 13-11-24
देशहित में सख्तीसंपादकीय
सरकार ने विदेशी फंडिग लेने वाले गैर-सरकारी संगठनों यानी एनजीओ की कड़ी निगरानी शुरू कर दी है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने घोषणा की है कि ऐसे किसी भी एनजीओ का लाइसेंस रद्द कर दिया जाएगा जिसके विकास विरोधी गतिविधियों, धर्मांतरण, दुर्भावनापूर्ण इरादे से विरोध-प्रदर्शन भड़काने या आतंकवादी या कट्टरपंथी समूहों के साथ संबंध हैं। विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम, 2010 के तहत उनका पंजीकरण रद्द कर दिया जाएगा। कानूनन विदेशी चंदा हासिल करने के लिए एनजीओ को विदेशी अंशदान (विनियमन) अधिनियम के तहत पंजीकृत होना अनिवार्य है। दो-तीन साल में किसी गतिविधि में शामिल नहीं रहने, पूर्णतः निष्क्रिय या जांच के दौरान उन गतिविधियों की पुष्टि नहीं की जा सकती, जिनका दावा किया गया था। इस साल की पहली तिमाही में ही सरकार द्वारा कई बड़े एनजीओ के पंजीकरण निरस्त किए थे जिन पर नियमों के विरुद्ध गतिविधियों में शामिल होने व कानूनों का उल्लंघन करने का आरोप था। केंद्रीय सांख्यिकी संस्थान के अनुसार देश में तैंतीस लाख एनजीओ काम कर रहे हैं जो समाज उत्थान व उपेक्षित वर्ग के लिए काम करते हैं। ये गैर-सरकारी व गैर- लाभकारी संगठन देसी-विदेसी संस्थाओं से वित्तीय मदद लेते हैं। इनमें से कई पर वित्तीय धांधली के अलावा देश विरोधी गतिविधियों में लिप्त होने के आरोप सिद्ध होते रहे हैं जिससे निपटने के लिए सरकार ने सख्त रवैया अपनाया। बीते वित्त वर्ष में इन संगठनों ने विदेशी फंडिंग के माध्यम से साढ़े पचपन हजार करोड़ रुपये की मदद प्राप्त की थी। जाहिर है, सरकार के पास इस धन के इस्तेमाल का सटीक ब्योरा होना अनिवार्य हो जाता है। देश विरोधी गतिविधियों, धन शोधन और आतंकवादियों के वित्त पोषण के सबूतों के बाद सरकार का सतर्क होना बनता है। हालांकि इन गैर-सरकारी संगठनों के प्रतिनिधियों का आरोप है कि सरकार की मंशा संग्दिध है। वह जान-बूझकर इनको अपनी गिरफ्त में रखना चाहती है। बेशक, शिक्षा, चिकित्सा व अन्य सार्वजनिक उपयोगिता उद्देश्यों को देश के जरूरतमंदों तक पहुंचाने का काम एनजीओ करते आए हैं मगर इसलिए उन्हें अतिरिक्त छूट नहीं दी सकती। आखिर, एक मछली सारे तालाब को गंदा कर देती है। उन्हें सरकारी नियमों और पाबंदियों का ख्याल रखना होगा क्योंकि कोताही होने पर अंततः सरकार और सुरक्षा व्यवस्था जवाबदेह माने जाते हैं।
Date: 13-11-24
नजीर बने निलंबनसंपादकीय
केरल सरकार द्वारा दो वरिष्ठ आईएएस अधिकारियों के निलंबन की कार्रवाई ने हमारे प्रशासनिक ढांचे में तेजी से बढ़ते गंभीर रोगों की ओर देश का ध्यान आकर्षित किया है। इन दोनों ही मामलों में की गई कार्रवाई न सिर्फ सराहनीय है, बल्कि अन्य राज्यों के लिए अनुकरणीय भी है। राज्य सरकार ने केरल उद्योग एवं वाणिज्य निदेशक के गोपालकृष्णन को सोशल मीडिया मंच वाट्सएप पर सांप्रदायिक समूह बनाने और उनसे भारतीय प्रशासनिक सेवा के सहधर्मी अधिकारियों को जोड़ने के आपत्तिजनक आचरण के लिए निलंबित किया है, तो वहीं कृषि विभाग के विशेष सचिव एन प्रशांत को एक अन्य वरिष्ठ आईएएस अधिकारी के खिलाफ लगातार सोशल मीडिया पर पोस्ट डालने के लिए निलंबित किया गया है। हालांकि, गोपालकृष्णन ने सफाई पेश की थी कि उनका मोबाइल हैक कर लिया गया था। मगर तिरुवनंतपुरम सिटी पुलिस की जांच में यह दावा सही साबित नहीं हुआ। अच्छी बात यह है कि इन वरिष्ठ अधिकारियों के कृत्य को राज्य सरकार ने नजरंदाज नहीं किया और बगैर वक्त गंवाए मुकम्मल तफ्तीश के बाद उनके खिलाफ कार्रवाई भी कर डाली। इससे राज्य के अन्य अधिकारियों को यकीनन पैगाम मिल गया होगा कि अनुशासनहीनता की कीमत चुकानी पडे़गी।निस्संदेह, हमारे प्रशासनिक अधिकारी इसी समाज से आते हैं और सामाजिक विमर्शों का उन पर असर स्वाभाविक है; मगर उन्हें यह नहीं भूलना चाहिए कि देश के संविधान ने उनको एक विशिष्ट भूमिका सौंपी है, जिसमें उनकी व्यक्तिगत भावनाओं-दुर्भावनाओं के लिए कहीं कोई जगह नहीं है। भारतीय प्रशासनिक सेवा देश की सबसे बड़ी सेवा है। एक कठिन प्रक्रिया के जरिये इसके अधिकारियों का चयन होता है और उनसे यह अपेक्षा की जाती है कि नागरिकों की सेवा करते हुए वे किसी भी किस्म के पक्षपात के बिना संविधान और कानून की रोशनी में काम करेंगे। वे इस देश की कार्यपालिका की रीढ़ हैं। मगर गोपालकृष्णन का आचरण इसके उलट था और राज्य सरकार ने उचित ही इसे अखिल भारतीय सेवा के काडरों के बीच हिंदू-मुस्लिम आधार पर विभाजन पैदा करने वाला करार दिया। ऐसे विभाजनों से सेवा की मूल अवधारणा खंडित होती है। धर्म के आधार पर अनुराग या वैमनस्य रखने वाला अधिकारी अपने सेवाकाल में जाति, उपजाति के आधार पर भेदभाव को प्रोत्साहित नहीं करेगा, यह कैसे माना जाए? इस तरह तो समूचे सामाजिक ताने-बाने को ही ऐसे अधिकारी संकट में डाल देंगे।इसी तरह, एन प्रशांत ने भी शासकीय मर्यादाओं का उल्लंघन किया। किसी भी महकमे के दो ओहदेदारों का टकराव सामान्य बात है, मगर सोशल मीडिया पर अपने वरिष्ठ सहकर्मी के खिलाफ विषवमन चरम अनुशासनहीनता ही नहीं, एक तरह से आपराधिक कृत्य है। दरअसल, इन दोनों अधिकारियों के कृत्य बताते हैं कि सोशल मीडिया के इस्तेमाल को लेकर किस तरह के प्रशिक्षण व सतर्कता की जरूरत है। पिछले कुछ समय में सोशल मीडिया के विभिन्न मंचों पर शासन-प्रशासन से जुडे़ अधिकारियों-कर्मचारियों की उपस्थिति काफी बढ़ी है और कई बार जाने-अनजाने ही वे सेवा-संहिता का उल्लंघन करते देखे गए हैं। देश के संविधान ने अपने सभी नागरिकों को आस्था की आजादी दी है, मगर अपनी आस्था के आधार पर सांविधानिक मूल्यों पर हमले की इजाजत किसी को भी नहीं दी जा सकती। विडंबना यह है कि कट्टरता के विरोधी भी स्वधर्मी कट्टर को सेनानी मानने लगते हैं। मगर यह खतरनाक प्रवृत्ति है, इस पर हर मुमकिन रोक लगाने की जरूरत है।
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जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे को समाप्त करके जब से इसे दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित किया गया है, तभी से वहाँ की जनता कुछ बेहतर की आशा लगाए बैठी है। लेकिन लोकनीति सर्वेक्षण से पता चलता है कि जम्मू के 40% निवासी विशेष दर्जे को समाप्त करने का विरोध कर रहे हैं। लद्दाख की भी कुछ ऐसी ही स्थिति है। इस असंतोष पर कुछ बिंदु –
‘द हिंदू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 22 अक्टूबर, 2024
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Date: 12-11-24
Our WastelandsManaging waste is complex. Incinerators are a solution as bad as the problemTOI Editorials
Turning waste into energy, and therefore, greening it, is an excellent plan. But plans in India have a way of subverting the very purpose behind them. Media reports in Delhi have highlighted problems with Jindal Group’s Timarpur-Okhla waste to energy plant. There’s also a New York Times report on this. Indian cities have a huge problem with landfills – rotting mountains oozing methane and leachate. Waste to energy plants, or incinerators, appeal to policymakers seeking instant, high-tech solutions – they promise to cut trash volume, generate electricity and produce ash that can be used for construction. But they’re unsuited to India, with our large proportion of organic and wet waste, which takes more energy to dry and reach scorching temperatures. Even Europe and US are witnessing a backlash against incinerators. But they are being set up everywhere in India.
A much better way for India is decentralised waste management – segregation at source, in-situ composting, and minimising waste creation to be sent to landfills is the sustainable way. It is this ecosystem, this task flow, at the source – refuse collector to recycling managers (read kabadis) – that needs to be professionalised, replacing the raggedy motley of workers with trained waste management professionals, in private and govt sectors.
Our solid waste management rules are clear on each category of waste. Towns like Alapuzha have achieved substantial progress. But waste is a complex and wicked problem, with no easy answers. It is simply the underside of consumption. After the mid-20th century, humans began generating enormous, everlasting heaps of trash: 20,000 plastic bottles are sold every second. Western nations offshored waste to poorer countries, blighting soil and water and lives. Nobody wants to look closely at waste.
India has special challenges, including the magnitude of our garbage, and the blind spots of a caste society. But it is not entirely unique – urbanising countries from Europe to US and Japan have grappled with garbage and sewage issues. Sometimes transformation takes a crisis, to trigger a shared panic among rich and poor and across social groups, as when the great stink of the Thames in 1958 appalled Westminster, or when the bubonic plague hit Surat in the 1990s. Dealing with our waste crisis requires deeper understanding – it is not just a matter of citizens recycling or better municipal arrangements: most of the waste is produced by industry. So, govts must make companies take responsibility for industrial waste, not let them get away with causing public harm, as the Okhla plant does.
Date: 12-11-24
Ending discrimination in prisonsWhile the Supreme Court did away with caste discrimination in prisons, incorporating basic amenities in prisons by amending the Model Prison Manual 2016 will ensure a minimum dignified life inside prisonsR.K.Vij and Shivani Vij, [ R.K. Vij is a former Indian Police Service officer. Views are personal. Shivani Vij is a Lawyer practising in Delhi. ]
On October 3, the Supreme Court in Sukanya Shantha v. Union of India (2024) reaffirmed the principle of non-discrimination in Indian prisons. The rules in jail manuals segregating prisoners based on caste was at the heart of this challenge. They were struck down for perpetuating caste discrimination and violating the fundamental rights of prisoners. Previously too, courts have often set aside prison rules that classified prisoners and treated them differently. Where the basis was either irrational, arbitrary, or a prohibited ground, it could not withstand the scrutiny of the equality code under Articles 14 and 15 of the Constitution.
No arbitrary segregation
A distinction based on social status of prisoners was dealt with by the Supreme Court in Prem Shankar Shukla v. Delhi Administration (1980). The Punjab Police Rules distinguished under-trial prisoners as ‘better class’ and ‘ordinary’. Only the ‘better class’ were exempted from wearing handcuffs. The Court reasoned that it was completely irrational for the state to assume that an indigent prisoner was more dangerous to the society than an affluent one. Economic and social considerations could not be the basis for classifying prisoners for the purposes of handcuffs. The provisions were held to be unconstitutional.
The Bombay High Court in Inacio Manuel Miranda v. State (1988) was faced with a different type of segregation affecting the prisoners’ right to write in prison. The Goa, Daman and Diu Prisoners Rules treated prisoners differently for writing welfare letters. ‘Class-I prisoners’ could write four letters per month, but ‘Class-II prisoners’ could only write two. This was held unreasonable and discriminatory, affecting the convict’s right to be treated equally in their freedom of expression. The Court followed its previous decision in Madhukar Bhagwan Jambhale v. State of Maharashtra (1984) where a prohibition on writing letters to co-prisoners, imposed by the Maharashtra Prison Rules, was struck down as having no logical basis and unduly inhibiting the prisoners’ constitutional rights.
A principle that resonated with the Court was that the prison itself could not strip the prisoners of rights they would otherwise be entitled to. Non-discrimination was one such right. The most recent decision of the Supreme Court in Sukanya Shantha brought about the starkest case of prison segregation. Here, caste hierarchy was the basis of classification for labour inside prisons. This meant that only prisoners of certain ‘marginalised castes’ were given cleaning and sweeping jobs, and others were given jobs like cooking. The State Prison Rules stated that these castes were “accustomed to performing such duties”. This classification had no connection with the individual ability or qualification of the prisoner and did not aid reformation. It perpetuated caste identity and prevented an equal opportunity to reform. The State Prison Rules and similar executive decisions were therefore set aside as discriminatory under Articles 14 and 15, with directions to the States to undertake amends.
The way forward
In another case, three petitions came before the Calcutta High Court, which were decided together in August 2012 (Gaur Narayan Chakraborty and Others). The main issue before the Court was whether Maoists who were waging a war against the state using arms, and who were charged under the Unlawful Activities (Prevention) Act, 1967, and other special statutes, could be treated as political prisoners. The trial court had rejected this demand of the petitioners in accordance with the West Bengal Correctional Services (WBCS) Act, 1992, on the premise that they were members of a banned terrorist organisation, and their activities were not for the common good of the people, but for the revolution with arms.
However, the High Court, after discussing municipal and international viewpoints on the political offences and interpreting the WBCS Act on the classification of prisoners, reached the conclusion that “the believers of any kind of political movement are to be acknowledged as political prisoners and thus, it cannot be held that those who participate in unlawful activities cannot be recognised as political prisoners”.
Though the Supreme Court did not have occasion to decide the special leave petition arising from this decision on merit, the Calcutta High Court’s judgment is significant for highlighting a similar right of prisoners to be treated in a dignified manner.
The High Court noticed that a person classified as a political prisoner is entitled to a few amenities, such as a chair, table, light, iron cot, mattress, pillow, blanket, and mirror. He is entitled to cooking, services of a barber, writing material, and a newspaper, and is also permitted to receive books and periodicals from his relatives. These facilities are a part of the basic human rights to which every prisoner ought to be entitled. The Court said these amenities should not be restricted to political prisoners. It suggested that the state administration re-look into the classification of prisoners and provide basic amenities to all. A slight improvement in the living conditions of prisoners in itself would erode the classification which the WBCS Act acknowledges.
While the Supreme Court’s recent judgment did away with caste discrimination inside prisons, incorporating basic amenities in prisons by suitably amending the Model Prison Manual 2016 will not only blur other distinctions, but will also ensure a minimum dignified life inside prisons.
Date: 12-11-24
इकोनॉमी के नए संकेतक कुछ संदेश भी देते हैंसंपादकीय
भारत जैसे सघन आबादी वाले देश में श्रम-शक्ति को कृषि-प्रधान अर्थव्यवस्था से निकालकर उद्योगों, सेवा क्षेत्रों या शहरी व्यवसायों में लाना सफल आर्थिक नीति का पैमाना है। श्रमिक अगर शहरों में नहीं रहे हैं और जीडीपी में कृषि का योगदान भी नहीं बढ़ रहा है तो क्या यह इस बात का संकेत नहीं है कि अर्थव्यवस्था के अन्य सेक्टर्स का विकास रोजगार देने वाला नहीं है। एक नया आंकड़ा इस खतरे को दर्शाता है। हम सभी जानते हैं कि मजदूरों का गांव से शहर आने का मुख्य साधन ट्रेन है। लेकिन वर्ष 2018-19 में जहां हर रोज 2.32 करोड़ लोग ट्रेन से यात्रा करते थे वे वर्ष 2023-24 में मात्र 1.84 करोड़ रह गए। जबकि आबादी इस दौरान बढ़ी है। कोरोना काल में मजदूरों के ऐतिहासिक रिवर्स माइग्रेशन के कारण वर्ष 2020-21 में रोज मात्र 34 लाख रेल- टिकट बिके। कोरोना के बाद जब अर्थव्यवस्था पटरी पर लौटने लगी तो वर्ष 2021-22 में ट्रेन यात्रियों की संख्या रोजाना 96 लाख हुई जो अगले साल 1.75 करोड़ हो गई। चूंकि ये मजदूर रेलवे का बहुतायत में इस्तेमाल करते हैं और इनके न आने-जाने से रेलवे को भी क्षति होती है लिहाजा यह नया संकेतक नीति-निर्धारकों के लिए चिंता का सबब होना चाहिए। क्या फ्री राशन, लाडकी बहन जैसी योजनाएं, किसान सम्मान निधि या अन्य सीधी नकद डिलीवरी ने इन मजदूरों को बेहतर जीवन जीने के उत्साह को कम किया है? किसी भी समाज में बेहतर जीवन जीने की इच्छा का कम होना खतरनाक स्थिति होती है। इसका एक और संकेतक है ग्रामीण मजदूर के पारिश्रमिक का लगातार कम होना। जहां जीडीपी बढ़ रही है वहीं लेबर ब्यूरो की रिपोर्ट के अनुसार पिछले पांच वर्षों में इन श्रमिकों का वास्तविक वेतन (महंगाई घटाकर ) कम होता गया है, यानी उनके जीवन की आर्थिक गुणवत्ता भी घट रही है। यानी देश का विकास पूंजी-सघन है, न कि रोजगारपरक ।
Date: 12-11-24
अर्थनीति के मैदान में क्या नियम सबके लिए समान हैं?अभय कुमार दुबे, ( अम्बेडकर विवि, दिल्ली में प्रोफेसर )
राहुल गांधी का एक हालिया लेख चर्चा में है। आलोचकों को इस लेख पर तरह-तरह की आपत्तियां हैं। मसलन, वे कह रहे हैं कि राहुल को राजे-रजवाड़ों द्वारा आजादी के आंदोलन में दिए गए योगदान की जानकारी नहीं, लेकिन, इनमें से कोई उस मुद्दे पर बात करने के लिए तैयार नहीं हैं, जो उस लेख की केंद्रीय विषयवस्तु है। पूरे लेख में सवाल यह उठाया गया है कि भारतीय पूंजीवाद की समुचित संरचना क्या होनी चाहिए, और इस समय उसका जो ढांचा है वह उचित है या अनुचित? यह एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रश्न है। सही मायनों में देश में समाजवाद न तो कभी था, और न ही कभी आने वाला है। हमारा जो भी आर्थिक विकास होगा या हो रहा है, वह पूंजीवाद के जरिए ही होना है। कॉरपोरेट सेक्टर और सरकार के बीच बनने वाला समीकरण हमारी आर्थिक नीति की चालक शक्ति है। इस विषय पर अर्थशास्त्री तो यदाकदा लिखते-विचारते हैं, पर नेता लोग इसे छूने से आम तौर पर परहेज करते हैं। अब राहुल गांधी ने इस मसले को छेड़ दिया है। इस पर राजनीतिक पक्ष-विपक्ष से हटकर बहस होनी चाहिए।
राहुल गांधी का मुख्य तर्क यह है कि आर्थिक धरातल पर सभी खिलाड़ियों और सभी टीमों के लिए समान मौकों के नियम का पालन करने के बजाय तरह-तरह से पक्षपात हो रहा है, मैच फिक्सिंग की जा रही है। इसके कारण कॉरपोरेट जगत में असंतोष है, बेचैनी है, और कुल मिलाकर सरकारी समर्थन का लाभ उठाकर अपनी मोनोपॉली कायम करने वाली गिनी-चुनी कॉरपोरेट ताकतों को छोड़कर बाकी स्वयं को शोषित और वंचित जैसा महसूस कर रहे हैं। यह सरकारी रवैया भारत की समृद्धि के रास्ते में रोड़ा है। राहुल गांधी दावा कर रहे हैं कि उनकी राजनीति सरकार द्वारा प्रोत्साहित इस मोनोपॉली का विरोध करने वाली है। उसका मकसद सभी उद्योगपतियों को अर्थनीति में समान धरातल मुहैया कराना है।
प्रश्न यह है कि क्या वास्तव में सरकारी नीतियों के दम पर भारत में मोनोपॉली को प्रोत्साहन दिया जा रहा है? पूंजी का चरित्र केंद्रीकरण वाला होता है। इसलिए उसमें मोनोपॉली होना एक स्वाभाविक प्रक्रिया है, और आम तौर पर सरकारें इस रुझान को कमजोर करने के तरीकों पर विचार करती रहती हैं। लेकिन राहुल गांधी ने सरकार पर आरोप लगाया है कि उसने न केवल मोनोपॉली के पक्ष में नीतियां बनाई हैं। बल्कि सरकारी एजेंसियों का इस्तेमाल करके उद्योग व्यापार के जगत में भय का माहौल तैयार किया है।
संसद में विपक्ष के नेता की तरफ से लगाया गया यह एक बेहद गंभीर आरोप है। इसका तो सरकार की तरफ से बाकायदा अधिकृत जवाब आना चाहिए। इस आरोप से दो अर्थशास्त्रियों की बातें याद आती हैं। दोनों ही मोदी सरकार के साथ नजदीकी तौर पर काम करते रहे हैं। ये हैं प्रोफेसर विरल आचार्य जो दो साल तक रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर रहे, और अरविंद सुब्रह्मण्यम जो मोदी सरकार के मुख्य आर्थिक सलाहकार रह चुके हैं। विरल आचार्य का एक लेख इन दिनों चर्चा में है। इसमें उन्होंने देश के पांच बड़े उद्योग-व्यापार घरानों (अदाणी, अंबानी, टाटा, भारती एयरटेल और आदित्य बिड़ला समूह) को नेशनल चैम्पियन (मोनोपॉली वाले पूंजीपतियों के लिए नया नाम) की संज्ञा दी है। उनका कहना है कि अर्थव्यवस्था के मैदान में ये पांच कॉरपोरेट समूह ही खेल रहे हैं और खेल के सारे नियम इनके लाभार्थ ही बनाए जाते हैं। इनकी ‘प्राइसिंग पावर ’ जबरदस्त है। विरल आचार्य ने यह भी कहा है कि ये पांच नेशनल चैम्पियन देश के अन्य बड़े छह से दस नंबर के उद्योग-व्यापार घरानों की कीमत पर बढ़ रहे हैं। विरल आचार्य की इन बातों का अभी तक किसी अर्थशास्त्री ने खंडन नहीं किया है।
कुछ दिन पहले अरविंद सुब्रह्मण्यम ने लिखा कि भारत में निजी क्षेत्र निवेश के लिए अपनी तिजोरी क्यों नहीं खोलता। हम जानते हैं कि भारत के निजी क्षेत्र के पास कम से कम दो लाख करोड़ की रकम न जाने कब से पड़ी हुई है, पर वह उसे अर्थव्यवस्था में लगाना नहीं चाहता। निवेश की जिम्मेदारी केवल सरकार की रह गई है। वही आधारभूत सुविधाओं के क्षेत्र में पैसा लगाती है। निजी क्षेत्र मैन्यूफैक्चरिंग और अन्य क्षेत्रों में नया निवेश नहीं करता। सुब्रह्मण्यम का कहना है कि उद्योगपति डरे हुए हैं। उन्हें लगता है कि अगर वे नया पैसा लगाएंगे तो सरकार की तरफ से उन्हें नीतिगत और संस्थागत समर्थन नहीं मिलेगा। सुब्रह्मण्यम के इस विश्लेषण का भी सरकार की तरफ से खंडन नहीं आया है।
अगर राहुल गांधी, विरल आचार्य और अरविंद सुब्रह्मण्यम की बातों पर मिला कर गौर किया जाए तो क्या तस्वीर उभरती है? कुछ न कुछ ऐसा जरूर हो रहा है जो पूंजीवाद के तहत मोनोपॉली होने की स्वाभाविक प्रक्रियाओं के परे जाता है।
Date: 12-11-24
प्रदुषण और धर्मसंपादकीय
सर्वोच्च न्यायालय ने फिर प्रदूषण को निशाने पर लेकर एक अनुकरणीय और स्वागतयोग्य संदेश दिया है। दीपावली के कुछ दिन पहले से ही राष्ट्रीय राजधानी सहित देश के एक बड़े इलाके में वायु प्रदूषण से बहुत बुरा हाल है। क्या प्रदूषण के लिए केवल दीपावली में होने वाली आतिशबाजी को जिम्मेदार मान लिया जाए ? लगभग यही सवाल सर्वोच्च न्यायालय ने भी किया है। न्यायालय ने सोमवार को दोटूक कहा है कि कोई भी धर्म ऐसी किसी गतिविधि को प्रोत्साहित नहीं करता, जिससे वायु प्रदूषण हो सकता है। साथ ही, न्यायालय ने दिसरकार को 25 नवंबर तक राष्ट्रीय राजधानी में पटाखा प्रतिबंध लगाए रखने का निर्देश दिया है। बड़े अफसोस की बात है कि दिल्ली की वायु गुणवत्ता सोमवार को लगातार 13वें दिन ‘बहुत खराब’ श्रेणी में रही। प्रदूषक तत्व मानों शहर में ठहर से गए हैं। ऐसे में, लोगों को स्वास्थ्य के मोर्चे पर भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। न्यायालय की सजगता का स्वागत होना चाहिए और लोगों को आने वाले दिनों में राहत की उम्मीद रखनी चाहिए।
हर किसी को अपने आसपास गौर करना चाहिए। प्रदूषण फैलाकर हमने हालात को किस कदर बिगाड़ लिया है? राष्ट्रीय राजधानी में धूल और धुंध की वजह से कभी-कभी 800 मीटर से ज्यादा दूर की चीजों को देखना मुश्किल हो जा रहा है। न्यायाधीश अभय एस ओका और ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने उचित ही कहा है कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत प्रदूषण मुक्त वातावरण में रहने का अधिकार एक मौलिक अधिकार है। कोई भी धर्म ऐसी किसी गतिविधि को प्रोत्साहन नहीं देता है, जो प्रदूषण को बढ़ावा देती हो या लोगों के स्वास्थ्य के साथ समझौता करती हो। सर्वोच्च न्यायालय की इस टिप्पणी का व्यापक महत्व है। धर्म पवित्रता और शुद्धता की दुहाई देता है, लोग बहुत धार्मिक होने का दावा करते हैं, मगर धर्म के पृथ्वी या पर्यावरण के अनुकूल जो संदेश निर्देश हैं, उनकी अवहेलना करते रहते हैं। वैज्ञानिक तो लगातार चेतावनी देते रहते हैं, कानून और स्वास्थ्य को लेकर भी चिंता जताई जाती है, पर बहुत से लोगों को यह बताना जरूरी है कि प्रदूषण फैलाना किसी अधर्म या दुष्कृत्य से कम नहीं है। पृथ्वी या पर्यावरण का उतना ही दोहन करना चाहिए, जितना जीवन के लिए बेहद जरूरी है।
सर्वोच्च न्यायालय ने जो कहा है, उसे विस्तार से समझने की जरूरत है। न्यायालय यह जानने के प्रयास में है कि पटाखों पर प्रतिबंध को लेकर सभी पटाखा निर्माताओं को नोटिस जारी किया गया था या नहीं ? पुलिस ने पटाखों की ऑनलाइन बिक्री पर अंकुश के लिए क्या कदम उठाए थे? न्यायालय ने माना है कि दिल्ली पुलिस ने आतिशबाजी पर प्रतिबंध के आदेश को गंभीरता से नहीं लिया। अब दिल्ली पुलिस को पटाखों पर प्रतिबंध सुनिश्चित करने के लिए अलग इकाई बनानी पड़ेगी। राष्ट्रीय राजधानी में आने वाले दिनों में शादी-विवाह या अन्य उत्सवों के समय पटाखे जलाने पर रोक लग सकती है। बेशक, पटाखों पर प्रतिबंध तार्किक होना चाहिए। यह भी सोचना चाहिए कि आतिशबाजी का विकल्प क्या है? अगर आभासी या इलेक्ट्रॉनिक आतिशबाजी की सुविधा आम लोगों तक पहुंचे और लोकप्रिय हो, तो कम से कम बड़े शहरों के तमाम आयोजनों की तस्वीर बदल जाएगी। | किसी भी सभ्य और शिक्षित समाज में स्वास्थ्य अनुकूल आयोजन मानवीयता ही नहीं, बल्कि अब जीवन की मूलभूत अनिवार्यता है।
Date: 12-11-24
सुपर ह्यूमन मशीनों के हाथों में न जाए शिक्षा की बागडोरअनुराग बेहर, ( सीईओ, अजीम प्रेमजी फाउंडेशन )
हाल-फिलहाल की कोई भी तकनीक इतनी उत्तेजना पैदा नहीं कर सकी है, जितनी जेनरेटिव आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) यानी कृत्रिम बुद्धिमत्ता ने पैदा की है। यह कल्पना की जा सकती है कि एआई में इस तरह के आश्चर्यजनक विकास के लिए जिम्मेदार लोग इसके भविष्य को लेकर सही ही कहते रहे हैं कि जल्द ही यह इंसानों से ज्यादा बुद्धिमान हो जाएगी। हमें यह अनुमान भी मान लेना चाहिए कि यह ‘बुद्धिमत्ता’ उन व्यवहारों और कार्यों को सक्षम बनाएगी, जो उन इंसानी क्षमताओं का नतीजा होती हैं, जिनको हम मूलतः मानवीय मानते हैं और उसी आधार पर फैसले लेते हैं। इसे हम सुपर ह्यूमन एआई (एसएचएआई) कह सकते हैं। मगर सवाल है कि शिक्षा में इसकी मदद किस तरह ली जा सकती है ?
ऐसे सुपर ह्यूमन रोबोट शिक्षा में चार प्रकार की भूमिकाएं निभा सकते हैं- छात्र – सहायक के रूप में, शिक्षक सहायक के रूप में, छात्रों के लिए शिक्षक के रूप में और शिक्षा प्रबंधन संबंधी कार्यों में सहायक के रूप में (इस पर हम यहां बात नहीं करेंगे)। सुपर ह्यूमन तक पहुंचने से पहले ही एआई का शिक्षा में अत्यंत सावधानी से इस्तेमाल होना चाहिए। नीति यही होनी चाहिए शिक्षा में इसका इस्तेमाल आखिरी विकल्प के रूप में हो और ऐसा तभी किया जाए, जब सुनिश्चित हो जाए कि इससे कोई खतरा नहीं है। चार परस्पर जुड़े कारणों की वजह से हमें यह नीति बनानी चाहिए। पहला कारण है, खोखला करना। अगर सुपर ह्यूमन एआई सहायक होगी, तो न शिक्षकों को और न ही छात्रों को सोचने की जरूरत पड़ेगी। यदि आप किसी क्षमता का उपयोग करना बंद कर देते हैं, तो उसको खो देते हैं या वह विकसित नहीं हो पाती। चूंकि, सुपर ह्यूमन एआई में इंसानों जैसी सोचने की क्षमता होगी, इसलिए इसके आने से ज्ञान संबंधी खोखलापन निश्चित तौर पर दिखेगा। हालांकि, लगभग सभी मानवीय क्षमताओं को लेकर यह डर बना रहेगा।
दूसरा, फॉर्म फैक्टर | यह एक तकनीकी शब्द है। इसका मतलब है कि किसी को कोई चीज किस भौतिक रूप में चाहिए- बक्सानुमा, छोटा, मुलायम या अन्य रूपों में। फोन के जरिये हमसे बातचीत करने वाले एआई का फॉर्म फैक्टर एआई रोबोट से अलग होता है, जो हमें मार भी सकता है। शिक्षा से जुड़ी हमारी इच्छाएं और सीखने की मानवीय प्रक्रियाएं कुछ ऐसी होती हैं कि फोन या कंप्यूटर वाले फॉर्म फैक्टर शिक्षा में सुपर ह्यूमन एआई का इस्तेमाल सीमित कर देंगे, क्योंकि प्रभावी शिक्षा के लिए छात्र की शारीरिक व मानसिक दशा को समझना, उसका ध्यान आकर्षित करना आदि आवश्यक होता है। और ऐसा बच्चों के समूह में किया जाना चाहिए, क्योंकि हम चाहते हैं कि वे सामाजिक बनें। इन सबका मतलब है कि सुपर ह्यूमन एआई को मौजूदा कक्षा जैसे किसी परिवेश में काम करना होगा। कप्यूटर बॉक्स या स्क्रीन के अंदर फंसे सुपर ह्यूमन एआई की अपनी सीमाएं होंगी।
तीसरा है, नियंत्रण यदि सुपर- ह्यूमन एआई वाकई उसी रूप में हो, जैसा हम सोच रहे हैं, तो क्या हम इसे अपने निजी और सामूहिक जीवन पर नियंत्रण करने की अनुमति देना पसंद करेंगे? निस्संदेह, सुपर ह्यूमन एआई नियंत्रण करना चाहेगा, चाहे शिक्षक के रूप में या सहायक के रूप में। क्या हमें इस रूप में आगे बढ़ाना चाहिए? याद रखिए, जो शिक्षा को नियंत्रित करता है, वह हमें भी काबू में करता है। चौथा है, विस्तार। यह सबसे मौजूं वजह
है। प्रौद्योगिकी मानवीय व्यसनों व विकृतियों को बढ़ाती है । यह असमानताओं को मजबूत बनाती है। इसमें सबसे अच्छी व उपयोगी चीजें हमेशा अमीरों के हाथों में होती है, जबकि गरीबों को सामाजिक आर्थिक व्यवस्था बनाए रखने के लिए इसका प्रतीकात्मक लाभ मिलता है।
शिक्षा में एआई का कोई भी लाभ अलग-अलग तरह से अमीरों के हिस्से में जाएगा, फिर चाहे वह व्यक्ति के तौर पर हो या राष्ट्र के तौर पर और इसका प्रतिकूल नतीजा सबसे पहले व सामान्य तौर पर वंचितों को ही भुगतना होगा, जिसके बाद पूरी मानवता को क्या हम शिक्षा को ऐसी किसी तकनीक के हवाले कर देना चाहते हैं, जो भले इंसानों जैसी लगे, लेकिन इंसान न हो और अधिक ताकतवर हो; जो छात्रों के दिमाग को खोखला कर दे और हमें नियंत्रित करने की स्थिति में हो; जो असमानता व संघर्ष को बढ़ा दे? इनका जवाब हमें पता ही है।
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हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने नागरिकता अधिनियम की धारा 6ए को संवैधानिक घोषित किया है।
– ज्ञातव्य हो कि संविधान में दिए गए नागरिकता प्रावधानों को 1955 में नागरिकता अधिनियम बनाकर लागू किया गया था।
– धारा 6ए का संबंध असम राज्य से है। कानून बनने के बाद बहुत से बांग्लादेशी असम राज्य में आते चले गए। इसका विरोध होने पर न्यायालय ने कहा कि एक जनवरी, 1966 तक भारत आ चुके बांग्लादेशियों को यहाँ की नागरिकता दी जाएगी।
– तत्पश्चात केंद्र सरकार का ऑल इंडिया असम यूनियन के साथ 1985 में समझौता हुआ, और नागरिकता देने की तिथि 25 मार्च, 1971 तक बढ़ा दी गई।
– लेकिन धारा 6ए के विरोध में लगातार याचिकाएं आती गईं। इनमें मुख्य आरोप यह था कि असम में आए प्रवासियों के कारण वहाँ की संस्कृति खतरे में आ गई है।
– हाल ही के निर्णय में मुख्य न्यायाधीश ने संस्कृति और सुरक्षा से जुड़े मौलिक अधिकार के अनुच्छेद 29(1) का भी उल्लेख किया, और कहा कि धारा 6ए का उद्देश्य असम में आप्रवासी आबादी के प्रति मानवीय दृष्टिकोण रखना था। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित भी करना था कि बड़े पैमाने पर आप्रवासन के कारण असम के लोगों के सांस्कृतिक, आर्थिक और राजनीतिक अधिकारों का नुकसान न हो। इस प्रकार न्यायालय में बहुमत की धारा 6ए को संवैधानिक घोषित करना 19 लाख लोगों के लिए राहत की बात है।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 22 अक्टूबर, 2024
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Date: 11-11-24
Baku To BasicsTrump may not blow up climate talks altogether. But COP29’s goals are still nearly unachievableTOI Editorials
As the annual UN climate summit COP29 gathers in Baku, Azerbaijan, it faces a forbidding future. Trump, backed to the hilt by fossil fuel interests, will be back in White House, which threatens a huge vibe-shift. He has indicated US would again exit the Paris climate agreement.
Climate finance is COP29’s main theme, where rich industrialised nations will have to up a new, bigger fund-a new collective quantified goal – to help developed and vulnerable nations transition away from fossil fuels and adapt to climate change. Given US is both the richest country and the largest GHG emitter, this abdication of responsibility will certainly throw off negotiations. There’ll be an CLINE CHANGE effort to draw in more nations to contribute funding, especially China and Gulf states, and resistance from those who don’t want to pay for a crisis they didn’t cause, and whose per capita emissions are still only a fraction of the wealthy Western nations. Meanwhile, more than half of all planned oil and gas expansion is set to come from five rich countries too. So geopolitical jockey- ing around justice, development and debt will
mark the Baku summit.
But it’s not all doom and darkness. Trump has pulled this act before, without destroying the climate project altogether. Outside the COP framework, parallel commitments have been signed by private sector, govts and philanthropists. Renewable energy is cheaper than ever. Solar power costs have plunged by 90% the last decade, and there’ve been dramatic improvements in battery storage and wind energy. China’s emissions are also projected to peak and decline before the decade ends. And yet, these advances are dwarfed by the scale of the challenge. This summit will reveal the extent to which a fractured world can get it together in the collective interest.
Date: 11-11-24
Don’s Climate Picture Abhi Baku HaiET Editorials
Donald Trump is one of the last-standing climate deniers among global leaders. While the jury is still out as to how his re- entry into the Oval Office will pan out for America’s ‘Great Again’ plans, his return does set brows furrowing on the clima te mitigation front. Reports such as the Copernicus Climate Change Service indicate that 2024 is poised to be the warmest year on record, and the first year to exceed 1.5°C above pre-in- dustrial levels. Effects of rising temperatures-floods, hurri- canes and droughts are impacting across the world, with hu- ge economic losses and human fatalities. In this context, Trump’s victory speech last Wednesday has fuelled concerns. He assured the oil and gas industry they’re ‘safe’ with him.
However, Trump is also an astute busi- nessman, and he’ll not miss an important data point: since passage of the Inflation Reduction Act (IRA) in 2022, clean energy and EV investments have surged 306%, compared to the two years before IRA. This trajectory is irreversible, even though glo- bal demand for oil remains steady, especi- ally from Asian economies and the petrochem sector. Trump’s policies could enable US oil and gas firms to exploit this, potenti- ally pushing two-speed decarbonisation a strategy that invol ves pursuing decarbonisation in some areas while continuing to expand fossil fuel use in other areas with countries like In dia slowing down their transition in sectors like transport.
As countries gather in Azerbaijan this week for COP29, Trump is the glant elephant in the room. Emerging economi- es, especially India, must take the lead to ensure the world do- esn’t lose sight and the fight against climate change-keep investing in clean tech and R&D, and develop low-cost solu tions for the world.
Date: 11-11-24
National minorityCourt ruling affirms need to preserve character of educational institutionsEditorial
The entitlement of religious and linguistic minorities to constitutional protection in India often gives rise to questions about how an institution’s “minority character’ is deter- mined. Drawing on precedents and adding value of its own, a seven-judge Constitution Bench of the Supreme Court of India, by a 4:3 majority, has laid down the ‘indicia’ required for identify- ing a minority institution. Much of the focus has been on the Aligarh Muslim University (AMU), which stands to gain by dint of this verdict in its efforts to vindicate its minority character, but it will only be a regular Bench that would take a call on its status. The AMU’s character is unique: it was established by Sir Syed Ahmad Khan in 1875 as a teaching college for the benefit of Muslim stu- dents, and was recognised as a university by an Act of the Central Legislature in 1920. In the Con- stitution, it was referred to as an institution of na- tional importance, along with the Benares Hindu University. A 1967 Supreme Court judgment held that it was not entitled to the benefit of being a minority institution under Article 30(1), as it was established by legislation and not by the Muslim community. Amendments brought in 1981 to the AMU Act sought to dilute the import of this ver- dict by changing some definitions. The current dispensation at the Centre argued in court that it was not a minority institution.
In a well-reasoned judgment, (the now form- er) Chief Justice of India D.Y. Chandrachud has rightly ruled that the fact that a statute was enact- ed to confer university status would not remove the minority character of a pre-existing institu- tion, and that the main criteria for identifying an institution’s status would be based on details such as who founded it, who made efforts to bring it into being, whether it was aimed at pro- moting the interests of that particular minority, and its administrative structure affirmed its mi- nority character. Also, a statute was required to incorporate any university prior to the passage of the University Grants Commission Act, 1956, and it could not be argued that an institution surren- ders its constitutional right in exchange for get- ting its degrees recognised. At least one dissent- ing judge, Justice Dipankar Datta, held that the AMU was not a minority institution. One aspect of this discussion is the scope for reservation in the AMU. If stripped of its minority character, it could be brought under the ambit of the reserva- tion for Scheduled Castes, Scheduled Tribes and Other Backward Classes. Whether an institution of national importance requires the minority tag is a valid question, but it is a matter of equal con- cern if a prestigious university identified with a distinctive educational and cultural ethos should be stripped of its original character. An ahistori- cal perspective unaided by any sense of context is unhelpful.
Date: 11-11-24
Can India get rich before growing old?To reap its demographic dividend before it becomes too late, India must create jobs in manufacturingHarshit Rakheja , Yuvraj Khetan, ( Communications Manager, Foundation for Economic Development & Programme Manager at the Foundation for Economic Development )
There has been a lot of hype about India’s demographic dividend, ever since liberalisation unlocked possibilities beyond the reach of our once socialist, more austere imagination. Demographic dividend denotes a country’s economic growth advantages when most of its population is in the working-age bracket. Today, the dividend has become this vague, almost mythical assurance of perpetual economic growth. Unfortunately, as often happens with things that are, or assumed to be, perpetual, we take them for granted. This perhaps explains why we end up resenting the ‘extra’ number of people vying for education, employment, and housing. Politicians then give expression to this resentment by trying to reserve jobs for locals.”
The middle-income trap
A reality check is in order. Even though three-fourths of India’s population is aged 15-64, the dividend, as it turns out, is not the silver bullet that we have held it out to be, nor is it perpetual. India’s total fertility rate (TFR)- the average number of children a woman has in her lifetime – is declining at a faster pace than was anticipated a decade ago. Projections suggest that within 10 years, the proportion of working-age individuals in the total population will begin to fall, marking the beginning of the end of India’s demographic dividend. Most States are now below the replacement-level fertility rate of 2.1 children per woman, needed to maintain a stable population. Southern States such as Andhra Pradesh and Karnataka, with TFRS below 1.75, are leading this trend. Other States, including Punjab and West Bengal, are also experiencing similar declines, indicating that this is a nationwide phenomenon.
India’s rapid decline in TFR also challenges conventional wisdom, which links lower birth rates to improvements in education and income. Despite modest gains in per capita income, which stillplaces India among lower-middle-income countries, the country’s TFR has dropped from 2.6 in 2010 to 1.99 today. As India approaches middle-income status by the next decade, this decline is expected to accelerate. Whether India can get rich before it grows old is no longer just an alarmist concern; it has become an existential dread.
What is even more worrying is that our dividend is right now being wasted as people remain stuck in low-productivity agricultural jobs or remain unemployed while preparing for competitive exams. Since liberalisation, India has reduced the proportion of its workforce in low productivity agriculture by a mere 17 percentage points, from 63% to 46%; for comparison, 30 years after China’s liberalisation, the country’s share of workers in agriculture reduced by 32 points, from 70% to 38%. Meanwhile, India’s labour force participation rate (LFPR) in urban areas remains at a dismal 50%. If India continues on this path, it risks falling into a middle-income trap from which only a handful of countries have escaped. Even China, after years of rapid growth, is slowing down. India must not assume it will fare any better, especially as its demographic window narrows.
Focus on manufacturing
So, what must we do to leverage the demographic dividend before it is too late? Throughout history, the proven path for economic growth has been the movement of workers from low-productivity sectors such as agriculture to higher-productivity jobs in manufacturing and services. While the services sector has grown significantly, manufacturing has stagnated in India. This needs to be addressed, because manufacturing, particularly in labour-intensive industries, creates far more jobs than services. For example, the textile and apparel industry, worth $150 billion, employs 45 million people, compared to 5.5 million in the
$250 billion IT-BPM sector. Moreover, textile factories often employ 60-70% women, empowering those who might otherwise be confined to unpaid work (only three out of 10 working age Indian women are in the labour force).
Manufacturers in India face significant challenges. According to recent World Bank surveys, one in six manufacturers cites business licensing and permits as major constraints, compared to less than 3% in Vietnam. Similarly, access to land and cumbersome customs and trade regulations are major hurdles, with 17% of manufacturers facing such issues, compared to 3% in Vietnam. These barriers are stifling manufacturing growth. Thus, India must improve its business environment, which is crucial for enabling large-scale job creation.
The Central government should lower tariffs to make inputs cheaper for Indian manufacturers and boost exports. Finalising long-pending free trade agreements with the U.K. and EU should be another priority to expand market access for Indian products. State governments should be bolder with labour reforms, allowing workers to choose flexible work arrangements, and also look into land and building regulations for factories. As per a recent report by Prosperiti, many factories can only use half their land due to restrictive building standards, which increases manufacturing costs. Additionally, restrictions on creating worker housing in industrial zones raise hiring costs. Addressing these issues and improving the investment climate must be India’s priorities.
We must strive to capitalise on our demographic dividend. With a similar per capita income to India in the 1980s, China transitioned millions from agriculture to manufacturing. It is time India stops patting itself on the back for the short-lived blessing that is its demographic dividend’ and gets to work on leveraging it.
Date: 11-11-24
बाकू सम्मेलन पर टिकीं निगाहेंआदित्य सिन्हा, ( लेखक प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद में ओएसडी-अनुसंधान हैं )
समूचा विश्व जलवायु परिवर्तन की गंभीर होती समस्या का समाधान तलाशने में जुटा है। ऐसे में, सभी की नजरें अजरबैजान के बाकू पर लगी हैं। बाकू में काप-29 सम्मेलन आयोजन होने जा रहा है। कांफ्रेंस आफ पार्टीज यानी कॉप सम्मेलन विश्व भर के नेताओं, कार्यकर्ताओं और उद्यमियों से लेकर तमाम अंशभागियों का ऐसा सालाना सम्मेलन है, जहां जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर मंत्रणा की जाती है।संयुक्त राष्ट्र की इस पहल के बाकू सम्मेलन में वार्षिक जलवायु फाइनेंसिंग टारगेट और बहुपक्षीय कार्बन क्रेडिट सिस्टम में प्रगति के साथ ही जलवायु परिवर्तन जोखिम के लिहाज से नाजुक देशों के प्रति वित्तीय प्रतिबद्धता जैसे अहम समझौतों पर कुछ सहमति बनाने के प्रयास होने के आसार हैं। कहने को तो इस सम्मेलन में सर्वानुमति को प्राथमिकता दी जाती है, लेकिन जमीनी हकीकत यही दर्शाती है कि लक्ष्यों की प्राप्ति में अपेक्षित प्रगति नहीं हुई और सफलता के लिए कार्रवाई की गति तेज करनी होगी।मौजूदा यथास्थिति के पीछे व्यापक रूप से यही मान्यता है कि विकसित देश जलवायु परिवर्तन से निपटने की दिशा में अपनी भूमिका के साथ न्याय नहीं कर पा रहे। ऐतिहासिक रूप से अपने उत्सर्जन दायित्व के बावजूद कुछ विकसित देश जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए पर्याप्त वित्तीय संसाधन नहीं उपलब्ध करा रहे हैं।इसमें देरी से विकासशील देशों की ऐसी क्षमताएं प्रभावित हो रही हैं, जिनसे वे जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए प्रभावी रणनीति बना सकें। उनके लिए अपनी आर्थिक वृद्धि और पर्यावरणीय निरंतरता के साथ संतुलन बिठाना मुश्किल हो रहा है। विकसित देशों को इस विसंगति की ओर ध्यान देकर पर्याप्त संसाधन उपलब्ध कराने की दिशा में प्रयास करने चाहिए।
जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निपटने की राह में विकासशील देशों की राह में सबसे प्रमुख अवरोध वित्तीय संसाधनों का अभाव है। अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं के बावजूद विकसित देशों का योगदान आवश्यक स्तर से कम है। वर्ष 2022 में विकसित देशों ने 115.9 अरब डालर उपलब्ध कराए और पहली बार 100 अरब डालर के वार्षिक लक्ष्य का आंकड़ा पार हुआ। हालांकि यह अभी भी कम है, क्योंकि अगर विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन से जुड़े लक्ष्य हासिल करने हैं तो 2030 तक हर साल दो ट्रिलियन (लाख करोड़) डालर राशि की आवश्यकता होगी। कर्ज का अंबार विकासशील देशों की राह में एक और बाधा बना हुआ है। तमाम विकासशील देश कर्ज के बोझ से ऐसे कराह रहे हैं कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए आवश्यक कदम उठाने के लिए उनके पास संसाधन बहुत सीमित हो जाते हैं। वर्ष 2011 से 2022 के बीच उन देशों की संख्या 22 से बढ़कर 59 हो गई, जिनका कर्ज उनकी जीडीपी के 60 प्रतिशत के स्तर को पार कर गया।
इसमें तीसरी बाधा निजी पूंजी से जुड़ी सीमित पहुंच की है। चूंकि जलवायु परिवर्तन से जुड़े उपक्रमों में प्रतिफल कम होने के साथ ही कई जोखिम भी जुड़े होते हैं तो निजी निवेशक अक्सर उनमें निवेश से कतराते हैं। वर्ष 2022 में निजी क्षेत्र द्वारा इस मद में केवल 21.9 अरब डालर ही जुटाए जा सके जो आवश्यकता के अनुपात में बहुत कम है। एडाप्टेशन यानी नई तकनीकी को अपनाने में फंडिंग की कमी भी एक बड़ी बाधा बनी हुई है।
इस मद में वर्ष 2021 में विकासशील देशों के लिए अंतरराष्ट्रीय फंडिंग 21.3 अरब डालर रही जबकि इसके लिए सालाना 215 से 387 अरब डालर की आवश्यकता है। यह अंतर कई देशों की स्थिति को जलवायु परिवर्तन के प्रभावों के प्रति और नाजुक बना सकता है। पांचवीं बाधा आर्थिक कमजोरी और बुनियादी ढांचे की कमी से जुड़ी है।अधिकांश विकासशील देश अस्थिर आर्थिकी वाले देश हैं, जहां बुनियादी ढांचा भी समुन्नत नहीं। इससे जलवायु परिवर्तन के प्रभावों की दृष्टि से इनकी स्थिति नाजुक बन जाती है। जबकि निवेशकों के लिए ये कम आकर्षक होते हैं। उदाहरण के लिए अफ्रीका विश्व का केवल दो से तीन प्रतिशत कार्बन उत्सर्जन करता है, लेकिन जलवायु परिवर्तन की तमाम चुनौतियों के साथ ही ऊर्जा की किल्लत से भी जूझ रहा है। स्वाभाविक है कि ग्रीन ट्रांजिशन यानी हरित संक्रमण की उसकी राह कठिन बनी हुई है।
स्पष्ट है कि कार्बन उत्सर्जन में कम योगदान के बावजूद विकासशील देश ही जलवायु परिवर्तन की सबसे अधिक तपिश झेल रहे हैं। विकसित देशों के वादों से भी वे आजिज आ चुके हैं। खासतौर से ग्रीन क्लाइमेट फंट यानी जीसीएफ जैसी संकल्पना का पूरी तरह साकार न होना विकासशील देशों को कचोटता है। ऐसे में कोई हैरानी नहीं कि विकासशील देशों को इस मामले में विकसित देशों की मंशा पर ही संदेह होने लगे।
कई विकासशील देशों की दलील है कि वे अभी भी गरीबी, तमाम बीमारियों और लचर बुनियादी ढांचे जैसी समस्याएं झेल रहे हैं, जिनके समाधान के लिए उन्हें ऊर्जा एवं संसाधनों की दरकार है। वहीं, विकसित देश कार्बन उत्सर्जन में अपने पुराने और भारी योगदान को अनदेखा करते हुए विकासशील देशों पर जल्द से जल्द उत्सर्जन कम करने के लिए ऐसा दबाव डालते हैं कि वे उनकी गति से ताल मिलाएं। इस प्रकार विकासशील देशों की सामाजिक-आर्थिक वास्तविकताओं का संज्ञान लिए बिना ही अमीर देशों द्वारा लक्ष्य तय किया जाना भी असंतोष का एक कारण बन रहा है।
इसमें कोई संदेह नहीं कि जलवायु परिवर्तन से उपजी प्रतिकूल मौसमी परिघटनाओं ने उन देशों एवं समुदायों को बहुत ज्यादा क्षति पहुंचाई है, जो ग्लोबल वार्मिंग के लिए अपेक्षाकृत कम जिम्मेदार हैं। मिस्र में हुए कॉप 27 में नुकसान एवं क्षतिपूर्ति कोष की पहल हुई थी, लेकिन उसमें पर्याप्त योगदान न होने से उसकी उपयोगिता सीमित बनी हुई है। ऐसे में यह उचित ही होगा कि विकासशील देश उस नुकसान एवं क्षतिपूर्ति मुआवजे पर भी जोर दें, जिसकी चर्चा तो बहुत हुई थी, लेकिन उस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए। बाकू में विकासशील देशों को इसके लिए अपनी आवाज बुलंद करनी होगी, क्योंकि यह न केवल न्याय के दृष्टिकोण से, अपितु उनके अस्तित्व के लिहाज से भी बेहद अहम है।
Date: 11-11-24
बिला वजह विवादसंपादकीय
सुप्रीम कोर्ट ने अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी को अल्पसंख्यक संस्थान से वंचित करने वाले 1967 के अजीज वाशा केस को पलटते हुए अल्पसंख्यक संस्थान घोषित करने का मसला रेग्युलर बेंच को दे दिया। अदालत ने कहा कि कोई संस्थान कानून के तहता बना है तो भी अल्पसंख्यक संस्थान होने का दावा कर सकता है। अनुच्छेद 30 अल्पसंख्यकों को शैक्षणिक संस्थान स्थापित करने और उनका प्रशासन करने के अधिकार से संबंधित है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने 2006 के अपने फैसले में एएमयू को अल्पसंख्यक संस्थान नहीं माना था जिसके खिलाफ सबसे बड़ी अदालत में याचिका दायर की गई थी। 2019 में सुप्रीम कोर्ट की तीन जजों की पीठ ने इसे सात जजों की पीठ को भेज दिया था। बीती फरवरी में यह फैसला सुरक्षित रख लिया गया था। 1967 में अजीज याशा बनाम भारत गणराज्य मामले में शीर्ष अदालत ने भी एएमयू का अल्पसंख्यक दर्जा खत्म कर दिया था। कहा कि कानून के मुताबिक स्थापित संस्थान अल्पसंख्यक होने का दावा नहीं कर सकता पर 1981 में सरकार ने एएमयू एक्ट में संसोधन कर विवि का यह दर्जा बरकरार करदिया। एएमयू को लेकर समय-समय पर विवाद होता रहा है आजादी की क्रांति का हिस्सा रहे सर सैय्यद अहमद खान ने इसके गठन में मुख्य भूमिका निभाई थी। समान शिक्षा के मामले में पिछड़ते मुसलमानों की स्थिति सुधारने की मंशा से उन्होंने तमाम तरक्की पसंद मुसलमानों के साथ मिल कर इस विवि की नींव डाली थी। उनका सपना था कि देश के मुसलमान उच्च शिक्षा हासिल कर प्रतिष्ठित पदों कर काबिज हों। एएमयू में फिलवक्ता सैंतीस हजार से अधिक छात्र पढ़ते हैं जिन्हें बगैर किसी जाति, पंथ, संप्रदाय या लिंग के भेदभाव के शिक्षा प्रदान की जा रही है। हालांकि कुछ पाठ्यक्रम सार्क और राष्ट्रमंडल देशों के छात्रों के लिए आरक्षित हैं। धार्मिक आधार पर देशवासियों को बांटने की राजनीति करने वालों के लिए यह करारा झटका हो सकता है जबकि उच्च शिक्षा प्राप्त करने को लालायित युवाओं को बेहतर शैक्षिक वातावरण देने के प्रयास होने चाहिए। शिक्षण संस्थानों को राजनीतिक विवादों से परे रखना चाहिए। सवाल अल्पख्यक शिक्षण संस्थान का नहीं है, बल्कि उच्च गुणवत्ता की शिक्षा प्रदान करने का होना चाहिए जिसमें हमारे विश्वविद्यालय बुरी तरह से असफल हैं। विश्वविद्यालयों की वैश्विक रैंकिंग में फिसड्डी साबित होने के बावजूद हमारा ध्यान उधर नहीं है जो छात्रों के बेहतरीन भविष्य के लिए बेहद जरूरी है।
Date: 11-11-24
चुनावी रेवड़ी या गरीबों की मददआलोक जोशी, ( वरिष्ठ पत्रकार )
मुफ्त, मुफ्त, मुफ्त … चुनाव आते ही किसी क्लियरेंस सेल जैसा माहौल बन जाता है। रस्ते का माल सस्ते में की तर्ज पर राजनीतिक पार्टियां वादे पर वादा करती जाती हैं और अब तो ज्यादातर पार्टियां सरकार बनते ही उन वादों को पूरा करने में भी जुट जाती हैं। कई दशक पहले दक्षिणी राज्यों से शुरू हुआ यह सिलसिला अब करीब-करीब पूरे देश में फैल चुका है। चमत्कारी बात यह है कि हरेक पार्टी ऐसे वादे करती है और दूसरे पर उंगली उठाने का कोई मौका भी नहीं चूकती।
अभी झारखंड और महाराष्ट्र में चुनाव गर्मी पकड़ ही रहा था कि एक बार फिर यह किस्सा खुल गया। मजे की बात यह है कि इस बार वाद-विवाद की शुरुआत कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे के एक बयान से हुई और वह भी कांग्रेस की सरकार वाले राज्य कर्नाटक में। खरगे के बयान को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लपक लिया और फिर कांग्रेस के नेता भी खुलकर मैदान में उतर गए। शुरुआत इस बात से हुई कि कर्नाटक सरकार महिलाओं के लिए मुफ्त बस सेवा देने वाली शक्ति योजना खत्म करने जा रही है। खरगे के सवाल उठाते ही कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धरमैया और उप-मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने तुरंत उन्हें दुरुस्त किया और कहा कि योजना की समीक्षा की बात हुई है, खत्म करने की नहीं। लेकिन यह बात खुले मंच से हुई, जहां पूरे प्रदेश का मीडिया मौजूद था। खरगे ने एक तरह से राज्य के नेताओं को फटकार लगाई और कहा कि उन्हें ऐसी बातें नहीं कहनी चाहिए, जिनका दूसरी पार्टियां फायदा उठा सकें। साथ ही उन्होंने यह भी कह दिया कि ‘राज्य का बजट देखकर ही गारंटी देनी चाहिए। अगर आप बजट से ज्यादा की गारंटी दे देंगे, तो दिवालिया हो जाएंगे। सड़क बनाने के लिए मिट्टी तक नहीं मिलेगी और लोग आपको दोष देंगे।’ उनका यह बयान झारखंड व महाराष्ट्र विधानसभा चुनावों के लिए था। उन्होंने साफ कहा कि कांग्रेस राज्यों के बजट का अध्ययन करेगी और उसके हिसाब से ही एलान किया जाएगा कि क्या गारंटी दी जाएंगी।
खरगे की इस बात से किसी को क्या ऐतराज हो सकता है? जो भी सुनेगा, यही कहेगा कि समझदारी की बात है, राजनीतिक दलों को ऐसा ही करना चाहिए। मगर राजनीति ऐसे तो चलती नहीं है। बीजेपी ने बात पकड़ ली और खुद प्रधानमंत्री मैदान में आ गए। उन्होंने कहा कि कांग्रेस गलत वादे करके बेनकाब हो गई है। इसके साथ ही भाजपा ने सवाल उठाना शुरू कर दिया कि सिद्धरमैया सरकार ने कर्नाटक की माली हालत खस्ता कर दी है और सरकार के पास वादे पूरे करने के लिए पैसे नहीं हैं। हालांकि, कांग्रेस की तरफ से इसका खंडन हो रहा है, लेकिन बाकी देश में यह विवाद छिड़ गवा है कि चुनावी वादे जनता की भलाई के लिए हैं या फिर वोट जुटाने के लिए रेवड़ी बांटने की कवायद है?
और फिर महाराष्ट्र चुनाव के लिए महाविकास आघाड़ी, यानी कांग्रेस गठबंधन की तरफ से पांच गारंटियों का एलान भी हो गया। खुद राहुल गांधी ने यह एलान किया। इनमें महिलाओं के लिए तीन हजार रुपये महीने का भुगतान और महिलाओं व बच्चियों के लिए मुफ्त बस सेवा देने वाली महालक्ष्मी योजना पहली गारंटी है। दूसरी गारंटी है किसानों के लिए तीन लाख रुपये तक की कर्जमाफी और कर्ज चुकाने वाले किसानों को पचास हजार रुपये की प्रोत्साहन राशि । इसे कृषि समृद्धि कहा गया है। तीसरी गारंटी है- राज्य में जातिगत गणना और आरक्षण में पचास प्रतिशत की सीमा खत्म करने का एलान चौथी गारंटी है- पच्चीस लाख रुपये तक का स्वास्थ्य बीमा और मुफ्त दवाएं। पांचवां वादा है- बेरोजगार नौजवानों को प्रतिमाह चार हजार रुपये तक की सहायता ।
मानना चाहिए कि कांग्रेस और उसके साथी दलों ने महाराष्ट्र का बजट पढ़कर ही ये वादे किए होंगे, लेकिन यह सवाल तो उठेगा कि इनमें से कितने वादे पूरे हो पाएंगे और क्या जनता इन पर भरोसा करेगी ? यहां यह भी ध्यान रखना चाहिए कि कांग्रेस के वादों पर सवाल उठाने वाली भाजपा भी महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे की ‘माझी लाडकी बहीण योजना’ पर जबर्दस्त जोर दे रही है।
ये चुनावी वादे हैं या रेवड़ी, यह सवाल दो साल पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ही खड़ा किया था, जब कांग्रेस ने कर्नाटक, तेलंगाना और हिमाचल प्रदेश के चुनावों में भी महिलाओं और नौजवानों के लिए ऐसे ही वादे किए थे। हिमाचल में कांग्रेस ने दस चुनावी वादे किए थे। तीनों जगह महिलाओं और नौजवानों को लुभाने के लिए उन्हें हर महीने भत्ता देने का वादा हुआ कह सकते हैं, पार्टी को इसका फायदा भी मिला। लेकिन तेलंगाना में केसीआर और आंध्र में जगन मोहन रेड्डी अपनी सरकारों की कल्याणकारी योजनाएं गिनाते रह गए और वोटरों ने उनका साथ नहीं दिया। जबकि मध्य प्रदेश में भाजपा की जीत में ऐसी ही योजना की बड़ी भूमिका मानी जा रही है। राज्यों के चुनाव को छोड़ भी दें, तो देश की राजनीति में किसान सम्मान योजना, मुफ्त रसोई गैस, मुफ्त शौचालय, मुफ्त घर और मुफ्त अनाज योजना ने जो भूमिका निभाई है, उसे भला कैसे नजरंदाज करेंगे?
नोबेल विजेता अर्थशास्त्री भी अब कह रहे हैं कि आने वाले वक्त में सबके लिए काम जुटाना संभव नहीं होगा, ऐसे में सरकारों को न सिर्फ गरीबों को मदद देने, बल्कि बिना उनके आत्मसम्मान को चोट पहुंचाए मदद का इंतजाम करना पड़ेगा। केंद्र या राज्य सरकारों के हाल देखें, तो वे मदद पहुंचाने में अपना भी राजनीतिक फायदा देख पा रही हैं। सम्मान का सवाल अभी केंद्र में आ नहीं पाया है।
ऐसी परिस्थिति में लखनऊ के मशहूर नवाब आसिफुद्दौला की याद लाजिमी है, जिन्होंने 18वीं सदी में अकाल पीड़ित जनता को राहत देने के लिए इमामबाड़ा जैसी बड़ी इमारत बनवाई थी। इसमें हजारों लोगों को काम दिया गया, ताकि लोग मेहनत करके पैसा कमा सकें, उन्हें खैरात लेने की जिल्लत न झेलनी पड़े। तभी से यह जुमला प्रसिद्ध है जिसको न दे मौला, उसको दे आसिफुद्दौला क्या आज इसी अंदाज में राहत देना संभव नहीं रह गया है ? काम के बदले अनाज और मनरेगा जैसी योजनाओं को मजबूत करना क्या बेहतर तरीका नहीं होगा? इस सवाल का जवाब सिर्फ सरकारों और राजनेताओं को नहीं, बल्कि उन्हें कुर्सी तक पहुंचाने वाले वोटरों को भी देना होगा।
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शांति, बहुध्रुवीयता और बहुपक्षवाद के प्रति भारत का समर्थन, न केवल विकासशील बल्कि विकसित देशों के लिए भी महत्वपूर्ण है।
‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 22 अक्टूबर, 2024
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Date: 09-11-24
पर्यावरण मामलों में अमीर देशों का रवैया बदलेगा?संपादकीय
विश्व पर्यावरण परिवर्तन सम्मेलन (सीओपी – 29 ) अजरबैजान में 11 से 22 नवंबर के बीच होगा। थीम है, फाइनेंस सीओपी। यह संकल्प पेरिस कांफ्रेंस में लिया गया था, लेकिन अमीर देश इस मदद के लिए आगे आना तो दूर, प्रारूप भी नहीं बना पाए हैं। इस बीच इस पर काम करने वाले अंतरराष्ट्रीय संगठन ‘आई- फॉरेस्ट’ ने एक रिपोर्ट में भारत का हवाला देते हुए बताया कि इस देश को अगले 30 वर्षों में कोयला-ऊर्जा से पूर्ण मुक्ति पाने में करीब 84 लाख करोड़ रु. का खर्च आएगा। कोयला आधारित ऊर्जा ग्रीनहाउस उत्सर्जन के अनेक बड़े कारकों में प्रमुख मानी जाती है और भारत कोयला-आधारित ऊर्जा उत्पादन में दूसरे स्थान पर है। रिपोर्ट के अनुसार भारत सरकार को हर साल कम से कम सवा दो लाख करोड़ रुपए इस मद में खर्च करने होंगे। यह राशि भारत में विगत वर्ष दी गई कुल प्रमुख सब्सिडीज का 60% है। क्या एक विकासशील देश के लिए ऊर्जा को पूर्णरूपेण हरित बनाने में इतनी बड़ी राशि अलग से खर्च करना संभव होगा? समस्या सिर्फ कोयला खदान या कोयला-आधारित बिजली संयंत्र बंद करने की नहीं है। केवल सरकारी कोयला उत्पादन इकाइयों में 3.70 लाख लोग काम करते हैं। इसके अलावा निजी क्षेत्रों की इकाइयां भी हैं। इनकी पुनर्स्थापना में भारी खर्च आएगा। क्या अमीर दुनिया रवैया बदलेगी ?
Date: 09-11-24
विशेष दर्जे की मांगसंपादकीय
जम्मू-कश्मीर विधानसभा में विशेष दर्जे के प्रस्ताव पर तीसरे दिन भी हंगामा होना यही बताता है कि एक ऐसे मसले को तूल दिया जा रहा है, जिससे राज्य की जनता को कुछ हासिल होने वाला नहीं है। नेशनल कांफ्रेंस सरकार ने विशेष राज्य के दर्जे की मांग वाला प्रस्ताव पारित कराते समय यह स्पष्ट नहीं किया कि इसका आशय क्या है। ऐसा शायद जानबूझकर किया गया, ताकि इस आरोप से बचा जा सके कि उनकी सरकार अनुच्छेद 370 और 35 ए की वापसी चाहती है, लेकिन इसके चलते उसे भाजपा विधायकों की आपत्ति का सामना करना पड़ा और पीडीपी एवं निर्दलीय विधायकों की नाराजगी भी झेलनी पड़ी। इसी के चलते विधानसभा में लगातार हंगामा हुआ। अच्छा होता कि प्रस्ताव में यह स्पष्ट किया जाता कि विशेष राज्य के दर्जे का मतलब क्या है? यदि सत्तारूढ़ नेशनल कांफ्रेंस और उसे समर्थन दे रही कांग्रेस यह चाह रही हैं कि जम्मू-कश्मीर को फिर से कुछ वैसे ही अधिकार मिल जाएं, जैसे अनुच्छेद 370 और 35 ए के तहत मिले हुए थे तो ऐसा कभी नहीं होने वाला। एक तो सुप्रीम कोर्ट इन दोनों विभाजनकारी अनुच्छेदों को निष्प्रभावी करने के मोदी सरकार के फैसले पर मुहर लगा चुका है और दूसरे, पहले वाली स्थिति बहाल होने का अर्थ होगा अलगाव को नए सिरे से खाद-पानी मिलना और साथ ही अनुसूचित जातियों-जनजातियों को उनके अधिकारों से वंचित करना ।
यह विचित्र भी है और चिंताजनक भी कि पीडीपी और निर्दलीय विधायक विशेष राज्य के दर्जे की मांग के बहाने न केवल अनुच्छेद 370 और 35 ए की बहाली चाह रहे हैं, बल्कि उस व्यवस्था को फिर से लागू करने पर भी जोर दे रहे हैं, जिसके तहत जम्मू- कश्मीर के मुख्यमंत्री को प्रधानमंत्री कहा जाता था । अच्छा होगा कि उमर अब्दुल्ला सरकार इस सच को स्वीकार करे कि अनुच्छेद 370 और 35 ए की बहाली कभी नहीं हो सकती। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला और उनके सहयोगियों को इन अनुच्छेदों की वापसी की मांग करने से ही नहीं बचना चाहिए, बल्कि जो भी नेता इस मांग पर जोर देकर कश्मीर की जनता को बरगला रहे हैं और उसे दिवास्वप्न दिखा रहे हैं, उन्हें आगाह भी करना चाहिए। इसलिए और भी, क्योंकि इससे अलगाववादियों और पाकिस्तानपरस्त तत्वों कोही सक्रिय होने का अवसर मिलेगा। इसके नतीजे अच्छे नहीं होंगे। इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि नई सरकार के गठन के बाद से राज्य में आतंकियों की गतिविधियां बढ़ती दिख रही हैं। जम्मू-कश्मीर सरकार इसके पहले राज्य के दर्जे की बहाली की मांग वाला प्रस्ताव भी पारित कर चुकी है। इस प्रस्ताव को उपराज्यपाल ने केंद्र सरकार को प्रेषित कर एक सकारात्मक संदेश देने के साथ यह भी रेखांकित किया है कि हालात अनुकूल होने पर इस मांग को पूरा किया जाएगा। ऐसे में उमर अब्दुल्ला सरकार के लिए बेहतर यही है कि वह हालात अनुकूल बनाने पर ध्यान दे।
Date: 09-11-24
रिक्तियों पर मनमानीसंपादकीय
सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने कहा है कि सरकारी नौकरी की प्रक्रिया चालू होने के बाद नियमों में बदलाव नहीं किया जा सकता। मामले में नौकरी से जुड़ी लिखित परीक्षा और साक्षात्कार के उपरांत 75% नंबर पर नियुक्ति का नियम बना दिया गया था। मामला राजस्थान हाई कोर्ट में अनुवादकों की भर्ती प्रक्रिया से संबंधित है। अदालत ने इस पर कहा कि नियमों में पहले से इसकी व्यवस्था हो कि पात्रता में बदलाव हो सकता है तो ही ऐसा किया जा सकता है। लेकिन समानता के अधिकार का उल्लंघन करते हुए मनमाने तरीके से ऐसा नहीं हो सकता। पीठ ने कहा कि मौजूदा नियमों या विज्ञापन के तहत मानदंडों में बदलाव की अनुमति है तो इन्हें संविधान के अनुच्छेद 14 के अनुरूप होना चाहिए। चयन सूची में स्थान मिलने से नियुक्ति का कोई अपरिहार्य अधिकार नहीं मिल जाता। राज्य या उसकी संस्थाएं वास्तविक कारणों से रिक्त पद न भरने का विकल्प चुन सकती हैं। पीठ ने 1965 के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि यह अच्छा सिद्धांत है। राज्य या उसके तंत्रों को नियमों से छेड़छाड़ की अनुमति नहीं देनी चाहिए। मामले में तीन असफल उम्मीदवारों ने हाई कोर्ट में रिट याचिका दायर कर इस परिणाम को चुनौती दी थी जिसे मार्च, 2010 में खारिज कर दिया गया। बाद में वे शीर्ष अदालत पहुंच गए। सरकारी नौकरियों में होने वाली धांधली कोई नई बात नहीं है पर कम ही मामलों में हताश अभ्यर्थी अदालत की शरण लेते हैं क्योंकि न्याय प्रक्रिया में जाते ही समय और धन का अतिरिक्त खर्च कांधों पर आ जाता है। जैसा कि इस मामले में चौदह सालों के इंतजार के बाद अन्ततः उनके पक्ष में फैसला आया। देश में बेरोजगारी बढ़ती जा रही है। युवाओं की सारी जवानी रिक्तियों की आपूर्ति के इंतजार में निकल जाती है। कई दफा परिणाम देरी से आते हैं या रद्द तक हो जाते हैं। जो परीक्षाएं और साक्षात्कार होते हैं, उनमें होने वाली धांधली को लेकर परीक्षार्थी सशंकित रहते हैं। मगर राज्य सरकारों की कोताही को लेकर सब मौन हैं। नौजवानों के भविष्य से खिलवाड़ का खमियाजा तो इन्हें भुगतना ही चाहिए।
Date: 09-11-24
अदालती फैसले से आगेसंपादकीय
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय, यानी एएमयू को क्या दर्जा दिया जाए, यह बहस पिछले कई दशकों से चल रही है। इसे अल्पसंख्यक संस्थान माना जाए या नहीं, इस पर काफी विवाद हुए हैं। इस मुद्दे पर राजनीति तो खैर होती ही रहती है, अदालतों में भी कानूनविदों ने इस पर काफी सिर खपाया है। अब शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट की सात सदस्यीय पीठ ने इस पूरी बहस पर अंतिम मुहर लगाने का रास्ता खोल दिया है। सुप्रीम कोर्ट में प्रधान न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ के कार्यकाल का कल अंतिम दिन था और इस दिन उन्होंने सात सदस्यीय पीठ में एक ऐसा फैसला सुनाया, जिसकी गूंज लंबे समय तक सुनाई दे सकती है। इस मामले की सुनवाई इस साल फरवरी में ही पूरी हो गई थी और फैसले को सुरक्षित रख लिया गया था।
शुक्रवार को दिए गए इस फैसले को समझने के लिए हमें 1967 में जाना होगा, जब सुप्रीम कोर्ट की एक पांच सदस्यीय पीठ ने यह फैसला सुनाया था कि एएमयू की स्थापना संसद की वैधानिक कार्यवाही से हुई है, इसलिए इसे अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा नहीं दिया जा सकता। इसके बाद तुरंत प्रभाव से इस विश्वविद्यालय का अल्पसंख्यक शिक्षण संस्थान का दर्जा समाप्त हो गया। सन् 1981 में संसद में एएमयू ऐक्ट में संशोधन करके इसे फिर से अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा दे दिया गया। बाद में, इस संशोधन को इलाहाबाद हाईकोर्ट में चुनौती दी गई, जिसने साल 2006 में कहा कि एएमयू अल्पसंख्यक संस्थान नहीं है। जाहिर है, इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती मिलनी ही थी । पूर्व प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई की तीन सदस्यीय पीठ के पास यह याचिका पहुंची थी। 1967 में चूंकि पांच सदस्यीय पीठ इस पर फैसला दे चुकी थी, इसलिए जरूरी था कि इस पर कोई बड़ी पीठ ही विचार करती । इसलिए न्यायमूर्ति गोगोई ने इसके लिए एक सात सदस्यीय पीठ का गठन किया। इस पीठ ने अब चार- तीन से यह फैसला दिया है कि किसी संस्थान का गठन संसद में पेश विधेयक के जरिये हुआ, सिर्फ इसी तर्क पर उसका अल्पसंख्यक दर्जा खत्म नहीं किया जा सकता। इसके लिए उस संस्थान का इतिहास देखना होगा और यह भी देखना होगा कि उसके संस्थापकों की मंशा क्या थी? एएमयू को अल्पसंख्यक संस्थान का दर्जा दिया जाना चाहिए या नहीं, अदालत ने यह फैसला तीन सदस्यीय पीठ के हवाले कर दिया है, जिसका गठन होना अभी बाकी है। इस पर पुनर्विचार के लिए 1967 के पांच सदस्यीय पीठ के फैसले से जो बाधा बनी हुई थी, बस उसे इस सात सदस्यीय पीठ ने खत्म कर दिया है। उम्मीद की जानी चाहिए, अब तीन जजों की पीठ का जो फैसला होगा, वह सभी को स्वीकार होगा।
हालांकि, शुक्रवार के फैसले के बाद जिस तरह के बयान आए हैं, उनसे नहीं लगता कि इस विवाद को इतनी जल्दी खत्म होने दिया जाएगा। एआईएमआईएम के नेता असदुद्दीन ओवैसी ने एक तरफ तो सुप्रीम कोर्ट के फैसले का समर्थन किया है, तो दूसरी ओर एएमयू, जामिया मिल्लिया और बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की तुलना करते हुए केंद्र सरकार पर यह आरोप लगाया है कि वह अल्पसंख्यक संस्थानों से भेदभाव कर रही है। वैसे, शुक्रवार के फैसले का उस बात से कोई लेना-देना नहीं है, जिसका जिक्र ओवैसी कर रहे हैं। अंतिम फैसला जो भी हो, लेकिन यह उम्मीद नहीं है कि इस तरह की राजनीति रुक जाएगी, जबकि कोशिश यह होनी चाहिए कि संस्थान का दर्जा चाहे जो भी हो, शिक्षा का स्तर सब जगह बेहतर होता रहे।
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परिचय – किसी अर्थव्यवस्था में असमानता की बात होने पर सबसे पहले धन-संपत्ति का विचार आता है। लेकिन सामाजिक प्रभाव भी आर्थिक असमानता पर प्रभाव डालते हैं। लोगों का मानना है SC, ST, OBC तथा अन्य में जो अधिक गरीब हैं, उन पर ध्यान केंद्रित होना चाहिए। इन सब के बीच हमें यह भी समीक्षा करनी चाहिए कि समान परिस्थितयों में लोगों को कितने समान अवसर मिलते हैं?
जातिय समानता लाने के लिए हमें विरासत में जाति का महत्व बहुत कम करना होगा। ऐसा सामाजिक परिवेश हो, जिससे अधिक से अधिक परिवार अंतर्जातीय तरीके से जुड़े।
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09 November 2024
प्रश्न -485- संसदीय समितियां ही सच्चे अर्थों में संसद का मस्तिष्क होती हैं। वर्तमान घटनाओं का संदर्भ लेते हुए इस कथन को समझायें। (200 शब्द)
Question -485- Parliamentary committees are the brain of the Parliament in the true sense. Explain this statement taking the context of current events. (200 words)
नोट : इसका उत्तर आपको हमें नहीं भेजना है, यह आपके स्वयं के अभ्यास के लिए है।
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Date: 08-11-24
All or anyThe state must have bandwidth to guard against concentration of resourcesEditorial
That the Constitution has an economic philosophy rooted in socialist principles, mainly embodied in its Directive Principles of State Policy, is well understood. However, a question that has often arisen for judicial review concerns how far the state’s obligation to subserve the common good and prevent the concentration of wealth and means of production can be allowed to go against fundamental rights of individuals. The state’s obligation to ensure that the ownership and control of “material resources of the community are so distributed as to subserve the common good” and to prevent the working of the economic system to the common detriment is found in Articles 39(b) and (c). The recent verdict of a nine-judge Bench of the Supreme Court, holding that not all private resources would fall under the ambit of ‘material resources’ of the community in Article 39, is notable for its examination of whether the underlying economic thought should be given an expansive view, or there are limitations on what sort of private property can be the subject of state action. The Court’s majority opinion rejects the expansive view taken in a few precedents in favour of any private resources, including those individual-owned, falling under its ambit. In tune with present-day economic realities, it holds that this directive principle cannot be seen through any particular ideological prism, and disapproves of such earlier formulations.
The majority view is that while, theoretically, private resources could be part of the community’s resources, the relevant consideration for the state to acquire or distribute them in pursuit of the common good will depend on “non-exhaustive factors”: the nature of the resources and their characteristics, whether such acquisition is essential for the community, the scarcity of such resources, and the consequences of their being concentrated in private hands. Land acquisition has always been based on the principle of eminent domain, while allocation of natural resources will require fair and transparent processes. On the other hand, nationalisation of utilities, services and industries has required constitutional justification through the Directive Principles. The majority is right in holding that the Constitution-makers consciously worded Article 39 in broad terms so that they do not tie down future regimes to any particular strand of economic thought. However, Justice Sudhanshu Dhulia’s dissent has significance. Highlighting the continuing inequality in society, he has questioned the majority for seeking to limit the scope of the “material resources”, when the better approach would have been to leave it to the wisdom of the legislature.
Date: 08-11-24
कॉलेजियम व्यवस्था और वीटो इस्तेमाल के मायनेसंपादकीय
अपने कार्यकाल के अंतिम सप्ताह में सीजेआई ने एक साक्षात्कार में कहा, ‘अगर कुछ मामलों में जजों की नियुक्तियां न करते हुए या विलंब करके सरकार एक किस्म का ‘वीटो पावर (निषेधात्मक शक्ति) इस्तेमाल करती है, तो कॉलेजियम भी इस शक्ति का प्रयोग करता है क्योंकि उसकी संस्तुति के बगैर सरकार कोई नियुक्ति नहीं कर सकती।’ उनका कथन कई मायनों में चौंकाने वाला है। जजों की नियुक्ति के मामले में स्वयं इस कोर्ट ने फैसला दिया कि कॉलेजियम को पूर्ण स्वायत्तता होगी और न्यायपालिका की स्वतंत्रता आधारभूत ढांचे का अंग है। स्वयं सीजेआई के नेतृत्व वाली एक बेंच ने इसी कोर्ट की कॉलेजियम द्वारा समय-समय पर जजों की नियुक्ति के लिए भेजी गई अनुशंसा पर सरकार से सख्त लहजे में यह ब्योरा मांगा कि कब-कब, कितनी संस्तुतियों पर कितने दिन नियुक्ति करने में देरी की गई। दरअसल ऐसे आरोप लगते रहते हैं कि नामों की संस्तुति और कॉलेजियम द्वारा दोबारा उन्हीं नामों को भेजने के बाद भी अक्सर सरकार नियुक्ति पत्र देने में देरी करती है। वर्ष 2014 में कानून के जरिए एनजेएसी बना कर कॉलेजियम को खत्म करने की कोशिश हुई थी, जिसे कोर्ट ने अवैध करार दिया। लेकिन इस साक्षात्कार में वीटो के सवाल पर सरकार और कॉलेजियम को एक ही तराजू पर तौलना विचित्र लगा |
Date: 08-11-24
मदरसा शिक्षा में सुधार की राह खुलीडॉ. हरबंश दीक्षित, ( लेखक उत्तर प्रदेश उच्च शिक्षा सेवा आयोग के पूर्व सदस्य एवं विधिवेत्ता हैं )
उत्तर प्रदेश मदरसा बोर्ड अधिनियम, 2004 पर सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आम फैसलों से अलग है। ऐसा बहुत कम होता है कि अदालत के किसी निर्णय से दोनों पक्षकार संतुष्ट हों, लेकिन इस मामले में ऐसा ही देखने को मिला। सुप्रीम कोर्ट ने अंजुम कादरी और अन्य बनाम भारत संघ के निर्णय में इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय को पलटते हुए उत्तर प्रदेश मदरसा एक्ट, 2004 को संवैधानिक ठहराया, किंतु कामिल (स्नातक) और फाजिल (परास्नातक) डिग्री देने से संबंधित प्रविधानों को यूजीसी एक्ट 1956 के विरुद्ध होने के कारण असंवैधानिक घोषित कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट में यह मुकदमा इलाहाबाद उच्च न्यायालय के उस फैसले के खिलाफ अपील के रूप में आया था, जिसमें उत्तर प्रदेश मदरसा बोर्ड एक्ट, 2004 को असंवैधानिक घोषित कर दिया गया था। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने 22 मार्च, 2024 के अपने फैसले में कहा था कि मदरसा बोर्ड की स्थापना संविधान के पंथनिरपेक्ष ढांचे, अनुच्छेद 21(क) में उल्लिखित अधिकार और सबको समान शिक्षा पाने के मूल अधिकार का उल्लंघन है। इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देते हुए कहा गया कि उच्च न्यायालय में में अल्पसंख्यकों को मिले मूल अधिकार की अनदेखी की गई है।
सर्वोच्च न्यायालय के सामने तीन प्रश्न थे। पहला यह कि संविधान के अनुच्छेद 30(1) के तहत अल्पसंख्यकों को शिक्षण संस्थाओं को स्थापित करने और उनके संचालन के अधिकार का अर्थ और उसकी सीमा क्या है। दूसरा प्रश्न यह था कि क्या यह कानून पंथनिरपेक्षता का उल्लंघन करता है और तीसरा यह कि अनुच्छेद 21(क) में दिए गए शिक्षा के मूल अधिकार और अनुच्छेद 30(1) में अल्पसंख्यकों को शिक्षण संस्थाएं स्थापित और प्रशासित करने के अधिकार के बीच क्या अंतर्संबंध है?
उत्तर प्रदेश में मदरसा शिक्षा बोर्ड एक्ट, 2004 के माध्यम से मदरसा बोर्ड स्थापित किया गया था। इसके अधीन मदरसों को पांचवीं (तहतानियां), आठवीं (फौकानिया), दसवीं (मुंशी-मौलवी), बारहवीं (आलिम), स्नातक (कामिल) तथा परास्नातक (फाजिल) डिग्री देने का अधिकार दिया गया था। मदरसा बोर्ड का तर्क था कि संविधान के अनुच्छेद 30(1) में भाषाई और धार्मिक अल्पसंख्यकों को शिक्षण संस्थाओं के संचालन का अधिकार है और संविधान निर्माताओं की मंशा थी कि अल्पसंख्यक वर्ग को अपनी भाषा और संस्कृति को संरक्षित करने का अधिकार होना चाहिए।
सर्वोच्च न्यायालय ने टीएमए पई फाउंडेशन (2002), इस्लामिक अकादमी आफ एजुकेशन (2003) तथा पीए ईनामदार (2005) जैसे कई मुकदमों में यह कहा था कि अनुच्छेद 30(1) के तहत अल्पसंख्यक समाज को शिक्षण संस्थाएं खोलने और एवं संचालन का अधिकार है, किंतु यह अधिकार असीम नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय की स्पष्ट मान्यता रही है कि संस्थाओं के लोकतांत्रिक स्वरूप को बचाने तथा शिक्षा के स्तर एवं गुणवत्ता को सुनिश्चित करने के लिए सरकार द्वारा बनाए नियमों को इन संस्थाओं को भी मानना होगा।
सर्वोच्च न्यायालय ने अपने पूर्ववर्ती निर्णयों की भांति उत्तर प्रदेश मदरसा बोर्ड एक्ट, 2004 के मामले में भी यही कहा कि अल्पसंख्यक समाज को अपनी पसंद की शिक्षण संस्थाएं स्थापित करने का अधिकार अनुच्छेद 30(1) द्वारा दिया गया है। इसी के चलते उसने इलाहाबाद उच्च न्यायालय के निर्णय का वह हिस्सा निरस्त कर दिया, जिसमें मदरसा बोर्ड को पूरी तरह असंवैधानिक घोषित कर दिया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि अल्पसंख्यक समाज अपनी पसंद के शिक्षण संस्थान स्थापित कर सकते हैं, किंतु शिक्षा की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए सरकार या उसके द्वारा स्थापित नियामक संस्थाओं द्वारा बनाए गए नियम अल्पसंख्यक संस्थाओं पर भी बाध्यकारी होंगे। यूपी मदरसा बोर्ड द्वारा दी जाने वाली डिग्री की मान्यता के बारे में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि शिक्षण संस्था खोलने के अधिकार और डिग्री की मान्यता को अलग-अलग देखा जाना चाहिए।
अनुच्छेद 30(1) अल्पसंख्यक समाज को शिक्षण संस्थाएं खोलने का अधिकार देता है, किंतु इसके अंतर्गत संस्थाओं की डिग्री को मान्यता मिलने का अधिकार शामिल नहीं है। डिग्री की मान्यता के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि उच्च शिक्षा संस्थाओं द्वारा दी जाने वाली डिग्री का नियमन विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी यूजीसी द्वारा किया जाता है। शिक्षा की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए इसके द्वारा व्यापक नियम बनाए गए हैं।
चूंकि मदरसा बोर्ड विश्वविद्यालय आयोग अधिनियम, 1956 की धारा 2(एफ) के तहत मान्यता प्राप्त नहीं, इसलिए उसके द्वारा दी जाने वाली कामिल तथा फाजिल की डिग्री विधिसम्मत नहीं। पांचवीं, आठवीं, दसवीं तथा बारहवीं के समकक्ष जारी किए जाने वाले प्रमाण पत्रों के बारे में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि वे अवैध नहीं हैं, किंतु शिक्षा की गुणवत्ता के लिए सरकार उनका भी नियमन कर सकती है।
सुप्रीम कोर्ट का निर्णय मदरसा शिक्षा से जुड़े कई भ्रम दूर करेगा और साथ ही उत्तर प्रदेश समेत अन्य राज्यों में मदरसा शिक्षा की गुणवत्ता को बनाए रखने में भी मदद करेगा। मदरसा संचालित करने के अधिकार को मान्यता मिलने से अल्पसंख्यक समाज को संविधान के अनुच्छेद 30(1) में दिए गए मौलिक अधिकारों की रक्षा तो की गई है,
किंतु यह भी स्पष्ट किया गया है कि मदरसों में पढ़ने वाले छात्रों को अन्य छात्रों की तरह स्तरीय शिक्षा पाने का हक है और इसे सुनिश्चित करने के लिए सरकार नियम बना सकेगी। स्नातक और परास्नातक डिग्री देने के अधिकार को भी स्पष्ट करते हुए शीर्ष अदालत ने कहा कि इसे यूजीसी अधिनियम, 1956 के अनुरूप ही चलाया जा सकता है।
Date: 08-11-24
ट्रंप के आने के मायनेसंपादकीय
रिपब्लिकन पार्टी के उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप एक बार फिर अमेरिका के राष्ट्रपति बन गए हैं। उन्होंने बहुमत के जादुई आंकड़ों से अधिक हासिल किए हैं जो अमेरिकी समाज में उनकी लोकप्रियता के दर्शाता है। वह 2016 में भी चुनाव जीते थे। उनकी यह दूसरी जीत इसलिए भी विशेष मावने रखती है कि इस बार उनकी पार्टी को सीनेट में भी वहुमत मिल गया है। चुनाव अभियान के दौरान डोनाल्ड ट्रंप पर जानलेवा हमला हुआ था। इस घटना ने अमेरिकी समाज को गहरे तक झकझोर दिया था। हमले के समय ट्रंप ने जैसी हिम्मत और दिलेरी दिखाई थी उसे अमेरिकी मतदाता बहुत प्रभावित हुआ था। आम लोगों में या धारणा वनी कि आज की अस्थिर और संघर्ष से जूझ रही दुनिया में ट्रंप जैसे दृढ़ संकल्प वाले नेता की जरूरत है। उनकी ऐतिहासिक जीत में ट्रंप के व्यक्तित्व के इस करिश्माई पहलू की बड़ी भूमिका रही है। चुनाव प्रचार के अंतिम चरण में डेमोक्रेटिक पार्टी के दो बड़े नेताओं ने ट्रंप को समर्थन देने की घोषणा करके हलचल मचा दी। कॉमेडी परिवार के सदस्य रॉबर्ट एस कैनेडी ट्रंप के समर्थन में आ गए। जनमत सर्वेक्षणों के मुताबिक वह पांच फीसद मतदाताओं की पसंद थे। उनके पहले बदलने से कड़ी टक्कर वाले ‘स्विंग स्टेट’ ट्रंप को भारी सफलता मिली। इसी तरह डेमोक्रेटिक पार्टी की एक और पूर्व नेता तुलसी गार्ड ने भी ट्रंप को समर्थन देने की घोषणा की। सैनिक होने के वावजूद तुलसी युद्ध विरोधी हैं। डोनाल्ड ट्रंप की जीत का असर अमेरिका की घरेलू राजनीति के साथ वैश्विक राजनीति पर भी पड़ेगा। घरेलू स्तर पर अमेरिकी समाज और राजनीति में ध्रुवीकरण की प्रक्रिया तेज होगी। विदेश मोर्चे पर ट्रंप वाहन प्रशासन से अलग राह पकड़ सकते हैं। चुनाव जीतने के बाद उन्होंने कहा कि ‘मैं युद्ध शुरू नहीं करूंगा बल्कि रोकने की कोशिश करूंगा।’ उनकी इस घोषणा से उम्मीद बनती है कि रूस यूक्रेन बुद्ध अब जल्द समाप्त होगा। ट्रंप भारत को ट्रंप से काफी अपेक्षाएं भी हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि वाहन प्रशासन की शह पर कनाडा जिस तरह से भारत के खिलाफ दुष्प्रचार कर रहा उस पर रोक लगेगी। हालांकि ट्रंप मनमौजी की किस्म के व्यक्ति हैं। वह किसी मुद्दे पर क्या रुख अपनाएंगे यह कहना मुश्किल है। फिर भी ट्रंप की नीतियों से भारत के हित एक हद तक सचेंगे ऐसा कहा जा सकता है।
Date: 08-11-24
योगी सरकार को झटकासंपादकीय
उत्तर प्रदेश के मदरसों को लेकर सुप्रीम कोर्ट का फैसला कई मायनों में ऐतिहासिक है। मदरसा कानून को निरस्त करने के इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले को सुप्रीम कोर्ट ने खारिज करते हुए कहा, मदरसा कानून अल्पसंख्यकों में शिक्षा के प्रसार का प्रभावशाली जरिया है। इससे उनमें सुरक्षा व आत्मविश्वास पैदा होता है। अदालत ने कहा उप्र मदरसा अधिनियम 2004 के रोजमर्रा के कामकाज में हस्तक्षेप हीं करता बल्कि मदरसों के मानकीकरण में सहायक है। इस कानून को 2004 में मुलायम सरकार ने पास किया था। संविधान के अनुच्छेद 30 के तहत अल्पसंख्यकों की शिक्षा के लिए उन्हें संरक्षण प्रदान किया हाईकोर्ट ने इसी साल मार्च में मदरसा अधिनियम को धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों का उल्लंघन करने वाला बताते हुए उसे असंवैधानिक करार दिया था। साथ ही उप्र सरकार को राज्य के अलग-अलग मदरसों में पत्र रहे छात्र-छात्राओं को औपचारिक शिक्षा प्रणाली में शामिल करने के भी निर्देश दिए थे। उप्र में तकरीबन पचीस हजार मदरसे चल रहे हैं। इनमें से सोलह हजार से ज्यादा को राज्य मदरसा शिक्षा परिषद से मान्यता प्राप्त हैं। जबकि 500 को सरकार से अनुदान मिलता है। तकरीबन साढ़े आठ हजार मदरसे गैर मान्यता प्राप्त हैं। सबसे बड़ी अदालत के इस फैसले भाजपा सरकार को करारा झटका लगा है। अदालत ने अपने फैसले में यह भी स्पष्ट किया कि हायर एजूकेशन को छोड़ कर मदरसा में चल रहे सभी कोई उच्च न्यायालय के फैसले से पूर्व वाले फैसले की तरह मान्य होंगे। सरकार का भेदभाव करना शोभा नहीं देता । जरूरी है कि इस शिक्षा प्रणाली को सुधारने के सकारात्मक प्रयास हों। ताकि मदरसों से निकलें छात्र उच्चतम शिक्षा पाने या बेहतर भविष्य का निर्माण करने में अपनी योग्यता का इस्तेमाल कर सकें यूं भी शिक्षित व सम्पन्न मुसलमान परिवार अपने बच्चों को अंग्रेजी व प्राइवेट स्कूलों में दाखिला दिलाते हैं। वे मदरसों में शिक्षा दिलाने के प्रति तनिक इच्छुक नहीं होते। नई पौध को बेहतर शिक्षा मिले, जो उनके लिए उचित व ज्ञानवर्धक साबित हो, ऐसे प्रवास होने चाहिए। पूर्वाग्रहों से भरकर ऐसे कोई निर्णय जनता पर नहीं लादने चाहिए, जो उन्हें साम्प्रदायिक रूप से वांटने की बजाए सौहार्दपूर्ण माहौल प्रदान करने वाला हो।
Date: 08-11-24
बढ़ता स्वास्थ्य संकटसुनिधि मिश्रा
हाल ही में इंटरनेशनल डायबिटीज फेडरेशन द्वारा जारी एक रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2045 तक मधुमेह के रोगियों की संख्या 134 मिलियन होने का अनुमान है। चिंता का विषय यह है कि भारत में मधुमेह का निदान औसतन 10 वर्ष पहले हो रहा है, जो पश्चिमी देशों की तुलना में काफी कम उम्र है। वर्तमान समय में हमारा देश एक गंभीर स्वास्थ्य चुनौती का सामना कर रहा है। वह है मेटाबोलिक सिंड्रोम यह एक जटिल स्वास्थ्य समस्या है जो उच्च रक्तचाप, मधुमेह (उच्च रक्त शर्करा), असामान्य कोलेस्ट्रॉल स्तर और अधिक शरीर वसा जैसे कई लक्षणों का संयोजन है। अक्टूबर 2023 में, भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद ने एक व्यापक अध्ययन जारी किया, जिसमें पाया गया कि भारत में मेटाबोलिक सिंड्रोम की दर पिछले पांच वर्षों में 15 फीसद बढ़ गई है। यह वृद्धि विशेष रूप से 30-45 वर्ष की आयु वर्ग में देखी गई है, जो चिंता का विषय है।
भारत में मेटाबोलिक सिंड्रोम की स्थिति चिंताजनक है। विशेष रूप से मधुमेह, हृदय रोग और मोटापे के संदर्भ में। इन तीनों स्थितियों का मेटाबोलिक सिंड्रोम से गहरा संबंध है और ये एक दूसरे को प्रभावित करती हैं। भारत को ‘मधुमेह की राजधानी’ के रूप में जाना जाता है, और यह उपाधि बिना किसी कारण के नहीं दी गई है। नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, भारत में लगभग 77 मिलियन लोग मधुमेह से पीड़ित हैं, जो विश्व में दूसरा सबसे बड़ा आंकड़ा है। मेटाबोलिक सिंड्रोम वाले व्यक्तियों में टाइप 2 मधुमेह विकसित होने का जोखिम 5 गुना अधिक होता है। भारतीय आबादी में इंसुलिन प्रतिरोध की उच्च दर पाई गई है, जो मेटाबोलिक सिंड्रोम का एक प्रमुख लक्षण है। मेटाबोलिक सिंड्रोम का दूसरा प्रमुख लक्षण हृदय रोग है जो कि भारत में मृत्यु का प्रमुख कारण है। भारत में हर साल लगभग 4.77 मिलियन लोगों की मृत्यु हृदय रोग के कारण होती है। एक अध्ययन के अनुसार, भारतीयों में हृदय रोग का खतरा पश्चिमी आबादी की तुलना में 3-4 गुना अधिक है। मेटाबोलिक सिंड्रोम वाले व्यक्तियों में हृदय रोग का जोखिम 2 से 3 गुना अधिक होता है। भारत में हृदय रोग के मामले युवा आयु वर्ग (30-40 वर्ष) में भी तेजी से बढ़ रहे हैं, जो मैटाबोलिक सिंड्रोम के बढ़ते प्रसार से जुड़ा हो सकता है। मोटापा भी मेटाबोलिक सिंड्रोम का एक प्रमुख घटक है और भारत में यह एक बढ़ती हुई समस्या है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-5 (2019-21) के अनुसार, भारत में 24 फीसदी महिलाएं और 22 फीसदी पुरुष मोटापे या अधिक वजन की समस्या से ग्रस्त हैं। शहरी क्षेत्रों में यह आंकड़ा और भी अधिक है। एक अध्ययन के अनुसार, मेटाबोलिक सिंड्रोम वाले व्यक्तियों में कोविड-19 के गंभीर लक्षण विकसित होने का खतरा 3.4 गुना अधिक था। महामारी के दौरान लॉकडाउन और सामाजिक दूरी के कारण लोगों की शारीरिक गतिविधियां कम हुई और खान-पान की आदतें बिगड़ीं, जिसने मेटाबोलिक सिंड्रोम के जोखिम को और बढ़ा दिया। वर्ल्ड हेल्थ ऑर्गनाइजेशन की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में महामारी के दौरान मोटापे के मामलों में 5.7 प्रतिशत की वृद्धि हुई, जो मेटाबोलिक सिंड्रोम का एक प्रमुख कारक है। महामारी के दौरान से ही वर्क फ्रॉम होम और हाइब्रिड कार्य मॉडल के चलते लोगों की दिनचर्या में बड़े बदलाव आए हैं। एक ताजा सर्वेक्षण के अनुसार, भारत में 69 फीसदी कर्मचारियों ने माना कि वर्क फ्रॉम होम के दौरान उनकी शारीरिक गतिविधियां कम हुई हैं और 42 फीसदी ने अस्वस्थ खाने की आदतों में वृद्धि की सूचना दी। ये दोनों कारक मेटाबोलिक सिंड्रोम के जोखिम को बढ़ाते हैं। एक अनुमान के अनुसार, भारत में मेटाबोलिक सिंड्रोम से जुड़ी बीमारियों के इलाज पर हर साल लगभग 30 बिलियन डॉलर खर्च होते हैं। कोविड 19 महामारी के बाद की आर्थिक चुनौतियों के मद्देनजर यह व्यय देश की अर्थव्यवस्था पर एक बड़ा बोझ है।
इस बढ़ती समस्या से निपटने के लिए व्यापक रणनीति की आवश्यकता है। सबसे पहले, जागरूकता बढ़ाने की जरूरत है। सरकार और स्वास्थ्य संगठनों को मेटाबोलिक सिंड्रोम के बारे में जन जागरूकता अभियान चलाने चाहिए। लोगों को इसके लक्षणों, कारणों और परिणामों के बारे में शिक्षित करना महत्त्वपूर्ण है। स्वस्थ जीवनशैली को प्रोत्साहित करना दूसरा महत्त्वपूर्ण कदम है। नियमित व्यायाम और संतुलित आहार को बढ़ावा देना चाहिए। एक नए सर्वेक्षण के अनुसार, नियमित व्यायाम करने वाले लोगों में मेटाबोलिक सिंड्रोम का जोखिम 30 फीसद तक कम हो जाता है। आहार में सुधार भी अहम है। पारंपरिक भारतीय आहार, जो फलों, सब्जियों और साबुत अनाज से समृद्ध को बढ़ावा देना चाहिए। प्रोसेस्ड और जंक फूड पर कर बढ़ाने जैसे नीतिगत हस्तक्षेप भी मददगार हो सकते हैं। हमें याद रखना चाहिए कि स्वस्थ समाज ही एक समृद्ध राष्ट्र का आधार है। मेटाबोलिक सिंड्रोम से लड़ना न केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य के लिए महत्त्वपूर्ण है, बल्कि यह हमारे देश के समग्र विकास के लिए भी आवश्यक है।
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‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 21 अक्टूबर, 2024
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Date: 07-11-24
What Trump 2.0 means for IndiaNew Delhi’s warm welcome for Trump 2.0 will be tempered by concerns over his social media posts and tough rhetoric on trade and tariffsSuhasini Haidar
Five years after Prime Minister Narendra Modi told a crowd in Houston, Texas, that India had “connected well” with Republican candidate Donald Trump and followed it up with “Abki Baar Trump Sarkar (This time, a Trump government)”, Mr. Trump has gained the votes required to become the U.S.’s 47th President. Mr. Modi’s statement reflected the bonhomie that the two leaders shared throughout Mr. Trump’s first tenure. But when we go beyond personal ties to bilateral ties, ‘Trump 1.0’ was a mixed bag for India. New Delhi will no doubt welcome Trump 2.0, even as it braces for the impact of some of his methods, such as using social media to open coercion in order to drive home a point.
Where the road will be smooth
There are several reasons for the Modi government to be delighted with Mr. Trump’s victory. The President-elect has made it clear that he intends to build on his past history with India, which will include building trade ties, opening up more technology for Indian companies, and making more U.S. military hardware available for Indian defence forces. He will pick up the broken threads of negotiations for a Free Trade Agreement, which saw intense negotiations in 2019-2020 before he lost power, and which former President Joe Biden showed no interest in continuing. Rather than pushing India on carbon emission cuts, Mr. Trump is likely to encourage India to buy into U.S. oil and LNG, along the lines of the Memorandum of Understanding for the Driftwood LNG plant in Louisiana in 2019, which would have brought $2.5 billion in investment from Petronet India into the U.S. but was shelved a year later.
Under Mr. Trump, India-U.S. ties are also unlikely to face less trouble over issues such as democratic norms, minority rights, press freedoms, and human rights, which the Modi government faced from the Biden administration and the U.S. Commission on International Religious Freedom. Nor will they need to worry about queries on the treatment of climate and human rights NGOs hit by the Foreign (Contribution) Regulation Act, 2010, although there may be some questions asked by Republican Congressmen who are concerned about U.S. Christian NGOs operating in India. New Delhi will also hope that public comments by the U.S. State Department and Department of Justice on the Pannun-Nijjar cases will be more muted. While the trial involving alleged middleman, Nikhil Gupta, for the aborted assassination attempt on Khalistani activist Gurpatwant Pannun last year would continue, founder of the Republican Hindu Coalition, Shalabh ‘Shaili’ Kumar, has said that he expects Mr. Trump to “crackdown” on Khalistani groups. Moreover, Mr. Trump’s frosty ties in the past with Canadian Prime Minister Justin Trudeau indicate that New Delhi would not have to worry about a reaction from Washington over its ongoing diplomatic war with Ottawa over the Nijjar killing.
Potential trouble areas
So, where could the trouble come from? The first problem is Mr. Trump’s persistent focus on cutting trade tariffs, which saw his administration impose a series of counter-tariffs, file World Trade Organization complaints, and then withdraw India’s GSP status for exporters. The second is his habit of disclosing the contents of private conversations with leaders and, on occasion, embellishing them or even imagining them. For instance, he mocked Mr. Modi on the issue of lowering of duties on Harley Davidson motorcycles and badgered India to lift the ban on Hydroxychloroquine exports, which did not go down well in New Delhi. This habit took a more serious turn when it involved other countries. In 2019, Mr. Trump told Pakistan’s then Prime Minister, Imran Khan, that they could “resolve the Kashmir issue”, and that Mr. Modi had asked him to mediate in the matter (India vehemently denied the assertion). In 2020, after China transgressed the Line of Actual Control and began a military stand-off with India, Mr. Trump posted that Mr. Modi was “not in a good mood” over the developments; India denied that the two leaders had spoken at all. Diplomats, however, point out that Mr. Trump did back India in the conflict, ensuring that the U.S. shared intelligence, leased drones, and supplied winter gear for the forces “in a manner different from past U.S. administrations”. Perhaps the most testing times were during the U.S.’s tensions with Iran: in June 2018, he sent the then United Nations envoy, Nikki Haley, on a mission to New Delhi to virtually threaten India with sanctions. Subsequently, India “zeroed out” its oil imports from both Iran and Venezuela. In some relief, New Delhi is likely to face little pressure now on cutting ties with Moscow, given Mr. Trump’s interest in engaging the Russian President. India will also seek Mr. Trump’s intervention in ending Israel’s war in Gaza and Lebanon, and reopening talks with Gulf countries, to help revive its plans for the India Middle East Europe Economic Corridor
India’s neighbours may be more concerned about the impact of Mr. Trump’s victory. During his last tenure, he had cancelled most of the U.S. aid to Pakistan. Now, the Shahbaz Sharif government would worry about losing U.S. support on loans from the International Monetary Fund and World Bank as well. In Bangladesh, Chief Advisor Muhammad Yunus, a close friend of Democratic Party leaders, has already run afoul of Mr. Trump, who posted on social media last week about Dhaka’s failure to protect Hindu minorities. The Biden government had expanded its outreach in South Asian countries, such as Nepal, Bhutan, and the Maldives. In that sense, many in the region may worry not so much about U.S. actions, but a lack of attention from the new administration.
Date: 07-11-24
ट्रम्प का भारत के प्रति रुख देखने लायक होगासंपादकीय
अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में ट्रम्प की दोबारा जीत एक ऐसे समय में हुई है, जब दुनिया के कई इलाकों में युद्ध चल रहा है। अरब-इजराइल तनाव ने पेट्रोलियम की कीमतें और इसके फलस्वरूप महंगाई बढ़ा दी है, रूस- यूक्रेन युद्ध के बहुआयामी वैश्विक दुष्प्रभाव हैं और दुनिया टेक्नोलॉजी के एक ऐसे नए दौर में प्रवेश कर रही है जिससे सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक ढांचे और नैतिक मूल्यों पर असर पड़ेगा। ट्रम्प से विश्व की आशा इसलिए और बढ़ गई है क्योंकि उनकी रिपब्लिकन पार्टी ने न केवल हाउस ऑफ रिप्रेजेन्टेटिव (लोकसभा के समतुल्य) में, बल्कि सीनेट (राज्यसभा के समतुल्य) में भी बहुमत हासिल किया है। अमेरिकी संविधान, कांग्रेस (संसद) के उक्त दोनों सदनों को निर्बाध शक्तियां देता है। ऐसे में दुनिया के सबसे शक्तिशाली देश के नए राष्ट्रपति के लिए कुछ भी करना संभव होगा। जीत के बाद अपने भाषण में ट्रम्प ने घुसपैठियों की समस्या से प्रभावी रूप से छुटकारा पाने की प्रतिबद्धता को दोहराया। भारत के पीएम से ट्रम्प के संबंध पहले से ही अच्छे रहे हैं। ट्रम्प की रूसी नेता पुतिन और इजराइली पीएम नेतन्याहू से भी दोस्ती है। ऐसे में दोनों जगह युद्ध पर अंकुश लगने की उम्मीद बनी है। देखना होगा कि व्यापार के मामले में ट्रम्प का भारत के प्रति पूर्व का कड़ा रुख क्या नर्म पड़ेगा ।
Date: 07-11-24
फिर आ गए ट्रंपसंपादकीय
अंततः अमेरिकी जनता ने रिपब्लिकन पार्टी के प्रत्याशी एवं पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को फिर से राष्ट्रपति बनाना पसंद किया। ट्रंप ने आसानी से जीत हासिल कर एक नया इतिहास बनाया। वह लंबे समय बाद दूसरे ऐसे राष्ट्रपति बने, जिन्होंने एक बार चुनाव हारने के बाद जीत हासिल की। इतिहास रचने का अवसर डेमोक्रेटिक पार्टी की उम्मीदवार एवं उपराष्ट्रपति कमला हैरिस के पास भी था। वह अमेरिका की पहली महिला राष्ट्रपति बन सकती थीं, लेकिन हिलेरी क्लिंटन की तरह वह भी नाकाम रहीं। हिलेरी को भी ट्रंप ने हराया था और कमला हैरिस को भी। यह साफ है कि राष्ट्रपति जो बाइडन की विरासत उन पर भारी पड़ी। यदि बाइडन कमजोर राष्ट्रपति साबित नहीं हुए होते और उन्होंने अर्थव्यवस्था को संभालने के साथ वैश्विक समस्याओं और विशेष रूप से यूक्रेन एवं गाजा युद्ध में निर्णायक भूमिका निभाई होती तो शायद कमला हैरिस की राह आसान होती। कमला हैरिस को इसका भी नुकसान उठाना पड़ा कि डेमोक्रेटिक पार्टी ने शरणार्थियों और अवैध रूप से आए लोगों के प्रति उदार रवैया अपना रखा था। भारत एवं अफ्रीकी मूल की महिला होने के नाते वह महिलाओं और साथ ही विदेशी मूल के नागरिकों को उतना आकर्षित नहीं कर पाईं, जितना मानकर चला जा रहा था। यह भी उनकी पराजय का कारण बना। इस नतीजे पर पहुंचने के पर्याप्त कारण हैं कि वह अमेरिकी जनता की उस तरह नब्ज नहीं पकड़ सकीं, जैसी ट्रंप ने पकड़ी। ट्रंप एक मजबूत नेता की अपनी छवि उभारने, अमेरिका के साथ दुनिया की समस्याओं के समाधान में सक्षम साबित होने का संदेश देने के साथ यह भरोसा दिलाने में भी समर्थ रहे कि वह महंगाई से जूझती अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की सामर्थ्य रखते हैं। इसमें उनकी व्यापारी वाली छवि भी सहायक बनी।
चूंकि रिपब्लिकन पार्टी का अमेरिकी संसद के दोनों सदनों में बहुमत होगा, इसलिए यह तय है कि ट्रंप अपने मनमाफिक खुलकर काम करेंगे, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि वह अप्रत्याशित फैसले करने वाले बड़बोले नेता हैं। वह किस मसले पर कब क्या कह और कर दें, इसका ठिकाना नहीं। वह जलवायु परिवर्तन को समस्या नहीं मानते और अमेरिका के आर्थिक हितों के आगे वैश्विक हितों की परवाह नहीं करते। वैसे उनके पहले कार्यकाल में विश्व अपेक्षाकृत स्थिर था और इसमें उनका भी योगदान था। ट्रंप का राष्ट्रपति बनना भारतीय हितों के लिए अच्छा माना जा रहा है और इसके पीछे कुछ ठोस कारण हैं। पिछले कार्यकाल में वह भारत के मित्र के रूप में उभरे थे, लेकिन इस सच्चाई से भी मुंह नहीं मोड़ा जा सकता कि वह भारत की उच्च आयात शुल्क दर की शिकायत करते रहते हैं। उन्हें यह भी रास नहीं आता कि दोनों देशों के बीच व्यापार का पलड़ा भारत के पक्ष में झुका है। भारत को व्यापार नीति के साथ एच-वन बी वीजा पर उनके रवैये से भी सतर्क रहना होगा।
Date: 07-11-24
ट्रंप का दूसरा कार्यकालसंपादकीय
डॉनल्ड ट्रंप चार साल के अंतराल के बाद दूसरी बार अमेरिका के राष्ट्रपति पद का चुनाव जीत गए हैं। इस जीत ने सर्वेक्षणों को धता बता दिया है और डेमोक्रेटिक पार्टी की चुनाव के पहले की आशंकाओं को रेखांकित किया है। यह मुकाबला किसी भी लिहाज से करीबी नहीं था। ट्रंप न केवल रिपब्लिकन प्रभुत्व वाले राज्यों में जीते बल्कि उन्होंने स्विंग स्टेट्स (वे राज्य जिनका रुझान स्पष्ट नहीं) में भी जीत हासिल की। 2016 के उलट ट्रंप ने पॉपुलर वोट में भी जीत हासिल की। 2004 में जॉर्ज डब्ल्यू बुश के दोबारा चुनाव जीतने के बाद पहली बार ऐसा हुआ है कि किसी रिपब्लिकन ने पॉपुलर वोट में जीत हासिल की हो। कमला हैरिस ने चुनाव के 107 दिन पहले अपना प्रचार अभियान शुरू किया था जो विश्व युद्ध के बाद के दौर में किसी प्रतिभागी का सबसे छोटा चुनाव अभियान था लेकिन उन्होंने जो गति हासिल की थी, उसे देखते हुए भी ट्रंप की जीत उल्लेखनीय है। हैरिस ने ट्रंप से अधिक धन जुटाया और खर्च किया तथा पूर्व राष्ट्रपतियों और ट्रंप के पहले प्रशासन के दिग्गजों से लेकर नोबेल पुरस्कार जीतने वाले अर्थशास्त्री तथा टेलर स्विफ्ट एवं ओपरा विनफ्रे जैसे सांस्कृतिक रूप से प्रभावशाली लोग उनका समर्थन कर रहे थे। उनकी कमजोरी इस बात में निहित है कि उन्होंने खुद को बाइडनॉमिक्स से जोड़ा। सर्वेक्षणों ने लगातार बताया कि बाइडन की आर्थिक नीतियां न केवल अलोकप्रिय रहीं बल्कि उनका एजेंडा भी अच्छी तरह परिभाषित नहीं था और गर्भपात के अधिकारों तथा नए परिवारों के लिए कर राहत के सिवा उसमें कुछ खास नहीं था। ट्रंप की अलोकप्रियता को लेकर उनका आत्मविश्वास भारी पड़ गया और वह इतनी आश्वस्त हो गईं कि उनके प्रचार अभियान की आरंभिक ऊर्जा बाद में नजर नहीं आई।
इसके विपरीत उनके प्रतिद्वंद्वी ने अपने चिरपरिचित एजेंडे को नहीं छोड़ा: सख्त आव्रजन नियंत्रण, अमीरों तथा बड़े कारोबारी घरानों को कर राहत, दूसरे देशों के साथ विद्वेष, लैंगिक भेदभाव और संरक्षणवाद। हत्या के प्रयास के बाद उन्होंने जो अनुकरणीय साहस दिखाया उसने भी उनकी प्रतिष्ठा बढ़ाई। सीनेट पर कब्जे के बाद कांग्रेस में रिपब्लिकन की संभावित पूर्ण विजय के बाद उन्हें पहले दो वर्षों में ही अपनी नीतियों को लागू करने का अवसर मिल जाएगा।
अमेरिकी मतदाताओं को अपने चुनाव का परिणाम मिलेगा लेकिन ट्रंप के पहले कार्यकाल के अनुभव शेष विश्व को खुश होने की वजह नहीं देते। आर्थिक मोर्चे पर बाइडन ट्रंप की टैरिफ वाली नीतियों के आसपास ही दिखे। परंतु ट्रंप अपने चुनावी वादे को पूरा कर सकते हैं जिसमें उन्होंने कहा है कि वह आक्रामक व्यापार नीतियों को बढ़ावा देंगे तथा चीन की वस्तुओं पर 60 फीसदी तथा अन्य देशों पर 10 फीसदी शुल्क लगाएंगे। करों में कटौती का भी वादा किया गया है और इससे बजट घाटा बढ़ सकता है। इससे मुद्रास्फीति का दबाव बनेगा और मांग तथा अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर असर होगा। विश्व अर्थव्यवस्था भी इससे अछूती नहीं रहेगी। भारत और अमेरिका के रिश्ते बीते सालों में मजबूत हुए हैं। परंतु ट्रंप के दूसरे कार्यकाल का तात्कालिक आर्थिक प्रभाव क्या होगा इस पर नजर रखनी होगी। उच्च टैरिफ निर्यात को प्रभावित कर सकता है, खासतौर पर फार्मा उद्योग के लिए। इसके अलावा आईटी उद्योग भी एच1बी वीजा नीतियों को सख्त बनाए जाने से मुश्किलों का सामना करेगा। चीन पर संभावित उच्च शुल्क भारत के लिए जरूर अवसर हो सकता है। देखना यह होगा कि भारत नए हालात से कैसे निपटता है।
भूराजनीति के लिए भी ट्रंप का दूसरा कार्यकाल सकारात्मक नहीं नजर आता। रूस-यूक्रेन और इजरायल-हमास के बीच लड़ाई चल रही है और पुतिन के प्रति ट्रंप का पक्षपात और उत्तर अटलांटिक संधि संगठन यानी नाटो को लेकर उनकी अवज्ञापूर्ण भूमिका यूक्रेन के लिए बुरी खबर हो सकती है जो हथियारों के लिए नॉटो पर निर्भर है। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू के साथ उनके रिश्ते इस बात से पता चलते हैं कि अमेरिका ने 2017 में यरूशलम को इराजयल की राजधानी के रूप में मान्यता दी थी। यह फिलिस्तीन के लिए अच्छी खबर नहीं। जलवायु परिवर्तन के एजेंडे की बात करें तो ट्रंप का पेरिस समझौते से हटना और पर्यावरण नियंत्रण समाप्त करने की बात कहना भविष्य के बारे में बताता है। लब्बोलुआब यह कि आर्थिक मंदी, संघर्षों और जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से जूझ रही दुनिया में ट्रंप की मजबूत जीत अनिश्चितता को और बढ़ाने वाली है।
Date: 07-11-24
भारत का ऊर्जा भविष्य और छोटे परमाणु संयंत्रलवीश भंडारी, ( लेखक सेंटर फॉर सोशल ऐंड इकनॉमिक प्रोग्रेस के प्रमुख हैं )
स्मॉल मॉड्यूलर न्यूक्लियर रिएक्टर या एसएमआर में भारत की ऊर्जा की तस्वीर बदल देने की क्षमता है। लेकिन अभी की स्थिति में भारत में एसएमआर से बिजली बनाने का व्यापक कार्यक्रम शुरू करने से पहले काफी कुछ किया जाना है। मगर यह अहम क्यों है? क्योंकि आगे चलकर भारत को हर आठ से 10 वर्ष में अपना बिजली उत्पादन दोगुना करना होगा। पारंपरिक नवीकरणीय ऊर्जा सस्ती तो होती है मगर उसका भंडारण सस्ता नहीं होता। साथ ही नवीकरणीय ऊर्जा में पवन ऊर्जा तथा सौर ऊर्जा मौसम पर निर्भर रहती है और रोजाना इसमें बदलाव होता रहता है। ऐसे में भारत ऊर्जा उत्पादन के लिए जीवाश्म ईंधन इस्तेमाल नहीं करना चाहता तो उसके पास दूसरे स्रोतों में विविधता लाने के सिवा कोई विकल्प नहीं है।
इसमें दो राय नहीं है कि विविधता लाने से जोखिम कम होता है और बिजली की उपलब्धता में उतार-चढ़ाव भी कम होता है। लेकिन यह काम चतुराई से किया जाए तो बिजली उत्पादन की लागत भी कम हो सकती है। अन्य ऊर्जा स्रोतों में जियोथर्मल यानी भूतापीय और टाइडल अर्थात ज्वार से ऊर्जा बनाना अभी ठीक से शुरू भी नहीं हुआ है। जैव ईंधन बहुत महंगे हैं। ऐसे में परमाणु ऊर्जा का ज्यादा से ज्यादा उत्पादन जरूरी लगता है। इससे उत्पादन स्थिर होता है और चौबीसों घंटे रहता है, जिस कारण यह और भी आकर्षक विकल्प बन जाता है।
किंतु बड़े परमाणु बिजली संयंत्रों के साथ दिक्कत यह है कि इनके निर्माण में बहुत समय लगता है। ये करीब एक दशक में तैयार होते हैं और इनके लिए बहुत जमीन की जरूरत होती है। इनका निर्माण शुरू होने के साथ ही कई एहतियात बरतने होते हैं। अगर 300 मेगावॉट से कम क्षमता वाली परमाणु परियोजनाओं की बात करें तो तकनीकी बदलाव और नियमों को दुरुस्त बनाने से ये व्यावहारिक विकल्प बन गई हैं।
कम लागत और छोटे आकार के कारण 300 मेगावॉट से कम की परमाणु ऊर्जा परियोजनाओं की तादाद बढ़ी है। इससे परमाणु ऊर्जा संयंत्रों के आपूर्तिकर्ता भी नई जुगत भिड़ाने के लिए मजबूर हुए हैं। वे इन्हें मॉड्यूल यानी हिस्सों में तैयार करते हैं, एक जगह बनाते हैं और वहां से परियोजना स्थल पर ले आते हैं। ऐसा करने पर लागत और भी घट सकती है। इससे भी अहम बात यह है कि इन संयंत्रों को एक दशक के बजाय अब तीन-चार साल में रही लगाया जा सकता है। तकनीकी नवाचार के कारण पहले से कम जमीन की जरूरत पड़ती है और 10 से 20 एकड़ में संयंत्र लग जाता है।
सुरक्षा के दो खास इंतजाम इन्हें पहले से ज्यादा आकर्षक बनाते हैं। इनमें कोई गड़बड़ होने पर बाहरी हस्तक्षेप के बिना आंतरिक स्तर पर ही सुरक्षा उपाय समस्या को नियंत्रित कर सकते हैं। इस कारण इन्हें बंद पड़े ताप बिजली संयंत्रों में भी स्थापित किया जा सकता है और वहां पहले से मौजूद बिजली वितरण व्यवस्था तथा दूसरे बुनियादी ढांचे का फायदा उठाया जा सकता है। ऐसे में तीन प्रमुख लाभ हैं: कम जगह की जरूरत, जल्दी पूरा होना और अधिक सुरक्षा। इन तीनों के कारण लागत भी कम हो जाती है। ये फायदे देखकर आप सोच रहे होंगे कि भारत को एसएमआर के जरिये परमाणु बिजली गतिविधियों को रफ्तार देनी चाहिए। मगर अब तक ऐसा नहीं हुआ है।
भारत मोटे तौर पर दो राहें चुन सकता है: पहली, खुद एसएमआर तैयार करना और दूसरी, वैश्विक आपूर्तिकर्ताओं के साथ समझौते करना। पहले देसी विकल्प पर विचार करते हैं। भारत लंबे समय से देसी क्षमताओं में इजाफा कर रहा है और हाल में 700 मेगावॉट क्षमता पर जोर है मगर 220 मेगावॉट के प्रेशराइज्ड हेवी वाटर रिएक्टर (पीएचडब्ल्यूआर) में भारत को गहरा अनुभव है। अगर भारत 100 मेगावॉट क्षमता से कम के व्यवहार्य विकल्प तैयार कर पाया तो उसके कई दूसरे औद्योगिक इस्तेमाल भी संभव हो जाएंगे। इससे हम शून्य कार्बन उत्सर्जन की दिशा में तेजी से बढ़ सकेंगे।
सबसे बड़ी चुनौती यह है कि भारत के मौजूदा परमाणु प्रतिष्ठान समय पर उत्पादन कर सकेंगे या नहीं। अतीत से संकेत लें तो इस क्षेत्र में अंतहीन विलंब होते हैं और एक दशक और इंतजार करना बहुत भारी पड़ेगा। 700 मेगावॉट के रिएक्टर को ही ले लीजिए। उसकी 10 अतिरिक्त इकाइयों के लिए 2017 में योजना बनाई गई थी और पांच साल के भीतर उन्हें स्थापित कर दिया जाना था। मगर ऐसा नहीं हो पाया। हालांकि भारत के परमाणु प्रतिष्ठान सुरक्षा और परिचालन की कसौटी पर बहुत कामयाब रहे हैं मगर समय का पाबंद होने के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता। अतीत में नवाचार और वृद्धि सीमित रहने का ठीकरा बाहरी प्रतिबंधों पर फोड़ा जा सकता था मगर हाल के दिनों में ऐसा नहीं हुआ है। दूसरे शब्दों में कहें तो देश में 220 मेगावॉट से कम क्षमता के संयंत्रों में नवाचार की गति बढ़ाने के लिए उचित वित्तीय, तकनीकी और प्रबंधकीय संसाधन देने होंगे।
अब दूसरे रास्ते पर विचार करते हैं यानी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उपलब्ध एसएमआर तकनीक को अपनाने की। कोरिया, अमेरिका, रूस और कई यूरोपीय देशों की कंपनियां भारत में इस अवसर से जुड़ना चाहती हैं। भारत की कई निजी और सरकारी कंपनियों की भी इसमें दिलचस्पी हो सकती है। इनमें स्टील संयंत्र, डेटा सेंटर, क्लीन हाइड्रोजन उत्पादक और बिजली उत्पादक शामिल हैं। किंतु 1962 का परमाणु ऊर्जा अधिनियम कहता है कि इन संयंत्रों का संचालन भारतीय न्यूक्लियर पॉवर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया लिमिटेड (एनपीसीआईएल) ही कर सकता है। इसमें बदलाव करना होगा तथा अन्य नियामकीय तथा अन्य संस्थाओं में थोड़े परिवर्तन करते हुए उनके दायरे की स्पष्ट व्याख्या करनी होगी।
महत्त्वपूर्ण बात यह है कि परमाणु क्षति के लिए नागरिक दायित्व (सीएलएनडी) अधिनियम 2010 में छोटे परमाणु संयंत्रों की जरूरतों के हिसाब से बदलाव करने होंगे। अभी यह कानून परियोजना चलाने वाले पर 1,500 करोड़ रुपये की देनदारी लगा देता है। मगर एसएमआर आकार में छोटे होते हैं, इसलिए राशि भी उसी हिसाब से कम करनी होगी। सीएलएनडी के साथ यह दिक्कत भी है कि आपूर्ति करने वालों की असीमित देनदारी का खतरा हो जाता है। परमाणु उपकरण प्रदान करने वालों के लिए लंबे समय से यह समस्या बनी हुई है। तीसरी बात, आपराधिक यानी फौजदारी जवाबदेही से जुड़ी अस्पष्टता भी दूर करनी होगी।
देश का मौजूदा परमाणु ऊर्जा प्रतिष्ठान सार्वजनिक क्षेत्र के अधीन बना था और इसलिए नियामकीय तथा निगरानी प्रणाली में कई बदलाव करने होंगे ताकि निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाई जा सके। इसके लिए परमाणु ऊर्जा नियामकीय बोर्ड की भूमिका बढ़ानी होगी और उसे निजी तथा सार्वजनिक दोनों क्षेत्रों की कंपनियों पर नियामकीय अधिकार देना होगा। साथ ही उसे सांगठनिक रूप से भी मजबूत करना होगा। कई सुरक्षा उपायों को भी संस्थागत स्वरूप देना होगा। इसके लिए गहन निगरानी, नियामकीय और प्रवर्तन क्षमताएं तैयार करनी होंगी, खास तौर पर रेडियोधर्मी विकिरण वाले कचरे के निपटान तथा संयंत्रों को बंद करने के मामले में।
आखिर में एसएमआर बड़ा नवाचार है और भारत के लिए उपयुक्त भी है बशर्ते सही नीतिगत, सांगठनिक, नियामकीय और निगरानी व्यवस्था लागू हो तथा वैश्विक तकनीक के साथ देसी नवाचार के लिए भी खुला नजरिया हो। देसी नवाचार हो या अंतरराष्ट्रीय तकनीक लाना, दोनों तरीके कारगर हैं और खुशकिस्मती से ये एक-दूसरे से अलग भी नहीं हैं।
Date: 07-11-24
अमेरिका की सत्तासंपादकीय
अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर बाजी अपने नाम कर ली है। उन्होंने बहुमत के जरूरी आंकड़े से कहीं अधिक मत हासिल कर लिए हैं। सर्वेक्षणों में नतीजे डेमोक्रेटिक उम्मीदवार और उपराष्ट्रपति कमला हैरिस के पक्ष में जाते दिख रहे थे। मगर मतदान के आखिरी दिन कांटे की टक्कर नजर आने लगी। ट्रंप को उन सात राज्यों में भी बढ़त हासिल हुई, जो पलटी मारने वाले राज्य यानी ‘स्विंग स्टेट’ माने जाते हैं। हालांकि ये नतीजे हैरान करने वाले नहीं हैं। डेमोक्रेटिक पार्टी उसी वक्त कमजोर पड़ने लगी थी, जब ट्रंप के आक्रामक चुनाव प्रचार के सामने राष्ट्रपति जो बाइडेन अपनी अस्वस्थता के चलते शिथिल नजर आने लगे थे। उसके बाद कमला हैरिस को उम्मीदवार बनाया गया। मगर पार्टी के भीतर ही उथल-पुथल शुरू हो गई थी। इस तरह कमला हैरिस को समय कम मिल पाया। हालांकि उन्होंने डोनाल्ड ट्रंप को कड़ी टक्कर दी और महिला मतदाताओं को लुभाने में कामयाब भी रहीं। मगर ट्रंप ने कमजोर अर्थव्यवस्था, महंगाई और अवैध प्रवासियों के मुद्दे पर बाइडेन सरकार पर निशाना साधा, और उसका असर वहां के मतदाताओं पर पड़ा। हालांकि इन मसलों पर ट्रंप ने अपने पिछले कार्यकाल में भी बहुत आक्रामक ढंग से काम किया था। उसी का प्रभाव था कि इस बार के चुनाव प्रचार में वहां के कई बड़े उद्योगपति भी उनके साथ मंच पर उतरे थे।
अमेरिका की अर्थव्यवस्था हालांकि अब भी बहुत खराब नहीं है, मगर पहले की तुलना में उसकी रफ्तार धीमी जरूर पड़ गई है। उस पर मंदी की मार है। महंगाई अब तक के पचास वर्षों में सबसे ऊपर पहुंच गई है। रोजगार के अवसर सिकुड़ रहे हैं। ऐसे में ट्रंप ने वादा किया कि वे एक करोड़ अवैध प्रवासियों को देश से निकाल बाहर करेंगे, उन पर करोड़ों डालर खर्च हो रहा है, तो वहां के युवाओं में नए अवसर की उम्मीद जगी। पिछले कार्यकाल में भी उन्हें युवाओं का भरपूर समर्थन हासिल था। इसमें कोई दो राय नहीं कि ट्रंप आक्रामक ढंग से प्रशासन चलाने में विश्वास करते हैं और आर्थिक नीति तथा विदेश नीति को लेकर उनका रुख स्पष्ट है। वे रूस-यूक्रेन संघर्ष को लेकर पहले ही घोषणा कर चुके हैं कि उसे रुकवा देंगे। इस तरह उन पर लोगों का भरोसा बना हुआ है। हालांकि चुनाव प्रचार के दौरान उन्होंने जिस तरह कई बार राजनीतिक और लोकतांत्रिक मर्यादाएं तोड़ीं, उसकी भरपाई वे कभी नहीं कर पाएंगे।
डोनाल्ड ट्रंप के सामने जो आर्थिक चुनौतियां हैं, उनसे तो शायद वे पार पा लें, मगर विदेश नीति को लेकर उन्हें सदा संदेह की नजर से देखा जाता रहा है। चीन के प्रति उनका रुख बहुत सख्त है। इस वक्त दुनिया में जिस तरह के समीकरण हैं, उसमें वैश्विक दक्षिण की अहमियत बढ़ी है। भारत के साथ अमेरिका के रिश्तों में कोई तनाव नहीं है, मगर चीन और रूस के साथ अमेरिकी रिश्ते तल्ख होंगे तो भारत के साथ भी समीकरण गड़बड़ होने का खतरा हो सकता है। सबसे अहम बात कि अगर ट्रंप आव्रजन नीति में बदलाव करते हैं, तो वहां रह रहे भारतीय नागरिकों पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। फिर, दुनिया में बढ़ रहे जलवायु संकट को लेकर ट्रंप संजीदा नहीं रहे हैं। पिछले कार्यकाल में ट्रंप के काम करने के तरीके पर लगातार सवाल उठते रहे। अगर इस बार भी उनका वही रुख रहेगा, तो उनका विवादों से बाहर निकलना मुश्किल होगा।
Date: 07-11-24
निजी बनाम सार्वजनिकसंपादकीय
नागरिकों के संपत्ति के अधिकार पर दूरगामी प्रभाव डालने वाला सुप्रीम कोर्ट के नौ जजों की बेंच ने दो के मुकाबले सात के बहुमत से ऐतिहासिक फैसला सुनाया कि संविधान के अंतर्गत सरकारों को जन कल्याण के लिए हर निजी स्वामित्व वाले संसाधन को अधिगृहित करने का अधिकार नहीं है। शीर्ष अदालत के इस फैसले से ध्वनित होता है कि विश्व व्यवस्था बदल रही है, देश की अर्थव्यवस्था बदल रही है और इसी के साथ निजी संपत्ति रखने से संबंधित विचार भी बदल गए हैं। इसे दूसरे अर्थों में कहा जा सकता है कि अदालत ने इस फैसले ने देश के संसाधनों पर राज्य के नियंत्रण को शिथिल किया है। सत्तर और अस्सी के दशकों में रूस, चीन समेत पूर्वी यूरोप के अनेक देशों में समाजवादी – मार्क्सवादी सरकारें थीं जिनका विश्वास था कि गरीबी और असमानता को दूर करने के लिए संपत्ति का पुनर्वितरण आवश्यक है। लिहाजा, सरकार को यह अधिकार होना चाहिए कि वह जनकल्याणकारी कार्यों के लिए किसी की भी संपत्ति का अधिग्रहण कर सके। जवाहरलाल नेहरू और इंदिरा गांधी का समाजवादी विचारों के प्रति विशेष आकर्षण था । इंदिरा गांधी ने इसी विचार से प्रेरित होकर बैंकों का राष्ट्रीयकरण और राजाओं प्रिवीपर्स के अधिकार को निरस्त किया था। आपातकाल के दौरान संविधान के 42वें संशोधन के जरिए संविधान की प्रस्तावना में समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता जैसे शब्दों को जोड़ा गया था। शायद इसी पृष्ठभूमि में 1978 में सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला आया होगा कि सरकार सभी निजी संपत्तियों का जनहित में अधिग्रहण कर सकती है। प्रधान न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने पिछले फैसले को पलटते हुए कहा कि पुराना फैसला विशेष आर्थिक और समाजवादी विचारों से प्रेरित था। हालांकि संविधान पीठ के दो जजों ने अलग से अपना फैसला दिया। जस्टिस वीवी नागरत्ना ने पीठ के सात जजों से आंशिक तौर पर असहमति व्यक्त की जबकि जस्टिस सुधांशु धुलिया ने सात जजों के फैसले के सभी पहलुओं से असहमति जाहिर की। बहरहाल, समाज परिवर्तनशील है। बाजार आधारित अर्थव्यवस्था में संपत्ति के अधिकार के नये सिद्धांत विकसित हो रहे हैं। परिवर्तन का स्वागत करने वाला समाज ही गतिशील और आगे बढ़ता है। सुप्रीम कोर्ट के इस ऐतिहासिक फैसले का स्वागत किया जाना चाहिए।
Date: 07-11-24
विशेष दर्जे की राजनीतिसंपादकीय
यह होना ही था। नेशनल कॉन्फ्रेंस ने जम्मू-कश्मीर का चुनाव ही इसी घोषणा के साथ लड़ा और जीता है कि वह भारतीय संविधान में राज्य को उसका विशेष दर्जा वापस दिलाएगी। यही बात महबूबा मुफ्ती सईद की पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी, यानी पीडीपी ने भी कही थी। नेशनल कॉन्फ्रेंस ने सत्ता में आते ही पहला काम यही किया और विधानसभा ने राज्य को विशेष दर्जा दिए जाने का प्रस्ताव पारित कर दिया। शुरू में उम्मीद यह थी कि सबसे पहले जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा दिए जाने की बात होगी, जो शायद ज्यादा व्यावहारिक होता। यह एक ऐसा काम था, जो देर-सवेर होना ही है। मगर उमर अब्दुल्ला सरकार ने ऐसे मुद्दे को प्राथमिकता देना जरूरी समझा, जिसे राज्य में कुछ लोगों की भावनाओं से जोड़ दिया गया है। प्रस्ताव में केंद्र सरकार से कहा. गया है कि वह विशेष दर्जा वापस देने के लिए राज्य के प्रतिनिधियों से बातचीत करे। बुधवार को नवगठित राज्य विधानसभा में जब यह प्रस्ताव उप मुख्यमंत्री सुरिंदर सिंह चौधरी ने पेश किया, तभी यह स्पष्ट हो गया था कि चौधरी का चयन ही इसलिए किया गया है कि भारतीय जनता पार्टी इसे सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश न कर सके। जाहिर है, भाजपा इस प्रस्ताव का विरोध करना ही था जब यह प्रस्ताव पारित हो रहा था, तब भाजपा विधायक सदन में ‘पाकिस्तानी एजेंडा नहीं ‘चलेगा’ के नारे लगा रहे थे।
विशेष राज्य का दर्जा पाने के मसले पर नेशनल कॉन्फ्रेंस जहां खड़ी है, पीडीपी उससे दो कदम आगे रहना चाहती है। उसे लगता है कि विशेष दर्जे के मुद्दे से कुछ लोगों के तार भावनात्मक रूप से जुड़े हैं, इसलिए ज्यादा अतिवादी रूख अपनाकर इसका कुछ राजनीतिक फायदा उठाया जा सकता है। पार्टी कह रही है कि विशेष दर्जे की वापसी का प्रस्ताव पास करने से पहले इसे खत्म करने के केंद्र सरकार के फैसले को नकारना चाहिए था और उसकी निंदा करनी चाहिए थी। पीडीपी के एक विधायक ने ऐसा प्रस्ताव पेश भी किया। इस पर मुख्यमंत्री उमर अबदुल्ला की टिप्पणी थी कि यह पीडीपी का केवल प्रचार स्टंट है और उसके विधायक सिर्फ कैमरे के लिए कर रहे हैं।
मगर उमर अब्दुल्ला जो बात पीडीपी के लिए कह रहे हैं, वही शायद | उनके लिए भी कही जा सकती है, वरना वह भी यह जानते हैं कि 5 अगस्त, 2019 को जम्मू-कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले संविधान के जिस अनुच्छेद 370 को खत्म किया गया था, उसकी वापसी अब इतनी आसान नहीं है। पूरे भारत में इसको लेकर जिस तरह का जनमानस है, उसे देखते हुए तो यह लगभग असंभव है। वैसे भी, इतना तो उन्हें पता ही होगा कि सिर्फ विधानसभा में प्रस्ताव पारित हो जाने भर से अनुच्छेद 370 वापस आने वाला नहीं है। फिर इस समय केंद्र में ऐसी सरकार भी नहीं है, जो किसी भी तरह से इस पर विचार करने के मूड में हो। इस बात को कश्मीर की जनता और राजनेताओं, दोनों को समझना ही होगा कि 70 साल तक विशेष दर्जा होने के बावजूद इससे राज्य का कोई बहुत भला नहीं हुआ। हालांकि, एक तर्क यह भी सुनाई देता है कि विशेष दर्जा हटाने का भी राज्य को कोई बहुत लाभ नहीं मिला है। लाभ मिला या नहीं, इस पर विवाद हो सकता है, लेकिन अनुच्छेद 370 के खत्म होने से राज्य का कोई नुकसान हुआ, ऐसा भी नहीं दिखता। इसलिए जम्मू-कश्मीर को अब ऐसी राजनीति की जरूरत है, जो विशेष दर्जे से इतर तरक्की का नया खाका खींचे।
Date: 07-11-24
ट्रम्प की वापसी से उम्मीदें और आशंकाएंकंवल सिब्बल, ( पूर्व विदेश सचिव )
अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में रिपब्लिकन उम्मीदवार डोनाल्ड ट्रंप की जीत के गहरे निहितार्थ हैं। उन्हें लेकर कई तरह की संभावनाएं और आशंकाएं जताई जाने लगी हैं। निस्संदेह, इस नतीजे का असर अमेरिका की घरेलू राजनीति पर तो पड़ेगा ही, अंतरराष्ट्रीय कूटनीति पर भी खूब होगा। यह जनादेश संकेत है कि अमेरिकी समाज और वहां की राजनीति अब काफी ध्रुवीकृत हो गई है। इसे श्वेत बनाम अश्वेत में भी बांटा जा सकता है।
ट्रंप की जीत की कई वजहें हैं। उनके पास अपना समृद्ध समर्थक-वर्ग है। ये वे लोग हैं, जो मानते हैं कि डेमोक्रेट – राज में अमेरिका का दबदबा घटा है। प्रवासियों की आमद बढ़ने से यहां की जनसांख्यिकी भी प्रभावित हुई है और श्वेतों का प्रभुत्व कम हो रहा है। इसी कारण ‘मेक अमेरिका ग्रेट अगेन’ जैसा नारा उनको उद्वेलित करता है और ट्रंप को ये अपने लिए उद्धारक मानते हैं।
अमेरिका में ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है, जो प्रवासियों के प्रति बाइडन की नीतियों से खफा थे। आरोप है कि कैलिफोर्निया जैसे राज्य में, जहां मतदाताओं को मत गिराने के लिए किसी मतदाता पहचान पत्र की अनिवार्यता नहीं है, कई प्रवासियों को मतदान का हिस्सा बनाया गया, ताकि वे डेमोक्रेटिक पार्टी को वोट दे सकें । इसीलिए, प्रतिक्रियास्वरूप लोगों ने डोनाल्ड ट्रंप के प्रति एकजुटता दिखाई होगी।
अमेरिका का एक तबका यह भी मानता है कि ट्रंप के खिलाफ अन्याय किया गया। उनको चुनाव लड़ने से रोकने का प्रयास किया गया। उन पर कई मुकदमे लादे गए और न्यायपालिका का बतौर औजार इस्तेमाल किया गया। इसने विशेषकर ‘स्विंग वोटरों’ (जिनका राजनीतिक रुझान स्पष्ट नहीं होता) को रिपब्लिकन की ओर आकर्षित किया। फिर, अमेरिकी जनता इतनी आसानी से किसी अश्वेत, और वह भी एक महिला को स्वीकार नहीं करना चाहती। हालांकि, इसमें काफी हद तक दोष खुद कमला हैरिस का है। वह अगर कुशल होतीं, तो शायद पहली महिला अमेरिकी राष्ट्रपति बनने का इतिहास रच सकती थीं, लेकिन उनमें न सिर्फ मौलिकता का अभाव दिखा, बल्कि नीतिगत मुद्दों पर भी उनकी उलझन जाहिर होती रही। कठपुतली उम्मीदवार का आरोप तो उन पर था ही नतीजतन, वह अपने लिए जरूरी समर्थन नहीं जुटा सकीं।
किसी प्राइमरी को जीते बिना पैराशूट प्रत्याशी बनना भी कमला हैरिस के खिलाफ गया। उनके विचारों में गहराई का अभाव है। वह उन्हीं बातों को अपनी बहसों में रखती रहीं, जो बराक व मिशेल ओबामा, बिल व हिलेरी क्लिंटन या जो बाइडन जैसे नेता कहते रहे हैं। इससे धारणा बनी कि राष्ट्रपति बनने के बाद भी कमला हैरिस खुद फैसले नहीं लेंगी। नर्वस होने पर उनकी हंसी भी लोगों को चुभी होगी। उन्हें इतना भी समर्थन इसलिए मिला, क्योंकि अमेरिका की एक बड़ी आबादी डोनाल्ड ट्रंप से खफा है। अलबत्ता, कई डेमोक्रेट अब इस चिंता में होंगे कि जैसा उन्होंने बोया है, कहीं वैसा ही काटना न पड़ जाए, यानी जिस तरह से उन्होंने ट्रंप को रोकने के लिए कानूनों का सहारा लिया, कहीं अब ट्रंप भी उन पर मुकदमों को बोझ न लाद दें।
हालांकि, दुविधा अब मुख्यधारा के मीडिया के सामने भी होगी। वह ट्रंप पर लगातार हमलावर रहा है। कयास लगाया जा रहा है कि आगे भी ऐसा होता रहेगा। उसकी यही कोशिश रहेगी कि ट्रंप को अपने अनुकूल काम करने की खुली छूट न मिल सके। ऐसे में, मीडिया में उनकी आलोचना और ज्यादा तीखी हो सकती है, जिससे अमेरिकी समाज में ध्रुवीकरण तेज हो सकता है, जो संभवतः तनाव की वजह बने।
रही बात विश्व राजनीति की, तो कुछ क्षेत्रों पर इस नतीजे का असर साफ-साफ दिख सकता है। मसलन, अब यूरोप की राजनीति प्रभावित हो सकती है। साल 2016 में जब ट्रंप को जीत मिली थी, तब बतौर जर्मन चांसलर एंजेला मर्केल ने कहा था कि डोनाल्ड ट्रंप के साथ हम अपने मूल्यों को साझा नहीं करते। जाहिर है, यूरोपीय देशों की वह चिंता आज भी कायम होगी। फिर, नाटो के खिलाफ भी ट्रंप मुखर रहे हैं और यह मानते रहे हैं कि इस पर खर्च मूलतः अमेरिका का होता है, लेकिन फायदा विशेषकर यूरोपीय देश उठाते हैं। उनके मुताबिक, वे अपनी सैन्य सुरक्षा पर खर्च बढ़ाने के बजाय अमेरिका से उम्मीद लगाए रहते हैं और अपनी अर्थव्यवस्था को सुधारते रहते हैं। अब ट्रंप यदि नाटो को लेकर कोई प्रतिकूल कदम उठाते हैं, तो यूक्रेन युद्ध पर इसका सीधा असर पड़ेगा। वैसे भी, ट्रंप पहले कह चुके हैं कि अगर वह सत्ता में होते, तो यह संघर्ष ही नहीं होता। सरकार बनने पर जल्द इसे खत्म कराने का दावा भी वह करते रहे हैं। वह रूस के साथ समझौते के भी पक्षधर हैं। ऐसे में, यूक्रेन के राष्ट्रपति बोलोदिमीर जेलेंस्की के लिए यह नतीजा किसी दुःस्वप्न से कम नहीं होगा। ट्रंप उन पर यह आरोप लगाते रहे हैं कि जेलेंस्की आते हैं और अरबों डॉलर इमदाद लेकर चले जाते हैं, जो अमेरिकी अर्थव्यवस्था पर बोझ बढ़ाता है।
इजरायल ईरान तनातनी पर भी यह नतीजा असरंदाज हो सकता है। ट्रंप इजरायल के पक्षधर हैं और ईरान को कभी भी परमाणु शक्ति न बनने देने का दावा करते रहे। हैं। अब सवाल है कि क्या यह आग और भड़केगी या शांत होगी ? आग भड़काना तो उचित नहीं माना जाएगा, लेकिन यदि इस ज्वाला को शांत करना है, तो इजरायल को रोकना होगा, साथ ही ईरान पर भी कुछ प्रभाव डालना | होगा। ट्रंप के लिए यह एक बड़ी चुनौती होगी।
ट्रंप हिंद-प्रशांत नीति में बहुत ज्यादा शायद ही बदलाव करेंगे। हां, चीन पर दबाव बनाने के लिए वह क्वाड (जापान, ऑस्ट्रेलिया, भारत और अमेरिका का समूह ) को आगे बढ़ा सकते हैं। वह अमेरिका आने वाले उत्पादों पर टैरिफ भी बढ़ा सकते हैं, जिसका नुकसान भारत को भी हो सकता है। टैरिफ ट्रंप की पिछली सरकार में भी एक बड़ा मुद्दा था।
यह सही है कि बाइडन के कार्यकाल में तकनीक (खासकर सेमीकंडक्टर निर्माण), सेवा, रक्षा जैसे मामलों में भारत और अमेरिका काफी करीब आए हैं, लेकिन आर्थिक मसलों को छोड़कर बाकी सब पर शायद ही कोई खास असर पड़े टैरिफ में वृद्धि के अलावा विश्व व्यापार संगठन को कमजोर करने संबंधी ट्रंप के पूर्व के बयानों से भी हमारी चिंता बढ़ी है, क्योंकि हम इस संगठन के पक्षधर हैं। हालांकि, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ ट्रंप की दोस्ती काफी अच्छी है। ऐसे में, उम्मीद यही है कि हमें लाभ ही अधिक होगा।
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भारत में लैंगिक असमानता के ऐसे तर्कहीन मानदंड जब तक बने रहेंगे, तब तक न ही अर्थव्यवस्था न ही अगली पीढ़ी और न ही पति बेहतर हो सकेंगे।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 17 अक्टूबर, 2024
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Date: 06-11-24
Private mattersSC ruling on govt acquisition of pvt properties is right & a reflection of how economic policies have changedTOI Editorials
Supreme Court’s ruling yesterday on Article 39(b) clarified not all private property can be classified as ‘material resources of the community’ that the state can redistribute for the common good. The Constitution’s Article 39(b) mandates that “the state shall…direct its policy towards securing that ownership and control of…material resources of the community are so distributed as best to subserve the common good.” The question before SC was whether private property can be considered part of the ‘material resources of the community’.
Limiting state intervention | CJI Chandrachud-led constitution bench underscored in their 7:2 judgment that while some privately held resources could potentially fall under this category, each case requires careful assessment, given context and on case-to-case basis. Only those resources of significant impact to community welfare, that have unique characteristics or are scarce and needed for community well-being, may be considered under this provision.
Potential for judicial oversight | The judgment straightaway increases scope of judicial oversight in cases involving resource redistribution or govt’s acquisition bids. Expect intense scrutiny of state’s claims – for infra projects, for example. Questions will be asked on whether acquisitions genuinely serve public welfare, on the consequence of such resource being concentrated in the hands of private commercial players, and on whether they meet criteria outlined by this judgment. Private property remains constitutionally protected unless it meets stringent criteria of public interest.
Judicial support for market-driven policy | The judgment is not unexpected, although its discussion outside the courtroom had taken on a tangential political life all its own ahead of Lok Sabha elections. Poll results evidenced that voters did take the misinformation that swirled around the issue with a fistful of salt. That said, it was an unusual day in court. It is rare to find ideologies discussed in Supreme Court judgments, with salty remarks on earlier judges. In their dissent, two of the nine judges strenuously countered the comments against certain political ideology. Justice Dhulia, who wholly dissented the judgment, backed the inclusive meaning given to ‘material resources of community’, and held that given growing inequality in income and wealth, it wouldn’t be prudent to abandon principles on which Articles 38 and 39 are based. In sum, what SC has ruled is that interpretations of constitutional provisions can vary with shifts in economic policies, keeping intact the basic structure doctrine. That is how it is expected to be.
Date: 06-11-24
The (Other) Right to Privacy UpheldLinks nature of resource to ownershipET Editorials
On Tuesday, a 9-judge bench of the Supreme Court delive- red a divided (8-1) interpretation that all private property can’t be included in ‘material resources’ of the communi- ty for the state to apportion equitable, or for the ‘greater common good’. The interpretation was overdue and is bro- adly in line with India’s development trajectory that relies on market forces to redistribute resources. Yet, as the dis- senting view points out, this reliance does not address ri- sing inequality, and the state shouldn’t unduly lose agency through a narrow reading of what constitutes ‘material resources of the community’ as stated in Article 39(b) of the Constitution. The verdict by a bench of this size over- turns the legal position derived through a minority judg- ment several decades earlier that included all private pro- perty in the definition of ‘community resources’. This is welcome. But it leaves open to interpretation what kind of private property is, well, private.
The bench had, at the outset, restric- ted itself to examining the question of community resources and not the constitutional immunity granted to the state in promoting public welfare. The judgment, thus, sets out the limit on resources the state can claim in its endeavour. To this extent, it serves as a check on creeping expansion of eminent domain’. Subsequent legal inter- pretations will have to strengthen the contract between state and its citizens over property rights. The state do- esn’t face any restriction in this ruling over the defini- tion of control, another term left vague in the Constitu- tion, which keeps alive the question of redistributing re- sources between community and individuals. This, too, is welcome in that it allows the state room to manoeuvre. By linking the nature of a resource to its ownership, the reading pushes the issue to a granular level while permitting a dynamic relationship between community and material resources. In this, it serves to build a deeper moat around private ownership, keeping Adam Smith’s proverbial hand invisible.
Date: 06-11-24
महीनों तक रुलाकर क्या वाकई महंगाई घटेगी?संपादकीय
लंबे समय बाद आरबीआई गवर्नर ने कहा कि दिसंबर में महंगाई घटेगी। इससे उम्मीद बंधी कि शायद रेपो रेट घटेगा, जिससे बाजार में पैसा आएगा और खरीदारी बढ़ेगी। महंगाई घटेगी तो उसका मूल कारण होगा खाद्यान्न व पेय पदार्थों के दाम कम होना, क्योंकि इसी ने अपनी 48% भागीदारी से उपभोक्ता मूल्य सूचकांक को विगत कई महीनों से ऊपर रखा था। लेकिन महंगाई में कमी किसी बड़े नीतिगत फैसले या राज्य – अभिकरणों के बाजार में हस्तक्षेप के कारण नहीं है। दरअसल अच्छी बारिश के बाद खरीफ की फसल आ चुकी है और रबी की बुवाई काफी हद तक खत्म हो चुकी है। ठंड के मौसम में सब्जियां पर्याप्त मात्रा में आने लगी हैं। इस मौसम में सब्जियां खराब होने का डर भी नहीं रहता। यानी कुल मिलाकर खाद्य पदार्थों के दाम घटना इस सीजन में आम बात है। लेकिन यहां सोचना होगा कि अगर इन जिंसों के दाम रेपो रेट प्रभावित कर सकते हैं, जिससे पूरी अर्थव्यवस्था को झटका लगता है तो क्या कोशिश यह नहीं होनी चाहिए कि शीतगृह की तादाद बढ़ाकर और प्रमुख उत्पादन वाले क्षेत्रों में बड़े गोदामों की संख्या बढ़ाकर सरकार इनकी बर्बादी कम करे और साथ ही किसानों को आढ़तियों के शोषण से बचाए? एक ताजा सरकारी रिपोर्ट के अनुसार बढ़ी कीमतों का बड़ा हिस्सा इन बिचौलियों के पास जाता है न कि किसानों के पास। ‘टॉप’ योजना को छह साल हो चुके हैं, लेकिन आज भी 30-35% सब्जियों की बर्बादी के अलावा अनाज और दूध भी खराब होने से रोके जा सकते हैं। व्यापक स्तर पर शीत – श्रृंखला और अच्छे गोदाम उत्पादन केन्द्रों के पास तैयार करना खाद्य महंगाई रोकने की पूर्व – शर्त है। गरीब के कुल खर्च में इसका हिस्सा 70% तक होता है। इन प्रयासों में सरकारी-निजी निवेश किसानों, गरीबों और मार्केट- सेंटिमेंट सभी को खुश रखेगा।
Date: 06-11-24
राह दिखाने वाला फैसलासंपादकीय
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला कि सरकार हर निजी संपत्ति का अधिग्रहण नहीं कर सकती, केवल इसलिए ऐतिहासिक नहीं है कि यह नौ सदस्यीय संविधान पीठ की ओर से दिया गया, बल्कि इसलिए भी है, क्योंकि इसने उस समाजवादी विचार को आईना दिखाया, जिसे सरकारों की रीति-नीति का अनिवार्य अंग बनाने का दबाव रहता था। स्पष्ट है कि सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला उन समाजवादी और वामपंथी सोच वालों के लिए भी झटका है, जो यह माहौल बनाने में लगे हुए थे कि देश में गरीबी और असमानता तभी दूर हो सकती है, जब सरकार संपत्ति का पुनर्वितरण करने में सक्षम हो और उसे यह अधिकार मिले कि वह किसी की भी संपत्ति का अधिग्रहण कर सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने यह साफ कर दिया कि सरकार एक हद तक ही ऐसा कर सकती है। अपने फैसले से सुप्रीम कोर्ट ने एक तरह से यह भी रेखांकित कर दिया कि आपातकाल के समय संविधान की प्रस्तावना में सेक्युलरिज्म के साथ समाजवाद शब्द जोड़कर भारतीय शासन व्यवस्था में समाजवादी तौर-तरीके अपनाने का जो काम किया गया था, वह निरर्थक था। अच्छा हो कि इस निरर्थकता को वे लोग भी समझें, जो संपत्ति के सृजन से अधिक अहमियत उसका पुनर्वितरण करने पर देते हैं। यह देश को समृद्धि की ओर ले जाने का रास्ता नहीं है। हो भी नहीं सकता, क्योंकि दुनिया भर का अनुभव यही बताता है कि जिन देशों ने अपने लोगों की भलाई के नाम पर अतिवादी समाजवादी तौर-तरीके अपनाए, वे आर्थिक रूप से कठिनाइयों से ही घिरे ।
निजी संपत्ति संबंधी सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले ने करीब चार दशक पुराने उस फैसले को खारिज करने का काम किया, जिसमें कहा गया था कि सभी निजी स्वामित्व वाले संसाधनों को राज्य द्वारा अधिग्रहित किया जा सकता है। यह अच्छा हुआ कि सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट करने की आवश्यकता भी समझी कि उक्त फैसला एक विशेष आर्थिक और समाजवादी विचारधारा से प्रेरित था । उसने यह भी रेखांकित किया कि पिछले कुछ दशकों में गतिशील आर्थिक नीति अपनाने से ही भारत दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था बना है। सुप्रीम कोर्ट के फैसले से यह भी पता चल रहा है कि देश को किसी विशेष प्रकार के आर्थिक दर्शन के दायरे में रखना ठीक नहीं है और आर्थिक तौर-तरीके ऐसे होने चाहिए, जिनसे एक विकासशील देश के रूप में भारत उभरती चुनौतियों का सामना कर सके। उम्मीद की जानी चाहिए कि सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से निजी संपत्ति के मामले में अब इसे लेकर कोई संशय नहीं रहेगा कि क्या समुदाय का संसाधन है और क्या नहीं? कोई भी देश हो, उसे अपना आर्थिक दर्शन देश, काल और परिस्थितियों के हिसाब से अपनाना चाहिए, न कि इस हिसाब से कि पुरानी परिपाटी क्या कहती है ? समय के साथ बदलाव ही प्रगति का आधार है। यह अच्छा हुआ कि सुप्रीम कोर्ट ने इस आधार को मजबूती प्रदान की ।
Date: 06-11-24
चुनौतीपूर्ण है निजी पूंजी जुटानासंपादकीय
अजरबैजान की राजधानी बाकू में आगामी 11 से 22 नवंबर के बीच आयोजित होने जा रहे जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र के सम्मेलन (कॉप29) में जलवायु वित्त तथा इसके लिए राशि जुटाना वार्ताकारों के बीच प्रमुख विषय होगा।विभिन्न देश, खासकर एशिया-प्रशांत क्षेत्र के देश जलवायु वित्त के मामले में करीब 800 अरब डॉलर की कमी का सामना कर रहे हैं और महामारी के कारण सार्वजनिक फंडिंग में भारी कमी आई है। ऐसे में नीति निर्माता और जलवायु कार्यकर्ता शिद्दत से ऐसे तरीके तलाश कर रहे हैं जिससे निजी क्षेत्र की फंडिंग जुटाई जा सके। यह बात और अधिक महत्त्वपूर्ण हो गई है क्योंकि यह माना जा रहा है कि विकासशील देश, जो इस वित्त के मुख्य लाभार्थी होंगे (क्योंकि उनका विकास जीवाश्म ईंधन पर निर्भर है) और उन्हें 2030 तक 5.9 लाख करोड़ डॉलर की आवश्यकता होगी।
बहरहाल, यह स्पष्ट नहीं है कि निजी वित्त इस भारी-भरकम राशि के बड़े हिस्से की भरपाई करने में शीर्ष भूमिका निभा भी पाएगा या नहीं। अब तक की बात करें तो जलवायु वित्त में निजी क्षेत्र की भागीदारी देखकर ऐसा नहीं लगता है कि हरित और ईएसजी फंड में इजाफा होने के बावजूद वर्तमान हालात में कुछ खास परिवर्तन आएगा।वर्ष 2022 तक जलवायु वित्त के क्षेत्र में जो भी फंड जुटाए गए उनमें निजी क्षेत्र की भागीदारी करीब 20 फीसदी रही। फंडिंग के इस स्रोत को बढ़ावा देने के लिए कई मोर्चों पर मौजूद चुनौतियों से निपटना होगा। जलवायु परिवर्तन के क्षेत्र में निजी क्षेत्र की फंडिंग का अब तक का रुझान यही बताता है कि विकासशील देशों की जोखिम अवधारणाएं और आर्थिक एवं निवेश नीतियों की दक्षता, निजी निवेशकों के निर्णयों में अहम भूमिका निभाएगा।
जलवायु वित्त के क्षेत्र में निजी पूंजी का बड़ा हिस्सा यानी करीब 81 फीसदी हिस्सा जलवायु परिवर्तन को रोकने पर केंद्रित था। जलवायु परिवर्तन को अपनाने के क्षेत्र में 11 फीसदी राशि दी गई। यह विडंबना ही है कि इसका अधिकांश हिस्सा विकसित देशों को गया। महत्त्वपूर्ण बात है कि निजी क्षेत्र से आने वाली 85 फीसदी पूंजी सबसे कम जोखिम प्रोफाइल वाले विकासशील देशों पर केंद्रित रही।
कम आय वाले देश जहां इस पूंजी की जरूरत अधिक थी उन्हें केवल 15 फीसदी राशि मिली। कुछ विश्लेषकों के अनुसार मुद्दे की मूल वजह है निवेश के लिए तैयार परियोजनाओं की कमी। परंतु इस परियोजना पाइपलाइन को तैयार करने में सरकारी और बहुराष्ट्रीय संस्थानों के समर्थन की अहम भूमिका होगी जिनकी मदद से जोखिम कम किया जा सकेगा और प्रतिफल और निर्गम पर नजर रखी जा सकेगी।
उदाहरण के लिए भारत जैसे देशों में यह कवायद दिक्कतदेह बन जाती है क्योंकि बिजली की कीमतें तय करने के मॉडल में दीर्घकालिक ढांचागत कमियां हैं और नवीकरणीय ऊर्जा के वितरण एवं पारेषण के साथ तकनीकी दिक्कतें जुड़ी हुई हैं।बिजली के क्षेत्र में राजनीतिक कारणों से प्रेरित सब्सिडी के चलते भी राष्ट्रीय ग्रिड से जुड़ी हरित ऊर्जा उत्पादन परियोजनाओं का लाभ समय पर नहीं मिल रहा है। आंकड़ों की कमी और अविकसित वित्तीय बाजार भी निजी क्षेत्र के निवेश को बाधित करते हैं।
अगर जलवायु नियंत्रण से संबंधित परियोजनाएं मसलन हरित ऊर्जा की दिशा में बदलाव की राह में इतनी चुनौतियां हैं तो जलवायु परिवर्तन को अपनाने के क्षेत्र में निजी निवेश जुटाना और कठिन होगा। पुनर्वनीकरण, जल संरक्षण या चक्रवात और तूफानों की अग्रिम चेतावनी जैसी गैर वाणिज्यिक परियोजनाओं के क्षेत्र में निजी पूंजी के आने की कल्पना करना थोड़ा मुश्किल काम है।लब्बोलुआब यह है कि जलवायु परिवर्तन के क्षेत्र में निजी निवेश जुटाने की तमाम कोशिशों के बीच सरकारी और बहुपक्षीय पूंजी की आवक जारी रखनी होगी। मुख्य भूमिका उनकी ही होगी जबकि निजी क्षेत्र की फंडिंग पूरक भूमिका में होगी। परंतु इस राशि को जुटाने के लिए भी प्राप्तकर्ता देशों को अपनी राज्य क्षमता मजबूत करनी होगी। परियोजनाओं के क्रियान्वयन में पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ानी होगी। इन बुनियादी सुधारों के बिना निजी पूंजी जुटाना मुश्किल बना रहेगा।
Date: 06-11-24
स्टार्टअप का खुमार और भविष्य की हकीकतअजित बालकृष्णन
एक दिन तड़के मेरे पास एक फोन आया। दूसरी ओर से जानी-पहचानी आवाज में किसी ने कहा, ‘मुझे लगता है मेरे भाई ने खुदकुशी कर ली।’
‘हे भगवान, क्या हुआ?’ मैंने पूछा।
‘उसने हमारा पुश्तैनी घर गिरवी रखकर बैंक से अपने स्टार्टअप के लिए कर्ज लिया था, जिसे बाद में वह चुका नहीं पाया। इसलिए बैंक ने घर पर कब्जा कर लिया और हमारे दादा-दादी समेत सभी घर वालों को घर खाली करने को कह दिया। उनके पास सिर छिपाने के लिए कोई जगह भी नहीं है! मुझे लगता है इसी वजह से उसने कुछ गोलियां निगल लीं और अब वह जग ही नहीं रहा है।’
मैं एकदम स्तब्ध और अवाक रह गया। अच्छा हुआ कि मेरे मित्र ने फोन काट दिया और मैं गहरी सोच में डूब गया। इस जमाने के ज्यादातर लोगों की तरह मुझे भी लगता है कि स्टार्टअप सारी आधुनिक आर्थिक चुनौतियों का इलाज हैं। इनसे हमें ढेर अपेक्षाएं हैं। मसलन इन्हें अच्छा रोजगार तैयार करना चाहिए, अर्थव्यवस्था का विकास करना चाहिए, हमारी अर्थव्यवस्था को विदेशी टेक दिग्गजों से बचाना चाहिए।
सरकार भी उतने ही जोश के साथ इसमें शामिल है: उसके स्टार्टअप इंडिया मिशन के तहत 2022-23 में करीब 23,000 इकाइयों ने पंजीकरण कराया और आंकड़ों से संकेत मिलता है कि इस साल और भी अधिक इकाइयों का पंजीकरण होगा। इसके अलावा लगभग हर आईआईटी (भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान) और आईआईएम (भारतीय प्रबंध संस्थान) तथा ऐसे ही अन्य शैक्षणिक संस्थानों ने भी अपने-अपने स्टार्टअप केंद्र स्थापित किए हैं। हम भारतीयों को मानो स्टार्टअप का बुखार चढ़ गया है।
मगर मुझे यह सोचकर रात भर नींद नहीं आती है कि स्टार्टअप पर ऐसे जश्न और शोरशराबे के बीच हमें नीति निर्माण के स्तर पर स्टार्टअप की प्रक्रिया में बहुत गहराई तक जाने की जरूरत है। ऐसा नहीं है कि हर स्टार्टअप कामयाब ही होगा और अपने संस्थापकों और निवेशकों को अमीर बना देगा।अमेरिका तथा भारत के आंकड़े बताते हैं कि 10 में से 9 स्टार्टअप अपनी मंजिल तक नहीं पहुंच पाते। केवल 10 फीसदी स्टार्टअप ही बचते हैं और फल-फूल पाते हैं। आगे का विश्लेषण दिखाता है कि 20 फीसदी स्टार्टअप एक साल बाद ही नाकाम हो जाते हैं, अगले 30 फीसदी स्टार्टअप दो साल के भीतर बंद हो जाते हैं। उससे आगे बढ़ें तो 20 फीसदी स्टार्टअप पांच साल के भीतर बंद हो जाते हैं और 20 फीसदी का बोरिया-बिस्तर 10 साल में बंध जाता है।इस तरह 10 फीसदी स्टार्टअप ही आर्थिक मायनों में सफल हो पाते हैं। इसका मतलब है कि स्टार्टअप में नाकामी को स्वीकार करना सीखना भी उतना ही जरूरी है, जिसका उसकी कामयाबी का जश्न मनाना सीखना। ऐसा नहीं किया जाए तो स्टार्टअप संस्थापक और उसके परिवार को वैसी ही त्रासदी झेलनी पड़ सकती है, जैसी मेरे मित्र के भाई के कारण हुई।
नाकामी से निपटने के तरीकों पर बात करने से पहले हम नाकामी की वजहों की पड़ताल कर लेते हैं। आंकड़े बताते हैं कि स्टार्टअप की नाकामी की सबसे अहम वजह है उसके बनाए उत्पाद या सेवा का बाजार को लुभाने में असफल रहना यानी उत्पाद बाजार के माफिक नहीं बन पाता।दूसरी सबसे बड़ी वजह है स्टार्टअप को शुरुआत में मिली पूंजी बहुत जल्दी इस्तेमाल हो जाना। तीसरी सबसे महत्वपूर्ण वजह है सही लोगों को नौकरी पर नहीं रख पाना। ध्यान रहे कि दोस्तों या रिश्तेदारों का जमावड़ा इकट्ठा कर लेने से बात नहीं बनती। संस्थापकों के पास एक-दूसरो को सहारा देने वाले कौशल होने चाहिए। मसलन एक संस्थापक तकनीक का जानकार है तो दूसरे को मार्केटिंग का विशेषज्ञ होना चाहिए।
नाकामी की आखिरी वजह कोई ऐसी घटना होती है, जिस पर हमारा वश नहीं चलता मगर जिसका हमारे कारोबार या कामकाज पर बहुत असर पड़ता है। उदारहण के लिए रुपये में अचानक गिरावट आ जाना या आपके लिए जरूरी वस्तु के आयात पर अचानक बहुत अधिक शुल्क लग जाना।
इसी तरह वर्ल्ड वाइड वेब (डब्ल्यूडब्ल्यूडब्ल्यू) किसी ऐसे पड़ाव पर पहुंच सकता है, जहां उसका बुनियादी ढांचा ही अचानक बदल जाए। अगर वर्तमान स्टार्टअप या पहले से जम चुके स्टार्टअप ऐसे बदलावों को पहले से नहीं भांप पाते हैं तो उनके सामने गंभीर संकट आ सकता है।
यह बदलाव किस तरह का हो सकता है, इसे पूरी तरह समझने के लिए हमें टिम बर्नर्स ली की बात सुननी होगी। विकीपीडिया पर लिखे परिचय को जस का तस लिखें तो टिम बर्नर्स ली ‘इंगलैंड के कंप्यूटर वैज्ञानिक हैं, जो डब्ल्यूडब्ल्यूडब्ल्यू, एचटीएमएल मार्कअप लैंग्वेज, यूआरएल सिस्टम और एचटीटीपी के आविष्कार के लिए सबसे ज्यादा मशहूर हैं।’ यह पढ़ते हुए आप ध्यान देंगे कि कंप्यूटर विज्ञान का जिक्र किए बगैर ही इन संक्षिप्त नामों ने वह सब स्पष्ट कर दिया जो वर्ल्ड वाइड वेब बनाने के लिए जरूरी है और जिसे हम सब प्यार करते हैं तथा मानते हैं कि उसी ने आधुनिक दुनिया बनाई है।
परंतु अब दम साधकर सुनिए कि हमारी यह आधुनिक दुनिया गढ़ने वाला विद्वान व्यक्ति आज के वेब के बारे में क्या कहता है (सारे बयान उनकी वेबसाइट से लिए गए हैं)। वह कहते हैं कि आज का वेब जानबूझकर सरकार के इशारे पर हैंकिंग तथा हमलों, आपराधिक व्यवहार, ऑनलाइन प्रताड़ना जैसे गलत इरादों से बनाया गया है। इसे कुछ इस तरह तैयार किया गया है कि इस्तेमाल करने वाले की कोई अहमियत ही नहीं रह जाती।विज्ञापन से कमाई का मॉडल इसका उदाहरण है, जिसमें लोगों को कीबोर्ड क्लिक करने के लिए आकर्षित करने वाली सामग्री (क्लिकबेट) और गलत सूचना के प्रसार से व्यावसायिक लाभ होता है। इसकी वजह से ऑनलाइन चर्चा का स्तर गिरा है और ध्रुवीकरण बढ़ता जा रहा है।
वेब के संस्थापक अपने जादुई अविष्कार के इस हश्र पर निराशा और नाराजगी जाहिर करने के लिए इससे कड़वा और क्या कह सकते थे। उनकी राय में कंपनियों को सुनिश्चित करना चाहिए कि जल्दी मुनाफा हासिल करने की उनकी दौड़ से मानवाधिकारों, लोकतंत्र, वैज्ञानिक तथ्यों और जन सुरक्षा की बलि न चढ़ जाए।
क्या ऐसा हो सकता है कि टिम बर्नर्स ली की बातों को ध्यान से सुनने वाले स्टार्टअप ही कल की दुनिया में फलें-फूलें? क्या आज की लीक पर चल रहे बाकी सभी का वैसा ही त्रासद अंत होगा, जिससे इस आलेख की शुरुआत हुई थी? इसका मतलब है कि जो स्टार्टअप विकेंद्रीकृत मॉडल पर चलते हैं और जिनके यहां यूजर्स का अपनी जानकारी पर अधिक नियंत्रण होता है, उनके लिए विकेंद्रीकृत संगठनों तथा विश्वसनीय पहचान प्रबंधन पर जोर देना ही सफलता की कुंजी है। ब्लॉकचेन, स्मार्ट कॉन्टैक्ट्स और विकेंद्रीकृत ऐप्स ही शायद कल सफलता के आसमान पर चमकेंगे।
Date: 06-11-24
राहत भरा फैसलासंपादकीय
मंगलवार को सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद उत्तर प्रदेश के हजारों मदरसों ने राहत की सांस ली होगी, वरना इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले के बाद उनके अस्तित्व पर संकट मंडराने लग गया था। उत्तर प्रदेश मदरसा शिक्षा कानून 2004 में तब बनाया गया था, जब प्रदेश में मुलायम सिंह यादव की सरकार थी। तब इस कानून का मकसद यह बताया गया था कि प्रदेश के सभी मदरसों का रजिस्ट्रेशन किया जाएगा, उनमें आधुनिक शिक्षा दी जाएगी और एकरूपता लाई जाएगी। इसी के साथ इसमें मदरसा शिक्षा बोर्ड का भी प्रावधान था, जो सारे के मदरसों का पाठ्यक्रम तय करने से लेकर वहां परीक्षाएं आयोजित करने का काम करेगा। इस कानून का एक मकसद यह भी बताया गया था कि इन मदरसों से जो छात्र निकलेंगे, वे देश की मुख्यधारा में शामिल होंगे और उनकी शिक्षा उन्हें विभिन्न रोजगारों में अवसर उपलब्ध कराएगी। उत्तर प्रदेश में इस समय लगभग 25 हजार मदरसे हैं। इनमें से 16,500 मदरसे शिक्षा बोर्ड से पंजीकृत हैं, जबकि बाकी का पंजीकरण नहीं हुआ। पंजीकृत मदरसों को सरकारी मदद भी मिलती है। और वहां के शिक्षकों के वेतनमान भी तय हैं। बाद में जब इस कानून को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई, तो अदालत ने इसे असांविधानिक घोषित कर दिया। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि यह कानून धर्मनिरपेक्षता के सिद्धांतों के खिलाफ है। अदालत ने कहा कि इन मदरसों में इस्लामी शिक्षा पर बहुत जोर दिया जाता है। इतना ही नहीं, हाईकोर्ट ने प्रदेश सरकार से यह भी कह दिया कि वह इन मदरसों में पढ़ रहे छात्रों को वहां से निकालकर मुख्यधारा के स्कूलों में भर्ती कराएं।
सुप्रीम कोर्ट ने अब इलाहाबाद हाईकोर्ट के इस फैसले को गलत ठहराया है और मदरसा शिक्षा कानून को फिर से वैधानिकता दे दी है। प्रधान न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ समेत तीन न्यायाधीशों की पीठ ने हाईकोर्ट के फैसले को गलत करार दिया। अदालत में प्रधान न्यायाधीश की यह टिप्पणी भी महत्वपूर्ण थी कि धर्मनिरपेक्षता का अर्थ होता है, जियो और जीने दो। उन्होंने यह भी कहा कि मदरसों का नियमन हो, यह हमारे राष्ट्रीय हित के लिए भी जरूरी है। उन्होंने इसमें यह भी जोड़ा कि अगर हम हाईकोर्ट के फैसले को ही लागू करें और अभिभावक अपने बच्चों को फिर भी इन्हीं मदरसों में भेजते रहे, तो हम उनके कूपमंडूक के बनने का रास्ता तैयार कर देंगे। अदालत ने
यह भी कहा कि मदरसों के छात्रों को अच्छी शिक्षा मिले, इसकी चिंता हमें भी है। पीठ के फैसले में यह भी गौर करने लायक है कि मदरसों में धार्मिक शिक्षा दिए जाने में कुछ भी गलत नहीं है। ये सारी टिप्पणियां अदालत के फैसले को ही नहीं, बल्कि उसके पीछे की सोच और भावना को भी स्पष्ट करती हैं।
सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला उस समय आया है, जब पूरे देश का माहौल सांप्रदायिक रूप से काफी संवेदनशील हो चुका है। माहौल जब खतरनाक ढंग से संवेदनशील बन चुका हो, तब जरूरत ऐसी ताकतों की होती है, जो सरल शब्दों में समझदारी की बातें बेखौफ होकर कहे। सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार के अपने फैसले में यही भूमिका निभाई है। उसने जो फैसला दिया है, वह कानून सम्मत और संविधान सम्मत तो है ही, साथ ही देश के माहौल को सुधारने और संवारने वाला भी है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला भले ही मदरसों की शिक्षा पर बने कानून को लेकर हो, लेकिन उसने जो कहा है, उसका असर इससे कहीं आगे तक जाता है।
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जलवायु परिवर्तन का खतरा पूरी दुनिया पर मंडरा रहा है। लेकिन अमेरिका जैसे देश में यह राजनीति का मुद्दा बना हुआ है, और भारत में यह पर्यावरण से जुड़ी जोखिम भरी परियोजनाओं को स्वीकृति देने का मामला बना हुआ है।
तूफानों पर राजनीति – अमेरिका में हाल ही में आए दो तूफानों से हुई तबाही को वहाँ की रुढ़िवादी रिपब्लिकन पार्टी सत्तासीन दल की आधिकारिक अक्षमता का परिणाम मान रही है। वह इस वैज्ञानिक सच्चाई को मानने से इंकार करती है कि जलवायु परिवर्तन ने तूफानों को अधिक शक्तिशाली बना दिया है।
भारत की विपरीत नीतियां –
अमेरिका के विपरीत, भारत की आपदा प्रबंधन प्रतिक्रिया सराहनीय रही है। यहाँ के राजनीतिक दलों में जलवायु परिवर्तन के बारे में कोई ध्रुवीकरण वाली बहस भी नहीं होती है। लेकिन यहाँ सभी सरकारें जलवायु परिवर्तन को उत्तेजित करने वाले हानिकारक कार्यों को हरी झंडी देना जारी रखती हैं; चाहे वह अरावली में आवासीय परियोजना हो, या चार धाम या पश्चिमी घाट हो। केंद्र सरकार आपदाओं को कम करने का प्रयास कर सकती है, लेकिन वह आपदाओं को बढ़ाने में भूमिका निभा रही है।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 14 अक्टूबर, 2024
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Date: 05-11-24
Time for actionConcrete action must take centre stage in climate mitigationEditorial
Next week will be that time of the year when countries get into a huddle for the annual two-week climate conference, in Azerbaijan’s capital Baku, to fine-tune global action on human-caused global warming. To have any chance at keeping global temperatures from exceeding 1.5° C of pre-Industrial levels, multiple scientific assessments have said that greenhouse gas emissions must peak before 2025 at the latest and decline 43% by 2030. However, summing up all the collective commitments by countries to reduce their greenhouse gas emissions would lead to only a 2.6% decrease in global greenhouse gas emissions by 2030, compared to 2019 levels. Save for 2020, the year of the COVID-19 pandemic, global emissions have only increased every year, with 53 billion metric tonnes emitted in 2023.
Given that most rich countries are loathe to make compromises on their lifestyles and poorer, developing countries aspire to be rich, the only practical solution envisaged is that the developing countries grow rich while eschewing the proven fossil-fuel led trajectory. However, the costs that these entail — of shifting to cleaner but land-intensive and relatively expensive renewable sources — remain the proverbial bone of contention. In 2009, at the climate summit in Copenhagen, developed countries agreed to fund developing countries $100 billion annually by 2020 as ‘climate finance’ to enable this transition. Though it is the United Nations that is supposed to ratify if these finance goals have been met, a lack of clarity on the definition of ‘climate finance’, and delays in the financial crediting system have led to considerable angst among developing countries that these goals have been far from met. The Paris Agreement of 2016 requires that countries decide on a new collective quantified goal (NCQG) before 2025, with the $100 billion as a base value. Then there is also a quibble, from the developed world, that major emitters such as China and India, which are large economies and major polluters, must also contribute. It is widely expected that this NCQG will be a major point of discussion at Baku. Another issue of import is carbon markets, that have for long been touted as the solution to the problem of finance. Rich countries or companies finance counterparts in the developing world for renewable energy generation and carbon-offsetting measures and gain tradeable credits. However, specifying the rules on how this is accounted for is a vexing problem. The hallmark of climate negotiations is that they are arenas of gladiatorial legalese where the stated goal of reducing emissions seems to stretch further beyond reach. It is time that concrete action takes centre stage.
Date: 05-11-24
We need to address India’s workplace cultureIf we are to address the worst excesses of India’s corporate culture, some form of regulation seems unavoidableT.T. Ram Mohan, [ Former professor at IIM Ahmedabad.]
In September, the mother of Anna Sebastian, the young chartered accountant who passed away in July allegedly due to work stress, said, “They say we have received freedom in 1947, but our children are still working like slaves.” Her anguished cry goes to the heart of the issue of workplace culture in India’s corporate world.
The inquiry report of the Ministry of Labour, promised within 10 days, is still awaited. The corporate world has chosen to remain largely silent on the tragedy. What corporate leader would dare to point fingers at others when the position at his own firm is not very different?
Toxic work culture
The issue is not just long hours or having to put in extra effort to meet a deadline. Employees will gladly slog it out if they are shown respect, appreciated, and feel they are treated fairly. From all accounts, much of corporate India fails on every count. Toxic work culture is pervasive in India’s private sector.
Long hours flow directly from a focus on the bottom line that comes at the expense of employees’ well-being. The management employs two people where four are required. It seeks to motivate the two employees by giving them the wages of three, thus saving on one employee. Impressive jargon has been created to justify exploitation of employees and inhuman work hours. Meeting stiff targets against heavy odds is ‘organisational stretch’. There is ‘variable pay’ to promote a ‘performance culture’ that translates into a higher stock price — great for top management that corners most of the stock options. There is a ‘bell curve’ that identifies super-performers as well as under-performers. There are ‘stress management’ workshops to deal with the burn-out that ensues. Management does not stop to ask itself why it is creating so much stress for employees in the first place.
Long hours and employee burnout are typical of the corporate culture of the U.S. but not of Europe. France has a 35-hour work week. In the rest of Europe, the norm is about 40 hours. European firms lack competitiveness, did you say? Well, European standards of living are nothing to scoff at.
It is unrealistic to try to import the American culture into a setting that could not be more different. The per capita income in the U.S. is $85,000. In India, it is $2,700. The typical U.S. employee operates at a level of comfort — in terms of housing, commuting, health, diet, and leisure — that is way above that of the Indian employee. In India’s big cities, simply going to office and getting back can be an ordeal. So are getting school admissions for children (and then getting them into coaching classes), looking after an elderly parent, and generally ensuring that the household is ticking along.
Long hours are only part of the problem. Bosses often use language that can range from being unprofessional to abusive. During the tenure of Prime Minister Rishi Sunak, his deputy, Dominic Raab, faced charges of ‘bullying’ from officials he had worked with in his previous stints as minister. An enquiry found that he had been “aggressive” and “intimidating” but not “abusive”. Mr. Raab, nevertheless, had to resign. Such was the fate of the U.K. Deputy Prime Minister, no less, for having breached norms of civilised behaviour.
One wonders what would happen if these standards were applied to India’s corporate world. In the U.S. and in Europe, employees can sue the firm for a range of objectionable behaviours including those that cause them mental stress. They often win huge settlements. No such recourse is available in India.
Employees also feel they are not treated fairly. The performance evaluation system is often suspect and the ruthlessness with which so-called under-performance is dealt with will make one squirm. Top management will talk of “weeding out dead wood”, an expression that shows scant regard for the worth of human beings. Variable pay is heavily skewed in favour of a handful of individuals at the top. When those below seethe with resentment at what they perceive as unfair, a toxic culture is inevitable.
Many public sector firms have a much better work culture. Employees may not get huge rewards but they have job security. Unions act as a check on the arbitrary ways of top management. Inequality in pay is nowhere as glaring as in the private sector. Officers at the middle and senior levels put in long hours. People have their grievances. But complaints about a toxic work culture are rarer.
Time to remedy matters
How do we remedy matters? Corporates can be expected to be respond along predictable lines: there will be affirmations of “core values”, a new “code of conduct” for management, programmes to address the “work-life balance”, more “town hall meetings” with employees. If these could make a difference, we shouldn’t be having a problem in the first instance. The board of directors should be paying attention to the company’s work culture, providing recourse and initiating corrective measures. Alas, boards tend to be even more disconnected from reality than the management. Moreover, they lack the incentives or the motivation to challenge management.
If we are to address the worst excesses of India’s corporate culture, some form of regulation seems unavoidable. Regulation may get boards to assume responsibility for the work culture, engage with employees at lower levels, and get a sense of what’s going on. The Nirbhaya episode caused a paradigm shift on the issue of women’s safety. One, hopes that Sebastian’s untimely demise will likewise turn out to be a defining moment for India’s workplace culture.
Date: 05-11-24
एआई का उपयोग बेहतर शिक्षा के लिए भी किया जा सकता हैजस्टिना निक्सन-सेंटिल, ( आईबीएम की वाइस प्रेसिडेंट और चीफ इम्पैक्ट ऑफिसर )
एआई का इस्तेमाल व्यापक और अधिक जटिल समस्याओं के लिए भी किया जा सकता है, खासकर शिक्षा में। यह बात केवल कपोल-कल्पना नहीं, वास्तविकता बनने की राह पर है, क्योंकि यह तकनीक पहले ही छात्रों की शिक्षा को बढ़ाने, बेहतर करियर के लिए नए रास्ते बनाने और आज की शिक्षा को कल की नौकरियों के साथ जोड़ने में मदद करने लगी है।
हाल ही में आई एक रिपोर्ट में पाया गया कि अमेरिका में किए एक सर्वेक्षण में लगभग आधे शिक्षक और स्कूल प्रशासक- जो वर्तमान में अपने काम में एआई का उपयोग कर रहे हैं- वे इसकी क्षमता के बारे में आशान्वित हैं। लेकिन प्रशिक्षण की कमी इसे व्यापक रूप से अपनाने में बाधा बन रही है।
सौभाग्य से, इस बाधा को पार करना अपेक्षाकृत सरल है। शुरुआत के लिए, बिजनेस लीडर्स और नीति-निर्माताओं को शिक्षकों को एआई और इसके व्यावहारिक अमल के लिए निःशुल्क प्रशिक्षण प्रदान करना चाहिए। इसे निःशुल्क ऑनलाइन शिक्षा के माध्यम से किया जा सकता है या इसे शिक्षा के विशिष्ट स्तरों या स्थानीय पाठ्यक्रम के लिए कस्टमाइज्ड किया जा सकता है। इससे शिक्षक नई तकनीक के साथ आत्मविश्वास हासिल कर सकेंगे और अपनी कक्षाओं में उनके प्रैक्टिकल के साथ प्रयोग शुरू कर सकेंगे।
इसके अलावा, एआई में प्रशिक्षित शिक्षक उन छात्रों की मदद करने के लिए भी बेहतर ढंग से तैयार होते हैं, जो इस क्षेत्र के बारे में अधिक जानना चाहते हैं। आईबीएम के एक सर्वेक्षण से पता चलता है कि कई शिक्षार्थी अच्छी तनख्वाह वाली तकनीकी नौकरी करना चाहते हैं, लेकिन उनका मानना है कि वे इसके लिए अयोग्य हैं क्योंकि उनके पास शैक्षणिक योग्यता नहीं है।
दूसरों का कहना है कि उन्हें बस यह नहीं पता कि शुरुआत कहां से करें। यहीं पर जनरेटिव एआई काम आता है : यह स्टूडेंट्स के स्तर और रुचियों से मेल खाने वाले कोर्सवर्क की सिफारिश कर सकता है और रियल-टाइम प्रतिक्रियाएं दे सकता है।
एआई-संचालित समाधान छात्रों को ऐसे सलाहकारों से भी जोड़ सकते हैं, जो उन्हें उच्च शिक्षा और करियर की प्रगति पर सलाह दे सकते हैं। इसका परिणाम बीते दौर की ऑनलाइन लर्निंग की तुलना में अधिक व्यक्तिगत और तत्काल शैक्षिक अनुभव देने वाला होता है।
एआई स्किल्स-गैप को कम करने में आने वाली एक महत्वपूर्ण बाधा इनोवेशन की तीव्र गति है, जिसके कारण विशेषज्ञता की पर्याप्त मांग पूरी नहीं हो पाई है। विश्व आर्थिक मंच के अनुसार, वैश्विक कार्यबल के आधे हिस्से को अप-स्किलिंग या री-स्किलिंग की आवश्यकता है, लेकिन प्रशिक्षण-बाजार वर्तमान में इस आवश्यकता को पूरा करने के लिए तैयार नहीं है। चूंकि तकनीकी कौशल का जीवनकाल लगातार कम होता जा रहा है, इसलिए युवा छात्रों और आजीवन सीखने वाले दोनों को एआई के प्रशिक्षण में निवेश करने के लिए प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
एआई उद्योगों और बाजारों में बड़े बदलाव ला रहा है और इसके अनुरूप व्यापक प्रतिक्रिया की आवश्यकता है- व्यक्तिगत प्रयास इसके लिए नाकाफी होंगे। विद्यार्थियों को आने वाले कल की नौकरियों के लिए अपना रास्ता खोजने में मदद करने का पहला कदम यह सुनिश्चित करना है कि वो पोजिशंस कायम रहें।
कॉर्पोरेट अधिकारियों और नीति निर्माताओं को ऐसी नौकरियां सृजित करने के लिए मिलकर काम करना चाहिए, जो योग्य उम्मीदवारों को उच्च-मूल्य वाला काम प्रदान करें। एआई एलायंस जैसे बहुक्षेत्रीय सहयोग भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं, जिसका उद्देश्य इन प्रणालियों के बारे में खुलेपन को प्रोत्साहित करना और नॉलेज-शेयरिंग में तेजी लाना है।
इस तरह की सामूहिक कार्रवाई एआई के इर्द-गिर्द निर्मित उत्साह का दोहन करने के अवसर पैदा कर रही है ताकि आम रूपरेखाएं बनाई जा सकें और स्किल्स को प्राथमिकता देने वाला दृष्टिकोण विकसित किया जा सके, जो आने वाले कल के टेक-लीडर्स की पहचान कर उन्हें तैयार कर सके।
Date: 05-11-24
आबादी बढ़ाने की अनावश्यक अपीलडॉ. जगदीप सिंह, ( लेखक राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर हैं )
गत दिनों आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एमके स्टालिन ने अपने-अपने राज्यों की घटती आबादी पर चिंता जताई। चंद्रबाबू नायडू ने आंध्र की बुजुर्ग होती आबादी की तरफ ध्यान दिलाया तो एमके स्टालिन ने आने वाले वर्षों में परिसीमन के बाद लोकसभा के सीटों पर पड़ने वाले इसके असर पर चिंता व्यक्त की।
स्टालिन ने कहा कि हमारी आबादी कम हो रही है। इसका असर हमारी लोकसभा की सीटों पर भी पड़ेगा। इसलिए अब समय आ गया है कि नवविवाहित जोड़े अधिक बच्चे पैदा करें। वहीं आंध्र के सीएम नायडू ने कहा कि ‘एक समय, मैंने परिवार नियोजन अपनाने को कहा था, लेकिन अब मैं लोगों से अपील कर रहा हूं कि ज्यादा से ज्यादा बच्चे पैदा करके जनसंख्या बढ़ाएं।’
दरअसल दक्षिण भारतीय राज्यों को लग रहा है कि बढ़ती जनसंख्या पर सफल नियंत्रण की वजह से उन्हें राजनीतिक और आर्थिक तौर पर नुकसान उठाना पड़ रहा है। यही वजह है कि उनके मुख्यमंत्री जनता से ज्यादा बच्चे पैदा करने की अपील कर रहे हैं, लेकिन उनका यह आह्वान भारतीय संघीय लोकतांत्रिक ढांचे के लिए सही नहीं है। इसके भारत को दुष्परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं।
दक्षिण भारतीय राज्य यह प्रचारित कर रहे हैं कि जनगणना के बाद होने वाले परिसीमन से लोकसभा में उत्तर भारत के राज्यों का दबदबा और बढ़ जाएगा। परिसीमन आयोग के 1976 के आदेश के बाद लोकसभा सीटों की संख्या स्थिर कर दी गई थी और अभी यह 543 है। 2001 में ‘जनसंख्या सीमित करने के उपायों’ के लिए 25 साल के लिए लोकसभा सीटों की संख्या एक बार फिर से फ्रीज कर दी गई थी। अब जनगणना के बाद परिसीमन की चर्चा जोर पकड़ चुकी है। केंद्र सरकार ने कहा है कि जनगणना के अनुसार परिसीमन की कवायद की जाएगी।
आंध्र और तमिलनाडु के मुख्यमंत्रियों की पहली चिंता लोकसभा सीटों के संदर्भ में 2029 से पहले होने वाले संभावित परिसीमन को लेकर है। संभावना है कि इसके बाद लोकसभा की सीटों की मौजूदा संख्या 543 से बढ़कर 790 हो जाए। अगर जनसंख्या में बदलाव के आधार पर लोकसभा की सीटें तय की गईं तो पांच दक्षिण भारतीय राज्यों की 23 सीटें कम हो जाएंगी।
वहीं यूपी, बिहार, राजस्थान, महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश की सीटों की संख्या में 35 की बढ़ोतरी हो जाएगी, क्योंकि इन पांच राज्यों में ही भारत की करीब आधी आबादी है। अगर परिसीमन आयोग लोकसभा सीटों की संख्या में कोई बदलाव नहीं करता तो भी जनसंख्या के आधार पर पांच दक्षिणी राज्यों की 25 सीटें घट जाएंगी और ज्यादा जनसंख्या वाले पांचों राज्यों के खाते में 33 सीटें अधिक जुड़ जाएंगी।
अगर परिसीमन आयोग तय करता है कि किसी भी राज्य की मौजूदा लोकसभा सीटों की संख्या कम नहीं होगी, लेकिन बड़ी आबादी वाले राज्यों को भी उसी के मुताबिक सीटें दी जाएंगी तो भी आंध्र, कर्नाटक, तेलंगाना को जहां 23 सीटें ही और मिलेंगी तथा केरल की सीट 20 पर ही सीमित रहेगी, लेकिन पांच बड़े राज्यों की लोकसभा सीटों की मौजूदा संख्या में 150 सीटों की बढ़ोतरी हो जाएगी।
चूंकि राज्यों को केंद्रीय सहायता मिलने में आबादी की भी भूमिका होती है इसलिए दक्षिण के राज्य यह शिकायत कर रहे हैं कि उन्हें आबादी पर नियंत्रण पाने के चलते नुकसान उठाना पड़ा रहा है और केंद्रीय फंड में उनकी हिस्सेदारी कम होती जा रही है। यह पूरी तौर पर सही नहीं, क्योंकि 13वें वित्त आयोग (2010-15) से लेकर 15वें वित्त आयोग (2021-26) की सिफारिशों के अनुसार दक्षिण भारतीय राज्यों की हिस्सेदारी घटी जरूर है, लेकिन इसमें बिहार और यूपी जैसे सबसे ज्यादा आबादी वाले राज्य भी शामिल हैं।
जैसे तमिलनाडु की हिस्सेदारी पांच प्रतिशत से घटकर 4.1 प्रतिशत, आंध्र प्रदेश की 6.9 प्रतिशत से चार प्रतिशत, कर्नाटक की 4.3 प्रतिशत से 3.6 प्रतिशत और केरल की 2.3 प्रतिशत से 1.9 प्रतिशत हुई है। वहीं यूपी की हिस्सेदारी 19.7 प्रतिशत से घटकर 17.9 प्रतिशत और बिहार की 10.9 प्रतिशत से 10.1 प्रतिशत हुई है। ज्यादा आबादी वाले राज्यों में सिर्फ मध्य प्रदेश, बंगाल, महाराष्ट्र और राजस्थान के केंद्रीय फंड में ही इजाफा हुआ है। 16वें वित्त आयोग की सिफारिशें अगले वित्त वर्ष से लागू होनी हैं।
इसमें भले ही प्रत्येक राज्य को मिलने वाली फंडिंग में वृद्धि हो रही हो, लेकिन सापेक्ष हिस्सेदारी में परिवर्तन हुआ है। राज्यों की हिस्सेदारी तय करने के फार्मूले में जनसंख्या का भार पहले के 80-90 प्रतिशत से गिरकर 15 प्रतिशत हो गया है। 14वें वित्त आयोग ने सरकारी राजस्व में राज्यों की हिस्सेदारी की गणना करने के लिए ‘जनसांख्यिकीय परिवर्तन’ मानदंड यानी प्रवासन और आयु संरचना का उपयोग किया था। इससे आंध्र और तमिलनाडु की हिस्सेदारी में गिरावट आई। 15वें वित्त आयोग ने जनसंख्या नियंत्रण के लिए ‘दंडित’ किए जाने पर राज्यों के बीच चिंताओं को दूर करने के लिए ही ‘जनसांख्यिकीय प्रदर्शन’ का एक मानदंड जोड़ा।
दक्षिण के राज्य यह भी न भूलें कि आटोमोबाइल से लेकर साफ्ट ड्रिंक, स्मार्ट फोन से लेकर कपड़े के उत्पादन में अगर दक्षिण भारत का बड़ा योगदान है तो इस सबकी खपत सबसे ज्यादा उत्तर भारतीय बाजारों में ही होती है। इससे ही उनके राजस्व में बढ़ोतरी हो रही है। दक्षिण भारतीय राज्यों के लिए उत्तर भारत के ज्यादा आबादी वाले राज्य मजदूरों के आपूर्तिकर्ता की भी भूमिका निभा रहे हैं।
उन्हें आबादी बढ़ाने की अपील करने के स्थान पर उत्तर भारत की आबादी का उपयोग करना चाहिए। उत्तर भारत के मजदूर दक्षिण के राज्यों में जाकर उनके राजस्व में ही योगदान दे रहे हैं। इसलिए दक्षिण भारतीय राज्यों का आबादी बढ़ाने पर जो जोर है, उसके तात्कालिक फायदे तो हो सकते हैं, लेकिन आगे चलकर ज्यादा आबादी की जो परेशानियां बड़े राज्य झेल रहे हैं, वे उन्हीं भी झेलनी पड़ सकती हैं।
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Date: 04-10-24
SC Sets The BarMonitoring is key to actually abolishing caste discrimination in prisons
TOI Editorials
Supreme Court has done great service in scrapping caste-based discriminatory practices from 11 state prison manuals. That such discrimination survived all jail reforms in free India, and flourished, is testament to caste as an institution. As SC elaborated on how the British systems imported caste discrimination into jail manuals, it also abolished the demarcation of ‘habitual offenders’ by caste.
Blind spot | The larger question perhaps is how did such caste discrimination go unnoticed all these decades since Independence. In the most recent reformatory step, members of National Human Rights Commission and NALSA, a statutory body that provides legal aid to weaker sections, were among contributors to the Model Prison Manual of 2016. The expert committee was formed by SC on a suo motu writ petition in 2015 on inhuman conditions in 1,382 prisons. The 2016 edition was an update on a 2003 manual. State prison manuals have been modernised – by states which care for prison reform – largely based on guidelines in the central manual. In all the modernisation, however, one aspect – division of prisoners’ labour by caste, and segregation of quarters by caste – remained a blind spot although it’s an open secret. SC’s Thursday order ensures it is no longer unseen.
Reform limited | With the Constitution promising equality, caste activism and reform almost entirely focused on Dalit uplift, limited to stopping atrocities against so-called lower castes. But caste retained firm hold on ideas of occupation, marriage, funeral rituals among other everyday matters. In jail, therefore, Brahmins would cook, those whose caste ‘vocation’ is barbering would do so, and the most marginalised would do menial tasks – including in women’s prisons, if a woman of the ‘appropriate’ caste wasn’t available for a given task. Such segregation of superior and inferior, decided at birth, reinforces caste hierarchy – so OBCs berate ‘lower’ OBCs, Dalits would attack Mahadalits, as we recently saw in Bihar. Such graded inequality remains ruinous, yet has been impossible to root out.
It has to happen | SC has instituted a compliance mechanism, but can expect reluctance in implementation. SC has empowered the progressive-minded in prison administration. This is not about Dalits or Brahmins. It’s about constitutional principles that govt-run prisons must abide by. Period. Dismantling such structure has to be swift. States can’t be allowed excuses of law and order problems to stall implementation. One has lost count of how many deadlines India has missed on eliminating manual scavenging, despite having a special law.
Date: 04-10-24
LebanonisationNo country, no matter how successful, can be safe if religious extremism & deep social divisions take holdTOI Editorials
As Israel continues its ground and aerial assault on Lebanon as part of its battle against Hezbollah, more than 1,100 Lebanese have been killed and around 1.2 million have been displaced by the fighting. This is the largest displacement in Lebanon’s history. That’s saying something given the country’s devastating civil war between 1975 and 1990. But Lebanon wasn’t always a war-ravaged country. Beirut was once called the ‘Paris of the Middle East’ – both because of the city’s affinity to French culture harking back to the old French mandate, and its cosmopolitan atmosphere.
Curse of sectarianism: Lebanon was a major tourist destination and a secure banking hub for Gulf Arabs. But it all came crashing down in the mid-1970s with the outbreak of civil war. The root of the problem was – and continues to be – Lebanon’s unique confessionalist political system that saw power being shared between major religious communities. Hence, Lebanon’s president has to be a Maronite Christian, its prime minister a Sunni Muslim, and its parliament speaker a Shia Muslim.
Dangerous othering: Though the end of civil war saw an agreement to dissolve Lebanon’s confessionalist system, its politics continues to be divided along sectarian lines. This in turn opened the door to international actors, who made Lebanon their battleground. From the West to Arab states and Iran, all cultivated Lebanese proxies that eventually undermined the Lebanese state. The failure of Lebanese society as a whole to come together irrespective of religious and sectarian differences is the reason why Lebanon continues to suffer.
Caution for nations: Lebanon holds out a lesson in what happens when deep religious divisions take hold of a country. Lebanon could have been a jewel in West Asia. Instead, religious extremism, political polarisation and foreign interference combined to bring the country to this ruinous moment. ‘Lebanonisation’ serves as a warning for all nation states.
Date: 04-10-24
Should EC ensure internal democracy in political parties?O. P. Rawat , ( Former Chief Election Commissioner )
M.R. Madhavan , ( co-founder and President of the PRS Legislative Research )
india’s multi-party democracy thrives on diversity but often sees political parties driven by individual charisma rather than internal democracy. Despite their role in upholding the nation’s democratic framework, many parties struggle to maintain democratic structures. Can the Election Commission (EC) ensure these organisations practise internal democracy? Former Chief Election
Commissioner O. P. Rawat and PRS Legislative Research President M.R. Madhavan discuss this question with Sreeparna Chakrabarty. Edited excerpts:
The EC has been thinking of nudging political parties on the issue of internal democracy. But how can they do it?
O. P. Rawat: The EC is the registering authority for all the political parties in our country. As such, the EC monitors whether they are functioning according to their Constitution, by-laws, etc. And in the process, they also oversee whether the elections to their office bearers are taking place regularly.
But there has been one important point in this whole issue. This was the 2002 ruling of the Supreme Court which says that the EC cannot go into the political process and anything which is part of the political process per se. That is why it has no power to de-register a political party based on any violation of these things.
They can de-register if registration has been obtained on the basis of fraud or other things, but they cannot de-register a party if they don’t have periodic elections. Otherwise, to whatever extent the laws permit, the EC is doing it.
M. R. Madhavan: I have a slightly different way of looking at it: what is the EC’s core mandate according to the Constitution? Their mandate is to conduct elections for Parliament, State Legislatures, and the posts of President and Vice President of India. They have to maintain electoral rolls and under Article 103, they advise on disqualification of any MP. There is a similar one for MLAs other than the anti-defection disqualifications, which is decided by the Speaker and not by them. That is their limited mandate.
And the question is are they carrying out this mandate well or not? So, any institution, should first do its core job and then take on more things. And my argument is that the EC has deteriorated in its core job and they are unable to do even that.
So before giving any institution an extra mandate, I would require them to do their core job first. That is my limited point and I would not give them anything more because they are not competent enough to do what they are supposed to do in any case.
What would be your views on whether the EC should have the power to de-register parties at all?
OPR: I would like to say that the EC does whatever is mandated to it with efficiency. The only thing is that when it comes to the de-registration of parties, it will have many different directions or dimensions.
You know, elections are challenged only by way of election petitions according to our Constitution. We have been monitoring this and find that these disputes are much less every time over the years. If you compare us with the democracy in the most developed country as well, they had a storming of their legislature when the results were against one candidate.
This kind of thing, we never witnessed in our country after any election, and political acceptance of the election results is beyond imagination for all democracies which is borne by international conferences which I attended and which my colleagues attended everywhere. Election Commissioners from different countries say that India is a golden example where acceptance of election results by all political parties is enormous.
With these credentials, if the EC is made to go into the internal process, the political process for de-registering, we will be running the risk of getting the poll body into a model where even the main stakeholders – the political parties – will start developing suspicion. So, I think we have to take a view in totality not only in the context of political parties about registration and regulation but also about the delivery of elections time and again on the stipulated time and in a free fair manner.
MRM: So, I am not going to talk about the EC’s reputation, which has been very high, but it has, in my opinion, faltered in the rating bit.
But back to the idea of political parties being regulated by them, I would agree with Mr. Rawat in saying that they should not get into that. Because then the EC becomes political, and susceptible to various political pressures, it should maintain its distance from the politics of Election Commissioners from different countries say that India is a golden example where acceptance of election results by all political parties is enormous
O. P. RAWAT
the day. So, I would say whether parties hold internal elections or not, you cannot regulate them because even today they are required to hold. But what do they do? There is somebody who manages it so that somebody is contesting unelected or it is managed so that the people know who is going to get elected. I would say the discipline of political parties should come from the electorate. If people think that this party is not democratic and you want a democratic party, don’t vote for them. If people want them, they will vote for them.
Is there any existing legal ground on which elections can be mandated within political parties?
OPR: No, I feel there is nothing except for this registration of political parties by the EC and the periodical review of compliance with their Constitution, their by-laws, and all those things. But in the end, it is a very kind of loose compliance which is visible.
Probably the most well-known instance of EC intervening in the lack of democracy issue was when they rejected the YSRCP proposal to make Jagan Mohan Reddy permanent president of the party. They said that such a step was inherently anti-democratic. Was this within its mandate?
OPR: Actually, the EC does not have that kind of mandate, but within the framework of the political party registration rules, the EC is overseeing the compliance with their Constitution and their by-laws. Now amending that is contrary to the democratic idea of periodic elections and that is the point at which the EC took shelter to reject the move.
MRM: Does it matter? Because let them make that intervention. The party re-elects the same person again, who will contest unopposed. I mean the whole thing is that what we are talking about is not the reality but what could be in the letter of the law and what can they do. But if in reality, political parties are being essentially dominated by one personality who controls the whole thing, then there is nothing that stops them from having an election with one candidate who will get selected for a post. So, it will tick the boxes, but there is absolutely no difference in practice.
In a situation where we want or think that the EC should regulate internal democracy in political parties, how can such a law be brought in?
MRM: My simple answer is that it is not needed. So, the question should not arise.
OPR: I agree with Mr. Madhavan. We should leave this kind of decision to the people who are the sovereign electorate and therefore I personally feel that one should not think of that.
Why this question arises again and again, is that the EC has made certain observations in many of the cases where parties are split.
OPR: Actually, these issues fall under the political party’s symbols order, 1968, Paragraph 15. And under that, EC goes by four tests when there is a split, whether every faction has been following the party Constitution, whether they have been having the majority of the party the organisation whether they have been having the majority of the legislature wing or they are proceeding according to the by-laws.
All these four tests are applied every time starting from Sadiq Ali case. It always comes down to the legislative majority, because all other tests fail.
The only test which is amenable to the summary inquiry is the number of legislatures with the splinter group. So, whoever has the majority of a number of legislators with the splinter group gets the party symbol and the party name and that has been the case with the EC. In the text arguments are there where the arguments cover the aspects that since this group which was in command did not hold elections, did not sort of follow these by-laws, and therefore whatever orders they have passed for disqualifying are invalid all those things are just for by way of explanation.
MRM: I will just add one thing, which is that I mean, I am looking at it as a citizen, right? I mean, it is in our interest that EC has a very high credibility on whatever it does, so that we trust the process.
They need to have an objective way of making the decision and as Mr. Rawat said, if you are counting the number of legislators supporting, there is an actual number there and you can count if number A is greater than number B or is number A less than number B and make that decision. So, that is a fairly wise way of doing it without getting politically entrapped and I think they have been smart at doing that.
Date: 04-10-24
पश्चिम एशिया में बड़े युद्ध का खतरा मंडरा रहा हैसंपादकीय
यूएनएससी की ताजा बैठक में फिर पश्चिम एशिया की स्थिति पर चिंता व्यक्त की गई। इससे एक दिन पहले ईरानी मिसाइल हमले के बाद इजराइल ने यूएन चीफ के अपने देश में आने पर पाबंदी लगा दी। यह यूएन के चार्टर का खुला उल्लंघन है। इजराइल का कहना है कि यूएन ने ईरानी हमले की निंदा नहीं की। सवाल यह है कि क्या ईरानी हमले की निंदा की जाती तो इजराइल यूएन की तमाम अपीलों को मानकर युद्ध बंद कर देता ? फिलिस्तीन पर महीनों से चल रहे हमले को तेल अवीव यह कहकर सही ठहराता रहा कि पहला हमला फिलिस्तीन की ओर से हमास ने किया। उस वक्त भी दुनिया की अपील को यह कहकर खारिज किया गया कि पहले हमास के हमले की निंदा की जाए । यह सच है कि पूरी दुनिया इस समय इस मुद्दे पर बंटी हुई है। अमेरिका सहित कई देश इजराइल को हथियार भी दे रहे हैं और शांति की अपील भी कर रहे हैं। तभी तो इजराइली मुखिया ने यूएस कांग्रेस में ‘युद्ध अंतिम जीत तक जारी रहेगा’ कहकर अमेरिका से मदद बढ़ाने की अपील की। ताजा स्थिति यह है कि इजराइल लेबनान की सीमा में कई किलोमीटर तक घुस चुका है। उधर ईरान की मदद में कई अरब देशों के साथ आने की संभावना है यानी सीरिया, यमन, इराक भी युद्ध में कूद सकते हैं। हितों के लिए बंटी दुनिया में तीसरा विश्व युद्ध और किसे कहेंगे?
Date: 04-10-24
खतरे में विश्व शांतिसंपादकीय
यूएनएससी की ताजा बैठक में फिर पश्चिम एशिया की स्थिति पर चिंता व्यक्त की गई। इससे एक दिन पहले ईरानी मिसाइल हमले के बाद इजराइल ने यूएन चीफ के अपने देश में आने पर पाबंदी लगा दी। यह यूएन के चार्टर का खुला उल्लंघन है। इजराइल का कहना है कि यूएन ने ईरानी हमले की निंदा नहीं की। सवाल यह है कि क्या ईरानी हमले की निंदा की जाती तो इजराइल यूएन की तमाम अपीलों को मानकर युद्ध बंद कर देता ? फिलिस्तीन पर महीनों से चल रहे हमले को तेल अवीव यह कहकर सही ठहराता रहा कि पहला हमला फिलिस्तीन की ओर से हमास ने किया। उस वक्त भी दुनिया की अपील को यह कहकर खारिज किया गया कि पहले हमास के हमले की निंदा की जाए । यह सच है कि पूरी दुनिया इस समय इस मुद्दे पर बंटी हुई है। अमेरिका सहित कई देश इजराइल को हथियार भी दे रहे हैं और शांति की अपील भी कर रहे हैं। तभी तो इजराइली मुखिया ने यूएस कांग्रेस में ‘युद्ध अंतिम जीत तक जारी रहेगा’ कहकर अमेरिका से मदद बढ़ाने की अपील की। ताजा स्थिति यह है कि इजराइल लेबनान की सीमा में कई किलोमीटर तक घुस चुका है। उधर ईरान की मदद में कई अरब देशों के साथ आने की संभावना है यानी सीरिया, यमन, इराक भी युद्ध में कूद सकते हैं। हितों के लिए बंटी दुनिया में तीसरा विश्व युद्ध और किसे कहेंगे?इजरायल की ओर से लेबनान में हिजबुल्ला के सरगना नसरुल्ला को मार गिराए जाने के बाद ईरान ने जिस तरह उस पर मिसाइलें दागीं, उसके बाद पश्चिम एशिया के हालात बेकाबू होते दिख रहे हैं। इसलिए और भी, क्योंकि इजरायल ने दो टूक कहा है कि ईरान को मिसाइल हमले के नतीजे भुगतने होंगे। इजरायल केवल ईरान पर ही हमले की तैयारी नहीं कर रहा है। उसने लेबनान में हिजबुल्ला को सबक सिखाने के लिए अपनी सेनाएं भेज दी हैं और वह सीरिया में अपने शत्रुओं पर हमला करने के साथ यमन में हाउती लड़ाकों को भी निशाना बना रहा है।हमास, हिजबुल्ला और हाउती वे संगठन हैं, जिन्हें ईरान हर तरह का सहयोग और समर्थन देता है। पश्चिम एशिया में अशांति केवल इसलिए नहीं है कि इजरायल फलस्तीन को एक अलग देश के रूप में स्वीकार करने को तैयार नहीं। इस अशांति का एक बड़ा कारण ईरान भी है, जो इजरायल का समूल नाश करने की अपनी सनक से ग्रस्त है। ईरान की तरह कतर भी इजरायल विरोधी संगठनों की मदद करता है। ये दोनों देश ऐसा इसलिए भी करते हैं, ताकि खुद को इस्लामी जगत का अगुआ साबित कर सकें।
इजरायल और अन्य इस्लामी देशों के बीच दुश्मनी और युद्ध का एक लंबा इतिहास है। इसकी जड़ें बहुत पुरानी हैं, लेकिन मौजूदा अशांति का मूल कारण एक साल पहले सात अक्टूबर को गाजा आधारित आतंकी संगठन हमास की ओर से इजरायल में किया गया बर्बर हमला रहा। इस भीषण हमले में 12 सौ से अधिक इजरायली नागरिक मारे गए थे। इस हमले के दौरान हमास के आतंकी दो सौ से अधिक इजरायलियों को बंधक बनाकर गाजा ले आए थे। हमास ने इन बंधकों को रिहाकर कोई समझौता करने से इन्कार करके गाजा में अपने लोगों को एक तरह से जानबूझकर मरवाने का ही काम किया।इजरायल ने हमास को तबाह करने की कोशिश में गाजा में जो भीषण हमले किए, उनमें हजारों फलस्तीनी मारे जा चुके हैं। यह सही है कि इजरायल हमेशा ही ईंट का जवाब पत्थर से देता है, लेकिन शायद हर वह देश ऐसा ही करेगा, जिसे अपने अस्तित्व पर संकट नजर आएगा। यदि यह अपेक्षा की जा रही है कि इजरायल संयम बरते और हमास, हिजबुल्ला जैसे संगठनों को सैन्य शक्ति के बल पर मिटाने की जिद छोड़े तो ईरान और अन्य इस्लामी देशों से भी यही अपेक्षित है कि वे इजरायल का नामो निशान मिटाने की मानसिकता का परित्याग करें। वास्तव में इसी मानसिकता के चलते अमेरिका और कुछ अन्य देश हर हाल में इजरायल का साथ देने की नीति पर चलते हैं। चूंकि संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद असहाय और अक्षम है, इसलिए पश्चिम एशिया में सुलह-समझौते के आसार नहीं दिखते। यदि वहां हालात और खराब होते हैं तो इससे विश्व शांति के साथ वैश्विक अर्थव्यवस्था भी खतरे में पड़ेगी, जो यूक्रेन युद्ध के चलते पहले से ही संकट में है।
Date: 04-10-24
संयुक्त राष्ट्र में सुधार का इंतजारशिवकांत शर्मा , ( लेखक बीबीसी हिंदी के पूर्व संपादक हैं )
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरस ने भविष्य शिखर सम्मेलन के उद्घाटन भाषण में कहा, ‘दुनिया एक बवंडर में फंसी है। हम ऐसी अभूतपूर्व चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, जो वैश्विक समाधान चाहती हैं।’ इससे पहले उन्होंने कहा था, ‘सुरक्षा परिषद जैसी संस्थाएं आज पूरी तरह अप्रासंगिक, अयोग्य और अक्षम हो चुकी हैं। इनमें सुधार किए बिना वैश्विक चुनौतियों से नहीं निपटा जा सकता।’ अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने कहा, ‘हताश होने के बजाय हमें एकजुट होकर चुनौतियों का सामना करना चाहिए। इसके लिए संयुक्त राष्ट्र को और सक्षम, प्रभावी और समावेशी बनाने की जरूरत है। इसीलिए हम सुरक्षा परिषद का सुधार और विस्तार करने का समर्थन करते हैं।’ वहीं प्रधानमंत्री मोदी ने वैश्विक संस्थाओं में सुधार के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा था, ‘सुधार प्रासंगिक बने रहने की कुंजी हैं। मानव की सफलता उसकी संगठित शक्ति में है, जंग के मैदान में नहीं।’ इन वक्तव्यों से संकेत मिलता है कि सुरक्षा परिषद के सुधार और विस्तार के लिए आम सहमति बन चुकी है। दक्षिण अफ्रीका के राष्ट्रपति रामफोसा ने भी सुरक्षा परिषद में सुधार करने और अफ्रीका को स्थायी सीट देने की मांग रखी।
महासचिव गुटेरस ने माना है कि अफ्रीका को सुरक्षा परिषद में स्थायी सीट देने पर सहमति हो चुकी है, पर सुधार और विस्तार की प्रक्रिया क्या हो और इसकी शुरुआत कब हो, इसे लेकर सहमति नहीं बन पा रही। लैटिन अमेरिका से ब्राजील को स्थायी सदस्यता देने पर भी किसी को आपत्ति नहीं है। मसला विश्व की दो तिहाई आबादी और लगभग आधी अर्थव्यवस्था वाले एशिया का है, जिसका प्रतिनिधित्व अकेले चीन के पास है। यूरोप के पास रूस, फ्रांस और ब्रिटेन की तीन सीटें हैं। इसलिए कुछ देशों का सुझाव है कि इन तीन देशों में से कम से कम एक को अपना वीटो अधिकार और सीट छोड़ देनी चाहिए।
संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के आठ दशकों में विश्व के सामरिक और आर्थिक समीकरण पूरी तरह बदल जाने के बावजूद वीटो अधिकार वाले पांचों स्थायी सदस्यों में से कोई अपने वीटो अधिकार और स्थायी सीट को छोड़ने को तैयार नहीं है। स्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाने पर आम सहमति है, परंतु चीन को वीटो अधिकार वाले सदस्यों की संख्या बढ़ाना मंजूर नहीं, खासकर एशिया से जहां स्थायी सदस्यता के दोनों दावेदारों, भारत और जापान पर वह अलग-अलग कारणों से संदेह करता है। यह समय की विडंबना है कि भारत ने जिस चीन को मान्यता देने में पहल की थी और सुरक्षा परिषद में उसकी स्थायी सीट को सिद्धांत के तौर पर लेने से मना कर दिया था, आज वही चीन भारत की स्थायी सदस्यता के मार्ग में आड़े आ रहा है।
अमेरिका भी भारत की खेमेबाजी से परे अवसरानुकूल कूटनीति को लेकर आशंकित रहा है। इसका नवीनतम उदाहरण भारत का रूस के खिलाफ आर्थिक प्रतिबंधों में शामिल न होना और यूक्रेन पर रूसी हमले के निंदा प्रस्तावों से दूर रहना है। इसलिए वह भारत को वीटो अधिकार वाली स्थायी सदस्यता देने का समर्थन कर ही देगा, यह सुनिश्चित नहीं। वीटो अधिकार के बिना सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता से अनुचित निर्णयों पर तमाशबीन बने रहने की बेचारगी के सिवा कुछ हासिल नहीं होगा। इसलिए भारत की दिलचस्पी ऐसी सदस्यता में नहीं है। या तो सभी अपने-अपने वीटो अधिकारों का परित्याग करें, जिसकी संभावना कम है या फिर नए सदस्यों को भी वीटो अधिकारों के साथ शामिल किया जाए, ताकि वे यूक्रेन पर रूसी हमले जैसे नियमों को ताक पर रखकर किए जाने वाले संयुक्त राष्ट्र चार्टर के उल्लंघनों को यदि न भी रोक सकें, तो भी कम से कम संयुक्त राष्ट्र के नाम पर इराक पर किए गए हमले जैसी विवादास्पद कार्रवाइयों को तो रोक सकें। यूक्रेन की अखंडता और संप्रभुता और फलस्तीनियों के अस्तित्व की रक्षा करने में संयुक्त राष्ट्र की बेचारगी दिखाती है कि उसकी संस्थाएं कितनी अयोग्य और अक्षम हो चुकी हैं। वैश्विक व्यवस्था को बहाल करने के लिए नाम के सुधारों की नहीं, बल्कि कारगर सुधारों की जरूरत है, जो मनमानी को रोक सकें। आतंकवाद की सर्वमान्य परिभाषा तय करने और उसकी रोकथाम के लिए वैश्विक रणनीति बनाने की भी जरूरत है, ताकि हमास, लश्कर और अल कायदा जैसे आतंकी संगठनों की रोकथाम की जा सके। साइबर, समुद्र और अंतरिक्ष में व्यवस्था कायम रखना भी बड़ी वैश्विक चुनौती है। प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संबोधन में इन तीनों का जिक्र किया, क्योंकि इनमें असुरक्षा रहने से संचार से लेकर व्यापार तक हर पहलू प्रभावित होता है।
इस समय विश्व के समक्ष सबसे बड़ी चुनौतियां हैं कृत्रिम मेधा और जलवायु परिवर्तन। कृत्रिम मेधा से प्रशिक्षित हो रहीं मशीनों का प्रभाव जीवन के हर क्षेत्र में पड़ने वाला है। इनका सही प्रयोग कायाकल्प कर सकता है तो दुरुपयोग के कल्पनातीत दुष्परिणाम भी हो सकते हैं। साइबर, संचार और जैविक आतंक के क्षेत्रों में इस तकनीक के दुरुपयोग की घातकता परमाणु हथियारों से कम नहीं है। इसलिए इसके दुरुपयोग की रोकथाम के लिए एक वैश्विक रणनीति की जरूरत है। जलवायु परिवर्तन की रोकथाम पर तो हमारा अस्तित्व ही निर्भर करता है। इसलिए उस पर ऐसी बहुपक्षीय और बहुकोणीय रणनीति बनाने की जरूरत है, जो कारगर होने के साथ-साथ व्यावहारिक और न्यायसंगत भी हो। भारत इन वैश्विक चुनौतियों का सामना करने के लिए वैश्विक व्यवस्था में सुधारों की पैरवी और अगुआई तभी कर सकता है, जब वह अपने यहां भी समयोचित सुधारों में आगे रहने की मिसाल कायम करे। आर्थिक सुधारों की गाड़ी मंथर गति से अटक-अटक कर चल रही है। भूमि, श्रम और न्यायिक सुधारों की बात ही शुरू नहीं हुई है। कृषि सुधारों से पीछे हटना पड़ा है। एक देश एक चुनाव और समान नागरिक संहिता जैसे सुधार क्षेत्रीयता और मजहबी राजनीति में उलझ गए हैं। ऐसे में आर्थिक और सामाजिक विकास की गाड़ी कैसे गति पकड़ेगी? कौटिल्य ने ढाई हजार साल पहले कहा था कि देश की असली शक्ति उसकी अर्थशक्ति में होती है। सुधारों के बिना यह शक्ति हासिल नहीं हो सकती और इसके बिना विश्व मंच पर हमारी वैश्विक सुधारों की बात ध्यान से नहीं सुनी जा सकती।
Date: 04-10-24
वैश्विक विनिर्माण का केंद्र कैसे बने भारत?अजय श्रीवास्तव , ( लेखक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनीशिएटिव के संस्थापक हैं )
विनिर्माण और व्यापार एक दूसरे को सहारा देते हैं। गुणवत्ता भरे विनिर्माण से निर्यात बढ़ता है और वैश्विक बाजार तक पहुंच से विनिर्माताओं को आगे बढ़ने में मदद मिलती है। देश का व्यापार विनिर्मित वस्तुओं पर बहुत अधिक निर्भर है और कुल वस्तु निर्यात में 75 फीसदी हिस्सेदारी इन्हीं की है।
2014 से 2024 तक के दशक में विनिर्माण तथा निर्यात के मामले में देश का प्रदर्शन दिलचस्प तरीके से बताता है कि आर्थिक वृद्धि के दोनों अहम घटकों ने कैसा प्रदर्शन किया। ‘मेक इन इंडिया’ कार्यक्रम के 10 वर्ष पूरे होने पर सरकार ने कई उपलब्धियों का उल्लेख किया है। उदाहरण के लिए देश में इस्तेमाल हो रहे 99 फीसदी मोबाइल फोन यहीं बनाए जाते हैं। भारत अब विनिर्मित स्टील का विशुद्ध निर्यातक है और नवीकरणीय ऊर्जा का चौथा सबसे बड़ा उत्पादक भी है।नवीकरणीय ऊर्जा की उत्पादन क्षमता 400 फीसदी बढ़ी है। उत्पादन से जुड़े प्रोत्साहन की योजना (पीएलआई) ने 1.46 लाख करोड़ रुपये का निवेश जुटाया है। इसके जरिये 12 लाख करोड़ रुपये के उत्पाद तैयार हुए हैं और 9 लाख रोजगार भी आए हैं। पिछले दशक में विनिर्माण में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) 69 फीसदी बढ़कर 165.1 अरब डॉलर हो गया।
किंतु इन सुर्खियों के परे अर्थव्यवस्था पर व्यापक नजर डालने पर मिले-जुले नतीजे दिखते हैं। वित्त वर्ष 2014 में देश का सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) 2,010 अरब डॉलर था और वस्तु निर्यात 314 अरब डॉलर। जीडीपी में विनिर्माण की हिस्सेदारी 15 फीसदी थी। वित्त वर्ष 2024 तक जीडीपी 3,900 अरब डॉलर हो गया और निर्यात 437 अरब डॉलर पर पहुंच गया, लेकिन जीडीपी में विनिर्माण की हिस्सेदारी कम होकर 13 फीसदी रह गई। दोनों वर्षों में देश के व्यापार में विनिर्मित वस्तुओं की हिस्सेदारी 75 फीसदी रही मगर विनिर्माण जीडीपी की तुलना में विनिर्माण निर्यात की हिस्सेदारी वित्त वर्ष 2024 में 64.6 फीसदी रह गई, जो वित्त वर्ष 2014 में 78.1 फीसदी थी। इससे दोहरी चुनौती का पता चलता है: विनिर्माण की घटती भूमिका और निर्यात में उसका कम होता योगदान। ये गहरी चुनौतियां हैं, जिन पर तत्काल हरकत में आने की जरूरत है। किंतु इसके अलावा भी कुछ बड़ी चुनौतियां इस प्रकार हैं।
कच्चे माल की अधिक लागत: चीन की तुलना में भारतीय विनिर्माताओं को कच्चे माल, ऊर्जा और कर्ज की अधिक लागत चुकानी पड़ती है। कंपनियों को अक्सर कच्चे माल का आयात करना पड़ता है, जिस पर भारी शुल्क देना होता है। मगर चीन को सस्ते स्थानीय उत्पादन और एकीकृत मूल्य श्रृंखला का लाभ मिलता है। भारत में औद्योगिक बिजली 0.08 से 0.10 डॉलर प्रति किलोवॉट घंटा या प्रति यूनिट पड़ती है जबकि चीन में उसकी कीमत यह 0.06 से 0.08 डॉलर प्रति यूनिट ही है। भारत में कर्ज पर औसतन 9-10 फीसदी की दर से ब्याज चुकाना पड़ता है मगर चीन में ब्याज दर 4-5 फीसदी ही है। लागत में यह अंतर उत्पाद को महंगा बनाता है। उदाहरण के लिए भारत में सोलर सेल बनाने के मुकाबले चीन से उनका आयात करना 40 फीसदी तक सस्ता पड़ता है। ऊंची लागत निर्यात पर असर डालती है और लोगों को विनिर्माण में उतरने से रोकती है।
जटिल श्रम कानून : इनके कारण विनिर्माताओं को कारोबार बढ़ाने में कठिनाई होती है। दुनिया भर में व्यापार बड़ी कंपनियों के पक्ष में होता है मगर भारत में श्रम कानून 300 से अधिक कर्मचारियों वाली कंपनियों को छंटनी नहीं करने देते। सैमसंग के श्रीपेरंबदूर कारखाने में हड़ताल जौसी घटनाएं बताती हैं कि नियमों का पालन करने पर भी कारोबारों को किस तरह की चुनौतियों का सामना करना पड़ता है। इसके विपरीत चीन, वियतनाम और बांग्लादेश में अधिक लचीलापन नजर आता है, जिससे वहां की कंपनियां भारतीय कंपनियों के मुकाबले आसानी से अपना कारोबार बढ़ा लेती हैं।
लॉजिस्टिक्स का ऊंचा खर्च: भारतीय कारोबारों के 90-95 फीसदी माल की आवाजाही विदेशी शिपिंग कंपनियों के भरोसे है। इससे माल भाड़े पर उनका खर्च बढ़ जाता है और वे यह भी तय नहीं कर पाते कि माल कब रवाना होगा। हमारा 25 फीसदी कार्गो कोलंबो और सिंगापुर जैसी जगहों से होकर जाता है क्योंकि ज्यादातर भारतीय बंदरगाहों पर पानी इतना गहरा नहीं है कि बड़े जहाज खड़े हो सकें। इससे समय और लागत दोनों बढ़ जाते हैं। चीन में बने कंटेनरों पर निर्भरता से आपूर्ति बिगड़ने का डर रहता है और देश के भीतर माल ढुलाई सड़क परिवहन और कस्टम मंजूरी में देर के कारण महंगी पड़ती है।
इन चुनौतियों के कारण देश में विनिर्माण और खास तौर पर इलेक्ट्रॉनिक्स क्षेत्र पूरी तरह उत्पादन करने के बजाय असेंबलिंग पर जोर देता है। उदाहरण के लिए भारत में बनने वाले महंगे स्मार्टफोन में लगने वाले 90 फीसदी तक पुर्जे विदेश से आते हैं। ऊंची लागत और कारोबारी सुगमता की कमी भी परिधान, समुद्री उत्पादों और रत्नाभूषण जैसे उन उत्पादों के निर्यात को नुकसान पहुंचाती है, जिनमें श्रम का ज्यादा इस्तेमाल होता है। इन सभी वस्तुओं का निर्यात पिछले एक दशक में कम हुआ है।
भारत को आगे चलकर अपनी छवि ऊंची लागत और पेचीदा नियमों वाले देश से बदलकर ऊंचे मूल्य वाले सामान और सेवाओं के किफायती उत्पादक की बनानी होगी। इसके लिए व्यवस्था में बदलाव करने होंगे। कच्चे माल और ऊर्जा की लागत कम करनी होगी, श्रम कानूनों को आधुनिक बनाना होगा और विनिर्माण क्षमता बढ़ानी होगी। आइए कुछ ऐसे सुधारों की बात करते हैं जिन्हें तत्काल लागू करना होगा।
कच्चे माल की लागत कम करने और आपूर्ति बढ़ाने के लिए भारत को ‘की स्टार्टिंग मटीरियल्स’ यानी केएसएम पर लगने वाले आयात शुल्क और एंटी डंपिंग शुल्क पर दोबारा विचार करना होगा। कपड़ा, रसायन और स्टील आदि क्षेत्रों में सबसे अधिक केएसएम तैयार कर रही कई बड़ी कंपनियों को ऊंचे आयात शुल्क की आड़ मिल जाती है। मगर इससे उन्हें इस्तेमाल करने वाले उद्योगों की लागत बढ़ जाती है, उनके उत्पाद महंगे हो जाते हैं और निर्यात की होड़ में टिक नहीं पाते। महंगा देसी माल खरीदने पर मजबूर उपयोगकर्ता उद्योगों के सामने तैयार माल पर कम आयात शुल्क की चुनौती भी होती है, जिससे देसी-विदेशी बाजार में उन्हें नुकसान होता है।अहम क्षेत्रों में बड़ी वैश्विक कंपनियों को आकर्षित करने का हर संभव प्रयास करना चाहिए क्योंकि वे कारोबार को तेजी से बढ़ा सकती हैं। हमने देखा है कि मारुति और सुजूकी के साझे उपक्रम ने कैसे देश के वाहन क्षेत्र की उत्पादकता बढ़ाई है या कैसे ऐपल ने तीन साल में ही 10 अरब डॉलर से ज्यादा का निर्यात कर दिया है। बिना कागजी झंझट के एक ही जगह सभी मंजूरी देने वाला ‘नैशनल ट्रेड नेटवर्क’ स्थापित हो जाए तो छोटे कारोबारी नियामक द्वारा मांगे जाने वाले सभी दस्तावेज ऑनलाइन ही दाखिल कर देंगे।यह पोर्टल हजारों सूक्ष्म, लघु और मझोले उपक्रमों को निर्यातक बनने में मदद करेगा। अच्छे उत्पाद बनाना ही काफी नहीं है। हमें ऐसी नीतियां चाहिए, जो किफायती और उत्पाद पर केंद्रित आपूर्ति श्रृंखला बनाएं, जिनसे कच्चा माल हासिल करना, उत्पादन करना, माल की आवाजाही करना और सीमा शुल्क मंजूरी मिलना सुगम हो जाए। फिलहाल सरकार के पास यह क्षमता हासिल करने की विशेषज्ञता ही नहीं है।
आखिर में हमें आत्ममंथन और सुधार करना होगा। हमें उन वैश्विक सलाहकारों से बचना चाहिए जो भारत को 50 लाख करोड़ या 100 लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने का सपना दिखा रहे हैं, जबकि हमारी प्रति व्यक्ति आय अब भी 3,000 डॉलर से कम है। ऐसे वादों के पीछे अक्सर कोई स्वार्थ छिपा होता है। चीन खामोशी के साथ निर्यात, तकनीक और विनिर्माण के क्षेत्र में अगुआ बन जाता है। तंग श्याओफिंग ने कहा था, ‘अपनी ताकत छिपाकर रखो और अपना वक्त आने की प्रतीक्षा करो।’ भारत को भी यही करना होगा।
Date: 04-10-24
घाटी में लोकतंत्रसंपादकीय
जम्मू-कश्मीर में हुए विधानसभा चुनाव के आखिरी चरण में भी जिस तरह लोगों ने उत्साह के साथ मतदान किया, उससे यह साफ जाहिर है कि राज्य में लोकतंत्र की नई हवा बहने की उम्मीद मजबूत हुई है। गौरतलब है कि जम्मू-कश्मीर में अंतिम चरण के चुनाव में 69.65 फीसद मतदान हुआ। तीन चरणों में हुए चुनाव में भारी संख्या में लोगों ने अपने विवेक से मताधिकार का प्रयोग कर देश के लोकतंत्र में भरोसा तो जताया ही, साथ ही उन्होंने अलगाववादी ताकतों और उन्हें पनाह देने वाले देशों को भी आईना दिखा दिया। यह भी संयोग है कि इस बार राज्य में कहीं पुनर्मतदान की नौबत नहीं आई। न कहीं कानून व्यवस्था की स्थिति बिगड़ी और न ही आतंकी हिंसा की कोई बड़ी खबर आई। वहीं तमाम अंतर्विरोधों के बीच सभी राजनीतिक दलों ने भी संयम का परिचय देते हुए देते हुए रैलियां और सभाएं कीं। इस तरह जम्मू-कश्मीर के नागरिकों ने पूरी दुनिया को बड़ा संदेश दिया कि यहां लोकतंत्र की जड़ें कितनी गहरी हैं। मुख्य निर्वाचन आयुक्त ने भी यह कहा कि इस चुनाव ने लोकतंत्र की गहराई को चिह्नित किया है और यह आने वाले वर्षों में क्षेत्र की लोकतांत्रिक भावना को प्रेरित करता रहेगा|
जम्मू कश्मीर के लोगों ने चुनावी बहिष्कार के किसी भी झांसे में आने के बजाय लोकतंत्र में आस्था जताई। यह कम बड़ी बात नहीं कि उन निर्वाचन क्षेत्रों में भी जम कर मतदान हुआ, जहां अलगाववादी समूह लोकतांत्रिक प्रक्रिया को ठेस पहुंचाने के लिए चुनावी बहिष्कार का एलान कर दिया करते थे। इसके उलट चुनाव में ऐसे समूहों की भागीदारी और सक्रियता देखी गई, जो एक समय वहां के लोगों से चुनाव से दूर रहने का आह्वान करते थे या उन्हें धमकाते थे। इसे एक बड़ी उपलब्धि कही जा सकती है कि चुनाव में भागीदारी करके अलगाववाद की राजनीति करने वाले समूहों ने मुख्यधारा की राजनीति और देश के संविधान में विश्वास जाहिर किया। एक खास बात यह भी दिखी कि जहां महिला मतदाताओं की संख्या में सत्ताईस फीसद से अधिक की बढ़ोतरी हुई, वहीं 2014 के बाद महिला उम्मीदवार भी अधिक संख्या में चुनाव मैदान में उतरीं। बहरहाल, नतीजों की तस्वीर चाहे जो बने, जम्मू-कश्मीर के मतदाताओं ने लोकतंत्र के पक्ष में फैसला सुना दिया है।
Date: 04-10-24
बदलाव के लिए वोटसंपादकीय
जम्मू कश्मीर में विधानसभा के तीन चरणों का आखिरी मतदान मंगलवार को संपन्न हो गया। केंद्र शासित इस पर्वतीय प्रदेश के मतदाताओं के उत्साह और राज्य के कुशल प्रशासन के मिले जिले प्रयासों से अलगाववाद की सियासत पर लोकतंत्र की जीत हुई। लोकतंत्र के इस उत्सव में मतदाताओं की उत्साहपूर्ण भागीदारी का सीधा सा अर्थ यह भी है कि लोगों ने बदलाव के लिए मतदान किया है। चुनाव शांतिपूर्ण, निष्पक्ष और स्वतंत्र हुए। चुनावी राजनीति में जनता की भागीदारी या बताती है कि सभी हितधारकों की लोकतंत्र में आस्था है। इस विधानसभा चुनाव में अलगाववादी और आतंकी शक्तियां हाशिये पर थीं। मतदाता बेखौफ होकर वोट डालने के लिए मतदान केंद्रों पर पहुंचे। राजनीतिक दलों के प्रत्याशियों ने भी उत्साह के साथ चुनाव प्रचार किया। एक दशक बाद और संविधान के अनुच्छेद 370 के निरस्त होने के बाद यहां विधानसभा चुनाव हुए जिसमें कुछ नई और सकारात्मक प्रवृत्तियां उभर कर सामने आईं। दक्षिणी कश्मीर के शोपियां, कुलगाम और पुलवामा एवं उत्तरी कश्मीर के बारामूला जिले आतंक से सबसे अधिक प्रभावित माने जाते हैं। यहां पिछले विधानसभा चुनाव की तुलना में अधिक मतदान हुआ। प्रतिबंधित जमात-ए- इस्लामी के पूर्व सदस्यों के चुनाव प्रक्रिया में शामिल होना भी मतदान के प्रतिशत में इजाफा होने का एक कारण हो सकता है। बारामूला निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले अवामी इत्तेहाद पार्टी के इंजीनियर रशीद का जमात-ए- इस्लामी के साथ गठबंधन है। भाजपा और कांग्रेस सहित राज्य के सभी क्षेत्रीय दल जम्मू-कश्मीर को पूर्ण राज्य का दर्जा देने के पक्ष में हैं। राज्य की जनता भी यही चाहती है। मतदाताओं में वोट डालने का जो उत्साह दिखाई दिया उसकी एक वजह यह भी है। हालांकि भाजपा अनुच्छेद 370 विहीन पूर्ण राज्य का दर्जा की पक्षधर है जबकि अन्य क्षेत्रीय दल अनुच्छेद 370 की बहाली की मांग कर रहे हैं। विधानसभा चुनाव में क्षेत्रीय दलों का यह मुख्य मुद्दा रहा है। अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के बाद भाजपा ने कड़ी मेहनत की है। अपेक्षा की जानी चाहिए कि राज्य की जनता ने जिस उत्साह के साथ मतदान में हिस्सा लिया है। उसी उत्साह के साथ आगामी 8 अक्टूबर को मतगणना की प्रक्रिया भी पूरी होगी और अरसे बाद लोकप्रिय सरकार का गठन हो पाएगा।
Date: 04-10-24
जेल में भी जातिवादसंपादकीय
जेलों में जाति आधारित भेदभाव को समाप्त करने संबंधी सर्वोच्च न्यायालय के फैसले की जितनी प्रशंसा की जाए कम होगी। इतनी ही प्रशंसा उस रिपोर्ट या याचिका की भी होनी चाहिए, जिसने सदियों से चली आ रही इस बेशर्म कुप्रथा पर प्रहार का जरूरी साहस दिखाया। हकीकत से वाकिफ न्यायालय का यह एक ऐतिहासिक फैसला है। प्रधान न्यायाधीश धनंजय वाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली पीठ ने गुरुवार को जेल संहिता में संबंधित प्रावधानों को असांविधानिक घोषित करते हुए जेलों में जाति-आधारित भेदभाव की इस प्रथा को समाप्त कर दिया है। अदालत ने केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को दोटूक निर्देश जारी करते हुए कहा है कि जेलों में बंदियों को जाति के आधार पर काम या आवास की सुविधा न दी जाए। अदालत ने माना कि प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से जाति के आधार पर किया जाने वाला भेदभाव औपनिवेशिक शासन का अवशेष है। संविधान के तहत सभी कैदियों से समान व्यवहार सुनिश्चित किया जाना चाहिए। जाति, लिंग व विकलांगता के आधार पर जेलों के अंदर होने वाला भेदभाव पूरी तरह अवैध है। यह बहुत आश्चर्य की बात है कि एकाध कानूनों और जेल नियमों में भेदभाव के प्रावधान अब तक दर्ज हैं।
सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को इस फैसले के तीन महीने के अंदर अपने जेल नियमों में संशोधन करना होगा। यह केंद्र सरकार की प्राथमिक जिम्मेदारी होनी चाहिए कि वह जेल मैनुअल 2016 में सुधार करने के साथ ही आदर्श जेल व सुधार सेवा अधिनियम, 2013 में संशोधन करते हुए दर्ज जाति-आधारित भेदभाव को दूर करे। यह बात बहुत चौंकाती है कि विचाराधीन या दोषी कैदियों के रजिस्टर में जाति का कॉलम होता है और जेल अधिकारी ही नहीं, स्वयं कैदी भी जाति देखकर व्यवहार करते हैं। जाति देखकर कैदियों को काम दिया या काम लिया जाता है। अत: जेल में जाति आधारित किसी भी कॉलम को समाप्त करने में ही भलाई है। आगामी वर्षों में जेल अधिकारियों की बड़ी जिम्मेदारी होनी चाहिए कि जेलों में जाति प्रथा का अंत हो। साफ-सफाई के काम से हर जाति के कैदियों को जोड़ा जाए। काम किन्हीं खास कैदियों पर लादने के बजाय क्रमवार सभी से कराया जाए, ताकि हर किसी को हर तरह के काम का मौका मिले। यह एहसास कैदियों में पैदा न हो कि किन्हीं खास जातियों के कैदी जेलों में ज्यादा आराम फरमाते हैं।
वास्तव में, पिछड़ी जातियों के नेताओं को भी भेदभाव के अंत के लिए युद्ध स्तर पर सक्रिय होना चाहिए। सवाल यह भी है कि इस बड़ी समस्या की ओर पहले क्यों इशारा नहीं किया गया? सवाल यह भी है कि क्या भारतीय समाज या भारतीय व्यवस्था में अभी भी ऐसे क्षेत्र हैं, जहां अघोषित रूप से या सामान्य रूप से ही जातिगत भेदभाव की कुप्रथा बेधड़क चल रही है? यह पूरा प्रकरण इस बात का संकेत है कि पिछड़ों के नेताओं को ज्यादा सजग होने की जरूरत है। जेलों में सदियों से जिनका शोषण हो रहा था, क्या उनकी ओर से आवाज उठाने वाला कोई नहीं था? विशेष रूप से सरकारों को अपनी ओर से यह विस्तृत अध्ययन करना चाहिए कि जेलों में गरीबों और विशेष रूप से आदिवासियों की क्या स्थिति है? क्या जेलों में समानता का व्यवहार हो रहा है? बेशक, जहां भी संविधान के अनुरूप समानता या मानवीयता का व्यवहार नहीं हो रहा है, वहां जिम्मेदार अधिकारियों के खिलाफ कड़े कदम उठाने की जरूरत है।
Date: 04-10-24
बाइडन के वक्त चतुर्भुज सुरक्षा संवाद को मिला बहुत बलसुरेंद्र कुमार , ( पूर्व राजनयिक )
जोसेफ रॉबिनेट बाइडन जूनियर अमेरिका के 46वें राष्ट्रपति हैं और उनकी दोबारा निर्वाचित होने की हार्दिक इच्छा थी। मगर कमजोर पड़ती याददाश्त, बार-बार की गलतियों और डोनाल्ड ट्रंप के साथ टीवी बहस में निराशाजनक प्रदर्शन के चलते प्रमुख डेमोक्रेटिक नेताओं के भारी दबाव के कारण उन्हें पद की दौड़ से हटना पड़ा।
बहरहाल, बाइडन अभी भी अमेरिका के राष्ट्रपति हैं और पिछले दिनों बेहद गर्मजोशी से अपने कार्यकाल के छठे क्वाड शिखर सम्मेलन पर उन्होंने हस्ताक्षर किए। उन्होंने अपने गृह नगर डेलावेयर में शिखर सम्मेलन की मेजबानी की और तीन क्वाड नेताओं- भारत से नरेंद्र मोदी, जापान से फुमियो किशिदा और ऑस्ट्रेलिया से एंथनी अल्बनीज के लिए उन्होंने अपने घर के दरवाजे खोल दिए और रिश्तों में यादगार स्पर्श जोड़ा। इस बार बाइडन विलमिंगटन घोषणापत्र जारी कराने में कामयाब रहे। सम्मेलन में बढ़ते समुद्र्री सहयोग को खासतौर पर रेखांकित किया गया : पहला क्वाड समुद्री जहाज पर्यवेक्षक मिशन, क्वाड इंडो-पैसिफिक लॉजिस्टिक्स नेटवर्क, क्वाड पोर्ट्स ऑफ फ्यूचर पार्टनरशिप और सेमीकंडक्टर आपूर्ति शृंखला में सहयोग। इससे समुद्री सुरक्षा सहयोग बढे़गा, जो आगामी वर्षों में क्वाड के लिए सबसे महत्वाकांक्षी एजेंडा साबित हो सकता है। जाहिर है, बाइडन ने अपने एक कार्यकाल में ही शानदार स्थायी विरासत हासिल कर ली है।
ध्यान रहे, क्वाड (चतुर्भुज सुरक्षा संवाद) का जन्म 2004 में दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों में सुनामी के चलते हुई तबाही के बाद हुआ था, जब अमेरिका, जापान, भारत और ऑस्ट्रेलिया की नौसेनाओं ने प्रभावित देशों को मानवीय सहायता व आपदा राहत देने के लिए हाथ मिलाया था। वैसे, यह एक दशक से अधिक समय तक निष्क्रिय रहा, वर्ष 2017 में अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने चीन की आक्रामकता के मद्देनजर इसे पुनर्जीवित किया। ट्रंप के बाद क्वाड की बैठकों को शिखर सम्मेलन के स्तर तक ले जाने की जिम्मेदारी जो बाइडन पर थी। पहला क्वाड शिखर सम्मेलन वस्तुत: 12 मार्च, 2021 को हुआ था। तब से बाइडन के राष्ट्रपति रहते कुल छह सम्मेलन हो चुके हैं, जिनमें से दो आभासी और चार भौतिक हैं।
बाइडन ने चीन के खिलाफ ट्रंप के अधिकांश शुल्कों को जारी रहने दिया है। चीन पर वहां कड़ा प्रहार किया है, जहां सबसे ज्यादा मायने रखता है : चीन को चिप्स और अत्याधुनिक प्रौद्योगिकियों के निर्यात से इनकार किया है। वैसे, बाइडन ने इस बात पर जोर दिया कि वह चीन के साथ कोई टकराव नहीं, बल्कि उसे मात देना चाहेंगे। हालांकि, डेलावेयर में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी जोर देकर कहा कि हम किसी के खिलाफ नहीं हैं। इसके बावजूद चीन ने जोर-शोर से दोहराया है कि क्वाड उसके खिलाफ है। यहां रूस भी चीन से सहमत है।
बेशक, बाइडन के शासनकाल में क्वाड का एजेंडा तेजी से बढ़ा है। यह अब संयुक्त राष्ट्र और जी-20 के एजेंडे जैसा दिखता है। क्वाड सर्वाइकल कैंसर को कम करने के लिए महत्वपूर्ण और उभरती प्रौद्योगिकियों, जलवायु परिवर्तन, आपूर्ति शृंखला, हरित ऊर्जा, साइबर अपराध, आतंकवाद, ऋण राहत, कौशल विकास में भी सहयोग का वादा करता है। भारत ने भी सरकार द्वारा वित्त पोषित तकनीकी संस्थान में चार साल के इंजीनियरिंग कार्यक्रम को आगे बढ़ाने के लिए इंडो-पैसिफिक क्षेत्र के छात्रों को 5,00,000 अमेरिकी डॉलर मूल्य की 50 क्वाड छात्रवृत्तियां देने का वादा किया है। इस संगठन में हर देश अपनी ओर से योगदान कर रहा है। बाइडन क्वाड के भविष्य के बारे में आशान्वित हैं, ‘हमारे देश रणनीतिक रूप से पहले से अधिक एकजुट हैं…चुनौतियां आएंगी, दुनिया बदल जाएगी, क्वाड यहीं रहेगा।’
दक्षिण-पूर्व एशिया के देशों की आर्थिक भलाई के लिए क्वाड देशों के बीच सहयोग की गति जारी रहेगी। बाइडन युग के बाद समुद्री सुरक्षा के लिए गहन सहयोग का और विस्तार होगा। यह विचार का विषय है कि हाल के वर्षों में जो क्वाड शिखर सम्मेलन हुए हैं, उनसे चीन की अपने पड़ोसियों के खिलाफ आक्रामकता में कमी आई है। खैर, अगले वर्ष भारत क्वाड की अध्यक्षता करेगा, उसके पास क्वाड को नई दिशा देने का अवसर होगा, जैसे उसने साल 2023 में जी-20 को दिया था|
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कोलकाता बलात्कार-हत्याकांड के बाद वहाँ के जूनियर डॉक्टरों ने काम करना बंद कर दिया। मुख्यमंत्री की बार-बार अपील के बाद बड़ी मुश्किल से वे बात करने को तैयार हुए थे। इसका कारण जांच में दिखाई दे रही विसंगतियों को बताया जा रहा था।
कुछ बिंदु –
जांच पर चल रही राजनीति – दुर्घटना के एक माह बाद भी दोषियों को पकड़ा नहीं गया था। पकड़ा गया एक अभियुक्त अपने को निर्दोष बता रहा था। सीबीआई का मानना है कि इस मामले में कई विसंगतियाँ हैं।
राज्य सरकार ने कहा कि उसके पास 88 फास्ट टैक कोर्ट हैं। लेकिन केंद्र का कहना है कि केंद्र की योजना के तहत राज्य को आवंटित 17 ऐसे कोर्ट में से कोई भी अस्तित्व में नहीं है। अब यह मामला राजनैतिक वैमनस्य और भ्रष्टाचार का अधिक हो गया है।
कानून –
इस बीच बंगाल ने अपराजिता महिला एवं बाल विधेयक 2024 बनाया है। यह बलात्कार के मामलों की जांच एफआईआर दर्ज होने के 21 दिनों के भीतर पूरी करेगा। मुकदमा पूरा करने के लिए 30 दिन दिए जाएंगे।
फास्ट ट्रैक कोर्ट कितने सार्थक – महिलाओं के खिलाफ अपराधों की प्रक्रिया के लिए फास्ट ट्रैक विशेष कोर्ट मौजूद हैं। इस योजना को 2026 तक बढ़ा दिया गया है। इसके लिए निर्भया कोष से 1207 करोड़ दिए जाते हैं। पूरे भारत में ऐसे 851 फास्ट-ट्रैक कोर्ट हैं। दुर्भाग्यवश, ये कोर्ट भी 50% लंबित मामलों के साथ भरे पड़े हैं।
14वें वित्त आयोग ने 2015-20 के दौरान 4,144 करोड़ रुपये की कुल लागत से 1800 फास्ट ट्रैक कोर्ट स्थापित करने की सिफारिश की थी। लेकिन पुलिस की जांच और फोरेंसिक की कमियों के कारण फास्ट-ट्रैक कोर्ट भी मामले का सही निपटारा नहीं कर पाते हैं। थीमी जांच प्रक्रिया से ही जनारोष व्याप्त हो रहा है। इसमें सुधार होना चाहिए।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 6 सितंबर, 2024
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Date: 03-10-24
Safety, But How?Implementing security checks for masses of Chinese electronic products will be a tough askTOI Editorials
By expanding its “trusted source” mandate, New Delhi is considering security checks for Chinese electronic products like smart meters, parking sensors, drone parts and even laptops and PCs. The trigger for the move is clearly the pager-walkie talkie attacks Israel launched against Hezbollah in Lebanon, which exposed supply chain vulnerabilities in a globalised world. While that incident involved violence to further geopolitical ends, India has been increasingly concerned about the security risks posed by imported Chinese equipment. Earlier this year, it notified rules for CCTVs that seek to test such equipment sold in India on “essential security parameters”.
A global issue | That such concerns are warranted is not in doubt. Given the Chinese state’s powers, risks like ransomware attacks and data breaches, besides hacking and penetration that compromise important utilities’ infra, posed by Chinese companies are real. Recently, US Congressional committees warned that China’s ZPMC installed intelligence-gathering equipment on cranes used at seaports across US could allow Beijing to cripple key infra. US has held that telecom equipment from Huawei and ZTE pose grave risk to its national security. Huawei has also been deemed a security risk by several other countries, including India, which left out the company and ZTE from its 5G trials.
China matters | But, given China’s critical place in global supply chains, GOI will need to weigh the consideration of safety against disruption before it mandates such security checks. For, besides Chinese products, components made in China are essential to many Indian products, used in the country and sold abroad as our exports. For instance, we may have become the world’s second largest mobile phone manufacturer, but only 15% of value-add for the product is indigenous, with China accounting for many vital components. There is also the question of doability of security checks when it comes to mass items like laptops and PCs since Chinese companies enjoy a large share of Indian market. Just as significant, even many non-Chinese powerhouses make their products in that country. How much China matters was evident after India’s move to impose restrictions on laptop imports last Aug. In months before that curb, about 76% of our laptop imports came from China, but in months following its revocation, the share went up to 87.5%. So, while the threat of Chinese devices having a backdoor is real, how GOI will implement its plan without impacting consumers’ market and the economy remains uncertain.
Date: 02-10-24
It is time to fix the UPSC selection processIndia has a huge task at hand in restoring the image of the civil servicesAshok Thakur, [ Former Education Secretary, Government of India ]
The image of the Union Public Service Commission (UPSC) and of the Indian Administrative Service (IAS) has taken a serious beating ever since the Puja Khedkar episode came to light. Ms. Khedkar has unwittingly exposed the chinks or rather the gaping holes in the system. When seen along with the National Eligibility-Cum-Entrance Test (NEET) fiasco, it becomes clear that India has a huge task at hand in restoring the image of the civil services, institutions of higher learning, as well as the organisations responsible for these national-level selections.
Gaping holes
While the NEET controversy was a one-time mismanagement of an exam paper, the UPSC case has serious long-term implications for not only the creamy layer concept in Other Backward Classes (OBC) reservation, but also for reservations for economically weaker sections (EWS), which were started a few years ago. For both these categories, people need to submit income certificates issued by the Tehsildar. This process has come under severe criticism in this case.
While there have also been complaints of candidates fraudulently posing as Scheduled Caste and Scheduled Tribe members, these can be verified on the ground. However, this is not the case with the EWS or the OBC quota system, as well as the disability category, which can all be gamed.
On the income issue, there is still no clarity on whether the candidate’s income or the candidate’s father’s income is to be considered. Also, let us say a man gets into the Indian Revenue Service under the OBC/EWS category and later reapplies for the UPSC exam because he wants to get into the IAS. His income has crossed the threshold in the interim period. What happens then? If income is dynamic, how can a one-time snapshot of a person’s economic status be accepted indefinitely? In our experience, once the status of a person is established by a certificate, it is neither reported differently by the applicant nor is it verified by the authorities concerned. In many cases, we have seen candidates failing to clear the exam the first time and then clearing it with an EWS certificate. To make matters worse, the Tehsildar who is charged with the responsibility of issuing the income certificate has no wherewithal or credentials to actually do so. They only issue it because, as some may argue, “this is how it has always been done.” If a candidate’s OBC father is rich and owns companies’ worth of money but does not pay personal income tax, there is no way the Tehsildar can get to him.
Despite all these questions and problems, there have been no attempts to update the rules on income and disability. Neither has there been any scrutiny of the cases. The rules and procedures do not have legs to stand on, but no one challenges them for fear of opening a can of worms. They invariably look the other way and, in some cases, even make hay while the sun shines. We both spent several years in the Ministry, but we did not have a single case referred to us by institutions seeking clarifications. Nor were any seemingly dubious cases brought to our notice. What we see today is therefore just the tip of the iceberg. It will not be surprising if many such cases tumble out not only from the civil services closet, but also from India’s premier higher education institutions. Unfortunately, India does not have a proactive system of scrutiny. There is scrutiny only when someone registers a complaint. Add to this the rampant sifarish (request) culture and we have a ‘fair is foul, foul is fair’ syndrome, a nightmare even for the best of our administrators.
The way forward
Could more transparency at every stage using technology be the antidote? Had this been done in Ms. Khedkar’s case, she would not have managed to sit for the UPSC exam 12 times. However, it is a fact that even a secure system such as the Aadhaar can be gamed. In 2018, for instance, fake biometric data were used to generate Aadhaar numbers to fraudulently claim subsidies on LPG and other welfare schemes.
What then is the solution? To begin with, the government needs to issue clear instructions on both income and disability, which are applicable throughout the country irrespective of State, Ministry, or sector. If need be, bodies could be set up with eminent persons or institutions to help the government reach a consensus on these issues. We need a robust system of verification. We need to adopt practices which are forward-looking and compatible with the times, especially in the disability category, and we need to use advanced technology to combat fraud.
We also need some honest thinking on several scores. The Department of Personnel and Technology must explain the rationale for allowing mental disability within the disability quota for civil services, which require serious and consistent application of mind. It is also unclear why the examination has no aptitude test unlike the Defence Services.
We need to impose serious penalties on officers and doctors who certify people wrongly without doing due diligence. The courts play an important role here. When one wrong person is selected for the services, another deserving candidate is denied their rightful place in the government. The civil services are no place for self-seekers who have no interest in serving the nation and who only clear the exam to enjoy the perks that come with the services, such as a chauffeur-driven car. It is high time we made changes at the procedural and structural levels.
Date: 03-10-24
Healthy signTurnout numbers in the Assembly polls show distinct patterns in south KashmirEditorial
One of the salubrious stories of Indian democracy has always been the regular and uninterrupted conduct of general and Assembly elections across provinces. Jammu and Kashmir (J&K) was an aberration with no Assembly elections which should have been held five years ago. Thankfully, this denial of a key democratic process came to an end after three phases of elections were held across the Union Territory and, provisionally, 63.5% of the electorate turned up to vote. This number is marginally lower than the 65.7% registered in the 2014 Assembly polls (excluding Ladakh). The numbers could go up, but the marginal drop should be contextualised. The turnout in 2014 was a peak ever since the militancy that began in 1987 which had dampened voting numbers across the province in subsequent years. Many changes have happened in the last decade — the Governor dissolved J&K’s elected Assembly on November 21, 2018; the province lost its special status a year later and, on its bifurcation into two Union Territories, lost its Statehood; and, a significant delimitation exercise led to new constituencies. But the electoral turnout now is still an encouraging number, considering the fact that the turnout in the general election in April-May 2024 was 58.5%.
Some other distinct patterns are discernible from the provisional turnout figures. Constituencies such as Shopian, Kulgam, Pulwama in south Kashmir and Baramulla in north Kashmir registered definite increases in turnout when compared to earlier Assembly polls. This was largely due to the presence of independent candidates supported by the banned Jamaat-e-Islami J&K in the south and Lok Sabha MP Engineer Rashid’s Awami Ittehad Party in Baramulla, leading to greater contestation. The Bharatiya Janata Party (BJP)-led Union government has worked hard to change the political discourse in the Valley and to alter the dynamics of party politics. But if the contests, the political discourse and the turnout are any indication, the elections have not been held according to the script envisaged by the BJP. The electorate has sought to use the elections as a means to voice their grievances with President’s Rule in the province — the securitised environment has dampened political activities beyond electoral campaigns. The regional parties have not limited their campaigns to bread and butter issues, also articulating demands for restoration of special status and a permanent solution to what they perceive to be unending conflict in the province. The poll results will indicate whether these demands have found resonance among the electorate, but it suffices to say that the elections herald the possibility of a return to normal democratic politics in J&K, aligning it more closely with the rest of the country.
Date: 03-10-24
देश में कृषि को राजनीति से दूर रखना जरूरी हैसंपादकीय
देश में कुल कृषि उत्पाद में 1.57 लाख करोड़ रुपए के अनाज, दलहन, तिलहन के अलावा लगभग पांच करोड़ टन या 15% फल-सब्जियां हर साल बर्बाद होती हैं। विगत दिनों सरकार ने नाबार्ड की सलाहकार सेवा इकाई के अध्ययन का हवाला देते हुए इस हानि को स्वीकारा। बेहतर ट्रांसपोर्ट सिस्टम, मशीनीकरण और गोदाम व शीतगृह की सुविधा के जरिए इस क्षति को काफी हद तक कम किया जा सकता है, लेकिन जहां पंजाब में 97% किसान कंबाइंड हार्वेस्टर का प्रयोग करते हैं, वहीं बिहार के केवल 10%। इसका मूल कारण है, दोनों राज्यों में किसान परिवार के खेती के रकबे में 9:1 का अनुपात। छोटा रकबा और बेरोजगार आबादी के कारण बिहार का किसान मशीन का प्रयोग कृषि में नहीं कर पाता । कृषि में मशीनीकरण की रफ्तार कम होने का दूसरा कारण है कमाने योग्य उम्र (15-59 ) के आधे से ज्यादा लोगों को अन्य उपक्रमों में काम न मिलना, जिससे वे कृषि पर बोझ बनकर लगातार अनुत्पादक होते जा रहे हैं और कृषि व्यवसाय अलाभकारी साबित हो रहा है। जहां एक ओर मशीनीकरण से कृषि को लाभकारी बनाना जरूरी है, वहीं इससे निकले युवाओं को स्किल देकर नए उद्यमों में योगदान देने के लिए सक्षम करना अपरिहार्य है। राजनीतिक लाभ परे रखकर कृषि पर सम्यक और बहुआयामी नीति जरूरी है।
Date: 03-10-24
काम में ‘इनोवेटिव’ होने के लिए थोड़ा आराम भी जरूरी हैचेतन भगत, ( अंग्रेजी के उपन्यासकार )
एक तरफ उद्योग-जगत के दिग्गज हैं, जो युवाओं से सप्ताह में 70 घंटे काम करने का आग्रह कर रहे हैं। दूसरी तरफ, अर्न्स्ट एंड यंग (ईवाय) की एक 26 वर्षीय कर्मचारी की वर्कलोड से हुई मृत्यु ने आक्रोश पैदा कर दिया है। दोनों पक्षों के अपने-अपने समर्थक हैं।
‘अधिक काम’ करने की हिदायत देने वालों का मानना है कि युवा होने का मतलब है कड़ी मेहनत करना, करियर बनाना और देश के लिए योगदान देना। उनके अनुसार, ‘वर्क-लाइफ बैलेंस’ कमजोर लोगों के लिए है। जब आप कंपनी के मुनाफे में ज्यादा योगदान दे सकते हैं तो अच्छी नींद या सेहत की क्या जरूरत है?
जिस ईवाय कर्मचारी की वर्कलोड से मृत्यु हुई, उसने सीए परीक्षा पास की थी, जिसे कुछ प्रतिशत लोग ही पास कर पाते हैं, और वह भी कई असफल प्रयासों के बाद। फिर उसे एक प्रतिष्ठित बहुराष्ट्रीय कम्पनी में एक डिमांडिंग जॉब में धकेल दिया गया।
उसके माता-पिता के अनुसार वह देर रात तक काम करने के बाद घर लौटती थी तो उसे और काम दे दिया जाता था। सीए होने के नाते, उसके काम में सम्भवतः हजारों पन्नों के दस्तावेजों को पढ़कर रिपोर्ट तैयार करना शामिल था। यह काम का कभी न खत्म होने वाला पहाड़ है।
बात केवल अकाउंटेंट्स की ही नहीं है। हमने हाल ही में आरजी कर हॉस्पिटल का भयानक मामला देखा, जहां युवा डॉक्टर 36 घंटे की शिफ्ट में बिना सोए काम कर रहे थे। आईटी मैनेजर, इंवेस्टमेंट-बैंकर, कंसल्टेंट्स, सेल्सपर्सन, मीडिया प्रोफेशनल्स- ये कुछ और उदाहरण हैं, जिनका काम कभी खत्म नहीं होता। और इस सब में, अगर किसी जूनियर कर्मचारी पर काम का बोझ बढ़ जाता हो, तो उसे क्या करना चाहिए?
मुझे एक इंवेस्टमेंट-बैंकर के रूप में कई साल पहले की घटना याद है। मैं एक खनन कंपनी पर क्रेडिट ड्यू डिलिजेंस करने के लिए ऑस्ट्रेलिया गया था। मैं फाइनेंस मैनेजर के साथ मीटिंग सेट करना चाहता था। उन्होंने कहा कि उनकी आखिरी मीटिंग दोपहर 3:30 बजे की थी क्योंकि शाम 4:30 बजे- चाहे कुछ भी हो- वे घर के लिए निकल जाते हैं। और अपना समय होने पर वे अपनी सेल्फ-ड्राइविंग बोट में बैठकर चले भी गए।
दफ्तर की इमारत स्वान नदी के ठीक बगल में थी, जो पर्थ से होकर गुजरती है। वे कभी भी अपना काम घर पर नहीं ले जाते थे। और जिस खनन कंपनी के लिए वे काम करते थे, वह ठीक चल रही थी। जबकि हांगकांग में बैंकिंग की अपनी नौकरी के दौरान हम सप्ताह में कई दिन रात 10 बजे तक काम करते थे।
ऐसी ही कार्य-संस्कृति भारत में भी प्रचलित है। जूनियर कर्मचारी अकसर अपने सीनियर के जाने से पहले घर नहीं जाते। सीनियर अपने से और सीनियर्स के घर जाने का इंतजार करते हैं। नतीजा यह रहता है कि हर कोई देर तक ऑफिस में बैठकर यह दिखाने की कोशिश करता है कि वे काम के प्रति कितने समर्पित हैं।
रिमोट-वर्क तकनीक ने चीजों को और पेचीदा बना दिया है। जो उपकरण जीवन को आसान बनाने के लिए बनाए गए थे, उनका उपयोग अब यह सुनिश्चित करने के लिए किया जा रहा है कि आप काम के लिए हमेशा उपलब्ध रहें और तुरंत प्रतिक्रिया दें।
विडम्बना यह है कि इससे भारतीय कंपनियां दुनिया की कंपनियों की तुलना में अधिक उत्पादक, कुशल या लाभ कमाने वाली नहीं बन गई हैं। किसी भी कंपनी में वास्तविक सम्पदा-निर्माण विजन और इनोवेशन से होता है। इसके लिए रचनात्मकता और स्वतंत्रता की आवश्यकता होती है। लोगों को नए विचारों के बारे में सोचने के लिए पर्याप्त खाली समय की भी जरूरत है।
भारतीय कंपनियों में सबसे बड़ी समय बर्बाद करने वाली चीजों में से एक है- मीटिंग्स। ईमानदारी से कहें, क्या किसी मीटिंग ने वैसा कुछ हासिल किया है, जिसे ग्रुप में एक मैसेज से हासिल नहीं किया जा सकता था? लेकिन नहीं, कॉर्पोरेट्स को मीटिंग्स पसंद हैं, क्योंकि वे मैनेजर्स के अहंकार को संतुष्ट करती हैं।
भारतीय कंपनियां इनोवेशन को भी नापसंद करती हैं। इसलिए जूनियर कर्मचारियों को खुश, रचनात्मक और स्वतंत्र मानसिक स्थिति में रखने का कोई प्रयास नहीं किया जाता। अगर आप जूनियर कर्मचारियों को उनके हक का आधा वेतन दे सकें और उनसे दो लोगों का काम करवा सकें, तो एक भारतीय मैनेजर इसे अपनी बड़ी सफलता के रूप में देखता है।
भारतीय कंपनियों का प्रतिस्पर्धी लाभ- विशेष रूप से सेवा क्षेत्र में- लगभग हमेशा ‘चीप-लेबर’ ही होता है। कॉर्पोरेट्स में अपना अस्तित्व कायम रखने के लिए ऐसे में बहुत सारे कर्मचारी ‘एलबीडीएन’ की नीति अपनाने लगे हैं, जिसका मतलब है- ‘लुक बिज़ी, डु नथिंग!’
Date: 02-10-24
अच्छे दिनों के संकेत दे रहा भारत-अमेरिका सेमीकंडक्टर समझौताहर्ष वी पंत, कार्तिक बोम्माकांति, ( हर्ष पंत ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन, नई दिल्ली में वाइस प्रेसिडेंट (अध्ययन एवं विदेश नीति) हैं और कार्तिक बोम्माकांति वहां सीनियर फेलो (राष्ट्रीय सुरक्षा एवं रक्षा) हैं )
भारत ने देश में सेमीकंडक्टर संयंत्र लगाने के लिए अमेरिका के साथ एक महत्त्वपूर्ण समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। यह संयंत्र बड़ी उपलब्धि है, जो राष्ट्रीय सुरक्षा और रक्षा से जुड़ी आवश्यकताएं पूरी करने में अहम भूमिका निभाएगा। चीन बड़ा भू-सामरिक खतरा और तकनीकी चुनौती बनकर उभर रहा है, जिस कारण अमेरिका के लिए भारत अहम साझेदार बन गया है क्योंकि क्वाड सदस्य होने के नाते उसके हित काफी हद तक अमेरिका के हितों के अनुकूल हैं।
नया समझौता भारत सेमी, थर्डआईटेक और यूनाइटेड स्टेट्स स्पेस फोर्स (यूएसएसएफ) के बीच पहल का नतीजा है। इस समझौते के केंद्र में इन्फ्रारेड, गैलियम नाइट्राइड और सिलिकन कार्बाइड जैसी सामग्री है, जो सेमीकंडक्टर निर्माण के लिए जरूरी है। इसी आपसी सहयोग के साथ यह समझौता इसलिए भी अहम है क्योंकि इसमें अमेरिकी सेना की एक प्रमुख शाखा यूएसएसएफ तथा भारतीय उद्योग जुड़े हैं।
समझौते पर कारगर तरीके से अमल हुआ तो भारत के देसी उच्च-प्रौद्योगिकी उद्योग को काफी लाभ मिलने की उम्मीद है, जो नरेंद्र मोदी सरकार के राष्ट्रीय सेमीकंडक्टर अभियान के अनुरूप भी है। साझे उपक्रम का लक्ष्य ऐसा फैब्रिकेशन संयंत्र स्थापित करना है, जिससे सुरक्षित, निर्बाध और मजबूत आपूर्ति श्रृंखला तैयार हो।
इस सेमीकंडक्टर समझौते के कारण भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा आवश्यकताओं के लिए हर वर्ष अरबों डॉलर का सेमीकंडक्टर आयात बंद हो जाएगा। साथ ही देश सेमीकंडक्टर आपूर्ति श्रृंखला का प्रमुख केंद्र बन जाएगा। भारत सेमीकंडक्टर क्षेत्र में महत्वपूर्ण तकनीकी पड़ाव हासिल करने की राह पर पहले ही काफी आगे है, जिसका उदाहरण भारत सेमी है, जो संयुक्त उपक्रम की अहम साझेदार है। भारत सेमी का एक फैब्रिकेशन संयंत्र है जो सिलिकन कार्बाइड और गैलियम नाइट्राइड जैसी सामग्री मिलाकर कंपाउंड सेमीकंडक्टर तैयार करता है। यह सेमीकंडक्टर रक्षा एवं हरित प्रौद्योगिकियों से जुड़ी ऊंचे वोल्टेज तथा ऊंचे तापमान वाली गतिविधियों में पुराने सेमीकंडक्टरों से बेहतर काम करता है।
अमेरिका-भारत फैक्टशीट के अनुसार फैब्रिकेशन संयंत्र का जोर राष्ट्रीय सुरक्षा, अत्याधुनिक दूरसंचार और हरित ऊर्जा के लिए संचार और इलेक्ट्रॉनिक पावर ऐप्लिकेशन पर होगा। यह फैब्रिकेशन संयंत्र भारत में अपनी तरह का पहला संयंत्र ही नहीं है बल्कि दुनिया में कहीं भी लग रहे उन शुरुआती संयंत्रों में से है, जिनमें फैब्रिकेशन के लिए कई प्रकार की सामग्री इस्तेमाल की जाती है। परिणामस्वरूप चिप निर्माण को बहुत रफ्तार मिलेगी और दोनों देशों को रक्षा के क्षेत्र में पारस्परिक लाभ मिलेंगे।
इस ऐतिहासिक समझौते के बाद भी दो अहम बातों का ध्यान रखना चाहिए। पहली बात, यूएसएसएफ, भारत सेमी और थर्डआईटेक के बीच सहयोग अमेरिका के निर्यात नियंत्रण नियमन पर ही निर्भर करता है। ये नियमन 2018 के निर्यात नियंत्रण सुधार अधिनियम (ईसीआरए) के स्वरूप में हैं जो अमेरिकी तकनीक को उन देशों में जाने से रोकता है, जिन्हें अमेरिका अपने हितों का विरोधी मानता है।
अमेरिकी कांग्रेस ने चीन को सेमीकंडक्टर और साइबर सुरक्षा से जुड़ी उन प्रतिबंधित और मौलिक तकनीकों तक पहुंचने से रोकने के लिए ईसीआरए पारित किया था, जो अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण हैं। इन प्रतिबंधों में तकनीकी क्षमताएं, संबंधित ज्ञान और वे विशिष्ट निर्देश भी शामिल हैं, जिनके दायरे में भारत और अमेरिका के बीच हाल ही में हुए सेमीकंडक्टर समझौते जैसे संयुक्त उद्यम भी आते हैं। तकनीक के निर्यात पर अंकुश के लिए अमेरिका के पक्ष को बेहद व्यापक संदर्भ में परिभाषित किया गया है।
इसके सिरे दूसरी चेतावनी से जुड़े हैं। ईसीआरए उन सामग्रियों पर ही नियंत्रण नहीं रखता है, जो अमेरिका में बनी हैं बल्कि यह कानून उन सामग्रियों पर भी नियंत्रण करता है, जिनका निर्यात उन देशों से हुआ है, जो किसी समय अमेरिका से मिली प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल करते हैं। अगर अमेरिका से मिली तकनीक का 25 प्रतिशत से अधिक इस्तेमाल हो तब तो खास तौर पर नियंत्रण रहता है। इसे 25 प्रतिशत नियम भी कहा जाता है।
निर्यात पर नियंत्रण लगाने वाले ये प्रतिबंध 2020 की शुरुआत में ट्रंप सरकार के दौरान और भी सख्त हो गए। उच्च प्रौद्योगिकी खास तौर पर सेमीकंडक्टर से जुड़े प्रतिबंधों का असली निशाना तो चीनी ही रहा है मगर ईसीआरए का दायरा दूसरे देशों तक फैला होने के कारण दूसरे देश भी इसकी जद में आ सकते हैं।
उदाहरण के तौर पर अमेरिकी कंपनियों ने ईसीआरए की उन खामियों का फायदा उठाया, जिनसे उनके विदेशी संयंत्रों या सहयोगी कंपनियों को अपना माल हुआवे जैसी चीनी कंपनियों को बेचने की इजाजत मिल गई थी।
नए संशोधन करते समय इन खामियों को दूर किया गया, जिससे अमेरिकी वाणिज्य विभाग को उन विदेशी संयंत्रों से वस्तु निर्यात पर भी प्रतिबंध लगाने की ज्यादा गुंजाइश मिल गई, जिनका अमेरिकी तकनीकी सामग्री या जानकारी से सीधे कोई ताल्लुक नहीं था मगर वे अमेरिका में तैयार डिजाइन तथा नक्शे पर बने थे। शुरुआती दौर में इस प्रतिबंध के निशाने पर ताइवान सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग कंपनी (टीएसएमसी) भी आई जिसने हुआवे को भारी मात्रा में निर्यात किया था।
भारत और अमेरिका के बीच सेमीकंडक्टर फैब्रिकेशन समझौते पर खुश होने की कई वजहें हैं, लेकिन भारत को भी ध्यान रखना होगा कि उसे अपने निर्यात नियंत्रण नियमों का तालमेल अमेरिका के नियमों के साथ बिठाना होगा। ऐसा नहीं हुआ तो भारत को अमेरिका के निर्यात प्रतिबंधों से नुकसान उठाना होगा, जिससे भविष्य में अमेरिका और भारत के बीच तनाव उत्पन्न हो सकता है। फिलहाल भारत-अमेरिका सेमीकंडक्टर समझौता अमेरिका की उच्च प्रौद्योगिकी रणनीति में बदलाव का महत्तवपूर्ण प्रतीक है और यह बता रहा है कि आगे काफी कुछ बेहतर होने जा रहा है।
Date: 03-10-24
सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा की चुनौतियांजयंतीलाल भंडारी
देश में तेज आर्थिक विकास के साथ जैसे-जैसे असंगठित और अनुबंध आधारित रोजगार का विस्तार हो रहा है, वैसे-वैसे सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा की चिंताएं तेजी से बढ़ रही हैं। सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा का संबंध ऐसी कानूनी व्यवस्था से है, जिसके तहत व्यक्ति या परिवार की आय के कुछ या सभी स्रोत बाधित हो जाएं, तब संबंधित व्यक्ति या परिवार का उपयुक्त रूप से ध्यान रखा जा सके । सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा के तहत जीवन चक्र में सामना किए जाने वाले बेरोजगारी भत्ता, विकलांगता लाभ, छंटनी लाभ, स्वास्थ्य बीमा चिकित्सा लाभ, मातृत्व अवकाश आदि लाभ प्रदान किए जाते हैं। निश्चित रूप से सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा मानव पूंजी निर्माण में या तो सीधे भोजन, कौशल और सेवाएं प्रदान करके योगदान देती है, या परोक्ष रूप से नकदी पहुंच प्रदान करके परिवारों को उनके विकास में सक्षम बनाती है। भारत सरकार द्वारा नागरिकों की सामाजिक भलाई सुनिश्चित करने और उन्हें विविध माध्यमों से आवश्यक सुरक्षा प्रदान करने के मद्देनजर निशुल्क आवास, खाद्य सुरक्षा, सबसिडी वाली रसोई गैस, जन-धन योजना के माध्यम से गरीबों और किसानों को निर्धारित धनराशियां देकर करोड़ों लोगों की सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा सुनिश्चित की जा रही है।
उल्लेखनीय है कि अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन यानी आइएलओ की रपट के मुताबिक दुनिया में महज 140 देशों में सामाजिक सुरक्षा से संबंधित योजनाएं हैं। दुनिया के विकासशील देशों में खासकर ये योजनाएं श्रमिकों की बीमारी, विकलांगता, बेरोजगारी पेंशन आदि से संबंधित हैं। हालांकि भारत सरकार विभिन्न माध्यमों से सामाजिक आर्थिक सुरक्षा का दायरा विस्तृत करने की डगर पर लगातार आगे बढ़ रही है, लेकिन अभी भी देश के अधिकांश लोग सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा की उपयुक्त छतरी से दूर हैं। देश के ऐसे करोड़ों लोग, जो अपनी बचत से अपनी सामाजिक सुरक्षा का प्रबंध करते हैं, वे बैंकों की ‘फिक्सड डिपाजिट’ तथा डाकखाने और अन्य सरकारी योजनाओं से जुड़ी विभिन्न बचत योजनाओं पर मिलने वाली कम ब्याज दरों से चिंतित हैं। गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने 11 सितंबर को सत्तर वर्ष या उससे अधिक उम्र के सभी वर्गों के लोगों को आयुष्मान भारत योजना में शामिल करने का फैसला किया है। इस योजना के तहत पांच लाख रुपए तक का मुफ्त इलाज मिलेगा। इससे 4.5 करोड़ परिवारों को फायदा होने की उम्मीद है। इन परिवारों में छह करोड़ बुजुर्ग हैं। इसी तरह केंद्र सरकार ने अगस्त में सरकारी कर्मचारियों के लिए यूनिफाइड पेंशन योजना (यूपीएस) को मंजूरी दी है।
निश्चित रूप से अभी देश का आम आदमी सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा लिए चिंतित रहता है। देश के करीब 57 करोड़ के श्रमबल में से तीन फीसद से भी कम सरकारी क्षेत्र के कर्मचारी यूपीएस से जुड़े हुए हैं। मगर करोड़ों श्रमिकों और कर्मचारियों से संबंधित संगठित निजी क्षेत्र और असंगठित क्षेत्र के श्रमबल के सामने वित्तीय और सामाजिक सुरक्षा चिंता का विषय बनी हुई है। हालांकि सरकारी कर्मचारियों के अलावा संगठित निजी क्षेत्र और असंगठित क्षेत्र के कर्मचारियों के लिए भी पेंशन की कुछ व्यवस्थाएं हैं, लेकिन वे वित्तीय और सामाजिक सुरक्षा के मद्देनजर अपर्याप्त और असंतोषप्रद हैं।
इस परिप्रेक्ष्य में उल्लेखनीय है कि प्रधानमंत्री जीवन ज्योति बीमा योजना के तहत मात्र 436 रुपए वार्षिक भुगतान पर दो लाख रुपए का बीमा कवर प्रदान किया जाता है। यह योजना 18 से 55 वर्ष की आयु के लोगों के लिए उपलब्ध है। प्रधानमंत्री सुरक्षा बीमा योजना के तहत 18 से 70 वर्ष के लोग बीस रुपए वार्षिक भुगतान पर दो लाख रुपए तक का दुर्घटना बीमा प्राप्त कर सकते हैं। अटल पेंशन योजना (एपीवाई) असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों पर केंद्रित एक पेंशन योजना है। इसके तहत साठ वर्ष की उम्र में एक हजार रुपए से लेकर पांच हजार रुपए प्रति माह की न्यूनतम पेंशन की गारंटी ग्राहकों द्वारा योगदान के आधार पर दी जाती है। देश का कोई भी श्रमिक जिसकी उम्र 18 से 40 साल के बीच हो, एपीवाई योजना में शामिल सकता है।
इसी तरह व्यापारियों, दुकानदारों और स्वरोजगार करने वाले व्यक्तियों सहित असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए सरकार ने दो प्रमुख पेंशन योजनाएं शुरू की हैं- प्रधानमंत्री श्रम योगी मान- धन योजना (पीएम- एसवाईएम) और व्यापारियों, दुकानदारों तथा स्वरोजगार करने वाले व्यक्तियों के लिए राष्ट्रीय पेंशन योजना (एनपीएस- ट्रेडर्स)। इन योजनाओं के तहत, लाभार्थी साठ वर्ष की आयु के बाद न्यूनतम तीन हजार रुपए की मासिक पेंशन प्राप्त करने के हकदार हैं। यह बात महत्त्वपूर्ण है कि 18-40 वर्ष की आयु के वे श्रमिक जिनकी मासिक आय पंद्रह हजार रुपए से कम है, वे पीएम-एसवाईएम योजना में शामिल हो सकते हैं और व्यापारी, दुकानदार और स्वरोजगार करने वाले व्यक्ति, जिनका वार्षिक कारोबार 1.5 करोड़ रुपए से अधिक नहीं है, वे एनपीएस- ट्रेडर्स योजना में शामिल हो सकते हैं। दोनों योजनाओं के तहत लाभार्थी द्वारा 50 फीसद मासिक अंशदान देय है और केंद्र सरकार द्वारा समान मिलान अंशदान का भुगतान किया जाता है।
संगठित क्षेत्र में कर्मचारी भविष्य निधि संगठन (ईपीएफओ) सबसे बड़ा सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा संगठन है। भविष्य निधि के लिए कर्मचारी का जो अशंदान कटता है, उसका एक हिस्सा पेंशन फंड के लिए कर्मचारी पेंशन योजना (ईपीएफ) में जाता है। पेंशन के लिए शर्त है कि कर्मचारी को कम से कम दस वर्ष तक नौकरी करनी होती और पीएफ खाते में अंशदान करना होता है। मौजूदा नियमों के अनुसार पेंशन योग्य वेतन की अधिकतम सीमा पंद्रह हजार रुपए है। ईपीएफ सदस्य को न्यूनतम एक हजार रुपए प्रतिमाह पेंशन मिल पाती है। इसे साढ़े सात हजार रुपए प्रति माह करने की मांग लंबे समय से हो रही है। असंगठित क्षेत्र के श्रमबल द्वारा सरकार के समक्ष उपयुक्त पेंशन की मांग की जा रही है। इसमें कोई दो मत नहीं कि इस समय ‘गिग वर्क’ सहित नई निर्मित नौकरियों में से ज्यादातर नौकरियां असंगठित क्षेत्र में सृजित हो रही हैं और इनमें पेंशन संबंधी सुरक्षा नहीं है। ‘गिग’ अर्थव्यवस्था का मतलब है अनुबंध आधारित या अस्थायी रोजगार वाली अर्थव्यवस्था ।
एक चिंताजनक प्रश्न यह भी है कि जहां असंगठित क्षेत्र के करोड़ों लोग पेंशन व्यवस्था से दूर हैं, वहीं बचत पर घटी हुई ब्याज दर और विभिन्न आकर्षण कम होने के कारण देश में सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा की चिंताएं बढ़ रही हैं। अभी भी देश में बड़ी संख्या में लोगों को सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा की छतरी उपलब्ध नहीं है। इतना ही नहीं, बचत योजनाओं पर मिलने वाली ब्याज दरों पर देश के उन तमाम छोटे निवेशकों का दूरगामी आर्थिक प्रबंधन निर्भर होता है, जो अपनी छोटी बचतों के जरिए जिंदगी के कई महत्त्वपूर्ण कामों को निपटाने की व्यवस्था सोचे हुए हैं। ऐसे में उपयुक्त पेंशन को अहमियत है। अब सरकार को इस ओर अवश्य ध्यान देना होगा कि वह निजी क्षेत्र तथा असंगठित क्षेत्रों में सेवा देने वाले करोड़ों लोगों के लिए उपयुक्त सम्मानजनक पेंशन और सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा के बारे में गंभीरतापूर्वक ध्यान दे और निजी क्षेत्र की पेंशन योजनाओं को भी आकर्षक बनाए ।
Date: 02-10-24
महायुद्ध की आशंकासंपादकीय
पश्चिम एशिया में करीब 1 वर्ष से जारी संघर्ष अब निर्णायक दौर में प्रवेश करता दिखाई दे रहा है। इस्राइल के हमले में लेबनान में हिजबुल्लाह के नसरुल्लाह और उसके नंबर दो अली कराकी के मारे जाने के बाद इस संघर्ष के महायुद्ध में तब्दील होने की आशंकाएं बढ़ गई है। इस बीच सोमवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस्राइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू से टेलीफोन पर बातचीत की। दोनों नेताओं के बीच पश्चिम एशिया के हालात पर चर्चा हुई। इस्राइल और फिलीस्तीन के बीच जारी संघर्ष के विस्तार होने की आशंकाओं के मद्देनजर यह बातचीत बेहद महत्त्वपूर्ण मानी जा रही है। मोदी ने अपनी इस्राइली समकक्ष से कहा कि दुनिया में आतंकवाद के लिए कोई जगह नहीं है। वस्तुतः हमास के प्रमुख नेता इस्माइल हानिया की हत्या के बाद नसरुल्लाह के मारे जाने के बाद परिदृश्य पूरी तरह बदल गया है। सबसे अधिक चिंताजनक स्थिति यह हो सकती है कि ईरान, हमास, इराक, हिज्बुल्लाह और सीरिया में सक्रिय ईरान समर्थक हथियारबंद गुट मिलकर इस्राइल पर हमला बोले, जिसके जवाब में इस्राइल की ओर से कई देशों में एक साथ सैनिक कार्रवाई की जाए। इस मुहिम में इस्राइल को अमेरिका, ब्रिटेन सहित कुछ अन्य यूरोपीय देशों की ओर से सक्रिय समर्थन मिलेगा।
सबसे भयावह परिदृश्य पश्चिम एशिया में महायुद्ध का हो सकता है। इसके विश्व युद्ध में तब्दील होने की आंशिक ही सही लेकिन आशंका है। ऐसा परिदृश्य उस समय बनेगा जब इस्राइल ईरान के परमाणु केंद्रों को नष्ट करने के अपने पुराने मंसूबे पर अमल करने का दुस्साहस करे। वास्तव में इस्राइल अपने लिए सबसे बड़ा खतरा ईरान को मानता है । इस्राइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू ने सोमवार को ईरान के लोगों से कहा कि हर दिन आप एक ऐसी शासन को देखते हैं जो आपको अपने अधीन कर लेता है। अगर उन्हें आपकी परवाह है तो वह मध्य पूर्व में बेवजह के युद्धों पर अरबों डॉलर बर्बाद करना बंद कर देगा। इस्राइल को इस हकीकत का पता है कि यदि ईरान परमाणु हथियार बना लेता है तो इससे पश्चिमी एशिया में शक्ति संतुलन पूरी तरह बदल जाएगा। यह इस्राइल ही नहीं बल्कि अमेरिका के लिए भी एक बड़ी चुनौती होगी। मध्य- पूर्व की राजनीतिक अस्थिरता भारतीय हितों को भी प्रभावित कर सकती है। इसलिए प्रधानमंत्री मोदी शांति और स्थिरता के लिए युद्धरत दोनों पक्षों से संवाद कर रहे हैं।
Date: 03-10-24
संकट में पश्चिम एशियासंपादकीय
इस्राइल पर ईरान की ओर से बैलिस्टिक मिसाइलों से हमलों से पश्चिम एशिया में युद्ध का संकट गहरा गया है। इस्राइलऔर छापामार संगठन हमास एवं हिजबुल्लाह के बीच का संघर्ष तो सीमित दायरे में होने वाली उथल-पुथल थी लेकिन संघर्ष में ईरान के शामिल होने के बाद क्या होगा, इसका आकलन जाने-माने युद्ध विश्लेषक भी नहीं कर पा रहे हैं। ईरान ने कहा है कि हमला हमास प्रमुख इस्माइल हानिया और हिजबुल्लाह चीफ नरुल्लाह की मौत का बदला है। सुनिश्चित है कि इस्राइल प्रतिक्रियास्वरूप ज्यादा मारक हमला ईरान पर करेगा । अमेरिका ने इस्राइल की मदद करने की घोषणा कर दी है। फिलिस्तीन में जब संघर्ष शुरू हुआ था तो परमाणु विशेषज्ञों ने संभावना व्यक्त की थी कि ईरान कुछ ही सप्ताह के अंदर परमाणु बम बना सकता है। पिछले एक वर्ष के दौरान ईरान का परमाणु कार्यक्रम कहां तक पहुंचा है, इस बारे में क्यास ही लगाया जा सकता है। पश्चिम एशिया के संघर्ष में परमाणु हथियारों का आयाम जुड़ जाने से विश्व मानवता के सामने अभूतपूर्व संकट पैदा हो गया है। ईरान ने जैसे तेवर अपनाए हैं, उसे देखते हुए इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि उसके पास सीमित संख्या में परमाणु बम हों। युद्ध भयावह रूप लेता है। तो इस्राइल टैक्टीकल परमाणु बम (सीमित विध्वंस क्षमता) का उपयोग कर सकता है। ऐसा उस समय होगा जब इस्राइल परंपरागत हथियारों से अपनी रक्षा करने में स्वयं को कमजोर महसूस करे। ईरान के पास परमाणु बम है तो इन्हीं हालात में इस्राइल के खिलाफ उनका इस्तेमाल करेगा। पश्चिम एशिया के अनेक देशों में अमेरिका के सैनिक अड्डे हैं जिनका उपयोग इस्राइल की मदद के लिए किया जाएगा। ऐसे में अमेरिकी अड्डे ईरान के लिए माकूल निशाना बन सकते हैं। दूसरी ओर, रूस और चीन कभी नहीं चाहेंगे कि ईरान की भारी पराजय हो। वे सीधे रूप से युद्ध में शामिल होते हैं या नहीं, यह बहुत कुछ हालात पर निर्भर करता है। भारत के लिए भी पश्चिम एशिया का संकट नई आर्थिक चुनौती पेश कर सकता है। आने वाले दिनों में कच्चे तेल का अंतरराष्ट्रीय मूल्य कितना ऊपर जाता है, यह विश्व अर्थव्यवस्था की बहाली के लिए निर्णायक होगा। रूस के खिलाफ यदि प्रतिबंध जारी रहा और पश्चिम एशिया से तेल आपूर्ति बाधित हुई तो जापान और यूरोप के देशों की अर्थव्यवस्था कमर टूट सकती है। भारत के लिए राहत की बात यह है कि रूस एक विश्वसनीय ऊर्जा प्रदाता देश है, जो आड़े समय में उसके काम आएगा।
Date: 03-10-24
न्याय का बुलडोजरसंपादकीय
आपराधिक मामलों के अभियुक्त या दोषी की संपत्ति पर बुलडोजर नहीं चलाया जा सकता, सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुरक्षित रखते हुए यह टिप्पणी की। अदालत ने यह भी कहा कि यदि सार्वजनिक जगहों पर अतिक्रमण किया गया है तो सार्वजनिक सुरक्षा के मद्देनजर इन अवैध निर्माणों पर कार्रवाई नहीं रोकी जा सकती। भले ही ये अवैध निर्माण कोई मंदिर हो या मजार। पीठ ने इससे पहले बुलडोजर कार्रवाई पर अंतरिम रोक लगा दी थी जिसमें अदालत ने कहा था निर्माण गिराने की कोई भी प्रक्रिया संविधान के मूल्यों के खिलाफ है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यदि दो अवैध निर्माण हैं परंतु कार्रवाई एक के खिलाफ की जा रही हैं तो इस पर सवाल उठना लाजिमी है, इस समस्या का हम समाधान निकालेंगे। उप्र, मप्र और राजस्थान सरकारों द्वारा बुलडोजर से गिराई जा रही निजी संपत्ति के खिलाफ विभिन्न याचिकाओं पर यह बात सबसे बड़ी अदालत ने कही। अदालत ने 4.45 लाख संरचनाएं गिराने की बात भी की। बुलडोजर चलाकर संपत्ति गिराने से पहले निष्पक्ष सुनवाई होनी जरूरी है। दूसरे, यह किसी से छिपा नहीं है कि अवैध निर्माण म्यूनिसिपल कानूनों को लागू करने में राज्य सरकारों और स्थानीय प्रशासन की ढिलाई का नतीजा होते हैं। अमूमन सार्वजनिक या सरकारी भूमि पर होने वाले कब्जों के लिए यही दोषी होते हैं। राजनीति करने और वोट बैंक बढ़ाने के लिए जानते-बूझते नाक के नीचे अवैध निर्माण कराए जाते हैं। इनमें भू-माफिया की भी मिली भगत देखी जाती है। सड़क, फुटपाथ, पार्कों और अन्य खाली सार्वजनिक स्थलों पर बनी अवैध संरचनाओं द्वारा कब्जा करने वालों की अदालत भी मदद नहीं करेगी। मगर ये कब्जे होने से पूर्व ही स्थानीय प्रशासन को चेतना होगा । अपराधियों या दोषियों के परिजनों की संपत्ति को ढहाना भी सरकारों द्वारा की जाने वाली कार्रवाई को वैध नहीं ठहराया जा सकता। सजा मुकरर्र करना अदालत का जिम्मा है। सरकारों को अपराध रोकने के प्रयास और आपराधिक या उदंडतापूर्वक काम करने वालों पर सख्ती करना चाहिए। अपराधियों को प्रश्रय देने वाली राजनीति पर भी लगाम लगाए जाने की जरूरत है। नियम-कानून देश के हर नागरिक के लिए बराबर हैं, जिन्हें पाबंदी से लागू कराना सरकारी महकमों का काम है। बुलडोजरों को न्याय का तराजू नहीं बनाया जा सकता।
Date: 03-10-24
महायुद्ध का खतरासंपादकीय
ईरान द्वारा इजरायल को सीधे निशाना बनाने से महायुद्ध जैसे हालात बनना पूरी दुनिया के लिए चिंताजनक और दुखद है। तनाव चरम पर है, क्योंकि इजरायल किसी भी वक्त ईरान पर जवाबी वार कर सकता है। दरअसल, लगभग एक साल से ईरान प्रत्यक्ष रूप से संयम दिखा रहा था। हिज्बुल्लाह जैसे आतंकी संगठनों को हर तरह की मदद देकर खुद को सीधे युद्ध में उतरने से बचा रहा था, पर मंगलवार को एक साथ 180 मिसाइलें दागकर इजरायल को उसने साफ संकेत दे दिया है कि वह अब चुप नहीं बैठेगा। खासकर, नसरल्लाह की मौत के बाद ईरान पर जंग में कूदने का भारी दबाव था। इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने भी साफ कह दिया है कि ईरान को इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी। इजरायल के साथ समस्या यह है कि वह बदले की मानसिकता में फंसा हुआ है और किसी भी नसीहत पर कान नहीं दे रहा है। संयुक्त राष्ट्र के महासचिव को भी वह रत्ती भर भाव देने को तैयार नहीं है। अमेरिका से मिल रहा समर्थन उसके लिए पर्याप्त है। ऐसे में, एक महायुद्ध दहलीज पर दस्तक देने लगा है।
आज एक बड़ा सवाल है कि क्या इजरायल, ईरान जैसे देश महायुद्ध चाहते हैं? दरअसल, हर देश दुनिया में आम जनमानस को लेकर सजग है। संसार के ज्यादातर लोग महायुद्ध नहीं चाहते, इसलिए बड़ी आक्रामकता दिखाने के बावजूद देश अपना बचाव भी कर रहे हैं। ईरान की ही अगर बात सुनें, तो उसने यही कहा है कि उसका हमला पूरी तरह रक्षात्मक था और वह लेबनान में इजरायल द्वारा की गई हत्याओं व हमलों का जवाब देना चाहता था। ईरान यह मानता है कि उसने 180 मिसाइलें दागकर हिसाब बराबर किया है और उसकी ओर से हमला समाप्त है, जब तक कि इजरायल उसे फिर उकसाता नहीं है। जाहिर है, इजरायल ने फिर वार किया, तो यकीन मानिए, दुनिया महायुद्ध की ओर बढ़ चलेगी। यहां परमाणु जनित खतरे की आशंका की चर्चा न हो, तो बेहतर है। आज दुनिया ऐसी स्थिति में नहीं है कि महायुद्ध झेल सके। यह किसी भी प्रकार के हमलावरों की पीठ थपथपाने के बजाय शांति दूतों को आगे करने का समय है। संयुक्त राष्ट्र की सक्रियता जरूरी है, ताकि दुनिया युद्ध की वास्तविकता से परिचित हो सके। आज दोनों ओर ऐसे देश हैं, जो सूचनाओं को छिपा सकते हैं। वार करने वाला देश अलग आंकड़े देगा और वार झेलने वाला देश न्यूनतम क्षति दर्शाएगा। शायद, हम एक ऐसे दौर के गवाह बनेंगे, जब सही सूचनाओं पर पहरे होंगे। यह दुनिया के लिए ज्यादा खतरनाक स्थिति होगी।
युद्ध पर कहीं तो लगाम लगे। गाजा से लेकर कीव तक युद्धों के चलते रोज सैकड़ों लोग मारे जा रहे हैं। इजरायल ने मंगलवार को भी लेबनान पर हमले जारी रखे, जिसमें 55 लोगों की मौत हो गई। किसी तरह से इजरायल को अमन बहाली के लिए तैयार करना होगा और दूसरी ओर, अरब मुल्कों को किसी भी तरह के आतंकी संगठन के बचाव से बाज आने के लिए पाबंद करना होगा। यह गौर करना जरूरी है कि मुट्ठी भर आतंकियों वाले हमास और हिजबुल्लाह की कारस्तानियों ने दुनिया को कहां पहुंचा दिया है। ईमानदारी से सोचना होगा, इजरायल का दुनिया में सकारात्मक योगदान भी है, पर उसकी आक्रामकता निर्ममता की हदें पार न करे, यह सुनिश्चित करना आज समय की सबसे बड़ी मांग है। महायुद्ध रोकने के लिए भारत के साथ चीन को भी जरूर आगे आना चाहिए, तो बात जल्दी सुनी जाएगी।
Date: 03-10-24
पश्चिम एशिया में बदले की बेरहम बयारविवेक काटजू, ( पूर्व राजनयिक )
मंगलवार की देर शाम ईरान का इजरायल पर मिसाइल हमला करना कई आशंकाओं को आधार दे रहा है। इजरायल ने बेशक ईरान की ज्यादातर मिसाइलों को अपने मित्र देशों की मदद से हवा में ही नष्ट कर दिया, जिसके कारण उसे ज्यादा नुकसान नहीं हुआ, लेकिन उसमें दहशत तो फैली ही। यही कारण है कि इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने तत्काल इस हमले का बदला लेने का एलान कर दिया। ईरान का कहना है कि उसने यह कदम हमास नेता इस्माइल हानिये और हिजबुल्लाह प्रमुख नसरल्लाह की मौत का बदला लेने के लिए उठाया है और अब अगर इजरायल की तरफ से कोई सैन्य कार्रवाई होती है, तो जंग भड़केगी।
यहां दो घटनाओं का जिक्र आवश्यक है। पहली, अप्रैल, 2024 में ईरान ने ड्रोन व मिसाइलों द्वारा इजरायल पर हमला बोला था और उस वक्त भी उसे नुकसान ज्यादा नहीं हुआ, क्योंकि इजरायल ने उनको मार गिराया था। ईरान का कहना था, यह हमला उसने सीरिया में ईरानी दूतावास पर हमले के बदले में किया था, जिसमें 15 से अधिक ईरानी कर्मचारियों की मौत हुई थी। दूसरी घटना, जनवरी 2020 की है, जब अमेरिका ने इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड के प्रमुख जनरल कासिम सुलेमानी की हत्या कर दी थी। जवाबी कार्रवाई करते हुए ईरान ने मिसाइलों के जरिये इराक में मौजूद अमेरिकी सैन्य अड्डों पर हमला बोला था, जिसके बाद मामला शांत हो गया था। तब बेशक तनाव के बादल छंट गए थे, लेकिन इस वक्त क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय तस्वीर बदली हुई है।
एक बड़ा बदलाव तो यही है कि इजरायली प्रधानमंत्री अब आक्रामक नीति अपना रहे हैं। इसकी वजह यही है कि उन पर पिछले कई महीनों से घरेलू राजनीति का दबाव तो है ही, गाजापट्टी पर हमले के बाद, जिसमें 40 हजार से अधिक फलस्तीनी मारे जा चुके हैं, उन पर अंतरराष्ट्रीय दबाव भी काफी अधिक बढ़ गया है। उन्होंने घोषणा की है कि ईरान के दोनों छद्म गुट- हमास और हिजबुल्लाह का सफाया होकर ही रहेगा। हिजबुल्लाह के खिलाफ तो कई हफ्तों से इजरायल का आक्रमण जारी है। पहले पेजर-वॉकीटॉकी विस्फोट से इजरायली खुफिया एजेंसियों ने हिजबुल्लाह के संचार तंत्र को ध्वस्त किया और फिर नसरल्लाह के साथ-साथ कई हिजबुल्लाह नेताओं को मौत के घाट उतार दिया। लगता यही है कि नेतन्याहू की महत्वाकांक्षा अब हमास या हिजबुल्लाह तक ही सीमित नहीं रह गई है। 1 अक्तूबर के अपने टीवी संदेश में उन्होंने ईरान की जनता को उनके सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई के खिलाफ उकसाया और अपील की कि वे अयातुल्ला सरकार को पलटकर एक नई सरकार बनाएं और आधुनिक ईरान की बुनियाद रखें। उल्लेखनीय है कि ईरान में एक तबका है, जो अयातुल्ला सरकार से संतुष्ट नहीं है और ईरान का आधुनिकीकरण चाहता है। हालांकि, ऐसा कोई सुबूत भी नहीं है कि ईरान किसी क्रांति के लिए तैयार है।
बहरहाल, सवाल यही है कि अब आगे क्या होगा? संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद इस पर चिंतन करेगी ही और यह अनुमान स्वाभाविक है कि वह इजरायल और ईरान, दोनों से शांति की अपील करेगी। सच यह भी है कि दुनिया की महाशक्तियां महायुद्ध नहीं चाहतीं। अमेरिका राष्ट्रपति चुनाव में उलझा हुआ है और रूस फिलहाल यूक्रेन मोर्चा पर ही सिमटे रहना चाहता है। रही बात चीन की, तो वह अपनी आर्थिक स्थिति सुधारने में लगा है। अरब देशों, विशेषकर खाड़ी के मुल्कों की तरफ से भी कोई आक्रामक बयान नहीं आया है और लगता यही है कि वे भी जंग के पक्ष में नहीं हैं। भारत भी शांति ही चाहता है और चंद दिनों पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नेतन्याहू से बात करके यही संदेश दिया था कि बातचीत की मेज पर समस्याओं का हल निकालना चाहिए। यानी, अब फैसला नेतन्याहू को लेना है। हमें यह भी देखना होगा कि उन पर घरेलू राजनीति का दबाव कितना बढ़ता है।
वैसे, ईरान के पास भी कई रास्ते हैं स्थिति को भड़काने के। वह इजरायल पर ही निशाना नहीं लगाए। हो सकता है कि पश्चिम के देशों को दबाव में लाने के लिए खाड़ी के पश्चिमी हिस्से में भी वह कार्रवाई करे, जिसकी वजह से तेल के बाजार पर असर पड़ेगा। यदि ऐसा हुआ, तो उसका सीधा असर विश्व की आर्थिक व्यवस्था पर पड़ेगा, जो कोई नहीं चाहेगा।
यहां यह भी याद रखना चाहिए कि 7 अक्तूबर को इजरायल पर हमास के हमले की बरसी है। पिछले साल इसी दिन हमास के लड़ाकों ने इजरायल में दाखिल होकर 1,200 इजरायलियों को मौत के घाट उतार दिया था और कई विदेशी नागरिकों सहित 250 लोगों को बंधक बना लिया था। अनुमान है कि 100 के करीब बंधक अब भी हमास के कब्जे में हैं और अमेरिका, कतर व मिस्र पूरी कोशिश में हैं कि हमास और इजरायल के बीच कोई समझौता हो जाए, लेकिन ऐसा अब तक नहीं हो सका है। जाहिर है, 7 अक्तूबर की तारीख जैसे-जैसे निकट आती जाएगी, इजरायल के घाव वैसे-वैसे हरे होते जाएंगे। यह भी स्वाभाविक है कि गाजापट्टी के लोगों में, जिनमें से 40 हजार की मौत बीते एक साल में इजरायली जवाबी प्रतिक्रिया में हुई है, आक्रोश बढ़ेगा। दुनिया के उस बड़े तबके में भी बहस तेज होगी, जो यह मानते हैं कि इजरायल की जवाबी कार्रवाई बिल्कुल असंगत थी।
जब भावनाएं भड़कती हैं, तो शांति के रास्ते धुंधले पड़ जाते हैं। विश्व की बड़ी शक्तियों की शांति की कोशिशों में बाधाएं तो आएंगी, लेकिन यह कयास गलत नहीं है कि अपनी विवशताओं के कारण वे हरसंभव कोशिश करेंगी कि इजरायल और ईरान, दोनों के हाथ रोके जाएं। इससे पश्चिम एशिया की स्थिति में दूरगामी बदलाव तो नहीं होगा, लेकिन जो मौजूदा संकट है, वह शायद टल सकता है। वैसे, यहां यह शायद शब्द ही अभी सबसे अधिक मौजूं है, क्योंकि अभी परिस्थिति ऐसी है कि कोई भी ठीक-ठीक नहीं कह सकता कि हालात किधर का रुख लेंगे? भारत के लिए भी पश्चिम एशिया में शांति बहुत जरूरी है। खाड़ी के देशों में लाखों भारतीय रहते है और उनसे हमारे आर्थिक व सामरिक हित जुड़े हुए हैं। ऐसे में, विदेश नीति की पुकार यही है कि हम सभी देशों के साथ बातचीत के रास्ते खुले रखें, इजरायल, ईरान और खाड़ी देशों के साथ भी।
Date: 03-10-24
वक्फ प्रबंधन का काम राज्यों के जिम्मे छोड़ दिया जाएताहिर मेहमूद, ( पूर्व अध्यक्ष रा. अल्पसंख्यक आयोग )
केंद्र सरकार और मुस्लिम समुदाय के बीच कलह की ताजा वजह इस साल अगस्त में संसद में पेश दो वक्फ (संशोधन) विधेयक हैं। उनके घोषित और कथित मकसद की सत्यता का आकलन देश में वक्फ प्रबंधन के इतिहास को ध्यान में रखते हुए ही किया जाना है। वक्फ, एक अरबी इजहार है, जो मजहबी और धर्मार्थ मकसदों से दान की गई संपत्ति को दर्शाता है। यह उपहार, दान या वसीयत से हासिल होता है। इस मायने में मस्जिद, दरगाह और कब्रिस्तान भी वक्फ हैं।
भारत में तीर्थ प्रबंधन का कानूनी नियमन ब्रिटिश हुकूमत के दौरान धर्मार्थ और धार्मिक ट्रस्ट अधिनियम 1920 के साथ शुरू हुआ था, जो सभी समुदायों पर लागू हुआ। तीन साल बाद इस क्षेत्र में पहला समुदाय विशेष कानून आया- मुसलमान वक्फ अधिनियम 1923। भारत सरकार अधिनियम 1935 ने धार्मिक व धर्मार्थ बंदोबस्ती को केंद्रीय व प्रांतीय विधायिकाओं के समवर्ती क्षेत्राधिकार में रखा। इसके बाद बंगाल, बिहार, उत्तर प्रदेश और दिल्ली में स्थानीय वक्फ अधिनियम बनाए गए। स्वतंत्रता के बाद, भारत के संविधान ने धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती को एक साथ केंद्र व राज्य विधानमंडलों के हाथों में सौंप दिया। हालांकि, संसद ने हिंदू मंदिरों के प्रबंधन को विनियमित करने के लिए कभी भी कोई केंद्रीय कानून नहीं बनाया और इसे पूरी तरह से राज्यों पर छोड़ दिया। इस विषय पर स्थानीय कानूनों का अधिनियमन बिहार हिंदू धार्मिक ट्रस्ट अधिनियम और मद्रास हिंदू धार्मिक और धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम के साथ शुरू हुआ, जो 1950-51 के दौरान लागू किया गया। अब अधिकांश राज्यों में ऐसे ही कानून हैं। प्रमुख मंदिरों के प्रबंधन के लिए कुछ राज्यों में विशेष कानून भी लागू हैं। ओडिशा में जगन्नाथ मंदिर, वाराणसी में काशी विश्वनाथ, तिरुपति में श्री वेंकटेश्वर मंदिर और जम्मू-कश्मीर में माता वैष्णोदेवी जैसे प्रमुख मंदिरों के विशेष कानून लागू हैं।
मुस्लिम समुदाय के लिए संसद ने 1954 में एक सामान्य वक्फ अधिनियम बनाया था और 1955 में देश के सबसे बड़े मुस्लिम धर्मस्थल- अजमेर में ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह के प्रबंधन के लिए खास कानून बनाया। साल 1984 में वक्फ कानून में संशोधन हुआ और 1995 में भी संसद ने नया व्यापक वक्फ कानून बनाया। फिर 2013 में वक्फ अधिनियम 1995 में बड़े पैमाने पर संशोधन किए गए। कानून में भारी बदलाव के अलावा वक्फ शब्द की वर्तनी को बदल दिया गया, जो गैर-जरूरी था और इससे भयानक भ्रम पैदा हुआ। वक्फ संबंधी कानून में साल 2014 और 2019 में भी बदलाव हुए। कुल मिलाकर, वक्फ प्रबंधन से जुड़े भारतीय कानून दयनीय हालत में हैं। इसके चलते भी न्यायालयों में विवादों का अंबार है।
बहरहाल, आज यह दावा करना कि किसी समुदाय के धार्मिक स्थलों के प्रबंधन में कोई भ्रष्टाचार नहीं है, हकीकत से आंखें मूंदने जैसा है। वक्फ के अधिकार व संसाधनों का दुरुपयोग हुआ है। ऐसे में, राज्य मूकदर्शक बनकर नहीं बैठा रह सकता। किसी भी समुदाय की यह धारणा कि उसके धार्मिक स्थलों को भारत के संविधान के तहत स्वतंत्रता, सुरक्षा प्राप्त है, पूरी तरह निराधार है, क्योंकि यह स्वतंत्रता बिना शर्त नहीं है। नागरिकों का धार्मिक स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार राज्य को किसी भी आर्थिक नियमन या प्रतिबंध के लिए कानून बनाने से नहीं रोकता है।
पिछले कुछ वर्षों में 1995 के वक्फ अधिनियम में संशोधन करने या उसे निरस्त करने के लिए कदम उठाए गए हैं और इसी मकसद से केंद्र सरकार दो नए विधेयक लेकर आई है। पहले का मकसद 1923 के पुराने मुसलमान वक्फ अधिनियम को निरस्त करना है। यह कार्रवाई स्वागत-योग्य है। दूसरा, विधेयक 1995 के वक्फ अधिनियम के 2014 संस्करण में भारी बदलाव से जुड़ा है। अब अनेक मुस्लिम नेता कई बदलावों का विरोध कर रहे हैं। चूंकि पूरे भारत में बहुसंख्यक समुदाय के धार्मिक स्थलों का प्रबंधन अभी भी राज्य कानूनों द्वारा ही किया जा रहा है, इसलिए वक्फ के लिए भी ऐसा ही तरीका आजमाना सबसे न्यायसंगत होगा।
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‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 03 सितंबर, 2024
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Date: 01-10-24
How India Can Escape The Middle-Income TrapThe key lies in a change in the economic mindset. We need to respect wealth creators. This applies to agriculture too, where the status quo only benefits a fewKV Kamath, [ The writer is chairman of the National Bank for Financing Infrastructure and Development (NaBFID) and former CEO of ICICI Bank ]
In 1999, when ICICI was designing its retail strategy, we picked two youngsters fresh out of campus to work on this task. One of them was a lad from IIM-C, Krishnamurthy Subramanian. It is gratifying to see the youngster become a professor, assume the mantle of India’s chief economic adviser during a difficult period for the global economy, and pen the optimism that I have passionately felt about the Indian economy in his new book India@100.
The retail strategy that we conceptualised then at ICICI helped spur the growth of India’s consumer class, which now contributes about 60% of our GDP. The Indian economy has now charted new territory, especially during the pandemic, by outperforming all the advanced economies with consistent growth over 7% and strong macro-fundamentals. The optimism that such outperformance has generated leads me to dream about the strength of our economy in our centennial year. A $55tn economy in 2047 is eminently possible.
Subramanian postulates a new growth construct for the nation. For the first time, we see an economist breaking free from the mould and mindset of 19th-century economic theory, boldly envisaging a Viksit Bharat or developed India by India’s centennial year with GDP per capita equalling $40,000.
Persuasively laying out his underlying theme, Subramanian argues that India needs to break free from the pessimistic shackles of the past and set bold targets, underpinned by sound thinking. The inspiration for India’s optimism stems from case studies of growth from the last 50 years, showcasing rapid transformations in economies like Japan, China, and South Korea.
For instance, Japan’s economy grew from $215bn to $5.15tn between 1970 and 1995. During this period, inflation declined from about 8% to around 1%, and interest rates saw a similar decline. The exchange rate strengthened from approximately 350 Yen to 85 Yen per dollar. Japan also became the innovation hub of the world. China’s growth trajectory demonstrates a similar trend. Rapid growth to India becoming a developed economy by 2047 is indeed possible if we discard pessimism.
So, how do we achieve a $55tn economy by 2047? Subramanian argues that an 8% long-term growth rate is feasible. Coupled with 5% inflation and 0.5% currency depreciation, which itself stems from lower inflation leading to lower depreciation of the currency, this results in an overall GDP growth rate of 12.5% (=8+5-0.5) in US dollars. According to the rule of 72, this implies that GDP would double approximately every six years over the 24-year period from 2023 to 2047. The doubling every six years would enable GDP to grow about 16 times from $3.28tn in 2023 to $55tn in 2047. This is eminently doable.
India’s growth can be not only high but also inclusive if we base it on four pillars that will shape Atmanirbhar Bharat at 100. These pillars are macro-economic focus on growth, social and economic inclusion to build a large middle class, ethical wealth creation by the private sector, a virtuous cycle ignited by private investment. As high growth has sharply reduced poverty, our macro-economic focus must be on implementing policies to generate high growth. Social and economic inclusion through high-quality jobs enables the benefits of high growth to spread far and wide, thereby generating the necessary democratic support for salutary economic policies.
The emphasis on markets and ethical wealth creation as the third pillar captures the refreshing change in economic mindset towards respecting wealth creators for the telling contribution they make. Finally, as the experience of every country that has registered high growth demonstrates, private investment is the engine that can drive a virtuous cycle.
In this path to Viksit Bharat, India can certainly avoid the middle-income trap. For this purpose, Subramanian emphasises the need to gradually eliminate subsidies and protectionism, drive manufacturing and exports, and implement reforms to ease economic activity. He calls for an agrarian renaissance by highlighting that the status quo only benefits a few. Therefore, agri reform must create the coalition of small farmers as the labharthis, or key beneficiaries, of reform.
The digital bridges that have been established can be built further by leveraging the digital public infra that has transformed the country. Over the next 24 years, India must become an innovation hub, driven by private investment and a virtuous investment cycle. Given the progress made in recent years, India benefits from clean and strong balance sheets in both the corporate and banking sectors, along with strong cash flows.
India@100 persuasively outlines the path forward to a Viksit Bharat in refreshing detail. By pursuing this path, India can certainly rub shoulders with the top economy in the world in 2047. This once-in-centuries opportunity thus heralds India’s Amrit Kaal.
Date: 01-10-24
Dignity in Death ’Cos Life is PreciousET Editorials
GoI issuing draft guidelines for assisted withdrawal of life support for terminally-ill patients for public consultation is a welcome move. For a patient and his or her loved ones, the decision to cease treatment to allay suffering when all other avenues are considered closed is a difficult one. Doctors have always let patients and their families know when treatment is futile even before the latest draft guidelines were drawn up. Such medical advice can feel arbitrary, encouraging family members to seek out second or third opinions and alternatives. So, the decision on if and when to ‘pull the plug’ needs to be taken when medical care becomes futile, something for the medical practitioner to decide and for him and her to share with patient/family for them to take a call.
Safeguards that this ‘bridge of communication’ is authentic must be in place. The proposed two-panel system creates a double-checking mechanism. It creates accountability for doctors and hospitals when they inform a patient and their family that there is nothing more that medicine can do for them. The guidelines give the patient/family/ legal guardian the legal space to make an informed choice.
The draft’s reference to economic burden, and statements on better use of medical resources, create a sense of unease. Safeguards must be built in to ensure that hospitals do not use it as a loophole to provide unnecessary extended treatment to those who can pay. Hope must not be abused. Alongside, a system of long-term care facilities should be set up for those who do not wish to terminate life-sustaining treatments even as mala fide parties may encourage assisted death for the wrong reasons. Life is precious. Which makes it more important that there is dignity in death.
Date: 01-10-24
Steady but slowIndia’s space programme needs more resources to realise its full potentialEditorial
In July, NASA cancelled its Volatiles Investigating Polar Exploration Rover (VIPER) mission to the moon after the development was beset by delays and costs had ballooned. By this time its engineers had fully assembled it and completed some tests, but NASA held its ground. The sudden decision dismayed scientists. VIPER was designed to map the distribution of water-ice in the moon’s south pole region and the soils in which it occurred, over three months. In all, the golf-cart-sized rover was to be launched by a SpaceX Falcon Heavy rocket and deployed using Astrobotic’s ‘Griffin’ lander, all managed through NASA’s Commercial Lunar Payload Services programme. Landing on the moon is an expensive, time-consuming exercise. NASA’s decision to cancel VIPER at this late stage thus drew the attention of the U.S. House Committee on Science, Space, and Technology and of the wider international community, which sees in VIPER’s absence an opportunity for China’s increasingly complex lunar programme to lead the way. The world’s rush back to the moon offers potentially significant commercial and geopolitical gains. VIPER was expected to be a pivotal component of the US-led ‘lunar axis’ defined by the Artemis Accords, which counts India among its leaders. Yet, India missed a trick when, on September 18, the Union Cabinet approved a proposal by the Indian Space Research Organisation (ISRO) to begin the second phase of the country’s lunar programme with Chandrayaan-4, a sample-return mission.
Moments after the Chandrayaan-3 lander descended on the moon’s surface on August 23, 2023, reports erupted to claim India had yet again admitted itself into a small, elite group of countries that have achieved an autonomous lunar soft-landing. But such proclamations overlook the considerable gaps between these countries’ space agencies from an operations perspective. One pertinent difference is that ISRO is unable to execute multiple flagship missions in parallel. Instead, it follows a ‘one major mission at a time’ cadence that, in exchange for maximising resource use efficiency, leaves the organisation incapable of manoeuvring rapidly to respond to new opportunities. Had it been able, ISRO could have sought the Cabinet’s approval for the ‘Lunar Polar Explorer’ mission it is planning with its Japanese counterpart, to land a rover on the moon to perform many of the crucial tasks VIPER was expected to, especially prospecting for large water-ice deposits. Even now, the VIPER incident should remind the Centre that despite an expanding allocation and new funding modes in the offing, the Indian space programme needs more resources to realise its full potential.
Date: 01-10-24
साइबर ठगी का सिलसिलासंपादकीय
सीबीआइ ने विदेशी नागरिकों और विशेष रूप से अमेरिकी नागरिकों के साथ साइबर ठगी करने वालों का भंडाफोड़ करके 26 लोगों की जो गिरफ्तारी की, वह यही बताती है कि भारत में साइबर ठग किस बड़े पैमाने पर सक्रिय हैं। ऑपरेशन चक्र के तहत सीबीआई ने साइबर ठगों के खिलाफ 32 शहरों में छापेमारी की। इनमें से चार शहरों-पुणे, हैदराबाद अहमदाबाद और विशाखापत्तनम में साइबर ठग लोगों को ठगने के लिए चार अवैध कॉल सेंटर चला रहे थे। ऐसे कॉल सेंटर पहली बार उजागर नहीं हुए। इसके पहले भी कई शहरों और विशेष रूप से दिल्ली-एनसीआर में ऐसे ही कॉल सेंटर चलते पाए गए हैं। इनमें से कुछ विदेशी नागरिकों को ठगते थे तो कुछ भारतीय नागरिकों को। कोई नहीं जानता कि पुलिस और अन्य एजेंसियों की आंखों में धूल झोंककर देश के विभिन्न शहरों में कितने अवैध कॉल सेंटर अभी भी लोगों के साथ ठगी करने में लगे होंगे। अपने देश में मोबाइल फोन के जरिये लोगों को ठगने वाले न जाने कितने गिरोह जगह-जगह सक्रिय हैं। पहले वे देश के कुछ ही हिस्सों में सक्रिय थे, लेकिन अब उनकी सक्रियता हर कहीं देखी जा सकती है। साइबर ठग कभी लोगों को लालच देकर ठगते हैं, कभी धमकाकर और कभी झूठी एवं भरमाने वाली सूचनाएं देकर। पिछले कुछ समय से तो वे नकली बैंक, पुलिस, सीबीआई और कस्टम अधिकारी बनकर भी लोगों को ठगने का काम कर रहे हैं। यह किसी से छिपा नहीं कि लोगों को डिजिटल अरेस्ट कर ठगने के मामले थमने का नाम नहीं ले रहे हैं।
निःसंदेह लोग अज्ञानता और जानकारी के अभाव में भी ठगी का शिकार हो रहे हैं, लेकिन एक कारण यह भी है कि साइबर ठग बेलगाम और दुस्साहसी हो गए हैं। कभी-कभी तो ऐसा लगता है कि उन्हें पुलिस और सुरक्षा एजेंसियों का कहीं कोई भय ही नहीं। जैसे-जैसे मोबाइल का उपयोग बढ़ता जा रहा है और ऑनलाइन लेन-देन और खरीदारी का चलन बढ़ रहा है, वैसे-वैसे साइबर ठगों को अपनी गतिविधियां बढ़ाने के मौके मिल रहे हैं। समस्या केवल यह नहीं कि साइबर ठगी के खिलाफ पर्याप्त नियम-कानून नहीं। समस्या यह भी है कि पुलिस और अन्य एजेंसियां साइबर ठगों के दुस्साहस का दमन कर पाने में नाकाम हैं। कई बार तो वे ठगों का पता भी नहीं लगा पातीं। इस कारण ठगी के शिकार तमाम लोगों का पैसा उन्हें वापस नहीं मिल पाता। साइबर ठगी पर इसलिए भी नियंत्रण नहीं लग पा रहा है, क्योंकि साइबर ठग फर्जी नाम से सिम लेने में सफल रहते हैं। समझना कठिन है कि ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं की जा पा रही, जिससे कोई फर्जी नाम से सिम न लेने पाए। निश्चित रूप से यह भी चिंता का विषय है कि पाकिस्तानी नंबरों से वाट्सएप कॉल करके लोगों को ठगा जा रहा है। यह ठीक नहीं कि डिजिटल होते भारत में साइबर ठग बेलगाम होते जाएं।
Date: 01-10-24
शोध और नवाचार है उन्नति का आधारडॉ. जयंतीलाल भंडारी, ( लेखक एक्रोपोलिस इंस्टीट्यूट आफ मैनेजमेंट स्टडीज एंड रिसर्च, इंदौर के निदेशक हैं )
विश्व बौद्धिक संपदा संगठन (डब्ल्यूआइपीओ) द्वारा प्रकाशित ग्लोबल इनोवेशन इंडेक्स (जीआइआइ) की 133 अर्थव्यवस्थाओं की हालिया रैंकिंग में भारत ने 39वां स्थान हासिल किया है। यह कोई छोटी बात नहीं है, क्योंकि इस रैंकिंग में 2015 में भारत 81वें स्थान पर था। जीआइआइ रैंकिंग में भारत की प्रगति दुनिया भर में रेखांकित हो रही है। इस ऊंची रैंकिंग को प्रधानमंत्री मोदी ने देश के वाइब्रेंट इनोवेटिव इकोसिस्टम की उपलब्धि बताया है। इस रैंकिंग में भारत निम्न-मध्यम आय वाली अर्थव्यवस्थाओं के साथ ही मध्य और दक्षिण एशियाई देशों में पहले स्थान पर रहा जबकि विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी क्लस्टर रैंकिंग में चौथे स्थान पर है। भारत के प्रमुख शहर मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरु और चेन्नई दुनिया के शीर्ष 100 विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी क्लस्टरों में सूचीबद्ध हैं।
रैंकिंग के अनुसार स्विट्जरलैंड, स्वीडन, अमेरिका, सिंगापुर और यूके दुनिया की सबसे अधिक नवोन्मेषी अर्थव्यवस्थाएं हैं, जबकि चीन, तुर्किये, भारत, वियतनाम और फिलीपींस पिछले एक दशक में सबसे तेजी से ऊपर उठने वाले देश हैं। यदि हम बौद्धिक संपदा, शोध एवं नवाचार से जुड़े अन्य वैश्विक संगठनों की रिपोर्ट भी देखें तो भारत इस क्षेत्र में लगातार आगे बढ़ रहा है। यूएस चैंबर्स आफ कामर्स के ग्लोबल इनोवेशन पालिसी सेंटर द्वारा जारी वैश्विक बौद्धिक संपदा यानी आइपी सूचकांक 2024 में भारत दुनिया की 55 प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में 42वें स्थान पर है। अब यह और अच्छे से स्पष्ट है कि शोध एवं नवाचार तथा बौद्धिक संपदा की दुनिया में भारत की रैंकिंग यह दर्शा रही है कि भारत इनोवेशन का हब बनता जा रहा है। भारत में शोध एवं नवाचार को बढ़ाने में डिजिटल ढांचे की अहम भूमिका है। भारत आइटी सेवा निर्यात और वेंचर कैपिटल हासिल करने में लगातार आगे बढ़ रहा है। विज्ञान और इंजीनियरिंग ग्रेजुएट तैयार करने में भी भारत दुनिया में सबसे आगे है। भारत के उद्योग-कारोबार समय के साथ तेजी से आधुनिक हो रहे हैं। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान के अनुसार कृषि से संबंधित चुनौतियों के समाधान के लिए भारत ने जिस तरह विज्ञान और प्रौद्योगिकी का प्राथमिकता के आधार पर उपयोग किया, उससे भारत कृषि विकास की डगर पर तेजी से आगे बढ़ा है। अगस्त में ही भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद द्वारा जारी की गई 61 फसलों की 109 नई एवं उन्नत किस्मों से कृषि नवाचार का नया अध्याय लिखा गया है।
शोध एवं नवाचार के मद्देनजर भारत ने कारोबारी विशेषज्ञता, रचनात्मकता, राजनीतिक और संचालन से जुड़ी स्थिरता, सरकार की प्रभावशीलता जैसे क्षेत्रों में अच्छे सुधार किए हैं। इसके साथ ही घरेलू कारोबार में सुगमता और विदेशी निवेश जैसे मानकों में भी बड़ा सुधार हुआ है। इस यात्रा में अपार ज्ञान पूंजी, स्टार्टअप और यूनिकार्न, पेटेंट वृद्धि, घरेलू उद्योग विविधीकरण, हाइटेक विनिर्माण और सार्वजनिक और निजी अनुसंधान संगठनों द्वारा किए गए प्रभावी कार्यों के साथ-साथ अटल इनोवेशन मिशन ने भी अहम भूमिका निभाई है। बुनियादी ढांचा, स्वास्थ्य, कृषि, शिक्षा और रक्षा सहित विभिन्न क्षेत्रों में तेज प्रगति हो रही है। प्रधानमंत्री मोदी ने 26 सितंबर को राष्ट्रीय सुपरकंप्यूटिंग मिशन (एनएसएम) के अंतर्गत लगभग 130 करोड़ रुपये की लागत से स्वदेश में विकसित तीन परम रुद्र सुपरकंप्यूटर राष्ट्र को समर्पित किए।
सुपरकंप्यूटिंग प्रौद्योगिकी में भारत को आत्मनिर्भर बनाने की यह बड़ी पहल है। इन सुपरकंप्यूटरों को अग्रणी वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए पुणे, दिल्ली और कोलकाता में लगाया गया है। मौसम और जलवायु अनुसंधान के लिए तैयार एक उच्च प्रदर्शन कंप्यूटिंग (एचपीसी) प्रणाली का भी उद्घाटन किया गया है। इसकी अनदेखी नहीं की जानी चाहिए कि बौद्धिक संपदा, शोध एवं नवाचार के बहुआयामी लाभ होते हैं और इनके आधार पर ही उद्यमी किसी देश में निवेश संबंधी निर्णय लेते हैं। विभिन्न देशों की सरकारें भी ग्लोबल इनोवेशन इंडेक्स को ध्यान में रखकर अपने व्यापारिक रिश्तों के लिए नीति बनाने की डगर पर बढ़ती हैं।
भारत में इंटरनेट आफ थिंग्स, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और डाटा एनालिटिक्स जैसे क्षेत्रों में शोध एवं विकास और जबरदस्त स्टार्टअप माहौल के चलते अमेरिका, यूरोप और एशियाई देशों की बड़ी-बड़ी कंपनियां अपने ग्लोबल इन हाउस सेंटर (जीआईसी) तेजी से शुरू करती हुई दिखाई दे रही हैं। ग्लोबल इनोवेशन इंडेक्स के तेजी से बढ़ने से भारत में दिग्गज वैश्विक फाइनेंस और कामर्स कंपनियां पैठ बढ़ा रही हैं। बौद्धिक संपदा, शोध एवं नवाचार की अहमियत को समझते हुए सरकार भी इस क्षेत्र को प्राथमिकता दे रही है।
फिलहाल भारत में आरएंडडी पर जीडीपी का करीब 0.67 प्रतिशत ही व्यय हो रहा है, जबकि वैश्विक औसत दो प्रतिशत है। छह-सात दशक पूर्व अमेरिका ने आरएंडडी पर भारी खर्च से ही सूचना प्रौद्योगिकी, संचार, दवा, अंतरिक्ष अन्वेषण, ऊर्जा और अन्य तमाम क्षेत्रों में तेजी से आगे बढ़कर दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश बनने का अध्याय लिखा है। हमें भी उसी राह पर आगे बढ़ना होगा।
उम्मीद करें कि सरकार जीआईआई की 39वीं रैंकिंग को नई ऊंचाई पर ले जाने के लिए रणनीतिक रूप से आगे बढ़ेगी। साथ ही निजी क्षेत्र द्वारा भी देश के तेज विकास और आम आदमी के आर्थिक-सामाजिक कल्याण के मद्देनजर दुनिया के विभिन्न विकसित देशों की तरह बौद्धिक समझ, शोध एवं नवाचार पर अधिक धनराशि व्यय करने की रणनीति अपनाई जाएगी। तभी हम 2047 तक विकसित राष्ट्र बनने का लक्ष्य हासिल कर सकते हैं।
Date: 01-10-24
एआई विकास के साथ सुरक्षा का भी रखा जाए ध्यानअजय कुमार
यूरोपीय संघ (ईयू) ने वर्ष 2018 में डेटा सुरक्षा के सामान्य नियम तैयार कर सबसे पहले डेटा सुरक्षा की दिशा में कदम बढ़ाया था। उसने एआई कानून बनाते हुए एक बार फिर बड़ी पहल की है, जिसका उद्देश्य आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) के अनियंत्रित उपयोग से होने वाले नुकसान पर अंकुश लगाना है। भारत में भी तकनीक और एआई का इस्तेमाल लगातार बढ़ता जा रहा है। मगर भारत को अपना डिजिटल व्यक्तिगत डेटा सुरक्षा (डीपीडीपी) अधिनियम लागू करने में लगभग 5 वर्ष की देर हो गई। अब एआई के लिए कायदे बनाने में सुस्ती बरतने की गुंजाइश उसके पास बिल्कुल भी नहीं है।
एआई नियमन की आवश्यकता पर हो रही चर्चा बहुत सामयिक है क्योंकि अगर यह तकनीक असामाजिक तत्त्वों के हाथ लग जाए तो समाज के लिए बड़ा खतरा बन सकती है। एआई साइबर सुरक्षा में आसानी से सेंध लगा सकती है और पूरे डिजिटल तंत्र को बेकार कर सकती है। एआई लोगों की निजता का हनन कर सकती है और अनधिकृत निगरानी शुरू कर सकती है, साइबर अपराध में मददगार बन सकती है और अपने आप हमले भी शुरू करा सकती है। यह स्वचालित हथियार तक बना सकती है। एआई डीपफेक वीडियो और दुष्प्रचार के जरिये तथ्य यानी वास्तविकता और कल्पना या मनगढ़ंत बातों के बीच फर्क खत्म कर सकती है, जनमत बदल सकती है और ऐसी बातों की लत लगाकर तथा समाज में अव्यवस्था फैलाकर मानसिक स्वास्थ्य खराब कर सकती है।
एआई का एक प्रभाव है, जिसकी काफी कम चर्चा होती है मगर जो लंबे अरसे में सबसे ज्यादा नुकसानदेह हो सकता है। यह है सीखने की क्षमता पर प्रभाव। जीन रॉचलिन ने अपनी किताब ‘ट्रैप्ड इन द नेटः द अनऐन्टिसिपेटेड कॉन्सिक्वेन्सेस ऑफ कंप्यूटराइजेशन’ में कहा है वास्तविक जगत में आने वाली प्राकृतिक चुनौतियों से जूझने में आई समस्याओं से मनुष्य को सीखने में मदद मिलती है। ऑटोमेशन और प्रौद्योगिकी इन चुनौतियों को काफी कम कर देती हैं, जिससे हमारे लिए समस्याएं सुलझाना और संकट से निपटना और भी कठिन हो जाता है। वर्ष 2009 में अटलांटिक महासागर के ऊपर एयर फ्रांस की उड़ान 447 दुर्घटना का शिकार इसलिए हो गई क्योंकि विमान में लगी फ्लाई-बाई-वायर प्रणाली तूफान में फंस गई मगर अपने दिमाग और कौशल का इस्तेमाल कर विमान को तूफान से नहीं निकाल पाए क्योंकि वे ऑटोमेशन के ही अभ्यस्त थे। एआई हमें प्रौद्योगिकी पर और भी ज्यादा निर्भर बना सकती है। इससे समस्याएं सुलझाने तथा चुनौतियों के अनुरूप स्वयं को ढालने की हमारी क्षमता और भी कम हो सकती है। फिर भी तकनीकी क्षेत्र में प्रगति का स्वागत जरूर किया जाना चाहिए क्योंकि इनसे नुकसान से ज्यादा फायदे होते हैं। एआई भी इससे अलग नहीं है। अगर कायदे बनाकर इसके जोखिमों को ठीक तरीके से बांध दिया जाए तो अपार संभावनाओं के द्वार खुल जाएंगे।
भारत जैसे तेजी से विकास कर रहे देश में एआई कृषि क्षेत्र में उत्पादकता बढ़ाने, शिक्षा में सुधार करने और बड़ी आबादी के लिए स्वास्थ्य सुविधाएं बेहतर बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। एआई वृद्धि दर बढ़ाने और विकसित भारत का लक्ष्य तेजी से हासिल करने में भारत की मदद कर सकती है। एआई के जोखिम कम से कम कर उसकी क्षमता का भरपूर इस्तेमाल करने के लिए भारत को इसके विकास और इस्तेमाल में मददगार व्यवस्था तैयार करनी होगी। भारत की आबादी के एक बड़े हिस्से ने पिछले कुछ समय में डिजिटल सेवाओं का इस्तेमाल शुरू किया है मगर हो सकता है कि उनके पास विकसित अर्थव्यवस्थाओं जैसी जागरूकता और एहतियात बरतने की समझ नहीं हो। इसलिए सतर्कता बरतना और पहले से ही जरूरी उपाय करना आवश्यक है।
भारत का एआई नियामकीय ढांचा ‘3-3-3’ प्रारूप में तैयार किया जा सकता है। इसमें पहला ‘3’ तीन प्रमुख सिद्धांतों से संबंधित है। पहला परमिसिव डेवलपमेंटल ईकोसिस्टम है, जिसमें एआई तकनीक के विकास के लिए अनुकूल माहौल तैयार किया जाता है। दूसरा सिद्धांत जोखिम के हिसाब से श्रेणी बनाना है, जो एआई ऐप्लिकेशन को उनसे जुड़े नुकसान और उनके निवारण के हिसाब से श्रेणियों में बांटता है। तीसरा सिद्धांत कारगर जिम्मेदारी और देनदारी से है, जो नवाचार बढ़ाने के साथ ही प्रतिकूल प्रभाव से निपटने के लिए जवाबदेही तय करने की त्वरित एवं प्रभावी प्रणाली तैयार करता है।
परमिसिव डेवलपमेंटल ईकोसिस्टम में उचित उद्देश्यों के लिए एआई के विकास पर कम से कम पाबंदी होनी चाहिए। ऐसा माहौल तैयार किया जाना चाहिए जहां आदर्श विकास, डेटा गुणवत्ता और कौशल वृद्धि पर जोर देने वाले श्रेष्ठ कार्य व्यवहार एवं मानक स्थापित किए जा सकें। इस वर्ष शुरू ‘द इंडिया एआई मिशन’ इस दिशा में उठाया गया एक कदम है।
जोखिम के हिसाब से श्रेणी तय करना एआई ऐप्लिकेशन को जोखिमों से निपटने के लिए जरूरी है। ऐप्लिकेशन को जोखिम की तीन श्रेणियों – कम, औसत और अधिक – में रखा जा सकता है। ऐप्लिकेशन के इस्तेमाल से पहले किसी बाहरी पेशेवर से जोखिमों की समीक्षा कराई जाए ताकि इनकी श्रेणी तय हो सके। कम जोखिम वाले ऐप्लिकेशन में डेवलपर स्वयं ही घोषणा करेंगे कि उन्होंने श्रेष्ठ स्थापित मानकों का पालन किया है। औसत जोखिम वाले ऐप्लिकेशन को तैयार करने वाले (डेवलपर) और इस्तेमाल में लाने वाले (डेप्लॉयर) को नैतिकता और पारदर्शिता वाले संचालन व्यवहार अपनाना होगा। उन्हें डेटा स्रोतों से पूर्वग्रह भी खत्म करना होगा ताकि जोखिम दूर किया जा सके। इनके लिए नियम-कायदे नियामक तय करेगा और वह अनुपालन सुनिश्चित कराने के लिए तीसरे पक्ष से ऑडिट कराकर नजर भी रखेगा। अधिक जोखिम वाले ऐप्लिकेशन को नियामक द्वारा व्यापक समीक्षा के बाद ही इस्तेमाल किया जाएगा। इन पर नजर रखने की प्रणाली भी सख्त होगी। मानव जीवन, राष्ट्रीय संप्रभुता या सार्वजनिक व्यवस्था को प्रभावित करने वाले ऐप्लिकेशन सरकार की निगरानी में इस्तेमाल किए जाएंगे। इनके संचालन में मानवीय हस्तक्षेप का प्रावधान रहेगा यानी यह प्रणाली मानव एवं मशीन दोनों मिलकर संचालित करेंगे।
एआई के लिए जवाबदेही और देनदारी की व्यवस्था में डेवलपरों, डेप्लॉयरों और यूजरों की जिम्मेदारी स्पष्ट रूप से परिभाषित होनी चाहिए। डेवलपर पर यह सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी होनी चाहिए कि एआई प्रणालियां पूर्वग्रह से दूर रहेंगी, निजता बची रहे और प्रणाली की समीक्षा भी हो। एआई प्रणालियों पर नजर रखने का जिम्मा डेप्लॉयर का होगा और उन्हें संभावित जोखिम का जल्द पता लगाकर उन्हें खत्म करने की व्यवस्था भी तैयार रखनी होगी। यूजर के पता होना चाहिए कि इस्तेमाल की जा रही एआई प्रणाली की सीमाएं और संभावित दुष्षपिणाम क्या हो सकते हैं। नियामकों को सुनिश्चित करना होगा कि प्रत्येक एआई प्रणाली अपनी निर्णय लेने की प्रक्रिया का ऑडिट रिकॉर्ड संभालकर रखे ताकि जांच और फॉरेंसिक में मदद मिले और पारदर्शिता तथा जवाबदेही सुनिश्चित हो। नुकसान होने पर मुआवजे का भी प्रावधान होना चाहिए।
एआई नियमन की प्रस्तावित व्यवस्था में ऐप्लिकेशन के जोखिम पता लगाने के लिए जोखिम विश्लेषक और ऑडिट तथा जांच के लिए एआई फॉरेंसिक की जरूरत हो सकती है। इससे एआई में नए रोजगार की संभावनाएं पैदा होंगी। मगर एआई नियमन में ‘इंस्पेक्टर राज’ नहीं होना चाहिए। सरकार को सूत्रधार की भूमिका में रहते हुए नियम एवं मानक तय करने चाहिए और जोखिम विश्लेषकों और एआई फॉरेंसिक विशेषज्ञों जैसे कुशल पेशेवर तैयार करने चाहिए।
कुल मिलाकर भारत को एआई की संभावनाओं का लाभ उठाने और इससे जुड़े जोखिम कम से कम करने के लिए कारगर नियामकीय व्यवस्था तैयार करनी चाहिए। यह व्यवस्था नवाचार और वृद्धि में मददगार होनी चाहिए मगर इसे सुनिश्चित करना होगा कि एआई का इस्तेमाल जवाबदेही, नैतिकता और पारदर्शिता के साथ हो। अब समय आ गया है कि एआई के इस्तेमाल में नैतिक मूल्यों का ध्यान रखते हुए मानवता के श्रेष्ठ हितों को आगे बढ़ाया जाए।
Date: 01-10-24
ढलती सांझ में न हों उपेक्षितयोगेश कुमार गोयल
भारतीय संस्कृति में सदा से ही बड़ों के आदर-सम्मान की परम्परा रही है, लेकिन आज दुनिया के अन्य देशों सहित हमारे देश में भी वृद्धजनों पर बढ़ते अत्याचार की खबरें समाज के लिए गंभीर चिंता का विषय बन गई हैं। समृद्ध परिवार होने के बावजूद घर के बुजुर्ग वृद्धाश्रमों में जीवन-यापन करने को विवश हैं। बहुत से मामलों में बच्चे ही उन्हें बोझ मानकर वृद्धाश्रमों में छोड़ आते देते हैं। जबकि यह उम्र का ऐसा पड़ाव होता है, जब उन्हें परिजनों के अपनेपन, प्यार और सम्मान की सबसे ज्यादा जरूरत होती है।
बुजुर्गों के प्रति वैसे तो सभी के हृदय में हर पल, हर दिन सम्मान का भाव होना चाहिए, लेकिन दिल में छिपे इस सम्मान को व्यक्त करने के लिए औपचारिक तौर पर यह दिन निश्चित किया गया। 1991 में ‘अंतरराष्ट्रीय वृद्धजन दिवस’ की शुरुआत के बाद वर्ष 1999 को पहली बार ‘बुजुर्ग वषर्’ के रूप में भी मनाया गया था। इस वर्ष ‘अंतरराष्ट्रीय वृद्धजन दिवस’ ‘गरिमा के साथ वृद्धावस्था दुनियाभर में वृद्ध व्यक्तियों के लिए देखभाल और सहायता पण्रालियों को मजबूत करने का महत्व’ विषय के साथ मनाया जा रहा है। इस विषय के बारे में संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस का कहना है कि आइए, हम देखभाल और सहायता पण्रालियों को मजबूत करने के लिए प्रतिबद्ध हों, जो वृद्धजनों और देखभाल करने वालों की गरिमा का सम्मान करती हों। भारतीय समाज में सयुंक्त परिवार को हमेशा से अहमियत दी गई है, लेकिन आज के बदलते परिवेश में छोटे और एकल परिवार की चाहत में संयुक्त परिवार की अवधारणा खत्म होती जा रही है। यही कारण है कि लोग अपने बुजुगरे से दूर होते जा रहे हैं और नई पीढ़ी दादा-दादी, नाना-नानी के प्यार से वंचित होती जा रही है। एकल परिवार के बढ़ते चलन के कारण ही परिवारों में बुजुगरे की उपेक्षा होने लगी है। न चाहते हुए भी बुजुर्ग अकेले रहने को मजबूर हैं। इसका एक गंभीर परिणाम यह देखने को मिला है कि बुजुगरे के प्रति अपराध भी तेजी से बढ़े हैं। शहरों-महानगरों में आए दिन बुजुगरे को निशाना बनाए जाने की खबरें दहला देती हैं। दूसरा गंभीर परिणाम यह कि बच्चों को बड़े-बुजुगरे का सानिध्य नहीं मिलने के कारण उनके जीवन पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। एक सर्वे के अनुसार दादा-दादी या नाना-नानी के साथ रहने वाले बच्चों का विकास अकेले रहने वाले बच्चों की तुलना में कहीं ज्यादा अच्छा और मजबूत होता है और ऐसे बच्चों में आत्मविश्वास भी अधिक देखने को मिला है। आज पति-पत्नी दोनों ही कामकाजी हैं, ऐसे में बच्चे घर में अकेले रहते हैं और कम उम्र में ही उनमें अवसाद जैसी समस्याएं पनपने लगती हैं। वरिष्ठ नागरिकों के कल्याण को बढ़ावा देने के लिए भारत सरकार ने हालांकि वर्ष 1999 में एक राष्ट्रीय नीति बनाई थी तथा उससे पहले वर्ष 2007 में माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण विधेयक भी संसद में पारित किया गया था, जिसमें माता-पिता के भरण-पोषण, वृद्धाश्रमों की स्थापना, चिकित्सा सुविधा की व्यवस्था और वरिष्ठ नागरिकों के जीवन और सम्पत्ति की सुरक्षा का प्रावधान था, लेकिन इसके बावजूद देशभर में वृद्धाश्रमों में बढ़ती संख्या इस तथ्य को इंगित करती है कि भारतीय समाज में वृद्धों को उपेक्षित किया जा रहा है। कुछ समय पहले 96 देशों में कराए गए एक सर्वे के बाद ‘ग्लोबल एज वॉच इंडेक्स’ जारी किया गया था। उस सूचकांक के मुताबिक करीब 44 फीसद बुजुगरे का मानना था कि उनके साथ सार्वजनिक स्थानों पर र्दुव्यवहार किया जाता है जबकि 53 फीसद बुजुगरे का कहना था कि समाज उनके साथ भेदभाव करता है।
आर्थिक समस्या से जूझते वृद्धों के लिए लगभग सभी पश्चिमी देशों में पर्याप्त पेंशन की व्यवस्था है। भारत में भी वृद्धावस्था पेंशन की सुविधा है, मगर उनके सामने स्वास्थ्य समस्याओं के अलावा अकेलेपन की जो समस्या है, उसका इलाज नहीं है। यह अकेलापन वृद्धजनों को भीतर ही भीतर सालता रहता है। हालांकि केंद्रीय कैबिनेट द्वारा पिछले दिनों 70 वर्ष या उससे अधिक आयु के सभी वगरे के लोगों को आयुष्मान भारत योजना में शामिल करने का निर्णय लिया गया है, जिसके तहत वृद्धजनों को पांच लाख रु पए तक का मुफ्त इलाज मिलेगा। निश्चित रूप से यह कदम वृद्धजनों के लिए स्वास्थ्य सेवाओं को सुलभ बनाएगा और इससे देश में करीब साढ़े चार करोड़ परिवारों को लाभ होने की उम्मीद है। लेकिन बुजुगरे के मामले में कई बार चिंताजनक स्थिति यह होती है कि बीमारी के समय में भी सांत्वना देने वाला उनका कोई अपना उनके पास नहीं होता। हालांकि आज कुछ ऐसी संस्थाएं हैं, जो एकाकी जीवन व्यतीत कर रहे वृद्धों के लिए निस्वार्थ भाव से काम कर रही हैं, लेकिन ये संस्थाएं भी अपनों की महसूस होती कमी की भरपाई तो नहीं कर सकती। बहरहाल, वृद्धजनों को अपने परिवार में भरपूर मान-सम्मान मिले, इसके लिए सामाजिक जागरूकता जैसी पहल की सख्त दरकार है ताकि वृद्धों के प्रति परिजनों की सोच सकारात्मक होने से बुजुगरे के लिए वृद्धाश्रम जैसे स्थानों की समाज में आवश्यकता ही महसूस नहीं हो।
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प्रतिवर्ष सितंबर माह के पहले शनिवार को अंतरराष्ट्रीय गिद्ध जागरूकता दिवस मनाया जाता है। भारत में गिद्ध की कुल नौ प्रजातियाँ पाई जाती हैं। इनमें से कुछ प्रजातियाँ विलुप्ति के कगार पर पहुँच गई हैं। उनके संरक्षण के प्रयास किए जा रहे हैं।
कुछ बिंदु –
गिद्धों का महत्व –
विलुप्ति का कारण और संरक्षण –
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित भूपेंद्र यादव के लेख पर आधारित। 07 सितंबर, 2024
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Date: 30-09-24
In Pursuit Of DeathDraft guidelines advance the rights of terminally ill patients on life support. Reality is painfully behindET Editorials
While healthcare reach in India leaves a lot to be desired, there is no doubt that everyday more persons have access to life-sustaining treatments than yesterday. But this also means that everyday there are more patients on life support who are “not expected to benefit” from it. While recent years have seen courts and govt recognise such terminally ill patients’ right to die with dignity, the actual processes to access this right are so gruelling that it largely remains out of reach. The draft GOI guidelines for withdrawal of life support in terminally ill patients, released for public comment, are intended to increase access to this right. Will they?
In a recent case, both Delhi HC and the Supreme Court turned down the plea of aging parents of a patient who has been in a “permanently vegetative state” for more than a decade, to direct the constitution of a medical board to assess him for passive euthanasia. The courts’ logic was that the patient “does not appear to be on life support”. Experts have since pointed out, including on this page, that the courts’ reading of the Ryles tube, inserted into the patient’s stomach through his nose, is neither the consensus medical opinion nor the legal position in most jurisdictions around the world.
A useful clarification provided by the draft guidelines is that “parenteral nutrition” – nutrients pumped directly into a vein – is in the same category as mechanical ventilation. They also underline that the judicial officer is only to be notified – of a decision made by medical professionals in consultation with the family/surrogate and valid Advance Medical Directives. “Approval is not required.” This should help medical boards get over fears of courts. But the medical boards need to exist in the first place. Then they need to step up. Act with gravity, empathy and science.
Date: 30-09-24
एक साथ चुनाव का बेतुका विरोध,सुरेंद्र किशोर , ( लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं वरिष्ठ स्तंभकार हैं )
संविधान निर्माताओं को इस देश के मतदाताओं के विवेक पर पूरा भरोसा था। उन्हें यह अनुभूति थी कि मतदाता राष्ट्रीय हितों के साथ ही अपने राज्य के हितों का भी ध्यान रख सकते हैं। इसीलिए संविधान में ‘एक राष्ट्र और अलग-अलग चुनाव’ जैसी कोई व्यवस्था नहीं की, क्योंकि एक साथ चुनाव से उन्हें संघवाद पर कोई खतरा नजर नहीं आया। कुछ समय तक एक साथ चुनाव का सिलसिला भी सुगमता से चला, लेकिन इतिहास गवाह है कि 1971 में अलग चुनाव कराने का इंदिरा गांधी का फैसला देशहित में न होकर अपने स्वार्थ से जुड़ा था। उसमें सुधार अब समय की जरूरत है। संविधान निर्माता जानते थे कि देश के मतदातागण इतने विवेकशील हैं कि वे एक ही चुनाव के समय लोकसभा के लिए एक पार्टी और उसी चुनाव में विधानसभा के लिए दूसरी पार्टी को वोट दे सकते हैं। स्वतंत्रता सेनानी एवं पूर्व उप-प्रधानमंत्री जगजीवन राम कहा करते थे कि ‘तमाम भारतीय मतदाता भले निरक्षर हैं, पर वे बेवकूफ नहीं हैं।’
वर्ष 1957 के चुनाव में केंद्र में जहां कांग्रेस सरकार कायम रही, वहीं केरल में पहली बार गैर-कांग्रेसी कम्युनिस्ट सरकार बनी। यह सिलसिला समय के साथ और तेज हुआ। वर्ष 1967 आखिरी ऐसा अवसर था जब केंद्र और राज्यों के चुनाव एक साथ हुए थे। तब केरल सहित सात राज्यों के विधानसभा चुनावों में गैर-कांग्रेसी सरकारें बनीं, जिनमें से एक राज्य बिहार भी था। तब बिहार में लोकसभा की 53 सीटें थीं। उनमें से 34 सीटें यानी आधी से अधिक कांग्रेस को मिली थीं, मगर विधानसभा चुनाव में उसे बहुमत नहीं मिल सका। यानी बिहार की जनता ने लोकसभा के लिए तो कांग्रेस को वोट दिए, लेकिन विधानसभा चुनाव में गैर-कांग्रेसी सरकार चुनी। तब क्या किसी ने संघीय ढांचे के कमजोर होने का शोर मचाया था।
ऐसे में, यदि एक बार फिर देश में लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव साथ होने लगें तो उसमें किसी को भला क्यों परेशानी होनी चाहिए, क्योंकि 1967 के बाद तो देश में साक्षरता से लेकर संचार के साधनों का काफी विस्तार हुआ है। लोगों में जागरूकता बढ़ी है। आज राजग विरोधी दल और उनके नेता यह आरोप लगा रहे हैं कि एक साथ चुनाव कराने पर केंद्र में सत्तासीन राष्ट्रीय दल और उसके शीर्ष नेता में एकाधिकारवाद की प्रवृत्ति पनपने का खतरा बढ़ेगा। वर्ष 1967 और 1971 के चुनावों के बाद के राजनीतिक विकास की जिन्हें गहरी जानकारी है, वे ऐसी बेतुकी दलील कतई नहीं देंगे। जब 1967 में लोकसभा के साथ ही विधानसभा चुनाव हुए तब इंदिरा गांधी ही प्रधानमंत्री थीं। उस चुनाव के बाद भी इंदिरा गांधी ही प्रधानमंत्री बनीं, लेकिन उनमें 1967 से 1971 तक एकाधिकारवाद की प्रवृत्ति नहीं बढ़ी थी, क्योंकि तब तक कांग्रेस पार्टी में ही एक हद तक आंतरिक लोकतंत्र कायम था। इंदिरा सरकार 1969 से 1971 तक अपने अस्तित्व के लिए दूसरे दलों पर भी निर्भर थी। यहां तक कि इंदिरा गांधी 1967 के चुनाव में पूर्व रक्षा मंत्री वीके कृष्ण मेनन तक को लोकसभा का टिकट नहीं दिलवा सकीं। जबकि वह 1962 के चुनाव में बंबई (अब मुंबई) की एक लोकसभा सीट से जीतकर आए थे। तब कांग्रेस संगठन मेनन के खिलाफ था।
हालांकि 1971 के चुनाव में इंदिरा गांधी भारी बहुमत से जीतकर आईं तो उनमें एकाधिकारवाद की प्रवृत्ति काफी बढ़ गई। यह प्रवृत्ति इतनी बढ़ी कि सक्रिय राजनीति से संन्यास ले चुके जयप्रकाश नारायण को भी लग गया कि यह देशहित में नहीं है। उन्होंने इंदिरा गांधी के एकाधिकारवाद पर एक लंबा लेख लिख दिया।उसी लेख के कारण जेपी से प्रधानमंत्री कुपित रहने लगीं। यह जेपी आंदोलन के शुरू होने से पहले की बात है। इसी पृष्ठभूमि में किसी कार्य से जेपी ने पटना से दिल्ली पहुंचकर जब प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी से मिलने की कोशिश की तो श्रीमती गांधी ने उन्हें कहलवा दिया कि वह सूचना एवं प्रसारण मंत्री इंद्र कुमार गुजराल से मुलाकात कर लें। जेपी गुजराल से मिले बिना पटना लौट गए। अब जो प्रतिपक्षी दल यह आरोप लगा रहे हैं कि एक साथ चुनाव से प्रधानमंत्री में एकाधिकार की प्रवृत्ति बढ़ेगी, तो वे 1971 के सत्ताधारी दल और आज के सत्ताधारी दल की बनावट एवं प्रवृत्ति में अंतर नहीं देख पा रहे हैं। फिर यदि ऐसी कोई प्रवृत्ति उभरती भी है तो मतदाता उसका जवाब देने में पूरी तरह सक्षम हैं।
एक साथ चुनाव कराने के विरोध में तरह-तरह के तर्क गढ़ने वाली कांग्रेस यह कह रही है कि वह संविधान और लोकतंत्र के खिलाफ होगा। दूसरी ओर वही कांग्रेस बार-बार यह तर्क दोहराती रहती है कि प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने इस देश में मजबूत लोकतंत्र की नींव डाली। यानी तब एक साथ चुनाव कराने से लोकतंत्र मजबूत होता था, तो आज वही काम करने से वह कमजोर कैसे हो जाएगा? जबकि तब की अपेक्षा आज के भारतीय मतदाता अधिक जागरूक हैं। कांग्रेस के साथ दिक्कत यह है कि फिर से एक साथ चुनाव की व्यवस्था से इंदिरा गांधी के उस विवादास्पद फैसले के औचित्य पर प्रश्न चिह्न लग जाएगा, जिसके तहत उन्होंने 1971 में अलग से लोकसभा का चुनाव कराया था, जिसके पीछे उनका निजी स्वार्थ था। उनकी सरकार सीपीआइ और डीएमके जैसे दलों के सहारे आराम से चल रही थी। उस पर कोई खतरा नहीं था, लेकिन वह इन दलों के दबाव से जल्द मुक्त होना चाहती थीं। सीपीआइ आदि के दबाव के कारण वह न तो खुद एकाधिकारवादी बन पा रही थीं न ही अपने पुत्र संजय गांधी के लिए कार संयंत्र की स्थापना करवा पा रही थीं। संजय गांधी ने लंदन के एक कार कारखाने में कुछ समय तक प्रशिक्षण भी लिया था। संजय की बड़ी इच्छा थी कि वह भारत में कारखाने की स्थापना करें। संजय ने अपने नाना के सिरहाने से हेनरी फोर्ड की किताब निकाल कर पढ़ी थी, जिससे उन्हें इसके लिए प्रेरणा मिली थी। इस बीच 1969 में कांग्रेस के महाविभाजन के बाद इंदिरा गांधी ने गरीबी हटाओ का लुभावना नारा गढ़ने के साथ ही कुछ लोकलुभावन काम भी किए।1971 के चुनाव में जीत के बाद इंदिरा गांधी गरीबी हटाने का अपना वादा तो भूल गईं, लेकिन अपने पुत्र संजय के कारखाने का सपना जरूर पूरा किया। उसके मूल में अलग-अलग चुनाव कराने की जो एक विसंगति आरंभ हुई, उसे दूर करना मौजूदा सरकार का दायित्व है।
Date: 30-09-24
बोझिल नियमों से मुक्त हो विनिर्माण क्षेत्रडॉ. ब्रजेश कुमार तिवारी , ( स्तंभकार जेएनयू के अटल स्कूल आफ मैनेजमेंट में प्रोफेसर एवं ‘मेक इन इंडिया-ए रोडमैप’ के लेखक हैं )
मेक इन इंडिया मोदी सरकार की एक प्रमुख योजना है। 25 सितंबर, 2014 को शुरू हुई यह योजना दस वर्ष पूरे कर चुकी है। इस अभियान के कुछ घोषित लक्ष्य थे, जैसे विनिर्माण क्षेत्र की विकास दर 12-14 प्रतिशत प्रति वर्ष करते हुए 2022 तक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में विनिर्माण के योगदान को 25 प्रतिशत तक बढ़ाना और 2022 तक अर्थव्यवस्था में विनिर्माण क्षेत्र की 10 करोड़ अतिरिक्त नौकरियां पैदा करना। अब इन लक्ष्यों को 2025 तक बढ़ा दिया गया है। हालांकि मौजूदा गति और बुनियादी ढांचे की कमी के कारण यह महत्वाकांक्षी लक्ष्य 2030 तक भी पूरा होता नहीं दिख रहा है। कोविड महामारी के दौरान यह प्रचारित किया गया कि चीन छोड़ने वाली कंपनियां भारत में आएंगी, लेकिन इनमें से अधिकांश ने वियतनाम, ताइवान एवं थाइलैंड की राह पकड़ी और केवल कुछ ही भारत आईं।
यह सच है कि सरकार निरंतर आर्थिक विकास करने और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में प्रासंगिकता बढ़ाने के लिए एक प्रतिस्पर्धी और गतिशील वातावरण बनाने का प्रयास कर रही है और इसके अच्छे परिणाम भी कुछ क्षेत्रों में दिख रहे हैं। भारतीय कंपनियों द्वारा कोविड टीकों का विकास एक बड़ा उदाहरण है। सरकार के प्रयासों के कारण 2014-2023 के दौरान विनिर्माण क्षेत्र में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश बढ़ा है।परंपरागत रूप से खिलौनों का आयातक रहा भारत अब निर्यातक बन गया है। अप्रैल-अगस्त 2022 में भारत के खिलौना निर्यात में 2013 की समान अवधि की तुलना में 636 प्रतिशत की वृद्धि हुई। इसी तरह मोबाइल उत्पादन 2014-15 में 18,900 करोड़ रुपये से बढ़कर वित्त वर्ष 2024 में 4,10,000 करोड़ रुपये के अनुमानित बाजार तक पहुंच गया।एयरोस्पेस, नवीकरणीय ऊर्जा जैसे अन्य क्षेत्रों में भी प्रगति हो रही है। आइबीईएफ की रिपोर्ट के अनुसार 2023 में विनिर्माण क्षेत्र ने अब तक का सबसे अधिक निर्यात किया, जो 447.46 अरब डालर तक पहुंच गया है। विश्व बैंक द्वारा जारी ईज आफ डूइंग बिजनेस इंडेक्स में 2014 में भारत की रैंक 134वीं थी, जो 2023 में बढ़कर 63 हो गई।वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता रिपोर्ट इंडेक्स में भारत 43वें स्थान पर है, जो 2014 में 60वें स्थान पर था। इसके बावजूद मैन्यूफैक्चरिंग में संभावनाएं पूरी तरह साकार नहीं हो पा रहीं। इसे अनदेखा नहीं किया जा सकता कि हाल के वर्षों में जनरल मोटर्स, मैन ट्रक्स, यूनाइटेड मोटर्स, फिएट और हार्ले डेविडसन ने भारतीय बाजार से निकलने का फैसला किया। फेडरेशन आफ आटोमोबाइल डीलर्स एसोसिएशन के अनुसार इन निकासियों के चलते 65,000 नौकरियां चली गईं। एक कंपनी के बंद होने से हजारों श्रमिकों का विस्थापन होता है।
हम चीन से तुलना करना पसंद करते हैं। उसकी जीडीपी में मैन्यूफैक्चरिंग की हिस्सेदारी 34 प्रतिशत है। भारत की तुलना में जीडीपी में विनिर्माण का बड़ा हिस्सा रखने वाले अन्य एशियाई देशों में दक्षिण कोरिया (26 प्रतिशत), जापान (21 प्रतिशत), थाइलैंड (27 प्रतिशत), सिंगापुर और मलेशिया (21 प्रतिशत), इंडोनेशिया और फिलीपींस (19 प्रतिशत) शामिल हैं। चीन ने खुद को दुनिया के कारखाने के रूप में स्थापित किया है और वैश्विक विनिर्माण में उसका हिस्सा 22.4 प्रतिशत है, जबकि पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के बावजूद भारत वैश्विक विनिर्माण में बमुश्किल 2.9 प्रतिशत योगदान देता है।चीन से आयात छोटे उद्यमों को बड़ा नुकसान पहुंचा रहा है, क्योंकि सस्ते चीनी सामान के कारण घरेलू कंपनियों के लिए बाजार में प्रतिस्पर्धा कठिन हो रही है। ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव के अनुसार कई आयातित उत्पाद स्थानीय एमएसएमई द्वारा बनाए जाते हैं और कम लागत वाले चीनी उत्पादों तक आसान पहुंच के कारण उन्हें मुश्किलों का सामना करना पड़ता है।उदाहरण के लिए चीन भारत के 96 प्रतिशत छाते, 92 प्रतिशत कृत्रिम फूल और मानव बालों से बनी वस्तुओं की आपूर्ति करता है। चीनी आयात ने कांच के सामान में 60, सिरेमिक उत्पादों में 51.4 और संगीत वाद्ययंत्रों में 52, फर्नीचर, बिस्तर और लैंप में 48.7 प्रतिशत, औजार और कटलरी में 39.4 प्रतिशत, पत्थर, प्लास्टर और सीमेंट में 49.3 प्रतिशत, चमड़े की वस्तुओं के बाजार के 54 प्रतिशत तक पर कब्जा कर लिया है।सरकार द्वारा खिलौनों पर सीमा शुल्क 20 प्रतिशत से बढ़ाकर 70 प्रतिशत करने के बावजूद भारतीय खिलौना बाजार में चीन का 35 प्रतिशत हिस्सा है। इस स्थिति के बारे में विचार किया जाना चाहिए।
हाल में विनिर्माण को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने कुछ कदम उठाए हैं, लेकिन अभी वांछित नतीजे नहीं मिल सके हैं।पिछले एक दशक में देश में स्टार्टअप की संख्या 350 से 1.48 लाख हो गई, पर आज भी 80 प्रतिशत स्टार्टअप फेल हो रहे हैं। हमें शिक्षा, प्रशिक्षण और आजीवन सीखने के कार्यक्रमों के माध्यम से कार्यबल के कौशल और क्षमताओं को बढ़ाना होगा, जो उद्योगों की जरूरतों और मांगों से मेल खा सके।
भारत में एमएसएमई क्षेत्र का विनिर्माण उत्पादन में 45 प्रतिशत से अधिक योगदान है। वैश्विक अर्थव्यवस्था के साथ एमएसएमई को अधिक कनेक्टिविटी की आवश्यकता है।निर्यात बढ़ाने के लिए पीएलआई योजना को एमएसएमई और उभरते उद्योगों तक बढ़ाया जाना चाहिए। भारत भविष्य में खुद को अगला वैश्विक कारखाना बना सकता है, बशर्ते बोझिल नियमों से विनिर्माण क्षेत्र को मुक्त किया जाए। सरकार को यह समझने की जरूरत है कि संसद के माध्यम से कोई विधेयक पारित करना, निवेशक सम्मेलन आयोजित करना आदि औद्योगीकरण को बढ़ावा देने के लिए पर्याप्त नहीं।
Date: 30-09-24
इजराइल का निशानासंपादकीय
इजराइल अब हमास और हिजबुल्ला के प्रमुखों का इजराइल ने कर दिया सफाया, अब दोनों के खिलाफ लड़ेगा आरपार की लड़ाई अभी तक ईरान इस संघर्ष में नरम रुख अख्तियार किए हुए था, पर अब उस पर दबाव बढ़ेगा। हालांकि अप्रैल में इजराइल ने ईरान पर भी हमले किए थे, जिसके जवाब में ईरान ने इजराइल पर गोले दागे थे। पर, उसके बाद वह संघर्ष आगे नहीं बढ़ पाया था। इजराइल अब हमास और हिजबुल्ला के खिलाफ आरपार की लड़ाई में जुट गया है। हमास के प्रमुख को उसने कुछ दिनों पहले मार गिराया था। अब उसके हवाई हमले में हिजबुल्ला के प्रमुख हसन नसरल्लाह के मारे जाने की पुष्टि हो गई है। शुक्रवार को इजराइल ने लेबनान की राजधानी बेरूत में निशाने बना कर हिजबुल्ला के ठिकारों पर हमले किए। उसमें हिजबुल्ला के मुख्यालय पर बंकरभेदी बम गिराए गए, जिसमें नसरल्लाह मारा गया। इसे इजराइल की बड़ी कामयाबी माना जा रहा है। अब भी इजराल हिजबुल्ला को पूरी तरह खत्म करने पर अड़ा हुआ है। पिछले हफ्ते अमेरिका और ब्रिटेन आदि इजराइल के समर्थक पश्चिमी देशों ने कोशिश की थी कि इक्कीस दिनों के लिए इजराइल हमले रोक दे। मगर राष्ट्रपति बेजामिन नेतन्याहू ने उस प्रस्ताव को सीधे-सीधे ठुकरा दिया और कहा कि जब तक वह हिजबुल्ला को खत्म नहीं कर लेगा, तब तक हमले बंद नहीं करेगा। वह संकल्प उन्होंने संयुक्त राष्ट्र के मंच से भी दोहरा दिया। नसरल्लाह के मारे जाने के बाद माना जा रहा है कि मध्यपूर्व में स्थितियां गंभीर हो सकती हैं। ईरान ने आपातकालीन बैठक बुला ली। अगर वह सीधे इस संघर्ष में कूदता है, तो सचमुच युद्ध खतरनाक रूप ले सकता है।
अभी तक ईरान इस संघर्ष में नरम रुख अख्तियार किए हुए था, पर अब उस पर दबाव बढ़ेगा। हालांकि अप्रैल में इजराइल ने ईरान पर भी हमले किए थे, जिसके जवाब में ईरान ने इजराइल पर गोले दागे थे। पर, उसके बाद वह संघर्ष आगे नहीं बढ़ पाया था। ईरान के इस संघर्ष में कूदने से बाकी अरब देशों पर भी अपनी स्थिति स्पष्ट करने का दबाव बनेगा। पेजर और रेडियो बम धमाके करके इजराइल ने पहले ही हिजबुल्ला के सैकड़ों लड़ाकों को मार और अशक्त बना कर उसकी कमर तोड़ दी थी। अब उसके प्रमुख नसरल्लाह के मारे जाने के बाद कई लोगों का मानना है कि हिजबुल्ला खत्म हो जाएगा।इजराइल ने भी दावा किया है कि हिजबुल्ला के हर लड़ाके पर उसकी नजर है। मगर सच्चाई यह है कि हिजबुल्ला इस हमले से कुछ हतोत्साहित जरूर हुआ है, उसकी ताकत शायद कम नहीं हुई है। अब भी उसके पास लाखों घातक हथियार जमा हैं, जिनका इस्तेमाल वह इजराइल के खिलाफ कर सकता है। इसलिए इजराइल का ज्यादा ध्यान हिजबुल्ला के हथियारों का जखीरा नष्ट करने पर है। हालांकि युद्ध में जीत का सेहरा चाहे जिसके सिर बंधे, नुकसान दोनों पक्षों के आम लोगों को झेलना पड़ता है।
मगर पिछले कुछ वर्षों से यह स्पष्ट है कि युद्ध की स्थितियों को टालने में जैसी भूमिका संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की होनी चाहिए, वह बिल्कुल नहीं दिखी है। उधर रूस-यूक्रेन संघर्ष जारी है, इधर इजराइल-हमास और हिजबुल्ला का संघर्ष तेज होता जा रहा है।
कोरोनाकाल के बाद से पूरी दुनिया आर्थिक संकटों का सामना कर रही है। आपूर्ति शृंखलाएं बाधित हैं। ऐसे में कुछ देशों की नाहक जिद और सनक की वजह से स्थितियां और चुनौतीपूर्ण हो रही हैं। मगर अमेरिका, ब्रिटेन आदि सुरक्षा परिषद में दबदबा रखने वाले देश अपने निजी स्वार्थों और आर्थिक समीकरणों के तहत चुप्पी साधे हुए हैं। पहले गाजा पट्टी में इजराइल ने हजारों बेकसूर लोगों को मार डाला, लाखों घर ध्वस्त कर दिए, अब वही काम लेबनान में कर रहा है। वहां के आम लोगों की जिंदगी सांसत में है। आखिर उसे मानवता का तकाजा कौन याद दिलाएगा।
Date: 30-09-24
बदलता रुखसंपादकीय
मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू ने जिस तरह अब भारत के प्रति अपना नरम रुख जाहिर किया है, वह दोनों देशों के कूटनीतिक संबंधों और अन्य हितों के लिहाज से बेहतर है। संयुक्त राष्ट्र महासभा की बैठक में शामिल होने अमेरिका पहुंचे मुइज्जू ने प्रिंसटन विश्वविद्यालय में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान कहा कि हम किसी भी समय, किसी भी देश के खिलाफ कभी नहीं रहे। यह भारत को बाहर करना नहीं था। उन्होंने भारतीय प्रधानमंत्री के बारे में आपत्तिजनक टिप्पणी करने वाले मंत्रियों के खिलाफ कार्रवाई का भी हवाला दिया। उनका यह भी कहना था कि दरअसल, मालदीव के लोगों को विदेशी सेना की उपस्थिति से गंभीर समस्या का सामना करना पड़ रहा था। इस मसले पर मालदीव में लोगों की राय के अपने आधार हो सकते हैं, लेकिन क्या यह मुद्दा भारत के खिलाफ धारणा बनाने और जनता को अपने पक्ष में लाने का जरिया बनाने का वाजिब कारण हो सकता है? ज्यादा वक्त नहीं बीता है, जब पिछले वर्ष मालदीव में हुए चुनाव में मुइज्जू ने अपने पक्ष में जनसमर्थन जुटाने के लिए ‘इंडिया आउट’ यानी ‘भारत बाहर जाओ’ का नारा दिया था और जीत भी हासिल की थी। यही नहीं, राष्ट्रपति बनते ही मुइज्जू ने सबसे पहले भारत सरकार से मालदीव में मौजूद अपने सैनिकों को हटाने के लिए भी कहा था।
चूंकि उन्हें चीन के प्रति झुकाव रखने वाला माना जाता रहा है, इसलिए उनका भारत के प्रति ऐसा आग्रह रखने को एक स्वाभाविक प्रतिक्रिया के तौर पर देखा गया। मगर भू-राजनीति के इस दौर में वैश्विक कूटनीति में कब कैसा समीकरण तैयार हो जाए, शक्तियों का केंद्र बदल जाए, कहा नहीं सकता। ऐसे में मुइज्जू ने अगर भारत के प्रति अपने पुराने रुख पर टिके रहने के बजाय अपने तेवर में नरमी लाने की कोशिश की है, तो इसका संदेश समझा जा सकता है। मुइज्जू जल्दी ही भारत का आधिकारिक दौरा कर सकते हैं। यों भी, पर्यटन या आर्थिक हितों के लिहाज से भारत और मालदीव के बीच संतुलित संबंध रहे हैं। संभव है कि मुइज्जू के नए रुख को उनके पुराने विचारों के आईने में रख कर देखा जाए, लेकिन उनमें आया बदलाव भारत और मालदीव, दोनों के लिए ही अच्छा है।
Date: 30-09-24
प्राकृतिक खेती की और बढ़ते कदमरवि शंकर
भारत के लोगों ने पिछले कई सालों से पाश्चात्य अंधानुकरण के कारण न केवल अपने जीवन, बल्कि कृषि को भी अंधकारमय बना दिया है। इस मशीनी युग में खाद्यान्न उत्पादन के लिए इस्तेमाल हो रहे रासायनिक खाद और कीटनाशकों से खाद्य सामग्री जहरीली होने लगी है। देश में कृषि को बढ़ावा देने के नाम पर काफी समय से इस्तेमाल हो रहे रसायनों के चलते धरती अब अपनी उर्वरा शक्ति भी खोने लगी है। यह हकीकत है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियां भारत की कृषि संस्कृति को तबाह करने पर तुली हुई हैं। हालांकि धरती को रसायनों से मुक्ति दिलाने और देश के नागरिकों को शुद्ध खाद्यान्न उपलब्ध कराने के लिहाज से शून्य लागत में प्राकृतिक खेती एक बड़ा विकल्प बनकर उभर रही है। सरकार भी इस दिशा में तेजी से काम कर रही है। उसका मानना है कि प्राकृतिक खेती से सबसे ज्यादा फायदा देश के अस्सी फीसद छोटे किसानों को होगा। ऐसे छोटे किसान, जिनके पास दो हेक्टेयर से कम भूमि है। इनमें से अधिकांश किसानों का काफी खर्च रासायनिक उर्वरकों पर होता है। अगर किसान प्राकृतिक खेती की तरफ मुड़ेंगे तो उनकी स्थिति और बेहतर होगी।
केंद्र सरकार ने इस वर्ष के बजट में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए कई महत्त्वपूर्ण कदम उठाए हैं। उसने एलान किया है कि अगले दो वर्षों में एक करोड़ किसानों को इसके लिए सहायता दी जाएगी और एक हजार ‘बायो रिसर्च सेंटर’ स्थापित किए जाएंगे। देश के अधिकांश कृषि वैज्ञानिक मानते हैं कि प्राकृतिक खेती में लागत कम होती है, लेकिन पैदावार को लेकर अब भी किसान और कृषि वैज्ञानिकों को संदेह है। गौरतलब है कि आज ज्यादा से ज्यादा उत्पादन के लिए कृषि क्षेत्र में अंधाधुंध रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों का उपयोग किया जा रहा है। इससे शहर से लेकर गांव तक कोई भी क्षेत्र अछूता नहीं है। फलत: आम जनता के साथ-साथ किसानों को भी कई दुष्परिणाम भुगतने पड़ रहे हैं। इससे किसान का खर्च और कर्ज दोनों बढ़ रहा है, क्योंकि किसानों को रासायनिक खाद, कीटनाशक और हाइब्रीड बीज महंगे दाम पर खरीदने पड़ते हैं। कई बार किसान बैंक कर्ज के जाल में फंसने से आत्महत्या तक कर लेते हैं। ऐसी कई घटनाएं सामने आ रही हैं। इतना ही नहीं, रासायनिक खाद और कीटनाशकों के उपयोग से मिट्टी प्रदूषित हो रही है, हानिकारक कीटों की वृद्धि हो रही है। विभिन्न प्रकार के लाभकारी जीवों जैसे-मछली, केंचुआ समेत दूसरे कीट-पतंगों की कमी हो रही है। रासायनिक खाद और कीटनाशक प्रभावित खानपान से कई प्रकार के रोग उत्पन्न हो रहे हैं। इसलिए बदलते वक्त और खेती की लागत ज्यादा होने की वजह से अब किसानों का रुख धीरे-धीरे प्राकृतिक खेती की ओर बढ़ रहा है।
वर्तमान में कृषि क्षेत्र का सकल घरेलू उत्पाद में योगदान 13.6 फीसद है। यह क्षेत्र देश की 60 फीसद आबादी को प्रत्यक्ष तौर पर रोजगार मुहैया कराता है। लेकिन देशभर में किसानों की वर्तमान सामाजिक-आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है। उत्पादन और मूल्य प्राप्ति दोनों में अनिश्चितता की वजह से किसान उच्च लागत वाली कृषि के दुश्चक्र में फंस गया है। किसानों की पैदावार का आधा हिस्सा उनके उर्वरक और कीटनाशक में ही चला जाता है। इस तरह किसान आज लाचार और विवश है। वह भ्रमित है। परिस्थितियां उसे लालच की ओर धकेल रही हैं। उसे नहीं मालूम कि उसके लिए सही क्या है?अधिकतर कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि रासायनिक खेती की तुलना में प्राकृतिक खेती में फसल की उपज कम होती है, फिर केंद्र सरकार प्राकृतिक खेती के समर्थन में क्यों है। दरअसल, सरकार को प्राकृतिक खेती के जरिए खाद अनुदान, मिट्टी की घटती उर्वरा शक्ति और जल संकट जैसी चुनौतियों से निपटने की उम्मीद है। सरकार का मानना है कि देश के वैज्ञानिक हरित क्रांति और रसायन आधारित कृषि पर अनुसंधान करते रहे हैं और इसी के आधार पर किसान खेती करते आए हैं। उसमें अब बदलाव लाने की जरूरत है, क्योंकि रासायनिक खाद से खेती करने से किसान और देश दोनों को आर्थिक नुकसान हो रहा है। एक अनुमान के मुताबिक हमारे देश में पांच करोड़ टन रासायनिक खादों का आयात होता है, जिसके लिए अनुदान एक लाख करोड़ रुपए है। इससे दोगुने से ज्यादा पैसा बाहर के देशों को रासायनिक उर्वरकों की खरीदारी के लिए जा रहा है।
यह भी कहा जा रहा है कि प्राकृतिक खेती काफी सरल और फायदेमंद है। विशेषज्ञों के अनुसार प्राकृतिक विधि से खेती करने में किसानों को खेती करने के लिए बाहर से कोई भी चीज खरीदने की जरूरत नहीं है। खेती में सही तकनीक के उपयोग से भूमि वातावरण से ही फसलों में पोषक तत्त्वों की जरूरत पूरी की जा सकती है। इस विधि से खेती करने वाले किसानों को बाजार से किसी प्रकार की खाद और कीटनाशक रसायन खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती है। फसलों की सिंचाई के लिए पानी और बिजली भी मौजूदा खेती-बाड़ी की तुलना में दस फीसद ही खर्च होती है। सबसे बड़ी बात, इससे पर्यावरण को जरा भी नुकसान नहीं पहुंचता।
कहा जा सकता है कि प्राकृतिक खेती अपनाने से लागत कम हो जाती है। हमारे देश में महाराष्ट्र, गुजरात और कर्नाटक आदि राज्यों में बड़े पैमाने पर किसान इस खेती को अपना चुके हैं। पंजाब में भी कई साल पहले इसकी शुरुआत हो चुकी है। हां, एक दिक्कत जरूर है कि इस तरह की प्राकृतिक खेती वर्ष भर देखभाल मांगती है। शुरू में यह ज्यादा मेहनत भी मांगती है। लेकिन इससे गांव में रोजगार के अवसर बढ़ते है। बेरोजगारी कम होती है। पर दूर शहर में रह कर खेती कराने वाले या अंशकालिक किसानों को थोड़ा मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। केवल नौकरी के भरोसे प्राकृतिक खेती करने वाले के लिए उतनी अनुकूल नहीं है, जितनी वर्तमान की रासायनिक खेती।
बहरहाल, प्राकृतिक खेती छोटे और सीमांत किसानों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है, क्योंकि फिलहाल खेती के लिए रसायनों आदि की भारी कीमत चुकाने के लिए किसानों को कर्ज लेना पड़ता है और कर्ज का यह बोझ बढ़ता ही जा रहा है। किसान रासायनिक खाद और कीटनाशक के प्रयोग से न केवल कर्ज में डूब रहा है, बल्कि खेतों में जहर की खेती भी कर रहे हैं। अनाज और सब्जियों के माध्यम से यही जहर हमारे शरीर में जाता है, जिससे आज कैंसर जैसी गंभीर बीमारियां लगातार फैल रही हैं। इस तकनीक का इस्तेमाल करने वाला किसान कर्ज के झंझट से भी मुक्त रहता है, वहीं उन्नत कृषि उत्पादों से आम जनजीवन का स्वास्थ्य भी सुरक्षित रहता है। अगर हमें अपने परिवार और समाज को स्वस्थ रखना है, तो हमें प्राकृतिक खेती की ओर लौटना होगा। यह एक बड़ा, लेकिन जरूरी काम है।
Date: 30-09-24
भारत को हासिल क्यागिरीश चंद्र पाण्डे
समय पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की 21- 23 सितम्बर, 2024 की तीन दिनी अमेरिका यात्रा कई मायनों में महत्त्वपूर्ण रही। उनकी यह यात्रा हिन्द-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता सुनिश्चित करने और वैश्विक व क्षेत्रीय मुद्दों पर विचारों के आदान- प्रदान के वास्ते क्वाड के अन्य सदस्य देशों यानी अमेरिका, जापान तथा ऑस्ट्रेलिया के बीच सहयोग बढ़ाने के तरीकों पर चर्चा करने के साथ ही यूक्रेन और गाजा में संघर्षों का शांतिपूर्ण समाधान खोजने और ग्लोबल साउथ की चिंताओं को दूर करने पर भी केंद्रित थी ।
जहां तक विलमिंगटन डेलावेयर में राष्ट्रपति जो बाइडेन द्वारा 21 सितम्बर, 2024 को आयोजित क्वाडिलैटरल सिक्योरिटी डायलॉग ‘क्वाड लीडर्स शिखर सम्मेलन में प्राप्त भारत की उपलब्धियों का प्रश्न है, तो प्रधानमंत्री मोदी ने इस मंच से अप्रत्यक्ष तौर पर चीन को संदेश देते हुए कहा कि हम सभी नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था, संप्रभुता एवं क्षेत्रीय अखंडता के सम्मान और सभी मुद्दों के शांतिपूर्ण समाधान का समर्थन करते हैं। हम किसी के खिलाफ नहीं हैं, और भारत विस्तारवाद के स्थान पर विकासवाद का समर्थक है। जब प्रधानमंत्री ने कहा कि आज समुद्र और आसमान, दोनों सुरक्षित नहीं हैं, तो उनका संकेत चीन की तरफ था क्योंकि दक्षिण चीन सागर पर चीन इसलिए कब्जे का प्रयास कर रहा है कि उसमें उसके देश का नाम शामिल है। ऐसे बेहूदे तर्कों के आधार पर जब कोई देश अंतरराष्ट्रीय कानूनों का माखौल उड़ाता है, तो स्वयं तो उपहास का पात्र बनता ही है, साथ में पूरी दुनिया को भी संकट में डालता है। मोदी की यात्रा ने भारत को 14 सदस्यों वाले हिन्द-प्रशांत आर्थिक समृद्धि ढांचे (आईपीईएफ) को और नजदीक लाने में भी सहायता की है। यह पहल क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव से निपटने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति ने 2022 में शुरू की थी।
क्वाड- अमेरिका, भारत, ऑस्ट्रेलिया तथा जापान चार देशों का चौगुट है, जो हिन्द-प्रशांत के भीतर मौजूद समस्याओं से निपटने और क्षेत्र में चीन की बढ़ती आक्रामकता और विस्तारवादी नीति पर लगाम लगाने के लिए बना है। इसीलिए चीन इस संगठन के खिलाफ नाराजगी व्यक्त करता रहता है। आज जबकि कई वैश्विक मंचों की अहमियत नहीं रह गई है, ऐसे में क्वाड लीडर्स के सम्मेलन में क्वाड के प्रति मोदी की प्रतिबद्धता और कहना कि यह संस्था बनी रहेगी, सदस्य देशों के बीच आपसी साझेदारी होगी तथा तालमेल भी बना रहेगा तो निश्चित ही पर चीन को नागवार ही गुजरेगा। क्वाड के चारों नेताओं की बातचीत के बाद क्लिमिंग्टन घोषणापत्र जारी किया गया। इसमें वैश्विक स्वास्थ्य और स्वास्थ्य सुरक्षा, कृषि शोध, साइबर सुरक्षा, अंतरिक्ष, बुनियादी ढांचा, इंडो-पैसिफिक लॉजिस्टिक्स नेटवर्क, महत्त्वपूर्ण और उभरती तकनीक, तटरक्षक सहयोग, अंडरसी केबल और डिजिटल कनेक्टिविटी, इंडो- पैसिफिक में प्रशिक्षण के लिए समुद्री पहल, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार आदि पर भी अपने भावी सहयोग और मजबूत करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की गई है। निश्चित तौर पर ये सभी पहलकदमियां क्वाड सहयोग की बढ़ती सार्वभौमिक प्रकृति को रेखांकित करती हैं।
क्वाड नेताओं ने ‘इंडो-पैसिफिक में प्रशिक्षण के लिए समुद्री पहल की घोषणा की ताकि क्षेत्रीय साझेदारों को इंडो- पैसिफिक मैरीटाइम डोमेन अवेयरनेस और अन्य क्वाड पहलों के उपकरणों का प्रभावी ढंग से उपयोग करने में मदद मिल सके ताकि सर्वोत्तम प्रथाओं को साझा किया जा सके और नागरिक समुद्री सहयोग में समुद्री सुरक्षा को लेकर सुधार किया जा सके, अपने जल की निगरानी और सुरक्षा की जा सके, अपने कानूनों को लागू किया जा सके और गैर-कानूनी व्यवहार को रोका जा सके। इस प्रकार क्वाड में भारत की भागीदारी जहां चीन के विस्तारवादी मंसूबों पर लगाम लगा रही है, वहीं एक्ट ईस्ट पॉलिसी और पूर्वी एशियाई देशों के साथ घनिष्ठ संबंध बनाने में भी मददगार साबित हो रही है। अमेरिका, भारत, जापान तथा ऑस्ट्रेलिया ट्रीटी के अलायंस पार्टनर्स हैं, लेकिन भारत की दिलचस्पी औपचारिक अलायंस में नहीं रही है। इसके बावजूद क्वाड हिन्द-प्रशांत क्षेत्र को स्वतंत्र और सबके लिए खुला बनाए रखने और इस क्षेत्र के लिए समावेशी रूप के साझा लक्ष्यों को लेकर जिस प्रकार आगे बढ़ रहा है, और चार वर्ष पहले बने इस संगठन ने अब तक जिस प्रकार से सफलतापूर्वक छह शिखर सम्मेलन आयोजित कर लिए हैं, उससे इस संगठन की प्रासंगिकता निकट भविष्य में और बढ़ेगी और दक्षिण प्रशांत, हिन्द महासागर और दक्षिण पूर्व एशिया में चीन की हरकतों से परेशान देश भी इसमें जुड़ते जाएंगे। गौरतलब है कि भारत जहां 2025 में 7 वें क्वाड शिखर सम्मेलन की मेजबानी करेगा वहीं अमेरिका 2025 में विदेश मंत्रियों की बैठक की मेजबानी करेगा।
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हाल ही में कैबिनेट ने एक प्रस्ताव पारित किया है। यह अर्थव्यवस्था, पर्यावरण और रोजगार के लिए बायो ई3 या बायोटेक्नॉलॉजी से जुड़ा हुआ है। इसका उद्देश्य इस क्षेत्र में विनिर्माण को बढ़ावा देना है।
भारत में बायोटेक –
भारत में 1986 से बायोटेक्नॉलॉजी विभाग है। यह मुख्यतः वैक्सीन बनाने, डायग्नोस्टिक्स आदि में काम करता है। इसके चलते विश्व में भारत को ‘वैक्सीन फैक्टरी’ के रूप में जाना जाने लगा है।
क्षेत्र की चुनौतियां –
तकनीकी जानकारी और मानव संसाधन के बावजूद केवल कुछ भारतीय बायोटेक ही विश्व स्तर पर पहचान बना पाए हैं, क्योंकि कुछ ही स्थानीय निर्माता, भारतीय प्रयोगशालाओं को उत्पाद बनाने के लिए सामग्री और उपकरण उपलब्ध करा सकते हैं। भारत को इस क्षेत्र में प्रतिस्पर्धी बनाए रखना ही नीति का उद्देश्य है।
इस पहल में छः कार्यक्षेत्र हैं। भविष्य के उद्योगों को पर्यावरण के अनुकूल उत्पादों पर आधारित करने के लिए परिष्कृत जैव प्रौद्योगिकी इनमें से एक है।
क्या किया जाना चाहिए –
पिछले चार दशकों में इस क्षेत्र में निवेश किया गया है। इससे आगे बढ़कर सार्वजनिक-निजी भागीदारी मोड में कंपनियां स्थापित करने की जरूरत है। बायो फाउंड्री और बायो एआई हब स्थापित करके, विभिन्न जैव प्रौद्योगिकीविदों का एकत्र किया जा सकता है।
बायो ई3 नीति केंद्र और राज्यों के बीच एक गहन सहयोग की मांग करती है।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 30 अगस्त, 2024
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Date: 28-09-24
Building Bridges with Lanka and OthersET Editorials
Sri Lanka’s new president ‘Comrade’ Anura Kumara Dissanayake’s intention of not becoming ‘sandwiched’ between India and China, as both countries are ‘friends’ and expected ‘to become closer partners’, has put speculation over Colombo’s tilt towards Beijing to repose, if not rest. His statement does quell New Delhi’s concerns about Colombo taking a pro-China line, especially given Dissanayake’s ideological affinity with China — he’s a self-described communist — and his party Janatha Vimukthi Peramuna’s anti-India stance in the past. It underscores that competitive bargaining, which has been the region’s SOP, will drive the Lankan leadership in keeping with national interest.
It’s also time for New Delhi to evaluate its approach. There is no escaping the constant tug of war in the region, especially as it abuts the Indo-Pacific. Beijing may consider Washington as its only peer, but it’s not blind to New Delhi’s ambitions and growing global presence. As a LMIC, India’s capacity to match China’s economic outreach is severely limited. India must find ways to seek ‘parity’ in other ways.
In the region, India has always been a dependable partner. Sri Lanka knows this from its recent crises. New Delhi should emphasise how it has demonstrated time over that it’s not a hegemonistic country that recognises that working together — and developing together — leveraging each other’s strength will lift all boats in the neighbourhood. Building on historical and cultural ties that bind is important. But as South Asia’s biggest economy, India must take the lead leveraging its economy to build mutually beneficial ties by augmenting intraregion trade, improving connectivity and energy systems. In other words, plug and play with its neighbours.
Date: 28-09-24
Staying the courseThe Centre and the States need to fight air pollution together.Editorial
With the southwest monsoon drawing to a close, north India, particularly the States in the Indo-Gangetic plains, brace themselves for the annual spike in winter pollution. Earlier this week, a top functionary in the Prime Minister’s Office convened a meeting with representatives from Delhi, Haryana, Punjab, Rajasthan and Uttar Pradesh, along with the heads of several ministries in Delhi. The brief was to take stock of the steps in place to prevent air quality from deteriorating catastrophically in Delhi. While pollution from vehicular emissions, road and construction dust, solid waste management, and diesel sets have over the years been counted as key sources of emissions, the burning of paddy stubble in Punjab and Haryana is known to be responsible for as much as 40% of the pollutant load during October and November. Punjab is expected to generate 19.52 million tonnes of paddy straw this year as compared to Haryana’s 8 million tonnes. At the meeting, both States have committed to “eliminate” paddy stubble burning this year. To be sure, last November, the Supreme Court of India had expressly ordered that such burning completely ceases. This year, it has demanded to know from the Centre the steps that have been taken to address the problem. Whether the States can comply remains to be seen.
The harvest season of 2023 saw a 59% fall in the number of stubble-burning incidents in Punjab as compared to 2022; in Haryana it dipped by 40% but Uttar Pradesh saw a 30% rise. Despite the solutions to address the problem being known — create economic incentives as well as punitive measures to prevent straw from being burned — implementation remains a challenge. Punjab says that it hopes to manage 11.5 million tonnes of its paddy straw through in-situ (on the field) crop residue management and the rest via ex-situ methods. Similarly, Haryana will manage 3.3 million tonnes in-situ and use ex-situ methods for the remainder. In addition to this, 2 million tonnes of paddy straw would be ‘co-fired’ in 11 thermal power plants across the NCR region. Co-firing refers to turning the straw into pellets that can be used as a source of carbon. Experience over the years shows that several of these machines are not available to farmers when required. While using the straw in power plants has often been touted as a solution, there is no well-oiled system in place to transport straw from field to plant. The causes of the pollution crisis are multi-layered and will yield results only gradually. The States and the Centre must set aside their political differences and stay the course collectively.
Date: 28-09-24
बुजुर्ग होती आबादी के लिए हम कितने तैयार हैंसंपादकीय
एसबीआई के एक अध्ययन के अनुसार भारत में जनसंख्या वृद्धि दर लगातार घटने के साथ पिछले तीन साल में आबादी की औसत आयु पांच वर्ष बढ़कर 29 वर्ष हो गई है। यानी अगर ये रफ्तार स्थिर भी रहे तो अगले पांच वर्षों में औसत आयु सांख्यिकी के सिद्धांत के मुताबिक 36 पार कर चुकी होगी। और तब हम डेमोग्राफिक डिविडेंड (युवा शक्ति का लाभ ) तो छोड़िए, बढ़ते बुजुगों के भरण-पोषण के लिए समुचित उत्पादकता बरकरार रखने वाली शक्ति भी नहीं होंगे। जिस देश में कुपोषण अभी भी खत्म होने का नाम न रहा हो वहां वैसे भी युवाओं से उच्च स्तर के उत्पादन में शिरकत की अपेक्षा नहीं की जा सकती। डब्ल्यूएचओ की परिभाषा के अनुसार कुपोषण के कारण ऐसे बच्चों में शारीरिक ही नहीं मानसिक अक्षमता भी रहती है। भारत में सन् 2018 से डेमोग्राफिक डिविडेंड काल शुरू हुआ। अगर यह लाभ लेना था तो कुपोषण खत्म करना जरूरी था। एक तरफ बुजुर्ग बढ़ रहे हैं और दूसरी ओर कार्यबल में युवाओं की औसत उम्र की सुई अधेड़ावस्था की ओर अग्रसर है। ज्यादा से ज्यादा युवा कार्यबल का हिस्सा बनते, तो जीडीपी बढ़ती और बुजुर्गों के लिए सामाजिक सुरक्षा की योजनाएं ला सकती थी। सरकार को नए आंकड़ों का संज्ञान लेना होगा। डेमोग्राफिक डिविडेंड का काल किसी भी देश के जीवन में बस एक बार ही आता है।
Date: 28-09-24
कार्य-जीवन में खतरनाक असंतुलनप्रो. गौरव वल्लभ, ( लेखक एक्सएलआरआइ, जमशेदपुर में वित्त के प्रोफेसर एवं भाजपा नेता हैं )
पिछले दिनों पुणे की एक युवा सीए का काम से संबंधित तनाव के कारण निधन हो जाना कार्यस्थल पर उस उच्च दबाव की याद दिलाता है, जिसका कई युवा पेशेवरों को प्रतिदिन सामना करना पड़ता है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो की हालिया रिपोर्ट से पता चला है कि भारत में 9.5 प्रतिशत से अधिक आत्महत्याएं वेतनभोगी पेशेवरों द्वारा की गईं। यह चिंताजनक है और इस पर तत्काल ध्यान देने की आवश्यकता है। इस संकट के लिए किसी एक कारण को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि यह कार्यस्थल पर दबाव की संस्कृति से उत्पन्न हुआ है। यह सच है कि आज कारपोरेट जगत में प्रतिस्पर्धा पहले से कड़ी हो गई है। आज कंपनियां कम कार्यबल से जितना संभव हो, उतना उत्पादन करने की कोशिश कर रही हैं। इसने एक हानिकारक माहौल तैयार किया है, जो कार्यस्थल पर मानवता को लील रहा है। इसने कार्यस्थल को एक युद्धक्षेत्र में बदल दिया है, जहां व्यक्ति न केवल पदोन्नति या वेतन वृद्धि के लिए प्रतिस्पर्धा कर रहे हैं, बल्कि अपनी भावनात्मक भलाई के लिए भी लड़ रहे हैं। यहां प्रतिस्पर्धा कठिन है और युवा पेशेवर अक्सर कारपोरेट जीवन के तनाव के लिए तैयार नहीं होते। स्कूल और विश्वविद्यालय तकनीकी कौशल विकास पर तो ध्यान केंद्रित करते हैं, लेकिन व्यक्ति के व्यवहार में लचीलापन लाने और तनाव प्रबंधन की उपेक्षा करते हैं।
लंबे समय तक काम से संबंधित तनाव के कारण उत्पन्न बर्नआउट (मानसिक एवं शारीरिक थकान) का एक अन्य कारण सामाजिक अलगाव भी है। भारत में सीए या किसी अन्य व्यावसायिक पाठ्यक्रम में सफलता प्राप्त करने का दबाव अक्सर छात्रों को कालेज के अनुभव से खुद को अलग करने के लिए प्रेरित करता है। केवल अपनी पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करने के कारण वे कालेज जीवन से चूक जाते हैं। यह अलगाव उन्हें उच्च दबाव वाली कारपोरेट दुनिया के लिए तैयार नहीं कर पाता और उनमें आवश्यक सामाजिक और भावनात्मक कौशल की कमी रह जाती है। कारपोरेट जगत अक्सर नेतृत्व और भावनात्मक बुद्धिमत्ता के बजाय अंतिम परिणामों की उपलब्धि या तकनीकी कौशल के आधार पर प्रबंधकों को बढ़ावा देता है। इससे प्रबंधकों के पास अपनी टीमों को भावनात्मक रूप से समर्थन देने के लिए समय और कौशल की कमी रह जाती है, जिससे तनाव पैदा होता है। कार्यस्थल पर पेशेवरों की संतुष्टि इससे काफी प्रभावित होती है कि उनके वरिष्ठ उनके साथ कैसा व्यवहार करते हैं और उनकी टीम की गतिशीलता क्या है।
युवा पेशेवरों को बर्नआउट से बचने के लिए उन्हें स्वीकृति या मान्यता प्रदान करने की भी आवश्यकता है। मान्यता एक मुख्य मानवीय आवश्यकता है। इसका मौद्रिक होना जरूरी नहीं है। एक साधारण धन्यवाद नोट या सार्वजनिक स्वीकृति ही काफी हो सकती है। इसके साथ-साथ कार्य-जीवन संतुलन बनाए रखना और कंपनियों द्वारा अपने कर्मचारियों की भलाई को प्राथमिकता देने की आवश्यकता है। कारपोरेट संस्कृति में मानसिक स्वास्थ्य को लेकर नकारात्मक सोच कई कर्मचारियों को मदद मांगने से रोकता है। इसके लिए कंपनियों को एक ऐसा परिवेश बनाने की आवश्यकता है, जहां मानसिक स्वास्थ्य के बारे में खुली बातचीत को प्रोत्साहित किया जाए। इसके अतिरिक्त, तकनीकी प्रगति से प्रेरित आज की “आलवेज आन” संस्कृति ने पेशेवर और व्यक्तिगत समय के बीच की रेखा को धुंधला कर दिया है, जिससे कर्मचारियों, विशेष रूप से युवा पेशेवरों के बीच तनाव का स्तर बढ़ रहा है। पेशेवरों को बर्नआउट की समस्या से निजात दिलाने के लिए कारपोरेट जगत को काम की मात्रा के बजाय जीवन की गुणवत्ता पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। ओवरटाइम या सप्ताहांत में काम करने या व्यक्तिगत समय छोड़ने के लिए कर्मियों को पुरस्कृत करने के बजाय कंपनियों को दक्षता और संतुलन पर जोर देना चाहिए। कंपनियों को अपने कर्मियों को कार्यस्थल पर भलाई को प्राथमिकता देने, ब्रेक लेने और व्यक्तिगत समय की सीमाओं का सम्मान करने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। सरकारों को भी सार्वजनिक स्वास्थ्य एजेंडे के हिस्से के रूप में कार्य-जीवन संतुलन का समर्थन करने की आवश्यकता है, क्योंकि लंबे समय तक काम करने से दीर्घकाल में मानसिक स्वास्थ्य संकट पैदा होता है और उत्पादकता कम होती है। कार्यस्थल पर उत्पादकता और खुशहाली बढ़ाने के लिए पारंपरिक 40 घंटे के कार्यसप्ताह को अपनाना एक आजमाया हुआ तरीका है। इस अवधारणा को स्वीडन जैसे देशों ने प्रभावी ढंग से लागू किया है, जिससे वहां उत्पादकता और कर्मचारियों की खुशी बढ़ी है। अध्ययन बताते हैं कि कम कार्यसप्ताह बेहतर कार्य-जीवन संतुलन को बढ़ावा देता है, तनाव के स्तर को कम करता है और मानसिक कल्याण को बढ़ावा देता है, जो लंबे समय में उत्पादकता बढ़ाने में योगदान करते हैं। जर्मनी की प्रायोगिक चार-दिवसीय कार्यसप्ताह योजना इसका ताजा उदाहरण है। स्वीडन और जर्मनी कड़ी मेहनत के बजाय बेहतर तरीके से काम करने के फायदों पर जोर देते हैं। दोनों देश दुनिया भर में कार्यस्थल संस्कृति में बदलाव पर जोर दे रहे हैं, ताकि कारपोरेट परिणामों और कर्मचारी कल्याण को समान महत्व दिया जा सके। ये माडल उन कंपनियों और सरकारों के लिए प्रेरणास्रोत के रूप में काम कर सकते हैं, जो अधिक टिकाऊ कार्यसंस्कृति बनाना चाहते हैं और जो कर्मचारियों के दीर्घकालिक स्वास्थ्य और उत्पादकता को पहले स्थान पर रखते हैं। फ्रांस और जर्मनी जैसे देशों ने तो श्रमिकों की भलाई और स्वस्थ कार्य-जीवन संतुलन सुनिश्चित करने के लिए “डिस्कनेक्ट करने का अधिकार” कानून लागू किया है। यह कानून कर्मचारियों को काम के बाद काम से संबंधित संचार से इन्कार करने का अधिकार देता है।
कार्यस्थल पर तनाव के कारण खोया हुआ प्रत्येक जीवन यही बताता है कि कारपोरेट संस्कृति लोगों पर पैसे को, करुणा पर दक्षता को और कल्याण पर उत्पादकता को प्राथमिकता देती है। ऐसे में हमें व्यावसायिक माहौल को फिर से विकसित करने के लिए एक सहयोगात्मक प्रयास की आवश्यकता है। सरकारों को इसे सार्वजनिक स्वास्थ्य चिंता के रूप में लेना चाहिए और कानून एवं नीति में मानसिक स्वास्थ्य और कार्य-जीवन संतुलन को प्रमुख स्थान देना चाहिए। इससे पहले कि और जानें जाएं, बदलाव का समय अब आ गया है।
Date: 28-09-24
ई-कचरे की पहेलीसंपादकीय
इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं के निर्माताओं ने इलेक्ट्रिक और इलेक्ट्रॉनिक कचरे के पुनर्चक्रण (रीसाइक्लिंग) और निपटान के लिए न्यूनतम मूल्य निर्धारित करने वाले केंद्र सरकार के नवीनतम मसौदा दिशानिर्देशों के खिलाफ जो शिकायतें की हैं वे एक ऐसे क्षेत्र में अव्यावहारिक ढंग से नियम थोपे जाने की ओर संकेत करती हैं जिसे तत्काल अनौपचारिक क्षेत्र से संगठित क्षेत्र में बदलने की जरूरत है। उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिकी के निर्माताओं का आरोप है कि मसौदा दिशानिर्देश में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के समक्ष उनके प्रतिनिधित्व की अनदेखी कर दी गई है।
नियमों के कारण उस लागत में भारी इजाफा हुआ है जो उत्पादकों को रीसाइकल करने वालों को ई-कचरे को रीसाइकल करने की अच्छी खासी कीमत चुकानी पड़ती है। उदाहरण के लिए धातुओं को रीसाइकल करने की कीमत बढ़कर 80 रुपये प्रति किलो हो गई है जबकि उत्पादक अनुबंध के मुताबिक रीसाइकल करने वालों को प्रति किलो छह से 25 रुपये तक का भुगतान करते हैं।
उत्पादकों को इलेक्ट्रॉनिकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय का समर्थन हासिल है और उसने अपना नजरिया हाल ही में सभी पक्षों की एक बैठक में प्रस्तुत किया। ये मसौदा नियम बताते हैं कि सरकार 2011 से ही ई-कचरे से जुड़ी प्रमुख दिक्कतों को निपटा पाने में नाकाम रही है। उसी साल ई-कचरा प्रबंधन के नियम बनाए गए थे।
भारत दक्षिण एशिया में दुनिया के सबसे अधिक ई-कचरा उत्पन्न करने वाले देशों में शामिल है और यह मोबाइल फोन, लैपटॉप, डेस्कटॉप और अन्य उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स उपकरणों से हर वर्ष 16 लाख टन कचरा उत्पन्न करता है। इसमें से करीब 67 फीसदी कचरा ऐसा होता है जिसमें लेड, कैडमियम, मर्करी, आर्सेनिक, एस्बेस्टॉस सहित तमाम नुकसानदायक तत्त्व शामिल होते हैं जो इस कचरे के साथ जमीन में मिल जाते हैं और न केवल आम लोगों बल्कि वनस्पतियों के लिए भी स्वास्थ्य तथा पर्यावरण संबंधी खतरे उत्पन्न करते हैं।
इस मसले का दूसरा पहलू यह है कि ई-कचरे को रीसाइकल करने का 90 फीसदी काम असंगठित क्षेत्र के लोगों द्वारा किया जाता है जो असुरक्षित हालात में अंजाम दिए जाते हैं और बच्चों से भी यह काम कराया जाता है। वर्ष 2016 में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने इस समस्या को हल करने के लिए अधिक ढांचागत ई-कचरा प्रबंधन नियम प्रस्तुत किए जिन्होंने इस नियमों के दायरे में आने वाले उत्पादों की संख्या भी बढ़ाई और इनका निपटान करने वालों, विनिर्माताओं और रीसाइकल करने वालों की भूमिकाएं और कर्तव्य भी तय किए। उन्होंने विस्तारित उत्पादक जवाबदेही (ईपीआर) तय की जिसके तहत उत्पादकों को कहा गया कि वे ईपीआर के बदले अपने पूरी तरह उपयोग किए जा चुके उत्पाद वापस लें।
हालांकि इन नियमों के कारण संग्रहीत होने वाले ई-कचरे और उसके निपटान में काफी तेजी आई लेकिन उल्लंघन के लिए किसी दंडात्मक व्यवस्था के अभाव में यह आंकड़ा फिर भी कमजोर ही बना रहा। इन कमजोरियों को दूर करने की कोशिश में ई-कचरा प्रबंधन नियम 2022 ने इस कानून के तहत आने वाले उत्पादों के दायरे को विस्तृत किया और हर विनिर्माता और रीसाइकलर के लिए यह जरूरी किया कि वह केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड द्वारा तैयार ऑनलाइन पोर्टल पर पंजीयन कराए।
नियमों के मुताबिक ऐसे इलेक्ट्रॉनिक कलपुर्जों के निर्माण को सीमित किया गया जिनमें लेड और मर्करी जैसे जहरीले पदार्थ अधिकतम तय सीमा से अधिक थे। ऐसे कई कानून हैं जो पर्यावरण संरक्षण पर केंद्रित हैं लेकिन उनका प्रवर्तन मुश्किल रहा है। इसके अलावा असंगठित क्षेत्र जिस कीमत पर काम करता हैवह भी संगठित क्षेत्र के कारोबारियों को इस बाजार में प्रवेश करने से हतोत्साहित करती है।
कुछ अनुमानों के अनुसार देश में ई-कचरे का उत्पादन सालाना 30 फीसदी की दर से बढ़ रहा है जबकि कुछ अन्य अनुमानों के मुताबिक समुचित रिसाइक्लिंग सुविधाएं विकसित करने के लिए जरूरी फंड के 20 फीसदी से भी कम का आवंटन किया जा रहा है।
ई-कचरे के निपटान और रीसाइक्लिंग को अधिक व्यवहार्य बनाने के सार्थक उपाय आने के बाद भी इस कारोबार की प्रकृति बदलती नहीं दिखती। यह देखते हुए कि इस क्षेत्र में 10 लाख से अधिक लोग काम करते हैं, सरकार को केवल कॉरपोरेट मुनाफे से इतर आजीविका के प्रश्न को भी ध्यान में रखना चाहिए।
Date: 28-09-24
निजीकरण बनाम कल्याणकारी राज्यपरमजीत सिंह वोहरा
निजी क्षेत्र का अनावश्यक पक्ष लेना अब बंद करना होगा। अब ऐसे आर्थिक सुधारों की नींव रखने का समय आ गया है, जिसमें ‘कल्याणकारी राज्य’ के लिए निजी क्षेत्र को भी बराबर का जिम्मेदार बनाया जाए। इस समय स्थितियां बड़ी विपरीत हैं। हम आर्थिक तरक्की के भ्रम में दिन-ब-दिन खुद को हांक रहे हैं। दूसरी तरफ, इस बात की स्वीकृति भी दे रहे हैं कि देश के गरीब आदमी की आय बढ़ाने के लिए एक लंबा सफर तय करना अभी बाकी है। गरीबी दूर करने के लिए आर्थिक असमानता एक मुख्य बाधा है। इन दिनों एक अजीब द्वंद्व या छलावा भी दिखता है, जब कल्याणकारी राज्य की जिम्मेदारी के साथ-साथ सरकारों द्वारा अपने चुनावी वादों को पूरा करने के लिए सामाजिक कल्याण को आर्थिक नीतियों में ज्यादा तरजीह दी जा रही है। इससे आर्थिक विकास पर बहुत विपरीत असर पड़ रहा है। राजनीतिक दलों के चुनावी घोषणापत्रों में वह सब कुछ शामिल हो रहा है, जो लोकलुभावन अधिक है, सर्वहित के लिए कम कल्याणकारी है।इससे राज्यों पर आर्थिक दबाव लगातार बढ़ रहा है।
नब्बे के दशक में उदारीकरण से निजी क्षेत्र को आगे बढ़ने का मौका मिला, पर अब समय आ गया है कि कल्याणकारी राज्य और सामाजिक कल्याण दोनों का मिश्रण गरीबी दूर करने के लिए एक मुख्य उद्देश्य के तौर पर आर्थिक नीतियों में जगह ले और उसके संचालन की जिम्मेदारी सरकारों के साथ-साथ निजी क्षेत्र भी उठाए। भारत में कभी आर्थिक नीतियों में निजी क्षेत्र को एकाधिकार नहीं दिया गया। आजादी के बाद से आर्थिक नीतियां सरकारी संरक्षण में ही रहीं। हालांकि आर्थिक विकास के आंकड़े इस बात की गवाही देते हैं कि सरकारी संरक्षण में बनीं, पलीं और बढ़ीं आर्थिक नीतियां, जिन्हें लोकहितकारी राज्य बनाने की सोच से देश के आर्थिक विकास को एक सुस्त वृद्धि ही मिली। इसी कारण हम विकसित मुल्कों की तुलना में पिछड़ते गए।
इन दिनों अमेरिका में आर्थिक नीतियों का विरोध हो रहा है। वहां इस बात की मांग उठ रही है कि अर्थव्यवस्था का रुख अब पूंजीवाद से समाजवाद की तरफ मुड़ना चाहिए। इसके बाद से यह चर्चा विश्व की सभी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में भी शुरू हो गई है कि बदलाव का रुख उन्हें भी अपनाना होगा या उसमें अभी देरी है। भारत में भी पिछले कुछ अरसे से यह सुनने को मिलता है कि देश में पूंजीपतियों की संख्या बढ़ रही है, जबकि गरीबी कम नहीं हो रही। यह कोई हैरत की बात नहीं, बल्कि पूंजीवादी आर्थिक नीतियों के चलते पैदा हुई आर्थिक विषमता का परिणाम है। समाज में पूंजीवाद का विरोध इसलिए भी जायज लगता है कि करीब सभी जगह सरकारें आर्थिक विकास की बागडोर पूरी तरह निजी क्षेत्र के हवाले कर देती हैं और कई दफा उनकी गलतियों के बावजूद उन्हें संरक्षित भी करती हैं। अमेरिका में तो यह सब बहुत आम हो गया है। 2005-06 में निजी क्षेत्र की गलत नीतियों के चलते ही अमेरिका में मंदी का सामना करना पड़ा। मगर यह सोचना भी आवश्यक है कि क्या समाजवाद के माध्यम से आर्थिक विकास को वह तेजी दी जा सकती है, जो पूंजीवाद की नीतियों से मिलती है?
आर्थिक नीतियों के सरकारी संरक्षण के दौरान भारत में 1960 से 1990 के तीन दशकों में प्रति व्यक्ति औसत आय में वृद्धि मात्र 1.6 फीसद थी। 1990 के बाद से अब तक यह 3.6 फीसद रही। वहीं वर्ष 2005 से वर्ष 2010 तक का समय आर्थिक सुधारों के कारण काफी तेजी से बढ़ने का था। इसलिए वृद्धि दर 4.3 फीसद थी और 2010 के बाद से प्रति व्यक्ति विकास दर ने अपने अधिकतम स्तर 4.9 फीसद को छुआ। गौरतलब है कि 1991 के बाद भारतीय आर्थिक नीतियों में उदारीकरण को सम्मिलित कर लिया गया था और फिर सरकारी नियंत्रण लगातार कम होता चला गया। वर्ष 1975 तक भारत, चीन और वियतनाम में प्रति व्यक्ति आय लगभग बराबर थी, पर वर्ष 2000 के बाद से चीन और वियतनाम में प्रति व्यक्ति आय 35 से 50 फीसद के बराबर बढ़ी। आज चीन में प्रति व्यक्ति आय भारत से ढाई गुना अधिक है। इसका कारण भारत में आर्थिक नीतियों में उदारीकरण को काफी देर से शामिल किया जाना रहा है और परिणामस्वरूप प्रति व्यक्ति आय भी एक समय के बाद ही बढ़ी।
अगर पूंजीवादी आर्थिक नीतियों से आर्थिक विकास तेजी से बढ़ता है, तो फिर इसका आमजन में विरोध क्यों हैं? इसके पीछे कुछ संभावित कारणों में से एक, सरकारों द्वारा निजी क्षेत्र को बहुत हद तक संरक्षित करना है। अमेरिका के संदर्भ में इसे कई दफा दिवालिया होने वाली कंपनियों को बचाने से समझा जा सकता है, तो वहीं भारत के संदर्भ में इसे व्यक्तियों की वित्तीय आय पर लगने वाला कर तुलनात्मक रूप से कंपनियों के मुनाफे पर लगने वाले कर से बहुत अधिक है। इसकी पुष्टि आर्थिक आंकड़ों से हो जाती है। वर्ष 2023-24 में भारतीय कंपनियों से मिलने वाले कर की राशि 9.3 लाख करोड़ थी, जो भारतीय अर्थव्यवस्था के जीडीपी का 3.11 फीसद था। वहीं व्यक्तिगत आयकर का संग्रह 10.22 लाख करोड़ के आसपास था, जो जीडीपी का 3.45 फीसद था। क्या इसका अर्थ है कि भारतीय कंपनियां कम मुनाफा कमा रही हैं, इसलिए वे कम कर का भुगतान कर रही है? यह एक गलत अवधारणा है।
एक ताजा आंकड़े के मुताबिक तकरीबन पैंतीस हजार भारतीय कंपनियों का कर से पूर्व का मुनाफा पिछले पांच वर्षों में करीबन 144 फीसद बढ़ा है। इसके अलावा स्टाक मार्केट में सूचीबद्ध पांच हजार कंपनियों के मुनाफे में पिछले पांच वर्षों में 186 फीसद की बढ़ोतरी हुई, जबकि उनके द्वारा दिया गया कर 35 फीसद ही बढ़ा है।
कंपनियों के कर संग्रह में जारी इस कमी के चलते ही पिछले पांच वर्षों में यह जीडीपी के 3.51 फीसद से गिर कर 3.11 फीसद पर आ गया है। वहीं व्यक्तिगत कर संग्रह 2.44 से बढ़कर 3.45 फीसद हो गया है। इसे इस तरह भी समझा जा सकता है कि 1991 के आर्थिक सुधारों के दौर में कंपनियों पर कर की दर 45 फीसद थी, जो वर्तमान समय में घट कर मात्र आधी रह गई है। हालांकि, इसके पीछे का मुख्य कारण भारतीय कंपनियों के उत्पादों को वैश्विक बाजार में प्रतिस्पर्धात्मक कीमत पर लाना है। भारत के संदर्भ में आर्थिक नीतियों में फेरबदल को सदैव लोकतंत्र की छाया में देख कर चलना जरूरी है। मगर भारत ने कभी पूर्ण रूप से पूंजीवाद के प्रारूप को नहीं अपनाया। इसने हमेशा कल्याणकारी राज्य की छवि को बरकरार रखने की कोशिश की है। इस पक्ष पर वर्तमान राजनीति में पारस्परिक विरोधाभास बहुत अधिक है, जिससे आमजन निष्कर्ष नहीं निकाल पा रहा कि सरकार की नीतियां उनके विकास के लिए हैं या उन्हें लुभाने का एक तरीका।
Date: 28-09-24
मुआवजे का हकसंपादकीय
सुप्रीम कोर्ट ने घरेलू हिंसा अधिनियम पर ऐतिहासिक फैसला सुनाया। शीर्ष अदालत ने कहा कि घरेलू हिंसा से महिलाओं का संरक्षण कानून 2005, नागरिक संहिता है जो भारत में हर महिला पर लागू होता है। चाहे उस महिला की धार्मिक संबद्धता और सामाजिक पृष्ठभूमि कुछ भी हो। शीर्ष अदालत ने भरण-पोषण और मुआवजा देने से संबंधित मामले में कर्नाटक हाई कोर्ट के आदेश को चुनौती देने वाली अपील पर फैसला सुनाया। याचिकाकर्ता महिला ने अधिनियम की धारा 12 के तहत अपील की थी जिसके पति को फरवरी, 2015 में बारह हजार रुपये मासिक और एक लाख रुपये मुआवजा देने के निर्देश दिए थे। पति की अधिनियम 25 के तहत इस आदेश में परिवर्तन की अपील को खारिज कर दिया गया था। महिला के हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाने पर उसकी याचिका खारिज कर दी गई। मजिस्ट्रेट को पति के आवेदन पर विचार करने को कहा गया। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा विवेकाधिकार का प्रयोग करते हुए मजिस्ट्रेट को परिस्थितियों में बदलाव के कारण संतुष्ट होना होगा जिसके लिए परिवर्तन, संशोधन का आदेश पारित करने की आवश्यकता है। साथ ही, यह भी कहा कि पीड़ित अधिनियम के प्रावधानों के तहत आदेश में परिवर्तन, संशोधन या निरस्तीकरण की मांग कर सकता है। अपने समाज में घरेलू हिंसा से बहुत महिलाएं जूझती हैं। उनके साथ न सिर्फ नियंत्रणकारी पति मार-कूट, जानलेवा हमले तक करते हैं। दैहिक – यौन, भावनात्मक- मनोवैज्ञानिक दुर्व्यवहार से त्रस्त होने के बाद ही कोई स्त्री न्याय की गुहार लगाती है। याचिककर्ता नौ सालों से अपने कानूनी अधिकार के लिए अदालती चक्कर लगा रही है। यहां सवाल केवल आदेशित भरण-पोषण राशि में वृद्धि या कमी का नहीं है, बल्कि यह देश की किसी भी महिला नागरिक को उसके हकों से वंचित करना भी है। चूंकि सरकारें अपने मुनाफे के लोभ में समुदायों या पृष्ठभूमि के आधार पर महिलाओं के भरण-पोषण और मुआवजे संबंधी कानूनों में पेंचीदगियां उत्पन्न करती रही हैं। हर महिला को यह अधिकार देकर अदालत ने घरेलू हिंसा कानून को पारदर्शी बनाने के साथ ही दूरगामी सकारात्मक परिणामों के लिए पैमाना तय कर दिया। परिवार अदालतें भी घरेलू हिंसा के मामले में इसका प्रयोग कर महिलाओं को उनका हक दिला सकेंगी। दरअसल, महिलाओं के भरण-पोषण संबंधी पेचीदे कानूनों का कार्यान्वयन अच्छे से न हो पाने से महिलाओं का संत्रास बढ़ा है।
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परिचय –
बांस को ‘गरीबों की लकड़ी‘ तथा ‘हरा सोना’ कहा जाता है। इसमें किसानों की आमदनी बढ़ोत्तरी की संभावना देखते हुए सरकार ने “राष्ट्रीय बांस मिशन” तथा, एकीकृत बागवानी विकास मिशन को नए सिरे से शुरू किया है, जिससे देश में बांस की खेती को बढ़ावा दिया जा सकेगा।
नीति आयोग का अनुमान है कि 2025 तक दुनिया में बांस का बाजार लगभग 98.3 अरब डॉलर का हो जाएगा। चीन के बाद भारत सबसे बड़ा बांस उत्पादक देश है।
भारतीय वन अधिनियम में संशोधन –
2017 में इसमें संशोधन कर बांस को पेड़ के बजाय घास की श्रेणी में डाला गया। इससे इसकी कटाई, ढुलाई तथा बिक्री पर लगे सभी तरह के प्रतिबंध हट गए।
अब अन्य फसलों की तरह इसकी भी खेती की जा सकती है। इसे बेचने के लिए न तो किसी लाइसेंस की जरूरत है और न ही वन विभाग या किसी अन्य सरकारी एजेंसी की अनुमति लेने की।
बांस के कुल उत्पादन का 50% पूर्वोत्तर भारत में होता है। यह मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, पश्चिमी- घाट आदि में भी होता है।
बांस की खेती से लाभ –
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28 September 2024
प्रश्न 480 – वर्तमान भारत अपने पड़ोसी देशों से राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी जिन चुनौतियों का सामना कर रहा है, उनका विवरण दें। (200 शब्द)
Question 480 – Describe the national security challenges that India is currently facing from its neighboring countries. (200 words)
नोट : इसका उत्तर आपको हमें नहीं भेजना है, यह आपके स्वयं के अभ्यास के लिए है।
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Date: 27-09-24
समस्या न बनने पाए श्रीलंकाहर्ष वी. पंत और आदित्य जी. शिवमूर्ति, ( पंत आब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में उपाध्यक्ष और शिवमूर्ति एसोसिएट फेलो हैं )
श्रीलंका के हालिया चुनाव में जनता विमुक्ति पेरामुना यानी जेवीपी को जीत हासिल हुई और उसके नेता अनुरा कुमारा दिसानायके नए राष्ट्रपति चुने गए। ऐसा प्रतीत होता है कि जनता ने ढांचागत बदलाव और भ्रष्टाचार मुक्त सरकार के लिए जनादेश दिया है। नई सरकार की विदेश नीति को लेकर तमाम अटकलें लगाई जा रही हैं। दिसानायके के अतीत और वैचारिक झुकाव को देखते हुए यह स्वाभाविक भी है। हालांकि वर्तमान आर्थिक एवं भूराजनीतिक परिदृश्य को देखते हुए यही संभावना अधिक है कि श्रीलंका उसी राह पर आगे बढ़ेगा, जिसमें वह भारत और चीन के साथ संतुलन साध सके। सुशासन और सुधारों को लेकर नई सरकार से जुड़ी उम्मीदें भी दीर्घकाल में भारत और उसके सहयोगियों को लाभ पहुंचाएंगी।
जेवीपी पिछली सदी के सातवें दशक में अस्तित्व में आई। अपने मार्क्सवादी चिंतन और सिंहली राष्ट्रवादी विचारधारा के चलते आरंभ से ही उसका रवैया भारत विरोधी रहा। दक्षिण एशिया में भारतीय ‘विस्तारवाद’ से निपटना उसके वैचारिक लक्ष्यों में से एक रहा। इसने 1971 में पहली बार श्रीलंका राज्य के विरुद्ध विद्रोह किया, जिसे तुरंत ही दबा दिया गया। तब कोलंबो एयरपोर्ट की सुरक्षा के अलावा सरकार के अनुरोध पर भारत ने सामुद्रिक निगरानी का भी काम किया। हालांकि 1987 से 1990 के बीच दूसरे दौर के इसके विद्रोह में भारत विरोधी तेवर कहीं तीखे थे। जेवीपी ने श्रीलंका-भारत के उस समझौते का भी विरोध किया था, जिसके तहत श्रीलंका में भारतीय शांति सेना को अनुमति दी गई थी।
अपनी स्वीकार्यता को बढ़ाने और भ्रष्ट एवं अक्षम कुलीन तबके को हटाने में भी इस संगठन ने अपने भारत विरोधी रवैये को नए तेवर दिए। वर्ष 1994 में जेवीपी सशस्त्र संघर्ष की राह छोड़ मुख्यधारा की राजनीति से जुड़ी, मगर मतदाताओं की पारंपरिक पसंद नहीं बन पाई। जब 2022 के आर्थिक संकट में लोग स्थापित व्यवस्था और नेताओं से आजिज आ गए, तब दिसानायके की लोकप्रियता बढ़नी शुरू हुई। जेवीपी के बढ़ते ग्राफ ने भारत को भी इस पार्टी के साथ सक्रियता बढ़ाने की दिशा में उन्मुख किया। चूंकि चुनावी नतीजों को लेकर भारी अनिश्चितता जुड़ी थी तो भारत के लिए सत्ता के प्रमुख दावेदारों के साथ संपर्क बनाए रखना जरूरी था। इसी सिलसिले में चुनावों से पहले भारत ने श्रीलंका के विभिन्न दलों के नेताओं को आमंत्रित किया। विदेश मंत्री एस. जयशंकर और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल ने कई नेताओं से बात भी की। दिसानायके भी इन नेताओं में शामिल रहे।
भारत की व्यावहारिक सक्रियता उसकी पड़ोसी-प्रथम नीति और सागर दृष्टिकोण के अनुरूप ही है। चूंकि समय के साथ श्रीलंका का भूराजनीतिक महत्व और बढ़ा है तो भारत भी वहां अपनी मौजूदगी बढ़ाकर लाभ उठाने के प्रयास में लगा है। जिस समय श्रीलंका आर्थिक दुश्वारी और अस्तित्व के संकट से जूझ रहा था, तब भारत ने चार अरब डालर के कर्ज के साथ ही करेंसी स्वैप, अनुदान और क्रेडिट लाइन जैसे कई उपायों से उसे मदद पहुंचाई। इसके अलावा कई आवश्यक वस्तुओं और दवाओं की आपूर्ति की। इस पड़ोसी देश पर चीन की बढ़ती पकड़ को देखते हुए भारत ने अपने प्रयासों की गति और बढ़ाई। इसी का नतीजा है कि भारत श्रीलंका में एयरपोर्ट और बंदरगाहों को अपग्रेड करने के साथ ही त्रिनकोमाली क्षेत्र के विकास और अक्षय ऊर्जा, रिफाइनरी, एनर्जी ग्रिड एवं पेट्रोलियम पाइपलाइन से जुड़ी परियोजनाओं में निवेश कर रहा है। तमाम भारतीय कंपनियां श्रीलंका सरकार के उपक्रमों में निवेश में दिलचस्पी दिखा रही हैं। दोनों देश एक लैंड ब्रिज बनाने पर भी चर्चा कर रहे हैं। आर्थिक एवं तकनीकी सहयोग अनुबंध (ईटीसीए) पर भी बात चल रही है।
जेवीपी के स्तर पर भी बदलाव की आहट दिखती है। उसे महसूस हो रहा है कि समकालीन विश्व में शीत युद्ध वाली मानसिकता से काम नहीं चल सकता। चुनावों के दौरान भी यह रवैया दिखा। उसे यह लगता है कि अपनी अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने में भारत का भूराजनीतिक कद और उसकी आर्थिकी बहुत मददगार हो सकती है। दिसानायके ने श्रीलंका के विकास और बुनियादी ढांचे को उन्नत बनाने के जो चुनावी वादे किए हैं, उनकी पूर्ति भारत के साथ सहयोग से ही संभव हो सकती है। सरकार पर्यटन और सूचना प्रौद्योगिकी के जरिये भी राजस्व बढ़ाना चाहती है। उसमें भी भारत की अहम भूमिका होगी। इसलिए भारत की चिंताओं पर गौर करना जेवीपी के लिए जरूरी होगा। उसके घोषणा पत्र में भी उल्लेख था कि किसी भी देश विशेषकर भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा को जोखिम में डालने वाली किसी भी प्रकार की गतिविधि को उसकी जमीन और जल एवं वायु सीमा से इजाजत नहीं दी जाएगी। इसके बाद भी भारत को देखना होगा कि श्रीलंका उसके हितों के लिए समस्या न बनने पाए।
यह तय है कि नई सरकार चीन के साथ भी संतुलन साधने की दिशा में बढ़ेगी। बीजिंग भी अपनी साम्यवादी विचारधारा को देखते हुए नई सरकार के साथ सक्रियता बढ़ाएगा। दिसानायके भी चुनाव पूर्व भारत से पहले चीन का दौरा कर चुके हैं। करीब सात अरब डालर के साथ बीजिंग श्रीलंका के लिए सबसे बड़े ऋणदाताओं में से एक बना हुआ है। हिंद महासागर क्षेत्र में अपनी स्थिति और मजबूत करने के लिए चीन के ऐसे प्रयास जारी रहेंगे। जैसे हंबनटोटा में रिफाइनरी के लिए 4.5 अरब डालर के निवेश की पेशकश श्रीलंका के लिए जरूर लुभावनी होगी, जिससे उसे अपनी आर्थिकी को पटरी पर लाने में मदद मिलेगी।
हालांकि चुनाव जीतने के बाद वादों को पूरा करने की नई चुनौती उत्पन्न होती है। देखना होगा कि दिसानायके इस चुनौती का सामना कैसे करते हैं। दिसानायके ने कुछ कदम उठाने भी शुरू कर दिए हैं, जिसका संभावित निवेश पर कुछ असर पड़ सकता है। जैसे अदाणी एनर्जी की परियोजना को लाल झंडी दिखाना। हो सकता है कि वह कुछ ऐसे फैसले लें, जो चीन के गले न उतरें, जो तमाम तिकड़मों के सहारे देशों के शोषण की योजना पर काम करता है। हालांकि अगर दिसानायके नीर-क्षीर विश्लेषण के साथ इस दिशा में आगे बढ़ते हैं तो यह भारत और उसके जैसे सोच वाले साझेदारों के लिए ही फायदेमंद होगा, क्योंकि तब चीन के लिए अनुचित लाभ की गुंजाइश खत्म हो जाएगी। साथ ही श्रीलंका के तंत्र में पारदर्शिता एवं जवाबदेही भी बढ़ेगी।
Date: 27-09-24
भारत जैसी उभरती ताकत के लिए चुनौतियांश्याम सरन, ( लेखक विदेश सचिव रह चुके हैं )
भारत अब भी विकासशील देश की पहचान से बाहर नहीं निकल पाया है। इसकी प्रति व्यक्ति आय 2,500 डॉलर है, जो आय एवं धन में व्यापक असमानता की तरफ इशारा करती है। मानव विकास सूचकांक में भारत इस समय 193 देशों में 134वें स्थान पर है। मानव विकास सूचकांक किसी देश की आबादी के सामाजिक एवं आर्थिक विकास के आकलन का अधिक उपयुक्त माध्यम है। विकसित भारत का स्वप्न साकार करने का मार्ग लंबा प्रतीत हो रहा है और लगभग निश्चित है कि 2047 में जब देश अपनी स्वतंत्रता की 100वीं वर्षगांठ मनाएगा तब तक यह लक्ष्य पूरा नहीं होने जा रहा है।
भारत को प्रति व्यक्ति आय के आधार पर बेशक निम्न से मध्यम आय वर्ग वाले देश की श्रेणी में रखा जा सकता है मगर यह उच्च सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) वाले देशों में शुमार है। भारत की अर्थव्यवस्था का आकार इस समय 3.5 लाख करोड़ डॉलर है और इस लिहाज से यह दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था मानी जाती है। किंतु शेष बड़ी अर्थव्यवस्थाओं तथा इसके बीच अंतर काफी अधिक है।
वैश्विक जीडीपी में अमेरिका की हिस्सेदारी 26.3 प्रतिशत, यूरोपीय संघ की 17.3 प्रतिशत और चीन की 16.9 प्रतिशत है लेकिन भारत की हिस्सेदारी महज 3.6 प्रतिशत है। चूंकि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में दूसरे की तुलना में आपका वजन काफी मायने रखता है, इसलिए वृहद-आर्थिक दृष्टि से दुनिया में भारत का रुतबा औसत स्तर का माना जा सकता है।
हालांकि कुछ ऐसे कारक भी हैं, जो भारत को वजनदार बना रहे हैं। भारत की आबादी दुनिया में अब सबसे अधिक हो गई है और इसमें युवाओं की संख्या अधिक है। भारत के लिए संभवतः यह बड़ी ताकत है क्योंकि चीन सहित दुनिया के अन्य देशों में आबादी तेजी से कम हो रही है और उसमें भी उम्रदराज लोगों की तादाद लगातार बढ़ रही है।
भारत दुनिया की दूसरी सबसे तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था है और इसका जीडीपी 6 से 6.5 प्रतिशत दर से बढ़ रहा है। अगर वृद्धि की यह दर बरकरार रही तो वैश्विक जीडीपी में ठहराव आने पर भारत आर्थिक एवं वाणिज्यिक संभावनाओं का बड़ा केंद्र बन जाएगा। भारत जलवायु परिवर्तन, जन स्वास्थ्य, खाद्य एवं ऊर्जा सुरक्षा तथा तकनीक में बदलाव जैसी चुनौतियों से निपटने में सकारात्मक भूमिका निभा रहा है।
अंतरराष्ट्रीय समस्याएं इतनी पेचीदा होती हैं कि दुनिया के सबसे शक्तिशाली देशों या औद्योगिक एवं विकासशील देशों के समूह जी-7 के लिए भी इनका व्यापक समाधान खोज पाना मुश्किल होता है। ऐसी चुनौतियों से निपटने के लिए शक्तिशाली देश बाकी दुनिया पर अब पहले की तरह वैश्विक नियम-कायदे नहीं लाद सकते।
तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाएं किसी विशेष क्षेत्र में वैश्विक व्यवस्था का आकार निर्धारित करने में आगे नहीं आ पाती हैं मगर वे ऐसी व्यवस्था लागू होने से रोकने में जरूर अपनी ताकत का इस्तेमाल करती हैं। इससे यह संदेश जा सकता है कि तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाएं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होने वाले प्रयासों में बाधा डालती हैं। मगर इसके ठीक उलट वे पहले के मुकाबले अधिक कारगर तरीके से अपने हितों की रक्षा कर पा रही हैं। भारत अपने हितों की रक्षा के लिए ऐसे कदम उठा चुका है और वह आगे भी ऐसा करेगा। मगर इसे वैश्विक स्तर पर पेचीदा संवाद प्रक्रिया में अपनी बात कारगर तरीके से रखने के लिए अपनी क्षमता बढ़ानी होगी।
भारत के आर्थिक एवं सामाजिक विकास सूचकांकों में मेल नहीं दिखता है। सामाजिक विकास सूचकांकों में यह अब भी पीछे चल रहा है मगर इस बीच दुनिया में भारत की छवि में काफी सुधार हुआ है। भारत के विकास का यह ढांचा दुनिया की स्थापित अर्थव्यवस्थाओं में पाए जाने वाले तौर-तरीकों से काफी अलग है। वैश्विक पटल पर दूसरे देशों की अहमियत उनके लोगों एवं सामाजिक कल्याण में सतत सुधारों के साथ-साथ बढ़ती जाती है।
तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाएं दुनिया में सक्रिय भूमिका निभाने में उलझन का सामना करती हैं। इन देशों से अपेक्षा की जाती है कि वे अधिक जिम्मेदारी उठाएं और साझा वैश्विक हितों में अधिक योगदान दें। मगर इन देशों को उन वैश्विक ढांचे की तलाश रहती है जो उन्हें घरेलू चुनौतियों से निपटने के लिए आवश्यक संसाधन और जरिये मुहैया कराएं। भारत जैसे देशों के लिए ऐसे ढांचे की तलाश जरूरी है क्योंकि वह विकासशील देश से बड़ी उभरती शक्ति बनने की तरफ कदम बढ़ा रहा है।
भारत जैसी तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए वैश्विक स्तर पर बड़ी भूमिका निभाना और देश के भीतर चुनौतियों से निपटने की अनिवार्यता के बीच संतुलन स्थापित करना आसान नहीं है मगर उसके लिए यह जरूरी है। विभिन्न देशों के साथ साझेदारी करने, छोटे स्तर के समझौतों, क्षेत्रीय एवं कार्यशील समूहों में सक्रिय भागीदारी निभाने में भारत की सक्रियता इसी ओर इशारा करती है। भारत उन विशेष उद्देश्यों के लिए तैयार गठबंधनों में हिस्सा ले रहा है और यह निर्णय उसके लिए लाभकारी भी रहा है।
भारत को ‘क्वाड’ (अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ) और ‘शांघाई सहयोग संगठन’ (जिसमें चीन, रूस, ईरान, पाकिस्तान और पश्चिम एशिया हैं) का हिस्सा होने में किसी तरह का विरोधाभास नहीं दिखता। न ही इसे ब्रिक्स (ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका) में चीन जैसे देशों के साथ सहयोग करने में कोई एतराज है। इसी तरह बिम्सटेक (जिसमें भारत, बांग्लादेश, भूटान और श्रीलंका तथा दक्षिण-पूर्व एशिया से थाईलैंड और म्यांमार शामिल हैं) का हिस्सा बनकर भी यह अन्य देशों के साथ सहयोग कर रहा है।
भारत ने जी-20 सम्मेलन का सफल आयोजन किया है। ये सभी प्रयास भारत को वैश्विक शक्ति बनाते हैं। देश के भीतर भारत की क्षमता और दुनिया में इसकी छवि के बीच तालमेल का अभाव इसकी विदेश नीति के लिए जटिल चुनौतियां खड़ी करता है। दुनिया में बढ़ता कद भारत के लिए संतुष्टि की बात है मगर आर्थिक, तकनीकी और सुरक्षा क्षमताओं के लिहाज से अधिक ताकतवर नहीं होने से वैश्विक समीकरण को नई दिशा देने में भारत की भूमिका सीमित रह जाती है।
हमारी मुख्य चिंता अपने नागरिकों के आर्थिक और सामाजिक विकास से जुड़ी है। इस लिहाज से वैश्विक ताने-बाने में भारत की स्थित सहज नहीं लगती है। व्यापार की बात हो या जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न चुनौतियां, भारत पूरी दुनिया को सार्वजनिक उपभोग का सामान देते हैं और दूसरे देशों से ऐसा सामान लेते भी हैं। जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों से निपटने के अधिक सहज नियम-कायदों की हिमायत करने या अपने विकास की जरूरतों के लिए अंतरराष्ट्रीय वित्त एवं तकनीक हस्तांतरण की मांग करने में हमारी प्राथमिकता चीन सहित दूसरे देशों से अलग है।
प्रश्न यह है कि भारत को वैश्विक स्तर पर अग्रणी भूमिका निभाने वाले देश के रूप में उससे लगाई जा रही उम्मीदों को कब पूरा करना चाहिए और कब इनका विरोध करना चाहिए, जबकि ऐसा करना उसकी गरीब आबादी के लिए नुकसानदेह हो सकता है? क्या हमें दुनिया के निम्न आय वर्ग वाले विकासशील देश के रूप में अपनी पहचान को दुनिया में एक बड़ी ताकत बनने की ख्वाहिश की तुलना में अधिक तरजीह देनी चाहिए?
भारत के लिए यह पसोपेश वाली स्थिति है, जो अगले कई वर्षों तक बनी रहेगी। प्रत्येक स्थिति में हमें संतुलन साधना होगा ताकि वैश्विक स्तर पर बड़े देश की भूमिका निभाते समय हमारे करोड़ों नागरिकों के बुनियादी विकास पर कोई असर न पड़े। यह संतुलन भारत के नागरिकों के हितों के अनुरूप रहना चाहिए।
Date: 27-09-24
क्वाड देशों के अंतर्विरोधब्रहाद्वीप अलूने
अंतरराष्ट्रीय राजनीति में सामूहिक सुरक्षा की अवधारणा एक मजबूत और स्थायी तंत्र है, जो शांति और सुरक्षा सुनिश्चित करने में मदद करती है। भारत, अमेरिका, जापान और आस्ट्रेलिया के हिंद प्रशांत में गहरे आर्थिक और सामरिक हित है, जिन्हें चीन से लगातार चुनौती मिल रही है। क्वाड इन चारों देशों का प्रतिनिधित्व करने वाला एक रणनीतिक गठबंधन है, जिसे आपसी सहयोग को बढ़ावा देने के लिए स्थापित किया गया है। इस गठबंधन का मुख्य उद्देश्य हिंद प्रशांत क्षेत्र में सुरक्षा, आर्थिक और रणनीतिक सहयोग को मजबूत करना है। क्वाड, शक्ति संतुलन की दृष्टि से भी बेहद महत्त्वपूर्ण है। यह सदस्य देशों के बीच राजनीतिक और सैन्य संबंधों को मजबूत करता है, जो क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखने में सहायक है।
इस समूह के शीर्ष नेताओं के बीच पिछले चार-पांच वर्षों से नियमित रूप से बैठकें और संवाद की प्रक्रिया तो चल रही है, लेकिन इसके सदस्य देशों- भारत, अमेरिका, जापान और आस्ट्रेलिया- की राजनीतिक और आर्थिक प्राथमिकताएं अलग-अलग होने से, इस समूह के राष्ट्रों के बीच ही अंतर्विरोध देखा जा रहा है। यही कारण है कि क्वाड का प्रभाव न तो सामरिक और कूटनीतिक स्तर पर दिखाई पड़ता है और न ही चीन से निपटने के लिए कोई प्रभावी कार्ययोजना और दीर्घकालिक रणनीति आगे बढ़ सकी है। अमेरिका में आयोजित क्वाड शिखर सम्मेलन में दक्षिण चीन सागर के सैन्यीकरण पर चिंता तो जताई गई, लेकिन कुछ बिंदुओं पर आपसी मतभेद भी दिखाई दिए। वहीं अमेरिका का रुख भारत को आशंकित करने वाला रहा।
भारत में खालिस्तानी गतिविधियों को लेकर सुरक्षा चिंताएं रही हैं और इसकी गंभीरता का अहसास अमेरिका को भी है। इसके बाद भी प्रधानमंत्री की यात्रा के ठीक पहले खालिस्तानी समर्थकों के साथ अमेरिकी प्रशासन ने वाइट हाउस में एक बैठक की। अमेरिका में कई समूह मानवाधिकार और सामाजिक न्याय के मुद्दों पर ध्यान केंद्रित करते हैं और अमेरिकी प्रशासन इसका इस्तेमाल वैश्विक स्तर पर राजनीतिक दबाव बढ़ाने के लिए करता है। खालिस्तानी आतंकी पन्नू की हत्या की साजिश को लेकर न्यूयार्क की एक अदालत में भारत के कई लोगों को समन जारी किया था। अमेरिकी अदालत और बाइडेन प्रशासन के कदम भारत विरोध और भारत की सुरक्षा से जुड़े महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों की छवि धूमिल करने तथा भारत की एकता तथा अखंडता को चुनौती देने के तौर पर देखे जाने चाहिए।
पन्नू के पास अमेरिका के साथ कनाडा की भी नागरिकता है। अमेरिका और कनाडा के मजबूत द्विपक्षीय संबंध हैं। कनाडा की जमीन खालिस्तानियों के लिए सुरक्षित मानी जाती है तथा वहां की राजनीति में कई पृथकतावादी खालिस्तानी नेता हावी हैं। ऐसे में अमेरिका का रुख कनाडा समर्थक और भारत विरोधी दिखाई पड़ रहा है।
भारत और अमेरिका के संबंध हाल के वर्षों में काफी मजबूत हुए हैं। दोनों देशों के बीच संयुक्त सैन्य अभ्यास, हथियारों की बिक्री और रक्षा प्रौद्योगिकी का आदान-प्रदान हो रहा है। दोनों देश एक-दूसरे के लिए महत्त्वपूर्ण व्यापारिक भागीदार हैं तथा कई मुद्दों पर साझा हित भी रखते हैं। इन सबके बाद भी कई मामलों में अमेरिका की कूटनीति भारत की परेशानियां बढ़ा रही है। खासकर पड़ोसी राष्ट्र बांग्लादेश में शेख हसीना के तख्तापलट में अमेरिका की भूमिका उभरना और इसके बाद अंतरिम सरकार को अमेरिकी आर्थिक मदद से भारत की सुरक्षा चुनौती बढ़ गई है। हिंद महासागर से लगे बांग्लादेश में चीन के बंदरगाह हैं और भविष्य में चीन, पाकिस्तान और बांग्लादेश का सुरक्षा घेरा भारत के साथ क्वाड के अन्य देशों की चुनौतियां भी बढ़ा सकता है।
बांग्लादेश हिंद महासागर में दक्षिण एशिया और पूर्वी एशिया के बीच एक महत्त्वपूर्ण व्यापारिक मार्ग के केंद्र में है। शेख हसीना के सत्ता में रहने से भारत ने बांग्लादेश और चीन के सामरिक सहयोग को एक सीमा से आगे नहीं जाने दिया था। अब बांग्लादेश में शेख हसीना के सत्ता से जाने के बाद पाकिस्तान और चीन का समर्थन करने वाली राजनीतिक ताकतों को अमेरिकी मदद ने क्वाड की सामूहिक सुरक्षा की अवधारणा को ही ध्वस्त कर दिया है।
क्वाड के एक और साझेदार आस्ट्रेलिया से भी भारत के रिश्ते स्थिर नहीं हैं। 2020 में आस्ट्रेलिया ने दो भारतीय नागरिकों को जासूसी के आरोप में निष्कासित कर दिया था और अब क्वाड सम्मेलन के दौरान अमेरिका की यात्रा पर आए आस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज ने मीडिया के सामने इसे कूटनीतिक तरीके से उठाने की बात स्वीकार की। ऐसा लगता है कि अल्बनीज कनाडा के साथ खड़े दिखाई दे रहे हैं। दुर्भाग्यपूर्ण है कि क्वाड जैसे बहुआयामी सुरक्षा संगठन के केंद्र में रहने वाले भारत के अमेरिका और आस्ट्रेलिया के साथ मजबूत संबंध होने के बाद भी, इन दोनों देशों ने खालिस्तानी आतंकियों पर दबाव डालने के लिए भारत की मदद करने में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई है। इन सबके बीच क्वाड देशों की चीन के साथ आर्थिक निर्भरता भी आपसी संबंधों के अलग-अलग आयाम प्रदर्शित करती है। सीमा पर भारत और चीन के जटिल संबंधों के बाद भी आर्थिक मोर्चे पर स्थितियां अलग हैं। चीन भारत का एक बड़ा व्यापारिक भागीदार है। इसी प्रकार आस्ट्रेलिया की अर्थव्यवस्था के लिए चीन एक महत्त्वपूर्ण बााजार है। आस्ट्रेलिया चीन से संतुलित संबंधों का हिमायती रहा है। वहीं जापान और अमेरिका के बेहद मजबूत संबंध हैं। अमेरिका और जापान रक्षा प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में सहयोग कर रहे हैं, जिसमें नई तकनीकों का विकास और उसे साझा करना शामिल है।
दरअसल, क्वाड समूह में चीन को लेकर अमेरिका ज्यादा मुखर दिखाई पड़ता है। वह चीन को एक प्रमुख रणनीतिक प्रतिस्पर्धी मानता है। इसका मुख्य कारण चीन की तेजी से बढ़ती सैन्य शक्ति, आर्थिक प्रभाव और वैश्विक स्तर पर उसकी विस्तारवादी नीतियां हैं। अमेरिका ने कई चीनी तकनीकी कंपनियों पर प्रतिबंध लगाए हैं और तिब्बत, शिनजियांग और हांगकांग में मानवाधिकार तथा लोकतंत्र की स्थिति पर चिंता जताई है। अमेरिका चीन के वैश्विक प्रभाव को रोकना चाहता है और इसीलिए उसने क्षेत्रीय सुरक्षा गठबंधनों को तरजीह दी है। दक्षिण चीन सागर में चीन की बढ़ती दादागीरी दुनिया के लिए चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि विश्व व्यापार का एक बड़ा हिस्सा यहीं से गुजरता है।
यह समुद्री मार्ग चीन, जापान, कोरिया और दक्षिण पूर्व एशिया के देशों के लिए आर्थिक गतिविधियों का केंद्र है। यह क्षेत्र चीन, वियतनाम, फिलीपींस, मलेशिया और ब्रुनेई के बीच स्थित है जिससे यह भौगोलिक और राजनीतिक दृष्टिकोण से महत्त्वपूर्ण हो जाता है। अमेरिका ने एशिया प्रशांत क्षेत्र में अपने सहयोगियों के साथ मिल कर चीन के बढ़ते प्रभाव का मुकाबला करने के लिए सहयोग बढ़ाया है और क्वाड उसी का प्रतिनिधित्व करता है।
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जनरल पर्पज टेक्नॉलॉजी यानि जीपीटी के अंतर्गत आने वाली एआई या आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस तकनीक न सिर्फ कारोबार व अर्थव्यवस्था को, बल्कि समाज, भू-राजनीति और मानवता को नया रूप दे रही है।
देखते हैं, कैसे –
– एआई नया यूजर इंटरफेस या यूआई है। इसमें हो रहा लगातार बदलाव मनुष्य की उत्पादकता बढ़ाता जा रहा है।
– नए-नए प्लेटफार्म एजेंट आ रहे हैं। बेकार के ऐप की जगह अब वे एजेंट लेते जाएंगे, जो हमारी ओर से काम करने में सक्षम होंगे।
– ‘सॉफ्टवेयर एज ए सर्विस’ की जगह ‘सर्विस एज़ ए सॉफ्टवेयर‘ होगा। इसमें वांछित (मनचाहा) परिणाम देने की जिम्मेदारी कंपनी की होगी।
– जेनेरेटिव एआई से हम कंप्यूटर को अपनी भाषा में निर्देश दे सकते हैं। यानि कि मशीनें हमारी भाषा को समझेंगी। इससे आम लोग भी कोडिंग कर सकते हैं।
– एआई फोन काफी अलग होंगे। इसे ‘टच‘ के बजाय बोलकर कमांड दिया जा सकेगा।
– जेनेरेटिल एआई एक लोकतांत्रिक तकनीक है। यदि हर कर्मचारी इसका इस्तेमाल करने लगे, तो व्यवसाय को काफी लाभ मिलेगा।
आने वाले दिनों में एआई, काम में आने वाली सामान्य तकनीक बन जाएगी, जो इंसानों और पृथ्वी के भविष्य को नया आकार दे सकेगी।
विभिन्न समाचार पत्र पर आधारित। 02 सितंबर, 2024
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Date: 26-09-24
Judging The JudgesSC does great service to courts’ dignity by calling out objectionable comments made from an HC benchTOI Editorials
Bringing to a close its suo motu case on two videos in which a Karnataka HC judge is seen making irrelevant, even harmful, remarks, a five-judge CJI-led bench reiterated the basics of what should guide judges’ constitutional task. “It is important every judge is aware of his or her own predispositions.” CJI Chandrachud did well to take serious note of the two videos. In one, the HC judge called a Bengaluru Muslim-majority area ‘Pakistan’. In another, he was mocking a woman lawyer by using offensive language. Justice Srishananda had apologised earlier, though his initial counter was that his words were taken out of context.
It’s unfortunate SC had to remind judges of such basics. But rather frequent instances are emerging of judges making either communally charged or openly anti-women rights comments. Have they suddenly turned offensive? No. It is CJI’s welcome measure of live-streaming and recording of court proceedings that is capturing some of the reality of courtroom discourse. SC picked up this case, and in doing so it showed it’s aware of unsavoury observations some judges make. Observations that no longer escape public attention.
SC observed “that the demands…of the electronic age would elicit appropriate modulation of behaviour, both on the part of the Bar and the bench in the future.” Two developments over the last few years have helped expose preachy self-righteousness of some judges countrywide, where own prejudices and biases weigh heavily upon their conduct in court. One, live-streaming has taken the court to the public. Two, the emergence of dedicated court-reporting websites has captured a plethora of cases, causes and comments that otherwise would be limited to lawyers alone. This is forcing courtrooms to be that much more accountable, in a manner of speaking, to the public they serve.
SC repeatedly emphasises judges should avoid patriarchal and misogynistic stereotypical commentary on women’s dress, behaviour, status etc. But judges continue to make loose comments, a misplaced morality damaging to the dignity of court and its proceedings. SC fixed that today – “the heart and soul of judging is the need to be impartial and fair.” Here’s hoping judges will take note.
Date: 26-09-24
We Were WarnedWorld is now living with extreme weather & extreme reluctance to take serious action about climate changeTOI Editorials
Heat almost killed you? Wilting your plants and making life miserable for all creatures great and small? Toxic air, a Delhi regular, burning your eyes, choking your airways? Rain washed your daily routine away? Brought your city to a standstill in, sometimes, chest-deep water? Everywhere in India, in different ways, the last few months have shown us what extreme weather looks like. The cost in lives lost, infra damaged, work hours foregone, and health risks is already large. Now, pundits are warning of extreme cold conditions in some parts of India in the winter. So, whom to blame, really? Mirror, mirror on the wall…
Scientists warned us. The first climate deal was inked over a quarter of a century ago. But, the greenhouse effect was first identified exactly 200 years ago, in 1824. The scientist who identified it wrote: “Establishment and progress of human societies…can notably change…in vast regions…the state of the surface, distribution of water and great movements of the air. Such effects are able to make to vary…the average degree of heat…”. By 1896, greenhouse effect was first calculated. It took another 100 years of development for the world to ink its first climate deal to “save the planet”, in the 1996 Kyoto Protocol. But COPs have been a cop out – glitzy episodes of theatric climate negotiations, dramatic emission targets, impressive goals, and shadowy lobbies. In 2023, US Congress and European Parliament members wrote to UN about their “profound concern that current rules…permit private sector polluters to exert undue influence.” The Egypt COP had a record 636 delegates who work for fossil fuel companies.
Rivers polluted and dry, oceans warmer and rising, glaciers melting, more ’n more ACs whirring for longer periods – human action alone has unleashed climate change upon us. Rail at the weather, but it heeds no criticism. How to mitigate? Even heat action plans are just that. Plans. There’s little evidence coverage required to protect, especially outdoor workers, has been achieved – traffic police, airport outdoors crew, street vendors, gig workers are all on their own. As are we. Withered by the weather.
Date: 26-09-24
संस्थाएं सामाजिक चेतना फैलाने का काम भी करेंसंपादकीय
गवर्नेस का कोई भी तंत्र रहा हो, कबायली व्यवस्था से लेकर लोकतंत्र तक, लेकिन निरंतर बदलते समाज में नैतिक मूल्य बनाए रखने का काम आध्यात्मिक व धार्मिक रूप से समुन्नत लोगों का रहा है । प्रजातंत्र में राजनीति वोट की याचक होती है और ऐसी याचना में समाज-सुधार करने की नैतिक शक्ति नहीं होती । धार्मिक संस्थाओं के भी अपने हित होते हैं। ऐसे में जो भी सबसे स्वीकार्य संस्था या उसमें लगा व्यक्ति समाज की निःस्वार्थ सेवा करता है वह समाज सुधारक की भूमिका में स्वतः आ जाता है। नैतिकता में गिरावट का संकट मोबाइल फोन के बाद का है। बाल यौन शोषण पश्चिमी देशों से भारत पहुंचा है। यही कारण है कि सुप्रीम कोर्ट को समाज-सुधारक की भूमिका में आना पड़ा। कोर्ट ने इस सामाजिक-मानसिक बीमारी के इलाज के लिए देश के सभी कोट्र्स द्वारा ‘चाइल्ड पोर्न’ शब्द के प्रयोग पर ही रोक लगा दी है और इसकी जगह ‘बाल-यौन उत्पीड़न सामग्री’ (सीएसईएएम) का प्रयोग करने को कहा है। कोर्ट ने ऐसे वीडियोज देखना ‘पॉक्सो’ के तहत सजा की श्रेणी में रखा है। इसके पहले भी सुप्रीम कोर्ट ने ही महिला अधिकार, दहेज व फौरी तलाक सरीखे मुद्दों पर समाज में नई चेतना पैदा की थी। देश की तमाम संवैधानिक संस्थाओं को भी चेतना फैलाने का काम करना चाहिए।
Date: 26-09-24
हिजबुल्ला की हरकतों की कीमत चुका रहा है लेबनानअभिजीत अय्यर मित्रा,( सीनियर फेलो, आईपीसीएस )
मैं यह लेख इजराइल के हृदयस्थल यरूशलम से लिख रहा हूं, जहां कल सुबह हिजबुल्ला की ओर से दागी गई एक बैलिस्टिक मिसाइल के चलते हमें एक बंकर में शरण लेनी पड़ी थी। इजराइल और हिजबुल्ला के बीच आज जो कुछ भी हो रहा है, उसके कारणों की गहराई से पड़ताल करना जरूरी है। पाकिस्तान की तरह लेबनान को भी एक कृत्रिम-राष्ट्र के रूप में गढ़ा गया था। उसका निर्माण स्थानीय ईसाई बहुसंख्या के लिए सीरिया को तोड़कर किया गया था, लेकिन अपने निर्माण के 50 वर्षों के भीतर ही यह सुन्नी बहुसंख्या वाला देश बन गया और 1990 के दशक में यह शिया बहुसंख्यक बन गया। लेकिन शियाओं के पास राजनीतिक ताकत नहीं थी और वे एक और गृहयुद्ध शुरू नहीं करना चाहते थे। तब उन्होंने हिजबुल्ला का सहारा लिया, जो कि ईरान के रिमोट कंट्रोल से संचालित होता है।
ईरान हिजबुल्ला की मदद से कई निशाने साधना चाहता है। उसका पहला मकसद है एक क्षेत्रीय शिया-गठजोड़ का नेतृत्व करना, जिसमें 2000 के दशक से इराक, सीरिया और लेबनान शामिल हैं। दूसरा मकसद इजरायल के विरोध में अपने को सबसे आगे दिखाना था, क्योंकि परम्परागत रूप से इसे सुन्नी एकाधिकार के रूप में देखा जाता था। यह 1980 और 1990 के दशक में सऊदी अरब से इस्लामिक दुनिया का नेतृत्व छीनने के लिए किया गया था, जिसने अमेरिका के सहयोगी के रूप में काम किया था। 2010 के दशक से तीसरा और सबसे महत्वपूर्ण मकसद ईरानी परमाणु हथियारों को कवर प्रदान करना रहा है। इसके लिए प्राथमिक खतरा हमेशा इजराइली हवाई हमले से आता है और आता रहेगा।
लेकिन दुर्भाग्य से, लेबनान के लोगों से इस बारे में कोई राय-मशविरा नहीं किया गया। अगर कोई लेबनानी ईसाई या सुन्नी लेबनान को ईरान के प्रॉक्सी के रूप में इस्तेमाल करने के खिलाफ बोलता है, तो उसे मार दिया जाता है और अपराधियों को पकड़ा नहीं जाता। 2005 में ईरान के हितों की पूर्ति के लिए लेबनान में सीरिया की निरंतर सैन्य उपस्थिति का विरोध करने पर पूर्व प्रधानमंत्री रफीक हरीरी तक की हत्या कर दी गई थी। लेबनान अब हिजबुल्ला की हरकतों की कीमत चुका रहा है। प्रतिरोध की कार्रवाइयां हिजबुल्ला करता है और जान लेबनानी नागरिकों को गंवानी पड़ती है।
मौजूदा तनाव की शुरुआत 7 अक्टूबर 2023 को हमास द्वारा इजराइल पर किए हमलों से हुई। पहले हिजबुल्ला को अधिक सक्षम आतंकवादी संगठन के रूप में देखा जाता था। लेकिन 7/10/23 को हमास ने ऐसा हमला किया, जो इससे पहले किसी भी अरब देश या संगठन ने नहीं किया था। हमास नंबर 1 बन गया। हिजबुल्ला को फिर से अपना वर्चस्व स्थापित करना था, इसलिए उसने उत्तरी इजराइल में लगातार रॉकेट बमबारी का अभियान शुरू किया। ऊपरी तौर पर यह कहा गया कि यह फिलिस्तीन का समर्थन करने के लिए किया जा रहा था, लेकिन असली कारण हमास के साथ उसकी प्रतिद्वंद्विता थी। 7/10/23 के बाद से हिजबुल्ला ने इजराइल पर 9000 रॉकेट दागे हैं, लेकिन वह उत्तरी इजराइल से लगभग 70,000 इजराइलियों के पलायन के अलावा और कुछ हासिल नहीं कर पाया है। ये 9000 रॉकेट बेकार में नहीं दागे गए थे, उनका उद्देश्य ईरानी परमाणु कार्यक्रम की रक्षा करना था।
पिछले 30-40 सालों से इजराइल ने हिजबुल्ला को बेअसर करने के कई तरीके आजमाए हैं, लेकिन उसे पूरी कामयाबी नहीं मिली। कारण, हिजबुल्ला का असली कमांड-सेंटर तेहरान में है और इजराइल ईरान को सीधे निशाना बनाने से परहेज करता रहा है। 7/10/23 के बाद यह तस्वीर बदल गई। इजराइल ने सीरिया में कई ईरानी राजनयिकों को मार डाला, जिसके परिणामस्वरूप ईरान की ओर से इजराइल पर पहला सीधा हमला हुआ। फिर इजराइल ने तेहरान में हमास के नेता इस्माइल हनीये को मार गिराया। तेहरान में लीडरशिप गेस्ट हाउस में हनीये को मारकर इजराइल ने ईरान को यह संदेश दे दिया कि वे अपने घर में भी सुरक्षित नहीं हैं। इसके बाद इजराइल ने हिजबुल्ला कमांडरों के पेजर और वॉकी-टॉकी में ब्लास्ट करवाके उसके कमांड-सिस्टम पर करारी मार की। फिर हवाई हमलों में हिजबुल्ला के डिप्टी-हेड और मिसाइल-फोर्स के प्रमुख को मार गिराया गया।
इजराइल ने पिछले साल से अब तक कई मोर्चों पर कार्रवाई की है। पर नुकसान लेबनान के लोगों का हो रहा है। ईसाइयों ने 1980 के दशक में लेबनान की सत्ता खो दी थी और अब उनके देश को ईरान की विदेश नीति के लक्ष्यों की पूर्ति के लिए अपहृत किया जा रहा है। वहीं सुन्नियों की सियासी ताकत को हिजबुल्ला ने हाईजैक कर लिया है।
Date: 26-09-24
मेक इन इंडिया अभियानसंपादकीय
मेक इन इंडिया अभियान के दस वर्ष पूरे होने के अवसर पर प्रधानमंत्री ने उसकी सफलता का जो उल्लेख किया, उससे असहमत तो नहीं हुआ जा सकता, लेकिन यह आभास किया जाए तो बेहतर कि इस पहल को और अधिक सफल बनाया जा सकता था। इस अभियान ने कई उल्लेखनीय सफलताएं हासिल की हैं, जैसे दस वर्ष पहले देश में मोबाइल फोन बनाने वाली केवल दो कंपनियां थीं। आज उनकी संख्या बढ़कर दो सौ के करीब हो गई है। इसके चलते भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा मोबाइल फोन निर्माता देश बन गया है। पहले केवल 1,556 करोड़ रुपये के मोबाइल फोन निर्यात होते थे। अब 1.2 लाख करोड़ रुपये के मोबाइल निर्यात हो रहे हैं और देश में प्रयोग होने वाले 99 प्रतिशत मोबाइल मेक इन इंडिया हैं। इसी तरह फिनिश्ड स्टील के उत्पादन में बढ़ोतरी हुई है। खिलौनों के निर्माण में भी भारत ने उल्लेखनीय प्रगति की है और अब उनका आयात घटकर आधा रह गया है। यह भी महत्वपूर्ण है कि देश में सेमीकंडक्टर के निर्माण के लिए जिस तरह डेढ़ लाख करोड़ का निवेश हुआ है, उससे पांच प्लांट लगने जा रहे हैं, जो प्रतिदिन सात करोड़ चिप बनाएंगे। भारत नवीकरणीय ऊर्जा के उत्पादन में अब दुनिया में चौथे नंबर पर है और देश का ईवी उद्योग अब तीन अरब डालर तक पहुंच गया है। रक्षा क्षेत्र भी मेक इन इंडिया की सफलता की कहानी कहता है। देश का रक्षा निर्यात 21 हजार करोड़ रुपये के आंकड़े को पार कर गया है और अगले पांच वर्षों में इसे बढ़ाकर 50,000 करोड़ रुपये करने का लक्ष्य रखा गया है। आज भारत कई देशों को रक्षा सामग्री का निर्यात कर रहा है।
यह कहा जा सकता है कि मेक इन इंडिया अभियान ने रक्षा क्षेत्र की तस्वीर बदलने का काम किया है। ऐसी ही तस्वीर अन्य क्षेत्रों में भी बदलनी चाहिए थी, लेकिन ऐसा नहीं हो सका। यह एक तथ्य है कि तमाम प्रयासों के बाद भी चीन से होने वाला आयात कम नहीं हो रहा है। तमाम ऐसी वस्तुएं चीन से मंगाई जा रही हैं जिनका निर्माण भारत में किया जा सकता है। एक समस्या यह भी है कि चीन से तमाम कल-पुर्जे मंगाकर उन्हें देश में असेंबल कर कई तरह के उपकरण बनाए जा रहे हैं। समझना कठिन है कि भारतीय उद्योगपति वह सब देश में क्यों नहीं बना सकते, जिसके निर्माण की संभावनाएं देश में हैं। इनमें से कुछ वस्तुएं तो ऐसी हैं, जो पहले भारत में बनती भी थीं। एक ओर जहां देश के उद्योगपतियों को कमर कसनी होगी, वहीं दूसरी ओर सरकार को भी यह देखना होगा कि हमारे उद्योगपति चीनी कारोबारियों का मुकाबला करने में क्यों हिचक रहे हैं और उनकी क्या समस्याएं हैं? कुल मिलाकर मेक इन इंडिया अभियान कुछ हद तो सफल है, लेकिन अभी बहुत कुछ हासिल किया जाना है।
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हाल ही में कोलकाता के आरजी कर मेडिकल हत्याकांड और केरल फिल्म उद्योग पर आई हेमा समिति की रिपोर्ट, कार्यस्थल पर महिलाओं की असुरक्षा को लेकर एक स्याह तस्वीर दिखाती है। लेकिन यह भी सच है कि महिलाओं के हित में कई काम किए गए हैं; जिनका लाभ उनको कार्यस्थलों पर मिला है।
कुछ बिंदु –
– महिलाओं को सबसे बड़ी ताकत भारतीय संविधान से मिली है। संविधान सभी भारतीयों को विधि के समक्ष समानता (अनुच्छेद 14) का अधिकार देता है।
– लैंगिक आधार पर विभेद न करने (अनुच्छेद 15 (U)) और राज्य को महिलाओं के पक्ष में विशेष उपबंध कर सकने (अनुच्छेद 15 (3)) की गारंटी देता है।
– अनुच्छेद 51 (अ) के तहत महिलाओं की गरिमा के विरूद्ध अपमानजनक व्यवहार को निषिद्ध (मनाही) किया गया है।
– महिलाओं का कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न (रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनिमय, 2013 जैसे कानूनों से उन्हें विधायी ताकत भी दी गई है।
– कार्यस्थलों पर महिलाओं के लिए अलग से शौचालय, स्तनपान कक्ष और सुरक्षा के अन्य उपाय किए गए हैं।
– कार्यस्थलों से महिला कर्मियों को घर भेजने के लिए कंपनी को सुरक्षा गार्ड के साथ वाहन की व्यवस्था करनी पड़ती है।
– कार्यस्थलों पर महिलाओं के हित में शिकायत समितियों का गठन किया जाने लगा है।
– महिला सहकर्मियों के साथ शालीनता से पेश आने से जुड़े जागरूकता अभियान चलाए जाते हैं, और व्यावहारिक प्रशिक्षण भी दिया जाता है।
विभिन्न समाचार पत्रों पर आधारित। 4 सितंबर, 2024
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Date: 25-09-24
Jaago, Sarkar, JaagoConsumer protection ecosystem in this country can take a leaf out of the Australia playbookTOI Editorials
Australia’s competitionregulator has sued the country’s two largest supermarket chains, Coles Group and Woolworths, because they misled shoppers. Imagine that. Both, the regulator said, inflated prices of lots of common items – as routine as Coca-Cola, Tim Tams biscuits and Colgate toothpaste for instance – before reducing them to MRP or slightly higher. But this playbook is all too familiar to shoppers in India. Inflated prices before discounts were in pre-internet times the SOP, till one could compare with, and snag a better bargain, at online grocers and supermarkets. It is unimaginable that our govt would rush to protect the Indian consumer at the grocers. Australian govt’s aggressive consumer protection is quite the novelty.
Consumer protection in India sadly remains a miserly set-up. After the initial burst of consumer awareness and much gusto in promising consumers ‘protection’ decades ago, the drive to build the required ecosystem petered out, an arduous trek, another govt layer with the same pervasive lethargy of most govt-public interfaces. The network, including quasi-judicial consumer courts, waffles on cases and is tight-fisted in awarding compensations. It has watched the coaching industry fleece students for decades, but only just discovered the muscle to recognise them as a consumer class – its helpline has long stacked thousands of complaints against coaching centres. Take the consumers’ right to defect-free goods. A buyer expects a glitch-free product. Manufacturers are loath to replace defective products, let alone refund, expecting buyers to accept repaired products. The law makes it incumbent on makers to replace or refund – but what buyers face is a tedious process that amounts to harassment. It was only yesterday that govt finally moved on forming “guidelines” for misleading ads claiming “nutrition”, and started to think about buyers’ right to information about repairability of electronic devices.
The successful tackle of surge pricing by cab aggregators is a shining example of what consumer protection ecosystem can deliver. The centralised consumer complaints received on average over 1L complaints each month April to June this year. Overpricing, fleecing, poor after-sales service are almost a given for the Indian consumer – including at private schools and hospitals. Perhaps, it’s way too ambitious to expect regulators to prioritise overpricing at the grocers.
Date: 25-09-24
Secularism, the best thing since hot rotiET Editorials
That we have to weigh in on a ‘secularism debate’ in 2024 is tiresome – but necessary. The latest quibble about it comes from Tamil Nadu governor R N Ravi. This is not some voice from the fringe but a central government representative. Ravi is right to trace secularism, as articulated in the French constitutional principle of ‘laicite’, of separation of state and religion in 19th-century Europe. He is wrong – and, ironically, Eurocentric – to think that it’s the only form secularism can take. Secularism, with Indian characteristics, predates the separation of church and state in Europe in that it has been practised and preached in India as equality of all citizens regardless of faith before the law, later incorporated in the Constitution. Just because the 42nd constitutional amendment, identifying India as ‘secular’, was brought about by an autocratic regime in 1976, doth not make secularism a dodgy idea.
True, ‘secularism’ has been misused by political players indulging in the Orwellian line, ‘All religions are equal, but some religions are more equal than others.’ But ‘pseudo-secularism’ cannot be conflated with secularism the same way pretence isn’t honesty. Secularism is the lodestone of multi-religious, multicultural India. Government officials shouldn’t be involved in the administration of Hindu temples or the Waqf Board have a free run. Administrations can’t be seen as being soft on cow vigilantes or be perceived as overlooking an attack on a person wearing the sacred thread.
The concept of sarva dharma samanwaya is the way we practise, protect and proliferate our secularism. Neither should take away the need of the state to have dhamma – a strong ethical and moral code that Ravi referred to in false opposition to secularism.
Date: 25-09-24
It is an offenceCourt has done well to clarify law on online content showing child sex abuseEditorial
The Supreme Court of India’s clear delineation of the penal consequences of accessing or storing sexual material concerning children is in complete consonance with the letter and spirit of the Protection of Children from Sexual Offences (POCSO) Act. Demonstrating an enlightened approach to the social questions that arise from the proliferation of online content featuring sexual exploitation of children, a three-Judge Bench has not only clarified the law but also drawn pointed attention to the legislative intent of presuming the culpable mental state of a person accessing and viewing such material. The Court has also advocated that the term ‘child pornography’ be avoided in both the law and in court verdicts, as it appears to trivialise the enormity of the offence of exploiting children to create and disseminate sexual material to gratify the perversions of a few. Instead, the Court has suggested that such content be described as ‘Child Sexual Exploitative and Abuse Material’ (CSEAM). The verdict also lays to rest doubts over what exactly some provisions of the Information Technology Act, 2000, and POCSO Act say on the subject, as High Court verdicts have differed on their exact implications. The case arose from a Madras High Court judgment that quashed a criminal case against an individual who had viewed sexual content involving children on the ground that the law only criminalised creating and disseminating such content, and not merely watching it in the private domain. The apex court has now set aside the High Court order.
Invoking the doctrine of “constructive possession”, it has ruled that any act of viewing or displaying such material over the Internet without actual possession or storage in any device would also amount to “possession”, made punishable under Section 15 of POCSO, provided the person had a degree of control over such material. Further, an intent to share or transmit such material can also be inferred from any failure to delete, destroy or report such material. It has cautioned courts against narrow interpretation of some provisions so that the legislative intent of penalising cyber-offences relating to children is not defeated. It has drawn attention to Section 67B of the IT Act, terming it a “comprehensive provision” to penalise various electronic forms of exploitation and abuse of children online. The Court has reminded platforms and intermediaries of their duty to remove such content as well as report it to police units concerned. Its advice to the government to implement comprehensive sex education programmes that include the legal and ethical ramifications of child sex abuse material merits immediate attention.
Date: 25-09-24
बेरोजगारी से जुड़े पहलुओं पर गौर करना जरूरी हैसंपादकीय
वर्ष 2023-24 की आवधिक श्रम बल सर्वे रिपोर्ट (पीएलएफएस) के अनुसार पिछले पांच सालों से लगातार घट रही बेरोजगारी दर इस साल 3.2% पर ठहर गई है। हालांकि पिछले छह वर्षों में बेरोजगारी दर आधी रह गई है। इस दौरान कामकाजी महिलाओं का प्रतिशत बढ़ा है। लेकिन इस रिपोर्ट को जब अन्य परिवर्तनशील कारकों के साथ देखते हैं, तो अन्य विचारणीय प्रश्न भी खड़े होते हैं। जैसे रिपोर्ट कहती है कि स्व-रोजगार का प्रतिशत बढ़ा है। लेकिन भारत के परिप्रेक्ष्य में यह शायद उतना प्रोत्साहित करने वाला आंकड़ा नहीं होगा, जितना चीन में होगा, जहां लघु व सूक्ष्म उद्योगों से बेहतर आय होती है। दूसरी ओर हमारी स्व-रोजगार की परिभाषा पर भी सवाल हैं। रिपोर्ट बताती है कि एक नियमित रोजगार में लगे व्यक्ति की आय स्व-रोजगार में लगे व्यक्ति की आय से डेढ़ गुनी (इसके अलावा तमाम सुविधाएं) से ज्यादा है। जाहिर है कोई व्यक्ति नियमित नौकरी छोड़कर कम आय वाले और बेहद असुरक्षित वाले स्व-रोजगार में मजबूरी में ही जाएगा। लेकिन यह भी पता चला है कि नियमित नौकरी में हर महीने पगार के अलावा अन्य सुविधाएं न देनी पड़ें, इसलिए मालिक 61.1% कर्मचारियों को कोई नियुक्ति पत्र नहीं देते। उधर दिहाड़ी मजदूरों का प्रतिशत कम होना यह बताता है कि निर्माण यानी कल-कारखानों या लघु उद्योगों में काम घटा है, जिससे ये मजदूर वापस गांवों में जाकर खेती या घर के ही व्यवसाय में लग जाते हैं। इनमें सबसे ज्यादा चिंता की बात है कि 15 से 29 के आयु वर्ग में बेरोजगारी औसत बेरोजगारी दर से तीन गुना ज्यादा है और वह भी पिछले एक साल से कम नहीं हुई। इससे एक और तथ्य पता चलता है कि हाल के दो वर्षों में मैन्युफैक्चरिंग में पहली बार रोजगार का प्रतिशत (11.4) होटल, रेस्तरां (12) से भी कम है। स्व-रोजगार का लाभ तभी मिल सकेगा जब युवाओं को कौशल देकर लाभकारी सूक्ष्म व लघु उद्योगों में लगाया जाए।
Date: 25-09-24
जातिगत समानता को समाज में मिले बढ़ावानितिन देसाई
किसी अर्थव्यवस्था में असमानता प्रायः लोगों को विरासत में मिली वस्तुओं में भिन्नता का नतीजा होती है। असमानता की चर्चा करने पर विरासत में मिली जिस वस्तु का जिक्र सबसे अधिक होता है वह है धन-संपत्ति। किंतु यदि सामाजिक रुतबा या ओहदा अगर आर्थिक व्यवस्था का हिस्सा बन जाए तो वह भी असमानता को जन्म देता है।
भारत में सभी अच्छी तरह जानते हैं कि लोगों की जातियों से जुड़े सामाजिक प्रभाव का असर उनकी आर्थिक संभावनाओं पर पड़ता है। यह बात अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अन्य पिछड़ी जातियों (ओबीसी) यानी कथित निम्न जातियों के लिए सकारात्मक कार्रवाई (अफर्मेटिव एक्शन ) के प्रावधानों में भी दिखती है। किंतु कुछ लोगों का तर्क है कि हमें अफर्मेटिव एक्शन के पात्र लोगों के बीच भी अधिक गरीब लोगों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए और इसका लाभ उन लोगों को भी मिलना चाहिए, जो निचली जाति से ताल्लुक नहीं रखते मगर गरीब हैं।
कुछ लोग ऐसे भी हैं जो जाति जनगणना की हिमायत कर रहे हैं। उनका उद्देश्य इस बात की पड़ताल करना है कि समाज में सामाजिक रूप से पिछड़े लोगों को अफर्मेटिव एक्शन का कितना लाभ मिल रहा है और इसे कितना बढ़ाया जा सकता है। इन दो अलग-अलग नजरियों के बीच इस बात की समीक्षा होनी चाहिए कि सभी स्थितियां समान रहने पर भी निचली जाति के किसी व्यक्ति का आय कम तो नहीं रह जाती या उसे दूसरे लोगों की तुलना में कम आर्थिक अवसर तो नहीं मिलते।
भारतीय मानव विकास सर्वेक्षण के आंकड़ों पर आधारित दो हालिया अध्ययन इस बात का स्पष्ट संकेत देते हैं कि आय का स्तर तय करने में जाति की अहम भूमिका होती है। पहले अध्ययन में आय कम होने के कई कारण गिनाए गए हैं और कहा गया है कि निचली जातियों के लोगों की सालाना आय देश की शेष आबादी की तुलना में 21.1 प्रतिशत कम है। आंकड़ों को अलग-अलग देखें तो पता चलता है कि आदिवासियों की आय उच्च जाति समूहों की तुलना में औसतन 20.7 प्रतिशत कम है जबकि दलितों की आय 27.74 प्रतिशत, मुसलमानों की 20.17 प्रतिशत और ओबीसी की आय 19 प्रतिशत कम है।
दो बाते हैं, जो असमानता कम कर देती हैं – उच्च शिक्षा और किसी उच्च आय वाले राज्य में रिहायश। अध्ययन बताता है कि निचली जातियों में जिन लोगों ने उच्च शिक्षा प्राप्त की है, उनकी आय ऊंची जाति के लोगों की तुलना में औसतन 10.3 प्रतिशत ही कम है।
आदिवासियों के मामले में असमानता और भी कम हो जाती है। अध्ययन बताता है कि किसी राज्य में प्रति व्यक्ति वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) 10,000 रुपये बढ़ जाता है तो आदिवासियों के लिए जाति आधारित आय असमानता में औसतन 9.05 प्रतिशत कमी आ जाती है। दलितों में असमानता 7.6 प्रतिशत, ओबीसी में 4.9 प्रतिशत और मुसलमानों में 1.8 प्रतिशत अंक कम हो जाती है। लेकिन अंतर कम ही होता है, पूरी तरह खत्म नहीं होता।
इसी सर्वेक्षण के आंकड़ों पर आधारित एक दूसरा अध्ययन बताता है कि निम्न एवं उच्च जातियों के कारोबार मालिकों को किस तरह के भेदभाव झेलने पड़ते हैं। कारोबार चलाने वाले दलितों की आय उन ओबीसी, आदिवासी और मुसलमान कारोबारियों के मुकाबले कम होती है, जिन्हें समाज से अलग-थलग तो नहीं रखा जाता मगर जिन्हें सामाजिक-आर्थिक नुकसान उठाने पड़ते हैं।
किसी व्यक्ति का दूसरी जातियों के अन्य पेशेवरों के साथ जो व्यक्तिगत संपर्क या तालमेल होता है, उसके दायरे को सामाजिक पूंजी कहते हैं। अध्ययन में कहा गया है कि दलित व्यक्ति की सामाजिक पूंजी अधिक हो तो भी आय में अंतर बरकरार रहता है, जिससे संकेत मिलता है कि जातिगत भेदभाव अपना असर दिखाते रहते हैं। यह भी पता चला कि शिक्षा से दलितों की आय में उसी तरह सुधार होता है, जैसे दूसरे वर्गों की आय में होता है।
ये अध्ययन तो इस वर्ष प्रकाशित हुए हैं मगर उनमें इस्तेमाल किए गए सर्वेक्षण के आंकड़े एक दशक से अधिक पुराने हैं। पहले अध्ययन में 2005 से 2012 के सर्वेक्षण नतीजे इस्तेमाल किए गए थे। इस अध्ययन के अनुसार ऊंची जातियों और निम्न जातियों में असमानता कम हुई है मगर खत्म नहीं हुई है। क्या हम यह मान सकते हैं कि आय में वृद्धि के कारण अंतर अब और कम हो गया है? संभवतः कम हुआ होगा मगर यह पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। शीर्ष पर पहुंच चुके दलितों और आदिवासियों से बात करने पर पता चलता है कि वे सामान्य से एक पायदान ऊपर हैं इसलिए वे भेदभाव का मुकाबला कर पाए और इससे बाहर निकल पाए।
जिन बच्चों के माता-पिता अनियमित कामगार हैं, उन्हें ज्यादा नुकसान होता है। मैंने पाया है कि निर्माण स्थल पर ही अस्थायी रिहायश बना लेने वाले श्रमिकों के बच्चों को अक्सर शिक्षा मिल ही नहीं पाती और बड़े होकर वे भी अनियमित कामगार बनने के लिए अभिशप्त होते हैं। यहां भी दलितों और आदिवासियों तथा दूसरी जाति के लोगों में फर्क होता है। एससी/एसटी को छोड़कर अन्य जातियों पर अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की एक रिपोर्ट के अनुसार 2004 में अनियमित कामों में उनकी हिस्सेदारी 83 प्रतिशत थी, जो आंकड़ा 2018 में घटकर 53 प्रतिशत रह गया। इस दौरान वेतन देने वाली नियमित और बेहतर गुणवत्ता वाली नौकरी में उनकी भागीदारी इतनी ही बढ़ गई। एससी/एसटी का भी अनियमित काम कम हुआ मगर यह 86 प्रतिशत से कम होकर 76 प्रतिशत रहा यानी इसमें गिरावट कम रही।
इसलिए अफर्मेटिव एक्शन की शुरुआत इस प्रमाणित तथ्य से होनी चाहिए कि उच्च जाति के व्यक्ति के बराबर योग्य और शिक्षित होने पर भी निम्न जाति के व्यक्ति की आय में काफी कमी रहेगी। यह तथ्य भी स्वीकार करना होगा कि कारोबार का मालिक यदि दलित है तो उसे गैर-दलित कारोबारी से पिछड़ना ही पड़ता है।
जिस वास्तविक बदलाव की आवश्यकता है वह है जातियों के बीच अलगाव में कमी करना या इसे पूरी तरह खत्म करना। इस राह में सबसे बड़ी बाधा है अपनी ही जाति में विवाह को अनिवार्य मानने की रूढ़ि। यह रूढ़ि या चलन चार वर्णों में ही नहीं बल्कि उनके अंतर्गत आने वाली करीब 4,000 जातियों में भी चला आ रहा है। इसके कारण सामाजिक अलगाव बढ़ता ही जाता है। वर्ष 2005 के एक सर्वेक्षण के अनुसार केवल 6 प्रतिशत विवाह अंतरजातीय थे यानी वर और वधू अलग-अलग जातियों से थे। अंतरजातीय विवाह को बढ़ावा देने से दीर्घकाल से चली आ रही सामाजिक असमानता खत्म करने में मदद मिल सकती है।
यह बात सरकारी योजना ‘डॉ भीमराव अंबेडकर स्कीम फॉर सोशल इंटीग्रेशन थ्रू इंटर-कास्ट मैरिजेज’ में स्वीकार की गई है। इस योजना के अंतर्गत अनुसूचित जाति के व्यक्ति का विवाह किसी अन्य जाति में होने पर 2.5 लाख रुपये बतौर प्रोत्साहन दिए जाते हैं। इस योजना की शुरुआत 2013-14 में हुई थी और पांच वर्षों में औसतन 17,000 से अधिक लोग इसका लाभ उठा चुके थे। किंतु इन लाभार्थियों में कोई भी बिहार या उत्तर प्रदेश से नहीं था।
एक सदी से भी पहले छुआछूत के खिलाफ शुरू किए गए राजनीतिक अभियान के कारण जातिगत भेदभाव में कमी आई है। बाद में इसे पूरी तरह खत्म करने के लिए संविधान में एक प्रावधान भी लाया गया। शहरीकरण में तेजी और पेशागत स्तर पर सभी जातियों के लिए अवसर बढ़ने से भी परंपरागत जाति प्रथा के दोष कम हुए हैं। लेकिन इसका दीर्घकालिक समाधान तभी होगा जब जातीय भेदभाव खुद ही खत्म हो जाएगा।भीमराव आंबेडकर ने भी यही कहा, ‘मेरे विचार से हिंदू समाज अपनी रक्षा के लिए पर्याप्त सामर्थ्य जुटाने की आशा तभी कर सकता है, जब वह पूरी तरह जातिरहित हो जाए।’ आंबेडकर ने अपने भाषण ‘द अनाइअलेशन ऑफ कास्ट’ में यह बात लिखी थी मगर यह भाषण वह कभी पढ़ नहीं सके।
सरल शब्दों में कहें तो किसी समाज में जातीय समता को बढ़ावा तभी मिल सकता है जब विरासत में जाति का महत्त्व बहुत कम माना जाए। हमें ऐसा सामाजिक ताना-बाना तैयार करना होगा, जिसमें अधिक से अधिक परिवार अंतरजातीय तरीके से एक दूसरे से जुड़े हों।
Date: 25-09-24
अश्लीलता पर अंकुशसंपादकीय
तकनीकी संसाधनों के विकास के साथ-साथ उनके आपराधिक उपयोग की गलियां भी खुलती गई हैं। इन पर अंकुश लगाने की ज्यादातर कोशिशें विफल ही देखी जा रही हैं। कुछ मसले अब इतने संवेदनशील हैं कि समाज के लिए गंभीर चिंता का विषय बन चुके हैं। बाल यौन शोषण और दुर्व्यवहार उनमें से एक है। इंटरनेट के विस्तार और हर हाथ मैं डिजिटल उपकरणों की पहुंच होने के बाद अब बड़े पैमाने पर ऐसी अश्लील सामग्री परोसी जाने लगी है, जो बच्चों को लेकर बनाई जाती है। इस पर रोक लगाने के लिए मद्रास उच्च न्यायालय में गुहार लगाई गई थी। अदालत ने उस याचिका पर कहा था कि ‘बाल पोर्नोग्राफी’ देखने और उसे डाउनलोड करके रखने को पाक्सो कानून के अंतर्गत अपराध नहीं माना जा सकता। उसी आदेश को सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी गई। अब सर्वोच्च न्यायालय ने न केवल मद्रास उच्च न्यायालय के फैसले को पलटते हुए ऐसी सामग्री को डाउनलोड करके रखना और दूसरों को भेजना पाक्सो कानून के अंतर्गत अपराध माना है, बल्कि इस विषय में कई विस्तृत निर्देश दिए हैं। देश की सभी अदालतों से कहा है कि अब वे ‘बाल पोर्नोग्राफी’ के बजाय ‘बाल यौनशोषण और दुर्व्यवहार सामग्री’ पद का उपयोग करें। साथ ही केंद्र सरकार से कहा है कि वह पाक्सो कानून में संशोधन कर इसे अधिक स्पष्ट और व्यापक बनाए। जब तक कानून नहीं बनता, तब तक इस पर अध्यादेश जारी करे।
बाल यौनशोषण और दुर्व्यवहार पर अंकुश लगाने के लिए हालांकि कठोर कानून हैं, पर उनमें कुछ जगहों पर स्पष्टता न होने के कारण अश्लील सामग्री तैयार करने के लिए बच्चों का भी उपयोग किया जाता है । सर्वोच्च न्यायालय ने इसी कमजोरी को दुरुस्त करने का निर्देश दिया है। दरअसल, अश्लील सामग्री का कारोबार दुनिया भर में फैला हुआ है कुछ देशों ने तो इसे कानूनी मान्यता भी दे रखी है, जैसे जर्मनी, फ्रांस आदि । मगर पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह डिजिटल माध्यमों पर अश्लील सामग्री परोसने की प्रवृत्ति और उससे समाजों में हिंसा तथा यौनशोषण की घटनाएं लगातार बढ़ी हैं, उससे दुनिया भर में ऐसी सामग्री पर अंकुश लगाने की मांग उठने लगी है। हमारे यहां ऐसी सामग्री के निर्माण को दंडनीय अपराध की श्रेणी में रखा गया है। मगर इंटरनेट की दुनिया इतनी जटिल बन चुकी है कि ऐसी सामग्री की पहुंच रोकना कठिन बना हुआ है। इनमें बच्चों का उपयोग रोकना बड़ी चुनौती है।
सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार से कहा है कि यौनशिक्षा को व्यापक रूप से लागू किया जाना चाहिए। । इससे ऐसे अपराधों पर काबू पाने में काफी मदद मिल सकती है। दरअसल, बहुत सारे लोग यौनशिक्षा के नाम पर ऐसा सामग्री को उचित ठहराते देखे जाते हैं मगर अश्लील सामग्री निर्माण के लिए जिस तरह बच्चों की तस्करी बढ़ी है। और उनके साथ दुर्व्यवहार और उत्पीड़न की घटनाएं बढ़ी हैं, उससे उनके मानवाधिकारों को लेकर गंभीर चिंता पैदा हो गई है। निस्संदेह इस पर अंकुश लगाने के लिए कठोर कानून की जरूरत है मगर अश्लील सामग्री के निर्माण और उनकी पहुंच पर रोक लगाना फिर भी बड़ी चुनौती बनी रह सकती है। जिन देशों में ऐसी सामग्री बनाने पर रोक नहीं है, अश्लील सामग्री बनाने वाले उन जगहों का उपयोग करते हैं । बाल अधिकारों को लेकर व्यापक पहल की जरूरत है, जिसमें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कुछ समझौतों की भी जरूरत हो सकती है । सर्वोच्च न्यायालय ने इस विषय पर गंभीरता से विचार करने का एक अवसर दिया है।
Date: 25-09-24
मासूमों की खातिरसंपादकीय
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चाइल्ड पोर्नोग्राफी डाउनलोड करना, स्टोर करना और देखना पोस्को और आईटी के तहत अपराध है। अदालत ने ‘चाइल्ड पोर्नोग्राफी’ की जगह ‘बच्चों के साथ यौन शोषण और अश्लील सामग्री’ करने पर विचार करना चाहिए। पॉस्को एक्ट में संशोधन के लिए संसद को कानून लाने को भी कहा। सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाई कोर्ट के उस फैसले को पलटते हुए यह कहा जिसमें कहा गया था कि केवल बाल पोर्नोग्राफी डाउनलोड करना और देखना पॉस्को अधिनियम और सूचना प्रौद्योगिकी कानून के अपराध नहीं है, जब तक कि नीयत इसे प्रसारित करना न हो । शीर्ष अदालत ने हाई कोर्ट के फैसले को अत्याचारपूर्ण बताते हुए उसे चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई करने पर सहमति जताई थी जिसके खिलाफ अपने मोबाइल पर बाल पोर्नोग्राफी सामग्री डाउनलोड करने का आरोप था। इससे पहले केरल हाई कोर्ट ने भी सितम्बर, 2023 में कहा था कि अगर कोई शख्स अश्लील फोटो या वीडियो देख रहा है, तो यह अपराध नहीं है, जब तक वह इसे दूसरे को न दिखाए। जबकि अप्रैल में इसी मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि बच्चे का पोर्न देखना शायद अपराध न हो लेकिन पोर्नोग्राफी में बच्चे का इस्तेमाल होना अपराध है। पीठ ने अपने फैसले में इन धाराओं के तहत पुरुषों के दोषी कृत्य निर्धारित किए जाने की बात भी की। पॉस्को एक्ट की धारा 15 (1) के अनुसार बच्चों से जुड़े अश्लील कंटेंट को न हटाने, नष्ट न करने या उसकी जानकारी न देने पर भी सजा का प्रावधान है। अदालत ने सरकार को सुझाव दिया कि वह विशेषज्ञों की कमेटी बना सकती है जो सेक्स एजूकेशन का सिस्टम तैयार करे। साथ ही, अदालत ने स्कूलों को भी सलाह दी कि वे कम उम्र में ही बच्चों को पॉस्को कानून के विषय में बताएं। सारी दुनिया के विशेषज्ञ चाइल्ड पोर्नोग्राफी देखने और प्रसारित करने वालों से जूझ रहे हैं। इसे लेकर गंभीर चिंता व्यक्त की जाती रही है। जब तक मासूमों को गोपन अंगों, अश्लील हरकतों या यौन शोषण के प्रति जागरूक नहीं किया जाता, वे अनभिज्ञ बने रहेंगे। अपराधी प्रवृत्ति के लोग उनकी मासूमियत से यूं ही खिलवाड़ करते रहेंगे। दोषियों को सजा देने की प्रवृत्ति की बजाय बच्चों की सुरक्षा पर खास ख्याल रखना सीखना होगा। जरूरत है कानून और नैतिक प्रभाव पर विशेष तवज्जो दिए जाने की ।
Date: 25-09-24
श्रीलंका में नई बयारसंपादकीय पड़ोसी देश श्रीलंका में 55 वर्षीय अनुरा कुमारा दिसानायके ने नौवें राष्ट्रपति के रूप में सत्ता संभाल ली है। देश के राजनीतिक इतिहास में दिसानायके के नेतृत्व में पहली बार मार्क्सवादी-लेनिनवादी पार्टी की सरकार बनी है। उनकी जीत का मतलब श्रीलंका की राजनीति में एक नई शुरुआत हो रही है। लोगों को याद होगा कि दो साल पहले श्रीलंका को गंभीर आर्थिक संकट का सामना करना पड़ा था। केंद्रीय बैंक को वित्तीय चूक की घोषणा करनी पड़ी थी। मुद्रास्फीति, महंगाई और आर्थिक को प्रबंधन ने राष्ट्रपति राजपक्षे और प्रधानमंत्री के विरुद्ध एक बड़ा लोकप्रिय आंदोलन (अरागालय) खड़ा हो गया था। उस समय सद्य निर्वाचित राष्ट्रपति दिसानायके ने देश की राजनीति में सकारात्मक बदलाव लाने में माहती भूमिका का निर्वाह किया था।
इस चुनाव में उनके भ्रष्टाचार विरोधी और लोक कल्याणकारी मुद्दों पर भारी समर्थन मिला। राष्ट्रपति दिसानायके के मार्क्सवादी हैं इसलिए राजनीतिक क्षेत्र में उनकी छवि चीन समर्थक है। जाहिर है कि यह कयास लगाया जा रहा है कि चीन समर्थक मार्क्सवादी राष्ट्रपति के शासनकाल में भारत के सुरक्षा हितों को नुकसान पहुंच सकता है| नेपाल के वामपंथी प्रधानमंत्री प्रचंड और केपी शर्मा के समय में दिल्ली और काठमांडू के रिश्तों का उल्लेख किया जा रहा है। हालांकि श्रीलंका की मौजूदा आर्थिक स्थिति को देखकर ऐसा नहीं लगता कि राष्ट्रपति दिसानायक भारत को नजरअंदाज करेंगे। उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती देश को आर्थिक संकट से बाहर निकलना है। श्रीलंका पर करीब 2.9 बिलियन डॉलर का ऋण है। 2023 में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा प्रदान किए गए बेल आउट से कुछ हद तक आर्थिक स्थिति का लाने में मदद मिली है। वास्तव में श्रीलंका की पटरी पर से उतरी आर्थिक हालात के लिए चीन पूरी तरह जिम्मेदार है। दिसानायके को भारत और चीन के बीच संतुलन बनाकर चलना होगा जहां तक भारत का सवाल है तो वह ‘पड़ोसी प्रथम’ की नीति पर चलने वाला देश है। श्रीलंका के संकट के दिनों में भारत हमेशा मददगार रहा है। इस वर्ष फरवरी में दिसानायके भारतीय नेताओं और राजनीतिकों से मुलाकात करने आए थे उनकी जीत पर प्रधानमंत्री मोदी ने बधाई दी है, जिसके जवाब में उन्होंने कहा कि मैं द्विपक्षीय संबंधों की मजबूती पर अपनी प्रतिबद्धता से सहमत हूं। उम्मीद की जानी चाहिए कि दोनों देशों के रिश्ते में और अधिक मजबूत होंगे।
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चुनौतियां –
कुल मिलाकर, यहाँ यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि घोषणाओं के बाद परियोजनाओं को कितने जोरदार तरीके से आगे बढ़ाया जाता है।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 30 अगस्त, 2024
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Date: 24-09-24
Adulteration CentralTirupati controversy reminds us how common adulterated food is in India & how little’s done about it.TOI Editorials
As the serious issue of adulteration of temple prasad at Tirupati spawns a political slugfest, various places of worship and organisations that distribute cooked food, investigators, and food adulteration safety inspectors need to review food checks and controls.
Who is monitoring | Places of worship are vested with deep trust. Which makes the scandal of alleged adulteration in TTD’s prasad a highly sensitive matter. Following the allegations made in public, all supplies were reportedly suspended and vendors replaced, including those for ghee. But the adulteration itself needs further scientific probe – from place of procurement of samples to the period of adulteration. It also needs to be seen what quality checks high footfall places such as Tirupati have in place, how frequent is the food monitoring, and SOP in event of breach. How frequently do state regulators oversee food inspections in places of worship, nationwide?
Everything needs checking | Adulteration is institutionalised nationwide. Community feeding as a mass activity is common across states, mass distribution of cooked meals is also state activity. The successful mid-day meal scheme is hobbled with cases of adulteration where kids have fallen severely sick. Leave aside fertiliser/pesticide residue in veggies and fruits, or antibiotics in poultry, or lead and arsenic in water. Spices and cooking mediums remain among the most adulterated items. A recent Stanford University multi-country study of lead chromate that took samples from 17 Indian cities, found 14% of all samples had high levels of the metal. Presence of lead was off the charts in samples from Patna, and high in samples from Guwahati and Chennai. On milk, cooperatives may have powered the industry’s growth, but the unorganised sector still constitutes over half the sector, including for processed products such as ghee. In 2016, Parliament was told 2 in 3 Indians consume milk that has detergent, caustic soda, urea or paint. Last Aug, data shared in Parliament showed over 25% of food samples tested in 2022-2023 had adulterants.
Inadequacy of inspection | Food inspections network is woefully lacking, failing to tackle adulteration with the goal of rooting it out. What typically happens is a rash of raids, seizures and bans follows any instance of adulteration that goes public – recall the Maggi masala mix case, or recent ethylene oxide scandal – followed by no-one-quite-knows-what-happened. The alleged Tirupati contamination is breach of people’s trust. But food adulteration everywhere continues apace – and regulators do not look like they’re winning the battle.
Date: 24-09-24
Keep Up With the Flux of Changing JobsA skills gap index will help employers, employees.ET Editorials
GoI is planning to map India’s skills gap by building an index in order to align the country’s labour market with long-term trends such as AI and climate transition. Labour shortages are a key determinant in adoption of new technologies, and early identification can, indeed, help both on the demand and supply sides of the skills equation. An index of overand under-qualification can help workers, industry, academia and policymakers to make the labour market more liquid. Employers can adopt new technologies quicker if they are not confronted with a shortage of skills. Job-seekers can be steered towards occupations facing recruitment difficulties. Educational institutions will be able to mould curricula to the evolving demands of the job market, something that needs better synching. And policies can be tailored to develop rapid reskilling to embrace technological change.
Technology is the biggest contributor to skills shortage. Not only are jobs being created and destroyed continually, the nature of jobis mutating as well. IT that allows machines to perform repetitive tasks has altered the employment scenario across industries. AI, which allows machines to make independent decisions, is expected to have a deeper impact on how work is done in an economy. Yet, employers report skills shortage to be among the top barriers to implementing AI as training institutes scramble to offer courses on the subject. GoI has to facilitate the training and oversee its quality, ensuring ‘AI-washing’ doesn’t gain ground. By some estimates, a third of all formal jobs in the economy could be at risk on account of AI. Not all these jobs will disappear, of course, and policies will have to be drawn up to encourage significant investments in retraining workers to be able to deliver in an automated economy.
India also has a special need for a skills gap index to accelerate employment in the formal economy. This is vital for the country to become a manufacturing and services base for the global economy.
Date: 24-09-24
इंडो-यूएस सेमीकॉन डील के वैश्विक मायनेसंपादकीय
करीब 19 वर्षों पहले अमेरिका से हुए सिविल परमाणु समझौते के बाद भारत ने एक बार फिर एक ऐसा समझौता किया है, जो अभी तक अमेरिका ने किसी अन्य देश से नहीं किया है। इसके तहत अमेरिका की मिलिट्री इकाई यूएस स्पेस फोर्स, भारत सरकार के सेमीकॉन मिशन सहित दो भारतीय कंपनियों के साथ मिलकर खास किस्म के सेमी-कंडक्टर बनाएगी, जो आधुनिक सामरिक क्षमता के मद्देनजर एडवांस्ड सेंसिंग, संवर्धित – संचार और हाई वोल्टेज पॉवर इलेक्ट्रॉनिक्स में भारत को अग्रणी बनाएगा। हाल में अमेरिका अति-परिष्कृत रक्षा टेक्नोलॉजी साझा करने में बेहद सतर्क रह रहा है, ताकि वह घूम-फिर कर चीन के पास न पहुंचे। दो साल पहले इसी आशय से ‘चिप्स कानून’ बना। लेकिन अब भारत को टेक्नोलॉजी ट्रांसफर करना मंजूर हुआ है। ‘क्वाड’ का जन्म चीन की विस्तारवादी नीति की प्रतिक्रिया में हुआ था। यही कारण है कि चीन ने दो दिन पहले ‘क्वाड’ की ताजा बैठक को लेकर कहा कि उसे धमकाने की कोशिश न की जाए। बहरहाल अमेरिका की भारत को सामरिक रूप से सक्षम करने की उदारता अकारण नहीं है। चीन से खतरा बढ़ता जा रहा है और जो चिंता अमेरिका की है, वही भारत के अलावा जापान, ऑस्ट्रेलिया की भी है। दरअसल अमेरिका के रक्षा उत्पादन में एडवांस्ड सेमी कंडक्टर की डिजाइन के शोध में लगी कई संस्थाओं के मुखिया भारतीय मूल के और कई भारतीय स्टार्टअप उत्पादन में सक्षम हैं। इसमें दिल्ली आईआईटी का भी योगदान है। इसीलिए भारत में इन उपकरणों का उत्पादन दोनों देशों के लिए हितकर होगा। यह पहली इकाई होगी जो दुनिया में बहु-तत्वीय इन्फ्रारेड, जेलियम नाइट्राइड, सिलिकॉन कार्बाइड सेमीकंडक्टर का निर्माण न केवल रक्षा-सामर्थ्य बल्कि रेलवे, डाटा सेंटर्स, ग्रीन एनर्जी, संचार और कमर्शियल हितों के लिए भी करेगी। भारत फिलहाल आठ हजार करोड़ रुपए से ऐसी चिप आयात करता है।
Date: 24-09-24
क्वाड का हासिलसंपादकीय
भारत, अमेरिका, जापान और आस्ट्रेलिया के संगठन क्वाड का यह छठवां शिखर सम्मेलन था, जिसमें चारों देशों ने बड़े उत्साह के साथ भाग लिया। अभी चार वर्ष हुए हैं इस संगठन को बने हुए। इस बीच दो आभासी माध्यम से बैठकें भी हो चुकी हैं। इस सम्मेलन में क्वाड देशों के बीच हिंद प्रशांत क्षेत्र में स्वास्थ्य और सुरक्षा संबंधी ऐतिहासिक फैसले हुए हैं। इसमें ‘कैंसर मूनशाट इनिशिएटिव’ के जरिए हिंद प्रशांत क्षेत्र में गर्भाशय ग्रीवा कैंसर से जीवन बचाने के लिए साझेदारी और समुद्री सुरक्षा को आगे बढ़ाने के लिए 2025 में ‘क्वाड ऐट सी शिप आब्जर्वर मिशन’ शुरू करना शामिल है। इसके जरिए हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बंदरगाहों के बुनियादी ढांचे के समावेशी विकास को आगे बढ़ाया जाएगा। संभावित बीमारियों और महामारियों से पार पाने के लिए पहले से रणनीति बनाने पर भी जोर दिया गया है । निस्संदेह ये महत्त्वपूर्ण समझौते हैं। गर्भाशय ग्रीवा कैंसर से पार पाना इस समय की बड़ी चुनौती है। क्वाड समझौते से निश्चय ही इस पर काबू पाने में काफी मदद मिल सकेगी। इसके अलावा, इस सम्मेलन में क्वाड देशों के बीच सेमीकंडक्टर आपूर्ति श्रृंखला को मजूबत बनाने के लिए किया गया समझौता बेहद अहम है।
हिंद प्रशांत क्षेत्र विश्व का सबसे अधिक आबादी वाला और आर्थिक रूप से सक्रिय क्षेत्र है, जिसमें चार महाद्वीप शामिल हैं- एशिया, अफ्रीका, आस्ट्रेलिया और अमेरिका । इस क्षेत्र में चीन के बढ़ते दखल से सारे देश सतर्क हैं। दरअसल, चीन से मिलने वाली चुनौतियों से पार पाने के मकसद से ही क्वाड का गठन किया गया था । इस क्षेत्र में भारत की भूमिका अहम है। अमेरिका, आस्ट्रेलिया और जापान चीन का मुकाबला करने के लिए दक्षिण चीन सागर तथा पूर्वी चीन सागर में भारत की उपस्थिति चाहते हैं । भारत भी अपनी सीमाओं और पड़ोसी देशों में चीन की पैठ से परेशान है। अमेरिका से उसकी तनातनी पुरानी है । ऐसे में, इन देशों के एक मंच पर उपस्थित होने से चीन को चुनौती देने में आसानी होगी । समुद्री सीमा के विस्तार और उसमें इन देशों के साझा सैन्य अभ्यास से चीन को रोकना आसान होगा । इस अर्थ में क्वाड का ताजा शिखर सम्मेलन कई अर्थों में ऐतिहासिक कहा जा सकता है।
फिलहाल देशों की ताकत उनकी तकनीकी संपन्नता से आंकी जाने लगी है। इस मामले में चीन अनेक मामलों में अमेरिका, जापान और आस्ट्रेलिया से बहुत आगे है। खासकर सेमीकंडक्टर निर्माण के क्षेत्र में फिलहाल पूरी दुनिया में उसका दबदबा है। अमेरिका ने पिछले कुछ वर्षों में इस क्षेत्र में काफी तरक्की की है, पर अब भी वह चीन से काफी पीछे है। भारत ने सेमीकंडक्टर निर्माण की दिशा में बहुत तेजी से कदम आगे बढ़ाया है, मगर उसके सामने कई अड़चनें बनी हुई हैं। दो कंपनियों ने इसमें निवेश का उत्साह दिखाया था, मगर उन्होंने अपने कदम वापस खींच लिए। तीसरी कंपनी को विदेशी विशेषज्ञों की जरूरत है, जो फिलहाल उपलब्ध नहीं हो पा रहे। ऐसे में क्वाड सम्मेलन में इस क्षेत्र में शोध और शिक्षा को प्रोत्साहन देने के लिए आर्थिक मदद की घोषणा से निश्चय ही उल्लेखनीय नतीजे आने की उम्मीद की जा सकती है। हालांकि सम्मेलन के बाद हमारे प्रधानमंत्री ने चीन का नाम लिए बगैर कहा कि क्वाड किसी के खिलाफ नहीं है। हम क्षेत्रीय अखंडता और सभी मुद्दों पर शांतिपूर्ण तरीके से समाधान करने के समर्थन में हैं। पर इस वास्तविकता से इनकार नहीं किया जा सकता कि क्वाड की सक्रियता से चीन की चिंता तो बढ़ी है।
Date: 24-09-24
नई बयारसंपादकीय
करीब दो वर्ष पहले श्रीलंका में उपजे आर्थिक संकट के बीच जो हालात पैदा हुए थे, उसके मद्देनजर यह आशंका स्वाभाविक थी कि इस स्थिति से निकलने में देश को शायद काफी वक्त लग जाए । मगर चुनावों के बाद अब वहां एक तरह से नई सत्ता की स्पष्ट तस्वीर उभर कर सामने आई है । श्रीलंका में हुए चुनाव के बाद आखिरकार वामपंथी नेता अनुरा कुमारा दिसानायके को 42.31 फीसद मत मिले और उनके प्रतिद्वंद्वी रहे सजी थ प्रेमदासा को 32.76 फीसद वोट मिले। मगर दूसरे दौर की गिनती के बाद दिसानायके को वहां के नौवें राष्ट्रपति के रूप में चुन लिया गया । दिलचस्प यह है कि सन 2019 में हुए राष्ट्रपति चुनाव में दिसानायके को सिर्फ तीन फीसद वोट मिले थे। यानी कहा जा सकता है कि इस बीच श्रीलंका में आर्थिक संकट और बिगड़ती स्थिति के बीच मुख्यधारा के बाकी राजनीतिक पक्षों में से किसी की भी आम लोगों की अपेक्षाओं या उम्मीदों के बीच जगह नहीं बची थी। इस बीच देश से भ्रष्टाचार खत्म करने, मजदूरों की आवाज उठाने और अच्छा प्रशासन देने के दिसानायके के वादे ने एक तरह से अंधेरे में घिरी आम जनता को उम्मीद की रोशनी दी।
निश्चित रूप से श्रीलंका के लिए यह एक नई बयार है और उम्मीद की जानी चाहिए कि वह कुछ वर्ष पहले भिन्न धार्मिक पहचान पर आधारित हिंसा से लेकर व्यापक आर्थिक संकट की वजह से पैदा हुए व्यापक अराजक विद्रोह के हालात से आगे की राह पर कदम बढ़ाएगा । दिसानायके की जीत को श्रीलंका में नस्लीय या धार्मिक कट्टरता के खिलाफ जनादेश भी कहा जा सकता है । मगर भारत और उसके पड़ोसी देशों की इस बात पर नजर रहेगी कि नई भू-राजनीतिक परिस्थितियों के बीच अंतरराष्ट्रीय संबंधों के समीकरण में श्रीलंका क्या रुख अख्तियार करेगा । पहले ही इस बात की आशंका जताई जाती रही है कि चीन के कर्ज के जाल में उलझने का असर श्रीलंका के अपने पड़ोसी देशों के साथ संबंधों और नीतियों पर पड़ता रहा है। अब वहां वामपंथी विचारधारा के एक नेता के राष्ट्रपति बनने के बाद यह देखने की बात होगी कि श्रीलंका चीन के प्रभाव से किस हद तक मुक्त रह पाता है।
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हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने प्रोटेक्शन फॉर मनी लांड्रिंग एक्ट या धन शोधन या पीएमएलए मामले में दिल्ली के मंत्री सिसोदिया की जमानत के बाद दो और जमानत दी हैं।
उच्चतम न्यायालय के इन आदेशों से जुड़े मुख्य बिंदु –
– पीएमएलएए यूएपीए (आतंकवाद विरोधी कानून) और पीएसए (पब्लिक सेफ्टी एक्ट) के तहत जमानत एक आदर्श है।
– न्यायालय के एक के बाद एक आए जमानत के आदेश में जांच एजेंसियों को जांच की गुणवत्ता और प्रकृति के लिए फटकार लगाई गई है।
– इन मामलों में न्यायालय ने दिल्ली उच्च न्यायालय और जांच एजेंसियों के समक्ष तीन बिंदु रखे –
1) जांचकर्ता ऐसे ‘साक्ष्य के आधार पर जमानत के विरूद्ध बहस नहीं कर सकते, जो केवल तब लागू होंगे, जब होंगे, मुकदमा शुरू होगा।’’ न्यायालय ने यह भी कहा कि ‘अनुमान’ साक्ष्य नहीं हैं।
2) जांच पूरी होने के बाद भी एजेंसी ने जमानत का विरोध किया था। न्यायालय ने एजेंसी को आगाह किया कि अगर साक्ष्य की गुणवत्ता पर की गई टिप्पणी को जमानत आदेश में डाल दिया जाता, तो यह मुकदमे को भी प्रभावित करता।
3) न्यायालय ने फिर से दोहराया कि यद्यपि पीएमएलए की धारा 45 जमानत के लिए दोहरी शर्तें निर्धारित करती है, लेकिन यह नहीं कहती कि स्वतंत्रता से वंचित करना आदर्श है।
उच्चतम न्यायालय की कड़ी टिप्पणीयों को कानूनी मिसाल के तौर पर नहीं देखा जा सकता है। लेकिन इस तरह के ऑर्बिटर डिक्टा का उद्देश्य पुलिस और उच्च न्यायालयों के लिए सबक है।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 29 अगस्त, 2024
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Date: 23-09-24
Two To TangoTo maximise its strategic ties with US, India needs domestic R&D, economic heftTOI Editorials
Modi’s declaration at Delaware’s Quad Summit that the grouping is “here to stay” is as definitive an indication as can be about the changed nature of geopolitics, which has seen China emerge as a global challenge for both big and middle power democracies. But it is Modi’s meeting with Biden on the sidelines of the summit that’s of most salience to India. The Indo-US strategic partnership has gone beyond talk in recent years. India’s growing reliance on US military weapons systems boosts that partnership. Under the US-India Defence Industrial Cooperation Roadmap, collaboration is underway to advance key co-production agreements for jet engines, munitions and ground mobility systems.
Do your homework | But India must be realistic about the limits of the relationship. For instance, while the two countries inked a deal last year to produce fighter jet engines, the deal between GE and HAL would only see 80% tech transfer. For India to come up with the remaining 20% is a tall order considering the status of our defence ecosystem. We still spend too little on R&D, with Indian firms allocating only 1.2% of their revenue to research, as against the global average of 3.4%. Ditto for absorption of disruptive technologies into our defence architecture. Closer strategic ties with US must also not foreclose our options with other countries for military purposes. That has been India’s foreign policy all along and it has served us well.
New tech | Critical and emerging technologies represent the second vital strand of Indo-US strategic relationship. Since iCET was launched last year to expand cooperation across key tech sectors, there has been considerable forward movement in sectors like semiconductors and space. But considering that it covers the whole gamut of cutting-edge disciplines, a lot remains to be done before iCET’s potential can be realised. Here, India would do well to seek from US partnerships at upper ends of the value chain that allow sharing of IPRs and application benefits. The best argument to get that is economic heft. GOI must remember that.
Date: 23-09-24
Ease of Being Women In Public SpacesET Editorials
Increasing women’s participation in the labour force is connected to increasing their presence in public spaces. And that is connected to making public spaces more accessible, safe and agreeable. Feeling unsafe outdoors isn’t confined to the developing world. A 2023 ‘Transport for New South Wales’ survey report in Australia found 59% surveyed women feeling unsafe walking after dark, compared to 31% men. Something as ‘innocuous’ as the lack of streetlights can make a difference between discomfort and comfort of ‘stepping out’. Such underrated concerns affect women in developing countries like India.
GoI has set up a taskforce headed by the labour secretary to consider options, including a flexi work arrangement framework for women. While welcome, this misses the crux of the matter — making conditions in public spaces ameliorative, and not just tweak schedules to limit women from venturing out. In the workplace, when it comes to promotion, assignments and continued participation, women should not be singled out for being women requiring ‘special treatment’. Flexible work arrangements, improved public transport and mobility options, access to services — from clean toilets, affordable food, to medical services — can make it easier for women to be very much part of public life, work included. The positive correlation of women and good work conditions that start from the moment one steps out of one’s house will help better any ‘ease of being a woman in public spaces’ index.
Safe public spaces and mobility options are real-world issues that lead up to better standards of living and working for women. One judges a society/city by the number of women who freely are visible in public spaces. Workplaces are part of that comfort level.
Date: 23-09-24
Unwarranted curbsFact-checking cannot be an excuse to impose censorshipEditorial
The Centre’s move to create a ‘fact-checking unit’ empowered to order the removal of ‘fake or false or misleading’ information from digital and social media platforms was never likely to succeed. Justice A.S. Chandurkar of the Bombay High Court struck down the amended rule, in a tie-breaking ruling after a two-judge Bench, in January, was split over its constitutional validity. In an opinion that makes it a 2:1 decision, he agreed with the view of Justice G.S. Patel, who had held that the provision violated the right to freedom of expression and sought to coercively classify speech as true or false based on vague and undefined terms. The rule, introduced as an amendment in 2023 to the rules governing information technology intermediaries and digital media ethics, meant that once the fact-checking unit flagged a piece of information on a social media platform as fake, false or misleading, the platform was bound to take it down. Failure to do so would result in its losing its ‘safe harbour’ protection, or exemption from legal action for third party content hosted on a platform. Editors and publishers rightly saw the creation of a fact-checking unit in the Press Information Bureau as a mechanism by which the Centre could censor anything that it disputes. Political satirists will be forced into self-censorship, argued comedian Kunal Kamra. The government contended that recklessly published material that was contrary to truth cannot have constitutional protection and that aggrieved platforms were free to approach the courts for remedy.
However, two of the three judges have found the rule unconstitutional, noting that the terms ‘fake’, ‘false’ or ‘misleading’ were not defined and there was no scope for redress provided in the rules. Another point that went against the government was that the restriction was applied only to information about the Centre, and not other kinds of information. Justice Chandurkar also agreed with Justice Patel that a restriction on free speech based on whether something is true or false was not one of the circumstances listed in Article 19(2) of the Constitution for imposing reasonable restrictions. The other judge on the Bench, Justice Neela Gokhale, had upheld the rule, holding that it was not vaguely worded and that there was no bar on a platform publishing a disclaimer to retain its safe harbour protection. She also rejected the idea that such a rule would have a chilling effect on free speech. The prevalence of misinformation or false information is a problem that undoubtedly requires to be tackled, but it cannot be an excuse to create a mechanism by which the government becomes a judge in its own cause or the sole arbiter of what information about itself is misleading.
Date: 23-09-24
Sri Lanka’s verdictThe spirit of the mandate of the presidential poll was clear — for changeEditorial
The people of Sri Lanka have voted for change in the ninth presidential election with their nod to Anura Kumara Dissanayake of the National People’s Power (NPP). Even though Mr. Dissanayake, also the chief of the Janatha Vimukthi Peramuna (JVP), had to go through a second round of counting — a first since the introduction of the system of executive presidency in 1978 — the spirit of the mandate is for a change and a perceptible shift away from the established, traditional parties and groups that dominated the political landscape. It is remarkable that the JVP, a party with Marxist origins, that is leading the NPP, has been able to get about 42% of the vote share, unlike its poor showing in 2019 and 2020. And though lower than in 2015 and 2019, voter turnout was about 79.5%. Given their constraints, all the contestants conducted themselves in a way that reflected their faith in the democratic system. It is also no surprise that the purpose for which the popular uprising Aragalaya (‘struggle’ in Sinhala) took place, found resonance in the campaign and verdict.
As economic woes had triggered the uprising, all the contenders had focused on the economic factor. Mr. Dissanayake told The Hindu recently that fixing the battered economy would be among his priorities. Despite being a Leftist, the JVP leader appears receptive to welcoming private and foreign investments. His election manifesto talks of renegotiating, rather than scrapping, with the IMF the $2.9 billion bailout agreement. What Mr. Dissanayake should not overlook is that he has to adopt a consensual path while implementing his economic policies and programmes. It is also going to be challenging when it comes to the other facets of governance and how he will be able to ensure a “system change” as he has repeatedly attacked the present “corrupt political culture”. The promise to hold elections to provincial councils — a tier of government that the JVP had once opposed — must be reassuring to Tamils. In the area of foreign relations, Mr. Dissanayake, dubbed by his critics a “pro-China” leader, is expected to extend his pragmatism — he did visit India early this year. His manifesto also mentions that Sri Lanka’s territory would not be allowed “to threaten or risk the national security of any country in the region including India”. But it remains to be seen how the new President will translate into action his electoral promise of abolishing the current system of executive presidency, a matter that has refused to die down in the political discourse of the country for over 30 years. Mr. Dissanayake, who will be assuming charge under not so comfortable conditions, requires understanding and cooperation from every section of Sri Lankan society.
Date: 23-09-24
आयुषमान भारत का मिशनजगत प्रकाश नड्डा, ( लेखक केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री हैं )
आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना यानी एबी पीएम-जय योजना की छठी वर्षगांठ गर्व का क्षण है। सितंबर 2018 में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व में शुरू की गई यह योजना आज विश्व की सबसे बड़ी स्वास्थ्य सेवा योजना में से एक बन चुकी है। यह योजना इस सरकार की प्रतिबद्धता को दर्शाती है कि सभी नागरिकों विशेष रूप से सबसे कमजोर वर्गों के लिए समान स्वास्थ्य सेवा उपलब्ध कराई जाए। पिछले छह वर्षों में इस योजना ने लाखों जिंदगियों को छुआ है। उन्हें जीवनरक्षक उपचार प्रदान किया है। उनके जीवन में एक नई आशा जगाई है। आयुष्मान भारत की यात्रा प्रमाण है कि एक राष्ट्र जब अपने लोगों के स्वास्थ्य और कल्याण को बेहतर बनाने के लक्ष्य के साथ एकजुट होता है तो क्या कुछ हासिल कर सकता है।
आयुष्मान भारत का मुख्य मिशन यह सुनिश्चित करना है कि कोई भी भारतीय अपनी वित्तीय स्थिति के कारण स्वास्थ्य सेवा से वंचित न रहे। माध्यमिक और तृतीयक अस्पताल देखभाल को कवर करने के लिए प्रति परिवार पांच लाख रुपये के वार्षिक कवरेज के साथ इस योजना ने आर्थिक रूप से वंचित परिवारों को देश के कुछ सर्वश्रेष्ठ अस्पतालों में नि:शुल्क गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा सेवा की सुविधा उपलब्ध कराई है। बीते दिनों ही सरकार द्वारा 70 वर्ष और उससे अधिक आयु वर्ग के नागरिकों के लिए इस योजना का विस्तार करने का निर्णय लिया गया है, जो देश के बदलते जनसांख्यिकीय परिदृश्य को देखते हुए महत्वपूर्ण कदम है। इससे पहले, सामुदायिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता, जैसे कि आशा बहनों, आंगनवाड़ी कार्यकर्ता और आंगनवाड़ी सहायकों के परिवारों को योजना के दायरे में लाया गया था। आज 55 करोड़ से अधिक लोग इस योजना के तहत मुफ्त स्वास्थ्य सेवाओं के लिए पात्र हैं। इसमें अभी तक 7.5 करोड़ से अधिक सफल उपचार हुए हैं, जिन पर एक लाख करोड़ रुपये से अधिक का खर्च हुआ है। यह एक बड़ी उपलब्धि है। जो परिवार स्वास्थ्य खर्च के कारण गरीबी के शिकंजे में फंस जाते थे, उनके लिए यह योजना वित्तीय ढाल साबित हो रही है। योजना के तहत लाभार्थी किसानों से लेकर दैनिक मजदूरों तक के कथन प्रमाण हैं कि यह योजना उन्हें आर्थिक परेशानी से बचा रही है। इस मायने में आयुष्मान भारत योजना अपने वादे पर खरी उतरी है।
इस योजना में उपचार का दायरा भी बहुत व्यापक है, जो 1900 से अधिक चिकित्सा प्रक्रियाओं को कवर करता है। इनमें हार्ट की बाईपास या ज्वाइंट रिप्लेसमेंट जैसी जटिल सर्जरी से लेकर कैंसर और गुर्दे की बीमारियों के उपचार तक शामिल हैं। ये ऐसे उपचार हैं जो पहले तमाम लोगों के लिए पहुंच से बाहर थे, लेकिन अब इस योजना ने उन्हें सुलभ, किफायती और सभी के लिए उपलब्ध बना दिया है। एबी पीएम जय की एक विशेषता इसका एक मजबूत स्वास्थ्य सेवा प्रदाता नेटवर्क तैयार करने की क्षमता रही है। आज, देश के 29,000 से अधिक अस्पताल, जिनमें 13,000 से अधिक निजी अस्पताल शामिल हैं, इस योजना के तहत सूचीबद्ध हैं। यह नेटवर्क ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों तक फैला हुआ है, जिससे सुनिश्चित होता है कि देश के सबसे दूरस्थ हिस्सों में रहने वालों को भी गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवाएं मिल सकें। योजना की अनूठी पोर्टेबिलिटी सुविधा ने यह सुनिश्चित किया है कि लाभार्थी अपने राज्य के अलावा देश भर के अस्पतालों में इलाज करा सकते हैं।
इस विशाल नेटवर्क को एक मजबूत आइटी बुनियादी ढांचे से लैस किया गया है, जो दावों के निपटान में पारदर्शिता, दक्षता और गति सुनिश्चित करता है। आधार आधारित बायोमीट्रिक सत्यापन और पेपरलेस क्लेम प्रोसेसिंग ने धोखाधड़ी और अक्षमता को काफी हद तक कम किया है। आयुष्मान भारत की सफलता ने स्वास्थ्य सेवा तंत्र के अन्य हिस्सों में भी सुधार को उत्प्रेरित किया है। योजना के गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा पर जोर ने सार्वजनिक और निजी दोनों अस्पतालों को अपने बुनियादी ढांचे और सेवाओं को उन्नत करने के लिए प्रेरित किया है।
एबी पीएम जय के साथ-साथ, सरकार आयुष्मान आरोग्य मंदिर यानी एएएम के माध्यम से प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने पर भी काम कर रही है। अब तक देश में 1.73 लाख से अधिक आरोग्य मंदिर स्थापित किए जा चुके हैं, जो सामान्य बीमारियों और मधुमेह, उच्च रक्तचाप और कैंसर जैसी परिस्थितियों के लिए मुफ्त स्क्रीनिंग, निदान और दवाएं प्रदान कर रहे हैं। कल्याण (वेलनेस) और प्रारंभिक निदान को बढ़ावा देकर हम अस्पताल में भर्ती होने की आवश्यकता को कम करने और स्वास्थ्य सेवा की पहुंच को लंबे समय में और अधिक स्थायी बनाने की उम्मीद करते हैं।
आयुष्मान भारत की उपलब्धियों पर अभिभूत होने के साथ ही हमें भावी चुनौतियों को भी स्वीकार करना चाहिए। योजना का पैमाना विशाल है और इसके साथ इसे लगातार अनुकूलित, परिष्कृत और सुधारने की जिम्मेदारी आती है। हम योजना की पहुंच को बढ़ाने, अस्पतालों को समय पर भुगतान सुनिश्चित करने और हर लाभार्थी को प्रदान की जाने वाली चिकित्सा सेवा की गुणवत्ता को बढ़ाने के लिए लगातार काम कर रहे हैं। भारत की समग्र, किफायती और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सेवा की इस यात्रा को और सुगम बनाने के लिए हम आयुष्मान भारत को मजबूत करना जारी रखेंगे। हम उपचारों की सूची का विस्तार करने, सूचीबद्ध अस्पतालों की संख्या बढ़ाने और आयुष्मान आरोग्य मंदिरों के सफल निर्माण करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।
किसी भी राष्ट्र का स्वास्थ्य उसकी समृद्धि की नींव है। स्वस्थ जनता देश के विकास, उत्पादकता और नवाचार में योगदान करने में सक्षम होती है। आयुष्मान भारत इस स्वस्थ, मजबूत और विकसित भारत की संकल्पना का केंद्र है। इस योजना की सफलता सरकार, स्वास्थ्य सेवा प्रदाताओं और लोगों के बीच की गई कड़ी मेहनत, समर्पण और सहयोग को दर्शाती है। हम प्रत्येक नागरिक के कल्याण और स्वास्थ्य को लेकर प्रतिबद्ध हैं। इस योजना की छठी वर्षगांठ पर, आइए हम सभी नागरिकों के लिए एक समावेशी, सुलभ और सहानुभूतिपूर्ण स्वास्थ्य सेवा प्रणाली बनाने के लिए अपनी प्रतिबद्धता को दोहराएं। हम आने वाली पीढ़ियों के लिए एक स्वस्थ भारत के निर्माण की यात्रा को जारी रखेंगे। जय हिंद!
Date: 23-09-24
भारत के भूराजनीतिक हितसंपादकीय
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन के साथ पिछली व्यक्तिगत बैठक और उनकी अध्यक्षता वाली क्वाड सालाना शिखर बैठक के दौरान जी 7 देशों के साथ भारत के बढ़ते तालमेल को रेखांकित किया। बाइडन का कार्यकाल आगामी जनवरी में पूरा हो जाएगा। दोनों बैठकों में चीन की बढ़ती होड़ से मुकाबला करने के रास्ते तलाशने के प्रयास किए गए। इसकी पुष्टि बाइडन द्वारा क्वाड नेताओं को दिए हॉट माइक कमेंट से भी होती है, जिसमें उन्होंने कहा था कि चीन, एशिया-प्रशांत के देशों का इम्तहान ले रहा है। इस संदर्भ में क्वाड नेताओं के साझा विलमिंग्टन घोषणापत्र में न केवल बढ़ी हुई भूराजनीतिक चिंताओं तथा उन्हें हल करने के लिए चुनिंदा पहलों को दर्शाया गया बल्कि इसमें वैश्विक सुरक्षा ढांचे के व्यापक पहलुओं पर संबंधों को गहरा बनाने का एजेंडा भी जारी रखा गया। इसमें स्वास्थ्य सहयोग से लेकर बुनियादी ढांचा क्षेत्र की संयुक्त परियोजनाएं और जलवायु परिवर्तन तक सभी पहलू शामिल थे। इनमें से कई कार्यक्रमों को 2025 में स्पष्ट आकार मिलेगा, जब भारत क्वाड शिखर बैठक की मेजबानी करेगा।
इस संदर्भ में देखें तो प्रमुख परियोजनाओं में से एक है हिंद-प्रशांत में प्रशिक्षण की समुद्री पहल (मैत्री) जो 2022 की समुद्री क्षेत्र जागरूकता परियोजना पर आधारित है। यह साझेदार देशों को उनके विशिष्ट आर्थिक क्षेत्रों में गतिविधियों पर नजर रखने की सुविधा देती है। इसमें अतिक्रमण और गैरकानूनी गतिविधियां शामिल हैं। मैत्री का लक्ष्य है इन उपायों का अधिकतम इस्तेमाल करना। अगले वर्ष भारत में इसकी आरंभिक कार्यशाला आयोजित की जाएगी। मुंबई में भी क्वाड क्षेत्रीय बंदरगाह और परिवहन सम्मेलन आयोजित किया जाएगा ताकि समूह के उन प्रयासों को मजबूती दी जा सके जिनके तहत वह हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बंदरगाहों का टिकाऊ और मजबूत बुनियादी ढांचा तैयार करा सकता है। यह ऐसी पहल है, जिसे दक्षिण और पूर्वी चीन सागर के पड़ोसी देशों में चीन के अतिक्रमण को ध्यान में रखकर शुरू किया गया है। इससे संबंधित संयुक्त वक्तव्य को पढ़ें तो वह गंभीर चिंताओं की बात करता है। संयुक्त वक्तव्य कई अनुच्छेदों में बहुत मजबूती से चीन के सहयोगी उत्तर कोरिया के निरंतर परमाणु हथियार बनाने के प्रयासों की आलोचना करता है। दस्तावेज में सेमीकंडक्टर, कृषि शोध, साइबर सुरक्षा और अंतरिक्ष शोध आदि सभी क्षेत्रों का उल्लेख है और क्वाड सहयोग की बढ़ती सार्वभौमिक प्रकृति को रेखांकित किया गया है। दुनिया के गरीब देशों तक भारत की पहुंच को स्वीकार करते हुए वक्तव्य ने यह इरादा प्रकट किया कि वह संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार के जरिये उसे अधिक समावेशी बनाने का प्रयास करेगा। इसके लिए स्थायी और अस्थायी सदस्यों की संख्या बढ़ाने की बात कही गई। इरादा यह है कि अफ्रीका, एशिया, लैटिन अमेरिका और कैरेबियाई देशों के प्रतिनिधित्व को सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों में स्थान दिया जाए। मोदी की यात्रा ने भारत को 14 सदस्यों वाले हिंद प्रशांत आर्थिक समृद्धि ढांचे (आईपीईएफ) के और नजदीक लाने में भी सहायता की। यह पहल क्षेत्र में चीन के बढ़ते प्रभाव से निपटने के लिए अमेरिकी राष्ट्रपति ने 2022 में की थी। क्वाड के साझेदार देशों जापान और ऑस्ट्रेलिया के उलट भारत ने 15 सदस्यीय क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी (आरसेप) से बाहर रहने का निश्चय किया, जबकि चीन इसका सदस्य है। परंतु उसने आईपीईएफ के चार में से दो स्तंभों – स्वच्छ और निष्पक्ष अर्थव्यवस्था पर हस्ताक्षर किए। इनका उद्देश्य स्वच्छ ऊर्जा और जलवायु के अनुकूल प्रौद्योगिकियों पर सहयोग करना तथा भ्रष्टाचार विरोधी और कर पारदर्शिता के उपायों को मजबूत करना है।
भारत ने फरवरी में आपूर्ति श्रृंखला मजबूत करने का समझौता स्वीकार किया। आलोचनात्मक दृष्टि से देखें तो भारत ने फ्रेमवर्क के पहले स्तंभ व्यापार के क्षेत्र में पर्यवेक्षक रहना तय किया है। इस साझेदारी का भविष्य बहुत हद तक इस बात पर निर्भर करता है कि अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव के नतीजे क्या होते हैं। गर डॉनल्ड ट्रंप को दूसरा कार्यकाल मिलता है तो आईपीईएफ में गतिरोध आ जाएगा क्योंकि वह धमकी दे चुके हैं कि वह सत्ता में आए तो इस समझौते को नकार देंगे। बहरहाल भारत क्वाड का इकलौता विकासशील साझेदार देश है। उसने क्वाड और आईपीईएफ के साथ स्पष्ट संकेत दिया है कि उसके भूराजनीतिक हित कहां होने चाहिए।
Date: 23-09-24
अभिव्यक्ति का हकसंपादकीय
करीब छह महीने पहले केंद्र सरकार ने जब ‘फैक्ट चेक यूनिट’ यानी तथ्य जांच इकाई के गठन संबंधी अधिसूचना जारी की थी, तभी से इस पर विवाद है। मगर इसे लेकर उभरी असहमतियां और उठे सवालों के बावजूद सरकार शायद इस ओर धीरे-धीरे कदम बढ़ा रही थी। अब इस मसले पर बंबई हाईकोर्ट के फैसले के बाद सरकार के लिए अपने पक्ष को निर्विवाद बताना मुश्किल होगा। बंबई हाईकोर्ट ने सूचना प्रौद्योगिकी संशोधन अधिनियम, 2023 को असंवैधानिक करार देते हुए रद्द कर दिया और इसे भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14, 19 और 21 का उल्लंघन बताया। गौरतलब है कि सूचना प्रौद्योगिकी यानी आइटी नियमों में किए गए संशोधनों के जरिए केंद्र सरकार को सोशल मीडिया मंचों पर अपने कामकाज के बारे में ‘फर्जी और भ्रामक’ सूचनाओं की पहचान करने और उन्हें खारिज करने या झूठा घोषित करने के मकसद से तथ्य जांच इकाई बनाने की इजाजत दी गई थी। इस इकाई को सोशल मीडिया पर केंद्र सरकार और उसकी एजंसियों को लेकर दी गई जानकारियों को चिह्नित करने की शक्ति भी दी गई थी।
इसके तहत यह इकाई अगर फेसबुक, इंस्टाग्राम, यूट्यूब और एक्स जैसे सोशल मीडिया मंचों पर किसी जानकारी को झूठी बताती, तो वे कंपनियां वह सूचना या टिप्पणी हटाने के लिए कानूनी रूप से बाध्य होतीं या उस पर अपने मंच की ओर से अस्वीकरण जोड़ना होता। प्रथम दृष्टया यह कवायद गलत सूचना या जानकारी को दुरुस्त करने या उस पर लगाम लगाने की कोशिश लगती है, मगर इसका सिरा कहां तक जाएगा, यह तय करना मुश्किल है। अगर कभी ऐसे नियम लागू होते हैं तो इस बात की क्या गारंटी है कि सरकार की तथ्य जांच इकाई जिन जानकारियों को फर्जी, भ्रामक या झूठी बताएगी और वह किसी तथ्य की मनमानी व्याख्या नहीं होगी और किसी खास टिप्पणी या जानकारी का चुनाव अपनी सुविधा के मुताबिक या सरकार की छवि बचाने के लिए नहीं होगा! अगर किन्हीं स्थितियों में ऐसा होता है, तो क्या इससे किसी व्यक्ति के अभिव्यक्ति के संवैधानिक अधिकार बाधित नहीं होंगे? इन्हीं आशंकाओं के मद्देनजर बंबई हाईकोर्ट ने कहा कि इन नियमों ने संवैधानिक प्रावधानों का उल्लंघन किया है।
हालांकि इससे पहले सुप्रीम कोर्ट ने इस वर्ष मार्च में इस इकाई के गठन से संबंधित केंद्र सरकार की अधिसूचना पर इस वजह से रोक लगा दी थी कि इसकी सुनवाई बंबई हाईकोर्ट में चल रही थी। शीर्ष अदालत ने तब कहा था कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता मौलिक अधिकार है और इस पर नियम के असर का विश्लेषण बंबई हाईकोर्ट में जरूरी है। अब बंबई हाईकोर्ट ने एक तरह से स्थिति स्पष्ट कर दी है। सवाल है कि अगर तथ्यों की जांच के नाम पर किसी अन्य पक्ष की ओर से किए गए विश्लेषण या दी गई जानकारी को खुद किसी सरकारी एजंसी की ओर से बाधित किया जाएगा, किसी की टिप्पणी को हटाया जाएगा, सोशल मीडिया पर उसका खाता बंद करा दिया जाएगा, तो ऐसी स्थिति में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की क्या जगह रह जाएगी? फिर, किसी जानकारी को भ्रामक या फर्जी बताने की व्यवस्था में क्या सिर्फ सरकार के खिलाफ की गई टिप्पणियों की ही जांच की जाएगी या इसका दायरा विस्तृत होगा? यह ध्यान रखने की जरूरत है कि भारत की लोकतांत्रिक परंपरा में विचारों में भिन्नता और असहमतियों के लिए मजबूत जगह रही है और इसी से देश का लोकतंत्र मजबूत हुआ है।
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हाल ही में वाणिज्य और उद्योग मंत्री ने ई-कॉमर्स से छोटे व्यापारियों को होने वाले बड़े नुकसान के बारे में बात की थी। इसे बाजार नियमों और उपभोक्ता के हित से जोड़कर देखा-परखा जाना चाहिए –
– उपभोक्ताओं की भलाई कई बाजार नियमों के केंद्र में होती है। ये नियम अनुचित व्यापार और प्रतिस्पर्धा को नष्ट करने वाली प्रथा को नियंत्रण में रखते हैं। ये नियम सभी कंपनियों पर लागू होते हैं; चाहे वह अमेजॉन हो या फ्लिपकार्ट।
– बड़े व्यापार प्लेटफॉमों के विरूद्ध अविश्वास के मुद्दें दुनियाभर में बढ़ रहे हैं। उन पर उपभोक्ताओं और विक्रेताओं को नुकसान पहुँचाने का आरोप लगाया जा रहा है; विशेषरूप से अमेरिका में।
– भारत को यह आकलन करने की आवश्यकता है कि अमेजन या अन्य ई-कॉमर्स ने उपभोक्ताओं, छोटे आपूर्तिकर्ताओं और प्रतिस्पर्धा के क्षेत्र में क्या किया है।
– अमेजन या ई-कॉमर्स के साथ भारतीय उपभोक्ताओं को कम कीमतें, खरीदने में आसानी और बेहतर सेवा जैसी सुविधाएं प्राप्त हुई हैं।
– ई-कॉमर्स में उपभोक्ताओं को सामान खरीदने के लिए मजबूर नहीं किया जा रहा है। उल्टे, नापसंद और खराब सामान की घर बैठे वापसी की सुविधा भी दी जा रही है।
– मामूली आय या झुग्गी में रहने वाले उपभोक्ता को भी ई-कॉमर्स से वही सेवा मिल रही है, जो एक संभ्रांत क्षेत्र में रहने वाले अमीर को मिलती है।
– ई-कॉमर्स के कारण स्थानीय दुकानदारों ने भी अपनी कीमतों को कम रखा है।
– छोटी दुकानों का महत्व यहाँ खत्म नहीं हो जाता है। उपभोक्ता हमेशा विकल्पों की खोज में रहता है। वह ई-कॉमर्स और स्थानीय दुकानों की तुलना करता है। अगर पड़ोस की दुकान में बेहतर विकल्प मिलते हैं, तो वह उनमें जाना पसंद करता है।
– यदि बड़े शहरों में दुकानों के कम या न चलने की बात करें, तो इसके कारण अलग हो सकते हैं। एक तो भूमि की बढ़ती कीमतों से इन स्थानों पर दुकान लेना ही मुश्किल हो चला है। दूसरे, नई पीढ़ी 24×7 दुकान पर बैठना नहीं चाहती है।
– इन सबके अलावा, भारत की मेगा खपत में कई ऐसे प्लेटफॉर्म बन गए हैं, जो छोटे व्यापारियों को इकट्ठा करके एक वर्चुअल बाजार बना रहे हैं। छोटी गलियों में चलने वाले व्यापार इससे फल-फूल रहे हैं।
– भारत में करोड़ों उपभोक्ता ऐसे हैं, जो रोज कमाते और खाते हैं। ऐसे छोटे उपभोक्ताओं की जरूरतें छोटे आपूर्तिकर्ता ही पूरी करते हैं। अतः भारत के छोटे व्यापारिकयों को बड़ी ई-कॉमर्स कंपनियों से आतंकित नहीं होना चाहिए। उनके लिए भी विकल्प खुले हैं।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित रमा बीजापुरकर के लेख पर आधारित। 23 अगस्त, 2024
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Date: 21-09-24
Don’t JudgeCourts should refuse to hear pleas against creative freedomTOI Editorials
Bombay HC was spot on saying creative freedom can’t be held hostage to law and order problems. Hearing a case against denial of film certification to Emergency, it directed the Censor Board to make a decision by Sep 25. But while this HC got it right, many HCs and other courts have ruled otherwise. This inconsistency doesn’t help the cause of freedom of expression. MP HC had issued a notice to the Censor Board on the same movie, for example.
The bigger point is whether courts should be venturing into this domain at all. As SC itself observed in the Adipurush case, “everyone is touchy about everything now.” By entertaining petitions over “hurt sensibilities” and becoming arbiters of what is kosher, courts end up granting censorship calls legitimacy they shouldn’t have. As it is, India has an inglorious record on censorship of films and books over decades. For the longest time, creative output hasn’t had a judicial eye on it in other democracies. Literature classics like Lady Chatterley’s Loveror Lolitawere proscribed in some Western countries. But those days are over. They should be over in India, too. For movies, India has a regulator. GOI should reconstitute the censor board appellate tribunal – abolished in 2021 – to hear appeals. Courts should refuse to hear such petitions. They have better things to do – the case backlog is over 50mn.
Date: 21-09-24
We Haven’t Missed the Bus to AfricaMahesh Sachdev, [ The writer is former India’s ambassador to Algeria ]
Despite pageantry, high-level participation and big-ticket announcements, the 9th edition of the Forum on ChinaAfrica Cooperation (FOCAC) in Beijing that took place on Sept 4-6 was marked by incrementalism. Slowing Chinese economy has curbed its appetite for African commodities, the main driver of the ties.
Africa’s lower export revenues have exacerbated the economic asymmetry. For instance, till 2013, the China-Africa trade was nearly in balance. But, in 2023, China had a surplus of $64 bn out of the total trade of $282 bn. China’s debt to Africa has mushroomed to around $170 bn, making it nearly 12% of the total debt owned by Africans. After five years of declining Chinese debts to Africa, these climbed in 2023. In some cases, these commercial loans have become unsustainable ‘debt traps’. With coups d’état galore in Africa, Chinese debts have also become riskier. However, facing Western ostracisation, FOCAC is good political optics for Beijing.
China was on a wanton quest for Africa’s raw materials for over two decades. It fuelled China’s overcapacities from real estate to manufactured goods, and the current bust is a sobering story. Now that commodity prices are down, Africans have learnt that it’s best not put all eggs in one basket and perils of borrowing-driven development.
Nevertheless, FOCAC-9 has been reason enough for some experts to hyperventilate that India has ‘missed the bus to Africa’. This is untrue. We are Africa’s second-biggest trading partner — around $100 bn in FY23 — and fourth-largest investor. India’s 3 mn-strong diaspora is omnipresent in the continent. The following needs must be met to help craft a better strategy in Africa:
➤ With 54 countries, 1.4 bn people and myriad needs, Africa is too large and diverse to be the backyard of a single country. Centuries of engagement with the continent have given us respect and momentum in several domains that we need to deploy.
➤ China has its well-known attractiveness for Africans, and India is often no match for them. But the converse is also true, say, in pharma. We should concentrate on our strengths.
➤ The Chinese model of mass manufacturing is unsuited for Africa. Our proven MSME role model best fits Africa’s eco-political requirements of appropriate and ruggedised (jugaadbased) tech, low-capital requirement, company-to-company bonding, and personnel-to-personnel synergy. Language and culture are less of barriers between Indians and Africans. However, the MSME ecosystem needs active government funding and support.
➤ Soft skills are India’s forte. We are most appropriate for Africa’s managerial prowess, IT, skilling, education and healthcare needs. Building such capacities can release synergies and create lucrative opportunities.
➤ Over 75 years, India has built credible eco-political institutions from the central bank to EXIM banks to EC, and stock markets, Aadhaar, UPI, Jan Dhan, DBT, India Stack and startup ecosystem. Most African countries are interested in leveraging or upgrading their ecosystems with such innovations. This could anchor bilateral economies.
➤ Despite its expansive farmlands, African agricul ture is in distress. Our success in this sector can be replicated, unleashing opportunities. Commercialising this sector through a collection of produce, such as edible oils, processing them locally and exporting them to India can be mutually rewarding.
➤ Defence and security sector is a priority for African countries, particularly Sahel countries — Burkina Faso, Chad, Mali, Mauritania and Niger — facing Islamic insurgencies. We should leverage the opportunities.
➤ Our large corporate sector has the wherewithal and staying power to explore opportunities in Africa, but should not compete in the same market.
➤ At the government level, India needs amore national interest-driven, holistic, but granular strategy towards Africa. We must not abdicate our funding and skilling to the African Union but offer these directly to the African states as a quid pro quo to strengthen our diplomatic hand. Signing comprehensive economic cooperation agreements with African countries would spur our trade.
At a policy level, we need not blindly follow the FOCAC model. It wastes too much diplomatic energy and creates distractions. Engaging with Africa is too serious a matter for showmanship.
Date: 21-09-24
Staunch the breachIndia and Pakistan need to drop their hard line stances on the Indus Waters TreatyEditorial
In its fourth notice to Pakistan since January 2023, India has escalated its demand for the renegotiation of the 1960 Indus Waters Treaty (IWT), now calling off all meetings of the Permanent Indus Commission (PIC) until Pakistan agrees to sit at the table for talks. India’s demand last year followed a logjam in the entire process, once held up internationally as a model template for water-sharing agreements. Even in the new millennium, the tenets of the treaty held firm, and India was able to win two major disputes by adhering to the processes laid out, including the Baglihar Dam project in 2007, and another dispute over allegations that India was interfering with Pakistan’s Neelum project in 2013. The issue over how to proceed on dispute resolution for the Kishenganga and Ratle projects has snowballed since 2016, when Pakistan escalated the disputes — having a neutral expert look at them and demanding a Permanent Court of Arbitration (PCA). In a moment of weakness, that it may come to regret, the World Bank — it is a co-signatory and guarantor of the IWT — decided to allow two parallel processes of the dispute mechanism to run at the same time. To make matters worse, Pakistan turned its back on the neutral expert’s proceedings, while India has boycotted the PCA hearings at The Hague. Pakistan has been cold to India’s notices on renegotiating the treaty and the decision by the Modi government to stop all PIC meetings has put the future of the process in peril. Unlike in past decades, when the IWT was considered off-limits for partisan politics, leaders on both sides are now not above using fiery rhetoric. Mr. Modi’s statement after the 2016 Uri attack, that “blood and water” cannot flow together, is perhaps the most egregious example.
It is no coincidence that the spiral mirrors the unravelling of the India-Pakistan bilateral relationship in the same period. There is no political engagement or trade and the 2021 LoC ceasefire agreement is in danger after growing terror attacks and deaths of Indian Army personnel. It may be possible to re-open the treaty talks, but concluding any agreement will be that much more difficult. All eyes are now on New Delhi’s response to Pakistan’s invitation for the SCO Heads of Government meeting on October 15-16. Such an opening could present an opportunity for talks on the way forward. No doubt, new-age issues such as climate change and the need for renewable energy and hydropower options on the Indus necessitate a re-opening of the 64-year-old Treaty. How that is done, along with resolving current disputes, will decide whether the two countries can save the treaty, once referred to as the “one bright spot” in a “very depressing world picture” by U.S. President Dwight D. Eisenhower.
Date: 21-09-24
विज्ञान का यह प्रयोग क्रांतिकारी हो सकता हैसंपादकीय
देश के पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय का ‘मिशन मौसम’ के शुभारंभ के साथ दावा है कि अगले पांच वर्षों में बादलों को अनिच्छित स्थानों पर न बरसने और जहां जरूरत हो वहां बरसाने की तकनीकी विकसित करने पर काम किया जा रहा है। इसके लिए एआई, डॉप्लर राडार, हवाओं की दिशा व गति की समझ के परिष्कृत उपकरण और रेडियो सिग्नल्स के जरिए न केवल जमीन पर बल्कि समुद्र और आकाश में भी बादलों की स्थिति, सघनता आदि पर और उन्हें विस्थापित और स्थापित करने की तकनीकी पर भी काम किया जाएगा। विभागीय सचिव का दावा है कि पांच वर्षों में यह क्षमता हासिल हो जाएगी कि इन बादलों को उन स्थानों में जहां जरूरत नहीं है या जहां ज्यादा बारिश से बाढ़ की स्थिति बन रही है, वहां से हटाया जा सके और साथ ही अनावृष्टि वाले क्षेत्रों में इसे लाकर बारिश कराई जा सके। दुनिया के कई देश क्लाउड सीडिंग के विज्ञान पर काफी हद तक सफलता पा चुके हैं। हाल के वर्षों में तूफान आदि को लेकर हमारी भविष्यवाणियां सही हुई हैं, जिसके आधार पर सरकारों ने बेहतर प्रबंधन करके धन-जन हानि काफी कम किया है। अगर विज्ञान के प्रयोग से ‘बादल प्रबंधन’ संभव हो सके तो यह मानव जीवन की विकास यात्रा में औद्योगिक क्रांति और कंप्यूटर युग के बाद तीसरी एक नई क्रांति होगी।
Date: 21-09-24
मजबूत होती भारत-अमेरिका की मैत्रीश्रीराम चौलिया, ( स्तंभकार अंतरराष्ट्रीय मामलों के विशेषज्ञ एवं ‘फ्रेंड्स: इंडियाज क्लोजेस्ट स्ट्रैटेजिक पार्टनर्स’ के लेखक हैं )
वर्ष 2014 से अब तक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आठ बार केवल एक देश की यात्रा की है और वह है अमेरिका। अमेरिका को प्राथमिकता के पीछे मोदी का सोच यह है कि उससे भारत के उत्थान हेतु जितने लाभ प्राप्त होते हैं, उतने अन्य कहीं से प्राप्त नहीं होते। भारत के मुख्य लक्ष्य हैं-आर्थिक विकास, तकनीकी प्रगति, सैन्य शक्ति में बढ़ोतरी और भूराजनीतिक संतुलन। इन सबकी पूर्ति में अमेरिका की अहम भूमिका है। व्यापार में आज अमेरिका भारत का सबसे बड़ा साझेदार है। दोनों देशों के बीच वस्तुओं और सेवाओं का सालाना कारोबार लगभग 200 अरब डालर का है। केंद्रीय वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने अनुमान लगाया है कि 2030 तक यह व्यापार तीन गुना बढ़ सकता है। अन्य वाणिज्यिक साझेदारों के मुकाबले अमेरिका के साथ भारत को व्यापार अधिशेष होने की भी संतुष्टि है। भारत की राष्ट्रीय आय का करीब 50 प्रतिशत व्यापार से आता है और इसीलिए अमेरिका से भारत की आर्थिक उन्नति का सीधा संबंध है। आगामी दशकों में भारत को विशाल अर्थव्यवस्था बनाने के लिए अमेरिका के साथ व्यापार और विदेशी निवेश निर्णायक होंगे।
हालांकि भारत में विदेशी निवेश के मोर्चे पर सिंगापुर और मारीशस को प्रथम एवं द्वितीय स्थान दिया जाता है, लेकिन वास्तव में तीसरे स्थान पर विराजमान अमेरिका ही हमारे देश में ठोस विदेशी पूंजी लेकर आता है। अमेरिकी निवेश से भारत में केवल सेवाओं को ही फायदा नहीं हुआ है, बल्कि औद्योगीकरण में भी उसकी अहम भूमिका है। मोटर वाहन, रसायन, इलेक्ट्रानिक्स, खाद्य प्रसंस्करण, स्वच्छ ऊर्जा, अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी और रक्षा जैसे विभिन्न विनिर्माण क्षेत्रों में अमेरिकी निवेशक भारत में सक्रिय हैं। उनके द्वारा लाखों भारतीयों को रोजगार मिल रहा है। प्रधानमंत्री मोदी, जिन्होंने स्वयं के बारे में कहा है कि ‘गुजराती होने के नाते व्यापर मेरे खून में है’, भलीभांति जानते हैं कि अमेरिका जैसे संपन्न देश में बसे पूंजीपतियों को आकर्षित करके भारत लाने में ही राष्ट्र का हित है। अपने हर अमेरिकी दौरे में वह वहां के व्यापार जगत के दिग्गजों संग मिलते-जुलते हैं और उन्हें भारत में निवेश को प्रेरित करते हैं। कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी एआइ, क्वांटम कंप्यूटिंग, सेमीकंडक्टर और जैव प्रौद्योगिकी यानी बायोटेक जैसे अत्याधुनिक व्यवसायों में महारत हासिल करने वाले देश वैश्विक शक्ति समीकरण में ऊंचे स्थान पर रहेंगे। ऐसी उभरती हुई तकनीकी के मामले में भी अमेरिका शीर्ष पर है। इसी को देखते हुए मोदी सरकार ने अमेरिका के साथ महत्वपूर्ण और उभरती प्रौद्योगिकी पहल (आइसेट) के अंतर्गत अनेक तकनीकों के सहविकास और सहनिर्माण पर जोर दिया है। ऐसी तकनीक के दोहरे उपयोग होते हैं और उनसे सैन्य आधुनिकीकरण भी होता है। यह उल्लेखनीय है कि तकनीकों के सहनिर्माण का उपक्रम दोनों पक्षों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार के नेतृत्व में चलाया जा रहा है।
इसकी अनदेखी नहीं की जानी चाहिए कि अमेरिका ने अपने मुख्य प्रतिद्वंद्वी चीन को संवेदनशील प्रौद्योगिकी देना रोक दिया है, जबकि ऐसी प्रौद्योगिकी को वह भारत के साथ साझा करने को तत्पर है। इस दोहरी रणनीति का कारण अमेरिका की यह चिंता है कि चीन आर्थिक और सैन्य ताकत में उससे आगे निकल जाएगा और पश्चिमी उदार अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था को नष्ट कर देगा। भारत लोकतंत्र होने के नाते और शक्ति में चीन से अपेक्षाकृत कमतर होने के कारण अमेरिका के अभिजात्य वर्ग और आम जनता को खतरा नहीं लगता। इसीलिए अमेरिका भारत पर अंतरराष्ट्रीय निर्यात नियंत्रण व्यवस्थाओं और नियमों जैसी बाधाओं को दूर करने में सहायक रहा है। अमेरिका-चीन संबंधों में कटुता ने अमेरिका-भारत सामरिक साझेदारी को नया आयाम दिया है। अमेरिका अपतटीय संतुलन (आफशोर बैलेंसिंग) रणनीति के तहत भारत और अन्य मैत्रीपूर्ण देशों को समृद्ध और सशक्त करके चीन पर अंकुश लगाने की मंशा रखता है। वामपंथी और गुटनिरपेक्षता को लेकर आग्रही विश्लेषकों ने इसे लेकर यही चेतावनी दी है कि भारत को अमेरिका के रचे हुए खेल में प्यादा बनकर चीन से दुश्मनी नहीं मोल लेनी चाहिए, पर मोदी सरकार ने इस दृष्टिकोण को तवज्जो नहीं दी है, क्योंकि चीन आए दिन आक्रामकता दिखाता रहता है।
वर्तमान स्थितियों में भारत के लिए एशिया पर हावी होने के लिए प्रयासरत चीन और अपनी क्षमताओं को मजबूत करते अमेरिका के बीच तटस्थ रहने का सवाल ही नहीं पैदा होता। इसमें कोई संकोच नहीं होना चाहिए कि चीन भारत का सामरिक प्रतिस्पर्धी है, जबकि अमेरिका भारत का सामरिक साझेदार है। मोदी सरकार की विदेश नीति ने चीन और अमेरिका के मामले में दूध का दूध और पानी का पानी कर दिया है, लेकिन इस विषय पर भारत में स्पष्टता नहीं बन पाई है। यहां कई समीक्षक और नागरिक घरेलू राजनीति के नजरिये से अमेरिका को परखते हैं। अमेरिका के कुछ सरकारी संस्थान भारत के आंतरिक विषयों पर आलोचना करते रहते हैं। इसी तरह वहां का मीडिया तथा बुद्धिजीवी वर्ग मोदी सरकार और संघ परिवार के विरुद्ध दुष्प्रचार करता रहता है। इसके चलते कई भारतीय अमेरिका को अनुचित हस्तक्षेप और अवांछित कृत्यों के लिए दोषी ठहराते हैं। कुछ विश्लेषकों के अनुसार अमेरिका गुप्त अभियानों के माध्यम से भारत में सत्ता परिवर्तन की भी कोशिश कर रहा है। लगता है कि ऐसे आलोचक भारत की लोकतांत्रिक क्षमता पर उतना भरोसा नहीं रखते, जितना उन्हें रखना चाहिए। ऐसे लोगों में वैश्विक भूराजनीति का ज्ञान भी नहीं है। उनकी संवेदनशीलता अंतरराष्ट्रीय राजनीति से परे है। भावुक होकर अमेरिका को भारत का दुश्मन करार देना और उसे चालबाज कहना आसान है, किंतु वैश्विक पटल पर भारत के उत्थान के लिए अमेरिका की मित्रता अनिवार्य है। यह अवश्य मानना पड़ेगा कि अफगानिस्तान, बांग्लादेश और म्यांमार जैसे पड़ोसियों के मामलों को लेकर भारत और अमेरिका के बीच अपेक्षित तालमेल नहीं रहा। फिर भी, समग्रता में देखा जाए तो अमेरिका की दोस्ती हमारे लिए कारगर रही है और आगे भी रहेगी। विदेश नीति में राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखकर हमें इस मैत्री को संभालकर आगे ले जाना होगा।
Date: 21-09-24
साथ चुनाव से धन और समय की बचत होगीगौरव वल्लभ, ( प्रोफेसर व भाजपा नेता )
लोकतांत्रिक मूल्यों का आधुनिक आदर्श भारत एक महत्वपूर्ण सुधार की दहलीज पर खड़ा है- एक देश एक चुनाव एक ऐसे राष्ट्र के रूप में, जिसने लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के लिए मानदंड स्थापित किए हैं, यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि हम इस बात पर विचार करें कि हमारी लोकतांत्रिक प्रणालियों की प्रभावशीलता, समानता और स्थिरता को कैसे बेहतर बनाया जाए। स्वस्थ लोकतंत्र के लिए चुनाव जरूरी हैं, पर उन्हें देश के राष्ट्रीय विकास के एजेंडे की सेवा करनी चाहिए, न कि इसमें बाधा डालनी चाहिए। एक साथ चुनाव भारतीय शासन की पूरी क्षमता को ‘अनलॉक’ करेगा। यह हमारे लोकतंत्र को सुव्यवस्थित करने के साथ ही प्रेरणा का काम कर सकता है।
अभी होता यह है कि देश लगातार चुनाव अभियान की मुद्रा में रहता है, जिसमें राजनीतिक दल शासन के बजाय चुनावी रणनीतियों पर ध्यान केंद्रित करते हैं। एक साथ चुनाव कराने का सबसे बड़ा लाभ यह भी है कि वित्तीय बचत होगी। यह भारत जैसे विकासशील देशों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है, जहां बार-बार होने वाले चुनावों से बचाए गए धन का उपयोग बुनियादी ढांचे, स्वास्थ्य सेवा और शिक्षा जैसी जरूरतों को पूरा करने के लिए बेहतर तरीके से किया जाता है। लोकतांत्रिक सिद्धांत की मांग है कि सार्वजनिक धन का कुशलतापूर्वक उपयोग किया जाना चाहिए और एक साथ चुनाव कराना उस दिशा में एक कदम है।
चुनावों के समन्वय से एक अधिक स्थिर राजनीतिक माहौल बनेगा, जिससे कंपनियां हर कुछ महीनों में संभावित नीतिगत बदलावों के खिलाफ अपने दांव को सुरक्षित रखने के बजाय विकास और विस्तार पर ध्यान केंद्रित कर सकेंगी। कंपनियां आश्वस्त होकर योजना बना सकेंगी। इसके अलावा, चुनावों का निरंतर चक्र अक्सर महत्वपूर्ण नीतियों के क्रियान्वयन को मुश्किल बना देता है। विकास की पहल अक्सर रुक जाती है, और सुधारों को आगे बढ़ाने के लिए आवश्यक गति खो जाती है। एक साथ चुनाव इन रुकावटों को कम कर देंगे, जिससे शासन अपने कार्यकाल की अवधि के दौरान विकास और शासन पर ध्यान केंद्रित कर सकेगा।
एक साथ चुनाव कराने से मतदान को भी बढ़ावा मिलेगा, जो किसी भी कार्यशील लोकतंत्र के लिए आवश्यक है। चूंकि जनता एक समय में व्यापक पैमाने पर निर्णय ले रही होगी, इसलिए राजनीतिक दलों को स्थानीय और राष्ट्रीय, दोनों मुद्दों को संबोधित करने वाले अधिक गहन अभियान चलाने की जरूरत होगी। एक साथ चुनाव कराने से राष्ट्रीय दलों को स्थानीय मुद्दों पर अधिक ध्यान केंद्रित करने के लिए प्रोत्साहन मिलेगा। मतदाता अधिक विचारशील और सुविचारित निर्णय लेंगे, इससे भारत का लोकतंत्र मजबूत होगा।
ब्राजील, फिलीपींस सहित अनेक देशों ने एक साथ चुनाव कराने के कुछ तरीके अपनाए हैं, जिससे यह साबित होता है कि यह मॉडल व्यावहारिक और प्रभावी है। इन देशों ने एक साथ कई स्तरों पर चुनाव कराने के लाभ देखे हैं, जिसमें कम लागत, मतदान में वृद्धि और अधिक कुशल शासन शामिल है। भारत अपने विशाल मतदाताओं और जटिल राजनीतिक परिदृश्य के साथ, ऐसी प्रणाली से और भी अधिक लाभ उठा सकता है। यद्यपि एक देश एक चुनाव योजना में कठिनाइयां हैं, पर उन्हें दूर करना होगा। समवर्ती चुनाव सरकार को सरल बनाएंगे और लोकतांत्रिक भागीदारी को बढ़ाएंगे। सरकारें लगातार अगले चुनाव के लिए प्रचार करने के बजाय लक्ष्यों को पूरा करने पर ध्यान केंद्रित करने के लिए स्वतंत्र होंगी भारत जैसे विविधतापूर्ण और गतिशील राष्ट्र में यह सुधार वांछनीय है।
इस क्रांतिकारी विचार को अपनाकर भारत एक पूर्ण विकसित देश बनने की दिशा में एक कदम बढ़ा सकता है, जहां शासन ज्यादा प्रभावी और उत्तरदायी होगा।
Date: 21-09-24
लोगो की परेशानी और खर्च में होगा इजाफासुप्रिया श्रीनेत, ( चेयरपर्सन, सोशल मीडिया, कांग्रेस )
एक देश एक चुनाव नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा छोड़ा गया जितना बड़ा शिगूफा है, उससे कहीं ज्यादा भारत के गौरवशाली संघीय ढांचे पर प्रहार करने की खतरनाक कोशिश है। उसे पता है कि संशोधन तभी पास हो पाएगा, जब लोकसभा में इसके पक्ष में 362 सांसद वोट करेंगे। अभी पूरा एनडीए मिलाकर 293 सांसद ही हैं। कमोबेश एनडीए की यही हालत राज्यसभा में भी है।
मगर सत्ताधारी मंडली को देश के असल मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए कोई न कोई मुद्दा तो चाहिए ही । इसलिए सरकार एक देश एक चुनाव का राग बेवजह अलाप रही है। उसे पता है कि हरियाणा, जम्मू एवं कश्मीर, महाराष्ट्र, झारखंड जैसे महत्वपूर्ण राज्यों में उनकी बुरी हार होने जा रही है। देश में महंगाई, बेरोजगारी, रेल दुर्घटनाएं, बेलगाम अपराध समेत तमाम मुद्दे हैं। इन मुद्दों को चर्चा से बाहर करने के लिए भाजपा को एक देश एक चुनाव याद आ रहा है।
ध्यान देने वाली बात यह है कि मौजूदा तंत्र जम्मू एवं कश्मीर, हरियाणा, महाराष्ट्र व झारखंड के चुनाव ही एक साथ नहीं करा पा रहा है। एक देश एक चुनाव के लिए बनी समिति की निष्पक्षता और पवित्रता पर भी दर्जनों सवालिया निशान हैं। इस समिति में राष्ट्रपति पद पर सुशोभित रही विभूति का शामिल होना मर्यादित नहीं है। इस समिति में राज्यसभा में नेता प्रतिपक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे को शामिल नहीं किया गया है। समिति में गुलाम नबी आजाद रहे, जो संसद के किसी सदन के सदस्य तक नहीं हैं। इसके अलावा इस समिति में कई और सदस्य ऐसे भी हैं, जिनका होना विवादास्पद है। समिति ने 18,626 पन्ने की रिपोर्ट तो पेश कर दी है, मगर प्रश्न का उत्तर कहीं नहीं लिखा कि जब पंचायत और विधानसभा लोकसभा का चुनाव एक साथ नहीं होगा, तो किस बात का एक देश एक चुनाव ? इसमें कहा गया है कि विधानसभा और लोकसभा के चुनाव एक साथ होंगे, जबकि पंचायत चुनाव इसके 100 दिन बाद होंगे। मतलब, विधानसभा और लोकसभा चुनाव के 100 दिन बाद फिर मतदान केंद्र बनेंगे, फिर मतदान दल बनेगा, फिर से चुनाव का पूरा बंदोबस्त किया जाएगा और इसका खर्च भी जनता को ही देना पड़ेगा। इस पूरी प्रक्रिया में अर्धसैनिक बल के जवानों, प्रशासनिक और पीठासीन अधिकारियों, पुलिस बल समेत 1.5 करोड़ लोग फिर से लगेंगे। इस पूरी प्रक्रिया में तीन गुना वीवीपैट, तीन गुना ईवीएम की जरूरत होगी। जाहिर है, इसमें अधिक समय और धन का दुरुपयोग होगा।
रिपोर्ट से यह भी बात साफ हो जाती है कि जिन राज्यों में विधानसभा चुनाव हो रहे हैं, वहां की सरकारों का कार्यकाल 5 वर्ष की बजाय 2029 के लोकसभा चुनाव तक ही होगा। तब तक तकरीबन 17 राज्य सरकारें ऐसी होंगी, जिनका 2 से 3 साल तक का कार्यकाल शेष रहेगा। ऐसी हालत में उनको भंग कैसे किया जा सकता है ? यह भी प्रावधान किया जा रहा है कि अगर कोई राज्य सरकार गिर जाती है, तो वहां चुनाव होगा, तब तक के लिए ही होगा, जब तक लोकसभा का कार्यकाल होगा। अगर केंद्र सरकार गिर जाती है, तो क्या सभी राज्य सरकारों को भी भंग कर दिया जाएगा ?
सरकार की यह भी दलील है कि देश में बार-बार चुनाव होने की वजह से नीति निर्माण में समस्या होती है। विकास कार्यों में खलल पड़ता है जो सरकार 5 साल में 4 साल 11 महीने काम नहीं कर सकती, उसकी तरफ से यह दलील फिजूल है। वस्तुतः यह सरकार हर चीज़ में एकरूपता ढूंढती है। कभी एक देश एक चुनाव, कभी एक देश एक भाषा, कभी एक देश एक रंग, एक देश एक संस्कृति। दरअसल, भाजपा एक देश एक राष्ट्रीय दल, एक नेता के सूत्र पर काम कर रही है। उसे देश की विविधता में ताकत नहीं, अपनी कमजोरी नजर आती है। खैर, ये प्रोपेगेंडा नया नहीं है और देश भी इस स्वांग को खूब समझता है।
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चर्चा में क्यों ?
हाल ही में संपन्न हुए पेरिस ओलंपिक में भारत ने 5 कांस्य और 1 रजत जीता। भारत 84 देशों में 71 वें स्थान पर रहा। सबसे बड़ी आबादी वाले देश में 25 करोड़ लोगों पर हमने केवल एक पदक ही प्राप्त किया। जबकि प्रथम स्थान पर रहे अमेरिका ने 30 स्वर्ण सहित 126, चीन 96 पदकों के साथ दूसरे स्थान पर रहा। भारत ने जब से आधुनिक ओलंपिक शुरू हुए हैं, अब तक कुल 41 पदक ही जीते हैं।
इस दयनीय प्रदर्शन के कारण
हमारा खेलों का बुनियादी ढांचा अपर्याप्त है। 2008 तक चीन में 3000 खेल संस्थान थे, जबकि 2024 में हमारे पास सिर्फ 150 खेल संस्थान हैं। इसमें 26 सार्वजनिक उपक्रमों के स्वामित्व में हैं। सन् 2023 तक चीन में 45 लाख से अधिक खेल-स्थल थे।
राज्यों के मध्य बुनियादी ढाँचे के लिए असमान धन का वितरण भी इसका एक कारण है।
खेल प्रतिभाओं को निखारने के लिए बच्चों को कम उम्र में ही उच्चतम गुणवत्ता के प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। हमारे प्रशिक्षण की गुणवत्ता खराब है। यह नौकरशाही व लालफीताशाही से भी ग्रस्त है। इसलिए संपन्न परिवार के खिलाड़ी घर पर ही प्रशिक्षण लेना पसंद करते हैं जैसा; अभिनव बिंद्रा ने किया था।
क्रिकेट के प्रति हमारा जुनून
क्रिकेट के कारण हमारा अन्य खेलों में कौशल अवरूद्ध हो गया है।
राजनीति और खेल का गठजोड़
कई खेल महासंघों के अध्यक्ष राजनेता हैं। जैसे कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष ब्रजभूषण सिंह, जिन्होंने महिला पहलवानों का यौन उत्पीडन किया था और डराया-धमकाया भी था। इससे खिलाड़ियों का मनोबल टूटता है। ये नेता खेलों के लिए कुछ करते भी नही हैं।
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21 September 2024
प्रश्न 479- राखीगढ़ी में खुदाई से प्राप्त निष्कर्षों के आधार पर वहाँ की विशेषतायें बतायें। (200 शब्द)
Question 479- On the basis of the findings obtained from the excavation at Rakhigarhi, describe its specialties. (200 words)
नोट : इसका उत्तर आपको हमें नहीं भेजना है, यह आपके स्वयं के अभ्यास के लिए है।
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Date: 20-09-24
All Together Now, Get The Scale of It RightET Editorials
The Union cabinet’s approval for ‘one nation, one poll’ has set the ball rolling for what is, indeed, an ambitious venture. If the proposal is passed by Parliament, India will join an exclusive club. Only three countries — Belgium, Sweden and South Africa — have ONOP. As is obvious by this list, almost all challenges lie in managing scale.
ONOP isn’t new to us. The first two decades of the Indian republic conducted simultaneous Lok Sabha and assembly elections. Till realpolitik caught up with democracy. Benefits from cost, accountability, even governance are obvious — on paper. But a foolproof plan with backups and contingencies to scenarios, such as a government unable to complete its term, are critical. And then there’s implementation. This is India with its scale, spread and multiplicity one is talking about. And the reality of personnel and institutional coherence is often overlooked or underplayed in such grand plans. EC has shown year after year, its capability and capacity. But ONOP is a different ball game of a different scale and order. Ensuring the seamless movement of EC personnel and central forces for the entire electoral process, dealing with complaints, violations of model code of conduct, ensuring that EVMs are available and geared for the 2-3 sets of voting, all have to be hardwired into ONOP. Voter awareness is another big ask — ensuring that all voters are able to grasp, and transition to, a system to register their choice of central, state and local mandates.
India has pulled off many seemingly impossible efforts, such as vaccinating almost its entire population against Covid. It can do so with ONOP again. But it must first design and betatest both its ‘software’ and ‘hardware’ before trotting it out.
Date: 20-09-24
Wrong notionThe idea of simultaneous elections is inherently anti-federal.Editorial
Notwithstanding the opposition from political parties and many in civil society to the idea of simultaneous elections, the Union government has decided to accept the recommendations of a high-level committee headed by former President Ram Nath Kovind to go ahead with the scheme. The committee envisaged simultaneous Lok Sabha and State Assembly elections as the first step, followed by municipal and panchayat polls within 100 days of the general election. In order to do so, the government would need to get constitutional amendments to be passed, in Parliament and in the State Assemblies. Two key reasons have been evinced for the proposal — first, the costs of conducting these elections would be significantly reduced if held together, and, second, not having simultaneous elections has kept political parties in prolonged campaign mode, impacting governance and legislative work. There has been little to no empirical data to support the first reason. Already, general elections take an inordinately long time, with some State polls being held in phases. Simultaneous elections could prolong this process. One of the committee’s recommendations is that if a State Assembly gets dissolved before five years of its term, after the “appointed date” — the date for synchronising Lok Sabha and Assembly elections — fresh “midterm” elections will be held but the new Assembly’s will not have a full five-year tenure. Its tenure will end five years from the “appointed date”. This provision militates against the original idea of cost cutting through simultaneous elections. It is also an anti-federal idea.
In a multi-tiered governance system, people choose their representatives based on their perception of who is best suited. The power being demarcated for different levels of government allows for distinct roles for each representative and suggests varied voter choices that could be based on party affiliation, candidate strength, ideological positions or socio-economic reasons that are constituency-specific. Each tier has its exclusive importance and so does the related election. The second reason, that representatives are in perennial campaign mode and, therefore, polls to every tier should all be held during the same period, is problematic. For one, that national representatives of parties are forever in campaign mode is a consequence of the centralising tendencies of parties that are in power today and is not a reflection of the extant electoral democratic system. Second, subsuming multi-tier elections into simultaneous mode has the potential to reduce the importance of each tier, especially the Assembly and municipal/panchayat levels, and is anti-federal. Lastly, to effect this proposal, the tenures of quite a few State governments will have to be cut short. Parties and civil society actors committed to federalism must squarely reject this proposal by the Union government.
Date: 20-09-24
एक देश-एक चुनाव से जुड़े भ्रम दूर करना जरूरीसंपादकीय
एक अध्ययन के अनुसार देश के हर 15 परिवारों में कम से कम एक व्यक्ति चुनावी प्रक्रिया में परोक्ष या प्रत्यक्ष रूप से सक्रिय है। यानी करीब करोड़ लोग विभिन्न स्तर पर या तो चुनाव लड़ते हैं, या लड़ाते हैं या कार्यकर्ता की भूमिका में रहते हैं। एक आम चुनाव में हफ्तों का समय और घोषित अघोषित करीब 1.50 लाख करोड़ रुपए खर्च होते हैं। विधानसभा चुनावों को शामिल कर लें तो यह राशि केंद्र द्वारा शिक्षा व स्वास्थ्य के मद में किए जाने वाले कुल खर्च से ज्यादा होती है। कोविंद समिति के समक्ष पेश एक अध्ययन में बताया गया कि एक साथ चुनाव हुए तो जीडीपी में 1.5% की वृद्धि होगी । यह निष्कर्ष चुनावों के बाद और पहले की जीडीपी के तुलनात्मक अध्ययन से मिला। इसके अलावा देश के अनेक परस्पर विरोधी पहचान समूहों में विभाजित होने से चुनावों में या इसके बाद सामाजिक स्तर पर हिंसा और अपराध बढ़ जाते हैं, जिनकी सामाजिक क्षति के अलावा आर्थिक कीमत भी होती है । एक साथ चुनाव करने के खिलाफ यह कहना कि इससे क्षेत्रीय दल घाटे में रहेंगे, अतार्किक है क्योंकि टेक्नोलॉजी के इस युग में जन-संवाद सस्ता है। जहां तक इसे संघीय ढांचे में राज्यों की भूमिका के खिलाफ बताया जा रहा है, वह अतिरेक है। क्योंकि स्वायत्तता पर कहीं ज्यादा नुकसान और भी कारणों से हुआ है। विपक्ष को भी इसे सकारात्मक दृष्टि से देखना होगा।
Date: 20-09-24
बार-बार चुनाव के दुष्चक्र से निकले देशडॉ. जगदीप सिंह, ( लेखक राजनीतिशास्त्र के प्रोफेसर हैं )
गत दिवस एक देश-एक चुनाव के प्रस्ताव को केंद्रीय कैबिनेट ने मंजूरी दे दी। उम्मीद है कि इससे संबंधित बिल संसद के शीतकालीन सत्र यानी नवंबर-दिसंबर में पेश किया जाएगा। केंद्रीय मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा कि पहले चरण में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव साथ होंगे। इसके बाद 100 दिन के भीतर दूसरे चरण में निकाय चुनाव साथ कराए जाएंगे। एक देश एक चुनाव का मतलब है लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराना। मोदी सरकार ने अपने पिछले कार्यकाल में इस पर विचार के लिए पूर्व राष्ट्रपति राम नाथ कोविन्द के नेतृत्व में एक उच्चस्तरीय समिति बनाई थी। उसने इस साल के आरंभ में अपनी 18,626 पेज की रिपोर्ट राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु को सौंपी थी। इस समिति को प्राप्त 21,558 सार्वजनिक प्रतिक्रियाओं में से 80 प्रतिशत से अधिक ने एक साथ चुनाव के विचार का समर्थन किया। 4,216 प्रतिक्रियाओं ने इसका विरोध किया। कोविन्द समिति ने सुझाव दिया है कि एक साथ चुनाव के लिए सभी राज्य विधानसभाओं का कार्यकाल अगले लोकसभा चुनाव यानी 2029 तक बढ़ाना होगा। चुनाव में किसी दल को बहुमत नहीं मिलने और किसी सरकार के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पास होने पर बाकी कार्यकाल के लिए नए सिरे से चुनाव कराने होंगे। चुनाव आयोग को लोकसभा, विधानसभाओं और निकाय चुनावों के लिए राज्य चुनाव अधिकारियों के परामर्श से एकल मतदाता सूची और मतदाता पहचान पत्र तैयार करना होगा। वांछित बदलावों के लिए संविधान में संशोधन की सिफारिश कोविन्द समिति ने दी है।
एक देश एक चुनाव के बारे में करीब 40 वर्ष पहले 1983 में पहली बार चुनाव आयोग ने सुझाव दिया था। 1951-52 में पहले लोकसभा चुनाव के साथ ही सभी विधानसभा चुनाव हुए थे। यह सिलसिला 1967 तक जारी रहा, लेकिन कई बार लोकसभा की अवधि कम होने, 1968 और 1969 में कई राज्यों में सरकारों को बर्खास्त किए जाने या राष्ट्रपति शासन लागू होने और नए राज्यों के गठन के साथ ही विभिन्न प्रदेशों में चुनाव का समय बदलता गया। चौथी लोकसभा भी समय से पहले भंग कर दी गई थी, जिसकी वजह से 1971 में फिर से आम चुनाव हुए। फलस्वरूप एक साथ चुनाव होने का चक्र बाधित हो गया। इस कारण हर साल देश के किसी न किसी राज्य में विधानसभा चुनाव होते रहते हैं। केंद्र सरकार के अलावा चुनाव आयोग की पूरी मशीनरी हर साल चुनावी मोड में ही रहती है, जिससे चुनाव वाले राज्यों में प्रशासनिक अधिकारी भी जनता के पूरे काम नहीं कर पाते। वर्तमान में हर साल करीब पांच-सात राज्यों के विधानसभा चुनाव होते हैं। 2015 में कार्मिक, सार्वजनिक शिकायत, कानून और न्याय पर संसद की स्थायी समिति ने कहा था कि देश में बार-बार चुनाव होने से सामान्य सार्वजनिक जीवन में व्यवधान होता है और जरूरी सेवाओं के कामकाज पर असर पड़ता है। चुनाव के चलते आचार संहिता लागू कर दी जाती है, जिससे लोक कल्याण की नई योजनाएं ठप हो जाती हैं। सरकार और राजनीतिक दलों को बड़े पैमाने पर धन खर्च करना पड़ता है। इसके अलावा काफी लंबे समय तक सुरक्षा बलों की तैनाती करनी पड़ती है।
एक साथ चुनाव के विचार के आलोचकों का कहना है कि मोदी सरकार का यह कदम राजनीति से प्रेरित है। क्षेत्रीय दलों को डर है कि वे अपने स्थानीय मुद्दों को मजबूती से नहीं उठा पाएंगे, क्योंकि राष्ट्रीय मुद्दे केंद्र में आ जाएंगे। इसके अलावा वे चुनावी खर्च और चुनावी रणनीति के मामले में भी राष्ट्रीय पार्टियों से मुकाबला नहीं कर पाएंगे। इससे मतदाताओं का व्यवहार इस रूप में प्रभावित हो सकता है कि वे राज्य के चुनाव के लिए भी राष्ट्रीय मुद्दों पर मतदान करने लगें। इससे बड़ी राष्ट्रीय पार्टियां लोकसभा और विधानसभा, दोनों चुनावों में फायदे में रहेंगी। इससे क्षेत्रीय पार्टियों के हाशिये पर चले जाने की आशंका है, जो अक्सर स्थानीय हितों का प्रतिनिधित्व करती हैं। उनका मानना है कि प्रत्येक पांच साल में एक से ज्यादा बार मतदाताओं का सामना करने से नेताओं की जवाबदेही बढ़ती है और वे सतर्क रहते हैं।
आइडीएफसी संस्थान के 2015 में किए गए एक सर्वे में बताया गया है कि अगर एक साथ चुनाव होते हैं तो 77 प्रतिशत संभावना है कि मतदाता राज्य विधानसभा और लोकसभा में एक ही दल या गठबंधन को चुनेंगे। वहीं चुनाव छह महीने के अंतर पर होते हैं, तो 61 प्रतिशत मतदाता एक पार्टी को चुनेंगे। स्पष्ट है कि आलोचकों की आशंकाएं कोरी प्रतीत होती हैं। देश के मतदाता बहुत परिपक्व हैं। इसका परिचय उन्होंने बार-बार दिया है। कई बार ऐसा देखा गया है कि लोकसभा के साथ किसी विधानसभा के चुनाव होने पर मतदाताओं ने अलग-अलग दलों को चुना है। यह भी देखा गया है कि मतदाता केंद्र में किसी एक दल को प्रचंड बहुमत देते हैं, लेकिन कुछ ही माह बाद हुए राज्यों के चुनाव में किसी अन्य दल को सत्ता सौंपते हैं। दुनिया में जहां भी लोकतांत्रिक शासन प्रणाली है, उनमें से अधिकांश देशों में आम चुनाव और प्रांतीय चुनाव साथ ही होते हैं, जैसे अमेरिका, ब्रिटेन, ब्राजील, कोलंबिया, फिलीपींस, दक्षिण अफ्रीका और स्वीडन आदि। अब भारत में भी एक साथ चुनाव के विचार को कानूनी रूप देने का वक्त आ गया है। बार-बार चुनाव हमारे लोकतंत्र में एक दोष है। इसे दूर किया जाना चाहिए। एक साथ चुनाव होने से केंद्र और राज्य की नीतियों और कार्यक्रमों में निरंतरता सुनिश्चित होगी। मतदान में वृद्धि होगी, क्योंकि लोगों के लिए एक बार वोट देने निकलना ज्यादा सुविधाजनक होगा। देश को भारी भरकम चुनावी खर्च से निजात मिलने के साथ गवर्नेंस में भी सुधार आएगा। इससे न सिर्फ विकास कार्य तेजी से होंगे, बल्कि खर्च भी बचेगा।
Date: 20-09-24
स्मार्ट शहरः प्रभाव दिखाने के लिए होंगे तैयार!विनायक चटर्जी, ( लेखक बुनियादी ढांचा विशेषज्ञ हैं। वह द इन्फ्राविजन फाउंडेशन (टीआईएफ) के संस्थापक एवं प्रबंध न्यासी हैं और सीआईआई की राष्ट्रीय बुनियादी ढांचा परिषद के चेयरमैन भी हैं। लेख में टीआईएफ के सीईओ जगन शाह का भी योगदान रहा )
भारत के नीति निर्माताओं ने दशकों से विनिर्माण क्षेत्र में निवेश आकर्षित करने के भरपूर प्रयास कर रहे हैं। किंतु सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में विनिर्माण की हिस्सेदारी 16 से 18 प्रतिशत ही है, जो भारत की आजादी के 75वें वर्ष में 25 प्रतिशत के करीब पहुंचने की उम्मीदों से बहुत दूर है। हाल ही में इलेक्ट्रॉनिक्स, चिप निर्माण, बैटरियों आदि में बड़े पैमाने पर निवेश की घोषणाओं ने ध्यान आकृष्ट किया है। लेकिन कुल मिलाकर विनिर्माण निवेश में उल्लेखनीय वृद्धि की आवश्यकता नीतिगत चुनौती बनी हुई है।
पिछले कुछ वर्षों में सरकार ने पीएलआई (उत्पादन से जुड़े प्रोत्साहन) योजना, राष्ट्रीय लॉजिस्टिक्स नीति, गति शक्ति, क्लस्टर विकास, औद्योगिक गलियारे, कारोबारी सुगमता और आने वाले निवेश के लिए पूंजी सब्सिडी जैसे कई कदम आजमाए हैं। 12 औद्योगिक स्मार्ट शहरों के विकास की घोषणा को इन कोशिशों को दम देने की बड़ी पहल माना जा रहा है। 27 अगस्त को मंत्रिमंडल की आर्थिक मामलों की समिति ने 10 राज्यों के छह प्रमुख औद्योगिक गलियारों में 12 औद्योगिक स्मार्ट शहर विकसित करने के लिए 28,602 करोड़ रुपये के सार्वजनिक निवेश को मंजूरी दी है। ये शहर इन स्थानों पर होंगे:
* अमृतसर-कोलकाता औद्योगिक गलियारे पर पांच शहर: (पंजाब में राजपुरा-पटियाला, उत्तराखंड में खुरपिया, उत्तर प्रदेश में आगरा तथा प्रयागराज और बिहार में गया)
* दिल्ली-मुंबई औद्योगिक गलियारे पर दो शहर: (राजस्थान में जोधपुर-पाली और महाराष्ट्र में दिघी)
* विशाखापत्तनम-चेन्नई, हैदराबाद-बेंगलूरु, हैदराबाद-नागपुर और चेन्नई-बेंगलूरु के औद्योगिक गलियारों पर चार शहर (आंध्र प्रदेश में कोप्पार्थी और ओरवाकल, तेलंगाना में जहीराबाद और केरल में पलक्कड़)
आदर्श आचार संहिता लागू होने के कारण एक और शहर का नाम अभी तक जाहिर नहीं किया गया है।
इस तरह के प्रयास निस्संदेह संकेत देते हैं कि सरकार विनिर्माण में निवेश को बढ़ावा देने के निरंतर और ठोस प्रयास कर रही है। मगर इस बात पर जोर देने की आवश्यकता है कि औद्योगिक स्थानों की उपलब्धता जरूरी तो है, लेकिन यही इकलौती शर्त नहीं है। इसलिए और भी अधिक सक्षम तंत्र उपलब्ध कराने के लिए पहले से मौजूद स्थानों के बजाय इन 12 नए स्थानों को ज्यादा प्रभाव दिखाना होगा। अधिक कारगर दिखने के लिए सात सुझाव दिए गए हैं।
प्लग ऐंड प्ले
ऐसा प्लग ऐंड प्ले माहौल होना चाहिए, जिसमें कारोबारी सुगमता के लिए जरूरी सभी प्रक्रियागत रियायतें हर हाल में मिलें। प्रत्येक स्थान पर सुविधा केंद्र अवश्य बनें,जो उन सुधारों को प्रत्यक्ष करके दिखाएं, जो नई दिल्ली में सत्ता के केंद्र से घोषित किए जाते हैं।
सामाजिक बुनियादी ढांचा
औद्योगिक क्षेत्रों में कर्मचारियों और उनके परिवारों की ‘सामाजिक’ आवश्यकताएं लंबे समय से उपेक्षित रही हैं। स्कूल, अस्पताल, पार्क से जुड़ी जमीन, रिटेल, घूमने की जगह और मनोरंजन सुविधाएं तैयार करने की एक समानांतर योजना को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। साथ ही इसे विकास के एजेंडा की योजना का अभिन्न हिस्सा बनाया जाए।
स्मार्ट यूटिलिटीज
21वीं सदी के मध्य में बने ‘स्मार्ट’ औद्योगिक शहरों में स्मार्ट यूटिलिटीज भी अवश्य शामिल होनी चाहिए। इनमें तरल और ठोस अपशिष्ट प्रबंधन के साथ-साथ हरित ऊर्जा और उपलब्ध आईसीटी प्रौद्योगिकियों की पूरी व्यवस्था शामिल है।
एकीकरण और मिलान
इसका अर्थ है कि राष्ट्रीय एकल खिड़की व्यवस्था, एक जिला एक उत्पाद, सागरमाला, अमृत, स्मार्ट सिटी, स्वच्छ भारत, जल शक्ति, आवास योजना, कौशल विकास केंद्र, संशोधित विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) योजना, चैलेंज फंड सिटीज और अन्य ऊर्जा, दूरसंचार तथा सार्वजनिक परिवहन परियोजनाओं के बीच सहज रूप से निर्बाध तालमेल बैठना चाहिए। कई माध्यमों वाली योजनाओं और अंतर्देशीय कंटेनर डिपो को भी इसमें शामिल किया जाना चाहिए।
अतीत की योजनाओं से सबक
दिल्ली-मुंबई औद्योगिक गलियारा विकास निगम (डीएमआईसीडीसी) ने पहली खेप में जिन सात औद्योगिक स्थलों का काम शुरू किया था, उनमें से धोलेरा और शेंद्रा-बिदकिन अभी तक पूरी क्षमता के साथ तैयार नहीं हो पाए हैं। इन परियोजनाओं को भूमि अधिग्रहण और पुनर्वास, बुनियादी ढांचे के विकास में देर के साथ ही कई हितधारकों के बीच तालमेल की कमी से जूझना पड़ा है।
को-डेवलपर से निजी पूंजी
करीब 28,602 करोड़ रुपये के केंद्रीय आवंटन में से हर स्थान के लिए औसत आवंटन करीब 2,400 करोड़ रुपये बैठता है। माना जाता है कि राज्य सरकारें जमीन मुहैया कराएंगी और अपने हिस्से की पूंजी भी देंगी। लेकिन यह सब मिलकर बाहरी विकास के लिए पूंजी ही जुटा पाएंगे।
ऐसे में सार्वजनिक-निजी साझेदारी (पीपीपी) की रचनात्मक योजनाएं बनानी होंगी ताकि करोड़ों में निजी पूंजी आए और सामाजिक बुनियादी ढांचा विकास और परिचालन एवं प्रबंधन में मदद भी मिले। कुछ देश को-डेवलपर बनने में दिलचस्पी दिखा रहे हैं, जिस पर गंभीरता से काम होना चाहिए।
तटीय आर्थिक क्षेत्र (सीईजेड)
भारत में निर्यात के लिहाज से विनिर्माण में होड़ को बढ़ाने के लिए सीईजेड को अभी तक ज्यादा तवज्जो नहीं दी गई है। वर्ष 2015 में नीति आयोग के तत्कालीन प्रमुख अरविंद पानगड़िया ने चीन के उदाहरणों से प्रेरणा लेते हुए बड़े सीईजेड स्थापित करने के विचार की वकालत की, जिन्हें मुक्त व्यापार क्षेत्रों के रूप में वैसे ही तैयार किया जाए, जैसे वित्तीय क्षेत्र के लिए अहमदाबाद में गिफ्ट सिटी है। इन सीईजेड में नियामकीय झंझट नहीं होते और श्रम के अधिक इस्तेमाल वाले मूल्यवर्द्धित निर्यात में भारत के बड़े कदम के लिए यह सही आधार मुहैया कराते। इस सुझाव को आगे बढ़ाने में अभी देर नहीं हुई है।
भारत विशेष क्षेत्र तैयार कर विनिर्माण निवेश आकर्षित करने की कोशिश लंबे समय से करता रहा है। समाजवादी दौर में भी लगभग हर राज्य में औद्योगिक क्षेत्र तैयार हुए थे, जिनमें से कई आज जीर्ण-शीर्ण स्थिति में हैं। इसके बाद क्लस्टर विकास की कोशिश हुई और स्मार्ट सिटी के लिए पहल की गई।
निजी क्षेत्र इसमें कदम रखने के लिए तैयार था और महिंद्रा तथा श्रीसिटी इंडस्ट्रियल एनक्लेव उल्लेखनीय सफलता की मिसाल बने हुए हैं। डीएमआईसीडीसी ने सात नए स्थानों के लिए कोशिश की। सेज से जुड़ी गतिविधियां काफी सुर्खियों में रहीं, लेकिन दुर्भाग्य से इसमें चूक दिखने लगी और डेवलपमेंट ऑफ एंटरप्राइज ऐंड सर्विस हब्स (देश) बिल, 2023 की पहल हुई। अब हमारे पास ये 12 औद्योगिक स्मार्ट शहर हैं।
कुल मिलाकर इन 12 औद्योगिक स्मार्ट शहरों को केंद्र और राज्य सरकारों से प्राथमिकता मिलनी चाहिए। लेकिन इन्हें पहले के प्रयासों की तुलना में अलग तरीके से देखा जाना चाहिए। इन्हें दमखम के साथ अधिक प्रभाव दिखाने का प्रयास करना चाहिए।
Date: 20-09-24
विपक्ष की सहमति जरूरीसंपादकीय
देश में लोक सभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ कराने यानी एक देश, एक चुनाव के प्रस्ताव को केंद्रीय कैबिनेट ने मंजूरी दे दी है। उम्मीद है कि सरकार संसद के शीतकालीन सत्र में यह विधेयक लाएगी। लोक सभा, विधानसभा और स्थानीय निकाय के चुनाव एक साथ कराने का विचार बहुत अच्छा और प्रेरक है, लेकिन इसके क्रियान्वयन में बहुत जटिलताएं और मुश्किलें आ सकती हैं। चुनावों से जुड़े सभी हितधारक यानी सत्ता पक्ष, विपक्ष और चुनाव आयोग के बीच जब तक एक देश, एक चुनाव के मुद्दे पर आम सहमति नहीं बनेगी तब तक इसका क्रियान्वयन संभव नहीं है। वास्तव में इस मामले पर सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों की अलग-अलग राय हैं। सरकार का मानना है कि अगर एक साथ चुनाव कराए जाएंगे तो सरकारी खजाने पर वित्तीय बोझ कम होगा क्योंकि बार-बार होने वाले खर्च से बचा जा सकेगा। जाहिर है कि देश में हर समय कहीं न कहीं चुनाव होते रहते हैं । इस कारण सरकार, राजनीतिक दलों और चुनाव लड़ने वाले उम्मीदवारों पर भारी आर्थिक बोझ पड़ता है। आचार संहिता लागू होने के कारण विकास कार्य भी अवरुद्ध होते हैं। दूसरी ओर, कांग्रेस ने इस विचार को अव्यावहारिक बताया है। समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, सीपीआई, डीएमके समेत करीब 15 दल इस प्रस्ताव के पक्ष में नहीं हैं। ऐसा नहीं है कि देश में पहली बार एक साथ चुनाव कराने पर चर्चा हो रही है। 1952, 1957, 1962 और 1967 में लोक सभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ होते रहे हैं। उन दिनों केंद्र और अधिकांश राज्यों में कांग्रेस का ही शासन था। इसलिए कांग्रेस की इस धारणा से सहमत नहीं हुआ जा सकता कि एक देश एक चुनाव का विचार अव्यावहारिक है। हां, यह जरूर है कि एक साथ चनाव कराए जाने में मौसम बाधक बन सकता है। खराब मौसम के कारण चुनाव कराने वाले अधिकारियों और सुरक्षा बलों की आवाजाही में मुश्किलें पैदा हो सकती हैं। एक देश एक चुनाव को लेकर पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता वाली समिति ने जो भी सिफारिशें की हैं, वे सभी लागू की जा सकती हैं लेकिन इसके लिए विपक्षी दलों की सहमति आवश्यक है। इसीलिए आगामी दिनों में सरकार सभी राजनीतिक दलों से सहमति बनाने की कोशिश करेगी। बिना इस सहमति के इस विचार को जमीन पर नहीं उतारा जा सकता।
Date: 20-09-24
चुनाव एक साथ कराने की चुनौतियांओपी रावत, ( पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त )
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अगुवाई वाली समिति की सिफारिशों को स्वीकार करते हुए ‘एक देश, एक चुनाव’ को मंजूर कर लिया है। संसद के शीतकालीन सत्र में इस बाबत बिल लाया जा सकता है। एक साथ पूरे देश में चुनाव कराने की जरूरत चुनाव आयोग भी काफी पहले से महसूस करता रहा है। उसने 1982 में तत्कालीन सरकार को लिखा भी था कि 1967 के बाद से चुनाव अलग-अलग हो रहे हैं, जिसके कारण निरंतर चुनाव की प्रक्रिया चलती रहती है, इसलिए जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम और संविधान में उचित संशोधन कर लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने की व्यवस्था की जानी चाहिए। हालांकि, तब इस सुझाव पर राजनीतिक सहमति नहीं बन सकी और मामला जस का तस बना रहा।
एक देश, एक चुनाव की उम्मीद साल 2015 में फिर से जगी, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस दिशा में आगे बढ़ने का भरोसा दिया। आज यदि मंत्रिमंडल ने इस पर सहमति जताई है, तो इसे सरकार की स्च्छिछा कहेंगे। मगर इस दिशा में मजबूती से तभी बढ़ा जा सकेगा, जब संसद से जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम व ‘संविधान में संशोधन विधेयक पारित कराया जाएगा। और, यह कोई आसान काम नहीं है। दरअसल, लोकसभा और विधानसभा के ही चुनाव एक साथ कराने की बात होती, तो जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम और संविधान में कुछ संशोधनों से यह काम हो जाता। मगर कोविंद समिति की अनुशंसा के मुताबिक, स्थानीय निकायों के चुनाव भी दूसरे चरण में 100 दिनों के अंदर कराने को कैबिनेट ने मंजूरी दी है, जबकि इन संस्थाओं के चुनाव राज्य सरकार के अधीन होते हैं। पेच यहीं पर फंसेगा। मुमकिन है कि एनडीए समर्थित सरकारें तत्काल अपने यहां संशोधन कर लें, लेकिन विपक्षी दलों वाली राज्य सरकारें भी ऐसा करेंगी, इस पर संदेह है। यह शक तब और गहरा जाता है, जब एक देश, एक चुनाव के विरोध में कांग्रेस, समाजवादी, तृणमूल, द्रमुक, आप जैसी करीब 15 पार्टियां खुलकर खड़ी हैं। केंद्र सरकार इस मामले में कोई एकतरफा कार्रवाई नहीं कर सकती, क्योंकि ऐसा करना राज्यों के विशेषाधिकार का हनन होगा और इससे हमारा संघीय ढांचा प्रभावित होता है।
चुनाव आयोग एक साथ पूरे देश में चुनाव कराने की जरूरत इसलिए महसूस करता रहा है, क्योंकि अभी उसे अनवरत चुनाव संबंधी कामों से जूझना पड़ता है। साल 2024 में ही पहले लोकसभा चुनाव हुए, अब जम्मू-कश्मीर व हरियाणा में मत डाले जा रहे हैं और वर्ष के आखिर में महाराष्ट्र, झारखंड और शायद दिल्ली में मतदान होंगे। चुनाव आयोग के पास बमुश्किल 300 कर्मचारियों की फौज है, इसलिए चुनाव के समय दिन-रात काम करना उनकी मजबूरी बन जाती है। जब कोई कर्मचारी साल भर दिन-रात काम करेगा, तो उसमें थकान होना स्वाभाविक है। इससे गलती होने की आशंका भी बढ़ जाती है, जबकि निष्पक्षता चुनाव की बुनियादी शर्तों में एक है।
चुनाव-प्रक्रिया में छोटी से छोटी गलती भी कितनी भारी पड़ सकती है, इसे ऑस्ट्रिया के चुनाव से समझ सकते हैं। वहां सरकार का कार्यकाल बस खत्म होने को था, तो चुनाव आयोग ने अपनी तैयारी शुरू की। मत-पत्र चिपकाने के लिए उसने जिस गोंद की खरीदारी की, उस पर लिखा था कि यह 30 डिग्री सेल्सियस तक काम करेगा। मगर जब चुनाव हुए, तो तापमान बढ़कर 35 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया और ऐन चुनाव के समय मत-पत्र खुलने लगे। इससे पारदर्शिता प्रभावित हुई और चुनाव रद्द करवाने पड़े। चूंकि, सरकार के पास बमुश्किल एक महीने का कार्यकाल बचा था, इसलिए आयोग के पास संसद में यह गुजारिश करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा कि संविधान में संशोधन करके चुनाव का वक्त आगे बढ़ाया जाए। स्थिति काफी खराब हो गई थी। अपने यहां अब तक ऐसी कोई नौबत नहीं आई है, जिसके लिए हमें चुनाव आयोग और उनके कर्मियों का धन्यवाद करना चाहिए, लेकिन जब थकान हावी हो जाए, तो कुछ भी हो सकता है। इसी चुनौती से पार पाने के लिए आयोग 1982 से ही एक साथ चुनाव कराने की मांग करता रहा है। यहां चुनाव आयोग की टीम बढ़ाने से भी कोई मदद नहीं मिल सकेगी, क्योंकि इससे आयोग की पारदर्शिता ही प्रभावित होगी और उसके लिए चुनौतियां बढ़ जाएंगी।
साफ है, हमें सोच-समझकर बढ़ना होगा। यदि कुछ राज्य सरकारें तैयार नहीं होती हैं, तो फिर जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम और संविधान में ऐसे संशोधन करने पडें़गे कि लोकसभा व विधानसभा चुनावों के तत्काल बाद स्थानीय निकायों के चुनाव कराने की मजबूरी न रहे। राज्यों को इस बाबत सिर्फ सलाह दी जाए, जिसे मानना या न मानना उनका विशेषाधिकार रहे। इसके बाद, लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने के लिए जरूरी संशोधन किए जाने चाहिए। उचित यही है कि संशोधन संबंधी कोई मसौदा बनाते समय सभी राजनीतिक दलों को बातचीत की मेज पर बिठाया जाए और उनकी चिंताओं व आशंकाओं को दूर करते हुए’ एक देश, एक चुनाव’ पर आम सहमति बनाई जाए। संविधान संशोधन के लिए जरूरी दो-तिहाई बहुमत जुटाने के वास्ते ऐसा करना अनिवार्य होगा। इसके बाद ही ईवीएम की कमी या सुरक्षा बलों जैसी जरूरतों को पूरा करने की दिशा में आगे बढ़ा जाए।
हालांकि, एक और चुनौती इस राह में है। अब जनगणना की कवायद भी शुरू होने वाली है, जिसे कोरोना महामारी की वजह से टाल दिया गया था। इसमें करीब डेढ़ साल का वक्त लगता है, यानी 2026 तक इसके आंकड़े सामने आ सकते हैं। तब हमें इसके अनुसार नया परिसीमन भी करना होगा, जिससे दक्षिण के राज्यों को नुकसान होने का अंदेशा है और वे इसके खिलाफ अभी से लामबंद होने लगे हैं। अगर यह मुद्दा जोर पकड़ता है, तब ‘एक देश, एक चुनाव’ पर आगे बढ़ना मुश्किल हो सकता है।
ऐसे में, चुनाव आयोग को अभी यह सुझाव केंद्र सरकार को देना चाहिए कि कम से कम एक साल के सभी विधानसभा चुनाव साथ-साथ कराए जाएं। इसके लिए किसी संविधान संशोधन की जरूरत नहीं होगी, क्योंकि आयोग के पास छह महीने के अंदर के सभी चुनाव एक साथ कराने के अधिकार हैं। इसकी शुरुआत जम्मू-कश्मीर, हरियाणा, झारखंड, महाराष्ट्र व दिल्ली के चुनाव एक साथ कराकर की जा सकती थी। मगर ऐसा नहीं हो सका। फिर भी, अभी देर नहीं हुई है। कम से कम इस पर तो सहमति बनाई ही जा सकती है।
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अतः राज्यों को सामाजिक बुनियादी ढांचे पर प्रतिस्पर्धा करने की आवश्यकता है। स्वास्थ्य और शिक्षा के माध्यम से इसमें बढ़त ली जा सकती है।
‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 29 अगस्त, 2024
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भारत में सिविल सेवाओं के लिए आकर्षण ऐतिहासिक है। वास्तव में सिविल सेवाओं की तैयारी करना एक राष्ट्रीय शगल माना जाता है। लेकिन हाल ही में इससे जुड़ी दो दुखद घटनाएं हैं, जो इन सेवाओं की चयन प्रक्रिया में सुधार की मांग करती हैं –
1) पहली घटना में महाराष्ट्र की एक प्रशिक्षु अधिकारी को अपनी पहचान और दस्तावेजों में जालसाजी करते हुए पाया गया।
2) दूसरी घटना में दिल्ली के एक नामी कोचिंग संस्थान में तीन अभ्यार्थियों की डूबने से मौत हो गई।
सुधार किए जा सकते हैं –
– उम्मीदवारों के लिए अधिकतम आयु सीमा को कम किया जाना चाहिए।
– प्रयासों की संख्या तीन तक सीमित की जा सकती है। विशेष श्रेणियों को एक अतिरिक्त प्रयास की अनुमति दी जा सकती है।
– एक ऐसा विश्लेषण किया जाना चाहिए, जो यह दिखाए कि कितने उम्मीदवार अपने प्रयासों को दोहराते रहते हैं, और अंततः अपने अवसरों की समाप्ति पर हार मान लेते हैं।
– युवा पीढ़ी को यह बताया जाना चाहिए कि सरकारी सेवा ही राष्ट्र की सेवा करने का एकमात्र तरीका नहीं है। ईमानदारी से की गई कोई भी मेहनत राष्ट्र निर्माण में महत्वपूर्ण है।
इन उपायों से सिविल सेवाओं के नाम पर बढ़ते कोचिंग उद्योग पर कुछ लगाम लगाया जा सकता है। इन सेवाओं के पास न तो सार्वजनिक सेवा का एकाधिकार है, और न ही यह राष्ट्र सेवा का कोई असाधारण अवसर प्रदान करती है।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 16 अगस्त, 2024
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Date: 03-09-24
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One of the most unfortunate features of the Indian judicial system is the high pendency of cases. According to the National Judicial Data Grid (NJDG), 510 million cases are pending across the judicial pipeline, including 82,989 pending cases, an all-time high, in the Supreme Court. In his address at a conference on 75 years of the district judiciary on Sunday, Chief Justice D Y Chandrachud said that tackling pending cases remains a critical challenge, and that increasing the disposal-to-filing ratio is important, but this hinges on attracting skilled personnel to the system. He added that the time has come to think of ‘national integration’ by recruiting members of judicial services across the ‘narrow walls of regionalism’ and ‘state-centred selections’.
CJI’s endorsement of an all-India judicial service, along the lines of IAS or IPS, has been on the NDA government’s wishlist, and underscores the practical benefits of a national-level service. GoI’s 2015 proposal had virtually no takers, with most states pushing back on the grounds of violating the federal nature of the polity or linguistic barriers. Interestingly, linguistic barriers have not posed an insurmountable problem for the administrative or police services.
An all-India judicial service will bring much-needed transparency to judicial appointments by creating a system based on established criteria. Besides attracting high-quality legal talent into the system, it will break the local and state-level nexus between political and judicial establishments and ensure inclusivity. This will enhance the quality of justice and accelerate its delivery while creating a strong pool of candidates for the higher judiciary. Strengthening the judicial system is essential to bolstering the health of our democratic polity.
Date: 03-09-24
जजों की संख्या बढ़ाए बिना न्याय में गति कैसे आएगीसंपादकीय
प्रधानमंत्री के बाद अब राष्ट्रपति ने भी न्याय में विलंब पर न्यायपालिका को कड़ी नसीहत दी है। उन्होंने कहा, कभी ‘व्हाइट कोट’ (डॉक्टर्स का एप्रिन) देखकर मरीजों का बीपी बढ़ जाता था, लेकिन आज आम जनता काले कोट वालों से न्याय मांगने की जगह चुपचाप जुल्म सहना पसंद करती है। क्योंकि इसमें कोर्स के वर्षों चक्कर लगाना और आर्थिक नुकसान झेलना पड़ता है। जिला न्यायपालिका के दो-दिवसीय सम्मेलन में बोलते हुए राष्ट्रपति ने जजों को ‘तारीख देने की कार्य- संस्कृति’ से बचने को कहा। साथ में बैठे सीजेआई को स्पष्टीकरण के मोड में आना पड़ा। उन्होंने कहा कि 28% जजों और 27% कर्मियों के स्वीकृत पद नहीं भरे जा रहे हैं। उन्होंने विलंब कम करने के लिए बनी समिति के तीन-चरण वाले कदमों के बारे में भी बताया। जजों की कमी के अलावा विलंब का एक और बड़ा कारण स्थगन की संस्कृति है । इसमें वकील भी आर्थिक लाभ देखता है और केस की मेरिट पर बहस करने के झंझट से वकील और जज दोनों बच जाते हैं। राष्ट्रपति की बात के पीछे हाल ही में अजमेर में आया एक फैसला है, जहां 32 साल बाद छह दोषियों को सामूहिक दुष्कर्म के मामले में आजीवन कारावास की सजा हुई। इसी साल कानून मंत्री ने संसद को बताया कि प्रति दस लाख आबादी पर 21 जज हैं। लेकिन यह आंकड़ा 2011 की आबादी और स्वीकृत पदों के आधार पर है। इस समय आबादी 142 करोड़ है और जजों की (जो सीजेआई ने बताया) असली संख्या स्वीकृत पदों का मात्र 62% ही है। इसके विपरीत लॉ कमीशन की 120वीं रिपोर्ट ने जजों की संख्या को प्रति दस लाख की आबादी पर 50 जज करने की संस्तुति की थी। न्याय के प्रति गरीब जनता में अविश्वास के दोषी सरकार, न्यायपालिका और जनता सहित सभी स्टेकहोल्डर्स हैं। इसलिए केवल किसी एक अंग पर दोष मढ़ना गलत होगा।
Date: 03-09-24
देश और दुनिया में अब ‘स्मार्ट शहरों’ का समय आ गया हैआशीष कुमार चौहान, ( नेशनल स्टॉक एक्सचेंज के एमडी और सीईओ )
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 28 अगस्त 2024 को भविष्य की ओर कदम बढ़ाया, जब आर्थिक मामलों की कैबिनेट समिति ने पीएम गतिशक्ति सिद्धांतों पर आधारित, 28,602 करोड़ रुपए की लागत से 10 राज्यों में 12 औद्योगिक स्मार्ट शहरों की स्थापना की घोषणा की। यह भारत का अब तक का सबसे महत्वाकांक्षी बुनियादी ढांचे का कार्यक्रम है, और इसका उद्देश्य पूरे देश में विकास के बड़े इंजन बनाना है।
साहसी और परिणाम-केंद्रित नेतृत्व ही विकसित भारत के सपने को साकार करने की दिशा में आगे बढ़ा सकता है। राष्ट्रीय औद्योगिक कॉरिडोर विकास कार्यक्रम (एनआईसीडीपी) के तहत संचालित की जाने वाली नई परियोजना इस लक्ष्य की ओर देश की यात्रा को गति देगी।
सतत विकास के लिए एक और प्रोत्साहन की आवश्यकता है- स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं के लिए बड़े पैमाने पर निवेश। सरकार यही करने का इरादा रखती है। उसकी योजना डिजिटल रूप से सम्पन्न, ‘प्लग-एंड-प्ले’ औद्योगिक और मैन्युफैक्चरिंग केंद्रों में बड़े पैमाने पर निवेश की है।
आज प्रधानमंत्री मोदी को एक व्यावहारिक नीति-निर्माता के रूप में देखा जाता है। उन्होंने जल्द ही यह महसूस कर लिया कि भारत जैसे विशाल देश को प्रगति की ओर ले जाने के लिए आर्थिक विकास पर ध्यान केंद्रित करना होगा।
इसी का उत्तर था मेगा-इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं को शुरू करना- भविष्य के शहरों का निर्माण करना, विशाल समुद्री केंद्र स्थापित करना, देश भर में अत्याधुनिक सड़क और रेल कॉरिडोर बनाना और विश्वस्तरीय डिजिटल बुनियादी ढांचा स्थापित करना।
इस अति-महत्वाकांक्षी परियोजना की रोजगार-क्षमता बहुत अधिक है : इससे 10 लाख प्रत्यक्ष और 30 लाख अप्रत्यक्ष रोजगार सृजित होने की उम्मीद है। इसमें 1.52 लाख करोड़ रुपए का निवेश भी होगा, जिसमें निवेशकों को आवंटन के लिए तैयार भूमि, पानी, बिजली, गैस, दूरसंचार, सड़क, रेल, हवाई अड्डे उपलब्ध होंगे। एकीकृत नगर-नियोजन और कर्मचारियों के लिए काम के समीप ही आवास की सुविधा के साथ पर्यावरण की चिंताओं का भी ध्यान रखा जाएगा।
चूंकि ये औद्योगिक स्मार्ट शहर आर्थिक चुम्बक के रूप में कार्य करेंगे, इसलिए वे प्रमुख महानगरों पर दबाव को भी कम करेंगे। इससे योजनाबद्ध शहरीकरण होगा। यह नया भारत है। यह ऐसा विचार है जिसका समय आ गया है। महाराष्ट्र हमेशा से भारत की आर्थिक शक्ति रहा है। सतत विकास के दृष्टिकोण से भी यह सबसे अधिक लाभान्वित होगा और बुनियादी ढांचे व परिवहन में नए मानक स्थापित करेगा।
इस वर्ष की शुरुआत में, मुंबई ने भारत के सबसे लंबे समुद्री पुल- मुंबई ट्रांस हार्बर लिंक को हरी झंडी दिखाई। कोस्टल रोड मुंबई एक अन्य मेगा-परियोजना है और वर्तमान में इसे चरणों में विकसित किया जा रहा है। महाराष्ट्र के आर्थिक और सामाजिक ताने-बाने को बदलने के लिए तैयार अन्य परियोजनाएं दिल्ली-मुंबई औद्योगिक कॉरिडोर, नवी मुंबई अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा, मुंबई-अहमदाबाद हाई-स्पीड रेल और मुंबई-पुणे हाइपरलूप हैं।
महाराष्ट्र के तटीय क्षेत्रों में दो बेहद महत्वाकांक्षी परियोजनाएं पहले ही चल रही हैं। एक है रायगढ़ जिले के नौ गांवों में फैला दिघी पोर्ट औद्योगिक क्षेत्र परियोजना। यह दिघी बंदरगाह के विकास के साथ-साथ शुरू की जा रही है और इससे राज्य में उपभोक्ता-उपकरण, धातु, ऊर्जा, पेट्रोकेमिकल और रसायन व्यवसाय जैसे उद्योगों में निवेश बढ़ने की उम्मीद है।
दूसरी समुद्री परियोजना मुंबई से 130 किलोमीटर उत्तर में दहानू स्थित वधावन में भारत के सबसे बड़े बंदरगाहों में से एक का विकास है। वधावन मध्य-पूर्व के माध्यम से भारत को यूरोप से जोड़ने वाली समुद्री और रेल संपर्क स्थापित करने की रणनीतिक पहल का हिस्सा है। अफ्रीका के पूर्वी तट और फारस की खाड़ी के देशों से कंटेनर यातायात की पूर्ति के लिए अरब सागर में एक केंद्र के रूप में बंदरगाह को विकसित करने की योजना है।
आज पूरी दुनिया में जीवन की गुणवत्ता में सुधार, शहरों को टिकाऊ बनाने और आर्थिक विकास को गति देने के लिए स्मार्ट शहरों का विकास किया जा रहा है। चीन ने 2012 में स्मार्ट शहरों को प्राथमिकता बनाया और 2020 तक देश भर में 900 से अधिक पायलट-प्रोजेक्ट स्थापित किए।
इसने ग्वांगझोउ, शेनझेन और हांग्जो जैसे छोटे शहरों को वैश्विक मानचित्र पर ला दिया, क्योंकि वे शहरी-नियोजन और प्रबंधन के लिए अभिनव दृष्टिकोण प्रदर्शित करते हैं। 2000 के दशक की शुरुआत में स्मार्ट शहरों को अपनाने वाले पहले देश दक्षिण कोरिया में आज दुनिया का सबसे स्मार्ट शहर सोंगडो है, जो सियोल से बहुत दूर नहीं है। पिछले एक दशक में प्रधानमंत्री के नेतृत्व में भारत का विकास-रथ हमें दिखा रहा है कि जब आप दृढ़ संकल्प को स्पष्ट दृष्टि और निर्णायक कार्रवाई से जोड़ते हैं तो क्या किया जा सकता है।
Date: 03-09-24
एशिया और अफ्रीका में नई पीढ़ी मुखर हो रही हैबिनाइफर नौरोजी प्रेसिडेंट, ( ओपन सोसायटी फाउंडेशन )
छह महीने पहले बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना की सत्ता पर पकड़ को अभेद्य माना जा रहा था। सत्तारूढ़ अवामी लीग ने निर्विरोध चुनाव में लगातार चौथी बार जीत हासिल की थी। पर अचानक पिछले महीने छात्र समूहों के नेतृत्व में पूरे देश में विरोध भड़क उठा और हिंसक झड़प में 400 लोगों की मौत हो गई। इससे हसीना सरकार के 15 साल के शासन की स्याह हकीकत उजागर हुई। जिस तरह से श्रीलंका में ‘अरगालय’ सामूहिक विरोध के बाद साल 2022 में राजपक्षे परिवार के शासन का अंत हुआ था, उसी तरह बांग्लादेश में युवाओं के कारण हसीना को इस्तीफा देना पड़ा और भागने के लिए मजबूर हो गईं।
युवाओँ के नेतृत्व में हो रहे आंदोलनों की शृंखला में बांग्लादेश हालिया जुड़ा नया नाम है, जिसने इस साल एशिया और अफ्रीका के कई देशों को हिलाकर रख दिया है। फरवरी में नौजवान पाकिस्तानियों ने चौंकाने वाले चुनावी नतीजे सामने रखे, जहां सेना को धता बताते हुए उन्होंने जेल में बंद पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान के लिए सामूहिक मतदान किया।
उसके एक महीने बाद, पश्चिमी अफ्रीकी देश सेनेगल के युवा मतदाताओं ने चुनावों में अपने लोकतंत्र की फिर से वापसी कराई, जो उनसे छीन लिया गया था। एक बहुत कम जाना-पहचाना चेहरा और टैक्स इंस्पेक्ट रहे दिओमाये फाये महज चंद हफ्तों में जेल से उठकर राष्ट्रपति बन गए। फिर जून में यह हवा केन्या पहुंच गई, जहां जेन ज़ी आंदोलनकारी तत्कालीन राष्ट्रपति विलियम रुटो के नए टैक्स लागू करने की योजना के खिलाफ सड़कों पर उतर आए। बांग्लादेश की तरह वहां भी अधिकारियों ने हिंसक प्रतिक्रिया दी, दर्जनों लोग मारे गए। और आखिरकार रुटो को विवादास्पद बिल वापस लेना पड़ा। अब अफ्रीका के ही देश नाइजीरिया में विरोध-प्रदर्शन हो रहे हैं, जहां जीवनयापन की बढ़ती लागत पर युवा उद्वेलित हैं।
एशिया और अफ्रीका के कुछ हिस्सों में एक नई पीढ़ी खुद को मुखर कर रही है। नौजवान उत्सुकता के साथ आंदोलनों की मशाल थाम रहे हैं और मुश्किल लगने वाले किले ढहा रहे हैं। यह ऐसी पहली पीढ़ी है, जो इंटरनेट के अलावा जीवन को जानती ही नहीं थी, और अब वे सोशल मीडिया से न सिर्फ विरोध-प्रदर्शनों की घोषणा कर रहे हैं, बल्कि इन्हें आयोजित करने के साथ इस पर वाद-विवाद भी कर रहे हैं। इस प्रक्रिया में वे इनोवेटिव रास्ते अपना रहे हैं, इसमें एआई का इस्तेमाल भी शामिल है और जब सड़कों पर विरोध-प्रदर्शन के रास्ते बंद हो जाते हैं, तो वे डिजिटली प्रदर्शन कर रहे हैं। जवाब में, सरकारों ने इंटरनेट का गला घोंटने से लेकर इसे पूरी तरह से बंद करने तक, अपने स्वयं के तकनीकी-दमन को उजागर किया है।
ये आंदोलन राजनीति के पारंपरिक विचारों को भी अस्थिर कर रहे हैं, पारंपरिक जातीय और राजनीतिक विभाजन की सीमाओं से परे जा रहे हैं और पारंपरिक राजनीतिक दलों और नागरिक-समाज संगठनों से मुंह मोड़ रहे हैं। आमतौर पर यह माना जाता है कि लोकलुभावनवाद और अधिनायकवाद एक-दूसरे के पूरक हैं, फिर भी यहां हम लोकलुभावनवाद की अभिव्यक्तियों से सत्तावाद को मिलती चुनौती देख रहे हैं- और यह सब एक ऐसी पीढ़ी द्वारा हो रहा है, जो निडर और अडिग दोनों साबित हो रही है।
Date: 03-09-24
मणिपुर का संघर्षसंदपाकीय
एक भी ऐसा संकेत नजर नहीं आता, जिससे पता चले कि सरकार मणिपुर में हिंसा रोकने को लेकर गंभीर है। सवा साल से ऊपर हो गए, मगर अब भी वहां कुकी और मैतेई समुदाय के बीच संघर्ष जारी है। इन समूहों के उग्रवादी संगठन लक्षित हिंसा करने लगे हैं। वे पहले दूसरे समूह के लोगों के घरों को चिह्नित करते हैं और फिर हमला कर देते हैं। इंफल के पश्चिमी हिस्से में हुआ ताजा हमला इसका उदाहरण है। उसमें एक महिला सहित दो लोगों की मौत हो गई और नौ घायल हो गए। घायलों को गोली लगी है।
इस घटना के बाद मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह ने संकल्प लिया है कि वे किसी भी चरमपंथी गुट को कट्टरपंथी और राष्ट्र-विरोधी नहीं बनने देंगे। विचित्र है कि वे कई मौकों पर दोहरा चुके हैं कि स्थिति काबू में है, अब वे अरामबाई तेंगगोल जैसे चरमपंथी संगठनों पर शिकंजा कसने की बात कर रहे हैं। मणिपुर सरकार के गृहमंत्रालय ने कहा है कि ताजा घटना में उग्रवादियों ने ड्रोन का उपयोग कर लक्षित हिंसा की। समझना मुश्किल है कि मणिपुर में सक्रिय उग्रवादियों की गतिविधियों पर नजर रखना इतना मुश्किल क्यों बना हुआ है और वे कैसे अत्याधुनिक तकनीक और हथियारों का इस्तेमाल कर पा रहे हैं।
छिपी बात नहीं है कि मणिपुर का सारा संघर्ष सरकार की शिथिलता की वजह से पैदा हुआ है। शुरू में ही अगर सरकार ने दोनों समुदायों के बीच पैदा हुई गलतफहमी को दूर करने का प्रयास किया होता, तो वैमनस्यता की आग इस हद तक न भड़कने पाती। मगर सरकार ने न तो बातचीत की पहल की और न उपद्रवियों पर काबू पाने की कोशिश। यही वजह है कि पिछले वर्ष शुरू हुई हिंसा के बाद कई थानों और शस्त्रागारों से हथियार लूट लिए गए और उनका हिंसा में इस्तेमाल होता रहा।
पुलिस की मौजूदगी में महिलाओं को निर्वस्त्र कर घुमाने, उनसे बलात्कार और उनकी हत्या तक की घटनाएं हो चुकी हैं। मगर उन पर कार्रवाई में तत्परता नहीं दिखाई गई। अब तक दो सौ से अधिक लोग मारे जा चुके हैं। हजारों लोग अपना घर-बार छोड़ कर शिविरों में रहने को मजबूर हैं। हजारों घर और पूजा स्थल तोड़-फोड़-जला दिए गए। इतना कुछ हो जाने के बाद अगर मुख्यमंत्री अब संकल्प ले रहे हैं कि वे उग्रवादी संगठनों को राष्ट्र-विरोधी और कट्टरपंथी नहीं बनने देंगे, तो हैरानी का विषय है।
मणिपुर के मामले में केंद्र सरकार का रवैया भी शुरू से सवालों के घेरे में रहा है। जिन राज्यों में विपक्षी दलों की सरकारें हैं, उनसे छोटी-सी घटना पर भी केंद्रीय गृहमंत्रालय तुरंत जवाब तलब कर लेता है, मगर मणिपुर के मामले में मौन साधे हुए ही दिखता रहा। शुरू-शुरू में वहां केंद्रीय सुरक्षा बलों को सख्ती के आदेश दिए गए थे, तब हिंसा रुक गई थी, मगर बाद में किस वजह से उस पर काबू पाने की कोशिश नहीं की गई, समझना मुश्किल है।
ऐसा नहीं माना जा सकता कि अगर केंद्र सरकार चाहे, तो वह मणिपुर जैसे छोटे राज्य में हिंसा को नहीं रोक सकती। इस मामले में मुख्यमंत्री की जवाबदेही भी तय नहीं की गई। सर्वोच्च न्यायालय ने स्वत: संज्ञान लेते हुए वहां घटनाओं की जांच और राज्य पुलिस की कार्रवाइयों आदि पर नजर रखने के लिए एक दल गठित कर दिया, मगर राज्य सरकार के सहयोग के अभाव में उसके सकारात्मक नतीजे नजर नहीं आते।
Date: 03-09-24
कसौटी पर कार्रवाईसंपादकीय
इस बात को लेकर पिछले कुछ समय से सवाल उठने शुरू हो गए थे कि अगर कोई व्यक्ति किसी अपराध का आरोपी है, तो सिर्फ इस कारण उसके घर को बुलडोजर से कैसे गिराया जा सकता है! अब इस मसले पर दाखिल याचिका की सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने सख्त नाराजगी जताई और साफ कर दिया है कि किसी भी व्यक्ति का मकान महज आरोप के आधार पर नहीं गिराया जा सकता। अदालत ने यहां तक कहा कि कोई व्यक्ति भले दोषी हो, फिर भी कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया का पालन किए बिना ऐसा नहीं किया जा सकता।
हालांकि किसी भी अनधिकृत निर्माण को संरक्षण नहीं दिया जा सकता। केंद्र सरकार का तर्क था कि जिन लोगों के खिलाफ इस तरह की कार्रवाई हुई, वे अवैध कब्जे या अवैध निर्माण के मामले थे। गौरतलब है कि हाल के दिनों में किसी जघन्य अपराध के आरोपी के खिलाफ कार्रवाई के नाम पर उसका घर ढहा कर भले सख्ती का संदेश दिया जाता रहा हो और इसे कुछ लोग पसंद भी करते हों, मगर कानून और मानवीयता की कसौटी पर यह तौर-तरीका सवालों के घेरे में शुरू से था।
इस संदर्भ में सर्वोच्च न्यायालय की यह राय बेहद महत्त्वपूर्ण है कि न केवल आरोप लगने, बल्कि दोषी होने पर भी किसी के घर को ढहाना उचित नहीं है। उस घर में आरोपी के अलावा उसके परिवार के अन्य सदस्य हो सकते हैं, जिनका उस पर लगे आरोप से कोई लेना-देना न हो। दूसरे, अगर किन्हीं हालात में अदालत की सुनवाई के बाद आरोपी को निर्दोष पाया गया, तो वैसी स्थिति में ध्वस्तीकरण को कैसे देखा जाएगा! हालांकि अगर किसी का घर किसी नियम का उल्लंघन करके बनाया गया है, तो उसे भी सही नहीं ठहराया जा सकता।
मगर यह भी ध्यान रखने की जरूरत है कि अगर किसी आरोपी के घर को गिराने के क्रम में अतिक्रमण या अवैध निर्माण को आधार बनाया जाएगा, तब सभी नागरिकों के लिए व्यापक और समान दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत होगी। शायद यही वजह है कि शीर्ष अदालत ने इस मसले पर सभी संबंधित पक्षों से सुझाव मांगा, ताकि अचल संपत्तियों के विध्वंस के मुद्दे पर पूरे देश के लिए एक ठोस दिशा-निर्देश जारी किया जा सके।
Date: 03-09-24
त्वरित न्याय की जरूरतसंपादकीय
त्वरित न्याय सुनिश्चित करने के लिए अदालतों में स्थगन की संस्कृति को बदलने का प्रयास किया जाना जरूरी है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने जिला न्यायपालिका के दो दिवसीय राष्ट्रीय सम्मेलन के समापन समारोह को संबोधित कर रही थीं । अदालतों में लंबित मामलों का लंबित होने को हम सभी के लिए बड़ी चुनौती बताते हुए उन्होंने कहा कि न्याय की रक्षा करना देश के सभी न्यायाधीशों की जिम्मेदारी है। महिला न्यायिक अधिकारियों की संख्या में वृद्धि पर प्रसन्नता व्यक्त की। कार्यक्रम में मौजूद प्रधान न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ ने कहा कि, यह सुनिश्चित किया जाए कि अदालतें समाज के सभी सदस्यों के लिए सुरक्षित व सहज वातावरण प्रदान करें। इस तथ्य को बदलना होगा कि अदालतों को बुनियादी ढांचा केवल 6.7 फीसद महिलाओं अनुकूल है। सार्वजनिक मंचों से इस तरह के बातें होना कोई नई बात नहीं है । अदालतों में वर्षों से लंबित मामलों को लेकर मुख्य न्यायाधीश पहले भी कई बार विभिन्न मंचों से बोल चुके हैं। खासकर निचली अदालतों की कार्यशैली, सुविधाओं की कमी, जजों की अपर्याप्त संख्या जैसी समस्याओं का हल खोजने के प्रति सरकारी रवैया बहुत ही ढुलमुल है । वादी व प्रतिवादी तारीख पर तारीख लेते-लेते आजिज आ जाते हैं। कई दफा उनके जीते-जी फैसला भी नहीं हो पाता । केवल अदालतों में ही नहीं, बल्कि अभी तो विभिन्न कार्यक्षेत्रों में महिलाओं की सहभागिता नाममात्र ही है। न्यायपालिका, कार्यपालिका से लेकर विधायिका तक महिलाओं के काम करने के अनुकूल स्थितियां होना अभी बेहद चुनौतीपूर्ण है। हालांकि देश भर की अदालतों में न्यायाधीशों की नियुक्ति और अन्य आधारभूत सुविधाओं को बढ़ाकर लंबित मामलों को कम करने की भरसक कोशिश की गई है। हां, कोरोना के वक्त जरूर न्यायिक कामकाज में व्यवधान आया, मगर अब नये सिरे से इस बारे में गंभीरता से मंथन होना अच्छा संकेत है। देश की प्रथम नागरिक, प्रधान न्यायाधीश से लेकर कानून मंत्री तक लंबे समय तक लंबित मामलों को लेकर संजीदा हो रहे हैं। इसलिए उम्मीद की जानी चाहिए कि जल्द ही इस गंभीर समस्या का उचित समाधान खोजने में सफलता प्राप्त हो सकती है। निःसंदेह त्वरित न्याय सुनिश्चित होने से जनमानस में न्यायपालिका के प्रति आस्था बढ़ेगी। साथ ही मानव श्रम, समय और अनावश्यक धन व्यय में लगाम लगने से व्यवस्था सुविधाजनक हो सकेगी।
Date: 03-09-24
ओवर टूरिज्म के खतरेमनीष कुमार चौधरी
दुनिया भर में पर्यटकों की संख्या कोविड महामारी से पहले के स्तर पर लौट रही है, कुछ देशों में पर्यटकों की संख्या में बहुत ज्यादा उछाल देखने में आया है। यात्रियों और पर्यटकों की बेहिसाब आवक को देखते हुए कुछ प्रमुख शहर और स्थल अब प्रतिबंध, जुर्माना, कर और समय-सीमा प्रणाली लागू कर रहे हैं। पर्यटकों की संख्या को कम करने के लिए हतोत्साहित करने के अभियान भी शुरू हो रहे हैं। बार्सिलोना में स्थानीय निवासी पर्यटकों पर पानी छिड़क कर अति पर्यटन के खिलाफ विरोध प्रदर्शन कर रहे हैं। स्पेन के अन्य हिस्सों जैसे मलागा और कैनरी द्वीप में भी इसी तरह से विरोध प्रकट किया गया। इटली के सिसिली, ग्रीस के सेंटोरिनी, क्रोएशिया के डबरोवनिक और इंडोनेशिया के बाली में विरोध प्रदर्शन हुए हैं। रोम में ट्रेवी फाउंटेन और स्पेनिश स्टेप्स जैसी लोकप्रिय जगहों पर बैठना प्रतिबंधित कर दिया गया है।
सवाल यह है कि पर्यटकों की इस अनियंत्रित भीड़ के लिए कौन जिम्मेदार है? अति पर्यटन के लिए सोशल मीडिया प्रमुख कारकों में से एक है, जिसने पर्यटन को हॉटस्पॉट में बदल दिया है, जिससे वैश्विक स्तर पर पर्यटकों की संख्या बढ़ रही है, जबकि गंतव्यों की क्षमता सीमित है। लगभग 80 प्रतिशत यात्री दुनिया के सिर्फ 10 प्रतिशत पर्यटन स्थलों पर जाते हैं। अनुमान है कि 2030 तक दुनिया भर में पर्यटकों की संख्या, जो 2019 में 1.5 बिलियन के शिखर पर थी, 1.8 बिलियन तक पहुंच जाएगी। जिससे पहले से ही लोकप्रिय स्थानों पर और ज्यादा दबाव पड़ने की संभावना है। अकेले बार्सिलोना में एक वर्ष में 1.6 मिलियन निवासियों के मुकाबले 30 मिलियन पर्यटक आए हैं। वर्ष 2023 के पहले तीन महीनों में विदेश जाने वाले लोगों की संख्या 2022 की इसी अवधि की तुलना में दोगुनी हो गई है। वर्ल्ड ट्रैवल टूरिज्म काउंसिल के अनुसार, इस साल पर्यटन क्षेत्र के 7.5 ट्रिलियन पाउंड तक पहुंचने की उम्मीद है, जो महामारी से पहले के स्तर का 95 प्रतिशत है, जबकि पर्यटन उद्योग के 2033 तक वैश्विक अर्थव्यवस्था का 11.6 प्रतिशत प्रतिनिधित्व करने का अनुमान है। पर्यटकों की संख्या के मामले में भारत दुनिया में 14वें स्थान पर है। क्रोएशिया, जिसकी जनसंख्या दिल्ली या मुंबई के एक छोटे से उपनगर जितनी है तथा जिसका क्षेत्रफल भारत के क्षेत्रफल का 2 प्रतिशत से भी कम है वहां 21 मिलियन से अधिक पर्यटक आते हैं। पर्यटकों को आकर्षित करने में दुनिया में अग्रणी फ्रांस में 117 मिलियन पर्यटक आते हैं, जो भारत आने वाले पर्यटकों की संख्या से साढ़े छह गुना अधिक है। हालांकि भारत में आध्यात्मिक पर्यटन में बेतहाशा वृद्धि हुई है। ऑडिट कंपनी केपीएमजी की रिपोर्ट के अनुसार 66.4 लाख विदेशी पर्यटक 2022 में तीर्थ स्थलों पर आए। वर्ष 2020 में यह संख्या 10 लाख थी। देश में धार्मिक पर्यटन पिछले पांच साल में प्रत्येक वर्ष 19 प्रतिशत की दर से बढ़ा है। ट्रेवल ब्लॉगर, टूरिज्म हैंडल्स धार्मिक और ऐतिहासिक स्थलों के प्रचार में अहम कड़ी बने हैं, जिसके कारण युवाओं का रुझान धार्मिक स्थलों की तरफ बढ़ा है। देश में धार्मिक पर्यटन करीब 8 करोड़ लोगों को रोजगार देता है। साल 2030 तक यह आंकड़ा 10 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है। गौरतलब है कि भारत में 60 फीसद से अधिक पर्यटन धार्मिक और आध्यात्मिक जगहों से जुड़ा है। पर्यटक स्थलों तक आसान पहुंच ने भी अति पर्यटन को हवा दी है। इंटरनेट से लेकर स्मार्टफोन तक तकनीक में नवाचारों ने अनिगनत तरीकों से हमारे जीवन में क्रांति ला दी है, जिसमें यात्रा भी शामिल है। सोशल मीडिया के प्रभाव के कारण कम देखे जाने वाले स्थल रातों-रात बड़े पैमाने पर पर्यटन के आकर्षण का केंद्र बन गए हैं, जिससे ओवर टूरिज्म के साइड इफेक्ट नजर आने लगे हैं। ओवर टूरिज्म ने दुनिया के कुछ सबसे लोकप्रिय स्थलों के मूल चरित्र को ही बदल दिया है। पर्यटकों की बढ़ती संख्या के कारण भीड़-भाड़ और अव्यवस्थित यातायात, कूड़ा-कचरा, प्रदूषण के चलते स्थानीय संस्कृति व पर्यावरण का ह्रास होता है।
पर्यटकों के कारण स्थानीय स्तर पर भले ही रोजगार बढ़े, पर जीवन-यापन का खर्च इतना बढ़ जाता है कि वहां स्थानीय निवासी महंगाई से जूझते रहते हैं। यात्री इसलिए आते हैं क्योंकि वे कुछ अलग देखना चाहते हैं और किसी अन्य संस्कृति में अंतर्दृष्टि की तलाश में होते हैं, लेकिन अति पर्यटन से गंतव्य की प्रामाणिकता और आकर्षण खो ता है तथा एक सांस्कृतिक विभाजन पैदा होता है। यात्रा और पर्यटन के कुछ अनुशासन व सीमाएं होती हैं, लेकिन यात्री जब छुट्टी पर जाते हैं, तो यह उनकी जगह नहीं होती, उनका समुदाय नहीं होता, इसलिए वे अपने स्वभाव से अलग व्यवहार करते हैं। कुछ माह पहले एक आयरिश पर्यटक ब्रुसेल्स में एक पुनर्निर्मित मूर्ति पर चढ़ गया, जिससे 19 हजार डॉलर का नुकसान हुआ। पर्यटकों का इस तरह का अनियंत्रित व्यवहार कई जगहों पर आम-सा हो गया है। अति पर्यटन स्थानीय निवासियों में ज्यादा पर्यटक विरोधी भावनाएं पैदा करता है। किसी गंतव्य पर मौजूदा सामाजिक और पर्यावरणीय मुद्दों पर खुद को शिक्षित करना ही आपको अधिक जागरूक पर्यटक बनाएगा।
Date: 03-09-24
बुलडोजर से आगेसंपादकीय
कार्यपालिका और न्यायपालिका, दूसरे शब्दों में कहें, तो प्रशासन और न्यायपालिका में कुछ तनाव हमेशा से रहते आए हैं। प्रशासन मानता है कि व्यवस्था की कुछ ऐसी प्रक्रियाएं हैं, जो डर पैदा करके ही आगे बढ़ाई जा सकती हैं। जबकि, न्यायपालिका मानती है कि जो कुछ भी हो, कानून की प्रक्रिया के तहत ही हो। कई बार प्रशासन ऐसे काम करता है, जिसे तत्काल न्याय कहा जाता है। न्यायपालिका का कहना है कि न्याय करने का काम उसका है, नागरिक प्रशासन का नहीं। सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को बुलडोजर न्याय पर जो टिप्पणियां की हैं, उनमें इसी तनाव की झलक देखी जा सकती है।
अदालत ने इस तरीके को अपनाने की कड़ी निंदा की है। अदालत का कहना है कि कोई किसी जघन्य मामले का आरोपी या दोषी ही क्यों न हो, उसे कानून के दायरे में दंडित करने के दूसरे तरीके हो सकते हैं, लेकिन उसके घर को सिर्फ इसीलिए गिरा दिया जाना किसी भी तरह से वाजिब नहीं कहा जा सकता। हालांकि, सरकारी वकील ने कहा कि ऐसी ही संपत्तियां गिराई गई हैं, जो गैर-कानूनी हैं। दूसरी तरफ, उत्तर प्रदेश सरकार ने शपथ पत्र देकर कहा है कि उसने जो भी अचल संपत्तियां हटाई हैं, वे सब कानून की प्रक्रिया का पालन करते हुए हटाई गई हैं। दरअसल, कई बार ऐसे मामलों में गड़बड़ी किसी और तरह से होती है। गैर-कानूनी अचल संपत्ति तो पूरी तरह कानून की प्रक्रिया का पालन करते हुए हटाई जाती है, लेकिन प्रशासन अपनी पीठ थपथपाने के लिए यह कहता है कि उसने आरोपी को मजा चखा दिया। ऐसे मामलों की मीडिया में भी यही कहानियां चलती हैं। इसी से यह छवि बनती है कि ‘बुलडोजर न्याय’ किया जा रहा है। जरूरी यह है कि ऐसी कार्रवाई करने के लिए सबसे पहले यह बताया जाए कि ढहाई जा रही संपत्ति किस तरह से गैर-कानूनी है और उसके साथ ही, यह भी साफ कर दिया जाए कि संपत्ति को गिराने के लिए किस तरह से कानून की प्रक्रिया का पालन किया गया? अदालत के सामने राजस्थान के उदयपुर का वह मामला भी लाया गया, जिसमें एक स्कूल में छुरेबाजी की घटना हुई और बाद में उस मकान को ढहा दिया गया, जहां वह लड़का रहता था। विडंबना यह कि लड़के के पिता ने वह मकान किराये पर ले रखा था। जस्टिस केवी विश्वनाथ ने कहा कि अगर वह लड़का गलत भी था, तो भी सीधे किसी का घर गिरा देना सही तरीका नहीं है।
भारत सरकार के सॉलिसिटर जनरल के तर्कों और उत्तर प्रदेश सरकार के शपथ पत्र को देखते हुए अदालत ने यह भी कहा कि गैर-कानूनी निर्माण को गिराने या हटाने की प्रक्रिया के लिए देश स्तर पर कुछ स्पष्ट दिशा-निर्देश होने चाहिए। सुप्रीम कोर्ट यदि ऐसे दिशा-निर्देश तैयार करती है, तो इसका स्वागत किया जाना चाहिए। इससे अभी तक ऐसी कार्रवाई से जो विवाद खड़े होते हैं, वे खत्म किए जा सकेंगे। ठीक यहीं पर एक और मसले को भी उठाया जाना चाहिए। यह बहुत जरूरी है कि तत्काल न्याय के तरीकों को खत्म किया जाए और सभी को अपराध की सजा अदालत की प्रक्रिया से ही मिले, लेकिन हमारी अदालतों में मामले इतने लंबे समय तक चलते हैं और अंतिम फैसला आने में इतनी देरी हो जाती है कि जनता का तबका तत्काल न्याय को ठीक मानने लगता है। इस पर भी कुछ किया जाना जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट की सोमवार की टिप्पणियां उम्मीद हैं। जब बुलडोजर न्याय मामले में अंतिम फैसला आएगा, तब बहुत सारी धुंध साफ हो सकेगी।
Date: 03-09-24
विशेषज्ञों को सीधे अधिकारी बना देना कितना लाभकारीआलोक रंजन, ( पूर्व मुख्य सचिव, उत्तर प्रदेश )
संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) द्वारा संयुक्त सचिव और उप सचिव/निदेशक के 45 पदों के लिए विशेषज्ञों की सीधी भर्ती के विज्ञापन निकालने के बाद ऐसा विवाद खड़ा हो गया कि विज्ञापन को रद्द करना पड़ा और सामाजिक न्याय के प्रति प्रतिबद्धता दोहरानी पड़ी। वैसे, भारत सरकार में प्रत्यक्ष भर्ती के सभी मामलों में आरक्षण प्रदान किया जाना चाहिए।
आज सवाल यह है कि लेटरल एंट्री का औचित्य क्या है? वर्तमान शासन प्रणाली में क्या समस्या है, जिसे लेटरल एंट्री हल करने की कोशिश कर रही है? इस विचार के पक्षधर यह तर्क देते हैं कि लेटरल एंट्री व्यवस्था के बाहर से नए खून और ताजे विचारों का संचार करेगी, जिससे यह अधिक उपयोगी और जीवंत हो जाएगी। इसके समर्थकों का मानना है कि यह सभी समस्याओं का रामबाण इलाज है, जिसके अभाव में कमतर प्रदर्शन हो रहा है। हालांकि, इसके लिए सिविल सेवक जिम्मेदार नहीं हैं। समस्या यह नहीं है कि उनमें डोमेन ज्ञान की कमी है, बल्कि समस्या नौकरशाही संरचना और सरकारी कार्यप्रणाली में निहित है। सर्वश्रेष्ठ सिविल सेवक, जिन्हें अपने करियर की शुरुआत में उत्साही और गतिशील माना जाता है, वर्षों के साथ- सीएजी, सीवीसी, सीबीआई, कोर्ट (चार सी) के भय के कारण नरम पड़ जाते हैं। अक्सर अधिकारी निर्णय लेने से पहले सुरक्षा-प्रथम दृष्टिकोण अपनाते हैं। समझ में नहीं आता कि यहां एक डोमेन या एक क्षेत्र विशेषज्ञ सिविल सेवक से बेहतर तरीके से कैसे काम कर सकता है?
यह आकलन करना दिलचस्प होगा कि एक संयुक्त सचिव या उप-सचिव कैसे कार्य करते हैं। उनका ज्यादा समय संसदीय मामलों में लगता है। मंत्रियों के लिए जवाब तैयार करने का काम उनके पास प्रमुखता से होता है।
वास्तव में बेहतर सेवा के लिए डोमेन विशेषज्ञता से अधिक नेतृत्व के गुणों की जरूरत होती है। वरिष्ठ स्तर पर एक सिविल सेवक को ही नेतृत्व प्रदान किया जाना चाहिए। अपने प्रशिक्षण के चलते सिविल सेवक उस स्तर तक पहुंचता है, जहां उसके पास ये गुण होने चाहिए। यदि नहीं, तो उसे इन गुणों को विकसित करने के लिए प्रशिक्षित किया जा सकता है। इस संबंध में डोमेन विशेषज्ञ का कोई औचित्य नहीं बनता।
किसी भी स्थिति में उप-सचिव स्तर पर लेटरल एंट्री की कोई उपयोगिता प्रतीत नहीं होती, क्योंकि यह विशेषज्ञ के लिए कोई योगदान करने के लिए बहुत जूनियर पद है। वह बिना किसी प्रभाव के केवल फाइलें आगे बढ़ाएगा। उप-सचिव स्तर पर अधिकारियों की कमी की समस्या है, तो इसके कारणों का पता लगाकर उनका समाधान किया जाना चाहिए। जल्दबाजी में लेटरल एंट्री निश्चित रूप से इसका उत्तर नहीं है।
लोक प्रशासन के विशेषज्ञ पॉल एप्पलबी के शब्दों में, आईएएस अधिकारी के अनुभव की विविधता अच्छी नीतियों के निर्माण के लिए सबसे अनुकूल है। इसके अलावा आप विशेषज्ञता के लिए किस हद तक जाएंगे? एक नेफ्रोलॉजिस्ट या बाल रोग विशेषज्ञ सामान्यत: अपने विशेषज्ञता के क्षेत्र में इतने डूबे होते हैं कि उन्हें स्वास्थ्य नीति पर समग्र दृष्टिकोण अपनाने में कठिनाई होती है, यह काम एक आईएएस अधिकारी कर सकता है। आईएएस अधिकारी के 8-10 वर्षों के अनुभव का कोई विकल्प नहीं है। महज तीस मिनट के साक्षात्कार से आप बेहतर अधिकारी का चयन नहीं कर सकते।
मैं सरकार में विशेषज्ञों के होने के खिलाफ नहीं हूं। विंस्टन चर्चिल के शब्दों में, विशेषज्ञ छोर पर होना चाहिए, शीर्ष पर नहीं । मंत्रालय के सलाहकार के रूप में विशेषज्ञों को रखने की परंपरा है । सलाहकार भी एक भूमिका निभा सकते हैं, लेकिन उनका सहारा सीमित होना चाहिए। निश्चित रूप से उत्कृष्ट लोगों को उनके विशेषज्ञता के क्षेत्र में सरकार के लिए काम करने के लिए लाया जा सकता है, जैसे नंदन नीलेकणि को आधार कार्ड परियोजना की अध्यक्षता दी गई थी।
सरकार में लेटरल एंट्री ऐसा विचार है, जिस पर गंभीर पुनर्विचार की आवश्यकता है। हमें इस अवधारणा से जुड़े मिथकों से हटकर अच्छे शासन की वास्तविकताओं की ओर बढ़ना चाहिए। वर्तमान सुशासन के संबंध में समस्याएं हैं, पर इसके लिए सही निदान होना चाहिए।
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उच्चतम न्यायालय ने हाल ही में निर्णय दिया है कि दिल्ली के उपराज्यपाल को दिल्ली नगर निगम में एलडरमैन की नियुक्ति का स्वतंत्र अधिकार है। यह निर्णय कुछ अर्थों में विवादास्पद कहा जा सकता है।
कुछ बिंदु –
बहरहाल, यह पूरा मुद्दा केंद्र और दिल्ली सरकार के बीच दलीय कटुता और मतभेद का मुद्दा है। न्यायालय के इस निर्णय से यह पता चलता है कि अन्य राज्यों के विपरीत दिल्ली विधानसभा के अधिकार क्षेत्र पर संविधान संसद को कानून बनाने की शक्ति देता है।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 8 अगस्त, 2024
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Date: 02-09-24
India’s neighbourhood watch, past and presentIn some instances, it was New Delhi’s missteps that affected it, while in others, it was a case of events spiralling out of controlT.S. Tirumurti, [ was India’s Permanent Representative to the United Nations, New York and, earlier, Head of Division for Bangladesh, Sri Lanka, Myanmar and the Maldives ]
While India’s neighbourhood seems to be in disarray, there are times when the country indulges in unwarranted self-flagellation if things go wrong primarily because it credits itself a bit too much in its ability to determine the outcome of events in its neighbourhood.
Change in a short span
Nearly 16 years ago, between 2008-10, in a span of just three years, epoch-making events unfolded in India’s neighbourhood, ushering in democracy and promising much. This was a period which coincided with this writer’s stint as Head of Division for Bangladesh, Sri Lanka, the Maldives and Myanmar in the Ministry of External Affairs. India had played a positive catalytic role to further this process in its neighbourhood.
In December 2008 in Bangladesh, after military rule under General Moeen U. Ahmed, Sheikh Hasina became Prime Minister (2009) riding on the strength of a massive mandate, especially from women and youth. In fact, then External Affairs Minister Pranab Mukherjee played a quiet “catalytic” role in the holding of elections in Bangladesh, free of army interference. And, over 15 years, India and Bangladesh forged a mutually beneficial partnership, with Ms. Hasina’s government displaying sensitivity to India’s core interests.
In May 2009 in Sri Lanka, after 33 years of its existence, the group, the Liberation Tigers of Tamil Eelam (LTTE), was finally defeated in no small measure due to India’s sustained engagement with Sri Lanka — a role which has not been adequately acknowledged. Without the sword of the LTTE over India’s head, India could look forward to closer relations with a united Sri Lanka.
In October 2008 in the Maldives, after 30 years of President Maumoon Abdul Gayoom’s autocratic reign, the first multi-party democratic elections were held where Mohamed Nasheed took over as President. India did its bit to stabilise this nascent democracy. In spite of ups and downs, the last three consecutive elections have ushered in three different Presidents, showing the democratic maturity of the Maldives in nearly 16 years.
In 2010 in Myanmar, after 20 years of military rule, elections were held in which the military-backed Union Solidarity and Development Party (USDP) came to power. Daw Aung San Suu Kyi was freed after phases of of imprisonment. Subsequently, her National League for Democracy (NLD) had landslide wins in 2015 and 2020, indicating a strengthening of democratic roots.
Even Pakistan elected a civilian government in 2008, sending President Pervez Musharraf into exile.
These developments gave hope that democracy, with all its imperfections, was taking root in India’s neighbourhood. It is not a coincidence that the years 2008-10 also witnessed an exponential increase in India’s development assistance to its neighbours, whether in the rebuilding of northern Sri Lanka or extending the biggest ever line of credit to Bangladesh, of $1 billion, or in connectivity projects in Myanmar or as budgetary support to stabilise the fledgling democracy in the Maldives. For once, India could more than match China’s “chequebook diplomacy” in its neighbourhood.
The present situation
Moving to 2024, the neighbourhood looks almost unrecognisable.
Just when one thought that four consecutive elections in Bangladesh would make democracy irreversible, Ms. Hasina’s government collapsed in August 2024 under the weight of its own democracy deficit, an economic downturn and a violent quashing of student protests that anti-Hasina forces joined in later. India was caught flat-footed. Could India have prevented it? Maybe yes, given that this happened over a period of time. But it is difficult to decide how much a leader should be pressured to change course without seeming to interfere in a country’s internal affairs, especially when there is appreciation of each other’s national interests. While India’s bias toward Ms. Hasina is under the scanner, let us be realistic. Individuals do matter in relations between countries as much as institutional links. But that did not preclude India from maintaining regular engagement with Bangladesh’s Opposition, which it failed to do.
In 2022, Sri Lanka had its own “Bangladesh” moment when President Gotabaya Rajapaksa fled Sri Lanka, unable to control a series of mass anti-government “Aragalaya” protests led mostly by apolitical irate public and youth. Its democracy and the economy took a severe beating, the after-effects of which are still being felt in Sri Lanka. Could India have anticipated it? It is very unlikely. But what India did in the aftermath was commendable. India’s timely and generous bailout package of about $4 billion saved the economy.
Since India has built bridges across the political spectrum in Sri Lanka, it is in a much better position, irrespective of who comes to power in the forthcoming elections. India has even made peace with the Janatha Vimukthi Peramuna, a right-wing party which has usually been anti-India in its stand.
In 2024, the results of elections in the Maldives caught India on the wrong foot as it nearly made the same mistake as in Bangladesh — not anticipating President Mohamed Muizzu’s huge win and not having engaged with him earlier. India is now making amends. However, what is noteworthy is that after Maldives’ first elections when President Nasheed (2008-12) was in trouble without a majority in the Majlis, India did not hesitate to “counsel” him on the importance of respecting the “coalition mantra”. However, he was not persuaded and ended up losing his presidency. So much for India turning a blind eye to the “mistakes” of its friends.
In Myanmar, after three consecutive elections, the military took over yet again in February 2021, despite the 2020 elections having given the NLD a huge mandate. Now, Myanmar’s military is riding a tiger and unable to dismount, with the Opposition and ethnic groups gaining ground. The conflict is spilling over into India’s north-east. It has renewed India’s dilemma on whether to stay with the military to protect itself from insurgents using Myanmar soil or to side with the rejuvenated Opposition forces fighting for change, since India cannot afford to lose Myanmar in this balancing act.
In August 2021, the Taliban forcibly captured power after two decades, turning the clock back in Afghanistan. India had anticipated this and even cautioned the United States, but the U.S. kept its “strategic” partner India out of its engagement with Taliban for fear of offending Pakistan. Now, India is fending for itself from the fall-out.
And Pakistan saw its civilian government toppled in 2022, widely seen as at the army’s behest as in the past.
New Delhi’s response as key factor
Hence, in some cases, India’s missteps and misjudgments have cost it to an extent, while in others, for no fault of India’s, events have spiralled out of control. The crux is on how India has reacted to these developments.
India has not done too badly considering that it bailed out Sri Lanka financially when Colombo needed India the most; extended friendship and patience with the new Maldivian government to find its feet; expressed willingness to do business with Taliban in Afghanistan to protect India’s geopolitical interests, and re-extended the hand of friendship to an unstable but democratic Nepal after an attempt to pressure Nepal boomeranged on India.
But Myanmar and Bangladesh, given their centrality to India’s interests, pose serious challenges — Myanmar is veering toward a possible civil war and Bangladesh is struggling to get back on its democratic feet. In both cases, going along with forces trying to keep democratic space open is India’s best bet. In Myanmar, used as India is to an uneasy alliance of the army and NLD, India needs a different approach with ethnic groups getting into this mix. With Bangladesh, India needs a new understanding with parties, not all of whom are favourable to India and keep out external anti-India forces waiting to take advantage of the situation.
In the midst of these upheavals, the importance of India’s robust developmental support becoming the bedrock for fostering closer relations with its neighbours and their peoples is underestimated. Even the Taliban hesitated to attack Indian projects over the last two decades since it benefited the people.
All these point to the fact that India requires more sustained engagement with its neighbours and in the region, which is discovering that once the genie of democracy has been freed, it is difficult to put it back in the bottle.
Date: 02-09-24
Reforming the process of judicial appointmentsSome countries have commissions comprising members of the judiciary and legal academia, politicians, and laypersons to appoint judges. India could take lessons from themPradeep Mehta, [ Secretary General, CUTS International, a global public policy research and advocacy group; and author of ‘Supreme Court and the Indian Economy’. Anuskha Kewlani of CUTS International contributed to this article ]
In April, while 60 lakh cases remained pending at various High Courts, 30% of the seats remained vacant, according to a report published by the Department of Justice.
Collegium system versus NJAC
The problem of appointment of judges, which is linked to the problem of pendency of cases, has always been a matter of debate in India. Delays in appointments are often caused by a standoff between the executive and the judiciary. This was exacerbated when the Supreme Court struck down as unconstitutional the National Judicial Appointments Commission (NJAC) Act, 2014, and the 99th Constitution Amendment, 2014, which sought to give politicians and civil society a final say in the appointment of judges to the highest courts. The Court held that the collegium system, which is in place, protects the independence of the judiciary. Since the world over, the judiciary is not the sole body which appoints judges, this argument has always appeared weak.
Furthermore, the collegium system has frequently been criticised for its lack of accountability and transparency, and the prevalence of nepotism. Parliament in its wisdom enacted the NJAC Act. The proposed body would have replaced the collegium system. In order to give it credence, the NJAC was to be headed by the Chief Justice of India, and include the Law Minister, two eminent persons, and two senior judges.
The judiciary contended that the NJAC would give the government excessive control over selection of judges, therefore undermining its independence. The Court determined that the NJAC may jeopardise impartiality and objectivity in the appointment process, thus endangering judicial independence. However, a number of legal professionals, including former judges, have argued that the NJAC is a better system. If appointments of judges have to take place faster, we need to bring back the NJAC. Prior to any plan being finalised, all relevant parties, including the judiciary, legislature, civil society, and Bar Associations should be consulted.
Lessons from other countries
Upon reviewing the process of judicial nominations in other nations, we find that most of them are made by a committee established by the administrative and legislative branches of government. For instance, the Constitutional Reform Act, 2005, introduced by the U.K., established two Commissions for the purpose of choosing candidates: one for the courts in England and Wales, and the other for the Supreme Court. A 15-member commission, called the Judicial Appointments Commission, is designated to oversee the nomination of judges to the courts of England and Wales. It comprises the chairman, who is always a lay member; six judicial members, including two tribunal judges; two professional members — they must be a Barrister in England and Wales, Solicitor of the Senior Courts of England and Wales, or Fellow of the Chartered Institute of Legal Executives, but both cannot hold the same qualification; five lay members; and one non-legally qualified judicial member.
Many countries have switched to an appointments commission system. South Africa has a Judicial Service Commission (JSC) that advises the President to appoint judges. The current JSC comprises the Chief Justice of South Africa, the President of the Supreme Court of Appeal, a Judge President, the Minister of Justice, two practicing advocates, two practicing attorneys, a professor of law, six persons designated by the National Assembly, four persons designated by the President, and four permanent delegates to the National Council of Provinces.
In France, the President of the Republic holds the constitutional duty to safeguard the independence of the judiciary but does not directly select judges. Judges are chosen through a process involving the High Council of the Judiciary (Conseil Supérieur de la Magistrature) or, in the case of lower courts, by the Minister of Justice who may consult or receive advice from the High Council. These models, which provide space to members of the judiciary, of legal academia, politicians, and laypersons, are progressive appointment systems. India could take lessons from them.
Reworking NJAC
The NJAC was an elegant reform. It could have resulted in faster nominations of judges because of its democratic structure. In its present form, the collegium system, under which the Chief Justice along with four/two senior-most Supreme Court judges, recommend appointments and transfers of judges, is opaque. No one knows what the criteria are to select judges. The system offers room for favouritism, which could prevent competent and deserving judges from being appointed. Despite its supposed faults, the NJAC can be reworked by taking into account the views of the judiciary, the executive, and civil society, and the need to strike a balance between judicial independence and accountability.
The NJAC could provide a more efficient method of appointing judges, encouraging communication between the arms of the state, and addressing some of the perceived drawbacks of the collegium system. The way forward ultimately necessitates a nuanced strategy that balances the justifiable concerns of all parties involved and guarantees that the new system will increase efficiency without jeopardising the integrity of judicial appointments. Attaining this equilibrium is vital for maintaining the rule of law and public confidence in the judiciary. In India, delayed justice is all too common and we need to think of ways of preventing this.
Date: 02-09-24
न्याय में देरीसंपादकीय
जिला अदालतों के राष्ट्रीय सम्मेलन के समापन दिवस पर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु ने लंबित मुकदमों और न्याय में देरी का उल्लेख कर न्यायिक तंत्र की एक गंभीर समस्या को ही रेखांकित किया। उन्होंने लंबित मुकदमों के कारण आम आदमी को होने वाली समस्याओं का जो जिक्र किया, उस पर अविलंब ध्यान दिया ही जाना चाहिए, क्योंकि लंबित मुकदमों का बोझ बढ़ता चला जा रहा है।
उन्होंने कहा कि यह बोझ निचली अदालतों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक बढ़ रहा है। चिंताजनक यह है कि इस पर विभिन्न स्तरों पर चर्चा खूब होती है और चिंता भी जताई जाती है, लेकिन समस्या के समाधान के लिए वैसे ठोस कदम नहीं उठाए जा पा रहे हैं जैसे आवश्यक हो चुके हैं।
राष्ट्रपति ने लंबित मुकदमों के साथ-साथ न्याय में देरी पर भी चिंता जताई और स्थगन संस्कृति पर लगाम लगाने पर बल दिया। यह वह संस्कृति है जो तारीख पर तारीख के सिलसिले के लिए जिम्मेदार है। इस संस्कृति को तत्काल प्रभाव से खत्म किया जाना चाहिए, क्योंकि यह न्याय में देरी का कारण बनती है और इस उक्ति को चरितार्थ करती है कि न्याय में देरी अन्याय ही है।
राष्ट्रपति ने न्याय में देरी का उल्लेख करते हुए यह कहकर आम आदमी की मनोदशा का सटीक चित्रण किया कि वह अदालतों में जाते हुए उसी तरह घबराता है जैसे जब कोई अस्पताल जाता है तो वहां उसकी घबराहट बढ़ जाती है। उन्होंने इसे ब्लैक कोर्ट सिंड्रोम की जो संज्ञा दी, वह बिल्कुल उपयुक्त है।
उन्होंने यह भी बिल्कुल सही कहा कि न्याय प्रक्रिया की जटिलता के कारण अब आम आदमी अदालतों का दरवाजा मजबूरी में ही खटखटाता है। न्याय में देरी के चलते लोग मानसिक रूप से तो परेशान होते ही हैं, आर्थिक संकट से भी दो चार होते हैं। यह अच्छा हुआ कि उन्होंने यह कहने में संकोच नहीं किया कि यदि 10-20 साल बाद न्याय मिले तो उसे न्याय कैसे कहा जा सकता है।
यह उल्लेखनीय है कि वह जब समय पर न्याय न मिल पाने के कारण आम आदमी को होने वाली परेशानी की चर्चा कर रही थीं, उस समय सभागार में सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश के साथ-साथ केंद्रीय कानून मंत्री भी उपस्थित थे। इससे संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता कि कार्यपालिका और विधायिका उन कारणों से परिचित है जिनके चलते समय पर सुगम तरीके से न्याय नहीं मिल पाता, क्योंकि देश इसकी प्रतीक्षा कर रहा है कि उन कारणों का प्राथमिकता के आधार पर निवारण किया जाए।
इससे इनकार नहीं कि पिछले कुछ वर्षों में न्याय प्रक्रिया को आसान बनाने और समय पर न्याय उपलब्ध कराने के लिए अनेक कदम उठाए गए हैं, लेकिन अपेक्षित नतीजे हासिल नहीं हो पा रहे हैं। यह आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य हो चुका है कि अदालतों के कामकाज का तौर-तरीका बदला जाए। यह तौर-तरीका जिला अदालतों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक बदलने की आवश्यकता है।
Date: 02-09-24
न्याय की गतिसंपादकीय
महिला सुरक्षा को लेकर चौतरफा गहरा असंतोष है। कोलकाता महिला चिकित्सक बलात्कार और हत्या कांड के बाद महिला सुरक्षा संबंधी कानूनों को कड़ाई से लागू करने और यौन उत्पीड़न संबंधी मामलों में त्वरित कार्रवाई की जरूरत फिर से रेखांकित की जा रही है। कोलकाता में विरोध प्रदर्शनों का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा। उस घटना पर हर राजनीतिक दल और बड़ा नेता अपनी संवेदना व्यक्त कर चुका है। राष्ट्रपति ने भी कहा कि अब बहुत हो चुका, ऐसी घटनाएं किसी भी रूप में रुकनी ही चाहिए। अब प्रधानमंत्री ने जिला न्यायालयों के न्यायाधीशों के सम्मेलन में उनसे अपील की कि महिला और बाल उत्पीड़न संबंधी मामलों में वे शीघ्र सुनवाई करें, ताकि उन्हें इंसाफ मिल सके और अपराधियों में खौफ पैदा हो। हकीकत यही है कि बलात्कार और बाल यौन उत्पीड़न जैसे मामलों पर नकेल कसना इसीलिए मुश्किल बना हुआ है कि अपराधियों में कानून का भय पैदा नहीं हो सका है। निर्भया कांड के बाद महिला सुरक्षा संबंधी कानूनों को और सख्त बनाया गया था। बाल यौन शोषण के विरुद्ध पाक्सो कानून बना था जिसमें आरोपी की तुरंत गिरफ्तारी और जमानत तक न देने का कड़ा प्रावधान किया गया। मगर उन कानूनों का भय कहीं नजर नहीं आता।
कड़े कानून बना देने भर से अपराधों पर लगाम लगने का भरोसा पैदा नहीं किया जा सकता। इसके लिए जरूरी है। कि उन्हें सही तरीके से अमल में लाया जाए और न्यायालयों में शीघ्र निर्णय हो मगर हकीकत यह है कि महिला उत्पीड़न संबंधी ज्याचातर मामलों में समय पर कार्रवाई नहीं हो पाती। बहुत सारे मामलों में तो प्राथमिकी दर्ज करने में ही कई चिन लग जाते हैं। इस तरह बलात्कार जैसे मामलों में जरूरी सबूत भी ठीक से उपलब्ध नहीं हो पाते। फिर जांचों में पुलिस इतना क्लिंग कर देती है कि सुनवाई वर्षों तक चलती रहती है। इसके अलावा सबसे चिंता की बात यह है कि बलात्कार के मामले में रोष सिद्धि की दर बहुत न्यून है। सबूतों के अभाव में अपराधी छूट जाते हैं। पाक्सो जैसे कानून में भी अनेक बार देखा गया है कि रसूखदार आरोपियों के मामले में पुलिस गिरफ्तारी तक को टालती रहती है। फिर गवाह और पीड़िता तक को डरा-धमका या लोभ-लालच देकर बवान पलटने पर मजबूर कर दिया जाता है। इन स्थितियों से अचालतें अनजान नहीं हैं। मगर आमतौर पर मिली अचालतें उस तरह पुलिस पर जांचों में तेजी और निष्पक्षता लाने का दबाव नहीं बना पाती, जिस तरह कई बार ऊपरी अचलतें करती हैं।
फिर अचालतों पर मुकदमों का बोझ अधिक होने की वजह से मामलों की सुनवाई लंबे समय के लिए टलती रहती है। महिला यौन उत्पीड़न के मामलों में प्रावधान किया गया कि उन्हें त्वरित अदालतों में निपटाया जाए। साल भर के भीतर उन पर फैसला देने का प्रयास हो मगर जी मामले खूब विवादों और चर्चा में रहते हैं उनकी सुनवाई भी जल्दी पूरी नहीं हो पाती। जिन देशों में आपराधिक मामलों में सा और तेज कार्रवाई होती है, वहां अपराध की दर काफी नीचे देखी जाती है। महिलाओं के खिलाफ जघन्य अपराध देश के किसी भी हिस्से में हो, अगर पुलिस तुरंत सक्रिय होकर कार्रवाई करे, जिला अदालतें महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े मामलों में सख्ती और तत्परता दिखाएं तो ऐसी आपराधिक प्रवृतियों पर लगाम लगाना आसान हो जाएगा। कानून का नय अपराध को रोकने में सबसे कारगर उपाय होता है।
Date: 02-09-24
अंतरिक्ष अनुसन्धान में बढ़ते कदमरंजना मिश्रा
चंद्रयान-3 का चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर सफलतापूर्वक उतरना भारत के लिए एक गौरवशाली क्षण था। उससे साबित हो गया कि भारत अंतरिक्ष अन्वेषण के क्षेत्र में एक प्रमुख खिलाड़ी बन चुका है। अब उस दिन को राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस घोषित कर दिया गया है। अंतरिक्ष अनुसंधान ने हमें कई नई तकनीकों का विकास करने में सक्षम बनाया है। उपग्रह संचार, जीपीएस, मौसम पूर्वानुमान जैसी सुविधाएं अंतरिक्ष अनुसंधान की ही देन हैं। अंतरिक्ष अनुसंधान से प्राप्त ज्ञान का उपयोग हमारी पृथ्वी की समस्याओं के समाधान में किया जा सकता है।
जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक आपदाओं और खाद्य सुरक्षा जैसी चुनौतियों का सामना करने के लिए अंतरिक्ष अनुसंधान बहुत जरूरी है। यह एक ऐसा क्षेत्र है, जहां विभिन्न देश मिलकर काम करते हैं। इससे अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा और वैश्विक समस्याओं के समाधान में मदद मिलती है।
पिछले कुछ दशक में भारत ने अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में असाधारण प्रगति की है। भारत का अंतरिक्ष अभियान 1962 में शुरू हुआ था, जब विक्रम साराभाई की पहल पर भारतीय राष्ट्रीय अंतरिक्ष अनुसंधान समिति की स्थापना की गई। उसके बाद 15 अगस्त, 1969 को भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) की स्थापना की गई।
इसरो ने अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में अधिक व्यापक भूमिका निभाई और अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के उपयोग को बढ़ावा दिया। 1972 में अंतरिक्ष विभाग की स्थापना की गई और इसरो को इस विभाग के अधीन लाया गया। शुरुआती वर्षों में इसरो ने छोटे उपग्रहों को प्रक्षेपित करने और राकेट प्रौद्योगिकी विकसित करने पर ध्यान केंद्रित किया। धीरे-धीरे, इसने अपनी क्षमतओं का विस्तार किया और अधिक जटिल अभियानों को अंजाम दिया। चंद्रमा की सतह पर भारत का पहला मिशन चंद्रयान था। 2023 में चंद्रयान-3 मिशन के माध्यम से चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर ‘साफ्ट लैंडिंग’ कर भारत ने इतिहास रच दिया। भारत चंद्रमा पर ‘साफ्ट लैंडिंग’ करने वाला दुनिया का चौथा और चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुवीय क्षेत्र के पास उतरने वाला पहला देश बन गया है।
मंगलयान ने बहुत कम बजट में मंगल ग्रह की कक्षा में प्रवेश कर एक नया इतिहास रचा। हाल ही में इसरो ने सूर्य का अध्ययन करने के लिए आदित्य मिशन शुरू किया है। यह सूर्य के बारे में महत्त्वपूर्ण डेटा एकत्र करेगा और हमारे सौर मंडल की बेहतर समझ विकसित करने में मदद करेगा। इसरो ने भारतीय क्षेत्रीय नौवहन उपग्रह प्रणाली (आइआरएनएसएस) विकसित की है, जो भारत और इसके आसपास के क्षेत्रों में सटीक नेविगेशन सेवाएं प्रदान करती है। इसने कई प्रकार के उपग्रहों को सफलतापूर्वक प्रक्षेपित किया है, जिनमें संचार उपग्रह, पृथ्वी अवलोकन उपग्रह, नौवहन उपग्रह और प्रायोगिक उपग्रह शामिल हैं। इसरो ने एक साथ कई उपग्रहों को प्रक्षेपित करने की क्षमता विकसित कर ली है। इससे न केवल प्रक्षेपण लागत में कमी आई है, बल्कि भारत की अंतरिक्ष तकनीक में भी एक नया आयाम जुड़ा है।
इसरो ने अधिकतर तकनीकों को स्वदेशी रूप से विकसित किया है, जिससे देश की आत्मनिर्भरता बढ़ी है। पीएसएलवी एक ऐसा राकेट है, जो कई उपग्रहों को एक साथ अंतरिक्ष में भेज सकता है। जीएसएलवी मार्क-3 भारी उपग्रहों को प्रक्षेपित करने में सक्षम है। क्रायोजेनिक तकनीक में महारत हासिल कर भारत ने एक बड़ी उपलब्धि हासिल की है। क्रायोजेनिक तकनीक में अत्यंत कम तापमान पर द्रवों का उपयोग किया जाता है। राकेटों में, क्रायोजेनिक इंजन में द्रव हाइड्रोजन और द्रव आक्सीजन जैसे अत्यंत ठंडे ईंधन का उपयोग किया जाता है। क्रायोजेनिक इंजन से राकेट को अधिक शक्तिशाली धक्का मिलता है, जिससे भारी उपग्रहों को पृथ्वी की कक्षा में स्थापित करना आसान हो जाता है।
इससे भारत की अंतरिक्ष क्षमता में काफी वृद्धि हुई है और अब भारत भारी उपग्रहों को स्वदेशी रूप से प्रक्षेपित करने में सक्षम है। स्वदेशी तकनीक ने भारत को अंतरिक्ष क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनाया और देश की वैज्ञानिक प्रतिष्ठा बढ़ाई है। भविष्य में इसरो और अधिक उन्नत तकनीकों को विकसित करेगा, जिससे भारत एक प्रमुख अंतरिक्ष शक्ति बन सके। इसरो ने एक महत्त्वाकांक्षी परियोजना शुरू की है, जिसका नाम है ‘गगनयान’। इसका मुख्य उद्देश्य भारतीय अंतरिक्ष यात्रियों को अंतरिक्ष में भेजना है। यह भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम में एक मील का पत्थर साबित होगा। इस मिशन के जरिए भारत अंतरिक्ष यान, जीवन समर्थन प्रणाली और अन्य आवश्यक उपकरणों को स्वदेशी रूप से विकसित करने में सक्षम होगा।
यह मिशन भारत की क्षमता को प्रदर्शित करेगा कि वह मानवयुक्त अंतरिक्ष मिशन को सफलतापूर्वक अंजाम दे सकता है। यह मिशन अंतरिक्ष के बारे में नए ज्ञान और जानकारी हासिल करने में मदद करेगा। इससे भारत को अन्य अंतरिक्ष एजंसियों के साथ सहयोग करने का अवसर मिलेगा।
हालांकि मानवयुक्त अंतरिक्ष मिशन तकनीकी रूप से बहुत जटिल होता है और इसमें कई चुनौतियां होती हैं, जैसे कि अंतरिक्ष यान का डिजाइन, जीवन समर्थन प्रणाली, और सुरक्षा उपाय। यह एक महंगा मिशन है और इसके लिए बड़े पैमाने पर निवेश की आवश्यकता होती है। इस मिशन के लिए कुशल वैज्ञानिकों, इंजीनियरों और अंतरिक्ष यात्रियों की आवश्यकता होती है। इसरो इस मिशन को सफल बनाने के लिए लगातार काम कर रहा है। गगनयान मिशन भारत के लिए एक गौरव का क्षण होगा और यह भारत को अंतरिक्ष शक्तियों के समूह में शामिल करेगा। गगनयान मिशन की सफलता के बाद इसरो का अगला लक्ष्य चंद्रमा पर मानवयुक्त मिशन भेजना है।
यह मिशन हमें चंद्रमा के बारे में और अधिक जानने में मदद करेगा और भविष्य में अन्य ग्रहों पर मिशन के लिए एक आधार तैयार करेगा। इसरो भारत का अपना एक अंतरिक्ष स्टेशन विकसित करने की दिशा में तेजी से काम कर रहा है। उसका लक्ष्य है कि वह 2035 तक अपना अंतरिक्ष स्टेशन स्थापित कर ले। इस स्टेशन में कुल पांच ‘माड्यूल’ होंगे और पहला माड्यूल 2028 में शुरू होने की उम्मीद है। इस स्टेशन में एक साथ कई अंतरिक्ष यात्री रह सकेंगे और वे विभिन्न प्रकार के वैज्ञानिक प्रयोग कर सकेंगे।
इस स्टेशन के जरिए भारत अंतरिक्ष में वैज्ञानिकों के लंबे समय तक रहने और काम करने की अपनी क्षमता को बढ़ाएगा। इसके अलावा यह अंतरिक्ष विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारत की स्थिति को मजबूत करेगा। यह स्टेशन अंतरिक्ष विज्ञान के विभिन्न पहलुओं पर गहन अध्ययन करने के लिए एक मंच प्रदान करेगा। भविष्य में इस स्टेशन का उपयोग अंतरिक्ष यात्रियों को प्रशिक्षित करने और चंद्रमा या मंगल जैसे अन्य ग्रहों पर मिशन के लिए तैयार करने में किया जा सकता है।
इसरो के भविष्य के लक्ष्य अत्यंत महत्त्वाकांक्षी और देश के विकास के लिए अहम हैं। इसरो की उपलब्धियों ने न केवल भारत को अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में एक अग्रणी देश बनाया है, बल्कि युवाओं को विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में करिअर बनाने के लिए प्रेरित किया है। आने वाले समय में भारत अंतरिक्ष अनुसंधान के क्षेत्र में और अधिक उल्लेखनीय उपलब्धियां हासिल करेगा।
Date: 02-09-24
त्वरित न्याय बेहद जरूरीसंपादकीय
महिलाओं के खिलाफ अपराध के मामलों में त्वरित न्याय की आवश्यकता है, इससे उन्हें अपनी सुरक्षा को लेकर भरोसा बढ़ेगा। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जिला न्यायपालिका के राष्ट्रीय सम्मेलन में दिए संबोधन में यह यात कही। प्रधान न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की उपस्थिति में प्रधानमंत्री मोदी ने न्यायपालिका को संविधान का संरक्षक बताया। महिलाओं के खिलाफ अत्याचार और बच्चों की सुरक्षा के ज्वलंत मुद्दे का जिक्र करते हुए इसे गंभीर चिंता का विषय कहा। उन्होंने कहा कि महिलाओं के खिलाफ अत्याचार के मामलों में जितनी तेजी से फैसला सुनाया जाएगा, आधी आबादी को अपनी सुरक्षा के बारे में उतना ही भरोसा होगा। दरअसल, महिला अपराधों में पिछले काफी समय से जिस तरह से जोरदार हजाफा हुआ है, उससे कानून लागू करवाने वाली तमाम एजेंसियों के साथ ही समाजशास्त्री तक चिंता में पड़ गए हैं। बेशक, जिला न्यायाधीश, जिला मजिस्ट्रेट और पुलिस अधीक्षक वाली जिला निगरानी समितियां इस प्रकार के अपराधों से पार पाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। हालांकि न्यायमूर्ति संजीव खन्ना ने कहा कि जिला स्तर पर न्यायपालिका लंबित मामलों की समस्या से जूझ रही है, हन चुनौतियों को कम करने के लिए जिला न्यायपालिका का कुशल कामकाज महत्त्वपूर्ण है। कोलकाता की डॉक्टर का रेप और हत्या तथा ठाणे के स्कूल में हुए दो बच्चियों के यौन शोषण की पृष्ठभूमि में प्रधानमंत्री मोदी की यह टिप्पणी आई है। जैसा कि न्यायमूर्ति खन्ना ने पीएम मोदी के सामने ही कहा कि न्यायालयों में ढेरों मामले लंबित हैं। जाहिर है कि न्यायाधीशों की कमी की बात समय-समय पर प्रधान न्यायाधीशों द्वारा उठायी जाती रहती है। संसाधनों की कमी के चलते मामलों का निपटारा समय पर होने में रुकावटें आती रहती हैं। महिलाओं में असुरक्षा की भावना तेजी से बढ़ती जा रही है जो देश और समाज के विकास में बाधक हो सकती है। सवाल सिर्फ त्वरित न्याय का नहीं है। असल सवाल है, महिलाओं के खिलाफ बढ़ते जा रहे अपराधों को रोक पाने में अक्षम सावित होती व्यवस्था का। चूंकि महिलाओं की सुरक्षा के प्रति स्वयं प्रधानमंत्री अव खुलकर बोल रहे हैं इसलिए यह उम्मीद करना गलत नहीं है कि आने वाले समय में महिलाओं के खिलाफ हो रहे अपराधों में कमी आ सकती है। सख्ती जब भी ऊपर से शुरू होती है तो नतीजे बेहतर आते हैं। खासकर जिन मामलों में आरोप सिद्ध हो जाते हैं, उनके निपटारे में देरी उचित नहीं कही जा सकती।
Date: 02-09-24
सात शानदार तरीकों से हम पर असर डालेगी एआईजसप्रीत बिंद्रा ( तकनीक विशेषज्ञ )
अब तक के इतिहास में कुछ तकनीकों ने इंसान को दूसरों की तुलना में कहीं अधिक प्रभावित किया है। यकीनन, आग को वश में करना वह पहली तकनीक थी, जिसके बाद कृषि, छपाई, बिजली, कंप्यूटिंग, इंटरनेट आदि का विकास संभव हो सका। इन तकनीकों को ‘जीपीटी’ भी कह सकते हैं, ‘चैटजीपीटी’ नहीं, बल्कि ‘जेनरल पर्पस टेक्नोलॉजी’, यानी सामान्य प्रयोजन की तकनीकें। मैं कृत्रिम बुद्धिमता, यानी एआई को भी इसी श्रेणी में रखता हूं, जो न सिर्फ कारोबार व अर्थव्यवस्था को प्रभावित करने, बल्कि समाज, भू-राजनीति और मानवता को भी नया रूप देने में सक्षम है। मैं यहां उन सात तरीकों की चर्चा कर रहा हूं, जिनसे एआई जीवन को नया रूप देगी। एक, एआई नया यूआई है। माइक्रोसॉफ्ट के संस्थापक बिल गेट्स ने यह पूछने पर कि हम मशीनों की ताकत का किस तरह उपयोग कर सकते हैं, यह बताया था कि कैसे कंप्यूटर के यूजर इंटरफेस (यूआई) में अनवरत हो रहा बदलाव इंसानों की उत्पादकता बढ़ाता रहा है। खासकर जेनरेटिव एआई के आने के बाद से हमारी आवाज ही नई यूआई बन जाएगी और हम मशीनों के साथ उसी तरह समन्वय बिठाकर काम कर सकेंगे, जैसे किसी अपने सहकर्मी के साथ करते हैं। दूसरा, अब नए प्लेटफॉर्म एजेंट होंगे। गेट्स ने बताया कि कैसे बेकार एप की जगह अब वे एजेंट ले लेंगे, जो हमारी ओर से काम करने में सक्षम होंगे। जैसे, आज हम किसी यात्रा की प्लानिंग करते हैं, तो हमें कई एप या वेबसाइटें खंगालनी पड़ती हैं। आने वाले दिनों में एजेंट ही हमारी पसंद व प्राथमिकताएं देखकर यात्रा-कार्यक्रम बना देंगे और हमारी ओर से टिकट, होटल वगैरह भी बुक कर देंगे। चैटजीपीटी के जीपीटी स्टोर जैसे प्रोटो-एजेंट हमें दिखने भी लगे हैं। तीसरा, ‘सॉफ्टवेयर एज ए सर्विस’ की जगह ‘सर्विस एज ए सॉफ्टवेयर’ होगा। मसलन, अभी क्विकबुक्स जैसी सॉफ्टवेयर एज ए सर्विस कंपनी कर सेवाओं के लिए अपने टूल बेचती है, पर वांछित नतीजे के लिए ग्राहक ही जिम्मेदार होता है, जबकि सर्विस एज ए सॉफ्टवेयर में वांछित परिणाम देने की जिम्मेदारी कंपनी की होगी, यानी आपको एक एआई अकाउंटेंट मिलेगा, जो आपकी जगह पर आपका टैक्स-रिटर्न भर देगा। चौथा, अंग्रेजी कोडिंग की नई भाषा है। गार्टनर के मुताबिक, एआई सिर्फ तकनीक नहीं, बल्कि कहीं ऊंची चीज है, क्योंकि यह इंसानों व मशीनों के बीच बातचीत के तरीके में बड़ा बदलाव लाती है। जेनरेटिव एआई द्वारा हम कंप्यूटर को अपनी भाषा में निर्देश दे सकते हैं, चाहे वह अंग्रेजी हो, हिंदी हो या अन्य कोई भाषा, यानी हमें मशीनों की भाषा सीखने की जरूरत नहीं, बल्कि मशीनों को हमारी भाषा समझने की जरूरत है। इससे उत्पादकता में बड़ी क्रांति आ सकती है, क्योंकि तब कोडिंग आम लोग भी कर सकते हैं।पांचवां, नया एआई फोन साकार हो सकेगा। बेशक एआई वाले उपकरण पहले से बाजार में उपलब्ध हैं, पर मेरा मानना है कि एआई फोन आज के आईफोन से काफी अलग होगा। इसे स्पर्श के बजाय बोलकर कमांड दिया जा सकेगा। एप की जगह एजेंट ले लेंगे और एंड्रॉयड ऑपरेटिंग सिस्टम के बजाय हम इंसानी भाषा समझने वाले सिस्टम देखेंगे। छठा, अब मुख्य मानव संसाधन अधिकारी (सीएचआरओ) नए मुख्य सूचना अधिकारी (सीआईओ) बन जाएंगे। चूंकि जेनरेटिव एआई एक लोकतांत्रिक तकनीक है, इसलिए यदि हर कर्मचारी इसका इस्तेमाल करने लगे, तो व्यवसाय को काफी लाभ मिलेगा। जाहिर है, कर्मचारियों में एआई की समझ बढ़ाने की संस्कृति नेतृत्व को ही विकसित करनी होगी। सातवां, एआई से इंसान की एक नई प्रजाति विकसित होगी। इजरायली लेखक युवाल नोआ हरारी की मानों, तो होमो सेपियन्स, यानी आधुनिक मानव एआई और जैव-प्रौद्योगिकी के बूते महामानव बन सकता है। इस प्रजाति को वह ‘होमो डेस’ कहते हैं। यहां ‘डेस’ का अर्थ है ईश्वर। हालांकि, इसे अतिरंजित बयान कहा जा सकता है, पर एलन मस्क जैसे लोग इस विचार के कायल हैं। साफ है, आगामी दिनों में एआई, जेनरेटिव एआई सामान्य प्रयोजन वाली तकनीकें बन जाएंगी, जो इंसानों व पृथ्वी के भविष्य को नया आकार दे सकेंगी। इसीलिए, हमें एआई-दक्ष बनने की दिशा में फौरन जुट चाहिए।
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‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 5 अगस्त, 2024
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Date: 31-08-24
आर्थिक विषमताएं दूर करने की भी कोशिशें होंसंपादकीय
हाल ही सामने आई दो रिपोर्ट देश की विरोधाभासी छवि देती हैं। हुरून इंडिया रिच लिस्ट के अनुसार पिछले एक साल में एक अरब डॉलर ( 8,355 करोड़ रुपए) से ऊपर की संपत्ति वाले रईसों में हर पांच दिन में एक नाम और जुड़ गया। इनकी कुल संपत्ति सऊदी अरब, स्विट्जरलैंड की कुल संयुक्त जीडीपी, या अकेले भारत की जीडीपी की आधी यानी 159 लाख करोड़ रुपए है । अब तस्वीर का दूसरा पहलू देखें। थिंक टैंक ‘प्राइस’ का अध्ययन बताता है कि देश की तीन-चौथाई आबादी के घरों के मुखिया की आय 830 रु. से कम है। एक ताजा लेख में वित्त आयोग के अध्यक्ष ने माना कि 75 साल के विकास के बाद भी देश के 85% कामगार या तो कृषि या 10 से कम वर्कर्स वाले उद्यम में लगे हैं। और चूंकि हुनर के अभाव में उनका आउटपुट बहुत कम है, लिहाजा आय भी कम है। उनके अनुसार व्यापारी, नीति-निर्धारक अफसरशाही, सारा का सारा सिस्टम बगैर कुछ सोचे, सहज व स्वाभाविक रूप से हाई-टेक और भारी पूंजी वाले उद्यमों के प्रति आकर्षित हो रहे हैं। जहां एक ओर हुरून रिपोर्ट चीन में अरबपतियों की घटती संख्या के आधार पर बताती है कि एशिया में भारत पूंजी निर्माण का इंजन बन गया है, वहीं ‘प्राइस’ की रिपोर्ट बताती है कि अमीर-गरीब की खाई बढ़ रही है। देश में मौजूद आर्थिक विषमताएं दूर करने की भी कोशिशें होनी चाहिए।
Date: 31-08-24
हर मामले में गिरफ्तारी जरूरी नहीं है, जमानत पर जोर दें अर्घ्य सेनगुप्ता जय ओझा, ( अर्घ्य सेनगुप्ता जय ओझा विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी के संस्थापक और रिसर्च फेलो )
सर्वोच्च न्यायालय ने जमानत एवं व्यक्तिगत स्वतंत्रता के महत्व पर जोर दिया है। जमानत-सम्बंधित कानूनों पर ताजा चर्चा एक नेता के अभियोजन के संदर्भ में उठी है। दिल्ली सरकार के पूर्व मंत्री मनीष सिसोदिया को जमानत देते समय सर्वोच्च न्यायालय की खंडपीठ ने जमानत पर शीघ्र ट्रायल के मौलिक अधिकार पर बल दिया।
पीठ ने जांच में देरी के लिए ईडी एवं सीबीआई की कठोर शब्दों में निंदा की। 17 महीनों की कैद के बाद सिसोदिया रिहा हुए। तीन सप्ताह बाद उनकी सह-आरोपी भारत राष्ट्र समिति की सांसद के कविता को भी जमानत दे दी गई। लेकिन दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और कई अन्य आरोपी अभी भी जेल में बंद हैं।
कहते हैं कि गठबंधन सरकार के दौरान न्यायपालिका अधिक सक्रिय होती है। तो अब यह पूछने का समय है कि आने वर्षों में जमानत-सम्बंधित कानून में क्या बदलाव आएगा। इस संदर्भ में विशेष रूप से तीन क्षेत्र रुचि के होंगे : मनी लॉन्ड्रिंग निवारण अधिनियम, 2002 (पीएमएलए) जैसे ‘विशेष कानूनों’ के तहत जमानत; सामान्य प्रतिवादियों की जमानत पर लगाई जाने वाली शर्तों का विनियमन; और कानून में स्थिरता लाने के लिए संभावित संसदीय कदम।
पीएमएलए और गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) अधिनियम, 1967 जैसे विशेष कानूनों में ऐसे प्रावधान हैं, जिनसे जमानत मिलना बहुत मुश्किल हो जाता है। सिसोदिया के मामले में पीएमएलए की धारा 45 पर विवाद था, जो जमानत आवेदनों का ट्विन टेस्ट अनिवार्य बनाती है : 1. जमानत देने के लिए न्यायाधीश को संतुष्ट होना चाहिए कि आरोपी जमानत पर बाहर रहते हुए कोई अपराध नहीं करेगा और 2. यह मानने के युक्तियुक्त आधार हैं कि वह दोषी नहीं है।
सिसोदिया के मामले में, न्यायमूर्ति गवई ने स्पष्ट किया कि इस धारा की व्याख्या इस तरह से न हो कि ‘जमानत नियम है और जेल अपवाद’ की जानी-पहचानी कहावत को नकार दिया जाए। इस कदम के बावजूद, पीएमएलए की धारा 45 या यूएपीए की धारा 43 डी(5) जैसे कठोर प्रावधानों के तहत स्वतंत्रता की समर्थक न्यायिक मंशा को बनाए रखना मुश्किल है।
सर्वोच्च न्यायालय ने धारा 45 को विजय मदनलाल चौधरी के मामले में 2022 में संवैधानिक घोषित कर दिया था। न्यायपालिका का जमानत के प्रति हृदय-परिवर्तन कितना सच्चा है, यह इस फैसले पर पुनर्विचार की कसौटी पर कसेगा।
मनीष सिसोदिया के मामले में न्यायालय के आदेश के बाद गिरीश गांधी बनाम गुजरात राज्य के मामले में एक और आदेश आया, जिसमें न्यायमूर्ति गवई और विश्वनाथन ने ट्रायल कोर्ट के आदेश को पलट दिया। उसमें जमानत देने के लिए कठोर शर्तें रखी गई थीं, खास तौर पर स्थानीय जमानतदारों की आवश्यकता के संबंध में। न्यायमूर्तियों ने कहा कि अत्यधिक कठोर शर्तों के तहत जमानत देना जमानत न देने के ही समान है।
यदि न्यायमूर्ति के शब्दों का पालन किया जाए तो हम शेख अयूब जैसे मामलों को दोहराने से बच सकते हैं। शेख अयूब को ढाई लाख रुपए के गबन के मामले में गिरफ्तार किया गया था। सत्र न्यायालय ने जमानत शर्त भी ढाई लाख रुपयों की रखी और 50000 रुपए का प्रतिभूति बंधपत्र भी मांगा, यानी जितने के गबन का आरोप था, उससे अधिक पैसे जमानत मिलने में लग जाते। हालांकि इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने इन शर्तों को रद्द कर दिया था। लेकिन ऐसे अनेक मामले भारत के सत्र न्यायालयों में देखे जाते हैं।
पिछले महीने सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों के बावजूद, भारत में जमानत की स्थिति को अनुच्छेद 21 की व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार की गारंटी के उच्च आदर्शों के साथ जोड़ना कठिन होगा। इस अधिकार को बार-बार संकुचित किया गया है।
न्यायपालिका ने अब रास्ता सुझाया है। कार्यपालिका में सांस्कृतिक बदलाव की आवश्यकता है। जैसा कि सर्वोच्च न्यायालय ने तीन दशक पहले जोगिंदर कुमार बनाम उत्तर प्रदेश राज्य मामले में बताया था कि गिरफ्तारी की शक्ति केवल पुलिस को जांच में सहायता देने के लिए है। हर मामले में गिरफ्तारी का इस्तेमाल जरूरी नहीं।
विधायिका को सतेंद्र अंतिल बनाम सीबीआई के मामले में न्यायालय के आह्वान को स्वीकार कर व्यापक जमानत कानून तैयार करना चाहिए। जमानत पर बहस अमूमन हाई-प्रोफाइल मामलों से प्रेरित होती है। फिर भी कानून के इस क्षेत्र को स्पष्ट करने के इस अवसर को गंवाना नहीं चाहिए। राजनीति के अपराधीकरण का समाधान फौजदारी कानून का राजनीतिकरण नहीं हो सकता।
अपराधियों को दोषी ठहराना चाहिए और उन्हें सजा भी काटनी चाहिए, लेकिन आरोपी को प्रक्रिया से प्रताड़ित करने का कोई अर्थ नहीं। जमानत-सम्बंधित कानून में सुधारों को आपराधिक प्रक्रिया में सुधार की शुरुआत माना जाना चाहिए।
Date: 31-08-24
नए अध्याय की ओर भारतीय कूटनीतिशिवकांत शर्मा, ( लेखक बीबीसी हिंदी के पूर्व संपादक हैं )
अपनी बहुचर्चित यूक्रेन यात्रा के दौरान राष्ट्रपति जेलेंस्की के साथ वार्ता में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था, ‘हम तटस्थ नहीं हैं। हमने शुरू से ही एक पक्ष चुना है और वह पक्ष शांति का है।’ भारत के किसी भी प्रधानमंत्री की यह पहली यूक्रेन यात्रा थी। वह डेढ़ महीने पहले रूस की यात्रा पर भी गए थे।
तब उन्होंने राष्ट्रपति पुतिन से कहा था कि युद्ध का समाधान जंग के मैदान में नहीं मिलता, परंतु जिस दिन वह राष्ट्रपति पुतिन से गले मिल रहे थे, उसी दिन रूसी सेना ने यूक्रेन में बच्चों के एक अस्पताल पर हमला कर दिया था, जिसमें बच्चों समेत कम से कम 38 लोग मारे गए थे।
हालांकि प्रधानमंत्री ने उस घटना को असहनीय बताते हुए उसकी निंदा की, फिर भी वह अमेरिका और उसके पश्चिमी खेमे के नेताओं को अपनी रूस यात्रा और हमले के दिन पुतिन से गले मिलने की निंदा करने से रोक नहीं पाए। जेलेंस्की ने भी उसे घोर निराशाजनक और शांति प्रयासों के लिए गहरा आघात बताया था।
प्रधानमंत्री मोदी की रूस यात्रा के समय ही अमेरिका वाशिंगटन में नाटो गठबंधन की शिखर बैठक की मेजबानी कर रहा था, जिसका मुख्य विषय स्वाभाविक रूप से यूक्रेन का संकट था। जब वह यूक्रेन की यात्रा पर गए, उस समय यूक्रेन की सेनाएं रूस के कुर्स्क प्रदेश की जमीन पर कब्जा करते हुए आगे बढ़ रही थीं।
इसलिए चीन और भारत के कुछ आलोचकों का मानना है कि मोदी को ये दोनों यात्राएं रूस और अमेरिका, दोनों को खुश रखने के दबाव में करनी पड़ीं। वह पिछले दो साल से रूस और भारत के बीच होने वाली द्विपक्षीय वार्षिक शिखर बैठकों को टालते आ रहे थे और 2022 की शंघाई सहयोग संगठन शिखर बैठक में भी नहीं गए।
यूक्रेन युद्ध और पश्चिमी आर्थिक प्रतिबंधों के मोर्चे पर स्पष्ट समर्थन देने और बढ़ती आर्थिक व्यापारिक निर्भरता के कारण पुतिन और शी चिनफिंग के रिश्ते और गहरे होते जा रहे। ऐसे में पुतिन को भारत की दोस्ती के बारे में आश्वस्त करना जरूरी हो चला था। दूसरी तरफ, अमेरिका और उसके खेमे के देश रूस के हमले की सीधी निंदा से बचने और रूस से तेल खरीदकर पश्चिमी आर्थिक प्रतिबंधों को निष्प्रभावी करने से नाखुश थे।
उन्हें आश्वस्त करना भी जरूरी था, परंतु जेलेंस्की के हालिया बयानों से स्पष्ट होता है कि यूक्रेन युद्ध को लेकर भारत की नीतियों पर सार्वजनिक रूप से अप्रसन्नता जाहिर करने के बावजूद वह चाहते हैं कि भारत सुलह-शांति कराने में पहल करे। वह भारत से शांति पहल की अपील कई बार कर चुके हैं।
यूक्रेन की संसदीय विदेश समिति के अध्यक्ष एलेग्जांडर मेरेज्को मानते हैं कि भारतीय प्रधानमंत्री की यात्रा को यूक्रेन की कूटनीतिक जीत के रूप में देखा जा सकता है। मोदी की यात्रा को लेकर यूक्रेन की इस खुशी का सबसे बड़ा कारण शायद यही है कि भारत यूक्रेन संकट के आरंभ से ही युद्ध का विरोधी और कूटनीति का पक्षधर रहा है।
उसके अमेरिका और रूस, दोनों से घनिष्ठ संबंध हैं। वह दक्षिणी देशों की आवाज उठाता रहा है, परंतु चीन की तरह रूस के साथ खड़ा नहीं दिखा। इसीलिए यूक्रेन ने पिछले साल शी चिनफिंग के पहले और उसके बाद ब्राजील के साथ मिलकर रखे दूसरे शांति प्रस्ताव को ठुकरा दिया था।
भारत ने शुरू से ही युद्ध की निंदा करते हुए दोनों पक्षों से संयुक्त राष्ट्र चार्टर के सिद्धांतों और क्षेत्रीय अखंडता का आदर करने और कूटनीति के द्वारा समाधान खोजने का आग्रह किया है। अपनी यूरोप यात्रा के दौरान चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग सर्बिया और हंगरी तक जाकर लौट गए। वह यूक्रेन नहीं गए। इसीलिए प्रधानमंत्री मोदी की यूक्रेन यात्रा का चहुंओर स्वागत हुआ।
उन्होंने राष्ट्रपति बाइडन और पुतिन को अपनी यात्रा के दौरान हुई वार्ताओं की जानकारी भी दी। फोन पर हुई बातचीत में राष्ट्रपति बाइडन ने प्रधानमंत्री के शांति संदेश और मानवीय राहत की सराहना की। इसके अगले दिन फोन पर राष्ट्रपति पुतिन के साथ हुई बातचीत के दौरान प्रधानमंत्री ने दोहराया कि भारत इस संकट के त्वरित, बाध्यकारी और शांतिपूर्ण समाधान के लिए पूरी तरह कटिबद्ध है।
वह सितंबर 2022 में भी साफ शब्दों में कह चुके थे कि यह जमाना युद्ध का नहीं है। रूस विश्लेषक ओलेग इग्नातोफ का कहना है कि प्रधानमंत्री मोदी की यूक्रेन यात्रा को रूस में भी सकारात्मकता से देखा जा रहा है। उनका कहना है कि भारत की भूमिका रचनात्मक होगी तो रूस भी उसका स्वागत करेगा।
हालांकि रूसी कुर्स्क प्रदेश पर यूक्रेन के हमले के बाद से रूसी विदेश मंत्री लावरोव बातचीत की संभावना को खारिज करते आ रहे हैं, परंतु राष्ट्रपति जेलेंस्की ने कहा है कि वह दूसरा शांति शिखर सम्मेलन भारत की मेजबानी में कराए जाने का समर्थन करेंगे।
पहला शांति शिखर सम्मेलन स्विट्जरलैंड में हुआ था, जिसमें रूस को नहीं बुलाया गया था और चीन भी रूस की अनुपस्थिति की वजह से शामिल नहीं हुआ। भारत ने भाग लिया था, परंतु उसने रूस की अनुपस्थिति के चलते सम्मेलन की विज्ञप्ति को एकतरफा बताकर उस पर हस्ताक्षर नहीं किए थे।
इसी को रेखांकित करते हुए चीनी सरकार के मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स ने लिखा कि पहले शांति शिखर पर हस्ताक्षर न करने वाले देश को दूसरे शिखर सम्मेलन की मेजबानी नहीं करने दी जाएगी। समस्या यह है कि अमेरिका, उसके खेमे के देशों और चीन के साथ-साथ स्विट्जरलैंड और आस्ट्रिया जैसे गुटनिरपेक्ष देशों की निष्पक्षता पर भी प्रश्नचिह्न लग गया है।
ऐसे में केवल भारत ही बचता है, जिस पर दोनों पक्ष भरोसा कर सकते हैं। इसलिए यदि वह रूस और यूक्रेन, दोनों को शांति वार्ता की मेज पर लाने में सफल हो जाता है तो संभवतः ऐसी शर्तों को आड़े नहीं आने दिया जाएगा। अपनी निष्पक्षता कायम रखने के लिए भारत ने यह स्पष्ट किया है कि समझौते का फॉर्मूला यूक्रेन और रूस को स्वयं तय करना होगा।
भारत केवल माध्यम बनेगा, मध्यस्थ नहीं। जो भी हो, यदि भारत की मेजबानी में शांति सम्मेलन कराने की बात आगे बढ़ती है तो भारत की कूटनीति में एक नया अध्याय जुड़ेगा, क्योंकि अभी तक भारत बड़े गुटों के संघर्ष में तटस्थ रहने की नीति पर ही चला है, शांति बहाल कराने की सक्रिय नीति पर नहीं।
Date: 31-08-24
समावेशी पहलसंपादकीय
कई बार साधारण-सी दिखने वाली कोई पहल आगे चलकर दूरगामी महत्त्व की साबित होती है। दस वर्ष पहले जब जन धन खाता योजना की शुरुआत हुई, तो इसे लेकर कई तरह की आशंकाएं जताई गई थीं। मसलन, अगर साधारण लोग बैंक में खाता खोल रहे हैं तो खाता चालू रखने की शर्तों को कैसे और कितने दिन तक पूरा कर पाएंगे और इससे आम लोगों के साथ- साथ देश को क्या लाभ होगा ! अब यह कहा जा सकता है कि जन धन खाता योजना में महत्त्वपूर्ण कामयाबी मिली है और एक बड़ा तबका इससे लाभान्वित हुआ है । इसके अलावा, इसने देश की अर्थव्यवस्था में काफी अहम योगदान दिया है। शायद यही वजह है कि जिस समय दुनिया भर में आर्थिक उतार-चढ़ाव और उथल- पुथल है, कई देशों में मंदी का माहौल है, उस समय भारत में केवल जन धन खातों में ढाई लाख करोड़ रुपए से ज्यादा की राशि जमा है।
गौरतलब है कि जन धन खाता योजना शुरू होने के बाद समाज का एक बड़ा वंचित और गरीब तबका बैंकिंग क्षेत्र के दायरे आया। इस तबके के लोगों का खाता अगर किसी बैंक या डाकघर में किसी तरह खुल भी जाता था, तो उसे बनाए रखना उनके लिए मुश्किल था। इसके मद्देनजर जन धन खाता योजना में यह सुविधा दी गई कि खाते में न्यूनतम राशि अगर नहीं है, तब भी खाता कायम रहेगा। साथ ही, जमा राशि पर ब्याज मिलने के अलावा एक अहम पहलू दुर्घटना बीमा के तहत अब दो लाख रुपए तक की सुरक्षा राशि दिया जाना है। इस योजना के खाताधारकों को विभिन्न सरकारी कल्याण योजनाओं के तहत मिली राशि सीधे हस्तांतरित करने में मदद मिलती है। आज ग्रामीण लोगों और खासकर महिलाओं के आर्थिक सशक्तीकरण में इस योजना ने बड़ी भूमिका निभाई है, जो राष्ट्रीय स्तर पर समावेशी वित्तीय विकास का एक ठोस आधार बना है । यह देखने की बात होगी कि देश के विकास में गरीब तबकों के समावेशन के जिस मकसद से इस योजना की नींव रखी गई थी, वह आने वाले वक्त में किस हद तक वास्तव में जमीन पर उतरती है।
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परिचय – C-40 विश्व के 96 देशों का एक संगठन है, जो शहरों का जलवायु के संबंध में नेतृत्व करता है। इसके सर्वेक्षण के अनुसार इस समय दुनिया के 350 से ज्यादा देश अत्यधिक गर्मी से प्रभावित हैं। सन् 2050 तक इनकी संख्या बढ़कर 970 हो जाएगी।
बचाव के उपाय –
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31 August 2024
प्रश्न – 476 –“कौशल विकास के अभाव में रोजगार के अवसर प्रायः अर्थहीन हो जाते हैं।” वर्तमान स्थितियों के संदर्भ में उपर्युक्त कथन का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिये। (200 शब्द)
Question – 476 – “In the absence of skill development, employment opportunities often become meaningless.” Critically examine the above statement in the context of current situations. (200 words)
नोट : इसका उत्तर आपको हमें नहीं भेजना है, यह आपके स्वयं के अभ्यास के लिए है।
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Date: 30-08-24
History LessonGOI’s industrial cities plan will face challenges that other mega projects failed to overcomeTOI Editorials
The Cabinet’s decision to approve 12 new industrial cities with an investment of Rs 28,602cr is impressive in intent. Spread across 10 states, the projects aim to boost domestic manufacturing by building greenfield cities, embodying ‘plug-n-play’ and ‘walk-to-work’ concepts. A million direct jobs and three million indirect jobs would be created through the initiative which is to fructify by 2027, govt has claimed. A follow-up to a budgetary announcement, the 12 cities would add to eight such cities that are already under different stages of implementation. That some success has been achieved in investment terms at four industrial cities that are in place is cause for optimism here. For instance, Tatas announced a mega investment of Rs 91,000 cr for a semiconductor fab unit at Dholera earlier this year. Reports say Hyundai has agreed to set up an automobile hub at Zaheerabad in Telangana, one of the cities greenlighted on Wednesday.
Track record uninspiring: But the larger govt agenda of boosting manufacturing has left a lot to be desired. Make in India, launched in 2014 with fanfare, was meant to increase manufacturing’s share of GDP to 25% by 2025 and create 100 mn additional jobs. Those targets will not be met by next year. The earlier SEZ policy had also failed to achieve its objectives. How vigorously projects are pursued post announcements is a key factor here. There is also the larger issue of planning for the sector. For instance, we are yet to come up with a New Industrial Policy. Industrial cities work best when planned alongside larger urban development of chosen sites. This is the experience of China with SEZs at places like Shenzhen and Hainan. Several industrial cities govt wants to develop aren’t large enough – one at Prayagraj is a mere 352 acres. Success of the initiative would also hinge on coordination with states, some of which are ruled by opposition parties.
What about investment? Besides, there is the all-important issue of front-linkages for infra that is created. While govt has enumerated sectors in which it seeks investment, will companies be forthcoming? Investment by Indian companies is yet to pick up and FDI has been on a declining trend for the past two years. Creating infra is sound policy but a change in investment climate is a must if policy is to translate into results.
Date: 30-08-24
Sukhu’s Strange LawRaising women’s marriage age to 21 is a redundant & regressive move. Himachal must do a U-turnTOI Editorials
It’s a puzzle how Congress’s Sukhu govt in Himachal passed a bill raising the age of marriage of women to 21 from 18. The measure is unsound – legally, politically, socially. It does anything but serve the purpose Sukhu’s health minister declared as the bill’s intention – empowerment of women by delaying marriage. The reality is early marriage is an outcome of lack of educational and economic opportunities for teen girls.
Legally, politically untenable | GOI’s bill on the same with similar intentions, introduced in the previous LS earlier this year, thankfully lapsed. Congress roundly opposed it. Which makes it odd that Sukhu would pass almost the same law within months. Surely he’s aware Himachal’s law can be rendered void? Central law provisions, which have age 18 as the age for women to marry, overrule state statutes. If the Himachal bill becomes law, it’ll create unnecessary liabilities and court cases, a burden people, enforcers and courts can do without.
Socially unsound | Himachal isn’t among states with a high proportion of child marriages. So, why such law? Further, on what basis did policymakers conclude marrying at 21 is ‘empowering’, when none of the factors that lead to child marriages are improving? Yes, child marriage must be tackled. Girls with no education are upto 6 times more likely to marry before they turn 18. Child marriage is a symptom/ outcome/ endgame of several disabilities. Address those causes – poverty, poor access to school, nutrition and safety infra, patriarchy that denies young girls sexual choices. In her ‘safety’ lies family ‘honour’, however warped the notion, the perception remains reality. Child marriage is seen as a solution. Don’t want girls marrying before 21? Provide them options. Ah, but the cost of infra required to ensure colleges, employment, economic and physical security is borne by govt. Cost of a bad law is borne by the people. This law is dereliction of state’s duty, the sooner it’s binned, the better.
Date: 30-08-24
Push to Ramp Up ManufacturingIndustrial smart cities need states’ supportET Editorials
GoI’s plan to set up a string of smart cities along industrial corridors is the next step in a broader push for manufacturing exports and lowering logistics costs in the economy. Connectivity along these corridors has been upgraded over the previous decade, and investors can expect the new industrial cities to offer technology and sustainability solutions. GoI sees the initiative drawing in investments that can create 4 mn direct and indirect jobs, and seed clusters of investments by small enterprises. The idea is to have industry-specific hubs that can sustain themselves as global manufacturing bases. This meshes into PLIs available to select industries and the recently announced incentives to encourage hiring new job seekers.
The idea of industrialisation through dedicated urban pockets has had a long history in India. Public and private sectors have made the anchor investments. Mining, petrochemical and manufacturing hubs have mushroomed all over the country with active support from the central and state governments. The focus has shifted to drawing in investors who are evaluating India as a base for global manufacturing. GoI is also trying to improve the attractiveness of the hinterland over port access, which influences investment decisions in manufacturing exports. Any success with drawing investments to the northern states will build on the infrastructure upgrades the country has witnessed over the past decade.
Yet, just as PLI schemes have yielded a range of outcomes, industry-specific smart industrial cities can be expected to be a mixed bunch. There is also the matter of bringing states on board to deliver on the potential of these townships. State governments have a conspicuously large role to play in the ease of doing business, apart from contributing financially to the development of these clusters. The proposed 12 industrial smart cities are spread over 10 states, some of which have noticeably lagged in industrialisation.
Date: 30-08-24
Be the Space for Advocating PeaceET Editorials
Narendra Modi’s visit to Ukraine — via Austria and Poland — last week, followed by calls with Joe Biden and Vladimir Putin, has been 360° diplomacy in action. It also opens the door wider to speculation about India’s role as an honest broker, beyond what the otherwise clichéd term signifies. This was not another instalment of India’s great balancing act. What Modi provided was a clue stressing that India has always chosen a side, that of resolution. Practising a level of neutrality, committing to peace critical for its own well-being and development and that of the larger world is it’s PoA.
India’s needs and limitations make crafting a balancing role challenging. Both Russia and the US are important partners for New Delhi, a relationship that has become more complex in the elephant forever in all rooms these days: China. So far, India has explained its choices. It can do well to reiterate the facts. No country’s foreign policy comes at the cost of national interest. Nobody expects India’s engagement with the world to come at its detriment. That India shapes its engagement with the world in light of its national circumstances and interests cannot be a cross it has to bear even if it may seem to some absolutists as fence-sitting.
Like the two principals, India and much of the developing world need an end to the Russia-Ukraine war. A resolution that respects territorial integrity and sovereignty and the rulesbased order — that is what India, most developing countries, Ukraine and Russia need. Practising neutrality in a geopolitical contest, India must be the space where peace can be advocated. With the geopolitical elbow room it has created for itself, India, and Modi, can be the facilitator of disentanglements.
Date: 30-08-24
Biotech enigmaBiotechnology initiatives need long-term capital investmentsEditorial
Earlier this week the Cabinet cleared a proposal, though without specifying a budget, called BioE3 or Biotechnology for Economy, Environment and Employment. Its thrust is to boost manufacturing in the biotechnology sector. Since 1986, India has had a dedicated department for biotechnology, and which deserves substantial credit. For instance, the progress in vaccine development, diagnostics and biologicals, that has bolstered India’s reputation as a ‘vaccine factory’, is due to the initiatives of this department. However, biotechnology did not quite spawn the equivalent of the IT revolution. There is much more to an industrialised biotechnology sector beyond vaccines. There are billion-dollar conglomerates today that rest on high-value microbes, gene-modification technologies, bio-plastics, bio-materials, and high-precision medical devices. However, despite the know-how and human resource capital, only a few Indian biotechs have global resonance, as there are few local manufacturers who can supply Indian laboratories/startups with the ingredients and devices to make products. The reliance on imports means that India loses its international competitiveness. The BioE3 policy aims to correct this.
In the last four decades, India has funded biotech research institutions but now sees that it needs to be going beyond and setting up companies, in public private partnership mode, to bolster biotechnology manufacturing. There are six verticals that this initiative envisages: bio-based chemicals and enzymes; functional foods and smart proteins; precision biotherapeutics; climate-resilient agriculture; carbon capture, and futuristic marine and space research. Futurists have been saying that the era of fossil-fuel industrialisation is over and humanity will have to rely on the natural world — for food and for making consumer products. This is to solve the global problem of non-biodegradable waste and carbon emissions. Future industries must be grounded in environmentally benign products, and this is impossible without sophisticated biotechnology. By setting up bio-foundries and bio-artificial intelligence hubs, the policy hopes there will be avenues for a variety of biotechnologists to congregate. Well intentioned this may be, but India’s woes with manufacturing have chronic causes. Without establishing enabling grounds for long-term capital investment — and these have little to do with biotechnology per se — top-down initiatives will have limited impact. The BioE3 policy must be a deeply collaborative effort between Centre and States. Rather than expect quick returns, the government must provide financial and infrastructural support over the long term.
Date: 30-08-24
Should lateral entry in the civil services be encouraged?Ashok Vardhan Shetty, retired IAS officer from the Tamil Nadu cadre and former vice chancellor of the Indian Maritime University; Harsh Shrivastava, a former CEO of the Microfinance Institutions Network, was deputy speech writer to Prime Minister Atal Bihari Vajpayee and consultant in the Planning Commission
Last week, just days after issuing an advertisement for 45 lateral entry posts (10 Joint Secretary positions and 35 Director and Deputy Secretary positions), the Union Public Service Commission (UPSC) withdrew it after receiving a massive backlash. The Opposition parties accused the government of attempting to bypass reservation policies and “snatching away” jobs from Other Backward Classes (OBCs), Scheduled Castes (SCs), and Scheduled Tribes (STs). Should lateral entry in civil services be encouraged? Ashok Vardhan Shetty and Harsh Shrivastava discuss the question in a conversation moderated by Priscilla Jebaraj. Edited excerpts:
What is the need for hiring people from outside the IAS (Indian Administrative Service)?
Ashok Vardhan Shetty: We definitely need expertise. Nobody objects to hiring experts as advisors or as consultants. What is objectionable is hiring people as Deputy Secretaries, Directors, and Joint Secretaries because these are administrative posts, they are secretarial posts; an expert is not suited for these kinds of posts. The combined civil services exam is one of the toughest. Last year, out of 13 lakh applicants, only 1,016 were selected, of which about 180 were selected for the IAS. People go through this tough exam and then put in nine years of service to become a Deputy Secretary in the Central Secretariat, they put in 12 years to become a Director, and at least 16 years to become a Joint Secretary. Lateral entrants, on the other hand, will walk in on the basis of a resume and a half-an-hour interview.
Harsh Shrivastava: The advertised posts for about disaster management, semiconductors, FinTech, investment, emerging tech… they are very specialised posts. Regular officers may not have this expertise. I would like to differentiate between implementation and policymaking. These officers who are being hired as lateral entrants are for policymaking; that is where their expertise is needed. For implementation, which is typically in the State and not in the Union government, you would need IAS officers who are generalists.
Ashok Vardhan Shetty: It is not true that policymaking is separate from implementation; they are intimately connected. You cannot make good policy unless you also have experience of implementation. When policymaking is divorced from implementation, you end up making airy-fairy policies, which will flop.
You must also look at what happened in Pakistan. In 1972, Zulfikar Ali Bhutto set up an administrative reforms commission which said the same things — that the civil services of Pakistan is full of generalists, and what we need is specialisation. So, Bhutto said, lateral entry is necessary. And he started appointing party people, party loyalists, in posts from Deputy Secretary to Secretary. After he fell from power, General Zia Haq dismissed Bhutto’s appointees. But he started inducting military people through lateral entry into the Pakistan civil service. Today, the Pakistan civil service is a mess.
Lateral entry, by whatever name it is called, is just a euphemism for the spoils system. That is, political parties trying to favour their partypersons under the guise of bringing in specialists. I don’t mind if these people appear for a tough written test on their domain of expertise and then go through a rigorous interview. But selecting them purely on the basis of their resume and conducting an interview is very dangerous. Even if it is done properly in the initial few years, in the long run, it is bound to degenerate into a spoils system. Political loyalties, cronyism, nepotism, and corruption will creep in.
What would you suggest to prevent such a crony system from taking root?
Harsh Shrivastava: This argument can be extended to anything. What is to stop the UPSC, when it conducts interviews of IAS aspirants, from looking at their ideological leanings and leaving out people who are not ideologically aligned?
Also, nowadays, we know everything about everybody. We have LinkedIn profiles, social media feeds. If the UPSC took somebody who had nothing to do with semiconductors as the Joint Secretary for semiconductors, I’m sure questions will be asked, PILs will be filed, and the Supreme Court will hold the UPSC chairperson in contempt.
Ashok Vardhan Shetty: An interview alone is insufficient to test expertise. The recent case of Puja Khedkar is an example of why the interview can be misleading. She scored more marks in the interview than most IAS toppers. The UPSC interview board could not spot that she was faking her identity. So, an interview alone is not a reliable guide of expertise of a person’s attitude and personality.
At what ranks do you think it would be most suitable to bring in people from outside?
Ashok Vardhan Shetty: Either you select people at the entry level through a tough competitive exam or you should bring in lateral entrants at the Secretary level. At the highest level, if you bring in somebody like a Manmohan Singh or a V. Krishnamurty or a M.S. Swaminathan, there is no problem because their expertise is beyond doubt. But at the mid-level, the expertise of the person is open to question. I’m not ruling out the possibility of someone like a Bill Gates or a Mark Zuckerberg doing wonderful things in their 20s and 30s, but those are not the kinds of people who are going to apply for the posts of Director, Deputy Secretary, and Joint Secretary in government.
Harsh Shrivastava: I would say at the Joint Secretary level because they have experience and can be of help in policymaking. The point of being an officer and not a consultant is that you have the authority of getting something done and you can direct people beneath you and you are responsible to the people above you. Somebody who has worked in a top company, assuming they want to take a salary cut and join the government, would bring a certain style of working, of conducting meetings, of not just going through endless rounds of papers and not taking a decision. They will get things done and make out-of-box suggestions. We should learn from some companies about how they take on board outsiders as seniors.
The reason the policy was actually rolled back was the Opposition’s accusation that the government was bypassing reservations for lateral entry hires. Is the Opposition right?
Harsh Shrivastava: No. First, the government did not say, ‘We were hiring 500 officers every year and now we will hire only 455 officers under the existing reservations and will take 45 directly.’ These are additional officers. Second, the government could have said that at least in one third of these seats, preference will be given to women or SCs and STs. But these are additions. They are not going to take away existing jobs.
Ashok Vardhan Shetty: I beg to differ. These are not additional posts. These posts are carved out of the existing posts of Joint Secretary, Director, and Deputy Secretary. They are affecting the promotion prospects of existing career bureaucrats. In fact, during the UPA (United Progressive Alliance)-2 government, there was a recommendation that 10% of the total posts be earmarked for lateral entry. Of course, it was never acted upon.
Regarding reservations, there are already standard norms saying there is 15% reservation for SCs, 7.5% for STs, 27% for OBCs, and 10% for EWS (economically weaker sections), among other classes. The Department of Personnel and Training’s own instructions are that reservations must apply for any post, even if it is a contractual post, if it is of more than 45 days duration. These posts are three years to five years. So, reservations should have applied to them.
But there is another provision which says if it is a standalone post, or what they call a single-post cadre, reservations need not apply. This applies to situations where there is one post of Vice Chancellor or one MD of a public sector undertaking. The UPSC has treated each of these Joint Secretary, Director, and Deputy Secretary posts as subject-specific, and through this narrow definition, it has converted non-standalone posts into standalone posts and then called them as single-post cadres and not applied reservation.
The government at the highest level has realised that there is a problem here. So, the Minister for Personnel, Jitendra Singh, wrote to the UPSC saying the government would like to re-examine this matter, which I think was the right thing to do. Otherwise, theoretically, each post’s job description is unique, so you can always argue that every post is a stand-alone post and reservations won’t apply.
Date: 30-08-24
जमानत के मामले में स्थिति स्पष्ट हुई है?संपादकीय
पीएमएलए मामलों में विपक्षी नेताओं की जमानत पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने इन फैसलों का एक ही मूल आधार बताया है- कोई भी कानून संविधान प्रदत्त स्वतंत्रता के ऊपर नहीं हो सकता । इन फैसलों में भी ट्रायल और हाई कोर्ट्स को ताकीद की गई है कि वे संविधान से ही मिले ‘जमानत नियम है, जेल अपवाद’ सिद्धांत का पालन करें। सुप्रीम कोर्ट की लगातार दी गई इस ताकीद से जमानत को लेकर एक इकोसिस्टम बन गया है, जिसे अब शायद निचली अदालतें भी नकार नहीं पाएंगी और तब यह दूसरे सख्त कानून यूएपीए में भी जमानत के लिए समान रूप से लागू होगा। पीएमएलए की धारा 45 ( 1 ) को भी प्रभावहीन करते हुए कोर्ट ने जांच संस्था को कहा कि जमानत का विरोध करने के लिए उसे साबित करना होगा कि प्रथम दृष्टया अभियुक्त का दोष बनता है। कोर्ट ने कहा कि जो अपना अपराध कबूल कर चुका है और जेल में है उसका भरोसा नहीं किया जा सकता, ना ही उसके बयान को ‘स्वतंत्र मन’ से दिया गया बयान माना जा सकता है। यह कानून अपराध न्यायशास्त्र के मूल सिद्धांत के उलट अपने को दोष मुक्त सिद्ध करने की जिम्मेदारी सेक्शन 24 के तहत आरोपी पर डालता है। कोर्ट ने जमानत के स्तर पर इसे अभियोजन की जिम्मेदारी बता कर इस कानून की खामियों को दुरुस्त किया है।
Date: 30-08-24
रेवड़ी संस्कृति का नतीजासंपादकीय
लोकलुभावन वादों के साथ हिमाचल प्रदेश की सत्ता में आई कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री सुखविंदर सिंह सुक्खू ने दो माह तक वेतन न लेने की जो घोषणा की, उससे यह तो पता चल रहा है कि राज्य की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं, लेकिन यह समझना कठिन है कि आखिर उनके और साथ ही मंत्रियों के दो महीने तक वेतन न लेने से आर्थिक हालात कैसे सुधर जाएंगे? यह प्रश्न इसलिए, क्योंकि उन्होंने यह नहीं कहा कि वह और उनके सहयोगी दो माह का अपना वेतन सदैव के लिए छोड़ रहे हैं। वैसे यदि वह ऐसा करते भी तो यह ऊंट के मुंह में जीरा भी नहीं होता। मुख्यमंत्री ने विधायकों से भी आग्रह किया है कि वे भी उनका अनुसरण करें। क्या इसके बाद वह सरकारी कर्मचारियों से भी ऐसी कोई अपील करने वाले हैं? जो भी हो, अच्छा यह होगा कि वह त्याग करने का संदेश देने के स्थान पर राज्य की आर्थिक स्थिति ठीक करने के लिए कुछ ठोस कदम उठाएं। ऐसा करते हुए उन्हें इस पर भी आत्ममंथन करना चाहिए कि राजनीतिक लाभ के लिए रेवड़ियां बांटने के चुनावी वादे करना कहां तक उचित था? कांग्रेस को कम से कम अब तो यह समझ आ ही जाना चाहिए कि आर्थिक नियमों और वित्तीय स्थिति की अनदेखी कर लोकलुभावन वादे करना तो आसान होता है, लेकिन उन्हें पूरा करना कठिन।
यह किसी से छिपा नहीं कि हिमाचल प्रदेश की कांग्रेस सरकार अपने कई चुनावी वादों को अब तक पूरा नहीं कर सकी है। उसके कुछ वादे ऐसे भी रहे, जो आधे-अधूरे ढंग से ही पूरे किए जा सके हैं। चुनावी वादों को खटाखट पूरा करने का आश्वासन देने वाले कांग्रेस के नीति-नियंताओं के साथ ही आम जनता को भी आत्ममंथन करने की जरूरत है। उसे यह आभास होना चाहिए कि लोकलुभावन वादे करने वाले उसे केवल गुमराह ही नहीं करते, बल्कि उसके भविष्य से खिलवाड़ भी करते हैं। यह आभास केवल हिमाचल प्रदेश ही नहीं, अन्य राज्यों की जनता को भी होना चाहिए, क्योंकि रेवड़ी संस्कृति अपनाने वाले राजनीतिक दल बढ़ते जा रहे हैं। यह किसी से छिपा नहीं कि जैसे हिमाचल प्रदेश आर्थिक संकट से दो-चार है, वैसे ही कर्नाटक और कुछ अन्य राज्य भी। कुछ राजनीतिक दल तो ऐसे हैं, जो मुफ्तखोरी वाली योजनाओं का वादा करके सत्ता में आ जाते हैं और फिर उन्हें लागू करने के लिए केंद्र सरकार से अतिरिक्त धन की मांग करते हैं। जब केंद्र सरकार उनकी मांग पूरा करने के लिए तैयार नहीं होती तो वे उस पर खुद की अनदेखी करने का आरोप मढ़ते हैं। क्या यह किसी से छिपा है कि कुछ राज्यों ने किस तरह यह माहौल बनाया था कि आम बजट में गैर भाजपा शासित राज्यों की उपेक्षा की गई है? इसी तरह दक्षिण के राज्य यह आरोप लगा चुके हैं कि केंद्र सरकार उनके साथ सौतेला व्यवहार कर रही है।
Date: 30-08-24
पेंशन क्षेत्र में बड़ा सुधारगौरव वल्लभ, ( लेखक वित्त के प्रोफेसर एवं भाजपा नेता हैं, लेकिन यहां व्यक्त विचार निजी हैं )
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने गत 24 अगस्त को एकीकृत पेंशन योजना यानी यूनिफाइड पेंशन स्कीम (यूपीएस) को मंजूरी प्रदान कर दी। यह योजना सरकारी कर्मचारियों को सेवानिवृत्ति के बाद सुरक्षित और सुनिश्चित पेंशन प्रदान करने की दिशा में एक बड़ी पहल है। एक अप्रैल 2025 से प्रभावी होने वाली यह योजना न केवल सरकारी कर्मचारियों को भविष्य की चिंताओं से मुक्त करती है, बल्कि सेवानिवृत्ति के बाद उनकी वित्तीय सुरक्षा भी सुनिश्चित करती है। पिछले कुछ वर्षों में विपक्षी दलों ने राष्ट्रीय पेंशन योजना यानी एनपीएस को एक राजनीतिक मुद्दे के रूप में भुनाने का प्रयास किया। इसे आम तौर पर नई पेंशन योजना के रूप में भी जाना जाता है। एनपीएस की आलोचना मुख्य रूप से इस कारण होती थी कि बाजार में उतार-चढ़ाव के चलते पेंशन में अनिश्चितता बनी रहती है और एक निश्चित पेंशन के अभाव में सरकारी कर्मचारी अपने भविष्य के प्रति आश्वस्त नहीं रह पाता। इसी आधार पर पुरानी पेंशन योजना की मांग होती थी। यूपीएस ने पेंशन संबंधी सभी प्रश्नों को संबोधित किया है। यूपीएस सुनिश्चित करती है कि सेवानिवृत्त लोगों को एक स्थिर और निश्चित पेंशन मिले, जो एनपीएस से उतना संभव नहीं हो पा रहा था, क्योंकि यह बाजार से जुड़ी योजना है, जिसमें सरकारी कर्मचारियों का योगदान तय होता है, लेकिन रिटर्न बाजार पर निर्भर करता है। चूंकि एनपीएस में पैसा बाजार में लगाया जाता है, इसलिए पेंशन की राशि निश्चित नहीं होती और बाजार के उतार-चढ़ाव पर निर्भर रहती है। यह एनपीएस की आलोचना का एक उल्लेखनीय बिंदु था।
यूपीएस की तीन प्रमुख विशेषताएं हैं। एक है सुनिश्चित पेंशन। यह पेंशन 25 वर्षों की न्यूनतम सेवा के बाद सेवानिवृत्ति से पहले के अंतिम 12 महीनों में कर्मचारी के औसत मूल वेतन का 50 प्रतिशत होगी। यूपीएस के तहत अगर कोई कर्मचारी 10 वर्षों की सेवा के बाद रिटायर होता है, तो उसे न्यूनतम 10,000 रुपये प्रति माह पेंशन मिलेगी। एनपीएस के तहत कर्मचारी अपने मूल वेतन का 10 प्रतिशत योगदान देता है, जबकि सरकार 14 प्रतिशत का योगदान देती है। यूपीएस में सरकारी योगदान बढ़कर 18.5 प्रतिशत हो गया है, जबकि कर्मचारी अपने मूल वेतन और महंगाई भत्ते का 10 प्रतिशत योगदान ही देंगे। यूपीएस की दूसरी विशेषता है मुद्रास्फीति सूचकांक। सभी प्रकार की पेंशन पर महंगाई राहत उपलब्ध होगी। इसकी तीसरी विशेषता है सेवानिवृत्ति पर एकमुश्त भुगतान। यह ग्रेच्युटी के अतिरिक्त होगा और इसकी गणना सेवानिवृत्ति की तिथि पर प्रत्येक छह माह की सेवा के लिए मासिक पारिश्रमिक (वेतन तथा महंगाई भत्ता) के 1/10वें भाग के रूप में की जाएगी।
कई राज्य 2003 से पहले की पुरानी पेंशन योजना यानी ओपीएस पर लौटने की घोषणा कर चुके हैं। यह निर्णय इन राज्यों की गैर-भाजपा सरकारों ने लिया था। ओपीएस गैर-अंशदायी और वित्तपोषित है। इसमें राज्य सरकार को तत्काल पेंशन फंड में अपने हिस्से का पैसा नहीं देना पड़ता। इससे पैसे की बचत होती है। हालांकि आने वाली सरकारों को बड़ी मात्रा में पैसा देना होगा। इससे इन राज्यों पर बहुत ज्यादा वित्तीय बोझ बढ़ जाएगा। भारतीय रिजर्व बैंक के अनुसार 2023-24 में पेंशन के लिए विभिन्न राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों का कुल बजट अनुमान 5.22 लाख करोड़ रुपये है, जो वित्त वर्ष 2020-21 के लिए 3.69 लाख करोड़ रुपये था। स्पष्ट है कि केवल तीन वर्षों में 41 प्रतिशत की उछाल आई।
अमेरिका में सेवानिवृत्ति आयु 67 वर्ष है। यहां कुल कार्यबल में सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारियों का प्रतिशत 13.4 है और जीवन प्रत्याशा 79.46 वर्ष है। जर्मनी में सेवानिवृत्ति आयु 67 वर्ष, सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारियों का प्रतिशत 12.9 और जीवन प्रत्याशा 81.54 वर्ष है। जापान में सेवानिवृत्ति आयु 64 वर्ष, सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारियों का प्रतिशत 7.7 और जीवन प्रत्याशा 84.85 वर्ष है। ब्रिटेन में सेवानिवृत्ति आयु 66 वर्ष, सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारियों का प्रतिशत 22.5 और जीवन प्रत्याशा 81.45 वर्ष है। भारत में सेवानिवृत्ति आयु 60, सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारियों का प्रतिशत 3.8 और जीवन प्रत्याशा 72.24 वर्ष है। स्पष्ट है कि पांच उन्नत देशों के मुकाबले अपने देश में सरकारी कर्मियों की सेवानिवृत्ति की आयु सबसे कम है। दुनिया भर में बेहतर चिकित्सा सुविधाओं की उपलब्धता और नागरिकों के बीच स्वास्थ्य संबंधी मुद्दों के बारे में अधिक से अधिक जागरूकता के कारण जीवन प्रत्याशा धीरे-धीरे बढ़ रही है। 1998 में सरकारी कर्मचारियों की सेवानिवृत्ति की आयु 58 से बढ़ाकर 60 वर्ष की गई थी। हालांकि तब भारतीय नागरिकों की जीवन प्रत्याशा केवल 61.4 वर्ष थी। 2024 तक जीवन प्रत्याशा तेजी से बढ़कर 72.24 वर्ष हो गई। पिछले 26 वर्षों में जीवन प्रत्याशा में 11 वर्षों की वृद्धि यह संकेत करती है कि इस वृद्धि को सेवानिवृत्ति आयु में वृद्धि द्वारा समायोजित किया जाए। इस विचार के खिलाफ एक तर्क यह है कि इससे बेरोजगारी बढ़ेगी, खासकर सरकारी नौकरियों के लिए नई भर्ती संख्या में कमी आएगी, लेकिन यह ध्यान रहे कि हमारे देश में कुल कार्यबल के मुकाबले सार्वजनिक क्षेत्र के कर्मचारियों की संख्या दुनिया की छह बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सबसे कम है। यह मात्र 3.8 प्रतिशत है। चीन में यह 7.89 प्रतिशत है। अन्य विकसित और उभरती अर्थव्यवस्थाओं में यह 7 से 15 प्रतिशत के बीच है। हमें सरकारी क्षेत्र में नई नौकरियों की संख्या बढ़ानी चाहिए। इससे समग्र शासन और सार्वजनिक सेवाओं की दक्षता में सुधार होगा और सेवानिवृत्ति की आयु में वृद्धि के कारण नई नौकरियों पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभाव को भी कम किया जा सकेगा।
यूपीएस पूर्वानुमानित पेंशन प्रदान करके उन सरकारी कर्मचारियों को लाभ पहुंचाएगी, जिन्होंने अपना पूरा जीवन राष्ट्रसेवा के लिए समर्पित कर दिया है। यह सरकार के लिए भी लाभकारी है। यूपीएस में सरकार और कर्मचारी अपने वेतन का एक निश्चित प्रतिशत योगदान देंगे। यह पेंशन फंड सरकार के वित्तपोषण के ढांचे को बनाए रखने में मदद करेगा। सरकारी खजाने पर यूपीएस के प्रभाव को कम करने के लिए सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ाने और सरकारी क्षेत्र में अधिक नए रोजगार के अवसर पैदा करने के बारे में गंभीरता से सोचा जाना चाहिए।
Date: 30-08-24
औद्योगिक पार्कों की राह में चुनौतियांसंपादकीय
केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा इस सप्ताह मंजूर की गई सरकार की औद्योगिक पार्क नीति, विशेष आर्थिक क्षेत्र (एसईजेड) अधिनियम 2005 के बाद कारोबार के अनुकूल क्षेत्र तैयार करने की सबसे महत्त्वाकांक्षी पहल है। 28,600 करोड़ रुपये की लागत से 12 ऐसे एन्क्लेव विकसित करने की योजना है जिसे वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने औद्योगिक पार्कों के ‘स्वर्णिम चतुर्भुज’ का नाम दिया है। याद रहे कि यह अटल बिहारी वाजपेयी की सफल सड़क निर्माण परियोजना का नाम था। योजना के मुताबिक राज्य सरकारों और निजी क्षेत्र के साथ मिलकर एकीकृत स्मार्ट औद्योगिक शहर बसाए जाने हैं जिनमें आवासीय और वाणिज्यिक क्षेत्र होंगे। इसके जरिए 1.5 लाख करोड़ रुपये का निवेश आकर्षित करने का लक्ष्य है। राज्यों का योगदान जमीन के रूप में होगा और केंद्र सरकार इक्विटी या डेट मुहैया कराएगी। कुछ औद्योगिक टाउनशिप अन्य देशों के साथ मिलकर विकसित की जाएंगी जिन्होंने ऐसी व्यवस्था में अभिरुचि दिखाई है। इस विषय में सरकार की मंशा कहीं से गड़बड़ नहीं लग रही।
बहरहाल एक सवाल यह है कि इसका क्रियान्वयन कैसे होगा? ऐसा इसलिए क्योंकि अतीत में औद्योगिक गतिविधियों को देश की कारोबारी सुगमता क्षेत्र की मानक अकुशलताओं से अलग-थलग रखने के प्रयासों को बहुत सीमित सफलता मिली है। सरकारी आंकड़े बताते हैं देश में करीब 4,420 औद्योगिक पार्क और 270 एसईजेड हैं। इनमें से अधिकांश को निवेश बढ़ाने में कोई उल्लेखनीय कामयाबी नहीं मिली है। एसईजेड नीति में भी इसी प्रकार इलाके चिह्नित किए गए थे जहां कर राहत प्रदान करके चीन की शैली में निर्यात क्षेत्र विकसित किए गए। शुरुआती रुचि के बाद जब कर रियायत समाप्त हुई तो ये क्षेत्र अपेक्षाओं पर खरे नहीं उतरे और इन्हें लेकर उत्साह समाप्त हो गया। देश के कुल निर्यात में एसईजेड की हिस्सेदारी केवल एक तिहाई रह गई। विनिर्माण में निवेश आकर्षित करने की सरकार की नीतिगत मंशा सफल नहीं हुई। एसईजेड में आए निवेश का करीब 60 फीसदी आईटी और आईटीईएस में आया।
उसके बाद आया डेवलपमेंट ऑफ एंटरप्राइज ऐंड सर्विस हब्स (देश), विधेयक 2023। इसके माध्यम से एसईजेड कानून की कमियों को दूर करने का प्रयास किया गया। इस विधेयक की स्थिति अस्पष्ट है। खबरों के अनुसार तो शायद इसे खारिज भी कर दिया गया है। ताजातरीन नीति में देश में निवेश से जुड़ी शाश्वत बाधाओं को दूर करने का प्रयास दिखता है। उदाहरण के लिए भूमि अधिग्रहण हमेशा से एक चुनौती रहा है। यहां तक कि एसईजेड भी निजी क्षेत्र के अचल संपत्ति कारोबार में बदलकर रह गए। औद्योगिक पार्कों में वे जमीनें शामिल होंगी जो सरकार द्वारा पहले ही अधिग्रहीत हैं और जिनके लिए पर्यावरण मंजूरी मिल चुकी है। दूसरा, एकल खिड़की मंजूरी के लिए स्पेशल परपज व्हीकल बनाने का प्रस्ताव भी है। तीसरा, पार्कों की लोकेशन को समर्पित माल ढुलाई गलियारे से लगे औद्योगिक गलियारे से जोड़ा गया है जिससे लॉजिस्टिक्स की एक अहम समस्या दूर हो सके। इनमें से पांच अमृतसर-कोलकाता बेल्ट पर, दो दिल्ली-मुंबई बेल्ट पर और पांच दक्षिणी एवं मध्य मार्गों पर स्थित हैं।
इस लिहाज से देखें तो कई व्यापक मुद्दे हैं जिन्हें हल करना होगा, तभी हमारे पार्क चीन जैसा प्रभाव उत्पन्न कर सकेंगे। उनमें से एक है आकार ताकि विनिर्माताओं के पास वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं जैसी पहुंच हो सके और वे सही मायनों में प्रतिस्पर्धी बन सकें। यह एक चुनौती हो सकती है। देश में एसईजेड का औसत आकार 0.25 वर्ग किमी से 14 वर्ग किमी तक का है। इसके विपरीत चीन के सबसे पुराने और बड़े एसईजेड में से एक शेनझेन का आकार 316 वर्ग किमी का है। इन शहरों के इर्दगिर्द जीवंत सामाजिक ढांचे की उपलब्धता भी अहम है। गुरुग्राम और बेंगलूरु इस मामले में मिसाल हैं क्योंकि उन्होंने नए दौर के श्रमिकों के समायोजन के लिए ढांचा विकसित किया है। यहां तक कि केरल जैसी अंकुश वाली मदिरा नीति या बिहार जैसी पूर्ण शराबबंदी भी पार्कों में विदेशी निवेश के निर्णयों को प्रभावित कर सकती हैं। नवीनतम नीति यकीनन निवेश जुटाने की एक नई कोशिश है। देखना होगा कि इसे कामयाबी मिलती है या नहीं।
Date: 30-08-24
नियम और अपवादसंपादकीय
इस मसले पर लंबे समय से बहस होती रही है कि महज आरोप के आधार पर किसी व्यक्ति को अगर कई-कई महीने जेल में बंद रखा जाता है और बाद में अंतिम तौर पर उसे निर्दोष पाया जाता है तो उसे जेल में रखे गए वक्त को किस सजा के दायरे में माना जाएगा। अब सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर इस मसले पर स्थिति साफ की है कि दोषी करार दिए जाने से पहले आरोपी को लंबे समय तक हिरासत में रखने को बिना सुनवाई के सजा बनाने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। गौरतलब है कि तेलंगाना के पूर्व मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव की बेटी और बीआरएस नेता के कविता इस वर्ष मार्च महीने से जेल में थीं। सीबीआइ और प्रवर्तन निदेशालय का दावा है कि वे दिल्ली आबकारी नीति से जुड़े कथित भ्रष्टाचार और धनशोधन के मामले में शामिल रही हैं। हालांकि उन्हें जमानत देते हुए अदालत ने यह भी कहा कि धनशोधन कानून के जरिए लगाई गई पाबंदियों की तुलना में स्वतंत्रता का मूल अधिकार ‘श्रेष्ठ’ है।
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट के सामने यह कोई पहला मौका नहीं था जब इस मसले पर उसने अपना यह रुख स्पष्ट किया है। इससे पहले दिल्ली के उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को जमानत देते हुए भी अदालत ने यह माना था कि उनके मामले में सुनवाई में देरी हो रही है और उन्हें ‘असीमित समय’ के लिए जेल में नहीं रखा जा सकता है, क्योंकि यह मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। के कविता को भी जमानत देते हए सुप्रीम कोर्ट ने इसी तरह अधिक समय तक जेल में रखने और सुनवाई में देरी को आधार बनाया है। अगर किसी गंभीर अपराध के आरोप में कोई जांच एजंसी किसी को गिरफ्तार करती है तो इससे पहला संकेत यही उभरता है कि उसके पास आरोपी के खिलाफ पुख्ता सबूत या आधार होंगे। मगर ऐसे मामले अक्सर सामने आते हैं, जिनमें कई वजहों से आरोपी के खिलाफ सबूत पेश करने या सुनवाई का मामला लगातार टलता रहता है और आरोपों के कठघरे में आया व्यक्ति बिना दोषी साबित हुए लंबे समय तक जेल में बंद रहता है।
यह एक तरह से जांच एजंसियों की कार्यशैली से लेकर कानूनी स्थिति पर भी सवाल है कि आरोप, जांच, सुनवाई और सजा की वे कौन-सी कसौटियां हैं, जिनके तहत बिना दोषसिद्धि के किसी को कई-कई महीने तक कैद में रखा जा सकता है। इस तरह के बिंदुओं पर अदालत को खुद सीबीआइ और ईडी जैसी जांच एजंसियों की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने का मौका मिलता है तो इसे कैसे देखा जाएगा? यों पिछले कुछ वर्षों से प्रवर्तन निदेशालय, आयकर विभाग और केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो पर भ्रष्टाचार के खिलाफ शिकंजा कसने के नाम पर सत्ता पक्ष के इशारे पर काम करने के आरोप लगते रहे हैं। अदालतों ने भी कई बार इन जांच एजंसियों की कार्यशैली को लेकर सवाल उठाए हैं। जहां तक आरोप के आधार पर जेल में रखने का मामला है, सर्वोच्च न्यायालय ने फिर इस सुस्थापित सिद्धांत को दोहराया है कि ‘जमानत नियम है, जेल अपवाद है’ और यह धनशोधन निवारण अधिनियम यानी पीएमएलए मामलों में भी लागू है। आरोप लगने और फैसला आने तक के संदर्भ में शीर्ष अदालत की यह टिप्पणी बेहद अहम है कि आजादी से वंचित सिर्फ उन स्थापित कानूनी प्रक्रियाओं के जरिए ही किया जा सकता है जो वैध और तर्कसंगत हों।
Date: 30-08-24
आत्महत्या का पाठसंपादकीय
प्रतियोगिता परीक्षाओं की तैयारी कराने का केंद्र माने जाने वाले कुछ शहरों से अक्सर विद्यार्थियों के आत्महत्या करने की घटनाएं सामने आती रहती हैं। यह समस्या अब एक व्यापक चिंता का रूप ले चुकी है। इसके अलावा, दसवीं या बारहवीं की परीक्षा में भी फेल होने या नंबर कम आने के तनाव में कई विद्यार्थियों के खुदकुशी कर लेने की खबरें हर वर्ष आ जाती हैं। चिंता की बात यह है कि अब ये कुछ घटनाएं मात्र न रह कर एक व्यापक समस्या की शक्ल लेती जा रही हैं। अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि छात्र-छात्राओं की आत्महत्या की दर कुल आत्महत्या की दर से तो ज्यादा है ही, लेकिन अब यह जनसंख्या में इजाफे की दर को भी पार गई है। गौरतलब है कि आइसी-3 सम्मेलन में बुधवार को राष्ट्रीय अपराध रेकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों के आधार पर ‘छात्र आत्महत्या : भारत में फैलती महामारी’ शीर्षक से जारी रपट में यह बताया गया है कि आत्महत्या की कुल घटनाओं में प्रति वर्ष जहां दो फीसद की बढ़ोतरी हुई है, वहीं विद्यार्थियों के बीच जान दे देने की मामलों में चार फीसद यानी राष्ट्रीय औसत से दोगुनी की वृद्धि हुई है। यह स्थिति तब है, जब इस बात की संभावना है कि विद्यार्थियों के आत्महत्या के मामलों में ‘कम रिपोर्टिंग’ हुई हो।
अगर विद्यार्थियों के बीच आत्महत्या की बढ़ती यह प्रवृत्ति खुदकुशी की कुल घटनाओं के मुकाबले और यहां तक कि आबादी में बढ़ोतरी की रफ्तार से भी तेज है तो यह सोचने की जरूरत है कि देश में शिक्षा का यह कैसा स्वरूप बन गया है, जिसमें पढ़ाई-लिखाई करने की उम्र में बच्चे जीवन से हार मान रहे हैं। स्कूल या उच्च शिक्षा का वह कैसा पाठ्यक्रम है जो बच्चों के भीतर हौसले और जीवट को मजबूत करने के बजाय उन्हें भावनात्मक स्तर पर बेहद कमजोर बना देता है। वहीं समाज और अभिभावकों की महत्त्वाकांक्षाओं और अपेक्षाओं का वह कैसा बोझ है, जिसके नीचे दब कर बच्चे दम तोड़ रहे हैं। निश्चित रूप से यह शिक्षा के समूचे ढांचे और सामाजिक सोच की एक ऐसी त्रासदी है, जिस पर बिना देरी किए गंभीरता से विचार करने की जरूरत है। यह स्थिति एक ओर राष्ट्रीय स्तर पर नीतिगत दूरदर्शिता पर एक सवाल है, वहीं यह सामाजिक स्तर पर शिक्षा में कामयाबी को लेकर भ्रमित धारणा का भी संकेत है।
Date: 30-08-24
कानूनी पहलुओं में हो बदलावडॉ. आमना मिर्जा
नारीवाद एक व्यापक और विकासशील विचार है। उदारवादी से लेकर सांस्कृतिक आदि तक नारीवाद के विभिन्न प्रकार हैं। सेनेका फॉल्स कन्वेंशन से 1848 में संयुक्त राज्य अमेरिका में पहला महिला अधिकार सम्मेलन हुआ‚ जिसने महिलाओं के मताधिकार आंदोलन का मार्ग प्रशस्त किया‚ दशकों बाद महिलाओं को वोट देने का अधिकार सुनिश्चित किया गया। सिमोन डी बेवॉयर के प्रसिद्ध कथन कि ‘कोई पैदा नहीं होता‚ बल्कि औरत बन जाता है’ की बात हो या महाभारत में द्रौपदी की वीरता का उल्लेख–जो अन्याय से लड़ने की शक्ति का पर्याय–है। यह एक चरण से दूसरे चरण तक वोट देने के अधिकार से लेकर शिक्षा से‚ ‘मी–टू’ तक– नारीवाद जारी रहा उसका एक कारण है कि लगातार उठती रही आवाजें।
लिंग केवल एक अवधारणा नहीं है‚ यह आंदोलन से संबंधित है। इसका काम और आजीविका से संबंध है। यह केवल महिलाओं के बारे में नहीं है‚ इसका प्रभाव पुरु षों पर भी पड़ता है। महिला शरीर‚ स्त्रीत्व‚ ‘सेक्सुअलिटी’ पर व्यापक बहस के साथ अब इसमें बहुत विविधता आ गई है। साथ ही प्रत्येक उद्योग में यौन उत्पीड़न के बारे में कई कहानियां हैं‚ सिनेमा अकेला नहीं है। औरत हो या पुरुष कास्टिंग काउच की पीड़ा सब जगह है। सेंसरशिप की जांच के लिए ‘भारतीय सिनेमैटोग्राफ समिति’ की 1928 की रिपोर्ट हो या केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) में बदलाव की सिफारिश करने के लिए 2016 में ‘श्याम बेनेगल समिति’ की स्थापना या हाल ही में मलयालम फिल्म उद्योग के भीतर चिंताजनक मुद्दों पर ‘जस्टिस हेमा कमेटी’ की रिपोर्ट‚ सिनेमा का दायरा अब सचमुच बदल गया है।
कैनवास जरूर बदल गया है‚ लेकिन ज्ञात उपेक्षित चिंताएं हैं जो ध्यान देने की मांग करती है। बड़े संघर्ष के बाद आवाजें सुनाई देती हैं। सात साल बाद महिला कलाकारों की सक्रियता पर हेमा कमेटी की रिपोर्ट सामने आई है। रिपोर्ट में कई गहरी बातें हैं जिसे हो सकता है कि हमने पहले भी सुना हो‚ लेकिन अब उन्हें नजरअंदाज नहीं कर सकते। वाकई में यौन उत्पीड़न आश्चर्यजनक रूप से व्याप्त है। यह अनियंत्रित होता जा रहा है। नैतिकता को स्वीकार करने वाले कम हैं। यह नौकरियों के उद्देश्य को ‘उच्च दबाव वाले करियर’ तक सीमित कर देता है। ऐसी स्थिति में यौन उत्पीड़न के कई आयाम भी हैं। यह आंतरिक अनियंत्रित भावनाओं के प्रकट होने का एक रूप है। यह शक्ति संबंधों की अभिव्यक्ति भी है। यह वर्चस्व का भी यक उपकरण है। इससे जुड़ा कलंक पीडि़त को असुरक्षित स्थिति में डाल देता है। जैसा कि हम उत्पीड़न के मुद्दे पर चर्चा करते हैं‚ उद्योग की प्रकृति को समझना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। सिनेमा उद्योग में जो कामकाजी स्थितियां मौजूद हैं‚ वही अन्य में भी मौजूद हैं‚ केवल डिग्री और प्रकृति भिन्न हो सकती है। लंबा‚ अनियमित समय‚ कार्य परिस्थितियों के लिए कोई विशिष्ट दिनचर्या नहीं। प्रत्येक असाइनमेंट के साथ कभी भी शेड्यूल बदल सकता है।
लिंग आधारित हिंसा का संबंध सामाजिक पहलुओं से भी है। फिल्में महिलाओं को इच्छा की वस्तु के रूप में चित्रित करती है। पुरुषों को अक्सर उनकी शारीरिक बनावट और कामुकता तक सीमित कर दिया जाता है। यह चित्रण पुरुष और महिलाओं दोनों पर प्रभाव डालता है। सिर्फ महिलाएं ही नहीं बल्कि पुरुष भी कार्यस्थल पर उत्पीड़न की शिकायत करते हैं‚ फिल्मों की शूटिंग स्थल भी इसके अपवाद नहीं हैं। वर्तमान समय में किसी भी उद्योग और नौकरी में काम करना जुनून से आने वाला एक सचेत निर्णय होना चाहिए। जब कोई यह निर्णय लेता है‚ तो उसे आसपास की चुनौतियों के प्रति सावधान और जागरूक रहना होगा। यौन हिंसा अन्य सामाजिक संरचनाओं जैसे वर्ग‚ धन‚ क्षेत्र‚ जाति‚ लिंग से भी संबंधित है। केवल आक्रोश और आलोचना से कोई फायदा नहीं है। पुरुषों और महिलाओं दोनों को अप्रिय स्थितियों का सामना करना पड़ा है या इनकार करने पर बहिष्कार का सामना करना पड़ा है। समाधान पर काम करना जरूरी है और साथ ही इस उद्योग को नए बदलाव की आवश्यकता है। सिनेमा से जुड़े कई कानून पुराने हैं। वर्तमान समय की जरूरतों को पूरा करने के लिए उनमें सुधार की आवश्यकता है। लिखित अनुबंधों पर ध्यान देने के साथ–साथ सामाजिक जागरूकता होना भी महत्वपूर्ण है।
इस मुद्दे को उठाते रहना महत्वपूर्ण है क्योंकि काम के लिए शोषण की आलोचना में मजबूत आवाजों की जरूरत है। अधिक पुरुषों और महिलाओं को अपने अनुभवों के बारे में बोलने के लिए प्रोत्साहित करना आवश्यक है। हालांकि आवाज उठाने के साधन का दुरुपयोग नहीं किया जाना चाहिए क्योंकि इससे कई निर्दोष संघर्षरत लोगों को नुकसान हो सकता है। कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न और हमले से निपटने पर व्यापक बहस की आवश्यकता है। इसमें आशा की किरण भी है। कम से कम अब‚ अतीत के विपरीत‚ कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न या हमला करने वाले लोगों को अब उनके कार्यों के लिए जिम्मेदार ठहराए जाने की अधिक संभावना है। दुर्व्यवहार को रोकें और पीड़ित को दोष देना बंद कीजिए। कलाकार संघों को अपने विचारों को प्रसारित करने के लिए सार्वजनिक शिकायत मंच की आवश्यकता है। शूटिंग स्थानों के दायरे को अन्य कार्य सुरक्षा अधिनियमों के साथ समन्वित किया जाना चाहिए। निसंदेह सिनेमा को ग्लैमर की जरूरत है। अच्छा सौंदर्य भी कला का हिस्सा है‚ लेकिन उससे आगे देखने की जरूरत है। निर्माता तो लाभ चाहते हैं‚ जो तब भी हो सकता है जब कलाकारों के साथ न्याय किया जाए। दर्शक अब स्मार्ट हैं‚ वह गुणवत्ता और नई चीजों का समर्थन करते हैं। ‘स्किन–शो’ की पुरानी चाल अक्सर प्रोजेक्ट की सफलता के लिए काम नहीं कर पाए।
जरूरी है कि कानूनी पहलुओं में बदलाव हो। उतना ही आवश्यक है कि किसी भी कार्यस्थल पर शोषण के विरुद्ध एकजुटता हो। विभिन्न प्रयासों का सही संतुलन होना चाहिए। मीडिया से लेकर कार्यालय कारखाने तक‚ सुरक्षित कार्यस्थल का समर्थन करना महत्वपूर्ण है। ऑनलाइन सक्रियता‚ प्रतिच्छेदन‚ यौन उत्पीड़न का विरोध आदि के लिए सामूहिक समर्थन अच्छी पहल है। यह नारीवादी मुद्दों‚ लिंग संबंधी प्रश्नों‚ सिनेमा के माध्यम की बदलती प्रकृति को दर्शाता है। अब पुरुषों और महिलाओं की विभिन्न ताकत‚ दृष्टिकोण‚ समास्याओं में नए समन्वय की जरूरत है। सतर्क रहें‚ आवाज उठाते रहें‚ यही प्रगति की खिड़की है।
Date: 30-08-24
दबाव मुक्त हों तभी बात बनेगीरजनीश कपूर
वर्ष 2014 से जब नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने की तैयारी में अपना अभियान शुरू किया तो भ्रष्टाचार के विरुद्ध उनका आह्वान था, ‘न खाऊंगा न खाने दूंगा।’ उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद इसका असर भी फौरन दिखाई दिया। केंद्र सरकार की नौकरशाही में यह संदेश गया तो ऐसा लगा जैसे अब जल्दी ही लालफीताशाही खत्म होगी। पर जैसे-जैसे समय बीतता गया, ये शुरुआती लक्षण ठंडे पड़ते गए। हालांकि मोदी जी दो बार अपने बूते पर और तीसरी बार अन्य दलों की मदद लेकर सरकार की तीसरी पारी खेल रहे हैं पर इन वर्षों में जिस बात ने सबको चौंकाया वो ये कि भ्रष्टाचार के विरुद्ध मोदी जी का ये अभियान केवल विपक्षी दलों तक ही सिमट कर रह गया है। उनमें से भी भ्रष्टाचार के आरोपों में घिरे जिस विपक्षी दल के नेता मोदी जी और अमित शाह के शरणागत हो जाते हैं। उनके सौ खून भी माफ कर दिए जाते हैं। इतना ही नहीं उन्हें संसद या मंत्री बना कर पुरस्कृत भी किया जाता है।
मोदी-शाह की इस रणनीति के हथियार बने हैं केंद्रीय जांच एजेंसियां, जो लगातार हिज मास्टर्स वॉइस’ की तर्ज पर काम कर रही हैं। इसलिए लगातार विपक्ष उन पर जांच एजेंसियों के दुरुपयोग का आरोप लगा रहा है, संसद में भी और संसद के बाहर भी। वैसे तो सीबीआई, आयकर विभाग और प्रवर्तन निदेशालय की छवि बड़े-बड़े मामलों को लंबा खींचने या दबाए रखने की है पर मोदी राज में ये चमत्कार हो रहा है कि सत्ता पक्ष से जुड़े लोगों पर तो प्राथमिक कार्रवाई भी नहीं होती किंतु विपक्ष के नेताओं पर हवा की गति से कार्रवाई होती है। यह आश्चर्यजनक है। हाल ही में सरकार की इस प्रवृत्ति पर कुछ रोक लगती नजर आई है। बीते कुछ महीनों में जिस तरह सुप्रीम कोर्ट ने भ्रष्टाचार के कई मामलों पर जांच एजेंसियों और सरकार को आड़े हाथों लिया है उससे यह संदेश गया है कि जांच एजेंसियां राजनैतिक दबाव में काम कर रही हैं, निष्पक्षता से कानून के दायरे में नहीं। मान्य सिद्धांत यह है कि आरोपी चाहे किसी भी दल या विचारधारा को क्यों न हो, यदि उसने अपराध किया है तो उसकी जांच निष्पक्षता से ही की जानी चाहिए। जाहरि सी बात है कि जांच एजेंसियों द्वारा ऐसी गलतियां बिना किसी दबाव के नहीं होती । ताजा उदाहरण दिल्ली शराब नीति घोटाले का है । जिस तरह शराब नीति घोटाले को लेकर आरोपी नेता एक के बाद एक जमानत पर छूट रहे हैं, उससे जांच एजेंसियों की ‘जांच’ को लेकर सवाल उठ रहे हैं। चुनाव से पहले और चुनाव के दौरान यह माहौल बनाया जा रहा था कि इन नेताओं का अपराध काफी संगीन है, इसीलिए इन्हें जमानत नहीं मिल रही, परंतु लंबे समय तक कछुए की चाल चल रही इस मामले की ‘जांच’ ने इन एजेंसियों की क्षमता को शक के घेरे में अवश्य खड़ा कर दिया है। वहीं सुप्रीम कोर्ट के कड़े रुख और सख्त आदेश के बाद जांच एजेंसियों द्वारा अपनाए गए दोहरे मापदंड का भी पर्दाफाश हुआ। यदि जांच एजेंसियां सभी आरोपियों को एक ही पैमाने से मापेगी तो जनता के बीच सही संदेश जाएगा, सिसोदिया हो, केजरीवाल हो, संजय राउत हो, या अन्य कोई आम आदमी, कानून की नजर में सभी एक समान हैं। पर यह भी विचारणीय है कि सुप्रीम कोर्ट ने इन वीआईपी आरोपियों के मामले में ये रुख पहले क्यों नहीं अपनाया? उल्लेखनीय है कि केंद्रीय जांच एजेंसियों पर निगरानी रखने के लिए 1997 के ‘विनीत नारायण बनाम भारत सरकार’ (जैन हवाला कांड केस) के फैसले ने केंद्रीय सतर्कता आयोग का पुनर्गठन किया था। जांच एजेंसियों को निष्पक्ष और राजनैतिक दबाव से मुक्त करने की दृष्टि से यह एक ऐतिहासिक फैसला था।
जाहरि सी बात है कि तमाम राजनीतिक दलों ने इसका विरोध भी किया, लेकिन उसके फौरन बाद ही से जिस तरह जांच एजेंसियों को ‘पिंजरे में बंद तोता’ और ‘सत्तापक्ष के हथियार’ से नवाजा गया है, यह लोकतंत्र के लिए उचित नहीं था। इसलिए यदि जांच एजेंसियों को अपनी छवि सुधारनी है तो उन्हें भय मुक्त हो कर ही कार्य करना होगा। जांच अधिकारी, चाहे छोटे पद पर हो या बड़े पद पर, उसे इस बात के लिए हमेशा तैयार रहना चाहिए कि यदि उसने किसी केस की जांच को लेकर, किसी नेता के मन की नहीं मानी तो हद सेहद उस अधिकारी का तबादला ही हो होगा, परंतु यदि वो अधिकारी फाइल पर सभी कानूनी तथ्यों को सही से दर्ज कर देता है तो कोई भी अधिकारी उसके खिलाफ नहीं जा सकता। उम्मीद की जानी चाहिए कि देश में आज भी ऐसे ईमानदार अधिकारी होंगे जो तबादले के डर से भयभीत हुए बिना अपना काम निष्ठा से करना जानते हैं। समय की मांग है कि ऐसे अधिकारी महत्त्वपूर्ण केस में सही तथ्यों को दर्ज कर केस फाइल के जरूरी पन्नों पर अपनी निष्पक्ष राय अवश्य दर्ज कराएं। भविष्य में जब भी कभी केस फाइल की जांच किसी निष्पक्ष समिति द्वारा की जाएगी तो दूध का दूध और पानी का पानी अपने आप सामने आ जाएगा। ऐसे में एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए जांच एजेंसियों का निष्पक्ष और दबाव मुक्त होना अनिवार्य है।
Date: 30-08-24
क्षेत्र के कामगारों को भी मिले पेंशन सुरक्षाआर के सिन्हा, ( पूर्व राज्यसभा सांसद व उद्यमी )
केंद्र सरकार ने एकीकृत पेंशन योजना, यानी यूनीफाइड पेंशन स्कीम (यूपीएस) की घोषणा कर दी है और पेंशन सबकी चर्चा का विषय बना हुआ है। यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की प्रतिबद्धता का भी प्रमाण है कि देश भर में सेवानिवृत्त सरकारी कर्मियों के हितों की रक्षा मजबूत होने वाली है। भारत में वृद्धावस्था में वित्तीय सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए पेंशन महत्वपूर्ण साधन है। जब कर्मचारी सेवानिवृत्त होते हैं, तो उनकी आमदनी का नियमित स्रोत अचानक खत्म हो जाता है, तब पेंशन की जरूरत पड़ती है। अगर रिटायर कर्मचारी को पेंशन न मिले, तो उसकी जिंदगी बहुत समस्याओं और अपमान में बीतती है।
यह चिंता की बात है कि पेंशन पर सहमति का माहौल नहीं है। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार ने 2004 में राष्ट्रीय पेंशन योजना (एनपीएस) शुरू की थी। कांग्रेस का एनपीएस पर रुख सदैव अस्पष्ट रहा और लगातार बदलता भी रहा है। शुरू में कांग्रेस ने एनपीएस की सराहना की। पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने भी इसे एक बेहतर पेंशन मॉडल बताया, पर बाद में कांग्रेस ने इसकी कमियां निकालनी शुरू कर दीं। पुरानी पेंशन योजना को खत्म करने के लिए एनडीए सरकार को लगातार आलोचना का सामना करना पड़ा है। केंद्र से लेकर राज्यों के सरकारी कर्मचारी पुरानी पेंशन स्कीम की मांग करते रहे हैं। राजस्थान में जब कांग्रेस की सरकार थी, तब उसने पुरानी पेंशन को लागू किया था, जो आज भी लागू है। हिमाचल प्रदेश में भी कांग्रेस सरकार पुरानी पेंशन योजना लागू कर चुकी है। अब राज्यों के पास एकीकृत पेंशन योजना लागू करने का मौका है।
देश और समाज में पेंशन को व्यापक विषय के रूप में देखने की जरूरत है। सरकारी पेंशन पाने वालों की संख्या देश में पांच प्रतिशत भी नहीं है। लाखों सरकारी कर्मियों को रिटायरमेंट के बाद आर्थिक सुरक्षा मिलेगी, पर बाकी लोगों का क्या होगा? देश में करोड़ों ऐसे कामगार हैैं, जो रिटायर होने के बाद बहुत कष्ट और जलालत झेलते हैं। देश के निजी क्षेत्र से जुड़े करोड़ों लोगों को हर माह बड़ी मुश्किल से दो-ढाई हजार रुपये ही पेंशन के रूप में मिलते हैं। अब आप सोच सकते हैं कि इतनी कम राशि से तो कोई इंसान अपने महीने का चाय-पानी का खर्च भी नहीं निकाल सकता है। मेरे बहुत सारे पत्रकार मित्रों को रिटायर होने के बाद मात्र दो-तीन हजार रुपये मिलते हैं। यही हाल अन्य निजी कंपनियों से जुड़े रिटायर कर्मियों का भी है।
भारत में निजी क्षेत्र के ज्यादातर कर्मचारी सेवानिवृत्ति के बाद कोई पेंशन प्राप्त करने के पात्र नहीं होते। ऐसे में, ईपीएफ, पीपीएफ, एनपीएस और ईएलएसएस पर उनकी निर्भरता बढ़ जाती है। मतलब, निजी कर्मचारी रिटायर होने के बाद भी आर्थिक सुरक्षा के लिए बाजार या निजी क्षेत्र पर निर्भर रहते हैं। निजी क्षेत्र में लोगों को समय रहते और नौकरी करते समय ही पेंशन की किसी योजना का सहारा लेना पड़ता है। निजी क्षेत्र की पेंशन योजनाएं खुले बाजार में निवेश पर निर्भर रहती हैं। वैसे, ईपीएफओ की ओर से यह कोशिश तो हो रही है कि निजी क्षेत्र के कर्मचारियों को भी रिटायरमेंट के बाद न्यूनतम 10,000 रुपये पेंशन मिले। इस दिशा में जरूर कदम उठाने चाहिए कि पेंशन का लाभ चंद सरकारी कर्मचारियों तक सीमित न रह जाए। अगर निजी क्षेत्र में पेंशन की सुविधा पर सरकार खर्च नहीं कर सकती, तो करों में राहत पर विचार करना चाहिए। अगर चुनिंदा निवेशों में कर कटौती की अनुमति दी जाए, तो पेंशन योग्य समाज के निर्माण में मदद मिलेगी।
नई पेंशन योजना एनडीए सरकार का एक अहम फैसला है। इसका लक्ष्य सरकारी कर्मियों को सामाजिक सुरक्षा देना है। कर्मचारियों की शंकाओं का समाधान होना ही चाहिए। एक स्थिर पेंशन प्रणाली कर्मचारियों को अपनी नौकरी के प्रति अधिक प्रतिबद्धता और निष्ठा प्रदान करती है। उन्हें लगता है कि रिटायर होने के बाद उन्हें वित्तीय सुरक्षा मिलेगी, इसलिए वे अपने काम पर अधिक ध्यान केंद्रित करते हैं।
बहरहाल, ध्यान रखना चाहिए कि असंगठित क्षेत्रों में सेवा देने वाले अनगिनत मेहनतकशों को पेंशन नहीं मिलती। इनकी संख्या सरकारी या संगठित क्षेत्र के कर्मचारियों की संख्या से कई गुना ज्यादा है और इनकी आय भी कम व अनिश्चित है। आखिर वे भी तो भारतीय नागरिक हैं। इनके बारे में गंभीरतापूर्वक सोचने की आवश्यकता है।
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हाल ही में केंद्र सरकार ने अनुभवहीन श्रमिकों के रोजगार को सब्सिडी देने की योजना प्रस्वावित की है। यह योजना वंचित श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा दे सकती है।
कुछ बिंदु –
– इस कार्यक्रम का उद्देश्य सालाना 1 करोड़ नए श्रमिकों को लाभ पहुंचाना है।
– प्रवेश स्तर के श्रमिकों को बाद में बिना सब्सिडी वाले रोजगार से जोड़ा जाता है, जिससे उनकी दीर्घकालिक नौकरी की संभावनाएं बेहतर होती हैं। पहले की सरकारों ने भी कार्य के अनुभव और श्रमिकों को आय का साधन देने के लिए ऐसी सब्सिडी दी थी।
– अनुभवजन्य साक्ष्य बताते हैं कि इस कार्यक्रम का लाभ, कार्यक्रम की अवधि से अधिक समय तक प्राप्त किया जाता है।
कुछ कमियां –
– इस योजना में किए जाने वाले रोजगार सृजन का स्वरूप ठीक नहीं है। अपेक्षित परिणाम देने के लिए सभी रोजगार को गैर कृषि अर्थव्यवस्था के औपचारिक हिस्से में लाना होगा।
– आधिकारिक अनुमानों के अनुसार अर्थव्यवस्था में सालाना लगभग 2 करोड़ रोजगार सृजन होता है। औपचारिक रोजगार कुल रोजगार का करीब दसवां हिस्सा है। इसका कार्यक्रम के नतीजों पर प्रभाव पड़ेगा।
– इसके अलावा, खपत में कमी के कारण निजी निवेश सुस्त है। इसका सीधा असर रोजगार सृजन पर पड़ता है। गति पकड़ने के लिए रोजगार सब्सिडी योजना की अवधि बढ़ानी पड़ सकती है।
‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 30 जुलाई, 2024
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Date: 29-08-24
Three Strikes For BailSC orders in Sisodia, Kavitha & Soren’s aide cases are a lesson for agencies, courts.TOI Editorials
Even in PMLA cases, bail is the norm, Supreme Court reiterated this yesterday, releasing Soren’s aide in a money laundering case. Coming a day after Telangana politician K Kavitha secured bail in the Delhi liquor policy case and days after Sisodia got bail, the three cases, taken together, are message enough for all courts and investigative agencies. Hearing Kavitha’s plea, probe agencies were again upbraided by SC, as was Delhi HC that had denied her bail twice in the last 5 months. Every such bail – and every observation SC made – holds out the promise of fair process for undertrials accused under stringent laws, struggling for release. ED arrested BRS chief KC Rao’s daughter on March 15. CBI arrested her on April 11 from Tihar jail. SC granted her bail in both cases, and rebuked Delhi HC’s single-judge bench.
Bail, not trial | In resisting bail to Sisodia earlier, and Kavitha in the latest instance, probe agencies have attracted SC’s ire on the quality/ nature of their investigation. In case after case, SC reiterates bail is the norm even under special laws PMLA, UAPA and PSA, among others. In Kavitha’s and Soren’s aide’s cases, SC made three points to Delhi HC and probe agencies. One, investigators cannot argue against bail basis “evidence” that would come into play only when trial begins. In neither Sisodia’s case, nor Kavitha’s, nor yesterday, did investigators demonstrate why bail must not be granted. “Inference” is not “evidence”, SC said.
‘Evidence’ dodgy | Two, agencies’ misplaced doggedness to oppose bail even after their investigation was over, prompted SC to caution that were its remarks on the quality of evidence to be made part of the bail order, it would impact the trial. For instance, it questioned how approvers were made witnesses arbitrarily, ‘accused’ were being ‘chosen’, and found no evidentiary merit in a phone being formatted months before arrest.
‘Case law’ for bail | Three, bailing Soren’s aide, SC reiterated its Aug 9 point bailing Sisodia. It said PMLA’s Section 45 that lays down twin conditions for bail “does not rewrite the principle to mean that deprivation of liberty is the norm”. SC’s strong comments may not be seen as legal precedent, nor were they the deciding factor that secured Kavitha’s bail. But the purpose of such obiter dicta is lessons for police and especially HCs to consider when hearing bail pleas. Cause of investigation and justice are both served best when due process is followed.
Date: 29-08-24
Southern Winds are Catching the SailsGood social infra key to foreign funds.ET Editorials
Competition among states for marquee foreign investments in manufacturing and services is confining itself to peninsular India, except NCR around Delhi — as the healthy wooing for Foxconn attention by Telangana, Andhra Pradesh and Karnataka amply shows. Investment inflows track ease of doing business, apart from land acquisition, manpower availability and infrastructure. Coastal states are working on their access to maritime trade to plug into global supply chains. Cluster development pursued by individual states has been successful. This plays into the federal incentives for select manufacturing exports that require seeding the vendor ecosystem alongside scalable production. These factors are creating a selfreinforcing loop for foreign investment and industrialisation. Improvements in logistics haven’t yet allowed laggards to make a severe dent in the attractiveness of leading states for foreign investors.
Apart from fiscal incentives, GoI is addressing infra deficit. It can offer states some helpful pointers on issues like business friendliness and workforce skills. These are, however, not enough to level the playing field among states. The north is participating in the industrialisation of the south by supplying cheap labour and markets for products. Northern states need to be much more creative to make up for their natural disadvantage in connectivity. In terms of resource endowments, they would have to work on their manpower advantage and proximity to internal markets.
States have little to differentiate themselves for a foreign investor seeking to make India a global production base. There is no tax arbitrage available in a localisation decision. Logistics costs are declining, and electricity supply is uniform with creation of a national grid. GST has created a common tax structure. States, thus, need to compete on social infrastructure that promotes industrialisation through enhanced outlays for health and education. This is where peninsular India is pressing its historical advantage, and the north must catch up.
Date: 29-08-24
Focus on trialAgencies should shed fixation on keeping people in jail.Editorial
The Supreme Court order granting bail to Bharat Rashtra Samithi leader K. Kavitha does more than grant relief to a jailed politician; it brings under focus the ill-motivated tactic of using the judicial process and the power of arrest as a tool to hound political opponents. The charge that the Delhi government’s liquor policy was formulated in exchange for crores of rupees to grant a favourable deal to a certain lobby is quite serious, warranting a thorough investigation and fair prosecution. However, the focus of the Centre and its agencies seems to be entirely on keeping some political figures imprisoned in the run-up to the trial. In oral observations, a Bench of Justices B.R. Gavai and K.V. Viswanathan has questioned the fairness of the investigation, especially because the agency has cited some of those apparently involved as witnesses, while seeking pardon to some arrested suspects so that they could testify as approvers. After a spell during which the courts were reticent to disregard the vehement objections by the prosecution to the grant of bail, the judiciary has now begun to see through the attempt to use the bail-denying features of the Prevention of Money-Laundering Act (PMLA) to keep adversaries in prison for long. The Court had earlier granted bail to Delhi Chief Minister Arvind Kejriwal (still in jail in a CBI case on the same allegations) and Deputy Chief Minister Manish Sisodia.
Ms. Kavitha has been accused of arranging the alleged deal between the Delhi government and a ‘south lobby’. It is notable that the political leaders have all been implicated by witnesses who themselves appear to be involved in the case and accused who have turned approvers. The Bench has questioned the Delhi High Court’s failure to give her the benefit of a proviso to Section 45 of the PMLA, which allows grant of bail to women, merely on the ground that she was educated and not a “vulnerable” woman. The mere fact that the investigation by the CBI and the Enforcement Directorate is over was enough to grant bail. Instead of vehemently objecting to bail, and spending their time filing lengthy replies to a spate of bail petitions in various courts, prosecutors should concentrate on building a water-tight case. They should now focus on opening the trial and concluding it within a reasonable time-frame. The agencies concerned should remember that headlines that cite fabulous sums of money allegedly paid as bribes and thousand page charge sheets can impress only a few. Trial courts would surely prefer concrete evidence and reliable testimony backed by relevant documents.
Date: 29-08-24
प्रधानमंत्री की यूक्रेन यात्रा कूटनीतिक रूप से सही थीपलकी शर्मा, ( मैनेजिंग एडिटर )
रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध तेज होता जा रहा है। ऐसे में समय की मांग कूटनीति है, कुछ ऐसा जो मामले को शांत करे। भारत ने पिछले हफ्ते ऐसी ही एक कोशिश की थी, जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कीव गए। लेकिन इस यात्रा ने भारत में लोगों की राय को विभाजित कर दिया है। कुछ का कहना है कि यह संतुलनकारी कार्य था, जबकि अन्य का कहना है कि यह गैर-जरूरी था, यहां तक कि रूस के साथ हमारे संबंधों के लिए यह प्रतिकूल भी हो सकता है। मोदी के जाने के बाद जेलेंस्की ने प्रेस कॉन्फ्रेंस भी की और भारत पर उनकी कुछ टिप्पणियां तीखी और स्पष्ट रूप से अनुचित थीं। कूटनीति में, आपको छोटे से छोटे लाभ का भी स्वागत करना चाहिए, और जेलेंस्की ने ऐसा नहीं किया।
तो क्या प्रधानमंत्री की यात्रा बेकार गई? वे वहां गए ही क्यों थे? जुलाई में ही मोदी रूस गए थे। वहां उन्होंने पुतिन से मुलाकात की थी और उन्हें गले लगाया था। इससे यूक्रेन और पश्चिमी देशों में नाराजगी थी। जेलेंस्की ने इसे बड़ी निराशा बताया था। अतीत में भारत ने ऐसी आलोचनाओं को नजरअंदाज किया है। लेकिन इस बार भारत ने यूक्रेन यात्रा करने का फैसला किया। कूटनीति में इसे हाइफनेशन कहते हैं- आप इजराइल जाते हैं, फिलिस्तीन भी जाते हैं। आप रूस जाते हैं, यूक्रेन भी जाते हैं। यह दोनों तरफ से खेलने जैसा है।
सवाल यह है कि क्या भारत के लिए ऐसा करना जरूरी था? रूस नई दिल्ली के सबसे पुराने रणनीतिक साझेदारों में से एक है। यूक्रेन नहीं है। पिछले हफ्ते तक किसी भी भारतीय प्रधानमंत्री ने कीव का दौरा नहीं किया था। रूस हमारे लिए यूक्रेन से कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण है, और इस यात्रा से इस स्थिति में कोई बदलाव नहीं आया। फिर इससे क्या हासिल हुआ?
मुख्य रूप से तीन बातें हैं। पहली तो यह कि इसने भारत की नीति को स्पष्ट कर दिया। कि वह पुतिन समर्थक नहीं है, युद्ध समर्थक नहीं है और तटस्थ भी नहीं है। जैसा कि मोदी ने कहा, भारत शांति के पक्ष में है। यह नई दिल्ली को चीन या ईरान से अलग करता है, जो रूस के युद्ध का सक्रिय रूप से समर्थन कर रहे हैं। भारत ऐसा नहीं है। नई दिल्ली का कहना है कि वह युद्ध को वित्तपोषित करने के लिए नहीं, बल्कि महंगाई पर नियंत्रण के लिए रूसी तेल खरीद रहा है। अगर यूक्रेन हमें सस्ता तेल बेच सकता है, तो हम उसे भी खरीदेंगे। इसलिए, यह राजनीतिक से ज्यादा वित्तीय निर्णय है। और लगता है कि यूक्रेन ने यह बात समझ ली है। 2022 में कीव ने कहा था कि भारत के हाथ यूक्रेन के खून से सने हैं। वैसी बयानबाजी अब बंद हो गई है।
दूसरा लक्ष्य रूस पर अंकुश बनाए रखना है, क्योंकि भू-राजनीति इसी तरह काम करती है। यह सच है कि मॉस्को हमारा पुराना साझेदार है, लेकिन वह चीन का भी सहयोगी है। पुतिन और शी जिनपिंग के बीच ‘बेरोकटोक साझेदारी’ है। इसलिए अगर भारत और चीन के बीच हालात खराब होते हैं तो पुतिन किसका समर्थन करेंगे? साथ ही, रूस अपने युद्ध के कारण पहले जितना भरोसेमंद नहीं रहा। 2019 में भारत द्वारा रूस से खरीदे गए एस-400 मिसाइल सिस्टम पर विचार करें। तीन सिस्टम वितरित किए जा चुके हैं, इस साल दो और आने वाले थे। लेकिन युद्ध के कारण देरी हो गई है। नई डेडलाइन 2026 की है।
वित्तीय लेन-देन के मामले में भी यही स्थिति है। भारत ने रूस की ऊर्जा क्षेत्र की बड़ी कंपनियों में अरबों डॉलर का निवेश किया है। लेकिन रिटर्न बहुत कम है। सखालिन-1 तेल-क्षेत्र में भारत की 20% हिस्सेदारी है। इसलिए नई दिल्ली तेल इक्विटी या फील्ड में से तेल का हिस्सा चाहता था। रूस ने मना कर दिया है। तेल के बजाय, वे भारत को लाभांश देना चाहते हैं। लेकिन इसमें एक पेंच है। रूस भारत को पैसे नहीं दे सकता क्योंकि उनकी ऊर्जा कंपनियां वैश्विक भुगतान प्रणालियों से कटी हुई हैं। इसलिए अवैतनिक लाभांश बढ़ता जा रहा है, जो लगभग 600 मिलियन डॉलर तक पहुंच गया है। यह वह राशि है जो रूस को भारतीय सरकारी कंपनियों को देनी है। और अब, वह अधिक लाभांश की पेशकश कर रहा है। भारत इससे खुश नहीं है। रूसी सेना में लड़ने वाले भारतीयों का भी मुद्दा है।
सबसे अंत में, इस यात्रा ने कूटनीति की आवश्यकता को रेखांकित किया। युद्ध अक्सर ऑटो-पायलट मोड में चले जाते हैं। लड़ाई नियमित हो जाती है, विनाश सामान्य हो जाता है और आप भूल जाते हैं कि शांति भी एक विकल्प है। मोदी ने जेलेंस्की को यह याद दिलाया है। उन्होंने यूक्रेन से शांति-वार्ता करने का आग्रह किया। यह पश्चिम नहीं करेगा, रूस नहीं करेगा, इसलिए किसी को तो करना ही चाहिए।
Date: 29-08-24
जीएसटी ढांचे को सहज बनाएंसंपादकीय
वस्तु एवं सेवा कर व्यवस्था में संभावित बदलावों पर काम कर रहे राज्यों के मंत्रियों के एक समूह ने संकेत दिया है कि फिलहाल उनकी योजना चार दरों वाले मौजूदा ढांचे को बरकरार रखने की है। हालांकि अभी चर्चाएं चल रही हैं और कोई निर्णय नहीं लिया गया है लेकिन समूह के कुछ सदस्यों का कहना है कि चूंकि जीएसटी व्यवस्था स्थिर हो चुकी है इसलिए शायद इसके साथ छेड़छाड़ करना उचित नहीं होगा। बहरहाल, जीएसटी ढांचे को सहज बनाए जाने की तमाम वजह हैं जिनके चलते समूह को इस पर चर्चा करनी चाहिए। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण जो जीएसटी परिषद की अध्यक्ष भी हैं, ने जुलाई में अपने बजट भाषण में कहा था कि सरकार जीएसटी कर ढांचे को सरल और युक्तिसंगत बनाने के प्रयास करेगी और इसे बाकी बचे क्षेत्रों तक विस्तार दिया जाएगा। राज्यों के मंत्रिसमूह को इस प्रक्रिया की पहल करनी चाहिए। इस संबंध में सीतारमण ने स्पष्ट किया है कि आगामी नौ सितंबर को होने वाली जीएसटी परिषद की बैठक में इस विषय पर चर्चा की जाएगी।
जैसा कि विशेषज्ञों ने सुझाया भी है, जीएसटी की दरों और स्लैब को युक्तिसंगत बनाने की सख्त आवश्यकता है। परिषद इस चरण में तीन दरों वाले ढांचे को अपनाने पर विचार कर सकती है। अनिवार्य वस्तुओं के लिए कर दर कम रखी जाए, अधिकांश वस्तुओं सेवाओं के लिए मध्यम दर रखी जाए और चुनिंदा वस्तुओं या नुकसानदायक वस्तुओं के लिए दरों को ऊंचा रखा जाए। यह सुझाव भी दिया गया है कि 12 और 18 फीसदी की स्लैब को मिलाकर 16 फीसदी का एक नया स्लैब तैयार किया जाए। इससे जटिलता में काफी कमी आएगी और दरों की बहुलता के कारण उत्पन्न विसंगतियों में से कई दूर होंगी। इसके अलावा समायोजन और दरों को सहज बनाने का काम इस प्रकार करना होगा कि समग्र जीएसटी कर संग्रह राजस्व निरपेक्ष दर के करीब पहुंच सके। ध्यान देने वाली बात है कि कर संग्रह का बड़ा हिस्सा 18 फीसदी के स्लैब से आता है।
शुरुआती वर्षों में जीएसटी दरों को समय से पहले कम कर दिया गया जिससे इसके प्रदर्शन में कमजोरी आई। हालांकि इस कर के क्रियान्वयन के बाद से संग्रह में प्रभावी इजाफा हुआ है। जैसा कि अर्थशास्त्री अरविंद सुब्रमण्यन और अन्य लोगों ने इस समाचार पत्र में लिखा है 2023-24 में उपकर समेत विशुद्ध जीएसटी संग्रह सकल घरेलू उत्पाद (जीएसटी) का 6.1 फीसदी था जो 2012-17 के जीएसटी से पहले के दौर के लगभग समान था। यह भी ध्यान देने लायक है कि मौजूदा संग्रह में क्षतिपूर्ति उपकर भी शामिल है जिसे उस कर्ज को चुकाने के लिए जुटाया जा रहा है जो महामारी के दौरान राज्यों के राजस्व में कमी की भरपाई के लिए लिया गया था। जीएसटी परिषद को निकट भविष्य में कर्ज चुकता हो जाने के बाद कभी न कभी इस उपकर के बारे में निर्णय लेना होगा।
एक सुझाव यह है कि इसे कर दर में शामिल किया जाए। हालांकि यह उपभोक्ताओं के वास्तविक कर व्यय पर असर नहीं होगा लेकिन किसी भी निर्णय की सावधानीपूर्वक जांच करना होगा। यह महत्त्वपूर्ण है क्योंकि उपकर को सीमित समय के लिए लागू किया गया था और इसका एक खास उद्देश्य था- पहले पांच सालों में राज्यों के राजस्व में कमी की भरपाई के लिए संसाधन जुटाना। संग्रह जारी रहा क्योंकि सरकार को इस पूरी अवधि में राज्यों की भरपाई करनी पड़ी। व्यापक तौर पर दरों को राजस्व निरपेक्ष दर के अनुसार समायोजित किया जाना चाहिए। इससे केंद्र और राज्य के स्तर पर राजस्व संग्रह में इजाफा होगा। बढ़ा हुआ राजस्व सरकार के दोनों स्तरों पर उच्च राजस्व को समायोजित करेगा। यह ऐसे समय में होगा जब देश को आम सरकारी बजट घाटा और सार्वजनिक ऋण कम करने की जरूरत है। इस विषय को टालने से जीएसटी व्यवस्था के लिए जरूरी समायोजन में देरी होगी।
Date: 29-08-24
प्रतिरोध का स्वरसंपादकीय
लगा था कि सर्वोच्च न्यायालय की दखल के बाद कोलकाता चिकित्सक बलात्कार और हत्या मामले को लेकर उभरा लोगों का रोष कुछ कम हो जाएगा, मगर वह और बढ़ता जा रहा है। अदालत ने घटना के विरोध में आंदोलन कर रहे चिकित्सकों से काम पर लौटने की अपील की थी। मामले पर कार्रवाई में बरती गई शिथिलता और लापरवाहियों को लेकर पुलिस और चिकित्सालय प्रशासन को फटकार लगाई थी। मगर उससे लोगों का गुस्सा शांत नहीं हो पा रहा। मंगलवार को पश्चिम बंग छात्र समाज ने ‘नवान्न’ अभियान शुरू कर दिया। बताया जा रहा है कि यह छात्रों का गैरराजनीतिक मंच है और इसकी तीन प्रमुख मांगें हैं- पीड़िता को न्याय मिले, मुख्यमंत्री अपने पद से इस्तीफा दें और अपराधी को मृत्युदंड मिले। अब छात्रों के विरोध में कुछ सरकारी कर्मचारी संगठनों ने भी अपना स्वर मिला दिया है। उधर भारतीय जनता पार्टी ने बुधवार को बारह घंटे के बंगाल बंद का आह्वान किया था, जिसमें पार्टी कार्यकर्ताओं और पुलिस के बीच कई जगह झड़पें भी हुईं। ऐसे वातावरण में राष्ट्रपति ने भी अपने संबोधन में कहा कि अब समय आ ग है कि बेटियों पर अत्याचार को सहन न किया जाए। किसी भी हाल में महिलाओं का उत्पीड़न रुकना चाहिए ।
स्वाभाविक ही इस विरोध प्रदर्शन से ममता बनर्जी सरकार की मुश्किलें बढ़ गई हैं। हालांकि इस मामले पर सियासी बयानबाजियां भी तेज हो गई हैं। ममता बनर्जी इन विरोध प्रदर्शनों के पीछे भाजपा का हाथ बता रही हैं और उनका आरोप है कि केंद्र सरकार, पश्चिम बंगाल सरकार को अस्थिर करने की कोशिश कर रही है। विपक्षी गठबंधन के नेता भी इसमें सियासी रंग घोल रहे हैं । इस तरह कोलकाता बलात्कार और हत्या प्रकरण में अब असल मुद्दे पर कार्रवाई से अधिक राजनीतिक सरगर्मी बढ़ गई है। हालांकि इस घटना को बीस दिन हो गए और शुरू में ही ममता बनर्जी ने इस पर सख्त रुख अख्तियार कर लिया था। आरोपी को फौरन गिरफ्तार कर लिया गया, लापरवाही बरतने वाले अस्पताल प्रशासन के खिलाफ भी कार्रवाई कर दी गई। मामले की जांच का जिम्मा सीबीआइ को सौंप दिया गया । सर्वोच्च न्यायालय लगातार इस मामले पर नजर बनाए हुए है। आरोपी के सच से सामना कराने से कुछ तथ्य सामने आने की उम्मीद बनी हुई है। मगर लोगों की नाराजगी कम होने का नाम नहीं ले रही, तो इसकी कुछ वजहें साफ हैं। अभी तक अनेक आपराधिक मामलों में ममता बनर्जी सरकार का रवैया संतोषजनक नहीं देखा गया है। उन सबका मिलाजुला, लंबे समय से जमा रोष इस घटना के बाद फूट पड़ा है।
कोलकाता चिकित्सक बलात्कार और हत्या कांड को लेकर पूरे देश में आक्रोश प्रकट हुआ है, तो उसके पीछे भी बड़ी वजह महिलाओं की सुरक्षा को लेकर बरती जा रही शिथिलता है। राष्ट्रपति के बयान को गंभीरता से लेने की जरूरत है कि निर्भया कांड के बारह बरस बाद भी ऐसे जघन्य अपराध रुकने का नाम नहीं ले रहे । मगर जब तक सरकारें राजनीतिक नफे-नुकसान से ऊपर उठ कर इस दिशा में सामूहिक प्रयास से कोई व्यावहारिक और कारगर कदम नहीं उठाएंगी, तब तक ऐसी घटनाओं पर रोक लगाना मुश्किल बना रहेगा। ममता बनर्जी को इसे राजनीतिक रस्साकशी का मुद्दा बनाने के बजाय लोगों को यह भरोसा दिलाना होगा कि वे महिलाओं की सुरक्षा को लेकर गंभीर हैं और बलात्कार तथा हत्या मामले में न्याय दिलाने का हर प्रयास करेंगी।
Date: 29-08-24
वृद्धि दर और अर्थव्यवस्था का सचअजय जोशी
कोरोना के चलते वर्ष 2020 से 2022 तक भारतीय अर्थव्यवस्था पर गंभीर नकारात्मक प्रभाव पड़ा। वर्ष 2022 के अंत से देश की अर्थव्यवस्था में सुधार आना शुरू हुआ। इस महामारी के बाद अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर को कुछ अर्थशास्त्री अंग्रेजी अक्षर ‘के’ आकार की वृद्धि मान रहे हैं, जिसमें अमीर और अमीर होते जा रहे हैं और गरीब और गरीब। अगर हम ‘के’ अक्षर की कल्पना करें तो इसमें दो रेखाएं नजर आती हैं। एक रेखा ऊपर की तरफ जाती है और दूसरी नीचे की तरफ। अर्थव्यवस्था में अंग्रेजी अक्षर ‘के’ आकार की वृद्धि यह बताती है कि इसमें कुछ उद्योग और व्यावसायिक समूह ऊपर उठ रहे हैं, जबकि अन्य नीचे की ओर जाते हुए, संघर्ष करते लग रहे हैं।
इस वृद्धि में मोटे तौर पर पूरी अर्थव्यवस्था में सुधार होता प्रतीत होता है, जबकि यह सुधार सभी क्षेत्रों में सामान रूप से नहीं होता। इसमें कुछ क्षेत्र ठीक हो पाते हैं, जबकि अन्यों को संघर्ष करते रहना पड़ता है। इसमें संगठित क्षेत्र आगे बढ़ता है, तो असंगठित क्षेत्र पीछे बना रहता है। कई अर्थशास्त्रियों का मानना है कि कोरोना काल के बाद जहां समाज के संपन्न वर्ग द्वारा अधिक खर्च करने के कारण महंगे सामान की मांग में वृद्धि हुई है, वहीं आमजन की जरूरत की वस्तुओं के बाजार की मांग में कमी आई है।
हालांकि सरकार और कुछ आर्थिक विश्लेषक ‘के’ आकार की वृद्धि के विचार को खारिज करते हैं। उनका मानना है कि अर्थव्यवस्था में स्वाभाविक वृद्धि हो रही है, लेकिन औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (आइआइपी) में यह विभाजन स्पष्ट नजर आता है। यह सूचकांक विभिन्न औद्योगिक क्षेत्रों की वृद्धि दरों का मापन करता है। वित्तवर्ष 2014 में आइआइपी 3.3 फीसद था, जो वित्तवर्ष जनवरी 2024 में बढ़कर 5.5 फीसद हो गया। इसमें वृद्धि मुख्य रूप से सरकार द्वारा बुनियादी ढांचे के विकास हेतु किए जाने वाले खर्च, जो कि मुख्य रूप से इस्पात और सीमेंट आदि की मांग में वृद्धि के कारण हुई है। उपभोक्ता आधारित उद्योग जैसे उपभोक्ता टिकाऊ वस्तुएं और गैरटिकाऊ जैसे खाद्य, परिधान, किराना आदि में बढ़ोतरी की दर कम हुई है या घटी है। असंगठित क्षेत्र महामारी के पहले के कारोबार वाली स्थिति में अब भी नहीं पहुंच पाया है और यह लगातार गिरावट की ओर है।
‘सेंटर फार मानिटरिंग इंडियन इकोनामी’ (सीएमआइई) की रपट के अनुसार भीषण गर्मी और मानसून में देरी की वजह से रोजगार के लिहाज से जून 2024 का महीना असंगठित क्षेत्र के लिए अच्छा नहीं रहा। खरीफ फसलों के बुवाई सीजन की शुरुआत में रोजगार की उम्मीद में 70 लाख से अधिक लोग जून में श्रम बाजारों में शामिल हुए, लेकिन उनमें अधिकांश को निराशा हाथ लगी। श्रम बाजारों ने उन्हें जोड़ने के लिए अतिरिक्त रोजगार पैदा करने के बजाय विद्यमान रोजगार में भी कटौती कर दी। इससे रोजगार ढूंढ़ने वालों की संख्या और बढ़ गई। इसी प्रकार लगभग 90 लाख छोटे व्यापारी और दिहाड़ी मजदूर, जिनमें कृषि मजदूर भी शामिल थे, श्रम बाजार से बाहर हो गए।
देश के असंगठित श्रम बाजारों में कोरोना काल के बाद भारी उतार-चढ़ाव रहा है, इसकी दिशा अधिकांशत: नकारात्मक ही रही है। जून 2024 भी असंगठित क्षेत्र की दृष्टि से काफी मुश्किल भरा महीना रहा। इस अवधि में असंगठित क्षेत्र में कुल रोजगार में 28 लाख की गिरावट देखने को मिली और बेरोजगारों की संख्या करीब एक करोड़ बढ़ गई। इससे देश में बेरोजगारी दर जून में बढ़कर 9.2 फीसद तक पहुंच गई। रपट में कहा गया कि भीषण गर्मी के कारण रोजगार के लिहाज से निर्माण क्षेत्र को भी बड़ा झटका लगा है। इस क्षेत्र में जून में 1.7 करोड़ लोगों का रोजगार छिन गया। यह चिंताजनक है कि इस क्षेत्र में मार्च 2024 से ही रोजगार में लगातार गिरावट आ रही है। व्यावसायिक क्षेत्र में भी रोजगार में 50 लाख की गिरावट रही। इस नुकसान का अधिकांश असर ग्रामीण क्षेत्रों पर पड़ा। रपट के अनुसार असंगठित क्षेत्र की तुलना में संगठित क्षेत्र में नौकरियां बढ़ी हैं। जून 2024 में वेतनभोगी कर्मचारियों की संख्या 28 लाख बढ़ गई। यह वृद्धि विशेष रूप से शहरी क्षेत्रों में हुई है।
संगठित क्षेत्र में पैदा हुए रोजगार को लेकर ईपीएफओ द्वार जारी पिछले चार वर्ष के आंकड़ों पर नजर डालें, तो वित्तवर्ष 2019-20 से 2022-23 के दौरान 4.86 करोड़ कर्मचारी भविष्य निधि संगठन यानी ईपीएफओ से जुड़े हैं। एसबीआइ रिसर्च ने अपने आंकड़ों में बताया है कि दुबारा नौकरी पाने वाले या फिर से ईपीएफओ में पंजीकरण कराने वालों की संख्या 2.27 करोड़ रही। ‘नेशनल पेंशन सिस्टम’ यानी एनपीएस द्वारा जारी आंकड़ों के अनुसार वित्तवर्ष 2022-23 में 8.23 लाख नए कर्मचारी नई ‘पेंशन स्कीम’ से जुड़े हैं। इसमें राज्य सरकारों के 4.64 लाख, गैर-सरकारी क्षेत्रों के 2.30 लाख और केंद्र सरकार के 1.29 लाख कर्मचारी जुड़े। इस प्रकार ईपीएफओ और एनपीएस से जो आंकड़ों मिले, उनके अनुसार संगठित क्षेत्र में 5.2 करोड़ से ज्यादा रोजगार के अवसर सृजित हुए हैं, इनमें महिलाओं की भागीदारी लगभग 27 फीसद है।
रोजगार में कमी और वृद्धि के साथ आय में असमानता भी ‘के’ आकर वृद्धि की अवधारणा को बल देती है। ‘इंडिया रेटिंग्स ऐंड रिसर्च’ के विश्लेषण से पता चलता है कि कंपनी जगत, जिसमें उच्च आय श्रेणी के शीर्ष 50 फीसद का प्रतिनिधित्व है, उसमें वित्तवर्ष 2022 में आय 11.6 फीसद, तो वित्तवर्ष 2023 में 10.7 फीसद बढ़ी, लेकिन कम आय श्रेणी वाले कृषि ग्रामीण मजदूरों और शहरी क्षेत्रों के कुशल कामगारों की मजदूरी में या तो कोई वृद्धि नहीं हुई या घट गई। शहरी क्षेत्रों में अकुशल श्रमिकों के लिए न्यूनतम मजदूरी वित्तवर्ष 2022 में तीन फीसद घटी और वित्तवर्ष 2023 में 0.55 फीसद की कमी आई। कृषि आय, जो ग्रामीण मजदूरी का आईना होती है, वह भी वित्तवर्ष 2022 में 3.4 फीसद घटी और वित्तवर्ष 2023 में मात्र एक फीसद बढ़ी है।
संगठित और असंगठित क्षेत्र के रोजगार के आंकड़ों और विभिन्न आयवर्ग के व्यक्तियों में उपभोग उत्पादों की मांग में कमी और वृद्धि से मोटेतौर पर यही लगता है कि देश की अर्थव्यवस्था में ‘के’ आकार की वृद्धि की दिशा में है, लेकिन अगर हम समग्र रूप से स्वाधीनता के 77 वर्षों में अर्थव्यवस्था की दिशा का अध्ययन करें, तो देश में अमीर लोगों के और अमीर होने और गरीब लोगों के और गरीब होने की स्थिति आजादी से लेकर आज के दौर तक बनी हुई है। सभी सरकारों ने इस खाई को पाटने का भरसक प्रयास किया, लेकिन बढ़ती आबादी और देश की बड़ी अर्थव्यवस्था में यह खाई आज तक बनी हुई है। इस दिशा में केंद्र सरकार, राज्य सरकारों, उद्योग जगत और सभी हित धारकों के मिले-जुले गंभीर प्रयासों की जरूरत है, तभी अर्थव्यवस्था स्वस्थ विकास की दिशा में अग्रसर हो सकती है और गरीब तथा अमीर के बीच की खाई को पाटा जा सकता है।
Date: 29-08-24
डिजिटल वित्तीय क्रांति के दस सालनितेश रंजन, ( लेखक यूनियन बैंक के कार्यकारी निदेशक हैं )
प्रधानमंत्री जनधन योजना (पीएम जेडीवाई) दुनिया की सबसे बड़ी वित्तीय समावेशन पहल की आज 10वीं वर्षगांठ है। यह एक बुनियादी समावेशन परियोजना है जिसे प्रधानमंत्री के मार्गदर्शन में 2014 में शुरू किया गया था। जनधन योजना ने अर्थव्यवस्था में वित्तीयकरण, औपचारिकरण और डिजिटलीकरण के उद्देश्यों को प्राप्त करने में सहायता की है। आज जबकि 53 करोड़ से अधिक जनधन बैंक खाते खोले जा चुके हैं, भारतीय अर्थव्यवस्था में लगभग 80% वयस्कों का किसी बैंक या किसी वित्तीय संस्थान में खाता है। यह 2500 अमेरिकी डॉलर के बराबर प्रति व्यक्ति आय वाली अर्थव्यवस्थाओं के लिए वैश्विक मानदंडों की तुलना में कहीं अधिक है।
बैंक खाते खोले जाने से महिलाओं (जनधन खातों में 55% हिस्सेदारी) के साथ-साथ पिरामिड के निचले हिस्से के लोगों को भी सशक्त बनाने में मदद मिली क्योंकि सरकार
विभिन्न कल्याणकारी योजनाओं के हिस्से की सब्सिडी बिना किसी लीकेज के सीधे उन्हें प्रदान करने के लिए प्रत्यक्ष लाभ अंतरण (डीबीटी) का उपयोग किया। भारत ने तीन महत्त्वपूर्ण आयामों को साथ जोड़कर डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना कार्यनीति को सावधानीपूर्वक तैयार किया जिससे यह संभव हुआ जैसे कि जैम ट्रिनिटी और बैंक खाता (जनधन) इस ट्रिनिटी का महत्त्वपूर्ण हिस्सा था, इसके अतिरिक्त डिजिटल पहचान (आधार) और मोबाइल नंबर भी इसका हिस्सा हैं। डीबीटी के उपयोग के माध्यम से इसने राजकोषीय बचत को बढ़ावा दिया। मार्च, 2023 तक संचयी बचत 3.5 लाख करोड़ रुपये होने का अनुमान है क्योंकि सरकार लगभग 7 लाख करोड़ रुपये सालाना अंतरित करती है। ‘बैंक रहित’ लोगों के पास अब बैंक खाते तक पहुंच है और उन्हें निःशुल्क रूपे कार्ड प्रदान किया गया है जिससे अर्थव्यवस्था में नकदी के कम उपयोग को बढ़ावा मिला है। डीबीटी के 65% से अधिक लाभार्थी ग्रामीण क्षेत्रों से हैं, जिससे वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देने में जनधन की भूमिका का संकेत मिलता है।
जनधन की शुरुआत के दो साल बाद अप्रैल, 2016 में भारत में यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस या यूपीआई नामक तत्काल भुगतान प्रणाली की शुरुआत की गई जिसने खुदरा
डिजिटल भुगतानों के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। वर्तमान में यूपीआई के माध्यम से 1200 करोड़ मासिक डिजिटल भुगतान लेनदेन ने इसे विश्व स्तर पर मान्यता प्रदान की है। भुगतान / वित्तीय लेनदेन के मामले में यूपीआई क्रांति के लिए बुनियाद तैयार करके इसमें जनधन ने प्रमुख भूमिका निभाई है। जनधन और यूपीआई ने मिल कर डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना के निर्माण को बढ़ावा दिया है, जो डेटा एक्सेस या अंतर-संचालनीयता के विस्तारीकरण बनाने में सहायता प्रदान करता है, जिसका लाभ वित्तीय संस्थानों द्वारा छोटे टिकट की उधारी की ऋण हामीदारी के लिए लिया जा सकता है। इसने फिनटेक जगत में नवोन्मेषिता को भी बढ़ावा दिया है। कुल मिला कर 2014 में जनधन से शुरू हुए सुधार उसके बाद 2016 में यूपीआई और फिर 2017 में जीएसटी ने भारत को ‘विश्व में सबसे बड़ा ‘निजी डेटा – कैश’ वाला ‘डेटा संपन्न देश’ बनाने में सहायता प्रदान की है।
भारत वर्तमान में विश्व में डिजिटल क्रांति का नेतृत्व कर रहा है। डिजिटल अर्थव्यवस्था में सबसे तेज वृद्धि उचित इकोसिस्टम के माध्यम से प्राप्त हुई है जिसकी नींव 2014 में जनधन सुधार के माध्यम से रखी गई थी। डिजिटल वित्तीय इकोसिस्टम में नवीनतम जुड़ाव यूएलआई ( यूनिफाइड लेंडिंग इंटरफेस) है जो विशेष रूप से ग्रामीण और छोटे उधारकर्ताओं, जिनकी ऋण मांग अभी भी पूरी नहीं हुई है, को परेशानी रहित ऋण प्रदान करता है। यह कृषि, एमएसएमई आदि के क्षेत्र में छोटे उधारकर्ताओं के लिए वित्तीय क्रांति होगी। आरबीआई गवर्नर के अनुसार, ‘जैम- यूपीआई यूएलआई की नई ट्रिनिटी’ भारत की डिजिटल अवसंरचना यात्रा में क्रांतिकारी कदम होगी।’ बैंकिंग प्रणाली, पिरामिड के निचले हिस्से में लोगों हेतु छोटे-टिकट वाले उत्पादों के प्रावधान के माध्यम से बड़े पैमाने की अर्थव्यवस्था को प्राप्त करके उल्लेखनीय वृद्धि कर सकती है। हम डीबीटी प्राप्तियों के आधार पर क्रेडिट इतिहास / क्षमता के साथ सूक्ष्म ऋण, माइक्रो-इंश्योरेंस (जीवन, सामान्य और स्वास्थ्य बीमा के लिए पृथक और एक साथ) के साथ-साथ कम मूल्य के सुनियोजित निवेश योजना (एसआईपी) के माध्यम से सूक्ष्म-निवेश विकल्पों, सरकारी बॉन्ड में प्रत्यक्ष खुदरा भागीदारी के लिए आरबीआई के पोर्टल के माध्यम से कम टिकट निवेश जैसे उत्पादों पर विचार कर सकते हैं। बैंकों के लिए बाद वाले विकल्प विभिन्न निवेश विकल्पों को ढूंढ़ने के इच्छुक युवा आबादी की बढ़ती आकांक्षाओं को समझने का एक सुनहरा अवसर हो सकता है।
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हाल ही में नीति आयोग की नौंवी गवर्निंग काउंसिल की बैठक में 10 राज्य और केंद्र शासित प्रदेशों के प्रतिनिधि शामिल नहीं हुए। इनमें से सात ने इसका बहिष्कार किया था। इससे नीति आयोग की भूमिका सवालों के घेरे में आ गई है।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 29 जुलाई, 2024
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Date: 28-08-24
She Said, He Quit…Then?Even when women, like in Mollywood now, get a hearing, their wait for real redressal continuesTOI Editorials
Yesterday, the Association of Malayalam Movie Artists postponed its emergency meeting, before collapsing into the emergency itself. The Hema Committee report, submitted to Kerala govt in 2019, finally became public last week. Insofar as powerful vested interests are thought to have machinated the years of delay, this conspiracy theory has been reinforced by everything that is frothing up now. Sexual abuse allegations have mounted even against AMMA officebearers. Its president Mohanlal and executive committee have resigned after widespread criticism of their response to the crisis. All this churn is promising. Exposing the decay to sunlight is where the
cleaning has to begin. But it is key to remember that a rot that goes deep cannot be fixed easy or quick. It will need razor-focused, sustained work.
Who must do the heavy-lifting? Actor Prithviraj is right to underline it is govt that must follow up on the findings of the report. This includes both thorough investigation of each case and wider redressal measures, such as a tribunal to address women’s concerns as recommended by the report. The Harvey Weinstein case that has been seminal to fighting sexual abuse in entertainment industries worldwide is a reminder of how much it takes to build a legally sustainable case, but also of how much of a change pulling this off makes. US has seen justice systems improve to hear the survivors, say by a lengthening of statutes of limitations.
Another #MeToo/Weinstein legacy is how it shifted public perception of sexual assault from ‘she said he said’. Doubting accusers while protecting abusers is much less kosher even in India now. But what we have yet to see is women artistes getting exemplary justice. Deterrence depends on proportionate punishment. Whether it is Women in Cinema Collective or others standing up against widespread abuse, their costs, including lost work opportunities, still total up as higher than their wins. Only a real reversal of this equation can ensure that the bravery of everyone who has brought the cause of justice so far, is not slapped by the abuse continuing after a pause, if that.
A third Weinstein lesson is to look wider. The reckoning that was needed was not in Hollywood alone. Today, it would be disingenuous to act like sexual abuse is some Mollywood speciality. Guilds and govts have totally failed artistes here. But what about other Indian film industries? Those need their own Hema Committees to bring grim patterns into the spotlight.
Date: 28-08-24
india needs to developDoing this will help increase women’s participation in the labour forceRama V. Baru,Pallavi Gupta, [ Retired Professor of Social Medicine and Community Health, Jawaharlal Nehru University, New Delhi.Specialist Health Systems Transformation Platform,New Delhi.]
A low female labour force participation rate (FLFPR) has been the focus of the bulk of the discussion around women’s empowerment. According to the Economic Survey 2023-24, against a world average of 47.8% (2022), the FLFPR in India was 37% (2022-23). Although it increased from 23.3% in 2017-18, 37.5% of this share comprises “unpaid helpers in household enterprises”, that is, women who are not paid for the work they do, which is separate from domestic work.
Women’s active participation in the economy is crucial for reducing gender inequality. A key reason for women’s low economic participation is the disproportionately high burden of care that they shoulder within the family. This ranges from childcare to the care of other household members, including the elderly, sick, and disabled. Added to these care responsibilities is other domestic work. In India, women aged 15-64 years spend about three times more time daily than men on unpaid domestic work.
Responding to childcare needs
To increase women’s participation in the labour force, attention is now being paid to childcare. Some State governments have focused on building support services through the existing Anganwadi network. In the 2024-25 Budget, there has been a 3% increase in the Ministry of Women and Child Development’s budget for the integrated childcare and nutrition programme (Saksham Anganwadi and Poshan 2.0 scheme). The Ministry has been working towards a policy framework to address the need for childcare. Different models of community-based creches for children are operational in parts of some States, with partnership between government and non-government bodies. It would be worthwhile to review these models for replicability, financial sustainability, and scalability. A more widespread network of creches suitable to the local context and populace is required in rural, tribal, and urban areas to facilitate the participation of women in the workforce.
However, recognising only childcare needs is a limiting perspective. Women are primary caregivers across the life course of household members. Hence, for women to participate in the economy, their care responsibilities need to shift elsewhere. The demand for external support in the form of hired caregivers is rising in urban and peri-urban areas. However, there are no standardised processes for employment of such workers. Domestic workers often double up as caregivers without any training or protection for themselves. There are no minimum wages, employment standards, safety and security measures, and quality standards for care by hired workers.
Offloading responsibilities
To offload women’s care responsibilities, it is crucial to create an ecosystem that responds to the household’s care needs while protecting the rights of care workers. This ecosystem must provide for safe, quality, and affordable care by care workers who are well-trained, earn decent wages, and command dignity and respect for their work.
From the demand side, developing a needs-based assessment of the mix of care services required across age groups, socio-economic status, and geographies would be a first step. A mapping of supply-side actors and institutions must include the public, private, and non-profit sectors.
With demand for care on the rise across a family’s life course, given rising incidence of ill-health and disabilities, the availability and quality of care workers have emerged as a major policy concern. Care workers are hired directly by families or through placement agencies, nursing bureaus, hospitals, home healthcare companies, and not-for-profit organisations, among others. The more organised ones train their workers and have a multidisciplinary team to attend to the varied needs, including specialised nursing, palliative, and end-of-life care at home. However, in the absence of any standards and regulations, the availability, accessibility, affordability, and quality of these services vary across regions.
Need for policy intervention
The gap in the training, skilling, and certification of a mix of care workers required to meet the growing demand needs to be addressed. The Domestic Workers Sector Skill Council (rechristened as the Home Management and Care Givers Sector Skill Council), the Healthcare Sector Skill Council, and the National Skill Development Corporation are the apex bodies involved in the skilling and certification of different cadres of care workers. It is unfortunate that the labour-intensive and emotionally exacting care sector does not command commensurate respect, remuneration, and dignity. This is a crucial area for policy intervention.
The World Economic Forum’s report on the ‘Future of Care Economy’ highlights three perspectives. The first is seeing the care economy as an engine for increasing economic productivity. The second is from a business perspective: organisations can relate to the care economy as investors and employers. The third is from a human rights perspective that focuses on gender equality and disability inclusion.
We need a comprehensive policy that defines the care ecosystem from a life course perspective. A committee of the Ministries of Women and Child Development, Health and Family Welfare, Labour and Employment, Social Justice and Empowerment, and Skill Development and Entrepreneurship would be ideal to initiate the process.
Date: 28-08-24
नीतिगत दृढ़ता गुड गवर्नेस की पूर्व शर्त होती हैसंपादकीय
न्यू पेंशन स्कीम (एनपीएस), जिसे पिछले दस वर्षों में सरकार की दृढ़ और सुविचारित नीति माना गया था, अब अचानक सरकार ने विकल्प के रूप में एक नई स्कीम ‘यूनिफाइड पेंशन स्कीम (यूपीएस) को घोषित कर दिया है। कह सकते हैं कि कुछ बदलाव के साथ फिर से पुरानी पेंशन योजना लौट आई है। हालांकि कर्मचारी एनपीएस और यूपीएस में कोई एक योजना चुन सकते हैं। माना जा रहा है कि यह ओल्ड और न्यू पेंशन के बीच का रास्ता है, लेकिन इससे सरकार पर पड़ने वाले आर्थिक बोझ को लेकर बहस शुरू हो गई है। सवाल है कि वे सब तर्क कहां गए, जो ओल्ड पेंशन स्कीम खिलाफ देकर इसे सन् 2004 में बंद किया गया था और जिसके खिलाफ वर्तमान सरकार दस साल से चट्टान जैसी दृढ़ता दिखाती रही? यूपीएस में सरकार का सालाना खर्च 6200 करोड़ रुपए बढ़ेगा और बकाया भुगतान में अतिरिक्त 800 करोड़ रुपए खर्च होंगे। हर साल यह व्यय बढ़ता जाएगा। वर्ष 2023-24 में केंद्र ने पेंशन के मद में 2.30 लाख करोड़ और राज्यों ने 5.20 लाख करोड़ खर्च किए। भारत में सरकारी कर्मों का वेतन जीडीपी के अनुपात में दुनिया में सर्वाधिक है। आज की गवर्नेस काफी टेक्निकल तरह से काम करती है, लिहाजा लेटरल एंट्री की योजना गवर्नेस में गत्यात्मकता (डाइनेमिज्म) लाती, लेकिन थोड़े विरोध के बाद इसे भी रोक दिया गया। कई फैसलों पर सरकार का यू-टर्न सवाल खड़े करता है। मसलन तीन किसान बिलों को वापस ले लिया गया। बजट में पेश प्रॉपर्टी गेन टैक्स/इंडेक्सेशन वापस लिया । वक्फ बिल जेपीसी भेजना, ब्रॉडकास्ट बिल मुल्तवी करना, डेटा प्रोटेक्शन बिल, भूमि अधिग्रहण बिल को भी वापस लेना क्या कहता है? गवनेंस में नीतियां गंभीर चिंतन और दूरदृष्टि से बनी होती हैं। सरकार को विचार करना होगा।
Date: 28-08-24
पंथनिरपेक्ष नागरिक संहिता का समयए. सूर्यप्रकाश, ( लेखक संवैधानिक मामलों के जानकार एवं वरिष्ठ स्तंभकार हैं )
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी लाल किले की प्राचीर से बड़ी-बड़ी घोषणाएं करते आए हैं। इसी कड़ी में इस बार उन्होंने ‘सेक्युलर’ सिविल कोड का उल्लेख किया कि संवैधानिक सिद्धांतों और उच्चतम न्यायालय के निर्देशों के अनुरूप ऐसी संहिता बनाई जाए। उनका यह रेखांकित करना भी उतना ही महत्वपूर्ण रहा कि वर्तमान में जो संहिता लागू है, वह सांप्रदायिक प्रकृति की है।
उनका संकेत 1955 में जवाहरलाल नेहरू सरकार के उस कानूनी सुधार की ओर था, जिसने हिंदू, सिख, जैन और बौद्ध समुदाय को तो अपने दायरे में ले लिया, मगर मुस्लिम सहित कुछ समुदायों को छोड़ दिया। हिंदू पर्सनल कानूनों में परिवर्तन के पीछे नेहरू सरकार की मंशा इन कानूनों को संहिताबद्ध करने की थी।
जहां यह काम द्रुत गति से हुआ, वहीं समान नागरिक संहिता को लेकर नेहरू सरकार ने कदम पीछे खींच लिए। संविधान सभा से ही मुस्लिम नेताओं ने इस मुद्दे पर जो दबाव बनाया, उसके आगे नेहरू सरकार ने समर्पण कर दिया। समान नागरिक संहिता की अनुपस्थिति से न्याय, समानता एवं बंधुत्व से जुड़े संवैधानिक मूल्य तिरोहित होते गए। यह नेहरू सरकार की बहुत भारी भूल थी और यदि देश में संवैधानिक-लोकतांत्रिक मूल्यों को अक्षुण्ण रखना है तो इस भूल को सुधारना ही होगा।
मजहब के आधार पर हुए देश के रक्तरंजित विभाजन के बावजूद भारत ने पंथनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक, संवैधानिक राष्ट्र की राह चुनी। यह इसीलिए संभव हो सका, क्योंकि इसमें बहुसंख्यक हिंदुओं और भारतीय धरा पर जन्मे धर्मों के अनुयायियों की सहमति थी। भारत पाकिस्तान की राह पर नहीं गया, क्योंकि हिंदू धार्मिक राज्य में विश्वास नहीं करते थे।
ऐसे में तत्कालीन राजनीतिक नेतृत्व को सुनिश्चित करना चाहिए था कि जिन्होंने भारत में रहने को तरजीह दी, विशेषकर मुस्लिम समुदाय, वे इन उदारवादी मूल्यों को आत्मसात करें। जिन्हें अपनी मजहबी परंपराएं ज्यादा प्यारी थीं, उनके लिए सरहद पार करके नवसृजित इस्लामिक देश में जाने का विकल्प खुला हुआ था।
भारत में इसे लेकर दिखाई गई हिचक का परिणाम यह निकला कि समान नागरिक संहिता अस्तित्व में नहीं आ पाई। आखिर संवैधानिक राह पर चलने वाले एक पंथनिरपेक्ष देश में मजहबी कानून कैसे प्रभावी रह गए, इसके जवाब की जड़ें 23 नवंबर, 1948 को संविधान सभा में अनुच्छेद 44 (तब यह अनुच्छेद 35 था) पर हुई बहस में छिपी हैं। इसके विरोध की शुरुआत बहस आरंभ करने वाले मोहम्मद इस्माइल साहिब के वक्तव्य से ही हो गई।
उन्होंने कहा कि पर्सनल कानूनों का पालन एक मूल अधिकार है। महबूब अली बेग साहिब बहादुर और बी. पोकर साहिब बहादुर ने उनसे सहमति जताई। बी. पोकर साहिब ने कहा, ‘यूसीसी एक दमनकारी प्रविधान है, जिसे किसी भी सूरत में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।’ हुसैन इमाम और नजीरूद्दीन अहमद भी विरोध की इस मुहिम में शामिल हो गए। इस प्रकार, समान नागरिक संहिता के मुद्दे पर उस दिन जितने भी मुस्लिम सदस्यों ने अपनी बात रखी, सभी ने उसका विरोध किया।
केएम मुंशी ने उनका प्रतिवाद किया। भारत में खोजा और कच्छी मेमन वर्ग में भारी असंतोष था कि उन पर शरीयत कानून लागू थे। मुंशी ने पूछा, ‘तब अल्पसंख्यकों के अधिकार कहां थे?’ उनका आशय इस्लाम के भीतर अल्पसंख्यक समुदायों से था, जो शरीयत कानून को मानने पर मजबूर थे। मुंशी ने कहा कि हम धर्म-पंथ को पर्सनल कानूनों से अलग करना चाहते हैं।
उन्होंने स्पष्ट कहा, ‘ये मामले (विवाह, तलाक और उत्तराधिकार आदि) धार्मिक न होकर, नितांत पंथनिरपेक्ष कानूनों के दायरे में आते हैं।’ उन्होंने कहा कि हिंदुओं ने अपने लिए संवैधानिक सिद्धांतों को आत्मसात कर लिया है। अल्लादि कृष्णास्वामी अय्यर उनसे सहमत थे। उन्होंने कहा, ‘यदि कोई समुदाय स्वयं को समय के साथ बदलने के लिए तत्पर है तो वह बहुसंख्यक (हिंदू) समुदाय ही है।’
संविधान सभा में प्रारूप समिति के प्रमुख डा. बीआर आंबेडकर ने भी मुस्लिम सदस्यों की आपत्तियों को खारिज किया। उन्होंने इस दावे की भी पोल खोली कि शरीयत कानून अपरिवर्तनीय होने के साथ ही पूरे भारत में एकसमान हैं। उन्होंने याद दिलाया कि नार्थ-वेस्ट फ्रंटियर प्राविंस में 1939 तक मुसलमानों पर शरीयत कानून लागू नहीं थे।
उत्तराधिकार आदि में वे हिंदू कानूनों का ही पालन करते थे। साथ ही, 1937 में शरीयत कानून लागू होने से पहले तक संयुक्त प्रांत, मध्य प्रांत और बांबे में हिंदू उत्तराधिकार कानून का पालन किया जाता तो मालाबार में मुसलमान हिंदू मातृसत्तात्मक कानून का पालन करते थे। इसलिए, उन्हें मुस्लिम सदस्यों के सभी संशोधनों को खारिज करना पड़ा।
स्वतंत्र भारत के आरंभिक वर्षों में राष्ट्रीय नेतृत्व ने जिस भीरुता का परिचय दिया, उसकी कीमत भारत को आज भी चुकानी पड़ रही है। सुप्रीम कोर्ट ने बार-बार इस मुद्दे को छेड़ते हुए समान नागरिक संहिता की आवश्यकता पर जोर दिया है। ऐसे मामलों में न्यायाधीशों ने कहा, ‘जब देश के 80 प्रतिशत से अधिक नागरिक पहले ही संहिताबद्ध पर्सनल कानूनों के दायरे में लाए जा चुके हैं तो शेष अन्य को इससे बाहर रखने और सभी नागरिकों के लिए समान नागरिक संहिता लाने के फैसले को स्थगित रखने का कोई औचित्य नहीं।’
शीर्ष अदालत की यह टिप्पणी भी उतनी ही समीचीन है कि हिंदुओं के साथ-साथ सिखों, बौद्धों और जैनियों ने ‘राष्ट्रीय एकता और एकीकरण के लिए अपनी भावनाओं के साथ समझौता कर लिया’, लेकिन कुछ अन्य समुदायों की ऐसी मंशा नहीं। वह भी तब जब संविधान पूरे भारत के लिए एक ‘समान नागरिक संहिता’ का निर्देश देता है। इसलिए प्रधानमंत्री मोदी का कहना पूरी तरह उपयुक्त है कि समय आ गया है कि हम ‘सेक्युलर कोड’ यानी पंथनिरपेक्ष नागरिक संहिता की दिशा में आगे बढ़ें।
इस राह में हमें सुनिश्चित करना होगा कि मजहबी भावनाएं संवैधानिक मूल्यों-प्रविधानों की राह में अवरोध न बनें। जब भी मजहबी बातों और संविधान के बीच विकल्प चुनने की बारी आए तो सदैव संविधान को प्राथमिकता दी जानी चाहिए। सीधे और सरल शब्दों में कहें तो संविधान ही सर्वोच्च है। कुछ इसी प्रकार का संदेश स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री के भाषण से झलका। भारत के संविधान की सर्वोच्चता को सुनिश्चित करने के लिए समान नागरिक संहिता को हर हाल में लागू किया ही जाना चाहिए।
Date: 28-08-24
ऋण देने में आसानीसंपादकीय
भारतीय रिजर्व बैंक एक प्रायोगिक परियोजना के बाद आने वाले समय में देशव्यापी स्तर पर एक नया यूनिफाइड लेंडिंग इंटरफेस अथवा यूएलआई जारी करने की तैयारी कर रहा है। इस प्लेटफॉर्म की मदद से अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों में ऋण बढ़ाया जाएगा, खासकर कृषि और सूक्ष्म लघु एवं मध्यम उपक्रमों (एमएसएमई) क्षेत्र में।
एक बार क्रियान्वयन होने के बाद इसमें इतनी क्षमता है कि यह ऋण क्षेत्र के परिदृश्य को यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस यानी यूपीआई की तरह बदलकर रख दे। यूपीआई से डिजिटल भुगतान के क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव आया।
हाल ही में ‘डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर ऐंड इमर्जिंग टेक्नॉलॉजीज’ विषय पर आयोजित आरबीआई@90 ग्लोबल कॉन्फ्रेंस में रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास ने इस बात को रेखांकित किया कि यूएलआई प्लेटफॉर्म विभिन्न डेटा सेवा प्रदाताओं से कर्जदाताओं तक डिजिटल सूचना का अबाध और सहमति आधारित प्रवाह सुनिश्चित करेगा। ध्यान देने वाली बात है कि यूएलआई ढांचा विभिन्न स्रोतों से हासिल सूचनाओं तक डिजिटल पहुंच सुनिश्चित करेगा। इससे कर्जदाताओं को संभावित कर्जदारों की ऋण पात्रता के बारे में सही सूचना मिल सकेगी।
यह उम्मीद भी है कि ऋण मंजूरी और वितरण में लगने वाले समय में कमी आएगी। ऋण की अबाध आपूर्ति और बिना गहन दस्तावेजीकरण के सहजता से काम होने से कर्जदारों और कर्जदाताओं दोनों को लाभ होगा। शासन की गुणवत्ता में सुधार करने की एक कोशिश में भारत ने अपनी डिजिटल सार्वजनिक अधोसंरचना (डीपीआई) का सही उपयोग किया है। इसमें जनधन खाते, आधार और मोबाइल फोन के साथ यूपीआई भी शामिल है।
यूएलआई देश में डीपीआई के सफर में सबसे नया हिस्सेदार बनने को तैयार है। छोटी कंपनियों द्वारा निजी निवेश को बढ़ाने तथा आम घरेलू खपत को गति देने के लिए भारत को एक विकसित ऋण बाजार की आवश्यकता है। बीते सालों के दौरान ऋण की मांग में निरंतर इजाफा हुआ है। उदाहरण के लिए 2021 और 2022 को मिलाकर देखें तो न्यू टु क्रेडिट (एनटीसी यानी नया ऋण लेने वाले) लोगों की संख्या 6.6 करोड़ रही। इसमें से 67 फीसदी लोग ग्रामीण और अर्द्धशहरी इलाकों से थे। इसके बावजूद आम परिवारों और एमसएमई को ऋण की उपलब्धता सीमित बनी रही।
ऋण की मांग और आपूर्ति में लगातार अंतर बना रहा है। इसके पीछे कई वजह हो सकती हैं, मसलन कर्जदारों का ऋण जोखिम प्रोफाइल, जोखिम आकलन के लिए अपर्याप्त आंकड़े, सेवा की ऊंची लागत, खासकर ग्रामीण इलाकों में जहां लोग निजी खपत के लिए कम मूल्य का कर्ज लेते हैं।
ईवाई द्वारा गत वर्ष जारी एक रिपोर्ट में दिखाया गया कि देश में एमएसएमई ऋण की पहुंच, खुदरा ऋण की पहुंच और क्रेडिट कार्ड की पहुंच क्रमश: 14 फीसदी, 11 फीसदी और चार फीसदी है। इस संबंध में यूएलआई कर्जदाताओं को उपभोक्ताओं के तमाम वित्तीय और गैर वित्तीय आंकड़े मुहैया कराएगा और डिजिटल ढंग से कर्ज देना संभव होगा। पूरी तरह पारंपरिक ऋण और आय वक्तव्यों पर विचार करने के बजाय कर्जदाताओं को अतिरिक्त आंकड़ों और उन्नत एलगोरिद्म तक पहुंच कराई जाएगी जिससे जोखिम का आकलन किया जा सके। उदाहरण के लिए भौतिक परिसंपत्ति स्वामित्व, जमीन के रिकॉर्ड, जियोलोकेशन टैगिंग और डिजिटल छाप की ट्रैकिंग से संभावित कर्जदार की ऋण पात्रता का संकेत मिल सकता है।
कुल मिलाकर डिजिटल ऋण उद्योग मजबूत वृद्धि की ओर अग्रसर है। डिजिटल चैनलों के माध्यम से ऋण वितरण कुल वितरण में अच्छी खासी हिस्सेदारी रहेगी। परंतु इसके साथ ही बैंकिंग तंत्र के भीतर आंतरिक समायोजन करना होगा ताकि इस प्लेटफॉर्म का लाभ लिया जा सके।
उदाहरण के लिए बैंकिंग तंत्र में ऋण और जमा वृद्धि के बीच भारी अंतर है। जमा वृद्धि कुछ समय से ऋण वृद्धि से पीछे चल रही है। बैंकों को जमा जुटाने की जरूरत है तभी वे मजबूत ऋण वृद्धि बरकरार रख सकेंगे। इसके अलावा रिजर्व बैंक को भी बैंकों और गैर बैंकिंग वित्तीय कंपनियों के ऋण व्यवहार पर नजर रखनी होगी। गत वर्ष उसने ऋण वृद्धि में नियंत्रण रखने के लिए कुछ क्षेत्रों के ऋण में जोखिम भार को बढ़ाया था।
Date: 28-08-24
भय के वातावरण में जीती स्त्रियांमोनिका शर्मा
हमारे समय का पीड़ादायी सच यह है कि देश में किसी भी आयु वर्ग की बेटियां सुरक्षित नहीं हैं। कुत्सित सोच का घेरा, स्कूल-कालेज से लेकर घर के आंगन तक हर कहीं बेटियों के आसपास बना हुआ है। कैसी विडंबना है कि शिक्षा के पहले पड़ाव पर ही लाडलियां शोषण का शिकार हो रही हैं और मेहनत के बल पर कुछ बन जाने वाली बेटियां भी। हरियाणा के जींद जिले के एक गांव, बंगाल की राजधानी कोलकाता और महाराष्ट्र के बदलापुर में हुई घटनाएं हमारे समाज में स्त्री देह के प्रति मौजूद विकृत सोच को उजागर करती हैं।
ये घटनाएं दिशाहीन सोच की ऐसी बर्बरता की बानगी हैं, जिसमें अपराधी शारीरिक शोषण के बाद स्त्री देह को क्षत-विक्षत करने से भी नहीं चूकते। हरियाणा के जींद जिले के एक निजी विद्यालय में प्रधानाचार्य ने बाथरूम में दस साल की बच्ची का यौन उत्पीड़न किया। कोलकाता के एक सरकारी अस्पताल में संदिग्ध परिस्थिति में मेडिकल छात्रा का शव बहुत बुरी हालत में मिला, जिस पर यौन हिंसा और प्रताड़ना के गहरे निशान थे।
गौरतलब है कि जींद में चौथी कक्षा की दस वर्षीय छात्रा को स्कूल का प्रधानाचार्य स्कूल का नया भवन दिखाने के बहाने साथ ले गया और उसका यौन उत्पीड़न किया। उसके बाद डरा-धमका कर उसे घर भेज दिया। बच्ची ने बताया कि स्कूल प्रिंसिपल उससे पहले भी कई बार छेड़छाड़ कर चुका है। जिससे वह काफी परेशान थी। कोलकाता में एक मेडिकल कालेज परिसर में स्नातकोत्तर कर रही छात्रा के साथ बलात्कार के बाद उसकी हत्या कर दी गई। जांच से पता चला है कि उसे बहुत बुरी तरह और बर्बरता से मारा-पीटा भी गया था।
अभी इन घटनाओं का गुस्सा शांत भी न हुआ था कि महाराष्ट्र के बदलापुर में करीब चार वर्ष की दो बच्चियों के यौन शोषण का मामला उजागर हो गया। ये घटनाएं बेटियों की सुरक्षा से जुड़े चिंताजनक हालात और स्त्री देह के प्रति कुत्सित सोच का पर्दाफाश करती हैं। कैसी विडंबना है कि चार वर्ष की या चौथी कक्षा की छात्रा हो या चिकित्सा विज्ञान में स्नातकोत्तर की पढ़ाई कर रही बेटी, सुरक्षा के मामले में उन्हें नकारात्मक परिस्थितियों से जूझना पड़ता है। कुत्सित मानसिकता के चलते एक बेटी का जीवन ही छिन गया। दूसरी बच्चियों का मन सदा के लिए भय और वेदना से भर गया।
सवाल है कि आखिर हमारे परिवेश में क्या बदला है? आज भी स्कूल-कालेज से लेकर समाज के हर हिस्से तक, बेटियों का जीवन असुरक्षित है। राष्ट्रीय अपराध रेकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2016 से 2022 तक बच्चों के यौन उत्पीड़न के मामले 96 फीसद बढ़े हैं। घर के आंगन से लेकर कामकाजी दुनिया तक, समानता के लिए जद्दोजहद कर रही स्त्रियों का जीवन जब पहले ही पड़ाव पर असुरक्षित है, तो भविष्य की रूपरेखा कैसी होगी?
इन सभी मामलों को जोड़कर देखा जाए तो समझा जा सकता है कि महिलाओं के अस्तित्व को आंकने-समझने और स्वीकार करने की सोच ही नदारद है। बहुत से लोगों में स्त्री को एक देह से आगे देखने की समझ आज भी नहीं आई है। शिक्षा और सजगता के बावजूद बेटियों के शोषण के मामलों पर लगाम नहीं लग पा रही है। मासूम बच्चियां हों या कामकाजी महिलाएं, भय के घेरे में जीने को विवश हैं। यहां तक कि तकनीक की तरक्की से मिली सुविधाएं भी शोषण का हथियार बन रही हैं।
हालात ऐसे बन गए हैं कि महिलाएं और लड़कियां हर समय, हर जगह, एक डर से जूझती हैं। सिमटी-सहमी जिंदगी जीती हैं। कोलकाता, बदलापुर और जींद जैसी घटनाएं इस डर को और विस्तार देती हैं। समझना जरूरी है कि महिलाओं और लड़कियों पर ही नहीं, उनके परिजनों पर भी ऐसी पीड़ादायी घटनाओं का गहरा असर पड़ता है। स्वयं महिलाएं तो अल्पकालिक और दीर्घकालिक गंभीर शारीरिक, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक उलझनों से जूझती ही हैं। ऐसी परिस्थितियां समाज के पूरे तानेबाने को प्रभावित करती हैं। दुर्भाग्यपूर्ण यह भी है कि शोषण और दुर्व्यवहार के अधिकतर मामलों में न्यायिक शिथिलता भी देखने को मिलती है।
गौरतलब है कि करीब छह वर्ष पहले गृह मंत्रालय द्वारा देश में महिला सुरक्षा के नियमों को शक्तिशाली बनाने के लिए ‘महिला सुरक्षा प्रभाग’ स्थापित किया गया। इसे समग्र रूप से न्याय के मोर्चे पर सक्रियता और प्रशासन के माध्यम से प्रभावी कदम उठाने के उद्देश्य से गठित किया गया, ताकि महिलाओं के लिए एक सुरक्षित वातावरण बनाने और देश की आधी आबादी के मन में सुरक्षा की भावना पैदा करने में मदद मिल सके। यह मुख्य रूप से राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की सहायता हेतु नीति निर्माण, आपसी समन्वय, परियोजनाओं और योजनाओं को लागू करने से जुड़ा प्रभाग है, जिसमें आपराधिक न्याय प्रणाली में सूचना प्रौद्योगिकी और तकनीक का इस्तेमाल बढ़ाकर फोरेंसिक विज्ञान, अपराध और आपराधिक रेकार्ड के लिए एक सहायक व्यवस्था को मजबूत बनाना शामिल है। बावजूद इसके, न्यायिक शिथिलता जारी है।
बहुत से मामलों में तो आरोपी को दोषी साबित करना ही कठिन होता है। दुर्दांत अपराधी भी कानून के शिकंजे से छूट जाते हैं। ऐसी घटनाएं भी प्रकट हैं, जिनमें व्यवस्था के ढुलमुल रवैए का लाभ उठाकर छूटे अपराधी फिर से बर्बर अपराध कर देते हैं। ऐसे हालात सामाजिक परिवेश और सामुदायिक सहभागिता के भाव को भी ठेस पहुंचाते हैं। पारिवारिक व्यवस्था के लिए मनोवैज्ञानिक आघात होते हैं। अकादमिक और कामकाजी मोर्चे पर स्वयं को साबित करने में जुटी बेटियों और महिलाओं के पांवों की बेड़ी बनते हैं। गौरतलब है कि राष्ट्रीय अपराध रेकार्ड ब्यूरो की वर्ष 2024 की रपट में पिछले वर्ष के मुकाबले आपराधिक घटनाओं में आई 0.56 फीसद की मामूली गिरावट के बावजूद देश में बलात्कार के मामलों में 1.1 फीसद और अपहरण की घटनाओं में 5.1 फीसद की वृद्धि हुई है। रपट में सबसे ज्यादा अपराध दर वाले प्रांतों में उत्तर प्रदेश, केरल, महाराष्ट्र, दिल्ली और बिहार शामिल हैं।
राष्ट्रीय अपराध रेकार्ड ब्यूरो के ताजा अध्ययन के अनुसार देश में महिलाओं और बच्चों के विरुद्ध होने वाले अपराध चिंता का विषय बने हुए हैं। विशेषकर यौन उत्पीड़न और बाल शोषण जैसे अपराध बड़ी समस्या हैं। विचारणीय है कि किसी भी समाज में स्त्रियों और बच्चों की स्थिति वहां की आर्थिक उन्नति और सामाजिक खुशहाली से भी जुड़ी होती है। हाल के वर्षों में तो आर्थिक मोर्चे पर भी महिलाओं ने अहम भूमिका दर्ज काराई है। विज्ञान से लेकर खेल की दुनिया तक बहुत-सी उपलब्धियां हासिल कर देश का मान बढ़ाया है।
दुर्भाग्यपूर्ण है कि बेहतरी की ओर कदम बढ़ाने में जुटी महिलाओं के लिए भय, अविश्वास और असुरक्षा के हालात बने हुए हैं। स्कूल की बच्चियां हों या कामकाजी महिलाएं, मन-जीवन की सहजता के हालात नहीं बन पाए हैं। हमारे देश में आज भी आधी आबादी संविधान में वर्णित व्यक्तिगत स्वतंत्रता और सुरक्षा के अधिकार के लिए जूझ रही है।
Date: 28-08-24
शांति की पहलसंपादकीय
दुनिया के सभी मानवतावादी, शांतिप्रेमी और युद्धविरोधियों की निगाहें इस्राइल-फिलिस्तीन और रूस- यूक्रेन के बीच जारी संघर्ष की और लगी हुई हैं। वर्तमान में दोनों क्षेत्र युद्धग्रस्त हैं और हाल की घटनाओं से यह नहीं लगता कि आने वाले दिनों में यहां स्थिरता और शांति कायम हो सकती है। पिछले रविवार से इस्राइल और फिलिस्तीन समर्थक लेबनान के हिजबुल्लाह के बीच तनाव एक बड़े संघर्ष में बदलता दिखाई दे रहा है। दोनों युद्धरत पक्षों ने एक-दूसरे पर हमले किए। विडंबना यह है कि ये हमले ऐसे समय हुए हैं जब मिस्र की राजधानी काहिरा में दोनों पक्षों के बीच युद्ध समा करने के लिए वार्ता हो रही है। रविवार को इस्राइल ने हिजबुल्लाह के लड़ाकुओं से खतरे की आशंका में उसके ठिकानों पर हवाई हमले किए जिसके तुरंत बाद हिजबुल्लाह ने इस्राइल पर ड्रोन से हमले किए। अभी इस बात का ठीक से पता नहीं चल पाया है कि इन हमलों से दोनों पक्षों को -माल का कितना नुकसान हुआ। लेकिन दोनों पक्षों की ओर से आग भड़काने वाली कार्रवाइयां पश्चिमी एशिया के लिए अच्छा संकेत नहीं हैं। रविवार की घटना से दोनों पक्षों के बीच युद्धविराम की कोशिशों को झटका लगा है, लेकिन पश्चिमी देश विशेषकर अमेरिका आशान्वित हैं कि आगामी कुछ दिनों में युद्धविराम के लिए होने वाली वार्ता दोबारा शुरू हो सकती है। वार्ता में शामिल अधिकारियों का विश्वास है कि युद्धविराम और बंधकों की रिहाई के जिन मुद्दों पर मतभेद हैं उन्हें सुलझाने की कोशिशें जारी हैं। वास्तव में अमेरिका और पश्चिमी देशों के लिए जरूरी हो गया है कि इस्राइल पर युद्धविराम के लिए दबाव डालना चाहिए। दूसरी ओर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की यूक्रेन से वापसी से मात्र 72 घंटे के बाद रूस ने यूक्रेन पर बड़ा हमला करके शांति के प्रयासों को एक सिरे से नकार दिया। माना जा रहा है कि रूस का यूक्रेन पर यह अब तक का सबसे बड़ा जवाब हमला है। प्रधानमंत्री मोदी जब ‘शांति दूत’ बनकर यूक्रेन जाने वाले थे उसी समय अनुमान लगाया जा चुका था कि इस यात्रा का क्या हश्र होगा। लेकिन भारत शांतिप्रेमी देश है। जाहिर है शांति के पक्ष में यात्रा का जोखिम उठाना अपरिहार्य था। अब प्रधानमंत्री मोदी ने यूक्रेन की स्थिति पर जो बाइडन से बात करके शांति के लिए नई पहल की है। अब आगे देखना है कि इस पहल के क्या नतीजे सामने आते हैं।
Date: 28-08-24
उत्पीड़न के दानव का कैसे हो दमनसंपादकीय
देश में उत्सवों और त्योहारों का दौर चल रहा है, पर बार-बार कोलकाता कांड की खबरें सुर्खियों में आ-जा रही हैं। डॉक्टरों और युवाओं की नाराजगी का दौर थम नहीं रहा है। एक प्रशिक्षु डॉक्टर के साथ अस्पताल में हुई बर्बरता का गहरा साया नौजवानों को सता रहा है। आक्रोश इस तरह फूटा है कि सर्वोच्च न्यायालय को भी खुद संज्ञान लेकर निर्देश जारी करने पड़े हैं।
समाचार-पत्रों में बलात्कार, यौन उत्पीड़न की घटनाओं की प्रचुरता हो गई है। असम में 14 वर्षीय लड़की का गैंगरेप, बदलापुर (महाराष्ट्र) में अबोध बच्चियों का त्रासद प्रकरण, अन्य स्थान पर 70 वर्षीय बुजुर्ग महिला से बलात्कार और स्पेनिश पर्यटक का छत्तीसगढ़ में गैंगरेप। उधर, हेमा रिपोर्ट के बाद केरल के फिल्म उद्योग में महिला कलाकारों के शोषण का मामला सुर्खियां बटोर रहा है। ये सब घटनाएं सोचने को मजबूर करती हैं कि क्या किसी भी उम्र की लड़कियां या महिलाएं सुरक्षित हैं? स्कूल, सड़क, बस, अस्पताल, यहां तक कि कई बार अपने घर में भी क्या महिलाएं सुरक्षित हैं?
क्या हमारा अमृत काल आधी आबादी, यानी महिलाओं की सुरक्षा के बिना साकार हो सकता है? भौतिक, आर्थिक व औद्योगिक विकास तो सामाजिक विकास या सुरक्षा के बिना अधूरा है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार, प्रत्येक 16 मिनट में देश में एक बलात्कार होता है और प्रत्येक घंटे महिलाओं के विरुद्ध 50 अपराध होते हैं। प्रत्येक दिन देश में 86 बलात्कार रिपोर्ट होते हैं। यह भी कहा जाता है कि सभी अपराधों में बलात्कार सबसे कम रिपोर्ट होता है और 63 प्रतिशत बलात्कार तो दर्ज ही नहीं होते। 10 प्रतिशत बलात्कार अवयस्क, यानी 18 वर्ष से कम उम्र की लड़कियों के साथ होते हैं और 89 प्रतिशत मामलों में बलात्कारी जान-पहचान का व्यक्ति होता है। यह बिंदु भी विचारणीय है कि बलात्कार के आंकड़ों में वे प्रकरण सम्मिलित नहीं हैं, जिनमें बलात्कार का प्रयास होता है या बलात्कार के उपरांत हत्या की जाती है। मतलब, महिला विरोधी कुल अपराधों की संख्या बहुत ज्यादा है। ये केवल आंकड़े नहीं हैं। प्रत्येक आंकड़े के पीछे एक बच्ची या महिला का पूरा जीवन है और उसका परिवार है। बहुत आक्रोश जताने के कुछ ही समय बाद शोषण की शिकार महिला को लोग भूल जाते हैं। अनेक पीड़िताएं मनोवैज्ञानिक रूप से पंगु हो जाती हैं। एक ही तो जीवन है, जो हमेशा के लिए बोझ बन जाता है। परिवार की त्रासदी भी असहनीय हो जाती है।
निर्भया मामले के बाद शासन ने बालिकाओं के लिए बहुत प्रयास किए हैं शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वावलंबन के प्रयास, गुड टच या बेड टच, चाइल्ड हेल्पलाइन, वूमेन पावर लाइन, चौबीस घंटे चलने वाले सहायक कॉल सेंटर, महिला हेल्प डेस्क, महिला थाना, पिंक बूथ, जनपद स्तर पर महिला व बाल सुरक्षा संबंधित प्रकोष्ठ इत्यादि के बावजूद बलात्कार व यौन उत्पीड़न के वाकये सुरसा के मुख की तरह बढ़ते जा रहे हैं और उनकी जघन्यता भी। इसलिए आवश्यक है कि बलात्कार क्यों होते हैं, इस पर भी विचार किया जाए।
बलात्कार के संदर्भ में सामाजिक-सांस्कृतिक मुद्दों के संबंध में, रेश्मा पिल्लै आदि ने युवा पुरुषों के बीच सर्वेक्षण किया। इस अध्ययन में पाया गया कि हमारा समाज अभी भी पुरुष प्रधानता की संकीर्णता से ग्रसित है। आज के युग में जब सबके पास मोबाइल है, तो घातक अश्लीलता भी सभी तक पहुंच रही है। समस्या और भी विकराल होती जा रही है। बाल्यकाल में दुर्व्यवहार का सामना करना, रिश्तों के बारे में नकारात्मक सोच, भावनाओं पर कमजोर नियंत्रण, मादक द्रव्यों के अत्यधिक सेवन, यौन कुंठा या असंतोष आदि कारक विभिन्न अनुपातों में मिलकर बलात्कार की मनोवैज्ञानिक पृष्ठभूमि बना सकते हैं। महिलाओं की इच्छाओं और जरूरतों के बारे में पुरुष की गलत धारणा भी कारण हो सकती है। ऐसे पुरुष बहुत हैं, जो महिला की न को भी हां समझते हैं। हमारी अनेक फिल्में भी महिलाओं को छेड़ने और उनको घेरकर जबरन अपनी भावनाओं का थोपने के लिए प्रेरित करती हैं। ऐसे पुरुष अविवाहित, तलाकशुदा या विधवा महिलाओं को बरगलाने की कोशिश करते हैं।
जब समाज में स्त्री को वस्तु की तरह देखा जाता है, तब हिंसा और बलात्कार की आशंकाएं बढ़ जाती हैं। सामाजिक व नैतिक मूल्यों का पतन द्रुत गति से हो रहा है। हमारे पूर्वजों की प्राथमिकता क्रमश: ऐसी थी – समुदाय – परिवार – मैं। आज यह बिल्कुल उल्टी होती जा रही है। जब हम केवल अपने बारे में ही सोचेंगे, अपनी इच्छा, अपनी शक्ति, अपनी पूर्ति पर ही ध्यान देंगे, तो परिणाम भयानक होंगे और इस सामाजिक अराजकता से अंतत: कोई भी अछूता नहीं रहेगा। स्कूलों के बारे में विशेष रूप से सोचना होगा। जब शिक्षक ही भक्षक बन जाए, तो क्या विद्योपार्जन होगा?
हमारी सोच और मानसिकता हमारे कार्यस्थल पर भी हमारे साथ जाती है। कुछ वर्ष पहले एक थाने के निरीक्षण में पुरुष प्रधान मानसिकता का दृष्टांत मुझे देखने को मिला। एक नाबालिग लड़की के लापता होने की शिकायत पर दो दिन तक संबंधित कांस्टेबल ने कोई कार्रवाई नहीं की थी। उत्तर था कि कदाचित वह लड़की भाग गई होगी और कुछ दिन में वापस आ जाएगी। सवाल यह है कि यदि उस कांस्टेबल की अपनी लड़की दो दिन से लापता होती, तो भी क्या उसकी यही सोच होती? नियम, कानून, व्यवस्था पर्याप्त हैं, जरूरत है संवेदनशील पुलिसिंग की।
गौर कीजिए, बलात्कार के प्रकरण में जांच की मियाद दो महीने निश्चित है, पर वास्तव में इस समय सीमा में कितनी जांच हो पाती हैं? निर्भया प्रकरण में ही फास्ट ट्रैक कोर्ट के बावजूद फांसी होने में 12 वर्ष लग गए। पॉक्सो एक्ट के तहत एक वर्ष में सुनवाई पूरी हो जानी चाहिए, परंतु 87 प्रतिशत मामले साल भर बाद भी लंबित रहते हैं। केवल 10 प्रतिशत मामलों का एक साल में निपटारा होता है और उनमें भी केवल 20 प्रतिशत मामलों में ही दोष सिद्ध हो पाता है।
मतलब, महिला सुरक्षा के लिए अनेक स्तर पर सुधार व प्रबंध की जरूरत है। अपने परिवार, कार्यस्थल में पुरुष प्रधान संकीर्णता की सोच में बदलाव करें। पीड़िता की मदद करें। यौन उत्पीड़न करने वालों और उनके परिवार का सामाजिक बहिष्कार करें, चाहे वह हमारे रिश्तेदार या मित्र ही क्यों न हों। याद रहे, रिश्तों, दोस्ती, जाति, राजनीति, विचारधारा, चाहे जिस भी आईने से देखने की कोशिश कीजिए, बलात्कार सिर्फ बलात्कार होता है और उसका आरोपी अक्षम्य।
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भारत में उच्च शिक्षा में दुनिया का नेतृत्व करने की क्षमता है। लेकिन इसके लिए शिक्षा में गुणवत्ता चाहिए। गुणवत्ता के लिए हमारे शैक्षिक संस्थानों में (1) संकाय की गुणवत्ता (2) वित्तीय मॉडल और (3) शासन के मुद्दे को संबोधित किया जाना चाहिए।
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‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित वी. रामगोपाल राव के लेख पर आधारित। 4 अगस्त, 2024
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Date:27-08-24
No more delaysCaste enumeration should not hold the Census from being undertaken quicklyEditorial
In what can only be a case of muddying the waters, the Union government is reportedly mulling the expansion of data collection in the long-delayed Census to include caste enumeration. That caste may be one of the variables in the Census could be an outcome of the strident demand for a caste census by several political parties. But considering the incomplete and poorly constructed nature of the Socio-Economic and Caste Census of 2011, which resulted in data that were unwieldy, inaccurate, and hence unusable, the government must not hurry into utilising the office of the Registrar General and other agencies to tabulate caste. There must first be a definite time frame to conduct the Census on a war footing. If the delay is deliberate, in order to allow for delimitation to be conducted first in 2026, this will be harmful not just to public policy but also to relations with States. As of June 2024, out of 233 countries, India was one of 44 not to have conducted the Census this decade. The ostensible reason provided by the Union Home Ministry was delay due to the COVID-19 pandemic, but 143 other countries conducted the Census after March 2020, which marked the onset of the pandemic. India shares this dubious distinction of not having a Census with countries affected by conflict, economic crises or turmoil such as Yemen, Syria, Afghanistan, Myanmar, Ukraine, Sri Lanka and in sub-Saharan Africa.
There remains little excuse to continually delay the decennial Census, an exercise that has been conducted without fail from 1881 to 2011. Yet, the deadline to freeze administrative boundaries of districts, tehsils, towns and municipal bodies — a prerequisite before the conduct of the Census — lapsed on June 30 this year. This deadline has been extended 10 times since 2019. Several public schemes such as the National Food Security Act, the National Social Assistance Programme and the delimitation of constituencies are dependent upon the Census being conducted. Besides, statistical surveys that go into setting policy such as those related to household and social consumption, the National Family Health Survey, the Periodic Labour Force Survey, and the Sample Registration System, among others, use the Census to set their sampling frames. With the 2011 Census data getting increasingly out-dated and phenomena such as migration across and within States, the urbanisation of Indian societies, and the suburbanisation of cities becoming increasingly prominent in recent years, the lack of a Census is telling. The reliance on a bevy of sample surveys to fill in the gap is only resulting in debates over methodology and conclusions based on cherry-picking according to one’s political choice. Clearly, the Union government must stop being derelict in its duties and should proceed with the Census quickly.
Date:27-08-24
बीच का रास्तासंपादकीय
केंद्रीय मंत्रिमंडल ने सरकारी कर्मचारियों के लिए एक नई पेंशन योजना को गत सप्ताह मंजूरी प्रदान की जिसे यूनिफाइड पेंशन सिस्टम (यूपीएस) का नाम दिया गया है। इसे 1 अप्रैल, 2025 से लागू किया जाएगा। इससे उन सरकारी कर्मचारियों को लाभ मिलेगा जिन्होंने 1 जनवरी, 2024 के बाद नौकरी शुरू की है तथा जो न्यू पेंशन स्कीम (एनपीएस) में शामिल हैं। यूपीएस के तहत केंद्र सरकार के कर्मचारियों को सेवानिवृत्ति के पहले के 12 महीनों के औसत मूल वेतन के 50 फीसदी के बराबर पेंशन मिलेगी। इसके लिए शर्त है कि कर्मचारी ने न्यूनतम 25 वर्षों की सेवा अवधि पूरी की हो। कम अवधि तक नौकरी करने वालों की पेंशन कम होगी लेकिन इसके लिए कम से कम 10 साल नौकरी करना जरूरी होगा। न्यूनतम 10 वर्ष नौकरी करने वाले कर्मचारियों को 10,000 रुपये की सुनिश्चित मासिक पेंशन प्रदान की जाएगी। यूपीएस में परिवार पेंशन भी मिलेगी तथा महंगाई का भी ध्यान रखा जाएगा। यूपीएस को मंजूरी मिलने के साथ ही सरकार ने पुरानी पेंशन योजना और नई पेंशन योजना की विशेषताओं को मिलाकर बीच का रास्ता निकालने की कोशिश की है।
पेंशन का मसला कुछ राज्यों में हाल में हुए विधानसभा चुनावों में राजनीतिक रूप से भावनात्मक रहा है। राजस्थान, छत्तीसगढ़ और पंजाब जैसे कुछ राज्यों ने जहां उस समय राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन की सरकार नहीं थी, वापस पुरानी पेंशन योजना अपना ली। इसकी वजह से भविष्य की पीढ़ियों पर पेंशन का बोझ पड़ेगा। उधर केंद्र सरकार ने तत्कालीन वित्त सचिव टीवी सोमनाथन के अधीन एक समिति का गठन किया था ताकि इस विषय की पड़ताल की जा सके ओपीएस के उलट जहां यूपीएस के तहत मिलने वाले लाभ परिभाषित होंगे, वहीं इसमें एनपीएस की तरह सुनिश्चित योगदान भी करना होगा। कर्मचारी यूपीएस में अपने मूल वेतन का 10 फीसदी और महंगाई भर्ती का योगदान जारी रखेंगे सरकार अब एनपीएस में 14 फीसदी के स्थान पर इसमें 18.5 फीसदी का योगदान करेगी। पहले वर्ष में इस अतिरिक्त योगदान का बोझ करीब 6,250 करोड़ रुपये होगा जबकि एकबारगी बकाये के रूप में 800 करोड़ रुपये की राशि खर्च होगी। जिन लोगों ने एनपीएस की शुरुआत के बाद स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति ले ली हैं उन्हें यूपीएस को अपनाने का विकल्प मिलेगा। यह योजना राज्य सरकारों के कर्मचारियों के लिए भी उपलब्ध होगी।
केंद्र सरकार ने सरकारी कर्मचारियों के बीच पेंशन को लेकर व्याप्त अनिश्चितता को दूर करने की कोशिश की है। सुनिश्चित पेंशन के साथ अब उन्हें अपने पेंशन फंड्स के प्रदर्शन को लेकर चिंतित नहीं होना होगा। योगदान बढ़ने के कारण सरकार को अतिरिक्त राशि चुकानी होगी। इसके अलावा भविष्य में अगर सुनिश्चित राशि प्रदान करने के लिए पेंशन फंड पर्याप्त रिटर्न नहीं जुटा पाता तो उसे इसके लिए भी धन जुटाना होगा। इसके बावजूद वह ओपीएस की तुलना में बेहतर विकल्प है क्योंकि इसमें भविष्य की पीढ़ियों पर उतना दबाव नहीं होगा। यद्यपि यूपीएस ने सरकारी कर्मचारियों की चिंताओं को दूर करने की कोशिश की है लेकिन अभी देखना होगा कि राजनीतिक रूप से इसका क्या असर होता है। संभव है कि कुछ राज्य अभी भी ओपीएस की और वापस जाएंगे क्योंकि अल्पावधि में उन्हें योगदान के मोर्चे पर बचत देखने को मिलेगी। बहरहाल वृहद आर्थिक नजरिये से ऐसे कठिन सुधारों को उलट देना अर्थव्यवस्था पर भारी पड़ेगा। उदाहरण के लिए चालू वर्ष में केंद्र सरकार के स्तर पर पेंशन पर होने वाला व्यव केंद्र के कर राजस्व का तकरीबन 10 प्रतिशत होने का अनुमान है। एनपीएस को अपनाना हालिया दशकों के सबसे अहम सुधारों में से एक था। यह देश के लिए दीर्घकालिक लाभ का विषय होता और इसमें किसी भी तरह के बदलाव से बचना चाहिए था।
Date:27-08-24
भारत में नए आविष्कार के युग का उदयअजित बालकृष्णन, ( लेखक इंटरनेट उद्यमी हैं )
कुछ हफ्ते पहले एक सुबह मैं भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) बंबई के सम्मेलन कक्ष में बैठा था। मैं उस कक्ष में छह अन्य लोगों के साथ एक कार्यक्रम शुरू होने का इंतजार कर रहा था। पूरा हॉल आईआईटी के छात्रों एवं प्राध्यापकों से खचाखच भरा था। इस भारी जुटान के लिए मैं मानसिक रूप से तैयार भी था। इसका कारण यह था कि मुझे आईआईटी और आईआईएम (भारतीय प्रबंध संस्थान) से किसी न किसी कार्यक्रम में शामिल होने के निमंत्रण मिलते रहते हैं। मुझे निर्णायकों की उस समिति में शामिल होने के लिए कहा जाता है जिसके सामने आईआईटी या आईआईएम के छात्र अपने शोध पत्र या उद्यम के विचार रखते हैं। मैं कुछ घंटों तक नए अल्गोरिद्म पर चर्चा सुनने और उस पर विचार-विमर्श करने के लिए मानसिक एवं भावनात्मक रूप से पूरी तरह तैयार था।
मुझे बताया गया कि उस दिन 10 टीमें आएंगी और हर टीम में दो सदस्य होंगे। प्रत्येक टीम अपने उत्पादों के नमूने या प्रोटोटाइप पेश करेगी, जो उन्होंने आईआईटी बंबई में छह सप्ताह ठहरकर तैयार किए हैं। आयोजकों ने जोर दिया कि कार्यक्रम में हिस्सा ले रहे सभी भागीदारों का जोर ‘इन्वेंशन’ (आविष्कार) पर रहेगा ‘इनोवेशन’ (नवाचार) पर नहीं। वे लोग तो इस पर चर्चा कर रहे थे मगर मैंने इस बीच चुपके से अपना मोबाइल फोन निकाला और अपने दोस्त चैटजीपीटी से दोनों के बीच अंतर समझने की कोशिश की। मैंने अपने दोस्त से यह भी कहा कि उनके बीच अंतर केवल एक वाक्य में बताओ। मेरे दोस्त चैटजीपीटी ने तुरंत मेरी इच्छा पूरी की और बताया, ‘आविष्कार कुछ नया तैयार कर देने की प्रक्रिया है, जबकि नवाचार में पहले से मौजूद विचारों को सुधारकर और बदलकर बेहतर इस्तेमाल किया जाता है’। इस उत्तर से चीजें अधिक स्पष्ट हो गईं।
प्रस्तुति शुरू होने के बाद मैं अचरज में पड़ गया। मैंने तो खुद को समझाया था कि आईआईटी क्या किसी भी इंजीनियर कॉलेज के छात्र केवल छह हफ्तों में तैयार प्रोटोटाइप से क्या दिखा सकते हैं? मुझे लगा था कि छह हफ्तों में उन्होंने जो भी सोचा है, उसके बारे में वे पावर पॉइंट प्रस्तुति के जरिये बताएंगे। मगर जो हुआ उसने मुझे भौंचक्का कर डाला। मंच पर आने वाली हरेक टीम ने अपने विचार रखते समय केवल पावर पॉइंट प्रस्तुति ही नहीं दी बल्कि तैयार उत्पाद भी सामने रख दिया। उदाहरण के लिए एक टीम ने तरल पदार्थ की बोतलों पर लगाने वाला ढक्कन दिखाया। उसने दिखाया कि उस ढक्कन की मदद से कैसे बोतल से निश्चित मात्रा में तरल निकाल सकते हैं। इस्तेमाल करने वाला व्यक्ति ढक्कन में लगे शाफ्ट को घुमाकर किसी निश्चित मात्रा (मान लीजिए 50 मिलीलीटर) पर सेट कर दे तो बोतल झुकाने पर उतनी ही मात्रा में तरल बाहर आता है। आसान शब्दों में कहें तो आपको मात्रा बार-बार नापने की जरूरत नहीं पड़ेगी, यह काम ढक्कन की मदद से अपने आप हो जाएगा। टीम का कहना था कि इस ईजाद से उन लोगों को मदद मिलेगी, जिन्हें नियमित तौर पर एक निश्चित मात्रा में दवा लेनी होती है। मैं यह सोचकर हैरान था कि उस टीम ने महज छह हफ्ते में ऐसा अनूठा उत्पाद तैयार कर लिया था।
दूसरी टीम ने ‘माउंटेबल गारबेज कॉम्पैक्टर’ का नमूना पेश किया। इस कॉम्पैक्टर का इस्तेमाल नगर निगम के कूड़ेदान में किया जा सकता है। इसे कूड़ेदान के ढक्कन पर रखा जाएगा तो यह कचरे को दबा देगा, जिससे उसमें और कचरे के लिए जगह बन जाएगी यानी कूड़ेदान में अधिक कचरा भरा जा सकेगा। दूसरे शब्दों में ‘कॉम्पैक्टर’ की मदद से नगर निगम के कूड़ेदानों में सामान्य से चार-पांच गुना अधिक कचरा आ सकेगा। मैं यह सोचकर दंग था कि इन बच्चों को कूड़े के बेहतर तरीके निपटान जैसी समस्याओं का ख्याल भी आखिर कैसे आया। मेरी पीढ़ी के आईआईटी एवं आईआईएम के बच्चे गणित के मॉडलों में ही दिमाग खपाते रह गए थे और शायद ही किसी ने तकनीक के जरिये देश के नागरिकों की जीवन शैली सुधारने के बारे में सोचा था।
मुझे सबसे ज्यादा मगर सुखद आश्चर्य तब हुआ, जब एक युवक और युवती अपना आविष्कार लेकर मंच पर आए। उनके पास एक छोटे से उपकरण का प्रोटोटाइप था, जिसमें एयर कंप्रेसर बैग लगा था। अगर आप लंबे समय से मांसपेशी के दर्द से जूझ रहे हैं तो इस बैग को अपनी पेशियों के इर्दगिर्द लपेट सकते हैं। बैग में दर्द खत्म करने वाला मरहम भी भरा जा सकता है। एथलीट एवं फुटबॉल प्रेमी होने के कारण यह प्रयोग मुझे बहुत काम का लगा। मगर ज्यादा सुखद आश्चर्य यह था कि इसे तैयार करने वाली टीम में एक महिला भी थी। महिला आविष्कारक? मैं जानता हूं कि भारत में महिलाएं कई ऊंचे पदों पर पहुंच चुकी हैं। देश के कई बड़े बैंकों में महिलाएं मुख्य कार्याधिकारी बन चुकी हैं और इस समय देश की वित्त मंत्री भी महिला ही हैं। मगर 20 वर्ष की किसी लड़की का इतने काम की ईजाद में योगदान करना वाकई चौंकाने वाला था। जब आप किसी महिला को एक अनूठे आविष्कार में भागीदार बना देखते हैं तो आपको तुरंत अहसास होता है कि सभ्यता के रूप में भारत ने शानदार प्रगति कर ली है। उस दिन ऐसी कई महिलाएं नजर आईं।
उस दिन अपने आविष्कार दिखाने वाली प्रत्येक टीम ने अपने इन अनूठे उत्पाद में पेटेंट कराने लायक खूबियों का भी जिक्र किया। उन्होंने बताया कि उनके उत्पाद किस तरह अलग थे और बाजार में मौजूद ऐसे दूसरे उपकरणों से बेहतर थे। इतना ही नहीं, उन्होंने यह भी बताया कि उन्हें भारत और अमेरिका में उनके उत्पादों के अस्थायी पेटेंट भी मिल गए हैं! उस दिन हमने जो 10 प्रस्तुतियां देखीं, वे आईआईटी एवं अन्य इंजीनियरिंग संस्थानों से आए 700 आवेदनों में चुनी गई थीं। इसकी आयोजक एक गैर-लाभकारी संस्था मेकर भवन फाउंडेशन है, जिसकी शुरुआत आईआईटी के पूर्व छात्रों ने अमेरिका में की थी।
हाल के वर्षों में भारत ने महसूस किया है कि स्टार्टअप एवं ‘कौशल’ देश में आर्थिक वृद्धि और रोजगार सृजन को बढ़ावा देने में प्रमुख भूमिका निभा रहे हैं। राष्ट्रीय कौशल विकास मिशन,आत्मनिर्भर एवं कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय सभी केंद्र एवं राज्य स्तरों पर कई कार्यक्रम चलाते हैं। भारत में ऐसी कई वित्तीय इकाइयां भी हैं, जो स्टार्टअप इकाइयों में निवेश करने पर विचार कर रही हैं। मगर ‘इन्वेंशन फैक्टरी’ उन सभी से अलग हैं क्योंकि वह पावर पॉइंट प्रस्तुति और अगले कुछ वर्षों के लिए कारोबारी अनुमानों के बजाय वास्तविक उपकरण (फिजिकल डिवाइस) तैयार करने पर ध्यान दे रही हैं, जो एकदम नए विचार वाले यानी पेटेंट कराने योग्य हैं। महत्त्वपूर्ण बात यह है कि ध्यान ‘आविष्कार’ पर केंद्रित हो ‘नवाचार’ पर नहीं।
Date:27-08-24
शोषण का पर्दासंपादकीय
मलयालम फिल्म उद्योग को लेकर एक धारणा रही है कि केरल में होने के नाते वहां की स्थितियां बेहतर होंगी, महिलाओं के लिए अपेक्षया ज्यादा सहज और अनुकूल माहौल होगा। मगर कुछ महिला कलाकारों के आरोप के बाद अब जो मामले उजागर हो रहे हैं, उससे यही लगता है कि पर्दे पर प्रगतिशील और महिलाओं के हक में दिखने वाली फिल्मी दुनिया का भीतरी ढांचा कई स्तर पर महिलाओं के खिलाफ बहुस्तरीय शोषण की शर्मनाक तस्वीर भी छिपाए हुए है। मलयालम फिल्म उद्योग में महिला कलाकारों के शोषण के मसले पर 2017 में गठित न्यायमूर्ति हेमा समिति की रपट के अब सामने आने के बाद कुछ पुराने मामले भी उभर रहे हैं। गौरतलब है कि एक अभिनेत्री ने मलयालम फिल्मों के एक निर्माता रंजीत पर अनुचित व्यवहार करने का आरोप लगाया, जिसके बाद रविवार को रंजीत ने केरल चित्रकला अकादमी के प्रमुख के पद से इस्तीफा दे दिया। वहीं एक अन्य अभिनेत्री के यौन उत्पीड़न के आरोप के बाद अभिनेता सिद्दीकी ने ‘एसोसिएशन आफ मलयालम मूवी आर्टिस्ट्स’ के महासचिव पद से इस्तीफा दे दिया।
यों आरोपों के घेरे में आने वाली हस्तियों ने सच्चाई सामने आने का इंतजार करने का हवाला दिया है, मगर इस मसले पर गठित समिति की रपट में जो हकीकत सामने आई है, उसके बाद किस तरह के सच की उम्मीद की जा सकती है! संभव है कि आरोप और उसके साबित होने के बीच लंबा फासला हो। यह भी परिस्थितियों पर निर्भर करता है कि फिल्म में काम पाने के लिए किसी महिला को मजबूरी में जो समझौते करने पड़े, शोषण या भेदभाव के मसले पर चुप रहना पड़ा, उसके काफी समय बीत जाने के बाद आरोप उसी रूप में साबित हो सकें। मगर मलयालम फिल्मों की दुनिया में महिलाओं के साथ होने वाले अनुचित व्यवहारों को हेमा समिति ने जिस शक्ल में दर्ज किया है, उससे साफ है कि पर्दे पर दिखने वाली प्रगतिशील कहानियों का नेपथ्य महिला कलाकारों के लिए उतना ही अनुकूल नहीं रहा है। वैसी स्थिति की कल्पना भी बेहद तकलीफदेह है जिसमें किसी महिला को उस व्यक्ति की पत्नी की भूमिका निभानी पड़ी, उसे गले लगाना पड़ा, जिसने एक दिन पहले उसका यौन उत्पीड़न किया था।
ऐसी न जाने कितनी घटनाएं काम नहीं मिलने और यहां तक कि प्रतिबंध लगाए जाने के हालात और मजबूरी के दुख में दब कर रह जाती होंगी और पर्दे पर चलती कहानियों के आधार पर फिल्म जगत की भीतरी दुनिया के बारे में लोग सकारात्मक राय बनाते होंगे। मगर उस दुनिया में महिलाओं के लिहाज से हकीकत कई बार उलट भी हो सकती है। किसी फिल्म की कहानी महिलाओं से होने वाले भेदभाव, उनके शोषण से जुड़े मुद्दे उठाती दिख सकती है, लेकिन यह जरूरी नहीं कि इसके निर्माण से जुड़े समूह में महिलाओं के हक और सम्मान का भी उतना ही खयाल रखा गया हो। हिंदी फिल्म उद्योग में महिला कलाकारों और खासतौर पर फिल्मी दुनिया में जगह बनाने पहुंची नई युवतियों को कैसी विपरीत परिस्थितियों और कई बार शोषण का सामना करना पड़ता है, इससे संबंधित खबरें पहले भी आती रही हैं। एक अघोषित चलन के तौर पर ‘कास्टिंग काउच’ नई महिला कलाकारों के लिए क्या साबित होता होगा, इसकी कल्पना की जा सकती है। यह देखने की बात होगी कि न्यायमूर्ति हेमा समिति की रपट में जो सामने आया है, उसमें बदलाव के लिए सरकार और खुद फिल्म जगत क्या करता है!
Date:27-08-24
अंतरिक्ष में नई जमीन की तलाशअभिषेक कुमार सिंह
भारत सरकार का एक आकलन है कि अगले कुछ वर्षों में देश अंतरिक्ष क्षेत्र में एक ट्रिलियन (एक लाख करोड़) डालर की अर्थव्यवस्था बन जाएगा। इस क्षेत्र के ज्यादातर विशेषज्ञों का मानना है कि चंद्रयान-3 की अभूतपूर्व सफलता के बाद भारत के लिए ऐसा करना मुश्किल नहीं है। भारत में जगते इस भरोसे की नींव असल में पिछले वर्ष 23 अगस्त, 2023 को रखी गई थी। उस दिन भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के ‘मून मिशन’ की कड़ी में चंद्रयान-3 चंद्रमा के उस दक्षिणी ध्रुव पर उतरा था, जो इससे पहले अछूता रहा था। इस सफलता में एक और अहम चीज जुड़ी थी कि चंद्रयान-3 ने चांद पर ‘साफ्ट लैंडिंग’ की थी, जो इससे पहले सिर्फ तीन देशों (रूस, अमेरिका और चीन) के खाते में दर्ज है। इस अहम पड़ाव पर पहुंचने के महत्त्व को दर्शाने के लिए इस वर्ष भारत ने प्रथम राष्ट्रीय अंतरिक्ष दिवस का आयोजन किया।
‘इसरो’ ने कहा है कि अब उसका ध्यान चंद्रयान-4 और चंद्रयान-5 के प्रक्षेपण पर है। इसे इस रूप में भी देखा जाना चाहिए कि चंद्रयान, मंगलयान और भावी गगनयान जैसी परियोजनाएं देश को आर्थिक महाशक्ति के रूप में स्थापित करेंगी। इस क्षेत्र में मिलने वाली हर कामयाबी देश की युवा पीढ़ी को अंतरिक्ष अनुसंधान के प्रति प्रोत्साहित करेगी और वे इसे एक सम्मानजनक पेशे के तौर पर अपनाने के लिए प्रेरित होंगे। मगर, मामला सिर्फ यहीं तक सीमित नहीं है। चंद्रयान की सफलता भारत को ‘लूनर जियोपालिटिक्स’ (चंद्र भू-राजनीतिक) परिदृश्य के एक बड़े खिलाड़ी के रूप में स्थापित कर रही है। भारत बेहद सस्ती दरों पर राकेट और अंतरिक्ष यानों के प्रक्षेपण के बाजार में खुद को एक बड़े खिलाड़ी के रूप में पेश कर रहा है। साथ ही, वह अंतरिक्ष में खनन की उन संभावनाओं को साकार करने की दिशा में बढ़ सकता है, जहां पृथ्वी पर कम पड़ते संसाधनों की भरपाई के लिए वह चंद्रमा और क्षुद्रग्रहों से खनिजों की ढुलाई कर भारी मुद्रा अर्जित कर सकता है।
भारत के बाद यह कामयाबी चीन के खाते में दर्ज हुई, जब जून 2024 में उसका यान (प्रोब) ‘चांग ई-6’ चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव स्थित बेसिन-एटकेन में उतरा। चंद्रमा का यह हिस्सा पृथ्वी से नजर नहीं आता है। निश्चय ही भारत और चीन अंतरिक्ष में आज जिस जगह पर हैं, उससे इस क्षेत्र में पश्चिमी दबदबे को ठोस चुनौती मिली है। इससे भी बड़ी बात यह कि भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने बेहद कम खर्च में जिस प्रकार अपने अंतरिक्ष कार्यक्रमों का संचालन किया है, उससे दुनिया बेहद प्रभावित है। यानी जितने खर्च में पश्चिमी देश कोई फिल्म बनाते रहे हैं, उससे कम खर्च में भारत अंतरिक्ष अनुसंधान के अपने कार्यक्रमों को चला रहा है। भारत के मार्स मिशन- मंगलयान और फिर चंद्रयान-1 और चंद्रयान-3 की कामयाबी ने वह रास्ता दुनिया को दिखाया कि इरादे पक्के हों तो आर्थिक मजबूरियां भी आखिर में घुटने टेक देती हैं। आज अगर ‘इसरो’ सूर्य के अध्ययन, चंद्रमा के खनिजों के दोहन और अंतरिक्ष में इंसानों को पहुंचाने वाले ‘गगनयान’ जैसे कार्यक्रमों के संचालन का दम भरता है, तो कोई उसकी क्षमताओं पर सवाल नहीं उठाता।
मानवता के इतिहास में यह पहली बार है कि भारत और चीन जैसे देश चंद्रमा के जटिल हिस्से में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। ‘इसरो’ की मानें तो चांद का दक्षिणी ध्रुव कई मायनों में भावी चंद्रमिशनों के द्वार खोलने वाला साबित होगा। इसकी कई वजहें हैं। पहली तो यह कि हमेशा छाया में रहने वाले इस हिस्से के बेहद ठंडे क्रेटर्स (गड्ढों) में जमी हुई बर्फ के भंडार हो सकते हैं, जो पानी के बड़े स्रोत होंगे। यहां जीवाश्मों का खजाना मिल सकता है। यहां हीलियम-3 जैसा बहुमूल्य खनिज मिलने की भी उम्मीद जताई जा रही है। एक टन हीलियम की मौजूदा कीमत करीब पांच अरब डालर हो सकती है और अंदाजा है कि चंद्रमा से ढाई लाख टन हीलियम-3 पृथ्वी तक ढोकर लाया जा सकता है। यह ऐसी अकूत संपदा होगी, जिसकी कीमत कई लाख करोड़ डालर मानी जा रही है। इसरो ने दक्षिणी ध्रुव की चट्टानों में लोहे के अलावा मैग्नीशियम, कैल्शियम आदि की मौजूदगी का अंदाजा लगाया है। यह खोजबीन बिना वहां रोवर उतारे मुमकिन नहीं है, जिसकी शुरुआत पहले चंद्रयान-3 और फिर चीनी यान के रोवरों ने कर दी है।
अगर चांद पर ये खनिज मिले, वहां भरपूर पानी मिला तो न सिर्फ चंद्रमा पर इंसानी बस्तियां बसाने की संभावनाओं को एक ठोस आधार मिल जाएगा, बल्कि इससे चांद ही नहीं, बल्कि पृथ्वी के निर्माण के नए रहस्यों का खुलासा हो सकता है। हालांकि ज्यादा बड़ा फायदा यह हो सकता है कि भविष्य में मंगल आदि ग्रहों पर भेजे जाने वाले अंतरिक्ष अभियानों के लिए संसाधन मुहैया कराने और पड़ाव के रूप में चंद्रमा का इस्तेमाल हो सकता है। अमेरिका, रूस, जापान और यूरोपीय संघ की चंद्रमा के प्रति दिलचस्पी बढ़ने की एक बड़ी वजह यह भी है कि आगे चलकर चंद्रमा को दुर्लभ अंतरिक्षीय सूचनाओं के केंद्र के रूप में विकसित किया जाने वाला है। यानी हमें ब्रह्मांड के जन्म से लेकर उसके और आगे बढ़ने से जुड़ी वे सारी सूचनाएं मिल सकेंगी, जो शायद इस पूरी कायनात के रहस्य खोल देंगी।
22 अक्तूबर, 2008 को श्रीहरिकोटा के सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से अंतरिक्ष में भेजा गया चंद्रयान-1 मिशन करीब एक साल (अक्तूबर 2008 से सितंबर 2009 तक) संचालित किया गया था और 312 दिन की अवधि में इससे चंद्रमा पर पानी के पहले निशान देखने का सौभाग्य भारत को मिला था। चंद्रमा की सतह से करीब सौ किलोमीटर ऊपर चांद के तकरीबन हर हिस्से के ऊपर से गुजरे चंद्रयान-1 ने पता लगाया था कि चंद्रमा के ध्रुवीय इलाकों में पानी की भारी मात्रा बर्फ की शक्ल में मौजूद हो सकती है। यह वाकई पानी ही है, इसकी पुष्टि तब हुई थी, जब चंद्रयान-1 के साथ भेजे गए अमेरिका के मून मिनरलाजी मैपर (एम-3) ने वहां से एकत्रित डेटा का विस्तृत अध्ययन किया। ‘नासा’ का यह अध्ययन ‘पीएनएएस’ जर्नल में प्रकाशित हुआ था। यह अध्ययन चांद की ऊपरी पतली परत में हाइड्रोजन और आक्सीजन की मौजूदगी तथा उनके रासायनिक संबंध पर केंद्रित था। इससे पहले चांद से धरती पर लाए गए नमूनों की जांच करने वाले शोधकर्ता लगभग चालीस वर्षों में इतना ही कह पाए थे कि चांद पर कभी कुछ पानी जरूर रहा होगा। मगर इसे साबित करने के लिए उनके पास कुछ नहीं था।
आज हम यह बात बेखटके कह सकते हैं कि चंद्रयानों की बदौलत भारत (इसरो) ने तकनीक का एक अहम पड़ाव पार कर लिया है। जिस तरह चंद्रयान-1 ने चांद पर पानी की तसदीक कर भारत के खाते में एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि डाली थी, उसी तरह चंद्रयान-3 ने भी कामयाबी की नई इबारत लिखी। अब भारत जिस तरह ‘गगनयान’ से भारतीय यात्रियों को अंतरिक्ष में भेजने की योजना पर काम कर रहा है, उससे हमारा देश अंतरिक्ष में एक बड़ी शक्ति के रूप में उभर कर सामने आएगा।
Date:27-08-24
ताकि पेंशन सही मायने में दे सके सामाजिक सुरक्षाअरुण कुमार, ( अर्थशास्त्री )
बुजुर्गों के लिए पेंशन एक सामाजिक सुरक्षा है। नई पेंशन योजना (एनपीएस) में चूंकि शेयर बाजार या अन्य वित्तीय संस्थानों में निवेश का प्रावधान था, इसलिए इसमें पुरानी पेंशन योजना (ओपीएस) जैसी सुरक्षा नहीं थी। फिर, ओपीएस में सरकार अपने बजट से पेंशन देती थी, लेकिन एनपीएस में यह प्रावधान हटा दिया गया था और बाजार में निवेश के बाद मिले रिटर्न के अनुपात में पेंशन का लाभ दिया जाता था, जो रकम अमूमन पुरानी पेंशन से कम होती थी। यही कारण है कि सरकारी कर्मी नई पेंशन योजना का विरोध व पुरानी पेंशन योजना की बहाली की मांग कर रहे थे।
यूपीएस के लाभ-हानि को समझने के लिए पेंशन की मूल संकल्पना को समझना आवश्यक है। भारत में 1930 के दशक में 58 साल में सेवानिवृत्ति की बात कही गई और वही पुरानी पेंशन योजना का आधार भी बनी। उस समय भारतीयों की औसत उम्र 35 साल होती थी। इसका मतलब था कि बहुत कम लोग ही 58 या 60 साल से अधिक जी पाते थे। ऐसे लोगों की संख्या बमुश्किल चार-पांच प्रतिशत होती थी। इस कारण सरकार को पेंशन भी बहुत कम लोगों को देनी पड़ती थी। अब भारतीयों की जीवन-प्रत्याशा काफी बढ़ गई है और 80-85 साल तक लोग जीने लगे हैं। इसका अर्थ है कि 60 साल में सेवानिवृत्त होने वाले व्यक्ति को अगले दो-ढाई दशकों तक सुरक्षा देने की अनिवार्यता है। यही विसंगति सरकारी खजाने पर भारी पड़ने लगी है और पेंशन नीति में सुधार की मांग होने लगी है।
इस समस्या का एक निराकरण हम शिक्षकों ने कुछ वर्ष पूर्व सुझाया था। दरअसल, हमारा मानना है कि जो लोग सरकारी सेवा में हैं, वे सेवानिवृत्ति के बाद या तो निजी क्षेत्र में काम करने लगते हैं या खुद का अपना कोई धंधा शुरू कर देते हैं। वे इतने कुशल होते भी हैं। यही कारण है कि हमने सेवानिवृत्ति की उम्र 70 साल करने की मांग की। शिक्षकों के लिए सेवानिवृत्ति की आयु 65 साल है और अगर वे चाहें, तो अगले पांच साल के लिए भी उनकी सेवा बरकरार रखी जा सकती है। इसका फायदा कर्मियों को भी होता है और सरकार को भी। सरकार को जहां तुलनात्मक रूप से कम वर्षों के लिए पेंशन देनी पड़ती है, वहीं ज्यादा साल तक सेवा देने के कारण कर्मियों की बचत ज्यादा होती है।
इसके खिलाफ एक तर्क यह दिया गया था कि इससे बेरोजगारों के लिए अवसर घट जाएंगे, इसलिए हमने श्रमबल में सरकारी कर्मियों की संख्या बढ़ाने का भी सुझाव दिया था। दरअसल, हमारे देश में करीब 60 करोड़ लोगों के हाथों में रोजगार है, जिनमें से 1.8 करोड़ सरकारी मुलाजिम हैं, यानी कुल कामगारों में तीन प्रतिशत हिस्सा ही सरकारी कर्मचारियों का है, जबकि अन्य देशों में यह आंकड़ा छह से लेकर 10 प्रतिशत तक है। ऐसे में, अगर हम श्रमबल में सरकारी कर्मियों की संख्या बढ़ाने का काम करें, तो नौजवानों को रोजगार भी मिलेगा और सेवानिवृत्ति की आयु बढ़ने का कथित नुकसान भी नहीं होगा। सरकार चाहे, तो इसकी शुरुआत उन 10 लाख सरकारी पदों को भरने के साथ कर सकती है, जो इस वक्त रिक्त पड़े हुए हैं। रही बात संसाधन जुटाने की, तो इसके लिए प्रत्यक्ष कर और जीडीपी का अनुपात बढ़ाने पर काम होना चाहिए। यह अनुपात अभी सवा छह प्रतिशत ही है। संसाधान जुटाकर हम असंगठित क्षेत्र को भी पेंशन का लाभ दे सकेंगे।
इसी कारण एकीकृत पेंशन योजना में सुधार की मांग जोर पकड़ने लगी है। इसमें न सेवानिवृत्ति-आयु बढ़ाने की बात कही गई है और न प्रत्यक्ष कर-जीडीपी अनुपात को लेकर कुछ कहा गया है। फिर अन्य पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जाति/ जनजाति के नौजवान 35-40 साल तक सरकारी नौकरी के लिए पात्र होते हैं, तो 58 या 60 साल में सेवानिवृत्ति से 25 साल तक वे सेवा देने में सक्षम नहीं होंगे और पूर्ण पेंशन का लाभ नहीं उठा सकेंगे। इसी तरह, न्यूनतम 10 साल की सेवा देने वालों को 10 हजार रुपये पेंशन देने की बात इसमें कही गई है, पर मुमकिन है, इस अवधि के बाद लोग बेहतर मौके की तलाश में जुट जाएं और दोनों लाभ उठाने लगें। जाहिर है, इन विसंगतियों को दूर करके ही हम सामाजिक सुरक्षा का सही लाभ कर्मचारियों को दे सकेंगे।
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भारत क्वाड (ऑस्ट्रेलिया, भारत, जापान और अमेरिका) एवं ब्रिक्स (ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका, ईरान, मिस्र, इथोपिया और संयुक्त अरब अमीरात) समूहों का संस्थापक सदस्य है। उसके लिए दोनों ही समूहों का अपना महत्व है।
क्वाड में भारत की भूमिका –
– क्वाड का उद्देश्य हमेशा से इंडो-पैथिफिक में बढ़ती चीनी घुसपैठ से सुरक्षा करना रहा है।
– भारत इसे और व्यापक स्तर पर ले जाते हुए तकनीकी-आर्थिक संरचना को भी जोड़ना चाहता है। यह समूह अब महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों की वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं की पुर्नसंरचना और डिजिटल सहित कई क्षेत्रों में रणनीतिक आवश्यकता पर काम कर रहा है। कुल मिलाकर, क्षेत्र की सुरक्षा के लिहाज से विकास को भी जरूरी माना जा रहा है।
– भारत को समूह के देशों, विशेषकर अमेरिका से द्विपक्षीय संबंधों में वृद्धि के माध्यम से लाभ हुआ है।
– दूसरी ओर, आस्ट्रेलिया की परमाणु पनडुब्बियों से अपनी सैन्य क्षमताओं को बढ़ाया जा सका है।
– भारत ने यह भी स्पष्ट किया है कि यह समूह एशियाई नाटो नहीं है। और यह क्षेत्र की सुरक्षा एवं अन्य हितों के प्रति समावेशी दृष्टिकोण लेकर चलता है।
ब्रिक्स की संभावनाएं –
– ब्रिक्स की स्थापना बहुपक्षीय प्रणाली में सुधार के लिए की गई थी।
– न्यू डेवलपमेंट बैंक और आकस्मिक रिजर्व व्यवस्था जैसी ब्रिक्स की पहल अग्रणी रही हैं।
– चीन ने इस समूह का उपयोग ग्लोबल साउथ पर अपना प्रभाव जमाने और पश्चिम को पीछे धकेलने में ही किया है। क्वाड समूह के चलते रूस ने भी ब्रिक्स के महत्व को समझा है, और चीन के पीछे खड़ा हो गया है। अब समूह में भारत ही एकमात्र देश रह गया है, जो चीन को रोक सके। अतः भारत ने इसके विस्तार का समर्थन करते हुए कई देशों को सदस्य बनाया है।
– अब भारत को देखना यह है कि नए सदस्य देशों के साथ द्विपक्षीय संबंधों की मधुरता के साथ-साथ चीन को नियंत्रण में रखने पर उनका सहयोग कैसे लिया जा सके। इसके लिए, भारत का जोर समूह में पारदर्शिता पर अधिक है।
साथ ही, इस समूह को सही दिशा में ले जाने के लिए भारत को अधिक सक्रिय भी होना होगा।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 22 जुलाई, 2024
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Date: 26-08-24
Nicobar QuestionsMore thought must go into building a major project in a fragile ecosystemTOI Editorials
Are environment ministry’s assurances about the impact of the Great Nicobar naval complex reassuring? The project, as envisaged, with an eye on crucial maritime chokepoint Malacca Strait, boasts geostrategic potential. It ensures India can control vital shipping lanes, protect sealanes of communication, counterbalance Beijing’s expansion in Indian Ocean and curb Myanmar’s poaching of marine resources. The national value of security imperatives aside, question often raised has been, do the benefits outweigh ecological and social costs, and the vulnerability of the project that’ll sit atop a seismic zone? Concerns over conservation are inarguable. Priority must equally be to ensure security of the naval complex from earthquakes.
Ministry statements that no seismic activity like the 2004 great earthquake is expected in the region “for 420-750 years” are puzzling. Andaman and Nicobar Islands lie in a highly active tectonic zone, at the intersection of major plate boundaries. Given the area’s seismic history and geology, probability of no significant seismic event over such a long period as 420-750 years is low, experts say. For seismology and disaster preparedness, scientists advise planning for the possibility of major events, rather than assuming they won’t occur.
The fragile Galathea Bay ecosystem, the construction site, makes any large-scale development inherently damaging. The very construction over 30 years – building material, blasting, dredging, drilling, debris – will permanently alter the ecosystem, disrupt island’s inhabitants’ lives; influx of outsiders will drain its freshwater resources. Locals, Shompen and Nicobarese tribes, see themselves simply as caretakers of biodiversity and nurturers of nature – mangroves and coral reefs, nesting sites of leatherback turtles, the latter residents of Earth since the time of dinosaurs. But keep aside conservation concerns. Building complex, costly, critical naval infra in an area highly prone to natural disasters needs a second look.
Date: 26-08-24
Catalyst for changeThe Hema Committee report should help reform the film industryEditorial
At different points of time, come events that have the potential to shape the future. Whether these catalysts fulfil that potential to the fullest extent or not is in the hands of the people in their vortex. The Justice K. Hema Committee report that studied the issues faced by women in cinema, could well be one such catalyst. The three-member committee was constituted in 2017, based on a petition submitted by the Kerala-based Women in Cinema Collective, and submitted its report two years later. It was released last week, several paragraphs redacted, and contains unsurprising and yet disturbing revelations about the state of affairs in the film industry — discrimination, exploitation and sexual harassment of women. The term ‘casting couch’, hatched in Hollywood, has become repugnantly accepted as a euphemism for sexual favours in exchange for a role in films. Justice Hema points out that making the exchange of sexual favours the passkey for entry into the field itself, and normalising it and conflating it with consensual sexual activity, makes the industry inherently exploitative. The report deals also with other inequities that disadvantage women in the industry, including the lack of essential facilities such as toilets, changing rooms, safe transportation, and accommodation at the shooting spot which are violative of the right to privacy; and discrimination in remuneration, and a lack of binding contractual agreements. These affect the range of women across the industry — actors, technicians, make-up artists, dancers, support staff, and particularly so, women lower in the pecking order.
The way ahead is not as murky as the hole that the film industry, here Malayalam, seems to find itself in. The government has decided to constitute a special investigation team to go into the accusations of harassment. While the government would do well to ignore the committee’s recommendation on doing away with internal complaints committees for each film project, it must act on suggestions that call for provision of essential facilities and for structural reforms within the film industry, including professionalising it. Nothing will change unless the state gets involved meaningfully in creating an equitable work space for men and women, in an industry dominated by people with great power and money, who have so far refuted the existence of such a power cartel or have remained silent. Each of the issues raised must be taken cognisance of, and acted upon. As with the #MeToo movement, Justice Hema’s report has the potential of being a catalyst to enable scores of women to speak up. It behoves the state to ensure that their complaints are not ignored, or worse still, used against them.
Date: 26-08-24
यूपीएस की जरूरतसंपादकीय
सरकारी कर्मचारियों के लिए एकीकृत पेंशन योजना अर्थात यूपीएस लाकर केंद्र सरकार ने लाखों कर्मचारियों की एक पुरानी मांग को पूरा करने की दिशा में एक ठोस कदम उठाया है। ऐसा कोई कदम उठाया जाना इसलिए आवश्यक हो गया था, क्योंकि 2004 में लागू की गई नई पेंशन योजना यानी एनपीएस सरकारी कर्मचारियों के हितों की पूर्ति में सहायक नहीं बन रही थी और इसीलिए उसे लेकर असंतोष था। इसी असंतोष के चलते कुछ राजनीतिक दल पुरानी पेंशन योजना यानी ओपीएस लागू करने का वादा कर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन यह संकीर्ण राजनीति ही थी और इसीलिए हिमाचल प्रदेश एवं कुछ अन्य राज्य सरकारों ने पुरानी पेंशन योजना लागू करने की जो घोषणा की, उस पर अमल नहीं कर सकीं। तथ्य यह भी है कि कांग्रेस को हिमाचल प्रदेश के अलावा अन्य कोई चुनावी लाभ भी नहीं मिला और यही कारण रहा कि लोकसभा चुनाव में कांग्रेस ने पुरानी पेंशन योजना को लेकर कहीं कोई वादा भी नहीं किया। यह आश्चर्यजनक है कि अब वही कांग्रेस यूपीएस को लेकर सरकार पर तंज कस रही है और इस योजना को सरकार का एक और यू टर्न बता रही है। स्पष्ट है कि कांग्रेस और विपक्ष के अन्य नेता यह भूल रहे हैं कि बहुत पहले वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने एक नई पेंशन योजना लाने का वादा किया था और इस संदर्भ में एक समिति भी गठित की थी।
यह अच्छा हुआ कि सरकार यूपीएस के रूप में एक ऐसी पेंशन योजना लाने में समर्थ रही जो सरकारी कर्मचारियों को भी संतुष्ट करेगी और सरकार के लिए बहुत अधिक बोझ भी नहीं साबित होगी। यह योजना इसलिए सरकारी कर्मचारियों को संतुष्ट करने वाली है, क्योंकि यह काफी कुछ पुरानी पेंशन योजना सरीखी है। अंतर केवल इतना है कि इस नई पेंशन योजना में कर्मचारियों को दस प्रतिशत योगदान देना होगा। इससे उन्हें कोई समस्या नहीं आने वाली, क्योंकि नई पेंशन योजना में भी वे इतना ही अंशदान देते थे, लेकिन उसमें कितनी पेंशन मिलेगी, इसे लेकर अनिश्चितता रहती थी। यह लगभग तय है कि राज्य सरकारें भी यूपीएस को अपनाना पसंद करेंगी और महाराष्ट्र सरकार ने तो इस दिशा में पहल भी कर दी है। सरकारी कर्मचारियों के पेंशन के एक जटिल मसले को सुलझाने के बाद केंद्र सरकार के लिए उचित होगा कि ईपीएस-95 को भी ऐसा रूप-स्वरूप देने की दिशा में आगे बढ़े जिससे निजी क्षेत्र के कर्मचारियों के हितों की भी पूर्ति हो। यूपीएस लाकर केंद्र सरकार ने केवल सरकारी कर्मचारियों की एक मांग ही नहीं पूरी की है, बल्कि संभावित राजनीतिक नुकसान से बचने का भी उपाय किया है। अब जब सरकारी कर्मचारियों के पेंशन हितों की रक्षा के लिए कदम उठा लिया गया है तब उनके लिए भी यह आवश्यक हो जाता है कि वे अपने कामकाज में जवाबदेही और जिम्मेदारी का परिचय दें। इससे कोई इनकार नहीं कर सकता कि सरकारी कामकाज के तौर-तरीके में सुधार की आवश्यकता है।
Date: 26-08-24
रेवड़ी संस्कृति का बढ़ता रोगडॉ. जगदीप सिंह, ( लेखक राजनीतिशास्त्र के प्रोफेसर हैं )
जम्मू-कश्मीर विधानसभा के चुनाव नजदीक आते ही राजनीतिक दल तैयारियों में जुट गए हैं। सभी अपना चुनावी घोषणापत्र जारी कर रहे हैं। घोषणापत्र वह दस्तावेज होता है, जो चुनाव लड़ने वाले सभी राजनीतिक दल जारी करते हैं। इसमें वे जनता के सामने अपने वादे रखते हैं। इसके जरिये बताते हैं कि वे चुनाव जीतने के बाद जनता के लिए क्या-क्या करेंगे? उनकी नीतियां क्या होंगी? सरकार किस तरह से चलाएंगे और उससे जनता को क्या फायदा मिलेगा? हालांकि वास्तविकता में घोषणापत्र वादों का पिटारा मात्र होता है। राजनीतिक दल लोगों के वोट पाने के लिए मुफ्त बिजली/पानी की आपूर्ति, बेरोजगारों, दैनिक वेतनभोगी श्रमिकों और महिलाओं को भत्ता, साथ-साथ गैजेट जैसे-लैपटाप, स्मार्टफोन आदि देने का वादा करते हैं, लेकिन ये कितने पूरे होते हैं, यह अलग चर्चा का विषय है।
जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री और पीडीपी की अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती ने ‘पहचान की रक्षा, भविष्य की रक्षा’ शीर्षक से अपना घोषणापत्र जारी किया है। इसमें उन्होंने वादा किया है कि पार्टी अनुच्छेद 370 को वापस लागू करेगी। साथ ही आमजन को खुश करने के लिए 200 यूनिट मुफ्त बिजली, मुफ्त पानी, गरीब परिवारों को वर्ष में 12 गैस सिलिंडर, वृद्धावस्था पेंशन, विधवा पेंशन को दोगुना करने का वादा किया है। वहीं नेशनल कांफ्रेंस (नेकां) ने अपने घोषणापत्र में कहा है कि पार्टी लोगों को 200 यूनिट तक बिजली मुफ्त देगी, अनुच्छेद 370 बहाल करेगी और जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा दिलाने के साथ-साथ 2000 में तत्कालीन विधानसभा द्वारा पारित स्वायत्तता संबंधी प्रस्ताव को लागू करेगी। जून 2000 में फारूक अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली तत्कालीन नेकां सरकार ने राज्य में 1953 से पहले की संवैधानिक स्थिति को बहाल करने की मांग करते हुए विधानसभा में एक प्रस्ताव पारित किया था। हालांकि इस प्रकार जम्मू-कश्मीर के क्षेत्रीय दलों द्वारा 370 को पुन बहाल करने की बात करना राष्ट्रीय हित के अनुकूल नहीं है। देखा जाए तो जम्मू-कश्मीर की आर्थिक स्थिति पर्यटन उद्योग पर टिकी है और यहां रोजगार का यही सबसे बड़ा साधन है। बावजूद इसके इस महत्वपूर्ण क्षेत्र की समस्याओं का इन राजनीतिक दलों के घोषणापत्रों में शामिल न होना गंभीर चिंता का विषय है। आखिर कब तक पर्यटन उद्योग की अनदेखी होती रहेगी।
वैसे घोषणापत्र जारी करने की परंपरा दुनिया भर में है। आमतौर पर घोषणापत्र में आर्थिक और सामाजिक आदि मुद्दों पर पार्टी की नीतियों और कार्यक्रमों को पेश किया जाता है। अमेरिका जैसे देश में घोषणापत्र में आर्थिक-विदेश नीति, स्वास्थ्य की देखभाल, शासन में सुधार, पर्यावरण से जुड़े मुद्दों और इमिग्रेशन आदि को शामिल किया जाता है। वहां इनमें लोगों को किसी तरह के खास लाभ देने की बात नहीं की जाती है। भारत में राजनीतिक दल मुद्दों के साथ-साथ मुफ्त की रेवड़ियां तक को अपने घोषणापत्र में शामिल कर लेते हैं, जिसका मुद्दा सुप्रीम कोर्ट तक में उठ चुका है। पूर्व में सुप्रीम कोर्ट कह चुका है कि कोई भी मुफ्त वितरण सभी लोगों पर असर डालता है। ऐसे में निष्पक्ष और स्वतंत्र चुनाव नहीं हो पाते। साथ ही देश में ऐसा कोई प्रविधान भी नहीं है जिससे घोषणापत्रों में किए जाने वाले वादों को नियंत्रित किया जा सके। राजनीतिक पार्टियों को ऐसे वादों से बचना चाहिए, जो चुनावी प्रक्रिया की पवित्रता को कम कर सकते हैं या मतदाताओं पर गलत प्रभाव डाल सकते हैं। राजनीतिक दलों को अपने घोषणापत्रों में किए गए वादों की जरूरत को भी बताना चाहिए। वही वादे करें, जो पूरे किए जा सकते हैं। यह भी बताएं कि इन वादों को पूरा करने के लिए वित्तीय जरूरतें किस तरह पूरी होंगी?
मुफ्त के वादे कर राजनीतिक दल लोगों को अपने पक्ष में मतदान करने के लिए एक प्रकार से रिश्वत दे रहे हैं। इसका आर्थिक पहलू यह है कि राजनीतिक दल सरकार के खर्चे पर मतदाताओं को मुफ्त उपहार दे रहे हैं, लेकिन क्या यह उस राज्य की आर्थिक स्थिति के लिहाज से उचित है? गत वर्ष श्रीलंका में घटी घटना इसका उदाहरण है। जानकारों का मानना है कि श्रीलंका के आर्थिक पतन का कारण वहां के राजनीतिक दलों द्वारा मतदाताओं को दिए गए मुफ्त उपहार रहे हैं। भारत के अधिकांश राज्यों की मजबूत वित्तीय स्थिति नहीं है एवं राजस्व के मामले में संसाधन भी बहुत सीमित हैं। दक्षिण भारत के राज्यों से शुरू हुई यह परंपरा धीरे-धीरे उत्तर भारत के राज्यों में फैलती जा रही है। कोई आय न होने के बाद भी मुफ्त की योजनाओं की घोषणा करना देश के आर्थिक स्वास्थ्य की दृष्टि से उचित नहीं है। आमदनी की कोई ठोस योजना न होने के बाद भी राजनीतिक दल भारी-भरकम घोषणाएं कर जनता को छलने का कार्य करते हैं। किसी वर्ग विशेष को मुफ्त की योजनाएं देकर जनता पर टैक्स का भार डाला जाता है। मुफ्त में सुविधाएं, उपहार देने से अंततः सरकारी खजाने पर असर पड़ता है। यह एक गलत परंपरा है। अब इस रेवड़ी संस्कृति पर गंभीरता से चिंतन करने का वक्त आ गया है। जब तक अपने वादों पर खरा उतरने की कोई वैधानिक बाध्यता नहीं तय की जाती, तब तक सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग को इस तरह की घोषणाएं करने से राजनीतिक दलों को रोकना चाहिए। चुनाव प्रचार के दौरान वादे करते हुए राजनीतिक दलों का केवल राजनीतिक पहलू पर विचार करना बुद्धिमानी नहीं है। आर्थिक हिस्से को भी ध्यान में रखना जरूरी है, क्योंकि अंततः बजटीय आवंटन और संसाधन सीमित हैं। मुफ्त की बात करते समय राजनीति के साथ-साथ राष्ट्रीय हित एवं अर्थव्यवस्था को भी ध्यान में रखना चाहिए।
Date: 26-08-24
प्रतिस्पर्धा बढ़ाए ई-कॉमर्स नीतिसंपादकीय
ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्मों की वृद्धि और खुदरा क्षेत्र पर उनके संभावित प्रभाव को देखते हुए केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल ने गत सप्ताह यह स्पष्ट किया कि सरकार ई-कॉमर्स के विरुद्ध नहीं है बल्कि वह ऑनलाइन और सामान्य खुदरा कारोबारियों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहती है। उन्होंने इस बात को भी रेखांकित किया कि ऑनलाइन खुदरा कारोबारियों के लिए नियमों का पालन करना महत्त्वपूर्ण है। गोयल ने सरकार की स्थिति साफ करके अच्छा किया लेकिन ऑनलाइन बनाम ऑफलाइन खुदरा के मुद्दे पर बहस जारी रहेगी। सरकार को अपनी नीतियों में भी इस प्रकार बदलाव करने पड़ सकते हैं ताकि बाजार में होने वाली स्वाभाविक उथलपुथल और गतिविधियां बाधित न हों।
नीतिगत नजरिये से देखा जाए तो यह समझना अहम है कि ई-कॉमर्स क्या कर रहा है और उसके क्या संभावित खतरे हैं। ग्राहकों के लिए ई-कॉमर्स ने चयन के विकल्प बढ़ाए हैं और खरीद को सरल बनाया है। कुछ ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्मों के गहन नेटवर्क और लॉजिस्टिक क्षमताओं के कारण छोटे शहरों और ग्रामीण भारत के उपभोक्ताओं की पहुंच उन उत्पादों तक हो सकी है जो पहले केवल बड़े शहरों में रहने वाले लोगों की पहुंच में थे। उत्पादक के नजरिये से देखें तो ऑनलाइन प्लेटफॉर्मों के साथ जुड़ाव ने पूरे देश को छोटे और मझोले उपक्रमों के लिए भी एक संभावित बाजार में बदल दिया है। ऑनलाइन और ऑफलाइन वेंडरों और उपभोक्ताओं के एक सर्वेक्षण के बाद पहले इंडिया फाउंडेशन ने एक रिपोर्ट जारी की है जिसमें क्रमश: 60 फीसदी और 52 फीसदी वेंडरों ने कहा कि ऑनलाइन बिक्री शुरू होने के बाद उनकी बिक्री और मुनाफा दोनों बढ़े हैं। जानकारी यह भी है कि वे अधिक लोगों को काम पर रख रहे हैं। ऐसे में यह स्पष्ट है कि ऑनलाइन प्लेटफॉर्म से जुड़े विक्रेता और उपभोक्ता दोनों को लाभ हुआ है।
बहरहाल, नीतिगत नजरिये से देखें तो दो प्राथमिक चिंताएं हो सकती हैं। पहली, अक्सर यह आरोप लगता रहा है कि कुछ ऑनलाइन प्लेटफॉर्म बहुत कम कीमत पर बेचने की रणनीति अपनाते हैं। इस तरह के व्यवहार की जांच जरूर की जानी चाहिए। वास्तव में ऐसे मामलों में प्रतिस्पर्धा नियामकों ने बड़े ऑनलाइन खुदरा कारोबारियों की जांच की है। बहरहाल, विशुद्ध कारोबारी नजरिये से देखा जाए तो ऑनलाइन कारोबारियों के ऐसा व्यवहार अपनाने की कोई तुक नहीं समझ में आती। आमतौर पर ऐसा व्यवहार छोटे बाजारों में अपनाया जाता है जहां सीमित प्रतिस्पर्धा हो। यहां मामला ऐसा नहीं है। दो बड़े विदेशी फंडिंग वाले ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म अब ढेर सारे घरेलू प्लेटफॉर्मों के साथ प्रतिस्पर्धा कर रह हैं। इनमें कुछ ऐसे प्लेटफॉर्म भी हैं जिनका स्वामित्व देश के बड़े औद्योगिक घरानों के पास है। ध्यान रहे कि क्विक कॉमर्स यानी शीघ्र सामान पहुंचाने वाली सेवाएं अब जोर पकड़ रही हैं। ये भारी छूट वाली सेवाओं के मुकाबले तेजी से बढ़ रही हैं। इससे पता चलता है कि ऑनलाइन खुदरा कारोबार काफी प्रतिस्पर्धी है और यहां प्रवेश बाधा वैसी नहीं है जैसा पहले सोचा जाता था।
नीति निर्माताओं की दूसरी बड़ी चिंता रोजगार की हो सकती है। आमतौर पर बड़ी संख्या में लोग आजीविका के लिए आसपास की दुकानों पर निर्भर होते हैं। हालांकि ऑनलाइन खुदरा ने किराना दुकानों पर अधिक असर नहीं डाला है लेकिन उनकी इंटरनेट पहुंच के कारण आने वाले सालों में कुछ उथलपुथल हो सकती है। कुल खुदरा कारोबार में ई-कॉमर्स की हिस्सेदारी 8 फीसदी है और यह तेजी से बढ़ रही है, जैसा कि रिपोर्ट बताती हैं। यह ध्यान देने लायक है कि ऑनलाइन प्लेटफॉर्म के वेंडर अधिक लोगों को काम पर रखते हैं। इस क्षेत्र में रोजगार की प्रकृति में बदलाव आ सकता है। ऐसे में नीतिगत हस्तक्षेप करके यथास्थिति का बचाव नहीं किया जाना चाहिए। उम्मीद है कि सरकार जल्दी ही नई ई-कॉमर्स नीति लाएगी। यह सुनिश्चित होना चाहिए कि नीति स्वामित्व या निवेश के आधार पर भेदभाव न करते हुए सबके लिए समान हो। एक निष्पक्ष नीति से निवेश बढ़ेगा, रोजगार तैयार होंगे और उपभोक्ताओं का भी कल्याण होगा।
Date: 26-08-24
आमदनी बढ़ाने में बांस की खेती होगी कारगरसुरिंदर सूद
कभी ‘गरीबों की लकड़ी’ कहलाने वाला बांस अब किसानों के लिए रकम पैदा करने का जरिया बन गया है और इसीलिए उसे ‘हरा सोना’ कहा जाता है। आधुनिक तरीकों से इसकी खेती करना गन्ने और कपास जैसी कीमती फसलों से भी ज्यादा फायदेमंद साबित हो रहा है। इसमें किसानों की आमदनी बढ़ाने की संभावना देखते हुए सरकार ने राष्ट्रीय बांस मिशन और एकीकृत बागवानी विकास मिशन को नए सिरे से शुरू किया गया है, जिसके तहत देश के विभिन्न हिस्सों में बांस की खेती को बढ़ावा देने के लिए योजनाएं लागू की जा रही हैं।
इन योजनाओं में लकड़ी के विकल्प के रूप में विभिन्न क्षेत्रों में बांस का उपयोग बढ़ाने के उपाय शामिल हैं। साथ ही बांस और इससे बने उत्पादों के उत्पादन, देश में मार्केटिंग तथा निर्यात के लिए मूल्य श्रृंखला बनाने के उपाय भी किए जा रहे हैं। नीति आयोग का अनुमान है कि साल 2025 तक दुनिया में बांस का बाजार लगभग 98.3 अरब डॉलर का हो जाएगा। चीन के बाद भारत ही दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा बांस उत्पादक देश है और तेजी से बढ़ते वैश्विक बाजार में बड़ा हिस्सा हासिल करने की कोशिश कर रहा है। देश में बांस की 136 देसी किस्में होती हैं और इस बहुमूल्य तथा बहुउपयोगी पौधे का करीब 32.3 लाख टन सालाना उत्पादन होता है।
जंगली पौधे के बजाय कृषि फसल के रूप में बांस की खेती को बढ़ावा देने के लिए वर्ष 2017 में भारतीय वन अधिनियम में एक अहम संशोधन किया गया, जिसके तहत बांस को ‘पेड़’ के बजाय ‘घास’ की श्रेणी में डाल दिया गया। इससे पेड़ों और दूसरे वन उत्पादों की कटाई, ढुलाई तथा बिक्री पर लगे तमाम तरह के प्रतिबंध बांस से हट गए। वनस्पति विज्ञान में पौधों का वर्गीकरण भी इस कदम को सही ठहराता है, जिसमें बांस को घास के एक विशेष परिवार में रखा गया है। इसमें गेहूं, चावल, जई, राई, मक्का, ज्वार और बाजरा जैसी खाद्य फसलें भी इसी परिवार में आती हैं। अब बांस की खेती भी दूसरी फसलों की तरह की जा सकती है और इसे बेचने के लिए न तो किसी लाइसेंस की जरूरत पड़ती है और न ही वन विभाग या किसी अन्य सरकारी एजेंसी की इजाजत लेनी पड़ती है।
बांस प्राकृतिक रूप से पूर्वोत्तर भारत और पश्चिम बंगाल में होता है, जहां इसका दायरा तेजी से बढ़ रहा है। इसके साथ ही मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, अंडमान-निकोबार द्वीप समूह और पश्चिमी घाट जैसे इलाकों में भी इसकी खेती तेजी से फैल रही है। इस समय 1.57 करोड़ हेक्टेयर से भी ज्यादा भूमि पर बांस की खेती होने का अनुमान है। देश में उगने वाले कुल बांस का लगभग 50 फीसदी पूर्वोत्तर क्षेत्र में होता है।
मीडिया में हाल में आई खबरों के मुताबिक गुजरात में पिछले दो वर्षों में बांस किसानों की संख्या दोगुनी हो गई है। महाराष्ट्र सरकार ने 7 लाख रुपये प्रति हेक्टेयर प्रोत्साहन का ऐलान कर बांस की खेती का रकबा 10,000 हेक्टेयर तक बढ़ाने की योजना का ऐलान किया है। यह पहल पर्यावरण प्रदूषण पर अंकुश लगाकर कार्बन सिंक (कार्बन डाई ऑक्साइड सोखने वाले इलाके) बनाने की राज्य की रणनीति का हिस्सा है। बांस कार्बन डाई ऑक्साइड को ऑक्सीजन में बदलने में बहुत कारगर होते हैं। कई अध्ययनों में पता चला है कि ज्यादातर पौधों की तुलना में बांस 35 फीसदी अधिक ऑक्सीजन का उत्पादन करता है।
खास बात है कि बांस दुनिया में सबसे तेजी से बढ़ने वाले पौधों में शामिल है। आम तौर पर यह एक ही दिन में 30 से 90 सेंटीमीटर (1 से 3 फुट) तक बढ़ जाता है, जिसके कारण यह बायोमास के सबसे कारगर उत्पादकों में से एक है। इस बायोमास का इस्तेमाल भोजन से ईंधन तक विभिन्न उत्पाद बनाने में किया जाता है। बांस की नई टहनियों से पूर्वोत्तर राज्यों में सब्जी बनाई जाती है या दूसरे स्थानीय व्यंजनों में इसका इस्तेमाल किया जाता है। बांस से बने खाद्य पदार्थ सेहतमंद माने जाते हैं क्योंकि इनमें फाइबर भरपूर होता है मगर कैलरी कम होती हैं। इनका स्वाद भी एकदम अलग होता है। बांस की जड़ समेत उसके कुछ हिस्से औषधि के रूप में इस्तेमाल किए जाते हैं। पूर्वोत्तर में इनका इस्तेमाल पारंपरिक उपचार में किया जाता है।
बांस को पर्यावरण के अनुकूल जैव ईंधन जैसे एथनॉल बनाया जा सकता है या इसकी लुगदी से कागज भी बनाया जा सकता है। मजबूती और लचीलेपन की वजह से निर्माण क्षेत्र में भी बांस का व्यापक उपयोग होता है, जहां इसकी मचानें खूब बनाई जाती हैं। इसके अलावा मेज, कुर्सी, पलंग जैसे फर्नीचर और दूसरे घरेलू सामान बनाने में भी इसका इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है क्योंकि यह हल्का, टिकाऊ होता है तथा बिल्कुल अलग दिखता है।
व्यावसायिक मकसद से खेती करने पर बांस को आम तौर पर बरसात के मौसम में रोपा जाता है। इसकी कलमों की रोपाई होती है। कटाई के बाद जो हिस्सा जमीन में बच जाता है, उससे भी नया बांस उग जाता है। पौधे को कटाई के लायक बनने में करीब 5 वर्ष लग जाते हैं। बांस की रोपाई के बाद शुरुआती दो-तीन वर्षों में इसके पौधों के बीच मौजूद जगह में हल्दी, मिर्च और अदरक जैसी कई फसल उगाई जा सकती हैं, जिनसे अतिरिक्त कमाई हो जाती है। एक हेक्टेयर रकबे में औसतन 30 से 35 टन बांस सालाना होता है।
बांस के बाग को अच्छी तरह संभाला जाए, ज्यादा उपज वाली किस्में लगाई जाएं, नकदी का इस्तेमाल हो और खेती की अच्छी पद्धति आजमाई जाएं तो उपज बढ़ भी सकती है। ‘बीमा बांस’ जैव प्रौद्योगिकी के जरिये तैयार की गई बांस की अधिक उपज वाली किस्म है, जो सबसे ज्यादा लोकप्रिय है। एक बांस आम तौर पर 100 रुपये में बिकता है। इस हिसाब से इसकी खेती करने वाले सालाना 75,000 से 80,000 रुपये प्रति हेक्टेयर शुद्ध लाभ कमा सकते हैं। इतना रिटर्न बहुत कम फसलों में मिल पाता है।
Date: 26-08-24
सुनिश्चित पेंशन की गारंटीसंपादकीय
केंद्र सरकार ने पुरानी पेंशन योजना सरीखी यूनिफाइड पेंशन स्कीम (यूपीएस- एकीकृत पेंशन योजना) की शुक्रवार को घोषणा की। सुनिश्चित पेंशन की अरसे से सरकारी कर्मचारी मांग करते रहे हैं, जिनके दबाव में मोदी सरकार को यह फैसला करना पड़ा है। कांग्रेस सहित तमाम विपक्षी दलों ने भी बराबर दबाव बना रखा था। योजना के अनुसार कर्मचारी के रिटायर होने पर सेवानिवृत्ति के दिन से पहले के बारह महीने के औसत वेतनमान का 50 फीसद पेंशन के रूप सुनिश्चित मिलेगा। क्वालीफाइंग सर्विस 25 साल होगी। दस साल से 25 साल तक नौकरी करने वाले कर्मचारियों को उसी अनुपात में पेंशन मिलेगी। यूपीएस एक अप्रैल, 2025 से लागू होगी। मौजूदा एनपीएस भी जारी रहेगी। कर्मचारियों पर है कि दोनों में से कौन सा विकल्प चुनते हैं। एनपीएस वाले यूपीएस में जाते हैं तो उन्हें फायदा होगा। दरअसल, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने तत्कालीन वित्त सचिव टीवी सोमनाथ की अध्यक्षता में एक समिति बनाई थी। समिति ने कर्मचारियों के कल्याण और सुरक्षित भविष्य के मद्देनजर पेंशन के मसले का गहनता से अध्ययन
किया। समिति की सिफारिशों के आधार पर मोदी मंत्रिमंडल ने यूपीएस संबंधी फैसला किया है। अलबत्ता, फैसले की टाइमिंग को लेकर काफी कुछ कहा जा सकता है। सबसे पहले तो यही कि लोक सभा चुनाव में पार्टी को मिले झटके के बाद कई राज्यों में आने वाले असेंबली चुनावों में भाजपा कोई जोखिम नहीं लेना चाहती। हरियाणा और जम्मू-कश्मीर में तो असेंबली चुनाव का ऐलान भी हो चुका है। जल्द ही महाराष्ट्र और झारखंड में भी चुनाव होने हैं। 2024 के चुनाव में भाजपा के सदस्यों की संख्या 303 से गिरकर 240 पर रह गई थी। उसे अपने तईं स्पष्ट बहुमत की सरकार की बजाय सहयोगी दलों के साथ बने गठबंधन एनडीए की सरकार का नेतृत्व करना पड़ रहा है। 2024 में अपेक्षानुरूप प्रदर्शन न कर पाने के पीछे तमाम कारक गिनाए जा सकते हैं, लेकिन अग्निवीर, पुरानी पेंशन योजना (ओपीएस) और आरक्षण, किसानों के मुद्दे ऐसे रहे जिनके चलते भाजपा को झटका लगा। पेंशन का मुद्दा खासा संवेदनशील है, 23 लाख कर्मचारी (राज्य सरकार भी इसे लागू करती हैं तो संख्या 90 लाख हो जाएगी) यूपीएस से लाभान्वित होने हैं, जिनकी अनदेखी का जोखिम भारी पड़ सकता है। यूपीएस से सरकार ने मध्यम वर्ग को राहत देने की कोशिश की है, जिसका उसे चुनाव में फायदा होता दिख रहा है।
Date: 26-08-24
वैश्विक शांति के लिए अहमप्रेम शुक्ल
भारतीय सनातन संस्कृति में रची-बसी वसुधैव कुटुम्बकम की अवधारणा आज वैश्विक पटल पर परचम लहरा रही है। आज युक्रेन- रूस युद्ध में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की वसुधैव कुटुम्बकम आधारित विदेश नीति से वैश्विक शांति एवं जनकल्याण की बहाली की कवायद हो रही है। यूक्रेन – रूस युद्ध काल में प्रधानमंत्री मोदी का कीव पहुंच कर यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर लेंस्की से मुलाकात करना वैश्विक शांति की दिशा में महत्त्वपूर्ण कदम माना जा रहा है। यह दौरा इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि इससे पहले मोदी ने 8-9 जुलाई को मास्को में रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन से मुलाकात की थी।
युद्धकाल में प्रधानमंत्री का कीव पहुंचना इसलिए भी महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है कि यूएसएसआर से टूटकर यूक्रेन देश बनने के बाद पहली बार भारत के किसी प्रधानमंत्री का यूक्रेन दौरा है। 2022 में यूक्रेन – रूस युद्ध शुरू होने के बाद से प्रधानमंत्री मोदी कई वैश्विक मंच से दोनों देशों को संदेश देते रहे हैं, ‘यह युग युद्ध का युग नहीं है। भारत शांति और स्थिरता की जल्द बहाली के लिए डायलॉग और डिप्लोमेसी का समर्थन करता है। किसी भी संकट में मासूम लोगों की जान हानि पूरी मानवता के लिए सबसे बड़ी चुनौती बन गई है।’ मानवता पर हो रहे अघात पर वह देश चुप नहीं बैठ सकता है जो वसुधैव कुटुम्बकम आधारित विदेश नीति को लेकर वैश्विक शांति, जनकल्याण और विकास के लिए काम करता रहा है।
2014 में सत्ता संभालने के बाद ही प्रधानमंत्री मोदी ने भारत की विदेश नीति को लेकर स्पष्ट कर दिया था। उन्होंने कहा था, ‘एक वक्त वह था, जब हम समुंदर किनारे लहरें गिना करते थे, लेकिन अब वक्त आ गया है हम पतवार लेकर समुंदर में खुद उतरें।’ उन्होंने स्पष्ट कर दिया था कि वसुधैव कुटुम्बकम की अवधारणा को लेकर चले हैं तो अपने घर में शांति और सद्भाव से बैठ कर काम नहीं चलेगा, बल्कि उसे साकार करने के लिए हर संभव प्रयास करना होगा। मानवता की खातिर आज मोदी युद्धग्रस्त पहुंच गए। भारत यूक्रेन से द्विपक्षीय संबंधों को बेहतर बनाने की दिशा में निरंतर काम करता रहा है। दिसम्बर, 1991 में यूक्रेन को संप्रभु एवं स्वतंत्र देश की मान्यता मिलने के बाद मई, 1992 में कीव में भारतीय दूतावास खोला गया। द्विपक्षीय संबंधों को बेहतर बनाने की दिशा में भारत ने यूक्रेन से आर-27 एयर-टू-एयर मिसाइल समेत अन्य हथियार आयात किए। एशिया-प्रशांत क्षेत्र में यूक्रेन का पांचवा सबसे बड़ा निर्यात गंतव्य भारत बना । भारत द्वारा यूक्रेन को दवाओं का निर्यात करना भी जारी रहा। यूक्रेन में 30 से अधिक यूक्रेनी संस्कृति संघ / समूह भारतीय नृत्य को बढ़ावा देने के लिए कार्य करते हैं। इसके बावजूद यूक्रेन ने कई मामलों में भारत का साथ नहीं दिया। 1998 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी की सरकार में जब भारत ने परमाणु परीक्षण किया तो यूक्रेन ने 25 देशों के साथ मिल कर भारत के परमाणु शक्ति बनने का विरोध किया। के यूक्रेन पड़ोसी देश पाकिस्तान को हथियारों की आपूर्ति करता रहा जो पाकिस्तान आतंकवाद को बढ़ावा देने में लगा रहा। आतंकवाद के मामले में यूक्रेन कई बार पाकिस्तान के पक्ष में खड़ा रहा, जिस पर भारत कई बार आपत्ति भी दर्ज करा चुका है। कश्मीर में पाक समर्थित आतंकवाद का मामला हो या पाक में आतंकियों को मिलने वाली मदद के मामले में यूक्रेन ने कभी भी भारत का साथ नहीं दिया। लेकिन, मानवता एवं विश्व बंधुत्व की भावना को लेकर भारत को सशक्त राष्ट्र बनाने वाले प्रधानमंत्री मोदी यूक्रेन- रूस युद्ध के खिलाफ रहे । मोदी की कूटनीति में भू- राजनीतिक स्तर पर भारत तेजी से ताकतवर बना है। यूक्रेन – रूस युद्ध शुरू होने के बाद से अब तक भारत दोनों में से किसी के भी साथ खड़ा नजर नहीं आया। रूस दौरे के दौरान पीएम मोदी के राष्ट्रपति पुतिन से गले मिलने की जम कर आलोचना की गई थी। मगर पीएम मोदी कीव पहुंच कर राष्ट्रपति जेलेंस्की के साथ कीव में भारत नेशनल म्यूजियम गए और जंग में मारे गए बच्चों को श्रद्धांजलि दी। फोमिन बॉटेनिकल गार्डन में पीएम मोदी ने महात्मा गांधी की प्रतिमा पर श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए विश्व को एक बार फिर ‘अहिंसा’ का पाठ याद दिलाया। मोदी ने एक्स पर लिखा, ‘बापू की प्रतिमा पूरी दुनिया में है। यह लाखों लोगों को उम्मीद देती है। बापू ने इंसानियत का जो रास्ता दिखाया है, उस पर हम सब को चलना चाहिए।’
ये बातें भले ही छोटी लग सकती हैं, लेकिन भू-राजनीति में बड़े बदलाव के संकेत दे रही हैं। जिस तरह से पीएम मोदी ने राष्ट्रपति जेलेंस्की के कंधे पर हाथ रखकर जंग में मारे गए बच्चों की याद में लगी प्रदर्शनी देखी, उससे स्पष्ट हो गया कि भारत मानवता को चुनौती देने वाली हर समस्या का समाधान निकालने में योगदान देगा। पीएम मोदी और राष्ट्रपति जेलेंस्की की द्विपक्षीय वार्ता का परिणाम भले ही तुरंत न दिखे, किंतु इसका दीर्घकालीक परिणाम यूरोशिया पर पड़ेगा, जो शांति और मानवता की बेहतरी के लिए होगा। दीर्घकालिक परिणाम हो या त्वरित परिणाम, इस प्रकार की विदेश नीति भारत के लिए कोई नई नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी की विदेश नीति में भारत के मान-सम्मान के साथ हर देश से आंख में आंख डाल कर बातचीत करना और मित्रता बनाए रखना है। पीएम मोदी एक तरफ रूस से एस-400 मिसाइल खरीदते हैं, और दूसरी ओर अमेरिका से सेमीकंडक्टर चिप बनाने की तकनीक एवं उत्पादन में सहयोग भी प्राप्त करते हैं, जबकि दोनों देश परस्पर घोर विरोधी हैं। प्रधानमंत्री मोदी इस्राइल भी गए और फिलिस्तीन भी, ईरान भी गए और इस्राइल भी, जबकि ये देश परस्पर कट्टर विरोधी हैं, किंतु भारत के इन देशों से अच्छे संबंध हैं। सशक्त हाथों से पतवार थामे समुंदर की लहरों पर आगे बढ़ने का परिणाम है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी विश्व में लोकप्रिय नेता होने के साथ ही सर्वमान्य नेता के रूप में स्वीकारे जाने लगे हैं। मोदी की वैश्विक नेतृत्व क्षमता का ही परिणाम है कि उनके यूक्रेन दौरे के दौरान रूस ने 8 घंटे का सीजफायर कर दिया। तभी तो संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंटोनी गुटरेस भी प्रधानमंत्री मोदी के यूक्रेन दौरे को लेकर आशान्वित हैं। उन्होंने यहां तक कहा, ‘पीएम मोदी का यूक्रेन दौरा शांति लाने में मददगार साबित होगा। हमें उम्मीद है कि ये यात्राएं असर दिखाएंगी।’ सिर्फ संयुक्त राष्ट्र ही नहीं, बल्कि अमेरिका और यूरोप के राष्ट्राध्यक्ष भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की यात्रा पर टकटकी लगाए रहे। भारत में कही जाने वाली बातों पर अब दुनिया भरोसा करने लगी है कि ‘मोदी हैं तो मुमकिन है।’
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Date: 24-08-24
Working 9 to 5……And disconnecting afterwards isn’t always heavenlyTOI Editorials
Once upon a time we spent working hours in the office and personal hours away from it. This binary life feels like ancient history because that’s how transformative the smartphone and then the pandemic have been. Thanks to these two, the worksite has been emancipated, to go where you will. You, in turn, have gotten shackled to it 24×7. Hence the growing, worldwide cry for the right to disconnect, to ignore work calls, messages and emails outside of working hours.
Australia has become the latest country to enshrine it in law. France was the first. Naturellement. Japan, at the other extreme, has a word for death from overwork. Karoshi. Everyone clocking out at 40 hours a week and taking all the vacation to which they are entitled, is unimaginable there.
More generally, common sense says it should depend on the job. Someone who works at the intersection of multiple time zones, for example, can’t deliver their KRAs doing 9 to 5. Then too, as Dolly Parton sings, doing a 9 to 5 job where you’re just “a step on the bossman’s ladder” is nobody’s dream either. A toxic manager can give you stress enough during the official work hours, while a job you luv will eat into your holiday no matter the law. Bottom line, workers are not slaves. We have to work to live. But our mindfulness about the kind of work-life balance we desire will only serve us well, if we actually have choices.
Date: 24-08-24
Celebrate National Give Space DayET Editorials
On Friday, the Indian state celebrated National Space Day, commemorating the first successful Indian moon landing on August 23, 2023. Indeed, it’s a milestone worth celebrating and commemorating. But, perhaps, India could also observe every August 25, starting this Sunday, as National Give Space Day.
Despite its vastness, India is a densely populated country — 30th among countries (tiny Vatican City and Palestine included) with an average population density of 426.1 people/sq km. Our urban spaces are even more jam-packed, with conglomerations existing cheek-by-jowl, if not tumbling on each other. Within a vast number of households, family members coexist in more restricted spaces than in other more densely populated but richer countries like Singapore, Bahrain and the Netherlands. Intimacy is a regular casualty.
The sanctity of personal space needs to be inculcated from a young age. And this is as important as instilling social values, the blurring of private and public space actually affecting both deleteriously. It’s one thing to negotiate a crowd, and quite another to become a crowd in somebody’s private space. The need to sensitive people about the latter is not just about good manners but decent citizenry. By virtue of valuing the individual and his or her space, one could also organically become more aware of the difference between a caring state and an overbearing one. As with most social entities, clarity begins at home. Allowing space — between couples and the rest of the family, between guardians/parents and their wards/children, etc — should be nurtured, not frowned upon. Effects of such a Lakshman rekha in place can work wonders over time for the mental health of not just individuals but also of a society at large.
Date: 24-08-24
The road to 2047 for Indian agricultureThere are several challenges but also opportunitiesSouryabrata Mohapatra,Sanjib Pohit, [ Souryabrata Mohapatra is with the National Council of Applied Economic Research (NCAER), New Delhi. Sanjib Pohit is with the National Council of Applied Economic Research (NCAER), New Delhi ]
India’s centennial year of independence is still away, in 2047, but the goal of becoming a developed nation looms large. Achieving this requires a significant increase in per capita Gross National Income (GNI) to about six times the current level. This necessitates a comprehensive development approach, especially in agriculture.
Transforming Indian agriculture depends on adopting sustainable practices that ensure long-term productivity and environmental health. Precision farming, genetically modified crops, and advanced irrigation techniques such as drip and sprinkler systems are leading this transformation. For instance, the Pradhan Mantri Krishi Sinchayee Yojana (PMKSY) has covered 78 lakh hectares, promoting water-use efficiency through micro-irrigation. The scheme’s ₹93,068 crore allocation for 2021-26 underscores the government’s commitment to sustainable water management.
India’s agricultural sector faces challenges, including climate change, land degradation, and market access issues. The Pradhan Mantri Fasal Bima Yojana (PMFBY), introduced in 2016, provides financial assistance for crop losses. With 49.5 crore farmers enrolled and claims totalling over ₹1.45 lakh crore, the scheme is a cornerstone of agricultural risk management.
The Electronic National Agriculture Market (eNAM), launched in 2016, integrates existing markets through an electronic platform. By September 2023, 1,361 mandis had been integrated, benefiting 1.76 million farmers and recording trade worth ₹2.88 lakh crore. This initiative improves market access and ensures better price realisation for farmers.
An imbalance
Despite agriculture engaging nearly 46% of the workforce, agriculture’s contribution to GDP is about 18%, highlighting a stark imbalance. If current growth trends continue, this disparity will worsen: while overall GDP has grown at 6.1% annually since 1991-92, agricultural GDP lags at 3.3%. Under the Narendra Modi administration, overall GDP growth was 5.9%, and agriculture grew at 3.6%. However, this is insufficient for a sector so critical to the nation’s socio-economic fabric.
By 2047, agriculture’s share in GDP might shrink to 7%-8%, yet, it could still employ over 30% of the workforce if significant structural changes are not implemented. This indicates that merely maintaining the current growth trajectory will not suffice.
The expected 7.6% overall GDP growth for 2023-24 is promising. However, the agri-GDP’s anaemic growth of 0.7%, primarily due to unseasonal rains, is alarming.
Further, according to United Nations projections, India’s population is expected to reach 1.5 billion by 2030 and 1.59 billion by 2040. Following the agricultural challenges, meeting the food requirements of this burgeoning population will be imperative. With an estimated expenditure elasticity of food at 0.45, the demand for food is expected to grow by approximately 2.85% annually, considering the population growth rate of 0.85%.
India’s real per capita income increased by 41% from 2011-12 to 2021-22 and is projected to accelerate further. However, the expenditure elasticity post-2023 is anticipated to be lower, correlating a 5% rise in per capita expenditure to a 2% growth in demand. The anticipated food demand will vary among commodities, with meat demand growing by 5.42% and rice demand by a mere 0.34%.
To address these challenges, rationalising food and fertilizer subsidies and redirecting savings towards agricultural research and development innovation and extension services are crucial.
Some initiatives
Several initiatives have been rolled out to bolster farmer prosperity and sustainable agricultural growth. The Pradhan Mantri Kisan Samman Nidhi (PM-KISAN), launched in 2019, disburses ₹6,000 annually to farmers in three instalments. This scheme has already benefited over 11.8 crore farmers, offering much-needed financial support. Another critical initiative, the Soil Health Card (SHC) scheme, aims to optimise soil nutrient use, thereby enhancing agricultural productivity. Over 23 crore SHCs have been distributed, providing farmers with crucial insights into soil health and nutrient management.
The government also championed the International Year of Millets in 2023, promoting nutritious coarse grains, both domestically and internationally.
The Agriculture Infrastructure Fund, with a ₹1 lakh crore financing facility, supports the development and modernisation of post-harvest management infrastructure. Within three years, over 38,326 projects have been sanctioned, mobilising ₹30,030 crore in the agricultural infrastructure sector. These projects have created employment for more than 5.8 lakh individuals and improved farmer incomes by 20%-25% through better price realisation.
Moreover, the Survey of Villages and Mapping with Improvised Technology in Village Areas (SVAMITVA) initiative aims to ensure transparent property ownership in rural areas. As of September 2023, over 1.6 crore property cards have been generated, enhancing land security and facilitating credit access for farmers.
Strategic planning
The government’s strategic planning for agriculture, leading up to 2047, focuses on several key areas: anticipated future demand for agricultural products, insights from past growth catalysts, existing challenges, and potential opportunities in the agricultural landscape. Projections indicate that the total demand for food grains in 2047-48 will range from 402 million tonnes to 437 million tonnes, with production anticipated to exceed demand by 10%-13% under the Business-As-Usual (BAU) scenario.
However, to meet this demand sustainably, significant investments in agricultural research, infrastructure, and policy support are required. The Budget for 2024-25, with an allocation of ₹20 lakh crore for targeted agricultural credit and the launch of the Agriculture Accelerator Fund, highlights the government’s proactive approach to fostering agricultural innovation and growth.
The road to 2047 presents both challenges and opportunities for Indian agriculture. By embracing sustainable practices, leveraging technological innovations, and implementing strategic initiatives, India can enhance farmer incomes, meet the food demands of its growing population, and achieve inclusive, sustainable development.
Date: 24-08-24
हाल की आपदाएं प्राकृतिक ही नहीं, मानव-निर्मित भी हैंसुनीता नारायण, ( पर्यावरणविद् )
हाल ही में केरल के वायनाड में भूस्खलन की त्रासद-घटना के कारण 300 से अधिक लोगों की मौत हो गई थी। उसका सम्बंध जलवायु परिवर्तन से था भी और नहीं भी। उससे पहले केदारनाथ या हिमाचल प्रदेश में भूस्खलन और बाढ़ की घटनाएं भी जलवायु परिवर्तन से जुड़ी थीं, और नहीं भी। हम जानते हैं कि जलवायु परिवर्तन से भविष्य में चरम-मौसम की और भी अधिक घटनाएं होंगी। हमने देश भर में कई क्षेत्रों में रिकॉर्ड तोड़ तापमान देखा है। फिर बारिश से मुसीबतों का मौसम आया। अत्यधिक बारिश और जलवायु-परिवर्तन से उसके संबंध का भी एक स्पष्ट विज्ञान है। जैसे-जैसे समुद्र का तापमान बढ़ेगा, दुनिया में ज्यादा बारिश होगी, और वह अतिवृष्टि के रूप में होगी। इसलिए कम बारिश वाले दिनों में भी ज्यादा बारिश देखने को मिलेगी। अनुमान है कि भारत में एक साल के लगभग 8700 घंटों में से कुछ सौ घंटे बारिश होती है। लेकिन जुलाई 2024 में भारतीय मेट्रोलॉजी विभाग (आईएमडी) के अनुसार ‘बहुत भारी बारिश’ के रूप में वर्गीकृत की गई घटनाएं पिछले पांच सालों में दोगुनी से भी ज्यादा हो गई हैं। जुलाई में ऐसी घटनाएं 2020 में 90 थीं, जो 2024 में बढ़कर 193 हो गई हैं।
यूपी के बरेली का डेटा लें। 8 जुलाई को इस जिले में 24 घंटे में 460 मिमी बारिश हुई। बरेली में हर साल औसतन 1100 से 1200 मिमी बारिश होती है। तो 24 घंटे में ही इसकी आधी बारिश हो गई। उत्तराखंड के चम्पावत जिले का भी यही हाल था। 8 जुलाई को ही 24 घंटे में 430 मिमी बारिश हुई। अगर आप 25 जुलाई को पुणे जिले को लें तो 24 घंटे में 560 मिलीमीटर बारिश हुई। यह इस जिले में साल भर में होने वाली बारिश की आधी से भी ज्यादा है।
हिमालय को ही लीजिए। यह दुनिया की सबसे युवा पर्वतमाला है। यह भूस्खलन और बादल फटने की घटनाओं के लिए एक जोखिम भरा स्थल है और यह अत्यधिक भूकंपीय-क्षेत्र भी है। यह नाजुक है। फिर भी हम हिमालय में कुछ इस अंदाज में निर्माण करते हैं मानो दिल्ली के किसी भीड़भाड़ वाले इलाके में पार्किंग स्थल बना रहे हों। हमारे पास हिमालय की वादी में बसे कस्बों के लिए कोई मास्टर प्लान नहीं है। हम बाढ़ के मैदानों पर निर्माण कर रहे हैं। वास्तव में, हम नदियों के ऊपर भी निर्माण करने लगे हैं। हम पहाड़ों को नष्ट कर रहे हैं। और पेड़ों को तो ऐसे काट रहे हैं, मानो कल इसका अवसर न मिलेगा। ये सच है कि हमें हिमालय-क्षेत्र में विकास करना चाहिए, लेकिन बिना सोचे-समझे विकास-परियोजनाओं का कोई औचित्य नहीं। हिमालय में चलाई जा रही जलविद्युत परियोजनाएं इसकी बानगी हैं।
हमें इन परियोजनाओं के खिलाफ नहीं होना चाहिए। आखिर, जलविद्युत एक महत्वपूर्ण ऊर्जा स्रोत है। यह एक अक्षय और स्वच्छ ऊर्जा स्रोत भी है। सवाल यह है कि हिमालय की संवेदनशीलता को ध्यान में रखते हुए इन परियोजनाओं पर हमें कैसे काम करना चाहिए? 2013 में, मैं एक उच्चस्तरीय समिति की सदस्य थी, जिसे इन परियोजनाओं की जांच के लिए गठित किया गया था। इंजीनियरों ने बताया कि वे 9000 मेगावाट बिजली पैदा करने के लिए गंगा पर 70 पनबिजली-परियोजनाएं बनाने का प्रस्ताव रखते हैं। इस योजना के अनुसार शक्तिशाली गंगा नदी का 80 प्रतिशत हिस्सा ‘संशोधित’ किया जाता और नदी में लीन पीरियड में उसमें 10 प्रतिशत से भी कम पानी बचता। तब वह एक नाले से ज्यादा नहीं रह जाती। मैंने पूछा, इसे विकास कैसे कहा जा सकता है?
मैंने इसका विकल्प सुझाया कि हमें नदी के प्रवाह के अनुरूप परियोजनाओं को फिर से डिजाइन करना चाहिए, ताकि जिस मौसम में नदी में अधिक पानी हो, तब उससे अधिक बिजली पैदा हो और जब पानी कम हो, तो कम। इसका मतलब यह था कि परियोजनाओं को इस तरह से तैयार किया जाना चाहिए कि नदी में हर समय 30 से 50 प्रतिशत प्रवाह बना रहे। तब आप परियोजनाओं में संशोधन कर रहे होंगे, नदी में नहीं।
केरल का वेस्टर्न-घाट- जहां भूस्खलन हुआ- 2013 में के. कस्तूरीरंगन समिति द्वारा अनुशंसित पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र का हिस्सा है। समिति ने सिफारिश की थी कि इन क्षेत्रों में खनन और उत्खनन जैसी गतिविधियों पर प्रतिबंध लगा दिया जाना चाहिए। लेकिन केरल सरकार ने इसे नहीं माना और परिणामस्वरूप अत्यधिक बारिश में वहां की कुछ पहाड़ियां ढह गईं और बड़े पैमाने पर जान-माल की हानि हुई। इसलिए ध्यान रहे, देश भर में हम आज जो भी प्राकृतिक आपदाएं देख रहे हैं, वे प्राकृतिक ही नहीं मानव निर्मित भी हैं।
Date: 24-08-24
केंद्र व राज्यों में तालमेल की कमी से देशहित की अनदेखीविराग गुप्ता, ( सुप्रीम कोर्ट के वकील )
बचपन में हमारे कक्का दो मूढ़ चेलों का किस्सा सुनाते थे, जिन्होंने सेवा के नाम पर गुरु के दोनों पैरों का बंटवारा कर लिया था। लेकिन एक छोटी-सी बात पर झगड़ा होने पर चेले जब गुरु के पैरों को कुल्हाड़ी से काटने लगे तो गुरु महाराज को भागकर जान बचानी पड़ी। कुछ ऐसे ही हालात अपने देश में हैं, जहां केंद्र और विपक्षी राज्यों के बीच बढ़ते विद्वेष की वजह से संवैधानिक व्यवस्था छिन्न-भिन्न होने के साथ देशहित से जुड़े जरूरी मुद्दों की अनदेखी हो रही है। भारत में बढ़ती अशांति और सड़कों में उफनाते गुस्से की पृष्ठभूमि में 6 बड़े पहलुओं की पड़ताल जरूरी है।
1. पड़ोसी देशों का संकट : श्रीलंका, पाकिस्तान, नेपाल और बांग्लादेश के तख्ता-पलट में जनता की नाराजगी के तीन बड़े पहलू भारत में भी दिख रहे हैं। नई आर्थिक व्यवस्था में बढ़ती असमानता। सोशल मीडिया के माध्यम से बेरोजगार युवाओं में उग्रराष्ट्रवाद और धर्मांधता का प्रसार। मोबाइल और वॉट्सएप के दौर में त्वरित अपेक्षाओं को पूरा करने में विफल सरकारों के खिलाफ सड़कों पर भीड़ का गुस्सा।
2. संविधान की डगमगाती इमारत : कोलकाता व महाराष्ट्र मामले में जजों की तीखी टिप्पणियों से साफ है कि राज्यों में पुलिस, प्रशासन, अस्पतालों का ढांचा चरमरा गया है। अन्याय को दूर करके गवर्नेंस को सुधारने के बजाय नेता दुष्कर्म जैसे संगीन मामलों पर भी सियासत कर रहे हैं। दोषियों को दंडित करने के बजाय चर्चित मामलों में सीबीआई जांच और सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई और जिला अदालतों का संस्थागत ह्रास होने से संविधान की इमारत डगमगा रही है।
3. ई-कॉमर्स से अर्थव्यवस्था में तबाही : अमेजन और विदेशी ई-कॉमर्स कम्पनियों की गैर-कानूनी गतिविधियों के बारे में वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के बयान से साफ है कि एआई की नवक्रांति का नेतृत्व करने के बजाय हमारा देश पिछलग्गू बनकर उपनिवेशवाद की अंधी सुरंग में फंस-सा गया है। गैर-कानूनी लॉबीइंग, टैक्स चोरी और कानून के उल्लंघन के प्रमाणों के बावजूद, ई-कॉमर्स कम्पनियों के खिलाफ सरकार की सुस्ती से करोड़ों का दिवाला निकल रहा है।
4. गूगल का एकाधिकार : अमेरिका में कम्पनियों के एकाधिकार को रोकने के लिए 1890 और फिर 1914 में सख्त कानून बनाए गए थे। जिस गूगल को भारत में महागुरु का दर्जा दिया जाता है, उसकी गैर-कानूनी कारस्तानियों और आपराधिकता का अमेरिका में बड़ा खुलासा हुआ है। गूगल ने अपने सर्च इंजन, वेब-ब्राउजर, गूगल एड और एंड्रॉइड ऑपरेटिंग सिस्टम का वर्चस्व बढ़ाने के लिए एपल और सैमसंग जैसी कम्पनियों को खरबों डॉलर का भुगतान किया है। गौरतलब है कि ऐसे भुगतानों का भारत में कोई रिकॉर्ड नहीं होने से ये कंपनियां भारत में खरबों रुपए के जीएसटी और कॉर्पोरेट टैक्स की चोरी कर रही हैं।
5. भारत में देशी उद्योगों व स्टार्टअप का संकट : अमेरिका में अगले राष्ट्रपति पद की दावेदार कमला हैरिस की मां भारतीय मूल की हैं। अधिकांश टेक कंपनियों की कमान भी भारतीयों के हाथ में है। गूगल के खिलाफ फैसला देने वाले जज मेहता भी भारतीय मूल के हैं। इस फैसले के बाद गूगल को अमेरिकी न्याय विभाग और एफटीसी को पूरी जानकारियां देने के साथ भारी जुर्माना देना पड़ सकता है। इसके अलावा एकाधिकार को खत्म करने के लिए गूगल को कई हिस्सों में बांटा जा सकता है। मजे की बात यह है कि गूगल के अलावा मेटा, अमेजन, माइक्रोसॉफ्ट और एपल जैसी कंपनियां भी भारत जैसे देशों में अनेक अनुचित उपाय अपना रही हैं। इनके एकाधिकार को रोकने में सरकार की विफलता से देशी उद्योगों और स्टार्टअप का विकास अवरुद्ध होने के साथ टैक्स चोरी से सरकारी खजाने को भारी चपत लग रही है।
6. सरकारों पर कब्जे की होड़ : अमेरिका में रजिस्टर्ड ये कम्पनियां अमेरिकी सरकारों से तालमेल रखती हैं। पिछले चुनावों में मेटा और दूसरी कंपनियों ने ट्रम्प के खिलाफ बाइडेन का साथ दिया था। इस बार ट्विटर यानी एक्स के एलॉन मस्क खुलकर ट्रम्प का साथ दे रहे हैं। भारत जैसे देशों में कानून के दायरे से बचने के लिए टेक कंपनियां सोशल मीडिया के माध्यम से विखंडनकारी ताकतों को बढ़ावा देती हैं। वे भारत में टैक्स चोरी, साइबर अपराध, डेटा चोरी के साथ चुनावी प्रक्रिया को भी हाईजैक कर रही हैं। इन अहम मुद्दों पर संसद और सुप्रीम कोर्ट में बहस नहीं होना दुखद और दुर्भाग्यपूर्ण है। ठोस कानून और प्रभावी रेगुलेटर से विदेशी टेक कंपनियों पर सख्त नियंत्रण नहीं हुआ तो अर्थव्यवस्था और बैंकिंग प्रणाली दोनों डगमगा सकते हैं।
Date: 24-08-24
न्याय व्यवस्था में सुधार की केरल की पहलअजय शाह, ( लेखक एक्सकेडीआर फोरम में शोधकर्ता हैं )
किसी भी अच्छे समाज के लिए न्याय बुनियादी जरूरत है। उदार लोकतंत्र बनाने का वादा सही ढंग से काम कर रही न्यायपालिका पर ही निर्भर करता है, जो सुनिश्चित करती है कि विभिन्न पक्षों के बीच प्रतिस्पर्धा में किसी को दबाया नहीं जाए। बाजार अर्थव्यवस्था का वादा पूरा करने के लिए भी व्यवस्थित ढंग से काम करने वाली न्याय व्यवस्था की जरूरत होती है ताकि अनुबंध पर श्रम संभव हो, राज्य की शक्तियों को सीमित किया जा सके और कंपनियों के बीच दबावरहित प्रतिस्पर्द्धा भी सुनिश्चित हो। भारतीय न्यायपालिका की बात करें तो इसके सही होने, अनुमान लायक होने और गति के मामले में काफी असहजता है।
न्याय व्यवस्था में सुधार जटिल यात्रा है, जिसमें राजनीतिक अर्थव्यवस्था और विचार विमर्श के साथ डेटा पर शोध आदि भी शामिल होते हैं। जिन्हें पहले से चली आ रही व्यवस्था से लाभ मिल रहा है, वे कुछ अहम सुधारों पर शंका जताएंगे। सही जवाब किसी को नहीं पता। हमें आजमाइश करते हुए आगे बढ़ना होगा और राह तलाशनी होगी। सही जवाब तलाशने के लिए कई अनुभवों से गुजरना होता है। इन प्रयोगों के दौरान प्रक्रिया में बदलाव के ऐसे कई विचार गलत साबित होंगे, जिनकी कल्पना विचारकों ने की थी। विधिक व्यवस्था में काम करने के तरीके नए सिरे से गढ़ना निजी क्षेत्र की तुलना में कठिन होता है क्योंकि वहां मुकाबला करने वाला कोई नहीं होता और मुनाफे या शेयर भाव जैसी कोई बात भी नहीं होती।
कंप्यूटर तकनीक अदालतों का कामकाज सुधारने में उसी तरह मददगार हो सकती है, जिस तरह वह सेवा क्षेत्र के तमाम संगठनों में कर चुकी है। इस यात्रा का पहला हिस्सा वह है, जो हम देश की अनगिनत कंपनियों में घटित होते देख चुके हैं। उद्यम सूचना प्रौद्योगिकी से नेतृत्व को अग्रिम पंक्ति के कामकाज की प्रकृति पर नियंत्रण मिल जाता है। शुरुआती व्यवस्थाएं पुराने तरीकों का अनुसरण भर करें तो भी गहन बदलाव की बुनियाद उद्यमी आईटी व्यवस्था ही होती है। शेड्यूलिंग यानी मुकदमों की तारीख तय करने की व्यवस्था पर विचार कीजिए, जो न्याय व्यवस्था के सुधार की आत्मा सरीखी है। न्यायाधीश दिल की सर्जरी करने वालों की तरह होते हैं और उनके समय का सही इस्तेमाल होना चाहिए। कई अदालतों में अभी एक ही न्यायाधीश के पास एक दिन में सौ मुकदमे सुनवाई के लिए पहुंच जाते हैं। अगर तारीख देने का काम कंप्यूटर की मदद से कर दिया जाए तो परेशानी बहुत कम हो सकती है।
बेहतर यही होगा कि ऐसे हालात बनें जहां न्यायाधीश कम समय में भी हर मामले पर ध्यान दे सकें और समय लगा सकें। इससे उन्हें हर मामले के बारे में सही समझ बनाने में मदद मिलेगी। इससे उत्पादकता बढ़ेगी। ऐसे लाभ कंप्यूटरीकरण के वर्तमान तरीकों के दोहराव से सामने नहीं आएंगे। किंतु बेहतर स्थिति तो वह होगी, जब न्यायाधीश को एक ही मामले पर अधिक समय और ध्यान देने का मौका मिले ताकि कम समय में ही वह उसे अच्छी तरह समझ सके। इस तरह के बदलाव किए गए तो कंप्यूटर वैज्ञानिकों की भाषा में ‘थ्रैशिंग’ (जब एक मुकदमे से दूसरे मुकदमे पर जाने में बहुत समय नष्ट होता है) से बचकर अधिक परिणाम हासिल किए जा सकेंगे। लेकिन अगर कंप्यूटरीकरण के बाद भी आज के ढर्रे पर ही चला गया तो ये फायदे नहीं होंगे।
न्याय व्यवस्था या विधिक व्यवस्था में हम अक्सर सर्वोच्च और उच्च न्यायालयों की बात करते हैं मगर वास्तव में मुकदमों का भारी बोझ निचली अदालतों पर है। इसके लिए संविधान में उच्च न्यायालयों को प्रबंधन की शक्तियां दी गई हैं। उन्हें ही खुद को और अपने मातहत आने वाली अदालतों को सुधारने के लिए नेतृत्व और प्रबंधन के गुण ढूंढने होंगे।
आज हम एक महत्त्वपूर्ण पड़ाव पर हैं, जहां केरल उच्च न्यायालय ने ‘24*7 ऑन कोर्ट’ की शुरुआत की है। इससे वहां की जिला अदालतों के तरीकों में भारी बदलाव आएगा। बदलाव का सूत्र यह भी है कि दौड़ने से पहले चलना सीखा जाए। यही वजह है कि इन बदलावों की शुरुआत केवल कोल्लम की अदालत में की गई है और इसे चेक बाउंस के मामलों में ही लागू किया जाएगा। सबसे पहले नए सॉफ्टवेयर को जमने दिया जाएगा। समय बीतने पर इसे नए स्थानों और दूसरी तरह के मामलों में भी शुरू किया जा सकता है। हम उम्मीद कर सकते हैं कि राजनीतिक अर्थशास्त्र, विचार विमर्श और वैज्ञानिक अनुसंधान की मदद से आने वाले सालों में कई गहन परिवर्तन देखने को मिलेंगे।
केरल के अदालती नेतृत्व ने ओपन सोर्स सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल किया है। जब इसका कोड देखने को मिलेगा तो यह डर कम हो जायेगा कि सरकारी सॉफ्टवेयर वास्तव में करता क्या है। ओपन सोर्स के विकास में बहस, आलोचना और इंजीनियरिंग शामिल होते हैं। केरल के इस कदम में कुछ एपीआई (एप्लिकेशन प्रोग्रामिंग इंटरफेस) का इस्तेमाल हुआ है, जो एक नए तरह का खुलापन है। उदाहरण के लिए कोई बैंक या लॉ फर्म एंटरप्राइज सॉफ्टवेयर बना पाएगी, जो इन एपीआई के साथ इस्तेमाल होकर भारतीय विधि समुदाय में श्रम के इस्तेमाल को कम कर देंगे। पारंपरिक अदालत में मौजूद व्यक्ति को संवैधानिक सिद्धांतों के जरिये जो भी मिलना चाहिए, वह सब एपीआई के जरिये ही आएगा।
केरल की न्याय प्रणाली में सुधार की इन पहलों के लिए विभिन्न प्रकार की क्षमताओं की जरूरत पड़ी – केरल उच्च न्यायालय का नेतृत्व और प्रबंधन, मौजूदा वस्तुस्थिति का विस्तृत अध्ययन और बेहतर प्रक्रिया एवं सॉफ्टवेयर निर्माण, परोपकार के द्वारा ओपन सोर्स डेवलपमेंट, केरल उच्च न्यायालय को केरल सरकार से संसाधन की प्राप्ति आदि। इसे केरल उच्च न्यायालय की काबिलियत ही कहा जाएगा कि वह परिवर्तन की प्रक्रिया के लिए इन सभी को एक साथ ले आया।
दुनिया के अलग-अलग देशों और भारत के अलग-अलग राज्यों की जमीनी हकीकत अलग-अलग है। हर स्थान को इस दिशा में बढ़ने के लिए राजनीतिक अर्थव्यवस्था, विचार विमर्श और अनुसंधान की अपनी यात्रा करनी होगी। केरल में शुरुआत के समय जो ओपन सोर्स सॉफ्टवेयर पेश किया गया, वह देश और दुनिया में दूसरी जगहों पर भी इस काम में मददगार हो सकता है।
यह सब स्थिर तरीके से कैसे काम करेगा? ईगवर्नमेंट फाउंडेशन ने ‘डिजिट’ और ‘आईफिक्स’ सॉफ्टवेयर प्रणालियों के लिए जो तरीके अपनाए वे उपयोगी साबित हो सकते हैं। उनके तरीके में सॉफ्टवेयर सार्वजनिक स्तर पर ओपन सोर्स प्रक्रिया के माध्यम से बनाया जाता है और इसमें परोपकार से आया हुआ धन लगता है। कोई उच्च न्यायालय निजी वेंडरों के साथ अनुबंध करता है ताकि इस सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करते हुए कामकाज संभाला जा सके। शुरुआत में ऐसी व्यवस्थाओं में एक ही बाधा आ सकती है कि उच्च न्यायालयों में कितने सरकारी ठेके दिए जाएं। भविष्य में ये व्यवस्थाएं देश की अदालतों में प्रशासनिक पहलुओं को न्यायिक कामकाज से अलग करने के उस उद्देश्य में बदल सकती हैं, जो न्याय और विधि प्रणाली में सुधार के जरिये पूरा होगा।
Date: 24-08-24
अमन की राहसंपादकीय
प्रधानमंत्री की यूक्रेन यात्रा से स्वाभाविक ही सबको काफी उम्मीदें थीं। खुद प्रधानमंत्री भी वहां रवाना होने से पहले काफी उत्साहित थे। उन्होंने कहा था कि वे यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की से मिलने को लेकर उत्सुक हैं। जेलेंस्की ने बहुत गर्मजोशी से उनका स्वागत किया और वहां युद्ध की स्थितियों से उन्हें अवगत कराया। दोनों नेताओं के बीच बातचीत मुख्य रूप से युद्ध रोकने के उपाय तलाशने पर ही केंद्रित रही। यूक्रेन ने इच्छा जताई कि भारत शांति समझौते में सदा साथ रहे। हालांकि इस दौरान दोनों देशों ने चार समझौतों पर हस्ताक्षर भी किए। अधिकारियों ने बताया कि इन समझौतों से कृषि, खाद्य उद्योग, चिकित्सा, संस्कृति और मानवीय सहायता के क्षेत्र में सहयोग सुनिश्चित होगा। प्रधानमंत्री की यूक्रेन यात्रा पर इसलिए भी दुनिया की निगाहें बनी हुई थीं कि शुरू से रेखांकित किया जा रहा है कि भारत ही रूस और यूक्रेन के बीच चल रही जंग रुकवा सकता है। हालांकि भारत शुरू से ही दोनों देशों के राष्ट्राध्यक्षों से बातचीत कर युद्ध का रास्ता छोड़ने की अपील करता रहा है। यूक्रेन रवाना होने से पहले भी प्रधानमंत्री ने कहा था कि यह दौर युद्ध का नहीं है, युद्ध से किसी समस्या का समाधान नहीं निकल सकता।
यूक्रेन से पहले प्रधानमंत्री रूस भी गए थे। तब जेलेंस्की ने काफी नाराजगी जाहिर की थी। उन्होंने रूसी राष्ट्रपति पुतिन को दुनिया का सबसे बड़ा अपराधी बताते हुए उनसे भारतीय प्रधानमंत्री के गले मिलने की आलोचना की थी। मगर अब वे भारत के साथ संबंधों को प्रगाढ़ करने को लेकर उत्साहित नजर आए। प्रधानमंत्री की यूक्रेन यात्रा ऐसे समय में हुई है, जब यूक्रेन ने रूसी इलाकों में हमले तेज कर दिए हैं। इसे देखते हुए कहना मुश्किल है कि प्रधानमंत्री की अपीलों का यूक्रेन या फिर रूस पर कितना असर पड़ेगा। पहले भी कई मौकों पर प्रधानमंत्री पुतिन से फोन पर बातचीत करके या फिर आमने-सामने यूक्रेन पर हमले बंद करने की अपील कर चुके हैं। पिछले दिनों रूस जाकर भी उन्होंने पुतिन से यही अपील की थी। मगर अभी तक ऐसा कोई मौका नजर नहीं आया, जब रूस ने भारत की अपील पर संजीदगी दिखाई हो। शंघाई शिखर सम्मेलन के दौरान आमने-सामने बातचीत के बाद लगा था कि पुतिन ने भारतीय प्रधानमंत्री की अपील को गंभीरता से लिया है, मगर वहां से लौटते ही उन्होंने यूक्रेन पर हमले तेज कर दिए थे।
रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे संघर्ष का असर पूरी दुनिया पर पड़ा है। यूक्रेन में बड़ी संख्या में नागरिक मारे गए हैं, उसकी संपत्ति को भारी नुकसान पहुंचा है। यूक्रेन का वाणिज्य और व्यापार बाधित हुआ है। वह चाहता तो है कि युद्ध विराम पर समझौता हो, मगर वह रूस की शर्तें मानने को तैयार नहीं है। रूस की शर्त है कि यूक्रेन नाटो की सदस्यता त्याग दे। दोनों में से कोई, किसी भी रूप में झुकने को तैयार नजर नहीं आता। ऐसे में बातचीत की मेज पर बैठने की सूरत बने भी तो कैसे, यही सबसे कठिन सवाल है। भारत के लिए भी बातचीत का रास्ता निकालना आसान नहीं है। मगर प्रधानमंत्री की दोनों देशों की बारी-बारी से यात्रा और युद्ध का रास्ता छोड़ने की अपील से विश्व बंधुता का रास्ता तो बना ही है। उम्मीद की जाती है कि रूस और यूक्रेन थोड़ा लचीला रुख अपनाते हुए समझौते के लिए बीच के किसी रास्ते पर चलने को तैयार हो जाएं।
Date: 24-08-24
व्यथित शीर्ष अदालतसंपादकीय
आर जी कर अस्पताल में हुए डॉक्टर के मर्डर और रेप के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस की देरी को बेहद व्यथित करने वाला कहा है। शीर्ष अदालत ने इस मामले में स्वतः संज्ञान लेते हुए कहा कि न्याय और औषधि को रोका नहीं जा सकता । घटना पर क्षुब्ध चिकित्सकों के धरना-प्रदर्शन और चली आ रही हड़ताल को रोकने को भी कहा और कुछ डॉक्टरों की 36 घंटों की ड्यूटी को अमानवीय बताया। पीठ ने चिकित्सकों की सुरक्षा विरोध प्रदर्शन के मानदंडों और प्रदर्शनकारियों के अधिकारों को लेकर दिशा-निर्देश भी जारी किए। सभी राज्यों के मुख्य सचिवों को पुलिस महानिदेशकों के साथ मिलकर स्वास्थ्य पेशावरों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के भी निर्देश दिए। पोस्टमार्टम रिपोर्ट के अनुसार रेप की पुष्टि हो चुकी है जिसमें पता चला है कि प्रशिक्षु चिकित्सक का गला दो बार घोंटा गया। दोषी संजय राय को मानसिक बीमार और यौन विकृत बताया जा रहा है। उसकी चार शादियां हुईं, जिनमें पहली तीन छोड़ गईं तथा चौथी की कैंसर से मौत हो गई। पीठ का सख्त लहजे में केंद्र और पश्चिम बंगाल सरकार को घटना का राजनीतिकरण बिल्कुल न करने के साथ ही हड़ताली डॉक्टरों के साथ सख्ती और दंडात्मक कार्रवाई न करने को कहा। निःसंदेह यह घटना बेहद गंभीर है मगर चिकित्सकों का इस तरह काम बंद कर देना रोगियों के लिए भारी दिक्कतें पैदा कर देता है। उन्हें सरकार के प्रति अपनी नाराजगी जताने के अतिरिक्त गंभीर रोगियों और उनके परिजनों का भी ख्याल रखना चाहिए। सरकारें देश के हर नागरिक के प्रति जिम्मेदार हैं। बलात्कार और बढ़ते अपराधों के प्रति उनकी जवाबदेही तया कियाज जाना भी जरूरी है। बात जब सुरक्षा की हो रही है तो इस बात का भी ख्याल रखा जा चाहिए कि दरिंदगी करने वाला अस्पतालकर्मी ही है। सवाल सिर्फ चिकित्सकों की सुरक्षा का नहीं रहा। कई जगहों और कार्यालयों में महिला कर्मियों के साथ आए दिन बलात्कार, मारपीट और शोषण की घटनाएं सामने आती रहती हैं। सबसे पहले तो हमें युवाओं की सोच को बदलना होगा। सिर्फ सख्त सजा देने की बात कहकर या उसका समर्थन करने से ऐसे अपराध कभी खत्म नहीं होंगे। अभी कुछ ही दिन पहले दिल्ली के एक सरकारी अस्पताल में घुसकर हत्यारों ने एक मरीज पर गोलियां दागी थीं। तब भी सुरक्षा-व्यवस्था को लेकर बातें बनाई गई थीं। ये सब मानवीय लापरवाही हैं, इन पर की गई कोताही के जिम्मेदारों को अपराधमुक्त किया जाना भी घटनाओं की पुनरावृत्ति के मौकों में इजाफा करने वाला साबित होता है।
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24 August 2024
प्रश्न – 475 – भारत का पश्चिमी घाट भू-स्खलन के प्रति अधिक संवेदलशील क्यों है? इसे कम करने संबंधी कुछ उपाय सुझायें । (200 शब्द)
Question – 475 – Why is the Western Ghats of India more vulnerable to landslides? Suggest some measures to reduce it. (200 words)
नोट : इसका उत्तर आपको हमें नहीं भेजना है, यह आपके स्वयं के अभ्यास के लिए है।
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Date: 23-08-24
Price Of InterventionRegulators can look at pricing. But be careful of creating market disruption.TOI Editorials
Commerce minister Piyush Goyal’s criticism of multinational e-commerce players for “predatory pricing”, which he argued damages mom-and-pop players and small retailers, revives an old debate in this country. It’s true e-commerce giants have been accused of such tactics even in developed economies. But underlying this issue is a more fundamental one. Market economies are governed by demand and supply and pricing is best left to the interplay of those forces. And govts and regulators must be very cautious about intervening in pricing mechanisms. Global and local experience suggests that price controls can lead to shortages, inferior product quality and illegal markets. Price interventions may have good intentions but they often result in bad outcomes, as a World Bank paper said.
Markets need free play | There are also several benefits of a market mechanism to consider here. For instance, the e-commerce boom has not just been a boon for consumers but also helped with formalisation and digitisation of economy and generated more than, by one estimate, 15mn jobs. In the telecom sector, it’s the entry of an Indian behemoth with aggressive pricing in 2016 that led to a fall in tariffs and data revolution in India. The sector, which has seen tariffs rise again, is also proof that beating competition with such a strategy has its limits. Fact is no company can indefinitely keep suffering losses to gain market share.
Regulate but with caution | Besides, what’s the line that separates competitive pricing from predatory or over pricing? We need very sound and efficient regulatory systems to make such distinctions and balance market sanctity with ensuring a sector doesn’t turn into a monopoly. There will certainly be cases where regulators need to step in. Take for instance, the issue of surge pricing by taxi aggregators. There must be a ceiling on what passengers shell out in rush hour. But such interventions must be kept to a minimum. Concern for investment, growth, and job creation is also why formulation of India’s e-commerce policy has seen long delays. Create no major market disruption, must be the mantra.
Date: 23-08-24
Consumer India’s Amma JaansLarge e-commerce platforms haven’t played out in India quite like in the West. Here, they have empowered both small consumers and small suppliers. This is an inclusive growth story.Rama Bijapurkar, [ The writer is a consumer behaviour analyst. ]
All modern market economies have regulations that define the rules of the marketplace, and put checks and balances on players, especially big players. Commerce and industry minister Piyush Goyal’s criticism of large e-commerce players’ practices, including “predatory pricing”, should be seen in this context.
● First, consumers’ well-being is central to many of the rules. They prohibit ‘unfair trade practices’ or ‘abuse of dominance’ or mergers or price cartels or any behaviour that destroys competitors, weakens competition and creates monopolies – all of which, as we know from pre-1991, are really bad for consumers. Such protection of consumers and competition is, of course, welcome. Plus, such rules apply to everyone, regardless of corporate nationality.
● Second, antitrust issues pitting regulators against big business platforms have been increasing the world over, with big businesses accused of exploiting their power and hurting vendors and consumers. The US Federal Trade Commission and 17 US states have filed a lawsuit against Amazon’s conduct, where it is accused of abusing its dominant position, to keep prices high and quality low, limit competition and depress innovation.
● Third, the opposite has happened in India. Indeed, before deciding how to deal with Amazon, we need to assess what its entry has done for consumers, small suppliers and the future of competition in India. Like everything else in our country, there are many truths and perspectives, all true and valid, which need to be weighed carefully, rather than blindly following the West.
Why Indian consumers embraced Amazon | With Amazon, Consumer India has got, and embraced, access to huge variety (of goods made in India alongside imports), lower prices, ease of buying, and service like never before. Earlier, you could not return even a defective item, leave alone something you didn’t like.
● No, Consumer India is not being forced to buy pasta or hot pants instead of sambar powder or saris – it is being given the courtesy of choice. Varieties of packaged cow dung are available if you are ritually inclined and black rice at your doorstep if you are a homesick, young, shop girl from Meghalaya in Bengaluru.
● Modest-income consumers love the status-blind service that e-commerce gives. Live in a slum and you get the same speed of delivery, price discounts and ability to return as if you live in a big condo. Humans discriminate, digital platforms don’t.
● A WhatsApp University joke sums up Consumer India’s relationship with Amazon – the husband asks the wife to buy X, Y and Z and each time she says “Amma Jaan se pooch.” Annoyed, he asks, “Why bring my mother into everything?” It turns out she means, “Amazon”.
● Amazon prices have disciplined many a high street, small electronics shop to reduce prices the same way Nrega forced many a rural employer to raise wages – by providing price discovery and benchmarks.
How Indian kiranas stood up to Amazon | What of competitors getting decimated and Amazon becoming the last man standing? One argument is that when we have seen predatory pricing in other categories like telecom, we have been sanguine. But beyond this, there is more solid and nuanced evidence of market dynamics to consider.
● Small shops will continue to do well because Consumer India’s behaviour is never “either-or” but is “and”. Consumer India searches in small physical shops and buys on Amazon (many of the small garment shops, by the way, neither have a trial room nor do they allow returns) or researches thoroughly on Amazon and buys from the neighbourhood store to ensure easy, related services.
● Kirana won effortlessly over physical modern retail by providing personalised value, and India has the largest number of vibrant small shops in the world. Quick commerce of Dunzo and Zepto disrupts kiranas for grocery and pantry far more than Amazon.
● And finally, what will see the demise of the bigger town kirana stores are newer settlements like Gurgaon or Powai, with no room for the shops, and gen next who don’t want to sit in the shop 24×7, without which the business model does not work.
New economy, magic bullet | The most compelling argument encouraging marketplace platforms is that they are perfect for the structure of demand India has – platforms aggregate small businesses and create a virtual marketplace and provide a host of services that small businesses individually cannot afford and provide more buyers than if located in a small alleyway somewhere.
India’s mega consumption story is best described as Lilliput Land – lots and lots of small consumers earning and spending a little bit each that adds up to a lot, served by millions of small suppliers oozing innovation and agility and customer intimacy but lacking in access to the market and to resources of all kinds. Most big companies, including most multinationals, do not serve the mass market small consumer because they cannot make the profit they target and offer the performance consumers want at the price they can afford.
At last, we have found the magic bullet in the new economy – which e-marketplaces are a part of. They aggregate existing small suppliers and small buyers and yoke them together digitally and it’s a win-win for all.
India’s Lilliput Consumers and Suppliers have given many a MNC Gulliver a run for their money. Amazon will not destroy Indias ‘small’. In fact, it will enhance them. Complaining small shops will shape up and serve consumers better, or themselves form alternative platforms. The platform marketplace comprising the small is the future of India’s mega consumption story. A thousand flowers will bloom and coexist – if only we allow it to happen.
Date: 23-08-24
eCommerce Paste Can’t Go Back in TubeBut concern for retailers, consumers is real.ET Editorials
Piyush Goyal has reiterated the old alarm among politicians over the ‘unbridled’ rise of ecommerce. Like paste out of a tube, it can’t be put back in, especially in an emerging market with an overwhelmingly informal retail sector. The employment argument remains powerful, though, in an economy that doesn’t create enough factory jobs to absorb surplus farm labour. Typically, this has been soaked up by a creaky retailing industry. eCommerce brings in efficiencies that create jobs, but not on a scale to offset the physical retailers it displaces. The latter also leverage advanced ecommerce logistics to improve market access, but again, not to a degree that yields gains in market share.
Lawmakers wade into this market asymmetry with good intentions. These concerns target consumer protection and predatory pricing. Regulations designed to protect privacy and discourage deep discounting can slow down the growth of ecommerce. Yet, ecommerce derives its higher productivity from data on consumption behaviour and large investments in logistics. Neither would be available to the small retailer unless ecommerce platforms provide it to them. This consideration governs the regulatory reflex. Besides, ecommerce offers a sophisticated bridge to export markets for small enterprises and excessive regulation could work against national interest.
Global rules have favoured the growth of digital commerce through tax exemptions. These are now being reexamined from a revenue-forgone perspective. Regulating this aspect of international ecommerce can cut both ways for economies trying to increase their share of manufacturing and services exports. The objective of regulation should be to encourage a bigger migration to ecommerce while keeping a tight vigil on concentration. Indian ecommerce policy has been proactive, and Goyal is articulating some of its more serious concerns over unregulated growth. These concerns must be heeded in one of the biggest available markets for ecommerce. Policy must co-evolve along with ecommerce to restrict the downside effects on consumers and retailers.
Date: 23-08-24
स्वर्णिम भारत में युवाओं को हुनरमंद बनाना होगासंपादकीय
आरबीआई की एक ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि देश के बैंकों में वर्ष 2011 तक अधिकारी-क्लर्क अनुपात 1:1 (यानी बराबर) का था, लेकिन घटते हुए ये आज 3:1 हो गया है। बैंक के गवर्नर ने इसका कारण बढ़ता डिजिटलाइजेशन बताया और एआई के आने के बाद मानव संसाधन पर इस खतरे के और बढ़ने के संकेत दिए। बैंकों को इसके लिए शीघ्र अप-स्किलिंग (नया तकनीकी ज्ञान) और री- स्किलिंग (पुनकौशल) की जरूरत पर बल दिया। रिपोर्ट में यह भी दावा है कि अगले दो वर्षों में डिजिटल इकोनॉमी जीडीपी का 20% हो जाएगी, लेकिन साथ ही इससे उपभोक्ता देखा-देखी खरीदी का शिकार होंगे और धोखेबाजी की घटनाएं ज्यादा बढ़ेंगी। याद करिए तीन दशक पहले जब बैंकिंग सेक्टर में ट्रेड यूनियन्स बेहद सशक्त होते थे तो बैंक कर्मचारियों ने कंप्यूटराइजेशन के खतरे को लेकर कई आंदोलन किए थे। आज उनकी संख्या अफसरों के मुकाबले एक-तिहाई हो गई है लेकिन कहीं कोई हलचल नहीं है। उधर ईपीएफओ के अनुसार पिछले एक वर्ष में निजी क्षेत्र में कर्मचारियों की संख्या सात लाख कम हुई है। जरा सोचें, देश में हर साल 1-1.2 करोड़ नए युवा जॉब बाजार में काम की तलाश में बढ़ जाते हैं। लेकिन नौकरियां नहीं हैं। उपयुक्त ट्रेनिंग और नौकरी दिए बगैर स्वर्णिम भारत बनना मुश्किल होगा।
Date: 23-08-24
बिखरते पड़ोसी देशों के बीच इकलौते खड़े रह गए हैं हममनोज जोशी, ( विदेशी मामलों के जानकार )
आज जब भारत अपने चारों ओर देखता होगा तो अपने आपको इस समूचे क्षेत्र में स्थिरता और आर्थिक विकास का इकलौता द्वीप पाता होगा।
हमारे पड़ोस में हुए घटनाक्रमों ने क्षेत्रीय नीति में बड़ा शून्य उत्पन्न कर दिया है। अगर बांग्लादेश के परिप्रेक्ष्य में बात करें तो आप निश्चिंत हो सकते हैं कि नई दिल्ली इस समूचे घटनाक्रम से हैरान थी और उसने इस नतीजे की कतई उम्मीद नहीं की थी। किसी को दूर-दूर तक भनक नहीं थी कि शेख हसीना को अपना राजपाट छोड़कर भागना पड़ेगा। यह इतना अप्रत्याशित था कि भारत ने हसीना की सरकार गिरने के काफी समय बाद तक कोई बयान जारी नहीं किया। हसीना के नई दिल्ली पहुंचने के एक दिन बाद लोकसभा में बोलते हुए विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा कि भारत ने उन्हें संयम बरतने की सलाह दी थी और आग्रह किया था कि बातचीत के जरिए स्थिति को शांत किया जाए, लेकिन प्रदर्शनकारियों के ढाका में एकत्र होने के बाद हसीना ने भारत आने की अनुमति मांगी। इसके बाद प्रधानमंत्री मोदी ने नोबेल विजेता मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली बांग्लादेश की अंतरिम सरकार को बधाई संदेश भी भेजा और उनसे हिंदुओं और अन्य अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सुनिश्चित करने का आह्वान किया।
शेख हसीना 2009 में महिलाओं और युवाओं के उत्साही समर्थन के साथ सत्ता में आई थीं। लेकिन अपनी राजनीतिक पूंजी को बर्बाद करने में उन्हें 15 साल लगे। उनके नेतृत्व में बांग्लादेश ने 11 साल तक वास्तविक प्रति व्यक्ति आय में 5% से अधिक की आर्थिक वृद्धि की थी। बांग्लादेश चीन के बाद दूसरा सबसे बड़ा कपड़ा निर्यातक बन गया था। लेकिन अब लग रहा है कि इसका एक बड़ा हिस्सा जॉबलेस-ग्रोथ का था। 2022 के आंकड़ों के अनुसार, बांग्लादेश के 15 से 24 वर्ष के 30 प्रतिशत युवा बेरोजगार हैं। आर्थिक विकास पर सरकार के फोकस से सामाजिक विकास हुआ था, लेकिन इसके साथ ही देश में लोकतांत्रिक स्वतंत्रता भी धीरे-धीरे कम होती चली गई। जनवरी 2024 के चुनाव सबसे ज्यादा विवादास्पद थे और विपक्ष ने उनका बहिष्कार किया था।
सिर्फ दो साल पहले ही, बांग्लादेश जैसी स्थिति के कारण शक्तिशाली राजपक्षे परिवार श्रीलंका से पलायन कर गया था। पड़ोसी म्यांमार में भी हालात स्थिर नहीं हैं और पाकिस्तान जैसे-तैसे अपना अस्तित्व कायम रखे हुए है। बांग्लादेश का घटनाक्रम भारत के लिए बहुत नकारात्मक साबित होगा। इसका एक कारण यह है कि नई दिल्ली ने अवामी लीग सरकार के साथ घनिष्ठ संबंध बनाने का निर्णय लिया था, जबकि हमारे पश्चिमी मित्रों ने इसके विरुद्ध विनम्र चेतावनियां दी थीं। अमेरिका और ब्रिटेन ने साफ कहा था कि जनवरी में वहां पर हुए चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष नहीं थे। बांग्लादेश को अमेरिका द्वारा प्रायोजित लोकतंत्र शिखर सम्मेलन से भी बाहर रखा गया था।
चिंता का सबब जमात-ए-इस्लामी भी है। इस संगठन पर लगा प्रतिबंध अब हटने के आसार हैं और यह पाकिस्तान की आईएसआई की मदद से भारत के खिलाफ अपने जहरीले अभियान को अंजाम देने के लिए स्वतंत्र हो जाएगा। वहां के मुख्य विपक्षी दल बांग्लादेश नेशनल पार्टी (बीएनपी) का कहना है कि उसे भारत से कोई समस्या नहीं है। मीडिया से बात करते हुए संगठन के वरिष्ठ नेताओं ने कहा कि भारत बांग्लादेश के लिए महत्वपूर्ण है। वरिष्ठ बीएनपी नेता खांडेकर मुशर्रफ हुसैन ने पीटीआई को बताया कि बांग्लादेश को दोनों देशों के बीच संबंधों में एक नया अध्याय शुरू होने की उम्मीद है। पार्टी के उपाध्यक्ष अब्दुल अवल मिंटू ने कहा कि बांग्लादेश भारत को एक दोस्त के रूप में देखता है। लेकिन अंतरिम सरकार द्वारा विदेश नीति की देखरेख के लिए पूर्व विदेश सचिव तौहीद हुसैन की नियुक्ति नई दिल्ली में खतरे की घंटी बजा सकती है।
समस्या यह है कि बांग्लादेश के हिंसक और राजनीतिक उथल-पुथल से भरे इतिहास को देखते हुए अब वहां पर स्थिति को स्थिर करने के लिए असाधारण प्रयास करने होंगे। भारत को ऐसी परिस्थितियों से उत्पन्न होने वाली कठिनाइयों के लिए तैयार रहना होगा, जिन्हें ढाका की सरकारों के लिए नियंत्रित करना मुश्किल हो सकता है। बांग्लादेश भारत के पांच राज्यों की सीमा से लगा हुआ है और पहले भी वहां अलगाववादियों और आतंकवादियों को समर्थन मिलता रहा है। अगर नई दिल्ली ने शेख हसीना को भरपूर समर्थन दिया था तो इसका कारण यह भी था कि उन्होंने इन तत्वों को रोकने के लिए भारत को भरपूर समर्थन दिया था।
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Date: 19-08-24
It’s safe to say That every case of ssaulted woman ais a blow against women’s workforce participationEditorials
There is no possible road to India’s prosperity, which doesn’t run through it becoming a gender fair society. Everyone doesn’t need to march to “reclaim the night”. But everyone does need to understand the costs of continued indifference to the security needs of women. As IMF’s Gita Gopinath indicated this weekend, India’s economic aspirations can’t be met without lifting its women’s labour force participation, which in turn depends on actively ensuring women’s safety.
It is bad enough that the women’s labour force participation rate in India is about half of, say, Vietnam. What’s much worse is how few Indian women are actually getting paid. A 2023 Azim Premji University report, for example, suggests that only about 17% of urban women are in the paid workforce. Rural women are much worse off. This amounts to women being caught in a vicious cycle. Their unpaid work, be it domestic or agricultural or in family enterprises, has low status. Seeking paid work, or higher education to enable it, is discouraged on account of various factors, very high among which is lack of safety.
Efforts to ensure their safety often, ironically, involve putting them in a cage. There’s a maze of laws and regulations to curb whether they can work at night or in jobs deemed hazardous or arduous or morally inappropriate. These also end up curbing women’s ability to rise up the ladder. Becoming a top manager means overcoming all the impediments, and also, as Gopinath indicated too, the countless suggestions to just chill, which men just don’t have to contend with. We have no way of knowing how many chains and hurdles the doctor raped and murdered at a Kolkata medical college and hospital on Aug 9, had to break through to be on night duty. But we know that in the press conference that day, her principal said she had been “irresponsible” to go to the seminar hall alone at night. The thing that women know about staying in a cage, though, is that it only gets more and more oppressive, and has a safety rating of zero.
This is a complex social problem, no doubt. But there’s no solving it without tough deterrence. CCTVs are everywhere in our cities now. Everyday, police must publicise how it has used these to catch a sexual assailant. Stop telling women where not to go. Start making more transports and destinations assault-free. By swiftly punishing the men who commit the assaults.
Date: 19-08-24
Think laterallyReservations shouldn’t be applicable when recruiting outside talent for short stints in govtEditorials
Opposition parties have charged that GOI’s advertisement for 45 lateral entry posts in the bureaucracy is unmindful of reservation provisions. Jobs advertised include those of joint secretary, director, and deputy secretary in 24 ministries of the central govt. But if the idea here is to recruit talent from outside the civil services system and tap domain expertise, reservations for lateral recruitment make little sense.
Enhancing merit | The whole purpose of lateral recruitment is to try and make the bureaucratic system more efficient. Specifically,lateral recruits are expected to deliver on specific projects and achieve faster implementation of fresh ideas. The purpose of affirmative action is to bypass structural social barriers to opportunities. Thus, the objectives are vastly different. Note that lateral entry posts are temporary in nature, lasting three to five years. Lateral recruitment should, therefore, focus on only getting the best expertise for the job, irrespective of the social background of the candidate.
Global experience | Lateral entry in govt isn’t a new idea. In US, a special govt employee category was created by Congress in 1962 to allow the federal govt to take advantage of outside experts. From 2005 to 2014, an average of 2,000 such employees worked every year for various US govt departments. Similarly, Britain has had the system of special advisers assisting ministers for decades.
Keep politics out | It’s also the opposition’s case that lateral entrants may be biased towards the party in govt. But this also holds true for regular, senior bureaucratic appointments, in Centre and in states. Calibre ought to be the only criteria for lateral entrants since they will serve very specific functions for a limited period. For the sake of a nimble bureaucracy, let’s not politicise the idea.
Date: 19-08-24
व्यापक लाभ वाला पूंजीगत खर्चविवेक देवराय और आदित्य सिन्हा, ( देवराय प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के प्रमुख और सिन्हा परिषद में ओएसडी-अनुसंधान हैं )
कोविड महामारी के बाद और इस समय जारी भू-राजनीतिक उथलपुथल के दौर में जहां दुनिया के तमाम हिस्से पुरानी आर्थिक तेजी हासिल करने के लिए संघर्षरत हैं, वहीं भारतीय अर्थव्यवस्था में सुधार के संकेत स्पष्ट दिखते हैं। देश में उपभोग का स्तर भी बढ़ा है। इसके बावजूद कुछ आर्थिक दबाव अब भी कायम हैं, जैसे कि निर्यात का मोर्चा, जो व्यापक रूप से बाहरी वैश्विक परिदृश्य पर निर्भर करता है।ऐसे में वृद्धि को गति देने के लिए सरकारी व्यय की भूमिका महत्वपूर्ण हो जाती है। सरकारी व्यय को भी मुख्य रूप से दो भागों में विभाजित किया जा सकता है। एक होता है चालू व्यय, जिसमें वेतन और सब्सिडी जैसे सामान्य एवं परिचालन लागतों से जुड़े खर्चे शामिल होते हैं। दूसरा होता है पूंजीगत व्यय जिसे कैपेक्स भी कहते हैं। इसमें बुनियादी ढांचे का निर्माण जैसी ऐसी परिसंपत्तियों का निर्माण होता है, जो लंबे समय तक उपयोग में लाई जाती हैं।इसमें वित्तीय हस्तांतरण के माध्यम से कल्याणकारी कार्यक्रमों के रूप में धन का पुनर्वितरण होता है। वस्तुओं और सेवाओं की लागत को नियंत्रण में रखने के लिए सब्सिडी दी जाती है और सार्वजनिक निवेश बढ़ाया जाता है। इसके अंतर्गत शोध, विकास एवं लोक उपक्रमों पर खर्च किया जाता है। अपनी उत्पादक प्रकृति के चलते पूंजीगत व्यय जीडीपी वृद्धि पर व्यापक प्रभाव डालता है। यह न केवल सड़क, स्कूल और कारखानों के निर्माण जैसी परियोजनाओं के माध्यम से तात्कालिक मांग को प्रोत्साहन देता है, बल्कि आर्थिकी की उत्पादन क्षमताओं में वृद्धि के जरिये दीर्घकालिक आर्थिक विस्तार की आधारशिला रखता है।
प्रश्न उठता है कि पूंजीगत व्यय अन्य खर्चों से कैसे बेहतर है? इसे मल्टीप्लायर इफेक्ट यानी गुणक प्रभाव की अवधारणा से समझा जा सकता है। इस प्रकार के खर्च में सरकार द्वारा आरंभिक स्तर पर जो राशि खर्च की जाती है वह अर्थव्यवस्था पर चक्रीय प्रभाव दिखाकर उसर्जित होती है। इस आय से कुछ लोग वस्तु और सेवाओं का उपभोग करेंगे तो कारोबारी अपने व्यवसाय में पुन: निवेश करेंगे। इस पैसे से जो कारोबार सृजित होगा, उससे अन्य लोगों के लिए भी रोजगार सृजित होंगे। यह प्रक्रिया चलती रहती है और हर एक चरण के साथ सरकार के आरंभिक निवेश में चक्रीय प्रभाव उत्पन्न होता रहता है। वस्तुत: गुणक प्रभाव से यही आशय है कि इसमें सरकारी खर्च केवल परियोजना में प्रत्यक्ष रूप से सक्रिय लोगों तक ही सीमित नहीं रहता, अपितु यह आर्थिकी के विभिन्न स्तंभों पर असर डालते हुए समग्र आर्थिक वृद्धि को संबल प्रदान करता है।
संभव है कि सभी के एक बड़े हिस्से को प्रभावित करने की क्षमता रखती है। जैसे सरकार किसी हाईवे के निर्माण पर जो खर्च करती है, उससे कंस्ट्रक्शन में आपूर्तिकर्ताओं से लेकर कामगारों के लिए अवसर बनते हैं। उन्हें आय अ प्रकार के सरकारी व्यय इस प्रकार का प्रभाव न उत्पन्न न कर पाएं। सुकन्या बोस और एनआर भानुमूर्ति के एक शोध के अनुसार पूंजीगत परियोजनाओं (बुनियादी ढांचे जैसी) पर खर्च अन्य प्रकार के खर्चों की तुलना में कहीं व्यापक प्रभाव डालता है।ऐसी परियोजनाओं पर सरकार जो एक रुपया खर्च करती है वह 2.45 रुपये के खर्च जितना प्रभाव उत्पन्न करता है। इसके उलट, सरकार नकदी हस्तांतरण (कल्याण और पेंशन) और सामान्य व्यय (जैसे कि वेतन) पर जो एक रुपया खर्च करती है, उसका प्रभाव 0.98 से 0.99 रुपये के बराबर पड़ता है। यानी अपने मूल के जितना भी नहीं।इससे स्पष्ट है कि पूंजीगत परियोजनाओं पर खर्च न केवल तात्कालिक तौर पर अर्थव्यवस्था की गति बढ़ाता है, बल्कि बुनियादी ढांचे में सुधार, उत्पादकता में बढ़ोतरी और भावी आर्थिक गतिविधियों को आधार प्रदान कर दीर्घकालिक वृद्धि की ठोस बुनियाद भी रखता है।सीधे शब्दों में कहें तो सरकार सड़क, स्कूल या अस्पताल जैसी परियोजनाओं पर जो खर्च करती है, उससे न केवल वर्तमान की आवश्यकताओं की पूर्ति होती है, बल्कि भविष्य के लिए भी अवसरों का सृजन होता है। यह निवेश लोगों के जीवन को सुविधाजनक बनाता है। कारोबार को सुगम बनाता है। रोजगार बढ़ाता है। इससे दीर्घकाल में एक सशक्त अर्थव्यवस्था की राह तैयार होती है।
वित्त वर्ष 2024-25 के बजट में सरकार ने पूंजीगत व्यय के लिए 11.1 लाख करोड़ रुपये का प्रविधान किया है। यह जीडीपी के 3.4 प्रतिशत के बराबर आवंटन है। इसमें पिछले वर्ष की तुलना में 17.1 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई। यह बढ़ोतरी बुनियादी ढांचा विकास एवं दीर्घकालिक आर्थिक वृद्धि के प्रति सरकार की प्रतिबद्धता को भी रेखांकित करती है। हाल के वर्षों में सरकारी निवेश के दम पर ही बुनियादी ढांचे के विकास ने गति पकड़ी है।वर्ष 2019 से 2023 के बीच इस मोर्चे पर हुआ 49 प्रतिशत निवेश सरकार द्वारा किया गया। पिछले एक दशक के दौरान देश में बड़े पैमाने पर बुनियादी ढांचे का विकास हुआ है। इनमें अत्याधुनिक रेलवे स्टेशन, एयरपोर्ट और बंदरगाह और हाईवे से लेकर ब्राडबैंड कनेक्टिविटी जैसे प्रमुख काम गिनाए जा सकते हैं।
सुनिश्चित किया जा रहा है कि दुर्गम इलाकों में भी स्कूल और अस्पताल जैसी सुविधाएं पहुंचें। आयुष्मान भारतयोजना के जरिये किफायती स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। दूरदराज के क्षेत्रों में भी आधुनिक अस्पताल और आरोग्य मंदिर स्थापित किए जा रहे हैं। तमाम मेडिकल कालेज और अस्पताल निर्माण की प्रक्रिया में हैं।करीब 60,000 तालाबों का पुनरुद्धार किया गया है तो दो लाख पंचायतों को आप्टिकल फाइबर नेटवर्क से जोड़ा गया है। नहरों का फैलता जाल भी किसानों को लाभ पहुंचा रहा है। इसके साथ ही चार करोड़ पक्के मकानों का निर्माण हाशिए पर रहने वाले लोगों को मुख्यधारा से जोड़ने में सेतु की भूमिका निभा रहा है।इसी कड़ी में तीन करोड़ और मकानों के निर्माण की भी बात है। सरकार का यह दृष्टिकोण प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की उसी संकल्पना के अनुरूप है, जिसका उल्लेख उन्होंने स्वतंत्रता दिवस पर अपने संबोधन में‘ईज ऑफ लिविंग’ यानी जीवन की सुगमता के रूप में किया।
Date: 19-08-24
पड़ोसी का सम्मान होगी सही रणनीतिशेखर गुप्ता
बांग्लादेश के घटनाक्रम ने एक बार फिर भारत के पड़ोस को सुर्खियों में ला दिया है। साथ ही ऐसी स्थितियों से निपटने के मोदी सरकार के रिकॉर्ड पर भी सबकी नजर है। आज के हालात पर गहराई से नजर डालने के लिए हमें चौथाई सदी पहले जाना होगा, जब अटल बिहारी वाजपेयी ने लाहौर की बस यात्रा कर पाकिस्तान के साथ रिश्ते सुधारने की बड़ी पहल की थी। उन्होंने कहा था कि हम अपने मित्र चुन सकते हैं लेकिन पड़ोसी नहीं।वर्ष 2008 में मनमोहन सिंह ने एक कदम आगे बढ़ाया और ‘पड़ोसी प्रथम’ का नारा दिया। 2014 में नरेंद्र मोदी ने भी इस पर मुहर लगाई और अपने शपथ ग्रहण समारोह में भारतीय उपमहाद्वीप के सभी देशों के नेताओं को आमंत्रित किया। इसके बाद उन्होंने पड़ोसी मुल्कों की यात्रा की। एक बार तो उनकी यात्रा बेहद नाटकीय रही, जब वह बिना किसी को बताए पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री नवाज शरीफ की पोती की शादी में मुबारकबाद देने लाहौर पहुंच गए।
उस समय उम्मीद जगी थी। 25 साल में पहली बार बहुमत की सरकार चला रहे देश का मुखिया अगर ऐसे सात संप्रभु देशों के बीच रिश्तों में सुधार के लिए इतना प्रतिबद्ध है, जिनके बीच कई मतभेद थे तो मतभेदों और टकरावों को दूर कर सभी के बीच सेतु बनाना मुमकिन था। हालांकि इन देशों के बीच कुछ मतभेद विचारधारा के कारण थे, जो समय के साथ गहरे हो गए थे। शीतयुद्ध के दौर के पूर्वग्रह भी इनके बीच थे। इन समस्याओं से निजात पाकर राह बनाना बड़ी चुनौती थी, जिसके लिए मोदी आगे बढ़ रहे थे।
अब मोदी सरकार का तीसरा कार्यकाल चल रहा है तो देखना होगा कि उनका प्रदर्शन कैसा रहा है? बांग्लादेश अब तक के सबसे बड़े संकट से गुजर रहा है। बीते 15 सालों से बांग्लादेश भारत का सबसे करीबी सहयोगी रहा है। भारत के लिए सुरक्षित पूर्वोत्तर की धुरी ढाका में है क्योंकि म्यांमार में शक्ति का केंद्र कहां है, कोई नहीं जानता। इस बीच पाकिस्तान में नाटकीय बदलाव आए हैं। वहां नया सत्ता प्रतिष्ठान है और 5 अगस्त, 2019 को जम्मू कश्मीर में हुए बदलावों के बाद भारत के साथ उसके संबंध लगभग समाप्त हो चुके हैं।
नेपाल में अविश्वास इतना बढ़ चुका है कि उसने अपने राष्ट्रीय मानचित्र में बदलाव करके सामरिक महत्त्व के उस भारतीय भूभाग को अपना हिस्सा दिखा दिया, जहां से कैलास-मानसरोवर तीर्थ यात्रा का मार्ग गुजरता है। नेपाल की संसद में इस मानचित्र को सर्वसम्मति से मंजूरी भी मिल गई।
श्रीलंका में आर्थिक संकट के बाद एक अलग किस्म की क्रांति हुई। हंबनटोटा जैसे उसके प्रमुख बंदरगाह का चीन ने अधिग्रहण कर लिया। मालदीव में मोहम्मद मुइज्जू के उभार के पीछे ‘भारत भगाओ’ का नारा रहा और यह हाल ही की बात है। भूटान पर सीमा विवाद ‘हल’ करने का चीनी दबाव लगातार बना हुआ है और उससे कहा जा रहा है कि इसमें ‘भारत के हितों की परवाह नहीं की जाए’।क्या यह नाटकीय और बदतर दौर पूरी तरह भारत की गलतियों का नतीजा है? या भारत पीड़ित है? मगर इतने रसूख वाला भारत पीड़ित होने का दावा कैसे कर सकता है? आज हमारा सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) शेष उपमहाद्वीप के कुल जीडीपी का चार गुना है। हमारी आबादी उनकी तीन गुना और वैश्विक शक्ति कई गुना है। भारत की जनता ने अपने गणतंत्र को पड़ोसी मुल्कों की तुलना में विशिष्ट बनाया है: एक संवैधानिक लोकतंत्र बनाया है, जहां सब कुछ लोकतांत्रिक, शांतिपूर्ण और विश्वसनीय तरीके से होता है। इसलिए पीड़ित होने की बात छोड़ ही दीजिए।दुनिया में सबसे अस्थिर पड़ोस हमारा ही है। ज्यादातर पड़ोसियों की आबादी बहुत अधिक है और शहरों में भीड़भाड़ है। उनकी आबादी में युवा ज्यादा हैं और अफ्रीकी देशों के उलट ज्यादातर ने लोकतंत्र को अपनाया है। बड़ी युवा आबादी और लोकतंत्र का अर्थ है कि जनता की राय मायने रखती है।
शेख हसीना और उनके मित्र के रूप में भारत ने बांग्लादेश में इसी बात की अनदेखी की। ये ऐसे देश नहीं हैं जहां कोई बेहद ताकतवर तानाशाह जनता की राय के खिलाफ जा सकता है। उनमें से हर एक देश का लोकतंत्र हमारी तुलना में अपूर्ण है लेकिन उनमें से किसी में पूरी तरह तानाशाही भी नहीं है। इन सभी देशों में आपको शासन और जनता के विचारों दोनों का ध्यान रखना होता है।
जनमत के लिए संप्रभुता भी मायने रखती है। अगर भारत दबाव बनाता नजर आएगा तो अच्छी प्रतिक्रिया नहीं होगी। हम नेपाल, मालदीव, श्रीलंका और बांग्लादेश में ऐसा होते देख चुके हैं। 2015 की नाकेबंदी ने गहरा जख्म दिया है। विदेश मंत्रालय यह जानता है और अक्सर सही बात कहता है। परंतु हमारा मीडिया खासकर सरकार के मित्रवत कहलाने वाले हिंदी समाचार चैनलों पर आने वाली खबरों पर गहरी नजर रखी जाती है। चरम राष्ट्रवादी सोशल मीडिया हैंडल उन्हें बढ़ा-चढ़ाकर पेश करते हैं।कुछ हैंडल तो बांग्लादेश में सेना भेजने, वहां रहने वाले 1.4 करोड़ हिंदुओं के लिए सीमाएं खोल देने और रंगपुर में उनके लिए बस्ती बनाने की सलाह तक दे रहे हैं।
मालदीव के साथ बिगड़ रहे संबंध सुधारने के लिए वहां गए विदेश मंत्री एस जयशंकर जिस दिन लौटे उसी दिन अफवाह फैल गई कि मालदीव ने 28 द्वीप भारत को सौंप दिए। कुछ हिंदी चैनलों के प्राइम टाइम में इस पर बहस तक हो गई। किसी ने कह डाला कि ‘मुइज्जु ने घुटने टेक दिए।’ हमारे लिए यह मजाक हो सकता है, मालदीव के लोगों के लिए नहीं। करीब 50 लाख की आबादी और सात अरब डॉलर जीडीपी वाला वह देश भी हमारी तरह संप्रभु है।आखिर में विदेश मंत्रालय ने सभी ट्वीट डिलीट कराए मगर तब तक देर हो चुकी थी। खुद को उस पड़ोसी की जगह रखकर देखिए। वे यही सुनते समझते होंगे कि भारत बहुत दबंगई से काम करता है। दबंगई अच्छी है लेकिन मानसिक, सांस्कृतिक, वैज्ञानिक और बौद्धिक गुणों का क्या? स्वामी विवेकानंद ने शिकागो में कहा था विनम्रता के साथ क्षेत्र में शिक्षक बनना होगा। क्या हमारे शिक्षा संस्थान इतने अच्छे हैं कि वे पड़ोसी देशों के उन हजारों विद्यार्थियों को लुभा सकें, जो शिक्षा के लिए विदेशों में जाते हैं? क्या हम चाहते हैं कि वे आएं?चरम राष्ट्रवादी मीडिया द्वारा अपमान की जगह छात्रवृत्ति, इंटर्नशिप, सांस्कृतिक प्रदर्शन और फिल्में हों तो कैसा हो? इकलौती महाशक्तियों का इतिहास बताता है कि सॉफ्ट पावर असल में हार्ड पावर या असली ताकत की सहायक नहीं है बल्कि उसके लिए बहुत जरूरी है। क्या भारत में ऐसे थिंक टैंक हैं जो पड़ोसी देशों के विद्वानों को जगह दें, उन्हें सम्मेलनों के लिए बुलाएं, खुद की ट्रैक-2 प्रक्रिया चलाएं? ऐसा नहीं है कि भारत को यह सब पता नहीं है। इसीलिए हम नेपाल और भूटान से तो बिजली खरीदते हैं लेकिन बांग्लादेश को बिजली निर्यात करते हैं।
दूसरा पहलू है हिंदू कार्ड का जरूरत से अधिक प्रयोग। प्रधानमंत्री की नेपाल और बांग्लादेश यात्राओं के दौरान मंदिर भ्रमण को खास तौर पर प्रचारित किया गया। मगर हकीकत यह है कि हमारी सबसे लंबी सीमाएं मुस्लिम बहुल देशों के साथ मिलती हैं। जब हम उनसे कहते हैं कि अल्पसंख्यकों के साथ अच्छा व्यवहार करें तो वे हमारी ओर सवालिया ढंग से देखते हैं। यह गजब ही है कि जब बांग्लादेश उबल रहा है और हमारी कूटनीति हालात संभालने में लगी है ठीक उसी समय एक बांग्लादेशी हिंदू को असम में सीएए के तहत नागरिकता प्रदान की गई।
पांच वर्ष से और खासकर यूक्रेन युद्ध के शुरू होने के बाद से भारत बहुध्रुवीयता, सामरिक स्वायत्तता और बहु-संबद्धता की बात करता रहा है। मगर हमारे पड़ोसी भी इस पर चल सकते हैं। अगर हम चीन के खिलाफ अमेरिका का इस्तेमाल कर सकते हैं तो उन सभी के पास हमारे विरुद्ध चीन है।ताकतवर अमेरिका भी अपने पड़ोसी देश क्यूबा को नहीं झुका सका। वेनेजुएला को भी नहीं। पड़ोसियों के साथ हमारी नीति वही होनी चाहिए जो वाजपेयी ने बनाई, मनमोहन सिंहने अपनाई और जिसे मोदी ने ऊर्जा प्रदान की। हमें बस घरेलू राजनीति और अंध धार्मिकता से बचना होगा। साथ ही पड़ोसियों के प्रति अधिक नरमी दिखानी होगी और सम्मान बरतना होगा|
Date: 19-08-24
बाढ़ कुप्रबंधनसंपादकीय
वर्ष मानसून में बाढ़ से देश के अलग-अलग इलाकों में जैसी तबाही सामने आने लगी है, उसकी वजह नदियों में उफान और पानी का बेलगाम हो जाना है। अगर बाढ़ से बचाव के इंतजामों पर समय रहते ध्यान दिया जाए, तो इसकी वजह से जानमाल के व्यापक नुकसान से बचा जा सकता है। यह अफसोसनाक है कि जिन राज्यों में पिछले कुछ वर्षों में बाढ़ की वजह से व्यापक तबाही मची है, उनमें से कई राज्य सरकारों की चिंता में यह पक्ष शामिल नहीं रहा कि बाढ़ से होने वाले नुकसानों से बचाव के इंतजाम पहले ही कर लिए जाएं। नतीजतन, कई राज्यों में बरसात के मौसम में उफनने वाली नदियां भारी कहर ढाती हैं और व्यापक पैमाने पर जानमाल का नुकसान होता है। यों कुदरती आपदाओं से बचाव में लापरवाही को लेकर सरकारों के रुख पर अक्सर वाल उठते रहे हैं, अब जल शक्ति मंत्रालय की लोकलेखा समिति ने भी राज्यों के रवैये पर सवाल उठाया है। गौरतलब है कि जल शक्ति मंत्रालय की बाढ़ नियंत्रण एवं पूर्वानुमान के लिए योजनाओं की लोकलेखा समिति की एक रपट में पश्चिम बंगाल सहित आठ राज्यों में बाढ़ प्रबंधन कार्यों में दस से तेरह महीनों की देरी को लेकर सवाल उठाया गया है। समिति के मुताबिक, इस देरी की वजह से वास्तविक वित्तपोषण के समय तकनीकी डिजाइन अप्रासंगिक या अप्रचलित हो गए। इस प्रवृत्ति के नतीजे में योजनाओं की लागत में भी भारी इजाफा हो जाता है। यह हैरानी की बात है कि जब बाढ़ प्रभावित इलाकों में तबाही आती है, जानमाल का व्यापक नुकसान होता है, तब संबंधित राज्य सरकारें इसे प्राकृतिक आपदा बताती और इसके लिए वित्तीय सहायता की मांग करती हैं। मगर यह समझना मुश्किल नहीं है कि अगर बाढ़ प्रबंधन से जुड़े कार्यों में करीब एक वर्ष तक की देरी की जाती है, तो उसके नतीजे क्या होंगे। यह सही है कि बाढ़ एक प्राकृतिक आपदा है, लेकिन अगर इससे उपजने वाली समस्याओं के संदर्भ में जरूरी प्रबंधन समय पर सुनिश्चित किए जाएं तो नुकसान को काफी कम किया जा सकता है। मगर बाढ़ प्रबंधन के मामले में खुद राज्य सरकारें समयबद्धता का ध्यान न रखें तो नतीजों का अंदाजा लगाया जा सकता है।
The post 19-08-2024 (Important News Clippings) appeared first on AFEIAS.
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Date: 17-08-24
Ensuring social justice in the bureaucracyThe solution lies in having a fixed tenure, irrespective of age of entryVivek Katju is a retired Indian Foreign Service officer.
During his parliamentary address on July 29, 2024, the Leader of the Opposition, Rahul Gandhi, regretted that there were no Scheduled Caste (SC) or Scheduled Tribe (ST) officers among the 20 who assisted in framing 2024 Budget proposals. He said that there was only one officer from the minorities and another from the Other Backward Classes (OBC) category involved in the exercise. His purpose in doing so was to highlight that those who originally belong to poor and deprived sections of society do not have a role in the framing of a crucial aspect of government’s economic policy. He couched his assertions in colourful political language.
The Union Finance Minister also responded to Mr. Gandhi’s charge by pointing to the absence of persons from these traditionally deprived backgrounds in the the Rajiv Gandhi Charitable Trust and the Rajiv Gandhi Foundation. A serious issue was converted into political tit for tat.
Upper caste domination continues
These political charges and counter-charges missed the real reason for the absence of SC/ST officers in the Budget-making exercise. The cause is the continuing domination of the so-called upper castes at senior levels of the civil service. This was evident from the answer by Minister of State Jitendra Singh to a parliamentary question on December 15, 2022.
This daily in a report carried the next day, quoted Mr. Singh as saying, “Out of a total of 322 officers currently holding the posts of Joint Secretaries and Secretaries under Central Staffing Scheme in different Ministries/Departments, 16, 13, 39 and 254 belong to SC, ST, Other Backward Classes (OBC) and General category, respectively.”
Mr. Singh further clarified that the number of Secretary and Joint Secretary-level officers stood at 4% and 4.9%, respectively. Clearly, there is an absence of reserved category officers in sufficient numbers at policy suggestion levels in the government. Unless this situation is remedied, Rahul Gandhi displaying photographs will only remain empty political gestures, for there is no reservation for promotions in Class A services.
In order to increase the representation of SC and ST officers at the senior-most positions in government, a complete departure from the traditional concept of the age of retirement would be necessary. This writer had advocated a new approach to retirement in an article in these columns in September 2012. If the Leader of the Opposition is truly interested in ensuring social justice in the civil services, he should, at least, ponder over the ideas presented in the subsequent paragraphs.
Eligibility and age factor
General category candidates between the ages of 21 and 32 years are currently eligible to appear for the civil services examination. They are allowed six attempts in all. SC/ST candidates are permitted to take the examination till the age of 37 years and there is no restriction on their number of chances. For OBC candidates, the upper age limit is 35 years and they are allowed nine attempts. The upper age limit for Persons with Benchmark Disabilities (PwBD) is 42 years. They have unlimited chances if they are SC/ST and nine if they are from other categories.
This means that SC/ST and PwBD candidates, irrespective of how well they perform as civil servants, are unable to reach the top because they generally join late and retire before reaching the top. They have to retire at lower or middle levels. This is the obvious implication of Jitendra Singh’s answer. The fact is that the civil service is a race in which those who join at a young age remain around to reach the top even if their performance is not as good as those who join later. This is simply because of the age factor. Logically, the government’s focus should be on the official’s efficiency and competence and not on when he/she made it to the civil services within the prescribed age limits.
If this proposition is accepted, it follows that the present retirement pattern should yield to a fixed tenure of years for every entrant to the civil service, irrespective of his age of entry within the prescribed limits. A possible fixed tenure could be 35 years.
If it is considered that persons should not be working in their seventies, then the present age limits can be lowered to ensure that all candidates would retire by the time they reach around 67 years of age. The average age of men and women is rising in India. Besides, stringent medical fitness examinations can be conducted annually after the age of 62. This age is being mentioned because even today, some officers’ tenures take them to this age. Indeed, some persons who are holding responsible positions today, after their retirement from government service, are well into their seventies.
Have a committee
It is only if a fixed tenure is prescribed for all officers, irrespective of their age of entry, that SC/ST and OBC officers in larger numbers will fill the senior-most positions in government. That will contribute to a dream of Viksit Bharat, with social justice for all. As a beginning, the Leader of the Opposition should press for an independent and multi-disciplinary committee with adequate SC/ST, OBC and PwBD representation to examine this proposal with an open mind.
Date: 17-08-24
ऊपरी अदालतों की चिंताओं बेफिक्र निचली अदालतेंसंपादकीय‘कहीं बेल पर नो, कहीं फल से रिहाई’। जहां उच्चतम न्यायालय की कई पीठ और स्वयं सीजेआई लगातार उच्च न्यायालयों और निचली अदालतों को ‘जमानत नियम है, जेल अपवाद’ का न्यायालय-प्रतिपादित कानून पालन करने का कह रहे हैं, वहीं सामान्य से लेकर संगीन धाराओं में जेल में बंद हर चार में से एक कैदी विचाराधीन बंदी है। लेकिन यही अदालतें और सरकारें तब उदारवादी हो जाती हैं जब कोई असरदार व्यक्ति दुष्कर्म या हत्या के जुर्म में आजीवन कारावास की सजा कट रहा होता है। दुष्कर्मी बाबा राम रहीम अपनी उम्र कैद की सजा के पिछले सात सालों में दस बार फलों / पेरोल पर रिहा हुआ। इसका कारण था उसके रसूख के इलाके में चुनाव, जहां वह प्रभाव डालता है। एक ओर जहां बहुमत से चुने गए मुख्यमंत्री, मंत्री, सामाजिक कार्यकर्ता, डॉक्टर, छात्र नेता यूएपीए और पीएमएलए जैसे संगीन कानूनों में वर्षों – महीनों से जमानत के अभाव में जेल में बंद हैं, वहीं इनतथाकथित बाबाओं के प्रति सरकारों की उदारता सुप्रीम कोर्ट को भी चिंतित कर रही है। ‘आप’ नेता मनीष सिसोदिया को रिहा करते हुए कोर्ट ने इसी चिंता का जिक्र किया। निचली अदालतों के लिए नए न्याय – शास्त्रीय व्याकरण को अंगीकार करने की जरूरत पर सीजेआई कई बार अपने भाषणों में जोर दे चुके हैं।
Date: 17-08-24
खेलों में बहुत कम से ही हम बहुत खुश क्यों हो जाते हैं?पवन के. वर्मा ( पूर्व राज्यसभा सांसद व राजनयिक )
स्वतंत्रता दिवस पर लाल किले से अपने भाषण के दौरान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पेरिस ओलिम्पिक में हमारे एथलीटों के प्रदर्शन के लिए उन्हें बधाई दी। लेकिन मैं अचरज करता हूं कि क्या खेलों में संतुष्टि की हमारी सीमा अस्वीकार्य रूप से कम नहीं है? पेरिस ओलिम्पिक में, भारत ने एक रजत और पांच कांस्य पदक जीते, लेकिन एक भी स्वर्ण नहीं जीता। 140 करोड़ से अधिक की आबादी वाले देश के लिए यह एक निराशाजनक प्रदर्शन है।इसका मतलब है लगभग 25 करोड़ लोगों पर एक पदक! पदक तालिका में हम 84 प्रतिभागी देशों में से 71वें स्थान पर रहे। अमेरिका के पास 30 स्वर्ण सहित 126 पदकों की सबसे अधिक संख्या थी। चीन 96 पदकों के साथ दूसरे स्थान पर था, लेकिन उसके पास भी उतने ही स्वर्ण थे। विकासशील देशों में, ब्राजील ने 20 पदक जीते औरकेन्या ने 11… 1900 से, यानी जब से आधुनिक ओलिम्पिक शुरू हुए हैं- भारत ने कुल 41 पदक ही जीते हैं।
खेलों में हमारे लगातार खराब प्रदर्शन के क्या कारण हैं? सबसे पहली बात तो यह है कि मामूली सुधारों के बावजूद, हमारा खेल बुनियादी ढांचा पूरी तरह से अपर्याप्त है। 2008 तक, चीन में 3000 खेल संस्थान थे; जबकि 2024 में हमारे पास केवल 150 ही हैं। इनमें से भी केवल 26 सरकारी या सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के स्वामित्व में हैं।ओलिम्पिक के स्तर तक खेल प्रतिभाओं को निखारने के लिए बच्चों को कम उम्र में ही उच्चतम गुणवत्ता के प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है। हमारा पहला राष्ट्रीय खेल विश्वविद्यालय 2018 में मणिपुर के इम्फाल में स्थापित किया गया था। राष्ट्रीय खेल विकास संहिता को 2017 में अपनाया गया, लेकिन अब भी सभी खेल महासंघों ने इसका अनुपालन नहीं किया है।प्रशिक्षण की गुणवत्ता भी खराब है और नौकरशाही व लालफीताशाही से ग्रस्त है। यही कारण है कि अभिनव बिंद्रा जैसे साधन-सम्पन्न एथलीट घर पर ही प्रशिक्षण लेना पसंद करते हैं। खेल मंत्रालय को 2020 में पिछले ओलिम्पिक के बाद से 45 करोड़ रुपयों की मामूली वृद्धि मिली है। इसके विपरीत, चीन में2023 तक देश भर में खेल स्थलों की कुल संख्या 45 लाख से अधिक हो गई थी।ये सच है कि हमारा खेलो इंडिया कार्यक्रम बढ़ा है, लेकिन इसके तहत खेल के बुनियादी ढांचे के लिए धन का आवंटन तर्क से परे है। उदाहरण के लिए, 8 करोड़ से कम आबादी वाले गुजरात को 426.13 करोड़ मिलते हैं, जबकि 13 करोड़ से अधिक लोगों वाले बिहार को मात्र 20.34 करोड़!
राजनीति और खेल का गठजोड़ भी एक समस्या है। महिला पहलवानों का यौन उत्पीड़न करने और उन्हें डराने-धमकाने के आरोपी, भाजपा के बाहुबली नेता बृजभूषण शरण सिंह भारतीय कुश्ती महासंघ को अपनी निजी जागीर समझते थे और जब कुश्ती सुपरस्टार विनेश फोगाट ने उनका विरोध किया तो उनके साथ इतना बुरा व्यवहार किया गया कि इससे उनका मनोबल टूट गया होगा। कई अन्य खेल महासंघों के अध्यक्ष भी राजनेता हैं।
एनसीपी के प्रफुल्ल पटेल लगातार चार बार अखिल भारतीय फुटबॉल महासंघ के अध्यक्ष रहे हैं। टेनिस महासंघ के अध्यक्ष भाजपा सांसद अनिल जैन हैं। हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री ओपी चौटाला के बेटे अभय सिंह चौटाला लगातार तीन बार मुक्केबाजी महासंघ के अध्यक्ष रहे।असम के सीएम हिमंत बिस्वा सरमा बैडमिंटन महासंघ के अध्यक्ष हैं। भाजपा के पूर्व सांसद विजय कुमार मल्होत्रा ने तो चार दशकों तक तीरंदाजी महासंघ के अध्यक्ष रहते हुए सारे रिकॉर्ड ही तोड़ दिए! इन राजनेताओं ने हमारे खेलों के प्रदर्शन को बेहतर बनाने के लिए क्या किया है?
क्रिकेट के प्रति हमारे जुनून ने भी अन्य खेलों की उपेक्षा की है।बीसीसीआई- जिसके महासचिव अमित शाह के बेटे जय शाह हैं- दुनिया भर में सबसे अमीर खेल लीगों में से एक है। 2023 में इसकी कमाई 18,700 करोड़ रुपए थी। इसके विपरीत, हॉकी महासंघ की 2023 में कमाई 86.7 करोड़ रुपए थी। क्रिकेट की छाया में अन्य खेलों का हमारा कौशल अवरुद्ध हो गया है।आश्चर्य नहीं कि पेरिस के 32 खेल आयोजनों में से हम केवल 16 में प्रतिस्पर्धा कर सके। जबकि चीन ने 30 में प्रतिस्पर्धा की थी। खेल-प्रतिभाओं की पहचान और पोषण के लिए हमारा कैचमेंट एरिया भी सीमित और ज्यादातर शहरी है। देश की आबादी में 2 प्रतिशत और कुल क्षेत्रफल में 1.6 प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाले हरियाणा ने हमारे 36 प्रतिशत पदक जीते हैं। हरियाणा को बधाई, लेकिन क्या हमने अन्य राज्यों में प्रतिभाओं को खोजने के लिए पर्याप्त काम किया है?
Date: 17-08-24
विकास मापने का नया आधारसुरेश भाई
जुलाई के तीसरे सप्ताह में मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी ने उत्तराखंड सकल पर्यावरण उत्पाद सूचकांक (जीईपी) लॉन्च किया। इसका सरल अर्थ है कि उत्तराखंड जैसे संवेदनशील क्षेत्र में विकास कार्य से पहले मूल्यांकन करके जल‚जंगल‚ जमीन‚ वायु पर उसके प्रभाव का आकलन होगा। यदि विपरीत प्रभाव की अधिक संभावनाएं होंगी तो निश्चित ही उसको रोकना भी पड़ेगा। यही बात २००७ की केंद्रीय पुनर्वास नीति में भी लिखी गई है।
5 जून‚2021 को तत्कालीन मुख्यमंत्री तीरथ सिंह रावत ने भी यही ऐलान किया था कि उत्तराखंड पहला राज्य होगा जहां विकास को मापने के लिए जीईपी लागू किया जाएगा। इससे पहले पूर्व मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा और ड़ॉ. रमेश पोखरियाल निशंक ने भी यह आश्वासन दिया था क्योंकि उत्तराखंड हिमालय में तेजी से भोगवादी विकास के नाम पर प्राकृतिक संसाधनों का विनाश हो रहा है‚ उसे रोकने के लिए छोटे–बड़े आंदोलन चलते रहते हैं। इसके बावजूद अब हर वर्ष सकल पर्यावरण उत्पादन में हम कहां खड़े हैं उसका मूल्यांकन करके जीडीपी के साथ जीईपी का लेखा–जोखा भी राज्य को प्रस्तुत करना पड़ेगा। यह किसी एक राज्य के लिए ही नहीं अपितु देश के लिए भी स्वागतयोग्य कदम है‚ लेकिन इससे एक गंभीर आशंका भीपैदा होती है। यह कि संबंधित विभागों से प्रस्तावित विकास से पर्यावरण पर पड़ने वाले प्रभावों के मूल्यांकन का आधार क्या होगाॽ क्या कोई मॉनिटरिंग प्रणाली होगीॽ यह भी कहा जा रहा है कि राज्य द्वारा95,112 करोड़ के लगभग दी जाने वाली पारिस्थितिकीय सेवाएं क्या हरियाली बचाने वाले निवासियों को लाभ प्रदान करेंगी या सिर्फ केंद्र से बजट का दावा पेश कियाजाएगा। नीति आयोग इस विषय पर किस आधार पर फैसला लेगाॽ इन सब के उत्तर भविष्य के गर्त में छिपे हैं|
वैसे भी समझने के लिए यह पर्याप्त है कि उत्तराखंड के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल में से 71प्रतिशत वन भूमि के अधीन है‚ जबकि सघन वन 40 प्रतिशत से अधिक नहीं है। लेकिन राज्य सरकार यही कह रही है कि जीईपी सूचकांक के आधार पर ग्रीन बोनस और केंद्र की सहायता लेने में यह लाभकारी साबित होगा। प्रति वर्ष जीईपी सूचकांक प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी उत्तराखंड के प्रमुख सचिव (वन) को दी गई है। इसका आंकलन मानवजनित और प्राकृतिक गतिविधियों के आधार पर होगा जिसमें जंगल‚ हवा‚ पानी‚ मृदा पर लगातार परिवर्तन जैसे–जंगल के संबंधित सूचकांक के लिए विभिन्न वर्षों में वन विभाग द्वारा रोपे गए पौधों की संख्या और इन्हीं प्रजातियों के वृक्षों के पातन की संख्या के आधार पर आंकड़े एकत्रित किए जाएंगे। इसमें यह भी पता हो पाएगा कि पातन के दौरान छोटी–छोटी वनस्पतियां‚ जीव–जंतु बुरी तरह प्रभावित होते हैं‚ लेकिन क्या हर वर्ष भीषण आग से जल रहे जंगल और रोपे गए पौधों के सापेक्ष प्राकृतिक वन संपदा की व्यावसायिक कटाई का मूल्यांकन करना आसान होगाॽ क्योंकि जिन पेड़ों को उसी वर्ष लगाया गया और यह मान लेंगे कि इतने ही इसी प्रजाति के पेड़ काटे गए तो यह अधूरी जानकारी होगी क्योंकि उत्तराखंड में हर साल चीड़‚ देवदार‚ कैल आदि प्रजातियों का बड़े पैमाने पर कटान हो रहा है।
मृदा के बारे में संभव है कि बड़े निर्माण कार्यों से बेतरतीब ढंग से काटे जा रहे पहाड़ों से खिसक रही मिट्टी को सीधे नदियों में डाला जाता हो और कहीं भी मिट्टी को पुनः उपयोग में लाने के लिए डंपिंग जोन नहीं है जिसके ऊपर पौधे रोपे जा सकते थे। जब तक ऐसा नहीं होगा तब तक मिट्टी की बर्बादी का मूल्यांकन संभव नहीं। जल के मामले में उपलब्ध जल की गुणवत्ता और मात्रा में तेजी से बढ़ रहे प्रभाव का सबसे जीता जागता उदाहरण तो यही है कि पहाड़ी भू–भाग में भी 60 प्रतिशत जल स्रोत सूख चुके हैं‚जिसके एवज में जो भी जल संरचनाएं बनी हैं‚ क्या उन्हें प्राकृतिक जल स्रोतों के समान स्वीकार किया जा सकता हैॽ और कोई भी विकास संरचना यदि जल स्रोतों को बर्बादकरती है तो उसे न्यूनतम करने के क्या तरीके होंगे। जंगल के बारे में भी कहा जा सकता है कि विकास के नाम पर न्यूनतम वनों को ही नुकसान हो।
भौगोलिक संरचना के आधार पर विकास की संरचना निर्धारित हो। भारी–भरकम परियोजनाओं से हिमालय के प्राकृतिकसंसाधनों का विनाश नहीं रोक पाएंगे तो जीईपी की हालत जीडीपी जैसी होगी। सकल पर्यावरण उत्पाद की मांग करने वाले पद्मभूषण ड़ॉ. अनिल प्रकाश जोशी मानते हैं कि उत्तराखंड में .9 प्रतिशत जीईपी है‚ जिसे 4-5 तक ले जाना पड़ेगा। लेकिन राज्य व्यवस्था तो फंड़ के लिए मजबूत हथियार के रूप में इसे देख रही है जबकि ग्रीन बोनस की मांग करने वाले पर्यावरणविद् जगत सिंह ‘जंगली’ और रक्षा सूत्र आंदोलन की टीम का कहना है कि रसोई गैस पर लोगों को आधी से अधिक सब्सिडी दी जानी चाहिए। जल पुरुष राजेंद्र सिंह कहते हैं कि पर्यावरणीय आर्थिकी वहां होगी जहां लोग अहिंसक होंगे|
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17 August 2024
प्रश्न – 474 – सर्वश्रेष्ठ प्रतियोगिता वह है, जो स्वयं से की जाती है। उक्त विषय पर एक सारगर्भित निबंध लिखें। (शब्द 1000-1200)
Question – 474 – The best competition is the one which is done among oneself. Write a concise essay on the above topic. (Words 1000-1200)
नोट : इसका उत्तर आपको हमें नहीं भेजना है, यह आपके स्वयं के अभ्यास के लिए है।
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Date: 15-08-24
India & IndiasporaSuccess of diaspora in US and other countries is reason for Centre to make emigration a standalone ministryEditorial
Regardless of which way US presidential elections go, there will be an Indian-origin woman in the citadel of power in Washington next Jan, whether it is as POTUS (Kamala Harris) or as Second Lady (Usha Vance). That encapsulates the power and influence the Indian diaspora has come to have on American life. From technology and business to healthcare, education and public policy, the 5.1mn-strong Indian diaspora in US – which comprises just 1.5% of its population – has punched far above its weight in the country. To take one metric, it contributes as much as 5-6% to US’s tax kitty. To take another, at $136,000, the median income of diasporamembers is almost double the American population’s average.
A great success story | The spread of Indian-origin people across different spheres of American life is commendable. They are also giving back to their home country, sending $26bn in remittances in 2022-23. Similar is the story for Indian migrants to West Asia, Europe and elsewhere. In fact, if the economic heft of the more than 3cr Indian migrants worldwide is taken into account, we already have a $5tn GDP. And this has not happened only because of highly skilled professionals. As a TOI story highlighted earlier this year, there is a Great Indian Outplacement at work involving blue-collar workers. This must be tapped to the fullest. A Donald Trump or Nigel Farage may not accept it owing to political reasons, but it presents a win-win scenario for both India and the destination countries.
Create a special ministry | With their birth rates going down and populations growing older, labour shortages in developed countries offer India’s large young population a great opportunity. Several states have already put in place systems to help with skilling and migration of young workers. But this must be pursued with far more vigour at Centre than has been the case so far. What we need is an emigration ministry in Union govt that coordinates with MEA, skill development ministry and states to institutionalise a mechanism for migration of Indian workers to countries around the world. It’s illegal migration that’s mostly the issue in the West –undocumented people account for 14% of Indian diaspora in US, for instance. Having a powerful minister who furthers legal migration would not just help deal with the huge unemployment problem India faces. It would also take the sting off the tirades of far-right leaders in the West.
Date: 15-08-24
Supremely clearTwo SC orders within a week should settle once and for all that bail, not jail, is the normEditorial
Supreme Court’s latest order granting bail, in a case under anti-terror law UAPA, adds to its last week’s order bailing Sisodia in a PMLA (money laundering) case. Both UAPA and PMLA have special provisions for bail – negative provisions – that an accused is “not presumed innocent”. In ordinary law, presumption of innocence is a fundamental principle in grant of bail.
SC’s clear signal | In Sisodia’s case, SC said that delay in trial and a long period behind bars are reason enough to grant bail, while in the UAPA case it said that “bail as rule and jail as exception is settled law” for all legislation. Taken together, the back-to-back SC rulings provide clear direction to grant of bail in cases under most stringent laws. On earlier occasions too, SC has observed that statutory restrictions on bail must not overshadow constitutional rights.
For SC to direct | It is this clarity in direction to interpret controversial legislation – whose provisions are under challenge in SC – that is much required for HCs and trial courts to take their cue. Barely six months ago, another SC bench had held the reverse in another order – that in UAPA jail, not bail, is norm. It is such contradictory signals from top court that can distort how any law is interpreted. The two latest orders should settle any such confusion, taken on a case to case basis.
For SC to decide | Pleas on constitutionality of provisions in UAPA and PMLA are waiting for SC deliberations. Challenges to amendments introduced as money bills are awaiting SC’s decision. Several PMLA and UAPA undertrials are behind bars where their lawyers argue against the very need for custody. Incarceration is damaging. Sooner the challenges to such laws are settled, better the direction SC can provide to investigators, litigants, and the accused.
Date: 16-08-24
Taxing judgmentSC call to make minerals tax retrospective brings back ghosts of Vodafone, CairnEditorial
Supreme Court shouldn’thave given retrospective effect to its recent judgment that granted states the right to levy tax on mineral rights. The huge burden on mining companies will not just impact their financials and investment plans but also have a ripple effect across the valuechain, possibly leading to inflationary trends for end products. SC’s July 25 verdict was a step forward for fiscal federalism. But had Wednesday’s ruling been different, the cause of fiscal federalism would have still been upheld, without the inevitable distortions retrospective taxation engenders. The legal story on this is most likely not over.
Questionable logic | While SC tried to soften the blow on mining companies by waiving interest and penalty imposed before July 25 and by staggering payments over 12 years, the cumulative effect will be considerable. That this matter was referred to a nine-judge bench as long back as 2011 should have weighed on SC’s mind. In effect, mining companies will now have to cough up – by one estimate – taxes in the range of ₹1.5-2tn, thanks to delays in the judicial process. Granting prospective effect to its ruling would make states that had passed enabling laws and collected taxes liable to refunds, SC said. But this doesn’t seem to have accounted for the Centre’s stand that it was agreeable to a “no recoveries no refunds” regime. Instead of a decades-old dispute being settled once and for all, what we now face is its persistence in the future.
A bad idea | The larger issue here is of retrospective taxation, which is both bad policy and unsound economics.Companies make decisions keeping in mind extant laws. To subject them to retrospective tax doesn’t just impact them financially. It affects the general business climate. We have seen this play out in the Cairn and Vodafone disputes, which saw international tribunals ruling against erstwhile UPA govt’s attempt to impose such a tax. Those taxes impacted India’s reputation as an investment destination. Fortunately, an amendment in law in 2021 undid the damage caused by that move. Did we need a judicial decision to bring the issue front and centre again?
Date: 15-08-24
The seductive trap of the civil servicesPublic service neither has the monopoly nor does it provide any extraordinary opportunity to serve the nationAshok Lavasa,( Retired IAS officer and former Election Commissioner )
Two lamentable tales unfolded in India recently. Both of them, about young aspirants, made telling headlines and made one sad, even angry. The first story from Maharashtra brought a cloud over the stellar reputation of the Union Public Service Commission (UPSC), which has selected government officers based on merit for over seven decades without any major controversies. The second story from Delhi laid bare the struggles of thousands in India in trying to achieve single-minded success in being able to crawl through an aspirational miasma. The civil services is the major seductive trap, which can be detoxified by some readjustment of public policy and popular perspective.
The underbelly
The attraction for the civil services is historical; the obsession seen in recent times unprecedented. About five decades ago, when we were students, preparing for the civil services was considered a national pastime driven by the dignity and security of a government job and by the dearth of employment opportunities. Economic liberalisation changed it all by opening up job options in the market. The government too reduced intake for its services in its zeal to downsize. However, as this was not accompanied by the shedding of government functions and reduction in the authorised strength of the service cadres, a huge deficit was created in due course. With the revision in government salaries recommended by the Sixth Pay Commission implemented in 2008, when there was an economic downturn and the private sector was benching or retrenching its staff, the government re-emerged as a preferred employer.
The national pastime of yore has assumed epidemic dimensions. Its underbelly was recently exposed first when a trainee officer in Maharashtra was found to have faked her identity and documents and then by the terrible and entirely avoidable deaths of three aspirants in Delhi. Questions have rightly been asked about the acts of omission and commission that led to both these incidents. While the first incident relates to the psyche of an individual, who was gaming the system to qualify to be termed the ‘cream of society’, the other relates to the collective psyche of a society enmeshed in chasing stereotypical aspirations. An entire industry capitalises on this pursuit even though it is aware that the rate of success is small.
One such aspirant has been sending me mails for the last seven years, sharing his repeated failures. I could not succeed in persuading him to change course despite his qualifying for the now-discredited National Eligibility Test. Such is the allure of the civil services, and the Indian Administrative Service has come to represent that fatal attraction. I once interacted with 28 aspirants who had qualified for the interview. Only one of them was appearing for the interview for the first time; the others were taking their fifth or sixth chance.
The catastrophe of the drowning of the three aspirants has raised a clamour for regulating the coaching institutions and for stricter enforcement of urban regulations. The irony is that the demand is being made of the same bureaucracy whose ineptitude is responsible for this calamity. The entry of the floodwater mixed with overflowing sewer into the basement is not the only calamity; nor is the arrest of the SUV driver accused of being the main culprit the only farcical response of the system. The rot is deeper.
Some suggestions
First, the upper age limit for candidates needs to be reduced. After the Kothari Commission’s recommendations and subsequent changes, and with age relaxation for various special categories, a candidate can be nearly 34-35 years old at the time of entry into service. Given that the lower age limit for eligibility is 21, the upper age limit should be reduced to 25 with a relaxation of two years for all special categories. The number of attempts may be restricted to three, with an additional attempt allowed to the special categories.
The wide age band and the many attempts allowed has created an enormous market for the notorious coaching industry to thrive on. Millions of aspirants join these centres every year. The success rate is so small that it is difficult to calculate. An analysis must be done to show how many candidates keep repeating their efforts and eventually give up after exhausting their chances. Why should our public policies promote a race in which so much energy and resources are spent? The only beneficiary of this insane pursuit is the mushrooming coaching industry, propagated by those who have occupied respectable positions of authority while in government.
Those who qualify after such a long and arduous struggle are bound to feel a sense of unrealistic attainment in qualifying for the exam. But when they are so overwhelmed by their repeated attempts and hard-earned success, how much fire is left in their belly to excel while in service? For some, it would be the time to enjoy the fruits of their labour and luck rather than toil to discharge the responsibility that follows their entry into public service.
It is equally important to disabuse the younger generation of the notion that government service is the only way of serving the nation. Being a good teacher, an ethical accountant, a conscientious chemist, and an honest contractor are also ways of serving society and contributing towards nation-building. All honest hard work goes into building a nation. Public service neither has the monopoly nor does it provide any extraordinary opportunity to serve the nation.
Date: 16-08-24
Freedom notes:India must make its governments more accountable to the peopleEditorial
Prime Minister Narendra Modi’s first Independence Day speech in his third term in office — the eleventh since 2014 — sought to signal continuity and authority, particularly in the context of the fact that he is now leading a coalition government. He called for a uniform civil code, terming it a secular measure agnostic of religious faiths, ‘one nation, one election,’ and increased safety of women against the backdrop of the sexual assault and murder of an on-duty doctor in Kolkata recently. Mr. Modi said there were attempts to destabilise the economy of the country, echoing the BJP’s view on a recent report by U.S.-based short seller Hindenburg Research that has accused the head of stock market regulator SEBI of conflict of interest. Mr. Modi criticised the continuing trend of dynastic politics and suggested that one lakh first generation young leaders should enter electoral politics at various levels, and also expressed hope for peace being restored in Bangladesh. Reviewing his two terms in power, he claimed that India has made great strides in manufacturing, and in fighting corruption, and vowed to stay the course regardless of obstacles. The desirability of a uniform civil code, or more youngsters in politics or fighting corruption is not in question. But unfortunately, all these remain contentiousissues, largely due to the government’s partisan approach.
That Leader of the Opposition Rahul Gandhi was seated in a back row of the audience at Red Fort where Mr. Modi delivered his customary address is instructive. The government’s explanation for this breach of precedent, that the seats in the front rows were given to members of this year’s Olympic team, is hardly a reasonable one. The government needs to be less unilateral and more consultative if it is truly committed to advancing a unified national agenda in the seventy-eighth year of India. A uniform civil code in a country as diverse as India requires consensus building, and ending the opportunistic use of the issue to attack the Muslim community. The government cannot fight corruption by investigating only Opposition leaders and overlooking serious charges against functionaries such as the SEBI chief. Criticism of the government is not a conspiracy to destabilise the nation, and labelling it as such is appealing only to a diminishing number ofpeople. Independence Day should be a good occasion as any other to remember that the nation is not the government, and certainly not synonymous with the party in power. The freedom is for keeping the government of the day accountable to the people through a political process.
Date: 15-08-24
खनिज का खज़ानासंपादकीय
किसी भी राज्य के विकास और आर्थिक संपन्नता में उसके अपने संसाधनों की अहम भूमिका होती है। मगर, देश के कुछेक राज्य ऐसे हैं, जहां प्राकृतिक संसाधन तो भरपूर हैं, लेकिन उन्हें इनका पूरा लाभ नहीं मिल पा रहा था। इसका कारण केंद्र सरकार और राज्यों के बीच करों तथा उपकरों के बंटवारे को लेकर विवाद था। खनिज संपदा पर किसका हक है, यह सवाल कई मौकों पर उठता रहा। पिछले महीने सर्वोच्च न्यायालय ने इस विवाद का निपटारा करते हुए व्यवस्था दी कि खनिज भंडार राज्य की संपदा हैं। फिर राज्यों को एक और बड़ी राहत बुधवार को मिली, जिसमें उन्हें खनिजों और खनिज-युक्त भूमि पर केंद्र सरकार द्वारा पिछले बारह वर्षों में क्रमबद्ध तरीके से वसूले गए कर का बकाया लेने की अनुमति मिल गई।
दरअसल, यह मामला इसलिए उलझा हुआ था कि संविधान में खदानों के आबंटन से संबंधित सीमाएं तय करने का अधिकार केंद्र सरकार को दिया गया है। जमीन और इमारत आदि पर शुल्क लगाने का अधिकार राज्य सरकारों को है। इसलिए राज्यों में खनिजों पर कर केंद्र सरकार लगा रही थी। मगर, सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने पिछले महीने स्पष्ट कर दिया था कि खनिज राज्य की संपदा हैं, इसलिए वे पट्टे की कीमत तय कर सकते हैं।खदानों और खनिज-युक्त भूमि पर कर लगाने का विधायी अधिकार राज्यों का है। कुछ राज्यों में प्राकृतिक संसाधन ही राजस्व अर्जित करने का मुख्य स्रोत होता है, इसलिए अगर खनिजों पर भी केंद्र सरकार ही कर वसूलेगी तो राज्यों को अपने विकास कार्यों के लिए धन जुटाना मुश्किल हो जाएगा।
सर्वोच्च न्यायालय के इस फैसले के बाद राज्य खनिजों और खनिज-युक्त भूमि पर केंद्र सरकार की ओर से वसूली गई रायल्टी और कर की बकाया राशि के भुगतान की मांग कर रहे थे। हालांकि केंद्र सरकार ने इसका विरोध किया, मगर शीर्ष अदालत ने केंद्र की दलीलों को खारिज कर राज्यों को खनिजों और खनिज-युक्त भूमि पर वसूले गए रायल्टी और कर पर एक अप्रैल 2005 से बकाया लेने की अनुमति दे दी। शीर्ष अदालत के इस फैसले ने साफ कर दिया है कि खनिज के खजाने पर पूरी तरह राज्यों का हक है।
Date: 15-08-24
विदेश व्यापार में घाटे की चुनौतीजयंतीलाल भंडारी
बांग्लादेश में शेख हसीना की सत्ता के तख्तापलट और अमेरिका तथा जापान सहित दुनिया के कई देशों में मंदी के परिदृश्य के बाद भारत में विदेश व्यापार घाटे की नई चुनौतियां दिखाई दे रही हैं। उल्लेखनीय है कि बांग्लादेश भारत का आठवां सबसे बड़ा निर्यात बाजार है। पिछले वर्ष भारत ने बांग्लादेश को ग्यारह अरब डालर मूल्य का निर्यात किया। ऐसे में देश के समक्ष विदेश व्यापार के बढ़ते घाटे को कम करने और निर्यात बढ़ाने की नई जरूरत है। हाल ही में वाणिज्य विभाग द्वारा जारी आंकड़ों के मुताबिक चालू वित्तवर्ष में अप्रैल से जून की पहली तिमाही में जहां निर्यात धीमी रफ्तार से बढ़े हैं, वहीं आयात की रफ्तार अधिक रहने से विदेश व्यापार घाटे में वृद्धि हुई है। इन तीन महीनों में कुल निर्यात 200.33 अरब डालर मूल्य का था, जिसमें वस्तु निर्यात 109.96 अरब डालर और सेवा निर्यात 90.37 अरब डालर मूल्य का था। कुल आयात 222.90 अरब डालर मूल्य का था, जिसमें वस्तु आयात 172.23 अरब डालर और सेवा आयात 50.67 अरब डालर मूल्य का था। इस वित्तवर्ष में भारत ने कुल निर्यात का लक्ष्य पिछले वर्ष से कुछ अधिक 800 अरब डालर पर पहुंचाने का सुनिश्चित किया है, लेकिन रूस-यूक्रेन और इजराइल-हमास युद्ध, लाल सागर संकट और कंटेनर की कमी की वजह से निर्यात का यह ऊंचा लक्ष्य प्राप्त करना चुनौतीपूर्ण है।
ऐसे में रणनीतिक रूप से विदेश व्यापार के बढ़ते घाटे को नियंत्रित करने और निर्यात की रफ्तार बढ़ाने के अभियान पर आगे बढ़ना होगा। इसके लिए पांच तरह के बहुआयामी उपाय करने होंगे। एक, भारत के विदेश व्यापार में नई जान फूंकने के लिए द्विपक्षीय वार्ताएं बढ़ाई जाएं। दो, वर्ष 2024-25 के बजट में निर्यात बढ़ाने के लिए सुनिश्चित किए गए बजट आबंटनों का शुरू से ही कारगर उपयोग किया जाए। तीन, सेवा निर्यात को हर संभव तरीके से बढ़ाया जाए। चार, निर्यातकों को शुल्क के अलावा आने वाली बाधाओं (नान-टैरिफ बैरियर) से राहत दी जाए और पांच, नए संभावित निर्यात बाजार तलाशे जाएं।
इसमें कोई दो मत नहीं कि सरकार विश्व व्यापार की चुनौतियों के बीच निर्यात बढ़ाने और व्यापार घाटे को कम करने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रही है। पिछले महीने नई दिल्ली में ‘बिम्सटेक’ (बंगाल की खाड़ी के आसपास स्थित देशों का संगठन) में भारत ने नई जान फूंकने की कोशिश की। भारत लगातार द्विपक्षीय व्यापार बढ़ाने का प्रयास तथा ‘पड़ोस प्रथम’, ‘एक्ट ईस्ट’ और सागर नीति के तहत आपसी सहयोग बढ़ाने की पहल कर रहा है। इसी तरह रूस सहित मित्र देशों और विभिन्न विकसित देशों के साथ द्विपक्षीय वार्ताओं से कारोबार बढ़ाने की नई कवायद शुरू की है।
नए बजट में विनिर्माण क्षेत्र को मजबूत करते हुए आयात घटाने और निर्यात बढ़ाने के प्रावधान किए गए हैं। यह बात महत्त्वपूर्ण है कि विनिर्माण क्षेत्र देश से निर्यात और रोजगार सृजन दोनों में अहम योगदान देता है और इसके प्रोत्साहन के लिए इस बजट में खास खयाल रखा गया है। केंद्र, राज्य और निजी क्षेत्र की आपसी सहभागिता से ‘प्लग एंड प्ले’ सुविधा वाले औद्योगिक पार्क विकसित किए जाएंगे। उद्यमी को ऐसे औद्योगिक पार्क में जाकर सिर्फ उत्पादन शुरू करना होता है। नए बजट के प्रावधानों के तहत सौ शहरों में ‘प्लग एंड प्ले’ सुविधा वाले औद्योगिक क्लस्टर या पार्क विकसित होंगे। बजट में सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योगों (एमएसएमई) का निर्यात बढ़ाने और आयात में कमी के मद्देनजर प्रावधान है। इसमें मशीनरी की खरीदारी के लिए ‘क्रेडिट गारंटी स्कीम’ शुरू की गई है। इसके तहत ‘सेल्फ फाइनेंसिंग गारंटी फंड’ बनाया जाएगा, जिसमें सौ करोड़ रुपए तक के कर्ज की गारंटी होगी।
कल तक पूरी दुनिया में भारत का सेवा निर्यात तेज रफ्तार से बढ़ रहा था, लेकिन अब इसकी रफ्तार सुस्त हो गई है। इसे बढ़ाना जरूरी है। सरकार के ‘डिजिटल इंडिया मिशन’ से सेवा क्षेत्र को बढ़ावा मिला है। भारत ने डिजिटल माध्यम से मुहैया कराई जाने वाली सेवाओं के वैश्विक बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाई है। दूरसंचार, कंप्यूटर और सूचना सेवा निर्यात के क्षेत्र में भारत दुनिया में दूसरे और सांस्कृतिक तथा मनोरंजक सेवा निर्यात में छठे स्थान पर है। विश्व व्यापार संगठन की एक नई रपट के अनुसार अगर केवल डिजिटल माध्यम से जुड़ी सेवाओं के निर्यात के आधार पर मूल्यांकन करें तो इस क्षेत्र में भारत, जर्मनी और चीन को पीछे छोड़ते हुए दुनिया में अमेरिका, ब्रिटेन और आयरलैंड के बाद चौथे क्रम पर आ गया है। भारत से डिजिटल सेवा निर्यात में तेजी से वृद्धि के लिए सेवाओं की गुणवत्ता, दक्षता, उत्कृष्टता तथा सुरक्षा को लेकर और अधिक प्रयास करने होंगे।
यह जरूरी है कि निर्यातकों के समक्ष शुल्क के अलावा गैर-शुल्क बाधाएं दूर की जाएं। अभी तक करीब दो सौ गैर-शुल्क बाधाएं चिह्नित की गई हैं। ये ऐसी बाधाएं हैं, जो कई देश अपने आर्थिक लक्ष्यों और विदेश व्यापार को ध्यान में रखकर निर्मित करते हैं। ये सामान्यतया अनुचित और आयातकों से विभेदकारी होती हैं। खासकर इनमें दस्तावेज से संबंधित प्रक्रियाएं, मौसमी शुल्क, टैरिफ कोटा, वस्तुओं की जांच और प्रमाणन, गुणवत्ता, आयात संबंधी पाबंदियां आदि शामिल हैं। ये बाधाएं मुख्य रूप से समुद्री उत्पाद, फार्मास्युटिकल्स, खनिज पदार्थ आदि से संबंधित हैं। आमतौर पर गैर-शुल्क बाधाओं को दूर करने में कई वर्ष लग जाते हैं। कई बार निर्यातकों को इनके बारे में पता भी नहीं होता। ऐसे में इस बात पर पूरा ध्यान देना होगा कि विदेशी व्यापारिक भागीदारों द्वारा लागू की गई गैर-शुल्क बाधाओं की चुनौती से निपटने के लिए भारत अपनी प्रणाली में उपयुक्त बदलाव करे।
यह भी महत्त्वपूर्ण है कि सरकार अतिशीघ्र गैर-शुल्क बाधाओं से संबंधित एक आनलाइन पोर्टल शुरू करे, जिससे निर्यातकों के समक्ष विभिन्न देशों में आने वाली चुनौतियों का पता लगाया जा सके। एक महत्त्वपूर्ण कदम यह भी उठाया जा सकता है कि चीन से गैर-शुल्क बाधाएं समाप्त कराने के लिए यूरोपीय देशों की तरह भारत भी चीनी आयात पर असाधारण आयात प्रतिबंध लगाने की रणनीति अपनाए। 12 जून को यूरोपीय आयोग ने चीन में बने इलेक्ट्रिक वाहनों पर 48 फीसद तक आयात शुल्क लगा दिया। पिछले कई वर्षों से यूरोपीय देश, चीन से आयात पर शुल्क की दरें 10 फीसद तक ही सीमित रखे हुए थे। इन देशों का मानना है कि चीन के इलेक्ट्रिक वाहनों पर असाधारण आयात शुल्क बढ़ाने पर चीन उनके निर्यातकों पर जिस तरह के प्रतिबंध लगाता है, अब उन्हें न्यायसंगत बनाना पड़ेगा। चीन से आयात के खिलाफ गैर-शुल्क बाधाओं के साथ विभिन्न आयात नियंत्रण के प्रभावी कदम उठाए जाने से चीन दबाव में आकर भारतीय निर्यातकों पर लगाई जा रही गैर-शुल्क बाधाएं कम करने को बाध्य होगा। इसके अलावा लंबे समय से लटके ‘इनवर्टेड टैक्स स्ट्रक्चर’ और जीएसटी सुधार काफी जरूरी हैं। जीएसटी दरों में भी कमी करने की जरूरत है।
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हाल ही में इंडियन काउंसिल फॉर रिसर्च ऑन इंटरनेशनल इकॉनॉमिक रिलेशन्स (आईसीआरआईईआर) ने सुझाव दिया है कि पंजाब और हरियाणा के किसानों को धान न उगाने के लिए सब्सिडी दी जानी चाहिए। इससे कई लाभ होने की संभावना है।
कुछ बिंदु –
‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 17 जुलाई, 2024
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Date: 14-08-24
Single digitsIndia needs to broaden its sport base for success in Olympics.Editorial
India’s return of six medals from the just-concluded Paris Olympics can be termed underwhelming at best. The nation secured one silver and five bronze medals, down from seven at Tokyo 2020 that included a gold and two silvers. At a time when the country is looking to diversify its sporting excellence, has found exuberant support from the government and big corporates, and was aiming for a double-digit medal yield, the Olympic fortnight belied expectations. There were indeed new heroes — shooters Manu Bhaker, Sarabjot Singh and Swapnil Kusale, and wrestler Aman Sehrawat are now household names. The men’s hockey team finishing on the podium for a second straight time and Neeraj Chopra adding a silver to his historic javelin gold from Tokyo are top-notch efforts. But the dependence on a select few to repeatedly deliver, the near-zero presence in disciplines such as swimming and gymnastics, and wrestler Vinesh Phogat being disqualified for being above the weight threshold cast a dark shadow. The need of the hour is thus to broaden the base, increase participation and distribute funding more equitably to usher in a grass-roots revolution. The onus is also on the Union Sports Ministry to bring errant federations — often dens of nepotism and corruption — in line with the National Sports Code, fix accountability and decentralise governance.
As much as the Olympics is about winning and the shaping of national identities, it is also the greatest stage on earth to showcase the triumph of human will. This was best exemplified by the Netherlands’ Sifan Hassan, the first since Emil Zatopek in 1952 to collect medals in 5,000m, 10,000m and marathon, Kenya’s Faith Kipyegon, the first woman to win three consecutive 1,500m titles, Cuba’s Mijain Lopez, who won a fifth individual gold on the trot in 130kg Greco-Roman wrestling, Novak Djokovic, who at 37 and with a surgically repaired knee, won the elusive singles gold in tennis, and Algerian boxer Imane Khelif, who braved incendiary attacks on her gender to rise to the top. Sweden’s Armand Duplantis broke the men’s pole vault record for an astonishing ninth time (6.25m) while swimmer Katie Ledecky, gymnast Simone Biles and hurdler Sydney McLaughlin-Levrone achieved transcendence by stretching their numbers to nine, seven and four Olympic golds, respectively. France did well as a host, winning 16 golds, its best figures in a century. The star was 22-year-old swimmer Leon Marchand, who bagged four golds to position himself as the best of this generation. Athletics, in the post-Usain Bolt era, was on the lookout for one such champion, but as Paris proved, that is a tough act to follow.
Date: 14-08-24
The problem of landslides in KeralaReports and recommendations are aplenty, but implementation is tardy.S. Anandan
Nearly a fortnight after two landslides gouged out the face of the Vellarimala hill in Wayanad’s Meppadi panchayat, killing more than 230 people in the foothills, the search continues for the missing, estimated to be more than 130 people.
This is a tragedy of epic proportions for Kerala, which has been battered by extreme weather events ever since the great flood of 2018. That year, 341 major landslides were reported in the State. Landslides have become a major hazard every monsoon since then, with Wayanad, Idukki, Malappuram, Kasaragod, and Kozhikode districts marked as, and proving to be, highly susceptible to deadly landslides. About 75 people died in overnight landslides at Kavalappara in Malappuram and Puthumala in Wayanad, situated six kilometres apart across the hills, in 2019. Puthumala is barely a few kilometres down the hill from the Chooralmala and Mundakkai wards of Meppadi panchayat, which bore the brunt of the landslides on July 30 this year.
As in 2019, the landslides this year were also triggered by extremely heavy rainfall: 527 mm of rain in 48 hours. It is evident now that there was inadequate early warning. But the role of anthropogenic factors in exacerbating the disaster cannot be discounted.
The Kerala government embarked on a mission to rebuild the State in the wake of the 2018 flood. The post-disaster needs assessment report envisioned a climate-resilient Kerala, which was to be built by managing integrated water resources, following an eco sensitive and risk-informed land use and settlement approach, promoting community-based disaster management, and integrating disaster risk reduction plans across sectors with technology and innovation. However, implementation has been tardy.
The ‘room for river’ project for flood management in the plains has not made any headway. Affirmative action to ensure eco sensitive land use remains a chimera, with the government biding time and a vast majority of the people opposed to the idea of resettlement due to a deep distrust of the system. Unregulated constructions continue to be a menace on the fragile hills in Wayanad and Idukki, with an eye on revenue from tourism. The India Meteorological Department and the Geological Survey of India have delayed upscaling their technical capabilities to give accurate, actionable, and timely early warnings. A case in point is the endless wait for the installation of a Doppler weather radar in Kozhikode to bring north Kerala, including Wayanad, under coverage. Such a radar can give ‘people-friendly’ information such as probable rainfall intensity, wind shear, and the probability of extreme weather such as a cloudburst. But this appears to be a tall order as Wayanad does not even have an adequate number of rain gauges.
But the government has brought local bodies on board the disaster risk reduction matrix. As many as 260 local bodies were handheld by the Kerala Institute of Local Administration in putting together panchayat-level disaster management plans after some laborious fieldwork. Each report contains the whole gamut of information pertaining to that panchayat. For instance, Meppadi, ravaged by the landslides in July, has published a report. To what extent this has been useful in fighting the disaster needs to be examined.
Nevertheless, the plan is sweeping in its coverage of the geomorphological features of the land, the people, the interventions on land, crops, safe routes, etc. It identifies the vulnerable spots and people, such as the differently abled, the bedridden, children, the aged, migrant workers, and those under palliative care. There are long lists of people to sound warnings and be the first responders in the event of a disaster. Officials say these panchayats have been given downscaled climate projection data and maps. For panchayat officials to make sense of the downscaled climate project data and maps, there is a need to ground truth the same.
While the disaster management plan should be frequently updated, experts point to the need to integrate these individual plans while preparing district disaster management plans. There is now a fairly sound understanding of which areas are prone to disasters. While the government should urge the Central agencies to upgrade their systems in order to be able to provide accurate and timely weather alerts, it should also pay attention to community-driven climate monitoring systems.
Date: 14-08-24
सरकारें सटीक डेटा के बिना योजनाएं नहीं बना सकती हैंचेतन भगत, ( अंग्रेजी के उपन्यासकार )
पिछले दशक में भाजपा की बड़ी राजनीतिक उपलब्धियों में से एक हिंदू वोटों को एकजुट करने की उसकी क्षमता रही है। 2014 के बाद ऐसा लगा कि हिंदू आखिरकार एक साथ आ रहे हैं, जबकि यह आजादी के बाद से नहीं हुआ था। इससे निश्चित रूप से भाजपा को वोट-शेयर में बढ़त मिली और चुनाव-दर-चुनाव उनका प्रदर्शन दूसरी पार्टियों के लिए ईर्ष्या का विषय बन गया। यह शाश्वत सत्य है कि अगर भाजपा के लिए बहुसंख्यक हिंदू-वोट अटूट रहे, तो कांग्रेस और उसके सहयोगी सत्ता में आने की उम्मीद नहीं कर सकते। यही कारण है कि 2024 के चुनावों में बेहतर प्रदर्शन करने के बाद से ही कांग्रेस और उसके सहयोगी फिर से अपने पुराने फॉर्मूले को अमल में लाने के लिए कमर कस चुके हैं।
जातिगत जनगणना के पक्ष और विपक्ष में बौद्धिक तर्क हो सकते हैं, लेकिन इसमें भला किसे संदेह होगा कि यह मूल रूप से राजनीतिक मुद्दा है। देश में जातिगत परिदृश्य को बेहतर ढंग से समझें तो न केवल यह पता लगाना जरूरी है कि किसी खास जाति के कितने लोग हैं, बल्कि उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति के बारे में मालूम करना भी उतना ही आवश्यक है। उदाहरण के लिए, कितने लोगों के पास कारें हैं? कितनों के पास दोपहिया वाहन हैं? वे किस स्तर की शिक्षा प्राप्त कर रहे हैं? वे कहां और कैसे घरों में रहते हैं? उनकी औसत आयु क्या है? ऐसे सवालों के जवाब बेहद मूल्यवान डेटा को सामने लाएंगे। यह डेटा आरक्षण सहित विभिन्न जाति-आधारित कल्याणकारी उपायों में प्रबंधन में मदद करेगा। भारत अभी भी सीमित संसाधनों वाला एक कम आय वर्ग का देश है। फिर भी, हम जो कुछ भी हमारे पास है, उसी के साथ संसाधनों को वंचित वर्गों में पुनर्वितरित करने और अपनी ऐतिहासिक गलतियों को सुधारने का प्रयास करते हैं। लेकिन अगर हमारे मौजूदा उपाय पुराने डेटा पर आधारित होंगे, तो बहुत सम्भव है कि हम अपने संसाधनों को बर्बाद कर रहे होंगे, क्योंकि तब हम वांछित समुदायों तक लाभ नहीं पहुंचा पाएंगे।
हम ऐसे समय में रह रहे हैं, जहां डेटा का उपयोग हर चीज को अनुकूलित करने के लिए किया जाता है। ऐसे में राष्ट्रीय स्तर पर कल्याणकारी योजनाओं को लागू करने के लिए भी सटीक डेटा होना बहुत जरूरी है।
जातिगत जनगणना के कुछ नुकसान भी हैं। सबसे बड़ा नुकसान यह है कि ये तमाम कवायदें अंततः जाति-व्यवस्था को जीवित रखती हैं। एक समाज के रूप में हमारा अंतिम लक्ष्य क्या होना चाहिए? अधिकतम आरक्षण प्राप्त करना? या एक ऐसा समाज बनाना, जहां कोई जातियां नहीं होंगी? इन सवालों के जवाब आसान नहीं। लेकिन यह साफ है कि जब तक जाति-आधारित आरक्षण मौजूद है, तब तक जाति-आधारित सामाजिक-आर्थिक डेटा का होना भी जरूरी है।
लेकिन ये सब तो तार्किक बातें हुईं। अंतिम निष्कर्ष में तो यह कवायद राजनीति के लिए ही है। जैसे राम मंदिर और अनुच्छेद 370 के मुद्दों ने हिंदू वोटों को मजबूत करने में मदद की है, उसी तरह जातिगत जनगणना हिंदू वोटों में सेंध लगाने की जुगत है। जब जातिगत जनगणना के आंकड़े आखिरकार जारी किए जाएंगे, तो विभिन्न जातियों और समुदायों के बारे में पुख्ता जानकारियां सामने आएंगी। कुछ उम्मीद से बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं (जो कि होना भी चाहिए, खासकर अगर आरक्षण कारगर रहा हो तो)। वहीं कुछ अन्य का प्रदर्शन खराब हो सकता है।
डेटा हमेशा नीतिगत फेरबदल की ओर इशारा करेगा, जिसका मतलब है कुछ जातियों को फायदा होगा और कुछ को नुकसान। व्यापक स्तर पर, इसका मतलब यह हो सकता है कि हमारे पास और अधिक आरक्षण होगा, जो उच्च जातियों को परेशान करेगा। या हमें कुछ ऐसी निचली जातियों के बारे में भी पता चल सकता है, जो शायद कुछ उच्च जातियों से बेहतर प्रदर्शन कर रही हों। यह सब चर्चाओं, बहसों, भ्रम को जन्म देगा। लेकिन इसका अंतिम निष्कर्ष हिंदू वोटों का विभाजन ही है और यही कारण है कि भाजपा इससे अचकचा रही है।
Date: 14-08-24
रोजगार के अवसर बढ़ाने की चुनौतीगौरव वल्लभ, ( लेखक आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ एवं भाजपा नेता हैं )
रोजगार सृजन एक ऐसी चुनौती है, जिससे दुनिया के लगभग सभी देश जूझ रहे हैं। चूंकि भारत दुनिया की सबसे बड़ी आबादी एवं युवाओं वाला देश है तो भारत के लिए यह चुनौती और बड़ी हो जाती है। सरकार इसे भलीभांति समझती है। उसने कुछ प्रयास भी किए हैं। उनके अनुकूल परिणाम भी सामने आए हैं। पीरियोडिक लेबर फोर्स सर्वे से लेकर रिजर्व बैंक, कर्मचारी भविष्य निधि संगठन यानी ईपीएफओ और राष्ट्रीय पेंशन प्रणाली-एनपीएस के समय-समय पर आने वाले आंकड़े इसकी पुष्टि करते हैं। इस उल्लेखनीय तथ्य को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता कि युवा वर्ग (15 से 29 आयु वर्ग) में 2017-18 के दौरान जो बेरोजगारी दर 17.8 प्रतिशत थी, वह 2022-23 में घटकर 10 प्रतिशत रह गई। समग्र बेरोजगारी दर भी 2022-23 में अपने निम्नतम पड़ाव 3.2 प्रतिशत पर आ गई। रोजगार के अन्य संकेतक भी सुधार की राह पर हैं। भविष्य निधि में योगदान देने वाले सदस्यों की संख्या 2018 से 20 प्रतिशत से अधिक की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर से बढ़ने पर है। संगठित क्षेत्र में बढ़ते अवसरों से रोजगारों का औपचारीकरण भी हो रहा है।
इसके बावजूद अभी और प्रयास करने की आवश्यकता है, क्योंकि 2041 तक भारत में उपलब्ध कामकाजी आबादी का स्तर चरम पर पहुंच जाएगा। इतनी बड़ी आबादी के लिए रोजगार के अवसर सृजित करना आसान तो नहीं, लेकिन आसान बनाया जा सकता है। इसके लिए कुछ उपाय करने होंगे। सबसे पहले तो यह सुनिश्चित करना है कि हर साल कार्यबल में शामिल होने वाले युवाओं की बड़ी संख्या को खपाने के लिए पर्याप्त नौकरियां पैदा की जाएं और दूसरा यह कि युवा जो नौकरी पाना चाहते हैं, क्या वे उसके लिए आवश्यक कौशल से लैस हैं भी या नहीं? केंद्र सरकार इन दोनों पहलुओं के समाधान की दिशा में प्रयासरत है। इसका आभास हालिया बजट से भी मिला। बजट में कौशल विकास, रोजगार सृजन और एमएसएमई पर फोकस किया गया। इससे जुड़ी विभिन्न पहल एक मजबूत और समावेशी रोजगार तंत्र को बढ़ावा देने के लिए सरकार के रणनीतिक दृष्टिकोण को दर्शाती हैं। इन कार्यक्रमों में इंटर्नशिप योजना की खासी चर्चा है, जिसके अंतर्गत युवा स्नातक शीर्ष कंपनियों में इंटर्नशिप के माध्यम से अनुभव हासिल करेंगे।
पांच वर्षों में एक करोड़ युवाओं को कौशल प्रदान करने के लिए तैयार किए गए इस कार्यक्रम में युवाओं को 5,000 रुपये मासिक भत्ता मिलेगा। भत्ते के लिए सरकार प्रति वर्ष 54,000 और आकस्मिक खर्चों के लिए अतिरिक्त 6,000 रुपये भुगतान करेगी। जबकि कंपनियां अपने सीएसआर फंड से 6,000 रुपये वार्षिक योगदान देंगी। प्रशिक्षण की लागत भी कंपनियां ही वहन करेंगी। यह व्यावहारिक अनुभव युवाओं की रोजगार क्षमता और नौकरी के लिए तैयारी को व्यापक एवं सार्थक रूप से बढ़ाने में मददगार होगा। यह एक करोड़ स्किल्ड युवा शक्ति देश के 6.4 करोड़ एमएसएमई उद्योगों के लिए प्रशिक्षित जनशक्ति के पूल का भी काम करेगी। हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि फिलहाल कुल रोजगार प्रदान करने में एमएसएमई की हिस्सेदारी 62 प्रतिशत की है। अन्य उभरती हुई अर्थव्यवस्थाओं में यह आंकड़ा 77 प्रतिशत तक है। एक वर्ष की इंटर्नशिप पूरी करने के बाद पहली बार नौकरी चाहने वाला युवा स्कीम ए के माध्यम से कार्यबल में प्रवेश कर सकता है। उन्हें तीन किस्तों में वितरित 15,000 रुपये तक की सब्सिडी सरकार द्वारा प्रदान की जाएगी। यह पहल युवा प्रतिभाओं को संगठित क्षेत्र से जोड़ेगी। इससे अनौपचारिक नौकरियों पर निर्भरता कम होगी, जिनमें अस्थिरता और अनिश्चितता कहीं ज्यादा होती है। इसी कड़ी में स्कीम बी के तहत विनिर्माण कंपनियों को जोड़ा गया है। यह योजना विनिर्माण क्षेत्र में रोजगार सृजन को लक्षित करती है, जो नियोक्ता और कर्मचारियों दोनों को वित्तीय प्रोत्साहन देती है। चार वर्षों के संरचित प्रोत्साहन वाली इस योजना में सरकार द्वारा प्रदान किया जाने वाला लाभ नियोक्ता और कर्मचारी के बीच समान रूप से साझा किया जाएगा। यह योजना भी अल्पकालिक भर्ती के बजाय निरंतर एवं स्थायी रोजगार को बढ़ावा देने वाली है। इस योजना का लाभ प्राप्त करने के लिए नियोक्ताओं को कम से कम 50 नए कर्मचारियों या पिछले वर्ष के ईपीएफओ-नामांकित कर्मचारियों के 25 प्रतिशत, इनमें जो भी कम हो, को नियुक्त करना होगा।
इसी तरह, स्कीम सी नियोक्ताओं को और अधिक समर्थन देने के लिए नियुक्त किए गए प्रत्येक अतिरिक्त कर्मचारी के लिए उनके ईपीएफओ योगदान में दो साल के लिए प्रति माह 3,000 रुपये तक का योगदान देगी। नियोक्ताओं के लिए अधिक कर्मचारियों को नियुक्त करना आर्थिक रूप से व्यवहार्य बनाने वाली यह योजना विभिन्न क्षेत्रों में रोजगार वृद्धि को बढ़ावा देगी। इससे अर्थव्यवस्था में चक्रीय प्रभाव उत्पन्न होगा। इनसे जहां उपभोक्ता खर्च बढ़ेगा, वहीं आर्थिक गतिविधियों में तेजी आएगी और नौकरियां सृजित होंगी। चूंकि रोजगार सृजन में कौशल विकास एक अहम कड़ी है तो सरकार ने इस ओर भी पर्याप्त ध्यान देने का प्रयास किया है। ऐसे प्रयासों के अंतर्गत राज्य सरकारों और उद्योग जगत के सहयोग से 1,000 औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों यानी आइटीआइ का उन्नयन यह सुनिश्चित करेगा कि कामकाजी आबादी को नई जरूरतों के अनुरूप तराशा जाए। पांच वर्षों के दौरान 60,000 करोड़ रुपये की यह योजना पहल परिणाम-आधारित शिक्षा और उद्योग-विशिष्ट कौशल पर केंद्रित है।
स्पष्ट है कि इंटर्नशिप, वेतन सब्सिडी, नियोक्ता प्रोत्साहन और निरंतर रोजगार सृजन सहित एक व्यापक मॉडल के माध्यम से सरकार रोजगार आकांक्षियों और नियोक्ता दोनों पक्षों के बीच संतुलन साधने की दिशा में आगे बढ़ रही है। इससे रोजगार टिकाऊ और उनकी प्रकृति संगठित स्वरूप वाली होगी। ये उपाय रोजगार चुनौतियों का समाधान करते हुए लाखों भारतीयों की आकांक्षाओं की पूर्ति में सहायक बनकर एक समृद्ध और समावेशी अर्थव्यवस्था का मार्ग प्रशस्त करते हैं।
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भारत में महिलाओं को गर्भपात से संबंधित निर्णय के केंद्र में अभी भी नहीं रखा जाता है। इसके लिए उन्हें डॉक्टर और न्यायालय पर निर्भर रहना पड़ता है।
कानून और पितृसत्ता का वर्चस्व –
ऐसे मामलों का याचिकाकर्ता के पक्ष में जाना या न जाना उसकी स्थिति की दयनीयता पर निर्भर करता है। चाहे वह बलात्कार पीड़िता हो, परित्यक्ता हो, एकल हो या भ्रूण की असमान्यता से पीड़ित हो, उसे अपनी पसंद के अनुसार चलने के लिए बाधाओं के एक बड़े पड़ाव को पार करना पड़ता है।
एक ओर, नौ न्यायाधीशों वाले एससी पुट्टस्वामी का ऐतिहासिक निर्णय है। इसमें कहा गया है कि प्रजनन संबंधी विकल्प चुनने का आधिकार एक महिला की निजताए सम्मान और शारीरिक अखंडता के मौलिक अधिकार से लिया गया है। दूसरी ओर, 1860 का आईपीसी प्रावधान गर्भपात को अपराध घोषित करता है। 1971 में एमटीपी अधिनियम ने इसके लिए अपवाद बनायाए ताकि चिकित्सकों को कुछ शर्तों के तहत गर्भपात करने में सक्षम बनाया जा सके। यह पूरी तरह से डॉक्टर-केंद्रित ढांचा है।
इसके लगभग 50 वर्ष बाद भी अलग-अलग डॉक्टर, अलग-अलग न्यायालय गर्भपात की अनुमति देने या अस्वीकार करने के लिए अलग-अलग मानदंड़ों का उपयोग करना जारी रखे हुए। इन सबसे बीच महिला की इच्छा गौण हो जाती है। हमें नागरिकों की शारीरिक स्वायत्तता बढ़ाने पर जोर देने की जरूरत है।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 17 जुलाई, 2024
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Date: 13-08-24
Slim Olympickings, A Correction StrategyET Editorials
The world’s most populous country, and 5th-largest economy, ranked 71st among 206 countries in the just-concluded Paris Olympics. Clearly, the proverbial ‘hopes and prayers’ of 1.4 bnplus people doth not an impressive sporting nation make. Improving India’s performance in future needs more than patriotic yelling. It requires changing the system of rewards, eschewing the propensity to politicise the sporting arena, and treating athletics as an avenue to build Viksit India.
The current system of central and state governments giving medal-winners — six this time, one less than in Tokyo — cash awards should be replaced by ploughing that amount and more for developing grassroots facilities in the medal-winners’ towns. This is likely to throw up many more potential alpha athletes. Improving local facilities will ease the journey from local to state level to regional, then national and on to the international arena for young athletes. Such an approach will also augment the longevity of athletes’ peak performance and career curve. Powering through injuries aggravated by lack of proper treatment, ‘rough and tough’ training adversely affects the peak age of athletes. More often than not, Indian athletes are at their prime before they reach the world stage. This queue must quicken.
For most Indian athletes, a difficult journey to the big stage makes it doubly hard to make way for the next gen. They, along with their movers and backers, become recalcitrant gatekeepers restricting free entry to new talent. Absence of systemic nudges to create a continuous supply of potential world-class athletes, and the propensity to corner opportunities, is made worse with politicisation of sports. Medals will come if this creaky architecture is jettisoned.
Date: 13-08-24
सभापति पर ‘अविश्वास’ के मायने क्या हैं?संपादकीय
संख्यात्मक रूप से सबल विपक्ष ने राज्य सभा के सभापति के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने का उपक्रम शुरू किया है। उपराष्ट्रपति ही राज्य सभा (जो राज्यों की परिषद भी है) के पदेन सभापति होते हैं। चूंकि इनका चुनाव राज्य सभा और लोक सभा, दोनों मिलकर करती हैं, लिहाजा इनके हटाए जाने के लिए तीन शर्तें हैं- प्रस्ताव राज्य सभा में पेश हुआ हो, जहां सदन की तत्कालीन सदस्य संख्या का बहुमत इसे पारित करे, लोकसभा इसे अनुमोदित करे और अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस 14 दिन पहले दिया गया हो। लोक सभा में विपक्ष अल्पमत में है यानी प्रस्ताव पारित नहीं होगा, लेकिन जिस सदन के हर सत्र में पीठासीन अधिकारी और विपक्ष के बीच रस्साकसी चल रही हो, उस सदन में पीठासीन अधिकारी के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पारित होना ही सभापति के लिए असहज स्थिति बना देगा। इस स्थिति का असली कारण यह है कि जब सरकार पर हमले होते हैं, तो शीर्ष पदों पर बैठे कुछ लोग पद की मर्यादा भूलकर सक्रिय राजनीतिक कार्यकर्ता बन जाते हैं। यह वही संसद है जहां करीब 153 सांसदों को निलंबित कर अहम विधेयक पारित करा लिए गए थे या जहां विपक्ष के किसान बिल पर वोट की मांग को अनसुनी कर बिल पारित करा लिए गए। चुनाव के बाद संसद की केमिस्ट्री बदली । नए सदन में सत्रावसान के दो दिन पूर्व राज्य सभा में विपक्ष के आरोपों पर सांसद निलंबित नहीं किए गए बल्कि सभापति गुस्से में यह कहते हुए अपनी कुर्सी से उठकर चले गए कि विपक्ष चेयर का अपमान कर रहा है। यह संख्यात्मक रूप से मजबूत विपक्ष का ही दबाव था कि विवादास्पद वक्फ कानून का मसौदा जेपीसी को सौंपा गया। आने वाले दिनों में संसद में यह गर्माहट कहीं आग न बने। हिंडनबर्ग खुलासा भी आक्रामक विपक्ष के तरकश का नया तीर होगा।
Date: 13-08-24
हमारे पास खेल प्रतिभाएं कम नहीं, सिस्टम में गड़बड़ी हैअभय कुमार दुबे, ( अम्बेडकर विवि, दिल्ली में प्रोफेसर )
टोक्यो ओलिम्पिक में हमारे खिलाड़ियों ने सात (एक स्वर्ण समेत) पदक जीते थे। पेरिस में एक पदक कम हुआ, और स्वर्ण घटकर रजत रह गया। देखा जाए तो यह कोई उल्लेखनीय गिरावट नहीं है। लेकिन इससे यह तो पता चलता ही है कि खेलों की दुनिया में हम आगे नहीं बढ़ रहे हैं और एक दीर्घकालीन जड़ता के शिकार हैं।
इसका कारण हमारे खिलाड़ियों में प्रतिभा और लगन की कमी भी नहीं है। प्रतिभा का तो विस्तार हो रहा है। उसमें विविधता आ रही है। नीरज चोपड़ा का एथलेटिक्स के विश्व-मंच पर उदय इसका सबसे बड़ा प्रमाण है।
हरियाणा का खेलों के असाधारण केंद्र के रूप में उभरना यह भी बताता है कि अगर देश में ऐसे दो-तीन केंद्र और बन जाएं तो दुनिया में हमारा सितारा बुलंद होने के लिए आवश्यक आधार तैयार हो जाएगा।
1975 में अजितपाल सिंह के नेतृत्व में भारत ने कुआलालम्पुर में पाकिस्तान को हराकर हॉकी का विश्व कप जीता था। इसके आठ साल बाद लॉर्ड्स के मैदान में कपिल देव के नेतृत्व में भारत ने क्रिकेट का विश्व कप जीता। उसी समय हमारी प्राथमिकताएं स्पष्ट हो गई थीं।
क्रिकेट का कप सुविधाओं, शाबासियों, ख्याति, धन-लाभ, भविष्य के अवसरों और सितारा बनने की संभावनाओं से लबालब निकला। हॉकी के कप और उसके विजेताओं का क्या हुआ? विश्व हॉकी संघ पर काबिज यूरोपीय ताकतों ने नियम बदल कर घास पर खेली जाने वाली पारम्परिक हॉकी का खात्मा कर दिया।
एस्ट्रो टर्फ और सुपर टर्फ का युग आया। हम घास पर ही प्रैक्टिस करते रहे। मॉन्ट्रियल ओलिम्पिक में हमारी विश्व विजेता टीम हारी। इसके बाद हम हार के लिए अभिशप्त हो गए। आज भी हॉलैंड जैसे छोटे-से देश के पास हमसे कई गुना ज्यादा हॉकी के कृत्रिम मैदान हैं।
सरकारी प्रयासों और निजी स्तर पर पूर्व खिलाड़ियों द्वारा की गई संस्थागत कोशिशों से इस दुर्गति में पिछले दिनों कुछ सुधार हुआ है। लेकिन खेलों का संस्थागत ढांचा पहले की ही तरह बुरी हालत में है। इनकी एसोसिएशनें पुराने जमाने की जमींदारियों से अलग नहीं हैं।
नेताओं और उनके परिजनों का इन एसोसिएशन पर कब्जा है। इस बार भारतीय महिला हॉकी टीम ओलिम्पिक में क्वालिफाई ही नहीं कर पाई। कारण था एसोसिएशन में सत्ता-परिवर्तन और कोच के साथ हुआ झगड़ा।
धनराज पिल्लै की कप्तानी में जो हॉकी टीम विकसित हुई थी, उसे ‘गोल्डन जनरेशन’ का नाम दिया जाता है। लेकिन इसी टीम को फेडरेशन के अध्यक्ष ने टूर्नामेंट में अच्छा प्रदर्शन करने के बावजूद निलम्बित कर दिया था। पिछले और इस ओलिम्पिक के बीच मुक्केबाजी संघ ने कोच को चार बार बदला।
तीरंदाजी फेडरेशन पर पूरे 44 वर्ष तक एक ही व्यक्ति का कब्जा रह चुका है। कुश्ती फेडरेशन का तो जिक्र होते ही जंतर मंतर पर पदक विजेता पहलवानों का धरना-प्रदर्शन याद आ जाता है। इनमें विनेश फोगाट भी शामिल थीं।
अगर भारत में खेलों का संस्थागत आधार दुरुस्त, चाक-चौबंद और सतर्क होता तो क्या होता? अगरहमारी बॉक्सिंग फेडरेशन प्रभावी होती तो निकहत जरीन को सीडेड खिलाड़ी के रूप में उतरने का मौका मिलता। आखिरकार वे अपने वर्ग में डबल वर्ल्ड चैम्पियन हैं। लेकिन अनसीडेड बॉक्सर के रूप में उन्हें दूसरे मैच में ही विश्व की नंबर एक बॉक्सर से लड़कर हारना पड़ा।
अगर वे सीडेड होतीं तो इस खिलाड़ी से फाइनल में भिड़ना पड़ता, जहां रजत पदक सुनिश्चित होता। हॉकी टीम ने कांस्य जीता, लेकिन उसका प्रदर्शन इस नतीजे से कहीं अच्छा था। इसका कारण भी संस्थागत माना जाएगा।
अतीत में निशानेबाजी में स्वर्ण पदक जीतने वाले अभिनव बिंद्रा ने अपनी उपलब्धि का श्रेय शूटिंग महासंघ को देने से इंकार कर दिया था। अगर उनके पिता ने निजी संसाधनों का इस्तेमाल करके उनका प्रशिक्षण न करवाया होता तो अभिनव पदक न जीत पाते। नीरज चोपड़ा चोटिल होने के कारण लम्बे अरसे प्रभावी ट्रेनिंग नहीं कर पा रहे थे। क्या भारतीय एथलेटिक फेडरेशन भारत के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी की इस स्थिति के लिए कुछ जिम्मेदारी महसूस करती है?
भारत में खेलों का संस्थागत ढांचा पहले की ही तरह बुरी हालत में है। इनकी एसोसिएशनें पुराने जमाने की जमींदारियों से अलग नहीं हैं। विभिन्न दलों के राजनेताओं और उनके परिजनों का इन एसोसिएशनों पर कब्जा है।
Date: 13-08-24
कोटा नहीं समान अवसर सृजित करने से बनेगी बातआर जगन्नाथन, ( लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। )
भारत एक कुत्सित शिक्षा एवं रोजगार कोटा व्यवस्था अपनाने की दहलीज पर खड़ा है। असंवेदनशील राजनीति एवं न्यायिक हस्तक्षेप सहित कई कारणों से भारत इस गुत्थी में उलझता जा रहा है। क्षेत्रीय राजनीतिज्ञ और कांग्रेस नेता राहुल गांधी भारत में जाति आधारित जनगणना कराए जाने पर जोर दे रहे हैं, वहीं उच्चतम न्यायालय ने आरक्षण पर हाल में अपने एक आदेश में किसी भी श्रेणी में वास्तविक रूप से पिछड़े लोगों के लिए कोटा में अलग से कोटा (सब-कोटा) तैयार करने के विचार का समर्थन किया है। हालांकि, न्यायालय ने राजनीतिक दलों को यह चेतावनी भी दी है कि न्यायपालिका मनमाने ढंग से सृजित अलग से कोई कोटा स्वीकार नहीं करेगी। इस तरह, यह आदेश जाति-आधारित सर्वेक्षण की बात कहता है।
उच्चतम न्यायालय का आदेश अनुसूचित जाति (एससी), अनुसूचित जनजाति (एसटी) और अन्य पिछड़ी जातियों (ओबीसी) में संपन्न समूहों को उसी वृहद श्रेणियों में दूसरे लोगों के खिलाफ खड़ा कर देगा। इसका कारण यह है कि आदेश में उन जातियों के लिए अवसरों में कमी करने की बात कही गई है, जो अब तक कोटा से सबसे अधिक लाभान्वित हुए हैं। इससे अंतर-जाति टकराव शुरू हो जाएगा।
कांग्रेस के कुछ दलित नेता जैसे पी एल पुनिया और कुमारी शैलजा उच्चतम न्यायालय का यह आदेश निष्प्रभावी करने के लिए संविधान में संशोधन की मांग कर रहे हैं। स्पष्ट है कि राहुल गांधी का यह दांव कांग्रेस के लिए मुसीबत बन सकता है। यह बात ध्यान देने योग्य है कि मणिपुर में जारी मौजूदा हिंसा पिछले साल न्यायालय के उस आदेश के बाद भड़की थी जिसमें कहा गया था कि हिंदू मैतेई भी अनुसूचित जाति माने जा सकते हैं। कुकी समुदाय ने इसका कड़ा विरोध किया था। अब कल्पना मात्र कीजिए कि यही हिंसा अगर कई राज्यों में एससी, एसटी एवं ओबीसी के बीच भड़क जाए तो क्या होगा।
वर्तमान श्रेणी के भीतर कोटा का पुनर्वितरण करने के बजाय कुल कोटा में विस्तार करने पर राजनीतिक आम सहमति बनेगी क्योंकि कोटे की मांग केवल एक दिशा में रही है, यानी इनका दायरा बढ़ाने की मांग की जा रही है। कोई भी राजनीतिक दल कोटा लाभार्थियों के किसी उप-समूह को वंचित नहीं करना चाहता है। इंद्रा साहनी मामले में पारित आदेश में कोटा पर तय 50 प्रतिशत की सीमा से उच्चतम न्यायालय ने स्वयं आर्थिक पिछड़ेपन के लिए विशेष कोटा प्रावधान जोड़ने के नरेंद्र मोदी सरकार के प्रस्ताव को स्वीकार किया है। कुछ राज्य (तमिलनाडु) काफी पहले 69 प्रतिशत कोटा की तरफ कदम बढ़ा चुके हैं।
अब इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि कोटा समर्थकों के लिए 69-75 प्रतिशत कोटे का प्रावधान हासिल करना नया लक्ष्य होगा। संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार के दौरान निजी क्षेत्र में भी कोटे का प्रावधान करने का प्रस्ताव दिया गया (मगर बाद में कारोबार पर प्रतिकूल असर पड़ने की आशंका के बाद यह वापस ले लिया गया) मगर कांग्रेस ने न केवल 2024 के घोषणापत्र (न्याय पत्र में)में कोटा पर 50 प्रतिशत सीमा बढ़ाने के लिए संविधान संशोधन करने का वादा किया है बल्कि निजी शैक्षणिक संस्थानों में भी यह विभिन्न कोटा बढ़ाने की बात कही है। निजी क्षेत्र की नौकरियों में इन्हें लागू करना अब महज कुछ समय की बात रह गई है।
पहचान आधारित आक्रामक राजनीति का प्रसार और कोटा प्रणाली में अनवरत विस्तार रोकने के लिए केंद्र एवं राज्य सरकारों, बुद्धिजीवियों एवं निजी क्षेत्र के विचारकों को एससी, एसटी एवं ओबीसी में प्रतिस्पर्द्धी क्षमता बढ़ाने की एक वैकल्पिक रणनीति सुनिश्चित करने पर विचार करना चाहिए। इससे धीरे-धीरे कोटा प्रणाली आधारित व्यवस्था से दूर जाने में मदद मिलेगी। रोजगार के अवसर में बढ़ोतरी ऐसे किसी प्रयास का आधार होना चाहिए क्योंकि कोटा अंततः युवाओं के लिए उपयुक्त गुणवत्ता वाले रोजगार की कमी को परिलक्षित करता है। केंद्र, राज्य और स्थानीय निकायों को उन कानूनों को समाप्त करने के लिए मिलकर काम करना चाहिए, जो रोजगार सृजन की राह में बाधा बनते हैं।
विनिर्माण एवं सेवाओं में तकनीक एवं स्वचालन (ऑटोमेशन) के तेजी से इस्तेमाल से हुनरमंद लोगों की मांग बढ़ रही है। अत्यधिक सक्षम एवं हुनरमंद लोगों (जैसे साइबर विशेषज्ञ, न्यूरोसर्जन) की मांग काफी अधिक है और तकनीक संचालित मगर कम हुनर वाली नौकरियों (जैसे उबर चालक, सुरक्षाकर्मी, लॉजिस्टिक एवं डिलिवरी पर्सन, रिटेल क्लर्क) की भी उतनी ही मांग है। हालांकि, कोई भी साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ या न्यूरो सर्जन की नियुक्ति कोटा के माध्यम से नहीं करना चाहेगा मगर कम हुनर वाली नौकरियों के लिए भर्तियां न्यूनतम योग्यता एवं पारदर्शी लॉटरी प्रणाली पर आधारित होनी चाहिए।
जब सरकार या निजी क्षेत्र (जो इस समय तीसरे पक्ष से काम कराने की तरफ मुड़ रहे हैं) अनुसेवक या कुरियर की भर्ती करना चाहते हैं तो कोटा जरूरी नहीं है, लॉटरियां विभिन्न जातियों के बीच नौकरियों का वितरण कर देंगी। किसी अतिरिक्त हुनर की जरूरत नियोक्ता (इस मामले में राज्य) की तरफ से पूरी की जा सकती है।
दूसरी बात यह है कि एससी, एसटी एवं ओबीसी श्रेणियों के छात्रों की कोचिंग एवं उनके मार्ग दर्शन की जरूरत है। यह व्यवस्था प्राथमिक एवं माध्यमिक स्तर से शुरू होकर स्नातक एवं तकनीकी शिक्षा तक जारी रहनी चाहिए। भारत में अनौपचारिक ट्यूशन पढ़ाने वाले शिक्षकों की हर जगह उपस्थिति है और सैकड़ों कोचिंग कक्षाएं प्रत्येक छात्रों की मांग पूरी कर रही हैं।
शिक्षुता (एप्रेन्टिसशिप के लिए पहसे से प्रतिबद्ध सरकार को कई स्तरों पर कोचिंग के लिए सब्सिडी मुहैया कराना चाहिए ताकि पीछे रह गई जातियां तकनीकी हुनर एवं उच्च खूबियां सीख सकें ताकि उन्हें एक अच्छे संस्थान में प्रवेश मिल जाए। शिक्षुता उस समय रुक जाएगी जब तकनीकी हुनर व्यापक स्तर पर जातियों एवं वर्गों तक पहुंच जाएगी।
तकनीकी हुनर जैसे अंग्रेजी या कोई एक भाषा धारा प्रवाह बोलने की क्षमता, संख्यात्मक जानकारियां उस शहरी क्षेत्रों में प्रति महीने 8,000-10,000 रुपये देने वाली नौकरी और 15,000-20,000 रुपये तनख्वाह में अंतर खत्म कर सकती है। इसका भी कोई कारण नहीं है कि सरकारी विद्यालयों का संचालन निजी न्यासों या कंपनियों द्वारा क्यों नहीं किया जाए क्योंकि मुख्य वित्त पोषण तो सरकारी खजाने से आ रहा है। कंपनियां अपनी तरफ से शिक्षकों के प्रशिक्षण, शिष्टाचार बहाल करने और बुनियादी ढांचे पर रकम खर्च खर्च कर सकती हैं।
कई होनहार एवं योग्य छात्रों एवं पहली बार नौकरी खोज रहे लोगों के पास लक्ष्य में सफल होने के लिए आवश्यक जानकारियां नहीं होती हैं। प्रत्येक विद्यालय, महाविद्यालय या कोचिंग संस्थानों में मार्गदर्शक तैयार करने की नीति से लाभ मिल सकता है। कंपनियां चाहें तो अपने निगमित सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) के कोष से अवश्य ऐसा कर सकती हैं। अरबपतियों से वित्तीय सहायता वालों न्यासों के माध्यम से भी ऐसा किया जा सकता है। इनके अलावा कई अन्य बेहतर विचार या उपाय भी हैं जिन्हें आजमाया जा सकता है और अगर ये कारगर रहते हैं तो इनका विस्तार किया जा सकता है।
निष्कर्ष यही निकलता है कि सामाजिक कारणों से विभिन्न लाभों से वंचित छात्रों एवं लोगों के लिए हमें समान अवसर उपलब्ध कराने होंगे। यह सोचना गलत है कि केवल कोटा व्यवस्था के माध्यम से अवसरों की समानता सुनिश्चित की जा सकती है। केवल कोटा से विकसित भारत बनाने का सपना पूरा नहीं हो सकता। अगर कोटा पर हम आपस में यूं ही लड़ते रहें तो यह लक्ष्य प्राप्त करना और भी मुश्किल हो जाएगा
Date: 13-08-24
आगे की सुधसंपादकीय
पेरिस ओलंपिक 2024 के समापन के साथ ही अब सभी देश और उनके खिलाड़ी अगली बार की तैयारी में लग जाएंगे। भारत की टीम भी ओलंपिक 2024 में एक रजत और पांच कांस्य पदक जीत कर अपनी टीम के साथ वापस आ गई है। इस आयोजन में भाग लेने और पदक हासिल कर पाने वाले देशों की संख्या के लिहाज से देखें तो भारत का प्रदर्शन कुछ बेहतर जरूर रहा, लेकिन कुल मिला कर यही कहा जा सकता है कि हमें ओलंपिक में अपनी मजबूत जगह बनाने के लिए अभी काफी तैयारी की जरूरत है। गौरतलब है कि ओलंपिक 2024 में शामिल एक सौ चौदह देशों की कोई पदक नहीं मिल सका। पदक तालिका में भारत को इकहत्तरवां स्थान मिला। जबकि तोक्यो ओलंपिक, 2020 में भारत ने एक स्वर्ण सहित सात पदक जीते थे और पदक तालिका में अड़तालीसवें स्थान पर रहा था। इसलिए उम्मीद थी कि इस बार पदक तालिका में भारत को पहले से बेहतर जगह मिलेगी। हाकी और तीरंदाजी में भारत के खिलाड़ियों ने अच्छी दखल दी और पदक जीते, मगर कुछ खेलों में अप्रत्याशित नतीजों और उतार-चढ़ावों की वजह से वह उम्मीद धुंधली रही।
खेलों में जीत-हार होती रहती है। फिर भी भारत की आबादी और ओलंपिक की चुनौतियों के मद्देनजर की गई तैयारियों को लेकर यह सवाल जरूर उभरता है कि आखिर क्या वजह है कि जहां छोटे-छोटे देश भी खेलों की दुनिया में बड़ी उपलब्धियां हासिल कर लेते हैं, वहीं हमारे देश को संतोषजनक जगह भी नहीं मिल पाती। साफ है कि अभी इस दिशा में बहुत कुछ करने की जरूरत है। प्रतिभाओं की खोज से लेकर उन्हें उचित और विश्वस्तरीय प्रशिक्षण मुहैया कराने की पहलकदमी सरकार को ही करनी होगी। पर्याप्त धन खर्च करने के अलावा संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल को लेकर ‘कोई समझौता नहीं’ की नीति पर चलना होगा। साथ ही, कुछ मामलों में जो अप्रिय स्थितियां उभरीं, जीता हुआ पदक हाथ से निकल गया, उससे बचने के लिए हर हाल में एक पुख्ता तंत्र बनाना होगा। अगर ठोस राजनीतिक इच्छाशक्ति हो और प्रतिभाओं के चयन तथा प्रशिक्षण को लेकर पूरी तरह ईमानदार और पारदर्शी व्यवस्था हो, तो ओलंपिक की पदक तालिका में हम भी सम्मानजनक स्थान हासिल कर सकते हैं।
Date: 13-08-24
व्यवहार में संतुलन जरूरीअवधेश कुमार
संसद का बजट सत्र समाप्त हो गया, लेकिन लोक और सत्तारूढ़ गठबंधन के सांसदों, मंत्रियों और नेताओं द्वारा दिए गए प्रत्युत्तर ने ऐसे अनेक प्रश्न उठाए हैं, जिनका उत्तर तलाशना ही होगा। संसद में हमने कभी भी इस तरह के नैरेटिव और परिदृश्य नहीं देखे। राहुल गांधी ने विपक्ष के नेता के रूप में जिस तरह का भाषण दिया वैसा पहले कभी सुना नहीं गया। हालांकि पिछले दो वर्षों की उनकी राजनीति पर गहराई से दृष्टि रखने वालों के लिए यह अपेक्षित है।
17वीं लोक सभा के बाद के काल के लोक सभा में और बाहर उनके भाषणों और वक्तव्यों में एक क्रमबद्धता है। वह भले विवेकशील लोगों को पसंद न आए या पुराने कांग्रेसियों को भी स्वीकार नहीं हो किंतु वह इसी तरह की भाषा बोलते रहे हैं। चूंकि विपक्ष के नेता के रूप में वह बजट पर चर्चा कर रहे थे इसलिए स्वाभाविक ही मुख्य फोकस इसी पर होना चाहिए था। इस समय उनके सलाहकारों, रणनीतिकारों, थिंक टैंक आदि की रणनीति यही है कि हर अवसर पर ऐसा भाषण या वक्तव्य देना है जिनसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और भाजपा की छवि जनता में दागदार हो, ऐसे मुद्दे उठे जिनका सीधा-सीधा उत्तर देना कठिन हो और इसके लिए किसी सीमा को स्वीकार करने की जरूरत नहीं। सामान्य तथ्यगत विरोध आक्रामकता के साथ होना कतई चिंता का विषय नहीं होगा। स्थिति इससे बहुत आगे है।
भारत और भारत से जुड़े वैश्विक नैरेटिव समूहों की स्थिति ऐसी है जिसमें हमें ज्यादातर एकपक्षीय स्वर इतने प्रभावी से सुनाई पड़ते हैं। कि उनमें आसानी से सच समझना कठिन हो जाता है। पूर्व केंद्रीय मंत्री अनुराग ठाकुर का लोक सभा भाषण इस मामले में सबसे ज्यादा निशाने पर है। अखिलेश यादव ने उस पर आपत्ति उठाते हुए कहा कि आप किसी की जाति कैसे पूछ सकते हैं?
राहुल गांधी ने कहा कि अनुराग ठाकुर ने उनको अपमानित किया है लेकिन मैं इन लोगों की तरह नहीं हूं इन्हें क्षमा मांगने के लिए नहीं करूंगा। ठाकुर भाजपा के वरिष्ठ नेता हैं, उनकी पार्टी सत्ता में है इसलिए कहा जा सकता है कि अति उत्तेजना और उकसावे के बीच भी उन्हें अंतिम सीमा तक संयम का परिचय देना चाहिए। दूसरे आप पर हमला करें और आप उसी भाषा में बोले तो फिर दोनों के बीच अंतर कठिन हो जाता है। किंतु नैरेटिव की दुनिया में वर्चस्व रखने वाले समूह ने एक पंक्ति नहीं कहा कि राहुल गांधी ने अपने भाषण में सत्तारूढ़ पार्टी को उकसाने, उत्तेजित करने या चिढ़ाने में कोई कसर नहीं खेड़ते हैं। यहां तक कि बार-बार वे लोक सभा अध्यक्ष को भी परोक्ष रूप में कठघरे में खड़ा करते रहे। अध्यक्ष ओम बिरला के टोकने या आपत्ति करने पर उनका उत्तर होता था कि सर, इसे कैसे बोलें या सॉरी सर सॉरी सर, लेकिन वह उसी बात को सॉरी कहते हुए दोहराते भी रहे। अध्यक्ष के लिए भी उनको संभालना या रोकना असंभव हो गया है। यह पहली बार होगा जब संसद के अंदर विपक्ष के नेता ने सरकार को घेरने के लिए ऐस उपमा दी, जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार तक घसीटे गए। चक्रव्यूह के बारे में राहुल गांधी को निश्चित रूप से कुछ गलत तथ्य दिए गए किंतु ऐसा हो जाता है। बावजूद उन्हें अपने पद के है। दायित्व का भान होना चाहिए था।
सत्तापक्ष हो या विपक्ष राष्ट्रीय सुरक्षा सर्वोपरि है। आपका सरकार से राजनीतिक वैचारिक मतभेद है और उसे प्रकट करने का अधिकार भी। वैसे उसमें भी सीमा है कि हम विरोध में कहां तक जाते हैं। कभी भी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार को इस तरह राजनीतिक दल के हमले के साथ जोड़ा नहीं गया। आप कल्पना करिए इसका संदेश देश के अंदर और बाहर क्या जाएगा। आंतरिक सुरक्षा हमारे देश में कितने नाजुक स्थिति में लंबे समय तक रहा है। और बाहरी खतरे कितने बड़े हैं इसका अनुमान उन सब लोगों को है जो थोड़ा बहुत भी सुरक्षा स्थिति पर दृष्टि रखते हैं। इसमें राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है जिसे कभी सार्वजनिक नहीं किया जा सकता। राहुल गांधी के भाषण को आधार बनाकर देश के अंदर उनके समर्थक तथा सरकार विरोधी सीमा के पार भी भारत के अनेक सुरक्षा या विदेश नीति संबंधी निर्णयों को आसानी से निशाना बनाएंगे। उनका खंडन करना भारत के लिए ज्यादा कठिन होगा।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के साथ बजट के पूर्व हलावा परंपरा की तस्वीरें डालकर उन्होंने राजनीति के अपनी जाति कार्ड को खेला। पिछले करीब 2 वर्षों से उनकी राजनीति में स्वयं को पिछड़ों दलितों का समर्थन तथा भाजपा को उसके विरुद्ध साबित करना सर्वोपरि हो गया है। परिणाम यह हुआ कि वित्त मंत्री ने यूपीए सरकार के कार्यकाल में हलवा परंपरा सहित कई तथ्यों का उल्लेख कर साबित कर दिया कि राहुल न केवल तथ्यात्मक रूप से तो गलत हैं बल्कि अपनी ही सरकार की परंपरा की धज्जियां उड़ा रहे हैं। इसी तरह सीतारमण के साथ खड़े अधिकारियों के बारे में भी कहा गया कि उनकी नियुक्ति तो राजीव गांधी सरकार के कार्यकाल में हुई थी। हालांकि राहुल गांधी ने बड़ी बुद्धिमत्ता से तस्वीर में से एक चेहरे हटा दिए जो वाकई पिछड़ी जाति का था। क्या सरकर की आलोचना या उसके विरोध के लिए संसदीय राजनीतिक मर्यादाओं की सीमा इस तरह लांघने और उनमें नौकरशाहों और प्रमुख पदों पर बैठे लोगों को निशाना बनाना उचित है? वे प्रधानमंत्री मोदी, गृहमंत्री अमित शाह के साथ देश के दो शीर्ष उद्योगपतियों के हाथों भारत संचालन का सूत्र बताएंगे तो इस पर उत्तेजना पैदा होगी और दूसरी ओर से भी कुछ लोग सीमा उल्लंघन कर आपको उसी तरह प्रति हमले का शिकार बनाएंगे। उन्होंने इसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख डॉ. मोहन भागवत को भी ले आया। ऐसा वह प्रयास करते हैं। वह इतना कुछ बोलते हैं, कभी संघ प्रतिवाद करने नहीं आता। संघ से सहमत या असहमत होना, इसका विरोध करना सबका अधिकार है पर इस दूसरे पहलू को भी कभी अपने चिंतन में लाना चाहिए। तथ्य और सत्य के आधार पर विरोध हो तो टिकाऊ होगा। हालांकि वर्तमान वातावरण में इसमें बदलाव की संभावना नहीं है। इसलिए देश के विवेकशील लोग, जिनमें राजनेता भी शामिल हैं शांत मन से सोचें, विचारें कि कैसे संतुलित तरीके से इसका प्रत्युत्तर दें तथा अपने व्यवहार से देश का वातावरण सकारात्मक शांत और संतुलित बनाए रखा जाए।
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हाल ही में पेरिस की सीन नदी ओलंपिक खेलों के चलते एक बार फिर चर्चा में आ गई है। यह नदी इतनी प्रदूषित हो चुकी थी कि 1923 से ही इसमें तैराकी पर प्रतिबंध था। ओलंपिक के लिए इसको साफ करने के लिए 1.5 अरब डॉलर खर्च किए गए हैं।
दरअसल, बड़ी नदियों को साफ करना आसान नहीं होता है। भारत में गंगा नदी का उदाहरण हमारे सामने है। 1980 के दशक से इसकी सफाई के लिए तीन बड़ी परियोजनाएं शुरू की गई हैं -गंगा एक्शन प्लान(1985 ),राष्ट्रीय गंगा नदी बेसिन परियोजना (2008), और नमामि गंगे कार्यक्रम (2014)|
परियोजनाओं की प्रगति –
‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 19 जुलाई, 2024
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Date: 12-08-24
Model For MedalsOlympics tally won’t rise unless more athletes are picked. Create larger talent poolTOI Editorials
A medal tally of 6 – no gold – is a disappointing Olympic performance for India. There were as many as 6 fourth-place finishes that could have gone our way, but for a nation of 1.4bn, even that’s not really good enough. Though there is no doubt India has improved considerably at Games since Beijing 2008, we have stayed in the 2-7 medal range in the last five editions. In what is a striking and sobering contrast, China bagged second place in total medals tally at Paris, even as it matched US in number of golds. For India, rethink of strategy and implementation is required to move to the next level.
Contingent’s still small | One reason we haven’t enough to show is that we aren’t sending enough athletes to Olympics. Our 117 athletes at Paris made for a representation of just .08 per mn population. Compare that with 37.8 for New Zealand. Or, Japan, with less than one-tenth of our population, sending more than 400 athletes. A larger pool at the Games is the first step to go up the medal tally. Increasing the number of sports we compete in is one way this can be done. At Paris, we were in the reckoning in just 16 of the 32 sports. Our neighbour China competed in 30. The problem is too few athletes qualify for Olympic selections.
Expand pool to draw from | Widening of the talent base is what’s needed if more of our athletes are to qualify for the Games. Our top-level infra has improved immensely in recent years. But, barring sporting states like Haryana and Punjab, it is largely urban talent that is benefiting from such infra. This will not change without a grassroots based approach. We need to create a sporting culture and build infra at our schools and universities. Such infra is what is behind US’s sporting success. To take just one example, American universities have produced US gymnastics champions.
Reform sporting bodies | And then there’s the pressing need to change how our sporting federations function. As the Wrestling Federation of India controversy highlighted, politicians, their kin, or their aides continue to rule the roost at many of these bodies, often at the cost of our athletes. A Vinesh Phogat bloomed not because of the system but despite it. The National Sports Development Code of India, meant to reform their functioning, is yet to be followed by many federations. Unless this changes, we might have to continue to endure underwhelming performances at sport’s greatest event.
Date: 12-08-24
ओलिंपिक में भारतसंपादकीय
पेरिस ओलिंपिक के समापन के पहले ही भारत का सफर खत्म हो चुका था। इस बार भारत एक रजत पदक समेत कुल छह पदक ही हासिल कर सका। इस प्रदर्शन को उत्साहजनक नहीं कहा जा सकता, क्योंकि भारत तमाम तैयारी के बावजूद पिछले प्रदर्शन को भी नहीं दोहरा सका। इससे यही रेखांकित होता है कि भारत को खेलों में बड़ी शक्ति बनने के लिए अभी लंबा सफर तय करना है। पदक तालिका में भारत का स्थान पहले 50 देशों में भी नहीं है। सबसे बड़ी आबादी वाले देश का पदक तालिका में इतना पीछे रहना ठीक नहीं। इस बार कुछ ही खेलों में भारतीय खिलाड़ी बेहतर प्रदर्शन कर सके। इनमें सर्वोपरि रहे नीरज चोपड़ा, जिन्होंने पिछली बार स्वर्ण पदक जीतकर करिश्मा किया था और इस बार उन्हें रजत से संतोष करना पड़ा। इसके बाद भी वह भारत के सर्वश्रेष्ठ खिलाड़ी के रूप में अपनी छाप छोड़ने में सफल रहे। शूटिंग में मनु भाकर ने भी चमत्कृत करने वाला प्रदर्शन किया। उन्होंने व्यक्तिगत स्पर्धा के साथ युगल प्रतिस्पर्धा में भी सरबजोत सिंह के साथ कांस्य पदक जीता। शूटिंग में ही ऐसा ही प्रदर्शन स्वप्निल कुसाले ने भी किया। कुश्ती में अमन सहरावत के कांस्य के रूप में एक ही पदक मिला। विनेश फोगाट से बहुत उम्मीदें थीं, लेकिन भाग्य ने उनका साथ नहीं दिया। पदकों की संख्या कम रह जाने का एक कारण यह भी रहा कि लक्ष्य सेन, अर्जुन बबूटा समेत कई खिलाडी चौथे स्थान से आगे नहीं जा सके। हॉकी टीम की ओर से लगातार दूसरा कांस्य पदक हासिल करना एक बड़ी उपलब्धि है। यह उपलब्धि यही बताती है कि भारतीय हॉकी अपने स्वर्णिम दिनों की ओर लौट रही है।
ओलिंपिक में समापन के साथ ही हमारे नीति-नियंताओं, खेल संगठनों, खेल प्रशासकों और स्वयं खिलाड़ियों को इस पर आत्ममंथन करना चाहिए कि भारत ओलिंपिक में इतना पीछे क्यों है। यह तो साफ है कि अपने देश में वैसी खेल संस्कृति विकसित नहीं हो सकी है, जैसी अब तक हो जानी चाहिए थी। चूंकि खेल संस्कृति का सही तरह विकास नहीं हो सका है इसलिए विभिन्न खेलों में प्रतिभाओं की तलाश और उनका समुचित प्रशिक्षण नहीं हो पाता। इस काम में सरकारी विद्यालय भी पीछे हैं और निजी स्कूल भी। विभिन्न खेल संगठन भी खेल प्रतिभाओं को तलाशने और उन्हें निखारने का काम नहीं कर पाते। एक समस्या यह भी है कि खिलाड़ियों को बेहतर प्रदर्शन करने के साथ ही अपने करियर की भी चिंता करनी पड़ती है। इसकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि केंद्र सरकार के साथ कुछ ही राज्य सरकारें खेलों को बढ़ावा देने के लिए तत्पर दिखती हैं। खेलों और खिलाड़ियों का विकास कैसे हो, इसकी सीख चीन समेत अन्य देशों से भी ली जानी चाहिए। अब जब भारत दुनिया की पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था बन गया है और आर्थिक विकास खेलों के विकास में सहायक होता है तब फिर भारत को ओलिंपिक की पदक तालिका में पहले बीस स्थानों में तो अपनी जगह बनानी ही चाहिए।
Date: 12-08-24
निराशाजनक प्रदर्शनसंपादकीय
पेरिस में आयोजित ग्रीष्मकालीन ओलिंपिक खेलों में भारत “के 117 खिलाड़ियों ने 16 खेलों में हिस्सा लिया। माना जा रहा था कि इन खेलों में देश टोक्यो ओलिंपिक के एक स्वर्ण और दो रजत समेत सात पदकों के प्रदर्शन को बेहतर करेगा। परंतु इन खेलों में हमें एक रजत और पांच कांस्य सहित केवल छह पदक मिले जो बताता है कि भारतीय खिलाड़ियों को विश्वस्तरीय बनाने के क्षेत्र में अभी काफी काम करने की आवश्यकता है। खासकर उन खेलों में जिनके बारे में हमारा दावा है कि हम विश्वस्तरीय सुविधाएं रखते हैं। मनु भाकर द्वारा एक ही ओलिंपिक में दो पदक (कांस्य) हासिल करने और अमन सहरावत के देश का सबसे युवा ओलिंपिक पदक विजेता (कुश्ती में कांस्य) बनने के अलावा भारत के प्रशंसकों को खुशी से अधिक निराशा का सामना करना पड़ा। विनेश फोगाट दुर्भाग्यपूर्ण ढंग से अयोग्य घोषित कर दी गईं जिनकी अपील पर फैसला आना बाकी है। भारत कई अवसरों पर करीबी मामले में पदक पाने से चूक गया।
उदाहरण के लिए भाकर 25 मीटर पिस्टल शूटिंग में बहुत मामूली अंतर से तीसरा पदक पाने से चूक गईं। बैडमिंटन में लक्ष्य सेन सेमीफाइनल में दो बार बढ़त गंवा बैठे और कांस्य पदक के लिए हुए मुकाबले में हार कर चौथे स्थान पर रहे। यह उस खेल में भारत का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन था जिसके बारे में उसका दावा है कि उसके पास विश्वस्तरीय सुविधाएं हैं। वेटलिफ्टर मीराबाई चानू जिन्होंने टोक्यो में रजत पदक जीता था, वह महज एक किलोग्राम वजन कम उठाने के कारण कांस्य पदक पाने से चूक गईं। हॉकी में जहां भारत को विश्व में पांचवीं वरीयता हासिल है, टीम ने लगातार दूसरे ओलिंपिक में कांस्य पदक जीता लेकिन यहां भी टीम स्वर्ण या रजत पदक जीत सकती थी। जर्मनी के खिलाफ मुकाबले में ढेर सारे पेनल्टी कॉर्नर को गोल में बदल पाने में नाकामी की शाश्वत समस्या के कारण टीम को 2-3 से हार का सामना करना पड़ा। भारतीय मुक्केबाजों को हमेशा पदक का दावेदार माना जाता है लेकिन उन्हें भी खाली हाथ लौटन पड़ा। नीरज चोपड़ा भी टोक्यो में स्वर्ण जीतने का कारनामा दोहरा नहीं सके और उन्हें पेरिस में रजत पदक से संतोष करना पड़ा। कुश्ती में भारत को केवल एक कांस्य पदक मिला। फोगाट को दुर्भाग्यपूर्ण ढंग से अयोग्य घोषित किए जाने के बावजूद एक ऐसे खेल में यह कमजोर प्रदर्शन है जिसमें भारत वैश्विक शक्ति होने का दावा करता है।
इस कमजोर प्रदर्शन की वजह निर्धारित कर पाना मुश्किल है। यकीनन सरकार के समर्थन में निरंतरता की कमी एक वजह है। उदाहरण के लिए शूटिंग में पदक जीतने वालों में से अधिकांश अच्छे परिवारों से आते हैं जिनकी वित्तीय स्थिति इतनी मजबूत होती है कि वे प्रशिक्षण और कोचिंग का खर्च उठा सकें। या फिर खिलाड़ी सरकारी सेवा में होते हैं, मसलन नीरज चोपड़ा सेना में जबकि शूटिंग का कांस्य पदक जीतने वाले स्वप्निल कुसाले आदि सरकारी कर्मचारी हैं। देश के अधिकांश खेल संघों के गैर पेशेवर रवैये ने हालात और भी खराब किए हैं। इन संघों में वरिष्ठ पदों पर राजनेता बैठे हैं जो खिलाड़ियों के कल्याण के बजाय अन्य बातों में रुचि रखते हैं। पिछले वर्ष पहलवानों द्वारा कुश्ती संघ के मुखिया और सत्ताधारी दल के ताकतवर राजनेता बृज भूषण शरण सिंह के खिलाफ प्रदर्शन इसकी बानगी है। फोगाट का अपने वजन को तय सीमा में रखने के लिए संघर्ष आंशिक रूप से उस विरोध प्रदर्शन में हिस्सा लेने का भी परिणाम था। जैसा कि इस श्रेणी में स्वर्ण पदक हासिल करने वाली पहलवान ने कहा भी कि निचले भार वर्ग में लड़ने की तैयारी कम से कम दो साल पहले शुरू होनी चाहिए। फोगाट के पास तैयारी के लिए एक वर्ष से भी कम समय था । पेरिस में भारत का प्रदर्शन 1900 के बाद से दूसरा सबसे बेहतर प्रदर्शन था। दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले देश की क्षमताओं को यह सही ढंग से नहीं दर्शाता ।
Date: 12-08-24
बचत की बुनियादसंपादकीय
किसी भी देश की अर्थव्यवस्था की सेहत का पता इस बात से भी चलता है कि उसके बैंकों का कारोबार कैसा है। बैंकों का कारोबार मुख्य रूप से लोगों से जमा आकर्षित करने और उसे कर्ज के रूप में देकर उससे ब्याज कमाने से चलता है। मगर इस समय भारतीय बैंकों में जमा और कर्ज का अंतर काफी बढ़ गया है। इसे लेकर सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक की चिंता स्वाभाविक है। पिछले दिनों मौद्रिक समीक्षा के वक्त आरबीआइ के गवर्नर ने बैंकों से इस अंतर को पाटने के लिए विशेष योजनाएं चलाने की सलाह दी थी। उन्होंने कहा कि बैंक ब्याज दरें निर्धारित करने को स्वतंत्र हैं। यही बात केंद्रीय वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने आरबीआइ गवर्नर के साथ बैठक में कही। वित्तमंत्री ने कहा कि बैंक अपने मुख्य कारोबार पर ध्यान दें। लोगों से जमा आकर्षित करने के लिए वे आकर्षक योजनाएं चला सकते हैं। दरअसल, सार्वजनिक बैंक निवेश की कमी के चलते गंभीर परेशानियों के दौर से गुजर रहे हैं। कायदे से बैंक अपनी ब्याज दरें रेपो दरों से आधा से लेकर एक फीसद तक ऊपर रख सकते हैं। मगर इस मामले में भी उन्हें कुछ राहत दी गई है, फिर भी उनके पास अपेक्षित जमा नहीं आ पा रहा।
इसकी वजहें साफ हैं। पिछले कुछ वर्षों से लोगों की आमदनी लगातार कम हुई है। पहले जीएसटी की वजह से छोटे कारोबारियों पर बुरा असर पड़ा, फिर कोरोनाकाल में पूर्णबंदी के बाद बहुत सारे कारोबार बंद हो गए, लाखों लोगों की नौकरियां चली गईं। जिन लोगों के पास नौकरियां हैं भी, उनके वेतन में तुलनात्मक रूप से काफी कम बढ़ोतरी हुई है, जबकि महंगाई काफी बढ़ गई है। इस तरह बहुत सारे लोगों के पास बचत के लिए पैसे हैं ही नहीं कि उन्हें वे बैंकों में रखें। बल्कि इसका उलट यह हुआ है कि छोटे-छोटे काम के लिए भी लोगों को कर्ज लेने पड़ रहे हैं। कर्ज पर ब्याज की भरपाई करना भी बहुत सारे लोगों के लिए कठिन बना हुआ है। बचत के बारे में लोग तब सोचते हैं, जब उनके पास जरूरी खर्चों से अधिक आमदनी होती है। मगर सरकार लगातार इस हकीकत पर पर्दा डालने का प्रयास करती रही है कि रोजगार और आमदनी के स्रोत लगातार घटे हैं। कुछ दिनों पहले आम बजट पेश करते हुए वित्तमंत्री ने खुद दोहराया था कि बेरोजगारी कोई समस्या नहीं है, गरीबी लगातार कम हो रही है। अगर सचमुच ऐसा होता, तो सरकार को इस तरह बचत बढ़ाने को लेकर चिंतित न होना पड़ता।
बैंकों में लोगों द्वारा जमा बचत से राष्ट्रीय बचत बनती है। जिस देश के पास राष्ट्रीय बचत जितनी अधिक होती है, उसे अपनी विकास परियोजनाएं चलाने में उतनी ही आसानी होती है। मगर इस वक्त जब चालू खाते में जमा की दर चिंताजनक देखी जा रही है, तो लंबे समय के लिए चलाई जाने वाली बचत योजनाओं में निवेश को लेकर क्या ही दावा किया जा सकता है। अगर बैंक आकर्षक योजनाएं लेकर आएंगे और उन पर अधिक ब्याज की पेशकश भी करेंगे, तो कितने लोग आकर्षित हो पाएंगे, कहना कठिन है। सरकारी योजनाओं के तहत कर्ज देने की बाध्यता और उनके वापस न लौट पाने, फिर बड़े पैमाने पर कर्जमाफी के चलते भी सार्वजिनक बैंकों के जमा और कर्ज में अंतर आया है। ऐसे में, सरकार बुनियादी पहलुओं पर काम करने के बजाय बैंकों पर दबाव बना कर शायद ही इस समस्या से पार पा सकेगी।
Date: 12-08-24
हमारे छह पदकसंपादकीय
पेरिस ओलंपिक 2024 के मीठे-खट्टे अनुभवों को भारत एक सबक की तरह हमेशा याद रखेगा। छह पदकों (एक रजत, पांच कांस्य) के साथ ओलंपिक 2024 में भारत के सफर का समापन हो गया। यह याद आना स्वाभाविक है कि पिछले टोक्यो ओलंपिक में हमने सात पदकों (एक स्वर्ण, दो रजत, चार कांस्य) के साथ इससे बेहतर प्रदर्शन किया था। यह कहने में कोई हर्ज नहीं कि अगर पहलवान विनेश फोगाट की अयोग्यता का मामला न होता, तो भारत अपने प्रदर्शन को दोहराने में सफल हो जाता। यह भी याद किया जाएगा कि विनेश फोगाट के मामले ने देश में बड़ा राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया। ऐसा नहीं होना चाहिए था, लेकिन जिस देश में राजनीति और खेल संघों को अलग-अलग न किया जा सके, वहां ऐसे विवाद स्वाभाविक हैं। यह 100 ग्राम से उपजी सियासत भी सुबूत है कि हम खेलों व खिलाड़ियों के प्रति पूरी तरह पेशेवर या समर्पित नहीं हैं। विनेश प्रकरण के अनेक परत हैं, जिन पर हमें गौर करना होगा। फिर भी प्रशंसा करनी चाहिए कि हमने ओलंपिक की खेल अदालत में विनेश की शिकायत को पुरजोर ढंग से उठाया है और मुमकिन है कि 13 अगस्त को एक और रजत पदक हमारी झोली में आ जाए।
सबसे बड़ी खुशी राष्ट्रीय खेल हॉकी को लेकर है कि हमने लगातार दूसरी बार कांस्य पदक जीता है। इससे निस्संदेह भावी खिलाड़ियों का मनोबल बढे़गा, हम लगातार अपने खेल को सुधारते और पदक जीतते चले जाएंगे। इस ओलंपिक को नीरज चोपड़ा के रजत पदक और उनके साथी पाकिस्तानी अरशद नदीम के स्वर्ण पदक के लिए भी याद किया जाएगा। नीरज और नदीम की मां के उद्गार भी याद आएंगे। लंबे समय बाद पाकिस्तान की झोली में एक पदक, वह भी स्वर्ण आया है और पाकिस्तानियों को चर्चा के लिए एक सकारात्मक विषय मिला है। नदीम वहां प्रेरणास्रोत बनें, तो इसमें दक्षिण एशिया का हित है। यह ओलंपिक निशानेबाज मनु भाकर के लिए भी याद किया जाएगा। उन्होंने एक कांस्य पदक व्यक्तिगत शूटिंग में और दूसरा सरबजोत के साथ मिश्रित टीम में जीता है। निशानेबाज स्वप्निल कुसाले और पहलवान अमन सहरावत ने भी कांस्य जीतकर भारत का नाम रोशन किया है। यह ओलंपिक हॉकी गोलकीपर पी आर श्रीजेश की शानदार विदाई के लिए भी याद किया जाएगा। ये खिलाड़ी अब प्रेरणा-स्रोत बनकर भारतीय खेल इतिहास में दर्ज हो गए हैं।
अब यहां से खेल प्रबंधकों-निर्णायकों के लिए काम शुरू हो जाता है। क्या सोचा गया था और क्या हुआ है? आगे क्या सुधार करना है? किससे क्या सीखना है? खेल निर्णायकों को युद्ध स्तर पर काम करना होगा, तभी उनकी सार्थकता है, वरना पदक तालिका तो अभी कहीं उत्साह से दिखाने लायक भी नहीं है। सबसे ज्यादा पदक अमेरिका ने जीते हैं, पर चीनी खिलाड़ियों ने रणनीति के तहत स्वर्ण पर निशाना साधा है। जापान, ऑस्ट्रेलिया, फ्रांस, नीदरलैंड, ग्रेट ब्रिटेन, दक्षिण कोरिया, जर्मनी, इटली इत्यादि के पदक गिनने के बजाय हमारा जोर अपने प्रदर्शन को सुधारने पर होना चाहिए। हमें सोचना होगा कि हमारा ध्यान किधर ज्यादा है? मुक्केबाजी और भारोत्तोलन में क्यों हमारी अवनति हुई है? खैर, यह पदक जीतने वाले खिलाड़ियों के सत्कार का समय है। हम जब खिलाड़ियों के साथ मजबूती से खड़े होने लगेंगे, तो खेलों में सुधार की प्रक्रिया तेज हो जाएगी। हॉकी के पुनरोत्थान और ओडिशा सरकार के सहयोग से भी सीखना चाहिए।
Date: 12-08-24
दुनिया में हुए युवा आंदोलनों को याद करने की जरूरतहरजिंदर, ( वरिष्ठ पत्रकार )
गुजरात के नवनिर्माण आंदोलन और बिहार के संपूर्ण क्रांति आंदोलन के जब 50 वर्ष पूरे हो रहे हैं, तब कई देशों में हुए एक और युवा आंदोलन को याद करना जरूरी है, जिसके घटनाक्रम अब भी हमारी स्मृतियों में ताजा हैं। चंद महीनों बाद उस आंदोलन के 15 साल पूरे हो जाएंगे, जिसे हम ‘अरब प्रिरंग’ के नाम से जानते हैं। ट्यूनीशिया से शुरू हुआ यह आंदोलन जब एक के बाद एक पश्चिम एशिया के तमाम देशों में फैलने लगा, तो पूरी दुनिया की खैर-खबर रखने वाले तकरीबन सभी आलिम-फाजिल दांतों तले उंगली दबाने को मजबूर थे। लीबिया, मिस्र, यमन, सीरिया, बहरीन जैसे देशों में नौजवान सड़कों पर आ चुके थे। वे तानाशाही की तमाम पाबंदियां हटाने और मानवाधिकार देने की मांग कर रहे थे। यह हवा इतनी तेज थी कि मोरक्को, इराक, अल्जीरिया, लेबनान, जॉर्डन, कुवैत, ओमान, सूडान और यहां तक कि सऊदी अरब में भी इसके झोंके महूसस किए गए। आंदोलन का भूगोल भले ही सीमित रहा हो, लेकिन इसने दुनिया के तानाशाहों और लोकतांत्रिक ताकतों को यह संदेश दे दिया था कि इस नए दौर में पुराने तौर-तरीकों से नौजवान पीढ़ी को ज्यादा समय तक भरमाए नहीं रखा जा सकता।
नए दौर का जिक्र यहां इसलिए जरूरी है कि इंटरनेट, मोबाइल फोन और सोशल मीडिया के आगमन के बाद का यह पहला बड़ा आंदोलन था, जो एक साथ कई देशों में फैला। तकनीक ने देश की सीमाओं से परे लोगों को आपस में जुड़ने का मौका दे दिया था। इनसे लोगों को लामबंद किया गया, धरना स्थलों तक खींच लाया गया और जो नहीं पहुंच सके, वे लाइक, कमेंट और फॉरवर्ड से भागीदार बनते रहे। इस सबका असर भी दिखा। कई देशों के शासनाध्यक्षों को गद्दी छोड़नी पड़ी। कई राजाओं ने अपनी गद्दी तो नहीं छोड़ी, लेकिन उन्हें प्रधानमंत्रियों को बर्खास्त करना पड़ा। तमाम जगहों पर सरकारें भंग की गईं और नए सिरे से चुनाव कराए गए।
मगर इन सबके बाद क्या रक्तहीन क्रांति की बात करने वाले इन देशों के नौजवानों ने वह हासिल कर लिया, जिसके लिए वे सड़कों पर निकले थे? इसका जवाब पाने के लिए हमें अमेरिकी थिंक टैंक ‘कौंसिल ऑन फॉरेन रिलेशन’ के एक अध्ययन को देखना होगा। यह अध्ययन बताता है कि इन सबमें ट्यूनीशिया एकमात्र ऐसा देश है, जहां लोकतंत्र स्थापित हुआ। बाकी सभी देशों में तानाशाही जैसी थी, कम या ज्यादा वैसी ही बनी रही। अपवाद सिर्फ मिस्र और सीरिया को कह सकते हैं, जहां सत्ता पहले से ज्यादा सख्त हो गई। तमाम देशों में लोगों के अधिकार कम कर दिए गए और उनके जीवन-स्तर में भी कोई खास सुधार नहीं हुआ। यहां तक कि ट्यूनीशिया में भी, जहां लोकतंत्र काफी हद तक स्थापित हो चुका था। युवा आंदोलनों के बारे में अक्सर यह कहा जाता है कि वे बेरोजगारी की कुंठा से उपजते हैं। इलाज भी यही बताया जाता है कि नौजवानों को काम में लगाकर घर-गृहस्थी में उलझा दो, तो वे सड़कों पर नहीं निकलेंगे। यह धारणा कितनी सही है और कितनी नहीं, इस विस्तार में जाए बिना अगर हम ‘अरब क्रांति’ के दौरान आंदोलित देशों को देखें, तो आंदोलन के बाद भी वहां की सरकारों ने इस इलाज को अपनाने की या तो कोशिश नहीं की या फिर इसमें सफलता हासिल नहीं की। ज्यादातर देशों में बेरोजगारी दर कम या ज्यादा वैसी ही बनी रही, जैसी वह पहले थी।
हम अरब देशों की इस क्रांति को तब याद कर रहे हैं, जब हमारे पड़ोस बांग्लादेश में युवा उबाल का एक अन्य रूप हमने अभी देखा है। चंद हफ्तों के युवा आंदोलन ने 15 साल से जमी-जमाई उस सरकार को उखाड़ फेंका, जो आई तो लोकतंत्र के दरवाजे से थी, लेकिन पूरे देश को तानाशाही की गहरी गुफाओं में ले गई। इस आंदोलन का स्वागत किया जाना चाहिए, पर अरब ्प्रिरंग के सबक यहां हमें आशंकित करते हैं। डर है कि ये नौजवान जितना हासिल करने के लिए घर से निकले हैं, कहीं उससे ज्यादा वे खो न दें। इस डर का कारण भी है। सत्ता में बदलाव के बाद वहां जिस तरह से हिंसा हो रही है, सांप्रदायिक तत्वों को खेलने का मौका मिला है और अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया जा रहा है, वह भविष्य को लेकर कोई उम्मीद नहीं बनाता। क्या पश्चिम एशिया के नौजवानों की तरह ही बांग्लादेश के नौजवानों को भी एक अंधेरे के बदले दूसरा अंधेरा मिलेगा?
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हाल ही में महाराष्ट्र सरकार ने एक विशेष आयु वर्ग के पुरूषों और महिलाओं के लिए सशर्त मासिक भत्ते की व्यवस्था की है। सरकार का मानना है कि यह बेरोजगारी की समस्या के लिए एक समाधान है। लेकिन सच्चाई यह है कि यह नियमित रोजगार का कोई विकल्प नहीं है। पार्टियों को इसे पहचानना चाहिए।
कुछ बिंदु –
आर्थिक आंकड़े और जमीनी वास्तविकता –
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 19 जुलाई, 2024
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Date: 10-08-24
Bail, under any lawSC’s Sisodia order should be a widely followed precedentTOI Editorials
The points on which Supreme Court granted Sisodia bail in the Delhi liquor policy case mark a precedent for bail not only in cases under PMLA, but also for those laws where application of bail is limited, such as anti-terror law UAPA.
Jail without bail | Yesterday, SC reiterated the principle of bail not jail, saying a long time behind bars – almost 18 months in Sisodia’s case – before conviction shouldn’t become “punishment without trial”. For context, earlier this week Parliament was told that in the last decade, 5,297 cases were filed under PMLA, conviction secured in 40 – that’s less than 1%.
Policy & quid pro quo | SC queried investigators on how they “per se infer” conspiracy from the mere fact that a policy benefitted certain wholesalers. SC asked, “Where do you draw the line between policy and criminality?”
Delay in trial | The key point: SC said both trial court and HC should have noted top court’s Oct 2023 judgment that “prolonged incarceration” and “delay in trial” should be read into bail provisions in both criminal code CrPC and PMLA. SC had said that a speedy trial is an accused’s “basic right”. That, when trial isn’t proceeding “for reasons not attributable to the accused, court…may grant bail. This would be truer where the trial would take years.”
Denied bail last year, SC had allowed Sisodia to re-apply if “trial…proceeds at a snail’s pace in next three months”. Yesterday, SC referenced investigators’ claim from Oct 2023 that trial would be completed in “6 to 8 months”. Investigators, SC said, were unprepared to start trial. From Elgar Parishad cases to those on Delhi riots, and several PMLA cases, securing bail is often process as punishment. It is this that SC’s Sisodia order can put a stop to.
Date: 10-08-24
बच्चे का भविष्य ‘कहां पैदा हुआ’ से तय होता हैसंपादकीय
आज बिहार में जन्मे बच्चे की आय गोवा, दिल्ली, चंडीगढ़, हरियाणा या तेलंगाना में पैदा हुए बच्चे की आय का मात्र 15-20% होगी। दिल्ली में पैदा हुए बच्चे की आय तो दक्षिण अफ्रीका के नवजात के बराबर होगी, लेकिन यूपी का ऐसा ही बच्चा सोमालिया के शिशु के बराबर होगा। जीवन के पांच बसंत देखने की संभाव्यता सबसे कम छत्तीसगढ़ और मप्र के बच्चे में होगी, जहां प्रति हजार बच्चों पर बाल मृत्यु दर (आईएमआर) क्रमशः 443 और 41.3 (एनएफएचएस-5 के अनुसार) है जबकि मिजोरम, नगालैंड, सिक्किम, गोवा और मणिपुर / केरल में ये संभाव्यता अधिक है। (यूके-यूएस के बराबर ) आखिर 75 साल के स्वशासन में हमने जीवन की सामान्य शर्तों को लेकर इतना क्यों नहीं किया कि हमारा नौनिहाल पैदा कहीं भी हों, चिकित्सा, पोषण, संस्थागत डिलीवरी और जच्चा की देखभाल के अभाव में दम न तोड़ें? संविधान निर्माताओं ने तो एक अर्ध- संघीय शासन प्रणाली देकर गवनेंस को विकेंद्रित किया। फिर दिल्ली और छत्तीसगढ़ में सात दशक बाद भी इतना अंतर क्यों? क्यों देश की आधी से ज्यादा फैक्ट्रियां केवल पांच राज्यों- मुख्यतः तमिलनाडु, महाराष्ट्र, गुजरात में हीं हैं। मात्र समाज की अकर्मण्यता मान कर इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती। समस्या गवनेंस की भी है।
Date: 10-08-24
सलाखों पर सवालसंपादकीय
आखिरकार दिल्ली के पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया को सर्वोच्च न्यायालय ने जमानत दे दी। हालांकि इसमें कुछ शर्तें भी जोड़ी हैं, पर अदालतों को एक बार फिर नसीहत दी है कि जमानत नियम है और जेल अपवाद। किसी की जमानत सजा के तौर पर नहीं टाली जानी चाहिए। हालांकि यह बात सर्वोच्च न्यायालय पहले भी कई बार कह चुका है, मगर निचली अदालतें इसे गंभीरता से लेती नजर नहीं आतीं। मनीष सिसोदिया को दिल्ली आबकारी नीति में भ्रष्टाचार के आरोप में पहले प्रवर्तन निदेशालय और फिर सीबीआइ ने जेल में बंद कराया था। सिसोदिया निचली अदालत से उच्च न्यायालय के बीच अपनी गिरफ्तारी को चुनौती देते और जमानत की अपील करते रहे, मगर किन्हीं तकनीकी कारणों से उन्हें सलाखों के पीछे ही रहने पर मजबूर होना पड़ा। करीब सत्रह महीने उन्होंने जेल में बिताए। जाहिर है, उनकी जमानत से आम आदमी पार्टी में उत्साह का माहौल है। मगर यह सवाल अपनी जगह बना हुआ है कि जब एक निर्वाचित सरकार के जिम्मेदार पद का निर्वाह कर रहे व्यक्ति को इतने लंबे समय तक जेल में रहने पर मजबूर होना पड़ता है, तो सामान्य नागरिक के बारे में क्या उम्मीद की जा सकती है। ये सवाल बेवजह नहीं उठ रहे हैं कि आखिर सिसोदिया के सत्रह महीनों का हिसाब कौन देगा।
सिसोदिया अकेले ऐसे नेता नहीं हैं, जिन्हें इस तरह सीखचों के पीछे लंबा वक्त गुजारना पड़ा। झारखंड के मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन, आम आदमी पार्टी के राज्यसभा सांसद संजय सिंह भी जेल में रह चुके हैं। सत्येंद्र जैन और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल अभी तक जमानत की आस लगाए हुए हैं। इस मामले में जांच एजंसियों के कामकाज पर गहरे सवाल उठे हैं। दिल्ली आबकारी मामले में अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, संजय सिंह और सेना की जमीन खरीद घोटाले के आरोप में हेमंत सोरेन को जांच एजंसियों ने बिना पुख्ता आधार और दोषसिद्धि के लंबे समय तक जेल में डाले रखा। इसमें निचली अदालतों ने भी गंभीरता से विचार नहीं किया कि इस तरह जिम्मेदार पदों का निर्वाह करने वालों को जेलों में डालने से आखिरकार सार्वजनिक महत्त्व के कामकाज बाधित होते हैं। किस मामले में मिली मनीष सिसोदिया को जमानत? कोर्ट में क्या दी गईं दलीलें, पढ़ें पूरी डिटेल किसी को जमानत देने का यह अर्थ कतई नहीं होता कि उसे दोषमुक्त कर दिया गया। उसके खिलाफ लगे आरोपों की जांच तो चलती रह सकती है और दोषसिद्धि पर उसे सजा भुगतनी ही पड़ेगी। इस तरह केवल आरोप और आशंका के आधार पर लोगों को लंबे समय तक जेलों में बंद रखना एक तरह से नाहक सजा देने के बराबर ही माना जाता है। इसलिए सर्वोच्च न्यायालय की नसीहत पर गंभीरता से पालन के अपेक्षा की जाती है।
पिछले कुछ वर्षों से प्रवर्तन निदेशालय, आयकर विभाग और केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो ने भ्रष्टाचार के खिलाफ शिकंजा कसने के नाम पर जिस तरह अंधाधुंध छापे मारे और गिरफ्तारियां की, उसे लेकर उन पर आरोप लगते रहे हैं कि वे सत्तापक्ष के इशारे पर, उसकी राजनीतिक मंशा के अनुरूप काम करती हैं। वे जानबूझ कर तकनीकी अड़चनें पैदा कर अदालत को जमानत देने से रोकने का प्रयास करती देखी जाती हैं। भ्रष्टाचार और धनशोधन पर अंकुश लगाना निस्संदेह बड़ी चुनौती है, इसके खिलाफ कड़ी कार्रवाई से शायद ही कोई इनकार करे, मगर इसके लिए बने कानूनों का राजनीतिक हथियार के रूप में इस्तेमाल होगा, तो असल मकसद हाशिये पर ही बना रहेगा। इसलिए सर्वोच्च न्यायालय की नसीहत पर गंभीरता से विचार किया जाना चाहिए।
Date: 10-08-24
बुजुर्ग पीढ़ी की बुनियादी समस्याएंअजय जोशी
देश की जनसंख्या का एक बड़ा वर्ग वरिष्ठ नागरिकों का है। वे अपने ज्ञान और अनुभव से समाज के लिए अपना अमूल्य योगदान कर सकते हैं। इस दृष्टि से उनका कल्याण भी सरकारों और समाज की प्राथमिकता में होना चाहिए। वर्ष 2011 की जनगणना के अनुसार देश में साठ वर्ष और इससे अधिक आयु के वरिष्ठ नागरिकों की जनसंख्या 10.38 करोड़ थी। फिलहाल वरिष्ठ नागरिकों की आबादी कुल आबादी का लगभग दस फीसद है। राष्ट्रीय जनसंख्या आयोग द्वारा गठित जनसंख्या अनुमानों पर तकनीकी समूह की रपट के मुताबिक वर्ष 2026 तक देश में साठ वर्ष से अधिक आयु के नागरिकों की संख्या 17.32 करोड़ होने की संभावना है। एक अनुमान के अनुसार वर्ष 2050 में हर चौथा व्यक्ति वरिष्ठ नागरिक होगा। इस वर्ग के अधिकांश नागरिक अपने परिवार, समाज और सरकार से किसी न किसी रूप में असहज, उपेक्षित और असहाय महसूस करते हैं। उनकी अपनी आर्थिक, शारीरिक और मानसिक समस्याएं हैं।
केंद्र और राज्य सरकारों ने वरिष्ठ नागरिकों का सहयोग करने के लिए कई योजनाएं बनाई हैं। उन्हें परिवहन, स्वास्थ्य देखभाल और अन्य सेवाओं पर छूट तथा लाभ प्रदान किए जाते हैं। केंद्र और राज्य स्तर पर उनके लिए कई तरह की पेंशन योजनाएं भी हैं, जिनके माध्यम से उन्हें वित्तीय सहायता उपलब्ध कराई जाती है। उनके स्वास्थ्य देखभाल हेतु चिकित्सा व्यय पर छूट, सरकारी अस्पतालों में मुफ्त स्वास्थ्य सेवाएं और स्वास्थ्य देखभाल सेवाओं में उनको प्राथमिकता देने जैसी सुविधाएं सम्मिलित हैं। उन्हें आय कर में सामान्य कर दाताओं की तुलना में अधिक कर छूट प्रादान की जाती रही है।
वरिष्ठ नागरिकों के हित सरंक्षण हेतु सरकार ने माता-पिता और वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण तथा कल्याण अधिनियम 2007 बनाया, जिसके अंतर्गत वृद्ध व्यक्तियों और माता-पिता के भरण-पोषण तथा देखरेख के लिए प्रभावी व्यवस्था का प्रावधान है। इस अधिनियम के अंतर्गत वे अभिभावक और वरिष्ठ नागरिक, जो अपनी आय या अपनी संपत्ति द्वारा होने वाली आय से भरण-पोषण करने में असमर्थ हैं, वे अपने व्यस्क बच्चों या संबंधितों से भरण-पोषण प्राप्त करने के लिए आवेदन कर सकते हैं। इस अधिनियम के तहत वरिष्ठ नागरिकों की उपेक्षा और परित्याग को एक संगीन अपराध माना गया है, जिसके लिए पांच हजार रुपए का जुर्माना या तीन माह की सजा या दोनों हो सकते हैं। वरिष्ठ नागरिक के भरण-पोषण हेतु दस हजार रुपए प्रतिमाह राशि देने का आदेश भी किया जा सकता है। वरिष्ठ नागरिकों के लिए कई संगठन और गैर-सरकारी संस्थाएं भी विभिन्न रूपों में सेवाएं प्रदान करती हैं। इनमें ‘डे केयर’ केंद्र वृद्धाश्रम, कानूनी मामलों में सहायता और आर्थिक-सामाजिक गतिविधियां तथा सामुदायिक सहभागिता जैसे कार्य किए जाते हैं।
यह सब होते हुए भी देश के वरिष्ठ नागरिकों को विभिन्न समस्याओं और चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। बहुत से वरिष्ठ नागरिक गंभीर आर्थिक समस्याओं से जूझ रहे हैं। उनकी कोई नियमित आय नहीं है, पेंशन या सामाजिक सुरक्षा की योजनाओं तक उनकी पहुंच सुलभ नहीं है। इनकी स्वास्थ्य सेवाओं से संबंधित समस्याएं भी कम नहीं हैं। उनके लिए पर्याप्त आरोग्य परामर्श सेवाएं उपलब्ध नहीं होतीं। उनको विशेष चिकित्सा सुविधाएं और निश्शुल्क दवाएं पाने में भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है। वरिष्ठ नागरिक समाज में अलगाव की स्थिति से भी त्रस्त हैं। उनमें समाजिक संपर्कों की कमी के कारण अकेलापन बना रहता है। उनको अपनी संपत्ति की सुरक्षा और अपने साथ होने वाले अपराधों से बचाव की भी जरूरत होती है। वरिष्ठ नागरिकों, खासकर अकेले रहने वाले व्यक्तियों, के साथ उनकी संपत्ति से जुड़े और उनके साथ होने वाले अपराधों के समाचार आते रहते हैं।
विगत कुछ वर्षों में वरिष्ठ नागरिकों को सरकारों से मिलने वाली सुविधाओं में कटौती देखी जा रही है। उन्हें इस वर्ष के आम बजट से काफी उम्मीदें थीं। कोरोना काल में वर्ष 2020 में रेल किराए में वरिष्ठ नागरिकों और महिलाओं को मिलने वाली छूट को बंद कर दिया गया। आम चुनाव के दौरान सत्तर वर्ष और उससे अधिक आयु के वरिष्ठ नागरिकों को मुफ्त इलाज हेतु स्वास्थ बीमा कवर देने का वादा किया गया, मगर उसके संबंध में बजट में कोई घोषणा नहीं हुई। वरिष्ठ नागरिक आयकर में और अधिक छूट की उम्मीद लगाए हुए थे, लेकिन उन्हें मानक कटौती में 25 हजार रुपए की मामूली वृद्धि के अलावा कुछ नहीं मिला। अस्सी वर्ष से अधिक आयु के वरिष्ठ नागरिकों को मिलने वाली अतिरिक्त छूट में भी कोई वृद्धि नहीं हुई। स्वास्थ्य बीमा के प्रीमियम पर लगने वाले जीएसटी की वर्तमान दर 18 फीसद है, जिसका भार किसी न किसी रूप में बीमाधारकों को ही वहन करना पड़ता है, उसे घटा या हटा कर स्वास्थ्य बीमा की लागत कम करने की अपेक्षा थी, लेकिन बजट में इस बारे में कोई घोषणा नहीं हुई। अब स्वास्थ्य बीमा और जीवन बीमा के प्रीमियम पर लगने वाले जीएसटी को पूरी तरह हटाने की मांग जोर पकड़ रही है। सरकार को इस दिशा में विचार करने की जरूरत है।
वरिष्ठ नागरिकों की एक बड़ी संख्या के जीवन यापन का आधार उनकी सेवा निवृत्ति पर मिली पीएफ और ग्रेच्युटी की राशि पर मिलने वाला ब्याज है। उनको अन्य किसी तरह की पेंशन आदि नहीं मिलती। बैंकों में जमा राशियों पर मिलने वाले ब्याज की दरों में विगत दस-बारह साल से निरंतर कमी आ रही है। ब्याज दरें इस अवधि में लगभग तीन से पांच फीसद कम हो गईं। हालांकि बैंकों द्वारा वरिष्ठ नागरिकों को आधा फीसद ब्याज अधिक दिया जाता है, लेकिन दस वर्ष पूर्व की ब्याज दरों की तुलना में यह आधा फीसद जोड़ने के बाद भी वास्तविक ब्याज दर कम ही हुई है। एक तरफ महंगाई बढ़ी, दूसरी तरफ ब्याज दरों में कमी आई, इससे वरिष्ठ नागरिकों पर दोहरी मार पड़ी है।
संगठित क्षेत्र में नई पेंशन योजना यानी एनपीएस में आने वाले ऐसे कर्मचारी, जिनका वेतन कम था या उनकी सेवा अवधि कम रही, उनको इस योजना के अंतर्गत मिलने वाली पेंशन तीन-चार सौ रुपए प्रतिमाह मिलने के समाचार भी आते रहते हैं। यह राशि केंद्र और राज्य सरकारों द्वारा गरीब वरिष्ठ नागरिकों और महिलाओं आदि को मिलने वाली पेंशन से भी बहुत कम रहती है। एनपीएस में आने वाले वरिष्ठ नागरिकों को एक न्यूनतम पेंशन देने की मांग भी समय-समय पर उठती रही है, लेकिन अभी तक इस दिशा में कोई घोषणा नहीं हुई है। कुल मिलाकर केंद्रीय बजट और सरकारी घोषणाओं में वरिष्ठ नागरिकों के हित में कुछ भी नहीं हुआ। समाज के अन्य कमजोर वर्गों की तरह वरिष्ठ नागरिकों का बड़ा वर्ग अपनी आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति में सक्षम नहीं है, कई मामलों में उनके भूखों मरने की नौबत तक आ रही है। आज जरूरत है कि वरिष्ठ नागरिकों को सम्मानजनक जीवन यापन करते रहने के लिए उनकी न्यूनतम जरूरतों की पूर्ति के लिए सक्रिय प्रयास हों। इसके लिए ऐसे वरिष्ठ नागरिक, जो शारीरिक, आर्थिक और मानसिक दृष्टि से सक्षम हैं, वे स्वयं, सरकार और समाजसेवी संगठन इस दिशा में सक्रिय प्रयास करें, तो आम वरिष्ठ नागरिक अपने जीवन का शेष समय स्वस्थ, प्रसन्न रहते हुए बिता सकते हैं।
Date: 10-08-24
एक और जमानतसंपादकीय
आम आदमी पार्टी के वरिष्ठ नेता मनीष सिसोदिया को सर्वोच्च न्यायालय में मिली जमानत राजनीतिक रूप से ही नहीं, बल्कि सामाजिक और नैतिक रूप से भी महत्वपूर्ण है। राष्ट्रीय राजधानी के व्यापक समाज ने एक समय मनीष सिसोदिया को भी बहुत उम्मीद के साथ देखा था। नैतिकता के बल से ही वह अपने नेता अरविंद केजरीवाल के साथ एक वैकल्पिक ताकत बनकर उभरे थे। वह लगभग 17 महीनों की जद्दोजहद के बाद जेल से बाहर आए हैं। न्यायालय ने पूरी तरह से आश्वस्त होने के बाद ही दिल्ली के पूर्व उप-मुख्यमंत्री को दिल्ली उत्पाद शुल्क नीति से जुड़े मामलों में जमानत दी है। दरअसल, पहले ही लगने लगा था कि सिसोदिया को ज्यादा समय तक सलाखों के पीछे रखना जांच एजेंसियों के लिए संभव नहीं होगा। आश्चर्य नहीं कि न्यायमूर्ति बीआर गवई और के वी विश्वनाथन की पीठ ने जमानत याचिका को विचारणीय मानते हुए कहा कि सिसोदिया को अब जमानत मांगने के लिए सुनवाई अदालत भेजना न्याय का मखौल होगा। वास्तव में, यह सिसोदिया के लिए पूरी रिहाई नहीं है, उन्हें आरोप मुक्त होने के लिए लंबा संघर्ष करना पड़ सकता है। हालांकि, यह माना जा रहा है कि सशर्त नियमित जमानत उनकी राजनीतिक ताकत को लौटा लाएगी।
प्रवर्तन निदेशालय जमानत से खुश नहीं है, अंतत: उसकी कोशिश थी कि सिसोदिया को दिल्ली सचिवालय या मुख्यमंत्री कार्यालय जाने से रोका जाए, पर न्यायालय ने प्रवर्तन निदेशालय की याचना पर ध्यान नहीं दिया। अब यह इतिहास में दर्ज हो गया है कि सीबीआई और ईडी ने आखिर तक यही प्रयास किया कि जमानत न हो सके, पर सर्वोच्च न्यायालय पहुंचकर जमानत मांगने की यह तीसरी कोशिश रंग लाई है। वैसे, एजेंसियों को जमानत रोकने पर जोर लगाने के बजाय दोष सिद्ध करने पर जोर देना चाहिए था, अगर पूरे प्रमाण के साथ मुकदमा शुरू हो जाता, तो सिसोदिया का बाहर आना मुश्किल हो जाता। अत: परोक्ष रूप से ईडी व सीबीआई की सुस्त चाल ने सिसोदिया की रिहाई को मुमकिन बनाया। एक पूर्व उप-मुख्यमंत्री को लगभग 17 महीने जेल में रखने के बावजूद सुनवाई और सजा की प्रक्रिया का किसी मुकाम पर न पहुंच पाना चिंता व विचार का विषय है। चिंता इसलिए कि जांच एजेंसियों की ऐसी कार्रवाई पर देश का खूब समय और संसाधन खर्च होता है, पर लोग कोई ठोस धारणा नहीं बना पाते हैं। एक लंबी फेहरिस्त है, ऐसे नेताओं की, जो सनसनीखेज ढंग से फंसे, जेल गए और बाहर निकल आए। एजेंसियां देखती रह गईं। इसी फेहरिस्त में अब एक नया नाम जुड़ गया है।
कुल मिलाकर, अभी न दूध का दूध हुआ है और न पानी का पानी। इंतजार करना होगा। यह भारतीय राजनीति के लिए चिंता की बात है। शक की चादर ओढ़े न जाने कितने नेता सक्रिय हैं। गौर कीजिए, तो राजनीतिक बिरादरी भी अपनी पूरी सफाई के पक्ष में नहीं है। सबके पास अपने-अपने दागी हैं, जिनके बचाव की त्रासद राजनीति लोगों और लोकतंत्र के समग्र विश्वास में सेंध लगा रही है। दाग छुड़ाने के बजाय छिपाने की राजनीति अब पीछे छूट जानी चाहिए। देश में विकास की गति बढ़ गई है, तो नेताओं से उम्मीदें भी बढ़ गई हैं, पर क्या जांच व कानून-व्यवस्था लागू करने वाली एजेंसियां देश के साथ कदमताल के लिए तैयार हैं?
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10 August 2024
प्रश्न – 473 – उच्चतम न्यायालय द्वारा अनुसूचित जाति एवं जनजातियों के आरक्षण के संबंध में हाल ही में दिये गये महत्वपूर्ण फैसलों का उल्लेख कीजिये। इन निर्णयों पर अपने विचार कीजिये। (250 शब्द)
Question – 473 – Mention the important decisions given recently by the Supreme Court regarding reservation for Scheduled Castes and Tribes. Give your views on these decisions. (250 words)
नोट : इसका उत्तर आपको हमें नहीं भेजना है, यह आपके स्वयं के अभ्यास के लिए है।
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Date: 09-08-24
‘Live Up To What Parliamentary Stands For’Lok Sabha Speaker writes on the criticality of discipline and decorum in legislatures, for both proper conduct of business and health of democracy.Om Birla
Legislatures have a sacrosanct responsibility of oversight, law making and ensuring financial accountability. Over the decades, there has been a manifold increase in roles and responsibilities of legislatures, especially in a developing country like ours. Ensuring discipline and decorum in legislatures has assumed critical importance for orderly and seamless conduct of business of the House and for virtuous outcomes and success of our parliamentary democracy.
When disruption in legislatures becomes a regular feature, it not only results in loss of taxpayer money, but also projects a negative image of legislatures, which can lead to erosion of faith in these institutions. Lack of discipline and decorum in legislatures cannot augur well for the health of our parliamentary democracy.
The All India Presiding Officers’ Conference (AIPOC), apex body of presiding officers of legislatures in the country, has played an important role in the evolution of Rules of Procedure and Conduct of Business in our legislatures. Through dialogue and discussion, it has come up with solutions to complex problems.
At a Nov 2001 conference, AIPOC deliberated on discipline and decorum in Parliament and state and UT legislatures. A resolution and a code of conduct for members were unanimously adopted. In 2000, with AIPOC’s efforts, an ad hoc Ethics Committee was constituted, which became a permanent standing committee of Lok Sabha in 2015. Its recommendations have a significant bearing on conduct of members.
Parliamentary decorum encompasses a set of rules, conventions, and etiquette governing behaviour of members within the legislative chamber. Key aspects relate to respect for the chair and fellow members; relevance of speeches and questions to matter under discussion; orderly conduct; refraining from interrupting other members, creating commotion, or engaging in other disruptive behaviour. Members should use appropriate and dignified language in the House.
Rules and standards of conduct for Lok Sabha members are provided in Rules of Procedure and Conduct of Business in Lok Sabha, directions issued by Speaker under Rules of Procedure, and rulings from the Chair. The Handbook for Members and Practice & Procedure of Parliament serve as guides on desirable conduct. Members are expected to be well conversant with these rules and guidelines. There are also parliamentary customs and conventions based on past precedents.
Extent and amplitude of the words “conduct of a member” have not been defined exhaustively. It’s within the powers of the House in each case to determine whether a member has acted in an unbecoming manner or in a manner unworthy of an MP.
Articles 105 and 194 of the Constitution outline the powers, privileges, and immunities of Parliament and its members. These enable Parliament and its members to discharge their responsibilities without fear or hindrance. Members should use them for smooth, effective and constructive utilisation of time allocated for legislative and other businesses of the House.
The Lok Sabha Speaker is entrusted by the Constitution, rules of procedure and conduct of business, and by parliamentary tradition, with wide-ranging powers and responsibilities. Speaker is not only looked upon as moderator and facilitator of sittings, but also vested with authority to help frame sound rules and promote practices, customs and conventions that create a healthy parliamentary culture.
Given his wide and onerous responsibilities, Speaker is also vested by Lok Sabha with disciplinary powers. Maintenance of discipline and decorum in the House is a delicate duty.
For instance, Speaker can intervene when a member makes an unwarranted or defamatory remark by asking him/ her to withdraw the offending remark and even order its expunction. Speaker may also order a member guilty of disorderly conduct to withdraw from the House and name a member for suspension if such member disregards or questions the Chair’s authority and persists in obstructing proceedings.
In no situation should the authority of the Chair be questioned or his/her instructions disregarded. Speaker is final arbiter of all questions arising in the legislature’s precincts. Members should regard the Chair not as an individual but as a supreme institution, a living embodiment of the authority of Parliament.
Elected members are looked up to by people of this country, especially youth, as their role models. Therefore, the conduct of legislators should be dignified, orderly, exemplary and beyond reproach. Upholding parliamentary decorum is critical for the edifice of parliamentary democracy and its supreme democratic institution. Parliamentarians and legislators are, thus, bound by the spirit of the Constitution to maintain high standards of conduct in the houses of legislature.
Date: 09-08-24
Change in Bangladesh, the challenges for IndiaNew Delhi can capitalise on its strong development partnership with Dhaka and work closely with the interim government, the army, and the people.T.S. Tirumurti was India’s Permanent Representative to the United Nations, New York and, earlier, Head of Division for Bangladesh, Sri Lanka, Myanmar and the Maldives.
With events in Bangladesh unfolding at a rapid pace, this writer recalls the events of February 2009 when (now former) Prime Minister Sheikh Hasina faced a major crisis within two months of her taking over. The mutiny of the Bangladesh Rifles (BDR), a paramilitary force, where the rebels took over the BDR’s headquarters in Dhaka, left 74 dead, out of whom 57 were army officers.
The unrest spread to 12 other towns and cities and posed a direct threat to the fledgling democratically elected government of Sheikh Hasina.
Indian Foreign Secretary Shivshankar Menon was called back from Colombo by the then External Affairs Minister Pranab Mukherjee, where this writer was also present, being the Head of Division for Bangladesh, Sri Lanka, Myanmar and the Maldives. We took the only available flight, late at night, to Mumbai and then to Delhi to reach early the next morning. Within two hours, the Foreign Secretary began meeting Ambassadors of important countries to convey India’s concern about the unfolding crisis and seeking their understanding in case the situation got worse.
The mutiny failed. It was bound to fail since Ms. Hasina had just come to power riding on “clean” elections with huge backing from women and youth, and without the army’s interference. But in the 15 years of her tenure, all this seems to have been squandered.
A growing disconnect
The recent elections in 2024 were least inclusive with the Opposition’s boycott, dwindling democratic space, an erosion of human rights, a severe economic downturn and, even more significantly, high levels of unemployment among the youth — a segment of support which had earlier benefited from the sustained economic growth under Ms. Hasina. And when the students’ protests broke out, led by the Anti-Discrimination Student Movement, the fact that it was handled in a ham-handed manner — almost as if they were the enemies of the state, and which saw the use of violence — sealed Ms. Hasina’s fate.
Factoring in public opinion, challenges
However, Bangladesh Army chief, General Waker-uz-Zaman, has stepped into a situation that is quite different from what existed when Gen. Moeen U. Ahmed took over in 2007 in a coup. In 2007, one needed the army to bring the anarchy and the violence that was unleashed by both the major political parties under control, restore governance and facilitate elections. The situation demanded a strong man at the top. In 2024, the army is seen more as facilitating the will of the people by driving out a beleaguered Prime Minister and restoring the democratic process. This has also made the army more vulnerable and, therefore, more responsive to public opinion.
A sign of this vulnerability is the acceptance of the students’ choice of Nobel laureate Muhammad Yunus as the head of the interim government. Normally, coup leaders nominate lacklustre technocrats to run the country under their tight supervision, and not accept a popular leader who commands widespread respect, internally and externally. But then, the army’s vulnerability may well be the silver lining which Bangladesh is looking for. Mr. Yunus is seen as a passionate supporter of democratic values and the rule of law. He is a known Hasina-baiter, on account of how she treated him. While he did nurse political ambitions and wanted to start his own political party, he is not seen to be close to the two main parties, the Awami League and the Bangladesh Nationalist Party. Could this be the springboard he needs to launch a third force in Bangladesh?
However, selecting the interim government is not the only task right now. There is an equally serious issue — of the students’ agitation being hijacked by those suppressed under the earlier regime or who had boycotted the elections or supported from outside the country. They include not only the Bangladesh Nationalist Party and the opposition but also the banned Bangladesh Jamaat-e-Islami which had unleashed Islamic jihadist violence in 2006-07. Violence against Awami League sympathisers and their properties continue, symbols of Bangladesh liberation including the statues of Sheikh Mujibur Rehman are being demolished, and the Hindu minority community is under attack. Accommodating such polarised forces in the interim government will weaken both Mr. Yunus and the army and, inevitably, give a fillip to anti-India forces. Will a weak army leadership be able to control these forces?
While India was the first country to flag “contemporary forms of religiophobia against non-Abrahamic religions” in the United Nations Security Council in 2021 and in the UN General Assembly in 2022, it has demurred, raising this more forcefully with its neighbours and the West, apart from the usual expression of concern. Recent events in Bangladesh have shown, yet again, that if India does not, nobody will.
Mirroring Myanmar and the Maldives
The situation in Bangladesh is akin to events unfolding in Myanmar rather than Sri Lanka. After three consecutive elections in Myanmar, the coup leaders are finding it difficult to retain control over the people and ethnic groups and may well collapse sooner rather than later. After four consecutive elections in Bangladesh, where peoples’ democratic aspirations have been raised, the military will find its role considerably circumscribed.
For India, the situation seems similar to what happened in the Maldives where it, inter alia, propped up President Ibrahim Mohamed Solih without building bridges to the other side and facing a backlash when the opposition came to power.
What is in its favour though, whether in the Maldives or Afghanistan or Sri Lanka, or now in Bangladesh, is the strong development partnership and projects it has built for the benefit of their peoples. India’s best bet is to work closely with Mr. Yunus and the army, and with the people.
Date: 09-08-24
बोलने की आजादी पर कसता नया शिकंजासंपादकीय
ब्रॉडकास्टिंग सर्विसेज (रेगुलेशन) बिल पिछले कुछ वर्षों से सोशल मीडिया पर शिकंजा कसने के क्रम में सबसे सख्त है। पर अब प्रस्तावित बिल की जद में संस्थाओं के साथ ही वह हर व्यक्ति होगा, जो अपनी बात किसी भी माध्यम से प्रसारित करता है। इनके लिए भी पंजीयन बाध्यकारी होगा। वर्ष 2021 में बनी आईटी नियमावली जब अपेक्षित मकसद (डिजिटल मीडिया पर अंकुश ) हासिल न कर सकी तो इसे दो बार संशोधित किया गया। पहला संशोधन 2023 में करके त्रि-स्तरीय शिकायत अपीलीय समिति बनाई गईं, जिसमें तीन मंत्रालयों के लोग लाए गए- गृह, सूचना व संचार प्रौद्योगिकी। फिर उसी साल 6 अप्रैल को तथ्य चेक करने के तथाकथित उपक्रम के नाम पर केंद्र को ‘फर्जी, झूठे और भ्रामक’ खबरों पर लगाम लगाने की शक्तियां दी गईं। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इस पर स्थगन आदेश दे दिया। सरकार ने ब्रॉडकास्टिंग सर्विसेज (रेगुलेशन) बिल, 2023 के मसौदे को जनता के बीच चर्चा के लिए जारी किया। चुनाव के कारण इसे मुल्तवी किया । लेकिन इस बार बिल आम जनता के बीच नहीं, केवल कुछ खास लोगों को ही वितरित किया गया है। अभिव्यक्ति की आजादी पर कहीं भी किसी किस्म का अंकुश पूरी जनता पर अंकुश है क्योंकि अनुच्छेद 19 (1) (अ) यह आजादी हर नागरिक को देता है।
Date: 09-08-24
अदालती चक्रव्यूह से जनता को राहत देना जरूरी हैविराग गुप्ता, ( सुप्रीम कोर्ट के वकील, ‘अनमास्किंग वीआईपी’ पुस्तक के लेखक )
अमेरिका, भारत या फिर बांग्लादेश समेत अधिकांश देशों में नेता और सरकार संविधान की आड़ में ही जनता के अधिकारों का दमन और भ्रष्टाचार करते हैं। बांग्लादेश में मुखिया पद के नए दावेदार मोहम्मद यूनुस के खिलाफ भी 100 से अधिक मुकदमे चल रहे हैं।
पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना और प्रधानमंत्री पद की भावी दावेदार खालिदा जिया दोनों को सेना ने भ्रष्टाचार के आरोपों में जेल में बंद कर दिया था। हसीना सरकार के आरक्षण बढ़ाने के दांव और हाईकोर्ट के फैसले के बाद बांग्लादेश में तख्तापलट का कथानक तैयार हो गया था। बांग्लादेश-संकट के बरक्स भारत में न्यायिक व्यवस्था से जुड़े तीन पहलुओं को समझना बेहद जरूरी है।
अदालतों से त्रस्त जनता : सुप्रीम कोर्ट में आयोजित पहली लोक अदालत के बाद चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि लम्बी मुकदमेबाजी से त्रस्त लोग सेटलमेंट चाहते हैं। उनके अनुसार अदालत की लम्बी प्रक्रिया सजा जैसी है, जो जजों के लिए चिंता की बात है।
रिजर्व फैसलों को तीन महीने के भीतर जारी कर देना चाहिए। लेकिन एमसीडी में एल्डरमैन की नियुक्ति पर एलजी के अधिकार के बारे में सुप्रीम कोर्ट ने 15 महीने बाद फैसला दिया। एक ही मामले पर दो अदालतों में सुनवाई नहीं होनी चाहिए। लेकिन बेसमेंट में कोचिंग के छात्रों की मौत के मामले में हाईकोर्ट के साथ सुप्रीम कोर्ट ने भी सुनवाई का फैसला लिया है।
सुप्रीम कोर्ट ने कोचिंग संस्थानों को डेथ चैम्बर बताया है। सड़क पर गाड़ी चलाने के आरोप में एसयूवी चालक को जेल भेजने वाले पुलिस वालों की निंदा हो रही है। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस के अनुसार किसी को गलत तरीके से जेल में रखना गुनाह है।
उसके बावजूद कार चालक को हिरासत में भेजने वाले और जमानत की अर्जी रद्द करने वाले मजिस्ट्रेट के खिलाफ हाईकोर्ट ने कार्रवाई नहीं की। ऐसे जजों की वजह से लाखों बेगुनाह लोग जेलों में बंद हैं। हाईकोर्ट के जजों ने कहा है कि एमसीडी नहीं सुधरी तो हाईकोर्ट को दखल देना होगा। लेकिन जज नहीं सुधरे तो फिर कौन दखल देगा?
अनुशासनहीनता और भ्रष्टाचार : ईडी के अनुसार छत्तीसगढ़ के पीडीएस स्कैम में हाईकोर्ट जज ने भ्रष्ट तरीके से आरोपी अफसरों को जमानत दी थी। इस मामले में वाॅट्सएप चैट के प्रमाण के बावजूद महाभियोग से जज को बर्खास्त करने के बजाय दूसरे हाईकोर्ट में ट्रांसफर करके मामले को रफा-दफा कर दिया गया।
सनद रहे कि आजादी के बाद किसी भी जज की बर्खास्तगी नहीं हुई है। बड़ी बेंच और संविधान पीठ के पुराने फैसलों का सम्मान करने के बजाय मीडिया में सुर्खियां हासिल करने के लिए फैसले देने की बढ़ती प्रवृत्ति से न्यायिक अनुशासन कमजोर हो रहा है।
पंजाब-हरियाणा हाईकोर्ट के सिंगल जज ने डिवीजन बेंच और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों को मानने से इंकार कर दिया। उनके अनुसार हाईकोर्ट स्वतंत्र संवैधानिक इकाई है, जो सुप्रीम कोर्ट के अधीन नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट के 5 जजों ने हाईकोर्ट जज के फैसले को निरस्त कर दिया। लेकिन जज साहब के वायरल हो रहे वीडियो में कही गई आपत्तिजनक बातों का न्यायिक व्यवस्था में सही और संतोषजनक जवाब नहीं मिल रहा।
संविधान हत्या दिवस : भारत में भी आपातकाल के दौरान विरोधी दलों के नेताओं को जेल में डाल दिया गया था। सरकार ने 25 जून को संविधान हत्या दिवस मनाने का फैसला लिया है। देश में यदि 50 साल पहले संविधान की हत्या हो गई थी तो सांसद, मंत्री और जज किस संविधान की शपथ लेकर देशसेवा कर रहे हैं?
दिलचस्प बात यह है कि आपातकाल से जुड़ी सभी ज्यादतियों और गैर-कानूनी गिरफ्तारियों के लिए सरकार और पुलिस के साथ न्यायपालिका भी बराबर की जिम्मेदार थी। खनन की रॉयल्टी में राज्यों को अधिकार देने के सुप्रीम कोर्ट के नए फैसले से केंद्र-राज्य संबंधों पर भी तनाव बढ़ रहा है।
सुप्रीम कोर्ट की बड़ी बेंच ने आरक्षण पर 20 साल पुराना फैसला बदल दिया है। जातिगत जनगणना के दबाव से सामाजिक विघटन बढ़ने की आशंका है। सोशल मीडिया के हथियार से लैस बेरोजगार युवाओं की बढ़ती नाराजगी भारत जैसे देशों के लिए भी चिंता का सबब होना चाहिए।
भारत में नेताओं से पीड़ित जनता चुनावों के जरिए आवाज उठा सकती है। नाकारा और भ्रष्ट अफसरों के खिलाफ सीबीआई और अदालतों के दरवाजे खुलते हैं। लेकिन अदालतों में न्याय के बजाय तारीख पे तारीख या फिर कागजी फैसला मिलने की प्रवृत्ति बढ़ रही है। लोकतंत्र और संविधान की सुरक्षा के लिए अदालती चक्रव्यूह से जनता को राहत देना जरूरी है।
Date: 09-08-24
समय की मांग है संसदीय मर्यादा का पालनओम बिरला, ( लेखक लोकसभा अध्यक्ष हैं )
विधायी निकायों को पर्यवेक्षण, विधि-निर्माण एवं वित्तीय जवाबदेही सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी दी गई है। इस तथ्य के दृष्टिगत कि भारत में दशकों से एक कार्यशील और मजबूत संसदीय लोकतंत्र है, विधायिका में अनुशासन और शिष्टाचार बनाए रखना और महत्वपूर्ण हो गया है। यदि सदन में व्यवधान नियमित घटना बन जाए तो इससे न केवल करदाताओं के पैसे की भारी बर्बादी होती है, बल्कि हमारे संस्थानों की नकारात्मक छवि भी बनती है, जिसके चलते लोकतांत्रिक संस्थाओं में जनता का विश्वास घट सकता है। विधायिका में अनुशासन और शिष्टाचार का अभाव हमारे संसदीय लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है। देश में विधानमंडलों के पीठासीन अधिकारियों का शीर्ष निकाय अखिल भारतीय पीठासीन अधिकारी सम्मेलन (एआइपीओसी) ने विधानमंडलों में प्रक्रिया और कार्य संचालन के नियमों के विकास में अहम भूमिका निभाई है। इसने रचनात्मक विमर्श और संवाद के जरिये विधानमंडलों के समक्ष समस्याओं के समाधान निकाले हैं, जिनमें अनुशासन और मर्यादा का मुद्दा भी शामिल है।
एक शताब्दी से अधिक की अपनी यात्रा के दौरान इस सम्मेलन द्वारा विधानमंडलों में मर्यादा और गरिमा से जुड़े अनेक मुद्दों पर विमर्श हुआ है। नवंबर, 2001 में हुए सम्मेलन में ‘संसद और राज्यों तथा संघ राज्यक्षेत्रों के विधानमंडलों में अनुशासन और शिष्टाचार” विषय पर गहन चर्चा हुई। उसमें इस विषय पर सर्वसम्मति से एक संकल्प और आचार संहिता स्वीकार की गई। एआइपीओसी के प्रयासों के फलस्वरूप एक तदर्थ आचार समिति का गठन किया गया, जो 2015 से लोकसभा की स्थायी समिति बन गई है। इसकी सिफारिशों का सदस्यों के आचरण पर महत्वपूर्ण प्रभाव पड़ता है। संसदीय मर्यादा के अंतर्गत कुछ नियम, परिपाटियां और शिष्टाचार शामिल हैं, जिनका पालन सदस्यों को विधायी सदन में करना होता है। सार्थक विचार-विमर्श और निर्णय लेने हेतु अनुकूल परिवेश बनाने के लिए आवश्यक है। संसदीय शिष्टाचार के कुछ महत्वपूर्ण पहलू ऐसे हैं जिन्हें लेकर सभी पक्षों की सहमति है, जैसे अध्यक्ष पीठ के प्रति सम्मान का प्रदर्शन, अन्य सदस्यों के प्रति सम्मान का प्रदर्शन, सदन में चर्चाधीन विषयों पर संगत भाषण, सदन में अनुशासित आचरण, अन्य सदस्यों के भाषण में व्यवधान न डालना, सदन के अंदर शोर न करना तथा सदन में किसी भी प्रकार की अव्यवस्था न उत्पन्न करना।
‘सदस्य का आचरण’ शब्द को पूर्ण रूप से परिभाषित नहीं किया गया है। यह निर्धारित करने की शक्ति सभा के पास होती है कि क्या किसी सदस्य ने अशोभनीय व्यवहार किया है या कोई ऐसा व्यवहार किया है, जो एक संसद सदस्य के लिए अनुचित है। सभा में सदस्यों के गरिमापूर्ण और मर्यादित आचरण को सुनिश्चित करने के लिए लोकसभा की प्रक्रिया तथा कार्य संचालन नियमों में कई प्रविधान हैं। सदस्यों का व्यवहार ऐसा होना चाहिए, जिससे संसद और उसके सदस्यों की गरिमा बढ़े। सदस्यों का आचरण संसदीय परंपराओं या उन मानकों के विपरीत न हो, जिनकी संसद सदस्यों से अपेक्षा की जाती है। संसदीय विशेषाधिकार सदस्यों को बिना किसी भय या व्यवधान के सदन में अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करने में सक्षम बनाते हैं। संविधान प्रदत्त संसदीय विशेषाधिकार अमूल्य हैं, इसलिए सदस्यों को सदन में इनका उपयोग इस प्रकार करना चाहिए, ताकि सदन के समय का सार्थक उपयोग हो और सदन के माध्यम से लोकहित के अधिकतम कार्य प्रभावी रूप से किए जा सकें।
लोकसभा अध्यक्ष को संसदीय लोकतंत्र के सिद्धांतों के अनुरूप निष्पक्ष और व्यवस्थित कार्यवाही सुनिश्चित करने तथा चर्चा के दौरान सभी प्रकार के विचारों की अभिव्यक्ति का अवसर प्रदान करने के लिए व्यापक शक्तियां और जिम्मेदारियां सौंपी गई हैं। अध्यक्ष न केवल सभा की बैठकों का संचालन करता है, बल्कि उस पर समुचित नियम, परिपाटियां, परंपराएं और एक स्वस्थ संसदीय संस्कृति विकसित करने की जिम्मेदारी भी होती है। उसके व्यापक उत्तरदायित्वों को देखते हुए लोकसभा द्वारा अध्यक्ष को नियमों के अंतर्गत अनुशासनात्मक शक्तियां भी प्रदान की गई हैं, ताकि संसद जनता के हित में अपने संवैधानिक अधिदेश को पूरा करने में सक्षम हो सके।
सदन में अनुशासन और मर्यादा बनाए रखना अध्यक्ष का एक महत्वपूर्ण दायित्व है। इसके लिए उसे नियमों और परंपराओं के तहत पर्याप्त अधिकार प्रदान किए गए हैं। जब कोई सदस्य अनुचित या अपमानजनक टिप्पणी करता है तो अध्यक्ष हस्तक्षेप कर सकता है और सदस्य से उस टिप्पणी को वापस लेने के लिए कह सकता है या वाद-विवाद के दौरान प्रयुक्त किए गए किन्हीं अपमानजनक या अभद्र शब्दों को हटाने का आदेश दे सकता है। अध्यक्ष अनुचित आचरण करने वाले किसी सदस्य को सदन से बाहर जाने का आदेश भी दे सकता है और यदि सदस्य अध्यक्षपीठ की अवहेलना करता है और सभा की कार्यवाही में लगातार व्यवधान उत्पन्न करके घोर अव्यवस्था उत्पन्न करता है तो अध्यक्ष किसी सदस्य को निलंबित भी कर सकता है। सदन की प्रतिष्ठा और गरिमा को बढ़ाने के लिए जरूरी है कि सदस्य अध्यक्ष पीठ के निर्देशों का अनुसरण करें। आसन पर बैठने के पश्चात अध्यक्ष किसी दल विशेष या विचारधारा विशेष का नहीं होता, बल्कि संसदीय लोकतंत्र का निष्पक्ष प्रहरी होता है। संसदीय संस्थाओं की उच्च मर्यादा को बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि सदस्य किसी भी परिस्थिति में अध्यक्ष के प्राधिकार पर प्रश्न न उठाएं और उसके निर्देश की अवहेलना न करें।
विधानमंडल परिसर के अंदर उत्पन्न सभी मुद्दों पर अंतिम निर्णय अध्यक्ष का होता है और विधायिका के प्रभावी कामकाज के लिए आवश्यक है कि सभी सदस्य अध्यक्ष के आदेश का पालन करें। सदस्यों को अध्यक्ष को एक व्यक्ति के रूप में न देखते हुए एक संस्था के रूप में देखना चाहिए, जो संसद के विशेषाधिकारों एवं शक्तियों का प्रतीक है। सदस्यों को सदैव स्मरण रखना चाहिए कि नागरिकों द्वारा संसद सदस्यों को आदर्श माना जाता है। इसलिए विधायिका के सदस्यों का आचरण गरिमापूर्ण, अनुशासित, अनुकरणीय और दोषरहित होना चाहिए। प्रत्येक जनप्रतिनिधि के लिए संविधान की भावना से संसद के सदनों में आचरण के उच्च मानक बनाए रखना अनिवार्य है।
Date: 09-08-24
आरोप की बुनियादसंपादकीय
पिछले कुछ वर्षों से धनशोधन के आरोपों के तहत प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी और सीबीआइ की ओर से छापे या गिरफ्तारियों के मामले सुर्खियों में रहे हैं। इसके अलावा, ऐसे कई मामलों में होने वाली कार्रवाइयों की जैसी प्रकृति देखी गई, उसमें अब ईडी को विपक्ष की आवाज को दबाने का औजार बनाए जाने के आरोप भी लगने लगे हैं। इस मसले पर खुद सुप्रीम कोर्ट की ओर से भी प्रवर्तन निदेशालय को एहतियात बरतने या हिदायत देने की कोशिश हो चुकी है। मगर आज भी ऐसे आरोपों में साक्ष्यों को लेकर शायद गंभीरता नहीं आ पाई है या फिर इसमें एक परिपक्व दृष्टि का अभाव दिखता है। शायद यही वजह है कि बुधवार को एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट ने धनशोधन के मामलों में दोषसिद्धि की बहुत कम दर का हवाला देते हुए ईडी से अभियोजन और साक्ष्य की गुणवत्ता पर ध्यान देने को कहा। यह छिपा नहीं है कि बीते कुछ समय से धनशोधन के आरोपों में छापा या फिर गिरफ्तारी के लगातार मामले सामने आ रहे हैं, मगर उनमें से बहुत कम मामलों में आरोप साबित हो रहे हैं। इसी के मद्देनजर सुप्रीम कोर्ट ने ईडी को दोषसिद्धि की दर को बढ़ाने के लिए वैज्ञानिक जांच करने की सलाह दी।
दरअसल, पहले भी धनशोधन के आरोप पर होने वाली कार्रवाइयों को लेकर कई तरह के सवाल उठते रहे हैं और बिना मजबूत साक्ष्य के आधार पर गिरफ्तारी के मामलों की विश्वसनीयता कसौटी पर रही है। इसके बावजूद लगातार इस तरह के आरोप में छापे या गिरफ्तारी के मामले सामने आए। हकीकत यह है कि धनशोधन के मामले में गैरकानूनी गतिविधियों के आरोप के साथ ईडी ने कार्रवाई करने में जितनी हड़बड़ी दिखाई, उतनी ही शिद्दत से आरोपों को साबित करने के लिए साक्ष्य पेश नहीं किए। नतीजतन, ऐसे मामलों में दोषसिद्धि की दर काफी कम रही। गौरतलब है कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने मंगलवार को लोकसभा में यह जानकारी दी कि ईडी ने सन 2014 से लेकर 2024 के बीच धनशोधन निवारण अधिनियम यानी पीएमएलए के तहत कुल पांच हजार दो सौ सत्तानबे मामले दर्ज किए, लेकिन इनमें से सिर्फ चालीस आरोपों में ही दोष सिद्ध हो सका। सवाल है कि इतनी बड़ी तादाद में दर्ज होने वाले मामलों की बुनियाद में सबूतों का आधार कितना ठोस था और किन वजहों से प्रवर्तन निदेशालय पर पूर्वाग्रहों से ग्रस्त होकर कार्रवाई करने के आरोप लगते हैं!
अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि शीर्ष अदालत को यह कहने की जरूरत पड़ी कि जिन मामलों में प्रथम दृष्टया मामला बनता है, प्रवर्तन निदेशालय को उन्हें अदालत में साबित करने की जरूरत है। अदालत की यह टिप्पणी यही दर्शाती है कि जिस तेजी से धनशोधन के मामलों में ईडी ने कार्रवाई किए, उसे साबित करने को लेकर उसके भीतर कोई गंभीरता नहीं दिखी। इसकी क्या वजहें हो सकती हैं?
आखिर क्या कारण है कि विपक्षी दलों को प्रवर्तन निदेशालय की मंशा पर और उसके सरकार के इशारे पर काम करने की प्रवृत्ति पर सवाल उठाने का मौका मिलता है? गैरकानूनी धनशोधन के मामलों की जांच और कार्रवाई की जिम्मेदारी का निर्वहन करते हुए अगर दर्ज मामलों में दोषसिद्धि की दर बेहद कम है तो क्या यह प्रवर्तन निदेशालय की साक्ष्यों को लेकर गंभीरता में कमी का सूचक नहीं है? यह ध्यान रखने की जरूरत है कि ईडी जैसी सरकारी एजंसी की विश्वसनीयता या साख उसकी कार्रवाइयों की बुनियाद और उसमें दोषसिद्धि की दर के आधार पर बनती या बिगड़ती है।
Date: 09-08-24
तकनीक का संजालसंपादकीय
आज बहुत सारे कामों के लिए स्मार्टफोन और कंप्यूटरों पर निर्भरता बढ़ती गई है। मगर इसका एक पहलू यह भी है कि आज ज्यादातर लोग जिस तरह स्मार्टफोन में खोए रहते हैं, वह इसकी उपयोगिता के बरक्स एक विरोधाभासी स्थितियां पैदा कर रहा है। चिंता की बात यह है कि शहरों-महानगरों में ऐसे तमाम बच्चे हैं, जिनकी सुबह मोबाइल के स्क्रीन के साथ होती है, उनका ज्यादातर वक्त उसी के साथ कटता है। ऐसे में बच्चों की मानसिक और शारीरिक सेहत पर पड़ने वाले असर का अंदाजा लगाया जा सकता है। इस संबंध में संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन की एक रपट में भी यह साफ कहा गया है कि मोबाइल या स्मार्टफोन के नजदीक रहने से विद्यार्थियों का ध्यान भंग होता है और उससे सीखने की क्षमता पर नकारात्मक असर पड़ता है। यूनेस्को के मुताबिक, विद्यार्थी अगर निश्चित सीमा से ज्यादा स्मार्टफोन का उपयोग करते हैं तो इससे उनके शैक्षणिक प्रदर्शन में बाधा आती है।
गौरतलब है कि आज बहुत सारे घरों में बच्चों को जरूरत के तर्क पर स्मार्टफोन तक आसान पहुंच तो दी गई है, लेकिन ज्यादातर बच्चों का बहुत सारा वक्त अब मोबाइल के स्क्रीन में कटता है। इससे न केवल उनकी पढ़ाई-लिखाई की सहजता और ज्ञान की ग्राह्यता बाधित हो रही है, बल्कि उनके स्वभाव में भी बदलाव दर्ज किए जा रहे हैं। कई बच्चे स्मार्टफोन का उपयोग किसी लत की तरह करते हैं और मना करने पर उनके भीतर अस्वाभाविक प्रतिक्रिया देखी गई है। इसके मानसिक प्रभावों के समांतर ही ज्यादा समय तक मोबाइल के स्क्रीन में खोए रहने से शारीरिक स्वास्थ्य पर भी नकारात्मक असर पड़ता है। इसमें नींद से लेकर खानपान की आदत में बदलाव हो सकता है। मोटापा बढ़ने और शारीरिक सक्रियता में भी कमी आ सकती है, जो सेहत के अन्य पहलुओं को प्रभावित करता है। बच्चों पर इसके गंभीर असर को देखते हुए ही दुनिया के कई देशों ने स्कूलों में स्मार्टफोन के उपयोग पर प्रतिबंध लगा दिया है। आधुनिक तकनीकों के उपयोग की सीमा वही होनी चाहिए, जिससे मनुष्य के मानसिक-शारीरिक स्वास्थ्य की गुणवत्ता बेहतर हो, न कि उसके असर से वह धीरे-धीरे छीजने लगे।
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हाल ही में चेन्नई में एक बीएसपी नेता की हत्या के संदिग्ध को पुलिस हिरासत में मुठभेड़ के नाम पर मार दिया गयां। उच्चतम न्यायालय ने 2014 में इस प्रकार से की जाने वाली हत्याओं की जांच करने के तरीके पर विस्तृत दिशा निर्देश दिए थे। लेकिन ऐसी मुठभेड़ों को अंजाम देने वाली सरकार शायद ही इनका अनुसरण करती हो। ऐसी मुठभेडें आम बात हैं।
पुलिस और राजनीतिक जाल –
मुठभेड़ में हत्याएं भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली की विफलताओं को ही उजागर करती हैं। इस विफलता के पीछे अभियोजन की खराब गुणवत्ता और दोष-सिद्धि में अत्यधिक देरी बड़े कारण हैं। इसके लिए पुलिस सुधारों और फंडिंग की कमी की दुहाई दी जाती है। कोई भी जिम्मेदारी नहीं लेना चाहता है। जब पुलिस किसी हिस्ट्रीशीटर या बलात्कारी को मारती है, तो जनता इसका जश्न भी मनाती है, क्योंकि उन्हें लगता है कि तत्काल दिया गया ऐसा न्याय ही सही न्याय है। ऐसी ज्यादतियों पर सवाल उठाना पुलिस के मनोबल पर चोट माना जाता है। इस बारे में न्यायालय भी कुछ नहीं करते हैं। ऐसी हत्याओं की जांच भी तभी निष्पक्ष हो सकती है, जब जांचकर्ता राजनीति से अलग हो। ऐसी मुठभेड़ें विफल आपराधिक न्याय प्रणाली का परिणाम हैं।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 16 जुलाई, 2024
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Date: 08-08-24
Under overlordsCourt ruling on aldermen shows Delhi’s vulnerability to Centre’s dominanceEditorial
The Supreme Court of India’s verdict holding that the Lieutenant Governor (L-G) of Delhi exercises independent authority while appointing aldermen to the Delhi Municipal Corporation, underscores the utter vulnerability of the elected Government of the National Capital Territory of Delhi to central overlordship. The judgment by a three-judge Bench rightly relies on the letter of the law governing Centre-Delhi government relations, as well as earlier judgments that sought to strike a balance between the elected regime and the appointed administrator. The final outcome of the latest round of litigation is not surprising, given that Delhi is a Union Territory, but it raises questions about the relevance of having an elected Assembly for Delhi. The Court held that the Lt. Governor’s power to appoint persons with special knowledge in municipal administration is his statutory duty, and is not one that he should exercise on the basis of advice from Delhi’s Council of Ministers. The power is an exception to the constitutional provision that says the L-G is bound by the aid and advice of Delhi’s Council of Ministers on all matters in the State and Concurrent Lists, except for the subjects of public order, police and land. The Court has rejected the Delhi government’s argument that municipal administration, being a State subject, the L-G could not have acted on his own.
Tracing the nature of the appointing power to the Delhi Municipal Corporation Act, 1957, as amended in 1993, a law enacted by Parliament, the Court noted that the Act identifies different authorities, each with distinct roles. While the Administrator was empowered to nominate 10 persons with special knowledge, the Speaker could nominate some legislators to serve on the Corporation by rotation. And that this showed that it was an independent statutory power. A Constitution Bench had sought in 2018 to lay down a framework to avoid escalation of issues arising from differences of opinion between the L-G and the Chief Minister. Such differences, as well as political acrimony between the ruling Bharatiya Janata Party at the Centre and the Aam Aadmi Party in Delhi, have been the principal driving force behind multiple conflicts and legal tussles over governing Delhi. However, in the ultimate analysis, it is the Centre that enjoys the final say. As the latest verdict on aldermen shows, the Constitution allows Parliament power to enact laws in respect of any matter on which the Delhi Assembly has jurisdiction, unlike other States which have an exclusive legislative domain. Parliament can also amend or supersede any law made by the Delhi Assembly. As legislative and executive powers are coextensive, this effectively means that the Delhi government can be undermined in any way the Centre wants.
Date: 08-08-24
विनेश! देश को आप पर फिर भी नाज हैसंपादकीय
इतिहास बनाने के मुहाने पर आकर गलतियां कोई नई बात नहीं है। विनेश ने एक ही दिन में तीन अंतरराष्ट्रीय पहलवानों को पटखनी दी। फाइनल में मात्र कुछ ग्राम से वजन सीमा पार करना एक हादसा था। सामान्यतः 53 किलो वजन वर्ग में खेलने वाली विनेश ने वजन कम कर 50 किलो वर्ग में खेलना शुरू किया। शरीर की आदत होती है, असामान्य स्थितियों में अपने मूल स्वरूप को ‘रीगेन’ करना । कितना दबाव होगा… 8-10 घंटे के अंतराल में तीनों बाउट्स और वह भी कुश्ती जैसे श्रम-साध्य खेल में लगातार जीतना और फिर अगले दिन फाइनल! हर्षातिरेक भी कैलोरी इंटेक में उत्प्रेरक का काम करता है। यह भी संभव है कि डायटीशियन का आकलन गलत हो हालांकि विनेश ने रात भर कसरत की। हां, जिन बातों पर इस खेल के नियम बनाने वाली संस्था को ध्यान देना होगा वे हैं- क्या एक दिन में कुश्ती जैसे व्यक्तिगत द्वंद्व में तीन अंतरराष्ट्रीय मैच का नियम सही है; क्या सेमी-फाइनल व फाइनल के बीच कम से कम दो दिन का गैप नहीं होना चाहिए जैसे अन्य खेलों में होता है? ताकि ऐसे छोटे वजन परिवर्तन को खिलाड़ी दुरुस्त कर ले और एक खिलाड़ी अगर बाकी मुकाबलों में वजन वर्ग के पैमाने पर सही है तो उसे उन मैचों में जीत का मैडल नहीं मिलना चाहिए? विनेश, देश को आप पर नाज है।
Date: 08-08-24
आरक्षण में महादलितों को उनका हिस्सा देने की पहलयोगेंद्र यादव, ( संयोजक भारत जोड़ो अभियान )
दृष्टिकोण बहुत गहरा शब्द है। चूंकि यह हमें याद दिलाता है कि हमारी दृष्टि हमेशा किसी कोण में टिकी है। हम दुनिया में जो कुछ देखते हैं, किसी कोने में बैठकर, दुबककर या सिमटकर देखते हैं। अक्सर यह कोना हम चुनते नहीं हैं। अमूमन हमारे जन्म का संयोग हमें किसी कोने में बैठा देता है। बाकी जीवन हम उसी कोण से जो कुछ दिखता है, उसे अपना मत, अपनी विचारधारा या अपने दर्शन की तरह पेश करते रहते हैं।
सुप्रीम कोर्ट द्वारा एससी-एसटी के लिए आरक्षण में अंदरूनी विभाजन को वैध करार देने के फैसले से उपजी बहस ने दृष्टिकोण के खेल की याद दिलाई है। मुझे याद है जब मैं कॉलेज-यूनिवर्सिटी में पढ़ता था, लोहिया के समाजवाद में दीक्षा ले रहा था और दलित-आदिवासी आरक्षण का समर्थक था, तब तक मंडल कमीशन लागू नहीं हुआ था और मेरे स्वजातीय लोगों को आरक्षण का लाभ नहीं मिलता था।
उन दिनों अपनी रिश्तेदारी व जान-पहचान के लोगों में आरक्षण की आलोचना सुनने को मिलती थी, उनसे बहस हो जाती थी। लेकिन मंडल कमीशन लागू होते ही आरक्षण के बारे में उनकी दृष्टि बदलने लगी। अब वे सामाजिक न्याय की बात करने लगे।
कभी-कभार फुले-आम्बेडकर का जिक्र भी आने लगा। अब शहरी और अपेक्षाकृत सम्पन्न यादव समाज के लोगों में मैं ‘क्रीमी लेयर’ का विरोध सुनता हूं तो सोचता हूं क्या उनकी दृष्टि का उस कोण से संबंध है, जहां जीवन उन्हें ले आया है?
आरक्षण में वर्गीकरण के मामले में दृष्टि के तीन अलग कोण हैं। पहला कोना तमाशबीनों का है। ‘ये उन लोगों का मामला है, मेरा इससे क्या लेना-देना?’ या फिर, ‘अब मजा आएगा, जब इनमें आपस में सर-फुटौव्वल होगी!’ या फिर ‘बहुत बनते थे ना सामाजिक न्याय के झंडाबरदार! अब मजा चखो, जब तुम्हारे ही लोग तुम से न्याय मांगेंगे।
यानी मियां की जूती मियां के सर!’ इस मुद्दे पर मीडिया की दृष्टि में अकसर यही कोण दिखाई देता है। या तो अज्ञान है या उदासीनता या दोनों ही। मानो मैतेई-कुकी विवाद पर चर्चा हो रही हो या यूक्रेन-रूस युद्ध पर। यह एक औपनिवेशिक दृष्टि है, जैसे मलिक अपने गुलामों के झगड़े को देखता है।
दूसरी दृष्टि दलित समाज के उस हिस्से की है, जिसे अब अगड़ा बताया जा रहा है और जिसे इस फैसले का पीड़ित बनाया जा रहा है। जाति-व्यवस्था और छुआछूत के दंश के शिकार इस दलित समाज का एक छोटा-सा तबका किसी तरह आरक्षण के सहारे खड़ा हुआ है।
आरक्षण के उसके अपने हिस्से में बंटवारे की बात सुनकर वह चिंतित है। उसकी चिंता बनी रहे, इसका इंतजाम करने के लिए नेता तैयार खड़े हैं। कोई उन्हें यह नहीं बता रहा कि आप का कोटा छीना नहीं जा रहा है, आपकी आबादी के अनुरूप ही आपका हिस्सा बना रहेगा।
जिन्हें अलग से टुकड़ा दिया जा रहा है, वो भी आपके ही लोग है, जाति-व्यवस्था के शिकार हैं, आपसे भी निचली पायदान पर खड़े हैं। कुछ सच्ची, कुछ झूठी चिंता को उछालकर यह प्रचार हो रहा है कि आरक्षण को खत्म करने की तैयारी है।
तीसरी दृष्टि उनकी है, जिनके लिए यह फैसला सुनाया गया था। दलितों के दलित या ‘महादलित’- यह वो समुदाय हैं, जो जाति-व्यवस्था की सबसे निचली पायदान पर खड़े हैं। इन्हें वाल्मीकि, मजहबी, मांग, मुसहर, भुइयां, डोम, पासी, मादिगा, अरुन्धतियार, चकलियार जैसे नामों से या इनके नामों से जुड़े आक्षेपों से पुकारा जाता है।
अपने मन-मैल को ढंकने के लिए इस स्वच्छकार समाज को बाकी लोग तिरस्कारते रहे हैं। पिछले 75 साल में यह महादलित समाज आरक्षण का फायदा उठाने की स्थिति में ही नहीं रहा है। आरक्षण में वर्गीकरण का फैसला इस महादलित समुदाय को उसका हिस्सा देने की देरी से हुई एक छोटी-सी पहल है। लेकिन इस मुद्दे पर चल रही राष्ट्रीय बहस में उनकी आवाज गुम है। इस समाज के पास ना तो राष्ट्रीय नेता हैं, न अपने बुद्धिजीवी या प्रवक्ता, ना ही बड़े चेहरे। उनका दृष्टिकोण छिप जाता है।
मुझे पिछले 20 सालों से इस उपेक्षित कोने में घुसने और उसके दृष्टिकोण को समझने का अवसर मिला है। आदि धर्म समाज नामक अभियान के मुखिया दर्शन रत्न ‘रावण’ के सत्संग में मैंने उत्तर भारत के वाल्मीकि समाज की व्यथा-कथा सुनी है, इनके संघर्ष का साक्षी रहा हूं, उनकी नई पीढ़ी के सपनों की उड़ान का भागीदार भी।
इसलिए जब अदालत का फैसला आया तो मैंने अपनी दृष्टि को इस कोण से जोड़ दिया। यह जरूरी नहीं कि हमारा दृष्टिकोण हमारे जन्म के संयोग से बंधा हो। इसलिए इस सवाल पर बहस करने वाले सभी लोगों से मेरा सवाल है : आपका दृष्टिकोण क्या है?
स्वच्छकार समाज को बाकी लोग तिरस्कारते रहे हैं। पिछले 75 साल में यह महादलित समाज आरक्षण का फायदा उठाने की स्थिति में ही नहीं रहा। इसके पास ना तो राष्ट्रीय नेता हैं, न अपने बुद्धिजीवी या प्रवक्ता, ना ही बड़े चेहरे।
Date: 08-08-24
अस्थिर पड़ोसियों से घिरता भारतऋषि गुप्ता, ( लेखक एशिया सोसायटी पालिसी इंस्टीट्यूट, दिल्ली में सहायक निदेशक हैं )
बांग्लादेश में हुए तख्तापलट के मुद्दे पर भारतीय संसद के दोनों सदनों में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने अपने वक्तव्य में कहा कि पांच अगस्त को प्रधानमंत्री शेख हसीना ने सुरक्षा प्रतिष्ठानों के साथ बैठक के बाद स्पष्ट रूप से इस्तीफा देने का फैसला किया और ‘कुछ समय के लिए’ उन्होंने भारत आने के लिए मंजूरी मांगी। पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना अब भारत में हैं और माना जा रहा है कि वह किसी तीसरे देश में शरण मिलने तक यहीं रहेंगी। यदि इस हालात को भारतीय दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह एक असाधारण स्थिति है, जहां भारत को कुछ कठोर निर्णय लेने पड़ेंगे, जिसमें पड़ोसी प्रथम नीति के तहत मदद भी करनी है।
बांग्लादेश में फंसे हजारों भारतीयों की सुरक्षा के साथ इस बात को भी सुनिश्चित करना है कि कोई अनधिकृत रूप से सीमा पार कर भारत में प्रवेश न कर सके। इस पूरे घटनाक्रम से देश के लिए एक अभूतपूर्व सुरक्षा स्थिति पैदा हो गई है। भारत के समक्ष 1971 वाली स्थिति फिर एक बार बन पड़ी है। बांग्लादेश में रह रहे तमाम अल्पसंख्यक समूह खासकर बड़ी संख्या में हिंदू भारत में शरणार्थी के तौर पर आने की गुहार लगा सकते हैं। इससे बांग्लादेश की सीमा से सटे बंगाल और त्रिपुरा जैसे राज्यों में चिंताजनक हालात पैदा हो सकते हैं।
अगर बांग्लादेश की अंतरिम सरकार में कट्टरपंथियों का दबदबा बढ़ता है, जिसकी भरी-पूरी आशंका है तो भारत की चुनौतियां और अधिक बढ़ जाएंगी, क्योंकि इनमें से कुछ गुटों को पाकिस्तान का समर्थन मिलता रहा है। इसके चलते ये लगातार भारत विरोधी गतिविधियां चलाते रहे हैं। पाकिस्तान आज तक भारत को अपने विभाजन यानी बांग्लादेश के निर्माण का कारण मानता रहा है और वह कोशिश करेगा कि बांग्लादेश के इस्लामिक कट्टरपंथी गुटों के साथ मिलकर भारत के खिलाफ आतंकी और असामाजिक तत्वों को सक्रिय किया जाए। बांग्लादेश में अराजकता के बीच दक्षिण एशिया में अस्थिरता और बढ़ गई है, जो भारत के हित में बिल्कुल नहीं है।
भारत की सुरक्षा के लिए चौतरफा चुनौतियां बढ़ रही हैं। बीते दिनों ही नेपाल में चीन समर्थक सरकार बनी है, जिसका नेतृत्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली कर रहे हैं। ओली को ‘इंडिया आउट’ अभियान का नेतृत्व करने के लिए जाना जाता है और हाल के वर्षों में उन्होंने अपनी राजनीतिक साख मजबूत करने के लिए भारत के साथ सीमा विवाद का मुद्दा शांत नहीं होने दिया है। चूंकि ओली की ‘राष्ट्रवादी छवि’ भारत विरोध से बनी है, लिहाजा भारत के लिए जरूरी है कि वह स्थिति पर नजर रखे। यदि नेपाली जनता पुरानी पार्टियों और पुराने नेताओं की कार्यशैली से ऊबती है तो 2006 जैसा जन आंदोलन छिड़ना कोई बड़ी बात नहीं होगी। इसका सीधा असर खुली सीमा के चलते भारत पर होगा। नेपाल के बगल में ही भूटान है, जो पूरी तरह से भारत की सुरक्षा चिंताओं को लेकर फिक्रमंद है और एक मित्रतापूर्ण सहयोगी रहा है। हालांकि हाल के वर्षों में चीन ने वहां भी अपनी पैठ बनाने में कसर नहीं छोड़ी है। इसके बावजूद भारत के लिहाज से भूटान में स्थिति नियंत्रण में है।
पूर्वी पड़ोसी देश म्यांमार में भी दबावपूर्ण और अनिश्चित राजनीतिक घटनाक्रम देखने को मिल रहा है। यहां विभिन्न विद्रोही समूह सैन्य शासन को कमजोर करने में सफल हो गए हैं। यहां अशांति और राजनीतिक अस्थिरता का सिलसिला कायम है, जिसके चलते भारत की सुरक्षा एजेंसिया भारत-म्यांमार सीमा पर नजर बनाए हुए हैं। यदि बांग्लादेश और म्यांमार की तानाशाही ताकतें चीन या पाकिस्तान जैसे देशों के प्रभाव में आकर भारत को हानि पहुंचाने की कोशिश में साथ आती हैं तो भारत के लिए एक बड़ी चुनौती खड़ी हो जाएगी। नई दिल्ली के लिए यह जरूरी है कि वह अपनी लुक-ईस्ट और एक्ट-ईस्ट नीति में सुरक्षा पहलुओं को भी शामिल करे।
म्यांमार में आर्थिक एवं राजनीतिक अस्थिरता की स्थिति बनी हुई है। यह सही है कि श्रीलंका धीरे-धीरे भारत और आइएमएफ की मदद से आर्थिक मुसीबतों से बाहर आ रहा है, लेकिन अभी भी वहां भारत विरोधी तत्व सक्रिय हैं। मालदीव भी इस मामले में अलग नहीं, जहां राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू लगातार भारत विरोध में लगे हुए हैं। उन्होंने भी ओली की तरह ‘इंडिया आउट’ अभियान चलाया, फिर वह चाहे भारतीय सैन्य अधिकारियों का मालदीव से भारत वापस भेजने का मुद्दा रहा हो या फिर उनकी सरकार के मंत्रियों का भारत और भारत के प्रतिष्ठित नेताओं के खिलाफ टीका-टिप्पणी का मामला।
पश्चिमी सीमा क्षेत्र में पाकिस्तान और अफगानिस्तान में सुरक्षा हालात पहले से ही भारत के लिए मुसीबत बने हुए हैं। हाल में जम्मू में हुए आतंकी हमलों ने भारत की चिंता बढ़ाने का काम किया है। यदि पड़ोसी देशों की राजनीतिक और आर्थिक स्थितियों को देखा जाए तो स्पष्ट हो जाता है कि भारत इन सभी देशों की सीमाओं के जुड़े होने के कारण एक प्रतिकूल स्थिति का सामना कर रहा है, जो आने वाले दिनों में सुरक्षा के लिए खतरा बन सकती हैं। दक्षिण एशिया में बड़े लंबे समय से भारत की केंद्रीयता को सभी समस्याओं की जड़ माना जाता रहा है और भारत पर लगभग सभी पड़ोसी देश हस्तक्षेप का आरोप भी लगाते आए हैं, लेकिन क्या अब यही देश अपनी आंतरिक हलचल के चलते भारत के सामने मौजूद सुरक्षा संकट पर नई दिल्ली के साथ खड़े होंगे? इसका जवाब संभवत: नकारात्मक ही मिले। दक्षिण एशिया में जैसी असामान्य परिस्थितियां निर्मित हो रही हैं, उनका सामना करने के लिए भारत को असाधारण प्रयास करने की आवश्यकता है।
भारत को हर कीमत पर अपने सुरक्षा ढांचे को मजबूत करने की आवश्यकता है और पड़ोसी देशों में सिविल सोसायटी समूहों के साथ मिलकर शांति बहाली के प्रयासों पर ध्यान देना होगा। इसके साथ ही दुनिया भर के लोकतांत्रिक देशों और क्षेत्र में मौजूद समान विचारधारा वाली शक्तियों जैसे अमेरिका, जापान और आस्ट्रेलिया के लिए भी जरूरी है कि वे भारत की चिंताओं को समझें और अपने स्तर पर पाकिस्तान और चीन पर दबाव डालें, ताकि ये दोनों देश दक्षिण एशिया की अस्थिरता का फायदा उठाकर भारत को परेशान करने के लिए नई तिकड़में न कर सकें।
Date: 08-08-24
युवाओं में कौशल विकास की चुनौतीडा. सुरजीत सिंह, ( लेखक अर्थशास्त्री हैं )
बजट पेश होने के बाद उसके प्रस्तावों पर अमल की दिशा में प्रयास भी शुरू हो गए हैं। इस कड़ी में सभी की निगाहें रोजगार सृजन की उन महत्वाकांक्षी योजनाओं पर टिकी हैं, जिन्हें हालिया बजट का सबसे विशिष्ट पहलू माना जा रहा है। कौशल, नवाचार और रोजगार पर विशेष ध्यान देते हुए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट में विशेष प्राविधान किए हैं। इसमें इंटर्नशिप योजना को खासी चर्चा भी मिली है। इससे न केवल रोजगार के आकांक्षियों के हितों की पूर्ति होगी, बल्कि उद्योगों को भी अपने अनुकूल कौशल से लैस लोग मिलेंगे। इससे न सिर्फ भारत की वैश्विक आपूर्ति शृंखला मजबूत होगी, बल्कि निवेश संभावनाएं भी बढ़ेंगी।
इससे सरकार की यह मंशा भी प्रकट हुई है कि अगले पांच वर्षों में वह रोजगार, कौशल और एमएसएमई पर अपना ध्यान केंद्रित करेगी। भारतीय अर्थव्यवस्था की संभावनाओं को भुनाने की राह में कार्यशील आबादी में महिलाओं की अपेक्षित भागीदारी न होने का संज्ञान भी सरकार ने लिया है। इसके लिए कामकाजी आबादी में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए कार्यस्थल के निकट महिला हास्टलों और शिशु देखभाल गृहों की स्थापना की जाएगी। इसके साथ ही महिला श्रमिकों के कौशल को बढ़ाने के लिए विशिष्ट कौशल प्रशिक्षण कार्यक्रमों पर भी फोकस किया जाएगा।
आर्थिक सर्वेक्षण में भी उल्लेख है कि देश में बढ़ते कार्यबल के समायोजन के लिए गैर-कृषि क्षेत्र में 2030 तक सालाना औसतन 78.5 लाख नौकरियां सृजित करनी होंगी। इसीलिए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट में युवाओं को सशक्त बनाने के लिए बहुआयामी रणनीति बनाई। बजट में युवाओं और रोजगार पर ध्यान केंद्रित करते हुए शिक्षा, रोजगार और कौशल विकास के लिए 1.48 लाख करोड़ रुपये आवंटित हुए हैं। कुल मिलाकर, पांच साल की अवधि में 2 लाख करोड़ रुपये के केंद्रीय परिव्यय के साथ 4.1 करोड़ युवाओं को शिक्षित, कौशल और रोजगार प्रदान करने के लिए कई योजनाएं बनाई हैं। विनिर्माण क्षेत्र में भी अतिरिक्त रोजगार सृजन के लिए बजट में प्रविधान है कि पहली बार रोजगार पाने वाले युवाओं को शुरुआती चार वर्षो में ईपीएफओ में योगदान के लिए नियोक्ता और कर्मचारी दोनों को प्रोत्साहन दिया जाएगा।
इससे 30 लाख युवाओं को लाभ पहुंचने की संभावना है। नियोक्ताओं को सहायता देते हुए यह उपाय भी किया गया है कि सभी क्षेत्रों में प्रत्येक अतिरिक्त रोजगार के संबंध में नियोक्ता के ईपीएफओ में अंशदान के लिए उन्हें दो वर्षो तक प्रति माह 3,000 रुपये तक की प्रतिपूर्ति की जाएगी। इस योजना का उद्देश्य 50 लाख अतिरिक्त लोगों को रोजगार के लिए प्रोत्साहित करना है। वित्त मंत्री की यह पहल औपचारिक रोजगार सृजन की दिशा में स्वागतयोग्य कदम है, जिससे सैद्धांतिक शिक्षा और व्यावहारिकता के बीच की खाई पाटने में मदद मिलेगी। इससे अधिक स्नातकों को नौकरी के व्यापक अवसर उपलब्ध होगें।
भारत में रोजगार की नहीं, बल्कि कुशल श्रमिकों की कमी है। बढ़ती श्रमशक्ति और कुशल श्रमिकों की मांग एवं आपूर्ति में संतुलन की दृष्टि से पांच वर्षों में देश की 500 दिग्गज कंपनियों द्वारा एक करोड़ युवाओं को इंटर्नशिप प्रदान करना एक बाजी पलटने वाली योजना सिद्ध हो सकती है, लेकिन तभी जब कंपनियां इस योजना में रुचि दिखाएं। इस योजना में 5,000 रुपये के मासिक भत्ते और 6,000 रुपये की एकमुश्त सहायता आकर्षक पहलू हैं। इसके माध्यम से सरकार का उद्देश्य पांच वर्षों में 20 लाख लोगों को कौशल प्रदान करना है। घरेलू संस्थानों में उच्च शिक्षा के लिए 10 लाख रुपये तक के शिक्षा ऋण प्रदान करने के साथ ही हर साल एक लाख छात्रों को सीधे ऋण राशि के तीन प्रतिशत ब्याज में छूट भी मिलेगी। कौशल विकास पर विशेष ध्यान देने के लिए 1000 आइटीआइ को और अधिक सक्षम एवं सशक्त बनाया जाएगा। उद्योगों की कौशल संबंधी आवश्यकताओं के अनुरूप ही विशेष पाठ्यक्रम तैयार किया जाएगा, जिससे नई उभरती हुई जरूरतों के साथ सामंजस्य स्थापित किया जा सके।
रोजगार सृजन के लिहाज से महत्वपूर्ण एमएसएमई और विनिर्माण क्षेत्र में श्रम प्रधान तकनीक भी सरकार की प्राथमिकता सूची में शामिल है। एमएसएमई क्षेत्र को वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बनाने एवं उत्पादों की गुणवत्ता में सुधार के लिए ऋण गारंटी योजना प्रारंभ करने के साथ-साथ इस क्षेत्र के डिजिटलीकरण पर जोर देने से इस क्षेत्र को संजीवनी मिलने के आसार हैं। प्रत्येक वर्ष 25,000 कुशल व्यक्तियों को 7.5 लाख रुपये तक का गारंटीकृत ऋण प्रदान करना निश्चित रूप से ग्रामीण उद्यमिता को बढ़ावा देगा। मुद्रा ऋण सीमा को 10 लाख से बढ़ाकर 20 लाख रुपये किए जाने से इस क्षेत्र की तेजी से वृद्धि होने की संभावना है। एमएसएमई क्षेत्र में 50 मल्टी प्रोडक्ट्स फूड इकाइयां स्थापित करने के लिए वित्तीय सहायता भी सराहनीय है।
पारंपरिक कारीगरों को अंतरराष्ट्रीय बाजारों में अपने उत्पादों को बेचने में सक्षम बनाने के लिए निजी क्षेत्र के सहयोग से ई-कामर्स निर्यात केंद्र स्थापित किए जाएंगे। सरकार की गंभीरता इससे भी स्पष्ट होती है कि रोजगार और कौशल विभाग का नाम भी बदलकर कौशल, रोजगार और आजीविका कर दिया है। बजट में एक लाख करोड़ रुपये से अनुसंधान और नवाचार को प्रोत्साहन से आर्थिक विकास के लिए अनुकूल माहौल को बढ़ावा मिलेगा। हालांकि, केंद्र के स्तर पर तमाम पहल तभी सफल हो पाएंगी, जब राज्य सरकारें भी अपने स्तर पर इस दिशा में अपेक्षित प्रयास करेंगी। इन कार्यक्रमों को यदि गंभीरता से लागू किया जाता है तो भारत को एक अग्रणी स्टार्टअप राष्ट्र के रूप में स्थापित किया जा सकता है। ऐसा किया जाना समय की मांग भी है।
Date: 08-08-24
पड़ोसियों के संकटसंपादकीय
बांग्लादेश के राष्ट्रपति मोहम्मद शहाबुद्दीन ने शेख हसीना के प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा देने और देश छोड़ने के बाद संसद भंग कर दी है। सेना प्रमुख जनरल वकार ने कहा कि जल्द ही अंतरिम सरकार का गठन किया जाएगा। हसीना अपनी बहन के साथ अस्थायी शरण के लिए भारत में हैं। परंतु उनकी लंदन जाने की योजना अटक गई प्रतीत हो रही है। ब्रिटेन सरकार ने संकेत दिए हैं कि उनके देश में चल रहे हिंसक प्रदर्शनों के कारण कानूनी सुरक्षा मिलने में अड़चनें आ सकती हैं। दूसरा, अभी यह भी बताया जा रहा है कि शेख हसीना अस्वस्थ हैं, और इस सूरत में यात्रा करने में परेशानी का सामना कर सकती हैं। इसलिए उनका भारत में कुछ रोज और रुकना हो सकता है। हसीना के परिवार के कुछ सदस्य फिनलैंड में भी हैं। उनकी बहन की बेटी ब्रिटिश संसद की सदस्य हैं। भारत सरकार मामले पर पैनी नजर रखे हुए है। वहां मौजूद भारतीयों और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर भी सतर्क है। भारत और बांग्लादेश के दरम्यान त्रेपन सालों से द्विपक्षीय संबंध हैं परंतु हसीना का सत्ता में न रह पाना मुश्किलें पैदा कर सकता है। लंबे समय से जेल में बन्द बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की प्रमुख खालिदा जिया को रिहा कर दिया गया है। खालिदा का झुकाव हमेशा इस्लामिक कट्टरपंथियों की तरफ रहा है जिसका लाभ उठाने में चीन और पाकिस्तान चूकने वाले नहीं। चूंकि भारत-बांग्लादेश के दरम्यान हजारों किलोमीटर की सीमा है। लिहाजा, शांति योजनाओं को झटका लगने का अंदेशा खासा बढ़ गया है। इस सारे संकट में विदेशी सरकारों का हाथ होने से भी इंकार नहीं किया जा रहा है जिसकी बुनियाद को समझना बेहद जरूरी है। वहां नये चुनाव होंगे, शेख हसीना को उसमें शामिल किया जाएगा या सत्ता को सेना अपने हाथ में ही रखेगी, यह कुछ अभी स्पष्ट नहीं है। हालांकि वहां सैन्य शासन नई बात नहीं है। मगर इससे लोकतांत्रिक प्रक्रिया को खासी ठेस पहुंचती है। हसीना को भारत सरकार पहले भी राजनीतिक शरण दे चुकी है। इसलिए हम उनकी आंख की किरकिरी बने हुए हैं। इस मुस्लिम देश में यदि अधिक वक्त तक अस्थिरता रहती है तो यह भारत के लिए भी अच्छा नहीं है क्योंकि कट्टरपंथियों, आतंकवादी संगठनों के हौंसले बढ़ेंगे और कानून- व्यवस्था ढुलमुला सकती है जो शेख हसीना के राज में बांग्लादेश की संभली अर्थव्यवस्था के अनुकूल तो कतई नहीं कही जा सकती। पड़ोसी देशों में होने वाली राजनीतिक अस्थिरता हमारे लिए संकट का सबब हो सकती है।
Date: 08-08-24
व्यापार पर असरसंपादकीय
पड़ोसी देश बांग्लादेश में फैली व्यापक अशांति और अस्थिरता की वजह से पश्चिम बंगाल के रास्ते होने वाला सीमापार व्यापार मंगलवार को पूरी तरह ठप हो गया। देश में हालात इस कदर बिगड़ गए हैं कि प्रधानमंत्री शेख हसीना को सोमवार को इस्तीफा देकर देश छोड़ने के लिए मजबूर होना पड़ा। कारोबारी स्थितियों की बेहतरी के लिए माना जाता है कि हालात सहज और शांतिपूर्ण होने चाहिए। और बांग्लादेश यह शर्त अब बाकी रह नहीं गई है, इसलिए बांग्लादेश में कारोबार चौपट हुआ जा रहा है। पश्चिम बंगाल निर्यातक समन्वय समिति के सचिव उज्ज्वल साहा के मुताबिक, राज्य में भूमि बंदरगाहों के माध्यम से व्यापार बांग्लादेश के सीमा शुल्क विभाग द्वारा माल की निकासी नहीं होने से रुका हुआ है। इसकी वजह से सैकड़ों ट्रक पार्किंग स्थल पर खड़े हैं। पश्चिम बंगाल में पेट्रापोल, गोजाडांगा, महादीपुर और फुलवारी में स्थित भूमि बंदरगाहों के जरिए होने वाला भारत-बांग्लादेश व्यापार प्रभावित हुआ है।
बांग्लादेश की तरफ की सीमा शुल्क चौकी पर काम ठन होने से भारत और बांग्लादेश के बीच भूमि बंदरगाहों पर व्यापार ठप हो गया है। बांग्लादेश भारत का 25वां सबसे बड़ा व्यापारिक भागीदार देश है। दोनों देशों के बीच 12.9 बिलियन अमेरिकी डॉलर का व्यापार होता है। इसलिए चिंता इस बात की जताई जा रही है कि दोनों देशों के व्यापार पर बांग्लादेश के हालात का प्रतिकूल असर पड़ सकता है। चिंता इसलिए भी है कि भारत एशिया में बांग्लादेश का सबसे बड़ा निर्यात गंतव्य देश है। वित्तीय वर्ष 2022-23 में उसने भारत को 2 बिलियन अमेरिकी डॉलर का निर्यात किया था। हालांकि एसएंडपी ग्लोबल रेटिंग्स के मुताबिक, बांग्लादेश की उथल-पुथल का दोनों देशों के व्यापार कोई ज्यादा असर नहीं पड़ेगा। अलबत्ता, उसका यह भी कहना है कि भारतीय निर्यात को बांग्लादेश में घरेलू मांग में कमी का सामना करना पड़ सकता है। बांग्लादेश में अंतरिम सरकार गठित होते ही संभवतः दोनों देशों के बीच व्यापार पटरी पर लौटे। भारत बांग्लादेश से मछली, प्लास्टिक, चर्म उत्पाद, परिधान आदि का आयात करता है, जबकि बांग्लादेश को सब्जियों, काफी, चाय, मसालों, चीनी, कन्फैक्शनरी, परिशोधित पेट्रोलियम उत्पादों, रसायन, कपास, लोहे और स्टील तथा वाहनों आदि का निर्यात करता है। स्थिति दो-एक दिन में साफ हो जाएगी।
Date: 08-08-24
दक्षिण एशिया में भारत अकेली उम्मीदबद्री नारायण, ( निदेशक, जीबी पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान )
बांग्लादेश भयानक उथल-पुथल से गुजर रहा है। वहां जनतंत्र इस्लामिक कट्टरवाद, पाकिस्तान प्रेरित आतंकवाद, सैन्य तानाशाही की आकांक्षा के प्रसार जैसे अनेक संकटों से जूझकर आगे बढ़ रहा था। बांग्लादेश के स्वतंत्रता संग्राम के योद्धा बंग बंधु शेख मुजिबुर्रहमान की पुत्री शेख हसीना अनेक मोर्चों पर जूझते हुए भी देश को विकास के रास्ते पर ले जाने के प्रयास में लगी थीं। अफसोस, विगत महीनों में यह प्रयास बाधित हो गया और ऐसी आंतरिक उथल-पुथल मची कि शेख हसीना को इस्तीफा देकर देश छोड़ना पड़ा। अब वहां फिर सेना की ताकत बढ़ गई है।
यह कहने में हर्ज नहीं कि बांग्लादेश के राष्ट्र इन द मेकिंग की प्रक्रिया को इससे गहरा धक्का लगा है। वहां मची हिंसा ने सामाजिक, जनतांत्रिक एवं राष्ट्रीय तंतुओं को छिन्न-भिन्न कर दिया है। न केवल बांग्लादेश, वरन आज पूरी दुनिया में अनेक तरह के पूर्वाग्रह, विघटनकारी धार्मिक या नस्लीय भाव एवं सैन्य प्रेरित आतंककवाद सिर उठाने लगे हैं। अनेक मुल्कों में आक्रामक भू-राजनीति, विघटन एवं विभाजन केंद्रित हिंसा को पड़ोसी मुल्कों से भी हवा दी जा रही है। इस नकारात्मक कार्य में अनेक महाशक्तियां और उनसे प्रभावित समर्थक देशों की भी बड़ी भूमिका है। ऐसी ही कुचेष्टाओं ने दक्षिण एशिया के अनेक मुल्कों जैसे – पाकिस्तान, बांग्लादेश, म्यांमार इत्यादि में जनतंत्र को संकटग्रस्त कर दिया है। इसमें कोई संदेह नहीं कि आधुनिकता ने जो सबसे मूल्यवान नीधि दुनिया को सौंपी थी, वह थी जनतांत्रिक व्यवस्था एवं जनतंत्र को पाने की चाह। वही बहुमूल्य नीधि आज के संदर्भ में संकटग्रस्त दिखने लगी है। इसके ज्वलंत उदाहरण हम बांग्लादेश में देख रहे है। यह हमारी सरकारों और समाज के लिए गहरे विचार का विषय होना चाहिए।
यहां प्रश्न यह उठता है कि पाकिस्तान, बांग्लादेश जैसे अनेक देशों में जनतंत्र क्यों बार-बार संकटग्रस्त हो जाता है? इसकी सबसे बड़ी वजह वे आधार तत्व हैं, जिन पर इन मुल्कों में समाज और राष्ट्र निर्मित हुआ है। इनमें पहला आधारभूत तत्व इन देशों में हिंसा या टकराव की बुनियाद पर खड़ा समाज है। एक अच्छे समाज को समावेश पर आधारित होना चाहिए, जबकि एक बुरा समाज टकराव पर खड़ा होता है। मोहम्मद अली जिन्ना ने चिड़ियों की दो आंख या द्वि-राष्ट्र के सिद्धांत के अनुसार ही भारत का विभाजन प्रस्तावित किया था। हम सब यह जानते हैं कि पाकिस्तान का निर्माण भारत विभाजन के लिए हुए भयंकर टकराव या हिंसा की बुनियाद पर हुआ। अफसोस, बाद में बांग्लादेश भी हिंसा की बुनियादी पर ही अलग हुआ या बना।
टकराव के दर्शन पर खड़े समाज अपने अंदर और बाहर हमेशा टकराव की ही दृष्टि पालते देखे जाते हैं। टकराव या अलगाव की इस संस्कृति और विश्व दृष्टि का एक बड़ा पोषक तत्व मजहब आधारित राष्ट्र की कल्पना है। मजहब आधारित राष्ट्रवाद हमेशा अपने भीतर आतंकवाद, कट्टरता को गति देता रहता है। ऐसे में, बाहरी व भीतरी विभाजनकारी तत्व योजनाबद्ध ढंग से काम करते हुए समाज और राष्ट्र के पूरे ढांचे को हिलाते एवं ध्वस्त करते रहते हैं। हम आसानी से देख सकते हैं कि अनेक देशों में इस्लाम अपने आध्यात्मिक एवं धार्मिक समाहार की शक्ति खोते हुए राजनीतिक अस्त्र में बदल गया है, जिसका इस्तेमाल प्राय: सैन्य तानाशाह एवं अन्य किस्म के तानाशाह करते रहे हैं।
इस तरह के समाज एवं राष्ट्रों में जनतंत्र के संकट का दूसरा बड़ा आधारभूत तत्व इन राष्ट्रों में उपजा आर्थिक संकट है। यह संकट इनके गलत एवं असंतुलित आर्थिक नीतियों की वजह से पैदा हुआ है। इसी आर्थिक संकट ने इन देशों में बेरोजगारी, जलालत एवं जहालत का भंवरजाल रचा है, जिसमें जनतंत्र का बार-बार खून होता है। अर्थव्यवस्था से निराश आबादी का इस्तेमाल तानाशाही, कट्टरपंथी एवं गैर-जनतांत्रिक शक्तियां ही करती हैं, जिससे समाज और राष्ट्र अव्यवस्थित हो जाता है। गौर कीजिए, बांग्लादेश में बेरोजगारी की वजह से ही आरक्षण विरोधी आंदोलन को बल मिला, जिसे कट्टरपंथियों ने हवा देकर हिंसक बना दिया। अब सवाल खड़ा हो गया है कि क्या बांग्लादेश की विकास यात्रा को अपूरणीय नुकसान हो चुका है? यह एक सबक है कि जो आरक्षण हाशिये के समूहों के सशक्तीकरण एवं सम्मान के लिए एक जनतांत्रिक प्रक्रिया के रूप में हमें मिला है, वह जब नकारात्मक मोड़ लेता है, तो समाज एवं राष्ट्र को तोड़ने के बड़े हथियार में बदल जाता है।
जिन दक्षिण एशियाई देशों में असंतुलित एवं हिंसक धार्मिक भाव राष्ट्र निर्माण के आधार होते हैं, वहां सैन्य तानाशाह प्राय: इन्हीं भावों का उपयोग करते हुए जनतंत्र को कमजोर कर देते हैं। हालांकि, बांग्लादेश का समाज भाषा, मजहब के साथ-साथ राष्ट्रीय मुक्ति आंदोलन के भाव से निर्मित हुआ था, इसलिए इसमें जनतंत्र, धर्मनिरपेक्षता एवं विकास की संभावना पाकिस्तान से कहीं ज्यादा रही है। बांग्लादेश की समकालीन राजनीति पर भारत का प्रभाव तो रहा है, पर इसकी भू राजनीति पर पाकिस्तान का सीधा हस्तक्षेप बना हुआ है।
यहां हमें यह विचार करना ही चाहिए कि भारत का समाज एवं राष्ट्र ऐसी विनाशक संहारक प्रवृत्तियों से क्यों और कैसे बार-बार उबरता रहता है? भारत के समाज में कई बार ऐसे संकट आते हैं, जनतंत्र कमजोर होता दिखता है, पर पुन: उन संकटों से उबरकर यहां जनतंत्र नई जीवन-शक्ति के साथ बहाल हो जाता है। इसका मुख्य कारण है- भारतीय समाज के ऐसे बुनियादी तत्व, जो इसे टकराव या अलगाव से बचाते हैं। अनेक दार्शनिक, ऐतिहासिक कारणों और अनुभवों के चलते आइडिया ऑफ इंडिया का विचार हमें टकराव से बचाकर समाहार की राह पर रखता है।
आजादी के बाद हमारे प्रमुख राष्ट्र निर्माताओं – महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, वल्लभभाई पटेल, बाबा साहेब आंबेडकर ने आइडिया ऑफ इंडिया को नव-निर्मित करते हुए एक ऐसे राष्ट्र की नींव रखी, जहां जनतंत्र निरंतर विकसित होता रहे। ऐसा राष्ट्र बने, जिसमें पंक्ति में खड़े अंतिम नागरिक तक देश के संसाधनों को पहुंचाया जा सके, ताकि वह विभाजनकारी ताकतों के हाथ में विघटन का औजार न बने। जिन्ना ने हम साथ नहीं रह सकते के टकराव भाव के साथ पाकिस्तान को बनाया था, जबकि गांधीजी मिलकर रहने या समाहार की बात लगातार करते चले गए। अब भारत को लगातार कोशिश करनी चाहिए कि उसके चरित्र में समाहार और सद्भाव का भाव वैसे ही बना रहे, जैसी उम्मीद संविधान ने की थी, तभी हम हर संकट से बचे रहेंगे।
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देश के स्वरूप संघीय ढांचे को पोषित करने के लिए राजकोषीय सीमाएं, करों के आवंटन के सिद्धांत और अनुदानों के आधार को पारदर्शी और वस्तुनिष्ठ होना चाहिए। लेकिन अब यह सब कुछ केंद्र में आने वाली सरकार पर निर्भर करता है कि वह एकपक्षीय बहुमत वाली है या गठबंधन की है। हाल ही में प्रस्तुत बजट में सहयोगी दलों के राज्यों बिहार और आंध्रप्रदेश को विशेष पैकेज देने का आरोप लगाया जा रहा है। यह संविधान में वर्णित संघवाद की अवधारणा के विरूद्ध है।
अपने सहयोगी राज्यों को विशेष पैकेज देकर सरकार राजकोषीय संघवाद की नींव को कमजोर कर रही है।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित आर मोहन के लेख पर आधारित। 8 जुलाई, 2024
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Date: 07-08-24
Totally Fake, Very ScaryFrom Dhaka protests to Wayanad tragedy to British riots, reminder again of dangers of AI deepfakesTOI Editorials
As explosive events in Bangladesh unfolded, Bengal police alerted the public to “not step into a fake news trap” that can spin into unrest. Images of Bangla protests have deluged messaging apps. It’s impossible for the public to differentiate between authentic and doctored, or fake, images. And it takes nothing to get confused, desperate and riled. It is this emotional impact of, and reaction to, images that make fake images so dangerous. Take for instance, how the multi-city anti-immigrant riots are sweeping Britain – in part triggered by fake news of a “Muslim immigrant” having stabbed three British girls.
Yesterday, a fact-checker unit posted that the image of an infant cradled in its mother’s arms, both caked in mud from the Wayanad landslide that took their lives, was AI-generated. The picture moved like wildfire across online media as among the “defining images” that captured the devastation. Now we’re told it wasn’t real. Pitfalls of political manipulation of images and their impact are known, but who gains from a deepfake of a tragedy?
Scientists say those who put out such AI images target how people remember events. One, the first thing that fades from memory is where an image came from. Two, striking photos can seldom be erased from memory. So, if it’s stuck in one’s mind, no fact-checking is likely to dislodge one’s recollection of the Wayanad landslide that was formed from the mother and baby image. Memory is non-factual. People trust photos. And AI researchers believe deepfakes will eventually become undetectable. In these testing times post the crisis in Dhaka, the dangers of engendering emotions by weaponising feeds are infinite.
Date: 07-08-24
From hope to despairSheikh Hasina developed an authoritarian streak as she stayed on in powerEditorial
With her dramatic escape from Dhaka, just moments before mob arson and vandalism, ousted Bangladesh Prime Minister Sheikh Hasina will have time to pause and consider what led to this little-expected outcome. Once the hope of Bangladesh’s youth, in battles for democracy, and a Prime Minister who breathed life into the Bangladeshi economy, Ms. Hasina was eventually seen as the students’ greatest adversary, held responsible for over 300 deaths in protests of the past two months. While she was admired for her crackdown on terrorist camps in 2009, handing over criminals to India, and her campaign against radicalisation, Ms. Hasina was recently more reviled for using the same strong-arm tactics on her opponents. The student protests over the quotas that began in July may have been the final straw; anger was building up over the past decade, with allegations of vote rigging and the suppression of media, and sending leaders, journalists and activists to jail on trumped-up charges. Even after winning elections in January for a fourth term, Ms. Hasina continued down that path, with cases and jail terms against Nobel Laureate and Grameen Bank founder Muhammad Yunus, now tipped to head the interim government. Her actions, and refusal to give any space for dissent, have tarnished the legacy she holds most dear — that of her father, the much-beloved founder of Bangladesh, Sheikh Mujibur Rahman, whose statues now stand amidst the rubble. There is no doubt that the extreme mob violence and protests had political support, and possibly the encouragement of elements in Pakistan and the U.S., both of which had tense ties with the Awami League government. More worrying is the underlying involvement of Islamist groups that could affect the religious tolerance and secularism that Ms. Hasina tried to usher in during her 15-year tenure.
For India, each of these outcomes must be cause for introspection. New Delhi was not just complicit in Ms. Hasina’s actions against Bangladeshi opposition members by failing to advise her of the repercussions. It also failed to engage them, losing goodwill on Dhaka’s streets as well. The Modi government’s unalloyed support for Ms. Hasina also ensured her uncritical support, forcing her to accept even unpopular decisions such as the Citizenship (Amendment) Act. While securing Ms. Hasina’s safety and well-being, in a manner accorded to a leader who has always upheld India’s interests, the government must not waste time in engaging with the next regime and work to assist a peaceful transition to a more inclusive process for democracy in Bangladesh.
Date: 07-08-24
Counting the ‘poor’ having nutritional deficiencyIt will go a long way if some nutritional schemes targeted towards the poorest of the poor are put in place to raise their level of nourishment to have a healthy lifeG.C. Manna, Professor at the Institute for Human Development, New Delhi, and a senior adviser at the National Council of Applied Economic Research; D. Mukhopadhyay, Former Deputy Director General of the National Sample Survey Office
The National Sample Survey Office recently released a detailed report based on the Household Consumption Expenditure Survey (HCES): 2022-23. Along with the report, the unit-level data on household consumption expenditure (HCE) is available in the public domain. The HCES collected data on the quantities of various food items consumed by households during specified reference periods and the total value of consumption of different food and non-food items. This analysis uses this information to convert the quantities of consumed food items into their total calorific value, and then compares the estimated per capita per day calorie intake of household members in the lower expenditure classes with the average per capita daily calorie requirement for a healthy life.
Approach of measurement
This analysis addresses two key issues: one, how one defines the ‘poor’ and two, the measurement aspect of the nutritional level.
In the Indian context, the various committees constituted earlier by the government, including the Lakdawala, the Tendulkar, and the Rangarajan Committees, have defined the poor as the persons below the ‘poverty line’ (PL). The PL is a monetary equivalence based on household monthly per capita consumer expenditure (MPCE) that should be sufficient for the household to purchase the food and non-food items included in the poverty line basket (PLB).
The Lakdawala Committee anchored the PL and the PLB, which included food and non-food items, to calorie norms of 2,400 kcal per capita per day for rural areas and 2,100 kcal per capita per day for urban areas. In contrast, the Tendulkar Committee did not anchor the PL to a calorie norm. The PL according to Rangarajan Committee is based on ‘certain normative levels of adequate nourishment, clothing, house rent, conveyance and education, and a behaviorally determined level of other non-food expenses’.
The methodology of this analysis first derives the average daily per capita calorie requirement (PCCR) for a healthy life based on the recommended energy requirements for Indians of different age-sex-activity categories as per the latest (2020) report of ICMR-National Institute of Nutrition.
The PCCR has been worked out as a weighted average of the calorie requirements of persons in different age-sex-activity categories with corresponding weights as the proportion of estimated persons in these categories as per the Periodic Labour Force Survey, 2022-23.
In the second step, estimated persons are arranged into 20 fractile classes of MPCE (poorest to richest), each comprising five per cent population, with the estimates of average per capita per day calorie intake (PCCI) and average MPCE (food and non-food) derived for each class based on the data of HCES 2022-23. From this all-India distribution, the average MPCE on food linked to the normative level of the PCCR is derived.
In a common man’s language, this average per capita expenditure on food can be considered the minimum amount a household must spend on food items for its members to maintain a healthy life. This average per capita expenditure on food, combined with the average MPCE on non-food items for the poorest five per cent is added to derive the total MPCE threshold (at average all-India prices) that is necessary for spending on food items (ensuring adequate nourishment) and on the non-food items with a bare minimum expenditure on the latter. This all-India total MPCE threshold is adjusted for price differentials across States/UTs in terms of general Consumer Price Index numbers to derive the corresponding State/UT-specific total MPCE thresholds.
State/UT-wise proportion of ‘poor’/ deprived, strictly for this analysis, is derived as the proportion of persons below such total MPCE thresholds. Finally, the proportion of ‘poor’/deprived for the country is derived as the weighted average of the State/UT-wise proportions of deprived with respective weights as the projected populations of the States/UTs as of March 1, 2023, based on July 2020 report of the National Commission on Population. The analysis involves certain approximations in deriving the calorie intake figures at the household level in quite a few cases where the HCES data reports the aggregate quantity figures for certain items grouped.
The PCCR is estimated to be 2,172 kcal for rural India and 2,135 kcal for urban India. At 2022-23 prices, the all-India threshold total MPCE is ₹2,197 (food: ₹1,569 and non-food: ₹628) for rural India and ₹3,077 (food: ₹2,098 and non-food: ₹979) for urban India. The corresponding proportion of ‘poor’ i.e. deprived is estimated at 17.1% for rural areas and 14% for urban areas.
If the non-food expenditure of the poorest 10% is considered instead of the poorest five per cent, the threshold total MPCE increases to ₹2,395 for rural areas and ₹3,416 for urban areas, with the consequent increase in the corresponding proportion of deprived to 23.2% for rural India and 19.4% for urban India. Regarding nutritional deficiency, the average PCCI of the poorest five per cent and the immediately above five per cent in rural India is 1,564 kcal and 1,764 kcal, respectively. For urban India, it is estimated to be 1,607 kcal and 1,773 kcal, respectively, which fall far short of the PCCR. The government has several welfare programmes, aimed at uplifting the poor, including improving their health conditions. It will go a long way if some nutritional schemes targeted towards the poorest of the poor are put in place to raise their level of nourishment to have a healthy life.
Date: 07-08-24
बांग्लादेश के हालात समझने में हम भी चूकेसंपादकीय
अगर चीन को छोड़कर कोई एक पड़ोसी देश लगातार अपने आर्थिक विकास का लोहा मनवा रहा था तो वह था बांग्लादेश । ऐसे में पड़ोसियों को छोड़िए शायद वहां के हुक्मरानों को भी किसी उपद्रव का अंदेशा नहीं था। लेकिन केवल आर्थिक विकास किसी देश में शांति की गारंटी नहीं होती । उपद्रव इस हद तक बढ़ा कि प्रधानमंत्री को देश छोड़कर भागना पड़ा। जाहिर है नए शासन में अब न तो विकास की वह रफ्तार होगी ना ही शांति बहाल होगी। सत्ताधारी दल के खिलाफ बना यह आक्रोश केवल सत्ता परिवर्तन से नहीं थमेगा। हसीना काल का देश भारत का एक भरोसेमंद पड़ोसी था, जो किसी भी लालच या दुराव के कारण चीन या पाकिस्तान के बहकावे में नहीं आता । पाकिस्तान और चीन तो हमारे दुश्मन थे ही, नेपाल, म्यांमार और श्रीलंका में भी चीनी प्रभुत्व लगातार बढ़ रहा है। कम से कम बांग्लादेश को हम इस दुष्प्रभाव से सुरक्षित रख सकते थे ! क्या यह हमारी गुप्तचर एजेंसियों और राजनयिक चैनल्स की असफलता भी है, जिन्हें वहां के हालात की भनक तक नहीं लगी? क्या मात्र प्रधानमंत्री का आंदोलनकारियों को ‘रजाकार’ कहना ही इस आंदोलन को इतना उग्र कर गया कि उन्हें राष्ट्र के नाम संदेश देने का भी अवसर नहीं मिला? आखिरी घोषित हिन्दू राष्ट्र नेपाल जब हमारे हाथ से गया तो इस बात से संतोष कर लिया गया कि प्रारम्भिक ऊहापोह है । बाद में सब ठीक हो जाएगा क्योंकि नेपाल और भारत में रोटी-बेटी का रिश्ता है। भारत के प्रधानमंत्री ने अयोध्या – जनकपुर बस यात्रा शुरू कर इस रिश्ते की याद भी दिलाई। यह वही भारत है जिसने 1971 में अमेरिका – समर्थित पाकिस्तान के दो टुकड़े कर दिए और बांग्लादेश एक आजाद देश बना। बांग्लादेश के हालात का देर-सवेर भारत पर असर जरूर दिखाई देगा।
Date: 07-08-24
अपने बदहाल पड़ोसियों से घिर गया है भारतपलकी शर्मा, ( मैनेजिंग एडिटर )
बांग्लादेश में अफरातफरी है। प्रधानमंत्री शेख हसीना देश छोड़कर भाग गई हैं। सड़कों पर अराजकता है। सैकड़ों लोग मारे गए हैं। बाकी दुनिया चुपचाप यह सब देख रही है, वहीं भारत इसके लिए खुद को तैयार कर रहा है, क्योंकि बांग्लादेश की घटनाओं का उस पर सीधा असर होगा। हसीना का जाना नई दिल्ली के लिए कई मायनों में झटका है। इसका यह मतलब भी है कि भारत ने पड़ोस में अपने इकलौते स्थिर साथी को अब खो दिया है। भारत के चारों ओर के नक्शे को देखें तो आप पाएंगे कि भूगोल ने हमें कितने बदहाल पड़ोसियों से नवाजा है।
सबसे पहले तो हमारे पड़ोस में अफगानिस्तान है, जिस पर कट्टरपंथी तालिबान का राज है। भारत-विरोधी समूहों को समर्थन देने का उसका एक इतिहास रहा है। फिर, पाकिस्तान के क्या कहने, जो परमाणु हथियारों से लैस अफगानिस्तान जैसा ही है। यह मुल्क राजनीतिक अस्थिरता का पर्याय है। पाकिस्तान के एक भी वजीरे-आजम ने अपना कार्यकाल पूरा नहीं किया है। हमेशा वहां की फौज ने उनके कार्यकाल में खलल डाला है। दक्षिण में श्रीलंका और मालदीव हैं। श्रीलंका 2022 में दिवालिया हो गया था। वहां से सामने आई तस्वीरें आज के बांग्लादेश से काफी मिलती-जुलती थीं। वहां भी प्रदर्शनकारियों ने राष्ट्रपति भवन पर धावा बोल दिया था और शासक को भागना पड़ा था। मालदीव एक समय भारत का सहयोगी हुआ करता था। लेकिन उनके नए राष्ट्रपति के सुर बदले हुए हैं। वे इंडिया-आउट का नारा बुलंद किए हुए हैं।
फिर नेपाल की बात करें। उनके प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली हैं। लेकिन मेरा सुझाव है कि आप इसे कुछ-कुछ समय में जांचते रहें, क्योंकि वहां पर प्रधानमंत्री नियमित बदलते रहते हैं। नेपाल में गत 16 वर्षों में 14 सरकारें बदल चुकी हैं। हालात इतने बदहाल हैं कि वहां पर कुछ लोग राजशाही को फिर से बहाल करना चाहते हैं। उत्तर दिशा में ही थोड़ा आगे चीन है, जो विस्तारवादी, अलोकतांत्रिक और अपने आस-पड़ोस के देशों के साथ धौंस-डपट करने वाला देश है। वह भारत के भूखंडों पर अपनी मिल्कियत जताता रहता है। भूटान में घरेलू राजनीति स्थिर है, लेकिन वह चीन के साथ सीमा-समझौते पर हस्ताक्षर करना चाहता है, और यह भारत के लिए चिंता का बायस है। म्यांमार की भी बात कर लें, जहां सेना सत्ता में है। वहां के अधिकांश राजनेता सलाखों के पीछे हैं और वहां गृहयुद्ध चल रहा है। ले-देकर एक बांग्लादेश ही बचा था, जिस पर नई दिल्ली भरोसा कर सकती थी। लेकिन हसीना की विदाई के बाद अब आप ढाका से भी कोई उम्मीदें नहीं लगाइए।
इस परिदृश्य पर विहंगम दृष्टि डालने पर आपको क्या मिलता है? एक बेहद अशांत पड़ोस, जो कट्टरपंथियों, सैन्य शासकों, दिवालिया अर्थव्यवस्थाओं और जलवायु-परिवर्तन के कारण डूबते देशों से भरा है। इन सबके बीच में भारत है, जो अंतिम व्यक्ति की तरह तनकर खड़ा है।
यह भारत के भविष्य को कैसे प्रभावित करेगा? मोटे तौर पर, तीन तरीकों से। एक, नई दिल्ली को हर समय सतर्क रहना होगा। बांग्लादेश की सीमा को ही देखें। हिंसा की तमाम वारदातें बांग्लादेश के अंदर हो रही हैं, फिर भी भारतीय सीमा-बल सतर्क हैं। पाकिस्तान और चीन के साथ भी ऐसा ही है। भारत शांति कायम रखने के लिए इन देशों पर भरोसा नहीं कर सकता। जिसका मतलब है अधिक बलों की तैनाती, अधिक रक्षा खर्च और सरहद पर अधिक बुनियादी ढांचों का निर्माण।
दूसरे, ये हालात चीन जैसे हमारे प्रतिद्वंद्वियों को आगे बढ़ने का मौका देते हैं। पैटर्न पर गौर करें। मालदीव की इंडिया-आउट नीति का किसने फायदा उठाया? चीन ने। श्रीलंका के दिवालियेपन से कौन फायदे में रहा? फिर से चीन। भूटान से सीमा विवाद सुलझाने के बारे में कौन बात कर रहा है? चीन। भारत अफगानिस्तान या म्यांमार जैसी अलोकतांत्रिक सरकारों के साथ काम नहीं करेगा, लेकिन बीजिंग को इससे ऐतराज नहीं है। नतीजा, चीन ने भारत के आस-पड़ोस में बढ़त हासिल कर ली है।
हमारे इर्द-गिर्द मची यह उथलपुथल हमारे वैश्विक एजेंडे को भी बाधित करती है। हमने प्रधानमंत्री को इसके बारे में बात करते हुए सुना है। वे भारत को विश्व-बंधु, यानी दुनिया का मित्र बनाना चाहते हैं। लेकिन जैसा कि कहते हैं, अच्छी पहल हमेशा घर से शुरू होती है। जब आपका क्षेत्र ही आग की लपटों से घिरा हो तो आप दुनिया पर ध्यान केंद्रित नहीं कर सकते। वैश्विक दृष्टिकोण के लिए आपको क्षेत्रीय स्थिरता की आवश्यकता होती है।
हमारे पड़ोस में जो कुछ हो रहा है, वो सम्प्रभु राष्ट्रों की अंदरूनी समस्याएं हैं। क्या भारत फिर भी उनकी मदद कर सकता है? हां, कर सकता है। क्योंकि इस क्षेत्र में भारत का रसूख है। अगर आप चीन को अलग रख दें, तो हर दूसरे पड़ोसी के भारत के साथ ऐतिहासिक संबंध हैं। उनमें से कुछ तो भारत से टूटकर ही बने हैं। साथ ही, नई दिल्ली बदलाव लाने के लिए सबसे बेहतर जगह है। भारत की आबादी 1.4 अरब है। उसके पड़ोसियों की कुल आबादी 50 करोड़ है। अर्थव्यवस्था के साथ भी ऐसा ही है। भारत की जीडीपी तीन ट्रिलियन डॉलर है। बाकी सब मिलाकर लगभग एक ट्रिलियन हैं।
ऐसे में भारत के सामने दो विकल्प हैं। या तो आस-पड़ोस की अराजकता को नजरअंदाज करे और अपनी विकास-यात्रा पर फोकस बनाए रखे। या, अपने प्रभाव का इस्तेमाल करके चीजों को सही दिशा में लेकर जाए। पाकिस्तान के साथ इस तरह की मशक्कत बेकार है। लेकिन दूसरे देशों से फिर भी उम्मीद की जा सकती है।
Date: 07-08-24
बदलाव की कगार पर खड़ा है संविधान का समाजशास्त्रअभय कुमार दुबे, ( अम्बेडकर विवि, दिल्ली में प्रोफेसर )
दलितों और आदिवासियों के वर्गीकरण के बारे में सुप्रीम कोर्ट का फैसला समाज और राजनीति के संबंधों को भीतर से बाहर तक बदलने की तरफ ले जा सकता है। इसका असर एससी-एसटी तक ही सीमित नहीं रहेगा, ओबीसी पर भी इसका रूपांतरकारी असर पड़ेगा। अगले 10 से 15 साल के भीतर-भीतर देश की 60 से 70 प्रतिशत आबादी की राजनीतिक-सामाजिक पहचान पहले जैसी नहीं रह जाएगी। फैसले को गंभीर राजनीतिक-कानूनी रुकावटों का सामना भी करना पड़ सकता है।
संविधान-निर्माताओं ने समाज की नक्शानवीसी करते हुए उसे दो (पिछड़े और अगड़े) हिस्सों में बांटा था। इसके बाद पिछड़े वर्ग की विशाल बहुसंख्यक श्रेणी का विभाजन तीन हिस्सों (एससी, एसटी, ओबीसी) में कर दिया गया। इसी मानचित्र के अनुसार हमारी चुनावी गोलबंदी की संरचना बनी। इसी के मुताबिक आरक्षण के जरिए यह तय होना शुरू हुआ कि राज्य के संसाधनों पर किसका कितना हक होगा। दूसरी तरफ इस संवैधानिक नक्शे में संशोधन की कोशिशें भी चलीं, पर इनमें से किसी को कानूनी दृष्टि से कामयाबी नहीं मिली।
अब बिहार में कर्पूरी ठाकुर के जमाने वाले उस मुंगेरी लाल कमीशन की प्रासंगिकता नए सिरे से समझ में आ सकती है, जिसने ओबीसी में नए समतामूलक वर्गीकरण का प्रस्ताव किया था। इसी तरह से मंडल कमीशन की रपट के साथ नत्थी आरएल नाइक (कमीशन के एकमात्र दलित सदस्य) की उस असहमति पर निगाह डालने की जरूरत महसूस होगी, जिसमें ओबीसी को खेतिहर और कारीगर जातियों में बांटकर उसी के मुताबिक आरक्षण का प्रतिशत अलग-अलग तय करने का आग्रह किया गया था। मुंगेरी लाल और नाइक के प्रस्तावों के अलावा संभवत: हो सकता है कि यह फैसला काका कालेलकर कमीशन के सदस्य शिव दयाल सिंह चौरसिया द्वारा व्यक्त उस विस्तृत असहमति पर गौर करने की तरफ भी ले जाए, जिसमें आर्थिक आधार पर आरक्षण देने के आग्रह की कड़ी आलोचना दर्ज है। यानी अब ईडब्ल्यूएस पर पुनर्विचार की गुंजाइश पैदा हो सकती है। सरकार द्वारा बनाए रोहिणी कमीशन के आंकड़े पहले ही ओबीसी के पुन: वर्गीकरण की जमीन तैयार करने का काम कर रहे हैं। ये नए संदर्भ में और प्रभावी लगेंगे।
सुप्रीम कोर्ट के निर्णय की खास बात यह है कि उसने पंजाब समेत कुछ राज्य सरकारों द्वारा शुरू की गई उस प्रक्रिया पर कानूनी मुहर लगा दी है, जो एससी-एसटी श्रेणियों में वर्गीकरण की तरफ ले जाती है। अगर यह फैसला पहले आ गया होता तो बिहार में नीतीश कुमार द्वारा बनाई गई महादलित श्रेणी में पासवान, पासी, धोबी और रविदास जातियां (कुल दलित समाज का 69%) राजनीतिक दबाव डालकर न घुस पातीं। उस सूरत में बिहार का दलित आरक्षण दो हिस्सों में बंट गया होता। ज्यादा बड़ा हिस्सा उन 18 बिरादरियों को मिल रहा होता, जो संख्याबल में कमजोर और सामाजिक-शैक्षिक रूप से बहुत पीछे मानी जाती हैं। अगर यूपी सरकार चाहे तो बसपा के मुख्य जाटव जनाधार के आरक्षण पर दबदबे को घटाकर दूसरी लेकिन संख्याबल में कमजोर दलित जातियों को प्रमुखता दे सकती है। इस रोशनी में अदालती फैसले को लेकर चिराग पासवान और बसपा की बेचैनियों को आसानी से समझा जा सकता है।
भाजपा के लिए इस फैसले ने कई तरह की अनिश्चितताएं पैदा कर दी हैं। एक तरफ वह अतिदलित और अतिपिछड़ा वर्ग को नए आश्वासन देकर एक बार फिर अपनी तरफ खींच सकती है, और दूसरी तरफ इसकी प्रतिक्रिया में ओबीसी श्रेणी की शक्तिशाली खेतिहर जातियां उसका साथ छोड़ सकती हैं। अगर केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को दलित-आदिवासी और ओबीसी श्रेणियों में इस फैसले के मुताबिक उपश्रेणियां बनानी पड़ीं, तो उन्हें व्यवस्थित जातिगत जनगणना कराने की तरफ जाना ही होगा। एक तरह से सुप्रीम कोर्ट ने यह फैसला देकर जातिगत जनगणना की मांग पर अघोषित मुहर लगा दी है। संघ के सिद्धांतकारों के लिए यह पूर्वानुमान लगाना मुश्किल है कि इस फैसले की रोशनी में हिंदू राजनीतिक एकता की नई परिभाषा क्या होगी।
Date: 07-08-24
भारत की बढ़ती चुनौतियांसंपादकीय
बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना के पलायन के बाद कूटनीतिक मोर्चे पर भारत की चुनौतियां बढ़ती दिख रही हैं। मोदी सरकार ने शेख हसीना को शरण देकर अच्छा किया, लेकिन इसके नतीजे में बांग्लादेश में भारत विरोधी भावनाएं और बढ़ सकती हैं। वहां भारत विरोधी तत्व पहले से ही सक्रिय थे। शेख हसीना उन पर लगाम लगा रही थीं, लेकिन उनके भारत आने और बांग्लादेश लौटने की संभावनाएं शून्य होने के साथ ही पश्चिम ने जिस प्रकार उनसे मुंह मोड़ा, उससे साफ है कि भारत को बांग्लादेश में अपने हित सुरक्षित करना और कठिन हो सकता है। ब्रिटेन शेख हसीना को शरण देने को तैयार नहीं और अमेरिका ने तो न केवल उनका वीजा रद कर दिया, बल्कि वहां की सेना को यह जानते हुए भी सलाम किया कि वह अंतरिम सरकार में कट्टरंपथी तत्वों की भागीदारी के लिए भी तैयार है। फिलहाल यह कहना कठिन है कि बांग्लादेश में सेना के वर्चस्व वाली अंतरिम सरकार का भारत के प्रति मित्रवत रवैया होगा। इस सरकार में घोर भारत विरोधी कट्टरपंथी संगठन जमाते इस्लामी के शामिल होने के साथ ही विपक्षी नेता एवं उन पूर्व प्रधानमंत्री खालिदा जिया की भी भागीदारी हो सकती है, जिनसे भारत के संबंध कभी सहज नहीं रहे। यदि इस अंतरिम सरकार में उन तत्वों की भागीदारी बढ़ी, जो शेख हसीना को नई दिल्ली की कठपुतली बताते थे, तो भारत की चुनौतियां और बढ़ जाएंगी।
बांग्लादेश में भारत के नजरिये से असहमत पश्चिमी देशों के साथ चीन का भी दखल बढ़ने का अंदेशा है। चीन पहले से ही मालदीव एवं नेपाल में अपना प्रभाव बढ़ा चुका है और पाकिस्तान तो उसकी गोद में ही बैठा है। वह श्रीलंका में भी अपना दबदबा बढ़ाने की ताक में है। एक अन्य पड़ोसी देश म्यांमार भी अस्थिरता से जूझ रहा है और वहां भी चीन का दखल साफ दिख रहा है। भारत की समस्या केवल यह नहीं है कि वह बांग्लादेश में अपने हितों की रक्षा कैसे करे, बल्कि यह भी है कि वहां के अल्पसंख्यकों और विशेष रूप से हिंदुओं को कैसे बचाए? आरक्षण विरोध के बहाने शेख हसीना को सत्ता से हटाने के आंदोलन के दौरान हिंदुओं पर छिटपुट हमले ही हो रहे थे, लेकिन तख्तापलट के बाद तो उनकी शामत ही आ गई है। बांग्लादेश का शायद ही कोई ऐसा इलाका हो, जहां से हिंदुओं के घरों, दुकानों और मंदिरों को निशाना बनाए जाने की खबरें न आ रही हों। शेख हसीना के शासन में बांग्लादेश के जो हिंदू खुद को थोड़ा-बहुत सुरक्षित महसूस करते थे, वे फिलहाल असहाय-निरुपाय दिख रहे हैं। चिंता की बात यह है कि सेना उनकी रक्षा को उतनी तत्पर नहीं दिख रही, जितना उसे दिखना चाहिए। भारत को बांग्लादेश के हिंदुओं को बचाने के लिए कुछ करना होगा, अन्यथा उनका वैसा ही बुरा हाल होगा, जैसे अफगानिस्तान में हुआ और पाकिस्तान में हो रहा है।
Date: 07-08-24
भंवर में बांग्लादेशसंपादकीय
बांग्लादेश में कुछ महीनों से आरक्षण को लेकर छात्रों का असंतोष इतना व्यापक हो गया कि 15 बरसों देश की सत्ता संभालने वाली प्रधानमंत्री शेख हसीना को पद से इस्तीफा देकर भारत भागना पड़ा। अब बांग्लादेश में शासन सेना के हाथ में है। जनवरी, 2024 में हसीना ने लगातार तीसरी बार जनादेश हासिल किया था लेकिन मुख्य विपक्षी दल ने चुनाव का बहिष्कार किया था। चुनावों में धांधली का आरोप लगाया था। इसलिए माना जा रहा है कि चुनाव का बहिष्कार करने वाली बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी और कट्टर मुस्लिम संगठन जमायते इस्लामी परोक्ष रूप से छात्र असंतोष को हवा दे रहे थे। जाहिर है कि देश में राजनीतिक अस्थिरता पैदा करने वाली ताकतों से हसीना सरकार को सख्ती से निपटना पड़ा। लेकिन यह सख्ती सरकार के लिए महंगी साबित हुई। जनाक्रोश बढ़ता गया और शेख हसीना के पसंदीदा सेना प्रमुख जनरल वकार-उजा-जमां भी उनकी सरकार को बचा नहीं पाए। हसीना सरकार के पतन से यह मिथक भी टूट गया कि देश का आर्थिक विकास शासनाध्यक्ष की सत्ता को स्थिरता प्रदान करता है। वस्तुत: हसीना के नेतृत्व में बांग्लादेश आर्थिक विकास की पटरी पर तेजी से दौड़ लगा रहा था। करीब पचास वर्ष पूर्व जाने-माने अमेरिकी समाज विज्ञानी प्रो. हंटिगटन और नेल्स ने एक परिकल्पना प्रस्तुत की थी जो आज बांग्लादेश पर सही साबित हो रही है। ,इन विद्वानों का मत है कि विकासशील देशों में सामाजिक-आर्थिक समानता एवं जनसहभागिता के मध्य संघर्ष होता है। सामाजिक-आर्थिक विकास और लोकतांत्रिक मूल्यों के बीच संतुलन कायम करने में हसीना विफल रहीं। विपक्षी दलों द्वारा आम चुनाव का बहिष्कार, छात्रों के आरक्षण विरोधी आंदोलन को बलपूर्वक दबाना आदि सरकार के दमनकारी कृत्यों के कारण हसीना का पंद्रह वर्षों का शासन अचानक धराशायी हो गया। इस पूरे घटनाक्रम का सबसे दुर्भाग्यपूर्ण पहलू यह है कि जनता 1971 के बांग्लादेश मुक्ति संघर्ष के पक्ष और विपक्ष में बंट गई। हसीना का प्रदर्शनकारियों को ‘रजाकर’ कहने ने आग में घी का काम किया। रजाकर उन्हें कहा जाता है जो मुक्ति संघर्ष के विरोध में थे। हसीना के कामकाज की आलोचना की जा सकती है, लेकिन वह सेक्युलर नेता थीं। विडंबना है कि देश की नई पीढ़ी मुक्ति संघर्ष का अपमान कर रही है।
Date: 07-08-24
बांग्लादेश में कट्टरपंथियों की वापसीडॉ. ब्रह्मदीप अलूने
बांग्लादेश की राजनीति में दूसरा बड़ा चेहरा खालिदा जिया हैं। बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी की यह नेता अब ताकतवर होंगी। खालिदा को जहां कट्टरपंथी ताकतों का समर्थक माना जाता है वहीं हसीना उदार और भारत समर्थक मानी जाती हैं। बांग्लादेश की राजनीति के केंद्र में भारत समर्थन और भारत विरोध की शक्तियां समानांतर कार्य करती हैं। इस साल बांग्लादेश में आम चुनाव से पहले प्रधानमंत्री हसीना ने सत्तारूढ़ अवामी लीग पार्टी का घोषणापत्र जारी करते हुए कहा था कि अगर उनकी पार्टी चुनाव जीतती है तो भारत के साथ सहयोग जारी रहेगा। यह भी स्पष्ट भी किया गया था कि भारत के साथ भूमि सीमाओं के सीमांकन और परिक्षेत्रों के आदान-प्रदान की लंबे समय से चली आ रही समस्या का समाधान हो गया है। हसीना के कार्यकाल में बांग्लादेश ने अपने क्षेत्र में उग्रवादियों, अंतरराष्ट्रीय आतंकवादियों और अलगाववादी समूहों की उपस्थिति को रोकने के लिए दृढ़ता दिखाई और इससे भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में शांति की स्थापना में बड़ी मदद मिली।
खालिदा की राजनीति भारत के हितों पर चोट करने वाली और पाकिस्तान के ज्यादा करीब नजर आती है। करीब डेढ़ दशक पहले बीएनपी सरकार के दौरान इस्लामिक कट्टरपंथियों को बड़ी मदद मिली। बीएनपी की जमात और इस्लामिक कट्टरपंथियों से पुरानी करीबी है। खालिदा की सहयोगी पार्टी जमात-ए-इस्लामी को देश की सबसे बड़ी इस्लामी राजनीतिक पार्टी माना जाता है। जेआईबी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार के गठबंधन का सदस्य रह चुकी है। 1971 में स्वतंत्रता युद्ध में इस दल ने पाकिस्तान का समर्थन किया था। बाद में यह बांग्लादेश के इस्लामीकरण के प्रयास में जुटकर एक सक्रिय दल के रूप में उभरा। जमात-ए-इस्लामी वही संगठन है, जिसने तालिबान द्वारा अफगानिस्तान पर कब्जा किए जाने के बाद बांग्लादेश बनेगा अफगानिस्तान जैसे नारे गढ़े हैं। यह इस्लाम के कट्टर और रूढ़िवादी रूप को बांग्लादेश में लाना चाहता है। जमात-ए-इस्लामी का सहयोगी संगठन है हुजी। हरकत-उल-जिहाद-अल इस्लामी बांग्लादेश नामक यह आतंकी संगठन कथित तौर पर ओसामा बिन लादेन को अपना आदर्श मानता रहा है। इस संगठन की मांग है कि बांग्लादेश को इस्लामिक स्टेट में बदल दिया जाए। हुजी-बी का लक्ष्य बांग्लादेश में युद्ध छेड़कर और प्रगतिशील बुद्धिजीवियों की हत्या करके इस्लामी हुकूमत स्थापित करना है।
दो दशक पहले भारत के गृह मंत्रालय ने एक दस्तावेज तैयार किया था, जिसका शीषर्क था-पाकिस्तान के वैकल्पिक परोक्ष युद्ध का आधार। इसमें पाकिस्तान द्वारा अपनी विध्वंसात्मक गतिविधियों को तेज करने के लिए चलाए गए नये ऑपरेशन के बारे में उल्लेख था। इस दस्तावेज में खास तौर पर बताया गया था कि पाकिस्तान अपने भारत विरोधी अभियानों के लिए बांग्लादेश को एक नये आधार के रूप में विकसित कर रहा है। इस बात का भी खुलासा था कि पाकिस्तान ने लगभग 200 आतंकवादी प्रशिक्षण कैंपों को पहले ही अपने यहां से हटाकर बांग्लादेश में व्यवस्थित करवा चुका है।
भारत और बांग्लादेश के बीच गहरे सामाजिक, सांस्कृतिक, आर्थिक और भू-राजनीतिक संबंधों के कारण हूजी को जटिल चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। हूजी कार्यकर्ता कथित तौर पर भारत के पूर्वी गलियारे में अक्सर घुसपैठ करते हैं ताकि क्षेत्र के आतंकवादी और विध्वंसक संगठनों के साथ संपर्क बनाए रख सकें। हूजी को भारत में कई स्थानों पर आतंकवादी हमलों के लिए जिम्मेदार पाया गया है। यह अलकायदा तथा तालिबान मिलिशिया से मजबूत संबंधों के बूते दक्षिण एशिया के कई देशों में कट्टरपंथी ताकतों को बढ़ावा दे रहा है। पूर्व सोवियत संघ के खिलाफ युद्ध में मुजाहिदीन के साथ लड़ने के लिए बड़ी संख्या में मुजाहिदीन अफगानिस्तान गए थे। 1990 के दशक में बेगम खालिदा जिया के राजनीतिक दल बीएनपी शासन के दौरान इनमें से बड़ी संख्या में मुजाहिदीन बांग्लादेश लौट आए और अब देश में कट्टरपंथी आंदोलन का नेतृत्व कर रहे हैं। हूजी के असम से भी संबंध हैं। हूजी कथित तौर पर बांग्लादेश में चटगांव पहाड़ी इलाकों में स्थित उल्फा के कुछ शिविरों का प्रबंधन करता है, जो भारतीय राज्य त्रिपुरा की सीमा पर स्थित हैं। बांग्लादेश में हुजी को बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी और जमात-ए-इस्लामी जैसी मुख्यधारा की राजनीतिक पार्टयिों का संरक्षण प्राप्त है। हरकत-उल-जिहाद-अल-इस्लामी बांग्लादेश अर्थात हूजी देवबंदी समूह है, जो पाकिस्तान स्थित हूजी से संबद्ध है और इसका गठन 17 बांग्लादेशी मुजाहिदीन द्वारा किया गया था। इनका संबंध पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई से है।
करीब चार हजार किमी. लंबी भारत- बांग्लादेश सीमा भौगोलिक और सांस्कृतिक जटिलताओं के कारण भारत के लिए सबसे बड़ा सुरक्षा संकट रही है। इसका फायदा आईएसआई खूब उठाती है और कई इलाकों में भारत के विरु द्ध विद्रोही संगठनों को आश्रय देकर और प्रशिक्षित करके भारत पर हमले करने के लिए प्रेरित करती है। आईएसआई बांग्लादेश के आतंकी संगठन हूजी से मिलकर असम, मिजोरम, मेघालय और मणिपुर को इस्लामिक कट्टरतावाद से जोड़ने के लगातार प्रयास करती रही है। जब से अवामी लीग की सरकार आई वह चरमपंथी संगठनों को दबाने की कोशिश कर रही थी और इसमें कुछ कामयाबी भी मिली थी। आम तौर पर बांग्लादेश में हिन्दुओं को अवामी लीग गठबंधन का समर्थक बताया जाता है, और इसी कारण अल्पसंख्यक हिन्दू बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी और जमात-ए-इस्लामी के निशाने पर होते हैं। बांग्लादेश में इस साल हुए आम चुनाव में अवामी लीग की जीत के बाद वहां जिस तरह से विपक्ष द्वारा इंडिया आउट अभियान शुरू किया गया और उसे व्यापक समर्थन मिल रहा था, उससे देखते हुए कहा जा सकता है कि शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद बांग्लादेश में भारत विरोधी ताकतें मजबूत होंगी। ये स्थितियां भारत के लिए आंतरिक और सीमाई सुरक्षा का संकट बढ़ा सकती हैं, और इससे सतर्क रहने की जरूरत है।
Date: 07-08-24
पड़ोस से सबकसंपादकीय
बांग्लादेश के घटनाक्रम पर भारत की सतर्कता और समझदारी की सराहना करनी चाहिए। सरकार ने संसद में कोई बयान देने से पहले बांग्लादेश के विषय पर जिस तरह सर्वदलीय बैठक का आयोजन किया है, वह अनुकरणीय है। विपक्ष के लगभग सभी महत्वपूर्ण नेताओं की भी प्रशंसा करनी चाहिए कि सभी ने बैठक में भाग लिया और अपनी-अपनी बात रखी। किसी भी विवादित विषय पर कोई निर्णय लेने से पहले सर्वसम्मति बनाने की चेष्टा सजीव लोकतंत्र का वही गुण है, जिसका अभाव बांग्लादेश में अक्सर उभरता रहा है। किसी भी लोकतांत्रिक देश को ऐसी स्थिति में कतई नहीं फंसना चाहिए, जहां सियासी पार्टियों के बीच दूरियां इस कदर बढ़ जाएं कि फौज दखल देने को मजबूर हो जाए। वाकई अगर बांग्लादेश में सत्ता पक्ष और विपक्ष को अपनी-अपनी सीमाओं का अंदाजा होता, तो यह नौबत नहीं आती। अब ऐसी नौबत आ ही गई है, तो कोशिश होनी चाहिए कि कम से कम खूनखराबा न हो। बहुत अफसोस की बात है कि शेख हसीना के देश से पलायन के बावजूद वहां हिंसा थमी नहीं है और कथित रूप से 100 से ज्यादा लोग मारे गए हैं।
यह एक बड़ा सवाल है कि वहां छात्रों को अब क्या नाराजगी है? क्या बांग्लादेश में छात्रों के नाम पर असामाजिक तत्वों ने फिर फन फैला लिया है? भारत ने ही नहीं, संयुक्त राष्ट्र ने भी स्पष्ट कहा है कि हिंसा तत्काल रुकनी चाहिए और जल्द से जल्द अंतरिम सरकार का गठन होना चाहिए। सरकार का एक व्यवस्थित ढांचा जब सामने आएगा, तभी उपद्रवियों पर लगाम लगेगी। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने राज्यसभा में बताया है कि कई जगहों पर अल्पसंख्यकों के व्यवसायों और मंदिरों पर हमले की रिपोर्ट के बाद भारत सरकार बांग्लादेश के अल्पसंख्यक समुदायों की स्थिति को लेकर बहुत चिंतित है। हालांकि, अफवाहों से भी सावधान रहने की जरूरत है। ऐसे अनेक तत्व होंगे, जो इस प्रकरण को सांप्रदायिक रूप देना चाहेंगे। जैसे, एक अफवाह उड़ी थी कि वहां की क्रिकेट टीम के सदस्य लिटन दास के घर पर उपद्रवियों ने हमला बोल दिया है। वास्तव में, बांग्लादेश से आ रही खबरों को दो-तीन बार परख लेने की जरूरत है। अनेक स्थानों पर बांग्लादेशी नागरिक ही अल्पसंख्यकों की रक्षा के लिए खडे़ हो गए हैं। भारतीय विदेश मंत्री ने भी बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा के लिए विभिन्न समूहों और संगठनों की पहल का स्वागत किया है।
बेशक, भारत ने शेख हसीना को बांग्लादेश से निकलने में मदद की है, पर विदेश मंत्री ने यह भी बता दिया है कि भारत ने शेख हसीना को संयम बरतने की सलाह बार-बार दी थी और आग्रह किया था कि हालात को बातचीत से सुलझा लें। अफसोस, हसीना ने सलाह पर गौर नहीं किया और अब यूरोप में शरण खोज रही हैं। यूरोपीय देश भी शरण देने से पहले चिंतित हैं, क्योंकि अब उनके यहां भी कट्टरता पैठ गई है। शेख हसीना का पतन वास्तव में उन सभी नेताओं के लिए सबक है, जो विपक्ष या विरोधियों के लिए जगह नहीं छोड़ते हैं। जो लोकतंत्र और चुनाव की इज्जत नहीं करते हैं। आज के समय में सत्ता में बने रहने से ज्यादा जरूरी है- प्रतिकूल परिवेश न बनने देना। इसके बावजूद अगर हालात खिलाफ हो जाएं, तो समय रहते सत्ता से अलग हो जाना ही बड़प्पन की निशानी है। ऐसे बड़प्पन से ही लोकतंत्र की ताकत बढ़ती है और अराजकता पर अंकुश रहता है।
Date: 07-08-24
अपने देश का मिलकर बढ़ाइए आकर्षणविभूति नारायण राय, ( पूर्व आईपीएस अधिकारी )
पिछले दिनों अखबारों में छपी एक खबर ने बरबस ध्यान अपनी तरफ खींचा। प्रतिवर्ष लगभग 2.25 लाख भारतीय देश छोड़कर बाहर चले जाते हैं और यह पूरी दुनिया में किसी एक देश से प्रवसन या पलायन करने वालों की सबसे बड़ी संख्या है। 2023 में अंतरराष्ट्रीय प्रवसन का अध्ययन करने वाली एक रिपोर्ट के अनुसार, 2021 और 2022 में विकसित देशों की ओर होने वाले पलायन का सबसे बड़ा स्रोत भारत था। यह मिथक ही है कि सिर्फ रोजगार की तलाश में गरीब या मध्यवर्ग के लोग ही देश छोड़कर बाहर गए। बाहर पूंजी लगाने के लिए प्रवसन का अध्ययन करने वाले थिंक टैंक हेनले ऐंड पार्टनर्स के एक अध्ययन के अनुसार, संभावना है कि 2024 में ही 4,300 अरबपति भारत की नागरिकता छोड़ेंगे और यह इस श्रेणी में दुनिया में तीसरी सबसे बड़ी संख्या होगी। चीन (15,200) इस सूची में सबसे ऊपर है। यहां यह उल्लेख करना आवश्यक है कि रोजगार के लिए बाहर जाने वालों में से काफी संख्या में लोग लौट आते हैं, पर अरबपति तो जाते ही हैं, अपना भारतीय पासपोर्ट जमा करके। भिन्न देशों की नागरिकता उन्हें लगभग खरीदनी पड़ती है। अर्थात वे वहां एक बड़ी राशि का निवेश या उसका वायदा करते हैं। इस तरह उनके जाने से देश उनके अनुभव के अलावा एक बड़ी धनराशि के निवेश से भी वंचित हो जाता है।
आज जब दावा किया जा रहा है कि भारत विकासशील देशों में सबसे तेज बढ़ती और विश्व की पांचवीं अर्थव्यवस्था है, क्योंकर ऐसा है कि हर समर्थ व्यक्ति अगर उसे मौका मिले, तो देश छोड़कर भागने के लिए तैयार बैठा है? विकास के निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति की मजबूरी तो समझ में आती है, जो रोजगार की तलाश में देश के अंदर ही मारा-मारा फिरता है और अपना गांव-दुवार छोड़कर महानगरों में कई बार नारकीय जीवन भी चुन लेता है। यह वह तबका है, जो रूस की सेना में निश्चित मृत्यु का जोखिम उठाकर भी भर्ती हो रहा है या हाल में युद्ध के दहाने पर बैठे इजरायल में इमारती कारीगर बनने चला गया। इजरायल जाने वाले एक मजदूर की मजबूरी इस वाक्य से समझी जा सकती है कि वहां से पैसे भेजकर वह कम से कम अपने बच्चों का पेट तो भर ही सकेगा। इस तरह का गरीब मजदूर अपनी नागरिकता नहीं छोड़ता, बल्कि हर महीने कुछ न कुछ विदेशी मुद्रा भेजकर देश की मदद ही करता है। गए वित्तीय वर्ष में भारतीय नौकरीपेशा लोगों ने बाहर से 107 अरब डॉलर भेजे और हमारे विदेशी मुद्राकोष को बढ़ाने में सहायक हुए।
यहां सवाल उठना स्वाभाविक है कि भारतीय अर्थव्यवस्था से भरपूर लाभ उठाने वाले अरबपतियों में देश छोड़ने की होड़ क्यों लगी हुई है? उनमें से एक छोटा सा तबका तो वह है, जो किन्हीं आपराधिक गतिविधियों में लिप्त होने और कानून की पकड़ से बचने के लिए बाहर भाग जाता है, पर ज्यादातर स्वेच्छा से और कानूनी तरीकों से अपने पासपोर्ट का रंग बदलते हैं। उनकी इस प्रवृत्ति को समझने के लिए हमें दो तथ्य मद्देनजर रखने होंगे।
चीन, जिसकी अर्थव्यवस्था भारत से कई गुना बड़ी है और अगले कुछ दशकों में जो अमेरिका को पछाड़कर विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाएगा, उसे छोड़कर जाने वाले अरबपति भारत के मुकाबले तीन गुने से अधिक हैं। फिर क्यों वे चीन से छोटी अर्थव्यवस्थाओं को चुन रहे हैं? इस प्रश्न का उत्तर इस तथ्य में छिपा है कि भारतीय और चीनी अरबपति जा कहां रहे हैं? वे उन देशों में जा रहे हैं, जहां पिछली कुछ शताब्दियों में लोकतंत्र फला-फूला है और जिन्होंने नागरिक अधिकारों को इस हद तक वैधानिक सुरक्षा प्रदान की है कि उसके चलते वे दुनिया की दो पुरानी सभ्यताओं- भारत और चीन को पछाड़कर इस सोपान पर दोनों से बहुत ऊपर पहुंच गए हैं। लोकतंत्र उनके जीवन का अंग बन गया है।
मुझे यह देखकर बड़ा दिलचस्प लगता है कि पश्चिम विरोधी दुनिया के दो बड़े दर्शनों- मार्क्सवाद और इस्लाम की छत्रछाया में रहने वालों के मन के भी किसी कोने में किसी भी तरह अमेरिका या यूरोपीय संघ के देशों में बस जाने की इच्छा छिपी रहती है। चीन और इस्लामी मुल्कों में जहां इस पलायन के लिए लोकतंत्र का अभाव जिम्मेदार है, भारत में इसके साथ गवर्नेंस की अनुपस्थिति भी एक बड़ा कारण है। धीरे-धीरे बढ़ रही शहरीकरण की प्रक्रिया में अनुपस्थित शासन साफ दिखता है। दूर न जाकर इस प्रक्रिया में विकसित हो रही सबसे बड़ी शहरी बसावट राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र को देखकर ही हम गवर्नेंस का अंदाज लगा सकते हैं। देश की राजधानी दिल्ली में बरसात अब किसी कोमल अनुभूति के साथ नहीं आती, नागरिक इस दौरान दहशत से गुजरते हैं। पिछले कई सालों की तरह इस बार भी आधे दर्जन से अधिक नागरिक जलभराव और इमारतों के गिरने से मरे, सड़कें चलने लायक नहीं रहीं और इस साल भी भ्रष्ट म्यूनिसिपल अधिकारियों की बांछें खिली रहीं। एनसीआर की एक महत्वपूर्ण बसावट नोएडा की सड़कों पर सांड़ और गायें घूमती रहती हैं। दूसरी बड़ी बसावट गुरुग्राम में हल्की बारिश भी नागरिकों को शहर में बाढ़ का मजा चखाती रहती है। एनसीआर की ज्यादातर जगहों पर टूटी सड़कें, बंद नालियां, उखड़े अतिक्रमित फुटपाथ और सड़कों पर घूमते लावारिस पशु आपका स्वागत करेंगे। उस पर तुर्रा यह कि अगले बीस-पच्चीस वर्षों में विकसित होने का सपना देखने वाले देश में स्वास्थ्य और शिक्षा की व्यवस्था निरंतर व्यावसायिक होते जाने से आम नागरिकों की पहुंच से दूर होती जा रही है।
यह एक खुला सच है कि किसी समाज के सभ्य और अपने नागरिकों के बीच लोकप्रिय होने का सबसे बड़ा आधार वहां मौजूद रूल ऑफ लॉ या कानून कायदों को निष्पक्ष ढंग से लागू करने में राज्य की इच्छाशक्ति और सामर्थ्य होता है। हमें बाहर भागने वालों को कोसने के पहले यह भी सोचना होगा कि क्या हम अपने नागरिकों को रूल ऑफ लॉ दे पा रहे हैं? चीन या इस्लामी देशों की स्थिति तो समझी जा सकती है कि सारी समृद्धि के बावजूद लोकतंत्र का अभाव उनके नागरिकों को पश्चिम की तरफ खींचता है, पर भारत में ऐसा क्यों हो रहा है? अवसरों की कमी की वजह से गरीब या मध्यवर्ग का पलायन तो स्वाभाविक लगता है, पर अरबपतियों के देश छोड़ने को समझने के लिए हमें देश में मौजूद नागरिक सुविधाओं, शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में आ रही गिरावट या गवर्नेंस की कमी के साथ-साथ निरंतर घट रहे लोकतंत्र पर भी नजरें डालनी पड़ेंगी।
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हाल ही में हाथरस में भोले बाबा के समागम में भगदड़ मचने से सौ से ज्यादा श्रद्धालु मारे गए थे। सवाल यह है कि ऐसे बाबाओं का अस्तित्व इतना लोकप्रिय क्यों हो जाता है ?
अमेरिका में भी ऐसी घटनाएं देखी जाती हैं। वहाँ चर्चों में उपस्थिति में भले ही कुछ गिरावट आई हो, लेकिन ईसाई मत का प्रचार करने वाले कॉलेजों या चर्चों के पंजीकरण में कोई कमी नहीं आई है।
कांट और विवेकानंद ने सदियों से तर्क दिया है कि विज्ञान और धर्म को आपस में नहीं मिलाना चाहिए। ऐसा इसलिएए क्योंकि “धर्म आध्यात्मिक दुनिया के सत्यों से निपटना है, जबकि विज्ञान भौतिक दुनिया के सत्य से निपटते हैं।’’ यहाँ तर्कवादी गलत इसलिए कहे जा सकते हैं, क्योंकि वे दुनिया को द्विफोकल लैंस से नहीं देखते। धार्मिक विश्वास की अपनी जगह है, और इसलिए धाार्मिक प्रचारक सफल होते चले जाते हैं।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित दीपांकर गुप्ता के लेख पर आधारित। 13 जुलाई, 2024
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Date: 06-08-24
BanglaMessHasina sowed the seeds of her downfall. But her exit is a huge problem for India.TOI Editorials
Once a thriving South Asian economy, Bangladesh today looked like a South Asian tragedy. Sheikh Hasina fled the country, protesters stormed her official residence, the army, via an interim govt, took over, and economic problems, worsening for a while, will most likely get worse in the short term. A Bangladesh in turmoil will also likely force a reset in New Delhi-Dhaka ties, and that raises multiple strategic and security questions for the region.
A lost opportunity | Hasina’s decade-and-a-half stint in govt had many positives. Her notable achievements included major constitutional reforms that reintroduced secularism as a fundamental tenet of Bangladeshi polity. Trials for war criminals of Bangladesh’s 1971 Liberation War – a hugely popular demand as manifested in the 2013 Shahbagh protests – were undertaken. And Bangladesh saw impressive economic growth that put it on the path to graduating from the Least-Developed Countries group to a developing nation by 2026. Were Bangladesh to continue on this track, it would have emerged as a genuine South Asian star.
India’s great friend | Ties between New Delhi and Hasina’s Dhaka reached unprecedented levels. Hasina ensured no anti-India group was able to operate from Bangladeshi soil. Connectivity and trade flourished. Transit and trans-shipment, especially to India’s Northeast, became a reality. Bilateral maritime and land boundary issues were resolved.
The fall | But where Hasina tripped up was in her handling of domestic politics. She decimated the opposition space, even had a bizarre experiment where the designated opposition party was in govt, and ruthlessly went after her govt’s critics. The draconian Digital Security Act, 2018 was used to muzzle free speech across social and mass media. This lack of an official opposition created a political vacuum that eventually attracted street protests. Add to this recent economic woes engendered by Covid and the Ukraine war, which created a serious cost-of-living and unemployment crisis, manifesting in the anti-jobs-quota protests last month. Multiple factors created a perfect storm.
Future uncertain | Bangladesh has a mixed record with interim/ caretaker govts. The one between 2007-2008 unsuccessfully tried a minus-two formula to eliminate Hasina and her rival Khaleda Zia from politics. Plus, last week Hasina had branded Jamaat-e-Islami as a terror organisation. But Jamaat was part of the all-party discussions with the army chief. And India’s experience with the last BNP-Jamaat govt wasn’t pleasant. Then there’s the issue of protection of Bangladesh’s Hindu minority and security along the Indo-Bangla border. China, Pakistan will be sniffing opportunities. New Delhi faces a huge diplomatic challenge.
Date: 06-08-24
India, Show Goodwill Towards BangladeshLeverage relations with other global powersET Editorials
Like nature, Bangladesh abhors a vacuum. Following escalation in violence and protests demanding her ouster, Sheikh Hasina stepped down as PM on Monday, bringing to an end 15 years of Awami League’s power grip on the country. Recognising the wave of sheer popular anger against her, Hasina promptly left Bangladesh. Army chief Waker-Uz-Zaman announced that an interim government would be in place by nightfall. Bangladesh’s position remains precarious, its trajectory uncertain. New Delhi needs to lean on to the new dispensationin-the-making and ensure that, despite finding an ally all this while in Hasina, it sincerely wants what’s best for the Bangladeshi people.
Considerable economic difficulties, which also contributed to the growing anti-Hasina sentiment, will remain a challenge for Bangladesh and its citizenry. India has been a reliable partner for post-pandemic Bangladesh as well as after the energy crisis resulting from Russia’s war in Ukraine. New Delhi must convey to the post-Hasina administration, and others in the political-military establishment, that India’s support will continue. As the major power in the region, it mustn’t be shy about this. India should also leverage its relations with other global powers to help bring stability to Bangladesh.
China will be pleased to see the back of Hasina and her Awami League for its friendly relations with India. It may try to harness prevailing anti-India sentiment. With opposition leader Khaleda Zia’s Bangladesh Nationalist Party and the radical Bangladesh Jamaat-e-Islami known to be inimical to India — they had reportedly piggybacked the last phase of anti-Hasina protests — New Delhi will need to act fast. Above all, it’ll have to demonstrate goodwill to Bangladesh’s people.
Date: 06-08-24
Take Tech Cheese To Avoid the TrapET Editorials
The World Bank’s warning that India and 100 other countries face a middle-income trap, where they will struggle to grow beyond 25% of US per-capita income, should reinforce public policy of the previous decade. The pathway out of the trap, from historical experience, is free markets and tech adoption. Indian companies must grow much faster than they have and become technology innovators to offer jobs to the country’s workforce before it starts shrinking. This involves freeing up factor markets for land, labour and capital at an accelerated pace.
Alongside, the government must push investment, its own and the private sector’s. The nature of public sector investment should prioritise skilling as industrial demand for labour rises.
This is broadly the playbook India has adopted, with limited success. Policymakers are aware of the window of opportunity presented by its demographic dividend, and, so, there is a sense of urgency in pushing the economy to take off during the next quarter-century. Technology transfer can be speeded up by plugging into global manufacturing value chains. An ecosystem for growth is being created through public infrastructure, both physical and digital, for small enterprises. But progress on land and labour reforms has been slow. Stakeholders such as state governments and private investors are yet to come on board on the scale needed. This restricts capital flows into employment-generating businesses.
The pace of economic liberalisation since the 1990s no longer serves India. Although the previous decade has seen a significant improvement, it does not approach the escape velocity needed. Countries that have escaped the middle-income trap have compressed their economic transformation within a generation. The prospects of that happening in India are slim on account of its fractious politics. It would be a shame if the country does not make the effort while it has the chance. Greater effort must go into building the political consensus over deeper reforms.
Date: 06-08-24
भारत के संदर्भ में विश्व बैंक की रपट के अर्थसंपादकीय
विश्व बैंक का कहना है कि भारत की वर्तमान विकास दर के हिसाब से इसे अमेरिका की प्रति व्यक्ति आय का एक चौथाई हासिल करने में अभी 75 वर्ष और लग सकते हैं जबकि चीन को 10 वर्ष। लेकिन इससे भी बड़ी चिंता इस बात की है कि अगर भारत, चीन सहित 100 अन्य देशों ने विकास की सीक्वेन्शिअल (अनुक्रमिक) नीति नहीं अपनाई तो ये कुख्यात ‘मध्य आय के जाल’ में फंस सकते हैं। बैंक की सलाह है कि यह देश अपने-अपने विकास के वर्तमान स्तर का आकलन करें और ‘एक से तीन आई’ के फॉर्मूले पर जाएं। बैंक के अनुसार पहले चरण में निवेश, दूसरे चरण में इन्फ्यूजन यानी विदेशों से तकनीकी हासिल कर उन्हें देश में विस्तार देना और अंतिम चरण- इनोवेशन ( स्व – आयोजित नवीकरण) में भी जाएं। ‘वर्ल्ड डेवलपमेंट रिपोर्ट 2024 द मिडिल इनकम ट्रैप’ शीर्षक से आई विश्व बैंक की ताजा रपट में भारत ही नहीं, चीन को ताकीद की गई है। कि वे विकास की प्रक्रिया में क्रमवार चलें वरना मध्य आय जाल में फंस सकते हैं। भारत पहला ‘आई’ तो पार कर चुका है लेकिन अभी भी मध्य आय वर्ग में आने के लिए इस निवेश को तकनीकी कौशल हासिल करने के उपक्रम में लगाना होगा। सेमीकंडक्टर के उत्पादन के लिए दुनिया के केंद्र बिंदु रहे ताइवान को भरोसा दिलाने में भारत सरकार लगी है। यह अलग बात है कि अभी तक ताइवान की एक छोटी कंपनी ने ही टाटा के साथ केवल फाउंडरीज के लिए तकनीकी देने का ( न कि निवेश का ) समझौता किया है। दूसरी ओर, कृषि क्षेत्र में भी नवोन्मेष की जरूरत है। खेती में सिंचाई के नए तरीके विकसित किए जाएं। फिलहाल, भारत की प्रति व्यक्ति आय (जीडीपी पर कैपिटा ) 2,484 डॉलर है, जबकि अमेरिका की 81,695 डॉलर और चीन की 12,614 डॉलर है।
Date: 06-08-24
बांग्लादेश में तख्तापलट के हमारे लिए मायनेअभिजीत अय्यर मित्रा, (सीनियर फेलो, आईपीसीएस )
बांग्लादेश में हुए तख्तापलट ने दक्षिण-एशिया क्षेत्र में उथल-पुथल मचा दी है। प्रधानमंत्री शेख हसीना को देश छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा है और उनका भविष्य अनिश्चित है। लेकिन इससे भी बड़ा सवाल यह है कि आखिर वहां पर ऐसा क्यों हुआ और अब भारत के पास क्या विकल्प हैं। बांग्लादेश में इसी साल चुनाव हुए थे, जिनमें विवादास्पद परिस्थितियों में शेख हसीना की अवामी लीग को भारी बहुमत मिला था। हालांकि चुनाव से पहले ही वहां पर विपक्ष का दमन शुरू हो गया था। शेख हसीना को लगता था कि फौज के हाथ मजबूत करके, उसे वह सब देकर जो वह चाहती है, फौजी अधिकारियों के स्पष्ट भ्रष्टाचार को नजरअंदाज करके वे उन्हें अपने पाले में कर लेंगी और वो उनके प्रति वफादार रहेंगे। आखिर 2009 में जब अर्धसैनिक बांग्लादेश राइफल्स ने तख्तापलट करने की कोशिश की थी, तो फौज ने हसीना का ही साथ दिया था। तो क्या अब फौज ने हसीना को दरकिनार कर दिया है? ऐसा पूरी तरह से सच नहीं है, क्योंकि शेख हसीना ने बांग्लादेशी वायुसेना के विमान से ही देश छोड़ा है। न ही वहां के सैन्य प्रमुख हसीना के आलोचक हैं।
सवाल उठता है कि ऐसे हालात क्यों बने और इस बार सेना के हाथ-पैर क्यों फूल गए? कई सालों से यह तर्क दिया जा रहा था कि बांग्लादेश जैसी स्थिति में- जहां विपक्ष कमजोर है- फौज ही विपक्ष की भूमिका निभाएगी। लेकिन समस्या यह है कि अगर सेना ऐसा करती है, तो उसे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का सामना करना पड़ेगा, और बांग्लादेश इसका बिल्कुल भी सामना नहीं कर सकता। कुछ का निष्कर्ष है कि फौज दबाव से कुछ राहत चाहती थी, इसलिए वह अंतरिम नागरिक सरकार बना रही है, जिसके सफल होने की कोई संभावना नहीं है। ऐसे में हसीना की सत्ता में वापसी की गुंजाइश कायम रहेगी।
यह ध्यान में रखा जाना चाहिए कि अमेरिका ने बांग्लादेश के चुनावों में हुई धांधली की तो निंदा की थी, लेकिन पाकिस्तान के चुनावों को सराहा था। इसी की प्रतिक्रिया में अपनी हाल की वॉशिंगटन यात्रा के दौरान शेख हसीना ने अमेरिकी सरकार के अधिकारियों से बातचीत करने से इनकार कर दिया था और इसके बजाय अमेरिका-बांग्लादेश चैंबर ऑफ कॉमर्स के कार्यालयों में बैठकें की थीं। दांव पर बांग्लादेश द्वारा खोजे गए विशालकाय ऑफशोर गैस भंडार हैं। चीन के साथ हसीना की सांठगांठ अमेरिका को रास नहीं आ रही थी। लेकिन वे बीजिंग के प्रति भी बेसब्र बनी हुई थीं। वे अपनी चीन यात्रा को बीच में ही छोड़कर गुस्से में घर लौट आई थीं।
ऐसे में किसी को आश्चर्य नहीं हुआ था, जब पिछले महीने 1971 के योद्धाओं और उनके परिवारों के लिए कोटा के मुद्दे पर विरोध-प्रदर्शन शुरू हो गए। ध्यान रहे कि उन विरोध-प्रदर्शनों के बाद बांग्लादेश के सर्वोच्च न्यायालय ने अधिकांश कोटा को खत्म कर दिया था। फिर नए विरोध-प्रदर्शन किस बारे में हो रहे थे? इन आरोपों को लेकर कि शेख हसीना तानाशाह और गैर-लोकतांत्रिक हैं। वैसे भी बांग्लादेश में बार-बार किसी न किसी मुद्दे पर विरोध-प्रदर्शन होते रहते हैं, क्योंकि वहां एकमात्र बचा हुआ विपक्ष- जमात-ए-इस्लामी- नहीं जानता कि कब उनकी किस्मत चमक जाएगी।
बांग्लादेश के हिंदू ऐतिहासिक रूप से अवामी लीग, शेख हसीना और उनके पिता मुजीबुर्रहमान के समर्थक रहे हैं। हालांकि ऐसा नहीं है कि वे हिंदू समुदाय के बहुत अच्छे दोस्त साबित हुए हों। उदाहरण के लिए शेख मुजीब विभाजन के दंगों में शामिल हुए थे, जिसके कारण 1947 में लाखों हिंदू मारे गए थे। हालांकि 1971 तक वे एक मुस्लिम होने से बढ़कर एक बांग्लादेशी के रूप में सोचते थे, जबकि पाकिस्तान ने स्पष्टतया मुस्लिम कार्ड खेला था। 1971 के बाद से और बांग्लादेश की मुक्ति में भारत की भूमिका के बाद से वहां की सभी अवामी सरकारें हिंदुओं के प्रति स्पष्ट रूप से मैत्रीपूर्ण रही हैं। ऐसे में विपक्ष ने अवामियों को एक ‘हिंदू पार्टी’ के रूप में चित्रित किया और बेरोकटोक तरीके से भारत पर निशाना साधा। वास्तव में, अवामी लीग भारत की सुरक्षा चिंताओं के प्रति संवेदनशील होने के लिए असामान्य हद तक चली गई है।
भारत के लिए यह एक बड़ा उलटफेर है। शेख हसीना ने भारत के विरुद्ध बेकार के दुष्प्रचार से इनकार कर दिया था। वे खालिदा जिया की तरह बांग्लादेश की तमाम समस्याओं के लिए भारत को दोष नहीं देने वाली थीं। इसके बजाय उन्होंने अर्थव्यवस्था पर ध्यान केंद्रित किया और इसे प्रभावशाली ढंग से संभाला। बांग्लादेश को एक समय गरीबी के लिए काम करने वाले एनजीओ के लिए स्वर्ग के रूप में जाना जाता था। अब इन एनजीओ की कोई आवश्यकता नहीं रह गई थी और बांग्लादेश ने कुछ आर्थिक-संकेतकों पर भारत को भी पीछे छोड़ दिया था। शेख हसीना न केवल भारत के साथ मित्रता सुनिश्चित कर रही थीं, बल्कि भारत में बांग्लादेशियों के प्रवास की आवश्यकता को समाप्त करके सीमा-सुरक्षा का भी ख्याल रख रही थीं। लेकिन इसका यह मतलब भी था कि भारत उन लगभग 3 करोड़ अवैध बांग्लादेशी प्रवासियों को वापस नहीं भेज सकता था, जो यहां रह रहे हैं। अब जब बांग्लादेश में बनने जा रही नई हुकूमत यकीनन भारत के लिए बहुत मैत्रीपूर्ण नहीं होने जा रही है, ऐसे में भारत इन प्रवासियों को वापस भेजने की शुरुआत कर सकता है।
यहां यह याद रखा जाना चाहिए कि श्रीलंका के विपरीत बांग्लादेश की बगावत आर्थिक तंगहाली के चलते नहीं हुई है और पाकिस्तान के विपरीत वहां पर फौज की मुखालफत में लोग नहीं उमड़े हैं। ऐसे में शेख हसीना के पास वहां पर सत्ता में वापसी की गुंजाइश अभी बाकी है।
Date: 06-08-24
बेहाल बांग्लादेशसंपादकीय
करीब सात महीने पहले फिर से सत्ता में आईं बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना को जिस तरह आनन-फानन देश छोड़कर भारत आने के लिए विवश होना पड़ा, उससे यही पता चलता है कि हालात किस कदर उनके खिलाफ हो गए थे। इसे इससे भी समझा जा सकता है कि उनका इस्तीफा मांग रहे प्रदर्शनकारियों ने उनके सरकारी आवास में घुसकर तो तोड़फोड़ की ही, उनके पिता एवं बांग्लादेश के राष्ट्रपिता कहे जाने वाले शेख मुजीब की प्रतिमा को क्षतिग्रस्त करने के साथ उनके नाम पर बने एक संग्रहालय को भी जला दिया। जैसी आशंका थी, शेख हसीना के पलायन करते ही सेना ने सत्ता संभाल ली और मिली-जुली अंतरिम सरकार बनाने की घोषणा की। शायद सेना इसकी तैयारी पहले से कर रही थी। शेख हसीना लगातार चौथी बार ऐसे चुनावों के जरिये सत्ता में आईं थीं, जिनका प्रमुख विपक्षी दलों ने बहिष्कार किया था। चूंकि शेख हसीना ने अपने लंबे शासनकाल में बांग्लादेश को स्थिरता प्रदान की और उसे आगे बढ़ाया, इसलिए उनकी सत्ता को कोई खतरा नहीं दिख रहा था, लेकिन कुछ समय पहले आरक्षण के खिलाफ छात्रों की ओर से शुरू हुआ आंदोलन उनके लिए मुसीबत बन गया। इस आंदोलन को शीघ्र ही शेख हसीना के सभी विरोधियों और साथ ही ऐसे कट्टरपंथी संगठनों ने भी समर्थन दे दिया, जो पाकिस्तान की कठपुतली माने जाते हैं। इसके चलते आरक्षण विरोधी आंदोलन सत्ता परिवर्तन के हिंसक अभियान में बदल गया। लगता है शेख हसीना विरोधियों की चाल भांप नहीं सकीं।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण में भारी कटौती कर दी, लेकिन विरोधी संतुष्ट नहीं हुए। वे शेख हसीना का इस्तीफा मांगने पर अड़ गए। आरक्षण विरोधी आंदोलन के दौरान बड़े पैमाने पर हुई हिंसा और उसमें तीन सौ लोगों के मारे जाने के कारण शेख हसीना की छवि एक अधिनायकवादी शासक की बनी और पश्चिमी देश विशेषकर अमेरिका उनकी निंदा करने में मुखर हो उठा। अमेरिका उनकी नीतियों से पहले से ही खफा था, क्योंकि वह मानवाधिकार और लोकतंत्र पर उसकी नसीहत सुनने को तैयार नहीं थीं। बीजिंग और नई दिल्ली के बीच संतुलन साधने की शेख हसीना की नीति से चीन भी उनसे रुष्ट था और इसी कारण उन्हें हाल की अपनी चीन यात्रा बीच में छोड़कर लौटना पड़ा था। इसकी भरी-पूरी आशंका है कि चीन ने पाकिस्तानी तत्वों के जरिये शेख हसीना विरोधी आंदोलन को हवा दी। उनका सत्ता से बाहर होना भारत के लिए अच्छी खबर नहीं, क्योंकि वह नई दिल्ली के प्रति मित्रवत थीं। यदि सेना के प्रभुत्व वाली अंतरिम सरकार चीन के प्रभाव में काम करती है तो यह भारत के लिए और अधिक चिंता की बात होगी। बांग्लादेश में एक अर्से से भारत विरोधी ताकतें सक्रिय हैं। उनका भारत विरोधी चेहरा आरक्षण विरोधी आंदोलन के दौरान भी दिखा। यह ठीक नहीं कि हिंसक प्रदर्शनकारी अभी भी हिंदुओं और उनके मंदिरों के साथ भारतीय प्रतिष्ठानों को निशाना बना रहे हैं।
Date: 06-08-24
अधिकार पर रारसंपादकीय
दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल के बीच तकरार पुरानी है। दोनों के बीच जब-तब नए विवाद उठ खड़े होते हैं। पिछले वर्ष दिल्ली नगर निगम यानी एमसीडी के चुनाव में ‘एल्डरमैन’ यानी विशेषज्ञ सदस्यों को नामित करने के मुद्दे पर खड़ा हुआ विवाद इसी की एक कड़ी था। उपराज्यपाल ने दस सदस्य नामित किए थे, जिन्हें लेकर आम आदमी पार्टी ने एतराज जताया कि ये सभी सदस्य भाजपा से संबद्ध हैं और एमसीडी के जोनों में मतदान कर चुनी हुई एमसीडी का गणित खराब कर सकते हैं। मामला सर्वोच्च न्यायालय में पहुंचा था। चुनौती दी गई कि उपराज्यपाल बिना दिल्ली सरकार के मंत्रिमंडल से सलाह लिए सदस्यों को नामित नहीं कर सकते। तब अदालत ने नामित सदस्यों को मतदान करने से रोक दिया था, पर यह आशंका जताई थी कि उपराज्यपाल द्वारा नामित सदस्य निर्वाचित एमसीडी को अस्थिर कर सकते हैं। तब लगा था कि फैसला दिल्ली सरकार के पक्ष में आएगा। मगर अब सर्वोच्च न्यायालय ने साफ कर दिया है कि उपराज्यपाल बिना मंत्रिमंडल की सलाह के, सदस्यों को नामित कर सकते हैं। यह मामला कार्यकारी फैसलों की प्रकृति का नहीं है।
पिछले एमसीडी चुनाव में आम आदमी पार्टी ने ढाई सौ में से एक सौ चौंतीस सीटें जीती थी। भाजपा को एक सौ चार सीटों पर कामयाबी मिली थी। तब उपराज्यपाल ने दस सदस्यों को नामित कर उन्हें महापौर और उपमहापौर के चुनाव में मतदान करने की इजाजत दे दी थी। इस तरह गड़बड़ी करके भाजपा के अपना महापौर बनाने की कोशिश की आशंका जताई जाने लगी थी। ऐसा चंडीगढ़ नगर निगम में भाजपा पहले कर चुकी थी। फिर, नामित सदस्यों के मताधिकार और उपराज्यपाल द्वारा सदस्यों को नामित करने के अधिकार को लेकर सवाल उठने शुरू हो गए थे। नियम के मुताबिक नामित सदस्य एमसीडी जोनों के चेयरमैन के चुनाव में हिस्सा ले सकते हैं। इससे कुछ जोनों में आम आदमी पार्टी का गणित गड़बड़ हो रहा था। अब सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद आम आदमी पार्टी उपराज्यपाल के अधिकारों को चुनौती नहीं दे सकती। हालांकि चुनावी गणित और अधिकारों की जंग में यह सवाल अपनी जगह है कि आखिर सदस्यों को नामित करने की प्रक्रिया में लोकतांत्रिक मूल्यों का कितना ध्यान रखा जाता है। एमसीडी में दस सदस्यों को नामित करने का प्रावधान इस मकसद से किया गया था कि इस तरह कुछ विशेषज्ञों को निगम में रखा जा सकेगा, ताकि उनके अनुभवों का लाभ मिल सके। मगर जिस तरह पार्टी के सक्रिय कार्यकर्ताओं को उपकृत करने की मंशा से नामित किया जाने लगा है, उससे वह तकाजा पूरा नहीं हो पाता।
दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल के बीच अधिकारों की तरकार में दिल्ली के विकास कार्यों की गति काफी प्रभावित हुई है। हर मामूली बात पर दोनों के बीच जंग छिड़ जाती है और मामला अदालत में पहुंच जाता है। कई बार उपराज्यपाल दिल्ली मंत्रिमंडल के फैसलों या मंत्रियों की सिफारिशों को रद्द कर या टाल देते हैं। इस तरह बहुत सारे काम रुक जाते हैं। जबसे केंद्र सरकार ने दिल्ली की निर्वाचित सरकार के बजाय उप राज्यपाल के अधिकारों को ऊपर रखने का कानून बना दिया है, तबसे यह स्पष्ट हो चुका है कि केंद्र सरकार खुद दिल्ली के सरकारी कामकाज में हस्तक्षेप करती है। अब आम लोग इस तनातनी से ऊब चुके हैं और उन्हें बुनियादी समस्याओं के निपटारे की आस है।
Date: 06-08-24
घटेगी वक्फ की ताकतसंपादकीय
वक्फ बोर्ड की ताकत घटाने और उसे नियंत्रित करने वाले कानून में संशोधन का केंद्र सरकार का फैसला साहस भरा कदम है। निकट भविष्य में वक्फ बोर्ड पहले की तरह किसी भी संपत्ति को स्वेच्छा से अपनी संपत्ति नहीं घोषित कर पाएंगे। कैबिनेट ने 40 संशोधन को मंजूरी दी है। साफ है सरकार वक्फ बोर्ड की मनमानी पर सख्ती के मूड में है। स्वाभाविक तौर पर सरकार के इस फैसले पर सियासी तनातनी और सरगर्मी भी तय है। कई मुस्लिम संगठन सिफारिश के विरोध में आ गए हैं। असदुद्दीन ओवैसी का तर्क है कि सरकार वक्फ बोर्ड की स्वायत्तता छीनना चाहती है, जो धर्म की आजादी के खिलाफ है। यही वजह है कि इसमें सियासी बढ़त के लिए संशोधन पेश करने से पहले भाजपा अपने सहयोगियों को साधने में जुट गई है। इसके लिए उसे जोर-आजमाइश ज्यादा करनी होगी। गौरतलब है कि वक्फ बोर्ड अधिनियन 1954 में पारित हुआ था। इसके बाद इस अधिनियम में समय के अनुसार कई संशोधन किए गए। नरसिम्हा राव सरकार ने वक्फ बोर्ड को असीमित शक्तियां दे दी थी। लाजिमी है कि कांग्रेस के साथ उसके सहयोगी पार्टियां सरकार के इस प्रस्ताव से इत्तेफाक नहीं रखती। वर्तमान में वक्फ बोर्ड के पास 8,65,644 अचल संपत्तियां हैं। अल्पसंख्यक मंत्रालय ने दिसम्बर 2022 में इसके बारे में लोक सभा में जानकारी दी थी। कहा जाता है कि रेलवे और सेना के बाद देश में संपत्ति के मामले में वक्फ तीसरा सबसे बड़ा संपत्ति मालिक है। हालांकि, सबसे अधिक विवाद वक्फ के अधिकारों को लेकर है। क्योंकि वक्फ एक्ट के सेक्शन 85 में इस बात पर जोर दिया गया है कि बोर्ड के फैसले को कोर्ट में चुनौती नहीं दी जा सकती। वक्फ बोर्ड निरंकुश हो गया और इसकी कार्यशैली पर लगाम लगाने की महती जरूरत भी है। दरअसल, वक्फ का निर्माण पिछड़े मुसलमानों के उत्थान के लिए किया गया था, लेकिन इसका सही से उपयोग नहीं किया गया, बल्कि दुरुपयोग ज्यादा किया गया। वक्फ की अरबों की संपत्ति अवैध रूप से कुछ लोगों के कब्जे में हैं, महिलाओं की भागीदारी इसमें न के बराबर है। इन सारी अनियमितताओं पर अगर सरकार ईमानदारी से काम करना चाहती है तो उसके फैसले को समर्थन देने में किसी को गुरेज नहीं होनी चाहिए। सांप्रदायिक नफा-नुकसान के तराजू पर तौलने से पहले सभी राजनीतिक दलों को हफ्ते भर बाद संसद में पेश किए जाने का इंतजार करना चाहिए। हां, बिना-वजह बयानबाजी कर माहौल खराब करने से हर किसी को बचने की जरूरत है।
Date: 06-08-24
बांग्लादेश में बजा बदलाव का बिगुलसंजय के भारद्वाज, ( प्रोफेसर, जेएनयू )
बांग्लादेश पर फिर सबकी नजर जा टिकी है। बीते दिनों से वहां जो आंदोलन चल रहा है, उसमें सामाजिक और आर्थिक मसले शामिल हैं। आंदोलनकारियों में ज्यादातर विश्वविद्यालयों के छात्र हैं, उनकी यह मांग थी कि मुक्तियोद्धाओं को जो 30 प्रतिशत आरक्षण मिलता है, उसे खत्म किया जाए, उससे बेरोजगारी बढ़ रही है, युवाओं को रोजगार नहीं मिल रहा है। ध्यान रहे, साल 1972 में मुक्तियोद्धाओं को आरक्षण दिया गया था, उसके बाद मुक्तियोद्धाओं के बच्चों को आरक्षण दिया गया और अब यह व्यवस्था कर दी गई थी कि मुक्तियोद्धाओं के पोते-पोतियों को भी आरक्षण दिया जाएगा। इसका वहां खूब विरोध हो रहा था। युवा सड़कों पर उतर आए थे। वैसे इस विरोध के भड़कने की एक वजह सियासी भी थी। चूंकि मुक्तियोद्धा ज्यादातर आवामी लीग समर्थक हैं, तो राजनीतिक विरोधियों द्वारा यह बार-बार कहा जाता था कि ये आवामी लीग के वोट बैंक हैं, इसलिए अवामी लीग उनको आरक्षण दे रही है। साल 2018 में भी जब विरोध हुआ था, तब अवामी लीग ने आरक्षण खत्म कर दिया था, पर अभी जून 2024 में अदालत से एक फैसला आया और आरक्षण को फिर लागू कर दिया गया। ऐसे में, छात्र फिर से भड़क उठे।
हालांकि, अवामी लीग की सरकार ने यह कहा था कि हम अदालत में जाएंगे, इस फैसले के खिलाफ अपील करेंगे और इसे खत्म कराने की कोशिश करेंगे। यह बात कहनी ही चाहिए कि सरकार ने इस पूरे मामले को गलत ढंग से संभाला। पुलिस ने हिंसा के माध्यम से आंदोलन को दबाने की कोशिश की। दूसरी गलती यह हुई कि शेख हसीना ने एक गैर-जिम्मेदाराना बयान दे दिया कि जो प्रदर्शनकारी हैं, वे रजाकार हैं। ध्यान रहे, रजाकार वे लोग थे, जो बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम के समय पाकिस्तानी सेना के साथ थे। इसके बाद तो विरोध कर रहे छात्र और भड़क गए। छात्रों को यह लगा कि हम शांति की बात करते हैं, पर हमें अपराधी करार दिया गया। इसके बाद ढाका में हिंसा बढ़ती गई और दो सौ से ज्यादा लोग मारे गए। सरकार ने आरक्षण को घटाकर पांच प्रतिशत तक कर दिया था, इसके बावजूद प्रदर्शनकारी संतुष्ट नहीं थे। छात्रों ने शेख हसीना से मांग कर दी कि वह छात्रों की हत्या के लिए माफी मांगें। मुक्तियोद्धाओं के नाम पर दिए जा रहे आरक्षण को सांविधानिक रूप से पूरी तरह खत्म करने के उपाय करें। चूंकि बांग्लादेश की सरकार ने इस दिशा में कोई ठोस आश्वासन नहीं दिया, इसलिए छात्रों का आक्रोश बढ़ा और बाहर से भी कुछ ताकतों ने उनका समर्थन किया।
अब दुनिया देख रही है, आंदोलन बढ़ते-बढ़ते ऐसे मुकाम पर पहुंच गया है, जहां प्रधानमंत्री शेख हसीना को सत्ता से हाथ धोना पड़ा है। अब सेना प्रमुख ने एलान किया है कि अंतरिम सरकार बनाएंगे।
वैसे, बांग्लादेश में यह विरोध अचानक प्रकट नहीं हुआ है, शेख हसीना ने कुछ और भी गड़बड़ियां की थीं या कुछ बड़ी कमियों पर लगाम लगाने में नाकाम रही थीं। अव्वल तो लोकतंत्र को इन्होंने प्रभावित किया था। पिछले दो चुनावों से लोगों की भागीदारी बहुत कम थी। साल 2024 के चुनाव में बमुश्किल 40 प्रतिशत लोगों ने हिस्सा लिया, इसमें भी विपक्षियों ने आरोप लगाया था कि आंकड़ों को मैनेज किया गया।
इसके अलावा स्थानीय निकायों के चुनाव में भी गड़बड़ियों को अंजाम दिया गया। लोकतांत्रिक ढंग से चुनाव होने के बजाय परिवारवाद का बोलबाला रहा। निकायों में ज्यादातर पद रेवड़ियों की तरह रिश्तेदारों में बंटने लगे थे। बांग्लादेश में भ्रष्टाचार भी बढ़ गया था। भाई-भतीजावाद बढ़ने की शिकायत आम लोग करने लगे थे। यह बात सरकार के पक्ष में नहीं थी। सरकार कहीं न कहीं निचले स्तर पर लोकतांत्रिक राष्ट्र की भावना को कायम नहीं रख पा रही थी। इसके अलावा, भ्रष्टाचार भी बढ़ गया था। रोजगार या शिक्षण संस्थानों में भ्रष्टाचार बढ़ गया था। इन तमाम समस्याओं ने मिलकर बांग्लादेश में एक बड़ी घटना को अंजाम दे दिया। तोड़फोड़ और हिंसा बढ़ने लगी, नौबत ऐसी आ गई कि प्रधानमंत्री को हटने के लिए मजबूर होना पड़ा। प्रधानमंत्री आवास खाली करके जाना पड़ा।
यह ध्यान देने की बात है कि मुख्य विपक्षी बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) के समर्थक भी लगातार नाराज चल रहे थे। वैसे, बीएनपी के नेता कमोबेश अपनी विश्वसनीयता गंवा चुके थे। साल 2014 के चुनाव का भी इसने बहिष्कार किया था और साल 2024 के चुनाव का भी। चुनावों के बहिष्कार की वजह से निचले स्तर पर बीएनपी का समर्थन घट गया था। अब इसमें कोई दोराय नहीं कि छात्रों में फैली नाराजगी का फायदा बीएनपी के नेताओं ने भी उठाया है। ऐसे हालात पैदा हो गए कि हसीना सरकार का नियंत्रण कमजोर पड़ गया।
यहां श्रीलंका की भी याद आ रही है। जिस प्रकार से राजधानी कोलंबो में लोगों ने सड़क पर निकलकर राजपक्षे की सरकार को पलट दिया था, ठीक उसी प्रकार के दृश्य ढाका में भी दिखे हैं और राजपक्षे की तरह शेख हसीना को भी देश छोड़ जाना पड़ा है।
बहरहाल, अब बांग्लादेश में क्या होगा? सेना निष्पक्ष अंतरिम सरकार की बात कर रही है, क्या उसमें सभी पार्टियों के सदस्य शामिल होंगे? सरकार चलाने की जिम्मेदारी नेताओं को दी जाएगी या जन-सेवकों को?
खैर, अब बांग्लादेश में सेना चाहती है कि जनता सहयोग करे,तो देश में माहौल को सुधारा जा सके। अब पहला सवाल तो यह पूछा जा रहा है कि बांग्लादेश में जो विकास परियोजनाएं चल रही हैं, उनका क्या होगा? ऐसा लगता है कि वहां कोई भी सरकार यह नहीं चाहेगी कि देश की तरक्की रुके। भारत, चीन और जापान के साथ मिलकर बांग्लादेश अपनी विकास परियोजनाएं चला रहा है।
सवाल यह भी उठता है कि भारत को अभी क्या करना चाहिए? वैसे जिस नेता या समूह को पश्चिमी देशों का समर्थन होगा, उसके पक्ष में भारत खड़ा हो जाएगा। भारत चाहता है कि बांग्लादेश में शांति रहे, स्थिर सरकार रहे, ताकि तेज विकास हो। भारत को किसी पार्टी विशेष के साथ संबंध न रखते हुए बांग्लादेश के विकास के पक्ष में खड़े रहना चाहिए। ध्यान रहे, पहले भी अंतरिम सरकार के साथ भारत के संबंध अच्छे रहे हैं। जो भी सरकार बनेगी, वह भारत के साथ अच्छे संबंध ही रखना चाहेगी।
भारत यही उम्मीद करेगा कि बांग्लादेश में जल्दी शांति और स्थिरता स्थापित हो। बेशक, वहां आम जनता के अनुकूल समाधान का इंतजार रहेगा।
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हाल ही में नई दिल्ली में बिम्सटेक (बे ऑफ बंगाल इनिशिएटिव फॉर मल्टी सेक्टोरल टेक्नीकल एण्ड इकॉनॉमिक कोऑपरेशन) के विदेश मंत्रियों की दो दिवसीय बैठक हुई है।
कुछ बिंदु –
‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 16 जुलाई, 2024
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Date: 05-08-24
Mining, For States to Tax and Take CareET Editorials
In an important judgment crucial to India’s mineral-rich states like Jharkhand, West Bengal, Odisha, UP, Madhya Pradesh, Karnataka and Goa, last week, the Supreme Court affirmed that state governments have the authority to levy taxes on mineral rights, despite the regulatory framework established by the Mines and Minerals (Development and Regulation) Act 1957. The court found royalty not to be tax, thereby limiting the scope of Parliament’s control over state taxation of mineral rights. This verdict is welcome.
It means enhanced revenue for states, many of which are resource-rich but poor. It underscores states’ autonomy in a federal structure and, importantly, clarifies the scope of MMDR Act, distinguishing between regulation of minerals (a central domain) and taxation of minerals (a state domain). This has been long-pending and will, hopefully, avoid future conflicts over jurisdiction. Importantly, CJI D Y Chandrachud pointed out that states have limited room for taxation, with most rights residing with the Centre. While it could be a windfall for states, they will now also have the responsibility of spending on development and bear liabilities. Mining companies have warned that the extra costs could be passed on to customers, so states will have to tax sustainably.
All is not done yet. On the day the top court gave its ruling, the Centre, along with a batch of mining companies, argued that the judgment should be applied prospectively to prevent confusion, legal challenges and associated administrative burdens. The apex court has reserved its decision. A middle ground would be to go for the prospective application of the ruling to limit the impact on mining companies and ensure that the new regime can begin on a fresh note.
Date: 05-08-24
लैंगिक समानता की दिशा में सही कदमऋतु सारस्वत, ( लेखिका समाजशास्त्री हैं )
नारी सशक्तीकरण को लेकर प्रतिबद्धता व्यक्त करते हुए सरकार ने हालिया बजट में लड़कियों एवं महिलाओं को लाभ पहुंचाने वाली योजनाओं के लिए तीन लाख करोड़ रुपये आवंटित किए। इस राशि का उपयोग महिलाओं के कौशल विकास कार्यक्रम, स्वयं-सहायता समूहों के लिए बाजार तक पहुंच को सक्षम बनाने और उन्हें विनिर्माण क्षेत्र में रोजगार देने में होगा।
इन कदमों से कामकाजी आबादी में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने में मदद मिलेगी। आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार शिक्षा और कौशल विकास तक बढ़ती पहुंच के चलते महिला श्रमशक्ति भागीदारी दर 2017-18 में 23.3 प्रतिशत से बढ़कर 2022-23 में 37 प्रतिशत हो गई। वित्त वर्ष 2024-25 में ‘लैंगिक बजट’ पर सरकार का खर्च अब तक व्यय की जाने वाली राशि में सर्वाधिक होगा। अब यह सरकार के कुल व्यय का 6.5 प्रतिशत हो चुका है। पिछले दो दशकों का यह औसत 4.8 रहा है।
भारत में लैंगिक बजट वित्त वर्ष 2005-06 में यह सुनिश्चित करने के लिए शुरू किया गया कि विकास के लाभ से आधी आबादी वंचित न रहने पाए। अन्य अनेक देशों ने भी कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए लैंगिक दृष्टि से संवेदनशील बजट बनाने शुरू किए हैं। वैश्विक स्तर पर ऐसे बजट बनाने की शुरुआत 1984 में आस्ट्रेलिया ने की, जिसका अनुसरण कई देशों ने किया।
किसी भी देश के लिए लैंगिक समानता के सभी आयामों तक पहुंच बनाने के लिए जितना अधिक महत्वपूर्ण लैंगिक दृष्टि से संवेदनशील बजट बनाना होता है, उतना ही आवश्यक लैंगिक समानता पर दृष्टि रखने के लिए व्यापक प्रणालियों को विकसित करना भी। सक्षम प्रणालियों के बिना देश लैंगिक समानता कानूनों और नीतियों को लागू करने के लिए संसाधनों का आवंटन और व्यय नहीं कर सकते।
2013 में मोरक्को के वित्त मंत्रालय ने लैंगिक दृष्टि से संवेदनशील बजट के लिए उत्कृष्टता केंद्र की शुरुआत की, जो सांसदों को जानकारी प्रदान करता है कि स्थानीय और राष्ट्रीय स्तर पर सार्वजनिक नीतियां लैंगिक समानता की दिशा में कैसे काम कर रही हैं? आस्ट्रिया वैश्विक स्तर पर उन देशों में अग्रणी है, जिसने संविधान में लैंगिक समानता को शामिल किया।
अपने देश में 2005-06 में लैंगिक बजट की शुरुआत के बाद मार्च 2007 में वित्त मंत्रालय के व्यय विभाग ने ‘जेंडर बजट सेल’ स्थापित किया। इसी क्रम में 2013 में लैंगिक रूप से संवेदनशील बजट को संस्थागत करने की दिशा में एक विस्तृत निर्देशिका जारी की गई।
लैंगिक समानता की बाधाओं से निपटने के लिए सरकार द्वारा विभिन्न घटकों पर काम किया जा रहा है। चूंकि लैंगिक समानता के सभी घटक अंतर्संबंधित हैं इसलिए किसी एक की अवहेलना दूसरे क्षेत्र को प्रभावित करने की क्षमता रखती है। इसी कारण सामाजिक, आर्थिक एवं राजनीतिक सशक्तीकरण के विभिन्न आयामों पर समान रूप से ध्यान दिया गया है।
दुनिया भर में हुए शोध यह स्पष्ट करते हैं कि वित्तीय स्वतंत्रता नारी सशक्तीकरण की अपरिहार्य शर्त है। वित्तीय स्वतंत्रता के मार्ग में सबसे बड़ा व्यवधान ‘प्रणालीगत पूर्वाग्रह और धारणा संबंधी’ चुनौतियां हैं, जो अक्सर वित्तपोषण करने की क्षमता सीमित कर देती हैं। समाज में परंपरागत भूमिकाएं भी महिलाओं की आत्मनिर्भरता के मार्ग को दुष्कर कर देती हैं। वित्तीय स्वावलंबन के दो आयाम हैं।
पहला, किसी रोजगार में संलग्न होना और दूसरा, स्वरोजगार। इन दोनों ही क्षेत्रों की अपनी-अपनी मुश्किलें हैं। शहरी क्षेत्र में रोजगार में संलग्न महिलाओं के मार्ग की सबसे बड़ी बाधा सुरक्षित और किफायती आवास है। इससे भी अधिक चुनौतीपूर्ण स्थिति कामकाजी माताओं की है। ‘वुमेन इन इंडिया इंक एचआर मैनेजर्स सर्वे’ के अनुसार 34 प्रतिशत महिलाएं कार्यजीवन में असंतुलन के कारण नौकरी छोड़ देती हैं।
केंद्रीय बजट में वित्त मंत्री ने कामकाजी महिलाओं के लिए छात्रावास स्थापित करने का प्रविधान करके कार्यबल में महिलाओं की अहम भूमिका को मान्यता दी है। इन छात्रावासों का उद्देश्य महिलाओं को सुरक्षित एवं अनुकूल परिवेश प्रदान करना है, जिससे वे सुविधा और सुरक्षा से समझौता किए बगैर कार्य कर सकें। इसके साथ ही कामकाजी माताओं के लिए पेशेवर और व्यक्तिगत उत्तरदायित्व के बीच संतुलन बनाने के लिए क्रेच की घोषणा यह स्पष्ट करती है कि सरकार का लक्ष्य महिलाओं को कार्यबल में शामिल करने का है, जिससे वे सशक्त बन सकें।
इस बार बजट में उन महिलाओं की ओर भी विशेष ध्यान दिया गया है, जो उद्यम स्थापित करना चाहती हैं। एमएसएमई क्षेत्र में सबसे ज्यादा महिलाएं हैं, जो बिना किसी गारंटी के ऋण पाने के लिए संघर्ष करती हैं। इन महिलाओं के लिए मुद्रा ऋण की ऊपरी सीमा को दोगुना करके 20 लाख किया जाना उत्साहवर्धक है। आर्थिक सशक्तीकरण महिलाओं की बाजारों और संसाधनों तक पहुंच सुनिश्चित करता है और उनकी क्रयशक्ति बढ़ाता है।
आत्मनिर्भर महिलाएं घर एवं बाहर, दोनों ही जगह निर्णय लेने की क्षमता रखती हैं। वित्तीय स्वतंत्रता घरेलू हिंसा से मुक्ति का मार्ग भी है। बजट 2024-25 की घोषणाएं लैंगिक समानता और नारी सशक्तीकरण के प्रति सरकार की संवेदनशीलता को तो स्पष्ट कर रही हैं, पर उनकी असल चुनौती क्रियान्वयन के मोर्चे पर है।
महिलाओं को कौशल प्रदान करने या उनके स्वयं सहायता समूहों को सशक्त बनाने की ज्यादातर पहल नेक इरादों से शुरू होकर बाद में अपनी गति को प्राप्त हो जाती है, इसलिए धन आवंटित करना ही पर्याप्त नहीं। इसके साथ एक ऐसे तंत्र को भी स्थापित करने की आवश्यकता है, जो यह सुनिश्चित करे कि लाभार्थियों को बिना किसी बाधा के बजट में प्रस्तावित वित्तीय सुविधाएं प्राप्त हों।
Date: 05-08-24
मुकदमेबाजी में समझौतासंपादकीय
भारत के प्रधानमंत्री जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ ने दोटूक कहा है कि लोग अदालतों से ‘इतने तंग आ गए हैं कि वे बस समझौता चाहते हैं। वे कहते हैं कि वस, अदालत से दूर करा दीजिए। जस्टिस चंद्रचूड़ विशेष लोक अदालत सप्ताह के दौरान शनिवार को एक कार्यक्रम को संबोधित कर रहे थे। वैकल्पिक विवाद निवारण तंत्र के रूप में लोक अदालतों की भूमिका पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि लोगों में इस प्रकार की भावना उपरना बतौर जज हम लोगों के लिए गहन चिंता का विषय है। बेशक, लोगों का अदालती मामलों से त्रस्त होकर छुटकारा पाने उत्कट इच्छा न्याय व्यवस्था के लिए कोई अच्छी बात नहीं है। इससे संदेश यह निकलता है कि व्यवस्था लोगों की अपेक्षाओं पर खरी नहीं उतर पा रही है। और इसलिए उन्हें मजबूरी में मामलों में समझौता करने की राह चुनना बेहतर लगता है। समझौता कोई न्याय नहीं है, बल्कि मजबूरी में किया गया उपाय है, जो समाज में पहले से मौजूद असमानताओं को ही दर्शाता है। जैसा कि प्रधान न्यायाधीश ने भी हंगित किया है कि यह स्थिति अपने आप में सजा है। लोक अदालत की अवधारणा इस स्थिति से निजात दिलाती हैं जहां आपसी समझते और सहमति से मामलों को सुलटाया जाता है और कोई भी अपने आप को मजबूर या न्याय से वंचित हुआ नहीं पाता। लोक अदालत से मामले का निस्तारण होने पर फैसले के खिलाफ अपील नहीं की जा सकती। सबसे अच्छी बात यह है कि फैसला परस्पर सहमति के आधार पर किया जाता है। कहना न होगा कि तमाम मामले ऐसे होते हैं, जिन्हें आपसी सहमति से सुलझाया सकता है। सबसे बड़ा तो यह कि लोक अदालत के माध्यम से न्याय दिया जाना अदालतों पर मुकदमों के भार को कम करने की दिशा में एक महत्त्वपूर्ण उपक्रम है। यहां फैसला किसी भी रूप में थोपा हुआ करार नहीं दिया जा सकता। इसलिए जरूरी है कि लोक अदालत की अवधारणा को संस्था के रूप मजबूत किया जाए। न्याय की पहुंच आम नागरिकों तक सुनिश्चित करने की बात हमारे संविधान में निहित है, लेकिन नौबत यह है कि आम जन न्याय पाने की बजाय हलकान ज्यादा हो जाता है। यह स्थिति लोकतांत्रिक समाज में स्वीकार्य नहीं हो सकती। जिस समाज में आम जन को न्याय पाने में हलकान होना पड़ जाए उसे किसी भी सूरत में अभीष्ट या आदर्श समाज नहीं कहा जा सकता। लोक अदालत सार्थक है क्योंकि इनका उद्देश्य ही लोगों के घरों तक न्याय पहुंचाना है।
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हाल ही में प्रकाशित संयुक्त राष्ट्र आर्थिक और सामाजिक मामलों के विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, इस सदी के अंत तक विश्व की आबादी के 10.3 अरब होने का अनुमान है। इसका अर्थ है कि दुनिया में लोग कम होंगे, लेकिन वे लंबे समय तक जीवित रह सकने लायक होंगे। इसका अर्थव्यवस्था पर क्या प्रभाव पड़ सकता है।
कुछ बिंदु –
‘द इकॉनॉमिक टाइम्स‘ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 13 जुलाई, 202
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Date: 03-08-24
Hone In on Those Who Need Help MostStronger focus on economics for quota-shapingET Editorials
This week, the Supreme Court allowed state governments to create sub-categories within SCs and STs, allowing benefits of reservations to reach the most needy subgroups within these categories. Economics doesn’t provide ready answers to the question of how quotas, or any other form of affirmative action, affect the incentive structure in competitive environments. Both the preferred and non-preferred groups can slacken their effort, respectively, on account of necessity and futility. Yet, there’s evidence to suggest a moderate degree of discrimination among two sets of contestants can be designed in public policy to improve incentives on either side of the divide. This causality, however, breaks down if discrimination is stronger (more quotas) or if the contest is among multiple sets (more sub-quotas). Each category of discrimination adds to the interplay of adverse incentives among all the contestants.
The incentive to perform among the preferred group is negatively correlated to the emergence of an even more preferred group within itself. The extra-preferred group will, on its part, have to be induced out of its historical discrimination to match up to performance of the less-preferred group. The nonpreferred group will have no reason to perform differently if the overall quota stays intact. The incentive structure splinters with heterogeneous affirmative action. It splinters further when contestants are forced to remain within preference groups. To retain its incentive structure, the top layer of the preferred group must surrender its preference. A golfer’s handicap improves with his game.
Subdivision of quotas will have to be a dynamic process to accommodate mobility of the top and bottom layers, and intermediate ones too. The process is an open auction of deprivation subject to judicial review. This is complicated by the politics of preference among competing groups. The most deserving groups may not have the political representation needed to secure their place in the hierarchy of discrimination. Stronger emphasis on economics to establish disadvantage and degree of discrimination it calls for could make the process less tricky. Effects on incentives must also figure in this decision process.
Date: 03-08-24
Mountain-Making Out Of Molehills by PoliceET Editorials
Minor offences are, by their very definition, minor offences. But the knack of our law-and-order authorities frequently making a mountain out of a molehill seems to be a feature that goes with the police’s other frequent shortcoming: making a molehill out of a mountain — that is, not taking serious crimes committed seriously. Take the arrests of youngsters in Bihar and the separate questioning of a bunch of boys in Gujarat last month ostensibly for waving Palestinian flags ahead of a Muharram procession. The charge? ‘Attempting to disturb communal peace.’ Talk about the dangers of police straitjacket profiling.
The arrests and questionings were made not on the basis of threat perceptions but solely on a complaint against the video recording of the flag-waving. Supporting an ‘international cause’ by waving a Palestinian flag isn’t even a ‘minor offence’. No discord was fomented. But the police — themselves stating that the ‘boys had no idea of the conflict in faraway Gaza’ — overreacted against yet another set of ‘soft targets’ engaged in a ‘trending’ activity for many young people across the world.
Old-fashioned ideas of community policing and neighbourhood engagement makes sense. The police, across states, need to be more connected with the communities that they serve. It helps reduce antagonism between law enforcement and civil society, the two speak the same language, helps nip criminals in the bud, and provides young people with a safe space to blow some steam and engage in perfectly legit activities.
Date: 03-08-24
Weakest firstAllowing sub-quotas to least advanced among SCs deepens social justiecEditorial
The jurisprudence of affirmative action has been evolving constantly. From a notion of formal equality rooted in a general principle of non-discrimination, it has reached a point where the aim is substantive equality. Reservation is no more seen as an exception to the equality norm, but as a deepening of the idea of equality by embracing diversity and accommodation of those suffering from historical and social disabilities. The latest Supreme Court judgment allowing States to classify Scheduled Castes (SC) into groups and give preferential treatment to the weaker and more backward among them is in line with this progression. By a majority of 6:1, the Court has rejected the idea that the SCs constitute a single homogenous class and that sub-classification will violate the equality rule. The verdict dislodges a 2005 Constitution Bench judgment (E.V. Chinnaiah vs AP) that had struck down an Andhra Pradesh law classifying SC communities into groups as unconstitutional. The Court had then ruled that once the President notifies the list of SCs under Article 341, Parliament alone could modify it by law, and that States were barred from “tinkering” with the list. This judgment was cited by the Punjab and Haryana High Court while quashing a preferential sub-quota for Balmikis and Mazhabi Sikhs within the SC quota. When the matter came to the apex court, a Bench doubted the correctness of E.V. Chinnaiah and referred the question to a larger Bench.
The majority verdict is based on a clear recognition that SCs do not constitute a homogeneous class. Under the Presidential List, they have a common constitutional status, but it does not mean that there are no differences in the extent of backwardness among them. A history of untouchability is indeed a common feature among them, but there is historical and empirical evidence that the level of advancement is not uniform. States are empowered to further identify the weaker sections among SCs and extend beneficial treatment. Four judges have taken the view that excluding the “creamy layer” among the SCs from reservation benefits is necessary to give full effect to the principle that the weakest should get the benefits of affirmative action and not be elbowed out by those more advanced than them. Applying the ‘creamy layer’ concept, hitherto confined to OBCs may not be easy. Justice B.R. Gavai, who writes in support of the exclusion of the better-off among the SCs, also notes that the creamy layer norms cannot be the same as those prescribed for the OBCs. The exclusion of the more advanced sections among Dalits was not an issue before the Bench, and the opinions may be non-binding as of now. While excluding the creamy layer may happen some day, the focus should be on the marginalised among Dalits getting adequate representation.
Date: 03-08-24
राजनीति की भेंट न चढ़ जाए कोर्ट का यह फैसलासंपादकीय
सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ का फैसला जाति, उप-जाति में बटे भारतीय समाज के लिए क्रांतिकारी हो सकता है। कोर्ट ने सरकारों को तार्किक, वैज्ञानिक और स्पष्ट पैमानों पर एससी-एसटी वर्ग में भी अति पिछड़ों को अलग कोटा देने की बात कही है। फैसले के अनुसार अब गेंद सरकारों के पाले में है। क्या वे वोट खोने के डर से उन उप-जातियों के लाभ का कोटा कम करेंगी, जिनकी संख्या ज्यादा है। और लाभ भी ? कोर्ट के आदेश के बाद क्या सरकारें कोई स्वचालित प्रक्रिया बनाएंगी, जिसके तहत हर पांच वर्ष के बाद इसके लाभार्थियों का संख्यात्मक आकलन किया जाए? शायद भारत की राजनीतिक पार्टियों से इतनी ईमानदार कोशिश की अपेक्षा करना सच्चाई से मुंह मोड़ना होगा | यानी फैसले में सन्निहित मकसद हासिल करना तो दूर, समाज में वैमनस्य और बढ़ने की भी आशंका है। उधर पिछड़े वर्गों में जातिगत गणना की मांग पहले से ही चल रही है और अब इस फैसले के बाद पिछड़े वर्ग में ऐसे ही वर्गीकरण की मांग होगी। फैसले में एक जज ने पिछड़ों के लिए पहले से चल रही क्रीमी लेयर की अवधारणा को अनुसूचित जाति के केस में भी लागू करने को कहा है। पर भूलें नहीं कि कुल नौकरियों में सरकारी नौकरियों का प्रतिशत मात्र 2.8 है। अनुसूचित जाति-जनजातियों के उत्थान के लिए कुछ और भी करना होगा।
Date: 03-08-24
क्वाड को लेकर बढ़ती अनिश्चितताऋषि गुप्ता, ( लेखक एशिया सोसायटी पालिसी इंस्टीट्यूट, दिल्ली में सहायक निदेशक हैं )
विदेश मंत्री एस. जयशंकर बीते दिनों क्वाड की बैठक में शामिल होने के लिए टोक्यो गए थे। इससे पूर्व इस समूह की बैठक दस महीने पहले न्यूयार्क में हुई थी। भू-राजनीतिक परिदृश्य पर हो रहे परिवर्तनों के संदर्भ में टोक्यो में हुई बैठक खासी महत्वपूर्ण थी। विशेषकर हिंद-प्रशांत क्षेत्र को लेकर, जहां चीन फिलीपींस जैसे देश को दक्षिण-चीन सागर में दबाने और ताइवान की स्वायत्तता पर निरंतर आघात करने की धमकी देता आ रहा है।
ऐसे माहौल में विश्व की चार बड़ी लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं का हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शांति और नियम आधारित व्यवस्था के प्रति अपनी प्रतिबद्धता दर्शाना काफी मायने रखता है। क्वाड के माध्यम से अंतरराष्ट्रीय नियमों की बहाली के साथ वैश्विक आर्थिक वृद्धि सुनिश्चित करने के लिए प्रमुख चुनौतियों का सामना करने और आपूर्ति शृंखला को सुरक्षित बनाने पर ध्यान दिया जा रहा है। इसके साथ ही क्वाड का उद्देश्य भरोसेमंद और पारदर्शी डिजिटल साझेदारी को बढ़ावा देने की जरूरत पर ध्यान देना भी है, ताकि संकट के समय एक साझा समाधान निकाला जा सके।
आज के विश्व में समुद्री मार्ग विश्व व्यापार, डिजिटल बुनियादी ढांचे, सामरिक बढ़त और दुर्लभ खनिजों की दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण हैं। चूंकि चीन ऐसे तमाम क्षेत्रों में अपना अधिकार जताता रहा है, इसलिए क्वाड सदस्य देशों का एक स्थिर, सुरक्षित और समृद्ध हिंद-प्रशांत क्षेत्र सुनिश्चित करने के लिए सामूहिक प्रयास जरूरी है। खास बात यह है कि ये चारों देश एक लोकतांत्रिक सूत्र में बंधे हैं और विश्व शांति पर समान विचारधारा रखते हैं और वे साथ मिलकर चीन की विघटनकारी, आक्रामक और विस्तारवादी शक्ति के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं।
अपनी प्रकृति एवं स्वरूप में क्वाड बुनियादी रूप से एक सामरिक मोर्चा न होकर आर्थिक सहयोग, क्षेत्रीय और समुद्री सुरक्षा सहयोग, प्रौद्योगिकी सहयोग के साथ लोकतांत्रिक मूल्यों के समर्थन का एक मंच है, लेकिन चीन के क्षेत्रीय प्रभाव को रोकने का यह अप्रत्यक्ष प्रयास बीजिंग को रास नहीं आता।
अपने बयानों में चीन का नाम न लेना क्वाड का एक रणनीतिक निर्णय जरूर माना जा सकता है, लेकिन चीन को इसकी उपस्थिति का अखरना यही दर्शाता है कि उसे अपनी विघटनकारी और आक्रामक नीतियों का अहसास है। टोक्यो में क्वाड की बैठक के दौरान जयशंकर का कहना था कि ‘यह कोई बातचीत की दुकान नहीं, बल्कि एक मंच है जो व्यावहारिक परिणाम उत्पन्न करता है।’
उनका बयान न केवल क्वाड की एक समूह के रूप में मजबूती, बल्कि चारों सदस्य देशों भारत, अमेरिका, आस्ट्रेलिया और जापान का चीन की नीतियों के खिलाफ साथ खड़ा भी होना दर्शाता है।
पिछले सात वर्षों में क्वाड एक मजबूत पहल के तौर पर उभरा है और ऐसे मुद्दों पर साथ आया है, जो भविष्य में चिंता का सबब बन सकते हैं। टोक्यो की बैठक का एक खास मुद्दा समुद्र के नीचे बिछे डिजिटल संचार केबलों से संबंधित रहा। ऐसा माना जा रहा है कि चीन वैश्विक डिजिटल बुनियादी ढांचे को बाधित करने के लिए युद्ध रणनीति का उपयोग कर रहा है।
अमेरिकी सुरक्षा एजेंसियों ने चिंता जताई है कि चीन इन केबलों में सेंध लगाकर अपनी तकनीक का इस्तेमाल करते हुए व्यक्तिगत डाटा से लेकर बौद्धिक संपदा और गोपनीय सैन्य खुफिया जानकारी चुरा सकता है। विश्व के करीब 95 प्रतिशत डाटा की आवाजाही इन्हीं केबलों के माध्यम से होती है।
निश्चित रूप से यह एक बड़ी चिंता का विषय है। अगर भविष्य में हिंद-प्रशांत क्षेत्र में किसी भी तरह के युद्ध की स्थिति बनी तो चीन इन केबलों को काटकर संचार बाधित करने का भी प्रयास कर सकता है। ऐसे में यह आवश्यक है कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र में क्वाड देश आपसी सहयोग के साथ ऐसी समस्याओं का समाधान निकालें।
तमाम स्तरों पर बात आगे बढ़ने के बावजूद इस वास्तविकता को भी अनदेखा नहीं किया जा सकता कि कुछ स्पष्ट रणनीतियों के अभाव में क्वाड अनिश्चितता की ओर बढ़ रहा है। क्वाड देशों के राष्ट्राध्यक्षों की आखिरी बैठक जापान के हिरोशिमा शहर में मई 2023 में हुई थी और आगामी बैठक का इस वर्ष जनवरी में होना तय था, लेकिन राष्ट्रपति बाइडन की अनुपलब्धता के चलते यह नहीं हो पाई।
हालांकि अमेरिकी विदेश विभाग के प्रवक्ता ने हाल में हुई प्रेस वार्ता में राष्ट्रपति बाइडन की क्वाड नेताओं की बैठक के प्रति प्रतिबद्धता की बात तो कही, लेकिन कोई निश्चित तारीख भी नहीं बताई। राष्ट्रपति बाइडन के स्वास्थ्य और अमेरिका में हो रहे चुनावों को देखते हुए इस वर्ष भी बैठक मुश्किल दिखती है। इस बीच अच्छी बात यही है कि समूह की अन्य बैठकों से निरंतरता बनी हुई है, लेकिन शीर्ष नेताओं का मिलना इस समूह की प्रतिबद्धताओं को और मजबूती प्रदान करेगा।
क्वाड के भविष्य की दशा-दिशा एक बड़ी हद तक अमेरिकी चुनाव परिणामों पर भी निर्भर करेगी। यदि अमेरिकी सत्ता में डोनाल्ड ट्रंप की वापसी होती है तो संभव है कि अमेरिका इससे कुछ पीछे हटे, क्योंकि ट्रंप बहुपक्षीय सक्रियता में बहुत ज्यादा विश्वास नहीं करते और अक्सर उन्होंने ऐसे मंचों को लेकर नकारात्मक टीका-टिप्पणियां ही की हैं।
ट्रंप का ‘अमेरिका प्रथम’ का नारा अमेरिका को हर क्षेत्र में पहले रखना चाहेगा और ऐसे में हो सकता है कि क्वाड देशों के साथ सामूहिक बराबरी ट्रंप की रणनीतिक प्राथमिकता न रहे। ऐसे में क्वाड के भविष्य पर सवालिया निशान लग सकता है। यदि इस प्रकार की स्थितियां उत्पन्न होती हैं तो भारत के पास एक सुनहरा अवसर होगा कि वह क्वाड समूह का नेतृत्व करे और नई ऊर्जा के संचार के साथ क्षेत्रीय पटल पर अपनी प्रतिबद्धताओं की मुखरता से पैरवी करे।
Date: 03-08-24
पश्चिम एशिया में शांति पर मंडराता खतरासंपादकीय
ईरान की राजधानी तेहरान में हमास के राजनीतिक प्रमुख इस्माइल हानिया की हत्या के बाद पश्चिम एशिया में टकराव का खतरा काफी बढ़ गया है। कतर और तुर्किये में रहकर हमास के राजनीतिक नेतृत्व की कमान संभालने वाले हानिया की तेहरान में बुधवार को एक हमले में मौत हो गई। हानिया की हत्या के बाद हमास में थोड़ा नरम रुख रखने वाली आवाज बंद हो गई है।
ईरान ने आरोप लगाया है कि हमास के मुख्य वार्ताकार हानिया की हत्या में इजरायल का हाथ है, लेकिन उसने इस घटना की जिम्मेदारी नहीं ली है। हानिया इजरायल के साथ संघर्ष विराम के पक्ष में थे और इस विषय पर प्रायः हमास के दूसरे नेताओं से उनकी भिड़ंत हो जाती थी। उनकी हत्या के बाद मिस्र और कतर के नेताओं ने शांति वार्ता के भविष्य पर गंभीर संदेह जताया है। इन देशों के नेताओं की यह चिंता जायज है।
7 अक्टूबर, 2023 को इजरायल के साथ संघर्ष शुरू होने के बाद हानिया पांचवें ऐसे नेता है, जिनकी हत्या हुई है। हानिया ईरान के नए राष्ट्रपति की ताजपोशी में भाग लेने के लिए तेहरान में थे और जिस समय उन पर हमला हुआ वह एक सुरक्षित स्थान पर थे। यह घटना इजरायल के परंपरागत प्रतिद्वंद्वी ईरान को कोई बड़ा कदम उठाने के लिए उकसा सकती है। हानिया की हत्या के बाद पश्चिम एशिया एक ऐसी विकट स्थिति में फंस चुका है, जिसमें शांति की संभावनाएं कमजोर हो गई हैं।
हमास के लड़ाकों एवं नेताओं की हत्या और इजरायल की तरफ से ताबड़तोड़ हमले के बाद भी इस संगठन की गतिविधियां कम नहीं हुई हैं और न ही इसकी लोकप्रियता में कोई कमी आई है। हानिया की हत्या के बाद हमास में कट्टरपंथी विचार रखने वाले मजबूत हो सकते हैं।
हमास के संभावित उत्तराधिकारी कूटनीति का रास्ता अख्तियार करने के लिए नहीं जाने जाते रहे हैं। दूसरी तरफ, इजरायल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू की लोकप्रियता काफी कम हो गई है, इसलिए वह हमास के खिलाफ युद्ध को सत्ता पर अपनी पकड़ सुनिश्चित करने का सबसे मजबूत जरिया समझ रहे हैं।
ईरान को जान बूझकर उकसाना इजरायल की इस रणनीति का हिस्सा हो सकता है। हानिया पर हमले से ठीक कुछ घंटे पहले इजरायल ने लेबनान की राजधानी बेरूत में एक आवासीय इमारत पर बमबारी की थी। कहा जा रहा है कि इस बमबारी में ईरान समर्थित हिजबुल्लाह के एक सिपहसालार की मौत हो गई थी। हमास के साथ युद्ध शुरू होने के बाद इजरायल ईरान के शक्तिशाली इस्लामिक रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स कोर (आईआरजीसी) के दो सिपहसालारों की कथित तौर पर हत्या कर चुका है। कुछ समय पहले तक ईरान ने युद्ध और भड़काने का कोई इरादा जाहिर नहीं किया था।
इस वर्ष अप्रैल में सीरिया में अपने वाणिज्य दूतावास पर इजरायल के हमले के बाद ईरान ने सीमित एवं नपी-तुली प्रतिक्रिया दी थी। दो क्षेत्रीय राजधानियों में कुछ ही घंटों के भीतर दो वरिष्ठ नेताओं की हत्या के बाद पश्चिम एशिया में भू-राजनीतिक जोखिम कई गुना बढ़ गया है।
वर्तमान स्थिति में अरब राष्ट्रों की निष्क्रियता के बाद पश्चिम एशिया में शांति स्थापना का सारा दारोमदार अब अमेरिका पर है। अमेरिका इजरायल को गाजा में लड़ाई जारी रखने के लिए धन एवं सामग्री मुहैया करा रहा है। इस लड़ाई के कारण गाजा में मानवीय संकट खड़ा हो गया है। तेजी से बदलती परिस्थितियों के बीच इजरायल के भीतर भी शांति के प्रयास शुरू हो सकते हैं, क्योंकि वहां भी हमास के साथ संघर्ष से लोग अब असहज महसूस करने लगे हैं।
अब इजरायल में बदले की भावना से ध्यान हटाकर लोग 7 अक्टूबर को हमास द्वारा बंदी बनाए गए इजरायल के नागरिकों की सकुशल वापसी की मांग करने लगे हैं। इस दिशा में इसलिए ठोस प्रगति नहीं हो पाई है कि फिलिस्तीन भी इजरायल को जेलों में बंद हजारों कैदियों की रिहाई की मांग कर रहा है।
इजरायल में आरक्षित सुरक्षा बलों में ऐसे लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है, जो युद्ध के मैदान में जाने से इनकार कर रहे हैं। हालांकि, काफी कुछ नवंबर में अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव के नतीजे पर निर्भर करेगा। डॉनल्ड ट्रंप नेतन्याहू के पक्ष में खुला समर्थन व्यक्त कर रहे हैं जबकि कमला हैरिस इजरायल और फिलिस्तीन के हितों में संतुलन साधने की कोशिश कर रही हैं। अगले कुछ महीने पश्चिम एशिया में कड़ी परीक्षा के होंगे।
Date: 03-08-24
वंचितों के पक्ष मेंसंपादकीय
प्रधान न्यायाधीश डी. वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली सात सदस्यीय संविधान पीठ ने 6:1 के बहुमत से ऐतिहासिक फैसला दिया है कि राज्यों को अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) में उप- वर्गीकरण करने का अधिकार है। इसका अर्थ है कि इन समूहों के भीतर और अधिक वंचित जातियों को आरक्षण का लाभ दिया जाए। अगर इस फैसले को ईमानदारी और पारदर्शी तरीके से लागू किया गया तो हाशिये पर खड़े लोगों को लाभ पहुंचाने की दृष्टि से ज्यादा परिणामदायी हो सकता है। शीर्ष अदालत इसी के साथ एससी और एसटी समूहों के भीतर भी आरक्षण के मद्देनजर मलाईदार (क़ीमीलेयर) की पहचान करके उसे आरक्षण से बाहर करने की व्यवस्था दी है। अभी तक मलाईदार तबके का सिद्धांत केवल अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) आरक्षण में ही लागू है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने वाले दिनों में भारतीय राजनीति में नया अध्याय जोड़ेगा। सभी राजनीतिक दल अपने-अपने हितों के लिए आरक्षण का इस्तेमाल करते रहते हैं। देश में आरक्षण लागू होने के बाद प्रायः यही देखा जाता है कि इन जाति समूहों में जो अधिक ताकतवर हैं, वे आरक्षण का लाभ उठाने में सफल हो जाते हैं। और जो कमजोर हैं उन्हें कुछ नहीं मिलता। ये कुछ पाने की आस में इंतजार करते रह जाते हैं।
सभी इस तथ्य से परिचित हैं कि ओबीसी में जो वंचित हैं वे भी शिक्षा और रोजगार पाने में सफल हो जाते हैं लेकिन एससी और एसटी समूह को यहां तक पहुंचने के ज्यादा अवसर प्राप्त नहीं होते । वस्तुतः देश के सार्वजनिक क्षेत्र में रोजगार सिकुड़ रहे हैं और निजी क्षेत्र में रोजगार अनिश्चितताओं से भरा है। जाहिर है ऐसे में स्थिर रोजगार की प्राप्ति के लिए आरक्षण की मांग भी बढ़ती जा रही है। कुछ समृद्ध और ताकतवर जातियां भी आरक्षण के लिए आंदोलनरत हैं। आजकल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी जातिगत जनगणना को बड़ा मुद्दा बनाने की जिद ठाने हुए हैं। मान लिया जाए कि जातिगत जनगणना हो भी जाए तो क्या उससे सभी को रोजगार मिल जाएगा। सच तो यही है कि आरक्षण रोजगार का विकल्प नहीं हो सकता। इतना जरूर है कि एससी और एसटी में लगातार नये-नये समूह जुड़ते जा रहे हैं। इसलिए इस श्रेणी के आरक्षण में मलाईदार तबके की पहचान के लिए उनसे जुड़े आंकड़ों का सही तरीके से विश्लेषण करने की आवश्यकता है। अगर सरकारें ऐसा करने में सफल सिद्ध होती हैं तो वंचितों को आरक्षण का लाभ मिल पाएगा और सही मायनों में आरक्षण का लक्ष्य पूरा हो सकेगा।
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03 August 2024
प्रश्न – 472 – क्या आप इस कथन से सहमत हैं कि ब्रिटेन की लेबर पार्टी भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के प्रति अपेक्षाकृत उदार रही है? इसके पक्ष या विरोध में तथ्य प्रस्तुत करें। (200 शब्द)
Question – 472 – Do you agree with the statement that the Labour Party of Britain has been relatively lenient towards the Indian freedom movement? Present the facts in favour or against it. (200 words)
नोट : इसका उत्तर आपको हमें नहीं भेजना है, यह आपके स्वयं के अभ्यास के लिए है।
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Date: 02-08-24
Quota QuicksandTop court right to okay subquotas within SC/STs. But the entire exercise will set off political gamesmanshipTOI Editorials
With an SC constitution bench allowing sub-categorisation within the Scheduled Castes and Scheduled Tribes reservation, a new political hot potato is now on boil. Govts also need to identify the creamy layer (children of individuals who’ve benefited from reservations) among SCs and STs. This exercise risks being as much political strategy, as authentic identification of those in dire need of affirmative action.
What’s good | Overall, sub-categorisation is a positive step. Quotas, unfortunately, have become the political class’s go-to arrow in its election quiver. This has had two outcomes. One, better-offs have tended to corner reservation benefits, crowding out the more marginalised. Two, SC/ST categories have expanded or become more porous. Ever-new groups get added. A community marginalised on the crowded OBC list stands a better chance at access to education, scholarship and jobs, if it is on the SC list. Such fluidity has seen communities jostling, SC/ST lists growing. Sub-categorisation, carried out efficiently and honestly, will help make the SC/ST quota more inclusive by identifying and including those worseoff in terms of social capital also. Punjab, with 32% of its population SC, realised the need for subquotas back in 1975 and reserved 50% SC quota for Valmikis and Mazhabi Sikhs. Haryana, Andhra, TN tried subquotas. An SC order in 2004 cancelled such a subquota – a decision the top court yesterday overturned.
What’s bad | Thinly sliced quotas are hardly sum and substance of affirmative action. Subquotas alone can never correct endemic discrimination or counter the shrinking jobs pie. Rehabilitation of manual scavengers for instance – those who managed to leave their punishing work behind – has been a challenge. Addressing discrimination in school and the workplace, as policy, remains a blind spot. Special contempt is reserved for the ‘quota-wala’. Assimilation remains a huge challenge. Govt sector jobs are down and private sector jobs are elusive. So, there are caste certificate scams. The desperation for a somewhat steady livelihood finds expression in repeated returns to demands for quota as the only solution. All this speaks to policy failure.
What’s tough | Headcounts can’t suffice for subquotas to be meaningful. There are about 1,200 SC communities and over 715 ST ones. Each of these must be parsed for their socio-economic data. That’s a mammoth task, and politics will be a determinant. SC decided on the constitutionality of subquotas. How it contributes as affirmative action is now all political number games.
Date: 02-08-24
Wayanad, How Much Do We Really Care?Designate the Western Ghats eco-sensitiveET Editorials
‘Rain violence’ sits awkwardly with a country aspiring to earn a ‘developed’ tag in 23 years’ time. Be that as it may, current reality has heavy rainfall and landslide-induced devastation in Kerala’s Wayanad as the latest example of what greed, biodiversity loss and climate change can lead to in 2024 India. This is hardly a surprise. In 2022, the Earth sciences ministry informed Parliament that of the 3,782 landslides recorded across India during 2015-22, about 59.2% — 2,239 landslides — occurred in Kerala, the highest in the country. This time, lives could have been saved if the state had heeded IMD’s orange alert on July 29 and red alert on July 30. Kerala claims there was no red alert.
Allegations aside, ‘Wayanad’ is the product of decades of privileging untrammelled greed over environmental well-being. As Madhav Gadgil, chair of Western Ghats Ecology Expert Panel, set up in 2011 by GoI, stated, the double landslides are proof that the Ghats have been exploited without care, and govs have no interest in protecting nature. The panel had recommended designating Western Ghats as eco-sensitive. It also suggested grading the region into zones based on their ecological sensitivity and fragility, and limiting human activity accordingly. Yet, all six Ghat states pushed back, complaining of an erosion of the federal structure. Unregulated and illegal economic activity flourished, fuelled by an unholy alliance between politics and business. Mining and unrestricted tourism aggravated the situation.
Unless governments and citizens start valuing natural capital, balance economic activities with environmental and ecological well-being, such disasters will recur. The first step now should be to designate the Western Ghats eco-sensitive and rigorously follow guidelines for the regulation and promotion of development activities. That is, if Indians care about the lives and well-being of Indians.
Date: 02-08-24
भ्रष्टाचार पर सिस्टम का रवैया भी उदासीन हैसंपादकीय
भ्रष्टाचार की पैड़ के दो मुख्य कारण होते हैं- समाज में नैतिक मूल्यों का क्षरण और सिस्टम की इसके प्रति उदासीनता (व कई बार सहभागिता)। एक साल पहले अगस्त में सीएजी ने संसद को बताया कि आयुष्मान भारत की पीएम एवाई योजना के तहत 88,760 ऐसे मरीजों (जिनकी मृत्यु हो चुकी के नाम पर 2,14,923 दावों का भुगतान सिस्टम दिखा रहा है। रिपोर्ट के अनुसार देश में भी लाख से ज्यादा ऐसे लाभार्थी थे, जो एक ही मोबाइल नंबर से जुड़े थे। इसे सुधारने के लिए एक साल का समय काफी था। लेकिन संसद की लोकलेखा समिति ने जब इस पर जांच की तो पाया कि ऐसे लेनदेन पर नजर रखने वाले ट्रांजेक्शन मैनेजमेंट सिस्टम (स) ने भी इस फर्जीवाड़े को मंजूरी दी थी। संसदीय समिति ने सरकार से दो सवाल पूछे- टीएमएस इसे कैसे नहीं पकड़ सका? और दूसरा, सीएजी की रिपोर्ट में बताई गई संख्या के आधार पर है, यानी घपला कई गुना ज्यादा बड़ा हो सकता है। इस पर मंत्रालय ने कहा, “सिस्टम के अपडेटेड संस्करण में ऐसे तथ्यों को पकड़ने की पुख्ता व्यवस्था है।’ आप सोचें, जहां प्रधानमंत्री के इस फ्लैगशिप कार्यक्रम को भ्रष्टाचारी अपार-निजी अस्पतालल में पहुंचा रहे हैं, वहीं सरकार की प्रतिक्रिया कितनी सामान्य है।
Date: 02-08-24
सवालों में घिरी सबसे प्रतिष्ठित सेवाविकास सारस्वत, ( लेखक इंडिक अकादमी के सदस्य एवं वरिष्ठ स्तंभकार हैं )
संघ लोक सेवा आयोग यानी यूपीएससी द्वारा सिविल सेवा परीक्षा में पूजा खेडकर की उम्मीदवारी समाप्त कर एक विवादित प्रकरण का पटाक्षेप करने का प्रयास हुआ। महाराष्ट्र कैडर की प्रशिक्षु आइएएस अधिकारी रहीं खेडकर पर आयोग ने भविष्य में अपनी किसी भी परीक्षा में भागीदारी पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया। सेवा में कदाचार और भर्ती के लिए फर्जी प्रमाण पत्रों से जुड़े इस मामले के सामने आने के बाद ऐसे तमाम अन्य मामले भी सतह पर आए हैं। 2011 बैच के पूर्व आइएएस अधिकारी अभिषेक सिंह भी ऐसे ही आरोपों में घिरे हैं। सिंह ने बेंचमार्क दिव्यांगता श्रेणी-3 में लोकोमोटर दिव्यांगता का दावा कर नौकरी पाई थी, जबकि उनके नृत्य और जिम में व्यायाम करने के तमाम वीडियो सामने आए हैं। लोकोमोटर दिव्यांगता में ठीक से चल पाना भी संभव नहीं होता सिंह नौकरी छोड़कर फिल्मों में काम करने चले गए थे और बाद में राजनीति में भी अपने हाथ आजमाना चाहते थे। लोकसभा चुनावों में टिकट न मिलने पर उन्होंने सेवा में वापसी की अर्जी डाली थी, परंतु योगी सरकार ने उसे नामंजूर कर दिया।
दिव्यांगता और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के झूठे प्रमाण पत्रों का प्रयोग करने के आरोप केवल पूजा और अभिषेक सिंह पर ही नहीं, बल्कि कई अन्य आइएएस अधिकारियों पर भी लगे हैं। ऐसे आरोपों के बाद इंटरनेट मीडिया पर व्यापक रूप से सक्रिय कई अधिकारियों ने अपने प्रोफाइल या तो प्राइवेट कर लिए या फिर डिलीट कर दिए हैं। पूजा खेडकर मामला इसलिए बहुत चौंकाने वाला है कि इसमें एक नहीं, बल्कि कई स्तरों पर गड़बड़ी हुई और उनके संज्ञान में आने के बावजूद खेडकर को आइएएस में नियुक्ति मिल गई। पिता के भी वरिष्ठ अधिकारी रहने के बावजूद पूजा ने स्वयं को क्रीमी लेयर से अलग दर्शाया और फर्जी दिव्यांगता बताई। खुद पूजा खेडकर के नाम पर 17 करोड़ रुपये की चल-अचल संपत्ति है और उनके माता पिता के नाम 50 करोड़ की घोषित संपत्ति है। आयोग द्वारा अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में छह बार मेडिकल टेस्ट हेतु बुलाए जाने के बावजूद वह नहीं आईं। बाद में यह रिपोर्ट भी आई कि उन्होंने अपनी आयु भी कम करके दर्शाई। दिलचस्प यह है कि खेडकर इतना फर्जीवाड़ा करके बच निकलीं और उन पर कार्रवाई तब हुई, जब उन्होंने अपने वरिष्ठ अधिकारियों के साथ अभद्रता और दुर्व्यवहार शुरू कर दिया।
फरवरी 2023 में केंद्रीय प्रशासनिक न्यायाधिकरण यानी कैट ने अधिकृत संस्थान दिल्ली एम्स से एमआरआइ न कराने पर पूजा खेडकर के चयन को रद करने का आदेश दिया था, परंतु यूपीएससी ने पुणे के एक अनधिकृत अस्पताल से भेजी गई रिपोर्ट को मानकर खेडकर के चयन को बहाल रखा और आइएएस कैडर आवंटित कर दिया। संघ लोक सेवा आयोग की गिनती उन चुनिंदा संस्थाओं में होती है, जिनकी साख आज भी बनी हुई है। बहुत से सामान्य परिवारों के अभ्यर्थी न सिर्फ सिविल सर्विस परीक्षा में उत्तीर्ण होकर देश के शासकीय नेतृत्व का हिस्सा बनते हैं, बल्कि उसे अपने उज्ज्वल भविष्य के प्रवेश द्वार के रूप में भी देखते हैं। ऐसे में दिव्यांगता और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को लेकर आ रहीं फर्जीवाड़े की शिकायतें चयन के अनुपात में भले ही बहुत कम हों, लेकिन चिंता का विषय हैं। चिंता की बात यह भी है कि देश की सबसे सम्मानित सेवा के चयन और प्रशिक्षण में ऐसी कौन सी खामियां हैं जो इन अधिकारियों में वैसा चरित्र निर्माण नहीं कर पा रहीं, जैसा सेना के प्रशिक्षुओं में देखने को मिलता है। यूपीएससी के प्रयास चयन में सामाजिक विविधता लाने में तो कारगर रहे हैं, परंतु भ्रष्टाचार में संलिप्तता के चौंकाने वाले मामले दर्शाते हैं कि चयनित उम्मीदवारों की सत्यनिष्ठा परखने में भारी चूक हो रही है। यह तब है जब मुख्य परीक्षा में एक प्रश्न पत्र नैतिकता और सत्यनिष्ठा पर केंद्रित होता है।
प्रशासनिक अधिकारियों के भ्रष्टाचार की स्थिति कितनी खराब है, इसका पता 2021 में कार्मिक राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह द्वारा संसद में दिए एक जवाब से चलता है, जिसमें उन्होंने केवल वित्त वर्ष 2020-21 में आइएएस अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार की 581 शिकायतें मिलने की बात कही थी। इसके पूर्व दो वित्त वर्षों में आइएएस अधिकारियों के खिलाफ 753 और 643 शिकायतें प्राप्त हुई थीं। संभव है कि एक ही अधिकारी के खिलाफ एक से ज्यादा शिकायतें आई हों। यह भी संभव है कि इनमें कई शिकायत झूठी एवं द्वेषपूर्ण हों, परंतु देश भर में आइएएस अधिकारियों की सीमित संख्या को देखते हुए इतनी अधिक शिकायतें गंभीर चिंता का विषय हैं। आइएएस में भ्रष्टाचार का मुख्य कारण राज्य की बहुमूल्य संपदा को वितरित करने की असीमित शक्तियां, सक्षम तृतीय पक्ष निगरानी का अभाव, नेताओं की उन पर अतिनिर्भरता और नौकरशाही एवं नेताओं की साठगांठ है। कड़ी राजनीतिक इच्छाशक्ति और नौकरी के प्रति असुरक्षा के भाव से ही इस समस्या का समाधान संभव है, परंतु चयन और प्रशिक्षण से लेकर अपने सिंहावलोकन में भी सिविल सेवा को बड़े फेरबदल की जरूरत है।
जहां परीक्षा के प्रारूप में निरंतर बदलाव से प्रतिभावान अभ्यर्थियों के लिए अवसर बढ़ेंगे, वहीं अंक तालिका में एकतरफा रुझान बनाने वाले ‘वैकल्पिक’ विषयों को हटाकर सेवाओं में काम आने वाला उपयोगी पाठ्यक्रम वांछित प्रत्याशियों के चयन में उपयोगी होगा। इंटरव्यू में मनोविश्लेषक की भागीदारी अभ्यार्थियों के चरित्र को गहराई से समझने में सहायक होगी। अच्छा तो यह हो कि आवेदन करने वाले परीक्षार्थी पहले निजी या सरकारी क्षेत्र में दो या पांच वर्ष का अनुभव लेकर आएं। इससे इन परीक्षार्थियों में परिपक्वता आएगी और जिस समाज की इन्हें सेवा करनी है, उसके प्रति संवेदनात्मक दृष्टिकोण भी बनेगा। साथ ही, आइएएस या समकक्ष सेवाओं को सही मायने में जनसेवकों का प्रारूप दिया जाए। बंगला, गाड़ी और अर्दली, ड्राइवर जैसी सुविधाओं से बना ठाट-बाट अधिकारियों को अंग्रेजी राज वाला अभिजात्य दर्जा देता है। साथ ही समाज में वर्ग श्रेष्ठता का भाव खुद को आमजन के लिए बने कानूनों से ऊपर होने का भाव देता है। कोई आश्चर्य नहीं कि ऐसी मानसिकता के चलते भ्रष्टाचार सहजता से पनपता है।
Date: 02-08-24
इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात में अवसरसंपादकीय
पिछले कुछ समय से भारत से वस्तुओं के निर्यात में इलेक्ट्रॉनिक सामान की हिस्सेदारी आकर्षण का प्रमुख केंद्र रही है। इस वर्ष जून में इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं का निर्यात सालाना आधार पर 16.91 प्रतिशत बढ़ा। वित्त वर्ष 2024-25 की पहली तिमाही में पिछले वित्त वर्ष की समान अवधि की तुलना में इसमें 21.64 प्रतिशत वृद्धि दर्ज हुई। इलेक्ट्रॉनिकी विनिर्माण क्षेत्र में वृद्धि की असीम संभावनाएं हैं और इस खंड पर विशेष ध्यान देने एवं नीतिगत समर्थन से वैश्विक मूल्य श्रृंखला (जीवीसी) के साथ इसका जुड़ाव बढ़ सकता है। देश में रोजगार के अवसर तेजी से उपलब्ध कराने की अदद जरूरत है और इसमें इलेक्ट्रॉनिक क्षेत्र महत्त्वपूर्ण योगदान दे सकता है। इस क्षेत्र में वर्ष 2018 से 2022 के बीच रोजगार में सबसे अधिक वृद्धि हुई है। आर्थिक समीक्षा में भी इस बात का उल्लेख किया गया है।
परंतु, विश्व में 4.3 लाख करोड़ डॉलर के इलेक्ट्रॉनिकी बाजार में भारत की हिस्सेदारी लगभग 2 प्रतिशत है। दुनिया में इस क्षेत्र पर चीन का खास दबदबा है और इन वस्तुओं के कुल निर्यात में इसकी हिस्सेदारी 30 प्रतिशत रही है। वियतनाम और मलेशिया जैसे तेजी से उभरते बाजारों ने भी इस खंड में तुलनात्मक रूप से अपनी स्थिति मजबूत कर ली है और इलेक्ट्रॉनिकी जीवीसी में इनकी हिस्सेदारी 4 प्रतिशत पहुंच गई है। इस परिप्रेक्ष्य में नीति आयोग की नई रिपोर्ट ‘इलेक्ट्रॉनिक्सः पावरिंग इंडियाज पार्टिसिपेशन इन जीवीसी’ में उल्लेख किया गया है कि देश में इलेक्ट्रॉनिकी क्षेत्र में उत्पादन 2017 से 2022 के बीच दोगुना हो गया और इसमें 13 प्रतिशत चक्रवृद्धि ब्याज दर से तेजी आई। यह वृद्धि दर अनुकूल अवसरों की ओर इशारा करती है, मगर और अधिक विस्तार एवं एकीकरण में चुनौतियां होने का भी संकेत देती है। वर्तमान समय में भारत में इलेक्ट्रॉनिक उत्पादन में मुख्यतः मोबाइल फोन, टेलीविजन, रेफ्रिजरेटर और दूरसंचार उपकरण बाजार में उतारने के लिए तैयार किए जाते हैं।
विनिर्माण में इस्तेमाल होने वाले पुर्जों के लिए आयात पर निर्भरता और डिजाइन की सीमित गुंजाइश के कारण मूल्य व्यवस्था में ऊपर उठने की देश की क्षमता प्रभावित हो जाती है। भारत में स्थानीय स्तर पर पुर्जों के विकास की क्षमता सीमित होने का प्रमुख कारण ऊंची शुल्क संरचना है। यहां औसत शुल्क दर 7.5 प्रतिशत है, जो चीन, वियतनाम, थाईलैंड और मलेशिया (जहां शुल्क 4 प्रतिशत से कम है) से अधिक है। इसके अलावा, अतिरिक्त कर एवं अधिभार भी लगते हैं, जिनसे स्थानीय स्तर पर उत्पादन अधिक महंगा हो जाता है। ऊंचे शुल्कों के कारण विनिर्माता विदेश से पुर्जे मंगाने को अधिक तवज्जो देते हैं, जिसका सीधा असर देश में इलेक्ट्रॉनिक विनिर्माण पर पड़ता है। कुल मिलाकर, ऊंचे शुल्क एवं सामग्री पर होने वाले खर्च, ढुलाई एवं वित्तीय लागत के कारण यह क्षेत्र 14-18 प्रतिशत संचयी लागत अक्षमता का सामना कर रहा है। श्रम लागत कम होने के बावजूद कमजोर श्रम उत्पादकता के कारण भारत इसका लाभ लेने में सदैव जूझता रहा है। इन चुनौतियों को देखते हुए भारत में विनिर्माण, विशेषकर इलेक्ट्रॉनिक उपकरण क्षेत्र पर नकारात्मक असर डालने वाले कारकों का समाधान खोजा जाना चाहिए। बड़े क्षेत्रीय या आर्थिक व्यापार गुटों से भारत का बाहर रहना एक प्रमुख बाधा रही है। इन संगठनों का हिस्सा बनने से कम शुल्कों, सरल नियमन एवं बढ़ी व्यापार क्षमताओं के कारण उत्पादन लागत कम हो सकती है।
सरकार के प्रयासों के बावजूद भारत कारोबार सुगमता में अपने प्रतिस्पर्द्धी देशों की तुलना में लगातार निचले पायदान पर है। क्षमताएं बढ़ाने के साथ ही भारत को इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं के विनिर्माण में विविधता लानी होगी और इसमें लैपटॉप तथा दूरसंचार उपकरणों को शामिल करना होगा। इस समय देश में तैयार होने वाली इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं में स्मार्टफोन की 43 प्रतिशत हिस्सेदारी है। स्थानीय स्तर पर मूल्य व्यवस्था खड़ी की जा सकती है और उत्पाद तैयार करने में तेजी लाई जा सकती है। प्रतिस्पर्द्धी देशों की तुलना में शुल्क भी तर्कसंगत बनाए जा सकते हैं। वित्त वर्ष 2024-25 के केंद्रीय बजट में सीमा शुल्क घटाने का प्रस्ताव एक स्वागत योग्य कदम है। बजट में सीमा शुल्क संरचना की समीक्षा से भारत में इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं का विनिर्माण और जोर पकड़ेगा। यदि इन सभी मुद्दों का त्वरित समाधान नहीं हुआ तो भारत उन कंपनियों को आकर्षित करने का अवसर खो देगा, जो चीन से इतर दूसरे देश में विनिर्माण संयंत्र लगाना चाह रहे हैं। वियतनाम अपनी अनुकूल नीतियों और कम झंझटों वाले नियामकीय एवं राजनीतिक पहल से इन कंपनियों को खींच रहा है। नीति आयोग की रिपोर्ट में इस बात का उल्लेख किया गया है कि क्या कदम उठाने की आवश्यकता है। अब सरकार को यह तय करना है कि वह इलेक्ट्रॉनिकी विनिर्माण क्षेत्र में इन अवसरों का लाभ कैसे उठती है।
Date: 02-08-24
किसकी जिम्मेदारीसंपादकीय
इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि जब हादसे की पृष्ठभूमि बन रही होती है, तब सरकारी महकमे नींद में खोए रहते हैं या फिर किसी परोक्ष कारण से उसे नजरअंदाज करते रहते हैं और जब कोई बड़ी त्रासद घटना हो जाती है तब वे जरूरत से ज्यादा सक्रिय दिखते हैं। अफसोसनाक यह भी है कि जो इमारतें अपनी बुनियाद में ही हादसे की जमीन साथ लिए होती हैं, उनके निर्माण के समय या फिर बाद में उनमें नियम-कायदों को ताक पर रख कर संचालित गतिविधियों की इजाजत दी जाती है और जब वहां हुए हादसे में जानमाल के नुकसान का मामला तूल पकड़ लेता है तब आनन-फानन में दिशाहीन कार्रवाई करने का दिखावा किया जाता है। यह एक तरह से गलत तरीके से या लेनदेन आधारित लाभ पहुंचाने की अघोषित व्यवस्था है, जिसके नतीजे में कोई त्रासदी सामने आती है! राजधानी दिल्ली के राजेंद्र नगर इलाके में एक कोचिंग सेंटर के बेसमेंट में बरसात का पानी भर जाने की वजह से भारतीय प्रशासनिक सेवा की परीक्षाओं की तैयारी करने वाले तीन विद्यार्थियों की मौत की घटना इसी का उदाहरण है।
इस मसले पर दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान दिल्ली सरकार की नीतियों की सख्त आलोचना की और कहा कि आप बहुमंजिला इमारतों की मंजूरी दे रहे हैं, लेकिन नाली की कोई उचित व्यवस्था नहीं है। अदालत ने यह भी कहा कि जब ‘रेवड़ी बांटने की संस्कृति’ के कारण कर संग्रह नहीं होता है तब ऐसी त्रासदियां होना स्वाभाविक है। जाहिर है, अदालत ने एक तरह से समस्या के कुछ बुनियादी कारणों की बात की, जिन पर अगर समय रहते गौर किया गया होता तो शायद हादसे की नौबत नहीं आती और न विद्यार्थियों की जान जाती। यह छिपा नहीं है कि जब इमारतें बन रही होती हैं, तब उसमें नियम-कायदों को ताक पर रख कर भी अपनी सुविधा के मुताबिक निर्माण करा लिया जाता है। इस बात की फिक्र नहीं की जाती है कि यही लापरवाही भविष्य में किसी बड़ी त्रासदी की वजह बन सकती है। इसमें सरकार के संबंधित महकमों के अधिकारियों की भी मिलीभगत या अनदेखी होती है, जो ऐसे निर्माणों को रोकते नहीं या फिर कई बार नियमों के विरुद्ध इजाजत दे देते हैं।
हैरानी की बात यह है कि जब इन वजहों से कोई बड़ी दुर्घटना हो जाती है और उस पर जनआक्रोश उभर जाता है, तब पूरी तेजी से कार्रवाई होती देखी जाती है। इस क्रम में कई बार दिखावे की कार्रवाई करके असली जिम्मेदार लोगों को एक तरह से बचाने की कोशिश की जाती है। राजेंद्र नगर के बेसमेंट में हुए हादसे के बाद वहां सामने की सड़क से गुजरते एक वाहन चालक को बिना देरी किए गिरफ्तार किया गया, मगर उन अधिकारियों के खिलाफ इतनी ही तेज कार्रवाई करना जरूरी नहीं समझा गया, जिनकी अनदेखी, लापरवाही या फिर इजाजत से बेसमेंट में पुस्तकालय चल रहा था। दिल्ली हाई कोर्ट ने इस पहलू पर भी सवाल उठाया है। अब दिल्ली सरकार की ओर से यह कहा गया है कि राजधानी में संचालित कोचिंग केंद्रों को नियंत्रित करने के लिए कानून लाया जाएगा। उपराज्यपाल ने भी शहर में कोचिंग सेंटरों को विनियमित करने के लिए एक समिति बनाने की घोषणा की। सवाल है कि अब तक कोचिंग सेंटरों की गतिविधियों को किस आधार पर सुरक्षा संबंधी जरूरी उपायों पर अमल करने की बाध्यता से बख्शा गया था और सरकारों की नींद किसी बड़ी त्रासदी के बाद ही क्यों खुलती है!
Date: 02-08-24
युद्ध के मुहानेसंपादकीय
करीब सात महीने पहले इजराइल पर हमास के हमले के बाद दोनों पक्षों के बीच टकराव की वजह से गाजा पट्टी में आम लोगों की जिंदगी किस दशा में चली गई है, यह सभी जानते है। इस युद्ध के दौरान त्रासदी का स्तर लगातार ज्यादा गहराते जाने के दौर में कई तरफ से युद्ध विराम के लिए इजराइल पर दबाव बनाने की कोशिशें चल रही थीं। यहां तक अमेरिका भी अपने करीबी सहयोगी से युद्ध को रोकने की उम्मीद कर रहा था। मगर इजराइल का रुख स्पष्ट बना रहा कि वह हमास पर हमले में कोई नरमी नहीं बरतेगा। इसके बावजूद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर युद्ध विराम की मांग की जा रही थी। अब ईरान में हमास प्रमुख इस्माइल हनियेह की जिस तरह हत्या कर दी गई और हमास के मिलिट्री कमांडर मोहम्मद दिएफ के भी मारे की जाने की खबर आई है, उससे न केवल शांति की उम्मीदों को गहरा झटका लगा है। खुद ईरान ने भी हनियेह की मौत का बदला लेने की बात कही है।
हालांकि अमेरिका ने दोनों पक्षों से तनाव कम करने की गुजारिश की है और ईरान पर जवाबी कार्रवाई न करने का दबाव बढ़ाया है। मगर उसकी अनदेखी कर अगर ईरान ऐसा कोई कदम उठाता है, तो उसके नतीजों का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। दरअसल, हनियेह की मौत के बाद समूचे मध्यपूर्व में जिस स्तर का तनाव उभरा है, वह कभी भी कोई चिंताजनक शक्ल अख्तियार कर ले सकता है। आशंकाएं यहां तक जताई जाने लगी हैं कि हनियेह की मौत के बाद उपजे हालात में अब ईरान इजराइल पर सीधा हमला भी कर सकता है। अगर ऐसा होता है तो अब तक केवल इजराइल और हमास के बीच सिमटे टकराव की आग में कई अन्य देश खुद को उलझा हुआ पाएंगे। यह ध्यान रखने की जरूरत है कि अगर युद्ध एक बार शुरू हो जाता है तब उसके बाद उसके अंत का स्वरूप शांति चाहने वाले समुदायों और देशों की इच्छा के अनुरूप नहीं होता है। इसलिए इजराइल ने हमास को सबक सिखाने का नाम लेकर जो जिद पकड़ ली है, उसने दुनिया के एक बड़े हिस्से को चिंतित कर दिया है। संघर्ष विराम की उम्मीदों के बीच समूचे मध्य पूर्व में इस तनाव के गहराने और युद्ध के नए मुहाने खुल जाने की आशंका बढ़ गई है।
Date: 02-08-24
युद्ध विस्तार की आशंकासंपादकीय
गाजा पट्टी में प्रभावशाली आतंकी संगठन हमास के राजनीतिक दस्ते के सर्वोच्च नेता इस्माइल हानिया की ईरान की राजधानी तेहरान में हुई हत्या ने पश्चिम एशिया की राजनीति में एक नया तूफान खड़ा कर दिया है। 70 वर्षीय हानिया ईरान के नये राष्ट्रपति मसूद पेजशिकमान के शपथ ग्रहण समारोह में हिस्सा लेने तेहरान आए थे। उन्होंने ईरान के सर्वोच्च नेता अली ख़ामनेई से भी मुलाकात की थी। हमास और ईरान दोनों ने हानिया की हत्या के लिए इस्राइल को जिम्मेदार ठहराया है। अली खामनेई ने कहा है कि हानिया की हत्या के लिए जो भी जिम्मेदार है उसे कठोर दंड दिया जाएगा। हानिया तेहरान के जिस भवन में ठहरा हुए थे वह सुरक्षा की दृष्टि से चाक-चौबंद था। ऐसे में कहना मुश्किल है कि हानिया की हत्या किसने की है अभी यह रहस्य बना हुआ है। इस बात की भी चर्चा है कि हमास के राजनीतिक दस्ते और सैन्य दस्ते के बीच इस्राइल के साथ युद्ध विराम और बंधकों की रिहाई जैसे मसलों परमतैक्य नहीं था। रूस, चीन और तुर्किये ने हानिया की हत्या की निंदा की है। इस्राइल की जिस तरह से घेराबंदी की जा रही है, उससे पश्चिम एशिया में तनाव और युद्ध के विस्तार की आशंका बढ़ गई है। एक अन्य घटनाक्रम में इस्राइल ने हिजबुल्लाह कमांडर फउद शुकर को मार गिराया है । हाल-फिलहाल लेबनान के आतंकी संगठन हिजबुल्लाह और इस्राइल के बीच मामूली झड़पें हो रही हैं लेकिन आने वाले दिनों में इनके बीच खुलकर युद्ध हुआ तो हजारों लोग मारे जा सकते हैं। हिजबुल्लाह ने भी अपने कमांडर की मौत का बदला लेने का संकल्प लिया है। ईरान भी बदला लेना चाहता है और हमास और कतर ने भी युद्ध के विस्तार की आशंका जताई है। इससे इस्राइल-फिलिस्तीन युद्ध अब मध्य पूर्व में फैलने के पूरे आसार हैं। अमेरिका ने हानिया की हत्या पर किसी तरह की टिप्पणी नहीं की है लेकिन रक्षा मंत्री लॉयड आस्टिन ने कहा है कि यदि ईरान, हमास और हिजबुल्लाह इस्राइल पर हमला करते हैं तो वह तेल अवीव के पक्ष में खड़ा होगा। अंतरराष्ट्रीय परिदृश्य यह है कि युद्ध के तीन क्षेत्र हैं- रूस – यूक्रेन, इस्राइल-फिलिस्तीन और चीन ताइवान इन क्षेत्रों में युद्ध विस्तार होता है तो जान-माल की अपार क्षति होगी।
Date: 02-08-24
तबाही की वजहप्रमोद भार्गव
नयनाभिराम प्राकृतिक संपदा और बहुआयामी जल- संसाधनों के कारण केरल को उत्तराखंड की तरह भगवान का घर माना जाता है किंतु मूसलाधार बारिश और भूस्खलन हिमालय से लेकर केरल तक तबाही के कारण बन रहे हैं। सुदूर दक्षिण राज्य केरल में प्रकृति ने रौद्र रूप दिखाया और भूस्खलन एवं चेरियाल नदी के जलभराव क्षेत्र में बसे चाय बागान मजदूरों के चार गांवों ने मिट्टी के मलबे में जल समाधि ले ली। चेरियाल नदी पहाड़ों से निकलती हुई समतल भूमि पर चार दिनों से चल रही बारिश के कारण अत्यंत तेज गति से बही। इसी समय पहाड़ जल के प्रवाह से बह पड़े और पत्थरों व मलबे से चूरलमाला, अट्टामाला, नूलपुझा और मुंडक्कई मलबे में पूरी तरह दब गए। जल की रफ्तार में हजारों पेड़, सैकड़ों वाहन भी जड़ों से उखड़ कर ग्रामों की ओर बहते चले आए। करीब 2200 की आबादी के 400 से ज्यादा घर कुछ पलों में मिट्टी के ढेर में बदल गए।
यह पूरा इलाका पहाड़ी क्षेत्र होने के कारण भूस्खलन प्रभावित क्षेत्र माना जाता है। केरल में केदारनाथ की तरह जो जल तांडव आया, उसने तय कर दिया है कि यह आपदा भगवान की देन न होकर मानव निर्मित है। पर्यावरणविद् ने भी इस बाढ़ को मानव निर्मित आपदा करार दिया है। कारण, बड़ी मात्रा में जंगलों की कटाई और पर्यटन में वृद्धि । चेरियाल बाढ़ क्षेत्र की जीवनदायिनी नदी मानी जाती रही है, लेकिन वही आधुनिक विकास के चलते मौत का सबब बन गई। कृषि प्रधान इस इलाके में चाय के अलावा नारियल, केला, मसाले और शुष्क मेवा की फसलें भी खूब होती हैं। पर्यटन भी राज्य की आमदनी व रोजगार का मुख्य स्रोत है। आय के ये सभी संसाधन प्राकृतिक हैं। गोया, प्रकृति का इस तरह से रूठ जाना आर्थिक रूप से खस्ताहाल केरल पर लंबे समय से भारी पड़ रहा है क्योंकि इसके पहले बरसात में ही केरल के 80 बांधों में से 36 बांधों के दरवाजे एकाएक खोल दिए गए थे। बांधों से निकले पानी ने बड़ी तबाही मचाई थी। यह तबाही पूरी तरह मानवीय भूल थी, लेकिन सिंचाई विभाग के किसी नौकरपाह की जवाबदेही तय करके दंड दिया गया हो, ऐसा देखने में नहीं आया।
केदारनाथ, अमरनाथ, हिमाचल और कश्मीर के जल प्रलय से हमने कोई सीख नहीं ली। गोया वहां रोज बादल फट रहे हैं, पहाड़ के पहाड़ ढह रहे हैं। हिमाचल, असम और उत्तर प्रदेश में भी बारिश आफत बनी हुई है। बावजूद न तो हम शहरीकरण, औद्योगीकरण, तकनीकीकरण और तथाकथित आधुनिक विकास से जुड़ी नीतियां बदलने को तैयार हैं, और न ही ऐसे उपाय करने को प्रतिबद्ध हैं, जिनसे ग्रामीण आबादी शहरों की ओर पलायन करने को मजबूर न हो? शहरों में यह बढ़ती आबादी मुसीबत का पर्याय बन गई है। नतीजतन, प्राकृतिक आपदाएं भयावह होती जा रही हैं। सूरत, चेन्नई, बैगलुरू, गुड़गांव ऐसे उदाहरण हैं, जो स्मार्ट सिटी होने के बावजूद बाढ़ की चपेट में रहे। यहां कई दिनों तक जनजीवन ठप रहा। बारिश का 90 प्रतिशत पानी तबाही मचाकर अपना खेल खेलता हुआ समुद्र में समा जाता है। यह संपत्ति की बरबादी तो करता ही है, खेतों की उपजाऊ मिट्टी भी बहाकर समुद्र में ले जाता है। देश हर तरह की तकनीक में पारंगत होने का दावा करता है, लेकिन जब हम बाढ़ की त्रासदी झेलते हैं, तो ज्यादातर लोग अपने बूते ही पानी में जान व सामान बचाते नजर आते हैं। आफत की बारिश के चलते डूब में आने वाले महानगर कुदरती प्रकोप के कठोर संकेत हैं, लेकिन हमारे नीति-नियंता हकीकत से आंखें चुराए हुए हैं। बाढ़ की यही स्थिति असम और बिहार जैसे राज्य भी हर साल झेलते हैं, यहां बाढ़ दशकों से आफत का पानी लाकर हजारों ग्रामों को डूबो देती है। इस लिहाज से शहरों और ग्रामों को कथित रूप से स्मार्ट व आदर्श बनाने से पहले इनमें ढांचागत सुधार के साथ ऐसे उपायों को मूर्त रूप देने की जरूरत है, जिससे ग्रामों से पलायन रुके और शहरों पर आबादी का दबाव न बढ़े ?
आफत की यह बारिश चेतावनी है कि हमारे नीति- नियंता, देश और समाज के जागरूक प्रतिनिधि के रूप में दूरदृष्टि से काम नहीं ले रहे हैं। कृषि एवं आपदा प्रबंधन से जुड़ी संसदीय समिति ने अपनी एक रिपोर्ट में कहा है कि जलवायु परिवर्तन से कई फसलों की पैदावार में कमी आ सकती है, लेकिन सोयाबीन, चना, मूंगफली, नारियल और आलू की पैदावार में बढ़त हो सकती है। हालांकि कृषि मंत्रालय का मानना है कि जलवायु परिवर्तन को ध्यान में रखते हुए खेती की पद्धतियों को बदल दिया जाए तो अनेक फसलों की पैदावार में 10-40 फीसद बढ़ोतरी संभव है। बड़ते तापमान के चलते भारत ही नहीं, दुनिया में वर्षा चक्र में बदलाव के संकेत 2008 में ही मिल गए थे, बावजूद इस चेतावनी को सरकार ने गंभीरता से नहीं लिया। बहरहाल, हर साल बाढ़ जैसी प्राकृतिक आपदाओं का संकट नहीं झेलना पड़े, अतएव क्रांतिकारी पहल करना जरूरी हो गया है। वरना देश हर वर्ष किसी न किसी राज्य या महानगर में बाढ़ जैसी भीषण त्रासदी झेलते रहने को विवश होता रहेगा?
Date: 02-08-24
कुल्लू से केरल तकसंपादकीय
भारत का मौसम की मार से प्रभावित और चिंतित होना स्वाभाविक है। उत्तर भारत में कुल्लू से लेकर दक्षिण के केरल तक कई जगह त्रासद मंजर सामने आए हैं। विशेष रूप से उत्तर भारत के एक बड़े इलाके में बुधवार को जिस तरह से मूसलाधार बारिश हुई है, उससे चिंता का बढ़ना स्वाभाविक है। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में 24 घंटे में 10 से ज्यादा लोगों की मौत हुई है। इतने ही समय में देश के सात राज्यों में 32 से ज्यादा लोग काल के गाल में समा गए हैं। जिस तरह हिमाचल में पचास से ज्यादा लोग लापता हैं, दस से ज्यादा की मौत हो गई है, उससे भी त्रासद स्थिति केरल के वायनाड में बनी हुई है। बारिश और भूस्खलन से मरने वालों की संख्या वहां 300 का आंकड़ा छूने वाली है। अभी भी 100 से ज्यादा लोग वहां लापता हैं। क्या इन मौतों से बचा जा सकता था? यह बहस का विषय है और कोई भी इस त्रासदी या किसी तरह की लापरवाही की जिम्मेदारी नहीं लेगा। केंद्र सरकार और केरल सरकार के बीच जो दुखद आरोप-प्रत्यारोप सामने आए हैं, उनसे आगे बढ़ने की जरूरत है। यह समय सतर्कता और सुधार का है।
दरअसल, भारत में मौसम को समग्रता में समझने और उसके अनुकूल व्यवहार करने की जरूरत है। कभी खूब गर्मी, सूखा, तो कभी खूब बारिश, क्या ऐसे विरोधाभास को सहज ही स्वीकार करना चाहिए? मौसम की विचित्रता बढ़ती चली जा रही है। भारत मौसम विज्ञान विभाग (आईएमडी) ने गुरुवार को बताया कि रात के तापमान के मामले में भारत में सबसे गर्म जुलाई माह का रिकॉर्ड दर्ज किया गया है। औसत तापमान के मामले में बीती जुलाई 1901 के बाद दूसरी सबसे गर्म जुलाई रही है, जबकि देश के कुछ हिस्सों में असामान्य वर्षा हुई है। जुलाई के आंकड़ों पर अगर हम गौर करें, तो बिहार, झारखंड, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश, पंजाब, हरियाणा में जुलाई महीने में 20 से 59 प्रतिशत तक कम बारिश दर्ज हुई है। पूर्वोत्तर में भी सिक्किम और मेघालय को छोड़ दीजिए, तो बाकी जगह कम बारिश हुई है। मौसम विभाग के आंकड़ों के अनुसार, उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड में कमोबेश सामान्य बारिश रही है। जुलाई के महीने में केवल गोवा, महाराष्ट्र और कर्नाटक ही हैं, जहां खूब वर्षा हुई है। बिहार और झारखंड के अनेक इलाकों में खेतों के सूखने की खबर है। धान के पौधों को पानी चाहिए, अगर पानी न बरसा, तो उपज पर असर पड़ जाएगा। यही कामना रहती है कि आवश्यकता के अनुरूप बारिश हो, पर ऐसा होता कहां है?
अब एक बड़ा सवाल यह है कि अगस्त कैसा बीतेगा? मौसम विभाग की मानें, तो अगस्त में देश में मासिक वर्षा 94 प्रतिशत से 106 प्रतिशत के बीच सामान्य सीमा में रहने की संभावना है। मतलब, कहीं बहुत ज्यादा, तो कहीं बहुत कम बारिश से इनकार नहीं किया जा सकता। यहां सबसे बड़ी चिंता यह है कि वर्षा जनित हालात को जानलेवा बनने से कैसे रोका जाए? तमाम शहरों में बेसमेंट या भूतल बन रहे हैं, पर भारी बारिश के बारे में नहीं सोचा जा रहा है। खूब चौड़ी और समतल सड़कें बन रही हैं, पर अत्यधिक जलभराव की स्थिति में क्या किया जाएगा, इसकी तैयारी शायद किसी भी शहर में सोलह आना मुकम्मल नहीं है। बिजली के बेतरतीब तार और अन्य प्रकार की शहरी सुविधाएं भी मुसीबत का कारण बनने लगी हैं। यह समय है, जब राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली को अपनी कमियों से सीखकर देश के सामने एक आदर्श पेश करना चाहिए।
Date: 02-08-24
आरक्षण में भी आरक्षण के निहितार्थविराग गुप्ता, ( अधिवक्ता, सुप्रीम कोर्ट )
गठबंधन सरकार बनने के बाद सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के दो फैसलों से राज्यों के सांविधानिक अधिकारों को नई मजबूती मिली है। पहले फैसले से माइनिंग में रॉयल्टी के माध्यम से राज्यों को टैक्स वसूली का अधिकार मिला है, जबकि दूसरे फैसले से आरक्षण मामले में राज्यों को जातियों के वर्गीकरण का अधिकार मिल गया है। सांविधानिक प्रावधान और सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसलों के साथ नए फैसले का विश्लेषण करने पर सरकार को कई चुनौतियों से जूझना पड़ सकता है। सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के नाम पर दिए जा रहे आरक्षण की बुनियाद उस जाति पर टिकी है, जिस पर संसद में बहस और तीखी हो सकती है। इंदिरा साहनी फैसले में तय आरक्षण की 50 फीसदी सीमा को रद्द करने के लिए संविधान संशोधन की मांग से भी सरकार पर दबाव बढ़ सकता है।
अब कोटे में कोटा मतलब आरक्षण में आरक्षण के लिए सांविधानिक रास्ता खुल गया है। अनुच्छेद-341 में अनुसूचित जाति और 342 में अनुसूचित जनजाति को अधिसूचित करने के बारे में संसद और राष्ट्रपति को स्पष्ट अधिकार दिए गए हैं। तीन दशक पहले आंध्र प्रदेश में अनुसूचित जातियों के भीतर समूहों के वर्गीकरण के लिए कानून बनाया गया था, जिसे साल 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया था। अनुसूचित जाति और जनजाति के आरक्षण का फायदा कुछ ही जातियों को मिला है, इस तर्क के मुताबिक, साल 2006 में पंजाब ने अनुसूचित जातियों के लिए निर्धारित कोटे के भीतर वाल्मीकि और मजहबी सिखों को 50 फीसदी कोटा और पहली वरीयता दी थी। उसके बाद तमिलनाडु, हरियाणा और बिहार जैसे कई राज्यों ने ऐसे कानून बनाए। संविधान पीठ के अनुसार, आरक्षण का मुख्य मकसद आर्थिक और सामाजिक समानता लाना है, पर इसके लिए शहर और गांव की सामाजिक हकीकत में अंतर के साथ आर्थिक पहलुओं को ध्यान में रखना जरूरी है। एससी समुदाय के बड़े अफसरों और बड़े वकीलों के बच्चों की तुलना गांव में मैला ढोने वाले बच्चों से करना गलत है। इसलिए पीछे रह गई जातियों को मुख्यधारा में लाने के लिए ओबीसी की तर्ज पर एससी में भी कोटे के भीतर कोटे को जजों ने सांविधानिक माना है। आज के समय में इस फैसले की जरूरत को समझा जा सकता है, लेकिन समस्या यह है कि देश में 140 करोड़ जनसंख्या की सामाजिक स्थिति और आर्थिक हैसियत के आंकड़े स्पष्ट तौर पर उपलब्ध नहीं हैं। ऐसी स्थिति में जनसंख्या के आधार पर आनुपातिक आरक्षण की मांग बढ़ने से सामाजिक और सियासी विद्वेष बढ़ सकता है।
क्या इस फैसले से राज्यों में मनमानी बढ़ सकती है? ध्यान रहे, न्यायमूर्ति बेला त्रिवेदी ने बाकी छह न्यायमूर्तियों के बहुमत के फैसले से अलग फैसला देते हुए ईवी चिन्नैया मामले में साल 2004 के फैसले को सही ठहराया है। अनुच्छेद-142 की असाधारण शक्तियों के इस्तेमाल से सुप्रीम कोर्ट कानून की व्याख्या कर संपूर्ण न्याय दे सकता है, पर इससे एक नई इमारत नहीं बनाई जा सकती। अनुच्छेद-341 के अनुसार, केवल संसद को ही आरक्षण के दायरे में किसी जाति को शामिल करने या बाहर करने का अधिकार है। न्यायमूर्ति गवई ने बहुमत के फैसले में यह लिखा है कि चिन्नैया मामले में यह गलत समझ थी कि अनुच्छेद-341 और 342 आरक्षण का आधार है। न्यायमूर्तियों ने जिस दृढ़ता के साथ कोटे में कोटा सिद्धांत के पक्ष में तर्क दिए हैं, उतनी ही साफगोई के साथ यदि क्रीमीलेयर के बारे में राज्यों और केंद्र सरकार को आदेश जारी किए जाते, तो आरक्षण से जुड़ी अधिकांश गलतफहमियों और विवादों का अंत हो सकता था।
अब नौजवानों से जुड़े अनेक मुद्दों जैसे कोचिंग, अग्निवीर, नीट, इंटर्नशिप, नकल और नौकरी पर बहस के बीच इस फैसले से क्रीमीलेयर का मुद्दा फिर गरमा सकता है। अब आरक्षण का कई पहलुओं से मूल्यांकन जरूरी हो गया है। एससी, एसटी, ओबीसी, दिव्यांग, महिला, ईडब्ल्यूएस जैसे सभी वर्गों के आरक्षण को जोड़ा जाए, तो 99 फीसदी आबादी आरक्षण के दायरे में आ जाती है। ओबीसी में क्रीमीलेयर को कानूनी और न्यायिक मान्यता मिली है, पर एससी/एसटी वर्ग में इसे लागू करने पर कई दशकों से विवाद चल रहा है। इस फैसले में शामिल चार जजों ने एससी/एसटी आरक्षण में क्रीमीलेयर फॉर्मूले को लागू करने की बात कही है। इसके अनुसार, सक्षम और अमीर लोगों को आरक्षण के दायरे से बाहर करने के लिए राज्यों को नीति बनानी चाहिए। क्रीमीलेयर को लागू किए बगैर राज्य सरकारें जातियों का वर्गीकरण शुरू कर दें, तो यह अदालत के फैसले की अवहेलना होगी। आरक्षण से जुड़े मामलों पर संविधान में अनेक संशोधन हुए हैं। आरक्षण के मसले पर संसद के अनुसार राष्ट्रपति को आदेश जारी करने का अधिकार है, इसलिए संविधान पीठ के ताजा फैसले के बाद एससी/एसटी वर्ग में क्रीमीलेयर फॉर्मूले को लागू करने के लिए केंद्र सरकार को नियम और कानून बनाने की जरूरत पड़ेगी।
तय मानिए, इस फैसले के बाद जातिगत जनगणना का आधार मजबूत होगा। साल 2006 में सुप्रीम कोर्ट ने नागराज फैसले में सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन, सरकारी नौकरियों में प्रतिनिधित्व और प्रशासनिक कार्यकुशलता के तीन पैमानों की बात कही थी। पदोन्नति में आरक्षण पर पिछले कई दशक से मुकदमेबाजी चल रही है। जब शैक्षणिक और सामाजिक पिछड़ेपन के आधार पर दिए जा रहे आरक्षण की जमीनी हकीकत जाति पर टिकी है, तब देशव्यापी जातिगत जनगणना से कैसे बचा जा सकता है?
बिहार सरकार ने साल 2007 में महा-दलित आयोग बनाया था। उसके बाद कनार्टक और फिर बिहार में राज्य सरकारों ने जातिगत गणना कराई। संविधान के अनुसार, जनगणना का विषय केंद्र सरकार के अधीन है, पर हर 10 साल में होने वाली जनगणना का मामला कोरोना के बाद से अटका हुआ है। अदालत के ताजा फैसले से राज्यों को जो अधिकार मिले हैं, उसकी आड़ में राज्यों में जातिगत गणना की होड़ शुरू हो सकती है। एक आशंका है, कोटे में कोटा लागू करने के लिए राज्यों को जो अधिकार दिए गए हैं, उनका दुरुपयोग होने पर अन्याय व असमानता बढ़ सकती है।
चार राज्यों में होने वाले चुनावों के मद्देनजर देखें, तो इस फैसले के बाद आरक्षण की राजनीति के साथ अदालतों में मुकदमेबाजी भी बढ़ेगी, जिसका समाधान करना होगा। अनुच्छेद-19 के तहत नागरिकों को पूरे देश में व्यवसाय और रोजगार का अधिकार है, इसलिए आरक्षण के माध्यम से न्याय और समानता स्थापित करने के लिए जातियों के व्यापक वर्गीकरण की राष्ट्रीय नीति को न्यायिक मान्यता देनी पड़ेगी।
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अन्य राज्यों को भी कर्नाटक का उदाहरण लेकर इस दिशा में कदम उठाने चाहिए।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 11 जुलाई, 2024
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Date: 01-08-24
Escape To Where?Unchecked tourism is also a culprit in Wayanad, govts won’t do anything about it until we doTOI Editorials
Even as rescue workers raced against time to save lives in Wayanad, invites and incitements to tourists to visit the region hustled uninterrupted on social media. This is one of the most landslide-prone areas of the Western Ghats. With Tuesday’s landslides taking over 150 lives, govts’ failure to mitigate its well-known ecological vulnerabilities is sharply, and justly, in focus today. But an unregulated tourist boom has also played a key role in the ghatastrophe. This factor deserves all the more attention, because it is seen wreaking havoc across several environmental hotspots in the country.
That many homestays and resorts which got destroyed were located right on river banks, ‘without providing any room for the river’, is reminiscent of how buildings constructed in floodplains got swept away during the 2013 Kedarnath floods. Uttarakhand has hardly corrected course since then. Tourism bucks and real estate greed are still seen running rampant. Whether travellers come looking for physical or spiritual adventures, they become part of the same traffic jams and garbage mountains. Tiger reserves to oncepristine beaches, too often the scene is sadly the same. They crowd onto railway tracks to see Dudhsagar Falls, make Darjeeling run short of drinking water, make Ooty feel indistinguishable from Bengaluru.
This is a painful irony. The search for an escape from cities, turns tourist destinations into an unpleasant reflection of these cities. It’s a Janus-faced challenge. It has to be addressed at both ends. Our cities have to be made much more ‘livable’ and our vacation stations have to be much better conserved. The first needs reversing the decline of our blue-green infra. Imagine Delhi with a Yamuna that raises our spirits rather than stench, Mumbai with its green lungs safe and stronger, Bengaluru with its lakes breathing not frothing. Imagine well-maintained parks, gardens, playgrounds.
But don’t imagine any of this will happen without a heavy increase in public pressure. Govts will have to be pushed to change their priorities. The decade-long inaction on the Gadgil and Kasturirangan reports on the Western Ghats is a classic example of how other interests prevail over the environment, in the normal course of things. This norm needs shaking up. While humans profit from it in some way or another, even if short-term, the destination only experiences loss after loss. What took millennia to build, we are destroying recklessly, and can never bring back.
Date: 01-08-24
Unnatural disasterKerala must restore denuded flora and rehabilitate people in vulnerable areasEditorial
Climate change can encourage unprecedented weather, precipitating natural disasters of magnitudes that may surprise local responders. The calamitous landslides in Wayanad district in Kerala on July 30 are not necessarily such disasters. Parts of Kerala have been bearing the brunt of heavy rains during the southwest monsoon and landslides are a yearly affair. But deadly landslides are new. This week, heavy rains triggered multiple landslides that have killed 200 people and laid waste to a few villages. The region is a tourist destination and incentivises infrastructure development to maximise revenue potential. The Chaliyar river here springs from an altitude of around 2 km and flows in a sheer path down towards Vellarmala, bringing fast waters that also sweep relatively more sediment downstream. The rains this year further increased the river’s volume and force, which swept up debris and deposited it in the villages settled on less steep land where many of the deaths have been reported. But the tragedy is compounded by the fact that heavy rains here in 2020 had caused the Chaliyar to strip swaths of its upstream areas of plant cover, leaving more rocks and humus vulnerable to being displaced.
The geographical peculiarities of landslide-prone Idukki, Kottayam, Malappuram, and Wayanad have been evident for years; they also feature prominently on landslide risk maps. Blame for the landslides’ deadly recurrence must thus be shared by climate change and a State that has been repeatedly caught off-guard. A recurring issue is an abject lack of advance warning and emergency preparedness. Landslides are more common in ecologically fragile areas. The monsoons have been producing more short bursts of intense rain, resulting in some soil types becoming easier to dislodge while quarrying; linear infrastructure development, construction activities, and monocropping have compromised ecosystems’ ability to cope with changing natural conditions. For these reasons, patterns of land use must not change and the State must restore denuded flora and rehabilitate people in these areas to ensure they have other opportunities for their welfare. As recommended by the Western Ghats Ecology Expert Panel, Kerala must also decline engineering projects in ecologically sensitive areas and their surroundings, and constitute, equip, staff, and empower expert committees that deliberate the feasibility of other projects here. Indeed, the panel’s recommendations were designed to tame the effects of unpredictable weather without also denting economic growth, but Kerala today is sliding past the point of having an option to balance development needs with environmental concerns.
Date: 01-08-24
Problem powerSmall modular reactors must deal with the cost of proliferation resistanceEditorial
The Indian government is planning to team up with the private sector to study and test small modular reactors (SMRs). Nuclear energy is an important power source in the world’s energy mix as it waits for the development and maturation of (other) renewable energy technologies while fossil-fuel-based sources, especially coal, continue to remain relevant and more affordable. Nuclear power offers a sufficiently high and sustainable power output, even if externalised costs like those of building safe and reliable reactors and handling spent nuclear fuel complicate this calculus. Indeed, cost and time estimates that expand to nearly twice as much as at the point of a project’s commissioning are not unheard of. The nuclear power tariff is thus higher from ‘younger’ facilities, even if they also fill gaps that haunt power from renewable sources. SMRs, of 10 MWe-300 MWe each, are smaller versions of their conventional counterparts. They aspire to be safer without compromising commercial feasibility by leveraging the higher energy content of nuclear fuel, a modular design, a smaller operational surface area, and lower capital costs. But the challenge is to have this aspiration survive SMRs’ external costs.
The government’s privatisation of nuclear power generation will also increase the demand for regulatory safeguards against radioactive material being diverted for military use. The first-generation SMRs are expected to use low-enriched uranium in facilities assembled on-site with factory-made parts, to produce waste that can be handled using existing technologies and power that can be sold at economical rates. But the reactor will need frequent refuelling and will yield a consequential amount of plutonium; both outcomes will stress proliferation resistance. The IAEA has touted the use of ‘safeguardable’ reactor designs but such solutions will increase capital costs. Subsequent SMR generations may also require more enriched uranium, especially if their feasibility is pegged on longer periods of continuous generation, or more sophisticated systems to increase fuel-use efficiency, which would increase the operational surface area and the generation cost. In fact, nuclear reactors have a fixed baseline cost and safety expectations that do not change with energy output, which means SMR-based tariffs need not automatically be lower. This is why the Department of Atomic Energy increased its reactors’ capacity from 220 MW to 700 MW. SMRs’ ability to bolster the prospects of nuclear power in India will thus depend on their commercial viability — and in turn on the availability of less uncertain market conditions, stable grids, and opportunities to mass-produce parts — and the price of proliferation resistance.
Date: 01-08-24
शोध पर पर्याप्त खर्च किए बिना खेती कैसे सुधरेगीसंपादकीय
वित्तमंत्री ने बजट भाषण में, विकसित भारत अभियान के लिए नौ मुख्य प्राथमिकता क्षेत्र चुने हैं। इसमें पहला है- कृषि में उत्पादकता और अनुकूलनीयता (रेजिलिस)। कृषि में ये दोनों प्रयास तब तक सफल नहीं हो सकते, जब तक उन पर व्यापक और युद्ध स्तर पर शोध न हों। लेकिन सच यह है कि इस घोषणा के बावजूद बजट में कृषि शोध की राशि न केवल नगण्य बल्कि लगभग पूर्ववत है। जरा सोचें, जिस देश में कृषि विकास दर पिछले वर्ष के 4.7% के मुकाबले वर्ष 2024 में घटकर मात्र 1.4 रह गई हो, उसमें कृषि शोध पर खर्च करना ही एक मात्र विकल्प होना चाहिए। लेकिन कृषि शोध तीव्रता (एआरआई) – शोध राशि और कृषि जीडीपी का अनुपात – जो वर्ष 2008-09 में 0.75% था, वर्ष 2022-23 में घटकर मात्र 0.43 रह गया है। कृषि अर्थशास्त्री मानते हैं कि कृषि शोध में एक रुपया खर्च करने से दस रुपया मिलता है। भारत जैसे देश में नई पर्यावरण अनुकूलित बीज और नई सिंचाई और बुवाई तकनीकी पर काफी काम करना होगा। कहने को इस कृषि प्रधान देश में 62% आबादी आज भी कृषि – अर्थव्यवस्था में संलग्न है, लेकिन कृषि उत्पादकता दुनिया के औसत से काफी कम है। यह भी कड़वा सच है कि नीति आयोग की 9वीं शासी परिषद की बैठक में कृषि पर सार्थक चर्चा नहीं हो सकी।
Date: 01-08-24
शिक्षा व स्वास्थ्य पर पैसा होने के बावजूद खर्च क्यों नहीं?डॉ. अरुणा शर्मा, ( प्रैक्टिशनर डेवलपमेंट इकोनॉमिस्ट और इस्पात मंत्रालय की पूर्व सचिव )
कोई भी देश तब तक समृद्ध नहीं हो सकता, जब तक कि उसके युवाओं की प्रगति न हो। भारत को अपने अच्छे शिक्षण संस्थानों के कारण दुनिया में प्रतिष्ठा मिली है, चाहे वे प्रौद्योगिकी में हों, चिकित्सा में हों या सामाजिक-विज्ञान में। तकनीकी-इनोवेशन और मेडिकल-टूरिज्म में भारतीयों की भूमिका पर देश गर्व करता है। हमारे कृषि शिक्षा संस्थानों ने कृषि-क्रांति में अपनी भूमिका निभाई है
लेकिन आज हमें स्वास्थ्य और शिक्षा पर कम खर्च के कारण आलोचनाओं का सामना करना पड़ रहा है। दुनिया भर में स्वीकृत प्रतिशत के मुकाबले कम खर्च करने के पीछे संसाधनों की कमी का हवाला दिया जाता है। जबकि शिक्षा और स्वास्थ्य में फंडिंग के लिए किए गए व्यय पर एक विशेष ‘उपकर’ बनाया गया है, क्योंकि देश के सभी नागरिकों को सुलभ और सस्ती शिक्षा-स्वास्थ्य सेवाएं प्रदान करना ही सुशासन का पहला दायित्व है। ध्यान रहे कि कर और उपकर के बीच अंतर यह है कि कर देश की समेकित निधि में जाता है जिसका कोई परिभाषित अंतिम उपयोग नहीं होता, जबकि उपकर का प्रयोजन स्पष्ट होता है और उसे उसी कार्य के लिए खर्च किया जाना होता है, जिसके लिए उसे लागू किया गया था।
वित्त वर्ष 2018-19 से ही नागरिक नियमित रूप से स्वास्थ्य और शिक्षा उपकर का भुगतान कर रहे हैं। दुर्भाग्य से अलग-अलग लेखांकन के बजाय यह राशि भारत के समेकित कोश में जा रही है, विशेष प्रयोजन फंड में नहीं, ताकि यदि किसी वित्तीय वर्ष में खर्च न किया गया हो तो उसे आगे ले जाया जा सके। प्रत्येक उपकर का संग्रह संसद द्वारा एक सक्षम कानून के माध्यम से इसके गठन को अधिकृत करने के बाद किया जाता है। कानून में उस उपकर का उद्देश्य स्पष्ट किया जाता है, जिसके लिए धन जुटाया जा रहा है। संविधान का अनुच्छेद 270 उपकर को उन करों के पूल के दायरे से बाहर रखने की अनुमति देता है, जिन्हें केंद्र सरकार को राज्यों के साथ साझा करना होता है। इसलिए केंद्र सरकार के लिए यह अनिवार्य है कि वह एकत्रित उपकर को उसके निर्धारित उद्देश्य के लिए ही खर्च करे, ताकि उसके द्वारा प्रदान की जाने वाली सुविधाओं की गुणवत्ता और मात्रा में सुधार हो सके।
वित्त वर्ष 2021-22 के दौरान स्वास्थ्य और शिक्षा उपकर के लिए 52,732 करोड़ रुपए एकत्र किए गए, जिनमें से 31,788 करोड़ रुपए या 60% प्रारंभिक शिक्षा कोष में स्थानांतरित कर दिए गए। भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) ने पाया है कि वित्त वर्ष 2021-22 के संशोधित अनुमानों के अनुसार क्रमशः 25,000 करोड़ रुपए और 21,499 करोड़ रुपए माध्यमिक एवं उच्चतर शिक्षा कोश (MUSK) और प्रधानमंत्री स्वास्थ्य सुरक्षा निधि (PMSSN) को हस्तांतरित करने के लिए स्वीकृत किए गए थे। यहां यह न भूलें कि 52,732 करोड़ के संग्रह के मुकाबले केवल 46,499 करोड़ आवंटित किए गए थे।
संसद में वित्त मंत्री ने उपकर के लिए एकत्र इस धन को रखने के लिए विशेष प्रयोजन निधि की व्यवस्था करने की प्रतिबद्धता जताई, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि इसे 2022 में केवल इसके उद्देश्य के लिए ही खर्च किया जाए। लेकिन अभी तक कैग द्वारा इस मुद्दे को उठाए जाने के बावजूद ऐसा नहीं किया गया है। वर्ष 2021-22 में 23,874 करोड़ रुपयों का हस्तांतरण न होने से उपयोग नहीं किया जा सका। कैग ने सरकारी खातों की अपनी नवीनतम लेखा-परीक्षा रिपोर्ट में पाया है कि केंद्र सरकार ने 2018-19 में विभिन्न उपकरों के माध्यम से एकत्र किए गए लगभग 2.75 लाख करोड़ रुपए में से 1.1 लाख करोड़ से अधिक भारत के समेकित कोश (सीएफआई) में रोक लिए हैं।
ऐसे में संसाधनों की कमी के कारण यह स्थिति नहीं बनी है, क्योंकि एकत्रित किया गया उपकर शिक्षा और स्वास्थ्य के क्षेत्र में किए गए व्यय में झलक नहीं रहा है। युवाओं को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा प्रदान करने और भारत के सभी निवासियों को बेहतर स्वास्थ्य सेवा सुनिश्चित करने के लिए उपकर और उसके खर्च के पैटर्न की निगरानी करना सोशल ऑडिट के लिए अनिवार्य है। मानव विकास सूचकांक में हमारे निम्न पैरामीटर आज इन कम खर्चों का ही परिणाम हैं। संविधान के अनुच्छेद 14 में कानून के समक्ष समानता अनुच्छेद 21 के तहत यह सुनिश्चित कर देती है कि किसी भी व्यक्ति को सुविधाओं आदि की कमी के कारण शिक्षा के अधिकार से वंचित नहीं किया जाएगा। और यही बात रियायती दरों पर हेल्थकेयर के अधिकार पर भी लागू होती है।
Date: 01-08-24
प्रकृति का तांडवसंपादकीय
केरल के वायनाड में तेज बारिश के बाद हुए भूस्खलन के कारण मरने वालों की संख्या 165 तक पहुंच चुकी है। 220 लापता हैं तथा 131 घायल हुए हैं। मुंडक्कई, अय्यामाला, चूरलमाला और नूलपुझा गांव में देर रात को हुई इस दुर्घटना के बाद बचाव कार्य जारी है। हजारों लोगों को बमुश्किल निकाला जा सका तथा उन्हें सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने का काम जारी है। इस बीच, मौसम विभाग भारी बरसात की चेतावनी अब भी दे रहा है। मल्लपुरम, कोझिकोड, वायनाड, कन्नूर और कासरगोड जिलों में चेतावनी के साथ ही एर्नाकुलम, इडुक्की, त्रिशूर में भी भारी बरसात होने की संभावनाएं व्यक्त की गई हैं। वायनाड का मुख्य पुल बह जाने से सैकड़ों फंसे लोगों का बचाव मुश्किल हो गया है। ढेरों घर बह गए हैं। करीब के चाय बागान के 35 कर्मचारियों का भी पता नहीं चल पाया है। हालांकि अब तक यह पता नहीं चल सका है कि चाय बागानों में कितने मजदूर काम कर रहे थे। पांच साल पहले भी इन्हीं गांवों में भूस्खलन हुआ था, जिसमें 50 से ज्यादा घर बह गए थे। लापता लोगों में से पांच का अब तक कोई पता नहीं चल सका है। इसलिए परिवार बेहाल हैं। वे अपनों को ढूंढने और अपने तबाह हो गए घर को देखने की गुहार लगा रहे हैं। मोबाइल टावरों के क्षतिग्रस्त होने से फोन सेवाएं भी बाधित हैं। आपदा प्रबंधन दल के लिए उन इलाकों तक पहुंचने में खासी दिक्कतें आ रही हैं। वे केबल के सहारे हैं तथा हैलीकॉप्टर से घायलों को लाने-ले जाने का काम कर रहे हैं। वायनाड पठारी इलाका है जिसकी 51% भूमि पहाड़ी ढलान वाली है। सरकारी दस्तावेज के अनुसार केरल का 43% इलाका भूस्खलन प्रभावित इलाका है। मानसून के दौरान यहां हमेशा जबरदस्त बरसात होती है। नदियों में बरसाती पानी के कारण बाढ़ जैसी स्थिति बन जाती है। प्राकृतिक आपदाओं के चलते प्रति वर्ष देश में हजारों लोग मारे जाते हैं, और हजारों लोग बेघर हो जाते हैं। देखने में आया है कि हाल के वर्षो में प्राकृतिक आपदाओं की बारंबारता में इजाफा हुआ है। बेशक, सरकार मदद करती है, मुआवजा भी देती है। मगर इससे पीड़ितों को न तो खास राहत नहीं मिलती है, न ही सबको मिल सकती है। सरकारी महकमे की धांधली से बचाव असंभव है। सेना के तीनों अंग और एनडीआरएफ ऐसे वक्त में आपदाग्रस्त देशवासियों के खासे मददगार साबित होते हैं।
Date: 01-08-24
बदलेगी गांवों की तस्वीरअखिलेश आर्येन्दु
बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने खेती- किसानी को अहमियत दी है। कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय की पुरानी योजनाओं को बरकरार रखते हुए कृषि क्षेत्र में तमाम तरह के बदलाव किए हैं, जिनमें खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने के साथ-साथ अगले 2 वर्षों में प्राकृतिक खेती के लिए 1 करोड़ किसानों को प्रोत्साहित करने की योजना भी है जिसके तहत केंद्र किसानों को धन मुहैया कराएगा। गौरतलब है कि कृषि एवं इससे संबद्ध क्षेत्र के लिए 52 हजार करोड़ रुपये का आवंटन किया गया है जो फरवरी में अंतरिम बजट के आवंटन से 25 हजार करोड़ ज्यादा है। खेती के वर्तमान तरीके से निकल कर प्राकृतिक खेती अपनाने पर किसानों को प्रोत्साहित करने के लिए बजट में मुहैया कराई गई राशि, किसानों को घाटे की खेती से उबारने का क्रांतिकारी कदम कहा जाना चाहिए।
पहली बार है जब केंद्र सरकार ने किसानों को आत्मनिर्भर बनाने की पहल की है, जिसमें किसानों को घाटे से उबारने की बाबत सरकार ने प्राकृतिक खेती के उत्पादों को बेहतर दाम दिलाने की बाबत बाजार या उपभोक्ता मुहैया कराने की बात की है। जाहिर तौर पर प्राकृतिक खेती में लागत नाम मात्र की आती है और उत्पाद महंगे बिकते हैं। कृषि में पैदा हुए उत्पाद महंगे बिकते हैं, तो किसान की घाटे वाली खेती मुनाफे में आ जाएगी। बजट में किसानों की आय और फसलों की उत्पादकता बढ़ाने के मद्देनजर बागवानी समेत 32 फसलों की 109 सर्वाधिक पैदावार वाली किस्में जारी करने का प्रावधान है, ये फसलें जलवायु अनुकूल होंगी। बजट में कृषि क्षेत्र में सरकारी क्षेत्र के साथ निजी क्षेत्र को आमंत्रित करने की बात भी की गई है। सवाल किया जा सकता है कि क्या कृषि को पूंजीपतियों के हवाले करने की योजना है? निजी क्षेत्र में निवेश किस जगह पर किया जाएगा?
कृषि क्षेत्र का निजीकरण की बात पहले भी की जाती रही है। एनडीए नीत केंद्र सरकार अपने तीसरे शासन काल में लगातार कृषि क्षेत्र के लिए में ल बजट में वृद्धि करती आ रही है। आंकड़े बताते हैं कि 2013-14 में कृषि का बजट जहां 21933.50 था, जो 2024-25 में बढ़कर 1.52 लाख करोड़ रुपये हो गया। आजादी के बाद खेती-किसानी के लिए इतना विशाल बजट पहली बार आवंटित किया गया है। प्राकृतिक खेती के प्रोत्साहन से जहां जल के दोहन में कमी आएगी वहीं खाद्यान्न की शुद्धता, जमीन की उर्वर शक्ति का संरक्षण, जलवायु को अनुकूल रखने में मदद मिलने के साथ प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहन देने से उर्वरकों, बीजों और छिड़काव करने वाले यंत्रों पर दी जाने वाली अरबों रुपये की सब्सिडी की भी बचत होगी जिससे इससे देश की आर्थिक सेहत सुधारने में मदद मिलेगी। इसके अलावा, गांवों से गरीबी ही नहीं भागेगी, बल्कि भुखमरी, कुपोषण, अशिक्षा, बेरोजगारी और पलायन जैसी तमाम समस्याओं से धीरे- धीरे छुटकारा भी मिलने लगेगा।
जाहिर तौर पर प्रदूषित अन्न, फल, सब्जियों और दूध के सेवन से मानसिक और शारीरिक बीमारियां लगातार बढ़ रही हैं। प्राकृतिक खेती से किसानों की आय ही नहीं बढ़ेगी, बल्कि जलवायु परिवर्तन से बढ़ती तमाम तरह की समस्याओं से निजात भी मिलने लगेगा। आजादी के बाद वैज्ञानिक खेती के नाम पर रासायनिक खेती की जाती रही है, जो हमेशा घाटे में ही रही। गौरतलब है कि वित्त वर्ष 2022-23 में 1.23 ट्रिलियन भारतीय रुपये से अधिक मूल्य के उर्वरकों का आयात किया गया। केंद्र सरकार की पहल को कारगर बनाने के लिए जरूरी है कि गांवों से पलायन रोका जाए। जाहिर तौर पर पलायन रोकने में रासायनिक खेती कारगर नहीं रही है। इसलिए रासायनिक खेती की उपयोगिता और प्रासंगिकता पर भी गौर करने की जरूरत है। कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने से पर्यावरण, खाद्यान्न, भूमि, इंसान की सेहत, पानी की शुद्धता को और बेहतर बनाने में मदद मिलती है। आम तौर पर कृषि व बागवानी में बेहतर उपज लेने और बीमारियों के खात्मा के लिए फसलों में कीटनाशकों का इस्तेमाल जरूरी माना जाता है लेकिन देशी तरीके से किए जाने वाली खेती और बागवानी ने इस धारणा पर सवाल खड़े कर दिए हैं। कीटनाशक बेहतर उपज के लिए या बीमारियों को खत्म करने के लिए भले ही जरूरी माने जा रहे हों। लेकिन इससे कई तरह की समस्याएं, जटिलताएं और बीमारियां बढ़ी हैं। गौरतलब है कि रासायनिक खादों और कीटनाशकों के इस्तेमाल से होने वाली बीमारियों और समस्याओं की जानकारी न होने की वजह से इनका इस्तेमाल इतना ज्यादा किसान करने लगे हैं।
प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहन से जमीन की उर्वरा शक्ति में जहां बढ़ोतरी होगी। वहीं पर्यावरण की हिफाजत करने में भी मदद मिलेगी। इसे अपनाने से अन्न, सब्जी और फलों से किसी को कोई किसी तरह की बीमारी भी नहीं होती । प्राकृतिक खेती में यज्ञ या हवन से निकली राख का इस्तेमाल किया जा सकता है। इस राख से जहां जमीन में उर्वरा शक्ति की बढ़ोतरी होती है वहीं उपज बढ़ाने में भी यह बहुत कारगर है । कृषि वैज्ञानिक हैरत में हैं कि स्वदेशी तरीके से खेती और बागवानी को जितना ज्यादा मुफीद बनाया जा सकता है, उतना आधुनिक तरीके से नहीं, खासकर फसलों और सब्जियों को सुरक्षित रखने के मामले में इसलिए ऐसे प्रयोगों को किसानों को अपनाने की जरूरत है। कृषि वैज्ञानिक देवेन्द्र शर्मा जैविक खेती को किसान और किसानी के लिए फायदेमंद और निरापद मानते हैं। उनका मानना है कि प्राकृतिक खेती से ही खेती घाटे से निकल कर फायदे में आ सकती है। इससे जहां गांवों से पलायन कम होगा, वहीं रासायनिक खादों और कीटनाशकों के इस्तेमाल से बढ़ रही तमाम तरह की समस्याएं भी कम होंगी। पिछले कई सालों से देश के दक्षिण राज्यों के किसानों के जरिए किए जा रहे उन सफल प्रयोगों को केंद्र और राज्यों की तरफ से कोई प्रोत्साहन नहीं मिला लेकिन अब केंद्र सरकार ने 1 करोड़ किसानों को प्राकृतिक खेती अपनाने के लिए योजना बनाई है, और विधिवत बजट में भी इसका प्रावधान किया जा चुका है।
केंद्र सरकार राज्यों की मदद से प्राकृतिक खेती को जन आंदोलन के रूप में आगे बढ़ाने की जरूरत है। जिस तरह हरित क्रांति और श्वेत क्रांति का आंदोलन देश में चला कुछ इसी तरह प्राकृतिक खेती का जनांदोलन चलाया जाना चाहिए।
Date: 01-08-24
अरब क्षेत्र की चिंतासंपादकीय
इजरायल की आक्रामकता का नया सिलसिला फिर चर्चा में है और इसके साथ ही पश्चिम एशिया के देशों में चिंता की नई लहर दौड़ गई है। पहले लेबनान के बेरूत में आतंकी संगठन हिजबुल्लाह के कमांडर फउद का अंत कर दिया गया और उसके बाद ईरान के तेहरान में आतंकी संगठन हमास के नेता इस्माइल हनियेह की हत्या कर दी गई। बुधवार शाम तक एक ही हत्या की जिम्मेदारी इजरायल की ओर से ली गई। ईरान में हुई सनसनीखेज हत्या विश्व राजनय के लिए ज्यादा गंभीर मामला है। इसमें कोई दोराय नहीं कि इजरायल घोषित रूप से हमास और अन्य आतंकी संगठनों को समाप्त कर देना चाहता है, पर उसके तरीके को लेकर विवाद बढ़ सकता है। हिजबुल्लाह के कमांडर का तो इजरायल ने सीधे अपराध भी गिना दिया है। उसे इजरायल में 12 बच्चों की हत्या के लिए दोषी ठहराया गया है। फिलहाल, खासकर इस्माइल हनियेह की हत्या इसलिए ज्यादा मायने रखती है, क्योंकि वह युद्धविराम की बातचीत में शामिल थे। गाजा को लेकर पहले ही भयंकर विवाद चल रहा है और पिछले कुछ दिनों से इजरायल व लेबनान में संघर्ष की स्थिति बढ़ गई है। ऐसे में, लेबनान में इजरायल द्वारा की गई कार्रवाई से जंगी माहौल को ही बल मिलेगा।
गौर करने वाली बात है कि हमास भले ही एक आतंकी संगठन हो, पर पश्चिम एशिया के देशों में उसे अलग नजरिये से देखने वाले बहुत हैं। तभी तो हमास ने अपने नेता की मौत पर शोक व्यक्त करते हुए उनको शहीद बताया है। इस्माइल चूंकि नए ईरानी राष्ट्रपति मसूद पेजेशकियान के शपथ समारोह में भाग लेने गए थे, इसलिए ईरान में भी बहुत नाराजगी है। पश्चिम एशिया में आज एक बड़ा सवाल है कि क्या ईरान इजरायल पर हमलावर हो सकता है? वैसे तो इजरायल के प्रति पश्चिम एशिया के देशों में बहुत हद तक नफरत का भाव है, पर इजरायल अपने दुश्मनों पर इक्कीस साबित होता रहा है। पश्चिम एशिया के देश रह-रहकर अपना गुस्सा प्रकट करते हैं, पर सीधे इजरायल से लड़ना उनके लिए आसान नहीं है। इजरायल ने यह एहसास उन सभी देशों को करा दिया है कि खुली जंग किसी के लिए भी खतरे से खाली नहीं है। आज जिस तरह की स्थिति पश्चिम एशिया में है, साफ तौर पर यह कहना मुश्किल है कि कौन पूरी तरह सही है और कौन पूरी तरह गलत। इजरायल अपने दुश्मनों के प्रति जरूरत से ज्यादा आक्रामक है, तो इसके पीछे शायद उसके अपने पुराने अनुभव हैं। दूसरी ओर, अनेक देश हैं, जो आतंकियों को पूरा सहयोग देते हैं, अपनी जमीन पर पनपने-रहने देते हैं, हथियार देते हैं, ऐसे देशों का खुलकर कैसे पक्ष लिया जाए?
पश्चिम एशिया में प्रतिशोध एक बहुत त्रासद शब्द है, उसके बारे में सोचकर सिवाय दुख के कुछ भी हासिल नहीं होता। अगर तेहरान में मारे गए इस्माइल की ही बात करें, तो पूर्व में उनके परिवार के करीब 14 लोग मारे जा चुके हैं। ये सभी 14 लोग कतई आतंकी नहीं थे। प्रतिशोध के नाम पर मासूम बच्चों को भी नहीं छोड़ा जाता, न इजरायल छोड़ता है और न हिजबुल्लाह या हमास, तो फिर भलमनसाहत या इंसानियत का अतिरिक्त लाभ किसे दिया जाए? बदला लेने का यह बर्बर तरीका किस मजहबी किताब से सीखा गया है? मजहब के नाम पर हैवानियत भरी जंग की जितनी निंदा की जाए, कम होगी। कम से कम आधा दर्जन पश्चिम एशियाई देशों का रवैया सिर्फ निराश ही नहीं करता है, बल्कि पूरी दुनिया को चिंता में डाल देता है।
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हाल ही में इस्लामिक गणराज्य ईरान ने एक ऐसे उम्मीदवार को चुना है, जो बदलाव की मांग करता है।
कुछ बिंदु –
‘द हिंदू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 8 जुलाई, 2024
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Date: 31-07-24
Justice Under WaterTrial courts, as CJI has said, are not applying common sense in bail hearings. Fault lies largely with HCs.TOI Editorials
In Delhi’s basement drowning case, a 50-year-old who drove past the tuition centre, navigating the waterlogged road, was sent to judicial custody for 14 days by Tis Hazari court. Yesterday, court reserved its order on his bail plea. The charge? That the rainwater his SUV displaced aggravated the surge. That cops arrested a passerby rather than pursue those who ignored alerts of the basement’s vulnerability, or those officials who’ve turned away from blatant rule-breaking, says a lot. But perhaps, more extraordinary is the court’s reaction. Just what is going on in the name of ‘justice’? That the court opted to stay its order on the bail plea exemplifies exactly the kind of court action SC and CJI caution about.
CJI-speak | Days ago, CJI in Bengaluru said judges must have “robust common sense”, that unless judges “separate the grain from the chaff in criminal jurisprudence”, “just solutions” were unlikely. He said trial courts “play it safe” when they deny bail, pinpointing the problem to the “suspicion with which grant of relief is viewed”. In 2022, CJI had said there exists a “sense of fear” among district judges that, if not sorted out, would render trial courts “toothless” and higher appellate courts “dysfunctional”.
Fear & rebuke | The bottom line is, SC has no power of supervision over HCs, but HCs enjoy such power over trial courts. Trial judges are indeed apprehensive, not least of high courts’ adverse remarks and of their orders getting overturned – both of which impact their careers. Recall Kejriwal’s bail, granted by a special judge, who took investigators to task in her order, saying the agency wasn’t acting without bias. Delhi HC dragged out its overturning of the bail and called the trial court order “perverse”. In another money laundering case early July, SC expressed its shock that Delhi HC “casually stayed” a “reasoned order granting bail”, without specifying any reason. SC said, “What signals are we sending?”
Internal matter | The signals are that no-bail is trial courts’ template. There’s another reason for this, which SC articulated in its landmark order in Satender Kumar Antil vs CBI (2022). SC said given the “abysmally low” conviction rate in criminal cases, courts “tend to think that the possibility of conviction being nearer to rarity, bail applications will have to be decided strictly, contrary to legal principles”. In essence, denial of bail doubles as punishment. Only HCs can give trial court judges the courage to apply common sense.
Date: 31-07-24
Option or stratagem?Court should limit Governor’s power to refer Bills to President without cause.Editorial
The manner in which some Governors have been dealing with legislation passed by the State legislatures is a travesty of the Constitution. After the Supreme Court of India intervened in the case of Punjab and raised questions about the action or inaction of Governors in Tamil Nadu and Telangana, it was believed that incumbents in Raj Bhavans would end their deliberate inaction on Bills passed by the Assemblies. However, it appears that on finding that their supposed discretion to sit indefinitely on the Bills or withhold assent to them has been significantly curtailed, Governors have taken to the stratagem of sending Bills they disapprove of to the President for consideration. When the President refuses assent, based on the advice of the Union government, there is no recourse left for the State legislatures. This has given rise to the question whether the provision for reservation of some Bills for the President’s consideration is being misused for subverting federalism. In other words, the Centre is given a contrived veto over State laws — something not envisaged in the Constitution. This is precisely the question that Kerala has raised in its writ petition before the Court, challenging the Governor’s action in sending the Bills to the President and the latter’s refusal of assent. It is now quite an appropriate time for the Court to adjudicate the question and place limitations on the use of the option given to Governors.
It is worth recalling that in the Punjab case, the Court ruled that Governors do not have a veto over Bills, and that whenever they withheld assent, they were bound to return the Bills to Assembly; and if the Assembly adopted the Bills, with or without amendments, they were bound to grant assent. In the case of Telangana, the Court observed that Governors were expected to act on Bills “as soon as possible”, underscoring that the phrase had significant constitutional content and that constitutional functionaries would have to bear this in mind. It is quite surprising that the Governors of West Bengal and Kerala have learnt nothing from these judgments and observations. Seven Bills from Kerala that may not normally require the President’s assent were sent up to Rashtrapati Bhavan; four were refused assent without any reason being assigned. The inaction on these Bills range from 23 to 10 months. West Bengal has also challenged the inaction on some Bills, a few of which may have been referred to the President. The issue transcends the political considerations that may have inspired the action or inaction on the part of the Governor. At its core, it concerns the question whether the Constitution permits such indirect central intervention in the legislative domain of the States.
Date: 31-07-24
भारत और रूस के संबंधों पर अमेरिकी रुख बेमानी हैसंपादकीय
सही या गलत दृष्टा के नजरिए पर निर्भर है। वैश्विक कूटनीति में राष्ट्रों के आचरण और उनके बीच आपसी संबंधों को भी इसी फ्रेमवर्क में देखना चाहिए। पिछले दिनों प्रधानमंत्री मॉस्को गए, पुतिन से गले मिले, हालांकि अपने संबोधन में उन्होंने रूसी बमबारी से यूक्रेन के बच्चों की हुई मौत पर अपनी वेदना स्पष्ट रूप से बताई। वहीं, अमेरिका ने इस यात्रा पर कहा कि उसने ‘सख्त लहजे’ में भारत से बात की है। यह अलग बात है कि भारत ने भी उसी लहजे में वाशिंगटन को राष्ट्रों के आपसी सबंध चुनने के अधिकार के सम्मान की नसीहत दी। लेकिन यह अमेरिकी नासमझी ही कही जाएगी कि उसके एनएसए जेक सुलिवन ने भारत को डराने के लिए कहा कि रूस स्थाई रूप से और हर क्षण भारत की जगह चीन के साथ जाएगा और चीन को मजबूत करेगा। पहले अमेरिका को यह समझना होगा कि इतिहास गवाह है, जब अमेरिका भारत के खिलाफ पाकिस्तान को हथियार और पैसे देकर भड़काता था, तब से आज तक युद्धभूमि हो या यूएनओ की सुरक्षा परिषद्, अगर कोई एक देश भारत को बिना शर्त स्थाई तौर पर समर्थन देता आ रहा है, तो वह रूस है। दूसरे क्या स्वयं भारत चीन को उस शत्रुवत नजर से देख रहा है, जिसके प्रभाव में वह रूस का साथ छोड़कर अमेरिका को खुश करने लगे? चीन से हमारा द्वि-पक्षीय ट्रेड इसका गवाह है। हम लम्बी- दुर्गम भारत-चीन सीमा पर चाहे जितना भी सतर्क रहें, व्यापार में चीन को अभी विस्थापित करने की स्थिति में नहीं हैं। सच बात तो यह है कि ट्रेड में अमेरिका भी चीन को खारिज नहीं कर पा रहा है। अगर उम्मीद के विपरीत इजराइली प्रधानमंत्री नेतन्याहू अमेरिकी संसद में फिलिस्तीन की लड़ाई को अंतिम लक्ष्य तक पहुंचाने की गर्जना करते हुए और हथियार व धन की मांग करते हैं और अमेरिका चुपचाप सुनता तो मित्र चुनने की यही आजादी भारत को क्यों न हो?
Date: 31-07-24
कोचिंग-उद्योग में जरूरी सुधार करने का समय आ गया हैचेतन भगत, ( अंग्रेजी के उपन्यासकार )
पिछले सप्ताह दिल्ली में एक कोचिंग सेंटर के बेसमेंट में पानी भर जाने से यूपीएससी की तैयारी कर रहे तीन छात्रों की मौत हो गई। ये मौतें कई स्तरों पर कुप्रबंधन को दर्शाती हैं- खराब जल-निकासी व्यवस्था, तलघर में अनधिकृत क्लास, इमारतों का घटिया डिजाइन और भीड़भाड़ वाले कोचिंग सेंटर, जो कुकुरमुत्ते की तरह उग आए हैं।
कोचिंग-उद्योग में तेजी से वृद्धि हुई है। हर बड़े शहर में कोचिंग सेंटरों के होर्डिंग्स लगे हैं। आज एक छात्र तब तक जीवनयापन नहीं कर सकता, जब तक वह किसी कोचिंग सेंटर में शामिल न हो जाए। स्कूल और कॉलेज में होने वाली पढ़ाई काफी नहीं है। स्कूल में बेहतर अंक लाने, कॉलेज के लिए प्रवेश परीक्षा पास करने, नौकरी की परीक्षा पास करने और अकादमिक रूप से कुछ भी सार्थक हासिल करने के लिए आज कोचिंग सेंटर मौजूद हैं। यहां तक कि अन्य (अधिक प्रतिष्ठित) कोचिंग सेंटरों में शामिल होने के लिए भी कोचिंग सेंटर हैं! छात्रों का समय कोचिंग सेंटरों के तहखाने की कोठरियों में बीतता है। वे 1% चयन-दर वाली परीक्षा पास करने की तैयारी में वहां जाते हैं और उम्मीद लगाते हैं कि उस साल उसका पेपर लीक नहीं हुआ होगा। अगर आप अस्वीकृत हो जाते हैं (जो कि 99% के साथ होता है), तो आपको स्वयं ही संघर्ष करना पड़ेगा। अगर आपके माता-पिता अमीर हैं, तो वो आपको किसी निजी कॉलेज में दाखिला दिलवा देंगे या अपने सम्पर्कों के माध्यम से नौकरी दिलवा देंगे। अगर नहीं, तो भगवान ही आपका मालिक है!
कोचिंग-उद्योग ने हताश विद्यार्थियों में अपने लिए एक बड़ा अवसर देखा है। यह एक शानदार बाजार है। सिर्फ डॉक्टर बनने की परीक्षा (नीट) में 2.3 करोड़ परीक्षार्थी थे। इसका अन्य विभिन्न व्यवसायों और कॉलेजों में गुणा करें तो आप करोड़ों ऐसे हताश छात्रों को पाएंगे, जो कड़ी प्रतिस्पर्धा के बीच अपने लिए किसी अवसर की तलाश में हैं। अगर आप उन्हें परीक्षा में पास होने का मौका दे सकते हैं, तो आप उनके लिए भगवान की तरह हैं। ऐसे में कोचिंग क्लास द्वारा लिए जाने वाले कुछ लाख रुपए क्या मायने रखते हैं? इसके लिए पिताजी कर्ज लेंगे; मां गहने बेच देंगी और परिवार के सदस्य अपनी जरूरतों को ताक पर रख देंगे!
अगर विशुद्ध व्यवसाय की नजर से देखें तो बहुत कम उद्योग इतने पैमाने पर जरूरतमंद ग्राहकों की गारंटी दे सकते हैं। ऐसे में क्या आश्चर्य कि हाल के वर्षों में वेंचर कैपिटल और निजी इक्विटी फर्मों ने कोचिंग-व्यवसाय में करोड़ों का निवेश किया है। भारत में लोग महंगे सामान खरीद सकते हों या नहीं, लेकिन वो हर हाल में अपने बच्चों को कोचिंग क्लास में भेजेंगे और इसके लिए मोटी रकम देंगे! समस्या कोचिंग क्लासेस द्वारा पैसा कमाने की नहीं है। समस्या तब पैदा होती है जब ग्राहक की मजबूरी तमाम किस्म के शोषणकारी व्यवहारों को जन्म देती है। कोचिंग क्लासेस को अच्छे से पता होता है कि कौन-से छात्र किसी प्रवेश परीक्षा में पास नहीं हो पाएंगे। फिर भी वे छात्रों को दाखिला देते हैं, केवल इसलिए क्योंकि वे भुगतान करने के लिए तैयार हैं।
दूसरी बेईमानी है कक्षा में ज्यादा से ज्यादा छात्रों को ठूंस लेना या छात्रों को पढ़ाने के लिए किसी भी सस्ती सुविधा को ले लेना। कक्षा या तलघर में एक और छात्र को ठूंसने की कोई अतिरिक्त लागत नहीं होती, लेकिन नए छात्र से सौ प्रतिशत शुल्क लिया जाता है। यही कारण है कि हमारे यहां जर्जर इमारतों में ठसाठस भरे कोचिंग क्लासरूम की भरमार है। कोचिंग सेंटर की कक्षा कैसी होनी चाहिए, इसके कोई दिशा-निर्देश नहीं हैं। कुछ बड़े कोचिंग संस्थानों में निवेशकों का पैसा लगा होने के कारण उन पर हर कीमत में आगे बढ़ने का दबाव होता है। इसके लिए वे छात्रों को दाखिला देने और उन्हें कक्षाओं में तब तक ठूंसने से बाज नहीं आते, जब तक कि उनका दम घुटने न लगे। यही वजह है कि चीन ने एडटेक कंपनियों पर प्रतिबंध लगा दिया है और वह इस क्षेत्र को गैर-लाभकारी बनाना चाहता है।
कोचिंग-उद्योग में सुधार की बहुत जरूरत है। सबसे बड़ा सुधार टेस्टिंग प्रणाली में होना चाहिए। ऐसी परीक्षा आयोजित करने का कोई मतलब नहीं, जिसमें महज आधा प्रतिशत का चयन हो और जिसके लिए छात्र कोचिंग सेंटर की कोठरी में दो साल तक प्रयास करते करें। एक अधिक तर्कसंगत टेस्टिंग प्रणाली अपने आप कोचिंग-उद्योग को दुरुस्त कर देगी। एक और बड़ा सुधार अर्थव्यवस्था को खोलना होगा, ताकि हमारे पास वर्तमान की तुलना में कहीं अधिक संख्या में अच्छी नौकरियां हों। सरकारी नौकरियों के लिए दीवानगी भी निजी क्षेत्र में पर्याप्त अच्छी नौकरियों की उपलब्धता की कमी के कारण है। हमें कोचिंग सेंटर्स के लिए एक आचार-संहिता बनाने की जरूरत है, जिसमें शोषण और अनैतिक उपायों पर रोक लगाने वाली एक पूरी प्रणाली मौजूद हो।
Date: 31-07-24
जनगणना में देरी से कई समस्याएं सामने आ रही हैंज्यां द्रेज़, ( प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री और समाजशास्त्री )
भारत की जनगणना का इतिहास बहुत पुराना है। इसे उन्नीसवीं सदी के अंत में अंग्रेजों ने शुरू किया था। शायद उन्होंने इस विशाल देश पर शासन करना आसान बनाने के लिए ऐसा किया हो। कारण चाहे जो भी हो, दशकीय-जनगणना इतिहासकारों, समाजशास्त्रियों, अर्थशास्त्रियों और कई विद्वानों के लिए सूचना का एक महत्वपूर्ण स्रोत बन गई है। उदाहरण के लिए, जनगणना के आंकड़ों से ही हमें लगभग 50 साल पहले भारतीय समाज की एक बड़ी समस्या का पता चला था : लड़कों की तुलना में लड़कियों की उच्च मृत्यु दर।
1881 से 2011 तक, हर दस साल में प्रत्येक दशक के पहले वर्ष में जनगणना की जाती थी। इसके अनुसार अगली जनगणना 2021 में होनी थी। हालांकि, कोविड संकट ने केंद्र सरकार को जनगणना स्थगित करने के लिए मजबूर कर दिया। तब से तीन साल बीत चुके हैं, और अगली जनगणना के लिए अभी भी सक्रिय तैयारी का कोई संकेत नहीं है। जबकि सौ से अधिक देशों ने कोविड के दौरान या उसके बाद जनगणना की है।
जनगणना में देरी कई समस्याएं पैदा कर रही है। उदाहरण के लिए, हम 2011 के बाद से साक्षरता की प्रगति का आकलन करने में असमर्थ हैं। कोविड के दौरान लगभग दो साल स्कूल बंद रहे, हमें यह जानने की जरूरत है कि इससे बच्चों की पढ़ने-लिखने की क्षमता पर क्या असर पड़ा। जनगणना कई अन्य उद्देश्यों के लिए भी महत्वपूर्ण है। जैसे, यह प्रवासी श्रमिकों के बारे में जानकारी का स्रोत है। राज्यों के बीच कर-राजस्व के आवंटन के लिए इसकी जरूरत है। इसका उपयोग कई सर्वेक्षणों के लिए एक रूपरेखा के रूप में किया जाता है।
जनगणना के आंकड़ों की आवश्यकता का एक और कारण है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम में सार्वजनिक वितरण प्रणाली का न्यूनतम कवरेज ग्रामीण क्षेत्रों में 75% और शहरी क्षेत्रों में 50% निर्धारित किया गया है। 2013 में अधिनियम के लागू होने के बाद ये अनुपात 2011 की आबादी पर लागू किए गए और 80 करोड़ व्यक्ति सस्ते अनाज के हकदार बने। यदि वही अनुपात वर्तमान आबादी पर लागू किए जाते तो शायद आज अन्य 10 करोड़ लोग सस्ते अनाज से लाभान्वित होते। दूसरे शब्दों में, आज लगभग 10 करोड़ लोग जन-वितरण प्रणाली से वंचित हैं, क्योंकि सरकार पुरानी जनगणना के आंकड़ों का उपयोग कर रही है।
संविधान के 84वें संशोधन के अनुसार, अगला परिसीमन 2026 के बाद पहली जनगणना के आधार पर किया जाना है। परिसीमन का अर्थ है निर्वाचन क्षेत्र की सीमाओं का नवीनीकरण। अंतरराज्यीय परिसीमन यह सुनिश्चित करता है कि लोकसभा सीटों में विभिन्न राज्यों की हिस्सेदारी कमोबेश उनकी जनसंख्या हिस्सेदारी के बराबर हो। राज्यांतर्गत परिसीमन सुनिश्चित करता है कि सभी निर्वाचन क्षेत्रों की जनसंख्या लगभग समान हो। 1973 के बाद से अंतरराज्यीय परिसीमन नहीं किया गया है। इस बीच, भारत के उत्तरी राज्यों की आबादी दक्षिणी राज्यों की आबादी की तुलना में तेजी से बढ़ी है। इसलिए आबादी में उत्तरी राज्यों का हिस्सा आज 1973 की तुलना में ज्यादा है। अंतरराज्यीय परिसीमन के बाद लोकसभा में इन राज्यों का हिस्सा बढ़ जाएगा और दक्षिणी राज्यों का हिस्सा घट जाएगा। यह समायोजन भाजपा के पक्ष में होगा, क्योंकि वह दक्षिण की तुलना में उत्तर में ज्यादा लोकप्रिय है। संभव है कि भाजपा 2029 के चुनाव से पहले परिसीमन करवाना चाहती हो। इसके लिए 2027 या 2028 में जनगणना करानी होगी, क्योंकि संविधान के अनुसार परिसीमन 2026 के बाद पहली जनगणना के आधार पर होना चाहिए। शायद यही कारण है कि जनगणना में बार-बार देरी हो रही है।
यह भी संभव है कि लोकसभा चुनावों के बाद भाजपा ने अपना विचार बदल दिया हो। पहला, दक्षिण में भाजपा की लोकप्रियता बढ़ी है और उत्तर में कुछ स्थानों पर गिरावट आई है। दूसरा, परिसीमन के कारण दक्षिण भारत में कुछ विरोध -प्रदर्शन होने की संभावना है। शायद भाजपा जनगणना जल्दी कराने का फैसला ले और अगली जनगणना के बाद परिसीमन को स्थगित कर दे।
Date: 31-07-24
भारतीय मूल के लोगों की महत्ताविवेक काटजू, ( लेखक विदेश मंत्रालय में सचिव रहे हैं )
पूरी दुनिया की नजरें इस समय अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव पर लगी हैं। इस बार के चुनाव के साथ भारतीय कड़ियों का दुर्लभ संयोग जुड़ा है। वर्तमान उपराष्ट्रपति कमला हैरिस जहां डेमोक्रेटिक पार्टी की ओर से राष्ट्रपति पद की प्रत्याशी बनने के बहुत करीब हैं, वहीं रिपब्लिकन पार्टी ने जिन जेडी वेंस को उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया है, उनकी पत्नी उषा वेंस की जड़ें भी भारत से जुड़ी हैं। हैरिस और उषा दोनों ही दूसरी पीढ़ी की अमेरिकी हैं। वेंस के अपनी ससुराल वालों के साथ बहुत मधुर संबंध हैं तो स्वाभाविक रूप से उषा अपने पति के अभियान में अहम भूमिका निभाएंगी। हैरिस प्रत्यक्ष और उषा परोक्ष रूप से भारतीय मूल के उन लोगों की सूची का एक हिस्सा बन गई हैं, जो पश्चिमी देशों में उच्च राजनीतिक पदों पर अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे हैं। यह सूची बहुत लंबी है। भारतीय मूल के ऋषि सुनक कुछ समय पहले तक ब्रिटेन के प्रधानमंत्री रहे। उनकी पत्नी अक्षता मूर्ति भी भारतीय मूल की हैं, जो दिग्गज उद्यमी एनआर नारायणमूर्ति की बेटी हैं। ऋषि और अक्षता ने हिंदू धर्म में अपनी आस्था भी कभी नहीं छिपाई।
आयरलैंड और पुर्तगाल की कमान भी ऐसे नेता संभाल चुके हैं, जिनकी जड़ें आंशिक रूप से भारतीय मूल की रहीं। आयरलैंड के पूर्व प्रधानमंत्री लियो वराडकर के पिता भारतीय, जबकि पुर्तगाल के पूर्व प्रधानमंत्री अंटोनियो कोस्टा के पिता आंशिक रूप से भारतीय थे। भारतीय मूल के लोग कनाडा की राजनीति पर भी अपनी छाप छोड़ रहे हैं। इसके अलावा मारीशस, गुयाना, फिजी और त्रिनिदाद एंड टोबैगो में भारतीय मूल के लोग सरकारों का नेतृत्व कर चुके हैं। इनमें से अधिकांश नेता भारत से अपना जुड़ाव महसूस करते हैं, लेकिन यह कभी नहीं भूलना चाहिए कि उनकी सर्वोच्च प्राथमिकता अपने राष्ट्रीय हितों की पूर्ति से जुड़ी है। हाल में सुनक के मामले में यह स्पष्ट रूप से देखने को मिला। उनके कार्यकाल के दौरान न तो मुक्त व्यापार समझौते को लेकर बात आगे बढ़ पाई और न ही विजय माल्या जैसे भगोड़े के प्रत्यर्पण पर सहमति बनी। इतना ही नहीं, भारत विरोधी खालिस्तानी तत्वों पर अंकुश लगाने में भी उनकी सरकार नाकाम रही। यह दर्शाता है कि राजनीतिक पटल पर ऐसे लोगों के उभार पर भारत के कुछ वर्गों में जिस प्रकार का उत्साह एवं उल्लास का भाव दिखता है, वह भारत के लिए किसी प्रकार के राजनीतिक या कूटनीतिक लाभ में परिणत नहीं हो पाता।
परिस्थितियां यही कहती हैं कि विदेश में रहने वाले भारतीयों को लेकर स्पष्ट दृष्टिकोण आवश्यक है। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए हमें भारतीय मूल के लोगों यानी पीआइओ और प्रवासी भारतीयों यानी एनआरआइ के बीच अंतर को समझना होगा। इनमें से एनआरआइ तो पूरी तरह से भारतीय हैं और उनके हितों की रक्षा एवं कल्याण का पूरा दारोमदार सरकार का है, जबकि पीआइओ विदेशी हैं, जिन्हें भारत के एक प्रकार के ‘अघोषित नागरिक’ के तौर पर ओसीआइ कार्डधारक के रूप में गिना जाता है। इससे कई बार भ्रम की स्थित बन जाती है। भारतीय संविधान दोहरी राष्ट्रीयता को मान्यता नहीं देता। इसलिए, जब कोई भारतीय किसी अन्य देश का नागरिक बन जाता है तो उसकी भारतीय नागरिकता स्वत: समाप्त हो जाती है। इसलिए, ओसीआइ कार्डधारकों के पास कोई राजनीतिक अधिकार नहीं होता। इन कार्डधारकों के पास भारत के लिए विस्तारित वीजा होता है और वे अन्य विदेशी नागरिकों की तुलना में भारतीय अर्थव्यवस्था में कहीं अधिक बड़े दायरे में सहभागिता कर सकते हैं। ऐसे में बेहतर होगा कि ओसीआइ कार्ड को कुछ नया नाम दिया जाए, ताकि किसी भी प्रकार के भ्रम की गुंजाइश न रहे।
भाजपा सरकार ने भारतीय मूल के लोगों और भारत के बीच कड़ियां जोड़ने की ओर काफी ध्यान दिया है। इसी कड़ी में प्रवासी भारतीय दिवस जैसे वार्षिक आयोजन के साथ ही प्रवासी भारतीय सम्मान भी दिए जाते हैं। पीआइओ की भारतीय सांस्कृतिक जड़ों को समृद्ध करने के लिए उन्हें साधने में कोई हर्ज भी नहीं। पीआइओ को भी भारत के साथ आर्थिक जुड़ाव की दिशा में हरसंभव अवसर दिए जाने चाहिए, जिससे परस्पर लाभ मिल सके। इसके साथ ही हमें यह भी स्वीकार करना चाहिए कि एक समय मजदूरों के रूप में गए भारतीयों ने भी विदेश में स्थानीय संस्कृति को अपना लिया है। मारीशस की ही मिसाल लें तो वहां उम्रदराज पीआइओ भले ही आज भी भोजपुरी बोलते हों, लेकिन उनकी युवा पीढ़ी ने उस क्रियोल भाषा को अपना लिया है, जिसे अधिकांश मारीशसवासी बोलते हैं। यह प्रक्रिया प्रवासी समुदाय की परिपक्वता को ही दर्शाती है।
अमेरिका जैसे देशों में प्रवासी समुदायों को अपनी लाबी बनाने की गुंजाइश दी जाती है, ताकि वे अपने मूल देश और अमेरिका के बीच राजनीतिक कड़ियां जोड़ने का माध्यम बन सकें। वहां सबसे ताकतवर लाबी यहूदियों की है, जो इजरायल के लिए काम करती है। भारत को भी भारतीय पीआइओ संगठनों के साथ सहभागिता को लेकर हिचकना नहीं चाहिए और वहां भारतीय लाबी को मजबूत करने के प्रयास करने चाहिए, जो पहले ही काफी सशक्त हो चुकी है। इसी लाबी ने परमाणु समझौते में अहम भूमिका निभाई थी। उस समझौते ने भारत-अमेरिका संबंधों की दशा-दिशा ही बदल दी थी। कई यूरोपीय देशों विशेषकर ब्रिटेन में भी ऐसा ही देखने को मिला। हालांकि राजनीतिक रूप से सक्रिय पीआइओ की कुछ मुद्दों पर अलग राय से असहजता की स्थिति भी बन जाती है। खालिस्तान को लेकर अमेरिका और कनाडा में ऐसा देखा भी गया। भारत को भी पीआइओ की अपने देशों के प्रति निष्ठा को लेकर संदेह नहीं करना चाहिए, क्योंकि ऐसी स्थिति में भारत के साथ उनके जुड़ाव की कड़ी फायदे के बजाय नुकसान का सबब बन जाएगी। कई बार विदेशी नेता पीआइओ के बीच किसी भारतीय नेता की लोकप्रियता का लाभ भी उठाना चाहते हैं। स्वाभाविक है कि भारतीय नेताओं को ऐसे मामलों में नहीं पड़ना चाहिए, क्योंकि ऐसी स्थिति दोधारी तलवार की तरह हो जाती है। अच्छी बात है कि भारत के राजनीतिक दलों ने विदेश में भी अपने प्रकोष्ठ बनाने आरंभ कर दिए हैं। एनआरआइ को भारत की राजनीतिक हलचल में दखल का पूरा अधिकार है। हालांकि उन्हें लामबंद करने को लेकर पार्टियों को कुछ संयम का परिचय भी देना चाहिए।
Date: 31-07-24
कम शुल्क दर से बढ़ेगा निर्यातसंपादकीय
केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने करीब 50 उत्पादों पर सीमा शुल्क कम करने का जो निर्णय लिया है वह स्वागतयोग्य है। इसे देश की बाह्य प्रतिस्पर्धा बढ़ाने के प्रयास से जुड़े कदम के रूप में भी देखा जा सकता है। उन्होंने अगले छह महीने में सीमा शुल्क ढांचे की व्यापक समीक्षा की भी घोषणा की। फिलहाल मोबाइल फोन, चमड़ा, फेरो-निकल, ब्लिस्टर कॉपर और पेट्रोल उत्खनन गतिविधियों समेत कई क्षेत्रों में सीमा शुल्क या तो समाप्त कर दिया गया है या फिर बहुत कम कर दिया गया है। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि 25 अहम खनिजों को सीमा शुल्क से मुक्त कर दिया गया है। इससे नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में देश की घरेलू उत्पादक क्षमता को मदद मिलेगी और साथ ही अन्य रणनीतिक उद्योगों मसलन रक्षा और ई-मोबिलिटी में भी यह मददगार होगा।
यह बदलाव देश की व्यापार नीति में संरक्षणवाद और आयात प्रतिस्थापन के जगह बना लेने के कई वर्ष बाद आया है। आयात में कमी करने के प्रति झुकाव को 2018 के बजट में ही देखा जा सकता है। घरेलू उद्योगों के संरक्षण और रोजगार निर्माण बढ़ाने के लिए 40 से अधिक आयात पर टैरिफ को बढ़ाया गया। इसमें वाहन कलपुर्जे से लेकर मोमबत्ती और फर्नीचर तक सब शामिल थे। पहले भारत ने कुछ इलेक्ट्रॉनिक उत्पादों मसलन मोबाइल फोन के कलपुर्जों, टेलीविजन और माइक्रोवेव ओवन पर आयात शुल्क बढ़ाया। 2010-11 से 2020-21 तक भारत की औसत शुल्क वृद्धि काफी बढ़ गई। देश के टैरिफ लाइन के अनुपात मे 15 फीसदी से अधिक इजाफा हुआ और यह 11.9 फीसदी से बढ़कर 25.4 फीसदी पर पहुंच गई।
सरकार ने सीमा शुल्क को आगे राजस्व जुटाने का उपाय नहीं मानकर बढ़िया किया है। अब यह बात अच्छी तरह स्वीकार्य है कि केवल व्यापारिक खुलापन ही भारत को वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में अहम हिस्सेदार बना सकता है। मिसाल के तौर पर स्मार्टफोन और उपभोक्ता इलेक्ट्रॉनिक्स के क्षेत्र में। भारत का मोबाइल फोन निर्यात 2023-24 में 15.6 अरब डॉलर हो गया जबकि 2022-23 में यह 11.1 अरब डॉलर था। पिछले वर्ष देश ने 102 अरब डॉलर मूल्य के इलेक्ट्रॉनिक सामान का निर्माण किया। इसके बावजूद निर्यात वृद्धि मोटे तौर पर देश में विनिर्माण के बजाय असेंबली तक सीमित है। लीथियम आयन सेल्स या सेमीकंडक्टर चिप्स जैसे घटकों का निर्माण भारत में नहीं हो रहा है। अधिकांश वास्तविक मूल्यवर्द्धन चीन, दक्षिण कोरिया, जापान और वियतनाम जैसे देशों में हो रहा है।
गैर टैरिफ गतिरोध भी ऊंचे हैं। विश्व व्यापार संगठन द्वारा वर्ल्ड टैरिफ प्रोफाइल 2024 में जारी आंकड़े बताते हैं कि भारत एंटी डंपिंग शुल्क लगाने के मामले में अमेरिका के बाद दूसरे स्थान पर है। 2023 में भारत ने 45 एंटी डंपिंग जांच शुरू कीं और 14 मामलों में शुल्क लगाया जबकि देश में 133 एंटी डंपिंग उपायों ने 418 उत्पादों को प्रभावित किया। प्रतिपूरक शुल्क भी बहुत अधिक हैं। 2023 में भारत ने 17 मामलों में प्रतिपूरक शुल्क लगाए जिन्होंने 28 उत्पादों को प्रभावित किया। एक निर्यातक के रूप में भारत के खिलाफ 173 उत्पादों के मामले में कुल 44 प्रतिपूरक कदम हैं। चाहे जो भी हो रणनीति में बदलाव नजर आ रहा है। विश्व व्यापार संगठन के आंकड़ों के अनुसार भारत की औसत शुल्क दर 2022 के 18.1 फीसदी से कम होकर 2023 में 17 फीसदी रह गई। भारत को हर क्षेत्र में शुल्क कम करने की आवश्यकता है। उम्मीद की जानी चाहिए कि सीमा शुल्क की समीक्षा इस दिशा में अहम कदम होगी। इस बीच भारतीय कारोबारियों को बढ़ती वैश्विक प्रतिस्पर्धा से निपटना होगा। शुल्क दर में कमी प्रतिस्पर्धा बढ़ाने में मददगार होगी।
Date: 31-07-24
कृषि भंडारण बिना विकास की कहानी अधूरीविनायक चटर्जी, ( लेखक बुनियादी ढांचा विशेषज्ञ और द इन्फ्राविजन फाउंडेशन के संस्थापक एवं प्रबंध ट्रस्टी हैं। लेख में वृंदा सिंह का सहयोग )
बुनियादी ढांचे पर होने वाली चर्चाएं अमूमन ऊर्जा, परिवहन और पानी तक ही केंद्रित रहती हैं, लेकिन 2022 में लागू की गई राष्ट्रीय लॉजिस्टिक पॉलिसी अब तक उपेक्षित रहे भंडारण बुनियादी ढांचा क्षेत्र की स्थिति को उजागर करने में काफी हद तक कामयाब रही है। औद्योगिक एवं वाणिज्यिक भंडारण क्षमता के बुनियादी ढांचे को तो डेवलपर आज की जरूरतों के हिसाब से ढाल रहे हैं, लेकिन कृषि क्षेत्र से जुड़ी भंडारण क्षमता बुरी तरह उपेक्षा की शिकार है। ये भंडारण अभी भी पुराने ढर्रे पर ही काम कर रहे हैं, जिन पर फौरी तौर पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है।
इन्वेस्ट इंडिया की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत का भंडारण बाजार 2022 के बाद से 15.64 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर से बढ़ रहा है, लेकिन यह वृद्धि अधिकांशत: औद्योगिक एवं वाणिज्यिक भंडारण क्षमता के जरिये ही दिख रही है। कृषि क्षेत्र में हालत बिल्कुल उलट है, जो कई संकटों से जूझ रहा है। आधुनिक भंडारण ढांचा और इससे जुड़ी सुविधाएं उपलब्ध नहीं होने के कारण कृषि अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान उठाना पड़ रहा है। खासकर फसल कटाई के बाद उपज की बड़े पैमाने पर बरबादी हो रही है। ऐसे देश में जहां ग्रामीण आबादी की जीवनधारा ही कृषि आधारित हो और लगभग आधे लोगों की रोजी-रोटी इसी से चलती हो, वहां भंडारण क्षमताओं को लेकर इस प्रकार की उपेक्षा काफी गंभीर मामला है।
इंडिया इन्फ्रास्ट्रक्चर रिसर्च के अनुसार कृषि भंडारण क्षमता जून 2023 में 14.5 करोड़ टन थी, जिनके वर्ष 2026-27 तक 22.3 करोड़ टन तक बढ़ाने की सख्त जरूरत है। भारत में फसल कटाई के बाद उपज की बरबादी बहुत ज्यादा होती है। इसे देखते हुए कृषि भंडारण क्षमता के विकास पर ध्यान दिया जाना बहुत ही आवश्यक है।
वर्ष 2022 में सरकार समर्थित एक अध्ययन से पता चलता है कि देश में फसल कटाई से लेकर खपत तक के सफर में सब्जी और फलों में 5 से 13 प्रतिशत की बरबादी होती है, जबकि तिलहन और मसालों जैसी अन्य फसलों में यह हानि 3 से 7 प्रतिशत तक है। इससे वार्षिक स्तर पर अर्थव्यवस्था को अनुमानित 1.52 लाख करोड़ रुपये का नुकसान होता है।
देश में पर्याप्त कोल्ड स्टोरेज तथा परिवहन के साधनों के अभाव में मूल्य वर्धित कृषि उपज न तो समय पर संरक्षित हो पाती है और न ही आगे आपूर्ति की जाती है। इससे पूरी आपूर्ति श्रृंखला के दौरान भारी मात्रा में कीमती उपज बरबाद हो जाती है। यह नुकसान 3.7 से 3.9 करोड़ टन भंडारण क्षमता उपलब्ध होने के बावजूद हो रहा है।
कृषि भंडारण क्षमता का भौगोलिक स्तर पर उचित वितरण नहीं होने से भी समस्या गंभीर हो रही है। उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, गुजरात, पंजाब और आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों में तो अधिक भंडारण क्षमता है जबकि बिहार और मध्य प्रदेश में इसकी भारी कमी है। खास यह कि ज्यादातर कोल्ड स्टोरेज में केवल एक ही फसल (अनाज और आलू) रखने की व्यवस्था होती है। अन्य फसलों के भंडारण की सुविधा इनमें नहीं होती। इसलिए देशभर में भंडारण क्षमता को उन्नत कर इनमें सभी या एक से अधिक कृषि उपज रखने की व्यवस्था किए जाने की सख्त जरूरत है।
वेयरहाउसिंग डेवलपमेंट ऐंड रेग्युलेटरी अथॉरिटी (डब्ल्यूडीआरए) को इस दिशा में काम करने के लिए सक्रिय भूमिका निभानी होगी। गोदाम (विकास एवं नियमन) अधिनियम 2007 के तहत गठित इस एजेंसी से उम्मीद की जाती है कि यह भंडारण क्षमताओं के विकास, संचालन विनियमन और रसीद व्यवस्था को बढ़ावा दे।
नियामकीय संस्था भविष्य को ध्यान में रखकर रणनीतियां बनाएं और भंडारण क्षेत्र में गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए सक्रिय भूमिका निभाए। डब्ल्यूडीआरए की पंजीकरण व्यवस्था को व्यापक हितधारकों से सलाह-मशविरा लेकर वास्तविकता के आधार पर तार्किक बनाना होगा। आज डब्ल्यूडीआरए से पंजीकृत भंडार की संख्या गिनती की 10 भी नहीं है।
जिम्मेदारियों का विकेंद्रीकरण कर और राज्यों को व्यापक नियामकीय भूमिका निभाने की इजाजत देकर डब्ल्यूडीआरए को अन्य महत्त्वपूर्ण काम अपने हाथ में लेने चाहिए। इससे भंडारण क्षमता का विस्तार तो होगा ही, इनके आधुनिकीकरण, निगरानी और प्रशासनिक व्यवस्था में सुधार करने में भी मदद मिलेगी। भंडारण सुविधाओं की वास्तविक उपलब्धता के बारे में सटीक जानकारी देने, इनकी क्षमता का पूर्ण उपयोग, ई-नाम यानी इलेक्ट्रॉनिक-नैशनल एग्रीकल्चरल मार्केट (कृषि उत्पादों की बिक्री के लिए देश भर में काम करने वाला इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग प्लेटफॉर्म) आदि की स्थिति जानने के लिए एक डिजिटल पोर्टल शुरू किया जाना चाहिए। इससे बाजार में नए अवसरों के द्वार खुलेंगे। ई-नाम से जुड़ना खासतौर पर बहुत ही महत्त्वपूर्ण है, क्योंकि इससे पारदर्शी कीमतों के बारे में जानकारी हासिल करने और किसानों को उनके क्षेत्र से बाहर के बाजारों तक पहुंच उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी।
इलेक्ट्रॉनिक निगोशिएबल वेयरहाउस रिसीट (ई-एनडब्ल्यूआर) की भूमिका भी बढ़ानी होगी। पारंपरिक कागज वाली रसीद की जगह लाया गया ई-एनडब्ल्यूआर एक डिजिटल दस्तावेज होता है, जिसे डब्ल्यूडीआरए से पंजीकृत भंडारण जारी करते हैं। इसका उद्देश्य ऋण उपलब्धता बढ़ाने के साथ-साथ वस्तुओं को एक से दूसरी जगह ले जाए बिना बिक्री करना तथा भंडारण में पारदर्शिता लाकर कृषि उत्पाद भंडारण और कारोबार को आसान बनाना है। ट्रेडिंग प्लेटफार्म से जुड़ने की संभावनाओं और नियामकीय निगरानी व्यवस्था में सुधार के बावजूद ई-एनडब्ल्यूआर को अपनाने की गति बहुत धीमी रही है।
वेयरहाउस रेटिंग की व्यवस्था भी थोड़ी सख्त बनानी होगी। इससे उसकी विश्वसनीयता बढ़ेगी और ऋणदाताओं में भरोसा जमेगा। इससे अंतत: किसानों के लिए वित्तीय लाभ के द्वार खोलने एवं बाजार की कार्यक्षमता में सुधार करने में मदद मिलेगी। इस दिशा में इसी साल मार्च में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा सहकारी क्षेत्र में विश्व का सबसे बड़ा अनाज गोदाम जैसी पहल शुरू की गई है।
इस महत्त्वाकांक्षी परियोजना का उद्देश्य 1.25 लाख करोड़ रुपये की लागत से अगले पांच साल में उत्पन्न होने वाले 7 करोड़ टन अनाज के रखरखाव के लिए भंडारण सुविधाएं विकसित करना है। प्रायोगिक परियोजना की शुरुआत हो चुकी है। भंडारण क्षमता बनाने और अन्य जरूरी कृषि संबंधी बुनियादी ढांचा विकसित करने के लिए 500 प्राइमरी एग्रीकल्चरल क्रेडिट सोसाइटीज (पीएसीएस) की नींव रख दी गई है, लेकिन आधुनिक कृषि-भंडारण अभियान को राज्यों और सहकारी क्षेत्र की जकड़न से बाहर निकालना होगा।
केंद्र सरकार ने देशभर में कृषि भंडारण के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने के लिए कई कदम उठाए हैं। प्रधानमंत्री कृषि संपदा योजना इनमें सबसे खास है जो एग्रो प्रसंस्करण कलस्टर की एग्रो-मैरीन प्रसंस्करण एवं विकास की योजना है। कुल 46 अरब रुपये बजट वाली इस योजना को 2026 तक बढ़ा दिया गया है। इसका जोर मेगा फूड पार्क और संयुक्त कोल्ड स्टोरेज श्रृंखला पर अधिक है, ताकि भंडारण सुविधाओं को बढ़ाकर फसल कटाई के बाद उपज में होने वाली हानि से बचा जा सके।
भंडारण सुविधाओं के विस्तार के लिए भारतीय खाद्य निगम एवं राज्य एजेंसियों के साथ सहयोग से प्राइवेट एंटरप्रिन्योर्स गारंटी योजना शुरू की गई है। संयुक्त कोल्ड स्टोरेज श्रृंखला जैसी योजनाओं से भंडारण क्षमताओं का आधारभूत ढांचा मजबूत करने में मदद मिल सकती है, जबकि राष्ट्रीय नीतियों के अनुसार आधुनिक स्टील सिलोस का विकास करने से अनाज भंडारण सुविधाओं में वृद्धि होगी।
यदि इस क्षेत्र में अग्रणी बनना है तो राष्ट्रीय कृषि एवं ग्रामीण विकास बैंक के वेयरहाउस इन्फ्रास्ट्रक्चर फंड जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से हर्मेटिक स्टोरेज और मशीनीकृत लोडिंग/अनलोडिंग जैसी आधुनिक भंडारण तकनीकों को बढ़ावा देने वाली नीतियां बनानी होंगी। साथ ही ब्याज में छूट जैसी योजनाओं समेत अन्य वित्तीय प्रोत्साहन दिए जाने की भी आवश्यकता है। ऐसे विकासोन्मुखी प्रयासों से भंडारण क्षेत्र में निजी निवेश को बढ़ावा मिलेगा। जिला या क्लस्टर स्तर पर गुणवत्ता परख, ग्रेडिंग और परीक्षण सुविधाएं स्थापित कर उन्हें भंडारण व्यवस्था से जोड़ा जा सकता है।
चूंकि भारत 5 लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने के लक्ष्य की ओर बढ़ रहा है, इसलिए उसे कृषि भंडारण के बुनियादी ढांचे जैसी अर्थव्यवस्था की कमजोर कडि़यों को मजबूत करने पर प्राथमिकता से ध्यान देना होगा। इन चुनौतियों की पहचान कर और दूरदर्शी रणनीति अपनाकर डब्ल्यूडीआरए देश की कृषि रीढ़ को मजबूत और लचीला बना सकता है। एक दृढ़ और सहायक नियामकीय वातावरण के जरिये जब तक आधुनिक, भरोसेमंद एवं सक्षम कृषि भंडारण पारिस्थितिकी तंत्र खड़ा नहीं होगा तब तक भारत के विकास की कहानी अधूरी ही कही जाएगी।
Date: 31-07-24
तबाही के इलाकेसंपादकीय
केरल में वायनाड के मेप्पाडी के पास सोमवार की रात को अचानक हुए भूस्खलन से जैसी तबाही हुई, उससे एक बार फिर यही रेखांकित हुआ है कि कुदरत के सामने समूची व्यवस्था कई बार लाचार हो जाती है। हालांकि प्रकृति के कहर को रोका भले न जा सके, लेकिन इससे बचाव के उपाय जरूर किए जा सकते हैं, ताकि जानमाल के नुकसान को कम से कम किया जा सके। वायनाड में रात के दो-तीन बजे को बाद तीन बार भूस्खलन हुआ और उससे वहां अब तक सौ से ज्यादा लोगों की मौत हो चुकी है, करीब सौ लोगों को अस्पताल में भर्ती कराया गया और काफी लोग लापता बताए जा रहे हैं। हताहतों की संख्या और बढ़ सकती है। यों राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन बल के कर्मचारियों सहित अन्य महकमों के राहतकर्मियों ने बचाव के लिए हर संभव प्रयास किया है, मगर त्रासदी है कि भूस्खलन से तबाह एक क्षेत्र पूरी तरह से अलग-थलग हो गया, जहां पहुंचना आसान नहीं है। भारी बारिश की वजह से राहत कार्य में बाधा पेश आई है।
गौरतलब है कि केरल में पिछले कुछ दिनों से लगातार भारी बारिश हो रही है, जिससे कई जगहों पर जनजीवन अस्त-व्यस्त है। मगर अब वहां कई जगहों पर बाढ़ और भूस्खलन जैसी त्रासदी भी दिखने लगी है। वायनाड में पहले भी घनघोर बारिश और उसकी वजह से भूस्खलन की घटनाएं होती रही हैं। मगर सोमवार रात वहां जो हुआ, उसने वायनाड के साथ-साथ सभी जगहों के लोगों के सामने एक खौफ का मंजर पैदा कर दिया है। पहाड़ों के बीच बसे और हरा-भरा स्वर्ग कहे जाने वाले वायनाड की पारिस्थितिकी को बेहद नाजुक माना जाता है। पश्चिमी घाट के नजदीक होने की वजह से वहां भूस्खलन का खतरा बना रहता है। पश्चिमी घाट में तीव्र ढलान है और मानसून में भारी बारिश से मिट्टी इतनी गीली और ढीली हो जाती है कि भूस्खलन के मामले बढ़ जाते हैं। जाहिर है, यह स्थिति अगर कुदरतन पैदा होती है, तो इसे तत्काल रोकना शायद मुमकिन नहीं है, मगर हर वर्ष बारिश के मौसम में भूस्खलन की आशंका के मद्देनजर बचाव के एहतियाती इंतजाम जरूर किए जा सकते हैं।
Date: 31-07-24
रोजगारपरक योजनाएं लागू करना जरूरीसुशील देव
केंद्र सरकार के नये बजट में बिहार के विकास को लेकर कई बड़ी घोषणाएं की गई हैं। घोषणाएं केंद्र में सरकार गठन से जुड़ी राजनीतिक मजबूरियों से भी जुड़ी हैं। बिहार में रोजगारपरक योजनाएं लागू करना जरूरी दरअसल, बिहार के मामले में अभाव और गरीबी की बात नई नहीं है। रोजी-रोजगार को लेकर लाखों लोग हर साल पलायन करने के लिए मजबूर हैं। बड़े उद्योग तो दूर वहां छोटे और मझोले उद्योगों की राह भी कठिन रही है। अलबत्ता, बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री एवं महादलित नेता जीतन राम मांझी के केंद्रीय सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम मंत्री बनने के बाद कुछ उम्मीदें जरूर जगी हैं।
खुद मांझी भी मानते हैं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने उन्हें अपने विजन का मंत्रालय दिया है ताकि छोटे और मझोले उद्योगों को बढ़ाकर विकसित भारत के लक्ष्य तक पहुंचा जा सके। शपथ ग्रहण के तुरंत बाद मोदी सरकार में सबसे उम्रदराज इस मंत्री ने इस दिशा में ईमानदारी और लगन से काम करने का भरोसा भी जताया है। ऐतिहासिक और सांस्कृतिक धरोहर के लिए प्रसिद्ध बिहार फिर से आर्थिक समृद्धि और रोजगार सृजन के नये आयाम तलाश रहा है।
ऐसे में इस मंत्रालय की भूमिका वरदान साबित हो सकती है। दरअसल, बिहार में छोटे और मझोले उद्योगों का राज्य की आर्थिक संरचना को मजबूती देने में बड़ा योगदान है, जिसमें राज्य के कृषि आधारित उद्योग, हस्तशिल्प, खादी, हथकरघा उद्योग प्रमुख रूप से शामिल हैं। एमएसएमई मंत्रालय की विभिन्न योजनाएं-प्रधानमंत्री रोजगार सृजन कार्यक्रम, मुद्रा योजना, स्टार्टअप इंडिया आदि बिहार के उद्यमियों के लिए विशेष रूप से लाभकारी साबित हो रही हैं। इनके माध्यम से नवाचार और उद्यमिता को बढ़ावा मिला है, जिससे रोजगार के नये अवसर सृजित हो रहे हैं।
अलबत्ता, दरकार इस बात की है कि राज्य के उद्यमियों को मंत्रालय की योजनाओं और सुविधाओं के बारे में विस्तृत जानकारी हो और उनका सही तरीके से क्रियान्वयन हो। उद्यमियों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम, वर्कशॉप और मार्केटिंग कैंप का आयोजन भी किया जाना चाहिए। मांझी के मंत्री बनने से बिहार की सामाजिक-आर्थिक स्थिति में सुधार की संभावनाएं बढ़ी हैं। उनके नेतृत्व में मंत्रालय के अब तक के कामकाज से लगता है कि मांझी का ध्यान शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार के अवसरों पर है।
रोजगार अवसर बढ़ाने के लिए उनका अनुभव और योजनाएं बिहार के युवाओं के लिए लाभकारी साबित हो सकती हैं। कृषि और उद्योगों के विकास के माध्यम से रोजगार सृजन की बात कारगर साबित हो सकती है। राज्य की आर्थिक संरचना में एमएसएमई पहले से महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इनको नई मदद और सुविधाएं औद्योगिक विकास का विकेंद्रित ढांचा खड़ा कर सकती हैं, जिससे कई क्षेत्रों के लोगों के जीवन में बदलाव संभव है।
दिलचस्प है कि बिहार की बदली राजनीति के साथ प्रदेश में विकास की नई बयार बह रही है। बजट में बिहार के लिए 26 हजार करोड़ के पैकेज के ऐलान के बाद खासकर औद्योगिक विकास को लेकर उम्मीदें कोरी नहीं कही जा सकतीं। गया में औद्योगिक विकास, काशी की तर्ज पर महाबोधि और विष्णुपद मंदिर कॉरिडोर, राजगीर और नालंदा का विकास, पटना-पूर्णिया एक्सप्रेसवे, बक्सर-भागलपुर राजमार्ग और गंगा नदी पर दो पुलों के निर्माण आदि की महत्त्वपूर्ण घोषणा निश्चित रूप से बिहार की तरक्की का नया आयाम साबित होगा। बजट की घोषणा रोजगार, कौशल विकास और पर्यटन की संभावनाओं से भरी है। जरूरी है कि इस दिशा में तेजी से काम हो और जमीनी स्तर पर किसी तरह का राजनीतिक विरोध या दुविधा आड़े न आए। गौरतलब है कि बजट में कौशल विकास और रोजगार के साथ गरीब, युवा, महिला और किसानों पर बल दिया गया है, जिसे विकास का सकारात्मक संकेत कहा जा सकता है।
बैंकों से ऋण लेना भी आसान कर दिया गया है। मुद्रा लोन की सीमा 10 से 20 लाख कर दी गई है। खरीदारों को ट्रेडर्स प्लेटफार्म पर अनिवार्य रूप से शामिल करने के लिए कारोबार की सीमा को 500 करोड़ से घटाकर 250 करोड़ कर दी गई है। एमएसएमई क्षेत्र में 50 मल्टी प्रोडक्ट फूड यूनिट स्थापित करने के लिए भी वित्तीय सहायता दी जाएगी और पारंपरिक कारीगरों को इंटरनेशनल मार्केट में उनके प्रोडक्ट बेचने में सक्षम बनाया जाएगा। उनके लिए पीपीपी मोड में ई-कॉमर्स निर्यात केंद्र भी स्थापित किए जाएंगे। केंद्र सरकार की पहल को आर्थिक जानकार अच्छा संकेत मान रहे हैं, लेकिन सबसे अधिक जरूरी होगा कि जो घोषणाएं की गई हैं, उनको लेकर राजनीतिक सहयोग और समन्वय का एक बड़ा आदर्श बिहार देश के सामने रखे।
देश की आबादी जितनी तेजी से बढ़ रही है, उसके अनुरूप रोजगार अवसर पैदा करना अति आवश्यक होगा। बिहार उत्तर प्रदेश के बाद दूसरा बड़ा राज्य है, राज्य के युवाओं द्वारा हर साल काफी संख्या में रोजगार के लिए दूसरे शहरों को पलायन करना चिंताजनक है। ऐसे में मोदी सरकार ने जिस तरह बिहार का बेहतर बजट देने के साथ ही बिहार के पूर्व सीएम मांझी को एमएसएमई मंत्री बनाया है, उससे निश्चित ही राज्य का न केवल विकास होगा, बल्कि उद्योग और रोजगार का नया ढांचा विकसित होगा।
Date: 31-07-24
वायनाड के भूस्खलन से क्या कुछ सबक पाएंगे हमसुशील कुमार रोहेला, ( भूभौतिकी वैज्ञानिक )
केरल के वायनाड में भूस्खलन से हुई भारी तबाही ने एक बार फिर अनियोजित विकास की ओर हमारा ध्यान खींचा है। कई जान चली गई है। उत्तर से लेकर दक्षिण भारत तक पहाड़ों का चरित्र कमोबेश एक जैसा ही है। हां, हिमालय के पहाड़ अभी तुलनात्मक रूप से नए जरूर हैं, जिसके कारण यहां की मिट्टी दक्षिण के पहाड़ों की तरह सख्त नहीं हुई है, पर उत्तर से लेकर दक्षिण तक भूस्खलन की जो घटनाएं हम देख रहे हैं, उनकी एक बड़ी वजह मानवीय गतिविधियां हैं। हम विकास और निर्माण-कार्यों के नाम पर लगातार पहाड़ काट रहे हैं, लेकिन उसे दरकने से बचाने के लिए जिन-जिन उपायों की जरूरत है, उस पर बमुश्किल अमल कर पा रहे हैं। अब तो पहाड़ की चोटियों पर ऊंची इमारतें बनती दिखने लगी हैं। इसके लिए पेड़ों की जमकर कटाई की जाती है। जाहिर है, जब पत्थर को थामने वाले कुदरती साधनों को हम खत्म कर देंगे, तो पहाड़ टूटेंगे ही। रही-सही कसर मानसून पूरी कर देता है। इस मौसम में पहाड़ों पर दबाव बढ़ जाता है, जिस कारण वे भरभराकर गिरने लगते हैं। पिछले दिनों कर्नाटक में ऐसा ही हुआ था।
अनियोजित विकास के हिमायती कहते हैं कि भौगोलिक परिस्थितियों के कारण भी भारत में भूस्खलन की घटनाएं बढ़ी हैं। निस्संदेह, पहाड़ खुद भी कभी-कभी भूस्खलन के माध्यम से स्थिर होते हैं। भूकंप भी वक्त-बेवक्त इसकी वजह बनते हैं। मगर हाल-फिलहाल की घटनाएं मूलत: उन जगहों पर ही दिखी हैं, जहां पर निर्माण-कार्य हुए हैं। जहां प्रकृति को बिल्कुल भी छेड़ा नहीं गया है, वहां से भूस्खलन की खबरें नहीं आई हैं। दिक्कत यह भी है कि हम विकास के नाम पर पहाड़ों के साथ खिलवाड़ तो करते हैं, लेकिन सुरक्षात्मक दीवार पुश्ता, जिसे रिटेनिंग वॉल कहते हैं, नहीं बनाते। विकास-कार्य बेशक होने चाहिए, क्योंकि पहाड़ पर रहने वाले लोगों को भी अच्छी सड़कों या इमारतों की जरूरत है, लेकिन ऐसा करते हुए उन उपायों को अमल में लाना चाहिए, जो इंसानी जान की सुरक्षा कर सकें। कई जगहों पर पहाड़ को काटने के बाद महज पांच फुट का रिटेनिंग वॉल लगाते मैंने देखा है। यह उचित नहीं है। उत्तराखंड में भूस्खलन की बढ़ी घटनाओं की यह एक बड़ी वजह है। हम चाहें, तो चिह्नित स्थानों पर कैंडलनट, बे्रडफूट, बांस जैसे पेड़ अथवा वेटिवर जैसी घास भी लगा सकते हैं, जिनकी मजबूत जड़े़ पहाड़ी मिट्टी को थामे रखने में काफी मददगार मानी जाती हैं।
ऐसा नहीं है कि अपने देश में इस बाबत दिशा-निर्देश नहीं है। गाइडलाइन तैयार है, लेकिन उसका पालन ढंग से नहीं हो रहा। इसके लिए हमें स्थानीय निकायों पर भरोसा करना होगा। जब तक उनको इस अभियान में शामिल नहीं करेंगे, हरेक मानसून में तबाही की खबरें आती रहेंगी। नियमों का पालन स्थानीय निकाय ही सुनिश्चित कर सकते हैं। उनको पता होता है कि निर्माण-कार्यों की वजह से कहां कितनी अस्थिरता हुई है और उसे स्थिर करने के लिए किस तरह के उपाय किए जाने चाहिए। फिर चाहे वह दीवार पुश्ता लगाना हो या पेड़-पौधों का रोपण या फिर कुछ और। इस तरह के प्रयास कितने कारगर होते हैं, इसका पता कोई जापान जाकर लगा सकता है। वहां की पहाड़ियों को स्थिर बनाए रखने के लिए जालियां तक लगाई गई हैं। ऐसे उपाय कुछ महंगे जरूर होते हैं, पर काफी कारगर माने जाते हैं। अपने देश में टिहरी बांध में ढलानों की कटाई के बाद अच्छे सुरक्षात्मक उपाय किए गए हैं, पर अन्य जगहों पर उचित व्यवस्था नहीं दिखती। कई इलाकों में तो पहाड़ से पत्थर सीधे सड़क पर आ गिरते हैं, जिससे जान-माल का नुकसान होता है। ताइवान ने अपने यहां दवाबमापी यंत्र लगाकर अलहदा प्रयोग किया है। इससे उसे समय-पूर्व पता चल जाता है कि पहाड़ पर कितना दबाव है और वह लोगों को पहाड़ के दरकने को लेकर आगाह कर देता है।
जाहिर है, भारत में भी भूस्खलन से निपटने के लिए समय-पूर्व चेतावनी प्रणाली की जरूरत है। इससे हम जान-माल के नुकसान से काफी हद तक बच सकते हैं। बेशक, केंद्र सरकार इसको लेकर गंभीर है, लेकिन जब तक स्थानीय स्तर पर जागरूकता नहीं आएगी, तब तक मनमाफिक परिणाम हमें नहीं मिल सकेंगे। लिहाजा, जागरूकता की शुरुआत निचले स्तर से ही करनी होगी।
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नई सरकार का गठन हो चुका है। नरेंद्र मोदी स्वयं ही ‘अधिकतम शासन, न्यूनतम सरकार’ की बात करते रहे हैं। इसी को देखते हुए नौकरशाही ने सरकारी विभागों और मंत्रालयों को तर्कसंगत बनाने और उनका पुनर्गठन करने की योजनाएं सुझाई हैं। यह निश्चित रूप से समय की मांग है।
कुछ बिंदु –
– वर्तमान प्रशासनिक योजना बनाने का अर्थ केवल विभागों को छोटा करने या महत्वपूर्ण कार्यों को आउटसोर्स करने से नहीं है, बल्कि इसमें ऐसी प्रणालियां और प्रक्रियाएं बनाना भी है, जो एक समन्वित संपूर्ण-सरकारी दृष्टिकोण को बढ़ावा देती हो।
– पुनर्गठन का काम दक्षता बढ़ाने के साथ-साथ अनुकूलन यानि संसाधनों के सर्वोत्तम उपयोग से जुड़ा है। ये संसाधन मानव, वित्तीय और भौतिक तीनों ही हो सकते हैं।
– इसका मतलब है कि अलग-थलग सोच, दोहराव और विपरीत उद्देश्यों को लेकर काम करने के बजाय विभाग तर्कसंगतता के साथ काम करें।
– नियमबद्ध नौकरशाही को कई बार राजनीतिक हलको में बाधा के रूप में देखा जाता है। इस दृष्टिकोण को बदलने की जरूरत है। साथ ही नियम और विनियम को नीति के कार्यान्यवयन को बढ़ाने के साधन के रूप में विकसित किया जाना चाहिए।
– सरकार के अगले पाँच साल उन प्रणालियों और प्रक्रियाओं को लागू करने के लिए महत्वपूर्ण हैं, जो सुशासन के ताने बाने हैं, और जो भारत के परिवर्तन को रेखांकित करेंगे।
‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 2 जुलाई, 2024
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Date: 30-07-24
ELIgant Signalling, But Job Creator?Urban unemployment subsidy may be better.ET Editorials
GoI’s plan to subsidise employment of inexperienced workers has theoretical and empirical justification. Subsidising employment of disadvantaged workers provides social security and connects the target group to unsubsidised employment, improving their long-term job prospects. It has been used by governments for decades to provide work experience and income support. There is evidence the earnings benefits of employment subsidies last longer than duration of the programme. The spillover benefits on expansion of small enterprises and support to consumption demand make a compelling argument for this subsidy. In the Indian context, it addresses the skilling gap entry-level workers face as a hurdle to employment.
Objections to the scheme lie not in its design but in the assumptions about job creation. The programme is meant to benefit 1 crore new workers annually. But all these jobs will have to be created in the formal part of the non-farm economy for the subsidy to deliver the expected outcomes. Official estimates set the economy-wide job creation rate at around 2 crore annually. Formal employment makes up around a tenth of the overall employment. This would have a bearing on the outcome of the programme. Besides, the business cycle may not be adequately supportive. Private investment has been sluggish on slowing consumption. This has a direct bearing on job creation. To gain traction, duration of the employment subsidy scheme may have to be extended.
That brings up the question whether more permanent solutions should be sought, given the country’s demographics. The public sector has ramped up capacity in line with GoI’s capex push. But this has not been particularly employment-generating. An unemployment subsidy for urban workers may have a more direct impact than an employment subsidy of similar scale, which is linked to growth of manufacturing and services, as also to the rate of formalisation of the economy. Subsidy to rural workers is shrinking slower than anticipated, which also established a marker for job creation overall.
Date: 30-07-24
सामान्य कामकाज में सिस्टम पंगु हो जाता है?संपादकीय
कुछ ताजा घटनाएं देखें। नीट में गड़बड़ी का राष्ट्रीय आयाम, एक आईएएस ट्रेनी द्वारा फर्जीवाड़े के राजफाश के बाद यूपीएससी चेयरमैन का ‘निजी कारणों से इस्तीफा, उद्घाटन से पहले पुल का ढहना, ट्रेन हादसा, दशकों तक जेल में रहने के बाद किसी विचाराधीन कैदी का कोर्ट से बरी होना, सरकारी स्कूलों में कक्षा पांच के आधे से ज्यादा बच्चों को कक्षा दो का सामान्य जोड़-घटाना नहीं आना…। लगता नहीं है कि ‘स्टेटक्राफ्ट’ (शासन चलाना) में सब कुछ सही है। सरकार में लगे लोग अक्षमता, उदासीनता या / और भ्रष्टाचार के कारण अपेक्षित डिलीवरी नहीं दे पा रहे हैं? यह वही तंत्र है जो कोरोना में देश भर को टीका लगाकर एक मिसाल बना था। यानी मिशन मोड में यह कुछ समय तक तो सक्षम होता है, लेकिन नियमित और सामान्य कामकाज में बेहद दोषपूर्ण । शायद इसका कारण हैं कर्मचारी। दुनिया के प्रमुख विकसित ही नहीं विकासशील देशों के मुकाबले प्रति 1000 जनसंख्या पर भारत में मात्र 16 (सबसे कम) कर्मचारी (केंद्र और राज्य मिलकर) हैं। जबकि ब्राजील में 111, चीन में 57 और अमेरिका में 77 हैं। दूसरी तरफ, जहां एक प्राइवेट लो – स्किल जॉब में पगार कम होती है, लेकिन वहीं सरकारी कर्मचारी एचआरए, डीए, वेतन सहित छुट्टियां छोड़कर निजी क्षेत्र से बेहतर कमाता है। सरकारी कर्मचारियों का यह वेतन प्रति व्यक्ति जीडीपी के अनुपात में 7.2 गुना, वहीं ओईसीडी देशों के मुकाबले भी साढ़े चार गुना है। अध्ययनों में पाया गया कि सरकारी स्कूलों के शिक्षक निजी स्कूलों के शिक्षकों से पांच गुना ज्यादा पगार लेते हैं लेकिन निजी शिक्षकों की उपस्थिति ही नहीं, प्रदर्शन भी बेहतर है। स्टेटक्राफ्ट के ढांचे में आज ‘सफेद हाथियों’ को खड़ा करने के बजाय मेहनती लोगों की ज्यादा जरूरत है।
Date: 30-07-24
क्या राज्य की सरकारें भी विदेश नीति तय कर सकती हैं?पलकी शर्मा, ( मैनेजिंग एडिटर )
भारत की विदेश नीति कौन तय करता है? आप कहेंगे कि नई दिल्ली में बैठी केंद्र सरकार। लेकिन क्या हो अगर राज्य सरकारें भी इसमें कूद पड़ें, और क्या वे ऐसा कर भी सकती हैं? इस सवाल पर अभी बहस हो रही है और इसका श्रेय पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी को जाता है, जिन्होंने बांग्लादेश में चल रहे विरोध-प्रदर्शन पर टिप्पणी की है। सरकारी नौकरियों में आरक्षण को लेकर बांग्लादेश में हिंसक विरोध-प्रदर्शन चल रहे हैं। इसमें सौ से ज्यादा लोग मारे गए हैं और कई घायल हुए हैं। हिंसा के बीच ममता बनर्जी ने एक प्रस्ताव जारी करते हुए कहा कि अगर बांग्लादेश से शरणार्थी बंगाल में आते हैं, तो वो उन्हें शरण देंगी। लेकिन समस्या यह है कि उन्हें ऐसा प्रस्ताव रखने का अधिकार नहीं है। बांग्लादेश ने भी इसका विरोध किया है। उसने ढाका में भारतीय उच्चायोग में औपचारिक शिकायत भी दर्ज कराई है और नई दिल्ली ने इसकी पुष्टि की है। नई दिल्ली ने यह भी कहा कि संविधान की 7वीं अनुसूची के तहत, विदेशी मामलों का संचालन केवल केंद्र सरकार का ही विशेषाधिकार है। राज्यों का उसमें कोई दखल नहीं है। वे विदेश मंत्रालय को केवल सुझाव भर ही दे सकते हैं।
इसके बावजूद यह हो रहा है, और सिर्फ पश्चिम बंगाल में ही नहीं। केरल में तो वहां की राज्य सरकार ने अपना खुद का एक ‘विदेश सचिव’ नियुक्त कर रखा है- विदेश में केरल से जुड़े मामलों की देखभाल के लिए। एक बार फिर, केंद्र ने कहा कि राज्य सरकारों को उन मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए, जो उनके संवैधानिक अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं। यह एक चिंताजनक मसला है। क्योंकि विदेश नीति, कर या शराब कानून की तरह नहीं होती। आप अलग-अलग राज्यों के लिए विदेश नीति सम्बंधी अलग-अलग नियम नहीं बना सकते। इसकी एक ही नीति होनी चाहिए। हमारे संविधान-निर्माताओं ने इस बात को समझा था। वे चाहते थे कि विदेश में पूरा भारत एक स्वर में बोले। यही कारण है कि केवल केंद्र ही विदेश नीति निर्धारित कर सकता है।
कल्पना कीजिए अगर ऐसा नहीं होता तो। क्या होता अगर जम्मू-कश्मीर के पास पाकिस्तान से बातचीत करने के लिए अपनी पृथक विदेश नीति होती? अगर तमिलनाडु के पास श्रीलंका के तमिलों से संपर्क करने की अपनी नीति होती तो? अगर पंजाब के पास खालिस्तानियों से निपटने की अपनी नीति होती तो? और क्या होता अगर अरुणाचल प्रदेश के पास मान्यता के लिए चीन से बातचीत करने की अपनी नीति होती? तब जो अराजकता मचती, क्या आप उसकी कल्पना कर सकते हैं? राष्ट्रीय हित पीछे छूट जाता, क्षेत्रीय हितों का बोलबाला होता। हमारे संविधान-निर्माता इसे रोकना चाहते थे। इसलिए कुछ शक्तियां केवल केंद्र के पास छोड़ी गई हैं, जैसे विदेश नीति और रक्षा। अगर आप इसे कमजोर करते हैं तो एक खतरनाक मिसाल कायम करते हैं। साथ ही, अगर नीतियां एक-दूसरे का खंडन करती हों तो क्या होगा? पश्चिम बंगाल शरणार्थियों का स्वागत कर सकता है, लेकिन असम निश्चित रूप से ऐसा नहीं चाहता। तब क्या वे इससे लड़ने के लिए अपनी सेनाएं भी खड़ी करेंगे? इस तरह के कदम भारत के संघवाद की नींव को कमजोर करते हैं।
सवाल यह है कि इसके बारे में क्या किया जा सकता है? सबसे पहले तो चीजों को दुरुस्त करना होगा। भाजपा ने केरल सरकार के कदम को असंवैधानिक बताया है। देखते हैं कि इसके बाद कोई कानूनी चुनौती आती है या नहीं। अगर ऐसा होता है, तो अदालतें हस्तक्षेप कर सकती हैं और मामले का निराकरण करने की पेशकश कर सकती हैं। दूसरे, हमें संघीय विभाजन को ठीक करने की जरूरत है। और यहां सिर्फ विदेश नीति की बात नहीं है। पश्चिम बंगाल और सीबीआई के बीच विवाद पर विचार करें। ममता बनर्जी का कहना है कि सीबीआई को उनके खिलाफ हथियार बनाया गया है। 2018 में, उन्होंने अपने राज्य से सीबीआई को बाहर कर दिया था। मामला अब अदालत में है। एक और उदाहरण सीएए का है। संसद ने इसे पारित कर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने इस पर रोक लगाने से इनकार कर दिया है। फिर भी, कुछ राज्यों ने इसके खिलाफ प्रस्ताव पारित किए हैं। उनका कहना है कि वे सीएए का पालन नहीं करेंगे।
दूसरी तरफ तमिलनाडु में राज्यपाल राज्य सरकार द्वारा पारित विधेयकों पर हस्ताक्षर करने और सरकार द्वारा तैयार भाषणों को पढ़ने से इनकार कर देते हैं और महत्वपूर्ण नियुक्तियों को रोक देते हैं। यह भी संविधान के अनुरूप नहीं है। और ये सभी मामले एक समस्या की ओर इशारा करते हैं- भारत के संघीय ढांचे में तनाव। इसकी कल्पना कई गियर वाली एक मशीन के रूप में करें। देश की तरक्की के लिए उन सभी को एक साथ काम करना चाहिए। संघवाद भारत की ताकत है। लेकिन राजनीतिक दल एकजुट होकर काम नहीं करेंगे, तो यह ताकत एक बाधा बन जाएगी।
Date: 30-07-24
स्पष्ट रोडमैप की जरूरतसंपादकीय
गत सप्ताह नीति आयोग की संचालन संस्था की नौवीं बैठक के बाद एक ‘दृष्टिकोण पत्र’ जारी किया गया। इसमें 2047 तक विकसित भारत बनाने को लेकर विजन पेश किया गया है। यह लक्ष्य चर्चा में है और खुद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी कई बार इसका उल्लेख कर चुके हैं। यह महत्त्वपूर्ण है कि इस बात का आकलन किया जाए कि सरकार का थिंक टैंक इस बारे में क्या सोचता है कि इसे हकीकत में बदलने के लिए क्या कुछ करना होगा। दस्तावेज में काफी आत्मविश्वास नजर आता है और वह इस मान्यता पर आधारित है कि भारत ने ‘बदलाव के अपने सफर में कई ऐसे मुकाम हासिल किए जो नजर आते हैं और अब वह उड़ान भरने को तैयार है।’ परंतु कई लोगों का तर्क है कि भारत बीते कम से कम दो दशकों से रनवे पर ही खड़ा है और उसकी उड़ान अभी भी कुछ दूर नजर आती है।
संबंधित दस्तावेज में बीते एक दशक के प्रदर्शन की काफी बात की गई है और यह दर्शाया गया है कि भारत ने तेज छलांग लगाने की क्षमताएं दिखाई हैं। इस बात को जन धन खातों में विस्तार, चंद्रयान की उपलब्धि और एशियाई खेलों में पदक तालिका में स्थान तक के संदर्भ में कहा गया है। ये सभी बातें गर्व करने लायक हैं लेकिन ये तथा ऐसे अन्य उदाहरणों का आवश्यक तौर पर यह अर्थ नहीं हो सकता है कि ये आर्थिक विकास की योजनाओं में भी अनिवार्य तौर पर अपनी भूमिकाएं निभाएं। इसका काफी हिस्सा इस बात की पड़ताल करता है कि विकसित भारत का क्या अर्थ हो सकता है। यह दावा किया गया है कि राष्ट्रीय स्तर पर 15 लाख लोगों के साथ संवाद करके विकसित भारत 2047 के लिए विजन का प्रारूप तैयार किया गया। बहरहाल इसमें कुछ लोकप्रिय मांगें मसलन स्वच्छ पेय जल, सबके लिए कौशल तथा ग्रामीण अर्थव्यवस्था को जीवंत बनाना आदि शामिल हैं और इस आधार पर लगता है कि इसके लिए इतनी गहन चर्चा की क्या आवश्यकता थी। ‘आंतरिक चुनौतियों’ वाला हिस्सा सबसे अधिक प्रासंगिक है। इसमें ऊर्जा क्षेत्र की दिक्कतें दूर करना, ग्रामीण शहरी असमानता और औद्योगिक प्रतिस्पर्धा जैसे विषय शामिल हैं। हालांकि इन पर कैसे काम होगा, ये सुझाव भी प्राप्त करने होंगे।
आखिर में सबसे अहम हैं आर्थिक लक्ष्य। ऐसा इसलिए कि विकसित भारत के अन्य लक्ष्यों को हासिल करने के लिए जरूरी गति वृद्धि से ही हासिल होगी।
पत्र में कहा गया है, ‘हमें 2047 तक 30 लाख करोड़ डॉलर की अर्थव्यवस्था बनना है और उस समय तक हम 18,000 डॉलर वार्षिक की प्रतिव्यक्ति आय का लक्ष्य लेकर चल रहे हैं।’ हालांकि इसे हकीकत में बदलने के लिए दो अंकों की वृद्धि लगातार बरकरार रखनी होगी। पत्र में ऐसी वृद्धि के उदाहरणों में जापान, जर्मनी, सिंगापुर और कोरिया के साथ चीन का नाम पढ़ना दिलचस्प है। इन देशों ने दशकों तक उच्च वृद्धि हासिल की है और इसे नाटकीय संस्थागत और साामजिक बदलावों से भी मदद मिली है। सिंगापुर ने अपनी अफसरशाही में सुधार किया, कोरिया ने नए तरह की निजी-सार्वजनिक भागीदारी विकसित की, जापान ने अपने सार्वजनिक क्षेत्र में, नियमन और न्यायपालिका में पूरी तरह पश्चिमी उदारवादी मॉडल अपना लिया। चीन में 1970 के दशक के बाद ऐसा ही बदलाव हुआ और संचालन की प्रक्रिया में खुलापन लाया गया, निजी मुनाफे की इजाजत दी गई और निर्णयों का विकेंद्रीकरण किया गया।
भारतीय संस्थानों में ऐसे बदलाव के बिना लगातार उच्च वृद्धि हासिल करना मुश्किल होगा। उदाहरण के लिए हमारे देश के पुराने और सख्त अफसरशाही ढांचे की वजह से निर्णय प्रक्रिया में देरी होती है और विशेषज्ञता या अनुभव को तवज्जो नहीं दी जाती है। स्पष्ट है कि प्रशासनिक सुधार भी काफी समय से लंबित हैं। कई संस्थानों में बदलाव की आवश्यकता है। न्यायिक प्रक्रिया में बहुत समय लगता है, कानून का प्रवर्तन करने में मनमानापन है, तीसरे स्तर की सरकार को पर्याप्त फंडिंग नहीं है और उसके यहां जवाबदेही का अभाव है। महिलाओं को श्रम शक्ति में अधिक भागीदारी देने जैसे सामाजिक बदलावों को लागू करना तब और कठिन हो सकता है। इन सभी के लिए राजनीतिक और सामाजिक सहमति की आवश्यकता होगी। नीति आयोग को उसे हासिल करने पर काम करना चाहिए।
Date: 30-07-24
ओबीएस के निर्यात में अपार संभावनाएंअजय श्रीवास्तव, ( लेखक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनीशिएटिव के संस्थापक हैं )
वर्ष 2030 तक अन्य कारोबारी सेवाएं (ओबीएस) भारत से निर्यात का अगला बड़ा स्रोत हो सकती हैं। अनुमान लगाया जा रहा है कि ये सॉफ्टवेयर एवं सूचना-प्रौद्योगिकी (आईटी) सेवा क्षेत्र को भी पीछे छोड़ देंगी। दूसरे शब्दों में कहें तो भारत से सेवा निर्यात में ओबीएस नए असरदार भागीदार के रूप में उभर रही हैं।
ओबीएस खंड में वे सेवाएं आती हैं जो विविध कारोबारी परिचालनों जैसे कारोबार परामर्श, अभियांत्रिकी (इंजीनियरिंग) और रिसर्च एवं डिजाइन (आरऐंडडी) से संबंधित होती हैं। इसमें विज्ञापन, जन संपर्क, बाजार शोध, लॉजिस्टिक्स, लेखा, अंकेक्षण (ऑडिट), वास्तुशिल्प एवं विधि सेवाएं सहित कई विधा आती हैं।
वित्त वर्ष 2022-23 में भारत से 150 अरब डॉलर मूल्य (वैश्विक हिस्सेदारी का 20 प्रतिशत) की सॉफ्टवेयर एवं आईटी सेवाओं और 80 अरब डॉलर मूल्य (वैश्विक हिस्सेदारी का 4.2 प्रतिशत) की ओबीएस का निर्यात हुआ। सॉफ्टवेयर एवं आईटी सेवाओं की भारत से सेवाओं के कुल निर्यात में आधी से अधिक हिस्सेदारी रहती है और ओबीएस की लगभग एक चौथाई हिस्सेदारी होती है।
आइए, यह समझने की कोशिश करते हैं कि क्यों ओबीएस में आईटी से भी आगे निकलने की क्षमता है। यद्यपि सॉफ्टवेयर एवं आईटी भारत से निर्यात के सबसे बड़े स्रोत हैं मगर ओबीएस का व्यापार भी तेजी से बढ़ रहा है। वैश्विक स्तर पर सेवाओं का निर्यात लगभग 7.1 लाख करोड़ डॉलर रहा। इनमें ओबीएस का निर्यात 1.8 लाख करोड़ डॉलर (25.4 प्रतिशत) और सॉफ्टवेयर एवं आईटी का 762 अरब डॉलर (10.7 प्रतिशत) रहा।
आने वाले वर्षों में आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) और केवल एक देश पर निर्यात संबंधी निर्भरता के कारण सॉफ्टवेयर एवं आईटी क्षेत्र की वृद्धि नरम पड़ सकती है। भारत आईटी निर्यात से जो कमाई करता है, उसमें अमेरिका की हिस्सेदारी 70 प्रतिशत से अधिक होती है। कुछ रणनीतिक कदमों से आने वाले वर्षों में भारत से ओबीएस निर्यात सॉफ्टवेयर एवं आईटी की तुलना में तेज गति से आगे बढ़ सकता है।
ओबीएस का बढ़ रहा वैश्विक व्यापार
विशेष सेवाओं की बढ़ती मांग, सेवाओं का विनिर्माण से जुड़ाव और तकनीक में प्रगति ओबीएस की वृद्धि को बढ़ावा दे रहे हैं। बड़ी विनिर्माण कंपनियां लागत कम करने के लिए संरचना, विकास एवं उत्पादन कार्य अलग-अलग जगहों पर ले जा रहे हैं। इस कदम के बाद अभियांत्रिकी, आईटी, लॉजिस्टिक्स एवं आरऐंडडी की मांग बढ़ रही है।
सेवाओं का विनिर्माण में यह जुड़ाव विनिर्माण के ‘सेवाकरण’ या सर्विसिफिकेशन के नाम से जाना जाता है, जो ओबीएस को बढ़ावा दे रहा है। उदाहरण के लिए कार बनाने वाली कोई अमेरिकी कंपनी इंजन बनाने का जिम्मा भारत में किसी इंजीनियरिंग कंपनी को दे रही है। यह ‘सर्विसिफिकेशन’ के रुझान को दर्शा रहा है।
इसके अलावा विदेश में कारोबार विस्तार करने वाली कंपनियों को नए बाजारों में अधिक सेवाओं की आवश्यकता होती है। तेजी से उभरती अर्थव्यवस्थाओं में तेज वृद्धि भी इंजीनियरिंग, विज्ञापन और आरऐंडडी सेवाओं की मांग बढ़ाती हैं। तकनीक में प्रगति जैसे क्लाउड कंप्यूटिंग, दूर बैठे काम करने की तकनीक और डिजिटल प्लेटफॉर्म दुनिया भर में अधिक सेवाएं पहुंचा रही है, जिससे उनका व्यापार तेजी से बढ़ रहा है।
विभिन्न क्षेत्रों में डिजिटल माध्यम के अधिक इस्तेमाल से तकनीकी एवं इंजीनियरिंग सेवाओं की मांग और तेजी से बढ़ रही है। यूरोप की किसी दवा कंपनी द्वारा भारत में आरऐंडडी केंद्र के लिए रकम मुहैया कराना या किसी भारतीय एजेंसी द्वारा किसी कोरियाई इलेक्ट्रॉनिक्स कंपनी के लिए मार्केटिंग अभियान चलाना इन गतिविधियों का उदाहरण हो सकता है।
कम से कम लागत में ज्यादा से ज्यादा काम होना भी एक अन्य कारक है। कंपनियां इंजीनियरिंग, आरऐंडडी और विज्ञापन जैसे कार्य भारत जैसे कम खर्चीले स्थानों से कराती हैं। इससे इन कंपनियों को प्रमुख कार्यों पर ध्यान केंद्रित करने में मदद मिलती है और विशेष सेवाओं के लिए दूसरे देशों की विशेषज्ञता पर निर्भर रहती हैं।
इसके अलावा नियामकीय दबावों के कारण व्यवसायों को अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुपालन के लिए परामर्श सेवाओं की आवश्यकता महसूस हो रही है। इन सभी कारणों से दुनिया भर में ओबीएस का वैश्विक व्यापार तेजी से बढ़ रहा है। भारत को इस रुझान से लाभान्वित होने का पूरा हक है।
भारत के ओबीएस निर्यात की ताकत कौन?
भारत से 80 अरब डॉलर मूल्य के ओबीएस का निर्यात होता है, जिनमें आधा वैश्विक क्षमता केंद्रों (जीसीसी) से और शेष हिस्सा विभिन्न आकार की कंपनियों एवं परामर्श इकाइयों से आता है। बहुराष्ट्रीय कंपनियों (एमएनसी) द्वारा स्थापित जीसीसी आईटी सेवाएं, वित्त, मानव संसाधन, आरऐंडडी और विभिन्न बैक-ऑफिस (प्रशासन एवं सहायता कर्मियों वाला विभाग जो सीधे ग्राहकों से संवाद नहीं करते हैं) परिचालन आदि कार्य संभालते हैं।
भारत में लगभग 1,500 जीसीसी हैं, जो बेंगलूरु, हैदराबाद, पुणे, चेन्नई, मुंबई, गुरुग्राम और नोएडा में हैं। माइक्रोसॉफ्ट, गूगल, आईबीएम, जीई, वॉलमार्ट, जेपी मॉर्गन, गोल्डमैन सैक्स, एचएसबीसी, सीमेंस और इंटेल जैसी कंपनियां ये जीसीसी स्थापित करती हैं। जीसीसी बिजनेस प्रोसेस आउटसोर्सिंग (बीपीओ) और नॉलेज प्रोसेस आउटसोर्सिंग (केपीओ) के विकास का अगला चरण हैं।
बीपीओ और केपीओ ने कई ग्राहकों को अपनी सेवाएं दीं मगर बड़ी एमएनसी अब धीरे-धीरे अपने जीसीसी लगाकर यह काम खुद करने लगी हैं। इससे इन कंपनियों को रकम बचाने और डेटा सुरक्षा से जुड़े मसलों से बेहतर तरीके से निपटने में मदद मिलती है। जीसीसी ने भारतीय आईटी कंपनियों से कुछ कारोबार छीन लिए हैं। जीसीसी के बाहर ओबीएस निर्यात में मुख्यतः स्थानीय कंपनियों का योगदान होता है।
कई छोटी नई कंपनियां और बड़ी सलाहकार इकाइयां लेखा एवं कर, विधि सेवा, प्रबंधन सलाह, विपणन एवं विज्ञापन सेवा, वास्तुशिल्प सेवा एवं लॉजिस्टिक्स सेवा जैसे क्षेत्रों में विशिष्ट सेवाएं देती हैं। ये कंपनियां अपनी सेवाएं पहुंचाने के लिए सीधे ग्राहकों के साथ या मध्यस्थों के साथ मिलकर काम करती हैं।
कुछ भारतीय कंपनियां इंजीनियरिंग, निर्माण और आईटी विकास में परियोजना के आधार पर काम कर अंतरराष्ट्रीय परियोजनाएं हासिल कर लेती हैं। वे दुनिया भर में अपनी सेवाएं देने के लिए अक्सर स्वतंत्र इकाइयों (फ्रीलांसिंग प्लेटफॉर्म) का इस्तेमाल करती हैं।
निर्यात क्षमता हासिल करने की रणनीति
कई छोटी कंपनियां ओबीएस का निर्यात तो करती हैं मगर भारत में ज्यादातर अभियांत्रिकी, शोध एवं प्रबंधन पेशेवर इस क्षेत्र में व्यापक संभावनाओं से परिचित नहीं हैं। पर्याप्त एवं उचित समर्थन दिया जाए तो ओबीएस निर्यात करने वाली कंपनियों की संख्या में भारी इजाफा हो सकता है। इस दिशा में पांच-सूत्री योजना फायदेमंद हो सकती है।
नियामकीय समीक्षाः सरकार को ओबीएस क्षेत्र में प्रत्येक विशिष्टीकृत सेवा के लिए स्थानीय नियमों की समीक्षा करनी चाहिए और उन्हें श्रेष्ठ वैश्विक मानकों के अनुरूप करना चाहिए। प्रमाणन नियमः ओबीएस में जरूरी विभिन्न पेशेवर हुनर एवं नियामकीय जानकारियों के लिए वैश्विक बाजार की आवश्यकताओं पर आधारित प्रमाणन मानक लागू किया जाना चाहिए। इससे पेशेवरों को अपने हुनर विश्व-स्तरीय बनाने में मदद मिलेगी।
संघ स्थापित करने की जरूरतः सॉफ्टवेयर एवं आईटी खंडों की तुलना में ओबीएस में सैकड़ों विशिष्ट सेवाएं हैं और इनमें प्रत्येक के लिए अलग हुनर, नियम एवं कारोबारी बाधाएं हैं। इसे देखते हुए बड़ी ओबीएस श्रेणियों के लिए संघ/संगठन स्थापित करने की जरूरत हैं। ये संघ सदस्यों को भारत और दुनिया में नियामकीय चुनौतियों से बाहर निकलने में मदद करेंगे।
दूसरे देशों में अपने समान संघों/संघठनों से सहयोग कर भारतीय संघ खरीदार एवं विक्रेताओं से जुड़ पाएंगे। ये संगठन कितने असरदार रहेंगे, यह उनके नेतृत्व एवं संरचना पर निर्भर करेगा। कई लोग गर्व से यह याद करते हैं कि किस तरह देवांग मेहता की सक्रियता ने 1990 के दशक में भारत के आईटी उद्योग को शुरुआती दौर में मदद पहुंचाई।
व्यापार आंकड़ों का प्रकाशनः भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) लेन-देन के देशवार आंकड़े जारी नहीं करता है। किसी खास ओबीएस पर विस्तृत आंकड़े विभिन्न ओबीएस श्रेणियों में विभिन्न क्षेत्रों के लिए मौजूद संभावनाओं को रेखांकित कर सकते हैं।
व्यापार वार्ताः व्यापार वार्ता के दौरान भारत साझेदार देशों पर दबाव डाल सकता है कि वे अपने बाजारों तक भारतीय कंपनियों के पहुंचने की राह में लगाई गई पाबंदी कम करें। ये प्रतिबंध ज्यादातर डेटा सुक्षा से जुड़ी चिंता, मालिकाना हक की सीमा, राष्ट्रीयता की जरूरत या खास सेवा प्रकारों पर पाबंदी से जुड़े हैं।
भारत में ओबीएस क्षेत्र की वृद्धि न केवल अर्थव्यवस्था को मजबूती देगी बल्कि उद्यमशीलता के उच्च गुणवत्ता वाले अवसर भी लाखों की संख्या में पैदा करेगी। अब ओबीएस खंड की पूर्ण क्षमता का लाभ उठाने के लिए निर्णायक कदम उठाने का समय आ गया है।
Date: 30-07-24
नगरों का प्रबंधन न हो जाए जानलेवाके के पाण्डेय, ( प्रोफेसर, शहरी प्रबंधन, आईआईपीए )
राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में एक के बाद एक हो रहे हादसे शहरी नियोजन की गंभीर कमियों की ओर इशारा कर रहे हैं। राजेंद्र नगर की घटना में, जिस पुस्तकालय में अचानक पानी भर जाने से तीन छात्र-छात्राओं की डूबकर मौत हो गई, उसे बेसमेंट में चलाने की अनुमति ही नहीं थी। इसी तरह, बीती 22 जुलाई को मध्य दिल्ली में यूपीएससी की तैयारी कर रहे एक नौजवान की इसलिए मौत हो गई, क्योंकि उसने जल भरे रास्ते से बचने के लिए एक लोहे के गेट को पकड़ लिया था, जिसमें खुले तारों की वजह से करंट दौड़ रहा था। पिछले साल मुखर्जी नगर में एक कोचिंग संस्थान में लगी आग में 60 से अधिक बच्चे घायल हो गए थे, जबकि जहां उनको पढ़ाया जा रहा था, वह स्थान छात्रों की संख्या के हिसाब से काफी छोटा था। साफ है, प्रशासनिक चूक बच्चों के जीवन पर भारी पड़ती दिखी है। इस चूक का खामियाजा महज पीड़ित परिवार नहीं भुगतते, बल्कि राष्ट्र को भी इसकी कीमत चुकानी पड़ती है, क्योंकि किसी भी देश के लिए मानव संसाधन बेशकीमती होता है।
बहरहाल, ऐसे मसलों पर किसी सियासी आरोप-प्रत्यारोप में उलझे बिना हमें यही सुनिश्चित करना है कि इसका उचित समाधान हो। यह तय करना ही होगा कि कोई भी अव्यवस्था किसी की जान पर भारी न पड़े। इसके लिए हमें ‘अर्बन रिन्यूअल पॉलिसी’, यानी शहरों के नवीनीकरण की नीति बनानी होगी। वास्तव में, आज भीड़भाड़ वाले अनेक क्षेत्र शहरों के मध्य में आ गए हैं, जबकि वहां का बुनियादी ढांचा आज की जरूरत के हिसाब से नहीं है। वहां नियम-कायदों के पालन में भी काफी दिक्कतें पेश आती हैं। लिहाजा, वहां या तो पूरी तरह रद्दोबदल करते हुए नया ढांचा विकसित किया जाए, अन्यथा जरूरत के हिसाब से मौजूदा ढांचे में ही अपेक्षित सुधार किए जाने चाहिए।
ऐसे क्षेत्रों को तकनीकी शब्दावली में ‘कोर सिटी एरिया’ कहते हैं। इनकी आर्थिक क्षमता काफी अधिक होती है, लेकिन अनियोजित विकास और पुराने बुनियादी ढांचे की वजह से इनकी आबादी की सघनता, क्षमता और जरूरी बुनियादी सुविधाओं में कोई मेल नहीं बैठ पाता। दिल्ली सरकार ने ही पिछले दिनों एक अध्ययन के हवाले से बताया था कि राजधानी में ड्रेनेज सिस्टम को बेहतर बनाने के लिए काफी निवेश की जरूरत है। देखा जाए, तो बारापुला, नजफगढ़ और यमुना पार के इलाके को तीन अलग-अलग भागों में बांटकर जल-निकासी की व्यवस्था में सुधार होना चाहिए। अभी इन तीनों इलाकों की जल-निकासी व्यवस्थाओं में कोई सामंजस्य नहीं है। यहां प्राकृतिक जल-निकासी से आंखें मूंद ली गई हैं।
सवाल उठाए जाते हैं कि इस तरह के व्यवस्थागत बदलाव के लिए पैसे कहां से आएंगे? वास्तव में, हमारे पास पैसों की उस तरह कमी नहीं है, जितनी बताई जाती है। जिस तरह से सरकारें मुफ्त की रेवड़ियां बांटती हैं, उसका अगर एक हिस्सा ही ऐसे ढांचागत कार्यों में नियमित रूप से खर्च किया जाए, तो लोगों को काफी राहत मिल सकती है। मुफ्त की रेवड़ियों का ही असर है कि जनहित सेवाओं के संचालन अथवा प्रबंधन में जिस तरह पैसे खर्च करने की जरूरत होती है, उतना सरकारों के पास नहीं बच पाता और उनको केवल आपात स्थिति के लिए अपनी तैयारी रखनी पड़ती है। राजेंद्र नगर हादसे में ही घटना के बाद तमाम तरह की कमियों की बात सामने आई है। आलम यह है कि जल व्यवस्था को ही दुरुस्त करने के लिए आवश्यक पाइपों की मरम्मत और प्रतिस्थापना का काम नियमित तौर पर नहीं हो रहा, जबकि यह आवश्यक माना जाता है।
शहरी ढांचे की बेहतरी या नवीनीकरण का काम मूलत: नगर निकायों का है, लेकिन संबंधित विभागों में जरूरी समन्वय बन ही नहीं पाता। दिल्ली में ही जल-आपूर्ति का मामला दिल्ली जल बोर्ड के पास है, तो जल-निकासी की व्यवस्था नगर निकाय के हवाले। ऐसे में, जब तक स्थानीय निकायों पर पूरी तरह से समन्वय की जिम्मेदारी नहीं डाली जाएगी, तब तक इस तरह की समस्या बनी रहेगी।
इस मसले का समाधान इसलिए भी आवश्यक है, क्योंकि 2047 तक विकसित देश बनने का लक्ष्य हमने तय कर रखा है। चूंकि योजनागत काम नहीं हो रहा, इसलिए आर्थिक क्षमता से भरे इन क्षेत्रों से हमें उचित फायदा नहीं मिल रहा। हम चाहें, तो मुंबई के धारावी से सबक ले सकते हैं, जहां नवीनीकरण का प्रयास तेज किया गया है। इस तरह के काम हर शहर में क्षेत्रों को चिह्नित करके उचित संदर्भ में किए जा सकते हैं। ऐसा इसलिए भी करना चाहिए, क्योंकि भारत में मुंबई और दिल्ली महानगर ही आने वाले समय में ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बन जाएंगे। विकसित भारत के सपने को साकार करने के लिए दिल्ली को लंदन, टोक्यो या न्यूयॉर्क से मुकाबला करना होगा और यह तभी संभव है, जब यहां बुनियादी ढांचे पर काम किया जाए। दिल्ली, मुंबई के अलावा बेंगलुरु, हैदराबाद, चेन्नई और कोलकाता भी आर्थिक विकास के दौर में ट्रिलियन डॉलर वाली अर्थव्यवस्था बनने के दावेदार हैं। ऐसे में, शहरों में नीतिगत और ढांचागत बदलाव अपरिहार्य है। मंझले और छोटे शहर राजकीय व अंतरराज्यीय प्रतिस्पद्र्धा से आर्थिक विकास को गति दे सकते हैं।
‘अर्बन रिन्यूअल पॉलिसी’ के फायदे यूरोपीय देशों में खूब देखे गए हैं। वास्तव में, दुनिया के तमाम देश ऐसी समस्याओं से जूझते रहे हैं, लेकिन वही इससे सफलतापूर्वक निकल पाते हैं, जो इसके लिए पर्याप्त दृढ़ता दिखाते हैं। यूरोपीय देशों ने समयानुकूल अपने यहां ढांचागत बदलाव किए। इसका नतीजा यह है कि आज वहां सघन आबादी वाले अनियोजित क्षेत्र नहीं दिखते। अच्छी बात है कि इस बार केंद्र सरकार ने आम बजट में बिहार, झारखंड, ओडिशा, आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों पर खास ध्यान दिया है। इससे वहां आधारभूत ढांचे पर निवेश हो सकेगा। अब इन राज्यों की आय बढ़ाने की व्यवस्था करनी होगी। इसके लिए सभी आकार के शहरों का विकास आवश्यक है, ‘क्योंकि जवाहरलाल नेहरू नेशनल अर्बन रिन्यूअल मिशन में नवीनीकरण पर ज्यादा काम नहीं हो सका है।
कुल मिलाकर, हमें शहरों के आर्थिक विकास का काम नगर निकायों के हवाले करना होगा। उसे ही यह तय करना चाहिए कि कौन-सा क्षेत्र किस गतिविधि के अनुकूल है और इसके लिए कैसा ढांचागत सुधार किया जाए। इस काम में बड़े और छोटे शहरों की अलग-अलग भूमिका होगी। शीर्ष विभागों को इस प्रक्रिया पर निगरानी रखनी चाहिए और जरूरत के मुताबिक समन्वय करना चाहिए। वास्तव में, नगर निकायों की मजबूती ही नगरीय व्यवस्था को बेहतर बनाती है।
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देश की अदालतों से निष्पक्षता और तर्क का समर्थन करने की आशा की जाती है। लेकिन हाल ही में इलाहबाद उच्च न्यायालय ने इससे उलट व्यवहार किया है। न्यायालय ने हिंदुओं के अ ल्पसंख्यक बनने के खतरे को सही ठहराने की कोशिश की है। डेटा के आधार पर यह झूठ सिद्ध होता है –
भारतीय न्यायालयों से रूढ़िवादिता और संघर्ष को बढ़ावा देने वाली टिप्पणीयों की अपेक्षा नहीं की जाती है। उन्हें तथ्यों के आधार पर व्यवहार करना चाहिए।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 4 जुलाई, 2024
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Date: 29-07-24
Be FederealNiti meeting minus oppn CMs shows neither INDIA nor BJP has realised what voters told them during electionsTOI Editorials
The “absence of fiscal federalism” – not enough funds to states – and the Centre’s “prejudice” against opposition-governed states were reasons 10 opposition-state CMs boycotted the Niti Aayog meeting, the first after Modi-led NDA govt’s first budget. The sole opposition CM who attended, Bengal’s Mamata Banerjee, walked out alleging her mike had been switched off. The verbal fisticuff with the Centre that followed was as banal as it was unsavoury.
Politics unstuck | Opposition’s boycott, in itself, was one more “event” around which INDIA allies showed they stick together, demonstrating how gluey is their alliance. This is not without its own vulnerability. The boycott also re-emphasised opposition’s deep distrust in Centre-led matters. States where Congress is in office accused GOI of the budget benefitting only NDA allies TDP and JDU. On the agenda of Modi-chaired Niti Aayog meeting was drinking water, electricity, health, schooling, and, land and property issues. It’s hard to see how a boycott can help any of these matters along. Such a break in Centre-state ties hits normative federalism, and is an unsustainable oppositiontactic – not all states can hold out or join boycott calls. To that end, INDIA brass must know it shouldn’t hang its unity on how states individually engage with the Centre – autonomy is paramount.
GOI needs bonding | It’s for GOI to recognise the mandate pushed for federalism, coalition and cooperation. BJP calling opposition politicians names didn’t stop voters from making INDIA a strong opposition. Despite GOI talking up official jobs data, the budget had to effectively concede there’s a jobs problem, an issue that came front and centre during elections. Long-term livelihood is the core concern for India’s majority. The number of people who need govt help in one form or another is not coming down. These are very visible craters on the road to being a developed nation by 2047.
Public needs governance | Instead of concrete Centre-state discussions, what one gets is talk. It’s ultimately the public that suffers. The decay in governance markers, from policy to practice – farms to higher education, urbanisation to jobs, climate adaptation to water crises – is evident. Both govt and opposition need to snap out of vitriolic campaign mode. For, the mandate also showed voters lukewarm to both NDA and INDIA’s ability to govern meaningfully. What the 18th Lok Sabha has demonstrated so far, with the budget followed by the boycott, is that GOI and opposition are playing Tweedledum and Tweedledee – simply twiddling.
Date: 29-07-24
Hubbub of Spokes That are the StatesBigger infra spenders outgrowing less-enthu peersET Editorials
At the 9th governing council meeting of NITI Aayog on Saturday, the prime minister’s exhortation to states on becoming more proactive on development has fiscal authority behind it. New Delhi is committed to spending big on physical infrastructure and wants states to match it in commitment. States, particularly ruled by parties in opposition to BJP, may differ on the particular development route the Centre is offering through accelerated capital expenditure. At different points in their development journey, states need the freedom to decide on their individual social outlays. No one, however, faults the logic of infrastructure leading to greater economic activity. Supply of a road creates demand for the road. Evidence also favours an aligned development approach. States that are more committed to infrastructure spending are outgrowing their reluctant peers.
So far as social outcomes go, the Centre is again backing its targets with more money. It is in sight of the end to chronic development blights such as poverty, and is in a position to step up resources as the scale of the issue diminishes into isolated pockets. On other issues such as unemployment, however, it needs the states to be on board with governance, reforms and skilling. Here, too, access to funding, both internal and external, is tied to a national view of development that leaves little scope for departure by the states. This curbs the political space for parties in power on the basis of regional aspirations.
Yet, the objective metrics of development are not in dispute. New Delhi has more resources to share with states both for infrastructure and welfare. States will have to fall in line with a national development course and evolve their specific roles depending on their resource endowments. The New Delhi consensus has been decades in the making with states contributing enormously to shaping the development agenda. As parts of that agenda reach fruition, states will have to build on those gains to evolve strategies for further development that may very well be vastly superior to the common minimum programme.
Date: 29-07-24
Planning betterThe NITI Aayog suffers from both structural and functional issuesEditorial
With 10 State and Union Territory representatives skipping the ninth Governing Council meeting of the NITI Aayog chaired by Prime Minister Narendra Modi — seven of them boycotted it — the think tank’s role has been called into question. The Chief Ministers of Tamil Nadu, Kerala, Karnataka, Telangana, Punjab, Himachal Pradesh and Jharkhand did so because of concerns with the perceived lack of allocations and projects to their States in the Union Budget. But the boycott and, later, the walkout by West Bengal Chief Minister Mamata Banerjee, suggest that the role of the think tank, limiting itself to an advisory body to the Union Government, has led to disenchantment among States, even if the protests were limited to leaders belonging to the political opposition. Constituted by the NDA government in its first term, the NITI Aayog was to replace the Planning Commission, doing away with the “top-down” approach of the earlier body, and to focus on “cooperative federalism”. But by limiting itself to an advisory body without any powers of resource distribution or allocation to States and other bodies and focusing on creating indices to evaluate States, it has led to the unintended consequence of “competitive federalism”; while the Finance Ministry has unfettered powers to decide on grants to States. In contrast, the Planning Commission, which too had its detractors, at least allowed for consultations with States in such matters.
It has not helped matters that the Bharatiya Janata Party has sought to seek votes in State elections on the basis of providing “double engine” governments, leading to complaints by Opposition-ruled States that the Centre has favoured those ruled by the BJP for investment projects. The fact that the NDA government now is crucially dependent upon the support of parties that rule Bihar and Andhra Pradesh — States that suffer varying developmental deficits — and the express intention of Finance Minister Nirmala Sitharaman to address their demands specifically in the Budget have not been lost on the government’s detractors. Irrespective of the merit in this contention, the fact is that consultations with States on grants and projects have become limited after the end of the Planning Commission. While the 16th Finance Commission is tasked with the removal of a horizontal imbalance among States and the Finance Ministry’s focus is on macro-economic stability and the financial system, the need to address growth through infrastructure and capital investments in States is something that requires institutional backing at the Centre as well. The NITI Aayog must be re-envisioned to bring back some of the responsibilities that the Planning Commission had for States for a truer “cooperative federalism”.
Date: 29-07-24
Plastic messMore efforts must be made to curb production and promote alternativesEditorial
India, like other large economies, faces a significant plastic waste problem. According to a 2020-21 report by the Central Pollution Control Board (CPCB), four million tonnes of plastic waste are generated annually. Unfortunately, only a quarter of this waste is recycled or treated, with the rest ending up in landfills or being disposed of unsustainably. Since 2016, the Plastic Waste Management Rules have mandated that users of plastics are responsible for collecting and recycling their waste. These requirements, or the Extended Producer Responsibility (EPR) rules, were initially voluntary but are now enforced through an online EPR trading platform. The EPR system involves packagers, importers, and large industrial users of plastic packaging, as well as professional recyclers, registering with the CPCB. Recyclers, who have networks to collect plastic waste, recycle the waste and receive validated certificates for each tonne recycled. These certificates can be uploaded to a dedicated CPCB portal and purchased by plastic packaging companies that fall short of their annual recycling targets. In 2022-23, the CPCB estimated that certificates for nearly 3.7 million tonnes of recycled plastic were generated. However, it was discovered that not all of these certificates were legitimate — there were approximately 6,00,000 fraudulent certificates. Additionally, hackers reportedly stole several thousand certificates last year and sold them to companies. A criminal investigation is ongoing, and it remains unclear how much of the claimed 3.7 million tonnes was genuinely recycled.
In response, the CPCB has taken two significant actions. First, it commissioned an audit of nearly 800 firms, representing almost a fourth of the 2,300 registered recyclers who had traded certificates. Second, it undertook a comprehensive overhaul of the security features on the EPR trading platform, although this has delayed the process of filing returns for 2023-24 by several months. The CPCB has described these problems as “teething issues” associated with implementing a large-scale electronic system. While the audit is necessary, it should be a one-time initiative to avoid undermining trust in the system with annual, lengthy investigations. Although the CPCB has the authority to impose heavy fines, the process is lengthy and fraught with legal challenges. A market-driven approach to solving plastic waste has a significant but limited effect. Greater efforts must be made to curb plastic production and promote sustainable alternatives. Addressing the root causes of plastic waste and enhancing the effectiveness of recycling systems are crucial in mitigating India’s plastic waste problem.
Date: 29-07-24
Defending disability reservationsPuja Khedkar’s alleged fraudulent activities should be met with stringent punishment. This is the solution, not the review of the reservation system that provides crucial support to a marginalised groupRahul Bajaj, [ practicing lawyer; Co-Founder, Mission Accessibility; Senior Associate Fellow, Vidhi Centre for Legal Policy; and adjunct faculty, BML Munjal University School of Law ]
The recent controversy involving Puja Khedkar, who allegedly faked her disability and caste to obtain benefits, has ignited a debate on the reservations granted to persons with disabilities (PwDs). The issue gained further traction when a former chief executive officer of NITI Aayog tweeted that reservations for PwDs need to be reviewed. Although he later clarified that he was referring only to mental disabilities (thereby drawing an unnecessary and baseless wedge between physical and mental disabilities), his statement, along with similar comments from other civil servants, raises troubling questions about societal attitudes towards disabilities and reservation policies.
Deep-rooted ableism
First, how many disabled individuals have these officers interacted with, or had the opportunity to know? Have they ever been introduced to the challenges faced by PwDs, during a session or a workshop? The deep-rooted ableism that their statements reflect are the lived realities of many PwDs.
PwDs face multiple barriers to their effective participation in society and the workforce. These include infrastructural challenges, the education system, and exam curricula and formats that are designed to be used by, and suit, able-bodied individuals. Reservation policies aim to level the playing field by providing equitable opportunities to PwDs. That a few individuals are exploiting these benefits should not overshadow the broader purpose and impact of such policies. Sweeping generalisations based on isolated incidents are unfair and counterproductive. Certain officers have asked whether PwDs who hold positions within the civil services have the “physical fitness” to fulfil their duties. Such statements reflect the unconscious bias that many people hold against PwDs.
PwDs continue to face challenges in both the education and employment sectors, yet those are hardly highlighted. The 76th round of the National Sample Survey in 2018 found that only 23.8% of PwDs were employed, whereas the Labour Force Participation Rate at the national level was 50.2% the same year. This can be attributed to lack of access to accessible education; stigma and biases at the hiring stage; and lack of reasonable accommodation at the workplace for PwDs.
These structural issues, however, are hardly ever pointed out by the same individuals who question the validity of affirmative action provided to PwDs. For instance, take the case of Kartik Kansal, who is affected by muscular distrophy. He has not been allotted a service despite clearing the Union Public Service Commission (UPSC)’s civil service exam four times. Similarly, due to her disability, Ira Singhal had to approach the Central Administrative Tribunal to secure her rightful posting despite having secured the first rank in the civil service exams. These are the moments when the conscience of our intellectuals should be stirred.
Potential misuse
In a related context, the Supreme Court addressed the potential misuse of scribes in Vikash Kumar v. UPSC (2021). The argument was that PwDs, if allowed to choose their scribes and if their disability percentage is less than 40%, might misuse this provision. The Court countered this saying: “If some incidents come to light of able-bodied candidates hiding chits in their dress code and misusing them to cheat in an exam, the normal consequence is suitable punitive action against such students. It is not to switch to a different dress code that is so uncomfortable that many competent students find it hard to sit in it for the entire duration of the exam and perform to the best of their ability.” This principle should similarly apply to reservations for PwDs.
Certification system
India’s certification system for disabilities also has significant flaws. The practice of quantifying disabilities by percentage is outdated and not supported by the United Nations Convention on the Rights of Persons with Disabilities. Functional limitations, rather than medical percentages, should be the basis for assessment. Also, the UPSC insists on a separate and independent disability assessment, thereby cocking a snook at the disability certification process recognised by the government that results in the issuance of a disability certificate and Unique Disability ID (UDID). This gives rise to the possibility of the two sets of assessments yielding contradictory results
An additional challenge is the lack of specialists to evaluate various disabilities, which makes the certification process inaccessible and time consuming. The complicated assessment guidelines prescribed by the state are often unrealistic at the level of district hospitals, which are constrained in terms of both infrastructure and resources. This leaves the assessment of the disability and its extent open to interpretation. Psychosocial disabilities, whose assessment is relatively more subjective, are assessed based on the outdated IDEAS (Indian Disability Evaluation and Assessment Scale) scale. In many cases, such tests are not even conducted. Persons with invisible, hidden, or less apparent disabilities, such as blood disorders, often face rejection because they “do not look disabled”.
The focus should be on addressing these systemic issues. Ms. Khedkar’s alleged fraudulent activities should be met with stringent punishment. This is the solution, not the unwarranted review of the reservation system that provides crucial support to a marginalised group.
Date: 29-07-24
धरोहरों के संरक्षण का कर्तव्यहृदयनारायण दीक्षित, ( लेखक उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष हैं )
यूनेस्को की विश्व धरोहर समिति ने असम के अहोम राजवंश के ‘मैदाम’ को विश्व धरोहर सूची में सम्मिलित किया है। देश प्रसन्न है। इस संदर्भ में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का कहना यथार्थ ही है कि विरासत सिर्फ इतिहास नहीं, बल्कि मानवता की साझा चेतना है। मैदाम असम के चराईदेव जिले में अहोम साम्राज्य के शाही परिवारों की कब्रगाह है। इनका निर्माण मिट्टी, ईंट और पत्थर से किया गया। यह एक टीलानुमा आकृति है।
18वीं शताब्दी के बाद अहोम राजाओं ने हिंदू दाह संस्कार पद्धति को अपना लिया। यह भारतीय ज्ञान परंपरा के लिए गौरव की बात है। अहोम साम्राज्य की स्थापना 1228 में ब्रह्मपुत्र घाटी में हुई थी। यह साम्राज्य 600 वर्ष तक चला। अहोमों की सेना सशक्त थी। उन्होंने ब्रह्मपुत्र में नौका सेतु बनाने की तकनीक भी सीखी थी।
लसित बोरफुकन के नेतृत्व में अहोम ने 1671 में सरायघाट के युद्ध में औरंगजेब की मुगल सेना को हराया था। बोरफुकन के पराक्रम की स्मृति में राष्ट्रीय रक्षा अकादमी के सर्वश्रेष्ठ कैडेट को बोरफुकन स्वर्ण पदक 1999 से दिया जाता है। प्रधानमंत्री मोदी ने बोरफुकन की विशाल प्रतिमा का लोकार्पण इसी वर्ष किया था।
भारत के कोने-कोने में राष्ट्र जीवन के भिन्न-भिन्न क्षेत्रों में सक्रिय लोगों की बहुतायत है। नरसिंह रेड्डी ब्रिटिश सत्ता से संघर्ष करने वाले आंध्र प्रदेश के लोकप्रिय नायक थे। उन्होंने सैकड़ों अंग्रेज सैनिकों को मारा था। इनका नाम राष्ट्रीय चर्चा में नहीं आया। बिरसा मुंडा भी इसी श्रेणी में आते हैं। देश में सांस्कृतिक महत्व के स्थलों की बहुतायत है।
राष्ट्रीय महत्व के ऐसे स्थलों को सूचीबद्ध करना और खोदाई आदि साधनों द्वारा संरक्षित करना एएसआइ की जिम्मेदारी है। एएसआइ ने काफी कुछ किया है, लेकिन अभी भी बहुत कुछ किया जाना शेष है। स्मारकों का संरक्षण राष्ट्रीय कर्तव्य है। कुछ महत्वपूर्ण स्मारक लापता भी बताए जा रहे हैं। वर्ष 2018 में संस्कृति मंत्रालय से जुड़ी सिंधु सभ्यता की अध्ययन समिति ने हरियाणा के भिराना एवं राखीगढ़ी की खोदाई के अध्ययन को महत्व दिया था।
इस पुरातात्विक क्षेत्र में कार्बन डेटिंग के अनुसार ईसा पूर्व 7000 से 6000 वर्ष की सभ्यता का अनुमान है। समिति के प्रमुख ने सिफारिश की थी कि कार्बन डेटिंग अध्ययन के परिणामों को ऋग्वेद, रामायण एवं महाभारत के समय-संदर्भ से जोड़कर समझा जाना चाहिए। भारत की सांस्कृतिक विभिन्नता पर सवाल उठाने वाले दुराग्रही हैं। वे सुमेरी सभ्यता को हड़प्पा से भी प्राचीन बताते हैं। वे हड़प्पा को सुमेरी सभ्यता की छाया मानते हैं।
वे जल भरी सरस्वती और सूखी सरस्वती के बीच समय विभाजन नहीं देखते। ऋग्वेद में सरस्वती जल भरी हैं। यह तथ्य हड़प्पा से पुराना है। बेशक भारत में सुमेर और मिस्र से प्राचीन सभ्यताएं हैं। इन सभ्यताओं के संबंधों का अध्ययन ऋग्वेद के तथ्यों के आधार पर करना चाहिए।
राष्ट्र सांस्कृतिक संपदा में अग्रणी है। संप्रति यूनेस्को की विश्व धरोहर सूची में 168 देशों के 1199 स्थल हैं। अफसोस कि इसमें भारत के 43 स्थल ही गणना में हैं। इटली भूक्षेत्र और जनसंख्या में भारत से बहुत छोटा है, लेकिन विश्व धरोहरों की सूची में इटली में 59 स्थल हैं। जर्मनी भी भारत से छोटा है, लेकिन उनकी धरोहरों की सूची लंबी (52) है। प्रसन्नता की बात है कि कुंभ को यूनेस्को ने विश्व विरासत सूची में सम्मिलित किया था।
ऋग्वेद पहले से ही यूनेस्को की सूची में है। इसी तरह यूनेस्को के ‘मेमोरी आफ एशिया पैसिफिक रीजनल रजिस्टर’ में रामचरितमानस, पंचतंत्र और सहृदयलोक-लोकन भी सम्मिलित हैं। तीनों महत्वपूर्ण ग्रंथों के समावेशन से भारत को प्रसन्नता हुई है। रामचरितमानस के रचनाकार तुलसीदास, पंचतंत्र के रचनाकार विष्णु शर्मा एवं सहृदयलोक-लोकन के आनंदवर्धन स्मरणीय हैं। इन्होंने पूरे विश्व को प्रभावित किया है। संस्कृति और दर्शन भौगोलिक सीमा में नहीं बांधे जा सकते।
भारत में विज्ञान, दर्शन और कला के क्षेत्र में बड़ा काम हुआ है। तमाम विदेशी विद्वान भारतीय संस्कृति के प्रशंसक रहे हैं और हैं। कुछेक विद्वान भारतीय विद्वानों की मेधा के प्रति ईर्ष्यालु भी जान पड़ते हैं। गणित भारतीय खोज है। पंडित नेहरू ने ‘डिस्कवरी आफ इंडिया’ में एक गणितज्ञ डान जिंग की पुस्तक ‘नंबर’ का उद्धरण दिया है। जिंग ने लिखा था कि, ‘अनजाने में हिंदुओं की स्थान मूल्य के सिद्धांत की खोज लोकव्यापी महत्व की है।
आश्चर्य है कि यूनानी गणितज्ञों ने इसकी खोज क्यों नहीं की।’ जिंग यूनानी गणितज्ञों द्वारा अंकों की खोज न कर पाने से आहत जान पड़ते हैं। ‘मैथमेटिक्स फार दि मिलियन’ में दाग वेन ने सटीक उत्तर दिया है, ‘हिंदुओं ने ही इस दिशा में कदम क्यों बढ़ाया? इस प्रश्न का उत्तर हम हल नहीं कर सकते अगर हम बौद्धिक विकास को कुछ प्रतिभाशाली लोगों के प्रयास का ही परिणाम मानेंगे।’ कुछ विद्वान भारतीय ज्ञान, विज्ञान, दर्शन और संस्कृति के लिए भारतीय धरोहरों की ओर नहीं देखते। स्मारक सभ्यता और संस्कृति के संवाहक हैं और राष्ट्र की धरोहर हैं।
विश्व का सबसे बड़ा विश्वविद्यालय तक्षशिला था। अर्थशास्त्र के लेखक कौटिल्य तक्षशिला के आचार्य थे। दुनिया के पहले व्याकरणकर्ता पाणिनि भी यहीं के थे। पतंजलि और चरक यहीं के थे। अंकशास्त्र यूरोप के देश नहीं खोज पाए तो इसका मूल कारण है यूरोप में ज्ञान, विज्ञान और दर्शन की सामूहिक चेतना का अभाव। साहित्य, संगीत और सभी कलाएं भारतीय संस्कृति के मुख्य अंग हैं।
यहां गांधार, मथुरा एवं सारनाथ तीन प्रमुख शैलियां रही हैं। बुद्ध की पहली मानवीय कृतियां गांधार कला की देन हैं। माना जाता है कि इस सृजन में यूनानी कला और भारतीय दर्शन का मेल है। राष्ट्र जीवन के सभी कर्तव्यों एवं क्षेत्रों में भारत अग्रणी रहा है। मथुरा, काशी, अयोध्या, केदारनाथ, बदरीनाथ, सारनाथ, मदुरै, तिरुपति, गुरुवायुर, कन्याकुमारी, मैसुरु, कांचीपुरम और रामेश्वरम आदि अंतरराष्ट्रीय आकर्षण हैं। ये सभी केंद्र अंतरराष्ट्रीय धरोहर घोषित किए जाने योग्य हैं। भारत स्वयं में वैश्विक संस्कृति की धरोहर है।
Date: 29-07-24
विवादों में क्यों लोकसभा अध्यक्षविनीत नारायण
भारतीय लोकतंत्र की परंपरा काफी सराहनीय रही है। लोकतंत्र में सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच लगातार नोक-झोंक का चलना सामान्य व स्वाभाविक बात है । लेकिन इस नोक-झोंक की सार्थकता तभी है जब वक्ताओं द्वारा मर्यादा में रह कर बात रखी जाए। जब तक संसदीय कार्यवाही का टीवी पर प्रसारण नहीं होता था, तब तक देश की जनता को पता ही नहीं चलता था कि उनके चुने हुए प्रतिनिधि संसद में कैसा व्यवहार कर रहे हैं? यह भी नहीं पता चलता था कि वे संसद में किन मुद्दों को उठा रहे हैं? अक्सर ऐसे मामले भी सामने आए हैं, जब सांसदों ने आर्थिक लाभ की एवज में बड़े औद्योगिक घरानों के हित में सवाल पूछे। वरिष्ठ पत्रकार ए सूर्यप्रकाश ने तीस वर्ष पहले ऐसे लेखों की श्रृंखला छापी थी जिसमें सांसदों के आचरण का खुलासा हुआ और देश ने पहली बार जाना, ‘संसद में सवाल बिकते हैं। पर जब से टीवी पर संसदीय कार्यवाही का प्रसारण होने लगा तब से देशवासियों को भी देखने को मिला कि सांसद सदन में कैसा व्यवहार करते हैं।
बिना अतिश्योक्ति के कहा जा सकता है कि कुछ सांसद है जिस भाषा का प्रयोग करने लगे हैं, उसने शालीनता की सीमाएं लांघ दी हैं। शोर-शराबा तो आम बात है। संसद में हुड़दंग भारत में ही देखने को नहीं मिलता। अनेक देशों से वीडियो आते रहते हैं, जिनमें सांसद हाथापाई करने और एक दूसरे पर कुर्सियां और माइक फेंकने तक में संकोच नहीं करते। सोचने वाली बात यह भी है कि भारतीय संसद की कार्यवाही पर देश की गरीब जनता का अरबों रुपया खर्च होता है। आकलन है कि संसद चलने का प्रति मिनट खर्च ढाई लाख रुपये से थोड़ा अधिक आता है। इसका सदुपयोग तब हो जब गंभीर चर्चा करके जनता की समस्याओं के हल निकाले जाएं। हमारी लोक सभा का इतिहास रहा है कि लोक सभा के अध्यक्षों ने यथासंभव निष्पक्षता से सदन की कार्यवाही का संचालन किया।
उल्लेखनीय है कि 15वीं लोक सभा के तत्कालीन अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने अपने ही दल के विरुद्ध निर्णय दिए थे जिसका खमियाजा भी उन्हें भुगतना पड़ा। उन्हें दल निष्कासित कर दिया गया पर उन्होंने अपने पद की मर्यादा से समझौता नहीं किया। लेकिन पिछले दस वर्षों से लोक सभा के वर्तमान अध्यक्ष ओम बिरला लगातार विवादों में रहे हैं। उन पर सत्ता पक्ष के प्रति अनुचित झुकाव रखने का आरोप विपक्ष लगातार लगाता रहा है। 17वीं लोक सभा में तो हद ही हो गई जब सत्ता पक्ष के एक सांसद ने विपक्ष के सांसद को सदन की कार्यवाही के बीच अपमानजनक गालियां दीं। अध्यक्ष ने उनसे वैसा कड़ा व्यवहार नहीं किया जैसा वो लगातार विपक्ष के सांसदों के साथ करते आ रहे थे। तब तो और भी हद हो गई जब उन्होंने विपक्ष के 141 सांसदों को सदन से निष्कासित कर दिया। ऐसा आजाद भारत के इतिहास में पहली बार हुआ। हाल में टीवी चर्चा में उत्तर प्रदेश
के पूर्व मुख्यमंत्री व समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव से बातचीत में नामी वकील, सांसद और पूर्व कानून मंत्री कपिल सिब्बल ने बताया, ‘देश के संविधान के अनुच्छेद 105, संसद के सदस्यों को संसद में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता होगी परंतु क्या सांसदों को ऐसा करने दिया जाता है? जबकि इसी अनुच्छेद में या पूरे संविधान में यह कहीं नहीं लिखा है कि किसी भी सांसद का, संसद सदन में, अपनी बारी पर बोलते समय, माइक बंद किया जा सकता है। यह भी कहीं नहीं लिखा है कि किसी सांसद को बोलते समय, यदि वह नियम व मर्यादा के अनुसार बोल रहा हो तो उसे टोका जा सकता। इतना ही नहीं, यह बात भी नहीं लिखी है कि यदि विपक्ष किसी मुद्दे पर सत्ता पक्ष का विरोध करे तो उसे टीवी पर नहीं दिखा सकते। परंतु आजकल ऐसा होता है और यदि लोक सभा अध्यक्ष इस बात को नकार देते हैं कि वे किसी का माइक बंद नहीं करते तो फिर कोई तो है जो माइक को बंद करता है। ऐसा है तो जांच होनी चाहिए कि ऐसा कौन कर रहा है और किसके निर्देश पर कर रहा है?’
18वीं लोक सभा की शुरुआत ही ऐसी हुई है कि नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी से लेकर अखिलेश यादव और अभिषेक बनर्जी तक अनेक दलों के सांसदों ने अध्यक्ष ओम बिरला के प्रति पक्षपातपूर्ण रवैये का खुला आरोप ही नहीं लगाया, बल्कि अपने आरोपों के समर्थन में प्रमाण भी प्रस्तुत किए हैं। ये न सिर्फ लोक सभा अध्यक्ष के पद की गरिमा के प्रतिकूल है, बल्कि ओम बिरला के निजी सम्मान को भी कम करता है। आवश्यकता इस बात की है कि ओम बिरला मुंशी प्रेमचंद की कालजयी रचना ‘पंच परमेश्वर’ को गंभीरता से पढ़ें जो शायद उन्होंने अपने स्कूली शिक्षा के दौरान पढ़ी होगी। कहानी शिक्षा मिलती है कि न्यायाधीश की कुर्सी पर बैठे व्यक्ति को सगे-संबंधियों का भी लिहाज नहीं करना चाहिए। लोक सभा की सार्थकता और पद की गरिमा के अनुरूप ओम बिरला को किसी सांसद को यह कहने का मौका नहीं देना चाहिए कि उनका व्यवहार पक्षपातपूर्ण है।
Date: 29-07-24
पौधों के बदले नामसंपादकीय
मानव संसार धीरे-धीरे शालीन हो रहा है, इसी कड़ी में पहली बार वनस्पतिशा्त्रिरयों ने निर्णय लिया है कि 200 से अधिक पौधों, कवक और शैवाल प्रजातियों के नामों को बदला जाएगा। सदियों से इन प्रजातियों के ऐसे नाम रखे जाते रहे हैं, जिनसे नस्लवाद की बू आती है। मध्ययुगीन बर्बरता की वजह से भी खासकर अफ्रीका में पाई गई विभिन्न प्रकार की वनस्पतियों के नाम नस्लीय आधार पर रखे गए थे। एक लंबा दौर था, जब अफ्रीकी देशों में लोगों और वहां की संस्कृति के साथ ही वहां की प्रकृति को भी हिकारत भरी निगाहों से देखा गया। शायद यह वही दौर था, जब अफ्रीकियों को दास बनाकर दुनिया की बदनाम दास मंडियों में बेचा जाता था। अनेक नाम ऐसे रखे गए, जो स्थानीय बोलियों में बिल्कुल गाली की तरह थे। वनस्पतियों के नाम रखते हुए ‘कैफ्रा’ शब्द का सर्वाधिक इस्तेमाल किया गया। अब चूंकि पूरी दुनिया में रंगभेद और नस्लवाद के खिलाफ निरंतर आंदोलन चलते रहे हैं, तो वनस्पति विज्ञान के विशेषज्ञों का यह फैसला बहुत सुखद और स्वागतयोग्य है। पहली बार, शोधकर्ताओं ने ऐसे वैज्ञानिक नामों को खत्म करने के लिए मतदान किया है, जो आपत्तिजनक हैं। ये ऐसे शब्द या नाम हैं, जिनका उपयोग ज्यादातर दक्षिणी अफ्रीका के अश्वेतों के खिलाफ किया जाता रहा है।
मैड्रिड में आयोजित अंतरराष्ट्रीय वनस्पति कांग्रेस में इन बदलावों के पक्ष में बाकायदा मतदान हुआ। पूरी सावधानी बरतते हुए गुप्त मतदान किया गया, नाम सुधार के पक्ष में 351 वोट पड़े, जबकि विरोध में 205। मिसाल के लिए, इसका एक बड़ा लाभ यह होगा कि साल 2026 से तटीय मूंगा जैसे पौधों को औपचारिक रूप से एरिथ्रिना कैफ्रा के बजाय एरिथ्रिना एफ्रा कहा जाएगा। नेल्सन मंडेला यूनिवर्सिटी (एनएमयू) के वनस्पति विशेषज्ञ गिदोन स्मिथ कहते हैं कि हमें इस प्रक्रिया में हमारे सहयोगियों से वैश्विक समर्थन का पूरा भरोसा था, भले ही वोट का नतीजा करीबी रहने वाला था। बेशक, नस्लभेदी या रंगभेदी नामों को बदलना जरूरी था, ताकि नफरत के आदिम दौर से पीछा छुड़ाया जा सके। बदलाव के पक्षधर वैज्ञानिकों को शायद शुरू में परेशानी और विरोध का सामना करना पड़ेगा, बहुत सारी किताबों को फिर प्रकाशित करने की जरूरत पड़ेगी, पर यह फैसला हर दृष्टि से गरिमापूर्ण और न्यायपूर्ण है। किसी भी किताब में अपशब्दों की क तई जरूरत नहीं है। निरंतर सभ्य और शालीन समाज के निर्माण के लिए ऐसे सुधार की कोशिश लंबे समय से जारी थी। इससे नाम सुधार की समग्र प्रक्रिया को बल मिलेगा।
समाज में व्याप्त ऐसे अनगिनत शब्द हैं, जो किसी न किसी मानव समूह या वर्ग के लिए अपमानजनक हैं। ऐसे में, एक साथ 200 नाम बदलने का फैसला प्रेरणा की वजह बनेगा। शायद हर देश को अपने स्तर पर अपमानजनक नामों से छुटकारा पाना होगा। बहरहाल, वनस्पति विज्ञान में अब नए नाम रखते हुए भी काफी सावधानी बरतने का इरादा है। तमाम वैज्ञानिक सहमत हैं कि अब नाम ऐसे नहीं रखे जाएंगे, जिनसे कोई आहत हो। मसलन, यदि अकेले ऑस्ट्रेलिया की बात करें, तो वहां जल्द ही सबसे बड़ी चुनौती उन हजारों नई प्रजातियों के नामकरण की होगी, जिनकी खोज हो चुकी है या होने वाली है। पिछले 50 वर्षों में लगभग 7,000 ऑस्ट्रेलियाई पौधों की प्रजातियां दर्ज हुई हैं, जिनका नामकरण होना बाकी है। ऐसे में, 200 वनस्पतियों के नामों में बदलाव के साथ यह महज एक शुरुआत है।
Date: 29-07-24
बढ़ती विषमता का विष कौन निगलेहरजिंदर, ( वरिष्ठ पत्रकार )
प्रसिद्ध अर्थशास्त्री कौशिक बसु ने केंद्रीय बजट की अपनी समीक्षा में भारत की बढ़ती आर्थिक विषमता का जिक्र किया है। उनका कहना है कि आर्थिक नीतियों को इसे कम करने के तरीके खोजने चाहिए। 16वें वित्त आयोग के अध्यक्ष और नीति आयोग के संस्थापक उपाध्यक्ष अर्थशास्त्री अरविंद पनगढ़िया ने भी कुछ सप्ताह पहले कहा था कि अब गैरबराबरी को नजरंदाज नहीं किया जा सकता। भारत की बढ़ती आर्थिक विषमता पिछले कुछ समय से काफी चर्चा में है। वर्ल्ड इनइक्वलिटी लैब से लेकर यूएनडीपी की रिपोर्टों में भी भारत को उन देशों में रखा गया है, जहां अमीर और गरीब के बीच का फासला सबसे ज्यादा है। यह ठीक है कि पिछले दो दशकों में भारत में अति-दरिद्रता कुछ कम हुई है। मनरेगा या सीधे अनाज बांटने की योजनाओं ने भुखमरी वाली गरीबी को कम किया है, मगर अमीर और गरीब का फासला लगातार बढ़ता गया है।
पिछली सदी की समाजवादी शब्दावली में कहा जाता था, अमीर अधिक अमीर होता जा रहा है और गरीब अधिक गरीब। अब गरीब अधिक गरीब भले न हो रहा हो, लेकिन अमीर जिस तेजी से ज्यादा अमीर होता जा रहा है, उससे फासला बहुत बढ़ गया है। बजट के बाद कांग्रेस सांसद शशि थरूर ने कहा कि इस बजट में विषमता को कम करने का कोई उपाय नहीं दिखता। उन्होंने यह भी याद दिलाया कि भारत में इस समय विषमता जहां पहंुच गई है, उतनी तो ब्रिटिश काल में भी नहीं थी। शशि थरूर जब यह कह रहे थे, तो दरअसल वह दुनिया के कई अर्थशा्त्रिरयों द्वारा तैयार किए गए एक शोध-पत्र का हवाला दे रहे थे, जो अभी कुछ ही महीने पहले जारी हुआ है। इस शोध-पत्र के अनुसार, इसके पहले भारतीय इतिहास में सबसे ज्यादा गैर-बराबरी 1930 में थी, जब देश की एक फीसदी आबादी के पास पहंुचने वाली आमदनी देश की कुल आमदनी का 20 फीसदी थी। बाद के दौर में इसमें गिरावट आ गई। मगर लगभग सौ साल बाद हम वहां पहंुच गए हैं, जहां देश के एक फीसदी अमीरों के पास पहंुचने वाली आमदनी 20 फीसदी की पिछली बुलंदी को भी पार कर गई है।
बात जब ब्रिटिश दौर की हो रही है, तो प्रसंगवश ब्रिटेन की ओर भी झांक लेते हैं। आर्थिक गैर-बराबरी वहां भी हाल के वर्षों में काफी तेजी से बढ़ी है। पिछले दिनों आम चुनाव में जिस तरह वहां के लोगों ने लेबर पार्टी को भारी बहुमत दिया, उसका एक कारण यह भी बताया जाता है कि लोग आर्थिक दबावों की वजह से आजिज आ गए थे। और अब जब लेबर पार्टी जीत गई है, तो उसके सांसद ही दबाव डाल रहे हैं कि सबसे पहले गैर-बराबरी दूर करो। पार्टी का पूरा अमला इसी में सिर खपा रहा है कि इस अफसाने को कैसे अंजाम तक पहुँचाया जाए। वैसे, भारत में भी आम चुनाव के दौरान कांग्रेस ने इस मुद्दे के संकेत अपने घोषणापत्र में दिए थे। मगर चुनावी माहौल में इस पर कोई विमर्श होने के बजाय मंगलसूत्र और भैंस खोल ले जानेे जैसी चर्चाएं ही खबरों में छाई रहीं।
भारत और ब्रिटेन ही क्यों, यह तो तकरीबन सारी दुनिया में हो रहा है। वर्ल्ड इनइक्वलिटी लैब की कोई भी सालाना रिपोर्ट उठा लीजिए, आपको तकरीबन हर जगह विषमता बढ़ती दिखाई देगी। अमेरिका तक में यही हो रहा है। इसे लेकर पहला आंदोलन भी वहीं शुरू हुआ था- ऑक्यूपाई वॉल स्ट्रीट। मगर समय के साथ इसके सुर ठंडे पड़ गए। अब कई अमेरिकी अर्थशास्त्री इस विमर्श में सिर खपा रहे हैं कि बढ़ती आर्थिक गैरबराबरी को समस्या माना भी जाए या नहीं? बेशक, वहां समस्या वैसी है भी नहीं, जैसी भारत जैसे कुछ देशों में है। तमाम विशेषज्ञ कह रहे हैं कि इसका समाधान आसान नहीं है। कुछ का तो कहना है कि दुनिया ने जो आर्थिक व्यवस्था अपनाई है, उसके कुएं में ही विषमता की भांग पड़ी है। आप कुछ भी कर लें, धन और संपत्ति का केंद्रीकरण लगातार बढ़ता ही जाएगा।
पहले यह माना जाता था कि विश्व-अर्थव्यवस्था को जब झटका लगता है, तब गैर-बराबरी अपने आप नीचे आ जाती है। यही प्लेग महामारी के समय हुआ था। यही पिछली सदी की पहली महा-आर्थिक मंदी के समय हुआ और यही दोनों विश्व युद्धों के बाद हुआ। मगर 21वीं सदी ने इस मिथक को भी तोड़ दिया है। 2008 के वित्तीय संकट के समय पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था हिल गई थी। बाद में, जब सब सामान्य हुआ, तो पता चला कि विषमता और बढ़ गई है। इसके बाद कोविड जैसी महामारी में जब पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था चक्कर खाकर गिर पड़ी थी और बहुत से लोगों के सिर पर अन्न और भोजन का संकट मंडराने लगा था, तब भी कुछ लोगों की ही संपत्ति लगातार बढ़ रही थी। गैरबराबरी अब हर आपदा में अपने लिए अवसर तलाश लेती है।
कुछ अर्थशास्त्री चेता रहे हैं कि ऐसा बहुत दिन नहीं चलेगा। इसी के साथ एक और चेतावनी नत्थी हो गई है कि आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस, यानी कृत्रिम बुद्धिमत्ता धन के केंद्रीकरण व विषमता को और बढ़ा सकती है। यह भी कहा जा रहा है कि इसके साथ बढ़ती बेरोजगारी कभी भी विस्फोट का कारण बन सकती है।
बावजूद इसके कोई नहीं जानता कि इसका किया क्या जाए? पिछली एक सदी में अमीरों पर भारी टैक्स लगाने से लेकर, संपत्ति कर से लेकर उपभोग कर तक के प्रयोग हुए। हर बार गैर-बराबरी ने अपने लिए गुंजाइश तलाश ली। जहां ऐसे प्रयासों ने अर्थव्यवस्था की लय बिगाड़ी, वहां इसका नजला भी गरीबों पर ही गिरा। हम चाहें, तो ऐसा करने वालों की नीयत पर शक कर सकते हैं। यह भी माना जाता है कि जो अमीर थे, उन्होंने हर बार अपने लिए तमाम नियम-कायदों के बीच से रास्ते निकाल लिए। ठीक यहीं पर राजनीतिक अर्थशास्त्र की एक प्राचीन कहावत को भी याद कर लेना चाहिए- यह एक स्वर्णिम नियम है, जिसके पास स्वर्ण है, उसके पास नियम है। आर्थिक विषमता को हमेशा के लिए सुला देने की खातिर साम्यवादी व्यवस्थाएं कायम की गईं, जो अपने ही अंतरविरोधों से चरमरा गईं।
पिछली सदी तक दुनिया के पास समता को कायम करने और विषमता खत्म करने की कई विचारधाराएं थीं। मगर 21वीं सदी के आते-आते उनके महल खंडहर में बदल गए, जो अब लोगों को आकर्षित नहीं करते। जिन्हें समता कायम करने की ऐतिहासिक शक्तियां कहा जाता था, उन्हें अब कोई याद भी नहीं करता। पूरे इतिहास में किसी समस्या के सामने हम इतने असहाय कभी नहीं रहे।
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हर साल मानसून के आते ही हर बड़े भारतीय शहर में यातायात अस्त-व्यस्त और आम जन जीवन रुक सा जाता है। शहर के ठप्प हो जाने के बाद इससे निपटा जाता है।
कुछ बिंदु –
– गड़बडी क्यों होती है?
– कौन जिम्मेदार है?
– आगे का रास्ता क्या है?
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित के.के. पाण्डेय के लेख पर आधारित। 29 जून, 2024
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Date: 27-07-24
Vance, You Kidding?Living with cats (and dogs), in pursuit of happinessTOI Editorials
Childless dog ladies are so pissed. If only JD Vance had dissed them instead of childless cat ladies, they’d have been the ones in the limelight now. He was taking aim at Kamala Harris, while suggesting that women who don’t bear children have miserable lives and misery is their sole contribution to society. But women without children, women with stepchildren, women with cats and their many champions have gotten up to say, hey, JD, you got it so damn wrong.
There are of course the powerful Swifties, who make cities shake when they chorus, “karma is a cat purring in my lap…vibe like that.” But even otherwise, one in five American women aged 35-44 have not had children. One in three American households own a cat. In gaslighting such widely made choices, Vance really read the room wrong. Now, if he had landed this punch in India, it would have played much better.
Childless women are so widely stigmatised in our country that the words to describe them strike like epithets. Baanjh, for example. And yet, even here, what academics call maternormativity is going down. The 7% childlessness among married women aged 40-49 in 2015-2016 was up to 12% in 2019-2021. While this has several causes, researchers do underline the overlap with increase in education and empowerment. So, yes, in India too, like everywhere else in the world, from east to west, when women truly have a choice, they can choose to live with a cat or a dog or by themselves, or with a man and children. And that choice is in pursuit of happiness. Childlessness is not incompleteness. People without children have no lesser stakes in building a better world. For men who think it’s a woman’s ‘duty’ to bear a child, the cat is out of the bag.
Date: 27-07-24
Who Will Change Their Spots, & How?ET Editorials
The Madhya Pradesh Forest Department’s refusal to provide information sought under RTI Act on Project Cheetah puts the spotlight back on the ambitious project. The RTI sought details on how the animals are faring in Kuno Wildlife Sanctuary in MP, the progress of plans for a second home at Gandhi Sagar Wildlife Sanctuary in Mandsaur district, and records on ‘management correspondence’ between both sites. The request was denied, invoking Section 8(1)(a) of the RTI Act, which allows public authorities to withhold information whose disclosure would affect India’s integrity and sovereignty. This is absurd.
The programme began in 2022, with cheetahs from Namibia and then from South Africa introduced at Kuno. The plan is to bring in 5-10 cheetahs every year over a decade, creating a self-sustaining population of 35 cheetahs. Unlike cheetahs in Namibia and South Africa who live in fenced reserved forests, the plan here is to release the animals after acclimatisation into unfenced protected forests, as is the norm in India. This is challenging because there has yet to be a successful reintroduction into an unfenced reserve. It has been attempted 15 times in South Africa and failed every time.
There have been initial hiccups in the Kuno project, and adjustments have been made. It is too early to declare success or failure. Denying information on a crucial public project on shaky grounds gives the impression that something is amiss. Moreover, it closes the possibility of people with expertise, knowledge and training contributing towards providing a more robust grounding to India’s ambitious cheetah relocation and conservation programme. And, above all, citizens need to know how things are proceeding (or not) to measure its progress and/or fix it.
Date: 27-07-24
Fiscal federalismThe ruling on taxing mineral rights opens up resource avenue for StatesEditorials
It is not often that fiscal federalism finds a prominent place in judicial discourse. The Supreme Court judgment, holding by an overwhelming majority of 8:1 that the States can tax mineral rights and mineral-bearing lands, is a truly landmark ruling, as it protects their legislative domain from interference by Parliament. For decades, it was believed that the States were denuded of their power to impose any tax on mineral resources extracted from their land because of the prevalence of a central law, the Mines and Minerals (Development and Regulation) Act, 1957. Even though the right to tax mineral rights is conferred on the States through Entry 50 in the State List of the Seventh Schedule, it was made “subject to any limitations imposed by Parliament by law relating to mineral development”. The Union government argued that the very existence of its 1957 law was a limitation on the States’ power to tax mineral rights, but Chief Justice of India, Dr. D.Y. Chandrachud, writing for the Bench, examined the Act’s provisions to conclude that it contained no such limitation. The royalty envisaged by the 1957 Act was held to be not a tax at all. The Union was hoping that once royalty was accepted as a tax, it would wholly occupy the field and thus remove the States’ scope for taxing mineral rights. However, the Court chose to see royalty as a contractual consideration for enjoyment of mineral rights. Also, it ruled that States could tax mineral-bearing lands under Entry 49, a general power to tax lands.
Proponents of fiscal federalism and autonomy will particularly welcome the fact that the judgment opens up a significant new taxation avenue for the States, and the observation that any dilution of the taxation powers of the States would adversely affect their ability to deliver welfare schemes and services to the people. However, Justice B. V. Nagarathna, in her dissent, argues that if the Court did not recognise the central law as a limitation on the State’s taxation powers, it would have undesirable consequences as States would enter into an unhealthy competition to derive additional revenue, resulting in an uneven and uncoordinated spike in the cost of minerals; and purchasers of minerals paying too much, leading to an increase in the price of industrial products. Further, the national market may be exploited for arbitrage. Given these implications, it is possible that the Centre may seek to amend the law to impose explicit limitations on the States’ taxation power or even prohibit them from imposing a tax on mineral rights. However, such a move may result in mining activities being left wholly out of the tax net, as the majority has also held that Parliament lacks the legislative competence to tax mineral rights.
Date: 27-07-24
A new push in the Bay of BengalThe intent of BIMSTEC member states to push forth with a bold vision for the region was evident at the 2nd Foreign Ministers’ RetreatHarsh V. Pant,[ Professor at King’s College London and is Vice President for Studies and Foreign Policy at Observer Research Foundation, New Delhi ]
India hosted the 2nd BIMSTEC (Bay of Bengal Initiative for Multi-Sectoral Technical and Economic Cooperation) Foreign Ministers’ Retreat in New Delhi earlier this month with a focus on providing an “informal platform to discuss ways and means of cooperating and accelerating action in security, connectivity, trade, and investment within the Bay of Bengal.” The retreat was held in preparation for the sixth summit meeting, scheduled for September, in which the BIMSTEC leaders will meet in person for the first time in the post-pandemic era. They are also expected to sign the BIMSTEC Agreement on Maritime Transport Cooperation to improve regional connectivity — a foundational aim of this grouping.
Strengthening ties with eastern neighbours
BIMSTEC is the regional organisation devoted to the Bay of Bengal, with a membership of five South Asian and two Southeast Asian countries, cooperating across seven diverse sectors. It allows New Delhi to engage multilaterally with the other countries of the Bay of Bengal region, which are its eastern neighbours and therefore vital for its economic development, security, and foreign policy imperatives. India also remains intent on solidifying relations with its eastern neighbours as China’s growing presence in the Bay of Bengal poses a potential threat to regional stability and New Delhi’s position as a preferred security partner in these waters.
Strengthening ties with Bangladesh and Myanmar accords India the advantage of providing its landlocked north-eastern region with access to the sea. Improved ties with Myanmar and Thailand will also lend India the opportunity to have a more profound presence in the Indo-Pacific, as it holds the ASEAN (Association of South East Asian Nations), in which these two countries are members, to be of central importance in its vision of the Indo-Pacific. Thailand reinforced this idea at the retreat by identifying itself as a bridge between BIMSTEC and ASEAN. These priorities were reflected in the opening address by the Minister for External Affairs, S. Jaishankar, when he stated that BIMSTEC represents the intersection of India’s ‘Neighbourhood First’ outlook, the ‘Act East Policy’, and the SAGAR (Security And Growth for All in the Region) vision.
Two parts of the retreat
The retreat was divided into two parts. In the first segment, participants assessed the current state of regional cooperation within BIMSTEC, building on a presentation by India on the implementation of key outcomes of the 1st Retreat. Multiple ideas were shared by the member states including the establishment of Centers of Excellence in member states, focusing on Agriculture, Disaster Management, and Maritime Transport. India announced support for cancer research, treatment, and issuance of e-visas for patients of all BIMSTEC states, while Sri Lanka proposed the inclusion of kidney disease. The need for involving the private sector in trade and promoting young entrepreneurs was also highlighted, as was the importance of connectivity, cyber-security, and countering the trafficking of narcotics and illegal arms.
In the second session, the expectations of each country from the forthcoming summit were discussed. Sri Lanka underscored the need to map mineral resources found in abundance in the BIMSTEC countries and create opportunities for the vertical integration of stages of production within specific sectors in the economies of the countries, enabling them to diversify their production structure. Bangladesh highlighted the need for cooperation in the Blue Economy and urged member states to ban fishing during the breeding season to address the problem of depleting catch in the Bay. Bhutan expounded on the need for collaboration in tourism and cultural exchanges, while Nepal highlighted its ‘whole of the region’ approach to leverage synergies among member states and transform BIMSTEC into a results-oriented regional forum. Thailand underscored the need for cooperation in non-traditional security domains, and Myanmar added the need to combat online scamming to the list. These proposals will be presented to the heads of state before the September summit.
Bilateral merits
While the retreat was a multilateral milestone for India, it had its bilateral merits too. Mr. Jaishankar met several of his counterparts on the sidelines. He shared with Myanmar India’s concerns over the flow of displaced persons, narcotics, and arms across the border and urged for the return of unlawfully detained Indians. He also held a meeting with the Bangladesh Foreign Minister, who requested him to ensure the smooth supply of daily essentials and send a technical team for the Teesta project, signifying another step towards easing this long-pending concern. At the end of the retreat, the Foreign Ministers called on Prime Minister Narendra Modi.
This year marks a decade of India’s Act East and Neighbourhood First policies, and the thrust on BIMSTEC is a manifestation of New Delhi’s efforts to continue nurturing collaborative growth for national and regional well-being. Thus, Mr. Jaishankar encouraged future collaborations through new energies, resources, and a renewed commitment to cooperation.
It remains to be seen how many of these proposals find culmination at the forthcoming Summit but the intent of the member states to push forth with a bold vision for the region was clearly evident at the retreat.
Date: 27-07-24
क्या नागरिक अधिकार सर्वोच्च होने चाहिए?संपादकीय
सुप्रीम कोर्ट तय करेगा कि राज्यपाल के खिलाफ आपराधिक जांच प्रक्रिया से पदभारपर्यंत मुक्ति की सीमा क्या है। क्या उनके आपराधिक कृत्य की जांच को तब तक रोका जाना, जब तक वह पद मुक्त न हों, आरोपी को सही न्याय दिला पाएगा? पश्चिम बंगाल के राज्यपाल पर शोषण का आरोप लगाते हुए एक महिला ने एफआईआर कराई है। याचिका में कोर्ट से पूछा गया क्या किसी महिला के साथ छल व दबाव से शारीरिक शोषण भी दायित्व निर्वहन में आता है? संविधान का अनुच्छेद 361 (2) राष्ट्रपति और राज्यपालों को किसी भी किस्म की अपराध प्रक्रिया से पदभारपर्यंत मुक्त करता है। अनुच्छेद 361 (1) कहता है राज्यपाल अपनी कार्य- शक्तियों और दायित्वों के निर्वहन के दौरान के कृत्य के लिए किसी भी कोर्ट में जवाबदेह नहीं होंगे। लेकिन अनुच्छेद 361 (4) किसी भी नागरिक को राहत प्राप्त करने के लिए राष्ट्रपति या राज्यपाल के खिलाफ सिविल प्रक्रिया शुरू करने की शर्तें बताता है। यानी नागरिक अधिकार को ऐसे मामलों में वरीयता दी गई है। सीजेआई की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने अटॉर्नी जनरल से केस में सहयोग देने और याचिकाकर्ता को सरकार को भी पार्टी बनाने को कहा है। संविधान निर्माताओं ने ‘महामहिम को संविधान के संरक्षक, अभिरक्षक और परिरक्षक के रूप में रखा था। लेकिन इन पर भी पक्षपातपूर्ण तरीके से काम करने के आरोप लगने लगे।
Date: 27-07-24
खानपान के आधार पर देश को बांटने की कोशिशें गलतराजदीप सरदेसाई, ( वरिष्ठ पत्रकार )
पिछले कई सालों से मैं ‘इलेक्शन ऑन माय प्लेट’ नामक एक टीवी शो कर रहा हूं, जो दर्शकों को चुनाव-अभियान के बारे में बताता है और खाने-पीने की चीजें उनका अतिरिक्त आकर्षण होती हैं। दरअसल, इस शो का ‘स्टार’ खाना ही है, क्योंकि दुनिया में ऐसा कोई देश नहीं है, जो भारत की खाद्य-विविधता की बराबरी कर सके। ऐसे में यूपी और उत्तराखंड पुलिस द्वारा कांवड़ यात्रा के दौरान भोजन की ‘पुलिसिंग’ का सहारा लेना भारतीय होने के मूल अर्थ पर ही प्रहार करना था।
आखिर भारत के अलावा और कहां ऐसा हो सकता है कि मदुरै के प्रतिष्ठित मीनाक्षीपुरम् मंदिर के पास अम्माज़ किचन नामक एक अद्भुत रेस्तरां आपको मिले, जो बेहतरीन चेट्टीनाड मांसाहारी भोजन परोसता हो? पुराने जयपुर में एक मुस्लिम परिवार द्वारा पीढ़ियों से चलाया जा रहा तीन मंजिला रेस्तरां आपको और कहां मिलेगा, जो स्वादिष्ट मुगलई भोजन परोसता हो और जो एक ‘शुद्ध’ शाकाहारी भोजनालय के ठीक बगल में स्थित हो? पुणे-सोलापुर राजमार्ग पर आपको जय तुलजा भवानी नामक एक ढाबा और कहां मिलेगा, जहां स्वादिष्ट मटन पकता हो? और भारत के अलावा आपको विजयवाड़ा के केंद्र में एक ऐसी फूड स्ट्रीट और कहां मिलेगी, जहां आधा दर्जन प्रकार की आंध्र बिरयानी इडली-डोसे के साथ ही बेची जाती हो?
शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व हमेशा से इस देश की भोजन-कला का सूत्र रहा है। यहां किसी रेस्तरां का मूल्यांकन उसके मालिक के नाम नहीं बल्कि खाने की गुणवत्ता से होता है। ऐसे में यूपी सरकार द्वारा पुलिस को यह ‘निर्देश’ देना कि वह सुनिश्चित करे कि हर स्ट्रीट वेंडर या सड़क किनारे के रेस्तरां पर मालिक के नाम की तख्ती लगी हो, जानबूझकर समाज में विभाजन के बीज बोना था। सरकार का यह दावा अनुचित था कि यह आदेश केवल यह सुनिश्चित करने के लिए था कि यात्रा मार्ग पर कानून-व्यवस्था की कोई गड़बड़ी न हो। पिछले कुछ वर्षों में यात्रियों की खान-पान की आदतों को लेकर कांवड़ यात्रा में कोई विवाद होने का शायद ही कोई सबूत मिला हो। उलटे, सरकार की भेदभावपूर्ण फूड-राजनीति परेशानी का सबब बन सकती थी।
नेम-प्लेट लगाने का आदेश वास्तव में सामाजिक अलगाव को दर्शाने वाला था, जो यात्रा मार्ग पर आने वाले लोगों को मुस्लिम स्वामित्व वाले प्रतिष्ठानों के साथ किसी भी तरह के संपर्क से बचने के लिए प्रोत्साहित करता था। भला ज्यादा से ज्यादा ग्राहकों को अपने यहां आकर्षित करने की इच्छा रखने वाला कौन-सा स्टॉल मालिक ऐसा होगा, जो कांवड़ यात्रियों को ऐसा खाना परोसेगा, जो उनकी धार्मिक मान्यताओं के खिलाफ हो? यहां पर इस्लामी नियमों के अनुरूप बनाए गए ‘हलाल’ प्रमाणित उत्पादों का हवाला देना भी गलत है। क्योंकि कोई भी किसी को भोजनालय के बोर्ड पर ‘शुद्ध’ शाकाहारी लिखने से नहीं रोकता है। लेकिन किसी विशेष आहार के अनुरूप भोजन को प्रचारित करना धर्म के आधार पर दुकान-मालिक को अलग-थलग करने की कोशिशों से बहुत अलग है।
मानो इतना ही काफी नहीं था तो मुस्लिम स्वामित्व वाली दुकानों को ‘अशुद्ध’ और ‘अस्वच्छ’ बताने वाला सोशल मीडिया अभियान भी चल पड़ा। यह एक सांप्रदायिक झूठ है। देश में स्वादिष्ट स्ट्रीट फूड की खोज करते हुए स्वच्छता अक्सर ही चिंता का विषय रहती है, लेकिन यह कभी समुदाय-विशिष्ट नहीं होती। भारतीय खाद्य सुरक्षा और मानक प्राधिकरण का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि खानपान की चीजों के गुणवत्ता-मानकों को बनाए रखा जाए; यह नहीं कि किसी खाने की जगह की स्वच्छता को उसके मालिक की धार्मिक पहचान से आंका जाए। कोरोना की पहली लहर के दौरान भी तबलीगी जमात के हवाले से यह दुष्प्रचार फैलाया गया था कि मुसलमान कोरोना फैलाते हैं। इसके परिणामस्वरूप कई मुस्लिम सब्जी-विक्रेताओं को बहिष्कार का सामना करना पड़ा था।
मालूम होता है कांवड़ यात्रा की ‘पवित्रता’ की बात करके योगी सरकार ने कोर-वोटरों के बीच अपनी हिंदुत्ववादी साख को फिर से मजबूत करना चाहा था। लेकिन बहुसंख्यक पहचान की राजनीति अब चुनावी सफलता का गारंटीकृत नुस्खा नहीं रह गई है। 2024 के चुनावों में, भाजपा को यूपी में दलित-मुस्लिम-यादव-ओबीसी वोटों के एकीकरण का सामना करना पड़ा था, क्योंकि पार्टी जमीन पर समावेशी-एजेंडे को आगे बढ़ाने में विफल रही थी। जातिगत विभाजक-रेखाएं भी फिर से उभर रही हैं। अगर आज मुस्लिम दुकानदारों की आजीविका दांव पर है, तो कौन कह सकता है कि कल दलित या निम्न ओबीसी समुदाय निशाने पर नहीं होंगे?
Date: 27-07-24
खनिज पर हकसंपादकीय
केंद्र और राज्यों के बीच करों के बंटवारे को लेकर कई बार विवाद उठ चुके हैं। केंद्रीय कर प्रणाली जीएसटी लागू होने के बाद भी कुछ चीजों पर करों और उपकरों के बंटवारे को लेकर सवाल उठते रहे हैं। खनिजों के स्वामित्व का प्रश्न भी उनमें एक है। केंद्र सरकार ने खनिजों पर कर और उपकर लगाना शुरू किया, तो कुछ कंपनियों और राज्य सरकारों ने इस पर सवाल उठाए। आखिरकार सर्वोच्च न्यायालय ने अब स्पष्ट कर दिया है खनिजों पर राज्य सरकारों का हक होता है। वे उनका पट्टा देने को स्वतंत्र हैं। इसके लिए किए गए करार की एवज में वे जो शुल्क प्राप्त करती हैं, उसे कर नहीं कहा जा सकता। वह रायल्टी की श्रेणी में आता है। रायल्टी को कर नहीं कहा जा सकता। इस फैसले से खासकर ओड़ीशा और झारखंड को बड़ी राहत मिली है। हालांकि करीब पैंतीस वर्ष पहले भी एक सीमेंट कंपनी ने सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष यह मामला उठाया था कि केंद्र सरकार उससे उपकर नहीं वसूल सकती। तब अदालत ने कहा था कि खनिजों पर कर लगाने का अधिकार केंद्र सरकार को है। मगर दूसरे मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने करीब बीस वर्ष पहले उस फैसले को पलटते हुए कहा कि पुराना फैसला छापे की गलती से भ्रामक हो गया था। केंद्र को खनिजों पर कर लगाने का अधिकार नहीं है।
अब नौ न्यायाधीशों की पीठ ने इस मामले पर बहुमत से फैसला दिया है कि खनिजों पर राज्य सरकारों का अधिकार है। दरअसल, यह मामला इसलिए उलझा हुआ था कि संविधान में केंद्र को खदानों के आबंटन से संबंधित सीमाएं तय करने का अधिकार केंद्र सरकार को दिया गया है। मगर जमीन, भवन आदि पर शुल्क लगाने का अधिकार राज्य सरकारों को है। इसलिए केंद्र सरकार खनिजों पर कर लगाने लगी थी। अब सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि खनिज राज्य सरकार की संपदा हैं, इसलिए वह उसके पट्टे की कीमत तय कर सकती है। अगर खनिजों पर भी केंद्र सरकार कर वसूलने लगेगी, तो राज्यों को अपनी विकास परियोजनाओं के लिए धन जुटाना मुश्किल हो जाएगा। इस फैसले के बाद राज्य सरकारें केंद्र द्वारा वसूला गया कर वापस दिलाने की गुहार लगा रही हैं। हालांकि इसका निपटारा किस प्रकार होगा, देखने की बात है।
राज्य सरकारों में अक्सर इस बात को लेकर असंतोष देखा जाता है कि केंद्र को जिस अनुपात में उनसे राजस्व प्राप्त होता है, उस अनुपात में उन्हें बजटीय आबंटन नहीं मिलता। जबसे जीएसटी लागू हुआ है, राज्यों में अपने हिस्से का राजस्व प्राप्त करने के लिए संघर्ष उभरता रहा है। इस तरह कई राज्यों में विकास परियोजनाएं ठहर जाती हैं। जाहिर है, सर्वोच्च न्यायालय के ताजा फैसले के बाद उन राज्यों को अपना राजस्व जुटाने में काफी मदद मिलेगी, जहां खनिज पदार्थों की बहुलता है। ओड़ीशा, मध्यप्रदेश, झारखंड आदि राज्यों में कोयला, सीमेंट, लौह अयस्क, पेट्रोलियम आदि पदार्थों की खदानें हैं, मगर वे उनका पूरा लाभ नहीं ले पातीं, क्योंकि उन पर अभी तक केंद्र सरकार भी अपना हक जताती आ रही थी। यह ठीक है कि राज्यों से प्राप्त राजस्व से ही केंद्र सरकार पूरे देश की विकास परियोजनाओं में संतुलन कायम करती है, मगर उनकी आय के निजी स्रोत नहीं होंगे, तो वे केंद्र के सामने हर वक्त याचक की मुद्रा में ही होंगी। इसलिए खनिज संपन्न राज्यों में कुछ बेहतरी की उम्मीद जगी है। मगर केंद्र को खनिजों के मनमाने दोहन पर नजर तो रखनी ही होगी।
Date: 27-07-24
खेती में मुनाफे की नई पहलअखिलेश आर्येंदु
एक बार फिर केंद्र सरकार किसानों की माली हालात सुधारने की पहल करती दिख रही है। सरकारी तौर पर कहा जा रहा है कि किसानों को किसानी के जरिए ही अब उद्यमी बनाया जाएगा, इससे किसानों की माली हालात में सुधार होगा। आमतौर पर भारतीय खेती को परंपरा से की जाने वाली देसी खेती माना जाता है। मगर यह महज मान्यता है, क्योंकि देसी खेती में रसायनों, रासायनिक उर्वरकों और विदेशी बीज का इस्तेमाल नहीं होता। नई तकनीक तथा वैज्ञानिक ढंग से की जाने वाली खेती में रसायनों और महंगे उर्वरकों का इस्तेमाल उत्पादन बढ़ाने के लिए किया जाता है। केंद्र सरकार की नई पहल आधुनिक खेती के जरिए किसानों को उद्यमी बनाने की है।
दुनिया में वैज्ञानिक तथा तकनीक पद्धति से खेती करना समझदारी और लाभकर समझा जाता है। इसी के जरिए केंद्र सरकार की नई पहल होगी, जिसमें किसानों को कृषि तकनीकों और वैज्ञानिक विधियों से परिचित कराना और उन्हें अधिक मुनाफा दिलाना है। इसके बाबत देश के हर जिले में ऐसी टीम बनाई जाएगी, जिसमें खेती से ताल्लुक रखने वाले सभी क्षेत्रों के लोग होंगे। केंद्र सरकार के जरिए मुहैया कराई गई सूचना या जानकारी के मुताबिक बनाई जाने वाली टीम में किसानों के अलावा कृषि वैज्ञानिक, कारखानों के विशेषज्ञ, कृषि विभाग और प्रशासन के अधिकारियों को शामिल किया जाना है। इसके अलावा, किसान उत्पादक संगठन (एफपीओ) कृषि सखी, ड्रोन दीदी और स्वयं सहायता समूह में बेहतर कार्य करने वाले किसानों और महिलाओं को भी इससे जोड़ने की बात कही गई है।
केंद्र सरकार की इस पहल में राज्य सरकार और भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आइसीएआर) के आधीन आने वाले सभी कृषि विज्ञान केंद्रों के वैज्ञानिक मिलकर काम करेंगे। फिलहाल देश में 731 कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) हैं। इन केंद्रों पर कार्यरत कृषि वैज्ञानिकों की मदद से किसानों को उद्यमी बनाने और फसलों को बर्बाद होने से बचाने का खाका तैयार किया जा रहा है। अगर केंद्र सरकार की यह योजना कारगर हुई, तो इससे उन करोड़ों किसानों को फायदा हो सकता है, जो खेती को घाटे का सौदा बताकर छोड़ चुके या बदहाली की जिंदगी गुजार रहे हैं।
अभी किसान अपने उत्पाद को औने-पौने दाम पर बेचने को मजबूर रहते हैं। इस पहल के मुताबिक हर जिले में टीम के गठन से पिछले आंकड़ों का अध्ययन कर फसल का जनपद में मांग और खपत का पता करना आसान हो सकता है। जानकारी के मुताबिक टीम के जरिए यह पता किया जाएगा कि आगामी सीजन में किस फसल की कितनी बुवाई करनी चाहिए और किस किस्म की फसल लेना बेहतर होगा। किसानों को अभी तक बाजार की जरूरत के बारे में कोई जानकारी नहीं मिल पाती थी। इस टीम के जरिए किसानों तक यह बात पहुंचाई जाएगी कि किस फसल को उगाने से फायदा होगा और किससे नुकसान। इतना ही नहीं, फसल तैयार होने के बाद जिले भर की खपत के बाद जो अन्न या उत्पाद बच जाएगा, उसमें से बढ़िया उत्पाद को निर्यात या बीज के रूप में इस्तेमाल के लिए सुनिश्चित किया जा सकेगा। ऐसे किसानों का चयन टीम करेगी, जो बेहतर उत्पाद और जलवायु परिवर्तन के अनुरूप खेती कर दूसरे किसानों के लिए नजीर बन सकते हैं।
केंद्र सरकार ने पिछले शासन के दौरान किसानों के लिए कई योजनाएं चलाई थीं, जिनमें पशुपालन, मधुमक्खी, मछली पालन, सुअर पालन जैसी व्यावसायिक योजनाएं शामिल हैं। गौरतलब है कि केंद्र सरकार और राज्य सरकारों की तमाम योजनाएं किसानों के लिए चलाई जा रही हैं, वे किसानों के लिए बहुत मुफीद नहीं हो पा रही हैं। उसकी पहली वजह पानी के कमी है। देश में सिंचाई की समस्या आज भी बहुत बड़ी है। जिन इलाकों में नहरों के जरिए सिंचाई होती है वहां खेती के समय नहर में पानी न आना बहुत बड़ी समस्या है। इसका सीधा असर फसल के उत्पादन पर पड़ता है। इसी तरह उत्तम किस्म के बीजों की अनुपलब्धता, मेड़बंदी और वर्षा जल का संरक्षण न होने की वजह से अपेक्षित परिणाम नहीं आ पाए।
तजुर्बेकारों का कहना है कि केंद्र सरकार अगर राज्य सरकारों के साथ मिलकर रासायनिक खेती मुक्त भारत का अभियान चलाए तो जलवायु परिवर्तन, बढ़ती बीमारियों, प्रदूषणों तथा अन्य समस्याओं से छुटकारा मिल सकता है। इसलिए किसानों को उद्यमी बनाने का बेहतर तरीका अपनाया जाना चाहिए। किसानों को जलवायु अनुकूल खेती, जिसे प्राकृतिक या जैविक खेती कहा जा रहा है, अपनाने के लिए प्रोत्साहित करने की जरूरत है। इससे उर्वरकों, बीजों और छिड़काव करने वाले यंत्रों पर दी जाने वाली अरबों रुपए की सबसिडी की बचत होगी और देश की सेहत सुधारने में मदद मिलेगी। इसके अलावा, गांवों की गरीबी दूर होगी, भुखमरी, कुपोषण, अशिक्षा, बेरोजगारी और पलायन जैसी समस्याओं से धीरे-धीरे छुटकारा मिलने लगेगा।
भारत उर्वरक उत्पादन में दुनिया के शीर्ष दस देशों में शामिल है। निर्यात के नजरिए से उर्वरकों का उत्पादन लगातार बढ़ाया जाना चाहिए, लेकिन भारतीय खेती के लिए यह घाटे का सौदा है। जाहिर तौर पर केंद्र सरकार के जरिए उर्वरकों पर छूट के बावजूद किसानों के लिए यह घाटे का सौदा है। इससे उपजाऊ जमीन और वायुमंडल पर जो विपरीत असर पड़ता है, उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। केंद्र सरकार की यह नई पहल तभी कारगर हो सकेगी जब फसल के लिए लागत कम से कम हो। बाजार को समझना और उसके अनुकूल फसल बोने को निश्चित करना ठीक है, लेकिन लागत में कमी करके किसानों का ज्यादा भला किया जा सकता है।
गौरतलब है कि वित्तवर्ष 2022-23 में 123 अरब भारतीय रुपए से अधिक मूल्य के उर्वरकों का आयात किया गया। केंद्र सरकार की नई पहल को कारगर बनाने के लिए जरूरी है कि गांवों से पलायन रोका जाए। जाहिर तौर पर पलायन रोकने में रासायनिक खेती कारगर नहीं रही है। इसलिए रासायनिक खेती की उपयोगिता और प्रासंगिकता पर भी गौर करने की जरूरत है। नाममात्र की लागत में अधिक उत्पादन और जलवायु परिवर्तन के असर को कम करने में प्राकृतिक खेती ही सबसे ज्यादा फायदेमंद और उपयोगी है, इस हकीकत को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
इस वक्त जो खेती की जा रही है उससे किसानों को फायदा नहीं मिलता और न यह सेहत के लिए ही मुफीद मानी जाती है। इसमें लागत बहुत ज्यादा और उत्पादन बहुत कम है। जरूरी है कि कम लागत में बेहतर उत्पाद देने वाली प्राकृतिक खेती को हर तरह से प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। जिस तरह कारखानों के घाटे की भरपाई सरकार करती है, इसी तरह किसानों की खेती में घाटा होने पर भरपाई की जानी चाहिए। एमएस स्वामीनाथन की न्यूनतम समर्थन मूल्य संबंधी सिफारशें हूबहू लागू होनी चाहिए। इससे देश का किसान ही खुशहाल नहीं होगा, बल्कि समाज से भी अनेक तरह की समस्याओं, दुश्वारियों और बीमारियों से छुटकारा मिल सकता है।
Date: 27-07-24
करों पर अधिकारसंपादकीय
खनिजों पर देय रॉयल्टी कोई कर नहीं है और संविधान के तहत राज्यों के पास खदानों और खनिजयुक्त भूमि पर कर लगाने का विधायी अधिकार है। सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र द्वारा खदानों और खनिजों पर लगाए गए हजारों करोड़ रुपये के करों की वसूली पर फैसला दिया। झारखंड और ओडिशा जैसे खनिज समृद्ध राज्यों ने इन करों की वापसी के लिए अदालत से आग्रह किया था। नौ न्यायाधीशों की खंडपीठ ने राज्यों से इस पर लिखित दलीलें मांगी हैं। 8:1 के बहुमत के फैसले में कहा कि खनिजों पर देय रॉयल्टी नहीं है। संविधान की दूसरी सूची की प्रविष्टि 50 के अंतर्गत संसद को खनिज अधिकारों पर कर लगाने की शक्ति नहीं है। पीठ ने माना कि खान एवं खनिज (विकास एवं विनियमन) अधिनियम, 1957 राज्यों को खदानों तथा खनिजों पर कर लगाने से प्रतिबंधित नहीं करता। 1989 के शीर्ष अदालत के फैसले में कहा गया था कि खनिजों पर रॉयल्टी कर है। उसमें रॉयल्टी को वह भुगतान बताया गया था जो उपयोगकर्ता पक्ष बौद्धिक संपदा या अचल संपत्ति परिसंपत्ति के मालिक को देता है। ये राज्य हजारों करोड़ की वसूली पिछली तारीख से आदलत के मार्फत करवाना चाहते हैं। सामाजिक व्यवस्था में राज्य यथासंभव सामाजिक, आर्थिक, विकास संबंधी, सुरक्षा, कानून-व्यवस्था, आरोग्यता, शिक्षा जैसे साधन मुहैया कराता है। राज्य सरकारें सभी व्ययों तथा कर निर्धारण की जिम्मेदारी निभाती हैं। राज्यों और केंद्र के दरम्यान कई बार खींचतान की स्थिति उत्पन्न होती रहती है। खासकर जिन राज्यों में विपक्षी दलों की सरकार होती हैं, उन्हें केंद्र की नीतियों या आर्थिक मदद को लेकर सहयोगपूर्ण रवैया न रखने जैसी शिकायतें आम हैं। निःसंदेह केंद्र संविधान के तहत कानून बनाता है और राष्ट्रीय स्तर की नीतियों के विकास और कार्यान्वयन का जिम्मा उसी का होता है परंतु राज्यों के अधिकारों की पूरी तरह अनदेखी नहीं कर सकता। ओडिशा और झारखंड प्रमुख खनिज उत्पादक राज्य हैं, जिनकी आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं रही। इसलिए अदालत का यह फैसला उनके विकास में महत्त्वपूर्ण साबित हो सकता है।
Date: 27-07-24
बजट में अनेक खोट और अधूरी कोशिशेंसुप्रिया श्रीनेत, ( सोशल मीडिया व डिजिटल प्रमुख, कांग्रेस )
बजट 2024-25 पर लोकसभा चुनाव परिणाम की स्पष्ट छाप है। जहां मोदी सरकार ने अपनी कुर्सी और गठबंधन बचाने के लिए सिर्फ दो राज्यों को लुभाने की कोशिश की, वहीं 10 साल बाद पहली बार नौकरी की बात प्रमुखता से की गई है। बजट भाषण में आठ बार जॉब (नौकरी), 32 बार एम्प्लॉयमेंट (रोजगार) शब्द बोला गया। केंद्र सरकार ने बेरोजगार युवाओं का आक्रोश समझकर उन्हें अपने पाले में करने की कोशिश की है, मगर इस कोशिश में भी खोट है।
असलियत यह है कि जिस देश में 60 प्रतिशत आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है, वहां प्रधानमंत्री बेरोजगारी की महामारी को स्वीकारना ही नहीं चाहते हैं। बजट से दो दिन पहले तक प्रधानमंत्री कह रहे थे कि हमने आठ करोड़ नौकरियां दे दीं। ये नौकरियां किसको, कहां, कब और कैसे दी गईं, इसका कोई विवरण तो है नहीं। यही नहीं, सरकार रोजगार सृजन को लेकर कितनी गंभीर है, इसका प्रमाण बार-बार पीएलएफएस के आंकड़े से बेरोजगारी कम सिद्ध करने की विफल कोशिश से भी मिलता है। 9.2 प्रतिशत बेरोजगारी दर को 3.2 प्रतिशत सिद्ध करने से अपने मन को तो बहलाया जा सकता है, पर समस्या का समाधान नहीं हो सकता।
वित्त मंत्री ने कांग्रेस की ‘पहली नौकरी पक्की’ स्कीम को कॉपी पेस्ट करने का अधूरा प्रयास तो किया, मगर स्कीम को 5,000 रुपये प्रति महीना, 500 टॉप कंपनियों और एक करोड़ लोगों तक सीमित रखा। बजट में युवाओं को लेकर घोषणा की गई कि सरकार पहली बार नौकरी करने वाले लोगों का एक महीने का वेतन देगी, पर यह सुविधा सिर्फ नए कर्मचारियों के लिए है। विशेषज्ञों का मानना है कि कंपनियों को ईपीएफओ योगदान के लिए 2 साल तक प्रतिमाह 3,000 रुपये मिलने वाली रकम से युवाओं को प्रत्यक्ष कोई फायदा नहीं होगा। इन योजनाओं में व्यापक सोच की कमी है। टुकड़ों में किए गए फैसलों से रोजगार सृजन नहीं होगा।
आखिर रोजगार का चक्र टूटा क्यों और उसे दोबारा पटरी पर कैसे लाया जा सकता है? 8.2 प्रतिशत जीडीपी वृद्धि की दर में अगर उपभोग वृद्धि मात्र चार प्रतिशत के पास है, कृषि वृद्धि 1.4 प्रतिशत है और मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर शिथिल रहेगा, तो नौकरियां कहां से बनेंगी? जब उपभोग और मांग बढ़ेगी, तभी उत्पादन व निवेश बढ़ेगा, जिसके बाद ही रोजगार सृजन होगा। सरकार को हवा-हवाई दावों के बजाय सबसे पहले खपत बढ़ानी होगी।
इस बार अपनी सरकार बचाने के लिए सरकार ने बजट को आंध्र प्रदेश और बिहार पर केंद्रित कर दिया। बिहार को करीब 60 हजार करोड़ और आंध्र प्रदेश को 15 हजार करोड़ रुपये दिए गए हैं। सहकारी संघवाद का राग अलापने वालों ने देश के बड़े राज्यों, जैसे उत्तर प्रदेश, राजस्थान, मध्य प्रदेश, कर्नाटक, पश्चिम बंगाल के लिए इस बजट में कुछ भी खास नहीं दिया है। क्या इन राज्यों की देखभाल की जिम्मेदारी केंद्र सरकार की नहीं है? हिमाचल प्रदेश के आपदाग्रस्त लोगों को ऋण के अतिरिक्त क्या और सहायता मिलेगी इस केंद्रीय बजट से?
कृषि का बजट कुल बजट के अनुपात में घटाकर 3.15 प्रतिशत कर दिया गया है। शिक्षा पर खर्च कम किया जा रहा है। सरकार ने कोरोना जैसी महामारी से भी कुछ नहीं सीखा। स्वास्थ्य बजट लगातार घटाया जा रहा है। रक्षा बजट जो पूरे बजट का पिछले साल 9.6 प्रतिशत था, उसे इस साल 9.4 प्रतिशत कर दिया गया है। देश में आए दिन हो रहे रेल हादसों के बावजूद बजट में रेलवे की सुरक्षा और कवच का कोई जिक्र नहीं है।
कुल मिलाकर, इस कुर्सी बचाओ बजट से युवा, किसान, मध्यम वर्ग की अपेक्षाओं पर पानी फेरने का ही काम हुआ है। खोखले दावों से रोजगार नहीं पैदा होगा, इसे समझने के लिए बेरोजगारी की समस्या को स्वीकारना होगा, पर सरकार ऐसा करने के मूड में नहीं है।
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27 July 2024
प्रश्न – 471 – निम्न में अंतर स्पष्ट कीजिए :
Question – 471 – Differentiate between the following:
नोट : इसका उत्तर आपको हमें नहीं भेजना है, यह आपके स्वयं के अभ्यास के लिए है।
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Date: 26-07-24
Yours, Mines, OursSC right to rule states can tax minerals. But states should be sensible while imposing the taxTOI Editorials
The SC constitution bench’s judgment (8-1) on the dispute between states and Centre regarding the former’s right to levy tax on minerals should settle the long-festering issue. It’s also indicative of the glacial pace of judicial processes in India. The ruling came 13 years after the matter was referred to a 9-judge bench. By holding that states have the right to levy such taxes, SC has made clear the remit of MMDR Act, 1957. The verdict also removes confusion arising out of differing conclusions reached by SC in India Cements (1989) and Kesoram Industries (2004) judgments.
Legal position’s clear | Two points of law stand settled post this verdict. One, ‘royalty’ is not tax, contrary to what GOI argued. As against a tax which is imposed for public purposes, a royalty is a contractual payment governed by a lease agreement between parties, SC said. Two, there is nothing in MMDR Act that prevents states from levying taxes on mineral rights. This view went against govt’s contention that MMDR was enough to limit states’ powers on taxing mineral rights.
The federal issue | Underlying the case was the deeper federal question and the issue of how much authority the Centre has in the name of ‘national’ welfare. Different regions in India are blessed with different resources. It is understandable that mineral-rich states, of which many, like Jharkhand and Chhattisgarh, are poor, will want tax revenues from mining activity. Don’t coastal states gain from sea-based activities and hilly states enjoy the benefits of tourism? Besides, as CJI pointed out, states already have limited room when it comes to taxation, with most of the rights residing with the Centre. Would it be a good idea to dilute states’ authority further?
Compensate non-mineral states | It is not that GOI’s concern regarding states with no or little minerals is without basis. If an additional taxation power for mineral-rich states skews the scale against those without such natural resources, there are ways the Centre can compensate the latter, perhaps via deliberations in Centre-state forums. Just as poorer states get extra central funds, mineral-poor states can get something extra. Mining industry is worried that a new tax will increase costs. But if states keep the tax at sensible levels, the burden should be bearable. Mineral-rich states should remind themselves of the proverb on the goose that lays golden eggs. They shouldn’t kill the goose.
Date: 26-07-24
Slowly Killing A LawMP govt’s reply on cheetah project shows how RTI is endangered. No one seems interested in conservationTOI Editorials
The extent to which India’s transparency law has been robbed of vitality is evident in MP govt’s recent refusal to provide info on Project Cheetah on an RTI application. It cited an exemption clause – that providing such info would “prejudicially affect sovereignty and integrity of India…relations with foreign state…” This is, frankly, absurd. And it exemplifies the breakdown of what was conceived as a far-reaching law. RTI has been turned and twisted bit by bit over the years. Parliament passed its last tweak exactly 5 years ago, on July 25, 2019 – nixing fixed terms for commissioners and their salaries, Centre arrogated to itself the right to decide both.
The measure of a transparency law is not only in its exposure of corruption – Adarsh to Vyapam – or social audits of govt schemes. It’s as much in the ways govts, bureaucracy, and even courts systemically stifled it. Even before the law’s passage, the appointment panel for info commissioners was altered to replace CJI with a govt minister, alongside PM and LoP. Near-defunct state commissions, vacancies, case pile-ups, high rejection rates, the murder of 100+ RTI activists, a slew of exemptions for public agencies and even judges, narrowed the law’s scope. Like in Nov last, CERT-In was exempted from RTI, freeing in part the keeper of all online info, breaches and surveillance – from accountability. Last year, RTI was permanently hobbled when the new data protection law blanket-barred personal info from being shared. The idea of privacy was inexplicably expanded to deny info – how is privacy an issue when it concerns data about a public official on public duty using public money? Norms were changed at will – like Railways tightening its RTI rules days after it provided info on a project that wasn’t quite under its area of responsibility. In effect, 20 years on, RTI is a shadow of what it could be. Even Kuno’s cheetahs would agree.
Date: 26-07-24
Is Inequality In India Really The Great Monster?A closer look reveals India is no different from other countries at similar income levels. Plus, equity valuation of billionaires is an irrational measure of wealth concentrationSomnath Mukherjee, [ The writer is CIO of an asset and wealth management firm ]
Inequality is an emotive issue. It’s spawned at least one history-changing revolution – the Russian Revolution. Most holy scriptures across religions frown upon it, prescribing various ameliorative actions for followers of the faith. The modern welfare state is the political-economy reaction to dampening extreme inequalities. The recent Union budget reflected the response most illustratively. Wide-ranging changes in the capital gains tax regime, most notably in financial assets and real estate, were primarily predicated on the inequality variable.
Is India’s economic inequality increasing? | The answer is yes, if one goes by conventional wisdom, buffeted by star-studded western commentary. Thomas Piketty, via the widely quoted World Inequality Report, has claimed the gap between rich and poor in India today is worse than what it was under British Raj. Meanwhile, the recent official Household Consumption Expenditure Survey claims a decline in consumption inequality between 2011 and 2023 across both rural and urban India. But the consensus view remains firmly around a rise in egregious inequalities.
Undoubtedly, India’s wealth concentration has increased. But so has China’s, and at a rate faster than India’s. Brazil is higher than both India and China. One causal linkage that can perhaps be inferred is the stage of development – lower and middle-income countries have higher structural inequalities than legacy rich countries. Perhaps it’s the price to pay for growth. Even accounting for the same, India’s wealth concentration is seemingly high by Asian standards. Could the reason lie elsewhere, in India’s financial markets?
Who’s the villain? | India’s financial markets are an outlier. In terms of efficiency, sophistication and global interest it compares with the most developed countries. Bangladesh, Brazil or arguably even China don’t have markets architecture on a par with India. That has two repercussions. One, it enables India’s entrepreneurs to monetise assets efficiently. Two, India’s growth profile prices Indian assets at a significant premium to most other Emerging Markets.
Look at the wealth profile of Indian billionaires. As per Forbes, Mukesh Ambani had a wealth of $116bn as of March 8, 2024. On the same day, the market cap of Reliance Industries Limited (RIL) was around ₹19.5L cr, or $232bn. Mukesh Ambani and his family own around 50% of RIL. Ergo, just his stake in the company is worth what Forbes assesses his wealth to be. The same would be seen for most listed in the Forbes list of billionaires. Is paper wealth of promoters a function of structural wealth inequality or merely a function of premium pricing of Indian assets?
Will the largest companies in Bangladesh get valuations in line with India? On current evidence, even Chinese companies don’t. In recent times, there have been several instances of start-up founders becoming millionaires, sometimes billionaires, overnight, thanks to high valuations afforded to their companies. Many of them have suffered significant markdowns in valuations post the heady days of 2021. Some have been catastrophically shut. Ergo, promoter equity valuation is an imperfect, sometimes rather irrational, measure of wealth, given how un-monetisable and ephemeral it can be. Bulk of the Piketty-ian outrage on inequality though, hangs its coat on the hangar of this single variable.
Theatre of the absurd | Real estate values can expand quite quickly and quite a bit. Someone living in a modest family apartment in, say, Parel, in central Mumbai, is today likely worth a few crores – technically a millionaire, on paper. Should he be taxed for what is certainly a significant generational accretion to his wealth? Can he even fund the tax liability without having to sell the property?
Narrow tax base | There are too few taxpayers in the country – a hypothesis often trotted out as some sort of a structural bug. Ironically, the solution cases rolled out to counter that bug typically end up hitting that same small cohort of taxpayers. Fact is, at less than $3,000 per capita income, India’s tax/GDP ratio, at 17-18%, is quite on a par with global averages at similar income levels. China, with 4 times India’s per capita income, has a similar tax/GDP ratio. While there might be some extreme anomalies – farm income is an obvious one – but by and large, Indians pay enough tax. Affluent Indians, as they should, pay enough tax as well. Peak tax rates in India are at the top end of Asian levels and very near Western levels.
Killing the golden goose | India is not a country blessed with surplus natural resources. Its primary source of development has been, and likely will be, via creating and retaining elite talent that generates value. The inequality debate, in that context, is a distraction.
The solution to inequality will have to be greater prosperity. As income levels rise, tax base, in numbers and value, will rise too, enabling govts to spend more on generating greater prosperity for all Indians.
Date: 26-07-24
यूपीएससी अपनी चयन प्रक्रिया को पुख्ता बनाएसंपादकीय
पूजा खेडकर प्रकरण आजाद भारत में शायद पहला केस है, जिसमें नौकरशाही के सर्वोच्च पदों पर चयन करने वाली संवैधानिक संस्था यूपीएससी के दोष पता चले। इस ट्रेनी पर कई फर्जीवाड़े के आरोप हैं, जिनकी पोल किसी बाहरी संस्था या आयोग की सतर्कता से नहीं बल्कि स्वयं अधिकारी के असामान्य आचरण से खुली। लेकिन इससे यह मान्यता भी शक के दायरे में है कि यूपीएससी में पिछले 70 वर्षों में सब कुछ सही रहा है । सवाल यह है कि और कितने ऐसे अधिकारी कब से बड़े पदों पर काम कर रहे होंगे? जो फर्जी दस्तावेज बनाकर सबसे शक्तिशाली नौकरी पाता होगा, वह क्या संवैधानिक – प्रशासनिक मूल्यों के मार्ग पर चलकर समाज की सेवा कर पाएगा या भ्रष्टाचार में डूबकर समाज को अतुलनीय कष्ट में डालता होगा? नेताओं का टेस्ट तो हर पांच साल बाद जनता लेती है। लेकिन स्थाई कार्यपालिका पर इसलिए भरोसा होता है क्योंकि इन्हें एक कठिन चयन प्रक्रिया से गुजारा जाता है और अनुच्छेद 311 के तहत इन्हें संविधान निर्माताओं ने सेवा- सुरक्षा का कवच दे रखा है। इस प्रकरण के बाद अब आधार कार्ड की प्रक्रिया को भी त्रुटि शून्य बनाने की जरूरत है। साथ ही हर जिले में डीएम की देखरेख में डॉक्टर्स की समिति हो जो दिव्यांगता का प्रमाण पत्र दे और यूपीएससी के डॉक्टर्स की टीम प्री और मिड एग्जाम में औचक सत्यापन करे।
Date: 26-07-24
नौकरियां देने की जिम्मेदारी अकेले निजी क्षेत्र की नहींअभय कुमार दुबे, ( अम्बेडकर विवि, दिल्ली में प्रोफेसर )
वित्त मंत्री जब नई सरकार का पहला बजट बनाने चली थीं, तो उन्हें पता था कि अर्थव्यवस्था के वे कौन-कौन से रोग हैं, जिनका इलाज करना जरूरी हो गया है। इससे एक दिन पहले जारी किया गया आर्थिक सर्वेक्षण इस बात का सबूत है कि रोगों की सूची में सबसे ऊपर बेरोजगारी का नाम था। आने वाले कई वर्षों तक सरकार को हर साल कम से कम 77 लाख नौकरियां देनी हैं। दूसरे नंबर पर निजी क्षेत्र का रवैया था। सर्वेक्षण में साफ कहा गया था कि निजी क्षेत्र अपने मुनाफे में आए जबर्दस्त उछाल (30%) के बावजूद नए रोजगारों का सृजन नहीं कर पा रहा है। न ही वह अर्थव्यवस्था में नए निवेश की जिम्मेदारी निभाने को तैयार है। उसकी इस दोहरी अक्षमता के कारण कई साल से सरकार ही नया निवेश करती रही है, और सरकार को ही बेरोजगारी की समस्या का समाधान न कर पाने की तोहमत का सामना करना पड़ रहा है।
कुछ रोग ऐसे भी हैं, जिनका आर्थिक सर्वेक्षण में जिक्र नहीं था। अर्थव्यवस्था पर निगाह रखने वाला हर व्यक्ति जानता है कि भारत का असंगठित क्षेत्र 2016 की नोटबंदी के बाद से हर वर्ष 5% की रफ्तार से गिर रहा है। इस क्षेत्र का महत्व निजी और सरकारी उद्यमों के तहत चलने वाले संगठित क्षेत्र (उद्योग, कृषि और सेवा) से भी ज्यादा समझा जाता है। आखिर इसमें देश की श्रम शक्ति का 94% हिस्सा सक्रिय रहता है। बेरोजगारी बढ़ने में इसकी प्रमुख भूमिका है। साथ ही लम्बे अरसे से हमारा बाजार मांग के ‘एनीमिया’ का शिकार है। ‘हाई एंड’ चीजें बिक रही हैं। छोटे-मझोले स्तर के बिना बिके उत्पादों से वेयरहाउस भरे पड़े हैं। आर्थिक सर्वेक्षण ने यह भी नहीं माना था कि स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र को पर्याप्त निवेश का पौष्टिक आहार आजादी के बाद से शायद ही कभी मिला हो। इन सभी रोगों को मिला लें तो एक आंकड़ा सामने आता है। भारत प्रति व्यक्ति आमदनी के मामले में दुनिया में 142वें नंबर पर है। यह हमारी अर्थव्यवस्था की अरसे से अनसुलझी समस्याओं का परिणाम है।
जाहिर है कि एक बजट में ऐसे सभी रोगों का इलाज सम्भव नहीं हो सकता। लेकिन यह तो हो ही सकता था कि समस्याओं को स्वीकार करके कुछ दूरगामी इलाज प्रस्तावित किया जाता। बजट में सरकार बेरोजगारी से निपटने के लिए जद्दोजहद करती दिखती है। सरकार पहली बार निजी क्षेत्र को उसकी जिम्मेदारियां याद दिलाते हुए भी दिखती है। लेकिन क्या इसे ठोस रूप से करने का पर्याय माना जा सकता है? सरकार ने नौकरियां देने की जिम्मेदारी निजी क्षेत्र को दे दी है। क्या पहली तनख्वाह की सब्सिडी, इंटर्नशिप की सब्सिडी और मुद्रा योजना में कर्ज की सीमा 10 से बढ़ाकर 20 लाख कर देने को ऊंट के मुंह में जीरा नहीं माना जाएगा? जब निजी क्षेत्र की फैक्ट्रियां 70-75 फीसदी क्षमता पर चलेंगी, तो वह नए कारखाने क्यों लगाएगा? नया निवेश क्यों करेगा? सब्सिडी का लाभ लेने के लिए नई नौकरियां कैसे देगा? जब मुद्रा योजना में स्वरोजगार के लिए ऋण उठाने का सामान्य औसत 50 हजार रुपए ही है, तो उसका शीर्ष ऋण यानी 20 लाख रुपए गिने-चुने व्यक्तियों के अलावा और कौन उठाएगा?
अर्थव्यवस्था के सारे अंग एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। जिन देशों में शिक्षा (केवल सवा लाख करोड़ की बढ़ोतरी) और स्वास्थ्य (सिर्फ 89,000 करोड़ की वृद्धि) पर खर्च नहीं किया जाता, उनके पास विकास के इंजिन को खींचने वाला स्वस्थ और शिक्षित नागरिक नहीं होता। हमारे 75% ग्रेजुएट ‘नौकरी देने लायक’ ही नहीं होते। वे ऊंची प्रौद्योगिकी वाली मैन्युफैक्चरिंग में लगाए जाने के काबिल नहीं होते। भारत की ज्यादातर आबादी निचले स्तर वाले कौशलों में ही खप सकती है।
वित्त मंत्री चाहतीं तो बजट में नई परम्परा डाल सकती थीं। निजी अस्पतालों-विश्वविद्यालयों पर भरोसा करने के बजाय स्वास्थ्य-शिक्षा के लिए आबंटन जमकर बढ़ाने का कदम उठाया जा सकता था। असंगठित क्षेत्र की समस्याओं को स्वीकार करके उसके आंकड़े जमा करके जीडीपी की वास्तविक तस्वीर सामने लाई जा सकती थी। कृषि के डिजिटलीकरण को बढ़ावा देने या कॉर्पोरेटीकरण करने के बजाय किसानों की आमदनी बढ़ाने के तरीके तलाशने के लिए उच्चाधिकार सम्पन्न कमीशन बनाया जा सकता था। मनरेगा को 86,000 करोड़ दिया गया है, लेकिन नीति आयोग के सुझाव पर अमल करते हुए ‘एक अर्बन मनरेगा’ की शुरुआत की जा सकती थी। बेरोजगारी एक टाइम बम है, जिसकी लगातार टिक-टिक किसी भी नेता की लोकप्रियता का क्षय कर सकती है। लोकसभा चुनाव के नतीजों से ज्यादा बड़ा इसका सबूत और क्या हो सकता है?
Date: 26-07-24
ग्रामीण विकास से आर्थिक विकासरंजना मिश्रा
भारत की आत्मा उसके गांवों में बसती है। सदियों से ग्रामीण क्षेत्रों ने हमारे देश की सांस्कृतिक विरासत, प्राकृतिक संपदा और कड़ी मेहनत करने वाले लोगों को पोषित किया है, लेकिन आज ग्रामीण भारत कई चुनौतियों का सामना कर रहा है। ग्रामीण गरीबी, ग्रामीण विकास में सबसे बड़ी बाधा है। ग्रामीण क्षेत्रों में आय, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच में असमानताएं हैं। सड़कों, बिजली, और सिंचाई जैसी बुनियादी सुविधाओं की कमी है। अपर्याप्त बुनियादी ढांचा, कम रोजगार के अवसर, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा तक सीमित पहुंच आदि कई समस्याएं ग्रामीण जीवन स्तर को प्रभावित करती हैं। रोजगार और बेहतर जीवन स्तर की तलाश में ग्रामीण युवा शहरों की ओर पलायन कर रहे हैं। इन चुनौतियों का समाधान करना और ग्रामीण भारत को समृद्ध बनाना एक महत्त्वपूर्ण कार्य है। यह केवल सरकार द्वारा नहीं किया जा सकता, बल्कि ग्रामीण समुदायों, गैर-सरकारी संगठनों और निजी क्षेत्र को भी मिलकर इसके लिए प्रयास करने होंगे।
दरअसल, ग्रामीण विकास, ग्रामीण क्षेत्रों में जीवन स्तर को बेहतर बनाने की एक बहुआयामी प्रक्रिया है, जिसमें गांवों का आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक विकास शामिल है। आर्थिक विकास के अंतर्गत, रोजगार के अवसरों में वृद्धि, कृषि उत्पादकता में सुधार और ग्रामीण उद्यमों को बढ़ावा देना आदि प्रक्रियाएं शामिल हैं। सामाजिक विकास के अंतर्गत, शिक्षा, स्वास्थ्य, स्वच्छता और बुनियादी ढांचे तक पहुंच में सुधार करना और राजनीतिक विकास के अंतर्गत, ग्रामीण समुदायों को सशक्त बनाना तथा उन्हें निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल करना आदि है। ग्रामीण विकास दरअसल ग्रामीण गरीबी को कम करने और जीवन स्तर को बेहतर बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। ग्रामीण क्षेत्र, राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था में महत्त्वपूर्ण योगदान करते हैं। कृषि, ग्रामीण उद्योग और गैर-कृषि रोजगार देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में महत्त्वपूर्ण हिस्सा रखते हैं। ग्रामीण विकास, सभी के लिए समान अवसर सुनिश्चित करने और सामाजिक न्याय को बढ़ावा देने में मदद करता है।
ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करके, यानी कृषि, ग्रामीण उद्योग और गैर-कृषि रोजगार के अवसरों को बढ़ावा देकर, सामाजिक सेवाओं में सुधार करके यानी शिक्षा, स्वास्थ्य, और स्वच्छता जैसी बुनियादी सामाजिक सेवाओं तक पहुंच बना कर, बुनियादी ढांचे यानी ग्रामीण क्षेत्रों में सड़कों, बिजली और सिंचाई जैसी बुनियादी सुविधाओं का विकास करके, कौशल विकास के माध्यम से ग्रामीण युवाओं को सशक्त बनाकर तथा ग्रामीण विकास योजनाओं और कार्यक्रमों को बनाने और लागू करने में ग्रामीण समुदायों को शामिल करके, ग्रामीण विकास को गति देने के महत्त्वपूर्ण प्रयास किए जा सकते हैं। ग्रामीण विकास योजनाओं और कार्यक्रमों की सफलता के लिए स्थानीय समुदायों का सक्रिय योगदान महत्त्वपूर्ण है।
जब लोग योजनाओं को बनाने और लागू करने में भाग लेते हैं, तो वे उनमें अधिक स्वामित्व की भावना रखते हैं, जिसके परिणामस्वरूप बेहतर कार्यान्वयन होता है। ग्रामीण समुदायों को निर्णय लेने की प्रक्रिया में शामिल करने से उनका सशक्तीकरण और सामाजिक पूंजी का निर्माण होता है। ग्रामीण समुदायों को योजनाओं और कार्यक्रमों का प्रबंधन करने के लिए आवश्यक कौशल और ज्ञान प्रदान करना चाहिए। गांव के लोगों को उपलब्ध योजनाओं और कार्यक्रमों के बारे में जागरूक करना आवश्यक है। सड़कें ग्रामीण विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं, क्योंकि वे बेहतर बाजार तक पहुंच प्रदान करती हैं, जिससे किसानों और व्यवसायों को अपनी उपज और उत्पादों को बेचने में आसानी होती है। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था में वृद्धि होती और रोजगार के अवसर पैदा होते हैं। कृषि गतिविधियों, लघु उद्योगों और घरेलू उपयोग को बढ़ावा मिले, इसके लिए निर्बाध बिजली आपूर्ति स्थापित करनी होगी। कृषि उत्पादकता और किसानों की आय में वृद्धि हो, इसके लिए स्वच्छ पेयजल और सिंचाई के लिए पर्याप्त पानी की उपलब्धता सुनिश्चित करनी होगी। शिक्षा, स्वास्थ्य सेवा और व्यापार के अवसरों तक पहुंच में सुधार करने के लिए, ‘ब्राडबैंड इंटरनेट कनेक्टिविटी’ प्रदान करना आवश्यक है। उपज के भंडारण के लिए बेहतर सुविधाएं प्रदान की जाएं, जिससे फसल नुकसान को कम करने और किसानों को बेहतर मूल्य प्राप्त करने में मदद मिले।
युवाओं को आवश्यक कौशल प्रदान करने के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम आयोजित किए जाने चाहिए, जिससे उन्हें बेहतर आजीविका के अवसर प्राप्त हो सकें। युवाओं के बेहतर भविष्य के लिए प्राथमिक, माध्यमिक और उच्च शिक्षा सहित गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक पहुंच सुनिश्चित करना जरूरी है। ग्रामीण क्षेत्रों में प्राथमिक चिकित्सा सुविधाओं का विकास भी आवश्यक है, ताकि लोगों को बेहतर स्वास्थ्य और जीवन स्तर प्राप्त हो सके। ग्रामीण पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए, ग्रामीण क्षेत्रों की प्राकृतिक सुंदरता और सांस्कृतिक विरासत को उजागर करने की पहल की जानी चाहिए। स्थानीय कारीगरों और कलाकारों को बढ़ावा दिया जाए, जिससे उन्हें अपनी कला और शिल्प बेचने के अवसर मिल सके।
वनों की कटाई रोकने और वनीकरण कार्यक्रमों के माध्यम से वन क्षेत्रों का विस्तार करने के लिए कदम उठाए जाने चाहिए। जल प्रदूषण को रोकने के लिए कड़े उपाय करना तथा वर्षा जल संचयन और सूक्ष्म सिंचाई जैसी तकनीकों को बढ़ावा देकर पानी की कमी को दूर करना जरूरी है। ग्रामीणों को कंप्यूटर और इंटरनेट का उपयोग करने के लिए प्रशिक्षित करना भी जरूरी है, ताकि उन्हें आनलाइन सेवाओं और सूचना तक पहुंच प्रदान की जा सके। गांवों के विकास के लिए ग्रामीण महिलाओं का सशक्तीकरण और आत्मनिर्भर होना बहुत जरूरी है। ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार और आय के अवसरों को बढ़ाकर ग्रामीणों को पलायन करने से रोकना होगा।
ग्रामीण क्षेत्रों और वहां के लोगों की विशिष्ट आवश्यकताओं के अनुसार योजनाओं को तैयार और क्रियान्वित किया जाना चाहिए। प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा अनिवार्य बनाने और बेटियों को उच्च शिक्षा के लिए प्रोत्साहित करने के लिए नीतियां बनानी होंगी। महिलाओं को उनके अधिकारों, स्वास्थ्य, स्वच्छता और वित्तीय प्रबंधन के बारे में जागरूक बनाने के लिए कार्यक्रम आयोजित करने होंगे। लैंगिक समानता और महिला सशक्तीकरण पर जागरूकता अभियान चलाने तथा लैंगिक रूढ़ियों को तोड़ने और महिलाओं के प्रति सम्मान को बढ़ावा देने के लिए सामाजिक परिवर्तन लाने की आवश्यकता है। महिलाओं को लघु उद्योग, कृषि, पशुपालन और हस्तशिल्प जैसे क्षेत्रों में स्वरोजगार स्थापित करने के लिए ऋण, सबसिडी और प्रशिक्षण प्रदान करना चाहिए। महिलाओं के स्वामित्व वाले व्यवसायों को बढ़ावा देने के लिए, महिला उद्यमियों को बाजार तक पहुंच, क्रेडिट सुविधाओं और सरकारी अनुबंधों में प्राथमिकता प्रदान करनी होगी तथा महिलाओं को रोजगार के लिए आवश्यक कौशल प्रदान करने के लिए व्यावसायिक प्रशिक्षण केंद्रों की स्थापना करनी चाहिए। ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं को स्वच्छ जल और स्वच्छता सुविधाओं तक पहुंच प्रदान करना जरूरी है।
ग्रामीण महिलाओं के सामने आने वाली विशिष्ट चुनौतियों को दूर करने के लिए लक्षित नीतियां और कार्यक्रम विकसित करना आवश्यक है। भारत सरकार ग्रामीण क्षेत्रों और वहां के लोगों के जीवन स्तर को बेहतर बनाने के लिए अनेक योजनाएं चला रही है। इन योजनाओं का उद्देश्य ग्रामीण क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे में सुधार करना, रोजगार के अवसर पैदा करना, किसानों को सशक्त बनाना तथा गरीबी और असमानता को कम करना है, लेकिन अभी भी बहुत काम करना बाकी है।
Date: 26-07-24
अनावश्यक फैसलासंपादकीय
भारतीय राजनीति में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) किसी न किसी कारण से हमेशा चर्चा और विवादों के केंद्र में रहा है। अभी पिछले दिनों केंद्र सरकार ने सरकारी कर्मचारियों पर आरएसएस की गतिविधियों में हिस्सा लेने पर लगे करीब छह दशक पुराने प्रतिबंध को हटाने का फैसला लिया है जिसे बुद्धिमत्तापूर्ण नहीं कहा जा सकता। जाहिर है कि राजनीतिक क्षेत्रों में इस फैसले की कड़ी आलोचना हो रही है। आरोप लगाया जा रहा है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कर्मचारियों को वैचारिक आधार पर विभाजित करना चाहते हैं। वस्तुतः आरएसएस की चाहे जितनी आलोचना या निंदा की जाए लेकिन राष्ट्र के उत्थान में इस संगठन की सार्थक भूमिका को नजरंदाज नहीं किया जा सकता। ब्रिटिश सरकार में भी 1932 में सरकारी कर्मचारियों की आरएसएस की गतिविधियों में भाग लेने पर प्रतिबंध लगाया था लेकिन इस प्रतिबंध के कारण आरएसएस के विस्तार में रुकावट नहीं आई। यह संगठन अपने ध्येय को लेकर आगे बढ़ता गया। आरएसएस अपनी स्थापना के शताब्दी वर्ष में प्रवेश करने जा रहा है और अब यह संगठन समाज की मुख्यधारा में है। आरएसएस पर महात्मा गांधी की हत्या, आपातकाल और बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद प्रतिबंध लगाया गया। लेकिन क्या यह हैरानी की बात नहीं है कि इतने प्रतिबंधों के बावजूद इस संगठन से जुड़े हुए लोग आज देश के शीर्ष पदों पर आसीन हैं। कुछ लोग संघ और सरकार के बीच संबंधों की तुलना चर्च और राज्य के रिश्ते से करते हैं। उनका विश्वास है कि धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक देश में चर्च और राज्य के बीच विभाजन रेखा का सम्मान किया जाता है लेकिन आरएसएस दावा करता है कि वह सामाजिक-सांस्कृतिक संगठन है और राजनीति एवं धर्म से इसका दूर-दूर तक रिश्ता नहीं है। आरएसएस पर ब्रिटिश सरकार से लेकर आज तक हमले होते रहे हैं लेकिन अपनी स्थापना के सौ वर्षों में यह संगठन बरगद का रूप ले चुका है। पूर्वोत्तर भारत यदि देश की मुख्यधारा में शामिल हुआ है तो इसका श्रेय आरएसएस को ही दिया जाना चाहिए। सरकारी कर्मचारियों के लिए आरएसएस का द्वार खोलने का केंद्र सरकार का फैसला एक नये विवाद को जन्म देने वाला है। संघ को इसकी कोई आवश्यकता नहीं थी ।
Date: 26-07-24
जमानत पर ‘सुप्रीम’ फैसलारजनीश कपूर
किसी भी अपराध के संबंध में निर्दोषता की धारणा एक कानूनी सिद्धांत है। जिसके अनुसार किसी भी अपराध के लिए आरोपी प्रत्येक व्यक्ति को तब तक निर्दोष माना जाता है जब तक कि उसे दोषी साबित न कर दिया जाए। देश की शीर्ष अदालत ने अपने कई आदेशों में यह भी स्पष्ट किया है कि ‘जमानत देना नियम है और जेल में रखना अपवाद ।’ परंतु आए दिन यह देखने को मिलता है कि जब भी किसी आरोपी को निचली अदालत से जमानत दी जाती है तो सरकारी एजेंसियां तुरंत उस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट पहुंच कर रोक लगवा लेती है। बीते मंगलवार सुप्रीम कोर्ट ने इस चलन पर आपत्ति जताते हुए एक अहम फैसला दिया।
सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति अभय सिंह ओका और न्यायमूर्ति ऑगस्टिन जॉर्ज मसीह की खंडपीठ ने धन शोधन के मामले में आरोपी परविंदर सिंह खुराना की याचिका पर सुनवाई करते हुए देश भर के हाई कोर्टों को यह निर्देश दिया कि, ‘कोर्ट को स्टे लगाने का अधिकार होता है, लेकिन किसी की जमानत पर यूं ही रोक नहीं लगाई जा सकती। सिर्फ असामान्य मामलों और असाधारण परिस्थितियों में ही ऐसा करना चाहिए। हाई कोर्ट को ऐसे मामलों में सोच समझकर फैसला देना चाहिए। सामान्य तौर पर हाईकोर्ट को जमानत के आदेशों पर रोक नहीं लगानी चाहिए।’ उल्लेखनीय है कि मनी लॉड्रिंग के आरोपी परविंदर सिंह खुराना को प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने 2023 में गिरफ्तार किया था, लेकिन खुराना को ट्रायल कोर्ट से जून 2023 में ही बेल मिल गई थी, जिसके खिलाफ ईडी ने हाईकोर्ट में याचिका लगाई थी। हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के बेल ऑर्डर पर रोक लगा दी। जिसे चुनौती देते हुए खुराना सुप्रीम कोर्ट पहुंचे। सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने उनकी स्वतंत्रता को लेकर चिंता जताई। कोर्ट ने कहा कि, ‘एक साल तक एक शख्स बिना किसी कारण के जेल में सड़ रहा है।’ केस की पिछली सुनवाई पर ईडी की तरफ से पेश हुए सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कोर्ट से कहा कि खुराना को जमानत मिलते ही वो देश छोड़ कर जा सकता है। यदि वो देश छोड़ कर चला गया तो जमानत के क्या मायने? शीर्ष अदालत ने इस तर्क को अस्वीकार करते हुए यह स्पष्ट किया कि, ‘जमानत पर रोक केवल बहुत ही दुर्लभ मामलों में लगाई जा सकती है। यदि आरोपी पर देशद्रोह, आतंकवाद या एनईए जैसे संगीन मामले दर्ज हों तभी जमानत पर रोक लगाई जानी चाहिए।’ गौरतलब है कि देश भर की जेलों में लगभग 6 लाख कैदी बंद हैं। इनमें से बहुत सारे कैदी ऐसे हैं, जिनका आरोप सिद्ध भी नहीं हुआ है। वहीं दूसरी तरफ, जिन मामलों में सीबीआई या अन्य जांच एजेंसियों को तत्परता दिखानी होती है वहां तो रातों-रात गिरफ्तारी भी हो जाती है, परंतु जहां ढील देने का मन होता है या ऊपर से ढील देने के ‘निर्देश’ होते हैं, वहां विजय माल्या, नीरव मोदी और मेहुल चोकसी जैसे आर्थिक अपराधियों को देश छोड़ कर भाग जाने का मौका भी दे दिया जाता है। यदि जांच एजेंसियां वास्तव में संगीन अपराधों को गंभीरता से लें तो उन्हें देश में लंबित पड़े सैकड़ों मामलों में तेजी दिखानी चाहिए। केवल चुनिंदा मामलों में तेजी दिखाने से जांच एजेंसियों पर सवाल तो उठेंगे ही। अब बनी फ्रॉड के मामलों को ही लें तो पिछली लोक सभा में एक सवाल का उत्तर देते हुए भारत सरकार के वित्त राज्य मंत्री डॉ. भागवत कराड ने बताया था कि 31 मार्च 2022 को खत्म होने वाले वित्तीय वर्ष में ‘टॉप 50 विल्फुल लोन डिफॉल्टरों ने बैंकों के साथ 5,40,958 करोड़ धोखाधड़ी की है, परंतु सीबीआई, ईडी व इनकम टैक्स विभाग ने इन मामलों में काफी ढुलमुल रवैया अपनाया। मिसाल के तौर पर लोक सभा में दिए गए इसी उत्तर में देश के ‘टॉप 50 विल्फुल लोन डिफॉल्टरों की सूची में छटे नंबर पर एक नाम ‘फ्रॉस्ट इंटरनेशनल लिमिटेड’ का भी है। सूची के अनुसार इनके बैंक फ्रॉड की रकम 3311 करोड़ है। इस कंपनी पर 14 बैंकों के एक समूह के साथ धोखाधड़ी का आरोप है।
गौरतलब है कि बैंक ऑफ इंडिया और इंडियन ओवरसीज बैंक ने 2020 में उदय देसाई और 13 अन्य लोगों के खिलाफ सीबीआई में धोखाधड़ी के मामलों की एफआईआर लिखवाई थी, परंतु इस मामले की जांच कर रही एजेंसियां किन्हीं कारणों से इस गंभीर मामले में फुर्ती नहीं दिखा रही हैं। 2020 में जब इस मामले की एफआईआर दर्ज हुई थी तब यह मामला नीरव मोदी और मेहुल चोकसी के 13,000 करोड़ के बैंक फ्रॉड मामले के बाद दूसरा सबसे बड़ा मामला था, लेकिन इतने संगीन मामले के अपराधी आज तक खुले घूम रहे हैं। वहीं इससे कई छोटे अपराध के मामले में यदि अपराधी जमानत लेता है तो जांच एजेंसियां इसका विरोध करने हाई कोर्ट पहुंच जाती हैं। ऐसे में देश की शीर्ष अदालत के आदेश के बाद जांच एजेंसियों द्वारा अपनाए गए दोहरे मापदंड का भी पर्दाफाश होता है। इसलिए जांच एजेंसियों को संगीन मामलों में फुर्ती दिखानी चाहिए न कि चुनिंदा मामलों में जमानत का विरोध कर सुप्रीम कोर्ट की लताड़ का सामना करना चाहिए।
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भारत का हिमालयी क्षेत्र भारत की जलापूर्ति का मुख्य स्रोत होने के साथ-साथ अमूल्य पारिस्थितिकी तंत्र से जुड़े उपहार और सेवाएं भी देता है। इस समझ के बावजूद, विशेष विकास आवश्यकताओं और हिमालयी क्षेत्र में चलाए जा रहे विकास मॉडल के बीच भारी मतभेद रहा है।
सर्वोच्च न्यायालय के कुछ हालिया निर्णयों से यह राहत मिलती है कि हम एक अधिक मजबूत अधिकार आधारित व्यवस्था की ओर बढ़ रहे हैं, जहाँ सतत विकास एक मौलिक अधिकार होगा।
सर्वोच्च न्यायालय के इन निणयों और जलवायु परिवर्तन के प्रतिकूल प्रभावों से मुक्त होने के नए मौलिक अधिकारों को देखते हुए, यह जरूरी है कि भारतीय हिमालयी क्षेत्र में वृद्धि और विकास की आकांक्षाओं को विज्ञान और लोगों तथा प्रकृति के अधिकारों के साथ जोड़ा जाये।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित अर्चना वैद्य के लेख पर आधारित। 25 जून 2024
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Date: 25-07-24
Scrap NEETThat SC refused a retest is no cause for relief. This year’s controversy makes clear how flawed system is.TOI Editorials
SC’s refusal to order a UG-NEET retest, on the ground there wasn’t evidence of a ‘systemic leak’, has put the lid on the controversy. The court’s decision is clearly based on analysis of results, which did not indicate candidates of centres under scanner doing exceptionally well. It was also mindful of the impact of such a decision on 2.4mn students who took the test this year.
Not a win | But Centre should not be taking SC’s stance as a victory for its position. For, the same SC has acknowledged that question papers were leaked at Hazaribagh and Patna. Besides, we now have unseemly scenario of all-India rankings being changed at the last stage because 4L students were granted marks for wrong answer – which, incidentally, was the ‘right’ answer in an older NCERT textbook. Do we need more proof that we face a mess?
Go for CBT | On NEET-UG, the way forward is clear. The pen-and-paper format must be replaced with the more secure offline Computer Based Test (CBT). Given the huge number of examinees and keeping JEE’s relative success in mind, NEET-UG must be made a two-stage exam, with the second stage being conducted with help from top medical institutions. To allow them to give their best, candidates should have the choice to take exam more than once in a year.
Choice of centres, questions vital | How exam centres are selected is all-important. Allowing outsourcing of work by successful bidders, as NTA has been doing, won’t do. Roping in one of the top companies in the business is the best option.
Creation of a question bank and proper use of technology to frame questions would add another layer of security. But for all this, we need genuine concern for young people’s future, not the bureaucratic mindset NTA has shown thus far.
Date: 25-07-24
Now’s The Turn Of InternsGOI’s internship programme blunts some of the risks companies face when hiring freshers. It may work quite well.Manish Sabharwal, [ The writer is with Team Lease Skills University. ]
India’s challenge since 1947 has not been unemployment (a low 4-9%) but employed poverty – the poor cannot afford to be unemployed. Putting employed poverty in the museum it belongs to needs three solutions: productive industries that don’t gift wrap self-exploitation as self-employment, employers with productivity to pay high wages and employees with skills to work productively. The recent budget has many interventions for mass prosperity that will combine our 3rd GDP (PPP) rank with a top 50 per capita GDP rank among countries. But it also makes us good ancestors by innovating at the intersection of jobs and skills – think of freshers whose job interviews ask for experience, but experience needs a job.
Looking back, it wasn’t God’s will that it should take 72 years for 1.4bn Indians to cross the GDP of 66mn British. Our high-wage, non-farm employment was sabotaged by romantics, elitists, welfarists, bureaucrats, macroeconomists, and trade unionists. Romantics unfairly view private employers as perpetual entities like govt, whose infinite resources come from having guns and jails. Elitists think private sector salaries are paid by shareholders rather than customers. Welfarists believe private employment can be substituted by govt spending financed by debt. Bureaucrats think statutory employer benefits are financed outside salaries rather than from them. Macroeconomists oversell fiscal and monetary policy. And trade unionists believe job preservation is a form of job creation.
All six worldviews suffer from inattention to detail; a bird’s rather than a worm’s eye view of the daily life of employers, employees, and job seekers.
The size, shape and effectiveness of policy interventions in creating high-wage jobs are debatable. But there are four uncontroversial biggies: macroeconomic stability, physical infra, rule of law and basic human capital. The budget’s fiscal deficit glide path to 4.5% will blunt inflation expectations and reduce the cost of capital. The qualitative shift to capex – it has tripled in the last five years – for infra is raising the productivity of all firms but particularly small ones. Corruption – a sense of humour about the rule of law – will come down with Jan Vishwas 2.0 and by adopting digital public infra for compliance, by creating a National Open Compliance Grid.
I hope the 50-year interest-free, performance-linked loans to states are contingent on rolling out labour codes, digitising compliance, decriminalisation (20,000+ employer jail provisions are embedded in state laws) and improving basic human capital (primary education and healthcare).
The two challenges of hiring and skilling freshers merit deep dives. Employers hesitate to hire freshers because of poor skills that entail high repair costs, weak signalling value of education – I recently interviewed a BA in English who did not know the vocational skill of English well – and unrealistic workplace expectations. Employers are willing to pay a wage premium for hiring skilled kids but unwilling to pay for skilling kids because of three holes in the financing bucket. They pay for training and the kids don’t qualify for the job (learning risk), they pay for training and the kid qualifies but is not productive (productivity risk), and finally they pay for training, the kid qualifies for the job and is productive, but she resigns (attrition risk).
The boldness of the budget lies in risk-taking to blunt two challenges. The first challenge of hiring freshers is addressed by reducing their costs to employers. The risk of ghost employees is covered by making these subsidies a reimbursement, linking provident fund accounts, and requiring a year of employment.
The second challenge in skilling freshers is addressed by an internship programme that tackles the market failure in financing skill development – employers cannot manufacture their own employees. We have learnt five design principles for making skilling programmes effective, scalable and sustainable. Learning while earning (partially offset costs of living, eating and commuting), learning by doing (soft skills are not taught but caught), learning with qualification modularity (NEP enables connectivity between certificates, diplomas and degrees), learning with flexible delivery (NEP enables equivalence between on-job, on-site, online and on-campus classrooms), and learning with signalling value (HDFC is a good place to be an intern at but a great place to be an intern from). India recognised the value of learning by doing a long time ago. Apprenticeships were the 20th point in the 20-point programme of 1975. But that poetry of campaigning wasn’t translated into the prose of employers.
The internship programme is voluntary but the regulatory legitimacy, stipend subsidy and freedom for employers to use CSR funds will attract volunteers who are tired of sitting on the fence on integrating internships into their people supply chains. Employers who try interns will soon realise that these programmes pay for themselves with faster hiring times, lower attrition and higher productivity. So this policy has good odds of creating a virtuous cycle in financing and qualification linkages that create scale.
Polio vaccine inventor Jonas Salks believed our biggest responsibility is to be good ancestors. If fiscal deficits could make countries rich, no country would bother being poor. And monetary policy is a placebo, painkiller or steroid. This budget recognises that the only renewable energy for mass prosperity is jobs and skills for our young.
Date: 25-07-24
Cultivating Wealth, Not DependencyET Editorials
Whenever we hear the word ‘agriculture’ in the context of the annual budget, we also hear the words ‘payouts’ and ‘subsidy’. On Tuesday, Nirmala Sitharaman’s focus on productivity and resilience in the agriculture sector got us sitting up. It was not just about politically cultivating an electorate — of cultivators — but about setting pathways for sustained higher incomes for the farm sector.
Acknowledging that higher incomes require ensuring that agriculturalists adapt and use the fruits of science and better techniques and processes is critical, especially to mitigate impacts of climate change. The plan to release 109 new high-yielding and climate-resilient varieties of 32 field and horticulture crops for cultivation opens up new trajectories for increasing yields and incomes, while bettering conditions all around. The proposed use of digital public infrastructure for a digital crop survey in 400 districts will help identify the most suitable crops for cultivation. Encouragement for high-value produce — such as vegetable production and encouraging self-sufficiency in oilseeds — is about crop diversification, market access and higher incomes. Expanding natural farming is another progressive step forward.
The allocation for agriculture, ₹1.52 lakh cr, accounts for 3% of the budget, and is 6% more compared to last year. Rather than the quantum, GoI’s budget should be judged for utilisation and achievement of goals it sets out, as well as the outcomes of these policies. To this end, GoI must undertake an impact assessment of schemes and measures, including the PM-Kisan Samman Nidhi and fertiliser subsidies, to understand their utility. The lens through which this must be measured is the twin goals of productivity and resilience.
Date: 25-07-24
Cleansing NEETNext year, the test must have safeguards against malpractice and inefficiency.Editorial
What comes undone is best redone. The latest development in the prolonged National Eligibility cum Entrance Test (NEET) 2024 saga has played out in the court, and will answer the question raised initially — the unusually high number of toppers this year. The Supreme Court of India’s ruling on the right answer to a particular physics question in the NEET paper, based on the expert opinion of IIT Delhi professionals, has brought down the number of toppers from 61 to a more reasonable number — 17. The wrong answer for the disputed question was chosen reportedly by four lakh students, including 44 in the list of toppers. As a result, all these students will lose five marks each. Ruling that there could be only one correct answer, the Court directed the National Testing Agency (NTA) to revise the scores based on the correct answer. It also emerged during the hearing that the wrong answer for the question was actually present in the older (until 2021) NCERT textbooks. The Court had earlier refused to cancel the entire NEET, which over 23 lakh applicants took. While the scheduled date of counselling, July 24, is past already, and with the NTA having to re-tally the marks with the revised answer, the counselling has been delayed again, but will take place as soon as possible.
While the scenario, as it stands today, seems ostensibly resolved sufficiently to let the process move forward, the truth is that an unprecedented number of violations have occurred in a manner that vitiated, possibly for good, the faith in NEET as a fail-safe entrance route. From charges of paper leaks, giving out the wrong question papers, damaged answer keys, impersonation by students, and an analysis of marks that showed an unusually high number of toppers from certain centres in the country, NEET-UG 2024 has been a string of bad news this year. Notably, the interventions to right the course have come mostly from the judiciary, with the executive stopping short of initiating significant or decisive action required to clean its Augean stables. For starters, the extraordinary emphasis that has come to be placed on medicine as a career choice, with over 23 lakh students hoping to compete for over one lakh MBBS seats, will have to be dialled down, with a healthy promotion of other scientific streams as viable career options. The government also has no option but to unwind the entire spool, and cast it out if it must, reorienting all systems so that the next NEET can be conducted professionally, and with adequate safeguards in place to prevent malpractice or inefficiency.
Date: 25-07-24
Not in orderThe directives on display of names on Kanwar Yatra route must be withdrawn.Editorial
The Supreme Court of India on Monday stopped the enforcement of directives issued by the Uttar Pradesh and Uttarakhand governments that required food stalls on the route of the Kanwar Yatra — an increasingly popular pilgrimage that Shiva devotees undertake — to prominently exhibit the names and other identity details of their owners and employees. Petitioners argued that the directives would result in discriminatory outcomes, besides negating the secular character of the country. The Court accepted the need for urgent judicial intervention in the matter and issued notices to the States that fall in the route — Uttar Pradesh, Uttarakhand, Delhi and Madhya Pradesh. The case will come up for hearing again on Friday. The yatra takes place during the Hindu month of Shravan when those who worship Shiva — popularly known as Kanwariyas or Bhole — walk hundreds of kilometres carrying pots of Ganga jal, known as kanwar (a structure made of bamboo that has containers suspended on both sides of a pole), to the temples in their home town. The yatra is increasingly popular, particularly among the Dalit and Other Backward Classes in the Hindi heartland. The police in Muzaffarnagar, western U.P., were the first to issue the controversial directive last week, which they said was done to ‘prevent any untoward incident’.
The discriminatory nature of this move became clear soon, and was criticised by the Opposition and National Democratic Alliance allies. Amid the criticism, U.P. Chief Minister Yogi Adityanath extended the requirement across the entire route of the pilgrimage in the State. The Bharatiya Janata Party (BJP) government in neighbouring Uttarakhand followed suit. Reports emerged of Hindu hotel owners being asked by the administration to remove their Muslim workers; there were also accounts of harassment of meat shop owners. BJP allies, the Rashtriya Lok Dal (RLD) and the Janata Dal (United), joined the Opposition Congress and the Samajwadi Party in calling out the brazenly communal move of the BJP governments. Many pilgrimages in India are undertaken and organised jointly by people of different faiths, and as it turns out, there are Muslims too who trek with Hindus to take part in this unique form of Shiva worship. All along the route, they have, for years, been served by Muslim shop owners and even volunteers. Muslim artisans make a living by making the kanwar in some parts. The economic, cultural and social aspects of the Kanwar Yatra — as with any other pilgrimage — are shared by people of various sects and religions. The government directive was unreasonable and achieved nothing other than promoting communal enmity. U.P. and Uttarakhand should withdraw their directives without waiting for the decision of the Court.
Date: 25-07-24
An outlining of urban transformation strategiesState governments, their municipalities and also citizens will have to take forward the provisions outlined in the Budget.Sudhir Krishna is the former Secretary, Urban Development, Government of India.
Cities are home to about 50 crore people, accounting for about 36% of India’s population. The urban population has been growing at a steady pace of 2% to 2.5% annually. The ever-growing pace of urbanisation in India calls for sustained investments, with a vision and determination. The maiden Budget of the new government has recognised cities as the growth hubs and offered many options and opportunities for the planned development and the growth of cities.
The issue of housing
The Pradhan Mantri Awas Yojana (Urban) has been under implementation since 2015 and has provided as many as 85 lakh housing units for the Economically Weaker Sections (EWS)-Middle Income Groups (MIG) categories of population, with an investment of about ₹8 lakh crore. Of this, a quarter has been provided by the central government and the remaining by the beneficiaries and State governments. The Budget has proposed to give a further push to the scheme by announcing support for the construction of another one crore such units in urban areas with an investment of ₹10 lakh crore, which will include central assistance of ₹2.2 lakh crore in the next five years, against which ₹30,171 crore has been provided in the Budget for the current year. A part of this allocation will be available to provide interest subsidy to facilitate loans at affordable rates.
The migrant population working in industries has been surviving in general in slums and yearning for a roof over their heads and a functional housing unit close to their workplaces. The Budget has announced new rental housing with dormitory-type accommodation for industrial workers. This is envisaged to be developed in public-private partnership (PPP) mode with upfront financial support under the Viability Gap Funding (VGF) scheme. This is to the extent of 20% from the central government, with the possibility of similar support from the State government.
The core infrastructure requirement for cities includes water supply, sanitation, roads and sewerage systems. Specific to the cities, the Atal Mission for Rejuvenation and Urban Transformation (AMRUT) provides ₹8,000 crore, which, by itself, may not appear to be very substantial. However, the Finance Minister has announced the availability of the VGF window, provided that the project is taken up as a commercial venture in PPP Mode. Most cities have, over the years, got exposed to the PPP model, and it should be possible to speed up the development of such core infrastructure, where it is unavailable and upgrade it where it exists but is inadequate.
The Budget Speech also mentions a huge investment of ₹11.11 lakh crore for capex in infrastructure. While this would include highways and many other sectors, cities can also make efforts to partake a share in it. Similarly, a provision of ₹1.50 lakh crore is made available to States as an interest-free loan for infrastructure development. States could use this window also, for cities.
The Smart Cities Mission, that was launched in 2015, was provided budgetary support of ₹8,000 crore in 2023-24, which has been scaled down to ₹2,400 crore in 2024-25, to take care of the remnant commitments. However, a new window, the National Urban Digital Mission (NUDM), has been opened in this Budget, with a provision of ₹1,150 crore, with a focus on the digitisation of property and tax records and their management, with GIS mapping. These will help urban local bodies in managing their finances better, and also help property owners.
On city planning
The Budget has declared the intention of focusing on the planned development of cities. Municipalities would get the normal ‘Finance Commission Grant’ of ₹25,653 crore. In addition, a provision of ₹500 crore has been made for the incubation of new cities. With the development of mass rapid transit systems, cities can embark on transit-oriented development, wherein transit hubs can be surrounded by denser development without creating a traffic overload on roads. Moreover, a well-designed mobility plan can conveniently connect cities with their peri-urban areas and ‘new cities’. Accordingly, the Budget has announced an enhanced focus on economic and transit planning, with the orderly development of peri-urban areas utilising town planning schemes. The Budget has also proposed encouraging electric bus systems for cities and has provided ₹1,300 crore for it. E-buses offer an economical and eco-friendly operating system, but the main challenge is their higher upfront cost. However, with this budgetary support, it should get going.
Solid waste management
Solid waste management (SWM) is perhaps the biggest challenge that most cities face today. The Budget has announced a special thrust to introduce bankable projects for SWM in collaboration with State government and financial institutions. States and municipalities can also make use of the VGF for this purpose. Cities such as Indore, Madhya Pradesh, have shown the way in making SWM a financially viable proposition.
The Street Vendors Act, 2014, was enacted by Parliament to regulate street vendors in public areas and protect their rights. It also envisaged the preparation of street-vending plans and the creation of street-vending zones, with a view to make street-vending a healthy and safe option for consumers and vendors. The Budget has proposed to develop 100 weekly ‘haats’ or street food hubs in select cities. Perhaps States need not feel constrained with the number and can facilitate all cities in preparing street-vending plans and developing street vending ‘haats’ in various parts of the city, according to felt needs.
While the Budget has made a slew of provisions, financial as well as procedural, to push for planned urbanisation, cities, represented by the municipalities, and guided by the respective State governments, will have to show the vision and the determination to incorporate all the resources coming not only from the Union Budget but also augmented by their own resources.
Above all, the participation of citizens would remain the bedrock for the success of any city’s development strategy.
Date: 25-07-24
उद्योग और सरकार मिलकर रोजगार सृजन करेंसंपादकीय
बजट में हुई घोषणाओं से जाहिर हो गया है कि रोजगार के लिए सरकार अब उद्योगों की तरफ देख रही है। इसकी पृष्ठभूमि में आर्थिक सर्वे की प्रस्तावना में बेलाग तौर पर उद्धृत की गई दो रिपोर्ट्स हैं। ‘रोजगार सृजन निजी क्षेत्र का वास्तविक लक्ष्य है’ उपशीर्षक के साथ सर्वे ने बताया कि किस तरह निजी क्षेत्र वर्ष 2020-23 के चार साल में चार गुना लाभ कमाने के बाद भी मशीन – इक्विपमेंट या बौद्धिक संपदा हासिल करने में पैसा न लगाकर रियल एस्टेट में निवेश करता रहा, जबकि इसे टैक्स में छूट इसलिए दी गई थी कि यह युवाओं को प्रशिक्षित कर उन्हें रोजगार दे। यह सर्वे निजी क्षेत्र पर आरोप तो सही लगा रहा है, लेकिन क्या बेरोजगारी, स्किलिंग और टेक्निकल शिक्षा देना केवल उद्योगों के जिम्मे है ? सर्वे ने ही एक रिपोर्ट का जिक्र करते हुए इस सवाल का जवाब भी दिया है। यह कहता है कि आईएमएफ द्वारा प्रकाशित एक नोट में विगत जून में कहा गया कि ‘जेनरेटिव एआई ने बड़े पैमाने पर श्रम व्यवधानों और असमानताओं के बारे में गहरी ‘चिंता जगाई है।’ इसमें स्वचालित सूचना आदान-प्रदान के बेहतर प्रवर्तन और पूंजीगत लाभ पर संवर्धित टैक्स की सिफारिश की गई है। सर्वे कहता है कि कॉर्पोरेट रोजगार सृजन की अपनी जिम्मेदारी को गंभीरता से ले। पर क्या सरकार को बजट में ऐसी शिक्षा व शोध के लिए मजबूत संस्थागत ढांचा और अपेक्षित धन मुहैया नहीं कराना था ?
Date: 25-07-24
दुकानदारों के व्यवसाय को निशाना बनाना उचित नहींप्रताप भानु मेहता, ( प्रिंसटन यूनिवर्सिटी में विजिटिंग प्रोफेसर )
सुप्रीम कोर्ट ने कांवड़-यात्रियों के मार्ग पर स्थित सभी खाद्य दुकानों के मालिकों के नाम प्रमुखता से प्रदर्शित करने के उत्तर प्रदेश सरकार के आदेश पर रोक लगा दी है। लेकिन यह केवल एक अस्थायी राहत है। एक समाज के रूप में हमें अभी भी उस अंतर्निहित मानसिकता से निपटना होगा, जिसका प्रतिनिधित्व उत्तर प्रदेश सरकार का वह आदेश करता था।
कांवड़-यात्रा की परंपरा हिंदू धर्म का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और सरकार इसकी स्वतंत्र अभिव्यक्ति के लिए सभी आवश्यक उपाय कर सकती है। वह व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के विभिन्न विवरणों को सार्वजनिक करने की मांग भी कर सकती है, बशर्ते यह सार्वजनिक हित में हो। लेकिन हमें किसी भुलावे में नहीं रहना चाहिए। दुकान मालिक के नाम को प्रदर्शित करने के सरकारी आदेश का मुसलमानों को निशाना बनाते हुए उनका बहिष्कार करने के लिए सिवा कोई और प्रयोजन मालूम नहीं हो रहा था!
सरकार कांवड़-यात्रा को सुविधाजनक बनाने के तमाम जतन जरूर कर सकती है। लेकिन वह इससे आगे बढ़ रही थी। उसका तर्क था कि वह आदेश कांवड़ियों को ऐसे निर्णय लेने में सक्षम बनाने के लिए था, जिससे यात्रा की पवित्रता बनी रहे।
यह अनेक कारणों से साम्प्रदायिक तर्क है। सबसे पहले तो राज्यसत्ता को दुकान-मालिकों के व्यवसाय करने के अधिकार की कीमत पर प्रदूषण व पवित्रता के मानदंडों को लागू करने का अधिकार नहीं है।
कांवड़-यात्री जिसके साथ चाहें क्रय-विक्रय कर सकते हैं। लेकिन सरकार को उनके लिए शुद्ध वातावरण बनाने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है, जिससे दुकानदारों के अधिकारों पर ही कुठाराघात हो।
इन आदेशों से सरकारी अधिकारियों को छोटे दुकानदारों को परेशान करने और उनकी पहचान और कागजात की लगातार जांच करने का अधिकार मिल जाता। यह ‘मिनिमम गवर्नमेंट, मैक्सिमम गवर्नेंस’ के सिद्धांत के अनुरूप भी नहीं था।
इससे भी गम्भीर बात यह थी कि वह आदेश मुस्लिमों की दुकानों को अन्य दुकानों से स्पष्ट रूप से अलग करने की अनुमति देने वाला था। आखिर कोई इन दुकान मालिकों की सार्वजनिक रूप से पहचान क्यों करना चाहेगा? इसके पीछे यह तर्क था कि धोखाधड़ी और अशुद्धता से लड़ने के लिए यह पहचान करना आवश्यक है।
यह धोखाधड़ी से ऐसे लड़ता कि भले ही किसी दुकान का नाम हिंदू जैसा लगता हो, लेकिन वह किसी मुस्लिम द्वारा संचालित हो सकती है। वहीं यह आदेश तीर्थयात्रियों को केवल हिंदुओं से भोजन खरीदने की अनुमति देकर कांवड़ यात्रा की शुद्धता को बनाए रखने में मदद करता।
अगर आप इस पर सोशल मीडिया पर चल रही बहसों पर नजर डालें, तो स्पष्ट हो जाएगा कि इन आदेशों के पीछे यह पूर्वग्रह छिपा था कि मुसलमान अपनी पहचान को गलत तरीके से पेश करके धोखाधड़ी करते हैं। लेकिन किसी दुकान का ऐसा नाम होना गैर-कानूनी नहीं है, जो उसके मालिक के धर्म को नहीं दर्शाता हो। यह भी शर्म की ही बात होनी चाहिए कि भारत में अक्सर अल्पसंख्यक और दलित अपनी पहचान छुपाकर ही व्यापार कर पाते हैं।
लेकिन हर स्थिति में, धोखाधड़ी किसी एक विशेष समुदाय की विशेषता नहीं है। इससे भी खतरनाक बात यह है कि यह विमर्श इस विचार को सामान्य बनाता है कि मुसलमान किसी तरह के प्रदूषण का स्रोत हैं।
याद रखें कि धार्मिक समूहों की अपनी वर्जनाएं होती हैं : मुसलमान हलाल भोजन को प्राथमिकता देते हैं, कांवड़-यात्री शाकाहारी या सात्विक भोजन पसंद कर सकते हैं। वे इन विकल्पों का प्रयोग करने के लिए स्वतंत्र हैं। लेकिन ये विकल्प बेचे जा रहे उत्पाद की गुणवत्ता से तय होते हैं, बेचने वाले की पहचान से नहीं।
इसलिए यह आग्रह कि शुद्धता के लिए किसी दुकान के मालिक की पहचान जानना जरूरी है, मुसलमानों को निशाना बनाने के अलावा और कुछ नहीं मालूम होता है। यह प्रशासनिक आदेशों की आड़ में अस्पृश्यता के एक नए रूप को संस्थागत बनाने का प्रयास था।
लगता है कि लोकसभा चुनाव में मिले झटके से भारतीय जनता पार्टी अभी तक उबरी नहीं है और अब वह हिंदुत्व की राजनीति पर और जोर देने की कोशिश कर रही है। उत्तर प्रदेश के आदेश भी उसी कड़ी में थे।
Date: 25-07-24
नौकरशाही की जकड़न से निकले शिक्षाजगमोहन सिंह राजपूत, ( लेखक शिक्षा, सामाजिक सद्भाव तथा पंथक समरसता के क्षेत्र में कार्यरत हैं )
यह अच्छा हुआ कि सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल कालेजों में प्रवेश की परीक्षा नीट-यूजी को दोबारा कराने की आवश्यकता नहीं समझी, लेकिन यह कहना कठिन है कि उसके फैसले से परीक्षा आयोजक एजेंसी एनटीए की साख बहाल होने जा रही है। बात केवल एनटीए की ही नहीं है, क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में समूचे देश में अनेक परीक्षाएं कदाचार का शिकार हुई हैं। व्यापम जैसे लज्जाजनक प्रकरण के बाद भी केंद्र और राज्यों की बड़ी संस्थाएं पर्चा-लीक रोक न पाएं तो यह या तो घोर अक्षमता है या संवेदनहीनता की पराकाष्ठा। देखा जाए तो इसमें देश की न्याय व्यवस्था की शिथिलता की भी भूमिका है। न्यायिक प्रक्रिया के प्रति भय-मुक्त होकर समाज विरोधी तत्व लगातार फल-फूल रहे हैं। यह दिखाता है कि विश्व को नैतिकता और जनसेवा का संदेश देने वाले महात्मा गांधी के देश ने व्यावहारिकता में उनके जीवन मूल्यों एवं सिद्धांतों को लगभग भुला दिया है। यदि ऐसा हर स्तर पर न हुआ होता तो अपने थोड़े से स्वार्थ के लिए कुछ लोग करोड़ों युवाओं और उनके परिवारों को घोर आपदा तथा कष्टकर अवसाद में नहीं झोंकते। यह सब करने वाले पढ़े-लिखे लोग हैं। चूंकि किसी न किसी अध्यापक ने ही इन सबको कभी पढ़ाया होगा, लिहाजा समूचे शिक्षक वर्ग के लिए भी यह गहन मंथन का समय है, क्योंकि देश के भविष्य का निर्माण और नई पीढ़ी का नैतिकता, मानव-मूल्यों तथा सदाचार से परिचय कराने का उत्तरदायित्व तो उनका ही है। हालांकि यह भी सही है कि इस उत्तरदायित्व निर्वहन में व्यवस्था-तंत्र की सजगता और संसाधनों की पूर्ति/आपूर्ति का प्रभाव पड़ता है।
जब हम गर्व के साथ प्राचीन भारतीय ज्ञान परंपरा को याद करते हैं, तब उन गुरुकुलों तथा ज्ञान-केंद्रों के सहज संचालन में गुरु के लिए जो सम्मान मिलता था, जिस सहजता से संसाधनों की व्यवस्था होती थी, उसे अक्सर भूल जाते हैं। यह अतिशयोक्ति नहीं है कि शिक्षा में उत्कृष्टता तभी संभव होती है जब अध्यापकों को ‘अफसरों’ का भय न हो, संस्था में आवश्यक संसाधन उपलब्ध हों और उसे परिवार संचालन की आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति की चिंता न हो। यह चिंता की बात है कि आज देश में बच्चों पर पाठ्यक्रम का बोझ बढ़ा है। उनमें प्रतिस्पर्धा का तनाव भी प्रतिवर्ष बढ़ रहा है। कोचिंग संस्थाओं की निर्ममता को झेलने के लिए बच्चे बाध्य हैं। माता-पिता उनके भविष्य की आशंकाओं से व्यथित हैं। यदि स्कूल ठीक से चलें, अध्यापक समय से अपना कार्य करें, पाठ्यक्रम समयानुसार परिवर्तित होते रहें, परीक्षा व्यवस्था पर फिर से लोगों का विश्वास लौटाया जाए, तभी बच्चों को कुछ राहत मिल सकेगी। यह लक्ष्य कठिन है, लेकिन प्रबुद्ध देशवासियों को इस दिशा में आगे बढ़ने के मार्ग प्रशस्त करने होंगे।
वह शिक्षा अधूरी है जिसमें केवल लिखित परीक्षा के अधिकाधिक अंक ही जीवन-लक्ष्य मान लिए गए हों। ऐसी स्थिति में व्यक्ति और व्यक्तित्व विकास की अपेक्षा अर्थहीन हो जाती है। दूसरे विश्व युद्ध में अत्यंत अपमानजनक स्थिति में पहुंचे जापान ने जब राष्ट्र के पुनर्निर्माण का कार्य प्रारंभ किया तो उसने कार्य संस्कृति, समय-पालन तथा कर्मठता से राष्ट्र के प्रति समर्पित लोग तैयार करने को सबसे महत्वपूर्ण लक्ष्य माना। इसकी सबसे पहली सीढ़ी बने स्कूल अध्यापक। उनके प्रयास से अगले दस-बारह साल में युवाओं की ऐसी पीढ़ी तैयार हो गई, जो अपने सामाजिक और राष्ट्रीय उत्तरदायित्व निर्वहन में पूरी तरह सक्षम थी। यदि भारत में भी ऐसे अध्यापक, कुलपति, राष्ट्रीय स्तर की संस्थाओं के अध्यक्ष परीक्षा केंद्रों के संचालन का उत्तरदायित्व निभा रहे होते, तो पेपर लीक की समस्या नहीं होती।
हमारे देश के साथ आज एक बड़ी समस्या यह है कि हमने नौकरशाही प्रशासन और अकादमिक प्रशासन के अंतर को पहचानने से इन्कार कर दिया है। जो उच्च शैक्षिक पद 1975-80 तक शिक्षविदों के पास होते थे, अब वे सब केवल नौकरशाहों के पास हैं। राज्यों में पाठ्यपुस्तक निगम, स्कूल बोर्ड तथा राष्ट्रीय स्तर पर सीबीएसई, नवोदय विद्यालय समिति और केंद्रीय विद्यालय संगठन के शीर्ष पदों पर शिक्षविद् क्यों नियुक्त नहीं हो सकते हैं? डा. कोठारी की अध्यक्षता में बने राष्ट्रीय शिक्षा आयोग (1964-66) ने इंडियन एजुकेशन सर्विस (आइईएस) की स्थापना की संस्तुति की थी। सरकारें आती रहीं, जाती रहीं, समय-समय पर विद्वत वर्ग की ओर से प्रयास होते रहे, मगर इस पर हुआ कुछ नहीं। कारण स्पष्ट है कि नौकरशाह इसके लिए तैयार नहीं है। लगता है वह अपने प्रभाव क्षितिज में किसी का प्रवेश नहीं चाहते।
जब भी उच्च शिक्षा की गुणवत्ता की चर्चा होती है, तब संस्थागत स्वायत्तता की ओर सभी का ध्यान अवश्य जाता है। पिछले कुछ वर्षों में कुछ राज्य सरकारों तथा राज्यपालों के संबंध जिस ढंग से जनता के समक्ष उभरे हैं, उस पर केवल शर्मिंदा ही हुआ जा सकता है। किसी भी विश्वविद्यालय के सुचारु रूप से चलने तथा उत्कृष्टता की ओर बढ़ने के लिए राज्य सरकार और राज्यपाल के समन्वित सहयोग तथा मार्गदर्शन की महती आवश्यकता होती है। इनमें से एक कुलपति नियुक्त करे और दूसरा उसे निरस्त करे तो इससे लोकतंत्र का विकृत चेहरा ही उभरता है। आज फर्जी डिग्री बांटने वाले अनेक संस्थान भी चिह्नित किए जा सकते हैं। इसके साथ ही अधिकांश राज्यों में शिक्षा संस्थानों में नियुक्तियों को लेकर पारदर्शिता और योग्यता का अभाव नजर आता है। यह सामान्य समझ से परे है कि राज्यों में अध्यापकों की नियुक्ति की ओर ध्यान क्यों नहीं दिया जाता है? यदि किसी राज्य में कई साल से रिक्त पदों की संख्या लाखों में हो तो किसी न किसी को जिम्मेदारी लेनी ही होगी।
Date: 25-07-24
विवेकशील, साहसी और समझदारी भरा बजटए के भट्टाचार्य
नरेंद्र मोदी सरकार के अपने छठे पूर्ण बजट में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने मंगलवार को दिखाया कि वह राजकोषीय विवेक, साहस और राजनीतिक समझदारी सब रखती हैं।
उनका राजकोषीय विवेक न केवल 2024-25 में राजकोषीय घाटे का लक्ष्य कम करके सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 4.9 फीसदी तक लाने में नजर आता है बल्कि उनकी इस घोषणा में भी दिखता है कि वह राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को 2026-27 से केंद्र सरकार के घाटे में कमी के साथ तालमेल वाला बनाएंगी।
वर्ष 2024-25 के अंतरिम बजट में राजकोषीय घाटे के लिए 5.1 फीसदी का लक्ष्य तय किया गया था जिसका मतलब था कि सरकारी ऋण जीडीपी का 57.2 फीसदी होगा। मंगलवार को पेश बजट में घाटे के लिए 4.9 फीसदी का लक्ष्य तय किया गया जो सरकारी ऋण को कम करके जीडीपी के 56.8 फीसदी के स्तर पर लाएगा।
यकीनन कर्ज का यह स्तर अभी भी आधिकारिक समिति द्वारा कुछ माह पहले तय किए गए 40 फीसदी के लक्ष्य से अधिक है। परंतु ध्यान देने वाली बात यह है कि मंगलवार तक कोविड के बाद के अपने सभी बजट भाषणों में यह लक्ष्य रखा गया कि राजकोषीय घाटे को 2025-26 तक जीडीपी के 4.5 फीसदी तक लाना है लेकिन सरकारी ऋण के स्तर में कमी का जिक्र करने की आवश्यकता नहीं समझी गई।
वर्ष 2024-25 के बजट भाषण में सीतारमण ने राजकोषीय घाटे को इस गति से कम करने का जिक्र किया जिससे कि सरकारी ऋण के स्तर में भी कमी आए। उन्होंने कहा, ‘2026-27 के बाद से हमारा प्रयास होगा कि राजकोषीय घाटे को ऐसा रखा जाए ताकि जीडीपी के प्रतिशत के रूप में भी केंद्र सरकार का ऋण गिरावट पर हो।’ यह एक स्वागतयोग्य और जरूरी बात है जिस पर सरकार की राजकोषीय मजबूती की रणनीति के तहत ध्यान देना आवश्यक था। एक विकासशील अर्थव्यवस्था की अलग तरह की दिक्कतों को देखते हुए कर्ज के स्तर को राजकोषीय मजबूती के अधिक विश्वसनीय आधार के रूप में देखा जा रहा है।
सीतारमण के वित्तीय विवेक को एक और तरह से आंका जा सकता है। उन्होंने रिजर्व बैंक से अतिरिक्त लाभांश मिलने के बावजूद खुद को विभिन्न योजनाओं के लिए अतिरिक्त आवंटन करने से रोके रखा। यह लाभांश जीडीपी के 0.4 फीसदी के बराबर है। उन्होंने इस बात को सही चिह्नित किया कि यह इस वर्ष हुआ एकबारगी लाभ हो सकता है और अगले वर्ष शायद अतिरिक्त लाभांश मौजूद नहीं हो। ऐसे में इस वर्ष अतिरिक्त धनराशि होने के बावजूद उन्होंने राजस्व आवंटन को केवल छह फीसदी बढ़ने दिया। बिना ब्याज भुगतान के वास्तविक इजाफा 4.78 फीसदी रहा यानी लगभग कोई वृद्धि नहीं हुई। इसके बजाय उन्होंने पूंजीगत व्यय में 17 फीसदी इजाफा बरकरार रखा है। ऐसे में केंद्र सरकार का कुल व्यय 8.5 फीसदी बढ़ने वाला है जबकि उसका कुल राजस्व 15 फीसदी बढ़ेगा।
आखिर में सीतारमण ने अपने व्यय की गुणवत्ता और मिश्रण में भी सुधार किया। इतना ही नहीं उन्होंने राजस्व घाटे को भी निरंतर कम किया। 2022-23 के जीडीपी के 4 फीसदी के मुकाबले राजस्व घाटा 2023-24 में 2.6 फीसदी रह गया और अब उसके लिए 1.8 फीसदी का लक्ष्य है। राजस्व घाटे में कमी के साथ ही सरकार के पास यह गुंजाइश होगी कि वह पूंजीगत व्यय में उधारी का अधिक हिस्सा डाले।
वित्त मंत्री इसलिए भी साहसी हैं क्योंकि उन्होंने हर प्रकार की परिसंपत्तियों से हासिल पूंजीगत लाभ पर कर का पुनर्गठन किया है। इसका परिणाम अल्पावधि और दीर्घावधि के पूंजीगत लाभ कर में इजाफे के रूप में सामने आया है। इसके अलावा उन्होंने प्रतिभूतियों के वायदा एवं विकल्प कारोबार पर लगने वाले प्रतिभूति विनिमय कर (एसटीटी) में भी इजाफा किया है। याद रहे कि बजट के पहले आर्थिक समीक्षा में अर्थव्यवस्था के जरूरत से अधिक वित्तीयकरण के जोखिम को रेखांकित किया गया था। शेयर बाजार में वास्तविक अर्थव्यवस्था की तुलना में तेज वृद्धि इसमें शामिल है। समीक्षा में कर नीतियों और पूंजी और श्रम आय के साथ उसके व्यवहार के महत्त्व को भी रेखांकित किया गया है।
ऐसा लगता है कि वित्त मंत्री ने पूंजीगत लाभ कर और एसटीटी को लेकर जो घोषणाएं की हैं वे दरअसल समीक्षा में जताई चिंताओं की बदौलत हैं। परंतु जब बात सालाना बजट तैयार करने की आती है तो शेयर मार्केट के मामले में वित्त मंत्रियों को जोखिम से बचने के लिए जाना जाता है। कुछ ही वित्त मंत्री शेयर बाजार को निराश करने वाली घोषणा करते हैं। सीतारमण ने यह जोखिम उठाने का निर्णय लिया। आश्चर्य नहीं कि घरेलू स्टॉक एक्सचेंज के मानक सूचकांकों में मंगलवार को तेजी से गिरावट आई लेकिन बाद में उनमें सुधार देखने को मिला।
वित्त मंत्री की राजनीतिक समझदारी तब नजर आई जब उन्होंने रोजगार से जुड़ी चिंताओं को दूर करने के लिए एक के बाद एक कई घोषणाएं कीं। इनमें केंद्र सरकार की ओर से निजी क्षेत्र को लोगों को काम पर रखने में वित्तीय मदद प्रदान करने की योजना शामिल है। सरकारी नौकरी की बात करने के बजाय उन्होंने निजी क्षेत्र में रोजगार देने के साथ प्रोत्साहन शामिल कर दिए हैं। सूक्ष्म, लघु और मझोले उपक्रमों की बात करें तो उन्होंने संकटग्रस्त इकाइयों के लिए अधिक ऋण और कुछ नियामकीय सहनशीलता दिखाने की घोषणा की।
इससे भी अहम बात यह है कि उन्होंने बिहार और आंध्र प्रदेश के लिए योजनाओं और परियोजनाओं की भरमार कर दी। इन दोनों राज्यों में केंद्र सरकार के गठबंधन साझेदारों की सरकार है। उन्होंने ऐसा करते समय ध्यान रखा कि राजकोषीय सेहत पर बुरा असर नहीं पड़े। इन योजनाओं में से कई तो राज्यों के साथ मिली जुली होंगी और आवंटन भी अगले पांच साल के दौरान किया जाएगा।
केंद्र सरकार की पीएम किसान और मनरेगा जैसी योजनओं में आवंटन नहीं बढ़ा है। प्रमुख सब्सिडी पर होने वाले व्यय में 2024-25 में 8 फीसदी की कमी आने की उम्मीद है। ऐसा गेहूं और धान की कम खरीद तथा उर्वरक कीमतों को युक्तिसंगत बनाए जाने के कारण हो रहा है।
ज्यादा चिंता की बात यह है कि कुल रक्षा आवंटन में ऐसे समय में गिरावट देखने को मिली है जबकि रक्षा तैयारी हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए। दूसरी ओर, कुछ प्रमुख योजनाएं जिनके आवंटन में अहम इजाफा हुआ है वे हैं ग्रामीण और शहरी आवास योजना, स्वास्थ्य आदि।
जहां तक बजट के दूरगामी नजरिये की बात है, वित्त मंत्री ने कुछ आश्वस्त करने वाले संदेश दिए हैं। विभिन्न क्षेत्रों में उत्पादकता बढ़ाने के लिए एक नए आर्थिक नीति ढांचे की बात कही गई है जिसे राज्यों के साथ मिलकर अंतिम रूप दिया जाएगा। आयकर अधिनियम की एक व्यापक समीक्षा होनी है ताकि इसे सरल बनाया जा सके और करदाताओं को निश्चिंतता प्रदान करते हुए विवाद कम किए जा सकें। सीमा शुल्क दरों की नए सिरे से समीक्षा होनी है और यह सब आगामी छह माह में पूरा करना है। वित्त मंत्री ने पहले ही एक दर्जन क्षेत्रों की करीब 50 वस्तुओं की सीमा शुल्क दरों में कमी करके शुरुआत कर दी है। इस भावना को छह महीने में पूरी होने वाली समीक्षा के दौरान बरकरार रखा जाना चाहिए तथा उम्मीद है कि इसे अगले बजट में प्रस्तुत किया जाएगा।
Date: 25-07-24
शुचिता पर सवालसंपादकीय
प्रतियोगी परीक्षाओं में गड़बड़ी और पर्चाफोड़ के मामले उजागर होने से स्वाभाविक ही परीक्षा आयोजित करने वाली संस्थाओं पर सवाल उठते हैं। खासकर राष्ट्रीय परीक्षा एजंसी यानी एनटीए की ओर से कराई जाने वाली राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट- यूजी) में पर्चाफोड़ से देश के लाखों विद्यार्थियों के विश्वास को धक्का पहुंचा है। परीक्षाओं की विश्वसनीयता को लेकर केंद्र और राज्य सरकारें चिंतित भी हैं। इसी के मद्देनजर केंद्र सरकार ने सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) नियम 2024 लागू किया है, जिसकी अधिसूचना पिछले माह जारी की गई थी। उत्तर प्रदेश सरकार ने परीक्षा में गड़बड़ी और पर्चाफोड़ पर अंकुश लगाने के लिए हाल में नया कानून बनाया है। अब बिहार सरकार ने भी प्रदेश लोक परीक्षा (पीई) अनुचित साधन निवारण विधेयक, 2024 विधानसभा में पारित किया है। दरअसल, बिहार सरकार ने इसकी तात्कालिक जरूरत इसलिए समझी, क्योंकि नीट- यूजी पर्चाफोड़ मामले के तार वहां से भी जुड़े हैं। कुछ अन्य राज्य भी इस तरह का कानून बनाने पर विचार कर रहे हैं। केंद्र और राज्य सरकारों की ओर से बनाए गए कानूनों में परीक्षा में गड़बड़ी और पर्चाफोड़ के दोषियों को सजा के कड़े प्रावधान किए गए हैं। मगर, सवाल है कि क्या हर राज्य में अलग-अलग कानून बना देने से ऐसे मामलों पर अंकुश लग पाएगा? नीट- यूजी पर्चाफोड़ के मामले में केंद्र सरकार ने कुछ तात्कालिक कदम उठाए हैं। नया कानून लागू करने के साथ ही इस मामले की जांच सीबीआइ को सौंपी गई है और कई लोगों की गिरफ्तारी भी हुई है। मगर, क्या ये कदम छात्रों और अभिभावकों की परेशानी दूर करने के लिए काफी हैं? यह कवायद मात्र रोग के लक्षणों का उपचार करना है। मूल समस्या कहीं अधिक गहरी है और इसकी जड़ों पर प्रहार करने की जरूरत है। प्रतियोगी परीक्षाओं में कुशल प्रतिभाओं का चयन जरूरी है और यह तभी संभव होगा, जब इन परीक्षाओं की शुचिता कायम रखी जाएगी। हर महत्त्वपूर्ण संस्थान और एजेंसी के कार्य तभी उत्तम स्तर के होंगे, जब सुयोग्य व्यक्तियों को उनकी जिम्मेदारी सौंपी जाएगी। साथ ही, परीक्षाओं में गड़बड़ी रोकने संबंधी कानूनों पर कड़ाई से अमल सुनिश्चित करना जरूरी है।
Date: 25-07-24
नौकरी देने-दिलाने की जरूरी कवायदआलोक जोशी, ( वरिष्ठ पत्रकार )
बजट से एक दिन पहले आए आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया था कि भारत के कॉलेजों से हर साल जो छात्र ग्रेजुएट होकर निकल रहे हैं, उनमें से सिर्फ 51.25 प्रतिशत नौजवान ही नौकरी पाने के लायक हैं। इसका मतलब है कि कॉलेज से निकल रहे हर दो में से एक छात्र को नौकरी मिलने की गुंजाइश ही नहीं है। इसी सर्वेक्षण में दूसरा आंकड़ा यह भी था कि अर्थव्यवस्था जिस रफ्तार से बढ़ रही है, उससे तालमेल बैठाने के लिए भारत में हर साल करीब 78.5 लाख रोजगार पैदा करने होंगे। नई नौकरियां पैदा करने का यह काम 2036 तक, यानी अगले बारह साल तक जरूरी होगा। कुल मिलाकर, करीब दस करोड़ नए रोजगार!
बजट में वित्त मंत्री ने अपनी जो नौ प्राथमिकताएं गिनाईं, उनमें पहले नंबर पर खेती थी। उसके बाद दूसरे नंबर पर रोजगार व कौशल के साथ ही तीसरे नंबर पर भी समावेशी मानव संसाधन था। यानी, रोजगार और नौजवानों पर असर डालने वाले फैसले। वित्त मंत्री ने रोजगार के मोर्चे पर पांच योजनाओं का एलान किया है, जिनसे कुल मिलाकर चार करोड़ दस लाख नौजवानों को फायदा होगा। सरकार इन पर दो लाख करोड़ रुपये खर्च करेगी।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने रोजगार के मोर्चे पर जो पहला एलान किया, वह है ‘एंप्लॉयमेंट लिंक्ड इन्सेंटिव’, यानी रोजगार पैदा करने के लिए सरकार निजी क्षेत्र को मदद देगी। इस योजना के तीन हिस्से हैं। पहली योजना है, पहली नौकरी पाने वालों को उनकी एक महीने की तनख्वाह सरकार से मिलेगी। यह राशन और गैस की सब्सिडी की तरह डीबीटी मॉडल पर काम करेगा। इसका मतलब है कि पैसा सीधे इन लोगों के खाते में जाएगा। यह रकम तीन किस्तों में दी जाएगी और ज्यादा से ज्यादा 15 हजार रुपये ही एक व्यक्ति को मिलेंगे। हालांकि, एक लाख रुपये महीने तक वेतन पाने वाले लोग इस योजना में शामिल हो सकते हैं। अनुमान है कि दो करोड़ दस लाख लोगों को इस योजना से लाभ मिलेगा। इस योजना का फायदा उठाने के लिए जरूरी है कि कर्मचारी ईपीएफओ योजना का सदस्य बने और उसके रिकॉर्ड के मुताबिक, यह उसकी पहली नौकरी हो।
दूसरी योजना खास तौर पर मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर, यानी कारखानों में काम करने वालों के लिए है। इरादा है कि मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर (विनिर्माण क्षेत्र) में नए लोगों के लिए ज्यादा रोजगार पैदा हों। वजह शायद यह भी है कि बरसों से मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर ही सबसे ज्यादा लोगों को रोजगार देता रहा है, लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह इस मामले में पिछड़ता दिख रहा है। नई योजना के तहत सरकार इस क्षेत्र में नौकरी पाने वाले लोगों और उन्हें नौकरी देने वाली कंपनियों को एक निश्चित दर से पहले चार साल तक उनके ईपीएफओ खाते में योगदान में मदद करेगी। यह योजना भी उन्हीं लोगों पर लागू होगी, जिनकी यह पहली नौकरी है। इससे तीस लाख नौजवानों और उन्हें रोजगार देने वालों को फायदा पहुंचेगा।
तीसरी योजना खासकर रोजगार देने वालों पर नजर रखकर बनाई गई है। किसी भी क्षेत्र या उद्योग में एक लाख रुपये महीने की तनख्वाह तक की नई नौकरी देने वालों को इस योजना में गिना जाएगा। सरकार हर नए कर्मचारी के लिए नियोक्ता के खाते से जाने वाली रकम में से हर महीने तीन हजार रुपये तक उन्हें देगी। स्कीम का फायदा वे दो साल तक ले पाएंगे। अनुमान है, ऐसे पचास लाख नए लोगों को रोजगार मिल पाएगा।
ये तीनों स्कीम जहां एक बड़ा रास्ता खोल रही हैं, वहीं यह एक बड़ी चुनौती की निशानदेही भी कर रही हैं। अभी हाल में मुंबई और सूरत में मुट्ठी भर नौकरियों के लिए जिस तरह हजारों की भीड़ उमड़ी, वह दिखा रहा है कि नौकरी इस देश में कितनी बड़ी नियामत है। यह बात भी लगभग साफ हो चुकी है कि अब सरकारें एक सीमा से ज्यादा लोगों को नौकरी नहीं दे सकतीं। मगर निजी क्षेत्र भी कितनी नौकरियां दे पाएगा, यह सवाल बड़ा होता जा रहा है। अगर निजी क्षेत्र को भी अपने काम के लोग नौकरी पर रखने के लिए सरकार से ही सहारा चाहिए, तो आगे क्या होगा? इसी के साथ सवाल उठा कि लोगों को नौकरी पर रखकर कर्मचारी और कंपनी, दोनों ने सरकार से मदद ले ली और फिर उसकी नौकरी खत्म हो गई, तब क्या होगा? हालांकि, बजट पर प्रेस कॉन्फ्रेंस में इसकी सफाई आ गई और बताया गया कि अगर नौकरी एक साल से पहले खत्म हो गई, तो कंपनी को वह इन्सेंटिव की रकम सरकार को लौटानी पड़ेगी।
जाहिर है, ऐसा तभी होगा, जब कंपनी को नए कर्मचारी काम के नहीं लगेंगे या फिर उन्हें कोई बेहतर काम मिल जाएगा। बेहतर काम के लिए जाना तो अच्छी बात है, मगर दूसरी सूरत पैदा न हो, इसके लिए भी वित्त मंत्री ने बजट में इंतजाम किया है। वह है, प्रधानमंत्री रोजगार योजना की चौथी स्कीम।
इसके तहत केंद्र सरकार राज्य सरकारों और निजी क्षेत्र से मिलकर अगले पांच साल में बीस लाख नौजवानों को तरह-तरह के कौशल या स्किल की ट्रेनिंग देने का इंतजाम करेगी। इसके लिए देश भर में एक हजार औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान या आईटीआई उन्नत किए जाएंगे और वहां छात्रों को उद्योगों की जरूरत के हिसाब से प्रशिक्षण देने की व्यवस्था की जाएगी।
यही नहीं, छात्रों को पेशेवर प्रशिक्षण पर होने वाले खर्च के लिए 7.5 लाख रुपये तक के शिक्षा ऋण पर सरकारी गारंटी भी दी जाएगी। देश में ही पढ़ाई के लिए 10 लाख रुपये तक का कर्ज सस्ती दरों पर दिया जाएगा। और जो लोग नौकरी की जगह अपना रोजगार करने की राह पर निकल पड़े हैं, उन्हें बढ़ावा देने के लिए भी एक बड़ा एलान है। जिन लोगों ने तरुण श्रेणी में मुद्रा लोन लेकर चुका दिया है, उनके लिए नया मुद्रा लोन लेने की सीमा दस लाख से बढ़ाकर बीस लाख रुपये कर दी गई है।
रोजगार में स्किल या कौशल का संकट दूर करने के लिए एक और बड़ा एलान है, इंटर्नशिप स्कीम। इसके तहत देश की पांच सौ बड़ी कंपनियों में एक करोड़ नौजवानों के लिए इंटर्नशिप का रास्ता खुलेगा। उन्हें हर महीने पांच हजार रुपये का स्टाइपेंड और छह हजार रुपये की एकमुश्त मदद दी जाएगी। कंपनियां इस खर्च का दसवां हिस्सा और ट्रेनिंग पर होने वाला खर्च अपने सीएसआर बजट से ले सकेंगी।
जाहिर है, योजनाएं तो अच्छी हैं, मगर अब चुनौती है इन्हें साकार करने की।
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हाल ही में लैंसेट ने शारीरिक निष्क्रियता से संबंधित एक सर्वे की रिपोर्ट प्रकाशित की है। इसमें 163 देशों और उनके क्षेत्रों में किए गए 507 सर्वे को रखा गया है। इसमें भारत भी शामिल है।
संबंधित बिंदु –
कुल मिलाकर, हमें शारीरिक गतिविधि में कमी को विलासिता समझने के बजाय एक प्रकार की कमी समझना होगा। इससे जुड़े कारणों को ठीक करने पर काम करना होगा।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधरित। 28 जून, 2024
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Date: 24-07-24
A message of fiscal stability, growth continuityYuvika Singhal, [ Co-Head, Research, QuantEco Research ]
The FY25 Union Budget has sent out a strong message under the new administration — there remains an unequivocal focus on stability (fiscal) and continuity (of sustainable growth impulses) amidst a new chiselled focus on providing growth a more inclusive character in India.
Focus on ‘weaker building blocks’
The 8.2% GDP growth in FY24, while commendable, was driven by an uneven K-shaped segmentation. The premiumisation of consumption, as seen in the robust demand for luxury cars, houses and goods, coincided with stagnant wages, low fast-moving consumer goods sales and (food) inflation continuing to vociferously bite those at the bottom end of the income pyramid. The fiscal deficit, at 5.6% of GDP in FY24, still high compared to pre-COVID-19 pandemic levels, provided the needed growth impetus via capital spending at a time when the private capex cycle remained much on the sidelines. Against this background, the FY25 Budget, through a panoply of measures, has addressed the weaker building blocks, viz. to improve the quality of employment, fortify agriculture and bring in the micro, small and medium enterprises (MSMEs) into a meaningful roleplay in India’s manufacturing renaissance. This will pave the path to establish a Viksit Bharat by 2047.
From an agriculture perspective — currently a key priority — promotion of Atmanirbharta in pulses and oilseeds, a focus on agriculture research (bearing in mind the realities of climate change), large-scale clusters for vegetable production, and Digital Public Infrastructure (DPI) in agriculture for coverage of farmers and their lands, are all likely to support the Annadata (i.e., farmer). A thriving agriculture sector will allow the government to deliver on its promise of foodgrains under the Pradhan Mantri Garib Kalyan Anna Yojana (PMGKAY), now extended for five years.
On employment generation
The Budget entailed an energised focus on employment generation, for the youth especially, within the ambit of the formal workforce. A new scheme offering incentives to employers as well as employees who join the workforce for the first time, was announced at an outlay of ₹10,000 crore through the Ministry of Labour. Other fresh schemes incentivising internships with an outlay of ₹2,000 crore, and for skilling youth in collaboration with State governments and industry were envisaged. This somewhat resonates with the tripartite compact (between Centre, States, private sector) that the Economic Survey had recommended on the eve of the FY25 Union Budget to deliver on the rising aspirations of Indian youth.
Outlay towards housing saw a massive jump in the FY25 Budget. For urban Pradhan Mantri Awas Yojana (PMAY), the government allocated 37% more funds in FY25 versus FY24, which though impressive, pales into some degree of insignificance when compared to the 70% jump budgeted for the rural counterpart of the scheme. Housing for all remains a key hallmark of the government, which now embarks on its version 2.0.
The PLI Scheme too got a handsome raise of 75% in the FY25 Budget, driven by higher allocation to the auto sector. This was accompanied by tweaks to sectoral custom duties in a bid to support domestic manufacturing and deepen local value addition. Financing constraints, typically faced by MSMEs, were addressed via promise to facilitate term loans to MSMEs for purchase of machinery and equipment without collateral. To facilitate improved and undisrupted lending, banks will now be allowed to develop in-house credit assessment and a facilitation backed by the government to continue to extend credit to MSMEs even during stress times.
Most of these measures will dovetail handsomely with the macro focus of pushing a job-led growth in the medium term. Commendably, the government has succeeded in maintaining the fiscal discipline whilst extending a wide gamut of measures to stimulate the economy.
Looking ahead
Compared to the interim Budget’s fiscal deficit estimate of 5.1% of GDP, the government pruned the FY25 headline deficit target to 4.9%. It kept the intended 70 Basis points consolidation over FY24 intact, as in the interim Budget. This allows for a smoother transition to 4.6% fiscal deficit to GDP in FY26.
The display of intent to continue to consolidate its fiscal position well beyond FY26, preserves the trust that this government has earned from economy watchers in the last few years, despite facing the pressure of new demands by regional partners.
While the capex target was left unchanged at ₹11.1 trillion, the gains from the Reserve Bank of India’s transfer of a record high dividend of ₹2.1 trillion earlier this year were divided between higher welfare spends and a reduction in fiscal deficit.
All this will serve India well, at a time when domestic bonds have embarked on a maiden journey of getting included in global bond indices. In the face of greater scrutiny of India’s fiscal metrics by international agencies, now more than ever, an adherence to fiscal discipline prepares the groundwork for the possibility of a sovereign rating upgrade in the future.
Date: 24-07-24
विकसित भारत का लक्ष्यसंपादकीय
मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल का पहला आम बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने यही प्रकट किया कि विकसित भारत का लक्ष्य उनकी निगाह में है। इसी कारण आम बजट अंतरिम बजट की कड़ी दिख रहा है। इस बजट से यह साफ है कि कृषि उत्थान के साथ-साथ रोजगार के अधिकाधिक अवसर पैदा करना मोदी सरकार की प्राथमिकता है।
इन दोनों क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देना आवश्यक था, क्योंकि किसानों की आय बढ़ाने के साथ रोजगार के पर्याप्त अवसर पैदा करने के वादे सरकार के लिए परेशानी का कारण बने हुए थे। बजट में किसानों और कृषि क्षेत्र के लिए लगभग डेढ़ लाख करोड़ रुपये के प्रविधान किए गए हैं।
बजट का जोर कृषि के बुनियादी ढांचे को मजबूत करने, कृषि में तकनीक को बढ़ावा देने और किसानों का रुझान प्राकृतिक खेती की ओर करने पर है, लेकिन कृषि और किसानों की दशा सुधारने के लिए जो उपाय किए जाने हैं, उन्हें वांछित सफलता तब मिलेगी, जब राज्य सरकारें कृषि संबंधी केंद्रीय योजनाओं को सहयोग देने के साथ किसानों की दशा सुधारने के लिए अपने हिस्से की भी जिम्मेदारी का निर्वाह करेंगी।
राज्य सरकारों का यह रवैया समस्याजनक है कि कृषि क्षेत्र का उत्थान तो केवल केंद्र की जिम्मेदारी है। बजट में रोजगार के सवाल का समाधान करने के लिए जो कई उपाय किए गए हैं, वे युवाओं को उत्साहित करने वाले तो हैं, लेकिन देखना यह होगा कि इस सिलसिले में सरकार ने जिन तीन नई योजनाओं की घोषणा की है, वे रोजगार के कितने मौके उपलब्ध करा सकेंगी?
युवाओं के लिए यह घोषणा खासी आकर्षक है कि सरकार पांच सौ बड़ी कंपनियों में एक करोड़ युवाओं को इंटर्नशिप कराएगी और उन्हें पांच हजार रुपये महीना देगी। अच्छा हो कि इस दायरे में अन्य कंपनियां भी लाई जाएं, ताकि अधिकाधिक युवाओं का कौशल विकास हो सके।
यह महत्वपूर्ण है कि लोकसभा चुनावों में अपेक्षित परिणाम न मिलने के बाद भी सरकार ने खुद को लोकलुभावन योजनाओं से दूर रखा और देश को विकसित बनाने में सहायक बनने वाली योजनाओं पर अपना ध्यान केंद्रित रखा और ऐसा करते समय वित्तीय अनुशासन को प्राथमिकता दी।
यह सरकार के आत्मविश्वास का परिचायक तो है, लेकिन इसके बाद भी इस बजट में देश की सूरत बदलने वाले क्रांतिकारी उपायों का अभाव दिखता है। ले-देकर आयकर कानून की समीक्षा का वादा किया गया है। आर्थिक सर्वे में कहा गया है कि शहरीकरण की तेज रफ्तार के चलते अगले पांच-छह वर्षों में 40 प्रतिशत आबादी शहरों में रह रही होगी।
इसे देखते हुए शहरों के विकास पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए था, क्योंकि शहर आर्थिक विकास के इंजन होते हैं। समस्या यह है कि शहरों के विकास के मामले में राज्य सरकारों का रवैया भी ढीलाढाला है। यह समझना होगा कि विकसित भारत का लक्ष्य केंद्र और राज्यों के सहयोग से ही हासिल किया जा सकता है।
Date: 24-07-24
वित्तीय अनुशासन पर कायम सरकारधर्मकीर्ति जोशी, ( लेखक क्रिसिल में मुख्य अर्थशास्त्री हैं )
अपने तीसरे कार्यकाल के पहले बजट में भी मोदी सरकार ने वित्तीय अनुशासन की राह पर चलने की अपनी परिपाटी को कायम रखा। अस्थिर एवं उथल-पुथल भरे वैश्विक एवं घरेलू माहौल में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट के माध्यम से संतुलन साधने का प्रयास किया। किसी बड़ी रेवड़ी के एलान से परहेज करते हुए उन्होंने आवश्यक क्षेत्रों के लिए सरकारी खजाने का मुंह खोलने से संकोच भी नहीं किया।
स्वस्थ राजस्व संग्रह के साथ ही भारतीय रिजर्व बैंक से सरकार को जो अतिरिक्त लाभांश प्राप्त हुआ, उसका उपयोग भी बहुत विवेकसम्मत ढंग से किया गया। सरकार ने जहां इसका कुछ हिस्सा राजकोषीय घाटे को घटाने में किया तो वहीं शेष राशि को वहां खर्च किया, जहां इसकी सबसे अधिक आवश्यकता महसूस हो रही थी।
जैसे सरकार ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को सहारा देने, कौशल विकास एवं रोजगार सृजन, एमएसएमई सहित समग्र मैन्यूफैक्चरिंग को प्रोत्साहन, शहरी आवास की समस्या के समाधान और महंगाई को काबू करने से जुड़े उपाय तलाशने में अपने संसाधन लगाए। देखने में ये भले ही बड़े खर्चे लगें, लेकिन इनकी प्रकृति बहुत उत्पादक किस्म की होती है।
जैसे कौशल विकास से लोगों के लिए रोजगार के अवसर बढ़ते हैं तो उद्योगों को अपनी आवश्यकताओं के अनुरूप कर्मियों की आपूर्ति होती है। इसी प्रकार, शहरी आवास के निर्माण की योजना को देखें तो जहां उनके निर्माण से बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन की संभावनाएं बनेंगी, वहीं ऐसी परिसंपत्तियों का भी सृजन होगा जो दीर्घकाल में उद्योगों से लेकर कामगारों की आवासीय आवश्यकताओं की पूर्ति में सहायक होंगी। इस प्रकार की गतिविधियों से आर्थिक गतिविधियों में लोगों की भागीदारी बढ़ती है, जिससे अंतत: आर्थिकी को ही गति मिलती है।
विभिन्न मदों में अपना खर्च बढ़ाने के बावजूद यदि सरकार राजकोषीय घाटे को जीडीपी के 4.9 प्रतिशत तक लाने में सफल रही तो यह बहुत सराहनीय कहा जाएगा। यह अंतरिम बजट में घाटे के 5.1 प्रतिशत के अनुमान से भी बेहतर प्रदर्शन है। वित्त मंत्री ने आगामी वित्त वर्ष में न केवल घाटे के दायरे को और घटाकर 4.5 प्रतिशत पर लाने का एलान किया, बल्कि यह भी कहा कि सरकार चरणबद्ध रूप से अपनी उधारी का दायरा घटाएगी।
असल में सरकार का राजकोषीय घाटा बढ़ने का अर्थ बाहरी उधारी पर उसकी निर्भरता बढ़ना है। इससे जहां ब्याज अदायगी पर सरकारी राजस्व का एक बड़ा हिस्सा खर्च हो जाता है, वहीं आर्थिक गतिविधियों के लिए वित्तीय तंत्र में संसाधनों की किल्लत भी पड़ जाती है। राजकोषीय घाटे का बेलगाम होना कई मोर्चों पर चिंता का सबब बन जाता है। यही कारण है कि इसे काबू करना सरकार की प्राथमिकताओं में शामिल होता है और मोदी सरकार इस मोर्चे पर खरी उतरती आ रही है।
उत्पादक खर्चों में कोई कंजूसी न करते हुए सरकार ने पूंजीगत व्यय को बढ़ाए रखने का सिलसिला कायम रखा है। देश में पिछले कुछ समय से बुनियादी ढांचे के विकास ने तेज रफ्तार पकड़ी है। केंद्र सरकार इस मोर्चे पर राज्य सरकारों से लेकर निजी क्षेत्र को भी साधकर समन्वित प्रयासों पर जोर दे रही है। चूंकि बुनियादी ढांचे का प्रभाव कई स्तरों पर देखने को मिलता है, इसलिए इस पर जोर दिया जाना आवश्यक ही नहीं, अपितु अपरिहार्य हो जाता है।
बुनियादी ढांचे के विकास से निजी क्षेत्र के लिए भी अनुकूल कारोबारी परिवेश तैयार होता है। बजट में निजी क्षेत्र को और सहारा देने के लिए सरकार ने कई वस्तुओं पर ड्यूटी घटाई है। इससे देश में मोबाइल फोन से लेकर चार्जर का निर्माण किफायती होगा। मूल्यवान धातुओं सहित कई अन्य वस्तुओं पर ड्यूटी घटने से उनके दाम भी संभलेंगे, जो वर्तमान परिस्थितियों में बहुत आवश्यक हो गया था।
मैन्यूफैक्चरिंग के मोर्चे पर लेबर इंटेंसिव एमएसएमई के लिए क्रेडिट गारंटी योजना और मुद्रा लोन का दायरा बढ़ाना भी सराहनीय कदम हैं। कौशल विकास और इंटर्नशिप से जुड़ी पहल न केवल रोजगार सृजन का विस्तार करेगी, बल्कि उद्यमों को भी बड़ा सहारा देगी। अतिरिक्त कर्मियों की भर्ती पर सरकार का 3,000 रुपये का प्रोत्साहन भी नई नौकरियों को बढ़ावा देने में प्रभावी सिद्ध हो सकता है।
आर्थिक मोर्चे को संतुलन प्रदान करने की दृष्टि से महंगाई पर अंकुश लगाने को सरकार ने अपनी प्राथमिकता सूची में रखा। अक्सर देखने में आता है कि महंगाई की स्थिति मौद्रिक मोर्चे के बजाय आपूर्ति शृंखला से जुड़ी होती है तो सरकार ने इस स्थिति को सुधारने के लिए कदम उठाए हैं। इस दिशा में जलवायु परिवर्तन की दृष्टि से अप्रभावित विभिन्न फसलों की नई किस्मों की पेशकश जैसी पहल की गई है।
इससे प्रतिकूल मौसमी परिघटनाओं से फसल को होने वाले नुकसान पर अंकुश लगने के साथ ही आपूर्ति के समीकरण भी नहीं बिगड़ेंगे और किसानों के हित भी सुरक्षित रहेंगे। सरकार कृषि उपज के भंडारण के लिए भी कमर कसे हुए है। निजी आयकर की दरों में बहुत मामूली फेरबदल किए हैं।
इसे लेकर वेतनभोगी वर्ग में असंतुष्टि का भाव दिख सकता है, क्योंकि ये शाश्वत अपेक्षाएं हैं। पूंजी बाजार से जुड़े विभिन्न करों के स्तर पर भी नकारात्मक प्रतिक्रियाएं देखने को मिली हैं। हालांकि पूंजीगत लाभ जैसे कर को लेकर अभी बहुत स्पष्टता नहीं है, लेकिन इसे बाजार में विभिन्न प्रकार के करों को एक स्तर पर सुसंगत करने की दिशा में आगे बढ़ने का संकेत माना जा सकता है। वैसे भी, प्यूचर एंड आप्शन यानी एफएंडओ को लेकर बीते दिनों तमाम तरह की आशंकाएं जताई गईं तो उसे देखते हुए यह अपेक्षित लग रहा था कि कुछ कदम जरूर उठाए जाएंगे। एंजल टैक्स की विदाई नि:संदेह स्वागतयोग्य है।
माना जा रहा था कि चुनावी झटके के बाद बजट कुछ लोकलुभावन हो सकता है, लेकिन सरकार ने उचित ही उससे किनारा किया। यह सही है कि इस समय सरकार, बैंकों और उद्योगों के बहीखातों से लेकर समग्र अर्थव्यवस्था काफी बेहतर स्थिति में हैं, लेकिन वर्तमान वैश्विक परिस्थितियां जिस प्रकार बेहद अस्थिर एवं अनिश्चित हैं, उसे देखते हुए अपने कवच को जरा सा कमजोर करना बहुत भारी पड़ सकता है।
Date: 24-07-24
समावेशी विकास के हरसंभव उपायविवेक देवराय आदित्य सिन्हा, ( देवराय प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के प्रमुख एवं सिन्हा परिषद में ओएसडी-अनुसंधान हैं )
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट में वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप अपनी प्राथमिकताएं गिनाई हैं। उनकी पहली प्राथमिकता ग्रामीण अर्थव्यवस्था एवं कृषि को समर्पित रही। बजट में कृषि उत्पादकता को बढ़ाने एवं जलवायु परिवर्तन की चुनौती के मद्देनजर विशेष किस्मों के विकास के लिए व्यापक अनुसंधान के जरिये खेती-किसानी के कायाकल्प की योजना बनाई है।
इस दिशा में करीब 109 उच्च उत्पादकता वाली किस्में न केवल खाद्य सुरक्षा के लिए कवच की भूमिका निभाएंगी, बल्कि इनसे किसानों की आय भी सुधरेगी। प्राकृतिक कृषि को बढ़ावा और बायो-इनपुट संसाधन केंद्रों की स्थापना से भी कृषि को बड़ा संबल मिलेगा। दलहन एवं तिलहन को प्रोत्साहन से देश आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ेगा। उपभोग केंद्रों के निकट बड़े वेजिटेबल क्लस्टर और कृषि में डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर की पहल से आपूर्ति सुधरने के साथ ही बाजारों तक किसानों की पहुंच सुगम होगी।
दूसरी प्राथमिकता कौशल विकास एवं रोजगार से जुड़ी है। इसके अंतर्गत विशेष पैकेज में दो लाख करोड़ रुपये का प्रविधान है, जिससे 4.1 करोड़ युवा लाभान्वित होंगे। पहली बार नौकरी में आए कर्मियों को 15,000 रुपये तक का एक महीने का पारिश्रमिक दिया जाएगा, जिससे 2.1 करोड़ युवाओं को लाभ मिलेगा।
विनिर्माण में रोजगार सृजन को प्रोत्साहन से 30 लाख नए कर्मियों को फायदा पहुंचेगा। वहीं, अतिरिक्त कर्मियों की भर्ती पर नियोक्ताओं को 3,000 रुपये प्रति माह दिए जाएंगे, जिसके माध्यम से 50 लाख नई भर्तियों की योजना है। महिलाओं की रोजगार में भागीदारी बढ़ाने के लिए कामकाजी महिलाओं के लिए हास्टल से लेकर अन्य सुविधाएं विकसित की जाएंगी।
कौशल विकास के लिए 1,000 आइटीआइ को उन्नत करना, 20 लाख युवाओं का केंद्रीय योजनाओं के जरिये कौशल विकास और आदर्श कौशल ऋण योजना को नए सिरे से तैयार किया गया है। शिक्षा ऋण में छूट के साथ ही उसे और सुगम बनाया जाएगा। शीर्ष 500 कंपनियों में युवाओं को इंटर्नशिप दिलाई जाएगी। इससे रोजगार संकट के समाधान के साथ ही हुए उद्योगों की अपेक्षाएं भी पूरी होंगी।
समावेशी मानव संसाधन विकास एवं सामाजिक न्याय भी सरकार की प्राथमिकता में शामिल है। इसके लिए पीएम विश्वकर्मा, पीएम स्वनिधि और राष्ट्रीय आजीविका मिशन के जरिये दस्तकारों, स्वयं सहायता समूहों और स्ट्रीट वेंडर्स की मदद दी जाएगी। पूर्वोदय योजना के तहत बिहार, झारखंड, बंगाल, ओडिशा और आंध्र में इन्फ्रास्ट्रक्चर एवं मानव संसाधन विकास के जरिये वृद्धि को नए पंख लगाए जाएंगे।
एमएसएमई के लिए नई क्रेडिट गारंटी स्कीम मशीनरी एवं उपकरण खरीदारी में मददगार होगी। उनकी संभावनाओं का आकलन करने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को खास जिम्मा सौंपा गया है। एमएसएमई क्लस्टर्स के निकट सिडबी की शाखाओं के विस्तार से वित्त तक उनकी पहुंच भी बेहतर होगी। ई-कामर्स एक्सपोर्ट हब भी स्थापित होंगे। दिग्गज कंपनियों में इंटर्नशिप और विशेष औद्योगिक पार्कों की स्थापना से निवेश को लुभाने एवं रोजगार बढ़ाने में मदद मिलेगी।
शहरी विकास को प्राथमिकता में रखते हुए सरकार ने 30 लाख से अधिक की आबादी वाले कुछ बड़े शहरों को चिह्नित किया है। लोगों की आवास संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति की दिशा में करीब 10 लाख करोड़ रुपये की महत्वाकांक्षी योजना का एलान किया गया है। घर खरीदने पर ब्याज में छूट की सुविधा भी जारी रहेगी।
पीपीपी माडल के जरिये भी शहरी कामगारों के लिए आवास तैयार करने की योजना है। जल आपूर्ति, स्वच्छता और स्ट्रीट मार्केट से जुड़ी योजनाओं के माध्यम से शहरों में रहने के लिए अनुकूल परिवेश एवं रोजगार सृजन के प्रयास हुए हैं। सतत वृद्धि के लिए ऊर्जा सुरक्षा को प्राथमिकता के तहत मुफ्त बिजली के लिए पीएम सूर्य घर मुफ्त बिजली योजना के माध्यम से लोगों को छतों पर सोलर प्लांट लगाने के लिए प्रोत्साहन की पेशकश की गई है।
स्माल मॉड्यूलर न्यूक्लियर रिएक्टर के माध्यम से ऊर्जा संसाधनों का विविधीकरण किया जाएगा। एडवांस्ड अल्ट्रा सुपर क्रिटिकल थर्मल पावर प्लांट्स और ऐसी कुछ अन्य पहल के जरिये ऊर्जा सुरक्षा सुनिश्चित करने के साथ ही पर्यावरण संरक्षण की प्रतिबद्धता को भी रेखांकित किया गया है। पारंपरिक छोटे उद्यमों में इन्वेस्टमेंट-ग्रेड एनर्जी आडिट से भी स्वच्छ ऊर्जा के उपभोग को बढ़ावा मिलेगा।
इन्फ्रास्ट्रक्चर भी सरकार की वरीयता सूची में है। सरकार ने पूंजीगत व्यय के लिए 11.11 लाख करोड़ रुपये का प्रविधान करने के साथ ही राज्य सरकारों एवं निजी क्षेत्र को अतिरिक्त सहायता के संकेत दिए हैं। इस मोर्चे पर सड़क निर्माण, सिंचाई, बाढ़ नियंत्रण और जल प्रबंधन आदि से जुड़ी योजनाएं शामिल हैं।
पर्यटन को भी प्राथमिकता देते हुए सैलानियों को लुभाने एवं रोजगार बढ़ाने पर जोर दिया गया है। तकनीक के महत्व को समझते हुए शोध एवं विकास की दिशा में अनुसंधान नेशनल रिसर्च फंड के विस्तार की योजना है। अंतरिक्ष से जुड़ी आर्थिक संभावनाओं को भुनाने के लिए 1,000 करोड़ का विशेष कोष स्थापित किया जाना है।
भूमि से लेकर श्रम सुधारों के मुद्दे पर भी आगे बढ़ने के संकेत दिए हैं, जो बेहद आश्वस्तकारी कदम है, क्योंकि लंबे समय से ऐसे सुधारों की प्रतीक्षा हो रही है। इसी कड़ी में ईज आफ डूइंग बिजनेस, डाटा गवर्नेंस और टेक्नोलाजी अडाप्शन से भी आर्थिक सक्षमता बढ़ने के भरे-पूरे आसार हैं। कुल मिलाकर, कौशल विकास एवं रोजगार में लक्षित निवेश के माध्यम से बजट में सतत एवं समावेशी आर्थिक वृद्धि का खाका खींचा गया है।
Date: 24-07-24
संतुलन साधने वाला बजटसंपादकीय
केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने वित्त वर्ष 2024-25 का बजट पेश करते समय उस राजनीतिक संदर्भ का जिक्र नहीं किया, जिसमें उनके मंत्रालय को बजट तैयार करना पड़ा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली इस नई सरकार के समक्ष पहले की तुलना में अधिक चुनौतियां हैं। भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के कुछ कट्टर समर्थकों से चुनाव में सरकार को मिले कड़े संदेश के बाद उस पर दबाव काफी बढ़ गया था।
सरकार चलाने के लिए जनता दल यूनाइटेड और तेलुगू देशम पार्टी (तेदेपा) पर निर्भरता बढ़ने से इन दोनों दलों की मांगें पूरी करने का दबाव भी बढ़ गया था।
मगर सीतारमण एवं उनकी टीम ने इन राजनीतिक विवशताओं और सरकार की प्राथमिकताओं, विशेषकर राजकोषीय मजबूती के बीच संतुलन साध कर सराहनीय कार्य किया है।
बजट का एक बड़ा हिस्सा बिहार और आंध्र प्रदेश से जुड़ी परियोजनाओं को समर्पित था। परंतु, सीतारमण ने 2021 के बजट में जिस राजकोषीय मजबूती का मार्ग तैयार किया था, उसे कोई बड़ी क्षति नहीं पहुंची है। इस साल फरवरी में लेखानुदान में राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 5.1 प्रतिशत तक सीमित करने का लक्ष्य रखा गया था।
मगर बजट में इसमें किसी तरह का इजाफा करने के बजाय इसे संशोधित कर 4.9 प्रतिशत कर दिया। इतना ही नहीं, वित्त मंत्री ने वादा किया कि अगले वर्ष तक राजकोषीय घाटा जीडीपी का 4.5 प्रतिशत से नीचे रह जाएगा। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) से मिले 2.1 लाख करोड़ रुपये के भारी भरकम लाभांश की मदद से बजट आंशिक रूप से राजकोषीय समझबूझ के मोर्चे पर बेहतर साबित हुआ। फरवरी में अंतरिम बजट में लाभांश के अनुमान से सरकार को लगभग दोगुना रकम मिली।
राजकोषीय मोर्चे पर संयम जरूर दिखाया गया है मगर इससे व्यय की गुणवत्ता प्रभावित नहीं होने दी गई है। पूंजीगत व्यय को लेकर सरकार की प्रतिबद्धता में कोई कमी नहीं आई है। राजस्व व्यय में बढ़ोतरी कुल व्यय की तुलना में थोड़ी कम रही है। दिलचस्प है कि पूंजीगत व्यय में हुई बढ़ोतरी का कुछ हिस्सा राज्यों को भी आवंटित किया जाएगा।
हालांकि, यह रकम राज्यों को इस शर्त पर दी जाएगी कि वे आर्थिक विकास को बढ़ावा देने वाले सुधार करेंगे। हालांकि, इससे केंद्र और राज्य सरकारों के बीच पहले से चला रहा तनावपूर्ण संबंध और बिगड़ जाएगा।
दूसरी तरफ, सुधार को बढ़ावा देने के लिए केंद्र सरकार के पास सीमित विकल्प हैं और इसमें कोई संदेह नहीं कि सरकार इन सभी विकल्पों को आजमाएगी। सरकार उन मामलों में रकम खर्च करने में सतर्क रही है जहां सॉवरिन या सरकार की गारंटी पर्याप्त होती है। सरकार राज्य सरकारों को साथ लाने के लिए वित्तीय प्रोत्साहन का सहारा लेती रही है। ऐसा सूझ-बूझ वाला वित्तीय प्रबंधन सब्सिडी के आंकड़ों में भी साफ तौर पर परिलक्षित होता है।
सरकारी खरीद में कमी लाने से खाद्य सब्सिडी मद में व्यय कम हुआ है। भारत में राजकोषीय गणित तैयार करने में खाद्य सब्सिडी एक बड़ी समस्या रही है मगर अब जीडीपी के प्रतिशत के रूप में इसकी हिस्सेदारी धीरे-धीरे कम हो रही है। रोजगार की कमी एक अन्य बड़ी राजनीतिक बाधा रही है मगर इससे कभी सावधानी से नहीं निपटा गया।
उदाहरण के लिए बजट में ‘इंटर्नशिप’ योजना की घोषणा पूरी तरह सोच-समझकर नहीं की गई है। अगर यह योजना मूल स्वरूप में ही लागू हुई तो इससे मानव संसाधन नीतियों एवं निजी क्षेत्र में उथल-पुथल मच जाएगी। इससे संरक्षण एवं अक्षमता बढ़ जाएगी। इन पर दोबारा विचार करने की आवश्यकता आन पड़ सकती है।
बाजार ने बजट पर सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं दी। वित्त मंत्री ने दीर्घ अवधि के पूंजीगत लाभ पर कर 10 प्रतिशत से बढ़ाकर 12.5 प्रतिशत कर दिया है और लघु अवधि के पूंजीगत लाभ पर कर भी 15 प्रतिशत से बढ़ाकर 20 प्रतिशत कर दिया गया है। वायदा एवं विकल्प कारोबार लेनदेन पर कर दरें बढ़ा दी गईं। हालांकि बाजार की प्रतिक्रिया से इतर इन बदलाव के आधार मजबूत हैं।
बजट में संरक्षणवादी नीति में आंशिक बदलाव करने की भी घोषणा हुई है जिसका स्वागत किया जाना चाहिए। लगभग 50 वस्तुओं पर सीमा शुल्क में कमी की गई है। सीतारमण ने सीमा शुल्क को तर्कसंगत बनाने का भी वादा किया है। कम एवं स्थिर शुल्कों की बदौलत ही भारत वैश्विक आपूर्ति व्यवस्था का हिस्सा बन सकता है।
करों में बदलाव पर कुछ नकारात्मक प्रतिक्रियाएं इसलिए आई हैं कि यह स्पष्ट नहीं है कि भविष्य में प्रत्यक्ष करों की राह कैसी होगी। अगले वर्ष राजकोषीय घाटे पर बजट में उत्साहजनक वादा जरूर किया गया है मगर घाटे एवं कर्ज पर लक्ष्य अभी भी स्पष्ट नहीं हैं। इस पर स्थिति साफ होती तो काफी मदद मिली होती।
Date: 24-07-24
उम्मीदों का बजटसंपादकीय
जिस दौर में वैश्विक स्तर पर अर्थव्यवस्थाओं में काफी उथल-पुथल और चिंताजनक हालात बने हुए हैं, उसमें मंगलवार को पेश बजट ने एक तरह से सबका खयाल रखने का आश्वासन दिया है। बजट के कुछ अहम बिंदुओं को देखते हुए यह साफ लगता है कि तीसरी बार सत्ता में आने के बाद नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार की प्राथमिकताओं में अब शायद कुछ बदलाव आया है। वित्त मंत्री के रूप में निर्मला सीतारमण ने अपने भाषण की शुरुआत में ही कहा कि शिक्षा और रोजगार के लिए बजट में 1.48 लाख करोड़ रुपए का प्रावधान किया गया है। यानी सरकार पिछले कुछ समय से देश की राजनीति में चुनावी मुद्दा बने, लेकिन प्रकारांतर से उपेक्षित सवालों की सुध लेती दिखती है। देश में बेरोजगारी की चुनौतियों से जूझने के लिए तीन नई योजनाओं की घोषणा की गई है, जिसमें अगले पांच वर्षों के लिए दो हजार करोड़ रुपए की राशि तय की गई है। औपचारिक क्षेत्र में पहली बार नौकरी हासिल करने वालों को सरकार उनके पहले महीने के वेतन पर अनुदान के रूप में पंद्रह हजार रुपए तक की अतिरिक्त राशि देगी।
इसके अलावा, एक करोड़ युवाओं को पांच वर्ष में शीर्ष पांच सौ कंपनियों में प्रशिक्षुता या इंटर्नशिप का मौका देने की बात की गई है, जिसके तहत युवाओं को पांच हजार रुपए मासिक भत्ता दिया जाएगा। जाहिर है, लंबे समय के बाद ऐसा लगता है कि बेरोजगारी की समस्या की गंभीरता को स्वीकार करने की कोशिश की गई है। आमतौर पर इस पर सबकी नजर रहती है कि बजट में मध्यवर्ग के लिए क्या कोई राहत है। इस लिहाज से देखें तो सरकार ने नई कर व्यवस्था की दरों में जो बदलाव किया है, उससे लोगों के साढ़े सत्रह हजार रुपए तक बच सकते हैं और अब तीन लाख रुपए की आय तक कोई आयकर नहीं देना होगा। अप्रत्यक्ष कर की दरों में बदलाव के बाद अब कैंसर की कुछ दवाएं, मोबाइल फोन, सोना-चांदी के दाम में कमी आने की संभावना है। मगर आम लोग जिस महंगाई से जूझ रहे हैं, उससे कितनी राहत मिलेगी, इस मसले पर कोई स्पष्टता नहीं है। हालांकि कृषि और ग्रामीण क्षेत्रों के विकास पर विशेष ध्यान देने के अलावा प्रधानमंत्री शहरी आवास योजना के तहत किए गए नए प्रावधानों से मध्यवर्ग को लाभ मिल सकता है।
इसी तरह, कर ढांचे के नए स्वरूप से ऐसा लगता है कि सरकार की मंशा लोगों को पैसा बचाने के बजाय खर्च करने का विकल्प चुनने की ओर प्रवृत्त करने की है। अल्पकालिक पूंजीगत लाभ और दीर्घकालिक पूंजीगत लाभ के नियमों में हुए बदलाव का असर इस रूप में सामने आया कि बजट भाषण के दौरान ही शेयर बाजार धड़ाम से गिर गए। एक उम्मीद यह थी कि पिछले कुछ समय से रेल यात्रा के समूचे तंत्र को लेकर जितने बड़े पैमाने पर सवाल उठे थे, तो सरकार बजट में शायद इस पर ध्यान दे। मगर विचित्र यह है कि रेलवे क्षेत्र के लिए कोई बड़ी घोषणा नहीं हुई इस बजट में खासतौर पर बिहार और आंध्र प्रदेश के लिए जिस तरह अलग से बड़े एलान किए गए हैं, उसने सबका ध्यान खींचा है। खासतौर पर बिहार के लिए छब्बीस हजार करोड़ की बड़ी राशि देने की घोषणा की गई। यह सभी जानते हैं कि मौजूदा सरकार के गठन में जद ( एकी) और तेलगु देसम की क्या भूमिका रही है। यही वजह है कि विपक्ष ने इसे ‘सरकार बचाओ’ बजट कहा है। बहरहाल, सरकार अगर इसे उम्मीदों का बजट बता रही हैं, तो आने वाले वक्त में ये आश्वासन कसौटी पर रहेंगे।
Date: 24-07-24
एकाकीपन का दंशसंपादकीय
सभ्यता के विकास क्रम में कायदे से होना यह चाहिए था कि सामाजिकता की जड़ें मजबूत हों और सरोकार की संवेदना को ज्यादा से ज्यादा जगह मिले। मगर आधुनिक समाज में नए-नए तकनीकों के सहारे रोज आधुनिक होती दुनिया में मनुष्य की पहुंच का दायरा तो विस्तृत हुआ है, मगर इसी क्रम में एक नई समस्या यह पैदा हुई है कि हजारों मील दूर किसी व्यक्ति से रिश्तों के आभासी तार जोड़ने वाला कोई इंसान वास्तविक समाज के साथ जुड़ाव को महसूस करने की संवेदना खोता गया । यह बेवजह नहीं है कि बहुत सारे लोग अकेलेपन के दंश को अलग-अलग रूप में झेलते हैं, मगर इसकी वजहों और हल को लेकर उनके भीतर कोई स्पष्टता नहीं बन पाती। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने इस स्थिति को ‘जुड़ाव न महसूस करने के सामाजिक दर्द रूप में परिभाषित किया है। अगर कोई व्यक्ति इस समस्या के जाल में खुद को फंसा हुआ पा रहा है और उसके प्रति सहज या अनुकूलित होता जा रहा है, तो इससे ऐसे व्यक्ति की मानसिक और शारीरिक सेहत में तेज गिरावट हो सकती है। एक शोध में इसका आकलन इस रूप में किया गया है कि सामाजिक जुड़ाव की भावना का अभाव हर रोज पंद्रह सिगरेट पीने के बराबर का स्वास्थ्य जोखिम पैदा करता है।
दरअसल, अलग-अलग कारणों से अपने दायरे में सिमटते जा रहे लोग न केवल सामूहिकता बोध से वंचित हो रहे हैं, बल्कि कई गंभीर बीमारियों को पलने का मौका दे रहे हैं। अफसोस यह है कि स्मार्टफोन या आधुनिक यंत्रों को बहुत सारे लोग आज अपने सामाजिक संबंधों के दुनिया भर में विस्तृत होने का जरिया मानते हैं। मगर इंटरनेट पर लोगों की फैलती दुनिया कितनी आभासी है, इसका पता तब चलता है, जब किसी गंभीर मानसिक या शारीरिक परेशानी में लोग फंसते हैं और उस समय उन्हें वास्तविक दुनिया के मनुष्यों की जरूरत होती है। तब उन्हें अपने परिजन, रिश्तेदार, करीबी दोस्त याद आते हैं, जो उसे इस संजाल से निकलने में मदद कर सकते हैं। मगर तकनीक आधारित कथित आधुनिकता के मूल्यों और उसमें सिमटती दुनिया में लोग लगातार भीड़ में अकेले पड़ते जा रहे हैं। इसलिए जरूरी है कि लोगों के बीच प्रत्यक्ष रूप से आपसी मेलजोल बढ़े, सहयोग पर आधारित सामाजिकता बोध की भावना मजबूत हो ।
Date: 24-07-24
संतुलित बजटसंपादकीय
वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण का 2024 का बजट कई मामलों में संतुलित माना जाएगा। नरेन्द्र मोदी की अगुवाई में राजग सरकार के तीसरी बार सत्ता में आने के बाद यह पहला बजट है। बजट में निसंदेह मानव संसाधन विकास और बुनियादी विकास पर विशेष ध्यान दिया गया है। केंद्र सरकार वेतनभोगियों की उम्मीदों में वह खरी उतरीं। नई टैक्स व्यवस्था में अब स्टैंडर्ड डिडक्शन पचास हजार से बढ़ाकर पिच्छत्तर हजार रुपए कर दिया। वेतनभोगियों को इनकम टैक्स में 17,500 रुपए तक की बचत होगी। वित्तमंत्री का कहना है कि इनकम टैक्स एक्ट की छह महीने में समीक्षा की जाएगी। कैपिटल गेन छूट की सीमा बढ़ा दी गई है। महिलाओं द्वारा खरीदी गई संपत्ति पर स्टॉम्प ड्यूटी कम करने के साथ ही चुनिंदा शहरों में साप्ताहिक हाट या स्ट्रीट फूड हब डेवलप करने की योजना भी है। सौ बड़े शहरों के लिए जलापूर्ति, सीवेज उपचार व ठोस अपशिष्ट परियोजनाओं की भी घोषणा की। देश में घरेलू क्रूज का परिचालन करने वाली विदेशी शिपिंग कंपनियों के लिए सरल कर व्यवस्था दी। सरकार ने स्पेस इकोनॉमी के लिए हजार करोड़ रुपए के वेंचर कैपिटल फंड स्थापित करने का भी प्रस्ताव रखा। सोने-चांदी पर कस्टम ड्यूटी घटाकर 6 फीसद व प्लैटनियम पर 6.5 फीसद का प्रस्ताव रखा। टीडीएस में देरी को अपराध से बाहर कर सीतारमण ने नौकरीपेशा को राहत दी है। केंद्रीय बजट में युवाओं के रोजगार के लिए 500 टॉप कंपनियों में एक करोड़ युवाओं को इंटर्नशिप मुहैया कराने के साथ ही पांच हजार रुपए महीने स्टाइपेंड देने की भी बात की। बजट के जरिये सियासी समीकरण दुरुस्त करने और विपक्षी धार को कुंद करने की रणनीति के तहत सरकार ने अपने अहम सहयोगी दलों जेडी(यू) व टीडीपी शासित राज्यों बिहार व आंध्र प्रदेश के लिए विशेष पैकेज दिया। हालांकि इस दिलदारी से बाकी राज्यों में सरकार के खिलाफ आवाज तेज होगी। खैर, जैसी उम्मीदें थीं, बजट वैसा नहीं रहा। विपक्ष का आरोप है कि बजट में गरीबों व आम लोगों के लिए कुछ नहीं है। साथ ही इसे राजनीतिक पूर्वाग्रह से ग्रसित भी बताया। राहुल गांधी ने इसे कुर्सी बचाओ व कॉपी-पेस्ट बजट तक कह दिया। यह कहना गलत नहीं होगा कि देश की अर्थव्यवस्था तेजी से स्थिर होने के बावजूद क्षेत्रीय असंतुलन गंभीर बना हुआ है। मगर तमाम चुनौतियों के बावजूद धन प्रबंधन करने में सीतारमण ने किसी को निराश नहीं होने देने की भरपूर कोशिश की है।
Date: 24-07-24
अपनी जिम्मेदारी में खरा उतरा बजटएन.के.सिंह, ( अध्यक्ष 15वां वित्त आयोग )
यह केंद्रीय बजट भारत के सामने मौजूद तमाम अहम मुद्दों को संबोधित करता है। यह 2047 तक भारत को विकसित अर्थव्यवस्था बनाने के संकल्प को साकार करने की दिशा में प्रेरित करने की एक अहम पहल है। यह सराहनीय है कि इसमें कई विरोधाभासों को अनेक तरीकों से सुसंगत बनाने की कोशिश की गई है। वाकई, संतुलन बनाने के लिए बुद्धिमत्ता और नेतृत्व की जरूरत होती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने इस कार्य को पूरी जिम्मेदारी के साथ विश्वसनीय रूप से अंजाम दिया है। आइए, बजट के खास बिंदुओं पर विचार करते हैं-
पहला, भारत, हाल के वर्षों में शायद अकेला ऐसा देश है, जिसने सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था बनने के अलावा विकास के गुणों को समग्र आर्थिक स्थिरता के साथ जोड़ने की कोशिश की है। वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद में 6.5 से 7 प्रतिशत की वृद्धि जारी रहने की उम्मीद है, जबकि मुद्रास्फीति रिजर्व बैंक के 4.5 फीसदी के की ओर बढ़ रही है। विकास की गति जारी रखते हुए समग्र रोडमैप आने वाले वर्ष में राजकोषीय घाटे के पांच प्रतिशत से कम रहने का सुझाव देता है, जो मध्यम अवधि के लक्ष्य 4.5 प्रतिशत के अनुरूप है।
दूसरा, अनेक दबावों के बावजूद, अंतरिम बजट के साथ तालमेल बिठाते हुए पूंजीगत व्यय पर जोर जारी है। इस वर्ष भी पूंजीगत व्यय 11.11 लाख करोड़ रुपये है, जो भारत की जीडीपी का 3.4 प्रतिशत है। सड़कों, राजमार्गों, हवाई अड्डों और औद्योगिक गलियारों में सुधार के लिए यह धन मांगा गया है। इससे भारतीय अर्थव्यवस्था की दीर्घकालिक प्रतिस्पद्र्धा दक्षता बढ़ेगी और बड़े पैमाने पर रोजगार के अवसर पैदा होंगे।
तीसरा, पहली बार बजट में रोजगार सृजन के साथ प्रौद्योगिकी के उपयोग पर ध्यान दिया गया है। 500 शीर्ष कंपनियों में एक करोड़ युवाओं को इंटर्नशिप के लिए प्रभावी कार्यक्रम की घोषणा हुई है, जहां कंपनियों से प्रशिक्षण और इंटर्नशिप लागत का 10 प्रतिशत अपने सीएसआर फंड से वहन करने की उम्मीद की जाएगी।
चौथा, इसी क्रम में रोजगार सृजन के इंजन के रूप में पर्यटन के महत्व को पहचानते हुए वित्त मंत्री ने घोषणा की है कि सरकार सफल काशी विश्वनाथ मंदिर कॉरिडोर की तर्ज पर विष्णुपाद मंदिर कॉरिडोर और महाबोधि मंदिर कॉरिडोर के विकास में सहयोग करेगी, ताकि इन तीर्थस्थलों को विश्वस्तरीय तीर्थ और पर्यटन स्थलों में शुमार किया जा सके।
पांचवां, बजट यह मानता है कि कृषि के तौर-तरीके को बढ़ती पर्यावरणीय चुनौतियों से जोड़ने की जरूरत है। वित्त मंत्री ने जिक्र किया है कि सरकार उत्पादकता बढ़ाने और जलवायु-अनुकूल किस्मों के विकास के लिए कृषि अनुसंधान ढांचे की व्यापक समीक्षा करेगी।
छठा, विनिर्माण क्षेत्र में यह एक महत्वपूर्ण खोज रही है कि पहली बार अतिरिक्त रोजगार को प्रोत्साहित करने के लिए योजना घोषित हुई है। यहां प्रोत्साहन कर्मचारी और नियोक्ता, दोनों को दिया जाएगा। बजट में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) पर विशेष ध्यान दिया गया है, जिसमें एमएसएमई को वैश्विक स्तर पर बढ़ाने और प्रतिस्पद्र्धा के लिए वित्त-पोषण, विनियामक परिवर्तन और तकनीकी मदद देने के वास्ते पैकेज की घोषणा हुई है।
सातवां, कॉरपोरेट कर दर में कटौती से प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को भी प्रोत्साहन मिलेगा और प्रौद्योगिकी के विकास को बल मिलेगा। जिस गति से भारत में वैश्विक क्षमता केंद्र (जीसीसी) बन रहे हैं, जिनकी संख्या 1,600 से अधिक है और 2028 तक 2,100 से ज्यादा होने का अनुमान है, उससे अर्थव्यवस्था का आधुनिकीकरण होगा और देश प्रौद्योगिकी के मामले में ज्यादा सक्षम बनेगा। अपनी विशाल आबादी का लाभ उठाने के लिए यह काम जरूरी है।
आठवां, कर संरचना में सुधार की कोशिश हुई है। कर संरचना को तर्कसंगत बनाने से जीएसटी से अपेक्षित राजस्व लाभ में सुधार होगा। सीमा शुल्क के संबंध में बात करें, तो शुल्क संरचना में सुधार काफी समय से लंबित था और यह भारत की कराधान संरचना को अंतरराष्ट्रीय संरचनाओं के अनुरूप बनाएगा।
नौवां, प्रत्यक्ष करों के संबंध में भी मौलिक समीक्षा की जरूरत पहचानते हुए आयकर अधिनियम 1961 की व्यापक समीक्षा के प्रति प्रतिबद्धता जताई गई है। ऐसा करने के पिछले प्रयास सफल नहीं रहे हैं। इसे वैश्विक मानदंडों के अनुरूप बनाने की जरूरत है। उम्मीद है, इस व्यापक समीक्षा के नतीजे तय समय सीमा में सामने आएंगे और 2025 के बजट में प्रतिबिंबित होंगे। हालांकि, इसके लिए इंतजार न करते हुए कर संरचना में कुछ बदलाव किए गए हैं।
दसवां, बिहार और आंध्र प्रदेश के लिए विशेष प्रबंध काफी समय से लंबित थे। प्रति व्यक्ति आय सबसे कम होने के चलते बिहार विकास के पिरामिड में सबसे निचले पायदान पर कायम है। बिहार अपने बुनियादी ढांचे में सुधार के लिए एक निश्चित पहल का हकदार है। एक बिजली परियोजना और अन्य अनेक विकास योजनाओं की घोषणा की गई है। बोधगया, राजगीर, वैशाली और प्राचीन नालंदा विश्वविद्यालय की क्षमता का लाभ उठाया जाएगा। इसी तरह से आंध्र प्रदेश के संबंध में भी प्रतिबद्धताओं को पूरा करने की दिशा में कदम उठाए गए हैं। हालांकि, इसकी रूपरेखा ऐसी लग सकती है कि ऐसा गठबंधन सरकार की मजबूरियों की वजह से किया गया है, पर गहराई से देखें, तो सभी को बिहार की विकास संबंधी मजबूरियों और स्थानीय प्रतिबद्धताओं को पूरा करने पर गौर करना चाहिए।
यह बजट अक्षय ऊर्जा के दौर में व्यवस्थित बदलाव के लिए भी जिम्मेदारी से काम करता दिखता है। भारत को वैश्विक प्रतिबद्धताओं को भी पूरा करना है और जलवायु अनुकूल बुनियादी ढांचा हमें जिम्मेदार देश के रूप में आगे बढ़ने में सक्षम बनाएगा। कुल मिलाकर, यह एक ऐसा बजट है, जिसका लाभकारी प्रभाव आने वाले महीनों में महसूस किया जाएगा। शेयर बाजार सूचकांक में फौरी बदलाव के प्रति ज्यादा सही प्रतिक्रिया के लिए बजट के बारीक लफ्जों को पढ़ने और समझने की जरूरत है। मैं इस बजट को विश्वसनीयता, जिम्मेदारी और सुसंगतता के मामले में उच्च रेटिंग दूंगा।
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जैसे-जैसे ऊर्जा की मांग बढ़ेगी, सभी देशों के लिए परमाणु ऊर्जा एक आवश्यक विकल्प बनता जाएगा। इस हेतु छोटे माड्यूलर रिएक्टर या नैट्रियम एसएमआर परियोजनाओं का विकास अनेक देशों में चल रहा है।
कुछ बिंदु –
‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 22 जून, 2024
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Date: 23-07-24
Cooking It Just RightSC order banning display of names at eateries along Kanwar route removes a govt-created blotTOI Editorials
The Supreme Court’s interim order putting a pause on UP, Uttarakhand and MP govt directives – for food stalls, shacks and eateries along the route of Shiv bhakts’ annual trek, ‘kanwar yatra’, to display their names and their staff’s – is a relief for both proprietor and pilgrim. States were wrong to enforce, with gusto and precision, such a measure. As SC said, food laws require that menus be displayed, and food be correctly labelled. People, petitioners argued, visit restaurants basis the menu, not who’s serving or cooking – which directly feeds into politics of “untouchability”. Thus, the case stood on the trinity of, SC said, “safety, standard and secularism”.
Livelihood hit | The measure had a chilling effect with restaurants forced to ask Muslim employees to stand down during the yatra. The workers, largely pasmanda, would thus lose wages, and proprietors, their workers. The kanwar yatra has been the busiest season for decades for these eateries, fruit sellers and food stalls on the 240km odd route with multiple paths, catering to hungry, thirsty, exhausted walkers. The non-compliant would have had to cough up fines. The choice then was between a fine and the possibility of economic boycott. It was unconscionable for states to roll out such a targeted measure that hits livelihoods of certain sections during a certain festival along a certain route – Muslims along UP’s districts, and OBC/Dalit-concentrated pockets in districts from UP into Uttarakhand.
Introducing a fault | Any rationale was missing from the word go. Unsurprisingly, directives drew new fault lines. Several kanwars too criticised the directive. There’s, after all, also the matter of choice. Peer pressure is big in community activity such as this. If a kanwar were to patronise a restaurant against his group’s choice, it might destroy camaraderie within kanwar groups. SC’s order rightly brings pause. But these govt directives should be altogether nixed. They speak to poor governance, and poorer politics.
Date: 23-07-24
Quest for quotaBangladesh needs to address its booming unemployment crisisEditorial
The violent student protests in Bangladesh against the controversial job quota system, which have claimed at least 163 lives, have exposed the fragility of the civil society-state relationship in Prime Minister Sheikh Hasina’s country, despite her back-to-back election victories. While the trigger was a High Court decision, last month, to reintroduce the old quota system — 56% of government jobs for different categories, including 30% for the descendants of freedom fighters — Ms. Hasina’s handling of the crisis made the situation worse. When student protests, backed by the opposition Bangladesh Nationalist Party, broke out, she dismissed the protesters as Razakars, which is considered to be derogatory as it refers to those who aided the Pakistani military’s genocide of locals in erstwhile East Pakistan prior to the creation of Bangladesh. There were also allegations that the student wing of Ms. Hasina’s Awami League attacked the protesters, besides police and paramilitary forces. The crisis spiralled out of control, bringing Dhaka, the megacity of 10.2 million people, to a grinding halt. On Sunday, the Bangladesh Supreme Court scaled back the quota system, offering a major victory to the protesters. The 30% quota has now been brought down to 5%, and remaining reservations to 2%, while 93% government jobs would be open for all Bangladeshis.
The quota system, established in 1972, has been a sensitive issue for years. In 2018, after violent protests, Ms. Hasina scrapped all reservations through an executive order. The protesters’ opposition now is driven by both the economic realities of the South Asian nation of 170 million and political concerns. Despite rapid economic growth under Ms. Hasina’s leadership, Bangladesh remains a poor country where youth unemployment stands at around 20%. Government jobs are seen as more stable and highly sought after. Growing frustration among the youth has been a social time bomb. The protesters and opposition parties also say the quota system mostly benefits the Awami League, which fought for independence, and helps the ruling party tighten its grip over the bureaucracy. The Supreme Court’s order has come as a relief for both sides. Ms. Hasina should be willing to talk to the protesters and opposition leaders to find a lasting solution by reforming the reservation system. The Prime Minister’s high-handed style and the persistent hostility between the government and the opposition are also hurting the country’s institutions and weakening its political system. Ms. Hasina should show accountability by ordering an independent investigation into the high number of deaths of protesters. And in the long run, her government should address the booming unemployment crisis, which, if left unchecked, will come back to haunt her one way or the other.
Date: 23-07-24
नीतियां गलत हों तो उनमें तुरंत सुधार होना चाहिएसंपादकीय
एक आधुनिक, उभरती अर्थव्यवस्था के राजकाज में प्रशासनिक ही नहीं, नीतिगत गलतियां भी हो सकती हैं। लेकिन सरकार का काम है, उन्हें तत्काल पहचानना और उनमें संशोधन करना। किसान कानून बगैर जनविमर्श के तैयार किए गए और इनके हानि-लाभ पर व्यापक चर्चा किए बिना ये आनन-फानन में पारित किए गए। किसानों को शक हुआ कि सरकार पूंजीवादी व्यवस्था की पोषक है और उत्पादन सभी साधन पूंजीपतियों के हाथों में देना चाहती है। लिहाजा विरोध हुआ। सरकार की मंशा जो भी रही, लेकिन उसका राजनीतिक घाटा भी उठाना पड़ा। देर आयद दुरुस्त आयद, कानून खत्म किए गए। नोटबंदी भी एक ऐसा ही फैसला था, जो गवर्नेस के शीर्ष पर बैठे लोगों ने बगैर व्यापक चर्चा के अचानक कर लिया। न्याय प्रणाली को लेकर तीन कानून बने। तीनों के नामों का भारतीयकरण तो हुआ ही, दंड संहिता की हर धारा की संख्या बदल दी गई। करीब 250 वर्षों से जुबान पर चढ़ी हत्या की दफा 302 आईपीसी अब 101 बीएनएस कहलाएगी। सवाल है कि क्या धाराओं की संख्या बदले बिना सामान्य संशोधन से नहीं किया जा सकता था? कुल 23 में से 18 अध्याय यथावत पुरानी संहिता से लिए गए हैं। यानी संशोधन या नए कानूनों की संख्या इतनी नहीं है कि देश की न्याय व्यवस्था, पुलिस, अभियोजन, वकील और आम जनता को पूरी की पूरी संहिताओं से दो-चार कराया जाए। फिर जब इतना व्यापक और प्रोग्रेसिव सुधार (बकौल गृहमंत्री) करना ही था तो क्या इसे देश की सबसे प्रमुख पेशेवर संस्था विधि आयोग को भेजने की जगह मात्र चुने हुए कुछ लोगों के जरिए बगैर किसी विपक्ष के, मात्र दो दिन में पारित कराना किसान कानून सरीखी गलती नहीं मानी जाएगी ? गलतियों को समय रहते सुधारना राजधर्म का मुख्य तकाजा है।
Date: 23-07-24
छोटे दुकानदारों से ही क्यों मांगे जाते हैं तमाम ब्योरे?विराग गुप्ता, ( सुप्रीम कोर्ट के वकील, ‘अनमास्किंग वीआईपी’ पुस्तक के लेखक )
कांवड़ के मार्ग में नाम की तख्ती लगाने सम्बंधी विवाद पर सुप्रीम कोर्ट के स्थगन आदेश के बावजूद बहस खत्म नहीं हुई है। इस पर धर्माचार्यों के बयानों में कालनेमि का उल्लेख आया है। मारीच के बेटे कालनेमि राक्षस ने कपट वेश धारण करके हनुमान जी को रोकने की कोशिश की थी। दरअसल भारत का समाज, संविधान और अर्थव्यवस्था सभी ‘कालनेमि सिंड्रोम’ के संकट से जूझ रहे हैं। लगभग 10.7 लाख कम्पनियों में से 56.5% की जीरो आमदनी है, जबकि 842 का 62% आमदनी पर आधिपत्य है। अमेरिका और जर्मनी की अर्थव्यवस्था पहले और तीसरे नम्बर पर है। वहां 50% और 61.3% से ज्यादा वयस्क लोग आयकर देते हैं। भारत में सिर्फ 2.2% लोग आयकर देते हैं, जिनमें से लगभग 6 लाख 47.6% टैक्स देते हैं। 60% से ज्यादा आबादी को फ्री सरकारी राशन, अग्निवीर और आरक्षण पर चल रहे विवादों से गरीबी, बेरोजगारी, असमानता और सम्पत्ति के केंद्रीकरण जैसे मर्ज की पुष्टि होती है। अर्थव्यवस्था में घुसे कालनेमि के विनाश के लिए बजट के माध्यम से 6 पहलुओं पर एक्शन लेना चाहिए।
1. ई-कॉमर्स में विक्रेता : ई-कॉमर्स कम्पनियां खुद को एग्रीगेटर बताते हुए ग्राहकों को अपना माल भी बेचती हैं। वेयरहाउसिंग से लेकर पूरी चेन पर नियंत्रण होने के बावजूद ये कम्पनियां इंटरमीडियरी की सुरक्षा के नाम पर टैक्स की हेराफेरी करती हैं। कांवड़ के मार्ग की तर्ज पर ई-कॉमर्स कम्पनियों की वेबसाइट, ऐप और प्रोडक्ट से जुड़ी कम्पनियों के रिश्तों का खुलासा जरूरी है। इससे दुकानदारों की आमदनी बढ़ने के साथ सरकारी खजाने को ज्यादा टैक्स मिलेगा।
2. पैन नम्बर : दिल्ली में आप पार्टी के घटनाक्रम से साफ है कि नेताओं की शराब माफिया के साथ मिलीभगत है। अनेक राज्यों में नेताओं की सरपरस्ती में माइनिंग माफिया ने लूट मचा रखी है। कालेधन, भ्रष्टाचार और अपराध के नेटवर्क को उजागर करने के लिए नेताओं के सभी होर्डिंग, सभाओं, रैली, रोड शो में खर्च की रकम और भुगतान करने वाले का पैन नम्बर सार्वजनिक होना चाहिए।
3. स्थायी प्रतिष्ठान : टेक और सोशल मीडिया कम्पनियां सिंगापुर और दूसरे देशों के माध्यम से भारत में मुनाफा कमा रही हैं। भारत में इनकी 100% सब्सिडरी कम्पनियां, ऑफिस और कर्मचारी काम करते हैं। इसके बावजूद इन पर आयकर और कम्पनी कानून के अनुसार परमानेंट एस्टेब्लिशमेंट के नियम लागू नहीं होते। टेक कम्पनियां आयकर और कम्पनी कर की चोरी करने के साथ जीएसटी रिफंड में भी फर्जीवाड़ा कर रही हैं। भारत में व्यापार कर रही हर विदेशी कम्पनी का स्थायी पता और मालिक का नाम उनकी वेबसाइट व ऐप में प्रदर्शित करना जरूरी हो।
4. दिवालिया कंपनियों के प्रमोटर : बायजू, पेटीएम और कू जैसी कंपनियों के प्रमोटर निजी संपत्ति की गारंटी के बगैर बड़ा कर्जा ले लेते हैं। इसलिए कंपनियों के दिवालिया होने से उनकी सेहत में बदलाव नहीं आता। कम्पनियों के पैसे से प्रमोटर और डायरेक्टर निजी इस्तेमाल के लिए गाड़ी, मकान, पार्टी और शादी के खर्चे करके आयकर में छूट भी लेते हैं। इसलिए ऐसे सभी खर्चों में डायरेक्टर के टिन नम्बर और कम्पनियों के जीएसटी नम्बर डिस्प्ले होना चाहिए।
5. एफडीआई और शेयर मार्केट : बैंक लॉकर बरकरार रखने के लिए जनता को केवाईसी के नाम पर दस्तावेज देना पड़ रहे हैं। लेकिन शेयर मार्केट में मॉरीशस-सिंगापुर से आने वाले निवेश की पड़ताल भी नहीं होती। छोटे दुकानदारों से जो विवरण मांगे जा रहे हैं, उसी तर्ज पर विदेशी निवेश की भी जांच हो।
6. टेक कम्पनियों का विवरण : डंडे के जोर पर छोटे दुकानदारों से नियम लागू कराने वाला प्रशासन बड़ी कंपनियों के आगे फेल हो जाता है। बड़ी कम्पनियों का आधिपत्य है। इन कम्पनियों से जुड़ी सेवाओं पर इनके संचालकों का नाम और नम्बर डिस्प्ले हो तो संविधान में किए गए समानता के प्रावधान प्रभावी तरीके से सफल होंगे।
Date: 23-07-24
हिमालय के क्षेत्र में विकास चुनौती बनता जा रहा हैडॉ. सीमा जावेद, ( पर्यावरणविद, जलवायु परिवर्तन एक्सपर्ट )
जोशीमठ डरावने संकेत दे रहा है। मुसीबत सिर्फ इस इलाके में नहीं बल्कि खतरा पूरे हिमालयीन क्षेत्र के लिए है। जोशीमठ, बद्रीनाथ और केदारनाथ का प्रवेश द्वार होने के लिहाज से हमारे लिए बेहद महत्वपूर्ण है। यह तीन महत्वपूर्ण तीर्थस्थलों- हेमकुंड साहिब, बद्रीनाथ और शंकराचार्य मंदिर जाने का रास्ता है। चार धाम यात्रा करने वालों के लिए भी यही रास्ता है। इसलिए इस महत्वपूर्ण क्षेत्र में योजनाबद्ध तरीके से निर्माण होना चाहिए। लेकिन यहां बेतरतीबी से हो रहा विकास मुसीबत बनता जा रहा है।
हिमालयी इलाके भूस्खलन से अस्थिर होकर अपरिवर्तनीय क्षय में प्रवेश कर रहे हैं। इन इलाकों में बेतरतीब और बिना सोचे-समझे हुए शहरीकरण, बदलती जलवायु और हमारी अक्रियाशीलता इसके लिए सीधे तौर पर जिम्मेदार है। शहरीकरण के चलते पहाड़ों पर कंक्रीट में बदल रहे लकड़ी के घर, अनप्लांड कंस्ट्रक्शन, टूरिस्ट इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए बढ़ रहे होटल-रिजॉर्ट आदि में बेतहाशा इजाफा, जल विद्युत परियोजनाओं के चलते नदियों के प्राकृतिक प्रवाह में बाधा, पर्यावरण के लिहाज इस संवेदनशील क्षेत्र में बेतरतीब निर्माण और नियमों की अवहेलना का एक और नमूना है।
हिमालय का दरकना जलवायु परिवर्तन की वजह से मौसम के बिगड़े तेवरों की मिली जुली कहानी भी बयां करता है, जो प्राकृतिक और मानव निर्मित दोनों है। जलवायु परिवर्तन के कारण वायुमंडल में नमी की मात्रा बढ़ रही है, जिससे भारी बारिश और खतरनाक हीटवेव आ रही हैं। इस साल उत्तराखंड ने पिछले दो महीनों में चरम मौसम की स्थितियों का सामना किया है। देहरादून में 9 जून से 20 जून तक लगातार 11 दिनों तक तापमान 40℃ डिग्री से अधिक रहा। वहीं, मई में भी शहर में आठ दिनों तक तापमान 40 डिग्री ℃से ऊपर दर्ज किया गया। मुक्तेश्वर में मई में कम से कम पांच मौकों पर तापमान लगभग 30℃ डिग्री रहा, जो पहाड़ी इलाकों में हीटवेव का संकेत है।
जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ते तापमान और लंबे सूखे की अवधि ने जंगलों में आग की घटनाओं को भी बढ़ा दिया है। जून में जहां अधिकतम तापमान ने रिकॉर्ड तोड़े, वहीं जुलाई में मूसलधार मानसूनी बारिश ने बाढ़ और भूस्खलन की स्थिति पैदा कर दी। 1 जून से 10 जुलाई तक उत्तराखंड में कुल बारिश 328.6 मिमी दर्ज की गई, जो सामान्य 295.4 मिमी से 11% अधिक है। इस समय, राज्य के सभी 13 जिलों में जुलाई के महीने में बारिश का अधिशेष दर्ज किया गया है। देश का एक बड़ा हिस्सा सिस्मिक जोन-5 में आता है, जो भूकंप की दृष्टि से सबसे अधिक संवेदनशील है। इसमें उत्तराखंड भी शामिल है। पर्वतीय क्षेत्रों की प्राकृतिक संपदा का दोहन तो किया ही गया, वहां से निकलने वाली नदियों से भी छेड़छाड़ की गई।
उत्तराखंड कोई अकेला राज्य नहीं है, जहां पर घरों और अन्य भवनों के निर्माण में सिविल इंजीनियरिंग के मानकों की धज्जियां उड़ाई गई हों। उत्तराखंड जैसी ही कहानी हिमाचल की भी है। पर्वतीय क्षेत्रों में किए जाने वाले अंधाधुंध निर्माण को लेकर पर्यावरणविदों एवं वैज्ञानिकों ने बार-बार आगाह करने की कोशिश की लेकिन ना तो वहां रहने वालों ने और ना स्थानीय सरकारों ने इस बारे में कोई खास तवज्जो दी।
Date: 23-07-24
दुकानदार का नामसंपादकीय
जैसे आसार थे, वैसा ही हुआ, उत्तर प्रदेश में कांवड़ यात्रियों के मार्ग की दुकानों पर उनके मालिक का नाम लिखने के निर्देश का मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने इस निर्देश पर रोक लगा दी और चूंकि ऐसे ही निर्देश उत्तराखंड सरकार ने भी जारी किए थे और मध्य प्रदेश सरकार की ओर से भी जारी किए जाने की चर्चा हो रही थी, इसलिए उसने तीनों राज्य सरकारों को नोटिस जारी किए। दुकानदारों को अपनी दुकान पर अपना नाम लिखने संबंधी निर्देश इसलिए प्रश्नों के घेरे में था, क्योंकि यह स्पष्ट नहीं था कि आखिर इसका उद्देश्य क्या है? उत्तर प्रदेश में मुजफ्फरनगर प्रशासन की ओर से कांवड़ मार्ग के दुकानदारों को अपनी दुकानों पर अपना नाम लिखने का निर्देश जारी करते हुए यह कहा गया था कि ऐसा भ्रम को दूर करने के लिए किया जा रहा है, लेकिन यह स्पष्ट नहीं था कि आखिर किस तरह का भ्रम? मुजफ्फरनगर प्रशासन का उद्देश्य कुछ भी हो, उसके निर्देश से यह संदेश निकला कि कांवड़ियों को परोक्ष रूप से यह संदेश देने की कोशिश की जा रही थी कि उन्हें मुस्लिम नाम वाली दुकानों से खाने-पीने की सामग्री न खरीदने का विकल्प दिया जा रहा है। चूंकि अब सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि दुकानदारों को केवल यह बताना होगा कि वे किस तरह का भोजन परोस रहे हैं, इसलिए कांवड़ियों और अन्य लोगों को अपनी पसंद का भोजन खरीदने-खाने की सुविधा और स्वतंत्रता होगी। वास्तव में यही होना चाहिए।
हर किसी को अपनी पसंद का भोजन खरीदने का अधिकार है और लोगों को यह पता होना ही चाहिए कि वे किस तरह की आहार सामग्री खरीद रहे हैं? कांवड़ यात्री ही नहीं, अन्य अनेक लोग भी शाकाहार पसंद करते हैं और कई बार वे उस दुकान से भी शाकाहार लेने से बचते हैं, जहां मांसाहार भी बनता-बिकता है। स्पष्ट है कि सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद कांवड़ यात्रियों और अन्य को यह चयन करने में आसानी होगी कि वे अपनी पसंद का भोजन कहां से खरीदें और कहां से नहीं? फिलहाल यह कहना कठिन है कि आगे इस मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट किस नतीजे पर पहुंचेगा, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जानी चाहिए कि कई धार्मिक यात्राओं में हर समुदाय के लोग अपनी दुकानें लगाते हैं। इनमें खाने-पीने की दुकानें भी होती हैं। इसके अतिरिक्त यात्रियों को किस्म-किस्म की सुविधाएं प्रदान करने वाले भी होते हैं। उनके सामने यह बाध्यता नहीं होती कि वे अपना नाम लिखें। यह एक तथ्य है कि अमरनाथ यात्रा में खाने-पीने की सामग्री बेचने वालों के अलावा खच्चर-टेंट वाले भी मुस्लिम होते हैं। इस मामले की आगे की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट से यह भी अपेक्षा है कि वह यह देखे कि हलाल प्रमाणन के नाम पर जो कुछ हो रहा है, वह कितना सही है?
Date: 23-07-24
टिकाऊ विकास की राहसंपादकीय
मुख्य आर्थिक सलाहकार (CEA) वी अनंत नागेश्वरन और वित्त मंत्रालय की उनकी टीम द्वारा तैयार आर्थिक समीक्षा (Economic Survey 2024) से एक स्पष्ट संकेत नजर आता है। वह यह कि भारतीय अर्थव्यवस्था महामारी से मजबूती से उबर चुकी है लेकिन विकसित भारत का लक्ष्य हासिल करने के लिए टिकाऊ वृद्धि के लिए निरंतर हस्तक्षेप की आवश्यकता होगी तथा कई उभरती आर्थिक और नीतिगत चुनौतियों का सामना करना होगा। महामारी के बाद भारत ने उच्च आर्थिक वृद्धि हासिल की है और इस दौरान उसे वित्तीय स्थिरता के साथ भी समझौता नहीं करना पड़ा। अब सबकी नजरें केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण पर होंगी जो मंगलवार को नरेंद्र मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल का पहला बजट (Budget 2024) पेश करेंगी। माना जा रहा है कि इस बजट में अन्य बातों के अलावा देश की अर्थव्यवस्था को लेकर मध्यम अवधि का खाका पेश किया जाएगा।
वृद्धि के नजरिये से देखें तो 2023-24 में देश का सकल घरेलू उत्पाद, कोविड के पहले वाले वर्ष यानी 2019-20 की तुलना में 20 फीसदी अधिक था। इसका अर्थ यह हुआ कि हमने 2019-20 से 2023-24 तक 4.6 फीसदी की चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि हासिल की। समीक्षा में कहा गया है कि देश का मौजूदा सकल घरेलू उत्पाद वित्त वर्ष 24 की चौथी तिमाही में महामारी के पहले के स्तर के करीब था। यह भी अनुमान जताया गया है कि देश की अर्थव्यवस्था चालू वर्ष में 6.5 से 7 फीसदी की दर से विकसित होगी। यह दर रिजर्व बैंक के 7.2 फीसदी के अनुमान से कम है। राजकोषीय स्थिति में भी महामारी के समय से अब तक काफी सुधार हुआ है। केंद्र सरकार का राजकोषीय घाटा जो पिछले वर्ष सकल घरेलू उत्पाद के 6.4 फीसदी था, वह वित्त वर्ष 24 में कम होकर 5.6 फीसदी रह गया। कर संग्रह में वृद्धि तथा रिजर्व बैंक की ओर से अनुमान से अधिक स्थानांतरण जहां चालू वर्ष की राजकोषीय स्थिति में राहत प्रदान करेगा, वहीं बढ़ा हुआ सरकारी कर्ज चिंता का विषय है तथा उस पर नीतिगत ध्यान देने की आवश्यकता है।
महामारी के बाद की अवधि में वृद्धि सरकार के पूंजीगत व्यय से अधिक संचालित रही है। वित्त वर्ष 24 में सरकार का पूंजीगत व्यय पिछले वर्ष की तुलना में 28.2 फीसदी बढ़ा और वह वित्त वर्ष 20 में दर्ज स्तर का करीब तीन गुना रहा। बहरहाल समीक्षा में इस बात को उचित ही रेखांकित किया गया है कि अब सरकार के बाद इसे आगे बढ़ाने का काम निजी क्षेत्र का है। निजी क्षेत्र के निवेश में सुधार के आरंभिक संकेत नजर आ रहे हैं लेकिन इस रुझान को बरकरार रखना होगा। जैसा कि समीक्षा में कहा गया है, भविष्य की वृद्धि कई कारकों पर निर्भर करेगी जिनमें भू-राजनीतिक विभाजन और विभिन्न देशों के बीच बढ़ता अविश्वास शामिल है। उदाहरण के लिए 2023 में करीब 3,000 व्यापार प्रतिबंध लागू किए गए। इसके अलावा नीतिगत योजना में उभरती तकनीकों को शामिल करने का भी वृद्धि और विकास पर असर होगा।
अल्प से मध्यम अवधि में जिन क्षेत्रों में नीतिगत ध्यान देने की आवश्यकता है उनमें उत्पादक रोजगार तैयार करना, कौशल की कमी को दूर करना, छोटे और मझोले उपक्रमों को प्रभावित करने वाले गतिरोधों को दूर करना, असमानता से निपटना और पर्यावरण के अनुकूल बदलाव का प्रबंधन शामिल हैं। बहरहाल यह ध्यान देने वाली बात है कि इनमें से कुछ मुद्दे ज्ञात हैं लेकिन दिक्कत यह है कि भारत उन्हें भलीभांति नहीं हल कर सका। इस बात ने समय के साथ वृद्धि और विकास संबंधी नतीजों को प्रभावित किया। समीक्षा में लंबी अवधि के लिए भी ऐसी नीतियों को भी रेखांकित किया गया जो लंबे समय के लिए कारगर हैं। उदाहरण के लिए कृषि क्षेत्र की दिक्कतें दूर करना, निजी निवेश को बढ़ावा देना और राज्य की क्षमता विकसित करना। सरकार के नए कार्यकाल की शुरुआत मध्यम से लंबी अवधि की वृद्धि रणनीति के समायोजन का सबसे बेहतर समय है। यह देखना होगा कि सरकार इन सुझावों पर किस प्रकार प्रतिक्रिया देती है। समीक्षा में चीन को लेकर भी कुछ अहम सवाल उठाए गए हैं जिन पर नीति निर्माण के दौरान बहस होनी चाहिए।
Date: 23-07-24
विकास का अर्थसंपादकीय
आर्थिक समीक्षा से बजट की रूपरेखा का अंदाजा लगाया जा सकता है। इसमें पिछले वर्ष की आर्थिक स्थितियों का लेखाजोखा पेश किया जाता है। इसी आधार पर आगामी वर्ष के लिए नीतियां निर्धारित होती हैं। इस वर्ष चूंकि आम चुनाव थे, पूर्ण बजट के बजाय अंतरिम बजट पेश किया गया था। आज इस वर्ष के लिए आम बजट पेश होगा। आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया है कि पिछला वर्ष आर्थिक विकास की दृष्टि से काफी महत्त्वपूर्ण रहा। कोरोना काल के बाद रोजगार के अवसर बढ़े हैं और बेरोजगारी की दर निरंतर घट रही है। भारत की कुल श्रमशक्ति में से सत्तावन फीसद स्वरोजगार में लगी हुई है। महंगाई के मोर्चे पर जरूर थोड़ी चुनौती उभरती रही है, पर अंतरराष्ट्रीय स्थितियों से तुलना करें तो इस पर अपेक्षाकृत काबू पाया जा सका है। इस वर्ष मानसून अच्छा रहने की वजह से जल्दी ही महंगाई की लक्षित दर हासिल कर ली जाएगी। इससे सकल घरेलू उत्पाद में कृषि क्षेत्र का प्रदर्शन भी बेहतर रहेगा। इस वर्ष विकास दर के साढ़े छह से सात फीसद रहने का अनुमान है। 2030 तक गैर-कृषि क्षेत्र में 78.5 लाख रोजगार सृजित करने की जरूरत रेखांकित की गई है। हालांकि वैश्विक मंदी की वजह से निर्यात के क्षेत्र में चुनौतियां बनी रह सकती हैं।
पिछले वर्ष के आर्थिक रुझानों के आधार पर सरकार ने इस वर्ष निजी क्षेत्र का निवेश बढ़ने का अनुमान लगाया है। इसके लिए निजी क्षेत्र को प्रोत्साहित करने के लिए बजट में प्रावधान किए जाएंगे। यों पहले से निजी क्षेत्र को बढ़ावा देने के उद्देश्य से अनेक बजटीय प्रावधान और योजनाएं लागू की जाती रही हैं। निजी उद्योगों की सुविधा के लिए कर, कर्ज आदि में छूट के अलावा श्रम कानूनों को लचीला बनाया गया। इससे पूंजीगत व्यय लगातार बढ़ा है। पिछले वर्ष निजी क्षेत्र के निवेश में नौ फीसद की बढ़ोतरी दर्ज हुई। वित्तमंत्री ने कहा है कि अब निजी क्षेत्र को अर्थव्यवस्था में अपना योगदान बढ़ाने का वक्त है। अगले वित्तवर्ष में बजट घाटा घट कर साढ़े चार फीसद तक रह जाने की संभावना जताई गई है। नए बजट में कृषि क्षेत्र पर भी ध्यान केंद्रित किया जाएगा। इस आर्थिक सर्वेक्षण में मुख्य रूप से हवाई सेवा क्षेत्र को बढ़ाने, शिक्षा और रोजगार के बीच संतुलन बिठाने, ड्रोन निर्माण में तेजी लाने और राज्यों की क्षमता बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित किया गया है। जाहिर है, आम बजट में इन क्षेत्रों के लिए विशेष योजनाओं पर बल होगा।
हालांकि इस सर्वेक्षण को विपक्ष ने अतिरंजित और आंकड़ों का खेल बताया तथा बजट में व्यावहारिक उपायों पर ध्यान केंद्रित करने की सलाह दी है। दरअसल, आंकड़ों में अर्थव्यवस्था की बुलंदी और व्यावहारिक धरातल पर बेहतरी के बीच कोई सहसंबंध नजर नहीं आता। एक तरफ तो आंकड़ों में तेजी से तरक्की करती अर्थव्यवस्था की गुलाबी तस्वीर नजर आती है, मगर आम जनजीवन के स्तर पर बेहतरी के कोई संकेत नजर नहीं आते। बेशक सरकार महंगाई और बेरोजगारी पर काबू पाने का दम भरती है, पर हकीकत यह है कि लोग रोजमर्रा उपभोग की वस्तुओं की कीमतें बढ़ने और क्रयशक्ति घटने की वजह से परेशान हैं। रोजगार के मोर्चे पर युवाओं को भरोसे का कोई काम मिलना कठिन बना हुआ है। जिस निजी क्षेत्र को प्रोत्साहन दिया जाता है, वह उस अनुपात में नौकरियां पैदा नहीं कर पा रहा। इसलिए बजट में अगर गंभीरता से व्यावहारिक नीतियों पर विचार नहीं होगा, तो मुश्किलें आसान नहीं होंगी।
Date: 23-07-24
खेती और खुदकुशीसंपादकीय
भारत को कृषि प्रधान देश कहा जाता है, मगर यहां के किसान आज भी कई तरह की समस्याओं और परेशानियों से घिरे हुए हैं। यही वजह है कि किसानों की आत्महत्या के मामले लगातार बढ़ते जा रहे हैं। महाराष्ट्र सरकार की एक रपट के मुताबिक, इस वर्ष जनवरी से जून के बीच राज्य में 1,267 किसानों ने आत्महत्या कर ली। राष्ट्रीय अपराध रेकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों से पता चलता है कि वर्ष 2022 में कृषि क्षेत्र से जुड़े 11,290 लोगों ने आत्महत्या कर ली, जिनमें 5,207 किसान और 6,083 खेतिहर मजदूर थे और इनमें महाराष्ट्र से सबसे ज्यादा थे। इसी तरह वर्ष 2021 में कृषि कार्यों में लगे 10,881 लोगों और 2020 में 10,677 लोगों ने अपनी जान दे दी। किसानों की खुदकुशी के पीछे पारिवारिक कर्ज या आर्थिक संकट को सबसे बड़ी वजह माना जाता है। हालांकि इन आर्थिक परेशानियों के भी कई स्तर हैं। मसलन, प्राकृतिक आपदा, कर्ज का बोझ, फसलों की बढ़ती लागत, घटती आय और फसलों के उत्पादन में गिरावट। महाराष्ट्र सरकार की रपट में कहा गया है कि राज्य में पिछले छह माह में किसानों की खुदकुशी के सबसे ज्यादा मामले विदर्भ क्षेत्र के अमरावती मंडल में सामने आए हैं।
बहुत से किसान खेती के लिए बैंक और साहूकारों से कर्ज लेते हैं और अगर प्राकृतिक आपदा की वजह से फसल बर्बाद हो जाए या उत्पादन कम हो, तो उनके लिए कर्ज चुकाना मुश्किल हो जाता है। उर्वरक, खेती के लिए उपकरण और सिंचाई पर होने वाला खर्च बढ़ रहा है, जबकि किसानों की आय में बढ़ोतरी नहीं हो रही है। लिहाजा, किसानों की आर्थिक परेशानियां बढ़नी स्वाभाविक हैं। लंबे समय से चली आ रही न्यूनतम समर्थन मूल्य के लिए कानूनी गारंटी की मांग भी लंबित है। दूसरी ओर, उद्योग जगत के ऋणों के प्रति सरकार के नजरिए में जो नरमी देखी जाती है, वह किसानों के लिए नहीं दिखती। ऐसे में किसानों की समस्याओं की जटिलता अगर उन्हें आत्महत्या के कगार पर ले जाती है तो इसे एक नतीजे के तौर पर देखा जा सकता है। इस समस्या के निराकरण के लिए ठोस और कारगर उपाय किए जाने जरूरत है, अन्यथा यह स्थिति और जटिल होगी।
Date: 23-07-24
संघीय ढांचे पर न आए आंचडॉ. आशुतोष कुमार
बाबा साहेब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने जब भारतीय संविधान में आरक्षण के प्रावधान को शामिल किया था, तब उन्होंने सोचा भी नहीं होगा कि आरक्षण एक समय भारतीय राजनीति की धुरी बनकर राजनेताओं के लिए एक ऐसा अमोघ मंत्र बन जाएगा, जिसका इस्तेमाल किसी के कल्याण के लिए कम और किसी को परास्त करने के लिए ज्यादा किया जाएगा। आज आरक्षण के पीछे किसी पिछड़े या वंचित समाज के कल्याण की भावना कम और राजनीतिक स्वार्थ अधिक दिखती है। सही मायने में आज आरक्षण राजनीति का झुनझुना बन गया है, जिसे चुनाव जैसे विशेष मौकों पर जनता को रिझाने के लिए बजाया जाता है।
बहरहाल, आरक्षण एक बार फिर चर्चा में है। आरक्षण को लेकर चर्चा के केंद्र बिंदु में है कर्नाटक। कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने निजी क्षेत्र की नौकरियों में कन्नड़ लोगों के लिए 100 प्रतिशत आरक्षण को लेकर सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर पहले एक पोस्ट की थी, जिसे बाद में उन्होंने हटा लिया था। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर एक पोस्ट किया था, जिसमें कहा गया है कि कैबिनेट ने कर्नाटक में निजी उद्योगों और अन्य संगठनों में प्रशासनिक पदों के लिए 50 प्रतिशत और गैर- प्रशासनिक पदों के लिए 75 प्रतिशत आरक्षण तय करने वाले विधेयक को मंजूरी दी।
सिद्धारमैया ने पोस्ट में कहा था, ‘हमारी सरकार की इच्छा है कि कन्नड़ लोगों को अपनी जमीन पर आरामदायक जीवन जीने का अवसर दिया जाए हम कन्नड़ समर्थक सरकार हैं। हमारी प्राथमिकता कन्नड़ लोगों के कल्याण का ध्यान रखना है। उन्हें कन्नड़ भूमि में नौकरियों से वंचित होने से बचाया जाए। हम कन्नड़ समर्थक सरकार हैं। हमारी प्राथमिकता कन्नडिगास के कल्याण की देखभाल करना है। जब उनके इस पोस्ट पर इस पर हर तरफ छीछालेदर होने लगा। विरोध में प्रतिक्रियाएं आने लगीं, तो दो दिन बाद उन्होंने सोशल मीडिया ‘एक्स’ प्लेटफॉर्म पर से पिछली पोस्ट हो हटाकर उसमें बदलाव कर दिया। कर्नाटक सरकार ने फिलहाल इस पर रोक लगा दी है। इसके साथ ही कहा जा रहा है कि कर्नाटक सरकार इस बिल पर पुनर्विचार करेगी, लेकिन यहां मौजू सवाल यह है कि आखिर इसकी जरूरत ही क्यों पड़ी। इसके पीछे सरकार की मंशा क्या है? कहीं आरक्षण की आड़ में देश के संघीय ढांचे को ध्वस्त करने की कोशिश तो नहीं की जा रही ? अगर नहीं, तो अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए देश की एकजुटता और अखंडता पर प्रहार क्यों किया जा रहा है। आमतौर पर इस तरह की कोशिश क्षेत्रीय दल की सरकार में की जाती है, क्योंकि क्षेत्रीय दल अपने को उस राज्य के प्रति ज्यादा उत्तरदायी समझते हैं, जहां उनकी सरकार होती है। हालांकि इस तरह की सोच भी देश के संघीय ढांचे के लिए खतरनाक है। फिलवक्त कर्नाटक में तो कांग्रेस की सरकार है, फिर सिद्धारमैया सरकार ने ऐसी संकीर्ण मानसिकता क्यों दिखाई। जाहिर तौर पर इससे राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस को नुकसान उठाना पड़ेगा, लेकिन यहां चिंता का विषय कांग्रेस का नुकसान नहीं, अपितु राष्ट्र का और देश के संघीय ढांचे के नुकसान को लेकर है।
अगर सभी राज्य सरकारें अपनी मर्जी की मालिक हो जाएंगी, तब तो देश का स्वरूप ही बिखर जाएगा। देश है, देश का एक स्वरूप है, उसकी अस्मिता है, तभी आरक्षण है। यह कहना गलत न होगा कि भारत में आरक्षण की व्यवस्था सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को समृद्ध बनाने के लिए हुई थी, मगर समय के साथ आरक्षण वोट बैंक की राजनीति का शिकार बनती चली गई और अब तो स्थिति इतनी बिगड़ गई है कि आरक्षण की आंच देश की संघीय व्यवस्था पर भी आने लगी है। किसी राज्य में आरक्षण का दायरा बढ़ाने के लिए देश के स्वरूप और उसके संघीय ढांचे को ध्वस्त नहीं किया जा सकता। यह सहज ही समझा जा सकता है कि जब सभी राज्य सिर्फ अपने प्रदेश के लोगों को नौकरी देने लगेंगे। वहां के प्राइवेट सेक्टर में सिर्फ उसी राज्य के लोगों को रखा जाने लगेगा, राब भारत एक संघ रह जाएगा क्या? इसलिए राजनीतिक दलों और राज्य की सरकारों को यह जरूर सोचना होगा कि वे अपने प्रदेश के विकास की बात जरूर सोचें, प्रयास जरूर करें कि प्रदेश के लोगों को अपने ही राज्य में रोजी-रोजगार मिले, किंतु इसका भी ख्याल रखें कि देश की समावेशी संस्कृति को नुकसान न पहुंचे।
क्या कहता है भारतीय संविधान
भारतीय संविधान के भाग तीन में समानता के अधिकार की भावना निहित है इसके अंतर्गत अनुच्छेद 15 में प्रावधान है कि किसी व्यक्ति के साथ जाति, प्रजाति, लिंग, धर्म या जन्म के स्थान पर भेदभाव नहीं किया जाएगा। अनुच्छेद 15(4) के मुताबिक यदि राज्य को लगता है तो वह सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े या अनुसूचित जाति या अनुसूचित जनजाति के लिए विशेष प्रावधान कर सकता है। वहीं, अनुच्छेद 16 में अवसरों की समानता की बात कही गई है। अनुच्छेद 16(4) के मुताबिक यदि राज्य को लगता है कि सरकारी सेवाओं में पिछड़े वर्गों को पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है तो वह उनके लिए पदों को आरक्षित कर सकता है। वहीं, अनुच्छेद 16(4ए) के अनुसार, राज्य सरकारें अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के पक्ष में पदोन्नति के मामलों में आरक्षण के लिए कोई भी प्रावधान कर सकती हैं, यदि राज्य की राय में राज्य के अधीन सेवाओं में उनका पर्याप्त प्रतिनिधित्व नहीं है, लेकिन इन सबके पीछे संविधान ऐसा कुछ करने की इजाजत नहीं देता जिससे देश की अस्मिता, एकता और अखंडता पर खतरा उत्पन्न हो।
आरक्षण की ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
सबसे पहले विलियम हंटर और ज्योतिराव फुले ने 1882 में मूलतः जाति- आधारित आरक्षण प्रणाली का विचार प्रस्तुत किया था। आज जो आरक्षण प्रणाली लागू वह सही मायने में 1933 में लागू की गई थी, जब ब्रिटिश प्रधानमंत्री रामसे मैकडोनाल्ड ने ‘कम्युनल अवार्ड’ प्रस्तुत किया था। इस निर्णय में मुसलमानों, सिखों भारतीय ईसाइयों, एंग्लो- इंडियन यूरोपीय लोगों और दलितों के लिए पृथक निर्वाचिका का प्रावधान किया गया। लंबी चर्चा के बाद महात्मा गांधी और डॉ. भीमराव अंबेडकर ने ‘पूना पैक्ट’ पर हस्ताक्षर किए, जिसमें यह निर्णय लिया गया कि एक ही हिन्दू निर्वाचन क्षेत्र होगा, जिसमें कुछ आरक्षण होगे।
Date: 23-07-24
कांवड़ और न्यायालयसंपादकीय
सर्वोच्च न्यायालय ने पक्ष-विपक्ष में तर्क सुनने के बाद उस विवादास्पद आदेश पर शुक्रवार तक रोक लगा दी है, जिसमें कांवड़ यात्रा मार्ग पर भोजनालयों को मालिकों व कर्मचारियों के नाम प्रदर्शित करने का निर्देश दिया गया था। न्यायमूर्ति हृषिकेश रॉय और न्यायमूर्ति एसवीएन भट्टी की पीठ ने साफ कर दिया है कि खाद्य विक्रेताओं को मालिक, कर्मचारियों के नाम प्रदर्शित करने के लिए मजबूर नहीं किया जाना चाहिए। न्यायालय ने उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड और मध्य प्रदेश सरकारों को नोटिस भी दिया है। तय है, याचिकाकर्ता ने अपनी मजबूत दलीलों से सर्वोच्च न्यायालय से अपने अनुकूल अंतरिम आदेश प्राप्त कर लिया है और अब गेंद इन सरकारों के पाले में है, उन्हें अपने आदेश के बचाव में अकाट्य तर्क के साथ पेश होना पड़ेगा। दुकानों-ठेलों पर मालिक को नाम लिखने के लिए बाध्य करने वाला यह आदेश व्यापक है और इससे समाज में एक बड़े बदलाव की शुरुआत हो सकती है। अत: संविधान की रोशनी में आगे बढ़ना चाहिए।
यह अच्छी बात है कि न्यायालय अपने अंतरिम आदेश में भी सतर्क है। न्यायालय की भी यही मर्जी है कि कांवड़ियों (तीर्थयात्रियों) को उनकी प्राथमिकताओं के अनुरूप शाकाहारी भोजन परोसा जाए और स्वच्छता के मानकों को बनाए रखा जाए। न्यायालय को प्रथम दृष्टया भारतीय गणराज्य के धर्मनिरपेक्ष चरित्र की चिंता है और याचिकाकर्ता भी इस मोर्चे पर अपनी आशंकाओं का समाधान चाहते हैं। एक तर्क यह भी है कि केवल नाम या पते के प्रदर्शन से शुचिता या पवित्रता बहाल नहीं होगी और न इच्छित उद्देश्य की प्राप्ति होगी। याचिकाकर्ता के वकील अभिषेक मनु सिंघवी ने तर्क दिया है कि आप किसी रेस्तरां में व्यंजन सूची के आधार पर जाते हैं, न कि कौन परोस रहा है। यदि किसी दुकानदार का नाम-मजहब स्पष्ट हो जाएगा, तो पहचान के आधार पर बहिष्कार की आशंका है। याचिकाकर्ता ने यह भी तर्क दिया है कि अनेक शाकाहारी रेस्तरां के मालिक हिंदू हैं, पर वहां मुस्लिम भी काम करते हैं, तो क्या इस आधार पर भी भेदभाव किया जाएगा? इसमें कोई शक नहीं कि इस आदेश के खिलाफ आशंकाओं की एक लंबी फेहरिस्त तैयार हो गई है। एक दिलचस्प विवरण तो न्यायमूर्ति भट्टी ने सुनाया, ‘केरल में एक शाकाहारी होटल है, जिसे एक हिंदू चलाता है और एक होटल मुसलमान चलाता है। एक न्यायाधीश के रूप में मैं उस होटल में जाता था, जिसे मुसलमान चलाता था और वह स्वच्छता का अंतरराष्ट्रीय मानक बनाए रखता था।’ मतलब, शुचिता और गुणवत्ता का धर्म से कोई लेना-देना नहीं है, खान-पान सेवा में सही मानसिकता होनी चाहिए।
बहरहाल, कांवड़ यात्रा शुरू हो गई है। सावन का पहला सोमवार बीत चुका है और अब दुकानदारों के साथ ही कांवड़ियों पर भी किसी तरह का दबाव नहीं है, पर दुकानदारों के साथ ही कांवड़ियों और अन्य ग्राहकों को भी सावधानी बरतनी चाहिए। गुणवत्ता और स्वच्छता के प्रति सजगता जरूरी है, यह एक ऐसा मसला है, जिसके लिए केवल सरकारों पर निर्भर नहीं रहा जा सकता। अगर लोग यह तय कर लें कि वहीं खाएंगे और वहीं से सामान लेंगे, जहां विश्वस्तरीय मानक बनाए रखा जाता है, तो आधी से ज्यादा समस्या का समाधान यहीं हो जाएगा। यहां ज्यादा जिम्मेदारी खाद्य एवं स्वास्थ्य विभाग की है, पुलिस की नहीं। अंतिम फैसले में न्यायालय को जिम्मेदारी का भी स्पष्ट निर्धारण करना चाहिए, ताकि आशंकाओं की कोई गुंजाइश न बचे।
Date: 23-07-24
लोकसेवा आयोग पर बना रहे विश्वासविभूति नारायण राय, ( पूर्व आईपीएस अधिकारी )
आजादी के फौरन बाद जब बहुत सारे औपनिवेशिक अवशेषों को नष्ट करने की मांग उठ रही थी, एक ब्रिटिश निर्मिति को समाप्त करने से तत्कालीन गृह मंत्री और लौहपुरुष के नाम से विख्यात सरदार पटेल ने यह कहकर इनकार कर दिया था कि देश की एकता के लिए इस स्टील फ्रेम की जरूरत है। यह स्टील फ्रेम आईसीएस (इंडियन सिविल सर्विस) और आईपी (इम्पीरियल पुलिस ) नामक दो अखिल भारतीय सेवाओं के रूप में मौजूद था। आजाद भारत में उन्हें नए अवतारों आईएएस (इंडियन एडमिनिस्ट्रेटिव सर्विस) और आईपीएस (इंडियन पुलिस सर्विस) के रूप में सुरक्षित रखा गया। नई बोतल में पुरानी शराब की तरह इन सेवाओं का अहंता, परीक्षा, सेवा शर्तों से संबंधित ढांचा कमोबेश बरकरार रहा।
संविधान लागू होने के बाद एक बड़ा फर्क यह जरूर आया कि संघ और प्रांतीय लोक सेवा आयोगों के रूप में ऐसी स्वतंत्र संस्थाएं बन गई, जो अभ्यर्थियों का एक निश्चित पद्धति से आकलन करती है और फिर वांछित संख्या में उपयुक्त अभ्यर्थियों की सिफारिश सरकार को भेजती है। यह व्यवस्था बहुत प्रभावशाली तरीके से वर्षों तक काम करती रही, पर किसी भी अन्य संस्था की तरह लोक सेवा आयोगों में भी गिरावट आई और इन दिनों कुख्यात पूजा खेड़कर ने बेदर्दी से इस सड़ांध को इस कदर उजागर कर दिया है कि बदबू के मारे हमारी नाक फटी जा रही है।
प्रादेशिक और संघ लोक सेवा आयोगों के सदस्यों को सांविधानिक हैसियत हासिल होने के कारण इन्होंने दशकों तक बेहतरीन काम किया, पर बीते कुछ वर्षों में उनके विरुद्ध जो आरोप लगे हैं, उनसे आम जन का विश्वास डगमगा गया है। पिछले दिनों कई प्रदेश लोकसेवा आयोगों के अध्यक्ष और सदस्य भ्रष्टाचार के आरोपों में हटाए गए, यहां तक गिरफ्तार भी किए गए हैं। कुछ वर्ष पूर्व पंजाब लोकसेवा आयोग के सदस्यों के पास से करोड़ों रुपये बरामद किए गए थे। इसी तरह इलाहाबाद लोक सेवा आयोग के एक अध्यक्ष के विरुद्ध इतने गंभीर आरोप लगे कि उसी शहर में स्थित उच्च न्यायालय को संज्ञान लेना पड़ा। ये तो सिर्फ चंद नमूने हैं।
गिरावट की सबसे बड़ी वजह शायद यह है कि इन संस्थाओं के सदस्यों के रूप में हाड़-मांस के पुतलों की नियुक्ति होती है और उनका चयन करने वाले भी उन्हीं की तरह के मनुष्य ही होते हैं। समस्या की शुरुआत होती है, जब सरकारें सदस्यों या अध्यक्ष के पद पर जाति, क्षेत्र या सिफारिश के आधार पर नियुक्तियां करने लगती है। इन अयोग्य सदस्यों से योग्य अभ्यर्थियों के चयन की अपेक्षा करना उनके साथ ज्यादती ही होगी। संविधान द्वारा स्वतंत्र इस संस्था की राजनीतिक
नियुक्तियां खुद ही अपनी स्वायत्तता समर्पित करने को कितना उत्सुक रहती हैं, इसे एक उदाहरण से समझा जा सकता है। मुझे एक लोक सेवा आयोग के परीक्षा नियंत्रक रह चुके मित्र अधिकारी ने एक बार बातचीत के दौरान बताया कि उनके अध्यक्ष परीक्षा फल घोषित करने के पहले मुख्यमंत्री कार्यालय से हरी झंडी मांग थे। वे मुख्यमंत्री से बात कर यह भी बताना नहीं भूलते थे कि उनकी जाति के कितने उम्मीदवार सफल हुए हैं। ये अध्यक्ष महोदय बड़ी लंबी कानूनी जद्दोजहद के बाद ही हटाए जा सके और उनके कार्यकाल की सीबीआई जांच वर्षों से लंबित है।
पूजा खेड़कर के प्रकरण ने तो पूरे तंत्र की विफलता के नए कीर्तिमान कायम कर दिए हैं। पूरी तरह कम्प्यूटरीकृत संघ लोक सेवा आयोग यह नहीं पकड़ पाया कि पूजा अपने निर्धारित अवसरों से काफी अधिक बारह बार लिखित परीक्षा में बैठी थी। इसके लिए उसे सिर्फ अपने या माता-पिता के नामों की वर्तनी मे छोटे-मोटे हेर-फेर करने पड़े, अपने निवास का पता बदलना पड़ा या अलग-अलग कोणों से खींची गई तस्वीरें फॉर्म पर चिपकानी पड़ीं। यह विश्वास करना मुश्किल होगा कि बिना किसी अंदरूनी मानवीय मदद के संस्था के कंप्यूटरों को धोखा देना इतना आसान रहा होगा। वह एक ऐसी सीट पर चुनी गई थी, जो अन्य पिछड़ा वर्ग के गैर-मलाईदार और शारीरिक अक्षमताओं वाले अभ्यर्थियों के लिए सुरक्षित थी। पूजा का पिता राज्य सरकार का एक रिटायर अधिकारी है। अपनी सेवा के दौरान वह अपनी संपत्ति का वार्षिक ब्योरा जमा करता होगा और निश्चित रूप से यह फर्जी रहा होगा, क्योंकि अवकाश प्राप्ति के बाद जब वह चुनाव लड़ा, तो चुनाव आयोग को दिए विवरणों के अनुसार उसके, उसकी पत्नी और खुद उसकी बेटी पूजा के नाम से करोड़ों रुपयों के मूल्य की चल-अचल संपत्तियां थीं। स्पष्ट है, वह सेवा के दौरान महाराष्ट्र सरकार को दिए गए वार्षिक विवरणों में झूठ लिखता रहा होगा, नहीं तो वहां ही आय से अधिक संपत्ति का प्रकरण बन जाता और वह पकड़ा जाता। संघ लोक सेवा आयोग ने कितनी लापरवाही से पूजा द्वारा दिए गए विवरणों की जांच की, यह तो इसी से स्पष्ट है कि साल-दर- साल वह बिना पकड़े गए फर्जीवाड़ा करती रही।
यह भी कम चिंताजनक नहीं है कि पूजा खेड़कर ने जिन शारीरिक अक्षमताओं का दावा किया था, उनकी पुष्टि कराए बिना उसे नियुक्ति दे दी गई। यहां भी आयोग और नियुक्ति पत्र जारी करने वाले केंद्रीय सरकार के विभाग ने पर्याप्त और जरूरी पड़ताल की परवाह नहीं की। इन विवादों की चर्चा चल ही रही थी कि संघ लोक सेवा आयोग के अध्यक्ष के इस्तीफे की खबरें मीडिया में गश्त करने लगीं। हालांकि, उनसे जुड़े सूत्रों ने समझाने की कोशिश की है कि इस्तीफे और पूजा प्रकरण में कोई संबंध नहीं है, पर क्या ही अच्छा होता, यदि उन्होंने नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए यह कदम उठाया होता।
पाठकों ने हिंदी की कालजयी कहानी हार की जीत पढ़ी होगी, जिसमें नायक बाबा भारती को एक ठग द्वारा अपंग बनकर उनका घोड़ा चुराने पर अपनी क्षति से अधिक इस बात की चिंता होती है कि लोग अब किसी असहाय पर विश्वास करना छोड़ देंगे। पूजा खेड़कर का प्रकरण सामने आने के बाद लोगों ने उन तमाम लोगों पर शक करना शुरू कर दिया है, जिन्हें आर्थिक या शारीरिक अक्षमताओं के कारण चवन में मदद मिली है। इनमें से अधिकांश बिना किसी झूठ के अपनी योग्यता के बल पर चुने गए होंगे, लेकिन पूजा ने सबको सदिग्ध बना दिया है। सोशल मीडिया पर चुन-चुनकर उन्हें ट्रोल करना शुरू कर दिया गया है। कोई यह नहीं सोच रहा है कि पहले ही प्रकृति की ज्यादतियों के शिकार इन लोगों पर शक कर हम उन्हें अतिरिक्त घाव दे रहे हैं।
Date: 23-07-24
बढ़ते भारत की बेहतर तस्वीर पेश पर रहा आर्थिक सर्वेदलीप कुमार, ( अर्थशास्त्री )
सोमवार को संसद-पटल पर रखा गया साल 2023-24 का आर्थिक सर्वे विकसित होते भारत की तस्वीर दिखा रहा है। इसमें अनुमान लगाया गया है कि 2023-24 में भारत की वास्तविक जीडीपी में 8.2 फीसदी की वृद्धि हुई, जबकि 2022-23 में यह 6.5 प्रतिशत थी। यह स्थिति तब है, जब विश्व की औसत विकास दर 3.2 प्रतिशत ही है। यही नहीं, भारत की जीडीपी की वृद्धि दर 2024-25 में 6.5 से सात प्रतिशत तक रहने का अनुमान लगाया गया है। अर्थव्यवस्था में यह भरोसा इसलिए बना है, क्योंकि सर्वेक्षण मानता है कि देश का भू-राजनीतिक महत्व, आर्थिक झटकों को झेलने की क्षमता और ठोस व स्थिर घरेलू वृद्धि से भारत आर्थिक रूप से लगातार मजबूत बन रहा है। यही कारण है कि अब विशेष तौर पर शोध व अनुसंधान के क्षेत्र में निजी निवेश को प्रोत्साहित करने की बात आर्थिक सर्वेक्षण में कही गई है।
बहरहाल, सर्वे में सबकी नजर रोजगार के आंकड़ों पर थी। बेरोजगारी बढ़ने को लेकर लगातार सरकार पर हमला बोला जाता रहा है, मगर आर्थिक सर्वे की मानें, तो देश में बेरोजगारी घटी है। 2017-18 में यह दर जहां 17.8 प्रतिशत थी, वहीं साल 2022-23 में यह घटकर 10 प्रतिशत रह गई। अच्छी बात है कि शहरी बेरोजगारी में भी कमी आई है, भले ही यह बेहद मामूली ही क्यों न हो। दरअसल, आम लोगों की नजर में रोजगार का मतलब सरकारी या स्थायी नौकरी होता है, पर कर्मचारी भविष्य निधि संगठन, यानी ईपीएफओ के आंकड़ों के आधार पर भी सरकार रोजगार की स्थिति नापती है और यह आंकड़ा बताता है कि 2019 में जहां 61.1 लाख कर्मचारियों के पास ईपीएफओ खाता था, वहीं 2024 में यह बढ़कर 131.5 लाख हो गया। यानी, पांच वर्षों में करीब-करीब दोगुनी संख्या में नए कामगार ईपीएफओ से जुड़े हैं। सुखद है कि श्रमबल में महिलाओं की संख्या भी अच्छी-खासी बढ़ी है और उनमें 2017-18 से लेकर 2022-23 में 16.9 प्रतिशत की वृद्धि हुई है।
महंगाई को लेकर भी आर्थिक सर्वे में कुछ अलग कहानी दिखती है। मुद्रास्फीति दर, जो 2022-23 में 6.7 प्रतिशत थी, वह 2023-24 में घटकर 5.4 हो गई है। इसमें मूलत: थोक महंगाई दर शामिल है। वैसे, खाद्य मुद्रास्फीति में वृद्धि हुई है और यह पिछले साल के 6.6 प्रतिशत की तुलना में इस वर्ष बढ़कर 7.5 प्रतिशत हो गई, जिसकी ठोस वजहें भी हैं। वास्तव में, जलवायु परिवर्तन को खाद्य मुद्रास्फीति दर बढ़ने की एक बड़ी वजह माना जाता है। प्रकृति का अनुकूल न रहना, अतिवृष्टि, अनावृष्टि जैसे कई कारक हैं, जो हमारी खेती को प्रभावित कर रहे हैं। इन सबसे खाद्य मुद्रास्फीति ऊपर-नीचे होती रहती है। वैसे, विशेषकर आलू, प्याज और टमाटर की कीमतें बढ़ी हैं। चावल, दाल आदि खाद्यान्नों में बहुत ज्यादा उछाल नहीं है।
सामाजिक सुरक्षा की बात करे , तो कॉरपोरेट सोशल रिस्पॉन्सिबिलिटी (सीएसआर), यानी कॉरपोरेट जगत की सामाजिक जिम्मेदारी बढ़ी है। यह जिम्मेदारी उन कंपनियों पर लागू होती है, जिनकी सालाना कमाई 1,000 करोड़ या सालाना लाभ पांच करोड़ रुपये है। उनको अपने तीन साल के औसत लाभ का कम से कम दो प्रतिशत समाज की बेहतरी के कार्यों पर खर्च करना होता है। आर्थिक सर्वे के मुताबिक, इस राशि में 53 फीसदी की वृद्धि हुई है और यह 2017-18 की 17,096 करोड़ रुपये की तुलना में बढ़कर 2021-22 में 26,278 करोड़ हो गई है, जो संकेत है कि उद्योगों के लिए देश में माहौल अनुकूल है। यह भी एक वजह है कि चीनी निवेश की अनुमति दे दी गई है। माना गया है कि द्विपक्षीय रिश्तों में आई खटास के कारण सरकार ने चीनी निवेश पर प्रतिबंध लगा दिया था, मगर आम जनता के हित में अब ऐसा नहीं किया जा सकता। इसका फायदा यह भी होगा कि टैक्स की चोरी नहीं होगी और सरकार के राजस्व में वृद्धि होगी।
आर्थिक सर्वे कृषि विकास दर की बेहतरी का संकेत दे रहा है, जिसमें औसतन चार प्रतिशत की दर से वृद्धि हुई है। कुल मिलाकर, यह सर्वे भारत की तरक्की की गाथा है। उसके मुताबिक, कोरोना महामारी से सुस्त पड़ी अर्थव्यवस्था तेजी से उबर रही है। लिहाजा, जीडीपी के हिसाब से विश्व की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था अब जल्द ही शीर्ष चार में शुमार हो सकती है।
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– अगर भारत को इलेक्ट्रिक वाहन (ईवी) और उपभोक्ता वस्तुओं जैसे उभरते विनिर्माण क्षेत्र में आगे बढ़ना है, तो उसे लिथियम आयन बैटरी तकनीक पारिस्थितिकी तंत्र का विकास करना होगा।
– 2022 में लिथियम-आयन बैटरी उम्पादन क्षमता में चीन की वैश्विक भागीदारी 77% थी। इसी के दम पर चीन ईवी बाजार में शीर्ष पर पहुंचने की सोच रहा है।
– भारत इस मामले में कॉफी पीछे है। हालांकि, हाल ही में छत्तीसगढ़ के कोरबा जिले में लिथियम के एक ब्लॉक की नीलामी होनी है, और दूसरे ब्लॉक में खनिज के आशाजनक भंडार दिखाई दे रहे हैं।
– लेकिन भारत में खनिज रिपोर्टिंग मानक अविकसित हैं। इसके चलते कई ब्लॉक में खनिज भंडार का सही अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है। इससे निवेश में कमी आती है।
– साथ ही, यहाँ का अधिकांश लिथियम हार्डरॉक ग्रेनाइट और पेग्माटाइट के रूप में है, जिससे इसे निकालना मुश्किल हो जाता है।
– अतः भारत को बैटरी के लिए अन्य विकल्प तलाशने होंगे।
– मेटल एयर बैटरी में ऑक्सीजन, एल्यूमीनियम, जिंक और आयरन का उपयोग किया जा सकता है। यह कम बजट में तैयार हो सकती है, लेकिन रिचार्ज नहीं की जा सकती है। रिसायकिल की जा सकती है।
– चीन, सस्ती सोडियम बैटरी में भी भारी निवेश कर रहा है।
– भारत भी ऐसे सस्ते बैटरी विकल्प ढूंढ सकता है। इसके लिए उसे उपयुक्त खनन उद्योग तकनीक और प्रक्रियाओं में पर्याप्त अनुसंधान करना होगा। इसके माध्यम से वह वैकल्पिक बैटरी में चीन को टक्कर दे सकता है।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 25 जून, 2024
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Date: 22-07-24
Disturbing In DhakaAnti-quota violence symptomatic of Awami’s authoritarian politics. India must think beyond Hasina.TOI Editorials
Before the Bangladeshi Supreme Court’s ruling yesterday struck down a contentious quota for liberation fighters and their progeny, massive anti-quota protests had claimed at least 114 lives, hundreds more had been injured. What Bangladesh is witnessing today is a lethal combination of quota politics, lack of opposition space, and a govt increasingly given to authoritarian ways.
Quota fire | The latest round of turmoil began after the Bangladeshi high court on June 5 ruled to restore 30% quota in govt jobs at all levels for Bangladesh’s liberation fighters and their children and grandchildren. While this quota isn’t new, it has had a fraught history. It was implemented whenever Awami League was in govt and ignored when BNP and its Islamist allies were in office.
Merit vs entitlement | When Awami returned to govt in 2009, it extended quota benefits to grandchildren of liberation fighters. That the benefits accrue to those politically aligned with Awami is lost on no one. But in 2018, amid similar protests against the quota, Awami scrapped it ahead of polls that year.
The perfect storm | The high court decision was challenged, and the Supreme Court reversed the quota, saying up to 93% of the jobs should be open to merit. But a large section of Bangladeshi society believes the judiciary is under Awami’s thumb. Plus, it didn’t help matters when Sheikh Hasina equated the protesters with razakars. Add to this a growing unemployment problem within Bangladesh.
Echoes for India | India is not unfamiliar with violent quota agitations. But things haven’t degenerated to the extent in Bangladesh. The latter is in this spot today because it is failing to tick the basic check-boxes of democracy – a viable opposition, elections seen to be free and fair, and an independent judiciary. The growing popular resentment against Awami presents a security dilemma for India. The last thing India needs is a Bangladesh run by a Pakistan-backed dispensation in a post-Awami scenario. New Delhi should change tack and reach out to all segments of Bangladeshi polity to secure its strategic interests.
Date: 22-07-24
Shock-proof stateIndia must ensure its democratic digital infrastructure is shock-proof.Editorial
A bright light fell on the extent of the world’s dependence on information technologies when on July 19, supermarkets, banks, hospitals, airports, and many other services in between suffered a simultaneous blackout after a common software solution they used glitched. Between then and the time at which the solution’s developers rolled out a fix, news of the problem and the resulting downtime spread around the world through the same networks that have been erected to facilitate communications between these systems. Technological advancements are inevitable and desirable, but the concurrent responsibility to set up failsafes and emergency protocols is often less glamorous. These gaps are exacerbated in societies where the adoption of new technologies is concentrated in sectors competing in the global market and in piecemeal fashion vis-à-vis services provided in local markets. Thus, for example, the glitch may have caused an airline operator to suffer greater monetary losses but it would have been more debilitating for cardiac facilities at a tertiary care centre, or a computer trying to access a thermal power facility during peak demand.
Such glitches are more common than people realise thanks to otherwise trivial process- or business-level failures. The focus must instead be on the network interconnections that allow these technologies to be useful and the implementation of life-saving redundancies. Unfortunately, unlike most other technological enterprises, information technologies are yet to develop a mature self-awareness of their pansocial character and the impetus to adjust for this rudiment lies with the state. This requires a ‘Digital India’ push that is cognisant of software solutions’ relationship with digital privacy and data sovereignty, layered over the challenges that income inequality and political marginalisation impose on communities navigating more socially interconnected settings. For example, public distrust in electronic voting machines, stoked by an incomplete understanding of software security among the political class, the judiciary, and civil society, could have been restored with open-source software and modes of integrity testing that violate neither physical nor digital property rights. The July 19 outage offers a similar opportunity: to rejig the software that public sector institutions need to provide their essential services and to incorporate redundancies, including moving away from single-vendor policies, that preserve the links between these institutions and people engaged in informal economies in the event of a network-level outage. The state was previously duty-bound to develop democratic digital infrastructure. Now, cognisant of more powerful interlinks among social, economic, and cultural realities, it is also duty-bound to ensure that this infrastructure is shock-proof.
Date: 22-07-24
The importance of both Quad and BRICSWith India being the only country common to both Quad and BRICS and a founding member of both, it cannot afford to downplay one for the other.T.S. Tirumurti, [ Foreign Service Officer who was India’s Permanent Representative to the UN, New York, and India’s Sherpa for BRICS. ]
The Quad Foreign Ministers’ meeting in Japan end-July, after a long gap of 10 months, comes at a time when the United Nations Security Council (UNSC) is paralysed and its reform nowhere in sight, international law is violated with impunity both in the Ukraine war and in the assault on Gaza by Israel, an axis of Russia, China, North Korea, and Iran is gaining traction, and Chinese influence is growing not just in the Indo-Pacific, but elsewhere too.
The U.S. has, in turn, realised that it needs not just allies, but also credible partners in its security architecture, including in the Indo-Pacific, and reached “across the aisle” to “non-ally” countries like India to partner with them in smaller pluri-lateral groupings and joint security initiatives. Further, ASEAN countries are getting increasingly vulnerable, with South China Sea remaining a flashpoint.
While India is a member of many pluri-lateral groups on both sides of the geo-strategic “divide”, its engagement in Quad and with BRICS present the country with interesting, and sometimes contrasting, dilemmas.
India has enthusiastically embraced Quad and its strategic objectives. U.S. President Joe Biden’s belief in the Quad has given it the necessary fillip at the highest level since 2021. The fact that India, during its presidency of the UNSC in August 2021, held a high-level virtual event on ‘Enhancing Maritime Security’, presided over by Prime Minister Narendra Modi and attended by Russian President Vladimir Putin, among others, indicates the importance India attaches to strengthening maritime security in the Indo-Pacific and beyond.
India’s role in the Quad
While Quad has always had a geopolitical security objective vis-à-vis China, India’s vision goes beyond this narrow thrust to a much broader redrawing of the security and techno-economic architecture of the Indo-Pacific region. With Quad now working on reorientation of global supply chains of critical technologies and on a range of areas of direct strategic relevance to the region, including digital, telecom, health, power, and semi-conductors, it has underlined that development too has a security perspective which cannot be ignored. India, in its turn, has benefited through enhanced bilateral relations with Quad partners, especially the U.S.
On the other hand, the formation of AUKUS with the U.S., Australia, and the U.K., with a view to enhance their military capabilities, especially Australia’s with nuclear submarines, has put securitisation of the Indo-Pacific region and deterrence of China at the centre. The Ukraine war and enhanced focus on NATO has made the West look at Asia too through a military lens. AUKUS may well suit India’s geo-strategic interests, but India’s reluctance to go the whole nine yards in embracing a purely security vision for Quad is seen as a dampener, in spite of the Indian External Affairs Minister clarifying that Quad is not an Asian NATO and India is not a treaty ally unlike the other three. In fact, I used to tell my Quad colleagues in the UN that the only value-add we have in Quad is India. Instead of factoring in India’s viewpoint, if they merely want to convert India to their cause, then they are wasting the opportunity to become inclusive and enhance their overall impact in the region, which includes developing countries with differing compulsions, not all of which are military-centric.
India’s independent policy of close relations with Russia and calling for a diplomatic solution to the Ukraine war, both of which are frowned upon by the West, do not distract India from strengthening the Quad. Some Quad members and European countries are themselves enhancing their bilateral engagement with China, underlining their differing bilateral and regional compulsions.
Against the backdrop of India’s enthusiastic engagement with Quad, its engagement with BRICS presents a different conundrum. India was an enthusiastic founder of BRICS. In fact, at the 10th annual summit of the BRICS in 2018 in Johannesburg, South Africa, it was Mr. Modi who reminded the leaders that BRICS was founded to reform the multilateral system and proposed for the first time his vision of “reformed multilateralism.” However, India’s participation in BRICS has fluctuated from enthusiastic to lukewarm. While BRICS’ initiatives such as New Development Bank and the Contingent Reserve Arrangement have been pioneering, the attempt by China to use BRICS to grandstand and push its world view on the Global South and now, to push back the West has made India wary of giving BRICS a higher profile.
The potential of BRICS
India had, consequently, been reluctant to expand BRICS. In fact, in 2018, Mr. Putin too underlined his reluctance to expand BRICS by quoting former South African President Nelson Mandela: “After climbing a great hill, one only finds that there are many more hills to climb.” But after Quad and the situation in Ukraine, Russia too realised the potential of BRICS, which includes pushing back the West, and lined up behind China. The change of guard in Brazil leaves India as the lone member to push back China. A reluctant India decided to accept BRICS’s expansion than oppose it and now many more countries are reportedly waiting to join. Even if India has the best of bilateral relations with all the new members, we need to make sure it all adds up to support for India inside BRICS. For this, India cannot afford to be ambivalent about BRICS any more. To counter moves to take BRICS in a direction India does not like, we need to be more engaged, not less. With India being the only country common to both Quad and BRICS, the country cannot afford to downplay one for the other.
Date: 22-07-24
गरिमा बनाम गुनाहसंपादकीय
संवैधानिक पदों का निर्वाह करने वाले लोगों को आपराधिक मामलों में सुनवाई, सजा आदि से इसलिए संरक्षण प्रदान किया गया है कि इससे उस पद की गरिमा आहत हो सकती है। ऐसे लोगों से भी यह स्वाभाविक अपेक्षा रहती है कि वे उस पद की गरिमा के अनुरूप आचरण करें। मगर इस तकाजे की कई बार अनदेखी की जाती है। खासकर राज्यपालों के कार्य और व्यवहार को लेकर अनेक मौकों पर अंगुलियां उठी हैं। पश्चिम बंगाल के राज्यपाल पर राजभवन में काम करने वाली एक महिला ने आरोप लगाया कि उन्होंने उसका यौन उत्पीड़न किया और राजभवन के अधिकारियों ने उसे राजभवन में बंधक बनाए रखा। मामला उच्च न्यायालय तक पहुंच गया। अदालत ने कहा कि राज्यपाल को संविधान के अनुच्छेद 361 के तहत आपराधिक मामलों में संरक्षण प्राप्त है। उन पर तब तक कोई मुकदमा नहीं चलाया जा सकता, जब तक वे अपने पद पर हैं। तब पीड़िता ने सर्वोच्च न्यायालय में गुहार लगाई कि अनुच्छेद 361 के खंड दो में राज्यपालों को दी गई छूट में मामले की जांच पर रोक का कोई उल्लेख नहीं है। यौन उत्पीड़न जैसे मामलों में जांच में देरी पीड़िता को न्याय दिलाने में बाधा है। सर्वोच्च न्यायालय इस मामले के मद्देनजर अनुच्छेद 361 की समीक्षा को राजी हो गया है।
सर्वोच्च न्यायालय ने अनेक मामलों में संवैधानिक प्रावधानों की व्याख्या कर मनमानी लाभ लेने वालों पर नकेल कसी है, इसलिए इस मामले में भी लोगों को उम्मीद बनी है कि संवैधानिक संरक्षण की आड़ में राज्यपालों के अपने पद की गरिमा के प्रतिकूल व्यवहारों पर रोक लगाने का कोई व्यावहारिक रास्ता निकल सकेगा। साथ ही इस सिद्धांत की रक्षा होगी कि कानून की नजर में सभी बराबर हैं। पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह राज्य सरकारों और राज्यपालों के बीच टकराव के अनेक मौके देखे गए और उनमें से कई में सर्वोच्च न्यायालय ने राज्यपाल के अधिकारों की व्याख्या करते हुए उनकी राजनीतिक सक्रियता पर विराम लगाया, उससे भी सर्वोच्च न्यायालय के ताजा कदम पर सबकी नजर रहेगी। यों राज्यपालों की नियुक्तियों को लेकर ही लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं। सक्रिय राजनीति में लंबा समय बिता चुके लोगों को राज्यपाल पद की जम्मेदारी सौंपी जाती है, तो वे राजभवन में रहते हुए भी अपने दल और केंद्र सरकार की इच्छाओं के अनुरूप काम करते देखे जाते हैं। यही वजह है कि जहां उन्हें राज्य की चुनी हुई सरकार के साथ तालमेल बिठा कर फैसले करने चाहिए, वे नाहक उसके काम में अड़ंगा लगाना शुरू कर देते हैं। पश्चिम बंगाल में भी लंबे समय से यही देखा जा रहा है। इसी आधार पर राज्यपाल शुरू में अपने ऊपर लगे आरोप को राज्य सरकार की साजिश कह कर खारिज करने का प्रयास करते रहे। मगर मामला इतना हल्का है नहीं।
किसी राज्यपाल पर छेड़छाड़ और यौन उत्पीड़न का आरोप उस पद की गरिमा को चोट पहुंचाने जैसा है। ऐसे मामलों की सच्चाई तो किसी भी हाल में उजागर होनी चाहिए। उसकी जांच को केवल इसलिए नहीं रोक दिया जाना चाहिए कि राज्यपाल को आपराधिक मामलों में संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है। लेकिन अगर राज्यपाल के अधिकारों को ऊपर रखा जाएगा, तो आरोप लगाने वाली महिला के न्याय के अधिकार की रक्षा कैसे हो पाएगी। इन्हीं सब सवालों के मद्देनजर सर्वोच्च न्यायालय राज्यपाल को मिले संरक्षण की समीक्षा करेगा। स्वाभाविक अपेक्षा है कि ‘कानून की नजर में सब बराबर हैं’ का सिद्धांत सर्वोपरि माना जाएगा।
Date: 22-07-24
आंदोलन और हिंसासंपादकीय
बांग्लादेश में आरक्षण विरोधी आंदोलन के हिंसक रुख अख्तियार कर लेने से वहां की सरकार के सामने एक बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। वहां के युवा न तो पुलिस-प्रशासन की बात सुनने को तैयार हैं और न प्रधानमंत्री शेख हसीना के अनुरोध और दलील का उन पर कोई असर हो रहा है। प्रदर्शन के दौरान हिंसा से अब तक सौ से ज्यादा लोगों की जान जा चुकी है और सैकड़ों घायल हुए हैं। हालात इस कदर बिगड़ गए हैं कि पूरे देश में कर्फ्यू लगाना पड़ा और उग्र प्रदर्शनकारियों को ‘देखते ही गोली मारने’ के आदेश दे दिए गए हैं। ऐसे में वहां रह रहे भारत, नेपाल और भूटान समेत अन्य देशों के लोगों को अपनी सुरक्षा की चिंता सताने लगी है। भारतीय विदेश मंत्रालय के मुतबिक, बांग्लादेश में करीब पंद्रह हजार भारतीयों के होने का अनुमान है। इनमें लगभग साढ़े आठ हजार विद्यार्थी हैं। अब तक एक हजार से अधिक भारतीय विद्यार्थी स्वदेश लौट आए हैं। केंद्र सरकार की ओर से बाकी भारतीय नागरिकों को सुरक्षित वापस लाने के प्रयास जारी हैं। इस बीच, बांग्लादेश-भारत सीमा पर सतर्कता बढ़ाने की मांग भी उठने लगी है।
दरअसल, बांग्लादेश में हिंसक आंदोलन पर उतरे युवा उस व्यवस्था को समाप्त करने की मांग कर रहे हैं, जिसके तहत वर्ष 1971 में पाकिस्तान के खिलाफ बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम में लड़ने वाले पूर्व सैनिकों के आश्रितों को सरकारी नौकरियों में तीस फीसद तक आरक्षण का प्रावधान है। प्रदर्शनकारियों का तर्क है कि आरक्षण की इस व्यवस्था के जरिए प्रधानमंत्री शेख हसीना के समर्थकों को लाभ पहुंचाया जा रहा है। गौरतलब है कि शेख हसीना की अवामी लीग पार्टी ने मुक्ति संग्राम आंदोलन का नेतृत्व किया था। प्रधानमंत्री शेख हसीना का कहना है कि युद्ध में भाग लेने वालों को सम्मान मिलना चाहिए, भले वे किसी भी राजनीतिक संगठन से जुड़े हों। बांग्लादेश सरकार और प्रदर्शनकारियों की दलीलें अपनी जगह हैं, लेकिन क्या अपनी मांगों को मनवाने की हिंसा ही एकमात्र उपाय है? जहां प्रदर्शनकारियों को शांतिपूर्वक अपनी बात सरकार के समक्ष रखनी चाहिए, वहीं सरकार को चाहिए कि सड़कों पर उतरे युवाओं को किसी तरह भरोसे में ले, ताकि पहले हिंसा थमे।
Date: 22-07-24
शुचिता की चिंतासंपादकीय
दुकानों और ठेलों पर उनके मालिक के नाम लिखने को अनिवार्य बनाने का फैसला अगर चर्चा में है, तो कोई आश्चर्य नहीं। सामान्य तौर पर किसी प्रतिष्ठान पर उसके मालिक का नाम लिखा जाना कोई असामान्य या गैर-कानूनी बात नहीं है। असंख्य लोग शौक से अपना नाम अपने प्रतिष्ठान के बोर्ड पर लिखते हैं, पर जिन लोगों को अपने प्रतिष्ठान पर अपना नाम लिखना अच्छा नहीं लगता, उनकी नाराजगी के निहितार्थ को समझने और समझाने की कोशिश पूरी समझदारी से होनी चाहिए। उत्तर प्रदेश में एक आदेश पर कांवड़ यात्रा मार्गों पर भोजनालयों के लिए मालिकों का नाम प्रदर्शित करना अनिवार्य कर दिया गया है। उत्तर प्रदेश के बाद उत्तराखंड और अब उज्जैन, मध्य प्रदेश में भी प्रशासन ने ऐसा ही फैसला किया है। अब अपने प्रतिष्ठान या दुकान के आगे अपना नाम न लिखने वालों को व्यवसाय करने में समस्या होगी। दरअसल, कांवड़ वाले मार्गों पर पहले भी शुचिता संबंधी शिकायतें सामने आती थीं और आदेश देने वाले अधिकारियों के पास यह दलील है कि कांवड़ियों की पवित्रता की रक्षा सुनिश्चित करने के लिए यह कदम उठाया गया है।
हालांकि, यह फैसला उतना सहज नहीं है, जितना प्रथम दृष्टया नजर आता है। समाज में इस फैसले पर विविध राय है और हर प्रतिकूल राय पर भड़क उठने के बजाय संवेदना के साथ गौर करना चाहिए। लोग क्या सोच रहे हैं और उनके नेता क्या सोच रहे हैं? भारतीय समाज में एक सफल उद्यमी व योगगुरु की पहचान रखने वाले बाबा रामदेव की टिप्पणी यहां गौरतलब है कि ‘अगर रामदेव को अपनी पहचान बताने में कोई दिक्कत नहीं है, तो रहमान को अपनी पहचान बताने में दिक्कत क्यों होनी चाहिए? हर किसी को अपने नाम पर गर्व होना चाहिए। नाम छिपाने की जरूरत नहीं है, सिर्फ काम में पवित्रता चाहिए।’ अब इस पहलू के विरोध में भी एक प्रतिनिधि बयान देख लीजिए, पीडीपी की अध्यक्ष महबूबा मुफ्ती ने सत्तारूढ़ पार्टी पर तीखा हमला बोलते हुए आरोप लगाया है कि वह मुसलमानों, दलितों और अन्य पिछड़े समूहों के अधिकारों को खत्म करना चाहती है। यह हमारे देश की विडंबना ही है कि जिस राज्य से धर्म के आधार पर एक बड़े समूह को निकाल बाहर किया गया, उस राज्य के नेता की यह दलील है कि ‘देश का संविधान सभी को समान अधिकार देता है और इसमें नाम या धर्म के आधार पर कोई भेदभाव नहीं है।’
कुल मिलाकर, यह फैसला व्यापक है और इसे विवादों से परे रखना आसान नहीं होगा। सत्तारूढ़ गठबंधन में भी सहमति बनानी पड़ेगी। क्या इस फैसले को लागू कराने की शालीनता हमारे सुरक्षाकर्मियों के पास है? क्या इस फैसले को लागू कराने की जिम्मेदारी किसी अन्य सक्षम विभाग को नहीं देनी चाहिए? ध्यान रहे, कोई व्यापारी विवाद नहीं चाहता, बहुत सारे दुकानदारों ने अपने नाम पहले ही लिख दिए हैं, पर उन सबकी आशंकाओं को दूर करने की जिम्मेदारी स्थानीय प्रशासन पर है। ध्यान रहे, जरूरी नहीं कि बहुसंख्यक संप्रदाय के सभी दुकानदार पवित्रता बरतते हों। मतलब, स्थानीय प्रशासन का ध्यान किसी नाम या मजहब पर नहीं, बल्कि दुकानों पर बरती जाने वाली साफ-सफाई व शुद्धता पर होना चाहिए। कांवड़ मार्गों पर असंख्य ढाबे हैं, दुकानें हैं, क्यों न युद्ध स्तर पर शुद्धता अभियान छेड़ दिया जाए? रही बात ऐसे दुकानदारों की, जो अपने ग्राहकों के प्रति सही सेवा भाव नहीं रखते, उन्हें तो वैसे भी विदा कर देने में पूरे समाज-देश की भलाई है।
Date: 22-07-24
ताकि सबको मिले पूरा पोषक भोजनजे पी नड्डा, ( केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री )
एनडीए शासन के दौरान दूसरी बार स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्री बनने के बाद पिछले सप्ताह जब मैंने भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण, यानी एफएसएसएआई का दौरा किया, तो मुझे वर्ष 2014 में स्वास्थ्य मंत्री के रूप में अपने शुरुआती कार्यकाल का स्मरण हो आया। यह वह समय था, जब यह प्राधिकरण देश के खाद्य-सुरक्षा नियामक के रूप में खुद को स्थापित कर रहा था और उस पर दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी आबादी के लिए खाद्य मानक और नीतियां तय करने की बड़ी जिम्मेदारी थी।
22 अगस्त, 2016 को खाद्य सुरक्षा और मानक अधिनियम (एफएसएसए), 2006 के एक दशक पूरे होने के अवसर पर आयोजित कार्यक्रम में मैंने पहली बार एफएसएसएआई टीम और विभिन्न हितधारकों से मुलाकात की, तो इस प्राधिकरण का दृष्टिकोण स्पष्ट था। इसका लक्ष्य नीतियों को मजबूत करना, उभरती चुनौतियों का समाधान करना और नागरिकों व खाद्य व्यवसायों के बीच सामाजिक व व्यावहारिक परिवर्तन को बढ़ावा देना था। इन कोशिशों को ‘ईट राइट इंडिया मूवमेंट’ के तहत खूबसूरती से एकीकृत किया गया है, जिसने सभी भारतीयों के लिए ‘सुरक्षित, स्वस्थ और सतत’ भोजन सुनिश्चित करने का एक समग्र ‘संपूर्ण प्रणाली दृष्टिकोण’ अपनाया है।
स्वास्थ्य मंत्रालय और एफएसएसएआई हमारे देश के खाद्य सुरक्षा परिदृश्य को बेहतर बनाने के लिए अथक प्रयास कर रहे हैं। एक मजबूत खाद्य सुरक्षा पारिस्थितिकी तंत्र मजबूत खाद्य-नीतियों और मानकों की नींव पर ही गढ़ा जा सकता है। ऐसे में, यह जानकर खुशी हुई है कि एफएसएसएआई के वैज्ञानिक पैनल व विशेषज्ञ समितियों का काफी विस्तार हुआ है। इनमें 88 संगठनों के 286 विशेषज्ञ शामिल हैं। इससे वैश्विक मानकों के अनुरूप मानदंडों और नीतियों के विकास की गति में उल्लेखनीय तेजी आई है।
एफएसएसएआई की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मिलेट के मानकों का सृजन है, जिनको साल 2023 में वैश्विक मिलेट (श्री अन्न) सम्मेलन में प्रधानमंत्री द्वारा लॉन्च किया गया था। ये मानक कोडेक्स एलिमेंटेरियस आयोग के साथ साझा किए गए हैं। इससे मिलेट के वैश्विक मानकों के विकास और भारत को एक अग्रणी देश के रूप में स्थापित करने का मार्ग प्रशस्त हुआ है।
सुरक्षित भोजन सुनिश्चित करने के लिए नीतियों व मानकों के विकास के साथ-साथ उनका प्रवर्तन और परीक्षण भी आवश्यक है। एफएसएसएआई के खाद्य-परीक्षण के बुनियादी ढांचे में बीते आठ वर्षों में काफी सुधार हुआ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दूरदर्शी नेतृत्व में कैबिनेट ने राज्य खाद्य परीक्षण प्रयोगशालाओं को मजबूत करने के लिए 482 करोड़ रुपये की मंजूरी दी। एफएसएसएआई ने ‘फूड सेफ्टी ऑन व्हील्स’ नाम से मोबाइल फूड लैब उपलब्ध कराकर दूरदराज के इलाकों में पहुंचना शुरू कर दिया है।
इन उपलब्धियों का उत्सव मनाते समय, हमें वैश्विक स्तर पर उभर रहे रुझानों, जैसे कि वनस्पति आधारित प्रोटीन, प्रयोगशाला में विकसित मांस आदि को भी स्वीकार करना चाहिए। एफएसएसएआई ने नई श्रेणियों- जैसे वीगन खाद्य पदार्थों, जैविक उत्पादों व आयुर्वेदिक आहार के लिए सक्रिय रूप से मानक विकसित किए हैं और यह खाद्य-सुरक्षा के उभरते रुझानों के अनुरूप’ निरंतर अनुकूलन कर रहा है।
जैसे-जैसे वैश्विक खाद्य व्यापार का विस्तार हो रहा है, एफएसएसएआई कोडेक्स जैसे विभिन्न मंचों पर अंतरराष्ट्रीय नियामकों के साथ साझेदारी कर रहा है। इसका उद्देश्य बढ़ती आबादी के लिए सुरक्षित और पौष्टिक भोजन सुनिश्चित करने के लिए सर्वोत्तम प्रक्रियाओं को साझा करना और सामंजस्यपूर्ण दृष्टिकोण विकसित करना है। एफएसएसएआई ने साल 2023 में दिल्ली में पहला वैश्विक खाद्य नियामक शिखर सम्मेलन (जीएफआरएस) भी आयोजित किया, जो खाद्य नियामकों के लिए उभरती खाद्य सुरक्षा चुनौतियों के बारे में मिलने और विचार-विमर्श करने के लिए अपनी तरह का पहला सहयोगी मंच है।
जब हम खाद्य सुरक्षा की बात करते हैं, तो नागरिकों और उपभोक्ताओं को हमें साक्ष्य-आधारित जानकारी के माध्यम से विभिन्न खाद्य सुरक्षा मुद्दों पर सशक्त भी बनाना होगा। तभी हमारा काम समग्रता से पूर्ण होगा। यहीं पर एफएसएसएआई का ‘ईट राइट इंडिया’ अभियान महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है, यह सुनिश्चित करके कि उपभोक्ताओं तक हर स्तर पर जरूरी जानकारी पहुंचे। इस परिवर्तनकारी कार्यक्रम का विस्तार किया जा रहा है, ताकि हमारी पहुंच बढे़और व्यावहारिक बदलाव को प्रोत्साहित किया जा सके। यह उपभोक्ताओं को सुरक्षित व स्वास्थ्यप्रद खाद्य विकल्पों की मांग करने के लिए सशक्त बनाता है और खाद्य व्यवसाय को बेहतर विकल्प प्रदान करने के लिए प्रेरित करता है।
एफएसएसएआई, 2006 खाद्य-उत्पादों के लिए व्यापक मानकों को अनिवार्य बनाता है, जिससे यह सुनिश्चित होता है कि वे उपभोग के लिए सुरक्षित हैं। साथ ही, फूड लेबलिंग के नियम उपभोक्ता को एक सूचित विकल्प (इंफोर्मड च्वाइस) चुनने में सशक्त करते हैं। विज्ञापन और दावों की नीतियां यह सुनिश्चित करती हैं कि खाद्य व्यवसायों द्वारा उत्पादों के बारे में कोई भ्रामक दावा नहीं किया जा रहा है। उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम-2019 उपभोक्ताओं को शिकायत दर्ज करने का पर्याप्त तंत्र प्रदान करके उनके सामने आने वाली आधुनिक चुनौतियों के समाधान में सहायक रहा है, विशेष रूप से भ्रामक विज्ञापनों और असुरक्षित या घटिया भोजन से संबंधित शिकायतों के संदर्भ में।
खाद्य सुरक्षा एक सामूहिक प्रयास है, और भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण विभिन्न सरकारी विभागों और अन्य हितधारकों के साथ मिलकर काम कर रहा है। यह संपूर्ण सरकार (होल-ऑफ-गवर्नमेंट) और संपूर्ण प्रणाली (होल-ऑफ-सिस्टम) दृष्टिकोण को अपना रहा है। एफएसएसएआई खाद्य सुरक्षा और स्वास्थ्य पहलों में उद्योगों और अन्य हितधारकों को शामिल करके एक सहयोगात्मक दृष्टिकोण को सक्रिय रूप से आगे बढ़ा रहा है।
भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण ने पिछले दस वर्षों में भारत की खाद्य सुरक्षा स्थिति को महत्वपूर्ण रूप से बदला है। इसके साथ ही, यह उभरती चुनौतियों का समाधान करने और उपभोक्ताओं को सशक्त बनाने के लिए लगातार काम कर रहा है। एफएसएसएआई का लक्ष्य अपनी प्रतिबद्धता और समग्र दृष्टिकोण से भारत को खाद्य-उत्पादन में ही नहीं, बल्कि खाद्य सुरक्षा और स्थिरता में भी वैश्विक गुरु बनाना है।
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इस मामले पर पर्यावरण मंत्रालय, राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग तथा राष्ट्रीय ग्रीन ट्रिब्यूनल जैसे सभी निकायों को पारदर्शिता और सहमति के साथ आगे बढ़ना चाहिए।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 25 जून, 2024
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Date: 20-07-24
The IT BluesAbout outage in a hyper connected world.TOI Editorials
Yesterday, when Windows machines simultaneously started BSODing worldwide, it looked like the much prophesied ‘cyber Pearl Harbour’ was upon us. Then, the critical error indicated by the blue screens was identified and a fix deployed, thankfully fast. But even then, there was really no sinking into a sigh of relief. As against early speculation about a cyberattack, it turned out that the unnervingly widespread tech outage had been caused by a flawed security update by CrowdStrike. This is a prominent cybersecurity platform, with kernel-level privileges to run across vast computer systems, to detect and protect against threats, ironically.
Did the firm tasked to ward off viruses and malware itself ‘violate every good software engineering practice we know’, critics are asking. Did the traumatic outages from airlines to banking take place because a software update was rolled out globally without proper testing? This does feel worse than ‘bad guys’ wreaking havoc. And given the usual nature of licensing agreements in the software industry, particularly the exemptions therein, a comforting level of accountability is also unlikely. Separately, accountability has been MIA within India as well, when, say, services at AIIMS Delhi were crippled as a result of an IT outage caused by ‘improper network segmentation’.
In a less connected world, the outage would have had less impact. The more our lives and livelihoods have moved online, the more dependent we have become on a global network of servers and satellites. We felt this deep vulnerability of interconnectedness during the pandemic too. Amid a chorus of ‘this should be a wake-up call’, which we have heard before, one fact stood out as constructive yesterday. That Mac and Linux hosts were unaffected. As even more global traffic inevitably gets onto digital highways, one thing govts should reconsider is dependence on too few platforms to serve too many critical functions. Yes, risks spread like wildfire in our connected world. But we can minimise those risks.
Date: 20-07-24
In Whose Name?UP govt’s kanwar yatra decision is wrong.TOI Editorials
CM Yogi has, unfortunately, doubled down and expanded the UP police order to display the names of owners of eateries all along the route that thousands of Shiv-bhakts take on their annual trek to Haridwar. The police order had covered only the three districts on the route with high Muslim populations. The state’s order ignores the severe criticism of UP police’s measure. Earlier, cops had dialled back, saying the measure was “voluntary”. BJP veteran Mukhtar Abbas Naqvi had captured the essence of the police measure: “Hasty orders of overzealous officials may give rise to…untouchability…Faith must be respected…but untouchability must not be patronised.”
Kanwar yatra is a tradition, even if it has exploded in numbers over the last 15 years. Districts with high Muslim populations have always been on the Kanwar route. There’ve been no communal conflicts, during the trek or during return journeys. That police in the first place thought issuing such an outrightly prejudicial instruction was their business is evidence of the blindness to real duty. That police imagined their bias would go unnoticed also showed their belief that they can fearlessly interfere in people’s day-to-day lives and livelihood.
NDA ally JDU had sought a review of the order saying Muslims along the route have always cooperated. At the heart of coalition is accommodation. The yatra starts on Monday. Preparations are underway by locals to cater to the walkers. UP police crossed a line. Yogi’s decision can not only potentially disrupt local businesses, it can also drive a new wedge in communal relations – because it can promote distrust. The order should be revoked.
Date: 20-07-24
If You Are Truly Hindu, You Can’t HateIn Hinduism’s foundational principles, concepts like chosen ones, villains, victims and oppressors don’t exist. So, hating someone or some group is fundamentally un-Hindu.Devdutt Pattanaik
Hatred is a powerful tool to unite a people. Israel uses it against Palestinians. The entire Muslim world uses it against Israel. Each one argues passionately why their hatred is justified. Hatred is easy to justify, when you see yourself as the victim. But the idea of victimhood does not exist in Hinduism, from a structural point of view.
Hinduism today has been reduced to casteism, by academics and activists, who believe in justice and equality, ideas that are not universal, contrary to popular belief. They are cultural, with foundation in Judaism, Christianity and Islam. When Marx referred to religions as the opium of the people, he did not realise that his own ideas of justice and equality came from the religions he was vilifying. Anyone who believes in justice and equality feels it’s a good idea, well worth spreading.
The reason why one cannot proselytise Hinduism is because it is not based on justice or equality! It is based on an altogether different way of seeing the world. It is about becoming aware that life has no climax. There is no oppression, villainy or victimhood. We simply exist in an unpredictable, uncontrollable forest of hunger, fear and ignorance, where we alone can bring nourishment, security and wisdom.
When you believe in justice and equality, it feels right to hate those who oppress, those promoters of injustice and inequality – the villain, the monster. In modern retellings of Hindu tales, asuras and rakshasas are presented as villains and monsters, who need to be killed by gods. Durga impales Mahisha with her trident. Narasimha disembowels Hiranakashipu with his sharp claws. Ram brings down Ravan with a volley of arrows. However, when we delve deeper, and actually observe the ritual performances, and temple ceremonies, we notice that the masks and images of Mahisha, Hiranakashipu, and Ravan are always worshipped. These ‘demons’ are not vilified. They are venerated.
The lower gods (devas) may seek ‘destruction’ of the asuras and the rakshasas, but the higher gods (Shiva, Vishnu, Devi) ‘uplift’ them. The violence becomes a metaphor either to establish the rhythm of nature, or to end ignorance. In subaltern spaces, the violence is a fertility ritual: the annual harvesting and the threshing of grain that brings food to the table. In intellectual circles, the violence unknots the human mind. At no point are Mahisha, Hiranakashipu or Ravan called evil. In fact, there is no Sanskrit synonym for the word ‘evil’.
Concepts like oppression, evil, villain, and victim are part of mythologies that presuppose one life: Judaism, Christianity, Islam, Marxism, atheism. In mythologies that presuppose rebirth, life is endless, without triumphor tragedy. No one enters this world with an empty balance sheet. No one leaves with an empty balance sheet. Those who consume are in debt. Those who are consumed are in credit. Mahisha is being slaughtered so that he does not consume the gods, but is instead consumed by the gods. This is the annual fertility cycle of food production and food consumption. Hiranakashipu is in debt – he is liberated by Narasimha. Ravan is blinded by his fortunes, his credits. In the wise eyes of Hanuman and Ram, he is no more than a petulant immature child. There is no hate in these stories.
But when these stories are retold on television or cinema, screenplay writers distort the mythic narrative to the demands of modern storytelling. They need heroes, villains, victims. So, they turn Durga, Narasimha and Ram into superheroes fighting supervillains. Effectively, the Hindu story becomes a Biblical tale – where the messiah comes to the rescue!
Politicians who tell Hindus to hate are spinning a rather un-Hindu yarn of injustice and inequality. Social media propagates the discourse that Hindus are victims of injustice; that Hindus have to fight back. If Jews have weaponised ‘Antisemitism’ and Muslims have weaponised ‘Islamophobia’, Hindus need to weaponise ‘Hinduphobia’.
Manufacturing enemies, inventing threats, does mobilise people. Feminists demonise men to rally women. Communists demonise capitalists to rally workers. In American institutions, White, heterosexual males are being demonised in the name of social justice. This ‘binary’ template of social change has now reached toxic proportions globally, as indicated in the cantankerous left-right debate manifesting everywhere. As a result, in India, all issues are reduced to either a Brahmin-Dalit, or a Hindutva-Muslim, confrontation. We do not have to subscribe to it.
We need to revisit the foundational principles of Hinduism, where there is no concept of Chosen People enslaved by a Pharaoh seeking a Promised Land. The Veda states the timeless truth (sanatan dharma) that in nature there is always the predator and the prey. One is not a villain; the other is not a victim. That which eats eventually has to repay its debt by being eaten. Humans want to eat but do not wish to be eaten. So, they create culture. Here debts are repaid by feeding. If we do not repay, we will continue to be reborn. So, the point of life is to feed, rather than eat. Hatred makes us eat rather than feed. It puts us in debt. Traps us in the endless cycle of samsara.
Date: 20-07-24
ऐसे फैसले सांप्रदायिक अलगाववाद को बढ़ाएंगेसंपादकीय
भारत में आमतौर पर व्यक्ति का धर्म उसके नाम, पोशाक या दाढ़ी आदि से पता चल जाता है। यूपी में पहले एक आदेश जारी हुआ कि एक पुलिस रेंज के तीन जिलों में जहां से कांवड़ यात्री गुजरेंगे, रास्ते में हर खोमचे-रेहड़ी-रेस्तरां पर खाने का सामान बेचने वाले मालिक और स्टाफ का नाम बोर्ड पर लिखना होगा। आदेश देने की वजह बताई गई, ‘कांवड़ियों की भावना को ठेस पहुंचने से लोक-व्यवस्था की समस्या बिगड़ने से बचाना’। जब दिल्ली में बैठे भाजपा के ही एक मुस्लिम नेता और एक प्रमुख एनडीए पार्टनर के अलावा देश भर से निंदा होने लगी तो पुलिस ने कहा आदेश स्वैच्छिक है। लेकिन अगले दिन ही मुख्यमंत्री कार्यालय ने न केवल इस पर मोहर लगा दी बल्कि राज्य भर में यात्रा के दौरान इस आदेश का विस्तार कर दिया। इस आदेश के राजनीतिक निहितार्थ समझने होंगे। ऐसा कहा जा रहा है कि आम चुनाव में यूपी में मिली करारी हार के बाद भाजपा के शीर्ष नेतृत्व और यूपी सीएम के बीच सब कुछ सही नहीं है। दूसरी ओर ये आदेश असंवैधानिक है। अनुच्छेद 19(6) राज्य को यह शक्ति नहीं देता कि वह लोक-व्यवस्था के नाम पर व्यवसाय की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाए। 19 (6) के प्रतिबंध केवल ‘आम जनता के हित’ ( न कि लोक व्यवस्था के लिए) तक ही सीमित हैं। राज्य सरकार का कदम सांप्रदायिक अलगाववाद को और बढ़ाएगा।
Date: 20-07-24
विवाह में अपनी सम्पत्ति का प्रदर्शन कितना सही-गलत?पवन के. वर्मा, ( पूर्व राज्यसभा सांसद व राजनयिक )
सात महीने तक चली उत्सवों की शृंखला के बाद, अनंत अंबानी और राधिका मर्चेंट आखिरकार 12 जुलाई को मुंबई में विवाह-सूत्र में बंध गए। विवाह से पहले हुए उत्सवों में जामनगर में एक भव्य समारोह हुआ, जहां एयरफोर्स स्टेशन को नागरिक निजी जेट विमानों के लिए खोला गया था, उसके बाद भूमध्य सागर में चार दिवसीय लग्जरी क्रूज का आयोजन हुआ और अंतत: विवाह-समारोह में भी कई कार्यक्रम हुए। इनमें भारतीय हस्तियों के अलावा रिहाना, जस्टिन बीबर, किम कर्दाशियां, बिल गेट्स, इवांका ट्रम्प जैसे अनेक अंतरराष्ट्रीय सितारे और गणमान्यजन उपस्थित थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी रिसेप्शन में भाग लिया। पूरे विवाह में अनुमानित रूप से 5000 करोड़ रुपए का खर्च होना बताया जाता है। अकेले नीता अंबानी के पन्ना जड़ित हार की कीमत 500 करोड़ रुपए बताई गई थी, जिसको देखने के लिए लोग उत्सुक थे।
इस पर आम लोगों की प्रतिक्रियाएं मिली-जुली रही हैं। कुछ लोगों को धनबल का अंतहीन प्रदर्शन अनुचित लगा। कुछ अन्य का विचार था कि एक ऐसे देश में इतना भव्य सार्वजनिक जश्न अनुचित है, जहां आज भी बहुत सारे लोग दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष करते हैं। हालांकि कई लोगों का तर्क था कि अगर अंबानी के पास पैसा है, तो वे इसे खर्च क्यों न करें? वैसे भी उन्होंने जो खर्च किया, वह उनकी कुल संपत्ति के अनुपात में बहुत ही कम था। कुछ लोगों ने ईर्ष्या के कारण आलोचना की, वहीं कुछ अन्य को लगा कि इसने विवाह, होटल और फूड-उद्योग के बढ़ते क्षेत्र में रोजगार को बढ़ावा दिया है।
सच यह है कि आज शादियां एक नयनाभिराम उत्सव बन चुकी हैं। यह सम्पन्न परिवारों और मध्यम-वर्ग दोनों पर लागू होता है। वहीं इससे गरीबों पर बहुत बोझ पड़ता है, जहां लड़की के परिवार को एक ‘उपयुक्त’ शादी की व्यवस्था करने के साथ ही दहेज की मांगों का भी प्रबंधन करना पड़ता है। वो दिन गए, जब विवाह एक दिन का साधारण समारोह हुआ करता था। अब तो परिवारों द्वारा इस अवसर को अपने वैभव और स्टेटस की नुमाइश बनाने के लिए एक-दूसरे से होड़ की जाती है। लाइव परफॉर्मर, डीजे, भव्य सजावट, खाने से भरी टेबलें और कई शानदार कार्यक्रम होते हैं। डेस्टिनेशन-वेडिंग में तो पूरे पांच सितारा होटल बुक कर लिए जाते हैं। वेडिंग-प्लानर और इवेंट-मैनेजर की बहुत मांग होती है। अगर हम अपने समाज पर नजर डालें तो पाएंगे कि अंबानी ने आखिर क्या गलत किया है?
यहां एक और महत्वपूर्ण प्रश्न यह भी है कि क्या भारतीयों का झुकाव संयम की ओर होता है? क्या वे दिखावे और नुमाइश से दूर रहते हैं? या फिर हम स्वभाव से ही दिखावटीपन और तड़क-भड़क पसंद करने वाले लोग हैं? हमारे राजनेता महात्मा गांधी को नमन करते हैं, लेकिन वे स्वयं भव्य बंगलों में रहते हैं और आलीशान लवाजमे के साथ चलते हैं। भारतीय-गणतंत्र के राष्ट्रपति दुनिया के सबसे बड़े महल में रहते हैं। प्रधानमंत्री और उपराष्ट्रपति ने भी अभी-अभी नए आलीशान आवास खरीदे हैं। ऐसे में धन बनाम संयम या सम्पत्ति बनाम सादगी के बीच का आदर्श मध्य-मार्ग कौन-सा हो सकता है? हमारे प्राचीन ग्रंथों में तो हमेशा इस बात पर जोर दिया गया है कि लक्ष्मी और सरस्वती यानी धन और विद्या-विवेक के बीच सही संतुलन होना चाहिए। अगर यह संतुलन खो गया, तो धन-सम्पदा की प्रदर्शनप्रियता अवश्य ही विवेक और संयम पर हावी हो जाएगी।
धन-संपत्ति के बेतहाशा प्रदर्शन के प्रलोभन को रोकने के लिए जरूरी आत्म-संयम हमारे देश में विशेष रूप से प्रासंगिक है, क्योंकि यहां अधिकांश लोग आज भी गरीबी और अभावों में जी रहे हैं। जब समाज की आखिरी पंक्ति के लोग अमीरों की बेलगाम हरकतों को देखते हैं, तो उन्हें आश्चर्य होता होगा कि क्या वे भी इस नए ‘चमकते’ भारत का हिस्सा हैं? अमीरों को अपनी सम्पत्ति दिखाने का अधिकार है, लेकिन अंततः सम्पन्नता और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच सही संतुलन बनाना भी हर व्यक्ति का चयन होना चाहिए। रिलायंस फाउंडेशन का कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) में अच्छा रिकॉर्ड है। अगर शादी पर खर्च की गई राशि का आधा भी अंबानी अपने चैरिटेबल फाउंडेशन को दे देते, तब भी उनका कार्यक्रम भव्यातिव्य होता, लेकिन साथ ही वे परोपकार में भी अग्रणी बन जाते। इससे उनके कॉर्पोरेट ब्रांड में इजाफा ही होता और नव-विवाहितों को भी कहीं अधिक मात्रा में आशीर्वाद प्राप्त होते।
Date: 20-07-24
साइबर संकटसंपादकीय
माइक्रोसाफ्ट के सर्वर में खराबी से दुनिया भर में जो संकट पैदा हुआ, उससे सबक सीखने की आवश्यकता है। जब एक साफ्टवेयर कंपनी के सर्वर में खराबी से इतनी अधिक समस्याओं का सामना करना पड़ा तो इसकी कल्पना सहज ही की जा सकती है कि अन्य कंपनियों में एक साथ कोई खराबी आने या उनके साइबर हमले का शिकार होने पर कितनी बड़ी मुसीबत खड़ी हो सकती है। माइक्रोसाफ्ट के सर्वर में तकनीकी गड़बड़ी से भारत समेत दुनिया के कई देशों में हवाई यातायात बाधित हुआ, बैंकों का कामकाज थमा, टीवी चैनलों का प्रसारण रुका, सरकारी एवं गैर सरकारी कंपनियों के काम में खलल पड़ा और अमेरिका में तो आपातकालीन सेवाएं भी ठप पड़ गईं। फिलहाल इसका अनुमान लगाना कठिन है कि माइक्रोसाफ्ट के सर्वर में खराबी आने से दुनिया को कितना अधिक नुकसान उठाने के साथ कितने लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ा, लेकिन यह ठीक नहीं कि तकनीक पर निर्भरता ऐसी विश्वव्यापी समस्या खड़ा कर दे। यह एक विडंबना ही है कि माइक्रोसाफ्ट के सर्वर में खराबी तब आई, जब साइबर सुरक्षा के उपाय किए जा रहे थे। इन उपायों ने ही साइबर सुरक्षा को संकट में डालने का काम किया। माइक्रोसाफ्ट ने कहा है कि खामी का पता लगा लिया गया है और शीघ्र ही समस्या का समाधान हो जाएगा, लेकिन माना जा रहा है कि स्थितियां सामान्य होने में दो-तीन दिन का समय लग सकता है।
निश्चित रूप से आज के युग में तकनीक के बगैर किसी का काम चलने वाला नहीं है। जीवन के हर क्षेत्र में तकनीक का प्रवेश हो चुका है, लेकिन समस्या यह है कि इस तकनीक पर कुछ बड़ी टेक कंपनियों का वर्चस्व है। इस वर्चस्व का लाभ उठाकर ये कंपनियां कई बार मनमानी करती हैं। कभी-कभी तो वे अपनी सेवाएं लेने वालों पर मनचाही शर्तें थोपती हैं। इससे भी खराब बात यह है कि वे अलग-अलग देशों के लिए अलग-अलग नियम बनाती हैं। निजी टेक कंपनियों के वर्चस्व और उनकी मनमानी का मुकाबला करने के लिए विभिन्न देशों की सरकारों को एकजुट होना होगा। पता नहीं दुनिया के प्रमुख देश टेक कंपनियों के एकाधिकार का सामना करने और उनकी मनमानी पर लगाम लगाने के लिए एकजुट हो पाएंगे या नहीं, लेकिन कम से कम भारत को तो इस दिशा में कदम उठाने ही चाहिए।
ऐसा इसलिए और भी आवश्यक है, क्योंकि यह देखने में आ चुका है कि इन कंपनियों ने भारत सरकार की ओर से बनाए गए नियम-कानूनों का पालन करने से इन्कार कर दिया। इस मामले में सोशल नेटवर्क साइट्स चलाने वाली कंपनियों का रिकार्ड तो बहुत ही खराब है। यह सही समय है कि तकनीकी क्षेत्र के भारतीय कारोबारी अमेरिका आधारित बड़ी टेक कंपनियों के एकाधिकार का सामना करने के लिए आगे आएं-ठीक वैसे ही, जैसे हाल में ओला कैब्स के भाविश अग्रवाल गूगल मैप्स के खिलाफ आए।
Date: 20-07-24
साइबर संकटसंपादकीय
एक दिग्गज सूचना प्रौद्योगिकी कंपनी ने लगभग पूरी दुनिया को जिस तरह से प्रभावित किया है, वह न केवल दुखद, बल्कि चिंताजनक है। इसे एक आधुनिक आईटी संकट कहा जा सकता है, जिसने दुनिया भर में न सिर्फ साइबर आधारित कामकाज को प्रभावित किया, बल्कि बड़े पैमाने पर इससे परिवहन भी बाधित हुआ है। इस वजह से दुनिया को कितना नुकसान हुआ है, इसका हिसाब लगाने में अभी समय लगेगा। नुकसान का एक पहलू हवाई सेवा के नजरिये से देखा जा सकता है। एविएशन एनालिटिक्स कंपनी सिरियम के अनुसार, वैश्विक आईटी संकट या आउटेज के कारण 1,390 उड़ानें तत्काल प्रभाव से रद्द कर दी गईं। आंकड़ों के अनुसार, अमेरिका में 512, जर्मनी में 92, भारत में 56, इटली में 45 और कनाडा में 21 उड़ानें रद्द कर दी गईं। टिकट लेने से रद्द कराने और रिफंड लेने तक यात्रियों को बड़ी परेशानी झेलनी पड़ी। अमेरिका समेत कई देशों में तो रेल यातायात भी बुरी तरह प्रभावित हुआ। यह संकट इतना व्यापक है कि स्थिति के सामान्य होने में अभी कुछ समय लग सकता है।
आखिर ऐसा क्यों हुआ? माइक्रोसॉफ्ट ने बताया कि वह मध्य अमेरिकी क्षेत्र में अपनी सेवाओं की जांच कर रहा है, जिनकी वजह से दुनिया भर में अनेक प्रकार की सेवाएं बाधित हुई हैं। इस संकट से सर्वाधिक प्रभावित देशों में ऑस्टे्रलिया का नाम सबसे पहले लिया जा रहा है, तो इस तथ्य को परखना चाहिए, हर देश को अपने-अपने स्तर पर अपने नुकसान का सही आकलन करना चाहिए। ऑस्ट्रेलिया से ही शायद सबसे पहले कंप्यूटर सिस्टम के काम न करने की शिकायतें सामने आईं। वहां बैंक, एयरलाइन्स, मीडिया प्रसारण तक रुक गया। कई संस्थान ऑफलाइन काम करने को मजबूर हो गए। अभी तक की सूचनाएं यही इशारा करती हैं कि माइक्रोसॉफ्ट संबंधी इस संकट के पीछे एक साइबर सुरक्षा फर्म क्राउडस्ट्राइक का हाथ है। कोई ऐसा अपडेट किया जा रहा था, जो बुनियादी रूप से वैश्विक साइबर तंत्र के अनुरूप नहीं था। यह कोई साइबर हमला नहीं था, बल्कि सेवा में कुछ अपडेट करने के चक्कर में यह महासंकट खड़ा हो गया। जिम्मेदार कंपनियां इस संकट के लिए तैयार नहीं थीं, तो जाहिर है, साइबर सुरक्षा कंपनी क्राउडस्ट्राइक के साथ ही माइक्रोसॉफ्ट को भी आर्थिक रूप से नुकसान उठाना पड़ेगा। विकसित देशों में अनेक कंपनियां इस संकट की भरपाई या मुआवजा मांगेंगी। वाकई, यह एक ऐसा संकट है, जिसे उदारता बरतते हुए भुला देना आने वाले समय के लिए बहुत भारी पड़ सकता है। यदि इरादतन कोई अपराध नहीं हुआ है, तब भी जो लापरवाही या उदासीनता बरती गई है, उसका माकूल हिसाब होना चाहिए।
हालांकि, इसमें कोई दोराय नहीं कि माइक्रोसॉफ्ट अपने पैमाने पर सक्रिय होगी और फिर ऐसी कोई नौबत नहीं आएगी, पर यह दुनिया की तमाम सरकारों और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए जागने व तैयार होने का समय है। ध्यान रहे, ऐसे संकट से अपराधियों का मनोबल बढ़ता है और वे अपनी साजिश में ऐसी कमियों का लाभ उठाने का दुस्साहस कर सकते हैं। अभी तक डार्क वेब दुनिया में यह बात पता चल चुकी होगी कि इस संकट को कैसे अंजाम दिया गया और अर्थव्यवस्था या सेवा का कौन सा क्षेत्र सर्वाधिक प्रभावित हुआ। अत: साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों के लिए चुनौती बहुत बढ़ गई है। सरकारों को भी नए सिरे से प्रबंध करना चाहिए, ताकि बड़ी आईटी कंपनियां अपने आर्थिक लाभ के लिए साइबर सुरक्षा से किसी भी तरह का समझौता न करने पाएं।
Date: 20-07-24
एक सर्वर की खराबी और दुनिया भर में हाहाकारमुकेश चौधरी, ( साइबर सुरक्षा विशेषज्ञ )
शुक्रवार को माइक्रोसॉफ्ट के सर्वर में आई गड़बड़ी से पूरी दुनिया हलकान रही। इससे वैश्विक अर्थव्यवस्था खासा प्रभावित हुई और विमान सेवाओं, बैंकिंग सिस्टम व शेयर बाजार पर इसका काफी असर पड़ा। कई कंपनियों में काम-काज पूरी तरह से ठप हो गए। माइक्रोसॉफ्ट के सर्वर में आई यह समस्या क्राउडस्ट्राइक की वजह से आई, जो इससे जुड़ी एक साइबर सिक्योरिटी कंपनी है। शुरुआती ‘आशंका यही थी कि यह कोई साइबर हमला है, मगर बाद में साफ हो गया कि यह तकनीकी गड़बड़ियों का नतीजा है। दरअसल, क्राउडस्ट्राइक ने एक अपडेट किया, जिसके बाद से ही दुनिया में जहां-तहां माइक्रोसॉफ्ट विंडोज सपोर्ट वाले अधिकतर उपकरण बैठने लगे।
सवाल है, आखिर ऐसा कैसे हुआ? क्या माइक्रोसॉफ्ट की सेवा लेने वाली कंपनियां ऐसे हालात के लिए तैयार नहीं थीं? अगर थीं, तो उस तैयारी को अमल में लाने में इतना वक्त कैसे लगा? इस पूरे घटनाक्रम को कई पहलुओं से देखना होगा। निस्संदेह, ऐसा किसी कंपनी के साथ हो सकता है, क्योंकि प्रौद्योगिकी की दुनिया में तकनीकी चूक की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है। मगर चूंकि माइक्रोसॉफ्ट एक भरोसेमंद वैश्विक ऑपरेटिंग सिस्टम है और अनगिन कंपनियां उस पर निर्भर हैं, इसलिए इस पूरे मामले में उसकी जिम्मेदारी कहीं अधिक बन जाती है। बड़ी-बड़ी कंपनियों का अपने साथ छोटी-छोटी दूसरी कंपनियों को रखना आम बात है। माइक्रोसॉफ्ट ने भी यही किया और क्राउडस्ट्राइक को अपने साथ जोड़ा। सवाल यह है कि आपात स्थिति या आपदा जैसे हालात में मुश्किलें पैदा होने पर ‘बिजनेस कॉन्टिन्यूटी प्लान’ (बीसीपी) पर कितना ध्यान दिया गया? यह सवाल माइक्रोसॉफ्ट से भी उतना ही जुड़ा है, जितना उन कंपनियों से, जो इसकी सेवाएं ले रही हैं। बीसीपी असल में एक ‘बैकअप प्लान’ होता है, जिसमें प्रतिकूल हालात में भी कंपनी की सेवा बहाल रखने के जरूरी दिशा-निर्देश होते हैं। कंपनियां यह योजना तैयार रखती हैं, ताकि उनके काम पर असर न पड़े। माइक्रोसॉफ्ट के पास भी योजना होगी ही। मगर जब तक अपनी क्लाइंट कंपनियों की वह मदद कर पाती, तब तक देर हो चुकी थी।
स्पष्ट है, बीसीपी न सिर्फ मूल कंपनी को, बल्कि उसकी तमाम ग्राहक कंपनियों को भी पता होना चाहिए। इतना ही नहीं, ग्राहक कंपनियों के पास इस बाबत सारी सहायता उपलब्ध होनी चाहिए, उनके इंजीनियरों को पता होना चाहिए और उनके सभी हितधारकों तक उस प्लान की पहुंच होनी चाहिए। साफ है, शुक्रवार को इन सबमें कहीं न कहीं चूक जरूर हुई। ऐसे में, माइक्रोसॉफ्ट यह जरूर पड़ताल कर रही होगी कि वह रिस्पॉन्स टाइम (किसी समस्या पर प्रतिक्रिया देने का समय) कितना कम कर सकती है? वैसे, यह किसी ख्यात कंपनी के लिए भी उतना ही जरूरी है, जितना स्टार्ट-अप के लिए। हां, छोटी कंपनियां बीसीपी नहीं रखतीं, क्योंकि इसके लिए अलग टीम की जरूरत पड़ती है और उसे अतिरिक्त खर्च करना पड़ता है।
इस मामले में यह देखना होगा कि अब ग्राहक कंपनियां किस तरह अपने घाटे को पाटती हैं? क्या माइक्रोसॉफ्ट मुआवजा देगी? अगर नहीं, तो क्या ग्राहक कंपनियां उसे अदालत में घसीट सकती हैं? क्या ऐसा करने का अधिकार उनके पास है? बेशक, यह सीधे-सीधे माइक्रोसॉफ्ट से जुड़ा मसला नहीं है, क्योंकि इसके लिए क्राउडस्ट्राइक जिम्मेदार है, लेकिन क्या जो अपडेट वह कर रहा था, उसको जांचने का काम सिर्फ क्राउडस्ट्राइक का था या फिर माइक्रोसॉफ्ट का भी? इन सब सवालों के जवाब तो आने वाले दिनों में ही मिलेंगे।
बहरहाल, शुक्रवार जैसी घटना शायद ही पहले कभी हुई है। ऐसा इसलिए, क्योंकि पहले क्लाउड इंफ्रास्ट्रक्चर इतने अधिक नहीं थे। पहले सर्वर डाउन जैसी गड़बड़ियां ज्यादा होती थीं। हालांकि, अब इसमें काफी कमी आ गई है, क्योंकि इनको तुरंत संभाल लिया जाता है। फिर भी, कभी-कभी सर्वर डाउन की खबरें हम सुनते ही हैं, जैसा कि पिछले दिनों मेटा (फेसबुक) के साथ हुआ था। कुल मिलाकर, मुश्किल वक्त में कंपनियों का आपसी संचार काफी अहम होता है। ग्राहक कंपनियों को यह पहले से पता होना चाहिए कि मुश्किल वक्त में हालात कैसे संभालने हैं?रिस्पॉन्स टाइम की जानकारी उनको होनी ही चाहिए। साथ ही, उस माध्यम की भी, जिसके द्वारा उनकी मुश्किलों को मूल कंपनी ठीक करेगी। तभी शुक्रवार जैसे हालात को हम बेअसर कर सकते हैं।
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20 July 2024
प्रश्न – 470 – एक रुकी हुई जिन्दगी दरअसल पीछे जाती हुई जिन्दगी होती है। उक्त विषय पर एक सारगर्भित निबंध लिखें। (1000-1200 शब्द)
Question – 470 – A stagnant life is actually a life going backwards. Write a concise essay on the above topic. (1000-1200 words)
नोट : इसका उत्तर आपको हमें नहीं भेजना है, यह आपके स्वयं के अभ्यास के लिए है।
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Date: 19-07-24
The Real WelfareGovt schemes keep multiplying. But they are no replacement for regular jobs. Parties must recognise thisTOI Editorial
Maharashtra govt has instituted a monthly stipend of ₹6,000 to ₹10,000 for men aged 18 to 35, and a dole of ₹1,500 a month for poor women (annual family income below ₹2.5L) aged 21 to 65. To qualify, women must be married, divorced, widowed, deserted or destitute; one single woman from each poor household is also entitled. The gendered handouts reiterate how women are viewed. But the very need for such sops/welfare is the real story. The women’s scheme will cost ₹46k cr annually, the men’s ₹10k cr a year. Over 44L applications have been received for the women’s scheme in the two weeks since it was announced – govt is expecting 1cr applications by Aug 31.
‘Welfare’ can’t replace wages | The scheme for men, said CM Eknath Shinde, is their “solution” to the unemployment problem. Govt believes it has responded to the jobs crisis. Unemployment was an issue during LS elections and promises to remain an issue in the forthcoming assembly polls. Reality check for politicians: can dole and stop-gap arrangements mask a no-jobs crisis?
Netas know better | In 2018, for 26,502 rail vacancies at one level (loco-pilots and technicians), there were 47.6L applications; at another level (assistants, helpers), 62,907 vacancies had 1.9cr applications. This was seen even in the attempted Karnataka private jobs quota bill, where unemployment rate among educated young population (15-29) is around 17.2%, up from 11.8% a decade ago, per India Unemployment Report 2024. More than half of India’s population depends on free grain from GOI. Demand for MGNREGA has been up – in 2019-20, work generated was 265.3cr person days. In 2023-24, it was 305.2cr – 40cr more.
Between eco numbers & ground reality | All this is happening when the macroeconomy is robust. IMF forecast a 7% growth, making India a standout major economy in terms of headline numbers. But consumption growth remains tepid. Employment data, from various official sources, use definitions that are at considerable variance to common sense definitions of a job. Welfare packages are more based on ground reality than jobs data. Young Indians going back to farm jobs and/or doing occasional non-farm work aren’t the answer. To solve a problem, we must first acknowledge it.
Date: 19-07-24
So, the Seine’s Now Clean, Ganga, Anyone?ET Editorial
Cleaning up large rivers is never easy. Proving they are clean and restoring citizen confidence in them is even tougher. Ask Paris mayor Anne Hidalgo. Earlier this week, she got into the Seine to take a well-publicised swim to prove that the city’s most famous river had been cleaned up enough for Olympic swimmers to swim in later this month. Swimming in the Seine had been banned since 1923 due to high pollution levels. Since 2015, organisers invested $1.5 bn to prepare it for the Olympics and to ensure Parisians have a cleaner river after the Games. It seems Parisians now have a river to swim in without worry.
The questions raised about Seine’s cleanliness provide a good opportunity to check the status of India’s lifeline and most famous, the Ganga. Three mega projects have been launched since the 1980s — Ganga Action Plan (1985), National Ganga River Basin Project (2008), and Namami Gange Programme (2014). According to the Central Pollution Control Board (CPCB), around ₹20k cr was spent on cleaning the Ganga between 1986 and 2014. Since 2014, another ₹13k cr has been allocated and spent by October 2022.
But we don’t yet have a clear answer to any progress made. In Parliament last year, Jal Shakti ministry said that the river has seen ‘varying degrees of improvement’ in water quality and that the number of polluted stretches has come down. However, news reports point out that the CPCB report quoted by the ministry didn’t mention what he had said. Cleaning the river, the ministry added, is a continuous process, and National Mission for Clean Ganga is implementing several conservation and rejuvenation initiatives for the Ganga and its tributaries. That’s good. But nearly 25 years on, one would have expected better results for a river we consider ‘sacred’.
Date: 19-07-24
भ्रष्टाचार दूर करना सबसे पहली शर्त होनी चाहिएसंपादकीय
अगर कोई राज्य दशकों से विकास से दूर हो, भ्रष्टाचार शासकीय ढांचे को घुन की तरह खा चुका हो और प्रशासनिक अकर्मण्यता स्वीकृत नॉर्म बन चुका हो तो क्या उसे केवल विशेष राज्य के दर्जे के नाम पर अतिरिक्त फंड की संजीवनी देकर पटरी पर लाया जा सकता है? अगर उद्घाटन से पहले करोड़ों की लागत से बने पुल ढह जाएं या बनने के कुछ समय बाद ही पुल नदी में समा जाए तो विशेष दर्जा मिलने से सिस्टम का करप्शन कम नहीं होगा बल्कि बढ़ेगा। विशेष दर्जे का लाभ केवल केन्द्रीय योजनाओं में राज्य के अंशदान को 60% से घटाकर 10% करता है और कुछ अतिरिक्त मदद केंद्र से मिलती है। लेकिन अगर वह राज्य विकास के मद में मिले धन को, यहां तक कि पूंजीगत खर्च के मद में बजटीय राशि भी खर्च न कर पाता हो (बकौल सीएजी वर्ष 2023 में 66,502 करोड़ रुपए की बड़ी राशि बगैर खर्च हुए वापस हो गई) तो क्या उसकी जरूरत फंड की है या उपलब्ध फंड को खर्च करने की? अगर ऐसे राज्य में शहरीकरण मात्र 12% हो, देश में एमएसएमई सेक्टर के कुल उत्पादन में इसका शेयर मात्र 1.32% हो, जिस राज्य में परिवार नियोजन की असफलता के कारण सर्वाधिक टीएफआर हो जिससे देश की आबादी में कुल हिस्सा 10% ‘चुका हो (जबकि जीडीपी में मात्र 2.8% ) क्या उसे अतिरिक्त फंड से ज्यादा उपलब्ध फंड के समुचित इस्तेमाल की जरूरत है?
Date: 19-07-24
भोजशाला का भी सच सामने आयाहरेंद्र प्रताप, ( लेखक बिहार विधान परिषद के पूर्व सदस्य हैं )
हाल में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआइ) ने मध्य प्रदेश स्थित धार शहर के ऐतिहासिक भोजशाला परिसर के पुरातात्विक सर्वेक्षण की रिपोर्ट मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ को सौंपी। दावा है कि इस सर्वेक्षण में 94 टूटी हुई मूर्तियों सहित 1,700 से अधिक चीजें ऐसी मिली हैं, जो बताती हैं कि भोजशाला स्थित वाग्देवी यानी सरस्वती देवी के मंदिर को मुस्लिम आक्रांताओं ने तोड़कर उसके अवशेष से मस्जिद बनाई थी।
इस रिपोर्ट के न्यायालय में प्रस्तुत होने के बाद हिंदुओं को अब न्याय की प्रतीक्षा है। धार में परमार वंश के राजा भोज ने वर्ष 1000 से 1055 तक शासन किया था। वह मां सरस्वती के अनन्य भक्त थे। वर्ष 1034 में उन्होंने एक महाविद्यालय की स्थापना की, जिसे ‘भोजशाला’ के नाम से जाना जाता है। वर्ष 1305 में अलाउद्दीन खिलजी ने उसे ध्वस्त कर दिया।
फिर वर्ष 1401 में दिलावर खान ने भोजशाला के एक हिस्से में मस्जिद बनवा दी। भोजशाला को लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा है। इस पर मध्य प्रदेश हाई कोर्ट में कई याचिकाओं पर सुनवाई हो रही है। इसी के तहत हाई कोर्ट ने गत मार्च में एक आदेश जारी कर एएसआइ को भोजशाला का पुरातात्विक सर्वेक्षण करने का निर्देश दिया था।
जिस तरह अयोध्या, काशी और मथुरा से हिंदू समाज का एक गहरा भावनात्मक रिश्ता है, उसी तरह भोजशाला से भी। काशी विश्वनाथ मंदिर का विवाद तो सर्वविदित है। औरंगजेब ने उसे तोड़कर ज्ञानवापी परिसर बनाया। सैकड़ों वर्ष के संघर्ष के बाद 1991 में यह मामला कोर्ट में पहुंचा। फिर 2021 में पांच हिंदू महिलाओं ने वाराणसी सिविल कोर्ट में याचिका दाखिल कर ज्ञानवापी स्थित शृंगार गौरी में पूजा की अनुमति मांगी।
न्यायालय के काफी चक्कर लगाने के बाद अंततः 2023 में वाराणसी जिला अदालत ने ज्ञानवापी परिसर में पुरातात्विक सर्वे की अनुमति दी। सर्वे करने वाली एएसआइ की टीम ने वैज्ञानिक सर्वेक्षण, वास्तुशिल्प अवशेषों, कलाकृतियों, शिलालेखों, कला और मूर्तियों के अध्ययन के आधार पर वहां मौजूदा संरचना के निर्माण से पहले एक हिंदू मंदिर होने कि पुष्टि करते हुए इसी साल जनवरी में अपनी रिपोर्ट न्यायालय को सौंपी।
ज्ञानवापी और भोजशाला की तरह ही मथुरा में भी श्रीकृष्ण जन्मभूमि मंदिर परिसर की ईदगाह मस्जिद के पुरातात्विक सर्वेक्षण का आदेश इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दिया था। इस पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है। उसके फैसले की प्रतीक्षा है। इलाहाबाद हाई कोर्ट आगरा स्थित शाही मस्जिद की सीढ़ियों में भगवान श्रीकृष्ण के विग्रह दबे होने के दावे की जांच एएसआइ विभाग से कराने की मांग वाली एक याचिका की सुनवाई कर रहा है। हाई कोर्ट ने सर्वे के संबंध में एएसआइ से जवाब मांगा है। इस मामले की अगली सुनवाई 5 अगस्त को होनी है।
मुस्लिम पक्ष के विरोध के बाद भी उच्च न्यायालयों द्वारा मथुरा तथा भोजशाला मंदिर की जांच एएसआइ विभाग को देने के आदेश के बाद जहां एक तरफ यह विश्वास बढ़ा है कि हिंदू मंदिरों का सत्य अब सामने आएगा, वहीं दूसरी तरफ एक शंका यह भी है कि क्या अयोध्या में प्रभु श्रीराम के जन्मस्थान पर मंदिर तोड़ कर बनाए गए विवादित ढांचे को हटाने के लिए दशकों चले मुकदमे की तरह उपरोक्त मामले भी न्यायालय में लटक तो नहीं जाएंगे? सच्चाई सामने न आए, इसके लिए मुस्लिम पक्ष बार-बार न्यायालय में जाकर सुनवाई को रुकवाने का प्रयास कर रहा है।
उपासना स्थल अधिनियम, 1991 का हवाला देकर मुस्लिम आक्रांताओं के कृत्यों को नकारने का असफल प्रयास किया जा रहा है। यह एक सच्चाई है कि मुस्लिम आक्रांताओं ने भारत पर आक्रमण कर इस देश के अनेक पूजा स्थलों को तोड़ा, विश्वविद्यालयों को जलाया और महिलाओं-बच्चों समेत सभी पर भयंकर अत्याचार किए। गैर हिंदुओं पर अत्याचार का सिलसिला भारत विभाजन के बाद बने पाकिस्तान और बांग्लादेश में भी जारी है। इन देशों में हिंदुओं के पूजा स्थल अभी भी तोड़े जा रहे हैं।
आक्रांता इस्लामी आक्रमणकारियों ने पूजा स्थल नहीं तोड़े, यह कहना सरासर झूठ है। वामपंथी इतिहासकार इरफान हबीब ने भी स्वीकार किया है कि मथुरा और काशी के मंदिरों को तोड़कर मस्जिदें बनाई गई थीं। उन्होंने यह भी माना कि औरंगजेब ने मंदिर तोड़कर गलत किया। राम भक्तों के धैर्य की सीमा जब समाप्त हो गई तो छह दिसंबर, 1992 को उन्होंने अयोध्या में विवादित ढांचे को ध्वस्त कर दिया।
अयोध्या में उस दिन वह आक्रोश इस्लामिक आक्रमण और न्यायपालिका के टाल-मटोल के खिलाफ भड़का था। भविष्य में ऐसी कोई अनहोनी न घटे और हिंदुओं-मुस्लिमों में आपसी तनाव न भड़के, इसका ध्यान रखना होगा। पुरातात्विक प्रमाण होने के बाद भी न्यायालय इन मामलों का जल्द निपटारा नहीं कर पा रहे हैं।
इस्लाम भले ही बाहर से आयातित पंथ हो, लेकिन उसके अनुयायी इसी मिट्टी के लोग हैं। यह भी एक तथ्य है कि इस्लामिक आक्रमण, इस्लामिक आतंकवाद तथा इस्लाम के आधार पर हुए देश के बंटवारे के कारण इस्लाम और हिंदुत्व के बीच अविश्वास की दीवार खड़ी हुई है। प्रार्थना या इबादत में अंतर मानकर पूजा स्थल से अतिक्रमण हटाकर इबादत या नमाज के लिए दूसरी जगह की मांग और उसकी व्यवस्था समस्या का एक सकारात्मक हल होगा।
जिस प्रकार अयोध्या का शांतिपूर्ण समाधान हुआ, उसी प्रकार काशी, मथुरा और धार स्थित भोजशाला का भी समाधान इस देश के अंदर सद्भाव का वातावरण निर्मित करेगा। राम मंदिर प्राण प्रतिष्ठा कार्यक्रम में अयोध्या के मुस्लिम पक्ष की सहभागिता ने एक नए युग की शुरुआत का संदेश दिया है। हिंदू पक्ष को मुस्लिम पक्ष से जो अपेक्षा है, उसकी पूर्ति होनी चाहिए।
Date: 19-07-24
साख का सवालसंपादकीय
अक्सर ऐसी खबरें आती हैं, जिनमें किसी अभ्यर्थी ने फर्जी प्रमाणपत्रों के आधार पर नौकरी हासिल कर ली। मगर संघ लोक सेवा आयोग यानी यूपीएससी जैसी संस्था आमतौर पर इस तरह के आरोपों से बची रही है। माना जाता रहा है कि यूपीएससी की किसी परीक्षा को पास करने के बाद नियुक्ति के लिए चुने गए अभ्यर्थी के प्रमाणपत्रों की गहन जांच होती है। मगर भारतीय प्रशासनिक सेवा के लिए चुनी गई एक अधिकारी पूजा खेडकर के पद के दुरुपयोग के मामले में और उसके बाद जैसी खबरें आ रही हैं, उससे यही लगता है कि संघ लोक सेवा आयोग जैसे उच्च स्तरीय संस्थान में भी किसी उम्मीदवार के प्रमाणपत्रों की जांच को लेकर लापरवाही या उदासीनता बरती जाती है। गौरतलब है कि पुणे में प्रशिक्षु आइएएस अधिकारी पूजा खेडकर यूपीएएससी की परीक्षा में चुने जाने के लिए खुद को शारीरिक रूप से दिव्यांग और अन्य पिछड़ा वर्ग समुदाय का बताने के लिए फर्जी प्रमाणपत्र पेश करने के आरोपों का सामना कर रही हैं। उन पर पुणे में तैनाती के दौरान विशेषाधिकारों का दुरुपयोग करने का भी आरोप है।
हैरानी की बात यह है कि पूजा खेडकर का मामला सुर्खियों में आने के बाद अब भारतीय प्रशासनिक सेवा और भारतीय पुलिस सेवा के कुछ अन्य अधिकारियों के बारे में भी यह दावा किया गया है कि उन्होंने अन्य पिछड़ा वर्ग और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लाभ उठाने के मकसद से फर्जी प्रमाणपत्रों का उपयोग किया है। सवाल है कि जब कोई अभ्यर्थी यूपीएससी की परीक्षाओं में सभी स्तर को पार करके चुन लिया जाता है, तब उसके बाद नियुक्ति के पहले उसके प्रमाणपत्रों की जांच को लेकर कैसी व्यवस्था है कि कोई व्यक्ति हेराफेरी करके अपने लिए प्रमाणपत्र बनवा लेता है, जिसे यूपीएससी भी अपनी जांच में पकड़ नहीं पाता। अब संभव है कि संदिग्ध अधिकारियों के प्रमाणपत्रों की फिर से गहन जांच हो। लेकिन अगर फर्जीवाड़े के आरोप सही पाए गए तो जिस यूपीएससी के समूचे तंत्र को पूरी तरह पाक- साफ और चौकस बताया जाता है, वहां अभ्यर्थियों के प्रमाणपत्रों की जांच में इस कदर लापरवाही बरतने को लेकर कैसी धारणा बनेगी? क्या यह देश के सबसे विश्वसनीय माने जाने वाले संस्थान की साख का सवाल नहीं है?
Date: 19-07-24
‘भूमिपुत्र’ की राजनीतिसंपादकीय
कर्नाटक की सिद्धारमैया सरकार ने भारी विरोध के बाद बुधवार को उस विवादित विधेयक पर रोक लगा दी है, जिसके तहत निजी क्षेत्र में कन्नड़ लोगों के लिए नौकरियों का प्रावधान किया गया था। इस विधेयक को बृहस्पतिवार को विधानसभा में प्रस्तुत किया जाना था। हैरानी की बात है कि संविधान की मूल भावनाओं को समझे बगैर कर्नाटक की कैबिनेट ने इस विधेयक को मंजूरी दी। कर्नाटक राज्य उद्योगों, कारखानों और अन्य प्रतिष्ठानों में स्थानीय उम्मीदवारों के लिए रोजगार विधेयक-2024 के प्रस्तावों के मुताबिक, निजी क्षेत्र के कंपनियों को प्रबंधन स्तर की 50 प्रतिशत और गैर- प्रबंधन स्तर की 70 प्रतिशत नौकरियां कन्नड़ लोगों को अनिवार्य रूप से देनी होगी। इस विधेयक में यह भी प्रावधान था कि निजी क्षेत्र की कंपनियों में समूह सी और डी श्रेणी के पदों के लिए स्थानीय निवासियों को 100 फीसद आरक्षण दिया जाएगा। इस तरह की ‘भूमिपुत्र’ नीति लागू करने वाला कर्नाटक पहला राज्य नहीं है। आंध्र प्रदेश ने 2019 में हरियाणा ने 2020 में इसी तरह के मिलते-जुलते विधेयक पारित किए थे। वस्तुतः स्थानीय लोगों को निजी प्रतिष्ठानों में आरक्षण देने का प्रावधान शेष भारत के नागरिकों के साथ भेदभाव पैदा करता है जो भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 का उल्लंघन करता है, जिसमें कहा गया है कि राज्य भारत के राज्य क्षेत्र में किसी व्यक्ति को कानून के समक्ष समानता से या कानूनों के समान संरक्षण से वंचित नहीं करेगा। इन्हीं आधारों पर पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय में दो सदस्यीय खंडपीठ ने 17 नवम्बर, 2023 को हरियाणा सरकार के कानून हरियाणा राज्य स्थानीय उम्मीदवारों के रोजगार अधिनियम, 2020 रद्द कर दिया जिसके तहत राज्य के निवासियों के लिए हरियाणा के उद्योगों में 75 फीसद आरक्षण का प्रावधान था। निजी कंपनियों का मानना है कि ऐसे कानून नियोक्ताओं के संवैधानिक अधिकारों पर कुठाराघात करते हैं। निजी क्षेत्र की नौकरियां कर्मचारियों की योग्यता और कौशल पर आधारित हैं। वस्तुतः नई आर्थिक नीतियों के कारण अब सार्वजनिक क्षेत्र में नौकरियां सीमित हो गई हैं। रोजगार के ज्यादातर अवसर अब निजी कंपनियों में ही रह गए हैं। इसलिए सरकारों को चाहिए कि ऐसे कदम न उठाएं जिनसे निजी कंपनियों के हितों पर चोट पहुंचे।
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‘द हिंदू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 19 जून, 2024
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Date: 18-07-24
In search of jobsTechnology must be harnessed for easing burden and for efficiencyEditorial
Employment generation will remain a major challenge before the Narendra Modi government in its third term, and the upcoming Union Budget is expected to take note of it. There are no easy ways out, given the swelling numbers of young job seekers, and the changing nature of the economy that requires fewer workers, thanks to rapid technological advancement. Recent studies have highlighted the seriousness of the challenge. The Annual Survey of Unincorporated Sector Enterprises (ASUSE) notes that just 21% of the total establishments used the Internet for entrepreneurial activities. The survey, quite similar to a previous report of the International Labour Organisation (ILO), says the unincorporated non-agricultural economy employed about 11 crore workers during October 2022 to September 2023 in comparison to about 9.8 crore workers during 2021-22. The ILO’s India Employment Report had also warned that the share of manufacturing employment was stagnant, at around 12%-14% and the slow transition of jobs from agriculture to non agriculture reversed due to the COVID-19 pandemic. A Citigroup report too said the current rate of job creation will not be sufficient to meet future demand. The ASUSE had also noted that ‘Other Services’ contributed the maximum share (36.45%) to the total employment followed by ‘trading’ (35.61%) and ‘manufacturing’ (27.94%). Various Periodic Labour Force Surveys had also noted that 45.76% of the total workforce was engaged in agriculture and allied sectors during 2022-23.
While the government cannot magically change the situation, it can initiate thoughts about solutions. The Swadeshi Jagran Manch has demanded that the Centre impose a robot tax and incentivise job creation in the Budget. The trade unions have asked the Centre to convene the long-pending Indian Labour Conference. Union Labour Minister Mansukh Mandaviya’s decision to reach out to trade unions is a positive development, but he must have stronger prescriptions than the Labour Codes to stop job losses and generate more jobs. Technological innovations should be to reduce the workload of people, and not to create hurdles for their livelihood. To industrialise agriculture production, the government should consider more public and cooperative investment to create more jobs and ease the load on farmers. It has to bring on board the private and public sectors, labour unions, States and political parties to design a growth model with job creation at its centre. Recent global experiences suggest that economic growth without employment growth can cause social and political upheavals. This is not a problem that can be explained away, and an honest account of the problem will be a good starting point for mitigative measures.
Date: 18-07-24
कृषि विस्तार ढांचे में बदलाव की जरूरत हैसंपादकीय
देश की प्रमुख कृषि शोध संस्था ‘आईसीएआर’ ने अपना स्थापना दिवस मनाते हुए 56 फसलों की 323 नई किस्मों के बीज जारी किए। इनमें से 289 बीज पर्यावरण-रोधी और 27 बायो-फोर्टिफाइड (संरक्षित) होंगे। ये बीज अनाज, तिलहन, दलहन, चारा, गन्ने की फसलों के हैं, जो तापमान या आर्द्रता -जनित मौसमी बदलावों से उत्पादन नुकसान से बचाएंगे। संस्था का दावा है कि इसने पिछले नौ वर्षों में 2593 किस्म के नए बीज जारी किए हैं, यानी हर कार्य दिवस पर एक। किसी भी देश की कृषि के लिए यह आंकड़ा गर्व की बात है, फिर क्यों प्रति हेक्टेयर उत्पादन में भारत अन्य देशों से पीछे है ? वहीं लागत भी ज्यादा है, जिसके कारण वैश्विक निर्यात बाजार में अक्सर हमारा रेट ज्यादा होता है। बहरहाल बजट के मात्र 0.20 फीसदी धन के बावजूद इन वैज्ञानिकों के शोध प्रशंसा योग्य हैं। सवाल यह है कि इतने परिश्रम के बाद विकसित ये नए बीज आखिर किसानों तक अपेक्षित समय में क्यों नहीं पहुंच पाते? क्या भारत में कृषि-विस्तार ढांचा अपनी उपादेयता खो चुका है यानी ब्लॉक इकाइयां अपना काम नहीं कर रही हैं ? जाहिर है आठ दशक पुराना कृषि विस्तार ढांचा लगभग चरमरा गया है और अगर कृषि में क्रांति लानी है तो इसे किसी नए ढांचे से विस्थापित करना होगा। किसान आज भी नई किस्मों के बीज बोने में संकोच करता है क्योंकि ब्लॉक आज भी शोध और किसानों के बीच भरोसेमंद कड़ी नहीं बन सका है।
Date: 18-07-24
जलवायु परिवर्तन- जीवन और मौत का सवाल?सुनीता नारायण, ( लेखिका सेंटर फॉर साइंस ऐंड एनवायरनमेंट से संबद्ध हैं )
हम यह जानते हैं कि जलवायु परिवर्तन का असर मौसम पर भी पड़ता है जिससे लोगों की जिंदगी और आजीविका के साधन दोनों ही प्रभावित होते हैं। लेकिन हम इस बात पर पर्याप्त चर्चा नहीं करते हैं कि मौसम के ये चरम स्तर लोगों के स्वास्थ्य को किस तरह प्रभावित करते हैं। इस निराशाजनक दौर में जब तापमान सहन की क्षमता से ऊपर चला गया, तब हमें पता चला कि गर्मी भी जानलेवा हो सकती है। हमें यह भी मालूम हुआ कि न्यूनतम तापमान में वृद्धि यानी रात की गर्मी भी मौत का कारण बन सकती है। यह निश्चित रूप से महत्त्वपूर्ण है कि हम बदलते जलवायु संकट और हमारे स्वास्थ्य पर इसके प्रभाव के बीच की कड़ियों को जोड़कर देखें।
इस साल दुनिया भर में झुलसाने वाली गर्मी पड़ी और इस भीषण गर्मी के कारण लोगों की जान भी गई। दिल्ली में जून महीने के आखिर तक यह अनुमान था कि अधिक गर्मी से करीब 270 लोगों की मौत हो गई। लेकिन मैं इस संख्या को सावधानी से देखती हूं। दरअसल हमें यह मालूम नहीं कि कितने लोगों की मौत सिर्फ गर्मी की वजह से हुई क्योंकि जिन लोगों को हृदय या गुर्दे की बीमारियों जैसी स्वास्थ्य समस्याएं हैं उनकी मुश्किलें गर्मी के कारण और बढ़ जाती है। संभव है कि इस गर्मी के मौसम में कई लोग केवल भीषण गर्मी का शिकार हो गए हों, लेकिन डॉक्टरों ने इसके लिए पहले से मौजूद स्वास्थ्य समस्याओं को ही इस परिस्थिति के लिए जिम्मेदार ठहराया।
हम जानते हैं कि गर्मी के कारण वैसे लोग अधिक जोखिम की स्थिति का सामना करते हैं जिनकी काम की परिस्थितियां ही कुछ ऐसी होती हैं जिसके कारण उन्हें धूप में रहना पड़ता है जैसे कि निर्माण कार्य से जुड़े कामगार या फिर किसान। इसके अलावा गरीब तबके के लोगों को भी इसी तरह के जोखिम से जूझना पड़ता है क्योंकि उनके पास बिजली की सुविधा नहीं होती है और वे खुद को ठंडा रखने के लिए विभिन्न उपकरणों का इस्तेमाल भी नहीं कर सकते हैं। लेकिन उनकी मौत की वजहों में गर्मी नहीं गिनी जाती है और यह मान लिया जाता है कि वे गरीब या बूढ़े हैं और उनकी मौत किसी ‘अज्ञात कारणों’ की वजह से हुई है। इसके अलावा भीषण गर्मी का शिकार होने जैसी स्थिति को कोई अधिसूचित बीमारी में नहीं गिना जाता है जिसका अर्थ यह भी है कि आगे किसी भी कार्रवाई के लिए गर्मी से जुड़ी परेशानी की बात दर्ज किए जाने या इससे जुड़ी सूचना मुहैया करने की जरूरत नहीं पड़ती है।
इसलिए हमें यह अवश्य स्वीकार करना चाहिए कि हाल की भयानक गर्मी के कारण स्वास्थ्य क्षेत्र पर पड़ने वाले बोझ और इसके कारण हुई मौतों के बारे में हमें बहुत कम जानकारी है।
हालांकि शोध अब भयानक गर्मी के विभिन्न आयामों की ओर इशारा कर रहे हैं। पहला, यह समझा जा रहा है कि रात के वक्त गर्मी बढ़ने से अधिक तादाद में मौत होती है। एक ब्रितानी मेडिकल जर्नल, ‘दि लैंसेट’ के 2022 के एक शोध पत्र में यह पाया गया कि ठंडी रातों वाले तापमान की तुलना में गर्म रात वाले दिनों में मृत्यु का जोखिम 50 फीसदी से अधिक हो सकता है। इस शोध पत्र के लेखकों का कहना है कि गर्मी के कारण लोगों की नींद भी प्रभावित होती है और इसके चलते शरीर को आराम करने का मौका नहीं मिलता जिसके परिणामस्वरूप स्वास्थ्य से जुड़े तनाव की स्थिति बढ़ती जाती है।
दूसरा, हम यह जानते हैं कि वाष्पीकरण हमारे शरीर को ठंडा करने का एक तरीका है लेकिन यह तब प्रभावी नहीं होता है जब आर्द्रता 75 प्रतिशत से अधिक बढ़ जाती है और इसे वेट बल्ब घटना कहते हैं। इसलिए न केवल तापमान बल्कि अत्यधिक गर्मी और अत्यधिक सर्दी की स्थिति को समझने की सख्त जरूरत है।
चिंता की बात यह है कि हम इन सभी तीन जानलेवा कारकों में बढ़ोतरी का रुझान देख रहे हैं खासतौर पर शहरी केंद्रों में। यहां तापमान मानवीय सहनशीलता के स्तर से ऊपर बढ़ रहा है और इसके साथ ही आर्द्रता और रात के वक्त गर्मी भी बढ़ रही है। सेंटर फॉर साइंस ऐंड एनवायरनमेंट में मेरे एक सहयोगी की एक ताजा रिपोर्ट में भारत के प्रमुख शहरों में गर्मी के रुझान पर नजर रखी गई और यह पाया गया कि देश के औसत तापमान के विपरीत शहरों की वायु के तापमान में बढ़ोतरी हो रही है। हैदराबाद, दिल्ली, मुंबई, कोलकाता और चेन्नई में अधिक आर्द्रता वाली गर्मी देखी जा रही है और पिछले से पिछले दशक 2001-10 की तुलना में 2014-23 के दशक के मुकाबले 5-10 फीसदी की बढ़ोतरी देखी जा रही है। केवल बेंगलूरु में गर्मी के आर्द्रता के स्तर में कोई बढ़ोतरी नहीं देखी गई और इस पर और जांच की आवश्यकता है।
रिपोर्ट में यह पाया गया कि सभी जलवायु क्षेत्रों के शहरों में रात में ठंड नहीं होती है। इसमें यह बताया गया कि 2001-10 के दशक में गर्मी के मौसम में रात का तापमान दिन के शीर्ष स्तर के तापमान से 6.2 डिग्री सेल्सियस -13.2 डिग्री सेल्सियस (विभिन्न शहरों में) तक कम हो गया।
लेकिन पिछली 10 गर्मियों के सीजन में, दिन और रात के तापमान (अधिकतम और न्यूनतम) के बीच का यह अंतर कम हो रहा है। हैदराबाद में 13 प्रतिशत की गिरावट आई है, दिल्ली में 9 प्रतिशत और बेंगलूरु में यह 15 प्रतिशत तक है। कोलकाता में पहले से ही दिन और रात के तापमान के बीच का अंतर कम था और अब उच्च आर्द्रता स्तर के कारण इसकी स्थिति और भी खराब हो गई है।
हम जानते हैं कि यह सब हमारी दुनिया के दोहरे झटके का हिस्सा है। एक तरफ, ग्रह गर्म हो रहा है और इस साल ने पिछले सभी उच्च तापमान के रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। इससे भी खराब बात यह है कि अनियमित बारिश, भीषण गर्मी और हवा के रुख में बदलाव से मौसम में भी परिवर्तन देखा जा रहा है। इससे गर्मी और अधिक तनावपूर्ण और घातक हो जाती है। दूसरी ओर, हमारे शहरों में स्थानीय स्तर पर औसत तापमान में नाटकीय बदलाव देखने को मिल रहा है हरियाली वाली जगहों का स्थान कंक्रीट निर्माण के लेने से गर्मी का प्रभाव और बढ़ जाता है। साथ ही यातायात और शीतलन के लिए ऊर्जा के उपयोग से हवा में गर्मी और बढ़ जाती है।
इस दौर ने हमें गर्मी से जुड़े दबाव-तनाव के बारे में नए सबक सिखाए हैं। तथ्य यह है कि जलवायु परिवर्तन में मानव स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव के साथ ही हमें ऐसी कई बातों से हैरान करने की क्षमता है। अब भी इस विज्ञान को समझना बाकी है। जलवायु परिवर्तन का प्रभाव निश्चित रूप से हमारे शरीर और हमारे स्वास्थ्य पर ज्यादा पड़ेगा। यही कारण है कि ग्रह की जैसी स्थिति होगी उसका सीधा संबंध मानव स्वास्थ्य से जुड़ा होगा। अब समय आ गया है कि हम यह समझें कि जलवायु परिवर्तन अस्तित्व से जुड़ा संकट क्यों है और यह वास्तव में जीवन और मौत के सवाल से भी जुड़ा है।
Date: 18-07-24
विषमता की बुनियादसंपादकीय
महंगाई का सीधा असर आम उपभोक्ता के घरेलू खर्चों पर पड़ता है। इसलिए यह हैरानी का विषय नहीं कि थोक और खुदरा महंगाई की बढ़ी दरों के साथ ही उपभोक्ता व्यय के आंकड़े भी बढ़े हुए आए हैं। सरकार द्वारा जारी 2022-2023 की घरेलू खर्च रपट के मुताबिक देश के करीब आधे लोगों को तीन वक्त का भोजन नहीं मिल पाता। गांवों और शहरों में रहने वाले लोगों के बीच यह अंतर बहुत मामूली है। करीब आधी आबादी नाश्ता, दोपहर और रात का भोजन नियमित नहीं कर पाती। इसकी वजह केवल बढ़ी हुई महंगाई नहीं, बल्कि आय में बढ़ती विषमता है। देश के शीर्ष पांच फीसद अमीर और पांच फीसद सबसे अमीर लोगों के घरेलू खर्च में करीब बीस गुना का अंतर है। पांच फीसद सबसे गरीब ग्रामीण लोगों का औसत घरेलू खर्च 1373 रुपए और पांच फीसद शीर्ष शहरी अमीरों का घरेलू खर्च 20824 रुपए है। इसे लेकर स्वाभाविक ही विपक्ष को सरकार पर निशाना साधने का मौका मिल गया है। कांग्रेस ने पिछले दस वर्षों में बढ़ी हुई आय संबंधी विषमता का आंकड़ा पेश करते हुए सरकार की आर्थिक नीतियों की आलोचना की है।
घरेलू खर्च में बढ़ोतरी और गरीब तथा अमीर के उपभोग व्यय में भारी अंतर आर्थिक विसंगतियों को रेखांकित करता है। महंगाई और घरेलू खर्च बढ़ने से लोगों को तब परेशानी नहीं होती, जब उसी अनुपात में उनकी आमदनी बढ़ी हो। मगर पिछले पांच-सात सालों में लोगों की क्रयशक्ति बुरी तरह प्रभावित हुई है। कोरोना काल के बाद लाखों लोगों की नौकरियां और रोजगार छिन गए, इससे उन्हें घर का खर्च चलाना मुश्किल है। तिस पर बढ़ती महंगाई मुसीबतों का पहाड़ बन कर टूटती है। दूसरी तरफ, अमीर लोगों का घरेलू खर्च बढ़ रहा है। यानी उनकी आमदनी भी बढ़ रही है। इससे बाजार में भी विसंगतियां पैदा होती हैं। केवल अमीर लोगों के बल पर कोई बाजार नहीं टिक पाता। अमीरों की आमदनी बढ़ने से ऐशो-आराम की वस्तुओं की बिक्री जरूर बढ़ जाती है, मगर आम उपभोक्ता के बल पर खड़े खुदरा बाजार को निरंतर संघर्ष करते रहना पड़ता है। पिछले कुछ वर्षों में सृजित कुल संपत्ति का करीब चालीस फीसद हिस्सा देश के केवल एक फीसद लोगों के पास गया है। देश की सत्तर करोड़ आबादी की कुल संपत्ति के बराबर हिस्सा कुल इक्कीस अमीरों के पास है। अर्थशास्त्रियों का कहना है कि अर्थव्यवस्था में बढ़ते एकाधिकार की वजह से महंगाई बढ़ रही है। मगर सरकार इस विसंगति को दूर करने को लेकर गंभीर नजर नहीं आती।
विचित्र है कि एक तरफ तो देश को दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था के रूप में रेखांकित किया जाता है। कुछ वर्षों में देश के दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाने का दावा किया जा रहा है। इसके विकसित देशों की श्रेणी में शुमार होने की उम्मीद जताई जा रही है। मगर इसके बरक्स दूसरी तस्वीर यह है कि देश की आधी आबादी तीन वक्त का भोजन नहीं जुटा पाती। सरकार खुद इसे अपनी बड़ी उपलब्धि के रूप में रेखांकित करती है कि वह अस्सी करोड़ लोगों को मुफ्त अनाज उपलब्ध करा रही है। जब तक लोगों की क्रयशक्ति नहीं बढ़ती और आय की असमानता दूर नहीं होती, तब तक संतुलित आर्थिक विकास की उम्मीद करना मुश्किल बना रहता है। इसके लिए नए रोजगार सृजित करने और वेतन-भत्तों के मामले में व्यावहारिक नीति बनाने की जरूरत होती है, जिसका अभाव लंबे समय से देखा जा रहा है।
Date: 18-07-24
आतंकवाद के विरुद्धसंपादकीय
जम्मू संभाग के डोडा जिले के जंगलों में आतंकवादियों के साथ सुरक्षा बलों की भीषण मुठभेड़ ने एक बार फिर सुरक्षा ढांचे की कमियों को उजागर कर दिया है। इस पूरे इलाके ने हाल के वर्षों तक लंबे समय तक शांति देखी है। 2021 के बाद से पूंछ जिले से लेकर पीर पंजाल तक के क्षेत्र में सुरक्षा बलों और नागरिकों पर आतंकवादियों ने लक्ष्य करके हमले किए हैं। डोडा, रियासी, कटुआ, पूंछ और राजौरी जिलों में आतंकी हमलों ने सुरक्षा बलों और केंद्रशासित प्रदेश के पुलिस के जवानों को भारी दबाव में ला दिया है। पिछले दो-ढाई महीनों से कुछ ज्यादा समय से आतंकी हमलों में तेजी देखने को मिली है। सोमवार की रात को डोडा जिले के जंगलों में आतंकवादियों के साथ मुठभेड़ में सेना के एक कैप्टन सहित चार सैनिक शहीद हो गए। अभी पिछले सप्ताह कठुआ जिले के माचेड़ी वन क्षेत्र में सेना के गश्ती दल पर आतंकवादियों द्वारा घात लगाकर किए गए हमले में पांच सैनिक शहीद हो गए थे और कई घायल हुए थे। जम्मू संभाग में आतंकी हमलों की तीव्रता का पता इस बात से चलता है कि पिछले ढाई महीने में सेना और आतंकवादियों के बीच मुठभेड़ में 12 सुरक्षाकर्मी शहीद हुए और 20 नागरिक मारे गए जबकि 5 आतंकी ढेर हुए। स्पष्ट दिखाई दे रहा है कि हाल के दिनों में आतंकवादियों कश्मीर घाटी की बजाय जम्मू संभाग के जंगलों में अपना कैंप बनाया है। यहां घने वन क्षेत्रों में वारदात करके छिपना आसान है। सीमा पार से घुसपैठ करके आने वाले आतंकवादियों के लिए यहां की पहाड़ियां मददगार साबित हो रही हैं। यह इलाका छिपने के लिए मुफीद साबित हो रहा है। यही वजह है कि सेना और सुरक्षा बलों को इनके आतंक के विरुद्ध लड़ाई में संघर्ष करना पड़ रहा है। इस क्षेत्र में लगातार होने वाले आतंकी हमले खुफिया मोर्चे पर चूक की ओर इशारा करते हैं। विभिन्न एजेंसियों के बीच समन्वय में कमी दिखाई दे रही है जिसका आतंकवादी फायदा उठा रहे हैं। यह सही समय है जब सरकार आतंक के विरुद्ध लड़ाई के सुरक्षा तंत्र की समीक्षा करे। राजनीतिक और आर्थिक मोर्चे पर अस्थिर पाकिस्तान अपनी पुरानी कश्मीर नीति से पीछे हटने के लिए तैयार नहीं है। लोक सभा चुनावों में कश्मीर की जनता ने भारी उत्साह से मतदान किया है। पाकिस्तान को यह फूटी आंख नहीं सुहा रहा है। इसलिए वह आसन्न विधानसभा चुनावों में व्यवधान पैदा करने के लिए आतंकवाद को नये सिरे से हवा दे रहा है। लेकिन उसके मंसूबे पूरे नहीं होंगे।
Date: 18-07-24
फैसले का इंतजार होसंपादकीय
मध्य प्रदेश के धार स्थित भोजशाला में 98 दिनों चले सर्वे की रिपोर्ट भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने मध्यप्रदेश हाई खंडपीठ में पेश की। सर्वे में सत्रह सौ से अधिक पुरावशेष मिले हैं। दीवारों व खंभों के अतिरिक्त खुदाई के दौरान मिलीं 37 देवी-देवताओं की मूर्तियां भी हैं। हिन्दू मानते हैं कि भोजशाला वाग्देवी सरस्वती का मंदिर है। मुसलमान इसे कमाल मौलाना मस्जिद बताते हैं। राष्ट्रीय भूभौतिकीय अनुसंधान संस्थान, हैदराबाद की ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम और ग्रांउड पेनेट्रेटिंग रडार जांच में शिव, कृष्ण, ब्रह्मा की मूर्तियों के साथ सोने-चांदी के सिक्के भी मिले हैं। यहां के खंभों पर शेर, हाथी, घोड़ा, कुत्ता, बंदर, कछुआ, हंस आदि पक्षियों की मूर्तियां भी उकेरी गई हैं। आधिकारिक रूप से बताया जाता है कि ग्यारहवीं शताब्दी में यहां परमार वंश के राजा भोज का राज था। उनके द्वारा स्थापित इस विश्वविद्यालय को भोजशाला के नाम से जाना गया। ऐतिहासिक रूप से 1305 ईस्वीं में इसे अलाउद्दीन खिलजी ने नष्ट कर दिया। 1401 में इसके एक हिस्से में दिलावर खान गौरी ने मस्जिद का निर्माण करा दिया। यह स्थान फिलवक्त केंद्र सरकार के अधीन है, जिसका संरक्षण पुरातत्व विभाग करता है। अदालत के आदेश के बाद 2003 से इस विवादित स्थल पर प्रति मंगलवार हिन्दुओं को पूजा की इजाजत है तथा शुक्रवार को मुसलमान नमाज अदा कर सकते हैं। कार्बन डेटिंग तकनीक से हुए सर्वेक्षण की रपट दो हज़ार पन्नों की बताई जा रही है। 1902-03 के 121 वर्ष बाद यह सर्वे अदालत के आदेशानुसार हो रहा है। दोनों समुदायों के अपने- अपने तर्क रहे हैं जिन्हें तथ्यहीन कहा जा रहा था, बल्कि सुनी-सुनाई बातें और विवाद पीढ़ियों से चले आ रहे हैं बाबरी मस्जिद-राम जन्म भूमि विवाद पर सबसे बड़ी अदालत के निर्णय के बाद से आम लोगों में विभिन्न विवादित पूजा स्थलों के निपटारे को लेकर खासा उत्साह बना हुआ है। चूंकि बहुसंख्य धार्मिक विश्वास वाले देशवासियों के बड़े वर्ग को उम्मीद है कि विवादित स्थलों पर पुनः विधि-विधान से पूजा-पाठ की जा सकेगी। अंततः तो अदालत का निर्णय सर्वोपरि होगा, जिसकी यह शुरुआत भर मानी जा सकती है। कोशिश होनी चाहिए कि देश की धार्मिक सहिष्णुता की छवि बरकरार रखते हुए सभी समुदायों की भावनाओं का सम्मान करते हुए ही अंतिम निर्णय हो ।
Date: 18-07-24
जड़ से खात्मा जरुरीडॉ. मनीष कु. चौधरी
जम्मू -कश्मीर में बढ़ती आतंकवादी घटनाओं ने एक बार फिर सुरक्षा व्यवस्था पर प्रश्न उठाया है। का जो इलाका शांत था, वह फिर से अशांत होकर आतंकवादी घटनाओं के निशाने पर है। केंद्र सरकार की लगातार कोशिश रही है कि जम्मू-कश्मीर में शांति बहाल हो और आम जन मुख्यधारा से जुड़े। केंद्र सरकार के प्रतिनिधि एवं जम्मू-कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा भी निरंतर प्रयासरत हैं। उनकी कार्यशैली बिना शोर किए अपने लक्ष्य तक पहुंचने में विश्वास करती है। 2021 के बाद पुंछ, राजौरी और जम्मू के साथ-साथ पीर पंजाल रेंज के दक्षिण क्षेत्रों में आतंकवादी गतिविधियों में काफी बढ़ोतरी हुई। है। यह बेहद चिंताजनक है। जम्मू क्षेत्र में 2022 और 2023 में सुरक्षा बलों पर कई हमले हुए। यह वर्ष इस अर्थ में और भी दुखद रहा है। दर्जनों जवान शहीद हुए हैं। इन आतंकवादी घटनाओं के पीछे कई संगठन और एजेंसियां सक्रिय हैं। इनके पाव में पाकिस्तान और चीन को देखा जा सकता है। जम्मू के क्षेत्रों में आतंकवाद की पैठ सोची-समझी रणनीति का हिस्सा है। घाटी को आतंकवादी गतिविधियों का केंद्र माना जाता है। जम्मू तुलनात्मक रूप से शांत माना जाता रहा है। इसी का फायदा आतंकवादी संगठनों ने उठाया है। जब जम्मू में आतंकवाद धीरे-धीरे अपनी जड़ें जमा रहा था, तब हमारी सुरक्षा एजेंसियों को इसकी भनक तक नहीं लगी। उनका सारा ध्यान घाटी पर केंद्रित था। दरअसल, आतंकवादी जम्मू में हमला करके संदेश देना चाहते हैं कि उनकी गिरफ्त में पूरा केंद्रशासित प्रदेश है। आतंकवादियों के लिए क्षेत्र महत्त्वपूर्ण नहीं है, बल्कि आतंकित करना लक्ष्य है। इसलिए पहले शांत इलाकों में अपनी जड़ें मजबूत कीं, फिर आतंकवादी घटनाओं को अंजाम दिया। जम्मू- कश्मीर आतंकवाद की समस्या को खत्म करने और देश की संप्रभुता की सुरक्षा के लिए सरकार ने विवादास्पद अनुच्छेद 370 हटाया। सरकार का फैसला एक हद तक सही और जरूरी भी था। लेकिन जम्मू-कश्मीर का आवाम सरकार की योजनाओं और नीतियों पर अपना विश्वास नहीं दिखला पाया। इन समस्याओं की जड़ें काफी गहरी हैं। जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद का इतिहास बहुत पराना है। इसकी शुरुआत 1990 के दशक से होती है। तब से ब्लेकर अब तक जम्मू-कश्मीर की धरती नापाक इरादों से रक्तरंजित होती रही है।
केंद्र में नई सरकार के गठन के बाद जम्मू- -कश्मीर में आतंकी घटनाओं में बेतहाशा वृद्धि हुई। है। इनके निशाने पर आम जन है। आखिर, क्या है जम्मू को आतंक के निशाने पर लाने का मकसद पाकिस्तान समर्थित आतंकवाद की जब कश्मीर में कमर तोड़ दी गई तब वह नये ठिकाने जम्मू में बनाने लगा। प्रश्न उठता है कि आखिर, जम्मू ही क्यों? इसका उत्तर बहुत सरल है कि जम्मू भौगोलिक रूप से जंगलों से घिरा है, जहां आतंकवादियों को आसानी से निशाना नहीं बनाया जा सकता। दूसरी बात यह भी है कि इसके बहाने वे संपूर्ण जम्मू-कश्मीर में आतंक दिखलाना चाहते हैं। दहशत – हिंसा पैदा करना इनकी प्राथमिकता है। नई सरकार के शपथ ग्रहण के दिन तीर्थयात्रियों पर हमलों ने इनके मंसूबों को बतला दिया था। कश्मीर को छोड़ जम्मू को नया निशाना बनाने के पीछे कारण यह भी है कि केंद्र सरकार ने कश्मीर में सेना और विभिन्न एजेंसियों द्वारा आतंकवादी ढांचों पर इस तरह से शिकंजा कसा कि वे लगभग नेस्तनाबूद हो गए। उनके सभी नेटवर्क खत्म कर दिए गए जबकि पाकिस्तान की पहली पसंद कश्मीर ही रहा है। वहां अशांति और उबाल पैदा करना पाकिस्तान का पुराना शगल है। सुरक्षा एजेंसियां इस तथ्य से इंकार नहीं करतीं कि आतंकवाद को पुनर्जीवित करने में पाकिस्तान और चीन की मिलीभगत हो सकती है। चीन का लक्ष्य संभवतः लद्दाख से सैनिकों को हटाने के लिए दबाव बनाने की रणनीति का हिस्सा हो । यह बात भी तय है कि आतंकवाद का कोई सैन्य समाधान नहीं हो सकता। सुरक्षा बलों की भूमिका स्थिति सामान्य करना है, ताकि कानून व्यवस्था की स्थिति नियंत्रित की जा सके।
कश्मीर समस्या का स्थायी निदान तभी मिल सकता है जब समस्या के वाह्य और आंतरिक, दोनों कारणों को संतुलित किया जाए। इस दिशा में भारत ने सदैव सकारात्मक पहल की है। जम्मू-कश्मीर में आगामी चुनाव के मद्देनजर आतंकी घटनाएं और भी चिंतनीय हैं। स्थायी लोकतांत्रिक सरकार के गठन का औचित्य सुरक्षा, सहयोग, अवसर और समुन्नत जनसुविधाओं की निर्मिति पर आधारित होता है। आतंकवादियों के अशांति और हिंसा फैलाने के कुत्सित प्रयासों से निपटने के लिए भारत को उन्नत टेक्नोलॉजी का प्रभावी प्रयोग करने वाली आतंकरोधी रणनीति तैयार करनी होगी। सुरक्षा बलों के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती है आतंकवाद का बदलता चेहरा, रणनीति और ढांचा । स्थानीय नागरिकों को विश्वास में लिए बगैर जम्मू- कश्मीर में शांति बहाल लगभग असंभव कश्मीर के लोगों की भावनाओं को समझे बिना किसी निर्णायक फैसले तक नहीं पंहुचा जा सकता। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी बाजपेयी ने कहा था कि इंसानियत और जम्हूरियत के दायरे में रहते हुए हम सब कुछ जम्मू-कश्मीर के लिए करने को तैयार हैं। अनुच्छेद 370 हटने के बाद नये निवेशों और रोजगार उपलब्धता ने युवाओं में बेहतर भविष्य की संकल्पना को ठोस आधार दिया है। जम्मू-कश्मीर में सकारात्मक परिवर्तन की पहल केंद्र सरकार की प्राथमिकता है।
कश्मीरी लोगों के दिल-दिमाग को जीतने, उनकी पीड़ा और उपेक्षा की भावनाओं को सहानुभूति प्रदान करना एवं उनकी चोटिल और कलंकित गरिमा को पुनस्थापित करने के लिए राजनीतिक एवं सामाजिक अभियान की जरूरत है। जम्मू- कश्मीर के लोगों को इस सत्य को स्वीकार करने की जरूरत है कि उनका सुरक्षित और गरिमापूर्ण भविष्य भारत के साथ है। आतंकवाद से निपटने के लिए हमें नियंत्रण और सशक्तिकरण, दोनों के साथ बढ़ना होगा। व्यापक ब्लूप्रिंट के आधार पर ही जम्मू-कश्मीर की समस्याओं से निपटा जा सकता है। पुनस्थापित लोगों को मुख्यधारा में लाकर उनमें आत्मविश्वास बढ़ाया जा सकता है। जम्मू- कश्मीर को लेकर बातें बहुत हुई हैं, अब समय निर्णायक और ठोस कदम उठाने का है। सेना के मनोबल को बढ़ाने का है। एक तरफ से कूटनीतिक प्रहार और दूसरी तरफ सेना द्वारा कार्रवाई। इस बार पाकिस्तान के नापाक मंसूबों को ठोस और दूरगामी उत्तर देना समय की जरूरत है।
Date: 18-07-24
स्थानीय को आरक्षणसंपादकीय
कर्नाटक में निजी क्षेत्र में स्थानीय लोगों को आरक्षण देने की कवायद पर जहां खुशी का इजहार किया जा रहा है, वहीं इसके विरोधी भी कम नहीं हैं। राज्य के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने तो एक्स पर आधिकारिक रूप से एक संदेश भी पोस्ट कर दिया था। संदेश बहुत स्पष्ट था कि कर्नाटक में सी और डी ग्रेड की तमाम निजी नौकरियों में स्थानीय लोगों को 100 फीसदी आरक्षण मिलेगा। यह खबर जंगल में आग की तरह फैली और मुख्यमंत्री ने अपनी पोस्ट हटा ली। अब कर्नाटक सरकार की ओर से जो आधिकारिक बयान जारी हुआ है, उसके अनुसार, राज्य में निजी कंपनियों की नौकरी में स्थानीय लोगों को आरक्षण दिया जाएगा। यह आरक्षण गैर-प्रबंधन भूमिकाओं के लिए 70 प्रतिशत और प्रबंधन स्तर के पदों के लिए 50 प्रतिशत है। दरअसल, कर्नाटक तेजी से उभरता हुआ राज्य है और बड़ी संख्या में यहां आईटी कंपनियां सक्रिय हैं, जिनमें बड़ी संख्या में अन्य राज्यों के लोग काम कर रहे हैं। जब इन तमाम कंपनियों में आरक्षण लागू हो जाएगा, तब जाहिर है, कर्नाटक के बाहर से आए लोगों के लिए वहां रोजगार के अवसर कम हो जाएंगे।
कर्नाटक का यह फैसला स्थानीय रूप से भले ही वहां की राजनीति को पसंद आए, पर यदि अपेक्षाकृत रूप से विकसित हर राज्य ऐसे ही आरक्षण का सहारा लेने लगे, तो उन राज्यों का क्या होगा, जो पिछड़े हुए हैं और जहां जरूरत के हिसाब से बहुत कम रोजगार उपलब्ध है? मुख्यमंत्री ने यह भी घोषणा की थी कि ‘हमारी सरकार की आकांक्षा है कि कन्नड़ भूमि में किसी भी कन्नड़ को नौकरी से वंचित नहीं किया जाना चाहिए, ताकि वे शांतिपूर्ण जीवन जी सकें। हमारी सरकार कन्नड़ समर्थक है।’ वास्तव में कर्नाटक राज्य अपने इस मकसद को पूरा करने के लिए कानून बनाने जा रहा है और इस विधेयक की समीक्षा अवश्य होनी चाहिए। स्थानीय लोगों को खुश करने के लिए अगर यह आदर्श विधेयक है, तो क्यों न हरेक राज्य इस लागू करें? हालांकि, इसमें उन राज्यों को बहुत नुकसान होगा, जहां निजी नौकरियां कम हैं। सरकारी स्तर पर तो समय-समय पर कुछ राज्य स्थानीय लोगों को खुश करने की कोशिश करते रहे हैं, लेकिन निजी क्षेत्र के सहारे स्थानीय लोगों को खुश करने की यह कोशिश काबिल-ए-गौर है। विरोध के बावजूद, लगभग तय है कि यह रोजगार संबंधी विधेयक गुरुवार को कर्नाटक विधानसभा में पेश कर दिया जाएगा।
दरअसल, यह मामला केवल स्थानीय राजनीति से नहीं, बल्कि भाषा की राजनीति से भी जुड़ा है। कर्नाटक सरकार यह कोशिश कर रही है कि राज्य में नौकरी के लिए कन्नड़ ज्ञान को अनिवार्य बना दिया जाए। वैसे, राज्य के ही कई उद्यमियों ने इस कदम पर आपत्ति जताते हुए इसे भेदभावपूर्ण करार दिया है और आशंका जताई जा रही है कि इससे तकनीकी उद्योग को नुकसान हो सकता है। इस फैसले को फासीवादी और असांविधानिक भी कहा जा रहा है। एक आशंका यह भी है कि निजी क्षेत्र की नौकरियों में भी सरकारी अधिकारियों का दखल बढ़ जाएगा। इससे सेवाओं की गुणवत्ता और कर्नाटक की अर्थव्यवस्था पर असर पड़ेगा। वैसे, सरकार रोजगार के अभाव में ही यह कदम उठा रही है। दरअसल, आज न सिर्फ कर्नाटक, बल्कि देश के तमाम राज्यों में बडे़ पैमाने पर रोजगार सृजन की जरूरत है और यह प्रस्तावित विधेयक इसी ओर इशारा कर रहा है।
Date: 18-07-24
तकनीकी आजादी की ओर बढ़े भारतभाविश अग्रवाल, ( सीईओ, ओला कैब्स )
पिछले दस साल में भारत की जीडीपी लगभग दोगुनी होकर 3.5 ट्रिलियन डॉलर की हो गई है। हम दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में एक हैं। हमारा लक्ष्य है, 2047 तक भारत विकसित देश बने। अगर हम अपनी आर्थिक विकास दर को आठ प्रतिशत से बढ़ाकर 12 प्रतिशत कर लें, तो भारत 50 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बन सकता है। दुनिया भर में तकनीक तेजी से विकसित हो रही है, खासकर एआई (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस या कृत्रिम बुद्धिमत्ता) और नई ऊर्जा के क्षेत्र में। हमारे समकक्ष देश, जैसे चीन, नई तकनीक में भारी निवेश कर रहे हैं, पारंपरिक उद्योगों में बदलाव ला रहे हैं और नए क्षेत्रों को बढ़ावा दे रहे हैं।
भारत के विकास और प्रतिस्पद्र्धा में आगे रहने के लिए हमें एआई और नई ऊर्जा जैसी तकनीक को प्राथमिकता देनी होगी। इससे हमारी पूरी अर्थव्यवस्था में बड़ा बदलाव आ सकता है। ध्यान रहे, साल 1947 में हमने अपनी राजनीतिक आजादी पाई थी और साल 2047 में हमें अपनी तकनीकी आजादी हासिल करनी है। हमें तकनीकी उन्नति के लिए अपनी खुद की रणनीति बनानी होगी। अपने देश में तकनीक का यह उपयोग सिर्फ आर्थिक विकास के लिए नहीं, बल्कि सामाजिक बदलाव के लिए भी होना चाहिए।
भारत की अर्थव्यवस्था काफी हद तक डिजिटल हो चुकी है, लेकिन कंप्यूटिंग में हमारी भागीदारी अभी भी बहुत कम है। आईटी सेवाओं में हमारी बड़ी सफलता के बावजूद 30 ट्रिलियन डॉलर की ग्लोबल टेक्नोलॉजी इंडस्ट्री में भारत का हिस्सा सिर्फएक प्रतिशत है। यहां निवेश की बड़ी जरूरत है। भारत अभी भी अनोखी ताकतों से लैस है। विश्व के सबसे बडे़ डेवलपर समुदाय में से एक भारत में है। वैश्विक स्तर पर सबसे अधिक सिलिकॉन डिजाइनर, विशाल मात्रा में उत्पन्न डाटा,और दुनिया का सबसे बड़ा आईटी उद्योग हमें एआई में अग्रणी बनाने की स्थिति में लाते हैं। हम एआई महाशक्ति में बदल सकते हैं। ठीक वैसे ही, जैसे चीन ने वैश्विक विनिर्माण के क्षेत्र में क्रांति ला दी। एआई के क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए भारत को डाटा, कंप्यूटिंग और एल्गोरिदम में विशेषज्ञता का लाभ उठाना चाहिए।
भारत दुनिया का 20 प्रतिशत डाटा बनाता है, लेकिन हमारा 80 प्रतिशत डाटा विदेश में स्टोर किया जाता है, एआई में प्रोसेस किया जाता है और फिर डॉलर में भुगतान करके वापस आयात किया जाता है। यह डाटा कॉलोनाइजेशन ईस्ट इंडिया कंपनी के तौर-तरीकों की याद दिलाता है, जहां भारत के कच्चे माल का दोहन करके, उन्हें प्रसंस्कृत उत्पाद के रूप में महंगे दामों पर भारतीयों को बेचा जाता था। आज, हमारे डिजिटल कच्चे माल, यानी डाटा का इसी तरह से लाभ उठाया जा रहा है। हमें अपने डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर का उपयोग करके गोपनीयता-संरक्षित डाटासेट बनाना चाहिए। हम अपनी डीपीआई की सफलता (जैसे, यूआईडीएआई, यूपीआई, ओएनडीसी) पर आधारित होकर एक नई, दुनिया की सबसे बड़ी ओपन-सोर्स आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस बना सकते हैं, जो भारत के सिद्धांतों पर आधारित हो।
बेशक, साल 2030 तक 50 गीगावाट डाटा सेंटर की क्षमता पाने के लिए 200 अरब डॉलर के निवेश की जरूरत होगी। यह हासिल करने योग्य लक्ष्य है। भारत सिलिकॉन डेवलपमेंट और डिजाइन टैलेंट के मामले में दुनिया का सबसे बड़ा केंद्र है। फिर भी, हमारे पास भारत में डिजाइन किए गए चिप्स की कमी है। हमें इंडस्ट्री लीडिंग चिप डिजाइन प्रोजेक्ट्स और रिसर्च-लिंक्ड प्रोत्साहन योजनाओं के माध्यम से सरकारी प्रोत्साहन की जरूरत है, ताकि रोजगार बढ़े, भारत में काम करने के लिए विश्व स्तरीय प्रतिभाओं और बेहतरीन वैज्ञानिकों को आकर्षित किया जा सके।
पर्याप्त रोजगार वाले विकसित भारत के लिए नई ऊर्जा आपूर्ति शृंखला और तकनीक का भी विकास होना चाहिए। वैश्विक ऊर्जा परिदृश्य बदल रहा है। भारत को इस बदलाव में सबसे आगे रहना चाहिए। नई ऊर्जा का पूरा इकोसिस्टम तीन स्तंभों पर टिका है : रिन्यूएबल एनर्जी जेनरेशन, बैटरी स्टोरेज और इलेक्ट्रिक वाहन। रिन्यूएबल एनर्जी का मतलब अक्षय ऊर्जा में भारत की ताकत बढ़नी चाहिए। भारत की अक्षय ऊर्जा क्षमता 2014 में 72 गीगावाट से बढ़कर 2023 में 175 गीगावाट से ज्यादा हो गई है। सोलर एनर्जी क्षमता 3.8 गीगावाट से बढ़कर 88 गीगावाट से ज्यादा हो गई है। वैसे, हम इस मोर्चे पर पीछे हैं। हमें 2030 तक 500 गीगावाट के लक्ष्य तक पहुंचने के लिए अक्षय ऊर्जा परियोजनाओं पर ध्यान देना चाहिए।
अक्षय ऊर्जा को प्रभावी बनाने के लिए हमें इसे मजबूत बैटरी स्टोरेज से जोड़ना होगा। अभी हमारी बैटरी स्टोरेज क्षमता सिर्फ दो गीगावाट है, जबकि चीन की 1,700 गीगावाट है। अपने अक्षय ऊर्जा ग्रिड को पावर देने और 100 प्रतिशत इलेक्ट्रिक वाहन के लक्ष्य को पाने के लिए 1,000 गीगावाट क्षमता का लक्ष्य रखना होगा। इलेक्ट्रिक वाहनों की बात करें, तो भारत में अभी प्रति 1,000 लोगों पर 200 से भी कम इलेक्ट्रिक वाहन हैं। चीन के तीन करोड़ की तुलना में भारत में हर साल सिर्फ बीस लाख ईवी बेचे जाते हैं। भारत को साल 2030 तक पांच करोड़ इलेक्ट्रिक वाहन बनाने वाला दुनिया का सबसे बड़ा ईवी बाजार बनने का लक्ष्य रखना चाहिए। यह बदलाव पर्यावरण को स्वच्छ बनाएगा, परिवहन लागत को कम करेगा।
वर्तमान में, सौर ऊर्जा उत्पादन, लिथियम सेल उत्पादन और ईवी उत्पादन जैसे न्यू एनर्जी इकोसिस्टम का 90 प्रतिशत हिस्सा चीन में है। अपनी खुद की तकनीक और आपूर्ति शृंखला बनाकर हम अपनी अर्थव्यवस्था को अधिक ऊर्जा-कुशल बना सकते हैं और देश में लाखों नौकरियां पैदा कर सकते हैं।
भविष्य की तकनीकों में महारत हासिल करना ही भारत के लिए ग्लोबल लीडरशिप का रास्ता है। हमें पीछे नहीं रहना है, बल्कि समकक्षों को पीछे छोड़कर एआई और नई ऊर्जा के क्षेत्र में लीडर बनना है। यह भारत को दुनिया में तकनीकी रूप से सबसे उन्नत अर्थव्यवस्था में बदलने का मौका है। सबसे बड़ी बात कि इससे देश में करोड़ों नई नौकरियां पैदा होंगी। इस लक्ष्य को पाने के लिए हमें समाज के सभी तबकों के एकजुट प्रयास की जरूरत है। जिस तरह हर भारतीय ने स्वतंत्रता संग्राम में भूमिका निभाई थी, उसी तरह अब हमारे तकनीकी भविष्य के निर्माण में हर नागरिक की भूमिका है। यह साहसिक कदम उठाने और बड़े सपने देखने का समय है। हमें तत्काल काम शुरू करना होगा, ताकि हम उज्ज्वल भविष्य का निर्माण कर सकें।
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हाल ही में यूरोपियन यूनियन ने अपने इकोडिजाइन निर्देंश में परिवर्तन किया है। इसने बिना बिके जूतों और कपड़ों को नष्ट करने पर प्रतिबंध लगा दिया है। इसका उद्देश्य धारणीयता के लक्ष्य को लेकर चलना है।
कुछ बिंदु –
– यूरोपियन यूनियन का लक्ष्य भले ही अच्छा है, लेकिन इस निर्देश का प्रभाव भारत सहित अन्य एशियाई देशों पर पड़ेगा, जहाँ ये उत्पाद बनाए जाते हैं।
– कपड़ों के वितरण और रिटेलिंग के कारण 5% से भी कम उत्सर्जन होता है। लेकिन इनकी खपत कम होने का प्रभाव लाखों लोगों की आजीविका पर पड़ सकता है, क्योंकि फास्ट फैशन अतिउत्पादन को बढ़ावा देता आया है।
– यूरोपीय संघ का प्रतिबंध छोटे निर्यातकों के लिए नहीं है। लेकिन केवल इतना करने से इससे जुड़े व्यापार संबंधी विवादों को सुलझाया नहीं जा सकता है।
– चूंकि कपड़ा उद्योग में डिजाइन, वेरायटी, मार्केटिंग और रिटेलिंग की अपेक्षा श्रम और सामग्री की लागत कम है, इसलिए रिटेल चैन फैशन ब्रांड अधिक स्टॉक रखने में परहेज नहीं करते हैं। इसे पैमाने की अर्थव्यवस्था भी प्रोत्साहित करती हैं। इससे उत्पादन लागत और भी कम हो जाती है।
– दायरे की अर्थव्यवस्था में मात्रा के बजाय विविधता मायने रखती है। इससे भी लागत कम होती है। लेकिन इससे अनबिका स्टॉक बढ़ता है।
– कुल मिलाकर अनबिके उत्पादों को नष्ट करने या अपेक्षाकृत गरीब देशों को पुनः निर्यात करने पर प्रतिबंध लगाने से फास्ट फैशन बहुत अधिक प्रभावित होने वाला है। इससे ऑनलाइन बिक्री पर भी प्रभाव पड़ेगा।
इसके लिए यूरोपीय संघ को अपने व्यापारिक साझेदारों के साथ गहनता से काम करना चाहिए। इसी में सबका हित है।
‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 19 जून, 2024
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Date: 17-07-24
Her Choice? HardlyWomen are still not at the centre of abortion rights in India. Courts and doctors decide.TOI Editorials
Why do so many women have to knock on courts’ doors to terminate a pregnancy? Before getting into this, consider two examples of what happens when they do. This month, in disallowing a woman to abort her 26+ weeks pregnancy, Bombay HC said a medical board did not report foetal abnormalities. Also this month, in accepting a woman’s plea to medically terminate her 30 weeks pregnancy, Delhi HC cited a medical board finding the foetus suffering abnormalities.
This is the state of law and paternalism. Too often, whether a case goes a petitioner’s way or not depends on how much pity her position evinces – be it on account of rape, abandonment, singlehood or foetal abnormality. The last reflects a troubling eugenic mindset. Overall, a woman has to overcome a formidable web of barriers to achieve her choice.
Where women’s rights are conditional, they can as well be denied as granted. An arbitrariness prevails. On the one hand, there is the landmark nine-judge SC Puttaswamy judgment. It said the right to make reproductive choices is deduced from a woman’s fundamental right to privacy, dignity and bodily integrity. On the other hand, there is the 1860 IPC provision criminalising abortion, which BNS hasn’t bothered to update. In 1971 the MTP Act carved out an exception to this, to enable medical practitioners to terminate pregnancies under certain conditions. But this is a very doctor centric framework. Half a century on, different doctors, then different courts, continue to use different benchmarks to permit or decline termination of pregnancy. In this high-stakes arbitration, a woman’s wishes end up being incidental.
Women end up at courts’ doors because the medical ecosystem fails them. Sometimes with moral policing, sometimes with delays, and sometimes with harsh insensitivity. Most women can’t go this route. That only 22% of abortions in the country can be considered safe, tells their tale. Now, there’s also the slippery import of an American style discourse of foetal rights, which has no cultural or legal roots in India. Instead, we need to double down on citizens’ bodily autonomy. Do more than lip service to women’s rights.
Date: 17-07-24
Pay Farmers Not To Farm… PaddyWean northwest India off from growing it.ET Editorials
Paying farmers in Punjab and Haryana an explicit subsidy not to grow paddy, as suggested by an ICRIER policy brief released this month, makes ample sense. It’s an efficient alternative to MSP earmarked for grain, legislated increments of which have become the cause of farmer agitation in the region. The MSP programme itself has been called into question over farmers’ ability to sell crops at prices that will support farming paddy and other covered crops. To access the intended price support offered through MSP, the farmer has to go through the expenses of an entire harvest so that GoI can procure grain to be stored for food security. A subsidy not to farm paddy addresses waste in the grain storage mechanism, but, more importantly, it frees up government resources to offer support prices for a larger variety of crops that the country is deficient in.
Paying farmers not to farm may sound odd, till the ecological impact of farming is priced in. That includes irrigation, fertiliser and power costs, some of which GoI bears. In the case of paddy in Punjab and Haryana, these costs are considerable, making cultivation unviable without input subsidies alongside price supports. Then there’s the matter of ecological damage of unsustainable agriculture. All of these add up to the explicit subsidy the ICRIER paper is suggesting for weaning farmers in northwest India off growing paddy — which can be grown with less damage to the environment in rainfed parts of the country. A green revolution awaits pulses and edible oils that would benefit from both input subsidies and price support. It would also reduce India’s import dependence for these crops.
Other countries have found it expedient to pay farmers not to grow selective crops, instead of making them go through with the expense of doing so to claim support prices, and for governments to store such crops in warehouses where they rot or are eaten by rats. India can consider this agri intervention for nutritional security, sustainable farming and an evergreen revolution.
Date: 17-07-24
सरकार का बाजार में हस्तक्षेप कितना प्रभावीसंपादकीय
आम आदमी की रोजमर्रा की सबसे बड़ी जरूरत है तीन सब्जियां – आलू, प्याज और टमाटर । इनके अंग्रेजी नामों के प्रथम अक्षर को जोड़कर 2018 में एक लुभावनी योजना शुरू की गई, जिसका नाम था- ‘टॉप’। उद्देश्य था, इनके रखरखाव का समुचित प्रबंधन कर दामों को नियंत्रित रखना, ताकि किसान मजबूरी में इन्हें न तो माटी मोल बेचें, ना ही इनके दाम आसमानी होकर गरीब और मध्यम वर्गों को हर साल संकट में डालें। कालांतर में इस स्कीम को विस्तार देकर ‘टोटल’ नाम दिया गया था, और 22 आइटम्स जोड़े गए। नई स्कीम तो पुरानी से भी लुभावनी थी। लेकिन भंडारण क्षमता 350 लाख टन से बढ़ाकर मात्र 395 लाख टन हुई, जो कुल फल-सब्जी उत्पादन का मात्र 9.5% है। नतीजतन खुदरा महंगाई रोकने में सरकार फेल रही। आलू, प्याज, टमाटर के दाम डेढ़ से दो गुना हो गए हैं। सीआईआई की रिपोर्ट के अनुसार 30-40% फल-सब्जियां बर्बाद होती हैं हालांकि सरकारी तंत्र केवल 5-16% मानता है। याद करें, पिछले साल इन्हीं दिनों टमाटर 250-300 रुपए किलो तक बिका था। समस्या की जड़ में जाना होगा। अगर आगरा- फर्रुखाबाद का किसान दो साल पहले आलू की फसल खेत में दबा देता है, लासलगांव के इलाके का किसान प्याज और कर्नाटक का किसान टमाटर सड़कों पर फेंक देता है तो यह समस्या का दूसरा पहलू है। क्या इन योजनाओं- जिन्हें एक वैल्यू चेन स्थापित करने के लिए लाया गया था- के तहत मंडियों को आज तक एकीकृत किया जा सका है? ये तीनों उत्पाद उचित भंडारण चाहते हैं ताकि कीमतें न ज्यादा गिरें, न ज्यादा आसमानी हों। लेकिन आज भी जो टमाटर कर्नाटक का किसान 10 रुपए किलो बेचता है, दिल्ली में 150 रुपए कैसे हो जाता है ? सरकार का मार्केट इंटरवेंशन (बाजार में हस्तक्षेप ) प्रभावी है ?
Date: 17-07-24
पूर्वाग्रहों से भरी एआई भारत के लिए चुनौती-अवसर दोनोंअविजित घोष, ( नॉर्थईस्टर्न यूनिवर्सिटी के पूर्व लेक्चरर )
एक शाम मैंने एलेक्सा (वॉइस असिस्टेंट) से कहा, ‘श्रेया घोषाल की आवाज में धूम ताना गाना प्ले करो।’ हालांकि मैंने ये अनुरोध अंग्रेजी भाषा में किया था, लेकिन मेरे बंगाली लहजे से एलेक्सा गफलत में पड़ गई और कई कोशिशों के बाद भी गाना प्ले नहीं कर पाई। पर जब मेरे पार्टनर ने अपने अमेरिकी लहजे में गलत-सही उच्चारण से वही गाना प्ले करने को कहा, तो एलेक्सा तपाक से समझ गई। भारतीय यूजर्स को पूरी तरह पहचानने या उन्हें समझने में नाकाम एआई सिस्टम से जुड़े इस घटनाक्रम से मैं सकते में आ गया। और मुझे लगता है कि एआई क्रांति के दौर में ऐसा सोचने वाला इकलौता मैं ही नहीं हूं।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) एक टेक्नोलॉजी है, जिसमें मशीन डेटा से सीखती और निर्णय लेती है। हालांकि कई बार एआई सिस्टम पक्षपातपूर्ण निर्णय लेते हैं और अपने पूर्वाग्रहों के साथ समस्याएं खड़ी कर सकते हैं। वहीं, एआई एथिक्स का उद्देश्य निष्पक्ष, सुरक्षित और लोगों के अधिकारों का सम्मान करने वाली टेक्नोलॉजी का निर्माण है। लेकिन जब एआई सबके लिए समान रूप से काम नहीं करती तो समस्याएं खड़ी कर सकती है, खासतौर पर भारत जैसे विविधतापूर्ण देश के सामने। अपने इस आलेख की तैयारी के लिए जब मैंने ‘स्टेबल डिफ्यूजन एक्सएल’ (शब्दों से तस्वीर तैयार करने वाला एआई मॉडल) से कुछ तस्वीरें तैयार कीं, तो भारतीय संदर्भ में इसने साफ-साफ भेदभाव का उदाहरण सामने पेश कर दिया। उच्च शिक्षित लोगों या ज्यादा वेतन पाने वालों के प्रस्तुतिकरण में इसने बमुश्किल ही महिलाओं को चित्रित किया, साथ ही अशिक्षित और दिहाड़ी मजदूरी करने वालों को एआई मॉडल ने बहुत सांवला दिखाया।
इस तरह के पूर्वाग्रहों के मूल में दरअसल एआई मॉडल के प्रशिक्षण में इस्तेमाल हुआ डेटा है, जो कि ज्यादातर अंग्रेजी में है और इंटरनेट पर मौजूद सामग्री से लिया गया है, जहां अमेरिकी दृष्टिकोण ही हावी है। एआई मॉडल्स, डेटा पर निर्भर है, इसलिए उच्च गुणवत्तापूर्ण डेटा का सावधानी से इस्तेमाल जरूरी है। पश्चिमी देशों में तैयार किए गए एआई मॉडल्स अक्सर भारतीय संस्कृति, भाषाई और सामाजिक आर्थिक विविधता के लिए जिम्मेदार नहीं होते हैं, जिससे उनकी प्रभावशीलता भी कम होती है। यूनिवर्सिटी ऑफ कोपेनहेगन के हालिया शोध में सामने आया कि चैटजीपीटी से जब अन्य देशों और संस्कृतियों के बारे में पूछा जाता है, तब भी वह मुख्य रूप से अमेरिकी मानदंडों व मूल्यों को दर्शाने के साथ उसे बढ़ावा देता है।
भारत में सबको साथ में लेकर चलने वाली समावेशी एआई तैयार करना इसलिए भी कठिन है क्योंकि देश का राजनीतिक और सांस्कृतिक दायरा बहुत जटिल है, जिसमें 22 आधिकारिक भाषाएं और 1652 से ज्यादा बोलियां हैं। एक आर्टिकल में सामने आया है कि चैटजीपीटी जैसी कुछ टेक कंपनियां विवादों के डर से भारत में एआई टेक्नोलॉजी अपनाने में हिचक रही हैं। इसके कारण देश में इनोवेशन और लाभकारी एआई टेक्नोलॉजी को अपनाने की गति धीमी पड़ सकती है। वहीं, जब बात ग्रामीण भारत में इसे अपनाने की हो तो एआई आधारित अनुवाद प्रणाली अंग्रेजी-केंद्रित डेटा पर प्रशिक्षित होने के कारण प्रासंगिक और बोलचाल के अनुवादों के साथ जूझती है। हालांकि इससे एआई मॉडल्स को अपनाने की गति में फर्क नहीं पड़ा है। आईबीएम की 2024 में आई रिपोर्ट के मुताबिक 59 प्रतिशत भारतीय कंपनियों ने पहले ही एआई को तैनात कर दिया है।
पश्चिमी मॉडल जिन जटिल समस्याओं की पहचान करने में विफल रहा है, उसके चलते हमें देखना चाहिए कि क्या एआई के लाभ सभी भारतीयों को समान रूप से मिल पा रहे हैं। एआई के सही मायनों में लोकतांत्रिक इस्तेमाल के लिए समुदायों को सशक्त करने की जरूरत है ताकि वे समझें कि उन्हें प्रभावित करने वाले एआई टूल्स कैसे काम करते हैं। एआई डिजाइन में मानव केंद्रित रणनीति के लिए साथ मिलकर काम करना होगा, जिसमें टेक्नोलॉजी जानकारों के साथ, डोमेन विशेषज्ञ, समुदाय के लोग भी हों। ‘एआईफॉरभारत’, ‘कलेक्टिव इंटेलिजेंस प्रोजेक्ट’ जैसी पहल उदाहरण हैं। जहां ‘एआईफॉरभारत’ भारतीय भाषाओं के लिए डेटासेट व भाषा मॉडल विकसित करती है, वहीं कलेक्टिव इंटेलिजेंस लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के माध्यम से एआई में सामुदायिक लक्ष्यों को शामिल करती है। इन चुनौतियों पर सक्रियता से काम किया जाए तो भारत भी एआई सिस्टम तैयार कर सकता है। इसके लिए इनोवेशन, सांस्कृतिक रूप से संवेदनशीलता और एथिक्स की जरूरत है। अपने सांस्कृतिक ताने-बाने को संरक्षित करते हुए एआई की क्षमता का उपयोग करने का भारतीय दृष्टिकोण अन्य उभरती अर्थव्यवस्थाओं के लिए मॉडल बन सकता है।
Date: 17-07-24
पर्यावरण के लिए भारत ही दुनिया के नेतृत्व में सक्षमप्रो. चेतन सिंह सोलंकी, ( आईआईटी बॉम्बे में प्रोफेसर )
लगता है कि दुनिया नेतृत्व की कमी से जूझ रही है। ऐसे युग में जहां हम एआई में महारत हासिल कर रहे हैं, लोग अभी भी ऐसी सरल-सी समस्याओं से संघर्ष कर रहे हैं, जिन्हें प्रभावी नेतृत्व से हल किया जा सकता था। भारत की सिलिकॉन वैली कहलाने वाले बेंगलुरु- जो कि इनोवेशन और टेक्नोलॉजी का केंद्र है- में पीने का पानी कोई मुद्दा नहीं होना चाहिए। फिर भी, यह है। नीति आयोग के समग्र जल प्रबंधन सूचकांक के अनुसार बेंगलुरु में पानी की गंभीर कमी है। यह एक ऐसी स्थिति है, जो शहरी भारत में जल-प्रबंधन के व्यापक संकट को उजागर करती है। मेरा मानना है कि यह समस्या पानी नहीं, नेतृत्व और शासन की कमी से उपजी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में अधिकांश भारतीयों को शौचालय उपलब्ध कराने की समस्या को स्वच्छ भारत मिशन के माध्यम से हल किया गया। अक्टूबर 2019 तक, सरकार ने ग्रामीण भारत को खुले में शौच मुक्त घोषित किया, जिसके लिए 10 करोड़ से अधिक शौचालय बनाए गए। यह मौलिक मुद्दों को प्रभावी ढंग से संबोधित करने और हल करने की प्रधानमंत्री की क्षमता को प्रदर्शित करता है। लेकिन जब ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन की समस्या को हल करने की बात आती है तो लगता है भारत ही नहीं, बल्कि पूरी दुनिया में नेताओं की कमी है। लगता है कि कोई भी नेता इतना बड़ा नहीं है कि इस मुद्दे पर विश्व को समाधान की ओर ले जा सके।
195 देशों द्वारा पेरिस समझौते पर हस्ताक्षर करने के बाद भी- जिसमें 2015 के स्तर से कार्बन उत्सर्जन को कम करना शुरू करने और 2030 तक उसे 45% तक घटाने पर सहमति व्यक्त की गई थी- कार्बन उत्सर्जन में कमी का कोई महत्वपूर्ण संकेत नहीं है। वास्तव में, वैश्विक कार्बन उत्सर्जन 2023 में 40 अरब टन से अधिक के रिकॉर्ड उच्च स्तर पर पहुंच गया है। यह 2022 की तुलना में 1.1% की वृद्धि को दर्शाता है, जो बढ़ते उत्सर्जन की चिंताजनक प्रवृत्ति को जारी रखता है। ऐसा लगता है कि पूरी दुनिया के देश एक-दूसरे को बेवकूफ बना रहे हैं। पेरिस समझौते पर हस्ताक्षर के बावजूद सीओ2 उत्सर्जन की प्रवृत्ति बढ़ रही है। सीओ2 एक ग्रीनहाउस गैस है, जो वायुमंडल में गर्मी को रोक लेती है। इसके बढ़ते स्तर से ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु-परिवर्तन होता है। तत्काल ही कठोर कार्रवाई की आवश्यकता है।
प्रधानमंत्री मोदी आज दुनिया में सबसे लोकप्रिय नेताओं में से एक हैं। हाल के सर्वेक्षणों के अनुसार उनकी अप्रूवल-रेटिंग 70% से अधिक रही है। उन्होंने अपनी कूटनीतिक सूझबूझ ने अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत का कद बढ़ाया है। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस जैसी पहल की है। वैश्विक स्तर पर भारतीय संस्कृति और मूल्यों को बढ़ावा देने की क्षमता प्रदर्शित की है। जी-20 और संयुक्त राष्ट्र जैसे मंचों में उनकी सक्रिय भागीदारी वैश्विक नीतियों को आकार देने और अंतरराष्ट्रीय सहयोग को बढ़ावा देने में उनकी भूमिका को भी रेखांकित करती है। वे पर्यावरण-संरक्षण और जलवायु-कार्रवाई के भी मुखर समर्थक रहे हैं। इसी कड़ी में मिशन लाइफ (पर्यावरण के लिए जीवनशैली) का शुभारंभ एक अग्रणी कदम था।
मिशन लाइफ के सिद्धांतों पर चलना भारतीयों के लिए मुश्किल नहीं होगा। प्रकृति का सम्मान करना और हवा, पानी, मिट्टी, पेड़, पहाड़ों जैसे प्राकृतिक संसाधनों की पूजा करना हमारी संस्कृति का हिस्सा रहा है। जीवन के अंत तक सामग्रियों का कुशलतापूर्वक उपयोग करना भारतीयों के लिए एक आदर्श रहा है। प्रधानमंत्री की समावेशी नेतृत्व शैली ने उन्हें जलवायु संकट के माध्यम से दुनिया का मार्गदर्शन करने में सक्षम नेता के रूप में स्थापित किया है। भारत को ‘विश्व गुरु’ बनाने का उनका दृष्टिकोण जलवायु- कार्रवाई का नेतृत्व करने के लिए एक वैश्विक नेता की आवश्यकता के साथ पूरी तरह से मेल खाता है। मैं उनसे आग्रह करता हूं कि मिशन लाइफ को लागू करके अपने नेतृत्व-कौशल का सही मायने में प्रदर्शन करें।
Date: 17-07-24
सुधार की राह देखती आईबीसीडॉ. अश्विनी महाजन, ( लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय के पीजीडीएवी कालेज में प्रोफेसर हैं )
इंसोल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड यानी आईबीसी के कानूनी रूप लेने से पहले दिवालियापन से निपटने के लिए लगभग एक दर्जन कानून थे। उनमें से कुछ कानून तो 100 साल से भी अधिक पुराने थे। मोदी सरकार ने इन कानूनों के स्थान पर आईबीसी के रूप में जो पहल की, उसे एक बड़ा आर्थिक सुधार माना गया। आईबीसी के अनुसार जब कोई देनदार दिवालिया हो जाता है तो उसकी संपत्ति को लेनदार आसानी से अपने कब्जे में ले सकते हैं। यदि लेनदारों की समिति के 75 प्रतिशत या उससे अधिक सदस्य सहमत होते हैं तो ऐसी कार्रवाई के लिए आवेदन स्वीकार किए जाने की तिथि से (एनसीएलटी की मंजूरी के अधीन 90 दिनों की छूट अवधि के साथ) 180 दिनों में कार्रवाई की जा सकती है। यदि तब भी ऋण का भुगतान नहीं होता तो व्यक्ति/फर्म को दिवालिया घोषित कर दिया जाएगा। आईबीसी के पीछे यह मंशा थी कि इससे ऋण की वसूली में होने वाली देरी और उससे जुड़े नुकसान स्वत: खत्म हो जाएंगे। कारोबारी सुगमता को बढ़ावा देने के लिहाज से वैश्विक संस्थाएं भी आईबीसी को सराहती रही हैं। विश्व बैंक की ‘ईज आफ डूइंग बिजनेस’ रैंकिंग में भारत के 2014 में 142वें स्थान से 2019 तक 63वें स्थान तक पहुंचने में आईबीसी जैसे सुधार की अहम भूमिका मानी गई।
कारोबारी सुगमता में व्यवसाय शुरू करने और उसे बंद करने में सहूलियत जैसे दोनों पहलू शामिल होते हैं। आईबीसी ने व्यवसाय को बंद करना आसान बना दिया। हालांकि आईबीसी की घोषित अपेक्षाओं और जमीनी स्तर पर अनुभव के बीच कुछ अंतर जरूर है। आईबीसी के तहत तनावग्रस्त संपत्तियों के समाधान का प्रारंभिक बिंदु कारपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (सीआइआरपी) है, जो वित्तीय लेनदारों, परिचालन लेनदारों या यहां तक कि कारपोरेट द्वारा स्वयं सीआइआरपी शुरू करने के लिए एक वसूली तंत्र है। भारतीय रिजर्व बैंक के अनुसार, आईबीसी के बाद से जनवरी 2024 तक 7,058 कारपोरेट देनदारों को सीआइआरपी में लाया गया है, जिनमें से 5,057 मामले बंद कर दिए गए और 2,001 समाधान के विभिन्न चरणों में हैं। जो मामले बंद हो गए हैं, उनमें से करीब 16 प्रतिशत में सफल समाधान योजनाएं सामने आई हैं। वहीं, 19 प्रतिशत को आईबीसी की धारा 12ए के तहत वापस ले लिया गया है, जहां बड़े पैमाने पर देनदार लेनदारों के साथ पूर्ण या आंशिक निपटान के लिए सहमत हुए। जबकि 21 प्रतिशत अपील या समीक्षा पर बंद कर दिए गए और 44 प्रतिशत मामलों में परिसमापन आदेश पारित किए गए हैं। हालांकि, समाधान के विभिन्न चरणों में अटके मामलों में देरी चिंता के रूप में उभरी है। वर्ष 2020-21 और 2021-22 के दौरान मामले को स्वीकार करने में लगने वाला औसत समय क्रमशः 468 दिन और 650 दिन रहा। यह अपेक्षित समय से कहीं अधिक है।
वित्तीय लेनदारों द्वारा दायर अपीलों के निपटारे में देरी का एक कारण यह है कि अक्सर अदालतें लेनदेन के वाणिज्यिक पहलुओं में उलझ जाती हैं। ये पहलू कानून से संबंधित बिंदुओं से नहीं, बल्कि प्राप्त मूल्य आदि के संदर्भ में लेनदारों से संबंधित होते हैं, जो समाधान योजना को मंजूरी देने का फैसला करने वाले लेनदारों की व्यावसायिक बुद्धि पर सवाल उठाने जैसा है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि लेनदारों की समिति (सीओसी) की व्यावसायिक समझ पर सवाल नहीं उठाया जा सकता। एक बार जब सीओसी अंतिम निर्णय ले लेती है कि समाधान योजना को मंजूरी दी जाए या नहीं तो इसे अदालतों द्वारा समीक्षा का विषय नहीं बनाया जाना चाहिए। विशेषकर उस स्थिति में जब किसी कानूनी प्रविधान का उल्लंघन न हो। एस्सार स्टील मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि यह बहुसंख्यक लेनदारों की व्यावसायिक समझ है, जो संभावित समाधान आवेदक के साथ बातचीत के जरिये यह निर्धारित करती है कि कारपोरेट समाधान प्रक्रिया कैसे और किस तरीके से संपादित होनी है। एसआरईआइ मल्टीपल्स मामले में भी शीर्ष अदालत ने कहा कि समाधान योजना सीओसी द्वारा स्वीकृत हो जाने के बाद कोई संशोधन स्वीकार्य नहीं है, जब तक कि यह आईबीसी की मूल भावना के विपरीत न हो। हालांकि वास्तविकता अलग है। वीडियोकान मामले में समाधान योजना को जून 2021 में एनसीएलटी ने अनुमोदित किया, मगर यह सुप्रीम कोर्ट में अभी भी लंबित है। एसकेएस पावर जेनरेशन मामले में सीओसी ने जून 2023 में पूर्ण सहमति के साथ सारदा एनर्जी एंड मिनरल्स की योजना को मंजूरी दी, फिर भी यह मामला अभी तक अनसुलझा है। ऐसी देरी से परिसंपत्तियों के मूल्य में कमी आने की आशंका होती है। इससे लेनदारों को नुकसान हो सकता है। इसके चलते भविष्य में संभावित खरीदारों को लुभाना भी मुश्किल हो जाता है और अंतत: आईबीसी का उद्देश्य विफल हो जाएगा।
वित्तीय मामलों की स्थायी समिति की एक रिपोर्ट में कारपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (सीआइआरपी) में देरी के कुछ चरणों की पहचान की गई है। इसमें पहला चरण है सीआइआरपी शुरू करने के लिए आवेदन की स्वीकृति और दूसरा एनसीएलटी द्वारा समाधान योजना को मंजूरी। सीआइआरपी आरंभ करने के लिए आवेदन स्वीकार करने से जुड़ी समस्याओं की चर्चा करें तो कभी-कभी हितधारकों के बीच असहमति के कारण भी देरी होती है। कानून कहता है कि यदि सीओसी के 75 प्रतिशत या उससे अधिक सदस्य सहमत हैं तो सीओसी द्वारा समाधान की प्रक्रिया के दौरान कुछ कार्रवाई संभव है। कई बार लेनदार और अन्य हितधारक समाधान योजना पर सहमत नहीं हो पाते हैं और इससे भी प्रक्रिया में देरी हो सकती है। दिवालियापन प्रक्रिया में शामिल विभिन्न हितधारकों जैसे लेनदार, देनदार और संभावित खरीदार के बीच विवाद एवं अदालती लड़ाई से और भी देरी हो सकती है। दिवाला और दिवालियापन के मामलों में समाधान खोजने में आने वाली प्रमुख समस्याएं कर्मचारियों की कमी से लेकर प्रक्रियाओं और उनसे संबंधित कानून के बोझिल बिंदुओं की प्रणालीगत अक्षमताओं से संबंधित हैं, जिनका दुरुपयोग भ्रष्ट और विलफुल डिफाल्टर मामलों को लटकाने के लिए करते हैं। वैसे तो, सुप्रीम कोर्ट ने आईबीसी की वैधता से जुड़े कई बुनियादी सवालों का समाधान कर दिया है, लेकिन कुछ मुद्दे सामने आते ही रहते हैं। जबकि आईबीसी जैसे किसी भी महत्वपूर्ण कानून पर लगातार समझ बनाते हुए उसमें आवश्यक बदलावों की जरूरत है ताकि अदालतों में अनावश्यक देरी से बचा जा सके।
Date: 17-07-24
निजी भागीदारी में हो इजाफासंपादकीय
बीते तकरीबन पांच साल में देश की रक्षा खरीद नीति में ‘स्वदेशीकरण’ का बड़ा लक्ष्य तय किया गया। भारत समेत किसी भी देश में ऐसे प्रयास करने के लिए पर्याप्त वजह होती हैं। यह महत्त्वपूर्ण है, खासकर एक बढ़ती असुरक्षा वाले विश्व में जरूरी हथियारों और उन्हें चलाने वाले प्लेटफॉर्मों पर अधिकतम नियंत्रण आवश्यक है। हथियारों पर विदेशी मुद्रा खर्च करने में कमी लाना एक और वांछित परिणाम है। इस बात की भी पर्याप्त वजह हैं कि यह माना जाए कि घरेलू रक्षा क्षेत्र उन बेहतरीन क्षेत्रों में से एक है जो सरकार को घरेलू अर्थव्यवस्था में नवाचार बढ़ाने के लिए उत्साहित कर सकते हैं। इसके बावजूद रक्षा खरीद के स्वदेशीकरण को समय के साथ टिकाऊ बनाने के लिए निजी क्षेत्र को सही ढंग से साथ में जोड़ना होगा। रक्षा मंत्रालय की ओर से हाल के दिनों में जारी आंकड़ों से यही संकेत मिलता है कि यह उस हद तक नहीं हो रहा है जिस हद तक वांछित है।
रक्षा मंत्रालय के मुताबिक देश का घरेलू रक्षा उत्पाद पिछले दो वित्त वर्षों से एक लाख करोड़ रुपये से अधिक है लेकिन निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी बमुश्किल एक चौथाई है और यह 2017-18 के स्तर के आसपास ही था। कई लोगों ने ध्यान दिया है कि लार्सन ऐंड टुब्रो जैसी कंपनियों ने हाल के समय में अपना रक्षा कारोबार बढ़ाया है लेकिन आंकड़े बताते हैं कि निजी क्षेत्र की ओर से ऐसा विस्तार देश के रक्षा उत्पादन में उसकी हिस्सेदारी बरकरार रख पाने भर के लायक है। रक्षा उत्पादन का अधिकांश हिस्सा रक्षा क्षेत्र के सार्वजनिक उपक्रमों से ही आ रहा है। यह निश्चित नहीं है कि उनमें भारत को इस क्षेत्र की मूल्य श्रृंखला में ऊपर ले जाने की क्षमता है अथवा नहीं या फिर क्या वे ऐसा आंतरिक स्तर पर नवाचार कर सकते हैं कि जो न केवल सुरक्षा के क्षेत्र में बढ़त दे बल्कि अन्य औद्योगिक क्षेत्रों में भी इसके प्रभाव को बढ़ाए। स्पष्ट है कि ‘मेक इन इंडिया’ की आकांक्षा है लेकिन हकीकत ‘मेक इन पब्लिक सेक्टर’ ही है।
यदि स्वदेशीकरण के माध्यम से निजी क्षेत्र को सही मायने में मजबूत बनाना है तो उन क्षेत्रों को चिह्नित करना होगा जहां सरकार को बदलाव करने की आवश्यकता है। एक जरूरत यह है कि रक्षा कारोबार में भारतीय कंपनियों को निवेश का सुरक्षित माहौल मुहैया कराया जाए।
ऐसा तब हो सकता है जबकि सरकार इसके लिए जरूरी दिशानिर्देश जारी करे, ये दिशानिर्देश उचित और तार्किक हों और उनके साथ खरीद की प्रतिबद्धता भी जुड़ी हो। दूसरे देशों में निजी कंपनियां बड़ा निवेश करके प्रसन्न हैं क्योंकि वहां उन्हें आश्वस्ति है कि उनका निवेश बरबाद नहीं होगा। परंतु भारत में ऐसे भरोसे का अभाव है। एक बड़े ग्राहक वाले कारोबार में ग्राहक को विश्वसनीय खरीदार के रूप में देखे जाने के लिए अतिरिक्त प्रयास करना होता है ताकि निवेश को गति मिले। देश में रक्षा निजी क्षेत्र के कुछ पहलुओं को अक्सर सफल बताया जाता है। इनमें छोटे और मझोले उपक्रमों की बढ़ती उपस्थिति एक है। इसमें स्टार्टअप भी शामिल हैं। बड़े निजी निवेश के लिए स्पष्ट खाके के अभाव में ऐसी स्टार्टअप भी उचित जगह नहीं बना पाएंगी या उन्हें समुचित प्रोत्साहन नहीं मिल सकेगा। भारत को इस क्षेत्र में विदेशी निवेश से जुड़े दिशानिर्देश को भी शिथिल करने की जरूरत होगी। गत वर्ष 100 फीसदी विदेशी स्वामित्व वाली एक परियोजना को मंजूरी दी गई -स्वीडिश कार्ल-गुस्ताव राइफल, परंतु प्रौद्योगिकी स्थानांतरण की चिंताओं के कारण अन्य मामलों में हम पिछड़े हुए हैं। ऐसी चिंताओं के कारण निवेश में देरी नहीं होने दी जा सकती है। इस क्षेत्र में निजी निवेश का दायरा बढ़ाने का काम काफी समय से लंबित है।
Date: 17-07-24
चढ़ती कीमतों को नीचे लाने के उपायअरुण कुमार, ( वरिष्ठ अर्थशास्त्री )
पिछले महीने यूरोपीय संघ ने यह कहते हुए ऋण दरों में कटौती की थी कि उसने महंगाई को काफी हद तक काबू में कर लिया है। ऐसा करने वाली वह दूसरी प्रमुख वैश्विक अर्थव्यवस्था थी, क्योंकि इससे पहले कनाडा ने भी दरों में कमी करने का एलान किया था। अब अमेरिका ने भी लगातार तीन महीने तक महंगाई कम होने के कारण यह संकेत दिया है कि जल्द ही फेडरल रिजर्व ब्याज दरों में कटौती कर सकता है। जाहिर है, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनेक देश अपने यहां दरों में कमी कर रहे हैं, जिससे लगता है कि महंगाई को नियंत्रित करने में वे सफल साबित हो रहे हैं। इसकी वजह यह हो सकती है कि कोरोना महामारी, यूक्रेन संकट और फिर इजरायल-हमास जंग की वजह से वैश्विक आपूर्ति शृंखला पर जो नकारात्मक असर पड़ा था, उससे पार पाने में उन्हें सफलता मिलने लगी है। मगर भारत में हालात चुनौतीपूर्ण नजर आते हैं। यहां फल-सब्जियां ही नहीं, खाद्यान्न के दाम भी चढ़ रहे हैं।
अक्सर देखा गया है कि गर्मी बढ़ने या बारिश ज्यादा होने से फलों और सब्जियों की कीमतें बढ़ जाती हैं, क्योंकि इनके भंडारण की समुचित व्यवस्था अपने देश में नहीं है। मगर क्या वजह है कि गेहूं, चावल जैसे खाद्यान्न की कीमतें भी चढ़ रही हैं, जबकि इनका संग्रह किया जा सकता है और हमारे पास इनका पर्याप्त भंडार भी है? वह भी तब, जब इनकी रिकॉर्ड पैदावार के दावे किए गए थे और हमने निर्यात पर भी रोक लगा दी थी? साफ है, भारत में विशेषकर खाने-पीने की वस्तुओं का प्रबंधन काफी कमजोर है, और यह भी कि शायद रिकॉर्ड उत्पादन नहीं हुआ है। कुछ विशेषज्ञ कहते भी हैं कि उत्पादन के आकलन का मौजूदा तरीका गलत है, जिसमें सुधार की सख्त जरूरत है।
अभी महंगाई दो तरीकों से मापी जाती है- एक, थोक मूल्यों के आधार पर, और दूसरा, उपभोक्ता मूल्यों के आधार पर। थोक मूल्य मूलत: उत्पादकों से जुड़ा है। किसानों, फैक्टरियों या उत्पादन करने वाली इकाइयों आदि के थोक उत्पाद इसमें शामिल होते हैं। महामारी के बाद भारत में थोक मूल्य सूचकांक में काफी बढ़ोतरी देखी गई थी। एक समय तो यह 15 प्रतिशत की रफ्तार से बढ़ रहा था। मगर इसकी तुलना में उपभोक्ता मूल्य उतना नहीं बढ़ा और वह सात-आठ प्रतिशत पर बना रहा। इसके बाद थोक मूल्य नीचे लुढ़का, लेकिन उपभोक्ता मूल्य पर आधारित महंगाई में बहुत कमी नहीं आई। रिजर्व बैंक द्वारा तय चार प्रतिशत (दो प्रतिशत ऊपर या नीचे) के लक्ष्य के करीब आने में भी इसे खासा वक्त लगा। आज भी यह पांच प्रतिशत से अधिक की रफ्तार से बढ़ रही है।
सवाल है, महंगाई आम आदमी को किस तरह परेशान करती है? दरअसल, हर तबके के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक का अर्थ अलग-अलग होता है। ऐसा इसलिए, क्योंकि हर वर्ग के लिए उपभोग की प्राथमिकता अलग-अलग होती है। मसलन, गरीबों के बजट में खाने-पीने की वस्तुओं की हिस्सेदारी 40 फीसदी तक होती है, जबकि अमीर तबके में यह बमुश्किल पांच प्रतिशत। इसी कारण जब खाद्यान्न के दाम बढ़ते हैं, तो गरीबों की थाली कहीं ज्यादा बिगड़ जाती है। इसके बनिस्बत, महंगाई अमीरों की बचत पर चोट करती है, क्योंकि वे अपनी बचत घटाकर ही महंगाई से लड़ते हैं, वहीं एक तबका व्यापारी वर्ग भी है, जिसके लिए महंगाई कारोबारी लाभ लेकर आती है।
ऐसे में, जरूरी है कि महंगाई से पार पाने के लिए पर्याप्त उपाय किए जाएं। इस दिशा में फूड मैनेजमेंट, यानी खाद्य प्रबंधन काफी अहम साबित हो सकता है। गेहूं, चावल जैसे उत्पादों के दाम इसलिए फल अथवा सब्जियों की तरह तेजी से ऊपर-नीचे नहीं होते, क्योंकि इनकी सरकारी खरीद होती है और एक नियत मात्रा में इनका भंडारण किया जाता है। हमें बाकी उत्पादों के लिए भी यही रणनीति अपनानी चाहिए। विशेषकर टमाटर, आलू अथवा प्याज को कोल्ड स्टोरेज में रखा जा सकता है। बाकी सब्जियों अथवा फलों को खाद्य प्रसंस्करण के जरिये सहेजने की रणनीति बनाई जानी चाहिए। मौजूदा हालात में खाद्य प्रसंस्करण और खाद्य भंडारण को बढ़ावा देना काफी जरूरी है। मगर दिक्कत यह है कि इसमें पर्याप्त मात्रा में निवेश नहीं हो रहा। निवेशकों की चिंता है कि यदि वे भंडारण करते हैं और बाद में भंडारण की सीमा कम कर दी गई, तो उन्हें औने-पौने दाम पर उत्पाद बेचने होंगे, जिससे उनको घाटा हो सकता है। लिहाजा, सरकार को एक स्थायी नीति बनानी चाहिए।
उसे न सिर्फ इन उत्पादों की खरीद करनी चाहिए, बल्कि कारोबारियों को यह भरोसा भी देना चाहिए कि दाम ज्यादा ऊपर-नीचे नहीं होंगे। इससे कोल्ड स्टोरेज करने वाले लोगों या खाद्य प्रसंस्करण करने वाली कंपनियों को एक मुकम्मल संदेश जाएगा। वैसे भी, महंगाई बढ़ने पर सरकार दखल देने में देर नहीं करती। मसलन, टमाटर-प्याज के दाम बढ़ने पर वह खुद सस्ते दामों में इनको बेचने लगती है। लिहाजा, जब हर साल तात्कालिक तौर पर यही नीति अपनाई जा रही है, तो इसे स्थायी जामा क्यों नहीं पहना दिया जाता?
विकसित देशों में यह नीति काफी कारगर रही है। वहां खाद्य प्रसंस्करण करने वाली कंपनियां उत्पादन अधिक होने पर प्रबंधन की जिम्मेदारी संभाल लेती हैं। वहां बड़ी जोत वाली कॉरपोरेट कंपनियां भी अधिक हैं, जो सुनिश्चित करती हैं कि कैसे उत्पादों का भंडारण किया जाए? जबकि, भारत में छोटे किसानों की संख्या अधिक है, जिनके पास भंडारण की उचित सुविधा नहीं है। इसलिए जो काम विदेश में कंपनियां करती हैं, उसे हमारी सरकारों को करना होगा। फसलों की सरकारी खरीद के साथ-साथ उनका भंडारण भी किया जाना चाहिए। बेशक, इस काम में प्रशासनिक चुनौतियां भी आड़े आएंगी, लेकिन ऐसा करना जरूरी है।
महंगाई कम करने में रिजर्व बैंक भी कुछ हद तक अपनी भूमिका निभा सकता है। वह मांग को नियंत्रित करके महंगाई कम कर सकता है, लेकिन जहां आपूर्ति शृंखला में गड़बड़ी है, वहां वह खाली हाथ रह सकता है। कराधान में भी सुधार आवश्यक है और हमें अप्रत्यक्ष कर को कम करना चाहिए। अभी कर-जीडीपी अनुपात 17 फीसदी के करीब है, जिसमें प्रत्यक्ष कर की हिस्सेदारी 11 प्रतिशत और अप्रत्यक्ष कर की 6 प्रतिशत है। ऐसे में, यदि हम लग्जरी उत्पादों पर ही अप्रत्यक्ष कर लगाएं, तो गरीबों को काफी राहत मिल सकेगी। मतलब साफ है कि महंगाई नियंत्रित करने में रिजर्व बैंक की उतनी भूमिका नहीं है, जितनी सरकार की है।
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Date: 16-07-24
Probe TN EncounterEncounters are an outcome of a failed criminal justice system – failures that are politically sustained.TOI Editorials
The investigation into the murder of BSP politician K Armstrong got murkier with Chennai police killing a suspect in custody, when he allegedly tried to escape – that’s SOP for encounters. Doubts have been raised on two counts by opposition parties AIADMK and state BJP. First, the suspect who allegedly had “surrendered” was not the “real culprit”, and two, he was “encountered” by police.
Nothing new | Supreme Court in 2014 laid down detailed guidelines on how to investigate extrajudicial killings. But that hardly happens because there is hardly a govt that hasn’t normalised encounter killings. Security forces are to use service weapons in self-defence. That’s often the fig leaf. Encounters as justice is routine. UP police, for instance, told court last year that 183 alleged criminals had been killed in close to 11,000 encounters from March 2017 to April 2023. Encounters seems to be a policy UP govt favours. During LS poll campaign, Bengal BJP chief had warned the state’s goons that his party would bring in the “UP treatment” and “encounters” once in office. Normalisation of encounter killings in everyday life is near complete.
Normal practice | States with leftwing extremism, and forces in J&K, normalised encounter killing decades ago. In Chhattisgarh this May, tribals, after the May 10 encounter in Pidiya village which claimed 12 lives, allegedly including 10 innocent villagers, said security forces were trigger happy. A PIL in Punjab HC, also in May, sought a probe into 6,733 encounter killings, custodial deaths, disappearances and illegal cremation of bodies in Punjab during 1984-1995. In 2014, when it spelt out the guidelines for probes into encounters, SC dealt with pleas on the authenticity of nearly 99 such encounters between Mumbai police and alleged criminals that killed 135 people between 1995 and 1997.
Police & political trap | Encounter killings only highlight failures of India’s criminal justice system – poor quality of prosecution and thus conviction, and inordinate delays. All of which are politically sustained – police reforms and funding are everybody’s pet cause and no one’s responsibility. When police kill history sheeters, or alleged rapists, like in the Hyderabad case, killings are celebrated by a public that finds instant justice the only kind being delivered. Questioning such excesses is considered a hit on police morale. Courts have repeatedly upheld the lawlessness of encounter killings. Questions on the probe into Armstrong’s murder can only be settled by a probe, where investigators are insulated from politics. Is that even possible? Will DMK govt respond?
Date: 16-07-24
Raise the Stakes of BIMSTEC MarkedlyET Editorials
The 2-day Bimstec (Bay of Bengal Initiative for Multi-Sectoral Technical and Economic Cooperation) foreign ministers’ retreat in New Delhi last week, the first since the group’s charter came into effect in May, should result in an actionable roadmap knitting the seven member countries — India, Sri Lanka, Bangladesh, Myanmar, Thailand, Nepal and Bhutan — into an effective economic grouping. Being the largest economy, India must play a leadership role by leveraging its economy and strengths of each partner to deliver on the promise of engagement. S Jaishankar underlined this fact when he said that Bimstec should harbour higher aspirations, and that it should infuse new energies and resources, and a fresh commitment to bolster cooperation among the BoB countries.
India’s traditional ambivalence toward taking the lead has allowed China to expand its influence. But trade among these seven economies has grown from 5.5% in 2010 to 7.2% in 2018. Yet, it remains woefully low compared to intra-Asean trade (25%). The priority must be increasing intra-Bimstec trade and filling the growing infrastructure investment gap — about $120 bn annually.
New Delhi’s role in enhancing trade volumes with Bimstec constituents and reducing trade barriers among member countries is crucial. Facilitating agricultural trade while ensuring domestic food security and improving connectivity, particularly of clean energy, is paramount. India’s rapidly growing RE sector can be a game-changer. By leveraging this sector, it can establish a cross-border energy infrastructure grid that addresses the group’s concerns about energy security, clean energy transition and sustainable economic growth. India’s aim should, indeed, be ‘solid outcomes and practical collaborations’.
Date: 16-07-24
भ्रष्टाचार और आम आदमीसंपादकीय
बिहार में एक तरफ शासन भ्रष्टाचार पर जीरो टालरेंस की नीति पर काम कर रहा है। दूसरी तरफ विपक्ष लगातार भ्रष्टाचार पर हमलावर है। चाहे पुल-पुलिया गिरी हो या तटबंधों की मरम्मत में गड़बड़ी हुई हो, भ्रष्टाचार का आरोप लगता ही रहा है। गंभीर बात यह कि अब मंत्री भी मानने लगे हैं कि निचले स्तर तक भ्रष्टाचारी सक्रिय हैं। राजस्व एवं भूमि सुधार मंत्री डा. दिलीप कुमार जायसवाल का रविवार को आया बयान आम आदमी के जख्म पर थोड़ा मरहम तो लगाता है, लेकिन समस्या का निराकरण नहीं करता। मंत्री सिर्फ अपने हिस्से की बात कर रहे थे। भूमाफिया की गरिफ्त में व्यवस्था का सच बता रहे थे। यदि इतना कुछ पता है तो इस तंत्र को नेस्तनाबूत करने में हिचक कैसी ? सिर्फ कहने से या सिर पीटने से बात नहीं बनेगी। पूरे तंत्र को खंगालने और उसपर कड़ी कार्रवाई की जरूरत है। आम आदमी चाहे जमीन का मामला हो, योजनाओं के लाभ का मामला हो, ऋण का मामला हो, अनुभव करना चाहता है कि वह वास्तविक लाभुक है। यदि कुछ योजनाओं का लाभ सीधे उसके खाते से लिंक न होता तो कल्पना की जा सकती है कि भ्रष्टाचार की व्यापकता किस स्तर पर होती । यदि विपक्ष की आलोचनाओं को गंभीरता से लिया जाए तो कई स्तरों पर गड़बड़ी के ढीले पेच को सका जा सकता है। आम आदमी अपने जीवन को सरल बनाने की छटपटाहट में इन्हीं व्यवस्थाओं के बीच से होकर गुजरता है। उम्मीद की जानी चाहिए कि यदि शीर्ष पर बैठे लोगों की दृष्टि इस ओर गई है तो आम आदमी को राहत मिलेगी। काम कराने के लिए जगह-जगह जेब ढीली नहीं करनी पड़ेगी। सुशासन को धकियाते ऐसे भ्रष्ट तंत्र पर लगातार चोट करने की जरूरत है।
Date: 16-07-24
सवालों से घिरी हुई प्रशासनिक सेवाप्रेमपाल शर्मा, ( लेखक भारत सरकार में संयुक्त सचिव रहे हैं )
प्रशिक्षु आईएएस अधिकारी पूजा खेडकर प्रकरण ने देश की प्रशासनिक सेवा की कई संस्थाओं के कारनामों को एक साथ उजागर कर दिया है। पूजा खेडकर अभी लालबहादुर शास्त्री अकादमी, मसूरी में प्रशिक्षण प्राप्त कर रही हैं। उनकी यह ट्रेनिंग अगले साल जुलाई में पूरी होगी। इस दौरान उन्हें फील्ड ट्रेनिंग के लिए असिस्टेंट कलेक्टर के रूप में पुणे भेजा गया। वहां जाते ही उन्होंने सभी नियम-कायदे और नैतिकता को ताक पर रख ऐसे-ऐसे काम किए, जो देश की पूरी प्रशासनिक सेवा के लिए कलंक कहे जा सकते हैं। उन्होंने वहां जाते ही लाल बत्ती लगी सरकारी गाड़ी, एक अलग आफिस, घर और चपरासी इत्यादि की मांग की। यहां तक कि अपनी निजी आडी गाड़ी पर खुद ही अवैध रूप से लाल बत्ती भी लगवा ली, जबकि उस गाड़ी के खिलाफ यातायात नियमों के उल्लंघन के दर्जन भर मामले दर्ज हैं और जुर्माना तक बकाया है। बीते दिनों उसे जब्त कर लिया गया। आईएएस अधिकारी बनने के बाद उन पर ऐसा नशा छाया कि पुणे में तैनात एक अन्य अफसर के कार्यालय से जबरन उनका नाम हटाकर अपनी नेम प्लेट लगा दीं।
हालांकि इस प्रकरण के सामने आना एक मायने में सही साबित हुआ है। इस प्रकरण से न जाने कितने ज्वलंत प्रश्न खुलकर सामने आ गए हैं। पहला सवाल तो यही है कि पूजा खेडकर को ओबीसी सर्टिफिकेट कैसे मिल गया? जब उनकी खुद की संपत्ति 17 करोड़ रुपये दर्ज है। उनके पिता भी एक पूर्व अधिकारी होने के साथ-साथ राजनीति में कदम बढ़ा रहे हैं। उन्होंने हाल में संपन्न हुए लोकसभा चुनाव में अपनी संपत्ति 40 करोड़ रुपये और आय 43 लाख रुपये वार्षिक दिखाई है। यह ठीक है कि पूजा खेडकर ओबीसी समुदाय से आती हैं, लेकिन आठ लाख रुपये से अधिक वार्षिक आय वाले तो क्रीमीलेयर के दायरे में आते हैं। ऐसे लोग आरक्षण के हकदार नहीं होते। इससे स्पष्ट होता है कि उन्हें ओबीसी प्रमाण पत्र गलत तरीके से दिया गया। इसके अलावा उन्होंने यूपीएससी की परीक्षा ओबीसी कोटे के साथ-साथ दिव्यांग उम्मीदवार के रूप में दी। ऐसे किसी सर्टिफिकेट के मामले में सत्यापन के लिए विशेष मेडिकल परीक्षा होती है, परंतु यूपीएससी द्वारा कई बार बुलाने पर भी वह इसके लिए नहीं गईं। हर बार एक नया बहाना बनाती रहीं, फिर उन्होंने खुद को दिव्यांग साबित करने के लिए एक निजी क्लीनिक से प्रमाण पत्र बनवाकर पेश कर दिया। यह मामला यूपीएससी की तरफ से कोर्ट में भी गया, लेकिन इसके बावजूद निजी क्लीनिक वाला उनका प्रमाण पत्र मान्य हो गया। आखिर यह कैसे स्वीकार हो गया? सवाल है कि यह किसके दबाव में किया गया? ओबीसी और दिव्यांगता के वर्ग में उनकी रैंक 841 थी। यानी उनसे ऊपर अन्य मेधावी और सक्षम उम्मीदवार थे, जिनकी कीमत पर उन्हें जगह मिली। इस प्रकार यह ओबीसी वर्ग के दूसरे छात्रों और दिव्यांगों की हकमारी का मामला भी है। निश्चित रूप से यह सुप्रीम कोर्ट द्वारा बनाए गए ओबीसी के पैमाने से लेकर उन सभी मानकों की भी अनदेखी है, जिनका उल्लंघन करते हुए वह आईएएस बन गईं। ऐसे लोग मेरिट की कीमत पर लगातार जगह बना रहे हैं।
इस प्रकरण में एक बात साफ नजर आ रही है कि बिना राजनीतिक और प्रशासनिक साठगांठ के पूजा खेडकर यहां तक नहीं पहुंच सकती थीं। आईएएस बनने के लोभ में वह वक्त से पहले भटक गईं और उन सुविधाओं की मांग करने लगीं, जो प्रशासनिक सेवा में शामिल हुए ज्यादातर अफसर करते हैं। आखिर उनके जैसे अधिकारी जनता की सेवा कैसे करेंगे? वह ऐसी अकेली अधिकारी नहीं हैं। उनसे पहले इस सूची में कई नाम दर्ज हैं, जिन पर भ्रष्टाचार के तमाम मामले दर्ज हैं। चाहे अभी जेल में बंद आईएएस पूजा सिंघल हों या मध्य प्रदेश के आईएएस दंपती। दरअसल नौकरशाही का कोई विभाग इससे अछूता नहीं है। अगर हाल का उदाहरण लें तो तीन वर्ष पहले जिस आइपीएस अधिकारी ने यूपीएससी की एथिक्स यानी नैतिकता के प्रश्नपत्र में सबसे ज्यादा नंबर पाए थे, उसके अगले वर्ष की परीक्षा में उसे नकल करते पकड़ा गया। इससे जाहिर होता है कि भारत जैसे विशाल देश को एक मजबूत प्रशासनिक व्यवस्था देने वाले इस स्टील फ्रेम में बहुत तेजी से गिरावट आ रही है।
हमारी सभ्यता सदियों पुरानी है। इसकी समृद्धि का गुणगान इतिहास के पन्नों में दर्ज है। इसके बावजूद समाज के विभाजन ने इसे इतना जर्जर कर दिया कि हम हजारों साल तक कभी मुगलों तो कभी अंग्रेजों के गुलाम बने रहे। दुख की बात है कि जाति, पंथ और क्षेत्र के नाम पर लगभग वैसा ही विभाजन आज हमारी प्रशासनिक सेवाओं में प्रवेश कर चुका है। राजनीति और नौकरशाही का गठजोड़ इसके लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार है। इससे छुटकारा पाने के लिए देश की नौकरशाही के मौजूदा रूप यानी उसकी भर्ती से लेकर ट्रेनिंग और सुविधाओं में तुरंत सुधार करना होगा। नौकरी की सुरक्षा और सुविधाएं ही बार-बार पूजा खेडकर जैसे अधिकारियों को जन्म देती हैं। यदि देश को कोई सही संदेश देना है तो पूजा खेडकर के खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए। प्रशिक्षण अवधि के दौरान बर्खास्त करने में कोई सेवा नियम आड़े नहीं आता। इसके साथ ही सरकार ने पूजा खेडकर पर लगे आरोपों की जांच के लिए जो समिति बनाई है, उसका यह दायित्व भी बनता है कि उनके मेडिकल सर्टिफिकेट से लेकर ओबीसी सर्टिफिकेट देने के मामलों की जांच करे, क्योंकि यह प्रकरण यूपीएससी और कार्मिक मंत्रालय के साथ-साथ देश की पूरी प्रशासनिक व्यवस्था की साख का भी है।
Date: 16-07-24
सीमित संभावनाएंसंपादकीय
संयुक्त राष्ट्र ने गत सप्ताह विश्व जनसंख्या संभावना रिपोर्ट जारी की। इस रिपोर्ट में व्यापक तौर पर वैश्विक जनांकिकी के भविष्य की राह समेत कई अनुमान जताए गए हैं तथा चुनिंदा देशों और क्षेत्रों को लेकर भविष्यवाणी की गई है। रिपोर्ट में कहा गया है कि दुनिया की आबादी में इजाफा जारी रहेगा और 2080 के दशक के आरंभ तक दुनिया की आबादी 10 अरब का आंकड़ा पार कर जाएगी। उसके बाद आबादी में गिरावट का सिलसिला आरंभ होगा। यह समग्र रुझान क्षेत्रीय और राष्ट्रीय स्तर पर उल्लेखनीय अंतर को छिपा लेता है। इस अवधि में बाद के वर्षों में आबादी में होने वाली वृद्धि का अधिकांश भाग अफ्रीका महाद्वीप से आएगा, खासतौर पर सब-सहारा अफ्रीका से। इनमें से कई देश मसलन सोमालिया और डेमोक्रेटिक रिपब्लिक ऑफ द कॉन्गो (डीआरसी) फिलहाल आर्थिक रूप से पिछड़े और राजनीतिक रूप से अस्थिर हैं। उनमें से कुछ देश मसलन डीआरसी आदि में भरपूर प्राकृतिक संसाधन भी हैं जिनका मूल्य आने वाले दशकों में बढ़ेगा। इन देशों में युवा आबादी भी होगी और संसाधनों को लेकर प्रतिस्पर्धा भी होगी। जाहिर है भविष्य में ये वैश्विक और भूराजनीतिक दृष्टि से
अहम होंगे।
वैश्विक जनसंख्या संभावना रिपोर्ट से यह संकेत भी मिलता है कि निकट भविष्य में भारत की आबादी चीन से अधिक रहने वाली है। बहरहाल इसका अनुमान है कि पाकिस्तान की आबादी का बढ़ना भी जारी रहेगा और 39 करोड़ की आबादी के साथ वह अमेरिका से आगे निकल जाएगा। यह बात भारत और विश्व के लिए महत्त्वपूर्ण है। यह देखना शेष है कि भारत की पाकिस्तान को अलग-थलग रखने और अनदेखा करने की नीति क्या तब भी टिकाऊ होगी जब वह दुनिया का तीसरा सबसे अधिक आबादी वाला मुल्क बन जाएगा? रिपोर्ट के अनुसार भारत की आबादी में 2062 के बाद कमी आनी शुरू हो जाएगी यानी वैश्विक जनसंख्या के सर्वोच्च स्तर पर पहुंचने के करीब दो दशक पहले उसकी आबादी घटने लगेगी।
इससे भी अहम बात शायद यह है कि देश की समस्त आबादी में गिरावट शुरू होने के करीब एक दशक पहले ही उसकी श्रम योग्य आयु की आबादी के बढ़ने की गति आम आबादी की तुलना में कहीं अधिक तेजी से धीमी होगी। निर्भरता अनुपात की बात करें तो 15 वर्ष से कम और 65 वर्ष से अधिक आयु के लोगों की संख्या में इजाफा होगा। बढ़ती और उच्च निर्भरता अनुपात वाले देश आमतौर पर उस सीमा से गुजर चुके हैं जहां वे प्रति व्यक्ति आय में इजाफा कर सकते थे। भारत के लिए इसके आर्थिक और नीतिगत निहितार्थ स्पष्ट हैं। उसके पास समृद्ध होने के लिए तीन दशक हैं। अगर हम इस अवधि का समझदारी से इस्तेमाल नहीं कर पाए तो मध्य आय स्तर में उलझ सकते हैं। ऐसे में वह जनसंख्या उत्पादकता में असाधारण वृद्धि करने में भी नाकाम रहेगा।
जो लोग 2054 में श्रम शक्ति में सबसे बुजुर्ग होंगे वे इस समय रोजगार की तलाश में हैं। अल्पशिक्षित युवाओं के सरकारी नौकरी की तलाश में कतार में लगे होना नीति निर्माताओं के लिए चिंता का विषय होना चाहिए। अगली सदी में तथा उसके बाद देश का भविष्य इन्हीं लोगों पर निर्भर करेगा। क्या उनके पास वह कौशल है कि वे देश को उच्च आय के स्तर पर ले जा सकें? इस प्रश्न का उत्तर सकारात्मक नहीं लगता। ऐसे में कौशल उन्नयन सरकार की पहली प्राथमिकता होना चाहिए। केवल रोजगार निर्माण करना उस आबादी के लिए पर्याप्त नहीं है जो अवसरों का लाभ लेने का कौशल नहीं रखती। उच्च और जीवनपर्यंत शिक्षा के विविध मॉडलों को आजमाना चाहिए। व्यावसायिक प्रशिक्षण का विस्तार होना चाहिए। भारत के जनांकिकीय लाभ का वक्त हाथ से फिसल रहा है। उम्रदराज होने की प्रक्रिया को पलटा नहीं जा सकता है और भारत को अगले तीन दशक में अपनी जनांकिकी का लाभ लेना चाहिए।
Date: 16-07-24
लोकतंत्र में हिंसासंपादकीय
अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर हुए हमले के बाद स्वाभाविक ही वहां की सुरक्षा और खुफिया एजंसियों पर सवाल उठने लगे हैं। ट्रंप इस बार के राष्ट्रपति चुनाव में फिर से उम्मीदवार हैं। वे पेन्सिल्वेनिया के बटलर में एक चुनावी सभा को संबोधित कर रहे थे कि एक युवक ने पास की एक छत से उन पर गोली दाग दी। गनीमत है कि निशाना चूक गया और गोली ट्रंप के दाहिने कान को चीरती हुई निकल गई। सुरक्षाकर्मियों ने हमलावर को वहीं ढेर कर दिया। राष्ट्रपति जो बाइडन ने घटना की सख्त निंदा की है। उन्होंने कहा कि अमेरिकी लोकतंत्र में हिंसा की कोई जगह नहीं है। मगर इस घटना के बाद राजनीतिक बयानबाजियां शुरू हो गई हैं।
रिपब्लिकन पार्टी के कुछ नेताओं ने आरोप लगाया कि जो बाइडेन के भाषणों से ट्रंप पर हमला करने की शह मिली। यह हत्या का प्रयास था। हालांकि अमेरिका में यह पहली घटना नहीं है, जब किसी नेता पर जानलेवा हमला हुआ। मगर दुनिया भर में सबसे सतर्क और चाक-चौबंद मानी जाने वाली अमेरिकी सुरक्षा प्रणाली पर सवाल इसलिए भी उठ रहे हैं कि ट्रंप पर हमला करने वाले के बारे में घटना से कुछ समय पहले सूचना दे दी गई थी। एक प्रत्यक्षदर्शी ने बताया है कि हमलावर को पास के घर की छत पर स्पष्ट रूप से देखा गया था और उसने सुरक्षाकर्मियों को इसकी सूचना भी दी थी।
चूंकि अमेरिका में राष्ट्रपति चुनाव की सरगर्मी है और ट्रंप की दावेदारी मजबूत मानी जा रही है, इस घटना को राजनीति के केंद्र में ला दिया गया है। कई विश्लेषक मानते हैं कि इस घटना से ट्रंप को सहानुभूति मिलेगी और उनकी दावेदारी और मजबूत होगी। हालांकि अमेरिका में मतदाताओं को इस तरह प्रभावित करना थोड़ा कठिन माना जाता है। अमेरिकी खुफिया एजंसी एफबीआइ अभी पता नहीं लगा सकी है कि हमलावर का उद्देश्य क्या था। उसका कहना है कि हमलावर ने अकेले हमले की योजना बनाई थी, उसका किसी अन्य समूह से कोई संबंध नहीं था, इसलिए उसके मकसद के बारे में जान पाना कठिन है। मगर अमेरिका में पिछले कुछ समय से जिस तरह का वातावरण बना है, उसमें युवाओं के भीतर पनपे हिंसक व्यवहार का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। पिछले चुनाव में जब ट्रंप चुनाव हारे थे, तब उनके समर्थक अमेरिकी संसद में घुस गए और वहां भारी तोड़-फोड़ की थी। वहां नस्लीय हिंसा और दूसरे देशों के नागरिकों के प्रति युवाओं में नफरत का जैसा मानस बना है, उससे वहां के वातावरण का अंदाजा लगाया जा सकता है।
छिपी बात नहीं है कि अमेरिका में महंगाई और बेरोजगारी के कारण बहुत सारे युवाओं में नाराजगी है। इस कुंठा में कई युवा हिंसक बर्ताव करते देखे जाते हैं। हालांकि ट्रंप पर हमला करने वाले युवक ने उनके समर्थक के रूप में खुद को पंजीकृत कराया था, पर जब तक ठीक-ठीक पता नहीं चल जाता कि उसने उन पर हमला क्यों किया, तब तक कुछ भी दावे के साथ कहना मुश्किल है। मगर यह घटना अमेरिकी लोकतंत्र के लिए चिंता का विषय इसलिए है कि ऐसी चुनावी हिंसा इससे पहले वहां नहीं देखी गई। अगर अमेरिकी युवाओं में ऐसी प्रवृत्ति पनप रही है, तो निस्संदेह इसे लेकर तुरंत सावधान हो जाने की जरूरत है। अच्छी बात है कि बाइडेन प्रशासन इस घटना की जांच में कोई राजनीतिक दुराग्रह नहीं दिखा रहा है।
Date: 16-07-24
अनदेखी से बिगड़ती पारिस्थितिकीजयप्रकाश त्रिपाठी
पर्यावरण को भारी नुकसान और जलवायु परिवर्तन के चलते दुनिया का ध्यान लगातार भविष्य की गंभीर चुनौतियों की ओर बना हुआ है। भारी विनाश के आसार नजर आने के बावजूद, ‘स्टैटिस्टिकल रिव्यू आफ वर्ल्ड एनर्जी’ के एक ताजा अध्ययन में खुलासा हुआ है कि जीवाश्म ईंधनों की खपत और ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन उच्च स्तर पर पहुंच चुका है। हालांकि अक्षय ऊर्जा स्रोतों में हुई वृद्धि के कारण वैश्विक ऊर्जा क्षेत्र में जीवाश्म ईंधनों की हिस्सेदारी में मामूली गिरावट आई है। वैश्विक प्राथमिक ऊर्जा की खपत अब तक के सबसे ऊंचे स्तर 620 एक्साजूल पर पहुंच गई है। पहली बार कार्बन डाई आक्साइड का उत्सर्जन 40 गीगाटन के पार चला गया है। यह रपट विश्वमंच और पर्यावरण विश्लेषकों को यह समझने में मदद करती है कि निकट भविष्य की चुनौतियां कितनी भयावह हैं।
वैश्विक तापमान में एक डिग्री का हर अंश प्राकृतिक प्रणालियों, मानव समाजों और अर्थव्यवस्थाओं के लिए महत्त्वपूर्ण और दूरगामी परिणाम उत्पन्न कर सकता है। वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने के लिए 2022 के स्तर से कार्बन डाइआक्साइड उत्सर्जन में लगभग 37 गीगाटन की कटौती करने और 2050 तक ऊर्जा क्षेत्र में शुद्ध-शून्य उत्सर्जन प्राप्त करने की आवश्यकता है। कुछ प्रगति के बावजूद, ऊर्जा संक्रमण प्रौद्योगिकियों की वर्तमान तैनाती और इस सदी के अंत तक वैश्विक तापमान वृद्धि को पूर्व-औद्योगिक स्तरों के 1.5 डिग्री सेल्सियस के भीतर सीमित करने के पेरिस समझौते के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए आवश्यक स्तरों के बीच महत्त्वपूर्ण अंतर बना हुआ है। 1.5 डिग्री सेल्सियस के अनुकूल मार्ग के लिए समाज द्वारा ऊर्जा के उपभोग और उत्पादन के तरीके में व्यापक परिवर्तन की आवश्यकता है।
दीर्घकालिक निम्न ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन विकास रणनीतियां और शुद्ध-शून्य लक्ष्य, अगर पूरी तरह से क्रियान्वित किए जाते हैं, तो 2022 के स्तर की तुलना में 2030 तक कार्बन उत्सर्जन में छह फीसद और 2050 तक 56 फीसद की कमी आ सकती है। हालांकि, अधिकांश जलवायु प्रतिज्ञाओं को अभी विस्तृत राष्ट्रीय रणनीतियों और योजनाओं में तब्दील और क्रियान्वित किया जाना है, जिसके लिए पर्याप्त आर्थिक संसाधन चाहिए। नियोजित ऊर्जा परिदृश्य के अनुसार, ऊर्जा से संबंधित उत्सर्जन अंतर 2050 तक 34 गीगाटन तक पहुंचने का अनुमान है। डेढ़ डिग्री सेल्सियस पर बने रहने के लिए हर साल करीब एक हजार गीगावाट अक्षय ऊर्जा की जरूरत होती है। दो साल पहले वैश्विक स्तर पर करीब 300 गीगावाट अक्षय ऊर्जा जोड़ी गई, जो नई क्षमता का 83 फीसद है, जबकि जीवाश्म ईंधन और परमाणु ऊर्जा के लिए संयुक्त हिस्सेदारी 17 फीसद है। अक्षय ऊर्जा की मात्रा और हिस्सेदारी दोनों में पर्याप्त वृद्धि की जरूरत है, जो तकनीकी रूप से संभव है।
सन 2022 में रेकार्ड अक्षय ऊर्जा क्षमता में वृद्धि हुई, इस वर्ष जीवाश्म ईंधन सबसिडी का उच्चतम स्तर भी देखा गया, क्योंकि कई सरकारों ने उपभोक्ताओं और व्यवसायों के लिए उच्च ऊर्जा कीमतों के झटके को कम करने की कोशिश की। सभी ऊर्जा संक्रमण प्रौद्योगिकियों में वैश्विक निवेश 2022 में 1.3 ट्रिलियन अमेरिकी डालर के उच्च स्तर पर पहुंच गया, फिर भी जीवाश्म ईंधन में पूंजी निवेश अक्षय ऊर्जा निवेश से लगभग दोगुना था। जलवायु प्रतिबद्धताओं को पूरा करने के लिए अक्षय ऊर्जा और ऊर्जा दक्षता के साथ-साथ ऊर्जा सुरक्षा और ऊर्जा सामर्थ्य उद्देश्यों को पूरा करने के लिए सबसे अच्छी स्थिति में होने के कारण, सरकारों को यह सुनिश्चित करने के लिए कि निवेश सही रास्ते पर हैं, अपने प्रयासों को दोगुना करने की आवश्यकता है।
ऊर्जा संक्रमण संकेतक ऊर्जा क्षेत्रों और प्रौद्योगिकियों में महत्त्वपूर्ण तेजी की आवश्यकता दर्शाते हैं। भविष्य में ये स्थितियां निवेश की जरूरतों और जलवायु परिवर्तन के बिगड़ते प्रभावों की लागत को भी बढ़ाएंगी। दूसरी ओर, अक्षय ऊर्जा के उत्पादन में वृद्धि के बावजूद जीवाश्म ईंधन की बढ़ती मांग भी गंभीर चिंता का विषय है। इससे पता चलता है कि स्वच्छ ऊर्जा की बढ़ती मांग का मुकाबला दुनिया नहीं कर पा रही है। यानी, ग्लोबल वार्मिंग को सीमित करने की दिशा में दुनिया को ऊर्जा उत्पादन में जिस बदलाव की जरूरत है, उसकी गति अब भी अपेक्षित नहीं है।
जानकार, जीवाश्म ईंधनों के इस्तेमाल में गिरावट न आने पर चिंता जताते हुए बताते हैं कि एक ऐसे वर्ष में, जहां हमने अक्षय ऊर्जा स्रोतों के योगदान को रेकार्ड स्तर पर बढ़ते देखा, दुनिया में ऊर्जा की मांग का स्तर भी पहले से कहीं ज्यादा बढ़ा है। इसका मतलब है कि जीवाश्म ईंधनों से प्राप्त ऊर्जा के हिस्से में कोई बदलाव नहीं आया है। भारत के ऊर्जा मिश्रण में कोयले की हिस्सेदारी करीब 55 फीसद है। भारत इसे अपने लिए सबसे अहम जीवाश्म ईंधन बताता है, क्योंकि देश में कोयले का बड़ा भंडार है। भारत ने सौर और पवन ऊर्जा में काफी विकास किया है, लेकिन ऊर्जा क्षेत्र में इनकी भागीदारी अब भी काफी कम है।
एक सच्चाई यह भी है कि दुनिया भर में जीवाश्म ईंधनों का इस्तेमाल एक जैसा नहीं है। मसलन, यूरोप में जीवाश्म ईंधन की खपत का रुझान बदल रहा है। औद्योगिक क्रांति के बाद से पहली बार यहां जीवाश्म ईंधनों से मिलने वाली ऊर्जा का स्तर 70 फीसद से नीचे रहा है। इसकी एक वजह यूक्रेन पर रूसी हमले के बाद रूसी गैस की खपत में आई कमी भी है। जर्मनी का कार्बन उत्सर्जन सात दशक में सबसे कम रहा है और कोयले की कम खपत ने इसमें बड़ी भूमिका निभाई है। अमेरिका में भी कोयले के इस्तेमाल में 17 फीसद तक की गिरावट आई है। भारत में जीवाश्म ईंधनों का इस्तेमाल बढ़ा है और इनकी कुल खपत में आठ फीसद की वृद्धि हुई है। देश में ऊर्जा की बढ़ी मांग का तकरीबन पूरा हिस्सा जीवाश्म ईंधन आधारित ऊर्जा से पूरा हो रहा है।
चीन में एक ओर जहां सौर और पवन ऊर्जा के क्षेत्र में काफी काम हुआ, वहीं पिछले वर्ष तक यहां भी जीवाश्म ईंधनों का उपभोग छह फीसद बढ़ा है। हालांकि, अक्षय ऊर्जा स्रोतों में चीन के बड़े निवेश में जानकार काफी संभावनाएं देखते हैं।
पिछले वर्ष दुबई जलवायु सम्मेलन में अंतरराष्ट्रीय समुदाय पहली बार तेल, गैस और कोयले से दूरी बनाने पर सहमत हुआ था। इस बात पर भी सहमति बनी कि सदस्य देशों को 2030 तक वैश्विक स्तर पर अक्षय ऊर्जा क्षमता को तीन गुना करने और उसी अवधि के भीतर ऊर्जा दक्षता की दर को दोगुना करने का प्रयास करना चाहिए। 2050 तक, शुद्ध कार्बन उत्सर्जन को शून्य तक कम किया जाना चाहिए। इस प्रकार जीवाश्म ईंधन युग के अंत की शुरुआत को चिह्नित किया और मान्यता दी कि नवीकरणीय ऊर्जा जलवायु कार्रवाई और जलवायु न्याय के लिए वैश्विक समाधान है। सवाल है कि उस जलवायु सम्मेलन के निर्णयों की दिशा में अब तक कैसी पहल हो सकी है। बदलती जलवायु, धूसर पर्यावरण, मानसूनी विचलनों के बीच इस बार की गर्मी ने कहर बरपा दिए। तब भी आंखें खुल जाएं तो गनीमत है।
Date: 16-07-24
धर्मस्थल और पारदर्शितासंपादकीय
भारत में धर्मस्थलों से जुडे़ तथ्यों, रहस्यों की भरमार है और उनका यथोचित खुलासा सुखद और स्वागतयोग्य है। धर्मस्थलों से जुड़े तमाम जरूरी पहलुओं पर से परदा उठाना इसलिए भी जरूरी है, ताकि समय-समय पर बेवजह उठने वाले विवादों का पटाक्षेप हो सके। इसी कड़ी में मध्य प्रदेश स्थित भोजशाला का विवाद है। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने सोमवार को भोजशाला-कमाल-मौला मस्जिद परिसर की अपनी वैज्ञानिक सर्वेक्षण रिपोर्ट मध्य प्रदेश हाईकोर्ट की इंदौर पीठ को सौंप दी है। एएसआई के अधिवक्ता हिमांशु जोशी ने 2,000 पेज से अधिक की रिपोर्ट हाईकोर्ट को सौंपी है, जिस पर 22 जुलाई को सुनवाई होगी। 11वीं सदी की इस इमारत में तीन महीने से सर्वेक्षण का कार्य चल रहा था और जो तथ्य सामने आए हैं, उन पर अदालत को फैसला करना है। यह ऐसा संवेदनशील मामला है, जिस पर तमाम संबंधित पक्षों को बहुत सावधानी और समझदारी से कदम आगे बढ़ाने चाहिए। ध्यान रहे, हिंदू समुदाय इसे वाग्देवी (देवी सरस्वती) का मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे मस्जिद कहता है। लंबे समय से यह मांग हो रही थी कि इस इमारत को वैज्ञानिक ढंग से परखा जाए।
वैसे, पुरातत्व विभाग की रिपोर्ट में क्या है, इसकी आधिकारिक सूचना अदालती सुनवाई में ही सामने आएगी, पर एक पक्ष का दावा है कि भोजशाला परिसर में बडे़ पैमाने पर मूर्तियों के प्रमाण मिले हैं। प्रमाणों को सियासी मंचों पर नहीं, बल्कि अदालत में परखा जाना चाहिए। विभिन्न पक्षों की खींचातानी या तनाव बढ़ाने की कोशिशें सराहनीय नहीं हैं। यहां यह भी ध्यान में रखना होगा कि अदालती आदेश के अनुसार, पिछले 21 वर्षों से ‘मंगलवार को भोजशाला में पूजा करने की अनुमति है, जबकि शुक्रवार को नमाज अदा करने की मंजूरी है। इस प्रचलित व्यवस्था में किसी भी तरह के बदलाव से असर पड़ सकता है, अत: यह फूंक-फूंककर कदम बढ़ाने का समय है। इस पूरे मामले को तथ्यों की रोशनी में देखने की जरूरत है, ताकि हिंदू-मुस्लिम विवाद बनने और बढ़ने न पाए। सभ्य संगठन, सभ्य तौर-तरीकों और लोकतांत्रिक उदारता के साथ भोजशाला विवाद को सुलझाना चाहिए। क्या ऐसी कोई भी मांग किसी धर्म के नाम पर न होकर न्याय और सच्चाई के आधार पर की जा सकती है? यहां खास तथ्य है कि ‘हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस’ की याचिका की वजह से यह सर्वेक्षण हुआ है।
यह संयोग है कि भोजशाला मामले की चर्चा के साथ ही पुरी के प्रसिद्ध जगन्नाथ मंदिर के खजाने की भी चर्चा हो रही है। इस मंदिर का खजाना 46 साल बाद खोला गया। खूब कयास लगाए जाते थे कि इस खजाने की रक्षा सांप करते हैं। सांप पकड़ने वाले विशेषज्ञों को भी तैनात किया गया था, पर एक भी सांप या कीड़ा वहीं नहीं मिला है। खजाने की पूरी सूची तो बाद में सामने आएगी, पर वर्तमान रत्न भंडार, बाहरी रत्न भंडार और आंतरिक रत्न भंडार में 150 किलोग्राम से ज्यादा सोना और 180 किलोग्राम से ज्यादा चांदी का अनुमान है। सरकार से अदालत तक हर कोई यह मानता है कि मंदिर के खजाने का विवरण स्पष्ट होना जरूरी है। एक लोकतांत्रिक देश में धर्मस्थलों से जुड़े किसी भी खजाने के बारे में आम लोगों को पूरी जानकारी होनी चाहिए। धर्मस्थलों को लेकर जितनी पारदर्शिता होगी, उनके प्रति लोगों की आस्था उतनी ही बढ़ेगी और सबसे जरूरी यह है कि खजाने का सदुपयोग हो, ताकि हमारे धर्मस्थलों की शोभा में चार चांद लग जाएं और रहस्यों व विवादों की गुंजाइश भी कम से कम बचे।
Date: 16-07-24
पानी के लिए फिर टकरा रहे कर्नाटक और तमिलनाडुएस. श्रीनिवासन, ( वरिष्ठ पत्रकार )
दक्षिण भारत में दो पड़ोसी राज्य – कर्नाटक और तमिलनाडु, फिर कावेरी नदी के जल के लिए लड़ पड़े हैं। रविवार को कर्नाटक के मुख्यमंत्री सिद्धारमैया ने सर्वदलीय बैठक बुलाई, जहां निर्णय लिया गया कि राज्य नदी का पानी तभी साझा करेगा, जब कर्नाटक में बारिश होगी। अब तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम के स्टालिन ने भी इसी मुद्दे पर सर्वदलीय बैठक बुलाई है।
कर्नाटक द्वारा तमिलनाडु को जल देने से इनकार के लिए सर्वदलीय बैठक बुलाना और तमिलनाडु द्वारा कर्नाटक को जल देने के लिए मजबूर करने के लिए सर्वदलीय बैठक बुलाना अब करीब तीन दशक से बार-बार दोहराई जा रही कहानी बन गई है। कोई अचरज नहीं, दोनों राज्य जानते हैं कि सर्वदलीय बैठकें सिर्फ सियासी चाल हैं, इनका कोई नतीजा नहीं निकलेगा।
मुख्यमंत्री स्टालिन तमिलनाडु में जबरदस्त सियासी दबाव में हैं, क्योंकि उन पर राज्य के अधिकारों की रक्षा में नाकाम रहने का आरोप लग रहा है। वैसे, कर्नाटक में कांग्रेस की अनुकूल सरकार है, फिर भी जल साझा करने पर तकरार जारी है। डेल्टा क्षेत्र, जिसे राज्य में धान का कटोरा माना जाता है, वहां के किसान सबसे ज्यादा प्रभावित हैं, क्योंकि बुआई का मौसम खत्म हो रहा है। दोनों पड़ोसी राज्यों की मानसून संरचनाएं थोड़ी अलग हैं। भारत की दो मानसून प्रणालियों में से एक- दक्षिण पश्चिम मानसून, जो जून और सितंबर के बीच भारत के ज्यादातर हिस्सों को कवर करता है, कर्नाटक से टकराती है। यह राज्य कावेरी सहित यहां की ऐसी अधिकांश नदियों का स्रोत है, जो समुद्र में गिरने से पहले तमिलनाडु से होकर बहती हैं। जब दक्षिण-पश्चिम मानसून की सहायता से अच्छी बारिश होती है, तो कर्नाटक और तमिलनाडु के बीच कोई समस्या नहीं होती है। समस्या और संघर्ष की स्थिति तब बनती है, जब मानसून नाकाम हो जाता है। कावेरी नदी आज भी तमिलनाडु में सिंचाई, पेयजल और औद्योगिक उपयोग के लिए पानी का प्राथमिक स्रोत है। 1892 में मद्रास प्रेसीडेंसी (अब तमिलनाडु) और मैसूर साम्राज्य (अब कर्नाटक) के बीच एक जल समझौते पर हस्ताक्षर किए गए थे। हालांकि, समाधान आज भी नहीं हो सका है।
पिछले कुछ वर्षों में कर्नाटक ने कई बांध बनाए हैं और उनमें से कम से कम चार – हरंगी, काबिनी, हेमवती और कृष्णराज सागर – कर्नाटक के किसानों की मदद के लिए जल भंडारण करते हैं। विवाद बढ़ने पर दोनों राज्य अदालत भी गए हैं और 1992 में दोनों राज्यों के बीच जल आवंटन, विवाद समाधान, जल प्रबंधन और जल के प्रवाह की निगरानी पर निर्णय लेने के लिए कावेरी नदी जल ट्रिब्यून की स्थापना भी की गई थी।
बहरहाल, जब विवाद लगातार बढ़ता गया, तब 2018 में सर्वोच्च न्यायालय ने कर्नाटक को बारिश के मौसम में तमिलनाडु के लिए 177.24 टीएमसीएफटी (हजार मिलियन क्यूबिक फीट) पानी छोड़ने का निर्देश दिया था, पर कर्नाटक सिर्फ 135 टीएमसीएफटी पानी जारी करने पर सहमत हुआ। इसे सर्वोच्च न्यायालय के आदेश के उल्लंघन के रूप में देखा गया, पर न्यायालय के फैसले की व्याख्या पर विवाद जारी रहा और दोनों पक्ष राहत के लिए अदालत में गुहार लगाते रहे हैं।
दोनों राज्यों के बीच जल विवाद इतना जटिल है कि एक समझदार पाठक भी भ्रमित हो सकता है। यह विडंबना ही है कि विवाद सुलझाने के लिए बहुत विस्तार से काम हुआ है, जल का कोटा तय हुआ है, इसके बावजूद विवाद कायम है। दोनों ही राज्यों में कृषि का विस्तार हुआ है और दोनों को ज्यादा पानी चाहिए।
वैसे, पिछले वर्षों में तमिलनाडु के किसानों ने जलाभाव से निपटना सीखा है। वे खेती के ऐसे तरीके अपना रहे हैं, जिनमें कम पानी का उपयोग होता है, पर उनकी चिंताएं शुष्क मौसम के दौरान बढ़ने लगती हैं, जब जल स्तर खतरनाक रूप से गिर जाता है।
खैर, दोनों राज्यों में विपक्षी दलों के पास राज्य सरकारों के खिलाफ भावनाएं भड़काने और आंदोलन करने का मौका है। हालांकि, जब वे स्वयं सत्ता में आते हैं, तो उनके सुर बदल जाते हैं। केंद्र सरकार विवाद में पड़ना नहीं चाहती है और दोनों राज्यों के बीच मनमुटाव का सिलसिला खत्म होता नहीं दिखता है।
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हाल ही में एनसीईआरटी ने 12वीं के राजनीति विज्ञान के पाठ्यक्रम में संशोधन किए हैं। यह कई मायनों में चिंता का विषय है। मुद्दा यह है कि राजनीतिक दृष्टिकोण के बदलने पर ऐसे संशोधन किए जाते हैं। इसको लेकर उदारवादियों में भी राजनीतिक पूर्वाग्रह होता है। लेकिन शिक्षा के प्रति यह दक्षिणपंथियों से बेहतर होता है।
ऐसी राजनीति विश्व पर्यंत है – अमेरिका में क्रिटिकल रेस थ्योरी विवाद और ताइवान की इतिहास की पुस्तकों में चियांक काई रोक की विरासत पर बहस होती रही है। लेकिन भारतीय शैक्षिक पाठ्यक्रम में बदलाव सीमा पार कर रहे हैं। 2014 के बाद से संशोधन का यह चौथा दौर है।
पक्षपात पर पक्षपात –
यह तर्क दिया जा सकता है कि भारत और दुनिया के अन्य हिस्सों में वामपंथी – उदारवादी पूर्वाग्रह रहा है। लेकिन इसका उत्तर इसे और भी बदतर दक्षिणपंथी पूर्वाग्रह से बदलना नहीं है, जैसा कि एनसीआरटी की पाठ्यपुस्तकों में हो रहा है।
उच्च लक्ष्य रखें – शिक्षा का लक्ष्य छात्रों को आधुनिक दुनिया के लिए तैयार करना होना चााहिए। उनको कई आख्यान प्रदान किए जाने चाहिए, और फिर अपना मन बनाने देना चाहिए। इस दिशा में, शिक्षा के प्रति एक उदार दृष्टिकोण, जो कई दृष्टिकोणों को मान्यता देता हो, अब तक का सबसे बेहतर विकल्प हो सकता है।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 19 जून, 2024
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Date: 15-07-24
Restoring a verdictOpportunistic defections will likely be punished by the votersEditorial
INDIA bloc parties won 10 of the 13 Assembly seats across seven States where by-polls were held on July 10 and the results were announced on July 13. The popular verdict broadly echoes the recent Lok Sabha election results that signalled a fatigue with the Bharatiya Janata Party (BJP). The by-poll results indicate that the BJP’s politics is encountering some resistance on the ground. Of particular note is Himachal Pradesh where the Congress won two of the three Assembly seats which fell vacant after three independent legislators joined the BJP after resigning their seats. The government of Chief Minister Sukhvinder Singh Sukhu had teetered on the brink in February after six Congress MLAs, along with these three independents, had voted in favour of a BJP candidate in a Rajya Sabha contest. They were later disqualified from the Assembly after Congress candidate Abhishek Manu Singhvi lost the Rajya Sabha poll. This had brought down the party’s tally to 34 in the 68-member House. With its victories in Dehra and Nalagarh, the Congress has returned to its original strength of 40 MLAs. The Sukhu government had won a majority on June 4 when the Congress won four of the six seats that had by-polls alongwith the 2024 Lok Sabha election. By restoring the numbers of the Congress, the electorate of Himachal Pradesh has rejected the opportunism of the defectors and the overreach of the BJP.
Something similar happened in Uttarakhand too, as the Congress retained the Badrinath seat. The sitting MLA from the seat, Rajendra Singh Bhandari, who had defected to the ruling BJP, was defeated by Congress’s Lakhapat Singh Butola. It is not that all defectors are being rejected by the people. The Congress continued to suffer losses in Madhya Pradesh where Kamlesh Pratap Shah, who had switched sides to the BJP, won a tough contest against his former party. The continuing decline of the Congress in the State is a clear message to the party that it needs to look beyond the current local leadership. While the Dravida Munnetra Kazhagam’s win in Tamil Nadu’s Vikravandi seat further reinforced its position, in West Bengal, the Trinamool Congress (TMC) continued to reign supreme by wresting three seats from the BJP, in Raiganj, Ranaghat Dakshin and Bagda. In all the three seats, MLAs of the saffron party had switched sides to the TMC, which is the ruling party in the State. The TMC also retained the Maniktala seat. In Punjab, the Aam Aadmi party got its pound of flesh from the BJP as it trounced the sitting MLA in Jalandhar West who had defected to the BJP and sought a re-election. All the parties should heed the voice of the people, seek consensus and reduce conflict, and eschew opportunistic defections.
Date: 15-07-24
There is only some good electoral newsNumerous elected governments appear determined to undermine the core tenets of the democratic projectShashi Tharoor is the fourth-term Lok Sabha Member of Parliament (Congress) for Thiruvananthapuram, a former Under Secretary-General of the United Nations and the Sahitya Akademi award-winning author of 25 books, including ‘Pax Indica: India and the world of the 21st Century’
The contrasting recent election outcomes a month apart in India and the United Kingdom tell a complicated story. As I pointed out mischievously on social media, “ab ki baar 400 paar” happened — but not in the country whose Prime Minister predicted it. It was Britain’s Labour Party that crossed that formidable threshold to record its most impressive win at the expense of the Conservatives, while in India the ruling Bharatiya Janata Party, which had brashly run on that slogan, lost its majority and is now dependent on allies to have a government. In both elections, the voters had a decisive say in cutting the pretensions of ruling parties down to size.
By the end of this year more than 60 countries, with some four billion people, will have held national elections, and pundits are at a loss to discern any common patterns among them. The broad narrative of 2023 was that of “democratic deconsolidation”: governments around the world were seen as becoming more authoritarian, less respectful of individual and media freedoms, more unfriendly to autonomous institutions and less restrained by checks and balances on their power.
What Samuel Huntington had described as the “third wave” of democracy — the heady global expansion of democratic governance that took place around the world from the end of the Second World War to the conclusion of the Cold War — had ebbed over the past decade and a half. Freedom House, the American think-tank that studies the state of democracies, announced that global freedom declined for the 17th consecutive year in 2023. The organisation’s annual report cited everything from coups against elected leaders in Africa to assaults on journalists in a number of countries (including India).
Results that are reassuring
Freedom House was not alone. The Economist’s Democracy Index told a similar story, while Sweden-based International Institute for Democracy and Electoral Assistance (IDEA), claimed that “across every region of the world, democracy has continued to contract”. And yet, voters in India — which Sweden’s Varieties of Democracy (V-Dem) Institute, had downgraded to an “electoral autocracy” — surprised the doomsayers by cutting autocrats down to size, while those in the United Kingdom and France confirmed that the health of the oldest democracies remained robust.
Thanks to its two-phase electoral system, France produced a mixed result in its parliamentary elections, making a xenophobic far-right party its largest in the first phase and then producing a “hung Parliament” in the second phase, failing to give any of the three main party coalitions a majority to form a government. Tactical arrangements by the left and the centrist forces to prevent a right-wing government by withdrawing candidates in the second phase so that the strongest non-rightist might win each seat, ensured a very different outcome in the second phase from the first.
There is much to be said for an electoral system that brings the self-correcting mechanisms of democracy so visibly alive by insisting that voters are entitled to be represented by someone who commands 51% of the electorate in his or her constituency. But the democracy that invented the term “cohabitation”, to reflect the uneasy co-existence of a President and a Prime Minister from opposing political groups, was now left scratching its head as to the nature of the government that would follow.
The spotlight on America
The nation that claims to be the very oldest of modern democracies, the United States, worries observers for other reasons as it heads into a presidential election in four months with an unappealing choice that I had prefigured in this column a year ago. That the world’s richest and most advanced country must choose between a septuagenarian felon (who tried to orchestrate a revolt against the last election results) and an octogenarian whose incoherent debate performance has raised serious questions about his mental decline — a contest cruelly described as “dementia versus the demented” – is depressing enough. But a new poll says that Republican voters are now more sympathetic to the rebels who stormed the U.S. Capitol in January 2021, with over a third of Americans saying Joe Biden’s 2020 election win was not legitimate, despite all the evidence to the contrary.
What does this say about the health of democracy in the U.S.? Could another disputed election result provoke violence in the streets again?
Interestingly, it is the newer democracies of the non-western world whose elections this year have given more cause for democratic reassurance. Bangladesh, Bhutan, Taiwan, Indonesia, Senegal, South Korea, India, South Africa and Mexico (in chronological order) have held elections which many feared would lead to uncertain outcomes and prolonged disputes. Yet, all have concluded peacefully and largely uneventfully, and all except one have witnessed a transition to either a new ruler or a new governing arrangement. The one exception is Bangladesh, where Sheikh Hasina has returned to office after an election boycotted by the principal Opposition party.
Pakistan does not figure in this list because of the undemocratic circumstances in which its election took place, with the principal contender jailed and his party outlawed, candidates representing him winning as Independents, allegations of ballot-rigging made even by election officials, and the military overtly calling the shots behind a hapless civilian government. If more countries’ elections were like Pakistan’s, global fears of a “democratic recession” would indeed be borne out.
A Pew poll
Still, for all the good electoral news, a Pew poll in 24 countries found support for “representative democracy” sliding, with some 59% respondents “dissatisfied with how their democracy is functioning”, three-quarters of those polled feeling that elected officials “don’t care” what they think, and mounting support for alternatives to democratic rule: “In 13 countries,” noted Pew, “a quarter or more of those surveyed think a system in which a strong leader can make decisions without interference from parliament or the courts is a good form of government.”
As columnist Ishaan Tharoor (in the interests of full disclosure, this writer’s son) wrote in The Washington Post earlier this year, “In society after society, illiberal values and politicians who embrace them are gaining ground. Numerous elected governments seem bent on undermining core tenets of the democratic project, from the freedom of the press to the independence of institutions such as the judiciary to the ability of opposition parties to fairly compete against the ruling establishment.”
Democracy’s future is far from assured.
Date: 15-07-24
संसद की गरिमा पर संकटहृदयनारायण दीक्षित, ( लेखक उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष हैं )
संसद राजनीतिक कलह का मंच नहीं है, लेकिन काफी समय से संसदीय मर्यादा का जबरदस्त ह्रास हुआ है। अध्यक्ष का आसन सर्वोपरि होता है। संविधान की दुहाई सब देते हैं, लेकिन पीठासीन अधिकारी के निर्देशों की प्रायः धज्जियां उड़ाई जाती हैं। 18वीं लोकसभा के शपथ ग्रहण के दौरान कुछ सदस्यों ने संवैधानिक शपथ के साथ अपने वाक्य भी जोड़े। यहां न मर्यादा बची है और न ही संयम एवं अनुशासन। संसदीय व्यवस्था में नेता प्रतिपक्ष का पद और दायित्व सम्माननीय है, लेकिन लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने हिंदुओं को हिंसक कहा। उनके वक्तव्य से करोड़ों लोगों की भावनाएं आहत हुई हैं। अध्यक्ष ने आपत्तिजनक अंश कार्यवाही से निकाल दिए हैं, लेकिन नेता प्रतिपक्ष वही बातें दोहरा कर फिर से जोड़े जाने की मांग कर रहे हैं।
भारत के लोग संविधान और संसद के प्रति आदरभाव रखते हैं। भारतीय संसद की अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा रही है। अनेक सदस्य संसद के लिए पवित्र सदन, आदरणीय सदन या आगस्ट हाउस कहते हैं। संसद सदस्यों पर विधि निर्माण और संविधान संशोधन की जिम्मेदारी है। आश्चर्य है कि अनेक सदस्य कार्यवाही में बाधा डालते हैं। नियमावली की भी उपेक्षा करते हैं। इससे आहत पूर्व लोकसभा अध्यक्ष सोमनाथ चटर्जी ने सदन की नियमावली को ही जला देने की बात कही थी। विधायी संस्थाओं में विधि और नियम का उल्लंघन साधारण घटना नहीं है। सदनों में कार्यवाही की गुणवत्ता की चिंता पुरानी है। ब्रिटिश राज में गठित केंद्रीय विधानसभा के समय (1921) अध्यक्ष फ्रेडरिक वाइट की अध्यक्षता में पीठासीन अधिकारियों का पहला सम्मेलन शिमला में हुआ था। तब से लगभग हर साल पीठासीन अधिकारियों के अखिल भारतीय सम्मेलन होते हैं। लोकसभा के प्रकाशन ‘संसदीय पद्धति और प्रक्रिया’ के अनुसार सम्मेलन का उद्देश्य यही है कि शासन की संसदीय प्रणाली का समुचित विकास हो। सदस्यों के संयम और आचरण भी महत्वपूर्ण हैं।
संप्रति, संसदीय कार्यवाही निस्तेज हो रही है। संसदीय गतिरोध एवं अव्यवस्था ने निराश किया है। माननीयों के सम्यक आचरण पर जनता की निगाह रहती है। सांसदों के लिए कोई निश्चित आचार संहिता नहीं है। अनुशासन और शिष्टाचार बनाए रखने का मुद्दा बार-बार चर्चा में आता है। मई 1992 में गुजरात में पीठासीन अधिकारियों का सम्मेलन हुआ था। सुझाव आया था कि अनुशासन और शिष्टाचार बनाए रखने पर विचार के लिए अखिल भारतीय सम्मेलन बुलाया जाए। इसके अनुसरण में 23 और 24 सितंबर, 1992 को संसद भवन के केंद्रीय कक्ष में पीठासीन अधिकारियों, सदनों के दलीय नेताओं, संसदीय कार्य मंत्रियों और सांसदों आदि की भागीदारी में सम्मेलन हुआ। सम्मेलन में गंभीर विचार विमर्श के बाद संसदीय परंपराओं और नियमों के आधार पर आचार संहिता का एक प्रारूप तैयार किया गया और उसे संसद तथा विधानमंडलों में ‘अनुशासन तथा शिष्टाचार’ शीर्षक पत्र में शामिल किया गया। इसे लोकसभा सचिवालय द्वारा प्रकाशित किया गया। सम्मेलन में सदस्यों के दायित्व और कर्तव्य के लिए सर्वसम्मति से एक संकल्प पारित किया गया। सुझाव दिया गया कि सभी राजनीतिक दल अपने जनप्रतिनिधियों के लिए आचार संहिता तैयार करें। अनुपालन सुनिश्चित करें। यह काम राजनीतिक दलों को करना था। दलतंत्र ने उसकी उपेक्षा की। लोकसभा के स्वर्ण जयंती सत्र के अंतर्गत 26 अगस्त 1997 से 1 सितंबर 1997 के दौरान यह विषय फिर विमर्श के लिए सामने आया। सभा ने एकमत से संकल्प पारित किया। संकल्प के अनुसार, ‘सभा की प्रक्रिया तथा कार्य संचालन संबंधी नियमों, व्यवस्थित कार्य संचालन संबंधी पीठासीन अधिकारियों के निर्देशों के गरिमापूर्ण अनुपालन द्वारा संसद की प्रतिष्ठा का परिरक्षण और संवर्धन किया जाए।’संकल्प बहुत अच्छा था, लेकिन परिणाम शून्य रहा। संकल्प में अन्य बातों के अलावा प्रश्न काल की महत्ता और नारेबाजी पर रोक तथा राष्ट्रपति के अभिभाषण में व्यवधान न करना भी शामिल था। 2001 में नियमों में संशोधन हुआ कि अध्यक्ष के आसन के सामने नारेबाजी करने वाले स्वतः निलंबित होंगे। निलंबन भी थोक के भाव हुए, मगर कोई लाभ नहीं हुआ।
इसी क्रम में 13वीं लोकसभा के दौरान अध्यक्ष ने 16 मई, 2000 को लोकसभा में 15 सदस्यीय आचार समिति का गठन किया था। समिति को सदस्यों की नैतिकता और आचरण पर ध्यान रखना, सदस्य के संसदीय व्यवहार से संबंधित अनैतिक आचरण की शिकायत की जांच करना था। इस समिति ने पहला प्रतिवेदन 31 अगस्त, 2001 को प्रस्तुत किया। इसे 22 नवंबर 2001 को सभा पटल पर रखा गया। 16 मई, 2002 को सभा ने स्वीकृत कर दिया। व्यवस्था, अनुशासन और संयम और वाक् संयम जैसे सामान्य विषयों पर लगातार बैठकें चलती रहीं, लेकिन ऐसे सम्मेलनों और बैठकों के भी अपेक्षित परिणाम नहीं आए।
सदनों की कार्यवाही का सीधा प्रसारण काफी लोकप्रिय हुआ है। उम्मीद की जाती थी कि सदन के भीतर अपशब्द बोलने, नियम तोड़ने, अध्यक्ष की बात न मानने जैसे व्यवहार को आम जनता देखेगी और अपने जनप्रतिनिधि के अनुचित आचरण का संज्ञान लेगी। यह संभावना गलत निकली। सदनों में हंगामा करने वाले सदस्यों के क्षेत्र में निर्वाचकगण हुल्लड़ देखकर संभवतः दुखी नहीं होते। संसद हुल्लड़ की जगह नहीं है। लोकतंत्र का पवित्र मंदिर है। जनप्रतिनिधि सदनों में अव्यवस्था का लगातार बढ़ना राष्ट्रीय चिंता का विषय है। बेशक जनप्रतिनिधि जनता से चुने जाते हैं, लेकिन उन्हें राजनीतिक दल ही उम्मीदवार बनाते हैं। निर्वाचित प्रतिनिधियों पर दलों का नियंत्रण रहता है। संसदीय समिति ने ठीक ही सिफारिश की थी कि राजनीतिक दल अपने-अपने प्रतिनिधियों के आचरण और व्यवहार पर ध्यान दें। संसद के सभी दलों के संसदीय पदाधिकारी परस्पर संवाद बनाएं। संसद में मर्यादा बनाए रखने के विषय पर संसद का विशेष सत्र आहूत करने पर विचार करें। भारतीय संसद विश्व की सभी जनप्रतिनिधि संस्थाओं से बड़ी है। पवित्र सदन में संवाद के स्थान पर अव्यवस्था उचित नहीं।
Date: 15-07-24
विकास का सूचकांकसंपादकीय
सरकारी थिंक टैंक नीति आयोग ने अपने ताजा सतत विकास लक्ष्य (एसडीजी) भारत सूचकांक में एक उम्मीद भरी तस्वीर पेश की है। सूचकांक में भारत को 100 में से समग्र रूप से 71 अंक मिले हैं जबकि 2021 में उसे 66 तथा आधार वर्ष 2018 में 57 अंक प्राप्त हुए थे। यह रिपोर्ट 113 अलग-अलग संकेतक पर आधारित होती है जो संयुक्त राष्ट्र के राष्ट्रीय संकेतक फ्रेमवर्क के तहत निर्धारित हैं और ये दिखाते हैं कि सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के एसडीजी में सुधार हुआ है तथा उनके अंक 57 से 79 के बीच हैं। इन्हें 2018 में 42 से 69 के बीच अंक मिले थे। व्यापक राष्ट्रीय रैंकिंग की बात करें तो 32 राज्य/केंद्रशासित प्रदेशों ने 65 से 95 तक अंक हासिल किए और इनमें 10 राज्य पहली बार शामिल हुए। अगर किसी राज्य को 49 से कम अंक नहीं मिले हैं तो अधिकतम अंक यानी 100 भी किसी राज्य को नहीं मिले। 16 में से 12 लक्ष्यों पर उल्लेखनीय वृद्धि देखने को मिली है। सबसे चिंताजनक मुद्दा महिला-पुरुष समानता का है जहां 2019-20 से अब तक हालात में शायद ही कोई सुधार हुआ है। भारत एसडीजी में अभी भी मजबूती राज्यों की श्रेणी में है।
रिपोर्ट में बेहतर समग्र अंकों को सरकार की कल्याण योजनाओं तथा पहलों से जोड़ा गया है। अगर ऐसा है तो आंकड़ों को अलग-अलग करके देखने पर पता चलता है कि यह सहायता सभी को बांटी गई है। भूख के मामलों को समाप्त करना इसका उदाहरण है। हालांकि कुल अंक 48 से सुधरकर 52 हुए हैं लेकिन ‘आकांक्षी’ राज्य पश्चिम में गुजरात से लेकर बिहार और उत्तर पूर्व के कुछ इलाकों तक बंटे हुए हैं। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की बात करें तो मध्य, पूर्व और उत्तर-पूर्व भारत के कुछ हिस्से अभी ‘आकांक्षी’ स्तर पर हैं। इन सभी बातों से संकेत मिलता है कि भोजन अथवा स्कूलों तथा शैक्षणिक संस्थाओं तक पहुंच का अर्थ आवश्यक रूप से संतोषजनक नतीजों वाला नहीं है। इन दोनों मानकों का देश की भविष्य की आबादी की गुणवत्ता पर सीधा असर होना है। उद्योगों में नवाचार और अधोसंरचना क्षेत्र पर भी यही बात लागू होती है।
कुछ आंकड़े ऐसे हैं जो वास्तविक हकीकत से मेल खाते नहीं नजर आते हैं। टिकाऊ शहरों और समुदायों के मामले में भारत को 2018 के 29 की तुलना में इस बार 83 अंक मिले हैं। देश के शहरों में अधिकांश लोग जिन खराब परिस्थितियों में रह रहे हैं उन्हें देखते हुए इसे हजम करना मुश्किल है। यह मानक इस बात पर निर्भर करता है कि जैविक-मेडिकल कचरे तथा अन्य जैविक कचरों का निपटान किस प्रकार किया जाता है। यह शहरों की बेहतरी का केवल एक पहलू होना चाहिए। इसी प्रकार किफायती और स्वच्छ ऊर्जा के मामले में भारी उछाल दर्ज की गई। देश के अधिकांश राज्यों को 100 फीसदी अंक दिए गए हैं जबकि भारत दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों की सूची में भी आगे है। साथ ही हमारे बिजली उत्पादन में कोयले की काफी अहम भूमिका है।
नीति आयोग की एसडीजी रिपोर्ट निस्संदेह सहकारी संघवाद की दिशा में एक अनमोल कवायद है और बहुआयामी गरीबी में कमी आने के प्रमाण सुखद हैं। परंतु यह कवायद अनिवार्य तौर पर अंदर की ओर झांकने वाली है और देश के भीतर की सामाजिक और विकास संबंधी प्रगति की तुलनात्मक तस्वीर पेश करती है। वैश्विक स्तर से, यहां तक कि एशियाई देशों से भी तुलना करें तो भारत लगभग सभी मानकों पर पीछे नजर आता है। संयुक्त राष्ट्र की टिकाऊ विकास संबंधी ताजा रिपोर्ट में भारत को 193 देशों में 109वां स्थान दिया गया है। रिपोर्ट में कहा गया है कि केवल 30 फीसदी एसडीजी लक्ष्य ही हासिल हुए हैं या पटरी पर हैं, 40 फीसदी में सीमित प्रगति हुई है जबकि शेष 30 फीसदी के मामले में हालात बेहद खराब हैं। इन हालात को बदलने के लिए उन मानकों में बदलाव लाना होगा जिनके आधार पर राज्यों का आकलन किया जाता है। उन्हें हकीकत के और करीब लाना होगा।
Date: 15-07-24
भारत के युवाओं का डिगता भरोसासुरेश सेठ
हमें गर्व है कि हम एक युवा देश हैं, क्योंकि हमारी आधी से अधिक आबादी छत्तीस वर्ष तक की उम्र के युवाओं की है। उसमें से भी तीन-चौथाई आबादी ऐसे नौजवानों की है, जो सोलह से छब्बीस वर्ष की उम्र के हैं और अपने लिए इस नए भारत में जिंदगी की सार्थकता तलाश रहे हैं। इस नाराप्रेमी और उत्सवधर्मी देश में नौजवान अपने लिए अपनी जमीन और थोड़े से आत्मगौरव की तलाश करते हैं। उन्हें अनुकंपाओं की बरसात से भीगी धरती की जगह धूप से तपती मेहनत मांगती वह धरती चाहिए, जो उनकी योग्यता के अनुसार रोजी-रोजगार दे सके और वे अपनी मेहनत से सफलता की सीढ़ियां चढ़ते हुए, बिना किसी बैसाखी के जी सकें। मगर ऐसा नहीं है।
नवनिर्माण और नवजागरण के लिए सबसे पहले तो शिक्षा और सम्माजनक पेशे चाहिए। इनके लिए प्रवेश परीक्षाएं आयोजित होती हैं, जो उनकी योग्यता का उचित मूल्यांकन करके उन्हें सम्मानजनक रोजगार दे सकें। मगर रोजगार की गारंटी इस देश में नहीं है। जो नौजवान जय जवान, जय किसान और जय अनुसंधान के देश को दिए मूलमंत्र का अनुसरण करते हुए अपनी जमीन की तलाश करना चाहते हैं, उन्हें उचित प्रशिक्षण के लिए दाखिला परीक्षाओं से गुजरना पड़ता है। पिछले दशकों में ऐसे शिक्षण संस्थान निजी क्षेत्र में कुकुरमुत्तों की तरह उग आए हैं। शिक्षा दुकान न बने, उसके दाखिले चोर-दरवाजे न बनें, इसके लिए देश में एक राष्ट्रीय परीक्षा एजंसी यानी एनटीए की स्थापना की गई। फैसला किया गया कि नौजवान अलग-अलग राज्यों में अलग-अलग प्रतिष्ठानों की परीक्षाएं देने को न भटकते फिरें। उन्हें एक देश, एक परीक्षा का मूलमंत्र एनटीए द्वारा दे दिया गया। अब चिकित्सक बनना है या उसमें विशिष्टता हासिल करनी है, इंजीनियर या प्राध्यापक बनना है या शोध छात्र, इन सबके लिए परीक्षाएं एनटीए के झंडे तले आयोजित होती हैं। वर्ष में ऐसी लगभग पंद्रह परीक्षाएं एनटीए आयोजित करता है और उनमें अलग-अलग पाठ्यक्रमों के लिए करीब दो करोड़ विद्यार्थी परीक्षाओं में बैठते हैं।
मगर इस प्रक्रिया में हर वर्ष पर्चाफोड़ होते हैं। इस वर्ष भी यही हुआ। इस पुरानी बीमारी का इलाज क्यों नहीं हो पाता? क्या इसलिए कि इसकी परीक्षा एजंसी को कोई नियमित सुदृढ़ ढांचा देने के बजाय ‘जैसा है, उसे निभाओ’ का नियम दे दिया गया। एजंसी में पंद्रह शीर्ष लोग तो अलग-अलग प्रतिनियुक्ति से आ गए, पर परीक्षाएं अंतत: निजी एजंसियों को ठेके पर दी जाने लगीं। जाहिर है, ऐसे माहौल में पर्चाफोड़ से लेकर अन्य भ्रष्ट तरीकों की कितनी संभावनाएं रहेंगी। इसकी चरम सीमा शायद इस बार हो गई, जब 571 शहरों के 4750 परीक्षा केंद्रों में 23 लाख से अधिक अभ्यर्थियों ने एमबीबीएस दाखिले के लिए ‘नीट’ परीक्षा दी। नतीजा निकला तो 67 छात्र प्रथम श्रेणी थे, उन्हें 720 में से 720 अंक मिले। स्पष्ट हुआ कि नंबरों का बंटवारा तर्कहीन तरीक से हुआ है। शोर-शराबा हो गया। जांच में पता चला कि सीमित ढंग से अनुचित साधनों का इस्तेमाल किया गया। पकड़-धकड़ होने लगी। बिहार से बहुत-सी खबरें आईं, लेकिन परीक्षा में बड़ी गड़बड़ी के संकेत नहीं मिले।
इस बार की गड़बड़ी से परीक्षार्थियों का विश्वास परीक्षा लेने वाली एजंसियों पर से डिग गया है। योग्यता का मूल्यांकन अगर इसी तरीके से होना है कि परीक्षा के ढांचे में चोर गलियां निकल आएंगी और अयोग्य छात्र उन्हें धक्का देकर निकल जाएंगे, तो इससे बड़ा अन्याय उन मेहनती छात्रों के लिए क्या हो सकता था, जो वर्षों से घर छोड़कर कोटा जैसी जगहों में परीक्षाओं की तैयारी करने में दिन-रात एक कर रहे थे। परीक्षाएं तो सही मूल्यांकन के विश्वास के आधार पर चलती हैं। तभी सुप्रीम कोर्ट ने भी 18 जून को नीट मामले की सुनवाई करते हुए कहा था कि 0.001 फीसद भी गड़बड़ी हुई है तो उसकी जांच करो। सीबीआइ की जांच में यहां-वहां दोषी भी पकड़े जाने लगे। संसद में इस पर बहस की मांग उठी।
नौजवान ही किसी देश का भविष्य होते हैं और जब वही अंधेरे में भटकने लगें, तो देश का भविष्य भला कैसा होगा? सर्वोच्च न्यायालय में दायर याचिकाओं पर विचार हुआ कि क्या ‘नीट’ की दुबारा परीक्षा ली जाए? परीक्षा में भ्रष्ट तरीकों और पर्चाफोड़ की पुष्टि हो गई। मगर जवाबी याचिका भी आ गई कि उन लाखों विद्यार्थियों का क्या दोष, जिन्होंने पूरी मेहनत से इम्तिहान दिए और अब उन्हें फिर उसी अग्नि परीक्षा से गुजरने के लिए कहा जा रहा है। जबकि हर पढ़ने वाला जानता है कि उसी उत्साह के साथ बार-बार परीक्षाओं की तैयारी नहीं हो सकती। खैर, मामला सर्वोच्च न्यायालय के ध्यान में है। केंद्र सरकार और एनटीए के हलफनामे भी सुप्रीम कोर्ट में आए हैं कि ‘नीट’ परीक्षा दुबारा करने की जरूरत नहीं। लाखों मेहनती छात्रों को दुबारा बेवजह परीक्षा की भट्ठी में न झोंका जाए। दोषी तो पकड़े जाएं, लेकिन ‘नीट’ के यही परीक्षा परिणाम सफल छात्रों के साथ रहेंगे, देशभर की चिकित्सा संस्थाओं में दाखिले के लिए।
इन इम्तिहानों के आधार पर अलग-अलग मेडिकल कालेजों में काउंसिलिंग शुरू होने लगी थी, जो अब जुलाई के अंत तक टल गई और सुप्रीम कोर्ट से अंतिम फैसले का इंतजार हो रहा है। फैसला जो भी हो, सवाल इस समस्या के फौरी हल का नहीं है। वह तो हो ही जाएगा। सवाल यह है कि मेहनती युवा पीढ़ी को उनकी मेहनत का उचित मूल्यांकन कैसे होना है, इसका स्थायी हल कैसे निकाला जाए? कुछ बातें बहुत स्पष्ट हैं। योग्य व्यक्तियों का स्थायी ढांचा बनना चाहिए, जो ये परीक्षाएं करवाएं और देशभर में इतने महत्त्वपूर्ण कार्य के लिए स्थायी परीक्षा मशीनरी बने, जिसकी कार्यशीलता और इमानदारी पर कोई भी व्यक्ति अंगुली न उठा सके। जब तक यह नहीं होगा, तब तक नौजवानों का विश्वास, जो अपने भविष्य के प्रति पहले ही शंकालु है, अपनी परीक्षाओं के प्रति भी अनिश्चय के भंवर में फंसा रहेगा।
हम शिक्षा की खामियों को दूर करने की बात कहते हैं। नए-नए शिक्षा माडल दे रहे हैं, लेकिन इसके एक जरूरी हिस्से यानी छात्र ने जो पढ़ा, उसका सही मूल्यांकन करके उसे रोजी-रोजगार देने के बारे में अभी तक सही फैसले नहीं हो सके। ये फैसले तत्काल होने चाहिए। देश के नव-निर्माण की बात करने वाले पहले देश की युवा पीढ़ी के लिए शिक्षा के नए ढांचे के निर्माण को तुरंत बनाना शुरू करें। तदर्थ उपायों से काम नहीं चलेगा। शिक्षा आपके अंतस को जगाती है। छात्र की योग्यता का तटस्थ मूल्यांकन करने के लिए शिक्षा विशारदों को तैयार रहना चाहिए। यह ठेका परीक्षा प्रणाली नहीं चलेगी। देश के शिक्षा प्रवीण सिर जोड़कर बैठें और ऐसा वैकल्पिक ढांचा बनाएं, जिसमें देश के युवा छात्र अपने विश्वास और सहज माहौल के साथ यहां अपनी योग्यता को प्रस्तुत कर सकें। इस योग्यता का सही मूल्यांकन होगा, इसका विश्वास उन्हें रहे। तभी देश के लिए कुछ कर गुजरने की तमन्ना उनमें जागेगी।
Date: 15-07-24
तुरंत हटाएं अवरोधकसंपादकीय
सर्वोच्च अदालत ने हरियाणा सरकार से अंबाला के पास शंभु बॉर्डर पर लगाए अवरोधक हटाने का निर्देश दिया है अदालत ने राजमार्ग को अवरुद्ध करने के अधिकार पर भी प्रश्न उठाए। कोई राज्य हाईवे को कैसे बंद कर सकता है। यातायात नियंत्रित करने को उसका दायित्व बताते हुए अदालत ने कहा कि किसान भी देश के नागरिक हैं। उन्हें खाना दीजिए, चिकित्सकीय देखभाल कीजिए। पीठ ने कहा वे आएंगे, नारे लगाएंगे, वापस चले जाएंगे। संयुक्त किसान मोर्चा, किसान मजदूर मोर्चा द्वारा फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य की कानूनी गारंटी सहित विभिन्न मांगों को लेकर दिल्ली चलो की घोषणा के बाद हरियाणा सरकार ने फरवरी में अंबाला-नई दिल्ली राष्ट्रीय राजमार्ग में बैरीकेड्स लगा दिए थे। शीर्ष अदालत हरियाणा सरकार की याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसमें पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट के फैसले को चुनौती दी गई थी। जैसा कि फरवरी में प्रदर्शनकारी किसानों और हरियाणा के सुरक्षाकर्मियों के दरम्यान हुई झड़प में हुई किसान की मौत की जांच के लिए उच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश की अध्यक्षता में पैनल गठित करने का निर्देश दिया था। राज्य सरकार का कहना है कि 400-500 किसान पंजाब की तरफ बैठे हैं। सबसे बड़ी अदालत की नाराजगी उस यातायात अव्यवस्था के कारण है, जिससे जनता को हर रोज जूझना पड़ता है। इस पर हैरत नहीं होती कि सरकारें किस बेरुखी से व्यस्त सड़कों पर अवरोधक लगाने के आदेश जारी कर देती हैं। पांच महीनों से ऐसी सड़क को बाधित रखना, जिसका प्रयोग ढेरों लोग नियमित तौर पर करते हैं। यहां तो किसानों के उग्र आंदोलन की दलील दी जा सकती है जबकि देखने में आता है कि राजनेताओं की सुविधा और उनके कार्यक्रमों के मद्देनजर देश भर में अवरोधकों के धड़ल्ले से उपयोग होते रहते हैं। अदालतों की कड़ी टिप्पणियों के बावजूद कोई कार्रवाई नहीं होती। सरकारी आदेशों या नियमों के विरोध का हक नागरिकों से छीना नहीं जा सकता। उन्हें काबू में रखने के तरीके मानवीय और व्यावहारिक भी हो सकते हैं। बात नाराज किसानों की ही नहीं है, बल्कि सड़क को लंबे समय तक बंद रखने और वैकल्पिक व्यवस्था देने में कोताही की भी है। उम्मीद की जानी चाहिए अदालत के इस आदेश से सरकारें सीख लेंगी और भविष्य में अवरोधकों का बेजा प्रयोग थम जाएगा।
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हाल ही में भारत में रह रहे तिब्बत के धर्मकुरू दलाई लामा से मिलने अमेरिकी प्रतिनिधिमंडल पहुंचा था। चीन ने इसका कड़ा विरोध किया था। अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडन जल्द ही ‘रिजॉल्व तिब्बत एक्ट’ पर हस्ताक्षर करने जा रहे हैं। यह चीन को तिब्बती नेता दलाई लामा व अन्य के साथ बातचीत करने के लिए आह्वान करता है।
भारत के लिए तिब्बत पर अपना पक्ष रखने का समय –
1) फिलहाल भारत तिब्बत की निर्वासित सरकार के मेजबान देश की स्थिति में है।
2) भारत से अपेक्षा की जाती है कि वह दलाई लामा के बाद भी तिब्बती सरकार और देश में 70,000 से अधिक तिब्बती शरणार्थियों को अपना समर्थन जारी रखेगा।
3) तिब्बती शरणार्थी आधुनिक इतिहास में पुनर्वास के सबसे सफल उदाहरणों में से एक हैं। यह भारत ही है, जो तिब्बतियों की सांस्कृतिक धरोहर को संजोए हुए है।
4) भारत-चीन संबंध बहुत खराब स्थिति में हैं। दोनों सेनाएं उच्च हिमालय में आमने-सामने हैं। भारत ने वर्षों से ‘एक चीन‘ नीति का उल्लेख करना बंद कर दिया है। और चूंकि चीन भारत को अपने बराबर नहीं मानता और सीमा-विवाद को एक सुविधाजनक राजनीतिक उपकरण के रूप में देखता है, इसलिए भारत को तिब्बती मुद्दे का समर्थन करने में कोई हिचकिचाहट नहीं होनी चाहिए।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 21 जून, 2024
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Date: 13-07-24
Walking Behind The GodmanRationalists don’t get why followers, rich or poor, continue to revere a guru even after scandals such as the Hathras stampede. But to ask why religious believers aren’t scientific is a most unscientific question.Dipankar Gupta, [ The writer is a sociologist. ]
Over a hundred devotees died last week in a stampede at Bhole Baba’s religious gathering. The arrangement was for 80,000 attendees but eventually about 2.5L devotees turned up. It is not as if Bhole Baba is a household name. There are hundreds like him but they all have enough worshippers to water the gardens, fire the “havans” and keep the chants humming.
Such godmen/godwomen are not unique to our country, except they seem to sprout spontaneously in this tropical air. However, poverty is not the reason, for they are not to be found in villages. Magnum cults of the Bhole Baba kind have always been urban, both in terms of the worshipped and the worshipper. Villages don’t have such godmen but, at best, lonely, dirt-poor ascetics.
We should now pause and reflect on the fact that, unlike other world religions, Hinduism doesn’t need a communion. One can pray alone, even have a special family deity and not participate in collective worship. In a village, where social ties are firm, such a trait easily blends in, but city life breeds anonymity. It is this that creates the need for a collective buffer, also known as community.
In a village where social bonds are firm, lack of communion is not strong. In a city where one is alienated, the need for a collective gathering is felt. This is why all night “jagrans” and the thronging of godmen’s ashrams come up to fill the vacuum. A guru’s blessings and uplifting sermons provide a healing touch to urban souls who are dangerously cantilevered on shifting ground.
Such godmen are worshipped not because there is poverty for, if that were so, then the guru cult should have suffered with the steady percentage drop of the poor. On the other hand, such “divinities” are flourishing and their numbers may even be growing. This is because a different kind of poverty stalks our society and its presence had hitherto gone unnoticed.
Such gurus do well because there are millions who are precariously balanced on a tear drop and moments away from a heartbreak. A recent study, by Prof Sonalde Desai shows that while poverty has declined, more than half the current poor are actually “newly poor”. These people have slipped down because of a catastrophic event such as illness or job loss.
It is this uncertainty, which exhibits itself primarily in urban India, that drives people to seek solace. After all, it is in towns and cities that fortunes swing to extremes. It is also in non-rural settings that you find most of the migrants in our country who are about 37% of the total population. That amounts to 45cr people in all. Hard to believe? Well, check the 2011 census.
Nor are the rich completely free of worries given the vagaries of enterprise and the fickleness of policies. When a lot depends on luck and less on self-confident skill, it is natural that beliefs in godmen will grow. There will be a persistent need to build stonewalls around sandcastles and have their ramparts guarded by “designer” gurus who have an exclusive pact with God.
Such a phenomenon, with slight variations, is also found in US. According to a 2019 Pew Research poll, America’s church attendance fell sharply by 6% in 10 years. Yet, enrolments in evangelical colleges and “born again” churches are holding steady. In US, this gave rise to the phrase “church shopping”, which is much like the “guru shopping” here.
Charismatics, like Billy Graham and Jerry Falwell, led the American Evangelist drive and they were quite like Bhole Baba or Osho. Evangelicalism and church shopping grew in Reagan-era US because old family churches were clueless about issues neoliberalism raised. Church shopping is now holding steady. Once our social conditions settle, our gurus may be right-sized too.
Finally, there is a problem of perception that particularly afflicts diehard rationalists. They cannot see a speck of scientific reasoning behind the adoration that godmen, like Bhole Baba, receive from their followers. To rationalists, these godmen are charlatans who swindle people blind. How then could good, decent folk block their reasoning faculties and not see through such obvious fakes?
Many gurus have lavish ashrams worldwide and some have also been convicted of rape and murder. Their followers are usually sceptical of these charges and that adds to the rationalists’ bewilderment. How is it, they ask, that in spite of all the evidence these gurus still retain their flock? Rationalists commit a major error here in their reasoning because science is not everything.
Both Kant and Vivekananda argued, over the ages, that science and religion should not mix and must be kept separate. Vivekananda put it clearly when he said that “their methods are different”. This is because, to quote Vivekananda: “Religion deals with the truths of the metaphysical world just as chemistry and the other natural sciences deal with the truths of the material world.”
Vivekananda, like Tagore, another great spiritualist, was a fervent supporter of Jagdish Bose’s scientific efforts. Rationalists go wrong because the lens they see the world with is not bifocal. They just know and see a single method.
To ask then why religious believers are not scientific is the most unscientific question of all.
Date: 13-07-24
Will Less (People) Bring More (Peace)?Richer people, more productive machines.ET Editorials
The world, according to a UN Department of Economic and Social Affairs report published on Thursday, is projected to reach its peak population at 10.3 bn towards the end of this century. Before then, Europe, Asia and the Americas would have experienced the phenomenon to varying degrees. Some countries are already dealing with declining populations. How does having fewer people who live longer affect an economy? For one, it makes people richer. With rising automation, improvements in productivity ensure economic output will keep climbing well after the workforce begins to shrink. Humans are unproductive for around half their lifespans. As productive activity is taken up by more efficient machines, the economic surplus accruing to the species will mount. Though how mankind divides the surplus among itself is a different issue.
Society will have to make fewer provisions to educate and keep a smaller population healthy. Poverty, hunger and disease will not be as grave as they have been for most of history. Cities would thin out. Inflation and unemployment could be relegated to the history books. Demands on the planet to feed, clothe and provide shelter will diminish. Re source exploitation will be driven by the needs of a growing machine population. But those resources will be prospected further afield in the solar system. The species that has contributed most to destruction of conditions that allow Earth to support life will eventually get around to restoring the natural balance. The pace of extinction of other species will slow after the human population reaches its peak around 2080.
What of the people who live in this Arcadian utopia? Would they be happier? Not if history is any guide. It would take a few centuries to turn the population clock back to the mediaeval age when human conflict began to acquire mass dimension. Even if affluence were to reduce the sources of conflict, there would be the matter of individual happiness. Lengthening lifespans and changing workleisure trade-offs could make life less satisfying. Or not.
Date: 13-07-24
Plumbing the Depths To Scale the HeightsET Editorials
With pressure on finite resources increasing, oceans have become the new frontier for exploration. In 2021, India launched the Deep Ocean Mission, or Samudrayaan, to undertake deepsea exploration to understand and use living (biodiversity) and non-living (minerals) resources. New Delhi also plans to develop ocean climate-change advisory services — important, because marine heatwaves are a reality — conservation methods for sustainable utilisation of marine bio-resources, offshore-based desalination techniques and RE generation. Setting up an underwater biodiversity research lab in the Indian Ocean to study seabed flora and fauna, and explore their potential for food consumption, is also being considered.
But biodiversity exploration is only one part of the story. India is also trying to reach huge deposits of mineral resources — cobalt, nickel, copper and manganese — that lie thousands of feet below the ocean surface. These can be used to produce RE, EVs and batteries, all essential for tackling climate change. India has two deep sea exploration licences in the Indian Ocean and has applied for two more from the International Seabed Authority (ISA). GoI has initiated an ₹8,000 cr plan to explore the ocean’s depths.
These steps are not solely driven by the need for resources but also by geopolitical competition. China has four licences and is aggressively conducting similar explorations. ISA has issued 31 exploration licences, 30 of which are now active. With India’s exclusive economic zone spreading over 2.2 mn sq km, it makes ample sense to explore. However, it must be done cautiously as the ocean ecosystem is fragile, and little is known about it. It also has implications for communities dependent on the sea for livelihood.
Date: 13-07-24
A wobbly walkIndia did well to assert its ties with Russia, but the optics were bad.Editorial
Prime Minister Narendra Modi’s Moscow visit was billed as his first “stand-alone” visit during this tenure, with officials laying stress on the purely “bilateral” framework. However, while the visit had strong bilateral components, its impact has been felt globally, with unprecedented criticism from Kyiv and Washington on its timing and optics. On the bilateral front, the visit, his first to Russia since 2019, and the first “annual” summit in three years, resulted in a number of outcomes. There was a reaffirmation of India-Russia ties as well as Mr. Modi’s obvious personal rapport with Russian President Vladimir Putin. Mr. Modi also received Russia’s highest civilian award. He praised Mr. Putin’s efforts to strengthen bilateral ties, that had appeared to be flagging, given the war in Ukraine, and growing Russia-China ties. In formal talks, the leaders focused on bettering the economic and trade relationship, which has often been a neglected part of the largely government-to-government engagements, and announced a bilateral trade target of $100 billion by 2030, which should be easily met given India’s massive increase in oil imports from Russia specially discounted due to western sanctions. Mr. Modi also won an assurance from Mr. Putin that Indian recruits enlisted in the Russian Army will be allowed to return to India. Unlike in the past, the visit lacked any announcements of military purchases that have been the mainstay of ties, due partially to Russian delays in supplies of deals already announced after the invasion of Ukraine and to also avoid international censure. Mr. Modi’s statement that there was “no solution on the battlefield” to the conflict, as well as his decision to travel further to Vienna, were seen as attempts to balance the trip, his first since the conflict began.
In an increasingly polarised world, this was easier said than done, especially as Mr. Modi’s visit happened even as Ukraine was hit by a devastating missile attack. There were also NATO, western alliance leaders and Ukraine President Volodymyr Zelenskyy converging in Washington for a summit that was aimed, albeit unsuccessfully, at showing Russia’s isolation. It is another matter that the stance reeks of hypocrisy, as the NATO countries have failed to show similar concerns over the killing of innocents in Gaza due to Israel’s relentless bombardment. The U.S. State Department and Ukraine have been openly critical of Mr. Modi’s visit, and New Delhi’s task will be to limit the damage in ties with the U.S. and Europe. In the long term, India will have to assert its interests and convince the West that it is futile to force India to choose, or to push a country known for its independent stance, to become a camp follower in this conflict.
Date: 13-07-24
The PDS impact on household expenditureThe Household Consumption Expenditure Survey Data offers the scope to analyse the impact of social transfers.Gopal Saha, Deputy Director, Survey Design and Research Division, National Sample Survey Office, Kolkata & Amitava Saha, Deputy Director General, Survey Design and Research Division, National Sample Survey Office, Kolkata.
The Public Distribution System (PDS) is an important social security programme in India. Its objective is to ensure food security. Today, up to 75% of the rural population and 50% of the urban population are eligible for subsidised food grains under the National Food Security Act (NFSA), 2013. If the cost of consuming food grains from the PDS is subsidised, this then frees up resources for a household to spend on other items such as vegetables, milk, pulses, egg, fish, meat and other nutrient and protein-rich food items. It is an empirical question whether households indeed diversify their food consumption. With the release of data from the Household Consumption Expenditure Survey (HCES):2022-23, there will be renewed interest in the above line of inquiry, i.e., the impact of consumption of free food items from the PDS on expenditure on items other than food grains.
On representativeness
To the extent possible, the HCES:2022-23 canvassed information on food and non-food items received by households free of cost through various social welfare programmes. In the HCES:2022-23 report published by the National Sample Survey Office (NSSO) and available on the Ministry of Statistics and Programme Implementation website, there is detailed information on pages 15 to 18. The objective of the survey is not to provide precise estimates of the proportion of households receiving benefits under every scheme. In most cases, survey estimates of coverage of a programme will be lower than that suggested by the administrative data. A common conjecture in the literature on the PDS is inclusion error (when an ineligible household consumes from the PDS) and exclusion error (when an eligible household is not consuming food grains from the PDS). For this purpose, researchers will compare the proportion of households consuming PDS items with the coverage under the NFSA. While care should be exercised in terms of interpreting the estimates, one advantage of the survey data is that it allows us to examine the characteristics of households that report benefits from the programmes.
Unless detailed information is sought on the nature of an ailment or disease in the case of health shocks, and waiver of fees or reimbursement in school or college, imputing the value of free medical services and education services received by the households is not possible. In the case of education and health, the NSSO conducts separate surveys where detailed information is canvassed on out-of-pocket expenditure and free services that are availed by a household. One might ask why one cannot use data on information paid by households to impute the value of medical services. Insurance products are treated as an investment and not consumption. The relevant information is sought as part of the All India Debt & Investment Survey, and not as part of the HCES.
In order to provide guidance to analysts and researchers, the NSSO, for the first time, decided to impute the value figures of selected food and non-food items which were received free. This allows us to compute two metrics. The first is the Monthly Per Capita Consumption Expenditure (MPCE) of a household, which is the ratio of monthly consumption expenditure to household size. The second metric is the value of household consumption in a month considering the imputed value of free food and non-food items, i.e., ‘MPCE with imputation’. Both metrics are published by the NSSO in its report.
Imputation of values
The NSSO has suggested two sets of values for each State and by sector (rural, urban) for imputation of food and non-food items received free of cost — modal unit price and the 25th percentile unit price. Consumption expenditure refers to out-of-pocket expenditure while value of consumption would include free and subsidised items consumed by households. In the report published by the NSSO, imputation has been done using the modal price only for items received free. The operative word is free and not subsidised. Thus, no imputation is done for the purchase of food items from the PDS at nominal regulated prices.
The main item that a large proportion of households received free was food grains from the PDS. Not surprisingly, at the all-India level, we find that in rural and urban India, about 94% and 95%, respectively, of the value of imputed items is attributable to food items. When we consider all the households, i.e., even those who did not receive any free items, the imputed value for food is ₹82 and ₹59 in rural and urban areas, respectively.
The report published by the NSSO has the average value of MPCE among those in the bottom 5% of distribution by the MPCE, 5-10, 10-20, 30-40, 40-50, 50-60, 70-80, 80-90, 90-95 and top 5% of distribution. Each interval is called a fractile class. The average MPCE of those in the bottom 5% of MPCE distribution is ₹1,373 in rural and ₹2,001 in urban. This means that the MPCE of 5% of Indians is less than this cut off. When we focus on the imputed value of consumption of those in the bottom end of the rural distribution, we find that 20% of those in this fractile class, or about 1% of India’s rural population is actually in the next fractile class, i.e., 5%-10%. In absolute terms this is about 86 lakh individuals in rural India. Similar patterns are observed till the sixth fractile class. In urban areas too, we see upward movement. There are different patterns observed across the major States. Needless to say, depending on their use case, researchers can impute the modal value for calculations for purchases from the PDS at the subsidised rate. This will increase the average MPCE with imputation. In short, there is evidence that even a limited imputation exercise establishes that in-kind social transfers help increase the value of consumption of poorer households.
Implications for poverty
Ever since the release of the report, there have been calls for a larger discussion on where the poverty line should be drawn. Among the issues that need to be considered is whether one needs to estimate the number of poor households based on the expenditure or based on the total value of consumption which includes the value of free items consumed. Needless to say, in-kind social transfers have implications for the well-being of households that are at the bottom end of consumption or income distribution.
Date: 13-07-24
सरकार को गिग वर्कर्स की सुध लेनी होगीसंपादकीय
मोटरसाइकिल पर सामान लादे आपके घरों में अल-सुबह डिलीवरी देने से लेकर एप-आधारित तमाम सेवाओं (यातायात, खाना पहुंचाना, आदि) में ‘गिग वर्कर्स’ के रूप में लाखों युवा आज भी एम्प्लॉई वर्ग में नहीं आते। यानी उन्हें कर्मचारी के रूप में कोई सुविधा नहीं मिलती। कहने को तो इन्हें ‘पार्टनर’ नाम से नवाजा गया है ताकि ये उपक्रम में साझेदारी का भाव रखें, पर सच यह है कि किसी भी क्षण एग्रीगेटर इन्हें काम से बाहर कर सकता है। कर्नाटक सरकार ने पहली बार इनके कल्याण के लिए बिल तैयार किया है। राजस्थान की पिछली सरकार ने भी इसकी कोशिश की थी, लेकिन वर्तमान सरकार ने खारिज कर दिया। नीति आयोग के अनुसार आज देश में करीब 77 लाख गिग वर्कर्स हैं। इनकी संख्या कुछ वर्षों में कई करोड़ होने जा रही है। आयोग मानता है कि गैर-कृषि मजदूरों में इनका प्रतिशत करीब 6.7 होगा और आय में 4.1 प्रतिशत | इतनी बड़ी संख्या में होने के बावजूद इन्हें एम्प्लॉई न मानना इनके भविष्य को अंधकार में डालना नहीं होगा ? अगर निर्माण मजदूरों के लिए सरकार योजना ला सकती है तो क्या इनका कल्याण, स्वास्थ्य, एक्सीडेंट बीमा, सेवा सुरक्षा सरकार की जिम्मेदारी नहीं है ? बेहतर होगा अगर इन्हें पहचान पत्र जारी कर ईएसआईसी (हेल्थ) की सुविधा दी जाए और लेबर कानूनों के तहत सेवा सुरक्षा भी मिले।
Date: 13-07-24
रूस यात्रा से भारत को फायदा हुआ या नुकसान?मनोज जोशी, ( ‘अंडरस्टैंडिंग द इंडिया-चाइना बॉर्डर’ के लेखक )
यूक्रेन युद्ध में भारत की रूस के प्रति झुकाव वाली तटस्थता अब उसके लिए मुश्किलें पैदा कर सकती हैं। युद्ध जारी है और आगे इसके और तीव्र होने की संभावना है, ऐसे में नई दिल्ली का यह स्टैंड कि रूस के प्रति उसका रुख उसकी रणनीतिक स्वायत्तता पर आधारित है, दिन-ब-दिन कमजोर होता जाएगा।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की रूस यात्रा के दो दिन बाद ही गुरुवार को अमेरिकी राजदूत एरिक गार्सेटी ने नई दिल्ली में सार्वजनिक मंच पर कहा कि भारत-अमेरिका रक्षा संबंध महत्वपूर्ण हैं, लेकिन इस रिश्ते को हल्के में नहीं लिया जा सकता।
उन्होंने कहा कि इसमें किसी विवाह-गठबंधन की तरह दोनों पक्षों को योगदान देना होगा और अमेरिका भारत की रणनीतिक स्वायत्तता का सम्मान करता है लेकिन युद्ध के समय, रणनीतिक स्वायत्तता जैसी कोई चीज नहीं होती है। इसमें कोई संदेह नहीं कि गार्सेटी मोदी की रूस यात्रा की ओर संकेत कर रहे थे।
दुर्भाग्य से, मोदी की रूस यात्रा दो महत्वपूर्ण घटनाओं के साथ हुई, जिसने भारत की स्थिति को और पेचीदा बना दिया। पहली घटना 8 जुलाई को कीव में बच्चों के अस्पताल पर रूस का मिसाइल हमला था और दूसरी घटना 9-11 जुलाई को वॉशिंगटन डीसी में नाटो शिखर सम्मेलन था।
जब दुनिया यूक्रेन युद्ध के गंभीर परिणामों में उलझी हुई थी, तब मोदी को मॉस्को में पुतिन से गर्मजोशी से मिलते देखा गया। इसने पश्चिम में चिंता और आलोचना को जन्म दिया। पूर्व अमेरिकी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार एच.आर. मैकमास्टर ने भारत से अमेरिका के संबंधों को कमतर करने का आह्वान किया। रिपोर्टों से पता चला कि अमेरिकी अधिकारी अपने भारतीय समकक्षों से फोन पर इस यात्रा के स्वरूप की आलोचना कर रहे थे।
अमेरिका के आधिकारिक प्रवक्ता चाहते थे कि भारत रूस के सामने क्षेत्रीय अखंडता और सम्प्रभुता का मुद्दा उठाए। वहीं यूक्रेन ने इस यात्रा को शांति प्रयासों के लिए बड़ा झटका बताया। भारत-रूस के संयुक्त बयान ने क्षेत्रीय अखंडता के मुद्दे को नजरअंदाज किया और शांति के बारे में कुछ हद तक अतार्किक बातें कीं।
यह स्वीकार करके कि यूक्रेन को दोनों पक्षों के बीच बातचीत और कूटनीति के माध्यम से शांतिपूर्ण समाधान खोजना चाहिए, नई दिल्ली संयुक्त राष्ट्र के एक सम्प्रभु सदस्य की क्षेत्रीय अखंडता के उल्लंघन और उसके साथ आक्रामकता के मुद्दे को संबोधित करने में विफल रही।
हालांकि मॉस्को में मोदी और पुतिन की गले मिलने वाली तस्वीर से भ्रमित नहीं होना चाहिए। यह मोदी की खास शैली है और वे ऐसा दर्शाने के लिए यह करते हैं कि विदेशी नेताओं के साथ उनकी व्यक्तिगत मित्रता है।
इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि इस यात्रा के उद्देश्य के बारे में अभी तक बहुत कम जानकारी मिल पाई है। विदेश मंत्रालय की वेबसाइट पर यात्रा के नौ सूचीबद्ध परिणाम अपनी कहानी खुद बयां करते हैं। कोई नया रक्षा सौदा घोषित नहीं किया गया है और दोनों देशों के बीच भुगतान के मुद्दे पर कोई सफलता नहीं मिली है।
भारत अपनी सैन्य मशीनरी को चालू रखने के लिए रूस के स्पेयर पार्ट्स और घटकों पर बहुत अधिक निर्भर है, वह केवल यह उम्मीद कर सकता है कि यूक्रेन-युद्ध इन आपूर्तियों को प्रभावित न करे। लेकिन कुल मिलाकर इस यात्रा ने पश्चिम में भारत की छवि को नुकसान पहुंचाने का काम किया है।
मोदी द्वारा बार-बार यह कहना कि यह युद्ध का युग नहीं है या युद्ध समस्याओं का समाधान नहीं कर सकता, इस वास्तविकता के विपरीत है कि रूस के लिए यह युद्ध का ही युग है और मॉस्को ने यूक्रेन के साथ अपनी समस्याओं को हल करने के लिए युद्ध का ही रास्ता चुना है। मॉस्को में प्रधानमंत्री द्वारा यह कहना कि जब हम मासूम बच्चों को मरते हुए देखते हैं, तो यह दिल दहला देने वाला होता है, यूक्रेन की स्थिति पर भारत की ठोस नीति की कमी की भरपाई नहीं कर सकता।
हकीकत तो यह है कि रूस से प्रधानमंत्री मोदी की वापसी के अगले ही दिन भारत ने संयुक्त राष्ट्र महासभा के उस प्रस्ताव पर मतदान में हिस्सा नहीं लिया, जिसमें मांग की गई थी कि रूस यूक्रेन के खिलाफ अपनी आक्रामकता बंद करे।
ऐसी चर्चा है कि इस यात्रा का मुख्य उद्देश्य चीन को रूस के बहुत करीब आने से रोकना था। लेकिन युद्ध ने अलग ही हालात पैदा कर दिए हैं। चीन रूस से सस्ते दामों पर कच्चा माल खरीद सकता है और वहां अपने उपभोक्ता-सामानों की बाढ़ ला सकता है।
रूस को दिए जाने वाले उसके गुप्त सैन्य समर्थन में ड्रोन, माइक्रो-इलेक्ट्रॉनिक्स और मिसाइल, टैंक और अन्य सैन्य उपकरण बनाने के लिए मशीन टूल्स शामिल हैं। भारत के पास ऐसा कुछ भी नहीं है, जो ऐसा होने से रोक सके।
इसमें कोई संदेह नहीं कि इस यात्रा ने पश्चिमी देशों को नाराज कर दिया है और अब भारत अपनी ‘स्ट्रैटेजिक-ऑटोनोमी’ की चाहे जितनी बातें करे, इससे उसकी छवि को हुई क्षति की भरपाई नहीं हो सकेगी।
राजदूत गार्सेटी का यह कहना सही है कि युद्धकाल में कोई भी देश तटस्थ नहीं होता है, वह या तो युद्ध के पक्ष में होता है या विपक्ष में। यूक्रेन का युद्ध अब एक ऐसे बिंदु पर पहुंचने लगा है, जहां पर पश्चिम यह कह सकता है कि जो हमारे साथ नहीं है, वह हमारे खिलाफ है!
Date: 13-07-24
संविधान हत्या दिवससंपादकीय
केंद्र सरकार ने 25 जून को संविधान हत्या दिवस के रूप में मनाए जाने की अधिसूचना जारी कर यही स्पष्ट किया कि वह विपक्षी दलों और विशेष रूप से कांग्रेस की ओर से किए जा रहे इस दुष्प्रचार की काट करने के लिए कोई कोर कसर नहीं उठा रखेगी कि भाजपा संविधान बदलने का इरादा रखती है। यह मानने के पर्याप्त कारण हैं कि मोदी सरकार ने 49 साल पहले 25 जून, 1975 को देश में आपातकाल थोपे जाने के इंदिरा गांधी के मनमाने फैसले को संविधान को कुचलने वाले कदम के रूप में स्मरण करने का निर्णय केवल इसलिए नहीं किया कि कांग्रेस ने हाल के लोकसभा चुनावों में देश भर में घूम-घूम कर यह दुष्प्रचार कर लोगों को बरगलाया कि यदि भाजपा का चार सौ पार का नारा सही सिद्ध हो गया तो प्रधानमंत्री मोदी संविधान बदल देंगे और आरक्षण खत्म कर देंगे। यह निर्णय संभवतः इसलिए भी लिया गया, क्योंकि लोकसभा चुनाव नतीजों के बाद भी कांग्रेस और उसके साथी दल यह खोखला दावा करने में लगे हुए हैं कि उन्होंने संविधान की रक्षा की। निःसंदेह 25 जून को संविधान हत्या दिवस के रूप में मनाने का निर्णय एक राजनीतिक फैसला है, लेकिन शायद मोदी सरकार के लिए ऐसा कोई फैसला लेना इसलिए आवश्यक हो गया था, क्योंकि अभी हाल में जब आपातकाल की बरसी पर इंदिरा सरकार की ओर से की गईं ज्यादतियों का स्मरण किया जा रहा था तो कांग्रेस ने यही दिखाया कि उसे यह रास नहीं आ रहा है। हद तो तब हो गई, जब आपातकाल के विरोध में लोकसभा में प्रस्ताव पारित किया गया तो राहुल गांधी की ओर से कहा गया कि इसकी कोई आवश्यकता नहीं थी।
आपातकाल के स्मरण पर कांग्रेस के नकारात्मक रवैये को देखते हुए इसकी आवश्यकता स्वतः रेखांकित होने लगी थी कि उस काले दौर को कभी भूला नहीं जाना चाहिए। यह स्वाभाविक है कि कांग्रेस को 25 जून को संविधान हत्या दिवस के तौर पर मनाए जाने का फैसला पसंद नहीं आया, लेकिन उसे यह नहीं भूलना चाहिए कि उसने तो आपातकाल के अलावा भी संविधान की अनदेखी करने वाले फैसले लिए हैं। क्या यह एक तथ्य नहीं कि शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट के 1985 के फैसले को पलटना संविधान का नग्न निरादर ही था? सुप्रीम कोर्ट के हाल के एक फैसले से देश को यह अच्छी तरह स्मरण भी हो आया। कांग्रेस संविधान को भाजपा और विशेष रूप से मोदी सरकार से खतरे का कितना ही हौवा खड़ा करे, सच यह है कि संविधान में सबसे अधिक संशोधन उसने ही किए हैं और वह भी विपक्ष की अनदेखी करके। इसके विपरीत मोदी सरकार ने बीते दस वर्षों में जो भी संविधान संशोधन किए, उनमें से हर किसी का कांग्रेस ने समर्थन किया-वह चाहे जीएसटी संबंधी हो या फिर निर्धन सवर्णों को आरक्षण प्रदान करने का।
Date: 13-07-24
परीक्षा में सुरक्षा की कमजोर कड़ियांब्रजेश कुमार तिवारी
सर्वोच्च न्यायालय अब चिकित्सा स्नातक पाठ्यक्रमों के लिए आयोजित की गई पात्रता सह प्रवेश परीक्षा यानी नीट-यूजी 2024 से जुड़ी याचिकाओं की सुनवाई अगले हफ्ते करेगा। पिछले महीने नतीजे घोषित होने के बाद से ही राष्ट्रीय परीक्षा एजंसी यानी एनटीए की साख पर देशभर में सवाल उठ रहे हैं। पटना पुलिस ने अदालत में दावा किया था कि नीट-यूजी का पर्चाफोड़ हुआ है। इस साल नीट-यूजी के लिए तेईस लाख से अधिक उम्मीदवारों ने पंजीकरण कराया था।
पर्चाफोड़ की इस घटना ने सरकार के सामने संकट खड़ा कर दिया है। यूजीसी नेट परीक्षा भी आयोजित होने के एक दिन बाद रद्द कर दी गई थी। हाल ही में लगातार चार परीक्षाओं- नीट-यूजी, यूजीसी-नेट, सीएसआइआर-नेट और अब नीट पीजी प्रवेश परीक्षाएं या तो रद्द या स्थगित कर दी गईं, जिससे करीब सैंतीस लाख अभ्यर्थी और उनके अभिभावक सीधे प्रभावित हुए हैं। इन पर्चाफोड़ से न सिर्फ लाखों छात्रों का भविष्य दांव पर है, बल्कि एनटीए की विश्वसनीयता भी सवालों के घेरे में है। पूरी जांच के बाद ही परतें खुलेंगी, पर एनटीए पर उठ रहे सवालों के पीछे सबसे बड़ी वजह है निजी एजंसियों को दिया जाने वाला ठेका।
भारत में अक्सर पर्चाफोड़ की खबरें आती रहती हैं। यह बीमारी कोई नई नहीं है, इसके चलते पहले भी कई परीक्षाओं को रद्द करना पड़ा है। 1997 में आइआइटी जेईई और 2011 में आल इंडिया प्री मेडिकल टेस्ट जैसी प्रतिष्ठित परीक्षाओं के पर्चे भी बाहर आ चुके हैं। यह एक ऐसा नासूर है जो समय के साथ और ज्यादा गहरा होता गया है। मीडिया रपटों के मुताबिक पिछले सात वर्षों में देश के अलग-अलग राज्यों में सत्तर से अधिक परीक्षाओं के पर्चाफोड़ हुए हैं, जिससे करीब दो करोड़ युवाओं का भविष्य प्रभावित हुआ है। पर्चाफोड़ और परीक्षा रद्द होने की खबरों के साथ युवाओं के सपने चकनाचूर हो जाते हैं। साथ ही, मां-बाप द्वारा पेट काट कर भेजा गया पैसा भी व्यर्थ चला जाता है। सरकारें इसे लेकर गंभीर रहीं हैं, फिर भी पर्चाफोड़ रोकने के उनके प्रयास नाकाफी साबित हो रहे हैं। बात यहां नीयत और नीति दोनों की है, जिसका जवाब ये युवा उम्मीदवार कई सालों से तलाश रहे हैं। हर बार जब तक जांच होती है, तब तक दूसरा पर्चाफोड़ हो जाता है।
राज्यों में भले सरकारें अलग-अलग पार्टियों की हैं, मगर पर्चाफोड़ का तरीका सब जगह एक जैसा है। अव्वल तो परीक्षाएं नियमित अंतराल पर होती नहीं। पद सालों-साल खाली पड़े रहते हैं, लेकिन भर्ती नहीं होती और जो होती भी है, वह पर्चाफोड़ की भेंट चढ़ जाती है। पर्चाफोड़ की अलग-अलग विधि होती है, जैसे असम में परीक्षा शुरू होने के कुछ सेकंड में पूरा पर्चा वाट्सऐप पर प्रसारित कर दिया गया। मध्यप्रदेश पर्चाफोड़ के आरोपियों ने मुंबई की उस कपंनी के सर्वर में सेंधमारी की थी, जिसे परीक्षा आयोजित करने की जिम्मेदारी दी गई थी। वहीं, यूपी पुलिस भर्ती परीक्षा में परिवहन निगम की जिस कंपनी को पर्चे छापने के बाद गोदामों में रखने की जिम्मेदारी दी गई, उसकी मिलीभगत से पर्चाफोड़ किया गया था। कई बार परीक्षा केंद्रों से भी पर्चाफोड़ किया जा चुका है।
पर्चाफोड़ न रोक पाना एक अक्षम्य अपराध है। यह केवल परीक्षा व्यवस्था में खामी नहीं, बल्कि लाखों युवाओं के सपनों को चकनाचूर करने का अपराध है। भारत की लगभग 65 फीसद आबादी युवा है। उनके सपने बड़े हैं। वे परिश्रमी और प्रतिभाशाली हैं, तमाम कठिनाइयों एवं अभावों से लड़ते-जूझते कई-कई वर्षों तक इन प्रतियोगी परीक्षाओं की जी-तोड़ तैयारी करते हैं। हालांकि पर्चाफोड़ और नकल कराने वालों के खिलाफ राज्य सरकारों ने सख्त कानून बनाए हैं, लेकिन इन सबके बावजूद इस प्रवृत्ति पर अंकुश नहीं लग पा रहा है। सवाल है कि आरोपियों के पकड़े जाने के बाद भी वे आसानी से कैसे छूट जाते हैं, जबकि कानून में तो सजा का कड़ा प्रावधान है। कड़ी सजा के प्रावधान भर से इस समस्या का कोई असरदार हल नहीं निकलने वाला है। हर साल सिविल सेवा परीक्षा में दस लाख से अधिक अभ्यर्थी होते हैं, फिर भी यूपीएससी सुरक्षित परीक्षा आयोजित करता है। जहां तक आनलाइन पर्चे की बात है, प्रौद्योगिकी-आधारित परीक्षा/ आनलाइन परीक्षाओं के निरंतर उपयोग से इसमें रिसाव का खतरा रहेगा। खतरा बढ़ना तय है, अब एआइ का समय है, ऐसे में यह भविष्य में बड़ा खतरा होगा। अगर गृह मंत्रालय की वेबसाइट में सेंधमारी हो सकती है, तो ये परीक्षाएं कैसे सुरक्षित मानी जा सकती हैं?
पर्चाफोड़ अब अकेली, व्यक्तिगत या छोटे समूह स्तर के घोटाले नहीं रह गए हैं। जैसे-जैसे प्रतियोगी परीक्षाओं का दौर तेजी से बढ़ा है, अनियमितता की प्रकृति भी बहुत बड़ी हो गई है। भर्ती आयोगों में राजनीतिक संपर्क वाली नियुक्तियों पर पूरी तरह रोक लगाई जाए। केंद्राध्यक्ष सहित सभी के लिए मोबाइल फोन प्रतिबंधित होने चाहिए। पर्चा तैयार करने से लेकर परीक्षा केंद्र पर वितरण तक सैकड़ों लोग शामिल होते हैं, इसलिए ऊपर से नीचे तक सभी की जिम्मेदारी तय हो। अधिकतर परीक्षा केंद्र निजी संस्थानों में होते हैं, उनमें से कई मानक के अनुरूप नहीं हैं। सार्वजनिक परीक्षा (अनुचित साधनों की रोकथाम) अधिनियम, 2024 में भी कई खामियां हैं, जिसमें तत्काल सुधार की आवश्यकता है। सार्वजनिक परीक्षा के पर्चाफोड़ का अपराध बड़े पैमाने पर जनता को प्रभावित करता है, इससे राज्य के खजाने पर भी भारी वित्तीय बोझ पड़ता है।
पारित अधिनियम में कारावास की न्यूनतम अवधि तीन साल है, जिसे दस साल करना चाहिए। वहीं, निर्धारित सजा की राशि अपराध की गंभीरता के अनुरूप नहीं है। इसमें समयबद्ध जांच का कोई प्रावधान नहीं है। अधिनियम के तहत किसी अपराध के लिए जुर्माना अदा न करने की स्थिति में कारावास की अतिरिक्त सजा के साथ-साथ अपराधी की संपत्ति जब्त करने का प्रावधान भी शामिल किया जाना चाहिए। इसके अलावा, अनुचित साधनों का लाभ उठाने में शामिल उम्मीदवार को भविष्य की किसी भी परीक्षा के लिए अयोग्य घोषित किया जाना चाहिए।
सरकारी विभागों में नौकरी पाने के लिए छात्र कमरतोड़ मेहनत करते हैं। मगर ईमानदारी से प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले छात्रों का हौसला अब हार रहा है। आज उनके अंदर निराशा है और इससे उनके परिवार का मनोबल भी टूट रहा है। परीक्षा एजंसी का अपना प्रिंटिंग प्रेस हो या एक घंटे पहले साफ्ट कापी को ‘कोड लाक’ के माध्यम से सीधे भेजा जाए और परीक्षा केंद्र में मौजूद अभ्यर्थियों को वहीं प्रिंट करके वितरित किया जाए। इस विधि से प्रश्नपत्र प्रेस छपाई से थोड़े महंगे जरूर होंगे, पर सुरक्षित होंगे। पूरी प्रक्रिया पर नजर रखने के लिए पर्चा बनाने से लेकर परीक्षा केंद्रों पर सीसीटीवी कैमरे लगाए जाने चाहिए। किसी कोचिंग संस्थान की संलिप्तता मिलने पर उसको भी बंद किया जाए। पर्चा तैयार होने से लेकर उन्हें परीक्षा केंद्रों पर पहुंचाने में शामिल सभी लोगों की जिम्मेदारी तय हो।
Date: 13-07-24
नाटो, युद्ध और शांतिसंपादकीय
यह महज संयोग है कि जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी मास्को में रूस के राष्ट्रपति ब्लादिमीर पुतिन और वियना में ऑस्ट्रिया के चांसलर कार्ल नेहमर के साथ वैश्विक शांति के लिए बुद्ध के उपदेशों पर चर्चा करते हुए अपनी बात को दोहरा रहे थे कि यह युद्ध का समय नहीं है, लगभग उसी समय वाशिंगटन में अमेरिका की अगुवाई वाले नाटो के सदस्य देश रूस- यूक्रेन के बीच जारी युद्ध में घी डालने का काम कर रहे थे। उनका विश्वास है कि रूस युद्ध का समर्थक है और उसने यूक्रेन पर आक्रमण किया है। इतना ही नहीं, रूस यूरोप सहित पूरी दुनिया की सुरक्षा के लिए चुनौतियां पेश कर रहा है। इसलिए नाटो देशों ने घोषणा की है कि अगले एक वर्ष के दौरान यूक्रेन को 40 अरब यूरो डॉलर की सैन्य सहायता दी जाएगी। फरवरी, 2022 से रूस और यूक्रेन के बीच युद्ध चल रहा है जिसमें हजारों निर्दोष नागरिक मारे गए हैं। यह सब जानते हुए भी अमेरिका और पश्चिमी देश रूस को चिढ़ाने का काम कर रहे हैं। अमेरिका यूक्रेन को अभी तक 50 अरब डॉलर से अधिक की सैन्य सहायता दे चुका है। हाल में उसने घोषणा की है कि वह 2026 में जर्मनी में लंबी दूरी की मिसाइलें तैनात करेगा। इसका उद्देश्य रूस की चुनौतियों का सामना करना है। इसका स्पष्ट मतलब है कि अमेरिका और पश्चिमी देश नहीं चाहते कि शांति वार्ता की मेज पर एक साथ बैठ कर विमर्श करें। राष्ट्रपति पुतिन इस संकेत से अनजान नहीं हैं। शायद इसीलिए उन्होंने पिछले महीने स्विटजरलैंड में आयोजित यूक्रेन शांति सम्मेलन में शामिल होने से इंकार कर दिया। पश्चिमी देश पुतिन को आक्रमणकारी और रक्त पिपासू ठहराते हैं लेकिन यह सच नहीं है। वस्तुतः यूक्रेन को नाटो का सदस्य बनाने की घोषणा के कारण पुतिन को अपने पड़ोसी पर हमला करने के लिए मजबूर होना पड़ा। सही मायने में नाटो का विस्तार रूस की सुरक्षा के लिए खतरा हो सकता है। चीन का भी ऐसा ही मानना है। प्रधानमंत्री मोदी ने ऑस्ट्रिया के चांसलर को 19वीं सदी की उस ऐतिहासिक वियना कांग्रेस की याद दिलाई जिसने यूरोप में शांति और स्थिरता कायम करने में महती भूमिका निभाई थी। चांसलर नेहमर को विश्वास है कि भारत रूस-यूक्रेन शांति प्रक्रिया में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। लेकिन हकीकत यह है कि इस शांति प्रक्रिया में नाटो को आगे आना होगा वरना पूरी दुनिया तीसरे विश्व युद्ध की चपेट में आ सकती है।
Date: 13-07-24
सुनवाई जरूरीसंपादकीय
न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी एमएसपी की कानूनी गारंटी और कृषि ऋण माफी सहित अन्य मांगों को लेकर किसान आंदोलन फिर शुरू किया जाएगा। संयुक्त किसान मोर्चा में शामिल अलग-अलग किसान संगठनों का कहना है कि वे प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता, लोक सभा और राज्य सभा के सदस्यों को ज्ञापन सौंपेंगे। इस बार दिल्ली कूच करने की बजाय देशव्यापी विरोध की तैयारी कर रहे हैं। महाराष्ट्र, झारखंड, जम्मू-कश्मीर और हरियाणा को वे प्रमुखता देंगे। इन राज्यों में जल्द ही विधानसभा चुनाव होने हैं। फसल बीमा, किसानों को पेंशन बिजली के निजीकरण को बंद करने के साथ सिंधु और टिकरी सीमा पर शहीद किसानों का स्मारक बनाने की मांग भी कर रहे हैं। समर्थन मूल्य को लेकर यह आंदोलन 2020 में शुरू हुआ था। यूं तो इसे बड़े किसानों का आंदोलन कहा जा रहा है लेकिन किसानों का एक वर्ग मोदी सरकार की कृषि नीतियों से संतुष्ट नहीं है। सरकार की तरफ से मिले आश्वासन और आम चुनाव के दौरान आंदोलन कुछ वक्त के लिए ठहर सा गया था। देश में छोटे किसानों की तादाद बहुत है। दूसरे वे लोग हैं, जो कृषि कार्यों के जरिए जीवन यापन करते हैं। उन सबको इन आंदोलनों या मांगों से ज्यादा फर्क नहीं पड़ता। हालांकि अभिव्यक्ति की आजादी का अधिकार हर देशवासी को है। वह सरकार के समक्ष अपनी कोई भी मांग रखने को आजाद है। मगर पिछले आंदोलन के दरम्यान प्रदर्शनकारियों के कारण कई स्थानों पर जन-जीवन अस्त-व्यस्त हो गया था। आगजनी और पथराव हुआ था । सुरक्षाबलों पर हथियार भी प्रयोग हुए। इसी दरम्यान पंजाब-हरियाणा हाई कोर्ट ने हरियाणा के शंभू बार्डर पर धरनारत किसानों को हटाने के आदेश दिए हैं। राज्य सरकार को भी बैरिकेड हटाने और चड़ीगढ़-दिल्ली राष्ट्रीय राजमार्ग खोलने का आदेश दिया है। पांच महीनों से अवरुद्ध इस मार्ग के खोलने से कारोबारियों और नियमित यात्रियों को होने वाली असुविधा से निजात मिल सकेगी। हम कृषि प्रधान देश हैं इसलिए उनकी जरूरतों और मांगों की अनदेखी नहीं की जा सकती। मगर उन्हें भी उग्र विरोध से बचना चाहिए । अड़ियल रुख दिखाने की बजाय सरकार को भी छोटे किसानों के हितों की रक्षा में कोई कोताही नहीं बरतनी चाहिए।
Date: 13-07-24
जमानत और जेलसंपादकीय
जब किसी को अदालत से जमानत मिलती है, तो कहा जाता है कि वह जमानत पर बाहर आ गए। मगर शुक्रवार को दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को जो अंतरिम जमानत मिली है, उसे लेकर यह नहीं कहा जा सकता। बेशक सुप्रीम कोर्ट ने उन्हें दिल्ली शराब-नीति मामले से जुड़े मनी लॉ्ड्रिरंग केस में जमानत दे दी है, लेकिन सिर्फ इतने से ही उनकी जेल से रिहाई नहीं हो पाएगी। कुछ सप्ताह पहले भी उन्हें इसी मामले में ट्रायल कोर्ट ने जमानत दे दी थी, हालांकि हाईकोर्ट ने तब इस पर रोक लगा दी। प्रवर्तन निदेशालय, यानी ‘ईडी’ के सामने यह तभी स्पष्ट हो गया था कि इस मामले में केजरीवाल को बहुत समय तक जेल में रखा जाना शायद संभव न हो। ठीक उसी समय एक दूसरी जांच एजेंसी ‘सीबीआई’ आगे आई और उसने अरविंद केजरीवाल के खिलाफ दिल्ली की आबकारी नीति को लेकर एक मामला दर्ज किया और उन्हें औपचारिक रूप से अपनी हिरासत में ले लिया। बाद में उन्हें इस मामले में भी न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया। इसी के साथ यह भी तय हो गया कि अगर दिल्ली के मुख्यमंत्री एक मामले में जमानत हासिल करने में कामयाब भी रहे, तो दूसरा मामला उन्हें जेल से बाहर जाने से रोक देगा। शुक्रवार को यही हुआ और जमानत की खबर उनके लिए कोई राहत नहीं ला पाई। यह जरूर है कि इन मामलों पर जो राजनीति चल रही है, उनमें आम आदमी पार्टी को अपनी आक्रामकता दिखाने का एक और मौका मिल गया।
सुप्रीम कोर्ट में शुक्रवार को सिर्फ इतना ही नहीं हुआ। अरविंद केजरीवाल ने जो अर्जी सर्वोच्च अदालत में दाखिल की थी, न्यायमूर्ति संजीव खन्ना और दीपांकर दत्ता की पीठ ने उसे एक बड़ी पीठ के पास भेज दिया। इस याचिका में मुख्यमंत्री केजरीवाल ने अपनी गिरफ्तारी को चुनौती दी थी और उसे गैर-कानूनी बताया था। जब इस याचिका पर बड़ी पीठ विचार करेगी, इस दरमियान केजरीवाल जमानत पर रहेंगे। दिल्ली के मुख्यमंत्री पद से हटाए जाने के सवाल पर अदालत ने कहा कि हमें संदेह है कि अदालत एक निर्वाचित नेता को पद छोड़ने का निर्देश दे सकती है। न्यायमूर्ति खन्ना ने कहा कि यह फैसला हम पूरी तरह अरविंद केजरीवाल पर छोड़ते हैं। इसके पहले आम चुनाव के दौरान भी अरविंद केजरीवाल को अंतरिम जमानत मिली थी, जो दिल्ली में मतदान खत्म होने के साथ ही खत्म हो गई थी। तब केजरीवाल रिहा होकर बाहर आए थे और उन्होंने पूरे देश में प्रचार भी किया था, इस बार जमानत के बाद भी वह जेल में ही रहेंगे।
सुप्रीम कोर्ट काफी पहले ही यह स्पष्ट कर चुका है कि नियमत: हर किसी को जमानत मिलनी चाहिए, केवल अपवाद मामलों में ही किसी को जेल में रखा जाना चाहिए। कौन सा मामला अपवाद है और कौन सा नहीं, यह हमेशा ही विवादास्पद रहता है। जिन मामलों में कोई राजनीतिज्ञ शामिल हो, वहां ऐसे विवाद काफी बढ़ जाते हैं। यह भी सच है कि दिल्ली आबकारी नीति से जुड़े जितने भी मामले हैं, वे काफी समय से चल रहे हैं और गिरफ्तारियों व आरोपों के अलावा चीजें बहुत आगे बढ़ती हुई दिख नहीं रही हैं। इसमें कितना इस वजह से है कि हमारी न्यायिक प्रक्रिया में चीजें बहुत ज्यादा खिंचती ही हैं और कितना इस वजह से कि इन मामलों में राजनीतिक खींचतान काम कर रही है। यह ऐसी समस्या है, जिसका समाधान पारदर्शिता लाकर ही किया जा सकता है।
Date: 13-07-24
तलाकशुदा औरतों के साथ यह नाइंसाफीप्रो. मधु दंडवते, ( वरिष्ठ सांसद )
महोदय, मैं उन लोगों में हूं, जो समाजवाद, प्रजातंत्र तथा धर्मनिरपेक्षता के मूल्यों से स्पष्टत: प्रतिबद्ध हैं और अपनी दृढ़ धारणा तथा विवेक के आधार पर मैं इस विधेयक का पूर्णतया विरोध करता हूं।… मैंने इस सम्मानित सभा में शपथ लेते समय देश के संविधान तथा संरक्षण के लिए शपथ ली थी। प्रजातंत्र में मेरे लिए वही सबसे पवित्र पुस्तक है। इस संविधान… के अनुच्छेद 14, 15 एवं 16 और उनमें से सबसे अधिक महत्वपूर्ण अनुच्छेद 13 (2) में यह कहा गया है कि राज्य ऐसा कोई कानून नहीं बना सकता, जो संविधान के भाग-तीन द्वारा दिए गए मौलिक अधिकारों को या तो छीनता है अथवा उनसे वंचित करता है।
मैं यह कहना चाहता हूं कि यदि इस विधेयक की न्यायिक जांच की जाए, तो आप पाएंगे कि इस विधेयक को एक बहुत छोटे से कारण से पहले ही झटके में वापस भेज दिया जाता कि इस विधेयक पर स्पष्ट रूप से अनुच्छेद 13(2) के उपबंध लागू होते हैं, जो किसी भी ऐसे विधेयक अथवा कानून को, जो वास्तव में संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों को छीनता है अथवा वंचित करता है, अनुमति नहीं देता है। इसलिए मैंने इस विधेयक की विधायी सक्षमता को पहले ही चुनौती दी।
महोदय, मैं उन व्यक्तियों में से हूं, जो यह सोचते हैं कि जहां तक दंड प्रक्रिया संहिता के अनुच्छेद का प्रश्न है, तो धार्मिक समुदाय का लिहाज किए बिना इसमें देश की महिलाओं को कतिपय सुरक्षा प्रदान की गई है और धार्मिक संप्रदाय की भावनाओं को चोट पहुंचाए बिना मैं यह कह सकता हूं कि इस्लाम के नियमों के अनुसार शरीयत की भावना यह है कि महिलाओं को समानता का अधिकार और सुरक्षा प्रदान की जाए। इसका निष्कर्ष यह है कि दंड प्रक्रिया संहिता के किसी अनुच्छेद में यदि महिलाओं को अतिरिक्त राहत या सहायता प्रदान की जाती है, तो किसी को भी महिलाओं के रास्ते में नहीं आना चाहिए, चाहे महिलाएं मुसलमान या हिंदू या ईसाई हों। इस विधेयक का उद्देश्य मुस्लिम महिलाओं को अनुच्छेद-125 की परिधि से बाहर करना है और उन्हें रिश्तेदारों तथा दिवालिया हुए वक्फ बोर्डों की दया पर छोड़ना है। वक्फ बोर्डों की वित्तीय स्थिति के बारे में हम सब अच्छी तरह जानते हैं। इस विधेयक को तैयार करने वालों ने जान-बूझकर उन्हें दंड प्रक्रिया संहिता के अनुच्छेद-125 की परिधि से बाहर किया है, ताकि इद्दत की एक विशेष सीमा के बाद वह (तलाकशुदा महिला) अपने पति से कोई अनुरक्षण की धनराशि की मांग न कर सके। इस मामले में अनुरक्षण और सहायता के लिए उसे अपने रिश्तेदारों के पास जाना होगा और यदि रिश्तेदार उसकी सहायता करने की स्थिति में नहीं हैं, तो वह वक्फ बोर्ड के पास जाएगी। परंतु वक्फ बोर्डों की वित्तीय ‘स्थिति क्या है? अपने सामान्य कार्यों के लिए भी ये वक्फ बोर्ड सरकार के पास आकर कहते हैं कि ‘हमारी वित्तीय स्थिति बहुत खराब है। बोर्ड के नियमों के अंतर्गत निर्धारित सामान्य कार्य भी हम नहीं कर पा रहे हैं। अत: हमें वित्तीय सहायता दीजिए।’ उनकी स्थिति यह है।
मैं एक कहानी बता सकता हूं, जो करुणा से भरी हुई है। आप प्रधानमंत्री से इसकी पुष्टि कर सकते हैं। मुस्लिम महिलाएं अश्रुपूरित नेत्रों से प्रधानमंत्री के पास गईं। एक मुस्लिम लड़की ने कहा : प्रधानमंत्री जी, मुझे तीसरी बार तलाक दिया गया है और यदि आप 21वीं शताब्दी में जाने की बात कहते हैं, तो हम जैसी महिलाओं को वापस छठी शताब्दी में क्यों फेंकते हैं? हमें इन लोगों की दया पर मत छोड़िए।’ …जब वह यह बात कह रही थी, तो प्रधानमंत्री की आंखों में आंसू आ गए। इसका उल्लेख समाचार-पत्रों में हो चुका है, क्योंकि एक प्रेस संवाददाता वहां उपस्थित था। उसने सारी तस्वीरें प्रस्तुत की हैं।
यह बिडंबना है। हम नहीं चाहते कि यह त्रासदी मुस्लिम महिलाओं के जीवन में लाई जाए।
Date: 13-07-24
महिलाओं के प्रजनन अधिकारों की रक्षा में छिपी खुशहालीशबाना आजमी, ( अभिनेत्री )
पिछली सदी के आखिरी दशक में संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (यूएनएफपीए) ने मुझे दक्षिण एशिया के लिए सद्भावना राजदूत नियुक्त किया था। अपनी नई भूमिका के लिए पूरी तरह तैयार होकर मैंने मुंबई की झुग्गियों में काम करने वाली महिलाओं से बात करने का फैसला किया। मैं गांवों में जाकर सैकड़ों महिलाओं से मिली और यह महसूस किया कि वे अपनी मर्जी से कई बच्चे पैदा नहीं करतीं। इससे उनके शरीर और बच्चों को होने वाले नुकसान से भी वे भली-भांति वाकिफ थीं। इनमें से कई महिलाएं कुपोषित थीं, तो कई एनीमिया (खून की कमी) से पीड़ित। मुझे याद है, मैंने एक महिला से कहा था कि उसके लिए मैं नियमित रूप से गर्भनिरोधक गोलियां भेजने की व्यवस्था करूंगी, जिसे वह अपनी सास और पति को बताए बिना चुपचाप ले सकती है। उसका जवाब था, दीदी, क्या आपको सच में लगता है कि मेरी झोपड़ी में एक भी ऐसी जगह है, जहां मैं परिवार की नजरों से बचाकर कोई चीज रख सकती हूं? उन दिनों कई समुदायों में परिवार नियोजन पर चर्चा करना गलत माना जाता था।
पितृ-सत्तात्मक सोच और सामाजिक मानदंड ही नहीं, कई अन्य कारकों ने भी महिलाओं को परिवार नियोजन, यौन संबंध और प्रजनन से जुड़े मसलों पर फैसले लेने से रोका है। लैंगिक समानता, परिवार नियोजन, यौन व प्रजनन स्वास्थ्य और एचआईवी/एड्स से जुड़े सार्वजनिक विमर्शों में इस तथ्य को सामने लाने की जरूरत थी। मुझे इस संदर्भ में तमाम लोगों से बात करने का मौका मिला- सरकारी अधिकारियों से लेकर समुदायों के मुखियों तक। तब से लेकर अब तक हमने परिवार नियोजन के क्षेत्र में सराहनीय प्रगति देखी है। हालांकि, भारत के परिवार नियोजन-2030 विजन को हासिल करने के लिए अब भी काफी प्रयास करने की दरकार है।
निस्संदेह, पिछले कुछ वर्षों में गर्भनिरोधक विकल्पों का काफी विस्तार हुआ है। अब ऐसे-ऐसे सुरक्षित और सरल तरीके हैं, जो स्त्रियों को अपने स्वास्थ्य और करियर को लेकर सजग फैसला लेने में सक्षम बना सकते हैं। इससे वे अधिक संतुष्ट जीवन जी सकती हैं। हालांकि, महिलाओं व पुरुषों, दोनों के लिए आधुनिक गर्भनिरोधकों तक पहुंच बनाना अब भी एक चुनौती है। आधुनिक गर्भनिरोधकों की उपलब्धता के बावजूद विवाहित स्त्रियों (15-49 आयु-वर्ग की) के बीच पारंपरिक तरीकों का उपयोग करीब-करीब दोगुना बढ़ गया है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस-5) के ताजा आंकड़ों के अनुसार, पारंपरिक तरीके से गर्भनिरोध करने वाली महिलाओं का आंकड़ा 2015-16 में 5.7 प्रतिशत था, जो 2019-21 में बढ़कर 10.2 फीसदी हो गया। सवाल है कि क्या हम उन बुनियादी कारणों को दूर करने में सफल रहे हैं, जो आधुनिक गर्भनिरोधकों को व्यापक तौर पर अपनाने से रोक रहे हैं?
भारत में विशाल युवा आबादी को देखते हुए यहां अस्थायी और अंतराल वाले तरीकों की पहुंच जरूरी है। गर्भनिरोधक, जैसे इंजेक्शन, प्रत्यारोपण व अंतरगर्भाशयी उपकरण (आईयूडी) अनचाहे गर्भ को रोकने के विश्वसनीय तरीके हैं। इसके अलावा, खुद से प्रबंधन करने वाले तरीके भी हैं। ये महिलाओं को अपने गर्भधारण के बीच अंतराल रखने में सक्षम बनाकर मां व बच्चे, दोनों की सेहत को सुधारने में मददगार साबित होते हैं।
एनएफएचएस-5 के मुताबिक, उन महिलाओं की संख्या घटी है, जो गर्भधारण को रोकना या टालना तो चाहती हैं, पर किसी गर्भनिरोधक का इस्तेमाल नहीं कर रही हैं। आंकड़ों के मुताबिक, वर्ष 2015-16 में ऐसी महिलाओं की संख्या 12.9 प्रतिशत थी, जो 2019-21 में घटकर 9.4 फीसदी हो गई। यह संकेत है कि महिलाएं अब गर्भधारण में अंतराल लाने वाली विधियों के फायदे समझने लगी हैं। महिलाओं को वास्तव में सशक्त बनाने व उनके प्रजनन स्वास्थ्य में सुधार के लिए हमें गर्भनिरोधक उत्पादों की पहुंच सुनिश्चित करने के प्रभावी और सुगम तरीके खोजने होंगे। इसके अलावा, गर्भनिरोधकों से जुड़ी गलत धारणाओं को खत्म करने के लिए समाज को शिक्षित भी करना होगा। इसके लिए नामचीन हस्तियों और समाज के बौद्धिकों को यह जिम्मेदारी लेनी होगी कि वे महिलाओं के प्रजनन अधिकारों का सम्मान करने वाली नीतियों की वकालत करें। ऐसे प्रयासों से हम स्वस्थ परिवार, सशक्त समाज व बराबरी वाली दुनिया बना सकेंगे।
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13 July 2024
प्रश्न – 469 – भारत के संदर्भ में गठबंधन सरकार के औचित्य पर समालोचनात्मक टिप्पणी लिखें। (250 शब्द)
Question – 469 – Write a critical note on the justification of coalition government in the context of India. (250 words)
नोट : इसका उत्तर आपको हमें नहीं भेजना है, यह आपके स्वयं के अभ्यास के लिए है।
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Date: 12-07-24
Women’s Right Over ‘Rights’ of CustomsET Editorials
A Supreme Court order on Wednesday finally ended the lack of clarity that has prevailed for four decades on the rights of illegally divorced Muslim women. The apex court asserted that any discrimination in matters of alimony under the country’s secular laws would be regressive and against gender justice and equality. This is a much-needed, most welcome clarification. The court ruled that all Muslim women — including those who have been illegally divorced by the pronouncement of triple talaq, a cognisable offence under the Muslim Women (Protection of Rights on Marriage) Ordinance 2018 — are entitled to seek maintenance from their husbands as per Section 125 of the CrPC.
The separate but concurring judgments in Mohd Abdul Samad v. The State of Telangana give firmer grounding to the 2019 order by Justice Ahsanuddin Amanullah of the Patna High Court, which stated that a divorced Muslim woman could not be debarred from seeking maintenance under Section 125. Both orders underline that religion-neutral provisions of the law must override personal or religious laws. Not doing so violates Article 15(1), which prevents the state from discriminating on the grounds of religion, race, caste, sex or place of birth, and allows a person’s identity as a citizen to take precedence over primordial identities. The top court’s ruling has implications for Article 44, which says that the state shall endeavour to secure a uniform civil code ‘throughout the territory of India’.
While both orders vindicate the struggles of Shah Bano, they will not be enough. Other supporting structures, such as implementation of law, timely legal help and constant social support, will be necessary if the court orders are to deliver their intended impact effectively.
Date: 12-07-24
Secular remedyMuslim women’s right to maintenance under secular laws is well established.Editorial
In holding that a divorced Muslim woman is not barred from invoking the secular remedy of seeking maintenance under the Code of Criminal Procedure (CrPC), the Supreme Court of India has done well to clarify an important question concerning the impact of a 1986 law that appeared to restrict their relief to what is allowed in Muslim personal law alone. The enactment of the Muslim Women (Protection of Rights on Divorce) Act, 1986, was a watershed moment that is seen as having undermined the country’s secular ethos by seeking to nullify a Court judgment in the Shah Bano case (1985), which allowed a divorced Muslim woman to apply for maintenance from a magistrate under Section 125 of the CrPC. Subsequently, the 1986 law was upheld by a Constitution Bench in 2001 after coming close to declaring its provisions unconstitutional for discriminating against Muslim women. The Act was declared valid after the Bench read it down in such a way as not to foreclose the secular remedy for Muslim women. Several High Court judgments took different views on whether Muslim women should avail of Section 3 of the 1986 Act or Section 125 of CrPC. The latest verdict by a Bench of Justice B.V. Nagarathna and Justice Augustine George Masih settles this question by holding that the codification of a Muslim woman’s rights in the 1986 Act — including the right to maintenance during the Iddat period, provision for a dignified life until she remarries, and return of mehr and dowry — was only in addition to and not in derogation of her right to seek maintenance like a woman of any other religion.
Justice Masih, in his main opinion, concludes that both the personal law provision and the secular remedy for seeking maintenance ought to exist in parallel in their distinct domains. While the CrPC may be invoked by a woman if she was unable to maintain herself, the 1986 Act makes it a Muslim husband’s obligation to provide for his divorced wife and her children up to a certain point. Justice Nagarathna, in her concurring opinion, looks at the social purpose behind the provision for maintenance in the CrPC, namely that it aims to prevent vagrancy among women by compelling the husband to support his wife. The 1986 Act codified the right available to a divorced Muslim woman in personal law. This right is in addition to, and not at the cost of, the rights available in existing law. The verdict is a great example of the Court using harmonious interpretation to expand the scope of rights as well as to secularise access to remedies. In the process, the Court has also neutralised the perception that the right of Muslim women to seek maintenance under secular provisions stood extinguished since 1986.
Date: 12-07-24
महिलाओं के हक में आया फैसला एक मिसाल हैसंपादकीय
सुप्रीम कोर्ट की दो सदस्यीय बेंच ने दो अलग-अलग लेकिन सहमति के साथ दिए अहम फैसलों में तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं को भी गुजारा भत्ते का हकदार माना है। कोर्ट के अनुसार सन् 1986 के मुस्लिम महिला कानून की धारा 3 में- ‘किसी भी अन्य कानून में किसी बात के होते हुए भी…’ का मतलब यह नहीं है कि सीआरपीसी की धारा 125 में वर्णित गुजारा भत्ते का प्रावधान खत्म हो जाता है, बल्कि दोनों को एक साथ देखना होगा। दरअसल शाहबानो फैसले को प्रभावहीन करने के लिए सन् 1986 में बने इस कानून में केवल ‘इद्दत’ के तीन महीनों तक भरण पोषण का प्रावधान है। सुप्रीम कोर्ट की नई व्याख्या के बाद मुस्लिम महिलाओं के जीवन में एक और बड़ा सवेरा आएगा और वे कानूनन अपना हक ले सकती हैं। सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के बाद संसद ने सन् 2019 में तीन तलाक प्रथा खत्म की थी। अब इस नए फैसले के बाद सीआरपीसी की धारा 125 (जिसे इस फैसले में सेक्युलर कहा गया) मुस्लिम महिला कानून सरीखे स्पेशल एक्ट पर प्रभावी रहेगी, यानी गुजारा भत्ता जैसे मामलों में अपराध कानून, पर्सनल लॉ के ऊपर रहेगा। इसके साथ ही जस्टिस बीवी नागरत्ना ने अपने फैसले के अंतिम पांच पैराग्राफ में देश की जनता से अपील की है कि गृहणियों (जो कमाती नहीं हैं) को भी आर्थिक स्वायत्तता दें।
Date: 12-07-24
गरीबी से निजातसंपादकीय
हाल के वर्षों के विभिन्न अनुमानों से यह संकेत मिलता है कि देश में गरीबी के स्तर में काफी कमी आई है। अगर गरीबी के दायरे में आने वाले परिवारों को बचाया जा सका तो परिणाम और बेहतर होंगे। नैशनल काउंसिल फॉर एप्लाइड इकनॉमिक रिसर्च ने इस बारे में एक नया शोध पत्र प्रकाशित किया है जिसमें नागरिकों के लिए सुरक्षा ढांचे को नए सिरे से तैयार करने की बात कही गई है। ‘रीथिंकिंग सोशल सेफ्टी नेट्स इन अ चेंजिंग सोसाइटी’ शीर्षक वाले इस शोध पत्र में कहा गया है कि 2011-12 में 21.2 फीसदी से 2022-24 में 8.5 फीसदी तक गरीबी के स्तर में उल्लेखनीय कमी आई है। यह आकलन तेंडुलकर गरीबी रेखा के आधार पर किया गया है। भारत मानव विकास सर्वेक्षण 2004-05, 2011-12 और 2022-23 के आंकड़ों का इस्तेमाल करके शोध पत्र में कहा गया है कि 2024-25 में जिन 8.5 फीसदी लोगों को गरीबों के रूप में चिह्नित किया गया उनमें से 3.2 फीसदी 2011-12 से ही गरीब बने हुए हैं जबकि 2.3 फीसदी लोग नए सिरे से गरीबी के शिकार हुए हैं।
अध्ययन में इस बात को रेखांकित किया गया है कि पुरानी गरीबी का स्तर कम हुआ है जबकि अस्थायी गरीबी बढ़ी है। ऐसे मामलों में परिवार समय-समय पर गरीबी के भंवर में गिरते और उससे उबरते रहते हैं। इसमें बार-बार गरीबी के शिकार होने वाले परिवारों को संवेदनशील ठहराते हुए कहा गया है कि गरीबी रेखा और उससे 200 फीसदी ऊपर तक के परिवार इस श्रेणी के हैं। कई अकादमिक अध्ययनों में भी इस बात के प्रचुर प्रमाण मिले हैं जो ऐसी संवेदनशीलता बढ़ाने वाले कारकों को चिह्नित करते हैं। उदाहरण के लिए परिवार में बड़ी संख्या में बच्चों का होना या एक परिवार में आश्रितों की संख्या अथवा भूमिहीनता की स्थिति लोगों के संवेदनशील होने की संभावना बढ़ा देते हैं। हरी झटके मसलन प्राकृ़तिक आपदा, परिवार का ध्यान रखने वाले मुखिया की बीमारी या उसकी मौत अथवा पेशाजनित अवसरों में कमी भी परिवारों को किसी भी समय गरीबी के दुष्चक्र में उलझा सकती है। देखा तो यह भी गया है कि सामाजिक और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के परिवार मसलन अनुसूचित जाति और जनजाति के परिवार अथवा अल्पसंख्यक समुदाय के परिवार इस तरह के जोखिम में अधिक होते हैं।
शोध मे गरीबी की गतिशील प्रकृति को रेखांकित किया गया है और सामाजिक सुरक्षा उपायों को लक्षित करने की मौजूदा व्यवस्था की कमियों को उजागर किया गया है। मौजूदा व्यवस्था गरीबी रेखा के नीचे के संकेतकों पर आधारित है और उसकी अपनी सीमाएं हैं जो इसके असर को कम करती हैं। पहली बात, गरीबी रेखा को लेकर ही काफी बहस है। आलोचक कहते हैं कि गरीबी रेखा की सीमा मनमाने ढंग से तय की गई है जो किसी तरह केवल जीवित रहने से संबंधित है। हालांकि हालिया परिवार खपत व्यय सर्वे के आंकड़े बहस के कुछ पहलुओं का समाधान कर सकते हैं। यह भी देखा जाना है कि क्या यह मसले को हल कर सकता है या नहीं। दूसरी बात, गरीबी की गतिशील प्रकृति को देखते हुए, खासतौर पर संवेदनशील समूहों के मामले में, समय पर आंकड़े नहीं मिलने से परिणाम प्रभावित होते हैं।
अगर सर्वेक्षण समयबद्ध नहीं हुए तो वे परिवारों की आर्थिक स्थिति में बदलाव को सही ढंग से दर्ज नहीं कर पाते। इससे गरीबी के नए उभरते परिदृश्य को हल करना मुश्किल होता है। इसके अलावा बीपीएल कार्ड से कई लाभ जुड़े हैं, फिर चाहे उसे धारण करने वाला गरीब हो या नहीं। इससे भी व्यवस्थागत दिक्कत और संसाधनों का गलत आवंटन सामने आता है। भारत को अपनी संवेदनशील आबादी की जरूरतों को हल करने के लिए बेहतर व्यवस्था की आवश्यकता है। इसके लिए सामाजिक सुरक्षा व्यवस्था को नए सिरे से अधिक समावेशी बनाना होगा। संबंधित कदमों में संवेदनशील समूहों से संबंधित आंकड़े जुटाना, व्यापक निगरानी रणनीति तैयार करना और जोखिम से बचाव आदि शामिल होंगे। कार्यक्रम का डिजाइन तैयार करने में लचीलापन कमजोर पहलों में सुधार लाने वाला हो सकता है जबकि रोजगार के अवसर तैयार करना भी जरूरी है। देश में समतापूर्ण और संतुलित विकास के लिए सामाजिक सुरक्षा को बदलते आर्थिक परिदृश्य के साथ तालमेल वाला बनाना अहम है।
Date: 12-07-24
प्रगतिशील फैसलासंपादकीय
सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों भारतीय राजनीति और समाज पर दूरगामी असर पड़ेगा। वस्तुतः शीर्ष अदालत का यह फैसला भारतीय समाज के एक विशेष धार्मिक समूह में मौजूद जड़ता, यथास्थितिवाद को तोड़ने वाला साबित होगा। यह एक प्रगतिशील फैसला है जिसमें मुस्लिम समाज की पीड़ित तलाकशुदा महिलाओं के भरण-पोषण के अधिकार सुरक्षित हो पाएंगे। धर्मनिरपेक्ष, लोकतांत्रिक और सभ्य समाज के सभी लोगों ने सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले का स्वागत किया है। न्यायमूर्ति नागरत्ना और ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने अपने फैसले में कहा है कि तलाकशुदा मुस्लिम महिलाएं दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 125 (गुजारा भत्ता प्राप्त करने का प्रावधान) सभी विवाहित महिलाओं पर लागू होती है, जिसके दायरे में मुस्लिम महिलाएं भी आती हैं। शीर्ष अदालत ने तलाकशुदा, बेसहारा और अपना भरण-पोषण करने में असमर्थ महिलाओं की आर्थिक और आवासीय सुरक्षा सुनिश्चित करने और उन्हें सशक्त बनाने पर जोर दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम महिला अधिनियम, 1986 और सीआरपीसी की धारा 125 दोनों की व्याख्या करते हुए यह व्यवस्था दी है कि 1986 के कानून से सीआरपीसी की धारा 125 में दिए गए अधिकार समाप्त नहीं हो जाते। लोगों को याद होगा कि 1985 में शाहबानो का मामला बहुत चर्चित हुआ था और इस मामले ने तब की राजनीति को गहरे तक प्रभावित किया था। शाहबानो ने अपने पति मो. अहमद खान से तलाक के बाद मुआवजा के लिए सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था। कोर्ट ने मुआवजा देने का आदेश पारित किया था लेकिन मुस्लिम समुदाय के विरोध के कारण तब की राजीव गांधी सरकार ने संसद में कानून बनाकर शीर्ष अदालत के फैसले को पलट दिया था। तब से अब तक भारतीय राजनीति की धारा बहुत बदल गई है। अब कांग्रेस ने भी इस फैसले का स्वागत किया है। भाजपा का तो यहचुनावी मुद्दा ही रहा है। जाहिर है कि उसने भी स्वागत किया है। बहरहाल, इस मानवीय और कल्याणकारी फैसले से तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं के जीवन में नई रोशनी आएगी।
Date: 12-07-24
इस प्रगतिशील फैसले का स्वागत कीजिएकुरबान अली, ( वरिष्ठ पत्रकार )
सुप्रीम कोर्ट ने एक ऐतिहासिक फैसला सुनाते हुए कहा है कि अब तलाकशुदा मुस्लिम महिलाएं भी भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) की धारा 125 के तहत अपने पूर्व पति से गुजारा-भत्ता मांग सकती हैं। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला कई मायनों में अहम है और देश में समान नागरिक संहिता (यूनिफॉर्म सिविल कोड) लागू करने की दिशा में एक अहम मोड़ है। यह फैसला सन् 1985 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा ही शाह बानो मामले में मुस्लिम तलाकशुदा महिला को गुजारा-भत्ता दिए जाने के निर्णय का समर्थन करता है और तत्कालीन राजीव गांधी सरकार द्वारा संसद में संविधान संशोधन करके तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं को उनके अधिकारों से वंचित किए जाने के कदम को गलत ठहराता है, इसलिए इसका स्वागत किया जाना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट के दो जजों, न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह ने अलग-अलग, पर एक जैसा फैसला सुनाते हुए कहा कि ‘कुछ पति इस तथ्य से अवगत नहीं हैं कि पत्नी, जो एक गृहिणी होती है, की पहचान भावनात्मक और अन्य तरीकों से उन पर ही निर्भर होती है।’ अदालत ने यह भी कहा है कि ‘एक भारतीय विवाहित महिला को इस तथ्य के प्रति सचेत होना चाहिए, जो आर्थिक रूप से स्वतंत्र नहीं है। इस तरह के आदेश से सशक्तीकरण का अर्थ है कि संसाधनों तक उसकी पहुंच बनती है। हमने अपने फैसले में 2019 के अधिनियम के तहत अवैध तलाक के पहलू को भी जोड़ा है। हम इस निष्कर्ष पर हैं कि सीआरपीसी की धारा-125 सभी महिलाओं (लिव-इन समेत) पर लागू होगी, न कि केवल विवाहित महिलाओं पर।
सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने यह फैसला सुनाते हुए एक मुस्लिम शख्स मोहम्मद अब्दुल समद की उस याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें सीआरपीसी की धारा-125 के तहत तलाकशुदा पत्नी के पक्ष में अंतरिम भरण-पोषण के आदेश को उसने चुनौती दी थी। अदालत ने साफ किया कि मुस्लिम महिला (तलाक पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986, सीआरपीसी की धारा-125 के प्रावधानों को रद्द नहीं करता।
दरअसल, इस प्रकरण की शुरुआत तेलंगाना के ‘फैमिली कोर्ट’ के उस फैसले से हुई, जिसमें समद को तलाक के बाद अपनी पूर्व पत्नी आगा को हर महीने 20,000 रुपये गुजारा भत्ता देने को कहा गया था। आगा ने सीआरपीसी की धारा-125 के अंतर्गत फैमिली कोर्ट में गुजारे-भत्ते की गुहार लगाई थी और यह कहा था कि समद ने उन्हें ‘तीन तलाक’ दिया है। अब्दुल समद ने इस फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील की। हाईकोर्ट ने कहा कि इस मामले में कई सवाल उठाए गए हैं, जिन पर फैसला लेना होगा, लेकिन साथ ही उसने याचिकाकर्ता समद को 10,000 रुपये प्रतिमाह अंतरिम भत्ता देने को कहा। हाईकोर्ट के इसी निर्देश को चुनौती देते हुए समद ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया और कहा कि हाईकोर्ट ने इस बात को नजरअंदाज कर दिया है कि 1986 का कानून एक खास कानून है और सीआरपीसी की धारा-125 की तुलना में उसे ही माना जाएगा, क्योंकि सीआरपीसी एक आम कानून है।
गौरतलब है, सन् 1985 के शाह बानो मामले के बाद से ही सुप्रीम कोर्ट लगातार अपने फैसलों में यह कहता आ रहा है कि तलाकशुदा मुस्लिम महिलाएं भरण-पोषण की हकदार हैं। ‘तीन तलाक’ के फैसले में भी सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम महिला के भरण-पोषण के पहलू को स्पष्ट किया था। सन् 1986 के कानून के बाद तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं के भरण-पोषण के बारे में सुप्रीम कोर्ट ने अपना पहला फैसला साल 2001 में ‘दानियाल लतीफी बनाम भारत सरकार’ मामले में सुनाया था और एक तरह से 1986 में केंद्र सरकार द्वारा किए गए संविधान संशोधन को रद्द कर दिया था।
इस नए फैसले ने शाह बानो मुकदमे के बाद के घटनाक्रमों को फिर जेहन में जिंदा कर दिया है। उस मुकदमे में सुप्रीम कोर्ट के फैसले और उसे लेकर अस्सी के दशक में हुई राजनीति ने देश को काफी प्रभावित किया था। तब राजीव गांधी सरकार में राज्य मंत्री रहे और आजकल केरल के राज्यपाल आरिफ मुहम्मद खान ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का जोरदार समर्थन किया था। हालांकि, उनका वह कृत्य कांग्रेस के अधिकतर सांसदों और नेताओं को पसंद नहीं आया था। इसके अलावा, मुसलमानों की एकमात्र नुमाइंदगी करने का दावा करने वाली संस्था ‘ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड’ ने देशव्यापी स्तर पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ आंदोलन शुरू कर दिया और राजीव गांधी सरकार पर दबाव बनाना शुरू कर दिया कि वह संविधान संशोधन कराकर इस फैसले को बदले।
गौरतलब बात यह है कि भाजपा, शिव सेना और वामपंथी दलों को छोड़कर लगभग सभी प्रमुख राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों ने मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की इस नाजायज मांग का समर्थन किया था। राजीव सरकार के वरिष्ठ मंत्री ही नहीं, मोहसिना किदवई, मुफ्ती मुहम्मद सईद, जियाउर्रहमान अंसारी, सीके जाफर शरीफ, गुलाम नबी आजाद और नज्मा हेपतुल्लाह जैसे लोग भी इसी राय के थे कि शाह बानो मामले में आए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को संसद के जरिये बदला जाए।
आखिरकार अपने दल के बहुमत के दबाव में कांग्रेस सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले को संविधान संशोधन के जरिये बदलने का फैसला किया। तब जूनियर मंत्री आरिफ मुहम्मद खान ने विरोध-स्वरूप मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यहीं से देश में सांप्रदायिक राजनीति की शुरुआत हुई, जिसकी परिणति पहले अयोध्या में बाबरी मस्जिद का ताला खोले जाने और फिर उसके विध्वंस के रूप में हुई और भारतीय जनता पार्टी के सत्ता में आने का रास्ता साफ हुआ।
मुस्लिम तलाकशुदा महिला को न्याय दिलाने के बारे में सुप्रीम कोर्ट ने जो फैसला सुनाया है, उसके कई निहितार्थ हैं। एक तो यह कि जाब्ता फौजदारी (सीआरपीसी) में धर्म, संप्रदाय और जाति के आधार पर फैसले नहीं होने चाहिए और संविधान की जो मूल भावना है कि समान नागरिक संहिता बनाई जानी चाहिए उसका अब वक्त आ गया है। दूसरे यह कि समान नागरिक संहिता के बारे में सरकार क्या सोचती है, उसका एक मसौदा देश की जनता के सामने पेश किया जाना चाहिए, ताकि उस पर आम सहमति बन सके और उसे जल्द से जल्द लागू किया जा सके और सबसे महत्वपूर्ण यह कि अदालतों के इस तरह के प्रगतिशील फैसलों का स्वागत किया जाना चाहिए।
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यह सही समय है कि कौशल और शिक्षा को बाजार आधारित प्रोत्साहन ढांचे के साथ जोड़ा जाए। अन्य बहुत से देश ऐसे हैं, जिन्होंने अपने कौशल पारिस्थिति तंत्र में उद्योग की हिस्सेदारी बनाने के लिए एक मॉडल दिया है।
कुछ बिंदु –
क्या भारत के सीएसआर और श्रम उपकर (लेबर सेस) या अन्य प्रावधानों को कौशल विकास के अधिक करीब लाया जा सकता है?
कुल मिलाकर, सरकार को कौशल और रोजगार के बारे में समग्र दृष्टिकोण अपनाना है, और सभी हितधारकों के लिए कौशल में हिस्सेदारी बनाने के उपाय करना है।
‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित अतुल तिवारी के लेख पर आधारित। 17 जून, 2024
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Date: 11-07-24
Even the odd jobsGig workers need a comprehensive national law on their employee statusEditorial
For India’s gig workers, who are increasing in numbers but are perched precariously on the edge of the unregulated labour pool, the Karnataka Platform-based Gig Workers (Social Security and Welfare) Bill, 2024, offers a welcome reprieve, but still stops short of providing them with the security of being employees. When app-based gig work was introduced a decade ago, courtesy ride-sharing and food delivery apps, the absence of the word ‘employee’ was actually seen as a positive; it supposedly offered a chance for ‘partners’ to retain their autonomy and earn good money without being locked into a contract with rigid timings. That illusion soon dissolved as incomes crashed and working hours lengthened, and the lack of a formal ‘employee’ status left workers at the mercy of the aggregator and all-powerful algorithms, in the absence of safety nets or governmental regulation. Despite this, the gig economy is growing. According to a NITI Aayog report, India had 77 lakh gig workers at the beginning of the decade, and by 2029-30, they are projected to account for 4.1% of income, and 6.7% of the non-agricultural workforce.
A rights-based legislation, the draft Bill aims to prevent arbitrary dismissals, provide human grievance redress mechanisms, and to bring more transparency into the opaque tangle of automated monitoring and algorithm-based payments. It is a step up from the Union government’s Code on Social Security, 2020. Karnataka’s law also offers social security through a welfare board and fund, with contributions from the government and the aggregator, either through a cut from every transaction on the app, or as a percentage of the platform’s turnover in the State. Noting that many of the firms that own these platforms report minimal profits, workers’ unions have rightly demanded that the welfare fee is charged as a cess on each transaction. Sceptics note the moribund nature of other unorganised sector welfare boards, but one advantage of mandatory registration with such a board is that it will make gig workers visible in the eyes of the law. Karnataka’s Congress government aims to enact the Bill in the monsoon session of the Assembly, and it must quickly formulate rules and establish the welfare board to ensure that the law is in force before the end of the year. A similar legislation in Rajasthan, enacted by the predecessor Congress government, has been effectively put into cold storage by the BJP government. At the national level, comprehensive legislation is needed not just to set minimum wages, reasonable working hours and conditions and robust social security but also to provide gig workers with the coveted status of ‘employees’.
Date: 11-07-24
सिर्फ जीडीपी वृद्धि नहीं पुख्ता आर्थिकी लक्ष्य होसंपादकीय
तीसरी बार सत्ता में आई मोदी सरकार अपना पहला बजट पेश करेगी। ताजा रिपोर्ट है कि देश में निजी निवेश पिछले 20 वर्ष के न्यूनतम स्तर पर है। यानी निवेशक सशंकित हैं। ऐसे में विकास के लिए जरूरी पूंजीगत निवेश का सारा बोझ सरकार पर होगा। कल्याणकारी योजनाओं की डिलीवरी जरूरी होगी और बजटीय नीतिगत सुधार के जरिए रोजगार के व्यापक अवसर उपलब्ध कराने होंगे। साथ ही आमजन की क्रय शक्ति बढ़ाना और महंगाई पर लगाम लगाना पूर्व शर्त होगी। ये तीनों बजटीय नीतिगत प्रयास किसी देश को वास्तव में खुशहाल और लंबे समय तक विकासोन्मुख रखते हैं। बजट कैसा हो इसके लिए पहले तो केंद्र की सत्ताधारी पार्टी को चुनावी मोड यानी लोकलुभावन प्रयासों से खुद को अलग करना होगा। दरअसल इस साल तीन राज्यों में विधानसभा चुनाव हैं। सरकार को ध्यान रखना होगा कि उसके आर्थिक क्रियाकलापों से सिर्फ देश की जीडीपी ही न बढ़े, बल्कि गरीब-अमीर की खाई भी घटे। एमएसएमई सेक्टर देश में सबसे ज्यादा 12 करोड़ रोजगार देता है, लेकिन पिछले कई वर्षों से मरणासन्न है। किसान के बेटे को स्किल न मिलने के कारण औपचारिक तो छोड़िए, अनौपचारिक सेक्टर में भी रोजगार नहीं मिलेगा, भले ही सरकार उन्हें सेल्फ-एम्पलॉइड मानती रहे। बजट नई सोच के साथ हो ।
Date: 11-07-24
सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसलासंपादकीय
सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश व्यापक प्रभाव वाला है कि तलाकशुदा मुस्लिम महिलाएं भी पति से भरण-पोषण यानी गुजारा भत्ता पाने की अधिकारी हैं। यह इसलिए एक बड़ा और बेहद महत्वपूर्ण निर्णय है, क्योंकि इसके माध्यम से सुप्रीम कोर्ट ने राजीव गांधी सरकार की ओर से उठाए गए एक गलत कदम का प्रतिकार करने के साथ ही मुस्लिम महिलाओं को न्याय देने का काम किया है।
एक तरह से इस निर्णय के जरिये सुप्रीम कोर्ट ने यही रेखांकित किया कि बहुचर्चित शाहबानो मामले में उसकी ओर से दिया गया फैसला सर्वथा उचित एवं संविधानसम्मत था और राजीव गांधी सरकार ने उसे पलट कर सही नहीं किया था।
ज्ञात हो कि शाहबानो पर सुप्रीम कोर्ट का 1985 का फैसला भी गुजारा भत्ता से संबंधित था, लेकिन मुस्लिम तुष्टीकरण की राजनीति के चलते राजीव गांधी सरकार ने इस फैसले को पलट दिया था और 1986 में कट्टरपंथी मुस्लिम संगठनों के दबाव में आकर उनके मन मुताबिक और शरिया के अनुकूल मुस्लिम महिला अधिनियम बनाया था। इस अधिनियम का एकमात्र उद्देश्य मुस्लिम महिलाओं के अधिकारों का हनन करना था।
अब सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह अधिनियम किसी पंथनिरपेक्ष कानून पर हावी नहीं होगा और तलाकशुदा मुस्लिम महिलाएं गुजारा भत्ता के लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत याचिका दायर कर सकती हैं।
तलाकशुदा मुस्लिम महिलाओं के भरण-पोषण पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला केवल यही नहीं कह रहा कि अलग-अलग समुदाय की महिलाओं को भिन्न-भिन्न कानूनों से संचालित नहीं किया जा सकता, बल्कि समान नागरिक संहिता की आवश्यकता भी जता रहा है। इसी के साथ यह भी संदेश दे रहा है कि देश के लोग संविधान से चलेंगे, न कि अपने पर्सनल कानूनों से, वे चाहे जिस पंथ-मजहब के हों।
यह अपेक्षा अनुचित नहीं कि विपक्षी दलों के वे नेता सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले की प्रशंसा करने के लिए आगे आएं, जो पिछले कुछ समय से संसद के भीतर-बाहर संविधान की प्रतियां लहराकर यह दावा करने में लगे हुए हैं कि उन्होंने उसकी रक्षा की है और वे उसे बचाने के लिए प्रतिबद्ध हैं। यदि संविधान के प्रति उनकी प्रतिबद्धता सच्ची है तो उन्हें इस फैसले का स्वागत करना ही चाहिए। इसकी भरी-पूरी आशंका है कि इस फैसले से कुछ मुस्लिम संगठन असहमति जताने के साथ उसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती भी दें।
पता नहीं वे क्या करेंगे, लेकिन राहत की बात यह है कि इस समय केंद्र में मोदी सरकार है, न कि तथाकथित सेक्युलरिज्म की दुहाई देने वाली कोई सरकार। यह सही समय है कि मोदी सरकार समान नागरिक संहिता लागू करने के अपने वादे को पूरा करने की दिशा में आगे बढ़े। इसका कोई औचित्य नहीं कि देश में अलग-अलग समुदायों के लिए तलाक, गुजारा भत्ता, उत्तराधिकार, गोद लेने आदि के नियम-कानून इस आधार पर हों कि उनका उनका पंथ-मजहब क्या है?
Date: 11-07-24
गुजारे का हकसंपादकीय
तलाकशुदा मुसलिम महिलाओं के लिए गुजारा भत्ता संबंधी सर्वोच्च न्यायालय का फैसला ऐतिहासिक है। न्यायालय ने कहा है कि हर महिला को गुजारा भत्ता पाने का अधिकार है, चाहे वह किसी भी धर्म की हो। दरअसल, अभी तक मुसलिम पर्सनल कानून के तहत तलाकशुदा महिलाओं का गुजारा भत्ता तय होता था। शरीअत कानून के मुताबिक इद्दत की अवधि तक ही तलाकशुदा महिला को गुजारा भत्ता दिया जा सकता है। इद्दत यानी तीन महीने की वह अवधि, जिसमें महिला किसी दूसरे के साथ विवाह नहीं कर सकती। मगर सर्वोच्च न्यायलय ने भारतीय दंड संहिता की धारा 125 को सभी महिलाओं पर समान रूप से लागू करार देते हुए कहा कि हद्दत के बाद भी महिलाएं गुजारा भत्ते का दावा कर सकती है। हैदराबाद उच्च न्यायालय ने एक मामले में फैसला दिया था कि पति अपनी तलाकशुदा पत्नी को गुजारा भत्ता दे। उसी फैसले को पति ने सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती दी थी। उसकी दलील थी कि मुसलिम महिला (विवाह विच्छेद पर अधिकारों का संरक्षण) अधिनियम, 1986 के चलते, तलाकशुदा मुसलिम महिला दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत गुजारा भत्ता नहीं ले सकती। मगर सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया कि धर्मनिरपेक्ष कानून पर वह धारा आरोपित नहीं की जा सकती।
मुसलिम महिलाओं के गुजारा भते संबंधी विवादों पर पहले भी अदालतें सहानुभूति पूर्वक विचार कर चुकी हैं। करीब दो वर्ष पहले इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने फैसला दिया था कि तलाक के बाद महिला को पति से गुजारा भत्ता पाने का पूरा हक है। मद्रास उच्च न्यायालय ने कह दिया था कि शरीअत काउंसिल कोई अदालत नहीं है और न उसे कानून बनाने का हक है, तलाकशुदा औरतों को अपने पहले शौहर से गुजारा भत्ता मिलना ही चाहिए। इसी साल बंबई उच्च न्यायालय ने कहा कि तलाकशुदा महिला अगर दूसरी शादी कर लेती है, तब भी वह अपने पहले पति से गुजारा भत्ता मांग सकती है। सर्वोच्च न्यायालय ने उन तमाम फैसलों पर अपनी मुहर लगा दी है। मुसलिम महिलाएं तीन तलाक और गुजारे भने की परंपरा के कारण सदियों से अत्याचार सहन करती आ रही हैं। तीन तलाक के विरुद्ध कानून बन जाने से उन्हें काफी राहत मिली। अब तलाक के बाद दूसरे धर्मों की महिलाओं की तरह ही गुजारा भत्ता पाने का कानून स्थापित हो जाने के बाद उन्हें बड़ी राहत मिलेगी। सर्वोच्च न्यायालय के ताजा फैसला के बाद जो महिलाएं गुजारा भत्ते के लिए पहल नहीं करती थी, वे भी दावा पेश करेंगी।
भारतीय समाज में आज भी अधिकतर महिलाएं विवाह के बाद अपने पति पर निर्भर हैं अगर किन्हीं स्थितियों में पति उन्हें छोड़ देता है, तो उनका भरण-पोषण मुश्किल हो जाता है। जिन महिलाओं के कंधों पर बच्चों को पालने, पढ़ाने- लिखाने का बोझ है, उन पर तो जैसे मुसीबतों का पहाड़ ही टूट पड़ता है। बहुत सारी तलाकशुदा मुसलिम औरतें दुबारा शादी नहीं करती, इसलिए केवल हद्दत तक गुजारा भता पाने से उनके जीवन की मुश्किलें दूर नहीं हो पातीं। फिर, जो महिलाएं दूसरा विवाह कर भी लेती हैं, जरूरी नहीं कि उससे उनके बच्चों का उचित भरण-पोषण हो ही जाए। असल सवाल है कि किसी महिला को केवल धर्म के आधार पर दूसरी महिलाओं से अलग क्यों माना जाना चाहिए। एक नागरिक के तौर पर हर महिला को समान अधिकार मिलना चाहिए। इस दृष्टि से सर्वोच्च न्यायालय का ताजा फैसला एक कल्याणकारी राज्य के कर्तव्यों के अनुकूल और सराहनीय है।
Date: 11-07-24
रूस यात्रा का संदेशसंपादकीय
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का लगातार तीसरी बार सरकार बनाने के बाद अपनी पहली द्विपक्षीय विदेश यात्रा के तौर पर रूस का चुनाव करना बुद्धिमत्तापूर्ण फैसला रहा है। वास्तव में वह अपने तीसरे कार्यकाल की शुरुआत में ही रूस के साथ भारत के द्विपक्षीय संबंधों को और अधिक ऊंचाइयों पर ले जाना चाहते थे। वह अपने इस मकसद में काफी हद तक सफल भी रहे हैं। दोनों नेताओं के बीच बाइसवीं वार्षिक द्विपक्षीय शिखर बैठक के बाद जारी संयुक्त वक्तव्य के मुताबिक दोनों पक्षों ने रणनीतिक साझेदारी के विकास के लिए प्रतिबद्धता दोहराई है। दोनों पक्षों ने नौ प्रमुख क्षेत्रों में सहयोग और मजबूत करने पर सहमति दिखाने के साथ ही 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार 100 अरब डॉलर से अधिक बढ़ाने पर सहमति व्यक्त की है। यह मात्र संयोग था कि मोदी सोमवार को मास्को पहुंचे और उसी दिन यूक्रेन में रूस के क्रूर मिसाइल हमले में 38 लोग मारे गए जिनमें तीन बच्चे भी शामिल हैं। यह हमला यूक्रेन की राजधानी कीव में बच्चों के एक बड़े अस्पताल पर हुआ था। जाहिर है कि यात्रा के शुरुआती दिन हुआ यह विनाशकारी हमला प्रधानमंत्री मोदी को असहज कर देने वाला था। उन्होंने पुतिन के साथ शिखर वार्ता से पहले बच्चों की मौत का मुद्दा बहुत बेबाकी से उठाते हुए कहा कि बेगुनाह बच्चों की मौत हृदयविदारक और पीड़ादायक है। वास्तव में अस्पतालों और नागरिक बस्तियों पर हमला करना अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन है और ऐसे कृत्य युद्ध अपराध की श्रेणी में रखे जाते हैं। हालांकि रूस ने किसी भी नागरिक बस्तियों पर हमले के आरोपों को खारिज किया है। लेकिन सच यह भी है कि रूस ने ऐसा किया है और उसकी बातों पर विश्वास नहीं किया जा सकता। प्रधानमंत्री मोदी ने पूरी दुनिया को युद्ध और शांति के संदर्भ में भारतीय दर्शन से अवगत कराते हुए कहा कि युद्ध के मैदान से किसी तरह का समाधान नहीं निकलता। लोगों को याद होगा कि दो वर्ष पहले समरकंद में शंघाई सहयोग संगठन की बैठक में मोदी ने कहा था कि यह युद्ध का समय नहीं है। मोदी की इस बात की पूरी दुनिया में चर्चा हुई थी। रूसी राष्ट्रपति पुतिन के साथ बातचीत में मोदी ने शांति बहाली की दिशा में भारत के यथासंभव सहयोग करने की पेशकश भी की है। चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने वैश्विक महाशक्तियों को सीधा संवाद बहाल करने में रूस- यूक्रेन की मदद करने की अपील की है। पुतिन ने शांति बहाल करने की पेशकश करने के लिए मोदी का आभार जताया है।
Date: 11-07-24
महिलाओं के हक मेंसंपादकीय
देश की आला अदालत ने बुधवार, 10 जुलाई को एक बार फिर तलाकयाफ्ता महिलाओं के भरण-पोषण के हक में जो फैसला सुनाया है, वह स्वागत योग्य तो है ही, उसके गहरे निहितार्थ भी हैं। न्यायमूर्ति बीवी नागरत्ना और न्यायमूर्ति एजी मसीह की पीठ ने ‘मोहम्मद अब्दुल समद बनाम तेलंगाना राज्य…’ मामले में स्पष्ट कहा है कि देश की दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत कोई भी तलाकशुदा पत्नी अपने पति से गुजारा-भत्ता मांग सकती है और इसमें धर्म कोई रुकावट नहीं है। निस्संदेह, इस फैसले ने लगभग 39 साल पहले के सुप्रीम कोर्ट के उस फैसले की याद दिला दी है, जो ‘शाह बानो मुकदमे’ के तौर पर देश के न्यायिक इतिहास में दर्ज है। तब राजीव गांधी सरकार ने गुजारे-भत्ते की मांग करने वाली शाह बानो के हक में आए उस सुप्रीम फैसले को अपनी विधायी शक्ति से पलट दिया था और इसके कारण देश में न सिर्फ धार्मिक ध्रुवीकरण की राजनीति को बल मिला, बल्कि सुप्रीम कोर्ट की प्रतिष्ठा भी आहत हुई थी। मगर इन चार दशकों में देश के मिजाज में, लोगों की मजहबी सोच में काफी तब्दीली आ चुकी है। तीन तलाक कानून के मुद्दे पर हम इस परिवर्तन को देख चुके हैं।\nकोई भी तरक्कीपसंद लोकतांत्रिक देश और समाज यही चाहेगा कि उसके किसी भी नागरिक के साथ लिंग, रंग या नस्ल के आधार पर किसी किस्म की ज्यादती न हो, बल्कि जो लोग किन्हीं भेदभाव की वजह से पीछे छूट गए हैं, उन्हें अतिरिक्त सहारा दिया जाए, ताकि वे अवसरों के लाभ उठाकर मुख्यधारा में शामिल हो सकें। इसलिए न्यायमूर्ति नागरत्ना की यह टिप्पणी बेहद मानीखेज है कि भारतीय पति पत्नी की भूमिका और त्याग को पहचानें। संयुक्त खाता खोलकर उन्हें आर्थिक संबल प्रदान करें। निस्संदेह, भारत में महिलाओं के पिछडे़पन का एक बड़ा कारण आर्थिक रूप से उनकी पिता, पति या पुत्र पर निर्भरता रही है। उन्हें सशक्त और आत्मनिर्भर बनाए बिना भारत कैसे विकसित राष्ट्र होने के सपने देख सकता है?
विडंबना देखिए, याची अब्दुल समद ने तेलंगाना हाईकोर्ट के निर्णय के खिलाफ उसी कानून के तहत सुप्रीम कोर्ट से संरक्षण की मांग की थी, जिसे शाह बानो मामले में आए फैसले के बाद 1986 में संसद ने बनाया था। मगर अब सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि धर्म इस कानून के आडे़ नहीं आता और अब्दुल समद को अपनी पत्नी को गुजारा-भत्ता देना ही होगा। गौरतलब है, परिवार न्यायालय ने समद को हर माह 20,000 रुपये अपनी बीवी को भरण-पोषण के तौर पर देने का कहा था, जिसके खिलाफ वह तेलंगाना हाईकोर्ट गए। हाईकोर्ट ने गुजारा-भत्ते की राशि घटाकर 10,000 रुपये कर दी थी। मगर समद इससे भी छुटकारा चाहते थे। निस्संदेह, एक इंसाफपसंद देश के तौर पर भारतीय लोकतंत्र ने लंबी वैधानिक दूरी तय कर ली है, मगर महिलाओं के मामले में धार्मिक और सामाजिक बंदिशों के टूटने का सिलसिला अपेक्षाकृत धीमा रहा है। हर धर्म में अच्छी-बुरी प्रथाएं रही हैं। ऐसे में, आदर्श स्थिति तो यही है कि मुस्लिम पर्सनल लॉ या किसी भी अन्य समुदाय के अंदर की विसंगतियां उसी समाज के भीतर से दूर करने की शुरुआत हो, मगर जब ऐसा नहीं होगा, तो संविधान के आलोक में उसे दुरुस्त करने की जिम्मेदारी विधायिका और न्यायपालिका की ही होगी। मोहम्मद अब्दुल समद बनाम तेलंगाना राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट का ताजा फैसला इसी सिद्धांत की स्थापना करता है।
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एआई के दौर में प्रत्येक देश के लिए यह एक बड़ी चुनौती है कि वह इस नई ताकतवर तकनीक को बढ़ावा देते हुए भी कैसे नियंत्रण में रखे? इस वातावरण में जापान ऐसे नियम बना रहा है, जिसमें नवाचार का माहौल बनाने के साथ-साथ सुरक्षित एआई के प्रयोग पर जोर दिया जा रहा है।
जापान ने 2023 के जी-7 शिखर सम्मेलन में हिरोशिमा एआई प्रोसेस (एआई सिस्टम बनाने के लिए अंतरराष्ट्रीय नियमन को बढ़ावा देने वाला फ्रेमवर्क) के दृष्टिकोण को अपनाया है। उसने यूरोपीय संघ या चीन के नियमों की तरह सख्त कानून न बनाकर अपेक्षाकृत नरम कानून बनाना शुरू किया है।
कुछ बिंदु –
ऐसे में, हमें एआई नियमन के लिए जापान को अपना आदर्श मानकर चलना चाहिए। इससे नवाचार व नियमन में संतुलन बना रहेगा।
‘हिन्दुस्तान’ में प्रकाशित जसप्रीत बिंद्रा के लेख पर आधारित। 24 जून, 2024
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Date: 10-07-24
सच न बोलना राजनीति की मजबूरी बन चुकी हैसंपादकीय
किसी देश में 123 लोग भगदड़ में मर जाएं, लेकिन दशकों से ऐसे आयोजनों के नायक (नारायण साकार हरि उर्फ भोले बाबा ) पर सरकार न तो एफआईआर करे, ना ही किसी राजनीतिक दल की हिम्मत हो कि बाबा के खिलाफ एक शब्द भी बोले, तो इसे क्या कहेंगे? यूपी सरकार बाबा के प्रति पहले ही दिन से उदार है! वह अपराध न्याय प्रक्रिया में एक नया शब्द ‘आयोजकों’ ईजाद कर छोटे-मोटे लोगों को असली दोषी मानकर तलाश रही है। मजा तो यह है कि इस भोले बाबा ने भी एक वीडियो जारी कर घटना पर चिंता जताई, अपने आप को घटना के समय अनुपस्थित बताया और कहा कि भगदड़ करने वाले उपद्रवियों को बख्शा नहीं जाएगा। बाबा पर हाथ डालने की हिम्मत न करने का कारण है करीब 15 जिलों के दलितों और पिछड़े वर्ग के लोगों पर उसका जादुई प्रभाव। लिहाजा सत्तापक्ष का डर तो छोड़िए, प्रदेश के प्रमुख विपक्ष के नेता का भी उसके साथ फोटो और बाबा के प्रति उपास्य भाव वाला सम्मान चर्चा में है। कांग्रेस के नेता ने प्रशासन को जिम्मेदार ठहराया, राज्य सरकार को कठघरे में खड़ा किया लेकिन बाबा की दोष युक्तता के बारे में सवाल आया तो कहा कि ‘घटना की गंभीरता पर ध्यान दीजिए और भविष्य में इसकी पुनरावृत्ति न हो इस पर प्रशासन से सवाल कीजिए।’ यानी सत्तापक्ष हो या विपक्ष, सबको एक कमजोर गर्दन की तलाश है और जाहिर है वह है- प्रशासन और उसमें सबसे नीचे का अधिकारी। यानी यह बाबा जो दशकों से अपने हैंडपंप के पानी से बीमारी ठीक करने का दावा करता रहा, अशिक्षित-अतार्किक – अवैज्ञानिक सोच को बढ़ाते हुए अपनी चरणरज से व्यक्तिगत दुःख दूर करने का स्वांग करता रहा, वह इतनी बड़ी घटना के बाद भी लोगों को धोखा देता रहेगा और अपनी ‘भक्त शक्ति’ के चुनावी लाभ या हानि से राजनीतिक वर्ग को नतमस्तक होने को मजबूर करता रहेगा।
Date: 10-07-24
रूस में भारत की बातसंपादकीय
तीसरी बार सत्ता संभालने के बाद अपनी पहली द्विपक्षीय विदेश यात्रा में मॉस्को जाकर भारतीय प्रधानमंत्री ने यह स्पष्ट किया कि भारत के लिए रूस की मैत्री कितनी महत्वपूर्ण है। अपनी इस यात्रा में उन्होंने दोनों देशों के आपसी संबंधों को आगे बढ़ाते हुए यूक्रेन युद्ध के संदर्भ में जिस तरह यह कहा कि बम-बारूद और गोलियों के बीच शांति वार्ता नहीं हो सकती, उससे उनके उस चर्चित कथन का स्मरण हो आया, जिसमें उन्होंने पुतिन से दो टूक कहा था कि यह युग युद्ध का नहीं। चूंकि भारतीय प्रधानमंत्री की मास्को यात्रा के मौके पर ही रूस ने यूक्रेन की राजधानी कीव में बच्चों के अस्पताल को भी निशाना बनाया, इसलिए उन्होंने बिना किसी संकोच यह भी कह दिया कि युद्ध या संघर्ष अथवा आतंकी हमलों में जब मासूम बच्चों की मौत होती है तो हृदय छलनी हो जाता है। भले ही भारतीय प्रधानमंत्री की मास्को यात्रा के अवसर पर यूक्रेन में रूस का जोरदार हमला वाशिंगटन में अमेरिका के नेतृत्व वाले सैन्य संगठन नाटो की बैठक को देखते हुए पश्चिमी देशों को संदेश देने के लिए किया गया हो, लेकिन भारतीय प्रधानमंत्री के लिए रूसी राष्ट्रपति को यह संदेश देना आवश्यक हो गया था कि भारत इस तरह के हमलों का समर्थन नहीं करता। देखना यह है कि यूक्रेन युद्ध पर भारतीय प्रधानमंत्री की फिर से खरी बात पर रूसी राष्ट्रपति कितना ध्यान देते हैं, लेकिन भारत को रूस के साथ अपनी मित्रता जारी रखते हुए यह स्पष्ट करते रहना होगा कि वह रूस-यूक्रेन युद्ध को यथाशीघ्र समाप्त होते हुए देखना चाहता है। यह केवल भारत ही नहीं, बल्कि विश्व शांति के भी हित में है।
यह समझना कठिन है कि यूक्रेन के राष्ट्रपति ने भारतीय प्रधानमंत्री और रूसी राष्ट्रपति के बीच बातचीत का पूरा विवरण सामने आने के पहले ही अपनी नाराजगी क्यों जता दी? उन्होंने एक तरह से कूटनीतिक अपरिपक्वता और उतावलेपन का ही परिचय दिया। उनके इस अपरिपक्व व्यवहार के बावजूद भारत के लिए यही उचित होगा कि वह रूस और यूक्रेन के बीच के युद्ध को खत्म कराने के लिए हरसंभव प्रयास करे। इन प्रयासों के सकारात्मक नतीजे आने से एक तो भारत के हित सधेंगे और दूसरे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर उसका कद बढ़ेगा। भारत के लिए यह भी आवश्यक है कि वह रूस से अपने संबंध आगे बढ़ाते हुए इस पर ध्यान दे कि उसे जिस चीन से खतरा है, उस पर रूस की निर्भरता बढ़ती जा रही है। भारत को रूस को यह संदेश देना ही होगा कि उसे अपने प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए चीन को अपनी हद में रहने के लिए कहना होगा। इस सबके बीच इसकी भी अनदेखी नहीं की जानी चाहिए कि रूस की चीन पर निर्भरता बढ़ने का एक कारण यह भी है कि भारत रूस को उसकी जरूरत की सामग्री का निर्यात नहीं कर पा रहा है।
Date: 10-07-24
परस्पर हितों वाली मैत्रीश्रीराम चौलिया, ( लेखक जिंदल स्कूल आफ इंटरनेशनल अफेयर्स में प्रोफेसर और डीन हैं )
पांच वर्षों के अंतराल के पश्चात प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के रूस दौरे ने खासी उत्सुकता जगाई है। कुछ समीक्षकों के अनुसार रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन द्वारा मोदी का भव्य स्वागत और कई क्षेत्रों में आपसी सहयोग को आगे बढ़ाने के उनके निर्णयों ने सिद्ध कर दिया कि भारत पश्चिम समर्थक विदेश नीति का पालन न करते हुए गुटनिरपेक्ष रुख अपना रहा है। कुछ ने यह भी अटकलें लगाई हैं कि मोदी ने तीसरे कार्यकाल की पहली द्विपक्षीय विदेश यात्रा के लिए रूस को अपना गंतव्य ठीक उसी समय चुना, जब अमेरिका में नाटो गठबंधन के सदस्य देश रूस विरोधी शिखर वार्ता के लिए इकट्ठे हो रहे थे। यानी भारत ने मानो कोई संकेत दिया है कि वह पश्चिमी शक्तियों द्वारा सुझाई गई लकीर पर नहीं चलने वाला। इन अटकलों के बीच भारत ने रूस के साथ पुरानी मित्रता को बरकरार रखकर अपनी जानी-पहचानी रणनीतिक स्वायत्तता का प्रदर्शन किया है। हालांकि यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि भारत रूस के साथ लंबे अर्से से चली आ रही सामरिक साझेदारी से पश्चिम को ललकार रहा है। रूस समर्थकों ने भले ही यह दर्शाना चाहा हो कि मोदी की यात्रा से भारत ने पश्चिम को चुनौती दी है और इससे पश्चिमी देश ‘ईर्ष्या से जल रहे हैं’, परंतु असल में भारत ऐसा कोई मंतव्य नहीं रखता है। विदेश सचिव विनय क्वात्रा ने स्पष्ट किया है कि ‘हम रूस के साथ अपने संबंधों को पूरी तरह से द्विपक्षीय संदर्भ के ढांचे से देखते हैं’ और इस भागीदारी के माध्यम से हमारा पश्चिम के खिलाफ मोर्चा खड़ा करने का कोई इरादा नहीं है।
वर्ष 2022 में जबसे रूस-यूक्रेन युद्ध आरंभ हुआ है, तबसे दुनिया विपरीत खेमों में बंटी हुई है। इस संदर्भ में रूस के प्रति हमारा रवैया वास्तविकता और व्यावहारिकता के आधार पर टिका है। इसमें वैश्विक विचारधारा के द्वंद्वों का कोई प्रश्न नहीं उठता। भारत और रूस की मैत्री वक्त की कसौटियों पर जांची-परखी और खरी है। भारत के 60 प्रतिशत सैन्य प्लेटफार्म रूसी मूल के हैं। भारत के तेल आयात में रूसी हिस्सेदारी 40 प्रतिशत से अधिक हो गई है। रक्षा हो या ऊर्जा सुरक्षा, रूस अब भी हमारे लिए प्रमुख आपूर्तिकर्ता है। इन ठोस कारकों को देखते हुए भारत रूस से मित्रता जारी रखना चाहता है और आपसी लेनदेन में उत्पन्न हो रही बाधाओं और असंतुलन का हल निकालना चाहता है। मोदी-पुतिन शिखर बैठक के बाद की गई घोषणाओं में कई ऐसे मुद्दे सुलझने के स्पष्ट संकेत देखने को मिले हैं। इसमें कोई दो राय नहीं है कि रूस भारत के मुख्य सामरिक साझेदारों की सूची में आज भी ऊपरी पायदान पर है। इसके बावजूद भारत रूस की कमजोरियों और परेशानियों से वाकिफ है।
यूक्रेन युद्ध से जुड़े पश्चिमी आर्थिक और तकनीकी प्रतिबंधों ने रूस के उज्ज्वल भविष्य पर प्रश्न चिह्न लगाया है। युद्ध से जुड़ी गतिविधियों के चलते रूस की आर्थिक वृद्धि तेज हुई है, लेकिन यह विकास टिकाऊ एवं सतत नहीं होने वाला। रूस की अर्थव्यवस्था भारत से काफी छोटी है और वह फिलहाल विश्व में ग्यारहवें स्थान पर है। रूस और भारत के बीच भारी व्यापार घाटे को कम करने के लिए जो विदेशी निवेश रूस से भारत में आना चाहिए, उतनी पूंजी रूस के पास है ही नहीं। प्रौद्योगिकी और विदेशी निवेश के हिसाब से भारत को रूस के मुकाबले पश्चिमी देशों से कई गुना अधिक लाभ मिल रहा है। इसके साथ ही, सैन्य नवाचार और अत्याधुनिक हथियारों के निर्माण में रूस जितना माहिर हुआ करता था, आज इस मामले में वह उतना महारथी नहीं रह गया। यही कारण है कि पिछले एक दशक में रक्षा आयात के क्षेत्र में भारत ने विविधीकरण की नीति के अंतर्गत रूस से सैन्य सामग्री की खरीदारी काफी घटाई है। एक समय भारत की सैन्य सामग्री की 70 प्रतिशत तक पूर्ति रूस से होती थी, जो अब करीब आधी घटकर 36 प्रतिशत रह गई है। इस दौरान फ्रांस जैसे सामरिक सहयोगियों की हिस्सेदारी काफी बढ़ी है। निश्चित रूप से ऐतिहासिक एवं आत्मीय कारणों से भारत रूस को अनदेखा नहीं कर सकता, लेकिन वह उसकी मौजूदा स्थिति से भलीभांति अवगत है। यही कारण है कि रूस की उपयोगिता को बहुत बढ़ा-चढ़ाकर नहीं आंका जा रहा है।
भूराजनीति के दृष्टिकोण से रूस एक समय भारत के लिए चीन की काट बना हुआ था। उस समय रूस वैश्विक महाशक्ति था तो चीन के विस्तारवाद और आक्रामक व्यवहार पर अंकुश लगाए रखता था। दुर्भाग्यवश आज पश्चिमी आर्थिक और कूटनीतिक दबाव से मुक्ति के लिए रूस चीन पर सर्वाधिक निर्भर हो गया है। ऐसे में भारत की अपेक्षा है कि हम रूस के साथ मित्रता को आगे बढ़ाएं, ताकि चीन पूरी तरह से रूस पर हावी न हो जाए। पुतिन स्वयं भी चाहते है कि भारत की दोस्ती के आधार पर रूस चीन के सामने पराधीन और बेबस न नजर आए। हालांकि जिस तादाद में चीन रूस के साथ व्यापार और सैन्य सहयोग कर रहा है, उतनी क्रय शक्ति फिलहाल भारत के पास नहीं है कि वह रूस के लिए दूसरा विकल्प बन सके। भारत के लिए हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के नौसैनिक दबदबे की काट करना अत्यंत महत्वपूर्ण है, किंतु इस लक्ष्य की पूर्ति में हमें शायद ही रूस का साथ मिल सके, क्योंकि चीन की तरह रूस भी हिंद-प्रशांत की अवधारणा को अमेरिकी षड्यंत्र मानता है। रूस-भारत सैन्य सामग्री (लॉजिस्टिक) समझौते पर भी कुछ बात आगे बढ़ी है, लेकिन लगता नहीं कि रूस किसी भी स्थिति में चीन से प्रतिस्पर्धा वाले प्रत्यक्ष गठबंधन का हिस्सा बनेगा। भारत-रूस संबंधों का सार यही है कि रूस चाहता है कि भारत पश्चिम का मुकाबला करने में उसकी मदद करे, जबकि भारत चाहता है कि चीन से मुकाबले में रूस उसके साथ आगे आए। इन विरोधाभासों के मद्देनजर भारत जानता है कि रूस के साथ उसकी ‘विशेष और विशेषाधिकार प्राप्त रणनीतिक साझेदारी’ की सीमाएं हैं। हमारा प्रयास रहेगा कि इन सीमाओं को स्वीकार करते हुए द्विपक्षीय व्यावहारिक सहयोग को जितना बढ़ाया जा सकता है, उतना बेहतर है। तेजी से बदलती और कठिन होती वैश्विक परिस्थितियों के बावजूद इतिहास, भूगोल और आपसी विश्वास पर आधारित रूस-भारत साझेदारी अपनी धुरी पर टिकी हुई है। यह तय है कि दोनों देश इसे कायम रखने के लिए प्रतिबद्धता दिखाते रहेंगे।
Date: 10-07-24
युद्ध में नैतिकतासंपादकीय
रूस और यूक्रेन के बीच जारी युद्ध थमता नजर नहीं आ रहा है। यूक्रेन के रिहाइशी इलाकों में भी बम और मिसाइलों से हमले हो रहे हैं। मगर विडंबना है कि इस युद्ध में वैसी जगहों को भी निशाना बनाया जा रहा है, जहां किसी भी हाल में हमला नहीं किया जाना चाहिए। गौरतलब है कि कीव में गत सोमवार को बच्चों के एक अस्पताल समेत शहर की कुछ अन्य इमारतों पर हमले हुए, जिनमें कई लोगों की जान चली गई। यूक्रेन का दावा है कि बच्चों के अस्पताल पर रूसी सेना ने मिसाइल से हमला किया। हालांकि, रूस ने कहा कि यूक्रेन की वायु रक्षा प्रणाली से छोड़ी गई मिसाइल ही अस्पताल पर गिरी है। दोनों देशों के ये दावे-प्रतिदावे अपनी जगह हैं, लेकिन क्या युद्ध के दौरान अस्पताल जैसे संस्थानों पर हमले करना वाजिब है? अस्पताल बीमार और घायलों को नया जीवन देने का काम करते हैं। यहां तक कि युद्ध में घायल सैनिकों की आखिरी उम्मीद भी उपचार के लिए इन्हीं जगहों पर टिकी होती है।
गौरतलब है कि कीव में यह हमला अमेरिका में होने वाले तीन दिवसीय नाटो शिखर सम्मेलन से ठीक एक दिन पहले हुआ। इस सम्मेलन में रूस-यूक्रेन युद्ध पर भी चर्चा होने की संभावना है। यूक्रेन में युद्ध के दौरान आम नागरिकों के हताहत होने का अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन भी कड़ाई से विरोध कर रहा है। उसका कहना है कि युद्ध में मानवाधिकारों का घोर उल्लंघन हो रहा है। संयुक्त राष्ट्र चार्टर और जेनेवा समझौते के अनुसार युद्ध के दौरान आम नागरिकों और रिहाइशी इलाकों, खासकर अस्पतालों और पनाहगाहों पर जानबूझकर हमला करना प्रतिबंधित है। ऐसी कार्रवाइयों को युद्ध अपराध की श्रेणी में माना जाता है। सवाल है कि क्या युद्ध के दौरान इन अंतरराष्ट्रीय नियमों का पालन सुनिश्चित किया जाता है? जिन देशों ने मिलकर ये नियम तय किए हैं, अगर वे खुद इनका खयाल नहीं रखेंगे तो भविष्य में भी इस तरह की कवायदों का कोई औचित्य नहीं रह जाएगा। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कायदे-कानून बनाने का मकसद वैश्विक समाज की सुरक्षा और बेहतरी पर केंद्रित होता है। यह मकसद तभी सफल हो पाएगा, जब तमाम देश आम सहमति से हुए फैसलों का सम्मान करेंगे।
Date: 10-07-24
दोषियों को दंड मिलेसंपादकीय
हाथरस भगदड़ मामले की जांच के लिए गठित विशेष जांच दल (एसआईटी) ने जिस तत्परता से अपनी रिपोर्ट सौंपी है और उत्तर प्रदेश सरकार ने इसके आलोक में जिस त्वरित गति से एसडीएम समेत छह अफसरों के खिलाफ कार्रवाई की है, उसकी सराहना की जानी चाहिए। इस हादसे में 120 से अधिक मासूम लोगों को अपनी जान से हाथ धोना पड़ा था और उनके परिजनों को जीवन भर का दर्द मिल गया है। ऐसे में, हर तरफ से जिम्मेदारी तय किए जाने की मांग उठ रही थी और राज्य सरकार ने बिना देरी किए जांच दल गठित की थी। अब एक हफ्ते के भीतर अपनी रिपोर्ट सौंपकर एसआईटी ने इंसाफ की प्रक्रिया को गति दी है। अमूमन ऐसी रिपोर्टें तब आती हैं, जब संबंधित घटनाएं लोगों के जेहन से उतर चुकी होती हैं और ऐसे में उन रिपोर्टों पर क्या कार्रवाई हुई, यह लोगों को पता भी नहीं चल पाता और अक्सर लीपा-पोती हो जाती है। मगर हाथरस हादसे की गहरी टीस अब भी लोगों के भीतर बनी हुई है। यही कारण है कि अब यह मामला सुप्रीम कोर्ट में पहुंच गया है, जहां 12 जुलाई को इससे जुड़ी याचिका पर सुनवाई होगी।
एसआईटी ने अपनी रिपोर्ट में आयोजकों को मुख्य रूप से जिम्मेदार ठहराया है और साफ-साफ कहा है कि उन्होंने प्रशासन को धोखे में रखकर इजाजत ली। स्थानीय प्रशासन से तथ्य छिपाए गए और इतनी विशाल भीड़ के प्रबंधन के लिए जरूरी इंतजाम नहीं किए गए थे। बल्कि बाबा नारायण साकार तक लोगों के पहुंचने की कोई व्यवस्था नहीं थी और जब भगदड़ मची, तो आयोजक घटनास्थल से फरार हो गए। ये तमाम बातें तो 2 जुलाई से ही कही जा रही हैं, मगर एसआईटी रिपोर्ट में जिस तरह से एसडीएम की लापरवाही का जिक्र किया गया है, उससे हमारे प्रशासनिक अमले में पैठ आई काहिली का ही उद्घाटन होता है। क्या एसडीएम को बाबा नारायण साकार के सत्संगों में उमड़ने वाली भीड़ का कोई अंदाजा नहीं था कि उन्होंने आयोजन स्थल का दौरा किए बगैर ही इसकी अनुमति दे डाली? उन्होंने वरिष्ठ अधिकारियों तक को सूचित नहीं किया। इसलिए उनके साथ-साथ अन्य संबंधित अधिकारियों का निलंबन बिल्कुल जायज है। सत्संग के आयोजकों के खिलाफ भी सख्त कानूनी कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि फिर कोई आयोजन जानलेवा न बन सके।
विशेष जांच दल ने ‘किसी बडे़ षड्यंत्र’ की आशंका को भी पूरी तरह खारिज नहीं किया है और इसकी गहन तफ्तीश की आवश्यकता पर बल दिया है। उम्मीद है, राज्य सरकार इसे गंभीरता से लेगी। मगर धर्मगुरुओं के लिए भी इस हादसे में एक बड़ी सीख है कि वे कहीं भी सत्संग के लिए जाएं, तो अपने तईं भी आयोजकों से इंतजामों के बारे में दरयाफ्त करें। आखिर श्रद्धालु उनके आकर्षण में जुटते हैं, इसलिए उनकी भी नैतिक जिम्मेदारी बनती है। भारत धर्मपरायण समाजों का देश है और यहां हरेक दिन हजारों जगहों पर छोटे-बड़े आयोजन होते रहते हैं। ऐसे में, बड़े आयोजनों के बारे में जो तय दिशा-निर्देश हैं, उनमें किसी किस्म की शिथिलता नहीं बरती जानी चाहिए। हमारे तंत्र को पेशेवराना तेवर की जरूरत है और यह तेवर तभी आएगा, जब निचले स्तर पर नियमित प्रशिक्षण और उच्च स्तर पर लापरवाह अधिकारियों को दंडित करने की व्यवस्था होगी। जाहिर है, प्रशासन यदि किसी के प्रभाव में आएगा, तो वह पेशेवर बन ही नहीं सकेगा। इसलिए इस मामले के दोषियों की सजा एक नजीर बननी चाहिए।
Date: 10-07-24
भारत-रूस संबंधों की नई इबारतपंकज सरन, ( रूस में रहे भारतीय राजदूत )
मंगलवार को ऑस्ट्रिया के लिए उड़ान भरने से पहले भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन जिस आत्मीय माहौल में बातचीत की मेज पर बैठे, वह इस बात की मुनादी थी कि दोनों देशों के बीच सात दशकों पुराना संबंध अब कितना प्रगाढ़ हो चुका है। यही वजह है कि प्रधानमंत्री मोदी ने शिखर बैठक में आतंकवाद के साथ-साथ यूक्रेन युद्ध का भी जिक्र छेड़ दिया। उल्लेखनीय है, यूक्रेन संकट के कारण रूस पश्चिमी देशों के निशाने पर है, जिसकी प्रतिक्रिया में मॉस्को भी मुखर है। मगर भारत ने बम-बंदूक के बजाय शांति-वार्ता के जरिये समाधान की बात दोहराई। वहीं, आतंकवाद के बहाने रूस को यह एहसास दिलाने की भी कोशिश की गई कि चीन के साथ उसकी नजदीकी परोक्ष रूप से पाकिस्तान को उत्साहित करती है, जो भारतीय जमीन पर आतंकी गतिविधियों को खाद-पानी मुहैया कराने का काम करता है। अच्छी बात यह भी रही कि ईंधन के मामले में भारत को स्थिरता प्रदान करने में रूसी योगदान की प्रधानमंत्री मोदी ने खुलकर सराहना की, जो उचित भी था, क्योंकि अब हम खाड़ी देशों के बजाय सबसे अधिक तेल रूस से ही आयात करने लगे हैं।
इस बैठक से पहले की गई कई अन्य घोषणाएं भी भारतीय हितों के अनुकूल रहीं। मसलन, रूस में दो नए वाणिज्यिक दूतावास खोलने का एलान किया गया है। यह जरूरी था, क्योंकि क्षेत्रफल के हिसाब से रूस से कहीं छोटे देश अमेरिका में हमारे पांच वाणिज्यिक दूतावास हैं, जबकि रूस में अब तक दो ही हैं। बीते करीब तीन दशकों से ऐसा कोई दूतावास रूस में नहीं खुला है, जबकि द्विपक्षीय रिश्ते काफी आगे बढ़ चुके हैं। नए वाणिज्यिक दूतावास के बाद रूस में हमारी गतिविधियां और बढ़ जाएंगी। कारोबार, पर्यटन आदि से जुड़े कामकाज में इजाफा होगा। वहां के बाजार को समझने में कहीं अधिक आसानी होगी और व्यापार को भी फायदा होगा। इसी तरह, यूक्रेन युद्ध में रूस की तरफ से हिस्सा ले रहे भारतीय सैनिकों की वतन वापसी पर बनी सहमति भी काफी अहम है। भारत लगातार यह मांग करता रहा है, जिस पर जल्द ही अमल करने का आश्वासन रूसी राष्ट्रपति ने दिया है।
नरेंद्र मोदी के तीसरे कार्यकाल के इस पहले द्विपक्षीय दौरे पर दुनिया भर की नजरें लगी हुई थीं, जो स्वाभाविक ही था। जब रूस और भारत जैसे बड़े देश मिलते हैं, तो द्विपक्षीय के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय मसलों पर भी बात होती है। विशेषकर यूक्रेन युद्ध को लेकर सबकी उत्सुकता बनी हुई थी, जिस पर प्रधानमंत्री मोदी ने भारत का रुख फिर से स्पष्ट कर दिया। सुखद है कि भारत-रूस संबंध को लेकर अब पश्चिमी देश किसी मुगालते में नहीं हैं। 2000 के दशक में भी रूस के साथ हमारा काफी अच्छा रिश्ता था, बावजूद इसके अमेरिका ने भारत के साथ ऐतिहासिक असैन्य परमाणु समझौता किया था। आज भी बेशक पश्चिमी देशों ने रूस पर तमाम तरह के प्रतिबंध लगाए, लेकिन साल 2023 में भारत ने 46.5 अरब डॉलर मूल्य के कच्चे तेल रूस से मंगाए, जबकि 2021 में यह आंकड़ा सिर्फ 2.5 अरब डॉलर था।
रूस के साथ ऊर्जा सुरक्षा ही नहीं, रक्षा के क्षेत्र में भी हमारी काफी नजदीकी है। रक्षा संबंध करीब 40 साल पुराना है। हम आज भी जितने रक्षा उत्पाद आयात करते हैं, उसका करीब 60-70 फीसदी हिस्सा रूस से ही आता है। ऐसे में, स्वाभाविक है कि इन उपकरणों के रख-रखाव, उन्नतिकरण आदि के लिए भी मॉस्को के साथ लगातार संबंधों को मजबूती दी जाए। फिर, जब कभी हमें जरूरत पड़ी है, रूस हमारी मदद के लिए आगे आया है।
इसी तरह, आपसी कारोबार भी दोनों देशों को काफी करीब ला चुका है। हां, भुगतान एक बड़ा मसला जरूर है, जिस पर इस बार अहम बातचीत हुई है। दरअसल, यूक्रेन युद्ध से पहले दोनों देशों के बीच डॉलर में ही लेन-देन होता था, लेकिन बाद में रूस पर प्रतिबंध और बदली वैश्विक परिस्थितियों के कारण कभी रूबल, तो कभी रुपये, तो कभी संयुक्त अरब अमीरात की मुद्रा दिहरम में व्यापार होने लगा। चूंकि मॉस्को पर लगा प्रतिबंध हाल-फिलहाल में खत्म होता नहीं दिख रहा, इसलिए यह बहुत आवश्यक है कि भुगतान की कोई स्थायी व्यवस्था बने।
ठीक इसी तरह की चुनौती रूसी संसाधनों को लेकर भी है। रूस चूंकि एक विशाल देश है, इसलिए उसके पास प्राकृतिक ऊर्जा, मिनरल आदि के अपार भंडार उपलब्ध हैं। ऐसे में, हमारे लिए यह जरूरी है कि अपने राजनय संबंधों का बेहतर इस्तेमाल करते हुए हम अपने हितों की पूर्ति करें। अभी वह बेशक पश्चिमी देशों के साथ उलझा हुआ है, लेकिन यह हमारे लिए एक मौका भी है। हमने पश्चिमी प्रतिबंधों को नजरअंदाज कर रूस के साथ अपने संबंधों को आगे बढ़ाकर अपनी मंशा स्पष्ट भी कर दी है।
प्रधानमंत्री मोदी की इस यात्रा में परोक्ष रूप से चीन पर भी बात हुई। यह स्पष्ट किया गया कि भारत और रूस के रिश्ते पर किसी तीसरे देश, खासतौर से चीन की तरफ से कोई आंच नहीं आनी चाहिए। चीन से हमें सामरिक तौर पर लगातार चुनौती मिलती रही है और वह पाकिस्तान को भी हरसंभव मदद करता रहता है। ऐसे में, मॉस्को से दशकों पुरानी दोस्ती के नाते यह जरूरी था कि हम उसे यह एहसास दिलाएं कि चीन के साथ भारत के रिश्ते तनावपूर्ण हैं, ताकि बतौर मित्र वह हमारी दिक्कतों को समझे और हमारी मदद करे।
वास्तव में, भारतीय प्रधानमंत्री की इस यात्रा के तीन पहलू थे। पहला, रूस के साथ रिश्ते बनाए रखना, साथ ही पश्चिमी देशों को स्पष्ट कर देना कि यह कोई राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के तहत नहीं की जा रही। भारतीय हितों की वकालत करते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विश्व मानवता की बात करना इसी रणनीति का हिस्सा था। दूसरा पहलू है, इस द्विपक्षीय रिश्ते में कौन-कौन से नए क्षेत्र शामिल किए जा सकते हैं, ताकि यह संबंध एक नई ऊंचाई पर पहुंच सके। विज्ञान-प्रौद्योगिकी और ‘पीपुल-टु-पीपुल कॉन्टैक्ट’ यानी आम लोगों के स्तर पर आपसी संबंध को आगे बढ़ाने पर रजामंदी को इसी नजरिये से देखा जाना चाहिए। और तीसरा पहलू है, पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों की वजह से आने वाली दिक्कतों को दूर करना। भुगतान की टिकाऊ व्यवस्था पर जोर इसकी एक बानगी है।
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भारत और जापान का समृद्ध इतिहास और विरासत के प्रति गहरा सम्मान ऐसा महत्वपूर्ण पक्ष है, जो सहज रूप से दोनों देशों को जोड़ता है। फिर भी दोनों देशों में व्यवहारगत भिन्नताएं बहुत हैं। जापानियों के पास जीवन जीने के ऐसे सात सुंदर गुण हैं, जिनसे भारतीय बहुत कुछ सीख सकते हैं –
1) चिल्लाने से सभ्यता नहीं झलकती – इस बिंदु पर हम भारतवासी बहुत असभ्य हैं। बिना किसी कारण या उकसावे के अपनी आवाज ऊँची करते जाते हैं। जापान में कोई ऐसा नहीं करता। सभी वयस्क; उम्र या सामाजिक स्थिति से परे, सभी के साथ शिष्टाचार दिखाते हैं।
2) अनुशासन – जापानियों के इस गुण ने उन्हें कई आपदाओं पर जीत दिलाई है। वहाँ कोई कतार नहीं तोड़ता। लिफ्ट या ट्रेन में चढ़ने के लिए कोई धक्का-मुक्की नहीं करना। संकट के समय वे शांत और व्यवस्थित तरीके से प्रतिक्रिया करते हैं।
3) अपने काम पर गर्व – निचले से लेकर ऊपरी पायदान तक, हर कोई अपने चुने हुए पेशे में सम्मान की भावना से प्रेरित होता है। नो-टिपिंग नियम इसी जागरूकता से उपजा है। आपको आपके काम के लिए भुगतान किया जाता है। इसके लिए किसी से अतिरिक्त मदद लेने की जरूरत नहीं है। टिप लेना आपके पेशे का अपमान माना जाता है। इससे आपकी प्रतिष्ठा को ठेस पहुँचती है। यह संभवतः जापान में सबसे बड़ी शर्म की बात है।
4) विनम्रता और शालीनता – सुख या दुख का अत्यधिक प्रदर्शन जापानियों में अश्लील माना जाता है। शालीनता को संजोया जाता है। लोग अपने व्यस्त काम से निकलकर आपको दिशा बताने के लिए आगे आ जाते हैं।
5) सुंदरता की प्रशंसा – जापानी सुंदरता के बड़े प्रशंसक होते हैं। उदाहरण के लिए, वहाँ कुछ समय के लिए उगने वाले सकूरा फूल की सुंदरता का वे जश्न मनाते हैं। उसे सम्मान देते हैं।
6) टीमवर्क – जापानी टीम भावना की सराहना करने के लिए किसी ब़ड़े स्टोर में जाएं। आपकी भाषा न समझने पर विक्रेता तीन-चार सहयोगियों को बुला लेगा। पूरी टीम ईमानदारी से आपकी पूरी सहायता करेगी। भारतीय दुकानों में उदासीन, असभ्य विक्रेताओं के साथ इसकी तुलना करें, तो आपको समझ आएगा कि जब ये अपने काम से नफरत करते हैं, तो सहयोगियों को साथ लेकर कैसे चलेंगे।
7) राष्ट्रीय गौरव – यह एक ऐसा बिल्ला है, जिसे हर जापानी व्यक्ति बड़े गर्व से टाँगता है। वहाँ अहंकार के लिए कोई जगह नहीं है।
हम भारतीयों को इन सभी विशेषताओं का अनुकरण करने की जरूरत है।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित शोभा डे के लेख पर आधारित। 16 जून, 2024
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Date: 09-07-24
क्या वजह है कि शोध की दौड़ में हम पिछड़ रहे हैंसंपादकीय
यह निर्विवाद सत्य है कि विकसित देशों के मुकाबले भारत में शोध की गुणवत्ता अच्छी नहीं है। उद्योगों को जो चाहिए, उस पर पर्याप्त शोध नहीं होता और जिस पर शोध होता है, वह उद्योगों की जरूरत से काफी पीछे होता है। इसका कारण प्रतिभा की नहीं, धन की कमी है। एआई-एमएल (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस – मशीन लर्निंग) के दौर में शोध पर जीडीपी का मात्र 0.6 प्रतिशत खर्च करके हम विश्वस्तरीय शोध नहीं कर सकते। प्रधानमंत्री ने जब अपनी अध्यक्षता में ‘अनुसंधान नेशनल रिसर्च फाउंडेशन’ बनाने की घोषणा की और इस पर आने वाले 50 हजार करोड़ रुपए के खर्च का 70 प्रतिशत उद्योगों के जरिए लेने की बात की, तो लगा कि शोध में सुधार होगा। लेकिन पिछले सप्ताह के एक कदम से बहुत उम्मीद नहीं जगी । विज्ञान मंत्रालय ने इस फाउंडेशन की एग्जीक्यूटिव और गवर्निंग बॉडीज की घोषणा की। इनमें एक भी सदस्य उद्योग जगत से नहीं है। यह सरकार का उद्योगपतियों के प्रति रवैया दर्शाता है। अमेरिका या यूरोप में शोध का बड़ा हिस्सा निजी क्षेत्र स्वयं खर्च करता है और उस हिसाब से लाभ भी लेता है। आखिर क्या वजह है कि सेमी-कंडक्टर के उत्पादन को बढ़ावा देने की योजना के तहत गुजरात में इकाई लगाने के लिए एक अमेरिकी उद्योग को उसकी कुल लागत का 70 प्रतिशत सब्सिडी के रूप में देने के बावजूद आज तक देश में फाउंडरीज ही लाई गई हैं ना कि डिजाइनिंग जैसी मौलिक उत्पादन प्रक्रिया शुरू हुई है। रिसर्च फाउंडेशन कानून ने प्रधानमंत्री को उद्योग जगत से पांच सदस्य नामित करने की शक्ति दी है। कहना न होगा कि इस संस्था के भविष्य को लेकर प्रधानमंत्री ने एक बार फिर अफसरशाही पर ज्यादा भरोसा जताया है, क्योंकि तमाम विभागों के सचिव इसके सदस्य होंगे, जिनका उच्च-स्तरीय शोध से कुछ भी लेना-देना नहीं है ।
Date: 09-07-24
सबसे पावरफुल ब्रांड अपने अंदर का आत्मविश्वास हैरश्मि बंसल, ( लेखिका और स्पीकर )
कुछ दिन पहले मैं एक फैंसी मॉल गई, जहां दुनियाभर की फैंसी दुकानें हैं। डिस्प्ले विंडो में एक जूता पसंद आया, प्राइस टैग लगा नहीं था। पूछना पड़ा, ये कितने का है? सेल्समैन ने गंभीरता से उद्घोषणा की, ‘मैडम 70 हजार रु. का। ओनली।’ जी, उस दुकान का सबसे सस्ता माल यही था। क्या उसमें हीरे-जवाहरात जड़े थे? नहीं। वही मटेरियल, जो हर जूते में होता है, डिजाइन थोड़ा अलग था। कीमत सिर्फ ब्रांड की थी। क्रिस्टियां डियॉ, अरमानी, लुई वितों, यहां से खरीद का चार्म किसी नुक्कड़ की दुकान में थोड़े ही मिलेगा।
वैसे कुछ कहानी तो फिर भी बनानी पड़ती है ना, तो लीजिए। हमारा बैग ‘मेड इन इटली’ है। कारीगरी देखिए, पूरा हाथ से बना है। अपने देश में भी जूते-बैग हाथ से बनते हैं। मगर देसी-विदेशी हाथों में फर्क होता है, समझा करो।
खैर, हाल ही में एक खबर आई जिसने इसका भी भांडा फोड़ दिया। जिस ब्रांड का हैंडबैग ढाई लाख रुपए का बिक रहा है, उसे बनाने की कीमत सिर्फ 4500 रुपए है। और माल बनता है छोटे-से कारखाने में, जो इटली में है, मगर बनाने वाले हाथ हैं चीनी। दस घंटा काम करते हैं ये वर्कर्स, बंधुआ मजदूर के समान। अगर महीने में एक भी छुट्टी न लें तो भी 1,000 यूरो नहीं बनेंगे (जो वहां रहने के लिए नाम मात्र पैसा है)। ये जानकारी एक कोर्ट केस के तहत दिए गए बयान से बाहर निकली।
लेकिन कॉमन सेंस की बात है, कहीं न कहीं खरीदने वालों को पता था कि इस बैग में कोई बहुत खास बात नहीं। बस लोगो देखकर औरों पर इफेक्ट पड़ेगा, इसलिए हमें लेना है। चिल्ला-चिल्लाकर कहता है, इसके पास जरूरत से ज्यादा पैसा है। शायद इनके घर से भी प्री-वेडिंग का बुलावा आएगा।
पैसा कोई बुरी बात नहीं, जिसने मेहनत से कमाया है, उसे जरूर एंजॉय भी करना चाहिए। मगर हमारे अंदर एक रडार भी जरूरी है। क्या मैं ये अपनी खुशी के लिए कर रही हूं, या सिर्फ दिखावे के लिए? ये आप आसानी से परख सकते हैं, एक सिंपल टेस्ट से। आपने एक ड्रेस ली, शीशे में खुद को देख मुस्कुराईं। सोचा, मैं अच्छी लग रही हूं। मतलब ड्रेस अपनी खुशी के लिए ली थी, मकसद पूरा हुआ। लेकिन अगर अपनी छवि देखकर आप सोच रही हैं, आज डिंपल जलेंगी, डॉली कॉम्प्लिमेंट देगी, इत्यादि-इत्यादि, तो आप दिखावे वाली कैटेगरी में हैं।
अब आप पूछेंगे, दिखावे में क्या प्रॉब्लम है। दुनिया इसी पर ही तो चल रही है। प्रॉब्लम ये है कि दिखावा करने के बाद भी एक खोखलापन महसूस होता है। क्योंकि सतही स्तर से आगे वो रिश्ता बढ़ नहीं पाता। दो फुट के तालाब में तैरने का वो मजा नहीं, जो गहरे सागर में मिलता है। लोगों की नजर मेरे पहनावे पर लगी हुई है, मुझे तो वो जानते ही नहीं। मेरी खुशी, मेरा गम, मेरा दर्द, मेरा दिल, उस एक लोगो के पीछे छुपा के घूमती हूं। पर इस चक्रव्यूह में से निकलूं कैसे? चलिए एक और प्रयोग करते हैं।
अगली बार लोकल मार्केट जाकर, अपनी पसंद, अपने रंग-ढंग से कपड़े खरीदें। जरूरी है कि आप अपनी पसंद से खुश हों, पहनकर मन में ख्याल आए, मैं अच्छी लग रही हूं। अगर सच्चे दिल से खुद को कॉम्प्लिमेंट किया, तो दूसरे लोगों के भी कॉम्प्लिमेंट्स जरूर आएंगे।
असल में सबसे पावरफुल ब्रांड होता है अपने अंदर का कॉन्फिडेंस। अगर आपके चेहरे पर वो चमकता है, तो लोगों की नजर आप पर टिकेगी। आपके कपड़े-जूते या हैंडबैग पर नहीं। ये करके कैसा महसूस हुआ, नोट करें। एक संतुष्टि जरूर मिलेगी। जरूरी नहीं कि लंबी गाड़ी बेहतर गाड़ी है, आप छोटी गाड़ी में भी बढ़िया सफर कर सकते हैं। जरूरी नहीं कि हर छुट्टी विदेश में मनाई जाए, आप भारत में भी आनंद ले सकते हैं। ऊंचे ब्रांड पहन कर आप बुद्धू बन रहे हैं। उन कंपनियों की जेब भर रहे हैं। दिखावा है एक धोखा। खत्म करो अपने से धोखा।
Date: 09-07-24
फिर भारत की चिंता बढ़ाता नेपालडॉ. ऋषि गुप्ता, ( लेखक एशिया सोसायटी पालिसी इंस्टीट्यूट, दिल्ली के सहायक निदेशक और नेशनल चेंगची यूनिवर्सिटी ताइपे में फेलो हैं )
नेपाल में वाम दल की सरकार एक बार फिर अस्थिरता की ओर बढ़ रही है। इसका कारण नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एमाले) का मौजूदा गठबंधन से अलग होना है। पूर्व प्रधानमंत्री और एमाले पार्टी प्रमुख केपी ओली ने 2022 के संसदीय चुनाव में उभरी सबसे बड़ी पार्टी नेपाली कांग्रेस के प्रमुख शेर बहादुर देउबा के साथ समझौता कर नई सरकार बनाने की बात कही है। 275 सदस्यों वाली प्रतिनिधि सभा में नेपाली कांग्रेस के पास 89 सीटें हैं, एमाले के पास 78 और पुष्प कमल दहल प्रचंड की पार्टी माओवादी सेंटर 32 सीटों के साथ तीसरे नंबर पर है। प्रचंड के पास अब इस्तीफा देने के अलावा और कोई रास्ता नहीं रह गया है। हालांकि यह पहली बार नहीं होगा कि केपी शर्मा ओली और नेपाली कांग्रेस पार्टी प्रमुख और पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा मिलकर सरकार बनाएंगे। वह पहले भी ऐसा कर चुके हैं। इनकी गठित होने वाली सरकार मौजूदा वाम सरकार की अपेक्षा काफी स्थिर होगी, क्योंकि दोनों ही इस पर सहमत हैं कि ओली और देउबा बारी-बारी से सरकार चलाएंगे। वैसे नेपाली राजनीति में समझौतों का सम्मान विरले ही हुआ है और यदि यह सरकार भी गिरती है तो आश्चर्य नहीं होगा, लेकिन सरकारों का बार-बार गिरना नेपाली लोकतंत्र का एक चिंताजनक पहलू है। नेपाल की अस्थिरता भारत के लिए भी चिंता का विषय है।
नेपाल में 2008 का साल लोकतंत्र की स्थापना और एक नई व्यवस्था के आरंभ का पड़ाव बना। दस वर्ष लंबे चले माओवादी विद्रोह के बाद सदियों पुराने हिंदू राजशाही वाले शासन का अंत हुआ। उसी वर्ष पहले लोकतांत्रिक चुनावों में माओवादी सेंटर को अच्छी-खासी सीटें मिलीं और प्रचंड पहले लोकतांत्रिक ढंग से निर्वाचित प्रधानमंत्री बने, लेकिन उनकी सरकार साल भर भी नहीं चली। तब से लेकर आज तक नेपाल की कोई भी पार्टी न अकेले बहुमत हासिल कर पाई है और न ही किसी गठबंधन सरकार ने पांच वर्षों का कार्यकाल पूरा किया है। 2008 से नेपाल में 14 प्रधानमंत्री बन चुके हैं। पिछले दो वर्षों में ही तीन बार सरकारें बनी हैं, जिनमें दो बार वाम गठबंधन वाली सरकारें रहीं। नेपाली राजनीति और राजनीतिक दलों को नजदीकी से देखने पर एक बात साफ तौर पर सामने आती है कि वाम दलों के नेता इसी प्रयास में रहते हैं कि कब प्रधानमंत्री बनने का मौका मिले। प्रचंड और ओली वामपंथी होने के बावजूद एक-दूसरे के धुर-विरोधी हैं और सरकार में रहते हुए भी सत्ता के लिए लड़ते रहे हैं।
वेस्टमिंस्टर संसदीय व्यवस्था में गठबंधन सरकारों का गिरना और बनना आम बात है, लेकिन जिस तरह नेपाल में लोकतंत्र का विकास हुआ है, उसने उसका अधिक नुकसान ही किया है। राजनीतिक अस्थिरता के चलते नेपाल से हर वर्ष लगभग डेढ़ लाख युवा अन्य देशों में काम की तलाश में पलायन कर रहे हैं। वहां इस स्तर का पलायन 1996 से 2006 के बीच हुए माओवादी विद्रोह के दौरान देखा गया था, लेकिन शांति काल में ऐसा होना चिंतनीय है। इसे देखते हुए माना जा रहा है कि आने वाले वर्षों में नेपाल में युवाओं की संख्या कम होती जाएगी। इस राजनीतिक अस्थिरता का उसके व्यापार, विदेशी निवेश और पर्यटन पर भी काफी असर पड़ा है। एक स्थलरुद्ध देश होने के बावजूद नेपाल अभी तक भारत और चीन के विषय में एक विस्तृत विदेश नीति का खाका नहीं तैयार कर पाया है। जब तक कोई नई सरकार और मंत्री नेपाल की विदेश नीति को समझ पाते हैं और नीतिगत निर्णय लेने के बारे में कुछ सोचते हैं, तब तक वह सरकार ही गिर जाती है। किसी देश की विदेश नीति उसके व्यापार और निवेश को कई मायनों में निर्धारित करती है। इसी कारण नेपाल विकास के मोर्चे पर लगातार पिछड़ रहा है।
केपी ओली की विदेश नीति जगजाहिर है। ओली की पिछले दस वर्षों की राजनीति भारत विरोध और चीन के साथ नजदीकी पर टिकी रही है। इस बार भी इसमें ज्यादा अंतर नहीं दिखेगा। वैसे भारत के साथ नेपाल के व्यापार पर इसका अधिक असर नहीं होगा, लेकिन चीन के सामरिक प्रभाव के चलते नेपाल में भारत के सहयोग से चल रहीं पनबिजली और बुनियादी ढांचे के विकास की योजनाओं की गति में कमी देखी जा सकती है। ओली चीन के साथ ज्यादा से ज्यादा जुड़ने की कोशिश करेंगे। 2017 में नेपाल चीन की अत्यंत महत्वाकांक्षी परियोजना बेल्ट एंड रोड पहल का हिस्सा बना था, लेकिन उस पहल के अंतर्गत अभी एक भी प्रोजेक्ट शुरू नहीं हो पाया है। चूंकि बेल्ट एंड रोड पहल चीन के सामरिक नजरिये से महत्वपूर्ण है, लिहाजा वह चाहेगा कि केपी ओली इसमें जान फूंकें। भारत के साथ सीमा विवाद के चलते चीन नेपाल में अपने सैन्य प्रभाव को भी बढ़ाने पर जोर देता रहा है। 2017 और 2018 में नेपाल और चीन की सेना के बीच ‘सागरमाथा मित्रता संयुक्त सैन्य अभ्यास’ हुआ था। 2019 से यह सैन्य अभ्यास बंद पड़ा है। चीन का प्रयास रहेगा कि ओली इसे पुनः शुरू करें।
भारत मानचित्र और कालापानी विवाद के बावजूद नेपाल नीति को एक नई दिशा देने में काफी हद तक सफल रहा है। नेपाल में कुछ दलों की भारत विरोधी नीतियों के बावजूद भारत ‘पड़ोसी प्रथम’ नीति के तहत उससे लगातार संपर्क करता रहा है, लेकिन ओली के सत्ता में आने के बाद भारत को चीन के प्रभाव और भारत विरोधी भावनाओं से निपटने के लिए तैयार रहना होगा। भले ही चीन भारत और नेपाल के व्यापार और सांस्कृतिक संपर्क को न तोड़ पाए, लेकिन नेपाली युवाओं में भारत के खिलाफ कालापानी विवाद के मुद्दे पर भड़काने में कोई कसर नहीं छोड़ेगा।
Date: 09-07-24
उपभोक्ताओं का सशक्तीकरणसंपादकीय
गत सप्ताह एक स्वागतयोग्य घटनाक्रम में भारतीय खाद्य संरक्षा एवं मानक प्राधिकरण (FSSAI) ने खाद्य संरक्षा एवं मानक (लेबलिंग और प्रदर्शन) नियमन 2020 को मंजूरी प्रदान कर दी। इसके तहत खाद्य पदार्थों में नमक, शक्कर और संतृप्त वसा (सैचुरेटेड फैट) के बारे में मोटे अक्षरों में जानकारी देनी होगी। ऐसा नहीं है कि पैकेटबंद खाद्य पदार्थों में यह सूचना उपलब्ध नहीं है लेकिन यह अक्सर छोटे अक्षरों में दी जाती है जिसकी अक्सर अनदेखी हो जाती है। यह कदम उपभोक्ताओं को सही निर्णय लेने में सक्षम बनाने के उद्देश्य से उठाया गया है। इस संशोधन से जुड़ी मसौदा अधिसूचना अंशधारकों के सुझावों और टिप्पणियों के लिए सार्वजनिक पटल पर रखी जाएगी। प्राधिकरण यह देखना चाहता है कि अन्य अंशधारक मसलन कंपनियां प्रस्तावित संशोधन के क्रियान्वयन के बारे में क्या कहना चाहती हैं।
यह कई वजहों से अहम है। भारत तेजी से विकसित हो रहा है और उसका शहरीकरण भी हो रहा है। ऐसे में कई वजहों से अधिक से अधिक संख्या में लोग पैकेटबंद भोजन को अपना रहे हैं। पैकेटबंद खाद्य पदार्थों की सहज उपलब्धता के कारण बड़ी तादाद में बच्चे पैकेटबंद चीजों को खाते हैं जिससे उनके स्वास्थ्य को बड़ा खतरा उत्पन्न होता है। उदाहरण के लिए यूनिसेफ के वर्ल्ड ओबेसिटी एटलस 2022 के मुताबिक 2030 तक भारत में 2.7 करोड़ से अधिक बच्चे मोटापे के शिकार होंगे। यह दुनिया के कुल मोटे बच्चों का करीब 10 फीसदी होगा। भारत में बड़ी तादाद में कुपोषित बच्चे हैं और इस बीच अधिक वजन वाले बच्चों की संख्या भी बढ़ रही है। ऐसे में प्राधिकरण की यह अपेक्षा सही है कि जन स्वास्थ्य में सुधार के लिए इन बदलावों को लागू किया जाए।
प्राधिकरण की इस बात के लिए सराहना की जानी चाहिए कि उसने इस दिशा में सक्रियता दिखाई है लेकिन केवल पोषण संबंधी सूचना को बड़े अक्षरों में लिखाना पर्याप्त उपयोगी नहीं होगा बल्कि उपभोक्ताओं को इसका अर्थ भी पता होना चाहिए। उन्हें यह जानकारी भी होनी चाहिए कि किस सीमा तक उपभोग करने से नुकसान शुरू हो जाता है। साफ कहा जाए तो कुल संतृप्त वसा, नमक और शक्कर के बारे में मोटे अक्षरों में जानकारी दिए जाने के बावजूद बड़े पैमाने पर जागरूकता फैलाने की आवश्यकता है। केंद्र और राज्यों के स्तर पर जन स्वास्थ्य से जुड़े विभागों को यह सलाह दी जानी चाहिए कि वे जागरूकता फैलाने के लिए सार्वजनिक अभियान चलाएं। बेहतर खाद्य पदार्थों का चयन भी स्वास्थ्य व्यवस्था पर दबाव कम करने का काम करेगा।
एक अन्य मुद्दा पैकेटबंद खाद्य पदार्थों में नियमन की सख्ती का भी है। यहां खाद्य नियामक को अधिक सक्रियता दिखाने की जरूरत है। उदाहरण के लिए भारतीयों को कुछ लोकप्रिय ब्रांड के मसालों में हानिकारक तत्त्वों के होने का पता तब चला जब उनका विदेशों में परीक्षण किया गया। इसका खुलासा एक विदेशी गैर सरकारी संगठन ने किया था कि एक लोकप्रिय बेबी फूड ब्रांड भारत जैसे विकासशील देशों में अतिरिक्त चीनी का इस्तेमाल कर रहा है। एक इंटरनेट इन्फ्लुएंसर के खुलासों के बाद ई-कॉमर्स वेबसाइटों को यह सलाह दी गई कि वे कुछ ब्रांडों को स्वास्थ्यवर्धक पेय की श्रेणी में रखकर न बेचें। ऐसे में यह अहम है कि खाद्य नियामक न केवल यह स्पष्ट करे कि विभिन्न तत्त्वों की मान्य सीमा क्या है बल्कि यह भी सुनिश्चित करे कि खाद्य क्षेत्र की सभी कंपनियां दिशानिर्देशों का पालन करें। नियामक को यह सुनिश्चित करने की जरूरत है कि सभी कंपनियां नियमों का पालन करें। यह न केवल लोगों के स्वास्थ्य के लिए बेहतर है बल्कि प्रसंस्कृत खाद्य पदार्थों तथा अन्य उत्पादों के लिए निर्यात के अवसर भी तैयार होंगे। इससे रोजगार का सृजन होगा और सभी को फायदा होगा। वर्ष 2014-15 से 2022-23 के बीच कुल कृषि खाद्य निर्यात में प्रसंस्कृत खाद्य की हिस्सेदारी दोगुनी होकर करीब 26 फीसदी हो गई। खाद्य नियमन में वैश्विक मानकों का पालन अवसर बढ़ाएगा।
Date: 09-07-24
सहकारिता का भारतीय कृषि में योगदानकेसी त्यागी और बिशन नेहवाल
कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ है, जो आधे से अधिक कार्यबल को रोजगार और जीडीपी में महत्त्वपूर्ण योगदान देती तथा देश की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करती है। मगर भारतीय कृषि को लगातार एक चुनौती का सामना करना पड़ रहा है। ‘क्रिसिल’ की 2021 की रपट में कृषि में ऋण अंतर लगभग 6-7 लाख करोड़ रुपए होने का अनुमान लगाया गया था। यह ऋण अंतर कृषि विकास, आधुनिकीकरण और अंतत: किसानों की आय में बाधा उत्पन्न करता है। परंपरागत रूप से, भारतीय किसानों को अनौपचारिक स्रोतों, जैसे साहूकारों पर बहुत अधिक भरोसा है, जो अत्यधिक ब्याज वसूलते हैं। यह ऋण जाल कई किसानों को गरीबी में धकेल देता, यहां तक कि आत्महत्या को भी विवश कर देता है। वाणिज्यिक बैंकों जैसे औपचारिक ऋण संस्थान अक्सर बड़ी ऋण राशि को प्राथमिकता देते हैं, जिससे छोटे और सीमांत किसान दूर हो जाते हैं।
यहीं पर सहकारी समितियां आशा की किरण के रूप में उभरती हैं। अपने विशाल संजाल, सदस्य-केंद्रित दृष्टिकोण और ग्रामीण विकास पर ध्यान देने के साथ, सहकारी समितियां भारतीय कृषि की ऋण आवश्यकताओं को पूरा करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा सकती हैं। जबसे सहकारिता विभाग को कृषि मंत्रालय से अलग कर एक स्वतंत्र मंत्रालय बनाया गया, तब से सहकारिता क्षेत्र में क्रांतिकारी सुधारों की उम्मीद जगी है।
आज भारत में 8.5 लाख से ज्यादा सहकारी समितियों का मजबूत नेटवर्क है, जो कृषि, डेयरी, आवास जैसे विभिन्न क्षेत्रों को मदद करता है। इन समितियों ने ग्रामीण समुदायों को सशक्त बनाने और समावेशी आर्थिक विकास को बढ़ावा देने में अहम भूमिका निभाई है। भारत में कई राज्यों ने कृषि ऋण में सहकारी समितियों की प्रभावशीलता को प्रदर्शित किया है। महाराष्ट्र अपने सफल सहकारी आंदोलन के लिए प्रसिद्ध है, खासकर चीनी और डेयरी क्षेत्र में। वहां सहकारी चीनी मिलों और डेयरी समितियों ने न केवल किसानों को ऋण उपलब्ध कराया, बल्कि मजबूत आपूर्ति शृंखला भी स्थापित की और उनकी उपज के लिए उचित मूल्य सुनिश्चित किया है। गुजरात का अमूल सहकारी माडल इस बात का एक शानदार उदाहरण है कि सहकारी समितियां किस तरह किसी उद्योग में क्रांति ला सकती हैं। ‘भारत का अन्न भंडार’ को जाने वाले पंजाब की कृषि सफलता का श्रेय मुख्य रूप से सहकारी समितियों के अपने मजबूत नेटवर्क को जाता है।
इन समितियों ने आधुनिक कृषि तकनीकों के लिए ऋण उपलब्ध कराने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है, जिससे किसानों की उत्पादकता और आय में वृद्धि हुई है। भारत की तीन स्तरीय सहकारी ऋण संरचना है- प्राथमिक कृषि ऋण समितियां (पैकस) गांव स्तर पर, जिला केंद्रीय सहकारी बैंक (डीसीसीबी) जिला स्तर पर, और राज्य सहकारी बैंक (एससीबी) राज्य स्तर पर। यह व्यापक नेटवर्क लगभग हर गांव में उपस्थित है। सहकारी समितियां सदस्य-स्वामित्व वाली संस्थाएं हैं, जो किसानों के बीच स्वामित्व और समुदाय की भावना को बढ़ावा देती हैं। मानकीकृत ऋण उत्पादों वाले वाणिज्यिक बैंकों के विपरीत, सहकारी समितियां लचीले पुनर्भुगतान कार्यक्रम, छोटी ऋण राशि और निजी कर्जदाताओं की तुलना में कम ब्याज दरों पर ऋण योजनाएं तैयार कर सकती हैं। ये बीज, उर्वरक और उपकरणों के लिए अल्पकालिक ऋण, सिंचाई या पशुधन के लिए मध्यम अवधि के ऋण जैसे छोटे पैमाने की खेती की विविध आवश्यकताओं को पूरा करता है।
सहकारी समितियों का एक महत्त्वपूर्ण लाभ कृषि समुदाय के कमजोर वर्गों को सशक्त बनाने पर उनका ध्यान केंद्रित करना है। छोटे और सीमांत किसान, किराएदार किसान और महिला किसानों को अक्सर संपार्श्विक (कोलेटरल) सुरक्षा या अपर्याप्त दस्तावेजों जैसे कारकों के कारण औपचारिक ऋण प्राप्त करने में कठिनाई होती है। सहकारी समितियां इन वंचित समूहों को ऋण देने को प्राथमिकता दे सकती हैं। यह न केवल सामाजिक समानता, बल्कि समावेशी कृषि विकास को भी बढ़ावा देता है। ये किसानों की अल्पकालिक और दीर्घकालिक दोनों ऋण आवश्यकताओं को पूरा करती हैं।
अल्पावधि ऋण, जिसमें मौसमी कृषि गतिविधियों, जैसे बुवाई, सिंचाई और कटाई के लिए ऋण शामिल हैं। सहकारी समितियां इन तत्काल आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए समय पर और पर्याप्त धनराशि प्रदान करती हैं, जिससे किसान बिना किसी वित्तीय तनाव के अपने फसल चक्र को बनाए रख पाते हैं। कृषि मशीनरी खरीदने, भूमि विकास और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं जैसे पूंजी-गहन निवेशों के लिए, सहकारी समितियां दीर्घकालीन ऋण प्रदान करती हैं। ये ऋण कृषि क्षेत्र में आधुनिकीकरण और उत्पादकता बढ़ाने में मदद करते हैं।
सहकारी समितियां प्रतिस्पर्धी कीमतों पर गुणवत्ता वाले बीज, उर्वरक, कीटनाशक और अन्य कृषि उपादानों के लिए एक विश्वसनीय स्रोत के रूप में कार्य कर सकती हैं। इससे किसानों को बिचौलियों के शोषण से बचने में मदद मिलती है। फसल कटाई के बाद होने वाला नुकसान भारतीय किसानों के लिए बड़ी चिंता का विषय है। एक अनुमान के अनुसार भारत को वार्षिक फसल कटाई के बाद खाद्यान्न में दस से पंद्रह फीसद के बीच नुकसान का सामना करना पड़ता है, जो ज्यादातर अपर्याप्त भंडारण सुविधाओं और अकुशल वितरण नेटवर्क के कारण होता है। यानी हर साल लाखों टन कीमती भोजन बर्बाद हो जाता है। यह एक ऐसी स्थिति है, जो तत्काल और अभिनव समाधान की मांग करती है। सहकारी समितियां किसानों को उनकी उपज को प्रभावी ढंग से संग्रहीत करने में मदद करने के लिए भंडारण सुविधाएं प्रदान कर सकती हैं, जिससे नुकसान कम से कम होगा और जब बाजार की स्थिति अनुकूल होगी, तो उन्हें अपनी फसल बेहतर कीमत पर बेचने की अनुमति मिलेगी।
अपनी क्षमता के बावजूद, भारत में सहकारी समितियों को ऐसी चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जो उनकी प्रभावशीलता में बाधा डालती हैं। नौकरशाही की अक्षमता, उच्च ऋण चूक दरों के कारण कमजोर वित्तीय स्वास्थ्य और पुरानी परिचालन प्रथाएं कुछ ऐसी बाधाएं हैं, जिनका तत्कालीन समाधान किया जाना चाहिए। ऋण अंतर को प्रभावी ढंग से पाटने तथा किसानों का वित्तीय हित सुनिश्चित करने के लिए बहुआयामी दृष्टिकोण की आवश्यकता है। इसमें पैक्स यानी गांव स्तर की संस्थाओं को मजबूत करना बहुत जरूरी है। संचालन को सुव्यवस्थित करना, ऋण वसूली तंत्र में सुधार करना और बेहतर ऋण प्रबंधन के लिए प्रौद्योगिकी को अपनाना आवश्यक कदम हैं। वित्तीय साक्षरता, जोखिम प्रबंधन और आधुनिक कृषि पद्धतियों पर सोसायटी के सदस्यों और कर्मचारियों के लिए प्रशिक्षण कार्यक्रम उनकी परिचालन दक्षता और प्रभावशीलता को बढ़ा सकते हैं। प्रौद्योगिकी को अपनाने से सहकारी समितियों के कामकाज में क्रांतिकारी बदलाव आ सकता है। मोबाइल बैंकिंग, आनलाइन ऋण आवेदन और डिजिटल रिकार्ड रखने से पारदर्शिता बढ़ सकती है, ऋण प्रसंस्करण दक्षता में सुधार हो सकता है और किसानों के व्यापक आधार तक पहुंच हो सकती है।
सहकारी समितियों में भारतीय कृषि परिदृश्य को बदलने की अपार क्षमता है। इन संस्थाओं को पुनर्जीवित करके, सदस्य-केंद्रित दृष्टिकोण को बढ़ावा देकर और प्रौद्योगिकी का लाभ उठाकर, सहकारी समितियां ऋण अंतर को पाट सकती हैं। इससे न केवल भारत की खाद्य सुरक्षा मजबूत होगी, बल्कि ग्रामीण विकास और समग्र आर्थिक विकास में भी महत्त्वपूर्ण योगदान मिलेगा।
Date: 09-07-24
सार्थक स्वास्थ्य योजनासंपादकीय
आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना के लाभार्थियों की संख्या आगामी तीन साल में दोगुनी करने पर केंद्र सरकार विचार कर रही है। शुरुआत में 70 से ज्यादा उम्र वाले बुजुर्गों को इसके दायरे में लाने व बीमा कवरेज को बढ़ाकर दस लाख सालाना करने पर भी विचार कर रही है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्राधीकरण के अनुमान के अनुसार इससे सरकारी खजाने पर 12,076 करोड़ रुपए का अतिरिक्त खर्च आयेगा । इस योजना के लागू होने के बाद देश की दो तिहाई से ज्यादा आबादी इसके दायरे में आ जाएगी। नीति आयोग के अनुसार वर्तमान में तीस फीसद आबादी स्वास्थ्य बीमा से वंचित है। तकरीबन 20 फीसद आबादी सामाजिक स्वास्थ्य बीमा व निजी स्वैच्छिक स्वास्थ्य बीमा के माध्यम से कवर की जाती है। स्वास्थ्य कवर से वंचित इस आबादी को लापता मध्य यानी ‘मिसिंग मिडल’ कहा जा रहा है। इसको इस सेवा के दायरे में लाने के सरकार के प्रयास स्वागतयोग्य कहे जाने चाहिए। गरीबों व असहाय लोगों के लिए शुरू की गई यह योजना प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के ड्रीम क्ट्स में से है। इस योजना के तहत रोगी पर होने वाले खर्चों के कारण पड़ने वाले आर्थिक बोझ पर मदद व गुणवत्तापूर्ण इलाज उपलब्ध कराना है। अब तक इसमें सामाजिक, आर्थिक जातिगत तौर पर पिछड़ों, निराश्रितों, भूमिहीनों, खाद्य सुरक्षा पर्चीधारक, असंगठित मजदूरों आदि को समावेशित किया गया था। सूचीबद्ध निजी अस्पतालों द्वारा इन लाभार्थियों के इलाज से मुकरने या बहानेबाजी करने की लगातार शिकायतें आ रही थीं। देश में आर्थिक रूप से विपन्नों की संख्या को देखते हुए इस योजना का विस्तार किया जाना बेहद जरूरी हो रहा था। गंभीर रोगों के इलाज व औषधियों के बढ़ते दामों के मद्देनजर योजना का विस्तार अच्छा है। मगर सरकार को निजी अस्पतालों, पैथोलॉजी सेंटरों तथा दवाओं की कीमत पर लगाम कसने की योजनाएं बनानी चाहिए। अपने यहां बड़ा मध्य वर्ग भी है, जिसके लिए गंभीर रोगों का इलाज कराना खासा रीढ़ तोड़ने वाला साबित होता है। रही बात स्वास्थ्य बीमा कराने की तो इसके तहत सभी देशवासियों को लाने के प्रयास होने चाहिए। ऐसी योजनाएं बननी चाहिए, जिनसे सबको बेहतर व आसानी से लाभ प्राप्त हो सके। अगर इस योजना में निम्न मध्यम वर्ग को भी शामिल कर लिया जाए तो और ज्यादा लोग लाभान्वित होंगे।
Date: 09-07-24
सत्ता परिवर्तन और भारतीय कूटनीतिडॉ. रमेश ठाकुर
ब्रिटेन में बेशक कड़ाके की ठंड पड़ रही हो, लेकिन आम चुनाव के परिणामों ने अचानक मौसम को गर्म दिया है। वहां राजनीति इतिहास का नया पन्ना लिखा जाएगा, क्योंकि सियासत की नई सुबह का आगाज हुआ है । चुनाव का ऐसा रिजल्ट, जिसकी कल्पना तक किसी ने नहीं की थी। सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों ने भी नहीं सोचा होगा। ब्रिटेनवासियों ने तकरीबन तकरीबन एक तरफा फैसला विपक्ष के हक में सुना डाला। चुनाव में विजय हासिल करने वाली ‘लेबर पार्टी’ ने ब्रिटेन के सियासी इतिहास में पूर्व में जीत के सभी रिकॉर्ड तोड़ डाले हैं। रिजल्ट देखकर पार्टी प्रमुख कीर स्टार्मर फूले नहीं समा रहे।
ब्रिटेनी नेशनल असेंबली में अभी तक वह नेता विपक्ष भूमिका में थे। विपक्ष के तौर पर उन्होंने जो जनकल्याणी मुद्दे कुरेदे। अलबत्ता, भारत के लिहाज से ऋषि सुनक की हार अच्छी नहीं है। क्योंकि प्रधानमंत्री रहते उनका मंदिरों में जाना, पूजा-अर्चना करना, हिंदू-हिंदुत्व की बातें करना, ये सब सनातनी प्रचार का हिस्सा माना जाता था । शायद ऐसा करना उनके लिए नुकसानदायक साबित हुआ हो। ब्रिटेन में बड़ी संख्या में भारतीय मूल के लोग रहते हैं । अफसोस इस बात का है कि उन्होंने भी सुनक से किनारा कर लेबर पार्टी को वोट किया। भारतीयों ने सुनक को क्यों नकारा इसकी समीक्षा लंदन से लेकर भारत में खूब हो रही है। प्रधानमंत्री सुनक बेशक अपनी संसदीय ‘नॉर्थलेरटन’ सीट से जीते हों पर बहुत कम अंतर से ? उनकी समूची पार्टी बुरी तरह से हारी है। सुनक भी मात्र 23,059 वोटों से ही जीते हैं। वरना, शुरुआती रुझानों में उनकी भी हालत पतली थी। दो राउंड तक पीछे रहे। ताज्जुब वाली बात ये है कि ‘नॉर्थलेरटन’ वह क्षेत्र है, जहां सुनक स्वयं रहते हैं और भारतीयों की संख्या भी अच्छी-खासी है। ऋषि के ज्यादातर मंत्री और पार्टी के वरिष्ठ प्रमुख नेता भी चुनाव में चित हो गए। कइयों की तो जमानत जब्त हुई है। लंदन और भारत के मौजूदा चुनावों ने एक बात बता दी है कि मतदाताओं के मिजाज को पढ़ना अब आसान नहीं? कोई नेता या दल इस मुगालते में न रहे कि फलां समुदाय या मतदाता उनका है? बहरहाल, ब्रिटेन में आए चुनाव नतीजे एग्जिट पोल के मुताबिक ही रहे। कुल सीटें 650 हैं, जिनमें एग्जिट पोल में लेबर पार्टी को 410 सीट मिलने का अनुमान था। कमोबेश, फाइनल नतीजे उसके आसपास ही रहे हैं। आए नतीजों को देखकर लेबर पार्टी चमत्कार मान रही है। जैसे, दिल्ली विधानसभा चुनाव नतीजों को देखकर खुद अरविंद केजरीवाल हक्के-बक्के रह गए थे। ब्रिटेन चुनाव में मुद्दे कुछ ऐसे थे, जिनमें ऋषि घिर गए थे। दो प्रमुख मसले जिसमें पहला कोरोना में व्यवस्थाओं का चरमराना, वहीं दूसरा देश की अर्थव्यवस्था का ग्राफ नीचे खिसक जाना ? इन दोनों मुद्दों को लेबर पार्टी ने अपना चुनावी कैंपेन बनाया था। भारत के साथ मित्रता और देशवासियों के हितों की अनदेखी करने का मुद्दा भी लंदन के चुनाव में खूब उछला। बहरहाल, ब्रिटेन की नई हुकूमत के साथ हमारे संबंध कैसे होंगे? इस सवाल के अलावा बड़ा सवाल यह है कि आखिर भारतीयों का सुनक के प्रति मोहभंग हुआ क्यों? ऋषि के भारतीय मूल के होने पर प्रवासी भारतीयों को उन पर गर्व होता था। पर जब वोटिंग का समय आया तो ऐसा प्रतीत हुआ कि भारतीयों ने इमोशनल एंगल की जगह बदलाव के लिए मतदान किया। दरअसल, इसे कंजर्वेटिव पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार के 14 साल के शासन से उपजी निराशा मानी जा रही है। वैसे, दिल पर लेने की जरूरत इसलिए भी नहीं है, राजनीति में हार-जीत कोई बड़ी बात नहीं? बदलाव होते रहते हैं और होने भी चाहिए? किसी एक व्यक्ति या दल के पास सत्ता की चाबी ज्यादा समय तक जनता रखना भी नहीं चाहती। हमारे यहां संपन्न लोक सभा चुनाव में भी दुनिया ने चमत्कारी बदलाव देखें? हालांकि, प्रधानमंत्री सुनक ने हार स्वीकार करते हुए लंदन वासियों से माफी मांगते हुए लेबर पार्टी के नेता ‘कीर स्टार्मर ब्रिटेन’ के अगले शासक बनने के लिए दिल खोलकर बधाई दी है। राजनीतिक लोगों में ऐसे नैतिकता हमेशा रहनी चाहिए। निःसंदेह लेबर पार्टी के लिए ये जीत करिश्माई है। उम्मीदों को सच करने वाली, अभिलाषाओं को जीवित करने वाली और नए इतिहास और संविधान को स्थापित करने वाली है।
नई सरकार पर उम्मीदों का पहाड़ है। चरमराई अर्थव्यवस्था को फिर से पटरी पर लाने की चुनौती के अलावा विभिन्न देशों के साथ संबंध सुधारने की परीक्षा । पनपते नए किस्म के आतंकवाद से निपटना, अमेरिका की बिलावजह दखलदांजी को रोकना, ऊर्जा स्रोतों को स्थानीय स्तर पर खोजना, गैस और प्राकृतिक संसाधनों का उत्सर्जन करना, यूक्रेन – रूस युद्ध के बाद बिगड़े कई मुल्कों से संबंधों को फिर से नई धार देना। भारत के साथ मधुर हुए संबंधों को यथावत रखना किसी चुनौती से कम नहीं होगा। हालांकि स्टॉर्मर ने अपने पहले विजयी भाषण में सिर्फ अपने मुल्कवासियों को संदेश दिया है जिसमें उन्होंने कहा है कि ‘मैं आपकी आवाज बनूंगा, आपका साथ दूंगा, हर दिन आपके लिए लडूंगा। लंदन का एक तिहाई समर्थन उनके पक्ष में है। इस जनादेश और जनसमर्थन को सहेजना भी कठिन परीक्षा जैसा रहेगा।
Date: 09-07-24
मॉस्को में मोदीसंपादकीय
तीसरी बार सत्ता संभालने के बाद अपने पहले द्विपक्षीय विदेश दौरे के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूस को चुना। पिछले दो कार्यकालों में उन्होंने अपनी पहली विदेश यात्रा के लिए पड़ोसी देशों को चुना था। जाहिर है, साल 2014 और 2019 के मुकाबले आज की वैश्विक चुनौतियां काफी अलग हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध ने जहां तमाम देशों की अर्थव्यवस्था और आपूर्ति शृंखला को प्रभावित किया है, तो वहीं हमास-इजरायल जंग ने एक अलग किस्म की मानवीय चुनौती पेश की है। ऐसे में, इस यात्रा के जरिये प्रधानमंत्री ने क्रेमलिन को यह संदेश देने की कोशिश की है कि भारत अपने भरोसेमंद मित्र देश का महत्व समझता है। रूस भी इस कदम की अहमियत से वाकिफ है। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के कार्यालय के प्रवक्ता के बयान इसकी तस्दीक करते हैं। क्रेमलिन प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने प्रधानमंत्री मोदी के नई दिल्ली से उड़ान भरने से पहले ही कहा कि ‘हम एक अति महत्वपूर्ण दौरे की आशा करते हैं, जो दोनों देशों के आपसी रिश्तों के लिहाज से काफी अहम होगा।’
भारत और रूस के शीर्ष नेतृत्व की आखिरी सालाना शिखर बैठक दिसंबर 2021 में हुई थी, तब राष्ट्रपति पुतिन नई दिल्ली आए थे। उसके बाद से शीर्ष स्तर पर दोनों नेताओं की बैठक नहीं हो सकी थी। हालांकि, दोनों देशों के संबंधों की ऊष्मा बनी रही। इसकी एक बानगी उस वक्त देखने को मिली, जब यूक्रेन पर आक्रमण करने के कारण रूस के खिलाफ तमाम प्रतिबंधों के बावजूद भारत ने पश्चिमी रुख को नजरअंदाज करते हुए उससे तेल खरीदना जारी रखा, बल्कि उसने पहले से कहीं अधिक तेल आयात किया। इस तरह उसने अपने अरबों डॉलर बचाए हैं। बहरहाल, प्रधानमंत्री के मौजूदा दौरे ने पश्चिम को प्रकारांतर से यह संदेश दिया है कि भारत की विदेश नीति स्वतंत्र है और अपने राष्ट्रीय हितों से संचालित है। गौर करने वाली बात यह है कि प्रधानमंत्री का मॉस्को दौरा उस समय हुआ है, जब रूस विरोधी नाटो समूह की अमेरिका में बैठक हो रही है।’
किसी एक देश की कीमत पर दूसरे से संबंधों में प्रगाढ़ता का भारत कभी हिमायती नहीं रहा। देर से ही सही, पश्चिम को यह बात अब समझ में आने लगी है। शायद यही कारण है कि अमेरिका के साथ भारत के रिश्ते विगत दो दशकों में काफी सुधरे हैं और वाशिंगटन में भारत की जरूरतों की समझ भी बढ़ी है। जहां तक रूस का प्रश्न है, तो उसके साथ ऊर्जा, रक्षा, व्यापार, निवेश, स्वास्थ्य, शिक्षा-संस्कृति, पर्यटन आदि अनेक क्षेत्रों में भारत के गहरे संबंध हैं और बदली वैश्विक स्थितियों में उन पर नए सिरे से विमर्श जरूरी हैं। निस्संदेह, भारत प्रत्येक देश की संप्रभुता की शुचिता के बडे़ पैरोकारों में से एक रहा है और इसीलिए यूक्रेन पर रूसी हमले का उसने कभी समर्थन नहीं किया। प्रधानमंत्री मोदी कई मौकों पर दोनों पक्षों के बीच बातचीत शुरू करने की आवश्यकता पर जोर दे चुके हैं। मुमकिन है, राष्ट्रपति पुतिन से अनौपचारिक बातचीत में इस मौजूं पर उनकी बात हुई हो। रूस, चीन और ईरान की बढ़ती नजदीकियों पर भी भारत की गहरी निगाह है। प्रधानमंत्री मोदी के दौरे ने यकीनन रूस को यह कहने का अवसर दिया है कि वह लोकतांत्रिक दुनिया में पूरी तरह से अलग-थलग नहीं पड़ा है। ऐसे में, क्रेमलिन को भी बीजिंग के साथ अपने संबंधों की पटकथा लिखते हुए भारतीय हितों और चिंताओं का ख्याल रखना चाहिए।
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स्कूल या कॉलेज का पाठ्यक्रम प्रचार के लिए नहीं होता है। हाल ही में राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद् (एनसीईआरटी) की पाठ्यक्रम में बदलाव को लेकर की गई टिप्पणी कुछ उल्टा संकेत देती है।
डिजिटल युग में अप्रिय तथ्यों को छिपाने से युवाओं को सही शिक्षा नहीं मिल सकती है।
‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 18 जून, 2024
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Date: 08-07-24
Tehran TwistAs religious conservatives ebb in Iran, it’s not Iranian women alone who are taking hope.TOI Editorials
Are presidential elections in Iran free and fair? Hardly. A stark tell is that instead of being selected by political parties, candidates are tightly screened by a guardian council beholden to the Ayatollah. But against this background, the divergence in the two finalists’ platforms was all the more striking. The victory of reformist Masoud Pezeshkian means a great deal more than a first glance at Iran’s political system would suggest.
On domestic liberties | Shervin Hajipour, whose Baraye became an anthem for anti-govt protests, has been sentenced to three years in prison. Pezeshkian’s campaign chose to play this song: “Because of dancing in the street/ Because of fear while kissing/ Because of my sister, your sister, our sister.” In sharp contrast, the defeated conservative advocates even stricter controls on women, to “strengthen the sanctity of the institution of family”. So, although Pezeshkian hasn’t gone as far as to call for an end to compulsory veiling, one real change his election should deliver is a climbdown of morality police.
On foreign relations | On the core national principle of anti-Israelism, no shift has been indicated by Pezeshkian. Plus, there is no sign that the Ayatollah will loosen his fierce grip on major policy decisions. But the world has taken note how Pezeshkian has admitted that fixing Iran’s economy needs lifting of US’s sanctions, which in turn means resolving the standoff over its nuclear programme. Many who have voted for him blame their own plight, such as having had to substitute lamb with lentils, on their govt isolating their country.
On Indian interests | Iran has managed to ward off economic collapse by increasing oil production and sales. Once the US waiver allowing import of Iranian crude ended, India stopped buying it in FY19. But in the years leading up to this, Iran was a big source of crude oil for India, sometimes the third biggest, sometimes the second biggest. Now, roughly 90% of Iranian crude goes to China. An Iran-US detente would be good news for India and the world. Of course, another election, Trump’s, could undo all Pezeshkian movement in this direction.
Date: 08-07-24
If Govts Really Cared, Hathrases Wouldn’t HappenStampede-like crowding is an Indian staple, Jagannath yatra is the latest example. Smoothly run events are exceptions. NDMA has a list of to-dos on crowd control. No administration follows itNandita Sengupta
Within hours of the two-day Jagannath rath yatra in Puri starting to cover its 3km journey, there was news of a “stampedelike” situation, some reports suggesting a death and people critically injured. The yatra is expected to attract 10L devotees. Police and paramilitary are focusing on 50 vulnerable points for bottlenecks and crowd surges. Because this yatra comes a week after the Hathras stampede that killed 121 people at a Dalit gathering of reportedly 2.5L people, administration has been particularly testy.
Again and again, it’s the same story. Back in Hathras, there’s little to suggest lessons are being learnt. There’s nothing to suggest district authorities even believe they’re as accountable as organisers for failing to recognise potential hazards of such a mass in their jurisdiction. The questions ask themselves.
Are local authorities trained enough to spot probable accidents as crowds swell? Do they have the resources or capacity for crowd control? Was there an SOP in place for crowds spilling beyond ‘permission’? Where were people congregated? Did authorities not notice the single exit/entrance? Was the crowd compartmented into seating areas? How many police are required to handle a surge? Where would they come from? These obvious questions are being asked post-mortem. They should’ve been asked pre-event – before permission was given.
That is the crux of crowd management. Planning. Preventive measures. Pre-event steps.
Plans on paper | There’ve been at least three inquiry committees into stampedes that made concrete proposals. But to quote Hegel, “We learn from history that we do not learn from history.” India is bursting with potential for stampedes. City crowds, suburban rail daily passengers, Howrah and Thane, discount days in malls – are everyday a stumble away from a crush.
To address “recurring stampedes”, and “typically ad hoc responses”, NDMA in 2014 released a 95-page document, currently a paper tiger, to “professionalise crowd management”. The National Guide on Crowd Management was specifically meant “for all levels of governance” in states, to move from “crowd control to crowd management”. Its applicability was for any gathering: religious, youth fests, sports and music events, political, even “product promotion”.
It talks of pitfalls and SOPs, underestimation of crowds and overselling of tickets, insufficient holding area in front of entrances and need for observation towers with PA systems. It details clearly identified tasks, and police’s role including “adequate publicity on security”, ensuring no collision of inward-outbound human traffic.
Who owns public safety | Religious gatherings and pilgrimages have been venues for 79% of the stampedes in India. Accountability is slippery. Blame is bouncy. State seldom holds itself responsible.
A stampede in Andhra during an event, Godavari Pushkaram (Naidu’s promotion of Brand Godavari), in July 2015 killed 29 people. An inquiry committee said: “AP govt started a high-decibel media campaign… assumed the role of a religious organisation…people …were welcomed in large numbers.” It went on to reason that “undue and unwarranted publicity” may have “caused the huge gathering”. It concluded that since the injured were medically treated and compensation paid, “the Pushkarams had ended on a happy note to the satisfaction of all.”
But that’s not what Calcutta HC said in a rare case of a stampede victim moving court. Ahead of a cricket match at Kolkata’s Eden Gardens in 1969, in a stampede during ticket sales, a 16-year-old was trampled. Doctors concluded in 1984 his condition post-stampede was “incurable and he’d have to live on medicines for the rest of his life”. The two defendants, govt and organiser, passed the ball one to the other throughout the hearings, but court was clear it was “an act of omission” by the state. That “permission” to an event made the state liable, that both govt and organisers were “liable in negligence for breach of their lawful duties”.
There are of course exceptions where administrations are very serious about crowd control. Like Jagannath yatra, Kumbh stands tall in its crowd management, as do Vaishno Devi and Tirupati. Stampedes still happen, but crowd management ensures casualties are minimised, aid and evacuation made available instantly.
That ‘stampede-like’ matter | Challenge is of administration’s mindset. At Jagannath yatra last year, a woman tripped, triggering what was reported as a “stampedelike” situation. At least 14 were injured, and treated at the district hospital. Such “stampede-like” situations across India are routine, and not just during religious activity.
Who really bothered with the “stampede-like” situation outside Wankhede stadium during Team India’s mammoth celebratory rally? Or the “stampedelike” throng at a UP poll campaign rally in May, or the one at Thane station, also in May, when a dust-storm delayed train services, leading to a pile-up on platforms. Stampedes are averted every day by a whisker and a phew. Administration and police simply throw their hands up.
A thin line separates stampede-like from stampede. It’s not a law and order situation. Crowd management is administrative responsibility, like traffic. State capacity is anaemic. In the Hathras case, the issue isn’t about the virtues and vices of organisers. It’s about state not recognising its weak links.
Date: 08-07-24
Winds of changeThe rest of the world must do more to engage with reformists in IranEditorial
The victory of Masoud Pezeshkian, a reformist who opposes moral policing of women and calls for engagement rather than confrontation with the West, in Iran’s presidential run-off, shows that the Islamic Republic, plagued by economic woes and social tensions, is still capable of springing a surprise. Until a few months ago, Iran’s executive, legislature and judiciary were controlled by the so-called ‘principalists’ (conservatives), who were opposed to reforms. The last few years also saw protests and state repression. The revolution seemed to be ageing. Yet, the Islamic Republic has elected a candidate who calls for change, in a poll that was necessitated by the death of Ebrahim Raisi, a conservative, in a helicopter crash in May. Mr. Pezeshkian, whose only administrative experience was a cabinet berth in the Khatami government over two decades ago, was a relatively obscure figure until last month. When his candidacy was cleared by the Guardian Council, Iran’s reformist coalition, which had been weakened after back-to-back electoral setbacks, threw its weight behind him. Mr. Khatami, and Hassan Rouhani, moderate cleric and President from 2013-21, endorsed him. In the July 5 run-off, he won 53.6% votes to beat conservative rival Saeed Jalili.
In recent years, a growing number of Iran’s voters have stayed away from elections as a protest against the system. In the first round of the presidential election, the 39.9% turnout fuelled debates about the legitimacy crisis of the semi-representative system. But the possibility of a reformist victory brought more voters in the run-off. The nearly 50% turnout helped Mr. Pezeshkian defeat Mr. Jalili despite a conservative consolidation behind him. This also means that the voters have high hopes about Mr. Pezeshkian, who in the past has spoken out against the way protests were handled by security personnel. He also backs dialogue with the West to revive the 2015 nuclear deal, which was sabotaged by Washington in 2018. It is to be seen how far he can go in a system tightly controlled by the Shia clergy. Iran’s President, the highest elected official, has limited powers in the country’s theocracy which is commanded by the Supreme Leader. But with his strong mandate, Mr. Pezeshkian should not shy away from pushing for change. The clerical establishment should see his victory as a message from the public. This is an opportunity to promote gradual reforms at home and careful engagement with the world. If Mr. Pezeshkian and the clergy reach common ground, Iran has a chance to ride out the storms engulfing it.
Date: 08-07-24
The problem of special packagesThat the outcome of an election can determine the fiscal distribution of national resources to a State or States goes against the grain of fiscal federalismR. Mohan [ a former Indian Revenue Service officer ]
Coalition politics is back at the Union level in a substantial way. The Bharatiya Janata Party is dependent on the Janata Dal (United) of Bihar and the Telugu Desam Party of Andhra Pradesh for its parliamentary majority. This is in contrast to 2014 and 2019, when de facto single-party governments came to office. With single-party majority becoming a thing of the past, demand for State-specific discretionary grants, or ‘special packages’, are back with a bang in public discussion.
The positive aspect of single-party dominance being tempered by the presence of coalition partners that can act as a check if unitary trends surge cannot be underestimated. Nevertheless, this is the time to test the hypothesis that when single-party dominance at the Union level fades, federal tendencies bloom and when a single-party majority under a strong leader at the Union level prevails, federal tendencies wilt.
If a healthy federal structure is to be nurtured, the fiscal boundaries, principles of assignment of taxes, and the basis for grants have to be transparent and objective. A federal setup can be asymmetric in a country that is characterised by linguistic, cultural, and economic diversity. But issues of asymmetry should be addressed by means of constitutional provisions that have both transparency and stability.
The Constitution has provisions that address the issues of specific States, or States that have a special status with regard to certain matters mentioned in the Constitution. These provisions are covered, for instance, in Articles 371A to H (Article 370 for the erstwhile State of Jammu and Kashmir, of course, is abrogated).
Purely discretionary
On the contrary, special packages are purely discretionary. They may be need-based, but the need is not the proximate reason for granting a special package, which is an additional grant under Article 282, which falls under ‘Miscellaneous Financial Provisions’. More often than not, they are the result of the bargaining power of some State-level political parties that can tilt the scales of parliamentary majority. What does this augur for the health of our federal set-up?
That the outcome of an election can determine the fiscal distribution of national resources to a State or States goes against the grain of fiscal federalism (or, more correctly, of federal finance). Some States may be justified in their demands for funds, but allocation has to be through the mechanism of the Finance Commission. The Commission is constituted by the President every five years or earlier to make recommendations regarding the distribution of a share of taxes collected by the Union to the States, and how this is to be distributed among the States, as per Article 280; and disbursement of grants to States in need of assistance, as provided in Article 275. The 16th Finance Commission, which is already in existence, cannot be bypassed solely on account of partisan political exigencies.
When the same political party is in power at the Union and State levels, it is called a ‘double-engine sarkar. The main engine has lost the power to run on its own and the owners of smaller engines that are needed to pull the train along are making their own demands. While individual States may well need special packages, process is of the utmost importance. How have these events impacted the political and fiscal relations between the Union and the States?
Federal tendencies
The first issue here is the extent to which our polity is federal. The Constitution has been famously described as having a quasi-federal framework. C.H. Alexandrowicz, however, disputed this description in his work Constitutional Developments in India (1957), stating that in situations other than an Emergency, it assumes a federal character. The Supreme Court has made the succinct observation that our polity is amphibian — it can assume unitary and federal characters depending on whether or not there is an Emergency under Articles 352 and 356 in force (State of Rajasthan and Others v Union of India, 1977).
Be that as it may, it is often argued that the prevailing political environment crucially determines whether federal tendencies bloom or wilt. Keeping this proposition in mind, the hypothesis stated above can be put to test.
How fiscal distribution is done is cardinal in the test of whether or not federalism is strong. In the recent past, some States raised concerns about their share in the divisible pool of Union taxes facing a decline. Tax distribution is formula-based, and it is for the 16th Finance Commission to address this issue and undertake the delicate task of balancing the interests of the States inter se, and with those of the Centre.
The focus here is on grants, in the disbursement of which scope for discretion is wider. In our constitutional framework, the primary task of recommending grants to States in need of assistance is that of the Finance Commission, until Parliament makes legislation in this regard.
But the fact now is that the flow of discretionary grants to the States through Article 282 have far overtaken (by almost a factor of four) that of the grants recommended by the Finance Commissions. Acceding to demands for special packages which are raised by State-based parties, holding the key to parliamentary majority, will weaken the foundations of fiscal federalism, as it will result in diverting national resources away from other States, which too may have pressing needs. If this is allowed to happen, we will see the paradox of federal tendencies wilting instead of blooming when single-party dominance fades.
Date: 08-07-24
घटता शारीरिक श्रम, बढ़ती व्याधियांमनीषा सिंह
किसी देश में सेहत और बीमारी का संबंध सिर्फ इलाज की सहूलियतों और आबादी की तुलना में उपलब्ध अस्पतालों और डाक्टरों की संख्या से हो, जरूरी नहीं। लोगों को कई रोग इसलिए भी घेरते हैं, क्योंकि उनकी दिनचर्या सेहत से जुड़े कायदों के मुताबिक नहीं होती और लोग ऐसी दिनचर्या अपनाते हैं, जिससे उनके बीमार पड़ने की आशंका कई गुना बढ़ जाती है। ऐसे कई अध्ययन और सर्वेक्षण हुए हैं, जो बताते हैं कि हमारे देश में साधन-संपन्नता बढ़ने के साथ लोग अपनी दिनचर्या और स्वास्थ्य को लेकर ज्यादा लापरवाह हुए हैं। ऐसा ही एक अध्ययन हाल में ‘द लैंसेट ग्लोबल हेल्थ’ पत्रिका में प्रकाशित किया है। इसमें दावा किया गया है कि भारतीय शारीरिक सक्रियता के मामले में दूसरे कई देशों के नागरिकों से काफी पीछे हैं।
दुनिया के 197 देशों में सन 2000 से 2022 के मध्य कराए गए इस अध्ययन का उद्देश्य विभिन्न देशों के वयस्क नागरिकों की दिनचर्या में शारीरिक सक्रियता की हिस्सेदारी और स्तर को नापना था। अध्ययन में 197 में से 163 देशों से मिले 507 सर्वेक्षणों का आकलन किया गया, जो दुनिया की कुल आबादी के 93 फीसद हिस्से का प्रतिनिधित्व करते हैं। इनमें से 167 सर्वेक्षण 2010 से पहले के, 268 सर्वेक्षण 2010 से 2019 के मध्य के और 72 सर्वेक्षण 2020 और उसके बाद के हैं। रपट में कहा गया है कि वैसे तो पूरी दुनिया में आम वयस्कों की शारीरिक सक्रियता में कमी आई है, लेकिन इसमें उच्च आय वाले एशिया प्रशांत क्षेत्र के देशों के आंकड़े परेशान करने वाले हैं। भारत ऐसे देशों की सूची में दूसरे स्थान पर है, जहां के वयस्कों में आलस्य यानी सुस्ती बढ़ने के स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं। रपट के मुताबिक आज से करीब पच्चीस वर्ष पहले भारत के वयस्कों का बाईस फीसद हिस्सा ऐसा था, जिसे शारीरिक सक्रियता के मामले में सुस्त माना जाता था। मगर 2010 में यह बढ़कर 34 और 2022 में लगभग 50 फीसद हो गया। कह सकते हैं कि कोविड महामारी के बाद वाले दौर में भारत के आधे वयस्कों की शारीरिक सक्रियता तकरीबन ठप हो चली है। 2030 तक इसके 60 फीसद तक पहुंचने का अनुमान है।
ताजा आंकड़े हमारे देश में 42 फीसद पुरुषों की शारीरिक निष्क्रियता दर्शाते हैं, तो स्त्रियों के मामले में यह 57 फीसद बताया गया है। ऐसा संभवत: इसलिए है क्योंकि घरेलू कामकाज में स्त्रियों की भूमिका लगातार सिकुड़ रही है। यहां शारीरिक सक्रियता से आशय तेज चलने, दौड़-धूप वाले काम करने और ऊर्जा जलाने वाले व्यायाम से है। हालांकि वैश्विक स्तर पर वयस्कों का निष्क्रियता संबंधी आंकड़ा वर्ष 2010 में 26.4 था, जो अब बढ़कर 31.3 फीसद हो गया है। कह सकते हैं कि इस निष्क्रियता में एक बड़ी भूमिका कोविड महामारी के दौर की हो सकती है। कोविड महामारी के दौरान सारे कामकाज इंटरनेट के जरिए घर बैठे कराने का चलन स्थापित हुआ, जो बाद में परिपाटी में बदल गया। इससे लोगों का घर से बाहर निकलना कम हो गया। यहां तक कि ‘वर्क फ्राम होम’ यानी ‘घर से काम’ की संस्कृति और विकसित हो जाने से दफ्तर जाने की अनिवार्यता में भी भारी कटौती हो गई है। इससे भी वयस्कों की शारीरिक निष्क्रियता बढ़ी है।
शारीरिक सक्रियता में कमी को लेकर इसलिए चिंता जताई जा रही है कि व्यायाम, दौड़-धूप वाला कोई काम न करने, पैदल न चलने का असर यह होता है कि शरीर पर चर्बी बढ़ने लगती है और कई अंग भारी वसा और निष्क्रिय जीवनशैली के असर से पैदा बोझ के तले दबते चले जाते हैं। इन दशाओं में मनुष्य का पाचनतंत्र कमजोर या बीमार हो जाता है। भोजन से मिली ऊर्जा खर्च न हो पाने की दशा में शरीर पर वसा और अतिरिक्त मांस के रूप में जमा हो जाती है। इससे मोटापा, उच्च रक्तचाप, हृदयरोग और पाचन तंत्र की कई समस्याएं बढ़ जाती हैं। इन बीमारियों को जीवनशैली संबंधी बीमारियों के रूप में पहचाना जाता है, जो दुनिया के लिए एक बड़े स्वास्थ्य संकट की तरह सामने आ रही हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन ने 2017 में अपने एक वृहद अध्ययन में बताया था कि भारत में 61 फीसद गैर-संक्रामक मौतों के पीछे लोगों की निष्क्रिय दिनचर्या है। दुनिया के 19 लाख लोगों की दैनिक शारीरिक सक्रियता का अध्ययन करके पेश की गई इस रपट में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अंदाजा लगाया था कि इस वक्त दुनिया में करीब 140 करोड़ लोगों की शारीरिक सक्रियता काफी कम है, लेकिन उस वक्त इस रपट में बताया गया था कि भारत के 24.7 फीसद पुरुषों और 43.3 फीसद महिलाओं को अपने हाथ-पांव हिलाने में ज्यादा यकीन नहीं है। यह आंकड़ा अब बढ़ चुका है। मगर पड़ोसी देश चीन ने ‘हेल्दी चाइना 2030’ अभियान चलाया है। इसी तरह आस्ट्रेलिया ने 2030 तक अपने 15 फीसद नागरिकों को व्यायाम में सक्रिय बनाने का लक्ष्य रखा है। ब्रिटेन में 2030 तक पांच लाख नए लोगों को व्यायाम से जोड़ने का लक्ष्य रखा गया है, जबकि अमेरिका में एक हजार शहरों को ‘फ्री फिटनेस’ से जोड़ने का अभियान चलाया गया है।
महत्त्वपूर्ण बात यह है कि यह सुस्ती हमारी पूरी जीवनशैली और कार्य संस्कृति में समाई हुई है और इसलिए यह एक चेतावनी है। इसलिए ऐसे अध्ययनों की गंभीरता को समझते हुए भारतीयों को अपनी दिनचर्या में बदलाव को लेकर तुरंत सतर्क हो जाने की जरूरत है। इस चेतावनी का सबसे अहम पहलू शारीरिक परिश्रम से जुड़ा है, जिसकी भारतीय जीवन में जबर्दस्त अनदेखी हो रही है। इसमें महिलाओं और पुरुषों ही नहीं, बच्चों की बदलती जीवनशैली के भी संकेत निहित हैं।
हमारे देश और समाज की आर्थिक उन्नति तेज शहरीकरण के रूप में दिखती है, जहां आधुनिक सुख-सुविधाओं में काफी ज्यादा बढ़ोतरी हुई है। कारों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है और अब लोग छोटे-मोटे कामों में भी कारों का इस्तेमाल करने लगे हैं। यही नहीं, ई-कामर्स की बदौलत अब तो बाजार खुद लोगों के घरों में आ पहुंचा है। ऐसे में अधिक से अधिक कसरत आंखों और हाथ की उंगलियों की ही होती है, अन्यथा लोग हाथ-पांव हिलाए बिना टीवी के सामने जमे रहते हैं। कहीं कोई चलने-फिरने का दबाव नहीं, जरूरत नहीं। यह सही है कि चिकित्सा विज्ञान की बदौलत इंसान की औसत उम्र में इजाफा हो रहा है, लेकिन लोग ऐसी बीमारियों से ग्रस्त रहने लगे हैं, जिन्हें जीवन-शैली की बीमारियां कहा जाता है। ‘लैंसेट’ में 2017 में प्रकाशित अध्ययन ‘ग्लोबल बर्डन आफ डिजीज’ में कहा गया था कि अमीर देशों के लोग यह समझने लगे हैं कि सेहत कितनी जरूरी है, इसलिए वे शारीरिक श्रम को महत्त्व देने लगे हैं, लेकिन भारत जैसे देशों में यह बात समझी नहीं जा रही। लिहाजा, गरीब और विकासशील देशों में अमीर मुल्कों की तुलना में लोग ज्यादा दिन बीमार रहते हैं।
Date: 08-07-24
भारत-ब्रिटेन की प्रतिबद्धतासंपादकीय
ब्रिटेन में लेबर पार्टी की जीत के साथ ही कीर स्टार्मर नये प्रधानमंत्री चुने गए हैं, और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने फोन पर उन्हें बधाई दी। कीर स्टार्मर ने भी मोदी को चुनावी जीत पर बधाई दी। शनिवार को अपनी पहली बातचीत में दोनों नेताओं ने भारत और ब्रिटेन के बीच व्यापक रणनीतिक साझेदारी को और गहरा करने के लिए प्रतिबद्धता जताई। पीएम मोदी ने स्टार्मर को जल्द भारत आने का निमंत्रण दिया और दोनों नेताओं ने संपर्क में बने रहने पर सहमति जताई। मोदी ने ‘एक्स’ पर एक पोस्ट में कहा, ‘कीर स्टार्मर से बात करके खुशी हुई। उन्हें ब्रिटेन का प्रधानमंत्री बनने पर बधाई दी। हम अपने लोगों की प्रगति और समृद्धि तथा वैश्विक भलाई के लिए व्यापक रणनीतिक साझेदारी और मजबूत भारत-ब्रिटेन आर्थिक संबंधों को गहरा करने के लिए प्रतिबद्ध हैं।’ भारत और ब्रिटेन बीते दो वर्षों से मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) पर बातचीत करते रहे हैं, लेकिन तेरह दौर की बातचीत के बावजूद एफटीए समझौता नहीं हो सका। चौदहवें दौर की वार्ता चल रही थी कि एकाएक दोनों देशों में आम चुनाव की घोषणा हो गई। उम्मीद है कि स्टार्मर जल्द ही इस वार्ता को फिर से आरंभ करेंगे और यह वार्ता नतीजाकुन होगी। भारत और ब्रिटेन जनवरी, 2022 से ही एफटीए सिरे चढ़ाने के लिए प्रयासरत हैं, जब बोरिस जॉनसन ब्रिटेन के प्रधानमंत्री थे। दोनों देशों के बीच 38.1 अरब पाउंड का द्विपक्षीय व्यापार होता है, और ये चाहते हैं कि द्विपक्षीय व्यापार को और बढ़ाया जाए। एफटीए होने पर इस दिशा में उत्तरोत्तर प्रगति हो सकती है। लेकिन 2022 से शुरू हुई यह कवायद बार-बार अवरुद्ध होती रही है। इसे ब्रिटेन में राजनीतिक उथल-पुथल का सामना करना पड़ा। पहले लिज ट्रस को थोड़े समय के लिए प्रधानमंत्री बनाया गया तो एफटीए की दिशा में काम नहीं बढ़ सका। उनके बाद ऋषि सुनक के प्रधानमंत्री बनने पर उम्मीद बनी कि अब एफटीए हो सकेगा लेकिन उनके कार्यकाल में भी यह पूरी नहीं हो सकी। व्यापार के मोर्चे पर ही नहीं, बल्कि हिन्द-प्रशांत क्षेत्र से संबंधित घटनाक्रम को लेकर भी दोनों देशों के बीच समन्वय और समझ की दरकार है। कीर स्टार्मर ने प्रधानमंत्री के रूप में अपने पहले भाषण में ब्रिटेनवासियों को आश्वस्त किया है कि वे अपने जीवन में जल्द ही सकारात्मक बदलाव महसूस करेंगे। हालांकि उनका यह भी कहना है कि देश को बदलना स्विच दबाने जैसा नहीं होता। दुनिया पहले से कहीं अधिक अस्थिर है, और देशों के बीच व्यापक रणनीतिक साझेदारी जरूरी है।
Date: 08-07-24
घातक आरामतलबीसंपादकीय
कहने को तो स्वास्थ्य के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर जागरूकता बढ़ी है और विभिन्न प्रकार के रोगों को लेकर शोध एवं अनुसंधान के क्षेत्र में पहले के मुकाबले निवेश भी बढ़ा है, मगर विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के शोधार्थियों ने अपने हालिया अध्ययन के आधार जो नए तथ्य उजागर किए हैं, वे एक बड़ी चुनौती की ओर इशारा कर रहे हैं, बल्कि एक अलग किस्म की चिंता पैदा करते हैं। द लांसेट में प्रकाशित यह अध्ययन-रिपोर्ट बताती है कि विश्व भर के वयस्कों की एक तिहाई से भी अधिक आबादी या 1.8 अरब वयस्क शारीरिक गतिविधि के अपेक्षित स्तर पर खरे नहीं उतरते, यानी वे पर्याप्त शारीरिक श्रम नहीं कर रहे हैं। इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि पिछले बारह वर्षों में वयस्कों में शारीरिक निष्क्रियता की प्रवृत्ति पांच फीसदी बढ़ गई है और यही प्रवृत्ति बनी रही, तो 2030 तक ऐसे वयस्कों की संख्या 31 प्रतिशत से बढ़कर 35 फीसदी हो जाएगी। डब्ल्यूएचओ की साफ सिफारिश है कि वयस्कों को हर हफ्ते 150 मिनट तक मध्यम गति वाली या 75 मिनट तक तेज शारीरिक गतिविधि करनी चाहिए। ऐसे में, ताजा आंकडे़ परेशान करने वाले हैं, क्योंकि शारीरिक निष्क्रियता वयस्कों में हृदय संबंधी रोग के साथ-साथ मधुमेह, डिमेंशिया व कुछ खास तरह के कैंसर का जोखिम बढ़ा देती है।\nविडंबना यह है कि पश्चिम के विकसित देशों के मुकाबले आरामतलबी या शारीरिक निष्क्रियता की दर एशिया प्रशांत क्षेत्र और दक्षिण एशिया के वयस्कों में बहुत अधिक दर्ज की गई है। पश्चिम के उच्च आय वाले विकसित देशों के वयस्कों में जहां यह निष्क्रियता-दर 28 फीसदी पाई गई, वहीं एशिया प्रशांत क्षेत्र के उच्च आय वाले देशों के वयस्कों में 48 प्रतिशत और दक्षिण एशियाई संपन्न देशों में 45 फीसदी देखी गई है। साफ है, एशियाई सरकारों के लिए खतरे की सूचना है, क्योंकि यह प्रवृत्ति हृदय रोगों और कैंसर की रोकथाम की उनकी कोशिशों को पलीता लगा सकती है। डब्ल्यूएचओ में स्वास्थ्य संवर्द्धन के निदेशक डॉ रुडिगर क्रेच ने उचित ही कहा है कि शारीरिक निष्क्रियता वैश्विक स्वास्थ्य के लिए एक मूक खतरा है, जो पुरानी बीमारियों का बोझ बढ़ाती है। \nबेहतर आर्थिक स्थिति वाले देशों, खासकर दक्षिण एशियाई मुल्कों के वयस्कों में शारीरिक निष्क्रियता क्यों बढ़ रही है, इसको जानने के लिए किसी नजूमी की जरूरत नहीं है। उम्र के जिस हिस्से में वे हैं, उसमें उनका करियर लगभग तय हो चुका है और उनकी जीवन शैली भी एक खास शक्ल अख्तियार कर चुकी है। यहां के ज्यादातर वयस्क अधिक से अधिक सुविधाओं के अभ्यस्त होते जा रहे हैं। वे स्कूटर से कार और फिर कार के आगे हवाई सफर को जरूरत से ज्यादा अपनी हैसियत से जोड़कर देखते हैं। पैदल चलना या सार्वजनिक परिवहन का उपयोग करना उनकी निगाह में पिछडे़पन की निशानी ही है। इसके बरक्स यूरोप के लोगों की सोच अलग है। मिसाल के तौर पर, चौदह वर्षों तक नीदरलैंड के प्रधानमंत्री रहे मार्ट रट ने हाल ही में जब अपना इस्तीफा दिया, तो अपने उत्तराधिकारी को सत्ता सौंपकर साइकिल से प्रधानमंत्री दफ्तर से निकल गए। सोलह वर्षों तक जर्मनी की चांसलर रहीं एंजेला मर्केल खुद सब्जियां खरीदते हुए बाजार में दिख जाती हैं। हर सुविधा हाथ में चाहिए, इस सोच को बदलना होगा। खासकर भारत जैसे विशाल आबादी वाले व समृद्ध होते देश के वयस्कों को शारीरिक निष्क्रियता के प्रति सतर्क करने की ज्यादा जरूरत है।
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हमारे देश में सरकारी नौकरियां बहुत ही सुरक्षित हैं। यही एक कारण है कि हर साल लाखों उच्च शिक्षित लोग निचले स्तर के सरकारी पदों के लिए आवेदन करते हैं। हमारे समाज में भी विवाह के लिए सरकारी कर्मचारियों को निजी क्षेत्र के कर्मचारियों की अपेक्षा पसंद किए जाने का यह एक बड़ा कारण है।
वैश्विक स्तर पर भी कार्यकाल की ऐसी सुरक्षा एक प्रमुख विशेषता हुआ करती थी। लेकिन समय के साथ इसमें बदलाव आया है। भारत में ऐसा नहीं हुआ है। इसके क्या नुकसान हैं, देखते हैं –
तत्काल सुधार की आवश्यकता –
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 17 जून, 2024
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Date: 06-07-24
अभी बहुत कुछ छूट रहा है नए टेलीकॉम कानून मेंविराग गुप्ता, ( सुप्रीम कोर्ट के वकील, ‘अनमास्किंग वीआईपी’ पुस्तक के लेखक )
स्पेक्ट्रम के आवंटन में सरकार की आमदनी घट गई है। दूसरी तरफ मोबाइल टैरिफ दरों में भारी इजाफे से ग्राहक को औसतन 50 रु. महीना ज्यादा देने होंगे। 119 करोड़ मोबाइल और 92.4 करोड़ इंटरनेट ब्रॉडबैंड कनेक्शन वाले देश में सरकार की आमदनी कम होती जाए, टेलीकॉम कम्पनियों का घाटा और आम लोगों की जेब पर बोझ बढ़े तो यह चिंता की बात है।
इस तस्वीर के साथ अधकचरे तरीके से लागू किए गए नए टेलीकॉम कानून के 6 पहलुओं की पड़ताल जरूरी है।
1. ओटीटी : जुलाई 2022 में जारी मसौदे में टेलीकम्युनिकेशन का दायरा बहुत बड़ा था। पर दिसम्बर 2023 में संसद से पारित कानून में टेलीकम्युनिकेशन के दायरे से ओटीटी, इंटरनेट आधारित कॉल्स और मैसेजिंग एप्स को हटा दिया गया। देश की बड़ी आबादी नेटफ्लिक्स, जूम और वॉट्सएप आदि का इस्तेमाल करती है। पर विदेशी कम्पनियों से जुड़ी इन सेवाओं को कानून, लाइसेंस, टैक्स के दायरे से बाहर रखने से डिजिटल क्रांति की तस्वीर धुंधला रही है।
2. स्पेक्ट्रम : स्पेक्ट्रम घोटाले पर यूपीए सरकार की बहुत फजीहत हुई थी। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के अनुसार स्पेक्ट्रम का आवंटन नीलामी के आधार पर ही होना चाहिए। लेकिन नए कानून में सैटेलाइट जैसी सेवाओं के लिए प्रशासनिक आधार पर स्पेक्ट्रम के आवंटन का कानून है। एलॉन मस्क जैसे दिग्गजों के वर्चस्व वाले सैटेलाइट इंटरनेट सेवाओं वाले सेक्टर के लाइसेंस और नियमन के लिए भारत में प्रभावी कानून नहीं है। रियायती दरों पर स्पेक्ट्रम आवंटन से सरकारी खजाने को नुकसान और सैटेलाइट इंटरनेट के निर्बाध संचालन से राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरा बढ़ सकता है।
3. मोबाइल टॉवर : मोबाइल कंपनियों ने टैरिफ दरों को 10 से 25 फीसदी बढ़ाया है। 5जी के नाम पर डेटा प्लान की दरों में 46 फीसदी बढ़ोतरी से मोबाइल कम्पनियों की सालाना आमदनी 47,500 हजार करोड़ होने के साथ उनके शेयर की वैल्यू भी बढ़ेगी। लेकिन तस्वीर का दूसरा पहलू बहुत स्याह है। मार्च 2023 में मोबाइल कम्पनियों का घाटा लगभग 6.40 लाख करोड़ हो गया है। टेक्नोलॉजी, रिसर्च और 12 लाख नए मोबाइल टावरों को लगाने के लिए टेलीकॉम कम्पनियों के पास पैसे नहीं हैं। इसीलिए 5जी के नाम पर पैसे चुकाने वाले ग्राहकों को सही सेवा नहीं मिल रही।
4. सस्ता डेटा : अमेरिका में एक जीबी डेटा की औसत कीमत 5.37 डॉलर है, जबकि भारत में सिर्फ 0.16 डॉलर। भारत में पिछले 10 सालों में डेटा की खपत 43 गुना बढ़ी है। इसका फायदा ओटीटी, इंटरनेट आधारित कॉलिंग सेवाओं और मैसेजिंग एप्स को हो रहा है। लेकिन उन्हें कानून के दायरे से बाहर रखने और उनसे लाइसेंस फीस की वसूली नहीं होने से सरकार को चपत लगने के साथ, मोबाइल कम्पनियों का घाटा बढ़ रहा है। साल 2015 में स्पेक्ट्रम की नीलामी से सरकार को 1.09 लाख करोड़ मिले थे। जबकि इस साल 2024 में स्पेक्ट्रम की नीलामी से सरकार को सिर्फ 11,340 करोड़ की आमदनी हुई है।
5. अनचाहे कॉल्स : मोबाइल टॉवरों की स्थापना जिस भूमि में होती है, वह विषय संविधान के अनुसार राज्य सरकारों के अधीन है। इलेक्ट्रिसिटी कानून से जुड़ा विषय भी समवर्ती सूची में है। उसके बावजूद टेलीकॉम कानूनों को बनाने और लागू करने में राज्य सरकारों के साथ पर्याप्त परामर्श नहीं किया गया। डीएनडी यानी डु नॉट डिस्टर्ब, अनचाहे कॉल्स और साइबर अपराध से लोगों को बचाने के बारे में कई सालों से सिर्फ हल्ला हो रहा है। अनचाहे कॉल्स से जुड़े कानून की धारा 28 के तहत नियम बनना अभी बाकी है, इसलिए आम जनता को नए कानून से ज्यादा राहत नहीं मिलेगी।
6. नियम नहीं बने : नए कानून में शामिल 62 धाराओं में से लगभग 39 को ही फिलहाल लागू किया गया और 23 धाराओं से जुड़े नियम अभी जारी नहीं किए गए। इसकी वजह से अंग्रेजों के समय बनाया गया टेलीग्राफ एक्ट अभी भी लागू है। अपचाहे कॉल और मैसेजों से मुक्ति के लिए कानून की धारा-28 में प्रावधान हैं। लेकिन उससे जुड़े नियमों को संसद में पेश करना बाकी है। ऐसी ही गफलत दूसरे कानूनों में है। नीट विवाद के बाद आपाधापी में नकल विरोधी कानून लागू करने के बाद जल्दबाजी में नियम बना दिए गए।
तीन आपराधिक कानूनों को भी हड़बड़ी में लागू करने से न्यायिक अराजकता बढ़ने का खतरा है। आपराधिक कानूनों के लिए तीन कानूनों की संहिता है। उसी तरह टेलीकॉम, इंटरनेट, मोबाइल, एआई और डेटा से जुड़े विषयों पर कानून और नियमों की संहिता लागू करने की जरूरत है।
Date: 06-07-24
ढहता आधारभूत ढांचासंपादकीय
यह अच्छा हुआ कि बिहार सरकार ने एक के बाद एक पुल गिरने की घटनाओं को देखते हुए अनेक इंजीनियरों को निलंबित कर दिया। इस तरह की कार्रवाई इसलिए आवश्यक थी, क्योंकि पुलों के गिरने का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा था। यह सामान्य बात नहीं कि महज 15 दिनों के अंदर एक दर्जन पुल गिर जाएं। बिहार में इसके पहले भी कई पुल गिर चुके हैं। एक-दो पुल तो ऐसे रहे, जो निर्माणाधीन स्थिति में ही ध्वस्त हो गए। इसे देखते हुए यह आवश्यक था कि बिहार सरकार कोई ठोस कदम उठाती। उसने कई विभागों के इंजीनियरों को निलंबित करने के साथ ही पुलों का निर्माण करने वाली कंपनियों को कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए उनका भुगतान रोकने की पहल की है। उसने कंपनियों से यह भी पूछा है कि क्यों न उन्हें काली सूची में डाल दिया जाए? यदि ऐसी कंपनियों की गलती पाई जाती है तो उन्हें न केवल काली सूची में डाला जाना चाहिए, बल्कि उन पर जुर्माना लगाने के साथ ही यह भी देखा जाना चाहिए कि वे नाम बदलकर फिर से सक्रिय न होने पाएं। यह तो किसी जांच से ही सामने आएगा कि नए-पुराने पुल इतनी जल्दी-जल्दी क्यों गिरते रहते हैं, लेकिन इसकी भरी-पूरी आशंका है कि इसके पीछे एक बड़ा कारण दोयम दर्जे का निर्माण है। यह समस्या केवल बिहार की ही नहीं, बल्कि पूरे देश की है। पिछले ही दिनों झारखंड से यह खबर आई कि वहां सुंदर नदी पर बना पुल उद्घाटन से पहले ही धंसने लगा। इस तरह के मामले देश के अन्य हिस्सों से भी सामने आते रहते हैं।
एक आंकड़े के अनुसार 2012 से 2021 के बीच देश के विभिन्न हिस्सों में छोटे-बड़े दो सौ से अधिक पुल गिर चुके हैं। बात केवल पुलों की ही नहीं, सड़कों, एक्सप्रेसवे और आधारभूत ढांचे से जुड़े अन्य निर्माण कार्यों की भी है। आखिर यह एक तथ्य है कि पिछले दिनों दिल्ली में अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे की एक छत गिर गई। इसी तरह की घटना जबलपुर और राजकोट हवाईअड्डे पर भी हुई। वास्तव में अपने देश में बरसात का मौसम आधारभूत ढांचे की पोल खोलने का काम करता है। इससे संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता कि जब भी कोई बड़ी घटना घटती है तो जांच के आदेश दे दिए जाते हैं, क्योंकि पुलों के गिरने और सड़कों के धंसने के मामले रह-रहकर सामने आते ही रहते हैं। इसका सीधा मतलब है कि आधारभूत ढांचे के निर्माण में लापरवाही का परिचय दिया जा रहा है। यह लापरवाही कमीशनखोरी की ओर ही साफ संकेत कर रही है। यह ध्यान रहे तो अच्छा कि आधारभूत ढांचे का तेज गति से निर्माण होने के साथ ही खराब गुणवत्ता के कारण उसके नष्ट होते रहने का सिलसिला प्रगति को थामने के साथ ही संसाधनों की बर्बादी और देश की बदनामी का भी कारण बनता है।
Date: 06-07-24
कौशल की कमी दूर करना जरूरीसंपादकीय
भारत के रोजगार क्षेत्र का एक बड़ा विरोधाभास यह है कि जहां एक ओर बेरोजगारी बड़ी चुनौती बनी हुई है, वहीं देश के संभावित बड़े नियोक्ताओं की शिकायत है कि उन्हें काम करने के लिए श्रमिक नहीं मिल रहे हैं। गत सप्ताह लार्सन ऐंड टुब्रो (L&T) के चेयरमैन एस एन सुब्रमण्यन ने कहा कि इंजीनियरिंग क्षेत्र की इस दिग्गज कंपनी को कुल मिलाकर 45,000 श्रमिकों और इंजीनियरों की जरूरत है। इस मामले में एलऐंडटी कोई अपवाद नहीं है। पूरे भारत की बात करें तो पूर्व में स्टील निर्माताओं से लेकर टेक्सटाइल हब तिरुपुर तक कंपनियों को मशीन ऑपरेटर, वेल्डर, फिटर, वाहन चालक, टेक्नीशियन, कारपेंटर और प्लंबर जैसे साधारण कामों के लिए कुशल श्रमिक तलाशने में दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है। यह कमी केवल ऑर्डर बुक के विस्तार, चुनावों या गर्मियों की वजह से नहीं है जिन्होंने श्रमिकों को वापस उनके गांव भेज दिया। यह देश के श्रम बाजार की एक पुरानी कमजोरी का परिणाम है जिसकी वजह से वेतन और लागत में ऐसे समय में इजाफा हो रहा है जब निजी क्षेत्र का निवेश अभी भी अपेक्षाकृत कमजोर है। यह कमी उस समय और बढ़ जाती है जब हम मूल्य श्रृंखला में ऊपर जाते हैं। उस स्थिति में कंपनियों को अंतर को पाटने के लिए विदेशों खासकर चीन से तकनीशियनों और इंजीनियरों को बुलाना पड़ता है।
इस कमी की प्रमुख वजह शिक्षा और प्रशिक्षण की खराब गुणवत्ता है। इससे कंपनियों को इंजीनियरों और तकनीकी कर्मचारियों के प्रशिक्षण की अतिरिक्त लागत वहन करनी पड़ती है। ताजा इंडिया स्किल्स रिपोर्ट के अनुसार करीब 64 फीसदी इंजीनियरिंग ग्रैजुएट रोजगार पाने योग्य हैं और इनमें से 40 फीसदी औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थानों यानी आईटीआई से आते हैं। कुल मिलाकर करीब आधे युवाओं के पास ही रोजगार पाने लायक कौशल है।
दिलचस्प है कि यह हतोत्साहित करने वाली तस्वीर भी 2014 की तुलना में बेहतर है। उस समय केवल 33.9 फीसदी युवा ही रोजगार पाने लायक थे। यह सुधार सरकार के प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना तथा अप्रेंटिस एवं अन्य योजनाओं की बदौलत आया। इस प्रगति के बावजूद रिपोर्ट में संकेत दिया गया है कि बाजार को कुशल श्रमिक उपलब्ध कराना एक बड़ी चुनौती बना हुआ है। यह बताती है कि केवल दो फीसदी श्रमिकों के पास औपचारिक व्यावसायिक प्रशिक्षण है और नौ फीसदी के पास अनौपचारिक व्यावसायिक प्रशिक्षण है। इसके अलावा सरकार के कौशल कार्यक्रमों में भी गुणवत्तापूर्ण प्रशिक्षकों या प्रमाणन की कमी है। इसके परिणामस्वरूप प्रधानमंत्री कौशल विकास योजना के तहत प्रशिक्षित 20 फीसदी से भी कम लोगों को कंपनियों में रोजगार मिल पाया।
समस्या की मूल वजह यह है कि प्रशिक्षण कार्यक्रम उद्योग जगत की जरूरतों के अनुरूप नहीं हैं। इससे एक बार फिर यह बात रेखांकित होती है कि उद्योग जगत के साथ करीबी भागीदारी करने की आवश्यकता है। इंजीनियरिंग पाठ्यक्रम इस समस्या का सटीक उदाहरण हैं। भारत हर वर्ष जो 15 लाख इंजीनियर तैयार करता है उनमें से 5 फीसदी से भी कम भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों, राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थानों या भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थानों से होते हैं। अधिकांश स्नातक ऐसे निजी और सरकारी संस्थानों से आते हैं जिन्हें अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद की मान्यता तो होती है लेकिन उनकी गुणवत्ता में काफी अंतर होता है। सरकार द्वारा 2008 में स्थापित राष्ट्रीय कौशल विकास निगम एक गैर लाभकारी संस्था है जिसे उद्योग जगत के साथ काम करने के लिए बनाया गया था लेकिन वह भी इस समस्या को हल नहीं कर सका। इसका असर देश के श्रमिकों पर पड़ रहा है। बड़े नियोक्ता इससे बचने के लिए आर्टिफिशल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल कर रहे हैं जिससे श्रमिक और प्रभावित हो रहे हैं। यही वजह है कि देश के श्रमिकों को उचित कौशल प्रदान करना सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए।
Date: 06-07-24
भारत-ब्रिटेन संबंध नए शिखर की ओरहर्ष वी पंत और शेरी मल्होत्रा, ( हर्ष वी पंत स्टडीज ऐंड फॉरेन पॉलिसी के उपाध्यक्ष हैं तथा शेरी मल्होत्रा ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन नई दिल्ली में एसोसिएट फेलो (यूरोप) हैं। )
ब्रिटेन में 14 साल बाद सत्ता परिवर्तन के साथ नई सरकार के समक्ष भारत से संबंधों समेत विदेश नीति को लेकर कई चुनौतियां होंगी। दोनों देशों के लंबे साझा इतिहास के बावजूद वर्षों से भारत और ब्रिटेन के संबंध बहुत मजबूत नहीं रहे हैं। इसके अतिरिक्त लंबी ब्रेक्जिट प्रक्रिया तथा आंतरिक राजनीतिक उथल-पुथल के कारण भी ब्रिटेन को इस तरफ ध्यान देने की फुर्सत नहीं मिली। ब्रेक्जिट के रास्ते से हटने के बाद भारत और ब्रिटेन की साझेदारी फिर पटरी पर लौटती दिख रही है। ब्रेक्जिट के बाद ब्रिटेन की विदेश और व्यापार नीति तथा वैश्विक ब्रिटेन के रूप में विश्व पटल पर छाने की उसकी आकांक्षाओं में भारत की प्रमुख भूमिका इसकी खासियत है।
दोनों देशों के संबंध 2022 में तत्कालीन प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन के कार्यकाल में व्यापक रणनीतिक साझेदारी और द्विपक्षीय सहयोग को मजबूत करने के लिए 2030 रोडमैप के साथ नई ऊंचाई पर पहुंचे।
लेबर पार्टी को जेरेमी कॉर्बिन के नेतृत्व काल के दौरान व्यापक रूप से भारत विरोधी माना जाता था। उस समय वह ब्रिटेन के मुस्लिम समुदाय को रिझाने के लिए अपने संदर्भों में बार-बार कश्मीर का जिक्र करती थी, क्योंकि मुस्लिम समुदाय लेबर पार्टी का बहुत बड़ा वोट बैंक था, लेकिन कियर स्टार्मर के नेतृत्व में पार्टी का रुख बदल गया है। स्टार्मर ने यह स्पष्ट ऐलान किया कि लेबर पार्टी भारत के साथ-साथ ब्रिटेन में रहने वाले भारतीय समुदाय के साथ बेहतर संबंध स्थापित करेगी। ब्रिटेन में भारतीय समुदाय की संख्या लगभग 18 लाख है, जो वहां की अर्थव्यवस्था में 6 फीसदी से अधिक योगदान देते हैं।
एजेंडे में व्यापार, सुरक्षा और प्रौद्योगिकी
अच्छी बात यह है कि भारत और ब्रिटेन के बीच मुक्त व्यापार समझौते (FTA) को लेबर पार्टी और कंजर्वेटिव पार्टी दोनों दलों का समर्थन प्राप्त है। इससे नई लेबर पार्टी सरकार में भी इसके अंजाम तक पहुंचने की पूरी संभावना है। एफटीए का उद्देश्य दोनों देशों के बीच वर्ष 2030 तक द्विपक्षीय व्यापार को दोगुना करना है, जो इस समय लगभग 40 अरब पाउंड (करीब 4.27 लाख करोड़ रुपये) का है। इससे भारत के कपड़ा, परिधान और रत्न क्षेत्र को खासा लाभ होगा। फिर भी इसमें भारत के उच्च शुल्क समेत कई पेच हैं, जो ऑटोमोबाइल और स्कॉच व्हिस्की के मामले में 100 से 150 फीसदी तक पहुंच सकता है। दूसरा मामला ब्रिटेन की भारतीय बाजार के सेवा क्षेत्र में पैठ बनाने की इच्छा का है। सेवा क्षेत्र ब्रिटिश अर्थव्यवस्था में 80 फीसदी योगदान देता है।
दूसरी ओर, भारत अपने कुशल पेशेवरों के लिए बेहतर गतिशीलता चाहता है। टोरीज (कंजर्वेटिव पार्टी) के शासन में यह राजनीतिक रूप से काफी विवाद का विषय बन गया था, क्योंकि टोरीज ने ब्रेक्जिट के लिए एंटी इमिग्रेशन व्यवस्था बनाने की वकालत की थी। इस मामले में लेबर सरकार नरम रुख अपनाते हुए कुछ रियायत दे सकती है। हिंद-प्रशांत क्षेत्र के बदले रणनीतिक परिदृश्य के परिणामस्वरूप ब्रिटेन का झुकाव हिंद महासागर की ओर हुआ है। यह ब्रिटेन के इंटीग्रेटेड रिव्यू रिफ्रेश (आईआर रिफ्रेश 2023) रणनीति में दर्ज है, जो ब्रिटेन के हिंद-प्रशांत की ओर झुकाव को मजबूत करता है और नियम आधारित व्यापार के लिए भारत जैसे समान विचारधारा वाले देशों के साथ सहयोग पर जोर देता है।
इससे हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत और ब्रिटेन के बीच रणनीतिक साझेदारी बढ़ी है। दोनों देश संयुक्त सैन्य अभ्यास, नौसेना अंतर-संबंध एवं समुद्री क्षेत्र जागरूकता, आतंकवाद रोधी अभियान, मानवीय सहायता एवं आपदा राहत जैसे क्षेत्रों में सहयोग के जरिये समुद्री क्षेत्र में अपनी उपस्थिति बढ़ा रहे हैं। क्षेत्र में यूके कैरियर ग्रुप को तैनात करने के अलावा ब्रिटेन गुरुग्राम स्थित भारतीय नौसेना के सूचना संलयन केंद्र में भी शामिल हो गया है।
प्रधानमंत्री ऋषि सुनक के पहले विदेश नीति भाषण, जिसमें ब्रिटेन और चीन संबंधों के ‘स्वर्ण युग’ के समाप्त होने का ऐलान था, से आगे बढ़ते हुए आईआर रिफ्रेश द्वारा चीन को एक बड़ी चुनौती के रूप में संदर्भित करने के परिणामस्वरूप भारत और ब्रिटेन के मतभेद कुछ कम हुए थे। भले ही चीन को एक खतरे के तौर पर पेश करने में यह रणनीतिक रूप से नाकाम रही हो। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में सबसे सक्रिय यूरोपीय शक्ति के रूप में उभरने की चाहत और रक्षा खर्च 2030 तक अपनी जीडीपी का 2.5 फीसदी तक बढ़ाने की योजना के बावजूद ब्रिटेन की क्षमता और संसाधनों को लेकर कई बड़े सवाल बने हुए हैं।
अभी इस बारे में भी कुछ नहीं कहा जा सकता कि क्या लेबर सरकार टोरीज द्वारा शुरू की गईं हिंद-प्रशांत केंद्रित योजनाओं को जारी रखेगी या नहीं। इसके अलावा, यूरोप में अमेरिका का दबदबा घटने के बाद ब्रिटेन को यूरोपीय-अटलांटिक सुरक्षा प्रदाता, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में स्थिरता के लिए भारत जैसे सहयोगी के साथ मिलकर प्रयास करने पर ध्यान केंद्रित करना होगा।
इसी साल जनवरी में रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह की ब्रिटेन यात्रा से दोनों देशों के बीच सुरक्षा और प्रतिरक्षा जैसे क्षेत्रों में साझेदारी को आगे बढ़ाने में मदद मिली। किसी भारतीय रक्षा मंत्री की 22 वर्षों में यह पहली ब्रिटेन यात्रा थी। वर्ष 2023 में दोनों देशों के बीच 2+2 की व्यवस्था के साथ संबंधों को नई उड़ान मिली। इसके उलट एक तस्वीर यह भी सामने आती है कि पिछले दशक में भारत की कुल रक्षा खरीद का 3 फीसदी ही ब्रिटेन से आया, जबकि इस क्षेत्र में, विशेषकर उन्नत प्रौद्योगिकी के आदान-प्रदान से रक्षा विनिर्माण क्षेत्र को मजबूत करने की अधिक संभावनाएं विद्यमान हैं और निर्यात लाइसेंसिंग नियमों को आसान बनाने में भी गुंजाइश मौजूद है, ताकि रूसी हार्डवेयर पर भारत की निर्भरता कम हो सके। भारत और ब्रिटेन प्रतिरक्षा के अलावा, आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (AI), सेमीकंडक्टर और हाई परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। ब्रिटिश फर्म एसआरएएम ऐंड एमआरएएम टेक्नोलॉजीज ने भारत के सेमीकंडक्टर क्षेत्र में 30,000 करोड़ रुपये निवेश की योजना बनाई है।
जलवायु के मोर्चे पर भी दोनों देश अनुसंधान और डिजाइन सहभागिता को मजबूत करने के लिए मिलकर काम कर रहे हैं। इसके अतिरिक्त फिनटेक, टेलीकॉम, स्टार्टअप और उच्च शिक्षा जैसे क्षेत्र भी काफी महत्त्वपूर्ण हैं। साइबर सुरक्षा क्षेत्र में दोनों देश उन्नत साइबर सहभागिता के माध्यम से नई इबारत लिख रहे हैं। यही नहीं, अमेरिका के अलावा ब्रिटेन ही ऐसा देश है, जिसके साथ भारत सालाना साइबर डायलॉग आयोजित करता है।
नए युग की शुरुआत
युद्धग्रस्त यूक्रेन को ब्रिटेन का ठोस समर्थन प्राप्त है। इधर, रूस के साथ भारत के घनिष्ठ संबंध भी जगजाहिर हैं। इसके बावजूद भारत और ब्रिटेन के आपसी संबंधों में कोई खास फर्क नहीं पड़ा है। कभी भारत एवं ब्रिटेन के संबंधों में खटास का कारण रहे पाकिस्तान और खालिस्तान जैसे पहले से चले आ रहे मुद्दे भी धीरे-धीरे किनारे हो गए हैं। अब दोनों देश आपसी सहयोग को तवज्जो दे रहे हैं। नई ताकत के साथ खड़ी हो रही लेबर पार्टी के साथ भारत और ब्रिटेन के संबंधों में प्रगाढ़ता की बहुत ज्यादा संभावनाएं हैं, क्योंकि स्टार्मर ने भारतीय चिंताओं को दूर करने के लिए बहुत ही गंभीरता से प्रयास किया है।
लगातार तीसरी बार सत्ता में आई मोदी सरकार ने ऑस्ट्रेलिया, यूएई और यूरोपियन फ्री ट्रेड एसोसिएशन ब्लॉक के साथ व्यापार समझौतों के लिए नया दृष्टिकोण अपनाया है। भारत का यही नजरिया खासकर संरक्षणवादी अमेरिका और चीन की नीतियों के वैश्विक संदर्भ में, ब्रिटेन में चुनाव बाद राजनीतिक स्थिरता आने से एफटीए के लिए निर्धारित लक्ष्य की ओर आगे बढ़ने का ठोस आधार प्रदान करता है।
ब्रिटेन के साथ भारत के संबंध इस समय बहुत ही रोचक मोड़ पर हैं और दिशा चाहे जो भी हो, लेकिन दोनों देशों की दोस्ती नए शिखर की ओर बढ़ती प्रतीत हो रही है। पी5, जी7 और फाइव आइज के सदस्य के रूप में इस वक्त वैश्विक पटल पर ब्रिटेन का दबदबा है, जबकि भारत सबसे तेज गति से बढ़ती अर्थव्यवस्था और दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश है। दोनों देश मिलकर आगे बढ़ने के लिए वैश्विक पटल पर अपने-अपने लिए भूमिका गढ़ने का प्रयास कर रहे हैं।
Date: 06-07-24
ब्रिटेन की सत्तासंपादकीय
दरअसल, कंजर्वेटिव पार्टी से लोगों का मोहभंग हो चुका था। खासकर प्रधानमंत्री ऋषि सुनक खासे अलोकप्रिय हो चुके थे। इस तरह वहां सत्ता-विरोधी लहर थी, जिसमें कंजर्वेटिव पार्टी ध्वस्त गई। ब्रिटेन में काफी समय से महंगाई उच्च स्तर पर है, लोगों पर करों का बोझ काफी बढ़ गया है, सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाएं चरमरा गई हैं और देश की अर्थव्यवस्था एक तरह से ठप पड़ गई है। ऋषि सुनक ने अर्थव्यवस्था संभालने का आश्वासन दिया था, इसके लिए उन्होंने परिश्रम भी खूब किया, मगर कामयाब नहीं हो सके। नतीजतन, लोगों का रहन-सहन पर खर्च बढ़ता गया है।
दरअसल, कंजर्वेटिव पार्टी के प्रति वहां के लोगों में रोष इस बात को लेकर भी था कि ‘ब्रेक्जिट’ करके ब्रिटेन यूरोपीय संघ से अलग हो गया, जिससे वहां की अर्थव्यवस्था पर बुरा असर पड़ा। इसके अलावा गैरकानूनी तरीके से हो रहे प्रवासन पर सुनक सरकार काबू नहीं पा सकी। इसके चलते वहां की सार्वजनिक सुविधाओं पर बोझ बढ़ा है। लेबर पार्टी ने आवास नीति बनाने, आव्रजन नीति को कड़ा करने और यूरोपीय संघ से रिश्ते मजबूत बनाने का वादा किया था। इससे वहां के लोगों में भरोसा पैदा हुआ। हालांकि चुनावी वादों को जमीन पर उतारना आसान नहीं होता। ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था को संभालना स्टार्मर के लिए भी बड़ी चुनौती होगी। खाली हो चुके खजाने के साथ करों का बोझ कम करना और सार्वजनिक सुविधाओं को बेहतर बनाना भी आसान नहीं होगा। ऐसे में, अगर आव्रजन नीतियों को कड़ा किया जाता है, तो अलग मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। देखने की बात है कि यूरोपीय संघ के साथ मिल कर वे ब्रिटेन की जर्जर हो चुकी अर्थव्यवस्था और लोगों के जीवन स्तर को ऊपर उठाने में कहां तक कामयाब हो पाते हैं।
Date: 06-07-24
सावधानी की जरूरतसंपादकीय
देश के प्रधान न्यायाधीश डी. वाई. चन्द्रचूड़ ने बाजार नियामक सेबी और सैट को शेयर बाजारों में उल्लेखनीय उछालों के बीच सावधानी बरतने की सलाह दी। अधिक न्यायाधिकरण पीठों की वकालत करते हुए स्थिर नींव सुनिश्चत करने की बात भी उन्होंने बात कही। सीजेआई मुंबई में नये प्रतिभूति अपीलीय न्यायाधिकरण यानी सैट परिसर का उद्घाटन भाषण कर रहे थे। उन्होंने अधिकारियों से सैट की नई पीठें खोलने का अग्रह भी किया क्योंकि अब अधिक मात्रा में लेन-देन और नये नियमों के कारण कार्यभार बढ गया है। उनके अनुसार, शेयर बाजार में जितनी तेजी देखी जाएगी, सेबी और सैट की भूमिका उतनी ही अधिक होगी। सेबी और सैट जैसे संस्थानों को बढ़ावा देने के पीछे उन्होंने अत्यधिक राष्ट्रीय महत्त्व बताया। प्रधान न्यायाधीश जिस वक्त यह सुझाव दे रहे थे, ऐन उसी समय बाजार में जबरदस्त तेजी देखी जा रही थी और बीएसई सेंसेक्स नये शिखर यानी अस्सी हजार को पार कर रहा था। यह अपने आपमें रिकार्ड शिखर है। शेयर बाजार और निवेश को लेकर युवाओं में गजब का उत्साह देखने में आ रहा है। नेशनल स्टॉक एक्सचेंज यानी एनएसई के अनुसार इस वर्ष जनवरी तक निवेशकों की संख्या 87 मिलियन तक पहुंच चुकी थी। महामारी के बाद से इन नये निवेशकों के बढ़ते रुझान को लेकर विशेषज्ञों का कहना है कि उन्हें भ्रम है कि इससे हर स्थिति में मुनाफा होता रहेगा। भारतीय कंपनियों का मुनाफा अच्छा होने के बावजूद यह कभी भी लुढ़क सकता है। कई बार अचानक किसी आर्थिक गड़बड़ी के चलते घरेलू बाजार अप्रत्याशित रूप से धड़ाम भी हो जाता है। वैश्विक अर्थव्यवस्थाओं और वित्तीय बाजारों का भी इस पर सीधा असर होता है। शेयर बाजार में होने वाले घोटाले और हेराफेरी पर कड़ी नजर रखी जाने के बावजूद आनन-फानन भारी मुनाफा कमाने के लोभ से मुकरा नहीं जा सकता। ऐसे में सेबी और सैट की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। खासकर छोटे निवेशकों के भरोसे को ये अप्रत्यक्ष तौर पर बढ़ाने का काम करती हैं। देश तभी आगे बढेगा, जब वह आर्थिक रूप से समृद्ध होता रहेगा और लोगों का विश्वास बढ़ता रहेगा जिसके लिए सावधानी बेहद जरूरी है।
Date: 06-07-24
बाबाओं की यूट्यूब जंगविनीत नारायण
जब से सोशल मीडिया का प्रभाव तेजी से व्यापक हुआ है, तब से समाज का हर वर्ग यहां तक कि गृहणियां भी 24 घंटे सोशल मीडिया पर हर समय छाए रहते हैं। इसके दुष्परिणामों पर काफी ज्ञान उपलब्ध है। सलाह दी जाती है कि यदि आपको अपने परिवार या मित्रों से संबंध बनाए रखना है, अपना बौद्धिक विकास करना है और स्वस्थ और शांत जीवन जीना है तो आप सोशल मीडिया से दूर रहें या इसका प्रयोग सीमित मात्रा में करें। पर विडंबना देखिए कि समाज को संयत और सुखी जीवन जीने का और माया मोह से दूर रहने का दिन-रात उपदेश देने वाले संत और भागवताचार्य आजकल स्वयं ही सोशल मीडिया के जंजाल में कूद पड़े हैं। विशेषकर ब्रज में ये प्रवृत्ति तेजी से फैलती जा रही है।
पिछले ही दिनों वृंदावन के विरक्त संत प्रेमानंद महाराज और प्रदीप मिश्रा के बीच सोशल मीडिया पर श्री राधा तत्व को लेकर भयंकर विवाद चला। ऐसे ही पिछले दिनों वृंदावन में नवस्थापित भगवताचार्य अनिरुद्धाचार्य के वक्तव्य भी विवादों में रहे । इसी बीच बरसाना के विरक्त संत श्री रमेश बाबा द्वारा लीला के मंचन में राधा स्वरूप धारण कर बालाकृष्ण से पैर दबवाने पर विवाद हुआ। ये सब ब्रज की विभूतियां हैं। हर एक के चाहने वाले भक्त लाखों-करोड़ों की संख्या में हैं। जैसे ही कोई विवाद पैदा होता है, इनका चेला समुदाय भी सोशल मीडिया पर खूब सक्रिय हो जाता है। ठीक वैसे ही राजनैतिक दलों की ट्रोल आर्मी, जो बात का बतंगड़ बनाने में मशहूर है, सक्रिय हो जाती है। यह सब सोशल मीडिया में अपनी पहचान बनाने का एक तरीका बन गया है।
अब प्रेमानंद जी वाले विवाद को ही लीजिए, कितने ही कम मशहूर भागवताचार्य भी इस विवाद में कूद पड़े जिनके फॉलोवर्स चार- पांच सौ ही थे पर जैसे ही वे इस विवाद में कूदे तो उनकी संख्या 20 हजार पार कर गई यानी बयानबाजी भी फायदे का सौदा है। परंपरा से शास्त्र ज्ञान का आदान-प्रदान गुरुओं द्वारा निर्जन स्थलों पर किया जाता था जहां जिज्ञासु अपने प्रश्न लेकर जाता था और गुरु की सेवा कर ज्ञान प्राप्त करता था। यही पद्धति भगवान श्री कृष्ण ने कुरुक्षेत्र के मैदान में अर्जुन को बताई थी। भगवद् गीता के चौथे अध्याय का चौंतीसवां श्लोक इसी बात को स्पष्ट करता है। ‘तद्विद्धि प्रणिपातेन परिप्रश्नेन सेवया उपदेश्यन्ति ते ज्ञानज्ञानिनस्तत्त्वदर्शिनः ।।4.34।। ‘ परंतु सोशल मीडिया ने आकर ऐसी सारी सीमाओं को तोड़ दिया है। अब धर्मगुरु चाहें न चाहें पर उनके शिष्य, उनके प्रवचनों का सोशल मीडिया पर प्रसारण करने को बेताब रहते हैं और फिर अलग-अलग गुरुओं के शिष्य समूहों में आपसी प्रतिद्वंद्विता चलती है कि किस गुरु के कितने चेले या श्रोता हैं। जिस संत के फॉलोवर्स की संख्या लाखों में होती है उन पर टिप्पणी करना या उन्हें विवाद में घसीटना लाभ का सौदा माना जाता है क्योंकि वैसे तो ऐसा विवाद खड़ा करने वालों की कोई फॉलोइंग होती नहीं है। पर इस तरह उन्हें बहुत बड़ी तादाद में फॉलोवर और लोकप्रियता मिल जाती है।
मतलब यह कि आप में योग्यता है कि नहीं, पात्रता है कि नहीं, आपको उस विषय का ज्ञान है कि नहीं, इसका कोई संकोच नहीं किया जाता। केवल सस्ती लोकप्रियता पाने के लालच में बड़े बड़े संतों के साथ नाहक विवाद खड़ा किया जाता है। आजकल ऐसे विवादों की भरमार हो गई है। वैसे तो तकनीकी के हमले को कोई चाह कर भी नहीं रोक सकता। पर कभी- कभी इंसान को लगता है कि उसने भयंकर भूल कर दी। 2003 की बात है जब मैंने बरसाना (मथुरा) के विरक्त संत श्री रमेश बाबा के प्रवचन नियमित रूप से हर सप्ताह बरसाना जा कर सुनना शुरू किया, बाबा की भक्ति और सरलता ने मुझे बहुत प्रभावित किया और मुझे लगा कि बाबा के प्रवचन पूरी दुनिया के कृष्ण भक्तों तक पहुंचने चाहिए। तब ऐसा होना टीवी चैनल के माध्यम से ही संभव था क्योंकि तब तक सोशल मीडिया इतना लोकप्रिय नहीं हुआ था। मैंने इसके लिए प्रयास करके श्री मान मंदिर में टीवी रिकॉर्डिंग स्टूडियो की स्थापना कर दी। उस दौर में मान मंदिर के विरक्त साधुओं ने मेरा कड़ा विरोध किया। उनका कहना था कि बाबा की बात अगर इस तरह प्रसारित की जाएगी तो बरसाना में कलियुग का प्रवेश कोई रोक नहीं पाएगा पर बाबा ने मुझे अनुमति दी तो काम शुरू हो गया। इसका लाभ मान मंदिर को यह हुआ कि उसके भक्तों की संख्या में देश-विदेश में तेजी से बढ़ोतरी हुई और वहां धन की वर्षा होने लगी। तब मुझे विरोध करने वाले अव्यावहारिक प्रतीत होते थे ।
पर आज जब मैं पलट कर देखता हूं तो मुझे लगता है कि वाकई इस प्रयोग ने मान मंदिर के पवित्र, शांत और निर्मल वातावरण को बहुत सारे झमेलों में फंसा दिया। वहां टीवी का प्रवेश न हुआ होता तो वहां का अनुभव पारलौकिक होता था जिसे अनुभव करने नीतीश कुमार, अर्जुन सिंह, सुषमा स्वराज, लालू यादव, केंद्रीय सतर्कता आयुक्त और सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश तक उस दौर में वहां गए और गद्गद् हो कर लौटे।
हमने बात शुरू की थी सोशल मीडिया पर बाबाओं के संग्राम से और बात पहुंच गई अध्यात्म की एकांतिक अनुभूति से शुरू होकर उसके व्यावसायीकरण तक। इस आधुनिक तकनीकी ने जहां श्री राधा कृष्ण की भक्ति का और ब्रज की संस्कृति का दुनिया के कोने-कोने में प्रचार किया वहीं इसका दुष्परिणाम यह हुआ कि आज वृंदावन, गोकुल, गोवर्धन, बरसाना, मथुरा आदि अपना सदियों से संचित आध्यात्मिक वैभव और नैसर्गिक सौंदर्य तेजी से समेटते जा रहे हैं। हर ओर बाजार शक्तियों ने हमला बोल दिया है। कहते हैं कि विज्ञान अगर हमारा सेवक बना रहे तो उससे बहुत लाभ होता है पर अगर वो हमारा स्वामी बन जाए तो उसके घातक परिणाम होते हैं। एक ब्रजवासी होने केऔर संतों के प्रति श्रद्धा होने के नाते मेरा देश भर के संतों से विनम्र निवेदन है कि सोशल मीडिया के संग्राम से बचें और अपने अनुयायियों को होड़ में आगे आकर अपना बढ़ा-चढ़ा कर प्रचार करने से रोकें जिससे वे अपना ध्यान भजन साधन के अलावा तीर्थस्थलों के सौंदर्यीकरण और रखरखाव में लगा सकें ताकि तीर्थयात्रियों को ब्रज जैसे तीर्थों में जाने पर सांस्कृतिक आघात न लगे, जो आज उन्हें लगने लगा है।
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06 July 2024
प्रश्न – 468 – भारत के संदर्भ में सहकारिता की प्रासंगिकता पर अपने विचार व्यक्त करें। (200 शब्द)
Question – 468 – Express your views on the relevance of cooperation in the context of India. (200 words)
नोट : इसका उत्तर आपको हमें नहीं भेजना है, यह आपके स्वयं के अभ्यास के लिए है।
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Date: 05-07-24
Make Parliament Parliamentary AgainET Editorials
Last month, the people of India gave their mandate. It was not just about who would run the government, but also about who would represent them in Parliament. Above all, it means elected parliamentarians doing what their job entails: conduct legislative proceedings. Much of what has been witnessed in Parliament so far seems to be nothing but a spillover of electiontime campaign rhetoric (sic). Both ‘battering ram’ Opposition and ‘bulldozer’ government seem to have misunderstood the mandate — of their jobs.
Holding successful elections, winning or losing in polls, and the act of voting are only one aspect of parliamentary democracy. The real ‘dance of democracy’ is what happens in between elections. In the institution of Parliament, elected representatives question and check the government, debate issues and make laws. In the words of former Rajya Sabha chairman M Venkaiah Naidu, the opposition and treasury benches are like ‘two eyes’ of the House. Going by the present theatrics, we are being made witness to a crosseyed Parliament, which seems to be doing everything but its job.
The Opposition and government need to come to a consensus, at least when it comes to serving their parliamentary — rather than only political — function. A functioning Parliament does not require the Opposition to acquiesce to every demand of the government. Neither does it mean responding only with kneejerk pushbacks. Issue-based engagement needs to be back centre stage. Rules and procedures set out the norms of engagement to ensure fairness, a level playing field and maximise outcomes. Parliament can’t be just another venue for MPs to grandstand. The people did not vote for a dysfunctional Parliament. So, MPs, make Parliament parliamentary again.
Date: 05-07-24
Grave concernThe risk of international spread of wild type-1 polio cases from Pakistan is great.Editorial
The ambitious goal of eradicating wild-type poliovirus type-1 (WPV1) by 2026 appears to have become tougher. WPV1, which is endemic only in Pakistan and Afghanistan, is showing signs of a resurgence since 2023. With Afghanistan and Pakistan reporting six WPV1 cases each in 2023 — there were two cases in Afghanistan and 20 cases in Pakistan in 2022 — the total incidence of type-1 cases in both countries in 2023 might appear to have nearly halved. But with six cases in Afghanistan and five cases in Pakistan already this year, there appears to be an uptick. If this continues, the total cases being reported from the two countries might be close to or even surpass the 2022 numbers. The concern about WPV1 is not limited to the number of cases in children. The circulation of the virus in the environment is seen to be rising, and, most importantly, after a gap of two years, positive environmental samples have been increasingly collected in Pakistan, in 2023 and till early June this year, from cities which have been historical reservoirs for the virus. Last year, 125 positive environmental samples were collected from 28 districts in Pakistan. Of these, 119 belonged to a genetic cluster (YB3A), which suggests that these were imported from Afghanistan. By June 1 this year, there have been 153 positive environmental samples from 39 districts. As of April 8, 2024, 34 positive environmental samples were collected from Afghanistan.
According to the World Health Organization, the presence of positive environmental samples in “epidemiologically critical areas and historical reservoirs” such as Karachi, Quetta and the Peshawar-Khyber blocks in Pakistan, and Kandahar in Afghanistan, represents a significant risk to the gains made in the past. Rising positive environmental samples are a reflection of polio campaigns not really achieving their desired coverage; fake finger marking sans vaccination is a persisting problem. Though children in Pakistan’s cities are largely immunised, there is a heightened risk of the virus striking any unvaccinated or not fully vaccinated children — in 2023, two of the six cases were from Karachi city. The situation in Pakistan appears worse than it is in Afghanistan with the actual spread of WPV1 seen “predominantly in Afghanistan in 2022 now being detected in Pakistan in 2023 and 2024”. There is also the grave risk of international spread from Pakistan, particularly to Afghanistan. With over 0.5 million Afghan refugees forced to leave Pakistan, and an estimated 0.8 million to be evicted soon, there is an increased risk of cross-border spread of the virus. There is a large pool of unvaccinated and under-immunised children in southern Afghanistan, increasing the risk that returning refugees can pose.
Date: 05-07-24
क्या मणिपुर में वाकई हालात सामान्य हो रहे हैं?संपादकीय
प्रधानमंत्री ने कहा है मणिपुर में स्थिति सामान्य हो रही है और विपक्ष इस पर राजनीति करके मुद्दे को न भड़काए। पहला वाक्य प्रशासनिक मूल्यांकन का है और दूसरा शुद्ध राजनीतिक प्रति आक्षेप का । क्या वाकई मणिपुर में सवा साल बाद भी हालात सामान्य हो रहे हैं? जिस दिन पीएम यह दावा कर रहे थे उसी दिन सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने सख्त लहजे में कहा कि हमें राज्य सरकार पर भरोसा नहीं है जो एक विचाराधीन कैदी का इलाज इसलिए नहीं करा रही है क्योंकि वह कुकी समुदाय से है। इलाज न करने का कारण बताने वाले हाईकोर्ट और प्रशासनिक आदेशों को देख सुप्रीम कोर्ट चौक गया। उसमें कहा गया था कि राज्य में हालात सामान्य नहीं हैं और अगर इस बंदी को अस्पताल में भेजा गया तो कानून-व्यवस्था और बिगड़ सकती है। अगर कोई विचाराधीन कैदी जानलेवा बीमारी से ग्रस्त हो, दर्द से कराह रहा हो और महीनों से जेल अधिकारी उसका एक समुदाय विशेष का होने के कारण इलाज न करा रहे हों, और अंततः उसे देश की सबसे बड़ी कोर्ट में आना पड़ा हो तो क्या इसे सामान्य स्थिति कहा जाएगा? अगर ऐसे मुद्दे पर विपक्ष राजनीति करता भी है तो यह उसका मौलिक दायित्व है। सरकार की विफलताओं को जनमानस में लाना प्रजातंत्र की पहली शर्त है। हां, उस पर सरकार कैसे प्रतिक्रिया करती है यह देखा जाना चाहिए।
Date: 05-07-24
इस मानसून में वर्षाजल को सहेजें, भूजल को रिचार्ज करेंसुनीता नारायण, ( प्रतिष्ठित पर्यावरणविद् और सीएसई की डायरेक्टर जनरल हैं )
कई साल पहले, मैं अपने सहयोगी दिवंगत अनिल अग्रवाल के साथ चेरापूंजी गई थी। वहां हमने एक साइनबोर्ड देखा, जिस पर लिखा था पानी की कमी है, ऐहतियात से इस्तेमाल करें। यह दुनिया में सबसे ज्यादा बारिश वाला स्थान था! यहां मिलीमीटर में नहीं, मीटर में बारिश होती है। फिर हम जैसलमेर गए। यह रेगिस्तानी शहर है। वहां हमें पता चला कि एक समय यह कारवां के रुकने की जगह हुआ करती थी; यहां फलता-फूलता व्यापार था। यहां साल भर में कुल 50 मिलीमीटर बारिश होती है। तो फिर यह शहर कैसे विकसित हुआ? जवाब है, बारिश की एक-एक बूंद तालाबों में एकत्र की गई, और हर घर की छत से पानी सहेजा गया। हर जलग्रहण क्षेत्र को संरक्षित किया गया।
हम थोड़ा आगे बढ़े तो हमें उलटी तश्तरी जैसी एक आकृति दिखी। जब हमने रुककर उसके बारे में पूछा तो हमें बताया गया कि यह जल संचयन के लिए एक ढंका हुआ कुआं था, जिसमें एक जलग्रहण क्षेत्र था। इसे कुंडी कहा जाता है। पानी का गणित सरल है, लेकिन बहुतेरे इंजीनियरों को यह समझ नहीं आता : 1 हेक्टेयर भूमि; 100 मिलीमीटर बारिश; इससे आप 100 मिलियन लीटर तक पानी का संचयन कर सकते हैं!
हमने गजेटियरों को खंगाला और यह समझने की कोशिश की कि भारत ने इतनी कम बारिश में सभ्यता का निर्माण कैसे किया। हमने सीखा कि हर क्षेत्र ने अपनी तकनीक को निखारा है। पूर्वोत्तर में बांस की सिंचाई प्रणाली थी, जहां झरनों से बांस के जरिए पानी लाया जाता था; हिमालय में गुल और कुल थे; ठंडे रेगिस्तान लद्दाख में झिंग; और दक्षिण भारत के अविश्वसनीय झरने तो स्पेस से भी देखे जा सकते हैं।
तर्क सरल था : बारिश को रोकें; भूजल को रिचार्ज करें। हमने इसे अपनी पुस्तक ‘डाइंग विजडम’ में प्रस्तुत किया। हमने इसे ‘डाइंग’ इसलिए कहा, क्योंकि धीरे-धीरे हम यह ज्ञान-प्रणाली खो रहे हैं। जब अंग्रेज भारत आए, तो उन्हें स्थानीय जल संचयन परंपराओं की समझ नहीं थी। वे ऐसी दुनिया से आए थे, जहां पानी केंद्रीकृत था और राज्य उसका प्रबंधन करता था। यह लोक निर्माण विभाग का काम था। व्यवस्था पानी को चैनलाइज करने की ओर बढ़ी; पानी को रोकने के लिए नहरें और बांध बनाए गए। इसमें कुछ गलत नहीं है, लेकिन यह हमारी जरूरतों को पूरा नहीं करता; और यह प्रकृति की व्यवस्था के अनुकूल भी नहीं है।
अब हमारे पास नहरें हैं, सिंचाई व्यवस्था है। इसे मेजर इरिगेशन कहते हैं। छोटी सिंचाई भूजल से होती है। लेकिन सच्चाई यह है कि हमारी अधिकांश कृषि-भूमि वर्षा पर निर्भर है (सरकारी आंकड़ों के अनुसार 50 प्रतिशत); और ये हमारे भोजन का लगभग 40 प्रतिशत उत्पादन करती है। इसी तरह, 60-70 प्रतिशत भूमि की सिंचाई भूजल से होती है; सतही प्रणालियों से नहीं और भूजल ही पेयजल का बड़ा हिस्सा प्रदान करता है। तो आइए, उत्पादकता बढ़ाने के लिए वर्षा को संचित करने के महत्व को समझें; स्थानीय और लचीली खाद्य प्रणालियों का निर्माण करें।
पिछले कुछ वर्षों में, वर्षा जल संचयन की आवश्यकता का अहसास सघन हुआ है। इस क्षेत्र में शायद दुनिया का सबसे बड़ा कार्यक्रम मनरेगा है- जिसमें लोगों के श्रम का उपयोग प्राकृतिक पूंजी बनाने के लिए किया जाता है। इस कार्यक्रम के तहत लाखों तालाब खोदे गए हैं; नहरों की मरम्मत की गई है; चेकडैम बनाए गए हैं। लेकिन एक बुनियादी खामी के साथ; यह कार्यक्रम अपने द्वारा बनाई संपत्ति में निवेश नहीं करता। यह केवल काम उपलब्ध कराने के बारे में है; जो यकीनन महत्वपूर्ण है, लेकिन पर्याप्त नहीं।
लेकिन सब कुछ खत्म नहीं हुआ है। जहां लोगों ने व्यवस्थाएं बनाई हैं; जलग्रहण क्षेत्र को संरक्षित किया है, वहां जादू देखने लायक है। हम मनरेगा से जुड़े उन ग्रामीणों के पास गए, पानी ने जिनकी आजीविका को सुरक्षित किया था। उनका रिवर्स माइग्रेशन हो रहा था क्योंकि वे खेती की ओर लौट रहे थे; अपनी भूमि-जल संपदा से अर्थव्यवस्था का निर्माण कर रहे थे। यह आश्चर्य की बात नहीं है। औपनिवेशिक काल की सबसे बड़ी मार भूमि-राजस्व प्रणाली पर पड़ी थी। भारत के शासक राजकोषीय प्रोत्साहन के माध्यम से जल प्रणालियों में निवेश को बढ़ावा देते थे। भू-राजस्व वर्ष के लिए फसल उपज के प्रतिशत पर आधारित होता था; किसानों को उत्पादकता बढ़ाने के लिए प्रोत्साहन दिया जाता था; वे जल संरचनाएं बनाते थे। यह सबसे बड़ा दान था। कहा जाता है कि उदयपुर में पिछोला झील खानाबदोशों द्वारा बनाई गई थी। लेकिन अंग्रेजों ने इसे बदल दिया।
Date: 05-07-24
मणिपुर का दर्दसंपादकीय
मणिपुर पिछले एक वर्ष से ज्यादा समय से अशांति और हिंसा के दौर से गुजर रहा है। सरकार की ओर से तमाम कवायदों के बावजूद आज भी हालात में कोई बड़ा बदलाव आता नहीं दिख रहा है। जाहिर है, मुख्य रूप से मैतेई और कुकी समुदायों के बीच चल रहे हिंसक टकराव की आग में आम लोग झुलस रहे हैं और इस पर काबू पाने में सरकार नाकाम रही है। दरअसल, लोकतंत्र और शासन के बुनियादी सिद्धांतों के तहत कम से कम सरकार को इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि वह इस संघर्ष के दौरान किसी खास तबके के पक्ष में या किसी के खिलाफ न दिखे। मगर मणिपुर में सरकार पर ऐसे आरोप कई बार लगाए गए कि वह मैतेई समुदाय के लिए नरम रुख और कुकी समुदाय के प्रति उपेक्षा का भाव रखती है। इस क्रम में सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को सरकार के प्रति सख्त नाराजगी जाहिर करते हुए उसे इस बात के लिए कठघरे में खड़ा किया कि एक व्यक्ति को सिर्फ इसलिए अस्पताल नहीं ले जाया गया क्योंकि वह अल्पसंख्यक कुकी समुदाय से था।
गौरतलब है कि मणिपुर में अब भी कुकी और मैतेई समुदाय के बीच टकराव जारी है। मगर कम से कम सरकार की जिम्मेदारी होती है कि वह अपने क्षेत्राधिकार में हर नागरिक के प्रति समान बर्ताव करे, बिना किसी भेदभाव के सबके लिए सुरक्षित और सहज जीवन सुनिश्चित करे। जरूरत इस बात की है कि राज्य सरकार किसी समुदाय के प्रति पूर्वाग्रहों के बिना शांति-व्यवस्था कायम करे। किसी बीमार या जरूरतमंद व्यक्ति की मदद से बचने के लिए अगर कानून-व्यवस्था बिगड़ने की आशंका को कारण बताया जाता है, तो सवाल है कि इसे बहाल करने और रखने की जिम्मेदारी किसकी है? हालत यह है कि राज्य में दो समुदायों के बीच हिंसा के एक वर्ष से ज्यादा बीत चुके हैं, दो सौ से अधिक लोग मारे जा चुके हैं और आज भी सरकार शांति कायम कर पाने में नाकाम है। एक ओर, केंद्र सरकार संसद में यह आश्वासन दे रही है कि मणिपुर में शांति की आशा और भरोसा करना संभव हो रहा है, वहीं सुप्रीम कोर्ट को यह टिप्पणी करनी पड़ रही है कि उसे मणिपुर सरकार पर भरोसा नहीं है। किसी भी लोकतांत्रिक कही जाने वाली सरकार के लिए यह आदर्श स्थिति नहीं है।
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हाल ही में कुवैत की एक रिहायशी इमारत की आग में जले अनेक प्रवासी भारतयों की दुर्घटना, एक राष्ट्रीय स्तर की प्रवासी नीति बनाने की मांग करती है।
कुछ बिंदु –
– पूरे विश्व में भारतीय प्रवासी श्रमिकों की संख्या लगभग 17-18 लाख है।
– पिछले दो दशकों में खाड़ी देशों को जाने वाले भारतीय श्रमिकों की संख्या में लगभग 80% तक की वृद्धि हुई है। लेकिन 2014 से 2019 के बीच यह संख्या गिरकर लगभग 62% पर आ गई थी।
– अमेरिका में भारतीय तीसरी सबसे बड़ी अनाधिकृत आप्रवासी आबादी बन गए हैं।
– ये प्रवासी भारतीय अधिकतर एक नेटवर्क के माध्यम से विदेश जाते हैं। इनके नियोक्ता और नियंत्रक अधिकतर भारतीय ही होते हैं। कुवैत मामले में भी ऐसा ही था।
– यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारतीय नियोक्ता ने भी इन प्रवासी भारतीयों को उचित सुविधा मुहैया कराने के बारे में नहीं सोचा।
– अवैध प्रवास का यह मुद्दा ऐसा है, जिसमें विश्वसनीय कहानियाँ बनाकर ले जाने वाले एजेंट बहुत ही खतरनाक भूमिका निभाते हैं। हाल ही में पंजाब में भी ऐसे रैकेट का भांडाफोड़ हुआ है, जो भारतीयों को जाली पासपोर्ट पर मलेशिया व अन्य एशियाई देशों में भेजा करते थे।
– विदेश जाने वाले छात्र भी कई बार भारतीय छात्र संघों द्वारा प्रताड़ित किए जाते हैं।
सरकार को ऐसे प्रवासी भारतीयों के लिए सुरक्षित परिस्थितयाँ बनाने के प्रयास करने चाहिए। विशेषज्ञों का सुझाव है कि इस दिशा में राष्ट्रीय स्तर का प्रवास डेटाबेस बनाया जाना चाहिए।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 15 जून, 2024
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Date: 04-07-24
Avoidable tragedyGatherings should be tightly regulated to prevent Hathras-type stampedes.Editorial
The stampede on Tuesday at a religious congregation at Hathras in western Uttar Pradesh, claiming over 120 lives, is only the latest in a series of such tragedies in the country. There have been at least half-a-dozen such incidents in the last 20-odd years. In this instance, at least a lakh of people flocked to Fulrai village to listen to an address by a preacher Suraj Pal, also known as Narayan Sakar Hari or “Bhole Baba”. There are reports that there were over 2.5 lakh participants at the venue, which could accommodate no more than 80,000. The preacher is said to have followers in States such as Madhya Pradesh, Rajasthan and Haryana too. Most of the deceased, mainly women and children, were from the economically vulnerable sections of society, and were in search of spiritual solace. While only a fair investigation can find out the cause for the stampede, the reasons being cited include overcrowding, and the bid by some to collect soil from around the feet of the preacher. Not surprisingly, the responses, particularly from the field-level public health system, have exposed how ill-prepared the Uttar Pradesh administration is. Visuals of bodies lying outside the place of post mortem and of the kin desperate for help, as well as an inadequate number of ambulances and medical staff have become the common features of such tragedies. What has made it worse is the preacher and his aides reportedly leaving the site even as panic-stricken people were dying.
The most tragic aspect, as seen in the past, is that it was all avoidable had there been proactive steps taken by a vigilant administration. Unfortunately, the authorities in many States do not appear to have learnt lessons or made use of the availability of better technology and communication. Apart from stringent action against those responsible, the U.P. administration should ensure a just compensation package, the cost of which has to be borne by the organisers. The tragedy is a classic study in the management of large crowds. The officials concerned should ensure that the organisers have the wherewithal to handle large gatherings of any size. The local authorities and organisers should also conduct a drill ahead of such events. What is more important is that the political executive, the bureaucracy and organisers of any public event should be conscious of the fact that the loss of a life is a tragedy for the person’s family. The arrangements for mass functions should be governed by this fact.
Date: 04-07-24
तर्क – शास्त्र की परंपरा वाले देश में हम धर्मांध हो रहे हैं ?संपादकीय
‘उद्धरेदात्मनात्मानम …रिपुरात्मनः’ (आप स्वयं ही अपना उद्धार करें, अपना पतन न करें- श्रीमद्भगवद्गीता – 6.5 ) जिस देश में गीता जैसा ग्रंथ हो, जिसे आध्यात्मिक उन्नयन का संविधान कहा जा सकता है और जो सहज सभी भाषाओं में उपलब्ध हो, वहां तथाकथित बाबाओं की स्वीकार्यता समाज की कुंठित सोच बताती है। विश्वास नहीं होता कि इस महान ग्रंथ और इसकी विषय-वस्तु किसी मानव मष्तिष्क से पैदा हुई होगी । फिर भी हाथरस में भगदड़ का कारण उन सवा लाख लोगों द्वारा ‘भोले बाबा’ (पूर्व में खुफिया विभाग का सिपाही) के पैरों की धूल माथे पर लगाने की होड़ थी। शायद वे मानते थे कि अगर वे पैरों की धूल माथे पर लगा सकें तो इहलोक ही नहीं परलोक सुधर जाता। हादसे में बचे कुछ लोगों का कहना है कि बाबा को इस घटना का पूर्वानुमान था इसीलिए वो अपने प्रवचन में नाराज दिखाई दिए। क्या हो गया है समाज को ? कितना कुंठित है यह समाज कि बाबा में ईश्वरत्व तलाशने के लिए कह रहा है कि ‘बाबा को इसकी जानकारी थी ? यह वह देश है जहां समुन्नत तर्क – शास्त्र की परम्परा शंकराचार्य और कुमारिल भट्ट के शास्त्रार्थ में थी। जहां अध्यात्म को धर्म से सर्वथा अलग कर और फिर धर्म को आध्यात्मिक उन्नयन का साधन मानकर जीवन को निष्काम कर्म के भाव से करने की सलाह दी गई है। ऐसी दुखद घटनाएं सोचने पर विवश करती हैं।
Date: 04-07-24
सतत विकास लक्ष्यसंपादकीय
संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास के 2030 के एजेंडे के एक हिस्से, सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) को प्राप्त करने में छह वर्ष से भी कम समय शेष रह गया है। ऐसे में इसके 17 लक्ष्यों और 169 संबद्ध लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए भारत को अभी बहुत प्रयास करने की आवश्यकता है। इन वैश्विक लक्ष्यों को 2015 में अपनाया गया था और ये गरीबी उन्मूलन, लैंगिक न्याय हासिल करने, पृथ्वी को सुरक्षित रखने तथा सभी के वास्ते शांति और समृद्धि हासिल करने की दिशा में कदम उठाने के लिए एक सार्वजनिक आह्वान हैं। इस संदर्भ में हाल में जारी भारत में एसडीजी की प्रगति रिपोर्ट डेटा आधारित प्रमाण पेश करती है। यह बताती है कि एसडीजी और उससे जुड़े लक्ष्यों को हासिल करने की प्रक्रिया में भारत की प्रगति मिलीजुली रही है। एसडीजी1 के तहत भारत ने हाल के वर्षों में गरीबी उन्मूलन के मामले में बेहतर प्रदर्शन किया है। रिपोर्ट के अनुसार बहुआयामी गरीबी में 9.89 फीसदी की कमी आई और यह 2015-16 से 2019-21 के बीच घटकर 14.96 फीसदी रह गई। नीति आयोग की एक हालिया रिपोर्ट से संकेत मिलता है कि 2022-23 में यह और गिरकर 11.28 फीसदी रह जाएगी। भविष्य में गरीबी के स्तर में और कमी लाने के लिए निरंतर प्रयासों की आवश्यकता होगी तथा लोगों की खर्च योग्य आय बढ़ानी होगी।
अन्य क्षेत्रों में जीवन स्तर सुधारने के लिए सरकार के निरंतर हस्तक्षेप की आवश्यकता होगी। उदाहरण के लिए रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया है कि एक ओर जहां मांओं और बच्चों के स्वास्थ्य में सुधार हुआ है तथा कुपोषण, मातृ एवं शिशु मृत्यु दर में कमी आई है, वहीं 15 से 49 वर्ष की आयु की महिलाओं तथा पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों में खून की कमी के मामलों में इजाफा हुआ है। एसडीजी 4 यानी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के मामलों में उच्चतर माध्यमिक शिक्षा में नामांकन, व्यावसायिक और तकनीकी प्रशिक्षण में भागीदारी दर, दिव्यांग बच्चों के नामांकन, शिक्षक-छात्र अनुपात और स्कूल बुनियादी ढांचे के मामले में 2015-16 से अब तक काफी सुधार हुआ है। बहरहाल, कक्षा पांचवीं और आठवीं की पढ़ाई पूरी करने वाले बच्चों की तादाद महामारी के पहले के स्तर से नीचे आ गई है। यह बताता है कि महामारी ने अर्थव्यवस्था को किस तरह प्रभावित किया है। इसके अलावा महिला श्रमिकों की भागीदारी बढ़ने के साथ ही वेतन की असमानता, दहेज के मामले और अपराधों की तादाद भी बढ़ी है। इनमें महिलाओं पर यौन अपराध शामिल हैं। ये कारक बताते हैं कि स्वास्थ्य, शिक्षा और सामाजिक संरक्षण के क्षेत्र में सरकारी व्यय बढ़ाने की आवश्यकता है। बहरहाल, रिपोर्ट में संकेत दिया गया है कि कुल सरकारी व्यय में अनिवार्य सेवाओं पर होने वाला व्यय महामारी के पहले के स्तरों से कम हुआ है।
टिकाऊ और कार्बन निरपेक्ष वृद्धि की तलाश में भारत ने ग्लास्गो में 2021 के कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज 26 में यह लक्ष्य तय किया था कि 2070 तक उसे ‘नेट जीरो’ उत्सर्जन का लक्ष्य हासिल करना होगा। यह रिपोर्ट नवीकरणीय ऊर्जा की बढ़ी हिस्सेदारी और बेहतर औद्योगिक पर्यावरण अनुपालन के साथ सकारात्मक संकेत देती है। बहरहाल, प्रति व्यक्ति जीवाश्म ईंधन खपत में इजाफा और वन क्षेत्र में इजाफा नहीं होने ने इस प्रगति का प्रतिकार करते हैं। पर्यावरण संरक्षण के लिए आवंटित सरकारी व्यय के अनुपात में भी मामूली सुधार हुआ है। यह 2015-16 से 2022-23 के बीच केवल 0.3 फीसदी बढ़ा है। इससे संकेत मिलता है कि सरकार को और कदम उठाने की आवश्यकता है।
शांति, न्याय और मजबूत संस्थानों से संबंधित एसडीजी16 शांति, प्रभावी शासन और पारदर्शी न्याय व्यवस्था चाहता है। इसके विपरीत रिपोर्ट में बताया गया है कि महिलाओं और बच्चों पर अपराध हर वर्ष बढ़ रहे हैं। भारत प्रति एक लाख आबादी पर 1.93 अदालतों और 1.53 न्यायाधीशों के साथ वैश्विक मानकों से बहुत पीछे है। आंकड़े यह भी बताते हैं कि सूचना के अधिकार के तहत मांगी गई जानकारियों के जवाब देने का प्रतिशत कम हुआ है। कुल मिलाकर जहां भारत स्वस्थ गति से बढ़ रहा है, वहीं वृद्धि के लाभ आबादी के कुछ हिस्सों तक नहीं पहुंच पा रहे हैं। अगर आर्थिक वृद्धि कुछ जगहों पर केंद्रित होगी तो इससे लंबी अवधि में अर्थव्यवस्था की संभावनाओं पर असर होगा। बेहतर होगा कि सरकार आने वाले वर्षों में तय लक्ष्य पाने के लिए उन क्षेत्रों पर जोर दे जहां हम अभी पीछे हैं।
Date: 04-07-24
बाबाओं का मायाजालप्रियंका सौरभ
पिछले कुछ दशकों से उभरने वाले किस्म-किस्म के बाबाओं ने राष्ट्र के मुख पर कालिख पोतने का काम किया है। अपनी अनुयायी स्त्रियों के शारीरिक शोषण, हत्या-अपहरण से लेकर अन्य जघन्य अपराध करने वाले बाबाओं का प्रभाव इस कदर बढ़ता जा रहा है कि आज जनता को तो छोड़िए, सदिच्छाओं वाले राजनेता, अभिनेता, अधिकारी, बुद्धिजीवी इत्यादि वर्ग भी उनसे घबराने लगा है। आखिर, इन बाबाओं के महाजाल का समाजशास्त्र क्या है? इसी तरह सवाल यह भी है कि इनके पीछे जनता के भागने का क्या अर्थशास्त्र और मनोविज्ञान है?
आजकल विभिन्न सामाजिक वगरे में अलग-अलग किस्म के अंधविश्वास प्रचलित हैं। इतने जागरूकता अभियानों के बावजूद आज भी आपको गांव-कस्बों में भूत-प्रेत के किस्से सुनने को मिल जाएंगे। वहीं हायर क्लास के अंधविश्वास अलग हैं। इस क्लास में भी असुरक्षा की भावना कम नहीं है। इस वर्ग के लोग यूं तो अत्याधुनिक होने का दावा करते हैं, लेकिन इसके बावजूद एयरकंडिशंड आश्रमों वाले गुरु ओं के यहां लाखों का चढ़ावा चढ़ाने से लेकर अपनी सफलता/असफलता की वजह लकी चार्म को मानने से भी गुरेज नहीं करते। ऐसी मान्यताएं भारत ही नहीं, बल्कि विश्व के सभी देशों में पाई जाती हैं।
सवाल उठता है कि समाज में अतार्किक विचारधारा वाले इतने अधिक लोग कहां से आ गए? जवाब है, वह परवरिश और माहौल जो हम अपने बच्चों को देते हैं। शिक्षा व्यवस्था के तहत बच्चों में वैज्ञानिक सोच विकसित करने के उतने प्रयास नहीं हो रहे जितने होने चाहिए। संयुक्त परिवारों का टूटना और नई जीवन शैली का एकाकीपन, यांत्रिकता, तनाव आदि ऐसी स्थिति पैदा कर दी जहां हर व्यक्ति परेशान और बेचैन हो चला है। इन्हीं सामाजिक-मनोवैज्ञनिक स्थितियों के बीच लोग जाने-अनजाने ऐसे बाबाओं की ओर उन्मुख होने लगते हैं, जो लोगों को हर दु:ख-तनाव से छुटकारा दिलाने का दावा करते हैं। लोगों में वहम पैदा कर फायदा उठाने की कला बाजार ने भी सीख ली है।
यही वजह है कि बाजार के जन्म दिए हुए बहुत सारे त्योहार आज परंपरा के नाम पर कुछ दूसरा ही रूप ले चुके हैं। किसी त्योहार पर गहने खरीदने का प्रचलन है तो किसी पर महंगे जानवरों की कुर्बानी देने का। साधारण से रिवाज आज पूरी तरह आर्थिक रंग में रंग चुके हैं। लोग भी इन्हें मानते रहते हैं। बिना महसूस किए कि इससे नुकसान उन्हीं का हो रहा है। छोटे शहरों में आज भी पाखंडी बाबाओं और फकीरों का जाल फैला हुआ है जिनकी नेमप्लेट अक्सर इनके मल्टीटैलेंटेड होने का आभास कराती है। ये अक्सर खुद को ट्रैवल एजेंट (विदेश यात्रा करवाने का दावा), फाइनेंशियल एक्सपर्ट (फंसा हुआ धन निकलवाने का दावा), रिलेशनशिप एक्सपर्ट (प्रेम विवाह करवाने, सौतन से छुटकारा दिलाने का दावा) और मेडिकल एक्सपर्ट (एड्स, कैंसर जैसी बीमारियां ठीक करने का दावा) आदि बताते हैं। कई लोग इनके झांसे में आ भी जाते हैं, और इनका बैंक बैलेंस बढ़ाते हैं।
देश में राजसत्ता-तंत्र अपने सामाजिक-आर्थिक दायित्व निभाने में अपेक्षाकृत पीछे ही रहा। दूसरी ओर, इन बाबाओं द्वारा शिक्षा और स्वास्थ्य से संबंधित कार्य किए जाने लगे। इसके साथ ही भूखों को भोजन से लेकर अन्य सामाजिक कामों में हिस्सेदारी की जाने लगी। इस क्रम में उनकी ओर से समानता का भाव स्थापित करने का काम भी किया जाने लगा। धीरे-धीरे वे लोगों के विवाद-झगड़ों का निपटारा भी करने लगे। ऐसे काम भी करने लगे जो राज सत्ता यानी शासन के हिस्से में आते थे। ऐसे कामों से उनकी लोकप्रियता बढ़ी। उनके कल्याणकारी कामों के तिलिस्म में न केवल गरीब-अभावग्रस्त और कम पढ़ी-लिखी जनता फंसी, बल्कि उनका जादू अपेक्षाकृत संपन्न और शिक्षित लोगों पर भी चला, जो जीवन की विविध जटिलताओं, सामाजिक-मानसिक समस्याओं में उलझे हुए हैं।
इस तरह ये अपने अनुयायी बढ़ा कर सामाजिक वैधता हासिल करते हैं, और उसके बल पर राजनीतिक संरक्षण हासिल करने में समर्थ हो जाते हैं। बाबाओं को राजनीतिक संरक्षण देने के लिए कोई भी राजनीतिक दल पाक-साफ नहीं है। माना जाता है कि राजनीतिक पार्टयिां अपना काला धन खपाने-छिपाने के लिए भी बाबा लोगों का इस्तेमाल करती हैं। चूंकि बाबाओं के पास अनुयायियों की अच्छी-खासी संख्या होती है, इसलिए राजनीतिक दलों के लिए वे वोट बैंक का भी काम करते हैं। किसी बात पर आंख मूंद कर विश्वास करने की प्रवृत्ति आज की स्मार्टफोन जेनरेशन से तर्कहीन काम तक करा सकती है। इस वर्ग के लोग आंखें मूंद कर दूसरों का अनुसरण करते हैं, और स्वविवेक का इस्तेमाल करके निर्णय नहीं ले रहे हैं। किसी काम को सिर्फ इसलिए करते हैं, क्योंकि वह सालों से होता आ रहा है, या उसे बहुत सारे लोग कर रहे हैं, और कभी नहीं सोचते कि उसकी उपयोगिता क्या है। दूसरे शब्दों में कहें तो ऐसे लोग सामाजिक, राजनैतिक, धार्मिंक और भावनात्मक अंधविश्वासों में जकड़े होते हैं।
इन लोगों का आईक्यू बेहद कम होता है, और इन्हें बेहद आसानी से प्रभावित किया जा सकता है। ये रैशनली नहीं सोचते, पर इमोशनली बेहद चाज्र्ड होते हैं। इनके दिल में आसानी से किसी चीज के लिए लगाव या नफरत पैदा की जा सकती है, और ऐसा होने पर ये किसी भी हद तक जा सकते हैं। आंख मूंद कर किया गया विश्वास न सिर्फ इनके लिए, बल्कि दूसरों के लिए भी घातक साबित होता है। कबीर की शिक्षाओं का निचोड़ यही है कि हर तथ्य पर सवाल उठाएं। जब तक खुद उसे परख न लें, तब तक उस पर विश्वास न करें। दार्शनिक प्लूटो ने भी यही कहा है कि शासक हमेशा अनबायस्ड व्यक्ति को ही होना चाहिए। दुर्भाग्य की बात है कि आज बहुत सारे लोग भीड़ का अनुसरण करने की मानसिकता से ग्रस्त हैं।
Date: 04-07-24
हाथरस हादसे के सबकसंपादकीय
हाथरस में बाबा नारायण साकार के सत्संग में मची भगदड़ में 120 से भी ज्यादा आस्थावान लोगों की मौत दर्दनाक तो है ही, यह हमारे तंत्र और समाज के सभी स्तरों पर आत्मचिंतन का अवसर भी है। विडंबना देखिए, जिन बाबा के दर्शन करने और प्रवचन सुनने आए इतने श्रद्धालु अपनी जान से हाथ धो बैठे, कई सारे जख्मी होकर अस्पतालों में पडे़ हैं, वह हादसे के घंटों बाद तक लापता रहे, जबकि उन्हें घायलों की सेवा में जुटना चाहिए था। बहरहाल, संतोष की बात है कि राज्य के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने हादसे के शिकार लोगों के परिजनों व घायल सत्संगियों से मिलकर उनके आहत मन पर मरहम रखने का काम किया है और इस घटना की न्यायिक जांच कराने की घोषणा की है। जो ब्योरे हैं, वे बताते हैं कि हादसे की वजह भी चिर-परिचित है और नारायण साकार के सत्संग में जुटी भीड़ की प्रकृति भी, मगर उसके ठीक-ठीक कारणों को जानने के लिए न्यायिक जांच के नतीजों का इंतजार करना होगा। आशा है, यह जांच जल्द पूरी होगी और इसमें जिम्मेदारियां भी तय की जाएंगी।
दुर्योग से ऐसे त्रासद मौकों पर भी सियासत अपनी निर्ममता नहीं छोड़ती। अभी हाथरस हादसे के सभी मृतकों की शिनाख्त भी नहीं हो पाई थी कि इस पर राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप शुरू हो गए। यह पीड़ादायक है। इसलिए पहला सबक तो हमारे राजनीतिक वर्ग को ही सीखने की जरूरत है कि कई बार मर्यादित मौन ज्यादा अभिव्यंजित होती है। दूसरा सबक हमारे शासन-तंत्र के लिए है कि वह स्थानीय प्रशासन को कैसे ज्यादा से ज्यादा संवेदनशील बनाए? भगदड़ की ऐसी घटनाएं लगातार और देश के लगभग सभी हिस्सों में घटती रही हैं, मगर इनके दोषियों को सजा दिए जाने की कोई नजीर याद नहीं आती और जब ऐसी कोई नजीर ही याद न रहे, तो लापरवाही पर लगाम कैसे लगेगी? ऐसा नहीं कि हमारे तंत्र में सामर्थ्य नहीं। करोड़ों की भीड़ वाले कुंभ मेले सुचारू रूप से आयोजित हो सकते हैं, तो फिर हजारों की भीड़ के लिए व्यवस्था बनाने में क्या दिक्कत हो सकती है? सवाल प्राथमिकता और पेशेवर कार्यशैली की है। हमारे तंत्र में आज भी पेशेवराना कौशल की कमी है।
देश में ऐसे कई उदाहरण मौजूद हैं कि यदि ईमानदारी से सबक सीखे जाएं, तो जान-माल की पूरी हिफाजत हो सकती है। साल 2004 में आई सुनामी से सीखा गया सबक इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। हमने पड़ोसी देशों के साथ मिलकर एक ऐसा सफल तंत्र खड़ा किया है, जिसके कारण अब चक्रवाती तूफान के आने से पहले ही हम लाखों लोगों को तटीय इलाकों से सुरक्षित स्थान पर ले जा पाते हैं। वैसी ही कोई व्यवस्था हाथरस जैसे आयोजनों के लिए अनिवार्य बनाई जानी चाहिए। यह हादसा संत समाज के लिए भी एक सबक है कि वे अपनी टोली में घुस आए अवांछित तत्वों की पहचान कर उनसे भोले-भाले आस्तिकों को सतर्क करें। यह छिपी हुई बात नहीं है कि धर्म के क्षेत्र में चढ़ावे के अर्थशास्त्र ने कई धनलोलुपों की इसमें घुसपैठ करा दी है। धार्मिक आयोजनों में बढ़ता आडंबर प्रशासन के आगे लगातार चुनौतियां बढ़ाता जा रहा है और आस्था एक ऐसा भावनात्मक मसला है कि कई बार प्रशासनिक अधिकारी चाहते हुए भी सख्ती करने से बचते हैं, ऐसे में धर्म-ध्वजा संभालने वाले लोगों की भी जिम्मेदारी बनती है कि वे शासन और तंत्र की मदद करें, तभी किसी सत्संग को कोहराम में बदलने से बचाया जा सकेगा।
Date: 04-07-24
भारतीय अदालतों पर मुकदमों का बोझ बढ़ाती लंबी जिरहराहुल मथान, ( साइबर विशेषज्ञ )
अपनी किताब द कोर्ट ऑन ट्रायल में अपर्णा चंद्रा, सीतल कलंत्री और विलियम हबर्ड ने भारतीय सुप्रीम कोर्ट के प्रदर्शन का आकलन करने के लिए डेटा-संचालित दृष्टिकोण अपनाया है। शीर्ष अदालत के दस लाख से भी अधिक मामलों के डेटा-सेट का उपयोग करते हुए इन तीनों ने कई सवालों का उत्तर खोजने का प्रयास किया है। मसलन, क्या हमारी शीर्ष अदालत वास्तव में ‘जनता का न्यायालय’ है; क्या कुछ व्यक्तियों (बड़े नामचीन वकीलों) का इसके फैसलों पर ज्यादा असर है; क्या रोस्टर-मास्टर के तौर पर प्रधान न्यायाधीश मनपसंद पीठ को अहम मुकदमों को सौंपने की शक्ति के जरिये अपना प्रभाव बढ़ाते हैं; और क्या सेवानिवृत्ति के बाद नियुक्ति का वादा किसी न्यायाधीश के कार्यकाल के अंतिम दिनों के न्यायिक निर्णयों को प्रभावित कर सकता है?
इस किताब की कुछ बातों से मैं सहमत नहीं हूं। जैसे, सुप्रीम कोर्ट जनता की अदालत है या नहीं, इसके आकलन के लिए अपनाई गई इनकी पद्धति। लेखक त्रयी ने इस आकलन के लिए मुकदमों को स्वीकृत किए जाने के आंकड़ों को देखा और तर्क दिया कि यह सचमुच लोगों की अदालत है, क्योंकि सुबूत बताते हैं कि न्यायालय ऐसे अधिक मामलों को स्वीकार करता है, जिनमें जीतने की संभावना नहीं होती। मेरी नजर में इस निष्कर्ष पर पहुंचने का यह पेचीदा तरीका है। सरल रास्ता यह होता कि विशेषाधिकार से रहित लोगों द्वारा दायर मुकदमों की संख्या गिनी जाती, और फिर उनमें से किस अनुपात में मुकदमे स्वीकार किए गए, इसका आकलन किया जाता।
हालांकि, इसमें कई जानकारियां ऐसी हैं, जो काफी उपयोगी हैं। उदाहरण के लिए, सुप्रीम कोर्ट में लंबित मामलों के आंकडे़ तो आंखें खोलने वाले हैं। शीर्ष अदालत में दर्ज सभी मामलों में से लगभग 40 प्रतिशत मुकदमे पांच साल से अधिक समय से लंबित हैं, तो वहीं 7.7 फीसदी मामले 10 से भी अधिक वर्षों से लंबित पड़े हैं। हम सब भारतीय कानून प्रणाली की लेट-लतीफी से बखूबी वाकिफ हैं, पर यह कई लोगों के लिए एक झटका हो सकता है कि देश की सबसे ऊंची अदालत भी कुछ मामलों में उच्च न्यायालय जितना लंबा समय लेती है!
ये तीनों लेखक बैकलॉग समस्या का समाधान भी सुझाते हैं। उनके मुताबिक, मुकदमों में जिरह पर अनुचित जोर देरी का बड़ा कारण है। जाहिर है, हम मौखिक जिरह से बचते हुए लिखित प्रस्तुतियों से भी फैसले तक पहुंच सकते हैं, खासकर वाणिज्यिक विवाद के मामलों में, जहां निर्णय अक्सर तथ्य की खोज मात्र होता है। ये कुछ ऐसी कमियां हैं, जिनके हम सब इतने अभ्यस्त हो गए हैं कि हम मानते हैं, यह न्यायिक प्रणाली की अपरिहार्य विशेषता है। यह एक गहरी धारणा है कि जब तक वकील मौखिक जिरह नहीं करेंगे, तब तक न्याय ही नहीं मिलेगा।
पिछले महीने, अमेरिका में एक अपीलीय न्यायाधीश के साथ मुझे सप्ताहांत बिताने का मौका मिला। उस दौरान हमने भारतीय न्यायिक प्रणाली के विभिन्न पहलुओं पर चर्चा की और यह जानने की भी कोशिश की कि अमेरिका में काम करने के तरीके से यह कैसे भिन्न है? मुझे यह जानकर आश्चर्य हुआ कि कई मामलों में अमेरिकी न्यायाधीश केवल लिखित दलीलों की बिना पर ही मुकदमों का फैसला करते हैं। मौखिक जिरह के लिए भी वहां एक सख्त समय-सीमा की व्यवस्था है। आम तौर पर छोटे मामलों में हर पक्ष के लिए 10 मिनट से अधिक नहीं, बल्कि सबसे महत्वपूर्ण (मृत्युदंड) मामलों में हरेक पक्ष को 30 मिनट तक मौखिक जिरह की अनुमति होती है।
जब मैंने उनसे पूछा कि सिर्फ 20 मिनट की मौखिक जिरह के बाद किसी मुकदमे का फैसला करते हुए उन्हें कैसा लगता है, तो उनका जवाब था, लगभग हरेक मामले में उनका निर्णय काफी हद तक लिखित दलीलों पर आधारित होता है। जब वकील मौखिक जिरह करते हैं, तब वह उस समय का उपयोग उन मुद्दों पर स्पष्टीकरण पाने के लिए करती हैं, जो लिखित प्रस्तुतियों में तफसील से शामिल नहीं किए गए होते।
अपने देश में 30 मिनट निराशाजनक रूप से कम लग सकते हैं। लेकिन यदि यह अमेरिका में काम कर सकता है, तो कोई वजह नहीं कि यहां यह काम न करे। न्यायिक दक्षता बढ़ाने के लिए भारतीय अदालतों में मौखिक जिरह पर एक समय-सीमा लगाने की कोशिश होनी चाहिए।
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इस आम चुनाव के नतीजों से यह प्रमाणित हो गया है कि भारत की हजारों साल पुरानी सभ्यता आज भी जीवित है। परिणामों ने नफरत की राजनीति पर लगाम लगाई है।
भगवान राम का आह्वान और चुनाव –
1984 में एक धर्मनिरपेक्ष दल के रूप में मात्र दो लोकसभा सीटों से 2019 में 303 सीटों तक भाजपा यात्रा करती रही। 22 जनवरी को रामलला की प्राण प्रतिष्ठा से ऐसा वातावरण बनाया गया कि 2024 के निकट आ रहे आम चुनाव में इसका प्रभाव जमा रहे। राम जन्म स्थान को लेकर की गई आडवाणी की रथ यात्रा का उद्देश्य भी पूरी तरह से राजनीतिक था। 1992 में बाबरी मस्जिद विध्वंस के साथ ही भाजपा नेताओं ने चुनावी जीत का रास्ता साफ माना होगा। लेकिन 1993 के चुनाव नतीजों में उन्हें वैसा कुछ लाभ नहीं मिला था। 1998 में पहली भाजपा सरकार का गठन राम मंदिर आंदोलन नहीं, बल्कि सत्तारूद गठबंधन में कलह के कारण हुआ था।
2024 के चुनाव में अयोध्या में भाजपा की हार, अपने आप में चुनावी राजनीति और भगवान राम के आह्वान के बीच की खराब कड़ी को दर्शाती है। इस चुनाव के नतीजे बताते हैं कि भारतीय मतदाता ने नफरत, फूट डालो और राज करो की राजनीति के प्रति घृणा व्यक्त की है।
एक सतत् विरासत –
इन चुनाव परिणामों ने दिखा दिया है कि हमारी मध्ययुगीन समय की सभ्यता आज भी प्रमुख है। इसने हमें कई संत कवियों एवं भक्तों की विरासत दी है। इन संतों ने एक सार्वभौमिक ईश्वर की अवधारणा करके देवताओं के तनावपूर्ण धार्मिक विभाजन को शांत किया है। यही विरासत आज भी कायम है। यह हमारी सांस्कृतिक शक्ति भी है।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित हरबंस मुखिया के लेख पर आधारित। 14 जून, 2024
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Date: 03-07-24
सत्संग या अनुष्ठानों में भगदड़ कैसे रुकेगी ?संपादकीय
उत्तर प्रदेश के हाथरस जिले के फुलरई गांव में एक सत्संग / समागम के बाद भगदड़ मच गई, जिसमें सैकड़ों लोगों की मौत की खबर है। घायलों की संख्या का अंदाजा लगाया जा सकता है। यह पहली घटना नहीं है। धर्मपरायण देश में ऐसे आयोजन होते रहते हैं, लेकिन इनमें मजबूत प्रबंधन का नितांत अभाव होता है, जिसके कारण अक्सर भगदड़ की खबरें सामने आती रहती हैं। चूंकि इसके लिए आमतौर पर स्थानीय प्रशासन से भी अनुमति नहीं ली जाती या ली जाती है तो भीड़ भी अनुमान से कहीं ज्यादा आ जाती है, फिर भी प्रशासन को लापरवाही का जिम्मेदार ठहराना अनुचित नहीं होगा। कई बार तो आयोजकों को भी अहसास नहीं होता कि भीड़ कितनी बड़ी होगी, कार्यक्रम के लिए जो स्थान लिया गया है, वह उस भीड़ के हिसाब से कैसा है…। हाथरस के इस ताजा मामले को ही लें। यह बाबा पहले आईबी में काम करते थे। अचानक उन्होंने ब्रह्मज्ञान का दावा किया। जनता उनसे प्रभावित होने लगी। दोनों पति-पत्नी भोले बाबा के नाम से समागम करने लगे। भारत में ऐसे बाबाओं की भक्त संख्या को वोटर के रूप में देखते हुए नेता और प्रशासन ऐसे मामलों में हस्तक्षेप नहीं करते। देश के कुछ बाबाओं के आचरण को लेकर तमाम आपराधिक घटनाएं देश ने देखी हैं। वैसे भी प्रशासनिक सिद्धांत के अनुसार भारत जैसा अपेक्षाकृत कम पढ़ा-लिखा, लेकिन बेहद धार्मिक (खासकर प्रवचन, संगीत, भंडारा जैसे आयोजनों को लेकर ) समाज अक्सर अपनी जान के प्रति लापरवाह होता है, जबकि आयोजकों को भीड़ जुटाने के अलावा उनकी सुरक्षा में कोई दिलचस्पी नहीं होती। याद करिए आजाद भारत में सन् 1954 के प्रयाग के कुंभ मेले में भी हजारों लोगों की भगदड़ में मौत हुई थी। क्या हम ऐसी घटनाओं के बाद कोई सबक लेते हैं
Date: 03-07-24
हाथरस में हृदयविदारकसंपादकीय
उत्तर प्रदेश के हाथरस जिले में एक धार्मिक समागम में भगदड़ मचने से सौ से अधिक लोगों की मौत एक भयावह घटना है। यह घटना इसीलिए घटी, क्योंकि इस समागम में अनुमान से कहीं अधिक संख्या में लोग शामिल हुए और जब वे आयोजन के उपरांत जाने लगे तो अव्यवस्था के चलते भगदड़ मच गई। और लोगों ने ही एक-दूसरे को कुचल दिया। इस तरह की घटनाएं केवल जनहानि का कारण ही नहीं बनतीं, बल्कि देश की बदनामी भी कराती हैं। हाथरस की घटना कितनी अधिक गंभीर है, इसका अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि प्रधानमंत्री ने लोकसभा में अपने संबोधन के बीच इस हादसे की जानकारी दी। इससे संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता कि उत्तर प्रदेश सरकार ने घटना की जांच के आदेश दे दिए हैं और दोषी लोगों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करने का आश्वासन दिया है, क्योंकि आमतौर पर यही देखने में आता है कि इस तरह के मामलों में कार्रवाई के नाम पर कुछ अधिक नहीं होता। इसी कारण रह-रहकर ऐसी घटनाएं होती रहती हैं और उनमें बड़ी संख्या में श्रद्धालु अपनी जान गंवाते हैं। इसके बावजूद कोई सबक सीखने से इन्कार किया जाता है। धार्मिक आयोजनों में अव्यवस्था और अनदेखी के चलते लोगों की जान जाने के सिलसिले पर इसलिए विराम नहीं लग पा रहा है, क्योंकि दोषी लोगों के खिलाफ कभी ऐसी कार्रवाई नहीं की जाती, जो नजीर बन सके।
हाथरस में जिन बाबा के सत्संग में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ जुटी, वह पहले पुलिस सेवा में थे और उनके आयोजन की देख- रेख उनके अनुयायी करते हैं। यह हैरानी की बात है कि किसी ने यह देखने-समझने की कोई कोशिश नहीं की कि भारी भीड़ को संभालने की पर्याप्त व्यवस्था है या नहीं? यह मानने के अच्छे-भले कारण हैं कि इस आयोजन की अनुमति देने वाले अधिकारियों ने भी कागजी खानापूरी करके कर्तव्य की इतिश्री कर ली। यदि ऐसा नहीं होता तो किसी ने इस पर अवश्य ध्यान दिया होता कि आयोजन स्थल के पास का गड्ढा लोगों की जान जोखिम में डाल सकता है। ऐसा लगता है कि अपने देश में धार्मिक-सामाजिक आयोजनों में कोई इसकी परवाह नहीं करता कि यदि भारी भीड़ के चलते अव्यवस्था फैल गई तो उसे कैसे संभाला जाएगा ? क्या इसलिए कि प्रायः मारे जाने वाले लोग निर्धन वर्ग के होते हैं? यह तय हैं कि हाथरस में इतनी अधिक संख्या में लोगों के मारे जाने पर शोक संवेदनाओं का तांता लगेगा, लेकिन क्या शोकाकुल होने वाले ऐसे कोई उपाय भी सुनिश्चित कर सकेंगे, जिससे भविष्य में देश को शर्मिंदा करने वाली ऐसी घटना न हो सके ? प्रश्न यह भी है कि आखिर धार्मिक आयोजनों में धर्म-कर्म का उपदेश देने वाले लोगों को संयम और अनुशासन की सीख क्यों नहीं दे पाते ? यह प्रश्न इसलिए, क्योंकि कई बार ऐसे आयोजनों में भगदड़ का कारण लोगों का असंयमित व्यवहार भी बनता है।
Date: 03-07-24
दंड नहीं, न्याय का विधानप्रमोद भार्ग
वर्ष 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम से आहत होकर अंग्रेजों ने स्वतंत्रता सेनानियों और उनके मददगारों को दंड देने की दृष्टि से अनेक औपनिवेशिक कानून लागू किए थे। इनमें प्रमुख रूप से अंग्रेजी राज का पर्याय बने तीन मूलभूत कानूनों में आमूलचूल परिवर्तन किए गए हैं। 1860 में बने इंडियन पेनल कोड को अब भारतीय न्याय संहिता, 1898 में बने दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और 1872 में बने इंडियन एविडेंस कोड को अब भारतीय साक्ष्य संहिता के नाम से जाना जाएगा। इन कानूनों के शीर्षक में ही ‘दंड’ की प्रधानता है।
मसलन, इन कानूनों की चपेट में जो भी आएगा उसे दंडित होना ही पड़ेगा दंड के मनोविज्ञान से ही निर्दोष भयभीत हो जाया करते हैं। इस भय से मुक्ति का प्रावधान करने की दृश्टि से ‘न्याय’ शब्द का प्रयोग कानून के शीर्षकों में किया गया है। न्याय शब्द ही इस अर्थ का प्रतीक है कि यदि आपसे भूलवश कोई अपराध हो भी गया है तो आप न्याय के भागीदार होंगे। फिरंगी हुकूमत ने कानून भारतीयों को अधिकतम दंड देने की मानसिकता से बनाए थे, जबकि कोई भी विधि सम्मत प्रक्रिया दंड की अपेक्षा न्याय के सरोकारों से जुड़ी होनी चाहिए। इसीलिए भारतीय न्याय व्यवस्था के सिलसिले में कहा जाता रहा है कि यहां न्याय नहीं निराकरण होता है। नये कानूनों के लागू होने के साथ दुनिया में सबसे अधिक आधुनिक आपराधिक न्याय प्रणाली भारत की होगी, क्योंकि अब इनकी आत्मा में भारतीयता निहित कर दी गई है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पांच प्रण किए थे, इनमें एक प्रण गुलामी की निशानियों को खत्म करना भी था। कानून संबंधी पारित विधेयक उसी परिप्रेक्ष्य में हैं। नये कानूनों के अंतर्गत दंड अपराध रोकने की भावना पैदा करने के लिए दिया जाएगा। नये कानून महिलाओं और बच्चों की सुरक्षा पर केंद्रित हैं। अब नये कानून में नाबालिग से दुष्कर्म और मॉब लिंचिंग के लिए फांसी की सजा दी जाएगी। राजद्रोह कानून ब्रिटिश सत्ता को कायम रखने के लिए था, इसे अब खत्म किया जा रहा है। कुछ प्रचलित धाराओं की संख्या भी बदली गई है। प्रमुख रूप से अंग्रेजी राज का पर्याय बने तीन मूलभूत कानूनों में आमूलचूल परिवर्तन किए गए हैं। 1860 में बने इंडियन पेनल कोड को अब भारतीय न्याय संहिता (बीएनएस) कहा जाएगा। 164 साल पुरानी आईपीसी में 511 धाराएं थीं, जो बीएनएस 2023 में 358 रह जाएंगी।
इसमें 21 नये अपराध जुड़े हैं, और 41 धाराओं में सजा बढ़ाई गई है। पहली बार छह अपराधों में सामुदायिक सेवा की सजा जोड़ी गई है। साफ है, पीड़ितों के साथ न्याय पर फोकस किया गया है। 1998 में बने दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (वीएनएसएस) कहा जाएगा। इसमें 47 नई धाराओं के साथ अब कुल 531 धाराएं होंगी। पहले धारा 154 में होने वाली प्राथमिकी नये कानून के तहत धारा 173 में दर्ज की जाएगी। अब पुराने कानून दंड प्रक्रिया संहिता में से ‘दंड को हटाकर नागरिक सुरक्षा पर जोर दिया गया है, 1872 में बने इंडियन एविडेंस कोड को अब भारतीय साक्ष्य संहिता के नाम से जाना जाएगा। पुराने कानून में 167 धाराएं थीं, जो अब 170 रह गई हैं। इस कानून को तकनीक और फॉरेंसिक आधार पर तैयार किया गया है ताकि सजा का प्रतिशत 90 प्रतिशत तक पहुंच जाए। बढ़ते साइबर अपराधों के संदर्भ में इस कानून की अहम भूमिका जताई जा रही है।
नये प्रारूप में धारा 150 के तहत आरोपी को सात साल की सजा से लेकर उम्रकैद तक की सजा दी जा सकती है। मॉब लीचिंग यानी उन्मादी भीड़ द्वारा हत्या और हिंसा के लिए अलग से सजा का प्रावधान किया गया है। इसे पंथनिरपेक्ष रखा गया है क्योंकि कभी-कभी चोर को भी भीड़ मार देती है। झारखंड और अन्य कई अशिक्षित क्षेत्रों में महिलाओं को डायन बता कर समूह मार देता है। इन हत्याओं पर अब मॉब लीचिंग कानून लागू होगा। अभी तक ऐसे मामलों में हत्या की धारा 302 और दंगा या बलवा की धाराएं 147 148 के तहत कार्यवाही होती है। नाबालिग से दुष्कर्म या पहचान छिपा कर किए गए दुष्कर्म के आरोप में 20 साल का कारावास या मृत्युदंड का प्रावधान किया गया है। विरोध नहीं करने के अर्थ का आशय सहमति नहीं निकाला जाएगा।
नये कानून में पहली बार आतंकवाद की इबारत को पारिभाषित किया गया है। कोई व्यक्ति देश की एकता, अखंडता, संप्रभुता और सुरक्षा को संकट में डालने के इरादे से कृत्य करता है तो उसे नये कानून के हिसाब से सजा मिलेगी। देश के अस्तित्व को चुनौती देने वाले बाहरी या भीतरी असामाजिक तत्व कानूनी शिकंजे से बचने न पाएं, इसके प्रावधान किए गए हैं। यही कानूनी प्रावधान बृहत्तर सामाजिक हित राज्य को भारत की संप्रभुता, अखंडता तथा राज्य की सुरक्षा से जोड़ते हैं। भारत के विरुद्ध सांप्रदायिक कट्टरता फैलाने और सरकार के लिए नफरत के हालात बनाने में भारत विरोधी विदेशी ताकतें सोशल मीडिया का में मनचाहा एवं गलत दुरुपयोग करती हैं, इसलिए नये कानून में देश तोड़ने की कोशिश करने वाली ताकतों पर अंकुश के लिए कठोर प्रावधान किए गए हैं। अतएव स्वतंत्रता के 76 साल बाद भारतीयों को वास्तव में ऐसी प्रणाली मिल गई है, जो दंड की बजाय अधिकतम न्याय पर आधारित है।
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अगर देश को एक स्वतंत्र और खुला समाज बनाना है, तो किसी भी दृष्टिकोण को दबाने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। साथ ही, तथ्यों के आधार पर सांप्रदायिक व अन्य प्रकार के दुष्प्रचार का मुकाबला करने के लिए साधन भी विकसित किए जाने चाहिए।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 12 जून, 2024
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Date: 02-07-24
Start Work on Project Optimus GovernanceET Editorials
Bureaucrats have reportedly suggested plans to rationalise and restructure government departments and ministries to the prime minister. This is certainly a need of the hour. Narendra Modi himself has long advocated for ‘maximum governance, minimum government’. Now, his administration needs a plan. This won’t happen merely by downsizing departments or outsourcing critical functions — although fighting flab and creating extra-governmental partnerships have their place in a refabrication — but by creating systems and processes that promote a coordinated whole-of-government approach.
Restructuring is more than an efficiency exercise, it’s an optimisation one. The driving force must be maximising resource (human, financial, material) utilisation by leveraging synergies. The left hand must be aware of what the right hand does. This means moving away from siloed thinking, duplication and working at cross purposes. Rationalisation is also not a euphemism for any drive for outsourcing critical government functions or hollowing out government capacity. Rule-bound bureaucracy, seen in many political quarters as impediments to action, must not be simply swapped for an increased dependence on a parallel network of ‘consultants’. Improving implementation and governance is impossible if the bureaucracy is hollowed out. Rules and regulations must be visible, and developed as instruments to enhance implementation of policy and not as hindrance.
The next five years are critical for putting in place systems and processes — the warp and woof of good governance — that will underpin India’s transformation. This requires improving internal coordination, and collaboration within government for efficient, agile and responsive implementation — in praxis.
Date: 02-07-24
नई न्याय प्रणाली पर भरोसा स्थापित होने में समय लगेगासंपादकीय
किसी भी देश में संविधान के बाद सबसे अहम दस्तावेज होता है वहां की अपराध-न्याय प्रणाली बताने वाली संहिताएं। भारत में नई प्रणाली लाने के लिए तीन नई संहिताएं- भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम लागू हो चुकी हैं। मैकाले के 160 साल पुराने आईपीसी, सीआरपीसी और साक्ष्य कानून को अलविदा किया जा चुका है। कई राज्यों ने नई संहिताओं को फिलहाल न लागू करने की अपील की है। 100 जाने-माने पूर्व नौकरशाहों ने भी इस संबंध में लिखा है। यह सच है कि जहां तीन साल से ज्यादा समय में देश के तत्कालीन बेहतरीन दिमाग वाले लोगों ने बड़ी मेहनत से संविधान बनाया, वहीं अपराध संहिताओं को बनाने की प्रक्रिया फौरी रही। संसद के दोनों सदनों में विपक्ष निलंबित था। संसदीय उप-समिति को समय बेहद कम मिला। यहां तक कि जब अधिसूचना हुई तब देश में चुनाव की आपाधापी शुरू हो गई। 4 जून के परिणाम आने के बाद पुलिस को फुर्सत मिली तो 160 साल पुराने कानूनों की जगह इन कानूनों की जटिलताओं को समझने के लिए मात्र 26 दिन मिले। पुराने कानून में हत्या की धारा 302 आईपीसी अचानक अब बीएनएस की धारा 103 हो गई। अभियोजन, अनुसंधान और न्याय निस्तारण में इतने बड़े बदलाव को समझने के लिए समय चाहिए था। सामान्य पुलिसकर्मी इस परिवर्तन के लिए कितना सुग्राही बन सका है? फिर आम जनता भी इसे अच्छी तरह से नहीं जान सकी है। आदेश के अनुरूप देश भर के 17,500 थानों में थानेदारों को जनता, वरिष्ठ नागरिक और प्रतिष्ठित लोगों को सोमवार को थाने बुलाकर नई संहिताओं के बारे में अवगत करने का कर्मकांड निभाया गया। नए बीएनएस के अनुसार इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्डिंग, फोटोग्राफी, डीएनए टेस्ट का व्यापक प्रयोग होगा। क्या वाकई जिलों में या थानों के पास इतने संसाधन फिलहाल उपलब्ध हैं? मैकाले से मुक्ति तो अच्छी है लेकिन नई न्याय प्रणाली पर भरोसा भी उतना ही जरूरी है।
Date: 02-07-24
नियमों के तहत सहायता मांगे राज्यसीबीपी श्रीवास्तव, ( लेखक सेंटर फार अप्लायड रिसर्च इन गवर्नेंस, दिल्ली के अध्यक्ष हैं )
नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में गठबंधन सरकार बनने के साथ ही इसकी संभावना जताई जाने लगी थी कि राजग के प्रमुख घटक दल टीडीपी और जेडीयू आंध्र और बिहार के लिए विशेष राज्य के दर्जे की मांग कर सकते हैं। बीते दिनों जेडीयू के नेताओं ने विशेष राज्य के दर्जे की मांग दोहरा दी। भारत के संविधान में राज्यों का गठन स्वायत्त प्रशासनिक इकाइयों के रूप में संघ द्वारा किया जाता है। राज्यों के विकास और उनकी सुरक्षा को देखते हुए संसद को कानून बनाने का अधिकार है और कोई भी राज्य अन्य राज्यों के समान अधिकार प्राप्त करने का दावा नहीं कर सकता। भारत में संसद को यह शक्ति है कि वह कानून के तहत किसी राज्य के लिए विशिष्ट नियमों और शर्तों का निर्धारण कर सकती है। चूंकि राज्य प्रशासनिक इकाइयां हैं और संघ सरकार द्वारा आवंटित संसाधनों के वितरण के लिए उत्तरदायी हैं, अतः उनकी भौगोलिक, सामरिक तथा सामाजिक-आर्थिक दशाओं को देखते हुए उन्हें विशेष सहायता दी जा सकती है। यहां यह भी उल्लेख करना समीचीन होगा कि प्रशासन से संबद्ध होने के कारण ऐसा कोई उल्लेख संविधान में नहीं है, क्योंकि संविधान शासन व्यवस्था के तीनों अंगों-विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका को दिशा निर्देश देता है, जिसके अनुरूप विधायिका द्वारा बनाई गई विधियों के अनुरूप कार्यपालिका प्रशासनिक कार्रवाई करती है और विवादों के समाधान के लिए न्यायपालिका उत्तरदायी होती है।
प्रशासनिक सुगमता और राज्यों के विकास पर गौर करते हुए 1969 में पांचवें वित्त आयोग ने विशेष राज्य का दर्जा देने की सिफारिश की थी। इस आधार पर असम, नगालैंड और जम्मू-कश्मीर को यह दर्जा दिया गया था। इनके अतिरिक्त, हिमाचल, मणिपुर, मेघालय, सिक्किम, त्रिपुरा, अरुणाचल, मिजोरम, उत्तराखंड और तेलंगाना सहित 11 राज्यों को विशेष श्रेणी के राज्य का दर्जा दिया गया है। संप्रग सरकार के शासन में संसद द्वारा विधेयक पारित करने के बाद आंध्र प्रदेश से अलग होने पर तेलंगाना को विशेष दर्जा मिला था। 14वें वित्त आयोग ने पूर्वोत्तर और तीन पर्वतीय राज्यों को छोड़कर अन्य राज्यों के लिए ‘विशेष श्रेणी का दर्जा’ समाप्त कर दिया था और ऐसे राज्यों में कर हस्तांतरण के माध्यम से संसाधन अंतर को 32 प्रतिशत से बढ़ाकर 42 प्रतिशत करने का सुझाव दिया था।
पिछले कुछ समय से बिहार के साथ आंध्र विशेष राज्य के दर्जे की मांग करते रहे हैं। यह उल्लेखनीय है कि विशेष श्रेणी राज्य विशेष दर्जे से अलग है। विशेष राज्य श्रेणी केवल आर्थिक और वित्तीय पहलुओं से संबंधित है। इस संबंध में संविधान के अनुच्छेद 371 (ए-जे) में कई राज्यों के लिए विशेष प्रविधान किए गए हैं। किसी राज्य को विशेष श्रेणी का राज्य बनने की अर्हता के लिए कई शर्तें निर्धारित हैं, जैसे-राज्य में पर्वतीय क्षेत्र, कम जनघनत्व या जनजातियों की बहुलता, अंतरराष्ट्रीय सीमा की साझेदारी, राज्य में आर्थिक और अवसंरचनागत पिछड़ापन और राज्य के वित्त की गैर-व्यवहार्य प्रकृति। इन शर्तों को ध्यान में रखते हुए अब यह विचार करना आवश्यक है कि आंध्र प्रदेश और बिहार विशेष राज्य का दर्जा क्यों मांग रहे हैं?
आंध्र प्रदेश का तर्क है कि राज्य के विभाजन के बाद उसकी कुल राजस्व प्राप्तियों में कमी आ गई है, जिससे राज्य की राजकोषीय व्यवहार्यता भी कम हो गई है। इसके अलावा यह भी कहा गया है कि राज्य का विभाजन अतार्किक एवं समता के सिद्धांत के विरुद्ध था। जहां तक बिहार की बात है, तो वह विशेष दर्जे की मांग 2008 से ही कर रहा है। जेडीयू की नई कार्यकारिणी ने अपनी यह मांग फिर से रेखांकित की है। बिहार का यह भी तर्क है कि उसका विभाजन सही तरह नहीं किया गया। वह संसाधनों की अपर्याप्तता का दावा भी करता रहा है। बिहार के दावे में यह भी शामिल है कि उसकी सीमा अंतरराष्ट्रीय सीमा है, जो नेपाल से मिलती है, लेकिन वर्ष 2015 और फिर 2023 में केंद्र सरकार ने ऐसा दर्जा देने की मांग को इस तर्क पर अस्वीकार कर दिया था कि ऐसा दर्जा देने वाली योजना समाप्त कर दी गई है।
बिहार और आंध्र प्रदेश, दोनों ही राज्य मूलतः कृषि आधारित हैं और उनके विभाजन के बाद निश्चित रूप से उनकी राजस्व प्राप्तियों में कमी आई है, लेकिन केंद्र की भी अपनी कुछ मजबूरियां हैं। संवैधानिक रूप से भारत में सहकारी संघवाद प्रचलित है, जिसके अनुसार यह संघ का दायित्व है कि वह राज्यों के आर्थिक-सामाजिक विकास के प्रति संवेदनशील हो और उनकी सहायता करे, लेकिन ध्यान देने वाली बात यह भी है कि क्या राजनीतिक दबाव बना कर ऐसे दर्जे की मांग करना उचित है? गठबंधन सरकारों की एक बड़ी समस्या यह रही है कि अक्सर उसके घटक दल दबाव समूह के रूप में कार्य करते हैं, जिसका उद्देश्य मूलतः राजनीतिक होता है। यह बहुदलीय राजनीति का एक आलोचनात्मक पक्ष है। क्षेत्रीय राजनीति के मजबूत होने से एक ओर जहां क्षेत्रीय हितों को राष्ट्रीय स्तर तक लाने में सहायता मिली है, वहीं दूसरी ओर इसकी नकारात्मकता यह रही है कि क्षेत्रीय दल अधिकांशतः राजनीतिक दबाव बना कर अपने निजी हित साधने का प्रयास करते हैं। इसे राजनीतिक ब्लैकमेलिंग में रूप में भी देखा जाता है। इस संदर्भ में पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने कहा था कि राजनीति जब विकास की दृष्टि से की जाती है तो वह देश के हित में होती है, लेकिन जब राजनीति का उद्देश्य केवल राजनीतिक होता है तो वह हानिकारक सिद्ध होती है। राष्ट्र हित में राजनीतिक दलों द्वारा कार्य किए जाने पर उनके राजनीतिक हित भी साधे जा सकते हैं। अतः दलगत राजनीति से ऊपर उठ कर ही ऐसे संवेदनशील मुद्दों को संबोधित किया जाना उचित होगा।
Date: 02-07-24
कानून की जगहसंपादकीय
नए तीनों कानून लागू हो गए। सरकार का कहना है कि इन कानूनों के जरिए न्याय सुनिश्चित होगा, पुराने कानूनों का बल दंड पर अधिक था। नए कानूनों से आधुनिक प्रणाली स्थापित होगी। इनमें अब घर बैठे प्राथमिकी दर्ज कराने, शून्य प्रथमिकी के तहत किसी भी थाने में शिकायत दर्ज कराने जैसी सहूलियतें दी गई हैं, जिससे लोगों का समय बचेगा और त्वरित कार्रवाई हो सकेगी। प्राथमिकी दर्ज होने के बाद अदालतों को भी तय समय के भीतर फैसला सुनाने की बाध्यता होगी। बलात्कार, बाल यौन शोषण जैसे मामलों में जांच और सुनवाई संबंधी सख्त नियम बनाए गए हैं। निस्संदेह, मामलों की जांच और सुनवाई में गति आएगी, तो लोगों को न्याय मिल सकेगा। मगर विपक्ष का कहना है कि इन कानूनों में कुछ ऐसी सख्त धाराएं बनाई गई हैं, जिनसे पुलिस को मनमानी का अधिकार मिलता और मानवाधिकारों के हनन का रास्ता खुलता है। खासकर आपराधिक कानूनों को लेकर व्यापक विरोध देखा जा रहा है। दरअसल, ये कानून विपक्ष की गैरमौजूदगी में और बिना किसी बहस के पारित हो गए थे, इसलिए इन पर विशद चर्चा नहीं हो पाई थी। इसलिए भी इनकी कई धाराओं को लेकर भ्रम और विवाद की गुंजाइश बनी हुई है।
सामाजिक बदलावों और जरूरतों के मुताबिक कानूनों में संशोधन और अप्रासंगिक हो चुके कानूनों को समाप्त करना जरूरी होता है। इस लिहाज से औपनिवेशिक काल से चले आ रहे कानूनों की समीक्षा और उनमें बदलाव जरूरी थे। हालांकि ऐसा भी नहीं कहा जा सकता कि सारे कानून ब्रिटिश राज के समय से जस के तस चले आ रहे थे। उनमें समय-समय पर बदलाव होते रहे हैं, जिन कानूनों की प्रासंगिकता नहीं रह गई थी, उन्हें समाप्त भी किया गया। मगर फिर भी बहुत सारे कानून बदली स्थितियों से मेल नहीं खाते थे। पिछले कुछ वर्षों में जिस तरह अपराधों की प्रकृति बदली और देश की अखंडता और संप्रभुता को चुनौती देने वाली गतिविधियां बढ़ी हैं, आतंकवादी संगठनों की सक्रियता बढ़ी है, उसमें कुछ सख्त कानूनों की जरूरत से इनकार नहीं किया जा सकता। मगर आपराधिक कानून बनाते समय यह ध्यान रखना भी जरूरी होता है कि उनका दुरुपयोग न होने पाए, उनके चलते सामान्य नागरिकों के मानवाधिकारों का हनन न हो। औपनिवेशिक समय के राजद्रोह कानून की जगह देशद्रोह कानून लाने की इसीलिए सबसे अधिक आलोचना हो रही है कि उससे लोगों में नागरिक अधिकारों के हनन का भय अधिक पैदा होता है।
हालांकि हर नए कानून के सकारात्मक और नकारात्मक पहलुओं पर चर्चा तो होती ही है, होनी भी चाहिए, मगर उन पर आम सहमति बने बिना लागू किए जाने से विवाद और नाहक भय का वातावरण बनता है। जब तक आम नागरिकों में इन कानूनों को लेकर भरोसा नहीं बनेगा, विरोध के स्वर उठते रहेंगे। जब ये कानून संसद में पारित हुए थे, तब उसके एक हिस्से को लेकर ट्रक चालकों ने देशव्यापी हड़ताल की थी। अब कई जगह खुद वकील इनके विरोध में उतरने वाले हैं। कुछ राज्यों ने इनके विरोध में आवाज उठानी शुरू कर दी है। संसद में विपक्ष तो हमलावर है ही। अगर सचमुच कुछ कानूनों की वजह से समाज में व्यवस्था के बजाय अव्यवस्था पैदा होती है, तो यह किसी भी तरह लोकतंत्र के लिए अच्छी बात नहीं होगी। सरकार को यह भरोसा दिलाना होगा कि ये कानून वास्तव में लोगों के लोकतांत्रिक और मानवीय अधिकारों की रक्षा करने वाले हैं।
Date: 02-07-24
न्याय की ओरसंपादकीय
तीन नए आपराधिक कानून- भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम का लागू होना सुखद व स्वागतयोग्य है। इसके साथ ही भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली में व्यापक बदलाव का दौर शुरू हो गया है। औपनिवेशिक युग के निर्मम या आम नागरिक विरोधी कानूनों को समाप्त करने की मांग लंबे समय से हो रही थी और अंतत: अब पुलिस को अनुशासित के साथ-साथ कारगर बनाने की ओर देश ने अपने कदम बढ़ा दिए हैं। पुलिस को अब सबसे पहले यह ध्यान में रखना होगा कि कोई भी कानून अगर लागू हो, तो सभी पर समान रूप से लागू हो। पुलिस प्रशासन की सफलता इसी में है कि तमाम लोगों को यह महसूस हो कि कानून न्यायपूर्ण ढंग से लागू किया जा रहा है। एक पहलू यह भी है कि पुलिस प्रशासन को कुशल और सक्षम बनाने के लिए संसाधनों की कमी आडे़ नहीं आए। जिस स्तर की सेवा की उम्मीद लोग पुलिस से कर रहे हैं, उसके लिए सरकारों को पुलिस पर व्यय बढ़ाना होगा। सक्षम और सहयोगी पुलिस हमारे तेज विकास में कारगर होगी।
ध्यान रहे, पिछले कानूनों में यह बड़ी कमी थी कि उनका इस्तेमाल गरीबों के खिलाफ जितनी आसानी से होता था, उससे कहीं ज्यादा कठिनाई से अमीरों के खिलाफ मामले दर्ज होते थे। आरोप सिद्ध होने या सजा के मामले में भी गरीबों को ही ज्यादा भुगतना पड़ता था। हम बार-बार कह रहे हैं कि इन तीन कानूनों ने ब्रिटिश काल के तीन कानूनों की जगह ले ली है, तो जमीन पर वास्तव में लोगों को यह एहसास कराना होगा कि ब्रिटिश हिसाब से बने कानून अब देश में नहीं चल रहे हैं। नए कानूनों में यह ताकत है कि इनसे अपने यहां संपूर्ण न्याय प्रणाली में आम नागरिकों के अनुरूप आधुनिक बदलाव हो सकता है। जीरो एफआईआर, पुलिस शिकायतों का ऑनलाइन पंजीकरण, एसएमएस जैसे इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों से सम्मन और सभी जघन्य अपराधों के लिए अपराध स्थलों की अनिवार्य वीडियोग्राफी जैसे प्रावधान ज्यादा कारगरता के साथ लागू हो जाएंगे। केंद्र सरकार ने अपना काम कर दिया है और अब राज्यों को अपने स्तर पर इन अच्छे कानूनों को लागू करने की पूरी तैयारी करनी पड़ेगी और देश के ज्यादातर राज्यों में पुलिस जिस तरह से प्रशिक्षित हो रही है, इससे जुड़ी खबरों का सामने आना भी सुखद है।
यह कहने में कोई हर्ज नहीं कि इन कानूनों के माध्यम से देश में पुलिस सुधार को भी बल मिलेगा। पुलिस कानून-कायदे के तहत काम करने को विवश या बाध्य होगी। इसके साथ ही, समग्र न्याय प्रणाली में इस स्याह पहलू को बहुत गंभीरता से देखने की जरूरत है कि ये अच्छे कानून कहीं भ्रष्ट आचरण से दुष्प्रभावित न हो जाएं। कानून बन जाना ही पर्याप्त नहीं है, यह देखना भी जरूरी है कि कानून को लागू करने और कराने वाले कितने ईमानदार हैं। राज्य सरकारों को प्रशिक्षण के स्तर पर यह सुनिश्चित करना होगा कि पुलिस सैद्धांतिक रूप से ही नहीं, बल्कि व्यावहारिक रूप से कुशल और शालीन हो। पुलिस बल मात्र सत्ताधीशों का नहीं, बल्कि समग्र समाज का बल है। पुलिस ही प्राथमिक रूप से संविधान और नियम-कायदों की बुनियाद मजबूत करती है। आज पुलिस को निरंतर प्रशिक्षित करने की जरूरत है और उनका प्रशिक्षण महज कागजी नहीं रहना चाहिए। प्रशिक्षण अगर सफलतापूर्वक संपन्न हुआ, तो यकीन मानिए, तीनों नए कानूनों में देश को न्याय की ओर ले जाने की क्षमता है।
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विपक्ष के लिए एक संदेश हो सकता है कि अपनी सत्ता वाले राज्यों में, उसे मजबूत पकड़ बनाए रखनी चाहिए। जहाँ वह सत्ता में नहीं है, वहाँ उसे समान विचारधारा वाली ताकतों के बीच एकता बनाने और भाजपा की केंद्रीकृत और एकात्मक पद्धति के विपरीत वैकल्पिक नीतियों के माध्यम से बदलाव लाने पर भरोसा करके आगे बढ़ना चाहिए।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 11 मई, 2024
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Date: 01-07-24
Court on climate right and how India can enforce itBecause India is still developing, what the country needs is a law that enables progress toward low-carbon and climate resilient development.Navroz K. Dubash is Senior Fellow at the Sustainable Futures Collaborative. Shibani Ghosh is Visiting Fellow at the Sustainable Futures Collaborative. Aditya Valiathan Pillai is Fellow at the Sustainable Futures Collaborative.
Through its recent judgment in M.K. Ranjitsinh and Ors. vs Union of India & Ors., the Supreme Court of India has dropped a large rock into the relatively placid waters of India’s nascent climate change jurisprudence. It has read into the Constitution of India the right to ‘be free from the adverse effects of climate change’, identifying both the right to life and the right to equality as its sources. As a new government considers its imperatives and agenda, Ranjitsinh provides an intriguing opportunity to think through and possibly enact much more systematic governance around climate change.
A new right around climate
Scholars and legal practitioners are still unpacking the judgment. The issue before the Court was whether and how electricity transmission lines can be built through the habitat of the critically endangered Great Indian Bustard. The government claimed that a previous court order protecting the bird’s habitat had affected the country’s renewable energy potential. Modifying this order, the Court prioritised transmission infrastructure to enable accelerated development of renewable energy to address climate change. But the more seismic aspect of the judgment was the newly minted ‘climate right’ rooted in the constitutionally guaranteed right to life (Article 21) and right to equality (Article 14). Reading this right into the Constitution potentially opens the door to climate litigation, empowering citizens to demand from the government that this right be protected.
But the judgment also leaves unresolved questions. Does the Court overstate the large-scale clean energy agenda as the main pathway to avoiding climate harms and, correspondingly, understate climate adaptation and local environmental resilience? Just how will this right against the adverse effects of climate change be protected? And what might it mean for the agenda of the newly formed government? One way forward is the slow accretion of judicial decisions around this right. But another is new legislation to actively realise a right against the adverse effects of climate change.
The former approach, the proliferation of court-based action through enhanced litigation around climate claims, will likely lead, slowly and over time, to an incomplete patchwork of (judiciary-led) protections. As with many other well-meaning judicial orders directing the protection of fundamental rights, realising climate rights could become contingent on the passage of several subsequent policy actions. Moreover, a patchwork approach is less likely to chart an overarching framework to guide future policy.
Is the latter approach, climate legislation, then a preferred approach to protect climate rights? The judgment itself states that there is no ‘umbrella legislation’ in India that relates to climate change. And in so doing, seems to implicitly recognise the merits of an overarching, framework legislation. Drawing from the experience of other countries, framework legislation can bring several advantages. It can set the vision for engaging with climate change across sectors and regions, create necessary institutions and endow them with powers, and put in place processes for structured and deliberative governance in anticipation of and reaction to climate change.
Indian context is important
These are important advantages, and good reasons for India to consider climate legislation. But at the same time, it is essential that Indian climate legislation not blindly copy other countries, and is tailored to the Indian context.
Undoubtedly, India needs to transition to a low-carbon energy future, an imperative that is highlighted in the Ranjitsinh judgment. But this, by itself, is not nearly enough to enforce a right against the adverse effects of climate change. Climate legislation should also create a supportive regulatory environment for more sustainable cities, buildings, and transport networks. It should enable adaptation measures such as heat action plans sensitive to local context. It should provide mechanisms for shifting to more climate-resilient crops. It should protect key ecosystems such as mangroves that act as a buffer against extreme weather events. And, it should actively consider questions of social equity in how it achieves these tasks. In brief, it should provide a way of mainstreaming and internalising climate change considerations into how India develops. Nothing less is required to make progress toward avoiding the adverse effects of climate change.
But having a single, omnibus law that covers all these areas is not feasible, particularly in the face of an existing legal framework that legislates on most of these issues. It is impossible to anticipate upfront all the ways in which society can and should prepare for climate change. So, what is the way forward?
Here, there is scope to learn from international experience both what not to do and what directions to follow. Climate laws in many countries, often following the example of the United Kingdom, focus narrowly on regulating carbon emissions, for example, by setting regular five yearly national carbon budgets and then putting in place mechanisms to meet them. This sort of approach, which has unfortunately become somewhat of a template for countries to follow, is ill-suited to India.
Instead, because India is still developing, is highly vulnerable, and yet to build much of its infrastructure, what the country needs is a law that enables progress toward both low-carbon and climate resilient development. The distinction between a regulatory law, such as the U.K.’s, and an enabling one, like, for example in Kenya, is important to understand. A regulatory law focuses, in a narrow way, on emissions and how they can be limited. An enabling law can be written to stimulate development-focused decisions in a range of sectors across the economy — urban, agriculture, water, energy and so on — by systematically asking whether each decision moves the country closer to or further from low-carbon growth and climate resilience. Importantly, this approach emphasises adaptation as much as mitigation.
An enabling law is likely to be a more procedurally-oriented law, one that systematically creates the institutions, processes and standards for mainstreaming climate change across diverse ministries and different parts of society. For example, such a law would build in procedures to support knowledge-sharing, ensuring transparency and avenues for public participation and expert consultation, prompting meaningful setting (and revision) of targets and timelines and reporting against these.
The factor of federalism
There is another dimension essential for a climate law tailored to India: ensuring that the law works effectively within Indian federalism. Many areas relevant to climate action, from urban policy to agriculture and water fall under the authority of sub-national governments — States or local levels, and electricity also is a concurrent subject. An Indian climate law must simultaneously set a framework for coherent national action while decentralising sufficiently to empower States and local governments, and enable them with information and finance to take effective action.
Finally, the enabling role should ideally also extend beyond government. Business, civil society and communities, particularly those on the frontlines of climate impacts, have essential knowledge to bring to energy transition and resilience. Finding ways of enabling participation in decision making would enable all these sections of society to bring their knowledge to the table in addressing climate change. An effective Indian climate law based on enabling procedures would also provide opportunities for voice to diverse segments of society.
These broad ideas provide a set of principles for a climate law tailored to India, one that provides a basis for taking forward and fulfilling the promise of the Ranjitsinh judgment.
Date: 01-07-24
पिघलते हिमनद, बढ़ती मुसीबतप्रमोद भार्गव
इस बार बढ़ते तापमान और जंगल में आग के चलते उत्तराखंड की नदियां उफान पर हैं। अमूमन ये नदियां मानसून में उफनती हैं, लेकिन इनमें पहली बार मई-जून माह में उफान देखा गया है। बदरीनाथ धाम के आगे अल्कापुरी हिमखंड से निकलने वाली अलकनंदा नदी में पांच दिन में दो से तीन फुट पानी बढ़ गया। उत्तरकाशी में भागीरथी नदी का जलस्तर असमय 150 घनमीटर प्रति सेकंड बढ़ता हुआ दर्ज किया गया है। इसी तरह कुमांऊ मंडल के कालापानी हिमखंड से निकली काली नदी, केदारनाथ से निकली मंदाकिनी में भी पानी बढ़ा है। सभी नदियों का पानी मटमैला दिखाई दिया। मौसम विज्ञान केंद्र का कहना है कि इस बार लंबे समय तक निरंतर गर्मी बनी रही, इसलिए ये हालात उत्पन्न हुए हैं। इन संकेतों से स्पष्ट है कि इस बार की गर्मी और जंगल की आग ने हिमालय के इन चारों हिमखंडों की सेहत बिगाड़ दी है।
इस वर्ष मई के अंतिम दिनों में उत्तराखंड के पांच जिलों के जंगलों में भीषण आग लगी थी, जिसके बुझने के बाद हिमालय के हिमखंडों पर अनेक प्रकार के दुष्परिणाम देखने में आए हैं। वाडिया भू-विज्ञान संस्थान की ताजा रपट के मुताबिक आग से हिमखंडों पर कार्बन की मात्रा सामान्य से ढाई गुना बढ़कर 1899 नैनोग्राम ज्यादा हो गई है। औसत से कम हिमपात और अब आग के कारण वायु प्रदूषण से हिमखंड काले कार्बन की चपेट में आ गए हैं। कार्बन के कण गरम होते हैं, जो हिमखंड की ऊपरी परत पर चिपक कर उसके पिघलने की गति बढ़ा देते हैं। ये सूर्य की किरणों को बहुत तेजी से अवशोषित करते हैं। नतीजतन, हिमखंड की ऊपरी परत गरम होकर पिघलने लगती है। इस बार उत्तराखंड के सात जिलों में बाईस दिन आग लगी रही। इससे 1450 हेक्टेयर जंगल साफ हो गया। ‘यूसेफ’ की रपट के मुताबिक बीते 37 वर्षों में जंगल की आग और कार्बन कणों के चलते हिमालयी बर्फ से ढंके रहने वाले क्षेत्र 26 वर्ग किमी घट चुके हैं। ‘नंदादेवी बायोस्फियर रिर्जव’ के ऋषिगंगा जलभराव क्षेत्र का कुल 243 वर्ग किमी क्षेत्र बर्फ से ढंका रहता था, जो अब 215 वर्ग किमी रह गया है। उत्तराखंड राज्य वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार बीस वर्ष में 44554 हेक्टेयर वन आग की भेंट चढ़ चुके हैं। तापमान में अगर एक डिग्री का मामूली बदलाव भी होता है तो हिमखंडों के साथ बर्फ के आवरण वाले क्षेत्र में बड़ी कमी दर्ज की जाती है।
इन्हीं कारणों और वैश्विक बढ़ते तापमान के चलते हिमखंडों वाली झीलों पर खतरा बढ़ रहा है। बढ़ती गर्मी से ये झीलें लगातार पिघल रही हैं। कश्मीर, लद्दाख, हिमाचल, उत्तराखंड, सिक्किम और अरुणाचल की 28043 हिमखंड झीलों में से 188 झीलें कभी भी तबाही का कारण बन सकती हैं। ऐसा हुआ तो तीन करोड़ की आबादी पर संकट गहरा जाएगा। गृह मंत्रालय के आपदा प्रबंधन विभाग और हिमालय पर्यावरण विशेषज्ञ दलों द्वारा एक वर्ष तक किए अध्ययन में ये तथ्य सामने आए हैं। वैश्विक तापमान बढ़ने के कारण 1.5 डिग्री पारा बढ़ने से हिमालय क्षेत्र में हिमखंड पिघलने की रफ्तार 1.5 फीसद तक बढ़ जाती है। भूकम्प या अन्य प्राकृतिक आपदा में हिमखंड झीलों के फटने से बड़ी मात्रा में पानी का बहाव बढ़ जाता है। ऐसी गंभीर अवस्था वाली 188 झीलें आपदा प्रबंधन द्वारा चिह्नित की गई हैं। अगर हिमालयी राज्यों में सात रिक्टर का भूकम्प आता है, तो अत्यधिक संवेदनशील 188 हिमखंड की झीलें टाइम बम की तरह फूट पड़ेंगी। पानी के बेहताशा प्रवाह से बड़ी आपदा का सामना करना पड़ सकता है।
हिमालय के बर्फ से आच्छादित हिमखंडों से ही ज्यादातर नदियां निकलकर समतल धरती पर बहकर जीवनदायिनी बनी हुई हैं। इसलिए यहां की बर्फ का निरंतर पिघलना नदियों के प्रवाह के लिए भविष्य में घातक सिद्ध हो सकता है। इस समय जलवायु परिवर्तन के चलते दुनिया के महाद्वीप और समुद्र भी बड़े बदलावों से गुजर रहे हैं। इसलिए हिमखंडों का पिघलना बड़े खतरे का संकेत है। इससे तत्काल नदियों और समुद्र का जलस्तर तो बढ़ेगा ही, इससे उत्तरी गोलार्ध पर भी असर पड़ेगा, जहां बड़ी आबादी निवास करती है। ये पिघलती बर्फ की चादरें वायुमंडलीय परिसंचरण को भी बदल देती हैं, जो भूमध्य रेखा और उससे आगे अमेजन और अफ्रीका तट के बदलते मौसम को प्रभावित कर सकती है।
विश्व मौसम संगठन (डब्लूएमओ) के अनुसार बीते वर्ष और पिछले दशक में धरती पर तेजी से गर्मी बढ़ी है। अमेरिका की पर्यावरण संस्था वैश्विक विटनेस और कोलंबिया विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने एक अध्ययन में पाया है कि तेल और गैस के अधिकतम मात्रा में उत्पादन से ये हालात बने हैं। अगर इन ईंधनों के उत्सर्जन का यही हाल रहा तो 2050 तक गर्मी अपने चरम पर होगी। इस गर्मी से जीव-जगत की क्या स्थिति होगी, इसका अनुमान लगाना भी मुश्किल है। इसीलिए कहा जा रहा है कि इस बार धरती पर प्रलय बाढ़ से नहीं, आसमान से बरसने वाली आग से आएगी। इसके संकेत प्रकृति लगातार दे रही है। इस संकट से निपटने के उपायों को तलाशने के लिए 198 देश जलवायु सम्मेलन करते हैं। इन सम्मेलनों का एक ही प्रमुख लक्ष्य रहा है कि दुनिया उस रास्ते पर लौटे, जिससे बढ़ते वैश्विक तापमान को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक स्थिर रखा जा सके। मगर अब जो संकेत मिल रहे हैं, उनसे स्पष्ट है कि कुछ ही सालों के भीतर गर्मी तापमान की इस सीमा का उल्लंघन कर लेगी। इस बार तीन सप्ताह लगातार गर्मी का तापमान 40 से 55 डिग्री तक बना रहा है।
बदलते हालात में हमें जिंदा रहना है, तो जिंदगी जीने की शैली को भी बदलना होगा। हर हाल में ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन में कटौती करनी होगी। कार्बन उत्सर्जन में 43 फीसद कमी लानी होगी। अगर कार्बन उत्सर्जन की दर नहीं घटी और तापमान में 1.5 डिग्री से ऊपर वृद्धि हो जाती है तो असमय अकाल, सूखा, बाढ़ और जंगल में आग की घटनाओं का सामना निरंतर करते रहना पड़ेगा। बढ़ते तापमान का असर केवल धरती पर नहीं होगा, समुद्र का तापमान भी बढ़ेगा और कई शहरों के अस्तित्व के लिए समुद्र संकट बन जाएगा। इसी सिलसिले में जलवायु परिवर्तन से संबंधित संयुक्त राष्ट्र की अंतर-सरकारी समिति की ताजा रपट के अनुसार सभी देश अगर जलवायु बदलाव के सिलसिले में हुई क्योतो संधि का पालन करते हैं, तब भी वैश्विक ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन में 2010 के स्तर की तुलना में 2030 तक 10.6 फीसद की वृद्धि होगी। नतीजतन, तापमान भी 1.5 से ऊपर जाने की आशंका बढ़ गई है। दुनिया में बढ़ती कारें भी गर्मी बढ़ाने का सबसे बड़ा कारण बन रही हैं। 2024 में वैश्विक स्तर पर कारों की संख्या 1.475 अरब आंकी जा रही है। मसलन, प्रति 5.5 व्यक्ति पर एक कार है, जो आजकल गांव-गांव प्रदूषण फैलाने का काम कर रही हैं। इन पर भी नियंत्रण जरूरी है।
Date: 01-07-24
अंतरिक्ष में होड़संपादकीय
अमेरिका इन दिनों अंतरिक्ष में जूझ रहा है, वहीं चीन ने कामयाबी के नए झंडे गाड़ दिए हैं। अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर एक तरह से फंस गए हैं, तो दूसरी ओर, चीन चांद से मिट्टी लाने में कामयाब हो गया है। अंतरिक्ष स्टेशन को करीब 25 साल हो चुके हैं, अमेरिका, रूस, जापान, कनाडा, यूरोप के संयुक्त प्रयास से स्थापित अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन पर अब तक 270 से ज्यादा अंतरिक्ष यात्री जा चुके हैं, पर ऐसा पहली बार हुआ है कि अमेरिकी बोइंग स्टारलाइनर परियोजना का यान वहां एक तरह से फंस गया है। स्टेशन पर पहुंचने से पहले ही यान में हीलियम का रिसाव और थ्रस्टर में खराबी आ गई थी। यान को 14 जून को वापसी यात्रा करनी थी, पर अभी तक वह लौटा नहीं है और आशंका है कि इसे लौटने में 90 दिन तक लग सकते हैं। इतने दिनों में वैज्ञानिक यह कोशिश करेंगे कि यान की खराबी को दूर किया जा सके। अभी नासा यान की पृथ्वी पर वापसी की सटीक तारीख की कोई घोषणा नहीं कर पा रहा है।
कुल मिलाकर, यही कहा जा सकता है कि अंतरिक्ष में फंसी भारतीय मूल की अमेरिकी सुनीता विलियम्स और अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री बुच विल्मोर को धरती पर लौटने में कुछ महीने लग सकते हैं। नासा के वाणिज्यिक क्रू कार्यक्रम प्रबंधक स्टीव स्टिच ने कहा है कि अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी स्टारलाइनर की अवधि को 45 से 90 दिनों तक बढ़ाने के बारे में सोच रही है। वास्तव में, नासा किसी तरह का खतरा मोल नहीं लेना चाहता, दो अंतरिक्ष यात्रियों की बहुमूल्य जिंदगी का सवाल है। वैसे, बेहद प्रतिभावान व साहसी सुनीता विलियम्स, सहित दोनों अंतरिक्ष यात्री ज्यादा चिंतित नहीं हैं और निरंतर अपने प्रयोग में लगे हुए हैं। दोनों को घर लौटने की कोई जल्दी नहीं है। यह ध्यान देने की बात है कि अंतरिक्ष स्टेशन जब से बना है, वहां लगातार पांच या सात अंतरिक्ष यात्री रहते आए हैं। नासा के ताजा अभियान पर इसरो की भी नजर टिकी है। इसरो वैज्ञानिक एम अन्नादुराई ने बताया है कि किसी भी अंतरिक्ष कार्यक्रम को पारगमन करते समय यह देखना ही होगा कि अगली उड़ान के लिए सभी सिस्टम तैयार हैं या नहीं। स्टारलाइनर को लॉन्च करते समय भी यह देखा गया था और तब भी कुछ देरी हुई थी। इस बार भी कुछ देरी हो रही है और वैज्ञानिक सुरक्षा के प्रति सुनिश्चित होने के बाद ही उड़ान भरेंगे। वैसे यह ध्यान रखना होगा कि बोइंग का स्टारलाइनर कार्यक्रम वर्षों से सॉफ्टवेयर गड़बड़ियों, डिजाइन संबंधी समस्याओं और उप-ठेकेदार जैसे विवादों से जूझता रहा है।
अंतरिक्ष विज्ञान से जुड़ी यह चर्चा तेज हो गई है कि क्या अमेरिका पिछड़ने लगा है। दूसरी ओर, चीन का चांग-ई 6 अंतरिक्ष यान चंद्रमा के सुदूर हिस्से से मिट्टी के नमूने सफलतापूर्वक पृथ्वी पर वापस ले आया है। यह ऐतिहासिक उपलब्धि अंतरिक्ष-अन्वेषण महाशक्ति के रूप में चीन की बढ़ती महत्वाकांक्षाओं की ओर संकेत करती है। गौरतलब है कि साल 2019 में चीनी यान चांद के सामने की ओर से नमूने लाने में कामयाब रहा था। चीन विज्ञान के क्षेत्र में विश्वसनीयता हासिल करने के प्रयास में लगा है और ठीक वैसी ही प्रतिस्पद्र्धा अमेरिका के साथ कर रहा है, जैसी पांच दशक पहले अमेरिका और सोवियत संघ के बीच होती थी। अगर इस प्रतिस्पद्र्धा का लाभ दुनिया को हो, तो यह बहुत सुखद व स्वागतयोग्य है। वैज्ञानिक सफलताओं की बड़ी जरूरत है, ताकि तरक्की और अमन-चैन को बढ़ावा मिले।
Date: 01-07-24
हमारी शिक्षा व्यवस्था को फेल करती परीक्षाएंहरजिंदर, ( वरिष्ठ पत्रकार )
रूस के महान क्रांतिकारी व भूगोलविद पीटर क्रोपोटकिन ने 19वीं सदी के अंत या शायद 20वीं सदी की शुरुआत में एक छोटी सी पुस्तिका उन नौजवानों के लिए लिखी थी, जो अपनी स्कूली पढ़ाई खत्म करने के बाद कोई करियर अपनाना चाहते हैं। भारत में इसका हिंदी अनुवाद नवयुवकों से दो बातें शीर्षक से छपा था। क्रोपोटकिन इसमें बताते हैं कि जो डॉक्टर बनना चाहते हैं, उनकी सोच क्या होनी चाहिए और जो इंजीनियर-प्रोफेसर वगैरह बनना चाहते हैं, उनका जज्बा कैसा होना चाहिए?
क्रोपोटकिन यह मानकर चल रहे थे कि जो बच्चे स्कूली शिक्षा पूरी कर चुके हैं, उन्होंने बहुत कुछ सीख-जान लिया होगा, इसके बाद असल सवाल उनकी सोच व जज्बे का ही बच जाता है। इससे ही अच्छे प्रोफेशनल तैयार हो सकते हैं, बाकी का ज्ञान तो वे जिस संस्थान में जाएंगे, वहां उनको मिल ही जाएगा। करियर अपनाने के लिए नीट, जेईई, नेट जैसी परीक्षाओं वाले हमारे समाज में सोच और जज्बा ही वे दो चीजें हैं, जिनको अब कोई नहीं पूछता। अक्सर कहा जाता रहा है कि भारत में शिक्षा व्यवस्था तो दरअसल है ही नहीं। बस एक परीक्षा व्यवस्था है। इसे जो पास कर लेता है, वह योग्य व विद्वान मान लिया जाता है। कुछ पढ़ा-नहीं पढ़ा, कुछ सीखा-नहीं सीखा इससे ज्यादा मतलब नहीं रह जाता। ज्ञान की असल कसौटी प्रश्न-पत्र में छपे कुछ सवाल हैं। किसी भी जुगत से उनको हल करने वाला हर बाधा को पार कर जाता है। क्या जाना, क्या समझा, क्या गुना, क्या सीखा इसके आगे ये सब निरर्थक हैं। यही वजह है कि बच्चा परीक्षा पास कर ले, इसके लिए अभिभावक कोई भी रकम चुकाने को तैयार हो जाते हैं। यहां तक कि परिवार के लोग, दोस्त-रिश्तेदार तो इसके लिए जान की बाजी तक लगाने को तैयार रहते हैं।
पूरी पीढ़ी के अच्छे भविष्य की बाधा जब परीक्षा ही है, तो व्यवसाय के इस युग में इसे पार कराने के बहुत से कारोबार भी शुरू हो गए हैं। कोचिंग है, ट्यूशन है, गाइड बुक हैं और अब तो ऑनलाइन व्यवस्थाएं भी हैं। बाकी कई कारोबार की तरह इस सारे कारोबार की निचले तल पर एक स्याह दुनिया भी है, जहां नियमित रूप से पेपर लीक होते हैं। कीमत दीजिए, प्रश्न-पत्र परीक्षा से पहले ही हासिल कर लीजिए। फिर भी अगर दिक्कत है, तो सॉल्वर गैंग है, वह आप तक प्रश्नों के जवाब भी पहुंचा देगा। यहां तक कि मोटी रकम लेकर आपकी जगह परीक्षा देने वाले भी मिल जाएंगे।
चंद साल पहले आईआईटी के कुछ विद्वान प्रोफेसरों ने कोचिंंग संस्थानों को लेकर काफी कुछ कहा-लिखा था। उनके शब्दों में ये कोचिंग दरअसल ऐसे कारखाने हैं, जो आईआईटी प्रवेश परीक्षा पास करने योग्य नौजवान तैयार करते हैं। उनका कहना था कि हमें प्रतिभाशाली नौजवान चाहिए, कारखानों में तैयार युवक-युवतियां नहीं। मगर वे प्रोफेसर भी कोई समाधान नहीं दे सके। उन परीक्षाओं का विकल्प उनके पास भी नहीं था, जिनके लिए देश भर में हजारों कोचिंग कारोबार ही नहीं चल रहे, बल्कि एक ऐसा तंत्र भी बन गया है, जिसे कोचिंग माफिया कहा जाता है। इन प्रोफेसरों ने एक और बात कही थी, जो महत्वपूर्ण है। उनका कहना था कि स्कूली शिक्षा ऐसी होनी चाहिए कि उसके बाद कोचिंग की जरूरत न पड़े। मगर एक दूसरा सच यह भी है कि हमारे स्कूल भी बहुत हद तक कोचिंग संस्थानों सा काम करते हैं। उनका लक्ष्य भी बच्चों को परीक्षा पास कराना भर होता है।
इन दिनों लगभग हर दूसरी या तीसरी परीक्षा के पर्चे लीक हो रहे हैं और उनमें से कई को मजबूरीवश रद्द भी करना पड़ रहा है। नीट और नेट के मामले में जो सीबीआई की जांच चल रही हैं, उम्मीद है कि वे अंजाम तक पहुंचेंगी और दोषियों को सजा भी मिलेगी। मगर शायद समस्या इससे खत्म नहीं होगी। अगर ऐसा होता, तो हम न जाने कब अपराधमुक्त समाज बन चुके होते। वैसे भी शिक्षा की समस्याएं किसी फौजदारी से हल होने वाली चीज नहीं हैं। इसके लिए लंबे विमर्श की जरूरत है। जब तक तीन घंटे में प्रश्न-पत्र को हल करने की व्यवस्था बौद्धिकता व योग्यता का पैमाना बनी रहेंगी, इससे जुड़ी समस्याएं बढ़ती रहेंगी। इसलिए विकल्प खोजते समय उस सोच व जज्बे की जरूरत का भी ध्यान रखना होगा, जिसकी बात पीटर क्रोपोटकिन ने की थी।
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‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 7 जून, 2024
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Date: 29-06-24
How To Tackle Our Cities’ Monsoon Mess● Restructure stormwater drains ● Remove encroachments from pavements, streets ● Make all agencies answerable to the urban local body ● Train more town plannersKK Pandey, [ The writer is professor, Indian Institute of Public Administration. ]
Monsoon arrived in Delhi yesterday – so did waterlogged streets, traffic chaos and massive disruption of regular life. This happens every year, and in every major Indian city. Why?
Because our approach to dealing with the problem is not preventive. Every year, we deal with it after the city has been brought to a grinding halt. Issues like regular repair, replacement of drainage/ sewerage system, keeping public spaces (roads, streets, footpaths) free of encroachments are put on the back burner while there is still time for planning and management.
India’s urban population of 461mn (2019) will go up by 416mn by 2047. This means, without timely and concerted action by all stakeholders, the problem will get worse in coming years.
What’s behind the mess? | Waterlogging in our cities is caused by expansion of planned and unplanned urban areas without regard for space for circulation; drying up and destruction of lakes, tanks and water bodies due to dumping of construction and demolition waste; and inclusion of areas occupied by lakes and other water bodies in habitation zones. For instance, half of the 519 water bodies in Gurugram have disappeared over 40 years. The story is quite similar for Bengaluru.
Who is responsible? | Water management is the responsibility of three stakeholders: planning agencies, urban local bodies and exclusive agencies for water and sewage. The three rarely work in tandem, with issues of jurisdiction marring their efforts. While solid wastes fall in the domain of urban local bodies, water and sewage quite often don’t.
This bits-and-pieces planning does not allow for holistic management of huge urban spaces like NCR. You cannot deal with water issues, sewage or drains by working in silos, which is what urban bodies like NDMC and MCD, or even satellite cities like Gurugram and Noida represent.
Town planners have a vital role to play in how urban systems are run. But we don’t have even one per lakh population. Compare that with 38 in UK and 23 in Australia. Even in our larger cities, the number is well below the norm for modern global cities.
If planning is bad, implementation is worse. It is quite common for our cities to not have stormwater drains in place. Most Indian cities do not even have an exclusive drainage plan. So, a spell of heavy rain is all it takes to disrupt the flow of existing drains and lead to waterlogging. Matters are made worse because of solid waste that municipal bodies are derelict in collecting. This waste chokes drains in our cities.
Urban planning is all about foreseeing the future. In India, on the other hand, planning starts when an area is already under habitation. Even when there is advance planning, things move so slowly that by the time action is taken, the planning is obsolete. To take one example, past Delhi Master Plans were notified after 8-10 years of preparation. While the 2041 one was prepared on time, it is being processed for the last four years.
But just as responsible are citizens, cutting across income groups. Is it not common to see educated people in high and middle-income colonies illegally occupying footpaths outside their houses? Or parking their vehicles on roads, leaving little space for traffic movement? As for low-income areas, they are totally choked with little space for circulation.
What’s the way forward? | One, how plans are implemented needs a complete relook. MPD-2041, for example, makes a provision for blue-green development and use of dhalaos for segregation of waste. That must be implemented rigorously. Two, we must prepare proper drainage plans, or revisit them in case they have proven inadequate. Take waterlogging at Delhi’s ITO. The only way it can be resolved is by detailed restructuring of the sewage network that aligns it with water level of Yamuna.
Three, water and sanitation plans must be prepared as per 15th finance commission’s devolution package for 44 urban agglomerations covering 1,115 urban local bodies. Four, safety audit of roads/streets and footpaths must be done regularly. Such an audit should identify barriers/encroachments for follow-up action to free up space for movement of water, goods and people.
Five, authorities need to engage with communities for removal of encroachments from footpaths and roads. At the same time, spaces occupied by govt departments for their use should be cleared. Six, agencies handling water and sanitation should be made accountable to ULBs. Most important, ULBs should have overarching authority over all agencies responsible for urban upkeep. Finally, there must be regular maintenance of drainage and sewage network to minimise the chances of an unforeseen event throwing urban life out of gear.
Date: 29-06-24
किसान खेती की बदलती हुई इकोनॉमी को समझेंसंपादकीय
कृषि विज्ञान के अनुसार एक फसली खेती से उत्पादकता घटती है। मौसम विज्ञान बताता है कि तापमान वृद्धि से उत्पादन गिरता है। एनएसएसओ के घरेलू उपभोग व्यय सर्वे में सामने आया कि लोगों में भोजन के रूप में अनाज के प्रति कम, जबकि फल, सब्जी, अंडा, दूध और मांसाहार के प्रति ज्यादा रुझान है। 20 साल पहले एक व्यक्ति हर महीने औसतन 11.78 किलो खाद्यान्न खाता था जो 2022-23 में घटकर 8.97 किलो रह गया है। सर्वे के अनुसार साल 2022-23 में पहली बार भारत में खाद्यान से 15 हजार करोड़ रु. ज्यादा फल और सब्जी (4.34 लाख करोड़ की पैदावार हुई है। दूध, तीन साल पहले ही गेहूं-चावल के कुल उत्पादन मूल्य को पार कर चुका है। इन आंकड़ों से यह साफ है कि परंपरागत खेती करने वाले किसान अब घाटे में रहेंगे क्योंकि एक- फसली खेती के कारण उनके जमीन की उत्पादकता घट रही है और ज्यादा पानी का दोहन करने से मिट्टी की उर्वरता भी नीचे जा रही है। जहां यूपी सबसे ज्यादा मूल्य का अनाज पैदा कर रहा है, वहीं पश्चिम बंगाल यूपी के मात्र एक-तिहाई भू-भाग के बावजूद देश में सबसे ज्यादा फल और सब्जी पैदा कर रहा है। हालांकि आज भी देश की कृषि अर्थ-व्यवस्था में खेती की उपज का योगदान सर्वाधिक 54 प्रतिशत है लेकिन खाद्यान्न और खासकर चावल – गेहूं की जगह अन्य बहु- फसली खेती की जरूरत है।
Date: 29-06-24
महामारी जैसा बनता अकेलापनक्षमा शर्मा, ( लेखिका साहित्यकार हैं )
काफी समय से यह माना जाता रहा है कि बुजुर्गों में अकेलापन बढ़ गया है। इसका कारण संयुक्त परिवार का न होना, बच्चों का विदेश या बाहर के शहरों में बस जाना, रिटायरमेंट, जीवनसाथी का न रहना और दोस्तों से संपर्क टूटना आदि हैं, मगर अब नए शोध के अनुसार अकेलापन युवाओं को भी बहुत परेशान कर रहा है। यह असमय ही उन्हें मृत्यु की ओर धकेल रहा है। इसका एक कारण हमउम्र लोगों से कम संपर्क और परिवार से दूरी है। नौकरियां भी अब ऐसी हो चली हैं, जहां युवा 24 घंटे के नौकर हैं। उन्हें हर हाल में टारगेट पूरे करने होते हैं। भले ही इसके लिए कितने ही घंटे काम क्यों न करना पड़े। इस अतिरिक्त व्यस्तता के कारण वे अपने आसपास और दोस्तों से कट रहे हैं। आपको अमेरिका में रहने वाले सर्वश्रेष्ठ गुप्ता का केस तो याद ही होगा। यह युवा बहुत तेजस्वी और मेधावी था। >अमेरिका के एक बड़े संस्थान में काम करता था। वह दफ्तर में 16-18 घंटे काम करता था, फिर भी अधिकारी कहते थे कि और करो। न उसके पास घर जाने का समय था और न ही सोने का। तब परिवार और दोस्तों के लिए समय कहां से आता। एक दिन इस युवा ने जिंदगी से हार मान ली। जिनके लिए 16-18 घंटे काम किया, उन्हें भला क्या फर्क पड़ा। उसकी जगह कोई और आ गया।
विशेषज्ञ कहते हैं कि अपनों से कट जाने का मतलब एक तरह की असामयिक मृत्यु है। अकेलापन धूमपान करने से भी अधिक खतरनाक है। कुछ दिन पहले विश्व स्वास्थ्य संगठन ने बढ़ते अकेलेपन पर चिंता प्रकट की। उसके अनुसार अकेलापन दुनिया में महामारी की तरह फैल रहा है। डाक्टरों का कहना है कि अकेलेपन के कारण लोगों को नींद नहीं आती। उन्हें तरह-तरह की समस्याएं होती हैं। अवसाद बढ़ता है। प्रतिरोधक प्रणाली कमजोर हो जाती है। मानसिक स्वास्थ्य कमजोर हो जाता है। दिल की बीमारियों के खतरे बढ़ जाते हैं और तरह-तरह के रोग घेर लेते हैं।
अकेलापन किसी गंभीर बीमारी जैसा ही खतरनाक है। अकेलापन हमारी भावनाओं पर आघात करता है। यह हमें हमेशा दुखी रखता है। दुखी होने से चिंता और तनाव बढ़ता है। यह जीवन की कठिनाइयों को बढ़ाता है। रही-सही कसर इंटरनेट मीडिया ने पूरी कर दी है। युवाओं का दफ्तर के कामकाज से जो समय बचता है, उसे वे इंटरनेट मीडिया पर खर्च करते हैं। इंटरनेट मीडिया भी तरह-तरह की प्रतिस्पर्धा से भरा है। किसको कितनी रीच एवं लाइक्स मिले, यह एक चिंता का विषय बन जाता है। अकेलेपन के जो कारण बताए जाते हैं, उनमें बेरोजगारी और कम आय भी महत्वपूर्ण है। जो लोग नौकरी या अन्य किसी कारण अकेले रहते हैं, उनका अकेलापन भी बढ़ता है। गंभीर बीमारियों से ग्रस्त लोग भी अकेलेपन का शिकार होते हैं। बहुत से सामाजिक दबाव भी इसे बढ़ाते हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि अकेलेपन की समस्या से समय रहते निपटा जाना चाहिए। इसके लिए ऐसी आदतें डाली जानी चाहिए, जो किसी को अकेला न रहने दें। अकेलेपन को दूर करने के लिए लोगों से मिलें-जुलें, दोस्ती बढ़ाएं। एक-दूसरे के सुख-दुख का हिस्सा बनें। सामाजिक कार्यों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने से भी जीवन सार्थक लगता है। इसलिए इनसे भी जुड़ना चाहिए। दोस्तों या परिवार के अन्य सदस्यों के साथ बाजार जाएं। दूसरों के अनुभवों से सीखें। यदि समय हो तो किसी अभिरुचि को पूरा कर सकते हैं। बहुत से शौक अपनाए जा सकते हैं। बागवानी, पेंटिंग और संगीत भी अकेलेपन को दूर करने में बहुत मदद करते हैं। संगीत सुनना और संगीत सीखना, दोनों उपयोगी हैं। योग और व्यायाम से न केवल अकेलेपन को दूर किया जा सकता है, बल्कि स्वास्थ्य को भी अच्छा रखा जा सकता है।
इन दिनों कहा जाता है कि युवाओं में पढ़ने की आदत कम होती जा रही है, जबकि कोई अच्छी किताब हमारी सबसे अच्छी साथी होती है। मनपसंद किताबें कभी अकेला नहीं रहने देतीं। प्रकृति के साथ रहना भी हमारे अवसाद को कम करता है और हमें बहुत सी चिंताओं से मुक्ति दिलाता है। सबसे प्रमुख तो हमारा परिवार ही है। यदि परिवार के साथ रहते हैं तो स्वजनों के साथ समय बिताना एक अच्छा विकल्प है। दूर रहते हैं, तो मोबाइल ने यह सुविधा प्रदान की है कि हम कभी भी परिवार के सदस्यों से बात कर सकते हैं। आज की तकनीक भले ही हमें बहुत आकर्षित करती हो, लेकिन यह मानवीय संबंधों का रूप कभी नहीं ले सकती। वह पश्चिम जो तमाम तकनीकी उपकरणों और सुविधाओं से भरा पड़ा है, वहां न केवल युवा, बल्कि अधिकांश आबादी अकेलेपन की पीड़ा झेलने को मजबूर है। लंबे अर्से तक वहां अकेलेपन को आत्मनिर्भरता और ताकत के रूप में पेश किया गया। आज पश्चिम के लोग परिवार-परिवार चिल्ला रहे हैं। यह अफसोस की बात है कि भारत में अकेलेपन को किसी वरदान की तरह समझा जा रहा है। अकेलेपन की विशेषता के रूप में यह बताया जाता है कि हम जो चाहें, वह सब कर सकते हैं। पहले संयुक्त परिवार को तोड़कर एकल परिवार बने। अब बहुत से युवा जिनमें लड़के-लड़कियां दोनों शामिल हैं, परिवार नाम की संस्था से ही दूर भागते हैं। उन्हें लगता है कि अकेले हैं तो आजाद हैं। परिवार है तो जिम्मेदारियों का बोझ है और आजादी खतरे में है। थोड़े दिनों तक तो यह सोच बहुत अच्छा लग सकता है, मगर एक वक्त के बाद यह लगने लगता है कि हमारा कोई नहीं। जब तक यह बात समझ आती है कि शेयरिंग और केयरिंग एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, तब तक कई बार देर हो चुकी होती है।
Date: 29-06-24
प्रगाढ़ होते रिश्तेडॉ. लक्ष्मी शंकर यादव
बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना ने 21 एवं 22 जून की दो दिवसीय भारत यात्रा की। उनकी इस यात्रा का मकसद दोनों देशों के बीच पहले से ही बने घनिष्ठ संबंधों को और आगे बढ़ाना था। भारत में नई सरकार के गठन के बाद यह किसी विदेशी नेता की पहली द्विपक्षीय राजकीय यात्रा थी। प्रधानमंत्री हसीना की इसी माह में यह दूसरी भारत यात्रा थी। इससे पहले वे प्रधानमंत्री मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने के लिए भारत आई थीं। इसके बाद जुलाई महीने में चीन की यात्रा पर जाएंगी। चीन की यात्रा पर जाने से पहले उनका दो बार भारत आना दर्शाता है कि चीन यात्रा से उनके भारतीय संबंधों को कोई खतरा नहीं है। इधर भारत सरकार भी बांग्लादेश से अपने मधुर संबंधों को आगे जारी रखना चाहती है।
बांग्लादेश और भारत के प्रधानमंत्रियों ने 22 जून को बैठक करके व्यापक वार्ता की । इस वार्ता में नये क्षेत्रों में आपसी सहयोग बढ़ाने के लिए भविष्य की योजना पर सहमति जताई और समुद्री क्षेत्र सहित अनेक मुख्य क्षेत्रों में संबंधों को बढ़ावा देने के लिए तकरीबन 10 समझौतों पर हस्ताक्षर किए गए। दोनों पक्षों द्वारा हस्ताक्षरित प्रमुख समझौतों में डिजिटल, हरित और रक्षा क्षेत्रों में बढ़ावा देने के समझौते शामिल हैं। इनमें बांग्लादेश के रोगियों के लिए ई-वीजा प्रमुख है। उल्लेखनीय है कि बड़ी संख्या में बांग्लादेश के लोग इलाज कराने के लिए भारत आते हैं। वहां से भारत आने वाले ऐसे लोग 30 प्रतिशत के करीब हैं। ई- वीजा मिलने से ऐसे लोगों को परेशानियों का सामना नहीं करना पड़ेगा। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि हमने नये क्षेत्रों में सहयोग के लिए भविष्योन्मुखी विजन तैयार किया है, जिसमें हरित साझेदारी, डिजिटल साझेदारी, अंतरिक्ष एवं ब्लू इकॉनमी जैसे विभिन्न क्षेत्रों में भारत-बांग्लादेश की बनी सहमति से दोनों देशों के नवयुवकों को काफी लाभ मिलेगा। दोनों देशों की ‘मैत्री उपग्रह’ भारत-बांग्लादेश संबंधों को नई ऊंचाइयां प्रदान करेगी। उन्होंने कहा कि हम अपनी वरीयता में डिजिटल और ऊर्जा कनेक्टिविटी पर फोकस रखेंगे। हमने पिछले 10 वर्षों में कार्य करते हुए 1965 से पहले की कनेक्टिविटी को बहाल कर दिया है। इससे दोनों देशों की अर्थव्यव्स्था गतिशील होगी। उन्होंने दोहराया, ‘मैं बंगबंधु के स्थिर, समृद्ध और प्रगतिशील बांगलादेश के विजन को साकार रूप प्रदान करने के लिए प्रतिवद्ध हूँ।’ इन समझौतों में दूसरा समझौता बांग्लादेश के रंगपुर में भारत का नया सहायक उच्चायोग होगा। बांग्लादेश के उत्तर-पश्चिम क्षेत्र के लोगों के लिए रंगपुर में सहायक उच्चायोग खोलने का निर्णय लिया गया है। ढाका और कोलकाता के बीच नई रेल सेवा चालू की जाएगी। इसी तरह, चटगांव और कोलकाता के बीच नई बस सेवा चालू हो जाएगी। पांचवां समझौता मेदे-दरसाना और हल्दीबाड़ी- चिलाहाटी के बीच दलगांव तक मालगाड़ी सेवाओं की शुरुआत किए जाने का है।
इसके अलावा, अनुदान सहायता के तहत सिराजगंज में अंतर्देशीय कंटेनर डिपो का निर्माण किया जाएगा। भारतीय ग्रिड के माध्यम से नेपाल से बांग्लादेश को 40 मेगावाट बिजली के निर्यात की शुरुआत की जाएगी। 1996 की गंगा जल संधि के नवीनीकरण के लिए भी एक समिति बनाई जाएगी। रक्षा संबंधों को मजबूत बनाने के उद्देश्य से प्रधानमंत्री मोदी और शेख हसीना के बीच चर्चा हुई। इसमें दोनों देशों ने लंबी अवधि के हितों को ध्यान में रख कर रक्षा सहयोग की एक नीति बनाने का निर्णय लिया है।
उल्लेखनीय है कि भारत-बांग्लादेश के बीच सैनिक और रक्षा सहयोग की गति अभी तक काफी धीमी रही है, लेकिन अब किए गए नये समझौते के बाद से भारत जो सहयोग करेगा उससे बांग्लादेश की आर्मी काफी अत्याधुनिक बनेगी। बांग्लादेश की रक्षा जरूरतों के मुताबिक रक्षा उपकरणों का उत्पादन शुरू होगा। यह कार्य इस प्रकार का होगा कि बांग्लादेश की रक्षा और यौद्धिक क्षमता काफी बढ़ सके। अभी तक भारत ने इस तरह का रक्षा समझौता किसी पड़ोसी देश के साथ नहीं किया है। प्रधानमंत्री मोदी और शेख हसीना ने आतंकवाद, कट्टरवाद और सीमा पर शांतिपूर्ण प्रबंधन अपनी सहभागिता को मजबूत करने का भी निर्णय लिया है।
इसके अतिरिक्त, दोनों देशों के मध्य हिन्द महासागर क्षेत्र के लिए समान दृष्टिकोण अपनाए जाने की बात निश्चित हुई। दोनों प्रधानमंत्रियों की मुलाकात में भारत ने बांग्लादेश की पुरानी मांग मान ली और बांग्लादेश को भूटान तथा नेपाल के साथ भारतीय रेलवे के जरिए कारोबार करने की स्वीकृति प्रदान कर दी। इस स्वीकृति से बांग्लादेश को निर्यात बढ़ाने का बेहतर अवसर प्राप्त होगा। इस कदम से उत्साहित दोनों देश शीघ्र ही एक विशेष समझौता भी करने वाले हैं। अब दोनों देशों का प्रयास है। कि भूटान, नेपाल और बांग्लादेश के बीच एक साझा बाजार तैयार किया जा सके। यदि इस कार्य में सफलता मिल गई तो भविष्य में इस बाजार में अन्य पड़ोसी देशों जैसे श्रीलंका, म्यांमार आदि को शामिल किया जा सकेगा। इसीलिए दोनों देश रेल, सड़क, हवाई मार्ग और समुद्री मार्ग के जरिए आवागमन और माल ढुलाई के लिए कनेक्टिवटी को और ज्यादा मजबूत बनाएंगे।
प्रधानमंत्री मोदी और शेख हसीना के बीच बैठक में इस बात की भी सहमति बनी कि तीस्ता नदी जल प्रबंधन पर वार्ता के लिए भारत की एक तकनीकी टीम ढाका का दौरा करेगी। टीम तीस्ता नदी की गाद को साफ करने तथा नदी को पुराने स्वरूप में लौटाने के लिए एक रोडमैप तैयार करेगी। बांग्लादेश में तीस्ता नदी के संरक्षण पर बातचीत के लिए एक भारतीय दल भेजने का निर्णय इसलिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि भारत की आपत्तियों के बावजूद एक अरब अमेरिकी डॉलर की इस परियोजना पर चीन की नजर थी। यह मुद्दा भारत के लिए अत्यंत संवेदनशील है क्योंकि चीन की कंपनियों को ठेका मिलने का मतलब है कि उन्हें तीस्ता नदी से संबंधित सारा डाटा हासिल हो जाएगा। इसलिए भारत का प्रयास था कि चीन का इसमें प्रवेश न हो। इस आश्वासन के बाद अपने देश पहुंच कर शेख हसीना ने कहा कि उनकी भारत यात्रा सार्थक रही। निश्चित है कि उपर्युक्त समझौतों के बाद भारत तथा बांग्लादेश के आपसी संबंध और अधिक मधुरता की ओर बढ़ेंगे
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Date: 28-06-24
Physical, FailedCan a country get sedentary before it gets rich? Yes. And it’s terrible for healthTOI Editorials
Physical inactivity is called “the silent killer”. Because of how its effects can creep up unnoticed year after year, decade upon decade. Until one day, one is diagnosed with a serious non-communicable disease. But aren’t sedentary lifestyles kind of the zeitgeist too? Readers will surely have seen sedentariness increase around them since their own childhood. And yet a pooled analysis of 507 surveys across 163 countries and territories, published in Lancet this week, surprises with the scale of its estimate of the malaise. As much as a third of the global population and half of India’s adults do not meet WHO recommended levels of physical activity.
Shock treatment | Another surprise is that insufficient physical activity is generally higher among women. South Asia shows the maximum sex difference, of 14 percentage points. In Afghanistan and Pakistan, it is 20 percentage points. Why are we surprised? Because India is an agricultural society and even other kinds of physical labour are a significant income source, we wonder how so many Indians can afford to be sedentary. Because women have so much household responsibility, and many have farm responsibility on top, we wonder how women of non-rich countries can be lagging men in physical activity.
Alien medicine | These disjunctions call for deeper health profiles. They need to be taken seriously because they track with other studies. One shows that India’s rural areas are closing in on urban BMIs, another that abdominal obesity is 40% among women compared to 12% in men. Dietary transformations are underway at supersonic speed. Women’s liberty and safety are advancing, but at snail’s pace in some places, and even reversing in others. Maidans for playing are also in retreat, be it in villages or cities. In other words, we need to begin investigating less physical activity as disprivilege rather than luxury.
Tech therapy | Better documentation has to be the building block for effective diagnosis and treatment. Here, the smartphone whose addiction has cut our sprightliness at the knees, can help pool together stronger national health data, and also help us be healthier. From counting our calories to steps, serving the alert to changes in our gait or menstrual cycle, the phone can redeem itself.
Date: 28-06-24
Sports Can Push Our Young Out of TorporET Editorials
India is unfit. A Lancet Global Health study published this week reveals that half of our adult population doesn’t meet WHO guidelines for sufficient physical activity. They get less than 150 mins of moderately-intense activity, 75 mins of vigorous-intensity activity, or an equivalent combination, per week. Such asedentary lifestyle puts adults at greater risk of heart attacks and strokes, Type 2 diabetes, dementia, and breast and colon cancers. But as far as incentives go, warnings haven’t been much useful. They are either seen as applicable to ‘other people’, or as ‘first world’ concerns. It’s time to take a different tack.
Physical activity regimes are usually conducted sporadically, if at all. Increasingly for our young, it’s on par with ‘Eat your greens’, something that gets little traction outside adult surveillance. Instead, why not approach the problem through the more seductive means of competitive sports? India is showing its sporting prowess beyond cricket, throwing up role models for youngsters to emulate. Add the catalyst of ‘fun’ — instead of duty — and sports can provide the perfect push to get young people out of their sedentary habits — and their heads out of smartphones. On their part, schools must inculcate the ‘gymnasium’ approach to treating bodies on par with minds. For this to take root, parents must realise that playing sports isn’t a waste of time. Infrastructure — fields, parks, pools — must be accessible and affordable.
Benefits of physical activity are immense: improved mental health and building defence against diseases, especially as Indians are genetically more prone to non-communicable diseases. Our growing physical prowess should match our growing affluence. The generational change can start now.
Date: 28-06-24
शिक्षा में बदहाली का सीधा संबंध बेरोजगारी से हैअभय कुमार दुबे, ( अम्बेडकर विवि, दिल्ली में प्रोफेसर )
नालंदा विश्वविद्यालय के परिसर का उद्घाटन करते हुए प्रधानमंत्री ने अपने प्रेरक संकल्पों की सूची में एक इजाफा और कर दिया है। उन्होंने भारत को ज्ञान और शिक्षा का वैश्विक केंद्र बनाने की शपथ ले ली है। लेकिन उनके वक्तव्य की पृष्ठभूमि दोहरी और एक-दूसरे को काटने वाली है।
एक तरफ हमारे एक प्राचीन विश्वविद्यालय के जीर्णोद्धार की महत्वाकांक्षी योजना है। दूसरी तरफ डॉक्टरी की नीट परीक्षा और यूजीसी-नेट परीक्षा के बहुचर्चित और बहुविवादित घोटालों के कारण मचा हुआ हंगामा है। इसी समय 12वीं तक पढ़ाई कर चुकी केंद्रीय मंत्रिमंडल की एक सदस्य द्वारा ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसे चार आसान शब्द भी ठीक से न लिख पाने का प्रकरण भारतीय शिक्षा के एक दुखद रूपक की तरह हमारे सामने आ गया है।
जाहिर है कि आज की तारीख में हमारी पूरी शिक्षा प्रणाली के स्तर पर एक बड़ा सवालिया निशान लगा हुआ है। इसलिए इस विरोधाभास की रोशनी में प्रधानमंत्री के संकल्प और जमीनी हकीकत के संबंधों पर गौर करना जरूरी है। मोटे तौर पर हम शिक्षा की व्यवस्था को तीन चरणों में बांटकर समझ सकते हैं।
पहला चरण प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा को मिलाकर बनता है। बुनियादी तालीम के लिए जरूरी इस दौर को पार करते-करते विद्यार्थी शिशु से किशोर वय के आखिर में पहुंच जाता है। फिर शुरू होता है विश्वविद्यालय प्रणाली के तहत उच्च शिक्षा का दौर। इसके तहत बीए, एमए और पीएचडी वगैरह की डिग्रियां मिलती हैं।
दरअसल, माध्यमिक शिक्षा खत्म होते-होते हमारे युवा और युवतियां तय करने लगते हैं कि वे शिक्षक बनेंगे या व्यापारी, पुलिस में जाएंगे या फौज में, वकील या न्यायाधीश, क्लर्क या नौकरशाह। या फिर वे डॉक्टर, इंजीनियर, चार्टर्ड एकाउंटेंट, मैनेजर आदि बनना पसंद करेंगे। यहीं से तरह-तरह की प्रतियोगी परीक्षाओं के चरण की निर्णायक भूमिका शुरू होती है। ये तीनों चरण संसाधनों की कमी, बदइंतजामी और भ्रष्टाचार की बहुतायत और स्तरहीनता से बेहाल हैं।
प्रधानमंत्री जिस अर्थव्यवस्था का पिछले दस साल से संचालन कर रहे हैं, उसके तहत शिक्षा पर जीडीपी का 3% के आसपास ही निवेश हो रहा है। जबकि इसे दोगुना होना चाहिए था। प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा की हालत यह है कि छात्र उत्तीर्ण होकर आगे की कक्षाओं में पहुंच जाते हैं, लेकिन उनमें नीचे की कक्षाओं के बराबर पढ़ने और गणित की क्षमता नहीं होती।
डिग्रियां लेने के बावजूद अकादमिक क्षमताएं निचले स्तर की होती हैं। ज्यादातर स्नातक बाजार के मानकों के लिहाज से रोजगार पाने लायक नहीं होते। प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए तैयारी का मार्केट पूरी तरह से निजी क्षेत्र में है। पुलिस या फौज के सिपाही से लेकर आईएएस-डॉक्टर-इंजीनियर -मैनेजर तक की कोचिंग निजी खर्चे पर उपलब्ध है। लेकिन जैसे ही ट्रेनिंग लेकर हमारा युवा वर्ग प्रतियोगी परीक्षाओं में बैठता है, वह पिछले बीस साल से मुतवातिर चल रहे राष्ट्रीय घोटाले की भेंट चढ़ जाता है। इस स्कैंडल का नाम है पेपर-लीक।
80 के दशक से पहले पेपर लीक की घटना अपवाद स्वरूप ही होती थी। आज पेपर लीक न हो, यह अपवाद है। नई शिक्षा नीति लागू हुई है। मौजूदा शिक्षा मंत्री 2021 से इसके इंचार्ज हैं। फिर भी बरसों से शिक्षा का एक भूमिगत बाजार सक्रिय है।
संगठित होकर नकल कराने वाले माफिया के बारे में सभी को पता है। पर इस तथ्य से लोग जानते हुए भी अनजान बने रहते हैं कि पंजाब, बिहार और यूपी जैसे राज्यों में न जाने कितने ऐसे अध्यापक हैं, जिनकी जगह कोई और पढ़ाता है। नियुक्ति पाने वाला केवल तनख्वाह उठाता है, और अपनी जगह पढ़ाने वाले को उसका एक हिस्सा दे देता है। प्रधानाचार्य की भी इसमें मिलीभगत होती है।
मोटी रकम देकर किसी भी विषय में पीएचडी की थीसिस लिखवाने का एक पूरा कुचक्र मुद्दतों से चल रहा है। हजारों-लाखों में कोई-कोई थीसिस ही ढंग की होती है। बाकी सभी स्तरहीन, घिसे-पिटे शोध, कट-पेस्ट या खानापूर्ति वाले फील्ड वर्क पर आधारित होती हैं।
हमारे विश्वविद्यालय ज्ञानार्जन के केंद्र नहीं रह गए हैं। वे ज्यादा से ज्यादा कोर्स पूरा कराने के लिए होने वाली टीचिंग की जिम्मेदारी ही पूरी कर पाते हैं। उन्हें मिलने वाली रेटिंग एक छलावा भर है, क्योंकि वह पीएचडी की डिग्रियां बांटने की संख्या पर आधारित होती है। मौलिकता और अकादमिक श्रेष्ठता से पूरी तरह से वंचित शोध-प्रबंधों के आकलन की इस रेटिंग में कोई भूमिका नहीं होती। कथित उच्च शिक्षा पाया छात्र जब मुंह खोलता है तो न ठीक से हिंदी बोल पाता है, न अंग्रेजी।
शिक्षा का अधिकांश हिस्सा सरकारी क्षेत्र में है, उसका तेजी से निजीकरण किया जा रहा है। पर इससे क्या बदलेगा? शिक्षा की बदहाली का सीधा संबंध बेरोजगारी की समस्या से है। फिर भी शिक्षा हमारी प्राथमिकताओं में कहीं नीचे है।
Date: 28-06-24
तिब्बत की आवाज बने भारतशंकर शरण, ( लेखक राजनीतिशास्त्र के प्रोफेसर हैं )
अमेरिकी सांसदों का एक दल जिस तरह दलाई लामा से धर्मशाला आकर मिला, वह इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस दल के सांसदों में नैंसी पेलोसी भी थीं, जिन्होंने अमेरिकी संसद में ‘रिसाल्व तिब्बत एक्ट’ का विधेयक रखा है। इसमें तिब्बत समस्या के समाधान के लिए चीन पर दबाव डालने की सिफारिश है।
इस विधेयक पर अमेरिकी राष्ट्रपति के हस्ताक्षर हो जाने से चीन पर तिब्बतियों से बातचीत करने का दबाव बनाने की अमेरिकी गंभीरता झलकेगी। इसका प्रभाव दुनिया के अनेक देशों पर भी पड़ सकेगा। इन देशों में सबसे महत्वपूर्ण भारत है।
उल्लेखनीय केवल यह नहीं कि भारत ने अमेरिकी सांसदों के दल को धर्मशाला आकर दलाई लामा से मुलाकात करने की अनुमति दी, बल्कि इस दल से प्रधानमंत्री मोदी ने भी भेंट की। डोकलाम और गलवान घाटी पर भारत-चीन तनाव के संदर्भ में भी इसका संकेत स्पष्ट है।
यदि भारत भी कूटनीति में चीन की तरह यथार्थवादी कदम उठाए तो आपसी संबंध सुधार की संभावना बढ़ेगी। केवल सदिच्छा और सांकेतिक बातों से भारत को आज तक कुछ लाभ नहीं हुआ। वस्तुत: तिब्बत ही भारत-चीन संबंधों की बीच की कड़ी है। इसकी अनदेखी से आपसी विश्वास नहीं बन सकेगा।
यहां स्मरणीय है कि बीजिंग में 1954 ई. में हुआ पंचशील समझौता भारत-तिब्बत पर ही था। इस समझौते का शीर्षक ही है: ‘‘चीन के तिब्बत क्षेत्र और भारत के बीच व्यापार और संबंध के बारे में।’’ छह अनुच्छेदों के इस संक्षिप्त समझौते में कुल नौ बार तिब्बत का नाम आया है। इसमें पांच अनुच्छेद केवल इसके वर्णन हैं कि भारत-तिब्बत संबंध पूर्ववत चलते रहेंगे।
ऐतिहासिक दृष्टि से सौ-पचास साल कुछ नहीं होते। इसलिए यह तथ्य महत्वपूर्ण है कि 1951 तक तिब्बत स्वतंत्र देश था। मार्च 1947 में दिल्ली में ‘एशियन रिलेशंस कांफ्रेंस’ में तिब्बत और चीन, दोनों ने स्वतंत्र देशों की तरह हिस्सा लिया था। इससे पहले 1914 में शिमला में चीन, तिब्बत और भारत ने आपसी सीमांकन समझौता भी किया था।
यदि चीन 1890 के दस्तावेज का हवाला देकर डोकलाम को अपना बताता है, तो 1914 केदस्तावेज के अनुसार तिब्बत भी स्वतंत्र देश है। ऐसे तथ्य उठाकर ही भारत, चीन और तिब्बत, तीनों के बीच पहले की तरह परस्परता का संबंध बनने का मार्ग मिल सकता है।
यह ठीक है कि 1949 में भारत से भूल हुई जब उसने चीनी कम्युनिस्टों को तिब्बत हड़पने दिया। उसके एवज में चीन ने भारत और तिब्बत को संतुष्ट करने के लिए पंचशील का उपाय किया। उस समझौते का सार यही था कि तिब्बत और भारत के सांस्कृतिक, व्यापारिक, सामाजिक संबंध पहले जैसे चलते रहेंगे- बिना किसी पासपोर्ट, वीजा, या परमिट आदि के।
यह ऐतिहासिक सत्य है कि भारत और तिब्बत के संबंध सदियों से खुले और पारस्परिक थे, जिसमें चीन का कोई अवरोध न था। जब चीनी नेता पंचशील समझौते का हवाला देते हैं, तो भारतीय नेताओं को कहना चाहिए कि उसके अनुच्छेद 2 और 5 के अनुरूप तिब्बती एवं भारतीय तीर्थयात्रियों की बेरोक-टोक यात्राएं पुनर्स्थापित की जाएं।
वस्तुत: न्याय और व्यवहारिकता, दोनों का तकाजा है कि पंचशील समझौते के सभी छह अनुच्छेद लागू किए जाएं, अन्यथा तिब्बत और उसकी सहायता के लिए भारत समेत दुनिया के अन्य उदार देश उसी तरह स्वतंत्र हैं, जैसे अन्य देश किसी पीड़ित देश की मदद के लिए होते हैं।
निर्मल वर्मा ने तिब्बत को ‘संसार का अंतिम उपनिवेश’ बताया था। भारत और तिब्बत को अपनी साझी चिंताओं और सांस्कृतिक जरूरतों पर बोलने का पूरा अधिकार है। यही पूरे मामले को सुलझाने का सूत्र है, पर अधिकांश नेता और बुद्धिजीवी ‘तिब्बत रीजन आफ चाइना’ की शब्दावली में सदैव चाइना पकड़ते हैं और तिब्बत भूल जाते हैं! वास्तव में होना उलटा चाहिए।
सदैव तिब्बत का नाम लें और चीन को टोकें। भारत का पड़ोसी पहले तिब्बत है। उसके पार चीन है। पंचशील समझौता होने पर कई पत्र-पत्रिकाओं में खबर का शीर्षक था- भारत-तिब्बत समझौता। इसके दो-तीन दशक बाद भी दुनिया भर के नक्शों में तिब्बत अलग देश ही रहा।
दुर्भाग्यवश भारतीय बुद्धिजीवी और नेता कई गंभीर चीजों का नाम लेते हैं, पर उसके अर्थ पर ध्यान नहीं देते, जबकि चीन यथार्थवादी होने के कारण तिब्बत और भारत दोनों के अधिकार से अवगत है। इसीलिए वह दलाई लामा पर सावधान रहता है।
उनसे देशी-विदेशी नेताओं के मिलने-जुलने का विरोध करता है, जबकि भारत अपने कर्तव्य से चूक जाता है। यह विचित्र है कि जिस तिब्बत को लेकर भारत का समझौता बीजिंग में हुआ था, उस तिब्बत की बात भारत ही नहीं करता।
चीन द्वारा तिब्बत पर हमले के बाद संपूर्ण विश्व ने पहले भारत की ओर ही देखा था, क्योंकि उससे सर्वाधिक प्रभावित होने वाला देश भारत था। भारत द्वारा चीन का समर्थन करते रहने से ही दुनिया चुप रही। वरना तब तक कम्युनिस्ट चीन महाशक्ति क्या, मान्यताप्राप्त देश तक नहीं था!
संयुक्त राष्ट्र में भी 1971 तक फारमोसा (ताइवान) को मान्यता थी। अमेरिका ने 1978 तक कम्युनिस्ट चीन से कूटनीतिक संबंध तक नहीं बनाए थे। यदि तिब्बत पर भारत आवाज उठाता, तो चीन मनमानी नहीं कर सकता था। वह भूल सुधारना भारत का अनिवार्य कर्तव्य है। उस पर चुप्पी रखने से भारत की हानि होती है।
यदि भारत ने सहजता से तिब्बत का मुद्दा उठाया होता, तो चीन को भारत के साथ सद्भाव बनाने की चिंता होती। तिब्बत की स्थिति भी सुधरती। जिस मुद्दे पर भारत ने धोखा खाया, उसी को उठाकर यानी तिब्बत से अपने संबंध को महत्व देकर ही सही मार्ग पाया जा सकता है।
अभी तिब्बत असहाय लगता है, पर यदि भारत ने इसे विश्व-मंच पर उठा दिया, तो ऐसा नहीं रहेगा। चीनी सत्ता ने अपने देश में तानाशाही को औजार बनाया है, तो अभिव्यक्ति स्वतंत्रता भारत का साधन बन सकता है।
तिब्बतियों को वैचारिक, सांस्कृतिक, राजनीतिक अभियान चलाने में सहायता देना भारत के हाथ में है। ऐसा न करना स्वयं भारत की नैतिक प्रतिज्ञा के विरुद्ध है। विविध सामाजिक सांस्कृतिक संगठन, गैर-राजनीतिक लोग भी तिब्बत पर आवाज उठा सकते हैं।
इसमें संदेह नहीं कि भारत-चीन संबंध और तिब्बत की स्वायत्तता आपस में जुड़े हैं। वर्तमान स्थिति स्थाई नहीं है। चूंकि किसी भी नए घटनाक्रम से हालत बदल सकते हैं, अतः सभी को अपना धर्म निभाना चाहिए। इससे ही वांछित बदलाव होते हैं।
Date: 28-06-24
बजट से जुड़े संकेतसंपादकीय
लोक सभा के नए सत्र के पहले संसद में राष्ट्रपति का अभिभाषण केवल एक संवैधानिक प्रक्रिया भर नहीं होता है क्योंकि इसमें आमतौर पर अगले पांच वर्ष के लिए सरकार की नीतियों और योजनाओं को रेखांकित किया जाता है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने 18वीं लोक सभा की शुरुआत के बाद संसद के पहले संयुक्त सत्र को संबोधित करते हुए जो कुछ कहा वह कई लिहाज से महत्त्वपूर्ण था। यह संबोधन तब आया जब नरेंद्र मोदी का बतौर प्रधानमंत्री तीसरा कार्यकाल शुरू हुआ लेकिन यह वह कार्यकाल है जहां राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के साझेदारों की भूमिका बहुत अहम है क्योंकि पिछले दो अवसरों की तरह इस बार भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को अपने दम पर बहुमत नहीं हासिल हो सका। व्यापक सामाजिक-राजनीतिक बहस के मुताबिक देखें तो यह ऐसे समय हुआ है जब रोजगार, खासकर युवा बेरोजगारी एक अहम मुद्दा है और घरेलू तथा विदेशी कारोबारियों का निवेश कमजोर पड़ा है। ऐसे में इस भाषण से उम्मीद की जा रही थी कि इसमें नीतिगत दिशा को लेकर अहम बातें कही जाएंगी। इस भाषण में सरकार की पिछली उपलब्धियों के बारे में विस्तार से बात की गई। इसने मोटे तौर पर इस बात पर जोर दिया कि कैसे भारत 10 वर्ष पहले की दुनिया की 11वीं बड़ी अर्थव्यवस्था से उठकर अब पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश बन गया है और इस समय हमारा देश दुनिया की सबसे तेज विकसित होती अर्थव्यवस्था वाला देश है। इन परिस्थतियों का श्रेय ‘रिफॉर्म, परफॉर्म ऐंड ट्रांसफॉर्म’ को दिया गया। आर्थिक वृद्धि के मोर्चे पर कोविंड के बाद 2021 से 2024 के बीच वृद्धि का दायरा सालाना 8 फीसदी रहने की बात को रेखांकित किया गया।
कुल मिलाकर अभिभाषण में राजनीतिक दृष्टि से सभी जरूरी विषयों को छुआ गया। सरकार के गरीबी निवारण पर ध्यान केंद्रित करने, पर्यावरण के अनुकूल अर्थव्यवस्था, किसानों और महिलाओं के सशक्तीकरण आदि विषयों को रेखांकित किया गया। उन विषयों का भी उल्लेख किया गया जिनका अतीत में काफी विरोध हुआ है। उदाहरण के लिए भाषण में इस बात का उल्लेख किया गया कि सरकार ने विवादास्पद नागरिकता संशोधन अधिनियम के तहत नागरिकता प्रदान करना शुरू किया, कैसे इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों ने पिछले चुनाव में एक बार फिर खरा उतर कर दिखाया और कैसे अनुच्छेद 370 को समाप्त करने से जम्मू -कश्मीर राज्य के विशेष दर्जे में परिवर्तन आया। यह दिलचस्प बात है कि भाषण में परीक्षा संबंधी संस्थाओं में व्यापक बदलाव के बादे से भी पीछे नहीं हटा गया। यह हाल ही में राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) के पेपर लीक से जुड़ी हुई बात है। ध्यान रहे कि यह परीक्षा केंद्र सरकार की एक संख्या के नेतृत्व में कराई जाती है।
राष्ट्रपति के अभिभाषण में इस बात के तगड़े संकेत थे कि सरकार आगामी आम बजट के लिए अपनी क्षमताएं बचाकर रख रही है। मुर्मू के अभिभाषण में साफ बताया गया कि कैसे आगामी बजट सरकारी दूरगामी और भविष्यदर्शी नीतियों और दृष्टिकोण का एक प्रभावी दस्तावेज होगा। मुर्मू ने वादा किया कि ‘बड़े आर्थिक और सामाजिक निर्णयों के साथ बजट में कई ऐतिहासिक कदम’ भी देखने को मिलेंगे। उन्होंने कहा कि बजट सुधारों की गति को तेज करेगा और ऐसा ‘देश के लोगों की तेज विकास की आकांक्षा’ के अनुरूप ही होगा। इसमें अहम बात थी दुनिया भर से निवेश जुटाने के लिए राज्यों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा को बढ़ावा देने की। उन्होंने कहा कि ऐसा करना प्रतिस्पर्धी सहकारी संघवाद की वास्तविक भावना के अनुरूप होगा। लोक सभा के मौजूदा स्वरूप में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर जोरदार बहस की उम्मीद है लेकिन विपक्ष के लिए बेहतर होगा कि वह बजट तक प्रतीक्षा करे।
Date: 28-06-24
सुस्ती का रोगसंपादकीय
जब किसी व्यक्ति को सुस्त देखा जाता है, तो इसका सीधा अर्थ यही लगाया जाता है कि शायद उसकी तबीयत ठीक नहीं है या फिर वह आलसी है। मगर यह इसलिए भी संभव है कि उसकी सक्रियता में कई वजहों से कमी आ रही हो और उसका कारण कोई शारीरिक बीमारी नहीं हो। हालांकि बीमारी की वजह से अगर सक्रियता में कमी आती है तो यह भी सही है कि सक्रियता में कमी से शरीर में बीमारी घर बनाती है। विडंबना यह है कि वक्त के साथ विस्तृत होते दायरे के बीच ज्यादातर लोगों की व्यस्तता तो बढ़ी है, मगर उनकी शारीरिक सक्रियता में तेजी से कमी आई है। ‘द लांसेट ग्लोबल हेल्थ’ जर्नल में प्रकाशित एक अध्ययन में यह उजागर हुआ है कि सन 2022 में भारत की सत्तावन फीसद महिलाएं शारीरिक रूप से पर्याप्त सक्रिय नहीं थीं, जबकि पुरुषों में यह दर बयालीस फीसद थी। अध्ययन में यह अनुमान लगाया गया है कि अगर मौजूदा परिपाटी जारी रही तो 2030 तक भारत में अपर्याप्त शारीरिक सक्रियता वाले वयस्कों की संख्या बढ़ कर साठ फीसद तक पहुंच जाएगी।
अंदाजा लगाया जा सकता है कि किसी देश की साठ फीसद आबादी अगर शारीरिक रूप से पर्याप्त सक्रिय नहीं रहे तो आने वाले वक्त में वहां आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक रूप से कैसी तस्वीर बनेगी। आमतौर पर अधिक आबादी वाले देशों में रोजी-रोटी का मसला इस तरह जटिल होता है कि ज्यादातर लोगों को जीवन चलाने के लिए शारीरिक रूप जरूरत से ज्यादा सक्रिय रहना पड़ता है। सवाल है कि आखिर भारत में ऐसे हालात कैसे पैदा हो रहे हैं कि यहां इतनी बड़ी तादाद में लोग सुस्त होते जा रहे हैं! विचित्र यह भी है कि लोगों की व्यस्तता में एक अजीब किस्म की बढ़ोतरी हुई है। ऐसे तमाम लोग हैं, जिनका आधे घंटे का कोई काम टलता रहता है, मगर रोजाना वे पांच या सात घंटे या इससे ज्यादा समय अपने स्मार्टफोन या अन्य तकनीकी संसाधनों पर, सोशल मीडिया या अन्य आभासी मंचों पर बर्बाद करते हैं। महामारी के दौरान घर से काम करने की व्यवस्था जब चलन में आई थी, उसने भी लोगों के ज्यादा शिथिल होने में भूमिका निभाई। शारीरिक सक्रियता में कमी की वजहों और नतीजों पर अगर गौर नहीं किया गया तो इन सबका समुच्चय आखिर व्यक्ति को विचार से कमजोर करेगा, शरीर को बीमार बनाएगा।
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भारत वैश्विक आप्रवासी कार्यबल बाजार में देर से प्रवेश कर रहा है। वैश्विक अर्थव्यवस्था अब पुरानी हो चली है। इसमें श्रमिकों के आवागमन की एक स्थापित व्यवस्था है। कल्याण कार्यक्रमों की भी एक व्यवस्था है। भारत के पास इनमें से कुछ नहीं है। फिर वह कुशल वैश्विक प्रतिभाओं को अपने यहाँ कैसे आकर्षित कर सकता है?
कुछ बिंदु –
एआई के वर्तमान दौर में भारत में उच्च स्तरीय प्रतिभाओं की मांग बढ़ना तय है। यहाँ का कार्यबल अत्यधिक कुशल नहीं है। युवा जनसंख्या की उम्र बढ़ने के साथ ही प्रतिभावान वैश्विक आप्रवासियों की जरूरत भारत को भी पड़ेगी। इसके लिए अभी से तैयारी में आव्रजन नीति की समीक्षा की जानी चाहिए।
‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 1 मई, 2024
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Date: 27-06-24
द्विपक्षीय संबंधों का स्वर्णिम दौरहर्ष वी. पंत, ( लेखक आब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में उपाध्यक्ष हैं )
इस दौर को यदि भारत-बांग्लादेश संबंधों का स्वर्णिम काल कहा जाए तो गलत नहीं होगा। इस महीने की शुरुआत में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के शपथ ग्रहण समारोह में शामिल होने के कुछ दिन बाद ही बांग्लादेशी प्रधानमंत्री शेख हसीना भारत के दौरे पर आईं। नई सरकार के कार्यकाल में यह किसी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष का पहला भारत दौरा है। यह दर्शाता है कि बीते दस वर्षों के दौरान दिल्ली और ढाका के रिश्ते कितने मधुर एवं सहज हुए हैं और कई बार मुश्किल परिस्थितियों की आंच भी उन पर नहीं पड़ी। तीस्ता जल समझौते की ही मिसाल लें तो जहां मोदी को बंगाल सरकार के विरोध से जूझना पड़ा, वहीं बांग्लादेश में हसीना को भारत-विरोधी तत्वों का सामना करना पड़ा। इसके बावजूद दोनों नेताओं ने अपनी साझेदारी को आगे बढ़ाने पर जोर दिया, जो न केवल द्विपक्षीय, बल्कि क्षेत्रीय दृष्टिकोण से भी अत्यंत महत्वपूर्ण है।
इस वर्ष जनवरी में जब शेख हसीना फिर से बांग्लादेश की प्रधानमंत्री बनीं तो उन्होंने अपने पहले विदेशी दौरे के लिए भारत को चुना। तब उन्होंने कहा था, ‘भारत हमारा एक प्रमुख पड़ोसी, भरोसेमंद साथी और क्षेत्रीय साझेदार है। भारत-बांग्लादेश रिश्ते बहुत तेजी से मजबूत हो रहे हैं।’ उनके हालिया दौरे की महत्ता को प्रधानमंत्री मोदी ने भी यह कहकर बखूबी रेखांकित किया कि ‘वह हमारी सरकार के तीसरे कार्यकाल की पहली विदेशी मेहमान हैं।’ इस दौरे पर दोनों नेताओं के बीच दस सहमति पत्रों (एमओयू) पर हस्ताक्षर हुए। ये एमओयू डिजिटल एवं हरित साझेदारी से लेकर सामुद्रिक सहयोग और सबसे उल्लेखनीय भारत-बांग्लादेश रेल कनेक्टिविटी का साझा दृष्टिकोण जैसे विविधतापूर्ण विषयों पर केंद्रित रहे। साझा बयान भी कनेक्टिविटी, व्यापार और सहयोग भाव पर केंद्रित शांति, समृद्धि एवं विकास को समर्पित रहा। द्विपक्षीय संबंधों को नया आयाम प्रदान करने के लिए कुछ नई पहल भी की गई हैं। जैसे बांग्लादेश से इलाज के लिए भारत आने वाले मरीजों को ई-वीजा, नई रेल एवं बस सेवा, गंगा जल समझौते के लिए संयुक्त तकनीकी समिति, तीस्ता नदी के संरक्षण एवं प्रबंधन से जुड़ी एक बड़ी परियोजना के लिए एक भारतीय तकनीकी टीम को बांग्लादेश भेजना, नेपाल से भारतीय ग्रिड के जरिये 40 मेगावाट बिजली बांग्लादेश को पहुंचाने के साथ ही बांग्लादेशी पुलिस अधिकारियों के प्रशिक्षण जैसी पहल शामिल हैं। बांग्लादेश की सामरिक क्षमताओं में बढ़ोतरी की संभावनाएं तलाशना भी एक मुद्दा रहा। इसमें बांग्लादेशी सुरक्षा बलों के आधुनिकीकरण के साथ ही रक्षा औद्योगिक उत्पादन में सहयोग पर चर्चा हुई।
शेख हसीना जुलाई में चीन का दौरा करेंगी। उससे पहले उनका हालिया भारत दौरा द्विपक्षीय संबंधों में आ रही परिपक्वता का भी परिचायक रहा कि दोनों देश अन्य राष्ट्रों के साथ अपने रिश्तों को बढ़ाने के साथ ही एक-दूसरे के साथ बहुत निकटता से काम कर रहे हैं। नई दिल्ली ने कभी ढाका को बीजिंग के साथ सक्रियता बढ़ाने से नहीं रोका, लेकिन चीन को लेकर भारत की कुछ चिंताएं जरूर रही हैं, जिनका हसीना ने हमेशा ख्याल रखा है। वर्ष 2020 से ही चीन तीस्ता नदी से जुड़ी विकास परियोजना में एक अरब डालर के निवेश की इच्छा जता रहा है और गत वर्ष उसने एक औपचारिक प्रस्ताव भी दिया। बांग्लादेश के लिए यह लंबे समय से चली आ रही प्राथमिकता है और मनमोहन सिंह की सरकार ने 2011 में इस संदर्भ में एक समझौता भी किया था, लेकिन वह बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के विरोध के चलते सिरे नहीं चढ़ पाया था। उधर चीन बार-बार प्रस्ताव दे रहा था और भारत की ओर से हीलाहवाली के चलते हसीना राजनीतिक विरोधियों के निशाने पर थीं। ऐसे में चीन जाने से पहले उनके भारत दौरे से नई दिल्ली को इस मोर्चे पर नए सिरे से पहल करने का अवसर मिला। तीस्ता नदी के संरक्षण एवं प्रबंधन के लिए भारतीय तकनीकी टीम को बांग्लादेश भेजने का निर्णय यही संकेत करता है कि कुछ घरेलू चुनौतियों के बावजूद वह पड़ोसी देशों में अपने रणनीतिक हितों को तिलांजलि नहीं देगा। इसी प्रकार, 1996 में हुए गंगा जल समझौते के नवीनीकरण के लिए तकनीकी वार्ता का निर्णय भी बांग्लादेश को समय पर आश्वस्त करने वाला है, क्योंकि यह मुद्दा हसीना सरकार की प्राथमिकता सूची में शामिल है।
भारत के लिए बांग्लादेश की अहमियत को कम करके नहीं आंका जा सकता। भारत हिंद-प्रशांत क्षेत्र में एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में स्थापित होना चाहता है और बंगाल की खाड़ी की भूमिका उसके एक क्षेत्रीय केंद्र के रूप में होगी। वहीं, बांग्लादेश के लिए इस क्षेत्र में एक प्रमुख आर्थिक एवं सामरिक केंद्र के रूप में अपनी संभावनाओं को भुनाना है तो उसके लिए भारत से साझेदारी बेहद महत्वपूर्ण होगी। चूंकि दोनों ही देश अपने रणनीतिक नजरियों को लेकर बहुत महत्वाकांक्षी हैं तो उनके व्यवहार को आकार देने में द्विपक्षीय साझेदारी निरंतर रूप से अहम बनी रहेगी। नि:संदेह, चीन इसमें एक अहम किरदार बना रहेगा, लेकिन उसे बहुत बढ़ा-चढ़ाकर नहीं पेश किया जाना चाहिए। भारत-बांग्लादेश के संबंध अपने हितों एवं समझ के आधार पर सशक्त हो रहे हैं। उनकी अपनी उपयोगिता एवं अहमियत है। इसी महत्ता को समझते हुए मोदी और हसीना ने अपने-अपने देशों की जनता के हितों को ध्यान में रखते हुए ठोस कदम उठाना सुनिश्चित किया है। पड़ोसी देशों के बीच किस प्रकार की आदर्श साझेदारी होनी चाहिए, उसे इन दोनों नेताओं ने पुन: परिभाषित किया है। परस्पर सम्मान, परस्पर हित और परस्पर संवेदनशीलता ने इस साझेदारी को अन्य देशों के लिए एक अनुकरणीय आदर्श के रूप में प्रस्तुत किया है।
Date: 27-06-24
भारतवंशियों ने चुनाव में गाड़े झंडेडॉ. आर. के. सिन्हा
भारत में लोक सभा चुनाव के नतीजे बीती 4 जून को आए और दक्षिण अफ्रीका के उससे मात्र दो दिन पहले 2 जून को। दोनों देशों में मिली-जुली सरकारें बन गई हैं। दक्षिण अफ्रीका से भारत सिर्फ इसलिए ही अपने को भावनात्मक रूप से जोड़कर नहीं देखता है कि वहां लगभग 21 सालों तक गांधी जी रहे। वहां उन्होंने भारतवंशियों और बहुसंख्यक अश्वेत आबादी के हक में लड़ाई लड़ी। दक्षिण अफ्रीका भारत के लिए इसलिए भी विशेष है कि वहां पर करीब 15-16 लाख भारतवंशी बसे हुए हैं। संसार के शायद ही किसी अन्य देश में इतने भारतवंशी हों।
दक्षिण अफ्रीका की संसद के लिए हुए हालिया चुनाव भारतीय मूल के बहुत से उम्मीदवार विभिन्न राजनीतिक दलों से भाग्य आजमा रहे थे। उन्होंने संसद और प्रांतीय असेंबलियों में भी जीत दर्ज की। मेरगन शेट्टी लगातार तीसरी बार संसद के लिए चुने गए। क्वाजुलू-नाटाल प्रांतीय विधानसभा की सदस्य शारा सिंह ने राष्ट्रीय राजनीति में प्रवेश किया और संसद सदस्य बन गई। शेट्टी संसद में डेमोक्रेटिक अलायंस (डीए) की सबसे लंबे समय तक सेवा करने वाले भारतीय मूल के सदस्य बताए जाते हैं। उन्होंने पहले 2006 में पीटरमारिट्जबर्ग नगर परिषद का प्रतिनिधित्व किया था। शारा सिंह ने संसद में चुने जाने के बाद स्थानीय सरकार की सदस्यता से इस्तीफा दे दिया। डीए के संसद के लिए 87 सदस्य चुने गए हैं। इनमें से चार भारतीय मूल के हैं। ए. सरूपेन ने लगातार दूसरी बार संसद के चुनाव में जीत हासिल की। सरूपेन के पूर्वज उत्तर प्रदेश से थे। वे गौतेंग प्रांतीय विधानसभा के सदस्य के रूप में भी कार्य कर चुके हैं। इंकथा फ्रीडम पार्टी के नेता नरेन्द्र सिंह, अफ्रीकी नेशनल कांग्रेस (एएनसी) की फासीहा हसन, अल जमा – आह के इमरान इस्माइल मूसा भी निर्वाचित हुए हैं। गोपाल रेड्डी और शुनमुगम रामसामी मूडली भी संसद पहुंचे हैं। अधिकांश चुने गए भारतीय मूल के सदस्य दक्षिण अफ्रीका में ही पैदा हुए हैं, लेकिन केरल के पथानमथिट्टा जिले के तिरुवल्ला के मूल निवासी अनिल कुमार केसवा पिल्लई ने 40 साल पहले दक्षिण अफ्रीका की स्थानीय राजनीति में खुद को स्थापित किया था। एक युवा शिक्षक के रूप में दक्षिण अफ्रीका पहुंचे पिल्लई शिक्षकों के ट्रेड यूनियन नेता के रूप में उभरे। उन्हें पहली बार 2019 में एएनसी के प्रतिनिधि के रूप में ईस्टर्न केप की प्रांतीय परिषद के लिए चुना गया था। डीए के सदस्य इमरान कीका, एम. नायर और रिओना गोकुल को भी क्वाजुलु-नाटाल की प्रांतीय विधानसभा के लिए फिर से चुना गया है।
इस बीच, दक्षिण अफ्रीका के फिर से राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा बन गए हैं। रामाफोसा ने अफ्रीकी राष्ट्रीय कांग्रेस (एएनसी), डेमोक्रेटिक अलायंस (डीए) और अन्य दलों के समर्थन से फिर से राष्ट्रपति पद को संभाला। खैर, भारत दक्षिण अफ्रीका समेत सभी अफ्रीकी देशों के साथ मैत्रीपूर्ण संबंध रखने का इच्छुक रहा है। कुछ साल पहले राजधानी में हुए भारत-अफ्रीका समिट को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने संबोधित किया। उन्होंने कहा था कि भारत और अफ्रीका की युवा होती आबादी पूरे विश्व में नये कीर्तिमान बना सकती है। उन्होंने कहा कि अफ्रीका में निवेश के लिए भारत बड़ा स्रोत है। तब भारत ने अफ्रीकी देशों के लिए 600 मिलियन डॉलर की मदद की घोषणा की थी। भारत की चोटी की कंपनियों टाटा, भारती, महिन्द्रा, अशोक लीलैंड वगैरह का अफ्रीका में तगड़ा निवेश है। भारती एयरटेल ने अफीका के करीब 17 देशों में दूरसंचार क्षेत्र में अरबों डॉलर का निवेश किया हुआ है। भारतीय कंपनियों ने कोयला, लोहा और मैगनीज खदानों के अधिग्रहण में भी रुचि जताई है। अफ्रीकी कंपनियां एग्रो प्रोसेसिंग और कोल्ड चेन, पर्यटन एवं होटल और रिटेल क्षेत्र में भारतीय कंपनियों के साथ सहयोग कर रही हैं। अफ्रीकी देश नाइजीरिया भारत को बड़े पैमाने पर तेल की आपूर्ति करता है।
अफ्रीका से राजधानी दिल्ली में आने नागरिकों को यहां अफ्रीका के बहुत सारे प्रतीक मिलेंगे। राजधानी के चाणक्यपुरी में घाना के शिखर नेता क्वामे नकरूमा मार्ग के नाम पर एक सड़क है। करीब ही अफ्रीका गॉर्डन है। अफ्रीका एवेन्यू भी है। संयोग ही है कि निर्गुट आंदोलन के नेता क्वामें नकरूमा मार्ग और अफ्रीका गार्डन इतने करीब हैं | इंडिया अफ्रीका फ्रेंडशिप रोज गॉर्डन को अब अफ्रीका गॉर्डन कहा जाने लगा है। दिल्ली में अफ्रीका नाम से किसी उद्यान का होना एक तरह से यहां पर रहने वाले अफ्रीकी नागरिकों को कुछ भरोसा तो दिलाता होगा कि भारत उनका मित्र है। राजधानी में नेल्सन मंडेला और मिस्र के जननायक गमाल आब्देल नासेर के नाम पर भी सड़क हैं। क्वामें नकरूमा की तरह नासेर भी निर्गुट आंदोलन के महत्त्वपूर्ण हस्ताक्षर थे। लगता है कि मोदी जी तीसरे प्रधानमंत्रित्व काल की सरकार दक्षिण अफ्रीका तथा अन्य सभी अफ्रीकी देशों से संबंध और मजबूत और स्थायी करेगी।
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लैंगिक समानता के मामले में भारत दो पायदान नीचे खिसक गया है। 146 देशों की सूची में भारत 129वें स्थान पर है।
– हाल ही में हुए लोकसभा चुनाव भी भारत में लैंगिक समानता से जुड़े पिछडेपन की छवि दिखाते हैं।
– देश में हो चुके 18 लोकसभा चुनावों के बाद भी संसद में केवल 74 महिला सांसद हैं। यानि कि केवल 13% महिला सांसद हैं।
– महिला मतदाताओं की जनसंख्या 31.2 करोड़ है। कुल 64.2 करोड़ मतदाताओं में यह 48% ठहरती है।
– इन चुनावों में 10% से भी कम उम्मीदवार महिलाएं थीं, और 155 निर्वाचन क्षत्रों में एक भी महिला उम्मीदवार नहीं थी।
राजनीतिक दल बहुत धीमी गति से महिलाओं को मैदान में उतार रहे हैं। उन्हें इसकी गति बढ़ानी चाहिए। अधिक महिलाओं को मतदाता सूची में शामिल होने के लिए प्रेरित किया जाना चाहिए।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 8 जून, 2024
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Date: 26-06-24
Exempt Selectively Sovereign Funds, RBIGoI needs to direct venture capital into select areas.ET Editorials
The Centre is seeking carve-outs on merits from provisioning rules for banks and NBFCs to curb evergreening of loans through alternative investment funds (AIF). Last year, RBI closed a loophole in the discovery of dodgy loans by pulling bank lending out of investment pools that also feed the same borrowers. This was a genuine regulatory concern, voiced by Sebi, given the ballooning flow of capital through AIFs. RBI’s directive to banks and NBFCs to liquidate their investments in AIFs that invest in their debtor companies is informed by previous instances of evergreening bad loans through shadow lending. The central bank moved with alacrity on Sebi’s findings that AIFs were being structured for such purposes.
But some solution has to be arrived at for funds GoI uses to direct venture capital into select areas, such as startups, small enterprises and stressed housing projects. This exemption is justified. But a blanket waiver would open up the field to foreign sovereign funds as well. The accommodation is warranted by the fact that the sovereign funds the Centre wants exempted provide a structure to ring-fence investment against political spending of the kind we see plenty of. The lack of transparency in operations of foreign sovereign funds doesn’t allow this accommodation to be extended for all. Since a category-specific carve-out is against the regulatory intent of the tighter rules, exemptions will have to be made by RBI in specific cases.
RBI has also eased some of the new provisioning rules for bank and NBFC investments in AIFs. Lenders are now required to provide only for the amount the AIF has invested in a debtor company. Equity shares of the debtor company have been excluded from the provisioning requirements. The central bank also exempted lenders investing in AIFs through intermediaries such as fund of funds and mutual funds. The additional relaxation on merits for funds operated by the Centre addresses similar concerns over the new rules choking capital flow.
Date: 26-06-24
जाति से ज्यादा जरूरी है कौशल – जनगणनासंपादकीय
एक आधुनिक समाज बनाने के लिए नई सोच जरूरी है। अगर दशकों से जारी आरक्षण के बाद भी पिछड़ी जातियां आर्थिक-सामाजिक- शैक्षि क मुख्यधारा में नहीं हैं तो नया हल तलाशना होगा। आंध्र प्रदेश के नए सीएम ने अपने राज्य में पहला और सबसे अहम फैसला स्किल-सेंसस (कौशल – जनगणना) कराने का लिया ना कि जाति आधारित जनगणना। इस गैर-राजनीतिक लेकिन शुद्ध विकास – परक फैसले के पीछे कारण है पीएलएफएस की ताजा रिपोर्ट, जिसके तहत बेहतर साक्षरता दर के बावजूद राज्य में बीमारू राज्यों से ज्यादा बेरोजगारी पाई गई। सरकार और देश के नीति-निर्माताओं को भी आंध्र मॉडल लागू करना चाहिए ना कि यह कहकर खुश होना चाहिए कि देश में दुनिया के सबसे ज्यादा (56 लाख ) प्रशिक्षित युवा हैं। नीति आयोग और शिक्षा मंत्रालय यह मूल समस्या नहीं समझ पा रहे हैं कि उसके अपने सर्वे के अनुसार भी आखिर क्यों किसी हाई-स्कूल या इंटर तक पढ़ाई किए युवक के मुकाबले स्नातक के बेरोजगार होने के चांसेस ज्यादा हैं। पीएलएफएस की रिपोर्ट में पाया गया कि राष्ट्रीय स्तर पर 15-29 वर्ष के युवाओं में बेरोजगारी 10% (सभी आयु वर्ग के औसत से तीन गुने से भी ज्यादा ) क्यों है और क्यों यह प्रतिशत बिहार में (13.9), यूपी में (7), एमपी में (4.4) और राजस्थान में ( 12.5 ) है। ग्रेजुएट्स में यह बेरोजगारी इन राज्यों में क्रमशः 16.6, 11, 9.3 और 23.1 प्रतिशत है, जबकि अपेक्षाकृत शिक्षित आंध्र में 24 प्रतिशत। दरअसल न तो युवा रोजगारपरक शिक्षा की ओर उन्मुख हैं ना ही तकनीकी शिक्षा जरूरत के मुताबिक है। सन् 2015 के नीति- पत्र में ये दोनों कमियां मानी गईं। एक साल पहले स्वयं नीति आयोग ने बताया कि आईटीआई ट्रेंड हर एक हजार युवाओं में एक नौकरी पा सका है क्योंकि प्रशिक्षण उद्योगों की जरूरत से 20 साल पुराना है। नई एआई क्रांति के मद्देनजर तकनीकी शिक्षा आईटीआई से आईआईटी तक बदलनीहोगी।
Date: 26-06-24
श्रम कानून में सुधारसंपादकीय
देश में श्रम संबंधों का संचालन करने वाले 40 केंद्रीय और 100 राज्यस्तरीय कानून मौजूद हैं जो औद्योगिक विवादों के निस्तारण, कार्य परिस्थितियों, सामाजिक सुरक्षा और वेतन भत्तों जैसे विभिन्न मामलों से संबंधित हैं। बीते वर्षों के दौरान देश में श्रम कानूनों की बहुलता, पुरातन प्रावधानों, परिभाषाओं की अनिश्चितता और अस्पष्टता के कारण इनका अनुपालन कठिन हो गया। दरों की बहुलता के अलावा श्रम कानूनों की जटिलता भी देश की औद्योगिक वृद्धि को प्रभाावित कर रही थी। इस मसले को हल करने के लिए सरकार ने साहसी कदम उठाते हुए श्रम कानूनों को सरलीकृत करते हुए चार व्यापक श्रम संहिताओं में शामिल करने का प्रावधान किया। मौजूदा 44 केंद्रीय कानूनों और 29 केंद्रीय श्रम कानूनों को समेकित करके चार श्रम संहिताओं में शामिल किया गया- वेतन संहिता (2019), सामाजिक सुरक्षा संहिता (2020), औद्योगिक संबंध संहिता (2020) और व्यावसायिक, सुरक्षा, स्वास्थ्य एवं कार्य परिस्थिति संहिता (2020)।
इन श्रम संहिताओं को संसद के दोनों सदनों की मंजूरी मिली और राष्ट्रपति ने भी उन्हें स्वीकृति प्रदान की। चारों श्रम संहिताओं पर मसौदा केंद्रीय नियम केंद्र सरकार द्वारा पूर्व प्रकाशित किए गए। चार वर्ष बाद उनके अनुमानित लाभ अभी भी हासिल होने बाकी हैं क्योंकि इनका क्रियान्वयन नहीं हो पाया। इस संदर्भ में श्रम एवं रोजगार मंत्रालय ने राज्य सरकारों के अधिकारियों के लिए प्रशिक्षण कार्यशाला आयोजित करने की योजना की घोषणा की है ताकि उन्हें श्रम संहिताओं से परिचित कराया जा सके। इस पहल का स्वागत किया जाना चाहिए क्योंकि इन संहिताओं में कारोबारी सुगमता बढ़ाने और औपचारिक रोजगार निर्माण करने की पूरी संभावना है। ये संहिताएं कई अहम बदलाव लाएंगी जिसमें मौजूदा 100 के बजाय 300 कर्मचारियों वाले औद्योगिक प्रतिष्ठानों में कर्मचारियों की छंटनी की सीमा बढ़ाने जैसी बातें शामिल हैं। नियोक्ताओं के लिए इस प्रकार लचीलापन बढ़ाने से और अधिक निवेश आएगा क्योंकि तब कंपनियां अपनी श्रम शक्ति को कारोबार की जरूरत के हिसाब से घटा-बढ़ा सकेंगी और उन्हें किसी नियामकीय बाधा का सामना नहीं करना होगा। कामगारों के हड़ताल करने के अधिकार को लेकर भी बदलाव किए गए हैं। इसके अलावा सामाजिक सुरक्षा के लाभ को बढ़ाकर श्रमिकों के एक बड़े हिस्से तक कर दिया गया है। इसके कारण परिचालन लागत में इजाफा हो सकता है लेकिन इससे श्रम शक्ति अधिक सुरक्षित और प्रेरित महसूस करेगी। इससे उत्पादक में भी इजाफा देखने को मिलेगा।
श्रम समवर्ती सूची का विषय है जिस पर संसद और विधानसभाएं दोनों कानून बना सकती हैं। क्रियान्वयन में अवश्य देरी होती रही है क्योंकि कुछ राज्यों को अभी भी इन संहिताओं के अधीन नियम तय करने हैं। वीवी गिरि राष्ट्रीय श्रम संस्थान के मुताबिक 24 राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों ने इन चारों संहिताओं के अधीन नियम बना लिए हैं। पश्चिम बंगाल, मेघालय, नगालैंड, लक्षद्वीप और दादरा एवं नागर हवेली को अभी नियम बनाने हैं। स्पष्ट है कि केंद्र सरकार संहिताओं को तभी लागू करना चाहती है जब सभी राज्य एकमत हों। ऐसा इसलिए कि क्रियान्वयन के बाद कानूनी दिक्कतों से बचा जा सके। इसके अलावा कुछ राज्यों में जहां मसौदा नियम बन चुके हें वहां राज्यों की संहिताएं केंद्र की संहिताओं से अलग हैं। इससे क्रियान्वयन में दिक्कत आएगी। केंद्र ने राज्य सरकारों के अधिकारियों को श्रम संहिताओं के बारे में संवेदी बनाने काम शुरू करके अच्छा किया है। उसे मतभेदों को दूर करने पर काम करना चाहिए। भारत को कारोबारी सुगमता सुधारने, विनिर्माण आधार बढ़ाने और बाहरी प्रतिस्पर्धा में बेहतरी के लिए आधुनिक श्रम कानूनों की आवश्यकता है। इससे बहुप्रतीक्षित रोजगार तैयार होंगे और अर्थव्यवस्था की दीर्घकालिक वृद्धि संभावनाओं में सुधार होगा।
Date: 26-06-24
भारत में नियामकीय सुधार का एजेंडाके पी कृष्णन, ( लेखक आईसीपीपी में मानद सीनियर फेलो और पूर्व अफसरशाह हैं )
नियमन हमारे जीवन को हमारे सोच से अधिक प्रभावित करते हैं। हम नाश्ते पर जो कॉफी पीते हैं, बाहर जाने के लिए ई-प्लेटफॉर्म से टैक्सी मंगाते हैं, उस सफर के लिए ई-भुगतान करते हैं, दवाइयां तथा पोषक उत्पाद मंगाते हैं तो ये सभी गतिविधियां विनियमित बाजार में घटित होती हैं। इनमें से हर क्षेत्र का प्रदर्शन और मजबूती एक या अधिक नियामकों की क्षमता पर निर्भर करती है।
आज केंद्र स्तर पर 20 से अधिक सांविधिक नियामकीय प्राधिकरण (एसआरए) हैं जो वित्त, दूरसंचार, बिजली, पानी, खाद्य सुरक्षा, प्रतिस्पर्धा, वेयरहाउसिंग, हवाई अड्डे, बड़े बंदरगाह, ऋणशोधन, चिकित्सा पेशेवर, दंत चिकित्सक, नर्स, अंकेक्षक और मूल्यांकन क्षेत्रों से संबद्ध हैं। कई एसआरए राज्य स्तर पर काम करते हैं। समग्र रूप से देखें तो ये सीधे तौर पर देश के सकल घरेलू उत्पाद के 75 फीसदी का नियमन करते हैं। इनका प्रदर्शन या प्रदर्शन की कमी अब भारत की विकास परियोजना के लिए रणनीतिक महत्त्व रखती है।
कई मायनों में नियमन ने उपभोक्ताओं और समाज के लिए अच्छे नतीजे दिए हैं। अधिकांश नियामक विनियमित संस्थाओं द्वारा प्रदान की जा रही वस्तुओं और सेवाओं में एक खास स्तर की सुरक्षा और गुणवत्ता बरकरार रखने में सफल रहे हैं। बहरहाल इन सफलताओं के साथ कई दिक्कतें भी सामने आईं। विशेष नियामकों की स्थापना के बाद के शुरुआती आशावाद की जगह उनके काम से जुड़ी चिंताओं ने ले ली। चिंताओं को विधि के शासन, प्रतिस्पर्धा, उपभोक्ता संरक्षण तथा आर्थिक गतिशीलता में बांटा जा सकता है। कई लोग किसी जटिल संस्थान के काम को वहां शीर्ष पर मौजूद व्यक्ति के साथ जोड़कर देखते हैं। वे इस बात पर जोर देते हैं कि बेहतर प्रदर्शन के लिए सर्वश्रेष्ठ लोगों का चयन किया जाए। नियुक्ति के निर्णय भी मायने रखते हैं। शीर्ष पर मौजूद व्यक्ति का चरित्र टीम के कौशल, रणनीति, नैतिक बल आदि पर भी गहरा असर डालता है। परंतु संगठनों के बेहतर प्रदर्शन को केवल बेहतरीन लोगों की बदौलत नहीं हासिल किया जा सकता है। संगठनात्मक प्रदर्शन को संगठन का डिजाइन आकार देता है जो संतुलन कायम करने का काम करता है। नियामक एक असामान्य सार्वजनिक संगठन होता है क्योंकि वह विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के कामों का मिश्रण होता है। इससे उन्हें एक खास समय पर किसी एक क्षेत्र में असीमित अधिकार मिल जाते हैं। इससे पहले देश में ऐसा नहीं देखा गया था।
भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (SEBI) अथवा भारतीय रिजर्व बैंक जैसे नियामकों का अपने नियंत्रण वाली संस्थाओं पर विस्तृत और गहरा नियंत्रण है। यह ऐसा नियंत्रण है जो सन 1991 के पहले के भारत में नहीं देखा गया था। किसी अन्य उन्नत अर्थव्यवस्था वाले देश में यह नहीं मौजूद है। ऐसी संस्थाओं के नियमन ने जहां बाजार विकास में मदद की वहीं इस स्तर की ताकत ने निजी क्षेत्र के आत्मविश्वास को प्रभावित करना शुरू कर दिया है। इससे नवाचार प्रभावित हो रहा है और भारत की सफल अर्थव्यवस्था के रूप में उभरने की संभावनाओं को भी नुकसान हो रहा है। ऐसी ताकत के साथ बहुत अधिक सावधानी की आवश्यकता होती है ताकि औपचारिक प्रक्रियाओं के दौरान नियामक सही प्रक्रियाओं का पालन कर सकें। यह बात हमें स्वायत्तता, प्रक्रिया, जवाबदेही और लोगों से जुड़े संगठित सिद्धांतों की ओर ले जाती है। ऐसा सुधारवादी एजेंडा इस तरह के हालात निर्मित करेगा जो लोगों के आर्थिक विकास और बेहतरी के लिए अच्छे होंगे।
लोग: किसी विनियमित क्षेत्र में तकनीकी विशेषज्ञता और विषय की जानकारी को वह वजह माना जाता है जिनके चलते नियामक बनाए जाते हैं। फिलहाल तो लगभग सभी एसआरए में वरिष्ठ स्तर पर सभी लोग पूर्व या सेवारत सरकारी अधिकारी हैं। आंशिक तौर पर ऐसा इसलिए है क्योंकि नियुक्ति प्रक्रिया में सरकार का दबदबा है और बाहरी विशेषज्ञों की भागीदारी नाम मात्र की होती है। इन नियुक्तियों का कार्यकाल भी अलग-अलग होता है। विषय विशेषज्ञों के एक विविध समूह का विचार जिसका कार्यकाल की कार्यावधि भी अलग-अलग होती है। विषय विशेषज्ञों के विविध समूह का विचार जिसका कार्यकाल पूर्व अनुमानित और निश्चित हो, तथा जो अनिवार्य तौर पर तकनीकी ढंग से नियमन को लेकर काम करे, जिसमें राजनीतिक विचार विमर्श न के बराबर हो, ऐसा विचार अभी दूर है।
स्वायत्तता: परिचालन की स्वायत्तता यानी सरकारी विभागों से दूरी एसआरए का एक बुनियादी तर्क है। हमें विभिन्न विधायी प्रावधानों को सुसंगत बनाने की आवश्यकता है ताकि सभी एसआरए बिना सरकारी मंजूरी के नियमन कर सकें। इसके लिए स्वायत्तता की जरूरत है। बदले में इसके लिए मानव संसाधन और वित्तीय स्वायत्तता की जरूरत होती है। इन विधायी प्रावधानों के साथ संसाधनों की स्वायत्तता को संतुलन के साथ मिश्रित करने की आवश्यकता होती है ताकि आत्मप्रशंसा तथा अन्य दुरुपयोगों से बचा जा सके।
प्रक्रिया: नियामकों द्वारा तैयार नियम कानून की तरह होते हैं। लोकतांत्रिक समाजों में कानून बनाने की शक्ति निर्वाचित संस्थाओं को होती है जो जनता के प्रति औपचारिक तौर पर जवाबदेह होती हैं। ऐसे में उम्मीद की जाती है कि इस शक्ति को गैर निर्वाचित व्यक्तियों को सौंपते समय इनके उपयोग में सावधानी बरती जाएगी। नियमन निर्माण में एक किस्म से लोकतांत्रिकता और वैधानिकता का अभाव है। यहां कानून लिखने का काम निर्वाचित प्रतिनिधियों से अधिकारियों के हाथ दे दी गई है। इसी तरह लिखित प्रक्रियाओं की आवश्यकता है ताकि यह निर्धारित हो सके कि नियामक के कार्यपालिका संबंधी और न्यायिक कार्यों को किस प्रकार अंजाम दिया जाए।
जवाबदेही: सभी सरकारी एजेंसियां अपने काम और उसके परिणामों के लिए संसद के जरिये जनता के प्रति जवाबदेह होती हैं। यह संवैधानिक लोकतंत्र वाले देशों में एक मानक प्रक्रिया है। अधिकांश भारतीय एसआरए कानूनों में प्राथमिक जवाबदेही संसदीय निगरानी की है जो इन एसआरए के सालाना प्रदर्शन और वित्तीय रिपोर्ट पर खुली चर्चा के माध्यम से तय की जाती है। हमारी संसद में किसी एसआरए को लेकर ऐसी चर्चा कभी नहीं हुई। जवाबदेही के लिए तीन सुधारों की आवश्यकता है: एक सही ढांचे वाला बोर्ड जिसके कामकाज और भूमिका को लेकर स्पष्टता हो, पंचाट में अपील की सुविधा तथा भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक द्वारा अंकेक्षण की व्यवस्था।
एक दशक पहले एसआरए में सुधार को लेकर वित्तीय क्षेत्र विधायी सुधार आयोग ने एक व्यापक रिपोर्ट प्रस्तुत की थी। इसकी अध्यक्षता सर्वोच्च न्यायालय के एक पूर्व न्यायाधीश ने की थी। इसमें विभिन्न क्षेत्रों के विषय विशेषज्ञ शामिल थे। आयोग ने देश के सभी एसआरए में सुधार के लिए एक विस्तृत रिपोर्ट पेश की थी। अब वक्त आ गया है कि इस रिपोर्ट को बाहर निकाला जाए, इसमें जरूरी सुधार किए जाएं और इसे वर्तमान की आवश्यकताओं के अनुरूप बनाया जाए। इसके पश्चात इसकी अनुशंसाओं पर काम किया जाना चाहिए।
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कारण क्या हो सकते हैं –
प्रश्न यह है कि मतदान में यह कभी स्वैच्छिक थी या निहित रूप से मजबूर थी? यदि स्वैच्छिक है, तो कौन सी जनसांख्यिकी व्याख्या इस अचानक गिरावट को उचित ठहरा सकती है? इस पर चुनाव आयोग से कुछ स्पष्टीकरण की उम्मीद की जा सकती है।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित प्रवीण चक्रवर्ती के लेख पर आधारित। 23 मई, 2024
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Date: 25-06-24
Lithium & MoreSyncing mining and battery tech R&D crucial to India’s Atmanirbhar goalsTOI Editorials
In mixed progress for India’s battery tech ecosystem, Chhattisgarh’s Korba district has seen one block of lithium move to the auctions stage and another block showing promising deposits of the mineral. This comes after setbacks such as the cancellation of auctions for the lithium block in J&K’s Reasi district due to insufficient investor interest, and shelving of exploration plans in Manipur’s Kamjong district due to local resistance. But if India is to emerge as a top player in sunrise manufacturing sectors such as electric vehicles (EVs) and consumer goods, it has to get ahead in the battery game, lithium-ion and others.
Lithium-ion challenge | In2022,China accounted for as much as 77% of global lithium-ion battery production capacity. Beijing is projected to retain this dominance even in 2027. It’s on the strength of this lithium-ion battery manufacturing capacity that the Chinese are looking to dominate the global EV market. India is way behind here. If it’s not to remain dependent on Chinese suppliers, it must ramp up its own lithium-ion battery production base or look for alternatives.
Poor technical depth | India also faces handicaps such as underdeveloped mineral reporting standards. This leads to figures for mineral reserves for several blocks being inconclusive, hindering investments. Plus, most of the lithium found in India is in the form of hard rock granites and pegmatites, making it difficult to extract the mineral.
Alternatives on anvil | There are other battery options too, but they need significant R&D. Metal-air batteries use atmospheric oxygen and metals such as aluminium, zinc and iron. They can be a lightweight, budget-friendly, and recyclable but non-rechargeable, option. Then, China is heavily investing in cheaper sodium batteries. For India to follow suit, it has to heavily invest in battery research and line up appropriate mining industry tech and processes. That’s the only way India can emerge as an alternative battery hub to China.
Date: 25-06-24
Nicobar triangleWithout consultations, Centre should not embark on infrastructure projectEditorial
The Union Tribal Affairs Ministry will be looking into the forest clearance paperwork of the ₹72,000-crore infrastructure project on Great Nicobar Island, a major initiative of the National Democratic Alliance (NDA) government, Tribal Affairs Minister Jual Oram told this newspaper. This is a significant step for the government, in its third term, as it brings to the surface the contentious and difficult choices that governments face while addressing the trilemma of infrastructure development, preserving pristine biodiversity respect and, being sensitive to the rights of the indigenous inhabitants, and tribals. The Great Nicobar Project involves developing a trans-shipment port, an international airport, township development, and a 450 MVA gas and solar-based power plant on the island. The project area is expected to cover over 130 sq. km. of pristine forest, and has been accorded a stage-1 environmental clearance — one of the mandatory prerequisites — by an expert committee. The government told Parliament in August 2023 that 9.6 lakh trees could be felled and ‘compensatory afforestation,’ for the loss of this unique rainforest ecosystem, had been planned, thousands of kilometres away, in the vastly different ecological zone of Haryana. The Galathea Bay in the Nicobar islands hosts multiple rare species including the leatherback turtle, and the project imperils their future.
The government contends that its motive is to leverage the strategic location with the Great Nicobar Island located only 90 km away from the western tip of the Malacca Strait, an important shipping route between the Indian Ocean and the South China Sea. However, critics and some of the government’s policy advisers suggest that tourism is a key imperative for the exercise. The Environment Ministry, which is a regulator of environmental policy, has opted to be secretive about the project. Details on the environmental clearance process and the appraisal process, usually a public document, have been kept under wraps. There also seems to be haste on the part of the island administration to proceed while ignoring the rights of the local tribes — the Shompen in particular — regarding consent. The National Commission for Scheduled Tribes, a constitutional body, has demanded an explanation from the district administration on these grounds. The National Green Tribunal had tasked a committee, headed by the Secretary of the Environment Ministry, to submit a report on the approval of forest clearances. This too is not public. Without transparency, it would be foolhardy for the government to attempt such a massive upheaval of the islands and it should, with its new mandate, immediately correct course.
Date: 25-06-24
The Court spells the way in Himalaya’s developmentAspirations for growth and development in the Indian Himalayan Region need to be aligned with science and the rights of people and natureArchana Vaidya, [ a natural resource management/ environmental law consultant and a Governing Council member of the Sustainable Development Forum, Himachal Pradesh ]
It is a well-established fact that the Indian Himalayan Region (IHR) is both India’s water tower and also the critical provider of invaluable ecosystem goods and services. Despite this understanding, there has always been dissonance between the special development needs and the development model being pursued in the IHR. As the economy of the region is dependent on the health and the well-being of its natural resources, plundering the same in the name of development will inevitably and surely lead the IHR towards its economic ruin.
In view of some of the recent judgments of the Supreme Court of India, we seem to be headed towards a more robust rights-based regime where sustainable development would be a fundamental right. The tone and tenor of the Court’s judgments highlighting the competing rights of people and nature are a clear sign of the direction in which the development versus environment debate in India is headed. In State of Telangana and Others vs Mohd. Abdul Qasim (Died) Per Lrs, the Court had said that the need of the hour is to adopt an ecocentric view of the environment, where nature is at the core. The Court said, “Man being an enlightened species, is expected to act as a trustee of the Earth…The time has come for mankind to live sustainably and respect the rights of rivers, lakes, beaches, estuaries, ridges, trees, mountains, seas and air…. Man is bound by nature’s law.”
A model of destruction
According to this approach, nature is not an object of protection but a subject with fundamental rights, such as the right to exist, to survive, and to persist and regenerate vital cycles. The current development model being pursued in the IHR is in total contravention of this approach. We are witnessing a ‘bumper crop’ of hydroelectric power stations on the rivers and streams in the IHR, without any care for the rights of these rivers and streams. There is a reckless widening of existing hill roads to four lanes in the name of development — in any case, these roads are getting washed away in many places in the IHR every time a river is in spate.
A post-disaster need assessment report by the National Disaster Management Authority on the floods in 2023 in Himachal Pradesh identified, unsurprisingly, rampant construction in violation of norms, regulations (and even court orders in many cases) right on river beds and flood plains, on the steep slopes, in seismic zones, in landslide-prone areas and the loss of green cover as the reasons for the disaster. The Teesta dam breach in Sikkim and the monsoon floods and landslides in Himachal Pradesh — both events in 2023 — are a stark reminder of the havoc our development model is causing to the environment, ecology and communities, especially in the mountains. The mountains, climate, forests, rivers, air and land all are crying for their right to survive in the IHR. In whatever approach we choose to adopt, whether ecocentric or anthropocentric, there is a need to align aspirations for growth and development in the IHR with the science and the rights of both people and nature.
Intersectionality of rights
In another matter of public interest litigation (PIL) titled Ashok Kumar Raghav vs Union of India and Ors., the Supreme Court asked the central government and the petitioner to suggest a way forward so as to enable the Court to pass directions on the carrying capacity of the Himalayan States and towns. In the case of the Great Indian Bustard, the Court has recognised the right of the people of this country to be free from the adverse impacts of climate change. Unfortunately the Court’s verdict in the Great Indian Bustard case is being interpreted in a very narrow sense — as if the Court has given a clean chit to all renewable energy projects over and above the concerns for biodiversity or any other right that might get compromised. The Court is not only cognisant but also committed to the conservation of species and has underscored the importance of taking proactive measures “not reactive” to protect the Great Indian Bustard. The Court modified the previous order where a blanket ban was imposed on a very large area despite the report of the Wildlife Institute of India, which had identified 13,663 square kilometres as the “priority area”, and the rest as “potential areas” and as “additional important areas” for the Great Indian Bustard. The Court has explained in the judgement the non-viability of underground power transmission lines.
In fact, the Court has explained in detail, with examples of many international and national obligations, to explain the intersectionality between the fundamental rights enshrined in Articles 14 and 21, specifically, and human rights which include the right to development and the newly minted right to be able to adapt to climate change. The top court went on to say: “without a clean environment which is stable and unimpacted by the vagaries of climate change, the right to life is not fully realised… The inability of underserved communities to adapt to climate change or cope with its effects violates the right to life as well as the right to equality. The right to equality under Article 14 and the right to life under Article 21 must be appreciated in the context of the decisions of this Court, the actions and commitments of the state on the national and international level, and scientific consensus on climate change and its adverse effects”.
It is a given that unless infrastructure is sustainable and dependable, it cannot become the foundation for people’s pursuit of their developmental goals. Sustainability of infrastructure necessarily means that it is resilient to the adverse impacts of climate change and consequent disasters. This is essential to ensure equality, equity and equal access to people, to various opportunities all across the country — as is the mandate of Articles 14 and 21 of the Constitution. Disasters are also known to amplify social inequality as the poor are the worst hit and the most inadequately equipped to deal with the consequences. To pursue a path of sustainable development can also be said to be a fundamental right, as a natural corollary or an integral part or a sub-set of the right to be free from the adverse impacts of climate change. The state must honour this. Hopefully, the Court’s judgment is a much-needed nudge and serves as the basis for a legal framework for necessary course correction for development in general and in the IHR in particular.
Development and disaster resilience
While there is no denying that as we are a lower-middle income country with a large and young population, rapid development is India’s destiny. The interconnection between disasters and unregulated development has become increasingly pronounced and visible. The only way forward is for disaster management to be incorporated in development planning, both from a perspective of prevention and resilience. Our actions in the name of development, in total disregard of nature in most cases, is to be blamed for these unnatural disasters resulting from natural hazards. The development plans, policies and laws that underpin them too play a pivotal role in the making of these disasters. There is an urgent need for planning stage convergence of different authorities so that when there is a plan for any development, all concerns about disaster and climate resilience are also factored in, and the project reaches implementation stage only after the green signal in these areas. We need both development and disaster resilience. We also need science, policy and action to be in conformity with each other, in an integrated approach with the involvement of all including policymakers, planners, the scientific fraternity and communities.
In view of these judgments of the Supreme Court and also the new fundamental right to be free from the adverse impacts of climate change, it is now a fundamental right for people in general and of IHR in particular to have a development model that is sustainable and in sync with the carrying capacity of the IHR.
Date: 25-06-24
नालंदा से सीख लेने का समयडॉ. रामानंद, ( लेखक सेंटर फार पालिसी रिसर्च एंड गवर्नेंस से संबद्ध हैं )
पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नालंदा विश्वविद्यालय के नए परिसर का उद्घाटन किया। इस अवसर पर उन्होंने विश्वविद्यालय के गौरवशाली इतिहास को याद करते हुए कहा कि नालंदा केवल एक नाम नहीं, बल्कि भारत की पहचान और सम्मान का प्रतीक है। नालंदा की छवि एक ज्ञान केंद्र के रूप में भारत की पहचान को दर्शाती है, जिसकी चर्चा प्राचीन काल से होती आई है और आज भी जारी है। नालंदा विश्वविद्यालय का जीर्णोद्धार इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यह वही विश्वविद्यालय है, जिसने भारत को ज्ञान के केंद्र के रूप में स्थापित किया था।
यह नालंदा विश्वविद्यालय का ही प्रभाव था जिसने ‘विश्वगुरु’ जैसी उपाधि को जन्म दिया, जिसे प्राप्त करने के लिए भारत आज भी लालायित है। आज जब भारत सरकार राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 आदि प्रयासों से देश की छवि को ज्ञान-विज्ञान और शोध के रूप में पुनः स्थापित करने का प्रयास कर रही है, ऐसे समय में नालंदा विश्वविद्यालय के खोए गौरव की वापसी का प्रयास एक ऐतिहासिक क्षण बन जाता है।
यह भारत के उस सांस्कृतिक जागरण की याद दिलाता है, जिसकी चर्चा विश्लेषक लंबे समय से कर रहे हैं। इसका जलना केवल एक विश्वविद्यालय का जलना नहीं था, बल्कि भारत को जोड़ने वाली और भारत के ज्ञान को स्थापित करने वाली डोर का बिखर जाना था। यह विश्वविद्यालय हमें यह भी सिखाता है कि पुस्तकों को जलाकर ज्ञान को नष्ट नहीं किया जा सकता, बल्कि ज्ञान लोगों की स्मृतियों में रहता है और किसी न किसी मोड़ पर उसका पुनरुत्थान संभव है। शर्त केवल इतनी है कि उस समाज के लोगों की जिजीविषा सशक्त होनी चाहिए, जो लगातार संघर्ष करते हुए स्मृतियों को सहेज सकें।
नालंदा विश्वविद्यालय 427 ईसा पूर्व में प्रारंभ हुआ था। यह उस समय विश्व का सबसे बड़ा शिक्षा केंद्र था। इसमें 10,000 से अधिक विद्यार्थी पढ़ते थे। आज जब इसकी पुनर्स्थापना हो रही है तो हमें यह भी स्मरण रखना चाहिए कि नालंदा विश्वविद्यालय को उसके चरम पर उसके भवन और उसके संसाधनों ने नहीं, अपितु उसके शिक्षकों और विद्यार्थियों ने पहुंचाया था। तब राज्य का हस्तक्षेप इसके प्रशासन में न के बराबर था।
यह विडंबना ही कही जाएगी कि नालंदा जैसे विश्वविद्यालय वाले देश के विद्यार्थी आज शिक्षा के लिए अन्य देशों में जाने को मजबूर हैं। वह समाज जो एक समय ज्ञान आधारित कहलाता था, आज उसी देश के लोग सबसे अधिक संख्या में विश्व के अन्य देशों में पढ़ रहे हैं, बल्कि यह संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। इसका एक प्रमुख कारण भारत में गुणवत्ता वाले उच्च शिक्षण संस्थानों की पर्याप्त संख्या का अभाव है।
इसके कारण न केवल भारत की अमूल्य मानव संपदा का दोहन हो रहा है, बल्कि कुछ आंकड़ों के अनुसार वर्तमान में लगभग 50 अरब डालर दूसरे देशों में जा रहे हैं। इसलिए यह आवश्यक है कि हम केवल भवनों की पुनर्स्थापना पर ही ध्यान न दें, बल्कि ज्ञान और शैक्षणिक परिवेश को भी फिर से स्थापित करें, ताकि हमारे विद्यार्थी भारतीय शिक्षण संस्थानों में पढ़ने के लिए प्रेरित हो सकें।
इस समय भारतीय शिक्षा परिदृश्य में चर्चा का प्रमुख विषय परीक्षाओं में होने वाली नकल और परीक्षाओं के परिणाम को प्रभावित करने वाले अन्य उपाय हैं। इसे रोकने के लिए भारत सरकार ने हाल ही में एक कानून भी पारित किया है, जिसका उद्देश्य परीक्षा के दौरान होने वाली गड़बड़ियों को रोकना है। पिछले कुछ दिनों से पेपर लीक होना और परीक्षा के दौरान नकल होना जैसी खबरें आम हो गई हैं, जिसके कुछ कारणों में से आनलाइन परीक्षा पर अत्यधिक निर्भरता और शैक्षणिक मानकों में गिरावट है।
ऑनलाइन परीक्षा ने जहां परीक्षा प्रक्रिया को आसान बनाया, वहीं नियामक संस्थानों की जिम्मेदारियों को कम कर दिया है। इसके कारण बिना यह समझे इस पर लगातार जोर दिया जाता रहा कि जमीन पर इसके प्रयोग को कैसे लिया जा रहा है। भारतीय समाज में शिक्षा को लेकर उत्साह तो है, लेकिन समाज शिक्षा की प्रक्रिया में ईमानदारी से भाग लेने के प्रति उतना उत्साही नहीं है जितनी उत्सुकता उसकी डिग्री और सर्टिफिकेट लेने में है।
इस रवैये के पीछे का एक प्रमुख कारण स्वयं शिक्षक हैं, जिन्होंने शिक्षा की पूरी प्रक्रिया को परीक्षा केंद्रित बना दिया है जबकि यह पाठ्यक्रम केंद्रित होनी चाहिए थी। देखा जाए तो आज हमारे शिक्षण संस्थानों का पूरा जोर परीक्षा लेने और सर्टिफिकेट देने पर हो गया है, जबकि अगर संस्थान पाठ्यक्रम निर्माण और उसके पालन पर ज्यादा ध्यान दें तो परीक्षा पर उनको बहुत अधिक कार्य नहीं करना होगा।
हालांकि हमारे संस्थान पिछले कुछ समय से ऐसा करने में लगातार असफल रहे हैं, जिसके कारण समाज में एक ऐसा वर्ग तैयार हो गया है, जिसका एकमात्र उद्देश्य किसी भी कीमत पर परीक्षा उत्तीर्ण करना रह गया है। इसके लिए उसे चाहे अपराध ही क्यों न करना पड़े। आज जब देश में पेपर लीक की घटनाएं और परीक्षा को प्रभावित करने वाले कुत्सित प्रयासों की शिकायतें लगातार आ रही हैं, तब हमें एक समाज के रूप में अपनी जिम्मेदारियों को याद करना चाहिए।
चाहे वह नालंदा हो या आक्सफोर्ड विश्वविद्यालय, इनके निर्माण और स्थापना में वहां के समाजों का भी प्रमुख योगदान रहा है। उन्होंने नैतिक मानकों का पालन किया और यह सुनिश्चित किया कि वहां के छात्र और अध्यापक भी उनका सही तरीके से पालन करें। कुल मिलाकर नालंदा विश्वविद्यालय का पुनरुत्थान भारतीय संस्कृति और शिक्षा क्षेत्र के लिए एक ऐतिहासिक घटना है, लेकिन यह तभी सफल माना जाएगा, जब नालंदा और अन्य विश्वविद्यालय ज्ञान के केंद्र के रूप में स्थापित होकर समाज को भी एक दिशा दे सकें।
Date: 25-06-24
आर्थिक नफा-नुकसान न हो लोक नीतियों का आधारअरुण मायरा, ( लेखक हेल्पएज इंटरनैशनल के चेयरमैन हैं )
आधुनिक अर्थशास्त्र मानव मूल्यों और आर्थिक मूल्यांकन के बीच प्रतिस्पर्द्धा बनकर रह गया है। यह स्थिति दो वैचारिक समस्याओं के कारण उत्पन्न हुई है। इनमें एक है उपयोगितावादी सिद्धांत और दूसरा है मानव जीवन का आकलन करने वाली असंभवता। आर्थिक लागत-लाभ मूल्यांकन ने मानव मूल्यों को दूषित कर दिया है और यह लोक नीतियों एवं कानूनी प्रक्रियाओं में गुणात्मक गिरावट का कारण रहा है।
उपयोगितावादी सिद्धांत के अनुसार एक अच्छी नीति अधिकतम लोगों के लिए लाभकारी होती है, मगर कुछ लोगों के लिए यह नुकसान का कारण भी बनती है। उपयोगितावादी नीतियां राजनीतिक रूप से लोकप्रिय होती हैं क्योंकि अधिकांश लोग इन्हें पसंद करते हैं।
उपयोगितावादी सिद्धांत वंचित लोगों के अधिकारों की रक्षा नहीं करती हैं और ऐसे लोगों की आवश्यकताएं आर्थिक वृद्धि के नाम पर कुचल दी जाती हैं। राजनीतिक एवं आर्थिक बहुसंख्यवाद स्वाभाविक साझेदार होते हैं। ज्यादातर लोग इस बात पर राजी हो गए कि जो लोग आर्थिक विकास की प्रक्रिया में पीछे छूट गए हैं उनकी आवश्यकताओं पर बहुत अधिक ध्यान नहीं दिया जाए तो कोई हर्ज नहीं।
बहुसंख्यकवाद सिद्धांत चुनावी राजनीति के लिए अच्छा हो सकता है परंतु, यह लोकतंत्र का दायरा सीमित कर देता है। बहुसंख्य लोकतंत्र में न केवल बहुसंख्यक संपन्न रहते हैं बल्कि उन्हें यह भी समझा दिया जाता है कि वे स्वाभाविक रूप से भी बेहतर व्यक्ति होते हैं।
समाज में विभिन्न समुदायों को हुए कुल लाभ की गणना और नुकसान की थाह लेने के लिए नफा एवं नुकसान का सही आंकड़ा अनिवार्य रूप से होना चाहिए। बिन्यामिन एपेलबाम ने ‘द इकनॉमिस्ट्स आवरः हाऊ द फॉल्स प्रोफेट्स ऑफ फ्री मार्केट्स फ्रैक्चर्ड आवर’ सोसाइटी में लिखा है कि लागत-लाभ विश्लेषण के इस्तेमाल ने पिछली शताब्दी में अर्थशास्त्रियों को नीति निर्धारण की जगह पर विराजमान कर दिया।
अर्थशास्त्री राजनीतिक नेताओं को नियमन के प्रभाव का मूल्यांकन करने और तार्किक निर्णय लेने में लागत-लाभ का विश्लेषण करने के लिए तैयार करने में सफल रहे। 1960 के दशक में अमेरिकी सरकार ने वियतनाम युद्ध में बरबाद हुए जीवन के मूल्यों के आगे अपनी शस्त्र प्रणाली की लागत का आकलन किया। वर्ष 1971 में अमेरिकी राष्ट्रपति ने सरकार को पर्यावरण सुरक्षा से संबंधित आर्थिक लागत एवं लाभों का जायजा लेने के लिए कहा।
अर्थशास्त्र में सभी मात्राओं को अनिवार्य रूप से मौद्रिक मूल्य में परिवर्तित किया जाना चाहिए ताकि वे एक ही समीकरण में फिट बैठ जाएं। अर्थशास्त्र में सभी मानव समान महत्त्व के नहीं होते हैं। जो लोग अधिक आय अर्जित करते हैं और अधिक उपभोग करते हैं और अंततः आर्थिक वृद्धि में अधिक योगदान देते हैं वे अधिक मूल्यवान माने जाते हैं।
जब अमेरिका में एक न्यायालय ने वर्ष 1984 में भोपाल गैस त्रासदी में जान गंवाने वाले 15,000 लोगों के लिए मुआवजा राशि तय की तो उसने कहा कि भारतीय लोगों के जीवन का महत्त्व अमेरिकी लोगों के जीवन के महत्त्व का महज एक हिस्सा है क्योंकि वहां लोग बहुत कम कमाते हैं।
बुजुर्ग लोग युवाओं की तुलना में आर्थिक रूप से कम उत्पादक माने जाते हैं क्योंकि उनके जीवनकाल की बची शेष अवधि कम होती है। ऐसे लोगों का महत्त्व युवा लोगों की तुलना में कम होता है क्योंकि युवा अधिक लंबे समय तक अर्थव्यवस्था में योगदान दे पाते हैं। आर्थिक हालात में सुधार और चिकित्सा विज्ञान में प्रगति और जन्म दर में गिरावट से पूरी दुनिया में जीवन प्रत्याशा बढ़ गई है।
कुछ युवा लोगों को अधिक बुजुर्ग लोगों का ख्याल रखना चाहिए। बुजुर्ग लोगों की उम्र बढ़ने के साथ ही उनके अधिक देखभाल की जरूरत पड़ती है और इसके लिए जरूरी आर्थिक संसाधनों का इंतजाम युवा करते हैं।
बुजुर्ग लोगों को दीर्घ अवधि तक पेंशन देने के लिए सरकार को युवा लोगों पर अधिक कर लगाना पड़ता है। आर्थिक संदर्भ में बुजुर्ग लोग समाज पर बोझ समझे जाते हैं मगर इस पर विचार नहीं किया जाता कि ऐसे लोग समाज में कई ऐसे योगदान देते हैं जिन्हें रुपये-पैसे में नहीं तौला जा सकता।
भारत के उच्चतम न्यायालय ने हाल में घोषणा की थी कि मानव समाज को जलवायु परिवर्तन के खिलाफ सुरक्षा पाने का अधिकार है। न्यायालय ने विलुप्तप्राय प्रजाति के पक्षियों के अधिकारों से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान यह कहा था। यह मामला पर्यावरणविदों ने जलवायु परिवर्तन से बचाव के लिए अक्षय ऊर्जा ढांचा लगाने वाली कंपनियों के खिलाफ उठाया था।
पर्यावरण अपरदन एवं जलवायु परिवर्तन कई रूपों (वायु प्रदूषण, चरम तापमान, सूखा, बाढ़ आदि) में मनुष्य के जीवन को प्रभावित करते हैं। इसके कई कारण भी हैं। इनमें प्रमुख है आर्थिक विकास के लिए मानव द्वारा द्वारा प्रकृति का दोहन। उदाहरण के लिए खनन, औद्योगिक कृषि, और बड़े संयंत्र की स्थापना के क्रम में प्रकृति के साथ खिलवाड़ किया जाता है।
जब कारण एवं प्रभाव दोनों ही अनगिनत हैं तो जिम्मेदारी तय करना संभव नहीं हो पाता है। न ही लागत-लाभ की गणितीय रूप से गणना हो सकती है। उदाहरण के लिए पापुआ न्यू गिनी में किसी बुजुर्ग महिला के जीवन का मूल्य अमेरिका के कोलोराडो में एक धनी परिवार में पैदा हुए शिशु की तुलना में कितना महत्त्वपूर्ण है?
सरकारी कामकाज प्रणाली में शक्ति
कानून समानता की गारंटी नहीं दे सकता है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 1948 में मानवाधिकारों की सार्वभौम घोषणा को आत्मसात किया था। संयुक्त राष्ट्र ने अंतरराष्ट्रीय न्यायालय की स्थापना की ताकि दुनिया के सभी देशों के लोगों को समान दर्जा मिल सके। इसके अलावा संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव लागू कराने के लिए शक्तिशाली देशों की भागीदारी से सुरक्षा परिषद का भी गठन किया गया।
मगर संयुक्त राष्ट्र की स्थापना के 75 वर्ष बाद भी गाजा में निर्दोष बच्चे उन देशों के हथियारों से मारे जा रहे हैं जो दूसरे देशों की तुलना में स्वयं को अधिक संभ्रांत समझते हैं। संभवतः उन्होंने अपने उच्च तकनीक वाले लक्ष्य वेधन में ‘अचूक’ बमों के साथ आम लोगों की परिणामिक मौत का आर्थिक लागत-लाभ विश्लेषण किया है।
बाजार की मांग-आपूर्ति पर आधारित आर्थिक प्रणाली में विश्वास करने वाला कोई व्यक्ति की नजर में इन पेचीदा समस्याओं का समाधान यह है कि भविष्य को बाजार के हवाले कर दिया जाए।
उनका कहना है कि सरकार एवं नियमन बाजार की सुंदरता एवं स्वतंत्रता की राह में आड़े आते हैं। मगर इस सुंदरता के पीछे शक्ति का कुरूप चेहरा नजर आता है। सरकारी तंत्र में बैठे शक्तिशाली संस्थाओं से शक्ति अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और देश के भीतर शक्तिहीन लोगों तक पहुंचनी चाहिए। यह मानव की टिकाऊ प्रगति और दुनिया को अधिक उचित स्थान बनाने के लिए बेहद जरूरी है।
यह विचारधारा लोकतांत्रिक समाज के कामकाज पर हावी हो रही है कि लोगों द्वारा समाज का संचालन आर्थिक रूप से लाभकारी नहीं है। इस विचारधारा के अनुसार विशेषज्ञों द्वारा तैयार नीतियों के साथ बाजार की अधिकतम और सरकार की न्यूनतम भागीदारी होनी चाहिए।
जिनके पास शक्ति है वे ऐसा कानून बनाते हैं जो उनकी शक्ति बढ़ा देती है। वे ऐसे संस्थानों पर नियंत्रण रखते हैं जो कानून लागू करते हैं, यहां तक कि उनकी विचारधारा से सहमति रखने वाले न्यायालयों पर भी उनका नियंत्रण हो जाता है।
लोक नीतियों का आधार मानव मूल्य होना चाहिए, न कि आर्थिक नफा-नुकसान। सभी के लिए समानता (गोरा-काला, अमीर-गरीब, युवा-बुजुर्ग) की शर्त यह है कि प्रत्येक जीवन को समान महत्त्व और उचित समान दिया जाए। बुजुर्ग और गरीब लोगों की महत्ता अर्थशास्त्रियों के समीकरणों में केवल संख्या तक सिमट कर नहीं रह जानी चाहिए।
गरीब केवल एक बड़ी अर्थव्यवस्था नहीं चाहते हैं बल्कि एक उचित एवं पारदर्शी अर्थव्यवस्था भी चाहते हैं। वे समान अवसर चाहते हैं। उनकी आवाज अनिवार्य रूप से सुनी जानी चाहिए और उसे अर्थव्यवस्था एवं समाज के संचालन में समान आदर मिलना चाहिए।
Date: 25-06-24
देश में गठबंधन धर्म की वापसीमिहिर एस शर्मा
पिछले कुछ दिनों में जो कुछ हुआ उसका सबसे बड़ा हासिल यह है कि भारत में नीति निर्माण की प्रक्रिया दोबारा गठबंधन के दौर में वापसी कर चुकी है। अब तक राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) के अहम साझेदार मसलन एन चंद्रबाबू नायडू की तेलुगू देशम पार्टी (TDP), नीतीश कुमार की जनता दल यूनाइटेड यानी जदयू ने मोटे तौर पर कोई खास मांग सामने नहीं रखी है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (PM Modi) ने भी अहम कैबिनेट मंत्रियों को दोबारा उन्हीं पदों पर नियुक्त कर संकेत दिया है कि वह पहले की तरह ही सरकार चलाएंगे। परंतु यह तय नहीं है कि यह दोस्ताना रिश्ता कितने दिन चलेगा?
गठबंधन साझेदारों को दिए गए मंत्रालयों पर नजर डालना दिलचस्प हो सकता है। तेदेपा को नागर विमानन मंत्रालय दिया गया है जो पहले भी गठबंधन साझेदारों को दिया जाता रहा है।
दिलचस्प है कि रेल मंत्रालय जिसकी अक्सर मांग रहती है वह पुराने अफसरशाह और पिछले रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव के पास ही है। साझेदार दलों को दिए गए अन्य मंत्रालय हैं- पंचायती राज मंत्रालय, मत्स्य और पशुपालन मंत्रालय, इस्पात और भारी उद्योग मंत्रालय, खाद्य प्रसंस्करण, सूक्ष्म और मझोले उपक्रम, कौशल विकास और पारंपरिक स्वास्थ्य सेवा आदि।
दूसरी ओर इनमें से शायद ही कोई तत्काल नीति निर्माण से जुड़े मंत्रालयों में से कोई पाए। उन मंत्रालयों को भारतीय जनता पार्टी (BJP) के नेताओं के पास ही रहने दिया गया है। इनमें से कुछ ग्रामीण और ग्राम-शहर पर ध्यान देने वाली हैं।
उदाहरण के लिए खाद्य प्रसंस्करण का नाम लिया जा सकता है। अन्य मंत्रालयों का बड़े कारोबारों के साथ करीबी रिश्ता है, मिसाल के तौर पर नागर विमानन और इस्पात। इनमें से कम से कम एक यानी कौशल विकास और उद्यमिता आने वाले समय में नीति निर्माण का एक बड़ा केंद्र होगी। यह मंत्रालय राष्ट्रीय लोक दल के मुखिया और जाट नेता जयंत चौधरी को दिया गया है।
चौधरी की पार्टी के पास महज ढाई साल पहले तक केंद्र या राज्य के स्तर पर कोई निर्वाचित प्रतिनिधि तक नहीं था। यह एक तरह से धन्यवाद ज्ञापन है क्योंकि वह राष्ट्रीय राजधानी के आसपास के इलाकों में युवाओं में असंतोष को कम करने की क्षमता रखते हैं। अब उन्हें अहम जिम्मेदारी दी गई है।
यह निश्चित नहीं है कि उन्हें यह मंत्रालय अन्य साझेदारों की तुलना में अधिक विश्वसनीय मानकर दिया गया है या फिर कौशल विकास इस सरकार की प्राथमिकता में नीचे है। परंतु यह यह भय तो बना ही रहेगा कि गठबंधन के साझेदार अपनी जमीन बचाते हुए व्यापक सरकारी नीतियों को बाधित भी करेंगे।
उदाहरण के लिए वित्त मंत्रालय और पर्यावरण मंत्रालय दोनों घरेलू कार्बन कीमतों को लेकर किसी समझौते पर पहुंच सकते हैं। क्या जनता दल सेक्युलर नेता तथा इस्पात और भारी उद्योग मंत्री एचडी कुमारस्वामी इसमें साथ देंगे? या फिर वह ऐसे किसी भी बदलाव को रोक देंगे जिसके बारे में उनके अफसरशाह उन्हें बताएं कि इससे निजी और सरकारी क्षेत्र की बड़ी इस्पात कंपनियों के मुनाफे और राजस्व में कमी आएगी।
कुमारस्वामी पहले ही सेमीकंडक्टर फैब्रिकेशन के लिए सरकार द्वारा तय की गई सब्सिडी के आकार पर सवाल उठाकर सुर्खियां बटोर चुके हैं। उन्होंने इसकी आलोचना करते हुए कहा कि गुजरात में सेमीकंडक्टर योजना की बदौलत आने वाले हर रोजगार की लागत करीब 3.2 करोड़ रुपये होगी।
उत्पादन संबद्ध प्रोत्साहन योजनाओं में से भी कई अपेक्षित रोजगार नहीं तैयार कर सकीं। इसके बावजूद जैसा कि कुमारस्वामी ने भी बाद में माना योजना का उद्देश्य रोजगार तैयार करना नहीं बल्कि आपूर्ति श्रृंखला के कुछ महत्त्वपूर्ण घटकों का उत्पादन देश में करने की एक महंगी कोशिश है।
बहरहाल उनकी आलोचना इस बात का प्रमाण है कि गठबंधन सरकार कैसे काम कर सकती हैं या उन्हें कैसे काम करना चाहिए। हमें यह सुने कितने वर्ष हो चुके जब सरकार के किसी मंत्री ने ठोस वजहों से सरकारी नीतियों की आलोचना की हो?
सरकार की पहलों पर खुले में होने वाली और बहसें भी बुरी नहीं होंगी। अगर आप पलटकर 2014 के बारे में सोचें तो इस बात को लेकर संतोष का भाव था कि करीब चौथाई सदी के बाद देश को पूर्ण बहुमत वाली सरकार मिली थी। ऐसा माना जाता था कि गठबंधन धर्म के कारण बहुत सारे सुधारों की राह रुक जाती थी।
हर मंत्रालय में गतिरोध की स्थिति बनी हुई थी और प्रधानमंत्री कार्यालय भी इतना मजबूत नहीं होता था कि चीजों को अंजाम दे सके। निश्चित रूप से इन प्रक्रियाओं में बदलाव आया। प्रधानमंत्री कार्यालय भी मोदी के अधीन अधिक ताकतवर हुआ और मंत्रालयों के सचिव इतने अधिक सशक्त हुए कि वे सत्ता के केंद्र से सीधे बातचीत कर सके।
परंतु वास्तव में विधानों की गुणवत्ता में न तो सुधार हुआ और न ही उनकी गति में तेजी आई। उदाहरण के लिए श्रम कानूनों को नए सिरे से तैयार करने में भी बहुत वक्त लगा लेकिन उनमें बहुत कम बदलाव किए गए।
इसके बावजूद चारों नए श्रम कानूनों को अभी भी सही ढंग से पारित और क्रियान्वित होना है। भू अधिग्रहण जैसे विवादास्पद सुधारों के आसानी से पारित होने की उम्मीदें उस समय खत्म हो गईं जब प्रधानमंत्री ने स्वयं विपक्ष के दबाव में उनको वापस ले लिया।
इस बीच, प्रस्तावित विधेयकों मसलन नई आपराधिक संहिताओं की गुणवत्ता पर भी असर पड़ा क्योंकि इन पर सार्वजनिक रूप से, विभागों के बीच और कैबिनेट में भी उनकी उपयोगिता को लेकर पर्याप्त चर्चा नहीं की गई।
ऐसे में दूरदराज की एक संभावना यह है कि गठबंधन का यह नया दौर पिछले एक दशक से ज्यादा नहीं तो भी कम उत्पादक नहीं साबित होगा। राजग में भाजपा के बाद सबसे अधिक सदस्यों वाले साझेदार दल का नाम है नायडू का तेदेपा।
सुधारों और वृद्धि के मामले में उसकी छवि एक अग्रगामी सोच वाले दल की है। जदयू के नीतीश कुमार की छवि सक्षम प्रशासक की है। इन दोनों को विशिष्ट राजकोषीय रियायतें देनी पड़ सकती हैं जिससे राजकोषीय समेकन का काम मुश्किल होगा।
परंतु संभव है कि यह प्रगतिशील बदलावों की राह में रोड़ा न बने। यह भी ध्यान देने लायक है कि इस सरकार में भाजपा के आंकड़े लगभग उतने ही हैं जितने कि पीवी नरसिंह राव के नेतृत्व वाली सरकार में कांग्रेस के थे। 1991 में उसी सरकार ने सुधारों की प्रक्रिया शुरू की थी।
पहले की तरह इस बार भी प्रधानमंत्री के कदमों के लिए असली चुनौती बाहरी नहीं आंतरिक होगी। ये गतिरोध राजनीतिक असर को लेकर उनके आकलन से ही उत्पन्न होते रहे हैं।
शायद यह करीबी चुनाव नतीजा यह याद दिलाएगा कि ऐसे राजनीतिक परिणामों का हमेशा कुशलतापूर्वक प्रबंधन नहीं किया जा सकता है। अब वक्त आ गया है कि कुछ जोखिम उठाया जाए और सुधार किए जाएं। गठबंधन उनकी राह नहीं रोकेगा।
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हाल ही के चुनावों में हमने सोशल मीडिया का जबरदस्त प्रभाव देखा है। ऐसा शायद पहली बार हुआ है, जब सोशल मीडिया ने अपनी एकतरफा दक्षिणपंथी बयानबाजी से इतर भी वैकल्पिक दृष्टिकोण के लिए रास्ते बनाए हैं। इस प्रक्रिया में उसने एक प्रकार से सरकारी शिकंजे से अपने को मुक्त रखा है।
सोशल मीडिया पर अपनी बात को प्रभावशाली ढंग से फैलाने वालों को एल्गोरिदम के माध्यम से बढ़त मिलती रही। ज्ञातव्य हो कि यूट्यूब और फेसबुक पर एक ऐसा एल्गोरिदम फीचर है, जो सामग्री की लोकप्रियता के बढ़ने के साथ ही उसे उपयोगकर्ताओं तक पहुँचाने का प्रयास करता है। गत चुनावों में यही विशेषता प्रभावी साबित हुई है। इसी के चलते जनता को (खासकर युवाओं) विभिन्न राजनैतिक दृष्टिकोणों को जानने-समझने का मौका मिल सका है।
दूसरी ओर नौकरियों की कमी से निराश शिक्षित युवाओं पर सोशल मीडिया पर चल रहे विभिन्न राजनीतिक विचारों का खूब प्रभाव पड़ा है, और वे भाजपा से दूर हो गए हैं। यह परिणामों में भी स्पष्ट दिखाई दे रहा है।
बहुत बुनियादी स्तर पर यह एक सकारात्मक विकास है। लोकतंत्र में विचारों की विविधता और राजनीतिक विचारों की सक्रिय प्रतिस्पर्धा महत्वपूर्ण है। सोशल मीडिया का यह ट्रेंड भारत में उभर रहे लोकतांत्रिक पुनर्जीवन का सूचक भी कहा जा रहा है।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 16 मई, 2024
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Date: 24-06-24
Fix It, GOIThe future of India’s young depends on govt thinking creatively on reforming examsTOI Editorials
Misery piles on for our young examinees. Last Wednesday, education ministry cancelled UGC-NET exam, conducted a day earlier, fearing a paper leak. On Saturday, it postponed NEET-PG exam scheduled for the next day, over “logistical issues”. When seen together with NEET-UG controversies, the message is loud and clear: something is seriously wrong with the National Testing Agency’s (NTA) functioning. And fixing the problem poses the first big challenge for new NDA govt.
Problems evident for long | The crisis may have blown up this year, but the signs have been there for years. Exams like NEET and JEE conducted by NTA have run into controversies regularly. In NEET 2022, CBI had to step in following allegations of impersonation in the exam. In 2021, a Russian hacker even hacked into the software for that year’s JEE to help examinees cheat.
It is the reluctance of authorities to take timely action against such episodes that is responsible for the present mess. This was made clear, when despite ample evidence, the education ministry remained in denial of a paper leak in this year’s NEET, ordering a CBI inquiry only on Saturday.
Remedy has failed us | What is galling is that NTA was put in place precisely to weed out issues we are facing today. So, one of the questions that needs to be asked is whether there are in-built flaws in conducting a mammoth exam like NEET, with 2.4mn examinees taking it in 13 languages across 4,500 centres.
It is welcome that govt has set up a high-powered committee to examine NTA’s functioning and recommend ways for fair conduct of exams. It has also brought into effect the Public Examination (Prevention of Unfair Means) Act, 2024 to prevent use of unfair means in public exams.
Nothing should be off table | But the panel’s work will have to be more than a bureaucratic exercise if the system is to be rid of its flaws. We need genuine reforms that address the spectrum of concerns that experts have been raising. The use of technology that allows algorithmic question patterns is one answer to paper leaks in avast system with innumerable nodes. Conducting exams more than once a year, as is the case in US, is another option to be considered. But decentralising the exams altogether is an option govt mustn’t shy away from. The future of young Indians is at stake.
Date: 24-06-24
Mend, Don’t Throw Away the Safety NTAET Editorials
The haste to damn the National Testing Agency (NTA) and the politicisation of what isn’t the agency’s finest moments is unfortunate. GoI’s move to address the problem of leaks and irregularities by setting up a time-bound committee headed by former Isro head and chair of IIT Kanpur board of governors, K Radhakrishnan, is the right first step. A common test for all applicants is a good idea. It reduces complexity, costs and ensures level playing field for applicants. Institutions are assured of a floor of the intakes’ aptitude.
Fixing NTA will also require regaining public trust. The committee must engage with stakeholders as well as experts, who can provide guidance on creating fail safes to localise and minimise impacts should the system be breached. Options for leveraging technology to improve the process and system — drawing on successful practices of similar organisations like ETS in the US — should be on the agenda.
GoI must be transparent and inclusive in its repair job. The committee’s report and work products should be made available on relevant websites including those of NTA and education ministry. GoI’s response to the recommendations and plan of action should be available for a time-bound public consultation finalisation. A time-bound implementation with regular audits would help restore trust.
The biggest vulnerability is the demand-supply gap. Nearly 24 lakh aspirants took the 2024 undergraduate medical test, NEET, for admission to 91,000 seats. As long as the ratio of aspirants to seats remains this high, there will be consistent and innovative efforts — some legal like coaching centres, and illegal to game the system. As the committee begins its work, the ministry should start working on addressing this mismatch.
Date: 24-06-24
Limit and excessCreamy layer should be kept out, but the ceiling on quota is artificialEditorial
The Patna High Court judgment striking down enhanced reservation for various communities in employment and education marks yet another instance of the strict application of the 50% ceiling on total reservations by the judiciary. The verdict has invalidated the Nitish Kumar regime’s decision of last year to amend its quota law to raise Backward Classes (BC) reservation from 12% to 18%, that of Extremely Backward Communities (EBC) from 18% to 25%, and those of Scheduled Castes and Scheduled Tribes from 16% to 20% and 1% to 2%, respectively. This took the total reservation level to 65%. Applying judicial precedents that have now crystallised into a legal bar on reservations exceeding 50%, the court has inflicted a huge blow to the Bihar government’s plan to utilise its Caste Survey findings to expand its affirmative action programme. The government may have erred in its policy approach — armed with caste-wise population numbers — when its preamble to the amending law said it aimed to achieve “proportionate equality”. The court agreed with the petitioners challenging the increased quotas on a key point: that adequate representation does not mean ‘proportionate representation’, as clarified in the famous nine-judge verdict in Indra Sawhney (1992). If any attempt to raise the quota level earmarked for any section to be in proportion to the State’s population results in the total reservation percentage exceeding the permissible limit, it is liable to be unconstitutional.
However, it is unfortunate that the court was so zealous about the reservation ceiling, that it rejected the State’s argument on the existence of special circumstances. Indra Sawhney did allow the quota ceiling to be exceeded in “extraordinary situations”. It suggested that the population living in remote or far-flung areas may require to be treated in a different way. The court seems to have taken that geographical remoteness is the only special situation to justify an enhanced quota and denied the benefit to Bihar. It is difficult to believe that a State which is backward in most parameters of human and social development should be denied the use of its executive and legislative power to expand its social justice programme. The court surely saw merit in the argument that there was no in-depth study before enhanced reservation was implemented. This raises the question whether the survey was indeed quite exhaustive when it gave a caste-wise break-up of the population and their economic conditions. While there may be a case for pruning the BC or EBC list based on the progress made over the last few decades, it might not be just to stymie every attempt to enhance the numerical representation of historically deprived sections on the ground that it exceeds the quota ceiling.
Date: 24-06-24
देशहित में एक राष्ट्र-एक चुनावकेसी त्यागी, ( लेखक जदयू के वरिष्ठ नेता एवं पूर्व सांसद हैं )
देश में लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने के मुद्दे पर कुछ दिन पहले हुई सर्वदलीय बैठक ने इस बहस को नए सिरे से छेड़ दिया है। बैठक में इस पर विचार करने के लिए एक समिति बनाने की घोषणा जरूर हुई, लेकिन विमर्श और आम सहमति की राह बनती नहीं दिखी। इसे लेकर विपक्ष भी दोफाड़ दिखा। कांग्रेस, सपा, बसपा और डीएमके समेत 16 दलों का बैठक से दूर रहना इस मुद्दे को पूर्णतया खारिज करने जैसा है, जबकि बैठक में शामिल एनडीए के घटक दलों समेत 21 दलों का समर्थन इस विचार को तेज गति प्रदान करने की पहली सफल कोशिश है। सीपीआइ और सीपीएम ने इसके क्रियान्वयन को लेकर चिंताएं जाहिर की हैं, लेकिन वैचारिक रूप से ये एक साथ चुनाव के समर्थन में हैं। देश के किसी भी मुद्दे पर सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच बहस लोकतंत्र की खूबसूरती है, लेकिन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा इतने महत्वपूर्ण विषय पर आहूत किसी बैठक से कुछ दलों का दूरी बना लेना लोकतांत्रिक मूल्यों की अवहेलना है। ‘पंचायत से पार्लियामेंट तक’ के चुनावों को एक साथ कराए जाने के विचार को किसी पार्टी की पहल के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
देश में लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ हो सकते हैं या नहीं, यह पता लगाने के लिए भारत सरकार ने पूर्व राष्ट्रपति राम नाथ कोविन्द की अध्यक्षता में एक समिति का गठन किया था। समिति ने 18,626 पृष्ठों की रिपोर्ट में राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु को लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने का प्रस्ताव दिया है। यह रिपोर्ट इसके 100 दिनों के भीतर स्थानीय निकायों के चुनावों को भी एक साथ कराने की वकालत करती है। जदयू के राष्ट्रीय अध्यक्ष और बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने भारतीय विधि आयोग के समक्ष सरकार के इन विधायी प्रयासों का समर्थन किया था। ‘एक राष्ट्र-एक चुनाव’ अवधारणा भारत में संसदीय, राज्य और स्थानीय सहित सभी चुनावों को एक निश्चित अंतराल, आमतौर पर हर पांच साल में आयोजित करने की वकालत करती है। भारतीय राजनीति में एक साथ चुनाव कराने का यह विचार नया नहीं है। इससे पहले 1951-52, 1957, 1962 और 1967 में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ हो चुके हैं। 1968 और 1969 में कुछ विधानसभाओं के समय से पहले भंग होने की वजह से पहली बार एक साथ चुनाव होने का चक्र बाधित हुआ था। वहीं चौथी लोकसभा भी समय से पहले भंग कर दी गई थी, जिसकी वजह से 1971 में नए चुनाव हुए। एक साथ चुनाव का विचार पहली बार औपचारिक रूप से भारत निर्वाचन आयोग ने अपनी 1983 की रिपोर्ट में प्रस्तावित किया था। बाद में भारत के विधि आयोग ने भी इसका समर्थन किया।
लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने के विचार को अमल में लाना देशहित में है। हालांकि यह चुनौतीपूर्ण है, क्योंकि विपक्ष की चिंता है कि मौजूदा सरकार अपने प्रभाव और महत्वाकांक्षी कार्यक्रमों के जरिये लोकसभा और विधानसभाओं के चुनावों को प्रभावित करने में कामयाब हो सकती है। ऐसे में स्थानीय मुद्दे गौण हो सकते हैं, लेकिन यह भय व्यर्थ है। 2014 के लोकसभा चुनाव में भाजपा को प्रचंड बहुमत मिला था, लेकिन उसके तुरंत बाद कई विधानसभा चुनावों में उसे पराजय मिली। फिर 2019 के लोकसभा चुनाव में ओडिशा में भाजपा को सात सीटों पर मिली बढ़त और विधानसभा में बीजद को बहुमत मिलना भी यही जाहिर करता है। दरअसल देश और प्रदेशों के अपने-अपने मुद्दे संबंधित चुनावों को प्रभावित करते हैं। इसके अलावा इस बार के लोकसभा चुनाव में लगभग 60,000 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं। यह राशि किसी दल की नहीं, बल्कि भारत सरकार के कोष में संचित देश के करदाताओं की है। एक साथ चुनाव से रैलियों, रोड शो, लोकलुभावन व्यय समेत बूथ और अन्य प्रबंधकीय खर्चों में कई गुना कमी आएगी। इससे करदाताओं के पैसे का इस्तेमाल विकास कार्यों में हो पाएगा। बार-बार चुनाव होने से उम्मीदवारों द्वारा वहन किया गया अतिरिक्त खर्च भी देश में काले धन के प्रवाह को गति देता है। एडीआर के अनुसार राजनीतिक दलों के कुल चंदे का लगभग 70-80 प्रतिशत हिस्सा अज्ञात स्रोतों से आता है। मौजूदा चुनावी संरचना में हर साल देश का कोई न कोई राज्य चुनाव में व्यस्त रहता है। इसके चलते चुनावी आचार संहिता लागू हो जाने से सरकार और मतदाता दोनों के रोजमर्रा के कार्य प्रभावित होते हैं। इस दौरान न तो कोई नई नीतिगत घोषणा हो पाती है, न ही उसका क्रियान्वयन। मंत्रियों समेत प्रशासनिक अधिकारियों की चुनावी प्रक्रिया में व्यस्तता की वजह से विकास और जनकल्याण के कार्य ठप रहते हैं।
हालांकि तमाम अनुशंसाओं के बावजूद एक साथ चुनाव की व्यवस्था करना आसान नहीं है। इस दिशा में एक सवाल यह है कि बहुमत की सरकार यदि अल्पमत में आ जाए तो उस स्थिति में विकल्प क्या होगा? इस स्थिति में नि:संदेह पुनः चुनाव की कवायद प्रचलन में है। एक साथ चुनाव कराने के लिए भंग लोकसभा या विधानसभा को शेष अवधि तक के लिए स्थगित रखना या फिर बहुमत खो चुकी सरकार का सत्ता में बने रहना भी लोकतांत्रिक जनादेश के लिए अपमानजनक होगा। संविधान के अनुच्छेद-356 के उपयोग तथा उसके बाद की दशा भी चिंता का विषय होगी। जहां तक संविधान में बदलाव कर इस नई व्यवस्था को गति देने का विषय है तो इसमें संशोधन के लिए दो-तिहाई बहुमत की आवश्यकता होगी, जो वर्तमान परिदृश्य में चुनौतीपूर्ण है। इस क्रम में कई राज्य सरकारों की कुर्बानी पांच वर्ष के कार्यकाल से पहले देनी पड़ सकती है। इसलिए प्रस्तावित सिफारिशों के लिए आम सहमति अनिवार्य है। यह पहल ऐतिहासिक है। इसलिए इसकी दूरगामी चुनौतियों को भी ध्यान में रखना जरूरी होगा।
Date: 24-06-24
अब कसेगी नकेलसंपादकीय
सरकार ने पब्लिक एग्जामिनेशन (प्रिवेंशन ऑफ अनफेयर मीन्स) एक्ट, 2024 लागू कर दिया है। इस एंटी-पेपर लीक कानून के तहत पेपर लीक या उत्तर-पुस्तिका से छेड़छाड़ करने पर कम से कम तीन साल की सजा होगी जिसे दस लाख तक के जुर्माने के साथ बढ़ा कर पांच साल तक भी किया जा सकता है। राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू चार महीने पहले ही लोक परीक्षा (अनुचित साधनों का निवारण) विधेयक, 2024 को मंजूरी दे चुकी थीं। इस कानून का उद्देश्य यूपीएससी, एसएससी, रेलवे, बैंकिग भर्ती परीक्षाओं और एनटीए द्वारा आयोजित अन्य तमाम परीक्षाओं में अनुचित साधनों के प्रयोग को रोकना है। इस तरह के संगठित अपराध में शामिल लोगों पर अब न्यूनतम एक करोड़ रुपये के जुर्माने का प्रावधान है। इस कानून से पहले राज्यों में नकल रोकने और परीक्षा में किसी भी तरह की धांधली को रोकने संबंधी कानून बनाए गए हैं। ओडिशा, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़, राजस्थान, गुजरात और उत्तराखंड में ऐसे कानून हैं। हालांकि ये उस तरह के नतीजे देने में असफल रहे हैं, जिनके बलबूते परीक्षाओं को पारदर्शी बनाया जा सके। इस नये कानून द्वारा परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था के प्रमुख और सदस्यों को लोक सेवक माना जाएगा ताकि उनके खिलाफ अपराध के साथ ही भ्रष्टाचार का मामला भी चलाया जा सके। विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं पर उठने वाली उंगलियों के कारण युवाओं का भरोसा लगातार टूट रहा है। बार-बार परीक्षा प्रणालियों पर संदेह और उनकी पारदर्शिता धूमिल पड़ने के चलते प्रतियोगियों में निराशा व्याप्त होती जा रही है। चूंकि अब यह संज्ञेय और गैर-जमानती अपराध की श्रेणी में आ गया है, इसलिए कोई भी पुलिस अधिकारी बगैर वारंट भी अपराधी को गिरफ्तार कर सकता है। भले ही यह फैसला लेने में सरकार ने काफी ढिलाई बरती है लेकिन देर आयद दुरुस्त आयद क्योंकि उच्च शिक्षा या नौकरी के लिए परीक्षार्थियों का समूचा भविष्य ही दांव पर लगा होता है। परीक्षाओं में धांधली होनहार युवाओं को नैतिक तौर पर बुरी तरह तोड़ देती है। हालांकि सख्त कानून बनाने में वक्त लगता है। विशेषज्ञों की राय और विभिन्न दृष्टिकोणों से इसे उस सख्ती से लागू किया गया ताकि भविष्य में इस तरह का कोई संकट ही न खड़ा हो सके। साथ ही, इस तरह के अपराधियों पर लगाम कसी जा सके। देखा जाना है कि कानून सख्त किए जाने के बाद पेपर लीक और परीक्षाओं में धांधलियों पर नकेल कसने में हम किसने सफल होते हैं।
Date: 24-06-24
कृत्रिम बुद्धिमत्ता के नीति और नियम जापान से सीखे भारतजसप्रीत बिंद्रा, ( तकनीक विशेषज्ञ )
साल 1991 में भारत ने अपने पूर्वी पड़ोसियों और दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों के साथ व्यापक आर्थिक और सामरिक संबंध बनाने के लिए ‘लुक ईस्ट पॉलिसी’ यानी ‘पूर्व की ओर देखो नीति’ बनाई थी, जो पश्चिम पर निर्भरता संबंधी पुरानी सोच से अलग थी। भारत कृत्रिम बुद्धिमत्ता, यानी एआई वाले इस दौर में यह विचार कर रहा है कि इस ताकतवर नई तकनीक को उसे कैसे बढ़ावा देना चाहिए और किस तरह इससे जुड़े नियम बनाने चाहिए, क्योंकि एआई हमारे उद्योग, समाज और भू-राजनीति को नया रूप दे सकती है। निस्संदेह, एआई से बड़े आर्थिक और सामाजिक लाभ मिलने की उम्मीद है, पर कॉपीराइट, मानवाधिकार हनन, निजता व निष्पक्षता से जुड़ी आशंकाएं भी कायम हैं। लिहाजा सवाल उठ रहे हैं कि एआई को नियमों के अधीन करने के लिए हमें क्या करना चाहिए?
मेरा मानना है कि भारत को पूर्व की ओर देखना चाहिए और जापान से सीखना चाहिए, जो ऐसे नियम बना रहा है, जिसमें नवाचार का माहौल बनाने के साथ-साथ सुरक्षित एआई के प्रयोग पर जोर दिया जा रहा है। उसकी नजर में एआई ऐसा प्रेरक है, जो नवाचार और तकनीकी पारिस्थितिकी तंत्र में दशकों से आए ठहराव को दूर कर सकती है। 2047 तक ‘विकसित भारत’ बनने के लिए हम भी एआई से इसी तरह मदद ले सकते हैं। दरअसल, जापान ने 2023 के जी-7 शिखर सम्मेलन का फायदा उठाया, जिसमें ‘हिरोशिमा एआई प्रोसेस’ (एआई सिस्टम बनाने के लिए अंतरराष्ट्रीय नियमन को बढ़ावा देने वाला फ्रेमवर्क) द्वारा एआई को विनियमित करने के लिए प्रावधान बनाने पर जोर दिया गया। इसमें दो दृष्टिकोण सामने आए- पहला, यूरोपीय संघ या चीन के नियमों की तरह सख्त कानून बनाया जाए, और दूसरा, पारंपरिक सिद्धातों और निगरानी को दरकिनार करके अपेक्षाकृत नरम कानून बनाना। जापान ने दूसरा नजरिया चुना।
स्टेलेनबोश यूनिवर्सिटी की इंगे ओडेन्डाल ने अपने शोध-पत्र में उसके प्रयासों के बारे में बताया है। इनमें पहला है, सरकार का सुविधा-प्रदाता के रूप में काम करना- जापान की सरकार नवाचार से जुड़े प्रयासों को अपनी मुट्ठी में कैद करने के बजाय उसके लिए सुविधा मुहैया कराने वाली संस्था बनना पसंद करती है। वह निजी क्षेत्र को अगुवा मानती है और अपने विभागों को उनकी मदद के लिए सक्रिय रहने को कहती है। हम भी ऐसा कर सकते हैं। हमारी सरकार को निजी क्षेत्र को केंद्र में रखना चाहिए और तमाम मंत्रालयों के माध्यम से सहयोगी भूमिका निभानी चाहिए। दूसरा है, वित्तपोषण और निवेश पर ध्यान- जापान ने जेनरेटिव एआई, घरेलू डाटा सेंटर और स्थानीय चिप उत्पादन के लिए एक बड़ा कोष बनाया है। इससे तकनीकी कंपनियों के साथ साझेदारी में प्रोत्साहन व सब्सिडी प्रदान की जाती है। भारत में भी इस तरह का कोष है, जो इंडिया एआई योजना के तहत बना है। मगर अंतर यह है कि इसका उपयोग प्रसंस्करण इकाइयों की खरीद पर अधिक हो रहा है, न कि जापान की तरह नवाचार पर।
तीसरा है, सरकार, अकादमिक और उद्योग में सामंजस्य- ‘एआई जापान आरऐंडडी नेटवर्क’ देश के तमाम विश्वविद्यालयों, शोध संस्थानों, निजी क्षेत्र व वैश्विक तकनीकी कंपनियों के साथ मिलकर एआई शोध और कंपनियों से जुड़ी नीतियों की सिफारिश करता है। भारत भी कुछ ऐसा ही कर रहा है। मजबूत निजी क्षेत्र के साथ-साथ वैश्विक तकनीक में हमारा खास दखल है। चौथा है, घरेलू क्षमता का निर्माण- जापान अपना लार्ज लैंग्वेज मॉडल (एलएलएम) बनाने की सोच रहा है। भारत में भी ऐसे कई मॉडल बन रहे हैं और उनको सरकारी मदद से लाभ होगा। आधार, यूपीआई जैसे कदमों से पता चलता है कि आम लोगों को केंद्र में रखकर हम तकनीक विकसित कर सकते हैं। इसी तरह जेनरेटिव एआई को आम जनजीवन में उतारा जा सकता है। और पांचवां है, दार्शनिक नजरिया- निजता और डाटा उपयोग जैसे बुनियादी मसलों पर पूरब और पश्चिम की सोच अलग है। पश्चिमी देशों के लिए जहां निजता का अर्थ है, अकेले रहने का अधिकार, वहीं पूरब में इसका मतलब है, सामूहिक व सामाजिक निजता। ऐसे में, हमें एआई नियमन को लेकर उचित ही जापान की ओर देखना चाहिए, जिससे हमारी संस्कृति मिलती है और जो नवाचार व नियमन को लेकर संतुलित नजरिया भी रखता है।
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– हाल ही में सियोल (द.कोरिया) में एआई विनियमन पर दूसरा वैश्विक शिखर सम्मेलन संपन्न हुआ है।
– इस सम्मेलन में तकनीकी कंपनियों ने एआई के विकास के साथ ही बुनियादी सुरक्षा उपायों को लागू करने के अपने इरादे की पुष्टि की है। सरकारों के पास ऐसे निरीक्षण संस्थान हैं, जो एआई से उत्पन्न खतरों का निरीक्षण कर सकें। वे एआई के लिए निषिद्ध क्षेत्रों का सीमांकन करने में भी सक्षम हैं।
– इससे आगे विभिन्न देशों की सरकारों के बीच विनियमन को सुसंगत बनाना है। यह दूरदृष्टि इसलिए, क्योंकि फिलहाल एआई पर बनाए गए विनियमन में दम नहीं है।
– एआई विनियमन के दृष्टिकोण के दो तरीके हैं। पहला, उपयोग के मामलों में नियम लागू करना होगा। उदाहरण के लिए चिकित्सा में एआई के विकास को स्वास्थ्य उद्योग के लिए मौजूदा और कुछ नई नियामक स्थितियों के अनुरूप बनाना होगा। इस मॉडल का उपयोग अन्य क्षेत्रों के लिए किया जा सकता है। सरकारें, इनमें से हर एक क्षेत्र में सहयोग करके वैश्विक नियमों का एक सेट तैयार कर सकती हैं।
दूसरा, सोर्स पर ही एआई के विकास को नियंत्रित करना है। अगर ऐसा नहीं किया गया, तो एआई में सभी उपयोग के मामलों में विनियमन को मात देने की शक्ति विकसित की जा सकती है। इस पर तकनीक निर्माता और कानून निर्माता अलग-अलग दृष्टिकोण रख रहे हैं।
एआई के मामले में सरकारें पारदर्शिता और प्रशासन को साथ लेकर चल रही हैं। इन्हें कानूनी ढांचे में लाने की प्रतीक्षा है।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 30 मई, 2024
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Date: 22-06-24
India, React to Small, Modular NuclearET Editorials
Bill Gates isn’t the first name that you’d think of after watching Oppenheimer. But TerraPower, the nuclear reactor engineering company the Microsoftwala founded in 2006, began constructing a micro nuclear reactor plant, Natrium, in Wyoming this month. This marks a quiet, commercially untested class of nuclear reactors: small modular reactors (SMR). SMR projects are in development in a dozen countries. In only China and Russia are they operational. Its viability test will come around 2030, when plants, including Natrium, will likely begin production.
As energy demands grow, nuclear power will be a necessary option. SMR is one. It’s modular, replicable with standardised design, and can absorb existing coal plant workforce. It has its fair number of challenges: capital costs, fuel sourcing and supply chains. Natrium will cost about $4 bn, with half the amount borne by support under the US Inflation Reduction Act. But nuclear power, as an unsafe bogeytech, should go through an image makeover in the public eye. There are at least six tech options at present. This has limitations on cost rationalisation and developing a regulatory regime. Besides, there are considerations of safety, use of spent fuel and disposal of waste. Building on its domestic nuclear programme, India should invest in SMR R&D, especially suited for local designs and needs.
India’s growing demands in a climate-constrained world compel it to explore all options for clean, reliable, affordable, safe and sustainable energy. It must take an informed decision to make budgetary allocations, investment plans and building infrastructure for this. SMR is one option that deserves a serious dekho.
Date: 22-06-24
New Cold WarRussia’s pact with North Korea will deepen U.S. ties in East AsiaEditorial
The security pact reached between Russian President Vladimir Putin and North Korean leader Kim Jong-un in Pyongyang, in which both countries promised mutual assistance “in the event of aggression”, has echoes from the Cold War era. Russia and North Korea, erstwhile allies, are facing biting sanctions, but for different reasons. And, both are at odds with the West. Now, they seem determined to revive the alliance so that they can stand up to the western-led global order together. Mr. Putin’s visit to Pyongyang, his first in 24 years, itself marked a new beginning. The Russian leader has supported multilateral efforts to curb the North’s nuclear programme in the past. Moscow has also voted for sanctions at the UN Security Council against Pyongyang over its nuclear arsenals. But the Ukraine war appears to have altered Kremlin’s geopolitical arithmetic and provided an opportunity for Pyongyang to make itself useful as an ally. When the Ukraine war dragged on and Russia came under western sanctions, Mr. Putin turned to Mr. Kim for ammunition and ballistic missiles. After Mr. Kim’s visit to Russia in September 2023, North Korea reportedly supplied ammunition to Russia. Moscow stepped up supplies of food and fuel, and there was speculation that it could help the North’s defence sector with critical technologies. While both have rejected reports of weapons trade, the security pact clearly elevates ties to the level of a de facto alliance.
Ever since the Ukraine war, Mr. Putin has steadily expanded Russia’s cooperation with countries that are at odds with the U.S. He reportedly bought kamikaze drones from Iran. China has also emerged as a key economic, technological and energy partner. And, by promising to help North Korea, an isolated, one-family-ruled totalitarian state that is still technically at war with South Korea, in the event of an attack, Russia has signalled its readiness to play a larger role in northeast Asia. Mr. Putin, essentially a cold warrior, wants to build an axis of the ‘others’ opposed by the West to expedite the churn in the global order. China remains cautious but seems fine with the idea of its closest partners challenging the western order. This will have far-reaching geopolitical consequences. North Korea will now have little incentive to discuss denuclearisation. Russia, which already has testy ties with Japan, could see its relationship with South Korea deteriorating. The agreement is also likely to strengthen the emerging tripartite partnership in East Asia among Japan, South Korea and the U.S., further solidifying the new cold war between great powers, which is still in its early stages.
Date: 22-06-24
मापदंड बदलने से सत्य नहीं बदल जातासंपादकीय
ऐसा कैसे संभव है कि जब सब्जी, दूध, दाल, अनाज, तेल और रोजमर्रा की चीजों के दाम आसमान पर हों और लगातार बढ़ रहे हों, तब खुदरा महंगाई पिछले साल भर के मुकाबले सबसे कम हो। पता चला कि सरकार ने पैमाना ही बदल डाला। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में खुदरा खर्च के सामान की सूची में खाद्यान्न के अलावा रिहाइश, परिधान, ट्रांसपोर्ट, चिकित्सा व मनोरंजन, शिक्षा और तमाम तरह की सेवाएं हैं। इनमें खाद्यान भार, जो पहले 46% था, घटा कर 39% कर दिया । खाद्यान्न की महंगाई अपने शबाब पर (17%) है, इसमें भी रोजाना के खाने-पीने वाले चीजें जैसे प्याज, आलू और दाल के दाम क्रमशः 55, 44 और 27% बढ़े हैं। गरीब या निम्न मध्यम वर्ग (जो 70% से ज्यादा है) का व्यक्ति न तो मनोरंजन करता है ना ही पेट्रोल खरीदता है। उसकी आय का 70 फीसदी खर्च खाने पर होता है। लिहाजा पेट्रोल या ट्रांसपोर्ट या फीस में वृद्धि उसे उतना नहीं सताती, जितना सब्जियों या तेल का महंगा होना । जनमत से बनी सरकार के लिए ऐसी महंगाई जनाक्रोश पैदा करती है लिहाजा वह निर्यात रोक पर अंकुश लगाती है, लेकिन इससे किसान की आय घटती है। सरकार को बेहतर पैदावार के लिए किसानों को वैज्ञानिक खेती की ओर ले जाना होगा और सिंचाई के भी नए तरीके अपनाने के लिए तत्पर करना होगा।
Date: 22-06-24
घातक सिद्ध होता प्रकृति से छेड़छाड़अनिल जोशी, ( लेखक पर्यावरणविद् हैं )
मानसून के आगमन के बीच हम सब इसकी अनदेखी नहीं कर सकते कि इस बार कितनी अधिक गर्मी पड़ रही है और लू का कहर किस तरह जानलेवा सिद्ध हुआ। गर्मी और लू के प्रकोप का सामना दुनिया के अन्य देशों को भी करना पड़ रहा है। निःसंदेह मानसून राहत देगा, लेकिन हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि मौसम में अप्रत्याशित बदलाव खतरे की एक घंटी है। पर्यावरणविदों के अध्ययनों के आधार पर यह पहले ही साफ हो चुका था कि 2024 में गर्मी ज्यादा पड़ने वाली है। पर्यावरणविदों के अनुसार इस वर्ष एल नीनो का असर होगा और फिर उसके तत्काल बाद ला नीना का भी। एल नीनो गर्मी को बढ़ाएगा तो ला नीना शीतकालीन परिस्थितियों को और गंभीर कर देगा।
एक अध्ययन के अनुसार, 2023 में एल नीनो ने पिछले साल जुलाई को अत्यधिक गर्म किया। वैसे ही हालात इस साल जून के आसपास दिखे। अपने देश में देखें तो दिल्ली में तापक्रम 50 के आसपास पहुंच गया। अन्य शहरों में भी इसी के आसपास तामपान पहुंचा। पहाड़ों में भी गर्मी बढ़ी तो जैसलमेर में तापमान ने 55 का आंकड़ा छू लिया। अब यह भी स्पष्ट हो चुका है कि 2024 तापक्रम वृद्धि को लेकर अच्छा नहीं कहा जा सकेगा। 2016 से 2019 के तीन साल के लंबे दौर के बाद 2023 में ही एल नीनो दूसरी बार आया और दिसंबर 2023 में यह अपने चरम पर था। समुद्री वायुमंडल के हालात बिगड़ने के कारण अगस्त 2024 में यह और प्रभाव डालेगा। इसके तुरंत बाद ला नीना के प्रभाव की आशंका है।
इस बार जापान और मेक्सिको में बसंत से पहले ही फूल खिलने लगे थे। इसी तरह यूरोप में फरवरी-मार्च में ही हिमखंड पिघलने लगे। इसी समय अमेरिका के टेक्सास में तापक्रम 38 के पार चला गया था। भारत में भी गर्मी के जल्दी आने से वनों की आग ज्यादा घातक हो गई। जापान से मेक्सिको तक तापक्रम की वृद्धि पिछले कई महीनों से लगातार बढ़ रही है और परिस्थितिकी में कुछ बड़े मूलभूत परिवर्तन आ रहे हैं। अपने देश में जनवरी- फरवरी कुछ इस तरह से बीते, जैसे बसंत आ गया हो। बीते जाड़े में भी ठंड का अधिक प्रभाव नहीं था।
वास्तव में लगातार लंबे समय से मौसम के व्यवहार का सही अनुमान नहीं लगाया जा पा रहा है। देश में बसंत वाली गर्मी पहले ही आ गई थी और उसने वनाग्नि जैसे दावानल के लिए दरवाजे खोल दिए। यह भी संज्ञान में लेना जरुरी है कि पश्चिमी विक्षोभ, जो पहले नवंबर-दिसंबर के महीने में आता था, इस बार फरवरी के अंत या मार्च के पहले सप्ताह में ही दिखाई दे गया। यह एक बहुत बड़ा लक्षण है कि अब मौसम का समयानुसार प्रभाव नहीं रहा। मौसम के अनुकूल न होने के कारण हमारे पारिस्थितिकी तंत्र पर असर पड़ रहा है। इसके असर को खेती-बाड़ी से लेकर वनों में बढ़ती हुई आग को लेकर देखा जा सकता है। इसके साथ तूफान और बाढ़ कब आ जाए, इसकी कल्पना नहीं की जा सकेगी। मौसम विभाग अब आने वाले समय में मौसम के हालात का सटीक विश्लेषण मुश्किल से कर पाएगा।
मौसम में अप्रत्याशित बदलाव का सीधा असर पूरे आर्थिक, सामाजिक और पारिस्थितिकी तंत्र पर पढ़ना तय है। तापक्रम के बढ़ने के कारण इसका असर वन्य जीव से लेकर मनुष्यों पर दिखाई देगा। कई तरह की बीमारियां भी पनपेंगी। खास तौर से वे, जो उमस के कारण आती हैं। उमस भरी गर्मी को झेलने के लिए एसी का उपयोग वातावरण में और गर्मी तो पैदा करेगा ही, वायु प्रदूषण के हालात और भी गंभीर हो जाएंगे, जो सीधे ही पूरे पारिस्थितिकी तंत्र पर विपरीत असर डालेंगे। इसका सीधा मतलब है कि जल, जंगल, जमीन बढ़ते तापक्रम के कारण आदर्श व्यवहार नहीं कर पाएंगे।
एक लंबे समय से मौसम में अप्रत्याशित बदलाव आ रहा है, लेकिन हम चेत नहीं रहे हैं। यह कड़वा सच है कि अब हमारे पास बहुत ज्यादा समय नहीं बचा कि हम अपनी पुरानी परिस्थितियों को वापस ला पाएं। हम जहां हालात को ले जा चुके हैं, वहां से हमारी वापसी 5 से 10 प्रतिशत ही बची है। इसका कारण यह है कि हम अपने जीवन को आरामदेह बनाने में लगे हैं। आरामदायक जीवनशैली आज की आवश्यकता बन गई है, लेकिन हम यह देखने से इन्कार कर रहे हैं कि आधुनिक जीवन शैली के चलते हमने पृथ्वी के पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को अपने प्रतिकूल बना लिया है। अगर ऐसा ही चलता रहा तो फिर धरती को प्रतिकूल मौसम से बचाना मुश्किल हो जायेगा। इतना तो हमारी समझ में आना ही चाहिए कि हम पृथ्वी को उतना ही भोगें, जितना उसमें जोड़ पाएं। पिछले दो-तीन सौ वर्षों में हमने पृथ्वी से जितना कुछ लिया है, उसका पांच प्रतिशत भी उसे वापस नहीं कर पाए हैं।
हम अपने काम का तो नफा-नुकसान जांचते हैं, पर धरती के पारिस्थितिकी तंत्र के हिसाब-किताब में फेल हैं। प्रकृति के पास कई तरीके हैं कि वह हमें रास्ते पर लाए। कुछ भी अप्रत्याशित रूप में प्रकट होगा, जो हमसे कुछ न कुछ छीन लेगा। कोविड की मार तो याद होगी ही, जिसकी हमने कभी कल्पना नहीं की थी। वह प्रकृति कहर ही था, जिसने हमें बताया था कि हमें समय रहते अपनी सीमाएं तय कर लेनी चाहिए। प्रकृति हमारी मनमानी ज्यादा सहन नहीं करेगी। हम सुनार की तरह ही गए हैं, जो जीवन को चमक-दमक देखते हैं, जबकि प्रकृति लोहार की तरह है, जो तप-खप कर बनी है। यह कहावत तो हमें पता ही होगी कि सौ सुनार की और एक लोहार की। मतलब टुकड़ों- टुकड़ों में हमारी चोटों के बदले लोहार की एक ही चोट हमें नेस्तनाबूद करने के लिए काफी होगी।
Date: 22-06-24
तार्किक हो कोटासंपादकीय
पटना हाई कोर्ट ने 50 प्रतिशत से बढ़ाकर 65 प्रतिशत किए गए राज्य सरकार के आरक्षण को रद्द कर दिया है। यह मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की अगुवाई वाली बिहार सरकार को तगड़ा झटका माना जा रहा है। यह दलितों, पिछड़े वर्गों व आदिवासियों को सरकारी नौकरियों व शिक्षण संस्थानों में दिया जा रहा था। बिहार की तत्कालीन महागठबंधन सरकार द्वारा बीते साल नवम्बर जाति गणना के आधार पर इन वर्गों के लिए आरक्षण सीमा बढ़ाने का कानून बनाया गया था। अदालत ने विभिन्न याचिकाओं की सुनवाई के बाद इस बढ़ी आरक्षण सीमा को संविधान के अनुच्छेद 14, 16 व 20 का उल्लंघन बताया। जैसा कि शीर्ष अदालत पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि कोई भी राज्य सरकार 50 प्रतिशत की तय सीमा से अधिक कोटा नहीं लागू कर सकती है, जबकि बिहार में आर्थिक रूप से पिछड़ों के लिए 10 फीसद मिलाकर यह आरक्षण 75 प्रतिशत पहुंच गया था। अदालत का मानना है कि बिहार में कुल जनसंख्या के केवल 1.57 प्रतिशत लोग ही सरकारी नौकरियों में हैं। जनसंख्या के अनुपात में सरकारी नौकरियों में पिछड़े वर्ग का प्रतिनिधित्व भी पर्याप्त बताया जा रहा है। हालांकि राज्य सरकार इस आदेश के खिलाफ सबसे बड़ी अदालत का दरवाजा खटखटाने की तैयारी में है। दरअसल, जैसा नजर आता है कि आरक्षण अब राजनीतिक पार्टियों के लिए जनता को फुसलाने का साधन मात्र रह गया है। उनका ध्येय समाज में व्याप्त गैर-बराबरी को मिटाना नहीं रहा । वे मतदाताओं को बड़ी तादाद में प्रभावित करने के उद्देश्य से व्यवस्था के साथ खिलवाड़ करते नजर आते हैं। तमाम अगड़ी जातियां मानती हैं कि आरक्षण के चलते नौकरियों क लाले पड़ रहे हैं। वे स्वस्थ प्रतिस्पर्धा के प्रभावित होने का रोना भी रोती रहती हैं, परंतु यह भी गलत नहीं है कि हमारी सामाजिक व्यवस्था में विभिन्न जातियों / समुदायों को जबरदस्त अन्याय सहना पड़ा है। उनके लिए कोटा तय कर, उन्हें सामाजिक, शैक्षणिक व आर्थिक तौर पर बराबरी पर लाने के प्रयासों पर अड़चनें लाने उचित नहीं है। यूं तो अन्य राज्यों में भी सत्ताधारी दल लाभ के लोभ में कोटा बढ़ाते रहने को उतावले हो सकते हैं। इसलिए बिना देरी किए, इस पर लगाम लगाना लाजमी है। कमजोर वर्ग की सहूलियत लिए, उन्हें सहायता देने व जीवन स्तर बेहतर बनाने के अन्य तरीकों पर भी विचार किए जाने की आवश्यकता से इनकार नहीं किया जाना चाहिए।
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22 June 2024
प्रश्न – 467 – वर्ष 2024 में लोकसभा के चुनाव सात चरणों वाले 44 दिनों में संपन्न कराये गये। इस निर्णय की आलोचनात्मक समीक्षा कीजिये। (250 शब्द)
Question – 467 – In the year 2024, the Lok Sabha elections were conducted in 44 days in seven phases. Critically review this decision. (250 words)
नोट : इसका उत्तर आपको हमें नहीं भेजना है, यह आपके स्वयं के अभ्यास के लिए है।
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Date:21-06-24
The Tibet PlayIndia must prepare for a post-Dalai Lama scenario. Its policy should always aim for leverage over China.TOI Editorials
A bipartisan US delegation meeting the Dalai Lama in Dharamshala has brought back the Tibet issue to the front burner. Of course, China has objected to the visit. The delegation included former US House speaker Nancy Pelosi, who had also visited Taiwan in 2022 despite Beijing’s protests. Biden is going to soon sign the Resolve Tibet Act, which calls on Beijing to negotiate with the Dalai Lama or his representatives. This puts India, the host country of the Tibetan govt-in-exile, in a decision spot.
Question of future | Given the Dalai Lama’s advanced age, the matter of his inevitable succession assumes salience. The US delegation affirmed that Washington would not allow Beijing to interfere with Dalai Lama’s succession. Meaning, it will not accept a Beijing-appointed Dalai Lama. India, however, has remained relatively quiet on the matter. But its opinion will matter for the future of the Tibetan movement. It must start thinking now.
Moral imperative | India is expected to continue its support to the Tibetan govt-in-exile and the more than 70,000 Tibetan refugees in the country even after this Dalai Lama. Tibetan refugees also constitute one of the most successful examples of rehabilitation in modern history. At a time China has even stopped referring to Tibet by name – using the Chinese term ‘Xizang’ instead – it’s India that has emerged as the cultural home of Tibetans.
Strategic imperative | Plus, India-China relations are at a major low. China has repeatedly intruded into and occupied Indian territory. Both armies are eyeball-to-eyeball in the higher Himalayas. India has stopped referring to the ‘One China’ policy for years. And since China doesn’t see India as an equal and treats the border dispute as a convenient political tool, New Delhi should have no hesitation in backing the Tibetan cause. India needs leverage. And the Tibet issue is a big one.
Date:21-06-24
एमएसपी से क्या सच में किसानों की आय बढ़ेगी?संपादकीय
मोदी-3 कैबिनेट का पहला अहम फैसला आगामी खरीफ की 14 फसलों की एमएसपी के रूप में आया। फैसले के बाद यह बताने की होड़ लग गई कि मोदी कैसे वादा निभाते हैं, कैसे किसानों का भाग्य इस एमएसपी से बदल जाएगा। पर अति उत्साह में भाजपा भूल गई कि जिस 2013-14 के मुकाबले आज की एमएसपी की तुलना सोशल मीडिया में की जा रही है, उसमें अधिकांश मुख्य फसल जैसे धान, दलहन और तिलहन पर आज दस साल बाद भी दोगुनी से कम एमएसपी है। किसानों की आय वर्ष 2022 तक दोगुनी करने का वादा किया गया था। अगर दस साल में भी कृषि उत्पाद का एमएसपी उस मुकाम तक नहीं पहुंचा तो किसानों की असली हालत क्या होगी ? इसके अलावा सीएसीपी रिपोर्ट बताती है कि पिछले एक साल में सम्मिलित लागत मूल्य सूचकांक 6.1% बढ़ा है। अगर सरकार इस वृद्धि को भी मद्देनजर रखकर मूल्य निर्धारण करती तो औसत वृद्धि 9.15% की होनी चाहिए थी। धान की एमएसपी मात्र 5.3% बढ़ी है। केवल नाइजर सीड और रागी दो ऐसे उत्पाद हैं जिनका एमएसपी 9.15% से ऊपर है। इसमें से नाइजर सीड (तिल की एक किस्म ) भारत में बेहद कम बोई जाती है। यहां तक कि बाजरा पर सबसे कम मात्र 5% की वृद्धि की गई है। क्या ऐसी वृद्धि से किसान कृषि के प्रति उत्साहित होगा?
Date:21-06-24
यूरोप की जरूरत बना भारतशिवकांत शर्मा, ( लेखक बीबीसी हिंदी के पूर्व संपादक हैं )
कहते हैं कि एक तस्वीर हजार शब्दों के बराबर होती है। बीते दिनों इटली में आयोजित जी-7 शिखर बैठक की सामूहिक तस्वीर पर यही बात लागू होती है। भारत इस समूह का सदस्य नहीं है, फिर भी विश्व की सात बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के इस समूह की शिखर बैठकों में 2019 के बाद से भारत को हर साल आमंत्रित किया जाता है। यह वैश्विक मंच पर उसके बढ़ते कूटनीतिक एवं आर्थिक कद का प्रतीक है। जी-7 की अध्यक्ष और शिखर बैठक की मेजबान इटली की प्रधानमंत्री जार्जिया मेलोनी ने भारत के अलावा ब्राजील, सऊदी अरब, तुर्की और यूएई जैसे 11 अन्य देशों को भी बुलाया। भारत के प्रधानमंत्री मोदी को जिस तरह नेताओं की पंक्ति के एकदम बीच में जी-7 के प्रतीक चिह्न के सामने स्थान दिया गया, वह शिखर बैठक में शामिल अन्य देशों की तुलना में भारत की मजबूत आर्थिक और राजनीतिक स्थिति को भी रेखांकित करता है।
अमेरिका के अलावा जी-7 के सभी देश आर्थिक विकास की धीमी रफ्तार से जूझ रहे हैं। 2008 में आई विश्वव्यापी मंदी के समय तक अमेरिका और यूरोप की आर्थिकी लगभग बराबर थीं, मगर उसके बाद से अमेरिकी अर्थव्यवस्था यूरोप से लगभग दोगुनी हो चुकी है। भारतीय अर्थव्यवस्था तब से करीब 3.5 गुना बढ़ी है। जबकि यूरोप की अर्थव्यवस्था 30 देशों के विभिन्न कानूनों और लालफीताशाही में उलझी रही। इसके चलते यूरोप प्रति व्यक्ति आय में भी अमेरिका से 25 प्रतिशत पिछड़ गया। बुजुर्ग होती आबादी की देखभाल में बढ़ते खर्च से सरकारों के बजट बिगड़ रहे हैं। कृषि सब्सिडी, श्रम सुधार और सेवा क्षेत्र में प्रवेश जैसी शर्तों पर अड़ियल रवैये के कारण भारत जैसे तेज आर्थिक रफ्तार वाले देशों के साथ भी मुक्त व्यापार समझौते नहीं हो पा रहे। जबकि भारत ने नार्वे, स्विट्जरलैंड, आइसलैंड और लिश्टेंस्टाइन के साथ मुक्त व्यापार समझौता किया है। ये देश यूरोपीय संघ का हिस्सा नहीं हैं।
यूरोप में लोग करों के बढ़ते बोझ और महंगाई से भी परेशान हैं। शरणार्थी और अप्रवासी उनके रोष का निशाना बन रहे हैं। सीरियाई गृहयुद्ध के बाद 2015 में यूरोप को दूसरे विश्व युद्ध के बाद के सबसे गंभीर शरणार्थी संकट का सामना करना पड़ा। सीरिया, कोसोवो, अफगानिस्तान, इराक, पाकिस्तान और लीबिया जैसे देशों के 13 लाख से अधिक शरणार्थी यूरोपीय देशों की सीमाओं पर जमा हो गए। अधिकांश देशों ने उन्हें शरण देने से मना कर दिया। अंत में अधिकांश लोगों को जर्मनी ने शरण दी, जिसके फलस्वरूप उसकी मुस्लिम आबादी 46 लाख का आंकड़ा पार कर कुल जनसंख्या का लगभग छह प्रतिशत हो चुकी है। फ्रांस में भी मुस्लिम आबादी बढ़कर 10 प्रतिशत हो गई है और वह यूरोप का सबसे बड़ी मुस्लिम आबादी वाला देश बन गया है। कड़े सीमा नियंत्रण के बावजूद ब्रिटेन में मुस्लिम आबादी 6.5 प्रतिशत को पार कर गई। इसके चलते यूरोप के कई शहरों में वहां के मूल निवासी अल्पसंख्या में आ गए। इस कारण भी स्थानीय लोगों में रोष पनपने लगा। यही इन दिनों यूरोप में चल रही अप्रवास विरोधी लहर का प्रमुख कारण बना, जिसके चलते ब्रिटेन को यूरोपीय संघ की सदस्यता छोड़नी पड़ी और पिछले सप्ताह यूरोपीय संसद के चुनावों में फ्रांस और जर्मनी जैसे प्रमुख देशों में सत्ताधारी उदारवादी पार्टियों को अप्रवास विरोधी दक्षिणपंथी पार्टियों के हाथों पराजय का मुंह देखना पड़ा।
फ्रांस में राष्ट्रपति मैक्रों की रेनेसां पार्टी को यूरोपीय संसदीय चुनावों में अप्रवासन विरोधी दक्षिणपंथी नेशनल रैली पार्टी से आधे वोट भी नहीं मिले। इसलिए उन्होंने अविश्वास प्रस्तावों से बनने वाले दबाव की प्रतीक्षा न करते हुए संसद को भंग कर दिया और मध्यावधि चुनाव की घोषणा कर डाली, जो 30 जून को होगा। इस चुनाव में मैक्रों की गठबंधन सरकार की हार लगभग तय मानी जा रही है। यदि ऐसा होता है तो वह नाम मात्र के राष्ट्रपति रह जाएंगे, क्योंकि दक्षिणपंथी नेशनल रैली उनकी घरेलू एवं विदेश नीतियों का विरोध करती है। इसी तरह यूरोपीय चुनावों में जर्मनी के चांसलर ओलाफ शुल्ज के डेमोक्रेटिक गठबंधन की इतनी बुरी हार हुई कि वह तीसरे स्थान पर चला गया। शुल्ज ने संसद भंग करके चुनाव की घोषणा तो नहीं की, लेकिन उनके लिए भी शेष डेढ़ वर्ष के कार्यकाल में अपनी सरकार चला पाना कठिन लग रहा है। ब्रिटेन में चार जुलाई को होने जा रहे आम चुनाव में प्रधानमंत्री सुनक की कंजरवेटिव पार्टी की हालत इतनी पतली है कि एक सर्वेक्षण में तो उसके तीसरे स्थान पर खिसकने के आसार बताए गए हैं।
अमेरिका में अर्थव्यवस्था की स्थिति बढ़िया होने के बावजूद राष्ट्रपति बाइडन का चुनाव जीत पाना कठिन है, क्योंकि अदालतों में दोषी पाए जाने के बाद भी ट्रंप की लोकप्रियता बढ़ती जा रही है। कनाडा में प्रधानमंत्री ट्रूडो के गिरते जनसमर्थन को देखते हुए उनकी सरकार का अगले साल तक चल पाना कठिन है। यही हाल जापान में प्रधानमंत्री फुमियो किशिदा की गठबंधन सरकार का है। कुल मिलाकर जी-7 के सातों नेताओं में से केवल मेजबान इतालवी प्रधानमंत्री मेलोनी का राजनीतिक आधार ही मजबूत है, क्योंकि यूरोपीय चुनावों में उनके गठबंधन की शानदार जीत हुई है। आमंत्रित देशों में भारत के प्रधानमंत्री मोदी अपनी पार्टी का बहुमत खो देने के कारण राजनीतिक रूप से कुछ कमजोर अवश्य पड़े हैं, परंतु उनके गठबंधन के पास पर्याप्त बहुमत है और अर्थव्यवस्था की रफ्तार दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में सबसे तेज है। मेलोनी के साथ उनके संबंध भी मधुर हैं।
चीन से पिछड़कर यूरोप अब दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था रह गया है। इसलिए उसे अपनी विकास दर की रफ्तार बढ़ाने की जरूरत है। भारत को भी अपना माल बेचने के लिए यूरोप जैसे विशाल एवं विकसित बाजार की दरकार है, क्योंकि कोई देश विदेश में माल बेचकर धन कमाए बिना अपने लोगों का जीवनस्तर ऊपर नहीं उठा पाया है। इसलिए भारत को यूरोप के साथ मुक्त व्यापार समझौते की कोशिश करनी चाहिए, जिसकी यूरोप और भारत दोनों को जरूरत है। जी-7 देशों ने भारत-पश्चिम एशिया-यूरोप आर्थिक गलियारे के लिए वित्तीय संसाधन जुटाने और हिंद प्रशांत क्षेत्र की आर्थिक सुरक्षा का संकल्प दोहरा कर इस दिशा में आगे बढ़ने का संकेत दिया।
Date:21-06-24
भारत में निर्यात बढ़ाने का खाकाअजय श्रीवास्तव, ( लेखक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनीशिएटिव के संस्थापक हैं )
देश का विदेश व्यापार वर्ष 2023-24 में 1.63 लाख करोड़ डॉलर मूल्य का रहा और सकल घरेलू उत्पाद में इसका योगदान 41 फीसदी था। इससे देश की अर्थव्यवस्था और रोजगार निर्माण में इसकी अहम भूमिका जाहिर होती है। इस क्षेत्र के सामने अहम आंतरिक एवं बाह्य चुनौतियां मौजूद हैं। हम यहां नौ सुझावों की बात करेंगे जो नई सरकार के लिए व्यापार और आर्थिक वृद्धि को बढ़ावा देने में अहम साबित हो सकते हैं।
श्रम आधारित निर्यात को पुनर्जीवन
2015 की तुलना में 2023 में अधिकांश श्रम गहन क्षेत्रों में निर्यात कम हुआ। अहम उत्पाद श्रेणियों में शामिल हैं तैयार वस्त्र, कपड़ा, धागा, फाइबर, कालीन, चमड़े के उत्पाद, जूते-चप्पल, हीरे और सोने के आभूषण आदि। अन्य क्षेत्रों की तुलना में ये क्षेत्र निवेश पर अधिक रोजगार उत्पन्न करते हैं।
बांग्लादेश और वियतनाम ने वस्त्र तैयार करने के लिए आयातित कपड़े पर भरोसा किया और भारत को पीछे छोड़ दिया। इसके लिए उन्होंने बीते दो दशक में विशिष्ट उपाय अपनाए।
कपड़ा क्षेत्र के लिए उत्पादन से संबद्ध प्रोत्साहन (PLI) योजना कामयाब नहीं रही है और उसे बंद करना ही बेहतर होगा। तकनीक कोई मुद्दा नहीं है। सलाहकारों की खुशनुमा भविष्य की रिपोर्ट के बजाय इस क्षेत्र को ईमानदार आकलन की जरूरत है। अगर निर्यात में गिरावट नहीं रुकती है तो हमें इन क्षेत्रों का आयात बढ़ता हुआ नजर आएगा।
सेवा निर्यात में विविधता
देश के सेवा निर्यात क्षेत्र की आय का तीन चौथाई हिस्सा सॉफ्टवेयर और आईटी तथा कारोबारी सेवा क्षेत्र से आता है। इन दोनों क्षेत्रों में भारत की वैश्विक हिस्सेदारी 9 फीसदी है जो काफी अधिक है। वैश्विक सेवा निर्यात में इस श्रेणी की हिस्सेदारी 36 फीसदी है। इन दोनों के अलावा अन्य सेवाएं वैश्विक निर्यात में 64 फीसदी की हिस्सेदार हैं जहां भारत की हिस्सेदारी महज 1.9 फीसदी है।
भारत की वैश्विक हिस्सेदारी वाली कुछ अन्य सेवाएं हैं परिवहन और यात्रा (2.4 फीसदी), रखरखाव और सुधार कार्य (0.24 फीसदी), बीमा और पेंशन सेवाएं (1.38 फीसदी), वित्तीय सेवाएं (1.30 फीसदी) तथा बौद्धिक संपदा के उपयोग के लिए शुल्क (0.23 फीसदी)। भारत को इन क्षेत्रों में अपनी हिस्सेदारी बढ़ाने की आवश्यकता है ताकि सेवा निर्यात में हमारा प्रदर्शन बेहतर हो।
चीन पर अहम निर्भरता में कमी
औद्योगिक वस्तुओं के लिए भारत के औसत वैश्विक आयात में 30 फीसदी चीन से आता है। इसमें दूरसंचार और स्मार्टफोन के कलपुर्जों की हिस्सेदारी 44 फीसदी, लैपटॉप और पीसी की 77.7 फीसदी, डिजिटल मोनोलिथिक इंटीग्रेटेड सर्किट की 26.2 फीसदी, असेंबल्ड फोटोवोल्टिक सेल्स की 65.5 फीसदी, लीथियम ऑयन बैटरी की 75 फीसदी, डाइ अमोनियम फॉस्फेट की 40.9 फीसदी, रेडियो ट्रांसमिशन और टेलीविजन आदि की 68.5 फीसदी तथा ऐंटीबायोटिक्स की 88.4 फीसदी है।
2019 से 2024 तक चीन को भारत का निर्यात करीब 16 अरब डॉलर सालाना पर ठहरा रहा। इस बीच चीन से होने वाला आयात वित्त वर्ष 19 के 70.3 अरब डॉलर से बढ़कर वित्त वर्ष 24 में 101 अरब डॉलर हो गया। अमेरिका और यूरोपीय संघ चीन से होने वाले आयात को कम करने के लिए शुल्क दरें बढ़ा रहे हैं।
ऑस्ट्रेलिया चीन के निवेशकों से कह रहा है कि वे ऑस्ट्रेलिया के दुर्लभ जमीनी संसाधनों के खनन में अपनी हिस्सेदारी छोड़ें क्योंकि यह क्षेत्र पर्यावरण के अनुकूल ऊर्जा और रक्षा क्षेत्र के लिए अहम है।
भारत में चीन से होने वाला आयात बढ़ने की उम्मीद है क्योंकि संयुक्त उपक्रमों अथवा व्यक्तिगत स्तर पर भी चीनी कंपनियां भारत में प्रवेश कर रही हैं। भारत को नए सिरे से आकलन करने की आवश्यकता है। उसे अपने आयात के स्रोतों में विविधता लाने तथा घरेलू उत्पादन क्षमता बढ़ाने की भी जरूरत है।
सुनिश्चित करें कि एफटीए इनवर्टेड ड्यूटी ढांचे में वृद्धि न हो: इनवर्टेड शुल्क ढांचा तब माना जाता है जब तैयार वस्तुओं पर आयात शुल्क कच्चे माल से कम होता है।
उदाहरण के लिए अगर पीतल और उससे तैयार पाइप, दोनों पर 5 फीसदी शुल्क हो तथा मुक्त व्यापार समझौता पाइप पर शुल्क को घटाकर शून्य कर दे तो स्थानीय रूप से उत्पादित पाइप कम प्रतिस्पर्धी रह जाते हैं। कंपनियां सस्ते आयात पर जोर देती हैं और स्थानीय निर्माण प्रभावित होता है।
पहले बजट में ऐसी कमियां दूर कर दी जाती थीं। बहरहाल, बढ़ते मुक्त व्यापार समझौते (FTA) अधिकांश औद्योगिक उत्पादों पर आयात शुल्क को शून्य करके समस्या बढ़ा रहे हैं। गैर एफटीए वाले देशों से कच्चे माल के आयात पर उच्च शुल्क और एफटीए साझेदार से शुल्क मुक्त तैयार वस्तु, स्थानीय खरीद पर आयात को बढ़ावा दे रहे हैं।
एफटीए के प्रदर्शन पर डेटा प्रकाशन
भारत ने 14 व्यापक एफटीए पर हस्ताक्षर किए हैं और उसने छह छोटे प्राथमिकता वाले व्यापार समझौतों पर दस्तखत किया है। सरकार को आंकड़े जारी करने चाहिए ताकि यह देखा जा सके कि क्या एफटीए अपेक्षाओं पर खरे उतरे हैं या फिर सुधार की जरूरत है। इससे निकले सबक भविष्य की वार्ताओं में मदद करेंगे।
यूरोपीय जलवायु नियमन के प्रतिकूल प्रभाव
यूरोपीय संघ के वनों की कटाई के नियम, कार्बन सीमा समायोजन उपाय (सीबीएएम) नियमन, विदेशी सब्सिडी नियमन और जर्मन आपूर्ति श्रृंखला उचित सावधानी अधिनियम असर डालेंगे और देश के निर्यात में अनिश्चितता बढ़ाएंगे। यूरोपीय संघ से आने वाली अपुष्ट खबरों के मुताबिक आधे से कम भारतीय निर्यातकों ने ही सीबीएएम के अनुपालन के आंकड़े संघ के साथ साझा किए हैं।
पूरे क्रियान्वयन के बाद सीबीएएम के कारण भारतीय कंपनियों पर 20-35 फीसदी आयात शुल्क लगेगा। कंपनियों को सभी संयंत्र और उत्पादन सूचनाएं यूरोपीय संघ के साथ साझा करनी होंगी। इसके अलावा कंपनियों को दो उत्पादन लाइन संचालित करनी होंगी ताकि प्रभावी प्रतिस्पर्धा कर सकें: एक, यूरोपीय देशों में निर्यात के लिए महंगे किंतु पर्यावरण के अनुकूल उत्पाद तथा दूसरा, शेष विश्व के लिए मानक उत्पाद। अब वक्त है एक योजना तैयार करने की ताकि यूरोपीय संघ के नियमन का मुकाबला किया जा सके और यूरोपीय संघ से होने वाले आयात पर ऐसे ही नियम लगाए जा सकें।
गुणवत्ता व्यवस्था में सुधार
हॉन्गकॉन्ग, सिंगापुर और अमेरिका ने हाल में भारतीय ब्रांड के मसालों को लेकर जो चिंता जताई है, वह बताती है कि तत्काल कदम उठाने की आवश्यकता है। भारतीय खाद्य एवं कृषि निर्यातकों को अक्सर अमेरिकी और यूरोपीय संघ के इनकार का सामना करना पड़ता है। ऐसा अक्सर कीटनाशकों की मात्रा और अन्य गुणवत्ता कारणों से होता है।
भारत को अपने गुणवत्ता मानकों को अंतरराष्ट्रीय मानकों के अनुरूप बनाना चाहिए ताकि ऐसे नकारे जाने के मामले कम हों, सब्जियों, मसालों और डेरी उत्पादों आदि प्रमुख निर्यात के लिए खेत से लेकर खाने तक ब्लॉकचेन ट्रेसिंग का विस्तार करना चाहिए, उद्योग के साथ परामर्श के बाद गुणवत्ता नियंत्रण आदेश देना चाहिए। भारतीय उत्पादों की वैश्विक स्वीकार्यता को बढ़ावा देने के लिए प्रमुख निर्यात भागीदारों के साथ परस्पर समझौतों पर हस्ताक्षर करना चाहिए।
कारोबारी सुगमता को बढ़ावा
हमें सरकार और कारोबारों के रिश्तों को सरकारी विभागों के चंगुल से निकालकर कारोबारों के अनुरूप करना होगा। फिलहाल निर्यातकों को कई सरकारी विभागों से अलग-अलग निपटना होता है।
उपयोगकर्ताओं के अनुकूल ऑनलाइन राष्ट्रीय व्यापार नेटवर्क कायम करने से कारोबारों के लिए एक ही स्थान पर प्रक्रियाएं पूरी करना आसान होगा। इस बदलाव से एक लाख छोटी कंपनियां एक साल के भीतर निर्यात आरंभ कर सकती हैं।
अन्य निर्यात संवर्धन उपाय
देरी और लागत कम करने के लिए सीमा शुल्क प्रक्रिया को स्वचालित करना होगा। आधुनिक बंदरगाहों में निवेश, किफायती लॉजिस्टिक्स और डिजिटल व्यवस्था अपनानी चाहिए। मौजूदा बाजारों में उच्च मूल्य वाली वस्तुओं का निर्यात, छोटे कारोबारों को वैश्विक पहुंच बनाने में मदद, ऋण तक उनकी पहुंच सुनिश्चित करना, ई-कॉमर्स निर्यात को बढ़ावा और अहम बाजारों में गैर टैरिफ गतिरोध को समाप्त करना, कुछ और कदम हो सकते हैं।
जानकारों के मुताबिक निर्यात वृद्धि को गति देने के लिए किसी देश को आयात टैरिफ कम करना चाहिए, एफटीए पर हस्ताक्षर करने चाहिए और वैश्विक मूल्य श्रृंखला के साथ एकीकरण करना चाहिए।
बहरहाल यह रणनीति केवल तभी कारगर होगी जब हम पहले लागत कम करेंगे और कारोबारी माहौल में सुधार लाएंगे। बिना कारोबारी सुगमता में सुधार किए शुल्क दरों में कमी करने से आयात बढ़ेगा और स्थानीय विनिर्माण और रोजगार की जगह लेगा।
Date:21-06-24
कनाडा का खतरनाक खेलसंपादकीय
खालिस्तानी आतंकवादी हरदीप सिंह निज्जर भारत और कनाडा के संबंधों को प्रभावित कर रहा है। कनाडा और वहां के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो के लिए आतंकी निज्जर नागरिक स्वतंत्रता का हीरो बन गया है। मंगलवार को कनाडाई संसद के निचले सदन हाउस ऑफ कॉमन्स में मौन रखकर निज्जर की पहली बरसी पर उसे श्रद्धांजलि दी गई। पिछले वर्ष 18 जून को ब्रिटिश कोलंबिया के सरे में एक गुरुद्वारे के बाहर उसकी हत्या कर दी गई। थी। प्रधानमंत्री टूडो ने पिछले वर्ष सितंबर में अप्रत्याशित रूप से यह दावा किया था कि निज्जर की हत्या में भारतीय अधिकारियों का हाथ है। वास्तव में कनाडा में गैंगवार के चलते जो हत्याएं हुई हैं उनके लिए वह इन गिरोहों के खिलाफ कार्रवाई करने की बजाय भारतीय एजेंसियों को ही ने कठघरे में खड़ा कर रहे हैं। ‘फाइव आईज’ का प्रमुख देश कनाडा है। इसमें कनाडा के अलावा अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और न्यूजीलैंड आते हैं। यह एक तरह से नस्लवादी गुट है और इनकी घरेलू और विदेश नीति एक जैसी है। निज्जर की बरसी पर कनाडाई संसद ने जिस तरह मौन रखकर उसे श्रद्धांजलि दी है उसका भारत ने माकूल जवाब देने का फैसला किया है। बैंकुवर स्थित भारतीय महावाणिज्य दूतावास कनिष्क विमान धमाके में मरने वालों के लिए 23 जून को श्रद्धांजलि सभा आयोजित करेगा। वास्तव में भारत को पिछले दशकों में अपनाए गए उदासीनता के रवैये की कीमत चुकानी पड़ रही है। उसी समय तत्कालीन भारत सरकार को कनाडा से जवाब-तलब करना चाहिए था। उस समय टूडो के पिता कनाडा के प्रधानमंत्री थे, जिन पर कोई कारगर कार्रवाई नहीं की गई। इसका एक कारण यह था कि मृतकों में अधिकांश भारतीय मूल के थे। कालांतर में कनाडा में बड़ी संख्या में पंजाबी मूल के लोग बसने लगे। वहां खालिस्तानी अलगाववादी आंदोलन ने जड़ जमानी शुरू कर दी। आज इसका व्यापक नेटवर्क खड़ा हो गया है। ऐसी ही स्थिति अमेरिका, ब्रिटेन और ऑस्ट्रेलिया में भी बनती जा रही है। इन देशों की सरकार और खुफिया एजेंसियां खालिस्तानी तत्वों को भारत के खिलाफ इस्तेमाल कर रही हैं। लेकिन खालिस्तान समर्थकों का तुष्टिकरण न केवल भारत-कनाडा के रिश्तों को नुकसान पहुंचाएगा बल्कि ‘फाइव आईज’ देशों की आतंकवाद के प्रति संघर्ष की प्रतिबद्धता पर भी सवाल खड़े करेगा।
Date:21-06-24
ज्ञान का गौरवसंपादकीय
नालंदा विश्वविद्यालय का नया परिसर विश्व को बतायेगा कि जो राष्ट्र मजबूत मानवीय मूल्यों पर खड़े होते हैं, वे इतिहास को पुनर्जीवित करके बेहतर भविष्य की नींव रखना जानते हैं । प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नए परिसर का उद्घाटन करते हुए ये बातें कही। नालंदा उस सत्य का उद्घोष है कि आग की लपटों में पुस्तकें भले जल जाएं, लेकिन आग की लपटें ज्ञान को नहीं मिटा सकतीं। नालंदा के विध्वंस ने भारत को अंधकार में भर दिया था। उन्होंने कहा अब इसकी पुनर्स्थापना भारत के स्वर्णिम युग की शुरुआत करने जा रही है। छात्रों के विदेशों में जाकर पढ़ाई करने को उन्होंने नालंदा व विक्रमशिला में पढ़ाई करने से जोड़ते हुए कहा, तब भारत शिक्षा में आगे था और आर्थिक सामर्थ्य भी ऊंचाई पर थी। बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के अनुसार वहां सत्रह देशों के चार सौ विद्यार्थी अध्ययन कर रहे हैं। नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना गप्तवंश के शासक कुमारगुप्त प्रथम द्वारा 450 से 470 ईस्वी के बीच की गई थी। यह मगध में प्राचीन बौद्ध मठ था, जिसे बारहवीं शताब्दी का अंत में आक्रमणकारी खिलजी ने नष्ट कर दिया व वहां के पुस्तकालय को बुरी तरह जला दिया था। इस नए विश्वविद्यालय को राष्ट्रीय महत्त्व के अंतरराष्ट्रीय संस्थान के रूप में 2014 में पंद्रह छात्रों के साथ पुनः चालू किया गया। नालंदा को देश का पहला विश्वविद्यालय होने का गौरव प्राप्त है परंतु हैरत की बात तो यह है कि शासकों ने कभी इसे पुनर्स्थापित करने में कोई उत्साह नहीं दिखाया। इसमें कोई संदेह नहीं कि भारतीय शिक्षा प्रणाली की दुनिया में तूती बोलती थी। तक्षशिला को दुनिया का पहला विश्वविद्यालय होने का गौरव यूं ही नहीं प्राप्त है। हालांकि विभाजन के बाद तक्षशिला पाकिस्तान के हिस्से आ गया। ऑक्सफोर्ड व कैम्ब्रिज विश्वविद्यायलों जैसी प्रतिष्ठा हासिल करने के लिए भले ही हमें कड़े प्रयास करने होंगे, मगर अपनी विरासत और रुतबे को दुनिया के समक्ष हासिल करने का हौसला हमें बना कर रखना होगा। तभी हम इनकी बराबरी कर पाएंगे। यदि सरकार अत्याधुनिक सुविधाओं वाले इस नामदार शिक्षण संस्थान को प्राथमिकता देते हुए बेहतरीन बनाए रखने में सफल होती है तो देश अपना प्राचीन गौरव पुनः प्राप्त कर सकता है।
Date:21-06-24
आरक्षण और अदालतसंपादकीय
न्यायालय ने फिर एक बार आरक्षण की सीमा के प्रति अपना जो फैसला सुनाया है, उस पर बहस ही नहीं, बल्कि राजनीति भी तेज हो सकती है। यह एक बड़ा बदलाव है कि पटना उच्च न्यायालय ने गुरुवार को राज्य में सरकारी नौकरियों और उच्च शिक्षण संस्थानों में पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जातियों और अनुसूचित जनजातियों के लिए आरक्षण सीमा 50 प्रतिशत से बढ़ाकर 65 प्रतिशत करने की बिहार सरकार की अधिसूचना को रद्द कर दिया है। अदालत ने आरक्षण में वृद्धि की सांविधानिकता को चुनौती देने वाली याचिकाओं की सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया है। याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि राज्य सरकार द्वारा आरक्षण सीमा में की गई वृद्धि उसके विधायी अधिकार से अधिक है। पटना उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के विनोद चंद्रन की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने बिहार सरकार को फिर सोचने और नए कदम उठाने के लिए प्रेरित किया है। अदालत दृढ़ है कि कुल आरक्षण की सीमा 50 प्रतिशत से अधिक नहीं होनी चाहिए।
गौरतलब है कि पिछले नवंबर में बिहार सरकार ने दो आरक्षण विधेयकों के लिए एक गजट अधिसूचना जारी की थी। एक अधिसूचना से सरकारी सेवाओं में रिक्तियों को भरने के लिए आरक्षण कोटा को 50 प्रतिशत से बढ़ाकर 65 प्रतिशत कर दिया गया। ठीक ऐसी ही बढ़ोतरी एससी, एसटी, ईबीसी और ओबीसी के लिए शैक्षणिक संस्थानों में प्रवेश के लिए की गई। इसके अलावा, आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (ईडब्ल्यूएस) के लिए अतिरिक्त 10 प्रतिशत आरक्षण को मिला दें. तो बिहार में कुल आरक्षण की सीमा 75 प्रतिशत तक पहुंच जाती । हालांकि, अब बिहार सरकार को परेशानी उठानी पड़ेगी, ज्यादा आरक्षण देने की उसकी कोशिशों पर अंकुश लग गया है। एक छोटी सी जात ऐसी है, जो आरक्षण या आरक्षण की सीमा बढ़ाने के पक्ष में नहीं है, पर जिस हिसाब से लोगों की महत्वाकांक्षा और जरूरतें बढ़ी हैं, उस हिसाब से आरक्षण की सीमा बढ़ाना ज्यादातर राज्य सरकारों के लिए मजबूरी बनता जा रहा है। अनेक राज्यों में आरक्षण की नई मांग हो रही है। विरोध-प्रदर्शन तक किए जा रहे हैं, अतः आरक्षण की राजनीति करने वालों के लिए यह समय अनुकूल है, पर जरूरत राजनीति से ऊपर उठकर देखने की है।
दरअसल, आरक्षण के इस पूरे विवाद को विस्तार से समझने और सुलझाने की जरूरत है। न्याय की दहलीज पर आरक्षण के कुछ फैसले बार-बार ठिठक क्यों जाते हैं ? बिहार, महाराष्ट्र जैसे राज्यों में आरक्षण की सीमा बढ़ाने में समस्या है, पर तमिलनाडु में सीमा पार जाकर आरक्षण दिया जा रहा है। आरक्षण जरूर होना चाहिए और उसमें एकरूपता भी होनी चाहिए। राज्यों में बहुत अलग-अलग आरक्षण सीमा उचित नहीं है। जहां तक संविधान में समानता के मौलिक अधिकार के उल्लंघन का प्रश्न है, तो उसे आरक्षण के संदर्भ में नहीं उठाना चाहिए। जहां भी जरूरत है, आरक्षण जरूर मिले, पर उसके नियमों में एकरूपता हो । परिस्थिति विशेष में इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ के मामले में 50 प्रतिशत की अधिकतम आरक्षण सीमा तय की गई थी, पर अब उससे आगे बढ़ने की जरूरत है। अगर राज्य सरकारों को आरक्षण बढ़ाने का अधिकार नहीं है, तो केंद्र सरकार ही आगे बढ़कर जरूरी कानूनों में संशोधन करे, ताकि अदालतों में आरक्षण की सीमा पर सवाल की नौबत न आए।
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‘द हिंदू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 24 मई, 2024
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Date:20-06-24
प्राथमिकताओं में खामी का असर नीतियों पर भी दिखेगासंपादकीय
गलती हुई नहीं कि सरकार डिफेंसिव ‘वो बनाम हम’ मोड में आ जाती है। सिलीगुड़ी ट्रेन हादसे के दो दिन बाद ही प्रेस नोट में बताया गया कि दस साल पहले रेलवे सुरक्षा पर जितना खर्च होता था उससे ढाई गुना ज्यादा आज हो रहा है। लेकिन यह नहीं बताया गया कि हाल की सारी दुर्घटनाओं में मानवीय नहीं, यांत्रिक गलतियां क्यों हैं। कहां गया बालासोर दुर्घटना के बाद का वादा कि नई ‘कवच’ सुरक्षा प्रणाली के बाद ट्रेनें गलत पटरी आने पर स्वयं रुक जाएंगी? अगर ताजा दुर्घटना के बाद आरोप हो कि लोको पायलट चार रातों से सोए नहीं थे या रेलवे में लाखों पद वर्षों से खाली हों और रेलवे बोर्ड को अब 5,696 की जगह 18,799 सह – लोको पायलटों की भर्ती के आदेश देने पड़े हों तो समस्या प्राथमिकता की है। रेलवे भारत की इकोनॉमी की रीढ़ है, लेकिन सीएजी की हालिया रिपोर्ट बताती है कि सरकारी दावों के विपरीत न तो मेल और एक्सप्रेस ट्रेनों, न ही माल गाड़ियों की स्पीड बढ़ी है। विकास सीढ़ी-दर-सीढ़ी हो तो दीर्घकालिक रहता है लेकिन अगर नीचे की बुनियाद कमजोर हो तो आलीशान छत भी ढह जाती हैं। 75 साल के स्व- शासन के बाद भी जरूरत अगर 80 करोड़ जनता को पांच किलो मुफ्त अनाज देने की हो, न कि रोजगार की, तो प्राथमिकताओं में कुछ तो गलत है।
Date:20-06-24
हद पार करता कनाडासंपादकीय
कनाडा की संसद ने खालिस्तानी आतंकी हरदीप सिंह निज्जर की मौत की पहली बरसी पर जिस तरह उसे श्रद्धांजलि दी, वह आतंकवाद का बेशर्मी से किया जाने वाला महिमामंडन है। एक आतंकी के प्रति आंसू बहाकर केवल खालिस्तानी आतंकियों के प्रति ही नरमी का परिचय नहीं दिया गया, बल्कि यह भी स्पष्ट किया गया कि कनाडा सरकार संकीर्ण राजनीतिक लाभ के लिए भारत से संबंध बिगाड़ने पर तुली हुई है। कनाडा सरकार की इस हरकत से यह भी साफ है कि चंद दिनों पहले वहां के प्रधानमंत्री जस्टिन टूडो ने इटली में भारतीय प्रधानमंत्री से मुलाकात के बाद दोनों देशों के संबंधों में सुधार को लेकर जो कुछ कहा था, वह छलावा था और वह खालिस्तानी आतंकियों-अतिवादियों के प्रभाव में आकर अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक मर्यादा भी भूल चुके हैं। कनाडा की संसद ने जिस हरदीप सिंह निज्जर को याद किया, वह वही है, जिसे भारत ने आतंकी घोषित किया था और जो फर्जी दस्तावेजों के साथ कनाडा जाने में सफल रहा था। खालिस्तानी अतिवादियों की गुटीय लड़ाई में उसकी हत्या कर दी गई थी, लेकिन कनाडा सरकार ने बिना किसी प्रमाण इसका दोष कथित भारतीय एजेंट पर मढ़ा। माना कि जस्टिन टूडी की अल्पमत सरकार खालिस्तानी चरमपंथी जगमीत सिंह के नेतृत्व वाले दल के समर्थन से सत्ता में टिकी है, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि वह भारत में अलगाववाद और आतंकवाद की पैरवी करने वाले तत्वों की जी हुजूरी करने लगे। वह यही कर रहे हैं। ऐसा करके वह भारत से संबंध खराब करने के साथ ही कनाडा की छवि और आतंरिक सुरक्षा के लिए भी खतरा पैदा कर रहे हैं।
यह किसी से छिन नहीं कि कनाडा में सक्रिय खालिस्तानी किस तरह नशीले पदार्थों की तस्करी में लिप्त हैं और उनके इशारे पर पंजाब में टारगेट किलिंग होती रहती है। जस्टिन टूडो इससे अनजान नहीं हो सकते कि खालिस्तानी आतंकियों ने किस तरह एअर इंडिया के विमान कनिष्क को बम से उड़ा दिया था, जिसमें तीन सौ से अधिक लोग मारे गए थे। इनमें से अधिकांश भारतीय मूल के कनाडाई नागरिक थे फिर भी कनाडा सरकार ने इस भयावह आतंकी घटना की ढंग से जांच नहीं की थी और इसी कारण केवल एक खालिस्तानी आतंकी को मामूली सजा हुई थी। यह अच्छा हुआ कि वैंकूवर स्थित भारतीय वाणिज्य दूतावास 23 जून को कनिष्क विमान हादसे की बरसी पर एक आयोजन करने जा रहा है। और भी अच्छा होगा कि नई लोकसभा में भी इस घटना का स्मरण कर कनाडा सरकार को शर्मसार किया जाए। कनाडा सरकार के प्रति सख्ती का परिचय देना इसलिए आवश्यक है, क्योंकि कनाडा में खालिस्तानी अतिवादी खुलेआम भारत विरोधी गतिविधियों को अंजाम देने में लगे हुए हैं। वे कनाडा में रह रहे भारतीय नागरिकों, उनके धार्मिक स्थलों और भारत के राजनयिकों की सुरक्षा के लिए ‘खतरा बन गए हैं।
Date:20-06-24
दलबदलुओं के लिए कठिन होती राहडॉ. जगदीप सिंह, ( लेखक राजनीतिशास्त्री हैं )
लोकसभा चुनाव के परिणामों ने दल बदलने वाले नेताओं के सामने मुश्किल खड़ी कर दी है। खासतौर पर हार का स्वाद चखने वाले ऐसे नेता अब अपने भविष्य को लेकर मंथन करने के क्रम में हैं। एक तो दल बदलने से लाभ नहीं मिला, वहीं अब पुरानी पार्टी में लौटने की गुंजाइश भी समाप्त है। वैसे अब ऐसे नेताओं के जीतने की संभावना भी कम होती जा रही है। इस बार लोकसभा चुनाव से ठीक पहले दलबदल करने वाले नेताओं को जनता ने समर्थन नहीं दिया। चुनाव से पहले हर नेता भाजपा के टिकट को जीत की गारंटी मान रहा था। यही कारण रहा कि बड़ी संख्या में दूसरे दलों के नेता भाजपा में शामिल हुए, मगर टिकट पाने वाले ऐसे 25 में 20 नेता लोकसभा चुनाव हार गए।
भाजपा का टिकट नहीं मिलने पर कांग्रेस में शामिल होने वाले नेताओं का हाल भी कुछ अलग नहीं रहा। कांग्रेस का टिकट पाने वाले छह में से पांच नेता चुनाव हार गए। दल बदलना नेताओं के लिए नई बात नहीं है। नेता कई कारणों मसलन-टिकट न मिलने, दूसरी पार्टी में जीत की संभावना अधिक दिखने आदि से पार्टी बदलते हैं। इस वजह से देश में कई बार राजनीतिक अस्थिरता का दौर देखा गया है। सरकारें प्रशासन पर ध्यान केंद्रित करने के बजाय खुद का अस्तित्व बचाने पर ज्यादा जोर देती रही हैं। पिछली सदी के सातवें दशक में ‘आया राम-गया राम’ का जुमला विधायकों के लगातार दलीय निष्ठा बदलने की पृष्ठभूमि में ही बना था।
भारतीय राजनीति में दलबदल का इतिहास काफी पुराना है। पहले और चौथे लोकसभा चुनाव के बीच दो दशक की अवधि में दलबदल के 542 मामले सामने आए थे। दलबदलू नेताओं के लिए सबसे अच्छा 1977 का आम चुनाव रहा था। आपातकाल के ठीक बाद हुए इस चुनाव में इंदिरा गांधी से मुकाबले के लिए कई राजनीतिक ताकतों ने हाथ मिलाया। तब चुनाव में उतरे 2,439 उम्मीदवारों में से 6.6 प्रतिशत यानी कुल 161 दलबदलू थे। इनकी सफलता दर 68.9 प्रतिशत थी, जो अब तक का उच्चतम स्तर है।
1980 के लोकसभा चुनाव में कुल 4,629 उम्मीदवारों में से 377 यानी 8.1 प्रतिशत दलबदलू थे। इनमें से 20.69 प्रतिशत सफल हुए। 1984 का साल कांग्रेस में आने वाले दलबदलुओं के लिए अच्छा साबित हुआ। इंदिरा गांधी की हत्या के बाद कांग्रेस के प्रति सहानुभूति की लहर चल रही थी। तब कांग्रेस ने 32 दलबदलू उम्मीदवार उतारे थे, जिनमें 26 को जीत मिली। 1984 में भाजपा ने अपना पहला लोकसभा चुनाव लड़ा। तब पार्टी से 62 दलबदलू उम्मीदवार लड़े थे, लेकिन किसी को भी जीत नहीं मिली।
अगर 2004 के लोकसभा चुनावों की बात करें तो कुल उम्मीदवारों में दलबदलू उम्मीदवारों का हिस्सा 3.9 प्रतिशत था और उनकी सफलता दर 26.2 प्रतिशत थी। 2014 में भाजपा के टिकट पर लड़ने वाले दलबदलू उम्मीदवारों की सफलता दर 66.7 प्रतिशत थी, वहीं कांग्रेस के लिए यह आंकड़ा 5.3 प्रतिशत था। 2019 के लोकसभा चुनाव में कुल 8,000 से अधिक उम्मीदवारों में अलग-अलग दलों के 195 दलबदलू उम्मीदवार मैदान में थे। इनमें से केवल 29 को ही जीत मिली। तब भाजपा के कुल उम्मीदवारों में 5.3 प्रतिशत दलबदलू थे, जिनमें से 56.5 प्रतिशत को जीत मिली। कांग्रेस के कुल उम्मीदवारों में 9.5 प्रतिशत दलबदलू थे, जिनमें से जीत सिर्फ पांच प्रतिशत को मिली। इस प्रकार 2019 के आम चुनावों में दलबदलू नेताओं की सफलता दर 15 प्रतिशत से कम रही, जबकि 1960 के दौर में औसतन लगभग 30 प्रतिशत दलबदलू नेता चुनाव जीत रहे थे।
ऐसा नहीं है कि इसे रोकने के लिए उपाय नहीं किए गए हैं। देश में एक मजबूत दलबदल विरोधी कानून है, जो नेताओं को दलीय निष्ठा बदलने से रोकता है। हालांकि यह कानून उस स्थिति में प्रभावी नहीं रह जाता, जब किसी दल से दो तिहाई जनप्रतिनिधि टूटकर किसी अन्य दल में शामिल होते हैं। ऐसी स्थिति में राजनीतिक दल के सदस्य सांसदी या विधायकी से अयोग्य होने से बच जाते हैं। कानून में कमी यह है कि अयोग्यता से राहत दलबदल के पीछे के कारण के बजाय सदस्यों की संख्या पर आधारित है।
इसका अंतरदलीय लोकतंत्र पर प्रभाव पड़ता है और दल से जुड़े सदस्यों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता खतरे में पड़ जाती है। लोकतंत्र में संवाद का अत्यंत महत्व है। जनता का, जनता के लिए और जनता द्वारा शासन ही लोकतंत्र है। लोकतंत्र में जनता ही सत्ताधारी होती है, उसकी अनुमति से शासन होता है, उसकी प्रगति ही शासन का एकमात्र लक्ष्य माना जाता है, परंतु यह कानून जनता का नहीं, बल्कि दलों के शासन की व्यवस्था अर्थात ‘पार्टी राज’ को बढ़ावा देता है।
दुनिया के कई परिपक्व लोकतंत्रों में दलबदल विरोधी कानून जैसी कोई व्यवस्था नहीं है। उदाहरण के लिए इंग्लैंड, आस्ट्रेलिया, अमेरिका आदि देशों में यदि जनप्रतिनिधि अपने दलों के विपरीत मत रखते हैं या पार्टी लाइन से अलग जाकर वोट करते हैं, तो भी वे उसी पार्टी में बने रहते हैं, परंतु भारत में कोई नेता पार्टी लाइन से अलग, किंतु महत्वपूर्ण विचार रखे तो भी उसे नहीं सुना जाता। इन सभी कारणों से भारतीय राजनीति में दलबदल एक बड़ी समस्या के रूप में उभरा है।
लोकतंत्र में जनता मतदान द्वारा किसी विशेष व्यक्ति को संसद या विधानसभा के लिए अपने प्रतिनिधि के रूप में चुनती है, लेकिन जब वह धन और पद के लालच में किसी अन्य दल में चला जाता है तो उसके विश्वास को ही तोड़ता है। आज की परिस्थितियों को देखते हुए दलविहीन लोकतंत्र ही भारत के लिए बेहतर है। ऐसा लोकतंत्र जिसका आदर्श समाज हो तथा जिसमें विरोधी और प्रतियोगिता-प्रतिस्पर्धा का स्थान व्यापक लोक कल्याण से प्रेरित सहयोग एवं सर्वोदय की भावना ने लिया हो।
Date:20-06-24
आतंक का सम्मानसंपादकीय
यह समझना मुश्किल है कि कनाडा आखिर भारत के साथ कैसे रिश्ते रखना चाहता है। इटली में आयोजित जी-7 के शिखर सम्मेलन में कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन टूडो भारतीय प्रधानमंत्री से मिले तो कहा कि भारत के साथ कनाडा का कई मामलों में बेहतर तालमेल है और नई सरकार के साथ बातचीत आगे बढ़ाने का अवसर दिखाई दे रहा है। मगर वहां से लौटते ही उनका रुख बदल गया। खालिस्तानी अलगाववादी हरदीप सिंह निन्जर की हत्या की बरसी पर वहां की संसद में एक मिनट का मौन रखा गया। पिछले वर्ष कनाडा में निज्जर की हत्या कर दी गई थी तब कनाडा सरकार ने आरोप लगाया था कि उसकी हत्या में भारतीय अधिकारी शामिल थे। हालांकि वह अभी तक इसका कोई सबूत नहीं पेश कर सका है। उसके बाद से कई जगहों पर खालिस्तानी अलगाववादियों ने भारत के खिलाफ उकसाने वाली गतिविधियां चलाई, भारत की तरफ से उन पर सख्त कदम उठाने की अपील की गई, मगर कनाडा सरकार उन पर चुप्पी साधे रही। अब निज्जर की बरसी पर संसद में मौन रखने का प्रकरण एक तरह से भारत को उकसाने का नया प्रयास है।
यह हैरानी की बात है कि निम्जर आखिर कनाडा सरकार को इतना प्रिय क्यों हो गया। आमतौर पर किसी देश की संसद में राष्ट्र के किसी सम्मानित व्यक्ति, किसी हादसे, जनसंहार या बुद्ध में मारे गए लोगों को श्रद्धांजलि दी जाती है। ऐसा नहीं माना जा सकता कि निज्जर की गतिविधियों को लेकर कनाडा सरकार अनजान हो। भारत ने उसे आतंकवादियों की सूची में डाल रखा था। आतंकवाद के खिलाफ भारत की कटिबद्धता भी कनाडा से छिपी नहीं है। फिर भी कनाडा सरकार निज्जर की हत्या को इतना तूल दे रही है, तो इससे यही जाहिर होता है कि न तो वह आतंकवाद पर अंकुश लगाने को लेकर गंभीर है और न भारत के साथ अपने रिश्ते बेहतर बनाने को लेकर अगर टूडो सरकार भारत के साथ बातचीत आगे बढ़ाने की इच्छुक होती, तो निज्जर को इतना महत्त्व न देती कि संसद में उसे श्रद्धांजलि दी जाती। यह तो स्पष्ट है कि इस तरह निज्जर को महत्त्व देकर टूडो वहां रह रहे सिख समुदाय का जनाधार अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रहे हैं, इसका कुछ लाभ शायद इस चुनाव में उनकी पार्टी को मिल भी जाए, मगर इससे भारत के साथ जो रिश्ते खराब हो रहे हैं, उसकी भरपाई आसान नहीं होगी। अलग खालिस्तान की मांग को लेकर चलाई जा रही हिंसक मुहिम से कनाडा सरकार अनजान नहीं है और न वह इस बात से बेखबर है कि किसी भी देश में चलाई जाने वाली कोई भी अलगाववादी गतिविधि दहशतगर्दी के दायरे में आती है। पंजाब के लोग खुद अलग राज्य का मुरा नहीं उठाते, मगर कनाडा, अमेरिका, ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया आदि देशों में जाकर बस गए और वहां की नागरिकता ले चुके कुछ लोग इसे लेकर उपद्रव करते देखे जाते हैं, तो उन पर अंकुश लगाने में मदद करने के बजाय अगर वहां की सरकारे उन्हें प्रश्रय देती हैं, तो इसे किसी भी रूप में स्वस्थ कूटनीति नहीं कहा जा सकता। इससे आतंकवादियों का मनोबल बढ़ता है और आखिरकार इसका खमियाजा किसी एक देश को नहीं, सारी दुनिया को भुगतना पड़ता है कनाडा सरकार के जवाच में भारत ने कनिष्क विमान हादसे की बरसी मनाने का फैसला किया है। ऐसे तनातनी वाले वातावरण से आखिरकार नुकसान कनाडा को ही अधिक होगा।
Date:20-06-24
शीर्ष अदालत का सख्त रुखसंपादकीय
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि नीट- यूजी 2024 परीक्षा के आयोजन में किसी की तरफ से 0.001 प्रतिशत लापरवाही भी हुई हो, तब भी उससे पूरी तरह से निपटा जाना चाहिए। जस्टिस विक्रम नाथ और एसवीएन भट्टी की अवकाशकालीन पीठ मंगलवार को पांच मई को हुई परीक्षा में छात्रों को कृपांक दिए जाने समेत अन्य शिकायतों से संबंधित दो अलग-अलग याचिकाओं पर सुनवाई कर रही थी। इन याचिकाओं पर अन्य लंबित याचिकाओं के साथ अब 3 जुलाई को सुनवाई होगी। याचिकाओं में परीक्षा में अनियमितता बरते जाने की सीबीआई जांच और नीट यूजी परीक्षा नये सिरे कराने की मांग वाली याचिकाएं भी शामिल हैं। अदालत ने एनटीए और केंद्र सरकार से याचिकाओं पर दो हफ्ते के भीतर अपने जवाब दाखिल करने को कहा है। लोक सभा चुनाव परिणाम आने की गहमागहमी के बीच ही नीट-यूजी 2024 परीक्षा के परिणाम भी घोषित किए गए थे। पीक्ष अनेक परीक्षार्थियों के टॉपर्स होने और खासी संख्या में परीक्षार्थियों को कृपांक दिए जाने की जानकारी होने के बाद लगा कि दाल में कुछ काला है। बाद के घटनाक्रम में कुछ गिरफ्तारियाँ हुई और पटना से लेकर गोधरा तक कई परीक्षा केंद्रों पर व्यापक स्तर पर अनियमितताएं बरती जाने की बातें सामने आने लगीं। परीक्षा में धांधली के संकेत मिलने लगे और परीक्षार्थियों के परिजनों के साथ ही अनेक संगठनों और राजनीतिक दलों ने विरोध प्रदर्शन करने शुरू कर दिए। कुछ परीक्षार्थियों ने अदालत का दरवाजा खटखटाया। मेडिकल की पढ़ाई पर अभिभावक खासा खर्च करते हैं। अभ्यर्थी छात्र सामाजिक जीवन से कटकर मेडिकल पाठयक्रम प्रवेश परीक्षा की तैयारी में रात-दिन एक कर देते हैं। दरअसल, अभ्यर्थियों की संख्या को देखते हुए मेडिकल कॉलेजों में सीटें पर्याप्त नहीं हैं। जरूरी है कि सरकार सीटें बढ़ाने के लिए ढांचागत आधार को मजबूत करे। एनटीए के वजूद में आने से पहले सीबीएसई और राज्य शिक्षा बोर्ड पीएमटी की परीक्षा आयोजित करते थे जिसके आधार पर प्रवेश आसानी से मिल जाता था। लेकिन इस बीच अभ्यर्थियों की संख्या बढ़ने और एनटीए जैसे निकाय को मेडिकल के अलावा अन्य तमाम परीक्षाओं का आयोजन करने की जिम्मेदारी सौंप दी गई। इतने बोझ से एनटीए का ढांचा कमजोर दिखलाई पड़ने लगा है, उसके सामने मैनपावर की समस्या भी है। बहरहाल, जरूरी हो गया है कि छात्रों के साथ न्याय हो और इसके लिए रि नीट यूजी के अलावा कोई रास्ता दिखाई नहीं पड़ता।
Date:20-06-24
पुनरोद्धार नालंदासंपादकीय
नालंदा विश्वविद्यालय के नए परिसर का उद्घाटन सुखद और अविस्मरणीय है। परिसर के उद्घाटन के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उचित ही कहा कि नालंदा विश्वविद्यालय भारत की शैक्षणिक विरासत और जीवंत सांस्कृतिक आदान-प्रदान का प्रतीक है। इसमें कोई शक नहीं कि यह विश्वविद्यालय एक राष्ट्रीय गौरव है और इसे बहुत लगाव और गुणवत्ता के साथ विकसित करना चाहिए जो पवित्रता और गरिमा लगभग 800 साल पहले नालंदा विश्वविद्यालय को प्राप्त थी, उसकी बहाली अगर आधुनिक नालंदा विश्वविद्यालय अपने नए परिसर में कर सके, तो यह पूरे मानव समाज की बड़ी सेवा होगी। वैसे, नालंदा विश्वविद्यालय की परिसर के साथ स्थापना का कार्य पहले भी किया जा सकता था, पर इसे नष्ट करने की जो त्रासद स्मृतियां हैं, वह नए दौर में भी बार-बार यह में आ खड़ी हो जाती थीं। हम ऐसे देश के वासी हैं, जहां किसी का दिल दुखाने वाली बात सोचना भी अमानवीयता है, तभी तो उस आक्रांता के नाम पर आज भी एक रेलवे स्टेशन है, जिसे भारतीय संस्कृति से भयंकर घृणा थी। अब भारत की नई पीढ़ी अगर शांतिपूर्वक सुधार या बदलाव की ओर बड़ी है, तो उसका स्वागत करना चाहिए। “वास्तव में इस विश्वविद्यालय के पुनर्जीवन की कल्पना भारत और पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन (ईएएस) देशों के बीच एक संयुक्त सहयोग के रूप में की गई थी। उद्घाटन समारोह में 17 देशों के दूतावास प्रमुखों की मौजूदगी सहज ही प्रमाण है कि प्राचीन विश्वविद्यालय की स्मृति दुनिया के एक बड़े क्षेत्र में लोगों के ज्ञान संस्कार में शामिल है। करीब 1,600 साल पहले स्थापित मूल नालंदा विश्वविद्यालय को दुनिया के पहले आवासीय विश्वविद्यालयों में से एक माना जाता है। उस पुरानी भव्यता, प्राचीनता और गुणवत्ता के साथ नालंदा विश्वविद्यालय की वापसी तो कतई संभव नहीं, पर जो भी विश्वविद्यालय स्थापित वा विकसित हो रहा है, उस पर अनेक देशों के गुणी लोगों की निगाह रहेगी। ध्यान रहे, भारत के अलावा 17 देशों ने नालंदा विश्वविद्यालय को समर्थन देने के लिए समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए थे। यह भी ध्यान रहे कि गैर-सनातन व विविध धर्म वाले देशों की सरकारें भी नालंदा विश्वविद्यालय का पुनर्जीवन देखना चाहती हैं। मतलब यह आधुनिक नालंदा विश्वविद्यालय ज्ञान के विस्तृत पटल पर तमाम वैमनस्य भुलाकर आगे बढ़ने की जरूरत और बढ़ती समझ का भी प्रमाण है। वह हमेशा ध्यान रखना चाहिए कि मेलजोल के अभाव और कट्टरता की वजह से ही प्राचीन नालंदा का विनाश हुआ था। भारतीय समाज में जब कट्टरता घटी और समझ बढ़ी, तभी नालंदा के पुनर्जीवन का विचार अवतरित हुआ।
अब वह स्वर्णिम इतिहास में दर्ज है कि नालंदा के प्राचीन खंडहरों के पास ही नया परिसर स्थापित हुआ, जिसका निर्माण साल 2017 में शुरू हुआ था। वैसे, साल 2007 में, जब केंद्र में मनमोहन सिंह की सरकार थी, तभी फिलीपींस में आयोजित दूसरे पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन में नालंदा विश्वविद्यालय की स्थापना का फैसला लिया गया था। मनमोहन सिंह सरकार ने ही साल 2010 में नालंदा विश्वविद्यालय अधिनियम पारित किया। साल 2014 में 14 छात्रों के साथ पढ़ाई-लिखाई का क्रम भी शुरू हुआ। इस सुखद सपने को नरेंद्र मोदी सरकार ने स्वतंत्र परिसर देकर जिस तरह आगे बढ़ाया है, उसकी प्रशंसा होनी ही चाहिए। अच्छे कामों और अच्छी परंपराओं को बल मिलता रहे दीप से दीप जलाने और आगे बढ़ते जाने का यही सही तरीका है।
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आर्थिक विकास और व्यय के योग्य बढ़ती आय के कारण, विदेश में छुट्टियां मनाने वाले भारतीयों की संख्या में भारी वृद्धि हुई है। मास्टर कार्ड इकोनॉमिक्स इंस्टीट्यूट के ‘ट्रैवल ट्रेंडस 2024 : ब्रेकिंग बाउंड्रीज’ के अनुसार इतने अधिक भारतीयों ने कभी इतनी अंतरराष्ट्रीय यात्राएं नहीं की हैं।
कुछ बिंदु –
उच्च व्यय क्षमता वाले विदेशी और देशी पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए क्या करना होगा –
भारत को एक सुखद, आरामदायक और सुरक्षित पर्यटन के लिए समस्याओं को दूर करने की जरूरत है।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 24 मई, 2024
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Date:19-06-24
NCERT AINTYYes, liberals also have political bias. But liberal approach to education is better than a right-wing oneTOI Editorials
NCERT keeps making news – mostly of the wrong kind. National Testing Agency (NTA), which conducts NEET-UG, has blamed changes in NCERT textbooks for inflated marks of some examinees. NTA’s logic is that some examinees had based their answers on earlier textbook versions. This doesn’t absolve NTA of its mismanagement. But NCERT revisions are a cause for concern, in multiple ways. Revised NCERT Class 12 political science textbooks, which hit stores last week, have engendered yet another pedagogic dispute.
Politics will be there | Politics influencing social science textbooks isn’t unique to India. Examples include the critical race theory controversy in US, and the debate over Chiang Kai-shek’s legacy in Taiwanese history books. But NCERT textbooks are arguably crossing a line. This is NCERT’s fourth round of textbook revision since 2014. Many are arguing these revisions are geared solely to pushing the political right-wing’s ideological agenda, often by deleting or diluting topics like Gujarat riots and Babri Masjid demolition.
Bias vs bias | There’s a case to be made that academia in India and other parts of the world has had a left-liberal bias. In the West, for example, East European studies are subsumed in Russian studies in many schools and universities – reflecting an old left-liberal bias for Soviet Union. But the answer is not to replace this with even worse right-wing bias, as seems to be happening in NCERT textbooks. Education should provide students with multiple narratives and then let them make up their minds. But that can’t happen if, for example, the contribution of Mughal dynasties in art, architecture and jurisprudence is diminished. Similarly, selectively presenting Supreme Court judgments to suit the governing party’s narrative does not create intellectually supple minds.
Aim higher | Ultimately the goal of education is to equip students for the modern world where multiple narratives co-exist. A student can go on to favour any shade of political ideology. But that’s not for educators to pre-judge. Their job is to provide a menu of perspectives, and provoke questioning. Towards that end, a liberal approach to education, which recognises multiple viewpoints, is by far a better option. NCERT’s thinking needs a revision.
Date:19-06-24
Parents, Step UpGovt warnings can’t cure kids’ social media addiction. That’s a job for mums & dadsTOI Editorials
US surgeon general Vivek Murthy’s call for a warning label on social media platforms – he said they are dangerous for the mental health of teenagers – is an idea that can spread globally. Murthy argues teenagers who spend more than three hoursa day on social media are twice as much at risk of facing anxiety and depression symptoms. He wants the warning labels done along the lines of action against tobacco use in US decades ago. But can govts influence individual behaviour beyond a point?
Mental health issues on rise | Since 2010, rates of anxiety and depression have gone up sharply for teens in many countries. This is also the period that saw smartphones take centre stage in our lives.
But, research on what too much social media use does to teens does not throw up definitive answers. Murthy argues that waiting for ‘perfect information’ could have serious consequences. EU has already taken steps to try and check the power of social media platforms.
It would just be a start | Yet, a warning label would only ‘start the conversation’. Anti-tobacco labelling has been around for years. But in more than a few countries, smoking is down but far from out. At 26.5%, the Southeast Asian region has the highest percentage of population using tobacco; the more developed European region is not far behind at 25.3%. Perhaps, warnings will make social media platforms more careful when planning their marketing techniques. Ideally, they should also spend more resources insulating adolescents from toxic content. But they probably won’t.
Onus is on guardians | Ultimately, ensuring warning labels are heeded is squarely the responsibility of parents and other responsible adults. Doing this job would require not just smartphone rules for teens but also difficult conversations. Psychologists and educators say teens must be made to cut down on screen time in general and engage more in unstructured play and offline activity. Since practice is the best form of preaching, it would help if parents begin by first limiting their own social media use, at least in children’s presence.
Date:19-06-24
EU’s Ill-Fitting Suite For ‘Greener’ NormsDoesn’t really address problems of fast fashionET Editorials
Changes to EU’s Ecodesign Directive banning destruction of unsold textiles — and footwear — purportedly to establish sustainability requirements, will have its biggest impact on Asia, where these are made. Distribution and retailing of textiles have less than 5% contribution to emissions. The rest are on account of all the steps that go into production and transport. Emergence of fast fashion favours overproduction, and EU’s attempt to discourage it will have a bearing on export earnings of several Asian economies, including those of India. The EU ban provides carve-outs for small exporters. However, these may not be adequate safeguards against trade dispute challenges. But has the EU pushed all its policy levers to curb fast fashion before imposing the hard action?
Since material and labour costs in the textiles industry are low relative to design, marketing and retailing, fashion brands have an incentive to overstock. This is encouraged by economies of scale that push production costs further down. There is the added effect of economies of scope, where variety, instead of volume, tends to lower costs. All of this ends up in higher unsold stocks. However, banning their destruction — or, for that matter, their re-export to poorer countries — doesn’t adequately address the force driving fast fashion: booming online sales, backed by legal assurance in EU of return of clothes that don’t look or fit or feel right. Offline sales don’t have this legal remedy, but competitive intensity makes it an industry-wide practice.
The EU, and its trading partners, would have benefited from upstream interventions that raise awareness over fast fashion. It could have required brands to disclose more about their unsold inventories before it moved on banning textiles destruction. It could also have behavioural policy to guide fashion-purchasing behaviour. In a way, simultaneously hard and soft policy actions send out a stronger message of intent. EU will have to work intensely with its trading partners to adjust to its new ecodesign rules.
Date:19-06-24
New dynamicsThe G-7 must review its own purpose in a rapidly changing worldEditorial
Welcoming leaders of 10 countries including Prime Minister Narendra Modi to the “G-7 Outreach” Summit, Italy’s Prime Minister Giorgia Meloni said it was important to step away from the old trope of the “West vs the Rest”. That sentiment explained Italy’s decision to invite mainly the Global South countries including BRICS notables such as Brazil, India, and the UAE, to hold an outreach with seven African countries on energy issues, and to host the summit in the Mediterranean Apulia region. The G-7 was once hailed as a dynamic group of the world’s most developed democracies where heads of state would roll up their sleeves once a year to effect real solutions to global financial and development issues. However, with manufacturing slowdowns, the COVID-19 pandemic, and the impact of the Russia-Ukraine conflict and western sanctions, the grouping has appeared more tired, and its meetings less effective. The shaky electoral fortunes of most of the G-7 leadership did not enhance that image at the summit. The joint communiqué read more like a laundry list of the world’s problems, than it did as a strong call to action on resolving them. Most salient was the G-7’s continued “military, budget, humanitarian, and reconstruction support” for Ukraine, but with no constructive plan on how to end the war. A Gaza ceasefire appeal has also not been accepted by Israel. The G-7’s focus on China in the Indo-Pacific and on “industrial targeting” and unfair practices was particularly sharp, but it remains to be seen whether any member-country will reduce its own considerable trade ties with Beijing. A line in the communiqué that recommitted to about eight infrastructure corridors, including the India-Middle East-Europe Corridor, reinforced the lack of focus on executing (as distinct from discussing) projects.
Given the G-7’s current situation, India, in attendance for the eleventh time, could well take stock of the engagement’s utility. While the event was an opportune moment for Mr. Modi, now in his third term, to meet with some of the world’s top leadership, the meetings themselves did not yield many outcomes. Formal bilaterals with the leaders of important partner the U.S., and fractious relationship-ridden Canada, did not materialise. Mr. Modi focused on India’s elections as a “victory for the democratic world”, on the importance of harnessing technology and artificial intelligence to bridge global inequalities, and on the value of the Global South, especially Africa. It would seem most of those issues would be better addressed in a larger and more representational format such as the G-20, while the G-7 may wish to review its own identity and purpose amidst a rapidly changing global power dynamic.
Date:19-06-24
राज्यों की विशेष दर्जे की मांग और उसकी जटिलताएंसंपादकीय
मोदी – 3 सरकार के लिए अपरिहार्य दो घटक दल अपने-अपने राज्यों के लिए विशेष दर्जे की मांग लंबे समय से कर रहे हैं। दोनों के अपने तर्क हैं। एक का कहना है कि उसका एक बड़ा हिस्सा जो कोयला और इस्पात सहित तमाम खनिज – आधारित आय का स्रोत था- नया राज्य बना, जिससे राजस्व का जरिया सूख गया। दूसरे का कहना है कि राजधानी व उसमें लगे उद्योग और वाणिज्य नए राज्य में चले गए, लिहाजा राजस्व की भरपाई और नई राजधानी बनाने के लिए विशेष राज्य का दर्जा दिया जाना चाहिए। आखिर इस दर्जे के मिलने से राज्य को क्या लाभ मिलता है ? वर्ष 1969 में 5वें वित्त आयोग और एनडीसी ने इस दर्जे के लिए निम्न मापदंड बनाए- पहाड़ी और दुर्गम क्षेत्र, कम आबादी घनत्व, अधिक आदिवासी आबादी, पड़ोसी देश से लगे सामरिक क्षेत्र का होना, आर्थिक व आधारभूत संरचना में पिछड़ा होना और राज्य की आय की प्रकृति का तय न होना। शुरू में जम्मू-कश्मीर, असम और नगालैंड और कालांतर में सीमावर्ती आठ और पहाड़ी राज्यों को विशेष दर्जा दिया गया। ऐसे राज्यों को केन्द्रीय योजनाओं में अपना अंश केवल 10% देना होता है और अन्य कई तरह की राजस्व रियायतें केंद्र देता है। आंध्र प्रदेश ने इस मांग को लेकर वर्ष 2018 में 11 दिन संसद नहीं चलने दी जबकि बिहार एक लंबे समय से यह मांग कर रहा है। राजस्थान और झारखंड भी ऐसी मांग करने लगे हैं। यह सच है कि बिहार की प्रति व्यक्ति आय 60 हजार सालाना से भी कम है और मानव विकास के तमाम अन्य पैरामीटर्स पर भी वह पीछे है। लेकिन सर्वाधिक जनसंख्या वृद्धि दर और उसके कारण आबादी घनत्व परिवार नियोजन की असफलता के कारण हैं। मात्र 10% शहरीकरण की दर और औद्योगीकरण का न होना यह प्राकृतिक कारणों से नहीं है। बहरहाल जिस राज्य में प्रति परिवार केवल 0.6 हेक्टेयर जमीन हो (राष्ट्रीय औसत के लगभग आधा ) उसे विशेष दर्जा देना लाजिमी है।
Date:19-06-24
अमेरिका-चीन में बढ़ गया है व्यापार युद्धअंशुमन तिवारी (मनी-9 के एडिटर)
डोनाल्ड ट्रंप ज्यादा बड़े चीन विरोधी हैं या जो बाइडेन ? चुनावी तैयारियों के बीच अमेरिका-चीन रिश्तों से राब्ता रखने वाले इस सवाल का हर जवाब तलाश रहे हैं। कहते हैं अगर बात कारोबार की हो तो अमेरिका जानी दुश्मन से भी दोस्ती कर सकता है मगर यहां तो डेमोक्रेट बाइडेन ने अमेरिका के तात्कालिक नुकसान की कीमत पर भी चीन के खिलाफ ऐसे व्यापार युद्ध की यलगार की है, जो रिपब्लिकन ट्रंप भी नहीं करते। बाइडेन ने चीन के खिलाफ अब तक के सबसे कठोर व्यापार प्रतिबंधों का ऐलान कर दिया है। आयात महंगे कर दिए गए हैं। इसके बाद यूरोप ने अमेरिकी इलेक्ट्रिक वाहनों पर इंपोर्ट ड्यूटी बढ़ा दी। अब लोगों को 2021 में एंकरेज (अलास्का) की बैठक याद आ रही है। बात यहीं से निकली थी, जो अब इतनी दूर तक आ गई है कि अमेरिका ने यूरोप को साथ लेकर चीन से खुला व्यापार युद्ध शुरू कर दिया है। बाइडेन की अगुआई में अमेरिका और चीन के बीच यह पहली बैठक थी। जहां होना कुछ था, हो कुछ गया। बैठक में एक-दूसरे पर खुले आरोप लगा दिए गए। चीन ने कहा अमेरिका दुनिया के देशों को चीन पर हमले के लिए उकसा रहा है। अमेरिका ने कहा चीन उसे नीचा दिखाने की तैयारी के साथ इस बैठक में आया है। अमेरिका और चीन के बीच रिश्तों का यह सबसे निचला स्तर था। एंकरेज की बैठक के बाद पीपुल्स डेली ने अपने वीबो (चीन का एक्स या ट्विटर) हैंडल पर दो तस्वीरों का कोलाज जारी किया। एक तस्वीर थी 1901 के बॉक्सर समझौते की, जिस पर क्विंग साम्राज्य और 8 देशों ने हस्ताक्षर किए थे। दूसरी थी एंकरेज बैठक की।
चीन की कूटनीति प्रतीकों के इस्तेमाल में पारंगत है, क्योंकि वह पश्चिम को सदैव अतीत के संदर्भ में देखती है। यह प्रतीक बड़ा अर्थपूर्ण था। चीन का सरकारी मीडिया बता रहा था कि एंकरेज की बैठक में अमेरिका कुछ वैसा ही करने वाला था, जो 1901 में बॉक्सर संधि में हुआ था। इस संधि को चीन अपना सबसे बड़ा ऐतिहासिक अपमान मानता है। 1842 की नानकिंग संधि के बाद के वर्ष चीन में अपमान की शताब्दी के तौर पर याद किए जाते हैं। ओपियम युद्ध में पराजय के बाद नानकिंग की संधि से चीन पर कारोबारी प्रतिबंध लगाए गए और हांगकांग ब्रिटेन का हो गया। विदेशी कारोबारियों के खिलाफ मार्शल आर्ट के लड़ाकों ने विहेक्वान गुरिल्ला संगठन बनाकर विदेशियों पर हमले बढ़ा दिए | पश्चिमी देशों ने सेना भेजकर बगावत कुचल दी और क्विंग साम्राज्य को सात देशों के साथ बॉक्सर संधि पर दस्तखत करने पड़े। इस संधि को लेकर चीन में अपमान का बोध इतना गहरा है कि 2021 की एंकरेज बैठक को इसी से जोड़कर देखा गया।
इतनी जल्दी बिगड़ गई बात: चीन और अमेरिका के बीच कारोबारी रिश्ते सदियों पुराने नहीं हैं। अपमान की एक सदी के बाद कोरिया युद्ध, पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना को मान्यता, वियतनाम युद्ध, ताइवान संकट, शीत युद्ध ने चीन और अमेरिका के रिश्तों में अविश्वास इस कदर बनाए रखा कि बीसवीं सदी के मध्य तक कारोबारी रिश्ते बन नहीं सके। हेनरी किसिंजर की कोशिशों से 1972 में राष्ट्रपति निक्सन अमेरिका की यात्रा पर गए, मगर कारोबारी भरोसा नहीं बन सका । लेनार्ड वुडस्टॉक बीजिंग में अमेरिका के राजदूत थे। उनकी कूटनीति से राष्ट्रपति जिमी कार्टर और देंगे श्याओ पेंग के रिश्तों में गर्मजोशी आई देंगे 1979 में अमेरिका गए। ये उनकी सबसे मशहूर यात्रा थी। इसके कारोबारी रिश्ते खुले । मानवाधिकारों व लोकतंत्र की फिक्र छोड़कर अमेरिका ने आनन-फानन में चीन को मोस्ट फेवर्ड नेशन का दर्जा दिया | आयात पर रियायतें दी गईं। अमेरिकी कंपनियां चीन में निवेश करने लगीं। अमेरिकी पूंजी चीन के शेयर बाजार में दौड़ने लगी। इसके बाद अमेरिका की चीन पर निर्भरता बढ़ती गई। 2001 में चीन डब्ल्यूटीओ में आया और अब अमेरिकी बाजार चीन के कब्जे में था।
नया व्यापार युद्ध दो दशक से ज्यादा नहीं चली अमेरिका-चीन की व्यापारिक दोस्ती बाइडेन ने करीब दो दर्जन उत्पादों पर सीमा शुल्क बढ़ा दिया, जिनमें अधिकांश उत्पादों पर शून्य या अधिकतम 75 फीसदी इंपोर्ट ड्यूटी लगती थी। अब यह 25 फीसदी होगी। सोलर-सेल सेमीकंडक्टर और इलेक्ट्रिक वाहन पर इंपोर्ट ड्यूटी 50-100 फीसदी कर दी गई है। महंगे आयातों का अगला चरण 2025 व 2026 में लागू होगा। इस फैसले से चीन का करीब 18 से 23 अरब डॉलर का निर्यात प्रभावित होगा। प्रतिबंधों व इंपोर्ट ड्यूटी की पहली चोट स्टील, एल्युमिनियम, ईवी, सेमीकंडक्टर, सोलर पैनल व बैटरी उद्योगों पर हुई। इन निर्यातों में चीन को अमेरिका पर बढ़त हासिल है। अमेरिका उन उत्पादों का आयात महंगा कर रहा है, जिनमें उसकी चीन पर निर्भरता ज्यादा है। महंगाई की कीमत पर व्यापार युद्ध छेड़ा गया है।
बीजिंग का पलटवार: लड़खड़ाती विकास दर के बीच चीन पर यह हमला भारी पड़ने वाला है। फिर भी चीन इस युद्ध में अपने पैंतरे चलेगा जरूर। अमेरिका से कारों का आयात महंगा किया जा सकता है। अमेरिकी कृषि आयात पर चीन में सीमा शुल्क बढ़ेगा, इसके असर से अमेरिकी किसान भड़क सकते हैं। करीब 18 अरब डॉलर का अमेरिकी निर्यात चीन के नए प्रतिबंधों का निशाना हो सकता है। इसके अलावा अमेरिका को रेअर अर्थ और क्रिटिकल मिनरल्स मिलना मुश्किल होता जाएगा। अमेरिकी कंपनियों पर चीन में सख्ती हो सकती है। इंपोर्ट ड्यूटी का असर कम करने के लिए चीन युआन का तेज अवमूल्यन भी कर सकता है ताकि निर्यातों की प्रतिस्पर्धा बनी रहे।
Date:19-06-24
लोकसभा का नया अध्यक्षसंपादकीय
प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार का गठन होने के बाद अब प्रतीक्षा इसकी है कि नई लोकसभा का अध्यक्ष कौन होगा? इसे लेकर जहां भाजपा अपने सहयोगी दलों और विशेष रूप से तेलुगु देसम पार्टी एवं जनता दल-यू नेताओं के साथ विचार-विमर्श कर रही है, वहीं विपक्ष इस कोशिश में है कि लोकसभा उपाध्यक्ष का पद उसके हिस्से में आए। चूंकि इस बार उसका संख्याबल अधिक है, इसलिए वह लोकसभा उपाध्यक्ष पद पाने के लिए हरसंभव कोशिश कर रहा है। कुछ विपक्षी नेताओं ने यह भी कहा है कि यदि सत्तापक्ष लोकसभा उपाध्यक्ष पद विपक्ष को देने के लिए तैयार नहीं होता तो उसकी ओर से अध्यक्ष पद के लिए भी अपना उम्मीदवार खड़ा किया जा सकता है। यदि ऐसा होता है तो ऐसा पहली बार होगा, जब इस पद के लिए चुनाव होगा। विपक्षी दलों के नेता तेलुगु देसम पार्टी और जनता दल-यू को यह नसीहत भी देने में लगे हुए हैं कि लोकसभा अध्यक्ष पद के लिए उनमें से किसी को अपनी दावेदारी पेश करनी चाहिए। यह ठीक है कि गठबंधन सरकारों में यह पद घटक दलों के हिस्से में जाता रहा है, लेकिन मौजूदा सरकार वैसी गठबंधन सरकार नहीं, जैसी वाजपेयी अथवा मनमोहन सिंह सरकार थी। इन गठबंधन सरकारों के मुकाबले वर्तमान सरकार की स्थिति इसलिए अलग है, क्योंकि भाजपा बहुमत से पीछे रहने के बाद भी संख्याबल में मजबूत है।
फिलहाल इसके आसार कम हैं कि जनता दल-यू अथवा तेलुगु देसम पार्टी की ओर से लोकसभा अध्यक्ष पद के लिए आग्रह किया जाएगा, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि वाजपेयी सरकार के समय अध्यक्ष पद तेलुगु देसम पार्टी के पास ही था। वाजपेयी सरकार एक वोट से इसीलिए गिरी थी, क्योंकि तत्कालीन लोकसभा अध्यक्ष ने ओडिशा के मुख्यमंत्री पद की शपथ ले चुके कांग्रेस सांसद गिरधर गोमांग को इस आधार पर सदन की कार्यवाही में भाग लेने की अनुमति दे दी थी कि उन्होंने लोकसभा की सदस्यता नहीं छोड़ी थी। लोकसभा अध्यक्ष केवल सदन की कार्यवाही ही संचालित नहीं करता, बल्कि कुछ मौकों पर मत विभाजन के समय निर्णायक भूमिका भी निभाता है। सदस्यों को उनके कदाचरण के लिए दंडित करने और दलबदल की स्थिति में उन्हें अयोग्य ठहराने का फैसला भी वही करता है। सभी संसदीय मामलों में उसका निर्णय अंतिम होने के कारण इस पद की महत्ता बढ़ जाती है। उचित यह होगा कि लोकसभा अध्यक्ष एवं उपाध्यक्ष पद को लेकर पक्ष-प्रतिपक्ष में कोई सहमति कायम हो। सदन के सुचारु रूप से संचालन के लिए यह आवश्यक है। इससे भी आवश्यक यह है कि जो भी अध्यक्ष बने, वह दलगत राजनीति से ऊपर उठकर कार्य करे। उसे निष्पक्ष होना ही नहीं चाहिए, बल्कि दिखना भी चाहिए। ध्यान रहे कि जब-जब ऐसा नहीं होता, तभी सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच विवाद पैदा होते हैं।
Date:19-06-24
भारत में समावेशी विकास और इससे जुड़ी चुनौतियांरथिन राय (लेखक कौटिल्य स्कूल ऑफ पब्लिक पॉलिसी में प्राध्यापक और ओडीआई लंदन में अतिथि वरिष्ठ फेलो हैं। )
भारत में नई सरकार का गठन हो गया है। अब सरकार के समक्ष कई गंभीर आर्थिक चुनौतियां हैं जिनका प्रभावी ढंग से समाधान होने पर ही भारत विकास यात्रा पर निर्बाध रूप से आगे बढ़ सकता है।
सबसे पहले चुनौती रोजगार के अभाव से जुड़ी है। वर्ष 2014 के बाद चार चीजें बदतर हो गई हैं। ये बिगड़े हालात की तरफ इशारा कर रहे हैं। इसे देखते हुए सरकार की तरफ से गंभीर प्रयास की आवश्यकता है। पहली बात, देश में 18 से 35 वर्ष के दायरे में 10 करोड़ लोग रोजगार तलाश नहीं कर रहे हैं और न ही उनके पास शिक्षा या किसी तरह का प्रशिक्षण है। दूसरी बात, देश के श्रम बल का 45 प्रतिशत हिस्सा जीविका के लिए कृषि पर निर्भर है। तीसरी बात, उत्तरी राज्यों से दक्षिणी राज्यों और देशभर से विदेश की तरफ पलायन स्थिर एवं सुरक्षित जीवन के लिए सबसे आकर्षक विकल्प बना हुआ है। चौथी बात, दूसरा सबसे प्रमुख आकर्षण सरकारी नौकरी के प्रति है जिसे पाने के चक्कर में लाखों युवा अपना समय बरबाद कर रहे हैं।
वर्तमान स्थिति में सरकार ने उन लोगों के लिए मुआवजे का प्रावधान कर रखा है जो कहीं पलायन नहीं कर पा रहे या सरकारी नौकरी में नहीं आ रहे हैं। कृषि क्षेत्र में लगे लोगों को ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना का सहारा दिया जा रहा है। सभी तरह की सब्सिडी और नकदी अंतरण से यह योजना इन लोगों को रोजमर्रा की जरूरतों का महज कुछ हिस्सा खरीदने में मदद मिल रही है। इसका परिणाम यह है कि देश लचर कृषि क्षेत्र, 90 प्रतिशत अनौपचारिक अर्थव्यवस्था और लगभग विनिर्माण उद्योग विहीन उत्तर एवं पूर्व (जहां देश की अधिकांश आबादी रहती है) जैसी चुनौतियों से उलझ कर रह गया है।
दूसरी चुनौती उपभोग/खपत से जुड़ी है। दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था में उपभोग में वृद्धि पिछले कुछ समय से कमजोर रही है। खतरनाक बात तो यह है कि उपभोग का एक बड़ा हिस्सा ऋणों पर टिका हुआ है। दूसरी तरफ, महंगी वस्तुओं का उपभोग बेरोकटोक बढ़ता ही जा रहा है। वाहन जैसे क्षेत्रों में महंगी कारें बिक्री बढ़ा रही हैं, न कि सस्ती कारें। हवाई यात्रा की बढ़ती मांग के बीच रेल सेवा जरूरत के हिसाब से सीमित की जा रही है। न्यूनतम वेतन पाने वाले लोगों के लिए ईंधन और बिजली की तरह आवास की व्यवस्था भी सब्सिडी के दम पर ही हो पाएगी। दुनिया में सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था में अधिकांश लोग ऋण, सब्सिडी के बिना बेहतर और आर्थिक रूप से सुरक्षित जीवन जीने की हालत में नहीं हैं।
तीसरी चुनौती उत्पादकता से जुड़ी है। मेरे विचार से यह समस्या असमानता का संकेत है और इसका तार समाज से जुड़ा हुआ है। इस चुनौती से निपटने के लिए सामूहिक रूप से प्रयास करना होगा। उत्तर प्रदेश और बिहार नेपाल से गरीब हैं। इन दोनों राज्यों से श्रम एवं पूंजी का प्रवाह देश के पश्चिमी और दक्षिणी राज्यों में होता है। इसका मतलब है कि ऐसे लोगों के मूल स्थानों या राज्यों में विनिर्माण एवं सेवा क्षेत्रों से जुड़ी नौकरियां नहीं होने के कारण उन्हें देश के दूसरे राज्यों में रोजगार के लिए पलायन करना पड़ रहा है। आधारभूत ढांचे का इस्तेमाल सामान तटीय बंदरगाहों तक ले जाने के लिए न होकर लोगों को एक से दूसरे स्थान तक पहुंचाने (कोविड महामारी का वाकया तो जरूर याद होगा) के लिए हो रहा है। जाति, धर्म एवं लिंग भी उत्पादकता पर असर डालते हैं। भाई-भतीजावाद और अपराधशीलता प्रवृत्ति को समाज में संचय और संपन्नता के बजाय स्थान मिलना स्थिति को और भयावह बना रहा है।
ये भारत के विकास की राह में गंभीर, बदतर होती और लंबे समय से चली आ रही चुनौतियां हैं। मगर ये मुद्दे चुनाव में अधिक प्रभावी नहीं दिखे और न ही नतीजों में इनकी स्पष्ट छाप मिली। चुनाव के बाद जनता के फैसले यानी नतीजों में विविधता यह बात स्पष्ट करती है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) को उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में नुकसान उठाना पड़ा वहीं, इंडी गठबंधन (इंडिया) को इन दोनों राज्यों में बढ़त मिली मगर बिहार और तेलंगाना में इसका उल्टा हुआ। यह इस बात का संकेत है कि विकास से जुड़े मुद्दे मौजूदा चुनावों के लिए प्रत्यक्ष तौर पर मायने नहीं रखते हैं।
अगर चुनावी राजनीति इस प्रतिस्पर्द्धा के इर्द-गिर्द घूमती है कि कौन बेहतर क्षतिपरक राज्य दे सकता है या आर्थिक अवसर हाथ से निकलने की भरपाई बेहतर तरीके से कौन कर सकता है तो फिर चुनौतियां कम नहीं होंगी। इनके साथ अगर संवैधानिक लोकतांत्रिक मूल्यों का पालन और राजनीतिक समावेशन लगातार विवाद में रहते हैं तो देश वास्तविक रूप से कभी विकासोन्मुख नहीं हो पाएगा।
राजनीतिक तंत्र इन व्यापक चुनौतियों से बेपरवाह है और केवल राजकोषीय घाटे एवं रीपो दर में मामूली बदलाव और कर से जुड़े विषयों पर बहस करने से ही संतुष्ट है। इन बातों में बेवजह समय बरबाद न कर नीति निर्धारकों को वर्तमान समय की चुनौतियों को दूर करने पर ध्यान देना चाहिए।
मगर देश में इन चुनौतियों से निपटने वाले लोग तभी आएंगे जब राजनीतिज्ञ बदलाव लाने की दिशा में काम करेंगे और एक ऐसी राजनीतिक विचारधारा को आगे बढ़ाएंगे जो राष्ट्र के विकास के लिए सामूहिक प्रयासों को बढ़ावा देने में सक्षम होगी।
एक ऐसी औद्योगिक नीति पर विचार किया जाना चाहिए जिससे विनिर्माण में नयापन आए और औपचारिक आर्थिक गतिविधियों की हिस्सेदारी बढ़ सके। न्यूनतम वेतन अर्जित करने वालों की घरों की जरूरत पूरी करने के लिए मध्यम अवधि की योजना जरूरी है। केवल निर्यात और यूनिकॉर्न (एक अरब डॉलर से अधिक मूल्यांकन वाली स्टार्टअप इकाई) को लेकर खुशफहमी में रहने से काम नहीं चलेगा। राष्ट्रीय आय में वेतन की शिथिल पड़ी हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए एक सक्रिय आय नीति की आवश्यकता है। इसके साथ ही एक ऐसी नीति की भी जरूरत है जिससे पारिस्थितिकी तंत्र और आर्थिक दृष्टिकोण से स्थिर एवं लाभकारी कृषि क्षेत्र के हितों को शहरी क्षेत्रों में बड़बोलापन दिखाने वाले लोगों को सस्ता भोजन देकर हमेशा सूली पर नहीं चढ़ाया जाना चाहिए। इस तरह के विचार राजनीतिक बहस का हिस्सा होना चाहिए और संसद में इन पर चर्चा होनी चाहिए। मगर ऐसा नहीं हो पा रहा है।
चुनावों में अधिक वजूद नहीं मिलने और पहले से मौजूद मुद्दों पर मची तकरार के बावजूद मैं लगातार एक समावेशी विकास की राह पर सभी के साथ आने की उम्मीद कर रहा हूं। समावेशी विकास की यह नीति देश को ब्राजील के बजाय जापान की तरह तरक्की करने की राह पर ले जाएगी। लंबे समय से चले आ रहे विवादित मुद्दों के समाधान के लिए इससे बेहतर कोई विकल्प नहीं हो सकता। समावेशी विकास की नीति एक प्रभावी औजार है।
Date:19-06-24
शांति की राहेंसंपादकीय
रूस यूक्रेन युद्ध की समाप्ति का रास्ता तलाशने के उद्देश्य से इस सप्ताह के अंत में स्विट्जरलैंड में एक शांति शिखर सम्मेलन का आयोजन हुआ जिसमें करीब 90 देशों ने हिस्सा लिया। विश्लेषकों का मानना है कि दो वर्षों के बाद युद्ध विराम को लेकर आयोजित इस शांति शिखर सम्मेलन का उद्देश्य यथार्थपरक है, लेकिन यह आकलन वास्तविकता से कई अर्थों में भिन्न है। सम्मेलन में करीब 100 प्रतिनिधिमंडल आये थे, जिनमें से ज्यादातर पश्चिमी देशों से थे और ये सभी रूस विरोधी थे। यह शिखर सम्मेलन युद्ध विराम और शांति स्थापित करने के उद्देश्य से कोसों दूर इसलिए भी रहा है इसमें रूस को आमंत्रित ही नहीं किया गया। रूस सबसे महत्त्वपूर्ण हितधारक है और जब तक रूस और यूक्रेन वार्ता की मेज पर एक साथ नहीं बैठेंगे तब तक शांति का कोई परिणाम ही सामने नहीं आएगा। इस शांति शिखर सम्मेलन से ठीक पहले जी- 7 देशों के सम्मेलन में दुश्मन देश रूस की जब्त 4177 अरब रुपए की संपत्ति यूक्रेने को देने की घोषणा की गई है। यूक्रेन को एक तरफ नाटो देश हथियार दे रहे हैं और दूसरी ओर अमेरिका लगातार फंड दे रहा है। अमेरिका बार-बार कह रहा है कि यूक्रेन को इस तरह की मदद लगातार मिलती रहेगी। अब अगर जी – 7 देशों की घोषणा के मुताबिक रूस की जब्त संपत्ति यूक्रेन को दी गई तो एक नया मोर्चा खुल जाएगा। यह दो दिवसीय शांति सम्मेलन था। अंतिम दिन यानी रविवार को एक साझा बयान जारी किया गया जिसमें यूक्रेन की क्षेत्रीय अखंडता बरकरार रखने की शर्त को मुख्य आधार बनाया गया है। भारत सहित 12 देशों ने इस शर्त को नामंजूर करते हुए साझा बयान पर हस्ताक्षर करने से इनकार कर दिया। इन देशों का मानना है कि इस शर्त से टकराव की स्थिति बनी रहने की आशंका है। भारत ने सार्वजनिक रूप से कभी भी रूस को आक्रामक देश नहीं कहा है जैसा कि पश्चिमी देश मानते हैं। पिछले दिनों एक जनमत सर्वेक्षण में यह बात सामने आई थी कि यूक्रेन की एक बड़ी आबादी का विजय के संदर्भ में निराशावादी रुख है। वे सीमित युद्ध परिणामों को स्वीकार करने के लिए तैयार हैं। यह भी सत्य है कि दो साल से जारी इस भीषण युद्ध के बाद भी जेलेंस्की और पुतिन दोनों के लिए विजय मृगतृष्णा बनी हुई है। युद्ध विराम और शांति स्थापित करने के लिए पश्चिमी देशों को स्वप्नद्रष्टा होने की बजाय जमीनी हकीकत को समझना होगा।
Date:19-06-24
पाठ्य पुस्तकों में सकारात्मक बदलावप्रमोद भार्गव
राष्ट्रीय शैक्षिक एवं अनुसंधान और प्रषिक्षण परिषद् (NCERT) की पुस्तकों में पढ़ाए जाने वाले पाठों में बदलाव की शुरुआत साकारात्मक नजरिए से हो गई है। अब 12वीं कक्षा की राजनीति विज्ञान की किताब में से बाबरी मस्जिद, हिंदुत्व की राजनीति 2002, गुजरात दंगों से जुड़े पाठ को हटा दिया है। इसकी जगह ‘राम जन्मभूमि आंदोलन की विरासत क्या है’ इस पाठ को जोड़ा गया है। इससे पहले इतिहास की पुस्तकों में राखीगढ़ी और आर्यों के मूल स्थान से जुड़े पाठ जोड़े गए हैं।
एनसीआरटी की पुस्तकों में वाकई सकारात्मक बदलाव हो रहे हैं। इसके पहले भारतीय ज्ञान प्रणाली के संदर्भ में महरौली के लौह स्तंभ के बारे में भी बताया गया है। ऋग्वेद में लोहे के आविष्कार के बारे में बताया गया है। इसी क्रम में सोना, तांबा और कांसा धातुओं के अविष्कार किए गए। अतएव ऐसे पाठों को जोड़ना भारतीय विज्ञान की विरासत को छात्रों के सामने लाना है। इसी क्रम में भारत के इतिहास में आर्य अब आक्रामणकारी नहीं, बल्कि भारतीय मूल के रूप में दर्शाए गए हैं। 21 वर्ष की खींचतान और दुनियाभर में हुए अध्ययनों के बाद आखिरकार यह तय हो गया कि आर्य सभ्यता भारतीय ही थी। राखीगढ़ी के उत्खनन से निकले इस सच को देश के पाठ्यक्रमों में शामिल करने का श्रेय ‘राखीगढ़ी मैन’ के नाम से प्रसिद्ध हुए प्राध्यापक वसंत शिंदे को जाता है। एनसीईआरटी की कक्षा 12वीं की किताब में बदलाव किया गया है। इसमें इतिहास की पाठ्य पुस्तक में ‘ईट, मोती और हड्डियां : हड़प्पा सभ्यता’ नामक पाठ में आर्यों को मूल भारतीय होना बताया है। इसके अलावा कक्षा 7, 8, 10 और 11 के इतिहास और समाजशास्त्र के पाठ्यक्रमों में भी बदलाव किया गया है। इतिहास तथ्य और घटना के सत्य पर आधारित होता है। इसलिए इसकी साहित्य की तरह व्याख्या संभव नहीं है। विचारधारा के चश्मे से इतिहास को देखना उसके मूल से खिलवाड़ है, परंतु अब आर्यों के भारतीय होने के संबंधी एक के बाद एक शोध आने के बाद इतिहास बदला जाने लगा है। इस सिलसिले में पहला शोध स्टेनफोर्ड विविद्यालय के टॉमस कीवीशील्ड ने किया था। 2003 में ‘अमेरिकन जर्नल ऑफ ह्यूमन जेनेटिक्स’ में प्रकाशित इस शोध-पत्र में सबसे पुरानी जाति और जनजाति के वशांणु (जीन) के आधार पर आर्यों के भारत का मूल निवासी बताया गया था। हालांकि वर्ष 2009 में वाराणसी हिंदू विविद्यालय के पूर्व कुलपति प्रो लालजी सिंह और प्रो. थंगराज ने भी आनुवांशिक परीक्षण के बाद आर्यों को मूल भारतीय बताया था। 2019 में प्रो. वसंत शिंदे द्वारा राखीगढ़ी उत्खनन से मिले 4000 साल पुराने वंशाणु की जांच में सबसे बड़ा सच सामने आया। शोध में पाया गया कि राखीगढ़ी से मिला जीन वर्तमान के प्रत्येक भारतीय व्यक्ति में उपलब्ध है। इसके आधार पर यह तथ्य स्थापित हुआ कि भारतीय सभ्यता और संस्कृति आर्यों द्वारा निर्मिंत है। एनसीआरईटी के इतिहास पाठ्यक्रम निर्धारण समिति के अध्यक्ष बनने पर प्रो. शिंदे ने इस तथ्य के आधार पर पाठ्यक्रम में संशोधन कराए हैं। इसी पुस्तक में मराठा शासक छत्रपति शिवाजी के नाम के साथ छत्रपति और महाराज जोड़ा गया है। इसी तरह कक्षा 12वीं के समाजशास्त्र विषय के पाठ्यक्रम से सांप्रदायिक दंगों के चित्र हटाए गए हैं। इतिहास पुस्तकों में यह बदलाव सिनौली-राखीगढ़ी में हुए उत्खननों में मिले साक्ष्यों के आधार पर संभव हुआ है। प्रोफेसर शिंदे ने राखीगढ़ी के उत्खनन के समय बताया था कि अलग-अलग खुदाई में 106 से भी ज्यादा नर-कंकाल मिले हैं। साथ ही भिन्न आकार व आकृति के हवन-कुंड और कोयले के अवशेष मिले हैं। तय है भारत में 5000 साल पहले हवन होते थे। यहीं सरस्वती और इसकी सहायक दृश्यवंती नदी के किनारे हड़प्पा सभ्यता के निशान मिले हैं। ये लोग सरस्वती की पूजा करते थे। आनुवांशिक संरचना के आधार पर हैदराबाद की संस्था ‘सेंटर फॉर सेल्युलर एंड मॉलिक्यूलर बायोलॉजी’ के वैज्ञानिकों द्वारा किए गए इस शोध से जो निष्कर्ष सामने आए थे, उनसे स्पष्ट हुआ था कि मूल भारतीय ही ‘आर्य’ थे। पाश्चात्य इतिहास लेखकों ने पौने दो सौ साल पहले जब प्राच्य विषयों और प्राच्य विद्याओं का अध्ययन शुरू किया तो बड़ी कुटिल चतुराई से जर्मन विद्वान व इतिहासविद् मैक्समूलर ने पहली बार ‘आर्य’ शब्द को जाति सूचक शब्द से जोड़ दिया। वेदों का संस्कृत से जर्मनी में अनुवाद भी पहली बार मैक्समूलर ने ही किया था। ऐसा इसलिए किया गया जिससे आर्यों को अभारतीय घोषित किया जा सके। जबकि वैदिक युग में ‘आर्य’ और ‘दस्यु’ शब्द पूरे मानवीय चरित्र को दो भागों में बांटते थे। प्राचीन साहित्य में भारतीय नारी अपने पति को ‘आर्य-पुरुष’ अथवा ‘आर्य-पुत्र’ नाम से संबोधित करती थी। इससे यह साबित होता है कि आर्य श्रेष्ठ पुरुषों का संकेत-सूचक शब्द था। ऋग्वेद, रामायण, महाभारत, पुराण व अन्य संस्कृत ग्रंथों में कहीं भी आर्य शब्द का प्रयोग जातिसूचक शब्द के रूप में नहीं हुआ है। आर्य का अर्थ ‘श्रेष्ठि’ अथवा ‘श्रेष्ठ’ भी है। यदि आर्य भारत में बाहर से आए होते तो प्राचीन विपुल संस्कृत साहित्य में अवश्य इस घटना का उल्लेख व स्पष्टीकरण होता।
Date:19-06-24
इतने क्यों तपने लगे हमारे घर-शहरकेके पांडेय, प्रोफेसर, अर्बन मैनेजमेंट, आईआईपीए
बेतहाशा बढ़ रही गरमी की एक वजह कार्बन उत्सर्जन नियंत्रित करने की हमारी विफलता भी है। यह सही है कि जलवायु परिवर्तन के कारण अब हमारे शहर 50 डिग्री सेल्सियस तक गरम होने लगे हैं, लेकिन सच यह भी है कि शहरी नियोजन और प्रबंधन में जो सामंजस्य दिखना चाहिए, वह नहीं दिख रहा। राजधानी दिल्ली में ही मास्टर प्लान 2041 तैयार है, जिसमें ‘ब्लू-ग्रीन पॉलिसी’ पर खूब जोर दिया गया है। यहां ‘ब्लू’ का अर्थ है, जल-स्रोतों और कचरे का उचित प्रबंधन। यानी, दिल्ली के भूगोल में जल-इकाइयों को बेहतर बनाना और कूड़े का वाजिब निस्तारण करना।
विकसित देशों में पांच से दस प्रतिशत कचरा ही डंपिंग ग्राउंड में जाता है, जबकि अपने यहां इसका उल्टा हो रहा। चूंकि कचरा कार्बन उत्सर्जन का एक बड़ा स्रोत होता है, इसलिए माना गया है कि सीवेज और कूडे़ का प्रबंधन आबोहवा को बेहतर बना सकता है। वहीं, मास्टर प्लान में ‘ग्रीन’ का अर्थ है- हरित पट्टियां या हरियाली का विस्तार। इसके तहत शहरी वानिकी को बढ़ाने का प्रयास किया जाता है। तापमान नियंत्रित रखने का यह एक मान्यता प्राप्त तरीका है। मगर विडंबना यह है कि इस मास्टर प्लान को अब तक अधिसूचित नहीं किया जा सका है।
पर्यावरण की अनदेखी का यह इकलौता मामला नहीं है। साल 2021 में कॉप-26 की बैठक में हमारी तरफ से यही कहा गया कि साल 2070 तक हम शून्य उत्सर्जन, यानी नेट जीरो के लक्ष्य तक पहुंच सकते हैं, जबकि अमेरिका व यूरोपीय संघ ने वर्ष 2050 तक और चीन ने 2060 तक इस लक्ष्य को पाने का भरोसा दिया है। यहां यह जानना महत्वपूर्ण होगा कि कार्बन उत्सर्जन के मामले में चीन, अमेरिका और यूरोपीय संघ के बाद भारत का ही स्थान आता है। हालांकि, इसका यह अर्थ नहीं कि शहरी नियोजन में हमने पर्यावरण को लेकर आंखें मूंद रखी हैं। पिछले कुछ वर्षों से, जब से यह मुद्दा जोर-शोर से सामने आया है, इस संदर्भ में तमाम तरह की योजनाएं बनाई गई हैं। मगर जितनी तत्परता योजनाएं बनाने में की गईं, संभवत: उतनी ही सुस्ती उनके क्रियान्वयन में बरती गई। प्रबंधन और नियोजन में तालमेल की इस कमी को दूर करना बहुत आवश्यक है।
दरअसल, योजनाओं का प्रबंधन सही तरीके से न हो, तो लक्ष्य को पाना मुश्किल होता है। यही कारण है कि उन इलाकों में, जहां सुविधाएं प्रदान नहीं की गई हैं, जहां हरित-पट्टी का अभाव है, जहां पार्क नहीं हैं या जहां वानिकी विकसित नहीं की गई है, गरमी का प्रकोप अधिक रहता है। शहरों में हरित क्षेत्र लगातार सिमट रहे हैं, जिसे बढ़ाने के लिए नियोजित ढंग से प्रयास किए जाने की जरूरत है। साल 2015 में तेलंगाना ने ऐसे ही एक सफल प्रयास की शुरुआत की थी। ‘हरिता हारम’ नामक इस योजना में राज्य के हरित क्षेत्र को 24 फीसदी से बढ़ाकर 33 प्रतिशत करने का लक्ष्य रखा गया था और अब तक कई दूसरे प्रयासों के अतिरिक्त यहां के शहरों में 75 हजार हेक्टेयर से अधिक भूमि पर 109 से अधिक पार्क विकसित किए जा चुके हैं। इस योजना में वृक्षारोपण के साथ-साथ उनकी देखभाल के लिए इन्सेंटिव की व्यवस्था भी की गई है।
इसी तरह, तापमान को नियंत्रित रखने के लिए वर्षा-जल के संरक्षण और दूषित जल के दोबारा इस्तेमाल की व्यवस्था भी आवश्यक है। मगर यहां तो जलापूर्ति में भी खासा कुप्रबंधन दिखता है। जल-संकट तो अपनी जगह है, लेकिप इसे नल के जरिये घरों तक पहुंचाने में ही करीब 30-40 फीसदी पानी बर्बाद हो जाता है। इस लीकेज को यदि हम रोक सकें, तो स्वाभाविक ही पानी की उपलब्धता बढ़ जाएगी। मगर इसके लिए पानी की पाइपों की नियमित देखभाल अनिवार्य है, जिसमें हमारा तंत्र चूक जाता है।
यह सिर्फ एक धारणा है कि बड़े शहरों में बहुमंजिली इमारतें ताप को न्योता देती हैं। अलबत्ता, चीन, कोरिया, हांगकांग ने तो ऐसे ही कार्यों से विकास का रास्ता नापा है। वास्तव में, कमी बहुमंजिली इमारतों के निर्माण में नहीं, बल्कि बुनियादी ढांचों की कमी में है। अपने देश में शहरी निर्माण-कार्यों के तहत इमारतें तो बना दी जाती हैं, लेकिन जरूरी हरित पट्टी का विकास नहीं किया जाता। विकास-कार्यों के नाम पर पौधों की बलि ले ली जाती है, लेकिन शहरी वानिकी बढ़ाने पर अमूमन गौर नहीं किया जाता। अब तो कई देशों में ‘ग्रीन बिल्डिंग’ भी बनने लगी हैं, जिसके तहत बनाई गई इमारतों में गरमी सहने की क्षमता अधिक होती है, लेकिन अपने यहां दिल्ली से सटे गुरुग्राम में संभवत: एक इमारत ही इस नई तकनीक पर बनाई जा सकी, शेष बिल्डरों ने मानो उदासीनता बरत रखी है।
जल-इकाइयों को लेकर भी हमारा व्यवहार रूखा रहता है। गुरुग्राम या बेंगलुरु जैसे बड़े शहरों में भी जल-इकाइयां बढ़ाना तो दूर, पानी के प्राकृतिक बहाव को भी हमने बाधित कर दिया है। ऐसे कई उदाहरण देश भर में पसरे हुए हैं कि कैसे नदी-पेटी में अथवा डूब क्षेत्र को भी निर्माण-योजना का हिस्सा बना दिया गया, झीलें खत्म कर दी गईं, तालाब पाट दिए गए और हरित क्षेत्रों को निर्माण-कार्यों की भेंट चढ़ा दिया गया। जब तक इन विसंगितयों को दूर करने के प्रयास नहीं होंगे, हमारे शहर यूं ही तपने को विवश होते रहेंगे।
कूड़ा निस्तारण, जल-स्रोतों का विस्तार, हरियाली का विकास, ग्रीन बिल्डिंग पर जोर, सुगम यातायात व्यवस्था, जल प्रबंधन आदि ऐसे क्षेत्र हैं, जिन पर काम करने की जरूरत है। बदलते परिवेश में नियोजन और प्रबंधन में तेज रफ्तार आवश्यक है। रास्ता यहीं से निकलेगा। शहरों का जो विस्तार अब हो रहा है, उनमें तो कुछ हद तक इन मापदंडों का ख्याल रखा जाता है, लेकिन जिन इलाकों में पहले से ही बेतरतीब इमारतें बन चुकी हैं, वहां के लिए खास नीतियां बनानी होंगी। स्मार्ट सिटी के तहत शहरों की बेहतरी की कुछ योजनाएं बनाई गई हैं। अब यह चिह्नित करने की जरूरत है कि स्मार्ट शहरों में क्या-क्या काम हुए हैं। हमें उन कामों को आगे बढ़ाना ही होगा, जो ‘नए विकास’ को पर्यावरण के अनुकूल बनाए। अब चूंकि वैश्वीकरण का दौर है, तो कोई भी नई संकल्पना किसी एक परिधि तक नहीं सिमटी रह सकती। हम अन्य देशों से भी सबक लेकर अपने यहां पर्यावरण के अनुकूल शहरों का विकास कर सकते हैं। इससे हमारे लिए शून्य कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य पाना कहीं ज्यादा आसान हो जाएगा।
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वर्तमान दौर की खंडित भूराजनीति में वैश्विक संस्थाओं का कोई खास महत्व नही रह गया है। ऐसी ही एक संस्था अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय या इंटरनेशलन क्रिमिनल कोर्ट या आईसीसी है। एक प्रकार से यह संस्था अपने अंतिम क्षणों का सामना कर रही है।
कुछ बिंदु –
– वैश्विक कानूनी संस्थाओ की स्थापना 1945 के सैन फ्रांसिस्को सम्मेलन में हुई थी।
– इसके बाद की विश्व-व्यवस्था श्रेणीबद्ध है। यानि कि संयुक्त राष्ट्र संगठन के नीचे बाकी की वैश्विक संस्थाएं आती हैं। यहाँ पाँच प्रमुख वैश्विक शक्तियों को वीटो पॉवर मिला हुआ है। यही पाँच शक्तियां विश्व व्यवस्था को बनाए रखने के लिए प्राथमिक रूप से जिम्मेदार है। और इसे बाधित करने के लिए भी वही जिम्मेदार हैं।
– आईसीसी को यह अधिकार है कि वह राष्ट्रीय न्यायालयों को दरकिनार करके, युद्ध अपराधों से जुड़े किसी भी व्यक्ति पर मुकदमा चला सकती है। लेकिन इसमें वह प्रवर्तन एजेंसियों को दरकिनार नहीं कर सकती। अपनी शक्ति का इस्तेमाल करते हुए गत वर्ष इसने पुतिन के विरूद्ध और इजरायल-हमास संघर्ष में नेतन्याहू सहित पांच महत्वपूर्ण व्यक्तियों के विरूद्ध गिरफ्तारी वारंट जारी किया है। लेकिन सुनने वाला कौन है?
– नियम आधारित व्यवस्था के दो भाग हैं – संघर्ष को बचाना और दूसरा आर्थिक सहयोग। संप्रभु राज्यों के बीच विचार-विमर्श और बातचीत से ही यह संतुलन पैदा हो सकता है। लेकिन फिलहाल यही दबाव में है।
– यही कारण है कि विश्व व्यापार संगठन, संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय जैसे बहुपक्षीय निकाय अप्रभावी हो चले हैं।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 22 मई, 2024
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Date: 18-06-24
The Verdict SpeaksPolitics is hotting up over speaker, dy speaker posts. BJP not wrong to want the former. Oppn should get the latter.TOI Editorials
The churn over speaker’s and deputy speaker’s posts is throwing up more froth than cream. Politicisation of these two constitutional offices is again worth a lament. The process started some time back. Every year, it turns a shade worse. BJP is likely to retain the post. NDA ally TDP had eyed it, which probably prompted INDIA’s stand that it would support Chandrababu Naidu’s candidate for speaker in the event of an election.
Verdict’s message | LS election’s sobering verdict returned BJP to office with significantly smaller numbers. With 240 seats, it is understandable that BJP wants to bag the speaker’s post, though to date it remains noncommittal. We’ll know soon if BJP’s choice will be a consensus candidate or if elections will be held.
Speaker’s role | From allowing questions and debate to disqualifying MPs, from deciding on defections to setting the agenda, the speaker and deputy speaker are Parliament’s conscience-keepers, tasked to run House business in an orderly manner. Essential attributes expected are impartiality, confidence they inspire in minority groups and Opposition, and freedom from party affiliations or bias. Given the hostile political atmosphere, such words sound outdated in the republic’s 75th year.
Legal fiction | One need only look to Maharashtra in 2023 to see how a speaker unfamiliar with constitutional law, and seen as a “party man”, can cause irrevocable damage to a House. But such is the post’s authority that Supreme Court restricted itself on deciding on defections of Sena and NCP MLAs, lest it interfere in speaker’s jurisdiction. But the speaker’s delayed and dramatic decisions made everyone a loser in Maharashtra assembly.
Record vacancy | The 17th Lok Sabha from 2019-2024 was the first one ever without a deputy speaker throughout its duration – though Article 93 of the Constitution requires that LS elect a speaker and deputy speaker ‘as soon as may be’. BJP allowed the vacancy, doing away with longstanding parliamentary convention of the post given to opposition parties. A CJI-led bench last Feb heard a PIL on the vacancy. Little came of it.
Be parliamentary | When the 18th LS meets for the first time later this month, govt must remember the mandate’s enormous message – the vote was for coalition, collaboration. The spirit of the people’s mandate and convention would be upheld were the post of deputy speaker to go to Opposition. That is how it should be.
Date: 18-06-24
Knowledge Economy, Not Silly ConformityET Editorials
A school or college syllabus is not propaganda. One would ha- ve thought that the National Council of Educational Research and Training (NCERT) would know this difference. However, comments by NCERT director DP Saklani on the new Class 12 political science textbook suggest otherwise. His explanation for the removal of sections pertaining to the demolition of Ba- bri Masjid in 1992 and communal violence in the 2002 Gujarat riots is that these ‘can create violent and depressed citizens’. This is straight out of the Agitprop 101 manual. Saklani also asked whether studying such ‘episodes’ is the purpose of edu- cation. He justified these latest deletions by pointing out the ‘lack’ of similar outcry over the absence of any mention of the 1984 anti-Sikh riots in textbooks. And, thus, we have entered the tu-tu mein-me- in whataboutery of textbook politics.
That India has plans to be a knowledge economy doesn’t sit well with such gro- upthink. The fact that ‘unpleasantness’ is perceived as a criterion for textbook excision tells a sad story about NCERT’s understanding of pedagogy and knowledge. If fake facts for our young are to join the trough of fake news to maintain some skewed notion of national ‘pleasantness’, we’ll be entering pamphleteering territory of ‘Mao’s Little Red Book’ variety instead of one that encourages critical thinking and disparate ideas, and prepares our young to engage and navigate the diffi- cult questions of life and society.
Saklani is right when he says syllabi are updated the world over. Indeed, they must-to incorporate new findings, excise mistakes and make them more engaging. Shielding ‘unplea- sant’ facts, especially in this digital age, is a sure way of produ- cing dimwits who are unable to tell facts from fabrications.
Date: 18-06-24
The vulnerabilities of India’s elderlyFrom social and financial independence to ensuring an active life course, we need to focus on preparatory measures for India’s ageing population.S. Irudaya Rajan is Chair at the International Institute of Migration and Development (IIMAD), Kerala & U. S. Mishra is Honorary Visiting Professor at the International Institute of Migration and Development (IIMAD), Kerala
The ageing phenomenon is the most notable experience of this century with remarkable improvement in human longevity complemented by the lowest levels of reproduction. While its magnitude and multiplication may appear threatening, there are attempts at redefining this domain not merely in terms of age but other related functioning conditioned by the evolving expansion in longevity on one hand and evolving scenario of vulnerabilities on the other.
In Indian conditions, in particular, the four vulnerabilities of later ages in life course are in terms of restrictions in activities of daily living, multi-morbidity, poverty and absence of any income. On these counts, the Longitudinal Ageing Survey of India (LASI, 2017-18) reports that about 20% of the elderly population experience each of these vulnerabilities. The remedy requires a multi-pronged approach involving the principles of inclusion and adoption of social security measures. Viewing these vulnerabilities as a life course phenomenon, promotion of life preparatory measures has to be put in place; this need not be limited to financial or economic independence per se but also means to ensure healthy active and productive years. Most attempts at evaluation of the ageing phenomenon have maintained an individual focus, wherein the attributes and characteristics of the aged are counted more than circumstances and conditioning of later life.
The rising count of the elderly need not be seen in isolation as the population transition is occurring along with a familial transition. The familial transition needs to be read in consideration of the household compositions and the accommodation pattern of the elderly within them. While there are households without elderly and households with multiple elderly, there are frequent instances of elderly living with elderly within the household. Not only is this living arrangement becoming more and more frequent but there are other features of dependence, care provisioning as well as social security and financial protection assuming prominence in households with elderly compared with those without them. This points to a persistence of vulnerabilities stated above in individual elderly arising simply out of the household features more than individual characteristics.
Contrasting today’s elderly with tomorrow’s, there is every possibility of characteristic advantage in terms of education, life preparation and economic dependence but adversities in health and quality of living owing to rising longevity and emergence of long-term chronic ailments. In this context, the slogan of healthy ageing need not focus on the elderly population but the prospective elderly to a large extent. Limitations as regards activities of daily living (ADL) do show a worsening trend over age even among the elderly population but one wonders as to whether that pattern will be moderated down among the future elderly and be postponed to much later ages of life.
The projected magnitude of the elderly population is estimated at 319 million by mid-century, growing by around 3% a year. This group will be feminine with a sex ratio of 1,065 females per thousand males; further, 54% of elderly women will be widows. While 6% of the elderly men live alone against 9% of their female counterparts, 70% of them are to be found in rural areas. These statistics can be of great use in terms of targeting welfare measures for this population.
The most disturbing feature relates to the health status that is reported to be poor by a quarter of the elderly as against about 20% among the population aged 45 and above. While 75% of the elderly population are victims of one or more chronic diseases, 40% of those aged 45 and above have one or the other disability. With the advent of the global burden of disease, it is apparent that the two threatening forces are diabetes and cancer which appear to be frequent among India’s elderly.
Also, the emerging concern relates to mental health with 20% of those aged above 45 self-reporting some ailment, primarily associated with depression; this is reasonably higher compared with the self-reported extent among the elderly.
There also appears to be food insecurity among India’s elderly where 6% of those above 45 years of age ate smaller portions or skipped meals and 5.3% of them did not eat despite being hungry. This phenomenon may look minimal but has its bearing on nutrition and consequential morbidities.
Recognising these adversities, protection measures are in place in terms of welfare provisioning, legal recourse as well as concessional measures for this group of population. However, there is very little awareness regarding the welfare provisioning. Hardly 12% are aware of the Maintenance and Welfare of Parents and Senior Citizens Act, 2007 and 28% are aware of various concessions offered to the elderly.
On the whole, there are few expectations from life among India’s elderly and their vulnerabilities make them victims of varied forms of abuse in the hands of family, community and society at large. While 5% of them report abuse, they are quite frequent, particularly for women in rural areas where they remain the most neglected. A movement towards creating social agency for this vulnerable group is the need of the hour. Innovative forms of institutions can be brought in place to alter their valuation from liability to an asset. There needs to be a focus on ensuring an active life course for the future elderly.
Date: 18-06-24
स्वास्थ्य खर्च के मामले में आज हम कहां खड़े हैं?संपादकीय
16 मार्च 2017 को नई ‘नेशनल हेल्थ पालिसी’ (एनएचपी) देश को समर्पित करते हुए तत्कालीन स्वास्थ्य मंत्री (जो कि वर्तमान में भी केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री हैं) ने संसद और संसद के बाहर भी अनेक वादे किए थे, जिनमें प्रमुख था स्वास्थ्य पर सरकारी व्यय को चरणबद्ध तरीके से जीडीपी का 2.5 प्रतिशत करना। उन्होंने यह भी बताया था कि सन् 2002 में बनी एनएचपी रोग-शमन केंद्रित थी लेकिन नई नीति रोग-निरोधक होगी। बहरहाल उसके बाद पिछले सात वर्षों में स्वास्थ्य के मद में सरकारी खर्च लगातार घटता हुआ आज 1.26 प्रतिशत यानी वादे का आधा रह गया है। यह भी कहा गया था कि रेगुलेटरी मैकेनिज्म को मजबूत किया जाएगा, लेकिन हाल ही में कैंसर की नकली दवा बनाने वाले एक राष्ट्रीय रैकेट का भंडाफोड़ हुआ है। उस स्वास्थ्य योजना में कुल खर्च का दो-तिहाई प्राइमरी हेल्थ पर खर्च करने का वादा था। लेकिन ताजा स्वास्थ्य रिपोट्र्स और एनएफएचएस के आंकड़े, गांवों और कस्बों में खस्ताहाल स्वास्थ्य सेवाओं की कलई खोल रहे हैं। 2017 से शुरू हुई यह योजना 2014 में बनना शुरू हुई थी। इसे लांच करते समय ये यूनिवर्सल हेल्थकेयर में मील का पत्थर मानी गई थी। लेकिन उसके लिए अपेक्षित धन नहीं मिला, जो वर्तमान खर्च से कम से कम दोगुना होना चाहिए था। आयुष्मान योजना वास्तव में पूरी तरह अमल में आए, इसके लिए पहली शर्त है ब्लॉक और जिले तक के स्वास्थ्य ढांचे में आमूलचूल बदलाव हो, देश में डॉक्टर्स, नर्सेस और दवाओं की भारी कमी है। जहां राज्यों ने इस मद में अपना व्यय पिछले दस वर्षों में डेढ़ गुना (0.64 से 0.96 प्रतिशत) किया है, वहीं केंद्र सरकार का खर्च पूर्ववत (0.28) बना हुआ है।
Date: 18-06-24
भारत भी बदले अपनी तिब्बत नीतिविजय क्रांति, ( लेखक सेंटर फार हिमालयन एशिया स्टडीज एंड एंगेजमेंट के चेयरमैन एवं वरिष्ठ स्तंभकार हैं )
अमेरिकी संसद द्वारा पारित तिब्बत और चीन से जुड़ा नया विधेयक अंतरराष्ट्रीय राजनीति में तिब्बत के मुद्दे को एक नई एवं सार्थक दिशा दे सकता है। ‘तिब्बत-चीन विवाद को सुलझाने के लिए प्रोत्साहन संबंधी कानून (2024)’ पर अब केवल अमेरिकी राष्ट्रपति के हस्ताक्षर होने शेष हैं। राष्ट्रपति के हस्ताक्षर के बाद इस पर पूरी तरह अमल करना भावी अमेरिकी प्रशासन के लिए कानूनी बाध्यता बन जाएगा। यह कानून भले ही तिब्बत के निर्वासित शासक दलाई लामा और चीन सरकार को बातचीत के जरिये परस्पर विवाद सुलझाने में सहयोग करने वाले एक दोस्ताना कदम जैसा लगता हो, लेकिन इसकी भाषा से समझ आता है कि यह तिब्बत को 73 साल से चले आ रहे चीनी उपनिवेशवादी कब्जे से मुक्ति दिलाने के अभियान की घोषणा है। अमेरिका की इस नई पहल में भारत जैसे उन एशियाई देशों के लिए भी नई संभावनाओं के द्वार खुलने के आसार बनते दिख रहे हैं, जिनकी राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वभौमिक हितों पर तिब्बत पर चीनी अवैध कब्जे के बाद खतरे बढ़े हैं।
अमेरिका की राजनीति में भले ही रिपब्लिकन और डेमोक्रेट्स दोफाड़ हों, मगर उक्त कानून पर दोनों दलों में सर्वसम्मति का भाव है और इसीलिए दोनों दलों के सांसद दलाई लामा से मिलने आ रहे हैं। इस कानून में तिब्बत को लेकर बेहद आक्रामक नीति अपनाने वाले राष्ट्रपति शी चिनफिंग के रवैये को चुनौती दी गई है। तिब्बत को चीन का ‘अविभाज्य अंग’ बताने, उससे जुड़े हर सवाल को चीन का ‘आंतरिक’ विषय कहने, तिब्बत की चर्चा मात्र पर आंखें तरेरने वाले एवं तिब्बत और अपनी ‘वन-चाइना’ पालिसी को लेकर अति आग्रही चिनफिंग की इससे जुड़ी नीतियों को नए कानून में अमान्य ठहराया गया है। इसमें चीन के हर उस दावे को झूठा घोषित किया गया है, जिन्हें पिछले 40 साल से चीन सरकार दलाई लामा के साथ वार्ता की मूलभूत शर्तों के रूप में पेश करती आई है। इसमें स्पष्ट रूप से रेखांकित किया गया है कि तिब्बत एक कब्जाया हुआ देश है और वह इतिहास में कभी चीन का हिस्सा नहीं रहा। चीन सरकार तिब्बत की निर्वासित सरकार के साथ बातचीत में तिब्बत की परिभाषा को मात्र ‘तिब्बती स्वायत्त क्षेत्र’ (टार) तक सीमित मानती है, जबकि अमेरिकी कानून में ‘तिब्बत’ के दायरे में उसके खम एवं आम्दो प्रांतों के उन हिस्सों को भी शामिल किया गया है, जिन्हें तिब्बत को कब्जाने के बाद उन्हें तिब्बत से काटकर यून्नान, सिचुआन, चिंघाई और गांसू जैसी सीमावर्ती चीनी प्रांतों में मिला दिया गया।
नए कानून में धर्मशाला-बीजिंग की प्रस्तावित शांति वार्ताओं में तिब्बत की ओर से न केवल दलाई लामा और उनके प्रतिनिधियों को भाग लेने का अधिकारी माना गया है, बल्कि अब धर्मशाला में तिब्बती जनता के निर्वाचित प्रतिनिधियों को भी इसमें शामिल करके केंद्रीय तिब्बती प्रशासन को ‘तिब्बती सरकार’ जैसी परोक्ष मान्यता भी दी गई है। दलाई लामा के अगले अवतार को चीनी कम्युनिस्ट पार्टी का क्षेत्राधिकार घोषित करने पर तुले हुए चिनफिंग के जले पर नमक छिड़कते हुए उक्त कानून में स्पष्ट कहा गया है कि दलाई लामा या अन्य अवतारी लामाओं की खोज करने और उनकी नियुक्ति तथा शिक्षा-दीक्षा का एकमात्र अधिकार दलाई लामा और तिब्बती समुदाय का है। यदि इस मामले में चीन का कोई हस्तक्षेप पाया गया तो अमेरिकी राष्ट्रपति और संबंधित अमेरिकी एजेंसियों की यह कानूनी जिम्मदारी होगी कि वे ऐसे सभी चीनी अधिकारियों पर जरूरी प्रतिबंध लगाएं। यह कानून अमेरिकी सरकार को तिब्बत के मामले में चीन के प्रत्येक दुष्प्रचार का जवाब देने और तिब्बत के समर्थन में वैश्विक समर्थन जुटाने के लिए दूसरे देशों के साथ मिलकर एक अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक संगठन बनाने का भी निर्देश देता है। तिब्बत को लेकर अमेरिकी सरकार एकाएक नहीं जागी। तिब्बत के समर्थन में अमेरिकी संसद दर्जनों बार कई कानून और प्रशासनिक आदेश पारित कर चुकी है। संयुक्त राष्ट्र महासभा में तिब्बत के समर्थन में 1959, 1961 और 1965 के दौरान प्रस्ताव पारित कराने में अमेरिका ने शुरुआती प्रयास किए थे, लेकिन फिर चीन के साथ गलबहियां बढ़ाने के चलते तिब्बत का मुद्दा ठंडे बस्ते में चला गया।
नए अमेरिकी कानून के कुछ प्रविधान भारत, नेपाल, भूटान और अन्य एशियाई देशों को चीन की दादागीरी से राहत दिलाने की राह दिखाने वाले हैं। इनमें सबसे प्रमुख मुद्दा है दलाई लामा के अगले अवतार पर चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के एकाधिकार को चुनौती। इन तीनों देशों के समक्ष एक खतरा यह है कि अगर चीन सरकार अगले दलाई लामा और अन्य अवतारी लामाओं पर अपने नियंत्रण में सफल हो गई तो तिब्बती बौद्ध प्रभाव वाले पूरे हिमालयी क्षेत्र में चीनी दखल बढ़ जाएगा। इससे वहां चीन के लिए उथल पुथल बढ़ाने का रास्ता खुल जाएगा। तिब्बत-चीन विवाद में धर्मशाला के निर्वासित तिब्बती प्रशासन को अमेरिकी मान्यता से इन देशों को तसल्ली मिल जाएगी कि वर्तमान दलाई लामा के बाद चीन को तिब्बत में पूरी मनमानी करने और इन देशों के बौद्ध क्षेत्रों पर आक्रामकता बढ़ाने की छूट नहीं मिल पाएगी। तिब्बत को लेकर अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक लामबंदी की पहल से भी इन एशियाई देशों और विशेष रूप से भारत को एक ऐसा शक्तिशाली मंच उपलब्ध होगा, जहां से वह चीनी दबंगई को चुनौती दे पाएगा। भारत को भी अब तिब्बत पर अपनी नीति बदलनी होगी। चीनी आक्रामकता के शिकार भारत और दक्षिण पूर्वी एशियाई देशों को तिब्बत के सवाल को धार देनी होगी।
भारत के लिए तो नया अमेरिकी कानून ऐसा अनुकूल अवसर सिद्ध हो सकता है, जिसकी कमी उसे पिछले 70 वर्षों से खटकती आ रही थी। आज भारत को भलीभांति समझ आ चुका है कि वह हिमालयी क्षेत्र में चीनी दादागीरी का केवल इसीलिए शिकार हो रहा है, क्योंकि तिब्बत पर कब्जा जमाने के बाद चीनी सेनाएं भारत की सीमा तक आ पहुंची हैं। चीन अभी तिब्बत को अपनी छावनी की तरह इस्तेमाल कर रहा है। ऐसे में यदि अमेरिका की पहल पर तिब्बत को चीन से मुक्ति मिल जाती है तो न केवल भारत, बल्कि नेपाल और भूटान भी चीन की दादगीरी से मुक्त हो जाएंगे।
Date: 18-06-24
झुलस रही जैव-विविधताअखिलेश आर्येन्दु
नवम्बर, 2023 से अब तक उत्तराखंड के तमाम इलाकों में लगी आग की तकरीबन एक हजार दो सौ बयालिस घटनाएं दर्ज की जा चुकी हैं जिससे 1,696 हेक्टेयर क्षेत्रफल की वन संपदा का नुकसान हो चुका है। कम से कम दस लोगों की मौत अब तक हो चुकी है। जैव-विविधता का जो नुकसान हुआ है, उसका अनुमान लगाना मुश्किल हैं। जैव-विविधता और जन-गण का नुकसान अभी रु का नहीं है, जिस पर तुरंत काबू पाने की जरूरत है।
सरकारी आंकड़े के मुताबिक राज्य के कुमाऊं मंडल में सबसे ज्यादा 598 और गढ़वाल मंडल में 532 जंगल की आग की घटनाएं घटीं। पिछले आठ महीने में आग की घटनाओं से वन संपदा का ही नाश नहीं हुआ है, बल्कि काफी बड़े इलाके में तपिश भी बढ़ गई है। इसका असर रानीखेत और अल्मोड़ा के जंगलों में बेकाबू आग के रूप में देखा जा सकता है। आग से जंगल ही नहीं जल रहे हैं, बल्कि लोगों के घर, दुकान और ऑफिस को भी नुकसान हो रहा है। महज दिल्ली में ही 26 मई, 2024 तक 8912 घटनाएं घट चुकी हैं, जिनमें 55 लोगों की जान जा चुकी है। अरबों का नुकसान हो चुका है।
देश-दुनिया में हर साल आग की लाखों घटनाएं घटती हैं जिससे करोड़ों की संपत्ति नष्ट होती है, मवेशी मारे जाते हैं, और कई लोग इसकी भेंट चढ़ जाते हैं। सरकारों के आग पर काबू पाने और मुस्तैदी के सारे दावे धरे रह जाते हैं। अब तक आग की बाइस हजार से अधिक घटनाएं देश के विभिन्न हिस्सों में घट चुकी हैं, जिससे करोड़ों-अरबों की संपत्ति खाक हो चुकी है। मवेशी और जन धन की जो हानि हुई है, वह अलग। देश के विभिन्न हिस्सों में जंगलों में आग लगने की घटनाएं लगातार बढ़ती जा रही हैं खासकर उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश जैसे पहाड़ी राज्य इससे सबसे ज्यादा प्रभावित हुए हैं। यूं तो मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, कर्नाटक, असम, महाराष्ट्र और अन्य राज्यों में भी आग से जंगल तबाह होते रहे हैं, लेकिन जिस बड़े पैमाने पर दोनों पहाड़ी राज्यों में तबाही देखने को मिलती है वैसी अन्य किसी राज्य में नहीं। पिछले तीस वर्षो में आग की लाखों छोटी-बड़ी घटनाएं घट चुकी हैं जिनमें लाखों हेक्टेयर जमीन में खड़े जंगल प्रभावित हुए हैं। जैविक-विविधता का नाश हुआ है और जीव-जंतु मारे गए।
नेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ डिजास्टर मैनेजमेंट के अनुसार भारत को 50 फीसद जंगलों को आग से खतरा है, जिसमें अधिकतर जंगल हिमाचल, जम्मू, उत्तराखंड, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और असम के हैं। कई बार सूखे पत्तों और घनी झाड़ियों को जलाने के लिए आग लगाई जाती है। माना जाता है कि स्थानीय निवासियों द्वारा छोटे इलाकों में सूखे पत्तों और छोटी सूखी वनस्पतियों को जलाने से बड़ी विनाशकारी आग की घटनाएं नहीं होती हैं जिससे पर्यावरण की क्षति, वन क्षेत्र की वनस्पतियों और जीव-जंतुओं के विनाश का भी खतरा नहीं रहता। राज्य सरकार और केंद्र सरकार को इस तरह के लोगों को बड़े पैमाने पर प्रशिक्षित करके छोटे इलाकों के पर्यावरण को क्षति पहुंचाने वाले खर-पतवारों को जलाने के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। लेकिन यह काम बहुत सावधानी के साथ किया जाना चाहिए। कई बार छोटी आग विकराल रूप धारण कर विनाश की वजह भी बन जाती है।
दरअसल, पहाड़ी जीवन समतल इलाकों में रहने वालों से कई मामलों में अलग होता है। पहाड़ी इलाकों के रहवासियों का पालन-पोषण जंगल ही करते रहे हैं। फल-फूल, मेवे, औषधियां, जलाऊ लकड़ियां और मकान बनाने की लकड़ियां भी जंगलों से आराम से मिल जाती थीं। 1988 में केंद्र सरकार ने जो वन नीति बनाई थी उससे जंगलों को संरक्षित करने और उनका विस्तार करने में सहूलियत तो मिली लेकिन उत्तराखंड बनने के बाद जिस तरह से वनों में माफिया समूहों, तस्करों और वन विभाग के अधिकारियों की मिलीभगत से लूट मची, उससे उत्तराखंड बनने का उद्देश्य खंड-खंड हो गया। आज भी उत्तराखंड में तमाम तरह की समस्याएं हैं, जिनका हल निकाला जाना चाहिए। पर्यटन के मामले में उत्तराखंड देश के दूसरे राज्यों से काफी आगे है, लेकिन जिस रूप में पर्यटन का विकास हो रहा है, उससे कई तरह की दुारियां भी पैदा हो रही हैं जिनमें जंगल काट कर भवनों का निर्माण भी एक है।
आज उत्तराखंड में भारत ही नहीं, विदेश की अनेक बहुराष्ट्रीय कंपनियां भी यहां की अमूल्य संपदा का दोहन कर पूरे इलाके को खोखला करने में लगी हुई हैं। रोजगार देने और खुशहाली का नया दौर शुरू करने का सब्जबाग दिखाने वाली ये कंपनियां राज्य सरकार से खाद पानी पाती रही हैं। राज्य सरकार अवैध निर्माण, अवैध जगली जंतुओं के शिकार, अवैध खनन और वन की अमूल्य औषधियों एवं लकड़ियों की तस्कारी रोकने में विफल रही है। जिस लक्ष्य को लेकर उत्तराखंड का निर्माण किया गया था, वह लक्ष्य आज भी अधूरा है।
पहाड़ के निवासियों द्वारा उत्तराखंड निर्माण के समय देखे गए स्वप्न जंगलों के साथ लगातार जलते आए हैं। हर बार चुनाव के समय हर पार्टी उत्तराखंड को सबसे खुशहाल राज्य बनाने का वादा करके सत्ता में आती है, और सत्ता मिलते ही अपना गुणा-भाग और नफा-नुकसान केवल पर्यटन को बढ़ावा देने और नई-नई देशी-विदेशी कंपनियों के जरिए केवल लाभ कमाने पर सारा ध्यान केंद्रित कर देती हैं। जो इस प्रदेश की मूल समस्याएं हैं, उनके लिए कोई ठोस दूरगामी कदम और योजनाएं नहीं बनाई जातीं। जब जंगल जलता है तो केवल जंगल नहीं जलता, बल्कि इस इलाके का आधार ही जल कर खाक हो जाता है।
देवभूमि कही जाने वाला इस पहाड़ी प्रदेश के अस्तित्व में आने के बाद यह अनगिनत प्राकृतिक त्रासदियों को झेलने के लिए मजबूर होता रहा है। शासन, प्रशासन प्राकृतिक त्रासदियों से छुटकारा दिलाने या मलहम लगाने के लिए तत्काल कदम उठाता तो है लेकिन जिस स्तर पर आग से लोगों का नुकसान होता है, उसकी भरपाई प्रशासन भी करने में नाकाम रहता है। जरूरत है जिम्मेदार विभाग और उनमें जिम्मेदार अधिकारियों को लापरवाही करने के प्रति चेतावनी देने की। कर्त्तव्य के प्रति लापरवाही को गम्भीर अपराध माना जाना चाहिए। प्रशासन अपने कर्त्तव्य के प्रति चुस्त रहेगा तो जगंल की बेकाबू होती आग भविष्य में विकराल रूप नहीं धारण कीं। और साथ में यह भी सोचना होगा कि प्राकृतिक संपदा को बचाने के लिए बड़े स्तर पर ऐसी योजना बनाई जानी चाहिए जिससे आगे लगने पर तुरंत उस पर काबू पाया जा सके।
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हमारे रोजमर्रा के जीवन में साइबर जगत बहुत महत्वपूर्ण हो चला है। विज्ञान की उन्नति के प्रत्येक चरण के साथ उसके अच्छे और बुरे पक्ष जुड़े हुए हैं। इसी के तहत सोशल मीडिया पर ‘ट्रोलिंग’ भी एक पक्ष है। हाल ही में हद तब हो गई, जब एक माँ ने ट्रोलिंग के चलते आत्महत्या कर ली।
आजकल लोग अपने विचार, डेटा, सोच और नजरिए को बिना सोचे-समझे इंटरनेट मीडिया पर डाल रहे हैं। इसमें ट्रोलिंग भी एक तरीका है, जिसमें सामने वाले व्यक्ति को बिना सोचे-समझे अपशब्द कहे जाते हैं। ऐसा करते हुए यह भी नहीं सोचा जाता कि व्यक्ति-विशेष के जीवन पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा? क्योंकि लोगों को मालूम है कि वे अनीतिपूर्ण हमले करने के बावजूद कानूनी गिरफ्त से बच सकते हैं।
देश में सन् 2000 का सूचना प्रौद्योगिकी एक्ट है। लेकिन वह न तो ‘ट्रोलिंग’ शब्द को पारिभाषित ही करता है, और न इस संबंध में कोई कानूनी समाधान देता है। भारतीय न्याय संहिता में भी इसकी कोई चर्चा नहीं है।
फिलहाल एक सीमा तक इससे बचने के लिए सोशल मंच प्रदान करने वाली कंपनी से शिकायत करना ही एकमात्र समाधान है। आईटी रूल्स 2021 के तहत सेवा देने वाली कंपनी ट्रोलर्स के सोशल अकाउंट पर 15 दिनों में कार्रवाई करने के लिए बाध्य है।
सूचना प्रौद्योगिकी कानून की धारा-87 केंद्र सरकार को इस कानून के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए तमाम प्रावधान अपनाने का अधिकार देती है।
ट्रोलिंग के ज्यादातर मामलों में ट्रोलर्स वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क (वीपीएन) के माध्यम से अपनी पहचान छुपा लेते हैं। अतः इनको पकड़ने के लिए खास उपाय करने होंगे। साथ ही, आम लोगों को भी साइबर सुरक्षा को अपनी जीवनशैली का हिस्सा बनाना चाहिए। तभी हम साइबर अपराध का शिकार बनने से बच सकेंगे।
‘हिंदुस्तान’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 22 मई 2024
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Date: 17-06-24
Why Govt Jobs Should Be Less SecureDismissing or demoting bureaucrats must be made simpler to ensure efficiency and accountability. Without this, no administration can achieve the speed of development it desiresPraveen Gedam & Arghya Sengupta, [ Gedam is Divisional Commissioner, Nashik. Sengupta is Research Director, Vidhi Centre for Legal Policy ]
With a new govt taking charge, the spotlight turns to bureaucrats who’ll work to fulfil its mandate. The tenure and service conditions of bureaucrats are often overlooked, but are critical to ensuring the whole govt works in concert to achieve its development goals. Highest in criticality is the ability of govt to hire and fire civil servants.
Mis-firing officers | Most of us haven’t heard of a govt employee being fired. This tells us how super secure govt jobs are. That’s one reason why lakhs of highly educated people apply for lower-level govt positions every year, and why govt servants are often preferred over higher paid private sector employees in arranged marriages.
Such security of tenure was a key feature of govt jobs globally as well, but has changed over time. In India, it hasn’t.
Pleasure to permanence | Traditionally, all civil servants served at the “pleasure” of the Crown. This meant that the monarch could dispense with their service at any time. When India became a democratic republic, this was sought to be balanced by the need to create an independent and empowered bureaucracy. This led to the incorporation of Article 311 of the Constitution based on which disciplinary laws for govt servants were enacted. But the process laid down has become so complicated over the years that it’s almost impossible to dismiss someone from a govt job. The only exception is if the person is convicted by a criminal court, another rarity in India for govt servants. The pendulum has swung from pleasure to permanence.
Unlike private sector, where bosses can fire someone for not doing her job well, in govt it’s practically impossible. No doubt, job security is of paramount importance. But it also means that it’s extremely difficult to get rid of employees who’re not discharging their duties. Anecdotally, we know of numerous cases where an engineer was unaware of standard guidelines for construction, a police officer prepared a criminal chargesheet under civil laws, and a clerk couldn’t even write the name of his office. Most of them, and countless others like them, continue to ‘serve’.
Long & winding process | Here’s how extant disciplinary rules work in practice. The process starts with gathering evidence, followed by a showcause notice, some times suspension, hearing the govt employee’s side, deciding whether to conduct an inquiry, gathering more evidence, preparing a chargesheet, appointing an inquiry officer, holding hearings, examinations and cross-examinations, giving the employee a chance to defend, preparing a report, giving this report to the employee, hearing the employee again twice – first on the report, and then usually also on the quantum of punishment – seeking views of the public service commission, and then finally making a decision.
Unsurprisingly, this takes years to complete. By that time, every stakeholder other than the employee involved has moved on, and the problem leading to the inquiry isn’t seen as important anymore. As a result, the employee is usually declared not guilty.
Urgent reform needed | For an efficient, modern, service-oriented bureaucracy, this process must be simplified. It should be completed within three months, during which other stakeholders (say, seniors and affected persons) are still around and consequences of misconduct of the employee are fresh in memory. Second, the quantum of punishment should also be an effective deterrent. At least for corruption, inefficiency, lack of delivery, insubordination, gross negligence and frequent absenteeism, major punishments such as dismissal or demotion should be made mandatory.
Idea for first 100 days | That said, protection from undue influences needs to be kept intact or even bolstered by shielding bureaucrats from arbitrary transfers (legally not punishments, but in practice so) through enacting suitable rules. The Indian bureaucrat is rightly praised for holding the vast and diverse country together, and guiding it towards progress. But at the same time, she is also criticised, again rightly so, for being slow and inefficient.
As India celebrates 75 years of its Constitution and with govt ready to unveil its first-100-day plan, it’s time to rethink how govt itself works. Listening to people and reducing friction are important. A part of this can be achieved by ensuring faster and tougher punishments for bureaucratic inefficiencies while increasing protection of bureaucrats from undue influences. We must move away from the idea that govt jobs should be secure and permanent at any cost. Instead, let us start instilling accountability by ensuring that the dead wood is weeded out regularly and expeditiously. This will be one reform that will change the face of govt service for 100 years.
Date: 17-06-24
Time to Reskill the Skilling PlanAtul Tiwari, [ The writer is secretary, skill development and entrepreneurship ministry, GoI ]
Countries with advanced skilling ecosystems integrate national priorities and industry initiatives through acollaborative framework. Governments handle investment, regulations and standards, while the framework creates demand for skills with financial and non-financial incentives, involving employers in the skilling and employability effort.
Over the last decade, ‘Skill India’ has enhanced access to quality education and skilling, including establishment of new ITI capacities, big increase in apprenticeship engagement, creation of new-age and future skill courses, launch of DPI of skilling in the form of Skill India Digital Hub (SIDH), and rolling out short-term training programmes under Pradhan Mantri Kaushal Vikas Yojana (PMKVY).
NEP 2020 envisions integrating skilling into all education forms, inspiring reforms like National Credit Framework (NCrF) and National Curriculum Framework (NCF). NCrF integrates credits from school, vocational, higher education and work experience, while NCF incorporates curricular skilling into secondary education and beyond.
It’s the right time to marry supplyside interventions in skilling and education with the market-led incentive framework to bring India Inc as acommitted partner of the effort. Other countries provide a model for building industry stakes in their skilling ecosystems that include:
While all the above practices may not be replicable in India, some out of-the-box solutions are needed to ensure a direct stake of India Inc in the skill development effort.
Can India’s own set of social contributions — CSR and labour cess — be brought closer to skilling? If GoI’s key focus should be on quality assurance, can the responsibility of skilling be shifted from government to industry through a demand-led model in which skill vouchers are given to firms for undertaking upskilling/ reskilling of their workforce at eligible training centres?
On the investment side, India could consider introducing an element of skilling in schemes like PLI and inbound foreign investment. Such skill investments shall have guaranteed market alignment, compared to government programmes, where some time lag to understand and implement changing trends is inevitable.
All these, and many more innovative solutions, may emerge if India takes a holistic view of skilling and employability, and takes measures to build a stake in skilling for all stakeholders. This is as important as supply-side investments for building a dynamic and sensitive skill ecosystem.
Date: 17-06-24
Two steps backIndia needs to close the gender gap in education and politicsEditorial
Gender parity may be climbing upwards worldwide with the global gender gap standing at 68.5% closed in 2024, but the glacial pace of change — it was 68.4% in 2023 — is a grim statistic. At this rate, it will take 134 years to reach full parity, the Global Gender Gap report released by the World Economic Forum (WEF) last week pointed out, “roughly five generations beyond the 2030 Sustainable Development Goal (SDG) target”. Iceland maintains its number 1 rank (93.5%), and is also the only economy to have closed over 90% of its gender gap. India has slipped two places to 129 out of 146 countries. Last year, it was ranked 127, after having jumped eight places from 135 in 2022. India has closed 64.1% of its gender gap in 2024, the report noted, leaving policy-makers with a huge window of opportunity to do better. The “slight regression,” according to the report, is mainly due to “small declines” in the spheres of education and political empowerment. With a population of over 140 crore, even two steps back mean staggering numbers. Though India, it pointed out, had shown a slight improvement in economic participation and opportunity for the last few years, it would need 6.2 percentage points more to match its 2012 score of 46%.
One way of achieving the objective will be through bridging gender gaps in, say, the labour force participation rate (45.9%). To do that, a slew of measures must be in place, from ensuring that girls do not drop out of higher education, providing them job skills, ensuring safety at the workplace, and helping them keep a job after marriage by sharing responsibility for chores at home. In education, the gap between men and women’s literacy rate is 17.2 percentage points wide, leaving India ranked 124th on this indicator. India has fared better in the political empowerment index, but women’s representation in Parliament continues to be low. For confirmation, look no further than the newly elected Lok Sabha. Close to 800 women contestants were in the fray, but the number of women Members of Parliament has dipped to 74 from 78 (2019) of 543 members, which is 13.6% of the total. These numbers are not a good sign in the backdrop of the Women’s Reservation Bill, 2023, yet to come into effect, which aims to reserve one-third of the seats in the Lok Sabha and State legislative Assemblies for women. All under-performing countries, including India, must heed WEF Managing Director Saadia Zahidi’s words, calling for “Governments to strengthen the framework conditions needed for business and civil society to work together to make gender parity an economic imperative”.
Date: 17-06-24
एक आवश्यक राजनीतिक सुधारहृदयनारायण दीक्षित, ( लेखक उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष हैं )
हम भारत के लोग अक्सर चुनावी तनाव में रहते हैं। लोकसभा चुनाव अभी-अभी संपन्न हुए हैं। कुछ दिन बाद महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड के बाद दिल्ली एवं बिहार आदि विधानसभाओं के चुनाव होने हैं। नगरीय क्षेत्रों एवं पंचायती राज संस्थाओं के चुनाव भी सामाजिक तनाव पैदा करते हैं। लगातार चुनावी व्यस्तता राष्ट्रीय विकास में बाधक है। चुनावों के दौरान प्रशासनिक तंत्र की अलग व्यस्तता बनी रहती है। चुनावी आचार संहिता के दौरान विकास कार्य भी रुक जाते हैं।
अलग-अलग चुनावों में अरबों रुपये का व्यय होता है। इसलिए सभी चुनावों को एक साथ कराने का विचार महत्वपूर्ण हो गया है। भाजपा ने अपने चुनावी घोषणा पत्र में ‘एक देश-एक चुनाव’ का विचार व्यक्त किया था। इस संबंध में मंथन के लिए पूर्व राष्ट्रपति राम नाथ कोविन्द की अध्यक्षता में एक समिति भी बनी थी। समिति ने 47 राजनीतिक दलों से सुझाव प्राप्त किए। 32 दलों ने एक साथ चुनाव का समर्थन किया।
समिति ने 18,626 पृष्ठों वाली रिपोर्ट राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मु को मार्च में प्रस्तुत की थी। समिति ने चार पूर्व मुख्य न्यायधीशों, उच्च न्यायालय के 12 मुख्य न्यायधीशों, चार पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्तों और आठ राज्य चुनाव आयुक्तों जैसे विशेषज्ञों से परामर्श मांगे थे। नागरिकों से 21,558 सुझाव प्राप्त हुए। विधि आयोग ने 2018 में एक प्रारूप रिपोर्ट प्रस्तुत की थी। अब समिति ने इस प्रसंग से जुड़े सभी मसलों पर व्यापक रिपोर्ट प्रस्तुत की है। नई सरकार में कमान संभालते ही केंद्रीय कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने इस दिशा में आगे बढ़ने के संकेत भी दिए हैं।
कोविंद समिति ने महत्वपूर्ण सिफारिशें की हैं। उसने लोकसभा, विधानसभा और स्थानीय निकायों के चुनाव साथ कराने का प्रस्ताव किया है। इसके लिए संविधान में संशोधनों की रूपरेखा भी प्रस्तुत की है। एक साथ चुनाव के लिए नियत तारीख निर्दिष्ट करने के लिए संविधान के अनुच्छेद-82 में संशोधन का सुझाव दिया है। एक साथ चुनाव के लिए ‘नियत तारीख’ के बाद जहां राज्य विधानसभाओं के चुनाव होने हैं, वे एक साथ चुनाव कराने की सुविधा के लिए संसद के साथ समन्वय कर लेंगे।
समिति के अनुसार सब कुछ योजनाबद्ध होता है तो संभवतः पहला एक साथ चुनाव 2029 में हो सकता है। यदि 2034 के चुनावों को लक्षित किया जाता है तो वर्ष 2029 के लोकसभा चुनाव के बाद नियत तारीख की पहचान होगी। तब जिन राज्यों में जून 2024 और मई 2029 के मध्य चुनाव होने हैं, उनका कार्यकाल 18वीं लोकसभा के साथ समाप्त हो जाएगा। राज्य विधानसभाओं के कार्यकाल का प्रभाव नहीं पड़ेगा। संसद या राज्य विधानसभा के समय से पहले भंग होने की स्थिति में समन्वय बनाए रखने के लिए समिति ने एक साथ चुनाव के अगले चक्र तक शेष कार्यकाल के लिए नए चुनाव कराने की सिफारिश की है। समिति का तर्क है कि त्रिशंकु सदन या अविश्वास प्रस्ताव एक साथ चुनाव की समग्र समय सीमा को प्रभावित नहीं करता।
संसदीय चुनावों के साथ नगर पालिका और पंचायतों के चुनाव का समन्वय जरूरी है। लोकसभा, विधानसभा और नगरीय पंचायती क्षेत्रों की मतदाता सूची में भी अंतर होते हैं। समिति ने संविधान के अनुच्छेद-324 के अधीन कानून बनाने का परामर्श दिया है। यह कानून स्थानीय निकायों के चुनाव कार्यक्रम को राष्ट्रीय चुनाव समय सीमा के साथ जोड़ेगा। भारत निर्वाचन आयोग राज्य चुनाव आयोगों के परामर्श से सभी स्तरों पर एकल मतदाता सूची और मतदाता फोटो पहचान पत्र तैयार करने में सक्षम बनाएगा। अभी तक लोकसभा चुनाव के लिए मतदाता सूची तैयार करने की जिम्मेदारी भारत निर्वाचन आयोग पर है और स्थानीय निकायों के लिए मतदाता सूची राज्य निर्वाचन आयोग द्वारा तैयार की जाती है। समिति ने दोनों की एक ही मतदाता सूची तैयार करने का सुझाव दिया है। कई बार इन सूचियों में विसंगतियां होती हैं तो सूची को प्रामाणिक बनाने का आग्रह है।
सभी संवैधानिक प्रतिनिधि संस्थाओं के चुनाव एक साथ कराने का विचार विशेष राजनीतिक सुधार है। भारत में राजनीतिक सुधारों विशेषत: चुनाव सुधार की गति बहुत धीमी है। यह एक प्रशंसनीय राजनीतिक सुधार है। कुछ लोगों का तर्क है कि इससे संघवाद को क्षति होगी। यह कहना गलत है। सभी राज्य एक साथ-एक चुनाव में राज्यों एवं केंद्र के मुद्दे एक साथ उठाएंगे। इससे राष्ट्रीय दल क्षेत्रीय दलों द्वारा उठाए जाने वाले मुद्दों से जुड़ेंगे। क्षेत्रीय दलों की दृष्टि अखिल भारतीय होगी। एक साथ चुनाव के विरोधी अनावश्यक रूप से घबराए हुए हैं। साथ-साथ चुनाव से आम जनों में राजनीतिक जागरूकता बढ़ेगी। वे राष्ट्रीय मुद्दों के साथ क्षेत्रीय मुद्दे भी देखेंगे। क्षेत्रीय दल स्थानीयता से ऊपर उठेंगे। राष्ट्रीय दल क्षेत्रीय कठिनाइयों को समझने का प्रयास करेंगे। मतदान का प्रतिशत बढ़ने की भी भरी-पूरी संभावना है। एक साथ चुनाव से नुकसान की बात करने वाले भूल जाते हैं कि 1967 तक देश में एक साथ चुनाव का सिलसिला कायम रहा।
कुछ दल कोविंद समिति की रपट का अध्ययन किए बिना ही उसे खारिज करने पर तुले हैं। कांग्रेस ने कहा कि वन नेशन-वन इलेक्शन लागू करने से संविधान की बुनियादी संरचना में बदलाव होंगे। यह संघवाद के खिलाफ है। कांग्रेस यह न भूले कि भारतीय संघ अमेरिकी संघवाद नहीं है। यहां राज्य भारत के अभिन्न अंग हैं। संविधान सबको बांधकर रखता है। तृणमूल कांग्रेस ने इस प्रस्ताव को असंवैधानिक बताते हुए आशंका जताई कि इससे राज्य के मुद्दों को दबाया जा सकता है। द्रमुक की दलील है कि इसके लिए राज्य विधानसभाओं को समय से पहले भंग करने की आवश्यकता होगी।
सपा ने कहा कि इससे राष्ट्रीय मुद्दे क्षेत्रीय मुद्दों पर प्रभावी होंगे। इनसे इतर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा था कि एक साथ चुनाव का विचार संकीर्ण राजनीतिक दृष्टि से ऊपर उठकर देखा जाना चाहिए। भाजपा, एनपीपी, अन्नाद्रमुक, आल झारखंड स्टूडेंट्स यूनियन, अपना दल (सोनेलाल), असम गण परिषद, लोक जनशक्ति पार्टी एक साथ चुनाव का समर्थन कर रहे हैं। याद रहे कि कोई भी देश लगातार चुनावी मोड में नहीं रह सकता। चुनावी आरोप-प्रत्यारोप सामाजिक चेतना और तानेबाने को आहत करते हैं। एक साथ चुनाव असल में कई समस्याओं का समाधान है।
Date: 17-06-24
खुलती राहेंसंपादकीय
अत्याधुनिक अर्थव्यवस्था वाले सात देशों के समूह जी -7 के शिखर सम्मेलन में भारत की विशेष उपस्थिति इसकी बढ़ती आर्थिक ताकत का ही प्रमाण है। भारत इस समूह का सदस्य नहीं है, मगर हर वर्ष इसे विशेष तौर पर आमंत्रित किया जाने लगा है। हालांकि इस बार इटली में आयोजित इस शिखर सम्मेलन में अफ्रीका, दक्षिण अमेरिका और हिंद प्रशांत क्षेत्र के बारह विकासशील देशों के नेताओं को भी निमंत्रित किया गया था, पर भारत को खास तवज्जो दी गई। दरअसल, यह सम्मेलन एक ऐसे समय में आयोजित हुआ, जब दुनिया में आर्थिक उथल-पुथल मची हुई है। रूस- यूक्रेन युद्ध और हमास – इजराइल संघर्ष जारी है। पूरी दुनिया अभी मंदी की चपेट में है। यहां तक कि जी-7 के सदस्य देश अमेरिका, इटली, जर्मनी, फ्रांस, ब्रिटेन, कनाडा और जापान भी इससे बाहर निकलने की कोशिश कर रहे हैं। मगर भारत की अर्थव्यवस्था पर कोई प्रतिकूल प्रभाव नजर नहीं आ रहा। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के मुताबिक भारत दुनिया की तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था है। जी-7 के मंच से प्रधानमंत्री ने फिर अपना संकल्प दोहराया कि 2047 तक भारत को विकसित देश बनाना है। उधर वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद के स्तर पर जी-7 देशों की भागीदारी लगातार घट रही है वे विश्व जीडीपी में साठ फीसद की भागीदारी से चालीस फीसद पर पहुंच गए हैं।
भारत लगातार विकसित देशों के समांतर एक ताकतवर समूह बनाने की कोशिश कर रहा है। उसी रणनीति के तहत जी-20 सम्मेलन के दौरान अफ्रीकी संघ को भी समूह में शामिल किया गया। इस तरह भारत वैश्विक दक्षिण के देशों को एक मंच पर लाकर एक नया आर्थिक मंच बनाना चाहता है। जी-7 के सदस्य देश इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि भारत सहित वैश्विक दक्षिण एक विशाल बाजार है, वहां सस्ते श्रम की उपलब्धता भी भरपूर है। हालांकि इस बार के शिखर सम्मेलन में प्रमुख रूप से दुनिया भर में बढ़ती महंगाई पर अंकुश लगाने, वैश्विक स्वास्थ्य सुविधाओं को बेहतर बनाने और कार्बन उत्सर्जन को कम करने संबंधी रणनीतियां बनाने पर जोर रहा, पर रूस और चीन की वजह से बढ़ते तनाव को रोकने के उपायों पर भी चर्चा हुई। जी-7 समूह के सभी देशों के साथ भारत के रिश्ते बेहतर हैं और उनके साथ व्यापार वाणिज्य संबंधी गतिविधियां निरंतर बढ़ रही हैं। जी-7 का जोर उभरती अर्थव्यवस्थाओं के साथ रिश्ते बेहतर बनाने पर है, इस तरह भारत इसमें मजबूत कड़ी साबित होगा।
भारत के सामने फिलहाल कड़ी चुनौती चीन की तरफ से है। चीन को लेकर जी 7 देश भी वक्र दृष्टि रखते हैं। इस दौर में जब संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद कमजोर होता गया है और जी-7 देश वैश्विक मामलों में निर्णायक साबित हो रहे हैं, वे भारत को विशेष रूप से अपने साथ जोड़े रखना चाहते हैं, तो निश्चय ही यह चीन के लिए चिंता का विषय होगा। रूस यूक्रेन संघर्ष में भी भारत की मध्यस्थता को अहम माना जा रहा है, जबकि इन दिनों रूस की नजदीकी चीन से बढ़ी है। जैसा कि प्रधानमंत्री ने जी-7 के मंच से यह संकल्प दोहराया कि वे पड़ोसी देशों से रिश्ते मधुर बनाने पर जोर देंगे, ताकि वे चीन की गिरफ्त से बाहर निकल सकें, यह भी चीन के लिए रणनीतिक रूप से परेशान करने वाली बात है। जी-7 के इस शिखर सम्मेलन से भारत के लिए नई राहें खुलती नजर आती हैं।
Date: 17-06-24
उम्मीदों भरी यात्रासंपादकीय
इटली के अपूलिया में संपन्न हुए जी-7 सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने आउटरीच सत्र में वैश्विक नेताओं से मुलाकात की। इस क्रम में तमाम वैश्विक राजनीतिक हस्तियों से उनका मिलना हुआ। इनमें पोप फ्रांसिस भी शामिल थे, जिन्होंने भरपूर गर्मजोशी से मोदी को गले लगाया और विचार-विमर्श किया। मोदी ने पोप को भारत आने का न्योता भी दिया। भारत में कैथोलिक इसाइयों की संख्या एशिया में दूसरे नंबर पर है। भारत के केरल जैसे राज्यों में ईसाइयों की संख्या खासी है, इसलिए इसे संकेत माना जा रहा है कि मोदी ने भारत की धर्मनिरपेक्ष छवि को दर्शाया है। जी- 7 यानी ग्रुप ऑफ सेवन दुनिया के सबसे अमीर और खुद को अत्याधुनिक मानने वाले मुल्कों की संस्था है। कनाड़ा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, ब्रिटेन, अमेरिका और जापान ये सात देश हैं। इनकी ग्लोबल ट्रेड और वैश्विक वित्त प्रणाली पर खासी पकड़ है। इस बार ये सब आर्थिक सुरक्षा और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे मुद्दों को लेकर विमर्श कर रहे थे। चूंकि भारत विकसित होती अर्थव्यवस्था है, इसलिए वे उसके सहयोग और लाभ की साझेदारी पर काम करने को इच्छुक हैं। इस सम्मेलन में दक्षिण अमेरिका और अफ्रीका के साथ भारत प्रशांत क्षेत्र के बारह विकासशील देशों के नेताओं को इसी खास मकसद से आमंत्रित किया गया था। माना जा रहा है कि जी-7 देश चीन और रूस की बढ़ती आर्थिक ताकत को लेकर चिंतित हैं। इस मौके का फायदा उठाने में मोदी सफल होते नजर आ रहे हैं। साथ ही, आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस को सुरक्षित और भरोसेमंद बनाने के प्रति सरकार की जिम्मेदारी को भी मदद मिलने की उम्मीद है। इस मसले पर बनने वाले अंतरराष्ट्रीय नियम-कानूनों द्वारा देश में बढ़ रहे साइबर क्राइम पर सख्ती की जा सकेगी। हालांकि यह कहना गलत नहीं है कि इस गुट के पास ऐसे कोई अधिकार नहीं हैं, जिनके बल पर कोई भी निर्णय जबरन लागू कराया जा सके, मगर भारत को इन देशों से जो सहयोग और लाभ मिल सकते हैं, उनके प्रति यदि मोदी सफल होते नजर आते हैं तो यह देश के भविष्य के लिए बेहतर करने का घटनाक्रम ही कहा जाएगा। निःसंदेह इनसे जुड़े परिणामों के लिए अभी इंतजार करना होगा। मगर कुल मिलाकर दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाले देश का लगातार तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने के बाद मोदी की यह पहली विदेश यात्रा सकारात्मक कही जा सकती है, जिसके परिणाम आने वाले वर्षों में यकीनन नमूदार होंगे।
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Date: 15-06-24
Kerala to KuwaitA deadly fire says Indians also exploit Indian migrantsTOI Editorials
Community networks are a crucial enabling factor for Indians to find work across the country and indeed the world. But the Kuwait fire that took 45 Indian lives is a reminder that such networks can also have a dark side.
Trust and betrayal | News that the building in which the deaths took place was a fire hazard waiting to explode – from cardboard and plastic being used to partition workers into cramped rooms to doors to the rooftop being locked – was painful enough. A subsequent revelation that an Indian managed the building and also employed most of those who died, somehow felt ‘worse’. It’s obvious why. Because this now becomes a case where not only was workplace safety not provided in a foreign country, an Indian employer also thought Indians didn’t deserve better. Separately, there is the vexed issue of illegal migration, where trusted stories and agents play an even more fraught role. Indians btw have become the third largest unauthorised immigrant population in US.
Home and abroad | Networks on which Keralites, Gujaratis, Punjabis and others have relied to make legal homes across the world, are an invaluable social and economic resource for India. The Kuwait fire reminds us that even these are not without tales of desertion, betrayal, fraud. Or milder letdowns. Say, students who are happy to have Indian student associations helping them with the commute, housing etc upon landing on foreign campuses, then find these to be oppressively parochial. A public policy that tries to even out all the dingy kinks of human nature will be pointless. Still, GOI should increase its efforts to ensure safe working conditions for migrant Indian workers, whose numbers are bound to keep going up. Experts suggest a national-level migration database will be useful in this direction.
Date: 15-06-24
Reimagining Indian federalismThe return of coalition governance to New Delhi offers hopeShashi Tharoor is the fourth-term Lok Sabha Member of Parliament (Congress) for Thiruvananthapuram, and the Sahitya Akademi award winning author of 25 books, including Ambedkar: A Life
On June 4, 2024, the Bharatiya Janata Party (BJP) tripped up short of the majority mark in the Lok Sabha, compelling it to hobble towards power by leaning heavily on its partners in the National Democratic Alliance, all of which are regional parties. Aside from placing fetters on the BJP’s overweening arrogance and decelerating our descent into majoritarian autocracy, the return to New Delhi of coalition governance offers another hope: that of revitalising India’s beleaguered federal structure, which has sustained countless death blows over the past decade.
A brand of federalism
As I argued in the Lok Sabha last year — while opposing the Government of National Capital Territory of Delhi (Amendment) Act, 2023 — what we have repeatedly seen since 2014 is an insidious, inexorable effort to curtail the autonomy of our States. Despite Prime Minister Narendra Modi’s rhetoric of cooperative federalism, all we have seen is the rise of a coercive and combative brand of federalism that seeks to centralise power at the expense of the States.
This Modi-fied brand of federalism has been manifest in seeking to foist Hindi upon our southern States; deploying independent regulatory and investigative agencies (such as the Enforcement Directorate, the Central Bureau of Investigation and Income-Tax agencies) to clamp down on political opponents from regional parties; using an obscure provision of the Disaster Management Act to impose a nationwide lockdown without consulting the Chief Ministers who had to implement it; creating and misusing the Prime Minister’s Citizen Assistance and Relief in Emergency Situations (PM CARES) Fund, which limited the flow of cash to State-run Chief Minister’s Distress Relief Funds; and robbing Jammu and Kashmir of Statehood and abrogating Article 370 in a manner that sets an ominous precedent for all other States. One must add to this litany, the tendency to undermine the careful balance in our fiscal federalism that previous governments had maintained, distributing revenues in a way that left it to our States to pursue their own priorities. This balance has been disturbed using a number of cynical tools, such as levying cess on a large number of items. Unlike tax, cess does not go into the divisible revenue pool and does not need to be shared with States.
Another shadow hangs over the federal system with the impending lapse of the 91st Amendment in 2026. This guarantees that the share of parliamentary constituencies across States would be based on the 1971 Census, in order not to punish those States that had empowered their women, improved human development indicators and curbed their population. The ruling party has made it clear that they have no intention of renewing this provision and are looking forward with glee to a fresh Census and a new delimitation exercise. The major concern of many federalists is that this could lead — given both demographic realities and the BJP’s own inclinations — to the Hindi-speaking States of the “cow belt” acquiring a two-thirds majority by themselves, in effect disenfranchising the southern States. This would give the BJP a permanent stranglehold on our Parliament and would lead to a severe crisis of our democracy as well as our federalism.
The BJP’s hyper-nationalist desire for uniformity was already evident in its decision in 2017 to change the terms of reference of the Fifteenth Finance Commission to base allocations on the 2011 Census, instead of 1971’s (following the same rationale) This proved pernicious, sending even more tax money from the south to the north than previously. Commentators spoke of the government rewarding “brute demographic advantage … over a state’s performance,” adding that the Fifteenth Finance Commission decisions were “a stunning rebuke of success”.
The concerns of the southern States
Most people in the south are staunch Indian nationalists who recognise full well the need to correct regional imbalances, and for richer States to subsidise poorer ones. But we must ensure that this balancing act does not become financial persecution of our southern States. For, unlike most federal systems, India’s revenues are going disproportionately to its worst-performing States, those with rampant illiteracy, high rates of fertility and population growth, while the high-performing southern States get short shrift. On June 10, 2024, Uttar Pradesh received a whopping ₹25,069 crore of tax devolution, a figure greater than all our five southern States collectively received. Bihar and Madhya Pradesh got the next largest allocations.
The concerns of our southern States about delimitation are not unfounded: Uttar Pradesh and Bihar are likely to together outweigh them all combined. May we dare hope that one of the BJP’s two crutches, with 16 seats in the Lok Sabha, the Chief Minister of Andhra Pradesh, N. Chandrababu Naidu, will refuse to make the mistake of allowing such a fate to befall South India? Whether he does or does not, the other southern Chief Ministers are bound to be speaking to each other, to ward off the threat of political disenfranchisement. The interests of millions are entwined with the success of this exercise, in which the principles of equitable redistribution and representation should weigh heavily. All States, ultimately, must work together to devise a solution.
There are no early signs that the large number of regional parties in the NDA might bolster India’s federal structure. Most regional members — chief among them the Telugu Desam Party, Janata Dal (United) and Lok Janshakti Party (Ram Vilas) — have for now contented themselves with securing cabinet births (not even major or pivotal ministries) and greater perquisites for their own States (such as demanding special status for Andhra Pradesh and Bihar). While they may keep the BJP on a relatively short leash, stanching the tide of the Hindutva project and demanding that contentious schemes (such as Agniveer) be reconsidered, they are not necessarily likely to rally around the cause of strengthening cooperative federalism. Seeking a larger slice of the pie for their own States is self-interest, not federalism.
When he was the Chief Minister of Gujarat, Narendra Modi was an unwavering federalist who championed decentralised policy-making. In his view, in a country as diverse as India, there could never be a universal, Union Government-devised panacea for the ills of all States, so, each should be able to innovate and tailor solutions to their peculiar problems. Each State in India, argued then Chief Minister Modi, ought to forge its own development path, engaging with other States in a spirit of “competitive” federalism, which meant attracting investment and improving governance, and stoutly resisting the encroachment of the central government on States’ rights. And, in many ways, Mr. Modi exemplified these tenets — until he became Prime Minister, that is.
Revive the Inter-State Council
Can Opposition-ruled States, especially in the south, leverage the BJP’s reduced majority to the benefit of cooperative federalism? The abolition of the Planning Commission has deprived them of a vital forum. If that cannot be undone, a good starting point would be extracting the Inter-State Council from the throes of desuetude. Though its rationale had long been outlined in Article 263 of the Constitution, it was convened only in the 1990s on the recommendation of the Sarkaria Commission. But, despite having the potential to become a formidable forum of deliberation, the Council has degenerated into a mere appendage of the Ministry of Home Affairs, in whose shadow it scarcely has any authority. So the Inter-State Council must be overhauled and revived to serve as an independent arena for consultation, decision-making, dispute resolution, and coordination between States and various governmental departments and levels of government on issues that affect the States.
In a country such as India, whose diversity is held together by a sense of common belonging but whose civic nationalism must accommodate a range of States with divergent levels of development, it is essential that all feel that their common nationhood is a winning proposition for them. In a country where regional, religious, and linguistic tensions are never far from the surface, an answer such as, “We have more people, so we will have more money and power”, risks rupturing the fragile bonds that hold us all together.
Date: 15-06-24
बेकाबू महंगाईसंपादकीय
महंगाई पर काबू पाना सरकार के लिए टेढ़ी खीर बना हुआ है। मई में थोक महंगाई पिछले पंद्रह महीनों के उच्च स्तर पर पहुंच गई। अब यह 2.61 फीसद पर है, जबकि अप्रैल में यह 1.26 फीसद थी। इसी अवधि में पिछले वर्ष यह नकारात्मक 3.61 फीसद पर थी। जबकि इसके उलट खुदरा महंगाई मई में घट कर 4.75 फीसद पर पहुंच गई, जो इस वर्ष का सबसे निचला स्तर है। थोक महंगाई पिछले तीन महीने से लगातार बढ़ रही है। वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय का कहना है कि खाद्य वस्तुओं, खाद्य उत्पादों के विनिर्माण, कच्चे तेल और गैस तथा अन्य विनिर्माण उत्पादों की कीमतों में बढ़ोतरी की वजह से इस वर्ष मई में थोक महंगाई बढ़ी। खासकर सब्जियों की थोक कीमतों में बेतहाशा वृद्धि देखी गई। सब्जियों की थोक महंगाई दर 32.42 फीसद रही। प्याज की थोक महंगाई दर 58.05 फीसद और आलू की 64.05 फीसद दर्ज की गई। भारतीय रिजर्व बैंक आमतौर पर खुदरा महंगाई दर के आधार पर अपनी मौद्रिक नीतियों में बदलाव करता है। मगर मई में खुदरा महंगाई पांच फीसद से कम होने के बावजूद उसने रेपो रेट में कोई बदलाव न करने का फैसला किया। इसलिए कि उसका अनुमान है कि अभी महंगाई का रुख अनिश्चित बना रहेगा और उसमें उतार-चढ़ाव आ सकता है।
आमतौर पर थोक महंगाई का असर खुदरा महंगाई पर पड़ता है। जो चीजें थोक में महंगी होती हैं, उनकी खुदरा कीमतें भी बढ़ती हैं। मगर बीते मई महीने में यह क्रम उलटा देखा गया। थोक महंगाई बढ़ी, पर खुदरा महंगाई कम हुई। महंगाई बढ़ने के पीछे आमतौर पर कच्चे तेल की कीमतों में बढ़ोतरी का तर्क दिया जाता है। पिछले कुछ वर्षों से रूस-यूक्रेन युद्ध और फिर इजराइल-हमास संघर्ष के चलते दुनिया भर में आपूर्ति शृंखला बाधित हुई है। विश्व अर्थव्यवस्था मंदी के दौर से गुजर रही है। जाहिर है, इसका असर कच्चे तेल की कीमतों पर पड़ा है। मगर यह कोई पहला मौका नहीं है, जब कच्चे तेल की कीमतें बढ़ी हैं। भारत में तेल की कीमतों में बढ़ोतरी कई वर्ष से हो रही है, जिसका प्रभाव माल ढुलाई पर देखा गया है। मई महीने में तेल की कीमतें इतनी बढ़ी भी नहीं कि उसका सीधा प्रभाव थोक महंगाई पर पड़े। फिर, खुदरा महंगाई घटी हुई कैसे दर्ज हुई, जबकि इसका असर उस पर भी पड़ना चाहिए था। दरअसल, खाने-पीने की चीजों की कीमतों में असंतुलन की बड़ी वजह अंतरराष्ट्रीय व्यापार है।
महाराष्ट्र के किसान लंबे समय से संघर्ष कर रहे हैं कि प्याज को निर्यात के लिए खोल दिया जाए, मगर सरकार ने उस पर प्रतिबंध लगा रखा है। इसकी वजह से उन्हें अपनी लागत भी नहीं मिल पा रही और खुदरा बाजार में औने-पौने दाम पर बेचना पड़ रहा है। इसके उलट, बाहर से दालों, फलों, खाद्य तेल आदि पर आयात शुल्क घटा या हटा देने की वजह से घरेलू जिंस की जगह विदेशी चीजें थोक बाजार में अधिक पहुंचने लगी हैं। यह समझना मुश्किल है कि जो खाद्य वस्तुएं अपने यहां जरूरत से अधिक पैदा हो रही हैं, उनकी घरेलू बाजार में खपत बढ़ाने पर जोर देने के बजाय विदेशी वस्तुओं की आवक क्यों बढ़ाई जाती है। खानेपीने की चीजों की कीमतें बढ़ने से आम लोगों के जीवन पर बुरा प्रभाव पड़ता है। उनकी क्रयशक्ति बढ़ाना पहले ही बड़ी चुनौती है, तिस पर महंगाई की मार उनका जीवन दूभर बना देती है।
Date: 15-06-24
नीट से न्यायसंपादकीय
नीट या मेडिकल प्रवेश परीक्षा विवाद को सुलझाने की कवायद जारी है, इसी कड़ी में सर्वोच्च न्यायालय ने शुक्रवार को नीट-यूजी परीक्षा के आयोजन को चुनौती देने वाली सात याचिकाओं को स्वीकार कर लिया। खास यह कि एक याचिका में इस बार के नीट-यूजी परीक्षा की सीबीआई जांच की मांग की गई है। न्यायालय ने केंद्र सरकार के अलावा राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी या एनटीए से भी जवाब मांगा है और अगली सुनवाई 8 जुलाई को बडे़ फैसले की उम्मीद है। अब तक के घटनाक्रम से यह तो बिल्कुल साफ हो गया है कि इस बार की प्रवेश परीक्षा में कुछ बड़ी कमियां रह गई हैं। इस बात के भी स्पष्ट संकेत हैं कि परीक्षा के साथ कोई न कोई गंभीर खिलवाड़ हुआ है। यह सुखद है कि एनटीए ने भी ग्रेस मार्क्स के खेल पर ध्यान दिया है और 1,563 छात्रों को फिर टेस्ट में बैठना पड़ेगा। टेस्ट का यह फैसला न्यायोचित है, जिन बच्चों के साथ ग्रेस मार्क्स की वजह से नाइंसाफी हुई है, उन्हें अब न्याय मिलने की संभावना बढ़ गई है।
बहरहाल, पूरी परीक्षा को नकार देने की कवायद ठीक नहीं है। लाखों विद्यार्थियों ने बहुत संसाधन और समय लगाकर परीक्षा दी है, उनके साथ न्याय होना चाहिए। अक्सर ऐसा होता है कि जो विद्यार्थी उत्तीर्ण नहीं होते, वे फिर से परीक्षा की मांग करते हैं, पर यहां किसी भी परीक्षा को न्यायोचित ढंग से ही देखना चाहिए। यहां भावना के ज्यादा मायने नहीं हैं। परीक्षा नियम-कायदे का मामला है, उसकी गुणवत्ता के साथ किसी भी तरह का समझौता किसी अन्याय से कम नहीं है। बहरहाल, कहीं न कहीं कुछ अन्याय हुआ है, तभी तो जगह-जगह उच्च न्यायालयों में परीक्षा को चुनौती दी गई है और एनटीए उचित ही चाहता है कि तमाम मामलों की सुनवाई एक ही जगह सर्वोच्च न्यायालय में हो। कोई आश्चर्य नहीं, एनटीए की ऐसी ही मांग पर संबंधित पक्षों को नोटिस जारी किया गया है। इस पर भी 8 जुलाई को सुनवाई होगी। न्यायमूर्ति विक्रम नाथ व न्यायमूर्ति संदीप मेहता की अवकाश पीठ को पूरी कड़ाई के साथ प्रश्नपत्र लीक और कदाचार की सुनवाई करनी पड़ेगी। एक बड़ा खतरा यह है कि अगर कदाचार का सहारा लेने वाले माफिया अभी बच गए, तो मेडिकल प्रवेश परीक्षा पर हमेशा के लिए दाग लग जाएगा। यह संभव है कि इस कदाचार में एनटीए के भी कुछ लोग लिप्त रहे हों, अत: एनटीए की जांच पैनल पर कितना भरोसा किया जाए, यह फैसला अदालत को ही करना चाहिए। यह मांग शायद उचित है कि जांच अदालत की निगरानी में होनी चाहिए।
अपने देश में मेडिकल की पढ़ाई का खर्च कई निजी संस्थानों में करोड़ों रुपये में पहुंच गया है। ऐसे में, सरकारी मेडिकल कॉलेजों में पढ़ाई के लिए जद्दोजहद तेज होती जा रही है। ध्यान रहे, मेडिकल प्रवेश परीक्षा 5 मई को 4,750 केंद्रों पर आयोजित की गई थी और लगभग 24 लाख विद्यार्थियों ने इसमें भाग लिया था। सबसे बड़ा शक तो यही है कि परिणाम 14 जून को घोषित करने के बजाय 4 जून को घोषित किए गए, उस दिन देश में मतगणना चल रही थी। क्या सफेदपोश लोगों ने यह सोचा कि चुनावी नतीजों के हो-हल्ले में उनका अपराध छिप जाएगा? क्या इसमें बड़े कोचिंग संस्थानों की भूमिका है? क्या अब अदालती जंग के पीछे भी चंद कोचिंग संस्थानों की प्रतिद्वंद्विता काम कर रही है? नीट से जुड़े अनेक बड़े सवाल हवा में तैर रहे हैं और सारी उम्मीदें सर्वोच्च अदालत पर टिकी हैं।
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15 June 2024
प्रश्न – 466 – संस्कार एवं परम्परा में अंतर स्पष्ट कीजिये। आप इन दोनों में से किसे श्रेष्ठ ठहरायेंगे, और क्यों? (200 शब्द)
Question – 466 – Explain the difference between culture and tradition. Which of these two would you consider the best, and why? (200 words)
नोट : इसका उत्तर आपको हमें नहीं भेजना है, यह आपके स्वयं के अभ्यास के लिए है।
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Date: 14-06-24
The ideology of social peace is still workingIndia’s millennia-old civilisation has asserted itself in this general election, placing constraints on the politics of hatredHarbans Mukhia, [ Taught History at Jawaharlal Nehru University, New Delhi ]
In a reaction to the invitation that was extended to the President of the Indian National Congress, Mallikarjun Kharge, to the swearing-in ceremony of Prime Minister Narendra Modi, Uttar Pradesh Minister Yogendra Upadhyay is reported to have said: “They (the Congress) rejected [the] Ram Mandir invitation. If they do the same this time, then it will show their shallow mentality.”
The comparison between the invitation to the consecration ceremony of the Ram Mandir in Ayodhya on January 22, 2024 and Mr. Modi’s oath-taking ceremony on June 9, 2024 shows, if anything, the same mentality that led Mr. Modi to deny, or at least doubt, while on the election trail, his own biological birth, and claim to be of divine origin.
Between an invocation and the election
Media orthodoxy has it that the fixation of the Bharatiya Janata Party (BJP) with Lord Ram is still bringing it huge electoral and political dividends, which has convinced the BJP leadership that this indeed is an inviolable truth. Any amount of empirical evidence to the contrary is dismissed as hypothetical at best, and/or false at worst. The ascendance of the BJP, from a mere two Lok Sabha seats in 1984 to a secular rise to 303 seats in 2019 is proof enough of the link with Lord Ram at its heart. What other proof is required?
The exploitation of Lord Ram for political ambitions was unambiguous in BJP veteran L.K. Advani’s famous statement in the middle of the launch of the rath yatra, that he was a political and not a religious leader, i.e., aiming at political, and not religious gains. In the timing of the installation of the statue of Lord Ram and the massive fanfare that accompanied it, followed by the consecration of the temple in Ayodhya on January 22 this year, it was clear that the proximity of the 2024 general election was the determinant. The link between the election and the invocation of Lord Ram, whatever the occasion, was forever highlighted rather than hidden. Yet, the failure of the link has been loud and clear on several occasions. On December 6, 1992, with the demolition of the Babri Masjid, the BJP’s top leadership must have imagined that the path to electoral victory now lay clear and unhindered. Assembly elections held in some of the main States in the Hindi belt, in 1993, led in the opposite direction: the BJP lost in Uttar Pradesh to arch rival of the Samajwadi Party Mulayam Singh Yadav (and Bahujan Samaj Party) and had to wait for a decade to return home. The wave of “liberating Ram Lalla” from the precincts of the masjid was feeble. There were electoral losses in Himachal Pradesh and Madhya Pradesh too. Its government in Rajasthan survived the debacle, though with a considerably reduced majority, as Chief Minister Bhairon Singh Shekhawat had kept a distance from Mr. Advani’s rath yatra and the resultant events of December 6. The formation of the first BJP government in 1998 was not due to the Ram Mandir movement but more the result of infighting within the various constituents of the then ruling coalition. But learning a lesson from it and keeping Lord Ram out of politics would have required a rethink of the communal perspective, which is central to the Sangh Parivar. In 2014, there had to be camouflaging of the communal agenda using the more general slogan of vikas (development).
The Ayodhya result
In the 2024 general election, the defeat of the BJP in Ayodhya itself demonstrates the dysfunctional link between electoral politics and the invocation of Lord Ram. It was no ordinary defeat, for the BJP candidate lost by over 50,000 votes. The BJP’s Lallu Singh was a veteran, taking on a Dalit rival, Awadhesh Prasad. And this happened after Prime Minister Narendra Modi and the Sangh Parivar’s investment in the construction of the Ram temple and its location in politics.
The 2024 general election result shows that the Indian voter has expressed a repugnance for the politics of hatred, of divide and rule, and the politics of the Prime Minister himself, whose electoral rhetoric this time was indecorous. Where was the grace reflected in person, behaviour and language that one saw in the speeches of Prime Ministers like Jawaharlal Nehru, Indira Gandhi, and Atal Bihari Vajpayee?
Will Mr. Modi, or the BJP as a party, or the RSS learn a lesson from Lord Ram? The people of India have made their preferred choices clear. It is very unlikely to happen. After the Supreme Court of India’s famous judgment of 2019 on the Babri Masjid-Ram Janmabhoomi dispute, which, among other things, had forcefully upheld the view that no temple, much less a Ram temple lay demolished under the debris of the masjid (a view advanced by several professional historians and archaeologists) and that the demolition of the masjid was a criminal act for which the guilty should be tried in a court of law, one still hears echoes of “undoing the injustice of 500 years” doing the rounds. Never mind what the historians and the Supreme Court have said.
A continuing legacy
In placing constraints on the politics of hatred, which is the hallmark of the Modi government, India’s millennia-old civilisation has asserted itself. In doing so, salience is due to the civilisation of our medieval centuries that has given us the legacy of numerous saint-poets, the Bhakti sants, who brought calm to the strained religious divide of rival gods by conceptualising one universal god where their rivalry gets submerged. For, in the midst of considerable bloodshed on the battlefields, between political and denominational factions extending over five and a half centuries, the first genuine communal riot between common people of different faiths — of which we have recorded evidence — happened in 1714, seven years after Aurangzeb’s death. Clearly, the ideology of social peace was working.
Date: 14-06-24
इस बार नई संसद के तेवर अलग नजर आएंगेसंपादकीय
18वीं लोकसभा की पहली बैठक 24 जून से 3 जुलाई तक चलेगी। इसमें प्रोटेम स्पीकर चुनकर आए सदस्यों को शपथ दिलाएंगे, जिसके बाद स्पीकर का चुनाव होगा। 27 जून को दोनों सदनों के संयुक्त सत्र में राष्ट्रपति के अभिभाषण के जरिए सरकार अपनी कार्य की दशा-दिशा बताएगी । संसदीय लोकतंत्र में सदन का चलना सरकार की जिम्मेदारी है। पहले से ताकतवर विपक्ष को साधना मुश्किल होगा। स्पीकर का चुनाव सर्वसम्मति से होने की परम्परा रही है, जो इस बार टूट सकती है। इसका कारण विपक्ष का यह दावा है कि संविधान के अनुच्छेद 93 में स्पीकर के साथ डिप्टी स्पीकर के चुनाव की अपरिहार्यता के बावजूद पिछले सदन के पूरे काल में यह पद सत्ता पक्ष ने खाली रखा। पिछली लोकसभा में कई अहम बिल जैसे तीन किसान बिल, तीन तत्काल बिल और तीन नए अपराध न्याय बिल बगैर किसी चर्चा के पारित हो गए थे, जबकि संसद से रिकॉर्ड संख्या में विपक्षी सांसदों को निलंबित किया गया। चुनाव परिणाम के बाद से ही सत्ताधारी भाजपा ने संसद में’ देश के विकास के लिए सहमति के बारे में बात करना शुरू कर दी है। चूंकि 1977 की विपक्षी एकता के बाद यह पहली वास्तविक विपक्षी एकता है जो अस्तित्व में आई है। लिहाजा विपक्ष का रवैया शायद ही समझौतावादी हो। सरकार को पिछले सदन जैसा द्वंद्वात्मक रवैया छोड़ना होगा।
Date: 14-06-24
अप्रासंगिक होते वामपंथी दलहरेंद्र प्रताप, ( लेखक बिहार विधान परिषद के पूर्व सदस्य हैं )
अठारहवीं लोकसभा चुनाव के नतीजे विचारधारा वाले दो दलों-भाजपा और कम्युनिस्ट पार्टियों के उत्कर्ष और पराभव की भी कहानी कहते हैं। राष्ट्रवादी विचार को लेकर चलने के कारण भाजपा जहां आज सत्ता के शीर्ष पर है, वहीं राष्ट्र विरोधी विचार के कारण देश में वामपंथ को नकारा जा रहा है। आज भारत में कम्युनिस्ट नामधारी कई पार्टिया हैं, जैसे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी यानी सीपीआइ, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी यानी सीपीएम, सीपीआइ (एमएल) लिबरेशन, सीपीआइ (एमएल) लिबरेशन रेड स्टार, सीपीआइ (एमएल) लिबरेशन रेड फ्लैग, मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी आफ इंडिया (यूनाइटेड) और सोशलिस्ट यूनिटी सेंटर आफ इंडिया (कम्युनिस्ट)।
इसके अलावा रिवोल्यूशनरी सोशलिस्ट पार्टी (आरएसपी) और फारवर्ड ब्लाक के नाम में भले कम्युनिस्ट या मार्क्स या लेनिन न जुड़ा हो, पर उनकी विचारधारा भी वामपंथी है और वे वाम गठबंधन में शामिल रहे हैं। सीपीआइ से टूट कर सीपीएम, सीपीएम से टूटकर सीपीआइ (एमएल) लिबरेशन और लिबरेशन से टूट कर लिबरेशन रेड स्टार और लिबरेशन रेड फ्लैग जैसे दल बने। अलोकतांत्रिक, असहिष्णु एवं हिंसा के पक्षधर वामपंथ में संवाद-सहयोग और समन्वय का अभाव तथा विदेशपरस्त नीतियां उनके विभाजन के प्रमुख कारण बनते रहे।
वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में सीपीएम तीन तो सीपीआइ दो सीटों पर जीती थी। इस बार लोकसभा चुनाव में सीपीएम केरल से एक, तमिलनाडु से एक तथा राजस्थान से एक यानी कुल तीन सीटें और सीपीआइ तमिलनाडु से दो सीटें जीती हैं। साथ ही सीपीआइ (एमएल) लिबरेशन बिहार से दो तथा आरएसपी केरल से एक सीटें जीतने में सफल रही। बंगाल में लोकसभा की 42 सीटे हैं। कभी इस राज्य में 28 सीटें जीतने वाली सीपीएम विगत लोकसभा चुनाव में अपना खाता भी नहीं खोल पाई थी। इस बार भी नहीं खोल पाई। इस बार के चुनाव में मात्र एक सीट पर ही वह दूसरे स्थान पर रही है। स्पष्ट है कि अब बंगाल उसके हाथ से पूरी तरह फिसल चुका है।
सीपीआइ का वर्ष 1964 में विभाजन हुआ। दूसरे धड़े ने अपना नाम सीपीएम रखा। 1967 के लोकसभा चुनाव में बंगाल, तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों में जहां कम्युनिस्ट पार्टी का खासा जनाधार था, वहां ये दोनों दल एक-दूसरे के खिलाफ लड़े। बंगाल में दोनों पांच-पांच सीटें जीते। धीरे-धीरे ये दोनों राज्य विशेष में अपना जनाधार बनाने लगे। त्रिपुरा, बंगाल और केरल में वामपंथी जनाधार पर सीपीएम का कब्जा तो बंगाल से सटे बिहार और उत्तर प्रदेश में सीपीआइ का असर हो गया। 1991 में सीपीआइ पूरे देश में 14 सीटें जीती थी, जिसमें बिहार की हिस्सेदारी आठ थी।
हालांकि 1996 के बाद से उत्तर प्रदेश तो 1998 के बाद से बिहार में सीपीआइ अपना खाता भी नहीं खोल पाई। अब बिहार के वामपंथी जनाधार पर सीपीआइ (एमएल) लिबरेशन का कब्जा हो गया है। 2020 में हुए बिहार विधानसभा के चुनाव में सीपीआइ (एमएल) लिबरेशन 19 सीटों पर लड़कर 12 सीटें जीतने में सफल रही। सीपीआइ तथा सीपीएम दोनों दो-दो सीटें ही जीत पाईं। इस बार लोकसभा चुनाव में बिहार में सीपीआइ (एमएल) लिबरेशन भाजपा के आरके सिंह तथा राष्ट्रीय लोक मोर्चा के उपेंद्र कुशवाहा को हराने में सफल हुई। तीन सीटों पर लड़कर दो सीटों पर विजय प्राप्त होने से सीपीआइ (एमएल) लिबरेशन के समर्थक उत्साहित हैं।
कुछ वामपंथी विचारक इसे वामपंथ के पुनरुद्धार से जोड़कर नई-नई भविष्यवाणी कर रहे हैं। ध्यान रहे कि बिहार में वामपंथी दलों का गठबंधन जातिवादी राजनीति के वाहक राजद के साथ है। वर्ग की बात करने वाले जाति की राजनीति करने वाले से हाथ मिलाकर इतरा रहे हैं। इस गठबंधन में कांग्रेस भी है, जबकि 2008 में सीपीएम के तत्कालीन महासचिव प्रकाश करात ने सार्वजनिक रूप से यह घोषणा की थी कि भविष्य में वह कांग्रेस से कोई गठबंधन नहीं करेंगे।
केरल में तो नहीं, पर बंगाल, त्रिपुरा और बिहार में वह कांग्रेस से गठबंधन कर लोकसभा चुनाव लड़े। बंगाल में कांग्रेस के साथ हुए गठबंधन में आरएसपी और फारवर्ड ब्लाक भी शामिल थे, लेकिन कूचबिहार और पुरुलिया में कांग्रेस ने आरएसपी के उम्मीदवार के खिलाफ अपना उम्मीदवार खड़ा कर दिया। अत: चुनाव परिणाम के अगले दिन ही आरएसपी और फारवर्ड ब्लाक ने यह घोषणा कर दी कि भविष्य में वे कांग्रेस के साथ कोई गठबंधन नहीं करेंगे।
बंगाल में जिस कांग्रेस का विरोध कर सीपीएम दशकों राज्य की सत्ता पर काबिज रही, उसी कांग्रेस के साथ चुनावी गठबंधन करती है और उसकी करारी हार होती है तो यह मतदाता नहीं कम्युनिस्ट नेतृत्व का दोष है। बंगाल आज राजनीतिक हिंसा और वोटों के अपहरण का पर्याय बन गया है। यहां इस संस्कृति का बीजारोपण सीपीएम नेतृत्व वाली वामपंथी सरकार ने ही किया था। अब वामपंथी दल ममता बनर्जी पर लोकतंत्र के अपहरण का आरोप लगा रहे हैं। बंगाल में लगातार हो रही हार पर सीपीएम के राज्य सचिव मोहम्मद सलीम ने कहा कि अब हमें भी ‘आइपैक’ जैसी पेशेवर संस्था का सहारा लेना चाहिए, ताकि पार्टी को फिर पटरी पर लाया जा सके।
वैसे भी वर्तमान में चुनाव इंटरनेट मीडिया पर कुछ ज्यादा निर्भर होता जा रहा है। वाम दलों की पराजय और बिखराव पर वामपंथी विचारक भले सार्वजनिक रूप से अपनी कमी को स्वीकार न करें, पर उनके अवसान का कारण वे खुद हैं। चीन के विस्तारवाद पर चुप्पी, बांग्लादेश के निर्माण का विरोध तथा अयोध्या में रामलला की प्राण प्रतिष्ठा के विरोध की घोषणा से सीपीएम बेनकाब हो गई है। अगर वामपंथी भारत विरोधी विचार नहीं छोड़ेंगे तो उनका इतिहास के पन्नों में सिमटना तय है।
Date: 14-06-24
हिंद महासागर का बिगड़ता मिजाजअखिलेश आर्येंदू
महासागरों का तापमान लगातार बढ़ रहा है। इनमें हिंद महासागर तेजी से गर्म हो रहा है। प्राकृतिक आपदाएं बार-बार उथल-पुथल मचाने लगी हैं। इनकी वजह से तटीय इलाकों में रहने वाले समुदायों के लिए खतरा पैदा हो गया है। विज्ञान पत्रिका ‘जर्नल साइंस डायरेक्ट’ में प्रकाशित अध्ययन से इसकी जानकारी मिली है। पिछले पांच दशक से प्राकृतिक संसाधनों में अनेक प्रकार के बदलाव देखे जा रहे हैं। इनके असर से ऋतुचक्र और वातावरण पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है। यह महज भारत की समस्या नहीं है, वैश्विक स्तर पर जलवायु में बदलाव देखा जा रहा है। पत्रिका के मुताबिक समुद्र की सतह का तापमान 28 डिग्री सेल्सियस से अधिक होने का अनुमान है। अध्ययन के मुताबिक हिंद महासागर का गर्म होना सिर्फ सतह तक सीमित नहीं है, इसके जल का तापमान भी बढ़ता जा रहा है। इससे समुद्री ऊष्म तरंगें बननी शुरू हो गई हैं। समुद्री जैव विविधता पर इसका बुरा असर देखा जा रहा है।
वैज्ञानिकों के अनुसार शताब्दी के अंत तक अत्यधिक द्विध्रुवीय घटनाओं में 66 फीसद तक वृद्धि का अनुमान है। एक अध्ययन के मुताबिक इक्कीसवीं सदी के अंत तक हिंद महासागर का तापमान तीन डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है। इसकी सिर्फ सतह नहीं, बल्कि दस किलोमीटर नीचे तक पानी गर्म हो रहा है। महासागर का तापमान बढ़ने से कई देशों पर इसका विपरीत असर पड़ेगा। वैज्ञानिकों के मुताबिक इसका असर पर्यावरण पर व्यापक रूप से पड़ेगा। वैज्ञानिकों ने अपने एक अध्ययन में पाया है कि वर्ष 2020 से 2100 के बीच हिंद महासागर की समुद्री सतह के तापमान में 1.4 डिग्री सेल्सियस तक की वृद्धि होने की उम्मीद है, जिससे कई तरह की प्राकृतिक आपदाएं आने की आशंका है। इससे मानसून पर असर पड़ेगा, चक्रवात आएगा और समुद्र के जल स्तर में वृद्धि होगी। आने वाले पचहत्तर साल में जैव विविधता पर बहुत बड़ा खतरा आ सकता है। हजारों किलोमीटर की जैव विविधता नष्ट हो सकती है।
अध्ययन के मुताबिक समुद्री लू (समुद्र का तापमान असामान्य रूप से अधिक रहने का समय) वर्ष 1970 से 2000 के दौरान हर साल बीस दिन होती थी। अब उसके बढ़कर हर साल 220-250 दिन होने का अनुमान है। इसके चलते उष्णकटिबंधीय हिंद महासागर इक्कीसवीं सदी के अंत तक स्थायी लू की स्थिति के करीब पहुंच जाएगा। इस हालात में समुद्र की पारिस्थितिकी पर गहरा असर होगा। समुद्र में पाए जाने वाली तमाम चीजों के रंग में बदलाव हो सकता है, जिसमें समुद्री घास, मूंगों और मछलियों का रंग भी बदल जाएगा। चक्रवात बहुत कम वक्त में ही जोर पकड़ने लगता है। समुद्र का तापमान बढ़ने से नई समस्याएं पैदा होंगी। समुद्र से इंसान का सीधा रिश्ता है, इसलिए वैज्ञानिक हिंद महासागर के बढ़ते तापमान से बेहद चिंतित हैं। जाहिर तौर पर धरती के बढ़ते तापमान के साथ समुद्र का तापमान बढ़ना मानव सभ्यता के लिए बेहद खतरनाक हो सकता है।
‘उष्णकटिबंधीय हिंद महासागर के लिए भविष्य के पूर्वानुमान’ शीर्षक अध्ययन के मुताबिक, हिंद महासागर के जल के तापमान का तेजी से बढ़ना महज इसकी सतह तक सीमित नही है। हिंद महासागर में, उष्मा की मात्रा सतह से 2,000 मीटर की गहराई तक वर्तमान में 4.5 जेटा-जूल प्रति दशक की दर से वृद्धि होने का अनुमान है और आने वाले वक्त में इसके 16 से 22 जेटा-जूल प्रति दशक की दर से बढ़ने का अनुमान है। जाहिर तौर पर इससे हिंद महासागर क्षेत्र के आसपास ही नहीं, कई किलोमीटर क्षेत्र में कई तरह के बदलाव होने का अनुमान है। वैज्ञानिकों के मुताबिक ऊष्मा की मात्रा में होने वाली वृद्धि एक परमाणु बम (हिरोशिमा में हुए) विस्फोट से पैदा होने वाली ऊर्जा के समान होगी। इसके अलावा, अरब सागर सहित उत्तर पश्चिम हिंद महासागर में बहुत ज्यादा मात्रा में गर्मी हो सकती है, जबकि सुमात्रा और जावा के तटों पर कम गर्मी होने का अनुमान है। बेहद तेज तूफानों से समुद्री तटों पर कई तरह के विनाशकारी मंजर नजर आ सकते हैं।
हिंद महासागर के साथ-साथ दूसरे महासागरों का तापमान बढ़ना किसी बड़े विनाश का सूचक बताया जा रहा है। महासागरों का तापमान गर्म होने के बीच, सतह के तापमान के मौसमी चक्र में बदलाव होने का अनुमान है, जिससे भारतीय उपमहाद्वीप में चरम मौसमी बदलाव की घटनाएं बढ़ सकती हैं। एक अध्ययन के मुताबिक, वर्ष 1980 से 2020 के दौरान हिंद महासागर में अधिकतम औसत तापमान पूरे साल 26 डिग्री सेल्सियस से 28 डिग्री सेल्सियस के बीच रहा। वैज्ञानिक इससे अनुमान लगा रहे हैं कि भारी उत्सर्जन परिदृश्य के तहत इक्कीसवीं सदी के अंत तक न्यूनतम तापमान पूरे साल 28.5 डिग्री सेल्सियस और 30.7 डिग्री सेल्सियस के बीच रहेगा। गौरतलब है कि 28 डिग्री सिल्सियस से ऊपर की सतह का तापमान आमतौर पर गहरे संवहन और चक्रवात के लिए अनुकूल माना जाता है। अध्ययन के मुताबिक, वर्ष 1950 के दशक से भारी बारिश की घटनाएं और भंयकर चक्रवात पहले भी कहर ढा चुके हैं। सागर के तापमान में वृद्धि के साथ इसके और बढ़ने का अनुमान है। इससे बहुत सारे विपरीत प्रभाव दिखाई पड़ सकते हैं।
हिंद महासागर में गर्मी बढ़ने से इसका जलस्तर भी बढ़ सकता है। पानी में गर्मी का विस्तार हिंद महासागर में समुद्र के जल स्तर में आधे से अधिक वृद्धि में योगदान देता है, जो ग्लेशियर और समुद्री बर्फ के पिघलने से होने वाली बढ़ोतरी से कहीं ज्यादा है। अध्ययन के मुताबिक सदी के अंत तक समुद्र का अम्लीकरण तेज हो सकता है। इससे सतह का पीएच 8.1 से ऊपर से घटकर 7.7 से नीचे आ सकता है। पीएच में अनुमानित बदलाव समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र के लिए नुकसानदायक हो सकता है। इस वजह से मूंगे और ऐसे जीव, जो अपनी खोल के निर्माण और रखरखाव के लिए कैल्सिफिकेशन पर निर्भर रहते हैं, प्रभावित होंगे। इस बदलाव को पीएच में बदलाव के आधार पर हम समझ सकते हैं। जैसे इंसान के रक्त के पीएच में मामूली 0.1 की गिरावट से सेहत पर गंभीर असर पड़ जाता है और कई अंग काम करना बंद कर देते हैं, उसी तरह सागर के पानी के पीएच मान में बदलाव के असर का अनुमान लगाया जा सकता है। इसके अलावा क्लोरोफिल और उत्पादकता में भी गिरावट आने का अनुमान है। इससे पश्चिमी अरब सागर की पारिस्थितिकी ज्यादा प्रभावित होगी।
मानसून और चक्रवात निर्माण को प्रभावित करने वाली एक घटना, हिंद महासागर द्विध्रुव, में भी बदलाव आने का अनुमान वैज्ञानिक लगा रहे हैं। इसमें इक्कीसवीं सदी के अंत तक बहुत तेज बदलाव वाली घटनाओं की आवृत्ति में 66 फीसद तक की वृद्धि हो सकती है, वहीं मध्यम घटनाओं की आवृत्ति में 52 फीसद की कमी आने का अनुमान है। हिंद महासागर चालीस देशों की सीमा को छूता है। दुनिया की आबादी के एक तिहाई हिस्से के घर, हिंद महासागर क्षेत्र में आते हैं। जलवायु परिवर्तन का सामाजिक और आर्थिक असर कितना गहरा पड़ेगा इससे अनुमान लगाया जा सकता है।आज हिंद महासागर और इसके आसपास के इलाकों में वैश्विक स्तर पर प्राकृतिक आपदाओं के सबसे ज्यादा खतरे वाले क्षेत्र के रूप में देखे जा रहे हैं। इसलिए हिंद महासागर और दूसरे महासागरों से बढ़ते खतरों पर चौकन्ना रहने की बेहद जरूरत है।
Date: 14-06-24
कुवैत में दर्दनाक हादसासंपादकीय
कुवैत के मंगाफ शहर में आग से जल कर 42 भारतीयों की मौत वाकई तकलीफदेह है। एक बहुमंजिला रिहायशी इमारत में अधिकांश भारतीय नागरिक थे। इनमें सबसे ज्यादा केरल के लोग थे। इनके अलावा, तमिलनाडु और उत्तर भारत के नागरिक भी अच्छी-खासी संख्या में थे। बताया जा रहा है कि इस छह मंजिला इमारत में जो भवन लिया गया था, उसकी क्षमता बेहद कम थी, जबकि वहां 200 से ज्यादा श्रमिकों को ठहराया गया था। स्वाभाविक रूप से यह संवेदनहीनता और घोर लापरवाही का मामला दिखता है। पहले भी यह देखा गया है कि हमारे यहां से बाहर जितनी संख्या में मजदूरों को ले जाया जाता है, उन्हें वैसी सुविधा मय्यसर नहीं होती। इन लोगों को मवेशियों की तरह ठूंस कर रखा जाता है। यहां तक कि सुवधाओं का सब्जबाग दिखाकर उन्हें बेहद तकलीफ वाली रोजमर्रा की जिंदगी जीने को मजबूर किया जाता है। इस मामले में एक तथ्य ज्यादा गंभीर और युक्तिसंगत है। हमारे देश में रोजगार की जो बुरी गत है, वह किसी से छिपी नहीं है। न केंद्र सरकार के पास रोजगार की कोई संभावना है और न राज्य सरकारों के पास। नतीजतन, युवा बाहरी मुल्कों की तरफ जाते हैं। बिना यह सोचे-समझे कि वहां उन्हें किस तरह की सुविधाएं मिलेंगी और क्या विशेषाधिकार मिलेंगे। सही-गलत का तार्किक विश्लेषण करने की बजाय युवा किसी भी कीमत पर नौकरी पाना चाहता है। कुवैत की घटना इसलिए मायनेखेज है कि जिस कंपनी ने इन लोगों को अपने पास बुलाया था, वह इन्हें नौकरी देना तो दूर इनकी जान तक नहीं बचा सकी। ऐसे कई उदाहरण अतीत में देखे गए हैं कि फलां कंपनी ने श्रमिकों को अपने यहां बुलाया और फिर बंधक बना लिया। कइयों की तो वहां मौत भी हो गई। बाहरी देशों में दूतावासों की भूमिका भी सुस्त और गैर-जिम्मेदाराना देखी गई है। क्या बाहरी मुल्कों में भारतीय दूतावास इस बात की पड़ताल नहीं कर सकते कि भारतीय मजदूरों से कंपनी का समझौता किन शर्तों पर हुआ है? सिर्फ रस्म अदायगी करने से हादसे को रोकना नामुमकिन है। रोजगार को लेकर अपने यहां की सरकार को ज्यादा गंभीर बनना होगा। इस बात की पड़ताल भी उन राज्य सरकारों को करनी होगी, जिनके यहां से मजदूर बाहर जा रहे हैं। जब तक सरकारी मशीनरी एकजुट होकर काम नहीं करेगी, कुछ भी नहीं बदलेगा।
Date: 14-06-24
कुंद होती संवेदनाएंवीरेन्द्र कुमार पैन्यूली
जून 2 से 12 मई, 2024 के बीच उम्र और दिल्ली में सीवर सफाई के दौरान आठ लोगों की मृत्यु के समाचार थे। हालांकि सरकारी आंकड़ों के अनुसार 2018-23 के पांच सालों के बीच 339 लोग मरे थे। ऐसी मौतों से यह भी उजागर होता है कि भारत में अभी भी असुरक्षित मैनुअल स्कैवेजिंग यानी हाथों से मानवीय अपशिष्ट मल उठाना और दोना जारी है जबकि मैनुअल स्केवेंजर्स का रोजगार और सूखे शौचालय निर्माण (निषेध) अधिनियम, 1993 के लागू होने के साथ ही मैनुअल स्कैवेजिंग गैर-कानूनी हो गई थी। 2008 में भारत सरकार ने अध्यादेश ला सफाई के लिए उपकरण देना अनिवार्य कर दिया था। इसके बाद प्रोहिबिसन ऑफ एम्पलॉयमेंट ऐज मैनुअल स्केवेन्जर्स एंड दियर रिहैबलीटेशन एक्ट, 2013 ने स्थिति को और भी पुष्ट कर दिया था। कुछ लोग सफाईकर्मियों की सीवरों में मौतों को हत्याएं कहते हैं वहीं समाचारों के अनुसार 2019 में उच्चतम न्यायालय की एक पीठ भी कह चुकी है कि दुनिया में कोई दूसरा देश इस तरह अपने लोगों को गैस चेम्बर में मरने को नहीं भेजता।
न्यायालयों की चिंता यह भी रहती हैं कि मैला सफाई के लिए सीवरों और सैप्टिक टैंकों में जाने का दबाव दलितों पर ही रहता है। इसी परिप्रेक्ष्य में 2024 में मद्रास हाईकोर्ट की मुख्य न्यायाधीश गंगापुरवाला और जस्टिस सत्य नारायण प्रसाद की बेंच ने एक सुनवाई के दौरान बिना लाग लपेट सुना दिया था कि मैले की हाथों से साफ-सफाई करवाना गहराई में जड़ जमाए जातिवाद और भेदभाव भी दर्शाता है और इसे एक तरह से राज्य से स्वीकृति प्राप्त है।
बेंच ने मैनुअल स्कैवेजिंग एकदम समाप्त करने संबंधी निर्देश भी दिए। इसके पूर्व अप्रैल, 2021 में तमिलनाडु हाईकोर्ट के तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश संजीव चैनर्जी की अध्यक्षता वाली दो सदस्यीय पीठ ने राज्य सरकार को निर्देश दिए थे कि सीवर सफाई करते सीवर टैंक में उतरे किसी सफाईकर्मी की यदि मौत होती है। तो उसके लिए निकाय प्रमुखों को जिम्मेदार बना उनके विरुद्ध आपराधिक मामले दर्ज हों। पीठ का कहना था कि जब तक यह नहीं होगा तब तक ऐसी घटनाओं पर रोक नहीं लगेगी। तब तमिलनाडु में फरवरी, 2021 से अप्रैल, 2021 तक 6 सफाईकर्मियों की सीवरों में मौत हो गई थी। आधिकारिक रूप से 30 जुलाई 2023 देश में 58,098 हाथ से मैला साफ करने वाले चिन्हित कर लिए गए थे।
विडम्बना है कि खुले में शौच से मुक्ति के लिए ग्रामीण व शहरी क्षेत्रों में बने व बनते लाखों शौचालयों के सैप्टिक टैंकों के भरने पर उनको खाली करने के लिये मैनुअल स्कैवेजिंग की जरूरत और ही बढ़ी है। उनका सीवर लाइनों से जुड़ना बहुत बाद में होता है हमें न भूलना होगा कि सीवरों और सैप्टिक टैंकों में घुसे श्रमिक मल निकासी या अवरोधों को खोलने में जब हादसों के शिकार होते हैं तभी खबरें बनती है अन्यथा प्रति दिन ही सैकड़ों जगह सीवरों में सैप्टीक टैंकों में श्रमिक बिना सुरक्षा उपकरणों के उतरे रहते हैं। दुखद तो यह है कि मैनुअल स्कैवेंजर्स को जो नगर निकाय या ठेकेदार सीवर सफाई के काम पर रखते हैं वे भी कई बार तो उनके कर्मियों की मौतों और हादसों की जिम्मेदारी भी नहीं लेते।
आक्रोशित और चिंतित न्यायालयों की सख्त टिप्पणियां समाज को आईना दिखाती हैं और यथार्थपरक और संवेदना जगाने वाली अवश्य रही हैं। कोर्ट निर्देशों और आदेशों के देने से ज्यादा कर सकते हैं। वे सीवरों में मौतों का स्वतः संज्ञान भी ले रहे हैं-3 मई, 2024 मप्र हाईकोर्ट ने ग्वालियर के बिरला नगर में सीवर चेम्बर सफाई के दौरान दो श्रमिकों की मौत की संज्ञान याचिका ली थी किन्तु जैसा कानूनों का ठीक से पालन हो तो सीवर से संबंधित दुर्घटनाओं में कमी आ जाए। हर जिम्मेदार अधिकारी, ठेकेदार या आम नागरिक यदि यह तय कर ले कि अपने देखे अपनी मौजूदगी में ‘लो’ वह बिना सुरक्षा उपकरणों या कवचों के किसी सफाईकर्मी को सीवरों और सैप्टिक टैंकों में घुसने नहीं देगा तो सफाईकर्मियों की मौत या स्थायी और अस्थायी दिव्यांगता की संभावनाएं काफी कम हो जाएंगी किन्तु संवेदनाएं इतनी चूकी हुई हैं कि नामी- गिरामी मॉल्स, अस्पतालों, संस्थानों और आवासीय परिसरों में जहाँ अच्छे-खासे शिक्षित और रसूखदार लोग रहते हैं, वहां के सीवरों में भी मैनुअल स्केवेंजर्स अपनी जान, अपनी चेतना और अंगों की कार्यशीलता खो रहे हैं। 21 अगस्त, 2017 में जब दिल्ली के एक प्रमुख अस्पताल में एक सफाईकर्मी की मौत हुई थी तब वह यह एक महीने के भीतर दिल्ली में दसवीं मौत थी।
दुखद है कि देश के सरकारी अस्पतालों और सरकारी संस्थानों में भी ऐसी मौतें हो रही हैं। यही नहीं आम नागरिक भी अपने घरों के सैप्टिक टैंकों की सफाई के लिए अनियोजित क्षेत्र के मजदूरों को बुलाते हैं, तो वे नहीं देखते कि यह बिना सुरक्षा उपकरणों के ही काम कर रहा है। उप्र में 3 मई, 2024 को नोएडा में निजी आवास के सैप्टिक टैंक की सफाई में दो दिहाड़ी मजदूरों की मौत हुई थी।
जरूरत श्रमिकों को भी इस बारे में जागरूक करने की है कि कौन-कौन ऐसे सुरक्षा उपकरण हैं जिनके साथ ही उन्हें सीवरों में उतरना चाहिए। इनको उपलब्ध कराने के लिए ठेकेदारों पर भी दबाव बनाना जरूरी है। ऐसा न करने पर उनका लाइसेंस रद्द होना चाहिए। सीवरों में जा अचेतों को | खुद को बचाते ऊपर पहुंचवाने के लिए भी प्रशिक्षण देने की आवश्यकता है। हम जाड़ों में दिल्ली के अतिशय गंभीर हालात की गैस चेम्बरी वातावरण से तुलना कर देते हैं। बताने लगते हैं कि यहाँ रहते जीवन कितना कम हो रहा है किन्तु सीवरों और सेप्टिक टैंकों के वास्तविक गैस चेम्बर में नित काम करने वाले दलितों पर संवेदनाएं कुंद रहती हैं। 20 अक्टूबर 2023 को सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के अनुसार अधिकारियों को सीवर सफाई करते हुये मृतकों को तीस लाख रुपये, स्थायी विकलांगता के लिए 20 लाख मुआवजा और अस्थायी विकलांगता के लिए कम से कम दस लाख का मुआवजा देना होगा।
Date: 14-06-24
भारतीयों की चिंतासंपादकीय
यह मर्माहत कर देने वाली खबर है कि कुवैती शहर मंगफ में एक आवासीय इमारत में आग लगने से कम से कम 40 भारतीयों की जान चली गई। यह बहुत दुर्भाग्यपूर्ण है कि आग उसी इमारत में लगी, जहां दर्जनों कर्मचारी रहा करते थे, उन्हें बचने का मौका तक नहीं मिला। निचली मंजिल पर लगी आग ऊपर फैलती चली गई। अधिकांश हताहत दक्षिण भारतीय राज्य केरल और तमिलनाडु से हैं। करीब 50 भारतीय घायल भी हुए हैं। घायलों में नेपाली कामगार भी शामिल हैं। इसमें तो कोई दोराय नहीं कि ये कर्मचारी या मजदूर बहुत अमानवीय माहौल में रह रहे थे। इमारत में करीब 196 कर्मचारी रह रहे थे। जाहिर है, इमारत में काफी भीड़भाड़ थी और इसी वजह से कर्मचारी आग से घिर गए। कुवैती उप-प्रधानमंत्री शेख फहद यूसुफ अल-सबा ने इमारत के मालिकों पर लालच का आरोप लगाया और कहा कि भवन मानकों के उल्लंघन के चलते यह त्रासदी हुई। वैसे, सिर्फ वजह बताने से काम नहीं चलेगा, हमें यह देखना होगा कि क्या कुवैती सरकार दोषियों के खिलाफ कड़े कदम उठाएगी ?
ध्यान रहे, तमाम अरब देशों में भारतीय बड़ी संख्या में रहते हैं। छोटे से मुल्क कुवैत की अगर बात करें, तो वहां आबादी का दो-तिहाई हिस्सा विदेशी श्रमिकों से बना है। वहां पर भारतीय श्रमिकों की संख्या अच्छी-खासी है। इतने बड़े हादसे के बाद प्रशासन जागता लग रहा है। प्रशासन सफाई दे रहा है कि ऐसे आवासों में भीड़भाड़ को लेकर अक्सर चेतावनियां जारी की जाती थीं, पर भवन मालिकों ने इस ओर ध्यान नहीं दिया। इस त्रासदी पर मानवाधिकार समूहों ने भी चिंता जताई है। अब चिंता से आगे बढ़कर काम करने की जरूरत है। तमाम अरब देशों में मजदूरों की स्थिति बहुत अमानवीय है। इन सभी देशों में मजदूरों की सुरक्षा चाक-चौबंद करने पर ध्यान देना होगा। भारत सरकार को अपनी ओर से भरपूर दबाव डालना होगा, ताकि अरब देशों में हमारे कामगारों के प्रति संजीदगी बढ़े। देश के लाखों मजदूरों को रोजगार के लिए विदेश जाना पड़ता है, तो विदेश गए मजदूरों के प्रति सरकार की जिम्मेदारी कम नहीं हो जाती है। सबकी नजरें भारत सरकार पर है कि वह आगामी दिनों में अपने लोगों की सुरक्षा के लिए क्या कदम उठाती है?
अरब देशों ही नहीं, यूक्रेन, रूस जैसे अनेक देशों में भारतीयों की सुरक्षा को ताक पर रखा जा रहा है। मिसाल के लिए, युवा काम की तलाश में रूस जाते हैं और उन्हें रूस में सैनिक बना दिया जाता है। रूसी सेना की ओर से लड़ते हुए भारतीय हमें बहुत चिंता में डाल रहे हैं। सरकार को आपत्ति जताने से आगे जाकर अपने लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए। यहां यह जान लेना चाहिए कि विदेश में भारतीयों की मौत चिंता की एक बहुत बड़ी वजह बनती जा रही है। सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत मांगे गए एक जवाब के मुताबिक, अकेले साल 2020 में विदेश में कुल 11,439 भारतीयों की मौत हुई। अगर छात्रों की बात करें, तो साल 2018 के बाद से विदेश में 403 भारतीय छात्रों की विभिन्न वजहों से मौत हुई है। इनमें से सर्वाधिक 91 छात्र कनाडा में मारे गए हैं। सोचने वाली बात है, भारतीय छात्रों की मौत के मामले में कनाडा, ब्रिटेन, रूस, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी जैसे देशों का दामन साफ नहीं है। अत: भारत सरकार को तगड़ी मोर्चाबंदी करनी पड़ेगी और विदेश जाने वालों को भी अपनी सुरक्षा के प्रति सजग होना पड़ेगा
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‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 1 जून, 2024
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Date: 13-06-24
देश में विकास नीतियां नए पैरामीटर्स पर बनेंसंपादकीय
देश की समस्याओं को गहराई से समझने और उसके अनुसार योजनाएं बनाने में कुछ नए पैरामीटर्स सरकार की मदद कर सकते हैं। हाल में एक नए पैरामीटर के आंकड़ों से पता चला कि उत्तर भारत के राज्य प्रति व्यक्ति जीएसटी (यानी उपभोग) में राष्ट्रीय औसत से काफी नीचे हैं जबकि दक्षिण के राज्य काफी ऊपर। यहां तक कि तेलंगाना और कर्नाटक का उपभोग खर्च एमपी और झारखंड से तीन-चार गुना ज्यादा है। जीएसटी केंद्र और राज्य दोनों लेते हैं। इन आंकड़ों से उन राज्यों की सही स्थिति पता करने में कोई गलती नहीं हो सकती । कम से कम जीएसटी आधारित कंजम्पशन आंकड़े असली उपभोग की स्थिति बता सकेंगे और उसी के साथ यह भी कि कोई व्यक्ति किस किस्म के उपभोग में कितना खर्च करता है । यह संख्या उसके जीवनयापन का स्तर यानी असली हालत बताती है। एक अन्य उदाहरण लें। देश में सरकारी कर्मचारियों का वेतन दुनिया के अन्य देशों के मुकाबले कितना कम या ज्यादा है, जानने के लिए औसत वेतन को देश के प्रति-व्यक्ति आय के अनुपात के रूप में देखने से पता चला कि इस पैरामीटर पर भारत के सरकारी कर्मचारी दुनिया में सबसे ज्यादा पगार पाते हैं। यह अलग बात है कि प्रति एक हजार आबादी में उनकी संख्या संपन्न देश तो छोड़िए, चीन और ब्राजील के मुकाबले क्रमशः मात्र 15 और 30% है। इन पैरामीटर्स के आधार पर सरकार बेहतर योजनाएं बना सकती है।
Date: 13-06-24
परीक्षाओं में धांधली होगी तो छात्रों में भरोसा कैसे पैदा होगाविराग गुप्ता, ( सुप्रीम कोर्ट के वकील, ‘अनमास्किंग वीआईपी’ पुस्तक के लेखक )
डॉक्टरी की प्रवेश परीक्षा ‘नीट’ में अनेक तरह की धांधली, मक्कारी और पेपर-लीक से लाखों परिवारों का सपना टूटने के साथ ही एनटीए और सरकार की साख को भी भारी धक्का लगा है। मेडिकल, इंजीनियरिंग, फार्मेसी और यूनिवर्सिटी के कॉलेजों में प्रवेश के लिए परीक्षा आयोजित करने वाली ‘नेशनल टेस्टिंग एजेंसी’ को सोशल मीडिया में ‘नेशनल ठगी एजेंसी’ नाम से शर्मसार किया जा रहा है।
राज्यों में पुलिस की जांच, संदेहजनक तरीके से गठित आंतरिक जांच समिति, तमाम हाईकोर्ट में सुनवाई और सुप्रीम कोर्ट में लम्बी तारीख से मामला और बिगड़ रहा है। परीक्षा में धांधली का योग्य छात्रों पर कितना प्रभाव पड़ता है, उसकी दो बानगी देना जरूरी है।
कई साल पहले सीबीएसई की कक्षा 12 की वार्षिक परीक्षा में एक मेधावी लड़की ने एनसीईआरटी की किताबों से अलग हटकर मौलिक और श्रेष्ठ जवाब दिए। लेकिन दकियानूसी परीक्षक ने उस सवाल में नंबर नहीं दिए। हाईकोर्ट में मेरी बहस के बाद कॉपी की दोबारा जांच हुई। जज ने मौखिक तौर पर यह माना कि ऐसे श्रेष्ठ जवाब पर पूरे नंबर मिलने चाहिए, लेकिन लिखित आदेश पारित करने से इनकार कर दिया। उस घटना के बाद सीबीएसई ने नीतियों में बदलाव किया। लेकिन समय पर सार्थक न्याय नहीं मिलने से उस लड़की का आत्मविश्वास लम्बे समय के लिए चरमरा गया।
दूसरा मामला क्लैट का है, जिसके माध्यम से विधि कॉलेज में प्रवेश होते हैं। पांच साल पहले बिहार में नकल और चीटिंग से कुछ बच्चों ने क्लैट में टॉप रैंक हासिल करके भारत के सर्वश्रेष्ठ लॉ कॉलेज में एडमिशन हासिल कर लिया। संदेह के बावजूद उन पर कार्रवाई नहीं हुई, क्योंकि इससे पूरी परीक्षा पर सवाल खड़े हो जाते। लेकिन कॉलेज की आंतरिक परीक्षा में छात्रों के फेल होने पर हेराफेरी की हकीकत सामने आने के बाद विद्यार्थियों का सिस्टम पर भरोसा डगमगा गया।
पेपर लीक हुआ है तो क्या पूरी परीक्षा रद्द नहीं होनी चाहिए? परीक्षा रद्द होने पर क्या बाकी निर्दोष छात्रों के साथ ज्यादती नहीं होगी? इन विवादों के चक्रव्यूह में फंसने के बजाय मध्यम-मार्ग पर एक्शन लिया जा सकता है। जिन सेंटर पर नकल, फर्जीवाड़ा और गलत तरीके से ग्रेस मार्क देने के आरोप हैं, ऐसे सभी संदिग्ध बच्चों का नए सिरे से टेस्ट कराने से मेरिट का सच सामने आ जाएगा।
इसके अलावा सभी संदिग्ध छात्रों, उनके पैरेंट्स, कोचिंग संस्थान और परीक्षा केंद्र के इंचार्ज लोगों का तत्काल प्रभाव से नार्को टेस्ट होना चाहिए। इससे मेरिट वाले छात्रों का सिस्टम में भरोसा बढ़ने के साथ भविष्य में धांधली करने वालों के मंसूबे ध्वस्त होंगे। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा है कि सभी मामलों को अदालतों के पाले में धकेलना गलत है। अगली तारीख के पहले ही पारदर्शी व निष्पक्ष तरीके से कार्रवाई करके सरकार को जनता का दिल जीतने की कोशिश करनी चाहिए। अन्यथा तमिलनाडु सरकार की यह बात सही साबित होगी कि नीट की परीक्षा प्रणाली गरीब और ग्रामीण विरोधी है।
राजनीतिक हस्तक्षेप, कोचिंग माफिया, धनबल के बढ़ते प्रभाव से परीक्षाओं में धांधली की वजह से शिक्षा के साथ नौकरियों की गुणवत्ता गिरने से भारत में शैक्षणिक अराजकता बढ़ रही है। स्मार्ट सिटी की बात करने वाले देश में जांच की उलटबांसियों के बजाय जल्द न्याय क्यों नहीं मिलता? व्यापमं घोटाले से साफ है कि पुलिस और सीबीआई की लम्बी जांच से पीड़ित लोगों का भविष्य अंधेरी सुरंग के हवाले हो जाता है। अपराधी सांसदों से जैसे लोकतंत्र शर्मसार होता है, उसी तरह कोचिंग माफिया और सॉल्वर गैंग की मिलीभगत से अयोग्य और धनपशुओं के मेडिकल प्रोफेशन में आने से समाज का अस्तित्व खतरे में पड़ सकता है।
भारत में पीआईएल यानी जनहित याचिका के नाम पर पब्लिसिटी का कारोबार बढ़ने के बावजूद पीड़ित लोगों को न्याय नहीं मिलना चिंताजनक है। वर्ष 2022 की नीट परीक्षा से जुड़े पेंडिंग मामले को अर्थहीन बताते हुए सुप्रीम कोर्ट के जजों ने पिटीशन को निरस्त कर दिया है। यह मामला व्यापमं की तरह बेपटरी ना हो, इसके लिए हाईकोर्ट में चल रहे सभी मामलों को सुप्रीम कोर्ट को अपने पास ट्रांसफर कराना चाहिए। चार हफ्ते का इंतजार किए बगैर सुप्रीम कोर्ट की वैकेशन बेंच में तत्काल प्रभाव से इस पर सुनवाई कराने की जरूरत है।
अपराध और धांधली के सभी पहलू अदालत के सामने आ सकें, इसके लिए एमिकस क्यूरी (न्याय-मित्र वकील) नियुक्त करने की जरूरत है।
अगर नीट की पवित्रता प्रभावित हुई है तो समय पर न्याय देकर जजों को संविधान की शपथ पूरी करनी चाहिए।
Date: 13-06-24
आंतरिक सुरक्षा को खतरासंपादकीय
रियासी के बाद जम्मू संभाग के कठुआ और डोडा में आतंकी हमले गंभीर चिंता का कारण बनने चाहिए। ये हमले यही बता रहे हैं कि आतंकी बेलगाम होते जा रहे हैं और वे जम्मू क्षेत्र में वैसे ही हालात पैदा कर रहे हैं, जैसे एक समय उन्होंने दक्षिण कश्मीर में कर दिए थे। इस नतीजे पर पहुंचने के पर्याप्त कारण हैं कि आतंकियों ने कश्मीर के बजाय जम्मू के उन इलाकों को अपने निशाने पर ले लिया है, जो पाकिस्तान की सीमा से सटे हुए हैं। यह सामान्य बात नहीं कि आतंकियों का दुस्साहस इतना अधिक बढ़ जाए कि वे 60 घंटे के अंदर तीन जगहों पर हमले करने में समर्थ रहें। उन्होंने न केवल निर्दोष-निहत्थे लोगों को निशाना बनाया, बल्कि सुरक्षाकर्मियों को भी। उनके खिलाफ कठोरतम कार्रवाई करनी होगी। ऐसी किसी कार्रवाई के ठोस नतीजे तब हासिल होंगे, जब पाकिस्तान को भी सबक सिखाया जाएगा, क्योंकि इसमें संदेह नहीं कि उसकी शह पर ही जम्मू में आतंकी गतिविधियां बढ़ रही हैं। इससे संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता कि दो आतंकियों को मार गिराया गया, क्योंकि यह साफ है कि जम्मू के विभिन्न इलाकों में पाकिस्तान से आए अनेक आतंकी छिपे हुए हैं।
चिंता की बात केवल यह नहीं है कि जम्मू में आतंकियों की सक्रियता बढ़ रही है, बल्कि यह भी है कि देश-विदेश में भारत विरोधी तत्वों का दुस्साहस बढ़ता जा रहा है। एक ओर जहां पंजाब में खालिस्तान समर्थक नए सिरे से सिर उठा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर कनाडा, अमेरिका, ब्रिटेन, इटली आदि में भी। भारतीय प्रधानमंत्री की इटली यात्रा के पूर्व वहां खालिस्तान समर्थकों ने गांधीजी की प्रतिमा को जिस तरह खंडित किया, वह एक तरह से अलगाववादी तत्वों की ओर से भारत को दी जाने वाली सीधी चुनौती है। भारत सरकार को पंजाब एवं जम्मू-कश्मीर में और अधिक सतर्कता बरतने के साथ उन देशों से भी दो टूक बात करनी होगी, जहां खालिस्तान समर्थक बेलगाम हो रहे हैं। भारत सरकार इसकी भी अनदेखी नहीं कर सकती कि लोकसभा चुनाव के पहले सार्वजनिक स्थलों पर बम रखे होने की झूठी सूचनाएं देकर दहशत फैलाने का जो सिलसिला शुरू हुआ था, वह खत्म होने का नाम नहीं ले रहा है। पहले स्कूलों में बम रखे जाने की झूठी सूचनाएं दी गईं, फिर अस्पतालों में। इसके बाद विमानों में और अब संग्रहालयों में। चिंताजनक यह है कि ऐसी झूठी सूचनाएं देकर सुरक्षा एजेंसियों का सिरदर्द बढ़ाने वाले तत्वों की पहचान नहीं हो रही है। माना जाता है कि ऐसे तत्व दूसरे देशों में छिपे हुए हैं। सच जो भी हो, भारत सरकार को आंतरिक सुरक्षा पर गंभीरता से ध्यान देना होगा। इसलिए और भी अधिक, क्योंकि हाल के लोकसभा चुनावों में कश्मीर और पंजाब में कई ऐसे अलगाववादी तत्व चुनाव जीतने में समर्थ रहे हैं, जो आंतरिक सुरक्षा के लिए बड़ा खतरा बन सकते हैं।
Date: 13-06-24
बदलाव की बयारसंपादकीय
ओड़ीशा में चौबीस वर्ष बाद किसी दूसरे दल की सरकार बनी है। पिछले पांच विधानसभा चुनावों से बीजू जनता दल ही लगातार सत्ता में बनी हुई थी। इस बार भाजपा बीजद से अलग होकर स्वतंत्र चुनाव लड़ी और सत्ता में पहुंच गई। यह निस्संदेह वहां के लोगों की बदलाव की आकांक्षा का ही प्रतिफल है। इस तरह भाजपा को भी पूरब में अपनी जगह बनाने का मौका मिला है। पहली बार ओड़ीशा में उसकी सरकार बनी है। नए मुख्यमंत्री के रूप में आदिवासी समाज के मोहन चरण माझी को राज्य की कमान सौंपी गई है। माझी ने शपथग्रहण से पहले ही आदिवासी समाज के कल्याण का संकल्प लिया था, उम्मीद है, वे इसे पूरा करेंगे। हालांकि उन्हें चौबीस वर्ष लंबे नवीन पटनायक के कार्यकाल के प्रभाव से लोगों को बाहर निकालना एक चुनौती होगी। लोगों में नवीन पटनायक के कामकाज को लेकर कोई खास नाराजगी नहीं थी, इसलिए भी माझी को कुछ अलग करके दिखाना होगा ।
माझी के साथ एक अच्छी बात यह है कि केंद्र में भी उनकी पार्टी की सरकार है, इसलिए योजनाओं और नीतियों के क्रियान्वयन में किसी अड़चन की गुंजाइश नहीं रहेगी। हालांकि नवीन पटनायक के भी केंद्र सरकार के साथ रिश्ते कभी कड़वे नहीं रहे। नवीन पटनायक ने ओड़ीशा को बीमारू प्रदेशों की श्रेणी से बाहर निकालने, वहां के लोगों की गरीबी दूर करने, शिक्षा और चिकित्सा आदि के क्षेत्र में बेहतरी के लिए जो विकास परिजनाएं चलाईं और प्रदेश का विकास किया, उसकी सभी सराहना करते हैं। मगर विकास परियोजनाओं के चलते नियमगिरी जैसे कुछ इलाकों के आदिवासियों की जमीन अधिग्रहण को लेकर जो नाराजगी देखी जा रही थी, उन्हें जरूर माझी सरकार से काफी उम्मीदें हैं। इसके अलावा, एक चुनौती होगी वहां सांप्रदायिक सौहार्द कायम रखने की। नवीन पटनायक सदा एनडीए के साथ रहे, मगर जब कंधमाल में ईसाई मिशनरियों पर हमले हुए तो वे उससे अलग हो गए थे। ओड़िया समाज पर इसका बहुत असर पड़ा था । माझी सरकार उसे कितना सुरक्षित रख पाती है, यह देखने की बात है । अब भी ओड़ीशा की छवि अत्यंत गरीब और पिछड़े प्रदेश की है, उस छवि को माझी कितना बदल पाएंगे, उनकी कामयाबी इसी से आंकी जाएगी।
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व्हिसलब्लोइंग से जुड़े कानून की जरूरत
भारत ने 2014 में मुखबिर संरक्षण अधिनियम पारित किया था। विडंबना यह है कि इसे आज तक अधिसूचित नहीं किया गया है। इस अधिनियम के दायरे में सशस्त्र बल और निजी क्षेत्र नहीं आते हैं। यह अमेरिकी फॉल्स क्लेम एक्ट की तरह व्हिसल ब्लोइंग के लिए कोई धनराशि नहीं देता है। कानूनी ढांचे के न होने से भारत में आरटीआई कार्यकर्ताओं पर हमले बढ़ गए हैं। यह लोकतंत्र की मजबूती का एक अस्त्र है, और इस पर जल्द ही कोई कानून आना चाहिए।
पेड़ काटने से जुड़े कानून की उड़ती धज्जियां
हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया को एक निर्देश दिया है। यह अरावली के दक्षिणी दिल्ली रिज सेक्टर में 11 कि.मी. लंबी सड़क बनाने के लिए काटे गए पेड़ों की जांच से संबंधित है।
राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र, राजस्थान, दिल्ली और हरियाणा में अधिकारी नियमित रूप से उच्चतम न्यायालय के आदेशों को दरकिनार करते हैं। ये लोग अरावली और दिल्ली रिज को समतल करने के लिए भूमाफिया और अवैध खनन कंपनियों के साथ मिलकर काम करते हैं।
इस मामले में शहरी विकास योजनाकार डीडीए को जानबूझकर पर्यावरण क्षरण के लिए कठघरे में खड़ा किया जा चुका है। लेकिन लूट रुक नहीं रही है। जंगलों को बचाया नहीं जा रहा है।
हर काटे हुए पेड़ के बदले न्यायालय ने डीडीए को 100 पेड़ लगाने का आदेश दिया है। लेकिन यह जंगलों को व्यापार मॉडल में बदल रहा है।
वास्तविकता यह है कि अधिकारी और खनन माफिया मिलकर उच्चतम न्यायालय और कानूनों की लगातार धज्जियां उड़ा रहे हैं। इन पर किसी का नियंत्रण नहीं है।
समाचार पत्रों पर आधारित। 18 मई, 2024
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Date: 12-06-24
Facts in fictionNo ban on books or films can be justified in the name of upholding order.Editorial
The likelihood of protests, communal tension or prejudice to law and order ought not to be cited as a reason to suspend the screening of a film. The Karnataka government’s decision to stop the release of the Hindi film, Hamare Baarah, for two weeks violates the freedom of expression in the name of upholding order and preventing communal tension. Such a ban on public screening of films, independent of their merit, has no place in a democratic society. The Bombay High Court, which initially stayed the release of Hamare Baarah, has lifted the ban, following the producer’s offer to remove some controversial dialogues. Its observation that allowing an individual to stall the release of a certified film would encourage film producers being held to ransom is consistent with judicial precedents. Once it is certified by the Central Board of Film Certification, presumably after proper scrutiny of its suitability for public viewing, there ought to be no scope for a second opinion by a law enforcement authority. The position that a work, be it a book or a play or a film, may be proscribed under threat of protests or likely violence has been rebuffed by the Supreme Court of India in some landmark verdicts. “… freedom of expression cannot be suppressed on account of threat of demonstration and processions or threats of violence,” the Court said in its 1989 judgment in S. Rangarajan vs P. Jagjivan Ram on the film, Ore Oru Gramathile.
The emphasis on freedom of expression does not mean that one should endorse any film whose content is distasteful or obnoxious or contains vile propaganda. As for the film now under the scanner, there is reason to believe that such criticism is justified, beginning with the overt communal overtones in its title itself. Its posters and synopsis suggest that the film draws upon sectarian allegations that the Muslim community is responsible for population growth and that its men force women to bear many children, in utter disregard of their health and well-being. The film’s proponents may claim it is about spreading awareness on population control, and that watching the film may dispel such an impression. However, it cannot be denied that contemporary film-making has made stereotyping the Muslim community a significant trend. Any film that gives prominence to the claim that members of the community have more children, must be aimed at pandering to communal sections and the political establishment that encourages them. If the country is to be a free and open society, there is no need to suppress any point of view. At the same time, it must also develop the wherewithal to counter sectarian propaganda with facts and without resort to unconstitutional methods.
Date: 12-06-24
अपने पड़ोसियों से रिश्ते सुधारना हमारे लिए जरूरी हैमनोज जोशी, ( ‘अंडरस्टैंडिंग द इंडिया चाइना बॉर्डर’ के लेखक )
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने शपथ ग्रहण समारोह में पड़ोसी देशों के नेताओं को आमंत्रित करके अच्छा संकेत दिया। सात देशों के नेता- मालदीव के राष्ट्रपति मोहम्मद मुइज्जू, बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना, श्रीलंका के प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे, नेपाल के प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’, भूटान के प्रधानमंत्री शेरिंग तोबगे, मॉरीशस के प्रधानमंत्री प्रविंद कुमार जगन्नाथ और सेशेल्स के उपराष्ट्रपति अहमद अफीफ इस कार्यक्रम में मौजूद रहे।
पाकिस्तान का नाम मेहमानों की फेहरिस्त में नहीं था, हालांकि याद रहे कि प्रधानमंत्री नवाज शरीफ ने 2014 में मोदी के पहले शपथ ग्रहण समारोह में हिस्सा लिया था। तब से भारत-पाकिस्तान के बीच बहुत सारे रिश्ते खत्म हो चुके हैं। यह स्पष्ट नहीं है कि इस बार पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ को आमंत्रित करने की कोई योजना थी या नहीं, लेकिन वैसे भी वे शनिवार शाम को ही चीन की अपनी पांच दिवसीय यात्रा से लौटे थे।
पिछले नवंबर में पदभार संभालने के बाद चीन-समर्थक मुइज्जू की यह पहली भारत यात्रा थी। अपने पूर्ववर्तियों के विपरीत- जिन्होंने नई दिल्ली को अपना पहला पड़ाव बनाया था- मुइज्जू भारत से पहले तुर्किये और फिर चीन की यात्रा पर गए थे। मालदीव के साथ भारत के संबंधों में तब खटास आ गई थी, जब मुइज्जू ने 88 या उससे ज्यादा भारतीय सैन्यकर्मियों को वापस बुलाने के लिए कहा था, जो भारत द्वारा मालदीव को उपहार में दिए तीन हेलीकॉप्टरों की देखभाल कर रहे थे।
2014 में मोदी के पहले शपथ ग्रहण समारोह में पाकिस्तान सहित सभी सार्क (SAARC) देशों के नेता शामिल हुए थे। 2019 में दूसरी बार शपथ ग्रहण करने तक भारत के पाकिस्तान से रिश्ते बहुत खराब हो गए थे और सार्क भी निष्क्रिय हो गया था, इसलिए बिम्स्टेक (BIMSTEC या बहु-क्षेत्रीय और आर्थिक सहयोग के लिए बंगाल की खाड़ी में की गई पहल) में शामिल देशों पर जोर दिया गया था। भारत का कहना है कि वह हिंद महासागर क्षेत्र के लिए अपने पड़ोसियों को पहले रखने की नीति के साथ-साथ सागर (SAGAR) क्षेत्र में सभी के लिए सुरक्षा और विकास पर जोर देता है। लेकिन भारत किसी भी चीज से ज्यादा चीन को अपने दिमाग में रखता है। भारत को अपनी विवादित सीमा पर बीजिंग से जैसी सैन्य चुनौती का सामना करना पड़ रहा है, दक्षिण एशिया और हिंद महासागर क्षेत्र में चीन से मिलने वाली चुनौती भी समान रूप से महत्वपूर्ण है।
बांग्लादेश का ही उदाहरण लें, जहां 2011 से 2019 के बीच चीन का प्रत्यक्ष विदेशी निवेश 10.9 गुना बढ़ा है और यह बुनियादी ढांचे, सूचना-प्रौद्योगिकी, रक्षा सहयोग और ऊर्जा उद्योग जैसे विभिन्न क्षेत्रों पर केंद्रित है। भारत से बांग्लादेश की निकटता और बंगाल की खाड़ी के मुहाने पर उसका होना उसे चीन के लिए भू-राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण बनाता है। पिछले एक दशक में, चीन ने बेल्ट एंड रोड पहल के तहत बांग्लादेश में 35 परियोजनाओं के लिए 4.45 अरब डॉलर प्रदान किए हैं, जिसमें कर्णफुली सुरंग, पद्मा नदी पुल आदि शामिल हैं। बांग्लादेश भारत और अमेरिका के साथ संबंधों को संतुलित करने के लिए चीन से अपने संबंधों का उपयोग करना चाहता है। बांग्लादेश में लोकतंत्र के मुद्दों पर भारत का रुख अमेरिका की तुलना में अधिक सूझबूझ भरा है और वह बांग्लादेश का प्रमुख रणनीतिक साझेदार बना हुआ है। साथ ही वह उसके साथ कई परिवहन और ऊर्जा परियोजनाओं में भी शामिल है। पिछले एक दशक में, बांग्लादेश से भारत का द्विपक्षीय व्यापार 2012-2013 में 5.3 अरब डॉलर से बढ़कर 2021-22 में 15.93 अरब डॉलर तक हो गया है। गैर-टैरिफ बाधाओं और सीमा पार आवागमन से संबंधित प्रक्रियागत मुद्दों के कारण व्यापार में जरूर बाधा आई है।
निकट-अतीत में भारत ने अपने कुछ पड़ोसियों को नाराज किया है। उदाहरण के लिए, 2015 में नेपाल की छह महीने की नाकेबंदी के कारण उसमें भारत के खिलाफ काफी नाराजगी निर्मित हो गई थी। हालांकि भारत ने इससे इनकार किया था कि नेपाल में मधेशी प्रदर्शनकारियों द्वारा शुरू की गई नाकाबंदी में उसकी भूमिका थी। लेकिन अब मुश्किल पड़ोसियों से निपटने में नई दिल्ली ज्यादा शांतिपूर्ण रवैया अपना रही है। इसका उदाहरण मालदीव के साथ उसका व्यवहार है। मुइज्जू की हरकतों के बावजूद भारत ने मालदीव के साथ दोस्ताना रवैया कायम रखा है। हाल ही में मुइज्जू ने ऋण राहत के लिए नई दिल्ली से सहायता भी मांगी। लेकिन भारत का अपने पड़ोसियों के प्रति बदला हुआ रुख सबसे स्पष्ट रूप से तब दिखाई दिया था, जब विदेशी मुद्रा भंडार की कमी होने के कारण श्रीलंका को संकट का सामना करना पड़ा था। तब भारत ने तुरंत 4 अरब डॉलर की वित्तीय सहायता प्रदान की थी, जो आईएमएफ के 3 अरब डॉलर के बेलआउट से भी अधिक थी। भारत की वैश्विक महत्वाकांक्षाएं तब तक पूरी नहीं हो सकतीं, जब तक कि उसका क्षेत्र उसके साथ न हो।
Date: 12-06-24
शहरों में कूड़ा प्रबंधन पर अभी बहुत काम बाकी हैडॉ. सुनील पांडे निदेशक, ( सर्कुलर इकोनॉमी एंड वेस्ट मैनेजमेंट, द एनर्जी एंड रिसोर्स इंस्टीटयूट )
जब भी शहरी क्षेत्रों में कूड़ा प्रबंधन से जुड़ी बात होती है, तो दो बड़ी चिंताएं सामने आती हैं- म्युनिसिपल सॉलिड वेस्ट (एमएसडब्ल्यू) और दूसरा सीवेज। हालांकि शहरी क्षेत्रों में और भी तरह का कूड़ा चिंता का सबब है, जैसे इलेक्ट्रॉनिक वेस्ट, निर्माण कार्यों से निकलता मलबा, अस्पताल या बायोमेडिकल वेस्ट और प्लास्टिक वेस्ट। शहरों में कूड़े का कुप्रबंधन न सिर्फ पर्यावरण प्रदूषण पैदा कर रहा है बल्कि इससे मानवजनित ग्रीनहाउस गैसों (जीएचजी) का उत्सर्जन भी बढ़ रहा है।
केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के मुताबिक भारत के शहर हर साल 58 मिलियन टन कूड़ा पैदा करते हैं। जिस गति से कूड़ा बढ़ रहा है, अनुमान के मुताबिक साल 2030 तक यह 165 मिलियन टन और 2050 तक 436 मिलियन टन तक पहुंच जाएगा। हालांकि जब से स्वच्छ भारत मिशन की शुरुआत हुई है, शहरों में ठोस अपशिष्ट के ट्रीटमेंट की क्षमता 26 हजार टन प्रतिदिन (18%) से बढ़कर 1 लाख टन प्रतिदिन (70%) तक पहुंच गई है।
शहरी क्षेत्रों में कूड़ा प्रबंधन और इसके निष्पादन में सुधार हुआ है, लेकिन कूड़े को यहां-वहां फेंककर कूड़ाघर बना देने का हमारा इतिहास रहा है, जहां हर तरह का कूड़ा फेंक दिया जाता है। इससे मिट्टी, भूजल प्रदूषित होता है, ऐसे कूड़े के ढेर में आग लगने से मीथेन निकलती है, जिससे जीएचजी लेवल बढ़ता है। शहरों में प्लास्टिक की पैकेजिंग भी बड़ी समस्या है। ये दुनियाभर में गंभीर है और प्लास्टिक कूड़ा नदियों में मिलकर समुद्र को दूषित कर रहा है। यूएनईपी के मुताबिक हर सेकंड, करीब एक ट्रक प्लास्टिक समुद्र में मिल रहा है। अगर इस पर काबू नहीं किया गया तो 2050 तक समुद्री कूड़ा मछलियों से ज्यादा हो जाएगा।
सीवेज की समस्या भी गंभीर बनी हुई है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड के अनुसार (2020-21) शहरी क्षेत्रों में 72,368 मिलियन लीटर प्रतिदिन (एमएलडी) सीवेज निकलता है, जबकि सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट की मौजूदा क्षमता 36,842 एमएलडी ही है। हालांकि इनकी असल कार्यक्षमता और कम है। जितना भी सीवेज निकलता है, उसके 28 फीसदी का ही ट्रीटमेंट हो पाता है। सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) से भी कीचड़ निकलता है, इसका भी विधिवत निपटारा जरूरी है और ज्यादातर शहरों में इसके लिए आधारभूत ढांचा नहीं है। गैरनिष्पादित सीवेज के जमीन पर या पानी में मिलने से ये प्रदूषित हो रहे हैं। इस विषय पर नीति आयोग की रिपोर्ट बताती है कि सीवेज के ट्रीटमेंट की कमी के कारण भारत में जल-जनित बीमारियों के इलाज में 15 अरब डॉलर से ज्यादा खर्च होते हैं। ज्यादातर शहर इस तरह की सीवेज ट्रीटमेंट सुविधाएं इसलिए नहीं जुटा पा रहे हैं क्योंकि इनके निर्माण के साथ, संचालन और प्रबंधन में बहुत पूंजी लगती है और अधिकांश सीवेज प्लांट्स को चलाने में बिजली भी बहुत ज्यादा खर्च होती है। इसलिए ये जरूरी है कि शहर और कस्बे मिलकर, घनी आबादी वाले इलाकों के लिए केंद्रीकृत सीवेज सुविधा और ट्रीटमेंट प्लांट का निर्माण करें। वहीं जहां आबादी कम है, वहां सोर्स ट्रीटमेंट सुविधाओं (जैसे रूट ज़ोन सिस्टम) को विकेंद्रीकृत करें। सूरत इसका उदाहरण है, जो सीवेज को ट्रीट करके इंडस्ट्रीज़ को बेचकर हर साल 150 करोड़ रु. कमाता है।
द एनर्जी एंड रिसोर्स इंस्टीट्यूट (टेरी) अपनी 50वीं वर्षगांठ बना रहा है। पर्यावरण से जुड़े ऐसे कई मुद्दों से निपटने के लिए टेरी ने स्थानीय सरकारों के साथ मिलकर कई कदम उठाए हैं। इसमें जीआईज़ी की मदद से पणजी में शुरू हुआ शॉप विद योर वेस्ट अभियान शामिल है, जहां कुछ किराना स्टोर किराने के बदले में रिसाइकिल योग्य कूड़ा लेते हैं। बहरहाल, भारत में पर्यावरण प्रदूषण को कम करने और सस्टेनेबल शहरी वातावरण बनाने के लिए व्यापक और नई अपशिष्ट प्रबंधन रणनीतियां जरूरी हैं।
Date: 12-06-24
संघवाद पर राष्ट्रीय सहमति बनेशंकर शरण, ( लेखक राजनीतिशास्त्र के प्राध्यापक एवं वरिष्ठ स्तंभकार हैं )
चुनाव नतीजों और सरकार गठन के बाद कुछ विषयों पर दलगत राजनीति से ऊपर उठकर विचार आवश्यक हो गया है। अन्यथा धर्म-संस्कृति ही नहीं, बल्कि उन्नति, एकता और विकास आदि की बातें बेमानी हो जाती हैं। ये विषय दलीय सीमाओं से बाहर हैं। इन्हें दलीय संकीर्णता में तय करने की कोशिशें अहितकारी भी हैं। स्वतंत्र भारत में संघीय और क्षेत्रीय अस्मिता का सामंजस्य ऐसा ही विषय है। आश्चर्य कि स्वतंत्रता के 75 वर्ष बाद भी हमारे नेताओं ने इस पर राष्ट्रीय सहमति बनाने की चिंता नहीं दिखाई है, बल्कि हालिया चुनाव में की गईं बयानबाजियां तो उलटा दिखा रही थीं। अनेक नेता क्षेत्रीय विद्वेष, असंतोष या अहंकार उभारने में लगे थे। इसमें वे भी थे, जिन्हें राष्ट्रीय दल का दर्जा मिला हुआ है। महाराष्ट्र में गुजराती बनाम मराठी भी एक मुद्दा बना। फिर बिहार के एक नेता ने कहा कि कम सांसदों वाले राज्य के नेता पूरे देश पर शासन करते हैं, जबकि अधिक सांसदों वाले राज्य के लोग केवल मजदूरी करने हर कहीं भटकते हैं। यह कहकर उन्होंने असमान विकास के मुद्दे को पक्षपात से जोड़ा। एक राष्ट्रीय नेता ने पुरी के जगन्नाथ मंदिर की चाबी दक्षिण चली गई कहकर अनजाने ही दक्षिण भारत को कठघरे में कर दिया। यद्यपि उनका निशाना एक स्थानीय नेता थे। तब एक तमिल नेता ने उन पर अनुचित दोष लगाने का आरोप लगाया। इसी तरह जब किसी राज्य और केंद्र की सत्ता भिन्न-भिन्न दलों के हाथ रहती है, तो केंद्रीय अनुदान में या एजेंसियों के उपयोग में भी भेदभाव की बातें उठती हैं। फिर एक ही नेता चेन्नई, दिल्ली और भुवनेश्वर में अंतर्विरोधी बातें कहते हैं। इससे बचा जा सकता है, यदि नेता कुछ विषयों को दलबंदी से अलग रखें, पर विचित्र बात है कि दिखाने के लिए जो लोग ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की बात करते हैं, वे व्यवहार में देश में, बल्कि एक राज्य, समुदाय और दल में भी ईर्ष्या-द्वेष और अविश्वास को हवा देते हैं। मानो देश तो क्या ये अपने समुदाय के भी सभी लोगों को अपना नहीं मानते।
राष्ट्रीय दलों के अंदर भी कभी-कभी उत्तर-दक्षिण गुट झलकता है। सो स्वतंत्र भारत में केंद्रीय बनाम क्षेत्रीय संबंध पर पेंडुलम सी स्थिति रही है। कभी अतिकेंद्रीयता, तो कभी बिखराव सा दिखता है। जब किसी राष्ट्रीय दल की ताकत बहुत बढ़ जाती है, तो केंद्रीयकरण प्रवृत्ति बढ़ती लगती है। जब केंद्र में किसी को बहुमत न मिले तो कई नीतियों में टाल-मटोल, अस्पष्टता दिखती है। यह सब संघ और राज्य के अधिकार और कर्तव्य पर सहमति के अभाव का ही संकेत है। मजे की बात है कि अंग्रेजों ने देश भर में विशिष्ट क्षेत्रों, शासकों, समूहों को स्वायत्त रहने दिया, जबकि वे असंख्य छोटी-बड़ी रियासतों को खत्म करने में समर्थ थे। त्रावणकोर से कश्मीर और राजपूताना से मैसूर तक सैकड़ों छोटे-बड़े क्षेत्रों पर अंग्रेजों ने केवल औपचारिक अधिकार रखा था। वास्तविक सत्ता रियासतों के पास थी। यह भी ब्रिटिश राज के लंबे समय तक चलने का एक कारण रहा। सैकड़ों सशक्त भारतीय राजा और नवाब अंग्रेजों के प्रति सामान्य या मैत्री भाव रखे हुए थे, जिससे ब्रिटिश राज अधिक सबल, समृद्ध और दीर्घकालिक बना। स्वतंत्र भारत के शासक अभी तक वह संतुलित प्रणाली नहीं बना सके हैं।
कभी केंद्र अत्यधिक हस्तक्षेपकारी हो जाता है, तो कभी एकदम ढुलमुल। एक समय तो केंद्र में भारी बहुमत से आई सरकार मनमाने तौर पर राज्य सरकारों को बर्खास्त कर देती थी, ताकि राज्यों में भी केंद्रीय सत्ताधारी दल के लोगों की सत्ता बन जाए। राज्यपालों के माध्यम से राज्य में दखलंदाजी पर भी सवाल उठते थे। क्षेत्रीय भावनाओं पर चोट का तीसरा रूप केंद्रीय नेताओं द्वारा उन राज्यों के मुख्यमंत्रियों को मनमाने तरीके से नियुक्त करना, बदलना रहा है, जहां उनके दल की सरकार हो। इसमें राज्य के जन-गण और विधायकों की इच्छा को भी दरकिनार कर केंद्रीय नेता अपनी पसंद थोपते हैं। इससे राज्य में सुयोग्य नेता भी उपेक्षित किए जाते हैं और एक नेता द्वारा देश के हर कोने पर एकाधिकारी निर्णय करने का संदेश जाता है। यह राष्ट्रीय हित की दृष्टि से अनावश्यक है। ऐसे कदम क्षेत्रीय असंतोष पैदा करते रहते हैं, विशेषकर जब कोई राज्य और केंद्र में सत्ता के दौरान अंतर्विरोधी नीतियां अपनाता दिखे। जैसे राज्यसभा में किसी राज्य की सीटों पर पर उसी राज्य के व्यक्ति जाएं या किसी भी राज्य के व्यक्ति जा सकते हैं? अथवा क्या नेताओं के लिए रिटायरमेंट की कोई आयु है? ऐसी बातों पर जब जैसा तब तैसा से क्षेत्रवाद या भेदभाव की सुगबुगाहट होती है। उसी तरह भाषा, शिक्षा, सांस्कृतिक, सामाजिक/राष्ट्रीय त्योहारों पर केंद्र से सब कुछ तय करना अनुपयुक्त है। वस्तुत: राजनीतिक केंद्रीयकरण भारतीय मिजाज और परंपरा के विपरीत है।
देश की सामरिक एवं विदेश नीति में केंद्र का महत्व होना उचित है। काफी हद तक मुद्रा और विदेश-व्यापार में भी। शेष सभी विषय-भाषा, शिक्षा, संस्कृति, कराधान और स्थानीय प्रशासन आदि में क्षेत्रीय रुचियों और क्षमताओं को प्रमुखता देना ही अच्छा है। वह देशवासियों के बीच सहयोग, सौहार्द और अपनी-अपनी प्रतिभाओं के मुक्त विकास में भी सहायक हो सकता है। हर चीज का केंद्रीयकरण करने से अंततः अधिकांश क्षेत्रों में दक्षता गिरती है, क्योंकि कोई भी व्यक्ति या समिति विविध प्रकार के नियमित मामलों, समस्याओं, शिकायतों और सुझावों आदि को स्वयं देख ही नहीं सकते, जो केरल से असम तक से आती रहती हैं। सो अंततः यह सब केंद्रीय संस्थानों के मातहत मामूली कर्मचारी ही देखते हैं, जो सीमित समझ रखते हैं। इस प्रकार असंख्य विषयों में जो कार्य स्थानीय जानकार और अनुभवी अधिक अच्छे से करते, वह केंद्रीय स्तर से होने पर प्रायः जैसे-तैसे और दिखावटी होकर रह जाते हैं।
केंद्र स्तर पर कम से कम विषयों पर अधिकार रखना ही उचित है। यह देश की सांस्कृतिक एकता के लिए भी उपयुक्त है। इसलिए हमारे नेताओं को राजनीतिक ही नहीं, शैक्षिक, सांस्कृतिक और व्यापारिक विषयों पर भी केंद्र और राज्यों के बीच उदार संबंध बनाने की पहल करनी चाहिए। यह दलबंदी से ऊपर उठकर ही संभव है। यह सच्ची इच्छाशक्ति और सद्भावना की मांग करता है। शेष सभी उपाय स्वत: मिल जाएंगे।
Date: 12-06-24
मणिपुर की आगसंपादकीय
एक वर्ष से अधिक समय बीत गया, मगर अभी तक मणिपुर में खूनी संघर्ष समाप्त नहीं हो पाया है। शुरू से ही वहां शांति बहाली के प्रयास शिथिल नजर आते हैं। प्रशासन और सुरक्षाबलों ने इच्छाशक्ति दिखाई होती, तो बहुत पहले इस समस्या का समाधान निकल गया होता। मगर उनकी भूमिका संदिग्ध बनी हुई है। इसी का नतीजा है कि सोमवार को उपद्रवियों ने घात लगा कर मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह के काफिले पर हमला कर दिया। गनीमत है कि उसमें सिर्फ एक सिपाही घायल हुआ, कोई बड़ा नुकसान नहीं हुआ। इससे वहां के उपद्रवियों के हौसले का अंदाजा लगाया जा सकता है। अब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने मणिपुर की स्थिति पर चिंता जाहिर करते हुए कहा है कि इतने लंबे समय से वहां अशांति का वातावरण है, मगर उसे हल करने की कोशिश नहीं की गई। इसे प्रथमिकता में रखते हुए शांति बहाली का प्रयास किया जाना चाहिए। पिछले दस वर्षों से वहां शांति का वातावरण था। हालांकि भागवत ने भी इस मामले में बयान देने में काफी वक्त लगा दिया। इसे लेकर विपक्षी दल लगातार सवाल उठाते रहे हैं। संसद में भी प्रश्न पूछे गए, मगर कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिल सका। अभी तक पूछा जाता है कि मणिपुर पर प्रधानमंत्री क्यों खामोश हैं।
मणिपुर में कुकी और मैतेई समुदाय के बीच संघर्ष, एक भ्रमपूर्ण बयान की वजह से भड़क उठा था। हालांकि अब वहां की अदालत खुद इस संभावना को खारिज कर चुकी है कि मैतेई समुदाय के लोगों को जनजातीय समुदाय का दर्जा दिया जाना चाहिए। मगर न तो राज्य और न केंद्र सरकार मणिपुर के खूनी संघर्ष को रोक पाई है। शुरू में जरूर केंद्रीय गृहमंत्री वहां गए थे, मगर फिर कोई उल्लेखनीय कार्रवाई नहीं हो सकी। बाद में सर्वोच्च न्यायालय ने मामले का संज्ञान लेते हुए जांच और कार्रवाई के लिए समितियां गठित कर दी, मगर उसका भी कोई नतीजा नजर नहीं आ रहा। पिछले वर्ष मई में शुरू हुए इस संघर्ष में अब तक सवा दो सौ से अधिक लोगों के मारे जाने, चार सौ से अधिक लोगों के घायल होने, हजारों घरों के जलाए जाने और साठ हजार से अधिक लोगों के विस्थापित होकर राहत शिविरों में शरण लेने के तथ्य उजागर हैं। सरकारों को अब यह बहाना जरूर मिल गया है कि मणिपुर के संघर्ष को रोकने की कार्रवाई सर्वोच्च अदालत की निगरानी में चल रही है, इसलिए वे इसमें बहुत हस्तक्षेप नहीं कर सकतीं। मगर यह उनका अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेने का एक और तरीका है।
यह समझना मुश्किल है कि कैसे कोई भी कल्याणकारी सरकार अपने नागरिकों को इस तरह मारकाट करते देखती रह सकती है। राज्य सरकार तो इस मामले में शुरू से नाकाम साबित हुई है, मगर केंद्र सरकार ने इस पर अपेक्षित गंभीरता क्यों नहीं दिखाई, समझ से परे है। जिस तरह वहां महिलाओं को निर्वस्त्र करके घुमाया गया, उनके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया, उससे पूरी दुनिया में देश की छवि खराब हुई। मणिपुर के लोगों का सरकार और प्रशासन पर से भरोसा उठ चुका है। गांव वाले खुद सुरक्षा दल बना कर पहरेदारी करते और उपद्रवियों से बचने की कोशिश करते हैं। यानी वहां के लोगों को एक तरह से उनके हाल पर छोड़ दिया गया है। संघ प्रमुख की मणिपुर को लेकर प्रकट की गई चिंता को केंद्र सरकार कितनी गंभीरता से लेती है, देखने की बात है।
Date: 12-06-24
इस चुनाव में आधी आबादी का हासिलमनीषा प्रियम, ( राजनीतिक विश्लेषक )
सतरहवीं लोकसभा का वह आखिरी सत्र था और विशेष भी, क्योंकि उसमें ‘नारी शक्ति वंदन अधिनियम’ को पारित किया गया। इसके द्वारा यह सुनिश्चित किया गया कि आने वाले वर्षों में (साल 2029 के आम चुनाव से संभवत:) लोकसभा में महिलाओं के लिए सीटें आरक्षित की जाएंगी। आरक्षण की यह सीमा 33 फीसदी तय की गई और इसे देश भर की विधानसभाओं पर भी लागू किया गया है। स्वाभाविक ही यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली राजग सरकार की महिलाओं के प्रति प्रतिबद्धता का संकेत था।
यूं तो महिला आरक्षण की चर्चा बतौर प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने सन् 1989 में ही उठाई थी। तब केंद्रीय मंत्री मार्गरेट अल्वा के नेतृत्व में एक कमेटी का गठन किया था, जिसने ग्राम पंचायतों और स्थानीय निकायों में महिलाओं के लिए आरक्षण प्रस्तावित किया। हालांकि, उनका वह विधेयक लोकसभा में तो पास हो गया, मगर राज्यसभा में गिर गया। उस वक्त खासकर सामाजिक न्याय में विश्वास रखने वाले नेताओं ने ही इसका विरोध किया था। तब शरद यादव ने कुछ ऐसी टिप्पणी की थी, जिससे प्रतीत हुआ कि ‘परकटी’ महिलाएं वास्तव में जाति आधारित आरक्षण को महिला आरक्षण के परोक्ष प्रयोग से कमजोर बना देंगी। हालांकि बाद में, पीवी नरसिंह राव वाली कांग्रेस सरकार ने इसे पास किया। बावजूद इसके संसद में महिला आरक्षण की फाइल धूल-धूसरित ही रही। कहा यह भी जाता रहा कि बीजद या तृणमूल कांग्रेस जैसी पार्टियां बगैर आरक्षण के भी औरतों को खुले दिल से टिकट देती हैं, जिसका अर्थ है कि बगैर आरक्षण के उन्हें संसद में लाया जा सकता है।
इसी पृष्ठभूमि में 18वीं लोकसभा के लिए चुनाव हुए। इसमें महिलाओं के बारे में दो बातें प्रमुखता से पूछी जा रही हैं। पहली, किस पार्टी ने कितने टिकट आधी आबादी को दिए और दूसरी, कहां से व कितनी औरतें चुनाव जीतने में सफल हुईं? हालांकि, चुनावी चर्चा में यह मुद्दा भी गरम रहा कि क्या महिलाएं सिर्फ एक वोटबैंक हैं और राष्ट्रीय चुनाव में क्या वे एकमुश्त नरेंद्र मोदी को अपना वोट देंगी? ऐसा इसलिए, क्योंकि अयोध्या में रामलला की मूर्ति-स्थापना के बाद माना जा रहा था कि महिलाएं इसके लिए प्रधानमंत्री को धन्यवाद देंगी और अपना वोट भाजपा को देंगी।
मगर चुनाव-बाद की तस्वीर कुछ अलग दिख रही है। बेशक ‘मोदी 3.0’ एक मिली-जुली सरकार है, फिर भी रविवार को जब मंत्रिमंडल की शपथ दिलाई गई, तो 72 माननीयों में केवल चार महिलाओं को यह सौभाग्य मिला। वैसे, लोकसभा में भी इस बार पिछली बार की तुलना में महिलाओं का कम प्रतिनिधित्व होगा। एडीआर के मुताबिक, 18वीं लोकसभा के लिए 74 महिलाओं का निर्वाचन हुआ है, जो कुल सांसदों का 13.6 प्रतिशत है। 17वीं लोकसभा में यह आंकड़ा 14 प्रतिशत था और 77 महिलाएं निचले सदन में आई थीं। हालांकि, 2014 के आम चुनाव में 542 में से 62 (11 प्रतिशत) महिला सांसद थीं, जबकि 2009 में 11 फीसदी (543 में से 59 सांसद) हिस्सेदारी आधी आबादी को हासिल हुई थी।
यदि विजेता उम्मीदवारों का लिंग के आधार पर विश्लेषण करें, तो इस बार बड़ी पार्टियों में तृणमूल कांग्रेस सभी दलों पर भारी साबित होती दिख रही है। उसके 29 सांसदों में से 11 महिलाएं (38 प्रतिशत) हैं। इनमें कृष्णानगर से जीतने वाली महुआ मोइत्रा भी शामिल हैं, जिनको कुछ ही महीने पहले लोकसभा से निष्कासित कर दिया गया था। तृणमूल कांग्रेस चूंकि ‘इंडिया’ ब्लॉक की प्रमुख सहयोगी है, इसलिए मुमकिन है कि विपक्ष में महिलाओं की आवाज बुलंद होती रहेगी। वैसे, कांग्रेस से जीतने वाली महिला उम्मीदवारों का प्रतिशत 13 है, जबकि सपा से 14 प्रतिशत। रही बात भाजपा की, तो उसके कुल सांसदों में विजेता महिलाओं की हिस्सेदारी 13 फीसदी है।
यहां कुछ सांसदों का नाम उल्लेखनीय है, विशेषकर राजस्थान की भरतपुर सीट से निर्वाचित संजना जाटव की, जिनकी जीत बताती है कि अब संभ्रांत घर की महिलाएं ही नहीं, दबी-कुचली जातियों की औरतें भी लड़कर लोकसभा में आने को आतुर हैं। एक लंबे अरसे तक औरतों की यह कहकर आलोचना की जाती रही कि किन्हीं कारणों से यदि पति चुनाव नहीं लड़ पाता, तो उसके रिक्त स्थान को भरने के लिए पत्नी मैदान में उतारी जाती है। मगर अब युवतियां खुद अपनी लड़ाई लड़कर वर्ग-जाति का प्रतिनिधित्व कर रही हैं। इसी तरह, कर्नाटक से प्रियंका जारकीहोली, बिहार से शांभवी चौधरी, उत्तर प्रदेश से इकरा हसन और प्रिया सरोज की चर्चा स्वाभाविक है, जो युवा महिला सांसदों में शुमार हैं। यहां सोफिया फिरदौस का उल्लेख भी आवश्यक है, जो वैसे तो ओडिशा की पहली मुस्लिम महिला विधायक बनी हैं, लेकिन आईआईएम की पढ़ाई करने के बाद उनका इस तरह राजनीति में उतरना बदलते समाज का एक महत्वपूर्ण संकेत है।
सवाल है कि आने वाले दिनों में संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व कैसे बढ़ाया जाए? इसके लिए तो सबसे पहले सभी दलों को औरतों को अधिक टिकट देना होगा, साथ ही महिलाओं को खुद भी सदन में पक्ष व प्रतिपक्ष की मुखर आवाज बनकर उभरना होगा। जरूरत इस बात की है कि महिलाएं राजनीतिक सरोकार से ऊपर उठकर जनहित के मुद्दों पर एकजुटता दिखाएं। जहां कहीं भी महिला अधिकारों का हनन हो, वहां उनको दलीय राजनीति से ऊपर उठकर उस महिला की प्रतिष्ठा का समर्थन करना चाहिए। मणिपुर में पिछले दिनों औरतों के अधिकारों का जिस तरह हनन किया गया, उसका एकजुट होकर विरोध जरूरी था, पर ऐसा हो नहीं सका। लिहाजा, महिला सांसदों को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि कैसे आधी आबादी की प्रतिष्ठा बनी रहे और वह भारतीय लोकतंत्र में समान नागरिक बनकर अपनी लोकतांत्रिक भागीदारी निभा सके।
चूंकि 2029 से महिला आरक्षण के तहत चुनाव संभावित हैं, इसलिए जो संसदीय क्षेत्र औरतों के लिए चिह्नित होंगे, उसमें यदि पार्टियां केवल मजबूत नेताओं की पत्नी-बेटी अथवा बहू को टिकट देंगी, तो स्वायत्तता से महिलाओं का प्रतिनिधित्व नहीं हो सकेगा। लिहाजा, राजनीतिक दलों पर यह दबाव भी बनाना चाहिए कि वे उन महिलाओं पर भरोसा करें, जो अपने बूते लड़ने में सक्षम हैं। वैसे, ईमानदारी से टिकट वितरण ही काफी नहीं है। संसदीय प्रणाली का प्रशिक्षण भी नवनिर्वाचित महिला सांसदों को देना होगा, तभी वे संसद में अपनी बात दम-खम के साथ रख सकेंगी।
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इस योजना का लाभ तभी मिल सकता है, जब वितरण कंपनियां इसमें निवेश करें। इसके साथ ही उपभोक्ताओं को सोलर पैनल पर स्विच करने के लाभों के बारे में जागरूक करके प्रोत्साहित करना होगा।
‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 13 मई, 2024
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Date: 11-06-24
For pluralityCSDS-Lokniti’s post-poll survey showed exhaustion with Hindutva politicsEditorial
A drop in satisfaction levels with governance, the stagnating popularity of Prime Minister Narendra Modi, the resilience of regional parties and the rejuvenation of the Congress party, and the fading of Hindutva for marginalised sections in the Hindi heartland. All these contributed to the National Democratic Alliance’s reduced majority in the 2024 general election, according to the CSDS-Lokniti’s post-poll survey. In its pre-poll survey, the agency had indicated that “unemployment” and “price rise” were key issues for a majority of the electorate and despite the healthy 46% support for the NDA, a chunk of those favouring the incumbents were willing to back the Opposition during the course of the election. The final vote share for the NDA, at 43.6%, was 1.4 points lower than what the constituents of this year’s coalition received in 2019 even as the INDIA bloc secured a significant 41.4% support (if the Trinamool Congress’s shares are included), a leap from 2019. In the previous Lok Sabha election, the Balakot action, the PM-Kisan scheme and 10% reservation for the Economically Weaker Sections category had helped the Bharatiya Janata Party romp home with 303 seats, according to Lokniti. But this time around, multiple narratives and political issues tied the party down in its strongholds. Even its ascendance in Odisha and Telangana was not enough to recoup its losses in the Hindi heartland.
The strong support by Dalits, other OBCs and minorities to the Congress in States such as Uttar Pradesh, and the Samajwadi Party’s terming the BJP’s agenda as a threat to the Constitution put the wind in the Opposition’s sails. That Congress leader Rahul Gandhi enjoyed a four-point lead (36% versus 32%) over Mr. Modi among respondents in Uttar Pradesh, when asked about their preference for the Prime Minister’s post, must alarm the BJP. Clearly, the party can no longer expect to rely on Hindutva as a cementing factor except in States such as Uttarakhand, Gujarat, Madhya Pradesh and Chhattisgarh, which are distinguished by a lack of a diligent Opposition. For the INDIA bloc, and the Congress in particular, its credible performance notwithstanding, its task is cut out in these States. The Congress also increased its vote share in Karnataka from what it was in the 2023 Assembly elections, but the NDA’s strong social coalition proved a hindrance in converting those increased votes into more seats. The message for the Opposition is clear — wherever it is in power, it must strive to provide a clear alternative to the NDA in terms of governance. And where it is not in power, it must rely on building unity among like-minded forces and a narrative of bringing change through alternative policies that offer a strong contrast to the centralising and unitary nature of the BJP.
Date: 11-06-24
साझा सरकार में सहयोगियों की अपनी प्राथमिकताएं हैंसंपादकीय
शपथ के बाद प्रधानमंत्री का पहला फैसला किसान सम्मान निधि की किस्त जारी करना रहा। कल्याणकारी राज्य में गवर्नेस के तीन आयाम होते हैं- आर्थिक और विदेश नीतियां, प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष लाभकारी योजनाएं और राजनीतिक हित साधन वाले कदम । साझा सरकार में क्षेत्रीय सहयोगी दलों को इससे मतलब नहीं होता कि पूंजीगत निवेश ज्यादा हो या रेपो रेट घटे, या फिर डब्ल्यूटीओ में भारत का स्टैंड क्या है। उनकी चिंता होती है कि केंद्र किसानों की उपज एमएसपी पर खरीदे, उसका मूल्य बढ़ाए और कपास, प्याज, गेहूं-चावल या चीनी का निर्यात न रोके। इसी तरह केंद्र की लाभकारी योजना के खर्च में अगर राज्य की भी देयता है तो योजना का श्रेय केवल केंद्र या प्रधानमंत्री को न मिले। घटक दल नहीं चाहेंगे कि केंद्र सरकार ऐसे ‘एजेंडा’ जारी रखे जो सम्प्रदाय – विशेष को लक्षित करके बनें जैसे समान नागरिक संहिता या अल्पसंख्यक-विरोधी आख्यान । इनमें से अधिकांश घटक दल अपने राज्यों में मुस्लिम वोट के आधार पर चुनाव जीतते हैं। फिर अगर ये केंद्र पर इन मुद्दों को लेकर मुखर नहीं होंगे तो राज्य के विपक्षी दल अल्पसंख्यकों को बरगलाएंगे। बिहार में जेडीयू को बैकवर्ड और मुस्लिम वोट बैंक चाहिए जबकि आंध्र में दोनों क्षेत्रीय दल – टीडीपी और वाईएसआरसीपी – का भी यही वोट बैंक है। इन सब से ज्यादा गंभीर मसला होगा ‘एक राष्ट्र, एक चुनाव’ की योजना । भले ही भाजपा के स्पिन- डॉक्टर्स कह रहे हों कि बगैर संविधान संशोधन के सामान्य कानून बनाकर इस योजना को अमल में लाया जा सकता हो, लेकिन संविधान की औसत समझ वाला भी जानता है कि इसके लिए कम कम से कम तीन संविधान संशोधन जरूरी होंगे, जो संसद में बिना दो-तिहाई बहुमत
संभव नहीं। सरकार के लिए अगले पांच साल चुनौती भरे होंगे।
Date: 11-06-24
सोशल मीडिया के जरिए उभर रही है न्याय की नई संस्कृतिमेघना पंत, पुरस्कृत लेखिका, पत्रकार और वक्ता
क्या इंसान की जिंदगी सस्ती होती है? या इंसान नहीं तो कम से कम वेतनभोगी वर्ग के जीवन की कीमत नहीं है? शक्तिशाली और अमीर लोगों की तुलना में क्या वो कमतर हैं? तब उनके प्रतिनिधित्व की जिम्मेदारी किसकी है? पुणे में कुछ समय पूर्व हुई पोर्श हादसे वाली घटना इन्हीं सब सवालों को जन्म देती है।
यह मामला हर पल उलझता चला गया था। ऐसा लग रहा था, जैसे किसी क्राइम-नॉवल के ब्योरे लिखे जा रहे हों, क्योंकि उन्हें सिस्टम की सभी खामियों के बारे में पहले से ही पता था। सबूतों से छेड़छाड़ से लेकर जालसाजी, अपहरण, धमकी, रिश्वत, फरारी तक- इस मामले ने हमारे सिस्टम में परिवार, न्यायपालिका, पुलिस, मेडिकल, सेवा क्षेत्र सभी जगह मौजूद सड़ांध का पिटारा खोल दिया। ये सभी ‘ब्रैट-कल्चर’ (उद्दंडों की संस्कृति) के दायरे में नजर आए।
लेकिन एक अच्छी बात भी है, जिसमें इसका समाधान है। याद रखें कि अगर सोशल मीडिया नहीं होता तो यह मामला भी एक और ‘दुर्घटना’ के रूप में बंद हो जाता। लेकिन अब ट्रायल-बाय-मीडिया की शक्ति न्याय को युक्तिसंगत बनाए रखती है और आशा बंधाती है।
देश के युवा कैंसल-कल्चर से ज्यादा इसमें रुचि रखते हैं कि चीजों के सकारात्मक परिणाम कैसे मिलें। और यही कारण है कि पुणे का मामला ‘ब्रैट-कल्चर’ के अंत का संकेत दे सकता है। यदि आप अपराध करते हैं, तो सोशल मीडिया सुनिश्चित करेगा कि आपको सजा मिले! युवाओं के पास यही शक्ति है।
चाहे आप कोई भी हों, जो भी करते हों, आप सबसे अमीर और सबसे शक्तिशाली लोगों को भी उनके किसी अपराध के लिए घुटनों पर ला सकते हैं। परिपक्व होने का एक हिस्सा यह सीखना है कि हम जो कुछ भी करते हैं, उसके परिणाम भी हमें ही भुगतने हैं।
याद रखें, कोई भी यह नहीं कह रहा है कि अपनी धन-दौलत से सुख-सुविधाओं का आनंद न लें। आग्रह इतना ही है कि इसे जिम्मेदारी के साथ करें, दूसरों के जीवन और आजीविका की कीमत पर इसे न होने दें। बड़ी ताकत के साथ बड़ी जिम्मेदारी भी आती है।
सोशल मीडिया को वह सुधार करने दें, जिसमें हमारी न्यायपालिका, समाज और हमारे परिवार पूरी तरह से कर पाने में असमर्थ रहे हैं। सच कहूं तो पुणे की घटना 1970 के दशक की बॉलीवुड मसाला फिल्मों की याद दिलाने वाला थी, जिसमें एक बिगड़ैल अमीरजादा मजदूर वर्ग को कुचल देता है, और सिस्टम उसको दंडित करने के बजाय उसके सुपर-रिच होने के कारण उसे दुलारता है।
कड़वी सच्चाई यह है कि भारत में कोई भी कानून से नहीं डरता। अगर ऐसा होता, तो ऐसी स्थिति निर्मित नहीं होती, जिसमें माता-पिता अपने 17 वर्षीय बेटे को पोर्श जैसी कार उपहार में देते और उसे लाइसेंस न होने के बावजूद गाड़ी चलाने की अनुमति देते। न ही वे उसे अपने दोस्तों के साथ पार्टी करने के लिए बेशुमार पैसा देते (इतना पैसा, जो मजदूर वर्ग के महीनों के वेतन के बराबर है)।
इतना ही नहीं, उन्होंने अपने बेटे को यह भी सिखाया कि अगर उसके हाथों कोई अनर्थ हो जाए, तो सिचुएशन को कैसे हैंडल करना है। लेकिन क्या उन्होंने उसे पीड़ितों के परिवार से माफी मांगने की मानवता और बुनियादी शालीनता भी सिखाई? नहीं! इस मामले में तीन व्यवस्थागत विफलताएं सामने आई थीं- व्यक्तिगत, सामाजिक, कानूनी। लड़कों को कानून-व्यवस्था, समाज-परिवार द्वारा दंड से मुक्ति दी जाती है, इसीलिए वे बड़े होकर अपराधी बनते हैं।
हम बेहतर परवरिश कैसे कर सकते हैं? कानूनी खामियों को कैसे रोक सकते हैं? हम इस भयावह मामले को उन सभी लोगों के लिए चेतावनी की कहानी में कैसे बदल सकते हैं, जो सोचते हैं कि वे कानून से ऊपर हैं? जो पैसे और भ्रष्टाचार में इतने अंधे हो गए हैं कि उन्हें लगता है कि वे जो चाहे कर सकते हैं और उन्हें कुछ नहीं होगा? उन लोगों को दंडित कैसे करें, जो समाचारों का शोर खत्म होने के बाद बच निकलते हैं? सोशल मीडिया से इन सवालों के जवाब निकल रहे हैं।
Date: 11-06-24
संघ की शक्तिसंपादकीय
यूरोपीय संघ के चुनाव में इस बार बड़ी उलट-फेर देखने को मिली है। दक्षिणपंथी रुझान वाले दलों को शानदार कामयाबी मिली है। इसे देखते हुए जर्मनी और फ्रांस जैसे देशों के सत्ताधारी दलों की घबराहट बढ़ गई है। हार की आशंका से फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों ने तो राष्ट्रीय संसद भंग कर मध्यावधि चुनाव की घोषणा कर दी है। सत्ताईस सदस्य देशों वाले यूरोपीय संघ में जर्मनी सबसे बड़ा देश है। वहां की ‘अल्टरनेटिव फार जर्मनी’ पार्टी मजबूत होकर उभरी है। हालांकि उसके कई शीर्ष उम्मीदवारों के नाम घोटालों में शामिल थे, मगर उसके बावजूद पार्टी का मत प्रतिशत बढ़ा। पार्टी ने 2019 में ग्यारह फीसद मत हासिल किए थे, जो इस बार बढ़ कर साढ़े सोलह फीसद हो गए। वहीं जर्मनी के सत्तारूढ़ गठबंधन में तीन दलों का संयुक्त मत मुश्किल से तीस फीसद से ऊपर रहा। इस तरह ‘अल्टरनेटिव फार जर्मनी’ ने देश के चांसलर ओलाफ शोल्ज की ‘सोशल डेमोक्रेट्स’ पार्टी को मात देने के लिए पर्याप्त सीटें जुटा ली हैं। जर्मनी में दक्षिणपंथ के इस उभार को कुछ लोग हिटलर के नाजी उभार के रूप में देख रहे हैं। यूरोपीय संघ यूरोप के सत्ताईस देशों का संगठन है, जिसकी संसद के लिए करीब चालीस करोड़ लोग मतदान करते हैं। यही संसद यूरोपीय देशों की आर्थिक विकास, वाणिज्य – व्यापार, राजनयिक, आप्रवासन आदि से जुड़ी नीतियां तय करती है। इसलिए दुनिया के तमाम देशों की नजर इसके चुनाव पर रहती है यूरोपीय संघ में दक्षिणपंथी रुझान वाले दलों का दबदबा बढ़ने से वाणिज्य-व्यापार, आप्रवासन आदि को लेकर कुछ देशों की चिंताएं बढ़ गई हैं। दक्षिणपंथी रुझान वाली सरकारों में देखा गया है कि वे राष्ट्रवादी नीतियों पर अधिक जोर देती हैं। यूरोपीय संघ आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वान डेर लेन की पार्टी ‘क्रिश्चियन डेमोक्रेट्स’ ने चुनावों से पहले ही दक्षिणपंथी रुझान के उभार को भांप लिया था और प्रवासन और जलवायु के मुद्दे पर और अधिक दक्षिणपंथी रुख अपना लिया था, जिसके कारण यूरोपीय संसद में उनकी पार्टी अब तक की सबसे बड़ी पार्टी बन गई है। भारत के लिए भी इसे इसलिए चिंता का विषय माना जा सकता है कि उन देशों में बड़ी संख्या में भारतीय नागरिक रोजगार आदि के लिए जाते हैं।
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बचाव के तरीके क्या हो सकते हैं –
हाल ही में देश के कुछ बड़े शहरों में हुई आगजनी की त्रासदी में जान और माल की काफी हानि हुई है। पिछले दो साल में दिल्ली के 66 अस्पतालों में आग लगने की घटनाएं घट चुकी हैं। इन पर रोक लगाने के लिए प्रशासन और जनता: दोनों को ही जागरूक होना होगा।
‘हिन्दुस्तान’ में प्रकाशित लेख पर आधाारित। 28 मई, 2024
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Date: 10-06-24
नई शुरुआतसंपादकीय
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को एवं गोपनीयता की शपथ ली। उनके साथ मंत्रिमंडल के सहयोगियों ने भी पस ग्रहण की। भारत जैसे विविधता से भरे लोकतंत्र में दो सफल कार्यकाल के बाद तीर पद पर सोनी इस बार मोदी सरकार चलाने के लिए राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन के साझेदारों पर निर्भर नई सरकार की बुनियादी प्राथमिकताएं आने वाले दिनों में हमारे सामने होगी. वह चिंता इस बात की भी है कि कहीं गठबंधन सरकार में सुधारों को अंजाम देना मुश्किल न साबित हो। बहरहाल अनुभव तो यही बताते हैं कि बंधन सरकारे न केवल प्रभावी ढंग से काम करती है बल्कि वे दांचागत सुधारों को भी अंजाम देती हैं। भारत को अगर मध्यम अवधि में निरंतर उच्च आर्थिक वृद्धि करनी है तो उसे निरंतर सुधारों को अपनाना होगा। यह बात ध्यान देने लायक है कि बहुप्रतीक्षित कारक बाजार सुधारों को अंजाम देने का काम तो एक पार्टी के बहुमत वाली सरकारों में भी मुश्किल साबित हुआ है।
ऐसे सुधारों पर सहमति बनाने में अवश्य समय लग सकता है लेकिन सरकार ऐसी पहल से शुरुआत कर सकती है जिन पर साझेदारो को आपत्ति होने की संभावना नहीं है। उदाहरण के लिए सरकार को वस्तु एवं सेवा कर यानी जीएसटी की दरों और सब को युक्तिसंगत बनाने की प्रक्रिया जीएसटी परिषद में शीघ्र शुरू करनी चाहिए। हालांकि हाल के वर्षों में जीएसटी संग्रह में सुधार हुआ है। इसकी वजह अनुपालन में सुधार है किंतु दरों की बहुता के कारण कर व्यवस्था का प्रदर्शन कमजोर रहा है। इससे केंद्र और राज्य ये सारी पर राजकोषीय परिणाम प्रभावित हुए है। एक सामान्य जीएसटी प्रणाली जिसमें सीमित स्लैब हो, वह राजस्व में बेहतरी लाएगी और कारोबारी सुगमता को भी बेहतर बनाएगी। इसके अतिरिक्त भाजपा के चुनावी घोषणा पत्र में कम से कम तीन ऐसे प्रमुख किए जिनपर तत्काल अमल शुरू किया जा सकता है।
इनमें से पहला है देश की की व्यवस्था भारत जैसे तेजी सेहो अर्थव्यवस्था वाले देश में वह अहम है कि आंकड़ों की गुणवत्ता विश्वसनीय हो ऐसे सरकारी और दोनों स्तरों पर निर्णय लेने की प्रक्रिया को बेहतर बनाने में मददगार साबित होगे। भारत में पिछली जनगणना 2011 में हुई थी। सरकार ने काफी अंतराल के बाद हाल ही में उपभोक्ता सर्वेक्षण के आंकड़े जारी किए हैं लेकिन अर्थशखिका कहना है कि घरेलू उत्पाद और उपभोक्ता मूल्य सूचकांक श्रृंखला में संशोधन के पहले एक और बार ऐसा करना चाहिए। भारतको उत्पादक मूल्य सूचकांक की भी आवश्यकता है ताकि उत्पादन के बारे में बेहतर जानकारी मिल सके। इसके अलावा रोजगार के क्षेत्र में भी निरंतरता के साथ विश्वसनीय आंकड़े हासिल करना आवश्यक है। चूँकि कुछ संकेतक पुराने आंकड़ों पर आधारित है इसलिए शायद वे मौजूदा हालात को सही ढंग से सामने नहीं रख पा रहे हों | इससे नीतिगत निर्णय की गुणवत्ता प्रभावित होगी और आर्थिक परिणामों पर असर होगा।
दूसरा अदालतों में लंबित मामलों के निपटारे के लिए राष्ट्रीय अभियोग नीति विभिन्न अदालतों में करीब पांच करोड़ मामले लंबित हैं। भारत को अपनी व्याधिक क्षमता में सुधार करने की आवश्यकता है। अदालत में मामलों का निपटारा और देश में रहना दोनों को आसान बनाएगा। तीसरा है पंचायती राज संस्थान में वित्तीय स्वायत्तता सर्वाधिक तथा तेजी से होते देशों में बुनियादी सरकारी सेवाएं स्थानीय निकाय देते हैं। भारत में स्थानीय निकाय ऐसे अनुदान पर आश्रित होते हैं जो अक्सर अपर्याप्त एवं अनियमित होता है। रिजर्व बैंक के एक हालिया अध्ययन से पता चलता है कि स्थानीय कर एवं पंचायत के कुल राजस्व में महज 1.1 फीसदी के हिस्सेदार होते हैं। स्थानीय निकायों का तर एकदम होगा। इसके लिए राज्यों के सहयोग की आवश्यकता होगी लेकिन इससे बेहतरी आएगी। कुल मिलाकर अगले पांच सालों में बेहतरी हासिल करने के लिए यह अहम है कि संसद को समुचित ढंग से काम करने दिया जाए। यह सरकार का दायित्व होगा कि वह विपक्ष के साथ सकारात्मक संबंध बनाए तथा बेहतर विधायी परिणाम हासिल करें |
Date: 10-06-24
पर्यटन क्षेत्र में नई संभावनाएंजयंतीलाल भंडारी
हाल ही में विश्व आर्थिक मंच ने यात्रा और पर्यटन विकास सूचकांक (टीटीडीआइ) 2024 जारी किया है। 119 देशों के इस सूचकांक में भारत 39वें स्थान पर है। इसके पहले 2019 में भारत इस सूचकांक में काफी नीचे, 54वें स्थान पर था। नए टीटीडीआइ सूचकांक में प्राकृतिक मापदंड पर भारत छठवें तथा संस्कृति, कारोबार, चिकित्सा और शिक्षा के लिए यात्रा मापदंडों पर नौवें क्रम पर है। इनमें कीमत प्रतिस्पर्धात्मकता के मामले में अठारहवें, हवाई यातायात की प्रतिस्पर्धात्मकता के मामले में छब्बीसवें और जमीनी तथा बंदरगाह बुनियादी ढांचे के मामले में पच्चीसवें स्थान पर है। इस पर्यटन सूचकांक के विश्लेषण से पता चलता है कि स्वच्छता, स्वास्थ्य, पर्यावरण, इंटरनेट सुविधा और पर्यटन के सामाजिक-आर्थिक प्रभाव जैसे मापदंडों पर भी भारत ने प्रगति की है।
देश में घरेलू पर्यटन तेजी से बढ़ रहा है और खासकर धार्मिक पर्यटन ऊंचाइयां छू रहा है। लेकिन नए पर्यटन सूचकांक के आधार पर कुछ ऐसी महत्त्वपूर्ण बातें सामने आई हैं, जिन्हें ध्यान में रखकर जहां भारत अपने घरेलू पर्यटकों की संख्या में वृद्धि कर सकता है, वहीं घरेलू पर्यटन स्थलों पर विश्व पर्यटन की तरह सुविधाएं और सुंदरता निर्मित करके विदेशों में पर्यटन का मोह पाले हुए घरेलू पर्यटकों को आकर्षित कर सकता है। गौरतलब है कि दुनिया के सभी प्रमुख पर्यटन स्थलों की पहचान उनकी सुंदरता और पेशेवर तरीके से तैयार किए गए संग्रहालयों से भी है। इसके अलावा वहां उपलब्ध बुनियादी ढांचे की गुणवत्ता, साधारण से साधारण पर्यटक के लिए भी उच्च गुणवत्ता की स्थानीय सार्वजनिक परिवहन सेवाओं के साथ-साथ वहां किफायती कीमत पर ठहरने और स्वच्छ तथा सुरक्षित आवास की जरूरत है।
उल्लेखनीय है कि दुनिया में सबसे अधिक विदेशी पर्यटक प्रमुखतया फ्रांस, स्पेन, अमेरिका, चीन और इटली जाते हैं। इनके अलावा सिंगापुर, विएतनाम, थाईलैंड, इंडोनेशिया, हांगकांग, मलेशिया और संयुक्त अरब अमीरात (दुबई) जैसे देश भी अपनी कुछ विशिष्टताओं से विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करने में भारत से बहुत आगे हैं। स्थिति यह है कि अभी भी दुनिया के कुल विदेशी पर्यटकों का दो फीसद से भी कम हिस्सा भारत के खाते में आ रहा है। हालांकि पर्यटन उद्योग भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में करीब छह फीसद का योगदान करता है, लेकिन इसमें सिर्फ आठ करोड़ लोगों को प्रत्यक्ष या परोक्ष तरीके से रोजगार मिला हुआ है।
इसमें कोई दो मत नहीं कि भारत में दुनिया के सबसे अधिक पर्यटकों को आकर्षित करने की संभावनाएं हैं, लेकिन यह इस डगर पर बहुत पीछे है। भारत के कई ऐसे अनोखे पर्यटन स्थल हैं, जो देश में पर्यटन के विभिन्न आयामों को चमकीली पहचान दे रहे हैं। भारत की संस्कृति, संगीत, हस्तकला, खानपान से लेकर नैसर्गिक सुंदरता हमेशा से देशी-विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करती रही है। भारत के पास हिमालय का सबसे अधिक हिस्सा, विशाल समुद्री तट और रेत का रेगिस्तान, कच्छ में सफेद नमक का रेगिस्तान, लद्दाख में ठंडे रेगिस्तान, देश के कोने-कोने में यूनेस्को द्वारा चिह्नित धरोहर स्थलों समेत अभयारण्य और राष्ट्रीय उद्यान जैसी प्राकृतिक विविधताएं हैं। देश के विभिन्न भागों में तटीय पर्यटन, समुद्र तट पर्यटन और आध्यात्मिक पर्यटन, स्थल अपनी पहचान बनाए हुए हैं।
गौरतलब है कि इस समय दुनिया के पर्यटन प्रधान देशों और भारत के पड़ोसी पर्यटन स्थलों वाले प्रसिद्ध देशों में भारतीय पर्यटकों को लुभाने की होड़ लगी हुई है। इन देशों ने इस बात को अच्छी तरह समझा है कि भारतीय मध्यवर्ग की तेजी से बढ़ती क्रयशक्ति के कारण उनमें विदेश यात्रा की ललक और अभिरुचि बढ़ी है। यही कारण है कि जहां एक ओर विदेशी पर्यटकों के कदम भारत की ओर धीमी गति से बढ़ रहे हैं, वहीं भारतीय पर्यटकों के कदम विदेशों में पर्यटन के लिए छलांगें लगाकर बढ़ रहे हैं। 4 दिसंबर, 2023 को सरकार ने लोकसभा में बताया कि वर्ष 2022 में भारत यात्रा पर आए विदेशी पर्यटकों की संख्या 85.9 लाख थी। जबकि उस वर्ष करीब दो करोड़ भारतीय पर्यटकों ने देश से बाहर भ्रमण किया। 23 मई, 2024 को प्रकाशित रिजर्व बैंक की रपट के मुताबिक भारतीयों ने वर्ष 2023-24 में विदेश घूमने पर 17 अरब डालर यानी करीब 1.41 लाख करोड़ रुपए खर्च किए, वहीं वर्ष 2022-23 में विदेश घूमने पर 13.6 अरब डालर खर्च किए गए थे।
विभिन्न अध्ययन रपटों के मुताबिक भारतीय पर्यटकों की विदेश यात्राओं के दौरान किए जाने वाले खर्च का ग्राफ लगातार बढ़ रहा है, मगर विदेशी पर्यटकों द्वारा भारत में किए जाने वाले खर्च के ग्राफ की वैसी ऊंचाई नहीं है। निश्चित रूप से भारतीयों का विदेश यात्रा की तरफ तेजी से बढ़ता रुझान घरेलू पर्यटन के मद्देनजर नुकसान की तरह है। इसमें दो मत नहीं कि भारत में भी विदेशी पर्यटकों से आमदनी बढ़ रही है, लेकिन भारतीयों द्वारा विदेश भ्रमण पर किए जा रहे भारी-भरकम व्यय की तुलना में भारत आने वाले विदेशी पर्यटकों से भारत की आमदनी बहुत कम है। विदेशी पर्यटकों से होने वाले आर्थिक लाभ का अनुमान इस बात से लगा सकते हैं कि एक विदेशी पर्यटक से औसतन दो लाख रुपए की कमाई होती है। पर्यटकों का खर्च स्थानीय अर्थव्यवस्था में पुन: निवेश का काम करता है। पर्यटकों की संख्या बढ़ने से रोजगार और पर्यटन से जुड़े विभिन्न उद्योग-कारोबार भी बढ़ते हैं।
पिछले एक दशक में देश में घरेलू पर्यटकों, धार्मिक पर्यटकों और विदेशी पर्यटकों के अनुभव को बेहतर बनाने के लिए पर्यटन के व्यापक बुनियादी ढांचे और अन्य पर्यटन सुविधाओं को नई वैश्विक पर्यटन सोच के साथ आकार दिया गया है। पर्यटन बजट में लगातार वृद्धि की गई है। यह भी उल्लेखनीय है कि भारत को वर्ष 2023 में जी-20 की अध्यक्षता के दौरान कार्यसमूह की रणनीतिक रूप से देश के कोने-कोने में दो सौ से अधिक विभिन्न बैठकों में हिस्सा लेने भारत आए विदेशी प्रतिनिधियों और विदेशी मेहमानों को भारत के पर्यटक स्थलों का भ्रमण करवा कर भारत के बेजोड़ पर्यटन केंद्रों का वैश्विक प्रचार-प्रसार का अभूतपूर्व मौका मिला। इसके साथ भारत की दुनिया भर में बढ़ती आर्थिक और राजनीतिक प्रतिष्ठा के कारण अब भारत में विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करने की नई संभावनाएं उभर रही हैं।
ऐसे में जरूरी है कि भारत के पर्यटन क्षेत्र को अधिक जीवंत बनाया जाए। इसके लिए केंद्र सरकार, राज्यों और स्थानीय निकायों को पर्यटन विकास के लिए समन्वित रूप से साथ मिलकर काम करना होगा। विदेशी पर्यटकों को लुभाने के लिए उनकी पसंदीदा पर्यटन गतिविधियां बढ़ानी होंगी। उम्मीद है कि नवगठित सरकार पर्यटन प्रधान देशों की तरह पर्यटन क्षेत्र को और जीवंत बनाने की नई रणनीति के साथ आगे बढ़ेगी। वर्ष 2030 तक भारत विदेशी पर्यटकों से 56 अरब डालर की विदेशी मुद्रा अर्जित करने के लक्ष्य को लेकर आगे बढ़ते हुए वर्ष 2047 तक एक लाख करोड़ डालर की पर्यटन अर्थव्यवस्था के रूप में दुनिया में रेखांकित होता दिखाई देगा।
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जनाग्रह सेंटर फॉर सिटिजनशिप एंड डेमोक्रेसी के 2023 के भारत की शहरी प्रणालियों का वार्षिक सर्वेक्षण “भारत के शहरी एजेंडे को आकार देना” से पता चलता है कि हमारे शहरी प्रशासन शहरों के बढ़ते आकार के प्रभावों से निपटने के लिए तैयार नहीं है।
– अनुमान है कि 2050 तक शहरों की जनसंख्या 80 करोड़ से अधिक हो जाएगी।
– 39% राज्यों की राजधारियों में सक्रिय मास्टर प्लान और दीर्घकालिक शहरी विकास की कोई तैयारी नहीं है।
– इसके अलावा खराब नीति कार्यान्वयन और पारदर्शिता की कमी जैसे मुद्दे हैं।
समाधान –
– सत्ता का विकेंद्रीकरण, प्रशासन को सुव्यवस्थित करना और स्थानीय सरकार की वित्तीय स्वायत्तता को बढाने से संबंधित सुधारों की आवश्यकता।
– नागरिक निकायों को हर प्रकार से सक्षम और सशक्त बनाना, तभी सार्वजनिक सुरक्षा और कल्याण संभव हो सकता है।
‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 16 मई, 2024
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दलबदल विरोधी कानून सन् 1985 में लागू किया गया था। आशा थी कि इससे दलबदल की घटनायें यदि रुक नहीं सकेंगी, तो काफी कम तो अवश्य हो जायेंगी। लेकिन हो इसके विपरीत रहा है। और इसका मुख्य कारण परिच्छेद 4 का प्रावधान है। इसके अनुसार यदि दल से अलग हुए विधायक समूह का किसी अन्य दल में विलय नहीं होता है, या एक अलग दल नहीं बन पाता हैं, तब भी विधायक अपात्र नहीं होंगे।
पिछले वर्ष महाराष्ट्र राज्य की विधानसभा में दल बदलने की हुई घटनायें इसका प्रमाण हैं।
वर्तमान में अधिकांश मामलों में देखा यह जा रहा है कि किसी भी दल के एक-तिहाई विधायक अपनी पार्टी से अलग हो जाते हैं। बाद में ये अलग हुए समूह किसी अन्य पार्टी में अपना विलय कर देते हैं।
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Date: 08-06-24
The 13% RealityIt’s a shame. Parliament’s gender ratio just isn’t changingTOI Editorials
After 18 Lok Sabha elections, Parliament still has just 74 women MPs. Slice it, dice it any which way but the crawling pace at which women are fielded by political parties needs much more attention. That just 13% of parliamentarians are women, when, at 31.2cr, women make up 48% of the total 64.2cr voters, is the story of an inequality that seems almost unshakeable. Less than 10% candidates were women, and 155 constituencies didn’t have a single woman candidate. The largest party BJP has 32 women MPs. But at 69, barely 16% of its 441 candidates were women. It shows the tortuous road ahead to achieve the 33% reservation – and even that ball has been kicked way down the road.
Two of six women Congress fielded in Karnataka have won. Delhi has two women among its seven MPs. Of Congress’s total 41 women candidates, 13, or 34%, won. TMC showed the way – 11 of 12 women candidates were elected, 38% of TMC’s 29 total MPs. That should silence the lame lament of “where are the women?”
Where the needle’s moved is that women MPs belong to various walks of life and age-groups, beyond family and tinsel town that have dominated the supply line of women netas so far. Career politicians were given more opportunity to contest, there are lawyers, academics and doctors in the mix. Winners include a 48-year-old Gujarati professor who crowdfunded her campaign; among youngest parliamentarians is a 27-year-old tribal woman who won on a general seat.
The onus is on political parties to increase women’s political participation. And it is the Big Two that have to do much better – only 13% of MPs of both Congress and BJP are women. Get more women to jump the voters queue to be on the ballot.
Date: 08-06-24
Change and continuityMexico’s first woman President must crack down on organised crime
Editorials
When Andrés Manuel López Obrador, the leftist nationalist and leader of the Movement of National Rejuvenation (Morena), became the President of Mexico in 2018, many warned that the Latin American country was on the path to become another Venezuela. But Mr. Obrador proved his critics wrong using populism with fiscal responsibility and pushing Mexico’s polity, which was dominated by the pro-American, centre-right Institutional Revolutionary Party (PRI) for over seven decades, towards the Left. The Morena’s surge helped Claudia Sheinbaum, the 61-year-old climate scientist who was endorsed by Mr. Obrador, make history last week as she was elected the first woman President of Mexico. The former Mexico City Mayor, known for her tough measures in tackling violent crimes, won 58.6% votes, while her rival, Xóchitl Gálvez, the joint candidate of three opposition parties, secured 28.4%. Morena also won a two-thirds majority in Parliament, which makes Ms. Sheinbaum the first leader in over 30 years who can push constitutional changes — a long-standing promise of Mr. Obrador — through Congress without the opposition’s support. Ms. Sheinbaum, who campaigned on the promise of wealth distribution, tackling crime and building a stronger economy, said she will stay true to Mr. Obrador’s legacy.
Mr. Obrador’s victory in 2018 marked a paradigm shift in Mexico’s politics. He promised to end widespread corruption and launch a massive public spending programme. But unlike several other populists in the region, he adopted a pragmatic approach seeking to bring in gradual changes. He rolled out cash handouts of about $350 for the elderly and monthly scholarships of about $50 for students, besides launching reforestation grants in rural areas, without jeopardising the country’s economic stability. The Mexican peso rose to its strongest levels in almost a decade and investments flowed in. While economic expansion averaged at about 1%, unemployment fell to 2.8%, one of the country’s all-time lows. Mr. Obrador remained largely popular despite criticisms of his failing to tackle violent crime and his intolerance towards dissent. Ms. Sheinbaum should be mindful of the criticisms her predecessor faced. There are concerns that the Morena’s supermajority would lead to constitutional amendments, doing away with some checks and balances on executive power. The new President should bring the fiscal deficit, which ballooned in Mr. Obrador’s last year in office, under check while continuing his social security measures. A bigger challenge would be to crack down on gangs that control drug trafficking to the U.S. Ms. Sheinbaum should use her strong mandate to offer a social contract that improves on Mr. Obrador’s welfarism with a stronger emphasis on the Morena’s social democracy.
Date: 08-06-24
Remoulding the Global Plastics TreatyNeethi P., Akbar A. [ Neethi P. is Senior Researcher at the Indian Institute for Human Settlements (IIHS), Bangalore and an Advisory Member to the Karnataka Labour Policy Committee,Akbar A. is the Director Programme Design at Hasiru Dala. ]
As discussions still continue for an international legally binding treaty on plastic pollution, it becomes crucial to consider how it can support a fair transition for individuals who collect and recycle waste informally. According to the OECD Global Plastic Outlook, global production of plastic waste was 353 million tonnes in 2019 — more than double since it was in 2000, and is set to triple by 2060. Only 9% of this was recycled, 50% sent to landfills, 19% incinerated, and 22% disposed of in uncontrolled sites or dumps. According to the United Nations Environment Programme, of the 9% recycled, 85% was done by informal recycling workers.
These workers collect, sort and recover recyclable and reusable materials from general waste, alleviating municipal budgets of financial burdens around waste management and, at large, subsidising the environmental mandate of the producers, consumers and the government. The Centre for Environment Justice and Development has also observed that they promote circular waste management solutions and help mitigate greenhouse gas emissions, valuably contributing to sustainability. Their efforts significantly reduce plastic content in landfills and dump sites, effectively preventing plastic leaking into the environment.
The need for recognition
Yet, these workers are often overlooked and remain highly vulnerable in plastic value chains. They face risks such as increasing privatisation of waste management, waste-to-energy or incineration projects, and exclusion through other public policy interventions in plastic waste management in the norms of Extended Producer Responsibility (EPR).
The informal waste and recovery sector (IWRS) is more than a minor player in worldwide municipal solid waste management systems. According to the UN-Habitat’s Waste Wise Cities Tool (WaCT), the informal sector accounts for 80% of municipal solid waste recovery in many cities.
A recent study by UN-Habitat and the University of Leeds estimates that around 60 million tonnes of plastic from municipal solid waste pollute the environment, including waterbodies, due to inadequate collection services and mismanagement of solid waste. Without the IWRS, the volume would be higher. However, as highlighted in the recent Leave No One Behind Report, strategies to reduce plastic pollution often neglect to effectively involve the recovery capacities, skills, and knowledge of the IWRS. This oversight worsens livelihood vulnerabilities and undermines existing informal recovery systems.
Global treaty, need for a just transition
The Global Plastics Treaty is a significant attempt to establish a legally binding agreement aimed at reducing and eliminating plastic pollution. The decision to establish an Intergovernmental Negotiating Committee (INC) was made in early 2021 during the fifth UN Environment Assembly in Nairobi, Kenya. The INC’s journey, beginning with an Ad Hoc Open-Ended Working Group meeting in Dakar, Senegal, in mid-2022, was followed by subsequent meetings in Uruguay, Paris, and Nairobi, with the fourth INC-4 in Canada in April this year. The final INC-5 meeting in South Korea will continue to see active participation from the International Alliance of Waste Pickers (IAWP).
The IAWP, a vocal participant in the UNEA Plastic Treaty process, emphasises the importance of supporting the formalisation and integration of informal waste pickers into discussions on addressing plastics. It also advocates including waste pickers’ perspectives and solutions at every stage of policy and law implementation.
These measures aim to acknowledge waste pickers’ historical contributions, protect their rights, and promote effective and sustainable plastic waste management practices. There is no universally agreed-upon terminology for a just transition or a formal definition of the informal waste sector and its workforce. Clarifying these definitions is crucial.
India’s voice is important
As a key representative from the Global South, India promotes an approach that enhances repair, reuse, refill, and recycling without necessarily eliminating the use of plastics altogether.
India has also stressed the importance of adopting country-specific circumstances and capacities. Hence, India’s informal waste pickers, who are indispensable, remain central to the discussion.
We, therefore, need to rethink the formulation of our EPR norms and raise questions on how to integrate this informal worker cohort into the new legal framework.
As the final round of negotiations for the Global Plastics Treaty approaches the INC-5, a key question remains — on how a global instrument to end plastic pollution can enable a just transition for nearly 15 million people who informally collect and recover up to 58% of global recycled waste, thereby shaping a sustainable future. By incorporating their perspectives and ensuring their livelihoods are protected, the treaty can embody social justice and equity principles while leaving no one and no place behind.
Date: 08-06-24
नई गठबंधन सरकार के सामने कैसी चुनौतियां रहेंगीपवन के. वर्मा, ( राजनयिक, पूर्व राज्यसभा सांसद )
नरेंद्र मोदी की सरकार कल अपने तीसरे कार्यकाल के लिए शपथ लेगी। इस बार के राष्ट्रीय चुनावों के नतीजों से भाजपा कमजोर हुई है, वहीं विपक्ष मजबूत हुआ है, और इसने यह भी सुनिश्चित कर दिया है कि नई सरकार गठबंधन वाली होगी।
भाजपा के उम्मीद से कम प्रदर्शन करने के कारणों का पहले ही विस्तार से विश्लेषण किया जा चुका है, लेकिन अब असली मुद्दा यह है कि क्या मोदी स्वाभाविक रूप से गठबंधन सरकार चलाने में समर्थ हैं? यह सवाल इसलिए प्रासंगिक है, क्योंकि मोदी को गठबंधन सरकार चलाने का कोई अनुभव नहीं है।
2001 से 2014 तक गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में उन्हें गठबंधन सहयोगियों की आवश्यकता नहीं थी। वे एकमात्र सुप्रीमो थे। जब वे 2014 में प्रधानमंत्री बने, तो भाजपा ने पहली बार पूर्ण बहुमत हासिल करके इतिहास रच दिया था। उस शानदार जीत के निर्विवाद नायक मोदी ही थे, और वे उसके हकदार भी थे।
कहने को वह एनडीए की सरकार थी, लेकिन सहयोगियों का सरकार की कार्यशैली में कोई दखल नहीं था। एनडीए की बैठकें धीरे-धीरे एक अपवाद और औपचारिकता बनकर रह गईं। जब गठबंधन के सहयोगी पार्टी-लाइन के अनुरूप चलने की हिम्मत नहीं जुटा पाए तो उन्हें जताया गया कि अब उनका यहां स्वागत नहीं है और वास्तव में कई दलों ने गठबंधन को छोड़ा भी।
नेतृत्व के इस एकतरफा मॉडल को 2019 के लोकसभा चुनावों ने और मजबूत किया, जहां भाजपा ने 2014 से भी बेहतर जनादेश हासिल किया। अब तो प्रधानमंत्री लगभग निर्विवाद हो गए। प्रधानमंत्री की इच्छानुसार निर्णय को बिना किसी सवाल के मंजूरी दे दी जाती थी।
सवाल पूछने या असहमत होने की गुंजाइश नहीं थी। न केवल सरकार, बल्कि पार्टी में भी प्रधानमंत्री का निर्देश ही सर्वोपरि था। लंबे समय से पद पर रहे लोकप्रिय मुख्यमंत्रियों और कैबिनेट मंत्रियों को हटा दिया गया।
रातों रात पूरे राज्य के मंत्रिमंडल को बर्खास्त कर दिया गया, और विरोध की आवाज नहीं उठी। यहां तक कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को भी दरकिनार कर दिया गया। केवल आवश्यक होने पर ही उससे परामर्श किया जाता, तथा उसकी सलाह को अक्सर नजरअंदाज कर दिया जाता।
संसदीय कार्य भी पूरी तरह से सत्ताधारी पार्टी की मर्जी पर चलता था। भूमि सुधार जैसे विधेयकों को अक्सर जबरन पारित कर दिया जाता था। लोकसभा और राज्यसभा में बहुमत था, जिससे अक्सर पर्याप्त परामर्श के बिना ही कानून पारित कर दिए जाते थे। कम ही विधेयकों को गहन जांच के लिए सिलेक्ट कमेटी को भेजा जाता था।
जब प्रधानमंत्री संसद में बोलते थे तो कमजोर विपक्ष हंगामा भर मचाता, लेकिन इससे ज्यादा कुछ नहीं कर सकता था। 2024 के चुनावों में भी पूर्ण बहुमत के साथ तीसरे कार्यकाल की उम्मीद कर रहे प्रधानमंत्री ने ‘अबकी बार 400 पार’ का नारा लगाते हुए उसी शैली में काम किया। पार्टी को इस हद तक हाशिए पर धकेल दिया गया कि वह अदृश्य-सी हो गई।
यहां तक कि पार्टी के चुनावी घोषणा-पत्र को भी ‘मोदी की गारंटी’ कहा गया। गठबंधन में किन दलों को शामिल किया जाए और किसे टिकट दिया जाए, इस बारे में बहुत ही केंद्रीकृत तरीके से निर्णय किए गए। मोदी अपनी निर्विवाद स्थिति के बारे में आश्वस्त थे। लेकिन चुनाव नतीजों ने तस्वीर बदल दी है।
अब प्रधानमंत्री को उन गठबंधन सहयोगियों से सलाह-मशविरा करना पड़ रहा है, जिनके समर्थन के बिना सरकार नहीं चल सकती। वे इस चुनौती का सामना कैसे करेंगे, जिसका उन्हें कोई अनुभव नहीं है? राजनीति विवशताओं की कला है।
क्या मोदी दूसरे अटल बिहारी वाजपेयी बन सकते हैं, जो मिलनसार, समावेशी, हास-परिहास में सक्षम और प्रेरणास्पद थे, और जो सहयोगियों से कुछ लेने और बदले में उन्हें कुछ देने को तत्पर रहते थे? इसी तरह, क्या राहुल गांधी भी परिपक्व राजनेता की गंभीरता हासिल कर सकते हैं और विभाजित विपक्ष को एकजुट कर सकते हैं?
जो भी हो, लेकिन परिणामों के लिए भारत के मतदाताओं को सलाम किया जाना चाहिए। उन्होंने भाजपा के अहंकार को काबू में किया है और साथ ही केंद्र में स्थिरता की संभावना भी सुनिश्चित की है। नई सरकार कम विभाजनकारी और अधिक समावेशी होनी चाहिए, क्योंकि उसके सामने इस बार मजबूत विपक्ष होगा।
प्रधानमंत्री को उन गठबंधन सहयोगियों से सलाह-मशविरा करना पड़ रहा है, जिनके समर्थन के बिना सरकार नहीं चल सकती। वे इस चुनौती का सामना कैसे करेंगे, जिसका उन्हें कोई अनुभव नहीं है? क्या वे दूसरे अटलजी बन सकते हैं?
Date: 08-06-24
गठबंधन सरकार की चुनौतियां डा. जगदीप सिंह, ( लेखक राजनीतिक विश्लेषक हैं )
देश में केंद्रीय स्तर पर एक बार फिर गठबंधन सरकार की शुरुआत हो गई है। चुनाव में जब कोई भी पार्टी पूर्ण बहुमत प्राप्त नहीं कर पाती तो गठबंधन के माध्यम से सरकार बनाना एक मजबूरी बन जाती है। गुजरात और फिर में केंद्र में लगभग ढाई दशक तक बहुमत वाली सरकारों की अगुवाई करने के बाद नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री के रूप में अपने तीसरे कार्यकाल में पहली बार एक गठबंधन सरकार का नेतृत्व करने जा रहे हैं।
नई सरकार में टीडीपी के मुखिया चंद्रबाबू नायडू और जदयू प्रमुख तथा बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की महत्वपूर्ण भूमिका होगी। मोदी को इस दौरान लोकसभा में प्रतिनिधित्व करने वाले अपने अन्य सहयोगी दलों के साथ समन्वय बनाए रखना होगा। ऐसे में देखना होगा कि उनके नेतृत्व में नई सरकार किस प्रकार के शासन माडल को अपनाती है। भाजपा की योजना प्रचंड बहुमत के साथ सरकार बनाकर पूरे देश में समान नागरिक संहिता लागू करने और सभी प्रकार के चुनाव एक साथ कराने की थी। गठबंधन सरकार होने के नाते यह देखना रोचक होगा कि भाजपा इन महत्वपूर्ण एजेंडों पर कैसे आगे बढ़ती है?
वैसे तो देश में 1967 से गठबंधन की राजनीति शुरू हुई थी। तब से क्षेत्रवाद के उदय के साथ भारत में गठबंधन आधारित राजनीति में काफी परिवर्तन आया है। गठबंधन सरकार का देश की व्यवस्था पर सकारात्मक और नकारात्मक, दोनों प्रकार के प्रभाव पड़ सकता है। इसके सकारात्मक पहलू को देखें तो गठबंधन सरकार में एक दल की मंत्रिपरिषद के बजाय कई दलों को मिलाकर मंत्रिपरिषद का गठन होता है। जब कई दलों के सदस्यों को मंत्रिपरिषद में शामिल किया जाता है तो इससे अधिक योग्य लोगों की टीम बनती है। इससे सभी दलों के वरिष्ठ और योग्य सदस्यों की योग्यता का लाभ देश को मिलता है।
गठबंधन में शामिल दलों की संख्या जितनी अधिक होती है, सरकार को उतना ही अधिक जन समर्थन प्राप्त होता है। इससे सरकार की स्वीकार्यता भी बढ़ती है। गठबंधन की राजनीति से अतिवादी दृष्टिकोण से भी बचा जा सकता है। एक दल की सरकार जनता पर अपने दृष्टिकोण को थोपने का प्रयास कर सकती है, जबकि गठबंधन में कोई भी दल अकेले अपनी नीतियां और सिद्धांत थोप नहीं सकता, क्योंकि अन्य दल विरोध कर सकते हैं। गठबंधन राजनीति का एक लाभ यह भी है कि एक राजनीतिक दल अकेले सत्तारूढ़ दल का उतना प्रभावशाली प्रतिरोध नहीं कर सकता, जितना कई दलों का गठबंधन कर सकता है। जैसे जब संप्रग की सरकार थी, तब राजग गठबंधन ने प्रभावशाली ढंग से उसका प्रतिरोध किया।
वर्तमान में राजग की सरकार बनने जा रही है। संप्रग गठबंधन उसकी मनमानी को प्रभावी ढंग से रोक सकता है। गठबंधन सरकार के मंत्रिपरिषद को प्रायः एक न्यूनतम साझा कार्यक्रम के अनुसार काम करना होता है। वह मनमाने तरीके से कार्य नहीं कर सकती। प्रधानमंत्री को भी कोई फैसला लेते समय गठबंधन के सभी दलों की नीतियों और सिद्धांतों का ध्यान रखना पड़ता है।
यह ठीक है कि गठबंधन सरकार में विभिन्न पार्टियां मिलकर सरकार चलाती हैं और हर फैसले से पहले सबकी राय ली जाती है, ताकि किसी एक पार्टी का वर्चस्व न हो, लेकिन अक्सर में ऐसा होता नहीं है। गठबंधन सरकार में जब मंत्रालयों का बंटवारा होता है, तो अधिक सीटों वाली पार्टी महत्वपूर्ण मंत्रालयों की मांग करती है। सत्ता की मजबूरी में बड़ी पार्टी इसे स्वीकार भी लेती है।
अगले पांच साल तक समर्थन देने वाली पार्टी उस मंत्रालय में मनमानी करती है और बड़ी पार्टी विरोध नहीं कर पाती, क्योंकि ऐसा करने पर उसके समर्थन वापस लेने का डर रहता है। इस कारण कई बार सरकार कठिन और महत्वपूर्ण फैसले नहीं ले पाती। जब सरकार महत्वपूर्ण फैसले नहीं लेती और केवल सत्ता में बने रहने की कोशिश करती है, तो गठबंधन की राजनीति से उसकी स्थिति कमजोर पड़ जाती है। ऐसी सरकार चाहे विदेशी मामलों में हो या घरेलू नीतियों में, दृढ़ निर्णय लेने में असमर्थ रहती है।
गठबंधन में विभिन्न विचारधाराओं और सिद्धांतों वाले दल शामिल होते हैं, जो कई बार राष्ट्र के बजाय अपने हित साधने वाली नीतियां बनाने की मांग करते हैं। इससे सरकार स्पष्ट नीति निर्धारित नहीं कर पाती और इसका प्रभाव उसके कार्यों पर पड़ता है। गठबंधन सरकार में स्थिरता की भी कमी होती है। देखा जाता है कि छोटे दल गठबंधन सरकार पर अपने हितों की पूर्ति के लिए दबाव बनाते रहते हैं। क्षेत्रीय दल अक्सर राष्ट्रीय हितों के बजाय क्षेत्रीय हितों को प्राथमिकता देते हैं, जिससे देश के हितों को हानि पहुंचती है। प्रधानमंत्री को अक्सर सहयोगी दलों के दबाव में काम करना पड़ता है। कई बार तो उन्हें विदेशी समझौतों और संधियों में भी उनकी सलाह भी लेनी पड़ती है। इससे वैश्विक मामलों में देश की स्थिति कमजोर हो जाती है।
चूंकि गठबंधन सरकार के मंत्री अपने दल के नेतृत्व के निर्देशों का पालन करते हैं, इस कारण कई अवसरों पर प्रधानमंत्री अनिर्णय की स्थिति में रहते हैं। गठबंधन शासन में सरकार के विभिन्न मंत्रालयों और विभागों में समन्वय की भी कमी देखी जाती है। गठबंधन छोटे राजनीतिक दलों के उदय को भी प्रोत्साहित करता है, जो स्थायी सरकारों के गठन में एक बाधा है। कुल मिलाकर गठबंधन सरकार का संचालन नरेन्द्र मोदी के लिए एक चुनौती है। इसके साथ ही नायडू और नीतीश के साथ काम करना भी एक बड़ी चुनौती है। ये दोनों नेता अनुभवी हैं और अपनी बातें मनवाने में सक्षम हैं, जिससे मोदी को दबाव की राजनीति का सामना करना पड़ सकता है। नरेन्द्र मोदी और अमित शाह की राजनीतिक प्रगति इसी पर निर्भर करेगी कि वे इस दबाव के बीच कैसे आगे बढ़ते हैं। उनके तीसरे कार्यकाल की सफलता इसी पर निर्भर करेगी।
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विश्व बैंक ने अपनी एक नवीन रिपोर्ट में कहा है कि यदि धनी राष्ट्र मांस एवं डेयरी उद्योग को प्रोत्साहन देने की बजाय उन पर अंकुश लगायें, तो जलवायु संकट से उबरने में सहायता मिल सकती है। विकसित राष्ट्रों को चाहिए कि वे पशुधन फार्मिंग को दी जाने वाली आर्थिक मदद में कटौती करें।
एग्रीफूड उद्योग विश्व के एक-तिहाई ग्रीन हाउस गैस का उत्सर्जन करते हैं।
विश्व के लगभग तीन अरब से भी अधिक जुगाली करने वाले पशु भारी मात्रा में मीथेन का उत्पादन करते हैं।
संयुक्त राष्ट्र के खाद्य एवं कृषि संगठन के अनुसार सन् 1960 के दशक की तुलना में वर्तमान में मांस की खपत दुगुनी हुई है। यह धनी देशों में बहुत अधिक है।
इसलिए विश्व बैंक का कहना है कि खाद्य व्यवस्था को सही करना आवश्यक है। यह जलवायु संकट का एक बड़ा कारण है।
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08 June 2024
प्रश्न – 465 – चाबहार केवल एक बंदरगाह नही है। यह एक ऐसे भविष्य का प्रवेश द्वार है, जो भारत की आर्थिक क्षमता में वृद्धि करने के साथ-साथ उसके वैश्विक प्रभाव को भी सुदृढ़ करेगा।
चाबहार बंदरगाह पर भारत एवं ईरान के मध्य हुए दस वर्षीय समझौते को केन्द्र में रखते हुए उक्त कथन को स्पष्ट करें। (250 शब्द)
Question – 465 – Chabahar is not just a port. It is the gateway to a future that will increase India’s economic potential as well as strengthen its global influence.
Explain the above statement keeping in mind the ten-year agreement between India and Iran on Chabahar port. (250 words)
नोट : इसका उत्तर आपको हमें नहीं भेजना है, यह आपके स्वयं के अभ्यास के लिए है।
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Date: 07-06-24
Green and Bear It For a Steely ResolveET Editorials
India is gearing up to fight at WTO over the EU’s Carbon Border Adjustment Mechanism (CBAM), which mandates non EU steel producers to report emissions. There are compelling reasons to address this issue at WTO. India is the only major steel producer experiencing robust growth, with an 8.5% increase in the first four months of 2024 compared to a year ago.
Indian steel has a large carbon footprint. The sector accounts for about 12% of India’s CO2 emissions, with an emission intensity of 2.55 t of CO2 per tonne of crude steel, compared to the global average emission intensity of 1.85 tCO2/tcs. Decarbonising is crucial to meet India’s climate targets and grow its export market. Earlier this year, the steel ministry began formulating a green steel policy. A task force has been set up to explore using biomass as an alternative in blast furnaces to reduce emissions. The ministry is also betting big on green hydrogen. But that’s for post-2030. Major steel producers have decarbonisation plans, but these rely on developing technologies such as carbon capture, utilisation and storage, and green hydrogen.
Meanwhile, new capacity, mostly carbon-intensive, is being added to achieve the 300 mn-t goal by 2030. These could become stranded assets. GoI must nudge the industry to go green. India has additional options, such as a green steel procurement policy and targets to encourage market creation and demand aggregation, supporting R&D to advance breakthrough tech and solutions, promoting alternative emissions mitigation actions, and framing mechanisms and frameworks for financing the transition, including mandatory compliance with carbon emissions trading. All these measures could ensure a fit-for-purpose steel sector.
Date: 07-06-24
नैसर्गिक राजनीतिक व्यवस्थासंपादकीय
भारतीय जनता पार्टी (BJP) लोक सभा चुनावों में बहुमत के आंकड़े से दूर रह गई है और इस बात ने अधिकांश राजनीतिक विश्लेषकों को आश्चर्यचकित किया है। खासतौर पर इसलिए कि किसी भी एक्जिट पोल या ओपिनियन पोल में ऐसी संभावना नहीं जताई गई थी। हालांकि राज्यों के राजनीतिक हालात के आधार पर चुनाव नतीजों का अलग-अलग पहलुओं से विश्लेषण किया जा रहा है लेकिन यह कहा जा सकता है कि केंद्र में गठबंधन की सरकार देश की नैसर्गिक राजनीतिक व्यवस्था का अंग है और बीते 10 वर्ष इस लिहाज से थोड़ा अलग थे। बीते 10 वर्षों को छोड़ दिया जाए तो सन 1989 से ही देश में गठबंधन की सरकारें रही हैं। उससे पहले 1984 में कांग्रेस को ऐतिहासिक बहुमत मिला था लेकिन 1989 में पार्टी हार गई थी। बीते दो आम चुनावों की प्रकृति कुछ अलग थी। भाजपा को 2014 में महत्त्वपूर्ण जीत मिली थी और उस चुनाव में जनता ने बदलाव के लिए मतदान किया था। 2019 में पुलवामा और बालाकोट के बाद पार्टी ने राष्ट्रवाद के मुद्दे पर और मजबूत जीत हासिल की। इस बार अपेक्षाकृत सामान्य चुनाव में पार्टी सामान्य बहुमत से पीछे रह गई। इस चुनाव में शासन और स्थानीय मुद्दे प्रमुख थे। बहरहाल, भाजपानीत राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) आराम से सरकार बनाने की स्थिति में है।
देश के राजनीतिक मानचित्र पर एक नजर डालें तो पता चलता है कि हालात केंद्र में गठबंधन सरकार के अनुकूल रहे हैं। देश में 11 ऐसे राज्य हैं जहां क्षेत्रीय दलों की महत्त्वपूर्ण उपस्थिति है-उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, झारखंड, पंजाब, जम्मू-कश्मीर तथा केरल (यदि वाम को क्षेत्रीय ताकत माना जाए)। इन राज्यों में 347 लोक सभा सीट हैं। अन्य 10 राज्य ऐसे हैं जहां राज्यस्तरीय दलों का पराभव हुआ है या उनका कोई अस्तित्व ही नहीं था। ये राज्य हैं- कर्नाटक, तेलंगाना, असम, हरियाणा, गुजरात, राजस्थान, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड। इन राज्यों में 169 लोक सभा सीटें हैं। कुल मिलाकर इन सभी राज्यों में 500 से अधिक सीटें हैं। ताजा परिणाम दिखाते हैं कि कांग्रेस ने दूसरी श्रेणी के कुछ राज्यों में भाजपा को चुनौती देने का तरीका तलाश लिया है। कांग्रेस का पराभव भी भाजपा के बहुमत तक पहुंचने की एक वजह थी। समाजवादी पार्टी ने भी उत्तर प्रदेश में जबरदस्त प्रदर्शन किया है और लोक सभा में भाजपा को बहुमत नहीं मिलने देने में उसकी भी अहम भूमिका रही है। ऐसे में देश के राजनीतिक हालात को देखते हुए भाजपा को अब अपने हिंदुत्ववादी बयानों को नियंत्रित करना होगा ताकि क्षेत्रीय दल उसके साथ बने रहें। अगर नीतीश कुमार के नेतृत्व वाला जनता दल यूनाइटेड समय पर साथ नहीं आया होता तो भाजपा के लिए हालात बहुत मुश्किल हो जाते। कांग्रेस की क्षेत्रीय दलों में स्वीकार्यता बढ़ी है तथा वह उनके लिए जगह खाली करने की इच्छुक है। यह बात भी बताती है कि गठबंधन देश में प्राकृतिक हैं।
वित्तीय बाजारों में तथा अन्य स्थानों पर यह चिंता है कि केंद्र में गठबंधन की सरकार होने से सुधार प्रभावित होंगे, लेकिन इस बात के पर्याप्त प्रमाण हैं कि गठबंधन सरकारें सुधारों के क्रियान्वयन के मामले में बेहतर साबित हुई हैं।
वास्तव में राजग सरकार में जनता दल यूनाइटेड और तेलुगू देशम पार्टी के रूप में दो क्षेत्रीय दलों की मौजूदगी के कारण केंद्र और राज्यों के बीच रिश्ते और सहज होने चाहिए। सरकार में क्षेत्रीय दलों की इस प्रकार मौजूदगी से जरूरी सुधारों को लेकर सहमति बनाने में मदद मिलेगी। काफी कुछ इस बात पर निर्भर करेगा कि नई राजग सरकार इसे लेकर किस प्रकार आगे बढ़ती है।
Date: 07-06-24
गठबंधन धर्मसंपादकीय
गठबंधन सरकारों में सहयोगी दलों की मंत्री पद और विभागों की मांग को लेकर खींचतान नई बात नहीं है। हर दल का मुखिया अपने नेताओं की सामूहिक आकांक्षाओं को साथ लेकर चलता है। गठबंधन का पहला धर्म होता है, नीतियों और योजनाओं पर फैसले के समय निजी या दलगत स्वार्थों से ऊपर उठ कर सहमति बनाने का। गठबंधन का एक भी दल इस धर्म का निर्वाह नहीं कर पाता, तो वह सरकार चल नहीं पाती। देश में गठबंधन सरकारें बनी और चली हैं, पर वे तब-तब गिर गई हैं, जब गठबंधन धर्म के निर्वाह में दलगत स्वार्थ या वैचारिक मतभेद आड़े आए हैं। इस बार फिर गठबंधन सरकार बनने जा रही है। राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन ने नरेंद्र मोदी की अगुआई में सरकार बनाने पर सहमति जता दी है। मंत्रालयों के बंटवारे आदि को लेकर मंथन चल रहा है। हर बड़े दल से बड़प्पन की अपेक्षा रहती है और वह थोड़ा झुक कर अपने सहयोगियों का मान ऊपर रख भी लेता है। मगर सरकार गठन से पहले ही जिस तरह जद (यू) और तेलगु देशम की तरफ से नीतियों को लेकर शर्तें रखी जाने लगी हैं, उससे गठबंधन के भविष्य पर आशंका गहराने लगी है।
जद (यू) ने कहा है कि अग्निवीर योजना पर सरकार को पुनर्विचार करना चाहिए। यही मांग विपक्षी दल शुरू से उठाते आ रहे हैं। चुनाव प्रचार के दौरान इंडिया गठबंधन ने तो सार्वजनिक रूप से एलान किया था कि अगर उसकी सरकार बनी तो अग्निवीर योजना को खत्म कर देंगे। वही बात अगर सहयोगी करने लगेंगे, तो सरकार के लिए मुश्किल होगी। भाजपा समान नागरिक संहिता लागू करना चाहती है। इस दिशा में वह आगे भी बढ़ चुकी है। मगर उसके दोनों प्रमुख सहयोगी दलों ने इस पर भी पुनर्विचार की बात कही है। सभी राज्य सरकारों से सहमति की मांग कर रहे हैं। हालांकि ये कुछ ऐसे मुद्दे हैं, जिन पर सरकार अगर लचीला रुख अपनाए, तो सहमति बन सकती है। राजनीति में हर कदम के दूरगामी परिणाम होते हैं। कौन-सा दल किस मुद्दे पर अपनी बात मनवा लेता है, उससे उसके राजनीतिक भविष्य पर असर पड़ता है। भाजपा को इस वक्त सहयोगी दलों के साथ मिल कर सरकार चलाने की मजबूरी है, पर वह अपने सिद्धांतों और नीतियों से डिगेगी, तो नुकसान का खतरा बना रहेगा।
ऐसी स्थितियों में सरकार की अगुआई कर रहे दल के सामने चुनौती होती है कि वह कैसे अपने सहयोगियों को नीतियों पर एकमत करे और किस हद तक उनकी शर्तों को माने। नीतीश कुमार और चंद्रबाबू नायडू की राजनीतिक छवि टिकाऊ और भरोसेमंद सहयोगी की नहीं रही है। इससे पहले भी वे कई बार राजग के साथ रहे, बीच में छोड़ कर चले गए, फिर आ गए हैं। बिहार और आंध्र प्रदेश को विशेष राज्य का दर्जा देने जैसी उनकी कुछ पुरानी मांगें हैं। इसके अलावा अल्पसंख्यकों के आरक्षण के मुद्दे पर भी उनके विचार अलग हैं। अब जब वे मोलभाव करने की स्थिति में हैं, ये मुद्दे उठा सकते हैं। मगर इससे सरकार की मुश्किलें बढ़ेंगी ही। गठबंधन की सरकारें शर्तों की रस्साकशी से नहीं, सहयोग और सहमति के संकल्प से चलती हैं। अगर इसकी कमी इस गठबंधन में रहेगी, तो अनिश्चितताओं के बादल शायद ही कभी छंटेंगे।
Date: 07-06-24
जलवायु अनुरूप नगरों की जरूरतप्रमोद भार्गव
सूर्य अपनी प्रचंड किरणों से पृथ्वी, प्राणी के शरीर, समुद्र और जल के अन्य स्रोतों से नमी सोख लेता है। नतीजतन उम्मीद से ज्यादा तापमान बढ़ता है, जो गर्म हवाएं चलने का कारण बनता है। यही हवाएं लू कहलाती हैं। अब यही हवाएं देश के पचास से ज्यादा शहरों को ‘उष्मा-द्वीप’ (हीट आइलैंड) में बदल रही हैं। राजस्थान, गुजरात, पंजाब, हरियाणा, उत्तरप्रदेश, हिमाचल प्रदेश और मध्यप्रदेश में पारा 43 से 47 डिग्री के बीच बना हुआ है। राजस्थान के बाड़मेर में दिन का तापमान 48 डिग्री और कश्मीर में गरम हवाओं के चलते तापमान 34 डिग्री तक पहुंच गया है। आमतौर से गरम हवाएं तीन से आठ दिन चलती हैं और एक-दो दिन में बारिश हो जाने से तीन-चार दिन राहत रहती थी, लेकिन इस बार गरम हवाएं चलने की निरंतरता बनी हुई है। इस कारण कई शहर ऊष्मा-द्वीप में बदल गए हैं और रहने लायक नहीं बचे हैं। इसके प्रमुख कारणों में शहरीकरण का बढ़ना और हरियाली का क्षेत्र घटना माना जा रहा है।
सामान्य स्थिति में द्वीप का अर्थ समुद्री या नदी-घाटियों में पानी से घिरे उस ऊंचे स्थल से लिया जाता है, जिसके चारों ओर जल भरा होता है। लेकिन अब उष्मा-द्वीप उन शहरी इलाकों को कहा जाने लगा है, जो ज्यादा तापमान से झुलस रहे हैं। ज्यादातर उष्मा-द्वीप घनी आबादी वाले शहरी क्षेत्रों में आमद दर्ज करा रहे हैं। ऐसे इलाकों में बाहरी क्षेत्रों की तुलना में अधिक तापमान का सामना करना पड़ता है। ऊंची इमारतें, सीसी की सड़कें, पैदलपथ और अन्य बुनियादी ढांचागत विकास इसके लिए दोषी हैं। हरियाली कम होने के कारण उच्च ताप वाले क्षेत्र उष्मा-द्वीप में परिवर्तित हो जाते हैं। इन क्षेत्रों में दिन का तापमान लगभग 1-7 डिग्री और रात का तापमान लगभग 2-5 डिग्री तक बढ़ जाता है।
सीएसई ने देश में अलग-अलग जलवायु वाले नौ शहरों के अध्ययन में पाया कि जयपुर जैसे शहरों में ज्यादा तापमान वाले दिनों में शहर का 99.52 फीसद हिस्सा गर्म हवाओं के केंद्र में आकर ऊष्मा-द्वीप बन जाता है। सतत आवास कार्यक्रम (सस्टेनेबल हैबिटैट प्रोग्राम) के निदेशक रजनीश सरीन का कहना है कि हीट सेंटर उस क्षेत्र को कहते हैं, जहां जमीनी सतह का तापमान (एलएसटी) छह साल या उससे अधिक समय में बार-बार मैदानी इलाकों में 45 डिग्री से ऊपर दर्ज किया जा रहा है। महानगरों में हरियाली और जल-संरचनाओं का क्षेत्र कम होने से हीट सेंटर का विस्तार हो रहा है। शहरों में हरियाली और नमी बनाए रखने वाले तालाब, नदी-झीलों का अस्तित्व सिमटता जा रहा है। यह जलभराव गर्मी से बचाव करता था। इनके सिमटने से शहरों में और शहरों के आस-पास बंजर भूमि और ईट, सीमेंट, कंक्रीट के जंगल बढ़ते जा रहे हैं, जो गर्मी बढ़ाने का काम कर रहे हैं। सीएसई ने नागपुर, अहमदाबाद, चेन्नई, पुणे, जयपुर, दिल्ली, हैदराबाद, कोलकाता और भुवनेश्वर में यह सर्वेक्षण किया है। लेकिन जिन शहरों में इस नजरिए से सर्वे नहीं हो पाया है, वे भी ऐसे ही हालातों के शिकार हो सकते है।
मानव निर्मित प्रदूषण से जुड़ी इस आपदा के कारणों में आधुनिक विकास और बढ़ता शहरीकरण है। इन्हीं कारणों से हवाएं आवारा होकर लू का रूप लेने लगी हैं। सुनामी जैसे तूफान इन्हीं आवारा हवाओं के दुष्परिणाम हैं। अमेरिका के नेशनल ओसियानिक एंड एटमासफेरिक एडमिनिस्ट्रेशन की रपट के अनुसार भारत ही नहीं, दक्षिण एशिया के कई देश गरम हवाओं से जूझ रहे हैं। इन देशों में गरम हवाएं चलने की आशंका 45 गुना बढ़ गई है। इन देशों में भारत, पाकिस्तान, बांग्लादेश और म्यांमा शामिल हैं। वियतनाम में तो हालात इतने बदतर हो गए हैं कि गर्मी की वजह से कई तालाब पूरी तरह सूख गए हैं और लाखों टन मछलियां मर गई हैं। पश्चिम एशिया के देश सीरिया, इजराइल, फिलिस्तीन, जार्डन और लेबनान में गरम हवाएं पांच गुना बढ़ सकती हैं। एशिया में घातक गरम हवाएं लगातार चलने का यह तीसरा वर्ष है। इसकी एक वजह अलनीनो भी मानी जा रही है। प्रशांत महासागर से आने वाली गरम हवाओं की वजह से दुनिया में गरम हवाएं चल रही हैं।
हरेक जुबान पर प्रचंड धूप और गर्मी जैसे बोल आमफहम हो गए हैं। हालांकि लू और प्रचंड गर्मी के बीच भी एक अंतर होता है। गर्मी के मौसम में ऐसे क्षेत्र जहां तापमान, औसत तापमान से कहीं ज्यादा हो और पांच दिन तक यही स्थिति यथावत बनी रहे तो इसे ‘लू’ कहने लगते हैं। मौसम की इस असहनीय विलक्षण दशा में नमी भी समाहित हो जाती है। यही सर्द-गर्म थपेड़े लू की पीड़ा और रोग का कारण बन जाते हैं। किसी भी क्षेत्र का औसत तापमान, किस मौसम में कितना होगा, इसकी गणना एवं मूल्यांकन पिछले 30 साल के आंकड़ों के आधार पर की जाती है। वायुमंडल में गर्म हवाएं आमतौर से क्षेत्र विशेष में अधिक दबाव की वजह से उत्पन्न होती हैं। वैसे तेज गर्मी और लू पर्यावरण और बारिश के लिए अच्छी होती हैं। अच्छा मानसून इन्हीं आवारा हवाओं का पर्याय माना जाता है, क्योंकि तपिश और बारिश में गहरा अंतर्सबंध है। जिस तरह से बेमौसम बरसात ने दुबई शहर को बाढ़ में बदल दिया, उसने आधुनिकतम शहरी विकास के माडल को नकार दिया है। यही हालात मुंबई, चेन्नई और बंगलुरु में देखने में आ रहे हैं। अतएव हमें जलवायु परिवर्तन के अनुकूल शहरों का निर्माण करना होगा।
हवाओं के गर्म या आवारा हो जाने का प्रमुख कारण ऋतुचक्र का उलटफेर और भूतापीकरण (ग्लोबल वार्मिंग) का औसत से ज्यादा बढ़ना है। इसीलिए वैज्ञानिक दावा कर रहे हैं कि इस बार प्रलय धरती से नहीं आकाशीय गर्मी से आएगी। आकाश को हम निरीह और खोखला मानते हैं, किंतु वास्तव में यह खोखला है नहीं। भारतीय दर्शन में इसे पांचवां तत्त्व यूं ही नहीं माना गया है। सच्चाई है कि यदि परमात्मा ने आकाश तत्त्व की उत्पत्ति नहीं की होती, तो संभवत: आज हमारा अस्तित्व ही नहीं होता। हम श्वास भी नहीं ले पाते। पृथ्वी, जल, अग्नि और वायु ये चारों तत्त्व आकाश से ऊर्जा लेकर ही क्रियाशील रहते हैं। ये सभी तत्त्व परस्पर परावलंबी हैं। यानी किसी एक तत्त्व का वजूद क्षीण होगा तो अन्य को भी छीजने की इसी अवस्था से गुजरना होगा। प्रत्येक प्राणी के शरीर में आंतरिक स्फूर्ति एवं प्रसन्नता की अनुभूति आकाश तत्त्व से ही संभव होती है, इसलिए इसे ब्रह्मतत्त्व भी कहा गया है। अतएव प्रकृति के संरक्षण के लिए सुख के भौतिकवादी उपकरणों से मुक्ति की जरूरत है। जलवायु परिवर्तन के कारण प्राकृतिक आपदाओं की आवृत्ति भी बढ़ रही है और जलीय स्रोतों पर दोहन का दबाव बढ़ता जा रहा है। ऐसी विपरीत परिस्थितियों में प्रकृति से उत्पन्न कठिन हालातों के साथ जीवन यापन की आदत डालनी होगी तथा पर्यावरण संरक्षण पर गंभीरता से ध्यान देना होगा।
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हाल ही में भारत ने 10 वर्ष की अवधि के लिए ईरान के चाबहार बंदरगाह का प्रबंधन अपने हाथ में ले लिया है।
इससे जुड़े मुख्य बिंदु –
– चाबहार, ईरान का एकमात्र गहरा बंदरगाह है, जिसकी समुद्र तक सीधी पहुँच है। यह होर्मुज जलडमरूमध्य से परे स्थित है।
– अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा परियोजना के साथ इसके एकीकरण को देखते हुए, यह व्यापार व्यवधानों को कम करने के लिए महत्वपूर्ण है। इससे पारगमन समय कम होगा, और माल ढुलाई लागत में लगभग 30% की कटौती होगी।
– वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में यह भारत की भूमिका को बढ़ाएगा।
– मानवीय सहायता शिपमेंट के लिए यह एक प्रवेश द्वार प्रदान करेगा।
– यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा को बढ़ाएगा। तेल और गैस के आयात मार्गों के विकल्प प्रदान करके यह प्राकृतिक संसाधनों तक पहुंच को बढाएगा।
– यह पारंपरिक आयात मार्गों में आ रहे खतरों से अलग, एक सुरक्षित आयात मार्ग उपलब्ध कराता है।
– इससे भारत के क्षेत्रीय संपर्क, मध्य एशिया के देशों और अफगानिस्तान के साथ व्यापार का हिसाब-किताब बदल सकता है।
– यह एक ऐसा विकल्प है, जो चीन ओर पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह को बायपास कर सकता है।
– यह भारत को पश्चिम एशिया, हिंद महासागर और अफ्रीका जैसे क्षेत्रों में सुविधाजनक स्थान देता है।
– रणनीतिक दृष्टि से देखें, तो भारत की उपस्थिति ईरान एवं पश्चिम एशियाई क्षेत्र में शांति और स्थिरता सुनिश्चित करने के लिए प्रोत्साहन दे सकती है।
– इससे भारत को इस क्षेत्र में चीन की महत्वाकांक्षी दृष्टि का मुकाबला करने के लिए मजबूत आधार मिल सकता है।
यह उन सभी देशों के लिए लाभकारी है, जो एक स्वतंत्र और खुले नियमों पर आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था चाहते हैं।
‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 15 मई, 2024
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Date: 06-06-24
Gone Babu GonePatnaik’s exit shows being larger-than-life isn’t a guarantee against voter fatigueTOI Editorials
That Odisha would provide BJP with its best performance in these elections wasn’t a widely shared prediction. BJD was saffron-washed in LS, and BJP will form a govt in the state. Naveen Patnaik’s 24-year-long stint as CM ends in a way he and many others would have thought inconceivable just a few weeks back. So, how did BJP storm Fortress Naveen?
Political sell-by date | Patnaik is 77. Odias aged 40 and below haven’t seen another CM. Indian politics has had long-serving CMs.
Sikkim’s Pawan Chamling, Bengal’s Jyoti Basu and Tripura’s Manik Sarkar. But they all had a sell-by date. With Naveen’s age becoming a matter of discussion during these polls, the sun was already setting on his political career. But that probably wasn’t what swung it against him.
Anti-incumbency tremors | Naveen’s govt was also facing considerable anti-incumbency. True, under his administration Odisha has witnessed substantial growth and the establishment of a credible welfare system. These saw poverty in the state fall from 57.6% in 2004-05 to 32.9% in 2011-12. Real per capita Net State Domestic Product rose from ₹54,210 in 2014-15 to ₹78,119 in 2019-20. But after 24 years, voters wanted more – especially jobs. This was exemplified by BJP making migration of Odias to other states a poll issue.
Local connect | Plus, BJP successfully tapped local issues under the ‘Odia asmita’ narrative. While training its guns on Naveen’s perceived successor, Tamil Nadu-born VK Pandian, BJP projected itself as the protector of Odia culture and language. The missing keys of Jagannath Temple’s Ratna Bhandar was another emotive issue that hurt BJD. Add to this BJP’s solid ground-level machinery built up over the years.
BJD’s fall in Odisha again shows that no party, no matter how long its tenure or how larger-than-life its leader, can assume continuous voter approbation. BJP won because BJD failed to reinvent itself.
Date: 06-06-24
A return to an era of genuine coalitionsThe 2024 Lok Sabha elections reflected a nuanced political landscape with the ruling party facing setbacks in key States; despite retaining strong support among certain demographics, the BJP’s inability to secure a majority underscores a return to genuine coalition politics, reshaping power dynamics and future governance strategies in IndiaSANDEEP SHASTRI, SUHAS PALSHIKAR, SANJAY KUMAR, [ Sandeep Shastri is the National Coordinator of the Lokniti Network.Suhas Palshikar is chief editor of Studies in Indian Politics, Sanjay Kumar is Co-director Lokniti-CSDS ]
As the results of the 2024 elections came trickling in, it was clear that the ‘silent’ voter had spoken quite strongly. The march of the ruling party, that was confident of a third term in office was halted in its tracks and had to claim a mandate under the wider cloak of the alliance it was leading. As the results settled, the ruling party was downplaying its own (under) performance and highlighting the majority secured by the coalition. The Opposition alliance led by the Congress is just 60 seats behind the ruling coalition in the new Lok Sabha.
Two important distinctions were visible in the National Democratic Alliance (NDA) and the Indian National Developmental, Inclusive Alliance (INDIA) coalition. Firstly, the composition of the two alliances: the BJP accounted for 80% of the NDA coalition while the Congress was a little over 40% of the INDIA coalition. The number of those not part of either coalition had shrunk to 18.
Secondly, the number of the non-BJP NDA had risen to 53 (compared to 50 in 2019) and the BJP had fallen by over 63 seats. In other words, the NDA shrank because its main anchor has failed to perform adequately. In the case of INDIA, it was a newly founded alliance — though somewhat of a revised United Progressive Alliance (UPA). The Congress saw an 80% rise in seats from 52 to 99. The other parties in the INDIA alliance also saw a rise in their share of seats. Principal among them were the Samajwadi Party and the Trinamool Congress. Thus, for INDIA, almost every member benefitted and contributed to its overall performance.
The decline in the seats of the BJP was largely on account of its performance in the Hindi heartland States of Uttar Pradesh, Rajasthan and Bihar and the reversals it faced in Maharashtra, Karnataka and West Bengal. It made up for some of these losses in Telangana and Odisha but the recoveries were far less than its deficits. The CSDS-Lokniti post-poll survey 2024, provides some insights into understanding the twists and turns that explain the electoral outcomes.
The support and opposition to a third term were clearly on party lines. Those who favoured re-electing the BJP justified the same based on the leadership of PM, the perceived good governance and the development of the country. Meanwhile, most of those who opposed a third term for the incumbent government mentioned unemployment and price rise as the key reasons. This polarisation is reflected in the results. More than three-fourths of those fully satisfied with the government voted for the BJP and its allies. Half of those somewhat satisfied with the incumbent government voted for the NDA. More than three-fourths of those fully dissatisfied with the performance of the BJP government voted for the Congress and its allies.
Close to half the respondents indicated that they voted for a party while a little over one-third focused on the candidate. Just one of every 10 kept the leadership factor in mind.
There is a clear five percentage point decline, in the preference for Mr. Modi as the Prime Minister if one were to compare the 2024 and 2019 figures. The gap between Mr. Modi and Rahul Gandhi as the preferred Prime Minister in 2024, has fallen by nine percentage points as compared to 2019. For those who voted for the BJP and its allies, the impact of Mr. Modi’s leadership continued to be high. One out of every four BJP voters said that they would have changed the way they voted if Mr. Modi were not the Prime Ministerial candidate of the BJP. These numbers have declined as compared to 2019. The main factor in the BJP campaign this time around had a much lesser impact as compared to the previous election.
One did notice a very heated election campaign with a lot of charges and counter charges being made. It is important to record that two-thirds of the respondents reported deciding on who to vote for only after the candidates were announced. Nearly one-fourth said that they took this call on the day of voting or a few days before voting. This does imply that the issues raised in the campaign, the assurances held out by parties and the attack on their rivals could well have impacted their final decision. It is important to note that economic issues were a focus of the campaign.
The post-poll survey also points out distinct demographic factors that impacted voting patterns. The BJP appeared to have a higher percentage of support among the younger voters while the vote for the Congress and its allies was spread across age groups. The BJP vote share rises among those with greater access to education while in the case of the Congress and its allies, the support is uniform across education levels. While the BJP continues to hold on to the votes of the rich, the middle class seems to be less intense in its support. When there is a somewhat ambiguous verdict, when voters are more evenly spread across parties and when any party fails to get a clear ‘mandate’, the support for parties across different social sections is also somewhat flatly distributed. This election outcome manifests this fact.
Electoral support
The BJP did well in the south and the east making it a more evenly spread party across the country.
But in the process, it also lost crucial support in the States of north India. Therefore, different social coalitions have propped up both the BJP and its opponents in different States. This means that the ongoing process of nationalisation of the social base of the BJP has slightly halted and altered. The BJP would now find itself in a situation where its voters are coming from disparate social groups in different States. However, there are two baseline features of its electoral support for the BJP. One is its continued limitation in reaching out to the minorities and the other is its extra-ordinarily strong base among the upper castes. This time too, as in 2019, more than half of the upper caste voters have reportedly voted the BJP.
The 2024 election indicates a return to the phase of genuine coalition politics. We did have a coalition government for the last decade. That was, however, a coalition with a dominant party with a majority of its own. The BJP then could give a notional representation to its allies in the Union Council of Ministers. This time around the allies of the BJP in the NDA would expect a fairer share of places in the Ministry as also the key portfolios.
We argue that BJP might not have lost greatly among many social sections. Yet, the losses at the State level among various social sections pushed the BJP below the majority mark and also denied any addition to its overall vote share. Secondly, the drop in BJP’s seat share has brought the era of coalitions back to the centre of power equations. These developments slow down the process of BJP becoming a dominant party that it had almost become during the last decade.
Date: 06-06-24
नतीजों ने बताया कि देश की राजनीति अब बदलेगीशेखर गुप्ता
सच कहूं तो चुनाव परिणामों की सबसे बड़ी हेडलाइन हमें तब मिली, जब 4 जून की दोपहर वोटों की गिनती से रुझान स्पष्ट हुए और खबर आई कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चंद्रबाबू नायडू से फोन पर बात की है। जाहिर है, हम इस बात को और आगे ले जा सकते हैं। लेकिन पहले इन नतीजों के तीन निष्कषों की बात करें।
पहला निष्कर्ष तो यह है कि भारतीय राजनीति 1989 के बाद के गठबंधन वाले दौर में फिर लौट आई है। दूसरा निष्कर्ष यह है कि भाजपा को शिकस्त दी जा सकती है और तीसरा यह कि करीब 100 सीटों के साथ कांग्रेस को पुनर्जीवन मिल गया है। जिन लोगों ने कहा था कि भारतीय लोकतंत्र मर चुका है, उनसे अनुरोध है कि जरा सुस्ता लीजिए | जिन लोगों ने कहा था कि भारत के मतदाताओं का ध्रुवीकरण हो गया है, वे कृपया उन 64 करोड़ से ज्यादा मतदाताओं से माफी मांगें, जो प्रचंड गर्मी में भी वोट डालने गए। इस बात पर भी गौर कीजिएकि अयोध्या (फैजाबाद) में भाजपा को हार का मुंह देखना पड़ा है।
एक और बात बहुत महत्वपूर्ण है। कसम खाइए कि भारतीय चुनाव व्यवस्था की साख पर आप कभी सवाल नहीं उठाएंगे चाहे यह ईवीएम हो या निर्वाचन आयोग हो या चुनाव आयुक्त हों, या इस विशाल प्रक्रिया को शांतिपूर्ण, हिंसा मुक्त और विश्वसनीय तरीके से संपन्न कराने में जुटे लाखों कर्मचारी हों। भारतीय चुनाव व्यवस्था एक ग्लोबल, सर्वजन हिताय वाली व्यवस्था है। इस पर कभी हमला मत कीजिए। यकीन न हो तो मैक्सिको में हुए चुनाव को देखिए, जो भारत में हुए चुनाव के साथ-साथ कराए गए और जिसमें 37 उम्मीदवारों की हत्या की गई। भारत में किसी को चोट तक नहीं आई। और मैक्सिको की प्रति व्यक्ति आय का आंकड़ा भारतीय आंकड़े से चार गुना ज्यादा बड़ा है।
साथ ही, बैंकरों, निवेशकों और फंड मैनेजरों से एक अनुरोध । शेयर बाजारों में होने वाली उथल-पुथल पर जरा नजर डालिए। आप सब महानुभाव उन लाखों लोगों से वादा कीजिए, जो अपनी गाढ़ी मेहनत की कमाई के साथ आप सब पर भरोसा करते हैं, कि आप अपना वोट जिस दृष्टि से देते हैं, उस दृष्टि से बाजार में अपनी पहल नहीं करेंगे। मैं मानता हूं कि राजनीतिक विश्लेषण का बड़ा आकर्षण होता है, लेकिन इसके साथ आपकी साख और आपके निवेशकों के पैसे जोखिम में रहते हैं। इसलिए इसे हम जैसों के लिए छोड़ दीजिए। हम आपकी तरह स्मार्ट नहीं हैं, लेकिन हममें वह खासियत है पर रखने वाले किसी मासूम और भावुक शख्स में नहीं होती है। वह है स्वस्थ राजनीतिक संशय वाली दृष्टि । इस चुनाव अभियान के दौरान मैंने फंड हाउसों और दलालों में सबसे भयानक और डरावनी बात देखी। उन्होंने ऐसी कई रिपोर्टें लिखीं, जिनमें भाजपा को 300 से ज्यादा सीटें मिलने के दावे किए गए। एक मतदाता के रूप में वह उनकी ख्वाहिश रही होगी। लेकिन उनकी बातों में आकर निवेश करने वाले अब इसकी कीमत चुका रहे हैं।
यह नतीजे सामान्य राजनीति में वापसी के संकेत दे रहे हैं। अगली लड़ाई के लिए मैदान तैयार है। महाराष्ट्र, हरियाणा और झारखंड के चुनाव होने वाले हैं। इनके ठीक बाद जम्मू-कश्मीर के चुनाव के लिए सांसें रोक कर तैयार रहिएगा, जहां की छह सीटों में से भाजपा केवल दो जीत पाई है। उपरोक्त हर चुनाव के लिए इस लोकसभा चुनाव के नतीजे भाजपा के लिए एक खतरनाक चेतावनी हैं। इसमें शक नहीं कि भाजपा के नेतृत्व वाले गठबंधन के नेता के रूप में नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बनेंगे, लेकिन यह भाजपा की नहीं बल्कि एनडीए की सरकार होगी। ऐसा एक दशक से नहीं हुआ था। वास्तव में, मोदी की दोनों सरकारों में ज्यादातर समय एनडीए का कैबिनेट में कोई मंत्री तक नहीं था, सिवाय रामविलास पासवान के। लेकिन अब जरूरत और वजूद की मांग का सिद्धांत भाजपा को सहयोगियों के लिए जगह छोड़ने पर मजबूर करेगा।
Date: 06-06-24
नोटा का विकल्पसंपादकीय
इस बार के चुनाव में पहली बार नोटा ने लोगों का ध्यान खींचा। उसकी प्रासंगिकता पर चर्चा शुरू हो गई। इंदौर की लोकसभा सीट पर दो लाख से अधिक लोगों ने नोटा का बटन दबाया। नोटा यानी ऊपर में से किसी को नहीं। यानी जो मतदाता किसी भी प्रत्याशी को पसंद नहीं करते, वे अपना मत नोटा के रूप में दर्ज कराते हैं। इस तरह मतदान मशीन में नोटा एक तरह से स्वतंत्र प्रत्याशी के रूप में उपस्थित होता है। पहले की अपेक्षा इस बार कई जगहों पर नोटा को बड़ी संख्या में मत प्राप्त हुए। इंदौर में इस बटन को कुछ अधिक लोगों ने इसलिए दबाया कि पर्चा वापसी के आखिरी दिन कांग्रेस के प्रत्याशी ने अपना पर्चा वापस ले लिया। इससे पहले सूरत में भी कांग्रेस के एक प्रत्याशी ने अपना पर्चा वापस ले लिया था। तब भाजपा प्रत्याशी को निर्विरोध चुन लिया गया था। उस वक्त कहा गया था कि इस तरह मतदाताओं को उनके मताधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता, नोटा भी एक प्रत्याशी होता है।
दरअसल, नोटा का विकल्प देने के पीछे एक लंबी लड़ाई चली थी। काफी समय से मांग उठ रही थी कि अगर किसी जनप्रतिनिधि से लोग खुश नहीं हैं, तो उन्हें उसे हटाने का अधिकार मिलना चाहिए। जिस तरह प्रतिनिधि चुनने का अधिकार है, उसी तरह मतदाता को उसे हटाने का भी अधिकार मिलना चाहिए। मगर उस पर कोई निर्णय नहीं लिया जा सका। फिर यह भी कहा गया कि बहुत सारे लोग किसी भी प्रत्याशी को पसंद नहीं करते, मगर मताधिकार का प्रयोग करते हुए किसी न किसी को मत देना ही पड़ता है। ऐसे में यह विकल्प भी होना चाहिए कि वे हर प्रत्याशी को नकारने का मत दे सकें। इसी मांग के तहत विकल्प के रूप में नोटा शुरू किया गया। मगर इस विकल्प का कोई निर्णायक महत्त्व नहीं है। अगर इसे लेकर कोई स्पष्ट नियम बन जाए कि कितने प्रतिशत लोगों के नोटा का विकल्प चुनने पर नए सिरे से चुनाव कराने होंगे, तब तो इसका महत्त्व होगा, नहीं तो यह महज दिखावे का एक बटन बना रहेगा। इसलिए अभी तक नोटा का कोई प्रभाव नजर नहीं आता।
Date: 06-06-24
जनादेश के पांच सियासी सबकराहुल वर्मा
मंगलवार को आए चुनाव नतीजे अप्रत्याशित रहे। दस साल बाद देश में फिर से गठबंधन पर निर्भर सरकार बनने जा रही है। इन नतीजों को इसलिए भी आश्चर्य की नजर से देखा जा रहा है, क्योंकि तमाम एग्जिट पोल कयास लगा रहे थे कि भारतीय जनता पार्टी भारी बहुमत के साथ सरकार में लौट रही है। मगर नतीजे इससे उलट आए, भले ही भाजपा सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरकर सामने आई हो और राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) को बहुमत के लिए जरूरी आंकडे़ भी मिल गए हों, लेकिन भाजपा अपने बूते बहुमत का जादुई आंकड़ा इस बार नहीं पा सकी।
इस जनादेश में सबके लिए कुछ न कुछ संदेश है। पहला संदेश तो भाजपा को मिला है कि कोई भी बहुमत स्थायी नहीं होता। लोकतंत्र में लगातार उथल-पुथल चलती रहती है। जिस पार्टी को आगे बढ़ने का मौका मिलता है, उसे नुकसान भी उठाना पड़ता है। यह सही है कि भारतीय जनता पार्टी को कुछ इलाकों में बड़ी सफलता मिली है, मसलन ओडिशा में या दक्षिण भारत के राज्यों में और उसने गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ जैसे मध्य भारत के सूबों में भी अपना दबदबा बनाए रखा है, मगर जिस उत्तर प्रदेश को उसका मजबूत दुर्ग कहा जाता है, वह इस बार दरक गया है। इसी तरह, हरियाणा और राजस्थान में भी उसे बड़े झटके लगे हैं। फिलहाल कहना मुश्किल है कि किन वजहों से पार्टी को हार का सामना करना पड़ा, लेकिन जैसा कि कुछ दिनों से लगातार कहा जा रहा था, देश के एक बड़े तबके में अपनी आर्थिक स्थिति को लेकर असंतोष बना हुआ है। भाजपा संभवत: इस नाराजगी को पूरी तरह से पढ़ नहीं पाई।
उसके लिए एक और सबक यह है कि सिर्फ नरेंद्र मोदी के चेहरे या गरीबों के लिए राशन योजना के नाम पर वह लगातार वोट नहीं जुटा सकती। फिर,पार का नारा भी अति-आत्मविश्वास का संकेत समझा गया। विपक्ष ने इस नारे का इस्तेमाल पिछड़ी जातियों, विशेषकर दलितों को यह समझाने में कर लिया कि संविधान बदलने की कवायद की जा रही है और उनका आरक्षण खत्म हो सकता है। भाजपा इस नैरेटिव की भी काट नहीं ढूंढ़ पाई।
दूसरा संदेश कांग्रेस और मुख्य रूप से इंडिया ब्लॉक के लिए है। निस्संदेह, विपक्षी दलों के इस गठबंधन ने अपेक्षा से बेहतर प्रदर्शन किया है। हालांकि, उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में वह एनडीए पर भारी साबित हुआ, पर दिल्ली जैसे सूबे में कुछ खास नहीं कर पाया है। कांग्रेस केरल और पंजाब का अपना गढ़ बचाने में सफल रही और हरियाणा, तेलंगाना व राजस्थान में भी उसने अच्छा प्रदर्शन किया है, लेकिन गुजरात, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में, जहां उसका सीधा मुकाबला भाजपा से था, वहां उसे कुछ खास सफलता नहीं मिल सकी। कर्नाटक में भी उसका प्रदर्शन अपेक्षा के अनुरूप नहीं रहा है।
इस बार कांग्रेस की सीट और उसके मत-प्रतिशत में उल्लेखनीय इजाफा हुआ है। लगता है कि उसके आर्थिक न्याय की संकल्पना और जातिगत सर्वेक्षण जैसे मुद्दे कुछ मतदाताओं को प्रभावित करने में सफल रहे हैं। इसमें राहुल गांधी की भूमिका काफी अहम मानी जाएगी। उनकी दो भारत जोड़ो यात्राओं का भी शायद असर रहा है। इस गठबंधन के लिए सबसे बड़ा संदेश यही है कि बेशक उसे अपनी सियासी जमीन जमाने के लिए एक सहारा मिल गया है, लेकिन उसकी आगे की राह काफी लंबी और जटिल है। इस गठबंधन की अहम पार्टियों जैसे उद्धव ठाकरे की शिवसेना या शरद पवार गुट की एनसीपी को सहानुभूति का लाभ मिला है और देखना होगा कि विधानसभा चुनावों तक यही परिस्थिति बनी रहती है अथवा नहीं?
तीसरा संदेश उन विपक्षी पार्टियों के लिए है, जो न तो एनडीए में थीं और न इंडिया में। जनादेश बताता है कि बिना खेमे वाले इन दलों को गहरी निराशा हाथ लगी है। बसपा जहां अपना खाता खोलने में भी विफल रही, वहीं बीजद को लोकसभा और विधानसभा, दोनों में करारी हार का सामना करना पड़ा है। दिल्ली में गठबंधन बनाकर लड़ने वाली आप को भी नुकसान उठाना पड़ा है। हां, पश्चिम बंगाल में अकेले चुनाव लड़ने वाली तृणमूल कांग्रेस ने अपना दमखम बचाए रखा है, लेकिन बाकी तमाम दलों को तेज झटका लगा है। इससे प्रतीत यही होता है कि भारतीय राजनीति अब दो ध्रुवों में बंट गई है और यदि कोई पार्टी इन गठबंधनों का हिस्सा नहीं है, तो उसे चुनावी संग्राम में खासी मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है।
चौथा संदेश चुनाव विश्लेषकों के लिए है। नतीजा बताता है कि एग्जिट पोल कई बार निष्प्रभावी भी हो सकते हैं। उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल और कुछ हद तक महाराष्ट्र में तो चुनावी नतीजा एग्जिट पोल के बिल्कुल उलट रहा। कुछ विश्लेषक जरूर भाजपा के नुकसान की बात कह रहे थे, लेकिन उनका अनुमान उतना नहीं था, जिस तरह के जनादेश आए हैं। मतदाताओं ने इन चुनावी पंडितों को संकेत दिया है कि एक ही चश्मे से पूरे देश को देखना गलत है। अलग-अलग हिस्सों में अलग-अलग समस्याए हैं और पार्टियों की ताकतें भी अलग-अलग होती हैं। जिन-जिन क्षेत्रों में चुनावी विश्लेषक इन समीकरणों को पढ़ने में सफल रहे, उनका नतीजा जनादेश से मेल खा गया, लेकिन जहां वे चूक गए, वहां मात खा गए।
पांचवां संदेश भारतीय लोकतंत्र के उन तमाम संस्थानों के लिए है, जिन पर लोकतंत्र को मजबूत रखने की अहम जिम्मेदारी है। फिर चाहे वे पारंपरिक व सोशल मीडिया हो या चुनाव आयोग जैसे संस्थान। जनता ने बताया है कि जनतंत्र जनता का, जनता द्वारा और जनता के लिए ही है। इसकी मजबूती के लिए लोकतंत्र के तमाम संस्थानों को आगे आना होगा। ये नतीजे इन संस्थानों के लिए सबक हैं कि वे अपना काम निष्पक्ष होकर करें, तभी जनता के हितों का पोषण हो सकेगा। वैसे, वोटरों ने राजनीतिक दलों को भी संदेश दिया है कि विनम्रता के साथ राजनीति करिए, क्योंकि लोकतंत्र में अहंकार की कोई जगह नहीं होती।
साफ है, यह जनादेश सभी को कुछ न कुछ संदेश दे रहा है। जरूरत है, तो सिर्फ इसे पढ़ने और समझने की। यदि इन सबक पर अमल करने का प्रयास किया गया, तो निस्संदेह भारतीय लोकतंत्र और ज्यादा समृद्ध व परिपक्व बनकर उभरेगा।
Date: 06-06-24
मजहब का अधिक इस्तेमाल करने वाले समाज को संदेशप्रशांत झा, ( एसोशीएट एडिटर )
अधिकतर हिंदू मतदाताओं ने धर्मनिरपेक्ष सामान्य ज्ञान को आज हिंदुत्व-युक्त सामान्य ज्ञान में बदल लिया है, मगर वे ऐसे सुसंगत, एकीकृत और समरूप हिंदू राजनीतिक पहचान बनाने के पक्ष में भी नहीं गए हैं, जो लगातार मुस्लिमों से मतभेद रखती है।
मुस्लिम मतदाता अपनी राजनीतिक आवाज और प्रतिनिधित्व चाहते हैं। अपनी पहचान के आधार पर वे किसी लोकतांत्रिक अधिकार से वंचित रहना नहीं चाहते, पर उनका भारत के संविधान में पूरा विश्वास है, वे हिंदू सामाजिक समूहों के साथ व्यापक चुनावी गठबंधन की जरूरत व अहमियत को पहचानते हैं। वे मुस्लिम पहचान-केंद्रित पार्टियों के बजाय मुख्यधारा के लोकतांत्रिक दलों के पीछे चलना चाहते हैं।
भारतीय मतदाता अपनी जातिगत पहचान से परे जाने के इच्छुक तो हैं, पर वे अभी भी अपनी जातिगत पहचान को अपने जीवन के अनुभव की रोशनी में देखते हैं। जाति की लामबंदी को वे एक वैध राजनीतिक साधन मानते हैं और वास्तविक या कथित जाति-आधारित अन्याय के एवज में लाभ चाहते हैं।
वास्तव में, यही वह त्रि-आयामी सामाजिक संदेश है, जो 2024 के जनादेश से उभर रहा है। यह निष्कर्ष चुनाव अभियान की व्यापक रूपरेखा, सार्वजनिक संदेश और पार्टियों के राजनीतिक कार्यों पर आधारित है। विपक्ष ने दावा किया कि भाजपा संविधान को बदलने और दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों के लिए तय आरक्षण हटाने पर तुली हुई है; हालांकि, भाजपा ने कहा कि उसकी ऐसी कोई योजना नहीं है। भाजपा की ओर से यह दावा किया गया कि विपक्ष पिछडे़ हिंदुओं के आरक्षण को हटाकर मुसलमानों को देना चाहता है; जबकि इंडिया ब्लॉक की पार्टियों ने कहा कि उनकी ऐसी कोई योजना नहीं है।
धर्म के सवाल पर भाजपा ने एक दशक तक मुस्लिम राजनीतिक प्रतिनिधित्व को अपने दायरे में नगण्य ही रखा और मुस्लिम सियासी पहचान के किसी भी दावे को सांप्रदायिक माना। कई ऐसी घटनाएं हुईं, जिनसे भाजपा के कथित मुस्लिम विरोधी रुख को ठोस बल मिला। यह विपक्षी दलों के लिए चुनाव अभियान का मुद्दा बन गया। विपक्ष ने मुस्लिम वोटों को एकजुट करके मुकाबला किया। इस पृष्ठभूमि में जनादेश क्या संकेत दे रहा है?
तथ्य यह है कि मतदाताओं ने भाजपा को सबसे बड़ी पार्टी का दरजा दिया है, इसका मतलब है कि दूसरे कार्यकाल में उसके कुछ कामों की लोकप्रियता की कुछ हद तक पुष्टि हुई है, चाहे वह सीएए का पारित होना हो या अनुच्छेद 370 को प्रभावी ढंग से निरस्त करने का निर्णय हो। यह ध्यान देने की बात है कि कश्मीर व राम मंदिर मामले में विपक्ष ने भाजपा को खुली चुनौती देने की हिम्मत नहीं की। यहां तक कि विपक्ष ने मुस्लिमों को आनुपातिक रूप से वाजिब संख्या में टिकट देने से भी परहेज किया। विपक्ष की रणनीति में भी हिंदुत्व से लैस सामान्य ज्ञान का उदय हो चुका है। विपक्ष ने वैचारिक लड़ाई को टाल दिया और इसलिए यह कहना गलती होगी कि यह जनादेश पुरानी शैली की धर्मनिरपेक्षता की जीत है। फैजाबाद में भाजपा की चुनावी हार स्थानीय कारकों के चलते हो सकती है, पर इसे चुनावी मकसद के लिए धर्म के लगातार उपयोग या दुरुपयोग के विरोध के रूप में भी देखा जा सकता है।
इस लोकसभा चुनाव में यह साफ हुआ कि आरक्षण की वर्तमान संरचना आगे भी केंद्रीय विषय बनी रहेगी। कोई भी पार्टी दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों के आरक्षण को हटाने की हिम्मत नहीं करेगी। एक तथ्य यह भी है कि कांग्रेस का वोट शेयर और सीट संख्या बढ़ी है, उसके मतदाताओं में युवा, पिछड़े और दलित मतदाता भी शामिल हैं, यह दर्शाता है कि इनकी मांगों में दम है।
तथ्य यह है कि भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनी हुई है – जातिगत जनगणना की मांग का समर्थन किए बिना और आनुपातिक प्रतिनिधित्व की मांग को स्पष्ट रूप से खारिज किए बिना। यह बताता है कि हिंदू समर्थक मतदाता बरकरार हैं और जातिगत पहचान-आधारित राजनीति भी जारी रहेगी। इसके मूल में पहचान-आधारित न्याय है, जिसने पहचान आधारित अंध-राष्ट्रवाद पर जीत हासिल की है। यह एक संदेश है कि पार्टियों को समाज में बंटवारे की खाई को गहरा करने के बजाय उसे पाटने पर ध्यान देना चाहिए।
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हाल ही में कांग्रेस के नेता सैम पित्रोदा ने कहा है कि ‘पूर्वी भारत के लोग चीनी और दक्षिण भारतीय अफ्रीकीयों की तरह लगते हैं’। उनकी यह बात कोई नई नही है। लेकिन भारत की विविधता के बारे में बात करने का उनका यह तरीका बेतुका है।
इंसान अपनी आनुवांशिक वंशावली को अफ्रीका से जोड़ते हैं। वंशावली एक होते हुए भी हम भिन्न-भिन्न दिखते हैं। दरअसल, हमारा देश कई जातीय समूहों, भाषाओं, धर्मों और संस्कृतियों का एक संघ है, जो बसावट और बातचीत के मेलजोल से पैदा हुआ है। इसलिए, विशेषताओं और त्वचा के रंग में क्षेत्रीय भिन्नताओं का होना स्वभाविक है।
यदि इससे जुड़ी समस्या की बात करें, तो यह विविधता से नहीं, बल्कि पदानुक्रम (हायरारकी) से आती है। भारत परतों में व्यवस्थित समाज है। काली त्वचा का गुणगान कविता, गीत और महाकाव्यों में भले ही किया जाता हो, लेकिन हममें से कई लोगों के लिए यह एक संवेदनशील मामला है। हमारी उपस्थिति को जाति और उपनिवेशवाद से रंगे हुए लेंस के माध्यम से आंका जाता है।
कई भारतीय अभी भी अपनी जड़ों से अलग सौंदर्य के मानदंड़ों को पूरा करने के लिए संघर्ष करते हैं। इसे देखते हुए भारतीयों की अफ्रीकी और चीनी की तरह दिखने वाली टिप्पणी आहत करने वाली हो सकती है। दरअसल, शब्द अपने आप में समस्या नहीं हैं, बल्कि उनका जुड़ाव जिस संदर्भ में हो रहा है, वह समस्या है। सैम पित्रोदा ने यही तुलना अगर पश्चिमी देशों के गोरे लोगों से की होती, तो यह उतनी बुरी नहीं लगती, क्योंकि वहाँ उनकी सामाजिक शक्ति सौंदर्य के मानक तय करती है।
अगर किसी को जातीय विविधता के बारे में बात करनी ही है, तो वह नागरिक सम्मान और समावेश के आधार पर बात करे। त्वचा के रंग, विशेषताओं, विकलांगता, जाति या क्षेत्र के आधार पर मानदंड बनाकर लोगों को नीचा न दिखाया जाए।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 10 मई, 2024
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Date: 05-06-24
मतदाताओं ने बता दिया कि उनके लिए मुद्दे मायने रखते हैंसंपादकीय
लोकसभा चुनाव के नतीजे सत्ता और विपक्ष दोनों के लिए बहुत कुछ कहते हैं। सत्ता के लिए जन स्वीकार्यता को तीसरी बार भुनाना तब और मुश्किल होता है जब जनता कुछ और चाहती है। आम चुनावों के परिणाम इस बात का संकेत हैं कि जनता के लिए उसकी जरूरत से जुड़े मुद्दे ज्यादा मायने रखते हैं क्या यह सच नहीं है कि नीचे के वर्ग, खासकर किसान, श्रमिक और दिहाड़ी मजदूर की आय हाल के वर्षों में लगातार घटी है और महंगाई इस वर्ग को बुरी तरह आहत कर रही है ? क्या सीएमआईई की विगत अप्रैल की रिपोर्ट चीख-चीख कर नहीं बता रही थी कि पिछले सात वर्षों में ओबीसी और अनुसूचित जाति वर्गों में बेरोजगारी सबसे ज्यादा बढ़ी है। दूसरा, धार्मिक वर्ग में बेरोजगारी सिखों और हिन्दुओं में अन्य सभी धर्मों से ज्यादा बढ़ी है। क्या इससे पैदा हुई नाराजगी को दस साल बाद भी मंगलसूत्र, मंदिर और मुसलमान के नाम पर कम किया जा सकता था? पाँच किलो अनाज एक गरीब के जीवन में बहुत कुछ होते हुए भी सब कुछ नहीं है। उसे बेटे के लिए नौकरी, नवजात के लिए दूध-पोषण, बूढ़े मां-बाप के इलाज के लिए आयुष्मान के नाम पर कागज का टुकड़ा नहीं, पहुंचने वाली दूरी पर असली चिकित्सा सेवा चाहिए। भोगा हुए कटु यथार्थ आम आदमी नजरअंदाज नहीं कर पाता। बेरोजगारी दर की तरह रोजगार दर के पैमाने पर भी सबसे ज्यादा गिरावट इन सात वर्षों में सभी वर्गों में हुई है। जाति वर्गीकरण में पाया गया कि बेरोजगारी सबसे ज्यादा उच्च जाति में थी लेकिन मध्य-जाति, जो आरक्षण की मांग कर रही है, उसकी बेरोजगारी दर में वृद्धि प्रतिशत पॉइंट में सबसे ज्यादा है। यह वह वर्ग है, जो खेती करता है और जिसके बच्चे असुविधा और अभाव के कारण समाज में ऊपर की सीढ़ियां चढ़ने में अक्षम हैं। भाव न बढ़ें, लिहाजा गेहूं, चावल, चीनी और प्याज का आयात रोकने की नीति ने इनकी गरीबी को और बढ़ाया। लोकसभा चुनाव परिणाम क्या इशारा करते हैं? आने वाले वक्त में राजनीति में मुद्दों की राजनीति को नकारा नहीं जा सकता।
Date: 05-06-24
गठबंधन युग की वापसीसंपादकीय
लोकसभा के चुनाव नतीजों ने एक्जिट पोल के निष्कर्षों के साथ अन्य अनेक अनुमानों को भी गलत साबित किया। परिणाम कई दृष्टि से अप्रत्याशित हैं, लेकिन लोकतंत्र की यही खूबसूरती है। जनता के मन में क्या है, इसकी थाह लेना कठिन होता है। नतीजों ने बताया कि जो भाजपा अपने सहयोगी दलों के साथ चार सौ पार का नारा लगा रही थी, उसके लिए तीन सौ पार जाना भी चुनौती बन गया। स्वयं भाजपा 272 के आंकड़े से पीछे रह गई। यह उसके लिए एक झटका है। उसे यह झटका लगा उसके अपने गढ़ उत्तर प्रदेश में भी। इसके साथ ही महाराष्ट्र, राजस्थान, हरियाणा और बंगाल में भी वह अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर सकी। उसके लिए यह तो अच्छा रहा कि ओडिशा, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश आदि में उसने उल्लेखनीय प्रदर्शन किया और गुजरात एवं मध्य प्रदेश में चमत्कार सा कर दिखाया, अन्यथा वह और भी पीछे रह जाती। चुनाव नतीजों से यह स्पष्ट है कि कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों ने आशा से कहीं अधिक बेहतर प्रदर्शन किया। जहां कांग्रेस ने अपनी सीटें अच्छी-खासी बढ़ा लीं, वहीं समाजवादी पार्टी, डीएमके, तृणमूल कांग्रेस ने भी अपेक्षा से बेहतर प्रदर्शन कर भाजपा को चौंकाया।
चुनाव नतीजों ने कांग्रेस और उसके साथ खड़े दलों को राजनीतिक बल देने के साथ उनके मनोबल को भी बढ़ाने का काम किया है। कांग्रेस वापसी की राह पर आती दिख रही है और इसका श्रेय जाता है उसकी ओर से बनाए गए नैरेटिव को। निःसंदेह भाजपा ने भी अपना नैरेटिव स्थापित करने की कोशिश की, लेकिन वह पूरे देश में उतना प्रभावी नहीं रहा। वह अपने पक्ष में वैसा कोई राष्ट्रीय विमर्श खड़ा नहीं कर सकी, जैसा पिछले आम चुनाव में बालाकोट हमले के कारण खड़ा करने में सफल रही थी। जहां भाजपा ने रेवड़ी संस्कृति से दूर रहना तय किया, वहीं विपक्ष ने इस संस्कृति को जोर-शोर से अपनाया और भुनाया भी। इसके अलावा कांग्रेस और सहयोगी दलों ने भाजपा की ओर से आरक्षण खत्म करने और संविधान बदलने की जो हवा बनाई, वह भी कुछ राज्यों और विशेष रूप से उत्तर प्रदेश में असर करती दिखी। भाजपा को सबसे बड़ा झटका उत्तर प्रदेश में ही लगा। इसका कारण कमजोर प्रत्याशी और नेताओं की आपसी खींचतान भी दिखती है और जाति-पंथ की राजनीति भी। केंद्रीय मुद्दे के अभाव में स्थानीय मुद्दे भी कहीं अधिक असरकारी हो गए और इसी कारण अलग-अलग राज्यों में हार-जीत के कारण भी भिन्न-भिन्न दिख रहे हैं। विपक्षी दल तो जनता को लोकलुभावन वादों से लुभाने में सफल रहे, लेकिन भाजपा विकसित भारत और देश को तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने जैसे वादों से जनता के एक वर्ग और विशेष रूप से निर्धन-वंचित तबके को उतना आकर्षित नहीं कर सकी। इस तबके को इन वादों में अपने लिए कुछ खास न दिखाई दिया हो तो हैरानी नहीं।
भाजपा के लिए यह संतोष की बात है कि ओडिशा की बागडोर उसके हाथ आ गई और आंध्र में उसके सहयोगी चंद्रबाबू नायडू सरकार बनाने जा रहे हैं, लेकिन इसके बावजूद वह लोकसभा में संख्याबल के लिहाज से कमजोर हुई है। अब केंद्रीय स्तर पर गठबंधन राजनीति और वह भी मजबूरियों वाली राजनीति फिर से एक आवश्यकता बन गई है। बहुमत के साथ सहयोगी दलों संग सरकार चलाना अलग बात है और उन पर निर्भर होकर शासन करना अलग बात। इस बार प्रधानमंत्री मोदी के सामने गठबंधन सरकार चलाने की मजबूरी होगी। इसके चलते निर्णायक प्रधानमंत्री की उनकी छवि पर असर पड़ सकता है और इसका प्रभाव शासन संचालन में दिख सकता है। अब भाजपा को अपनी प्राथमिकताओं से भी समझौता करना पड़ सकता है, क्योंकि उसे अपने एजेंडे को लागू करने के लिए सहयोगी दलों पर निर्भर रहना होगा। गठबंधन सरकार की कुछ मजबूरियां होती हैं। उनका लाभ सहयोगी दल ही नहीं, बल्कि विपक्षी दल भी उठाते हैं। विपक्ष की ताकत बढ़ जाने से से भावी सरकार को उसके साथ कहीं अधिक सहयोग और समन्वय का परिचय देना होगा। यह परिचय देने के लिए विपक्ष को भी तैयार रहना चाहिए।
Date: 05-06-24
गठबंधन का दौर वापससंपादकीय
लोकसभा चुनाव के नतीजों ने ज्यादातर एक्जिट पोल को गलत साबित किया और साफ तौर पर दिखा दिया कि भारत में चुनाव पहले की तरह कड़े मुकाबले वाले बने हुए हैं। भारतीय जनता पार्टी 240 सीट पर आगे है या जीत चुकी है। यानी वह अकेले दम पर बहुमत के आंकड़े से दूर है। हालांकि, उसके नेतृत्व वाला राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (राजग) आसानी से अगली सरकार बनाने का दावा पेश कर सकता है। ऐसे में करीब एक दशक बाद भारत में गठबंधन सरकार की वापसी हो रही है। लोक सभा के साथ ही जिन कुछ महत्त्वपूर्ण राज्यों में विधान सभा चुनाव हुए, मंगलवार को घोषित नतीजों के अनुसार उनमें राजग को अच्छा फायदा हुआ है और वह मौजूदा सरकारों को सत्ता से बाहर करने में कामयाब हुआ है। ओडिशा में करीब 23 साल से सत्ता में रहा बीजू जनता दल हार गया और राज्य की 147 सदस्यीय विधान सभा में भाजपा 80 सीट जीत रही है। इसके पड़ोसी राज्य आंध्र प्रदेश में एन चंद्रबाबू नायडू के नेतृत्व वाली तेलुगू देशम पार्टी भी जबरदस्त जीत हासिल करते हुए अगली सरकार बनाने जा रही है। राष्ट्रीय स्तर पर देखें तो भाजपा ने अपनी मत हिस्सेदारी में मामूली सुधार किया है, लेकिन उसे 2019 के बराबर भी सीट नहीं मिल पाईं। दूसरी तरफ, कांग्रेस भी अपनी मत हिस्सेदारी करीब 3 फीसदी बढ़ाने में सफल हुई लेकिन उसकी सीट संख्या करीब दोगुनी हो गई है। भाजपा ने उत्तर प्रदेश जैसे हिंदी पट्टी के अहम राज्य में अपनी जमीन गंवा दी है। हरियाणा और महाराष्ट्र के आंकड़ों को देखते हुए अब यह देखना दिलचस्प होगा कि इन राज्यों में अगले कुछ महीने में होने वाले विधानसभा चुनाव में क्या होता है? कई लोगों का यह मानना है कि गठबंधन सरकार सुधार प्रक्रिया को धीमी कर सकती है, शेयर बाजार सूचकांकों में भारी गिरावट इसी आशंका को दिखाती है, लेकिन साल 1991 में देश में आर्थिक सुधार की प्रक्रिया एक अल्पमत सरकार ने शुरू की थी और बाद में 2014 तक उसे गठबंधन सरकारों ने जारी रखा। अब ज्यादा सहमति बनाने की जरूरत होगी, जिससे निस्संदेह कुछ फैसलों में देरी हो सकती है, लेकिन इससे राजनीतिक स्वीकार्यता बढ़ेगी।
यह भी अहम होगा कि आर्थिक सुधारों के लिए अब राज्यों को भी साथ लिया जाए। वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) के मामले में जिस तरह से केंद्र और राज्यों में सहयोग दिखा, उससे यह उम्मीद बनी थी कि अन्य क्षेत्रों में भी इसी तरह से सहयोग कायम कर सुधार प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा सकता है। लेकिन साफ है कि ऐसा हो नहीं पाया है। इसलिए अगली सरकार के लिए यह सलाह होगी कि वह नीतिगत मसलों पर राज्यों के साथ सहयोग के लिए संस्थागत तंत्र को पुनर्जीवित करे। यह शायद नीति आयोग के जरिये हो सकता है या कोई नया तंत्र बनाकर। इससे भूमि, श्रम और कृषि जैसे क्षेत्रों में काफी समय से लंबित सुधारों को आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी। करीब एक दशक बाद भारत को एक मजबूत विपक्ष मिला है और यह अब सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के लिए अहम है कि वे एक-दूसरे की स्थिति का सम्मान करें। इस समय देश के व्यापक आर्थिक मानदंड अनुकूल हैं। भारतीय अर्थव्यवस्था वर्ष 2023-24 में 8.2 फीसदी की दर से आगे बढ़ी है और लगातार तीसरे साल 7 फीसदी से ज्यादा की वृद्धि हासिल हुई है। मौजूदा साल के लिए नजरिया भी अनुकूल है और अच्छे मॉनसून का साथ मिलने से यह अनुमान लगाया जा रहा है कि इस वर्ष करीब 7 फीसदी की वृद्धि होगी। महंगाई की हालत में भी सुधार हुआ है और पिछले कुछ वर्षों में बैंकों और कॉरपोरेट का बहीखाता काफी मजबूत हुआ है। लेकिन यह बताना भी अहम है कि हाल के वर्षों में आर्थिक वृद्धि में बड़ा योगदान ऊंचे सरकारी खर्च का रहा है, जिसकी कि अपनी सीमा होती है। वैसे तो सरकार इस वर्ष सहज राजकोषीय स्थिति में रहेगी, फिर भी उसे अपनी वित्तीय स्थिति को मजबूत करना होगा। इसलिए निजी क्षेत्र के लिए यह अहम होगा कि वह सतत आर्थिक वृद्धि को बनाए रखने के लिए सरकार की कमी पूरी करे। फिलहाल तो निजी क्षेत्र ज्यादा निवेश से हिचक रहा है क्योंकि निजी खपत भी कमजोर है। खपत कमजोर रहने की एक वजह नौकरियों की हालत भी है। समग्र बेरोजगारी में तो कमी आ रही है, लेकिन ज्यादातर लोग खेती या स्वरोजगार, बहुत छोटे उद्यम चलाने जैसे कम उत्पादकता वाले पेशे में लगे हुए हैं। चुनाव पूर्व सर्वेक्षणों से भी यह संदेश मिला था कि रोजगार मतदाताओं के बीच सबसे बड़े मुद्दों में से एक है।
इस नतीजे ने इस पर भी सवाल खड़े किए हैं कि देश में बढ़ते कार्यबल के लिए उत्पादक रोजगार का प्रबंध न होने के बीच मुफ्त अनाज जैसी योजनाएं कब तक कारगर हो सकती हैं। रोजगार का मसला हल करने के लिए अगली सरकार के लिए यह अहम होगा कि वह विनिर्माण को बढ़ावा दे, जहां कम कुशल कामगारों को बड़ी संख्या में काम मिल सकता है। घरेलू मांग बढ़ाने के साथ ही भारत को निर्यात बढ़ाने पर भी जोर देना होगा, जिसके लिए व्यापार नीति में समीक्षा की जरूरत होगी। निर्यात को बढ़ावा देने और रोजगार सृजन के लिए यह जरूरी है कि देश वैश्विक मूल्य श्रृंखला का हिस्सा बना रहे। ऊंचे शुल्क इसमें अड़चन बनते हैं। अब काफी कुछ नई सरकार की संरचना, ढांचे और कार्यक्रमों पर निर्भर करेगा, लेकिन आर्थिक नीति निर्माण क्षमता में सुधार और परामर्श बढ़ाने से निश्चित रूप से फायदा होगा।
Date: 05-06-24
जैव विविधता बचाने की चुनौतियांअमित बैजनाथ गर्ग
भारत जैव विविधता से समृद्ध देश है। विश्व के चौंतीस जैव विविधता क्षेत्रों में से चार भारत में हैं। इसी प्रकार विश्व के सत्रह ‘मेगा-डायवर्सिटी’ देशों में भारत शामिल है। इस प्रकार जैव विविधता न केवल पारिस्थितिकी तंत्र का आधार निर्मित करता, बल्कि देश में आजीविका को भी आधार प्रदान करता है। भारत में जैव विविधता संरक्षण के लिए कई उपाय किए गए हैं जैसे कि 103 राष्ट्रीय उद्यानों, 510 वन्य जीव अभ्यारण्यों, 50 टाइगर रिजर्व, 18 बायोस्फीयर रिजर्व, तीन कंजर्वेशन रिजर्व तथा 2 सामुदायिक रिजर्व की स्थापना। जैव विविधता संरक्षण के लिए राष्ट्रीय जैव विविधता कार्रवाई योजना तैयार की गई है, जो वैश्विक जैव विविधता रणनीतिक योजना 2011-20 के अनुकूल है। इसे 2010 में ‘कन्वेंशन आन बायोलाजिकल डायवर्सिटी’ की बैठक में स्वीकार किया गया था।
भारत में जैव विविधता और इससे संबंधित ज्ञान के संरक्षण के लिए 2002 में जैव विविधता अधिनियम तैयार किया गया। इस अधिनियम के क्रियान्वयन के लिए त्रि-स्तरीय संस्थागत ढांचे का गठन किया गया है। अधिनियम की धारा 8 के तहत सर्वोच्च स्तर पर वर्ष 2003 में राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण का गठन किया गया, जिसका मुख्यालय चेन्नई में है। यह एक वैधानिक निकाय है, जिसकी मुख्य भूमिका विनियामक और परामर्शदाता की है। राज्यों में राज्य जैव विविधता प्राधिकरण की भी स्थापना की गई है। स्थानीय स्तर पर जैव विविधता प्रबंध समितियों (बीएमसी) का गठन किया गया है। नबीए के डेटा के अनुसार, देश के 26 राज्यों ने राज्य जैव विविधता प्राधिकरण एवं जैव विविधता प्रबंध समितियों का गठन किया है। अकेले महाराष्ट्र और मध्यप्रदेश में 43,743 बीएमसी का गठन किया गया है। इन समितियों का उद्देश्य देश की जैव विविधता और संबंधित ज्ञान का संरक्षण, इसके सतत उपयोग में मदद तथा यह सुनिश्चित करना कि जैविक संसाधनों के उपयोग से जनित लाभों को उन सबसे उचित और समान रूप से साझा किया जाए, जो इसके संरक्षण, उपयोग एवं प्रबंधन में शामिल हैं।
राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण के अनुसार, राष्ट्रीय जैव विविधता कार्रवाई योजना का क्रियान्वयन चुनौतीपूर्ण है। इसके सफल क्रियान्वयन में लोगों की भागीदारी की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। केरल के वायनाड जिले में एमएस स्वामीनाथन रिसर्च फाउंडेशन का सामुदायिक कृषि जैव विविधता केंद्र इस बात का बेहतरीन उदाहरण है कि कैसे स्थानीय स्वशासन को सुदृढ़ करके स्थानीय विकास योजनाओं में जैव विविधता संरक्षण को समन्वित किया जा सकता है। भारत के राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण ने हाल ही में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम की मदद से ग्रामीणों की आजीविका में बेहतरी के नए मानदंड स्थापित किए हैं।
जैव विविधता पर सम्मेलन के लक्ष्यों को हासिल करने के लिए व्यापक कानूनी और संस्थागत प्रणाली स्थापित करने में भारत काफी आगे रहा है। आनुवांशिक संसाधनों को लोगों के लिए उपलब्ध कराना और लाभ के निष्पक्ष, समान बंटवारे के सम्मेलन के तीसरे उद्देश्य को जैव विविधता अधिनियम 2002 और नियम 2004 के तहत लागू किया जा रहा है। राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण की पहुंच बढ़ाने और लाभ साझाकरण प्रावधानों के संचालन के लिए राष्ट्रीय स्तर पर लोगों के जैव विविधता रजिस्टर और जैव विविधता प्रबंधन समितियों का संजाल तैयार किया जाता है।
2002 के अधिनियम के आधार पर बनी जैव विविधता प्रबंधन समितियां स्थानीय स्तर की वैधानिक निकाय हैं, जिनमें लोकतांत्रिक चयन प्रक्रिया के तहत कम से कम दो महिला सदस्यों की भागीदारी जरूरी होती है। ये समितियां शोधकर्ताओं, निजी कंपनियों, सरकारों जैसे प्रस्तावित उपयोगकर्ताओं की जैव संसाधनों तक पहुंच संभव बनाने और सहमति बनाने में मदद करती हैं। इससे जैव विविधता रजिस्टरों और जैविक संसाधनों के संरक्षण तथा टिकाऊ उपयोग के फैसलों के जरिए उपलब्ध संसाधनों का स्थायी उपयोग और संरक्षण सुनिश्चित किया जाता है।
इस परियोजना का उद्देश्य जैविक संसाधनों तक बेहतर पहुंच बनाना, उनके आर्थिक मूल्य का आकलन करना और स्थानीय लोगों के बीच उनके लाभों को बेहतर ढंग से साझा करना है। इसे देश के दस राज्यों- आंध्र प्रदेश, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, सिक्किम, पश्चिम बंगाल, गोवा, कर्नाटक, ओड़ीशा, तेलंगाना और त्रिपुरा में चलाया जा रहा है। भारत में जैव विविधता के कई आकर्षक वैश्विक केंद्र हैं। मसलन, सिक्किम में पक्षियों की 422 प्रजातियां और तितलियों की 697, फूलों के पौधों की साढ़े चार हजार, पौधों की 362 प्रजातियां और सुंदर आर्किड फूलों की समृद्ध विविधता है।
जंतुओं और वनस्पतियों की अनगिनत प्रजातियां ही हिमालय को जैव विविधता का अनमोल भंडार बनाती हैं। यहां मौजूद हजारों छोटे-बड़े ग्लेशियर, बहुमूल्य जंगल, नदियां और झरने इसके लिए उपयुक्त जमीन तैयार करते हैं। मध्य हिमालय में बसे उत्तराखंड में ही वनस्पतियों की 7000 और जंतुओं की 500 महत्त्वपूर्ण प्रजातियां मौजूद हैं। आज हिमालयी क्षेत्र में जैव विविधता को कई खतरे भी हैं। इसकी मुख्य वजहें जलवायु परिवर्तन से लेकर जंगलों की कटान, वहां बार-बार लगने वाली अनियंत्रित आग, जल धाराओं का सूखना, खराब वन प्रबंधन और लोगों में जागरूकता की कमी आदि हैं। इस वजह से कई प्रजातियों के सामने अस्तित्व का संकट है। ऐसी ही एक वनस्पति प्रजाति है आर्किड, जिसे बचाने के लिए उत्तराखंड में पिछले कुछ सालों से कोशिश हो रही है।
आर्किड पादप संसार की सबसे प्राचीन वनस्पतियों में है, जो अपने खूबसूरत फूलों और पर्यावरण में अनमोल योगदान के लिए जानी जाती है। उत्तराखंड में आर्किड की लगभग ढाई सौ प्रजातियां पहचानी गई हैं, लेकिन ज्यादातर अपना वजूद खोने की कगार पर हैं। जीव वैज्ञानिकों का कहना है कि कम से कम 5 या 6 प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर हैं। खुद जमीन या फिर बांज या तून जैसे पेड़ों पर उगने वाला आर्किड कई वनस्पतियों में परागण को संभव और सुगम बनाता है। पिछले दो वर्ष से उत्तराखंड वन विभाग के शोधकर्ताओं ने कुमाऊं की गोरी घाटी और गढ़वाल मंडल के इलाकों में आर्किड की करीब सौ से अधिक प्रजातियों को संरक्षित किया है।
संयुक्त राष्ट्र ने 2021-30 को पारिस्थितिकी संरक्षण का दशक घोषित किया है। इसलिए यह विश्वव्यापी चिंताओं का भी समय है, जब दुनिया के लोगों के सामने अपनी उस कुदरती पारिस्थितिकी का पुनरुद्धार करने की चुनौती है, जो विभिन्न कारणों से नष्ट हो रही है। जाहिर है, इस व्यापक चिंता से भारत के लोग भी अलग नहीं रह सकते। तेज आर्थिक वृद्धि और विकास नियोजन में पर्यावरणीय चिंताओं को समाहित न कर पाने की सीमाओं, कमजोरियों या दूरदर्शिता के अभाव के चलते भारत की जैव विविधता पर भी अनावश्यक और अतिरिक्त दबाव पड़ रहे हैं। ऐसे में संरक्षण की हर स्तर की पहल स्वागत योग्य है। खासकर यह ध्यान रखते हुए कि जैव संपदा और मनुष्य अस्तित्व के बीच सीधा और गहरा नाता है। जैव विविधता के इस केंद्र में भारत की वह करीब पचास फीसद आबादी भी आती है, जो गरीबी रेखा से नीचे बसर करती है, जंगल जिनका घर है और जंगल से जिनका रिश्ता अटूट है। यही लोग जैव विविधता के नैसर्गिक पहरेदार हैं।
Date: 05-06-24
जीत से ज्यादा सबक हैउमेश चतुर्वेदी
अठारहवीं लोक सभा चुनावों में भाजपा भले ही सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी हो, लेकिन मोटे तौर पर देखें तो यह नतीजा उसके लिए सबसे बड़ा झटका ही माना जाएगा। 2014 में जब पार्टी 283 सीटों के साथ अपने दम पर बहुमत हासिल करके सत्ता में आई थी, तब कहा गया था कि देश का मतदाता प्रबुद्ध हो गया है। उसे अस्थिर सरकारें मंजूर नहीं हैं। 2019 के आम चुनाव ने इसी धारणा को आगे बढ़ाया और ब्रांड मोदी का नाम स्थापित हो गया, लेकिन 2024 में स्थितियां बदली हुई हैं। ये पंक्तियां लिखी जाते वक्त तक भाजपा अपने दम पर ढाई सौ का आंकड़ा भी पार करती नहीं दिख रही है। ऐसे में सवाल उठेंगे कि भारतीय जनता पार्टी कहां चूकी?
भाजपा को सबसे ज्यादा उम्मीद जिस उत्तर प्रदेश से रही है, वहां पार्टी को सीटों का सबसे ज्यादा नुकसान है। बिहार में भी वह सबसे बड़ा दल होती थी, लेकिन इस बार उसे जनता दल (यू) मात देता नजर आ रहा है। वह आगे निकल गया है। पश्चिम बंगाल में उसे बड़ी जीत की उम्मीद थी, तकरीबन सारे एक्जिट पोल ऐसी ही उम्मीद जता रहे थे, लेकिन वैसा नहीं हुआ। उलटे उसकी सीटें भी घट गई। राजस्थान में भी पार्टी बेहतर प्रदर्शन नहीं कर पा रही है। राज्य की आधी सीटों पर ही जीत हासिल होती नजर आ रही है। पार्टी को हरियाणा में भी झटका लगा है। लेकिन प्रज्ज्वल रेवन्ना कांड के बाद जिस कर्नाटक से उसे सबसे ज्यादा झटके की उम्मीद थी, वहां से उसे उतना नुकसान नहीं हुआ है।
भाजपा भले ही तमिलनाडु से बहुत उम्मीद कर रही थी, लेकिन वहां भी उसे 2014 की तरह महज एक सीट पर ही जीत मिलती नजर आ रही है। भाजपा को महाराष्ट्र में भी बड़ा नुकसान हुआ है। पिछली बार पार्टी के यहां से 22 सांसद जीते थे। लेकिन इस बार उसकी सीटें आधी रह गई हैं। एनसीपी से अलग होकर भाजपा का साथ देने वाले अजित पवार को महज एक ही सीटें मिलती नजर आ रही हैं। कुल मिला कर कहा जा सकता है कि भाजपा को उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पश्चिम बंगाल, बिहार और हरियाणा से बड़ा झटका लगा है। हालांकि पार्टी को सबसे ज्यादा समर्थन मध्य प्रदेश से मिला है। गुजरात में भी उसका गढ़ बचा हुआ है। असम, अरु णाचल प्रदेश, उत्तराखंड और हिमाचल में भी उसका जादू चल रहा है।
सवाल यह है कि आखिर, भाजपा उत्तर प्रदेश में क्यों कमजोर हो गई? फौरी तौर पर देखें तो सबसे बड़ा कारण यहां के युवाओं के गुस्से को बड़ा कारण माना जा रहा है। राज्य में बार-बार परीक्षाओं के पेपर आउट होते रहे। इससे युवाओं में गुस्सा रहा। इसकी वजह से उनकी नौकरियां लगातार दूर जाती रहीं। अग्निवीर योजना को लेकर विपक्षी दलों विशेषकर कांग्रेस नेता राहुल गांधी और सपा नेता अखिलेश यादव ने जिस तरह मुद्दा बनाया, उसने युवाओं में भाजपा के खिलाफ गुस्सा भर दिया। राम मंदिर के निर्माण के बाद समूचा देश जिस तरह राममय हुआ था, उससे भाजपा को उम्मीद थी कि पार्टी को रामभक्तों का बहुत साथ मिलेगा। लेकिन उत्तर प्रदेश में ही राम की लहर नहीं चल पाई।
उत्तर प्रदेश में भाजपा की मौजूदा हालात के चलते 1999 का आम चुनाव याद आ रहा है। तब उत्तराखंड भी उत्तर प्रदेश का हिस्सा था, इस लिहाज से उत्तर प्रदेश में लोक सभा की 85 सीटें थीं। 1998 के आम चुनावों में भाजपा को राज्य से 52 सीटें मिली थीं। लेकिन बाद में कल्याण सिंह ने बागी रुख अपना लिया तो अगले ही साल हुए आम चुनावों में भाजपा की 23 सीटें घट गई। कुछ ऐसी ही स्थिति इस बार भाजपा की उत्तर प्रदेश में होती दिख रही है। पार्टी अपना आकलन तो करेगी, लेकिन मोटे तौर पर माना जा रहा है कि भाजपा को राज्य में सबसे ज्यादा नुकसान युवाओं के गुस्से, राज्य सरकार के स्थानीय स्तर पर भ्रष्टाचार ना रोक पाने और गलत उम्मीदवार देने की वजह से हुआ। उदाहरण के लिए बलिया से नीरज शेखर की उम्मीदवारी पर पार्टी के ही लोगों को सबसे ज्यादा ऐतराज रहा। खुद प्रधानमंत्री मोदी भी डाक मतमत्रों में छह हजार से ज्यादा वोटों से पीछे चलते रहे, इसका मतलब साफ है कि भाजपा को लेकर राज्य में एक तरह से गुस्सा था, जिसे भांपने में पार्टी नाकाम रही।
बिहार के बारे में माना जा रहा था कि नीतीश को नुकसान होगा लेकिन इसके ठीक उलट नीतीश अपनी ताकत बचाए रखने में कामयाब हुए हैं। राज्य में अब जनता दल सबसे बड़ा संसदीय दल है। तो क्या यह मान लिया जाए कि 2020 के विधानसभा चुनावों में कमजोर किए जाने की कथित कोशिश को पलट दिया है? पार्टी को महाराष्ट्र में शायद अजीत पवार को साथ लाना उसके वोटरों को पसंद नहीं आया। भाजपा ही उन्हें राज्य की सिंचाई घोटाले का आरोपी मानती रही और उन्हें ही उपमुख्यमंत्री बनाकर ले आई। जब कोई विपक्षी व्यक्ति पार्टी या गठबंधन में लाया जाता है, तो सबसे ज्यादा जमीनी कार्यकर्ता को परेशानी होती है। वह पसोपेश में पड़ जाता है कि कल तक वह अपनी पार्टी लाइन के लिहाज से जिसका विरोध करता रहा, उसका अब कैसे समर्थन करेगा। महाराष्ट्र का कार्यकर्ता इसीलिए निराश रहा। जिसका असर चुनावी नतीजों पर दिख रहा है।
हरियाणा के प्रभुत्वशाली जाट मतदाताओं को सबसे ज्यादा गुस्सा अग्निवीर और शासन में उसकी घटती भागीदारी को लेकर रहा। इसकी वजह से यहां का अधिसंख्य मतदाता पार्टी से रुष्ट हुआ और नतीजा सामने है। राजस्थान में भाजपा का कार्यकर्ता ही मुख्यमंत्री भजनलाल को स्वीकार नहीं कर पा रहा है। पार्टी की दिग्गज नेता वसुंधरा को किनारे लगाया जाना भी भाजपा की अंदरूनी राजनीति पर असर डाला। इसका असर है कि पार्टी राज्य में अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर पाई। पश्चिम बंगाल में ममता अपने किले को बचाने में कामयाब रहीं। हालांकि ओडिशा में पार्टी का जबरदस्त प्रदर्शन रहा जहां राज्य सरकार के साथ ही संसद की ज्यादातर सीटों पर वह काबिज हो चुकी है।
इस चुनाव ने यह भी संदेश दिया है कि गठबंधन की राजनीति खत्म नहीं हुई है। दो कार्यकाल में अपने दम पर बहुमत हासिल करने के चलते मोदी-शाह की जोड़ी लगातार अपने एजेंडे को लागू करती रही लेकिन अब गठबंधन की सरकार होगी, इसलिए अब इस जोड़ी को पहले के दो कार्यकाल की तरह काम करना आसान नहीं होगा। एक धारणा यह भी बन गई थी कि जिस संगठन के चलते भाजपा की पहचान थी, वह धीरे-धीरे किनारे होता चला गया। लेकिन बहुमत न हासिल होने की स्थिति में अब संगठन की अहमियत बढ़ेगी। इस चुनाव का संदेश यह भी है कि संगठन को जमीनी लोगों पर भरोसा करना होगा। भाजपा के लिए राहत की बात यह है कि तीसरी बार वह सत्ता पर काबिज होगी। उसने उन राज्यों में भी अपनी उपस्थिति बनाने में कामयाबी हासिल की है, जहां वह नहीं थी।
Date: 05-06-24
जनादेश का संदेशसंपादकीय
अठारहवीं लोकसभा चुनाव के परिणाम न केवल चौंकने, बल्कि सोचने पर भी मजबूर कर रहे हैं। कोई बहुत बड़ा उलट-फेर नहीं है, पर जो हुआ है, उसकी तरह-तरह से विवेचना संभव है। अगर शुद्ध गणितीय दृष्टि से देखें, तो कुल मिलाकर, केंद्र में सत्तारूढ़ प्रमुख पार्टी को जोर कम हुआ है। चार सौ पार पहुंचने का उसका मनसूबा पूरा नहीं हुआ। पिछले चुनाव में भाजपा को अकेले ही 303 सीटों के साथ भारी बहुमत मिला था, पर इस बार बहुमत दरकता दिखा है। वैसे, भारत जैसे राजनीतिक, सामाजिक विविधता वाले देश में यह कोई कम बड़ी बात नहीं कि एक पार्टी-एक नेता नरेंद्र मोदी लगातार दो बार सत्ता में रहने के बावजूद तीसरी दफा भी मिले-जुले जनादेश के बाद सरकार बनाने में सक्षम हो गए हैं। उन्हें न जाने क्या-क्या कहा गया, लेकिन व्यापकता में लोगों की नजरों में वह अभी भी देश के नंबर वन नेता हैं। हां, यह जरूर है कि साल 2014 और साल 2019 के चुनाव में भाजपा को अकेले ही बहुमत हासिल था और अन्य सहयोगियों के साथ वह बहुत आसानी से दस साल तक सरकार चला पाई। अब ताजा चुनावी नतीजे पहला इशारा तो यही कर रहे हैं कि तीसरी बार भाजपा को सरकार चलाने में उतनी सुविधा नहीं होगी। मतलब, देश में दस साल बाद फिर गठबंधन पर निर्भरता का दौर लौट आया है।
विपक्ष के नजरिये से अगर परिणामों को देखा जाए, तो यह एक बड़ी कामयाबी है कि प्रमुख विपक्षी गठबंधन के पास सवा दो सौ से ज्यादा सीटें हैं। लोकसभा चुनाव 2019 में विपक्षी गठबंधन यूपीए के पास 92 सीटें थीं, पर अब इंडिया ब्लॉक के पास इतनी सीटें हैं कि वह मजबूती के साथ सत्ता पक्ष को चुनौती दे सकता है। पिछले चुनाव में समाजवादी पार्टी विपक्ष में तो थी, पर कांग्रेस के साथ नहीं थी, इस बार कांग्रेस के साथ उसका होना खासतौर पर उत्तर प्रदेश में रंग लाया है। इस चुनाव में समाजवादी पार्टी के साथ ही कांग्रेस को भी बहुत लाभ हुआ है। समाजवादी पार्टी देश में तीसरे नंबर की पार्टी बनकर उभरी है, तो देश में दूसरे नंबर की पार्टी के रूप में कांग्रेस ने अपने प्रदर्शन को बहुत सुधारा है। पिछले दो चुनावों में वह 44 और 52 सीटों पर सिमट गई थी, जिससे मुख्य विपक्षी पार्टी और नेता प्रतिपक्ष का आधिकारिक दरजा भी उसे नहीं मिल सका। इस बार कांग्रेस के पास 20 प्रतिशत के करीब सीटें हैं और उसे मुख्य विपक्षी होने का आधिकारिक दर्जा मिल जाएगा। अत: लोकसभा में कांग्रेस के पास एक नई शुरुआत करने का मौका है।
गौर करने की बात है कि इस चुनाव में गठबंधन की बहुत बड़ी भूमिका रही है। जहां, भाजपा इस बार गठबंधन के मोरचे पर कमजोर थी, वहीं कांग्रेस ने आगे बढ़कर गठबंधन किया। यहां यह याद कर लेना जरूरी है कि गठबंधन करके आगे बढ़ने के प्रति कांग्रेस जब गंभीर नहीं थी, तब उसे सियासी नुकसान हुआ था और देश में प्रमुख दल होने का उसका गौरव भी छिन गया था। इस बार चुनाव से पहले कांग्रेस ने गठबंधन के प्रति पर्याप्त गंभीरता दिखाकर एक नए प्रकार की राजनीतिक संस्कृति को जन्म दिया है, यह संस्कृति भले ही भाजपा को उखाड़ फेंकने के लिए खड़ी हुई, पर लगता है, आने वाले कुछ वर्षों में विपक्षी गठबंधनों के लिए यही तरीका मुफीद है। जहां तक सत्ता पक्ष की बात है, समर्थन में आई कमी सोचने का अवसर है और यह सोचना तब ज्यादा सार्थक होगा, जब जनता के अनुरूप और अच्छी नीतियों के साथ कामकाज में सुधार किया जाएगा।
Date: 05-06-24
उत्तर भारत में फिर गठबंधन की गूंजनीरजा चौधरी, वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषक
इस बार का लोकसभा चुनाव अंकुश लगाने वाला साबित हुआ है। लगातार दो बार अपने बूते बहुमत पाने वाली भाजपा मानो थम गई है। लोगों के मन में चुनाव से पहले कई तरह की आशंकाएं थीं- कहीं हम एकदलीय निरंकुश सरकार की ओर तो नहीं बढ़ रहे? क्या संविधान में मनमर्जी का बदलाव होने जा रहा है? राजस्थान, महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश जैसे राज्यों के दलित टोलों में डर था कि यदि संविधान बदल दिया गया, तो क्या उनका आरक्षण खत्म कर दिया जाएगा? उत्तर प्रदेश के राजपूत चिंतित थे कि यदि बेलगाम सरकार आई, तो शायद वह मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को दिल्ली बुला ले?
सवाल राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ व भाजपा के आपसी रिश्ते को लेकर भी थे। इस बार कई जगहों पर संघ उस तरह सक्रिय नहीं दिखा, जितना वह पिछले चुनावों तक था। फिर, टिकट बंटवारा भी एक बड़ा मसला रहा। बाहरी लोगों को टिकट देने से पुराने कार्यकर्ता खुश नहीं थे। वे इसे ‘भाजपा का कांग्रेसीकरण’ कहने लगे।
इन सब विवादों को भाजपा नेतृत्व द्वारा नजरंदाज करने की नीति से यह शक गहराने लगा कि ‘400 पार’ का नारा यूं ही नहीं दिया गया है। लिहाजा, इस जनादेश का संकेत यही है कि गठबंधन के बूते भाजपा सरकार तो बना सकती है, पर उसकी लगाम अब सहयोगी दलों के हाथों में होगी। हालांकि, यहां प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ जरूर की जानी चाहिए, क्योंकि दस साल के शासन के बाद उनके नाम पर ही वोट मांगे गए और भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनने में सफल रही। मोदी पार्टी का चेहरा न होते, तो भाजपा के लिए इतनी सीटें जुटाना इस बार काफी मुश्किल होता।
इस चुनाव की असली कहानी उत्तर प्रदेश ने लिखी है। बाकी राज्यों का नतीजा काफी कुछ प्रत्याशित है, बेशक कुछ सीटें ऊपर-नीचे हैं। मसलन, महाराष्ट्र में शुरुआत से ही ‘इंडिया’ ब्लॉक के असरदार रहने के कयास लगाए जा रहे थे, जिसकी वजह थी, उद्धव ठाकरे और शरद पवार के प्रति सहानुभूति। लोगों ने देखा था कि किस तरह से इनकी पार्टियों को तोड़ा गया। यहां तक कि इनके नाम और चुनाव-चिह्न तक छीन लिए गए। इसीलिए, तंत्र व विधायकों की जुगलबंदी पर सहानुभूति की लहर भारी पड़ गई।
पश्चिम बंगाल में भी ममता बनर्जी का प्रदर्शन चौंकाता नहीं है। उन्होंने अकेले लड़कर न सिर्फ अपनी जमीन बचाई, बल्कि भाजपा से कई सीटें छीन लीं। इसी तरह, राजस्थान में यह अंदेशा था कि जाट और राजपूत की नाराजगी एनडीए को भारी पड़ सकती है और वह दिखा भी है। हरियाणा में जाट दो वजहों से सरकार से नाराज थे- किसान आंदोलन और महिला पहलवानों से दुर्व्यवहार। इसका असर नतीजों पर पड़ा। ओडिशा में भी भाजपा ने जो कमाल दिखाया है, उसकी चर्चा पहले से थी। वहां लोकसभा ही नहीं, विधानसभा चुनावों में भी बीजद को करारी मात मिली है।
बिहार की तस्वीर भी अलग नहीं है। यहां मुख्यमंत्री नीतीश कुमार का राजद छोड़ भाजपा का दामन थामना काम कर गया। गैर यादव, महादलित, पसमांदा मुसलमान जैसे पिछड़े समुदाय नीतीश के साथ रहे हैं, जिसमें सेंध लगाने की कोशिश तेजस्वी यादव ने चुनाव के दौरान की, मगर वह सफल नहीं हो सके। फिर, यहां भाजपा में उत्तर प्रदेश जैसा अंदरखाने कोई विवाद भी नहीं था।
जाहिर है, चौंकाने वाले नतीजे सिर्फ उत्तर प्रदेश से आए हैं। यहां समाजवादी पार्टी इतना अच्छा करेगी या कांग्रेस इतनी सीटें ले आएगी, यह किसी ने नहीं सोचा होगा। इसका एक बड़ा कारण है, सपा का नया प्रयोग। उसने ‘एमवाई’ का विस्तार किया, यानी मुसलमान व यादव प्रत्याशियों को बहुत कम सीटें दीं। दो दर्जन से अधिक उम्मीदवार उसने गैर-यादव ओबीसी के उतारे, दलित व जाटव को टिकट दिए। यह भी एक वजह है कि दलितों के मत सपा को गए। लगता यही है कि बसपा का आधार उससे छिटक रहा है। माना जा रहा है कि मायावती के 25 फीसदी दलित वोट सपा को मिले हैं, जबकि 10 फीसदी भाजपा को। वैसे, उत्तर प्रदेश में भाजपा की इतनी बुरी स्थिति की एक वजह राजपूतों की नाराजगी भी है। पहले दो चरणों में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के राजपूतों ने वोट देने के बजाय घर में रहने का फैसला किया था। नतीजतन, उनको मनाने के लिए भाजपा नेतृत्व को कई दौरे करने पड़े थे।
यह आम चुनाव मतदाताओं के हिंदू-मुसलमान मुद्दे से छिटकने की मुनादी भी करता है। इस बार धर्म के आधार पर ध्रुवीकरण की कई कोशिशें की गईं, लेकिन उसका जमीन पर कोई असर नहीं दिख रहा। बेशक लोग खुद को धर्म से जोड़ते हैं। यहां तक कि कई जाटवों का चुनाव-पूर्व कहना था कि यदि मायावती किसी मुस्लिम उम्मीदवार को टिकट देती हैं, तो वह भाजपा को वोट देंगे। मगर लगता यही है कि हिंदू-मुसलमान के नाम पर वे अब शायद ही तनाव चाहते हैं।
कांग्रेस के लिए यह नतीजा संजीवनी है। विशेषकर उत्तर प्रदेश में उसे फिर से पांव जमाने का मौका मिल सकता है। अमेठी व रायबरेली घूमते हुए मुझे वीपी सिंह के समय की याद आ रही थी, क्योंकि कांग्रेस नेताओं की हर पंक्ति पर लोग उसी तरह उत्साहित होते दिखते थे, जैसे वीपी सिंह के भाषणों से। तब अंदेशा था कि कांग्रेस इस भीड़ को शायद ही वोट में बदल सकेगी, क्योंकि उसके पास सांगठनिक ढांचा तक नहीं है। पर अमेठी की जीत ठोस संकेत है कि उसका एक कार्यकर्ता किसी मंत्री को मात दे सकता है। लगता है कि पार्टी ने राज्य में अपने पुनरोद्धार की ओर कदम बढ़ा दिए हैं।
साफ है, विपक्ष ने पूरा दमखम दिखाया है। संसद में मजबूत विपक्ष की वापसी कई लोगों को सुकूनदेह लग रही होगी, क्योंकि इससे सरकार और संस्थान, दोनों पर अंकुश लगाने में मदद मिलती है। मगर इसे मोदी सरकार के खिलाफ मोहभंग की शुरुआत मान सकते हैं? इसके लिए फिलहाल हमें और आंकड़ों की जरूरत होगी।
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हाल ही में गूगल की एक सहायक कंपनी डीपमाइंड ने विभिन्न प्रोटीनों के मुड़ने के आकार की भविष्यवाणी करने के उद्देश्य से ए आई उपकरण विकसित किया है, जिसे अल्फाफोल्ड कहा जाता है। वर्तमान अल्फाफोल्ड संस्करण 3 है। इसमें पहले दो और संस्करण आ चुके हैं, जो बहुत सटीक नहीं थे।
कुछ बिंदु –
– प्रोटीन अमीनो एसिड अवशेषों की लंबी श्रृंखलाएं होती हैं, जो विशिष्ट आकृतियों में मुड़ती हैं। ठीक से मुड़े हुए प्रोटीन सामान्य रूप से काम करते हैं, जबकि गलत तरीके से मुड़े हुए प्रोटीन बीमारियों का कारण बन सकते हैं। संरचनात्मक या स्ट्रक्चरल जीवविज्ञान में इसे प्रोटीन-फोल्डिंग समस्या कहा जाता है।
– वैज्ञानिक मानते है कि डीपमाइंड के दो डीप लर्निंग सिस्टम ने प्रोटीन संरचनाओं के बारे में मानवीय जागरूकता को बदल दिया है, और अब इस तीसरे अल्फाफोल्ड से प्रोटीन की आकृतियों की भविष्यवाणी 80% सटीक हो सकेगी।
– यह डीएनए, आरएनए, लिगैंड (एक आयन या अणु, जो एक केंद्रीय धातु परमाणु से जुड़कर बंध बनाता है) को ढाल सकता है, या उनमें संशोधन कर सकता है।
– यह फोल्ड हुए प्रोटीन की संरचनाओं को कुछ क्षणों में ही स्पष्ट कर सकता है।
– फिर भी ये मशीनें अभी यह नहीं बता सकतीं कि प्रोटीन संरचनाएं अगर मुड़ी हैं, तो इस प्रकार से क्यों मुड़ी हैं। यह अभी भी मानव वैज्ञानिकों का ही काम है।
– अल्फाफोल्ड 3 का मुफ्त उपयोग अभी सीमित है। इसका आंतरिक तंत्र अभी सार्वजनिक अन्वेषण के लिए उपलब्ध नहीं है।
फिर भी, यह अन्वेषण स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में मूल्यवान है। भविष्य में जल्द ही इसके सार्वजनिक उपयोग की उम्मीद की जा सकती है।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 11 मई, 2024
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Date: 04-06-24
वक्त आ गया है कि एआई की दौड़ में भारत पीछे न रहेसंपादकीय
टेक्नोलॉजी समाज में धीरे से लेकिन असाधारण क्रांति करती रही है। लेकिन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस / मशीन लर्निंग (एआई/ एमएल) के बारे अभी भी केवल अनुमान लगाया जा सकता है कि यह मानव जीवन में क्या, कितना और कैसे परिवर्तन करेगी। जाहिर है यह परिवर्तन, व्यक्ति और समाज के स्तर पर ही नहीं संस्थागत, आर्थिक और गवर्नेस के स्तर पर भी गुणात्मक के साथ संख्यात्मक भी होगा। जो देश इस दौड़ में आगे होंगे, वे अगले कई दशकों के लिए दुनिया का नेतृत्व करेंगे। खुशी की बात यह है कि भारत इस दौड़ में शामिल है, भले ही एआई के कुछ क्षेत्रों में इसकी रफ्तार कम हो । आज देश में 54 लाख तकनीकी प्रशिक्षित लोग हैं यानी चीन और अमेरिका के समकक्ष हैं। लेकिन पिछले दस वर्षों में भारत में निजी कंपनियों ने पूंजी लगाने में चीन और अमेरिका के मुकाबले भारी कोताही की है, जिसके कारण प्रतिभा में अग्रणी रहने के बावजूद भारत निजी पूंजी निवेश में सातवें स्थान पर है। चीन और अमेरिका का निजी निवेश भारत से क्रमशः 13 गुना और 33 गुना ज्यादा है। आई/ एमएल का ज्ञान भारत में दुनिया के अन्य देशों के मुकाबले सस्ता भी है। चूंकि इस तकनीकी का प्रयोग ह्यूमन रिसोर्स और इंजीनियरिंग में प्रचुरता से हो रहा है और उत्पादन और सेवा के अन्य क्षेत्रों में विस्तार होने लगा है लिहाजा सरकार को ही नहीं, निजी क्षेत्र को भी इसमें निवेश के लिए आगे आना होगा। यह सोचना कि अमेरिका और चीन से ज्ञान आयात कर लेंगे, ये बेहद महंगा पड़ेगा। क्योंकि हम एक बार फिर इस टेक्नोलॉजी यूजर मात्र रह जाएंगे। पिछले सात वर्षों में लिंक्डइन के कुल सदस्यों में से बड़ी संख्या ने अपने प्रोफाइल में एआई कौशल को जोड़ा है। क्या यह ज्ञान वास्तव में इंडस्ट्री की जरूरत के अनुरूप है। देखना होगा कि यह टैलेंट नौकरी करने वाला बनता है या नौकरी देने वाला।
Date: 04-06-24
केवल पेड़ लगाने से ही कम नहीं होगी ग्लोबल वार्मिंगप्रो. चेतन सिंह सोलंकी, ( आईआईटी बॉम्बे में प्रोफेसर, संस्थापक, एनर्जी स्वराज फाउंडेशन )
पेड़ लगाना यकीनन बहुत जरूरी है और हम सभी को इसे नियमित रूप से करना चाहिए। यह हमारे और हमारे प्लैनेट के लिए भी अच्छा है। इससे कार्बन को कम करने, ऑक्सीजन के उत्पादन, जैव विविधता को बनाए रखने, मिट्टी की स्थिरता और जल-चक्र के रेगुलेशन में मदद मिलती है। अभी 10 दिन पहले ही, मैंने अपने 50वें जन्मदिन पर 50 पेड़ लगाए हैं। लेकिन इससे पहले कि हम इस विश्व पर्यावरण दिवस पर पेड़ लगाने के बारे में सोचें, थोड़ा रुकिए!
जैसे-जैसे हम 5 जून (विश्व पर्यावरण दिवस) के करीब पहुंच रहे हैं, सामाजिक संगठनों, प्रभावशाली लोगों, राजनेताओं, कॉर्पोरेट्स और व्यक्तियों को पेड़ लगाने की वकालत करते हुए देखना उत्साहजनक है। यह अच्छा है, लेकिन पर्याप्त नहीं है। यह सोचना कि पौधे लगाने से पर्यावरण-क्षरण, वायु और जल प्रदूषण, ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन जैसी मौजूदा ज्वलंत समस्याओं का समाधान हो जाएगा, एक गलती है।
अनेक युगों से, पृथ्वी की सतह और महासागरों ने स्वाभाविक रूप से कार्बन डाइऑक्साइड (सीओटू) और अन्य ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन और अवशोषण किया है, जिससे वायुमंडल के भीतर एक नाजुक संतुलन बना रहा है। यह प्राकृतिक चक्र मनुष्यों के अस्तित्व में आने से पहले का है।
औद्योगीकरण की शुरुआत से पहले तक- यानी लगभग 1850 ई. में- सीओटू उत्सर्जन और अवशोषण की दर संतुलन में थी। लेकिन उसके बाद हमने कोयला, पेट्रोल, डीजल और एलपीजी जलाना शुरू कर दिया, जिससे सीओटू उत्सर्जन में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है। वर्तमान में, मानवीय गतिविधियां सालाना लगभग 38 अरब टन अतिरिक्त सीओटू का वायुमंडल में योगदान कर रही हैं। जब यह प्रवाह पृथ्वी की इसे अवशोषित करने की क्षमता को पार कर जाता है, तो प्राकृतिक कार्बन चक्र का नाजुक संतुलन बिगड़ जाता है। पृथ्वी की सतह और महासागर, साथ ही पौधे और पेड़, सीओटू को अवशोषित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। हालांकि औद्योगिक गतिविधियों से सीओटू उत्सर्जन की विशाल मात्रा इसे प्रभावी रूप से संतुलित करने की उनकी क्षमता को प्रभावित करती है। नतीजतन, वातावरण में सीओटू की अधिकता हो जाती है, जिससे ग्रीनहाउस प्रभाव होता है। पूर्व-औद्योगिक युग की तुलना में वर्तमान में वायुमंडल में 52% अतिरिक्त सीओटू है। इसका मतलब है कि उसमें प्लैनेट की गर्मी को ट्रैप करने की 52% अतिरिक्त क्षमता है।
वर्तमान की हीटवेव इसी अतिरिक्त गर्मी का परिणाम हैं। एक पेड़- आमतौर पर 10-15-20 साल के विकास के बाद- अपने जीवनकाल के दौरान लगभग 1 से 2 टन सीओटू अवशोषित करता है। मान लें कि 10 वर्षों में एक पेड़ लगभग 1 टन सीओटू सोखता है तो मानवीय गतिविधियों के कारण प्रतिवर्ष उत्सर्जित होने वाली अतिरिक्त 38 अरब टन सीओटू को संतुलित करने के लिए हमें हर साल लगभग 380 अरब पेड़ लगाने होंगे।
अगर मानें कि एक पेड़ के लिए लगभग 10 वर्ग मीटर क्षेत्र की आवश्यकता होती है तो प्रति वर्ष 380 अरब पेड़ लगाने के लिए लगभग 30.8 लाख वर्ग किलोमीटर यानी भारत के आकार से भी बड़े क्षेत्र की आवश्यकता होगी, और वह भी हर साल। व्यक्तियों के लिए भी, वृक्षारोपण के माध्यम से सीओटू की भरपाई करना संभव नहीं होगा। एसी जैसे सामान्य स्रोतों से होने वाले कार्बन उत्सर्जन पर विचार करें।
एक टन का एयर कंडीशनर दिन में सिर्फ 8 घंटे चलने पर एक वर्ष में 2 टन से अधिक सीओटू उत्सर्जित करता है। इसलिए सिर्फ एक एसी के कार्बन फुटप्रिंट को संतुलित करने के लिए हमें सालाना 1 से 2 पेड़ लगाने की जरूरत है। वास्तव में उत्सर्जन की भरपाई के लिए पेड़ लगाने की नहीं, बल्कि 10-15 साल तक उनका पालन-पोषण करने की भी जरूरत है। यदि कोई व्यक्ति वाहन का उपयोग करता है और प्रतिदिन सिर्फ 2 लीटर पेट्रोल या डीजल जलाता है, तो वह एक वर्ष में 2 टन से अधिक सीओटू उत्सर्जित करने के लिए जिम्मेदार होगा। इस प्रकार, वाहनों के उपयोग के पर्यावरणीय प्रभाव को कम करने के लिए भी सालाना 1 से 2 नए पेड़ लगाना होंगे।
आधुनिक युग में, व्यक्ति प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से बहुत अधिक मात्रा में ऊर्जा और सामग्रियों का उपभोग करते हैं। केवल पेड़ लगाकर पर्यावरण पर पड़ने वाले उनके प्रभाव को कम करने का प्रयास लगभग असंभव होगा।
हर किसी के लिए आवश्यक मात्रा में पेड़ लगाना और उनकी देखभाल करना संभव नहीं है, न ही इस तरह के प्रयासों के लिए पर्याप्त जगह उपलब्ध है। इससे ज्यादा समझदारी का दृष्टिकोण तो यह होगा कि ‘रोकथाम इलाज से बेहतर है!’ यानी हमें पर्यावरण-संबंधी चुनौतियों का प्रभावी ढंग से समाधान करने के लिए कार्बन उत्सर्जन और संसाधनों की खपत को कम करने के व्यापक उपायों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
Date: 04-06-24
जलवायु परिवर्तन की चुनौतीसंपादकीय
मौसम के उतार-चढ़ाव की बढ़ती घटनाएं और देश के अधिकांश भागों में लू के थपेड़े हमें यह याद दिला रहे हैं कि जलवायु कितनी तेजी से बदल रही है और भारत जैसे देश पर इसका क्या असर हो सकता है। भारत अपने ऊर्जा मिश्रण में नवीकरणीय ऊर्जा की हिस्सेदारी बढ़ाने के लिए निवेश कर रहा है, लेकिन जलवायु परिवर्तन की समस्या को विकासशील देश अपने ही स्तर पर हल नहीं कर सकते हैं। ध्यान देने वाली बात है कि विकसित देशों ने विकासशील देशों को वित्तीय सहायता मुहैया कराने की प्रतिबद्धता भी जताई है। इस संदर्भ में आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन की एक नई रिपोर्ट इस बात को रेखांकित करती है कि वर्षों तक जलवायु वित्त प्रतिबद्धताओं के मामले में पिछड़ने के बाद विकसित देश आखिरकार 2022 में विकासशील देशों के लिए 115.9 अरब डॉलर की राशि जुटाने में कामयाब रहे जो 100 अरब डॉलर के वार्षिक लक्ष्य से अधिक रही। यह लक्ष्य 2020 के लिए तय किया गया था लेकिन दो वर्ष बाद यानी 2022 में इसे हासिल करने में कामयाबी मिली। इस वादे को पूरा करने में हुई देरी के कारण नाराजगी पैदा हुई और विकासशील देशों के मन में भविष्य की जलवायु फंडिंग के वादों को लेकर संदेह भी पैदा हुआ। ऐसे में तय लक्ष्य को पार करने को एक छोटा लेकिन अहम कदम बताया जा रहा है जो विकासशील देशों को जलवायु परिवर्तन से निपटने के क्रम में मजबूती प्रदान करेगा।
वर्ष 2009 में कोपेनहेगन में आयोजित जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में विकसित देशों ने 2020 तक हर वर्ष 100 अरब डॉलर का फंड जुटाने की प्रतिबद्धता जताई थी। इसके बाद 2015 में पेरिस समझौते पर हस्ताक्षर के समय ये देश इस बात पर सहमत हुए कि 2025 तक मिलकर 100 अरब डॉलर की राशि जुटाई जाएगी और उसके बाद एक नया सामूहिक परिमाणित लक्ष्य तय किया जाएगा। यह नया लक्ष्य शायद इस वर्ष अजरबैजान में कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज (COP29) में अपना लिया जाए। वर्ष 2022 में जो कुल राशि जुटाई गई उसमें 80 फीसदी हिस्सेदारी सार्वजनिक जलवायु वित्त (द्विपक्षीय और बहुपक्षीय) की है। निजी जलवायु वित्त हाल के दिनों में तेजी से बढ़ा है लेकिन अभी भी यह सार्वजनिक स्रोतों से हासिल फंड की तुलना में काफी कम है। कुल जलवायु वित्त का करीब 60 फीसदी उत्सर्जन कम करने के उपायों पर केंद्रित है। खासतौर पर ऊर्जा और परिवहन क्षेत्र में। जलवायु अनुकूल उपायों को अपनाने के लिए जुटाई गई राशि काफी कम है।
बहरहाल, अधिकांश सहयोग ऋण के रूप में है, न कि अनुदान और इक्विटी निवेश के रूप में। यह जलवायु न्याय की अवधारणा के खिलाफ है। जलवायु वित्त का अधिकांश हिस्सा चूंकि ऋण के रूप में है इसलिए इसका बड़ा अंश गैर रियायती प्रकृति का है। इससे अधिकांश क्षेत्रों और आय समूहों पर ऋण का दबाव बढ़ता है। विकासशील देशों में भी कम और मध्य आय वाले देश इसके मुख्य लाभार्थी बने रहते हैं। उसके बाद उच्च मध्य आय वाले देश आते हैं। दुर्भाग्यपूर्ण बात यह भी है कि 100 अरब डॉलर प्रति वर्ष की राशि पेरिस समझौते के अनुरूप जलवायु लक्ष्य हासिल करने में विकासशील देशों की कुछ खास मदद नहीं करती नजर आती। संयुक्त राष्ट्र के जलवायु परिवर्तन कन्वेंशन के वित्तीय मदद संबंधी ताजा विश्लेषण के मुताबिक विकासशील देशों को 2030 तक करीब छह लाख करोड़ डॉलर की आवश्यकता होगी। यह राशि भी उनके मौजूदा राष्ट्रीय निर्धारित सहयोग की आधी जरूरत ही पूरी कर पाएगी।
स्पष्ट है कि 100 अरब डॉलर का लक्ष्य जरूरत पर आधारित नहीं था। इसके बजाय इसने एक राजनीतिक प्रतिबद्धता के रूप में काम किया जिसने विकासशील देशों को सहायता प्रदान करने की विकसित देशों की प्रतिबद्धता को चिह्नित किया। जीवाश्म ईंधन परियोजना को वित्तीय मदद भी जारी है। इस क्षेत्र में नई कंपनियों को सालाना एक लाख करोड़ डॉलर तक की राशि दी जा रही है। इससे जलवायु वित्त पोषण को लेकर प्रश्न पैदा होते हैं। विभिन्न देशों के लिए यह आवश्यक है कि वे पहले पर्यावरण के लिए नुकसानदेह परियोजनाओं के बारे में कुछ बुनियादी बातों पर सहमति बनाएं। इसमें डॉलर में राशि से लेकर हर देश की हिस्सेदारी तक शामिल हैं।
Date: 04-06-24
सबक सीख आगे बढ़े चुनाव आयोगओपी रावत, ( पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त )
किसी भी निर्वाचन-प्रक्रिया का अंतिम अहम हिस्सा है मतगणना। चुनाव आयोग ने इसके बारे में बहुत विस्तार से दिशा-निर्देश जारी किए हैं, जिनको समयानुकूल अपडेट भी किया जाता रहा है। इस बार नतीजों से एक दिन पहले आयोग ने प्रेस कॉन्फ्रेंस भी की, जिसमें मतदाताओं की संख्या बताने के साथ-साथ सुचारु मतगणना-कार्य को लेकर चर्चा की गई। दो सीख मिलने की बात भी मुख्य चुनाव आयुक्त ने कही, जिनमें पहली है- तेज गरमी में मतदान नहीं कराना चाहिए था, बल्कि इसे एक महीना पहले खत्म किया जा सकता था। और दूसरा सबक, आयोग अपने खिलाफ तैयार किए जा रहे फेक नैरेटिव से अब किस तरह लड़ेगा।
इस संवाददाता सम्मेलन की जरूरत इसलिए भी महसूस हुई, क्योंकि वोटर टर्नआउट, यानी मतदाताओं की असली संख्या को लेकर बार-बार सवाल उठे हैं। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि इस बार चुनाव आयोग ने ‘वोटर टर्नआउट’ नामक एक एप बनाया, जिसके जरिये मतदान के आंकड़े तत्काल मुहैया कराने के दावे किए गए थे। यह फॉर्म 17-सी जैसा था, जिसमें मतों का पूरा लेखा होता। इस एप को लेकर लोगों में शुरू-शुरू में उत्साह तो खूब रहा, लेकिन यह समय पर अपडेट नहीं हो सका, क्योंकि मतदानकर्मियों की पहली प्राथमिकता चुनाव कराने की होती है और उनको बाकी काम तुलनात्मक रूप से कमतर लगते हैं। चूंकि एप में आंकड़े अपडेट नहीं हुए, और आंकड़े भी कभी प्रतिशत, तो कभी अंक में दिए गए, इसलिए मत-प्रतिशत को लेकर कुछ विवाद पैदा हो गया।
निस्संदेह, फॉर्म-17(सी) किसी चुनाव का काफी महत्वपूर्ण दस्तावेज होता है, क्योंकि इसी से तय होता है कि मतदान-केंद्र पर जो ईवीएम इस्तेमाल की गई, वह सही है और उसमें उतने ही वोट पड़े हैं, जितने की गिनती हुई है। यह ‘क्रॉस चेकिंग’ का बड़ा औजार है। चूंकि चुनाव आयोग पर कोई सवाल न उठे, इसलिए यह अनिवार्य किया जाता है कि फॉर्म-17 (सी) और डाले गए वोटों का मिलान हो और सभी काउंटिंग टेबल पर तमाम एजेंट इससे पूरी तरह संतुष्ट हों। हां, यदि ईवीएम सही परिणाम नहीं दिखा पा रही, तो उसे रिटर्निंग ऑफिसर, यानी पीठासीन अधिकारी को वापस सौंप दिया जाता है, लेकिन अन्य टेबलों पर ईवीएम से वोटों की गिनती बदस्तूर जारी रहती है। अंत में, जब प्रत्याशियों की हार-जीत का अंतर उस ईवीएम में पड़े कुल वोटों से अधिक पाया जाता है, तो उसे किनारे कर दिया जाता है, अन्यथा उसमें दर्ज आंकड़ों को फिर से जुटाने की कोशिश होती है।
मतगणना का कार्य बहुत ही संवेदनशील होता है। मतगणना-स्थल पर तनाव कम करने के हरसंभव प्रयास किए जाते हैं। गड़बड़ी दिखते ही उसके निराकरण की तत्काल व्यवस्था की जाती है। सुप्रीम कोर्ट ने भी इसीलिए सभी निर्वाचन-क्षेत्रों के हर विधानसभा क्षेत्रों के पांच मतदान-केंद्रों पर वीवीपैट के मिलान की व्यवस्था की है। यह काम बहुत मुस्तैदी से किया जाता है। यहां तक कि वीवीपैट पर्चियों को उन स्थानों पर गिना जाता है, जहां तेज हवा का झोंका न आए, क्योंकि छोटी-छोटी पर्चियां हवा में उड़ सकती हैं और संबंधित मतदान केंद्र पर पड़े वोटों की संख्या से मिलान प्रभावित हो सकता है। इससे चुनाव आयोग की विश्वसनीयता पर सवाल खडे़ हो सकते हैं, इसलिए आयोग इसको लेकर विशेष संजीदा रहता है।
पहले चुनाव मतपत्रों से होते थे, तो सुबह आठ बजे से शुरू हुई मतगणना अगले दिन सुबह चार बजे तक भी चलती रहती थी। उस समय मतपत्रों की गिनती सीधे नहीं होती थी, बल्कि मतपेटियों से सभी मतपत्रों को एक जगह निकालकर 25-25 का बंडल बनाया जाता था और फिर उसे आपस में मिलाकर हर टेबल पर बांट दिया जाता था। इससे यह पता नहीं चल पाता कि किस मतदान-केंद्र का मतपत्र किस टेबल पर आया है। यह बेशक एक लंबी और थकाऊ प्रक्रिया थी, पर ऐसा करना अनिवार्य समझा गया था, क्योंकि जब टीएन शेषन मुख्य चुनाव आयुक्त थे, तो उन्होंने यह महसूस किया था कि विजेता प्रत्याशी आमतौर पर उन मतदान-केंद्रों के मतदाताओं के प्रति रूखा व्यवहार रखता था, जहां से उसे कम वोट मिले होते हैं। विजेता प्रत्याशियों की इसी दुर्भावना की काट उन्होंने मतपत्रों को आपस में मिलाने और 25-25 के बंडल में हर टेबल पर बांटने के रूप में निकाली थी।
वैसे, मतों की गिनती के इस कार्य में मील का पत्थर सिर्फ यही एक प्रयास नहीं है। पहले के दो आम चुनावों में, यानी 1952 और 1957 के लोकसभा चुनावों में उम्मीदवारों के नाम की मतपेटी रखी जाती थी और मतदाता अपने चुनिंदा प्रत्याशी की मतपेटी में पर्ची गिरा देते थे, जिनकी गिनती करके नतीजे का एलान किया जाता था। बाद में मतपत्रों की व्यवस्था की गई, लेकिन शुरुआती दौर में मतदान-केंद्रों के आधार पर मतपत्रों की गिनती होती थी, जिसे टीएन शेषन ने बदल दिया। ईवीएम ने मतगणना के कार्य को काफी आसान बना दिया। इसमें छह-सात घंटों में ही परिणाम आने लगा। इसके बाद सुब्रमण्यम स्वामी की एक याचिका के बाद वीवीपैट की व्यवस्था शुरू हुई, ताकि मतदाता को पता चल सके कि उसने जिस प्रत्याशी के नाम का बटन दबाया है, वोट उसे ही मिला है। फिर, हरेक विधानसभा क्षेत्र के एक मतदान केंद्र की वीवीपैट पर्ची मिलाने की व्यवस्था की गई, जिसे बढ़ाकर अब प्रत्येक विधानसभा क्षेत्र के पांच-पांच मतदान केंद्रों तक कर दिया गया है।
जब मुकाबला कड़ा होता है, तब मतों की गिनती काफी चुनौतीपूर्ण कसरत मानी जाती है। आयोग पर इसकी जवाबदेही बढ़ जाती है कि प्रत्याशियों के संदेह का तत्काल निराकरण हो। आयोग इसमें सफल रहा है, इसलिए उसकी साख पूरी दुनिया में है। जितने मत यूरोप व अमेरिका में डाले जाते हैं, उनसे कहीं अधिक भारत में मतदान होता है। यहां पश्चिमी देशों की तरह मतदाताओं में साक्षरता नहीं है, फिर भी हमारे यहां चुनाव ऐतिहासिक होते हैं और सभी पार्टियां नतीजों को स्वीकार करती हैं। नतीजों के खिलाफ याचिकाएं भी नाममात्र की डाली जाती हैं। इसकी वजह यही है कि आयोग आपत्तियों का निपटारा करने में सक्षम है। इस बार भी यदि किसी प्रत्याशी को आपत्ति हो और वह प्रथम दृष्टया अपने आरोपों का तथ्यात्मक आधार देने में सफल होता है, तो उसकी शिकायत पर पीठासीन अधिकारी तत्काल कार्रवाई करेगा। संतुष्ट न होने पर चुनाव आयोग को प्रतिवेदन भी भेजा जा सकेगा।
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हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को अंतरिम जमानत दी है। इस निर्णय के पीछे उच्चतम न्यायालय ने जो कारण दिए हैं, उस पर कुछ बिंदु –
कुल मिलाकर, न्यायालय ने लोकतंत्र के हितों को अन्य मुद्दों से ऊपर रखकर सही किया है।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 11 मई, 2024
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Date: 03-06-24
Fewer women are being hired for leadership positionsLinkedIn’s Economic Graph data show that representation of women across the workforce has declinedWhile representation of women across the workforce has increased over the years, LinkedIn’s Economic Graph data show that progress has stalled since 2022 and declined in 2024. Also, the progress that was being made in promoting women to senior and leadership roles has stagnated in recent years.
Most women in senior positions are employed in sectors such as healthcare, education, administrative, and support services. The number of women employed across all positions is poor in the manufacturing, construction, oil and gas industries. LinkedIn found these trends from self-reported data by more than 1 billion members across 41,000 skills in 68 million companies and 1,35,000 schools globally.
Chart 1 shows representation of women in the overall workforce and in senior positions over the years. Women’s representation in the overall workforce increased from 23.9% in 2016 to 27.3% in 2022. It stayed the same in 2023 before decreasing to 26.8% in 2024. The 2024 data are based on the position of women in the month of January.
A similar trend was also seen in the representation of women in senior leadership positions. The promotion of women to higher roles has been snail-paced. It took four years (2016 to 2019) for the share of women in senior positions to go up by one percentage point and another four years (2019 to 2022) for it to go up by another point. If the downturn seen in January 2024 persists throughout the year, even this slow-paced increase will cease.
The stagnation in the share of women in senior positions and the dip in January this year can be attributed to the slowdown in fresh hires of women for leadership roles, data show. The share increased from 18.8% in 2016 to 25.2% in 2021 and declined after that. “LinkedIn Economic Graph data shows that despite progress, women still face obstacles in reaching leadership roles due to bias, societal norms, and structural barriers. However, recent focus on ‘women-led development’ has led to concerted efforts by both policymakers and business leaders to tackle these challenges,” said Aditi Jha, LinkedIn India Board Member and Country Head, Legal and Government Affairs.
An industry-wide look at the share of women in senior leadership positions shows that even the gradual rise was limited to certain sectors. The entry and career progression of women were lowest in the oil, gas and mining, construction, utilities, wholesale, manufacturing, transportation and real estate sectors (Chart 2). In these sectors, there were just 11%-14% women in leadership roles. The oil industry had the lowest share of women in top positions — just around 11%.
In accommodation and food services, financial services, retail, technology, and media, the representation of women in senior roles was between 15% and 20% (Chart 3).
In administrative and support services, healthcare and hospitals, consumer services, government administration, and education, the share of women was between 22% and 30% (Chart 4). The share of women in senior positions was highest in the education sector (30%).
Data in the report also show that laws such as the Companies Act, 2013, which mandates women directors on company boards, are not being followed strictly. Between April 2018 and December 2023, 507 companies were fined for flouting this norm. Of them, 90% were listed companies.
Date: 03-06-24
वास्तविक जीवन बनाम आभासी रिश्तेमोनिका शर्मा
लोगों के सार्वजनिक और निजी जीवन को लेकर मनमानी बातें करने की प्रवृत्ति अब आम लोगों के लिए भी परेशानी का सबब बन गई है। हमारे सामाजिक-पारिवारिक परिवेश में किसी व्यक्ति के गलत या सही विचार-व्यवहार को लेकर टीका-टिप्पणी करने की आदत सदा से जीवन को दूभर कर देती रही है। किसी घटना-दुर्घटना के सभी पक्षों को जाने-समझे बिना तानों-उलाहनों की बौछार करने में पराए ही नहीं, अपने भी नहीं चूकते। पहले से ही परिस्थितिजन्य पीड़ा के शिकार किसी इंसान या परिवार को ठेस पहुंचाने के इस व्यवहार को अब तकनीकी मंचों ने और विस्तार दिया है। देखने में आता है कि सहज से वाकये को भी विवादास्पद बनाकर आभासी माध्यमों पर होने वाले संवाद में हद दर्जे तक विद्रूप बना दिया जाता है। आभासी दुनिया में ‘ट्रोलिंग’ कहा जाने वाला यह बर्ताव लोगों को आत्महत्या करने के हालात तक ले जा रहा है।
बीते दिनों तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई में ‘ट्रोलिंग’ से परेशान होकर एक आइटी पेशेवर मां ने खुदकुशी कर ली। गौरतलब है कि तैंतीस वर्षीय महिला की बच्ची गोद से फिसलकर गिरी और छज्जे पर अटक गई। आस-पड़ोस के लोगों ने पंद्रह मिनट की मशक्कत के बाद बच्ची को तो बचा लिया, पर उस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर प्रसारित हो गया। उसके बाद आभासी दुनिया में लोग महिला को खरी-खोटी सुनाने के लिए टूट पड़े। उसकी ‘ट्रोलिंग’ शुरू हो गई। किसी ने लापरवाह मां कहा, तो किसी ने बच्ची का ढंग से खयाल रखने की रूखे शब्दों में सलाह दी। स्थिति ऐसी बना दी गई कि घटना के बाद महिला अवसाद में चली गई। जबकि यह घटना जान-बूझकर की गई किसी गलती का परिणाम नहीं थी। लोगों ने यह क्यों नहीं समझा कि एक शिक्षित-सजग मां अपनी बच्ची की देखभाल में लापरवाही क्यों बरतेगी? क्यों लोगों के पास उसे कोसने की अंधी दौड़ में इस घटना के कारण को लेकर सोचने तक का अवकाश नहीं था? विचारणीय है कि ऐसा हादसा किसी के भी साथ हो सकता है। इस घटना का सबसे पीड़ादायी पक्ष यह है कि बिना गलती की सजा के रूप में दिए गए तानों-उलाहनों ने एक मासूम बच्ची से उसकी मां छीन ली। हालांकि इस मासूम की कुशलता और बचाव के लिए साझा प्रयास किए जा रहे हैं, पर ऐसी सोच को लेकर अनगिनत प्रश्न भी मौजूद हैं।
हाल के वर्षों में अधिकतर आभासी माध्यम आक्षेप, आरोप और उपहास का अड्डा बन गए हैं। आम लोग भी जीवन से जुड़ी किसी घटना-दुर्घटना के कारण बेवजह सलाह-मशविरा के नाम पर ‘ट्रोलिंग’ की जद में आ जाते हैं। बात का बतंगड़ बनाने का यह व्यवहार सचमुच जीना मुहाल करने वाला है। अपमान और उपहास का ऐसा मेल, किसी की भी मन:स्थिति को बिखेर सकता है। सहज-सी तस्वीर हो या कोई पारिवारिक आयोजन, सामाजिक जीवन से जुड़ा कोई वाकया हो या व्यक्तिगत सोच, आपसी जुड़ाव के लिए अस्तित्व में आए सोशल मीडिया मंचों पर होने वाली ‘ट्रोलिंग’ एक दुखदायी समस्या बन गई है। कुछ समय पहले उत्तर प्रदेश दसवीं बोर्ड परीक्षा में अव्वल आई एक बच्ची को उसके चेहरे पर दिख रहे बालों को लेकर सोशल मीडिया पर खूब ‘ट्रोल’ किया गया। दुर्भाग्यपूर्ण ही कहा जाएगा कि एक छात्रा द्वारा हासिल किए गए अंक, साल भर की मेहनत और अकादमिक प्रतिबद्धता पर ध्यान देने के बजाय सोशल मीडिया मंचों पर समाज के एक बड़े तबके ने अजीबो-गरीब बातें लिखीं। सफलता के लिए जिस बच्ची की सराहना की जानी चाहिए थी, लोग उसके चेहरे में ही मीनमेख निकालने लगे। उसके चेहरे पर दिख रहे बालों को लेकर मजाक बनाने वाली तस्वीरें और टिप्पणियां सोशल मीडिया पर छा गईं। किसी के व्यक्तिगत जीवन पर टीका-टिप्पणी करने का यह अमानवीय बर्ताव आखिर क्यों और कैसे जड़ें जमा रहा है? क्यों तकनीकी सुविधाओं ने आभासी संसार में रमे लोगों को इतना बेसुध कर दिया है कि चर्चित चेहरों के ही नहीं, आम लोगों के व्यक्तिगत जीवन में भी मीनमेख निकालने लगे हैं?
अब न किसी के दुख को समझने का भाव दिखता है और न ही सहज स्थितियों से सामने आए किसी सुखद परिणाम की स्वीकार्यता, जिसके चलते अर्थहीन कहासुनी का परिणाम किसी का जीवन छीन लेने की भयावह परिस्थितियां बना रहा है। दरअसल, ‘आनलाइन’ चर्चाओं का सार्थक भाव कहीं खो गया है। अर्थपूर्ण संवाद का स्थान संवेदनहीनता और नफरत की विकृत मानसिकता ने ले लिया है। दुखद यह भी है कि यह सब अपरिचित लोगों के साझा संवाद में हो रहा है। अधिकतर अनजाने-अनदेखे चेहरों को इस घृणा और बेवजह गरियाने की मानसिकता का शिकार बनाया जाता है। ऐसा बेनाम चेहरा, जो किसी व्यक्ति या समूह को प्रतिक्रिया देने के लिए उकसाने के उद्देश्य से जानबूझकर किसी बहस की शुरुआत करता है। इतना ही नहीं, भड़काऊ या आक्रामक टिप्पणियां देते हुए आभासी दुनिया में एक भीड़ को इस संवाद का हिस्सा बना लेता है। बहुत से लोग बिना सोचे-समझे अपमान, उकसावे और धमकी भरी भाषा की बमबारी करने वाली इस मुहिम का हिस्सा बन जाते हैं।
भारत ही नहीं, दुनिया के हर हिस्से में क्षेत्र विशेष की जानीमानी हस्तियां लंबे समय से इस तरह के व्यवहार झेलती आई हैं। हाल के वर्षों में आम हो या खास, हर कोई नकारात्मक मानसिकता वाले ऐसे लोगों के निशाने पर आने लगा है। किसी को क्रोधित करने, आत्महीनता लाने या अपराधबोध जगाने के उद्देश्य से की जाने वाली टिप्पणियां और प्रतिक्रियाएं अब आए दिन सोशल मीडिया में देखने को मिलती हैं। विडंबना है कि यह आनलाइन दुर्व्यवहार इसके शिकार लोगों की मुश्किलें असली संसार में भी बढ़ा देता है। कई लोग भावनात्मक रूप से चोट पहुंचाने वाली भीड़ के इस विवेकहीन व्यवहार से व्यथित-विचलित होकर आत्महत्या जैसा कदम उठा लेते हैं। करीब दस साल पहले सिडनी की सैंतालीस वर्षीय टीवी प्रस्तोता चार्लोट डासन ‘ट्रोलिंग’ की पहली शिकार बनी थीं।
अध्ययन बताते हैं कि उम्र के नाजुक मोड़ पर खड़े किशोरों में बढ़ती आत्महत्या के मामलों से ‘ट्रोलिंग’ और आनलाइन नकारात्मकता का गहरा संबंध है। कुछ समय पहले उज्जैन के सोलह वर्षीय ‘सोशल मीडिया इंफ्लुएंसर’ ने भी ट्रोलिंग से परेशान होकर खुदकुशी कर ली थी। महिलाओं को तो हर बात में ही ‘ट्रोलिंग’ का शिकार बना दिया जाता है। कभी शारीरिक बनावट को लेकर तानेबाजी की जाती है तो कभी किसी स्त्री के विचारों को लेकर उलाहने दिए जाते हैं। कुल मिलाकर, आभासी उत्पीड़न का यह घेरा निशाने पर आए इंसान को बेचैन करने वाला वातावरण बना देता है। ऐसे में, किसी भी विषय, घटना या दुर्घटना को लेकर कुछ कहने से पहले ठहराव के साथ उसे समझना-जानना आवश्यक है। मानवीय समझ और सरोकारी सोच ही इस दुर्भाव को रोक सकती है। बेहद जरूरी हो चला है कि लोग तकनीक से मिली सुविधाओं को सनक न बनाएं।
Date: 03-06-24
होनहार होने की कसौटीसतीश सिंह
मौजूदा समय में शिक्षा और कौशल विकास के बीच तालमेल नहीं दिख रहा है। शिक्षा के माध्यम से कौशल का विकास होना चाहिए, लेकिन ऐसा नहीं हो पा रहा है। हमारे अकादमिक कल-कारखानों से लाखों की संख्या में डॉक्टर, इंजीनियर, एमबीए आदि की भारी-भरकम डिग्रियां लेकर युवा निकल रहे हैं, लेकिन उनमें से अधिकांश कौशलयुक्त एवं ज्ञानवान नहीं हैं। ऐसे लोग किसी भी कार्य को कुशलतापूर्वक अंजाम तक नहीं पहुंचा पाते, लेकिन होनहार के लिए रोजगार की कमी नहीं है।
तकनीकी एवं व्यावहारिक ज्ञान रखने वाले, भले ही डिग्री एवं अंग्रेजी के मामले में पीछे होते हैं, लेकिन वे हर किस्म की मुश्किलों को आसानी से सुलझा सकते हैं क्योंकि किसी कार्य को करने के लिए डिग्री से ज्यादा कौशल की जरूरत होती है। कौशल को विकसित करके युवा बिना किसी डिग्री के भी हर कार्य कुशलतापूर्वक कर सकते हैं। हमारे देश के स्कूल और कॉलेज के अध्यापकों का मानना है कि जो बच्चा लगातार हर परीक्षा में अव्वल आ रहा है, उसी को सिर्फ होनहार माना जा सकता है, जो छात्र इस कसौटी पर खरा नहीं उतर पाते हैं, उन्हें कम अक्ल माना जाता है। इसमें दो मत नहीं हैं कि स्कूल-कॉलेजों में प्राप्त अच्छे अंक छात्र-छात्राओं की पढ़ाई के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को दर्शाते हैं किंतु इसका मतलब कदापि नहीं है कि हम इसे मेधावी होने या न होने का प्रमाण मानें। किसी विषय में कम या ज्यादा अंक प्राप्त करने से किसी भी छात्र को मेघावी या कमअक्ल नहीं माना जा सकता। हर विषय में हर छात्र की रुचि का होना जरूरी नहीं है। महान वैज्ञानिक थॉमस अल्वा एडिसन की रुचि केवल भौतिक विज्ञान में थी । महान वैज्ञानिक अल्बर्ट आइंस्टीन की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। लता मंगेशकर की भी गणित या विज्ञान में रुचि नहीं थी। सचिन तेंदुलकर या महेंद्र सिंह धोनी का अकादमिक रिकॉर्ड बहुत खराब रहा है, लेकिन वे अपने क्षेत्र में महान हैं।
दरअसल, यहां फंडा ‘जब जागा तभी सवेरा’ वाला है। जिन छात्रों के अंदर जीवन में सफलता हासिल करने की जिजीविषा जागृत हो जाती है वे हर कक्षा में तृतीय या द्वितीय श्रेणी से उत्तीर्ण होने के बावजूद आईएएस की परीक्षा में शीर्ष 20 या 50 में स्थान बनाने में सफल हो जाते हैं। बारहवीं फेल फिल्म में एक ऐसे ही युवा की कहानी फिल्माई गई है। फिल्म ‘थ्री इडियट’ में दिखाए गए दर्शन को भी हम नकार नहीं सकते। जरूरी नहीं कि हर बच्चा इंजीनियर या डॉक्टर बने। दुनिया में करने के लिए इतने सारे क्षेत्र हैं कि आप किसी बच्चे को कमतर नहीं मान सकते। बस आपके दृष्टिकोण पर निर्भर करता है कि आप किसे होनहार मानते हैं। भारत में जो बच्चे कॉलेज तक लगातार अच्छे अंक लाकर नौकरी के लिए आवेदन करने लायक अर्हता अंक प्राप्त करने में सफल हो जाते हैं, उन्हें ही जहीन माना जाता है। संघ लोक सेवा आयोग (यूपीएससी) ने 2013 में पहली बार प्रारंभिक और मुख्य परीक्षा के अंकों को सार्वजनिक किया था, जिसमें 1004 अभ्यर्थी सफल हुए थे और शीर्ष स्थान प्राप्त करने वाले प्रत्याशी ने समग्र रूप 53 प्रतिशत अंक हासिल किए थे जबकि अंतिम पायदान पर सफल रहने वाले अभ्यर्थी ने लिखित परीक्षा में 30 प्रतिशत अंक प्राप्त किए थे। पूर्व में धारणा थी कि यूपीएससी की परीक्षा में 75 से 80 प्रतिशत से अधिक अंक प्राप्त करने वाले अभ्यर्थी ही सफल होते हैं।
मामला यूपीएससी तक सीमित रहे तो बात समझ में आए। हालात तो इतने बदतर हैं कि बैंक या अन्य निजी तथा सार्वजनिक क्षेत्र के संस्थानों में कर्मचारियों की भर्ती हेतु आयोजित प्रतियोगी परीक्षा में सर्वोच्च स्थान प्राप्त करने वाले अभ्यर्थी 100 तो छोड़िए 60 प्रतिशत अंक भी स्कोर नहीं कर पाते हैं। देश में इंजीनियरिंग, मेडिकल, आईटीआई एवं अन्य रोजगारपरक शिक्षा की शुरुआत जरूर की गई है, लेकिन इन पाठ्यक्रमों की सार्थकता नाममात्र की है, क्योंकि यहां से पढ़कर बाहर निकलने के बाद भी अधिकांश युवा कौशलहीन होते हैं, जबकि हुनरमंद युवा देश के समावेशी विकास को सुनिश्चित करने में आगे रहते हैं। हुनरमंद बेरोजगार नहीं रहता। आसानी से अपने परिवार का भरण-पोषण कर लेता है। बढ़ई, लोहार, प्लंबर, बिजली मिस्त्री, राज मिस्त्री, वाहन की मरम्मत करने वाले कारीगर आदि कभी भूखे नहीं मरते । सरकार को कर भी देते हैं, और देश के अर्थ चक्र को गतिमान भी रखते हैं। अस्तु, आज सरकार को डिग्री बांटने की जगह युवाओं को हुनरमंद बनाने पर जोर देना चाहिए और योग्यतानुसार रोजगार उपलब्ध कराने की दिशा में अग्रतर कार्रवाई करनी चाहिए क्योंकि सभी के ज्ञान का स्तर एक समान नहीं होता पर निरंतर मेहनत सभी कर सकते हैं। मामले में अंकों की बाजीगरी की तह तक पहुंचने की भी आवश्यकता है। ऐसा होता है तो सरकार और लोग स्वतः कौशल विकास को प्राथमिकता देंगे।
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संयुक्त राष्ट्र का धारणीय विकास लक्ष्यों पर सम्मेलन 2018-19 में न्यूयार्क में हुआ था। इसमें लक्ष्यों की ओर किए जाने वाले विकास की समीक्षा हुई थी। एजेंडा- 2030 के 17 धारणीय विकास लक्ष्यों में से कुछ को 2030 तक पूरा किया जाना है।
इसकी धीमी विकास गति पर कुछ बिंदु –
1) एस डी जी के वादों को पूरा करने के लिए सात साल की त्वरित, निरंतर और परिवर्तनकारी कार्रवाईयों के लिए सरकार की प्रतिबद्धता।
2) त्वरित प्रगति प्रदान करने के लिए राष्ट्रीय और उपराष्ट्रीय क्षमता, जवाबदेही और सार्वजनिक संस्थानों को मजबूत करना।
3) असमानता को कम करना। महिलाओं और अन्य कमजोर लोगों के अधिकारों को मजबूत बनाने पर ध्यान केंद्रित करना। गरीबी-उन्मूलन के लिए ठोस, एकीकृत और लक्षित सरकारी नीतियां बनाना, और उनका कार्यान्वयन करना।
4) विकासशील देशों की सहायता के लिए संसाधन प्रदान करना।
5) संयुक्त राष्ट्र विकास प्रणाली को निरंतर मजबूत करना।
संयुक्त राष्ट्र विकास लक्ष्यों की विकासगति की जांच पर आधारित परिणाम –
1) 64 विद्वानों की एक टीम ने गरीबी उन्मूलन, सामाजिक न्याय और पर्यावरण संरक्षण की चुनौतियों को राष्ट्रीय और वैश्विक प्रशासन के स्तर पर सुलझाने के लिए अध्ययन किया। इन्होंने निष्कर्ष निकाला कि विकास लक्ष्यों का अब तक विवादास्पद प्रभाव रहा है। कुल मिलाकर, धारणीय विकास लक्ष्यों के अभी तक के प्रभाव परिवर्तनकारी नहीं पाए गए हैं।
2) संयुक्त राष्ट्र की अन्य रिपोर्ट ने बताया है कि 2030 एजेंडा की वास्तविक परिवर्तनकारी क्षमता को एक व्यवस्थित दृष्टिकोण के माध्यम से महसूस किया जा सकता है। यह व्यवस्थित दृष्टिकोण ऐसे वैश्विक एक्शन की मांग करता है, जिसमें शासन, अर्थव्यवस्था और वित्त, व्यक्तिगत और सामूहिक कार्रवाई और विज्ञान प्रौद्योगिकी के माध्यम से राष्ट्रीय और स्थानीय प्राथमिकताओं को संबोधित किया जा सके। इसे ‘हमारा साझा भविष्य’ की तरह देखा जाना चाहिए।
2024 वर्ष दुनिया भर में चुनाव का वर्ष है। कम से कम 64 देशों में रहने वाली विश्व की 49% जनता अपना नेता चुनेगी। सभी नव-निर्वाचित सरकारों के लिए यह महत्वपूर्ण है कि वे संयुक्त राष्ट्र के लक्ष्यों को लेकर चलें।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित श्रीकुमार चट्टोपाध्याय के लेख पर आधारित। 4 मई, 2024
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अमेरिका और चीन के बीच लंबे समय से लगातार तनाव की स्थिति बनी हुई है। ऐसे में ताइवान अपने लगभग सभी उपक्रम भारत में शिफ्ट करना चाहती है। उल्लेखनीय है कि दुनिया का यह छोटा सा देश ताइवान विश्व को 90% चिप की आपूर्ति करता है।
लेकिन ताइवान के मन में कुछ हिचकिचाहटें भी हैं। उसने भारत के सामने अपनी चार शिकायतें रखी हैं, जो इस प्रकार हैं-
1) भारत का जटिल प्रशासनिक ढाँचा; यानि कि नौकरशाही। इसके कारण प्रोजेक्ट के पूरा होने में अनावश्यक रूप से बहुत देरी हो जाती है।
2) अनुभवी इंजीनियर्स की कमी के कारण काम कराने में बहुत दिक्कत होती है।
3) चिप निर्माण के काम में आने वाले सहायक उपकरणों पर आयात शुल्क काफी अधिक है। इसके कारण उत्पाद की लागत बढ़ जाती है।
4) कमजोर इन्फ्रास्ट्रक्चर के कारण गतिशीलता एवं संचार व्यवस्था में काफी परेशानियां होती हैं।
यद्यपि सरकार ने इसके लिए एक समर्पित टास्क फोर्स; इंडिया सेमी-कंडक्टर मिशन का गठन किया है। तथा टाटा-पीएसएमसी के संयुक्त प्रयास से पहली फाउंडी तैयार हो रही है।
फिर भी ताइवान कम्पनियों की इन चिंताओं को दूर करना आवश्यक है।
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Date: 01-06-24
Look At Job MarketConsumption growth is half of GDP’s. That’s worryingTOI Editorials
India’s GDP growth for Jan-Mar quarter and also 2023-24 was higher than what most economists and even GOI’s statistics ministry forecast. GDP for 2023-24 expanded 8.2% to ₹173.8L cr, while the fourth quarter growth was 7.8%. The economy is doing well, with GDP receiving an unexpected boost from the relatively low economy-wide inflation rate, or deflator, of 1.4%. It’s also led to a surge in manufacturing growth.
Upside | Public investment is arguably the most important catalyst for economic growth today. Led by it, the overall fixed investment in 2023-24 expanded by 9% to ₹58.3L cr. Along with it, manufacturing has started firing. It grew 9.9% in 2023-24 to record ₹27.5L cr.
Challenges | Robust GDP growth hasn’t necessarily made decision-making easier for RBI and GOI. GVA growth, which measures supply side, has lagged GDP growth by a relatively large extent of over a percentage point in the last two quarters of 2023-24. Also, the large difference between the deflator and retail inflation complicates both monetary and fiscal policymaking.
Downside | The most puzzling aspect of GDP data is the weak growth rate of private consumption. This component grew 4% in 2023-24, growing at less than half the pace of total output. This may be on account of the deterioration in the quality of employment. For example, the Jan-Mar GOI urban jobs data showed that the proportion of self-employed has increased by more than a percentage point since the same period in 2022. Poor quality of jobs can be a drag on GDP.
Date: 01-06-24
India, the Choice For Global Talent?Plan an immigration policy for high-end labourET Editorials
India’s population will peak after most developed nations. That will make it a late entrant into the market for migrant labour. It will face a settled world order of labour movement to economies now ageing. These countries have the advantage of established welfare systems and decades of structured immigration. India has neither. However, it offers opportunities to foreign workers in high-end manufacturing, services and the knowledge economy. This bridges some of the domestic skills gap that weighs on the economy’s potential to grow. It also smoothens India’s economic transition to an adverse age-dependency demographic. An immigration policy directed at improving productivity will speed up development and climb the value chain in manufacturing and services faster.
A structured immigration policy has a positive spin-off —it involves creating the ecosystem that, in effect, arrests migration. This means creating an academic and research environment to compete with those that draw Indians abroad. These institutions then have to feed into industry that creates the right kind of jobs. Social security needs to be upgraded alongside improved cultural assimilation. The fiscal effects are broadly positive — in India’s case, the hurdle may be higher to harmonise the social and economic environments. All the more reason to plan early for the eventuality of Indians growing old before they become rich.
Tech is bringing forward timelines. AI is set to disrupt the job market just about the time countries reach a critical phase of labour shortages. As competition for talent intensifies, there will be attempts to hoard skills in demand in a post-AI world. India’s advantage in skilling its workforce will diminish in a couple of decades. It should, by then, have established itself as a base for suitable immigrants. The scale of India’s ageing will have to be tackled through tech adaptation and its attendant immigration. This is as good a time to set the ball rolling to make India the country of choice for high-end global talent.
Date: 01-06-24
इजरायल को कमजोर पड़ता समर्थनसंपादकीय
सात महीने पहले शुरू हुई इजरायल-हमास जंग (Israel-Hamas war) अब गतिरोध के स्तर पर पहुंच गई है। वैसे तो दोनों में से कोई भी पक्ष अपने उद्देश्य के करीब भी नहीं पहुंचा है, लेकिन इजरायल की विफलताएं उसके पास मौजूद असंगत सैन्य शक्ति की वजह से काफी बढ़ गई हैं।
इजरायली सेना ने गाजा को मलबे में तब्दील कर दिया है, फिर भी न तो वे हमास को खत्म करने के करीब हैं और न ही, हमास द्वारा अक्टूबर 2023 में अचानक हमला कर बंधक बनाए गए इजरायली नागरिकों को छुड़ा पाए हैं। अमेरिका और यूरोप से आपूर्ति होने वाले अत्याधुनिक हथियारों से गाजा पर हमला करने के बावजूद 129 इजरायली नागरिक बंधक बने हुए हैं और काफी हद तक हमास नेतृत्व को भी कोई नुकसान नहीं पहुंचा है।
हाल ही में रफा (Rafah) से इजरायल में दागे गए रॉकेटों से पता चलता है कि हमास अपनी पीठ पर ईरान का हाथ होने की वजह से मजबूत जवाबी कार्रवाई करने की क्षमता रखता है। इस तरह इजरायल एक विषम गुरिल्ला युद्ध में फंस गया है।
साल 2020 के अब्राहम समझौते (अमेरिका, इजरायल, संयुक्त अरब अमीरात और बहरीन के बीच) के आधार पर एक पश्चिम एशियाई गठबंधन बनाने की अमेरिका की उम्मीदें विफल हो गई हैं क्योंकि फिलिस्तीनियों के साथ इजरायल के व्यवहार के खिलाफ अरब जगत में असंतोष की आवाज ने अरब शक्तियों को पीछे हटने के लिए मजबूर किया है। सबसे बड़ी बात यह है कि अब इजरायल के लिए अंतरराष्ट्रीय समर्थन तेजी से कमजोर पड़ रहा है।
हमास के हमले पर, जिसमें बच्चों सहित 1,200 लोग मारे गए थे और 252 लोग बंधक बनाए गए, करीब पूरी दुनिया की सहानुभूति हासिल कर चुका इजरायल अब गाजा में आक्रामक रुख अपना चुका है।
खबरों के मुताबिक इसकी वजह से 36,000 से ज्यादा आम फिलिस्तीनी लोग मारे जा चुके हैं (जिनमें करीब 15,000 बच्चे थे) और 80,000 से ज्यादा लोग घायल हुए हैं। इसे लेकर काफी आक्रोश है। रफा में इजरायल की सैन्य कार्रवाई की लगभग पूरी दुनिया में आलोचना हुई है, खासकर उस हमले के बाद जिसमें विस्थापित फिलिस्तीनी नागरिकों के लिए बनी एक टेंट सिटी जलकर तबाह हो गई।
इस महीने की शुरुआत में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने एक प्रस्ताव पारित कर फिलिस्तीन के संयुक्त राष्ट्र में शामिल होने के प्रस्ताव को सही ठहराया और सिफारिश की कि सुरक्षा परिषद इस पर अनुकूल तरीके से विचार करे। इस प्रस्ताव के पक्ष में 143 (भारत सहित), विपक्ष में 9 वोट पड़े और 25 सदस्य देश अनुपस्थित रहे।
इसके बाद नॉर्वे, आयरलैंड और स्पेन ने औपचारिक रूप से फिलिस्तीन को एक देश के रूप में मान्यता दे दी। पिछले हफ्ते अंतरराष्ट्रीय आपराधिक न्यायालय (आईसीसी) ने युद्ध अपराधों और मानवता के खिलाफ अपराधों के आरोप में इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू और हमास नेता याह्या सिनवार, दोनों के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट की मांग की थी।
आईसीसी के स्थापना कानून पर इजरायल के यूरोपीय सहयोगियों सहित 124 देशों के दस्तखत हैं। इसके मुताबिक अगर किसी व्यक्ति के खिलाफ वारंट है और वह इन देशों की यात्रा पर जाता है तो वे उसे गिरफ्तार करने के लिए बाध्य हैं।
अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) ने इजरायल के खिलाफ दक्षिण अफ्रीका के द्वारा पिछले साल दाखिल एक मामले में इसी 30 मई को इजरायल को आदेश दिया कि वह गाजा पर अपने सैन्य हमले तत्काल बंद करे।
इसके पहले जनवरी महीने में भी आईसीजे ने इजरायल को आदेश दिया था कि वह गाजा में जंग को रोकने के लिए यथासंभव सभी उपाय करे। वैसे तो इस तरह के बढ़ते टकराव के माहौल में ऐसे आदेशों का पालन कठिन ही है, लेकिन इनमें काफी प्रतीकात्मक शक्ति जरूर है।
इस बीच, अमेरिका में जो बाइडन का फिर से राष्ट्रपति चुना जाना अधर में ही दिख रहा है, क्योंकि इजरायल को हमास के खिलाफ जंग में बिना शर्त समर्थन दिए जाने को लेकर डेमोक्रेटिक पार्टी के भीतर ही मतभेद की स्थिति है।
अमेरिकी विश्वविद्यालय परिसरों में हो रहे विरोध प्रदर्शनों से ऐसा लग रहा है कि सभी नस्ल के युवा मतदाताओं (यहूदी समुदाय सहित) में गाजा में इजरायली कार्रवाई को लेकर गहरी आपत्ति है।
जंग को लेकर इजरायली मंत्रिमंडल में भी फूट पड़ गई है, जिससे यह संभव है कि श्री नेतन्याहू और उनके साथियों को इसकी कीमत चुकानी पड़े। लेकिन गाजा की बरबादी और पश्चिमी तट से बड़े पैमाने पर फिलिस्तीनियों के निष्कासन के साथ, यह संभव है कि दो देशों में विभाजन का समाधान जमीन पर पस्त हो गया हो, जिससे अंतरराष्ट्रीय समुदाय के सामने नई चुनौतियां आ सकती हैं।
Date: 01-06-24
देर आयद दुरुस्त आयदनवल किशोर कुमार
आज के दौर में स्वास्थ्य एक बड़ा सवाल है और इसके लिए आंकड़ों की कोई कमी नहीं है। फिर चाहे वह कैंसर रोगियों की संख्या का मामला हो या फिर हृदय संबंधी रोग से ग्रस्त लोगों की संख्या का यह संख्या कितनी अधिक हो सकती है, उसका अनुमान सिर्फ इसी मात्र से लगाया जा सकता है कि दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में रोजाना 10 से 15 हजार नए मरीज इमरजेंसी से लेकर जनरल ओपीडी में आते हैं।
यह हाल बेशक देश के सबसे बड़े सरकारी अस्पताल का है, लेकिन इसके आधार पर पूरे देश के स्तर पर यदि हम संख्या का अनुमान लगाएं तो हम इस नतीजे पर पहुंच सकते हैं कि आज स्वास्थ्य के मामले में हम कहां खड़े हैं। हालांकि देश में लोगों को स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए सरकार के स्तर पर आधारभूत संरचना मौजूद है। मसलन, सेंट्रल ब्यूरो ऑफ हेल्थ इंटेलिजेंस (सीबीएचआई) द्वारा 2019 में जारी रिपोर्ट के 1 अनुसार भारत में कुल 23,581 सरकारी अस्पताल और 22 सेंट्रल गवर्नमेंट के अस्पताल हैं, लेकिन यह भी उतना ही सच है कि आज के दौर में यह संख्या ऊंट के मुंह में जीरे के समान है और बड़ी संख्या में लोगों को निजी अस्पतालों की शरण में जाना पड़ता है।
इसके अलावा इलाज के खर्चे में हुई गुणात्मक तरीके कारण निम्न आय वर्गीय लोगों को गुणवत्तायुक्त इलाज से वंचित कर दिया है। वहीं मध्यम आय वर्गीय परिवारों के लिए भी यह कम मुश्किलों वाला नहीं रह गया है। ऐसे में स्वास्थ्य के क्षेत्र में बीमा कंपनियों से उसे राहत जरूर मिलती है। मसलन, इलाज का खर्चा बीमा कंपनियां उठाती हैं और इसके बदले इस सुविधा के उपभोगकर्ता को बीमा योजना के तहत एक तय राशि प्रीमियम के रूप में चुकानी होती है, लेकिन बीमा कंपनियों से बीमा का दावा करना अमूमन आसान नहीं होता। दस्तावेज संबंधी कागजातों के निष्पादन के नाम पर अनावश्यक देरो बहुत साधारण सी बात है। लिहाजा होता यह है कि बीमा कराने के बाद भी मरीज को अपने इलाज के लिए प्रारंभ में अपने पैसे से इलाज कराना होता है। इसके कारण उन्हें आर्थिक संकट का सामना तो करना ही पड़ता है, सबसे अधिक संकट समय पर इलाज नहीं होने के कारण होता है। खैर, मध्यम आय वर्गीय लोगों के लिए यह राहत भरी खबर है कि भारतीय बीमा नियामक व विकास प्राधिकरण (इरडाई) ने बीमा कंपनियों की मनमानी पर नकेल कसने के लिए कुछ कदम उठाए हालांकि उसने यह कदम तब उठाए हैं जब ‘लोकल सर्किल्स’ के एक सर्वे का परिणाम सामने आया है, जिसमें 43 प्रतिशत बीमाधारकों ने यह कहा है कि बीमा कंपनियां संकट के समय साथ तो नहीं ही देती हैं, संकट के बाद भी बीमा की राशि देने में आनाकानी करती हैं। इरडाई ने कहा है कि आपात मामलों में बीमा कंपनी को आवेदन प्राप्त होने के एक घंटे के अंदर कैशलेस प्राधिकरण के अनुरोध पर निर्णय लेना चाहिए। बीमाकर्ता कंपनियां इसके लिए आगामी 31 जुलाई तक तैयारी कर लें। इसके अलावा वे चाहें तो कैशलेस ऑथराइजेशन को सुगम बनाने के लिए अस्पताल में डेस्क बना सकती हैं।
ठीक वैसे ही जैसे एयरपोर्ट पर विभिन्न विमानन कंपनियां अपना डेस्क उपभोक्ताओं की सुविधा के लिए बनाती है। इरडाई ने यह भी का हैं कि वे डिजिटल माध्यम से ऑथराइजेशन देने की प्रक्रिया शुरू करें। इसके अलावा उसने बीमा कंपनियों को यह भी कहा है कि अब कोई भी दावा वे प्रोडक्ट मैनेजमेंट कमिटी की मंजूरी के बिना खारिज नहीं की जा सकेगी। यदि कोई दावा आंशिक रूप से या पूरी तरह से खारिज किया जाता है तो पॉलिसी के दस्तावेज के नियमों और शर्तों सहित पूरा विवरण उपभोक्ता को उपलब्ध कराना होगा। इन सबके अलावा इरडाई ने स्पष्ट निर्देश दिया है कि इलाज के दौरान मरीज की मौत होने पर बीमा कंपनियों को
हैं।
एक घंटे के अंदर बीमे की राशि का भुगतान करना होगा और यह भी कि संबंधित अस्पतालों से दस्तावेज संग्रह करने का काम बीमा कंपनियां स्वयं करेंगों, मृतक के परिजन नहीं जाहिर तौर पर ये कुछ ऐसे पहल हैं, जिनसे मध्यम आय वर्गीय परिवारों को राहत मिल सकती है और वे उम्मीद कर सकते हैं कि अपनी गाड़ी कमाई का एक हिस्सा जो वे बीमा कंपनियों को दे रहे हैं. यह जाया नहीं होगा। समय पड़ने पर वह काम आएगा, लेकिन इसमें बड़ी अड़चन यह है कि इरडाई स्वयं इस मामले में लचर रहा है।
ऐसे मामले बहुत कम ही आए हैं. जिनमें बीमाधारकों की शिकायत पर इरडाई ने आगे बढ़कर वीमाकर्ता कंपनियों के खिलाफ कोई कार्रवाई की हो। आज स्वास्थ्य संबंधी बीमा के क्षेत्र में भारतीय जीवन बीमा निगम जैसी देशी कंपनियां तो हैं ही, विदेशी कंपनियां भी हैं। अब यह पूरी तरह से बाजार का रूप ले चुका है। आंकड़ों के रूप में कहें तो आज का भारत वैश्विक स्तर पर 10वां सबसे बड़ा बाजार है और सभी उभरते बाजारों में दूसरा सबसे बड़ा है, जिसका अनुमानित बाजार हिस्सा 1.9 प्रतिशत है। उम्मीद है कि भारत आने वाले दशक में सबसे तेजी से बढ़ते बीमा बाजारों में से एक के रूप में उभरने के लिए तैयार है। वर्तमान में देश में 67 वीमाकर्ता कंपनियां हैं, जिनमें से 24 जीवन बीमाकर्ता, 26 सामान्य वीमाकर्ता हैं, 5 एकल स्वास्थ्य बीमाकर्ता कंपनियां और 12 पुनर्बीमाकती हैं।
हम चाहें तो इस निष्कर्ष पर भी पहुंच सकते हैं कि भारत में बीमा उद्योग ने पिछले दो दशकों में प्रभावशाली वृद्धि दर देखी है, जो निजी क्षेत्र की अधिक भागीदारी और वितरण क्षमताओं में सुधार के साथ साथ परिचालन दक्षता में पर्याप्त सुधार के कारण संभव हो पाई है. लेकिन मूल समस्या उन लोगों की है जो अब भी बीमाधारक नहीं हैं। ये वे लोग हैं जो दिहाड़ी मजदूर हैं, खेतिहर मजदूर हैं या फिर हम चाहें तो इनमें आसंगठित क्षेत्रों के मजदूरों को शामिल कर सकते हैं। इन लोगों की संख्या बहुत बड़ी है। और इनके वास्ते सरकारी अस्पताल हैं, जिनकी गुणवत्ता पर हमेशा प्रश्नचिएन लगा रहता है। देश और राज्यों की राजधानियों के मुख्य अस्पतालों को छोड़ दें तो जिला स्तर पर जो सरकारी आस्पताल मौजूद हैं, वे रेफरल अस्पताल बनकर रह गए हैं। जाहिर तौर पर यह काम हरडाई का नहीं, बल्कि केंद्र और राज्य सरकारों का है, जिन्हें जन स्वास्थ्य को अपनी प्राथमिकता सूची में ऊपर रखना होगा और स्वास्थ्य क्षेत्र पर बाजार को पूर्ण रूप से साथी होने से रोकना होगा। वजह यह कि यह देश जितना उच्च आर्य वर्ग और मध्यम आय वर्ग के लोगों का है, उतना ही निम्न आय वर्ग के लोगों का भी।
Date: 01-06-24
भारत आएगा सोनासंपादकीय
भारत भूमि पर भारतीय रिजर्व बैंक के खजाने में 100 टन से कुछ ज्यादा स्वर्ण का शामिल होना सुखद और गौरवान्वित करने वाली खबर है। यह सोना भारत का ही है और भारतीय रिजर्व बैंक इस सोने को स्वदेश लाकर अपने विभिन्न खजानों में सुरक्षित कर लेगा। जब सोने के स्वदेश लाए जाने की सूचना है, तब साल 1991 की याद स्वाभाविक है, जब मजबूरी में देश को अपना सोना विदेश भेजना पड़ा था। तब कर्ज का जाल भारी हो गया था, लेकिन आज भारत की अर्थव्यवस्था बेहतर प्रदर्शन कर रही है और कर्ज चुकाना अब समस्या नहीं है। ऐसे में, इतने बड़े पैमाने पर विदेश से सोना लाने की प्रशंसा ही की जा सकती है। मार्च के अंत तक रिजर्वबैंक के पास 822.1 टन सोना था, जिसमें से 413.8 टन विदेश में था। वास्तव में, अपना सोना किसी अन्य देश में रखने को बहुत अच्छा नहीं माना जाता है। रिजर्व बैंक शायद संदेश देना चाहता है कि भारत अब शक्तिशाली है और वह अपने सोने की हिफाजत खुद कर सकता है।
भारत का ज्यादातर सोना बैंक ऑफ इंग्लैंड के पास सुरक्षित है और कुछ सोना विदेश में रखना रणनीतिक रूप से ठीक फैसला है। एक खास बात यह भी है कि भारत चालू वित्त वर्ष में ऐसे चंद देशों में शुमार है, जिन्होंने सोना खरीदा है। भारतीय रिजर्व बैंक ने कुछ ही महीनों में 27.5 टन सोना खरीदकर अपने स्वर्ण भंडार में जमा किया है। विगत कुछ वर्षों में भारत ने अपनी सुधरती आर्थिक स्थिति और जरूरत के अनुरूप जो सोना खरीदा है, उसका ज्यादातर हिस्सा विदेश में ही रखा गया है। आर्थिक विशेषज्ञ भी यह मानते हैं कि अनुपात से अधिक सोना विदेश में रखना कोई अच्छा फैसला नहीं है। ध्यान देने की बात है कि साल 1991 में जब भारत पर आर्थिक संकट आया था, तब विदेशी बैंक गिरवी रखे जा रहे भारतीय सोने को भारत में ही रहने दे सकते थे, पर तब शायद भारतीय अर्थव्यवस्था से दुनिया के ज्यादातर देशों को विश्वास कुछ डिग गया था। आज अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर हम ब्रिटेन से आगे निकल गए हैं, तो हमें अपनी नीतियों में गरिमा के अनुरूप परिवर्तन करना ही चाहिए। वैसे, भारत की स्थिति अचानक नहीं सुधरी है। लगभग पंद्रह साल पहले भारत ने अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष से 200 टन सोना खरीदा था। संकेत साफ है, आर्थिक उदारीकरण की नीति अब रंग ला रही है।
सोने का भंडार किसी देश की आर्थिक स्थिरता के लिए महत्वपूर्ण है। जरूरत के समय सोना ही मजबूती देता है या संकट से उबारता है। पहले दुनिया की तमाम अर्थव्यवस्थाएं स्वर्ण मानक को मानती थीं, पर 1970 के दशक में ज्यादातर देशों ने आधिकारिक तौर पर स्वर्ण मानक को छोड़ दिया। फिर भी दुनिया के सभी ताकतवर देशों के पास भारी मात्रा में सोना है। स्वर्ण भंडार के मामले में भारत 822.1 टन के साथ दुनिया में नौवें स्थान पर है और अमेरिका के पास सर्वाधिक 8,133 टन से ज्यादा सोना है। जर्मनी के पास 3,352 टन सोना है। उसके बाद इटली, फ्रांस, रूस, चीन (2,262 टन), स्विट्जरलैंड और जापान का स्थान है। समय के साथ सोने का भाव बढ़ता ही रहा है, बीस साल पहले जो सोना 6,307 रुपये का था, वही सोना आज 73,390 रुपये का हो गया है। जाहिर है, सोने की मांग नहीं घटने वाली, पर ज्यादा से ज्यादा भारतीयों को अपनी बुद्धि और श्रम से सोना खरीदने में सक्षम होना पड़ेगा, तभी देश के स्वर्ण भंडार की खनक-चमक बढ़ेगी।
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बीते कुछ दशकों में सेवा-निर्यात की तीव्र गति भारतीय अर्थव्यवस्था का एक अत्यंत महत्वपूर्ण तथ्य रहा है। इसकी दो सबसे महत्वपूर्ण भूमिका रही हैं –
भारतीय रिजर्व बैंक के अप्रैल 2024 के मासिक रिपोर्ट में प्रकाशित एक शोध में बताया गया है कि पिछले तीन दशकों (1993-2022) के बीच डॉलर के रूप में भारत का सेवा-निर्यात 14 प्रतिशत से अधिक समेकित वार्षिक दर से बढ़ा है।
सेवा निर्यात में भारत की हिस्सेदारी 0.5 प्रतिशत से बढ़कर 4.3 प्रतिशत तक पहुंच गई है।
इसके कारण भारत विश्व में सातवां सबसे बड़ा सेवा निर्यातक देश बन गया, जो सन् 2001 में 24वें स्थान पर था।
इस सफलता का श्रेय निम्न कारणों को दिया जा सकता है –
इन्हीं कारणों से भारत वैश्विक सेवा व्यापार में अपनी प्रतिस्पर्धी क्षमता प्रदर्शित कर सका है, विशेषकर दूरसंचार एवं सूचना प्रौद्योगिकी से संबंधित क्षेत्रों में।
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01 June 2024
प्रश्न – 464 – (अ) वर्तमान में राजनीतिक नेताओं द्वारा किये जाने वाले दल परिवर्तन को आप लोकतंत्र की दृष्टि से किस रूप में देखते हैं? (100 शब्द)
(ब) अंटार्कटिका महाद्वीप पर किस तरह के संकट मंडरा रहे हैं? विश्व पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा? (100 शब्द)
Question – 464 – (a) How do you view the current party changes by political leaders from the point of view of democracy? (100 words)
(b) What kind of crises are looming over the continent of Antarctica? What effect will this have on the world? (100 words)
नोट : इसका उत्तर आपको हमें नहीं भेजना है, यह आपके स्वयं के अभ्यास के लिए है।
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Date: 31-05-24
बढ़ते तापमान का पहला नुकसान खेती को होगासंपादकीय
समाजशास्त्रीय अवधारणा है कि चार हजार साल की सभ्यता को खत्म होने में चंद घंटे लगते हैं अगर दुनिया को पांच वक्त का भोजन न मिले। सारा विकास, नागरिक चेतना, नैतिकता, संस्थाएं, दर्शन, धर्म तभी तक हैं, जब तक यह डर नहीं है कि भविष्य में भोजन पर खतरा हो सकता है। तापमान और कृषि उपज का उलटा रिश्ता है। खेती खुले में होती है और मौसम – सापेक्ष है, लिहाजा अगर औसत तापमान 2 डिग्री भी बढ़ जाए तो दुनिया में गेहूं-धान-दलहन-तिलहन के उत्पादन में 10 प्रतिशत का अंतर आ सकता है। आज दुनिया में कुल खाद्यान्न उत्पादन (2850 मिलियन टन) हमारी सभी किस्म की जरूरतों से इतना अधिक है कि हम उसे सड़ा – जलाकर एथेनोल बनाते हैं और जानवरों को खिलाते हैं ताकि उनका मांस स्वयं खा सकें। लेकिन आबादी बढ़ रही है, पर्यावरण असंतुलन के कारण तापमान बढ़ रहा है और अनाज उत्पादन पर नया खतरा मंडरा रहा है। अधिक उपज के चक्कर में उत्तर भारत के प्रमुख अनाज उत्पादक राज्यों का किसान गेहूं-चावल की खेती में इतने भूगर्भ जल का दोहन करता है कि जमीन की गुणवत्ता घटने लगी है। किसानों की नाराजगी से डरे शासक वर्ग इन फसलों की बुवाई या पानी के दोहन पर अंकुश तक नहीं लगा पा रहे हैं।
Date: 31-05-24
इस बार बेरोजगारी चुनावों में एक निर्णायक फैक्टर हैआरती जेरथ, ( राजनीतिक टिप्पणीकार )
चुनाव नतीजों के बाद अगली सरकार चाहे जिसकी बने, एक बड़ी चुनौती पहले से ही मौजूद है : रोजगारों का सृजन। दो महीने लंबे चुनाव-अभियान के दौरान देश भर के मतदाताओं- खासकर युवाओं ने बेरोजगारी को अपनी सबसे प्रमुख समस्या बताया। बेरोजगारी को एक महत्वपूर्ण चुनावी मुद्दे के रूप में पहली बार इस साल मार्च-अप्रैल में लोकनीति-सीएसडीएस सर्वेक्षण में उठाया गया था। यह सर्वेक्षण मतदान से ठीक पहले हुआ था। इसमें पाया गया कि पिछले चुनावों के विपरीत, इस बार बेरोजगारी एक निर्णायक फैक्टर के रूप में उभरकर सामने आ रही है।
ऐसे में आश्चर्य होता है कि भाजपा ने अपने चुनाव-अभियान में इस मुद्दे पर बात करने की जरूरत नहीं समझी। पार्टी के चुनाव घोषणा-पत्र में 2036 के ओलिंपिक खेलों की मेजबानी से लेकर सभी ट्रेन संबंधी सेवाओं के लिए एक ‘सुपर एप’ बनाने तक के वादे किए गए, लेकिन बेरोजगारी की जमीनी हकीकत से वो मेल नहीं खाते हैं। वास्तव में, केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने तो बेरोजगारी के मुद्दे को ही नकार दिया। हाल ही में एक प्रमुख राष्ट्रीय दैनिक को दिए साक्षात्कार में उन्होंने कहा, ‘दुर्भाग्य से लोगों ने रोजगार को सरकारी नौकरी से जोड़ दिया है। 130 करोड़ की आबादी में किसी भी सरकार के लिए सभी को नौकरी देना असंभव है।’ शाह की बात सही है कि सरकारों के पास रोजगार देने की सीमित क्षमता है। तब निजी क्षेत्र का विस्तार करके इस कमी को पूरा किया जाना चाहिए, खासकर छोटे और मध्यम स्तर के उद्योगों में, जहां अकुशल और अर्ध-कुशल श्रमिकों को समायोजित किया जा सकता है। याद रहे कि देश की वर्कफोर्स में एक बड़ी संख्या ऐसे अकुशल और अर्ध-कुशल कामगारों की ही है।
इसके बावजूद शाह की टिप्पणी कठोर थी, क्योंकि वे एक ऐसी सरकार के शीर्ष नेता की ओर से आई थी, जो 22 करोड़ श्रमिक परिवारों का प्रभावशाली नेटवर्क बनाने पर गर्व करती है। मोदी सरकार ने इन परिवारों को अन्य लाभों के अलावा मुफ्त मासिक राशन, मुफ्त रसोई गैस कनेक्शन, मुफ्त शौचालय, सब्सिडी युक्त सस्ते घर, प्रत्यक्ष नकद हस्तांतरण लाभ और मुफ्त स्वास्थ्य बीमा दिया है। जब इतना सब दिया जा सकता है तो नौकरियां क्यों नहीं? सच तो यह है कि जब आप एक लाभार्थी-संस्कृति विकसित करते हैं, जिसमें लोग इतने बड़े पैमाने पर सरकार की ओर से मुफ्त सौगातें पाने के अभ्यस्त हो चुके हों, तब वे अपने दैनिक जीवन में मानवीय श्रम और प्रयास की भावना को गंवाने लगते हैं। राजकोषीय घाटे के प्रबंधन पर दबाव के बावजूद सरकार ने कल्याणकारी योजनाओं की अपनी सूची में कटौती नहीं की है, जाहिर है चुनावी लाभ के लिए।
सरकारी नौकरियां आर्थिक सुरक्षा, स्थायित्व और अपने रुतबे की वजह से एक औसत भारतीय का हमेशा से ही सपना रही हैं। दुर्भाग्य से, पिछले दस वर्षों में सरकार ने भर्ती में भारी कटौती की है। अग्निवीर योजना ने सशस्त्र बलों और अर्धसैनिक बलों में स्थायी नौकरी की उम्मीदों को आघात पहुंचाया है। विनिवेश से भी सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों में नौकरियां कम हुई हैं। सरकारी भर्ती के लिए परीक्षाओं में लगातार पेपर लीक हो रहे हैं और पिछले कई वर्षों से यूपी और बिहार जैसे राज्यों में न के बराबर भर्तियां हुई हैं। स्वरोजगार करने वालों और रेहड़ी-पटरी आदि के लिए उदारतापूर्वक कर्ज जरूर दिए जा रहे हैं, लेकिन आकांक्षी वर्गों की महत्वाकांक्षाएं इस तरह के रोजगारों से कहीं अधिक की हैं। विकसित भारत के विजन के रूप में जिस नई अर्थव्यवस्था की बात की गई थी, वह अभी भी बहुत दूर है।
दूसरी तरफ, विपक्ष ने बेरोजगारी को अपना मुख्य चुनावी मुद्दा बना लिया है। कांग्रेस के घोषणा-पत्र में केंद्र सरकार में स्वीकृत पदों पर 30 लाख रिक्तियों को भरने, सरकारी विभागों और सार्वजनिक उपक्रमों में संविदा कर्मचारियों को नियमित करने और अग्निवीर योजना को खत्म करने सहित कई वादे किए गए हैं। हालांकि इस बात पर कोई स्पष्टता नहीं है कि कांग्रेस सरकारी खजाने पर इस अतिरिक्त बोझ को कैसे वहन करेगी, जिससे यह आशंका बढ़ रही है कि ये वादे भी कहीं कागजों पर ही न रह जाएं। बिहार और यूपी में पिछले कुछ वर्षों में कई बार तब हिंसा भड़की है, जब नौकरी के इच्छुक उम्मीदवार पेपर लीक और सरकारी भर्तियों को अचानक रद्द करने के विरोध में सड़कों पर उतर आए थे। बढ़ती बेरोजगारी को लेकर गुस्सा साफ है और यह हर जगह उबल रहा है, खासकर हिंदी पट्टी में। 4 जून के बाद निर्मित होने वाली सरकार इनको अनदेखा करके अपना ही नुकसान करेगी।
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इंटरनेट की दुनिया में ए आई या आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस की घुसपैठ बढ़ती जा रही है। इसमें भी ओपन ए आई की महत्वपूर्ण भूमिका है। यह संस्था एक अमेरिकी ए आई प्रयोगशाला है। यह मित्रवत ए आई को बढ़ावा देने के इरादे से अनुसंधान करती है। यह जल्द ही एक नया सर्च इंजन लाने वाली है।
ओपन ए आई से जुड़े कुछ बिंदु –
आशा की जा रही है कि ओपनएआई का यह सर्च इंजन गूगल को मात देने वाला होगा। अगर यह अनुमान सच साबित हुआ, तो दुनिया में इंटरनेट सेवा एक अलग ही स्तर पर पहुँच जाएगी।
विभिन्न स्रोतों पर आधारित। 13 मई, 2024
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Date: 30-05-24
Not A Drop To WasteWater woes are a recurring Indian urban phenomenon. Reusing treated water is the solution.TOI Editorials
Delhi residents are experiencing a double whammy of intense heat and water scarcity. Parts of the capital yesterday recorded a maximum temperature of 52.3°C. Along with it came announcements this week of water rationing. It’s the second major city, after Bengaluru, to simultaneously experience a heatwave and acute water shortage this summer.
The scariest moment in urban India was Chennai’s “Day Zero” in June 2019, when the city’s four major water reservoirs dried up. We are very vulnerable to water crises.
Urban mess | Common to all urban water nightmares is that economic growth and consequent building expansion have outpaced the capacity of civic authorities. Private firms have stepped into the breach to support this growth. But the downside is that they lack scale to solve critical problems.
Reality check | India cannot escape the impact of climate change. Extended heatwaves are here to stay and water demand in urban areas will not reduce. Neither can some consequences of haphazard urban expansion, such as building over natural landscapes, be undone. To illustrate, in 2022, the Karnataka govt told the state assembly that 40 lakes in Bengaluru had “disappeared”.
Recycle, the best option | On the heels of its “Day Zero”, Chennai became the first Indian city to recycle wastewater at scale. Tertiary treatment reverse osmosis plants are used to recycle water for industrial use. Recycling lifts the pressure on freshwater resources and allows urban areas to cushion the impact of poor monsoons. Some states have now mandated industrial zones to use treated water. It’s a sensible policy as India’s ranked the 13th most water-stressed in the world.
Potential’s huge | In 2016, IISc carried out a study of the potential addition to Bengaluru’s water supply through treating sewage water. It estimated that of the annual domestic demand of about 20 TMC, treated sewage could provide up to 80% of the requirement. It’s consistent with UN’s findings that on average, high-income countries treat about 70% of the industrial and municipal wastewater they generate, while the ratio falls to about 28% in lower middle-income countries.
Pushing ahead with recycling doesn’t need huge govt projects. Tight implementation of a policy to get both residential and commercial projects to use recycled water will have a significant impact. Who knows, not long after, India may go the Singapore way to use treated water in craft beer.
Date: 30-05-24
Human Intelligence On Keeping AI in LineGood intent, but regulation still lacks teeth.ET Editorials
The second global summit on AI regulation in Seoul earlier this month made progress in supervision of the technology. Tech companies have again reaffirmed their intent to apply basic safeguards as AI develops. In addition, governments now have institutions to observe the emanating risks, and are in a position to demarcate no-go areas. The next step is to harmonise intergovernmental regulation that can keep AI development within pre-approved limits. All this is, however, intent, and ‘regulation’ lacks teeth. But the global response to AI has made some progress between Bletchley Park in Britain where the first AI safety summit was held and Seoul. Regulation of AI is moving from companies and academics to governments that are acquiring capacity to oversee and check its evolution.
There are two ways to approach AI regulation. The first would be to apply rules to use cases. Thus, development of AI in medicine would have to conform to existing and some new regulatory conditions for the health industry. These rules can then be adjusted to fit some other industry, for instance, finance. Governments would collaborate in each of these verticals to come up with a broad set of global rules. A scaffolding, thus, emerges to keep AI within legal limits across a range of its uses. A separate set of rules would also similarly emerge on what AI should not be doing, such as its use in warfare.
The second, and much more nettlesome, approach is to control AI’s development at source. This would be in response to the risk that AI is able to independently outwit some or all use-case regulation — the Armageddon scenario. The approach to regulation here would be to control AI through computing power, over which tech creators and lawmakers differ. Governments are already prevailing by linking transparency and governance with size. Just as thresholds of ethical behaviour are being imposed on the basis of impact scale of AI deployment. All of these now await being converted into a legal harness to guide AI.
Date: 30-05-24
अवैध खनन का खेलपंकज चतुर्वेदी
मई 26 को असम के तिनसुकिया जिले की पाटकाई पहाड़ियों पर अवैध रूप से संचालित ‘रेट होल माइंस’ में दब कर तीन लोग मारे गए। विदित हो पास ही मेघालय के पूर्वी जयंतिया जिले में कोयला उत्खनन की 26 हजार से अधिक ‘रेट होल माइंस’ अर्थात चूहे के बिल जैसी खदानें बंद करने के लिए राष्ट्रीय हरित प्राधिकरण (एनजीटी) के आदेश को दस साल हो गए हैं, लेकिन आज तक एक भी खदान बंद नहीं हुई। कुछ साल पहले सुप्रीम कोर्ट ने भी इन खतरनाक खदानों को बंद करने लेकिन पहले से निकाल लिए गए कोयले के परिवहन के आदेश दिए थे।
इस काम की निगरानी के लिए मेघालय हाई कोर्ट द्वारा नियुक्त जस्टिस बीके काटके समिति ने अपनी 22वीं अंतरिम रिपोर्ट में बताया है कि किस तरह ये खदानें अभी भी मेघों का देश कहे जाने वाले प्रदेश के परिवेश में जहर घोल रही हैं। उल्लेखनीय है कि कभी दुनिया में सबसे अधिक बरसात के लिए मशहूर मेघालय में अब प्यास ने डेरा जमा लिया है। यहां नदियां जहरीली हो रही हैं, और सांस में कार्बन घुल रहा है। यह सब हो रहा है इन खतरनाक खदानों से कोयले के अवैध, निर्बाध खनन के कारण। हाई कोर्ट की कमेटी बताती है कि अभी भी अकेले पूर्वी जयंतिया जिले की चूहा-बिल खदानों के बाहर 14 लाख मीट्रिक टन कोयला पड़ा हुआ है जिसको हटाया जाना है।
दस साल बाद भी इन खदानों को कैसे बंद किया जाए, इसकी ‘विस्तृत कार्यान्वयन रिपोर्ट’ अर्थात डीपीआर प्रारंभिक चरण में केंद्रीय खनन योजना एवं डिजाइन संस्थान लिमिटेड (सीएमपीडीआई) के पास लंबित है। एक बात और, 26 हजार की संख्या तो केवल एक जिले की है, ऐसी ही खदानों का विस्तार वेस्ट खासी हिल्स, साउथ वेस्ट खासी हिल्स और साउथ गारो हिल्स जिलों में भी है। इनकी कुल संख्या सात हजार से अधिक होगी। जस्टिस काटके की रिपोर्ट में कहा गया है, ‘मेघालय पर्यावरण संरक्षण एवं पुनर्स्थापन निधि (एमईपीआरएफ) में 400 करोड़ रु पये की राशि बगैर इस्तेमाल पड़ी है, और इन खदानों के कारण हुए प्रकृति को नुकसान की भरपाई का कोई कदम उठाया नहीं गया। मेघालय में प्रत्येक एक वर्ग किलोमीटर में 52 रेट होल खदान हैं। अकेले जयंतिया हिल्स पर इनकी संख्या 26 हजार से अधिक है। असल में ये खदानें दो तरह की होती हैं। पहली किस्म की खदान बमुश्किल तीन से चार फीट की होती हैं। इनमें श्रमिक रेंग कर घुसते हैं। साइड कटिंग के जरिए मजूदर को भीतर भेजा जाता है और वे तब तक भीतर जाते हैं, जब तक उन्हें कोयले की परत नहीं मिल जाती। सनद रहे मेघालय में कोयले की परत बहुत पतली हैं, कहीं-कहीं तो महज दो मीटर मोटी। इसमें अधिकांश बच्चे ही घुसते हैं। दूसरे किस्म की खदान में आयताकार आकार में 10 से 100 वर्गमीटर माप में जमीन को काटा जाता है और फिर उसमें 400 फीट गहराई तक मजदूर जाते हैं। यहां मिलने वाले कोयले में गंधक की मात्रा ज्यादा है और इसे दोयम दर्जे का कोयला कहा जाता है। तभी यहां कोई बड़ी कंपनी खनन नहीं करती। ऐसी खदानों के मालिक राजनीतिक दलों से जुड़े हैं, और श्रमिक बांग्लादेश, नेपाल या असम से पहुंचे घुसपैठिए होते हैं।
एनजीटी की रोक के बाद मेघालय की पिछली सरकार ने स्थानीय संसाधनों पर स्थानीय आदिवासियों के अधिकार के कानून के तहत इस तरह के खनन को वैध रूप देने का प्रयास किया था लेकिन कोयला खदान (राष्ट्रीयकरण) अधिनियम, 1973 की धारा 3 के तहत कोयला खनन के अधिकार, स्वामित्व आदि हित केंद्र सरकार के पास सुरक्षित हैं। सो, राज्य सरकार अवैध खनन को वैध का अमलीजामा नहीं पहना पाई। लेकिन गैर-कानूनी खनन, भंडारण और पूरे देश में इसका परिवहन चलता रहता है। आये रोज लोग मारे जाते हैं, कुछ जब्ती और गिरफ्तारियां होती हैं, और खेल जारी रहता हैं। रेट होल खनन न केवल अमानवीय है, बल्कि इसके चलते यहां से बहने वाली कोपिली नदी का अस्तित्व ही मिट सा गया है। एनजीटी ने अपने पाबंदी आदेश में कहा था कि खनन इलाकों के आसपास सड़कों पर कोयले का ढेर जमा करने से वायु, जल और मिट्टी के पर्यावरण पर बुरा असर पड़ रहा है। भले ही कुछ लोग इस तरह की खदानों पर पाबंदी से आदिवासी अस्मिता का मसला जोड़ते हों, लेकिन हकीकत सुप्रीम कोर्ट में प्रस्तुत नागरिक समूह की रिपेर्ट में बताई गई थी कि अवैध खनन में प्रशासन, पुलिस और बाहर के राज्यों के धनपति नेताओं की हिस्सेदारी है, और स्थानीय आदिवासी तो केवल शेषित श्रमिक ही हैं।
सबसे ज्यादा चिंता इस बात की है कि कोयले की कालिख राज्य की जल निधियों की दुश्मन बन गई है। लुका नदी पहाड़ियों से निकलने वाली कई छोटी सरिताओं से मिल कर बनी है, इसमें लुनार नदी के मिलने के बाद इसका प्रवाह तेज होता है। इसके पानी में गंधक की उच्च मात्रा, सल्फेट, लोहा और कई अन्य जहरीली धातुओं की उच्च मात्रा और पानी में आक्सीजन की कमी पाई गई है। एक और खतरा है कि जयंतिया पहाड़ियों के गैर-कानूनी खनन से कटाव बढ़ रहा है, दलदल बढ़ने से मछलियां कम आ रही हैं। ऊपर से जब खनन का मलबा इसमें मिलता है तो जहर और गहरा जाता है। मेघालय ने गत दो दशकों में कई नदियों को नीला होते, फिर उनके जलचर मरते और आखिर में जलहीन होते देखा है।
विडंबना है कि यहां प्रदूषण नियंतण्रबोर्ड से ले कर एनजीटी तक सभी विफल हैं। दुर्भाग्य है कि अदालत की फटकार है, पर्याप्त धन है लेकिन इन खदानों से टपकने वाले तेजाब से प्रभावित हो रहे जनमानस को कोई राहत नहीं है। यह हरियाली चाट गया, जमीन बंजर कर दी, भूजल इस्तेमाल लायक नहीं रहा और बरसात में यह पानी बह कर जब पहाड़ी नदियों में जाता है तो वहां भी तबाही ला देता है। नदी में मछलियां लुप्त हैं। मेघालय पुलिस यदा कदा अवैध कोयला की ढुलाई को लेकर मुकदमे जरूर दर्ज करती है, लेकिन ये कागजी औपचारिकता से अधिक नहीं हैं। आज जयंतिया हिल्स में असम से आए रोहिंग्या श्रमिकों की बस्तियां हैं, जो सस्ते श्रम को स्वीकार कर जान दांव पर लगा अवैध खदानों से हर रोज कोयला निकालते हैं।
अभी तो मेघालय से बादलों की कृपा भी कम हो गई है, चेरापूंजी अब सर्वाधिक बारिश वाला गांव नहीं रह गया है। यदि कालिख की लोभ में नदियां भी खोदीं तो दुनिया के इस अनूठे प्राकृतिक सौंदर्य वाली धरती पर मानव जीवन भी संकट में होगा।
Date: 30-05-24
झुलसाती हवाओं का बढ़ता इलाकाके जे रमेश, ( पूर्व महानिदेशक, भारतीय मौसम विभाग )
हर साल मई के आखिरी पखवाड़े से लेकर जून के अंत तक, जब तक मानसून गंगा के मैदानी इलाकों में नहीं आ जाता, उत्तर भारत में गरमी सामान्य मौसमी परिघटना है। इन दिनों दिल्ली, उत्तर प्रदेश, राजस्थान, पंजाब, बिहार, झारखंड, बंगाल जैसे तमाम राज्य तपते रहते हैं। यह मानसून में तेजी लाने के लिए आवश्यक भी माना जाता है, क्योंकि गरमी जितनी तेज होती है, अरब सागर से उतना ही मजबूत मानसून भारत को भिगोता है। मगर अब जरूरत से अधिक गरमी पड़ने लगी है और तापमान 50 डिग्री के पार जाने लगा है। भारत के कई शहर तो पहले से अधिक गरम हो चले हैं। आखिर क्यों?
दरअसल, इसकी बड़ी वजह जलवायु में लगातार हो रहा बदलाव है। जलवायु परिवर्तन के कारण अब हर मौसम पिछला रिकॉर्ड तोड़ता नजर आता है। इसी साल जनवरी पिछले वर्ष के जनवरी माह से अधिक गरम था। फरवरी, मार्च या अप्रैल महीने की भी यही कहानी रही। स्थिति यह है कि वैश्विक गरमी 1.2 डिग्री सेल्सियस तापमान की सीमा को पार कर चुकी है, जबकि समुद्र तटों के किनारे के देश साल 2100 तक वैश्विक गरमी को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक रोकने के हिमायती हैं। पेरिस समझौते में भी वैश्विक तापमान वृद्धि को पूर्व-औद्योगिक स्तरों से 2 डिग्री सेल्सियस कम करने पर सहमति बनी थी, लेकिन नतीजा अब भी सिफर ही दिख रहा है।
जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (आईपीसीसी) का कहना है कि जब तापमान में 1 डिग्री सेल्सियस की बढ़ोतरी होती है, तो हीट वेव की आवृत्ति (आने की दर), समय और प्रभाव में कम से कम दोगुना का इजाफा होता है। यही कारण है कि हाल के वर्षों में हीट वेव आने की दर बढ़ गई है। पहले झारखंड, ओडिशा, छत्तीसगढ़, बिहार, बंगाल, महाराष्ट्र जैसे राज्य ही इसकी चपेट में आते थे, लेकिन अब तेलंगाना, उत्तरी कर्नाटक जैसे इलाके भी मार्च-अप्रैल से ही बेहिसाब गरमी झेलने को मजबूर हैं। सरकारों ने तो पहले से ही इससे लड़ने की तैयारियां शुरू कर दी थीं।
बहरहाल, तापमान का बढ़ना और गरमी की तपन महसूस करना, दोनों अलग चीजे हैं। आपने खबरों में भी देखा होगा कि कहीं तापमान तो कम होता है, लेकिन गरमी अधिक महसूस होती है। यह काफी हद तक नमी पर निर्भर करता है। यदि वातावरण में नमी कम हो, तो शुष्क, यानी सूखी गरमी पड़ती है, जिसमें कूलर, पंखा आदि से राहत मिल जाती है। मगर जब तापमान के साथ नमी भी होती है, तो हमारे शरीर से काफी ज्यादा पसीना निकलने लगता है और 35-36 डिग्री सेल्सियस तापमान भी 40 डिग्री के समान महसूस होने लगता है। ऐसी उमस में एयर कंडिशनर ही कारगर साबित होता है। उल्लेखनीय है कि तापमान मापने का तरीका बिल्कुल सामान्य है। शहर की कुछ जगहों पर इसकी मशीनें लगाई जाती हैं, जिनमें थर्मामीटर की तरह तापमान मापने वाला यंत्र होता है। वही हवा की गति भी माप लेता है।
अभी विशेषकर उत्तर भारत में तापमान में जो उछाल दिखने को मिल रहा है, उसमें जल्द ही कुछ राहत मिल सकती है। अगले तीन-चार दिनों में जम्मू-कश्मीर में पश्चिमी विक्षोभ आ सकता है। दिल्ली-एनसीआर के कुछ इलाकों में तो बुधवार की शाम हल्की बारिश भी हुई। इस विक्षोभ से राजस्थान को छोड़कर शेष मैदानी इलाकों में कुछ राहत मिल सकती है। हालांकि, इसका असर भी तीन-चार दिनों तक ही रहेगा, फिर सूरज पहले की तरह आग बरसाने लगेगा। यह स्थिति कमोबेश मानसून आने तक बनी रहेगी।
बढ़ती गरमी मानव स्वास्थ्य को भी नुकसान पहुंचाती है। जिस तरह 98.5 फारेनहाइट तापमान के बाद शरीर में हलचल तेज हो जाती है, उसी तरह 37 डिग्री से अधिक का तापमान शरीर को बेचैन कर सकता है। इसके बाद मुख्यत: बेहतर प्रतिरोधक क्षमता ही गरमी का मुकाबला करती है। चूंकि बच्चे और बुजुर्गों में यह क्षमता कम होती है, इसलिए उनके साथ-साथ उन लोगों को भी सावधानी बरतने की सलाह दी जाती है, जो पहले से बीमार होते हैं। हालांकि, सावधानी सामान्य आदमी को भी रखनी चाहिए, क्योंकि जब तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर चला जाता है, तो शरीर में पानी घटने लगता है और शारीरिक क्षमता घटकर आधी रह जाती है। यही कारण है कि गरमी के महीने में पानी अधिकाधिक पीने और मौसमी फलों का सेवन करने को कहा जाता है। नारियल, खीरा, तरबूज, ककड़ी, खरबूजा जैसे फल शरीर में पानी की कमी को पूरा करने में सक्षम होते हैं।
एक यह सावधानी भी बरतने को कहा जाता है कि सुबह 11 बजे से लेकर शाम चार बजे तक धूप के ‘एक्सपोजर’ से बचना चाहिए। महानगरों व बडे़ शहरों में राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) तमाम तरह के दिशा-निर्देश लागू करता है। जैसे, इस बार अस्पतालों को अपने 100 बेड लू के शिकार लोगों के लिए खाली रखने के निर्देश दिए जा चुके हैं। बच्चों के वार्ड अस्पताल के शीर्ष तल पर न रखने के निर्देश भी हैं, क्योंकि तेलंगाना में 2017 में कई नवजातों की हुई मौत के बाद अध्ययन में यही बात सामने आई थी कि संबंधित अस्पतालों ने नवजातों को शीर्ष तल पर रखा था, जहां गरमी तुलनात्मक रूप से अधिक थी।
इसी तरह, खुले में काम करने वाले श्रमिकों, निर्माण-कारीगरों, निगम कर्मचारी, सफाईकर्मियों, कूड़ा बीनने वालों आदि को अपना काम सुबह 10 बजे तक खत्म कर लेना चाहिए और 11 बजे से चार बजे तक खुले में काम करने से बचना चाहिए। उन कंपनियों में भी दिन में छुट्टी देने की व्यवस्था की जाती है, जहां की छत गरमी से बचने के लिए नाकाफी मानी जाती है।
सवाल है कि आखिर इस बढ़ते तापमान को रोकें कैसे? इसका एक समाधान वृक्षारोपण है। इसके लिए सरकारों को आगे आना होगा। शहर में जहां हरियाली है, वहां उसे बढ़ाने की व्यवस्था करनी होगी। पार्क में वृक्षों की सघनता बढ़ानी होगी और उनकी कटाई रोकनी होगी। तापमान कम करने के लिए पार्कों के अंदर की झीलों के आसपास भी हरियाली बढ़ानी चाहिए। बेंगलुरु, हैदराबाद में तो तापमान को नियंत्रित करने के लिए रिसाइकिल वाटर, यानी दूषित जल को इस्तेमाल के लायक बनाकर पार्कों में इस्तेमाल किया जा रहा है। जाहिर है, इस तरह के प्रयास तमाम जगहों पर करने होंगे। एक समग्र रणनीति ही बढ़ते तापमान की तपिश से हमारी सुरक्षा कर सकती है।
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– भारत अपने बिग सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग प्लान या बीएसएमपी में एक कदम आगे बढ़ गया है।
– इसका श्रेय टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स को जाता है। इसने पैकेज्ड सेमी कंडक्टर चिप्स का परीक्षण निर्यात शुरू किया है।
– दरअसल, सैकड़ों कंप्यूटर चिप्स वाले सिलिकॉन वेफर्स को ऐसी सामग्री में पैक किया जाना चाहिए, जो उन्हें सुरक्षित रखे, और उनमें से बिजली गुजरने दे। यह वह माध्यम है, जिसके द्वारा चिप्स कंप्यूटर सिस्टम से कनेक्ट करते हैं।
– टाटा समूह ने ताइवान के सहयोग से गुजरात में एक फेब्रिकेशन यूनिट शुरू किया है। अब वे असम में भी से शुरू करना चाहते हैं।
– गुजरात की यूनिट का काम तब शुरू हुआ, जब वैश्विक स्तर पर ताईवान केंद्रित मूल्य श्रृंखला में विविधता लाने की आवश्यकता स्पष्ट हो गई, और उत्पाद रेंज को व्यापक बनाने के प्रयास में प्रारंभिक प्रस्तावों के बाद योजना को संशोधित किया गया।
– फिलहाल, भारत सरकार चिप फेब्रिकेशन के लिए जरूरी सभी तरह की सुविधाएं मुहैया कराने की इच्छुक है।
– इस क्षेत्र में चीनी प्रभुत्व को तोड़ने के लिए चिप विनिर्माता की गति बहुत मायने रखती है।
‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 08 मई, 2024
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Date: 29-05-24
Elderly GapsHealth insurers have mostly bypassed senior citizens. That’s the market a new entrant must coverEditorial
India’s insurance regulations may be tweaked to dismantle the wall between life and non-life insurers. If that happens, LIC, the market leader in life insurance, will consider getting into health insurance. It’s well placed to do so, with an annual profit in excess of ₹40,000cr and its share price having almost doubled since Oct. The big question is, what will this mean for consumers.
Dissatisfaction amidst plenty | Health insurance is highly competitive. At end-2023, there were 29 insurers underwriting health policies, the largest segment of the non-life market. It’s also fast growing. Health insurance premium in 2023 expanded 21%, which was seven percentage points faster than the overall growth in non-life segments.
The numbers are at odds with consumer experience. A survey by insurance broker Policybazaar showed that while 96% of the sample was aware of health insurance, only 43% owned a policy. Two of the three most important reasons for insubstantial ownership were a feeling that premiums are too high and that policies are complex in terms of ailments excluded from coverage etc.
Lopsided market | India’s health coverage is dominated by govt sponsorship, but the premium is raised overwhelmingly from private policies. Insurance regulator Irdai’s data showed that 550 million people have health cover. About 54 of every 100 covers are govt-sponsored. But ₹91 of every ₹100 collected as premium come from individual and group policies.
Gaps galore | Standalone health insurers have sidestepped govtsponsored health coverage. This group of insurers concentrates on the private market and has a far lower claims payout ratio than PSUs and private general insurers. How does that really help when GOI data showed that a mere 6% of the population with an individual health cover are senior citizens even though Irdai encourages their coverage? The most vulnerable group is excluded mainly because the hike in premium is particularly steep for that demographic. A new entrant needs to figure out how to fill the large gap in India’s health cover. Will LIC be that insurer?
Date: 29-05-24
The question of Palestine’s UN membershipC.S.R. Murthy, [ is former Professor of International Organization at JNU, New Delhi. He is the author of ‘India in the United Nations: Interplay of Interests and Principles’ ]
Israel’s war on Gaza has raised several ethical, political, and diplomatic questions. One diplomatic development that has attracted a lot of interest is Palestine’s renewed application for membership of the United Nations (UN). Ironically, its quest is stuck at the UN Security Council (UNSC) due mainly to the geopolitical calculations of the U.S., which argued that membership should follow and not precede a negotiated solution to the long-standing conflict.
This is not the first time that Palestine has attempted to obtain UN membership. In 2011 too, its request was opposed by the veto-bearing U.S. in the UNSC. Since then, Palestine enjoys only non-member observer status.
This year, in April, after the UNSC failed to agree on Palestine’s request because of the lone veto cast by the U.S. in its capacity as a permanent member, the UN General Assembly (UNGA) stepped in to voice support to the Palestinian application. On May 10, the UNGA overwhelmingly adopted a resolution affirming Palestine’s eligibility to assume full membership in the UN. It also urged the UNSC to favourably consider Palestine’s request.
Norms and politics
The UN requires membership seekers to be “peace loving” states and to be able and willing, in its judgment, to carry out the obligations of the Charter. While the criteria were liberally interpreted, the procedural threshold laid down for admission turned out to be decisive and difficult, and was dictated by the political exigencies of the five permanent members (P5) in the UNSC at any given time. As such, membership applications require recommendation without the express opposition of any of the P5 before the UNGA accepts the admission request. In other words, the UNSC’s recommendation is ruled out if any of the P5 casts a negative vote by exercising their veto power, whereas no such veto power applies in the UNGA except that the decision should be cleared by a two-thirds majority.
When Cold War politics stalled numerous admission requests in the UNSC in early years, the UNGA sought the World Court’s opinion on whether the UNGA had the power to admit states in the absence of the UNSC’s recommendation. The Court ruled in 1948 that the UNSC’s recommendation is a prerequisite for the UNGA to exercise its power. Subsequently, the deadlock in the UNSC was broken to recommend all pending applications. This marked successive decades of steady increase of the total membership from the 51 founding members to 193 today. It would not be off the mark to note that membership of the UN is invariably viewed as a sought-after confirmation of sovereign statehood of the countries which gained independence from foreign rule or occupation.
The example of Mongolia is comparable to Palestine’s plea. When Mongolia’s membership application was stuck in the UNSC, the UNGA intervened with a resolution similar to what was done in the Palestine case, suggesting that Mongolia deserves a favourable recommendation by the UNSC. Eventually Mongolia became a member in 1961.
India’s approach
India joined 142 member countries in supporting the UNGA in the May 2024 resolution favouring Palestine’s case for membership. India opined that membership status could enhance the prospect of a two-state solution to the protracted Israel-Palestine conflict. Notably, India’s position to the membership question is now entirely in line with the approach articulated during the Nehruvian era — that UN membership should be open to all state applicants without discrimination. In fact, there is not a single instance of India opposing any country’s membership so far. India supported Pakistan’s admission to the UN in 1947 and also representation of the People’s Republic of China’s in 1971, despite a prolonged border conflicts with the latter.
While it is true that the U.S. or the former USSR/Russian Federation stood in the way of many applicants’ prospects of becoming UN members, China is not free from blame either. After being seated in the UNSC in 1971, the People’s Republic of China vetoed newly liberated Bangladesh’s membership application.
What is the way forward?
Clearly Palestine cannot assume full membership bypassing the UNSC and the U.S. China and Russia are apprehensive that such bypassing could become a precedent for the admission of Taiwan or Kosovo later. In a less likely scenario, the U.S. might refrain from casting yet again its veto or abstain from voting, as an expression of displeasure with Israel for ignoring its advice to cease attacks against Gazan civilians, thereby paving the way for the UNGA’s approval of Palestine’s membership. Israel might protest and quit the UN. If the UNSC stalemate continues, the UNGA could possibly consider keeping Israel out of its deliberations. Such a bold tactical move, which is short of Israel’s suspension or expulsion that would be impractical without the UNSC’s recommendation, has precedents. South Africa in the apartheid era and the Serb Republic of Yugoslavia during the brutal ethnic cleansing era were barred from participating in the UNGA.
Apart from these theoretical options, accretion of participatory privileges to Palestine, just short of the power to vote in the UNGA and eligibility to be elected to other major principal organs of the UN, from September would signal that might cannot become right in this age.
Date: 29-05-24
जंगलों की कटाई अब कारोबार पर भी भारी पड़ेगीअंशुमान तिवारी, ( मनी – 9 के एडिटर )
बीते बरस दुबई में पर्यावरण बचाने की जुटान यानी कोप – 28 की बैठक में जब दुनिया के महान नेता भाषणों की जलेबी बना रहे थे, उस वक्त कुछ अखबारों में एक खबर कौंधी | पता चला कि दुबई की एक कंपनी ब्लू कार्बन ने अफ्रीका में जंगल खरीद लिए हैं। इस कंपनी के मालिक शेख अल मकतूम दुबई के सुल्तान के कुनबे से आते हैं। जंगल खरीदना बड़ी बात नहीं मगर इन्होंने तो कुछ और ही किया। ब्लू कार्बन ने जिम्बाब्वे का 20%, लाइबेरिया का 10%, जाम्बिया का 10%, तंजानिया का 8% हिस्सा खरीद लिया। इस भूमि पर जंगल हैं। इन चार अफ्रीकी देशों में जितना जंगल अमीरात की कंपनी ने खरीदा है, वह यूके के क्षेत्रफल के बराबर है! इससे पहले अक्टूबर में अल मकतूम की कंपनी ने केन्या में जंगल खरीदने का एक बड़ा सौदा किया था। खरीदे गए जंगलों के क्षेत्रफल का ब्योरा नहीं बताया गया, मगर इस सौदे की जानकारी केन्या की सरकार की तरफ से दी गई। दुबई की इस कंपनी ने पाकिस्तान में भी जंगल खरीदे हैं। ब्लू कार्बन की पैरेंट कंपनी ग्लोबल कार्बन इन्वेस्टमेंट ने अकेले जाम्बिया के सौदे से 1.5 अरब डॉलर कार्बन क्रेडिट हासिल किए हैं।
बर्बादी का लेनदेन : 1997 में क्योटो में तय हुआ था कि उद्योगों और देशों को पर्यावरण की तबाही और ग्लोबल वार्मिंग घटाने के लिए कार्बन का उत्सर्जन रोकना होगा। यह काम चुटकियों में तो होना नहीं था, इसलिए खुला कार्बन क्रेडिट और कार्बन ऑफसेट का बाजार कंपनियों को अपना कार्बन फुटप्रिंट कम करना होता है। इसके दो रास्ते हैं। एक वे उत्पादन में कार्बन वाली ऊर्जा के इस्तेमाल को कम करें और दूसरा वो जितना धुआं छोड़ रहे हैं उसके बदले उतनी ही ऑक्सीजन पैदा करने वाले किसी प्राकृतिक संसाधन में निवेश करें।
सनद रहे कि ऑक्सीजन तो केवल जंगल ही पैदा कर सकते हैं। कार्बन क्रेडिट एक तरह का लाइसेंस है, जिन्हें दिखाकर उद्योग कार्बन उगलते रह सकते हैं। क्योंकि इनके बदले कहीं कोई जंगल उतनी ही टन ऑक्सीजन बना रहा है। कार्बन क्रेडिट सरकारें या अंतरराष्ट्रीय संगठन जारी करते हैं। मसलन अमेरिका में कैलिफोर्निया की सरकार कार्बन उत्सर्जन करने वाले बिजली घरों और गैस कंपनियों को कार्बन क्रेडिट देती है। जबकि कार्बन ऑफसेट का बाजार फर्क है। यह कार्बन बेचने खरीदने वालों के बीच चलता है। जैसे किसी कंपनी ने जंगल बढ़ाकर उत्सर्जन कम किया तो वह इस क्रेडिट को किसी दूसरी कंपनी को बेच सकती है, जिसे कार्बन फुटप्रिंट कम करना है।
अफ्रीका की होड़ : इस बाजार पर कब्जे के लिए दुबई के शेखों ने गरीब अफ्रीका को धर लिया। अफ्रीका के जंगल हर साल करीब 600 टन सीओ2 सोख सकते हैं, जो दुनिया के लिए भी इको सिस्टम से ज्यादा है। अफ्रीका का अपना उत्सर्जन नगण्य है। अफ्रीका के लिए कार्बन क्रेडिट सबसे बड़ा निर्यात होने वाले हैं। अगले छह साल में यह महाद्वीप करीब 300 मिलियन कार्बन क्रेडिट बेच सकता है। दुबई के शेख को जंगलों की खरीद के साथ अगले 30 साल के लिए कार्बन क्रेडिट बेचने का अधिकार मिल गया है। ब्लू कार्बन अगले एक दशक में कार्बन क्रेडिट की सबसे बड़ी कारोबारी हो सकती है। अफ्रीका में कार्बन क्रेडिट पर टैक्स और कारोबार के नियम भी नहीं बने हैं। सरकारें भ्रष्टाचार का उत्पादन करती हैं। अरब के शेखों के लिए यह बाजार लपकना आसान है।
बाजार का खेल : कोप-दुबई में यह बात साफ हो गई थी कि दुनिया अपना कार्बन उत्सर्जन कम करने वाली नहीं है। सभी देशों ने कार्बन उत्सर्जन बढ़ाने के लक्ष्य रखे हैं। इसलिए अब बाजारों में कार्बन क्रेडिट की होड़ मचेगी। उद्योगों को कार्बन उत्सर्जन कम करना होगा और कंपनियां तलाशेंगी अफ्रीका जैसे बाजार जहां कार्बन सोखा जा सके। मार्केटसैंड मार्केट की रिपोर्ट का अनुमान है कि कार्बन क्रेडिट का बाजार 2022 में 332 अरब डॉलर था, जो सालाना 31% की बढ़त के साथ 2028 में 1.6 ट्रिलियन डॉलर हो जाएगा। इसमें सबसे बड़ा हिस्सा कंप्लायंस के बाजार का है यानी वे क्रेडिट जो कंपनियों को खरीदने ही होंगे। मसलन, भारतीय निर्यातकों को यूरोप में निर्यात पर कार्बन टैक्स चुकाना होगा। कार्बन तो कम होने से रहा तो फिर उन्हें कंप्लायंस क्रेडिट (कहीं दूसरी जगह ऑक्सीजन उत्सर्जन की गारंटी) खरीदने पड़ सकते हैं। मार्च 2022 में अबू धाबी में दुनिया का पहला कार्बन क्रेडिट मार्केट भी शुरू हो गया है। कार्बन क्रेडिट के मौजूदा बाजार में पारदर्शिता नहीं है। कार्बन वैल्यूएशन के नियम स्पष्ट नहीं हैं। कोप की बैठक के बाद हाय-तौबा मची है कि अफ्रीका का कार्बन मार्केट सस्ते में लुट रहा है।
और भारत : भारत ने भी कार्बन उत्सर्जन घटाने का वादा नहीं किया। बल्कि कोयला जलाने के नए लक्ष्य तय किए हैं। कल्पना करें कि भारत में कार्बन क्रेडिट का घरेलू बाजार हो तो वह कैसा होगा। क्या उत्तराखंड, हिमाचल, कश्मीर, मध्य प्रदेश और मध्य-पूर्व के राज्य बाकी देश का कार्बन सोखने की कीमत वसूलेंगे? क्योंकि इसी तरीके से बाजार चलने वाला है। मगर भारत के पास जंगल हैं कितने ? वास्तव में, यूके की प्रतिष्ठित एजेंसी यूटिलिटी बिल्डर के मुताबिक जंगल गंवाने में भारत दुनिया का दूसरा सबसे कुख्यात मुल्क है! अगर आप देश के किसी हिस्से में जंगलों के कटने की खबर सुन रहे हैं तो समझिए कि भारत अपना सबसे कीमती बाजार गंवा रहा है। जल्द ही इनकी जरूरत समझ आएगी जब यूरोप के बाजार में भारत के निर्यातकों से कार्बन की खपत और उत्सर्जन का हिसाब मांगा जाएगा!
Date: 29-05-24
दलबदल विरोधी कानून ने उलटे दलबदल को बढ़ाया हैमयूरी गुप्ता, ( विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी में रीसर्च फेलो
पिछले कुछ वर्षों में राजनेताओं ने दलबदल विरोधी कानून का फायदा उठाने के लिए नित नए तरीके ईजाद किए हैं। दलबदल विरोधी कानून या संविधान की दसवीं अनुसूची- 1985 में लागू किया गया था। कानून जिस उद्देश्य के लिए बनाया गया था, उसमें बहुत कम सफलता हासिल कर पाया है उलटे दसवीं अनुसूची ने उन समस्याओं को और विकट बना दिया, जिनका उसे समाधान करना था। उसने बड़े पैमाने पर दलबदल का मार्ग प्रशस्त किया। इसका मुख्य कारण राजनीतिक दलों में विभाजन और विलय को दी गई छूट थी। इन छूटों ने वास्तव में कई तरीकों से दलबदल को और सुविधाजनक बना दिया है। 2003 में, परिच्छेद 3 के तहत विभाजन वाली छूट को हटा दिया गया था। हालांकि, विभाजन और विलय इन दोनों ही अपवादों के संयुक्त उपयोग से दलबदल विरोधी कानून के क्रियान्वयन पर जो असर पड़ा, वह समझने जैसा है।
लोकसभा और यूपी-हरियाणा विधानसभा के स्पीकर्स द्वारा दिए गए निर्णयों के विश्लेषण से एक पैटर्न का पता चलता है, जहां दलबदल के कारण अपात्रता से बचने के लिए विधायकों द्वारा विभाजन और विलय की छूट का उपयोग बार-बार किया गया था। इसे मोटे तौर पर ‘विभाजन के बाद विलय’ कहा जा सकता है। इन उदाहरणों में, एक निर्वाचित जनप्रतिनिधि (या जनप्रतिनिधियों का एक समूह) उस राजनीतिक दल से अलग हो गया, जिसमें वे शामिल थे, और विधायक दल के एक-तिहाई सदस्यों का समूह बनाकर विभाजन की छूट का लाभ उठाया। फिर अलग हुए विधायकों के पूरे समूह का दूसरी पार्टी में विलय हो गया। यह मानते हुए कि वे पूर्ण रूप से विलय करेंगे, उन्होंने किसी अन्य पार्टी के साथ वैध-विलय को लागू करने के लिए दो-तिहाई सदस्यों की आवश्यकता को आसानी से पूरा कर लिया। उदाहरण के लिए, 1997 में यूपी के जनता दल विधायक राजाराम पांडे ने दो अन्य लोगों के साथ मिलकर जेडी (राजाराम) गुट बनाने के लिए पार्टी में विभाजन कराया। 2000 में जेडी (राजाराम ) का लोजपा में विलय हो गया। 2002 में राजाराम पांडे ने लोजपा से अलग होकर लोजपा (राजाराम) गुट बना लिया। अंत में पांडे 2003 में सपा में शामिल हो गए।
ऐसा ही पैटर्न लोकसभा और हरियाणा विधानसभा में भी देखने को मिला। मार्च 1992 में लोकसभा सांसद भूपतिराजू विजयकुमार राजू ने तेलुगु देशम पार्टी से अलग होकर टीडीपी (वी) का गठन किया। कुछ ही महीनों के भीतर अगस्त 1992 में उन्होंने पूरे गुट का कांग्रेस (आई) संसदीय दल में विलय कर दिया। इसी तरह हरियाणा में करतार सिंह भड़ाना और 16 अन्य विधायकों ने 13 अगस्त 1999 को हरियाणा विकास पार्टी से अलग होकर एचवीपी (डेमोक्रेटिक) का गठन किया और 3 दिनों में हरियाणा लोकदल में विलय कर लिया। यह बताता है कि कैसे विभाजन और विलय अक्सर तेजी से होते हैं, कभी-कभी तो एक ही दिन में भी जैसे यूपी विधानसभा से मित्रसेन यादव ने 4 मार्च 1994 को सीपीआई से अलग होने का फैसला किया और उसी दिन सपा में विलय कर लिया। इन मामलों में विधायकों द्वारा कई बार पार्टी बदलने के बावजूद वे अपात्र घोषित नहीं हुए।
महाराष्ट्र में दो अवसरों पर अपात्रता से बचने के लिए एक नया पैटर्न तैयार किया गया, जिसे ‘विभाजन के बाद विलय नहीं कहा जा सकता है। दोनों उदाहरणों में, एक समूह ने विधायक दल में आवश्यक दो-तिहाई बहुमत जुटाया, अलग गुट बनाया और बाद में अन्य दलों के साथ सरकार बना ली या सरकार में शामिल हो गए। 2003 के बाद से, बड़े पैमाने पर दलबदलुओं के लिए उपलब्ध एकमात्र छूट परिच्छेद 4 के तहत विलय है। इसके अनुसार विभाजित होने वाले किसी भी गुट का किसी भी दल के साथ विलय या एक अलग समूह नहीं बनने के बावजूद, विभाजन और विलय की राजनीतिक जुगलबंदी ने अलग होने वाले विधायकों को महाराष्ट्र में अपात्रता से बचा लिया। इन हथकंडों ने दलबदल विरोधी कानून को निष्प्रभावी बना दिया है।
Date: 29-05-24
तूफान और गर्मीसंपादकीय
भारत आजकल प्रतिकूल मौसमों की मार झेल रहा है और इसमें सबसे त्रासद मिजोरम में हुआ भूस्खलन है। चक्रवात रेमल के वार से पश्चिम बंगाल तो किसी तरह संभलने लगा है, पर पूर्वोत्तर भारत में अनेक स्थानों पर बहुत बुरी स्थिति बन गई है। खराब मौसम के चलते बचाव प्रयासों में बाधा आ रही है। रेमल के असर से बिहार में भी कई स्थानों पर बारिश हुई है और उत्तर प्रदेश में भी इसके असर की संभावना है। मिजोरम में भूस्खलन व बारिश ने आइजोल को देश के बाकी हिस्सों से काट दिया है। मौसम की मार इतनी तगड़ी है कि राष्ट्रीय राजमार्ग-6 पर आवाजाही बंद हो गई है। पूर्वोत्तर में कई जगह चट्टानों के गिरने से कई अंतरराज्यीय राजमार्ग बाधित हो गए हैं। अधिकारी इंतजाम में लगे हैं, पर नुकसान का वास्तविक आकलन भारी बारिश के थमने के बाद ही किया जा सकेगा। आइजोल के बाहरी इलाके में पत्थर की खदान के ढहने से बीस से भी ज्यादा लोगों की मौत हुई है और अनेक लोग लापता हैं। असम में भी लोगों की मौत हुई है। नदियों का जलस्तर बढ़ गया है, तो बड़ी संख्या में लोगों को सुरक्षित स्थानों पर ले जाया गया है।
चक्रवात रेमल ने बांग्लादेश में भी तबाही मचाई है। बांग्लादेश और भारत के पश्चिम बंगाल में लाखों लोगों को एहतियातन विस्थापित किया गया है। भारत और बांग्लादेश को अगर मिला लें, तो चालीस से ज्यादा लोगों की मौत की आशंका है। तूफान और भारी बारिश की वजह से बड़ी संख्या में लोग जख्मी हुए हैं। ज्यादातर इलाकों में विद्युत आपूर्ति बाधित है और बारिश के थमने के बाद ही आपूर्ति व्यवस्था सुधर सकती है। पश्चिम बंगाल में अकेले बिजली के 1,200 से ज्यादा खंभे गिरे हैं। तकलीफ से भरे ऐसे समय में सभी प्रभावित राज्य सरकारों को पूरी सक्रियता के साथ काम करना चाहिए। जिन लोगों ने घर-बार गंवा दिया है, उनके प्रति पूरी संवेदना होनी चाहिए। राहत कार्य में संसाधन की कमी आड़े नहीं आनी चाहिए। चक्रवात और उसके बाद बारिश के चलते कोलकाता महानगर पर भी भारी असर हुआ है। पश्चिम बंगाल के साथ ही पूर्वोत्तर के राज्यों में सड़क, रेल और हवाई यातायात प्रभावित हुआ है। समुद्री चक्रवात हमारे दौर का एक स्याह सच है, जो रह-रहकर हमें रुलाने लगा है। अत: हमें समुद्री तटों पर ऐसे इंतजाम या ऐसी बसावट के बारे में सोचना होगा, ताकि चक्रवात की स्थिति में कम से कम नुकसान हो। समुद्र तटीय इलाकों में किसी भी प्रकार के निर्माण के संबंध में मुकम्मल नीति होनी चाहिए।
देश में तूफान और बारिश से अलग एक विशाल क्षेत्र ऐसा भी है, जहां पारा अपने आसमान को छू रहा है। गांवों से कहीं ज्यादा शहर के लोग परेशान हैं। कंक्रीट के जंगलों में रात के समय में गरमी से राहत नहीं मिल रही है। घर-द्वार तप रहे हैं। आगजनी की आशंका बढ़ गई है। अनेक इलाकों में तापमान 45 डिग्री सेल्सियस के पार चला गया है। अस्पतालों को उचित ही सजग और तैयार रहने के लिए कहा गया है। आंकडे़ स्पष्ट नहीं हैं, पर उत्तर भारत में पारा मौत की वजह बनने लगा है। बड़ी संख्या में लोग लू के चलते बीमार हैं। मौसम विभाग ने उत्तर भारत के छह राज्यों के लिए रेट अलर्ट जारी किया है। अनुमान यही है कि आने वाले कुछ दिनों तक गरमी का प्रकोप ऐसे ही जारी रहने वाला है। गरमी, धूप और लू से बचने के लिए लोगों को स्वयं भी सचेत रहना होगा। बच्चों, बुजुर्गों का खास ध्यान रखने की जरूरत है। राहत की खबर यही है कि मानसून तीन-चार दिन में केरल में दस्तक देगा।
Date: 29-05-24
अब किसी को नहीं सुन रहा इजराइलअश्विनी महापात्र, ( प्रोफेसर जेएनयू )
दक्षिणी गाजा पट्टी में राफा पर इजरायली हमले के खास निहितार्थ हैं। बेशक, इस हमले में 40 से अधिक आम फलस्तीनियों की मौत हुई है और दुनिया भर में इसकी निंदा जारी है, लेकिन ऐसा लगता है कि इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू सोच-समझकर अपने कदम आगे बढ़ा रहे हैं। पिछले कुछ वर्षों में ऑपरेशन प्रोटेक्टिव शील्ड (जुलाई, 2014), ऑपरेशन कास्ट लीड (दिसंबर, 2018), ऑपरेशन वॉल गार्जियन (मई, 2021) जैसी फौजी कार्रवाइयों के बावजूद इजरायल को इसलिए सफलता नहीं मिल सकी थी, क्योंकि सैन्य ऑपरेशन के बाद अंतरराष्ट्रीय दबाव में उसे संघर्ष-विराम करना पड़ता था और हालात पूर्ववत हो जाते थे। ऐसे संघर्ष-विराम में दोनों पक्षों द्वारा कैदियों की अदला-बदली की भी बात होती थी, लेकिन करीब एक करोड़ इजरायलियों की सुरक्षा का कोई स्थायी समाधान नहीं निकल पाता था।
अब इजरायली प्रधानमंत्री इस परिपाटी को बदलते हुए दिख रहे हैं। इस युद्ध में हमास की मंशा यही लग रही थी कि अक्तूबर, 2023 में हमले के बाद संघर्ष-विराम कर लिया जाएगा और इजरायली बंधकों के बदले फलस्तीनी कैदियों को छुड़ाकर स्थिति सामान्य बना ली जाएगी। मगर नेतन्याहू अब इस समस्या का स्थायी समाधान चाहते हैं। उनकी योजना मानो दुनिया के नक्शे से गाजा पट्टी को मिटा डालने की है, ताकि हमास को सिर छिपाने की कोई जगह न मिले। इससे ही इजरायलियों की सुरक्षा सुनिश्चित हो सकेगी। इजरायल का यह भी मानना है कि जब उत्तर और मध्य गाजा से फलस्तीनियों को दक्षिणी इलाकों में आने को कहा गया था, तब आम लोगों की भीड़ में कुछ हमास के लड़ाके भी यहां पर आ गए, जो रह-रहकर इजरायली सुरक्षा बलों को चुनौती देते रहे हैं। उसकी यह सोच उन हमलों से पुष्ट होती है, जो बीते दिनों इजरायल पर हुए हैं। माना जाता है कि उत्तर और मध्य गाजा में हमास ने अपना ठिकाना फिर से बना लिया है।
यही कारण है कि इजरायली प्रधानमंत्री अंतरराष्ट्रीय समुदाय की अवहेलना करते दिख रहे हैं। उन्होंने स्पष्ट कहा है कि वह किसी दबाव में आकर सैन्य कार्रवाई बंद नहीं करेंगे। अंतरराष्ट्रीय बिरादरी से उनकी नाराजगी की एक वजह फलस्तीन को राष्ट्र का दर्जा देने वाले देशों की बढ़ती संख्या भी है। अब तक संयुक्त राष्ट्र के 195 सदस्य देशों में से 143 राष्ट्र फलस्तीन के पक्ष में हैं, जिनमें नया नाम आयरलैंड, नॉर्वे व स्पेन का है।
इतना ही नहीं, पिछले मार्च महीने में सुरक्षा परिषद् ने गाजा में संघर्ष-विराम और बिना शर्त इजरायली बंधकों की रिहाई संबंधी एक प्रस्ताव पारित किया था, जिसका अमेरिका ने कोई विरोध नहीं किया, जबकि इससे पहले तक वह इजरायल के पक्ष में खड़ा रहा है। फिर, वाशिंगटन ने इजरायल को भेजी जाने वाली हथियारों की खेप भी टाल दी और राफा पर हमले की सूरत में इसे रद्द करने की चेतावनी दी थी, जिसे इजरायल ने नजरंदाज कर दिया है।
हालांकि, इन सबकी कीमत आम फलस्तीनी चुका रहे हैं। तकरीबन 10 लाख फलस्तीनी विगत अक्तूबर के बाद से पलायन करके दक्षिणी गाजा पट्टी में आ चुके थे, लेकिन ताजा हमले के बाद वे वापस उत्तर व मध्य इलाकों में लौटने लगे हैं। माना जा रहा है कि तीन लाख, 60 हजार फलस्तीनी राफा छोड़कर वापस लौट चुके हैं। जबकि, हालिया हमले में लगभग 1,000 लोगों की मौत के साथ अब तक तकरीबन 40 हजार फलस्तीनी इस युद्ध की भेंट चढ़ चुके हैं। फिर भी, इजरायल इसलिए नहीं पसीज रहा, क्योंकि उसकी नजर में यही आखिरी मौका है, जब वह हमास को जड़ से खत्म कर सकता है। स्पष्ट है, यह एक मानसिक खेल है, जो दोनों पक्षों की ओर से खेला जा रहा है।
ऐसे में, सवाल यही है कि अंतरराष्ट्रीय समुदाय अब क्या कर सकता है? अमेरिका बार-बार इजरायल से यही पूछ रहा है कि आखिर वह चाहता क्या है? वाशिंगटन के मुताबिक, समझौता ही इस जंग का अंतिम रास्ता है। मगर फलस्तीनी प्रशासन भी फिलहाल झुकने को तैयार नहीं है, क्योंकि इससे उसके पक्ष में बन रही सहानुभूति कम हो सकती है। जिस तरह से दुनिया भर के देश उसके पक्ष में गोलबंद हो रहे हैं, विशेषकर अमेरिकी विश्वविद्यालयों में उसके पक्ष में प्रदर्शन हो रहे हैं, उससे उसमें यह भरोसा बना है कि अंतरराष्ट्रीय समर्थन उसके साथ है।
यह माना जा रहा था कि मिस्र, सऊदी अरब जैसे देश मिलकर इस मसले का हल निकाल लेंगे और हमास पर दबाव डालेंगे, ताकि वह कहीं और चला जाए। मगर इजरायल फलस्तीन जैसे किसी समुदाय का ही पक्षधर नहीं दिख रहा। वह गाजा पट्टी पर अपना अधिकार चाहता है। यही कारण है कि वह दो-राष्ट्र के सिद्धांत की भी मुखालफत करता है, जबकि तमाम शांतिप्रिय राष्ट्र इस सिद्धांत के हिमायती हैं।
कुछ लोग तर्क देते हैं कि इजरायल के भीतर जो फलस्तीन समर्थक आवाजें उठ रही हैं, वे इजरायलियों की अपनी सरकार से नाराजगी का संकेत है। मैं इससे सहमत नहीं हूं। इजरायल में जहां-कहीं छिटपुट संख्या में फलस्तीन समर्थक हैं, खासतौर से वेस्ट बैंक में, वहीं विरोध-प्रदर्शन हो रहे हैं। इसका बहुत ज्यादा अर्थ नहीं है। लिहाजा, सवाल यही है कि आखिर इस युद्ध का अंत कैसे हो? इजरायल फलस्तीन का पूर्ण सफाया चाहता है और उसकी नजर में फलस्तीनियों की मौजूदगी उसकी एक करोड़ आबादी की सुरक्षा को दांव पर लगाना है, पर यह व्यावहारिक समाधान नहीं हो सकता। तो, क्या दो-राष्ट्र का सिद्धांत ही समाधान है? अगर हां, तो यह कैसे संभव होगा? इन्हीं सवालों के जवाब में इजरायल-फलस्तीन समस्या का हल भी छिपा है।
तमाम संभावनाओं को देखें, तो उचित हल यही है कि दो-राष्ट्र के सिद्धांत को मान लिया जाए। तभी अंतरराष्ट्रीय समुदाय का दबाव फलस्तीनियों पर पड़ेगा और शांति-बहाली का प्रयास हो सकेगा। ऐसा करने पर शांति-सेना गाजा में तैनात हो सकेगी। दिक्कत यह है कि इस युद्ध को रोकने के लिए कोई भी कुछ खास करता नहीं दिख रहा। अरब देश चुप हैं। इस्लामी राष्ट्र भी कुछ नहीं कह रहे। ईरान ने इस मामले में काफी हद तक कदम बढ़ाए थे, लेकिन एक हवाई हादसे में अपने राष्ट्रपति की दुखद मौत और घरेलू चुनौतियों के कारण वह भी फिलहाल शांत पड़ता दिख रहा है। बाकी देश स्थिति पर निगाह जरूर बनाए हुए हैं, लेकिन वे निष्क्रिय ही जान पड़ते हैं। नतीजतन, यह युद्ध दिन-ब-दिन वीभत्स होता जा रहा है।
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पिछले पांच वर्षों में नवंबर से जून तक उत्तराखंड में जंगल की आग का खतरा लगातार बढता जा रहा है। यहां तक कि सर्दियों में आग लगने की घटनाओं में कई गुना वृद्धि हुई है।
इसके पीछे के कारणों पर कुछ बिंदु –
यद्यपि सरकारी प्रयास से जंगल की आग पर काबू पाया जा सकता है, लेकिन बेतहाशा गर्मी और मौसम की परम घटनाओं को काबू में नहीं किया जा सकता। उसकी हानि जनता को ही उठानी पड़ती है।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 07 मई, 2024
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Date: 28-05-24
Chabahar’s opportunities and challengesThe geopolitics around India’s play in Chabahar and Iran’s leverages are interestingKabir Taneja is Fellow, Strategic Studies Programme, Observer Research Foundation
The recently concluded contract between India and Iran, which gives New Delhi rights to invest in and operate the Shahid-Behesti terminal at Chabahar Port for another 10 years, has created many headlines. The port remains the crown project anchoring economic relations between the two countries. The deal came at a precarious time in West Asia as the war in Gaza continues unabated, Israel-Iran tensions remain critical, and the passing of Iran’s President and Foreign Minister in a helicopter accident challenges domestic politics in Tehran.
Representative of India’s thinking
There is no denying that the Chabahar project is an important endeavour for both economic and strategic reasons. At the core of it, Chabahar, for India, represents its thinking from the perspective of an extended neighbourhood, and not necessarily as part of its West Asia outlook. The port is a fulcrum of the International North–South Transport Corridor, a project looking towards seamlessly linking India with Central Asia and Russia, bypassing Pakistan. Beyond this, Chabahar is also astutely tuned into the ‘new’ realities of Afghanistan. The Taliban-led interim government in Kabul has also thrown its weight behind the port, offering an investment of $35 million as it looks to secure alternatives and not be economically reliant on Pakistani ports such as Karachi or the China-backed Gwadar. In November 2023, Taliban leader Mullah Baradar visited Chabahar, with Shahid-Behesti visible in the background.
Bilaterally for India and Iran, Chabahar is also a symptom of challenges between the two states. While there is a lot of public championing for the project, and for good reasons, if it was not for Chabahar, India-Iran ties today would look extremely dry. The reasons are multifaceted and tied to both country’s views of their national, regional, and geopolitical interests. Instead of expanding projects and economic cooperation beyond Chabahar, many older ones, such as the gas field Farzad-B which was discovered by Indian state-owned enterprise ONGC Videsh, have now been written off. Another old bilateral platform, the IranoHind shipping company, was dissolved in 2013 because of sanctions. Chabahar, is a legacy project, which has its foundations going back to 2003. This was an era when India was opening to developing economic assets abroad. Chabahar in Iran was one, Sakhalin-I in Russia, was another.
A reflection of diplomacy
The geopolitics today that surrounds India’s play in Chabahar, and Iran’s leverages, make for an interesting study. This latest iteration of the deal was signed not too long after both Israel and Iran exchanged missile fire and came critically close to a full-scale conflict. India’s Adani Group, meanwhile, has also invested in a large port project in Israel. The company bought Israel’s Haifa port on the Mediterranean Sea for $1.2 billion. This was also made possible in part due to India’s participation in new diplomatic and economic endeavours with the United States, Israel, and Arab partners, such as the I2U2 and India-Middle East-Europe Economic Corridor.
The fact that India’s buy-in into Haifa was not a constraint for the Chabahar deal to go through is not only a testament to Indian diplomacy but also for the U.S. to also recognise that this kind of access which New Delhi has is beneficial, and not detrimental, to Washington.
Recent remarks from the U.S. over potential sanctions against Chabahar stand out as myopic. India’s relations with Iran and the continuity of Chabahar’s development, which offers access to difficult political terrain such as Central Asia, and even Afghanistan, could bring in a significant level of integration and help in building alternatives to China-backed projects. Despite public discourse, China’s heavy financial might and the 2021 strategic deal with Iran, does not automatically make Tehran subservient to Beijing. Iran is a quintessential survivalist state and plays a diverse set of cards in its playbook of geopolitics.
The Biden administration would benefit by not blindly following former U.S. President Barack Obama’s doctrine on how to deal with India-Iran ties, and Chabahar, at its centre. New Delhi burnt its fingers by giving Mr. Obama too much room when it completely stopped importing oil from Iran. This took Tehran, consistently among India’s top-two suppliers of oil for decades, out of the top 10. Even if India’s thinking was to build influence in Washington around the nuclear deal negotiations, Donald Trump as the U.S. President and the unilateral exit of the U.S. under his watch from the Joint Comprehensive Plan of Action (JCPOA) in 2018, recalibrated how non-partisanship and the stability of critical U.S. foreign policies were to be viewed thereafter.
The bigger picture
Finally, for Chabahar, there are two main points to consider moving forward. First, the port project cannot be the singular major play in the bilateral relationship. This concentration of interests is volatile. Second, the U.S. must move towards being accommodative on sanctions against Chabahar. Viewing the port as a collateral against problematic Iranian policies in West Asia would not be an accurate understanding of the big picture of India’s own outreach towards its extended neighbourhood which could benefit larger American aims as well.
This is important to be considered at a time when the U.S. itself maintains a channel with the Iranians not only through Swiss intermediators but, increasingly, through Oman and Qatar as well.
Date: 28-05-24
हम अपने बच्चों को कैसे बड़ा कर रहे हैंचेतन भगत, ( अंग्रेजी के उपन्यासकार )
पुणे में एक धनाढ्य परिवार के 17 वर्षीय लड़के ने नशे में धुत्त होकर तेज गति से कार चलाते हुए दो बाइक सवारों को टक्कर मार दी, जिससे एक युवक और युवती की मौत हो गई। इस एक वाक्य में ही बहुत सारी गड़बड़ियां हैं। अव्वल तो 17 साल के किसी लड़के को गाड़ी नहीं चलानी चाहिए। दूसरे, 17 साल के किसी लड़के को शराब नहीं पीनी चाहिए (महाराष्ट्र में- जहां यह घटना घटी- शराब पीने की न्यूनतम उम्र 25 वर्ष है)। और तीसरे, किसी भी उम्र के व्यक्ति को शराब पीकर तो हरगिज गाड़ी नहीं चलानी चाहिए। और इसके बावजूद, इस पोर्श कार वाले लड़के ने यह सब किया।
लड़का नाबालिग है (उसके 18 वर्ष का होने में अभी 4 महीने शेष हैं), इसलिए उस पर जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड में मामला दर्ज किया गया। ऐसे मामलों में माता-पिता को उत्तरदायी माना जाता है। ‘पोर्श-बॉय’ जमानत का पात्र था, इसलिए उसे सड़क सुरक्षा पर 300 शब्दों का निबंध लिखने के असाइनमेंट के साथ तुरंत छुट्टी मिल गई। लेकिन मामला संगीन था। एक अमीर बिल्डर का शराबी बेटा 2 करोड़ की कार चलाते हुए दो होनहार आईटी पेशेवरों को रौंद देता है और उनके परिवारों को कभी न खत्म होने वाला दर्द दे देता है। घटना के बाद भारी आक्रोश फैल गया। आरोपी के लिए कड़ी से कड़ी और तत्काल सजा की मांग की गई। पूरे पुणे के पब बंद कर दिए गए। इस सब से आक्रोश की अभिव्यक्ति तो हो जाती है, पर समस्या हल नहीं होती।
समाधान केवल अधिक सख्त किशोर-कानूनों से नहीं होगा। समस्या की जड़ इसमें है कि हम अपने बच्चों की पैरेंटिंग कैसे करते हैं। भारत की प्रति व्यक्ति जीडीपी के साथ ही समृद्ध भारतीयों की संख्या भी पिछले कुछ दशकों में कई गुना बढ़ गई है। इस समृद्धि का स्वागत किया जाना चाहिए, लेकिन यह अपने साथ कुछ बड़ी समस्याएं भी लेकर आती है। इनमें से एक प्रमुख समस्या है- बच्चों की एक स्वस्थ माहौल में परवरिश करना।
चाहे जैसी भी आय-स्तर वाला व्यक्ति हो, पैरेंटिंग सभी के लिए कठिन है। यहां कोई यूजर-मैनुअल, स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग सिस्टम या प्रैक्टिस-गाइड काम नहीं आती। अगर हम बच्चे पर बहुत अधिक सख्त होते हैं, तो उसकी स्वतंत्रता और विकास को नुकसान पहुंच सकते हैं। अगर बच्चे के प्रति अत्यधिक उदार होते हैं, तो उसे सीमाओं और अनुशासन के बारे में पता नहीं चल पाता। अब मान लें कि उदारता समृद्धि का परिणाम है, जिसमें बच्चे की हर मांग पूरी की जाती है। जिसमें माता-पिता सोचते हैं कि बच्चे को प्यार करने का मतलब है उसे अधिक से अधिक संसाधन, पैसा और सेवाएं प्रदान करना और उसके रास्ते में आने वाली हर बाधा को दूर करना। ऐसे में बच्चा एक ऐसे गुस्सैल, ‘एनटाइटल्ड’ व्यक्ति के रूप में बड़ा हो सकता है, जो अपनी पसंद की हर चीज को हासिल करने का आदी है। ऐसे में अत्यधिक-उपभोग, कम उम्र में शराब पीना और गाड़ी चलाना, अधिकारपूर्ण-व्यवहार के बावजूद बच्चा एक दु:खी व्यक्ति के रूप में बड़ा होता है। उसकी परवरिश बिना किसी संघर्ष के और निरंतर सुख की तलाश के माहौल में होती है और यह तथाकथित लग्जरियस जीवन वास्तव में बरबादी का नुस्खा है।
अगर पुणे वाली वह दुर्घटना नहीं भी हुई होती, तब भी वह ‘पोर्श-बॉय’ पहले ही शराबी बन चुका था। वह रात 2 बजे शहर के पबों में अल्कोहल पर ही लाखों खर्च कर रहा था। समय के साथ, इस बात की पूरी सम्भावना थी कि वह ड्रग्स का आदी हो जाता, क्योंकि एक सीमा के बाद शराब उतना ‘हाई’ फील कराना बंद कर देती है। इसी ‘हाई-चेसिंग’, ‘थ्रिल-सीकिंग’ व्यवहार के कारण उसे अंधाधुंध गति से गाड़ी चलाने की जरूरत महसूस हुई होगी। जब जीवन में पैसे खर्च करने और उपभोग करने के अलावा कोई और चुनौती, उद्देश्य या प्रयोजन नहीं होता, तो आप हादसों की ओर ही बढ़ रहे होते हैं।
ऐसे में माता-पिता के लिए यह बहुत जरूरी हो गया है कि अपने बच्चों को अनुशासन और सही मूल्यों के साथ बड़ा करें। बच्चे पर भौतिक वस्तुएं न्योछावर कर देना ही प्यार नहीं हैै। किसी बच्चे को जल्द ही शराब पीने की अनुमति दे देना ‘कूल’ होना नहीं है। पैरेंटिंग दो चीजों के बीच संतुलन बनाने के बारे में है- सहानुभूति और सीमाएं। ‘हां बेटा, मुझे पता है तुम बोरियत महसूस कर रहे होगे’- ये कहना सहानुभूतिपूर्ण है। लेकिन साथ ही हमें यह भी कहना होगा कि ‘बोरियत मिटाने के लिए घंटों अपने फोन पर मत रहो, कोई खेल खेलो या किताब पढ़ो।’ तब आप सीमाएं निर्धारित कर रहे होते हैं। एक और उदाहरण देखें। ये कहना कि ‘हां बेटा, मुझे पता है कि दूसरे बच्चे महंगे ब्रांड्स का उपयोग करते हैं, जिससे तुम खुद को हीन महसूस करते हो,’ सहानुभूति का प्रदर्शन करना है। लेकिन इसके साथ यह जोड़ देना कि ‘अलबत्ता मैं तुम्हें डिजाइनर बैग खरीदकर नहीं दे सकता क्योंकि तुम अभी उसके लिए बहुत छोटे हो,’ सीमाएं तय करना है। या, ‘पोर्श बहुत शानदार कार है, लेकिन अभी तुम स्पोर्ट्स कार चलाने के बजाय पढ़ाई और दूसरे लक्ष्यों पर ध्यान दो।’
‘पोर्श-बॉय’ के मामले में ऐसी सीमाओं का निर्धारण नहीं किया गया था। आज ऐसे अनेक समृद्ध भारतीय माता-पिता हैं, जो बच्चे की मांगों के आगे झुक जाते हैं। वे प्यार के नाम पर या बच्चे से रिश्ते खराब न करने के लिए हार मान लेते हैं। लेकिन उन्हें याद रखना चाहिए कि सही सीमाएं तय करने से रिश्ते खराब नहीं होते। वास्तव में, हमारे बच्चे तो चाहते हैं कि हम उनके लिए ऊंची सीमाएं तय करें, जो उन्हें दुनिया में मुकाम बनाने में मदद करती हों।
Date: 28-05-24
इस बार के आम चुनाव पिछले दो चुनावों से बहुत अलग हैं रुचिर शर्मा ग्लोबल’ ( इन्वेस्टर व बेस्टसेलिंग राइटर )
नरेंद्र मोदी लहर पैदा करना बखूबी जानते हैं! दस साल पहले उन्होंने भाजपा को पहली बार लोकसभा में पूर्ण बहुमत दिलाया था। पांच साल बाद राष्ट्रवादी भावनाओं के उफान के बूते उन्होंने अपने बहुमत को और अधिक निर्णायक बहुमत में बदल दिया। यही कारण था कि जब प्रधानमंत्री, उनकी पार्टी और सर्वेक्षणों ने इस बार एक और बड़ी जीत की भविष्यवाणी करना शुरू किया तो कुछ ही लोगों ने इस पर संदेह जताया था। कम से कम मैंने तो निश्चित रूप से इस पर संशय नहीं किया था।
लेकिन उसके बाद मैं अपने 20 मीडिया सहयोगियों के एक समूह के साथ चुनावी दौरों पर निकला। हमने आंध्र प्रदेश, तेलंगाना, कर्नाटक और महाराष्ट्र राज्यों को पार करते हुए पूर्वी तट से पश्चिम तक चल रहे चुनाव-अभियानों पर नजर रखी। और जैसा कि अक्सर होता है, परंपरागत सूझ-बूझ हमेशा ही सड़कों पर होने वाले रियलिटी-टेस्ट से मेल नहीं खाती। ठीक उसी तरह, आठ दिनों में इस 2,000 किमी की यात्रा के दौरान हमें कहीं भी लहर जैसी कोई चीज नजर नहीं आई।
लेकिन इसके साथ ही हमें प्रधानमंत्री के खिलाफ कोई विशेष नाराजगी भी नहीं दिखाई दी। यह राष्ट्रीय राजनीति में मोदी के उदय से पहले के दौर की तरह था, जब स्थानीय मुद्दों और नेताओं पर ध्यान केंद्रित किया जाता था और इसके नई दिल्ली में क्या मायने निकलेंगे, इस पर बाद में विचार किया जाता था। शहरी मध्यम वर्ग मोदी के तीसरे कार्यकाल के लिए इस आधार पर उत्साहित है कि तेजी से विकसित हो रही अर्थव्यवस्था भारत के वैश्विक कद को बढ़ा रही है। लेकिन बहुतेरे ग्रामीण मतदाता ऐसा नहीं सोचते। मोदी के राज में गरीबों के लिए सब्सिडी दोगुनी होने के बावजूद वे अभी भी बढ़ती कीमतों से रोजमर्रा के जीवन पर आए संकट और अधिक सरकारी राहत की तत्काल आवश्यकता की बात करते हैं। हां, चमचमाते हुए नए एक्सप्रेस-वे जरूर बनाए गए हैं, लेकिन उनमें से हरेक शहरी-विकास की इस तरह की विसंगतियों का सामना कर रहा होता है कि हम दो शहरों के बीच केवल 50 किमी प्रति घंटे की औसत गति ही हासिल कर पाए हैं- जो कि एक-चौथाई सदी पहले भी इतनी ही थी।
हमारी यात्रा आंध्र प्रदेश से शुरू हुई थी, जहां मतदाताओं ने पूछे जाने तक प्रधानमंत्री का जिक्र नहीं किया। राजमुंदरी में मोदी की रैली थी, लेकिन मतदाताओं ने एनडीए के पवन कल्याण- एक क्षेत्रीय फिल्म स्टार, जिन्होंने अपनी पार्टी लॉन्च की है- का ज्यादा बड़ा स्वागत किया। अक्सर रैली में आने वालों का एक समूह ऐसा होता है, जो सिर्फ मशहूर हस्तियों को उनके हेलीकॉप्टरों से उतरते देखने के लिए आते हैं। वहीं कुछ श्रोता तेलुगु में कल्याण का जोशीला भाषण सुनने के बाद चले गए। इसके तीन दिन बाद हम हैदराबाद पहुंचे, जहां कांग्रेस पार्टी के मुख्यमंत्री रेवंत रेड्डी ने कहा कि केवल छह महीने के कार्यकाल के बाद ही वे दबाव में हैं, क्योंकि देश ‘स्विगी’ राजनीति की चपेट में है। वे सार्वजनिक लाभ की तत्काल डिलीवरी की अपेक्षाओं की ओर संकेत कर रहे थे।
दुनिया के विश्लेषक भारत के बारे में बात करते हुए विचारधारा पर बहुत जोर देते हैं, जबकि वे भारतीय राजनीति की बढ़ती ‘ट्रांसैक्शन’ की गुणवत्ता को चूक जाते हैं। जैसा कि रेड्डी ने हमें बताया कि ‘विचारधारा लाइब्रेरियों के लिए होती है!’ पार्टियां और मतदाता तो अक्सर विशुद्ध निजी हितों से प्रेरित होते हैं। एक गणना के अनुसार, देश भर में भाजपा के लगभग चार में से एक उम्मीदवार विपक्षी पार्टियों से आए हुए नए सदस्य हैं- उनकी हिंदुत्व की विचारधारा के प्रति अतीत में कोई प्रतिबद्धता नहीं रही है।
यात्रा के दूसरे चरण में हम कर्नाटक गए, जहां के चमचमाते घर और चौड़ी सड़कें उसकी बढ़ती समृद्धि का संकेत दे रहे थे। जबकि महाराष्ट्र में हाई-वे गड्ढों से भरे थे। कभी प्रति व्यक्ति आय के हिसाब से देश का दूसरा सबसे अमीर राज्य रहा महाराष्ट्र अब शीर्ष दस से बाहर हो गया है। और उसकी गिरावट निरंतर जारी है, जबकि कर्नाटक और तेलंगाना में तेजी आई है। अब वे क्रमशः तीसरे और दूसरे स्थान पर हैं। स्थानीय परिस्थितियां ही स्थानीय मनोदशा का निर्माण करती हैं। सोलापुर में चैंबर ऑफ कॉमर्स के एक प्रतिनिधि ने हमें बताया कि महाराष्ट्र में उद्योग-क्षेत्र कमजोर हो गया है और नौकरियां इतनी कम हैं कि हजारों की संख्या में युवा पलायन कर रहे हैं। यहां किसानों की आत्महत्याओं का मुद्दा विशेष रूप से गंभीर है।
भारत आज भी विभिन्न राज्यों का समूह बना हुआ है, और सबसे करिश्माई और ताकतवर लोगों के लिए भी पूरी तरह से उस पर हावी होना कठिन है। हालांकि मोदी के तीसरे कार्यकाल में लौटने की संभावना कायम है, लेकिन उनकी हाइप घट सकती है। अगर इस बार भाजपा कम अंतर से चुनाव जीतती है, तो यह डर खत्म हो जाएगा कि मोदी और भाजपा जरूरत से ज्यादा मजबूत हो रहे हैं, जिससे भारतीय लोकतंत्र को खतरा है। तब इस बात पर चर्चा शुरू हो जाएगी कि वे कम जनादेश के साथ कैसे शासन कर सकते हैं।
Date: 28-05-24
अमेरिका और चीन का व्यापर संघर्षपरमजीत सिंह वोहरा
बीते दिनों अमेरिका के जो बाइडेन प्रशासन ने चीनी वस्तुओं पर करों की दरें काफी बढ़ा दीं। इससे चीन और अमेरिका के बीच व्यापार युद्ध बढ़ गया है। अमेरिका ने इसे चीन की गलत वैश्विक नीतियों का परिणाम बताया है। उसने कहा है कि चीन अपनी घरेलू आर्थिक समस्याओं को पूरे विश्व तक पहुंचाने की कोशिश कर रहा है, जो कि अनुचित है और इसे बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। सर्वविदित है कि चीन और अमेरिका की पारस्परिक लेने-देन में चीन हमेशा आगे रहा है।
आंकड़ों के मुताबिक 2022 में अमेरिका का चीन से आयात 562 अरब डालर का था, जबकि निर्यात मात्र 195 अरब डालर। यानी तब अमेरिका का चीन के साथ व्यापारिक घाटा 367 अरब डालर का था। इसे लेकर चर्चा आम रही कि अमेरिका आखिर चीन पर क्यों निर्भर है? बाद में इस पर नियंत्रण करने की कोशिश जरूर की गई, जिसके चलते वर्ष 2023 में चीन के साथ व्यापारिक घाटा घट कर 279 अरब डालर तक पहुंचा, मगर अब भी यह अमेरिका के लिए एक समस्या है।
अमेरिका में इस वर्ष चुनाव होने हैं। अक्सर देखा गया है कि अमेरिका चुनावी वर्ष में दूसरे मुल्कों को लक्षित करके अपनी आर्थिक नीतियों में बदलाव करता है। मसलन, बीते कई चुनावों में भारत को लेकर ‘आउटसोर्सिंग’ का मुद्दा चर्चा में रहा, इस दफा उसके निशाने पर चीन है। उसने चीन से कुछ विशेष पदार्थों के आयात कर में बहुत वृद्धि कर दी है, जिनमें स्टील, बिजली चालित वाहन, बैटरियां, सोलर सेल, चिकित्सा उपकरण और कुछ खनिज संपदा आदि शामिल हैं। स्टील पर कर 7.5 फीसद से बढ़कर 25 फीसद, सेमीकंडक्टर पर 25 से बढ़कर 50 फीसद कर दिया गया। सबसे अधिक अधिक बिजली चालित वाहन पर कर 25 से बढ़ा कर 100 फीसद कर दिया गया है। इसके अलावा, कुछ खनिज संपदाओं जिनमें ग्रेफाइट और मैग्नेट आदि शामिल हैं, पर कर पहले नहीं लगता था, पर 2026 से इनको 25 फीसद की सीमा में ला दिया गया है। राष्ट्रपति पद के अन्य दावेदार डोनाल्ड ट्रंप ने भी कहा है कि वे अमेरिका के सभी प्रकार के आयात पर दस फीसद की दर से कर बढ़ा देंगे, ताकि अमेरिका हमेशा सुरक्षित रहे। अगर अमेरिका में ट्रंप ऐसा करते हैं, तो भारत पर भी विपरीत असर पड़ेगा, क्योंकि भारत का अमेरिका के साथ निर्यात तकरीबन 25 अरब डालर के बराबर है।
दरअसल, चीन अब अमेरिका के लिए ही नहीं, विश्व की दूसरी सभी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के लिए समस्या बनता जा रहा है। इसके पीछे चीन का आर्थिक ढांचा मुख्य कारण है, जो पूरी तरह निर्यात पर निर्भर है। चीन की आर्थिक नीतियों में पिछले दो-तीन दशक से इस बात पर ध्यान केंद्रित किया जाता है कि वहां के सभी कारखाने सौ फीसद क्षमता के आसपास का उत्पादन करें। बीते कई वर्षों से चीन में घरेलू मोर्चे पर नागरिकों की उपभोग क्षमता जीडीपी की तुलना में विश्व के सभी बड़े विकसित मुल्कों में सबसे कम है। यानी चीनी उद्यमों में तैयार पदार्थों की मांग खुद चीन में बहुत कम है, इसलिए चीन को इन्हें विश्व के दूसरे मुल्कों में खपाना पड़ता है। चीन की गलत आर्थिक नीति यह है कि वह इन्हें कम मूल्य पर दूसरे मुल्कों को निर्यात करता है, ताकि उन मुल्कों का घरेलू बाजार इन पदार्थों के सामने प्रतिस्पर्धा में खड़ा ही न हो पाए।
इसी सोच के चलते विश्व के 173 मुल्कों के साथ चीन का व्यापार मुनाफे में रहता है। मात्र पचास के आसपास मुल्कों के साथ चीन को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर घाटा होता है। इन पचास मुल्कों से बहुतायत में कच्चे तेल की खरीदारी या अफ्रीकी मुल्कों तथा मंगोलिया जैसे राष्ट्रों से बड़ी मात्रा में कच्चे माल की खरीदारी है। इस संदर्भ में गौरतलब है कि वर्ष 2022 में चीन का अंतरराष्ट्रीय व्यापार में मुनाफा 890 अरब अमेरिकी डालर का था, जबकि उस दौरान भारत का कुल अंतरराष्ट्रीय व्यापार, जिसमें आयात और निर्यात दोनों सम्मिलित हैं, 964 अरब डालर का था, जबकि दोनों मुल्क जनसंख्या और कुछ अन्य परिस्थितियों में तकरीबन एक जैसे हैं।
चीन की आर्थिक नीतियों में वैश्विक स्तर पर कोई समानता और एकरूपता नहीं दिखती है। मसलन, चीन का अपनी आर्थिक नीतियों में सिर्फ इस बात पर ध्यान केंद्रित रहता है कि जनता के पास कम से कम वित्तीय तरलता बनी रहे। कोरोना के दौरान विश्व के सभी बड़े मुल्कों ने प्रति व्यक्ति उपभोग क्षमता को बनाए रखने के लिए बैंक दरों में कमी तथा वित्तीय ऋण की मात्रा बढ़ाकर अपने नागरिकों की खरीदारी के प्रति रुचि को बनाए रखा था। मगर चीन ने इसके विपरीत किया। बीते कुछ वर्षों से चीन में जमीन-जायदाद का कारोबार नकारात्मक दौर से गुजर रहा है। कई भवन निर्माण परियोजनाएं बंद हो गई हैं, जिसके चलते कई वित्तीय संस्थान दिवालिया घोषित हो गए हैं। यह भी देखा गया है कि पिछले कई वर्षों से लगातार चीन में प्रति व्यक्ति उपभोग क्षमता में वृद्धि नहीं हो रही है, जबकि व्यक्तियों के पास वित्तीय बचत उपलब्ध है। शायद इन्हीं के चलते चीन अब कुछ भयभीत है।
अमेरिका के बाइडेन प्रशासन ने चीन के विरुद्ध यह कदम एकाएक नहीं उठाया है। बीते कुछ समय में वैश्विक स्तर पर चीन की आर्थिक नीतियों की मुखालत बड़े स्तर पर देखने को मिली है। बीते अप्रैल में जर्मनी के राष्ट्रपति ने अपनी चीन की यात्रा के दौरान इस बात को बड़ी मुखरता से रखा कि चीन की उत्पादन क्षमता प्रशंसनीय है, लेकिन इसके चलते विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धात्मक क्षमता कमजोर नहीं पड़नी चाहिए, अन्यथा इसका नुकसान सभी को उठाना पड़ेगा। चीन ने बीते एक दशक में जलवायु परिवर्तन के मुद्दे को बड़ी तेजी से अपने विनिर्माण क्षेत्र में शामिल किया है। इसी के चलते उसने अपना सारा ध्यान बिजली चालित वाहन, सौर ऊर्जा संयंत्र आदि बनाने पर लगा दिया। देखने को मिला है कि चीन की विभिन्न मोबाइल उत्पादक कंपनियां भी बिजली चालित वाहनों के निर्माण में उतर रही हैं।
चीन की इन आर्थिक नीतियों के चलते विश्व के सभी बड़े विकसित मुल्क आशंकित हैं, क्योंकि उन्होंने खुद के आधारभूत ढांचे में पिछले एक दशक में जलवायु परिवर्तन के मुद्दे को लेकर आमूलचूल परिवर्तन किए हैं और सभी घरेलू मोर्चों पर वे अपनी मांग को खुद ही पूरा करना चाहते हैं, पर चीन के चलते उन्हें अब यह संभव होता नहीं दिख रहा। ऐसा लग रहा है कि वैश्वीकरण के दौर में मुक्त व्यापार क्षेत्र के चलते चीन के उत्पादों की जोरदार आपूर्ति उनके घरेलू बाजार को बुरी तरह प्रभावित कर रही है। तकरीबन एक दशक पूर्व इसी तरह चीनी फर्नीचर की अमेरिकी बाजार में एकाएक आपूर्ति बढ़ गई थी, जिसके चलते अमेरिका के घरेलू फर्नीचर बाजार में 1.5 लाख अमेरिकी बेरोजगार हुए थे, जिसे बाद में ट्रंप ने अपनी आर्थिक नीतियों में शामिल किया और उन्हें अपना मतदाता बनाया था।
Date: 28-05-24
लापरवाही की आग से झुलसते हमारे शहरों का बुरा हालके के पाण्डेय, ( प्रोफेसर, अर्बन मैनेजमेंट, आईआईपीए )
राजकोट (गुजरात) के गेमिंग जोन में लगी आग में लगभग 30 लोगों की मौत की टीस अभी कम भी नहीं हुई थी कि राजधानी दिल्ली के एक अस्पताल में लगी आग कई नवजात पर भारी पड़ गई। आंकड़े तो ये भी हैं कि पिछले दो साल में दिल्ली के 66 अस्पतालों में आग लगने की घटनाएं घट चुकी हैं। इसका अर्थ है कि जिन जगहों पर हम जीवन की उम्मीद में जा रहे हैं, वे भी हमारी जान पर भारी पड़ सकती हैं। दिल्ली का उपहार सिनेमा अग्निकांड, पुरानी दिल्ली के लाल कुआं इलाके में एक केमिकल गोदाम में लगी आग, फिल्मिस्तान अग्निकांड जैसी घटनाएं हमारी यादों में अब तक जिंदा हैं।
ऐसी आगजनी आमतौर पर तभी होती है, जब नियमों का पालन नहीं किया जाता। या तो इमारत अनधिकृत तरीके से बनाई गई होती है या फिर उसमें सुरक्षा के पर्याप्त उपाय नहीं किए जाते या फिर सुरक्षात्मक उपायों की निगरानी नहीं होने के कारण वे वक्त पर काम नहीं करते। मुश्किलें तब बढ़ जाती हैं, जब इस तरह की इमारतें घनी आबादी वाले क्षेत्रों में होती हैं। तब ऐसी आगजनी कहीं अधिक जानलेवा साबित होती है। स्पष्ट है, आगजनी के लिए काफी हद तक नियोजन और प्रबंधन की व्यवस्था में खामी उत्तरदायी है। अगर प्रबंधन की नियमित व्यवस्था हो, लाइसेंस आदि ससमय लेने के प्रयास हों, स्थानीय प्रशासन द्वारा निगरानी की उचित व्यवस्था हो, तो आगजनी की घटनाएं काफी रोकी जा सकती हैं।
सवाल मानसिकता का भी है। औद्योगिक इमारतों में नियमों की अवहेलना के कारण आमतौर पर खिड़कियां नहीं बनाई जातीं, सीढ़ि़यों की पर्याप्त व्यवस्था नहीं होती, ज्वलनशील पदार्थों विशेषकर गैस सिलेंडरों के भंडारण को लेकर उचित सावधानी नहीं बरती जाती और निकासी के रास्ते पर्याप्त चौड़े नहीं होते। इन सब वजहों से छोटी-सी आगजनी भी जान-माल का भारी नुकसान कर जाती हैं। आगजनी कोई नई परिघटना नहीं है। शहर से लेकर गांव तक आग लगती रहती है। गरमी के मौसम में हवा के संयोग से गांवों में आगजनी की ऐसी-ऐसी घटनाएं घटती हैं कि कई घर उनमें स्वाहा हो जाते हैं, लेकिन वहां आमतौर पर इंसानी जान बचा ली जाती है।
वास्तव में, बचाव के उपाय हमें अपने तईं भी करने होंगे और प्रशासन के स्तर पर भी। इस मामले में सरकारी एजेंसियों में समन्वय बहुत आवश्यक है। पेच यह है कि योजना बनाने का दायित्व किसी अन्य एजेंसी पर होता है और उसे लागू करने का दायित्व किसी अन्य एजेंसी का। उसके प्रबंधन की जिम्मेदारी तीसरी एजेंसी संभालती है। दिल्ली में ही योजना दिल्ली विकास प्राधिकरण (डीडीए) बनाता है, जबकि बिल्डिंग लाइसेंस नगर निगम के हवाले है। फैक्टरी लाइसेंस दिल्ली प्रशासन देखता है। इन अलग-अलग एजेंसियों के बीच समन्वय बने, तो उन लोगों को राहत मिल सकती है, जो नियमों का पालन तो करना चाहते हैं, मगर इनकी जटिलताएं उनकी मंशा पर भारी पड़ जाती हैं। अब ऑनलाइन व्यवस्था की जा रही है, ताकि सभी एजेंसियां एक प्लेटफॉर्म पर आकर मामले को निपटा सकें, मगर इसके लिए भी समन्वय जरूरी है। जाहिर है, उपाय तो हैं, लेकिन उनके क्रियान्वयन के स्तर पर भारी कमी है। दिल्ली की तुलना में मुंबई, पुणे के लोग कहीं अधिक जागरूक जान पड़ते हैं, जो इन मसलों को उठाते रहते हैं। हालांकि, अभी दिल्ली के एक अस्पताल में जो आगजनी हुई है, वहां की अनियमितता को लेकर स्थानीय लोग आवाज उठाते रहे हैं। मगर जुझारू नेतृत्व का अभाव उनकी आवाज को दुखद अंत की ओर ले गया।
दिल्ली-एनसीआर की ऊंची-ऊंची इमारतों का हाल और भी बुरा है। इनमें सुरक्षा उपायों की बात तो छोड़िए, कई बार निर्माण-कार्य शुरू करने तक की अनुमति नहीं ली जाती। ज्यादातर इमारतों में सही समय पर ‘कम्प्लीशन सर्टिफिकेट’ नहीं लिया जाता, यानी स्थानीय प्रशासन द्वारा मंजूर प्लान के तहत निर्माण-कार्य की स्वीकृति नहीं ली जाती या खरीदारों को ‘पजेशन’ देने के बाद यह सर्टिफिकेट लिया जाता है। ऐसे में, उनमें अगर कोई दुर्घटना घटी, तो भुगतना आम लोगों को पड़ता है, इसलिए ऐसे मामलों में भी आम लोगों में जागरूकता कहीं अधिक जरूरी है। उनको अपने हितों की आवाज उचित मंच पर लगातार उठानी चाहिए, तभी ऐसे हादसों से वे बच सकेंगे।
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हाल ही में प्लास्टिक प्रदूषण को रोकने के लिए की गई वैश्विक प्लास्टिक संधि की चौथे दौर की वार्ता संपन्न हुई है।
इससे जुड़े कुछ बिंदु –
– प्लास्टिक के इस्तेमाल को खत्म करने के लिए कम से कम 175 संयुक्त राष्ट्र सदस्य देशों ने यह संधि की है।
– इसका लक्ष्य 2024 के अंत तक प्लास्टिक पर यथासंभव रोक लगाने के लिए एक कानूनी दस्तावेज को अंजाम देना है।
– प्लास्टिक उत्पादन पर प्रतिबंध लगाने की समय सीमा को निर्धारित करना; उसके ऐसे उपयोग को बंद करना, जो कचरा उत्पन्न करता हो, और इसकी रिसायक्लिंग के लिए लक्ष्य निर्धारित करना इस संधि के मुख्य बिंदु हैं।
– इन बिंदुओं पर अमल में देरी के मुख्य कारण आर्थिक है। तेल का उत्पादन और शोधन करने वाले प्रमुख देशों ने प्लास्टिक उत्पादन को खत्म करने के लिए सख्त समय-सीमा का विरोध किया है।
– अफ्रीकी देशों के गठबंधन ने 2040 के अंत तक वाली समयसीमा का समर्थन किया है।
– बाध्यकारी लक्ष्यों के प्रति भारत का भी बहुत समर्थन नहीं है।
– इसके अलावा भारत चाहता है कि प्लास्टिक प्रदूषण को खत्म करने के लिए एक कानूनी उपकरण होना चाहिए। प्लास्टिक के विकल्पों की उपलब्धता, पहुँच, वहनीयता के लिए तकनीक हस्तांतरण, वित्तीय सहायता और क्षमता निर्माण पर भी चर्चा करके एक्शन लिया जाना चाहिए।
– संधि के शुरूआती वर्ष 2022 में भारत ने प्लास्टिक अपशिष्ट प्रबंधन संशोधन नियम 2021 लागू कर दिया था, जिसमें एकल-उपयोग या सिंगल यूज प्लास्टिक की 19 श्रेणियों पर प्रतिबंध लगाया गया था।
– ईए अर्थ एक्शन की एक रिपोर्ट के अनुसार प्लास्टिक प्रदूषण का वैश्विक वितरण असमान है। इसमें ब्राजील, चीन, भारत और अमेरिका 60% प्लास्टिक कचरे के लिए जिम्मेदार हैं।
प्लास्टिक प्रदूषण को केवल संधियों पर हस्ताक्षर करके समाप्त नहीं किया जा सकता है। संधि में विवादास्पद तत्वों पर मतदान या आम सहमति से निर्णय लिया जाना भी मुश्किल है, क्योंकि प्रत्येक देश के पास वीटो है। देशों को चाहिए कि वे प्लास्टिक के वैकल्पिक उत्पादों में अधिक निवेश करें, और उन्हें किफायती बनाएं।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 8 मई, 2024
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Date: 27-05-24
Tragedy ForetoldRajkot, Delhi fires point to familiar stories of official negligence that allow shady businesses to flout normsEditorial
A horrifying weekend – fires killing at least 9 children along with 28 adults and counting in a Rajkot gaming/recreational set-up, and 7 newborns in a private children’s hospital in Delhi. Post-tragedy,Indian authorities are all too efficient at making arrests, filing FIRs, hand wringing, chest-beating, announcing compensation –while courts do their thing. In a few months’ time, little would have changed and in all likelihood, it’ll be business as usual. Owner of the Rajkot facility that operated in tin sheds has been arrested for culpable homicide, as it should be. The tragedy was one waiting to happen.
Loophole in urban plan | But the Rajkot facility’s owner is not alone to blame. As TOI reported, a glaring loophole in Gujarat’s development regulations (CGDCR) allowed illegal recreational activities to flourish. Implemented in 2017 to regulate urban development, CGDCR has zero construction and safety guidelines for recreational facilities, which private players have exploited, erecting temporary structures for gaming facilities, without any approvals. Here then, it is policy itself that poses a significant threat to public safety, especially for children. Per reports, numerous such establishments have cropped up, even in bigger cities like Ahmedabad and Gandhinagar. Most are functioning without mandatory fire safety or town planning sanctions. Privately owned plots hosting such activities often sidestep regulatory scrutiny altogether. On the Rajkot premises, 2,000 litres of petrol were stored onsite along with numerous tyres.
Fires & accidents routine | Oxygen cylinders exploding triggering fatal fires, as was the case in the Delhi hospital yesterday, are nothing new for commercial premises, even though their storage is supposed to be strictly regulated. The Mumbai billboard tragedy is a recent case of criminal negligence. It is when authorities turn away from brazen flouting of norms that fatal accidents occur. In fire after fire or bridge collapses – Morbi (135 deaths), Kollam temple fire (109 deaths, 2016), Varanasi flyover collapse (at least 18 deaths, 2018), or Delhi’s Mundka fire (27 deaths, 2022) – at fault is official oversight, lax enforcement of safety norms and audits, and lack of accountability for low-quality construction and maintenance across India.
Pin the blame | Experts have long cautioned against this pan India disregard for safety regulations. As court takes note, and investigation proceeds, it is the system of ignored rules, avaricious bureaucrats and crooked businessmen that must be in the dock. Nothing will lower the probability of future tragedies more than swift and exemplary punishment of the powerful.
Date: 27-05-24
समृद्ध और सशक्त भारत की रूपरेखारमेश कुमार दुबे, ( लेखक एमएसएमई मंत्रालय के निर्यात संवर्धन एवं विश्व व्यापार संगठन प्रभाग में अधिकारी हैं )
सामान्यतः लोकसभा चुनाव से पहले सरकारें जनादेश को लेकर आशंकित रहती हैं, लेकिन मोदी सरकार इन सबसे अलग नजर आ रही है। तभी तो लोकसभा चुनाव की तारीखों के एलान के बाद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कैबिनेट की बैठक की अध्यक्षता करते हुए अपने मंत्रियों से नई सरकार के लिए पहले 100 दिन और पांच साल के लिए रोडमैप तैयार करने के लिए कहा। इससे पहले प्रधानमंत्री मोदी की अध्यक्षता में कैबिनेट ने विकसित भारत-2047 के विजन दस्तावेज पर विचार-विमर्श किया था। तब प्रधानमंत्री ने कहा कि मैं न छोटा सोचता हूं, न मामूली सपने देखता हूं और न ही मामूली संकल्प करता हूं, क्योंकि 2047 में मुझे देश को विकसित भारत के रूप में देखना है। स्पष्ट है कि प्रधानमंत्री मोदी 25 वर्ष का रोडमैप बनाकर आगे बढ़ रहे हैं और इसके केंद्र में है छोटे शहरों का विकास।
इसका आभास संकल्प पत्र के नाम से जारी भाजपा के चुनावी घोषणा पत्र से भी होता है। प्रधानमंत्री मोदी का भारत को विकसित देश बनाने का यह संकल्प हवा-हवाई नहीं है। इसकी सफलता के ठोस जमीनी आधार हैं। पिछले 10 वर्षों में मोदी सरकार में चार करोड़ गरीबों को घर बनाकर दिए गए हैं। सरकार 83 करोड़ लोगों को मुफ्त में राशन दे रही है। नल जल योजना के तहत 75 प्रतिशत ग्रामीणों तक पाइपलाइन से पेयजल की आपूर्ति की जा रही है। देश के हर घर में स्वच्छ ईंधन उपलब्ध कराने के लिए शुरू की गई प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के तहत अब तक 10 करोड़ से अधिक रसोई गैस के कनेक्शन दिए जा चुके हैं। इसी तरह स्वच्छ भारत मिशन के तहत देश भर में करोड़ों शौचालय बनाए गए हैं, जिससे देश खुले में शौच की कुप्रथा से मुक्त हो रहा है।
गरीबी उन्मूलन की दिशा में सरकार की जनधन-आधार-मोबाइल त्रयी के जरिये विकसित हुए बिचौलिया मुक्त धन हस्तांतरण नेटवर्क की मुख्य भूमिका रही है। आज जनधन बैंक खातों का इस्तेमाल सरकारी योजनाओं की सब्सिडी, छात्रवृत्ति, पेंशन, आपदा सहायता जैसी अनगिनत योजनाओं का लाभ सीधे लाभार्थियों के बैंक खातों में पहुंचाने में किया जा रहा है। वित्त वर्ष 2022-23 में सरकार ने विभिन्न योजनाओं के 7.16 लाख करोड़ रुपये लाभार्थियों के बैंक खातों में हस्तांतरित किए, जो 2013-14 में हस्तांतरित राशि (7,367 करोड़ रुपये) की तुलना में 100 गुना ज्यादा है जब प्रत्यक्ष नकदी हस्तांतरण (डीबीटी) शुरू किया गया था। आज 53 केंद्रीय मंत्रालयों की 320 योजनाओं के लाभ डीबीटी के तहत सीधे लाभार्थियों के बैंक खातों में भेजे जा रहे हैं। इसी तरह महंगे इलाज के कारण जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा अस्पतालों तक नहीं जा पाता था। लाखों परिवारों को इलाज के लिए कर्ज लेना पड़ता था जिससे उनकी जमीन-जायदाद तक बिक जाती थी। इस संकट को आयुष्मान भारत योजना के तहत मिल रहे मुफ्त इलाज ने खत्म कर दिया।
भारत विकसित देश बने, इसके लिए गुणवत्तापूर्ण बिजली आपूर्ति भी जरूरी है। इसी के तहत पहले चरण में देश के हर गांव तक बिजली पहुंचाने के साथ-साथ आपूर्ति में सुधार किया गया। इसी का परिणाम है कि आज शहरी क्षेत्रों में प्रतिदिन औसतन 23.5 घंटे और ग्रामीण क्षेत्रों में औसतन 20.5 घंटे बिजली आपूर्ति की जा रही है। अब सरकार देश के हर घर को सातों दिन-चौबीसों घंटे रोशन करने की कवायद में जुटी है। इसके लिए मार्च 2025 की समयसीमा तय की गई है। बिजली क्षेत्र की भांति ही सरकार रेलवे और सड़क क्षेत्र का भी कायाकल्प कर रही है, ताकि देश में विश्वस्तरीय आधारभूत ढांचा बने। विकास में बाधा बने सैकड़ों कानूनों को पहले ही निरस्त किया जा चुका है।
मोदी सरकार की योजनाओं के पारदर्शी क्रियान्वयन का नतीजा गरीबी उन्मूलन के रूप में सामने आया है। वित्त वर्ष 2013-14 से 2022-23 के बीच देश में बहुआयामी गरीबी 29.17 प्रतिशत से घटकर 11.28 प्रतिशत रह गई। इस दौरान 24.8 करोड़ लोग बहुआयामी गरीबी से बाहर निकले। शहरों की तुलना में ग्रामीण आबादी का अधिक हिस्सा गरीबी रेखा से ऊपर उठा है। इसमें उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश मुख्य राज्य रहे हैं। गरीबी घटने की इस रफ्तार को देखें तो जल्दी ही वह एक अंक में रह जाएगी। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) गरीबी की एक परिभाषा का उपयोग करता है जिसे बहुआयामी गरीबी सूचकांक कहा जाता है। यह सूचकांक शिक्षा, स्वास्थ्य और जीवन स्तर के 10 संकेतकों को शामिल करता है। भारत में नीति आयोग ने इसके अलावा मातृत्व स्वास्थ्य और बैंक खाते को भी शामिल कर लिया है। इस प्रकार भारत में 12 संकेतकों के आधार पर बहुआयामी गरीबी का आकलन किया जाता है। इसमें बहुआयामी गरीबी को शिक्षा, स्वास्थ्य और जीवन स्तर में सुधार की कसौटी पर मापा जाता है। सरलता से देखें तो एक व्यक्ति जो इन सभी मोर्चों पर मजबूत हुआ हो उसे ही बहुआयामी गरीबी से बाहर निकलने के तौर पर गिना गया है। अब तक देश में गरीबी आकलन के आंकड़े प्रति व्यक्ति आय तक सिमटे रहे हैं। इससे गरीबी उन्मूलन की सटीक जानकारी नहीं मिल पाती थी। इसका कारण है कि आय के अनुमान हासिल करना कठिन है।
कुल मिलाकर मोदी सरकार के इन्हीं प्रयासों का नतीजा है कि भारत दुनिया की 10वीं से पांचवीं सबसे बड़ी आर्थिक शक्ति बन गया है। इसी को देखते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी गारंटी दे रहे हैं कि उनकी तीसरी पारी में भारत दुनिया की तीन शीर्ष अर्थव्यवस्थाओं में से एक होगा। स्पष्ट है कि प्रधानमंत्री मोदी 2047 तक भारत को विकसित देश बनाने की दिशा में अग्रसर हैं।
Date: 27-05-24
सही मायने में अतुल्य हो भारतसंपादकीय
विश्व आर्थिक मंच (World Economic Forum) के हर छह माह पर जारी होने वाले नवीनतम यात्रा और पर्यटन विकास सूचकांक (TTDI) में भारत का 39वें स्थान पर आना यह दिखाता है कि इस ऊंची संभावना वाले कारोबारी अवसर के दोहन में हमारा देश कमतर प्रदर्शन कर रहा है।
करीब 119 देशों पर किए गए इस अध्ययन में बताया गया है कि भारत पूरे दक्षिण एशिया में सबसे बड़ा यात्रा और पर्यटन क्षेत्र है लेकिन इसने टीटीडीआई में किसी शीर्ष निम्न-मध्यम आय वाली अर्थव्यवस्था की तरह प्रदर्शन किया है।
वैसे तो साल 2019 के अध्ययन में भी भारत काफी नीचे 54वें स्थान पर था, लेकिन उससे बिल्कुल तुलना नहीं की जा सकती, क्योंकि तब से अब सूचकांक के मापदंड बदल गए हैं। हालांकि कई आंकड़े यह बताते हैं कि भारत अब कोरोना महामारी के दौर से उबर चुका है।
उदाहरण के लिए, भारत तीन संसाधन मानदंडों पर शीर्ष दस में स्कोर करने वाले केवल तीन देशों में से एक है – प्राकृतिक (6), सांस्कृतिक (9) और कारोबार, चिकित्सा और शिक्षा के लिए यात्रा (9)। इसके अलावा उत्साहनजक बात यह भी है कि कीमत प्रतिस्पर्धात्मकता के मामले में भारत 18वें, हवाई यातायात की प्रतिस्पर्धात्मकता के मामले में 26वें और जमीनी एवं बंदरगाह बुनियादी ढांचे के मामले में 25वें स्थान पर है।
अध्ययन में इस बात पर भी गौर किया गया है कि इंटरनेट कनेक्टिविटी, स्वास्थ्य एवं स्वच्छता, पर्यावरण सततता और पर्यटन सामाजिक-आर्थिक प्रभाव जैसे कई प्रमुख कमियों को दूर करने के मामले में भी प्रगति हो रही है।
कुल मिलाकर बनी तस्वीर से यह संकेत मिलता है कि प्राकृतिक सौंदर्य की समृद्ध विविधता और जीवंत बहु-सांस्कृतिकवाद का आनंद लेने वाले देश में यात्रा और पर्यटन से रोजगार की भारी संभावनाओं को देखते हुए भारत काफी बेहतर कर सकता है।
इसके बावजूद साल 2021 में अंतरराष्ट्रीय पर्यटक आगमन में भारत की हिस्सेदारी महज 1.54 फीसदी रही। वैसे तो साल 2011 के करीब 0.63 फीसदी के आंकड़े की तुलना में यह बेहतर है, लेकिन यह तथ्य ध्यान रखना होगा कि विदेशी पर्यटक आगमन में बड़ी संख्या प्रवासी भारतीयों की है।
यही नहीं, इस तथ्य को देखते हुए भी ऐसा कहा जा सकता है कि भारत बहुत फायदा नहीं उठा पाया है, कि दुनिया के दस सबसे ज्यादा घूमे जाने वाले पर्यटन स्थलों वाले देश चीन में इस दौरान लंबे समय तक लॉकडाउन लगा हुआ था।
उदाहरण के लिए नवीनतम टीटीडीआई में चीन का आठवां स्थान है, जबकि उसने अपना सख्त लॉकडाउन जनवरी 2023 में जाकर हटाया है। यह गौर करने की बात है कि दुनिया के सभी शीर्ष दस पर्यटन गंतव्य ऊंची आय वाली अर्थव्यवस्थाएं हैं और ज्यादातर यूरोप में हैं।
वैसे तो इन गंतव्यों तक पर्यटकों का आना सुनिश्चित हो, इसके लिए उनके शहरों और देहाती इलाकों की सुंदरता और उनके पेशेवर तरीके से तैयार किए गए संग्रहालयों की जबरदस्त भूमिका है, लेकिन सबसे अहम अंतर है वहां उपलब्ध बुनियादी ढांचे की गुणवत्ता।
फ्रांस हो, जापान, चीन या इटली, साधारण से साधारण पर्यटक के लिए भी वहां शीर्ष गुणवत्ता के स्थानीय सार्वजनिक परिवहन सेवाओं का लाभ उठाना संभव होता है-बसें, ट्रेन, ट्राम आदि- और वहां किफायती कीमत पर ठहरने के स्वच्छ और सुरक्षित विकल्प भी उपलब्ध हैं।
भारत में अगर दो शहरों में मेट्रो रेल सेवा को सम्मानजनक अपवाद मान लें, तो इंटरसिटी बस और ट्रेन सेवाओं जैसे सार्वजनिक परिवहन उस तरह की विश्वस्तरीय गुणवत्ता से काफी दूर हैं, जो कि अब भारतीय हवाई अड्डों और हवाई यात्रा की विशेषता बन चुकी है।
पश्चिम के विपरीत, जहां सभी वर्गों के नागरिक सार्वजनिक यातायात सेवाओं का इस्तेमाल करते हैं, भारत के अमीर और उच्च मध्य वर्ग के लोग आमतौर पर अपने देश में ऐसी सेवाओं के इस्तेमाल से बचते हैं। ऐसे नामुनासिब वजहों से भारत की मूल्य प्रतिस्पर्धात्मकता कमजोर होती है। इन सबका नतीजा यह है कि भारत पर्यटन के मामले में अपनी क्षमता से कमतर प्रदर्शन कर रहा है।
पर्यटन उद्योग भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में करीब 6 फीसदी का योगदान करता है और लेकिन इसमें सिर्फ 8 करोड़ लोगों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तरीके से रोजगार मिला हुआ है।
पिछली जी20 (G20) बैठकों के एक हिस्से के तहत जारी धर्मशाला घोषणापत्र में सरकार ने साल 2047 तक पर्यटन से जीडीपी में 1 लाख करोड़ रुपये की बढ़त करने और भारत को एक प्रमुख पर्यटन गंतव्य बनाने का महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य रखा है। तो भारत को अपने सभी नागरिकों के लिए स्वच्छ और अधिक रहने योग्य बनाने की बुनियादी बातों पर काम कर इस मामले में अच्छी शुरुआत की जा सकती है।
Date: 27-05-24
कम मतदान चिंता की बातसंपादकीय
भीषण गर्मी और पश्चिम बंगाल में कुछ केंद्रों पर परस्पर विरोधी राय रखने वालों के बीच झड़प के बीच शनिवार को लोक सभा चुनाव के छठे चरण, जिसके तहत 8 राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की 58 सीटों पर मतदान हुआ, में औसतन 61.22 फीसद मत पड़े। दिल्ली की सातों संसदीय सीटों के लिए मतदान 58.52 फीसद पर सिमट गया। पिछली बार यह 60.52 फीसद था। चुनाव आयोग के अनुसार सुबह सात से शाम छह बजे तक चले मतदान में पश्चिम बंगाल में सबसे अधिक 78.19 फीसद वोट डाले गए जबकि उत्तर प्रदेश में 54.03 फीसद मतदाताओं ने मताधिकार का इस्तेमाल किया। छठे चरण के मतदान के साथ ही लोक सभा की 486 सीटों के लिए चुनाव पूरा हो चुका है। अब आखिरी और सातवे चरण में एक जून को 57 सीटों पर मतदान होगा और इसी के साथ लोक सभा की सभी सीटों के लिए मतदान पूरा हो जाएगा। परिणाम 4 जून को आएंगे। बहरहाल, लोक सभा चुनाव 2024 अपनी शुरुआत से ही कम मतदान प्रतिशत से चिंता में डाले हुए है। लोगों का अपने मताधिकार का इस्तेमाल करने में इस प्रकार इस प्रकार से कम दिलचस्पी लेना यकीनन मजबूत लोकतंत्र के लिए अच्छा संकेत नहीं है। जीवंत लोकतंत्र के लिए जरूरी है कि मतदाता पूरी सक्रियता और तन्मयता से चुनाव प्रक्रिया का हिस्सा बने, लेकिन पहले चरण से ही देखने में आया कि मतदान के रोज अनेक मतदाता अपने परिवार के साथ घूमने-फिरने निकल पड़े। कुछ कहते सुने गए कि उनके परिवार के मत न भी पड़े तो क्या फर्क पड़ेगा। जीतने वाली पार्टी को जीत ही जाएगी। बताया जा रहा है कि भीषण गर्मी होने के कारण भी मतदाता वोट करने घर से नहीं निकल रहे । चुनाव आयोग ने पहले चरण के कम वोट प्रतिशत रहने पर अपनी कोशिशें और तेज कर दीं ताकि ज्यादा से ज्यादा मतदाता वोट करने से घरों से निकलें, लेकिन मतदाता की उदासीनता टूटने में नहीं आ रही। दिल्ली जैसे राजधानी शहर, जहां के निवासी बनिस्बत पढ़े-लिखे और जागरूक माने जाते हैं, में भी मत प्रतिशत पिछली दफा से भी कम रह जाना वाकई चिंता की बात है। दरअसल, एक तो चुनाव में कोई लहर नहीं बन सकी है, और चुनाव पूरी तरह स्थानीय मुद्दों पर आ सिमटा है, मगर कम मतदान को किसी भी तर्क से वाजिब नहीं ठहराया जा सकता है। कम मतदान चिंता की बात है।
Date: 27-05-24
गरमी और आगजनीसंपादकीय
ताप का असर चहुंओर दिखने लगा है। नौतपा के दिन शुरू हो गए हैं। माना जाता है कि सूर्य इन नौ दिनों में पृथ्वी के सबसे करीब आ जाता है। यह क्रम आगामी 2 जून तक चलेगा, पर जून के महीने में उत्तर भारत में गरमी से राहत की उम्मीद नहीं है। आगजनी की घटनाएं अचानक से बढ़ गई हैं। देश के अनेक शहरों में आगजनी के मामले कई गुना बढ़ गए हैं। इसी कड़ी में गुजरात के राजकोट में शनिवार को बहुत दुखद हादसा हुआ है। एक गेमिंग जोन में भीषण आग लगने से कई बच्चों समेत 30 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई है। आग लगने का कारण जांच में चाहे जो भी सामने आए, पर इसमें मौसमी तापमान की बड़ी भूमिका है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी इस घटना पर गहरा दुख जताया है। गुजरात सरकार की ओर से मृतकों के परिजन को चार लाख और घायलों को 50 हजार रुपये देने की घोषणा ही पर्याप्त नहीं है, जो लोग दोषी हैं या जिन लोगों ने आग से बचने के पूरे इंतजाम नहीं रखे थे, उनके प्रति कतई नरमी बरतने की जरूरत नहीं है।
इधर दिल्ली में भी मुंडका इलाके में शनिवार को एक कार एसेसरीज फैक्टरी में ऐसी भीषण आग लगी कि बचाव कार्य के लिए रोबोट का इस्तेमाल करना पड़ा। फायर ब्रिगेड की 26 गाड़ियां भी मिलकर जल्दी आग नहीं बुझा पाईं। यहां भी आग का कारण तुरंत पता नहीं चला है, पर मौसम का असर साफ है। दरअसल, अनेक ऐसे कारखाने हैं, जहां गरमी के दिनों में भी काम को धीमा नहीं किया जाता है। चूंकि इन दिनों व्यावसायिक गतिविधियों में तेजी आई है, इसलिए तमाम कारखाने दिन-रात काम कर रहे हैं और आगजनी जैसी दुर्घटना की आशंका बढ़ जा रही है। क्या ऐसे कारखानों को कम से कम दिन के समय रोका जा सकता है, जहां आगजनी की आशंका ज्यादा है? जहां बचाव के इंतजाम पूरे नहीं हैं, वहां तो विशेष रूप से दिन के समय काम रोक देने में ही भलाई है। ध्यान देने की जरूरत है, आगजनी की घटनाएं नोएडा में भी सामने आई हैं, और बाजारों में भी लोगों को सावधानी से रहना सिखाया जा रहा है। उधर, गुरुवार को ही महाराष्ट्र के डोंबिवली के औद्योगिक क्षेत्र में आग लगने से कम से कम दस लोगों की मौत हो गई और 60 से अधिक घायल हो गए। क्या इस रासायनिक कारखाने को भीषण गरमी के समय बिना सुरक्षा इंतजाम के चलाना जरूरी था? दरअसल, ऐसे मामलों में दोषियों को पर्याप्त सजा नहीं मिलती है, इसलिए औद्योगिक क्षेत्रों में आगजनी का सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है।
वास्तव में, भीषण गरमी में आगजनी के इतने ज्यादा मामले हैं कि आप गिनते चले जाएंगे। इसके साथ ही चिंता की बात यह भी है कि बिजली की मांग बहुत बढ़ गई है। बड़े पैमाने पर वातानुकूलित यंत्रों का इस्तेमाल हो रहा है। मिसाल के लिए, दिल्ली में अब बिजली की मांग रिकॉर्ड 8,000 मेगावाट के पार चली जा रही है। नतीजा साफ है, जिस दिन मांग ने रिकॉर्ड तोड़ा, उस दिन राष्ट्रीय राजधानी में आगजनी के अनेक मामले सामने आए। अकेले एक शहर दिल्ली की शिकायतों पर गौर कीजिए, तो मई के पहले 20 दिनों में ही आग लगने की कॉल की संख्या पिछले साल की तुलना में दोगुनी से अधिक, 2,280 तक पहुंच गई। दिल्ली का अनुभव यह बताता है कि आग लगने के पचास प्रतिशत से ज्यादा मामलों में विद्युत संबंधी गड़बड़ी या कोताही ही जिम्मेदार होती है। अत: यह समय घर-घर सावधानी बरतने का है और प्रशासन को भी चौबीस घंटे सचेत रहना चाहिए।
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भारत में न्याय देने में देरी का एक बहुत बड़ा कारण न्यायाधीशों की संख्या में कमी होना है।
अच्छे सार्वजनिक प्रशासन को बढ़ावा देने के लिए एक मजबूत कानूनी व्यवस्था महत्वपूर्ण है। इसलिए, इस संकट से निपटने के लिए अधिक न्यायाधीशों की नियुक्ति, न्यायालयीन सुविधाओं के आधुनिकीकरण और प्रक्रियाओं के डिजिटलीकरण के लिए पर्याप्त धनराशि में वृद्धि को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 4 मई, 2024
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पिछले कुछ महिनों से सभी विपक्ष पार्टी वाली राज्य सरकारें कर राजस्व में अपने घटते हुए प्रतिशत को लेकर काफी नाराज हैं। यहाँ तक कि कुछ राज्यों ने इसके लिए न्यायालय की भी शरण ली है।
राज्यों के मुख्य दो आरोप हैं –
1) सन् 2015-16 में राज्यों की वास्तविक हिस्सेदारी केंद्र के कुल राजस्व का 35% थी। यह वर्ष 2023-24 तक घटकर 30% रह गई है। जबकि इसी काल में केंद्र का राजस्व 14.60 लाख करोड़ रुपये से लगभग ढाई गुना बढ़कर 33.60 लाख करोड हो गया है।
2) नाराजगी का दूसरा एवं तात्कालिक कारण है – केंद्र द्वारा नेट बारोइंग सीलिंग में राज्यों की पीएसयू द्वारा लिये गये ऋण को भी जोड़कर कर्ज की सीमा तय किया जाना।
केंद्र का मानना है कि कई राज्य अपनी पीएसयू के जरिए ऋण ले रहे हैं।
उल्लेखनीय है कि इस संबंध में मामले की सुनवाई करते हुए उच्चतम न्यायालय ने टिप्पणी की थी कि राज्यों की वित्तीय स्थितियों के बारें में केंद्र हस्तक्षेप कर सकता है, क्योंकि इसका संबंध राष्ट्र से होता है।
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Date: 25-05-24
Southern sojournIndia must continue to oppose unregulated tourism in the Antarctica
Editorial
Delegates from over 60 countries have convened in Kochi, Kerala to attend the 46th Antarctic Treaty Consultative Meeting (ATCM) that is expected to go on until the month end. An annual affair, this is in essence a meeting of the ‘Consultative Parties,’ or the 29 countries that have a right to vote on affairs concerning the management of the continent. Other attendees are countries with a non-voting ‘observer’ status as well as independent experts and invited functionaries. One of the interesting points on the agenda this time relates to tourism. A group of ‘like-minded’ countries, that includes India, pressed for a proposal to introduce a regulatory framework governing tourism in the continent. Unlike other continents, the Antarctica does not have its own indigenous population.
With millions of hectares of untrammelled ice and its geographical isolation, it is not a tourist’s everyday jamboree or the elite’s regular private-jet getaway. This makes it irresistibly alluring. In this day and age, where every navigable square inch of land is up for fleeting, visual consumption, the Antarctica is the only continent that can be described as wild, its secrets buried under kilometres-thick blankets of ice. Given that the creation, capture and marketing of the ‘exotic’ experience is an industry that guarantees exponential returns, the Antarctica is now the ‘wild south’ that the wealthy traveller aspires to. A recent joint study by universities in Tasmania, the U.K. and Australia said that the number of tourists rose from 8,000 in 1993 to 1,05,000 in 2022. This does not include all the scientific expeditions and the long-term presence of scientific personnel at research stations maintained by different countries. Reports now suggest that the number of tourists exceeds scientists. To be sure, concerns about rising tourists have been expressed since 1966 at the consultative meets, with the attendant worries that more ships and more people mean more man-made pollutants and rising instances of accidents and disasters that lead to upsetting the unique biodiversity of the region. This urge to preserve the pristine purity of the continent — estimated to be the size of the United States and Mexico combined — however conceals the underlying anxiety of all nations. Will, despite the treaty’s commitment to disallowing territorial claims, unexpected future circumstances effect a change in terms? Will the presence of more people from one country influence terms in their favour? Though India’s Antarctica-bound tourists are minimal, this could very well change in the days to come, thanks to growing lop-sided prosperity. While a proponent of the proposal, India must be wary of any deal that could undercut future opportunities from tourism.
Date: 25-05-24
बंगाल हाई कोर्ट का फैसला आईना दिखाने वाला हैसंपादकीय
यह राजनीतिक वर्ग का ही कमाल हो सकता है कि जिस देश में प्रति एक हजार आबादी पर (केंद्र और राज्य जोड़कर) सरकारी कर्मचारी मात्र 16 हों, जबकि बिहार में चार, बंगाल में सात और केरल में 17 ही हों, वहां चुनावों में बेरोजगारी नहीं आरक्षण आज भी मुद्दा बने। सरकारी नौकरियां घटती जा रही हैं और इनकी प्रकृति स्थाई न होकर कैजुअल होती जा रही हैं। ऐसे में पश्चिम बंगाल में ममता सरकार का सभी स्थापित संवैधानिक कानूनी व्यवस्था को छोड़कर वर्ष 2011 में शासन में आते ही वेस्ट बंगाल बैकवर्ड क्लासेस एक्ट 2012 बनाना और उसके तहत जातियों की पहचान की सारी शक्ति आयोग की जगह सरकार को देना और फिर बगैर किसी वैज्ञानिक- तार्किक संख्यात्मक आधार के 77 मुस्लिम ‘जातियों’ को दो चरणों में बैकवर्ड घोषित करना हाईकोर्ट ने रद्द कर दिया। सवाल यह है कि क्या गणतंत्र के 75 साल बाद भी पिछड़ों को मुख्यधारा में लाने का एक यही जरिया रह गया है। और अगर है तो सामाजिक कारणों से सदियों से शोषित, वंचित और अशिक्षित रखे गए इन वर्गों का अपेक्षित उत्थान हो सका है? क्या ये राजनीतिक वर्ग का फरेब नहीं है कि चुनाव में आरक्षण की बात तो करते हैं लेकिन सरकारी पदों पर भर्ती दशकों तक लंबित रखते हैं? हाई कोर्ट का फैसला सरकारों को आईना दिखाने जैसा है।
Date: 25-05-24
सभी पार्टियां अपने नेताओं के आचरण की जवाबदेही लेंविराग गुप्ता , ( सुप्रीम कोर्ट के वकील )
पुणे में पोर्श कार से दो लोगों को कुचलने वाले नाबालिग रईसजादे की रिहाई के बाद नेता, पुलिस और जज सभी कठघरे में हैं। ऐसे हाई प्रोफाइल मामलों से साफ है कि सिस्टम की आखिरी चाबी नेताओं के पास है। लोकसभा चुनावों में सभी पार्टियों के नेता लगभग 1.35 लाख करोड़ रुपए खर्च करके सत्ता हासिल करने की दौड़ लगा रहे हैं।
गौरतलब है कि 90 फीसदी से ज्यादा चुनावी खर्च अवैध और काला धन है। वैकल्पिक राजनीति और तस्वीर बदलने का वादा करने वाली पार्टियों के नेताओं पर भी भ्रष्टाचार, अवैध विदेशी फंडिंग और महिलाओं के साथ हिंसा के गंभीर आरोप लग रहे हैं। लेकिन संविधान में समानता का सिद्धांत है। उसके अनुसार सभी पार्टियों को कानून की कसौटी पर कसने की जरूरत है। इसके तीन पहलू हैं।
गलत किराएदार रखने पर मकान मालिक के खिलाफ और सीवर लाइन में हादसे के लिए ठेकेदार की जवाबदेही होती है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने एक इंटरव्यू में सभी नेताओं से अपनी-अपनी राजनीतिक पार्टी के क्रियाकलापों की जिम्मेदारी और जवाबदेही लेने की बात कही है। इसलिए सभी पार्टियों को अपने नेताओं और उनके कथित भ्रष्टाचार की कानूनी जवाबदेही लेनी ही चाहिए।
साल 2010 में केंद्रीय मंत्री जयपाल रेड्डी ने कहा था कि एक चौथाई सांसदों के खिलाफ कारोबारी स्वार्थ साधने का मामला बन सकता है। वर्तमान लोकसभा में ऐसे सांसदों की संख्या 60 फीसदी से ज्यादा है।
ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और दक्षिण अफ्रीका में नेताओं को निजी और कारोबारी हितों के मामलों पर वोट देने का अधिकार नहीं है। दक्षिण कोरिया और कनाडा जैसे देशों में सांसदों और मंत्रियों के रिटायरमेंट के बाद नौकरी और रोजगार करने पर कई तरह की शर्तें हैं। लेकिन पार्टी, सरकार और कारोबार के बीच फर्क खत्म होने से संविधान के साथ आम जनता के हित गौण हो रहे हैं।
लोकसभा की आचरण समिति ने साल 2008 में हितों के विरोधाभास की घोषणा के लिए नियम बनाने का सुझाव दिया था, जिस पर तत्काल अमल करने की जरूरत है।
कंपनी को खत्म करने या दिवालिया घोषित करने के लिए कंपनी कानून और आईबीसी में प्रावधान हैं। लेकिन अपराध साबित होने पर किस कानून के तहत पार्टी की मान्यता रद्द होगी? पार्टी को आरोपी बनाने के बाद सरकार के उप-मुख्यमंत्री और मुख्यमंत्री की जिम्मेदारी कैसे तय होगी ?
चुनाव आयोग के पास चुनाव चिह्न को निलंबित या जब्त करने का स्पष्ट अधिकार है। क्या अनुच्छेद 324 के तहत हासिल विशिष्ट शक्तियों के इस्तेमाल से चुनाव आयोग, राजनीतिक दलों की मान्यता रद्द कर सकता है? लोहिया, जेपी, वीपी सिंह और अन्ना हजारे द्वारा प्रचारित वैकल्पिक राजनीति के प्रयोग विद्रूप तरीके से भले ही विफल हो गए हों, लेकिन कानून का डंडा सभी पार्टियों के खिलाफ समान तौर पर चले तो जरूर तस्वीर बदल सकती है। चुनाव परिणाम और नई सरकार के गुणा-भाग के साथ पार्टियों के अपराधों की कानूनी जवाबदेही तय हो तो वोटिंग में जनता की दिलचस्पी के साथ संविधान का मान भी बढ़ेगा।
Date: 25-05-24
दुनिया पर कमजोर होती अमेरिका और पश्चिमी देशों की पकड़टी एन नाइनन, ( लेखक बिज़नेस स्टैंडर्ड के पूर्व संपादक एवं चेयरमैन हैं )
पश्चिम देशों और शेष दुनिया के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्द्धा के बीच यह स्पष्ट हो गया है कि अमेरिका के नेतृत्व में पश्चिमी देश अब भी ताकतवर अवश्य हैं मगर दुनिया पर उनकी पकड़ कमजोर होने लगी है। एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अमेरिकी नौसेना का दबदबा हुआ करता था मगर अब उसकी भूमिका चीन को रोकने तक सीमित रह गई है।
आर्थिक मोर्चों पर भी अमेरिका ने आक्रामक रवैया (तकनीक, व्यापार एवं आर्थिक प्रतिबंध जैसे कदम) छोड़ दिया है और अब बचाव की मुद्रा (अमेरिकी बाजार के हित सुरक्षित रखने के लिए शुल्कों का सहारा) में आ गया है।
एक और ध्यान देने योग्य बात यह है कि यूक्रेन को पश्चिमी देशों से मिले समर्थन के बावजूद रूस के सैनिक लगातार आगे बढ़ रहे हैं। माओ ने काफी पहले कह दिया था कि पूरब से चलने वाली हवा की गति पश्चिमी दिशा से चलने वाली हवा से अधिक हो गई है। माओ का अभिप्राय यह था कि चीन जैसे देश पश्चिमी देशों को कड़ी चुनौती देने की ताकत रखने लगे हैं।
कई वर्षों तक पश्चिमी देशों के विश्लेषकों एवं पत्रकारों ने चीन और रूस दोनों को ही समझने में भूल की। रूस को आर्थिक रूप से कमजोर समझा गया और यह धारणा बना ली कि व्लादीमिर पुतिन के लिए राजनीतिक चुनौती उन्हें एक दिन किनारे लगा देगी।
पुतिन को गंभीर बीमारी से भी ग्रस्त बता दिया गया। दशकों से यह कयास भी लगाए जा रहे थे कि एक न एक दिन चीन कमजोर पड़ जाएगा और हाल तक इसकी ताकत को अधिक अहमियत नहीं दी गई। इन कयासों के बीच रूस ने पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों का उम्मीद से कहीं बढ़कर मजबूती से सामना किया है और अब यूक्रेन में उनकी सेना नए इलाकों पर कब्जा कर रही है। पुतिन एक बार फिर राष्ट्रपति चुन लिए गए हैं।
इस बीच, चीन आय के स्तर पर पश्चिमी देशों को टक्कर देने के साथ दुनिया में सर्वाधिक तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल रहा है।
हाल में अमेरिका ने चीन के कुछ उत्पादों पर शुल्क काफी बढ़ा दिया है मगर यह कदम दोनों देशों के बीच पूर्ण व्यापार युद्ध शुरू होने का संकेत नहीं दे रहा है। इसका कारण यह है कि अमेरिका द्वारा शुल्क में बढ़ोतरी उन उत्पादों पर की गई है जिन्हें चीन अमेरिका को बहुत अधिक नहीं बेचता है।
इस तरह, यह कदम जो बाइडन ने घरेलू राजनीतिक समीकरणों को ध्यान में रखते हुए उठाया है। कारण जो भी हो, चीन इनमें कई उत्पादों का अब भी बड़ा उत्पादक है और वह इनके लिए बाजार आसानी से खोज सकता है।
शुल्कों से दिक्कत अमेरिका के आयातकों को हो सकती है जिनके पास कुछ वस्तुओं की आपूर्ति के वैकल्पिक स्रोत मौजूद नहीं हैं। चीन तीसरी दुनिया के देशों में कारखानों के जरिये इनकी आपूर्ति कर सकता है। दूसरी तरफ, अमेरिकी उपभोक्ताओं को मुद्रास्फीति के कारण अधिक भुगतान करना होगा।
ऐसी रक्षात्मक नीतियां (सब्सिडी के दम पर अमेरिका में विनिर्माण को पटरी पर लाने के दुष्प्रभाव) पूर्व में दिखे आक्रामक रवैये के विपरीत हैं।
उम्मीद तो यह की जा रही थी कि ये आक्रामक कदम अमेरिका के दुश्मनों को जकड़ लेंगे। यह सच है कि प्रतिबंधों से रूस पर असर जरूर हुआ है मगर इसका प्रभाव आंशिक ही रहा है।
रूस को इसके तेल एवं गैस के लिए नए ग्राहक मिल गए हैं जबकि यूरोप को सस्ती ऊर्जा के किफायती स्रोत से हाथ धोना पड़ा है। इससे जर्मनी जैसी मजबूत अर्थव्यवस्थाओं को भी नुकसान पहुंचा है।
दूसरी तरफ रूस की अर्थव्यवस्था लगातार आगे बढ़ रही है। रूस और चीन दोनों ही ने भुगतान प्रणाली विकसित कर ली है जो डॉलर और बैंकिंग संवाद प्रणाली जैसे ‘स्विफ्ट’ (सोसाइटी फॉर वर्ल्डवाइड इंटरबैंक फाइनैंशियल टेलीकम्युनिकेशन) को दरकिनार कर आगे बढ़ रही है।
रूस और चीन के बीच 95 प्रतिशत व्यापार स्थानीय मुद्राओं में हो रहा है। रूस के पास डॉलर की तुलना में अब रेनमिनबी का भंडार अधिक है। चीन सोना खरीदने में काफी सक्रियता दिखा रहा है और पिछले 18 महीनों में इसने भारी मात्रा में यह पीली धातु खरीदी है।
द पीपुल्स बैंक ऑफ चाइना के पास 2,250 टन सोना है जो दुनिया में कुल भंडार का 5 प्रतिशत से कम है मगर तब भी यह अब तक के उच्चतम स्तर पर है।
तकनीक के मोर्चे पर चीन अन्य देशों की तुलना में काफी पहले कदम उठाया और तेजी से आगे बढ़ा और अब वह इलेक्ट्रिक वाहन, सौर ऊर्जा और लीथियम बैटरी खंड में प्रभावी भूमिका में आ गया है। इन उद्योगों के लिए जरूरी विशेष सामग्री की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए भी चीन ने तेजी से कदम बढ़ाया है। वह इलेक्ट्रॉनिक्स, जीव विज्ञान और रक्षा विनिर्माण में आने वाली तकनीकी बाधाओं को पार करने की ताकत जुटा चुका है।
उदाहरण के लिए हुआवे ने हाल में 7 नैनोमीटर चिप से लैस स्मार्टफोन के साथ पश्चिमी देशों को चकित कर दिया। कंपनी अब 5 नैनोमीटर की चिप लाने की तैयारी कर रही है। चीन अगले वर्ष तक चिप विनिर्माण में 70 प्रतिशत तक आत्म-निर्भरता हासिल करने का लक्ष्य लेकर चल रहा है।
इस बीच, पश्चिमी देशों की दवा कंपनियां भी बायोफार्मा और जीव विज्ञान में चीन के बढ़ते प्रभुत्व को स्वीकार कर रही हैं। रक्षा क्षेत्र में चीन चौथा विमानवाहक पोत बना रहा है जो परमाणु ऊर्जा से संचालित किया जा सकता है। यह भी एक तकनीकी बाधा को पार करने का संकेत है। सच्चाई यह है कि तकनीक के मोर्चे पर चीन की प्रगति रोकने में काफी देर हो गई है। सुरक्षा के मोर्चे पर पश्चिमी टीकाकारों को इस बात का डर सता रहा है कि अगर रूस यूक्रेन पर अपनी पकड़ यूं ही मजबूत बनाता रहा तो उनके लिए इसके कई गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
डॉनल्ड ट्रंप अगर अमेरिका के राष्ट्रपति निर्वाचित हुए और उन्होंने उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (NATO) से बाहर निकलने की धमकी पर अमल किया तो पश्चिमी देशों के लिए हालात और बिगड़ सकते हैं। मानव संसाधन, उपकरण, लड़ने की क्षमता और रक्षा उत्पादन में यूरोप के हाथ काफी तंग होने से शीत युद्ध के बाद पहली बार यूरोपीय देश स्वयं को इतने असुरक्षित महसूस करेंगे। हालांकि, अब यूरोप का रक्षा बजट सकल घरेलू उत्पाद का 2 प्रतिशत तक जरूर पहुंच गया है मगर अमेरिकी मदद (परमाणु हथियार सहित) के बिना अपनी रक्षा में पूरी तरह सक्षम होने में इसे कम से कम एक दशक लग जाएगा।
यूरोपीय देशों एवं अमेरिका की तुलना में रूस और चीन एक दूसरे के काफी करीब आ गए हैं और दुनिया के अन्य हिस्सों में कूटनीतिक बढ़त भी हासिल कर ली है। रूस सीरिया में अपने दांव में सफल रहा है और उसे ईरान से ड्रोन भी मिल रहे हैं। चीन ने पिछले साल ईरान और सऊदी अरब के बीच संबंध सामान्य बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई। आर्थिक संसाधनों की कमी का सामना कर रहे अफ्रीका में चीन अमेरिका से अधिक खर्च कर रहा है।
अफ्रीका में कई देश देश फ्रांस और अमेरिकी सैनिकों को जाने के लिए कह रहे हैं। उनकी जगह वे सुरक्षा देने के लिए रूसी सैनिकों को आमंत्रित कर रहे हैं। दक्षिण-पूर्व एशिया में चीन पर निर्भर देश अमेरिका को तरजीह देने के मूड में नहीं हैं।
एक भरोसेमंद साथी के रूप में अमेरिका की विश्वसनीयता कम होती जा रही है। यूक्रेन को हथियारों की आपूर्ति में अमेरिका के लचर रवैये से यह बात काफी हद तक साबित भी हो गई है। ये सभी पहलू अमेरिका के खिलाफ जा रहे हैं जिससे चीन को सीधा फायदा मिल रहा है। पश्चिमी देश के यूक्रेन और गाजा में विरोधाभासी रुख को भी आर्थिक रूप से कमजोर एवं विकासशील देश पचा नहीं पा रहे हैं।
पश्चिमी देशों के टीकाकार कारण के साथ तर्क दे रहे हैं कि लंबे समय से चीन कारोबारी रणनीति के साथ आगे बढ़ता और भारी भरकम सरकारी समर्थन से उद्योगों को बढ़ावा देता रहा है। उनके अनुसार निर्यात बढ़ाने के लिए चीन जान बूझकर अपनी मुद्रा का अवमूल्यन नहीं रोकता है।
इन टीकाकारों के अनुसार चीन की इन हरकतों को देखते हुए ही पश्चिमी देशों ने उसके खिलाफ एहतियाती उपाय किए हैं। यह तर्क अपनी जगह ठीक है मगर पश्चिमी टीकाकार यह नहीं कह रहे हैं कि चीन के घरेलू बाजार में प्रतिस्पर्द्धा काफी तेज है।
उदाहरण के लिए वहां लगभग 139 कंपनियां इलेक्ट्रिक वाहन बनाती हैं। जो सबसे उपयुक्त होगी वही अपना अस्तित्व बचा पाएगी, इसलिए बीवाईडी जैसी कंपनियां दुनिया की संभावित दिग्गज कंपनी के रूप में उभर रही हैं।
हालांकि, निर्यात के बड़े बाजार तक पहुंच नहीं होने से चीन के लिए चुनौती जरूर बढ़ेगी। मगर भारत का अनुभव बताता है कि महज शुल्क लगाने से चीन के उत्पाद को आने से नहीं रोका जा सकता है। वास्तव में चीन जल्द ही तकनीक और बाजार में प्रवेश देने के मामले में पश्चिमी देशों एवं अमेरिका के खिलाफ जवाबी कदम उठाने की स्थिति में होगा।
पश्चिमी देशों के दबाव के जवाब में संभवतः वह इसी तरह के कदम उठाएगा जो जापान से अलग होंगे। 1980 के मध्य में अमेरिका और जापान के बीच व्यापार युद्ध चल रहा था। अमेरिकी दबाव के जवाब में जापान ने निर्यात नियंत्रित कर लिया था और अपनी मुद्रा येन को मजबूत होने दिया था। दुनिया में वर्तमान हालात में सुरक्षा मामलों से लेकर, तकनीकी विकास, विनिर्माण एवं व्यापार एवं कूटनीतिक मोर्चों पर पूरब से चलने हवा प्रचंड रूप ले रही है।
Date: 25-05-24
अपराध तो बालिग जैसा हैकमलेश जैन
पूरे हिन्दुस्तान में चर्चा है कि यह कैसा कानून है जिसमें दो 24 वर्षीय युवाओं, इंजीनियर्स की 150-200 की स्पीड में करोड़ों की पोर्श कार से रात में दो बाइक सवारों को फुटबॉल की तरह उड़ा देने पर 17 वर्ष 8 महीने के युवा को नाबालिग समझ कर, पुलिस स्टेशन से ही बेल देकर रिहा करने और 300 शब्दों में निबंध लिखने की सजा देकर क्लीन चिट दे दी।
सवाल है क्या 17 वर्ष 8 महीने का लड़का बालिग है या नाबालिग? तो इसका जवाब जुवेनाइल जस्टिस एक्ट 2015 में किए गए संशोधन के अनुसार सेक्शन 18 में, 1- 9-2022 से यह बदलाव आया कि 16 वर्ष या उससे भी छोटा लड़का-लड़की यदि जघन्य अपराध करता जुवेनाइल जस्टिस बोर्ड उसको कोर्ट में स्थानांतरित कर देगा, जहां वह एक बालिग की तरह ट्रायल के सम्मुख होगा। साथी ही 2 वर्ष या ज्यादा सजा वाले प्रावधान में सजा का अधिकारी होगा। सर्वोच्च न्यायालय के कई फैसलों के अनुसार ‘मोटर व्हीकल एक्ट’ में अधिकतम सजा के प्रावधान भी वह जनरल आईपीसी में जघन्य अपराध की तरह सजा ही देगा कम नहीं। अब इससे जघन्य अपराध क्या हो सकता है? जनता का आक्रोश सही है मैंने कभी कहा था- कानून का सही पालन करने वालों के साथ, मेहनत करने वालों के साथ, बिना रसूख वालों, गरीब व्यक्तियों को कानून के अधिकारी, पुलिस, निचली अदालतें, अदक्ष वकीलों के ज्ञान और कर्तव्य के प्रति असम्मान होने के कारण ही यहां का कॉमन आदमी जो निर्दोष है वह जेलों में है। आजादी के बाद से ही, पुराने ब्रिटिश कानून की प्रक्रिया को अपना लिया गया है जो आज भी व्यवहार में आ रहा है।
जैसे कानून ‘को चलाने वाले उसी युग के कर्ताधर्ता हैं, जिनका काम निर्दोष पर अन्याय करना है। कानून बदले पर कानून के ज्ञान रखने वाले, रूल करने वाले उसका संशोधन भी नहीं पढ़ते। गलत आर्डर देते रहते हैं यह संशोधन सितम्बर 2022 का है। किसी ने इसे पढ़ा क्यों नहीं? पुलिस कमिश्नर ने कहा कि इसे नाबालिग किस आधार पर ट्रीट किया। क्या वह भी अरबपति पिता, दादा के प्रति डर था कि जिसका संबंध छोटा राजन से था। नाबालिग को 300 शब्दों का निबंध लिख, बेल पर जाने क्यों दिया? जुवेनाइल जस्टिस एक्ट बोर्ड ने क्यों नहीं अभी ही यह निर्णय दिया कि वह 16 से ऊपर का है। 16 से नीचे भी होता तो उसे गंभीर अपराध के आधार पर रेगुलर कोर्ट को रेफर किया जाता जहां उसे वर्षों तक बेल नहीं होती और आजीवन कैद मिलती। उसे रिमांड होम क्यों भेजा, फैसला 5 जून तक क्यों टाल दिया? क्या वह लड़का जो कानूनन बालिग है, रिमांड होम में चंद दिनों में सुधर जाएगा, एक संत होकर निकलेगा, उसके अभिमान भरे क्रिमिनल माइंड में बदलाव आएगा? यह जस्टिस बोर्ड के हसीन सपनों के सिवा कुछ नहीं है। क्यों हम भी यह नहीं सोचे कि वह पढ़ता नहीं, इस पद के बुलाए अयोग्य अपराधी के रसूख से प्रभावित है? इस देश का जस्टिस सिस्टम को तीन लेयर का बनाया गया- पहले ट्रायल कोर्ट, फिर हाईकोर्ट, उसके बाद अंतिम सुप्रीम कोर्ट | यह कई लेयर सिस्टम है। पहले लेयर पर पुलिस है- वह कानून नहीं जानती, जानने पर भी लागू नहीं करती, मनमाने तरीके से निर्णय लेकर काम करती है। खुद मैने, अपनी गाड़ी चोरी होने की रिपोर्ट दर्ज कराने पुलिस स्टेशन पहुंची तो जब तक मैने अपना परिचय नहीं दिया तो एक घंटे तक कम्पलेन नहीं लिया गया। उसके बाद जब मैंने अपना विजिटिंग कार्ड दिया तो तुरंत मुझे थाना इंचार्ज के कमरे में बैठाकर आनन-फानन में मेरी शिकायत दर्ज की, रिपोर्ट घर पहुंचाने को कहा गया। वैसे भी अब कई ट्रिब्यूनल्स हैं, वे गलती करें तो हाईकोर्ट, उसके बाद कई सालों तक मुकदमा चलने पर खारिज होने तक सुप्रीम कोर्ट केस लड़ा जाता है।
इस प्रक्रिया में 30-32 साल आराम से गुजर जाते हैं, दूसरी-तीसरी पीढ़ी केस लड़ती है। जेल तो खुद ही नरक बन चुकी है। गरीब लोग छोटे अपराधों में 32-35 वर्ष तक रिहाई के बाद भी ट्रायल नहीं होने पर भी जेलों में पड़े रहते ,कारण उनका कोई नहीं है जो ज्यादा फीस देकर वकील रखे। उसकी तुलना में रसूख वालों का मुकदमा नीचे से ऊपर तक किस प्रकार हल्के तौर पर ट्रीट किया जाता है, जगजाहिर है। संक्षेप में कहें तो कभी-कभी किसी की आत्मा जाग्रत हो या भाग्य पलटता है तो गरीब को न्याय नसीब हो जाता है। वाकई, पुणे की घटना को जानने-समझने के बाद इस व्यवस्था में दम घुटता है। एक वकीलों की सोसाइटी के सामने अचानक एमसीडी, डीडीए सरकारी फुटपाथ से आज्ञा लेकर एक रेस्टोरेंट खुलता है मालिक उसे अपनी बपौती समझ सुबह 9 से रात तीन बजे तक, बिना किसी परमीशन पर, रेजिडेंसियल सोसाइटी के सामने तेज म्यूजिक और हुड़दंग करता है, विगत 3-4 वर्षों से पुलिस हाईकोर्ट पहुंचने पर भी न्याय नहीं मिलता है। पुलिस कभी विक्टिम के पास आकर उसका हालचाल नहीं पूछती हाईकोर्ट के आदेश पर भी नहीं।
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विशेष रूप से पंजाब के किसान संघ न्यूनतम समर्थन मूल्य की अनिवार्यता, मूल्य में वृद्धि तथा अन्य प्रकार की कृषि संबंधी मांगों को लेकर आंदोलन करते रहे हैं। राज्य-सरकार उनकी मांगों को स्वीकार करती रही है। इसके कारण पंजाब की जो वर्तमान आर्थिक-स्थिति है, यहाँ उसी का एक संक्षिप्त विवरण दिया जा रहा है।
लाभ की स्थिति में उद्योगपति अपने उद्योगों का विस्तार करके आर्थिक विकास की गति को तेज करते हैं। जबकि किसान ऐसा कुछ नहीं करते।
स्वामीनाथन के अनुसार किसानों की समस्या का समाधान उन्हें रेवड़ियां बाँटने में नहीं, बल्कि इसमें है कि उन्हें कृषि क्षेत्र से निकालकर उद्योग एवं सेवा-क्षेत्र में लगाया जाये। अमेरिका की केवल 1.2 प्रतिशत आबादी कृषि-कार्य में संलग्न है। इतने लोग अमेरिका की 35 करोड़ आबादी का पेट भरते हैं। साथ ही उत्पादों का निर्यात भी करते हैं।
पंजाब के किसानों के कृषि मॉडल से देश के किसानों को सीख लेनी चाहिए।
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25 May 2024
प्रश्न – 463 – उच्चतम न्यायालय ने जलवायु परिवर्तन के विरूद्ध जीवन की रक्षा के अधिकार को मौलिक अधिकार घोषित किया है। इस घोषणा का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिये? (250 शब्द)
Question – 463 – The Supreme Court has declared the right to protect life against climate change as a fundamental right. Critically evaluate this announcement? (250 words)
नोट : इसका उत्तर आपको हमें नहीं भेजना है, यह आपके स्वयं के अभ्यास के लिए है।
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Date: 24-05-24
It’s Also the Journey, Not Just DestinationTourism within India has to get more comfortableTOI Editorials
Fuelled by economic growth and rising disposable incomes, the number of Indians holidaying abroad has skyrocketed. They are travelling not just to Paris, Lisbon or Tokyo but are increasingly choosing offbeat places and luxury locales. According to Mastercard Economics Institute’s Travel Trends 2024: Breaking Boundaries, more Indians are travelling, especially internationally, than at any time in history. In the first three months of 2024, 97 mn people travelled through Indian airports. Reaching this figure would have taken a whole year to achieve about a decade ago. Annual data for remittances reveals a significant rise in overseas travel spending, which reached $17 bn in FY24, an increase of more than 24.5% over the $13.6 bn in the previous year. In comparison, India’s inbound tourism earnings in 2023 were $28.07 bn.
But domestic travel is sluggish. India’s ranking in the World Economic Forum’s Travel and Tourism Development Index (TTDI) 2024, which reflects each country’s ability to develop and sustain its travel and tourism industry, has slipped 10 places to 39 since 2019. India scored high on price competitiveness and availability of cultural and natural resources, underscoring its potential as a tourism hotspot in the same ranking. The destinations are fab. It’s the journeys that can be Dantean. This has to drastically change.
Attracting high-end tourists, both domestic and international, won’t be easy in a competitive landscape unless gaps, such as poor security, poor infra, air connectivity, lack of hotels across budgets and patchy services, are addressed. In a letter to the PM last year, the Indian Association of Tour Operators outlined a few more reasons for the decline in inbound travel: withdrawal of incentives to tour operators on their forex earnings and lack of marketing funds. While initiatives like showcasing India during the G20 summit last year and Lakshadweep’s brand building have been cheer-worthy, they are not enough. Stakeholders need to iron out the problems to make India a pleasurable, comfortable and incredible place to explore and enjoy.
Date: 24-05-24
Powerful symbolicThe recognition of Palestine by more nations is an indictment of IsraelEditorial
The announcement by Ireland, Norway, and Spain, of their intent to formally recognise the state of Palestine, next week, is one more important sign of the changing tide of international opinion that Israel Prime Minister Benjamin Netanyahu cannot afford to ignore. In just the past month, in the UN General Assembly, 143 countries, including India, passed a resolution calling for the recognition of the Palestinian state by the UN Security Council, where the U.S. has vetoed such a move. Earlier this week, the International Criminal Court Prosecutor moved applications for arrest warrants for Mr. Netanyahu and Defence Minister Yoav Gallant for operations after October 7 in Gaza as well as the Hamas leadership for the terror attack that killed 1,200 in Israel, terming these as “war crimes”. On May 24, the International Court of Justice will pronounce another verdict in the petition by South Africa calling for additional measures in the prosecution of Israel for “genocide”. The latest decision by the three countries, that have been vocal in their criticism of Israel — they join eight EU members that have already recognised Palestinian statehood — may not materially change the situation on the ground. But it is meant to be what the Irish Taoiseach Simon Harris referred to as an “act of powerful political and symbolic value” to Israel, especially as it essays what could be the “final assault” on Rafah. While practically every country has condemned Hamas’s terror attacks, Mr. Harris said it would be a mistake to ignore the legitimate Palestinian government in the West Bank, saying that “Hamas is not the Palestinian people”. Norway’s Prime Minister Jonas Gahr Støre said that the move aimed to support “moderate forces that are on a retreating front in a protracted and cruel conflict”. Spain’s action followed its denial of port facilities to a Danish-flagged ship with explosive material from India meant for Israel, which it said was a firm policy now. Israel’s response, however, has been to recall its envoys and summon the envoys of all three countries for a dressing down.
In the immediate future, the multiple messages of near-global consensus are meant to push Israel’s government to rethink its plans for Rafah, to stop more civilian losses, and to allow humanitarian aid free access into Gaza. But in the longer term, they are meant to remind Mr. Netanyahu that even if he has disassociated himself from the “two-state solution”, this is something the world believes is the road map to peace. By turning deaf to these messages, Mr. Netanyahu is only furthering his isolation, especially from an international community that came out in full sympathy on October 7, but has grown increasingly horrified by the military campaign since then.
Date: 24-05-24
आर्थिक भविष्य का प्रवेश द्वार चाबहारडॉ सुरजीत सिंह, ( लेखक अर्थशास्त्री हैं )
चुनावी सरगर्मी के बीच मोदी सरकार ने विकास प्रतिबद्धताओं को प्राथमिकता देते हुए गत दिनों चाबहार बंदरगाह के प्रबंधन एवं परिचालन के लिए समझौता किया। ईरान में स्थित चाबहार पहला ऐसा बंदरगाह है, जो विदेशी धरती पर होने के बावजूद भारतीय नियंत्रण में रहेगा। यह समझौता वैश्विक भू-राजनीति में ही भारत को बढ़त नहीं दिलाएगा, बल्कि विदेश व्यापार और निवेश को बढ़ाने के लिए एक नई पृष्ठभूमि भी तैयार करेगा। चाबहार बंदरगाह के परिचालन से एक तरफ पाकिस्तान के अस्थिर व्यापार मार्गों पर निर्भरता कम होगी तो दूसरी ओर भारत के व्यापार को नई ऊंचाइयां मिलने से सतत विकास को भी बढ़ावा मिलेगा।
वर्ष 2002 में पहली बार तत्कालीन ईरानी राष्ट्रपति सैयद मोहम्मद खातमी एवं भारतीय प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा रणनीतिक सहयोग को बढ़ाने के लिए चाबहार बंदरगाह को बनाने पर सहमति व्यक्त की गई थी। भारत के लिए इसके दो स्पष्ट उद्देश्य थे। पहला, चीन के बढ़ते प्रभाव को रोकना एवं दूसरा, पाकिस्तान के व्यापार मार्गों के विकल्प की तलाश करना। इस दिशा में उल्लेखनीय प्रगति 2016 में मोदी सरकार में हुई जब चाबहार में शहीद बेहिश्ती टर्मिनल को विकसित करने के लिए भारत ने ईरान और अफगानिस्तान के साथ एक त्रिपक्षीय समझौता किया।
चाबहार बंदरगाह विकसित करने में भारत के निवेश की महत्वपूर्ण भूमिका रही है, जिसके कारण 2019 में भारत को चाबहार बंदरगाह के प्रयोग का अधिकार मिल गया, जिसका भारत को प्रत्येक वर्ष नवीनीकरण कराना होता था। हालांकि इसके कारण भारत स्थायी तौर पर कोई आर्थिक रणनीति बनाने एवं उसके प्रयोग के लिए आश्वस्त नहीं था। यह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कूटनीतिक सफलता ही है कि अब इस समझौते का नवीनीकरण प्रत्येक 10 साल बाद होगा। इस संदर्भ में भारत अब व्यापार की दीर्घकालिक नीतियों को क्रियान्वित कर सकेगा। चाबहार बंदरगाह में भारत के निवेश से अरब देशों में यह संदेश भी गया है कि भारत एक बदलता हुआ बड़ा निवेशक देश है, जो आधारिक संरचना का निर्माण करने में भी सक्षम है।
भारत के सभी बंदरगाहों से चाबहार बंदरगाह तक आसानी से पहुंचा जा सकता है। इससे आगे सड़क एवं रेलवे ट्रैक द्वारा कैस्पियन सागर से होते हुए रूस और उससे आगे यूरोपीय देशों तक पहुंचने का विकल्प मिलता है। इस बंदरगाह के माध्यम से ईरान के प्रमुख शहर तेहरान से गुजरने वाले अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे से भी आसानी से जुड़ सकते हैं। मध्य एशिया के लैंडलाक देशों के लिए 7,200 किमी लंबा यह कारिडोर हिंद महासागर तक पहुंचने का सुरक्षित एवं सुगम मार्ग है। यह एक बहुदेशीय परिवहन मार्ग है, जिसके द्वारा तुर्किए, इस्तांबुल, बुल्गारिया, अजरबैजान, तुर्कमेनिस्तान, उज्बेकिस्तान, किर्गिस्तान से आगे चीन तक पहुंचा जा सकता है। वास्तव में चाबहार बंदरगाह का व्यापार मार्ग सिल्क रूट का विकल्प भी देता है, जो स्वेज नहर की तुलना में 40 प्रतिशत दूरी कम करता है। इससे होने वाले व्यापार में न केवल 15 दिन का कम समय लगेगा, बल्कि 30 प्रतिशत सस्ता होने से प्रतिस्पर्धात्मक लाभ भी भारत को मिलेगा। इस मार्ग का प्रयोग कर भारत अपनी व्यापार क्षमता को बढ़ाने के साथ-साथ इस क्षेत्र के देशों के साथ आर्थिक संबंधों को भी मजबूत कर सकता है। इस जुड़ाव से भारत के लिए व्यापार के नए रास्ते खुलेंगे और पूरे क्षेत्र में आपूर्ति शृंखला मजबूत होगी। मध्य एशिया के संसाधन-संपन्न नए बाजारों तक भारत की पहुंच भी बनेगी। ईरान सहित मध्य एशिया के देशों से हमारा व्यापार आनुपातिक रूप से बहुत कम होता है। तुर्कमेनिस्तान से प्राकृतिक गैस, कजाखस्तान से यूरेनियम सहित यह क्षेत्र जीवाश्म ईंधन और जल विद्युत के माध्यम से भारत की ऊर्जा सुरक्षा में योगदान कर सकता है और कई महत्वपूर्ण खनिजों और धातुओं की आवश्यकता को पूरा कर सकता है। भारत भी दवा, मांस, यांत्रिक उपकरण, प्रसाधन सामग्री, गारमेंट्स, रसायन, कीटनाशक दवाएं, इंजीनियरिंग उत्पाद, प्रौद्योगिकी, चिकित्सा पर्यटन और आइटी आदि के निर्यात को बढ़ा सकता है। इन क्षेत्रों में भारत रुपये में व्यापार को बढ़ावा देकर अंतरराष्ट्रीय स्वीकृत मुद्राओं पर निर्भरता कम कर सकता है।
चाबहार बंदरगाह से ईरान को भी लाभ होगा, जो पहले से ही अमेरिका के आर्थिक प्रतिबंधों को झेल रहा है। भारत क्षेत्रीय स्थिरता में योगदान करते हुए अफगानिस्तान को विभिन्न तरह की सहायता पहुंचाने के लिए इसी बंदरगाह का उपयोग करता है। रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण बदलती परिस्थितियों में भारत का रूस से तेल आयात काफी बढ़ा है। भारत ने अमेरिकी दबाव को न मानते हुए रूस से होने वाले तेल आयात से 25 से 30 अरब डालर बचाए हैं। चाबहार बंदरगाह समझौते के बाद रूस और भारत के व्यापार में और बढ़ोतरी होगी। चाबहार बंदरगाह द्वारा हिंद महासागर क्षेत्र में भारत का सामरिक प्रभाव बढ़ने से भू-राजनीतिक स्थिति भी मजबूत होगी।
बदलते समय में आर्थिकी अब राजनीति पर भारी पड़ रही है। चीन भी भारत के साथ व्यापारिक संबंधों को सुधारने का प्रयास कर रहा है। इसे देखते हुए अमेरिका भी कठोर रुख अपनाकर भारत की नाराजगी मोल नहीं लेना चाहेगा। अब मध्य एशियाई एवं यूरोपीय देशों के साथ व्यापार बढ़ाने के लिए एक उपयुक्त लाजिस्टिक्स नीति को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए जिससे इन देशों एवं भारत के बीच संबंध और मजबूत हो सकें। कुल मिलाकर चाबहार सिर्फ एक बंदरगाह नहीं है, यह एक ऐसे भविष्य का प्रवेश द्वार है, जो भारत की आर्थिक क्षमता को बल देने के साथ उसके अंतरराष्ट्रीय प्रभाव को मजबूत करेगा। इससे क्षेत्रीय समृद्धि और आर्थिक विकास के एक नए युग की शुरुआत होगी।
Date: 24-05-24
राजकोष के लिए हो लाभांश का उपयोगसंपादकीय
भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) ने बुधवार को ऐलान किया कि उसके बोर्ड ने भारत सरकार को डिविडेंड (Dividend) के तौर पर दी जाने वाली राशि तय कर ली है। इसके बाद आया 2.11 लाख करोड़ रुपये का आंकड़ा चौंकाने वाला है। केंद्रीय वित्त मंत्री द्वारा इस साल पेश वित्त वर्ष 2024-25 के अंतरिम बजट में रिजर्व बैंक से डिविडेंड के रूप में सिर्फ 1.02 लाख करोड़ रुपये मिलने का अनुमान लगाया गया था। इस तरह सरकार के लिए मौजूदा वित्त वर्ष में यह 1.09 लाख करोड़ रुपये के अप्रत्याशित लाभ जैसा है। यह इसके बावजूद है कि रिजर्व बैंक के बोर्ड ने आकस्मिक जोखिम बफर को बढ़ाकर बहीखाते के 6.5 फीसदी तक करने का फैसला किया है जो कि कुछ साल पहले घोषित दिशानिर्देशों के तहत उच्चतम स्तर है। ऐसा उच्च धन हस्तांतरण सतह पर तो सुरक्षित लगता है। फिलहाल भारत की व्यापक आर्थिक स्थिरता को लेकर कोई वास्तविक चिंता भी नहीं है।
अतिरिक्त लाभांश से निश्चित रूप से अगली सरकार के लिए काम थोड़ा आसान हो जाएगा। जब जुलाई महीने में पूर्ण बजट पेश होगा तो यह उम्मीद है कि वित्त मंत्रालय इस अवसर का इस्तेमाल अपनी राजकोषीय मजबूती की प्रक्रिया को तेज करने के लिए करेगा। सरकार के वित्त व्यवस्था पर अब भी कोरोना महामारी के कुछ प्रभाव दिख जाते हैं। महामारी आने से पहले राजकोषीय घाटा सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का 4.6 फीसदी था जो किसी भी लिहाज से ‘सामान्य समय’ के लिए काफी ज्यादा है। महामारी के वर्ष में जीडीपी में कमी और कुछ असाधारण कदम उठाने की मजबूरी की वजह से यह बढ़कर जीडीपी के 9 फीसदी से ज्यादा हो गया। हालांकि वित्त वर्ष 2024-25 के बजट अनुमान में यह अब भी 5 फीसदी से ज्यादा है।
इसलिए समझदारी इसी में है कि रिजर्व बैंक के इस धन हस्तांतरण का, जो कि जीडीपी के 0.3 फीसदी तक हो सकता है, इस्तेमाल राजकोषीय घाटे को 5 फीसदी से नीचे लाने के लिए किया जाए। मौजूदा वित्त वर्ष में सरकार की सकल बाजार उधारी 14.13 लाख करोड़ रुपये तय की गई है और शुद्ध बाजार उधारी 11.75 लाख करोड़ रुपये होगी। अगर इस आंकड़े में कुछ कमी होती है इससे कर्ज प्रबंधन में मदद मिलेगी और सरकारी प्रतिभूतियों की यील्ड में गिरावट आएगी जो कि स्वागत योग्य बात होगी।
हालांकि, राजकोषीय टिकाऊपन के बड़े सवाल का समाधान होना चाहिए। सरकार लगातार केंद्रीय बैंक से हस्तांतरण या सार्वजनिक उद्यमों से मिलने वाले लाभांश पर निर्भर नहीं रह सकती। समुचित राजकोषीय प्रबंधन के लिए जरूरत इस बात की है कि सरकार देश में कर-जीडीपी अनुपात को बढ़ाए। यह वस्तु एवं सेवा कर (GST) को सुव्यवस्थित करने से हो सकता है। तो जीएसटी परिषद में जीएसटी दरों और स्लैब को वाजिब बनाने के लिए अगली सरकार को तत्काल कदम बढ़ाने होंगे। अपरिपक्व तरीके से दरों में कटौती और कई स्लैब होने के कारण जीएसटी प्रणाली का प्रदर्शन कमजोर रहा है। प्रत्यक्ष कर सुधार के विचार पर भी नए सिरे से विचार होना चाहिए। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि प्रत्यक्ष कर संहिता (डीटीसी) लाने की योजना में खास प्रगति नहीं हो पाई। व्यय की बात करें तो सरकार ने ऊंची उधारी के दम पर पूंजीगत व्यय को बढ़ावा दिया है। लेकिन इस तरीके को बनाए रखने की भी एक सीमा है क्योंकि सरकार के आम बजट का घाटा और सार्वजनिक ऋण काफी ऊंचा है। इसके लिए ज्यादा उपयुक्त तरीका यह होगा कि मौजूदा सार्वजनिक क्षेत्र का विनिवेश किया जाए। अब जबकि एयर इंडिया की सफल तरीके से बिक्री हो चुकी है, थोक में निजीकरण को वापस लाना होगा। अगले पांच वर्षों में सरकार के लिए यह अच्छा रहेगा कि विनिवेश पर जोर दिया जाए। रिजर्व बैंक के धन हस्तांतरण का तात्कालिक प्रभाव यह होगा कि वित्त मंत्रालय के राजकोषीय गणित को सरल बनाया जाए लेकिन दीर्घकालिक प्राथमिकताएं पहले जैसी ही रहेंगी।
Date: 24-05-24
मनरेगा से जुड़ी समस्याएं और उनका समाधानए के भट्टाचार्य
महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (MANREGA ) समीक्षा के चरण से गुजरती प्रतीत हो रही है। समाचार माध्यमों में प्रकाशित खबरों के अनुसार मनरेगा में बड़े बदलाव भी किए जा सकते हैं। वर्ष 2005 में संसद में एक विधेयक पारित कर तत्कालीन संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (UPA) सरकार ने इस योजना की शुरुआत की थी। मनरेगा में प्रत्येक ग्रामीण परिवार के लिए वर्ष में कम से कम 100 दिनों का रोजगार एक निश्चित पारिश्रमिक पर सुनिश्चित करने का प्रावधान है।
पिछले कई वर्षों में मनरेगा के सफल होने पर संदेह जताने के साथ ही इस पर सवाल भी खड़े हुए हैं। हालांकि, इन तमाम किंतु-परंतु के बावजूद मनरेगा ने संकट के समय अपनी उपयोगिता सिद्ध की है। विशेषकर, कोविड-19 महामारी के दौरान इस योजना से ग्रामीण श्रमिकों को रोजगार पाने में काफी सहायता मिली। मनरेगा कोष (MANREGA Fund) का इस्तेमाल और भारतीय अर्थव्यवस्था पर दबाव के बीच सीधा संबंध दिखा है। तालिका में यह स्पष्ट रूप से दर्शाया गया है कि मनरेगा की शुरुआत के दो वर्षों बाद ही देश की आर्थिक वृद्धि कम होकर 2008-09 में 3.1 प्रतिशत रह गई। वैश्विक वित्तीय संकट इसका एक बड़ा कारण रहा था। वित्त वर्ष 2007-08 में देश की आर्थिक वृद्धि दर 7.7 प्रतिशत थी परंतु इसकी धार कुंद पड़ गई। बाद के वर्षों में सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में सुधार अवश्य हुआ परंतु देश में रोजगार की उपलब्धता पर गहरी चोट पड़ी। इसका परिणाम यह हुआ कि मनरेगा के अंतर्गत रोजगार की मांग और आवंटित रकम दोनों में भारी बढ़ोतरी हुई।
कोविड-19 महामारी के समय भी ऐसा देखा गया। कोविड से बिगड़ी परिस्थितियों के बीच नीति निर्धारक अर्थव्यवस्था को संभालने की जद्दोजहद कर रहे थे और इस बीच ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार उपलब्ध कराने की यह योजना एक ताकतवर माध्यम बन गई। वर्ष 2020-21 में मनरेगा के अंतर्गत रोजगार खोजने वाले लोगों की संख्या बढ़ गई।
यह बात भी विचारणीय है कि मनरेगा की शुरुआत के बाद जब वैश्विक वित्तीय संकट या कोविड से प्रभावित वर्षों में देश की अर्थव्यवस्था कराह रही थी तब इस योजना के लिए वित्तीय आवंटन बढ़कर केंद्र सरकार के कुल का 3 प्रतिशत (सकल घरेलू उत्पाद का 0.5 प्रतिशत) से अधिक हो गया। अब स्वाभाविक प्रश्न यह उठता है कि अगर मनरेगा आर्थिक चुनौतियों के समय मददगार साबित हुई है तो फिर इसकी समीक्षा या इसमें बदलाव की आवश्यकता क्यों आन पड़ी है? जैसा तालिका में दर्शाया गया है, देश में आर्थिक चुनौतियां कम होती हैं तो सरकार के खजाने पर बोझ भी कम हो जाता है और रोजगार तलाशने वाले लोगों की संख्या घट जाती है। उदाहरण के लिए वर्ष 2023-24 में केंद्र सरकार के कुल व्यय में मनरेगा का हिस्सा मात्र 1.9 प्रतिशत था। वर्ष 2014-15 और इससे भी पहले 2006-07 में मनरेगा का केंद्रीय व्यय में लगभग इतना ही हिस्सा रहा था। उन वर्षों में रोजगार की मांग कम थी और अर्थव्यवस्था चुस्त-दुरुस्त थी।
संकट के वर्ष गुजरने के बाद भी लोग नौकरियों की तलाश में भटकते हैं तो यह इस बात का सीधा संकेत है कि अर्थव्यवस्था, विशेषकर ग्रामीण क्षेत्र के लिए हालात अनुकूल नहीं हैं। इसी तरह, मनरेगा के अंतर्गत रोजगार की मांग नीति निर्धारकों को यह संकेत भी देती है कि देश के ग्रामीण क्षेत्र आर्थिक दबाव कहीं न कहीं से गुजर रहे हैं। हम अच्छी तरह जानते हैं कि अर्थव्यवस्था में मांग को ताकत देने में ग्रामीण क्षेत्र महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। परंतु, ऐसा आभास हो रहा है कि मनरेगा को लेकर सरकार कुछ चिंतित है, इसलिए दो विशेष कारणों से वह इसकी समीक्षा करना चाहती है। पहला कारण तो यह है कि मनरेगा उन योजनाओं में एक है जिनमें केंद्र सरकार पूरा वित्तीय दायित्व उठाती है मगर इनके तहत होने वाले कार्य की निगरानी राज्य सरकारें करती हैं। तर्क दिया जा रहा है कि अगर राज्य मनरेगा में वित्तीय अंशदान दें तो इसके तहत संपादित कार्य की गुणवत्ता में काफी सुधार होगा। इसके सकारात्मक प्रभाव यह होंगे कि अधिक उत्पादकता वाली एवं उपयोगी संसाधन तैयार होंगे।
कुछ राज्य मनरेगा के प्रावधानों का अपने विशेष हितों के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। यह मनरेगा की समीक्षा का दूसरा कारण है। मनरेगा का ढांचा मांग आधारित है जिसमें परियोजनाओं पर रकम उसी स्थिति में खर्च की जानी चाहिए जब परेशान श्रमिक रोजगार की तलाश में इधर-उधर भटक रहे होते हैं। जिन परियोजनाओं के क्रियान्वयन का उत्तरदायित्व राज्य सरकारों का है उनके लिए मनरेगा की रकम का उपयोग नहीं होना चाहिए। राज्य सरकारों को अपने बजट से इन परियोजनाओं को आगे बढ़ाना चाहिए। वर्तमान स्थिति में निगरानी के अभाव में मनरेगा के कोष का दूसरे मदों में इस्तेमाल हो रहा होगा। खबरों के अनुसार उन राज्यों में ऐसा अधिक हो रहा है जहां पारिश्रमिक तुलनात्मक रूप से अधिक है। ऐसे राज्य मनरेगा की रकम अपनी कल्याणकारी योजनाओं को पूरा करने में खपा रहे होंगे।
एक और रुझान सामने आ रहा है जो चिंता का कारण हो सकता है। पिछले कुछ वर्षों के आंकड़े कह रहे हैं कि वर्ष 2018 से 2020 के बीच पश्चिम बंगाल ने मनरेगा के अंतर्गत आवंटित रकम का सर्वाधिक इस्तेमाल किया था। इसके बाद तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, राजस्थान और कर्नाटक रहे। इतना ही नहीं, वर्ष 2023-24 के आंकड़ों के अनुसार केंद्र द्वारा मनरेगा पर किए गए कुल व्यय में पांच दक्षिणी राज्यों-आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु और तेलंगाना- की हिस्सेदारी एक तिहाई से अधिक रही। वर्ष 2022-23 और 2023-24 में पश्चिम बंगाल को मनरेगा अधिनियम, 2005 के प्रावधान 27 के अंतर्गत रकम रोक दी गई। केंद्र सरकार के निर्देशों का पालन नहीं करने के लिए राज्य को रकम से वंचित किया गया था। अतः स्वाभाविक प्रश्न यह उठता है कि अगर नियमों का पालन नहीं करने वाले राज्यों को रकम से वंचित किया जा सकता है तो मनरेगा कोष का बेजा इस्तेमाल रोकने के लिए निगरानी तंत्र को मजबूत क्यों नहीं बनाया जा सकता? मनरेगा के संचालन में राज्यों को वित्तीय अंशदान देने के लिए कहना आसान है मगर इससे योजना के बेजा इस्तेमाल से उठने वाली चिंता एवं समस्याएं दूर नहीं होंगी। अगर प्रत्येक राज्य को उनके यहां मनरेगा के संचालन पर होने वाले व्यय में 20 या 40 प्रतिशत हिस्सा देने के लिए कहा जाए तो इससे केंद्र पर राजकोषीय बोझ अवश्य कम होगा परंतु मनरेगा कोष के अनुचित इस्तेमाल की समस्या दूर नहीं होगी। किसी भी सूरत में, अगर राज्यों को मनरेगा के बजट में योगदान देने के लिए कहा जाता है तो इससे संबंधित कानून में संशोधन की आवश्यकता होगी। ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार संकट दूर करने में काम आने वाले तात्कालिक उपायों में मनरेगा भी एक है। सरकार को केवल स्वयं पर वित्तीय बोझ कम करने में उलझने के बजाय साझा निगरानी व्यवस्था के माध्यम से इसके क्रियान्वयन से जुड़ी दिक्कतों पर अधिक ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
Date: 24-05-24
संघर्ष के बीचसंपादकीय
जिस दौर में इजराइल और हमास के बीच का संघर्ष अपने सबसे तीखे चरण में चल रहा है, उसमें तीन यूरोपीय देशों की ओर से फिलिस्तीन को एक देश के रूप में मान्यता देने की घोषणा अंतरराष्ट्रीय राजनीति के लिहाज से एक बेहद अहम घटनाक्रम है। माना जाता है कि चूंकि अमेरिका इजराइल के साथ आमतौर पर खड़ा दिखता है, इसलिए इसका असर यूरोप पर भी होता रहा है। यही वजह है कि ज्यादातर यूरोपीय देश फिलिस्तीन के खिलाफ इजराइल के आक्रामक रवैये के बावजूद या तो चुप रहने या फिर नरम रुख अख्तियार करने का रास्ता अपनाते हैं। ऐसे में स्पेन, नार्वे और आयरलैंड की ओर से फिलिस्तीन को एक देश के रूप में मान्यता देने की घोषणा निश्चित रूप से नए समीकरण खड़े कर सकता है। इस फैसले से इजराइल का परेशान होना स्वाभाविक है, क्योंकि फिलहाल उसे अंतरराष्ट्रीय समर्थन की जरूरत महसूस हो रही है। यही वजह है कि उसने इन तीनों देशों के रुख को आतंकवाद को पुरस्कृत करना बताते हुए वहां से अपने राजदूतों को वापस बुला लिया है।
इस मसले पर नार्वे ने साफ कहा कि अरब शांति योजना के लिए फिलिस्तीन को एक देश के रूप में मान्यता देना जरूरी है। स्पेन और आयरलैंड ने भी इस कदम का उद्देश्य इजराइल-फिलिस्तीन संघर्ष को द्वि-राष्ट्र समाधान के जरिए हल करने में मदद करना बताया है। गौरतलब है कि इजराइल पर हमास के हमले के बाद वैश्विक स्तर पर इजराइल के प्रति सहानुभूति का रुख सामने आया था। मगर उसके बाद इजराइल के बेलगाम हमले और उसमें पैंतीस हजार से ज्यादा फिलिस्तीनी आम लोगों के मारे जाने के बाद अब उसके प्रति समर्थन में तेजी से कमी आ रही है। ऐसे में इजराइल का पक्ष लेने के बजाय अगर स्पेन, नार्वे और आयरलैंड ने फिलिस्तीन को एक देश के रूप में मान्यता देना तय किया है तो यह एक तरह से इजराइल के रवैये पर सवाल उठाना भी है। हालांकि इससे वैश्विक स्तर पर स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में स्वीकार किए जाने के मामले में फिलिस्तीन की राह के रोड़े खत्म नहीं हुए हैं, लेकिन इतना तय है कि स्पेन, नार्वे और आयरलैंड के ताजा रुख से यूरोप के कुछ अन्य देशों पर भी फिलिस्तीनियों के आत्मनिर्णय के अधिकार का समर्थन करने का दबाव बढ़ेगा।
Date: 24-05-24
भारी पड़ती कुदरत की मारअनिरुद्ध गौड़
दुबई में पिछले महीने भयंकर आंधी-तूफान भारी बारिश और बाढ़ से हालात संभाल भी नहीं थे कि इस महीने की शुरुआत में दूसरी बार हुई ओलावृष्टि और भारी बारिश ने हालात और बिगाड़ दिए। दुबई में बारह घंटे में बीस मिमी और अयुधायी में चौबीस घंटे में चौतीस मिमी बारिश हुई, जो अप्रैल-मई में होने वाली बारिश से चार गुना ज्यादा है। शेष और शोधकर्ता इन देशों में चरम वर्षा के पीछे जलवायु परिवर्तन को कारण बता रहे हैं। हालांकि कुछ वैज्ञानिकों का कहना है कि यह शोध का विषय है।
प्राकृतिक तूफान से दुबई का हाल ऐसा हुआ कि 15 और 16 अप्रैल की वर्षों से दुबई में भयानक बाढ़ जैसे हालात हो गए। आंधी-तूफान से ऊंची इमारतों की बालकनी में रखे सामान उड़ गए लोगों की कारे जहां-तहां दूब गई माल घर और बड़े-बड़े दरों की इमारतों में पानी घुस गया। दुनिया का बेहद व्यस्त दुबई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा जलमग्न हो गया। समाम अंतरराष्ट्रीय उड़ानें रद्द करनी पड़ी और हवाई जहाजों को पार्क करने के लिए जलमग्न हवाई अड्डे पर ऊंचाई वाली जगहे तलाशनी पढ़ी। यहाँ कभी इतना पानी नहीं बरसा, इसलिए जल निकासी व्यवस्था भी इसके लिए तैयार नहीं थी।
पृथ्वी पर 71 फीसद पानी और 29 फीसद जमीन है। इस 29 फीसद जमीन पर एक तिहाई भाग ठंडा और गर्म रेगिस्तान है। अस्य का उपोष्णकटिबंधीय रेगिस्तान 23.3 लाख वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में फैला है। इसका अधिकतर भाग सऊदी अरब में है, जबकि बड़ा भाग गार्डन, इराक, कुवैत कतर, संयुक्त अरब अमीरात, ओमान और यमन तक फैला हुआ है। रेगिस्तान में पूरे वर्ष में 250 मिमी से भी कम औसत वर्षा होती है। दुनिया के लोग खाड़ी के रेगिस्तानी देशों में इतनी बड़ी पारिश की तबाही का मंजर देख कर हैरान हैं। क्या यह जलवायु परिवर्तन का असर है या कुदरत के काम में मानव की दखलंदाजी है?
भयानक आंधी-तूफान से सऊदी अरब, बहरीन, कतार, ओमान में स्याही मच गई, जिसमें संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) में भारी वर्षा और तूफान से स्थिति गंभीर हो गई। राजधानी अबुधावी सहित आधुनिक शहर दुबई में चारों तरफ पानी भर गया। सभी गतिविधियां रुक गई। ओमान में तूफान और भारी बारिश का कहर हुआ, अनेक लोग मरे, तो बाढ़ से नदियां उफन गई, जिनकी जद में कई शहर आ गए। इसी दौरान पाकिस्तान के बलूचिस्तान और सहित अफगानिस्तान के इलाकों में भी भारी बारिश की वजह से लोग शाहिमाम कर उठे।
संयुक्त अरब अमीरात अपने रेगिस्तानी शहरों को हरा-भरा करने और घटते भूजल स्तर को सुधारने के लिए अक्सर वर्ष में कई बार “क्लाउड सीटिंग’ से वर्षा कराता है। इससे तीस से पैंतीस फीसद अधिक बारिश हो जाती है। हालांकि यह पूरी तरह स्पष्ट नहीं है कि इस घटना से पहले कृत्रिम बारिश के कितने प्रयास हुए, लेकिन दुबई में इस तरह की भारी वर्षा कभी नहीं हुई।
कृत्रिम बारिश की विधि विज्ञान ने ईजाद कर ली है। चीन में जब 2022 में ओलंपिक खेल हुए तो खबर थी कि बेजिंग में उद्घाटन से पहले बादलों में क्लाउड सीटिंग कर पहले ही वर्षा कर उन्हें हल्का कर दिया गया, ताकि उद्घाटन के दिन बदल न बरसे दुबई में राष्ट्रीय मौसम विज्ञान केंद्र (एनसीएम) कृत्रिम बारिश कराने के लिए हवाई वान के जरिए रसायन का छिड़काव कर क्लाउड सीटिंग करता रहता है मगर इस तकनीक में अभी यह कहना मुश्किल है कि किस प्रयास से कितनी अधिक बारिश होगी। पर इतना तो जरूर है कि मौसम में बदलाव लाने की कोशिश प्रकृति से छेड़छाड़ का दुस्साहस है।
अटकले लगाई जा रही है कि दुबई में क्लाउड सीटिंग ने इस भारी वर्षा में योगदान दिया है लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि आंधी- तूफान और बारिश के पूर्वानुमान की सूचना देने वाली दुबई की व्यवस्था और एजेंसियों ने पहले ही भारी आंधी-तूफान और बारिश की चेतावनी दे दी थी। प्रश्न है कि फिर ओमान और बहरीन ने तो क्लाउड सीडिंग नहीं की थी, फिर यहां क्यों भारी बारिश हुई। समझा जा रहा है कि समुद्री इलाके में भारी दबाव के चलते सयाही की बारिश हुई है। प्रश्न है कि आखिर खाड़ी देशों में इस तरह आंधी-तूफान और बारिश क्यों हो रही है. जयकि यहां आमतौर पर इन दिनों बारिश नहीं होती। विशेषज्ञों का मानना है कि मध्यपूर्व में मौसम बदलने के पीछे की वजह दक्षिण पश्चिम की ओर से आया कम दबाव है और इसी वजह से बने बादलों ने मध्यपूर्व के इन देशों में कहर ढाया।
पिछले पचहत्तर वर्षों में दुबई में इतनी भारी बारिश नहीं हुई है। दो दिन में डेढ़-दो साल में होने वाली बारिश के बराबर पानी बरस गया। ‘द वाशिंगटन पोस्ट’ की एक खबर में दुबई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे के मौसम संबंधी आंकड़े बताते हैं कि उस दिन सोमवार को देर रात से सुबह तक लगभग 20 मिलीमीटर बारिश हुई। फिर मंगलवार सुबह शुरू हुई बारिश ने चौबीस घंटे में 142 मिलीमीटर (5.59 इंच) वारिश कर दी। जयकि यहाँ पूरे वर्ष में कुल 94.7 मिलीमीटर (3.73 इंच) बारिश होती है।
वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी और मौसम के बदलावों को लेकर संयुक्त राष्ट्र ने 1992 में चिंता जताई थी। फिर 1992 में रियो पृथ्वी शिखर सम्मेलन में इसका खाका तैयार किया गया। इस सम्मेलन के उप-महासचिव रहे नितिन देसाई ने एक पत्रिका को दिए गए एक साक्षात्कार में बताया कि उस समय अमेरिका जैसे कई देश इस बात को लेकर संशय में थे कि क्या वाकई इंसानों की वजह से जलवायु परिवर्तन हो रहा है। संयुक्त राष्ट्र के अंतर-सरकारी प्रकोष्ठ की पहली रपट में तो खुले तौर पर इसे जिम्मेदार नहीं माना गया था, लेकिन 2001 में अपनी तीसरी रपट में उसने यह बात स्वीकार की थी कि इंसानों की वजह से भी जलवायु परिवर्तन हो रहा है। आज तो इस यात पर आम सहमति भी है।
समुद्र तल बढ़ रहा है, वैश्विक तापमान 1.5 डिग्री से ऊपर जा रहा है सदी के मौसम में गर्मी और गर्मी के मौसम में सर्दी, तापमान ऊपर- नीचे कई इलाके सूखा झेल रहे हैं, जो वनों में आग की घटनाएं बढ़ रही हैं रेगिस्तानी इलाकों में भारी वर्षा और स्याही की चरम मौसमी घटनाएं जलवायु परिवर्तन का ही परिणाम है जो घटनाएं पिछले पचहत्तर वर्ष में न हुई हो और एकाएक हो जाएं, तो यह बहुत चिंताजनक है। संयुक्त राष्ट्र की ‘काप 28’ जलवायु वार्ता में, जो संयुक्त अरब अमीरात में ही हुई, बढ़ते तापमान और ‘ग्लोबल वार्मिंग की चिंताओं से निपटने के लिए रणनीति बनाई गई अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी ने भी कहा है कि अगर दुनिया ‘ग्लोबल वार्मिंग’ को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक रखना चाहती है तो जीवाश्म ईंधन परियोजनाओं को समाप्त करना होगा। यानी सभी देशों को अपनी पर्यावरणीय योजनाओं को बताने और उनके निर्धारित लक्ष्य को प्राप्त करने की जरूरत है। नहीं तो दुबई जैसी घटनाएं आम हो जाएंगी।
Date: 24-05-24
चुनाव आयोग से अपेक्षासंपादकीय
चुनाव आयोग से अपेक्षाएं बढ़ी हैं, तो शिकायतों का भी अंबार लगने लगा है। इसी कड़ी में आयोग के ताजा हलफनामे को देखा जा सकता है। चुनाव आयोग ने सर्वोच्च न्यायालय को बताया है कि आयोग के लिए फॉर्म 17सी के आधार पर मतदान संबंधी आंकड़ों के रिकॉर्ड को सार्वजनिक करने का कोई कानूनी आदेश नहीं है। आयोग मानता है कि इन आंकड़ों का खुलासा अतिसंवेदनशील हो सकता है। चुनाव आयोग ने यह हलफनामा ‘एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स’, यानी एडीआर और ‘कॉमन कॉज’ द्वारा दायर एक याचिका के जवाब में दायर किया है। याचिका में मौजूदा लोकसभा चुनावों में मतदान डाटा के तत्काल प्रकाशन की मांग की गई है और चुनाव आयोग शायद इसके लिए तैयार नहीं है। ध्यान रहे, यह देश अपनी तमाम सांविधानिक संस्थाओं से ज्यादा से ज्यादा पारदर्शिता की अपेक्षा करता है। सहजता से अगर देखें, तो कोई संस्था जब अपने आंकड़ों की गोपनीयता के प्रति ज्यादा आग्रह दिखाती है, तब बहुत से संवेदनशील लोग चिंतित हो जाते हैं। पारदर्शिता से ही विश्वसनीयता का विकास होता है और आयोग को यथासंभव जल्दी के साथ मतदान संबंधी आंकड़ों को सार्वजनिक करना चाहिए।
हां, तकनीकी रूप से चुनाव आयोग सही है। आंकड़ों को सबके लिए सार्वजनिक करना उसका कानूनी कर्तव्य नहीं है। बाध्यता नहीं है कि आयोग फॉर्म 17सी के तहत दर्ज प्रामाणिक आंकड़ों को सबसे साझा करे। दरअसल, चुनाव आयोग आंकड़ों की खान है और वह अपने तमाम आंकड़ों को उजागर करता रहा है। उसे इस मोरचे पर किसी भी तरह की हिचक से बचना चाहिए। संविधान रचने वालों ने सांविधानिक संस्थाओं से यही उम्मीद की थी कि जैसे-जैसे देश के लोगों को जरूरत होगी, ये संस्थाएं अपने को समय के अनुरूप बदलेंगी। हर बात के लिए लिखित कानून का इंतजार या कानून के अभाव का हवाला अनुचित है। अगर आयोग ने समय के साथ अपनी किसी नीति में परिवर्तन किया है, तो उसके बारे में भी लोगों को पता होना चाहिए। मात्र तकनीकी आधार पर सूचनाओं के प्रसार को नहीं रोका जा सकता। यह कहना नैतिक रूप से ठीक नहीं है कि उम्मीदवार या उसके पोलिंग एजेंट के अलावा किसी अन्य व्यक्ति को फॉर्म 17सी की सूचनाएं प्रदान करने का कोई कानूनी आदेश नहीं है।
इस समग्र मामले को पूरी गंभीरता और साफगोई से देखना चाहिए। वैसे तो चुनाव आयोग मतदान के आंकडे़ जारी कर रहा है, पर जारी करने में देरी हो रही है और इसी देरी से संदेहों को बल मिल रहा है। अनेक लोग सवाल उठा रहे हैं। एक विश्लेषण के अनुसार, 2024 के लोकसभा चुनावों के पहले चार चरण के लिए हुए चुनाव में मतदान आंकड़ों में 1.07 करोड़ वोटों का अंतर लगता है। आशंका है कि प्रति सीट औसतन 28,000 वोटों की वृद्धि हो रही है। ये वोट किधर जा रहे हैं, इससे किसे लाभ होगा, इसकी चिंता अगर कुछ चुनाव विशेषज्ञों को हो रही है, तो आश्चर्य नहीं। चुनाव आयोग को अपने ठोस और अकाट्य जवाब के साथ सामने आना चाहिए। तकनीकी बहानों के पीछे ज्यादा समय तक छिपा नहीं जा सकता, क्योंकि अंतत: आज के समय में आंकड़ों को छिपाना असंभव है। छिपाए गए आंकडे़ देर-सबेर सामने आएंगे, तब इससे आयोग की ही प्रतिष्ठा प्रभावित होगी। अत: आयोग को अपने वर्तमान ही नहीं, भविष्य को भी संदेहों से परे बनाए रखने की कोशिश करनी चाहिए।
Date: 24-05-24
सड़क पर सबके काम आए अच्छा कानूनकमलेश जैन, ( अधिवक्ता, सुप्रीम कोर्ट)
पुणे में एक नाबालिग के शराब पीकर दो नौजवानों को रौंदने की घटना कानून-व्यवस्था पर सवाल उठाती है। इस पूरी घटना में पुलिस-प्रशासन के साथ-साथ किशोर न्याय बोर्ड के रवैये पर भी सवाल उठ रहे हैं, जो बिल्कुल स्वाभाविक हैं। दरअसल, शनिवार-रविवार की रात 17 वर्ष का एक किशोर शराब के नशे में अपने पिता की पोर्श कार करीब 200 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ा रहा था और उसने एक बाइक को पीछे से टक्कर मार दी, जिससे बाइक पर सवार दो युवा इंजीनियरों की मौत हो गई। लोगों ने आरोपी को पुलिस के हवाले किया और पुलिस उसे लेकर किशोर न्याय बोर्ड पहुंची, लेकिन वहां उसे न सिर्फ बड़ी आसानी से जमानत मिल गई, बल्कि 300 शब्दों में ‘सड़क दुर्घटना’ पर एक निबंध लिखने को भी उसे कहा गया। इसकी विशेषकर सोशल मीडिया में तेज प्रतिक्रिया हुई और किशोर न्याय बोर्ड की लानत-मलामत शुरू हो गई। नतीजतन, बोर्र्ड ने न सिर्फ अपना फैसला बदला, बल्कि 5 जून तक किशोर को बाल सुधार गृह में भेज दिया। हालांकि, यह अब तक स्पष्ट नहीं किया गया है कि उस किशोर को बालिग की तरह सजा दी जाएगी या नाबालिग की तरह रियायत?
यह जानकारी देश के संभवत: बहुत कम लोगों को है कि किशोर न्याय अधिनियम, 2015 में साल 2021 में महत्वपूर्ण संशोधन किए गए थे, जिसे 1 सितंबर, 2022 को लागू कर दिया गया है। यहां इसकी धारा 18 का जिक्र आवश्यक है, जिसमें पहले यह प्रावधान था कि जिनकी उम्र 18 साल से कम है, उनके द्वारा यदि कोई ‘छोटा’ या ‘गंभीर’ अपराध किया जाता है, तो उसका निस्तारण किशोर न्याय बोर्ड करेगा। मगर 2021 के संशोधन में न सिर्फ इसमें ‘जघन्य अपराध’ को शामिल किया गया, बल्कि उम्र सीमा घटाकर 16 साल की गई। यानी, अपराध की गंभीरता को देखते हुए आरोपी को बालिग माना जा सकता है और आपराधिक प्रक्रिया संहिता, 1973 के तहत उस पर मुकदमा भी चलाया जा सकता है। जाहिर है, कानूनी संशोधनों के मुताबिक इस किशोर को भी उम्र और अपराध की प्रकृति के मुताबिक बालिग समझा जाना चाहिए था, पर ऐसा नहीं किया गया। वैसे कानून यह भी है कि वह 16 वर्ष से कम भी होता, तब भी इतना गंभीर अपराध करके वह बाल सुधार गृह नहीं, जेल जाता या सजा पाता।
अफसोस की बात यही है कि यह कानून 1 सितंबर, 2022 से भारत में लागू है, फिर भी इसकी जानकारी कम लोगों को है। साधारण व्यक्ति की बात छोड़िए, इस मामले में तो यही जान पड़ता है कि संबंधित अधिकारीगण और किशोर न्याय बोर्ड भी आंखें मूंदे हुए है। यहां आरोपी को अपने परिवार के रसूख का फायदा मिलता भी दिखता है। इतना गंभीर अपराध करने के बाद भी यदि आरोपी को तुरंत जमानत मिल गई, तो यह बात कहीं न कहीं हमारी व्यवस्था पर सवाल उठाती है। यह भी संकेत है कि आरोपी के परिजनों के दबाव में उसे राहत दी गई थी। उल्लेखनीय यह है कि किशोर न्याय अधिनियम में ‘छोटे’, ‘गंभीर’ और ‘जघन्य’ अपराधों की श्रेणियां सर्वोच्च न्यायालय द्वारा शिल्पा मित्तल बनाम दिल्ली के मामले में साल 2020 में दी गई टिप्पणी के बाद बांटी गई थीं, जिसमें कहा गया था कि किशोर न्याय अधिनियम में अपराध की चौथी श्रेणी ‘जघन्य अपराध’ के लिए प्रावधान नहीं किए गए हैं, जिसमें अपराध के लिए अधिकतम सजा सात वर्ष है, किंतु न्यूनतम सजा नहीं है।
स्पष्ट है, किशोर न्याय बोर्ड को इस कानून की जानकारी होनी चाहिए थी और इस मामले को नियमित अदालत में कार्रवाई के लिए भेजना चाहिए था। उसका कर्तव्य आरोपी को सही मार्ग दिखाना है, इसलिए उसकी यह अनभिज्ञता दुखद है। पीड़ित परिवार चाहे, तो उच्च न्यायालय जाकर इंसाफ की गुहार लगा सकता है। इस मामले में पुलिस चाहती, तो काफी कुछ कर सकती थी। ऐसे मामलों को रोकने के लिए उसके पास कई शक्तियां हैं। मसलन, पुलिस किसी को भी, बिना कारण भी, गिरफ्तार कर सकती है, जिसने किसी पुलिस अफसर के सामने एक गैर-जमानतीय अपराध किया हो। इतना ही नहीं, यदि किसी के खिलाफ वाजिब शिकायत की गई है या उसके खिलाफ कोई विश्वसनीय रिपोर्ट आई है या ऐसी कोई गैर-जमानतीय अपराध का संदेह उस पर हो, जिसमें सजा सात वर्ष या इससे ज्यादा हो, तो पुलिस उसे गिरफ्तार कर सकती है।
देश के परिवहन कानून को भी काफी सख्त बनाया गया है। अब तो तेज गति या लापरवाही से गाड़ी चलाने के परिणामस्वरूप किसी अन्य व्यक्ति को चोट लगने या मृत्यु होने के मामले में धारा 279 और धारा 304-ए (लापरवाही से मौत का कारण बनना), धारा 337 (किसी के जीवन या व्यक्तिगत सुरक्षा को खतरे में डालने वाले कार्य से चोट पहुंचाना) या धारा 338 (दूसरों के जीवन या व्यक्तिगत सुरक्षा को खतरे में डालकर गंभीर चोट पहुंचाना) के तहत दोषी को दंडित किया जा सकता है। इनमें 10 वर्ष तक की सजा हो सकती है। जाहिर है, कानून के पालन में चूक हुई है। पुलिस अधिकारियों को नए कानूनों की जानकारी के लिए प्रशिक्षण देना अनिवार्य है। उनमें यह समझ भी विकसित करनी होगी कि किस अपराध में किस धारा के तहत कार्रवाई की जानी चाहिए? यदि पुलिस-प्रशासन रसूखदारों की परवाह किए बिना, आम आदमी के हित में कानून का पालन करेंगे, तो देश बहुत हद तक अपराध से मुक्त हो सकता है।
इसी तरह, ड्राइविंग लाइसेंस को जारी करने की प्रक्रिया में भी सुधार जरूरी है। खास गाड़ियों के लिए सोच-विचारकर ड्राइविंग लाइसेंस जारी होना चाहिए। अच्छी बात है कि नाबालिगों के गाड़ी चलाने के मामले में उनके माता-पिता को गिरफ्तार कर सजा का प्रावधान किया गया है, जिसका कड़ाई से पालन जरूर किया जाना चाहिए। अपने देश में शराब पीकर गाड़ी चलाना, बिना नंबर प्लेट की गाड़ी चलाना या मोबाइल चलाते हुए गाड़ी चलाना आदि भी कानूनन अपराध हैं।
असल में, अपने देश में कानून तो कई हैं, लेकिन उनका पालन सुनिश्चित नहीं हो पाता है। इसी अनदेखी की वजह से कानून की अवहेलना होती है और इसे लागू करने वाली एजेंसियां अथवा अधिकारीगण सुस्त जान पड़ते हैं। विडंबना यह है कि न्यायालय आदेश देने में तो तत्परता दिखाते हैं, लेकिन उस आदेश को लागू करवाने के मामले में उनके हाथ बंधे दिखते हैं। हमें यह तस्वीर भी बदलनी चाहिए।
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देश में महंगे घरों और कारों की मांग की नई प्रवृत्ति देखी जा रही है। कोविड ने कामकाज का एक ऐसा तंत्र विकसित कर दिया है, जिसमें वर्क फ्रॉम होम की सुविधा मिल गई है। इस प्रावधान में ऐसे प्रीमियम घरों की मांग आने लगी है, जहाँ परिवार के सभी सदस्य एक दूसरे के रास्ते में आए बिना अपना काम कर सकें। इसका अर्थव्यवस्था पर भी बहुत सकारात्मक प्रभाव पड़ रहा है।
कुछ बिंदु –
– खुदरा ऋण में उछाल आ रहा है।
– आर्थिक सुधार को बढ़ावा मिल रहा है।
– बड़े घरों की मांग छोटे शहरों में भी जोर पकड़ रही है। इससे यहाँ भी विकास में तेजी आ रही है।
– भारत के आवास से जुड़े स्टॉक में मूल्य संवर्धन के कई गुणक प्रभाव देखे जा रहे हैं।
– प्रॉपर्टी डेवलपर्स अब जमीन की कम कीमत वाले क्षेत्रों को विकसित करके, मांग के अनुरूप प्रीमियम सुविधाएं उपलब्ध कराने की कोशिश कर रहे हैं।
– भारत के सस्ते आवास बाजार को आगे बढ़ने का मौका मिल रहा है। इससे शहरीकरण में तेजी आ रही है।
– इसके साथ ही घरों में तकनीकी उपकरणों और साज-सज्जा की वस्तुओं व सेवाओं की भी मांग बढ़ रही है।
भारत की जनसंख्या की औसत आयु उस बिंदु के करीब पहुंच रही है, जिसकी जीवन शैली से जुड़ी मांगों से स्थायी बदलाव हो रहे हैं। यह एक बहुत ही सकारात्मक उछाल हो सकता है।
‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 29 अप्रैल, 2024
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Date: 23-05-24
Setting the barThe ECI is too important an institution to be left to its own devices.Editorial
The Election Commission of India (ECI) asking the BJP and the Congress to desist from raising divisive issues in campaigning in the general election is a case of better late than never. The ECI has, in recent years, disappointed the Indian electorate by its inability to be effective, impartial and prompt in its role as the watchdog of elections. This is partly a function of the mechanism of the appointment of the ECI’s members, which is entirely a partisan decision of the executive. The ECI has now written to BJP President J.P. Nadda to ask “star campaigners” of the party to refrain from making statements which “may divide the society”. Its letter follows his response on May 13 to a notice issued to him over a complaint against Prime Minister Narendra Modi’s speech in Banswara, Rajasthan — Mr. Modi had referred to Muslims as “infiltrators” and “people with more children.” The letter to Congress President Mallikarjun Kharge asks him to ensure that the party’s star campaigners desist from making any statements which may cause tensions between different castes and communities. These rebukes from the ECI to the parties come a day after it censured the former Calcutta High Court judge turned BJP candidate from Tamluk, West Bengal, Abhijit Gangopadhyay, for his remarks against Trinamool chief Mamata Banerjee. He was barred from campaigning for 24 hours.
Earlier, the ECI had acted against YSRCP chief, Y.S. Jagan Mohan Reddy, BRS chief K. Chandrashekar Rao, Telangana Minister Konda Surekha, BJP leaders Shobha Karandlaje and Dilip Ghosh, and Congress leaders Supriya Shrinate and Randeep Surjewala. Complaints against U.P. Chief Minister Yogi Adityanath and Assam Chief Minister Himanta Biswa Sarma, last week, for their alleged violation of the model code of conduct (MCC) are pending. Overall, these measures might give an appearance of impartiality but that is not enough. The ECI is assuming a false parity between legitimate debates on policies that impact various social groups differently and an incitement of xenophobia for social polarisation. The MCC cannot be a ruse to muffle political debates and disagreements which are, and should be, at the heart of campaigning. Misuse of power and creation of disharmony fall in a different basket. The integrity and the credibility of the ECI is central to the legitimacy of elections. Reinforcing its independence should be a priority for all stakeholders in Indian democracy, particularly political parties and the judiciary. The ECI is too important to be left to itself.
Date: 23-05-24
The curious case of declining voters in the 2024 electionsIn nearly one-third of all constituencies in the 2024 election, the total absolute number of voters declined vis-à-vis the 2019 election.Praveen Chakravarty is Chairman, All India Professionals’ Congress and Data Analytics of the Congress.
It is generally well-accepted that prices of essential goods, population, GDP, agricultural production, professionals’ salaries and many such parameters only increase every year in a developing and growing country like India unless there is an abnormal, rare event such as Covid-19, which can cause GDP or population or salaries to decline that year. The percentage or rate of increase for each may vary year to year but the absolute number only goes up, barring exceptional conditions.
Similarly, the total number of people who come out to vote in an election is expected to only increase over a five-year election cycle. This is because India’s population continues to grow and the number of people who reach the voting age of 18 increases every year unless there has been a rare demographic disaster resulting in higher numbers of deaths or people fleeing. The total number of people who voted in a constituency in 2024 should then be higher than the number who voted in that constituency in 2019. Just as percentage increase in GDP or salary may vary yearly, voter turnout percentages can go up or down between elections. But the actual number of voters generally only rises between two five-year election cycles in India.
Is it then not intriguing that in nearly one-third of all constituencies in the 2024 election, the total absolute number of voters declined vis-à-vis the 2019 election? An analysis of the 427 constituencies until Phase 5 reveals that in 115 (27%) constituencies, fewer number of people came out to vote than in 2019. It is almost unparalleled in India’s electoral history that in such a large number of constituencies, there is a decline in total voters from the previous election held five years ago. Remember, these are not voter turnout percentages but absolute total numbers of people who voted.
There is much hullabaloo over voter turnout percentages in the ongoing election. But here is the rub – voter turnout percentage is an insufficient measure to compare across elections. It is because turnout percentage depends on the total number of electors on the electoral rolls. The total number of electors in a constituency for an election depends on the number of new voters registered as well as the number of dead or emigrated voters deleted. Both these vary widely from election to election depending on the intensity of electoral roll cleaning by the Election Commission. This is why the more meaningful and intuitive measure for comparison is the change in total number of people who came out to vote across elections.
Until Phase 5, more than 505 million people voted in 2024 versus 485 million in 2019, an increase of just 4%. In 2019, there was a 12% increase in total voters in these same constituencies vis-à-vis 2014. Clearly, there is a significant decline in the total number of voters in the current election than the norm in previous elections. But the even more baffling finding is that in 115 constituencies, the total number of voters declined from 2019, which is a rarity in a growing country like India. To put it in context, none of these constituencies experienced a decline in total voters in 2014 and only 19 did in 2019. How is it possible that so many constituencies had such a dramatic drop in total voters? Even if one were to adjust by removing small States and Union Territories that one may argue skews the analysis, the finding is still the same – in one-third of all constituencies, the total voters declined vis-à-vis 2019.
Delving further, most of the constituencies where there is a decline in total voters are in six States – Kerala, Madhya Pradesh, Rajasthan, Tamil Nadu, Maharashtra, and Uttar Pradesh. A change in total voters in a constituency from the previous election is largely a function of three factors – number of new eligible electors, number of electors who have emigrated out, and percentage of electors who come out to vote. Surely it cannot be the case that there was an inexplicable drop in the number of eligible electors, which normally only follows broad population trends? Neither can it be the case that there was a sudden alarming increase in emigration of people from these 115 constituencies due to economic or other compulsions. None of these constituencies saw a decline in total voters in either the 2014 or 2019 election from the previous election.
So, the only logical explanation is an extreme decline in turnout to cause a reduction in total absolute voters vis-à-vis 2019. The natural follow-up question then is – why is there is a decline in voters in a significant number of constituencies that the Opposition won in 2019 or is expected to get stronger in 2024? Was the reduced turnout voluntary or implicitly coerced? If voluntary, what demographic or other explanations justify such a large and sudden drop in turnout in so many constituencies in States that are seemingly ‘in play’ for 2024? It is not even the case that voters in the initial phases of the elections were apathetic and the turnout started to pick up as elections progressed. The share of constituencies that saw a decline in total voters from 2019 fluctuates up and down across phases.
It is a rarity in the Indian context for constituencies to see a decline in the absolute number of voters between two five-year election cycles. But nearly one-third of all constituencies experienced such a decline in 2024 vis-à-vis 2019. It is best to avoid conjectures and let the Election Commission explain this mysterious trend.
Date: 23-05-24
आखिर न्याय क्यों इतना विरोधाभासी है ?संपादकीय
पुणे में एक रईसजादे किशोर (17) ने दोस्तों के साथ शराब पी, 48 हजार रु. के बिल का भुगतान किया और फिर ढाई करोड़ रुपए की पोर्श कार को 160 की स्पीड में चलाकर दो युवा इंजीनियर्स को मार डाला। किशोर न्यायालय ने उसे दुर्घटना पर निबंध लिखने और आरटीओ ऑफिस में जाकर ट्रैफिक नियम समझने की शर्त लगाकर छोड़ दिया। वहीं दूसरी घटना उत्तराखंड की है, जहां एक 14 वर्षीय किशोर ने साथ पढ़ने वाली लड़की का नग्न वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर डाला, जिससे क्षुब्ध लड़की ने आत्महत्या कर ली। पांच माह से बाल संरक्षण गृह में बंद इस किशोर को किशोर न्यायालय ने जमानत नहीं दी, हाईकोर्ट ने यह कहकर निचली कोर्ट का आदेश बहाल रखा कि ‘अपराध को देखते हुए जमानत देने से गलत संदेश जाएगा। ‘हाईकोर्ट ने कहा कि यह किशोर ‘अनडिसिप्लिन्ड’ है और इसे छोड़ना खतरनाक हो सकता है। लड़के की मां ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की, लेकिन कोर्ट ने भी जमानत से इनकार करते हुए हाईकोर्ट का आदेश सही माना । आखिर क्या वजह है जिस बात को तीन-स्तर की कोर्ट्स खतरे के रूप में देख रही हैं, उसे पुणे के मामले में किशोर न्यायालय नहीं देख सका और एक ऐसी शर्त रखी, जो पीड़ित परिवार के साथ भद्दा मजाक है। यह फैसला निचली कोर्ट की समझ पर भी सवाल खड़े करता है।
Date: 23-05-24
ईरान के सिस्टम को समझना दुनिया के लिए जरूरी हैमनोज जोशी, ( ‘अंडरस्टैंडिंग द इंडिया चाइना बॉर्डर’ के लेखक )
ईरान के 63 वर्षीय राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी की मृत्यु वहां के शासक-कुलीनों के लिए एक गंभीर झटका है। वे ईरान के 85 वर्षीय सर्वोच्च नेता अयातुल्ला खामनेई के पक्के वफादार थे और खबरें थीं कि उन्हें उनके उत्तराधिकारी के रूप में तैयार किया जा रहा था। ईरानी कानून के मुताबिक, उपराष्ट्रपति मोहम्मद मोखबर अब अंतरिम राष्ट्रपति बन गए हैं और ईरान को 50 दिनों के भीतर राष्ट्रपति चुनाव कराने होंगे। लेकिन पूरी संभावना है कि केवल रईसी सरीखी प्रोफाइल वाले ही किसी व्यक्ति को सर्वोच्च नेता द्वारा हरी झंडी दी जाएगी।
दरअसल, ईरान की शासन-प्रणाली बहुत यूनीक है। वहां आधिकारिक तौर पर आम नागरिकों और मौलवियों के बीच शक्ति का विभाजन किया गया है। सिस्टम पर करीब से नजर डालने से पता चलता है कि यह मौलवियों और उनके रूढ़िवादी सहयोगियों की सत्ता को बनाए रखने के लिए डिजाइन किया गया है। इस व्यवस्था के शीर्ष पर खामनेई हैं, जिनके पास लगभग हर चीज पर वीटो है। सर्वोच्च नेता को विशेषज्ञों की असेंबली द्वारा जीवन भर के लिए चुना जाता है। यह असेंबली 88 शीर्ष मौलवियों से निर्मित है, जो प्रत्यक्ष मतदान के माध्यम से आठ वर्षों में एक बार चुने जाते हैं। खामनेई ईरान में राज्यसत्ता के प्रमुख और शीर्ष धार्मिक नेता होने के साथ ही सरकार के लीडर भी हैं।
ईरान में विधायिका के दो अंग हैं- निचला सदन या कंसल्टेटिव असेंबली और ऊपरी सदन या गार्जियन काउंसिल। असेंबली एक नियमित संसद की तरह है, जिसमें गुप्त मतदान के माध्यम से प्रतिनिधियों का चुनाव होता है। गार्जियन काउंसिल में 12 सदस्य हैं, जिनमें से आधे सर्वोच्च नेता द्वारा चुने गए मौलवी हैं और अन्य आधे निचले सदन द्वारा चुने गए न्यायविद् हैं। गार्जियन काउंसिल के पास सभी कानूनों पर वीटो है और यह उन लोगों की सूची को भी मंजूरी देती है, जो राष्ट्रपति, संसद और विशेषज्ञों की सभा के चुनाव लड़ सकते हैं। इसके अलावा, प्रबंधन में सहायता के लिए सर्वोच्च नेता द्वारा चुने गए लगभग 30-40 लोगों की शक्तिशाली परिषद भी होती है। इस सिस्टम का इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड्स कॉर्प्स (आईआरजीसी) पर पूर्ण नियंत्रण रहता है। आईआरजीसी, ईरानी फौज के समानांतर और उससे भी अधिक शक्तिशाली संगठन है। उसकी अपनी सेना, नौसेना और एयरोस्पेस विंग हैं।
रईसी को 2017 के चुनावों में हसन रूहानी ने हरा दिया था। रूहानी भी मौलवी थे, लेकिन वे एक व्यावहारिक व्यक्ति थे, जिन्होंने 2015 में परमाणु समझौते पर बातचीत की थी और ईरान पर से प्रतिबंध हटवाए थे। गार्जियन काउंसिल द्वारा बड़ी संख्या में अन्य उम्मीदवारों को अयोग्य घोषित किए जाने के बाद रईसी ने 2021 का चुनाव जीता। चुनाव में मतदान 50% से कम था। यह तो साफ है कि खामनेई, रूहानी जैसे किसी नेता को राष्ट्रपति के रूप में उभरने नहीं देंगे। पिछले कुछ वर्षों में, महिलाओं के हिजाब-विरोधी आंदोलनों के कारण ईरान घरेलू स्तर पर संघर्षों से जूझ रहा है। 500 से अधिक प्रदर्शनकारियों को मार दिया गया है और सैकड़ों को या तो जेल में डाल दिया है या वे गुमशुदा हैं। इसके बाद रूढ़िवादी नियमों और महिलाओं पर पाबंदियों को बढ़ा दिया गया है।
पश्चिमी प्रतिबंधों, सरकारी कुप्रबंधन और भ्रष्टाचार से ईरानी अर्थव्यवस्था लड़खड़ा चुकी है। ऐसे में वह चीन और रूस से संबंधों को गहरा रहा है। चीन के द्वारा उससे की जा रही तेल की खरीद से वह अपना अस्तित्व कायम रखे हुए है। ईरान मध्य-पूर्व में एक बड़ी ताकत बन सकता था, लेकिन रूढ़िवादी नेतृत्व के चलते उसने सिस्टम पर घरेलू नियंत्रण का रास्ता चुना। वह अपने प्रतिनिधियों के माध्यम से मध्य-पूर्व में अमेरिका, इजराइल और विभिन्न अरब देशों के खिलाफ गुप्त युद्ध भी चला रहा है। इसी सिलसिले में उसने यूक्रेन-युद्ध में उपयोग के लिए रूस को लड़ाकू ड्रोन की आपूर्ति की थी। लेकिन हाल में ईरान खतरनाक ढंग से अमेरिका और इजराइल से सीधे भिड़ गया है।
ईरान से भारत के हित जुड़े हैं। वह उसके तेल का प्रमुख खरीदार था, लेकिन अमेरिकी प्रतिबंधों ने तेल-व्यापार को लगभग समाप्त कर दिया है। 2016 में भारत ने चाबहार बंदरगाह में निवेश के इरादे जताए थे, जिससे उसे मध्य एशिया में पाकिस्तानी नाकेबंदी को दूर करने में मदद मिलती। आगामी दस वर्षों के लिए चाबहार का प्रबंधन करने के अपने हालिया निर्णय से भारत ने संकेत दिया है कि वह ईरान के अपने विकल्प को हाल-फिलहाल तो बरकरार रखना चाहता है।
Date: 23-05-24
महिला रोजगार की चुनौतियांसंपादकीय
जनवरी से मार्च 2024 (वित्त वर्ष 24 की चौथी तिमाही) के लिए हाल में जारी आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण के तिमाही बुलेटिन से महिलाओं और भारतीय श्रम बाजार में उनकी स्थिति को लेकर कई दिलचस्प जानकारियां सामने आई हैं। कार्यबल में भागीदारी के लिहाज से देखें तो शहरी इलाकों में महिला श्रम बल भागीदारी दर (एलएफपीआर) 2022-23 की चौथी तिमाही के 22.7 फीसदी से बढ़कर 2023-24 की चौथी तिमाही में 25.6 फीसदी तक हो गई है। साल 2022 से ही महिला एलएफपीआर में लगातार बढ़त देखी जा रही है। यह साल 2017-18 में पीएलएफएस की शुरुआत के बाद से अब तक के उच्च स्तर पर पहुंच गई है। इसके अलावा, साल 2022 से ही शहरी इलाकों में महिला बेरोजगारी दर घटती जा रही है। वित्त वर्ष 23 की चौथी तिमाही के 9.2 फीसदी से घटकर वित्त वर्ष 24 की चौथी तिमाही में यह 8.5 फीसदी रह गई है। हालांकि श्रम बल में महिलाओं का प्रतिनिधित्व लगातार कम बना हुआ है। महिला एलएफपीआर पुरुष एलएफपीआर के एक तिहाई के आसपास है, जो कि वित्त वर्ष 24 की चौथी तिमाही में 74.4 फीसदी थी। यह जरूरी नहीं कि समान भागीदारी अपने आप महिला-पुरुष समानता की गारंटी हो, लेकिन भारत अब भी महिला और पुरुष दोनों के मामले में समान श्रम बाजार नतीजे से हासिल करने से दूर है।
इसके अलावा, 2022-23 की चौथी तिमाही और 2023-24 की चौथी तिमाही के बीच शहरी भारत में कुल महिला कामगारों में नियमित वेतनभोगी नौकरियों वाली महिला कर्मचारियों का हिस्सा 54.2 फीसदी से घटकर 52.3 फीसदी रह गया। पिछले छह साल में यह किसी भी तिमाही में सबसे कम है। इसी दौरान, स्वरोजगार में लगी महिलाओं का हिस्सा 2022-23 की चौथी तिमाही के 38.5 फीसदी से 2023-24 की चौथी तिमाही में बढ़कर 41.3 फीसदी हो गया। इसमें घरेलू उद्यमों में बिना वेतन काम करने वाले लोग भी शामिल होते हैं। ये दोनों घटनाएं संकेत करती हैं कि काम की गुणवत्ता घट रही है। यह देखा गया है कि शहरी महिलाओं में शिक्षा के स्तर बढ़ने से ऐसी महिलाओं की संख्या बढ़ी है जो घर में रहकर घरेलू जिम्मेदारियां संभालना चाहती हैं। महिला श्रम भागीदारी दर अक्सर 20 से 25 साल की महिलाओं में कम रहती है, जो यह संकेत देता है कि शादी या पारिवारिक जिम्मेदारियों की वजह से महिलाओं की श्रम में भागीदारी सीमित हो जाती है। जो महिलाएं कोई उत्पादक रोजगार हासिल नहीं कर पातीं, उनके लिए अपने पुरुष साथी के जैसा पर्याप्त वेतन हासिल कर पाना मुश्किल होता है।
स्वरोजगार और पारिवारिक उद्यमों में बिना वेतन वाले रोजगार में बढ़त, जो कि सालाना पीएलएफएस रिपोर्ट में भी दिखता है, इस बात को रेखांकित करती है कि देश में लाभकारी रोजगार के अवसर कम हैं। शहरी रोजगार के मामले में देखें तो कंपनियों ने महामारी के बाद अपने कर्मचारियों को वापस दफ्तर में काम पर बुलाया है, जिसकी वजह से महिलाओं में नौकरी छोड़ने की दर तेज हुई है- महामारी के दौरान घरेलू जिम्मेदारियों में बदलाव की वजह से बहुत सी महिलाओं के लिए काम पर वापस जाना संभव नहीं रह गया। महिलाओं के एलएफपीआर और कार्यबल भागीदारी दर में अच्छी बढ़त के बावजूद शहरी इलाकों में नौकरियों का अपर्याप्त सृजन होने का मतलब यह है कि महिलाओं का बड़ा हिस्सा उत्पादक कार्य अवसरों में समायोजित नहीं हो पाया है, भले ही अच्छी जीविका की तलाश में शहरों में पलायन बढ़ा हो। भारत के श्रम बाजार में महिला-पुरुष खाई हमेशा शैक्षणिक उपलब्धि और पेशेवर कौशल में अंतर की वजह से ही नहीं होती। अक्सर श्रम बाजार महिलाओं द्वारा मांगे जाने वाले कार्य समय के लचीलेपन को मुहैया नहीं करते।
नौकरियों के सृजन में उल्लेखनीय बढ़त से शायद चीजें बदल सकती हैं, जिससे कि कुशल और अर्द्ध कुशल, दोनों तरह के श्रम के लिए मांग बढ़ेगी। सरकार ने कार्यबल में महिलाओं के सहयोग के लिए कई कदम उठाए हैं, लेकिन बड़ी संख्या में छोटे उद्यमों की भारतीय अर्थव्यवस्था की प्रकृति भी ऐसी संरचनात्मक अड़चन पैदा करती है जिसका छोटी अवधि में समाधान कर पाना मुश्किल है।
Date: 23-05-24
अब रोकिए युद्धसंपादकीय
अपनी आक्रामक नीतियों के जोर पर इजरायल उस दिशा में तेजी से बढ़ रहा है, जहां उसके पुराने मित्र देश उसका साथ छोड़कर जाने लगे हैं। आयरलैंड, नॉर्वे और स्पेन ने बुधवार को फलस्तीन को एक देश के रूप में मान्यता देने की घोषणा कर दी, इससे नाराज इजरायल ने इन देशों से अपने राजदूत वापस बुला लिए। यूरोप के अनेक देश आज भी इजरायल के इतने बड़े समर्थक हैंकि उन्होंने अभी तक फलस्तीन को मान्यता नहीं दी है। कहीं न कहीं इन देशों का यह ख्वाब रहा है कि एक न एक दिन फलस्तीन या गाजा की जमीन पर इजरायल का पूर्ण कब्जा हो जाएगा। अगर इन देशों का ख्वाब अब टूटने लगा है और फलस्तीन को मान्यता देने की स्थितियां बनने लगी हैं, तो यह स्वागतयोग्य है और इससे युद्ध रोकने में मदद मिलेगी। इजरायल-हमास युद्ध रोकना जरूरी है। यूरोपीय देशों में पहली बार युद्ध रोकने के प्रति गंभीरता दिख रही है। ध्यान रहे, पश्चिम एशिया में जारी इस युद्ध में अब तक 36 हजार के करीब लोग मारे गए हैं और 80 हजार के करीब घायल हुए हैं।
युद्ध को रोकने की दिशा में किसी भी प्रयास का हमें स्वागत करना चाहिए। संकेत यही है कि 28 मई के आसपास कई अन्य देश फलस्तीन को मान्यता देंगे। दरअसल, अब ज्यादातर यूरोपीय देश भी युद्ध नहीं चाहते। स्पेन के प्रधानमंत्री पेड्रो सांचेज ने संसद में साफ घोषणा की है कि ‘समय आ गया है, हम शब्दों से काम की ओर बढ़ें।’ हमास के पक्ष में या यहूदियों के खिलाफ जाना कतई जरूरी नहीं है, पर युद्ध का विरोध जरूरी है। काश! यह बात इजरायल भी समझ जाए। हालांकि, यूरोपीय देशों के इस कदम से इजरायल नाराज है और अपनी आक्रामक मुद्रा से पीछे हटने को तैयार नहीं है। कोई दोराय नहीं कि इजरायल की आक्रामकता को अमेरिका और यूरोपीय देशों ने ही पुष्ट किया है। इन सबके सामूहिक प्रयासों से ही इजरायल के व्यवहार में नरमी आएगी। आतंकवाद का जवाब कदापि आतंक से नहीं दिया जा सकता। फलस्तीन के लोगों को आत्मनिर्णय का मौलिक, स्वतंत्र अधिकार है। इजरायल व फलस्तीन, दोनों को अपने-अपने क्षेत्र में शांति से रहने का हक है। इन दोनों देशों के बीच विवाद के समाधान के बाद ही पश्चिम एशिया में शांति होगी।
भारत सहित लगभग 140 देश फलस्तीन को मान्यता देते हैं। भारत ने अगर यहूदियों को प्यार से सहारा दिया, उनके दर्द को समझा, तो फलस्तीन की कराह सुनने वाले देशों में भी भारतीय आगे थे। आज के दौर में यह बेहद अफसोसनाक है कि फलस्तीन को संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्यों- अमेरिका और ब्रिटेन से भी मान्यता नहीं मिली है। ये देश अपने इजरायल प्रेम में फलस्तीनियों के साथ नाइंसाफी कर रहे हैं। भारत तो 1988 में ही फलस्तीन राज्य को मान्यता देने वाले पहले देशों में से एक था। विश्व बैंक भी इस बात को मानता है कि फलस्तीन एक राष्ट्र के रूप में जरूरी मानदंडों को पूरा करता है, अत: जहां फलस्तीन के पक्ष में आवाज उठाने की जरूरत है, वहीं इजरायलियों की सुरक्षा से भी कोई समझौता नहीं किया जा सकता। इजरायल पर अगर 7 अक्तूबर को हमला नहीं हुआ होता, तो यह युद्ध न छिड़ता। ताकत और विद्वता से भरपूर इजरायलियों को भी अपनी सुरक्षा के प्रति पूरी तरह आश्वस्त करना होगा। ऐसा करने के लिए अरब दुनिया में आतंकियों के लिए कोई जगह नहीं बचनी चाहिए। सभी मिलकर अरब दुनिया में शांति के प्रयास करें, तो इससे पूरी दुनिया में अमन-चैन को बल मिलेगा।
Date: 23-05-24
चुनावी हिंसा पर लगी रहे लगामदिलीप त्रिवेदी, ( पूर्व आईपीएस अधिकारी )
बहुत जगह मैं चुनाव कराने में भागीदार रहा हूं। पुलिस सेवा के अपने लंबे करियर के शुरू में, जब हम लोग नौकरी में आए ही थे, तब 1980 का चुनाव था, इंदिरा गांधी सत्ता में वापस आई थीं। एक पुलिस सेवा अधिकारी के रूप में हम लोग पहले बहुत चिंतित रहते थे कि मतदान केंद्र पर कोई समस्या न हो जाए। हिंसा न हो जाए। कहीं गड़बड़ी होती थी, तब लोग मानते थे कि प्रशासन समर्थ नहीं है, इसलिए ऐसी घटनाएं होती हैं। फिर एक दौर आया, जब चुनाव आयोग ने कहा कि पुनर्मतदान समस्या नहीं है, जहां भी जरूरी हो, पुनर्मतदान का फैसला किया जाएगा। इस फैसले का बहुत असर हुआ, चुनावी हिंसा घटने लगी। गड़बड़ी करने वालों के बीच संकेत चला गया कि अगर हमने कहीं कोई अनियमितता की, तो हमारी पूरी साजिश नाकाम हो जाएगी, क्योंकि चुनाव आयोग कड़ी सुरक्षा व्यवस्था में इस बूथ पर पुनर्मतदान कराएगा। मुख्य चुनाव आयुक्त टी एन शेषन के समय तो यह और भी स्पष्ट हो गया कि जहां भी हिंसा या गड़बड़ी होगी, वहां पुनर्मतदान कराया जाएगा।
नेताओं को भी यह लगने लगा कि मतदान या चुनाव के समय हिंसा से कुछ नहीं होने वाला। राजनीतिक दलों को भी यह एहसास हो गया कि बाहुबल से दादागीरी नहीं चलने वाली। धीरे-धीरे शारीरिक हिंसा बहुत कम हो गई, जबकि एक समय अपराधी बैलेट बॉक्स लेकर भागते थे और गोली चलाने की नौबत आ जाती थी।
जब मैं सीआरपीएफ में डीजी था, छत्तीसगढ़ के नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में साल 2013 में चुनाव था। स्पष्ट निर्देश था कि अगर किसी मतदान केंद्र पर मतदान दल नहीं पहुंच पाता है, तो जान को जोखिम में नहीं डालना है। दो-तीन जगह जो बच जाएंगे, वहां बाद में पूरी तैयारी के साथ मतदान करा लेंगे। इसका फायदा यह हुआ कि नक्सल प्रभावित इलाकों में भी बहुत कम हिंसा हुई थी। कहीं भी हिंसक तत्वों को अगर हिंसा का लाभ नहीं दिखे, तो वे हिंसा से बाज आते हैं।
बहरहाल, साल 2024 के आम चुनाव में फिर हिंसा दिख रही है। पहले संभल में हुई, फिर छपरा में हुई। पश्चिम बंगाल में तो लगातार हो रही है। आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? अनेक लोगों की यह शिकायत है कि हमारा चुनाव आयोग इस पर पूरा ध्यान नहीं दे पा रहा है। ऐसे में, अनेक नेताओं को लगने लगा है कि अगर चुनाव या मतदान के दिन उन्होंने गड़बड़ी की, तो वे बच जाएंगे और चुनाव भी जीत जाएंगे।
इस बार चुनाव चूंकि टक्कर का है, इसलिए हिंसा की स्थिति बन रही है। दूसरी बात, चुनाव आचार संहिता के उल्लंघन की शिकायतें भी आ रही हैं। कड़े कदम नहीं उठाए जा रहे हैं। गौर कीजिए, कलकत्ता उच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग को तगड़ी फटकार लगाई है। चुनाव आयोग के इंतजाम पर बड़े सवाल उठे हैं। हिंसक तत्वों तक जो कड़ा संदेश पहुंचना चाहिए, वह शायद इस बार ठीक से नहीं पहुंच रहा है।
अब बमुश्किल दस दिन बाद मतगणना है। मुझे लगता है, जो भी हिंसा होगी, मतगणना के पहले हो जाएगी, उसके बाद हिंसा की आशंका कम है। हां, पश्चिम बंगाल में कुछ इलाके हैं, जहां मतगणना के बाद हिंसा की कुसंस्कृति बन गई है। मतगणना चंद जगहों पर सीमित दायरे या परिसर में होती है और पहले का दौर नहीं है, जब चीजों को छिपा लिया जाता था, कैमरे नहीं हुआ करते थे। आज मीडिया और सोशल मीडिया चप्पे-चप्पे पर मौजूद है। जो भी गड़बड़ी करेगा, उसकी कोई न कोई वीडियो बनाएगा और वह वायरल हो जाएगा। वायरल होने के बाद अपराधियों पर शामत आ जाएगी। अत: मुझे लगता है, अब मतगणना के समय कहीं हिंसा करना बहुत मुश्किल है। आखिर कोई क्यों हिंसा करते दिखकर अपना राजनीतिक करियर खराब करेगा?
हां, कुछ इलाके पहले बिहार, उत्तर प्रदेश में ज्यादा थे और अब पश्चिम बंगाल में ज्यादा हैं, जहां हारने वाले को लगता है कि उसकी दादागीरी नहीं चली, तो वह हिंसा का सहारा लेता है। हार का गुस्सा निकालने का काम बाहुबलियों के इशारे पर महीने-छह महीने तक चलता रहता है। बहुत जगहों पर लोगों को पता चल जाता है कि किसने किसको वोट दिया और इसे लेकर हिंसा होती है। उत्तर प्रदेश में भी ऐसे अनेक ताकतवर नेता रहे हैं, जिन्होंने ऐसी हिंसा का सहारा लिया है। वैसे, ध्यान रहे, ऐसी हिंसा को सिर्फ पुलिस बल या प्रशासन के सहारे नहीं रोका जा सकता, इसे रोकने के लिए बहुत सशक्त राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है। हिंसा वाले इलाकों में समाज को जगाने की जरूरत है। यह देखने की बात है कि चुनावी हिंसा दक्षिण भारत के राज्यों में नहीं होती है, क्योंकि ऐसी हिंसा की निरर्थकता को वहां के राजनीतिक और सामाजिक नेता समझते हैं।
चुनावी हिंसा को पूरी तरह रोकने में हमारी नाकामी के पीछे देश की बंटी हुई राजनीति का भी बड़ा योगदान है। अनेक राज्यों में क्षेत्रीय पार्टियों की सरकार है और कानून-व्यवस्था राज्य सरकार का विषय है। कुछ राज्यों में बाहुबली तत्वों को स्थानीय स्तर पर समर्थन मिलता है, जिससे समाज और राजनीति में हिंसा, बाहुबल और अपराध को बढ़ावा मिलता है। मिसाल के लिए, उत्तर प्रदेश में अतीक अहमद थे या बिहार के मोहम्मद शहाबुद्दीन, इनके हारने या जीतने के बाद भी साल भर हिंसा का सिलिसला चलता था। बेशक, ऐसी हिंसा में कमी आई है, पर ऐसी हिंसा के पटाक्षेप के लिए समग्रता में समाज और राजनीति के स्तर पर भी कदम उठाने पड़ेंगे।
यह जरूरी है कि हिंसक तत्वों को किसी भी स्तर पर आगे न आने दिया जाए। पुलिस केवल अपने स्तर पर यह काम नहीं कर सकती, क्योंकि अनेक पुलिस अधिकारी राजनेताओं से जुड़कर काम करने में अपना ज्यादा फायदा देखते हैं, इससे पुलिस बल में गलत संदेश जाता है। किसी अधिकारी को अगर अपराध रोकने के लिए, समाज की सेवा के लिए जान जोखिम में डालने पर सम्मानित किया जाए, तो समझ में आता है, पर जब सियासी किस्म की सेवा के लिए किसी अधिकारी को पुरस्कृत किया जाए, तो पूरी व्यवस्था पर नकारात्मक असर पड़ता है और चुनाव के समय इसका असर दिखता है। अत: चुनावी हिंसा रोकने के लिए ही नहीं, बल्कि चाक-चौबंद चुनाव कराने के लिए भी सबको अपना कर्तव्य निभाना होगा।
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आर्टिफिशिएल इंटेलिजेंस से उत्पन्न वायस क्लोनिंग अब डीपफेक के रूप में दुनिया के सामने नई चुनौतियां प्रस्तुत कर रहा है। भारत सहित पूरे विश्व में साइबर अपराधी धन ऐंठने के लिए इसका उपयोग करने लगे हैं।
वायस क्लोनिंग एक ऐसी एआई तकनीक है, जो हैकर्स को किसी भी आडियो रिकार्डिंग लेने, उनकी आवाज पर एआई टूल को प्रशिक्षित करने और उसे फिर से बनाने की सुविधा देता है।
1990 के दशक के अंत में जब यह प्रौद्योगिकी सामने आई थी, तब इसका उपयोग एआई विशेषज्ञों तक ही सीमित था। किन्तु पिछले कुछ वर्षों में यह तकनीक इतनी सस्ती और सुलभ हो गई है कि अब कोई भी इसका उपयोग कर सकता है।
इसके लिए बातचीत की पाँच मिनट की क्लिप की आवश्यकता होती है। हैकर्स किसी फोन काल या यहाँ तक कि इंटरनेट मीडिया पर पोस्ट किए गए वीडियों से भी ऑडियो ले सकते हैं।
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Date: 22-05-24
Warranted or NotInternational Criminal Court is a good example of global institutions’ limitations in fractured geopoliticsEditorial
The International Criminal Court (ICC) faces its moment of reckoning. Set up to prosecute war crimes, it can issue arrest warrants against individuals if national courts can’t/won’t do it. ICC’s testing its power. Last year, it issued an arrest warrant against Vladimir Putin and now its prosecutor has applied for warrants against five consequential figures in the Israel-Hamas conflict, including Benjamin Netanyahu. The catch here is that ICC can bypass national courts but not enforcement agencies if arrests have to be made.
‘World order’ | The pivotal moment for global legal institutions was the San Francisco conference in 1945 when the UN charter and the statute of the International Court of Justice (ICJ) were adopted. The euphoria of the founding moment contained a kernel of truth. The world order would be hierarchical. UN’s ‘Big Five’ would get exclusive veto powers because they bore the primary responsibility to hold up the order. And also disturb it, as subsequent events showed.
Shifting equilibrium | A rules-based order has two parts. There are well-intentioned ideas to prevent conflict and promote economic cooperation. There’s also the reality of power exercised by sovereign states. Their interaction produces an equilibrium. That equilibrium is increasingly under pressure, leading to the architecture falling apart. Be it UN or WTO, multilateral bodies are now mostly ineffective.
Fragmented order | Move aside World Bank and IMF. China is today the world’s largest official creditor. A 2021 study looked at contracts between Chinese state enterprises and 24 sovereign borrowers. They’re designed to weaken collective action on debt restructuring by groups like the Paris Club. The world order is fragmenting and there’s not much sympathy because of past institutional hypocrisy. As for ICC, after years of prosecuting African warlords, it’s facing a new reality.
Date: 22-05-24
Ghar Wapsi, a Start Up the Right PathIndia’s regulatory regime has also helpedET Editorials
‘Reverse flips’ by Indian startups such as Pine Labs underscore welcome structural shifts in the ecosystem. Startups incorporated in India choose to transfer ownership to holding companies in the US or Singapore because it’s easier to do business there, to benefit from tax arbitrage and to gain greater access to capital. The decision to flip, or reverse flip, is shaped by outbound and inbound investment rules, apart from tax implications. Principally, though, the overriding concern for a startup remains its valuation before and after listing. This is the key reason late-stage Indian startups, too small to generate institutional investor interest abroad, choose to return home. Even if that means forgoing tax benefits on accumulated losses and vesting periods for sweat equity.
India’s regulatory regime has also facilitated shifts in both directions. Outbound investments were made easier by regulators clarifying what constitutes bona fide business when a startup intends to relocate abroad. Inbound investments also face more clarity over transfer of assets, apart from overall lower sectoral restrictions on foreign investments. India’s offshore investment hub in Gujarat allows companies to relocate with a greater degree of certainty over treatment of beneficial ownership than provided through treaty benefits. With progressive harmonisation of playing rules in GIFT IFSC and other offshore jurisdictions, the reverse flip may become easier to accomplish.
The pull of Indian investors’ appetite for startups was established in fancy listing valuations of a clutch of unicorns a couple of years ago that didn’t sustain in the secondary market. Regulators have since increased their vigil on VC valuation methodologies. The tax structure for early-stage startups is designed to encourage fair valuation. With guard rails in place, regulators derive greater comfort in exposing retail investors to the startup ecosystem. PE, too, finds an easier exit with India’s strong investor investment and is instrumental in guiding the domicile decision. All of which should add momentum to the trend of reverse flips.
Date: 22-05-24
बिना आधार गिरफ्तारी वाले सख्त कानूनों पर नकेलसंपादकीय
केंद्रीय जांच एजेंसियों द्वारा यूएपीए पीएमएलए और आतंक -विरोधी एक्ट में बगैर आधार ( न कि कारण ) बताए गिरफ्तार करना और महीनों-वर्षों जेल में रखना सामान्य प्रक्रिया बन गई है। यूएपीए जैसी सख्त दफा में गिरफ्तार हुए एक न्यूज पोर्टल के पत्रकार को रिहा करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सरकार की शक्तियों पर अंकुश लगाया है। दरअसल कोर्ट ने अपने 42 पेज के फैसले में सरकार को याद दिलाया कि विगत 3 अक्टूबर, 2023 को इसी कोर्ट ने पीएमएलए में बगैर आधार बताए गिरफ्तारी को अवैध करार दिया था। अब वर्तमान बेंच ने यूएपीए में पत्रकार की गिरफ्तारी को संविधान के अनुच्छेद 22 (1) (जिसमें बगैर आधार बताए गिरफ्तारी के खिलाफ संरक्षण है) सहित अनुच्छेद 20 और 21 का भी उल्लंघन माना है। उपरोक्त दोनों फैसलों से एक बार फिर सरकारों की शक्तियों के विस्तार की ललक पर विराम लगा। इन दोनों कानूनों में जमानत मिलना हाल के दिनों में नामुमकिन होने लगा था क्योंकि यूएपीए की धारा 43डी 5 और पीएमएलए की धारा 45 ने न्यायपालिका के हाथ बांध दिए थे। चिंता की बात यह थी कि बगैर आरोप तय हुए किसी को भी विचाराधीन कैदी के रूप में वर्षों जेल में रखना सरकार की एजेंसियों का नया हथियार बनता जा रहा था। एनसीआरबी की रिपोर्ट कहती है कि 2021 के मुकाबले साल 2022 में यूएपीए के 23 प्रतिशत मामले बढ़ गए, जबकि पिछले दस सालों पीएमएलए के मामले भी बढ़ गए, जबकि सजा की दर दो प्रतिशत से भी कम रही। वर्ष 2021 में 12 हजार लोग इन सख्त धाराओं में गिरफ्तार हुए। आज देश भर में 76 प्रतिशत कैदी विचाराधीन श्रेणी में हैं। 84 वर्षीय स्टेन स्वामी इन्हीं दफाओं के तहत बगैर न्याय मिले जेल में ही मर गए। इन धाराओं में गिरफ्तार 98 प्रतिशत लोग कोर्ट द्वारा निर्दोष पाए जाते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने संविधान को कानून के ऊपर रखा।
Date: 22-05-24
वो कौन-सी ताकतें हैं जो हमारे चुनावों में दखल देना चाहती हैं ?अभिजीत अय्यर मित्रा, ( सीनियर फेलो,आईपीएस )
वे दिन गए, जब अमेरिका की चर्चित खुफिया एजेंसी सीआईए सीधे ही दूसरे देशों में हो रहे चुनावों में पैसा लगाती थी। वास्तव में छोटे देशों को छोड़कर ये तरीके बिल्कुल कारगर साबित नहीं हुए थे। भारत में तो यह कभी नहीं चलने वाला, चाहे कितने ही बेहतरीन प्रयास क्यों न किए जाएं। फिर भी इसका मतलब यह नहीं है कि हमारे चुनावों में हस्तक्षेप करने की कोशिशें नहीं की जा रही हैं। सवाल है कि ये लोग कौन हैं और उनकी मंशा क्या है?
हमारे चुनावों में हस्तक्षेप करने वाले लोगों का पहला और सबसे शक्तिशाली समूह स्पेकुलेटिव- इंवेस्टर्स का है। इनमें जॉर्ज सोरोस जैसे हेज फंड मैनेजर्स का नाम लिया जा सकता है। मानवाधिकारों और लोकतंत्र के प्रति अपने घोषित समर्थन के बावजूद उनकी प्राथमिकता अपने मुनाफों पर रहती है। उनके लिए ‘मानवाधिकार’ शब्द देशों में अस्थिरता फैलाने का एक उपकरण है- क्योंकि जितना अधिक अस्थिर देश होगा, उसमें उतनी ही अधिक अराजकता, प्रणालीगत त्रुटियां, रिश्वतखोरी आदि होगी। उन्हें इकोनॉमी क्रैश से मुनाफा होता है। भारत उन अर्थव्यवस्थाओं में से है, जिससे वे लाभ कमाना चाहते हैं, लेकिन ऐसा करने में अभी तक विफल रहे हैं। यही कारण है कि सोरोस और पियरे ओमिडयार जैसे लोग नियमित रूप से अराजकतावादी न्यूज-आउटलेट और गैर सरकारी संगठनों में निवेश करते हैं- मुख्य रूप से ऐसे दीर्घकालिक नैरेटिव को बनाए रखने के लिए, जो स्थिरता कायम रखने में सक्षम किसी भी राजनेता या पार्टी की चुनावी संभावनाओं को नुकसान पहुंचाते हों।
दूसरे तरह के लोग विदेशी उद्योगपति- विशेष रूप से बड़े तकनीकी प्लेयर्स हैं। उनकी प्रेरणाएं अपने एकाधिकार को कायम रखने की हैं। निश्चित रूप से अमेजन भारत में बहुत पैसा कमाता है। लेकिन मार्केट पर उसका एकाधिकार है, क्योंकि फ्लिपकार्ट इतना आगे नहीं बढ़ सका है और ईबे फैशन से बाहर है। ऐसे में उसके मालिक जेफ बेजोस भारत पर निशाना साधने के लिए वॉशिंगटन पोस्ट का उपयोग क्यों करते हैं? मार्क जकरबर्ग का फेसबुक और इंस्टाग्राम सरकार समर्थक सामग्री को क्यों सेंसर करता रहता है और अराजकतावादियों को क्यों बढ़ावा देता है? गूगल अपनी सर्च और अपने सहायक यूट्यूब पर एक जैसे कंटेंट को प्राथमिकता क्यों देता है?
इन सब सवालों का जवाब बहुत सरल है। अपने जीवनकाल में हमने तकनीक और सेवाओं दोनों को बढ़ते और अप्रचलित होते देखा है। जब हम बड़े हुए तो हमें मोबाइल फोन पेश किए गए और रातों-रात नोकिया और एरिक्सन घर-घर में पहचाने जाने वाले नाम बन गए। लेकिन हमने अपने जीवनकाल में ही इन कंपनियों को ध्वस्त होते भी देखा है। इसी तरह हॉटमेल और याहू जैसी मेल सेवाएं, अल्टा विस्टा जैसे सर्च इंजन, ऑर्कुट और आईसीक्यू जैसे सोशल मीडिया भी गायब हो गए। क्यों? क्योंकि स्थिर और नियमित दुनिया में इनोवेशन की गति तेज और क्रूरतापूर्ण होती है। जबकि टेक दिग्गज बेदखल होने से बचने के लिए अस्थिरता को बढ़ावा देते हैं और इनोवेशन की गति को धीमा करते हैं। ट्विटर, फेसबुक, यूट्यूब, अमेजन (जो एडब्ल्यूएस के माध्यम से वेब होस्टिंग को नियंत्रित करता है) और गूगल ने इसे अमेरिकी चुनावों में सफलतापूर्वक कर दिखाया था। लेकिन उन्हें भारत में अभी तक सफलता नहीं मिली है।
तीसरे समूह में पश्चिमी सरकारें हैं। हालांकि पश्चिम सामंतवादी युग में लौट रहा है, जहां राजा (सरकारों) की तुलना में बैरन और नोबल्स (कॉर्पोरेट्स) अधिक शक्तिशाली हो गए हैं। आज सोरोस, ओमिडयार, जकरबर्ग, बेजोस जो कर पा रहे हैं, उनकी तुलना में ये सरकारें अपने पूर्ववर्तियों के आसपास भी नहीं हैं। बाडडन, रोनाल्ड रीगन की तुलना में और ऋषि सुनक, मार्गरेट थैचर की तुलना में शक्तिहीन हैं। नौकरशाही कॉर्पोरेट के वश में है। पर भारत में अस्थिरता चीन को मजबूत करेगी और पश्चिम यह भी नहीं चाहेगा।
Date: 22-05-24
घोर लापरवाही से उपजी त्रासदीतरुण गुप्त
संसदीय चुनावों की गहमागहमी के बीच स्थानीय निकायों की कार्यप्रणाली की चर्चा कुछ असंगत सी लग सकती है। यहां मैं स्पष्ट करना चाहता हूं कि जब कर्तव्यों की उपेक्षा जीवन के लिए घातक सिद्ध होने लगे तो फिर मौके और दस्तूर की परवाह नहीं की जानी चाहिए। बीते दिनों मुंबई में एक होर्डिंग गिरने से जुड़ी भयावह त्रासदी में 16 लोग असमय काल कवलित हो गए तो सैकड़ों लोग घायल हुए। यह प्रकरण इसका उदाहरण है कि जिन गलतियों को प्रायः हम मामूली समझकर अनदेखा कर देते हैं, उनके कितने विध्वंसक परिणाम सामने आ सकते हैं।
हमारे नगर निगमों की सबसे बदतर कार्यप्रणाली को चिह्नित करने की बारी आए तो इसे लेकर अजीब दुविधा होती है। क्या वे कचरा प्रबंधन या ड्रेनेज के मोर्चे पर सबसे अधिक नाकारा हैं अथवा बेसहारा या पालतू जानवरों के नियमन को लेकर सबसे अधिक नाकाम, सड़क पर गड्ढे भरने में लाचार अथवा अतिक्रमण पर अंकुश लगाने में असहाय या फिर झुग्गी बस्तियों के विस्तार पर विराम लगाने में अक्षम या सामान्य स्वच्छता को लेकर लापरवाह? इसमें कोई भी विकल्प चुना जा सकता है, क्योंकि हर मोर्चा एक दूसरे के मुकाबले और बदतर आंका जा सकता है। इसी क्रम में होर्डिंग-बिलबोर्ड्स जैसे आउटडोर विज्ञापनों के लचर प्रबंधन को भी जोड़ा जा सकता है। यह घोर उपेक्षा एवं जानबूझकर की जाने वाली लापरवाही का प्रत्यक्ष प्रमाण है।
स्थापित व्यवस्था यही है कि नगर निगम आउटडोर विज्ञापनों के लिए निविदाओं के माध्यम से अनुबंध करते हैं। इस व्यवसाय में निगम से अनुबंध हासिल करने वाले ठेकेदार विज्ञापनदाताओं से तो मोटी रकम वसूलते हैं, लेकिन नगर निगम को उसके अनुपात में मामूली राशि अदा करते हैं। जो भी लोग इस व्यवसाय में संलग्न हैं, उनके लिए उचित प्रतिफल के अधिकार को कोई नकार नहीं सकता।
एक समाज के रूप में हम इतने परिपक्व तो हो ही गए हैं कि निजी लाभ को तिरस्कार के रूप में देखने के बजाय इसे सराहना योग्य मानते हैं। हालांकि, इसके साथ ही सरकारी खजाने में अधिक योगदान की संभावनाओं को भी तलाशा जाना चाहिए। इसलिए प्रयास इसी दिशा में होने चाहिए कि निजी लाभ और राज्य की आय के बीच उचित संतुलन साधा जा सके। अद्यतन डाटा का अभाव भी ऐसे उद्यमों की अस्पष्ट एवं बेतरतीब प्रकृति को रेखांकित करता है।
प्राधिकरणों के पास शहर में मौजूद कुल साइट्स का बमुश्किल ही कोई सारगर्भित रिकार्ड होता है। प्रत्येक होर्डिंग, बिलबोर्ड का उसकी लोकेशन, आयाम-आकार-प्रकार और अन्य प्रासंगिक बिंदुओं के साथ व्यापक रिकार्ड रखना आखिर कितना कठिन है? वास्तविकता यही है कि निगम द्वारा आधिकारिक रूप से स्वीकृत होर्डिंग्स की संख्या से कई गुना अधिक होर्डिंग्स अवैध रूप से लगे रहते हैं। इससे राजस्व की स्वाभाविक क्षति तो होती ही है, वहीं अनधिकृत लोग इस व्यवसाय में प्रवेश कर जाते हैं।
मुंबई होर्डिंग हादसे ने इस ओर ध्यान आकर्षण करने के साथ ही आवश्यक आक्रोश भी उत्पन्न किया है। नि:संदेह यह इस तरह की सबसे भयावह दुर्घटना है, किंतु यह पहली ऐसी त्रासदी नहीं। तेज हवाओं और तूफानों में होर्डिंग्स का उड़ जाना साल भर चलता ही रहता है। प्राधिकरणों द्वारा सुरक्षा मानकों का शायद ही कभी गंभीरता से जायजा लिया जाता है। जबकि उपयुक्त आकार, ढांचे की मजबूती और ऐसी तकनीकी कसौटियां पहले से निर्धारित होनी चाहिए, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि तेज हवाओं में ढांचा उड़ न जाए। ऐसा प्रतीत होता है कि सुरक्षा से जुड़े मानक या तो नदारद हैं या फिर प्रभावी रूप से लागू ही नहीं हैं।
यह तो एक सर्वविदित तथ्य है कि एक्सप्रेसवे पर होर्डिंग्स लगाने की अनुमति नहीं है। चूंकि उनके चलते चालकों का ध्यान भंग होना घातक सिद्ध हो सकता है, लिहाजा इस पर प्रतिबंध है। उदाहरण के लिए दिल्ली-मेरठ एक्सप्रेसवे इस नियम की उपेक्षा का प्रतीक है। इसमें किसकी गलती है? उस ठेकेदार की, जिसने ढांचा खड़ा किया या जमीन के मालिक की, जिसने अपनी जमीन दी या फिर विज्ञापनदाता की? वस्तुतः, यह सामूहिक जिम्मेदारी का मामला है। इस क्रम में कार्रवाई का दायित्व भी राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण से लेकर स्थानीय पुलिस और प्रशासन समेत विभिन्न इकाइयों का है।
वास्तविकता यह है कि जहां एक ओर परस्पर दोषारोपण की स्थित बनती है, वहीं जिन इकाइयों पर नियमों का अनुपालन कराने की जिम्मेदारी है, इसमें उनकी विफलता भी समग्रता में झलकती है। ऐसा लगता है कि कुख्यात रेत खनन माफिया की तरह एक होर्डिंग माफिया भी उभरता दिख रहा है। कानून को ताक पर रखते हुए वे तंत्र को भ्रष्ट बनाते हैं, विज्ञापन माध्यम को बदनाम करते हैं, सरकारी खजाने को क्षति पहुंचाते हैं और लोगों की सुरक्षा को खतरे में डालते हैं। इस आलेख का आशय आउटडोर विज्ञापन जैसे प्रभावी माध्यम का विरोध करना कतई नहीं है। असल में इस माध्यम के असंगठित-अनियमित स्वरूप, व्यापक भ्रष्टाचार और सुरक्षा मानकों की अवहेलना सालने वाली है। इसके अतिरिक्त, दोषियों में कानून के भय का अभाव और अधिकारियों के साथ साठगांठ दुखदायी हो गई है। इसकी स्वाभाविक परिणति नागरिकों में गहराते असुरक्षाबोध के रूप में प्रकट होती है।
स्मरण रहे कि केवल समृद्धि ही विकास के लिए पर्याप्त आधार नहीं है। यह केवल एक सराहनीय आरंभिक बिंदु है। जीवन की गुणवत्ता और मानव विकास सूचकांक आवश्यक कसौटियां हैं। अभी बहुत कुछ किया जाना शेष है। अस्वाभाविक मृत्यु और जिस जनहानि से बचा जा सके, उसे हरसंभव प्रकार से न्यूनतम किया जाए। यह सही है कि यहां चर्चा नगर निगम से जुड़ी कुछ प्रमुख जिम्मेदारियों की हो रही है। यह भी सत्य है कि नगर निकाय राज्य सरकारों के अधीन काम करते हैं। किंतु यदि शासन के ये दो स्तंभ तमाम चुनौतियों का समाधान निकालने में विफल साबित हो रहे हैं तब फिर सर्वोच्च विधायी संस्था एवं चिंतनशील इकाई के रूप में संसद को ही पहल कर कोई राह दिखानी होगी।
आज हमारा दिल मुंबई के असहाय पीड़ितों के लिए द्रवित है, लेकिन कुछ समय बाद हम उनके शोक एवं पीड़ा को विस्मृत कर देंगे। यही मानव स्वभाव है, किंतु हमारे जेहन में यह हमेशा कैद रहना चाहिए। शोक संतप्त परिवारों को स्थितियों से सामंजस्य बिठाने में पता नहीं कितना समय लगेगा? क्या समय के साथ इतनी भीषण त्रासदियों से भी उबर पाना संभव होता है? मैं आशा तो यही करता हूं।
Date: 22-05-24
बंद हों फर्जी समीक्षाएंसंपादकीय
इस डिजिटल जमाने में फर्जी खबरों (Fake news) और गलत सूचनाओं के व्यापक मसले ने दुनिया भर के नीति-नियंताओं का ध्यान आकर्षित किया है।
डिजिटल स्वरूप में सूचनाओं की बाढ़ ने खबरों और सूचनाओं के उपभोग करने के लोगों के तरीके को मौलिक रूप से बदल दिया है और इससे लोगों के लिए यह पता करना मुश्किल हो गया है कि क्या फर्जी है और क्या प्रामाणिक।
ऐसे समय में जब दुनिया फर्जी खबरों से निपटने के लिए जूझ रही है, डिजिटलीकरण का एक और पहलू नियामकों और अन्य हितधारकों को परेशान कर रहा है, वह है ई-कॉमर्स वेबसाइटों पर फर्जी ऑनलाइन समीक्षाओं की समस्या।
इस संबंध में, उपभोक्ता मामलों का विभाग (DCA) उपभोक्ता समीक्षाओं के लिए गुणवत्ता मानकों और नियम-कायदों को लागू करने की तैयारी कर रहा है, और ऐसे गुणवत्ता मानदंडों के अनुपालन को अनिवार्य बनाने का स्वागत किया जाना चाहिए।
डीसीए की सभी हितधारकों या साझेदारों के साथ हुई बैठक में शामिल ई-कॉमर्स कंपनियों ने भी सरकार की इस पहल का समर्थन किया है। प्रस्तावित गुणवत्ता नियंत्रण आदेश (QCO) से संभवत: पूर्वग्रहों और पक्षपात के साथ उपभोक्ता समीक्षाओं को ऑनलाइन प्रकाशित करने, उनके संदेश को बदलने के लिए समीक्षाओं को संपादित करने या नकरात्मक समीक्षाओं को रोकने या हतोत्साहित करने से ई-कॉमर्स प्लेटफार्मों को रोका जा सकेगा।
एक बार इस तरह के नियम-कायदे लागू हो गए तो समीक्षा लिखने वालों की पहचान और सत्यापन की भी आवश्यकता हो सकती है। इसके अलावा, ऑनलाइन उपभोक्ता समीक्षाओं के लिए आईएस 19000:2022 मानक लागू करने की भी चर्चा है।
उपभोक्ताओं के ऑनलाइन व्यवहार को तय करने में समीक्षाओं की अहम भूमिका होती है। दूसरे लोगों की सिफारिशों को पढ़ना किसी दुकान में जाकर उत्पादों के परीक्षण और आजमाने के डिजिटल समकक्ष जैसा ही लगता है। इस संदर्भ में, ऑनलाइन समीक्षाएं उन उत्पादों की गुणवत्ता को जानने के एक विकल्प की तरह काम करती हैं, जिन्हें हम भौतिक रूप से जाकर नहीं जांच पाते।
खरीदारों और विक्रेताओं के बीच सूचना की असमानता को दूर कर और ऐसी जानकारियां प्रदान कर जिनका शायद अन्यथा खुलासा नहीं हो सकता, ऑनलाइन समीक्षाएं एक मूल्यवान आर्थिक कार्य करती हैं।
एक वैश्विक अध्ययन से पता चलता है कि ऑनलाइन समीक्षाएं पेश करने वाली वेबसाइटों के लिए कन्वर्जन रेट यानी विजिट करने वाले उपभोक्ता के ग्राहक बनने की दर स्पष्ट रूप से बढ़ सकती है।
ग्राहक अधिग्रहण सुरक्षा वेंडर सीएचईक्यू की एक रिपोर्ट से पता चलता है कि ऑनलाइन समीक्षाओं ने साल 2021 में करीब 3.8 लाख करोड़ डॉलर के वैश्विक ई-कॉमर्स खर्च को प्रभावित किया है।
इसके अलावा, इंटरनेट और सोशल मीडिया पर विचारों के खूब आदान-प्रदान को देखते हुए कारोबारी और ऑनलाइन खुदरा विक्रेता अपने उत्पादों के बारे में उपभोक्ताओं की राय की निगरानी करने में सक्षम हैं।
दूसरी तरफ, फर्जी और प्रायोजित समीक्षाएं उपभोक्ताओं को गलत खरीदारी का निर्णय लेने के लिए प्रेरित करती हैं, जिससे बाजार के परिणाम विकृत हो जाते हैं। इससे ऐसे डिजिटल प्लेटफॉर्मों की विश्वसनीयता और भरोसे पर भी असर पड़ता है।
अक्सर फर्जी समीक्षाएं लिखने के लिए संदिग्ध यूजर्स और बॉट्स की सेवाएं ली जाती हैं ताकि किसी एक कंपनी या विक्रेता को फायदा हो। इंटरनेट पर सर्च रैंक एल्गोरिदम अक्सर ऑनलाइन समीक्षाओं पर निर्भर होते हैं, जिसकी वजह से किसी उत्पाद की दृश्यता और बिक्री पर असर पड़ता है।
यह विक्रेताओं के लिए अपने उत्पादों की रैंकिंग में हेरफेर के लिए एक मजबूत प्रोत्साहन है। हालांकि मध्यम अवधि में इस तरह की समीक्षाएं अक्सर बिक्री और राजस्व के आंकड़े को नुकसान पहुंचाती हैं क्योंकि आमतौर पर इनसे घटिया गुणवत्ता के उत्पादों को बढ़ावा मिलता है।
उदाहरण के लिए ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर फर्जी ऑनलाइन समीक्षाओं के बारे में राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन पर दर्ज शिकायतों में साल 2018 से 2023 के बीच 366 फीसदी की आश्चर्यजनक बढ़त हुई है। फर्जी समीक्षाओं की पहचान करने व उन्हें हटाने और उपभोक्ताओं का भरोसा बनाए रखने की इस निरंतर लड़ाई में आर्टिफिशल इंटेलिजेंस की मदद लेना अनिवार्य हो गया है।
सामग्री विश्लेषण के तरीके का इस्तेमाल कर एआई फर्जी समीक्षाओं की पहचान करने में मदद कर सकती है। भुगतान वाली समीक्षाओं को प्रकाशित करने और प्रचार सामग्री के बारे में पूरी तरह से खुलासे की जरूरत के बारे में भी नियम-कायदे बनाने चाहिए। सरकार के प्रस्तावित नियम-कायदों की सफलता अंतत: इसके प्रभावी तरीके से क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी।
Date: 22-05-24
वैश्विक मानकीकरण में भारत की भूमिकाअजय कुमार, ( लेखक भारत के पूर्व रक्षा सचिव और आईआईटी कानपुर के विशिष्ट अतिथि प्राध्यापक हैं )
तेज तकनीकी प्रगति द्वारा आर्थिक वृद्धि को गति प्रदान करने के इस दौर में मानक निर्माण के परिदृश्य तथा संचालन में आमूलचूल बदलाव आया है। हर नए तकनीकी नवाचार को वैश्विक रूप से अपनाने के लिए मानकीकरण की आवश्यकता होती है।
बहरहाल अपनाने की गति, खासकर नवाचारी डिजिटल तकनीक के मामलों में अक्सर पारंपरिक मानक विकास प्रक्रिया पीछे रह जाती है। इससे कुछ मानक स्वत: निर्मित होने लगते हैं। उदाहरण के लिए विंडोज ऑपरेटिंग सिस्टम अथवा इंटेल सीपीयू प्रणाली।
तेज तकनीकी विकास ने वैश्विक मानकीकरण संस्थाओं के परिदृश्य को नया आकार दिया है। पारंपरिक संस्थाएं मसलन इंटरनैशनल ऑर्गनाइजेशन फॉर स्टैंडर्डाइजेशन (ISO), इंटरनैशनल इलेक्ट्रोटेक्निकल कमीशन (आईईसी) और इंटरनैशनल टेलीकम्युनिकेशन यूनियन (आईटीयू) देशों की सरकारों से बहुत अधिक प्रभावित थीं और उनकी जगह उद्योग जगत द्वारा संचालित संगठनों ने ले लिया जो विशिष्ट क्षेत्रों द्वारा संचालित थे।
उदाहरण के लिए इंटरनेट से संबंधित मानक अब प्रमुख तौर पर उद्योग जगत के नेतृत्व वाली इंटरनेट इंजीनियरिंग टास्क फोर्स (आईईटीएफ), वर्ल्ड वाइड वेब कंर्सोसे (डब्लयू3सी) तथा गैर लाभकारी आईकैन तथा अन्य संस्थाओं द्वारा तय किए जाते हैं।
इसी तरह थर्ड जनरेशन पार्टनरशिप प्रोजेक्ट (3जीपीपी) दूरसंचार मानकों में प्रमुख स्थिति में है। विशेष संस्थाओं की ओर यह बदलाव तेजी से बदलते उद्योगों की खास मांगों को लेकर प्रतिक्रिया देने में सक्षम है। तकनीकी विकास में अग्रणी कंपनियां इन मानक तैयार करने वाली संस्थाओं में दबदबा रखती हैं।
स्टैंडर्ड एसेंशियल पेटेंट्स (एसईपी) के मामले में पेटेंट नवाचारों के मानकीकरण से अच्छी खासी संपत्ति बनती है और अकेले 3जी तकनीक ने 23,000 एसईपी तैयार किए और राजस्व् में हजारों अरब डॉलर की राशि तैयार हुई।
विश्व व्यापार संगठन की उरुग्वे दौर की वार्ता के बाद जब आयात टैरिफ कम कर दिए गए तो मानकीकरण अंतरराष्ट्रीय व्यापार के लिए अहम हो गया।
कुछ सरकारें आयात को नियंत्रित करने के लिए मानकीकरण या तकनीकी नियमन करती हैं। इसके तहत स्थानीय स्तर पर परीक्षण और प्रमाणन किया जाता है। लागत बढ़ती है और बाजार पहुंच सीमित होती है।
विश्व व्यापार संगठन के तकनीकी व्यापार अवरोध (टीबीटी) का दूर करने के लिए समझौतों के बावजूद कमजोर प्रवर्तन इनके असर को सीमित करता है। परिणामस्वरूप मानक न केवल तकनीकी रूप से प्रासांगिक हैं बल्कि उनका भूराजनैतिक और सामरिक मूल्य भी है। इससे देश वैश्विक मानक निर्माण प्रक्रिया की होड़ में शामिल होते हैं।
मानक प्रबंधन में भारत का प्रदर्शन मिलाजुला रहा है।
भारतीय मानक ब्यूरो अधिनियम 1986 से आशा की गई थी कि वह देश में विश्वस्तरीय मानक व्यवस्था कायम करेगा तथा सभी क्षेत्रों में मानक तैयार करने के लिए केंद्रीय सांविधिक ढांचा तैयार करेगा।
बहरहाल मानक निर्माण और प्रवर्तन दोनों में कमियां नजर आईं। भारत एक ऐसी व्यवस्था कायम करने में नाकाम रहा जहां घरेलू नवाचारों से घरेलू मानक तैयार किए जा सकें, वैश्विक मानक तो छोड़ ही दें। इसने 20,000 से अधिक भारतीय मानक तैयार किए लेकिन प्राय: वैश्विक मानकों का अनुकरण थे।
वह तकनीकी नवाचारों के मानक नहीं तैयार कर सका। मसलन टाटा टी के लेमिनेट पॉली पैक्स, टैली या फिनैकल जैसे सॉफ्टवेयर या जल संरक्षण अथवा समुद्र की सतह के नीचे खेती जैसे पारंपरिक व्यवहार। ये बताते हैं कि हम मानकीकरण के जरिए भारतीय नवाचारों को प्रोत्साहित करने का अवसर गंवा चुके हैं। भारतीय मानक ब्यूरो भारतीय मानकों को उद्योग जगत और सरकार द्वारा अपनाए जाने को लेकर भी संघर्ष करता रहा।
तमाम उपलब्धता के बावजूद कई सरकारी निविदाएं अभी भी वैश्विक मानकों से संदर्भित होते। भारतीय मानक ब्यूरो अधिनियम के मुताबिक भारतीय मानक तैयार करने के लिए लाइसेंस लेना होता है, उन पर नियामकीय नियंत्रण होता है और इंसपेक्टर राज से जुड़े मामले भी हैं।
इसके चलते उद्योग जगत ने विरोध किया। 2013 तक कुछ ही भारतीय मानक तैयार हुए जबकि वैश्विक मानक भारत में भी लोकप्रिय बने रहे। इससे भारतीय विनिर्माताओं को नुकसान हुआ जबकि विदेशी कंपनियों के लिए भारतीय बाजारों में पहुंच आसान बनी रही।
सन 2013 में भारत में खराब गुणवत्ता वाली और असुरक्षित चीनी इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं की बाढ़ आ गई। ऐसे में इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने ने एक अनिवार्य पंजीयन ऑर्डर जारी किया जिसके तहत लैपटॉप, डेस्कटॉप, मोबाइल फोन, माइक्रोवेव ओवन और अन्य इलेक्ट्रॉनिक वस्तुओं के सुरक्षा मानक तय होने थे। तब पहली बार भारतीय मानक अधिनियम के तहत तकनीकी नियमन को पहली बार व्यापक तौर पर अपनाया गया।
उसने एक स्वनियमन योजना पेश की जो लाइसेंस आधारित प्रणाली की स्थानापन्न थी। विनिर्माताओं को मान्यताप्राप्त प्रयोगशालाओं से जांच और प्रमाणन कराना होता उसके बाद ही उन्हें भारत में बिक्री की इजाजत मिलती। उल्लेखनीय बात यह है कि कुछ महीनों के भीतर ही इसे 90 फीसदी लोगों ने अपना लिया। इसकी शुरुआत कई के लिए अविश्वसनीय थी क्योंकि तत्कालीन बीआईएस अधिनियम केवल लाइसेंस आधारित तकनीकी नियमन करता था।
इसके बावजूद मंत्रालय ने एक स्वपंजीयन योजना उसी अधिनियम के तहत आरंभ की। इस योजना ने परीक्षण अधोसंरचना में निवेश को बढ़ावा दिया और विश्वस्तरीय परीक्षण आकर्षित किया ताकि उद्योग जगत की मांग पूरी हो सके।
योजना देश के मानक संचालन में निर्णायक बदलाव लाने वाली साबित हुई। इसकी कामयाबी के बाद बीआईएस ने 2016 में अधिनियम में बदलाव किया ताकि स्वनियमन और स्वप्रमाणन को प्रमुखता दी जा सके। तमाम उद्योगों में भारतीय मानकों को अपनाने को गति दी गई। यही वजह है कि अनिवार्य मानक वाले उत्पादों की संख्या 2023 तक 500 से अधिक हो गई और निकट भविष्य में यह 1500 से 2000 तक पहुंच सकती है।
बीआईएस को आगे चलकर मानक अपनाने की प्रक्रिया को सहज बनाना चाहिए। कड़ी निगरानी की व्यवस्था होनी चाहिए और पालन न करने वालों पर कड़ा जुर्माना लगाया जाना चाहिए। यह पारंपरिक रुख से अलग है जहां कठोर, जटिल और अधिक लागत के साथ शिथिल निगरानी होती थी। बीआईएस को मानकीकरण में सुधार लाने की जरूरत है।
देश का नवाचार परिदृश्य बीते दशक में नाटकीय ढंग से बदला है और करीब दो लाख से अधिक पंजीकृत स्टार्टअप सामने आई हैं। 2013-14 से 2022-23 के बीच पेटेंट आवेदन चार गुना बढ़े हैं। देश को स्वदेशी मानक विकसित करने की संस्कृति अपनानी चाहिए।
देश के मानकों को विश्वस्तरीय बनाने के लिए देश की 1.4 अरब की आबादी और कई लाख करोड़ रुपये के बाजार का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। इसके लिए पहले हमें उद्योग जगत के नेतृत्व वाली और समुचित प्रतिकिया देने वाली मानक निर्माण संस्थाओं की जरूरत होगी। इसके लिए बीआईएस अधिनियम में संशोधन करने होंगे और उसे इनकी निगरानी करने वाला बनाना होगा।
सरकार को वैश्विक मानक निर्माण संस्थाओं में भारत की भागीदारी को बढ़ावा देना होगा। तीसरा, विदेश मंत्रालय भी भारतीय विशेषज्ञों को वैश्विक मानक निर्माण संस्थाओं में जगह दिलाने में मदद कर सकता है। खासतौर पर सॉफ्टवेयर और फिनटेक के क्षेत्र में ऐसा किया जा सकता है जहां भारतीय कंपनियों और स्टार्टअप का प्रदर्शन बेहतर है।
2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ‘जीरो डिफेक्ट जीरो इफेक्ट’ का नारा दिया था। क्या भारत अपनी मेक इन इंडिया पहल को इस नए मानक से नहीं जोड़ सकता ताकि इसे वैश्विक मानक बनाया जाए? जरूरत है मानसिकता में बदलाव की।
Date: 22-05-24
साइबर संसार में संवेदनशील समाजपवन दुग्गल
साइबर दुनिया में किसी को हद से अधिक कलंकित करके खुदकुशी के लिए मजबूर कर देना ट्रोलिंग का एक भयावह रूप है। दुर्भाग्य से तमिलनाडु की घटना इसी श्रेणी की है, जो हर संवेदनशील इंसान को झकझोर रही है। कोई मां जान-बूझकर अपने बच्चे का बुरा नहीं करती, लेकिन लोगों के ताने ने उस मां को इतना तोड़ दिया कि उसने खुद अपनी जान ले ली। इस ट्रोलिंग की शुरुआत अप्रैल के आखिरी हफ्ते में आए उस वीडियो से हुई, जिसमें पहली मंजिल पर लटके एक छोटे बच्चे को बचाने की सफल कोशिश होती दिख रही थी। बताया गया था कि चौथी मंजिल पर खड़ी मां के हाथों से वह बच्चा छिटककर नीचे गिर गया था। इस वीडियो के सामने आने के बाद से ही मां को सोशल मीडिया में लापरवाह बताया जाने लगा। अब खबर यह है कि लांछनों से तंग आकर उसने आत्महत्या कर ली।
अब तक हम यही सोचते थे कि ट्रोलिंग पश्चिमी देशों में ही होती है और अगर अपने यहां होती भी है, तो नामचीन शख्सियतों की। मगर अब तो यह आम जनजीवन का हिस्सा बनती जा रही है। इसका कारण यही है कि भारत में द ग्रेट इंडियन वोमिटिंग रिवॉल्यूशन (भारतीयों का वमन-क्रांति) चल रही है। अब लोग अपने विचार, डाटा, सोच और नजरिये की बिना यह सोचे इंटरनेट पर उल्टियां कर रहे हैं कि इसके कानूनी स्वरूप क्या होंगे? ट्रोलिंग भी एक तरह की उल्टी ही है, जिसमें सामने वाले व्यक्ति को बिना सोचे-समझे अपशब्द कहे जाते हैं। ऐसा करते हुए यह भी नहीं सोचा जाता कि व्यक्ति-विशेष के जीवन पर इसका क्या प्रभाव पड़ेगा?
अब ट्रोलिंग इसलिए भी बढ़ गई है, क्योंकि लोगों को पता है कि वे अनीतिपूर्ण हमले करने के बावजूद कानूनी गिरफ्त से बच सकते हैं। ट्रोलिंग रोकने के लिए अब तक अपने यहां कोई तयशुदा कानून नहीं बन सका है। देश में सन् 2000 का सूचना प्रौद्योगिकी कानून (आईटी ऐक्ट) जरूर है, लेकिन वह न तो ट्रोलिंग शब्द को परिभाषित करता है और न इस संदर्भ में कोई कानूनी समाधान देता है। दुखद यह है कि भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) में भी इसका कोई जिक्र नहीं है। हां, स्टॉकिंग यानी लड़कियां अथवा महिलाओं का गलत इरादे से पीछा करने जैसे अपराधों का जिक्र आईपीसी में जरूर है और कुछ परिस्थितियों में स्टॉकिंग को ट्रोलिंग भी कह सकते हैं, लेकिन ट्रोलिंग की ज्यादातर घटनाएं स्टॉकिंग नहीं कही जा सकतीं। ट्रोलिंग में ट्रोलर्स दरअसल लक्षित व्यक्ति को गाली देते हैं, उसे नीचा दिखाते हैं, उस पर लांछन लगाते हैं और अपने दैनिक जीवन में रम जाते हैं, जबकि स्टॉकिंग का चरित्र इससे अलग होता है।
सूचना प्रौद्योगिकी कानून की सहायता से यदि ट्रोलिंग रोकने की कोशिश करें, तो धारा 67 कुछ हद तक हमारी मदद कर सकती है, क्योंकि जब किसी व्यक्ति को ट्रोल किया जाता है, तो इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से कुछ ऐसे शब्द या कंटेंट प्रसारित किए जाते हैं, जिनको पढ़ने, सुनने या देखने के बाद लक्षित व्यक्ति पर नकारात्मक असर पड़ता है। मगर यह धारा मूलत: इलेक्ट्रॉनिक रूप से अश्लील सामग्रियों के प्रकाशन और प्रासरण से जुड़ी है, इसलिए ज्यादातर मामलों में पुलिस ट्रोलिंग में इसके इस्तेमाल से बचती है।
ट्रोलिंग से यदि मानहानि होती है, तो आईपीसी की धारा 499 और 500 का इस्तेमाल किया जा सकता है, लेकिन ये धाराएं भी इसलिए कारगर नहीं हो पातीं, क्योंकि ट्रोलिंग एक तरह से टिप्पणी है और मानहानि न होने पर ये धाराएं निष्प्रभावी हो जाती हैं। हालांकि, फर्जी अकाउंट से यदि ट्रोलिंग की जा रही है, तो जालसाजी और पहचान छिपाने के खिलाफ आईटी ऐक्ट की धारा 66-सी के तहत कार्रवाई हो सकती है और अगर ट्रोलिंग से गुमराह करने की कोशिश की गई है, तो धारा 66-डी लगाई जा सकती है।
इसी तरह, ट्रोलिंग में यदि झूठ लिखा जा रहा हो और लोगों को भ्रमित करने की मंशा दिखती हो, तो आईपीसी की धारा-468 और 469 के तहत कार्रवाई की जा सकती है, जिनमें सजा और जुर्माना, दोनों के प्रावधान हैं। और, अगर ट्रोलिंग के साथ स्टॉकिंग हो, तो कुछ हद तक आईपीसी-354 के तहत कार्रवाई हो सकती है। मगर ये भी ट्रोलिंग से निपटने के परोक्ष तरीके हैं, कोई प्रत्यक्ष उपाय नहीं। हालांकि, इसका यह अर्थ भी नहीं कि बतौर नागरिक हमारेे पास कोई रास्ता नहीं है। आत्महत्या करने के बजाय हमें ट्रोलिंग की शिकायत साइबर क्राइम की वेबसाइट पर करनी चाहिए। इसके लिए 1930 हेल्पलाइन नंबर से भी मदद ली जा सकती है।
जब तक कोई समर्पित कानून न बने, तब तक ट्रोलर्स से सीधे मुकाबला करने से भी हमें बचना चाहिए। अगर आप इसके भुक्तभोगी बनते हैं, तो पहले अपने परिजनों को विश्वास में लें। इसकी शिकायत सोशल मंच प्रदान करने वाली कंपनी से भी की जा सकती है। आईटी रूल्स 2021 के तहत सेवा देने वाली कंपनी से ट्रोलर्स के सोशल अकाउंट की शिकायत की जा सकती है, जिसमें अधिकतम 15 दिनों में कार्रवाई सुनिश्चित की गई है। अगर अश्लील शब्दों के साथ ट्रोल किया गया है, तो 24 घंटे के अंदर शिकायत के निवारण का प्रावधान आईटी कानून में है।
कुछ लोग तर्क देते हैं कि अपने देश में कानून बनाने का रास्ता काफी लंबा है, लेकिन ट्रोलिंग के मामले में हमें एक सुविधा हासिल है। दरअसल, सूचना प्रौद्योगिकी कानून की धारा-87 केंद्र सरकार को इस कानून के उद्देश्यों की पूर्ति के लिए तमाम प्रावधान अपनाने का अधिकार देती है। इसका उपयोग किया जा सकता है। फिर, हमें दूसरे देश का मुंह नहीं ताकना चाहिए, क्योंकि भारत की जमीनी हकीकत अन्य राष्ट्रों से अलग है। चेन्नई मामले में ही मां को कोसा गया, जबकि पश्चिमी देशों में मां और बच्चे का संबंध अपने यहां से अलग होता है। चूंकि हमारी संस्कृति, हमारे मूल्य व परिवेश विदेश से अलग हैं, इसलिए ट्रोलिंग को लेकर हमारा कानून भी अलग होना चाहिए।
ज्यादातर मामलों में ट्रोलर्स वीपीएन, यानी वर्चुअल प्राइवेट नेटवर्क का इस्तेमाल करते हैं, जिससे वे अपनी पहचान छिपा लेते हैं, इसलिए इनको पकड़ने के लिए हमें खास उपाय अपनाने होंगे। यहां पुलिस अधिकारियों को भी संवेदनशीलता दिखानी होगी। उनको भुक्तभोगियों का दर्द महसूस करना होगा। हालांकि, आम लोगों को भी साइबर सुरक्षा को अपनी जीवनशैली का हिस्सा बनाना चाहिए। तभी वे साइबर अपराध का शिकार बनने से बच सकेंगे।
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अन्य देशों की हरित विकास नीतियों से सीख –
हमारे यहाँ भी 16,000 करोड़ रुपये के सॉवरेन ग्रीन बॉन्ड जारी किए गए हैं। विदेशी संस्थागत निवेशकों को भविष्य की ग्रीन प्रतिभूतियों में भाग लेने की अनुमति दी गई है। अब भारत को स्तरित ग्रीन टैक्सोनॉमी को शुरू करने पर भी प्रशासनिक विचार-विमर्श करना चाहिए।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 29 अप्रैल, 2024
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Date: 21-05-24
Death of a PresidentChange at the helm comes at a time of domestic and regional uncertainties.Editorial
The death of Iran’s eighth President, Ebrahim Raisi, and Foreign Minister Hossein Amir-Abdollahian, in a helicopter crash in northwestern Iran amid bad weather has sent shockwaves across West Asia. Raisi and others, including local officials, were travelling to Tabriz after inaugurating a dam with Azerbaijan’s President Ilham Aliyev, on the countries’ shared border when his chopper went down in Iran’s East Azerbaijan province. Raisi, a conservative cleric, rose to power in 2021 after eight years of rule by moderate President Hassan Rouhani, who signed the 2015 nuclear deal with the U.S. and other world powers. Mr. Rouhani’s promise of change and prosperity through dialogue did not materialise as the then U.S. President, Donald Trump sabotaged the deal in 2018 and reimposed sanctions on Iran. When moderates lost their face and morale, the conservatives tightened their grip on the state through Raisi. A confidant of Supreme Leader Ayatollah Ali Khamenei, Raisi escalated a crackdown on civil rights at home, strengthened Iran’s ties with Russia and China, doubled down on its support for non-state militias such as Hamas and Hezbollah and expanded Iran’s nuclear programme. In three years, he emerged as one of Iran’s most powerful men and was seen as a potential successor to Mr. Khamenei.
The death of the President could not have come at a worse time for Iran. It is already struggling to stabilise a stricken economy, battered by U.S.-imposed sanctions, and trying to calm social tensions. The nuclear deal remains dead and West Asia is on fire. In April, Raisi oversaw an unprecedented attack on Israel following Israel’s strike on the Iranian consulate in Damascus. Israel’s meek response avoided an all-out war but tensions remained high. In recent years, Iran has also lost key officials. In the deaths of Raisi and Amir-Abdollahian, the Islamic Republic has lost an experienced, crisis-hardened cleric administrator and a seasoned diplomat. It is understandable that Iran would need time to get over the shock that it is in now. Given the geopolitical tensions, Raisi’s death could also fuel conspiracy theories, which could further inflame the region. So, it is imperative for Iran to get to the bottom of the crash. Another priority is that the transition to a new presidency is handled smoothly. First Vice-President Mohammed Mokhber will assume interim presidential powers and the country is expected to hold a presidential election within 50 days. A change in presidency is unlikely to alter Iran’s foreign policy direction, but the loss of one of the most experienced and ideologically disciplined defenders of the revolution and a transition amid domestic and regional uncertainties, is an added challenge to the Islamic Republic.
Date: 21-05-24
Critical times call for strong judicial adjudicationThe process of judicial review should be strong, immediate, and unambiguous in the case of statutes that are obviously unconstitutional or divisive.Kaleeswaram Raj is a lawyer at the Supreme Court of India
The Supreme Court of India will, sooner or later, consider the question whether the Citizenship (Amendment) Act (CAA) and the rules under it can pass constitutional scrutiny. That the recently promulgated CAA Rules are unclear about the fate of the applicants whose request for citizenship is turned down has aggravated concerns over the issue. There is also a fear that persons whose applications are disallowed might end up in detention centres. Some of the petitioners before the Court have also raised concerns over dual citizenship to foreign applicants who need not have to abandon their original citizenship. This would create uncertainty in the matter of citizenship, as it goes against the spirit of the parent Act, it is pointed out.
Interdicting a statute or set of statutory rules is not a routine exercise undertaken by the constitutional courts. Generally, a law made by Parliament is presumed to be valid unless it is shown to have ostensibly breached constitutional provisions. The law presumes that, normally, malice cannot be attributed to a process of legislation (Manish Kumar vs Union Of India, 2021). In Gurudevdatta Vksss Maryadit and Ors. vs State Of Maharashtra and Ors (2001), the Supreme Court said that “legislative malice is beyond the pale of jurisdiction of the law courts….”
The lack of interdiction
This conventional wisdom, however, is incapable of addressing the contemporary challenges posed by populist regimes across the world, which often invoke motivated or targeted legislation. Such dispensations also manipulate the electoral system or process by legislative means. This recent legislative trend calls for an advanced and assertive juridical approach. Refusing to interdict the operation of such enactments, by adhering to an obsolete presumption regarding validity of the law would severely diminish the counter-majoritarian role which constitutional courts are supposed to play in critical times.
Every piece of legislation is a political statement. A regime that does not believe in the idea of constitutional democracy would naturally enact laws with scant regard to the scheme of the Constitution. On such occasions, a sense of judicial euphoria about the ‘validity’ of the laws has precluded the Supreme Court from interdicting the operation of laws. The absence of an order of stay against demonetisation has allowed the tragedy to happen and by the time the case was decided in Vivek Narayan Sharma vs Union of India (2023), the situation was totally irreversible. The lack of interdiction of the dilution of Kashmir’s special status has also made the litigation almost a fait accompli, as one finds in the judgment In Re Article 370 of the Constitution of India (2023).
Anoop Baranwal vs Union of India (2023) was a radical judgment by the Constitution Bench of the top court that called for an independent body to select the Election Commission of India (ECI), with no predominance for the executive of the day. But, recently, the Centre promulgated the Chief Election Commissioner and other Election Commissioners (Appointment, Conditions of Service and Term of Office) Act, 2023. This Act revived the earlier position of the “Prime Minister’s Committee” choosing the ECI. It comprises the Prime Minister, a Minister chosen by him and the Opposition Leader in the Lok Sabha, whose presence is inconsequential for all practical purposes. Appointments were made based on the new law.
The law was challenged in Jaya Thakur vs Union of India (2024). The Court, however, refused to prevent the operation and implementation of the statute based on “presumption” of its validity. This is not a targeted legislation, but an enactment, which, on the face of it, is unconstitutional. The statute threatens the very foundation of our democracy, of which free and fair elections are a basic feature. This is an illustrative case where the Court failed to protect its own judgment, essentially on account of the judicial superstition regarding the presumption of validity of the enactment. It is no wonder that in the general election 2024, the commissions and omissions by the ECI on several occasions remain questionable.
A case of targeted legislation
The CAA and the rules under it, on the other hand, clearly fall within the category of targeted legislation. Legislative malice is writ large in the law. The law classifies people in the name of religion and excludes Muslims from the process for grant of citizenship.
Another prominent example of targeted legislation is the Muslim Women (Protection of Rights on Marriage) Act (2019), which criminalised instant triple talaq. Significantly, the act of instant triple talaq had been invalidated by the Supreme Court in Shayara Bano (2017) and, therefore, there was no legal requirement to ‘criminalise’ an act which was non est in the eye of law. The statute only motivated the ‘clever’ husbands to resort to other means of divorce or to simply desert their wives, to get rid of the penal consequences. Thus, the law, which was aimed against the Muslim community, evidently did not come to the rescue of Muslim women. Often, it did the opposite. The enactment was however ‘successful’ in its divisive agenda. Anti-conversion laws in certain States in the country also followed suit.
An example in the U.S.
In the United States too, the conventional view did not favour judicial nullification of statutes on the ground of malice. John Hart Ely stated that the Constitution cannot be used as “an instrument for punishing the evil thoughts of members of the political branches”. But evil thoughts of the majority in the legislative bodies are a harsh contemporary reality. Therefore, motivated legislations should call for a more rigorous judicial scrutiny. Scholar Susannah W. Pollvogt correctly writes that “animus can never constitute a legitimate state interest for purposes of equal protection analysis”. By referring to the judgment in United States Dept. of Agriculture vs Moreno, 413 U.S. 528 (1973), she said that the enactment to exclude “hippies” from collective residential rights implies a “desire to harm” a particular group and therefore reflects discrimination (Unconstitutional Animus, Fordham Law Review, 2012).
There are Indian precedents where the Supreme Court has effectively interdicted operation of parliamentary legislations. In Ashoka Kumar Thakur vs Union of India (2007), regarding the prescription of 27% quota for Other Backward Community (OBC) candidates to professional colleges, the Court initially issued a judicial injunction. The Court’s order of stay in the case of the three contentious farm laws in Rakesh Vaishnav vs Union of India (2021) is another example. The Court in that case effectively prevented the implementation of the farm laws which the Centre had to withdraw ultimately following farmers’ protest.
As regarding the statutes which are glaringly unconstitutional or divisive, the process of judicial review should be strong, immediate, and unambiguous. The top court should be able to learn from its track record and understand the political consequences of its insensitivity during critical times. Delay often defeats the purpose of constitutional adjudication. Time is the essence of judicial review when it comes to malicious and unconstitutional laws.
Date: 21-05-24
चुनाव की शुद्धता पर सवाल खड़े करने वाली घटनाएंसंपादकीय
लोकसभा में सर्वाधिक सीटों के दम पर देश का शासन तय करने वाले उत्तर प्रदेश के एक जिले में स्थानीय ग्राम प्रधान के 17 वर्षीय बेटे पर एक खास दल को आठ बार वोट देने का आरोप है। निर्वाचन अधिकारियों ने घटना का संज्ञान लेते हुए केस दर्ज करवाया है और पोलिंग बूथ कर्मियों पर कार्रवाई शुरू की है, जो कि हर घटना के बाद की पारंपरिक ड्रिल है। किशोर को गिरफ्तार कर उसके खिलाफ भी कई दफाओं में केस दर्ज किया गया। इस घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ है। वीडियो में किशोर हर बार ईवीएम का बटन दबाता हुआ इसकी संख्या बता रहा है कि ‘कितनी बार वोट डाला’। यही नहीं, हिमाकत देखिए कि यह सब कोई कैमरे में रिकॉर्ड करता है। यह घटना मतदाताओं के मन में पूरे चुनाव की शुद्धता पर सवाल खड़े करती है । क्या यह सब चुनाव स्टाफ की मिलीभगत के बगैर संभव हो सकता है? आधार कार्ड या अन्य किसी पहचान पत्र से उसकी उम्र क्यों नहीं देखी गई? क्या उसके पास अनेक फर्जी पहचान-कार्ड थे ? अंगुली पर स्याही क्यों नहीं लगाई गई या स्याही का निशान नजरअंदाज किया गया ? अभी दो हफ्ते पहले मध्यप्रदेश में एक बूथ में एक पांच साल के बच्चे का वीडियो वायरल हुआ था। इसमें बच्चा ईवीएम का बटन दबा रहा है। चुनाव कर्मियों ने बच्चे को बूथ में जाने की अनुमति कैसे दी ? मोबाइल से उसका वीडियो कैसे बना? चुनाव आयोग जहां एक ओर मतदान प्रतिशत बढ़ाने को प्रजातंत्र की सफलता का पैमाना मानते हुए ज्यादा से ज्यादा लोगों से इस पर्व में शरीक होने की अपील करता है, वहीं क्या चुनाव कर्मियों के इस रवैये पर सामान्य धाराओं में कागजी खानापूर्ति करना काफी है? फिर क्या इस चुनाव में नेताओं द्वारा मॉडल कोड को ठेंगा दिखाते हुए भड़काऊ भाषण देने से मतदान के निर्णय की गुणवत्ता दूषित होने के खतरे पर भी आयोग ने कोई कार्रवाई की है ?
Date: 21-05-24
जंगलों की आग को लेकर हमारी समझ में कमी है!डॉ. अनिल जोशी, ( पद्मश्री से सम्मानित पर्यावरणविद् )
उत्तराखंड के जंगलों में आग का सिलसिला अभी जारी है। करीब 2,000 हेक्टेयर से ज्यादा वनों पर इसका असर पड़ा है। इस साल वनों में आग की करीब 1000 घटनाएं हुईं और कई जगह ये रिहायशी इलाकों तक भी पहुंच गई है। पर जंगलों की आग इस राज्य के लिए कोई नया मुद्दा नहीं है। बीते दो दशकों में हमने ऐसी कई घटनाएं देखी हैं। इस बार की आग तो अप्रत्याशित भी नहीं थी, क्योंकि इस साल उत्तराखंड में शीतकालीन वर्षा भी कम हुई। जब-जब ऐसी स्थिति बनती है, वनों की नमी में कमी आती है। इस बार तो भीषण गर्मी से पतझड़ भी ज्यादा हुआ, इससे बची-खुची नमी भी उड़ गई। पर सवाल है, क्या ऐसी घटनाएं रोकी जा सकती हैं?
असल में वनों की आग के मुद्दे को समझने में हम अभी भी पीछे हैं। पहले जब वनों में आग लगती थी तो गांव के गांव इसको बुझाने में जुट जाते थे। एक गांव का काम अगर आग बुझाने का होता था, तो दूसरे गांव का दायित्व उसके लिए पानी और खाना लाने का था। एक तरह से यह एक ऐसी व्यवस्था थी, जिसमें सभी ग्रामसभाएं व वन पंचायतें जोर-शोर से जुट जाती थीं। क्योंकि वे वनों को अपनी संपदा मानते थे और अपना दायित्व भी समझते थे। पर जब से 1988 में नई वन नीति आई, जन-जंगल के बीच एक दूरी बन गई।
वैसे सरकार के प्रयत्नों को नकारा नहीं जा सकता। पर उसके मुट्ठी भर कर्मचारी नाकाफी हैं। 100-100 हेक्टेयर में अगर एक फॉरेस्ट गार्ड होगा तो आग कैसे बुझ पाएगी? इसलिए इस काम में सामूहिकता ज्यादा जरूरी है। आज सबसे बड़ी पहल यह होनी चाहिए कि गांवों और वन पंचायतों को नए सिरे से जोड़ा जाए, जिसमें उनके अधिकार और रुचियां भी सुरक्षित हों ताकि वे वनों को अपना हिस्सा मानें।
जब भी जंगलों में आग लगती है, वहां के वन्यजीवों को नुकसान के साथ जलस्रोतों पर प्रतिकूल असर पड़ता है। हिमालय के ऊंचाई वाले इलाकों में एरोसोल की समस्या बढ़ रही है। यही आग ब्लैक कार्बन के रूप में समस्या को और गंभीर बना रही है। इस तरह के संकट से निपटने के लिए हमें वन क्षेत्रों को जल संग्रहण क्षेत्र में तब्दील करना होगा। इससे कई बातों का समाधान निकल सकता है। दरअसल जंगलों में आग पहले सतह पर लगती है, फिर कैनोपी फायर की तरफ बढ़ जाती है। ऐसे में अगर हम वनों के अंदर ही जल छिद्र बनाकर छोटे-छोटे ताल-तलाब बना लें और जब भी वर्षा हो, इनमें पानी संग्रहीत करके वनों की नमी को बरकरार रखा जा सकता है। इससे सतह की आग जैसी घटनाएं ज्यादा नहीं फैलेंगी। ऐसे प्रयोग हो चुके हैं। ‘हेस्को’ ने खुद वन विभाग की सहायता से अपनी नदी को संचित करने के लिए यहां जल छिद्र का निर्माण किया और एक नदी को पुनर्जीवित किया। अब यह एसा इलाका बन चुका है, जहां वनों की आग जीत नहीं पाती है।
आज वन पंचायतों को जोड़ना भी जरूरी है। वनों की आग फैलने के पीछे सबसे बड़ा कारण पत्तियों का गिरना है, जो कि गर्मियों में आग का कारण बनती हैं। इनके आर्थिक लाभ विभिन्न रूप से लिए जा सकते हैं। पारंपरिक रूप से ग्रामीण इन पत्तियों को हटाकर अपने जानवरों के लिए उपयोग में लाते रहे हैं और जलाने के लिए ईंधन के तौर पर प्रयोग करते रहे हैं, खासतौर से चीड़ की पत्तियां, जो कि इस दावानल का कारण बनती हैं। इस पेड़ की पत्तियां और कोन जलावन के रूप में प्रयोग में लाए जाते रहे हैं। इस तरह के प्रयोग आर्थिक दृष्टिकोण से स्थानीय उपयोगिता बढ़ाएंगे। वहीं जंगल की आग को निपटाने में भी सहायक होंगे। हालांकि इससे होने वाले प्रदूषण पर भी गौर करना होगा।
अभी मई का महीना लगभग बीतने को है। भीषण गर्मी का दौर अभी खत्म नहीं हुआ है। ऐसे में जंगलों की आग हमारा पीछा नहीं छोड़ने वाली। जरूरत है कि हम नए सिरे से सोचकर प्रकृति के अनुरूप रास्ते तलाशें।
Date: 21-05-24
बढ़ता हुआ स्क्रीन-टाइम अब नजरों को कमजोर कर रहा हैडॉ. चन्द्रकान्त लहारिया, ( जाने माने चिकित्सक )
अर्जुन एक प्लंबर हैं और दक्षिणी दिल्ली के कई घरों में टूटी हुई पाइप लाइनों और स्वच्छता प्रणाली में आई खराबियों को दुरुस्त करते हैं। पिछले कुछ हफ्तों से वे सिरदर्द से परेशान थे। डॉक्टरों के परामर्श और दवाओं के बाद भी राहत नहीं मिली। सभी जांचें भी सामान्य थीं। फिर एक सप्ताह पहले समस्या की सही पहचान हुई। उनकी नजर कमजोर हो गई थी। उन्हें चश्मा दिया गया और अब वे पूरी तरह से ठीक हैं।
भारत में आंखों की रोशनी कम होना एक प्रमुख सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या है। अनुमानित रूप से 28 करोड़ भारतीय (यानी हर पांच में से एक) ऐसे हैं, जिन्हें आंखों की रोशनी से संबंधित कोई न कोई समस्या है। हालांकि मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मानसिक स्वास्थ्य जैसी अन्य समस्याओं के उलट खराब दृष्टि को नजरअंदाज कर दिया जाता है और इसका पता भी बहुत देर से चलता है। आंखों की रोशनी कम होना केवल वयस्कों की ही समस्या नहीं है। बच्चे भी अक्सर इससे प्रभावित होते हैं। हाल के अध्ययनों से पता चला है कि कुछ दशक पहले तक बच्चों में कमजोर नजर आमतौर पर 10 से 12 साल की उम्र में मिलती थी, अब इसकी शुरुआत 6 से 8 साल की उम्र में ही हो जाती है। भारत में लगभग 20% स्कूली बच्चे ऐसे हैं, जिन्हें चश्मे की जरूरत होती है।
भारत एक बहुत ही सफल राष्ट्रीय अंधत्व नियंत्रण कार्यक्रम चला रहा है। इससे अंधत्व तो कम हुआ है, लेकिन कमजोर नजर की समस्या से अभी भी निपटा नहीं जा सका है। बढ़ते स्क्रीन-टाइम, बच्चों के लिए अतिरिक्त ट्यूशन और कक्षाओं के कारण सभी आयु-समूहों में खराब दृष्टि का बोझ बढ़ रहा है। आमतौर पर सिरदर्द, आंखों में तनाव, सूखी आंख से इसकी शुरुआत होती है। इसका सामाजिक और आर्थिक दोनों तरह से प्रभाव पड़ता है, क्योंकि कमजोर नजर से कार्यबल की उत्पादकता कम होती है। जून 2022 में प्रकाशित एक अध्ययन में पता चला था कि कमजोर दृष्टि के कारण भारत में उत्पादकता के संभावित 64,600 करोड़ रु. का नुकसान हुआ।
सबसे बड़ी लागत रोजगार के नुकसान की है। फिर आंखों की देखभाल में जाने वाला समय है। यदि कामकाजी आबादी की नजर कमजोर हो तो यह किसी भी देश की आर्थिक वृद्धि को रोक सकती है। हाल में बांग्लादेश में किए गए एक अध्ययन से भी यही पता चला है।
सबसे पहले तो आंखों के स्वास्थ्य और खराब नजर के बारे में सार्वजनिक स्वास्थ्य जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता है। चश्मों के प्रति जन-स्वीकार्यता बढ़ाना भी जरूरी है। चश्मा पहनना एक बहुत ही सामान्य बात है और इसमें देरी करने से आंखों की रोशनी प्रभावित हो सकती है और अनेक जटिलताएं उत्पन्न हो सकती हैं। दूसरे, देश को सिर्फ अंधेपन ही नहीं, सही दृष्टि पर भी ध्यान देने की जरूरत है। गरीबों और वंचितों के लिए चश्मों का नि:शुल्क वितरण भी सरकार की ही अपनी जिम्मेदारी होनी चाहिए।
वहीं बच्चों में कमजोर दृष्टि की बढ़ती चुनौती से निपटने के लिए स्कूली स्वास्थ्य कार्यक्रमों को मजबूत करने की जरूरत है, जिसमें आंखों की जांच और चश्मे की पेशकश पर ध्यान बढ़ाया जाए। नेत्र रोग विशेषज्ञ सेवाओं को प्राथमिक स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली में एकीकृत करना भी अपेक्षित है, ताकि लोगों को स्वास्थ्य सेवाओं तक आसान और समय पर पहुंच मिले। भारत में बुजुर्गों की आबादी पहले ही लगभग 11 करोड़ हो चुकी है और अगले दशक में इसके दोगुना होने की संभावना है, ऐसे में जरूरी है कि इस आबादी की नजर सही हो और सेवाओं तक पहुंच हो।
साथ ही, प्रत्येक व्यक्ति को अपनी आंखों की जांच करानी चाहिए। सभी के लिए स्क्रीन टाइम कम किया जाना चाहिए और खासकर बच्चों के लिए। जो लोग कंप्यूटर स्क्रीन का उपयोग करते हैं, वे 20-20-20 के तरीके का पालन कर सकते हैं यानी हर 20 मिनट के स्क्रीन-टाइम के बाद 20 सेकंड के लिए 20 फीट दूर देखना चाहिए। खानपान की आदतों में सुधार भी जरूरी है।
Date: 21-05-24
गुणवत्ता पर सवालसंपादकीय
सिंगापुर, हांगकांग के बाद नेपाल ने जिस तरह कुछ भारतीय कंपनियों के मसालों के आयात पर पाबंदी लगाई, वह चिंताजनक है। इसलिए और भी अधिक, क्योंकि इस बीच न्यूजीलैंड, अमेरिका आदि ने भी यह कहा है कि वे भारत से आयात होने वाले मसालों की गुणवत्ता की जांच करेंगे। यह ठीक है कि एक के बाद एक देशों की ओर से भारतीय मसालों की गुणवत्ता पर सवाल उठाए जाने पर सरकार ने यह कहा है कि वह नए मानक तैयार करने के साथ ही यह भी देखेगी कि भारतीय मसाला कंपनियों के खिलाफ विभिन्न देश जो कदम उठा रहे हैं, उसके पीछे कहीं कोई साजिश तो नहीं है, लेकिन अच्छा होता कि सरकार तभी चेत जाती, जब सिंगापुर और हांगकांग ने एमडीएच एवं एवरेस्ट कंपनियों के मसालों में हानिकारक पदार्थ पाए जाने की शिकायत करते हुए उनके आयात पर पाबंदी लगा दी थी। चूंकि भारत मसालों का सबसे बड़ा निर्यातक है और उनके निर्यात से देश को अच्छी-खासी विदेशी मुद्रा प्राप्त होती है, इसलिए भारतीय मसाला बोर्ड के साथ-साथ सरकार को समय रहते सजगता दिखानी चाहिए थी। मसालों की गुणवत्ता को लेकर पहले भी सवाल उठते रहे हैं। कई बार यह सामने आ चुका है कि देश में बिकने वाले विभिन्न कंपनियों के मसालों की गुणवत्ता ठीक नहीं होती। उनमें अखाद्य वस्तुएं वस्तुएं तक मिलाई जाती हैं।
बात केवल मसालों की ही नहीं है। अन्य अनेक खाद्य एवं पेय पदार्थों के साथ-साथ दवाओं की गुणवत्ता की भी है। यह किसी से छिपा नहीं कि किस तरह कुछ देशों ने भारत से आयात होने वाली खांसी की दवा को विषाक्त बताते हुए उस पर पाबंदी लगाई थी। इसके बाद भारत सरकार को कार्रवाई करने के लिए विवश होना पड़ा था। प्रश्न यह है कि आखिर भारतीय उत्पादों की गुणवत्ता पर दूसरे देशों में सवाल उठने के बाद ही सरकार और उसकी एजेंसियां क्यों चेतती हैं? भारत में खाद्य एवं पेय पदार्थों के साथ दवाओं की गुणवत्ता के साथ समझौता होता ही रहता है। यह इसीलिए होता है, क्योंकि जिन पर भी यह सुनिश्चित करने का दायित्व है कि मानकों से कोई समझौता न होने पाए, वे लापरवाही का परिचय देते हैं। यह कहने में संकोच नहीं कि इसका कारण संबंधित अधिकारियों का भ्रष्टाचार है। यह निराशाजनक है कि भारतीय खाद्य सुरक्षा एवं मानक प्राधिकरण न तो भारतीय कंपनियों के उत्पादों की गुणवत्ता की सही तरह छानबीन कर पाता है और न ही बहुराष्ट्रीय कंपनियों के उत्पादों की। अब जब भारतीय उत्पादों का निर्यात बढ़ रहा है, तब सरकार को यह सुनिश्चित करना ही होगा कि न केवल देश में बिकने वाले उत्पादों की गुणवत्ता सही हो, बल्कि निर्यात होने वाले उत्पादों की भी। सरकार के साथ ही उद्यमियों को भी चेतना होगा। उन्हें अपने उत्पादों की गुणवत्ता को विश्वस्तरीय और विश्वसनीय बनाने के लिए अतिरिक्त प्रयत्न करने होंगे।
Date: 21-05-24
स्वास्थ्य के लिएसंपादकीय
दवा का उपयोग लोग इसलिए करते हैं ताकि उन्हें बीमारी से मुक्ति मिले। केंद्रीय दवा मानक नियंत्रक संगठन (सीडीएससीओ) हर माह ड्रग अलर्ट जारी कर ऐसी दवाओं की सूची जारी करता है, जो गुणवत्ता की कसौटी पर खरी नहीं उतरती हैं। अब सीडीएससीओ ने हर माह ड्रग अलर्ट के साथ नकली दवाओं की जानकारी भी जारी करने की पहल की है। पहली बार पांच नकली दवाओं की जानकारी साझा की गई है। लोगों के स्वास्थ्य को सुरक्षित रखने की दिशा में यह बड़ी पहल है। आमतौर पर लोगों को पता नहीं होता कि जो दवा वे खा रहे हैं, वह असली है या नकली दवा की गुणवत्ता के बारे में भी वे अनभिज्ञ रहते हैं। हिमाचल प्रदेश के सोलन जिले में स्थित बद्दी-बरोटीवाला-नालागढ़ फार्मा हब के रूप में पहचाना जाता है। इसके अलावा ऊना, सिरमौर, कांगड़ा में भी दवाओं का उत्पादन होता है। दवा उद्यमियों के साथ कई बार ऐसे लोग इस उद्योग में शामिल हो जाते हैं, जिन्हें सिर्फ मुनाफे से मतलब रहता है। उन्हें लोगों की सेहत की कोई चिंता नहीं होती। पिछले कुछ समय से नकली दवाओं के उत्पादन के मामले भी ऊना एवं बद्दी जिलों में सामने आए हैं। किसी भी उद्योग की विश्वसनीयता उसके उत्पाद पर निर्भर करती है, लेकिन चिंता की बात है कि हिमाचल के उद्योगों में बन रही दवाओं पर हर माह सवाल उठ रहे हैं। अप्रैल में भी प्रदेश की सात दवाएं मानकों पर खरी नहीं उतरीं। नकली दवाओं का अलर्ट जारी करने में राज्यों को सक्रियता से योगदान देना चाहिए। फरवरी में सीडीएससीओ ने जानकारी उपलब्ध करवाने के लिए सभी राज्यों को लिखा था, लेकिन हिमाचल समेत कई प्रमुख राज्यों ने सूची नहीं दी। मामला लोगों के स्वास्थ्य से जुड़ा है, इसलिए इसमें किसी भी स्तर पर कोताही नहीं होनी चाहिए।
Date: 21-05-24
राजनीतिक अस्थिरता का शिकार नेपालडॉ ऋषि गुप्ता, ( लेखक एशिया सोसायटी पालिसी इंस्टीट्यूट, दिल्ली में सहायक निदेशक हैं )
बीते दिनों नेपाल में वामदलों की गठबंधन वाली सरकार ने संसद के निचले सदन (राष्ट्रीय सभा) में विश्वासमत प्राप्त कर लिया। यह चौथी बार है कि जब प्रधानमंत्री पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड’ पिछले 18 महीने के भीतर संसद के पटल पर विश्वासमत सिद्ध करने के लिए खड़े हुए थे। दरअसल गत 13 मई को उपप्रधानमंत्री उपेंद्र यादव के समूह वाली जनता समाजवादी पार्टी आपसी फूट के चलते प्रचंड सरकार से अलग हो गई थी। ऐसे में प्रधानमंत्री प्रचंड ने संविधान की धारा 100(2) के अंतर्गत विश्वासमत का प्रस्ताव रखा, जो 157 मतों के साथ बहुमत से पारित हो गया। नेपाल में वर्ष 2022 में प्रधानमंत्री प्रचंड के नेतृत्व में वामदल वाली सरकार बनी थी, लेकिन वह ज्यादा दिनों तक नहीं टिक पाई। फिर प्रचंड ने प्रजातांत्रिक पार्टियों के साथ मिलकर दूसरी बार सरकार बनाई, जिसमें नेपाली कांग्रेस भी शामिल थी, पर वह भी अधिक दिनों तक नहीं टिक सकी। तीसरी बार प्रचंड ने पूर्व प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली की कम्युनिस्ट पार्टी आफ नेपाल (एमाले), रवि लामिछाने की स्वतंत्रता पार्टी और उपेंद्र यादव की जनता समाजवादी पार्टी के साथ मिलकर सरकार बनाई, जो हाल में उपेंद्र यादव के इस्तीफे के चलते संवैधानिक संकट में आ गई। उसके चलते प्रचंड को एक बार फिर बहुमत हासिल करना पड़ा।
नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता सामान्य बात हो गई है। नेपाल में 2008 में लोकतंत्र की स्थापना के बाद से चार बार राष्ट्रीय चुनाव हो चुके हैं। वहां अब तक 12 से ज्यादा प्रधानमंत्री रह चुके हैं, लेकिन कोई भी सरकार पांच साल की अवधि पूरी करने में असमर्थ रही है। मौजूदा वामदल वाली सरकार में प्रधानमंत्री प्रचंड की माओवादी केंद्र पार्टी और केपी शर्मा ओली की एमाले दो धुर विरोधी समूह शामिल हैं, जिनके बीच शक्ति और प्रधानमंत्री पद की दावेदारी को लेकर लगातार खींचतान होती रही है। हालांकि ओली ने प्रचंड सरकार को समर्थन दिया है, लेकिन पिछले कई मौकों पर सरकार केवल इसी वजह से गिरी, क्योंकि प्रचंड और ओली, दोनों ही प्रधानमंत्री पद की दावेदारी करते रहे। इस बार भी प्रचंड सरकार को भले विश्वासमत मिल गया हो, लेकिन यह राजनीतिक स्थिरता की कोई गारंटी नहीं है। आने वाले दिनों में अगर वाम सरकार फिर गिरी तो यह कोई आश्चर्य की बात नहीं होगी, क्योंकि ओली कभी भी प्रचंड सरकार से अपना समर्थन वापस ले सकते हैं। इसका बड़ा कारण यह है कि 275 सदस्यों वाली राष्ट्रीय सभा में जो 165 सदस्य सीधे चुनकर आए हैं, उनमें से प्रधानमंत्री प्रचंड की माओवादी केंद्र के पास कुल 32 सीटें हैं, जबकि एमाले के पास 78 सीटें हैं। राजनीतिक गणित के हिसाब से गठबंधन में सबसे बड़ी पार्टी होने के नाते एमाले को प्रधानमंत्री पद का दावेदार होना चाहिए, लेकिन प्रचंड की हठ के चलते एमाले प्रमुख ओली को अपनी राजनीतिक आकांक्षाओं से समझौता करना पड़ा। यदि ओली फिर से प्रधानमंत्री पद पर दावेदारी करते हैं तो सरकार का गिरना तय है।
राजनीतिक दलों के स्वार्थ के चलते नेपाल आज सबसे अधिक पूर्व प्रधानमंत्रियों एवं मंत्रियों का ठिकाना बन गया है। वामदल नेपाल की विदेश नीति के साथ लगातार खिलवाड़ करते आ रहे हैं, जिसका सीधा नुकसान वहां की जनता को हो रहा है। नेपाल की कोई खुली सीमा नहीं है। उसके एक ओर एक विस्तारवादी देश चीन है और बाकी तीन तरफ से भारत। ऐसे में जरूरी हो जाता है कि नेपाल एक स्थिर विदेश नीति अपनाए, लेकिन पिछले 75 वर्षों के आधुनिक राजनीतिक इतिहास में वह ऐसा करने में असमर्थ रहा है। भारत लंबे समय से नेपाल के विकास का समर्थक रहा है। भारत के मित्रवत व्यवहार के बावजूद नेपाल के वामपंथी दल हमेशा भारत विरोधी रुख अपनाते रहे हैं। एमाले जैसी पार्टियों ने पिछले 10 वर्षों से भारत विरोधी आंदोलनों का नेतृत्व किया है। हाल में नेपाल के राष्ट्रपति के आर्थिक सलाहकार को इसलिए इस्तीफा देने के लिए मजबूर होना पड़ा, क्योंकि उन्होंने वामपंथी सरकार के उस फैसले का विरोध किया, जिसके तहत वह सौ रुपये के नोटों पर एक विवादित नक्शा छाप रही है। यह वही नक्शा है, जिसे नेपाल की संसद ने 2020 में पारित किया था, जिसमें भारत के कुछ हिस्सों को नेपाल ने अपना बताया है। माना जा रहा है कि प्रचंड ने ओली के दबाव के चलते ऐसा किया।
ओली अपने भारत विरोध और चीन समर्थन के लिए जाने जाते हैं। उनका यह रवैया नेपाल के हित में कभी नहीं रहा, बल्कि इससे उसे नुकसान अधिक हो रहा है। यह बस उनके लिए राजनीतिक फायदा हासिल करने का एक जरिया बनकर रह गया है। गत दिनों नेपाल के उपप्रधानमंत्री नारायण काजी श्रेष्ठा भी अपनी पहली विदेश यात्रा पर चीन गए थे। वामदलों के इस भारत विरोध के बावजूद ज्यादातर नेपाली जनता चीन पर विश्वास नहीं करती, क्योंकि यह सर्वज्ञात है कि चीन छोटे देशों को अपने ‘ऋण जाल’ में फंसाकर उनकी राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य व्यवस्थाओं को अपने कब्जे में करने की कोशिश करता है। वामदलों की अदूरदर्शिता के कारण नेपाल भी चीन के चंगुल में फंसता जा रहा है। उनकी राजनीति का आधार ही भारत विरोध बन गया है, जो न केवल भारत के साथ नेपाल के ऐतिहासिक संबंधों को खराब कर रहा है, बल्कि उसकी प्रगति को भी बाधित कर रहा है। नेपाल की राजनीतिक दुर्गति के चलते आज वहां के लाखों युवा रोजगार और अच्छे जीवन की खोज में लगातार पलायन कर रहे हैं। यदि नेपाल के नेता स्वार्थ त्यागकर देशहित में राजनीतिक अस्थिरता को दूर करें तो वह विश्व की दो बड़ी अर्थव्यवस्थाओं से घिरे होने का सबसे बड़ा फायदा उठा सकता है।
Date: 21-05-24
हादसे पर सवालसंपादकीय
हेलिकाप्टर हादसे में ईरान के राष्ट्रपति सहित कई ताकतवर लोगों की जिस तरह मौत हो गई, उसमें ऐसी घटनाओं को हादसे के अलावा अंतरराष्ट्रीय राजनीति पर पड़ने वाले प्रभाव के लिहाज से भी देखा जाने लगता है। गौरतलब है कि रविवार को ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी, वहां के विदेश मंत्री और कई अन्य अहम लोग एक हेलिकाप्टर पर सवार होकर तबरेज शहर की ओर जा रहे थे। इसी बीच मौसम खराब होने के कारण हेलिकाप्टर हादसे का शिकार हो गया, जिसमें राष्ट्रपति रईसी सहित वहां के विदेश मंत्री हुसैन अमीर-अब्दुल्लाहियन, ईरान के पूर्वी अजरबैजान प्रांत के गवर्नर मलिक रहमती, चालक और सुरक्षा प्रमुख मारे गए। राष्ट्रपति रईसी रविवार को अजरबैजान में किज कलासी और खोदाफरिन बांध का उद्घाटन करने गए थे। जाहिर है, अपनी सीमा में ईरान के शीर्ष नेता और उनके सहयोगियों को इस बात की आशंका भी न रही होगी कि ऐसा कोई हादसा हो सकता है। भारत सहित कई देशों ने इस घटना पर शोक संवेदना जताई है।
यह बेहद अफसोसनाक है कि पिछले कुछ वर्षों में ईरान की कुछ महत्त्वपूर्ण शख्सियतों की जान या तो हादसे में चली गई या फिर उनकी हत्या कर दी गई। मसलन, ईरान में 2020 में एक नायक की तरह मशहूर कुर्द फोर्स के जनरल कासिम सुलेमानी की मौत में अमेरिकी ड्रोन से हमले के आरोप लगे। फिर उसी वर्ष ईरान के मुख्य परमाणु वैज्ञानिक मोहसिन फखरीजादेह की भी हत्या कर दी गई। वहां हुए कुछ अन्य आतंकवादी हमलों में अमेरिका या फिर इजराइल का हाथ होने की आशंका जताई गई। हाल में इजराइल और अमेरिका के प्रति ईरान के सख्त रुख के मद्देनजर ताजा हादसे को लेकर भी किसी साजिश की आशंका जताई जा रही है। हालांकि अब तक सामने आए तथ्यों के मुताबिक बेहद खराब मौसम की वजह से हेलिकाप्टर हादसे का शिकार हो गया। मगर कुछ लोगों का सवाल है कि अगर मौसम ही कारण था, तो उसी काफिले में शामिल अन्य दो हेलिकाप्टर सुरक्षित कैसे अपने गंतव्य तक पहुंच गए। इस हादसे की असली वजहें तो व्यापक जांच के बाद सामने आएंगी, लेकिन फिलहाल ईरान के सामने एक नाजुक स्थिति से निपटने की चुनौती है।
Date: 21-05-24
मौसम से लड़ना सीखेंसंपादकीय
देश के विभिन्न इलाकों में भीषण गरमी पड़ने से लोग परेशान हैं। दिल्ली, राजस्थान, मध्यप्रदेश, पंजाव व उत्तर प्रदेश में कई स्थानों पर 46-47 डिग्री तक पारा चला गया। मौसम विभाग द्वारा अगले पांच दिनों तक लू चलने तथा भीषण गरमी पड़ने का अनुमान जताया है। हिमाचल प्रदेश जैसे पहाड़ी इलाके में भी गरमी बढ़ रही है। गुजरात के तटीय इलाकों में गर्मी और उमस बढ़ गई है। दिल्ली, चंडीगढ़, हरियाणा, पंजाब व राजस्थान के लिए रेड अलर्ट जारी किया गया है। उप्र, बिहार व गुजरात ऑरेंज अलर्ट में हैं। ‘कोढ़ में खाज’ यह कि दिल्ली में वायु गुणवत्ता सूचकांक भी खराब हो गया है। कार्बन डाईऑक्साइड यानी प्रदूषण बढ़ने से भी मौसम में शुष्कता बढ़ती जाती है। साथ ही राजस्थान से आने वाली हवाएं अभी दिल्ली को और भी झुलसाएंगी। अल नीनो तथा मजबूत सोलर आइसोलेसन के चलते तापमान लगातार बढ़ रहा है। वैज्ञानिकों के अनुसार अलनीनो इफेक्ट मध्य व पूर्वी प्रशांत महासागर का तापमान सामान्य से बहुत ज्यादा हो जाता है। भीषण गरमी से जन-जीवन बुरी तरह प्रभावित हो जाता है। हालांकि बच्चों, बुजुर्गों व बीमारों का ऐसे में विशेष ख्याल रखने को कहा जाता है, परंतु मौसम की इस मार से सतर्क रहने के हर किसी को प्रयास करने चाहिए। इस भीषण गरमी के चलते लोगों को हीट स्ट्रोक का खतरा बढ़ रहा है। लू के चलते पेट संबंधी गड़बियां, तेज ज्वर, उल्टी-दस्त आम समस्या हैं। के चलते लोगों को मजबूरी में घरों से बाहर निकलना ही पड़ता है। ऐसे में विशेषज्ञों की राय है कि वे खुद को अच्छी तरह लपेट कर, सिर को ढक कर और ढेर सारा पानी पीकर ही निकलें। लस्सी, शिकंजी, छाछ पीने तथा तरबूज, खरबूजा, खीरा, ककड़ी खूब खाने की सलाह भी दी जा रही है। कुल मिलाकर आम आदमी के लिए मौसम की मार से बचना लगभग नामुमकिन है। हालांकि ये विपदाएं प्राकृतिक हैं, इनसे सभी को जूझना है। मगर सरकारें चाहें तो दफ्तरों व सरकारी विभागों के काम के समय में परिवर्तन कर सकती हैं। जो या जहां संभव हो, घर से काम की व्यवस्था लागू हो। साथ ही निजी कंपनियों व बाजार को निर्देश जारी कर भोर व देर रात काम की व्यवस्था का आदेश जारी कर सकती हैं। मौसम के अनुरूप व्यवस्था करने के लिए धन से अधिक नैतिक संबल व संवेदनशीलता की जरूरत है।
Date: 21-05-24
तय होनी चाहिए तंत्र की जिम्मदारीअनिरुद्ध गौड़
मुंबई में गत 13 मई को एक भयंकर धूल भरी आंधी, तूफान और भारी बारिश आई, जिससे मुंबई महानगर का जनजीवन अस्त-व्यस्त हो गया। पेड़ उखड़ गए, बिजली गुल हो गई, चल रहा यातायात रुक गया, बचने को लोग जहां तहां छिप गए। इस तूफान से बचने को मुंबई के घाटकोपर पूर्वी उपनगर में भी एक फ्यूल स्टेशन के शेल्टर के नीचे सौ से अधिक लोग खड़े थे। इस बीच फ्यूल सेंटर के साइड में खड़ा 120 गुणा 120 फीट लंबा चैड़ा विशालकाय टनों वजनी लोहे का विज्ञापन होर्डिंग फयूल स्टेशन पर गिर गया। हादसे में दबकर अबतक करीब 16 लोगों की मौत हो चुकी है और करीब 70 घायलों का इलाज चल रहा है।
देश की व्यावसायिक राजधानी मुंबई में हुआ यह हादसा बेहद गंभीर है। हादसे के बाद अभी भी राहत और बचाव के कार्य चल रहे हैं, महाराष्ट्र सरकार ने हताहतों को मुआवजे की धनराशि देने की घोषणा और घायलों के इलाज के इंतजाम किए है, जबकि मुंबई में लगे सभी होर्डिंगस के सुरक्षा ऑडिट के निर्देश दिए हैं। होर्डिंग एजेंसी पर भी मामला दर्ज आरोपी की तलाश है, लेकिन साफ तौर पर यह हादसा व्यवस्था में आमूलचूल लापरवाही का नतीजा है। रेलवे पुलिस की जमीन पर खड़ा ये होर्डिंग गिरा और जिम्मेदारी की बात उठी तो बीएमसी ने रेलवे पर और रेलवे ने बीएमसी को जिम्मेदार ठहराया है। जिम्मेदारी के आरोप प्रत्यारोप में राजनीति भी गरमा रही है, जबकि इस दुर्घटना में महाराष्ट्र की आई गई सरकार से लेकर हर उस एजेंसी की जिम्मेदारी है जो बड़े इंफ्रास्टक्चर के निर्माण से लेकर उस पर निगरानी तक रखती हैं। सवाल उठता है आखिर व्यावसायिक नगरी मुंबई में मानक से कहीं अधिक बड़ा होर्डिंग कैसे खड़ा हो गया ? जबकि मुंबई में 40 गुणा 40 फीट से अधिक बड़ा होर्डिंग लगाने की मंजूरी नहीं है। क्या इस होर्डिंग को लगाने वाली विज्ञापन एजेंसी ईगो मीडिया प्राइवेट लिमिटेड के पास बीएमसी से इस विशालकाय होर्डिंग को लगाने की अनुमति थी? क्यों रेलवे ने बिना बीएमसी की मंजूरी के इतना बड़ा होर्डिंस लगने दिया? नियमों का उलंघन कर इतने बड़े होर्डिंग की लोगों ने शिकायत की तो क्यों बीएमसी और रेलवे ने इसे हटाने को कदम नहीं उठाएं? क्या शिकायत पर बीएमसी का रेलवे और विज्ञापन एजेंसी को दो साल बाद नोटिस देना ही काफी था? सवाल यह भी है कि विशालकाय होर्डिंग को लगाने के दौरान निर्माण सामग्री की जांच और सभी सुरक्षा पहलुओं पर क्यों नहीं निगरानी की गई ? क्योंकि जब होर्डिंग गिरा तो देखा गया कि होर्डिंग मानक से बहुत कम गहरी नींव पर खड़ा था। आखिर क्यों नहीं जिम्मेदार संस्थाओं ने इस होर्डिंग को लगाने के दौरान निर्माण मानकों और सुरक्षा की जांच परख की? क्या होर्डिंग लगाने वाली एजेंसी व्यवस्था से अधिक ताकतवर है जिसके कारण जिम्मेदार अधिकारी उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं कर सके। मुंबई शहर समुद्र के किनारे बसा है, कभी भी बारिश होना और तेज हवाओं का चलना यहां आम बात है। जब मुंबई में बड़े इंफ्रास्टक्चर खड़े किए जाते हैं तो बीएमसी सुरक्षा मानकों को पूरी तरह परखकर ही अनुमति देती है । फिर सुरक्षा मानकों और नियम कायदों में कोताही बरतकर बेहद असुरक्षित विशालकाय होर्डिंग का खड़ा हो जाना बीएमसी और रेलवे की लापरवाही नही तो और क्या है? पेट्रोल और गैस फ्यूल स्टेशन एक बेहद संवेदनशील यूनिट होती हैं, इसके समीप विशाल होर्डिंग लगाने में सुरक्षा मापदंडों में पूरी कोताही रही है। वैसे जलवायु परिवर्तन से देश ही नहीं वल्कि पूरा विश्व प्रभावित है । प्राकृतिक आपदाओं के हर दिन हादसे देखे जा सकते हैं । ग्लोबल वार्मिंग के कारण अरब सागर में चक्रवातों की तीव्रता में वृद्धि हुई है। भारत में समुद्री चक्रवातों की बात करें तो हर साल बंगाल और अरेबियन सी के समुद्र तटों पर कोई न कोई तेज रफ्तार चक्रवाती तूफान तबाही का मंजर लेकर आता है। मुंबई अरेबियन सी के तट पर बसी है । अतीत में झांकें तो पता चलता है कि अरेबियन सी में कई भयंकर तूफान ने कहर बरपाया है। तेज हवाओं और आंधी तूफान गुजरात के तटों और तटीय गांवों पर बुनियादी ढांचे तहस नहस हुए।
इन चक्रवातों के दृष्टिगत समुद्र किनारे के शहरों में अधिक एहतिया बरतने की आवश्यकता है। विज्ञापन होर्डिंग नगर निकायों की अतिरिक्त आय के साधन हैं। जबकि विशालकाय विज्ञापन होर्डिंग उपभोक्ताओं को दूर से आकर्षित करते हैं। जहां तक देश के राज्यों में विज्ञापन होर्डिंस लगाने की बात है अलग-अलग राज्यों और शहरों में इनको लगाने के दिशा-निर्देश अलग हो सकते हैं। इन पर प्रतिबंध लगाना तो ठीक नहीं क्योंकि ये नगर निकायों की आय के साधन हैं, लेकिन नगर निकायों को इनके मानकों और आमजन की सुरक्षा को देखना भी बहुत जरूरी है। विज्ञापन एजेंसी मनमर्जी से किसी भी आकार, भार और मानकों के होर्डिंस लगाए यह मंजूर नहीं है । ऐसी एजेंसियों के खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। नगर निकायों को होर्डिस लगाने के नियम और मानको को स्पष्टता के साथ एक अंतराल पर इनका सुरक्षा ऑडिट करना भी जरूरी है। ताकि संबंधित संस्थाओं की लापरवाही मुंबई के इस होर्डिंग की तरह निर्दोष जनता के लिए जानलेवा ना बने।
Date: 21-05-24
ईरानी राष्ट्रपति के इंतकाल का असरदिनकर प्रकाश श्रीवास्तव, ( पूर्व राजदूत, ईरान )
हेलीकॉप्टर दुर्घटना में ईरान के राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी, विदेश मंत्री हुसैन अमीर-अब्दुल्लाहियन सहित नौ लोगों की मौत दुखद है। जिस तरह से दुनिया के कोने-कोने से शोक-संवेदनाएं आ रही हैं, उनसे तो यही पता चलता है कि अपने पांच दशकों के सार्वजनिक जीवन में इब्राहिम रईसी काफी प्रभावशाली रहे। यह सही है कि उनका बड़ा योगदान न्यायपालिका के क्षेत्र में रहा, खासतौर से पिछली सदी के 80 के दशक में, जब वह तेहरान के उप-अभियोजक और अभियोजक बने। मगर बाद में उन्होंने अस्तान कुद्स रजावी के मुख्य संचालक की जिम्मेदारी भी बखूबी संभाली। अस्तान कुद्स रजावी एक तरह का ट्रस्ट है, जो ईरान के पवित्र शहर मशहद स्थित इमाम रजा दरगाह का प्रबंधन करता है। यह दरगाह शिया संप्रदाय के लोगों के लिए काफी अहमियत रखती है। उल्लेखनीय है कि मशहद रईसी का जन्मस्थान भी है।
रईसी ने 2017 का चुनाव भी लड़ा था, लेकिन तब वह हार गए थे। 2021 में उन्हें जीत मिली और वह ईरान के राष्ट्रपति बने। बीते कुछ वर्षों में ईरान अगर उन्नति कर सका और इराक युद्ध से उबरकर एक स्थिर देश बन सका, तो इसमें रईसी का बड़ा योगदान माना जाता है। ऐसे में, सवाल यही है कि अब आगे ईरान का क्या होगा? हालांकि, अच्छी बात यही है कि ईरान का लोकतंत्र काफी परिपक्व है और वहां व्यक्ति-विशेष के रहने या न रहने से खास प्रभाव नहीं पड़ता। वहां राष्ट्रपति का पद भले अहम है, मगर ‘चेक ऐंड बैलेंस’, यानी संतुलन बनाने वाली व्यवस्थाएं काफी कारगर हैं, इसलिए यह कहना सही नहीं होगा कि रईसी के न रहने से ईरान की नीतियां प्रभावित होंगी।
पश्चिमी मीडिया ने भले ईरान की एक खास छवि बना दी है, लेकिन वास्तव में यह एक स्थिर मुल्क है और यहां का नेतृत्व काफी सुलझा हुआ रहा है। यह कितना जिम्मेदार देश है, इसका एहसास इससे भी होता है कि इसने जो परमाणु समझौता किया था और जिससे अमेरिका खुद बाहर निकल आया, उसे सुरक्षा परिषद के देशों के साथ-साथ संयुक्त राष्ट्र ने भी सराहा था। रईसी के कार्यकाल में ही ईरान शंघाई सहयोग संगठन का सदस्य बना। ईरान ने क्षेत्रीय मसलों को सुलझाने में भी काफी मदद की है और अफगानिस्तान में इसने जो काम किया है, उसका नतीजा हमें पिछले दिनों देखने को मिला, जब उसके साथ चाबहार समझौता हो सका।
हां, उसकी घरेलू राजनीति कुछ हद तक अस्त-व्यस्त रही, लेकिन इसकी वजह यह है कि ईरान की अर्थव्यवस्था काफी हद तक तेल पर निर्भर है। 2013-14 तक तेल के दामों में काफी वृद्धि हुई थी, जिससे तेहरान की आमदनी बनी रही, जबकि उस पर प्रतिबंध भी लगा हुआ था। मगर 2014 के बाद तेल के दाम घट गए, जिससे उसकी अर्थव्यवस्था पर असर पड़ा। रही सही कसर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने 2018 में पूरी कर दी, जब वह उस समझौते से बाहर निकल गए, जो बराक ओबामा के कार्यकाल में किए गए थे। इससे ईरानी अर्थव्यवस्था पर काफी असर पड़ा, फिर भी उसकी सियासत बहुत अस्थिर नहीं हुई।
यही कारण है कि रईसी के जाने के बाद भी ईरान में स्थिरता बने रहने की संभावना अधिक जताई जा रही है। विशेषकर भू-राजनीति के मोर्चे पर इसलिए भी भरोसा ज्यादा होता है, क्योंकि ईरान ने अब तक काफी परिपक्वता दिखाई है। दरअसल, इसकी भू-राजनीति तीन पहलुओं में सिमटी हुई है। पहला पहलू अफगानिस्तान है, जो इसके पूर्व में स्थित है। ईरान एक शिया बहुल राष्ट्र है, जबकि तालिबान एक सुन्नी गुट। दोनों में मतभेद जरूर रहे हैं, लेकिन अफगानिस्तान के नव-निर्माण में ईरान की भूमिका किसी से छिपी नहीं है। पाकिस्तान के साथ ईरान की नोक-झोंक की वजह भी यही है। यहां तक कि हिन्दुस्तान के समान ईरान ने भी पाकिस्तानी आतंकियों को खूब झेला है। भारत में यह कई लोगों को पता नहीं होगा कि पुलवामा घटना से ठीक एक दिन पहले ईरान में भी इसी तरह फौजियों पर हमला किया गया था, जिसमें ईरानी फौज के 27 जवान शहीद हो गए थे। अभी चार महीने पहले भी जब ईरान ने पाकिस्तान के बलूचिस्तान में मिसाइल दागे थे, तब दोनों देशों के बीच तनातनी बढ़ गई थी। मतलब साफ है, अफगानिस्तान और पाकिस्तान को लेकर हमारी और ईरान की नीतियों में काफी समानता है। उसका यह रुख यूं ही बना रह सकता है।
दूसरा पहलू गाजा है, जो ईरान के पश्चिम में स्थित है। फलस्तीन की समस्या 1948 से चल रही है और 1979 तक ईरान व इजरायल के संबंध बहुत अच्छे थे। इसका अर्थ है कि ईरान और इजरायल के मौजूदा तनातनी का कारण गाजा नहीं है, क्योंकि यह समस्या तो बरसों पुरानी है। गाजा मसले का हल इजरायल के नजरिये से उसके बंधकों की रिहाई और फलस्तीन के नजरिये से युद्ध विराम से निकल सकता है। इन दोनों में ईरान की शायद ही कोई भूमिका हो सकती है।
यही बात तीसरे पहलू, यानी हूती समस्या के बारे में कही जा सकती है, क्योंकि हूतियों ने तब हमले शुरू किए, जब उनका सऊदी अरब से झगड़ा हुआ। जबकि, ईरान के खाड़ी देशों के साथ अच्छे रिश्ते हैं। ईरान ने सऊदी अरब के साथ अपने संबंध रईसी के कार्यकाल में काफी सुधारे हैं। इसका बड़ा असर तेल के दामों पर भी पड़ा है।
रही बात अमेरिका से रिश्ते की, तो यह बहुत कुछ अमेरिका की नीतियों पर निर्भर करेगा। मगर माना यही जा रहा है कि चूंकि इस वर्ष वहां राष्ट्रपति चुनाव होने वाले हैं, इसलिए चुनावी वर्ष में शायद ही कोई नेता अमेरिकी नीतियों में बदलाव का जोखिम उठाना चाहेगा। भारत को लेकर भी ठीक इसी तरह की बात कही जा सकती है। भारत और ईरान का रिश्ता वर्षों पुराना है और दोनों देशों में नीति-नियंता काफी परिपक्व हैं। चाबहार समझौता बेशक रईसी साहब के कार्यकाल में हुआ, लेकिन इसको लेकर चर्चाएं साल 2012 से ही शुरू हो गई थीं और 2015 में हमने इस बाबत एक समझौता भी किया था। जो जुड़ाव दोनों देशों में बना है, वह इस एक हादसे की भेंट नहीं चढ़ सकता।
स्पष्ट है, ईरान स्थिरता का पक्षधर रहा है। बतौर राष्ट्रपति इब्राहिम रईसी ने इसे आगे बढ़ाने का ही काम किया था। ऐसे में, उनका न रहना दुखद जरूर है, पर ईरान की व्यक्ति-विशेष की राजनीति से जिस तरह की दूरी है, वहां की राजनीतिक संस्कृति पूर्ववत बनी रहेगी।
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हाल ही में विरासत और संपत्ति कर की चर्चा जोरों पर है। केवल भारत ही नहीं, बल्कि इसकी चर्चा अमेरिका के राजनीतिक परिदृश्य में भी की जा चुकी है। जो बाइडन ने इस कर की वकालत की थी, जिसका कड़ा विरोध किया गया।
लाभों का असमान प्रवाह है – पूरी दुनिया संचार प्रौद्योगिकी या आईटी के नेतृत्व में एक नई औद्योगिक क्रांति के बीच में है। यह पिछली औद्योगिक क्रांति के पैटर्न का ही अनुसरण कर रही है। तकनीकी परिवर्तन के लाभ असमान रूप से दिए जाते हैं, या प्रवाहित होते हैं। इसलिए क्योंकि आम तौर पर, इसमें श्रम की न्यूनतम भूमिका होती है। तथा नई आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए मानव कौशल का विकास करने में समय लगता है। इस परिवर्तन को संभालने का प्रयास सरकारें करती हैं, लेकिन कभी-कभी वे भी गलत नीतियों को लेकर सामने आती हैं।
धन एक मृगतृष्णा – वित्तीय बाजार में इस परिवर्तन के प्रमुख लोगों या कंपनियों या स्टार्टअप्स को शेयर कीमतों में अत्यधिक मुद्रास्फीति के माध्यम से एक तरह से पुरस्कृत कर दिया जाता है। लेकिन क्या यह टिकाऊ होता है या मात्र एक बबल या गुब्बारा है? यह काल्पनिक धन ही होता है, जिसे बाइडन या सैम पित्रोदा जैसे नेता संपत्ति कर का प्रस्ताव देकर, अपनी ओर ध्यान आकर्षित करने के लिए काम में लाते हैं। वे केवल काल्पनिक धन पर कर लगाने की बात कर रहे हैं। उदाहरण के लिए, इलेक्ट्रिक वाहन टेस्ला के मालिक इलॉन मस्क को लें। दो वर्ष पहले, उनकी काल्पनिक संपत्ति या लाभ बहुत ज्यादा था। उनके शेयर के नीचे गिरते ही उनकी कुल संपत्ति बहुत कम रह गई है।
असमानता ही वास्तविक है – लाभ के प्रवाह की असमान गति, वास्तविक जगत के परिणाम हैं। भारत के संदर्भ में यह चार दशकों की मजबूत जीडीपी वृद्धि और रोजगार सृजन की कमजोर नीतियों के संबंध के रूप में सामने आई है। बड़े पैमाने पर आर्थिक विकास हुआ, लेकिन कौशल के अभाव में उतना रोजगार सृजन नही हो पाया है। अतः चुनावी माहौल में कल्याणकारी सरकार की छवि को प्रस्तुत करने का अवसर सभी राजनीतिक दलों को मिल रहा है, और वे इसे भुनाने के लिए अपने-अपने प्रस्ताव ला रहे हैं।
लोग मायने रखते हैं – लोक कल्याण के लिए सब्सिडी देना एक अल्पकालिक समाधान है। विरासत और संपत्ति कर जैसे उपायों से पुनर्वितरण या लोककल्याण का विचार भी ठीक नहीं है। एक मात्र उपाय नीतियों का पुर्नमूल्यांकन है। नीतियां ऐसी हो, जो श्रम-आधारित विनिर्माण और मानव कौशल का विकास कर सकें। कौशल विकास ही अंतिम समाधान है, संपत्ति कर नहीं।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 25 अप्रैल, 2024
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Date: 20-05-24
Talking peaceIndia must push for a more inclusive peace effort against the Ukraine war.Editorial
Two years after Russia’s invasion of Ukraine, Switzerland has stepped in to organise a peace conference, making a special effort to broaden global consensus on the war by enlisting those who have not joined the western coalition thus far. As a close partner of Russia, a member of the BRICS and SCO groupings, a leader in the Global South, and an aspirant to world leadership, India is, no doubt, at the top of the list. And the Swiss Foreign Secretary Alexandre Fasel’s visit to Delhi this week, following closely those of two Swiss Ministers, and the Ukrainian Foreign Minister Dmytro Kuleba over the past few months, is evidence that the invitation to India at the head of state/head of government level is a priority. Of the 160 or so countries that invitations for the conference have gone to — it is to be held in the resort town of Bürgenstock on June 15-16 — about 50 have confirmed their attendance, mostly from the European Union, NATO alliance, G-7 countries and U.S. allies such as Japan, South Korea and Australia. Russia has not been invited, and Mr. Fasel made it clear that their diplomacy was hoping to bring over ‘BICS’ leaders (BRICS minus Russia) so they could convey the outcomes to Moscow, with a view to inviting Russia to a future round of talks. With Brazilian President Lula indicating that he would not attend, and South Africa’s citing its general elections on May 29 to formally decline the invitation, all eyes are on whether Chinese President Xi Jinping, and Prime Minister Narendra Modi, if he is re-elected, or official nominees would attend.
Convincing the rest of the world to attend a platform that appears stilted towards Ukraine remains a tall order for the organisers. While Switzerland prides itself on its “neutrality”, it has already chosen sides in the current conflict by imposing sanctions on Russia. Another venue may have appeared more impartial. The agenda for the conference is to build a framework for or road map to peace, and to discuss issues such as ensuring food security and freedom of navigation, nuclear safety and humanitarian issues. It seems unlikely that much headway can be made on any of these issues without both parties to the conflict at the table. It is also hard to foresee what else can be achieved as long as Russia and Ukraine believe they can make or consolidate more gains on the battlefield — a real negotiation begins when either one or both sides believe they have exhausted military options. If the aim of the conference then is, as Russian President Vladimir Putin says, to “pressure” Russia into announcing a ceasefire or ceding territory it has won, then it is hardly likely to succeed, given the UN General Assembly’s failure to bring such pressure through multiple resolutions. New Delhi, that has thus far refused to join any statement that is overtly critical of Russia, and has not diluted ties with Moscow, may thus find it easier to hedge its bets, and only show its hand once a truly balanced and more inclusive peace effort gets under way.
Date: 20-05-24
चुनावी विमर्श से गायब जरूरी मुद्देहृदयनारायण दीक्षित, ( लेखक उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष हैं )
संसदीय चुनाव में पांचवें चरण का मतदान है। लोकतंत्र में मतदान का अधिकार नागरिकों को अवसर देता है कि सरकार कैसी हो और उन पर कौन शासन करे? यह सत्ता के दावेदारों की विचारधारा, रीति, नीति और दृष्टिकोण को भी जांचने और इच्छानुसार मतदान का अवसर भी होता है। मतदान केवल अधिकार नहीं, उत्तरदायित्व भी है। मतदान से नागरिकों की राजनीतिक इच्छा प्रकट होती है। मतदाताओं के पक्ष को समझा जाता है। चुनाव में मतदाता के सामने भिन्न-भिन्न विचार वाले दल आश्वासन देते हैं। मतदाता उपलब्ध विचारों और वादों में अपने सपनों वाली सरकार बनाने के लिए वोट देते हैं। मताधिकार मूल्यवान है।
चुनाव राष्ट्रीय विमर्श का अवसर होते हैं। बहस और विमर्श, वाद-विवाद और संवाद भारत की प्राचीन परंपरा है। संप्रति पूरा देश सभा या संसद जैसा है। यहां प्रत्येक मतदाता अपनी इच्छा वाले देश और समाज के लिए सजग है। राष्ट्रीय चिंता के सभी विषयों पर राष्ट्रीय विमर्श की आवश्यकता है, लेकिन वर्तमान चुनाव में बुनियादी सवालों पर राष्ट्रीय विमर्श का अभाव है। राष्ट्र सर्वोपरिता, राष्ट्रीय एकता और अखंडता, संविधान के प्रति निष्ठा एवं भारत की विश्व प्रतिष्ठा जैसे विषय आधारभूत हैं। यह विषय किसी न किसी रूप में हमेशा राष्ट्रीय विमर्श में रहते हैं, लेकिन वर्तमान चुनाव में पृष्ठभूमि में चले गए हैं। हम भारत के लोग संस्कृति के कारण दुनिया के प्राचीनतम राष्ट्र हैं। यहां विविधता और बहुलता सतह पर है, लेकिन इन सबको एक सूत्र में बांधे रखने वाली सांस्कृतिक एकता चुनावी विमर्श में नहीं है। राष्ट्र से भिन्न कोई भी अस्मिता अलगाववाद की प्रेरक होती है। राजनीतिक दल एक दूसरे पर सांप्रदायिक होने का आरोप लगाया करते हैं, मगर सांप्रदायिकता की परिभाषा नदारद है। चुनावी विमर्श में सांप्रदायिकता के निराकार और साकार खतरे पर विमर्श होना चाहिए था।
सेक्युलर विदेशी विचार है। राजनीति में बहुधा इसका दुरुपयोग होता है। व्यावहारिक अर्थ में यह अल्पसंख्यकवाद का पर्याय है। छद्म सेक्युलरवाद भी विमर्श में नहीं है। राष्ट्र के समग्र विकास में प्रशासनिक सेवाओं की मुख्य भूमिका है। प्रशासनिक अमला सरकारी नीतियों का क्रियान्वयन करता है। प्रशासनिक सुधारों पर अनेक आयोग बन चुके हैं, लेकिन प्रशासन की गुणवत्ता प्रश्नवाचक रहती है। इसी तरह अर्थनीति सबसे महत्वपूर्ण विषय है। यह राष्ट्रीय समृद्धि की संवाहक होती है। महाभारत में नारद ने युधिष्ठिर से पूछा, ‘क्या आप अर्थ चिंतन करते हैं-चिंतयसि अर्थम्?’ अर्थनीति पर सतत राष्ट्रीय विमर्श अनिवार्य है।
राष्ट्र का आत्मविश्वास होता है राष्ट्रीय विमर्श। भूमंडलीय ताप में वृद्धि अंतरराष्ट्रीय समस्या है तो भारत भी उससे अछूता नहीं रह सकता। इसके बावजूद भूमंडलीय ताप चुनावी विमर्श से बाहर है। जल और जीवन पर्यायवाची हैं। जल प्रदूषण स्वास्थ्य का बड़ा शत्रु है। एक रिपोर्ट के अनुसार देश के 400 से अधिक जिलों का जल गंभीर रूप से प्रदूषित हो चुका है। भूजल में शीशा, आर्सेनिक, फ्लोराइड और क्रोमियम जैसे जानलेवा रसायन पाए गए हैं। हर साल लगभग ढाई करोड़ लोग जल प्रदूषण जनित बीमारियों के शिकार होते हैं। बच्चे दिव्यांग होते हैं। औद्योगिक इकाइयों का विषैला पानी और कचरा भूगर्भ जल में मिलते हैं। बोतलबंद पानी और भी खतरनाक है। जल में उपस्थित रसायन बोतल की प्लास्टिक से रासायनिक क्रिया करते हैं और जल दूषित हो जाता है। वायु प्रदूषण से भारत भी पीड़ित है। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में भी धूल भरी वायु लोगों के श्वसन तंत्र पर आक्रामक रहती है। ऐसे चिंताजनक मुद्दे भी चुनावी विमर्श में नहीं हैं।
कृषि भारत की आजीविका है और किसानों के लिए व्यवसाय भी है। ऋषि और कृषि भारतीय श्रम साधना के शीर्ष पर रहे हैं। चिकित्सा महत्वपूर्ण विषय है। जन स्वास्थ्य और आनंद साथ-साथ रहते हैं। राष्ट्रीय पौरुष का संबंध जनस्वास्थ्य से है। स्वस्थ जीवन के लिए उत्तम परिस्थितियां पाना मौलिक अधिकार है। बीमार लोग राष्ट्रीय उत्पादन में भागीदार नहीं हो सकते। उत्पादन की दृष्टि से प्रत्येक व्यक्ति राष्ट्र का सक्रिय मानव संसाधन है। अन्य योजनाएं टाली जा सकती हैं, लेकिन चिकित्सा और स्वास्थ्य नहीं। निजी अस्पताल अपेक्षाकृत महंगे हैं। राष्ट्रीय संवेदना का अभाव है। गरीबों को पांच लाख तक की चिकित्सा उपलब्ध कराने में ‘आयुष्मान भारत’ योजना की प्रशंसा होती है। इस दिशा में काफी काम हुआ है, लेकिन जन स्वास्थ्य और कृषि भी राष्ट्रीय विमर्श में नहीं हैं।
प्रतियोगी परीक्षाओं में असफल होने पर युवाओं में आत्महत्या की प्रवृत्ति दिखाई पड़ी है। यह राष्ट्रीय चिंता का विषय है। ऐसे विषय सरकार के अलावा सामाजिक उत्तरदायित्व से संबंधित हैं। भारतीय इतिहास का विरूपण पिछले 10-15 वर्षों से चर्चा का विषय है। इस इतिहास में वास्तविक तथ्य नहीं हैं। दुर्भाग्य से यह चुनाव में कोई मुद्दा नहीं है। समान नागरिक संहिता संविधान का नीति निदेशक तत्व है। पिछले कई वर्षों से यह राष्ट्रीय चर्चा का विषय है, लेकिन चुनावी विमर्श का मुद्दा नहीं है।
सारा काम सरकारें ही नहीं कर सकतीं। सामाजिक दायित्वबोध भी जरूरी है। सड़क, पानी और बिजली आदि के सवालों पर अनेक गांवों में मतदान के बहिष्कार के समाचार भी सुनाई दिए हैं। इसलिए महत्वपूर्ण मुद्दों पर विमर्श जरूरी है। संवैधानिक लोकतंत्र में अनेक संस्थाएं हैं। भारतीय लोकतंत्र अति प्राचीन है। जब भारत में लोकतंत्र फल-फूल रहा था तब प्लेटो जैसे विद्वान लोकतांत्रिक मूल्यों पर चिंतन कर रहे थे। प्लेटो ने लिखा है कि जनतंत्र समान और असमान को समान भाव से एक तरह की समानता प्रदान करता है।’ प्लेटो के अनुसार जनतंत्र में अव्यवस्था है। भारतीय लोकतंत्र के लिए भी अव्यवस्था की बात कही जा सकती है। इसके लिए भी महत्वपूर्ण मुद्दों पर राष्ट्रीय विमर्श जरूरी है। संविधान निर्माताओं ने उद्देशिका में ही सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय के साथ प्रतिबद्धता व्यक्त की है। व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता अखंडता सुनिश्चित करने वाली, बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ़संकल्प व्यक्त किया है। चुनाव इन सब पर चर्चा और विमर्श का महत्वपूर्ण अवसर है।
Date: 20-05-24
दूषित जल का गहराता संकपंकज चतुर्वेदी, ( लेखक पर्यावरण मामलों के जानकार हैं )
पिछले दिनों दिल्ली से सटे गाजियाबाद की एक हाउसिंग सोसायटी में दूषित पानी के कारण सात सौ से अधिक लोगों को डायरिया हो गया। दूषित पानी से नहाने के चलते त्वचा रोग के मरीज तो लगभग हर घर में हैं। गाजियाबाद-नोएडा में यह हाल करीब हर ऊंची इमारतों वाली सोसायटी का है। यहां अधिकांश में जल आपूर्ति भूमिगत जल से है और पीने के पानी का आश्रय या तो बोतलबंद पानी या फिर खुद के आरओ हैं। आज देश के अन्य हिस्सों में भी कमोबेश यही स्थिति है। देश के अलग-अलग हिस्से अब नल से बदबूदार पानी आने या फिर हैंडपंपों से गंदे पानी की शिकायतों से परेशान हैं। पानी धरती के लिए प्राण है, लेकिन यदि जल दूषित हो जाए तो यह प्राण हर भी सकता है। पांच साल पहले पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सात जिलों में पीने के पानी से कैंसर से मौत का मसला जब गर्माया तो एनजीटी (नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल) में प्रस्तुत रिपोर्ट ने इसका कारण हैंडपंपों का दूषित पानी पाया गया। जबकि 2016 में ही एनजीटी ने नदी किनारे के हजारों हैंडपंप बंद कर गांवों में पानी की वैकल्पिक व्यवस्था के आदेश दिए थे। हालांकि, कुछ हैंडपंप बंद हुए, कुछ पर लाल निशान लगाने की औपचारिकता हुई, मगर साफ पानी का विकल्प न मिलने से मजबूर ग्रामीण वही जहर पी रहे हैं। तमाम सरकारी योजनाओं पर अरबों रुपये खर्च भी हुए, लेकिन आज भी करीब 3.77 करोड़ लोग हर साल दूषित पानी के इस्तेमाल से बीमार पड़ते हैं। अनुमान है कि पीने के पानी के कारण बीमार होने वालों से 7.3 करोड़ कार्य दिवस बर्बाद होते हैं। इससे आर्थिकी को करीब 39 अरब रुपये का नुकसान होता है।
हर घर जल की केंद्र की योजना इस बात में तो सफल रही है कि गांव-गांव में हर घर तक पाइप बिछ गए, लेकिन आज भी इन पाइपों में आने वाला 75 प्रतिशत पानी भूजल है। गौरतलब है कि ग्रामीण भारत की 85 प्रतिशत आबादी अपनी पानी की जरूरतों के लिए भूजल पर निर्भर है। एक तो भूजल का स्तर लगातार गहराई में जा रहा है। दूसरा भूजल एक ऐसा संसाधन है, जो यदि दूषित हो जाए तो उसका निदान बहुत कठिन होता है। यह बात संसद में बताई गई है कि देश में करीब 6.6 करोड़ लोग अत्यधिक फ्लोराइड युक्त पानी के घातक नतीजों से जूझ रहे हैं। उन्हें दांत खराब होने, हाथ-पैरे टेढ़े होने जैसे रोग झेलने पड़ रहे हैं। जबकि करीब एक करोड़ लोग अत्यधिक आर्सेनिक वाले पानी के शिकार हैं। कई जगहों पर पानी में आयरन की ज्यादा मात्रा भी बड़ी परेशानी का सबब है। नेशनल सैंपल सर्वे आफिस (एनएसएसओ) की 76वीं रिपोर्ट बताती है कि देश में 82 करोड़ लोगों को उनकी जरूरतों के मुताबिक पानी नहीं मिल पा रहा है। महज 21.4 प्रतिशत लोगों को ही घर तक सुरक्षित जल उपलब्ध है। सबसे दुखद है कि नदी-तालाब जैसे भूतल जल का 70 प्रतिशत हिस्सा बुरी तरह प्रदूषित है। सरकारें इस बात को स्वीकार कर रही हैं कि 78 प्रतिशत ग्रामीण और 59 प्रतिशत शहरी घरों तक स्वच्छ जल उपलब्ध नहीं है। यह भी विडंबना है कि हर घर तक पानी पहुंचाने की परियोजनाओं पर 89,956 करोड़ रुपये से अधिक खर्च होने के बावजूद सरकार इस लक्ष्य को प्राप्त करने में विफल रही है। आज भी लगभग 19,000 गांव ऐसे हैं, जहां पीने के साफ पानी का कोई नियमित साधन नहीं है।
पूरी दुनिया में खासकर विकासशील देशों में जलजनित रोग एक बड़ी चुनौती हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) और यूनिसेफ का अनुमान है कि अकेले भारत में हर रोज 3,000 से अधिक लोग दूषित पानी से उपजने वाली बीमारियों के शिकार हो रहे हैं। गंदा पानी पीने से दस्त और आंत में सूजन, पेट में दर्द और ऐंठन, टायफाइड, हैजा, हेपेटाइटिस जैसे रोग अनजाने में शरीर में घर बना लेते हैं। ये भयावह आंकड़े सरकार के ही हैं कि भारत में एक बड़ी संख्या में बच्चे हर साल गंदे पानी से उपजी बीमारियों के चलते मर जाते हैं। देश के 158 जिलों के कई हिस्सों में भूजल खारा हो चुका है और उनमें प्रदूषण का स्तर सरकारी सुरक्षा मानकों को पार कर गया है। हमारे देश में ग्रामीण इलाकों में रहने वाले तकरीबन 6.3 करोड़ लोगों को पीने का साफ पानी तक मयस्सर नहीं है। इसके कारण बीमारियों के साथ-साथ कुपोषण के मामले भी बढ़ रहे हैं। पर्यावरण मंत्रालय और केंद्रीय एजेंसी ‘एकीकृत प्रबंधन सूचना प्रणाली’ (आइएमआइएस) द्वारा 2018 में पानी की गुणवत्ता पर कराए गए एक सर्वे के मुताबिक राजस्थान में सबसे ज्यादा 19,657 बस्तियां और यहां रहने वाले 77.70 लाख लोग दूषित पानी पीने से प्रभावित हैं। आइएमआइएस के मुताबिक पूरे देश में 70,736 बस्तियां फ्लोराइड, आर्सेनिक, लौह तत्व और नाइट्रेट सहित अन्य लवण एवं भारी धातुओं के मिश्रण वाले दूषित जल से प्रभावित हैं। इस पानी की चपेट में 47.41 करोड़ आबादी आ गई है।
देश में पेयजल से इस जहर के प्रभाव को शून्य करने के लिए जरूरी है कि पानी के लिए भूजल पर निर्भरता कम हो और नदी-तालाब आदि सतही जल में गंदगी मिलने से रोका जाए। वैसे तो भूजल के अंधाधुंध इस्तेमाल को रोकने और भूजल को दूषित करने वालों पर अंकुश के लिए कानून बनाए गए हैं, लेकिन ये कागजों से बाहर नहीं आ पाए हैं। नदी-तालाब को जहरीला बनाने में तो किसी ने भी कसर छोड़ी नहीं है। आज समाज को 20 रुपये का एक लीटर पानी पीना मंजूर है, परंतु पीढ़ियों से सेवा कर रहे पारंपरिक जल-संसाधनों को सहेजना नहीं। यह अंदेशा सभी को है कि आने वाले दशकों में पानी को लेकर सरकार और समाज को बेहद मशक्कत करनी होगी। वह दिन नहीं देखना पड़े इसके लिए जरूरी है कि सभी एकजुट होकर पानी और इसके स्रोतों को बचाने में जुट जाएं।
Date: 20-05-24
लोकतंत्र की रोटी है मतदानआमिर खान
मतदाताओं को जागरूक करने के लिए कई संस्थाएं और संगठन सक्रिय हैं। उनका मकसद होता है कि ज्यादा-से-ज्यादा मतदाता वोट देने के लिए मतदान केंद्रों तक पहुंचें। इन अभियानों में लोकतंत्र और मतदान के रिश्तों को लेकर नई भाषा और मुहावरे भी विकसित हो रहे हैं। दिल्ली के दक्षिण पूर्व जिले में मतदाताओं के बीच चलने वाले पार्क टोली के अभियान में व्यक्तियों की सेहत से जुड़ी भाषा और मान्यताओं का इस्तेमाल किया जा रहा है। पार्क टोली का मानना है कि नागरिक अपनी सेहत को लेकर जागरूक हुए हैं। इस क्षेत्र में भी मतदाता बड़ी तादाद में पाकरे और उन स्थानों पर सुबह-शाम जाते हैं, जहां हरियाली और स्वच्छ वातावरण होता है। टोली बता रही है कि व्यक्ति का स्वास्थ्य लोकतंत्र के स्वास्थ्य से जुड़ा है।
जैसे कोई व्यक्ति भूखे नहीं रह सकता है। उसे जितना मिलता है, और भूख के समय जो खाने के लिए हासिल हो सकता है, उसे वह खाता है। वैज्ञानिक तथ्य है कि भूखे रहने से शरीर कमजोर और बीमार हो सकता है। इसी तरह हर मतदाता अच्छे से अच्छा प्रतिनिधि चुनने की कोशिश में अपने मताधिकार का इस्तेमाल करता है, लेकिन वोट का इस्तेमाल नहीं करना तो लोकतंत्र को भूखा रखने जैसा है। टोली बताती हैं कि मताधिकार लोकतंत्र के लिए रोटी जैसा है, और मतदान करना हर मतदाता की जिम्मेदारी है। चुनाव में लोग हिस्सा लेते हैं तो पूरे देश के लिए उन नीतियों और कार्यक्रमों के प्रति समर्थन जाहिर करते हैं, जो राजनीतिक पार्टयिां अपने चुनावी घोषणापत्र में दर्ज करती हैं। चुनाव गणतंत्र में स्वायत्तता के विचार को सुनिश्चित करता है। राज्यों के चुनाव अपनी विविधता की संस्कृति को मजबूत करते हैं। स्थानीय निकाय के चुनाव बुनियादी सुविधाओं के लिए लोगों की राय जाहिर करने के माध्यम होते हैं। इस तरह हर चुनाव की भी अपनी जरूरत है, जो मतदान के जरिए ही पूरी की सकती है।
1947 में भारत को जो आजादी हासिल हुई, उसका अर्थ ही है कि देश के लोग अपनी सरकार बना सकें। उन्हें अधिकार मिला कि वे अपना मत दें, लेकिन इस अधिकार के साथ मतदाताओं को इस तरह से जिम्मेदार भी बनाया गया है कि उनका वोट केवल उनका वोट नहीं है। उनके वोट में आबादी के बड़े हिस्से का वोट भी शामिल है। जो लोग वोट देने जाते हैं, वे केवल अपना वोट नहीं देते हैं, बल्कि उनके वोट में वे वोट भी शामिल होते हैं, जो वोट नहीं दे सकते। बच्चे, लाचार, कमजोर लोग भी होते हैं। एक वोट में परिवार और कॉलोनी के कई लोगों का वोट होता है। लेकिन जब कोई वोट के अधिकार का इस्तेमाल नहीं करता है तो एक साथ कई लोगों को सरकार बनाने में वोट के अधिकार से वंचित कर देता है। 2019 के लोक सभा चुनाव के आंकड़े बताते हैं कि 89.6 करोड़ मतदाता थे। इनमें से 60 करोड़ 37 लाख मतदाताओं ने ही वोट दिया। कम लोग वोट देते हैं, तो इससे लोकतंत्र और संविधान के प्रति नागरिकों की जिम्मेदारी के भाव कमजोर होते हैं। पार्क टोली दिल्ली के दक्षिण पूर्व जिले में अपने अभियान में मतदाताओं के बीच फैली एक और प्रवृत्ति की तरफ ध्यान खींचती हैं। मतदाता समझता है कि वह एक उम्मीदवार को वोट देने जाता है। इस तरह की सोच लोकतंत्र के विचारों को कमजोर करती है। मतदाता अपने प्रतिनिधि का चुनाव करने के लिए मताधिकार का इस्तेमाल करता है। जिस उम्मीदवार को सर्वाधिक वोट मिलते है, वह सदन में प्रतिनिधित्व करने का अधिकारी होता है।
जिस उम्मीदवार को कम वोट भले वह सामाजिक प्रतिनिधि होता है। यह लोकतंत्र के लिए बेहतर से बेहतर प्रतिनिधित्व के लिए प्रतिस्पर्धा की कड़ी को मजबूत करता है जो लोकतंत्र को बनाए रखने के लिए जरूरी है। सोचना उचित नहीं है कि मताधिकार का इस्तेमाल सबसे ज्यादा वोट पाने वाले किसी उम्मीदवार के लिए ही हो सकता है। वोट का महत्त्व इसमें भी है कि सभी व्यस्क नागरिकों को यह अधिकार मिला है। वे चाहें अमीर हों या गरीब। स्त्री हों या पुरु ष या अन्य जेंडर के हों। ग्रामीण हों या शहरी। शिक्षण संस्थानों से डिग्री प्राप्त हों या नहीं। अंग्रेजों ने संपत्ति वालों को ही वोट का अधिकार दिया था। पार्क टोली का अभियान मतदाताओं के बीच नई तरह की जागरूकता विकसित कर रहा है। इस अभियान में पत्रकारिता का प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे छात्र खासी तादाद में हिस्सा ले रहे हैं। वैसे मतदान बढ़ाने के लिए केंद्रीय चुनाव आयोग की महती भूमिका रही है। खासकर, देश के प्रमुख शख्सियतों को ब्रांड एंबेस्डर बनाकर आयोग ने नि:संदेह जनता को जागरूक करने में कोर-कसर नहीं छोड़ी है। इस तरह के अभियान कुछ हफ्तों के अंतराल पर जरूर होने चाहिए। क्योंकि यह सर्वविदित है कि देश में कहीं-न-कहीं चुनाव होते ही रहते हैं।
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हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने हिंदू विवाह में अपेक्षित विवाह समारोह या सप्तपदी की अनिवार्यता को रेखांकित किया है। और कहा है कि इसके बिना हिंदू विवाह अमान्य है।
न्यायालय की ओर से दिए गए कुछ बिंदु –
न्यायालय की यह नई व्यवस्था कितनी मान्य ?
न्यायालय का यह निर्णय विवाह से जुड़ी अनेक मान्यताओं के लिए बहुत निराशाजनक है। हमारे देश में अलग-अलग प्रांतों से जुड़ी विवाह की अनेक रीतियां हैं। जरूरी नहीं कि उनमें सप्तपदी और न्यायालय द्वारा अपेक्षित संस्कारों का पालन किया जाता हो।
इसके अलावा ‘कोर्ट मैरिज’ के प्रावधान का क्या होगा? यह तो न्यायालय द्वारा प्रदत्त विवाह का एक तरीका ही है न।
दूसरी ओर, हिंदू विवाह अधिनियम ने समय के साथ-साथ स्वयं ही विवाह की अनेक प्रथाओं को धूमिल कर दिया है। इसमें कर्नाटक की अलियासंतना और केरल की मरूमक्कथयम जैसी मातृवंशीय प्रथाएं हैं, जो लगभग लुप्तप्राय हो चुकी हैं।
कुल मिलाकर, हमें स्पेशल मैरिज एक्ट के एक नए संस्करण की आवश्यकता है, जहाँ सरकार कानून और नागरिकों के बीच इंटरफेस की तरह काम कर सके, और उनका मार्गदर्शन कर सके।
विभिन्न समाचार पत्रों पर आधारित। 3 मई, 2024
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31 जनवरी 2025 से शुरू होकर अगले दस माह में भारतीय सरकारी बॉन्ड ब्लूमबर्ग के बॉन्ड सूचकांक में शामिल हो जायेंगे।
यह जेपी मार्गन के बाद भारतीय सरकारी बॉन्डों को शामिल करने वाला दूसरा वैश्विक सूचकांक होगा।
ऐसा होना मुख्यतः भारत की वैश्विक आर्थिक शक्ति का एक प्रमाण प्रस्तुत करता है।
लाभ –
लेकिन यह एक दुधारी तलवार की तरह होता है। अधिक विदेशी निवेश के लिए बेहतर एवं अधिक चुस्त वृहद् आर्थिक प्रबंधन की आवश्यकता होगी।
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Date: 18-05-24
Murder Of TreesCompensatory plantations cannot replace a forest.TOI Editorials
Supreme Court on Thursday directed Forest Survey of India to investigate how many trees have been felled in the Aravallis’ outcrop – Southern Delhi Ridge sector – since Feb 16 to build an 11km road. SC was dismayed that tree-felling had started before forests ministry gave a prelim permission on March 1. Court took to task DDA’s vice-chairperson – saying it was criminal contempt of court to allow the felling to continue though SC had rejected DDA permission for the same.
No stopping them | Daylight murder is what the felling of trees in Delhi’s Ridge Area is. The abandon with which the triad of authorities in National Capital Region spanning Rajasthan, Delhi and Haryana routinely sidestep SC orders, and work in cahoots with land mafia and illegal mining outfits to level the Aravallis and Delhi Ridge is well-established. In this case, DDA, the urban development planner for the dustbowl heat-island capital of a $3.7 trillion economy, is in the dock for wilful environmental degradation. Nothing is stopping the loot.
No saving forests | Compensatory afforestation, 100 trees to be planted for every tree felled, that SC has directed DDA to do, is a useless measure. Compensatory afforestation simply puts a price on trees, making them a commodity. It puts forests into a business model. But reality is that chopping down forest stretches destroys entire ecosystems of microflora and fauna, multiple species and habitats of tree-dwelling creatures. Afforestation is invariably a monoculture, and no matter how many saplings are replanted, they can never replace a forest. Compensatory afforestation is a dead-end.
Date: 18-05-24
Stay investedIndia should not tailor its ties with Iran to U.S. foreign policy changes.Editorial
By signing a 10-year agreement with Iran to develop and operate the Chabahar port, India has taken its infrastructure and trade partnership with the Islamic Republic to the next level despite tensions in West Asia. India will invest $120 million and offer a credit facility of $250 million to further develop the terminal it operates in Chabahar’s Shahid Beheshti port and related projects. However, after the deal was signed, the U.S. State Department said entities considering business deals with Iran “need to be aware that they are opening themselves up to and the potential risk of sanctions”. In the past, American sanctions on Iran had delayed the project. Conceived in 2003, the project did not take off for years after the U.S. and the UN imposed sanctions on Tehran over its nuclear programme. India signed a memorandum of understanding in 2015 after Washington eased sanctions on Iran following that year’s nuclear agreement, and in 2016, the contract was executed during Prime Minister Narendra Modi’s Iran visit. The U.S.’s unilateral withdrawal from the nuclear deal in 2018 and reimposition of sanctions on Iran raised questions on India’s continued cooperation with Tehran. But India managed to win a carve-out from U.S. sanctions that allowed it to operate the port through ad hoc measures.
The Chabahar port is critical for India’s connectivity plans. First, it offers an alternative route to Afghanistan and Central Asia by bypassing Pakistan, allowing better trade with Central Asia. And, Chabahar is expected to be connected to the International North-South Transport Corridor (NSTC), bringing India closer to Europe through Iran, Azerbaijan and Russia. An alternative to the Suez route, a fully operational NSTC would reduce the time and money spent on intercontinental trade. The port, roughly 200 km from Pakistan’s Gwadar, where China is developing a port as part of its BRI, would also help India expand its geopolitical influence in Central Asia. But the U.S. seems to have taken a narrow view of the project over its hostility with Iran. America’s interests in the region have also changed. In 2018, when U.S. forces were backing the Islamic Republic government in Afghanistan, it gave a sanctions waiver to India as Kabul also stood to benefit from the port project. Today, U.S. troops are out of Afghanistan, the Taliban has replaced the Islamic Republic, and the U.S.’s focus is on containing Iran. India, in the past, had taken U-turns in its Iran engagement depending on the policy changes in Washington DC. It should not do that any more. It should stay invested in Chabahar and seek to improve its trade and connectivity projects with Central Asia, which is essential for India’s continued rise.
Date: 18-05-24
The burning hills of UttarakhandDhananjay Mohan, [ In-charge, Head of Forest Force in Uttarakhand. ]
1 of 5 A forest fire in Nainital district in Uttarakhand on May 6, 2024. Since November 2023, when forest fires began to rage, there have been 1,038 incidents in the State. Shashi Shekhar Kashyap
Five people were killed in May in forest fires that have been raging in Uttarakhand since last November. The forest department attributes the fires to out-migration, high-tension wires, and the abundance of pine trees, while the State government has said in the Supreme Court that the fires are completely manmade. Ishita Mishra travels across the State and finds that villagers, mostly women, are helping extinguish the flames
On May 2, Gyanu Chalaune and his wife Basanti trudged up the hills in Sunrakot village in the scenic district of Almora in Uttarakhand to collect resin from the chir pine trees in the forest. The couple had moved from Nepal to Uttarakhand just last year for a better life and education for their three children. The temperature that morning was above 30°C. They worked to extract the resin, called leesa in the hills, for Ramesh Bakuni, a contractor. They earned ₹50,000-60,000 if they worked for 10 hours a day for six months.
As they were getting ready to leave, the couple heard a scream. They saw a man running on the hilltop, desperately trying to shake off flames that had engulfed him. They realised with horror that he was Deepak Pujara, a friend. The Chalaunes scrambled to the hilltop and found Pujara’s wife, Tara, lying on the ground, half burnt. Quickly, they broke a green branch off a nearby tree and began hitting Pujara, even as their clothes caught fire. Before anyone could help them, the four victims were severely burnt. All of them succumbed to injuries in hospital.
Bakuni did not have the courage to break the news to Chalaune’s children for days. “They have been playing in my garden for months. I didn’t have the heart to tell them what had happened,” says Bakuni, who is worried that people will no longer work for him. The children are now under the care of their uncle in Nepal’s Bajhang district, from where they came.
Five people have been killed and four injured in forest fires in Uttarakhand this year. According to a 2019 report of the Forest Survey of India, Uttarakhand has a recorded forest area of 38,000 square kilometres, which is 71.05% of its geographical area. Since November 2023, when forest fires began to rage, there have been 1,038 incidents that have gutted 1,385.5 hectares (ha) of forest land till May 10. While authorities have dismissed these as “annual affairs” in the hills, the cost of these fires has been borne by the people whose lives depend on the mountains.
Flame of the forest
A booklet on the Uttarakhand forest department website says increasing migration of people from here to other States, which has left the hills barren; high-tension wires; and the abundance of chir pine trees, which are highly inflammable in nature, are the main reasons for forest fires. While the youth don’t know how to tackle forest fires because the current academic curriculum does not educate them about the environment, older generations, who predominantly populate the hills, are unable to climb the hilltops to control the fires, the booklet says.
“People in [the] hills are now getting cooking gas under [the] ambitious Ujjawala scheme of the Central government and hence, villagers have stopped going to forests in [the] hills to collect wood for cooking, which is also a reason for increasing forests fires,” it adds.
Dhananjai Mohan, who is in charge of the Head of Forest Force in Uttarakhand, says surfaces have become drier because of an excessive dry spell and less snowfall than usual this year. This has caused fires to spread faster in the forests, which are full of pine trees. According to the forest department website, Uttarakhand has 3,94,383.84 ha of chir pine forests. Chir pine trees constitute 15% of the 13 varieties of trees in the State.
“In this environment already conducive to fires, forest fires spread quickly when villagers burn stubble in the fields. Villages and forests are interspersed in the State. Forest fires also occur when people leave burnt cigarettes in the forest or set forests on fire to clear the land in the belief that it will boost the growth of fodder,” he says.
Dousing fires for a mango drink, biscuits
It is May 6. In Almora’s Sitlakhet, located 1,900 meters above sea level in the Kumaon Himalayas, the hills, laden with tall trees, which were once green, are not visible from the balconies of homes in the villages; they have disappeared under a thick cover of smog.
The trees are now black, and the ashes of burnt pine leaves cover the forest floor. The mountains, which always promise clean and cool air, radiate heat. Instead of the aroma of flowers, the smell of burnt wood lingers in the air.
Around 20 women from Sitlakhet and the nearby Bhakar village come down from a hilltop after dousing a forest fire. Using green bushes, their only weapon against the towering flames, they worked hard for 10 hours. Their clothes are soaked in sweat and ash; they look exhausted.
The women belong to a 300-member group in Sitlakhet called ‘Jungle Ke Dost (friends of forests)’. Their mentor is Gajendra Pathak, 56, a pharmacist in a local healthcare centre who brought these women and some men together in a community initiative last year to tackle forest fires. On his call, the members of the group, mostly women, set out to put out fires.
In return for their effort, the women are offered nothing but a 125 millilitre tetra pack of Frooti, a popular, sweet mango-flavoured drink; and some biscuits. Pathak has ordered these, and the forest ranger, Manoj Lohani, has paid for them. The women tie the packets to the corner of their sarees to take home for their children.
One of them, Indumati, a housewife, is desperate to go home. “Sir, please take me,” she says to Pathak, who is with them. “My six-month-old child must be hungry. I breastfed him at 10 a.m. before coming here. It’s 6:30 p.m. now,” she says, as she wipes her worn-out slippers.
Pathak stops a Jeep passing by and asks the women to sit inside. Lohani gives a few of the women a gardening rake before they climb into the vehicle They use this to clear the forest line so that fires can be stopped early.
“These women are the reason you see some greenery around. Otherwise, the forest fires would have ruined everything. It is sad that we are not in a position to do anything for them. They risk their lives to save our mountains,” says Pathak, who feels that the government must provide life insurance for the people of the State who help mitigate forest fires.
On being asked why there are more women than men in the group, Debuli Devi, 65, says, “Ye aadmi hi to jungle main aag lagate hain. Woh kya ise bhujayenge? (It is the men who set the forest on fire. How will they douse the fire?)“
Similarly, in Patwa Dagar village of Nainital district, Sunil Rawat says he has helped extinguish more than 20 forest fires since April 19. “Sitlakhet is not the only place where this happens. Villagers across the State come in large numbers to support the forest department, which has now woken up from a deep slumber, to control these incidents,” he says.
The District Forest Officer of Nainital, Chandra Shekhar Joshi, says the forest department has sent a proposal to the State government asking for remuneration for the villagers who help mitigate fires. Nainital district, with the largest forest area (70.67%) in the State, has around 300 forest fire watchers on its rolls. Half of them are women.
Of the recorded forest area of 38,000 sq km in Uttarakhand, the forest department manages 26.5 lakh ha of reserved forests where human intervention is banned, while van panchayats, or community-led forest managers, manage 7.32 lakh ha. As per a forest department bulletin, there is greater damage to reserved forests than to the area managed by the van panchayats.
After the recent fires, the State government announced insurance cover of ₹3 lakh for 4,000 contract employees of the forest department.
Playing politics
On May 8, the Uttarakhand government said in the Supreme Court that “all the instances of forest fires are manmade.” It informed the Court that 388 criminal cases had been registered across the State against those found setting the forests on fire. In most cases, people who were arrested had attempted to burn stubble, but had failed to control the fires which spread due to strong winds, the government said.
The 380-page interim status report submitted by the government in Court said that a section of the media had reported that 40% of Uttarakhand was burning, which was “misleading”, and that only 0.1% of forest cover was affected by fires. The State informed the Court that the State Disaster Response Force and the National Disaster Response Force had been deployed to tackle the forest fires. The Indian Air Force was using Bambi Buckets (collapsible containers that hang from a helicopter and release large amounts of water in targeted areas) to douse the flames, it said.
The government added in the report that the Uttarakhand Forest Fire Mitigation Project 2023-28 was pending with the Central government. The report also said that forest fires were not “new” in the State and that there was no longer an “emergency” situation.
The government informed the Court that it is tying up with IIT Roorkee to explore the option of cloud seeding to increase precipitation and trigger rainfall. Dismissing this solution, the Court said “cloud seeding or depending on [the] rain gods is not the answer” to forest fires.
The next day, after rains, the government claimed credit for having “controlled” the forest fires completely. But fires have raged on. On May 17 alone, 11 forest fires were reported.
On the same day, the Court adjourned the case to September 2024 after expressing satisfaction with the State’s response on the measures it was taking to tackle the problem. The State said that it had used the entire Compensatory Afforestation Fund for firefighting and fire prevention and was filling up vacant posts at the field level in the forest department, among other things.
The Congress was quick to use this issue in its Lok Sabha election campaign to target the State government, led by the Bharatiya Janata Party (BJP). “While fires continued to burn the forests in April, Chief Minister Pushkar Singh Dhami was busy travelling to other States to campaign for BJP candidates. Even the Forest Minister, Subodh Uniyal, was campaigning in Assam,” said Garima Dasauni, the spokesperson of Congress.
After completing his campaign, Dhami met with officials and ordered the police to charge those found setting the forests on fire with the Gangster Act and the Uttarakhand Public and Private Property Damage Recovery Act, 2024.
Where solutions lie
Pathak believes that great injustice is being done to the chir pine tree, which many people in Uttarakhand hold as the main culprit of the fires. “This tree, which hardly needs maintenance, is a major source of timber and fuel wood. Its trunk is used to make furniture. Its leaves are used for decoration. Its bark is a source of charcoal, resin, and coal tar, which are not just used by villagers, but also sold to earn money,” he says. “Is there any other tree which gives us so much?”
The State has developed a concept to generate electricity from pine needles, which fall from the trees from mid-March until the onset of rains in July every year. But the low price offered for the collection of these needles is not helping.
This year, Dhami announced the start of a scheme, Pirul Lao-Paise Pao (bring pine leaves and get money), under which the State purchases pine leaves at the rate of ₹50 per kg, much higher than the ₹3 per kg, which has been the rate so far.
Pathak suggests that the government focus more on community participation to mitigate forest fires. He also believes that the Assisted Natural Regeneration (ANR) technique should be adopted across the State. This simple and low-cost forest restoration method involves facilitating the natural regeneration of degraded or deforested lands by providing favourable conditions for the growth of indigenous tree species. It involves a range of techniques such as the removal of invasive species, the creation of microsites for establishing seedlings, and the protection of natural regeneration from grazing and other disturbances. “ANR will not even cost half of what the government spends on planting trees. And finally, what we see of the government’s initiative is not even 10% of the total saplings planted,” he says. Establishing a fire line across the mountains is crucial to mitigate fires, he adds.
The forest fires in Uttarakhand have also ignited communal flames after a video emerged of young men celebrating, even as fires raged behind them. Some people accused Muslims of setting the forests on fire to “take revenge” on the State government which introduced a Uniform Civil Code and embarked on an “anti-encroachment drive” in Haldwani in February, which sparked riots. The police arrested the men, who hailed from Bihar and claimed to have recorded the video to gain some ‘likes’ on Instagram.
While the fires are being doused, Hemant Dhyani, from Ganga Avahan, an NGO which works to save the river Ganga, worries about the snowball effect of recurring forest fires. “Forests get burnt in fires. This reduces the strength of the mountains and the soil. When it rains, the loose soil fails to retain water and impacts ground water rejuvenation, causing flash floods. As the loose boulders crash and water also gushes down, landslides occur,” he explains
Ravi Chopra, an environmentalist from Uttarakhand, says the forest department in the State has “very few or no capabilities” to control forest fires. “Nothing can be done to mitigate forest fires unless they empower the local people and take them into confidence,” he says.
Date: 18-05-24
मतदाताओं की उदासीनता के कारणराज कुमार सिंह, ( लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं )
लोकसभा चुनाव अब समापन की ओर हैं, मगर इसे लेकर संतोष से ज्यादा चिंता की लकीरें नजर आ रही हैं। चुनाव आयोग चिंतित है कि मतदाताओं को प्रेरित करने की कवायद के बावजूद मतदान में कमी क्यों? चुनाव से ही सत्ता बनती-बिगड़ती है। इसलिए राजनीतिक दल और नेता चिंतित हैं कि कम मतदान किस पर भारी पड़ेगा। दोनों के लिए ही कम मतदान का ठीकरा मौसम पर फोड़ना सुविधाजनक है। बेशक गर्मी तो है, पर 2014 के लोकसभा चुनाव भी कमोबेश ऐसे ही मौसम में हुए थे, जब संसदीय चुनाव में रिकार्ड 66.44 प्रतिशत मतदान हुआ था। स्थितियों की मांग है कि सहज सुलभ बहानों के बजाय वास्तविक कारणों की पड़ताल की जाए। चुनाव कार्यक्रम की घोषणा के समय भी आयोग को पता होगा कि मई-जून में गर्मी चरम पर होगी। फिर मतदान सात चरणों तक क्यों खींचा गया? मतदान केंद्रों की दूरी कम क्यों नहीं रखी गई? पेयजल जैसी मूलभूत सुविधा भी सभी केंद्रों पर सुनिश्चित क्यों नहीं हुई? मतदाता सूचियां त्रुटिरहित क्यों नहीं? ग्रामीण मतदाताओं के लिए यह बड़ी समस्या है। मतदान केंद्रों के बाहर पहचान पत्र की जांच के नाम पर सुरक्षाकर्मी परेशान क्यों करते हैं? माना कि मतदान मतदाताओं का अधिकार और कर्तव्य है, पर यह उनकी परीक्षा नहीं। चुनाव परीक्षा है आयोग के प्रबंधन और राजनीतिक दलों की गतिविधियों की, जिसमें मतदाता उनके परीक्षक होते हैं।
राजनीतिक दलों और उम्मीदवारों की चिंता अपने समर्थकों द्वारा अधिकाधिक मतदान के जरिये अपनी जीत सुनिश्चित करने तक सीमित है। कुल मतदान प्रतिशत में कमी के असर की आशंका से उन पर मानसिक दबाव तो बढ़ता है, लेकिन स्वस्थ लोकतंत्र के हित में मतदान का प्रतिशत बढ़े, वे ऐसा प्रयास करते नहीं दिखते। अमूमन ज्यादा मतदान को सत्ता विरोधी लहर और कम मतदान को यथास्थिति का संकेत मान लिया जाता है, लेकिन अतीत के परिणाम इस पर एकमत नहीं। कम मतदान के बावजूद सत्ता परिवर्तन हुए तो ज्यादा मतदान के बाद भी यथास्थिति बरकरार रही। 1998 में जब मतदान चार प्रतिशत बढ़ा तो लोकसभा में भाजपा की सीटें बढ़कर 182 हो गईं, लेकिन अगले साल हुए चुनाव में मतदान में एक प्रतिशत कमी के बावजूद वह काफी सीटें बरकरार रखने में सफल रही। 2004 में मतदान 1.7 प्रतिशत कम हुआ। फिर भी अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली राजग सरकार विदा हो गई, जबकि ओपिनियन पोल उसकी जीत की भविष्यवाणी कर रहे थे। तब मतदान का राष्ट्रीय औसत तो 58.7 प्रतिशत रहा, लेकिन उत्तर प्रदेश, बिहार और गुजरात जैसे राज्यों में वह 50 प्रतिशत से नीचे चला गया, जबकि पहली बार देश भर में ईवीएम से चुनाव कराए गए थे।
वर्ष 2014 में सर्वाधिक 66.44 प्रतिशत मतदान हुआ, जो उससे पिछले लोकसभा चुनाव से सात प्रतिशत ज्यादा था। परिणामस्वरूप तीन दशक बाद किसी एक दल के रूप में भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिला। भाजपा ने बहुमत से भी 10 अधिक 282 सीटें जीतीं। 2019 में मतदान 1.7 प्रतिशत बढ़ा और भाजपा की सीटें भी बढ़कर 303 हो गईं। कम या ज्यादा मतदान प्रतिशत से चुनाव परिणाम पर पड़ने वाले असर के स्पष्ट निष्कर्ष को लेकर भ्रम के बावजूद मतदाताओं में कम या ज्यादा उत्साह के कारण समझने की कोशिश की जा सकती है। 1996 के लोकसभा चुनाव में सबसे बड़े दल के रूप में उभरने के बावजूद वाजपेयी के नेतृत्व में बनी भाजपा सरकार मात्र 13 दिन चल पाई, क्योंकि समता पार्टी जैसे अपवादों के अलावा राजनीतिक अस्पृश्यता के चलते अन्य दल समर्थन देने को तैयार नहीं हुए। कांग्रेस के बाहरी समर्थन से एचडी देवेगौड़ा और इंद्र कुमार गुजराल के नेतृत्व में बनीं संयुक्त मोर्चा सरकारें कुछ ही महीनों की मेहमान साबित हुईं। संभव है कि उसका मतदाताओं पर प्रभाव पड़ा हो, जो अधिक मतदान प्रतिशत में नजर आया और जिसका लाभ भाजपा को 1998 और 1999 के चुनाव में मिला। इसी तरह 2014 में मनमोहन सिंह के नेतृत्व में कांग्रेसनीत संप्रग सरकार न सिर्फ नीतिगत जड़ता की शिकार नजर आई, बल्कि उसमें कई बड़े घोटाले भी उजागर हुए। इसके बाद हुए चुनाव में भाजपा को स्पष्ट बहुमत मिला। फिर 2019 के लोकसभा चुनाव में मतदान का प्रतिशत और भाजपा की सीटें बढ़ीं, क्योंकि पुलवामा और बालाकोट से उपजा राष्ट्रवाद का तात्कालिक मुद्दा एक बड़ा कारक रहा। बेशक भाजपा के पास विशाल संगठन के साथ ही उसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से भी सहयोग और शक्ति मिलती है, लेकिन इस सच से इन्कार नहीं किया जा सकता कि 2014 और 2019 के लोकसभा चुनाव में उसकी भारी जीत के सबसे निर्णायक कारक स्वयं नरेन्द्र मोदी रहे।
अगर 2024 के लोकसभा चुनाव में मतदाताओं में वैसा उत्साह नजर नहीं आ रहा तो कारण किसी कारक विशेष की अनुपस्थिति और राजनीतिक व्यवस्था की बिगड़ती छवि में भी खोजने होंगे। तभी हम मतदाता की उदासीनता का मर्म समझ पाएंगे। हमें कुछ सवालों के जवाब तलाशने होंगे। जैसे, वोटवालों से वादों और नोटवालों की चिंता करने वाली राजनीति बड़ी संख्या में नेताओं का खानदानी पेशा क्यों बन रही है? क्या धनबल और बाहुबल ने चुनाव प्रक्रिया को सत्ता का तिकड़मी खेल नहीं बना दिया है? क्या आम आदमी इतने महंगे चुनाव लड़ने की सोच भी सकता है? प्रत्याशियों के चयन का आधार क्या है? निष्ठा और नीति पर जीत की संभावना क्यों भारी पड़ जाती है? जनता के मुद्दे दलों के चुनावी मुद्दे क्यों नहीं बनते? कांग्रेस ने 55 साल शासन किया, किंतु जाति जनगणना की याद अब आ रही है? 80 करोड़ गरीबों को हर माह पांच किलो राशन मुफ्त देने पर सवाल उठाने वाली कांग्रेस चौथे चरण के बाद खुद 10 किलो राशन मुफ्त देने का वादा कर रही है। बेरोजगारी और महंगाई कम करने का ब्लूप्रिंट पेश करने के बजाय प्रचार अरबपति, आरक्षण और संविधान के इर्दगिर्द क्यों घूम रहा है? भाजपा दस साल के रिपोर्ट कार्ड पर वोट मांगने के बजाय पाकिस्तान, मंगलसूत्र और शहजादे का सहारा क्यों ले रही है? पाकिस्तान चूड़ियां पहने या कंगन, आम भारतीय का जीवन स्तर उससे कैसे बेहतर हो जाएगा? लगता है कि इस बार सत्ता के खिलाड़ी खुद मतदाता का मूड भांपने में भ्रमित हैं या फिर मतदान के बीच मुद्दे बदल कर उसे भरमाने की कोशिश कर रहे हैं।
Date: 18-05-24
कड़ी नसीहतसंपादकीय
सर्वोच्च न्यायालय ने एक बार फिर प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी को कड़ी नसीहत दी है। उसने व्यवस्था दी है कि अगर धनशोधन के मामले में किसी व्यक्ति के खिलाफ विशेष अदालत ने संज्ञान लिया है, तो ईडी उसे गिरफ्तार नहीं कर सकती। अगर आरोपी अदालत के बुलाने पर हाजिर होता है, तो उसे हिरासत में लेने के लिए ईडी को अदालत में आवेदन करना होगा और फिर न्यायालय बहुत जरूरी होने पर ही उसे हिरासत में भेजने का फैसला कर सकता है। धनशोधन निवारण अधिनियम की धारा 19 के तहत उसकी गिरफ्तारी नहीं की जा सकती। यह फैसला एक तरह से ईडी की उसकी सीमा बताने वाला है। इसी धारा के तहत ईडी किसी आरोपी को गिरफ्तार कर सकती है। अदालत ने स्पष्ट कहा है कि इस धारा के तहत गिरफ्तारी के बाद किसी आरोपी को जमानत देना मुश्किल हो जाता है। हालांकि एक वर्ष पहले भी सर्वोच्च न्यायालय ने ईडी को नसीहत दी थी कि धनशोधन मामले में गिरफ्तारियों को लेकर वह अतिरिक्त उत्साह न दिखाए। उसके बाद भी स्पष्ट निर्देश दिया था कि ईडी तभी किसी व्यक्ति को गिरफ्तार करे, जब उसके पास आरोपी के खिलाफ पुख्ता सबूत हों, उसके बारे में वह स्पष्ट उल्लेख करे।
दरअसल, पिछले कुछ वर्षों से धनशोधन मामलों में जिस तरह ईडी सक्रिय नजर आ रहा है और विपक्ष के अनेक नेताओं और उनसे संबंधित लोगों को सलाखों के पीछे डाल चुका है, उसे लेकर लगातार आपत्ति दर्ज कराई जाती रही है। एक वर्ष पहले सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट निर्देश दिया था कि ईडी भय का माहौल पैदा न करे। उसकी गिरफ्तारियों में राजनीतिक विरोधियों की गिरफ्तारी असाधारण रूप से अधिक है। मगर उस नसीहत का उस पर कोई असर नहीं हुआ। विपक्षी नेताओं की गिरफ्तारियां लगातार जारी रहीं। उनमें से कई नेता अब भी जेल में हैं और उन्हें जमानत नहीं मिल पा रही है। माना जाता है कि चुनाव आचार संहिता लागू होने के बाद इस तरह के छापों और गिरफ्तारियों पर विराम लग जानी चाहिए, ताकि राजनेता चुनाव में समान अधिकार से चुनाव मैदान में उतर सकें। मगर इस दौरान भी छापे रुके नहीं हैं। ईडी की इस सक्रियता के विरोध में विपक्षी दलों ने सर्वोच्च न्यायालय में गुहार लगाई थी, मगर धनशोधन का मामला संवेदनशील होने की वजह से अदालत ने कोई आदेश नहीं दिया था। अब अगर सर्वोच्च न्यायालय इसे लेकर गंभीर और कड़ा रुख अपनाए हुए है, तो ईडी को अपने दायरे का अहसास हो जाना चाहिए।
जब भी किसी राजनेता या बड़े अधिकारी के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप लगते हैं, तो ईडी भी पीछे-पीछे वहां पहुंच जाती है और अपने असीमित अधिकारों का इस्तेमाल करती देखी जाती है। धनशोधन के मामले में कड़ी कार्रवाई से इनकार नहीं किया जा सकता। यह देश की सुरक्षा के लिए काफी संवेदनशील मामला है। इसी दृष्टि से धनशोधन निवारण अधिनियम को कड़ा बना गया था। मगर इस कानून को अगर ईडी राजनीतिक विरोधियों को सबक सिखाने के हथियार के रूप में इस्तेमाल करती है, तो इस कानून का प्रभाव संदिग्ध हो जाता है। छिपी बात नहीं है कि पिछले कुछ वर्षों में इस अधिनियम के तहत गिरफ्तारियां तो तेज हुई हैं, पर दोषसिद्धि बहुत कम हुई है। यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि सर्वोच्च न्यायालय की नई व्यवस्था के बाद ईडी गिरफ्तारियों के मामले में पुनर्विचार करेगा।
Date: 18-05-24
झुलसते शहरों में बढ़ती दुश्वारियांअभिषेक कुमार सिंह
कुछ वैज्ञानिक प्रमाण बताते हैं कि बढ़ते तापमान के साथ ‘सीजनल इफेक्टिव डिसार्डर’ की स्थिति बनती है। इससे लोगों के दिमाग में पाए जाने वाले न्यूरो ट्रांसमीटर में तेजी से बदलाव आते हैं। ये परिवर्तन लोगों को आत्महत्या जैसा आत्मघाती कदम उठाने को प्रेरित करते हैं। वर्ष 2018 में अमेरिकी विश्वविद्यालय स्टैनफोर्ड के शोधकर्ताओं ने गर्म मौसम और बढ़ती आत्महत्या दर के बीच एक मजबूत संबंध चिह्नित किया था। स्टैनफोर्ड के अर्थशास्त्री मार्शल बर्क के नेतृत्व में हुए अध्ययन में दावा किया गया था कि 2050 तक अनुमानित तापमान वृद्धि से संयुक्त राज्य अमेरिका और मैक्सिको में अतिरिक्त इक्कीस हजार आत्महत्याएं हो सकती हैं।
गर्मी, लू और उमस किस तरह जानलेवा बन गई हैं- इसके उदाहरण दुनिया भर के शहरों में दिख रहे हैं। भारत में शहरों को बेहतर बुनियादी ढांचे, शानदार जनसुविधाओं और रोजगार के अवसरों के केंद्र के रूप में देखा जाता रहा है। वहां रहने वाले लोग एक अच्छी जीवनशैली वाली जिंदगी की उम्मीद करते हैं। पर अब शहर ही दुनिया के लिए मुसीबत बनते जा रहे हैं। आबादी के बोझ से कराहते और सुविधाओं के नाम पर भयानक प्रदूषण झेलते ये शहर बुनियादी ढांचे पर भीषण दबाव, महंगाई और कामकाज की जगहों से रिहाइश की बढ़ती दूरियों के कारण उनमें रहने वालों की सुविधा के बजाय दुविधा का केंद्र बन रहे हैं। इधर कुछ वर्षों में उन्हें एक नई समस्या ने घेर लिया है। यह समस्या गांवों के मुकाबले शहरों में ज्यादा गर्मी पड़ना है। इस समस्या को वैज्ञानिकों ने ‘अर्बन हीट’ कहा है। इसे शहरी लू भी कहा जा रहा है।
इस शहरी लू पर नजर वर्ष 2018 में तब गई थी, जब ‘यूएस जर्नल प्रोसिडिंग्स आफ द नेशनल एकेडमी आफ साइंसेज’ ने दुनिया के चौवालीस शहरों में बढ़ते तापमान पर एक रिपोर्ट प्रकाशित की थी। उस शोध रिपोर्ट में दक्षिण एशिया के छह महानगरों में पैदा होने वाली शहरी लू (अर्बन हीट) पर केंद्रित करते हुए बताया गया था कि वर्ष 1979 से 2005 के बीच जिस कोलकाता शहर में सालाना सोलह दिन भयंकर लू चलती थी, अब वहां ऐसे दिनों की संख्या बढ़कर चौवालीस तक हो गई है। शोध में दावा किया गया था कि दिल्ली, मुंबई, कोलकाता जैसे महानगरों की करोड़ों की आबादी के सामने आने वाले वक्त में शहरी लू झेलने का खतरा चार गुना तक बढ़ गया है। इसमें एक चेतावनी भी दी गई थी कि अब शहरियों को इस ‘अर्बन हीट’ के साथ रहना और लगातार उसका खतरा सहना सीखना होगा।
इधर, ‘सेंटर फार साइंस एंड एनवायरनमेंट’ ने अपनी पत्रिका ‘डाउन टू अर्थ’ में एक विस्तृत रिपोर्ट में इस समस्या का खुलासा किया है। इसमें सवाल उठाया गया है कि कंक्रीट के जंगलों में बदलते हरियाली विहीन शहरों में आखिर इंसान कितनी अधिक गर्मी झेल सकता है। सवाल यह भी है कि आखिर बड़े शहरों या महानगरों में ऐसा क्या है, जो वहां प्राकृतिक रूप से पैदा होने वाली गर्मी या लू के मुकाबले कई गुना ज्यादा गर्मी पैदा हो रही है। इसका गंभीर पक्ष यह है कि शहरी लू केवल मई-जून में नहीं, घोर सर्दी में भी अपना असर दिखा सकती है।
‘अमेरिकन जियोफिजिकल यूनियन’ के ‘जियोफिजिकल रिसर्च लेटर जर्नल’ में एक शोधपत्र ‘अर्बन हीट आईलैंड ओवर दिल्ली पंचेज होल्स इन वाइडस्प्रेड फाग इन द इंडो-गैंगेटिक प्लेन्स’ शीर्षक से प्रकाशित हुआ था। उसमें बताया गया था कि 2018 में देश की राजधानी दिल्ली में पिछले सत्रह वर्षों के मुकाबले प्राकृतिक कोहरे का सबसे कम असर इसलिए हुआ, क्योंकि यहां पैदा हुए प्रदूषण और गर्मी ने कोहरे में छेद कर दिए थे। सिर्फ दिल्ली नहीं, दुनिया भर के शहरों में शहरी प्रदूषण के कारण सर्दियों में कोहरे की सघनता में भारी कमी देखी गई। आइआइटी, मुंबई और देहरादून स्थित ‘यूनिवर्सिटी आफ पेट्रोलियम एंड एनर्जी स्टडीज’ ने ‘नासा’ के सत्रह वर्षों के उपग्रह डेटा का विश्लेषण कर कोहरा छंटने की प्रक्रिया को ‘फाग होल’ की संज्ञा देते हुए बताया था कि दिल्ली में जनवरी, 2018 में नब्बे से ज्यादा फाग होल हो गए थे। शोधकर्ताओं ने कहा था कि शहरों की गर्मी कोहरे को जला रही है, जिसकी वजह से ग्रामीण इलाके के मुकाबले शहरों का तापमान चार से पांच डिग्री ज्यादा हो जाता है।
बताया गया कि शहरों में तेजी से हो रहे हर किस्म के निर्माण कार्यों, बढ़ रहे शहरीकरण, हरित पट्टी में तेज गिरावट और कंक्रीट से तैयार हो रही संरचनाओं के कारण जमीन के अंदर की गर्मी सतह में या सतह के करीब फंसकर रह जाती है। आज की सच्चाई यही है कि दिल्ली-मुंबई समेत देश के तेईस शहरों की करीब बारह-पंद्रह करोड़ आबादी की जरूरतों के मद्देनजर हुए शहरीकरण ने शहरों को ऐसे ‘हीट’ और ‘गैस चैंबरों’ में बदल डाला है, जो मौसम की अतियों का कारण बन रहे हैं। ये शहर क्यों ऐसे बन गए हैं, इसकी कुछ स्पष्ट वजहें हैं। जैसे, कम जगह में ऊंची इमारतों का अधिक संख्या में बनना और उन्हें ठंडा, जगमगाता और साफ-सुथरा रखने के लिए बिजली का अंधाधुंध इस्तेमाल करना। चाहे घर हो या दफ्तर, मौसम से लड़ने के लिए उन्हें वातानुकूलित बनाना और आने-जाने के लिए कारों आदि का बढ़ता इस्तेमाल। अगर किसी शहर में एक वक्त में लाखों-करोड़ों एयर कंडीशनर- रेफ्रिजरेटर (एसी-फ्रिज) चल रहे हों, पेट्रोल-डीजल से चलने वाली लाखों कारें ग्रीनहाउस धुएं के साथ गर्मी भी वातावरण में घोल रही हों, तो शहरों में नकली रूप से पैदा होने वाली इस लू की संहार क्षमता का अंदाजा लगाया जा सकता है। सवाल है कि इस शहरी लू से कैसे निपटा जाए। अभी तक सामान्य मौसमी बदलावों से मुकाबले के लिए जो साधन और उपाय आजमाए जा रहे हैं, उनमें कोई फेरबदल लाए बगैर संभव नहीं है कि हम शहरी लू का मुकाबला कर पाएं। जाहिर है, इसके लिए शहरीकरण की योजनाओं के बारे में नए सिरे से कोई सोच बनानी होगी। अभी तो हमारे योजनाकार देश की आबादी की बढ़ती जरूरतों और गांवों से पलायन कर शहरों की ओर आती आबादी के मद्देनजर आवास समस्या का ही समाधान खोज रहे हैं, उनके सामने शहरों की आबोहवा को बिगाड़ने वाली चीजों का कोई खाका ही मौजूद नहीं है। कुछ भारतीय योजनाकारों के मत में कंक्रीट की ऊंची इमारतों के बल पर होने वाला शहरीकरण असल में भारत के विकास के गांधीवादी नजरिये को आघात लगाता है।
वास्तुकार एजीके मेनन ने इस बारे में कहा था कि अच्छा हो कि हम भावी शहरों के निर्माण के मामले में विकसित कहे जाने वाले पश्चिमी मुल्कों की नकल न करें और अपनी परंपराओं को ध्यान में रखते हुए योजनाएं बनाएं। अगर ऐसा होगा, तभी हम शहरी लू और इसी किस्म की अन्य शहरी त्रासदियों का कुछ मुकाबला कर पाएंगे।
Date: 18-05-24
अहम है ईरान से समझौताडॉ. सुरेन्द्र कु. मिश्र
अमेरिका द्वारा भारत-ईरान के बीच चाबहार बंदरगाह परियोजना के संबंध में हुई डील को नया बताकर अपनी नराजगी व्यक्त की गई। इसके साथ ही भारत-ईरान के बीच 10 साल के इस अनुबंध पर अमेरिका प्रतिबंध लगा सकता है क्योंकि वह इसे नए दृष्टिकोण से देख रहा है अमेरिका को इस बात का गंभीरता से भी विचार करना होगा कि दबाव, दमन, दहशत व दादागिरी की नीति हमेशा नहीं चलती है। प्रत्येक देश अपने भू आर्थिक, भू-राजनीतिक तथा भू-सामरिक हितों को ध्यान में रखकर कार्य करता है जैसा कि भारत ने ईरान के साथ इस अनुबंध पर हस्ताक्षर किए। भारत चाबहार बंदरगाह को पाकिस्तान में चीन द्वारा निर्मित बंदरगाह के काउंटर के रूप में देखता है।
भारत और ईरान के चाबहार बंदरगाह के संगठन और उनके अनुबंध के लिए और मेगा कनेक्टिविटी योजनाओं के माध्यम से परियोजनाओं के अगले चरण के विकसित करने के लिए यह समझौता हुआ है। भारत इसे अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे के साथ एकीकृत करने की योजना बना रहा है, ताकि ईरान के माध्यम से भारत से रूस तक एक निर्बाध व्यापारिक मार्ग तैयार किया जा सके। भारत एक संयुक्त देश है और यह अनुबंध भारत और ईरान दोनों देशों के लिए बेहद एक सामयिक, सामरिक एवं संवेदनशील विशेष समझौता है कि मध्य एशिया और उससे आगे तक पहुंच आसान हो जाएगी। यह चीन द्वारा पाकिस्तान के ग्वादर में बनाई जा रही अपनी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) का एक करारा जवाब भी है।
ओमान की खाड़ी पर दक्षिणी पूर्वी ईरान में स्थित चाबहार एक महत्त्वपूर्ण बंदरगाह है। यह ईरान के एकमात्र समुद्री बंदरगाह के रूप में कार्य करता है और इसमें ‘शाहिद कलंतरी’ ‘शाहिद बेहिश्ती’ नामक दो अलग-अलग बंदरगाह शामिल हैं। यह बंदरगाह भारत को अरब सागर में चीन की उपस्थिति को नजरअंदाज करने में सक्रिय सहयोग देता है। अपनी भौगोलिक अवस्थिति, आर्थिक व व्यापारिक तथा सामरिक कूटनीतिक दृष्टिकोण से भारत के लिए एक विशेष महत्त्व का क्षेत्र है। यही कारण है कि इस बंदरगाह को अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा (आईएनएसटीसी) के रूप में भी जाना जाता है। उल्लेखनीय है कि यह भारत, ईरान, अफगानिस्तान, अजरबैजान, अर्मेनिया, रूस के साथ ही मध्य एशिया तथा यूरोप के बीच व्यापार हेतु 7200 किलोमीटर की बहुउद्देश्यीय परिवहन परियोजना भी है। भारत अल्पकालिक समझौते पर इस बंदरगाह का संचालन कर रहा था, जिसे समय-समय पर नवीनीकृत करना पड़ता था। जब चाबहार में निवेश की बात आई तो अल्पकालिक समझौते और ईरान के भू-राजनीतिक तनाव ने शिपर्स और निवेशकों को इससे दूर रखा था। इसके कारण एक बार तो ईरान इस समझौते में प्रगति न होने के कारण अपने कदम चीन की ओर बढ़ाने की मंशा बना ली थी। वास्तव में इस योजना को क्रियान्वित करने की चीन की क्षमता एवं संपन्नता भी थी।
भारत के इस समझौते के बाद अमेरिका ने प्रतिबंध की चेतावनी को ‘प्रतिबंधों का संभावित जोखिम’ की बात कहकर अपने रुख में परिवर्तन का संकेत दिया है। आखिरकार भारत ने अपने रणनीतिक एवं आर्थिक महत्त्व चाबहार बंदरगाह को दस वर्ष के लिए विकसित और संचालित करने के लिए ईरान के साथ 13 मई को इस समझौते पर हस्ताक्षर कर दिए। वास्तव में यह एक नए भारत की साहसिक पहल है जो किसी भी प्रतिबंध की अब परवाह नहीं करता, विशेष रूप से भू-आर्थिक, भू-सामरिक एवं भू-राजनीतिक पहल के मामलों में। आखिर द्वंद्व कहां तक टाला जाए, भारत समझ गया है कि समय पर सामरिक व आर्थिक समझौते पर हस्ताक्षर जरूरी हो गए, जिसे जरूरत पड़ने पर जवाब देना भी जेहन में रखना होगा। यह बात अमेरिका को समझनी होगी कि यह समझौता कोई ‘नया’ नहीं है, यह तो केवल विगत रूप में संचालित हो रहे कार्यक्रम की निरंतरता है। पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह में चीन की मौजूदगी को देखते हुए भारत की चाबहार की ओर पहल एक महत्त्वपूर्ण सामयिक एवं सामरिक आवश्यकता बन गई थी।
स्मरणीय है कि अमेरिका के डोनाल्ड ट्रंप ने वर्ष 2018 में भारत, चीन तथा तुर्की को ईरान प्रतिबंधों से छूट दी थी, जबकि वाशिंगटन ओमान की खाड़ी के बंदरगाह पर अपना ध्यान केंद्रित कर रहा था1 चूंकि यह युद्धग्रस्त अफगानिस्तान में उसकी उपस्थिति के लिए बेहद महत्त्वपूर्ण था। वास्तव में अगर अमेरिका इसे एक नए समझौते के रूप में देखता है तो यह उसकी भारी-भूल होगी, क्योंकि मई 2016 में मूल रूप से हस्ताक्षर करने के बाद से इस पर बहुत काम हुआ है। भारत चाबहार बंदरगाह में बेहिश्ती टर्मिनल को विकसित करने के लिए भारी-भरकम निवेश कर चुका है। यह बात भी विशेष ध्यान देने योग्य है कि भारत पहले ही अमेरिका के दबाव के कारण फारस की खाड़ी में फरजाद-बी गैस क्षेत्र खो चुका है, जो वास्तव में भारत के लिए एक विशेष आकषर्क तथा आर्थिक व रणनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण परियोजना थी। अत: भारत ईरान के चाबहार बंदरगाह के शाहिद बेहिश्ती टर्मिनल का प्रबंधन अब अपने हाथ में लेने की अवहेलना कदापि नहीं कर सकता है। यदि भारत किसी कारणवश अमेरिकी प्रतिबंध के दबाव में आ जाता तो खाड़ी क्षेत्र में अपना आर्थिक आधार एवं रणनीतिक प्रभाव खो देता।
यह भी जानना जरूरी है कि अमेरिका द्वारा पहले दी गई प्रतिबंधों की छूट के बाद भारत और ईरान स्वतंत्रता और प्रति-प्रसार अधिनियम 2012 के तहत वाशिंगटन द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों को मात देने की अनुमति प्रदान की थी। भारत के अलावा चीन, जापान, दक्षिण कोरिया, ताइवान, तुर्की, ग्रीस तथा इटली आदि को अस्थायी छूट प्रदान की गई थी। इसके साथ ही इन सभी देशों को फारस की खाड़ी देश के साथ व्यापार करने की अनुमति दी गई थी। इस समझौते में भारत ने अपना दृढ़ विश्वास स्पष्ट रूप से दिखाया जो कि सामयिक व सामरिक रूप से बेहद अनिवार्य था। भौतिकता एवं आर्थिक होड़ की दौड़ में कोई भी देश, किसी भी देश का स्थायी मित्र या शत्रु नहीं रह सकता। प्रत्येक राष्ट्र की सभी नीतियों में सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण उसकी राष्ट्रीय सुरक्षा नीति होती है।
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पिछले दिनों ताइवान में 7.4 तीव्रता का भूकम्प आया था। लेकिन जान-माल का नुकसान बहुत मामूली रहा। इतनी ही तीव्रता के भूकम्प ने तुर्किये में भयावह तबाही मचा दी थी।
ताइवान ने भूकम्प विरोधी आपदा प्रबंधन की जो व्यवस्थायें की हैं, उन्हें जानना अत्यंत रोचक एवं भारत के संर्दभ में उपयोगी भी होगा।
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18 May 2024
प्रश्न – 462 – इरडा ने बीमा कम्पनियों के लिए हाल ही में कुछ दिशा-निर्देश जारी किये हैं? कुछ महत्वपूर्ण निर्देशों की चर्चा करते हुए उनका आकलन कीजिये। (200 शब्द)
Question – 462 – Has IRDAI recently issued some guidelines for insurance companies? Discuss and evaluate some important instructions. (200 words)
नोट : इसका उत्तर आपको हमें नहीं भेजना है, यह आपके स्वयं के अभ्यास के लिए है।
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Date: 17-05-24
It’s Courage, Not CrimeWhistleblowers strengthen democracy but face dangers. Give them strong legal protectionTOI Editorials
Whistleblowers have it tough across the world. The Supreme Court in Canberra, Australia, recently sentenced former Australian army lawyer David McBride for revealing information about alleged Australian war crimes in Afghanistan. This comes seven years after Australian public broadcaster ABC published a series of articles based on information provided by McBride. That information was separately confirmed by an Australian govt inquiry. However, it was McBride the whistleblower who was prosecuted.
From false claims to national security |Whistleblowing has a chequered history. During the American Civil War Abraham Lincoln’s govt enacted the False Claims Act (FCA) to incentivise reporting corruption in military supplies.
Interestingly, FCA remains on US statute books in an amended form and has been used over the years in cases related to fraud in military contracts and corruption in the pharma industry. But things get murky when it comes to matters of national security and wrongdoings in militaries. State interests and discipline are privileged over those seeking to spotlight internal wrongs.
Risky business | Perhaps the most high voltage case of whistle blowing related to war crimes this century was the highlighting of atrocities committed by US soldiers in Iraq’s Abu Ghraib prison. The horrific torture was exposed by Sergeant Joseph Darby. Once identified as the whistleblower, he and his family faced harassment and even death threats. Similarly, US’s NSA contractor Edward Snowden had to flee to Russia for exposing illegal mass surveillance programmes.
India’s paper tiger | India passed a Whistle Blowers Protection Act in 2014. Ironically, it hasn’t been notified to date. In any case, the Act has multiple exemptions – it doesn’t cover armed forces and is not applicable to the private sector. Nor does it provide financial incentives for whistle blowing like the American FCA. Civil society groups have argued that attacks against RTI activists and whistleblowers have increased in the absence of a legal framework. True, state secrets need to be protected for national security. But this can’t be a blanket cover to hide corruption and criminal wrongs. Democracy is strengthened by courageous whistleblowers speaking up for justice.
Date: 17-05-24
Courting The Cops, AlwaysSC order in the News Click case shows trial court judges are authorising detentions casually. With around 50 lakh arrests a year and thousands of remand applications a day, they must apply judicial scrutiny
Naveed Mehmood Ahmad, [ The writer is a Senior Resident Fellow at Vidhi Centre for Legal Policy ]
On Wednesday, Supreme Court declared the arrest of Prabir Purkayastha, founder of NewsClick, illegal and ordered his release from custody. Purkayastha had been in police and judicial custody since October last year, in connection with a case under provisions of the Unlawful Activities (Prevention) Act, 1967 and the Indian Penal Code, 1860.
Issue | Individual rights and national security
SC declared Purkayastha’s arrest and subsequent police remand illegal on the basis that grounds of his arrest were not communicated to him in writing. The court further held that mere filing of the chargesheet would not rectify the illegality and unconstitutionality of the arrest and grant of police custody. The court’s order is significant as it recognises the need for procedural propriety to protect individual liberties, even in cases involving national security concerns. It is, however, even more crucial for bringing attention to how remand applications are processed by magistrates and law enforcement agencies, effectively obstructing the realisation of the fundamental rights guaranteed under Articles 21 and 22.
Article 22 | Provide grounds of arrest in writing
Article 22 of the Constitution enshrines the right to be informed of the grounds of arrest, and to consult and be defended by a legal practitioner of choice. Clause (5) of Article 22 extends this protection to cases of preventive detention. Drawing from the protection that Article 22 offers, the Code of Criminal Procedure, 1973, UAPA, 1967 and other special laws require the arresting officers to inform the arrestee of the grounds of arrest. This is critical to ensure that the arrestee is able to mount a defence, protect their personal liberty and avoid unnecessary pre-trial detention.
Interestingly, these provisions do not mandate the communication of grounds of arrest to be in written form. This, in fact, was one of the grounds on which the state opposed Purkayastha’s release. A contention that SC held was “untenable in the eyes of law”. Relying on SC’s judgments in Harikisan vs State of Maharashtra (1962) and Lallubhai vs UOI (1982), the bench underlined that communication of the grounds of arrest in writing “is sacrosanct and cannot be breached under any situation”. In essence, a detailed and written communication of the grounds of arrest is critical for a fair remand hearing and to realise the purpose of Article 22.
Issue | Remand and due process
SC’s scrutiny of the events surrounding Purkayastha’s arrest and his remand hearing, however, reveals a far more concerning fact about the workings of the criminal justice system. The court noted that the entire process of securing police remand for Purkayastha was carried out in a clandestine manner, suggesting an attempt to circumvent due process of law. In fact, the failure on the part of the police to inform Purkayastha and his advocate of choice the grounds of arrest and the proposed remand application, as well as the timing of the remand proceedings –as early as 6 in the morning at the residence of the remand judge – suggest how investigative agencies may sidestep due process requirements to retain custody of the accused.
Trial courts | First line of defence
The remand judge, perhaps the only line of defence in such a situation, failed to acknowledge these concerns and to apply judicial scrutiny, instead mechanically granting police custody for seven days. Interestingly, this is not the only case in which remand proceedings have been called into question. In fact, SC itself in Arnesh Kumar vs State of Bihar (2014) categorically stated that in many cases detention is authorised in a “routine, casual and cavalier manner”, grossly affecting the liberty of citizens.
To check this practice, SC in Manubhai Ratilal Patel vs State of Gujarat And Others (2013) underscored that the act of directing remand of an accused is a judicial function and that it is “obligatory on the part of the Magistrate to apply his mind and not to pass an order of remand automatically or in a mechanical manner”.
Issue | Accountability for arrest procedures
With around 50 lakh arrests recorded every year, and thousands of remand applications heard by judges every day, the critical nature of this function cannot be overlooked, especially given the overcrowding in prisons nationwide and the minimal protections provided when an accused is in police custody. The Wednesday order of SC must prompt greater scrutiny of arrest procedures and remand proceedings. It should also foster a renewed emphasis on procedural fairness and accountability within the criminal justice system.
Date:17-04-24
रोजगार सृजन की तेज होती गतिअभिनव प्रकाश, ( लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं )
भारत में रोजगार सृजन सदैव एक महत्वपूर्ण चुनौती रहा है। इसका मुख्य कारण जनसंख्या में अधिकांश हिस्सा युवा वर्ग का होना है। जब से नरेन्द्र मोदी ने प्रधानमंत्री का पद संभाला है, भारत में रोजगार सृजन में एक नई गति आई है। कर्मचारी चयन आयोग (एसएससी) ने पांच लाख से अधिक युवाओं की भर्ती की है। जबकि कांग्रेस के दस वर्षों (2004-14) के शासनकाल में केवल दो लाख भर्तियां की गई थीं। रेलवे भर्ती बोर्ड ने 4.9 लाख से अधिक युवाओं की भर्ती की है।
संघ लोक सेवा आयोग ने पिछले नौ वर्षों में 50,906 उम्मीदवारों की भर्ती की है, जो कांग्रेस शासनकाल से करीब 6,000 अधिक हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने अक्टूबर 2022 में केंद्र सरकार द्वारा 10 लाख केंद्रीय सरकारी नौकरियों को भरने का लक्ष्य रखा था, जिसमें से लगभग नौ लाख उम्मीदवारों को नियुक्ति पत्र दिए जा चुके हैं। इसी तरह आइटी, विनिर्माण, व्यापार और परिवहन सहित नौ संगठित क्षेत्रों में 1.5 करोड़ से अधिक नौकरियां सृजित हुई हैं।
कोविड के बाद लगभग पांच करोड़ लोग कर्मचारी भविष्य निधि संगठन यानी ईपीएफओ के पेरोल में शामिल हुए हैं। इनमें करीब 3.5 करोड़ लोग पहली बार ईपीएफओ के दायरे में आए हैं। यानी इन्होंने संगठित क्षेत्र में नौकरियां प्राप्त की हैं। चूंकि संगठित क्षेत्र का हिस्सा भारत में रोजगार में करीब 10 प्रतिशत ही है, इसीलिए रोजगार सृजन की स्थिति के लिए असंगठित क्षेत्र के आंकड़ों को भी देखना महत्वपूर्ण होगा।
मोदी सरकार की मुद्रा योजना के माध्यम से 40 करोड़ छोटे उद्यमियों को ऋण प्रदान किए गए हैं। आठ करोड़ लोगों ने पहली बार स्वरोजगार शुरू किया है। पीएम स्वनिधि योजना के माध्यम से 35 लाख रेहड़ी-पटरी विक्रेताओं को आसान दर पर ऋण प्रदान कर सूदखोरी से मुक्त किया गया है। इन्हें अपने व्यवसाय का विस्तार करने और अधिक लोगों को रोजगार देने में सक्षम बनाया गया है। आजीविका योजना के तहत नौ करोड़ महिलाओं को 83 लाख से अधिक स्वयं सहायता समूहों में संगठित किया गया है, जिससे उनकी आय के अनेक मार्ग खुले हैं।
आत्मनिर्भर भारत रोजगार योजना ने अपने रोजगार सृजन लक्ष्य को पार करते हुए 60 लाख से अधिक नए कर्मचारियों को नामांकित किया है। कोरोना काल में इस पहल ने देश में आर्थिक पुनरुत्थान और रोजगार संरक्षण में महत्वपूर्ण योगदान दिया। कोरोना काल में ही आपातकालीन क्रेडिट लाइन गारंटी योजना के तहत सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (एमएसएमई) के लिए 3.63 लाख करोड़ रुपये की राशि स्वीकृत की गई।
इसने 1.8 लाख करोड़ रुपये के एमएसएमई ऋण को एनपीए बनने से बचाया, जिससे 1.5 करोड़ नौकरियां बचीं और साथ ही नए रोजगार भी सृजित हुए। पीएम रोजगार प्रोत्साहन योजना के तहत 1,52,900 से अधिक प्रतिष्ठानों को लाभ मिला, जिसके 1.2 करोड़ से अधिक लाभार्थी हैं। दीनदयाल उपाध्याय ग्रामीण कौशल योजना के तहत लगभग 13 लाख उम्मीदवारों को 56 सेक्टरों और 600 ट्रेडों में प्रशिक्षित किया गया है और 7.9 लाख को विभिन्न नौकरियों में सीधे नियोजित किया गया। ग्रामीण स्वरोजगार एवं प्रशिक्षण संस्थानों के तहत 64 पाठ्यक्रमों में 39.9 लाख से अधिक लोगों को प्रशिक्षित किया गया है और 28.11 लाख से अधिक उम्मीदवारों को स्वरोजगार में स्थापित किया गया है।
नेशनल अप्रेंटिस प्रमोशन स्कीम के तहत अब तक कुल 13.38 लाख प्रशिक्षुओं को नियुक्त किया गया है। एक वर्ष के भीतर असंगठित क्षेत्र के 29 करोड़ श्रमिकों को सरकारी ‘ई-श्रम’ पोर्टल पर पंजीकृत किया गया है। पीएम ग्रामीण डिजिटल साक्षरता अभियान के तहत 6.2 करोड़ लोगों को ट्रेनिंग दी गई है, जिससे जमीनी स्तर पर रोजगार की क्षमता बढ़ी है। पिछले नौ वर्षों में 5.47 लाख कामन सर्विस सेंटर भी खोले गए हैं। प्रत्येक केंद्र में दो से पांच लोग कार्यरत हैं। ग्रामीण डिजिटल उद्यमों का भी सृजन हुआ है, जिनमें से 67,000 से अधिक महिलाएं उद्यमी हैं।
स्टार्टअप इंडिया के तहत एससी/एसटी लाभार्थियों को 7,351 करोड़ रुपये से अधिक के ऋण दिए गए हैं। स्टैंडअप इंडिया के तहत 25,000 से अधिक एससी/एसटी उद्यमियों को बैंक ऋण और व्यावसायिक सुविधा प्रदान की गई है। खादी और ग्रामोद्योग आयोग ने ग्रामीण क्षेत्रों में 9,54,899 नई नौकरियां सृजित करके एक नया आयाम स्थापित किया है। वित्त वर्ष 2022-23 में 448 अरब डालर से अधिक का रिकार्ड निर्यात हुआ। प्रत्येक अतिरिक्त एक अरब डालर के निर्यात से 1.5 लाख नौकरियां सृजित होती हैं। पीएलआइ योजना से भी संगठित क्षेत्रों में 60 लाख से अधिक अतिरिक्त नौकरियां सृजित हुई हैं।
भारत का लक्ष्य 2025-2026 तक इलेक्ट्रानिक्स उत्पादन क्षमता को 24 लाख करोड़ रुपये तक बढ़ाना है, जिससे 10 लाख से अधिक नौकरियां सृजित होने की उम्मीद है। बायोगैस उद्योग में 85,000 नौकरियां सृजित हुई हैं। राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन से 2030 तक आठ लाख करोड़ रुपये से अधिक का निवेश और छह लाख से अधिक नौकरियां सृजित होने की संभावना है। सरकारी प्रोत्साहन से इलेक्ट्रानिक वाहन उद्योग में 2030 तक पांच करोड़ प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष नौकरियां सृजित हो सकती हैं।
रिकार्ड इन्फ्रास्ट्रक्चर विकास के कारण भी करोड़ों प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार सृजित हुए। रियल एस्टेट सेक्टर में ही करीब तीन करोड़ रोजगार उत्पन्न हुए हैं। स्टार्टअप की संख्या 2014 में 350 से बढ़कर आज 1.25 लाख हो गई है। इससे प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष लाखों नौकरियां सृजित हुई हैं। इस प्रकार देखा जाए तो सरकारी नीतियों के कारण बेरोजगारी दर में लगातार गिरावट आ रही है, जो आज 3.2 प्रतिशत रह गई है। इसी वजह से पिछले दस वर्षों में 25 करोड़ लोग गरीबी रेखा से बाहर आए हैं।
Date:17-04-24
विस्थापन का दंशसंपादकीय
दुनिया भर में हर वर्ष लाखों लोग विस्थापित होते हैं और उन्हें अकथनीय मुश्किलों का सामना करना पड़ता है मगर इक्कीसवीं सदी का सफर तय करते विश्व में भी ऐसी ठोस पहलकदमी नहीं दिखाई देती जिसमें अपनी जड़ों से उखाड़ दिए गए लोगों के दुख पर गौर किया जा सके और एक दीर्घकालिक समाधान का रास्ता तैयार हो। यह बेवजह नहीं है कि आज भी अलग-अलग देशों से बड़ी संख्या में लोग अपना घर बार छोड़ कर दूसरी जगहों पर जाने पर मजबूर कर दिए जाते हैं। अक्सर आने वाली रपटों में इस समस्या की जटिलताओं की ओर ध्यान दिलाया जाता रहा है, लेकिन अब तक विस्थापन का सिलसिला बदस्तूर कायम है। अब जिनेवा स्थित आंतरिक विस्थापन निगरानी केंद्र यानी आइडीएमसी की ताजा रपट में यह दावा किया गया है कि सन 2023 में दक्षिण एशिया में कुल उनहत्तर हजार लोगों को विस्थापन का दंश झेलना पड़ा। इसमें अकेले मणिपुर से सड़सठ हजार लोग विस्थापित हुए। यानी दक्षिण एशिया के सभी देशों में जितने लोगों को अपने ठौर से उजड़ना पड़ा, उसमें सत्तानवे फीसद लोग मणिपुर के हैं।
गौरतलब है कि सन 2018 के बाद यानी पिछले पांच वर्षों में भारत में हुआ यह सबसे बड़ा विस्थापन है देश के अन्य इलाकों में जहां बाढ़ या अन्य प्राकृतिक आपदा और रोजी-रोटी जैसी वजहों से लोगों को दूसरी जगहों की ओर अपने जीने के रास्ते की खोज में निकलना पड़ा, वहीं मणिपुर में हुई व्यापक हिंसा ने वहां हजारों लोगों को विस्थापित होने पर मजबूर कर दिया। आइडीएमसी ने अपनी रपट में इस बात का उल्लेख किया है कि मार्च 2023 में मणिपुर उच्च न्यायालय ने मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति में शामिल करने के संदर्भ में जो रुख जाहिर किया था, उसके बाद राज्य के बड़े हिस्से में हिंसक विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए। इसमें करीब दो सौ लोगों की जान जा चुकी है और इसकी वजह से हजारों लोगों को अपना घर छोड़ कर राहत शिविर या दूसरों जगहों पर शरण लेना पड़ा। आज भी वहां स्थिति में कोई उल्लेखनीय सुधार नहीं हुआ है। जाहिर है, एक साधारण विवाद से जो हालात पैदा हुए, उसके एक वर्ष जाने के बावजूद उसे संभालने में सरकार अब तक नाकाम है और इसका खमियाजा हिंसक संघर्ष की वजह से बेठौर हुए लोगों को भुगतना पड़ रहा है।
विश्व भर में ऐसे लोगों की एक बड़ी संख्या है, जो बहुत मुश्किल से किसी जगह पर अपना ठिकाना और उनमें से कुछ लोग घर बनाते हैं मगर इससे ज्यादा तकलीफदेह और क्या हो सकता है कि उन्हें वैसी वजहों के लिए उस जगह को छोड़ कर कहीं और जाना पड़ जाता है, जिसके लिए वे जिम्मेदार नहीं होते हैं। यही नहीं, अपने ठौर से वंचित लोग जब कहीं और जीने की जगह ढूंढने निकलते हैं तो सभ्य कही जाने वाली व्यवस्थाओं वाले लोकतांत्रिक देशों में भी उनके लिए टिकना आसान नहीं होता। इससे अफसोसनाक और क्या होगा कि विश्व के आधुनिक होने के दावों के बीच पिछले दो वर्षों में संघर्ष और हिंसा की वजह से अपना घर छोड़ने पर मजबूर लोगों की संख्या में चिंताजनक बढ़ोतरी हुई है। दुनिया के जिन हिस्सों में हालात में सुधार हो रहे थे, अब वहां भी यह समस्या अपने पांव पसार रही है। हिंसा या संघर्षो को रोकने और शांति की स्थापना करने में नाकामी दरअसल विश्व भर में अशांत इलाकों में सक्षम देशों की कूटनीतिक और रणनीतिक कवायदों के महज दिखावा होने को ही दर्शाती है।
Date:17-04-24
भारत – ईरान संबंधों का भविष्यब्रह्मदीप अलूने
ईरान, यूरेशिया और हिंद महासागर के मध्य एक प्राकृतिक प्रवेश द्वार है, जिससें भारत, रूस और यूरोप के बाजारों तक आसानी से पहुंच सकता है। एशिया महाद्वीप की दो महाशक्तियों, भारत और चीन, की सामरिक प्रतिस्पर्धा समुद्री परिवहन और पारगमन की रणनीति पर देखी जा सकती है। चीन की ‘पर्ल आफ स्प्रिंग’ के जाल को भेदने के तौर पर चाबहार बंदरगाह के रूप में अंतत: भारत को सफलता मिल गई है, लेकिन अंतरराष्ट्रीय राजनीति में ईरान की स्थिति और कूटनीतिक दांव-पेंचों के बीच यह कहा जा सकता है कि भारत की सामरिक और आर्थिक क्षमताओं की असली परीक्षा भी अब शुरू हो रही है।
दरअसल, ईरान एक ऐसा देश है, जो राजनीतिक, कूटनीतिक, आर्थिक और सामरिक प्रतिबंधों का सामना करते हुए अमेरिका विरोधी खेमों से जुड़ने के लिए हमेशा तैयार नजर आता है। 2021 में चीन ईरान के बीच रणनीतिक रिश्तों की शुरुआत हो या मध्यपूर्व में ‘प्राक्सी’ समूहों को मजबूत बनाए रखने की कोशिश, अमेरिका की चुनौतियां ईरान ने बढ़ाई हैं। इस बीच भारत अमेरिकी सहयोग बढ़ा है, हिंद महासागर से लेकर लद्दाख तक, चीन से निपटने के लिए भारत को अमेरिका की जरूरत है, ऐसे में भारत ईरान के संबंधों के दीर्घकालीन समय तक सामान्य बने रहने को लेकर गहरी आशंकाएं हैं।
ईरान चीन की ‘बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव’ का सदस्य है और वह इसे पूर्व और पश्चिम के बीच एक सेतु होने की ऐतिहासिक स्थिति को पुन: स्थापित करने के अवसर के रूप में देखता है। ईरान में परिवहन, बंदरगाहों, ऊर्जा, उद्योग और सेवाओं की विभिन्न परियोजनाओं में चीन अरबों डालर का निवेश कर रहा है तथा वह ईरान का एक मजबूत आर्थिक सहयोगी बनकर उभरा है। ईरान के पास विश्व में कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के बड़े भंडार मौजूद है। वह अपना तेल बेचने के लिए भारत को एक बड़े बाजार के रूप में देखता है।
भौगोलिक रूप से दोनों देश निकट हैं, जो इसकी लागत को कम करता है और इससे ईरान की लड़खड़ाती अर्थव्यवस्था को सहारा मिल सकता है। मगर भारत वैश्विक नियमों में बंधा हुआ एक लोकतांत्रिक और जिम्मेदार देश है, इसलिए भारत ने अमेरिकी प्रतिबंधों को देखते हुए पिछले चार वर्षों से ईरानी तेल का आयात बंद कर दिया है। इससे भारत की ऊर्जा जरूरतें प्रभावित हुई, वहीं ईरान ने भी इसे ठीक नहीं समझा।
अब चाबहार बंदरगाह को लेकर भारत और ईरान के बीच समझौता पूर्ण हो गया है, इसे सामरिक और व्यापारिक दृष्टि से भारत के लिए महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है। इसके कई भू-राजनीतिक कारण हैं। चाबहार बंदरगाह परियोजना का विकास भारत ईरान की एक प्रमुख परियोजना है। भारत, ईरान और रूस के मध्य 16 मई 2002 को इस संबंध में एक समझौता हुआ था, जिसके द्वारा ईरान होकर मध्य एशियाई राज्यों तक निर्यात करने के लिए एक उत्तर दक्षिण गलियारे का निर्माण किया जा सके।
ईरान में कैस्पियन सागर पर बने अस्तारा, बंदर अंजाली और अमीराबाद बंदरगाह रूस के अस्ताराखान बंदरगाह से बखूबी जुड़े हैं। अरब सागर के तट पर कराची बंदरगाह, ग्वादर बंदरगाह, कांडला बंदरगाह, मुंबई बंदरगाह और चाबहार भी हैं। ओमान की खाड़ी में स्थित चाबहार बंदरगाह अब भारत के कब्जे में है। इसके साथ ही यह भी सुनिश्चित हो गया है कि ईरान के दक्षिण समुद्र तट को भारत के पश्चिमी समुद्र तट से जोड़ने का रणनीतिक दांव कामयाब हो गया है। यहीं नहीं, इस परियोजना में अफगानिस्तान का सहयोग सामरिक संतुलन बनाने में भी मददगार होगा।
ईरान भी इस नए मार्ग को लेकर काफी उत्साहित है, क्योंकि भारत से जो माल पहले पाकिस्तान होते हुए सीधे अफगानिस्तान जाता था वह अब जहाजों के जरिए पहले ईरान के चाबहार बंदरगाह पर जाएगा और फिर वहां से ट्रकों द्वारा अफगानिस्तान पहुंचेगा। चाबहार बंदरगाह के जरिए भारत अफगानिस्तान के साथ ही मध्य एशिया, रूस, पीटर्सबर्ग, मध्य एशिया का ‘लैंड लाक्ड’ इलाके तक जुड़ जाएगा। इस प्रकार इस बंदरगाह से भारत की सामरिक, आर्थिक और भू-राजनीतिक स्थिति बेहद मजबूत होने की संभावना बढ़ेगी।
चाबहार बंदरगाह भारत की आर्थिक ताकत बनने की आशा के प्रतीक के तौर पर भी देखा जा रहा है। गुजरात के कांडला बंदरगाह से केवल छह दिनों में चाबहार पहुंचा जा सकता है। वहां से रेल या सड़क के माध्यम से सामान आगे पहुंचाया जा सकता है। यही लाभ ईरान को भी होगा। भारत को ईरान से तेल, गैस और मध्य एशिया के लिए संपर्क चाहिए, ताकि पाइपलाइन के जरिए गैस लाई जा सके। मगर चाबहार बंदरगाह को लेकर भारत की दीर्घकालीन योजनाएं ईरान की जटिल धार्मिक और वैश्विक नीतियों के चलते कैसे पूरी होंगी, इसको लेकर गहरा असमंजस है।
चाबहार बंदरगाह से भारत को होने वाले फायदों के केंद्र में ईरान, अफगानिस्तान और रूस हैं। ये तीनों देश वर्तमान में कड़े वैश्विक प्रतिबंधों का सामना कर रहे हैं। अमेरिका ने लंबे समय से तालिबान को किसी भी तरह के समर्थन को अपराध घोषित कर रखा है। ऐसे में अफगानिस्तान में काबिज तालिबान और भारत के बीच सहयोग की गुंजाइश बेहद सीमित है। यूक्रेन पर हमले के बाद रूस कड़े अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों का सामना कर रहा है।
अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोपीय संघ के साथ-साथ आस्ट्रेलिया, कनाडा और जापान सहित कई देशों ने रूस पर साढ़े सोलह हजार से अधिक प्रतिबंध लगाए हैं। रूसी बैंकों की लगभग 70 फीसद संपत्ति जब्त कर ली गई और कुछ को वित्तीय संस्थानों के लिए ‘हाई स्पीड’ मैसेजिंग सेवा ‘स्विफ्ट’ से बाहर कर दिया गया। अमेरिका और ब्रिटेन ने रूसी तेल और प्राकृतिक गैस पर प्रतिबंध लगा दिया है। यूरोपीय संघ ने समुद्री रास्ते से कच्चे तेल के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया है
चाबहार बंदरगाह वाला ईरान भी गंभीर मानवाधिकारों के उल्लंघन और परमाणु बम बनाने की कोशिशों के कारण कई वैश्विक प्रतिबंधों का सामना कर रहा है। फिर, ईरान की कूटनीति और भारत की स्थिति में गहरे अंतर्द्वंद्व और विरोधाभास हैं। ईरान के दो सबसे बड़े शत्रु राष्ट्र अमेरिका और इजराइल भारत के महत्त्वपूर्ण आर्थिक और सामरिक साझीदार हैं। भारत और अमेरिका व्यापक रणनीतिक भागीदार हैं और दोनों के बीच सहयोग व्यापार, रक्षा, बहुपक्षवाद, खुफिया, साइबर स्पेस, नागरिक परमाणु ऊर्जा, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा जैसे कई क्षेत्रों में फैला हुआ है।
भारत और इजराइल के बीच गहरे द्विपक्षीय आर्थिक, सैन्य और रणनीतिक संबंध हैं। रूस के बाद इजराइल भारत का दूसरा सबसे बड़ा रक्षा आपूर्तिकर्ता है। दोनों देशों के बीच सैन्य और रणनीतिक संबंध आतंकवादी समूहों पर खुफिया जानकारी साझा करने और संयुक्त सैन्य प्रशिक्षण तक विस्तारित हैं।
चाबहार बंदरगाह, वैश्विक बाजार में पहुंच बढ़ाने के लिए भारत के लिए बहुत मददगार बन सकता है। मगर ईरान, चीन और रूस के साथ निरंतर आगे बढ़ रहा है। ऐसे में अमेरिका और यूरोप ईरान की ऐसी किसी भी योजना को फलीभूत नहीं होने देंगे, जिसका व्यापक लाभ उसे मिल सके। जाहिर है, चाबहार बंदरगाह के व्यापक फायदों के लिए ईरान में लोकतांत्रिक सरकार, पुतिन का पतन तथा जिनपिंग की साम्राज्यवादी आक्रामक नीतियों जैसे व्यापक परिवर्तनों की जरूरत होगी और इसकी उम्मीद फिलहाल कहीं दिखाई नहीं पड़ती। इसके साथ ही भारत ईरान के साथ सहयोग बढ़ाने को लेकर अमेरिका, इजराइल और यूरोपीय देशों से संबंध बाधित कर ले, इसकी संभावना भी बिल्कुल नहीं है।
Date:17-04-24
सुधरें जांच एजेंसियांसंपादकीय
सर्वोच्च न्यायालय ने प्रबीर पुरकायस्थ को रिहा कर दिया। प्रबीर समाचार वेबसाइट ‘न्यूजक्लिक’ के संस्थापक संपादक हैं, जिन्हें 3 अक्टूबर, 2023 इस आरोप में गिरफ्तार किया गया था कि वह चीन से पैसे लेकर भारत के विरुद्ध दुष्प्रचार करते हैं। उनकी गिरफ्तारी गैर-कानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम (यूएपीए) के तहत की गई थी। जाहिर है कि उनके ऊपर लगाया गया आरोप निहायत ही गंभीर था, लेकिन जांच एजेंसियों ने वह गंभीरता नहीं दिखाई जो उन्हें दिखानी चाहिए थी। न्यायालय के अनुसार संविधान के अनुच्छेद 20, 21 और 22 व्यक्ति के जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार की सुरक्षा प्रदान करते हैं। ये अधिकार संविधान के तहत व्यक्ति को प्राप्त सर्वाधिक पवित्र एवं महत्त्वपूर्ण अधिकार हैं, लेकिन पुरकायस्थ की गिरफ्तारी की प्रक्रिया में उनके इसी अधिकार का मनमाने ढंग से अतिक्रमण किया गया। विधिक प्रक्रिया यह है कि जिस व्यक्ति को गिरफ्तार किया जाए उससे पहले पूरी जांच-पड़ताल करके उसे लिखित तौर पर बताया जाए कि आखिर उसे क्यों गिरफ्तार किया जा रहा है। इसी तरह रिमांड देने वाले न्यायिक अधिकारी का भी दायित्व बनता है कि वह सुनिश्चित करे कि जिस व्यक्ति को रिमांड पर भेजा जा रहा है, उसे लिखित में बताया जाए कि उसे रिमांड पर क्यों भेजा जा रहा है। लेकिन जांच एजेंसी ने प्रबीर के मामले में इस बेहद महत्त्वपूर्ण निर्धारित प्रक्रिया का पालन नहीं किया। प्रबीर को बेहद हड़बड़ी में गिरफ्तार किया गया और इस तरह न्याय की मूल अवधारणा के विरुद्ध कार्य किया गया। इसीलिए न्यायालय ने इसी आधार पर कि अभियुक्त को उसकी गिरफ्तारी का आधार नहीं बताया गया, उसकी गिरफ्तारी और रिमांड को अवैध करार दिया और रिहा करने का आदेश दिया। यह आदेश उन सभी जांच एजेंसियों के लिए एक तमाचा भी है, और सबक भी है कि वे किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार तो कर लेती हैं, लेकिन गिरफ्तारी से पहले की जो कार्यवाहीजन्य प्रक्रियाएं होती हैं, उन्हें पूरा नहीं करतीं । परिणामस्वरूप गंभीर आरोपों के अभियुक्तों को भी रिहाई मिल जाती है और जांच एजेंसियों की किरकिरी होती है। उम्मीद की जानी चाहिए कि सर्वोच्च न्यायालय को आगे इस तरह की टिप्पणी करने की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।
Date:17-04-24
चाबहार बंदरगाह पर रिश्तों के जहाजविवेक काटजू , ( पूर्व राजदूत )
चाबहार बंदरगाह को लेकर भारत और ईरान के बीच हुआ ताजा समझौता काफी अहम है। यह आपसी रिश्ते को तो नई ऊंचाई देगा ही, कनेक्टिविटी की दृष्टि से भी बेहद महत्वपूर्ण साबित होगा। दोनों देशों के संबंधित मंत्रियों की मौजूदगी में इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड (आईपीजीएल), जो भारत की एक सार्वजनिक कंपनी है और ईरान के बंदरगाह एवं समुद्री संगठन के बीच यह तय हुआ है कि शाहिद बेहेश्ती बंदरगाह-चाबहार के आधुनिकीकरण में भारतीय कंपनी अगले 10 साल में लगभग 37 करोड़ डॉलर खर्च करेगी और उसका प्रबंधन व संचालन भी करेगी। इस रकम में से करीब 12 करोड़ डॉलर की धनराशि बुनियादी ढांचे के विकास में निवेश की जाएगी, जबकि शेष 25 करोड़ डॉलर बतौर कर्ज ईरान को दिया जाएगा।
चाबहार बंदरगाह को विकसित करने की भारतीय मंशा दशकों पुरानी है। यह बंदरगाह ईरान के दक्षिण-पूर्वी तट पर है, जहां से अफगानिस्तान-ईरान सीमा पर स्थित जरांज शहर के जरिये दक्षिणी अफगानिस्तान का पूरा फलक खुल जाता है। आज से 22 साल पहले 2002 में ही वाजपेयी सरकार ने दूरंदेशी दिखाते हुए जरांज से दिलाराम तक सड़क बनाने में अफगानिस्तान की मदद की थी। यह सड़क चाबहार से अफगानिस्तान और अफगानिस्तान के जरिये मध्य एशिया, आगे रूस व यूरोपीय देशों के लिए रास्ता खोलती है। इसके साथ-साथ, ईरान की सहभागिता वाला अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारा भी भारत के वाणिज्यिक हितों को आगे बढ़ाने में बड़ी भूमिका अदा करेगा। हमें भूलना नहीं चाहिए कि पाकिस्तान अपने पंजाब, खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान के जरिये अफगानिस्तान का मार्ग हमारे निर्यात के लिए कभी नहीं खोलेगा, जबकि इस्लामाबाद व बीजिंग की मंशा अफगानिस्तान को चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे से जोड़ने की भी है, जिसकी कड़ी ग्वादर बंदरगाह से जुड़ी है। ऐसे में, आर्थिक और वाणिज्यिक नजरिये से स्वाभाविक ही चाबहार बंदरगाह का विकास हमारे हित में है। इससे हमारा सामरिक हित भी जुड़ा हुआ है।
शाहिद बेहेश्ती बंदरगाह-चाबहार पर समझौते के बाद अमेरिकी प्रवक्ता ने कहा है कि ईरान से सहयोग करने वालों को वे अमेरिकी प्रतिबंध याद रखने चाहिए, जो वाशिंगटन ने तेहरान पर लगा रखे हैं। अभी हमें यह नहीं पता कि अमेरिकी प्रवक्ता की यह प्रतिक्रिया बस औपचारिक थी या फिर अमेरिकी प्रशासन ने चाबहार की अपनी नीति बदल ली है? दरअसल, 2016 में जब भारत और ईरान के बीच चाबहार को लेकर एक समझौता हुआ था, तब प्रतिबंधों के बावजूद अमेरिका ने यह एलान किया था कि चाबहार के विकास के लिए दिया जाने वाला भारतीय सहयोग प्रतिबंध के दायरे से बाहर रहेगा। लिहाजा, भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने ठीक ही कहा है कि चाबहार के सहयोग को संकीर्ण नजरिये से नहीं देखना चाहिए, क्योंकि इसका सकारात्मक प्रभाव पूरे क्षेत्र पर पड़ेगा। यह भी मुमकिन है कि भारत और अमेरिका की इस मसले पर परदे के पीछे बातचीत हुई हो, क्योंकि अमेरिकी प्रवक्ता के बयान में तल्खी नहीं थी। संभावना यह भी है कि घरेलू दबाव के चलते अमेरिका ने यह बयान दिया हो, क्योंकि इस साल वहां पर राष्ट्रपति चुनाव होने वाला है और बाइडन प्रशासन ने ईरान के प्रति काफी कड़ा रुख अपनाया है।
बहरहाल, ईरान पश्चिम एशिया का एक बड़़ा देश है। भारत के साथ उसके राजनीतिक संबंध और आधुनिक काल में, विशेषकर ऊर्जा के क्षेत्र में द्विपक्षीय सहयोग दोनों देशों के लिए लाभदायक रहे हैं। हालांकि, सच यह भी है कि अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते कई भारतीय कंपनियों ने ईरान से दूरी बनाए रखी थी। वे वहां निवेश करने से तो बचती ही थीं, ईरानी कंपनियों के साथ साझेदारी से भी हिचकती थीं, क्योंकि उनको डर था कि ऐसा करने से अमेरिकी कंपनियों से उनका रिश्ता या अमेरिका में उनका संचालन प्रभावित हो सकता है। भारत सरकार ने भी ईरान के साथ अपने संबंधों को आगे बढ़ाने में अमेरिकी प्रतिबंधों को ध्यान में रखा है। हां, चाबहार समझौता एक अपवाद रहा। आज भी भारत-ईरान के आर्थिक और वाणिज्यिक संबंधों में अमेरिकी प्रतिबंधों का नकारात्मक प्रभाव हम आसानी से देख सकते हैं, क्योंकि भारत के चहुंमुखी हित ईरान की तुलना में अमेरिका से कहीं अधिक जुड़े हैं। फिर भी, इसका यह मतलब नहीं कि तेहरान और नई दिल्ली अपने रिश्ते आगे न बढ़ाएं। कुछ न कुछ रास्ता तो ढूंढ़ना ही पड़ता है और यही कूटनीति की चुनौती भी होती है कि एक बड़ी शक्ति अमेरिका के प्रतिबंधों से कैसे निपटा जाए?
इस पूरे मसले का एक पहलू यह भी है कि भारत के पश्चिम एशियाई देशों से गहरे हित जुड़े हैं। सामरिक और सुरक्षा के नजरिये से इजरायल नई दिल्ली के लिए अहम है, तो खाड़ी के देश हमारी ऊर्जा-सुरक्षा के लिए जरूरी हैं। अरब देशों के साथ हमारा व्यापारिक संबंध काफी मजबूत है और लाखों भारतीय वहां काम करते हैं, जिनके द्वारा स्वदेश भेजी गई रकम हमारी अर्थव्यवस्था को फायदा पहुंचाती है। भारत की पारंपरिक नीति यही थी कि वह पश्चिम एशिया की अंदरूनी राजनीति से दूर रहे। यहां के हरेक देश के साथ वह अपने संबंध आगे बढ़ाता रहा है। मगर बीते कुछ वर्षों से इस नीति में बदलाव देखने को मिल रहा है। जिस तरह से अमेरिका ने खाड़ी के कुछ देशों, खासकर यूएईके साथ इजरायल के रिश्ते बढ़ाने में परदे के पीछे से मदद की, भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी यूएई के सदर और अबू धाबी के शासक मोहम्मद बिन जायेद से अपने निजी रिश्ते भी मजबूत किए हैं। कुछ महीने पहले प्रधानमंत्री ने अमीरात का सफल दौरा भी किया था, जब वहां एक भव्य मंदिर का उद्घाटन हुआ था। स्वाभाविक है, इन घटनाओं को तेहरान में तीखी नजर से देखा जा रहा हो? ऐसे में, हम यह कह सकते हैं कि ताजा समझौते के जरिये भारत ने ईरान और इस क्षेत्र को एक संकेत दिया है कि वह अपनी पश्चिम एशिया की नीति में संतुलन बनाना चाहता है, जो उचित भी है।
उल्लेखनीय है कि ऐसे समझौते अमूमन चुनाव के बीच नहीं होते हैं। मगर इसका दूसरा पहलू यह है कि ईरान को विश्वास है, भारत और उसके हित को हर भारतीय सरकार आगे बढ़ाने के लिए तैयार है। इतना ही नहीं, वह यह भी जानता है कि भारत की नजर चीन-ईरान-पाकिस्तान रिश्तों पर भी रहती है और ईरान जैसे महत्वपूर्ण देश में चीन और पाकिस्तान को भारत खुली छूट नहीं दे सकता है।
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हमारे देश में खाद्य पदार्थों का सुरक्षित स्तर का होना सार्वजनिक स्वास्थ्य का एक महत्वपूर्ण विषय बन गया है। हांगकांग और सिंगापुर के खाद्य विनियामकों की हाल की रिपोर्ट में दो लोकप्रिय भारतीय ब्रांड के मसालों में एथिलीन ऑक्साइड के ज्यादा होने का आरोप लगाया जा चुका है। इससे पहले नेस्ले कंपनी पर भारत में शिशु आहार में चीनी मिलाने का विवाद हो चुका है।
इससे जुड़े कुछ बिंदु –
‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 01 मई, 2024
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Date: 16-05-24
The Right CallIn releasing NewsClick founder, SC says Constitution’s emphasis on procedural safeguards is inviolableTOI Editorials
Supreme Court yesterday reiterated the paramount importance of procedural safeguards that flow from the Constitution to ensure arrests are not arbitrary. In Prabir Purkayastha (NewsClick founder) vs State (NCT of Delhi), the arrest, a subsequent remand order and also an order of Delhi HC were quashed because of the failure to follow due process. Purkayastha was ordered to be released on a technicality.
Constitutional guarantee | Article 22 of the Constitution provides safeguards when it comes to arrests. SC said the right to life and personal liberty is the most sacrosanct fundamental right. All the guardrails when it comes to arrests flow from this fundamental right.
Right to defend oneself | The bone of contention in the Purkayastha case was that the appellant was not given the grounds of arrest in writing before remand. SC observed that everyone has “a fundamental and statutory right to be informedabout the grounds of arrest in writing”.
This principle applies regardless of the law invoked to make the arrest. Hence, yesterday’s judgment drove home the point “it has been the consistent view of this court that the grounds on which the liberty of a citizen is curtailed must be communicated in writing”. The purpose of ensuring that the details are communicated in writing is to allow the accused an opportunity to oppose remand and seek bail. In the absence of formal communication, the accused is at a disadvantage.
Homework needs to be done | SC’s order highlighted that arrests had to be preceded by detailed investigation. It explained that grounds of arrest encompass details available with an investigating officer. It’s these details that form the basis of an arrest. When these details are not communicated formally to an accused prior to remand, there’s room for arbitrariness.
Specifics of the case | SC’s order did not deal with the merits of the case. Yet, both the remand and a supporting HC judgment were quashed only because of the sanctity attached to due process. SC concluded: “this entire exercise was done in a clandestine manner and was nothing but a blatant attempt to circumvent the due process of law; to confine the accused to police custody without informing him the grounds on which he has been arrested.” It’s unfortunate that it took Purkayastha almost eight months to get his arrest declared illegal. The delay is a telling statement on lower judiciary.
This judgment is built on precedent. The apex court has repeatedly emphasised that it will not allow dilution of statutory safeguards. That’s the basis of rule of law.
Date: 16-05-24
Fix Our Jugaad Cities First, Then Get ViksitET Editorials
Before anyone makes the next call-out for a Viksit Bharat, let’s first acknowledge a fact: Indian cities are dotted with death traps. It could be an open manhole, overflowing storm-water drains, dangling power lines or, as was the case on Monday during a sudden dust storm in Mumbai, crashing billboards. When a 17,040 sq ft hoarding comes crashing down in Ghatkopar, killing 14 people and injuring 70, it’s not a freak accident, but a man-made catastrophe waiting to happen. BMC, India’s richest civic agency, discovered soon enough that the company that owned the killer billboard had put up eight other hoardings without mandatory permissions.
Mishaps like this are a result of poor urban governance that shows little value for safety and unbridled ardour for profit under the euphemism of jugaad (read: cutting corners). Indian cities are expected to host over 800 mn people by 2050. Janaagraha Centre for Citizenship and Democracy’s 2023 ‘Annual Survey of India’s City-Systems: Shaping India’s Urban Agenda’, reveals that our urban governance is ill-prepared to deal with impacts of unprecedented expansion. 39% of state capitals lack active master plans, essential tools for charting long-term urban development and growth. And, then, there are issues with poor policy implementation and transparency.
City-systems reforms have been painfully slow. Reforms like decentralising power, streamlining administration and enhancing local government financial autonomy are required. Without empowered civic bodies, navigating local action for public safety and well-being will be well-nigh impossible. For a country that created Coalition for Disaster Resilient Infrastructure (CDRI), its cities behaving like villages isn’t just embarrassing, but alarming too.
Date: 16-05-24
Social media’s impact on Indian politicsThe traditional media’s shift to more provocative, biased content for survival, may have ensured its deathYamini Aiyar is a Public Policy Scholar; Neelanjan Sircar is Senior Fellow, Centre for Policy Research
“If Congress wins this election, it will be because of Dhruv Rathee,” declares a young Muslim man in Uttar Pradesh. Another group of young Jatav men in Agra list out who they follow — Mr. Rathee is top on the list as are local online “influencers.” Even a young supporter of the ruling Bharatiya Janata Party (BJP) from the Rawat community in Mohanlalganj admits that he regularly listens to Ravish on YouTube. Strikingly, almost everyone can recount the content — the details of the different shows and episodes of these influencers.
This is the first ever social media election in India. Social media has created avenues for alternate viewpoints outside of the spectre of state control and in the process successfully created a cognitive dissonance with the government narrative.
Changing contours
Till recently, social media has been a tool deployed by the BJP and Prime Minister Narendra Modi himself. In the early part of the decade, a “right wing ecosystem” emerged on social media to generate cognitive dissonance with the existing traditional media. The traditional media, in those early years did not indulge in active fear mongering. This was the role occupied by the right wing social media, which was openly politically colored and pushed the boundaries of decency with commentary on Muslims, women, and re-telling of history. As Kunal Purohit notes in his incisive book H-Pop: The Secretive World of Hindutva Pop Stars, “It provides ways to disseminate hate and stoke anger against minority groups and rivals each day, without ever becoming a tangible event, like a hate speech rally or a riot.”
But things have changed, especially as traditional media began to echo much of the content from the right wing ecosystem, saturating the type of content that was received. People are not being fooled; even core BJP supporters recognise the extent of this control. In the words of a BJP supporter we spoke to, “The media only speaks for one side (the BJP).” With a more diverse population using mobile phones and as more people searched for alternate viewpoints, an opportunity was created for critical voices. Crucially, these voices don’t align themselves with any political party, allowing them to garner the credibility vacated by the traditional media. Thus many we spoke to said that it was easier to get the true picture of what is happening in India through social media. Paradoxically, the traditional media’s shift to more provocative, biased content for survival, may have ensured its death.
Influencers with views that challenge the dominant narrative have been quick to catch on, helped by the algorithms. A feature of the algorithms used in YouTube and Facebook is that content that is growing quickly in popularity will be boosted to the whole user base. Indeed, Mr. Rathee’s video titled, “Is India becoming a DICTATORSHIP?”, has already garnered 25 million views on YouTube. This is also certainly an undercount, as snippets of the video have been circulating all over social media platforms.
Social media has also offered a space for political engagement of an increasingly reticent voter, silenced due to the prevailing environment of fear. In Mohanlalganj, we meet a local Instagram influencer from the Jatav community who reads shairi and remains publicly apolitical. But his frustration against the BJP is growing. He tells us, “I see and hear everything. If I speak, I will have trouble.”
Social media has most rapidly been adopted by the educated youth population. The youth was once viewed as the core support base for Mr. Modi. However, after 10 years, the aspiration is largely gone and for many, frustration has come in its place.
The Kurmi population is pivotal in many parts of central and eastern Uttar Pradesh. Once fully behind the BJP, division among them is palpable in Barabanki. Educated youth frustrated with the lack of jobs and armed with a narrative derived from social media, have moved away from the BJP — and it shows in the results. In 2019, the BJP swept the Barabanki parliamentary constituency, but in the 2022 State election, it lost three of the five assembly constituencies that comprise the parliamentary constituency.
At a very basic level, this is a positive development. In a democracy, diversity of opinion and active contestation of political views are critical. That these spaces are being prised open is an indicator of the sites of democratic reclaiming that are emerging in India.
However, the long-term implications need greater interrogation. First, political narratives are now being shaped outside the formal party system. Traditionally, the party worker and the political intermediary presented voters with political narratives, connecting them with the political ideologies with which they were aligned — generating policy demands from the bottom up. But social media is making the party workers and intermediaries less relevant. This enables greater centralisation within political parties, as the leader can directly shape narratives. Algorithms also ensure deeper polarisation. What this will do to party structures and more significantly the public sphere remains to be seen.
Regardless, the emergence of social media as the key player in this election has everything to do with the complete abdication of the bulk of traditional media from its professional purpose of framing political issues with credibility. What does this portend for reasoned discussion and the health of Indian democracy? This is the question that the 2024 election raises.
Date: 16-05-24
चाबहार पर करार भारत की कूटनीतिक सफलतासंपादकीय
चाबहार पोर्ट के विकास और प्रबंधन पर अगले दस वर्ष के लिए ईरान की सरकारी कंपनी से समझौता भारत को व्यापारिक सामरिक लाभ देगा। जहां एक ओर चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव का यह सही जवाब है, वहीं मध्य एशिया के देशों के अलावा यूरोप से व्यापार का मार्ग खुल जाएगा। चूंकि अमेरिका का ईरान पर प्रतिबंध जारी है लिहाजा भारत के इस कदम पर दुनिया को दिखाने के लिए धमकी देना उसकी मजबूरी थी । भारत के विदेश मंत्री ने अमेरिका को याद दिलाया कि उसने हाल ही में इस पोर्ट को विकसित करने में भारत की भूमिका की तारीफ की थी। विदेश मंत्री ने कहा कि यह समझौता सभी के हित में है, लिहाजा अमेरिका को संकीर्ण दृष्टि नहीं रखनी चाहिए। वैसे भी ट्रम्प के शासन काल में इस प्रतिबंध से भारत को मुक्त रखा गया था। अब इस नए समझौते के बाद अमेरिका को यह सोचना होगा कि वह दक्षिण और मध्य एशिया में चीन को पांव पसारने की खुली छूट देना चाहता है या भारत के जरिए उस पर अंकुश लगना चाहता है। चाबहार परियोजना उत्तर-दक्षिण ट्रांसपोर्ट कॉरिडोर का ही हिस्सा है। उधर भारत-मध्यपूर्व-यूरोप – इकोनॉमिक कॉरिडोर, जिसकी सर्वसम्मत परिकल्पना नई दिल्ली की जी-20 बैठक में भारत के प्रधानमंत्री ने की थी, उसे भी अंजाम देने का रास्ता खुलेगा। भारत के लिए यह एक बड़ी राजनयिक सफलता है।
Date: 16-05-24
क्या युवाओं का बौद्धिक विकास ठीक से हो रहा है?चेतन भगत, ( अंग्रेजी के उपन्यासकार )
हाल ही में एक वीडियो बहुत चर्चित हुआ। एक निजी विश्वविद्यालय के बेखबर छात्र विरोध-प्रदर्शन में भाग लेने चले आए थे। एक रिपोर्टर के साधारण से सवालों के जवाब में वे दो वाक्य भी नहीं बोल पा रहे थे। वीडियो देखकर कइयों की हंसी फूट पड़ी, लेकिन वह उतना ही दु:खद भी था। उसमें हमारे आज के औसत कॉलेज छात्रों का एक छोटा-सा नमूना नजर आया था। वे साधारण छात्र नहीं थे। उनके माता-पिता ने उन्हें अच्छी परवरिश दी थी और गुणवत्तापूर्ण स्कूलों में दाखिला दिलाया था। वे महंगे निजी विश्वविद्यालयों का खर्च उठाने में भी सक्षम थे। वे छात्र अच्छे कपड़े पहनते हैं और महंगे फोन रखते हैं। इसके बावजूद जब वे कुछ कहने के लिए मुंह खोलते हैं तो हम पाते हैं कि उनकी पढ़ाई-लिखाई ठीक से नहीं हो सकी है।
यह एक गंभीर स्थिति है। इसका यह मतलब है कि हमारे मौजूदा स्नातकों और भावी स्नातकों का एक पूरा वर्ग- जो शायद लाखों में हैं- ऐसा है, जिसकी किसी चीज के बारे में सोचने, समझने, उसका विश्लेषण या समाधान करने की क्षमता शोचनीय है। स्कूल के बारह साल और कॉलेज के तीन या चार साल पूरे करने के बाद ये हालात हैं। मैं एक मोटिवेशनल स्पीकर के रूप में पूरे देश की यात्राएं करता हूं और कॉलेज-छात्रों को संबोधित करता हूं। यह कहते हुए मुझे दु:ख हो रहा है कि औसत छात्र अयोग्यता का भयावह स्तर प्रदर्शित करते हैं। अगर युवा किसी भी चीज में दिमाग लगाने से ही इनकार कर देंगे तो हम विकसित कैसे बनेंगे?
मैं यह नहीं कह रहा हूं कि भारत में मेधावी छात्र नहीं हैं। भारत के छात्र ही यूनिकॉर्न के संस्थापक, इंवेंटर्स, शीर्ष वकील और सर्जन बने हैं। लेकिन, वे अपवाद हैं। जब ‘सभी’ छात्रों की बात आती है, तो चीजें इतनी उजली नहीं लगतीं। सर्वेक्षणों से पता चलता है कि आधे से अधिक भारतीय स्नातक बेरोजगार हैं। ऐसा क्यों है? हम अक्सर इसके लिए अपनी शिक्षा प्रणाली को दोष देते हैं। शायद आंशिक रूप से वह हो भी। लेकिन वास्तविक कारण इससे गहरे हैं। तीन कारण देखें।
भारतीय परिवार, जिनमें साधन-संपन्न परिवार भी शामिल हैं, अपने बच्चों को पढ़ने, लिखने, सोचने, विश्लेषण करने, राय देने और समस्याओं को हल करने के लिए प्रोत्साहित नहीं करते। कितने मध्यम वर्गीय या उच्च मध्यम वर्गीय परिवार ऐसे हैं, जो खाने की मेज पर किताबों, करंट अफेयर्स, वैश्विक चिंताओं आदि पर चर्चा करते हैं? इसके बजाय हम इस बारे में बात करना पसंद करते हैं कि खाना कैसा बना है, घी, अचार और गुड़ कितना अच्छा है, कौन किससे शादी कर रहा है, रियलिटी शो और क्रिकेट में क्या हो रहा है, कौन-सी वेब सीरीज देखनी है या कौन-सा बॉलीवुड स्टार विवाह कर रहा है। इससे भी बदतर यह है कि हम आजकल खाने की मेज पर भी फोन में लगे रहते हैं। दिमागी जड़ता वहीं से शुरू होती है। इसके लिए किसी राष्ट्रीय शिक्षा नीति, पाठ्यक्रम या कॉलेज को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
वीडियो देखना नया चलन बन गया है। किताबें पढ़ने को समय की बर्बादी माना जाता है। कई छात्र कहते पाए जाते हैं कि ‘मैं किताबें नहीं पढ़ता, मैं तो वीडियो देखना पसंद करता हूं।’ वास्तव में वो यह कहना चाह रहे होते हैं कि मैं पढ़ने के लिए जरूरी मानसिक प्रयास नहीं करना चाहता, क्योंकि वीडियो देखने में दिमाग की कम कसरत होती है। जबकि पढ़ने का कोई विकल्प नहीं है। क्या आप किसी ऐसे डॉक्टर पर भरोसा करेंगे जो कहता हो, ‘मैंने कभी मेडिकल की किताबें नहीं पढ़ीं, लेकिन बहुत वीडियो जरूर देखे हैं?’
एक औसत भारतीय छात्र अच्छा जीवन बिताना चाहता है। अच्छे जीवन से उसका आशय आईफोन, आकर्षक डेटिंग पार्टनर, महंगे कपड़े, ऑनलाइन शॉपिंग और ट्रेंडी बार-रेस्तरां में जाना है। सोशल मीडिया फीड उसे यही सब दिखाकर उसकी इच्छाओं को बढ़ावा देती है। उसके दिमाग में अपने जीवन के उद्देश्य पर विचार करने के लिए समय ही नहीं है। जब उससे करियर के लक्ष्यों के बारे में पूछा जाता है, तो वो बस इतना ही कहता है कि मुझे कोई अच्छी-सी नौकरी चाहिए। दुनिया पर अपनी छाप छोड़ने, किसी क्षेत्र में उत्कृष्टता हासिल करने या सार्थक जीवन जीने का जुनून उसमें नहीं होता। उनकी मानसिकता यह होती है कि चाहे जैसे हो, मुझे यह लाइफस्टाइल मिल जाए, फिर उसके लिए मां-पिता से ही मदद क्यों न लेनी पड़े। इससे बचें। हर उस चीज में ध्यान भटकाना बंद कर दें, जो आपको बौद्धिक रूप से जड़ बनाती हो। दुनिया के बारे में जानें। समाज के रचनात्मक-सदस्य के रूप में अपना स्थान खोजें। चुनौतीपूर्ण लक्ष्य तय करें और उन्हें हासिल करने पर ही फोकस करें।
Date: 16-05-24
भारत के युवाओं में बढ़ती आत्महत्या की प्रवृत्तिरंजना मिश्रा
भारत के युवाओं में बढ़ती आत्महत्या की प्रवृत्ति न केवल सामाजिक चिंता का विषय, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी खतरा पैदा कर रही है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो की ताजा रिपोर्ट के आंकड़े भारत में आत्महत्या की गंभीर स्थिति को उजागर करते हैं। रिपोर्ट के अनुसार, 2022 में भारत में 1.71 लाख लोगों ने आत्महत्या की, जो दुनिया में सबसे अधिक है। यह आंकड़ा चिंताजनक है, खासकर जब हम यह जानते हैं कि भारत में आत्महत्या के मामलों की वास्तविक संख्या दर्ज संख्या से कहीं अधिक हो सकती है। अपर्याप्त पंजीकरण प्रणाली, मृत्यु के चिकित्सा प्रमाणन की कमी और आत्महत्या से जुड़े सामाजिक कलंक के कारण कई मामलों का पता तक नहीं चल पाता है। रिपोर्ट में यह भी सामने आया है कि 41 फीसद आत्महत्याएं 30 वर्ष से कम आयु के युवाओं द्वारा की जाती हैं।
इसके पीछे अनेक जटिल कारण हैं, जिनमें मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं, शैक्षणिक दबाव, सामाजिक आर्थिक समस्याएं, प्रेम संबंधों में विफलता, व्यसन और घरेलू हिंसा आदि प्रमुख हैं। भारत में युवाओं पर मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का बोझ काफी ज्यादा है, लेकिन उनमें से ज्यादातर इसका उपचार नहीं कराते। परीक्षाओं में सफलता का अत्यधिक दबाव, अभिभावकों और शिक्षकों की अपेक्षाएं और विफलता का डर युवाओं को आत्महत्या की ओर धकेल सकता है। गरीबी, बेरोजगारी, सामाजिक बहिष्कार, भेदभाव, और परिवार में तनाव भी आत्महत्या के लिए जोखिम का कारक बन सकते हैं। युवाओं के बीच इंटरनेट के उपयोग में होने वाली उल्लेखनीय वृद्धि भी आत्महत्या में प्रमुख भूमिका अदा करती है। इसके कुछ अन्य कारकों में साइबरबुलिंग, लैंगिक उत्पीड़न, घरेलू हिंसा और सामाजिक मूल्यों में गिरावट भी शामिल हो सकते हैं।
मानसिक स्वास्थ्य समस्याएं आत्महत्या का एक बड़ा कारण हैं। भारत में लगभग 54 फीसद आत्महत्याएं मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं के कारण होती हैं। पढ़ाई के दबाव यानी शैक्षणिक तनाव से होने वाली आत्महत्याओं के मामले लगभग 23 फीसद पाए गए हैं। इसी प्रकार भारत में होने वाली आत्महत्याओं में सामाजिक तथा जीवन शैली कारकों का लगभग 20 फीसद और हिंसा का 22 फीसद योगदान रहता है। इसके अलावा आर्थिक संकट के कारण 9.1 फीसद और संबंधों की वजह से लगभग 9 फीसद आत्महत्याएं भारत में देखी गई हैं। युवा लड़कियों और महिलाओं में कम उम्र में विवाह, कम उम्र में मां बनना, निम्न सामाजिक स्थिति, घरेलू हिंसा, आर्थिक निर्भरता और लैंगिक भेदभाव भी आत्महत्या के महत्त्वपूर्ण कारक हैं। आत्महत्या के आंकड़ों के अनुसार, भारत में वर्ष 2022 में परीक्षा में विफलता के कारण 2095 लोगों ने आत्महत्या की थी।
इस भीषण समस्या का समाधान ढूंढ़ने के लिए बहुआयामी रणनीति अपनाने की जरूरत है, जिसमें मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता, मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच में सुधार, शैक्षणिक प्रणाली में सुधार, सामाजिक-आर्थिक सहायता, प्रेम संबंधों में परामर्श, व्यसन से मुक्ति, हेल्पलाइन और सहायता समूह, मीडिया की जिम्मेदारी और सामुदायिक जागरूकता शामिल हैं। इसके लिए सरकारों, गैर-सरकारी संगठनों और समुदायों को मिलकर कदम उठाने होंगे। युवाओं को यह जानकारी देनी आवश्यक है कि वे जिन समस्याओं का सामना कर रहे हैं, उनका वैकल्पिक और उचित समाधान मौजूद है। अगर इस प्रकार समस्याओं से परेशान युवाओं से लगातार बातचीत की जाए और उन्हें अच्छी प्रकार समझाया जाए, तो आत्महत्या जैसे बड़े संकट से उन्हें बचाया जा सकता है।
युवाओं को आत्महत्या से बचाने के लिए, उनकी मानसिक परेशानियों की शीघ्र पहचान करनी होगी और अनुकूल वातावरण में उनकी देखभाल के समुचित प्रावधान होने चाहिए। इस प्रवृत्ति को रोकने और मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ावा देने के लिए, मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को सभी के लिए सुलभ बनाना और उन्हें सस्ती दर पर उपलब्ध कराना भी आवश्यक है। शिक्षा प्रणाली में परिवर्तन लाकर परीक्षाओं में सफलता के दबाव को कम करना और विद्यार्थियों में आत्मविश्वास बढ़ाने पर ध्यान देना होगा। नशे से ग्रस्त युवाओं के लिए नशा मुक्ति केंद्रों की स्थापना करनी चाहिए और उन्हें उपचार प्रदान करना चाहिए।
अगर कोई युवा आत्महत्या के विचारों से जूझ रहा है, तो उसे किसी विश्वसनीय व्यक्ति से बात करनी चाहिए जैसे परिवार के सदस्य, दोस्त से या चिकित्सक से। आत्महत्या जैसी घातक प्रवृत्ति से बचने के लिए स्वस्थ जीवनशैली अपनाना बहुत जरूरी है। स्वस्थ जीवनशैली के अंतर्गत, पर्याप्त नींद लें, स्वस्थ भोजन करें, नियमित व्यायाम करें और तनाव को कम करने के लिए स्वस्थ मनोरंजन करें। इसके अलावा सदैव सकारात्मक सोचें, नकारात्मक विचारों को दूर भगाएं। उन्हें ऐसे लोगों से मित्रता या निकटता रखनी चाहिए, जो उन्हें सही सलाह दें और उनके मानसिक बल को बढ़ाएं।
मानसिक समस्याओं से जूझ रहे युवाओं के पारिवारिक माहौल को सुधारने का भी भरपूर प्रयास किया जाना चाहिए। इसके अलावा हमारे देश में ऐसे सामाजिक परिवर्तन की भी आवश्यकता है, जिसमें किसी भी व्यक्ति के साथ जातिगत आधार पर, धर्म के आधार पर या लैंगिक आधार पर भेदभाव न किया जाए। इसके लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति, अंतर क्षेत्रीय सहयोग और सामाजिक तथा सामुदायिक भागीदारी की बहुत आवश्यकता है, ताकि किसी भी व्यक्ति में मानसिक स्वास्थ्य जैसी समस्याएं उत्पन्न न हों और न ही उनमें आत्मघाती प्रवृत्तियां विकसित हो सकें। गैर-सरकारी संगठनों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को आत्महत्या रोकथाम के लिए जागरूकता अभियान चलाने और पीड़ितों को सहायता प्रदान करने के लिए आगे आना चाहिए।
आत्महत्या के कारणों और इससे निपटने के सबसे प्रभावी तरीकों के बारे में अधिक अनुसंधान करने की आवश्यकता है। सरकार को इस दिशा में अधिक निवेश करना चाहिए और विश्वसनीय डेटा इकट्ठा करने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। राजनीतिक इच्छाशक्ति से ही आत्महत्या रोकथाम को एक राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाया जा सकता है। इसके लिए पर्याप्त बजट आबंटित किया जाना चाहिए। सरकार को इस समस्या से निपटने के लिए एक मजबूत राष्ट्रीय रणनीति विकसित करनी चाहिए और इसके कार्यान्वयन पर ध्यान देना चाहिए।
युवाओं का जीवन अमूल्य है और उनके पास इस दुनिया को देने के लिए बहुत कुछ है। इसलिए चाहे परिस्थितियां कितनी भी मुश्किल क्यों न हों, उन्हें उम्मीद की किरण कभी नहीं छोड़नी चाहिए और समस्याओं से हार न मानकर बेहतर भविष्य के लिए प्रयास करते रहना चाहिए। आत्महत्या कभी भी किसी समस्या का समाधान नहीं है। आज हमारे देश के युवाओं में आत्महत्या करने की प्रवृत्ति एक गंभीर समस्या बनती जा रही है। जागरूकता, रोकथाम रणनीति और सामाजिक प्रयासों द्वारा मिलकर हम इस समस्या का समाधान कर सकते हैं और युवाओं को बेहतर जीवन जीने के अवसर प्रदान कर सकते हैं।
किसी भी देश के युवा उस देश के सामाजिक-आर्थिक विकास के रीढ़ की हड्डी होते हैं, या दूसरे शब्दों में कहें तो उस देश का राष्ट्रीय धन होते हैं। उनका इस प्रकार आत्महत्या करना देश का बहुत बड़ा नुकसान है। हमें हर हाल में इस आत्मघाती प्रवृत्ति को समूल नष्ट करना होगा और अपने देश की युवा शक्ति को बचाकर उन्हें देश के नवनिर्माण में लगाना होगा।
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हाल ही में द इंश्योरेंस रेग्यूलेटरी एण्ड डेवलपमेंट अथॉरिटी ऑफ इंडिया या आईआरडीएआई या भारतीय बीमा विनियामक और विकास प्राधिकरण ने कंपनियों से स्वास्थ्य बीमा की पात्रता को व्यापक बनाने को कहा है। इस निर्देश में सबसे महत्वपूर्ण यह है कि इसमें वरिष्ठ नागरिकों को स्वास्थ्य बीमा उपलब्ध कराने पर विशेष जोर दिया गया है।
इससे संबंधित कुछ बिंदु –
– 2011 के बाद से भारत की जनसंख्या के आंकड़ों का आधिकारिक तौर पर हिसाब नहीं लगाया गया है। लेकिन संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष और विशेषज्ञों के अनुमान से भारत की जनसंख्या चीन के लगभग बराबर है।
– भारत एजिंग रिपोर्ट, 2023 (संयुक्त राष्ट्र के अनुमान पर आधारित) का अनुमान है कि भारत की 60 वर्ष से ऊपर की जनसंख्या, जो 2022 में लगभग 10% थी, 2050 में 30% तक हो जाएगी। यह अमेरिका की वर्तमान जनसंख्या से भी अधिक यानि 34 करोड़ से भी अधिक हो जाएगी।
– कई विकसित देशों में जहाँ 65 वर्ष से ऊपर की जनसंख्या 16% से 28% तक है, वहाँ स्वास्थ्य देखभाल, सस्ती दवा और बुजुर्गों की उचित देखभाल जैसी चुनौतियां आ रही हैं। उनसे सबक लेकर ही भारत, बीमा को व्यापक करने की ओर कदम उठा रहा है।
– इनमें से कई देशों में बीमा पॉलिसी में प्रवेश के लिए उम्र कोई बाधा नहीं है। लेकिन भारत में फिलहाल 65 वर्ष से ऊपर के लोगों का स्वास्थ्य बीमा नहीं किया जाता है।
– हमारे देश में पहले से ही अभिजात्य वर्ग ‘फैमिली फ्लोटर‘ प्लान लेकर चल रहा है। इसमें व्यक्ति और उसके माता-पिता का बीमा कम कीमत पर हो जाता है। अगर आईआरडीएआई का परिपत्र बाकी वरिष्ठ नागरिकों को भी वहन योग्य कीमत पर स्वास्थ्य बीमा उपलब्ध करवा सके, तो यह प्रशंसनीय होगा।
फिरहाल, भारत के लिए अपने जनसांख्यिकीय लाभांश को भुनाने का समय है। इसका अर्थ है हम पारंपरिक कृषि में लगे युवाओं को बेहतर रोजगार मुहैया कराना चाहते हैं। इस प्रक्रिया में उनके वृद्ध परिजनों की देखभाल का पुख्ता प्रबंध होना चाहिए। इस हेतु स्वास्थ्य बीमा और स्वास्थ्य सेवा, दोनों का ही उन्नयन होना चाहिए।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 24 अप्रैल, 2024
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Date: 15-05-24
Chabahar, Opening Routes for India-PlusMore options than Beijing for Tehran.
ET Editorials
With Monday’s agreement, India takes over management of Iran’s Chabahar Port for an initial 10-year period. This will change the face of regional connectivity, trade with landlocked countries of Central Asia and Afghanistan, and provide an alternative route that connects the region with Europe. For India and the region, economic benefits come with a strategic sweetener — an alternative that can bypass China and Pakistan’s Gwadar Port.
Chabahar, Iran’s only deep seaport with direct access to the ocean, is located beyond the Strait of Hormuz. This is critical to minimising trade disruptions, especially given its integration with the International North-South Transport Corridor (INSTC) project. It would reduce transit times and cut freight costs by an estimated 30%. This, in turn, will enhance India’s role in the global supply chain, as well as provide an entry point for humanitarian aid shipments. It bumps up India’s energy security as it allows for diversification of import routes for oil and gas, and improves access to critical natural resources, mitigating risks associated with traditional import routes. As India’s first overseas port management, here’s an opportunity to bolster our infra capabilities.
Trade, economics apart, this development is of great strategic importance. It gives India a vantage point across regions — West Asia, Indian Ocean, Africa. This isn’t just for itself, but also for countries committed to a free and open rules-based international order. India’s presence can provide Iran with an off-ramp necessary to ensure peace and stability in the West Asian region. It also allows Tehran to place its eggs in more baskets than in Beijing’s. Central Asian states, and Armenia and Azerbaijan also get an alternative, strategic vantage in the Indian Ocean region. This is an opening that can counter plans that China’s ‘ambitious’ vision has for the region. The US and other G7 powers should view India’s management of Chabahar as the creation of a safety valve, an alternative where none seemed likely to materialise.
Date: 15-05-24
Make Farmers Better Informed About RiskET Editorials
Food inflation is on another episodic spike. Which makes targeting inflation overall a more complicated exercise. Manufacturing and agriculture are diverging in price trends, in which the weather plays a crucial role. Food inflation is likely to remain elevated due to heatwave conditions till monsoon arrives. Then it’s expected to trend down sharply because of the high base during last year’s scattered and inadequate monsoon. Dependence of retail inflation on the weather is becoming more volatile with the rising frequency of extreme events. Supply responses like export bans and stocking limits don’t address rising volatility, and with it headline inflation that serves as a key macro target.
A more holistic food supply response would look at price signalling, marketing and logistics support, and expanded irrigation and stockholding. These are longer-term solutions by derisking food production from weather. Then there are climate mitigation efforts to reduce extreme weather phenomena, an even broader approach to keeping a lid on food prices. None of these will, of course, yield the outcome policymakers seek: an immediate reversal of food inflation. This tends to slow down progress on the policy that’ll actually make a difference.
Food production is more a victim of state intervention than market imperfection. GoI adds to these imperfections by trying to control input and output prices in farming without having adequate control over the former and insufficient capacity for the latter. India needs to craft policy that makes agriculture less risky. Instead, what we get is state responses that heighten price volatility. Food availability, GoI’s overriding concern, will be better served by farmers making better infor med decisions about risk.
Date: 15-05-24
ऐसी दूषित चेतना से प्रजातंत्र कैसे बचेगा?संपादकीय
उत्तर भारत की अपेक्षा बेहतर शिक्षा, आय और गवर्नेस वाले दक्षिण भारत के राज्य आंध्र प्रदेश में कुछ जगहों पर वोटर्स ने (जिनमें महिलाएं भी थीं) मतदान की पूर्व-संध्या पर पार्टी और प्रत्याशियों के कार्यालयों के सामने विरोध प्रदर्शन किया। यह विरोध किसी मुद्दे, लोक-कल्याण का कोई काम पूरा नहीं होने पर नहीं था। बल्कि उनकी मांग थी कि पार्टी के प्रत्याशी ने वोट के बदले जो रकम देने का वादा किया था, वह पूरा नहीं किया या कम पैसे दिए। वोटर्स का कहना था कि प्रत्याशी के कार्यकर्ताओं ने हर वोटर को एक हजार से लेकर छह हजार रुपए तक देने का वादा किया था । दक्षिण के कई राज्यों में राजनीतिक पार्टियां पैसे और घरेलू सामान जैसे टीवी, फ्रिज आदि देते रहे हैं। उत्तर भारत के भी सुदूर ग्रामीण इलाकों में असरदार लोग तत्काल लाभ देकर या भय दिखाकर वोट डलवाते रहे हैं। लेकिन इस मुद्दे पर सामूहिक प्रदर्शन शायद पहली बार है। यह सच है कि गरीबी की कशमकश व्यक्ति को समझौते करने को मजबूर करती है और प्रत्याशी और उनके लोग प्रजातंत्र को विषाक्त करने का खुला खेल खेलते रहे हैं। लेकिन आजादी इतने दशकों बाद भी जन-चेतना परिष्कृत होने के बजाय दूषित होती रहे, यह देश के प्रजातांत्रिक भविष्य पर प्रश्न चिह्न खड़ा करता है।
Date: 15-05-24
घटते मतदान के लिए नेता भी जिम्मेदारशंकर शरण, ( लेखक राजनीतिशास्त्र के प्राध्यापक एवं वरिष्ठ स्तंभकार हैं )
देश में जारी आम चुनाव के दौरान मतदान के घटते रुझान पर व्यापक चिंता व्यक्त की जा रही है, जबकि कई लोकतांत्रिक देशों में कम मतदान एक सामान्य परिघटना मानी जाती है। पूर्व की तुलना में घटता मतदान सदैव नकारात्मक नहीं, बल्कि मिले-जुले संकेत भी देता है। इसका सकारात्मक अर्थ इससे भी निकाला जाता है कि लोग बहुत क्षुब्ध नहीं हैं। सामान्य से अधिक मतदान अक्सर जनाक्रोश से भी उमड़ता है और सत्ता बदल देता है। इसलिए यूरोपीय देशों में सत्ताधारी नेता कम मतदान से नहीं, अपितु अधिक मतदान से आशंकित होते हैं। इसके बावजूद भारत में इस बार मतदान में कुछ मतदाताओं ने यदि उदासीनता दिखाई है तो यह सत्ताधारियों को हल्की चेतावनी भी है कि वे आत्ममंथन करें। सदैव दूसरों में गलती न खोजें। कम मतदान के मामले को कभी दूसरों की दृष्टि से भी देखना चाहिए। दलों, उम्मीदवारों की गुणवत्ता और उन्हें ही अधिक जिम्मेदार बनाने पर सोचना चाहिए। उदाहरण के लिए यदि सत्तारूढ़ दल खुद ही ‘चार सौ पार’ के दावे कर रहा हो तो मतदाताओं के एक वर्ग में उनका मत व्यर्थ मानने का भाव आना स्वाभाविक ही है। घर में आग हमेशा दुश्मन नहीं लगाता, कभी लापरवाही में वह घर के चिराग से भी लगती है। इस बीच मतदान को अनिवार्य करने का विचार भी चर्चा में है। यह अनर्गल विचार है। मतदान न करने का निर्णय भी एक मत है। इसका भी सम्मान होना चाहिए। यही प्रतिष्ठित लोकतांत्रिक देशों में भी प्रचलित है। मतदान को जबरिया बनाने की बातें जले पर नमक छिड़कने जैसी हैं कि जबरा मारे और रोने भी न दे!
हमारे राजनीतिक दल और नेता कितनी भी क्षुद्रता दिखाएं, लेकिन अपने लिए सबसे तालियां चाहते हैं। दलों द्वारा दुष्प्रचार, आडंबर, सौदेबाजी, भ्रष्टाचार, छल-प्रपंच, एक-दूसरे पर घृणित आरोप आदि के होते उन्हें चुनने के लिए सबसे उत्साहित होने की मांग जबरदस्ती ही है। सुविख्यात कार्टूनिस्ट आरके लक्ष्मण का करीब चालीस साल पुराना एक कार्टून है। उसमें हमारे विभिन्न दलों के नेता एक-दूसरे को विदेशी एजेंट, बिका हुआ, देशद्रोही, चरित्रहीन, भितरघाती और लोभी-लंपट आदि कह रहे हैं। आज का दृश्य क्या बेहतर है? अभी कुछ लोग अपने दल के नारे और अपनी नीतियों के लिए प्रतिद्वंद्वी दल को दोष दे रहे हैं। बरसों से हाल यही है कि कुछ नेता सालों-साल जैसे चुनावी भाषण ही देते रहते हैं। सदैव चुनौती, तैश, शेखी और निंदा से भरी लफ्फाजी। वे विदेश में बोलते हुए भी अपने प्रतिद्वंद्वी दल या नेताओं पर आक्षेप करते हैं। हमारे नेता कभी भी समाज की विभिन्न आवश्यकताओं, समस्याओं या विवादों पर कोई गंभीर विचार-विमर्श करते हुए नहीं मिलते। मानो जिम्मेदारी लेकर, सबको साथ जोड़कर, कोई रचनात्मक विमर्श उनका काम ही नहीं है। उनका काम तो मानो केवल एक-दूसरे को नीचा दिखाना और मनमाने वादे करना भर है। चुनावी घोषणा पत्र के नाम पर भी कोरी सैद्धांतिक बातें, लच्छेदार वादे या हवा-हवाई बातें। अब तो सीधे लालच देकर मतदाताओं के किसी वर्ग को लुभाने जैसे प्रस्ताव भी आने लगे हैं।
यह भी एक विचित्र दृश्य है कि मूलतः एक जैसी आर्थिक, सामाजिक, शैक्षणिक, वैदेशिक नीतियां रखते हुए भी वे दूसरों की नाहक निंदा करते हैं। जिन नीतियों को स्वयं गलत कहते रहे, स्वयं सत्ता पाने पर वही नीति जमकर चलाते हैं अथवा ऐसे काम करते हैं या घोषणाएं कर देते हैं, जिनका कभी घोषणा पत्र में उल्लेख ही नहीं किया था। फिर, बात-बात में श्रेय लेने की लालसा और तरह-तरह की तिकड़में भिड़ाना। सभी नारे अपनी पार्टी या नेता केंद्रित गढ़ना। सार्वजनिक स्थानों पर भी केवल दलीय नेताओं के नाम थोपना, चाहे वे स्थान तकनीक, व्यापार, साहित्य, कला या खेलकूद से संबंधित क्यों न हों। राजनीतिक गतिविधियों में नित्य अवसरवादी जोड़-तोड़, गठबंधन करके अपनी पिछली बातों को स्वयं झूठा साबित करते रहना। सालों-साल एक-दूसरे पर कीचड़ उछालकर फिर गद्दी के लिए मिल जाना। जिन कामों की एकमात्र जिम्मेदारी उनकी है, उससे मुंह चुराकर दूसरों को ललकारना, दोष देना, उलाहना और फटकारना कि सब काम नेता थोड़े ही कर सकते हैं। कुछ जनता को भी करना चाहिए।
यह सब एकतरफापन है, जिसमें केवल दलों और नेताओं की सुविधा का ध्यान रखना ही प्राथमिकता होती है। उदाहरण के लिए, उम्मीदवार एक से अधिक चुनाव क्षेत्र से खड़े हो सकते हैं, लेकिन मतदाता केवल एक ही क्षेत्र में मतदान कर सकता है। जबकि किसी नेता द्वारा दो जगह से चुनाव लड़ने में पहले से तय हो जाता है कि एक पूरे क्षेत्र में फिर मतदान, भारी समय और धन की बर्बादी हो सकती है। यदि विजयी उम्मीदवार ने उस क्षेत्र से जीतकर वहां से त्यागपत्र दे दिया तो लाखों लोगों का मत बेकार जाएगा। जनता को फिर से उपचुनाव में मतदान करना होगा।
जरूरत चुनाव प्रक्रिया को सरल, सस्ता, जिम्मेदार और गुणवत्तापरक बनाने की है। तब स्वत: मतदान अधिक सार्थक होगा और उसके प्रति आकर्षण बढ़ेगा। यह समझना चाहिए कि कम मतदान भी प्रपंची नेताओं, दलों, उम्मीदवारों और उन सबकी बातों के प्रति एक तरह का नकार भाव है। इसलिए, ऐसे राजनीतिक सुधार पर विचार होना चाहिए जिसमें समाज का व्यापक हित हो। सदैव खंडित, स्वार्थी, दलीय, वर्गीय हित के लिए तरह-तरह के प्रपंच से इतर हटकर भी विचार करना आवश्यक है। इसलिए, ऐसा चुनाव सुधार श्रेयस्कर होगा, जो चुनाव प्रक्रिया में बेतहाशा खर्चीलापन रोकने पर ध्यान केंद्रित करे, ताकि हर तरह के योग्य लोगों को प्रोत्साहन मिले। दलीय मनमानियों पर लगाम लगे। चुनाव प्रचार बिल्कुल संक्षिप्त और संयमित किया जाए, ताकि उसके लिए अधिक धन की जरूरत ही खत्म हो जाए। तमाम आडंबरों पर रोक लगाई जाए। यानी, चुनाव को सरल-सहज, किंतु गंभीर काम बनाया जाए। चाहे कुछ उत्सव-भाव भी रहे, लेकिन महंगे रोडशो जैसा अनावश्यक प्रदर्शन बंद हो। झूठी या निराधार बयानबाजी पर सांकेतिक ही सही, किसी दंड या उत्तरदायित्व की पक्की व्यवस्था बने। संसद और विधानसभाओं की कार्रवाइयों में दलबंदी का खुला प्रदर्शन रोका जाए। हर कहीं स्वस्थ गतिविधियों, जिम्मेदार, सहयोगी और सकारात्मक बातों की प्रवृत्ति को प्रोत्साहन मिले। उपरोक्त सुधारों पर सभी दलों के गंभीर नेताओं को साथ मिलकर कर सोचना चाहिए। तब चुनावी प्रक्रिया में लोगों की रुचि बढ़ेगी।
Date: 15-05-24
आर्थिकी का सहारा बने प्रवासी भारतीयडॉ. जयंतीलाल भंडारी, ( लेखक एक्रोपोलिस इंस्टीट्यूट आफ मैनेजमेंट स्टडीज एंड रिसर्च, इंदौर के निदेशक हैं )
पिछले दिनों यूनाइटेड नेशंस माइग्रेशन एजेंसी द्वारा इंटरनेशनल आर्गनाइजेशन फार माइग्रेशन रिपोर्ट, 2024 जारी की गई। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि भारतीय प्रवासियों द्वारा वर्ष 2022 में भेजा गया रेमिटेंस यानी प्रवासियों द्वारा अपने घर भेजा गया धन दुनिया के किसी भी देश के मुकाबले सबसे ज्यादा है। यह राशि 111 अरब डालर की ऊंचाई पर पहुंच गई है। देखा जाए तो यह उपलब्धि प्रवासी भारतीयों के परिश्रम, उनकी दक्षता और उनके मातृभूमि के प्रति स्नेह को भी रेखांकित करती है। यह कोई छोटी बात नहीं है कि पिछले एक दशक में प्रवासी भारतीयों द्वारा भेजे गए धन की मात्रा लगातार बढ़ी है। वर्ष 2010 में भारत में रेमिटेंस के तौर पर 53.48 अरब डालर आए थे। यह राशि वर्ष 2015 में बढ़कर 68.19 अरब डालर और वर्ष 2020 में बढ़कर 83.15 अरब डालर हो गई। अब भारत विश्व का ऐसा पहला देश बन गया है, जहां प्रवासियों द्वारा एक साल में 100 अरब डालर से अधिक की रकम भेजी गई। खास बात यह है कि प्रवासी भारतीयों द्वारा भेजा गया यह धन वित्त वर्ष 2021-22 में भारत आए कुल 83.57 अरब डालर के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश से भी ज्यादा है। भारत के बाद मेक्सिको, चीन, फिलीपींस और फ्रांस सबसे ज्यादा रेमिटेंस प्राप्त करने वाले देश हैं। रिपोर्ट के मुताबिक दुनिया में सबसे ज्यादा प्रवासी भारत के हैं, जिनकी संख्या करीब एक करोड़ 80 लाख है। यह आंकड़ा देश की कुल जनसंख्या का करीब 1.3 प्रतिशत है।
सबसे ज्यादा प्रवासी भारतीय संयुक्त अरब अमीरात, अमेरिका और सऊदी अरब में रहते हैं। पहले जहां भारत से अकुशल श्रमिक कम आय वाले खाड़ी देशों में जाते थे, वहीं अब विदेश जाने वाले भारतीयों में कुशल लोगों की संख्या ज्यादा है, जो अमेरिका, इंग्लैंड, सिंगापुर, आस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे उच्च आय वाले देशों में जा रहे हैं। ऐसे में वे अधिक कमाई करके ज्यादा धन भारत भेज रहे हैं। उल्लेखनीय है कि वर्ष 2020 में कोविड-19 के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था ऋणात्मक विकास दर की स्थिति में पहुंच गई थी। दुनिया के विभिन्न देशों की अर्थव्यवस्थाओं में धीमापन आने के कारण प्रवासी भारतीयों की आमदनी में भी बड़ी कमी आई थी। उन आर्थिक मुश्किलों के बीच भी प्रवासी भारतीय देश में रकम भेजते रहे। इससे भारतीय अर्थव्यवस्था को बड़ा सहारा मिला, लेकिन अभी भी विदेश में प्रवासी भारतीयों को आर्थिक और सुरक्षा समेत कई परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है। विदेशी कार्यस्थलों पर दुर्व्यवहार और नौकरी के समय जिनोफोबिया यानी नापसंदगी जैसी समस्याओं का सामना करना पड़ता है। जिनोफोबिया एक नई समस्या है। इसके बावजूद प्रवासी भारतीय भारत का खजाना भर रहे हैं।
इजरायल और हमास के आतंकियों के बीच चल रहे संघर्ष के बीच वहां फंसे भारतीय नागरिकों और प्रवासी भारतीयों की सुरक्षित वतन वापसी के लिए भारत ने आपरेशन अजय चलाया। इसी तरह वर्ष 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण यूक्रेन में जब भारतीय समुदाय सीधे खतरे में आ गया था, तब भी आपरेशन गंगा के तहत बड़ी संख्या में भारतीयों को सुरक्षित वापस लाया गया था। इसके बावजूद अभी भारत को अपने लोगों के दुख-दर्द को कम करने में और अधिक सहयोग करना होगा। विदेश में ऐसे भारतीयों की संख्या बढ़ती जा रही है, जो गलत लोगों या संस्थाओं के हाथ लगकर दुर्दशा के शिकार हो रहे हैं। यद्यपि भारत सरकार ने विभिन्न शिकायतों पर संबंधित देशों की सरकारों से दखल देने को कहा है, लेकिन भारत सरकार की और अधिक सक्रियता जरूरी है। इस लोकसभा चुनाव के बाद एक स्थिर और मजबूत सरकार केवल इसलिए आवश्यक नहीं कि वह आर्थिक मामलों में बड़े और कड़े फैसले ले सके, बल्कि इसलिए भी आवश्यक है, ताकि भारत के विकास में सहयोगी प्रवासियों की चिंताओं को दूर कर उन्हें नई ऊर्जा दे सके। दुनिया के कोने-कोने में बसे भारतवंशियों और प्रवासी भारतीयों की राजनीतिक, आर्थिक और कारोबारी क्षेत्रों में बढ़ती पकड़ भारत के तेज विकास के मद्देनजर महत्वपूर्ण हो गई है। प्रवासी भारतीयों का एक बड़ा वर्ग यह महसूस करता है कि पिछले एक दशक में दुनिया के आर्थिक और राजनीतिक मंचों पर भारत की सफलता का परचम फहराया है। इससे विश्व में इंडिया फिलांथ्रोपी अलायंस जैसे भारत हितैषी संगठन तेजी से आगे बढ़े हैं। इंडियास्पोरा भारत के विकास में अहम योगदान देने के उद्देश्य से 2012 में अमेरिका में स्थापित एक ऐसी गैर-लाभकारी संस्था है, जो करीब 20 देशों में सक्रिय रूप से काम कर रही है। यह संगठन दुनियाभर के विभिन्न देशों के प्रवासी भारतीयों के लिए भी प्रेरणादायी बन गया है। इसके प्रयासों से भारतवंशियों तथा प्रवासियों का भारत के लिए सहयोग और स्नेह लगातार बढ़ा है। पिछले वर्ष भारत की अध्यक्षता में आयोजित जी-20 सम्मेलन को अभूतपूर्व सफलता दिलाने में प्रवासी भारतीयों की भी अहम भूमिका रही।
इसमें कोई दो मत नहीं है कि आज दुनिया के हर बड़े मंच पर भारत की आवाज सुनी जाती है। कहीं भी संकट आता है, तो सबसे पहले पहुंचने वाले देशों में भारत का भी नाम होता है। ऐसे में इस लोकसभा चुनाव के बाद देश में एक ऐसी प्रभावी सरकार का गठन होना जरूरी है, जो प्रवासियों के साथ स्नेह एवं सहभागिता जारी रखे। तभी प्रवासी भारतीय अपने ज्ञान एवं कौशल की शक्ति से भारतीय अर्थव्यवस्था को आगे बढ़ाने, 2027 तक भारत को दुनिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने और 2047 तक भारत को विकसित देश बनाने की डगर पर तेजी से आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाते हुए दिखाई दे सकेंगे।
Date: 15-05-24
भूराजनीतिक लाभसंपादकीय
अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार के नेतृत्व में अपनी परिकल्पना के दो दशक से ज्यादा समय बाद और नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा चाबहार (Chabahar) में अंतरराष्ट्रीय परिवहन और ट्रांजिट कॉरिडोर की स्थापना संबंधी समझौते के आठ वर्ष बाद आखिरकार भारत और ईरान ने सोमवार को 10 वर्षीय परिचालन अनुबंध पर हस्ताक्षर कर दिए। भारत सरकार के स्वामित्व वाली कंपनी इंडिया पोर्ट्स ग्लोबल लिमिटेड (IPGL) और ईरान के पोर्ट्स ऐंड मैरीटाइम ऑर्गनाइजेशन (पीएमओ) के बीच हुए समझौते में भारतीय कंपनी ने बंदरगाह को उपकरण संपन्न बनाने और संचालन के लिए करीब 12 करोड़ डॉलर का निवेश करने की प्रतिबद्धता जताई है। अधोसंरचना को पूरा करने के लिए 25 करोड़ डॉलर की रुपी क्रेडिट की बात भी कही गई है। समझौते का तात्कालिक महत्त्व तो यही है कि यह उपकरणों की खरीद को लेकर छह साल से चला आ रहा गतिरोध समाप्त करता है। आपूर्तिकर्ता आईपीजीएल को ऋण देने के अनिच्छुक रहे क्योंकि वे ईरान पर अमेरिकी प्रतिबंधों से आशंकित थे। नए समझौते के तहत पीएमओ आईपीजीएल की ओर से उपकरण खरीदेगा और धनराशि संयुक्त अरब अमीरात में स्थित एक ईरानी कंपनी को रिफंड की जाएगी।
इससे पहले अप्रैल में भारत और म्यांमार के बीच एक समझौता हुआ था जिसमें म्यांमार और भारत के पूर्वोत्तर इलाके के बीच संपर्क मजबूत करने के लिए सितवे बंदरगाह का पूरा संचालन आईपीजीएल के संभालने की बात शामिल थी। चाबहार परियोजना चीन की विशाल बेल्ट और रोड पहल का भारतीय जवाब चाबहार परियोजना (Chabahar Project) को चीन की विशाल बेल्ट और रोड पहल का भारतीय जवाब माना जा रहा है। अगर मान भी लें कि यह बढ़ाचढ़ाकर कही गई बात है तब भी यह भारत के लिए महत्त्वपूर्ण है क्योंकि नौवहन, बंदरगाह और जलमार्ग मंत्री सर्वानंद सोनोवाल आम चुनाव के बीच इस समझौते पर हस्ताक्षर करने तेहरान पहुंचे। चाहबार का पूरा नाम शाहिद बहेश्ती बंदरगाह को ग्वादर के प्रतिद्वंद्वी के रूप में देखा जा रहा है। ग्वादर वह बंदरगाह है जिसे चीन पाकिस्तान में विकसित कर रहा है। चाबहार भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया से संपर्क मुहैया कराएगा। इसके इंटरनैशनल नॉर्थ साउथ परिवहन गलियारे से जुड़ाव की संभावना इसकी संभावनाओं का विस्तार करती है। यह भारत, रूस और ईरान की संयुक्त परियोजना है जो हिंद महासागर और पर्शिया की खाड़ी को एक जमीन स्थित मल्टी मॉडल कॉरिडोर के जरिये सेंटर पीटर्सबर्ग तथा उत्तरी यूरोप से जोड़ेगी। चाबहार को मोदी सरकार के लिए इतना अहम माना जा रहा था कि अफगानिस्तान तक पहुंच को वजह बताते हुए डॉनल्ड ट्रंप के नेतृत्व वाले अमेरिकी प्रशासन से बाकायदा रियायत चाही गई थी। परंतु अमेरिका के अफगानिस्तान से निकलने के बाद बाइडन प्रशासन ने चेतावनी जारी की कि ईरान के साथ समझौता करने वालों को प्रतिबंध झेलने होंगे। भारत सरकार के आगे बढ़ने की राह में यह कूटनीतिक चुनौती होगी।
म्यांमार में छिड़ा गृहयुद्ध सितवे की प्रगति को रोक रहा है, उसी तरह इस क्षेत्र में मची राजनीतिक उथलपुथल भी बताती है कि बंदरगाह का संचालन मुश्किल होगा। यह सिस्ता-बलूचिस्तान क्षेत्र में स्थित है जहां पाकिस्तान और अफगानिस्तान की सीमा मिलती है। वह अशांतिपूर्ण क्षेत्र है। इस वर्ष जनवरी में ईरान ने पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में मिसाइल हमला किया था ताकि ईरान विरोधी आतंकियों को समाप्त कर सके। इसके जवाब में पाकिस्तान ने भी मिसाइल और लड़ाकू विमानों से हमला बोला। यूक्रेन के साथ रूस का युद्ध भी आईएनएसटीसी को कमजोर कर सकता है। परंतु चाबहार समझौते से भूराजनीतिक लाभ हासिल होगा। ऐसे समय पर जब भारत हमास के खिलाफ जंग में रणनीतिक रूप से इजरायल का साथ दे रहा है और एक समझौते के तहत फिलिस्तीनियों की जगह इजरायल में भारतीय कामगारों को भेज रहा है, चाबहार समझौता अवसर है कि भारत पश्चिम एशिया में अपने रिश्तों को नए सिरे से संतुलित करे। इस क्षेत्र की मौजूदा अनिश्चितता तथा भारत की इस पर गहरी निर्भरता को देखते हुए यह भी बड़ा लाभ होगा।
Date: 15-05-24
भारतीय संघ को बेहतर बनाने की जरूरतअजय छिब्बर, ( लेखक एनआईपीएफपी, नई दिल्ली के अतिथि प्राध्यापक रहे हैं )
दक्षिण भारत के राजनीतिज्ञों और टिप्पणीकारों के बीच इन दिनों यह बहस तेज हो गई है कि भारतीय संघ में दक्षिणी राज्यों को उचित अहमियत नहीं मिल रही है। उनका तर्क है कि दक्षिणी राज्यों की संपन्नता का दोहन हो रहा है और उनके आर्थिक संसाधन तुलनात्मक रूप से कमजोर उत्तरी राज्यों को प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से अंतरित किए जा रहे हैं। उनका यह भी कहना है कि प्रत्येक 1 रुपये के कर भुगतान में कर्नाटक को मात्र 15 पैसे और तमिलनाडु को 29 पैसे मिल रहे हैं जबकि इनकी तुलना में उत्तर प्रदेश को 2.73 रुपये और बिहार को 7.06 रुपये मिल रहे हैं। उनका कहना है कि बेहतर आर्थिक प्रबंधन के बावजूद दक्षिणी राज्यों को नुकसान उठाना पड़ रहा है जबकि आर्थिक रूप से कमजोर उत्तरी राज्यों को राजकोषीय अंतरण के जरिये उनके योगदान से कहीं अधिक आर्थिक संसाधन भेजे जा रहे हैं।
देश के विभिन्न राज्यों में आय का स्तर भिन्न होने से यह असंतोष और बढ़ सकता है। मगर यह केवल उत्तर-दक्षिण का मामला नहीं है बल्कि गरीब बनाम अमीर राज्यों का मसला है। महाराष्ट्र, गुजरात, हरियाणा और दिल्ली जैसे राज्य अधिक योगदान देते हैं। जो राज्य केंद्रीय कोष में योगदान के बाद शुद्ध रूप से लाभ में रहते हैं, उनमें असम, ओडिशा और पश्चिम बंगाल जैसे पूर्वी राज्य शामिल हैं।
यूरोपीय संघ (EU) जैसे आर्थिक संघों में भी ऐसी ही शिकायतें सुनी जाती हैं। ईयू में आर्थिक रूप से धनी उत्तरी देश जैसे जर्मनी, नीदरलैंड्स, स्वीडन और डेनमार्क को लगता है कि वे दक्षिणी यूरोप के देशों जैसे ग्रीस, पुर्तगाल और स्पेन और कम संपन्न पूर्वी यूरोप के देशों के लिए जरूरत से अधिक योगदान कर रहे हैं। हालांकि, ये देश अब आर्थिक रूप से अधिक संपन्न हो गए हैं मगर उन्हें अब भी मदद की जरूरत है। ब्रिटेन को भी ईयू कोष में अधिक अंशदान करना पड़ रहा था और यही वजह थी कि वह ईयू से अलग हो गया। यह अलग बात है कि वह ईयू से निकलने के अपने निर्णय पर पछता रहा है।
मगर राजकोषीय अंतरण से ही केवल बात नहीं बनती है और यह भारत सहित किसी भी संघ के हित में भी नहीं है। औद्योगिक रूप से अधिक प्रगतिशील, धनी देशों के लिए ईयू एक बड़ा बाजार है जिसमें वे अपने उत्पाद बेच पाते हैं। जिन देशों ने अपनी मुद्रा के रूप में यूरो को अपनाया है उन्हें एक बड़ा फायदा यह मिलता है कि उनके श्रमिक कम लागत पर (श्रम उत्पादकता की तुलना में) उपलब्ध रहते हैं जबकि स्पेन, ग्रीस और पुर्तगाल जैसे देशों में यह तुलनात्मक रूप से अधिक महंगे हो जाते हैं। बर्टेल्समैन स्टिफ्टंग फाउंडेशन के अनुसार जर्मनी की आर्थिक वृद्धि दर यूरो के कारण प्रति वर्ष 0.5 फीसदी अधिक थी। ऑस्ट्रिया और नीदरलैंड्स और यहां तक कि डेनमार्क (जो ईयू का हिस्सा नहीं है मगर यह अपनी मुद्रा क्रोन को यूरो से जोड़कर रखता है) को भी यह फायदा मिल रहा है।
इस तरह, ईयू के धनी देश राजकोषीय स्थानांतरण के जरिये आर्थिक रूप से कमजोर देशों की मदद करते हैं मगर इसके बाजार के कारण वे फायदे में रहते हैं। मुद्रा सस्ती रहने से वैश्विक बाजार में इन देशों को निर्यात के मोर्चे पर अधिक फायदा मिलता है।
भारतीय संघ में भी सर्वाधिक संपन्न राज्यों को ऐसे ही लाभ मिलते हैं। ऐसे राज्य केवल देश के दक्षिणी हिस्से में ही नहीं हैं बल्कि इनमें गुजरात, महाराष्ट्र, पंजाब, हरियाणा, दिल्ली और पहाड़ी राज्य हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और सिक्किम भी आते हैं। बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे गरीब राज्यों की तुलना में इन राज्यों में श्रम उत्पादकता तीन से चार गुनी अधिक है। इससे ये धनी राज्य देश के अन्य राज्यों की तुलना में आर्थिक रूप से अधिक सशक्त हो जाते हैं। इससे अधिक निवेश आता है और आर्थिक वृद्धि की रफ्तार भी तेज हो जाती है। इन सभी कारणों से धनी और गरीब राज्यों के बीच समानता स्थापित करना और कठिन हो जाता है। इन धनी राज्यों में एक ऐसा बाजार भी उपलब्ध होता है जो वस्तु एवं सेवा कर (GST) लागू होने के बाद और अधिक मजबूत हो गया है।
ईयू में निःशुल्क आंतरिक आवागमन का लाभ मिलता है। ईयू की तरह भारत में भी गरीब राज्यों से धनी राज्यों की ओर पलायन से मजदूरों को भी फायदा मिलता है क्योंकि उन्हें निर्माण एवं कृषि क्षेत्र में अधिक पारिश्रमिक मिलता है। दूसरी तरफ जिन राज्यों में ये मजदूर जाते हैं उन्हें भी लाभ मिल जाता है। प्रवासी मजदूर वे काम करते हैं जो स्थानीय संपन्न लोग करने से कतराते हैं। हालांकि इसका लाभ यह होता है कि स्थानीय लोग अधिक हुनर एवं आर्थिक लाभ वाले रोजगारों की तरफ रुख करते हैं। रोजगार सिर्फ स्थानीय लोगों तक सीमित करने से, जैसा कि कई राज्य चाहते हैं, सार्वजनिक हित को नुकसान होगा, न कि फायदा।
किसी संघ में अर्थव्यवस्थाएं तनाव बढ़ने का कारण नहीं बनती हैं। ईयू से ब्रिटेन के निकलने के आर्थिक कारण नहीं थे। भारतीय संघ के लिए एक खतरनाक- उत्तर और दक्षिण के बीच बढ़ती दूरी के साथ यह स्थिति और भी भयावह बनती जा रही है- बात यह है कि उसने 1991 की जनगणना के बाद संसदीय सीटों का राज्यवार वितरण नहीं किया है। वर्ष 2026 के बाद सीटों का परिसीमन करना वैधानिक रूप से अनिवार्य हो जाएगा। इसका मतलब यह होगा कि वास्तविक सीटों और जिनका आवंटन किया जाएगा उनके बीच असमानता काफी बढ़ जाएगी (अगर आबादी के आधार पर इनका वितरण किया जाता है तो)।
राजनीतिक-अर्थव्यवस्था के विशेषज्ञ मिलन वैष्णव का कहना है कि दक्षिण की तुलना में उत्तर भारत में आबादी में अधिक तेजी से बढ़ोतरी से बिहार, उत्तर प्रदेश के साथ मध्य प्रदेश, झारखंड और राजस्थान में 30 सीट बढ़ जाएंगी। बिहार और उत्तर प्रदेश का पहले ही संसद में सीटों के लिहाज से दबदबा है। दक्षिण भारतीय राज्यों, ओडिशा और पश्चिम बंगाल को नुकसान उठाना होगा। इसके कुछ समाधान खोजे जा सकते हैं, मसलन संसद में सीटों की संख्या बढ़ाई जा सकती है, बड़े राज्यों का विभाजन किया जा सकता है या लोक सभा का गणित संतुलित करने के लिए छोटे राज्यों को राज्य सभा में और सीट दी जा सकती हैं। भारत को 2026 से 2030 के बीच इस चुनौती का सामना करना होगा।
इस बीच, 16वें वित्त आयोग के समक्ष राजकोषीय वितरण की चुनौती है। मगर भारतीय संघ के साथ बने रहने पर आने वाली लागत एवं लाभों पर वाद-विवाद के बीच दक्षिण भारत सहित देश के धनी राज्यों को यह अवश्य ध्यान में रखना चाहिए कि शुद्ध राजकोषीय वितरण के जरिये गरीब राज्यों को आर्थिक संसाधन देने के साथ-साथ उन्हें भी भारतीय संघ से कई लाभ मिलते हैं।
गरीब राज्यों को अधिक रकम मिलने के बावजूद धनी एवं गरीब राज्यों के बीच अंतर बढ़ता जा रहा है। भारत को इस वास्तविक चुनौती का अवश्य सामना करना चाहिए। गरीब राज्यों में अधिक निवेश लाने के लिए शिक्षा, स्वास्थ्य और बुनियादी ढांचे में सुधार जरूरी है। बिहार, मध्य प्रदेश, झारखंड, उत्तर प्रदेश और राजस्थान जैसे आर्थिक रूप से पिछड़े राज्यों में शुद्ध राजकोषीय अंतरण से इन असमानता को दूर कर ही पूरे देश में अधिक समावेशी विकास सुनिश्चित किया जा सकता है। इससे 2047 तक भारत एक संघ के रूप में और मजबूत हो जाएगा।
Date: 15-05-24
चाबहार: जवाब और जरूरतसंपादकीय
भारत का ईरान के चाबहार बंदरगाह के एक टर्मिनल शाहिद बेहिश्ती का प्रबंधन अपने हाथ में लेना इस क्षेत्र में दीर्घकालीन भागीदारी की नींव रखना है। ओमान की खाड़ी में बना यह बंदरगाह अपनी भौगोलिक अवस्थिति एवं आर्थिक व्यावसायिक, सामरिक कूटनीतिक दृष्टिकोण से भारत के लिए असाधारण महत्त्व का है। इससे महज 174 समुद्री मील दूर पाकिस्तान के ग्वादर में चीन अपनी बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) के तहत मौजूद है । इसलिए अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे (आईएनएसटीसी) के तहत किया गया यह करार ग्वादर का जवाब भी है। जो भारत, ईरान, अफगानिस्तान, आर्मेनिया, अजरबैजान, रूस, मध्य एशिया और यूरोप के बीच माल ढुलाई के लिए 7,200 किलोमीटर की मल्टी मोड परिवहन परियोजना है। इस महत्त्वपूर्ण परियोजना को लेकर 2003 से ही ईरान से वार्ता जारी थी। पर इस अवधि में द्विपक्षीय संबंधों और वैश्विक हालात में कई उतार-चढ़ाव आए। 2020 में तो ईरान ने समझौते में प्रगति न होने से झुंझला कर भारत को इससे बाहर ही कर दिया था। वह चीन की तरफ देखने लगा था, जिसके पास किसी योजना के क्रियान्वयन के लिए भारत से अधिक तत्परता और संपन्नता थी। पर भारतीय शिथिलता की इस एक वजह के साथ अमेरिकी प्रतिबंध की जब- तब बनने वाली स्थितियां भी जिम्मेदार रही हैं। यह तो आज भी है। भारत से समझौते के बाद अमेरिका ने फिर प्रतिबंध की चेतावनी दी है। हालांकि इसके बावजूद भारत ने करार करने का साहस दिखाया तो इसकी वजह उसकी स्वतंत्र – निडर विदेश नीति के साथ व्यापक स्व-हित था। इस तकाजे को भारत और अधिक सहन नहीं कर सकता था। एक तो ग्वादर में चीन की मौजूदगी से भारत पहले ही भारी दबाव में था, वह चाबहार को बहुत दिनों तक नहीं टाल सकता था। अफगानिस्तान तक पहुंचने के लिए भी भारत को पाकिस्तान पर निर्भर रहना पड़ता था। दूसरे, रूस- यूक्रेन युद्ध के बाद से मध्य एशिया तक उसका कारोबार सुगम नहीं रह गया था और तीसरे, फिलिस्तीनी – इस्राइल युद्ध से जी-20 में आईएमईसी के प्रस्ताव पर काम शुरू होने की कोई सूरत नहीं नजर आ रही है । तिस पर ईरान बार- बार इस ठहराव से निकलने के लिए नई दिल्ली पर जोर दे रहा था । इसलिए भारत को एक समझौते पर चुनाव के बीच ही पहुंचना पड़ा। वैसे यह प्रबंधन का 10 सालों के लिए ही है और यह 2016 में हुए करार का नवीकरण है परंतु इसकी मियाद बढ़ती रहेगी।
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मालदीव के राष्ट्रपति मुइज्जू ने अपनी संसद में दो-तिहाई बहुमत प्राप्त कर लिया है। इससे दोनों देशों के संबंध और भी जटिल हो सकते हैं। मुइज्जू ने गत वर्ष पदभार संभालने के बाद से ही अपने भारत विरोधी और चीन समर्थक रुख के बारे में कोई छिपाव नहीं रखा है। हालांकि, भारत और चीन के बीच तालमेल बैठाने की मालदीव की यह कोशिश पहले की सरकारों ने भी की है।
अतीत में उतार-चढाव – भौगोलिक दृष्टि से भारत मालदीव के लिए सबसे पहले जवाब देने वाला देश रहा है। 1988 में ऑपरेशन कैक्टस से लेकर 2014 में मालदीव के जल संकट तक, भारत ने हमेशा मालदीव के अनुरोध पर तुरंत मदद की है। 1990 के दशक में मालदीव में बढ़ते लोकतांत्रिक आंदोलन के जवाब में भारत पर चीन का लाभ उठाने का दांवपेच शुरू हुआ था, जो आज भी किसी न किसी रूप में चलता चला जा रहा है।
विभाजित राजनीति – मालदीव की राजनीति आज उन लोगों के बीच विभाजित है, जो भारत के साथ बेहतर संबंधों के पक्षधर हैं, और जो अधिक चीनी सहायता चाहते हैं। इसमें से बहुत कुछ राजनीतिक दिखावा हो सकता है; जैसा कि मुइज्जू ने ‘इंडिया आउट’ करके चीनी जासूसी पोत को द्वीप में घुसने की अनुमति दी है।
खतरनाक रणनीति – मालदीव का बचाव और पुनर्वास मिशन पर लगे भारतीय सैनिकों को वापस भेजना एक बात है। लेकिन चीनी जासूसी पोत को मालदीव में रुकने की अनुमति देना भारत की सुरक्षा के लिए भी खतरनाक हो सकता है। चीन तो रणनीतिक रूप से भारत को घेरना चाहता ही है। मालदीव को इसमें शामिल नहीं होना चाहिए। चीन अंततः मालदीव की संप्रभुता को कमजोर करेगा, या इसे कर्ज के जाल में फंसा देगा। कंबोडिया और श्रीलंका इसी के उदाहरण हैं।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 23 अप्रैल, 2024
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Date:14-05-24
Stabilising India-Nepal ties in changing timesK.V. Rajan, [ is India’s former Ambassador to Nepal. He is the author of a recently published book, ‘Kathmandu Chronicle: Reclaiming India-Nepal Relations’ ]
In Nepal, there is a palpable sense of restlessness, dissatisfaction and uncertainty in the air these days because of the overall political and economic environment. While the transition to a full-fledged democracy underpinned by credible political institutions seems to be an unending one, there is also confusion about the direction in which it is headed.
And, there are a lot of questions. Was it premature for Nepal to have decided through a Constitution (which was rushed through and barely debated) that it should be transformed instantaneously into a secular federal democratic republic? This when as a young democracy it had just battled one upheaval after another, and was in dire need of leaders, experience and institutions capable of handling daunting challenges? Should Nepal, which had a wonderful tradition of being deeply religious but with a secular and tolerant ethos, revert to its Hindu identity which it had lost when political parties were negotiating with the Maoists for an end to their 10-year insurgency? Should the monarchy be restored for want of institutions which could make sure that red lines were respected in the interests of safeguarding democracy? Was a genuine federal setup not an invitation for Nepal’s disunity? How can Nepal survive in the post-COVID-19 world when corruption and misgovernance are so rampant?
The new government in New Delhi in June will have its hands full handling its foreign policy priorities. One of them will continue to be China. And for that reason alone, a high level of attention being paid to Nepal is certain, especially in view of recent developments there and the high probability that political certainty will continue there in the months ahead.
Changes under China’s shadow
One reason for attention is the recent dramatic change in the coalition partners of the incumbent Prime Minister, Maoist leader Pushpa Kamal Dahal ‘Prachanda’, which saw the largest party in Parliament, the centrist Nepali Congress (NC), being replaced by the second largest party led by K.P. Sharma Oli, who when Prime Minister in the past, had gained the reputation of being pro-China and anti-India.
The Chinese were the first to officially welcome the renewed alliance between the two major left parties, which they have been urging for long, sometimes publicly, and clumsily.
This time around they managed to avoid public controversy and allow the revival of the partnership to look as if it was a purely internal matter. Yet, they would have relished the readiness of the new left government to ignore Indian sensitivities. Nepal’s Foreign Minister departed from convention by making his first official foreign visit to Beijing rather than New Delhi, and, despite domestic warnings of falling into a Sri Lanka-like debt trap, agreed to revive cooperation on China’s Belt and Road Initiative (BRI).
There have also been high-level military visits where new understandings have reportedly been reached. China’s intentions are very clear: to expand its influence in Nepal at the cost of India’s. Interestingly, the revival of the far left is being accompanied by a strong clamour from forces on the far right, which include calls for the restoration of the institution of monarchy and Nepal’s Hindu identity.
Nepal, which was once the world’s only Hindu kingdom, was converted by its Parliament into a secular federal republic shortly after the Maoist insurgency ended and the Maoists agreed to be mainstreamed into the country’s democratic polity a few years ago.
Both sets of forces have the reputation of being ultra-nationalistic, pro-China and anti-India. Even otherwise, continuing political instability and malgovernance could invite a proliferation of India-directed mischief from Nepal by third countries and their non-official partners — the ‘nexus’ of smuggling and terrorism in Pakistan that India’s External Affairs Minister S. Jaishankar recently described as an ‘industry’.
During the last phase of the King Birendra years, political instability accompanied by frequent changes of government (a result of political opportunism), facilitated the spread of a Maoist insurgency within Nepal which later established its headquarters in a jungle hideout in India. In parallel, there was an escalation of the smuggling of drugs, arms and terrorist-related cross-border activities masterminded from Pakistan against India, from Nepalese soil. The latter culminated in the hijacking of flight IC 814 in December 1999.
The redeeming feature then was a stable relationship between India and Nepal under Nepal’s ‘twin pillar’ policy of supporting the king and multi-party democracy, which resulted in India’s discreet cooperation and good relations across the political spectrum. It also saw Indian and Nepalese intelligence agencies working to expose Pakistani involvement.
Eventually, the situation quickly developed into a multi-faceted crisis, causing upheavals and transformations in Nepal and new questions about the quality of its bilateral ties with India.
Unlike in the past, China is now proactively working against India in Nepal. No longer does it have a low profile. It would probably be openly supportive of any cross-border instigation of terrorist activities in India — which, for China, would come under the category of “good terrorism”. It suits Pakistan to do its bit too as it knows that it can rely on China for support when needed. Theoretically, India is not alone. It has the Quad (Australia, India, Japan, the United States), Indo-Pacific and other groupings keeping a close watch on China’s moves to expand its influence through fair means and foul. However, it would be risky to assume that these would be of help if a Great Game 2.0 begins in a shaky Nepal.
India’s stand
India has been playing its cards reasonably well, keeping a low profile and avoiding controversy by staying out of Nepal’s internal affairs. However, pressure from some Nepali quarters to give “advice”, or the temptation by some in India to give it in at least two important matters can be anticipated. Should Nepal revert to its old identity as a Hindu nation? And, should the calls for restoration of monarchy be encouraged given rising frustration with a democracy without strong institutional underpinnings?
India (whether at the level of central, State or civil society) will have to give careful answers. In Nepal, opinions are often over-interpreted and confusion caused as a result of ‘mixed signals’ from India. It is for the Nepalese to decide on such issues. India could consider offering a new and holistic development road map which would excite public imagination and attract cross-party political consensus.
For example, there could be a transformative, sustainable development agenda aimed at improving the quality of life of its people. Innovative approaches in sectors such as health, education, food and nutrition, child development, gender and jobs, will ensure that the BRI and other Chinese pet projects are not a priority.
High-level Indian attention could inject a sense of optimism, stimulate investment in key sectors, and promote cross-party consensus on major projects. This will ensure that there is continuity and time-bound results even in the midst of instability, foster new inter-linkages between industries in both countries, address the demographic dividend, respond to the yearning in Nepal for a sense of equality and sovereign space, and build on the foundation of common civilisational assets which make the India-Nepal relationship so unique. India should also never forget that for the big brother-small brother syndrome to be overcome, the onus lies on the big brother — the style of diplomacy matters as much as the substance in relations between the two countries.
With regard to Nepal, the many concerns complicating the India-Nepal relationship need not be an insoluble migraine. The new government in New Delhi in June this year has its work cut out.
Date:14-05-24
भारत की वृद्धि प्राथमिकताओं को सही करने की जरूरतजनक राज
ऐतिहासिक रूप से देखें तो अकेले आर्थिक वृद्धि या आय को ही मानव विकास का प्राथमिक मानक माना जाता था। समय बीतने के साथ-साथ आय के अलावा स्वास्थ्य और शिक्षा धीरे-धीरे मानव विकास के अहम तत्त्व बनकर उभरे।
मानव विकास की व्यापक अवधारणा को सन 1990 में उस समय गति मिली जब संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम ने मानव विकास सूचकांक के देशव्यापी आंकड़े जारी करने शुरू किए। ये आंकड़े आय, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे मानव विकास के तीन पहलुओं के आधार पर देश की औसत उपलब्धियों को पेश करते हैं।
यह बात महत्त्वपूर्ण है कि वैश्विक संदर्भ में शोध यह स्थापित करता है कि मानव विकास के आय और गैर आय घटक यानी शिक्षा और स्वास्थ्य आदि आपस में संबद्ध हैं और एक दूसरे को बल देते हैं। कोई भी देश लंबी अवधि में तब तक आर्थिक वृद्धि नहीं जारी रख सकता है जब तक कि उसे मानव विकास का समर्थन नहीं हासिल हो।
‘इंटर-लिंकेज बिटवीन इकनॉमिक ग्रोथ ऐंड ह्यूमन डेवलपमेंट इन इंडिया- अ स्टेट लेवल एनालिसिस’ नामक एक हालिया अध्ययन जिसे मैंने वृंदा गुप्ता और आकांक्षा श्रवण ने मिलकर लिखा है, में पाया गया है कि देश में आर्थिक वृद्धि और मानव विकास में दोतरफा संबंध है। इससे यह भी स्थापित हुआ कि मानव विकास से आर्थिक वृद्धि होती है और इसका उलटा भी उतना ही सही है।
हमने ऊपर जिस अध्ययन का जिक्र किया है उसमें यह भी पाया गया कि द्वितीयक स्तर की शिक्षा का स्तर कृषि और विनिर्माण में आर्थिक गतिविधियों को बढ़ाने वाला है जबकि उच्च शिक्षा सेवा क्षेत्र में आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देती है।
उच्च शिक्षा में नामांकन का सेवा क्षेत्र पर प्रभाव द्वितीयक शिक्षा के कृषि और विनिर्माण पर प्रभाव का चार गुना है। प्राथमिक शिक्षा का आर्थिक गतिविधियों पर कोई असर नहीं दिखा। इससे संकेत मिलता है कि कम से कम द्वितीयक स्तर पर गुणवत्तापूर्ण शिक्षा की आवश्यकता है ताकि संज्ञानात्मक कौशल विकसित किए जा सकें। ऐसे कौशल आर्थिक वृद्धि से सीधी तौर पर जुड़ा हुआ है।
हाल ही में हुए देशव्यापी अध्ययन बताते हैं कि द्वितीयक शिक्षा में निवेश से अहम आर्थिक वृद्धि हासिल होती है जो प्राथमिक शिक्षा से हासिल होने वाले प्रभाव से बहुत अधिक है।
दूसरे शब्दों में प्राथमिक शिक्षा को आर्थिक वृद्धि में योगदान देना है तो यह अहम है कि द्वितीयक शिक्षा के व्यापक प्रावधान किए जाएं। ध्यान देने वाली बात यह है कि संयुक्त राष्ट्र सतत विकास लक्ष्यों में अब प्राथमिक और द्वितीयक शिक्षा के चुनिंदा लक्ष्य भी शामिल हैं। यह सहस्राब्दि विकास लक्ष्यों के उलट है जो केवल सबके लिए प्राथमिक शिक्षा पर जोर देता है।
इन्हीं लेखकों के ‘इकनॉमिक ग्रोथ ऐंड ह्यूमन डेवलपमेंट इन इंडिया- आर स्टेट्स कन्वर्जिंग?’ नामक एक अन्य अध्ययन में पाया गया कि देश के आर्थिक रूप से कमजोर और कम मानव विकास वाले राज्य आर्थिक रूप से सशक्त राज्यों के करीब नहीं आ पा रहे हैं।
हालांकि जब विभिन्न राज्यों को आर्थिक विकास और मानव विकास के आधार पर अलग-अलग श्रेणियों में बांटा जाता है तो आर्थिक रूप से कमजोर प्रांत समान मानव विकास वाले आर्थिक रूप से बेहतर राज्यों की ओर बढ़ते नजर आते हैं।
दोनों अध्ययनों से एक संदेश साफ निकलता है कि आर्थिक रूप से कमजोर राज्यों को अगर अधिक समृद्ध राज्यों की बराबरी करनी है और भारत को प्रति व्यक्ति आय तथा आकार के मामले में विकसित देशों की बराबरी करनी है तो मानव विकास को आर्थिक नीति निर्माण के केंद्र में रखना होगा।
ऐतिहासिक रूप से देखें तो देश में नीति निर्माताओं ने आर्थिक वृद्धि को प्राथमिकता देते हुए स्वास्थ्य और शिक्षा की अनदेखी सी कर दी है। स्वास्थ्य पर सार्वजनिक व्यय हमारे सकल घरेलू उत्पाद के एक फीसदी से भी कम है। यह स्थिति पिछले तीन दशकों से बनी हुई है। 2017 की राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति में इसके लिए 2.5 फीसदी का लक्ष्य तय किया गया था लेकिन हम उसके आसपास भी नहीं हैं।
सार्वजनिक स्वास्थ्य पर हमारा व्यय रूस के 5.3 फीसदी, ब्राजील के 4.5 फीसदी, थाईलैंड के 3.6 फीसदी और चीन के 2.9 फीसदी से काफी कम है। इसी तरह शिक्षा पर भारत का सरकारी व्यय सकल घरेलू उत्पाद के 4.6 फीसदी के बराबर है जो 6 फीसदी के वांछित स्तर से काफी कम है।
इसे 6 फीसदी करने का लक्ष्य सबसे पहले 1968 की राष्ट्रीय शिक्षा नीति में प्रकट किया गया था और 2020 समेत बाद की सभी शिक्षा नीतियों में दोहराया गया। यह भी ध्यान रहे कि 6 फीसदी का यह लक्ष्य तीन दशक पहले यानी 1986 में हासिल होना था।
जन स्वास्थ्य के लिए कम आवंटन के चलते आम परिवारों को स्वास्थ्य और शिक्षा पर अपनी जेब से खर्च करना पड़ रहा है। एक अध्ययन बताता है कि स्वास्थ्य पर खर्च के चलते 2011-12 में 5.5 करोड़ लोग गरीबी में चले गए।
स्वास्थ्य पर होने वाले कुल व्यय में 50 फीसदी से अधिक इसी प्रकृति का होता है जो दुनिया में सर्वाधिक स्तरों में शामिल है। इसके चलते लोगों को कर्ज लेना पड़ता है और कई बार संपत्ति बेचनी पड़ती है।
शिक्षा पर कम सरकारी व्यय के कारण बड़ी तादाद में बच्चे आज भी बुनियादी स्तर से आगे की स्कूली शिक्षा नहीं हासिल कर पा रहे हैं। भारत को स्वास्थ्य और शिक्षा पर सरकारी व्यय बढ़ाना चाहिए और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि लोगों को अनावश्यक व्यय न करना पड़े।
इसमें दो राय नहीं कि आर्थिक वृद्धि अप्रत्यक्ष रूप से मानव विकास में योगदान के रूप में सरकार और व्यक्तियों को अधिक संसाधन मुहैया कराती है ताकि वे स्वास्थ्य और शिक्षा पर खर्च कर सकें।
बहरहाल ऐसे योगदान की गति बहुत धीमी है। बीते तीन दशक में हमारे मानव विकास सूचकांक में केवल 0.20 का सुधार हुआ है। सबसे तेज विकसित होती अर्थव्यवस्थाओं में से एक होने के बावजूद भारत अहम स्वास्थ्य एवं शिक्षा मानकों पर समकक्ष देशों से पीछे है।
मानव विकास के मामले में हम इस भरोसे नहीं रह सकते कि ऊपर से आने वाली बेहतरी नीचे हालात को ठीक करेगी। हमें मानव विकास को प्राथमिकता देनी होगी और इसके लिए विशिष्ट कदम उठाने होंगे। ऐसा करके ही हम पूर्ण आर्थिक वृद्धि हासिल कर सकेंगे।
Date:14-05-24
पक्षियों की परवाज में बदलाव आपदा का संकेत तो नहींसंपादकीय
भारतीय वन सर्वेक्षण ने इसी 12 मई को बताया है कि बीते एक हफ्ते में जंगल में आग लगने की 342 बड़ी घटनाएं देश भर में दर्ज की गईं, जिनमें से 209 तो अकेले उत्तराखंड की थीं। ये आग अमूमन मानवीय लापरवाही या शरारती तत्वों के कारण लगीं। ऐसी आग तब बेकाबू हो जाती है, जब सूखी भूमि का सामान्य से अधिक तापमान वाली हवा के साथ संयोग होता है। उल्लेखनीय है, मार्च से जून तक का समय पक्षियों के लिए प्रजनन का चरम वक्त होता है। ऐसे में, जंगल की आग प्रजनन वाले पक्षियों पर अभूतपूर्व असर डालती हैं। छोटे-बड़े तमाम जीवों पर इनका खासा प्रभाव पड़ता है। स्थानीय पारिस्थितिक अर्थव्यवस्था पर इसके असर की कल्पना करना काफी कठिन है।
साफ है, गरम होती दुनिया पक्षियों का जीवन भी बदल रही है। विशेषकर, भोजन और आश्रय के लिए सर्द उत्तरी अक्षांश से उष्णकटिबंधीय, यानी गरम क्षेत्रों में आने वाले प्रवासी पक्षियों को ज्यादा नुकसान हो रहा है। चूंकि जीन एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में हस्तांतिरत होती है, इसलिए साल भर भोजन उपलब्ध हो, तो पक्षियों की कुछ प्रजातियां कठिन यात्राएं शायद ही करेंगी। बेशक, पक्षियों का प्रवासन इतनी जल्दी खत्म नहीं होगा, लेकिन ऐसी रिपोर्टें हैं, जो बताती हैं कि अपने प्रजनन-काल में पक्षी अमूमन जहां जाया करते थे, अब उनमें से कई नहीं जाते। अगर आप दिल्ली के ओखला पक्षी अभयारण्य घूमने जाते रहे हों, तो आपने देखा होगा कि आर्कटिक क्षेत्र से आने वाले कई पक्षी अब तक यहां नहीं आए हैं। इस साल तो कीटों पर भी ध्यान दिया गया, जिनकी आबादी मूलत: कीटनाशकों के अत्यधिक प्रयोग और प्रकाश प्रदूषण के कारण घट रही है।
जाहिर है, प्रवासी पक्षियों और उनके भोजन-स्रोतों का आपसी समय मेल नहीं खा रहा। इससे पक्षियों की आबादी में संकुचन या विस्तार हो सकता है। आलम यह है कि तमाम प्रकार की चीजों को खाने वाली और हर वातावरण में अनुकूलन करने वाली प्रजातियां बढ़ रही हैं और खास आबोहवा में रहने वाली व खास आहार वाली प्रजातियां कम हो रही हैं। इसका एक बड़ा उदाहरण बैंक मैना है, जो अब टोल प्लाजा व रेलवे स्टेशनों पर ज्यादा दिखती है, क्योंकि इसका प्राकृतिक आवास बाढ़ और विकास की भेंट चढ़ गया है। दरअसल, पक्षियों को ट्रैक करने के उपकरणों ने पक्षी विज्ञानियों को दुनिया भर में पक्षियों के प्रवासन को जानने का मौका दिया है कि किस तरह पक्षी मौसम के अनुसार उत्तर से दक्षिण जाते हैं? आंकड़ों के मुताबिक, भारतीय उप-महाद्वीप सर्दियों में 600 से अधिक प्रवासी पक्षियों का घर बनता है, लेकिन इनमें से 240 प्रजातियों की आमद घटती जा रही है। हालांकि, विदेशी पक्षी बार-हेडेड हंस के मामले में लाभ की स्थिति है। बेशक, भारत की आबोहवा विदेशी पक्षियों के लिए विविध परिस्थितियां उपलब्ध कराती हैं, लेकिन इन पर विकास योजनाओं की गाज गिर रही है। चरम मौसमी घटनाओं ने ही नहीं, बढ़ते तापमान ने भी पक्षियों के आवास को खत्म किया है। ऐसे में, बैंक मैना या बार-हेडेड हंस की तरह अन्य प्रजातियां भी नए माहौल में अनुकूलन कर पाती हैं या नहीं, यह देखने वाली बात होगी!
स्टेट ऑफ इंडियन बर्ड्स (2023) रिपोर्ट कहती है कि पिछले आठ वर्षों में कम से कम 217 प्रजातियां या तो स्थिर हुई हैं या उनमें वृद्धि हुई है और 204 प्रजातियों में गिरावट देखी गई है। रिपोर्ट के मुताबिक, खुले पारिस्थतिकी तंत्र, नदियों और तटों पर रहने वाले पक्षियों की प्रजातियां सर्वाधिक घटी हैं, लेकिन जैसे-जैसे प्रवासन का पैटर्न बदल रहा है, हमें जनसंख्या अनुमान मॉडल का या तो विस्तार करना चाहिए या इसे नया गढ़ना चाहिए।
साल 2024 के चरम मौसम को एक वैश्विक खतरा मानना होगा। हिंद महासागर भी स्थायी गरम लहरों में तब्दील हो रहा है। पूर्वी और प्रायद्वीपीय भारत में अप्रैल में काफी ज्यादा तापमान जलवायु संकट की गंभीरता ही बताता है। मगर क्या सिर्फ हमारे अस्तित्व के लिए ही जलवायु परिवर्तन पर बात होनी चाहिए? नहीं, हम उन तमाम जीव-जंतुओं से भी जुड़े हुए हैं, जो अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष कर रहे हैं। हमें उनके प्रति उतना ही संजीदा होना चाहिए, जितना हम अपने लिए हैं।
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विश्व अर्थव्यवस्था को चलाने में पर्यटन की महत्वपूर्ण भूमिका है। लेकिन कुछ देशों में पर्यटन के प्रतिकूल हवा भी चल रही है। आइए, जानते हैं क्यों –
इस प्रकार, पूरे विश्व में पर्यटन को बढ़वा देने के लिए स्थानीय चिंताओं के प्रति संवेदनशीलता दिखाते हुए ही आगे बढ़ना उचित होगा। अन्यथा ‘पर्यटकों, वापस जाओ’ के नारे आम होते जाएंगे।
‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 22 अप्रैल, 2024
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Date:13-05-24
India’s Undereducated YoungMillions of students, who have been to good schools and are going to good universities, are growing up on videos not books. There is no big purpose, no real interest in the world or in electionsChetan Bhagat is an Indian author, columnist and screenwriter
A recent video of students of a private Indian university taking part in a political protest has provided much mirth and laughter online – because of how utterly clueless they appear to be about what their protest is about.
They are carrying placards but just cannot explain these. Indeed, they are unable to string two original sentences together in response to a reporter’s simple questions about their protest.
The specific college and even the cause of the protest are in a way irrelevant to the volumes the video, simultaneously hilarious and sad, speaks about the average Indian college student today. Let’s call them, politely, the undereducated class of India.
To be clear, the video features privileged students. We can assume their parents enrolled them in quality schools before sending them to an expensive private university. These students dress well and carry expensive phones. And yet, once they open their mouth, it all seems to have been for nought.
The internet memes are funny, but this is a serious issue. There is an entire class, probably in the millions, of Indian graduates and would-be graduates who are absolutely sub-par in their ability to think, communicate, understand, analyse or problem-solve anything. They have completed 12 years of school and 3-4 years of college. Yet, as the saying goes, if some students drink at fountains of knowledge, these students just gargle.
Across India, the average college student displays a frightening level of incompetence. It is not about that one village idiot. We are talking about entire villages of idiots. How on earth will we become a viksit country when our young generation refuses to engage their brain? Even as the world adopts artificial intelligence, how do we make do with so much unintelligence?
This is not about the top colleges. Nor is it being said that there are no bright students in India. Indian students have gone on to become unicorn founders, inventors, top lawyers and surgeons. Our top students are amongst the world’s best. However, these are exceptions. When it comes to all students, things are quite dim around the middle of the curve. Surveys indicate that more than half of Indian graduates are unemployable.
Why is this the case? How did the Indian student become so stupid? This too in the privileged class, where they are brought up with relatively high resources? We often blame our outdated educational system. That may partly be the reason for this crisis, but true reasons run deeper. They are hard to listen to. Here are the top three.
The non-thinking family | Many Indian families, even with means, do not encourage their children to read, write, think, analyse, opine and solve problems.
How many middle-class or upper middle-class families sit at the dining table and discuss books, current affairs, global concerns, self-reflection?
Not many. Instead, we discuss the food, how ghee and jaggery are good for us, which achaar is the best, who is getting married to whom, reality shows, cricket, which web series to watch or which Bollywood star or industrialist is getting married.
Worst is when we are on our phones even at the dining table, not engaging with our family at all. This is a breeding ground for intellectual stagnation. No national education policy, no updated curriculum, no college can do much when the family itself brews dullness.
The aversion to read | Somehow, watching videos has become the new cool and books a waste of time. ‘I don’t read books. I prefer watching videos,’ is what many college students say proudly. What they are actually saying is, ‘I don’t want to make the mental effort to read.’
For heaven’s sake, please read. To understand stuff, you have to read. That’s why we study using books in school and college. Would you trust a doctor who says, ‘I’ve never read a medical book, but I’ve watched a lot of medical videos?’
The addiction to distractions | The average Indian student wants a good life. This includes a nice iPhone, an attractive dating partner, expensive clothes, online shopping sprees, and hanging out at trendy bars and restaurants.
A constant stream of content from social media fuels these desires by only showing students more of what they already enjoy. As a result, the student gets lost in this world of consumption and fleeting desires. Their minds have literally no time to consider their life’s purpose. ‘Bas, I want some nice easy job,’ is all they offer when asked about their career goals.
There’s no focus, passion, or desire to make a mark on the world, excel in a particular field, or build a meaningful life. Their mentality is often, ‘Give me this lifestyle somehow, even if my parents indirectly subsidise it.’ Please, stop! Stop being distracted by whatever is keeping you intellectually stagnant and underachieving. Learn about the world. Find your place as a productive member of society. Set challenging goals and stay focused on achieving them.
As our nation strives to develop, we need not only physical infra like roads, ports, and airports, but also human infra – millions of sharp young minds with the ability to think critically and execute a better future for themselves and the nation. A generation lacking in intellect will potentially lead to us being indirectly colonised again by the developed world. We must think for ourselves, or else someone else will do the thinking for us.
Date:13-05-24
Net Metering Key to Rooftop SunshineET Editorials
GoI’s plans to train 1 lakh people to install, maintain and service rooftop solar panels, and develop an entrepreneurial ecosystem of vendors for implementing the PM Surya Ghar: Muft Bijli Yojana is a move in the right direction. This initiative holds the potential to significantly increase the adoption of rooftop solar systems among the scheme’s target households. However, to fully realise its benefits, GoI needs to address structural issues related to electricity market design and tariff, power purchase contracts, and infrastructure requirements.
The promise of 300 units of free electricity for setting up rooftop solar panels is attractive. However, since many states give free power, setting up solar panels seems like an additional effort with no significant benefit. Outreach to target consumers, and increasing their awareness of the benefits of switching to rooftop solar, must be an integral effort of this programme. The on-ground outreach in Ayodhya for rooftop solar could serve as a template in other towns and cities.
A major impediment is the slow rollout of the net metering system. This is essential to account for electricity produced, consumed, and put into the grid by households that generate solar power. Without proper net metering, the economic incentive for these households is lost. Distribution companies aren’t keen to undertake the investment required for net metering because of the varying cost of power. Discoms have not warmed up to rooftop solar because of the long-term power purchase agreements they are locked into. Success of the scheme hinges on getting all stakeholders to the table, addressing the challenges they face, and fostering a collaborative approach.
Date:13-05-24
Clickbait paperLinking demographic shifts directly to state actions is problematicEditorial
A recent ‘working paper’ titled the ‘Share of Religious Minorities: a Cross-Country Analysis (1950-2015)’, by Shamika Ravi, a credentialed economist and member of the Economic Advisory Council (EAC) to the Prime Minister, and two co-authors, has sparked a political firestorm, dredging familiar anxieties of a decline in the proportion of Hindus in India’s population. Freely accessible, the paper draws on a dataset, Religious Characteristics of States Dataset, 2017 (RCS-Dem), where two U.S.-affiliated researchers have compiled an extensive dataset of religio-demographic changes in 167 countries. By defining ‘majority’ and ‘minority’ religions based on countries’ official census data, the RCS-Dem quantifies changes in the population of those professing a country’s major religion. There is no discussion on the causes or factors driving these changes. The current paper does little other than reproduce this data set, explain it, and highlight — what has been known since 2011 in India and discussed threadbare since — that the share of Hindus as a proportion of India’s population declined from 84.68% to 78% (1950-2015). Muslim proportion meanwhile has risen from 9.84% to 14%. They underline how most countries have seen their majority-religion adherents decline. They note that the Indian experience, vis-à-vis the proportional decline of Hindus, is unexceptional in the light of broad trends globally. They reiterate that they make no “…causal links between a specific state action and demographic shifts..” They note however that in the “immediate South Asian neighbourhood”, this 7% relative decline was second only to Myanmar’s 10% decline of the majority Theravada Buddhists.
From here the authors make, without analysis or data, a deduction. That the rise in Muslim numbers proved media reports and UN human rights reports (which they cite) of discrimination and violence against Muslims in India were false. They single out Pakistan and Bangladesh to underline that “demographic shocks” reduced the proportion of the largest minorities, Hindus, there. The authors thus break their own rule of not having a causative explanation of demographic change by ascribing rising Muslim numbers in India to “progressive policies and inclusive institutions.” The authors would then have to explain if India’s Parsi and Jain populations (whose numbers they reference) are declining due to hostile state policies. Given that prosaic explanations of declining fertility rates across religions and economic migration explain some of these known India trends, it is perplexing why the EAC would lend its sanction to a work that is at best incomplete, and at worst disingenuous.
Date:13-05-24
मायने रखता है प्रवाससंपादकीय
कई भारतीय नागरिक अन्य देशों, खासकर खाड़ी और विकासशील देशों में जाते हैं। आंतरिक प्रवास यानी देश के भीतर लोगों का एक स्थान से दूसरे पर जाना और देश से दूसरे देशों में जाना अक्सर आजीविका के बेहतर अवसरों के लिए होता है। परंतु कई बार ऐसा हताशा में भी होता है। वर्ष 2020 में करीब 1.8 करोड़ भारतीय अपने जन्म के देश से बाहर रह रहे थे। सबसे अधिक प्रवासी भारतीय संयुक्त अरब अमीरात, अमेरिका और सऊदी अरब में रहते हैं। इंटरनैशनल ऑर्गेनाइजेशन फॉर माइग्रेशन की ताजा रिपोर्ट इस बात की पुष्टि करती है कि भारत से संयुक्त अरब अमीरात, अमेरिका और सऊदी अरब को होने वाला प्रवास दो देशों के बीच होने वाले प्रवास गलियारों में शीर्ष 10 में शामिल है। दिलचस्प है कि बांग्लादेश से भारत को होने वाला प्रवास भी इस सूची में शामिल है। भारत से बाहर जाने वाले लोगों की तादाद न केवल दुनिया में सबसे अधिक है बल्कि इसमें लैंगिक झुकाव भी नजर आता है। भारत से दूसरे देशों में जाने वाले प्रवासियों में पुरुषों की तादाद करीब 65 फीसदी है। इससे संकेत मिलता है कि पुरुष काम की तलाश में बाहर जाते हैं जबकि महिलाएं देश में ही रह जाती हैं।
वृहद आर्थिक दृष्टि से देखें तो प्रवास विदेश से स्वदेश धन भेजने का बहुत बड़ा जरिया है। रिपोर्ट में यह रेखांकित किया गया है कि 2022 में भारत विदेश से धन पाने वाला सबसे बड़ा देश रहा। उसे 111 अरब डॉलर से अधिक राशि मिली। इस धनप्रेषण में भारत का दबदबा लगातार बढ़ रहा है और वह कई वर्षों से शीर्ष पर बना हुआ है। देश के चालू खाते का घाटा कम करने में भी इसकी अहम भूमिका रही है। 2023-24 की तीसरी तिमाही में यह सकल घरेलू उत्पाद के 1.2 फीसदी के स्तर पर था। चूंकि भारत ऊर्जा का बड़ा आयातक है इसलिए वाणिज्यिक घाटे का स्तर भी अधिक है। अतिरिक्त खर्च करने योग्य आय का जरिया होने के कारण यह धन प्रेषण घरेलू खपत व्यय में इजाफा करता है और घरेलू मांग को मजबूत करता है। बहरहाल, दूसरे देशों में रहने वाले भारतीयों द्वारा भेजे जाने वाले धन पर बहुत अधिक निर्भरता भी चिंता का विषय है। कई बार यह कहा जाता है कि इससे प्राप्तकर्ता देश में निर्भरता की प्रवृत्ति उत्पन्न हो सकती है। इससे उत्पादकता कम होगी और आर्थिक वृद्धि में धीमापन आएगा। इससे अर्थव्यवस्था की स्थिति संवेदनशील हो सकती है और कई कारणों से अगर धन प्रेषण अचानक प्रभावित होता है तो मुश्किल हालात बन सकते हैं। खुशकिस्मती से रिपोर्ट में दिए गए आंकड़े बताते हैं कि अन्य देशों की तुलना में भारत की निर्भरता सीमित है। ताजिकिस्तान इस सूची में शीर्ष पर है और 2022 में उसका धनप्रेषण-जीडीपी अनुपात 51 फीसदी रहा। इसके विपरीत उसी वर्ष भारत में यह केवल 3.3 फीसदी रहा। श्रम आधिक्य वाला देश होने के नाते भारत को प्रवासी आबादी से बहुत मदद मिलती है। इन प्रवासियों का बड़ा हिस्सा कम वेतन वाले कामों मसलन विनिर्माण, सुरक्षा, घरेलू काम और खुदरा क्षेत्र में काम करता है जबकि अन्य उच्च वेतन वाले कौशल संपन्न पेशों में हैं। भारत जैसे विकासशील और बड़े देश में कुछ लोगों का बेहतर अवसरों की तलाश में विकसित देशों में चले जाना सामान्य बात है। परंतु कम कौशल वाले लोगों का बाहर जाना यही बताता है कि देश में उत्पादक रोजगार अवसर तैयार करने की आवश्यकता है। बहरहाल, बड़े पैमाने पर ऐसे अवसर तैयार करना लंबे समय से नीतिगत चुनौती बना हुआ है। ऐसे में निकट भविष्य में प्रवासन का यह रुझान बने रहने की उम्मीद है। इस संदर्भ में जहां हाल के वर्षों में प्रगति हुई है, वहीं भारत को विदेशों में रहने वाले भारतीयों की दिक्कतें दूर करने के लिए भी अपनी क्षमता बढ़ाने की आवश्यकता है। इसमें भेदभाव, शोषण, स्वदेश वापस भेजने आदि के मामलों से निपटना तथा बाहर रहने वाले भारतीयों की पूरी जानकारी रखना शामिल है। फिलहाल जो हालात हैं, वैश्विक श्रम की गतिशीलता भारत की आर्थिक कूटनीति की प्राथमिकता होनी चाहिए। इसे ऐसी दुनिया में भारत के हितों की रक्षा करनी चाहिए जहां संरक्षणवाद तेजी से बढ़ रहा है।
Date:13-05-24
बुजुर्गों की सेहतसंपादकीय
अगर बुजुर्गों की आबादी का एक बड़ा हिस्सा किन्हीं वजहों से अपना इलाज नहीं करा पाता, तो यह समाज और व्यवस्था की एक बड़ी नाकामी है। गौरतलब है कि एक गैरसरकारी संगठन के अध्ययन में यह तथ्य सामने आया है कि शहरी इलाकों के लगभग पचास फीसद बुजुर्ग आर्थिक मुश्किलों और कई अन्य तरह की चुनौतियों के चलते जरूरत के वक्त चिकित्सकों के पास नहीं जा पाते हैं। ग्रामीण इलाकों में यह समस्या ज्यादा व्यापक है। वहां बुजुर्ग आबादी के बासठ फीसद से ज्यादा के सामने आर्थिक और अन्य बाधाएं खड़ी हैं, जिनके चलते उन्हें बीमारी में मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। आमतौर पर साठ वर्ष की उम्र के बाद व्यक्ति को सेवानिवृत्ति की वजह से आर्थिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जबकि इसी उम्र में उन्हें सेहत संबंधी देखभाल की ज्यादा जरूरत पड़ती है। ऐसे में अगर स्वास्थ्य सुविधाएं सुलभ हों तो उनका जीवन कुछ आसान हो सकता है। मगर कई बार पारिवारिक उपेक्षा के शिकार बुजुर्गों को सरकार की ओर से भी सामाजिक सुरक्षा के रूप में कोई विशेष सुविधा नहीं मिल पाती है। वहीं देश के कई इलाकों में सार्वजनिक स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव और आर्थिक स्थिति से जुड़ी समस्याएं जगजाहिर रही हैं।
यह कोई छिपा तथ्य नहीं है कि आज वृद्धावस्था में पेंशन या अन्य सामाजिक सुरक्षा के अभाव में दैनिक खर्च और स्वास्थ्य देखभाल पर खर्च में भारी उछाल आया है। इसके अलावा, स्वास्थ्य बीमा के क्षेत्र में ज्यादा उम्र वालों के लिए अब तक जो शर्तें रही हैं, वे स्वास्थ्य सुविधाओं तक उनकी पहुंच को मुश्किल बनाती हैं। आए दिन ऐसी खबरें आती रहती हैं कि किसी वृद्ध व्यक्ति के बीमार पड़ने पर उचित इलाज न मिल पाने से उसकी जान चली गई। यह ध्यान रखने की जरूरत है कि आमतौर पर हर बुजुर्ग अपने बाद की उस पीढ़ी को बेहतर जीवन देने के लिए अपनी जिंदगी झोंक देता है, जो अपने परिवार साथ-साथ समाज और देश के लिए एक उपयोगी संसाधन बनता है। सवाल है कि बुजुर्गों की अपनी संतानें और सत्ता-तंत्र उसके स्वास्थ्य और संतोषजनक जीवन के लिए उचित व्यवस्था करने के प्रति उदासीन क्यों रहता है।
Date:13-05-24
संजीदगी से सोचना होगाडॉ. सुरजीत सिंह गांधी
हाल में आई एशियाई विकास बैंक की रिपोर्ट भारत सहित एशियाई देशों में होने वाले जनसांख्यिकीय परिवर्तनों को ही रेखांकित नहीं करती, बल्कि बुजुर्गों की बढ़ती संख्या की चुनौतियों के प्रति भी सजग करती है। रिपोर्ट के अनुसार भारत सहित एशियाई देशों में बुजुर्गों की संख्या और अनुपात में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। भारत में आर्थिक- सामाजिक प्रगति से जीवन की गुणवत्ता में सुधार होने से जीवन प्रत्याशा 70 वर्ष से अधिक हो गई है। वर्तमान में भारत में बुजुर्गों की आबादी 10 प्रतिशत से अधिक है।
संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (यूएनएफपीए) के अनुसार, 2050 तक बुजुर्गों की संख्या कुल संख्या का 19.5 प्रतिशत तक होने का अनुमान है। रिपोर्ट यह भी उल्लेख करती है कि 2031-40 के दौरान भारत में उम्रदराज आबादी से आर्थिक विकास पर बहुत कम प्रभाव होगा क्योंकि इस दशक में भी युवा आबादी अधिक ही रहेगी। लॉन्गिट्यूडनल एजिंग स्टडी ऑफ इंडिया 2021 की रिपोर्ट इस बात पर प्रकाश डालती है कि बुजुर्ग आबादी का एक बड़ा हिस्सा पुरानी बीमारियों, कार्यात्मक सीमाओं, अवसादग्रस्त लक्षणों और कम जीवन संतुष्टि से पीड़ित है।
आयु बढ़ने के साथ बुजुर्गों की दैनिक गतिविधि देखभाल की जरूरतें भी बढ़ने लगती हैं। औद्योगीकरण एवं शहरीकरण बढ़ने से परिवारों का आकार छोटा होता जा रहा है, जिससे बुजुर्गों की देखभाल और भी मुश्किल होती जा रही है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रोफाइल के अनुसार, 2017 में ग्रामीण क्षेत्रों में प्रति 100,000 जनसंख्या पर 43 चिकित्सक थे, जबकि शहरी क्षेत्रों में 118 चिकित्सक। ऐसे में भारत में वृद्धों विशेषकर ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वालों की स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच चुनौती है। तेजी से बढ़ती बुजुर्ग आबादी के लिए व्यापक दीर्घकालिक देखभाल रणनीतियां डिजाइन करने की आवश्यकता है जिसमें सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण स्वास्थ्य बीमा है। भारत में अभी तक स्वास्थ्य बीमा लगभग 20 प्रतिशत आबादी को ही कवर करता है। स्वास्थ्य बीमा कंपनियां अपने उत्पाद मुख्य रूप से उच्च आय समूहों के लिए डिजाइन करती हैं। मध्य आय वर्ग के अधिकांश लोगों के पास बीमा सुविधा नहीं है। शहरी और ग्रामीण आबादी में भी काफी भिन्नता है। भारत में बुजुर्गों की पहुंच स्वास्थ्य बीमा तक कम होने का प्रमुख कारण यह सुविधाजनक होने की बजाय पेचीदा चुनौती है। पॉलिसियों में कम कवरेज, उच्च प्रीमियम और लंबी प्रतीक्षा अवधि जैसी अनेक बाधाओं एवं जेब पर पड़ने वाले भारी बोझ के कारण अधिकांश बुजुर्ग स्वास्थ्य बीमा को बीच में ही छोड़ देते हैं। हाल में इस दिशा में सार्थक पहल करते हुए बीमा नियामक-आईआरडीएआई ने स्वास्थ्य बीमा पॉलिसी खरीदने वालों के लिए 65 वर्ष की आयु सीमा को हटा दिया है, जिससे न केवल बीमा क्षेत्र के बाजार का विस्तार होगा, बल्कि स्वास्थ्य देखभाल खर्चों से पर्याप्त सुरक्षा भी मिलेगी। यद्यपि सरकार द्वारा चलाई जा रही प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना एवं आयुष्मान भारत जैसी योजना से निम्न आय वर्ग को कैशलेस स्वास्थ्य सेवा से स्वास्थ्य कवरेज में सुधार हुआ है।
इसके बावजूद बुजुर्ग आबादी का बड़ा हिस्सा स्वास्थ्य बीमा से वंचित है। भविष्य की जरूरतों को देखते हुए विचार इस बात पर होना चाहिए कि अधिक समावेशी और सुलभ स्वास्थ्य देखभाल पारिस्थितिकी तंत्र को किस प्रकार विकसित किया जाए कि सीनियर सिटीजन को अर्थव्यवस्था के लिए अधिक उत्पादक बनाने की नई शुरुआत की जा सके। एडीबी के मुख्य अर्थशास्त्री अल्बर्ट पार्क का मानना है कि वृद्धों से अतिरिक्त उत्पादकता के रूप में प्राप्त कर सकल घरेलू उत्पाद को औसतन 0.9 प्रतिशत तक बढ़ाया जा सकता है। नीति आयोग के अनुसार स्वस्थ और शिक्षित वृद्ध लोगों को अधिक उत्पादक बनाने, उनकी अप्रयुक्त कार्य क्षमता से प्राप्त होने वाला लाभांश या अतिरिक्त उत्पादकता से अर्थव्यवस्थाओं के लिए सकल घरेलू उत्पाद में 1.5 प्रतिशत के बराबर वृद्धि की जा सकती है। भारत में लगभग एक तिहाई बुजुर्ग ही काम कर रहे हैं। सरकार की ओर से उचित हस्तक्षेप द्वारा बुजुर्गों को विभिन्न क्षेत्रों में अपने अनुभव और विशेषज्ञता का उपयोग करने के लिए एक मंच प्रदान कर अर्थव्यवस्था में इनके योगदान को बढ़ाया जा सकता है। भविष्य की इस चुनौती के लिए व्यापक, एकीकृत नीति बनानी होगी।
भारत में सामुदायिक सहभागिता परियोजनाएं शुरू करने की आवश्यकता है और सामाजिक भागीदारी में डिजिटल और भौतिक, दोनों बाधाओं को दूर करने की आवश्यकता है। बुजुर्गों का सशक्तिकरण मौजूदा कानूनी सुरक्षा उपायों और कल्याणकारी योजनाओं के बारे में जागरूकता और मौजूदा कल्याण और रखरखाव अधिनियम को मजबूत करने जैसे कानूनी सुधार सुनिश्चित करने से भी स्थिति को सुखदायी बनाया जा सकता है। संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2021-2030 को स्वस्थ उम्र बढ़ने का दशक घोषित किया गया है। वृद्ध लोगों, उनके परिवारों और जिस समुदाय में वे रहते है, उनके जीवन को बेहतर बनाने की दिशा में मिलकर काम करना होगा। जिससे वरिष्ठ नागरिकों के जीवन की गुणवत्ता में सुधार हो सके जिससे उन्हें भोजन, आश्रय, चिकित्सा देखभाल और यहां तक कि मनोरंजन के अवसर जैसी विभिन्न बुनियादी सुविधाएं मिल सकें।
विभिन्न शहरों में समाजसेवियों को पहल करते हुए एक वरिष्ठ नागरिक डिजिटल मंच बनाया जाना चाहिए जिससें बुजुर्ग लोग अपनी स्वास्थ्य संबंधी चिंताओं को साझा कर सकें और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं पर जानकारी और मार्गदर्शन प्राप्त कर सकें जिनका वे दिन-प्रतिदिन सामना करते हैं। अब चिकित्सा और सामाजिक आयामों के अलावा वरिष्ठ देखभाल के विशेष आयामों के बारे में सोचना शुरू करने का समय आ गया है। यही समय है जब उम्र बढ़ने को गरिमा से प्रेरित, सुरक्षित और उत्पादक बनाने पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए। बुजुर्गों की सामाजिक सुरक्षा सुनिश्चित करने, भलाई और देखभाल पर अधिक जोर देने की जरूरत है।
Date:13-05-24
एआई की दुनियासंपादकीय
कृत्रिम बुद्धिमत्ता की नित नई होती दुनिया पर सबकी नजर स्वाभाविक और सुखद है। इंटरनेट पर अब लोगों के लिए केवल सर्च इंजन नहीं, बल्कि एआई से लैस बेहतर सर्च इंजन की उपलब्धता सुनिश्चित होने वाली है। इंटरनेट की दुनिया में यह सबसे बड़ी खबर है कि ओपनएआई एक नए कृत्रिम बुद्धिमत्ता-संचालित सर्च इंजन की घोषणा के लिए तैयार है। यह घोषणा किसी भी समय हो सकती है और इसके साथ ही गूगल की बादशाहत को भी चुनौती मिलने लगेगी। अभी गूगल का सर्च इंजन हर कंप्यूटर और हरेक स्मार्टफोन में मौजूद है, पर जब ओपनएआई का कृत्रिम बुद्धिमत्ता वाला सर्च इंजन सक्रिय हो जाएगा, तो स्थितियां बदलेंगी। वैसे पप्र्लेक्सिटी नामक एक सर्च इंजन भी लगातार विकसित हो रहा है, जो कृत्रिम बुद्धिमत्ता से लैस है, लेकिन ओपनएआई का सर्च इंजन विशेष होगा। यह गौर करने की बात है कि ओपनएआई ने बड़ी संख्या में गूगल के विशेषज्ञ प्रोग्रामरों को अपने यहां बहाल किया है, जिससे यह संभावना बढ़ी है कि ओपनएआई दुनिया के सामने कुछ बहुत खास पेश करने वाला है।
माइक्रोसॉफ्ट समर्थित ओपनएआई कृत्रिम बुद्धिमत्ता में अभी सबसे आगे है। चैटजीपीटी भी ओपनएआई का अब तक का सफलतम उत्पाद है। अब नए सर्च इंजन के आने से ओपनएआई के चैटजीपीटी की क्षमताओं में वृद्धि की उम्मीद है, जिससे यह वेब से वास्तविक समय में या तत्काल जानकारी प्राप्त कर सकेगा और अपनी प्रतिक्रियाओं में अनेक उद्धरण शामिल कर सकेगा। यह अक्सर कहा जा रहा है कि चैटजीपीटी काफी मशीनी या एकरूपता वाले पाठ पेश कर रहा है, जबकि बाजार में ज्यादा विविधता वाले ऐसे पाठों की जरूरत है, जो मशीनी नहीं, बल्कि ज्यादा मानवीय लगें। एक ही तरह के बनावटी, घिसे-पिटे जवाबों या पाठों की शिकायतें बार-बार आ रही हैं। गूगल ही नहीं, बल्कि माइक्रोसॉफ्ट की भी कोशिश है कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता क्षेत्र में त्रुटिहीन या कम त्रुटियों वाले उत्पाद पेश करे। हालांकि, ऐसा नहीं है कि पहली बार ओपनएआई का जुड़ाव किसी सर्च इंजन से होने जा रहा है। इसके पहले ओपनएआई ने माइक्रोसॉफ्ट के ही सर्च इंजन बिंज के साथ मिलकर काम किया है, जिसका लाभ चुनिंदा या प्रीमियम उपयोगकर्ताओं को ही मिला है।
इंटरनेट की दुनिया में लोगों को नए सर्च इंजन का इंतजार तो है, पर ओपनएआई के ही एक शोधकर्ता द्वारा बनाए गए पप्र्लेक्सिटी की भी लोकप्रियता बढ़ी है और इस कंपनी का बाजार भाव एक अरब डॉलर से ज्यादा हो चुका है। बहरहाल, अभी जो एआई सक्षम सर्च इंजन उपलब्ध हैं, उनकी सेवाएं पाठ और छवि तक ही सीमित हैं, इसलिए बाजार में एक ऐसे सर्च इंजन की जरूरत है, जो व्यापक रूप से किसी भी खोज को ज्यादा बुद्धिमत्तापूर्ण ढंग से आसान बनाए। गूगल पर सर्च की अभी जो विविध सुविधाएं हैं, वैसा ही अगर ओपनएआई ने पेश किया, तो एक नई क्रांति आ जाएगी। हालांकि, गूगल भी शांत नहीं है, आने वाले दिनों में गूगल के सर्च इंजन में ही कृत्रिम बुद्धिमत्ता का समावेश हो जाए, तो दुनिया में इंटरनेट सेवा एक अलग ही स्तर पर पहुंच जाएगी। लोग तो मानो कृत्रिम बुद्धिमत्ता के इंतजार में बैठे हैं। मिसाल के लिए, चैटजीपीटी की शुरुआत साल 2022 के अंत में हुई थी और अब तक उसके दस करोड़ मासिक उपयोक्ता हो चुके हैं। कुछ दिन और सब्र कीजिए, इंटरनेट की दुनिया में एक नई क्रांति के कदमों की आहट महसूस होने लगी है।
Date:13-05-24
उत्तराखंड के जलते जंगल और कृत्रिम बारिश की आसवीरेंद्र कुमार पैन्यूली, ( पर्यावरण वैज्ञानिक व सामाजिक कार्यकर्ता )
उत्तराखंड के जंगलों के सुलगने का सिलसिला जारी है। दावानल इतना भयावह है कि सेना के हेलीकॉप्टरों की मदद से पानी का छिड़काव किया जा रहा है। अब आग मुख्य राजमार्गों व सहायक मार्गों, खेतों, आवासों और गांवों को जोड़ने वाले पैदल मार्गों तक आ-जा रही है। पिछले पांच वर्षों में सबसे सूखा गुजरा अप्रैल माह ही था। फिर, चारधाम यात्रा भी शुरू हो गई है, जिसमें अभी ही 15 लाख से ज्यादा यात्रियों का पंजीकरण हो चुका है। पारंपरिक ग्रीष्मकालीन फायर सीजन अभी 40-50 दिन और चलेगा, जिसके बाद ही मानसून राज्य में पहुंचेगा। मगर जाड़ों में मौसमी बदलाव से वनाग्नि का चक्र फिर से शुरू हो जाएगा, जिसकी तस्दीक सुप्रीम कोर्ट में उत्तराखंड के उप-महाधिवक्ता जतिंदर कुमार सेठी के इस उद्धरण से भी होती है कि नवंबर, 2023 से अब तक तक 398 बार जंगल सुलगे हैं। इसी सुनवाई के दौरान में यह भी बताया गया कि राज्य सरकार क्लाउड सीडिंग, यानी कृत्रिम बारिश से वनाग्नि को काबू करने का विचार कर रही है, जिस पर अदालत ने कहा कि जंगल की आग बुझाने के लिए केवल कृत्रिम बारिश या बरसात पर भरोसा न किया जाए। यह बिल्कुल सही सीख थी कि हम बरसात के इंतजार में ही नहीं बैठे रह सकते हैं। वनाग्नि को रोकने के उपाय जल्द ही करने होंगे।
दरअसल, सुप्रीम कोर्ट से आग्रह किया गया था कि उत्तराखंड की भयावह वनाग्नि की स्थिति पर वह तत्काल सुनवाई करे। 8 मई को उसी सुनवाई के दौरान कृत्रिम बारिश पर टिप्पणी आई, जिस पर राज्य सरकार को गंभीरता से अमल करना चाहिए। बताया जाता है कि जंगल में आग लगाने के अपराध में 350 से अधिक एफआईआर दर्ज की गई हैं, जिनमें 62 आरोपियों को नामजद किया गया है, किंतु 8 मई को सुप्रीम कोर्ट में जब याचिका सुनी जा रही थी, उस दिन भी उत्तराखंड में आग लगने की 15 बड़ी घटनाएं घटीं! इस दावानल से वन्य जीव अभयारण्य, संरक्षित दुर्लभ वानस्पतिक प्रजातियां, ग्लेशियर आदि सभी संकट में हैं। धुएं के कारण यहां दृश्यता कम हो गई है, जिसके कारण हवाई सेवाएं भी स्थगित की जा रही हैं। होटल की बुकिंग भी रद्द की जा रही हैं, यानी राज्य को पर्यावरणीय ही नहीं, आर्थिक नुकसान भी हो रहा है।
उल्लेखनीय है कि क्लाउड सीडिंग से बारिश ही नहीं कराई जाती, हिमपात भी कराया जा सकता है। विश्व में पहली बार 1946 में न्यूयॉर्क में कृत्रिम बारिश कराई गई थी। इसका जनक भी एक अमेरिकी रसायन वैज्ञानिक और मौसम वैज्ञानिक था। आज कई देश इस तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं, जिसमें चीन सबसे आगे है। ऑस्ट्रेलिया में भी इसका खासा उपयोग किया जाता है। इससे संघर्ष-काल में शत्रु क्षेत्रों में बाढ़ और सूखे की स्थितियां पैदा की जा सकती हैं। अपने देश में महाराष्ट्र, आंध्र प्रदेश, कर्नाटक जैसे राज्यों में इसका उपयोग हुआ है। जलाशयों में पानी की कमी होने पर, जल भंडारण की संभावनाओं को बढ़ाने, स्मॉग-वायु प्रदूषण से निपटने और लैंडफिल्स की आग को रोकने के लिए इसके इस्तेमाल पर विचार होता रहा है। 2009 में तानसा झील में पानी की कमी से निपटने के लिए महाराष्ट्र ने इसी तकनीक का उपयोग किया था। माना जाता है कि क्लाउड सीडिंग का खर्च अब करीब एक लाख रुपये प्रति वर्ग किलोमीटर तक आ सकता है। आईआईटी, कानपुर के वैज्ञानिकों की इस पर विशेषज्ञता हासिल है।
जंगलों की आग अक्सर जन-सतर्कता और बरसात से ही रोकी जाती रही है। मगर दिक्कत यह है कि सरकारी अकर्मण्यता, पौधारोपण में अनियमितताएं, भ्रष्टाचार, आपराधिक तत्वों की जंगलों में उपस्थिति आदि कमियों को दूर करने की तरफ पर्याप्त ध्यान नहीं दिया जाता, जिसके कारण दावानल की भयावहता साल-दर-साल बढ़ती जा रही है। सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर करने वाले राजीव दत्त यह भी बताते हैं कि उत्तराखंड सरकार को वनाग्नि पर दिशा-निर्देश देने की मांग करने वाली कई याचिकाएं वर्षों से शीर्ष अदालत में लंबित हैं। साल 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा भी था कि वह सारी याचिकाओं को सुनेगा, लेकिन अभी तक ऐसा नहीं हो सका है। अब नई तारीख 15 मई है, जिस दिन शीर्ष अदालत इस मामले को सुनेगी।
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हाल ही में गुजरात सहकारी दुग्ध विपणन महासंघ ने मिशिगन मिल्क प्रोड्यूसर्स एसोसिएशन के साथ साझेदारी की घोषणा की है। इसके तहत ब्रांडेड अमूल दूध अमेरिका में उपलब्ध कराया जाएगा। यह सफलता कई कारणों से महत्वपूर्ण है –
– अमूल जैसी सहकारी समिति के उत्पाद पहले से ही 50 से अधिक देशों में निर्यात किए जा रहे हैं। पर यह पहली बार है कि इसका ब्रांडेड ताजा दूध भारत के बाहर भी उपलब्ध हो सकेगा।
– अमेरिका में उपलब्धता से इसकी शुरुआत भर हो रही है। धीरे-धीरे इसे अन्य देशों में भी शुरु किया जा सकेगा।
– तीसरा, यह देश की अन्य सहकारी समितियों के लिए वैश्विक स्तर पर विस्तार का आधार बनाता है।
– ज्ञातव्य हो कि वैश्विक दुग्ध उत्पादन में भारत की हिस्सेदारी 24% हो चुकी है।
– सहकारी समितियों के मामले में हमें मलेशिया, न्यूजीलैंड, कनाडा और केन्या जैसे देशों से सफलता के मंत्र सीखने की जरूरत है।
– क्योंकि, संयुक्त राष्ट्र ने 2025 को अंतरराष्ट्रीय सहकारिता वर्ष घोषित कर रखा है। इसलिए भारत के सहकारी आंदोलन के वैश्वीकरण के लिए यह उचित समय कहा जा सकता है।
– वैश्विक पहुंच और मान्यता के लिए सरकार सर्वश्रेष्ठ सहकारी समितियों का एक समूह बना सकती है। इससे रोजगार, धन सृजन और राष्ट्रीय विकास में अधिक मदद मिलेगी।
‘हिन्दुस्तान’ में प्रकाशित जॉर्ज स्कारिया के लेख पर आधारित। 22 अप्रैल, 2024
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इजराइल-हमास युद्ध में ईरान के शामिल होने से भारत की स्थिति थोड़ी दुविधापूर्ण हो गई है, क्योंकि ईरान और इज़रायल दोनों से भारत के संबंध अच्छे हैं। ऐसे में भारत ने यह कहकर संतुलन रखने की कोशिश की है कि दोनों देशों को तनाव को कम करने के प्रयास करने चाहिए।
इसी पृष्ठभूमि में हम यहाँ भारत एवं ईरान के वर्तमान संबंधों को जानेंगे।
1) व्यापारिक संबंध –
I) ईरान-भारत का व्यापार प्रतिवर्ष लगभग 2.5 अरब डॉलर का है। भारत ईरान से मुख्यतः पेट्रोलियम पदार्थ (एनर्जी) आयात करता है।
II) भारत ईरान में चाबहार बंदरगाह में 8.5 करोड़ डॉलर का एक व्यापारिक टर्मिनल बना रहा है। यह पाकिस्तान को बायपास करके मध्य एशिया तक पहुँचने के लिए भारत के लिए अत्यंत आवश्यक है।
III) यदि ईरान स्ट्रैट ऑफ होमुर्ज को बंद कर देता है, तो भारत में तेल की आपूर्ति रुक सी जायेगी। साथ ही पेट्रोलियम पदार्थों की कीमतें भी काफी बढ़ जायेंगी।
2) राजनीतिक संबंध –
भारत-ईरान के मध्य ऐतिहासिक काल से सांस्कृतिक संबंध रहे हैं।
ईरान में दस हजार भारतीय रहते है।
3) रणनीतिक संबंध –
भारत ईरान को मध्य-एशिया के ‘प्रवेश द्वार’ के रूप में देखता है।
इस्लामिक देशों के साथ संबंधों को सामान्य रखने की दृष्टि से भी भारत ईरान को महत्वपूर्ण मानता है।
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Date:11-05-24
The Election ArgumentSC does right to give Kejriwal interim bailTOI Editorials
SC had indicated last week that it may give Arvind Kejriwal bail because of elections, and it followed through yesterday. AAP is a national party, in govt in Delhi, which votes on May 25, and in Punjab, which votes on June 1. Besides being the party chief, Kejriwal is also the chief minister of Delhi. In the past, of course, AAP campaigns in both Delhi and Punjab have been very much helmed by Kejriwal. While only time will tell how much his return to the campaign trail will affect voters, the uplift of party workers’ spirits is already evident.
The court order takes pains to clarify that this is not about “placing politicians in a benefic position compared to ordinary citizens”. It notes that Lok Sabha elections provide the vis viva (kinetic energy) to a democracy. To ignore elections’ prodigious importance in examining the grant of interim bail to an electorally significant figure, the court said, “would be iniquitous and wrong”. What do precedents say? That even when regular bail would not be justified, interim bail can be granted under compelling circumstances. That in Chandrababu Naidu’s case too, SC has “deleted the condition restraining the respondent” from participating in the political process.
As part of its reasoning for interim bail, the court also cited the timing of Kejriwal’s arrest in March this year, when the investigation has been pending since August 2022. These matters will resume in court after Kejriwal’s bail period, which ends on June 1. But for now, the court has done right to put the interests of democracy over other issues.
Date:11-05-24
Voting for reliefInterim bail for Delhi CM reverses damage to level playing field in pollsEditorial
In granting interim bail to Delhi Chief Minister Arvind Kejriwal, the Supreme Court of India has reversed a development that upset the level playing field for the ongoing general election. When Mr. Kejriwal was arrested in March for his alleged involvement in corruption in the formulation of a liquor policy for Delhi, it might not have seemed an obvious setback to federalism and democracy. But the arrest of a serving Chief Minister and a key figure in the Opposition, when the election process was already on, sent shock waves among regional parties. And, as he remained behind bars, it stoked fears that States run by parties other than those in power at the Centre could easily be undermined by getting central agencies to arrest Chief Ministers on charges that may or may not be based on evidence. In Mr. Kejriwal’s case, the Court is right in both citing the general election as a good enough reason to grant him interim bail until June 1, when the last phase of polling will be held, and in rejecting the Centre’s argument that it would amount to favourable treatment to politicians. As the Court has pointed out, interim release orders relate to the “peculiarities associated with the person in question and surrounding circumstances”. The absence of a notable leader from the campaign arena, especially when he is yet to be convicted, will be a factor that will cast a doubt on the free and fair nature of the election.
The Court has made his bail conditional on his keeping away from the Delhi Secretariat and the CM’s office. And he is to abide by his statement that he would not sign any official file, unless required to do so to get the Lieutenant General’s approval for something. That Mr. Kejriwal did not respond to several summonses from the Enforcement Directorate (ED) does not show him in a good light. But, at the same time, it cannot be forgotten that be it the CBI’s corruption charge, or the ED’s money-laundering charge, the case against him is based on a belated statement made by suspects who had turned approvers and obtained pardon on the promise of testifying against him. The probative value of these statements will be tested during trial. Another factor to be noted is that there are statutory restrictions under the Prevention of Money Laundering Act on seeking bail, resulting in many questioning the validity of their arrest, as Mr. Kejriwal has done, rather than file for bail. If only courts applied the basic principle of granting bail to those who are unlikely to flee from justice, with appropriate conditions to neutralise their likely influence over witnesses and to safeguard evidence, orders granting bail would not evoke political reactions and doubts whether the political class is being unduly favoured.
Date:11-05-24
Folds and faultsFree use of AlphaFold 3 must extend to scrutiny of its inner mechanismsEditorial
Proteins are long chains of amino-acid residues that fold into specific shapes. Properly folded proteins function normally whereas misfolded ones can lead to debilitating diseases. Since these chains are quite long, a given protein can actually fold into one of a very large number of shapes — yet it makes a beeline for a specific shape while avoiding all the others. How and why this happens constitute an important mystery in structural biology called the protein-folding problem. In 2018, five decades after it was mooted, a Google subsidiary named DeepMind developed a purpose-built AI tool to predict the shapes into which different proteins could fold, called AlphaFold. The upgraded AlphaFold 2 followed two years later. Many scientists and technologists acknowledge that these two deep-learning systems have transformed human awareness of protein structures, a feat the machines demonstrated in the biennial Critical Assessment of Protein Structure Prediction contest. Recently, DeepMind launched AlphaFold 3, which can reportedly predict the shapes with nearly 80% accuracy as well as model DNA, RNA, ligands, and modifications to them. As with the first two AlphaFolds, no. 3 is great for being able to elucidate the folded proteins’ structures in seconds rather than the years humans have required with advanced microscopic techniques.
Not surprisingly, the excitement that followed the release of AlphaFold 3 has been unable to escape the hype and overblown expectations that dogged the launches of its predecessors. These machines can predict protein structures with relatively high accuracy but they cannot say why they are folded that way; this is still the task of human scientists. How the AlphaFolds will catalyse drug discovery is also unclear. Many drugs fail to make it to the market from the laboratory because medical researchers are unable to anticipate all the interactions between the drugs’ various components and various parts of the body. The protein-folding problem is important to crack but it will not magically improve drugs’ chances in human clinical trials. It is a step in that direction. Finally, the free use of AlphaFold 3 is limited while its inner mechanisms are unavailable for public exploration or scrutiny, so far. While the motivation to innovate of DeepMind is laudable, the cutting-edge value AlphaFold 3 presents to health care means the company should explore alternative revenue models in which the system is not trapped behind paywalls or exorbitant prices — a fate that has already befallen scientific papers and medicines born of publicly funded research. Recall that the AlphaFolds’ training data itself includes protein structures first elucidated by such research.
Date:11-05-24
केजरीवाल को अंतरिम जमानत देने के मायनेसंपादकीय
अपने आठ पेज के फैसले में सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने स्पष्ट किया कि दिल्ली के सीएम केजरीवाल को दी जाने वाली अंतरिम जमानत को न तो नजीर बनाया जाएगा, ना ही इससे कानून की नजरों में राजनीतिक लोगों का एक अलग क्लास बनेगा। फैसले के बिंदु 7, 8 और 14 में ईडी की आशंका को खारिज करते हुए कोर्ट ने कहा कि 97 करोड़ मतदाताओं में से करीब 65-70 करोड़, सरकार चुनने के लिए वोट डालेंगे। चुनाव किसी भी प्रजातंत्र की प्राण- वायु है। ऐसे में अभियोजन (ईडी) का कहना कि इससे राजनीतिक वर्ग को प्राथमिकता मिलेगी, कतई गलत होगा। कोर्ट ने अनुच्छेद 21 (जीने का अधिकार) का भी जिक्र किया। कोर्ट के अनुसार यह अंतरिम जमानत है और कानून कोर्ट को इसकी शक्ति देता है। बहरहाल जिन पांच शर्तों पर केजरीवाल को छोड़ा गया है उनमें कोई भी उन्हें कहीं भी चुनाव प्रचार करने से नहीं रोकती। हालांकि जमानत को लेकर अंतरिम शब्द का प्रयोग आईपीसी में कहीं नहीं है लेकिन कोर्ट ने कहा कि विशेष परिस्थितियों में और हर केस के तथ्यों को देखते हुए कोर्ट इस शक्ति का इस्तेमाल करता है। केजरीवाल के चुनावी मंचों पर आने से विपक्षी गठबंधन में काफी जोश आ गया है। बहरहाल कोर्ट ने साफ कर दिया है कि ये जमानत केस के मेरिट की आधार पर नहीं दी जा रही है। और सुनवाई की तारीख जल्द दी जाएगी।
Date:11-05-24
सहजीवन में सांसत भरा जीवनमोनिका शर्मा
यह अत्यंत चिंता का विषय है कि मन के जुड़ाव की बुनियाद पर चुने गए सहजीवन संबंधों में भी आए दिन शारीरिक-मानसिक शोषण, हत्या, आत्महत्या, धोखाधड़ी और ‘ब्लैकमेलिंग’ के मामले सामने आते हैं। बावजूद इसके, दायित्वबोध से दूर यों साथ रहने वाले लोगों के आंकड़े बढ़ रहे हैं। कभी महानगरों में देखे-सुने जाने वाले सहजीवन रिश्तों के वाकये अब छोटे शहरों और कस्बों तक में आम हो चले हैं।
माता-पिता बन चुके महिला-पुरुष भी सहजीवन रिश्तों को चुनने लगे हैं। कभी दबे-छुपे रहने वाले आधुनिक जीवनशैली के इन रिश्तों को लेकर अब खुलकर संवाद होने लगा है। शोषण और जीवन से हार जाने की ऐसी दर्दनाक घटनाएं इन्हें चर्चा का विषय बनाती हैं। ऐसे में सवाल है कि केवल अपनी सहूलियत और आपसी समझ के आधार पर चुने गए जीवन के साझेपन में भी संघर्ष की स्थितियां क्यों बन जाती हैं? आमतौर पर सहजीवन संबंधों में न तो समाज का दबाव होता है और न ही परिजनों का दखल। एक-दूजे संग जीने के अलावा कोई जिम्मेदारी भी ऐसे युवक-युवतियों या उम्रदराज महिला-पुरुषों पर नहीं होती। फिर भी कभी जीवन से हारने की स्थितियां बन जाती हैं, तो कभी एक-दूजे की जान ले लेने की।
इसमें दो राय नहीं कि साझा संबंधों में दायित्वबोध का भाव ही सुरक्षा और संबल देता है। साझेपन के इन पहलुओं को सहजीवन संबंधों के मामले में भी न्यायिक रूप से परिभाषित किया जा चुका है। ऐसे रिश्तों को काफी समय पहले कानूनी मान्यता मिल चुकी है। सहजीवन में रहने के लिए अठारह वर्ष से अधिक आयु वाला जोड़ा किसी भी लिंग का हो सकता है। साथ ही, बिना किसी दबाव के दोनों की आपसी सहमति होनी चाहिए। सहजीवन में रहने वाले जोड़े के जीवन में उनके माता-पिता सहित कोई भी हस्तक्षेप नहीं कर सकता है। संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत सहजीवन वाले जोड़ों को जीवन का अधिकार है। स्पष्ट है कि ऐसे रिश्तों में नाते-रिश्तेदारी के किसी दूसरे संबंध या परिजनों के कारण उपजे मानसिक दबाव के चलते उलझनें पैदा नहीं हो सकतीं।
एक ओर बगैर शादी के लंबे समय तक एक ही घर में साझा जीवन जीने वाले जोड़ों के संबंधों से जुड़ी पेचीदगियां बढ़ रही हैं, तो दूसरी ओर अपराध के आंकड़े। गौरतलब है कि किसी सहजीवन संबंध में माता-पिता बने जोड़े के बच्चों के अधिकार की बात हो या पहले से शादीशुदा लोगों का सहजीवन में रहने का रास्ता चुन लेना। बिखराव-उलझाव के कई पक्षों पर न्यायालय की टिप्पणियां आ चुकी हैं। इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने हाल ही में पति को तलाक दिए बिना सहजीवन में रहने वाली एक विवाहित महिला की याचिका खारिज कर दी थी। उच्च न्यायालय ने कहा कि विवाहित महिला पति से तलाक लिए बिना किसी और के साथ सहजीवन में नहीं रह सकती। इस मामले में न्यायालय ने महिला की सुरक्षा की मांग को खारिज करते हुए दो हजार रुपए का जुर्माना लगाया था। न्यायालय ने कहा था कि अगर ऐसे रिश्तों को मान्यता दी जाती है, तो इससे अराजकता बढ़ेगी और समाज का ताना-बाना नष्ट हो जाएगा।
दरअसल, परंपरागत बंधनों से परे और सामाजिक-पारिवारिक जीवन की रीति-नीति से हट कर अपनी इच्छा से जोड़े गए सहजीवन संबंधों में हो रही भयावह घटनाएं अनगिनत प्रश्न उठाती हैं। जीवन की हर उलझन से दूर, आपसी सहमति से चुने सहजीवन संबंध क्यों असुरक्षा, अपमान और अवसाद की ओर धकेलने वाले साबित हो रहे हैं? रहने-सहने के मोर्चे पर क्या मनमर्जी से चुने रिश्ते निभाना भी अब कठिन हो गया है? देखने में आ रहा है कि प्रेम, सहजता और आपसी समझ के आधार पर साथ रहने का मार्ग चुनने वाले संबंधों में भी हत्या और आत्महत्याओं के आंकड़े बढ़ रहे हैं। अधिकतर मामलों का भावनात्मक भटकाव और व्यावहारिक पहलुओं की समझ नदारद होती है। समाज से टूटकर और खुलकर जीने के नाम पर किए गए अनगिनत वादों-इरादों में वास्तविक जीवन से जूझने की समझ और साहस दोनों कमजोर पड़ जाते हैं। साथ ही, दायित्वबोध की कमी कभी नकारात्मक और बर्बर सोच ले आती है, तो कभी भावनात्मक टूटन। बिखरी मानसिकता के दौर में पहली वजह अपने साथी का जीवन छीन लेने का कारण बनती है, तो दूसरी अपनी जान देने की।
स्नेह-साथ के जुड़ाव में मौखिक दुर्व्यवहार और हिंसा के मामले भी आए दिन सामने आते हैं। यही वजह है कि उच्चतम न्यायालय द्वारा सहजीवन में रहने वाली महिलाओं को घरेलू हिंसा कानून से संरक्षण दिया है। ऐसे में सहजीवन में रहने वाली महिला के साथ किसी भी तरह का हिंसात्मक बर्ताव होता है, तो वह अदालत का दरवाजा खटखटा सकती है। पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करा सकती है। चिंताजनक है कि प्रेम और परवाह के भाव से शुरू होने वाले सहजीवन में साथी और उसके परिजनों का जीवन छीनने जैसी घटनाएं सामने आ रही हैं। जबकि कई सहजीवन रिश्तों की शुरुआत तो इस सोच के साथ होती है कि आगे चलकर परंपरागत ढंग से शादी कर साझा जीवन जीएंगे। सहजीवन रिश्तों को अपनाने वाले बहुत से लोग इस संबंध को शादी से पहले एक-दूसरे को पूरी अंतरंगता से जान लेने के लिए जरूरी बताते हैं।
दुखद है कि जानने-समझने की इस यात्रा में ही शोषण और हिंसा के हालात बन जाते हैं। बिना पारिवारिक दायित्व और सामाजिक दबाव के, मनमर्जी से चुने संबंधों में भी समाज को दहलाने वाली पीड़ादायी घटनाएं होने की परिस्थितियां बन जाती हैं। यही वजह है कि 2022 में इंदौर उच्च न्यायालय ने पिछले कुछ बरसों में सहजीवन संबंधों में बढ़ते अपराधों का संज्ञान लेते हुए टिप्पणी की थी कि यह अभिशाप नागरिकों को जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता की संवैधानिक गारंटी का सह-उत्पाद है।
सहजीवन संबंधों में हो रहे अपराधों को देखते हुए अदालत यह टिप्पणी करने पर मजबूर है कि यह भारतीय समाज के लोकाचार को निगल रहा है। सहजीवन संबंध तीव्र कामुक व्यवहार के साथ ही व्यभिचार को बढ़ावा दे रहा है, जिससे यौन अपराधों में लगातार इजाफा हो रहा है। गौरतलब है कि इंदौर हाईकोर्ट यह टिप्पणी सहजीवन में रह रही एक महिला से बार-बार बलात्कार, उसकी सहमति के बिना उसका जबरन गर्भपात कराने, और आपराधिक धमकी देने वाले पच्चीस वर्षीय युवक की अग्रिम जमानत याचिका खारिज करते हुए की थी। निस्संदेह, मनचाहे रिश्तों में बन रही अनचाही स्थितियां आज के दौर में समग्र समाज को चेताने वाली हैं। साथ ही व्यक्तिगत मोर्चे पर भी ऐसे आपराधिक वाकये हर इंसान को आगाह करते हैं कि जिम्मेदारियों को छोड़ कर मन-मुताबिक जीवन जीने की जद्दोजहद भी कम नहीं। दायित्वबोध का भाव और सम्मानजनक मानवीय जुड़ाव हर संबंध में आवश्यक है।
Date:11-05-24
केजरीवाल को राहतसंपादकीय
दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव प्रचार के लिए अंतरिम जमानत देकर प्रथम दृष्टया चुनाव और लोकतंत्र का महत्व बढ़ाया है। शीर्ष अदालत ने पूरी सुनवाई के बाद उन्हें 1 जून तक रिहाई दी है। देश में मतदान का आखिरी चरण 1 जून को संपन्न होगा और 2 जून को उन्हें समर्पण करना होगा, वह फिर जेल जाएंगे। इसका सीधा अर्थ है कि चुनाव के बचे हुए कम से कम तीन चरणों में केजरीवाल ठीक से चुनाव प्रचार कर पाएंगे। बेशक, आम आदमी पार्टी में एक नए जोश का संचार होगा और विपक्षी गठबंधन को भी मजबूती मिलेगी। हालांकि, यह अंतरिम जमानत सशर्त है। रिहाई के इन 21 दिनों में वह मुख्यमंत्री का कोई कर्तव्य नहीं निभाएंगे। वह मुख्यमंत्री कार्यालय और सचिवालय नहीं जाएंगे। अपने इस मुकदमे के बारे में चर्चा नहीं कर पाएंगे। सबसे बड़ी बात, वह दिल्ली उत्पाद शुल्क नीति से जुडे़ मनी लॉ्ड्रिरंग मामले में अपनी भूमिका के बारे में भी कोई टिप्पणी नहीं कर पाएंगे, जिसमें उन्हें गिरफ्तार किया गया है। इसके बावजूद अनेक विशेषज्ञ यह मानते हैं कि चुनाव प्रचार के लिए आम आदमी पार्टी के पास मुद्दों का अभाव नहीं है। अरविंद केजरीवाल को मिली अंतरिम जमानत के दो मुख्य आधार हैं। पहला आधार तो यही है कि मुकदमा नया नहीं है, पर गिरफ्तारी के समय को लेकर सवाल लाजिमी है। किसी भी पार्टी के प्रमुख या मुख्यमंत्री के लिए चुनाव प्रचार का विशेष महत्व होता है। किसी पुराने मामले में अगर ठीक चुनाव से पहले कार्रवाई शुरू होती है, तो संदेह की गुंजाइश बन जाती है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस तथ्य को माना है और ईडी के पास इसका कोई ठोस जवाब नहीं है। अगर ईडी गिरफ्तारी के समय और जरूरत को न्यायोचित ठहरा पाती, तो दिल्ली के मुख्यमंत्री को 21 दिन की रिहाई नसीब नहीं होती। दूसरी बात, मुकदमा होने के बाद भी केजरीवाल मुख्यमंत्री थे और उन्हें गिरफ्तार नहीं किया गया था, वह मुकदमे से जुड़े तथ्यों के साथ तब भी खिलवाड़ कर सकते थे, पर अदालत की नजरों में उन्होंने ऐसा नहीं किया, जिसका लाभ उन्हें रिहाई के रूप में मिला है। सर्वोच्च न्यायालय ने साफ इशारा किया है कि अभी अपराध सिद्ध नहीं हुआ है और केजरीवाल समाज के लिए खतरा नहीं हैं। इन तथ्यों की रोशनी में ईडी केजरीवाल की रिहाई का ठीक से विरोध नहीं कर सकी है। खैर, ईडी के पास अभी भी मौका है, उसे आगामी दिनों में पूरी तैयारी और अकाट्य साक्ष्यों के साथ अदालत में आना होगा, वरना एक मुख्यमंत्री को ज्यादा समय तक जेल में रखना गरिमामय नहीं है।\nखैर, अदालत में 2 जून को चाहे जो हो, आगामी 21 दिन केजरीवाल के लिए उतने ही अहम होंगे, जितने उनके विरोधियों के लिए। विशेष रूप से दिल्ली और पंजाब में अरविंद केजरीवाल की लोकप्रियता या प्रासंगिकता से भला कौन इनकार कर सकता है? अगर इन दोनों राज्यों में आम आदमी का प्रदर्शन अच्छा रहता है, तो इससे दिल्ली के मुख्यमंत्री को भी अपनी बात मजबूती से रखने का आधार मिलेगा। लोकतंत्र में बहुत हद तक जनता ही फैसला करती है, किसी दागी को किनारे लगाने की बात हो या सत्ता सौंपने की बात, जनादेश के बाद ही व्यवस्था को आगे बढ़ने या ठिठक जाने का इशारा मिलता है। बेशक, यह एक विरल मामला है, जब जेल में बंद एक मुख्यमंत्री या नेता को चुनाव प्रचार के लिए अंतरिम जमानत का लाभ दिया गया है, पर यह समग्र भारतीय राज्य की उदारता का नवीनतम प्रमाण है।
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11 May 2024
प्रश्न – 461 – वर्तमान में म्यांमार भारत की आंतरिक सुरक्षा के लिए किस प्रकार की चुनौतियां प्रस्तुत कर रहा है। भारत सरकार इन चुनौतियों का सामना करने के लिए क्या-क्या उपाय कर रही है? (200 शब्द)
Question – 461 – What kind of challenges is Myanmar currently presenting to India’s internal security? What measures is the Government of India taking to face these challenges? (200 words)
नोट : इसका उत्तर आपको हमें नहीं भेजना है, यह आपके स्वयं के अभ्यास के लिए है।
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विश्व का पाँचवा बड़ा महाद्वीप अंटार्कटिका दुनिया की लगभग 90 प्रतिशत बर्फ का घर है। इसलिए इसे ‘पृथ्वी का रेफ्रिजरेटर’ कहा जाता है। यहाँ के बर्फ की चादरों में धरती का सबसे अधिक पानी समाया हुआ है। सदियों से यह महाद्वीप पृथ्वी को शीतल रखे हुए है।
हाल के शोधों के अनुसार जलवायु परिवर्तन के कारण यह महाद्वीप बड़े बदलावों से गुजर रहा है। इस महाद्वीप के चारों और तैरने वाली बर्फ सन् 2022 की तुलना में दस प्रतिशत कम हो गई है।
यहाँ तक कि सर्दियों के मौसम में भी इस बर्फ की क्षतिपूर्ति नहीं हो पाई। यानी कि अंटार्कटिका की यह ‘आइस शीत‘ घट रही है।
एक अध्ययन के अनुसार 25 वर्षों में अंटाकर्टिका करीब साढ़े सात लाख टन बर्फ खो चुका है।
अन्तरराष्ट्रीय जर्नल ‘नेचर’ में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार ग्लोबल वार्मिंग के कारण तेजी से अंटार्कटिका की बर्फ पिघल रही है। इसके कारण प्रतिवर्ष लगभग पाँच हजार उल्कापिंड बर्फ की गहराईयों में डूबकर नष्ट हो रहे हैं।
उल्लेखनीय है कि अंटार्कटिका की सतह पर अनगिनत छोटे-बड़े उल्कापींड जमा हैं। पृथ्वी पर अब तक प्राप्त लगभग 80 हजार उल्कापिंड में से 60 प्रतिशत से अधिक अंटाकर्टिका की सतह पर ही पाये गये है।
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Date:10-05-24
Coloured QuestionsThat not all Indians ‘look’ the same isn’t news. But Pitroda’s is a tone-deaf way to talk diversity.TOI Editorials
We, humans, trace our genetic ancestry to Africa. But, also, we “look” different. This looking-different business is, however, a minefield created by egregious bits of past and present. So, even minimally sensible public speaking avoids this when batting for – or even against – diversity. Why Sam Pitroda chose this way to talk of India’s diversity can perhaps be answered only by him. But lost in the inevitable political din that followed were voices that could intelligently talk of India’s many ethnicities.
This country is a union of many ethnic groups, languages, religions and cultures, born out of waves of settlement and interaction. So, of course, there are regional variations in features and skin colour. The problem comes not from diversity, but hierarchy. India is also a highly stratified society. Having dark skin might have been celebrated in poetry, song and epics, but it is also a sensitive matter for many of us. Our appearance is judged through a lens tinted by caste and colonialism. Cinema and media images usually reflect dominant aesthetics. Many Indians still struggle to meet norms of beauty alien to their roots.
Given this, remarks about resembling African, Chinese and Arab people could blunder into hurtful territory. They are not plain descriptors, they can remind people of slurs hurled at them. The words are not the problem, their associations and affiliations are. It’s telling that nobody objected to being compared to white people – social power sets the beauty standard.
There’s a good way to talk about ethnic diversity, and it is based on civic respect and inclusion. Blunt comparisons like Pitroda’s give ammo to those who belittle people outside the norm, on the basis of skin colour, features, disability, caste or region. Pitroda’s is a celebration of diversity that diversity can do without.
Date:10-05-24
केंद्रीय एजेंसियों पर उठते सवालों का कोई अंत है?संपादकीय
केंद्र सरकार के दूसरे सबसे बड़े वकील सॉलिसिटर जनरल (एसजी) ने सुप्रीम कोर्ट की बेंच के सामने अंततः माना कि केंद्र सरकार के आदेश पर सीबीआई राज्यों में जाती है। एक हफ्ते पहले इसी बेंच से उन्होंने कहा था कि इस संस्था पर सरकार का कोई नियंत्रण नहीं होता। बेंच पश्चिम बंगाल सरकार की याचिका सुन रही थी, जिसमें केंद्र को पार्टी बनाते हुए आरोप लगाया गया था कि ( 2018 में डीएसपीई एक्ट के सेक्शन 5 (1) के तहत राज्य की अनुमति वापस लेने के बावजूद ) सीबीआई को राज्य में जांच के लिए भेजा जा रहा है, जो संघीय संविधान की भावना के विपरीत है। दरअसल उक्त प्रावधान में केंद्र को कुछ अपराधों (धारा 3 में वर्णित) में एजेंसी के कार्य-क्षेत्र में विस्तार करने की शक्ति है। लेकिन इसी एक्ट का सेक्शन 6 कहता है कि बगैर राज्य की पूर्व – अनुमति एजेंसी जांच नहीं कर सकती। राज्य का आरोप है कि पहले सीबीआई आती है, फिर उसके पीछे ईडी पहुंच जाती है। याद करें कि यूपीए-2 काल में वर्ष 2013 में सुप्रीम कोर्ट की बेंच के एक जज ने कोयला घोटाले पर सुनवाई के दौरान गुस्से में कहा था कि ‘ सीबीआई पिंजरे में बंद तोता है’। इस कथन को तब विपक्ष की भूमिका में भाजपा ने खूब भुनाया था। इस समय पश्चिम बंगाल में सीबीआई ने जांच के लिए करीब 15 मामले दर्ज कर रखे हैं। सरकारें अपनी एजेंसियों का दुरुपयोग हमेशा से करती रही हैं, लेकिन इससे लोकतंत्र कमजोर होता है।
Date:10-05-24
प्रबुद्ध समाज को एआई से ज्यादा ‘ईआई’ की जरूरतनंदितेश निलय, ( वक्ता, एथिक्स प्रशिक्षक एवं लेखक )
एक फिल्म के गाने के बोल थे, मैं चाहे ये करूं, मैं चाहे वो करूं, मेरी मर्जी । मुझे यह गाना उस दिन याद् आ गया, जब मैं एक बहुत ही बड़े शिक्षण संस्थान में प्रवेश कर रहा था। मेरे ठीक आगे एक छात्र और छात्रा चल रहे थे और दुनिया से बेखबर अपने ब्लूटूथ के साथ उन्हें बिल्कुल भी यह इल्म नहीं था कि उनके आसपास कोई और भी चल रहा है। ऐक्सक्यूज मी कहता हुआ मैं निकल पड़ा और तभी मेरी नजर उस
खेल के मैदान पर पड़ी, जहां इक्का-दुक्का ही कोई खेल रहा था और अधिकांश छात्र अकेले अपने फोन के साथ चिपके नजर आ रहे थे। यूनिवर्सिटी में हरियाली तो बहुत थी लेकिन मुझे पता नहीं क्यों पत्तों का रंग पीला पड़ता नजर आ रहा था!
हम उस युग में प्रवेश कर चुके हैं जहां आजकल के छात्रों ने एक ऐसी दुनिया बना ली है, जिसमें वो अकेले और बेसुध अपने में खोए हुए-से हैं। जहां एक कभी ना खत्म होने वाला आलस्यपन है और जहां उनकी
वर्चुअल दुनिया तो दौड़ रही है लेकिन वास्तविक जीवन में ठहरे हुए हैं। मैं थोड़ी देर रुककर उनकी ओर देखने लगा पर मानो उनको किसी से मतलब नहीं था। जब मैं उनकी क्लास में पहुंचा तो करीब पचास के आसपास उनकी उपस्थिति थी। मुझे ऐसा लगा कि उनमें से अधिकांश मानो बिस्तर से सीधे उठाकर क्लास में आ गए थे। उनके चेहरे पर कोई भाव ही नहीं था। ना वो हंस रहे थे और ना उदास ही थे। बस मेरी हर बात पर हां में हां मिलाते जा रहे थे। मैंने सोचा कि क्यों नहीं उनको कोई प्रश्न पूछने के लिए कुछ प्रोत्साहित किया जाए। पर वो तो मानो सुकरात को ही पराजित कर रहे थे। ना कोई प्रश्न और ना कोई उत्तर की इच्छा। सबसे ज्यादा आश्चर्य तो मुझे तब हुआ जब उनमें से बहुत से छात्रों के पास कॉपी और पेन भी नहीं था। बस सॉरी कहते गए और बगले झांकते रहे।
शायद वो मुझे यह कहना चाह रहे थे कि ‘की फर्क पैंदा’ यानी क्या फर्क पड़ता है? कुछ ऐसा ही उनके प्रोफेसर्स ने क्लास में कहा। क्योंकि मेरी पिछली क्लास उनके प्रोफेसर्स की थी। अधिकांश प्रोफेसर्स के एक ही प्रश्न थे कि छात्रों को एथिकल कैसे बनाया जाए, उन्हें पढ़ने के प्रति सीरियस कैसे किया जाए, उन्हें क्लास में कैसे बुलाया जाए, उनसे होमवर्क कैसे करवाया जाए क्योंकि पचास की कक्षा में पांच से ज्यादा छात्र पढ़ाई या किसी प्रोजेक्ट को करने में दिलचस्पी नहीं दिखाते हैं।
मुझे अधिकांश प्रोफेसर्स छात्रों के इस तरह के एटीट्यूड से परेशान दिखे। ऐसे में सवाल यह है कि एआई और तमाम तरह के बदलाव के बीच कॉलेजों में छात्रों का इस प्रकार का एटीट्यूड क्यों हो रहा है? पढ़ाई के प्रति बढ़ती यह अरुचि क्यों? वे कॉलेज तो आते हैं पर क्लास में क्यों नहीं जाना चाहते? और वे इतना बेफिक्र क्यों रहते हैं? यह किस तरह की भाव- शून्यता है? क्या वे उस नौकरी के लिए खुद को तैयार कर रहे हैं, जो उनसे उस इमोशनल इंटेलिजेंस की आशा करेगी, जो उनके टीम और स्वयं के प्रबंधन में मददगार बन सके ?
शायद यह इसलिए है कि अब शिक्षण संस्थान, खासकर निजी संस्थान ‘स्टूडेंट ड्रिवन’ हो चुके हैं। अब वे ‘टीचर्स ड्रिवन’ नहीं रहे। छात्रों को लगता है कि उन्होंने भारी-भरकम फीस दी है, इसलिए ग्राहक सेवा के दौर में वे भी किसी चलते-फिरते भगवान से कम नहीं हैं। यह कॉलेज की जिम्मेदारी है कि वह उनका खयाल रखे और उनकी बोझिल आदतों को भी झेले। और उनको अच्छी कंपनी में प्लेसमेंट भी कराना कॉलेज का ही कर्तव्य है। ऐसे में मुझे याद आए युवाल हरारी, जो यह मानते हैं कि 21वीं शताब्दी में वही टिक सकता है जिसमे इमोशनल इंटेलिजेंस हो। वो कहते भी हैं, यह हमारी 21वीं सदी हमसे ऐसी आशा कर रही है जो किसी भी पिछले युग से अलग हैं। आज के व्यक्ति को जीवित रहने और आगे बढ़ने के लिए अनुकूलनशीलता और लचीलेपन के कौशल की आवश्यकता होगी। लेकिन उन युवाओं को देखकर मुझे ऐसा लगा कि मेटा और एआई ने उन्हें ना इमोशनल ही रहने दिया है और ना इंटेलीजेंट ही । और तो और एडमिशन का टारगेट पूरा करने में पूरा सिस्टम ही स्टूडेंट ड्रिवेन बनता जा रहा है।
घर से कॉलेज निकले युवा को माता-पिता कुछ बनाने की कोशिश में हैं और उधर कॉलेज का शिक्षक इस बात से परेशान है कि कैसे शत-प्रतिशत ‘कस्टमर सैटिस्फेक्शन’ प्रदान करें। तो क्या छात्र भी अब किसी शिक्षण संस्था के लिए ग्राहक सदृश हो गए हैं? ऐसे में पढ़ाई की संस्कृति या शिक्षण संस्थाओं की भूमिका तो फिर बाजार के नियम ही तय करेंगे। और बाजार में तो बस तीन ही तरह के लोग होते हैं, क्रेता, विक्रेता और ग्राहक।
Date:10-05-24
संसदीय प्रणाली की समस्याएंआर. विक्रम सिंह, ( लेखक पूर्व सैन्य अधिकारी एवं पूर्व प्रशासक हैं )
देश में निर्वाचन पर्व चल रहा है। संभावना है कि एक दल की सरकार पूर्ण बहुमत के साथ सत्ता में आएगी। पूर्ण बहुमत की सरकारें वास्तव में हमारी संसदीय प्रणाली का ऐसा उच्चतम शिखर हैं, जो अपने स्वरूप में राष्ट्रपति प्रणाली वाली शासन पद्धति की अनुभूति कराती है। राष्ट्रपति व्यवस्था में आम जनता सीधे राष्ट्रपति के लिए वोट डालती है। हमारी व्यवस्था संसदीय है, किंतु व्यवहार में वह राष्ट्रपति वाली है। हम नरेन्द्र मोदी को ही प्रत्येक चुनाव क्षेत्र में लड़ते हुए देख रहे हैं। भाजपा नेता उन्हीं के नाम पर वोट मांग रहे हैं। एक समय नेहरू जी और इंदिरा जी के नाम पर वोट मांगे जाते थे। यह व्यवस्था अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव जैसी ही है। जैसे नेहरू जी देश में कहीं से भी लड़कर चुनाव जीत सकते थे, वैसे ही आज मोदी भी कहीं से भी लड़कर जीत सकते हैं।
बीते सात दशकों में देश ने संसदीय प्रणाली अनुभव लिया है। इसकी सीमाएं स्पष्ट हो रही हैं। उसमें कुछ अस्थिरता के लक्षण होते हैं, जबकि विकास के लिए स्थिरता आवश्यक है। सीमित आबादी एवं सीमित क्षेत्रफल के एक भाषाभाषी, एक सांस्कृतिक धार्मिक क्षेत्रीय स्वरूप के यूरोपीय देशों में संसदीय या वेस्टमिंस्टर प्रणाली सुविधाजनक व्यवस्था हो सकती है, किंतु भारत जैसे देश में जहां बहुलताएं हैं और इन बहुलताओं को राष्ट्रीयता के एक धागे में पिरोए रखना एक मूलभूत राष्ट्रीय आवश्यकता है, वहां देश में अमेरिकी प्रणाली पर भी एक बहस की जरूरत लग रही है। संसदीय प्रणाली के प्रारंभ में हमने नेहरू और इंदिरा जैसे सशक्त प्रधानमंत्री देखे हैं तो कालांतर में वीपी सिंह, चंद्रशेखर, देवेगौड़ा, चरण सिंह, इंद्रकुमार गुजराल जैसे कमजोर एवं मजबूर प्रधानमंत्री भी देखे। गठबंधनों के माध्यम से किसी प्रकार अपनी सरकार को बचाए रखना ही उनकी सबसे बड़ी उपलब्धि थी। कश्मीरी हिंदुओं के पलायन को रोकने में असहाय वीपी सिंह की प्राथमिकता अल्पसंख्यक राजनीति थी। राजीव गांधी को जैसे ही भनक लगी कि चंद्रशेखर रामजन्मभूमि मामले में समझौता कराने के निकट हैं तो उन्होंने समर्थन वापस लेकर सरकार गिरा दी। देश ने मनमोहन सिंह जैसे गठबंधन धर्म को मजबूरी बताने वाले प्रधानमंत्री भी देखे हैं।
राष्ट्रपतीय प्रणाली में बंधुआ राष्ट्रपति नहीं हो सकते। इसमें वैकल्पिक या गैरजिम्मेदार सत्ता केंद्र का विकास असंभव है। संसदीय प्रणाली के साथ समस्या यह है कि उसे राष्ट्रीय नेताओं की आवश्यकता नहीं है। देश का प्रधानमंत्री वही होगा, जिसके पक्ष में अधिकतम सांसद लामबंद हों। इसके लिए बहुत से दलीय हितों के घात-प्रतिघात, क्षेत्रीय एवं व्यक्तिगत स्वार्थों के समायोजन की योग्यता अपेक्षित है। राजीव गांधी, देवेगौड़ा, गुजराल और मनमोहन सिंह आदि का संघर्ष से उपजा राष्ट्रीय व्यक्तित्व नहीं था। गठबंधन सरकारों ने देश को अपने कद एवं क्षमता के अनुरूप खड़ा ही होने नहीं दिया। नेहरू गठबंधन राजनीति के दबाव से मुक्त थे। इसका उपयोग उन्होंने समाजवादी विकास माडल को ढालने में और पंचवर्षीय योजनाओं में लगाया। इस प्रकार देश को एक सशक्त औद्योगिक आधार देने का काम किया। वर्तमान में नरेन्द्र मोदी भी गठबंधन के दबाव की मजबूरियों से मुक्त हैं। इसका परिणाम हम पिछले दस वर्षों में प्रभावशाली हो रहे भारत के रूप में देख रहे हैं। इन दोनों नेताओं का राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय व्यक्तित्व ऐसा रहा कि उन्होंने प्रधानमंत्री पद की सीमाओं से आगे जाकर उसे गरिमा प्रदान की। हम इसकी अनदेखी नहीं कर सकते कि गठबंधन सरकार चलाने वाले अधिकांश प्रधानमंत्रियों को तरह-तरह के समझौते करने पड़े।
हमारे यहां सक्षम राष्ट्रीय नेताओं के अभाव का मुख्य कारण यह है कि संसदीय प्रणाली राष्ट्रीय नेतृत्व के विकास की अपेक्षा ही नहीं करती। इसी कारण कुछ ऐसे नेता एकाएक प्रधानमंत्री बन गए, जिनकी देश ने कभी कल्पना भी नहीं की थी। आखिर किसने सोचा होगा कि देवेगौड़ा, गुजराल या मनमोहन सिंह कभी प्रधानमंत्री बनेंगे। गठबंधन सरकारें वास्तव में राजनीतिक सौदेबाजी करने वाले क्षत्रपों के लिए ही हितकारी होती हैं, जबकि 140 करोड़ की आबादी का विशाल देश ऐसी व्यवस्था चाहता है, जो उसकी समग्र शक्ति एवं क्षमताओं को अभिव्यक्ति दे सके। इसीलिए देश को पूर्ण बहुमत की सशक्त सरकार की अपेक्षा होती है। ऐसी ही सरकार राष्ट्रीय हित से जुड़े दायित्वों एवं लक्ष्यों को पूर्ण करने में समर्थ होती है। भारतीय लोकतंत्र अपनी समस्त शक्ति एकत्रित कर अपने आदर्श नेतृत्व को अधिक से अधिक जितना अधिकार दे सकता है, वह एक अमेरिकी राष्ट्रपति को स्वाभाविक रूप से उपलब्ध है। संसदीय प्रणाली में गठबंधन राजनीति, राजनीतिक जोड़तोड़ की कमजोरियां बाहरी दखल की आशंकाएं बढ़ाते हैं। हमारा देश तो स्वयं इसका मुक्तभोगी रहा है। मित्रोखिन आर्काइव्स भारतीय राजनीति में सोवियत संघ के दखल का आंख खोलने वाला दस्तावेज है।
राष्ट्रपति प्रणाली जादू की छड़ी भी नहीं है, जो तत्काल सब कुछ सुधार देगी। इसलिए व्यवस्था के चौकीदारों को जागते रहना आवश्यक है। संसदीय प्रणाली सत्ता में भागीदारी की संभावना बढ़ाती है, लेकिन हमारे यहां जाति, संप्रदाय, क्षेत्रीय समूहों, दबंगों और भ्रष्टतंत्र के हितसाधकों एवं अलगाववादियों की भागीदारी बढ़ाने लगती है। कई क्षेत्रीय दलों में तो समग्र राष्ट्रीय दृष्टि होती भी नहीं है। भारत की अखंडता उनके लिए महत्व का मुद्दा नहीं बनती। वे कई बार तो विदेश नीति को भी अपने हिसाब से चलाने की कोशिश करते हैं। चूंकि राष्ट्रपति प्रणाली देश के नागरिकों से सक्षम राष्ट्रीय नेतृत्व विकसित करने की अपेक्षा करती है इसलिए देश को उत्तर से दक्षिण, पूर्व से पश्चिम तक जोड़ने वाले नेतृत्व के सक्षम चरित्र राष्ट्रीय फलक पर दिखने लगेंगे। उनकी संस्कृति की, भाषा की समझ बेहतर होगी। वे कभी बंगाल में, कभी तमिलनाडु में, कभी वनवासियों तो कभी तमिल मछुआरों के बीच रहने वाले होंगे। तब देश में वह राष्ट्रीय कर्मठ एवं समर्पित नेतृत्व आकार लेगा, जिसकी दृष्टि समस्त देश को समाहित किए हुए होगी। अच्छा होगा कि राजनीतिक खानदानों और क्षत्रपों के दिन चले जाएं। देश का ध्यान अपनी ओर खींचने वाला कोई नेता जब राष्ट्रपति शैली में चुनाव लड़ेगा तो देश के गांव-गांव में उन्हें वोट देने वाले मिलेंगे और फिर राष्ट्रीय नेतृत्व के विकास की राह स्वाभाविक रूप से प्रशस्त होगी।
Date:10-05-24
चुनाव का अर्थ सिर्फ प्रतिनिधि चुनना नहींराघवेंद्र प्रसाद तिवारी, ( लेखक पंजाब केंद्रीय विश्वविद्यालय, बठिंडा के कुलपति हैं )
इस समय 18वीं लोकसभा के गठन के लिए चुनाव प्रक्रिया जारी है। राजनीतिक दल मतदाताओं को लुभाने के लिए तमाम घोषणाएं और उम्मीदवारों का चयन कर रहे हैं। ऐसे में सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक दृष्टि से लोकतंत्र को सशक्त बनाने के लिए चुनाव से संबंधित समस्त पहलुओं पर समग्रता से चिंतन-मनन करने का यह अनुकूल समय है। इस संदर्भ में दो यक्ष प्रश्न हमारे विचार-प्रक्रिया के केंद्रबिंदु में होने चाहिए। क्या उम्मीदवारों के चयन के लिए ‘जीतने की क्षमता’ एकमात्र मानदंड होना चाहिए? क्या मतदाताओं को प्रतिनिधियों को केवल स्वीकारने या अस्वीकारने के लिए मतदान करना चाहिए अथवा इससे परे विचार कर मताधिकार का प्रयोग करना चाहिए? सार्वजनिक जीवन में अनुभव, सद्कार्यों के जरिये जनता में लोकप्रियता, ईमानदारी, सत्यनिष्ठा, पारदर्शिता, जन कल्याण के लिए प्रतिबद्धता एवं राष्ट्रहित आदि गुणों के आधार पर उम्मीदवारों का चयन होना चाहिए। निर्वाचित प्रतिनिधियों को विकास के एजेंडा के निर्धारण एवं क्रियान्वयन में सक्षम होना चाहिए। उनमें समावेशी एवं सतत विकास के लिए जरूरी विमर्श में जनआकांक्षाओं को रेखांकित करने की क्षमता होनी चाहिए।
असल में चुनाव मतदाताओं के लिए कई विकल्प खोलते हैं। उनसे पता चलता है कि कौनसा राजनीतिक दल समसामयिक विषयों पर बेहतर कानून बना सकता है, लोककल्याण के लिए बेहतर निर्णय ले सकता है, समावेशी एवं टिकाऊ सामाजिक-आर्थिक विकास के लिए नीतियां एवं कार्यक्रम बनाकर उन्हें प्रभावी ढंग से लागू कर सकता है। किस राजनीतिक दल में संसद एवं संसद के बाहर जनआकांक्षाओं को सर्वोत्तम तरीके से अभिव्यक्त करने का कौशल है। कौनसा दल वैश्विक शांति के लिए अंतरराष्ट्रीय दृष्टिकोण को प्रभावित कर सकता है। यह भी देखना चाहिए कि कौनसे राजनीतिक दल राष्ट्रहित के मुद्दों को ताक पर रखकर मुफ्तखोरी की संस्कृति, जाति, संप्रदाय, धनबल, बाहुबल एवं अन्य प्रभावों के माध्यम से मतदाताओं को लुभा रहे हैं। चुनाव वास्तविक अर्थों में जनता के लिए राजनीतिक दलों द्वारा अपने घोषणा पत्रों में प्रस्तावित विभिन्न माडलों के बीच ऐतिहासिक, सांस्कृतिक, सुरक्षा, पर्यावरणीय, सामाजिक, भावनात्मक, नैतिक, बौद्धिक, आध्यात्मिक, विदेश नीति एवं राष्ट्रहित आदि विषयों पर सहमति या असहमति व्यक्त करने का अवसर होते हैं। राजनीतिक दलों द्वारा प्रस्तुत इन विषयों से संबंधित सर्वोत्तम माडल को ही जनप्रतिनिधियों के चयन में प्राथमिकता मिलनी चाहिए। इससे जन एवं राष्ट्र-कल्याण के लिए नीति निर्माण एवं कार्यक्रमों के संदर्भ में राजनीतिक दलों के बीच स्वस्थ प्रतिस्पर्धा पनपेगी। चुनाव अभियानों के दौरान राजनीतिक दलों एवं उम्मीदवारों का इन बिंदुओं पर ही मूल्यांकन होना चाहिए। लोक कल्याण के लिए तत्पर, निष्पक्ष तरीके से सुशासन करने की क्षमता एवं राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय मंचों पर नीतियों के बारे में सोचने तथा नवाचार करने की क्षमता ही उम्मीदवारों के चयन के लिए राजनीतिक दलों के साथ मतदाताओं की भी प्रमुखता होनी चाहिए।
सार्वजनिक जीवन में जो लोग पुनः चयनित होना चाहते हैं, उन्हें जनता को लोकतंत्र और चुनावों के स्वस्थ तरीकों के बारे में शिक्षित करना चाहिए। प्रचार के दौरान उन्हें विकास एवं सुशासन का वैकल्पिक माडल पेश करना चाहिए तथा अपने पूर्व-प्रदर्शन के मूल्यांकन के लिए स्वयं को प्रस्तुत करना चाहिए। प्रबुद्ध समाज को भी सभी दलों के उम्मीदवारों के लिए साझा मंच उपलब्ध कराने चाहिए, जहां सघन विमर्श के द्वारा जनमानस राष्ट्रीय महत्व के बिंदुओं पर उनके सोच-समझ के आधार पर समुचित निर्णय ले सकें। राजनीतिक दलों को सही उम्मीदवारों के चयन के लिए बेहतर मानदंड चुनने के लिए बाध्य करने में नोटा सहायक नहीं है। राजनीतिक दलों ने इस प्रविधान से कतई सीख नहीं ली है। पाल टैमब्या नामक विद्वान का मत है कि ‘मतदान कोई विवाह नहीं है। यह एक सार्वजनिक परिवहन है। आप उसकी प्रतीक्षा नहीं कर रहे हैं। आप बस में चढ़ रहे हैं और यदि कोई बस आपके गंतव्य तक नहीं जा रही है, तो आप घर पर बैठकर उदास नहीं होते। आप वह बस चुनते हैं, जो आपको आपके गंतव्य के सबसे नजदीक ले जाए।’ इसका तात्पर्य है कि सर्वोत्तम विकल्प चुनाव से दूर रहना नहीं, अपितु ऐसे उम्मीदवारों का चयन है, जिसकी रीति-नीति आपके जीवन-मूल्यों के सन्निकट हो। इस संदर्भ में मतदाताओं को जागरूक करने के लिए मीडिया सार्थक भूमिका अदा कर सकता है। वह उन मुद्दों को रेखांकित करे, जिनसे जनमानस प्रभावित होते हैं और जिनसे उपलब्ध विकल्पों में से सर्वश्रेष्ठ विकल्प का चयन करने में जनता को मदद मिले।
अक्सर कुछ लोग यह सोचकर मतदान करने से बचते हैं कि मेरा वोट कोई महत्व नहीं रखता। यह रवैया सही नहीं है। मतदान के अधिकार का प्रयोग न करने से अयोग्य उम्मीदवार एवं अक्षम सरकार बनने की आशंका बढ़ जाती है एवं लोकतांत्रिक प्रणाली अव्यवस्था की शिकार होती है, जिसकी कीमत सभी को चुकानी पड़ती है। तथ्य यह है कि मतदान अधिकार के साथ ही राष्ट्रधर्म भी है। अनेक राष्ट्र-नायकों ने भारत को लोकतंत्र की जननी बनाने के लिए बलिदान दिया है। मतदान कर हम उनके जीवन मूल्यों को जीवंत करते हैं। ऐसी सद्भावनाएं ही हमें मतदान के लिए प्रेरित कर सुयोग्य सरकार के गठन में अधिकतम जनभागीदारी सुनिश्चित करेंगी। वास्तव में यह संसदीय चुनाव भारत के लिए दुनिया के समक्ष अनुकरणीय लोकतांत्रिक प्रक्रिया एवं राष्ट्रधर्म के उच्चतम आदर्श स्थापित करने का अवसर है, जिससे यह भावना दृढ़ हो जाए कि निःसंदेह भारत ही लोकतंत्र की जननी है।
Date:10-05-24
चिप से बढ़ेगी डिजिटल ढांचे की ताकतविनायक चटर्जी, ( लेखक आधारभूत ढांचा क्षेत्र के विशेषज्ञ हैं। साथ में अचिंत्य तिवारी और वृंदा सिंह )
नई दिल्ली के भारत मंडपम में आयोजित बिज़नेस स्टैंडर्ड मंथन कार्यक्रम में 27 मार्च, 2024 को सूचना-प्रौद्योगिकी, संचार एवं रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कुछ महत्त्वपूर्ण बिंदुओं पर चर्चा की। वैष्णव ने कहा कि दुनिया में सेमीकंडक्टर का बाजार इस समय 75 अरब डॉलर का है, जो अगले 6-7 वर्षों में दोगुना हो सकता है। उन्होंने कहा कि भारत खास मकसद से अपनी क्षमताएं विकसित करने पर ध्यान केंद्रित कर रहा है।
उन्होंने दूसरी महत्त्वपूर्ण बात यह कही कि तकनीक में रुचि रखने वाले लोग आसानी से मिलने, हरित ऊर्जा की उपलब्धता और विशेष रसायन विनिर्माण तंत्र ऐसे कारक हैं जो भारत के पक्ष में जाते हैं। तीसरी अहम बात उन्होंने यह कही कि भारत पूर्ण मूल्य श्रृंखला (वैल्यू चेन) में एक बड़ी हिस्सेदारी हासिल करने का लक्ष्य लेकर चल रहा है। इनमें नई चिप से लेकर इनका ढांचा तैयार करने एवं इनकी जांच कर इन्हें फैब्रिकेशन (विनिर्माण) संयंत्र तक ले जाना शामिल हैं। चौथी बात उन्होंने यह कही कि भारत अपनी आर्थिक सुरक्षा मजबूत करने के उद्देश्य से भी इस दिशा में कदम बढ़ा रहा है।
वैष्णव की टिप्पणी ऐसे समय में आई जब वैश्विक मंच पर हलचल तेज हो गई है। अमेरिका का वाणिज्य विभाग चिप निर्माण के लिए 39 अरब डॉलर के अनुदान की पुनर्संरचना कर रहा है। ऐसा समझा जाता है कि अमेरिका ताइवान सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग कंपनी (टीएसएमसी) को 11.6 अरब डॉलर का अनुदान देगा। इस रकम के साथ चिप बनाने वाली दुनिया की इस शीर्ष कंपनी को अमेरिका में अपनी पैठ बढ़ाने में मदद मिलेगी। अमेरिकी अनुदान के लिए अन्य कंपनियां भी कतार में खड़ी हैं जिनमें इंटेल, सिक्योर इंक्लेव, ग्लोबल फाउंड्रीज, माइक्रोचिप टेक, बीएई सिस्टम्स सहित कुछ अन्य शामिल हैं। जापान और यूरोपीय संघ भी ऐसे ही कदम उठा रहे हैं।
भारत में सरकार ने ‘डेवलपमेंट ऑफ सेमीकंडक्टर्स ऐंड डिस्प्ले मैन्युफैक्चरिंग ईकोसिस्ट्मस इन इंडिया’नीति के तहत सेमीकंडक्टर इकाइयों की स्थापना को मंजूरी दी है। यह नीति 21 दिसंबर 2021 को अधिसूचित हुई थी और 76,000 करोड़ रुपये आवंटित हुए थे। इस नीति का मकसद भारत को आत्मनिर्भर और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम के ढांचा एवं विनिर्माण का एक वैश्विक केंद्र बनाना है। इस क्षेत्र में निवेश आकर्षित करने के लिए केंद्र सरकार परियोजना लागत का 50 फीसदी हिस्सा वित्तीय मदद के रूप में देगी। यह नीति विशेष तौर पर सेमीकंडक्टर फैब्रिकेशन यूनिट, डिस्प्ले फैब्स और कम्पाउंड सेमीकंडक्टर, सिलिकन फोटोनिक्स, सेंसर्स और असेंबली एवं टेस्टिंग संयंत्र की स्थापना के लिए वित्तीय प्रोत्साहन देगी।
राज्य सरकारें भी इस दिशा में आगे कदम बढ़ा रही हैं। उदाहरण के लिए केंद्र सरकार से 50 फीसदी समर्थन के अलावा गुजरात सरकार ने टाटा की परियोजना के लिए 20 फीसदी पूंजी समर्थन देने का वादा किया है। टाटा जैसी कई परियोजनाएं इस नीति के अंतर्गत काम कर रही हैं। गुजरात के साणंद में माइक्रॉन की असेंबली एवं टेस्टिंग संयंत्र ने सितंबर 2023 में निर्माण शुरू किया था। टाटा इलेक्ट्रॉनिक्स गुजरात के धोलेरा में 91,000 करोड़ रुपये निवेश से एक सेमीकंडक्टर फैब स्थापित करने की तैयारी कर रही है। कंपनी ताइवान की पावरचिप सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग कॉर्प (पीएसएमसी) के साथ साझेदारी कर रही है। टाटा सेमीकंडक्टर असेंबली ऐंड टेस्ट (टीएसएटी) प्राइवेट लिमिटेड की अगुवाई में दूसरी परियोजना के तहत असम के मोरीगांव में 27,000 करोड़ रुपये के साथ पैकेजिंग एवं टेस्टिंग संयंत्र की स्थापना की जाएगी। एक अन्य कंपनी सीजी पावर, रेनेसां इलेक्ट्रॉनिक्स कॉर्पोरेशन और स्टार्स माइक्रोइलेक्ट्रॉनिक्स के साथ मिलकर गुजरात के साणंद में 7,600 करोड़ रुपये निवेश के साथ असेंबली एवं टेस्टिंग संयंत्र की स्थापना करेगी। टाटा-पीएसएमसी प्रस्ताव एकमात्र ऐसा फैब्रिकेशन संयंत्र है जिसे अब तक सरकार की मंजूरी मिली है। यह भी समझा जा रहा है कि दुनिया के कुछ अन्य देश भारत में प्रवेश करने की रणनीति (स्थान और स्थानीय साझेदार की तलाश) को अंतिम रूप देने के लिए सरकार के साथ बातचीत कर रहे हैं।
तकनीक एवं इलेक्ट्रॉनिक्स के लिहाज से बात करें तो चिप और सेमीकंडक्टर का एक दूसरे से गहरा रिश्ता है मगर ये एक जैसे नहीं हैं। सेमीकंडक्टर एक प्रकार की ऐसी सामग्री होती है जो बिजली के चालक और कुचालक के बीच की श्रेणी है। दूसरी तरफ इंटीग्रेटेड सर्किट (आईसी) या माइक्रोचिप को चिप कहते हैं। यह एक छोटा सेमीकंडक्टर होता है जिस पर हजारों या लाखों छोटे इलेक्ट्रॉनिक कलपुर्जे जैसे ट्रांजिस्टर, कैपेसिटर और रेसिस्टर तैयार किए जाते हैं। ये कलपुर्जे एक विशेष कार्य- जैसे कंप्यूटर में डेटा प्रोसेसिंग या इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को नियंत्रित करना- पूरे करने के लिए एक दूसरे से जुड़े होते हैं। चिप काफी पेचीदा उत्पाद होते हैं जिन्हें बनाना आसान नहीं होता है। फैब्रिकेशन विशिष्ट संयंत्रों में होता है जिन्हें सेमीकंडक्टर फैब्रिकेशन संयंत्र या ‘फैब’ के नाम से जाना जाता है। इन संयंत्रों में फोटोलिथोग्राफी, एचिंग (निक्षारण), डोपिंग और मेटलाइजेशन की मदद से सिलिकॉन वेफर पर चिप का भौतिक ढांचा तैयार किया जाता है।
इस कार्य में तकनीक की गहरी समझ की जरूरत होती है। इसके अलावा लागत के स्तर पर प्रतिस्पर्द्धा बढ़ने से एक ऐसी अलग किस्म की आपूर्ति व्यवस्था तैयार हो गई है, जिसमें कुछ ही कंपनियां हैं। सेमीकंडक्टर इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों को डेटा प्रोसेस, स्टोर और ट्रांसमिट करने के लिए आवश्यक क्षमताओं से लैस करता है। ये एकीकृत सर्किट होते हैं जो सिलिकॉन से बने होते हैं। कुछ वर्ग मिलीमीटर में अरबों इलेक्ट्रॉनिक पुर्जों की पैकिंग से ये सर्किट तैयार होते हैं। हमारे इर्द-गिर्द जितनी भी इलेक्ट्रॉनिक वस्तुएं हैं उन सभी के लिए चिप महत्त्वपूर्ण होते हैं। स्मार्टफोन, सर्वर, आधुनिक कारें, मशीनरी एवं ऑटोमेशन, महत्त्वपूर्ण ढांचे और यहां तक कि रक्षा प्रणाली, सभी में चिप की मौजूदगी होती है। भारत में चिप की मांग अधिक है मगर यह सुस्त उपभोक्ता देश है और भू-राजनीतिक तनाव से आपूर्ति व्यवस्था को होने वाले नुकसान की जद में आ सकता है। उदाहरण के लिए कोविड-19 के दौरान चिप की कमी और हुआवे पर अमेरिकी प्रतिबंध बाहरी आपूर्तिकर्ताओं पर भारत की निर्भरता को रेखांकित करती हैं। फिलहाल भारत सेमीकंडक्टर का आयात (100 फीसदी) करता है। मिल रहे संकेतों के अनुसार आयात का आंकड़ा साल 2030 तक बढ़कर 110 अरब डॉलर तक पहुंच सकता है। इसे देखते हुए अति महत्त्वपूर्ण एवं उच्च-तकनीक वाले इलेक्ट्रॉनिक विनिर्माण में ‘आत्मनिर्भर भारत’ के अनुरूप सेमीकंडक्टर आपूर्ति व्यवस्था का स्थानीयकरण करना जरूरी हो गया है। स्पष्ट रूप से भारत सरकार ने इसके लिए कई निर्णायक कदम उठाए हैं।
साल 2019 के शुरू में सरकार ने सेमीकंडक्टर फैब्रिकेशन संयंत्रों को ‘आधारभूत दर्जा’ दे दिया था। ऐसा पहली बार था जब एक विनिर्माण संयंत्र आधारभूत ढांचे की आधिकारिक परिभाषा में शामिल किया गया था। पूंजीगत सब्सिडी आवंटन की प्रक्रिया अगला तर्कसंगत कदम थी। इस उद्योग की संवेदनशीलता, वैश्विक, तकनीकी एवं निवेश संबंधी चुनौतियों को देखते हुए सरकार को दिलचस्पी दिखाने वाली संभावित इकाइयों की जरूरतें पूरी करने के लिए पूंजी सब्सिडी फंड का आकार बढ़ाना एक उपयुक्त विकल्प लग सकता है। देश कुछ और कंपनियों के साथ अपने डिजिटल ढांचे को और ताकत देने के लिए तैयार है।
Date:10-05-24
लापरवाही की आगसंपादकीय
उतराखंड के जंगलों में लगी आग से हर वर्ष भारी नुकसान होता है। मगर लगातार ऐसी घटना के बावजूद सरकार और संबंधित महकमों को इस बात की सुध लेने की जरूरत नहीं लगती कि इसे रोकने के लिए क्या इंतजाम किए जाएं। जंगल में आग लगने से बचाव की फिक्र में औपचारिक तौर पर जो कदम उठाए जाते हैं, उसकी हकीकत इसी से समझी जा सकती है कि इस वर्ष फिर नैनीताल के आसपास के जंगल में लगी आग की वजह से बड़े क्षेत्र में भारी नुकसान हुआ। पिछले कई दिनों से वहां आग पर काबू पाने के लिए हेलिकाप्टर के प्रयोग सहित कई अन्य उपाय आजमाए जा रहे हैं। जाहिर है, फिलहाल सबसे पहली प्राथमिकता जंगल क्षेत्रों में लगी आग को फैलने से रोकना और बुझाना है, ताकि नुकसान का दायरा कम किया जा सके। इसलिए यह देखने की जरूरत है कि पहाड़ी इलाकों में स्थानीय जरूरतों के अनुकूल किस तरीके से आग को बुझाया जा सकता है। मगर इतना तय है कि जिन इलाकों में जंगल धधक रहे हैं, उनमें वन संरक्षण के लिए तैनात कर्मचारियों ने शायद अपनी ड्यूटी ठीक से निभाई होती तो समस्या को गंभीर शक्ल लेने से रोका जा सकता था।
सवाल है कि धधकते जंगलों के संकट की जिम्मेदारी तय करना कब संभव हो सकेगा ! फिलहाल आग बुझाने के काम में लापरवाही बरतने के आरोप में दस वनकर्मियों के निलंबन के साथ कुल सत्रह लोगों के खिलाफ कार्रवाई की गई है। माना जाता है कि जलवायु में बढ़ते तापमान और पर्यावरण असंतुलन की वजह से दुनिया भर के जंगलों में आग लग जाती है और उसमें व्यापक पैमाने पर जानमाल का नुकसान होता है। मगर इसके समांतर वनाग्नि की कुछ घटनाएं ऐसी भी हैं, जिनमें वन संरक्षण की ड्यूटी में तैनात कर्मचारी और अधिकारियों ने सही समय पर आग से बचाव के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाया। यह भी खबर आई कि वहां कुछ उत्पाती तत्त्वों को जंगल में आग लगाने के आरोप में गिरफ्तार किया गया। इससे यह पता चलता है कि जंगल में आग लगने की घटनाएं केवल प्राकृतिक ही नहीं है, बल्कि इसमें कुछ अपराधी तत्त्व भी शामिल हैं। जाहिर है, वनाग्नि की घटनाओं से निपटने के लिए सरकार को सभी चिह्नित पहलुओं के मद्देनजर ठोस कदम उठाने की जरूरत है।
Date:10-05-24
समय का खेलसंपादकीय
भारतीय विविधताओं के बारे में कांग्रेस के प्रिय ‘फिलास्फर’ सैम पित्रोदा की महादेशीय उपमाएं घोर नस्लीय लगी हैं। वे सत्ताधारी दल गठबंधन के साथ खुद कांग्रेस को इस हद तक अरुचिकर और नागवार लगीं कि पार्टी ने उनसे किनारा करने में ही भलाई समझी। सैम को इंडियन ओवरसीज के अध्यक्ष पद से तत्काल इस्तीफा देना पड़ा। पर कांग्रेस से उनका रिश्ता अभी बना हुआ है। सैम ने दो मई को एक इंटरव्यू में कहा था: ‘हम भारत जैसे विविधता से भरे देश को एकजुट रख सकते हैं, जहां पूरब में रहने वाले लोग दिखने में चीनी जैसे, पश्चिम में रहने वाले अरब जैसे, उत्तर में रहने वाले गोरों की तरह और दक्षिण में रहने वाले अफ्रीकी जैसे लगते हैं, लेकिन इससे कोई अंतर नहीं पड़ता। हम सब आपस में भाई-बहन हैं।’ सैम के वक्तव्य में आपत्तिजनक क्या है? जिन लोगों ने भारत के इतिहास का, समाजों का, उनके नृतात्विक विवेचनों को पढ़ा है, और उनका भाषाशास्त्रीय अध्ययन भी किया है, उन्हें यह मालूम है कि अपना देश मूलतः छह नस्लों का सांस लेता एक रंग-बिरंगा समुच्चय है। इनका चेहरा-मोहरा और बोली – बानी भले अलग हैं पर वे सब मिलाकर समूचे भारतीय हैं। विश्वकवि रवीन्द्र नाथ टैगोर, जिनकी अभी दो दिन पहले ही जयंती मनाई गई है, उन्होंने भी यही कहा-‘यहां आर्य हैं, अनार्य हैं, यहां द्रविड़ और चीन मूल के लोग हैं। शक हूण, पठान, मोगल सब एक ही शरीर यानी भारत में लीन हो गए हैं।’ ये सब मिलकर हमारी ताकत बन गए हैं। राष्ट्रगीत तक में भौगोलिकता के इसी वैविध्यता का गुणगान – बखान हुआ है। देश में इतनी रची-पगी, प्रौढ़ एवं सर्वमान्य-सर्वस्वीकृत विविधताओं के बावजूद कांग्रेस परेशान हो गई या उसे कर दिया गया? इसलिए कि चुनाव का समय है। कांग्रेस इस बार भाजपा एवं उसके नेता नरेन्द्र मोदी को कड़ी टक्कर देने में लगी है। ऐसे में वह उन उपमाओं का स्वागत नहीं कर सकती, जिनमें दुश्मन (चीन), आक्रमणकारी मुगलिया सल्तनतों, गुलाम बनाने वाले गोरों और गरीबी के पर्याय अफ्रीकी ‘जैसी’ साम्यता दिखाई गई है। यह माना कि सैम के कई बयान विगत में कांग्रेस के लिए मुश्किलात पैदा करते रहे हैं। इसकी एक वजह संवाद की शैलीगत कमी भी हो सकती है। उपमाएं अपनी बात या स्थिति स्पष्ट करने के लिए दी जाती हैं। उनका निहितार्थ यही होता है।
Date:10-05-24
अपने बॉस खुद बनेंरजनीश कपूर
एक दौर था जब पढ़ाई-लिखाई पूरी करने के बाद हर युवक को नौकरी या व्यवसाय में प्रवेश करना ही पड़ता था। फिर शुरू होती थी उनके जीवन में 9 से 5 की दिनचर्या । जैसे-जैसे समय बदला नौकरी और व्यापार के माहौल में भी बदलाव आए, लेकिन जब से कवि की महामारी आई उसने दुनिया भर में ‘वर्क फ्रॉम होम’ का चलन शुरू कर दिया। दुनिया भर में सूचना प्रौद्योगिकी की क्रांति के बाद, आज हर किसी के हाथ में एक स्मार्टफोन देखा जा सकता है और मेज पर कंप्यूटर । इस क्रांति ने दुनिया भर के हर कोने में व्यक्तियों को एक दूसरे से जोड़ दिया है। आज अधिकतर युवा और प्रोफेशनल किसी की नौकरी करना पसंद नहीं करते। वे खुद के ही बॉस बनने में विश्वास रखते हैं। ऐसे काम करने वालों को ‘गिग वर्कर्स’ कहा जाता है।
आम तौर पर ‘उबर’ ‘ओला’ जैसी टैक्सी चलाने वाले या खाना व अन्य वस्तुएं डिलीवर करने वालों को ‘गिग वर्कर’ माना जाता है, परंतु ऐसा सोचना सही नहीं है। आज के दौर में हर वो व्यक्ति या प्रोफेशनल जो किसी भी कंपनी में मासिक वेतन की सूची में नहीं है, परंतु वो किसी न किसी कंपनी के लिए कुछ न कुछ कार्य कर रहा है वो ‘गिग वर्कर’ की श्रेणी में आता है। फिर वो चाहे पत्रकार हो, वकील हो, आर्किटेक्ट हो, लेखक हो, फोटोग्राफर हो, वेब डिजाइनर हो या अन्य कोई भी हो, जो भी किसी बड़ी या छोटी कंपनी या संस्था के लिए एक विशेष प्रोजेक्ट पर कार्य कर रहा है वो गिग वर्कर, फ्रीलांसर या सलाहकार की श्रेणी में ही आता है। ऐसा करने से उस कंपनी को भी अपने वैतनिक कर्मचारी की संख्या बढ़ानी नहीं पड़ती। ऐसे में ‘गिग वर्कर’ उस कंपनी के न सिर्फ ऊपरी खर्च भी घटाते हैं बल्कि कार्य कुशलता के साथ उस प्रोजेक्ट या असाइनमेंट को पूरा भी करते हैं । ‘गिग वर्कर’ होने के कई फायदे भी हैं। ऐसा कार्य करने वाला हर व्यक्ति अपनी मर्जी का मालिक होता है। जब भी मन करे वो काम पर हो सकता है और जब भी मन करे वो छुट्टी पर हो सकता है। उसे किसी से अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं होती। यदि आप इस श्रेणी में आने वाली महिला हैं और आपके घर में एक छोटा बच्चा है जिसे आपकी देखभाल की जरूरत है, तो आप अपने बच्चे की दिनचर्या पूरी कर, उसे सुलाने के बाद अपने कंप्यूटर की मदद से ‘ऑनलाइन’ आ सकती है। हां, ऐसे में आपकी सेवा केवल वही कंपनी लेंगी जिनका उस समय काम का समय होगा। ऐसे में ‘एक पंथ दो काज’ बड़े आराम से हो सकते हैं और आप घर बैठे दुनिया के किसी भी कोने में अपनी क्षमता अनुसार किसी कंपनी को अपनी सेवा दे सकते हैं। मुझे याद है जब 2013 में मैं दुबई गया था वहां टैक्सी चलाने वाले एक दक्षिण भारतीय से पूछा कि दुबई में काम करने के लिए अधिकतर लोग भारत या अन्य देशों से ही आते हैं। इन्हें दुबई में काम करने पर कैसा माहौल मिलता है? वो काफी संतुष्टि से बोला कि हम बहुत सुखी हैं। यहां की सरकार हमारा बहुत ध्यान रखती है। हम अच्छा पैसा कमाते हैं। जब मैंने उससे उसकी औसत कमाई पूछी तो उसने बताया करीब एक लाख रुपए कमा लेता हूं। जैसे ही मैने उसकी तनख्वाह पूछी तो वह बोला कि हमें प्रति किलोमीटर कमीशन मिलती है। हम अधिक से अधिक समय गाड़ी चलाना पसंद करते हैं। जब मन करता है ड्यूटी ऑफ कर लेते हैं। कुछ ही वर्षों बाद जब से भारत में ‘उबर’ ‘ओला’ की टैक्सियों का चलन बढ़ने लगा तो इनके ड्राइवरों से भी कुछ ऐसी ही प्रतिक्रिया मिली। आज भारत में ऐप से चलने वाली कई टैक्सी सेवाएं हैं जो आपको कभी भी और कहीं भी ले जा सकती हैं। जिस तरह आज आपको घर बैठे ही कुछ भी सामान, कभी भी और कहीं भी मंगाना हो तो आप झट से अपने स्मार्ट फ़ोन की मदद से उसे उपलब्ध करा लेते है। ऐसा तभी संभव होता है कि क्योंकि इसे कामयाब करने के लिए ऐसे लाखों ‘गिग वर्कर्स’ एक फौज दुनिया भर में तैनात है और हर दिन इसमें बढ़ोतरी हो रही है। ज्यादातर लोग ‘गिग वर्कर्स’ को टैक्सी चलाने वाले और सामान डिलीवर करने वाले ही समझते हैं। परंतु ऐसा नहीं है। आंकड़ों के अनुसार अमरीका जैसे देश में 5.73 करोड़ ‘गिग वर्कर’ हैं।
एक अनुमान के तहत 2027 आते-आते अमेरिका में काम करने वालों की 50 प्रतिशत संख्या ‘गिग वर्कर्स’ की होगी। भारत की ही बात करें तो 2021 में ही ‘गिग वर्कर्स’ की संख्या करीब 1.5 करोड़ थी जो हर दिन बढ़ती जा रही है। एक शोध के अनुसार 2023 के अंत तक दुनिया भर की अर्थ व्यवस्था में ‘गिग वर्कर’ के जरिये करीब 45.5 करोड़ डॉलर का योगदान हुआ। दुनिया भर में ऐसे कई प्लेटफार्म है जो ‘गिग वर्कर’ को ऐसी कई कंपनियों या व्यक्तियों से जोड़ते हैं जो मासिक तनख्वाह पाने वाले कर्मचारी नहीं रखना चाहते। इसलिए यदि आप अपने लिए घर बैठे ही कोई रोजगार देख रहे हैं तो आप इस विषय में भी सोचें कि ‘गिग वर्कर’ बन कर आप न सिर्फ स्वयं के बॉस बन सकते हैं बल्कि अपनी मर्जी अनुसार काम पर आ जा सकते हैं। यदि आपको अपने लिए व अपनों के लिए समय निकालना है तो ‘गिग वर्कर’ एक अच्छा विकल्प साबित हो सकता है।
Date:10-05-24
युवाओं की ज्यादा परवाह का समयराज कुमार सिंह, ( वरिष्ठ पत्रकार )
इसी साल फरवरी के अंतिम रविवार को अपने ‘मन की बात’ कार्यक्रम के 110वें संस्करण में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 18 साल की उम्र पूरी करने पर नए बने मतदाताओं से यह आह्वान किया था कि वे 18वीं लोकसभा चुनने के लिए बड़ी संख्या में मतदान करें। प्रधानमंत्री ने चुनाव आयोग के अभियान ‘मेरा पहला वोट देश के लिए’ की भी प्रशंसा की थी, पर हाल ही में 18 वर्ष के होने वाले युवाओं पर इस सबका ज्यादा असर नजर नहीं आता। 18वीं लोकसभा के लिए सात चरणों में मतदान हो रहा है। 19 अप्रैल को मतदान के पहले चरण से कुछ ही दिन पहले यह आंकड़ा आया कि देश भर में 18-19 आयु वर्ग के युवाओं के मतदाता बनने का प्रतिशत 40 से भी कम है। देश में इस आयु वर्ग के मतदाताओं की अनुमानित आबादी 4.9 करोड़ है, पर 1.8 करोड़, यानी 38 प्रतिशत ने ही खुद को मतदाता के रूप में पंजीकृत कराया है। यह आंकड़ा वर्ष 2014 में खुद को मतदाता के रूप में पंजीकृत कराने वाले इसी आयु वर्ग के नौजवानों से 1.9 प्रतिशत कम है।
राजनीतिक दल भी इससे इनकार तो नहीं करते कि युवा ही वास्तव में किसी देश का भविष्य होते हैं। तब क्या भारत के युवाओं में मतदाता बनने के प्रति ही ऐसी उदासीनता को गंभीर संकेत नहीं माना जाना चाहिए? मतदान तो अगला कदम है। मतदाता बनने के प्रति उदासीनता के राज्यवार आंकड़े भी सवाल खड़े करते हैं। मसलन, देश का दिल कही जाने वाली दिल्ली में 18 से 19 आयु वर्ग के युवाओं के मतदाता बनने का प्रतिशत मात्र 21 है। राजनीतिक रूप से सजग और सक्रिय माने जाने वाले बिहार में तो यह 17 प्रतिशत पर ही अटक गया। देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में भी इस आयु वर्ग के 23 प्रतिशत युवाओं ने ही मतदाता बनने में दिलचस्पी दिखाई। अपेक्षाकृत नए राज्य तेलंगाना के आंकड़े अवश्य उत्साहवर्द्धक हैं, जहां इसी आयु वर्ग के 66.7 प्रतिशत युवाओं ने मतदाता के रूप में खुद को पंजीकृत कराया है। अरसे से आतंकवाद और अलगाववाद झेल रहा जम्मू-कश्मीर भी इस मामले में प्रशंसा का पात्र है, जहां 62 प्रतिशत नौजवानों ने मतदाता बनने में दिलचस्पी दिखाई है। हिमाचल प्रदेश, ओडिशा, पश्चिम बंगाल और केरल में यह प्रतिशत क्रमश: 60, 49, 48 और 38 रहा। जाहिर है, कम मतदाता बनने का सीधा असर चुनाव प्रक्रिया के जरिये युवाओं की भागीदारी पर भी पड़ेगा।
चुनाव प्रक्रिया में युवाओं की घटती दिलचस्पी के जो कारण जानकार बताते हैं, वे दरअसल हमारी राजनीति को ही कठघरे में खड़ा करने वाले हैं। मसलन, उम्रदराज राजनीतिक नेतृत्व में युवाओं को अपना प्रतिनिधित्व और अपनी आकांक्षाओं का प्रतिबिंब नहीं दिखता। चुनाव प्रक्रिया में युवाओं की घटती दिलचस्पी तब और भी चौंकाने वाली है, जब देखें कि 2014 के लोकसभा चुनाव में युवाओं ने बढ़-चढ़कर मतदान किया था। एक आंकड़े के मुताबिक, 2014 के लोकसभा चुनाव में 18 से 25 आयु वर्ग के युवाओं ने शेष आबादी की तुलना में कहीं ज्यादा 70 प्रतिशत तक मतदान किया था। चुनाव प्रक्रिया पर नजर रखनेवाले मानते हैं कि तब भाजपा की जीत में भी निर्णायक भूमिका युवाओं ने ही निभाई थी। 2019 के लोकसभा चुनाव में भी युवा पीछे नहीं रहे। फिर अब युवाओं का चुनाव प्रक्रिया से मोहभंग क्यों नजर आ रहा है? वास्तविक कारण तो युवाओं के बीच किसी व्यापक सर्वेक्षण से ही पता चल सकता है, पर देश-काल-परिवेश के मद्देनजर उसका अनुमान लगाने की कोशिश की जा सकती है। तत्कालीन सरकार पर भ्रष्टाचार और नीतिगत जड़ता के गंभीर आरोपों के बीच हुए 2014 के लोकसभा चुनाव में बड़े पैमाने पर नौकरियां देने का वायदा किया गया था, पर आज भी लाखों सरकारी पद खाली पड़े हैं।
युवाओं के वोट की चाह रखने वाली हर पार्टी को यह भी दिखना चाहिए कि युवाओं की चिंता क्या है? अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की 2024 की रिपोर्ट बताती है कि कुल मिलाकर 83 प्रतिशत युवा बेरोजगार हैं। आयु वर्ग की बात करें, तो राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय (एनएसएसओ) के आवधिक श्रम बल सर्वे (पीएलएफएस) के आंकड़े बताते हैं कि जुलाई, 2022 से जून, 2023 के बीच नौकरी तलाश कर रहे 17 साल के युवाओं का प्रतिशत 16.8, 18 साल के युवाओं का प्रतिशत 28.5 और 19 साल के युवाओं का प्रतिशत 31.3 था। इसी सर्वेक्षण के मुताबिक, पहली बार मतदान करने वालों की श्रम बल भागीदारी 29.7 प्रतिशत थी, यानी उनमें से 70 प्रतिशत के पास कोई रोजगार नहीं था। ऐसे में, युवाओं की चुनाव प्रक्रिया से कुछ दूरी बहुत चौंकाती तो नहीं, पर सवाल अवश्य खड़े करती है। पिछले कई सालों से भारत को युवाओं का देश कहा जा रहा है। भारत की जनसंख्या 144 करोड़ हो जाने पर आई संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष (यूएनएफपीए) की रिपोर्ट बताती है कि रोजगार की दृष्टि से युवा यानी 18 से 35 वर्ष के बीच की आबादी की बात करें, तो उसका आंकड़ा 60 करोड़ के आसपास बैठता है। दिल्ली में तो 45 प्रतिशत मतदाता 40 साल से कम उम्र के हैं।
आर्थिक उदारीकरण के बाद भारतीय अर्थव्यवस्था की तेज विकास दर की कहानी खुद आंकड़े बयान करते हैं। भारत का विश्व की पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था बन जाना निश्चय ही गर्व की बात है। ऐसा कदापि नहीं कहा जा सकता कि हमारे राजनीतिक दल युवा मतदाताओं का महत्व नहीं समझते हैं। कमोबेश सभी राजनीतिक दलों के विभिन्न नामों से जारी चुनाव घोषणापत्रों में युवाओं के लिए लुभावनी घोषणाएं हैं। फिर भी, युवाओं में मतदान के प्रति दिलचस्पी घट रही है, तो सभी दलों को सोचना होगा। बेशक यह स्थिति राजनीतिक नेतृत्व से भी आत्म-विश्लेषण की मांग करती है, लेकिन देश सिर्फ राजनीतिक दलों-नेताओं का नहीं है। देश की सही दिशा के लिए जरूरी है कि दलों-नेताओं की दिशा भी सही रखी जाए। हालात मोहभंग से नहीं, मनोबल से ही बदले जा सकते हैं। मतदान अधिकार ही नहीं, हर नागरिक का कर्तव्य भी है। स्वामी विवेकानंद ने युवाओं के लिए ही कहा था : उठो, जागो और तब तक मत रुको, जब तक मंजिल प्राप्त न हो जाए।
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हाल ही में दुबई में भरे पानी के मद्देनजर क्लाउड सीडिंग जैसे कार्यक्रम की चर्चा होने लगी है। हालांकि दुबई की घटना जलवायु परिवर्तन और अजीबोगरीब मौसम की स्थिति के कारण हुई थी, लेकिन इससे पहले अनेक देश विभिन्न उद्देश्यों के लिए इस तकनीक का उपयोग करते रहे हैं।
कुछ बिंदु –
– यह एक मौसम संशोधन तकनीक है, जो 1940 के दशक में शुरू हुई थी।
– इस तकनीक में कृत्रिम बारिश उत्पन्न करने के लिए सिल्वर आयोडाइड गोलियों का इस्तेमाल किया जाता है।
– आज, चीन के पास दुनिया का सबसे बड़ा क्लाउड सीडिंग कार्यक्रम है। 2022 में इसका इस्तेमाल वहाँ की एक सूखी नदी में जल भरने के लिए किया गया था।
– लगभग 52 देशों में यह कार्यक्रम उपलब्ध है।
– पिछले वर्ष दिल्ली सरकार ने प्रदूषण से निपटने के लिए इस कार्यक्रम पर विचार किया था। लेकिन विशेषज्ञों ने ऐसा न करने की सलाह दी थी।
कई जलवायु वैज्ञानिकों का मानना है कि क्लाउड सीडिंग से केवल मामूली मदद ही मिल सकती है। इसके अलावा मौसम के पैटर्न में हेरफेर करने के विपरीत प्रभाव भी हो सकते हैं। हितों का टकराव भी हो सकता है। भारत के हिमालयी राज्यों में अचानक आने वाली बाढ़ के लिए चीन की मौसम संशोधन गतिविधियों पर सवाल उठाए जाते रहे हैं। अतः इस प्रकार की कृत्रिम विधियों से बचकर, कार्बन उत्सर्जन कम करने पर ध्यान दिया जाना चाहिए।
‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 20 अप्रैल, 2024
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Date:09-05-24
Giving primacy to human developmentM. Suresh Babu, [ is Director, Madras Institute of Development Studies. ]
The promise of development has emerged as a rallying point for political parties for the elections. Taking stock of the achievements of the past few years, as portrayed in the Human Development Report, underscores the task ahead and the need for a clear strategy for embarking on a long journey.
A poor ranking on HDI
Two recent reports reveal some important facets of India’s development. First, the Human Development Report 2023-24, published by the United Nations Development Programme, takes a comparative perspective and maps the achievements in the area of human development. Second, a paper published by the World Inequality Lab in March 2024 provides long-term trends in income and wealth inequality in India between 1922 and 2023. These reports do not reveal very encouraging trends on both fronts and can be used for future course corrections. More importantly, the evidence published is a significant guidepost for the forthcoming government, if it is to advance human capabilities and enhance the welfare of citizens, which are agendas of the major parties.
India ranked 134 out of 193 countries in the UN Human Development Index (HDI) in 2022, which was an improvement compared to 2021, when it ranked 135 out of 192 countries. This one point increase can be attributed to a marginal increase in HDI value to 0.644 in 2022 from 0.633 in 2021. This places India is in the medium human development category. Between 1990 and 2022, India witnessed an increase in HDI value by 48.4%, that is, from 0.434 in 1990 to 0.644 in 2022.
However, even though India moved up a rank compared to 2021, it still fell behind Bhutan, Bangladesh, Sri Lanka, and China. The medium human development category of countries includes Myanmar, Ghana, Kenya, Congo and Angola. The index on which India registered an improvement is the Gender Inequality Index. In 2022, India was ranked 108 out of 193 countries, while in 2021, it ranked 122 out of 191 countries. However, India also has one of the largest gender gaps in its labour force participation rate as there exists a 47.8% difference between women (28.3%) and men (76.1%).
The Report raises concerns on rising inequality and its implications for advancing human development. Inequality between countries at the upper and lower ends of the HDI started to increase each year since 2020. This divergence is compounded by substantial economic concentration, as almost 40% of the global trade in goods is concentrated in three or fewer countries. Further, in 2021, the market capitalisation of each of the three largest technology companies surpassed the GDP of more than 90% of countries that year. The ramification of increased inequality is discussed in the Report, which states, “The share of people reporting having very high control over their lives is low and relatively equal for the bottom 50 percent of the population, but rises with income for deciles 6 and above. Thus, income inequalities, which often intersect and are associated with other inequalities in human development, shape agency.” That is, agency increases as income grows for the bottom 50% of the distribution.
When adjusted for inequality, India’s loss in HDI is 31.1%, which is higher than that of Sri Lanka, Bangladesh, Nepal and Pakistan.
Widening inequality
The World Inequality Lab study shows that the bottom 50% were getting only 15% of India’s national income in 2022-23. According to the study, “The top 1% earn on average 5.3 million, 23 times the average Indian (INR 0.23 million). Average incomes for the bottom 50% and the middle 40% stood at INR 71,000 (0.3 times national average) and INR 1,65,000 (0.7 times national average) respectively. At the very top of the distribution, the richest 10,000 individuals (of 920 million Indian adults) earn on average INR 480 million (2,069 times the average Indian)”. This stark income inequality in India has important implications on the aggregate demand and consumption and on human welfare. The real growth rate of incomes at each percentile of the income distribution shows that growth for the top decile has been significantly higher than the rest of the population. Within the top 10%, growth rates rise with rank indicating that those at the very top benefited much more than the others. Interestingly, during 2014-2022, the incomes of the middle 40% of the income distribution seem to have grown slower than the bottom 50%. This skewed income distribution and growth of incomes of the higher percentiles indicate a forthcoming possibility of the reduction in the size of the ‘middle class’. When growth gets very concentrated at the top, the pace of economic polarisation accelerates eventually resulting in the emergence of two classes, the haves and have-nots.
Household debt levels in India reached a record high of 40% of GDP by December 2023, and the net financial savings plunged to 5.2% of the GDP, according to a recent report. A breakup of household debt shows that unsecured personal loans have experienced the most rapid growth, followed by secured debt, agricultural loans, and business loans. Annual borrowings of households surged to 5.8% of GDP in 2022-23, the second-highest level in independent India. Given low levels of human development, high levels of inequality, low savings and high debt, it is time to think about an alternate growth strategy which accords primacy to human development and convert it as a route to accelerate growth. This needs political will and thinking beyond short-term electoral gains. As a first step towards this, the narrative of development needs to be recast.
Date:09-05-24
निर्यात – नीति दीर्घकालिक बनाने पर ध्यान देना होगासंपादकीय
आम चुनाव के बीच प्याज के निर्यात पर पांच माह से लगा प्रतिबन्ध कुछ शर्तों के साथ हटाने का फैसला एक बार फिर नीतिगत ऊहापोह दर्शाता है। वैश्वीकरण के दौर में कोई भी देश बगैर निर्यात बढ़ाए विकास नहीं कर सकता। चूंकि भारत में आज भी 60% लोग कृषि से जुड़े हैं और 45-48 प्रतिशत श्रम-शक्ति मजबूरन इसी क्षेत्र पर बोझ बनी है लिहाजा कृषि और श्रम – बहुल उद्योगों के उत्पादों का निर्यात ही बेरोजगारी और कृषि संकट से बचाने का एक मात्र तरीका है। लेकिन अगर नीतियां महंगाई और सरकार की इमेज के विपरीत रिश्ते के हिसाब से बनेंगी तो उत्पादनकर्ता न तो ज्यादा उत्पादन के लिए तत्पर होकर निवेश करेगा, ना ही लागत कम करने के लिए अपेक्षित तकनीकी और विज्ञान के प्रयोग के लिए प्रेरित होगा। गेहूं, चावल और चीनी का निर्यात पिछले एक-दो वर्षों से बाधित है, क्योंकि चुनाव काल में महंगाई किसी भी सरकार को अलोकप्रिय बना सकती है। लेकिन थोड़ा गहराई से सोचकर अगर नीतियां उत्पादन बढ़ाने, लागत कम करने और श्रम-बहुल उद्योगों को अलग से प्रोन्नत करने की दीर्घकालिक योजना बने तो सरकार का महंगाई का खौफ भी जाता रहेगा साथ ही विश्व बाजार का भरोसा बढ़ेगा और देश मार्केट लीडर बन सकेगा। देश की निर्यात नीति उद्योगों की प्रकृति के अनुरूप और दीर्घकालिक होनी चाहिए।
Date:09-05-24
भारत से क्यों गईं विदेशी वित्तीय कंपनियां ?देवाशिष बसु, ( लेखक मनीलाइफडॉटइन के संपादक और मनीलाइफ फाउंडेशन में ट्रस्टी हैं )
सन 1992 के प्रतिभूति घोटाले के बाद कई विदेशी बैंकों ने जो अहंकार से भरी चुटकियां लीं और उत्तर दिए उनमें से एक यह भी था, ‘अगर आप घर का मुख्य द्वार खुला रखेंगे तो आपके घर में चोरी होने की आशंका है।’
यह टिप्पणी सिटी बैंक के एक काउबॉय बैंकर ने की थी। वह विदेशी बैंकों द्वारा एक अपारदर्शी सरकारी प्रतिभूति बाजार में सरकारी बैंकों को धोखा देकर मोटा मुनाफा कमाने को उचित ठहरा रहे थे।
भारतीय ऋण बाजार की छोटी सी दुनिया के बाहर उनका ट्रेजरी संचालन एक प्रकार से गुमनाम था लेकिन सिटी बैंक 1990 के दशक के आरंभ में भी एक प्रमुख खुदरा वित्तीय सेवा ब्रांड था जिसने क्रेडिट कार्ड से लेकर उपभोक्ता ऋण तक खुदरा वित्त की गति निर्धारित की।
आईसीआईसीआई बैंक उस समय तक एक डेवलपमेंट-फाइनैंस संस्थान था, कोटक महिंद्रा बैंक और ऐक्सिस बैंक तब अस्तित्व में ही नहीं थे और सन 1994 में स्थापित हुए एचडीएफसी बैंक का संचालन भी सिटी बैंक से निकले एक व्यक्ति के हाथों में था।
करीब 30 वर्ष बाद मार्च 2023 में उसी सिटी बैंक ने अपना खुदरा कारोबार ऐक्सिस बैंक को बेच दिया और वह भारत के खुदरा बैंकिंग कारोबार से बाहर निकल गया। यह अपनी तरह का इकलौता मामला नहीं था। वर्षों के दौरान भारत में विदेशी बैंकों की मौजूदगी लगभग न के बराबर रह गई है।
देश का सबसे बड़ा विदेशी बैंक स्टैंडर्ड चार्टर्ड बैंक है जिसकी 42 शहरों में केवल 100 शाखाएं हैं। एचएसबीसी की केवल 26 शाखाएं हैं। 38 अन्य विदेशी बैंकों की मौजूदगी नगण्य है। अकेले एचडीएफसी बैंक की 8,000 से अधिक शाखाएं हैं। सबसे बड़े वैश्विक बैंक मसलन जेपी मॉर्गन चेज, बैंक ऑफ अमेरिका, मित्सुबिशी यूएफजे और बीएनपी पारिबा आदि या तो भारत में हैं ही नहीं या फिर उनकी उपस्थिति बहुत मामूली है।
भारत के शीर्ष बैंक हैं भारतीय स्टेट बैंक, ऐक्सिस बैंक, आईसीआईसीआई बैंक, एचडीएफसी बैंक और कोटक महिंद्रा बैंक। म्युचुअल फंड की कहानी भी ऐसी ही है। शीर्ष 20 म्युचुअल फंड में से बहुत कम में विदेशी संयुक्त साझेदार हैं और उनकी भी भूमिका बहुत सीमित है।
अधिकांश फंड पूरी तरह भारतीय स्वामित्व वाले हैं। शीर्ष 10 में इकलौती विदेशी परिसंपत्ति प्रबंधन कंपनी निप्पॉन इंडिया है। सबसे बड़े अमेरिकी म्युचुअल फंड भारत में नहीं हैं। मॉर्गन स्टैनली और फिडेलिटी ने भारत से कारोबार समेट लिया और टेंपलटन वृद्धि के लिए संघर्ष कर रही है।
बीमा क्षेत्र का मामला थोड़ा अलग है जहां कई विदेशी कंपनियां संयुक्त उपक्रम में साझेदार हैं क्योंकि यह कारोबार थोड़ा अलग प्रकृति का है। परंतु इन पर भी भारतीय प्रबंधन का नियंत्रण है। भारतीय जीवन बीमा निगम जो कि भारत सरकार की कंपनी है, वह अभी भी जीवन बीमा कारोबार पर पूरा दबदबा रखती है।
यह सब 1990 के दशक के शुरुआती दिनों से एकदम अलग है जब भारतीय नीति निर्माता सतर्क थे और एक तरफ घरेलू हितों और दूसरी ओर अमेरिकी व्यापारिक प्रतिनिधियों के राजनयिक दबाव के बीच संतुलन साधने का प्रयास कर रहे थे। ऐसा इसलिए ताकि अमेरिकी वित्तीय कंपनियों का भारत में सहज प्रवेश सुनिश्चित किया जा सके।
मीडिया में इस बारे में खूब लिखा गया कि कैसे आकांक्षी भारतीय मध्य वर्ग (उस समय करीब 20 करोड़) जो आर्थिक उदारीकरण से लाभान्वित हो रहा था, उसे खुदरा ऋण, बीमा और म्युचुअल फंड जैसे निवेश उत्पादों की जरूरत पड़ने वाली थी।
भारतीयों को इन्हें बेचने के लिए अमेरिकी कंपनियों से बेहतर कौन होगा जिनके बारे में कहा जाता है कि उनके उत्पाद बेहतरीन हैं और निवेश में उनकी विशेषज्ञता है। विश्व व्यापार संगठन में कई दौर की वार्ताएं इस विषय पर केंद्रित रहीं कि उभरते बाजारों को विकसित देशों की सेवाओं (पढ़ें वॉल स्ट्रीट) के लिए खोला जाए। वाम रुझान वाले राजनेता और अकादमिक जगत के लोगों ने नवउपनिवेशवाद का डर दिखाया। परंतु हुआ एकदम उलटा।
सन 1993-94 में जब छह निजी म्युचुअल फंड को लाइसेंस दिया गया था तब उनमें से कई में विदेशी साझेदार थे। बाद में और विदेशी म्युचुअल फंड भारत में आए लेकिन उनमें से शायद ही कोई अपने मूल स्वरूप में नजर आया।
पायनियर, ब्लैकरॉक, अलायंस कैपिटल, सन एफऐंडसी, मॉर्गन स्टैनली, जार्डाइन फ्लेमिंग, जेपी मॉर्गन और गोल्डमैन सैक्स आदि ऐसे फंड हैं जो यहां से चले गए। इसके विपरीत भारतीय फंड कुछ ऐसे विदेशी साझेदारों के साथ बने रहे जो सक्रिय नहीं हैं। जेएम फाइनैंशियल, डीएसपी, आदित्य बिड़ला, श्रीराम आदि इसके उदाहरण हैं।
लाखों भारतीय इस रुझान को भारतीय उद्यमियों की महानता के प्रमाण के रूप में देखेंगे। यह सही है कि भारतीय उद्यमियों और प्रबंधकों ने बहुत अधिक प्रतिभा और क्रियान्वयन कौशल दिखाया है लेकिन विदेशी वित्तीय कंपनियों की भारत छोड़ने की नीति की वजह अलग है।
साफ कहें तो सन 1990 के दशक के मध्य में भारतीय मध्य वर्ग को लेकर जो भी अनुमान लगाए गए थे वे गलत साबित हुए। मध्य वर्ग की समृद्धि इस गति से नहीं बढ़ी कि विदेशी कारोबार उसका लाभ ले सकें। ऐसा भारतीय अर्थव्यवस्था के कुप्रबंधन की वजह से हुआ।
उत्पादकता कमजोर बनी रही, भ्रष्टाचार और कर दरें ऊंची बनी रहीं और सांठगांठ वाले पूंजीवाद ने 2000 के दशक के मध्य में बुनियादी वृद्धि को नुकसान पहुंचाया। परिणामस्वरूप सरकारी बैंकों का फंसा हुआ कर्ज 20 लाख करोड़ रुपये से अधिक हो गया।
2005 से 2008 के बीच समृद्धि में सुधार विशुद्ध रूप से तमाम भूभागों में वैश्विक तेजी की बदौलत हुआ। इससे कई परिसंपत्तियों की कीमतें बढ़ीं और वित्तीय सेवाओं में अल्पकालिक तेजी आई। परंतु वैश्विक वित्तीय संकट ने 2008 में भारत पर भी असर डाला और हम एक बार फिर दशक भर के संघर्ष में उलझ गए।
विदेशी कंपनियां वैश्विक वित्तीय संकट से बुरी तरह कमजोर पड़ चुकी थीं और उन्होंने बाहर निकलना शुरू कर दिया। भारतीय कंपनियों के पास ऐसा विकल्प नहीं था। उन्होंने समय बिताया और धीरे-धीरे बाजार हिस्सेदारी हासिल की। इसलिए जब ग्राहकों को डिजिटल बनाने जैसे उथलपुथल मचाने वाले अवसर आए तो घरेलू बैंकों की तैयारी बेहतर थी।
इसी प्रकार जब कोविड के बाद शेयर बाजार ने गति पकड़ी तो घरेलू म्युचुअल फंड और ब्रोकरेज फर्म तेजी से विकसित हुए। वित्तीय क्षेत्र में भारतीय कंपनियां स्पष्ट विजेता बनकर उभरीं जबकि विदेशी कंपनियां पिछड़ गईं। ध्यान रहे अन्य क्षेत्रों में ऐसा नहीं हुआ। उदाहरण के लिए विदेशी कंपनियों के व्यक्तिगत उत्पाद बने रहे। उनकी मजबूत उपस्थिति बरकरार है।
Date:09-05-24
तय जिम्मेदारी को निभाएंसंपादकीय
भ्रामक विज्ञापनों की रोकथाम के लिए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि प्रख्यात व सार्वजनिक हस्तियों को जिम्मेदार व्यवहार करना चाहिए। अदालत निर्देश दिया कि विज्ञापन जारी करने की अनुमति से पहले केबल टेलीविजन नेटवर्क नियम, 1994 के अनुसार, विज्ञापनदाताओं से स्वघोषणापत्र हासिल किया जाए। इस कानून का नियम 7 विज्ञापन संहिता का प्रावधान करता है। जिसमें कहा गया है कि विज्ञापन देश के कानूनों के अनुरूप बनाए जाने चाहिए। अदालत पतंजलि आयुर्वेद लिमिटेड द्वारा भ्रामक विज्ञापनों से जुड़े मामले पर सुनवाई कर रही है। ये विज्ञापन निषिद्ध किए जा चुके हैं। पीठ ने संबद्ध केंद्रीय मंत्रालयों को भी इन भ्रामक विज्ञापनों व केंद्रीय उपभोक्ता संरक्षण प्राधिकरण द्वारा की गई या प्रस्तावित कार्रवाई से अवगत कराने को भी कहा । प्रचार व विज्ञापन उपभोक्ता को प्रभावित करने में महती भूमिका निभाते हैं। उस पर जब यह किसी प्रख्यात या सार्वजनिक शख्सियत द्वारा किया जा रहा हो तो आम जनता को खास तौर पर प्रभावित करता है। इस मामले में तो कोविड टीकाकरण व आधुनिक चिकित्सा प्रणाली को सीधा निशाना बनाया गया था जिस पर इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने याचिका दायर की जिस पर सुनवाई चल रही है। इसमें संदेह नहीं कि लाभ के लोभ में कंपनियां भ्रामक प्रचार द्वारा सालों-साल जनता को बरगलाती रहती हैं। संबंधित मंत्रालय व विभाग इनके प्रति अपनी जिम्मेदारी निभाने से मुंह फेर लेते हैं। निराधार दावों, अतिरंजित बातों, छद्म दावों व अनुचित सूचना वाले तथा असुरक्षित उत्पादों से उपभोक्ताओं को प्रभावित कर रहे तमाम विज्ञापन अभी भी बेधड़क प्रकाशित/प्रचारित हो रहे हैं जो बच्चों के कोमल मन को बुरी तरह प्रभावित कर रहे हैं, युवाओं को दिग्भ्रमित व बुजुर्गों को भ्रमित कर रहे हैं। नियमों की अवहेलना करते हुए नामदार शख्सियत धन के लोभ में इनका बेतहाशा प्रचार करती हैं जिनके आधार पर कहना ज्यादती नहीं होगा कि वे उपभोक्ताओं के अधिकारों को तरजीह देने को राजी नहीं। ऐसा सिर्फ इसीलिए हो रहा है क्योंकि समूची व्यवस्था अपनी जिम्मेदारियों के प्रति घोर लापरवाही बरतती है। बात अकेले पतंजलि की नहीं है। इसे उदाहरण मान कर संबंधित मंत्रालयों व विभागों को सतर्क हो जाना चाहिए न कि एक-एक विज्ञापन को लेकर अदालतों का दरवाजा खटखटाने वालों के इंतजार में बैठे रहना चाहिए।
Date:09-05-24
विमान सेवाओं पर आए दिन मंडराते संकट के बादलसरस चंद्र त्रिपाठी, ( पूर्व मेजर व विमानन विशेषज्ञ )
अभी ज्यादा दिन नहीं बीते हैं, जब विस्तारा एयरलाइन की एक के बाद दूसरी उड़ानें रद्द हो रही थीं। अब एअर इंडिया एक्सप्रेस की 70 से अधिक उड़ानें इसलिए रोकनी पड़ीं, क्योंकि मंगलवार की देर रात से उसके क्रू मेंबर अचानक बीमार हो गए। यह बीमारी दरअसल विरोध जताने का उनका एक तरीका है। वे एअर इंडिया एक्सप्रेस और एअर इंडिया के विलय के खिलाफ हैं। उनका मानना है कि इससे उनके वेतन-भत्ते पर व्यापक असर पड़ सकता है। विस्तारा के साथ भी यही मामला था, एअर इंडिया के साथ उसके विलय को लेकर आपत्तियां हैं। हालांकि, एअर इंडिया एक्सप्रेस ने ऑपरेशनल कारणों से सेवाएं रद्द होने की बात कही है।
असल में, जब से टाटा समूह ने एअर इंडिया को अपने अधीन लिया है, तब से किसी न किसी वजह से यह समूह सुर्खियों में है। ताजा घटनाक्रम में घरेलू ही नहीं, अंतरराष्ट्रीय उड़ानों को भी रद्द करना पड़ा। इस प्रकार जब अचानक उड़ानेें रद्द होती हैं, तो अनेक लोगों की नौकरियों पर बन आ सकती हैं, कुछ लोगों तक जरूरी इलाज नहीं पहुंच सकता है और कुछ मनोरंजन या अपने अन्य उद्देश्यों से दूर हो सकते हैं। यानी, जीवन-मरण के प्रश्नों से लेकर पर्यटन शादी, नौकरी तक के मामले इससे जुड़े हो सकते हैं। यही कारण है कि उड़ानों का रद्द होना निजी ही नहीं, राष्ट्र के लिए भी नुकसानदेह होता है।
संगठनात्मक दृष्टि से टाटा समूह के पास इस समय चार एयरलाइंस हैं, जिनमें एअर इंडिया को उसने भारत सरकार से खरीदा है। इसके अलावा, उसके पास विस्तारा, एअर इंडिया एक्सप्रेस और एयर इंडिया एक्सप्रेस कनेक्ट (एअर एशिया) है। टाटा ने इन चारों सेवाओं के आपस में विलय की योजना बनाई है, लेकिन कर्मचारियों, पायलटों व उनकी यूनियनों के साथ प्रबंधन के टकराव के कारण यह कार्य काफी कठिन होता जा रहा है। इसमें विस्तारा एयरलाइन को प्रीमियम सेवा माना जाता है और उसके कर्मियों का वेतन काफी अच्छा है। जबकि, एअर एशिया की हालत काफी खराब है, इसलिए उसके कर्मियों के वेतन-भत्ते काफी कम हैं। दिक्कत यह है कि जब कंपनियों का विलय होता है, तो तमाम स्तरों पर समानता का प्रयास किया जाता है। टाटा की मुश्किलों की यही जड़ है। जिनको ऊंचा वेतन मिलता है, उनको वेतन-कटौती का डर सता रहा है, इसलिए विरोध की आवाजें उठ रही हैं। विमानन कंपनी और सरकार इस मसले को सुलझाने का प्रयास कर रही हैं, लेकिन ध्यान देने वाली बात यह है कि ऐसे किसी घटनाक्रम में यात्रियों को परेशानी नहीं होनी चाहिए, लेकिन यहां इसके उलट ही हो रहा है। ऐसे में, कोई यात्री आखिर क्या करे? इसके लिए नागरिक उड्डयन महानिदेशक ने कुछ दिशा-निर्देश जारी किए हैं। मसलन, यदि दो घंटे के अंदर यात्री चाहे, तो दूसरी फ्लाइट में अपने गंतव्य के लिए टिकट ले सकता है। इसी तरह, विमानन कंपनी का भी यह फर्ज है कि वह अगली फ्लाइट में यात्री को जगह देने का प्रयास करे। दूसरा, यदि यह संभव नहीं है, तो यात्रियों के लिए भोजन-ठहरने की उचित व्यवस्था करनी चाहिए और किसी दूसरी फ्लाइट से जल्द ही उनको गंतव्य की ओर भेजना चाहिए या पैसे रिफंड का विकल्प उनको देना चाहिए। यदि यात्री रिफंड लेता है, तो उसे दोगुना रिफंड का प्रावधान है, इसलिए अधिकांश विमानन कंपनियां यात्रियों को किसी दूसरे विमान से ही भेजने का प्रयास करती हैं।
ताजा घटनाक्रम बताता है कि भारत में विमानन उद्योग अब भी परिपक्व नहीं हो सका है। ऐसे सामूहिक रूप से बीमार हो जाने के विरुद्ध सरकार को कानून बनाना चाहिए। पायलटों, बैकअप स्टाफ की कम संख्या, सीमित बुनियादी ढांचे आदि के कारण भारत की ज्यादातर बड़ी विमानन कंपनियां तनाव में काम कर रही हैं, जिस कारण उड़ानों के अचानक रद्द होने या उनमें अघोषित देरी जैसी समस्याओं से यात्री जूझते रहते हैं। यह स्थिति तब और गंभीर नजर आती है, जब आंकड़े बताते हैं कि देश की शीर्ष पांच विमानन कंपनियों में से चार हर साल करोड़ों रुपये का घाटा सह रही हैं। इसका अर्थ है कि पूरे विमानन उद्योग में ही व्यापक सुधार की तरफ हमें बढ़ना होगा। उड्डयन क्षेत्र में विश्व स्तरीय परवाज के लिए भारत को अब कठोर कदम उठाने ही होंगे।
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जांच के दौरान जोर इस बात पर दिया जाना चाहिए कि जांच की विधियां बेहतर परिणाम दे सकें। इसे पूर्वाग्रहित न करें। न्यायालयों को भी न्यायिक रिमांड की अवधि जैसे मुद्दों पर निर्णय लेते समय इन बातों का ध्यान रखना चाहिए।
‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 17 अप्रैल, 2024
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Date:08-05-24
Pack a Punch Before We Get Fab at ChipsTatas set ball rolling in earnest for our BSMPET Editorials
India has moved a step forward in its BSMP — Big Semiconductor Manufacturing Plans — with Tata Electronics test-exporting packaged semiconductor chips. Silicon wafers containing hundreds of computer chips need to be packaged in material that keeps them safe and allows electricity to pass through them. This is the means through which chips communicate with the rest of the computer system. Although not as fundamental as fabricating chips —turning semiconductor material into a usable product before chips can be manufactured — packaging them involves advanced materials research to prevent overheating. Tatas are seeking feedback ahead of upcoming chip packaging capacity in Assam. This is in addition to a fabrication unit they are setting up in Gujarat with Taiwan’s Powerchip Semiconductor Manufacturing Corporation.
Tatas could make up for India’s initial missteps over semiconductor manufacturing. GoI rolled out incentives for chip-making when the need to diversify this concentrated value chain became evident to policymakers globally. The scheme was revised after initial proposals in an effort to broaden the product range, which led to the dissolution of a JV between Foxconn and Vedanta. Subsequently, Micron proposed to set up a chip-testing and packaging unit in Gujarat. Tatas have gone beyond with plans for both fabrication and packaging.
GoI is okay with peripheral development in the domestic semiconductor industry. It gives play to PLIs in the expectation that the scheme will be able to eventually draw in the really big investment in chip manufacturing. It also allows infrastructure to reach levels required for chip fabrication. The Tata project timelines put them ahead in the race with industries seeking resilient chip supply after the chokehold of the pandemic. In the process, it puts India on the map of chip-making nations. Speed is of essence, as countries try to establish domestic manufacturing to break Chinese dominance of the export market. With the direction set right, it’s now one chip off the block at a time.
Date:08-05-24
Plastic solutionPlastic pollution cannot be ended by treaties, without investment in alternativesEditorial
The Global Plastics Treaty, an ambitious initiative involving at least 175 United Nations member nations to eliminate the use of plastics, concluded its fourth round of negotiations recently. The goal is to finalise a legal document by the end of 2024 with timelines by when countries must agree to curb plastic production, eliminate its uses that create wastage, ban certain chemicals used in its production and set targets for recycling. Unfortunately, an agreement is not in sight. There is yet another round of negotiations scheduled in Busan, South Korea this November. The primary hurdles are economic. Oil producing and refining countries such as Saudi Arabia, the United States, Russia, India and Iran are reluctant about hard deadlines to eliminate plastic production. A coalition of African countries, supported by several European nations, is in favour of a year, around 2040, to ensure that a timeline for reduction is in effect. There is also disagreement on whether contentious elements in the treaty should be decided on by a vote or consensus — the latter implying that every country has a veto. India’s opinion, other than being uncomfortable with binding targets, is that a legally binding instrument to end the plastic pollution must also address “… availability, accessibility, affordability of alternatives including cost implications and specifying arrangements… for capacity building and technical assistance, technology transfer, and financial assistance”. This language — and India is not the only proponent — is reminiscent of the principle of ‘common but differentiated responsibility’ enshrined in climate talks. Under this, countries must have a common target but those more privileged must support others and take on stricter targets themselves.
In the year that the plastics treaty was mooted, in 2022, India brought into effect the Plastic Waste Management Amendment Rules (2021) that banned 19 categories of “single-use” plastics. It, however, does not include plastic bottles — even those less than 200 ml — and multi-layered packaging boxes (as in milk cartons). Moreover, even the ban on single-use plastic items is not uniformly enforced nationally, with several outlets continuing to retail these goods. The global distribution of the plastic pollution is unequal with Brazil, China, India and the U.S. responsible for 60% of plastic waste, according to a report by the non-profit EA Earth Action. Much like how transitioning away from fossil fuel invites its own challenges, plastic pollution cannot be ended by merely signing treaties. There needs to be much greater investment in alternative products and making them affordable before realistic targets are decided upon.
Date:08-05-24
An inheritance tax will help reduce inequalityProperty of the elite being bequeathed to descendants implies that the descendants do no work to acquire it. There is no economic reason for it to be a freebie for them.Advait Moharir is an independent researcher and Rajendran Narayanan teaches at Azim Premji University, Bengaluru and is affiliated with LibTech India.
Aremark by Chairman of Indian Overseas Congress Sam Pitroda on implementing an inheritance tax as a tool of wealth redistribution has sparked massive debates. In this article, we present rationale on why high inequality is harmful, and advocate for progressive taxes as a mechanism to reduce inequality.
Primarily, we underscore the need to take a view of citizenship where the poor and the rich can participate equally in democratic decision-making. However, in an unequal society, a handful of dominant individuals can wield a disproportionate amount of power through control of resources. This will likely lead to a few wealthy elites dictating the socioeconomic and political decisions aimed to benefit them at the cost of the majority. The recent electoral bonds scam bears witness to this. The citizenship of wealthy elites would then carry more weight than the majority of the country. This is ethically hazardous.
Why inequality matters
First, inequality harms growth in the medium-to-long run, by hampering firm productivity, reducing labour income, and diverting resources away from rights such as education. Second, in unequal countries, the place of birth holds inordinate power in directing lifetime outcomes. In India, almost a third of the variation in consumption can be explained by the place of residence: the State, and city or village. Third, high inequality is also associated with political polarisation and increased conflict. Fourth, inequality is likely to have a negative multiplier effect on the economy — diminished earnings for the poor lead to reduced consumption and savings and increased indebtedness. This reduces aggregate demand, limits production and investments, and leads to lower growth rates in the future. Using labour bureau data, Jean Drèze and Reetika Khera showed that while real wages of agricultural labourers grew by 6.8% between 2004-2014, they declined by 1.3% in the last decade. Using Periodic Labour Force Survey data, a Bahutva Karnataka report shows that 34% of households earned less than the recommended daily minimum wage of ₹375 in 2022-23. Using Reserve Bank of India data, Zico Dasgupta and Srinivas Raghavendra voice concern about the sharp reduction in household savings and increased debt. In contrast to these, the richest 1% holds 40% of India’s wealth.
Some commentators argue that some inequality during growth is inevitable, and the priority instead should be towards reducing poverty. However, research by Tianyu Fan and co-authors shows that the gains from India’s growth over the last two decades have been skewed towards high-income urban residents. Keeping everything else the same, there is nothing inherently special in the children of the wealthy compared to the children of the poor. The Constitution mandates equality of status and of opportunity. As such the government is obliged to take steps to reduce the disparities arising from accidents of birth.
An inheritance tax
A wealth tax is a recurring tax on all physical and financial assets an individual owns. An inheritance tax differs from a wealth tax in two ways: it is intergenerational and levied once in a lifetime. These taxes are meant to be applied to individuals having high wealth above a threshold. When implemented well, these taxes reduce the concentration of wealth and encourage shifting investments from non-productive to productive activities. Property of the elite being bequeathed to descendants implies that the descendants do no work to acquire it. There is no economic reason for it to be a freebie for them. Some might argue that inheritance tax will disincentivise innovations. But this disregards that innovation is needed to be competitive today and suggests that innovation is solely to propagate dynastic control of resources which is at odds with democratic ideals. On the contrary, revenue generated from inheritance tax can be used to fund a diversified set of innovations. An advanced country like Japan has up to 55% inheritance tax. A variant of the inheritance tax, called estates duty, was levied in India between 1953-1985 but this was abolished owing to administrative costs. However, the economist Rishabh Kumar shows that this was effective in reducing the top 1% personal wealth share from 16% to 6% between 1966 and 1985.
Another approach is the land value tax (LVT): this taxes the rental value of land, without considering the property built on it. This is borne by the landowner and not the tenants. Unlike labour, land is a natural resource and is unresponsive to changes in taxes, making the LVT an efficient source of revenue. Given the role of land ownership in perpetuating feudal caste relations in rural India and the pervasive politician-builder nexus in urban India, LVT can be a useful redistributive mechanism.
Detractors claim that tax evasion among the wealthy makes these taxes impractical. However, recent research by Natasha Sarin (in the U.S.) projects that sufficient investment in improving tax compliance can yield revenue up to 10 times the investment. Nathaniel Hendren and co-authors show that auditing the top 1% and 0.1% generated three to six times the return on investment.
Economists Jayati Ghosh and Prabhat Patnaik demonstrate that a 2% wealth tax and a 33.3% inheritance tax only on the top 1% in India can raise an additional public expenditure of 10% of the GDP. This can be used to ensure a bouquet of socioeconomic rights for the poor like living wages, right to health, employment, and food. Given technological advancements, these are possible if there is political will.
Date:08-05-24
श्रमिक आपूर्ति में भारत का अव्वल होना क्या दर्शाता हैसंपादकीय
वर्ष 2023 में भारत का रेमिटेंस (विदेश में काम करने वाले भारतीयों द्वारा वतन भेजा गया पैसा) दुनिया में सबसे ज्यादा – 125 अरब डॉलर था। यह देश की जीडीपी का 3.4 प्रतिशत था। यह हर साल बढ़ रहा है। यही कारण है कि हाल ही में उत्तर भारत के एक राज्य की सरकारी रिक्रूटमेंट एजेंसी ने एक इश्तिहार के जरिए बाहर के देशों में (जिसमें युद्धरत इजराइल भी था ) दस हजार श्रमिक पदों के लिए आवेदन मांगे हैं। इनमें प्लम्बर से लेकर पेंटर तक, नाई से नारियल तोड़ने वालों तक और बढ़ई से लेकर बाउंसर तक हैं। सिर्फ खाड़ी देश और यूरोप ही नहीं, दुनिया के कुल 193 देशों में भारतीय कामगार सप्लाई हो रहे हैं। हर राज्य आज इस होड़ में है कि उसके श्रमिक भी छोटी-मोटी स्किल हासिल कर विदेश में कमाएं और भारत में अपने परिवार की खुशहाली के लिए पैसा वापस भेजें। लेकिन क्या 70 साल पहले आजाद हुए देश के लिए यह खुशी की बात है ? भारत डेमोग्राफिक डिविडेंड (जनसांख्यिकी लाभांश) काल में है और यह स्थिति अगले दस साल में चरम पर होगी। किसी भी देश के इतिहास में यह स्थिति एक बार ही आती है। संपन्न देश अब बूढ़े हो रहे हैं। क्या हमारे नीति-निर्माताओं को समझ में नहीं आया कि चीन में जब यह स्थिति आई तो उसने श्रमिक सप्लाई में अव्वल बनकर अपनी पीठ थपथपाने की जगह युवाओं को स्किल और उच्च-स्तरीय टेक्नोलॉजी का ज्ञान देकर अपने देश में ही उत्पादन कर दुनिया में बेचने की ओर प्रेरित किया । श्रम बेचकर कमाने और बुद्धि और उसके उत्पाद बेचने में मूल अंतर यह है कि श्रम बेचने की मियाद होती है क्योंकि शरीर थकता है। अगर इस युवा शक्ति को बेहतर स्किल दी जाती तो भारत, चीन से मूर्ति से लेकर मोटर और मोबाइल से लेकर मशीन तक खरीदता नहीं, बल्कि बेचता । इस बारे में सोचने की जरूरत है।
Date:08-05-24
हम अपने यहां विश्वस्तरीय शिक्षा क्यों नहीं दे पाते हैं?निधि डुगर कुंडलिया, ( युवा लेखिका और पत्रकार )
पिछले महीने कई मीडिया-प्रकाशनों ने 2024 की ‘क्वाक्वेरेली साइमंड्स (क्यूएस) वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग बाय सब्जेक्ट’ का जश्न मनाया। यह बहुत प्रतिष्ठित रैंकिंग है। इस बार इसमें 69 भारतीय विश्वविद्यालयों को भी शामिल किया गया है, जो कि 2023 की तुलना में 19.4 फीसदी का सुधार है। भारत अब धीरे-धीरे चीन, अमेरिका और ब्रिटेन के बाद वैश्विक अनुसंधान में चौथा सबसे बड़ा योगदानकर्ता देश भी बन गया है। इसके बावजूद पिछले वर्ष हमारे लगभग 8 लाख छात्रों को विदेशी विश्वविद्यालयों की ओर पलायन करना पड़ा। इसके परिणामस्वरूप 3 अरब डॉलर की भारतीय मुद्रा का आउटफ्लो हुआ है। नौकरियों की किल्लत की बात तो रहने ही दें, लेकिन सरकार भी शिक्षा पर जीडीपी का 6% खर्च करने का वादा करके इसका केवल आधा ही खर्च कर रही है।
शहरों की सीमा से लगे राजमार्गों के दोनों ओर देखें तो आप पाएंगे कि वहां निजी कॉलेज फैले हुए हैं, जिन्हें बड़े व्यापारिक घरानों और राजनीतिक नेतृत्व का संरक्षण प्राप्त है। लेकिन उनमें दी जाने वाली शिक्षा का स्तर श्रेष्ठ नहीं है। देश में शैक्षिक सेवाओं से मुनाफा कमाने को कानूनी रूप से प्रतिबंधित किया गया है, इसके बावजूद वे मुनाफा कमाने के लिए टैक्स-कानूनों को दरकिनार करते हैं। देश के 40,000 से अधिक ऐसे कॉलेज बेरोजगारों की फौज पैदा कर रहे हैं, जो वर्तमान की नॉलेज और टेक्नोलॉजी-केंद्रित अर्थव्यवस्था में सर्वाइव नहीं कर पाते। यहां तक कि उच्च रैंकिंग वाले भारतीय विश्वविद्यालयों में भी अच्छे विद्यार्थी होने का एकमात्र मार्कर उसकी प्रवेश-परीक्षा में उत्तीर्ण होने की क्षमता को ही माना जाता है। प्रशिक्षण कार्यक्रमों, गुणवत्तापूर्ण इंटर्नशिप, रिसर्च को फंडिंग, अंतर-अनुशासनात्मक पाठ्यक्रमों आदि की कमी है। शिक्षकों के लिए सीमित प्रशिक्षण कार्यक्रम हैं। आईआईटी जैसे संस्थानों में भी उच्च शिक्षा का उद्देश्य अपने संभावित नियोक्ताओं के सामने कड़ी मेहनत करने और कठिन प्रवेश परीक्षा पास करने की अपनी क्षमता को प्रदर्शित करना भर ही है।
इन समस्याओं के कमजोर समाधान के रूप में, यूजीसी ने विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए भारतीय कैम्पस के दरवाजे खोल दिए हैं। लेकिन अगर कोई शीर्ष विश्वविद्यालय कहता हो कि हार्वर्ड ने हमारे लिए अपने दरवाजे खोलने का फैसला किया है तो क्या वह अपने संसाधनों के बावजूद उससे मेल कर सकेगा? एक अच्छे विश्वविद्यालय के लिए धन और जगह से ज्यादा एक सोशियो इकोसिस्टम (सामाजिक पारिस्थितिकी तंत्र) की आवश्यकता होती है, ताकि उसके प्रोफेसरों और छात्रों का उनके अनुरूप विकास होता रहे। विभिन्न कॉन्फ्रेंस, सभाएं, थिंक टैंक, सामाजिक मानसिकता और विचारों की स्वतंत्रता से वो फलते-फूलते हैं। समस्या यह है कि परिणाम चाहे कितने भी उत्साहवर्धक क्यों न हों, स्टैनफोर्ड या हार्वर्ड की तर्ज पर बनाया गया कोई भी विश्वविद्यालय अंतरराष्ट्रीय रैंकिंग में उनके सैकड़ों स्थान नीचे की जगह बना पाता है। एक मॉडल की नकल करने के फेर में वो उसकी एक घटिया प्रतिलिपि बनकर रह जाते हैं।
जब हमारे यहां विश्वस्तरीय विश्वविद्यालयों का इतिहास रहा है तो हमें पश्चिम की ओर क्यों देखना चाहिए? नालंदा, विक्रमशिला, जगद्दल, नागार्जुन- इनमें तिब्बत, चीन, कोरिया और मध्य एशिया से भी छात्र यात्रा करके पढ़ने आते थे। उसके बाद विश्वभारती-शांतिनिकेतन, कलकत्ता, इलाहाबाद, मद्रास के विश्वविद्यालयों ने कई प्रतिभाओं को जन्म दिया है, जिनमें नोबेल विजेता भी शामिल हैं। भारतीय विश्वविद्यालयों को अपने समृद्ध इतिहास और शैक्षिक प्रणाली पर ध्यान केंद्रित करते हुए छात्रों के विकास पर फोकस करना चाहिए और वह भी स्थानीय संस्कृति का उत्सव मनाते हुए। हम इंटर-डिसिप्लिनरी रिसर्च प्रस्तुत कर सकते हैं और विदेशी विश्वविद्यालयों, स्टार्टअप और कंपनियों के साथ टाई-अप करके स्किल-सेट की जरूरतों को भी पूरा कर सकते हैं।
Date:08-05-24
आर्टिफिशल इंटेलिजेंस सामाजिक दृष्टि से सहीअजित बालकृष्णन, ( लेखक इंटरनेट उद्यमी हैं )
आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (AI) के कारण रोजगार बाजार में निराशा या उछाल की खबरें हाल के दिनों में काफी सुर्खियों में रही हैं। ऐसी ही एक खबर में देश की एक सबसे बड़ी सॉफ्टवेयर सेवा कंपनी के प्रमुख के हवाले से कहा गया है, ‘एक वर्ष के भीतर देश के कॉल सेंटरों में अधिकांश काम एआई के हवाले होगा।’ कॉल सेंटर उद्योग में करीब तीन लाख से अधिक भारतीय काम करते हैं जिनमें से अधिकांश की उम्र 30 से कम है। इनमें से अधिकांश अविवाहित और कॉलेज जाने वाले युवक-युवतियां शामिल हैं। अगर उनके रोजगार चले जाते हैं तो यह बहुत बड़ी आपदा होगी। इसके बाद गोल्डमैन सैक्स ने एक वक्तव्य जारी करके कहा कि एआई के कारण जल्दी ही 30 करोड़ से अधिक ऐसे रोजगार खत्म हो सकते हैं जो कार्यालयीन प्रकृति के हैं। उसके पश्चात अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के एक ब्लॉग में आधिकारिक तौर पर कहा गया कि जल्दी ही दुनिया भर में 40 फीसदी रोजगार एआई के पास चले जाएंगे।
ऐसी निराशाजनक सुर्खियां देखकर आश्चर्य होता है कि क्या नियोक्ता केवल इसलिए एआई को अपना रहे हैं ताकि वे कर्मचारियों की संख्या कम करके अपना मुनाफा बढ़ा सकें। इस समय एआई को जिस दिशा में विकास के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है, यानी कर्मचारियों की संख्या कम करने के लिए, उस पर मैं सवाल उठा रहा हूं। ऐसा इसलिए कि सोशल कंस्ट्रक्शन ऑफ टेक्नॉलजी (एससीओटी) के रूप में एक नया विचार सामने आ रहा है जो कह रहा है कि तकनीकी नवाचार अपने बल पर संचालित नहीं है बल्कि वह सामाजिक शक्तियों से संचालित है।
आइए इस बात का एक उदाहरण देखते हैं कि कैसे सामाजिक शक्तियों ने साइकल के विकास को आकार दिया। साइकल का आरंभिक संस्करण 1800 के दौर में यूरोप में सामने आया जिसमें पैडल नहीं होते थे। उपयोगकर्ताओं को अपने पैरों को जमीन का सहारा देना पड़ता था जिससे पहिया चलता था। सन 1860 के आसपास साइकिलों के अगले पहिये में पैडल और क्रैंक लगाए गए। इस डिजाइन की वजह से साइकल बहुत उपयोगी बन गई। उसकी गति में भी सुधार हुआ। यह घुड़सवारी का विकल्प बनकर सामने आई। 19वीं सदी के अंत तक पहिए बराबर आकार के कर दिए गए और पैडल को पिछले पहिये से जोड़ने वाली चैन इस्तेमाल की गई जिससे साइकल की स्थिरता बढ़ी और वह आरामदायक हुई। इसे ‘सेफ्टी बाइसिकल’ का नाम दिया गया और यह खूब चर्चित हुई। खासतौर पर महिलाओं के लिए साइकल चलाना आधुनिकता का प्रतीक बन गया। इसके जरिये वे काम पर जा सकती थीं। इसके बाद अमेरिकी सेना ने अपनी घुड़सवार रेजिमेंट की जगह साइकल वाली रेजिमेंट तैनात कर दी। उसके बाद 20वीं सदी में न्यूमैटिक टायर, एल्युमीनियम और बेहतर ब्रेक आदि ने वह साइकल बनाई जिस पर हम आज चलते हैं। स्वास्थ्य को लेकर जागरूकता ने साइकल के इस्तेमाल को और व्यापक बनाया। आज साइकल को एक स्वच्छ और पर्यावरण के अनुकूल साधन माना जाता है। साइकल के विकास के इस अध्ययन को देखते हुए ही कई विद्वान एससीओटी आंदोलन के अंतर्गत साथ आए और यह देखना शुरू किया कि विभिन्न तकनीकें सामाजिक शक्तियों को किस प्रकार प्रभावित करती हैं। इन प्रयासों को लेकर ‘द सोशल कंस्ट्रक्शन ऑफ टेक्नॉलाजिकल सिस्टम्स’ नामक एक पुस्तक भी लिखी गई है।
हाल के दिनों में चैटजीपीटी और उसके जैसी अन्य एआई तकनीक को लेकर काफी उत्साह है कि उनमें जादुई गुणधर्म हैं। हालांकि चैटजीपीटी के जवाब बेहतर विनम्रता से भरे हुए हैं। उदाहरण के लिए मैंने गत सप्ताह उससे प्रश्न किया, ‘पाइथन का नवीनतम संस्करण कौन सा है?’ इसके जवाब में चैटजीपीटी ने कहा, ‘जनवरी 2022 के मेरे ताजा अपडेट के मुताबिक पाइथन का नवीनतम स्थिर संस्करण था 3.10। बहरहाल तब से शायद नए संस्करण भी जारी किए गए हों। आप पाइथन की आधिकारिक वेबसाइट पर या पाइथन पैकेज इंडेक्स पर ताजा संस्करण की जानकारी पा सकते हैं।’ हम जानते हैं कि चैटजीपीटी की जानकारियां उसके नवीनतम अपडेट पर निर्भर करती है और यह भी यह एक खोज इंजन है। चैट जीपीटी और उसके जैसे अन्य उपायों मसलन गूगल के जेमिनी आदि को तैयार करने वालों ने इंसानी बातचीत से इनपुट लेकर बहुत महत्त्वपूर्ण काम किया है। वे मित्रतापूर्ण बातचीत के लहजे में ही जवाब भी देते हैं। जाहिर सी बात है कि बातचीत का यही दोस्ताना तरीका इनके जवाबों को ‘आर्टिफिशल इंटेलिजेंस’ के रूप में स्वीकार करने देता है। दूसरे शब्दों में कहें तो इन्हें तैयार करने वाले प्रोग्रामर जानबूझकर अपनी सॉफ्टवेयर सेवा को ‘सामाजिक रूप से तैयार’ करते हैं ताकि बातचीत की शैली उन्हें मानवीय स्वरूप प्रदान करे। यह 1970 के दशक के ‘पंच्ड कार्ड’ और फिर भारी-भरकम ‘की बोर्ड’ और माउस से होता हुआ टच स्क्रीन तक का सफर है। इसके बाद कीबोर्ड और माउस की जगह वॉइस इनपुट और वाइस आउटपुट लेने लगे। अब हमारे सामने यह विषय आता है कि हमें एआई को किस दिशा में विकसित करना चाहिए: लिपिकीय या अफसरशाही श्रम को प्रतिस्थापित करने के लिए जैसा कि पिछले दशकों में कंप्यूटर ने किया था या फिर कारोबार के लिए वास्तविक मूल्यवर्द्धन किया जाना चाहिए? जब एमेजॉन के संस्थापक और प्रमुख जेफ बेजोस से हाल ही में यह सवाल पूछा गया (वह एआई के लिए मशीन लर्निंग शब्द इस्तेमाल करते हैं) तो उनका जवाब था, ‘मैं कहूंगा कि हम मशीन लर्निंग से जो कुछ हासिल कर रहे हैं उसका बड़ा हिस्सा सतह के नीचे है। इसमें खोज परिणामों में सुधार, उपभोक्ताओं को उत्पादों की बेहतर अनुशंसा, इन्वेंटरी प्रबंधन के लिए बेहतर पूर्वानुमान आदि शामिल हैं।’ इसके कारण ही एमेजॉन लगातार तरक्की कर रहा है और उसके कर्मचारियों की संख्या भी घटी नहीं बल्कि बढ़ी है।
शायद हमारे सरकारी अधिकारियों को सामाजिक दृष्टि से सही एआई या मशीन लर्निंग उपकरण तैयार करने के लिए कारोबारों को उसी तरह की चेतावनी जारी करनी चाहिए जैसी अमेरिका के फेडरल ट्रेड कमीशन ने हाल ही में किया। उसने पूछा, ‘क्या आप अपने एआई उत्पादों की क्षमता को बढ़ाचढ़ाकर पेश कर रहे हैं?’ आयोग ने कारोबारों को चेतावनी देते हुए कहा कि ऐसे दावे भ्रामक साबित होंगे अगर उनके साथ वैज्ञानिक प्रमाण न हों। कंपनियों को भी इस बात के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है कि वे एआई को उच्च उत्पाद लागत या श्रम संबंधी निर्णयों के लिए उचित ठहराया जाए। यह भी कहा जा रहा है कि उत्पादों को जनता के लिए पेश करने के पहले समुचित जोखिम आकलन की सावधानी बरती जाए।
Date:08-05-24
‘नेटवर्क स्टेट’ समुदाय की परिकल्पनादेवांशु दत्ता
नागरिक समाज के कार्यकर्ता अक्सर गेटेड कम्युनिटी (चहारदीवारी वाली रिहायशी कॉलोनी) को लेकर शिकायत करते हैं। इन कम्युनिटी के रहवासी आसपास के अन्य बाशिंदों से अलग रहते हैं और अपने लिए ऐसा बुनियादी ढांचा और सुविधाएं जुटाते हैं जो आसपास के लोगों को उपलब्ध नहीं होतीं। इनमें जिम, स्विमिंग पूल, टेनिस कोर्ट, स्क्वैश कोर्ट आदि हो सकते हैं। इसके अलावा उन्हें 24 घंटे सुरक्षा, पानी, बिजली और इंटरनेट की सुविधा भी मिलती है। गुरुग्राम जैसे इलाकों में बहुत विडंबनापूर्ण स्थिति बन चुकी है जहां अमेरिकी शैली वाली रिहायशी कॉलोनियों के बाहर सड़क पर भैंस का दूध निकाल कर बेचते देखा जा सकता है। इन कॉलोनियों का मतदान का प्रतिशत भी कम होता है। एक बार जब आप अपनी बिजली, पानी और सुरक्षा की व्यवस्था कर लेते हैं तो आपको स्थानीय प्रशासन से ज्यादा लेनादेना नहीं होता। अगर आप बहुराष्ट्रीय कंपनियों (MNCs) में काम करते हैं तो आप राष्ट्रीय राजनीति से भी दूरी बरत सकते हैं। एक तार्किक कदम बढ़ाएं तो अलग होकर विकेंद्रीकृत राज्य के नागरिक क्यों नहीं बन जाते? टेक उद्योगपति बालाजी श्रीनिवासन ने अपनी पुस्तक ‘द नेटवर्क स्टेट’ में इसी बात की पड़ताल की है। यह एक दिलचस्प वैचारिक प्रयोग है।
उनके शब्दों में ‘एक नेटवर्क स्टेट वास्तव में एक ऐसा समुदाय है जिसमें उच्च सामूहिक कदम उठाने की क्षमता होती है, जो दुनिया भर में क्राउड फंडिंग करता है और पहले से मौजूद राज्यों से कूटनीतिक मान्यता प्राप्त कर लेता है।’ यह ‘ऐसे लोगों का समुदाय होता है जो गणित, क्रिप्टोकरेंसी, स्थायी रूप से समुद्र में रहने वाले, अंतरिक्ष यात्रा करने वाले, तकनीक की मदद से मानवीय क्षमता बढ़ाने वाले, जीवनावधि बढ़ाने वाले और ऐसे विचारों पर काम करने वाले होते हैं जो शुरू में पागलपन लग सकते हैं लेकिन जिन्हें तकनीक की मदद से हासिल किया जा सकता है।’
बालाजी की उम्र 40-50 के बीच में है और वह प्रवासियों की दूसरी पीढ़ी से आते हैं। उन्होंने स्टैनफर्ड विश्वविद्यालय से पीएचडी की है और वह टेक उद्योग में निवेश करते हैं। वह क्रिप्टोकरेंसी प्लेटफॉर्म कॉइनबेस के मुख्य प्रौद्योगिकी अधिकारी रह चुके हैं तथा वेंचर कैपिटल फर्म आंद्रेस्सेन होरोवित्ज में साझेदार रहे हैं। वह कई जानीमानी टेक कंपनियों के साथ उनके शुरुआती दौर में जुड़े रहे हैं और उनका ध्यान स्वास्थ्य से जुड़ी तकनीक एवं क्रिप्टोकरेंसी पर रहा है। वह एक ऐंजल निवेशक भी हैं और इस उद्योग के कई अन्य लोगों की तरह वह भी उदारवादियों के साथ सहानुभूति रखते हैं।
ऐसे कई सामुदायिक रिहाइश वाले इलाके हैं जहां साझा हितों वाले लोग एक साथ रहते हैं। वे बेंगलूरु, गुरुग्राम, वाशी, सिलिकन वैली, डबलिन, ह्यूस्टन आदि टेक केंद्रों के आसपास रहते हैं। वे चाहे जहां भी हों वास्तव में वे ‘नेटवर्क स्टेट के नागरिक’ होते हैं जिनकी आय बहुत अधिक होती है और वे स्थानीय तथा गैर टेक क्षेत्र के लोगों से काफी अलग होते हैं।
बालाजी ने अपनी पुस्तक में ‘गेट के दायरे में रहने वाले समुदाय’ नहीं लिखा है। मैंने उसका इस्तेमाल किया है क्योंकि अक्सर ऐसे लोग इसी तरह की आवासीय व्यवस्था में रहते हैं। वे अक्सर बेहतर बुनियादी ढांचा तैयार करने के लिए अपने ही संसाधन और ज्ञान का इस्तेमाल करते हैं तथा उनके जीवन की गुणवत्ता भी दूसरों से बेहतर होती है। वे एक साथ रहना पसंद करते हैं और वे तकनीक निर्माता तथा उसे जल्दी अपनाने वालों में शामिल होते हैं।
ये समुदाय पूरी तरह नेटवर्क वाले होते हैं और कई एक दूसरे को केवल इसलिए जानते हैं क्योंकि वे एक ही पेशे और सामाजिक दायरे के रहने वाले होते हैं। लिंक्डइन और फेसबुक पर आपको बहुत आसानी से ऐसे कई लाख लोग मिल जाएंगे जो समान विचार रखते हैं। हां यह सही है कि व्यापक सोशल नेटवर्किंग प्लेटफॉर्म के मानकों पर ये लोग खास बड़े समुदाय का हिस्सा नहीं हैं।
इन सभी बंटे हुए लोगों को एक साथ रखने पर आपको एक विकेंद्रीकृत नेटवर्क स्टेट मिल जाएगा। यह नेटवर्क स्टेट आसानी से दस लाख से बहुत अधिक संख्या वाले लोगों का हो सकता है क्योंकि माना जा सकता है कि उच्च तकनीक क्षेत्र में काम करने वाले कई लोग इसके नागरिक बनने में रुचि रख सकते हैं। राष्ट्र राज्य के मानक के आधार पर देखें तो यह अच्छी खासी तादाद है। संयुक्त राष्ट्र के सदस्य देशों में करीब 20 फीसदी ऐसे हैं जिनकी आबादी 10 लाख से कम है। दुनिया के आधे से अधिक देशों की आबादी एक करोड़ से कम है।
बालाजी संकेत करते हैं कि इंटरनेट हमें दुनिया भर में अबाध ढंग से नेटवर्क बनाने की इजाजत देता है और इसकी मदद से दिल्ली के हजारों अपार्टमेंट्स को कैलिफोर्निया के किसी इलाके के सैकड़ों घरों से जोड़ा जा सकता है। क्लाउड की मदद से हर जरूरी चीज के लिए तालमेल भी बनाया जा सकता है।
चूंकि सभी नागरिक उच्च आय वाले, समझदार लोग होते हैं इसलिए वे साझा संसाधनों के लिए क्राउडफंडिंग कर सकते हैं। बालाजी सुझाते हैं कि नेटवर्क राज्य को एक स्टार्ट अप के रूप में पेश किया जा सकता है। वह लाइव ऐक्शन रियल प्लेयर गेम (एलएआरपी) का उदाहरण देते हैं। जैसे-जैसे इसका आकार बढ़ता है यह मौजूदा राज्यों से कूटनीतिक मान्यता भी प्राप्त कर सकता है। इसके लिए दोहरी नागरिकता जैसी व्यवस्था अपनाई जा सकती है।
क्या यह ऐसा रास्ता हो सकता है जिसके जरिये 21वीं सदी के राष्ट्र राज्य विकसित हों, जो अपने वर्तमान अधिनायकवादी और धार्मिक तथा विविध प्रकार के लोकतंत्रों के मिश्रण से आगे बढ़कर एक विकेंद्रीकृत जगह बन सकें जो साझा हितों से आबद्ध हों? सरसरी तौर पर आसान नजर आने वाली इस व्यवस्था के गहराई में जाने पर कई जटिलताएं सामने आ सकती हैं।
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नकारात्मक वोट – उच्चतम न्यायालय के ऐतिहासिक चुनाव सुधार फैसलों में से एक 2013 में आया था। पीयूसीएल बनाम भारत संघ संबंधी निर्णय में नोटा (नन ऑफ द अबव) को मान्यता दी गई। इस निर्णय का उद्देश्य दो क्षेत्रों में बदलाव लाने के लिए नोटा का इस्तेमाल करना था। (1) मतपत्र पर विकल्पों से नाखुश मतदाता अभी भी मतदान करने और संदेश भेजने के लिए प्रेरित हो सकते हैं। (2) यह बदले में राजनीतिक दलों को उम्मीदवारों के चयन में सुधार करने के लिए प्रेरित कर सकता है। ज्ञातव्य हो कि 2019 के लोकसभा चुनावों में सूरत में नोटा तीसरे स्थान पर रहा था।
आधा-अधूरा सुधार – चुनाव आयोग ने नोटा को मतपत्र मे जोड़ तो दिया था, लेकिन यह नोटा की केवल प्रतीकात्मक उपस्थिति थी।
राज्यों ने रास्ता दिखाया – कुछ राज्य चुनाव आयोगों ने उच्चतम न्यायालय की 2013 की भावना को पहचानते हुए नोटा को एक ‘काल्पनिक उम्मीद्वार‘ माना। और अगर नोटा जीतता है, तो चुनाव फिर से कराने का नियम बनाया गया। महाराष्ट्र, हरियाणा और दिल्ली के चुनाव आयोग ने 2018 से नोटा को महत्व देकर न्यायालय के निर्णय की पूरी रक्षा की है।
संकेत मायने रखते हैं – नोटा को राजनीतिक दलों ने अच्छी तरह से स्वीकार नहीं किया है। नोटा के कारण वोट बंट जाते हैं, जिसमे पहले और दूसरे स्थान पर रहने वाले उम्मीदवारों के बीच वोटों का अंतर बढ़ जाता है।
नकारात्मक वोट हितधारकों के लिए एक शक्तिशाली शस्त्र है। इसके माध्यम से मतदाता उम्मीद्वारों के प्रति अपनी निराशा व्यक्त करने का प्रयास कर सकते हैं। यह बदलाव का आह्वान है।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 24 अप्रैल, 2024
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Date:07-05-24
Why U’khand BurnsThe Himalayan state has emerged as India’s most ecologically fragile. We’re to blame.TOI Editorials
Last five years have seen a dangerous rise in forest fires across Uttarakhand’s central Himalayas, from Nov to June. Northeast states, once most prone to long-ranging forest fires, pale in comparison to the inferno Uttarakhand finds itself in with increasing intensity and longer duration. Even winter fires have increased manifold in both frequency and intensity. In fact, Uttarakhand inaugurated its New Year with a fire raging in the forest behind Nainital, thick smoke billowing on the horizon, haze over Naini Lake.
Missing the trees | There is heightened global concern over the sharp uptick in forest fires in this Himalayan region, stretching across Uttarakhand and Nepal. The impact is evident – loss of life, belching carbon emissions, shrinking forest area, loss of habitat and entire microbial ecosystems and biodiversity burnt to cinders. The smoke that travels impacts the health of people over a very large area. Tourism takes a body-blow, and the crippling impact on the state economy and its resources. Dry extreme warming, heatwaves that are the new normal, and human activity – the what and how of forest fires are well documented.
Fanning the flames | The core question is why Uttarakhand, where forest fires were never a hazard, reached this point. Forests were onceover 50% of Uttarakhand’s land cover. Swathes of forest area have been sacrificed at the altar of development, much of which has not been judiciously planned or designed. It is long established that deforestation contributes to increased risk of fire, fragmented forest cover is also a fire risk. Reducing tree cover and ground vegetation dries out forests. In turn, fire-damaged forests are weakened, and deforestation often follows. Post-mortems of forest fires by authorities can only douse the flames but cannot put out the real fire – callous human activity despite the evidence of severe warming and extreme weather events. That’s what Uttarakhand govt must acknowledge.
Date:07-05-24
Neo-Orientalism and Its DiscontentsRightly calling out Occidental double standards.ET Editorials
Orientalism is alive and kicking. This was one of the key takeaways from S Jaishankar’s interaction with this paper last week, where he also reminded us that tackling neo-Orientalism isn’t about India getting prickly, but the need for the world to engage with, and understand, India’s PoV. This applies for the world, but clarity must begin at home. Which it has. The foreign minister’s take on a post-Western monopolistic narrative was an argument for India’s own voice to be heard — no longer via ventriloquists — by world powers, which themselves have changed in the post-Cold War landscape. Jaishankar called out something that was known, but spoken only sotto voce earlier — that ‘there are self-proclaimed people with different interests’ and what the West preaches, practises, its agenda, its objectivity ‘or lack of it’ must be factored in.
Gone are the days when a handful of countries emerging victorious out of a world war fog defined what was geopolitically and geoculturally kosher and what wasn’t. The multipolar world that India advocates isn’t the 19th-century version of ceaseless geopolitical competition, but one in which countries like itself are not just seen but also heard. Neither does India share China’s hegemonic world view where anti-Westernism is a neurosis suited up as foreign policy. India is the world’s fifth-largest economy, home to a sixth of humanity’s population. It is also a microcosm of aworld encompassing both rich G7 countries as well as least developed nations. This gives India the moral (read: political) heft and prerogative to push back against double standards — whether as depicted by sections of Western media or voices representing states. What’s sauce for the Western goose should be sauce for the Indian gander.
There is much to be said for Mary Lathrap’s call to ‘judge softly’, and to ‘walk a mile in his moccasins/ Before you abuse, criticise and accuse’. But it is also important to come across as not being hypersensitive to critique. Mature democracies respond with reasoned argument, not in fits of piques or knee-jerk sulks.
Date:07-05-24
India’s press freedom has rapidly declined in recent yearsAccording to the press freedom index, India is currently ranked 159 out of the 180 nations analysed.THE HINDU DATA TEAM, [ With inputs from AFP and Reuters. ]
India is ranked 159 out of the 180 nations considered in the 2024 edition of the press freedom index, published by the organisation Reporters Without Borders. While this is a marginal improvement from last year, India’s performance in the recent past has been consistently poor.
Chart 1 shows India’s ranking in the press freedom index over the years. It is important to note that India has been ranked over 100 since 2003, which means that press freedom has been poor for a very long time. However, press freedom has eroded rapidly in recent years, with India being ranked 161 out of 180 nations last year, the lowest ever for the country. In the 2024 index, its ranking improved by two places to 159.
According to the index, press freedom in India is currently comparable to that of the occupied Palestinian territories; the UAE, an absolute monarchy; Turkey, a flawed democracy; and Russia, an authoritarian regime.
Table 2 shows the 2024 press freedom rankings of select countries. This year too, the Scandinavian countries — Norway, Denmark, and Sweden — were the best performers, while Eritrea, Syria, and Afghanistan were the worst. Among the BRICS countries (the old list), Brazil and South Africa enjoy greater press freedom than India, whereas China and Russia are ranked lower. Among South Asian nations, except Bangladesh, all the other countries rank better than India in the latest list.
While India’s press freedom has eroded in recent years, the slide has been steeper in many other countries. But many countries have shown a record increase too. Table 3 lists the biggest losers and gainers in the press freedom rankings of 2024, compared with 2019. Bhutan was ranked 80 in 2019 and slid to 147 in 2024, showing the biggest decline. Hong Kong and Afghanistan followed. On the other hand, the Central African Republic, Timor-Leste, and Montenegro recorded the biggest increases.
Italy and Argentina, which belong to the set of countries where press freedom rankings have dropped in the last five years, were discussed in detail in the report. Argentinian President Javier Milei’s decision to shut the public press agency Telam is a “worrisome symbolic act,” the report says. In Italy, a member of Prime Minister Giorgia Meloni’s coalition government is trying to acquire news agency AGI. Despite improvements in its score, Greece has been criticised over its continued failure to deal with a scandal around wiretapping journalists by the intelligence service and the murder of veteran crime reporter Giorgos Karaivaz in 2021.
Notably, the Wall Street Journal has announced that it will shift its Asia headquarters from Hong Kong to Singapore, in a letter sent to staff and seen by AFP. The U.S. newspaper said its decision comes after other foreign firms have reconsidered their operations in the financial hub. Hong Kong authorities this year introduced a new national security law, which critics say expanded the city’s powers to prosecute dissidents and was scaring away foreign businesses. This law expands on a national security law implemented by China in 2020 to quell the huge and sometimes violent pro-democracy protests that swept Hong Kong in 2019.
In Israel, Al Jazeera went off air on Sunday after the Benjamin Netanyahu government shut it down following a long-running feud. The Qatar-based channel decried the move as “criminal”. Israel’s press enjoys less freedom in 2024 compared to 2019: the country’s ranking dropped to 101 from 88.
Date:07-05-24
लाइलाज हुई दलबदल की बीमारीराज कुमार सिंह, ( लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं )
पता नहीं सत्ता-स्वार्थ केंद्रित वर्तमान राजनीति में पूर्व उपराष्ट्रपति एम. वेंकैया नायडू की आवाज सुनी जाएगी या नहीं। हाल में उन्होंने दो बड़ी राजनीतिक विकृतियों की ओर ध्यान दिलाया। पहली, दलबदल और दूसरी, रेवड़ियों की राजनीति। यहां दलबदल की पड़ताल करते हैं। लोकतंत्र में अपेक्षा की जाती है कि नीति, सिद्धांत और कार्यक्रम यानी विचारधारा के आधार पर दल बनें और उसी आधार पर लोग उनसे जुड़ें भी, मगर क्या ऐसा हो रहा है? जैसा कि नायडू ने कहा कि लोग अक्सर दल बदलते हैं, सुबह एक दल में होते हैं तो शाम को दूसरे दल में। वे अपने नेता की आलोचना करते हैं, उनमें से कुछ टिकट के इच्छुक होते हैं। नायडू की टिप्पणी अतिरंजित लग सकती है, किंतु ऐसे उदाहरण तो हैं। हरियाणा के दशकों पुराने आयाराम-गयाराम प्रकरण के बाद भी ऐसे उदाहरण मिल जाएंगे। नायडू असल में उस पीढ़ी के नेता हैं, जिसमें राजनीतिक मर्यादा के दर्शन होते थे। इसीलिए वह दलबदल कानून की मजबूती की सलाह देकर अपेक्षा करते हैं कि दलबदल करने वालों को सांसद-विधायक पद भी त्याग देने चाहिए। दलबदल भले सांसद-विधायक या अन्य नेता करते हों, मगर वह पार्टी आलाकमान की सहमति एवं सहयोग के बिना नहीं होता। तब आप दलबदल कानून को मजबूत बनाने की उम्मीद और पद त्याग जैसी नैतिकता की अपेक्षा किससे कर रहे हैं? दलबदल को प्रोत्साहन देने वालों से या विधायी सदनों में पहुंचने वाले दलबदलुओं से?
दलबदल की बीमारी नई नहीं है, लेकिन पिछले कुछ दशकों में यह नासूर बन गई है। चुनाव से पहले तो यह खेल इतने बड़े स्तर पर खेला जाता है कि आम नागरिक के लिए हिसाब रख पाना भी मुश्किल हो जाए कि कौन-कौन कहां से कहां चला गया। राजस्थान की चूरू सीट से निवर्तमान सांसद राहुल कस्वां इसलिए कांग्रेस के टिकट पर चुनाव लड़ रहे हैं, क्योंकि भाजपा ने इस बार उनके बजाय पैरालंपियन देवेंद्र झांझड़िया को टिकट दे दिया। ऐसी और भी तमाम मिसालें हैं। किसी को टिकट देने या किसी का टिकट काटने के कारण सार्वजनिक रूप से बताने की स्वस्थ परंपरा देश में नहीं है। जब दलों में आंतरिक लोकतंत्र ही संदेह के घेरे में हो, तब ऐसी आदर्श परंपराओं की अपेक्षा भी तर्कसम्मत नहीं लगती, लेकिन टिकट न मिलने पर धुर वैचारिक विरोधी दल से चुनाव लड़ना राजनीतिक महत्वाकांक्षा और अवसरवादिता के अलावा क्या कहा जा सकता है? विडंबना है कि 2024 के लोकसभा चुनाव में भी ऐसे दलबदल का यह इकलौता उदाहरण नहीं। बलिदानी सैनिकों की विधवाओं के लिए बनाई गई आदर्श हाउसिंग सोसायटी में घोटालों के चलते अशोक चह्वाण को महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा देना पड़ा था। वही चह्वाण पिछले दिनों कांग्रेस छोड़कर भाजपा में आ गए। वह लोकसभा चुनाव तो नहीं लड़ रहे, लेकिन राज्यसभा सदस्य बना दिए जाने के बाद भाजपा के लिए प्रचार कर रहे हैं। पूर्व केंद्रीय मंत्री मिलिंद देवड़ा और पूर्व सांसद संजय निरुपम ने भी ऐसा ही किया। दोनों लोकसभा टिकट के तलबगार रहे, लेकिन गठबंधन में हुए सीट बंटवारे में उनकी सीटें कांग्रेस को छोड़नी पड़ीं। निरुपम शिवसेना से कांग्रेस में आए थे, लेकिन देवड़ा तो खानदानी कांग्रेसी थे। भाजपा नेता धैर्यशील मोहिते पाटिल का धैर्य भी टिकट न मिलने पर जवाब दे गया और वह शरद पवार की एनसीपी में शामिल हो गये। खनिज संपदा समृद्ध झारखंड राजनीतिक अस्थिरता के लिए कुख्यात है। एक निर्दलीय विधायक के मुख्यमंत्री बन जाने का गजब उदाहरण भी वहीं का है। उसी राज्य में सत्तारूढ़ झारखंड मुक्ति मोर्चा के प्रमुख शिबू सोरेन की बड़ी पुत्रवधू सीता सोरेन भाजपा में शामिल हो गईं। शिबू के छोटे बेटे हेमंत ने कुछ समय पहले ही भ्रष्टाचार के आरोप में गिरफ्तारी से पहले इस्तीफा देकर चम्पाई सोरेन को मुख्यमंत्री बनाया था। सीता का दलबदल सोरेन परिवार में चल रहे सत्ता संघर्ष का नतीजा है। इसका वैचारिक राजनीति से कुछ भी लेना-देना नहीं। सत्ता के लिए परिवार छोड़ने वाले क्या किसी दल के सगे हो सकते हैं?
भाजपा से कांग्रेस में आए नवजोत सिंह सिद्धू की राहुल और प्रियंका गांधी से निकटता के चलते पंजाब में सुनील जाखड़ को प्रदेश अध्यक्ष और कैप्टन अमरिंदर सिंह को मुख्यमंत्री पद से अपमानजनक तरीके से हटना पड़ा। उनकी नाराजगी समझी जा सकती है। दोनों का भाजपा में चले जाना भी समझा जा सकता है। अमरिंदर की सांसद पत्नी परनीत कौर को कांग्रेस ने पहले ही अनुशासनहीनता में निलंबित कर दिया था, लेकिन पंजाब में आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष के नायक रहे दिवंगत कांग्रेसी मुख्यमंत्री बेअंत सिंह के पोते सांसद रवनीत सिंह बिट्टू के अचानक भाजपा में शामिल होने को कैसे समझा जाए? यही सवाल सुशील कुमार रिंकू के मामले में उठता है। मूलत: कांग्रेसी रिंकू जालंधर लोकसभा उपचुनाव आप के टिकट पर जीते थे, मगर अब भाजपा के टिकट पर लड़ रहे हैं। भाजपा पंजाब में इस बार अकेले लोकसभा चुनाव लड़ रही है। शायद इसलिए अन्य दलों से ‘जिताऊ’ उम्मीदवार जुटाने का दबाव हो, जैसा कि 2014 में हरियाणा में नजर आया था। ऐसे में उन निष्ठावान नेताओं-कार्यकर्ताओं का क्या होगा, जो दशकों से पार्टी के झंडे-बैनर उठाते रहे?
मुक्केबाज विजेंदर सिंह का मामला और भी दिलचस्प है। 2019 में कांग्रेस के टिकट पर दक्षिण दिल्ली से लोकसभा चुनाव हारे विजेंदर राहुल गांधी के ट्वीट (पोस्ट) को रिट्वीट (रीपोस्ट) कर सोए और अगले दिन भाजपा में शामिल हो गए। उत्तर प्रदेश में पिछले लोकसभा चुनाव में सपा से गठबंधन में बसपा के जो दस सांसद जीते थे, उनमें से ज्यादातर ने इस बार नया ठिकाना खोजा है। उन्हीं में से भाजपा में शामिल हुए रितेश पांडे को ठीक चुनाव से पहले अहसास हुआ कि बसपा में उन्हें नजरअंदाज किया जा रहा। ऐसे अंतहीन उदाहरण राजनीति में नैतिक मूल्यों के पतन पर शाब्दिक चिंता जताने वाले दलों और नेताओं को कठघरे में खड़ा करते हैं। ऐसे में दलबदल पर अंकुश की उन्हीं से अपेक्षा चरम आशावाद और आदर्शवाद लगता है। दलबदल अभी भी हो रहे हैं। यदि चुनाव के अंतिम चरण के प्रत्याशी घोषित होने तक दलबदल का सिलसिला कायम रहे तो हैरानी नहीं। समय आ गया है कि लोकतंत्र का मखौल बनने से बचाने के लिए दलबदलुओं को सबक सिखाना भी जरूरी है। इसका दारोमदार मतदाताओं पर भी है।
Date:07-05-24
सहभागी और सक्रिय अदालतेंसंपादकीय
सर्वोच्च न्यायालय ने आपराधिक मामलों की सुनवाई में अदालतों को सहभागिता-सक्रियता का निर्देश दिया है। कहा है कि अदालतें गवाहों, खास कर गुमराह हुए गवाहों, के बयान दर्ज करने वाला टेप-रिकार्डर भर नहीं हैं। दरअसल, यह पैसिवनेस है, जो दोतरफा मार करती है। पहले तो सरकारी वकील ऐसे गवाहों के प्रति ढीले पड़ जाते हैं। वे उससे जरूरी सवाल भी नहीं करते जिनसे कि उसके मुकरने की सटीक वजह मालूम होती। कोई भी आपराधिक मुकदमा गुमराह गवाहों की बदौलत जीता जाता है। इसमें सरकारी वकील, जो अभियोजन पक्ष के होते हैं, वे अपने पैने सवालों से सच उगलवा सकते हैं, पर वे इन सवालों को जानबूझ कर टाल जाते हैं। उनका यह कतराना भी बिका हुआ होता है, जबकि उन्हें सरकार से मोटी पगार मिलती है। इस स्थिति में बदलाव के लिए सरकारी वकीलों के पदों को वकील की राजनीतिक निष्ठा के आधार पर नहीं, उसकी पेशेवर सक्षमता के अनुसार भरा जाना चाहिए। योग्यता और नैतिक निष्ठा सबसे जरूरी आस्पेक्ट है। गलत और अक्षम वकीलों के चयन से मुकदमा जरूरी स्टेज पर कमजोर होने लगता है। दोषी मुकदमा जीत जाता है। पीड़ित को कभी भरोसा ही नहीं होता कि उसकी सुनवाई निष्पक्ष व पारदर्शी तरीके से होगी, उसे अंतत: न्याय मिलेगा। यहां सबसे बड़ी क्षति न्यायाधीशों की अ-सक्रियता से होती है, जब वे अपनी भूमिका को गवाहों के बयान दर्ज करने तक सीमित कर अ-सहभागी हो जाते हैं। यह दोहरा घाटा है। इससे न्याय के उस प्राथमिक सिद्धांत का खंडन हो जाता है, जिसे सुलभ कराने के लिए न्यायपालिका का गठन हुआ है। इससे बचने के लिए सर्वोच्च न्यायालय अदालतों से गवाहों से जिरही होने की ताकीद करती है ताकि सच का खुलासा हो सके। मुकदमे पर रोशनी पड़े। पीड़ितों को न्याय मिले। यह बिल्कुल वाजिब ताकीद है। प्राय: देखा गया है कि बड़े से बड़ा कांड, यहां तक कि नरसंहार मामलों में भी गवाहों के मुकरने और अदालतों के जिरही न होने से दोषी छूटते रहे हैं। इससे न्याय व्यवस्था की भारी किरकिरी होती रही है। सर्वोच्च न्यायालय के ताजा निर्देश में इस नासूर हो चुकी स्थिति की एक बुनियादी पड़ताल है। अदालतों को सक्रिय होना है। इस अंदाज में कि अपराध का दूसरा पहलू सामने आ सके क्योंकि ‘कोई अपराध आखिर में एक व्यक्ति के विरु द्ध ही नहीं, समाज के विरु द्ध भी होता है।’ क्या यह न्यायिक सक्रियता का आगाज है? नहीं, इसकी अपनी सीमा है पर यह कई बार न्याय व जन हित में लाजिमी है।
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अक्सर हम सुनते हैं कि किसी विशेष मामले पर न्यायालय ने निर्णय ‘सुरक्षित’ रखा है। इसका सही अर्थ क्या है, और इस प्रावधान का उपयोग कितनी ईमानदारी से किया जा रहा है। हाल ही में उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायालधीश की इस प्रावधान पर आई टिप्पणी ने आम जनता का ध्यान इस ओर खींचा है।
कुछ बिंदु –
इस प्रकार से, न्याय प्रक्रिया का यह उपाय, समाधान की जगह समस्या बन गया है। ज्ञातव्य हो कि भारतीय न्यायालयों में मुकदमेबाजी का बड़ा हिस्सा जटिल नहीं है। सामान्य मामलों में न्यायाधीशों को आमतौर पर आगे विचार-विमर्श की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए। फिर भी लगभग पूरी तरह से यह होता जा रहा है। वह भी तब; जब अधीनस्थ न्यायालयों के लिए सिविल प्रक्रिया संहिता ने सामान्य परिस्थितियों में निर्णय सुनाने के लिए एक महीने की समय सीमा, और असाधारण मामलों में दो महीने निर्धारित किए है। आपराधिक मामलों के लिए, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता ने समय सीमा 45 दिन तय की है। एक ऐेतिहाहिसक फैसले में, उच्चतम न्यायलय ने सभी उच्च न्यायालयों पर एक समान समयसीमा लागू की कि निर्णय सुरक्षित रखने के बाद इसे तीन महीने के भीतर सुनाया जाना चाहिए।
कुल मिलाकर यही लगता है कि भारतीय न्यायालयों में समय सीमा कोई मायने नहीं रखती है। अनिवार्य समय सीमाओं के बावजूद न्यायालयों ने इसे निर्देशिका के रूप में व्याख्यायित किया है। मतलब कि वे इसे केवल एक सिफारिश मानते हैं, अनिवार्यता नहीं मानते हैं। न्यायालयों के इस रवैये को देखते हुए मुख्य न्यायाधीश का प्रयास प्रशंसनीय कहा जा सकता है। इस पर आगे भी कदम उठाया जाना चाहिए।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित अर्घ्य सेनगुप्ता और आदित्य प्रसन्ना के लेख पर आधारित। 13 अप्रैल 2024
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Date:06-05-24
Old King Coal Still Chief Power PlayerTransition challenges more political than economicET Editorials
India has averted large power outages during peak summer demand by increasing its reliance on coal-fed electricity-generation capacity. Share of renewables isn’t improving, partly on account of the intermittence of supply from solar and wind energy. Both thermal and renewables face tepid investor interest because of uncertainty over payments by distribution companies. The Centre has had some success in nudging states to bring down indebtedness of their distribution monopolies, but not on a scale to inspire investing confidence by private capital. The new generating capacity coming up is, thus, skewed in favour of public-funded coal-fired plants.
Distribution holds the key to capacity build-up across the electricity value chain. This is the only point in the chain where revenue enters the system, and it remains because political parties use it to price power to their advantage. The immediate bottleneck, of discoms running up huge bills with generating companies that, in turn, was affecting payments to coal suppliers, has been corrected substantially in the past two years partly by some smart persuasion. The way forward would be to break monopolies by allowing multiple distributors to share transmission infrastructure. Here, too, challenges are more political than economic. More work also needs to be done to curb power theft through smart metering.
Tepid investment in power storage from RE sources amplifies the problem of intermittence fosters overdependence on coal. PLIs for domestic battery manufacturing have not delivered substantially, but GoI is pitching hard to foreign investors. Renewables offer India a pathway to reduce its dependence on energy imports, apart from achieving self-imposed emission reduction targets. At this point, however, India will feed its economic growth through energy from all sources, and significant energy transition will be deferred. This comes at a cost in terms of price of energy and climate mitigation. But India’s growth through exports could pass some of this cost to the rest of the world.
Date:06-05-24
समुद्र के लिए गति शक्ति जैसे कार्यक्रम की जरूरतअजय कुमार, ( लेखक भारत के पूर्व रक्षा सचिव और आईआईटी कानपुर के विशिष्ट अतिथि प्राध्यापक हैं )
महासागरों में बहुत व्यापक आर्थिक संभावनाएं हैं जिनका लाभ अभी नहीं उठाया जा सका है। आर्थिक पैमाने पर ये लाखों करोड़ डॉलर तक हो सकती हैं लेकिन इसके बावजूद इनके बहुत सारे हिस्सों के बारे में हम नहीं जानते। न केवल 94 प्रतिशत जीवन समुद्र के भीतर है, बल्कि समुद्र ग्रीनहाउस गैसों के प्रबंधन में भी अहम भूमिका निभाते हैं।
पृथ्वी की सबसे लंबी पर्वत श्रृंखला मिड-ओशन रिज जो करीब 65,000 किलोमीटर लंबी है, वह भी समुद्र के भीतर है। समुद्र के भीतर 30 लाख जहाजों का मलबा पड़ा है जिनमें से प्रत्येक के साथ कहानियों का पूरा जखीरा है। आश्चर्य की बात है कि समुद्र की उतनी भी पड़ताल नहीं हुई है जितनी चांद या मंगल की सतह की।
भारत का समुद्री क्षेत्र उसके भूभाग के ही बराबर है और हमारे 80 फीसदी संसाधन समुद्र में हैं लेकिन देश के सकल घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी (GDP) में उसका योगदान केवल चार फीसदी है।
भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर बढ़ रहा है, ऐसे में जलीय या समुद्री अर्थव्यवस्था में बहुत अवसर छिपे हुए हैं। भारत मछलीपालन, जलीय पर्यटन, नौवहन, तटीय ऊर्जा और खनिज आदि की मदद से लाखों रोजगार और लाखों करोड़ रुपयों का राजस्व जुटा सकता है।
समुद्र में मछली मारने के हिसाब से चीन के पास दुनिया का सबसे बड़ा बेड़ा है और भारत को उसकी बराबरी करनी है। गहरे समुद्र के खनिजों की बात करें तो पॉलिमेटालिक नॉड्यूल्स और दुर्लभ खनिजों सहित वहां असीमित संभावनाएं हैं। बेहतर तकनीक के साथ निकट भविष्य में उनका निरंतर खनन भी आसान होता जाएगा। जो देश समुद्री क्षेत्रों में जल्दी पकड़ बनाएगा वही लंबी अवधि में संसाधनों और क्षेत्र पर काबिज होगा।
समुद्री अर्थव्यवस्था की रणनीति बेहतर जलीय क्षेत्र जागरूकता यानी अंडरवाटर डोमेन अवेयरनेस (यूडीए) पैदा करने पर निर्भर है जिसकी मोटे तौर पर अनदेखी की गई है। इस क्षेत्र को शीत युद्ध के दौरान पहली बार तवज्जो मिली और अमेरिकी नौसेना ने अटलांटिक सागर में एसओएसयूएस जैसे समुद्री सतह वाले हाइड्रोफोन नेटवर्क की स्थापना की ताकि रूसी समुद्री पनडुब्बियों की निगरानी की जा सके।
बहरहाल, तकनीकी उन्नति के साथ यूडीए का आर्थिक महत्त्व भी बढ़ा है। अब पानी के भीतर की जानकारी पानी के भीतर तथा अंतरिक्ष में मौजूद सेंसरों की मदद से निकाली जाती है। अंतरिक्ष स्थित सेंसरों की मदद से मछली मारने वाली नौकाओं को महंगी मछलियों को पहचानने और ज्यादा मछलियों वाले इलाकों में जाने में मदद की जाती है।
भारत को पानी के भीतर काम करने वाली स्वदेशी सेंसर तकनीक विकसित करने को प्राथमिकता देनी चाहिए क्योंकि ये तकनीक बहुत अधिक महंगी हैं और इसलिए उनका आर्थिक उपयोग अव्यावहारिक हो जाता है।
इसके अलावा शीत युद्ध के दौर में उपकरण प्रशांत और अटलांटिक महासागर के कम तापमान वाले इलाकों में कारगर रहता है लेकिन हिंद महासागर जैसे अपेक्षाकृत गर्म इलाके में उनका प्रदर्शन कमजोर पड़ जाता है। यहां उसके आंकड़े 60 फीसदी तक गलत साबित होते हैं।
भारत में अगस्त 2022 में नौसेना के स्प्रिंट कार्यक्रम के तहत 75 आईडेक्स के साथ अच्छी शुरुआत हुई। इसके परिणामस्वरूप देश में पहली बार स्वदेशी तकनीक के नमूने बनाए गए जो पानी के भीतर काम करते हैं। जल के भीतर काम करने वाली प्रणालियों को मजबूत करने के लिए घरेलू चिप विकास क्षमता जरूरी है।
एक डिजाइन आधारित प्रोत्साहन योजना के जरिये ऐसी प्रणालियों के लिए सेंसर विकास को फंड किया जा सकता है और चिप तैयार करने को भी। इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्रालय सरकार की ओर से खरीद की गारंटी के साथ आईडेक्स जैसी प्रणालियों पर विचार कर सकता है।
ऐसी प्रणालियों में बहुत अधिक आंकड़ों के संग्रह और विश्लेषण की आवश्यकता होती है। इनमें ढेर सारी सूचनाएं होती हैं, मिसाल के तौर पर समुद्र में स्थित भौगोलिक आकृतियां, वहां घटित होने वाली घटनाएं आदि।
इसके अलावा नेविगेशन, संचार, तापमान, क्षारीयता जैसे पर्यावरण कारक, पानी की गुणवत्ता और रासायनिक घटक, समुद्री धाराएं, संकेत और पृथ्वी का चुंबकीय क्षेत्र आदि शामिल हैं। केंद्रीय मंत्रालय, संगठन, तटीय राज्य अलग-अलग आंकड़े एकत्रित करते हैं जिससे अलहदा आंकड़े तैयार होते हैं।
यूपीआई और आधार के तर्ज पर एक ओपन एपीआई आधारित ढांचा आंकड़ों की साझेदारी का माध्यम बन सकता है। इसमें स्टार्टअप और विभिन्न संगठनों द्वारा ऐप्लिकेशन विकास मददगार हो सकता है और इस क्षेत्र में आर्टिफिशल इंटेलिजेंस के उपयोग को भी बढ़ावा दिया जा सकता है।
जिस तरह स्थलीय आर्थिक विकास के लिए पीएम गति शक्ति की शुरुआत की गई है, वैसे ही समुद्र के भीतर की आर्थिक संभावनाओं के लिए भी पीएम गति शक्ति की शुरुआत की जा सकती है। यह पहल उपलब्ध आंकड़ों के आधार पर एक व्यापक तस्वीर पेश करेगी और मजबूती और खामियों का पता लगा सकेगी और विभिन्न एजेंसियों के लिए केंद्रीकृत समन्वय प्लेटफॉर्म की तरह काम करेगी।
आर्थिक यूडीए के लिए पीएम गति शक्ति को जीआईएस आधारित प्लेटफॉर्म से विशिष्टीकृत किया जा सकता है। चूंकि तापमान, खारापन, घनत्व आदि हमेशा बदलते रहते हैं इसलिए इस प्लेटफॉर्म का समय वाला पहलू अहम होगा।
सुंदरबन और सर क्रीक जैसे क्षेत्रों में विविध जलीय क्षेत्रों के लिए विशिष्ट समुद्री योजना बनानी होगी। आर्थिक यूडीए के लिए पीएम गति शक्ति को अपनाने से भारत स्मार्ट सिटी के तर्ज पर ‘स्मार्ट समुद्री क्षेत्रों’ का विकास कर सकता है।
इससे तकनीक संपन्न समुद्री योजना बनाने में मदद मिलेगी तथा समुद्री संसाधनों का सुरक्षित और समुचित खनन हो सकेगा। इस दौरान पानी के नीचे प्रदूषण, आर्थिक संसाधनों का प्रबंधन भी संभव होगा। इसके लिए सागर यानी सिक्युरिटी ऐंड ग्रोथ फॉर आल इन द रीजन को एक नए स्तर पर ले जाना होगा और यह भारत को हिंद महासागर क्षेत्र में अव्वल बनाएगा।
आर्थिक यूडीए के लिए गति शक्ति योजना मानव संसाधन नियोजन के लिए भी निर्देशन का काम करेगी। जरूरत इस बात की है कि नीति निर्माताओं, सेना और पुलिस में जागरूकता बढ़ाई जाए। समुद्री शोध केंद्र इस क्षेत्र में एक संसाधन केंद्र बनकर उभरा है। उसकी भूमिका का विस्तार करके तथा उसके साथ एक राष्ट्रीय कार्यक्रम शुरू करके क्षेत्रीय क्षमता विस्तार केंद्र स्थापित किए जा सकते हैं।
समुद्री शोध केंद्र नवाचार के केंद्र के रूप में भी काम कर सकता है और यूडीए केंद्रित स्टार्टअप के विकास में मदद कर सकता है। यूडीए को जहां सुरक्षा के मुद्दे के रूप में देखा गया है वहीं इसमें आर्थिक उत्प्रेरक होने की भी संभावना है।
इसी प्रकार अतीत में इलेक्ट्रॉनिक, अंतरिक्ष और परमाणु ऊर्जा आयोगों जैसी पहल के तर्ज पर आर्थिक यूडीए के लिए गति शक्ति भी भारत को इस क्षेत्र में अग्रणी भूमिका में ला सकती है। यूडीए में यह क्षमता है कि वह भारत की समुद्री विरासत में नई जान फूंके और आर्थिक वृद्धि तथा वैश्विक नेतृत्व का अवसर मुहैया कराए।
Date:06-05-24
नेपाल की जिदसंपादकीय
पड़ोसी देश नेपाल ने पिछले कुछ समय से भारत को लेकर जैसा रवैया अख्तियार किया हुआ है, उससे साफ है कि वह चीन के प्रभाव में कुछ अवांछित फैसले भी कर रहा है। हालांकि उसे यह ध्यान रखना चाहिए कि भारत जैसे पड़ोसी के संप्रभु क्षेत्र में अगर वह दस्तावेजी तौर पर नाहक दखलअंदाजी करने की कोशिश करता है तो वह एक तरह से उकसावे की कार्रवाई है। गौरतलब है कि नेपाल सरकार ने सौ रुपए के नए नोट छापने का फैसला किया है, जिस पर देश का एक नक्शा भी होगा। किसी भी देश का यह अपना फैसला होता है कि वह अपनी मुद्रा पर क्या प्रतीक चिह्न देता है। मगर उसमें अगर किसी पड़ोसी देश की संप्रभुता के अतिक्रमण का संकेत दिखेगा तो यह निश्चित तौर पर आपत्तिजनक है। नेपाल ने सौ रुपए के नोट पर जो नक्शा छापने का फैसला किया है, उसमें लिपुलेख, लिंपियाधुरा और कालापानी इलाके भी शामिल हैं, जबकि ये भारत के सीमा क्षेत्र में हैं। पिछले चौतीस वर्षों से वह भारत के इन तीनों क्षेत्रों को अपना बता कर विवाद को जटिल बनाता रहा है।
भारत के लिए यह तकलीफदेह इसलिए भी है कि सदियों से नेपाल के साथ मधुर रिश्ते रहे हैं। इसी वजह से नेपाल के सबसे विकट समय में भी भारत ने उसका साथ दिया है, हर स्तर पर आगे बढ़ कर मदद पहुंचाई है अफसोस की बात है कि नेपाल भारत के साथ अपने पुराने संबंधों की गरिमा को ताक पर रख कर अब कूटनीतिक संवेदनशीलता का ध्यान रखना भी जरूरी नहीं समझ रहा है। नेपाल की ओर से यह विवाद करीब चार वर्ष पहले भी उठा था, जब उसने देश के नए राजनीतिक और प्रशासनिक नक्शे की मंजूरी के लिए संसद में पेश किया था। सवाल है कि जो इलाके लंबे समय से और आधिकारिक तौर पर भारत का हिस्सा रहे हैं, उन पर दावा जता कर नेपाल क्या हासिल करना चाहता है! अभी तक भारत, नेपाल के इस रुख पर तीखी प्रतिक्रिया देकर शांत रह जाता रहा है मगर अब उसे इस मसले के हल के लिए अपनी ओर से ठोस पहल करने की जरूरत है।
Date:06-05-24
अंतरिक्ष में मुकाबलासंपादकीय
दुनिया में लगभग पांच दशक बाद फिर वैज्ञानिक प्रतिद्वंद्विता साफ दिखने लगी है और दुनिया के ज्यादातर देशों ने समझ लिया है कि वास्तविक तरक्की के लिए वैज्ञानिक कुशलता बहुत जरूरी है। फिलहाल दुनिया में चीन वैज्ञानिक रूप से सबसे तेज तरक्की करता दिख रहा है। चीन ने शुक्रवार को अपनी तरह का पहला मिशन चांग-ई-6 अंतरिक्ष यान लॉन्च कर दिया। यह यान चंद्रमा पर दूसरी तरफ से मिट्टी या नमूने लेकर धरती पर लौटेगा। चीन राष्ट्रीय अंतरिक्ष प्रशासन (सीएनएसए) के लिए यह स्वर्णिम काल है, नाना प्रकार के प्रयोग हो रहे हैं और संयोग भी घटित हो रहे हैं। कुल मिलाकर, चीन अपनी पूरी चेष्टा में दुनिया को यह दिखा पा रहा है कि वह वैज्ञानिक रूप से भी अब दुनिया का अग्रणी देश बनने जा रहा है। चीन अच्छी तरह जानता है कि दुनिया में लंबे समय तक अमेरिकी बादशाहत विज्ञान की बदौलत ही चली है। नया चीनी यान चांद के उस दुर्लभ हिस्से से नमूने लाएगा, जहां से अमेरिका और रूस भी कुछ लाने में कामयाब नहीं हुए हैं। चांद के सामने वाले हिस्से से नमूने लाने का काम अमेरिका, रूस और चीन पहले कर चुके हैं।
चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर एक आधार बनाने की ओर बढ़ता चीन प्रशंसा का हकदार है। यही नहीं, बीते सप्ताह ही चीन ने तियांगोंग अंतरिक्ष स्टेशन के लिए अपने अंतरिक्ष यात्रियों को रवाना किया है। चीनी अंतरिक्ष स्टेशन भी अपने आप में एक बड़ी कामयाबी है। वैज्ञानिकों के बीच अक्सर चर्चा होती है, जब अंतरराष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन से चीन को लाभ मिलना कम हुआ, तब चीन ने अपना अंतरिक्ष स्टेशन बना लिया। बीजिंग के नवीनतम मानव अंतरिक्ष यान मिशन शेनझोउ-18 के माध्यम से तीन अंतरिक्ष यात्री चीनी अंतरिक्ष स्टेशन पर पहुंच गए हैं और वहां पहले से मौजूद अंतरिक्ष यात्री वहां से लौटने वाले हैं। यह रोचक तथ्य है कि अंतरिक्ष स्टेशन पर एक जीवित मछली भी गई है, जिसे चौथा चालक दल सदस्य कहा जा रहा है। इस जेब्राफिश और शैवाल के जरिये परीक्षण किया जा रहा है, ताकि इंसानों को लंबे समय तक अंतरिक्ष में रहने में मदद मिल सके। अमेरिका बहुत हद तक अचंभित है, क्योंकि लगभग हर महीने चीन कुछ न कुछ अंतरिक्ष संबंधी शोध-परीक्षण लेकर सामने आ रहा है। अमेरिका ने बीजिंग के भू-राजनीतिक इरादों पर चिंता जताई है, जिसे नासा के प्रमुख ने एक नई अंतरिक्ष दौड़ या स्पेस रेस कहा है।
चांग-ई-6 का प्रक्षेपण भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) द्वारा अपने अगले चंद्रमा मिशन चंद्रयान-4 की योजना बनाने की चर्चा के बीच हुआ है। चंद्रयान-4 का मकसद भी चंद्रमा से नमूने लाना है। साल 2026 में जब चीन चांग-ई-7 का प्रक्षेपण करेगा, तब चंद्रयान-4 का भी प्रक्षेपण होगा। हालांकि, भारत को किसी भी प्रकार की होड़ में शामिल नहीं होना चाहिए। भारत की अपनी गति है, जिसे बढ़ाने के सतत प्रयास होते रहने चाहिए। योग्यतम भारतीय वैज्ञानिकों को इसरो में ही रुककर काम करना चाहिए। चीन की कामयाबी का राज यह है कि अब उसके योग्यतम वैज्ञानिक देश सेवा में लगे हुए हैं। अमेरिका से जैसी तकनीकी मदद चीन को तीन दशक तक मिली है, वैसी मदद भले अब न मिल रही हो, पर चीन को ज्यादा जरूरत भी नहीं है, तो क्या किया जाए? वैज्ञानिक प्रगति से किसी भी देश को रोका नहीं जा सकता, पर तरक्की करने वाले हर देश को दुनिया और इंसानियत के प्रति जिम्मेदार बनाने के प्रबंध होने चाहिए।
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हाल ही में एक खबर सबने सुनी होगी कि लद्दाख और उसके निवासियों को बचाने की लड़ाई में वहाँ के जलवायु कार्यकर्ता सोनम वांगचुक ने 21 दिन का जलवायु उपवास किया है। उन्हें ऐसा करने की क्या जरूरत पड़ गई? क्योंकि सरकारी नीतियों के कारण आज लद्दाख की पारिस्थितिकी डावाडोल स्थिति में पहुँच गई है।
लद्दाख से जुड़े कुछ तथ्य –
कहर ढाती सरकारी नीतियां –
अपने ही एक्शन प्लान को दरकिनार करती सरकार –
दुखद पक्ष यह है कि पर्यावरण विनाश का खामियाजा क्षेत्र में गरीब निवासियों, प्रवासी श्रमिकों, पर्यटकों और तीर्थयात्रियों को भुगतना पड़ता है। परियोजनाओं को मंजूरी देने वाली सरकारी संस्थाएं उस प्रकोप से बच जाती हैं। जलवायु कार्यकर्ताओं की निराशा इस बात में भी है कि अदालतों का दरवाजा खटखटाने और विशेषज्ञ समितियों के गठन के बावजूद उनकी सिफारिशें धूल खा रही हैं। विकास के नाम पर हम हिमालयी पारिस्थितिकी तंत्र और उसकी जैव विविधता में नाजुक संतुलन को बिगाड़ने का जोखिम नहीं उठा सकते। सोनम वांगचुक की लड़ाई मानवता और उसकी भावी पीढ़ियों की लड़ाई है। हिमालयी क्षेत्र की रक्षा करना हम सबका दायित्व है।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित जानकी मुरली के लेख पर आधरित। 12 अप्रैल, 2024
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रिपोर्ट यह भी कहती है कि ऐसा बड़े व्यवसायों एवं सरकार के बीच सांठगांठ के कारण हो रहा है।
लेकिन हम इस बारे में शायद ही कभी बात करते हैं कि इस आय का लोगों में कैसे वितरण हो।
विश्व बैंक के पूर्व मुख्य अर्थशास्त्री कौशिक बसु के विचारों पर आधारित।
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राजनीति विज्ञान/Political Scienceसंविधान की मुख्य विशेषतायें
Salient features of the Constitution
उद्देशिका, मौलिक अधिकार, राज्य के नीति-निर्देशक तत्व एवं मूल कर्तव्य
Preamble, Fundamental Rights, Directive Principles of State Policy and Fundamental Duties
लोकसभा के चुनाव एवं गठन
Election and formation of Lok Sabha
अनुच्छेद – 243, 142, 200, 105 (2)
Article – 243, 142, 200, 105 (2)
भारतीयों द्वारा विदेशी नागरिकता लिया जाना
Indians taking Foreign Citizenship
मध्यस्थता अधिनियम, 2023
MEDIATION ACT 2023
दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की सरकार (संशोधन) अधिनियम, 2023
Government of National Capital Territory of Delhi (Amendment) Act, 2023
डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम
Digital Personal Data Protection Act
नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023
Nari Shakti Vandan Adhiniyam, 2023
हिन्दू विवाह अधिनियम
Hindu Marriage Act
भारतीय न्याय संहिता, 2023
Indian Justice Code, 2023
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023
Indian Civil Protection Code, 2023
भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023
Indian Evidence Act, 2023
दूरसंचार अधिनियम, 2023
Telecommunications Act, 2023
नागरिकता संशोधन अधिनियम
Citizenship Amendment Act
लैंगिक रूढ़िवादिता से निपटने पर हैंडबुक
Handbook on Combating Gender Stereotypes
नेशनल रिसर्च फाउंडेशन
National Research Foundation
राष्ट्रीय पार्टी
National Party
मणिपुर में हिंसा
Violence in Manipur
58 वां संविधान संशोधन
58th Constitutional Amendment Act
स्टे आर्डर
Stay Order
असहमति का अधिकार
The Right to Dissent
भारत में विदेशी शैक्षणिक कैम्पस
Foreign Educational Campus in India
चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति
Appointment Of Election Commissioners
अंतर्राष्ट्रीय संबंध/International Relationsइज़रायल, नाइजर, सोमालिया
Israel, Niger, Somalia
इथियोपिया, सूडान (कोमोरोस, मोरक्को, लीबिया)
Ethiopia, Sudan (Comoros, Morocco, Libya)
सिडनी
Sydney
नाटो के नये सदस्य
New members of NATO
ट्रुशियल स्टेट्स
Trucial States
नाटो प्लस
NATO Plus
ब्रिक्स के नये सदस्य
New members of BRICS
दक्षिणी अफ्रीकी सीमा शुल्क संघ (एसएसीयू)
South African Customs Union (SACU)
भारत-अमेरिका समझौता
India-America Agreement
भारत-नेपाल समझौता
India-Nepal Agreement
भारत में G20 शिखर सम्मेलन का आयोजन
G20 Summit organized in India
भारत-मध्यपूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारा
India-Middle East-Europe Economic Corridor
फाइव आइज
The Five Eyes (FVEY)
हिन्द प्रशांत आर्थिक फ्रेमवर्क समूह
Indo Pacific Economic Framework Group
भारत-बांग्लादेश समझौता
India-Bangladesh Agreement
बलूचिस्तान
Balochistan
आपरेशन प्रास्पेरिटी गार्डियन
Operation Prosperity Guardian
ऑपरेशन दोस्त
Operation Dost
अर्थशास्त्र/Economicsअन्तरराष्ट्रीय मुद्रा रुपया
International Currency Rupee
वाहन मुद्रा
Vehicle Currency
विश्व व्यापार में भारत
India in the World Trade
प्रतिबंधित खनिजों की सूची में परिवर्तन
Changes in the List of Banned Minerals
प्रधानमंत्री विश्वकर्मा योजना
Pradhan Mantri Vishwakarma Scheme
श्रम बल भागीदारी
Labour Force Participation
सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी (सीएमआईई)
Centre for Monitoring Indian Economy (CMIE)
वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम
Vibrant Village Programme
हरित बॉड
Green Bonds
ग्रामीण भंडारण योजना
Rural Storage Scheme
सिटी इन्वेस्टमेंट टू इनोवेट, इंटीग्रेट एंड सस्टेन (CITIIS)
City Investments to Innovate, Integrate and Sustain (CITIIS)
भारत में विदेशी मुद्रा भेजा जाना
Sending Foreign Currency To India
जॉम्बी स्टार्टअप
Zombie Startup
भारत : विश्व की पाँचवी बड़ी अर्थव्यवस्था
India : World’s fifth largest economy
डॉर्क पैटर्न
Dark Pattern
प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना
Pradhan Mantri Garib Kalyan Yojana
16वां वित्त आयोग
16th Finance Commission
श्री अन्न योजना
Shree Anna Yojana
भारतीय बाजार अनुसंधान संस्थान
Indian Market Research Institute
भूगोल/Geographyसूरजमुखी
Sunflower
दालों का उत्पादन
Production of Pulses
मूंग दाल
Green Gram Beans
चावल निर्यात
Rice Export
समुद्र तट क्षरण
Beach Erosion
कच्चातिवु द्वीप
Kachchatheevu Island
कोलोरोडो नदी
Colorado River
सितवे बंदरगाह
Sittwe Port
लैग्रेंज बिंदु
Lagrange Point
कोझिकोड
Kozhikode
न्यूट्रॉन तारे
Neutron Star
लक्षद्वीप
Lakshadweep
लाल सागर
Red Sea
INS जटायु
INS Jatayu
सलाल हेमाना क्षेत्र (जम्मू-कश्मीर)
Salal Haimana Region (J & K)
पर्यावरण/ Environmentभारत का ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन
India’s Greenhouse Gas Emissions
बाघ अभयारण्य
Tiger Reserve
इंटरनेशनल बिग कैट अलायंस प्रोजेक्ट
International Big Cat Alliance Project
मिष्टी योजना
MISHTI Scheme
कार्बन सीमा समायोजन तंत्र (सीबीएएम)
Carbon Border Adjustment Mechanism (CBAM)
ब्लू जोन
Blue Zone
क्लाइमेट क्विटिंग
Climate Quitting
विज्ञान/Scienceमैनहट्टन परियोजना
Manhattan Project
गुइलेन-बैरे सिंड्रोम (जीबीएस)
Guillain Barre Syndrome (GBS)
गैलियम धातु
Gallium Metal
चन्द्रयान – 3
Chandrayaan-3
सूर्य मिशन आदित्य – L1
Solar Mission Aditya L1
निसार उपग्रह
NISAR Satellite
एक्सपोसैट (एक्स-रे ध्रुवणमापी उपग्रह)
XPoSat (X-ray Polarimeter Satellite)
स्मार्ट लैंडिंग फॉर इन्वेस्टिगेटिंग मून अभियान
Smart Lander for Investigating Moon (SLIM)
पोलरिमीटर
Polarimeter
सिकल सेल
Sickle Cell
विद्युत प्रकाशिकी प्रणाली प्रयोगशाला (लियोस)
Laboratory for Electro-Optics Systems (LEOS)
लेजर-प्रेरित ब्रेकडाउन स्पेक्ट्रोस्कोपी ( एलआईबीएस )
Laser-induced breakdown spectroscopy (LIBS)
डॉर्क नेट
Dark Net
एनवीएस-01
NVS – 01
बैलेचले घोषणापत्र
The Bletchley Declaration
साहित्य, कला और संस्कृति/ Literature, Art & Culture विश्व विरासत सूची
World Heritage List
संगीत का शहर
City of Music
रचनात्मक शहरों का नेटवर्क
Creative Cities Network
श्री राम से संबंधित रचनाएं
Creations Related to Lord Ram
फिल्म ओपेनहाइमर
Movie Oppenheimer
सेंगोल
Sengol
शंकराचार्य
Shankaracharya
लांजिया साओरा चित्रकारी
Lanjia Saura Painting
यशोभूमि (भारत अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन और एक्सपो सेंटर)
YASHOBHOOMI (India International Convention & Expo Centre)
आर्य समाज
Arya Samaj
अन्य/Others‘अनाबियरेबल लाइटनेस ऑफ बीइंग’ पुस्तक
‘The Unbearable Lightness Of Being’ Book
विश्व कुश्ती प्रतियोगिता
World Wrestling Championship
आर प्रज्ञानंद
R Praggnanandhaa
शजर पत्थर
Shajar Stone
कृपाण
Kripan
हांगझू एशियाई खेलHangzhou Asian Games
मत्स्य – 6000
MATSYA-6000
लॉस एंजिल्स ओलम्पिक्स
Los Angeles Olympics
नोबेल पुरस्कार
Nobel Prize
अपार आईडीAPAAR (Automated Permanent Academic Account Registry) ID
मिकी माउस
Mickey Mouse
शिव शक्ति पॉइंट
Shiv Shakti Point
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Watch the video on Important Topics for UPSC IAS Prelims 2024 Exam (Current Affairs)
https://youtu.be/Kgj0AYi3qYs
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Date:04-05-24
Fix the Judicial Supply-Demand GapET Editorials
That India’s judiciary is overwhelmed with cases is wellknown. One of the reasons for delay in dispensing justice is the misalignment between demand and supply of judges. Five high courts — Allahabad, Punjab and Haryana, Gujarat, Bombay, and Calcutta — have reportedly 171 vacancies as of April 1, 2024, accounting for over 52% of total vacancies of 327 posts in 25 high courts. Sanctioned strength of judges across all high courts is 1,114, and 29.4% of positions are vacant. Citizens, especially marginalised, bear the brunt of this shortfall. There are almost 62 lakh cases pending in high courts. This needs rectifying.
There are several reasons for this HR crisis. One, appointment of judges is governed by Article 217 of the Constitution, and the mechanism used for selecting judges is time-consuming. Two, political tussles between the executive and judiciary over names and ‘other’ factors, as exemplified in the Saurabh Kirpal case — a member of the LGBTQ+ community who was recommended for judgeship first in 2017 — is a case in point. Three, Indian judges are underpaid compared to their counterparts in developed countries. Their pay has only increased threefold in the last 65 years. According to the National Judicial Compensation Survey, adjusting for inflation, they actually earn much less than before. So, not many are keen on taking up judgeships.
A robust legal system is vital for promoting good public governance. Therefore, this crisis must be handled with urgency and adroitness. Substantial funding increases for hiring more judges, modernising court facilities and digitising procedures to cut delays in justice delivery must be prioritised.
Date:04-05-24
This is the year to get the SDG goals back on trackSrikumar Chattopadhyay, [ is a retired scientist. ]
The United Nations summit on Sustainable Development Goals (SDG), that was held in New York (September 18-19), assessed progress towards achieving the SDGs. The Agenda-2030, which was adopted by the UN General Assembly in 2015, identified 17 SDGs with 169 specific targets to be achieved by 2030. The programme is internationally non-binding, but all countries have committed to work towards these goals as transiting to sustainable development is a common global endeavour.
Slow progress
Progress, according to available reports, is off track. From 2015 to 2019, there were some improvements, although grossly insufficient to achieve the goals. The outbreak of the COVID-19 pandemic and other global crises have virtually halted progress. Apart from slow progress, and little or no attention towards the goals related to the environment and biodiversity (including responsible consumption and production, climate action, life below water, and life on land), it is a matter of great concern that the current practice of pursuing SDGs defies the integrated and indivisible nature of SDGs. We are far from the overarching target of balancing human well-being and a healthy environment. The present trend, if it continues, will lead to accelerated environmental degradation and the purpose of transiting towards sustainability defeated.
Given this emerging scenario, the UN SDG Report, 2023 identified five key areas for urgent action: Commitment of governments to seven years of accelerated, sustained and transformative actions to deliver on the promises of SDGs; concrete, integrated and targeted government policies and actions to eradicate poverty, reduce inequality and to end the war on nature with a focus on advancing the rights of women and girls and empowering the most vulnerable; strengthening of national and subnational capacity, accountability, and public institutions to deliver accelerated progress; recommitment of the international community to deliver and mobilise resources to assist developing nations, and continued strengthening of the UN development system.
World leaders took cognisance of the situation, reaffirmed their commitments and agreed to step-up efforts to deliver SDGs, our global road map out of the crisis, by 2030. But how far these global pronouncements are operative at the ground level remains a big question.
Results that deserve deliberation
A team of 64 scholars analysed 3,000 studies, mostly peer-reviewed published articles across the world to examine ‘Scientific evidence on the political impact of the sustainable development goals’ within national and global governance to address pressing challenges of poverty eradication, social justice and environmental protection. The results, which were published in the journal, Nature Sustainability, September 2022 issue (under the leadership of Professor Frank Biermann of the Copernicus Institute of Sustainable Development Utrecht University, Utrecht, The Netherlands), deserve wide deliberations, especially in the context of Agenda 2030 implementation.
The authors look at five dimensions: global governance, domestic political systems, the integration and coherence of institutions and policies, the inclusiveness of governance from local to global level, and the protection of ecological integrity. They concluded that ‘the SDGs thus far have had mainly discursive effects but also have led to some isolated normative and institutional reforms.
However, effects are often diffuse, and there is little evidence that goal setting at the global level leads directly to political impacts in national and local politics. Overall, our assessment indicates that although there are some limited effects of the SDGs, they are not a transformative force in and of themselves’.
In this context, another UN report, ‘Future is Now’ (2019), perhaps provides some guidelines for action. It emphasised that ‘The true transformative potential of the 2030 Agenda can be realised through a systemic approach that helps identify, manage trade-offs while maximising co-benefits.’ By co-benefit the stress is on the activities that, while addressing one SDG, will help address others at the same time. The report suggests adopting locally best suited entry points following regional and national priorities and applying four levers — governance, economy and finance, individual and collective action, and science and technology to propel our actions along the entry points.
Actors from these levers must develop partnership and establish novel collaboration to design and rapidly implement integrated pathways to sustainable development corresponding to the specific needs and priorities of the country. This will ultimately contribute to global transformation. In the prologue to this report, Gro Harlem Brundtland, former Prime Minister of Norway and renowned for the famous Brundtland report, ‘Our Common Future”, expressed the hope that politicians and policymakers will take note of the suggestions advanced in this report and steer the world towards sustainable development.
An important year
The year 2024 is an election year across the world. At least 64 countries, both developed and developing, accounting for 49% of world population, will go to the polls. Perhaps, it is important for all the newly elected governments to ponder over the sustainability issue and align their national policies accordingly.
Date:04-05-24
प्लास्टिक प्रदूषण का सामनासंपादकीय
तकरीबन 175 देशों के प्रतिनिधियों के नैरोबी में एकत्रित होने और प्लास्टिक प्रदूषण (Plastic Pollution) से निपटने के लिए कानूनी रूप से प्रभावी पहली संधि करने पर सहमति होने के दो वर्ष बाद भी इस बात की बहुत कम उम्मीद है कि निकट भविष्य में दुनिया इस विषय पर किसी सहमति पर पहुंच सकेगी और प्लास्टिक से पर्यावरण को होने वाले नुकसान को लेकर कोई संधि हो सकेगी।
प्लास्टिक प्रदूषण (Plastic Pollution) को लेकर अंतरसरकारी वार्ता समिति की ओटावा में चौथी बैठक हाल ही में हुई। बहरहाल, आश्चर्य नहीं कि आधी रात के बाद तक बातचीत के बावजूद प्लास्टिक उत्पादन की सीमा तय करने को लेकर कोई साझा सहमति नहीं बन सकी।
अधिकांश देश जहां इस बात पर सहमत थे कि प्लास्टिक उत्पादन के लिए जीवाश्म ईंधन के आरंभिक खनन से लेकर प्लाटिस्क कचरे के अंतिम निपटान तक इसके संपूर्ण जीवनचक्र में प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने की आवश्यकता है लेकिन कुछ देशों ने कहा कि इसके उत्पादन पर कोई सीमा आरोपित करना संभव नहीं प्रतीत होता।
पेट्रोकेमिकल संपन्न देशों और कई औद्योगिक समूहों ने इस प्रस्ताव के खिलाफ लॉबीइंग की। इसके बजाय वे चाहते हैं कि संधि में प्लास्टिक के पुनर्चक्रण और कचरा प्रबंधन पर ध्यान केंद्रित किया जाए।
यह बात सभी जानते हैं कि कचरा प्रबंधन और पुनर्चक्रण पर ध्यान केंद्रित करना भर प्लास्टिक संकट से निपटने के लिए पर्याप्त नहीं होगा। पूरी दुनिया में हर वर्ष 40 करोड़ टन प्लास्टिक कचरा उत्पादित होता है। दुनिया भर में अब तक उत्पन्न सात अरब टन प्लास्टिक कचरे में से 10 फीसदी से भी कम का पुनर्चक्रण हुआ है।
अधिकांश प्लास्टिक कचरा समुद्रों और कचरे के ढेरों में जाता है। प्लास्टिक सिंथेटिक पॉलिमर होता है जिसका जैविक अपघटन नहीं होता है। समस्या यहीं समाप्त नहीं होती है। इसकी उत्पादन प्रक्रिया भी ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन करती है। पॉलिमराइजेशन की प्रक्रिया और उत्सर्जन करती है।
अमेरिका की लॉरेंस बर्कली नैशनल लैबोरेटरी के अनुमानों के मुताबिक 2019 में प्लास्टिक निर्माण के कारण 2.24 गीगाटन ऐसा प्रदूषण हुआ जो धरती का तापमान बढ़ाने वाला है। यह 600 कोयला संचालित ताप बिजली घरों के उत्सर्जन के बराबर है। चार फीसदी वार्षिक वृद्धि के अनुमान के साथ देखें तो 2050 तक प्लास्टिक उत्पादन 5.13 गीगाटन हो जाएगा, भले ही तब तक हम सफलतापूर्वक पावर ग्रिड का अकार्बनीकरण कर चुके हों।
इस संदर्भ में वैश्विक समझौते पर नहीं पहुंच पाना दिखाता है कि कारोबारी और आर्थिक हित संभावित पर्यावरणीय लाभों पर भारी पड़ रहे हैं। दुनिया की सात शीर्ष प्लास्टिक उत्पादन कंपनियां जीवाश्म ईंधन कंपनियां ही हैं। बीते कुछ दशकों में प्लास्टिक को लेकर एक नई चिंता सामने आई है और वह है मानव स्वास्थ्य पर इसका दुष्प्रभाव।
सूक्ष्म और नैनो प्लास्टिक के अंश न केवल इंसानी खून में बल्कि गर्भनाल में भी पाए गए हैं। समुचित निपटान प्रणाली और कचरा संग्रहण तकनीक प्लास्टिक के जलवायु प्रभाव को रोकने या उन्हें मनुष्य के शरीर में पहुंचने से रोकने के लिए अपर्याप्त हैं। ऐसा कचरे के प्लास्टिक बन जाने के बहुत पहले हो जाता है। ऐसे में उत्पादन कम करके ही लंबी अवधि में इस समस्या से निपटा जा सकता है।
सन 2022 में भारत ने प्लास्टिक कचरा प्रबंधन (संशोधन) नियम 2021 लागू किया था जिसके तहत 19 श्रेणियों में एकल इस्तेमाल वाले प्लास्टिक पर प्रतिबंध लगाया गया था हालांकि वे देश में एकल इस्तेमाल वाले कुल प्लास्टिक का केवल 11 फीसदी है। परंतु अब भी उनका इस्तेमाल धड़ल्ले से किया जा रहा है। तमाम स्थानों पर इनकी बिक्री चल रही है।
यह दुर्भाग्य की बात है कि प्लास्टिक की समस्या को लेकर निजी या सार्वजनिक रूप से पर्याप्त फंडिंग नहीं आ रही है। इसके चलते बेहतर लागत वाले विकल्प सामने नहीं आ रहे हैं। फोटो-ऑक्सिडेशन या प्लास्टिक खाने वाले माइक्रोब्स मसलन नेट्रिजिएंस बैक्टीरिया का उत्पादन भी नहीं बढ़ाया जा सका है। फिलहाल बुसान की राह अनिश्चित है जहां वार्ता समिति की पांचवें दौर की बातचीत इस वर्ष के अंत में होनी है।
Date:04-05-24
बुजुर्गों की फिक्रसंपादकीय
हमारे देश में सामान्य तौर पर बुजुर्गों की अहमियत है। सभी अपने घर के बड़े- बूढ़ों का खयाल रखने की कोशिश करते हैं। मगर उनकी सामाजिक सुरक्षा को लेकर अपेक्षित नीतिगत व्यवस्था की कमी रही है। खासकर ढलती उम्र में उनके स्वास्थ्य का खयाल रखने के लिए बीमा जैसी व्यवस्था में भी अभी तक उनके लिए पर्याप्त जगह नहीं रही है। यह बेवजह नहीं है कि बुजुर्गों के लिए स्वास्थ्य बीमा के मामले में भारत एशिया-प्रशांत देशों में सबसे निचले पायदान पर है। ‘एजिंग वेल इन एशिया’ शीर्षक से गुरुवार को जारी एशियाई विकास बैंक की एक रपट में बताया गया है कि भारत को तेजी से बढ़ती आबादी की जरूरतों को पूरा करने और वृद्धि की रफ्तार बनाए रखने के लिए सबको स्वास्थ्य बीमा के दायरे में लाना वक्त का तकाजा है। हालांकि गरीब लोगों को नकदी रहित स्वास्थ्य बीमा देने वाली आयुष्मान भारत जैसी योजना आने के बाद से बुजुर्गों के लिए स्वास्थ्य से संबंधित सुविधाओं का विस्तार हुआ है, लेकिन इस ओर विशेष ध्यान देना समाज और देश के हित में है, क्योंकि अधिक उम्र वाले लोगों की मौजूदगी से मिलने वाला ‘लाभांश’ ज्यादा हो सकता है
दरअसल, बदलती स्थितियों में बुजुर्गों को अपनी सेहत के लिहाज से ज्यादा संसाधनों की जरूरत पड़ती है। परिवार और समाज के अतिरिक्त व्यवस्थागत ढांचे में कुछ ऐसे नियम-कायदे हैं, जिनमें कई बार बुजुर्गों को या तो उपेक्षा झेलनी पड़ती या फिर उन्हें कमतर सुविधाएं मिलती हैं। मसलन, स्वास्थ्य के क्षेत्र में बीमा के मामले में देखें तो ज्यादा उम्र के लोगों के लिए जैसी शर्तें रखी गई हैं, उसमें उनका कोई विशेष लाभ नहीं मिल पाता। जबकि बढ़ती उम्र के साथ सेहत के लिहाज से कई ऐसी स्थितियां पैदा होती हैं, जिनमें उन्हें स्वास्थ्य बीमा की सबसे ज्यादा जरूरत पड़ती है। हालांकि अब बीमा नियामक एवं विकास प्राधिकरण ने बुजुर्गों को भी बीमा खरीदने की सुविधा प्रदान कर दी है। पर स्वास्थ्य बीमा का खर्च कम और उनकी पहुंच में होना चाहिए। इस संदर्भ में देखें तो एशियाई बैंक विकास की ताजा रपट नीतिगत स्तर पर ठोस पहल की जरूरत को रेखांकित करती है।
Date:04-05-24
घातक आत्मग्लानिसंपादकीय
कर्नाटक हाई कोर्ट ने ‘जाओ फांसी लगा लो’ कहने को आत्महत्या के लिए उकसाने की श्रेणी में रखने से मना कर दिया। अदालत आपत्तिजनक बयानों से जुड़े आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले की जटिलताओं को दूर करने के मुद्दे पर विचार कर रही थी। तटीय कर्नाटक के उडुपी में गिरजाघर में पादरी की मौत के सिलसिले में हत्या के लिए उकसाने के आरोपों से जुड़ी याचिका पर अदालत ने यह कहा। आरोप है कि पादरी और याचिकाकर्ता की पत्नी के दरम्यान दैहिक संबंध थे। दोनों के बीच हुई बहस में उसने पादरी को मरने के लिए कहा। एकल जज की पीठ ने सर्वोच्च अदालत के पूर्व निर्णयों के आधार पर कहा सिर्फ बयानों को उकसाने वाला नहीं माना जा सकता। अदालत ने पिता और पादरी होने के बावजूद मानव मन की जटिलताओं का जिक्र करते हुए
मामले को खारिज कर दिया। जिम्मेदार और धार्मिक पद पर होने के बावजूद सामाजिक मूल्यों का अनादर करने वाला शख्स आत्मग्लानि के चलते भी जिंदगी समाप्त कर सकता है। अपने समाज में साल दर साल आत्महत्याओं के मामले बढ़ते जा रहे हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार सिर्फ एक साल (2022) में प्रति दिन 468 लोगों ने अपनी जान ली। खुद की जान लेने वालों में युवाओं की संख्या बढ़ती जा रही है। खासकर सामाजिक पारिवारिक कारणों से लोग खुदकुशी कर लेते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार अपनी जिंदगी से उकता कर, निराश होकर या आवेश में आत्महत्या करने वाले भी मानसिक तौर पर इसके लिए तैयार होते हैं, जिसके संकेत वे लगातार अपने करीबियों, परिवार या मित्रों को देते रहते हैं, जिसकी प्रायः अनदेखी की जाती है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि मानसिक प्रताड़ना, उलाहनों, उत्पीड़न और दोष मढ़े जाने से आजिज आकर भी लोग अपनी जान ले लेते हैं। मगर इस मामले में केवल कहासुनी के दौरान मरने का ताना देना ही काफी नहीं कहा जा सकता। आत्म- गलानि भरे उपासकों के पाप-स्वीकरण सुनने वालों के प्रति आम जन जो सम्मान का भाव रखता है, उसका दुष्चरित्र होना, सामाजिक तौर पर अस्वीकृत और तिरस्कृत होता है। इसी सब से भयभीत होकर मृतक को यह कदम उठाना पड़ा होगा।
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अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन तथा मानव विकास संसाधन ने मिलकर एक रिपोर्ट जारी की है, जिसमें सन् 2000 के बाद से भारत में रोजगार के उपलब्ध आंकड़ों का व्यापक विश्लेषण किया गया है। इस रिपोर्ट की विषयवस्तु है संगठित क्षेत्र में वास्तविक पारिश्रमिक में ठहराव, कृषि रोजगार की ओर वापसी और महिला श्रम भागीदारी दर, जो पहले से ही गिर रही थी। लेकिन हाल के दिनों में उसमें सुधार हुआ, जिसका प्रमुख कारण स्वरोजगार और बिना मेहनताने का घरेलू कामकाज है। जबकि इस बीच बड़ी तादाद में शिक्षित युवा बेरोजगार हैं।
यह रिपोर्ट पाँच प्राथमिकताओं को चिन्हित करती है –
1) उत्पादन और वृद्धि को और अधिक रोजगार आधारित बनाया जाना चाहिए।
2) रोजगार की गुणवत्ता में सुधार होना चाहिए और इसके लिए प्रवासन और नए दौर के क्षेत्रों; जैसे- केयर इकोनॉमी में निवेश करना होगा तथा श्रम अधिकार सुनिश्चित करने होंगे।
3) श्रम बाजार की असमानताएँ; जो महिलाओं, युवाओं और हाशिये पर मौजूद समूहों के लोगों को प्रभावित करती है, उनके लिए नीतियाँ तैयार करना।
4) कौशल प्रशिक्षण और सक्रिय श्रम बाजार नीतियों को बढ़ावा देना। तथा
5) रोजगार को लेकर बेहतर और अधिक आंकड़ों का होना।
आगे की राह –
यह स्पष्ट है कि महिलाओं के घर या कृषि से बाहर रोजगार बढ़ा पाने में कमी कई बार सांस्कृतिक कारणों से भी पैदा होती है अन्य मामलों में ऐसा अनुकूल माहौल तथा कानून व्यवस्था से जुड़ी चिंताओं की वजह से भी है। इसके लिए बहुत बड़े पैमाने पर सामाजिक सुधारों की आवश्यकता है।
– उत्पादन को अधिक रोजगारपरक बनाने की आवश्यकता है। भारत के भविष्य की वृद्धि सेवा क्षेत्र पर निर्भर होगी। इसमें भी नीतियों की आवश्यकता है।
– तेज तकनीकी विकास और उभरती विश्व व्यवस्था को देखते हुए वृद्धि और रोजगार निर्माण के मानक तौर तरीके शायद भविष्य में काम न आएं। ऐसे में यदि भविष्य की बात करें, तो भारत को हर अवसर का पूरा लाभ उठाते हुए अधिकतम रोजगार सृजन करने की तैयारी रखनी होगी।
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04 May 2024
प्रश्न – 460 – नागरिकता संशोधन अधिनियम 2019 की आलोचना के प्रमुख बिन्दुओं का उल्लेख करते हुए उन पर अपने विचार प्रस्तुत कीजिये। (200 शब्द)
Question – 460 – Mention the main points of criticism of the Citizenship Amendment Act 2019 and present your views on them. (200 words)
नोट : इसका उत्तर आपको हमें नहीं भेजना है, यह आपके स्वयं के अभ्यास के लिए है।
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Date:03-05-24
My Marriage, My WayLaws make marriage complicated. State’s role should only be in registering marriages, not specifying sacramentsTOI Editorials
Divorce can be the true test of marriage. This was one takeaway from a case SC judged this week. It was hearing a couple that on its path towards divorce, took a singular leap, and asked for its marriage to be declared invalid instead. On the grounds that no “customs, rites and rituals” had been performed. Justices BV Nagarathna and Augustine George Masih granted the required “relief” and also an illuminating tutorial on the Hindu Marriage Act, 1955. In a nutshell, per law, a marriage performed without “appropriate ceremonies” cannot be said to be “solemnised”.
Why is this jaw-dropping? Because up and down the country Indians get married in a glorious diversity of ways. And all of these should have equal standing in the eyes of modern law. But between the different laws that pronounce rigidities on the matter, they don’t. The judges in this instance declared, “marriage is not an event for ‘song and dance’ and ‘wining and dining’.” But why can’t it be? Or rather, in the countless cases where it already is, surely law shouldn’t ruin the party.
HMA itself has been criticised for flattening wedding practices over time. As examples, scholars point to the fading of matrilineal practices like Aliyasantana in Karnataka and Marumakkathayam in Kerala. Besides, it only refers to Sagai, Kanyadan and Saptapadi. That’s very despiriting for, say, Shubho Drishti and Arundhati Nakshatra. Not to mention all the marriages that completely sidestep the named trinity.
Is there any elegant solution to all this confusion and exclusion? Yes! The state should remain the registry for all marriages, but no longer have anything to do with sacraments and ceremonies.
The Special Marriage Act, 1954 does wear the dress of such a solution. But, from its 30-day notice to how it’s being undermined by anti-conversion laws, its embodied reality is citizen-unfriendly. Moreover, the vast majority of marriages take place under other, religion-based laws, which, like HMA, have very specific requirements for a “solemnised” marriage. What we need is a dramatically reformed version of SMA, where it becomes the sole interface between the state, law and citizens. Why should the state only recognise marriages that limit themselves to a rigid menu of options? Real India certainly doesn’t. Quite happily so. But SC reminded us how vulnerable this happiness is. Better check if your wedding meets the “appropriate ceremonies” criteria.
Date:03-05-24
अधिकार और सीमासंपादकीय
इसमें कोई दोराय नहीं कि अगर कोई व्यक्ति कानून के विरुद्ध काम करता है तो उस पर कार्रवाई होना चाहिए। मगर कानून को अमल में लाने वाली कोई एजंसी अगर अपने अधिकारों को असीमित मानने लगे और उसके रवैये से मनमानी का संकेत मिलने लगे तो सवाल उठना स्वाभाविक है। पिछले कुछ समय से प्रवर्तन निदेशालय यानी ईडी की सक्रियता ने सबका ध्यान आकृष्ट किया है और यह धारणा बनी है कि भ्रष्टाचार में लिप्त लोगों के खिलाफ कार्रवाई में तेजी आई है। मगर इसके साथ ही विपक्षी दलों ने कई बार सवाल उठाए हैं कि ईडी अपने अभियानों में सुविधा और आग्रहों के मुताबिक चुने हुए लोगों के खिलाफ कार्रवाई करती है और उसकी सक्रियता में एक खास तरह का आग्रह दिखता है। विपक्षी पार्टियों के आरोपों को यह मान कर नजरअंदाज कर दिया जा सकता कि वे अपने दल से संबंधित आरोपियों के बचाव में ईडी को कठघरे में खड़ा करती हैं। मगर यह भी सच है कि कई मौके पर खुद अदालतों की ओर से ईडी की कार्यशैली पर अंगुली उठाई गई है।
सवाल है कि किसी कानून पर अमल को लेकर ईडी अगर ईमानदार है, तो बार-बार विपक्षी दलों से लेकर अदालतों तक की ओर से उसकी मंशा पर अंगुली क्यों उठ रही है। बुधवार को नौकरी के बदले जमीन के आरोपों से जुड़े एक मामले में राज एवेन्यू कोर्ट की एक विशेष अदालत ने ईडी को फटकार लगाई और उसकी प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए कहा कि वह एक जांच एजंसी के रूप में कानून के नियमों से बंधी है और वैसे आम नागरिकों के खिलाफ सख्त कार्रवाई नहीं कर सकती, जो संदिग्ध तक नहीं हैं। जाहिर है, यह ईडी के कामकाज के तौर-तरीकों पर एक बार फिर गहरा सवालिया निशान है, जो उसकी साख को कसौटी पर रखता है अगर इससे शासन के काम का एक ढांचा तैयार होता है तो उसका लोकतंत्र और जनता के अधिकारों पर भी प्रभाव पड़ेगा। विडंबना यह है कि ईडी के रवैये की वजह से पिछले कुछ समय से इस संबंध में कई सवाल उठे हैं।
शायद इसी वजह से अदालत ने यह भी कहा कि इतिहास से कोई सबक सीखना है तो यह देखना चाहिए कि मजबूत नेता, कानून और एजेंसियां आमतौर पर उन्हीं नागरिकों को निशाना बनाती हैं, जिनकी रक्षा का वे संकल्प लेती हैं। इस टिप्पणी को जनता के अधिकार और राज्य के कर्तव्य के संदर्भ में देखा जा सकता है, जिसमें उम्मीद की जाती है कि लोगों के मौलिक अधिकारों का हनन नहीं किया जाएगा। करीब एक वर्ष पहले सुप्रीम कोर्ट की ओर से भी ईडी को यह सलाह दी गई थी कि वह अपनी कार्यशैली से भय का माहौल पैदा न करे। शीर्ष अदालत की टिप्पणी इस बात का इशारा थी कि एजंसी को राजनीतिक विरोधियों पर लगे आरोपों की जांच को लेकर संतुलित रुख अख्तियार करने की जरूरत है। आखिर ऐसी शिकायतों की नौबत क्यों आनी चाहिए कि किसी एजंसी के अधिकारियों के पेश आने का तरीका कई बार भयादोहन की तरह लगने लगता है। इस तरह के व्यवहार का एक स्वाभाविक नतीजा यह होता है कि वास्तविक कारण भी संदिग्ध लगने लगते हैं। ऐसे में ईडी के सामने यह विचार करने का वक्त है कि विपक्षी दलों से लेकर अदालतों तक के बीच उसकी कार्यशैली को लेकर जैसी राय बन रही है, वह उसकी साख को किस हद तक प्रभावित कर रही है और उसे अपने तौर-तरीके में क्या सुधार करने की जरूरत है!
Date:03-05-24
कुंद हो गई हमारी सोचअखिलेश आर्येन्दु
भारत का आम चुनाव हो या अमेरिका का सोशल मीडिया की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। चुनाव प्रचार का तरीका बदलने की वजह से चुनाव प्रचार सोशल मीडिया के जरिए बहुत कम खर्च में हो जाता है, लेकिन इसी मीडिया के जरिए विवाद, झगड़े-फसाद और लोगों को गुमराह करने का काम भी खूब हो रहा है जिससे चुनाव की निष्पक्षता प्रभावित हो रही है।
युवा वर्ग पर सोशल मीडिया का ज्यादा असर हो रहा है, इसलिए इस पर नियंत्रण की बात भी कही जा रही है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि सोशल मीडिया ने समाज के अंतिम छोर पर खड़े व्यक्ति को भी अपनी बेबाक बात कहने, अपनी जरूरत की चीजों को जानने-समझने और किसी बात का समर्थन या विरोध करने का अवसर दिया है। आकड़ों के मुताबिक वर्तमान में भारत में 447 मिलियन से ज्यादा लोग सोशल मीडिया का उपयोग करने वाले हैं। इसका जहां समाज पर सकारात्मक असर पड़ा है वहीं नकारात्मक असर की वजह से तमाम तरह की समस्याएं, बीमारियां, तनाव, हिंसा और झगड़े-फसाद भी बढ़े हैं। सर्वाधिक नकारात्मक असर युवा वर्ग पर पड़ रहा है। समय की बर्बादी, नकारात्मक बर्ताव, नकारात्मक सोच, रूढ़ियों और गंदी प्रवृत्तियों को बढ़ावा लगातार बढ़ावा मिल रहा है। गुलामी किस तरह व्यक्ति के मन, मस्तिष्क, धन और सोच को बदली है। आधुनिक तकनीक का चमत्कारी यंत्र मोबाइल की गुलामी से समझा जा सकता है।
अपने और अपनों से दूरियां बढ़ाने में मोबाइल का असर इस कदर हुआ कि सामान्य व्यवहार, पढ़ने-पढ़ाने की आदत, सुनने-सुनाने का वक्त, सहजता जैसी जिंदगी की महत्त्वपूर्ण कवायदें भी हमारी रोजमर्रा की जिंदगी से गायब हो चुकी हैं। सोशल मीडिया सर्वेक्षण के आंकड़े बयां करते हैं कि पिछले दो दशक में सामाजिक सद्भावना में कमी आई है, अपसंस्कृति का लगातार विस्तार हुआ है, और मानव मूल्यों के प्रति लगाव कम हुआ है। पारिवारिक समरता, सामाजिक सदभावना और आपसी विश्वास में भी कमी आई है। यही वजह है परिवार टूट रहे हैं, रिश्तों का बाजारीकरण हुआ जिससे बड़े- बुजुर्गों के प्रति बर्ताव और सद्भाव में कमी आई हैं। आंकड़े बयां करते हैं कि 2018-19 में फेसबुक, ट्वीटर समेत कई साइटों पर 3,245 आपत्तिजनक सामग्रियां मिलने की शिकायत की गई थीं, जिनमें से 2,662 सामग्रियों को हटा दिया गया था। इन सामग्रियों में ज्यादातर वे थीं जो धार्मिक भावनाओं को भड़काने और राष्ट्रीय प्रतीकों के अपमान का निषेध करने वाले कानूनों का उल्लंघन कर रही थीं। तब से पिछले पांच वर्षों में हजारों और आपत्तिजनक सामग्रियां सोशल मीडिया की साइटों पर डाली गई, इसका प्रमाण है यूनेस्को की वह रिपोर्ट जो सोशल मीडिया के असर का बयां करती है।
सोशल मीडिया के जरिए किस तरह के अंधविश्वासों, पाखंडों, बुराइयों, नकारात्मक सोच को लगातार बढ़ावा मिल रहा है, इसकी जानकारी यूनेस्को की रिपोर्ट के जरिए देखी – समझी जा सकती है। संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन (यूनेस्को) के रिपोर्ट के मुताबिक सोशल मीडिया से लैंगिक रूढ़ियां और दकियानूसी सोच को लगातार बढ़ावा मिल रहा है। खासकर लड़कियों की मानसिक स्वास्थ्य और कल्याण पर नकारात्मक असर हो रहा है। ‘प्रौद्योगिकी अपनी शर्तों पर’ नाम की रिपोर्ट यूनेस्को ने 25 अप्रैल को जारी की है। इतने बड़े पैमाने पर सोशल मीडिया पर जो सामग्री परोसी जाती है, वह मल्टीमीडिया के जरिए उपलब्ध कराई जाती है। लेकिन इससे यौन सामग्री से लेकर ऐसे वीडियो की जद में आने का खतरा है, जिनमें अनुचित बर्ताव या शारीरिक सुंदरता के अवास्तविक मानकों का महिमामंडन किया गया हो। इससे लड़कियों के लिए मानसिक तनाव बढ़ सकता है, उनके सम्मान को ठेस पहुंच सकती है। सोशल मीडिया पर जिस तरह लड़कियों के लिए नकारात्मक दिकयानूसी छवियों को गढ़ा जाता वह उन्हें विज्ञान, टैक्नॉलजी, अभियंत्रिकी और गणित विषयों में पढ़ाई से दूर ले जा सकती है। तस्वीर आधारित यौन सामग्री, एआई से तैयार झूठी तस्वीरों व वीडियो (डीपफेक) के ऑनलाइन और कक्षाओं में शेयर किए जाने से हालात और जटिल हो रहे हैं।
रिपोर्ट में इसके बचाव पर जोर देते हुए बताया गया है कि शिक्षा में और ज्यादा निवेश किया जाना चाहिए। खासतौर पर मीडिया और सूचना साक्षरता पर डिजिटल प्लेटफार्म, यूनेस्को के शिक्षानिर्देशों के अनुरूप स्मार्ट ढंग से इनका नियमन भी किया जाना चाहिए। आम आदमी सोशल मीडिया का उपयोग बड़े पैमाने पर करके खुद को संतुष्टि पा रहा है परंतु हकीकत महज इतनी ही नहीं है। कहने को तो रेलवे – टिकटिंग, लाइफ इंश्योरेंस, ई-कॉमर्स, ई-टिकटिंग और ई-गवर्नेस जैसी सुलभता सोशल मीडिया का उपहार हैं, लेकिन दूसरी तरफ अश्लीलता, हिंसा, ठगी, क्रूरता और भ्रष्टाचार के नये चेहरे भी आए। इससे नई पीढ़ी को बहुत संकुचित और स्वार्थी बना दिया है। यदि हम जीवन, परिवार और समाज की बेहतरी के लिए सोशल मीडिया का उपयोग करें तो अनेक लाभ घर बैठे भी हो सकते हैं। सोशल मीडिया के अधिक इस्तेमाल के कारण सोशल एंग्जाइटी जैसी समस्या से युवा ग्रस्त हो रहा है।
लड़कियों के शारीरिक और मानसिक क्षमता पर बुरा असर सोशल मीडिया के अधिक इस्तेमाल के कारण देखा जा रहा है। धन, समय, सहजता, चिंतन और चिंता की समस्या सोशल मीडिया ने कृत्रिम ढंग से पैदा की है। अभिभावकों के लिए यह नई समस्या है। आतंकवाद, सांप्रदायिकता, नफरत, हिंसा, नई बीमारियों के चपेट में आने का डर, मांसाहार, शराबखोरी, धुम्रपान और अन्य अनेक समस्याएं सोशल मीडिया के कारण तेजी से बढ़ी हैं। इसलिए सोशल मीडिया के अच्छे-बुरे इस्तेमाल पर जरूर गौर करना चाहिए वरना इससे जीवन का बड़ा हिस्सा सोशल मीडिया के नाम होने का खतरा मडराता रहेगा और जिंदगी जीने का मायने ही कहीं सोशल मीडिया के नाम न हो जाएं। मानव मूल्यों के ख़त्म होने और इंसान का वस्तु या यंत्र के रूप में तब्दील होने का खतरा आसन्न दिखाई दे रहा है। एक संतुलित जीवन, परिवार, समाज, संस्कृति और देश के लिए सोशल मीडिया के दोनों पक्षों पर हमें खुले मन से विचार करना चाहिए। यदि कानून बनाना पड़े तो भी कानून बना कर गिरते जीवन मूल्यों को रोकने की कोशिश भी करनी होगी।
Date:03-05-24
विकास बनाम न्याय का सियासी विमर्शबद्री नारायण, निदेशक, जीबी पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान
किसी भी जनतंत्र में चुनाव मात्र जीत-हार, सरकार बनाने-गिराने का माध्यम नहीं होते हैं, ये वस्तुत: राजनीतिक चेतना को प्रेरित करने का माध्यम होते हैं। चुनाव समाज में संवाद, विकास एवं राष्ट्र निर्माण के विमर्शों को प्रेरित करने का माध्यम होते हैं। चुनाव के दिनों में ये बहसें मूलत: राजनीतिक दलों द्वारा जारी किए गए घोषणापत्रों, रैलियों में नेताओं के दिए गए भाषणों और बयानों से बनती-बिगड़ती हैं।
वैसे तो मेरा मानना है कि यह चुनाव ‘छवियों के टकराव’ का चुनाव है, जिसमें इस चुनाव के दौरान नेताओं द्वारा कही गई बातों से ज्यादा एक लंबे काल खंड में बनी-बिगड़ी उनकी छवियों का असर है। इस चुनाव में कथनी से ज्यादा ‘करनी’ की स्मृतियों एवं प्रभाव में जनता वोट डाल रही है। चुनाव में कुछ बहसें दीर्घकालिक परिवर्तन की दृष्टि से होती हैं, तो कुछ बहसें तात्कालिक लोकप्रिय प्रकृति की होती हैं। इस चुनाव में ऐसी कौन-सी बहसें हैं, जो तात्कालिक राजनीतिक लाभ या लोकप्रियता पाने की रणनीति से प्रेरित हैं। इन तमाम मुद्दों पर विचार इस चुनाव के संदर्भ में ही नहीं, वरन पूरे लोकतंत्र के विस्तार एवं उसे गहरा बनाने के लिए भी जरूरी है।
इस चुनाव में दो प्रकार की बहसें हो रही हैं। एक तरफ, भाजपा देश को तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनाने के लक्ष्य को विमर्श का विषय बना रही है। वह भारतीय समाज में राज्य द्वारा संसाधनों के वितरण के लिए गरीब, युवा, नारी एवं किसान, चार आर्थिक वर्गों को केंद्र में रखकर योजनाओं को प्रचारित कर रही है।
दूसरी तरफ, कांग्रेस अपने घोषणापत्र में अन्य वादों के साथ समाज कल्याण कार्यक्रमों को आरक्षण आधारित जाति केंद्रित सामाजिक न्याय की अवधारणा के साथ मिलाकर लोकप्रिय वादे के रूप में प्रचारित कर रही है। इसके लिए वह पूरे देश में जातीय जनगणना कराने को भी एक लोकप्रियतावादी नारे के रूप में अपने चुनावी विमर्श में इस्तेमाल कर रही है।
अगर इस चुनाव की बहसों के निर्माण की प्रक्रिया को देखें, तो साफ लगता है कि भाजपा इस चुनाव को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की छवि, सामाजिक कल्याण के कार्यक्रमों पर केंद्रित एवं विकसित भारत की संकल्पना के ईद-गिर्द रखना चाहती है। इस चुनाव में टिकट बंटवारे में परोक्ष जातीय जोड़-घटाव को छोड़ दें, तो उसने अपने घोषणापत्र एवं अपने नेताओं के भाषणों में जातीय अस्मिता की राजनीति से दूरी बनाने की कोशिश की है। वहीं कांग्रेस ने अपने चुनावी विमर्श में शुरू से ही भारतीय समाज में जाति आधारित सामाजिक अन्याय को मुद्दा बनाते हुए पारंपरिक ढंग के आरक्षण आधारित सामाजिक न्याय को लोकप्रिय बहस बनाने की कोशिश की है। इस बार अल्पसंख्यकों के संदर्भ में धार्मिक अस्मिता एवं सामाजिक न्याय के संदर्भ में जातीय अस्मिता कांग्रेस के घोषणापत्र के केंद्रीय तत्व बने हुए हैं। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इन जातीय एवं धार्मिक अस्मिताओं को न्याय-अन्याय जैसी शब्दावली में बार-बार उठाया है। कांग्रेस ने भाजपा के शासन में आने पर ‘संविधान बदल दिया जाएगा’, ‘चुनाव नहीं होंगे’ आदि अनेक भय व चिंता जगाने वाले विमर्श खड़े कर दिए हैं। कांग्रेस के चुनावी विमर्श की इसी रणनीति ने भाजपा को अपने चुनावी विमर्श की रणनीति में परिवर्तन के लिए बाध्य किया। कांग्रेस के इन पारंपरिक राजनीतिक अस्त्रों का जबाब देने के लिए भाजपा ने अपने विकास, भारत गर्व एवं विकसित भारत के विमर्श के साथ ही कांग्रेस पर तुष्टिकरण की राजनीति करने का पारंपरिक अस्त्र चला दिया।
इसी तुष्टिकरण के विमर्श में जाति के साथ ही धार्मिक अस्मिता का विमर्श भी सामने आने लगा। भाजपा ने सक्षमता से इसी तुष्टिकरण के विमर्श को सामाजिक न्याय के विमर्श से जोड़ दिया। यह प्रचार शुरू कर दिया कि कांग्रेस एक धर्म के लोगों को संतुष्ट करने के लिए पिछड़ों, अनुसूचित जाति एवं जनजाति के गरीबों का हक छीनकर एक खास धार्मिक समुदाय में बांट देना चाहती है। साथ ही, उसने कांगे्रस द्वारा स्वर्ण एवं संपत्ति के सर्वे की मंशा को भारतीय स्त्रियों, विशेषकर मध्यवर्गीय स्त्रियों के ‘मंगल सूत्र’ पर खतरे के वृतांत में पीरो दिया। भारतीय चुनावों में वृतांतों या ‘नैरेटिव्स’ की राजनीति में प्रधानमंत्री मोदी का यह मास्टर स्ट्रोक माना जाना चाहिए, जिसमें उन्होंने मध्यवर्गीय मानस को तो झकझोरा ही, गरीबों, पिछड़ों एवं दलितों की अस्मिताओं को भी पारंपरिक जाति आधारित सामाजिक न्याय की राजनीति के खांचे से बाहर निकाल हिंदुत्व, सामाजिक न्याय एवं विकास की आकांक्षा का संतुलित मिश्रण तैयार किया। राजनीति में यह ऐसा मारक आक्रमण है, जिसका सामना कांग्रेस के विमर्शकार कैसे कर पाते हैं, यह देखना होगा।
यह बार-बार देखने में आता है कि जाति कई बार सामाजिक न्याय के वितरण की एक इकाई के रूप में मददगार तो होती है, किंतु आगे चलकर अनेक प्रकार के सामाजिक अन्याय को जन्म भी देती है। कांगेस को यह समझना होगा कि जाति से जाति को काटना भारतीय समाज में अत्यंत मुश्किल है। हमने देखा है कि ऐसे अनेक प्रयोग अब तक विफल ही हुए हैं। आजादी के बाद सामाजिक न्याय की राजनीति के एक अनोखे प्रयोगकर्ता कांशीराम शुरुआती सफलताओं के बाद अंतत: कमजोर पड़ते देखे गए। समझना होगा कि भारतीय समाज में जाति की धार को आर्थिक विकास की प्रक्रियाओं से ही कुंद किया जा सकता है।
अगर गहराई से विवेचना करें, तो भारतीय जनतांत्रिक राजनीति को एक नई भाषा की जरूरत है, एक आधुनिक भाव बोध की भी। इसे एक नई राजनीति भी चाहिए। विकास की राजनीति की भाषा को अन्य प्रकार की राजनीति केंद्रित भाषा की तुलना में ज्यादा अधुनातन, अग्रगामी एवं प्रगतिशील तो माना ही जाता है। जैसे ही इस भाषा को हम जाति एवं धर्म आधारित राजनीतिक भाषा की सीमा में जाने के लिए मजबूर करते हैं, वैसे ही हम तीन-चार दशक पीछे की राजनीतिक परिदृश्य में पहुंच जाते हैं।
हिंदी के प्रसिद्ध उपन्यासकार फणिश्वर नाथ रेणु ने अपनी कहानी पंचलाइट (पंचलैट) में एक गांव में एक ऐसे जाति विभाजित समाज का वर्णन किया है, जहां हर जाति को अपना गोल बैठता है एवं उनकी अपनी ‘पंचलाइट’ (पेट्रोमैक्स) होने की चाह होती है। वह अगर आज जीवित होते, तो स्वयं भी चाहते कि भारतीय जनतंत्र के पास एक विकासमान एवं नए भारत की अंतर्दृष्टि एवं राजनीतिक भाषा हो, जो अन्य अनेक पारंपरिक अस्मिताओं पर केंद्रित राजनीतिक भाषा एवं विमर्शों का चोला उतार फेंके।
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कुछ तथ्य –
कारण क्या हैं?
समाधान क्या हो सकते हैं?
सरकारी प्रयत्न –
स्वास्थ्य मंत्रालय ने राष्ट्रीय आत्महत्या रोकथाम रणनीति विकसित करने के लिए नवंबर 2019 में एक टास्क फोर्स का गठन किया था। अंतिम रणनीति 2022 को शुरू की गई, जिसमें 2030 तक आत्महत्या को 10% तक कम करने का लक्ष्य है। रणनीति ने माना है कि आत्महत्या कम करने के लिए स्वास्थ्य, शिक्षा, सूचना और प्रसारण व सामाजिक कल्याण मंत्रालयों के बीच सहयोग आवश्यक है। यह रणनीति मानसिक स्वास्थ्य को बढ़ावा देने के लिए स्कूल स्वास्थ्य राजदूतों और युवा क्लबों के माध्यम से मादक पदार्थों और व्यसन को कम करने पर जोर देती है।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित डॉ৹ लक्ष्मी विजय कुमार के लेख पर आधारित। 8 अप्रैल, 2024
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Date:02-05-24
Mystery of MGNREGA Demand AsymmetryET Editorials
Popularity of the MGNREGA scheme in poorer states is wellknown. But a new data analysis reported in this paper has thrown up an interesting fact: Tamil Nadu, one of India’s most industrialised states, takes a much larger share of funds under the rural employment guarantee scheme than Bihar, one of the country’s poorest and more populous states. Over the past five years, TN accounted for 10-15.3% of India’s annual work demand submitted by individuals under MGNREGA, while Bihar made up for 4-5.7%. As for person-days generated, TN’s annual share has been 8.6-13.1% over the same period, compared to Bihar’s 5-8%. Other progressive southern states like Andhra Pradesh, Karnataka and Kerala have also been cornering larger shares of MGNREGA funds than states with similar populations or workforces.
What accounts for this unintended asymmetry? One, an efficient administrative set-up has not just streamlined the job demand-to-payment process better, but it has also — as the TN case study shows — managed to execute a geographical exercise where labourers can find work at a place not far from their homes, thereby reducing the need to travel far, never mind migrate. The other factor is higher participation by women. 80% of active MGNREGA workers in TN are women, while in Bihar, the corresponding figure is about 54%. The high number of female workforce participation in MGNREGA work can be attributed to decades of the southern state’s progressive politics, policies and supportive ecosystem.
While GoI should delve deeper into this ‘north-south’ asymmetry, laggard states must learn how to utilise the scheme better and weed out roadblocks in MGNREGA implementation. Essentially, make it work better for those who need this economic cover.
Date:02-05-24
आम वोटर चुनाव को लेकर उत्साहित नहीं हैराजदीप सरदेसाई, ( वरिष्ठ पत्रकार )
चुनाव के दो राउंड हो चुके हैं, पांच राउंड बाकी हैं। लेकिन बड़ा सवाल यह है कि टीवी स्टूडियो के भीतर और बाहर लगातार ढोल की थाप के बावजूद लोकतंत्र के ‘उत्सव’ में कम मतदान क्यों हो रहा है? गर्मी, फसलों की कटाई, सप्ताहांत की लंबी छुट्टियां आदि केवल आंशिक रूप से ही मतदान में गिरावट की व्याख्या कर सकती हैं। सच यह है कि देश के कई हिस्सों में लोकतांत्रिक-भावना में गिरावट आई है, जिससे एक आम वोटर अपने सामने मौजूद विकल्पों को लेकर उत्साहित नहीं महसूस करता है।
चुनाव से पहले का शोरगुल ‘अबकी बार 400 पार’ के नारे पर केंद्रित था। ऐसा माना जा रहा था जैसे नतीजों का फैसला पहले ही हो चुका है और अब केवल यह देखना बाकी है कि 1984 में राजीव गांधी की 414 लोकसभा सीटों का रिकॉर्ड टूटेगा या नहीं। लेकिन जैसे-जैसे चुनाव-अभियान आगे बढ़ रहा है, दोनों ही पक्षों को अचानक राज्य-दर-राज्य चुनावी-संघर्ष की ‘लहर-रहित’ जमीनी हकीकत का सामना करना पड़ रहा है।
यह अकारण नहीं है कि पहले दौर के मतदान में औसतन 3 प्रतिशत की गिरावट के ठीक एक दिन बाद भाजपा ने अपने सांप्रदायिक-सुर तेज कर दिए थे। कहां तो 2047 तक ‘विकसित भारत’ के वादे के साथ चुनाव-अभियान में प्रवेश किया गया था और कहां डर की राजनीति की जाने लगी। लेकिन जहां डर नुकसानदेह और विनाशकारी हो सकता है, वहीं उम्मीदें सकारात्मक और रचनात्मक होती हैं।
जब कांग्रेस के घोषणापत्र की तुलना मुस्लिम लीग से की जाती है तो लगने लगता है कि ‘सबका साथ, सबका विकास’ की नेक बातें केवल दुनिया की स्वीकार्यता अर्जित करने के लिए ही हैं। लेकिन अगर भाजपा ने लंबे समय से निर्मित अपनी सांप्रदायिक छवि को पुनर्जीवित कर दिया है तो कांग्रेस भी काल्पनिक भय की शिकार हो रही है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने अपनी रैलियों में संविधान की प्रति लहराते हुए चेतावनी दी है कि अगर भाजपा सत्ता में आई तो वे दलितों, आदिवासियों और ओबीसी के लिए आरक्षण खत्म करने के लिए संविधान में संशोधन करेंगे।
जबकि औसत मतदाता आजीविका के बुनियादी सवालों से घिरा है और उस पर ये तमाम चुनावी बातें बेअसर साबित हो रही हैं। अगर आप देश की यात्रा करें तो पाएंगे कि नेताओं और नागरिकों के बीच एक स्पष्ट अलगाव है। पिछले पांच साल कई भारतीयों के लिए कठिन रहे हैं : महामारी, लॉकडाउन, महंगाई, नौकरियां छूटना, बेरोजगारी, घटती आमदनी आदि ने कोई ऐसा माहौल नहीं बनाया है कि मतदाता ‘फील-गुड’ करें। दुनिया में ‘उभरता हुआ भारत’ पांच सितारा समारोहों में भले ही चर्चा का विषय हो, लेकिन गर्मी और धूल से जूझते ग्रामीण भारत में आज भी पानी का टैंकर आठ दिनों में केवल एक बार आता है। एक तरफ उत्साहपूर्ण बयानबाजी और दूसरी तरफ जीवन की कठोर वास्तविकताओं के इस अंतर ने ही कई मतदाताओं को मतदान-प्रक्रिया के प्रति उदासीन बना दिया है।
महाराष्ट्र का ही उदाहरण लें। पिछले पांच वर्षों में किसी और राज्य ने उसके जैसी राजनीतिक उथल-पुथल नहीं देखी है। वहां पांच साल में तीन मुख्यमंत्री बदले हैं, गठबंधन बने और टूटे हैं और परदे के पीछे सौदेबाजियां चलती रही हैं। यहां तक कि सभी पार्टियों के राजनीतिक कार्यकर्ता भी अब चुनाव-प्रणाली को लेकर उत्साहपूर्ण नहीं दिखते हैं। जब नेता हर कीमत पर सत्ता में बने रहने के लिए लगातार समझौते कर रहे हों और कल के कट्टर विरोधी आज के गठबंधन सहयोगी बन जाते हों तो एक वफादार कार्यकर्ता जमीन पर मेहनत क्यों करेगा? अवसरवादिता ने कार्यकर्ताओं में राजनीति को लेकर संशय पैदा कर दिया है।
एक तरफ राजनेता पहले से ज्यादा समृद्ध होते गए हैं, वहीं दूसरी तरफ औसत से कम बारिश के कारण बढ़े कृषि संकट ने विषमता के विकट विरोधाभास रच दिए हैं। मुंबई के सुपर-रिच जहां अपने स्विमिंग पूल में नाश्ता कर रहे होते हैं, वहीं ग्रामीण महाराष्ट्र में टैंकर माफिया 200 रुपए प्रति बाल्टी की दर से पानी बेचते हैं। ऐसे में क्या आश्चर्य कि राज्यभर के ग्रामीण इलाकों में मतदाताओं का अधूरे वादों से मोहभंग हो चुका है। तब सवाल उठता है कि मतदाताओं की इस थकी हुई मानसिकता से चुनावी तौर पर किसे फायदा या किसे नुकसान होगा? भाजपा को पूरा भरोसा है कि एक ऐसे नेता के नेतृत्व में उनकी बेहतर चुनावी ‘संगठन’ मशीन जीत की हैट्रिक सुनिश्चित करेगी, जिस पर जनता को अभी भी उनके प्रतिस्पर्धियों की तुलना में कहीं अधिक भरोसा है। कांग्रेस इस उम्मीद पर टिकी है कि मतदाताओं की उदासीनता उसे कम से कम करीबी मुकाबले वाली सीटों पर लड़ने का मौका जरूर देगी। लेकिन भारतीय लोकतंत्र का संकट ‘भाजपा बनाम विपक्ष’ से कहीं आगे तक जाता है। यह धारणा बढ़ती जा रही है कि चुनाव चाहे कोई भी जीते, मतदाताओं की हार ही हो रही है। ऐसे में जो लोग मतदान नहीं कर रहे हैं, वो भी शायद एक कड़ा संदेश ही दे रहे हैं कि : हमारे वोटों को हल्के में न लें!
Date:02-05-24
कराधान की दृष्टि से सही विचार नहींअजय शाह, ( लेखक एक्सकेडीआर फोरम में शोधकर्ता हैं )
देश में इस समय यह लोकलुभावन मांग जोरों पर हैं अमीरों से संपत्ति छीनकर उसे गरीबों में बांट दिया जाए। यह रास्ता निरंतर गरीबी और आर्थिक नाकामी की ओर ले जाता है। इन दिनों संपत्ति कर और विरासत कर के रूप में जिन दो विषयों पर चर्चा की जा रही है वे सार्वजनिक वित्त के क्षेत्र में सुपरिचित विषय हैं। पूरी दुनिया में इनी उपयोगिता कम होने को लेकर विश्लेषण हुए हैं। भारत में भी इन्हें लगाने की कोशिश की जा चुकी है। इन्हें दोबारा नहीं लगने देना चाहिए।
आमतौर पर एक दशक में एक बार भारत में संपत्ति और विरासत पर कर का मुद्दा बहस में आता है। ये मुद्दे 19वीं सदी से ही विचार में आते रहे हैं और कई देशों ने इन्हें अपनाने का प्रयास भी किया। अधिक आजादी हासिल करने के लिए इन करों को हटाए जाने के साथ ही अच्छी खासी समृद्धि हासिल हुई है।
भारत में 1953 से 1985 तक संपदा शुल्क लगता था। इसकी दरें 85 फीसदी तक थीं लेकिन व्यवहार में संग्रह की राशि बहुत कम होती थी। राजीव गांधी ने इसे समाप्त किया। संपदा या विरासत पर कर लगाने की व्यवस्था कई देशों में आज भी लागू है। औसतन 24 ओईसीडी देशों में यह कर राजस्व में 0.5 फीसदी का हिस्सेदार है। सार्वजनिक प्रशासन की दृष्टि से देखें तो इसमें मामूली राजस्व के लिए काफी जटिलताओं का सामना करना होता है।
संपत्ति कर के मामले में संभावनाएं और भी कमजोर हैं। भारत में इसकी शुरुआत 1957 में की गई थी। इससे 2012-13 में 800 करोड़ रुपये का राजस्व जुटाया गया। इसे 2015 में समाप्त कर दिया गया। चार ओईसीडी देशों में यह लागू है और इससे नाम मात्र का राजस्व आता है।
इन्हें हासिल करने की प्रक्रिया में कीमत चुकानी होती है: मसलन देश में समझदारी भरी कर व्यवस्था लागू करने के बुनियादी काम पर ध्यान नहीं दे पाना। भारत में कराधान काफी ऊंचे स्तर पर है। देश में व्यक्तिगत आय कर की उच्चतम दर 42 फीसदी है। कॉर्पोरेट आय कर 25 फीसदी और अधिकतम जीएसटी की दर 18 फीसदी है।
आयात, गैर टैरिफ अवरोध आदि पर कर स्थिर गति से बढ़ रहा है। अगर 1991 के बाद के दौर से तुलना करें तो हमारे यहां आयात कर की दर काफी अधिक है। इससे अत्यधिक उच्च कर वाला माहौल तैयार होता है और कर अधिकारियों को मनमाना अधिकार प्रदान करता है। कर नीति में हमारी प्राथमिकता संपदा कर या विरासत की चुनौती से जूझने के बजाय कर नीति और कर प्रशासन के क्षेत्र में बेहतर काम की होनी चाहिए।
एक अर्थशास्त्री ऐसा व्यक्ति होता है जो किसी काम के व्यवहार में सफल होने पर यह देखता है कि क्या यह सिद्धांत में भी सफल है। क्या कोई अनुभव केवल चुनिंदा दुर्घटनाओं पर आधारित होता है या फिर कोई अवधारणात्मक आधार होता है जिनसे बचा न जा सके। ऐसे में तह तक जाकर यह सवाल पूछना सही होगा कि विरासत कर और संपदा कर का प्रदर्शन सही रहेगा या नहीं? लोग प्रोत्साहन पर प्रतिक्रिया देते हैं। अधिक कराधान को लेकर पहली प्रतिक्रिया कम काम के रूप में सामने आती है। अगर विरासत और संपदा कर से दंडित किया जाएगा तो लोग संपत्ति बनाने के लिए कम काम करेंगे। यह देश के लिए नुकसानदायक होगा।
दूसरी प्रतिक्रिया है कर किफायत ढांचे में नई जान फूंकना। अपने अंतिम समय में वसीयत बनाने के बजाय लोग अपनी परिसंपत्ति जिंदा रहते ही चुने हुए लोगों को हस्तांतरित कर देंगे। यह सरकार की राजस्व प्राप्ति की क्षमता को बाधित करते हुए उनके व्यवहार में विसंगति लाएगा।
कई माता-पिता कर से बचने के लिए बच्चों को जल्दी संपत्ति देकर अधिकार खोने के बजाय अप्रत्याशित निधन के पहले के वर्षों में बार-बार वसीयत को बदलना पसंद कर सकते हैं। तीसरी प्रतिक्रिया है कारोबारी गतिविधियों को किसी मित्रतापूर्ण क्षेत्र मसलन दुबई, श्रीलंका, केमैन आइलैंड, सिंगापुर या आयरलैंड में स्थानांतरित करना। यह बात कर राजस्व को प्रभावित करती है।
अगर भारत की अर्थव्यवस्था एक खुली अर्थव्यवस्था होती तो कुछ भी गलत नहीं होता। एक व्यक्ति आयरलैंड में कर चुकाता और भारत में कारोबारी गतिविधियां संचालित करता। परंतु भारत खुली अर्थव्यवस्था वाला देश नहीं है। हमारे यहां सीमा पार गतिविधियों को लेकर कई दिक्कतें हैं। चालू खाते और पूंजी खाते में परिर्वतनीयता अनुपस्थित है। ऐसे में एक बार जब कोई व्यक्ति अपना कर आवास देश के बाहर कर लेता है तो एक तरह के अलगाव की भावना घर कर जाती है तथा देश में संगठन बनाने की भावना कमजोर पड़ती है।
भारत का भविष्य करीब 10,000 कंपनियों के हाथ में है और यह बेहतर है कि भारतीय राज्य को इस प्रकार तैयार किया जाए कि वह इन नेतृत्वकारी टीम में से प्रत्येक की ऊर्जा और महत्त्वाकांक्षा का पोषण करे। संक्षेप में कहें तो संपत्ति कर और विरासत कर कमजोर प्रदर्शन करते हैं क्योंकि वे लोगों के व्यवहार को बाधित करते हैं जिससे जीडीपी को नुकसान पहुंचता है।
लोगों के व्यवहार में आई विसंगति कर राजस्व को प्रभावित करती है। ऐसे में ये कर दुनिया के सबसे बुरे उदाहरण पेश करते हैं। व्यवहारगत विकृतियां जीडीपी को प्रभावित करती हैं, एक जटिल कर अफसरशाही तैयार होती है जो भारत जैसे देश में कर अधिकारियों को मनमाना अधिकार दे सकती है और कर राजस्व में कमी आती है।
यह बहस पुनर्वितरण बनाम वृद्धि की व्यापक पहेली में सटीक बैठती है। हमें ऐसी बहसों में अपना ध्यान नहीं भटकाना चाहिए कि एक पिज्जा किस प्रकार बांटा जाएगा। भारत एक निम्न मध्य आय वाला देश है। हमारे सामने एक बड़ी चुनौती है और वह है आगामी 100 वर्षों तक वृद्धि को बरकरार रखना तथा विकासशील राज्य की क्षमता बनाए रखना।
सन 1947 में गरीब रहे देशों में से केवल चार आज उन्नत अर्थव्यवस्था वाले देश बन सके हैं। विकास की यात्रा एक कठिन यात्रा है जहां सफलता की कोई गारंटी नहीं। ऐसे में वर्ग को लेकर जंग छेड़ना निजी गतिशीलता पर बुरा असर डालेगा और राज्य की क्षमता को प्रभावित करेगा।
लैंट प्रिचिट कहते हैं कि दुनिया भर में गरीबी की दर में 99 फीसदी अंतर को केवल एक आंकड़े से समझा जा सकता है और वह है: औसत आय। अगर हम गरीबी दर में बदलाव करना चाहते हैं तो हमें औसत आय पर ध्यान देना होगा। कर, सामाजिक कार्यक्रम आदि के माध्यम से पुनर्वितरण के सरकार के सभी प्रयास शेष एक फीसदी में बैठते हैं और कम वृद्धि की कीमत पर आते हैं।
Date:02-05-24
मुसीबत बनता आबादी का असंतुलनअखिलेश आर्येंदु
आज तमाम विकासशील देश बढ़ती आबादी और संसाधनों की कमी की वजह से परेशान हैं। दूसरी तरफ, विकसित देशों में घटती जन्मदर, खासकर नौजवानों की घटती आबादी से आर्थिक और सामाजिक ताने-बाने पर पड़ रहे असर से कई तरह की समस्याएं पैदा हो गई हैं। 2022 के संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के मुताबिक पिछले दस वर्षों में एक करोड़ से ज्यादा आबादी वाले आठ देशों की आबादी कम हो गई, जिनमें ज्यादातर देश यूरोप के हैं। जापान में पिछले कई वर्षों से जनसंख्या में कमी और बुजुर्गों की बढ़ती आबादी की वजह से सामाजिक और आर्थिक हालात पर असर पड़ा है। इससे कई तरह के असंतुलन पैदा हो गए हैं।
‘द लैंसेट’ में 20 मार्च, 2024 को प्रकाशित अध्ययन के मुताबिक भारत में आबादी का असंतुलन लगातार बढ़ रहा है। लड़कियों की जन्मदर घटने के कारण सामाजिक ताने-बाने पर बुरा असर पड़ रहा है। भारत में जीवन शैली में बदलाव की वजह से युवा शादियां विलंब से करने लगे हैं, जिससे संतान होने में देर हो रही है, जिसका असर बच्चों के पालन-पोषण, उनकी शिक्षा और सेहत पर पड़ता है। इससे सामाजिक ताना-बाना बिगड़ रहा है। रपट के मुताबिक 1950 यानी चौहत्तर वर्ष पहले तक भारत की प्रजनन दर 6.2 फीसद थी, जो 2021 आते-आते घट कर दो फीसद से भी कम रह गई। अनुमान के मुताबिक 2050 तक प्रजनन दर घट कर 1.29 फीसद और 2100 में घटते-घटते 1.04 तक पहुंच सकती है। इसे भारत के लिए किसी भी नजरिए से अच्छा नहीं कहा जा सकता है।
गौरतलब है कि प्रजनन दर 2.1 को ‘रिप्लेसमेंट लेवल’ कहा जाता है। यानी इस दर पर आबादी स्थिर रहती है और इससे कम होने पर घटने लगती है। युवाओं की आबादी घटने का मतलब है, वृद्धों की आबादी में वृद्धि। वृद्धों की आबादी बढ़ने का मतलब है, श्रमशक्ति में कमी आना। यह किसी भी देश के लिए जोखिम की स्थिति हो सकती है। भारत को भी एक या दो दशक बाद श्रमशक्ति में कमी से कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।
विकसित देशों में प्रजनन दर लगातार कम हो रही है, जिससे युवाओं की तादाद कम और बुजुर्गों की बढ़ रही है। यानी जन्म और मृत्यु दर में असंतुलन पैदा हो गया है। अध्ययन के मुताबिक 2030 तक स्पेन, दक्षिण कोरिया, रूस, सिंगापुर और जर्मनी की आबादी घटनी शुरू हो जाएगी। इसके अलावा, भारत, नेपाल, श्रीलंका और म्यांमा की आबादी की रफ्तार भी थम सकती है। अभी कई विकसित देशों में बच्चों की जन्मदर बहुत तेजी से घट रही है। इसमें सिंगापुर और जापान प्रमुख हैं। सिंगापुर में जन्मदर 0.97 फीसद है, जापान में 0.6 फीसद और कोरिया में 0.72 फीसद है।
गौरतलब है कि जापान ज्यादा बच्चे पैदा करने के लिए युवाओं को इनाम दे रहा है। इसके बावजूद, शादी करने वाले युवाओं की संख्या लगातार कम हो रही है। आंकड़े बताते हैं कि जापान में शादी न करने वाले युवाओं की संख्या लगातार घट रही है। वर्ष 2023 में महज चार लाख युवाओं ने शादियां की। इसी तरह सिंगापुर में 2023 में 26,500 युवाओं ने ही शादियां की। इसलिए जापान और सिंगापुर में जन्मदर में लगातार गिरावट आ रही है। सिंगापुर इस समय दोहरे संकट से जूझ रहा है। एक तरफ जन्मदर में बेतहाशा कमी आ रही है, तो दूसरी तरफ देश की बहुत बड़ी आबादी बूढ़ी हो गई है। जन्मदर में यह कमी जापान और सिंगापुर की अर्थव्यवस्था पर सीधे असर डाल रही है।
आबादी के मामले में चीन दुनिया का सबसे बड़ा देश है, उसकी आबादी 2100 तक आज के स्तर से आधी यानी 1.4 अरब से घट कर 77.1 करोड़ रह सकती है। मगर दुनिया के तमाम अविकसित देशों में आबादी घटने के बजाय लगातार बढ़ रही है। इनमें अफ्रीकी देशों के अलावा मुसलिम देश भी शामिल हैं। दुनिया के जिन देशों में जन्मदर बहुत अधिक है, उनको संसाधनों की कमी का सामना करना पड़ रहा है। हालात ऐसे हो गए हैं कि जनसंख्या का घनत्व लगातार बढ़ने के कारण कई तरह की समस्याएं पैदा होती हैं। उन समस्याओं में पीने के पानी, पोषण युक्त खाद्यान्न के अलावा दवाओं और रोजगार की कमी जैसी समस्याएं शामिल हैं। भारत भी ऐसी समस्याओं का सामना वर्षों से कर रहा है, लेकिन पिछले दस वर्षों में पानी, खाद्यान्न और रोजगार पर गौर करने के कारण इनमें कमी देखी जा रही है। फिर भी जनसंख्या घनत्व अधिक होने और जीवन-शैली में बदलाव की वजह से बच्चों के जन्मदर में कमी देखी जा रही है। मगर बूढ़े हो रहे लोगों की संख्या जापान की तरह भारत में भी बढ़ रही है, इस पर तुरंत गौर करने की जरूरत है। वहीं, भारत के पड़ोसी देशों, खासकर बांग्लादेश, म्यांमा से पलायन कर भारत में चोरी-छिपे रह रहे लाखों लोगों की वजह से भी जनसंख्या घनत्व पर असर पड़ा है।
भारत में स्थिर जनसंख्या वृद्धि का लक्ष्य हासिल करना बहुत बड़ी चुनौती है। इसलिए प्रजनन दर में कमी लाने के लिए व्यावहारिक कदम उठाने की जरूरत है। बिहार, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, मध्य प्रदेश, झारखंड और छत्तीसगढ़ में बच्चों की जन्मदर काफी अधिक है। इसलिए इन राज्यों को परिवार नियोजन पर अधिक ध्यान देना होगा। इसी के साथ भारत में युवाओं की बहुत बड़ी आबादी बेरोजगार है। इससे जनसंख्या का बहुत बड़ा हिस्सा देश के विकास में बाधा बना रहता है। इसलिए रोजगार की समस्या को प्राथमिकता के स्तर पर हल करने की जरूरत है।
यों तो बढ़ती आबादी पर रोक लगाने और बेरोजगारी की समस्या हल करने के मद्देनजर केंद्र और राज्य सरकारों ने कई कदम उठाए हैं, लेकिन आज भी करोड़ों की तादाद में भारत के युवा बेरोजगार हैं। इसलिए गैरबराबरी की समस्या भारतीय समाज में तेजी से बढ़ी है। भारत एक विकसित देश बने, इसके लिए जरूरी है कि बढ़ती आबादी पर रोक लगाई जाए और सबको शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाएं समान रूप से हासिल हों। गांवों से शहरों की तरफ पलायन को रोकना भी जरूरी है। क्योंकि पलायन से कई तरह की समस्याएं पैदा होती हैं और जनसंख्या असंतुलन लगातार बढ़ता है।
अर्थशास्त्रियों के अनुसार जनसंख्या समस्या का सबसे बेहतर समाधान है कि सेहत और शिक्षा संबंधी सुविधाओं का लगातार प्रसार किया जाए और गुणवत्ता में तेजी लाई जाए। आज जरूरत है स्त्री-पुरुष जनसंख्या संतुलन को बनाए रखने में आ रही बाधाओं को खत्म करने की। इसके लिए सरकार की नीतियों और योजनाओं को आम आदमी का भरपूर समर्थन मिले, ताकि जनसंख्या का असंतुलन न हो और बढ़ती गैरबराबरी की समस्या में कमी लाई जा सके। उम्मीद की जानी चाहिए कि भारत अपनी बेहतर नीतियों और योजनाओं से इस समस्या से कुछ वर्षों में पार पा लेगा।
Date:02-05-24
जवाबदेह बनें संस्थाएंसंपादकीय
सर्वोच्च अदालत ने लोक सभा चुनाव से पहले दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी के समय को लेकर प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) से सवाल किया और जांच एजेंसी से इसका जवाब मांगा। अदालत ने पांच सवाल पूछे और उनके जवाब लेकर आने का निर्देश दिया। दो सदस्यीय बेंच ने कहा कि स्वतंत्रता बहुत महत्त्वपूर्ण है। आखिरी सवाल गिरफ्तारी के संबंध में है। न्यायिक कार्यवाही के बिना, जो कुछ हुआ उसके संदर्भ में कार्यवाही कर सकते हैं। अदालत ने पूर्व उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया के लिए कहा कि पक्ष और विपक्ष में निष्कर्ष हैं। हमें बताएं कि केजरीवाल का मामला कहां है। क्या हम सीमा को बहुत विस्तृत बनाते हैं और सुनिश्चित करते हैं कि जो व्यक्ति दोषी है, उसका पता लगाने के लिए मानक समान हों। केजरीवाल 21 मार्च से शराब नीति घोटाले के मामले में न्यायिक हिरासत के तहत दिल्ली की तिहाड़ जेल में बंद हैं। केजरीवाल इस गिरफ्तारी से पहले ही सार्वजनिक तौर पर कई मर्तबा दोहरा चुके थे कि मोदी सरकार लोक सभा चुनाव के दौरान उन्हें गिरफ्तार कर सकती है। दिल्ली सरकार के नेता पहले ही जेल में हैं। माना जा रहा है कि आम आदमी पार्टी की लोकप्रियता विभिन्न राजनैतिक दलों के लिए चुनौती बनती जा रही है। सत्ताधारी दल की यह जिम्मेदारी है कि वह अन्य विपक्षी दलों के साथ पूर्वाग्रह भरा बर्ताव करने से बचे। दंड प्रक्रिया संहिता के अध्याय 5 में स्पष्ट प्रावधान है, कोई भी गिरफ्तारी इसके अधीन ही होनी चाहिए। केजरीवाल अपनी गिरफ्तारी और हिरासत को अवैध बता रहे हैं। यह कहना गलत नहीं है कि चुनाव के दरम्यान लगातार गिरफ्तारियां हो रही हैं तथा नोटिस भी थमाए जा रहे हैं या छापे तक डाले जा रहे हैं। दरअसल, केजरीवाल की गिरफ्तारी की टाइमिंग को लेकर सवाल उठ रहे हैं, जिनके उत्तर मिलने चाहिए। यह स्थिति लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए उचित नहीं कही जा सकती। बेशक, न्यायिक व्यवस्था अपनी जिम्मेदारी निभा रही है। सार्वजनिक जीवन में रहने वाला कोई भी राजनीतिज्ञ यदि किसी तरह के घोटाले में शामिल है तो उसे दंडित करने के लिए अदालतें हैं। अदालतोंपर पहले ही लंबित मामलों का दबाव है। उस पर मोदी सरकार लगातार आरोपियों को भाजपा में शामिल कर उन्हें क्लीन चिट देने का काम कर स्पष्ट संकेत दे रही है। यह अपने आप में गलत संदेश दे रहा है। बावजूद इसके अंतिम फैसला तो जनता के हाथ में है, जो मूकदर्शक जरूर है, लेकिन अपना निर्णय समय आने पर देगी।
Date:02-05-24
विवाह की वैधतासंपादकीय
देश की सर्वोच्च अदालत ने हिंदू विवाह पर एक नई व्यवस्था देते हुए कहा है कि अगर अपेक्षित विवाह समारोह नहीं हुआ है, तो हिंदू विवाह अमान्य है। अदालत ने हिंदू विवाह अधिनियम 1955 के तहत विवाह की कानूनी आवश्यकताओं और पवित्रता को स्पष्ट करने की जो कोशिश की है, उस पर पूरी गंभीरता से गौर करने की जरूरत है। इस फैसले को समग्रता में नहीं समझा गया, तो हिंदू विवाह की वैधता को लेकर अक्सर सवाल उठेंगे। न्यायालय ने जोर दिया है कि हिंदू विवाह की वैधता के लिए सप्तपदी (पवित्र अग्नि के चारों ओर सात फेरे) जैसे उचित संस्कार और समारोह जरूरी है। विवाद की स्थिति में समारोह के प्रमाण पेश करना जरूरी है। सात फेरों और समारोह का मूल्य समझाने की यह कोशिश ध्यान देने लायक है। इसमें कोई शक नहीं कि विवाह संस्कार का मूल महत्व पहले की तुलना में कम हुआ है, अब विवाह बहुतों के लिए एक दिखावा, मजबूरी या समझौता भर रह गया है। न्यायमूर्ति बी नागरत्ना ने अपने फैसले में बिल्कुल सही कहा है कि हिंदू विवाह एक संस्कार है, जिसे भारतीय समाज में एक महान मूल्य की संस्था के रूप में दर्जा दिया जाना चाहिए।
हालांकि, विवाह की पवित्रता का आभास समाज में समय के साथ घटा है और उसमें सुधार की जरूरत है। जो लोग विवाह को मात्र एक पंजीकरण मानते हैं, उन्हें चेत जाना चाहिए। उन्हें सात फेरों का अर्थ समझना होगा। सात फेरों का अर्थ समझे बिना हिंदू विवाह को नहीं समझा जा सकता और सर्वोच्च न्यायालय के ताजा फैसले में ऐसी ही समझाइश की कोशिश झलकती है। अदालत ने यह भी साफ किया है कि हिंदू विवाह एक संस्कार है और यह नाच-गाने, खाने-पीने का आयोजन नहीं है। अपेक्षित विवाह समारोह होना चाहिए, उसके बिना मात्र पंजीकरण से विवाह वैध नहीं हो जाता है। दहेज या उपहार का आदान-प्रदान भी विवाह नहीं है और इसे रोकने के लिए कानून भी लागू है। कुल मिलाकर, अगर न्यायालय का संदेश यह है कि फिजूल के तमाशे-दिखावे से बचते हुए विवाह के मूल अर्थ को समझना चाहिए, तो यह सुखद और स्वागतयोग्य है। फिर भी अदालतों को सचेत रहना होगा कि ताजा फैसले के बाद विवाह पंजीकरण का महत्व कहीं कम न हो जाए। असंख्य विवाह बहुत जरूरी होने पर या सुरक्षा की दृष्टि से ही सुनियोजित ढंग से पंजीकृत किए जाते हैं। विवाह पंजीकरण का यह रास्ता अगर बंद न हो, तो समाज में अपेक्षाकृत ज्यादा उदारता बहाल रहेगी।
हिंदू विवाह को लेकर अब ज्यादा स्पष्टता की जरूरत है। पिछले वर्षों में कुछ खास हालात की वजह से अनेक ऐसे अदालती फैसले आए हैं, जिनके बाद विवाह संबंधी नियम-कायदों को सुलझाने की जरूरत बढ़ गई है। मिसाल के लिए, एक फैसला देखिए। इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने पिछले दिनों यह माना कि हिंदू विवाह अधिनियम के अनुसार, हिंदू विवाह को संपन्न करने के लिए कन्यादान का समारोह जरूरी नहीं है। उस फैसले में भी सप्तपदी के महत्व को दर्शाया गया था। मध्य प्रदेश की एक परिवार अदालत के फैसले में महिला पक्ष को यह समझाया गया था कि सिंदूर लगाना एक विवाहित हिंदू महिला का धार्मिक कर्तव्य होता है। यह सवाल पूछा जा सकता है कि धार्मिक कर्तव्य बताने या तय करने का काम किसका है? वाकई, बदलते समय में विवाह के तमाम पुराने प्रतीकों और कर्मकांडों पर पुनर्विचार की जरूरत आन पड़ी है।
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जलवायु परिवर्तन को सीमित करने के लिए सरकारों पर दबाव बनाने का प्रयास कई जगह शुरू होता जा रहा है। हाल ही में स्विस वरिष्ठ महिला नागरिकों के एक संगठन ने जलवायु परिवर्तन को मानवाधिकारों के उल्लंघन से जोड़कर देखा है। इस पर वहाँ के मानवाधिकार न्यायालय ने इसकी रक्षा की जिम्मेदारी सरकार पर डाली है।
इस पर कुछ बिंदु –
विभिन्न समाचार पत्रों पर आधारित। 10 अप्रैल, 2024
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Date:01-05-24
More Guts for Our Food RegulatorsET Editorials
Whether food products we ingest are safe or not continues to worry us. Or, at any rate, should worry us. Recent reports by Hong Kong and Singapore food regulators of two popular Indian brands of prepackaged spice-mix products allegedly containing ethylene oxide, a carcinogenic substancedenied by both companies does raise a flag, and brows. European food authorities reportedly found the same carcinogen in 527 Indi- an food products. The US FDA, which had raised the issue of salmonella contamination in prepackaged spice mixes, is con- ducting a fresh probe. Indian Spices Board, Gol’s regulator for spice exports, is working with companies to address the issue. Between Nestlé’s ‘added sugar in infant foods’ for Indian mar- kets controversy, Food Safety and Stand- ards Authority of India (FSSAI) stopping malted beverages and mixes from being sold as ‘health’ drinks, and now l’affaire ethylene oxide, food safety is now a hotpo- tato public health topic. Reputational da- mage that can affect exports aside, repo-rts that we may be routinely consuming harmful products is worrying. More so as growing affluence is changing our food basket and habits. This makes it more ur- gent to have a robust food regulator with the right capabilities. As gatekeepers of the nation’s alimentary system, FSSAI ne- eds more guts. It now has a network of more than 200 food test- ing labs. But more needs to be done given the range of food seg- ments. Increasing accredited labs, ensuring functional state food labs, upping trained manpower and focusing on enforce- ment of norms must be prioritised. Whether to clear allegati- ons or to clamp down on non-compliance, FSSAI must coordi- nate with other food-related regulators to ensure that what we consume and sell elsewhere is safe.
Date:01-05-24
सरकार को फटकारसंपादकीय
दिल्ली उच्च न्यायालय ने सोमवार को पारित अपने आदेश में कहा है कि अरविंद केजरीवाल की गिरफ्तारी के बावजूद मुख्यमंत्री बने रहने का उनका फैसला निजी है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि स्कूली बच्चों के मौलिक अधिकारों को रौंद दिया जाए। अदालत ने दिल्ली नगर निगम के स्कूलों में बच्चों को किताबें उपलब्ध न होने के मामले में दिल्ली सरकार को फटकार लगाते हुए निगमायुक्त को निगम के स्कूली बच्चों के लिए पाठ्यसामग्री के लिए अपनी सीमा से बाहर जाकर राशि आवंटित करने का निर्देश दिया। इस काम में केजरीवाल के जेल में होने के कारण विलंब हो रहा है। कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश मनमोहन एवं जस्टिस मनमीत प्रीतम सिंह अरोड़ा की पीठ गैर-सरकारी संगठन ‘सोशल जूरिस्ट’ की जनहित याचिका पर सुनवाई कर रही थी। पीठ ने कहा कि दिल्ली व्यस्त राजधानी ही नहीं है, बल्कि उसका या किसी भी अन्य राज्य में मुख्यमंत्री का पद कोई औपचारिक पद नहीं है। यह ऐसा पद है, जहां पदधारक को बाढ़, आग और बीमारी जैसी प्राकृतिक आपदा या संकट से निपटने के लिए 24 घंटे सातों दिन उपलब्ध रहना पड़ता है। इसलिए राष्ट्रीय हित और सार्वजनिक हित की मांग है कि इस पद पर रहने वाला कोई भी व्यक्ति लंबे समय तक या अनिश्चित समय के लिए संपर्क से दूर या अनुपस्थित न रहे। बेशक, स्कूली बच्चों को पाठ्यपुस्तकों, लेखन सामग्री और वर्दी मिलने में पेश आ रही समस्याओं का अब त्वरित समधान हो सकेगा। लेकिन आने वाले दिनों में अदालत को इस तरह के तमाम फैसले देने पड़ सकते हैं, जो आम जन के सरोकार से जुड़े हो सकते हैं। कारण, जब से केजरीवाल ईडी द्वारा दर्ज धन शोधन मामले में पीएमएलए के तहत गिरफ्तार करके जेल भेजे गए हैं, तभी से दिल्ली सरकार और उससे आवंटित धन के जरिए काम चलाने वाले नगर निगम में सारा कामकाज ठप सा पड़ गया है। केजरीवाल जेल में रहते हुए मुख्यमंत्री के रूप में दायित्व निभाना चाहते हैं। इस बाबत कोई स्पष्ट नियम न होने के कारण उन्हें अपनी जिद पर अड़े रहने में मदद मिल रही है। होना तो यह चाहिए कि उन्हें अपनी पार्टी के किसी अन्य विधायक को मुख्यमंत्री की शपथ दिलवा देनी चाहिए ताकि जनता के काम न रुकें। जनता से जुड़े कार्यों में भी राजनीति होने लगेगी तो आने वाले दिनों में दिक्कतें और बढ़ने वाली हैं, और कोर्ट का दरवाजा खटखटाने वालों की संख्या बढ़ना भी तय है।
Date:01-05-24
हर साल जलने वाले जंगलों को भला कैसे बचाया जाएएस पी सती, ( प्रोफेसर, वानिकी महाविद्यालय, रानीचोरी )
शीतलता और हरियाली के प्रतीक माने जाने वाले जंगल इन दिनों धधक रहे हैं। उत्तराखंड के जंगलों में लगी आग अब इतनी विकराल हो चुकी है कि उन पर काबू पाने के लिए सेना को उतारना पड़ा है। ऐसा नहीं है कि दावानल की घटनाएं पहले नहीं होती थीं। सदियों से पहाड़ इसके गवाह रहे हैं। उत्तराखंड का इतिहास तो यह भी है कि 1920-21 में जब जंगलों पर लोगों के हक-हुकूक खत्म कर दिए गए, तब खुद लोगों ने ही आंदोलन के तहत वनों में आग लगा दिए थे। मगर अब तो हर साल दावाग्नि की समस्या विकराल रूप में सामने आने लगी है। इसकी कुछ खास वजहें हैं।
पहली वजह, जलवायु परिवर्तन के कारण ‘ड्राई पीरियड’ यानी सूखे की अवधि बढ़ गई है। तापमान बढ़ रहा है, जिसके कारण नमी कम हो रही है। नतीजतन, जंगलों में सूखी पत्तियां या टहनियां आसानी से दहक उठती हैं। वन विभाग के आंकडे़ बता रहे हैं कि इस साल 1 जनवरी से लेकर 14 फरवरी के बीच जंगलों में आग लगने की 100 से अधिक बड़ी घटनाएं हुई हैं, जिसकी एक बड़ी वजह ड्राई पीरियड और तापमान-वृद्धि है। पहले यह अवधि छोटी होती थी, लेकिन अब जनवरी-फरवरी से लेकर मई-जून तक हम इसका एहसास करते हैं। दूसरी वजह है, सन् 1980 में वन (संरक्षण) कानून में किया गया वह प्रावधान, जिसके तहत पहाड़ों पर 1,000 मीटर ऊंचाई से ऊपर हरे पेड़ों की व्यावसायिक रूप से कटाई प्रतिबंधित कर दी गई। इसका नुकसान यह हुआ कि चीड़ के पेड़ों की संख्या असीमित बढ़ गई। चीड़ दरअसल ऐसा पेड़ है, जो आग बढ़ाने में सहायक माना जाता है। मार्च-अप्रैल से चीड़ की पत्तियां सूखकर नीचे गिरने लगती हैं और तापमान में वृद्धि होने पर आग के फैलाव का एक बड़ा कारण बनती हैं। बेशक, हरे पेड़ों की कटाई बंद होनी चाहिए, लेकिन ऐसा कोई प्रावधान तय करते समय हमें यह भी सोचना चाहिए कि किन पेड़ों की कटाई बंद होनी चाहिए और किनकी नहीं। ऐसा इसलिए, क्योंकि हर पेड़ की प्रकृति अलग होती है। चीड़ को अन्य पेड़ों के समान देखना एक गलत नजरिया साबित हुआ है।
तीसरी वजह है, जंगलों से लोगों का रिश्ता खत्म हो जाना। पहले लोगों का अपने आसपास के जंगलों से करीबी रिश्ता होता था। वे वनोपज से अपना गुजारा करते थे, इसके बदले में जंगलों का प्रबंधन किया करते थे। मगर सरकार ने जैसे ही जंगल अपने हाथों में लिया, लोगों ने खुद को इससे अलग कर लिया। इसके कारण वन बढ़ते हुए गांवों तक पहुंच गए, जो दावानल की चौथी वजह है। पहले जंगल को रोकने के तमाम उपाय अपनाए जाते थे, लेकिन अब अव्वल तो पहाड़ी गांवों में लोग रहते नहीं, और जो रहते हैं, उनके घरों में एलपीजी गैस आदि की सुविधा बढ़ने से जंगलों पर उनकी निर्भरता खत्म हो गई है। नतीजतन, वे वनों को नियंत्रित करने में खास रुचि नहीं रखते। इसी कारण जंगल की आग अब रिहायशी इलाकों तक पहुंचने लगी है और वनाग्नि की विकरालता काफी ज्यादा बढ़ गई है।
ऐसा नहीं है कि इस समस्या का समाधान नहीं निकल सकता। इसके लिए सबसे पहले मजबूत इच्छाशक्ति की दरकार है, फिर सही दिशा में कदम बढ़ाना होगा। सबसे पहले 1980 के वन (संरक्षण) कानून के प्रावधान ठीक करने होंगे। इसमें 1,000 मीटर की ऊंचाई के ऊपर हरे पेड़ों की कटाई संबंधी प्रतिबंध तत्काल खत्म किए जाने चाहिए। विशेषकर चीड़ के संबंध में तो इसे जरूर हटाना चाहिए और ऐसा प्रावधान करना चाहिए कि चीड़ की कटाई हो सके। इसके साथ-साथ गांव बसाने की तरफ भी ध्यान देना अनिवार्य है। गांवों में आबादी को इतना जागरूक करना ही होगा कि वे पहले की तरह जंगलों का प्रबंधन अपने हाथों में ले लें।
तीसरा रास्ता है, वन विभाग को सक्रिय बनाना। पहले यह विभाग जंगलों का प्रबंधन किया करता था, फिर इस पर वन-संरक्षण की जिम्मेदारी डाल दी गई। इसको प्रबंधन का अपना कर्तव्य निभाना चाहिए। अच्छी बात है कि सरकार अपने तईं कुछ प्रयास कर रही है, पर उसका खास असर नहीं पड़ रहा, इसलिए उसका बहुत फायदा नहीं दिखता। जाहिर है, हमें बुनियादी उपाय करने होंगे, तभी हम जंगलों को जलने से बचा पाएंगे।
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एक अभूतपूर्व कदम उठाते हुए, विश्व एथलेटिक्स ने पेरिस ओलंपिक में 48 ट्रैक और फील्ड स्वर्ण पदक विजेताओं में से प्रत्येक को 50,000 डॉलर की पुरस्कार राशि प्रदान करने का निर्णय लिया है।
अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति को समय के साथ चलते हुए कमजोर महासंघों को उनकी विशिष्टताओं में समान पुरस्कार राशि देने में मदद करनी चाहिए।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 12 अप्रैल, 2024
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Date:27-04-24
Quality Matters in the Knowledge FactoryET Editorials
Earlier this month, UGC announced that students with 4-year undergrad degrees and 75% aggregate marks or equivalent grades can now sit for the National Eligibility Test (NET) to qualify for a PhD programme. Earlier, NET candidates were required to hold a master’s degree with a minimum of 55% marks. Two reasons have been cited for this change: the new system will simplify the process for students and open many research opportunities. ‘We will have a lot of young people getting into research at a very young age and they’re really creative,’ explained UGC chairman M Jagadesh Kumar.
On the face of it, the decision seems alright, ostensibly ‘democratising’ access to research opportunities. But there could be aproblem. The rush to incorporate undergrads into PhD programmes could undermine research quality. Pursuit of a doctoral degree demands more than ‘creativity’. It requires rigorous critical thinking, methodological thoroughness and originality of thought. This requires going through a certain experiential period. A 2-year MA degree — MPhil was scrapped earlier — is an excellent time to prep for a PhD. Besides, completing a PhD is not just about writing a thesis but also about making a meaningful contribution to a field. Absence of empirical data to substantiate supposed benefits of the new policy doesn’t help. Transparent communication about expected outcomes and potential challenges is essential to build trust in any education system.
India wants to be a knowledge economy. The focus should not be solely on quantity — more PhD holders — but also on nurturing a culture of quality and intellectual inquiry without cutting corners. Quality needs to be paramount, even as efforts are made to enhance accessibility and inclusivity
Date:27-04-24
चिप मेकर बनने के लिए हर स्तर पर तैयारी जरूरीसंपादकीय
उद्योगपति इलॉन मस्क का ‘व्यस्तता’ के कारण भारत यात्रा रद्द करने के एक हफ्ते बाद ही चीन जाकर निवेश विस्तार की बात कहना चिंतनीय है। अमेरिका-चीन तनाव के बाद दुनिया को 90 फीसदी चिप सप्लाई करने वाला ताइवान अपने सभी उपक्रम चीन से भारत शिफ्ट करना तो चाहता है लेकिन उसकी चार शिकायतें हैं- भारत में जटिल प्रशासनिक ढांचा, अनुभवी इंजीनियर्स की कमी, कंपोनेंट आयात पर भारी शुल्क और कमजोर इंफ्रास्ट्रक्चर। हालांकि सरकार ने एक समर्पित टास्क फोर्स ( इंडिया सेमी कंडक्टर मिशन) का गठन किया है और टाटा-पीएसएमसी के साझा प्रयास के तहत पहली फाउंडरी (फैक्ट्री ) तैयार हो रही है। माइक्रोन कंपनी भी पैकेजिंग इकाई लगा रही है। लेकिन ताइवानी कंपनियों की चिंता को फौरन दूर करना और भरोसा दिलाना सरकार के लिए जरूरी है। यह सच है कि भारत में इंजीनियर्स का कौशल मूल और शोध – निष्ठ नहीं है । ताइवान, चीन, इजराइल और अमेरिका आज भी शोध के स्तर पर भारत पर पूरा भरोसा नहीं रख सकते। चूंकि भारत में शोध पर जीडीपी का मात्र 0.6% ही खर्च होता है इसलिए आईआईटी जैसी प्रीमियम संस्थाएं आज भी इस क्षेत्र में अपना स्थान नहीं बना सकी हैं। तमिलनाडु में हुई ‘ग्लोबल मीट’ में एक्सपर्ट्स ने सलाह दी कि भारत सरकार मैन्युफैक्चरिंग की जगह डिजाइन पर जोर दे । क्षमता को लेकर सवाल तो हैं, लेकिन इतने बड़े देश में कोरोना में सरकारी तंत्र की वैक्सीन निर्माण- टीकाकरण और फ्री-राशन वितरण में सराहनीय भूमिका देखकर कहा जा सकता है कि मिशन मोड में यह तंत्र बेहतर आउटपुट देता है। उच्च स्किलिंग का प्रयास भी अगर मिशन मोड में हो तो भारत के इंजीनियर्स भी कमाल कर सकते हैं। फिर विकल्पहीन भारत के पास ‘करो या मरो’ की स्थिति है क्योंकि एआई, उत्पादन या गवर्नेस ही नहीं जीवन के हर आयाम में इस्तेमाल होने जा रहा है। क्या यह मौका गंवाना उचित होगा?
Date:27-04-24
आकड़ो के अभाव में असंतुलित विमर्शशिवकांत शर्मा, ( लेखक बीबीसी हिंदी के पूर्व संपादक हैं )
भारतीय चुनावों में जातीय और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण और सत्ता के दुरुपयोग के आरोप-प्रत्यारोप आम हैं, परंतु क्या इनकी भूमिका निर्णायक होती है? अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के पूर्व कार्यकारी निदेशक और प्रख्यात अर्थशास्त्री डा. सुरजीत भल्ला का कहना है कि जीवन में सुधार को लेकर लोगों की राय और नेतृत्व पर भरोसे की भूमिका सबसे बड़ी होती है। अपनी पुस्तक ‘हाउ वी वोट’ में उन्होंने पिछले सात दशकों के आंकड़ों की सहायता से सिद्ध करने का प्रयास किया है कि युद्ध और आतंक जैसी विपदाओं को छोड़ दें तो मतदाताओं के फैसले का 70 प्रतिशत उसकी इसी धारणा पर निर्भर करता है कि कौनसा नेतृत्व उसके जीवन में सुधार ला सकता है। यह सुधार नागरिक सुविधाओं के बिना संभव नहीं है और ऐसी सुविधाएं आर्थिक विकास के बिना संभव नहीं। डॉ भल्ला के आंकड़े दिखाते हैं कि कोविड महामारी की मार के बावजूद पिछले पांच वर्षों में आर्थिक विकास में तेजी के साथ-साथ आर्थिक विषमता का ह्रास भी हुआ है।
अर्थशास्त्रियों और समाजशास्त्रियों के निष्कर्ष मुख्यत: आंकड़ों पर आधारित होते हैं। आंकड़ों के बिना उपयोगी नीतियां नहीं बन सकतीं, पर आंकड़ों को लेकर दो समस्याएं हैं। पहली विश्वसनीयता की और दूसरी व्याख्या की। सरकारें आंकड़ों में मिलावट कर सकती हैं या उन्हें गढ़ भी सकती हैं, लिहाजा उनके आंकड़े पूरी तरह भरोसेमंद नहीं। अंतरराष्ट्रीय और गैर-सरकारी संस्थाओं के आंकड़ों के अपने निहितार्थ होते हैं। आंकड़े विश्वसनीय होने पर भी उनकी व्याख्या से परस्पर विरोधी निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं। आंकड़ों की विश्वसनीयता और व्याख्या की इन्हीं चुनौतियों को देखते हुए बहुत से लोकतांत्रिक देशों ने आर्थिक एवं सामाजिक आंकड़ों को एकत्र करने और उनकी वस्तुनिष्ठ व्याख्या के लिए केंद्रीय बैंकों की तरह की स्वायत्त संस्थाएं बना रखी हैं। ये संस्थाएं सरकार और विपक्ष की बजट और कराधान नीतियों, उनके प्रभावों, अर्थव्यवस्था, कर्ज, बेरोजगारी, महंगाई और विकास दर जैसे महत्वपूर्ण पहलुओं के आंकड़े और उनकी व्याख्या करती हैं और समय-समय पर सरकार और विपक्ष को उनकी नीतियों और उनके संभावित प्रभावों के प्रति सचेत करती हैं।
ब्रिटेन की ऐसी ही स्वायत्त संस्था का नाम ओबीआर या बजट दायित्व कार्यालय है। इसकी स्थापना 2010 में ब्रिटेन के सार्वजनिक वित्तप्रबंधन का तटस्थ और प्रामाणिक विश्लेषण करने के लिए की गई थी। यह सरकार और विपक्ष की राजस्व नीतियों का विश्लेषण करते हुए अर्थव्यवस्था के विभिन्न क्षेत्रों और समाज के विभिन्न वर्गों पर उनके संभावित प्रभाव का पूर्वाकलन करती है। इसकी वजह से राजनीतिक दल उन लोकलुभावन वादों से बचते हैं, जिनके लिए धन जुटाने की कारगर योजना उनके पास न हो। मीडिया और गैर-सरकारी संस्थाएं भी उसके आंकड़ों और आकलन का भरोसे के साथ इस्तेमाल कर सकती हैं। ऐसी तटस्थ संस्थाएं यूरोप, अमेरिका, कनाडा, आस्ट्रेलिया समेत कुल 37 देशों में हैं, जिन्हें राजस्व निगरानी समिति या परिषद कहा जाता है। अमेरिका में बजट नीतियों की समीक्षा और अनुमोदन चूंकि संसद ही करती है, इसलिए वहां ऐसी अलग संस्था की जरूरत नहीं है। यहां तक कि ईरान, केन्या, दक्षिण अफ्रीका, मेक्सिको और चिली में भी राजस्व नीतियों पर निगाह रखने वाली स्वायत्त संस्थाएं हैं, परंतु भारत में नहीं हैं, जहां ऐसी स्वायत्त संस्थाओं की जरूरत केंद्र ही नहीं, हर राज्य में है। स्वायत्तता के लिए इन्हें रिजर्व बैंक का हिस्सा भी बनाया जा सकता है।
भारत में जिस तरह संवैधानिक संस्थाओं का राजनीतिक विरोध बढ़ रहा है, उसके चलते संभव है कि स्वायत्त बजट निगरानी संस्था का भी विरोध हो। इसके बावजूद गैर-जिम्मेदाराना लोकलुभावनवाद पर अंकुश लगाने के लिए यह जरूरी है। अन्यथा राजस्व का अधिक भाग आर्थिक विकास को गति देने वाले बुनियादी विकास के उत्पादक कामों पर खर्च होने की जगह सब्सिडी और नकद भत्ते जैसे अनुत्पादक कामों पर खर्च होने लगेगा। ऐसी संस्था होती तो सरकार से पूछ सकती थी कि अगले पांच वर्ष तक तीन चौथाई आबादी को पांच किलो मुफ्त राशन देने का क्या तुक है? इस पर खर्च होने वाले करीब दो लाख करोड़ को उद्योगों के विकास में लगाकर रोजगार क्यों नहीं बढ़ाए जा रहे या फिर इस पैसे को गरीबी रेखा से नीचे के लोगों में बांटकर गरीबी का उन्मूलन क्यों नहीं किया जा रहा? इसी तरह कांग्रेस से पूछा जा सकता था कि 30 लाख सरकारी नौकरी, हर स्नातक और हर गरीब परिवार की महिला को एक-एक लाख प्रतिवर्ष और एमएसपी की गारंटी जैसे वादों को पूरा करने के लिए लगभग 10 लाख करोड़ प्रतिवर्ष कहां से आएगा? अगर विरासत कर लगाएंगे तो उसकी दर क्या होगी? मकान और धन-संपत्ति पर ही टैक्स लगेगा या जमीन पर भी? ऐसे टैक्स का रियल एस्टेट कारोबार पर क्या असर हो सकता है और लगभग कितना राजस्व मिल सकता है? उससे आर्थिक नुकसान अधिक होगा या कर की आमद? अमेरिका में केंद्र सरकार विरासत कर नहीं, बल्कि संपत्ति कर लेती है। संपत्ति कर लगभग सौ करोड़ रुपये से ऊपर की संपत्ति पर लगता है। विरासत कर मात्र छह राज्य सरकारें लगाती हैं, जिससे बचने के लिए लोग संपत्ति बेचकर दूसरे राज्यों में चले जाते हैं। ब्रिटेन में सवा तीन करोड़ से ऊपर की संपत्ति पर 40 प्रतिशत की दर से विरासत कर लगता है।
महंगाई और बेरोजगारी का मुद्दा भले अपने आप में निर्णायक न हो, लेकिन यह सीधे तौर पर जीवन में सुधार लाने से जुड़ा है, इसलिए हमेशा चर्चा में रहता है। महंगाई, बेरोजगारी, गरीबी और रुपये की हैसियत को लेकर तमाम आंकड़े उछाले जा रहे हैं। यदि स्वायत्त आंकड़ा संस्था होती तो उसके आंकड़े संतुलित विमर्श का आधार बन सकते थे। मुफ्त राशन लोगों की गरीबी का परिचायक है या एमएसपी की खरीद से सरकार के मत्थे पड़े अनाज के सही उपयोग का? रुपया संप्रग सरकार की तुलना में अधिक गिरा या कम? लोगों का जीवन स्तर सुधरा है या गिरा? कृषि सुधार न होने से किसानों और देश का फायदा हुआ या नुकसान? ऐसे बहुत से मुद्दे हैं जो जीवन सुधार की धारणा बनाने में मदद करते हैं और चुनाव में निर्णायक भूमिका निभाते हैं। प्रामाणिक आंकड़ों के बिना इन पर सार्थक विमर्श संभव नहीं हो पाता। यूरोप जैसी स्वायत्त संस्था ही इसे संभव बना सकती है।
Date:27-04-24
कितना सच्चा कितना झूठाअवधेश कुमार
कांग्रेस के रणनीतिकारों का जो भी मानना हो, लेकिन उसके विचार एवं व्यवहार इन दिनों लगातार आम व्यक्ति को हैरत में डालते हैं। संपत्तियों के सर्वे और वितरण संबंधी विवाद कांग्रेस की स्वयं की देन है। इसे लेकर मचे बवंडर के बीच विदेश में कांग्रेस पार्टी की इकाई ओवरसीज कांग्रेस ऑफ इंडिया के प्रमुख सैम पित्रोदा ने उत्तराधिकार कर का बयान देकर इसे लोक सभा चुनाव के एक बड़े मुद्दे के रूप में स्थापित कर दिया है।
स्वाभाविक है कि जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी सहित समूची भाजपा कांग्रेस पर यह आरोप लगा रही है कि वह लोगों के घरों में घुसकर संपत्तियों का सर्वे करेगी तथा समान वितरण के नाम पर अपने चाहत के अनुरूप समुदाय विशेषकर मुसलमानों के बीच बांट देगी उस समय यह बयान बवंडर को और बढ़ने वाला ही साबित होना था। सैम पित्रोदा के बयान को व्यक्तिगत कह कर खारिज करना आसान नहीं है। आखिर वह कांग्रेस पार्टी के पदाधिकारी हैं। और सोनिया गांधी परिवार के निकटतम लोगों में माने जाते हैं। राहुल गांधी को नरेन्द्र मोदी के समानांतर विदेशों में प्रोजेक्ट करने, जगह-जगह उनका भाषण और पत्रकार वार्ता करने की पूरी कमान उनके हाथों होती है। वह कह रहे हैं कि जब हम सामान वितरण की बात करते हैं तो हमें अमेरिका जैसे ‘इन्हेरिटेंस टैक्स’ यानी ‘उत्तराधिकार कर’ पर भी विचार करना चाहिए। उनके अनुसार यहां कई राज्यों में पिता की मृत्यु के बाद संपत्ति की विरासत संभालने वाले को 55 फीसद तक कर दे कर उसके हिस्से शेष 45 फीसद आता है। इससे स्वाभाविक ही यह शंका गहरी हुई कि कांग्रेस सत्ता में आने पर वाकई विरासत कर भी लगा सकती है।
अगर राहुल गांधी ने अपने भाषणों और वक्तव्यों में लगातार जाति जनगणना के साथ वित्तीय एवं आर्थिक सर्वे की बात नहीं करते तो प्रधानमंत्री मोदी या भाजपा को इसे इतना बड़ा मुद्दा बनाने का अवसर नहीं मिलता। उनके भाषण और वक्तव्य सार्वजनिक रूप से उपलब्ध हैं, जिनमें वह कह रहे हैं कि हम सत्ता में आने पर जाति जनगणना करेंगे और उसके बाद क्रांतिकारी कदम उठाएंगे, संपत्ति के समान वितरण के लिए वित्तीय सर्वेक्षण करा कर देखेंगे कि किसके पास किस वर्ग के पास कितनी संपत्ति है। इसके बाद जितना जिसका हक होगा उतना उसको दिया जाएगा। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे सहित कांग्रेस पार्टी के अंदर कोई यह कहने को तैयार नहीं है कि हम वित्तीय और आर्थिक सर्वे नहीं करेंगे तथा समान वितरण की भी बात हमारे एजेंडे में नहीं है। इसकी बजाय कांग्रेस के नेता प्रवक्ता लगातार भारत में उद्योगपतियों, अरबपतियों को निशाना बनाते हुए इनमें से कुछ के हाथों धन सिमट जाने के वक्तव्य दे रहे हैं। चूंकि राहुल गांधी अपनी घोषणा पर कायम हैं और कांग्रेस इससे पीछे नहीं हट रही तो सैम पित्रोदा के उत्तराधिकार कर से देश में भय पैदा हो गया है। कुछ लोगों ने तो यह भी तलाश लिया कि पहले भी भारत ने विरासत कर था और स्वयं पित्रोदा कोई नई बात का नहीं कह रहे हैं। प्रकारांतर से यह स्वयं पित्रोदा के विचार का समर्थन करना ही है।
यह अंग्रेजों का बनाया हुआ कानून था जो व्यवहार में नहीं उतर पाया तथा सरकारी विभागों में इतनी मुकदमे हुए जिनके खर्च उससे प्राप्त से ज्यादा हो गया। हालांकि प्रधानमंत्री का आरोप है। कि राजीव गांधी के प्रधानमंत्रीत्व काल में उसे इसलिए हटाया गया, क्योंकि उन्हें बिना कर दिए अपनी मां की संपत्ति का उत्तराधिकार लेना था। यह ऐसा मुद्दा आरंभिक दिनों में मेनका गांधी ने उठाया था। बहरहाल, भले अर्थव्यवस्था, समाज और देश के बारे में समझ रखने वाले इसे उचित न मानें, लेकिन कांग्रेस के अंदर भाव यही है कि राहुल गांधी की इन घोषणाओं आम लोगों पर बड़ा प्रभाव है और उन्हें लगता है कि कांग्रेस सत्ता में आई तो देश के धनी और संपन्न लोगों की संपत्तियां लेकर हमारे बीच बांटा जाएगा। पांच न्याय और 25 गारंटी में कांग्रेस ने ऐसी- ऐसी बातें की है जिनको धरातल पर उतारना भारतीय अर्थव्यवस्था के बूते की बात नहीं है, लेकिन इस समय कांग्रेस के थिंक टैंक या सोनिया गांधी परिवार को सुझाव देने वाले मानते हैं कि कांग्रेस को पुराने वामपंथियों की तरह क्रांतिकारी तेवर धारण करना चाहिए तभी वह अपना खोया हुआ जनाधार वापस ला सकती है तथा भाजपा को हरा सकती है। सैम पित्रोदा ने जो कहा है वह इसी सोच का विस्तार है। अमेरिका पूंजीवादी देश है, लेकिन क्रांति हुए बिना वहां वामपंथियों की ताकत हमेशा सशक्त रही है। वहां ये सत्ता, प्रशासन, न्यायपालिका, मीडिया से लेकर पूरे थिंक टैंक पर हावी हैं।
वहां के बड़े-बड़े पूंजीपति जिनमें जार्ज सोरोस जैसे लोग शामिल है, भी अपने प्रकट लक्ष्यों और घोषणाओं में आधुनिक वामपंथी ही है। उनकी दृष्टि की लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था में उनकी ही सोच की अर्थव्यवस्था, समाज के बीच संपत्ति का विभाजन, अल्पसंख्यकों के विशेषाधिकार आदि के लक्ष्य से भारत जैसे विकासशील देश में बदलाव के लिए अपने थिंक टैंक विकसित करते हैं और ऐसे लोगों को आगे बढ़ाने में मदद करते हैं। इसलिए यह मानने का कोई कारण नहीं है कि राहुल गांधी, कांग्रेस के दूसरे नेता या सैम पित्रोदा के साथ उनके संवाद नहीं होंगे। इस अतिवादी वाम सोच में ही अल्पसंख्यकों के लिए वैसे विशेष प्रावधानों की घोषणाएं हैं। जिन्हें देखकर भाजपा के लिए यह आरोप लगाना आसान हो गया है कि संपत्ति के सर्वे के पीछे राहुल गांधी और कांग्रेस का इरादा अल्पसंख्यकों के नाम पर मुसलमानों के बीच ही उसे वितरीत करना है।
पहली दृष्टि में कहा जा सकता है कि भाजपा जानबूझकर कांग्रेस को मुस्लिमपरस्त साबित करने के लिए ऐसा कर रही है, किंतु कांग्रेस ने अभी तक इस बात का खंडन नहीं किया है कि उसकी मंशा मुसलमानों को विशेष तौर पर धन के वितरण में या आरक्षण आदि में शामिल करना नहीं है। वर्तमान युग में अपनी क्षमता, प्रतिभा की बदौलत उत्तरोत्तर आर्थिक प्रगति पर किसी भी बंधन की स्वीकार्यता नहीं है। इससे समाज के विकसित होने की मानसिकता कमजोर होती है तथा यह पूरे देश की प्रगति को उल्टी दिशा में मोड़ना है। इस तरह की सोच से भयावह अराजकता और उथल-पुथल की स्थिति पैदा होगी, जिसे संभालना कठिन होगा। चूंकि चुनाव के बीच यह मुद्दा आ गया है इसलिए देश के लोगों को तय करना है कि वह इसके साथ है या विरोध में।
Date:27-04-24
न्याय में तेजी लाएंगे तीन नए कानूनविभूति नारायण राय, पूर्व आईपीएस अधिकारी
देश अपनी अठारहवीं लोकसभा को चुनने में व्यस्त है और चुनावों के शोर-शराबे में एक महत्वपूर्ण चर्चा गुम हो गई है। शनिवार 20 अप्रैल को राजधानी नई दिल्ली के एक सेमिनार में बोलते हुए देश के प्रधान न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ ने एक महत्वपूर्ण घटनाक्रम को इंगित करते हुए कहा कि हाल में भारतीय संसद में पारित तीन नए कानूनों – भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम के साथ भारत का आपराधिक न्याय संबंधी कानूनी ढांचा एक नए युग में प्रवेश कर रहा है। यहां यह उल्लेख करना प्रासंगिक होगा कि ये तीनों कानून पहली जुलाई से अस्तित्व में आ जाएंगे। खुद प्रधान न्यायाधीश के शब्दों में, ‘मैं समझता हूं कि संसद द्वारा इन तीन नए कानूनों को पारित करने से यह स्पष्ट संदेश मिलता है कि भारत अब बदल रहा है। भारत आगे बढ़ रहा है और हमें अपने समाज के भविष्य के समक्ष आने वाली रोजमर्रा की चुनौतियों से निपटने के लिए नए कानूनी औजारों की जरूरत है।
प्रधान न्यायाधीश ने प्रचलित के स्थान पर नए कानूनों के पारित होने को एक ऐतिहासिक क्षण बताया, क्योंकि उनके शब्दों में ‘दूसरे कोई भी कानून हमारे समाज की रोजमर्रा की गतिविधियों को इन फौजदारी कानूनों से अधिक प्रभावित नहीं करते।’
ऐसा क्या है इन तीन संशोधित कानूनों में, जिनके चलते प्रधान न्यायाधीश को इनका संसद में पारित किया जाना युगांतकारी लगा? इसके लिए जरूरी है कि जिन तीन कानूनों की जगह ये नए कानून ले रहे हैं, उनकी पृष्ठभूमि, उद्देश्य और दीर्घकालीन भूमिका को समझ लिया जाए। साल 1857 के विद्रोह को दबाने और ईस्ट इंडिया कंपनी से शासन अपने हाथ में लेने के बाद ब्रिटिश शासकों को संसद द्वारा पारित ऐसी संहिताओं की जरूरत महसूस हुई, जिनसे वे अपना शासन तो सुरक्षित कर ही लें और साथ यह भी दावा कर सकें कि उनकेउपनिवेश भारत में कानून और कायदे का राज्य है। इसी मकसद से 1860 के दशक में तीन महत्वपूर्ण कानून भारतीय दंड संहिता (आईपीसी), दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम (इंडियन एवीडेंस ऐक्ट) ब्रिटिश संसद से पारित होकर, कुछ अपवादों को छोड़कर, देश भर में लागू किए गए।
इन कानूनों को बनाने के पीछे मुख्य उद्देश्य तो 1857 जैसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकना और दुनिया को ब्रिटिश राज्य के न्याय प्रिय होने का संदेश देना था, पर इनके चलते भारतीय समाज ने अभूतपूर्व सांस्कृतिक झटके महसूस किए। यह पहला मौका था, जब वर्णाश्रम पर आधारित इस समाज में न्याय के सामने सभी नागरिक समान समझे जाने वाले थे। समान अपराध के लिए ब्राह्मण और शूद्र को एक समान दंड मिलता और दोनों की गवाही की कीमत भी समान होती। मैकाले की बनाई दंड संहिता बहुत ही विस्तृत और मानव जीवन के हर पहलू को छूने वाली थी। यह हुआ भी, पर तेजी से बदलती दुनिया में कोई भी व्यवस्था डेढ़ सौ वर्षों से अधिक समय तक अपरिवर्तनीय नहीं रह सकती। एक औपनिवेशिक शासन के सुदृढ़ बने रहने में मदद करने के लिए बनाई गई संहिताओं ने बखूबी अपनी भूमिका निभाई, पर क्या एक स्वतंत्र भारत में इन्हें बदला नहीं जाना चाहिए था? विकास के पथ पर तेजी से बढ़ने की कोशिश करने वाले समाज में स्वाभाविक रूप से बड़ी आर्थिक हलचलें होनी थीं और इनसे आर्थिक अपराधों की नई श्रेणियां निर्मित होनी थीं। बहुत सारी उप-राष्ट्रीयताओं को एक बड़ी राष्ट्रीयता में समाहित करने की दुष्कर प्रक्रिया भी लंबी खिंचनी थी। इन सबसे अधिक पराधीनता में रहने के आदी नागरिकों के विशाल समूह को किसी स्वतंत्र गणतांत्रिक समाज का नागरिक बनाना भी कोई आसान काम नहीं था। इन सबके लिए जरूरी था कि हमारे कानूनों को बदलते यथार्थ के अनुकूल बनाया जाए। यह अलग बात है कि आजादी हासिल करने के 75 वर्षों बाद ही ये बहुप्रतीक्षित परिवर्तन हो सके।
हममें से जिनका भी साबका भारतीय न्याय प्रणाली से पड़ा है, उनमें से शायद ही किसी के अनुभव सुखद रहे हों। एक अनुभव जिससे सभी सहमत होंगे कि न्याय हासिल करने की पूरी प्रक्रिया बड़ी उबाऊ और थका देने वाली होती है। दीवानी मुकदमों में तो कहावत ही है कि किसी भी वाद का फैसला तीसरी पीढ़ी में होता है। फौजदारी अदालतों की रफ्तार का अंदाजा सिर्फ एक प्रकरण से लगाया जा सकता है। पूर्वी उत्तर प्रदेश के माफिया मुख्तार अंसारी के खिलाफ जब पहला आपराधिक मुकदमा दर्ज हुआ, तब उसकी उम्र 17 साल थी और जब उसे पहली सजा मिली, उसकी उम्र 57 साल हो चुकी थी। नए कानूनों के अनुसार, किसी फौजदारी मुकदमे में तीन साल के अंदर फैसला हो जाना चाहिए। यह एक बड़ी चुनौती होगी, क्योंकि आज के दिन तो पीड़ित को छोड़कर सारे भागीदारों-जिम्मेदारों की दिलचस्पी मुकदमे को लंबा खींचने में होती है। न्याय के इन भागीदारों में पुलिस, वादकारी, वकील सभी शरीक हैं। न्यस्त स्वार्थ कोई न कोई नुक्ता तलाश कर मुकदमे की कार्यवाही को लंबा घसीटते रहते हैं और नतीजतन मुख्तार अंसारी जैसे धनवान बाहुबली दशकों छुट्टे घूमते रह सकते हैं। यह देखना दिलचस्प होगा कि नई व्यवस्था कैसे फैसलों के लिए तीन साल की अवधि सीमा लागू करवा सकेगी।
गृह मंत्री अमित शाह और उनके मंत्रालय को जहां वर्षों की जद्दोजहद के बाद पुरानों को बदलकर नए कानून लाने की शाबाशी मिलनी चाहिए, वहीं उन्हें न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ की यह सलाह भी याद रखनी होगी कि 1 जुलाई से लागू होने वाले इन कानूनों की सफलता या सार्थकता इन्हें लागू करने वालों की इच्छाशक्ति और नेकनीयती पर निर्भर करेगी। न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ के अनुसार, इनके सफल कार्यान्वयन के लिए जरूरी है कि हम अपने फोरेंसिक विशेषज्ञों की क्षमता वृद्धि के लिए पर्याप्त निवेश करें, विवेचनाधिकारियों के प्रशिक्षण की व्यवस्था करें और अदालती निजाम को सुधारने के लिए संसाधनों की कमी न होने दें। उनके अनुसार, नए कानूनों का सकारात्मक प्रभाव दिखाने के लिए बिना विलंब अधिकतम निवेश करने की जरूरत है। यदि हम विश्वस्तरीय आधारभूत ढांचे बनाने का दावा कर सकते हैं, तो कोई भी कारण नहीं कि हम विश्वस्तरीय अदालतें, पुलिस तंत्र या जेलें क्यों नहीं बना सकते? इनके लिए हमें बड़े पैमाने पर निवेश करने होंगे, पर इससे कौन इंकार करेगा कि विशाल भारतीय जनता को सुगम न्याय दिलाने के लिए यह करना कोई महंगा सौदा नहीं होगा।
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हाल ही में उच्च न्यायालय ने भारतीय पक्षी ग्रेट इंडियन बस्टर्ड के मुख्य आवास को बचाने के लिए एक विशेषज्ञ समिति बनाई है। यह समिति पारिस्थितिकी संरक्षण के साथ विकास का संतुलन बैठाने में सही निर्णय ले सकेगी।
कुछ बिंदु –
इस प्रकार के बड़े लक्ष्यों की प्राप्ति के लिए अन्य जीवित प्राणियों की हानि नहीं की जा सकती है। न्यायालय का कदम इसी दृष्टिकोण को सामने रखता है।
‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 9 अप्रैल, 2024
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Date:27-04-24
Welcome to the Great Indian IndoorsMore care, money being invested in our homesET Editorials
A new breed of upper middle-class buyers has emerged that is scaling up demand for premium housing across the country. India’s housing market remained subdued in a decade till Covid struck, which brought home the need for better living conditions to white-collar workers who had moved ahead in the affordability race. The pandemic underscored the need for larger spaces where family members could get on with their daily routines without getting in each other’s way. This trend has endured post-pandemic and houses have become larger in gated communities, with an expanding list of add-on features for work and living.
This changes the country’s property market because the feature sets most in demand are unavailable in city centres, and move to the suburbs is adding to the boom in commuter car-buying. The complementary demand for upscale houses and cars soaks up a big chunk of premiumisation of consumption in the country that is driving a retail credit boom and feeding India’s economic recovery amidst aturbulent external environment. The trend is catching on in smaller cities that are witnessing asurge in growth as economic activity radiates outwards from India’s infrastructure-challenged metropolises. Permanent changes are underway across the country about what middle-class Indians expect from interiors of their homes and their neighbourhoods.
Greater value addition to India’s housing stock has favourable multiplier effects. The median age of the population is approaching the point when demand for new housing peaks and the property market seems set for a sustained boom. Rising real income levels in the top consuming classes and an acceleration in urbanisation on improved connectivity are additional drivers. Property developers, too, are seeking better margins through premium features in areas with lower land prices. Premiumisation is actually bringing India’s housing market closer to equilibrium by opening up cheap land parcels to urbanisation. The same holds for items and services — such as tech devices, appliances and furnishings — in this new boom in India’s burgeoning indoors.
Date:29-04-24
Towards green growthThe RBI must assess the impact of climate change on economic stability.Editorial
A notable feature of the Reserve Bank of India’s (RBI’s) latest Monetary Policy Report (included in its April Bulletin) is the primacy given to “extreme weather events” and “climate shocks” affecting not only food inflation but also likely having a broader impact on the natural rate of interest, thereby influencing the economy’s financial stability. Natural, or neutral, rate of interest refers to the central bank’s monetary policy lever, which allows it to maintain maximum economic output, while keeping a check on inflation. The report mentions a “New-Keynesian model that incorporates a physical climate risk damage function” being used to estimate the “counterfactual macroeconomic impact of climate change vis-à-vis a no climate change scenario”. The report’s authors go on to warn that the “long-term (economic) output” could be lower by around 9% by 2050 in the absence of any climate mitigation policies. They ominously add that ‘if inflation hysteresis gets entrenched, it may lead to a de-anchoring of inflation expectations, and the undermining of the central bank’s credibility would warrant higher interest rates to curb inflation, leading to greater output loss’.
Beginning with its July 2022 discussion paper on ‘climate risk and sustainable finance’, the RBI has made incremental progress to address the transition to a green economy, even while admitting that India requires over $17 trillion to achieve its net zero ambitions by 2070. Its peers in advanced economies, most notably the European Central Bank, have aided the formulation of a green taxonomy for the entire Eurozone’s economic value chain. A green taxonomy is a framework to assess the sustainability credentials and possible ranking of an economic activity. The RBI and the Finance Ministry could take inspiration from the developing world, especially the ASEAN region, where a layered green taxonomy as a living document keeps getting updated with sectoral views of possible sustainable trajectories. While the issuance of ₹16,000 crore worth of Sovereign Green Bonds and expanding the resource pool by allowing Foreign Institutional Investors to participate in future green government securities are welcome steps, the RBI must undertake a thorough-going assessment on the quantitative and qualitative impact on economic and financial stability due to climate change. It must encourage administrative consultation to begin populating a layered green taxonomy that is reflective of India’s fragmented developmental trajectories. The effort should be to mitigate the transitional risks to the financial system as the economy moves towards a sustainable future.
Date:29-04-24
विरासत कर का बेतुका विचारविवेक देवराय और आदित्य सिन्हा, ( देवराय प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के प्रमुख और सिन्हा परिषद में ओएसडी-अनुसंधान हैं )
स्वतंत्रता के बाद से भारत में समाजवादी सोच के चलते संपदा सृजन को एक समस्या के रूप में देखा गया। समय-समय पर विशेष रूप से चुनावों के दौरान संपदा सृजन को नियंत्रित किए जाने के विचार सामने आते रहते हैं। इसी कड़ी में विरासत कर को लेकर एक बार फिर बहस छिड़ी है। यह स्थिति तब है जब संपदा सृजन को आर्थिक वृद्धि एवं नवाचार का उत्प्रेरक माना जाता है, जिससे लोगों का जीवन स्तर सुधरता है। इसलिए उसे गलत रूप में पेशकर भयादोहन नहीं किया जाना चाहिए। जब व्यक्तिगत एवं संस्थागत दायरे में संपदा सृजन होता है तो उसके पुनर्निवेश से रोजगार सृजन एवं तकनीकी प्रगति की राह खुलती है। इस चक्र से नए उद्योगों की वृद्धि, रोजगार सृजन में बढ़ोतरी और ऊंचे कर राजस्व के जरिये बेहतर सार्वजनिक सेवाएं सुनिश्चित होती हैं। संपदा सृजन के माध्यम से ही निम्न-आय पृष्ठभूमि के लोगों के लिए ऊंचे वेतन वाली नौकरियों की राह खुलती है तो सफल उद्यमियों को शैक्षणिक गतिविधियों एवं सामुदायिक परियोजनाओं में निवेश के लिए प्रोत्साहन मिलता है। इससे सामाजिक व्यवस्था गतिमान रहती है। स्थानीय विकास और सशक्तीकरण से उपलब्धियों एवं उद्यमिता की प्रगतिशील संस्कृति का भी विकास होता है।
समय के साथ भारत ने व्यापक आर्थिक प्रगति की है और इस प्रक्रिया में कुछ विषमता की स्थिति भी उत्पन्न हुई है, जिसे दूर करने के लिए गाहे-बगाहे विरासत कर का सुझाव दिया जाता है। इतिहास गवाह है कि मध्य वर्ग और गरीबों के उत्थान के लिए लाई जाने वाली ऐसी नीतियां अंतत: उनका अहित ही करती हैं। ऐसे कदमों से जनजीवन अस्तव्यस्त होता है और आर्थिक अक्षमता बढ़ सकती है। ऐसे में स्पष्ट है कि चुनावों के बीच इस प्रकार का विचार उछालने वालों की मंशा वास्तविक आर्थिक सुधारों के बजाय राजनीतिक लाभ उठाने की अधिक लगती है। वैसे भी विरासत कर का विचार भारत में नया नहीं है। आजादी के बाद से ही भारत में इसी प्रकार की एस्टेट ड्यूटी लागू हुई, जिसे मार्च 1985 में हटाना पड़ा। इसे हटाने के पीछे यही वजह बताई गई कि इससे राजस्व की तो बहुत कम प्राप्ति हुई, लेकिन यह एक बड़ी संख्या में करदाताओं के उत्पीड़न का कारण बना। यह ड्यूटी कम से कम एक लाख रुपये हैसियत की संपत्ति पर लगाई गई थी, जिसके लिए 7.5 प्रतिशत की दर नियत थी। हालांकि 20 लाख रुपये से अधिक की संपत्ति पर इसकी दर 85 प्रतिशत के स्तर तक पहुंचती थी, जिसके चलते यह दांव जनता की नजरों में खटकने लगा। केंद्र के प्रत्यक्ष कर संग्रह में एस्टेट टैक्स संग्रह की हिस्सेदारी भी बेहद मामूली थी। वित्त वर्ष 1984-85 के दौरान एस्टेट ड्यूटी के तहत कुल 20 करोड़ रुपये का राजस्व मिला। चूंकि इस कर के आकलन की प्रक्रिया खासी जटिल थी और उसमें तमाम मुकदमेबाजी के पेच भी फंस जाते थे तो इसकी वसूली सरकार को खासी महंगी पड़ती थी। जिस समय यह ड्यूटी हटाई गई तब देश में राजीव गांधी की सरकार थी। उनकी सरकार में वित्त मंत्री रहे विश्वनाथ प्रताप सिंह ने इसे लेकर अपने बजट भाषण में कहा, ‘एस्टेट ड्यूटी से जहां केवल 20 करोड़ रुपये की प्राप्ति हुई, वहीं इसके अनुपालन पर काफी प्रशासनिक व्यय करना पड़ा।’ अंतत: 16 मार्च, 1985 की अवधि के उपरांत इसकी समाप्ति की घोषणा हुई।
विरासत कर अक्सर आर्थिक अक्षमताओं को भी आमंत्रित करता है, जिसके कई मोर्चों पर अनपेक्षित परिणाम सामने आते हैं। इस प्रकार के कर से लोगों का आर्थिक व्यवहार बिगड़ सकता है। विरासत कर जैसी व्यवस्था में लोग बचत या निवेश से अधिक उपभोग की ओर उन्मुख हो सकते हैं। विरासत कर की अतिरिक्त लागत भी करदाताओं का मिजाज बिगाड़ती है। साक्ष्य यही दर्शाते हैं कि ऊंचे एस्टेट टैक्स संपदा सृजन की राह में बाधक बनते हैं, जिससे आर्थिक वृद्धि के लिए आवश्यक पूंजी निर्माण प्रभावित होता है। इसके विरोध में एक तर्क दोहरे कराधान का भी है, क्योंकि विरासत कर के दायरे में आने वाली परिसंपत्तियां पहले ही आयकर या पूंजीगत लाभ कर के दायरे में आ चुकी होती हैं। यदि सक्षमता की दृष्टि से देखें तो ऐसे परिदृश्य में कोष की सीमांत सक्षमता लागत यानी एमईएसएफ काफी ऊंची हो सकती है। यह संकेत करता है कि जिन करों को एक बार ही अधिरोपित किया जाता है, उनसे राजस्व वसूली किफायती होती है। छोटे उद्यमों और पारिवारिक स्वामित्व वाली इकाइयों के मामले में विरासत कर के चलते तरलता की समस्या भी खड़ी हो जाती है। चूंकि ऐसी इकाइयों के पास वृहद कर देनदारियों की पूर्ति के लिए आवश्यक लिक्विड असेट्स का अभाव होता है तो उन्हें अपनी उत्पादक परिसंपत्तियों की बिक्री या उन्हें पूरी तरह भुनाने पर मजबूर होना पड़ता है। इससे स्थापित उद्यमों का पूरा ढांचा बिगड़ सकता है, जिससे रोजगार और आर्थिक विविधता के समक्ष खतरा उत्पन्न होने का जोखिम बढ़ जाता है।
ऊंचा विरासत कर पूंजी पलायन को भी गति दे सकता है। इसके चलते लोग अपनी पूंजी को वहां लगाना चाहेंगे जहां करों को लेकर अनुकूल व्यवस्था हो। इससे देश का कर दायरा सिकुड़ने के साथ ही घरेलू निवेश घट सकता है, जिससे संसाधन आवंटन की स्थिति गडबड़ा सकती है। विरासत कर के पेचीदा अनुपालन एवं जटिल प्रशासनिक प्रक्रिया से भी यह फायदे से अधिक नुकसान करता है और संभावित राजस्व प्राप्ति नगण्य रह सकती है। भारत जैसे विविधतापूर्ण और अधिकांश मामलों में परिसंपत्तियों के असंगठित स्वरूप वाले देश में विरासत कर को लागू करने की अपनी तमाम चुनौतियां हैं। रियल एस्टेट, ज्वैलरी और कृषि भूमि जैसी संपत्तियों की व्यापकता प्रभावी कराधान व्यवस्था के लिए आवश्यक मूल्यांकन को जटिल बनाती है। विरासत कर के आकलन के लिए संपत्तियों का सटीक रिकार्ड बहुत आवश्यक है, जिसका भारत में अभाव है। आंकड़े डिजिटल भी नहीं हैं। इससे यह प्रक्रिया और जटिल हो जाएगी। कुल मिलाकर, जिस विषमता को दूर करने के लिए विरासत कर का विचार आगे बढ़ाया जाता है उससे जाने-अनजाने विषमता और बढ़ती ही है। धनाढ्य लोग बेहतर कर नियोजन के साथ अक्सर इस प्रकार के करों के प्रभाव को कुछ कम करने या उससे बच निकलते हैं, जबकि अपेक्षाकृत कम संसाधनसंपन्न लोगों को उसकी तपिश झेलनी पड़ती है।
Date:29-04-24
पिघलते हिमनद पर तैरते खतरेप्रमोद भार्गव
जलवायु परिवर्तन के संकेत अब स्पष्ट दिखने लगे हैं। नए शोध बताते हैं कि अंटार्कटिका से हिमखंड टूट रहे हैं, तापमान बढ़ने से बर्फ भी तेजी से पिघल रही है। जलवायु परिवर्तन का बड़ा संकेत संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) में दिखा है। पिछले दिनों बीते पचहत्तर वर्षों में यहां सबसे अधिक बारिश दर्ज की गई है। चौबीस घंटे में दस इंच से ज्यादा हुई इस बारिश ने रेगिस्तान के बड़े भू-भाग को दरिया में बदल दिया। दुनिया का सबसे व्यस्त दुबई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा जलाशय बन गया। उधर, 1986 में अंटार्कटिका से टूट कर अलग हुआ जो हिमखंड स्थिर बना हुआ था, वह अब समुद्री सतह पर बहने लगा है। उपग्रह से लिए गए चित्रों से पता चला है कि करीब एक लाख करोड़ टन वजनी यह हिमखंड अब तेज हवाओं और जल धाराओं के चलते अंटार्कटिका के उत्तरी सिरे की ओर बढ़ रहा है। यह हिमखंड करीब चार हजार वर्ग किमी में फैला हुआ है, आकार में यह मुंबई के क्षेत्रफल 603 वर्ग किमी से करीब छह गुना बड़ा है। इसकी ऊंचाई 400 मीटर है। यह जिस महानगर की सीमा से टकराएगा, वहां प्रलय आ जाएगा।
उत्तरी ध्रुव यानी आर्कटिक पर जलवायु परिवर्तन के प्रभाव को लेकर लगातार अध्ययन हो रहे हैं। ये अध्ययन विशाल आकार के हिमखंडों के पिघलने, टूटने, दरारें पड़ने, पृथ्वी के चुंबकीय क्षेत्र के खिसकने, ध्रुवीय भालुओं के मानव आबादियों में घुसने और सील मछलियों में कमी, ऐसे प्राकृतिक संकेत हैं, जिनसे पृथ्वी के बढ़ते तापमान का आर्कटिक पर प्रभाव स्पष्ट होता है। पर्यावरण विज्ञानी इस बदलाव को समुद्री जीवों, जहाजों, पेंगुइन, छोटे द्वीपों और महानगरों के लिए एक बड़े खतरे के रूप में देख रहे हैं। अमेरिका के ‘नेशनल स्नो एंड साइंस डाटा सेंटर’ के अध्ययन को सत्य मानें तो वर्ष 2014 में ही उत्तरी ध्रुव के 32.90 लाख वर्ग किमी क्षेत्र में बर्फ की परत पिघली है। यह क्षेत्रफल लगभग भारत-भूमि के बराबर है। इस संस्थान के अनुसार 1979 में उत्तरी ध्रुव पर बर्फ जितनी कठोर थी, अब नहीं रह गई है। इसके ठोस हिमतल में चालीस फीसद की कमी आई है।
क्षेत्रफल के हिसाब से अंटार्कटिका पांचवां सबसे बड़ा महाद्वीप है। यह दक्षिणी गोलार्ध में करीब बीस फीसद हिस्से को अपनी बर्फीली चादर से ढके हुए है। इसमें दक्षिणी ध्रुव भी समाहित है। उत्तरी ध्रुव का कुल क्षेत्रफल 2.1 करोड़ वर्ग किमी है। इसमें से 1.30 करोड़ वर्ग किमी क्षेत्र की सतह बर्फ की मोटी परत से ढकी हुई है। बर्फ से आच्छादित होने के कारण यहां का औसत तापमान ऋणात्मक 10 डिग्री सेल्सियस है। जाड़ों में यह 68 डिग्री तक ऋणात्मक हो जाता है। बर्फ से ढके इसी क्षेत्र को आर्कटिक महासागर कहा जाता है।
आमतौर पर आर्कटिक का उल्लेख उस भाग के परिप्रेक्ष्य में होता है, जो उत्तरी ध्रुव को घेरे हुए है। आर्कटिक का भू-क्षेत्र रूस के साइबेरिया के किनारों, आइसलैंड, ग्रीनलैंड, उत्तरी डेनमार्क, नार्वे, फिनलैंड, स्वीडन, अमेरिका, अलास्का, कनाडा का अधिकांश उत्तरी महाद्वीपीय भाग और आर्कटिक टापुओं के समुदाय तथा अन्य अनेक द्वीपों तक फैला है। औद्योगिक विकास के लिए खनिज संपदा की लूट के लिए यहां व्यापारिक गतिविधियां तेज हुई हैं। इस क्षेत्र में तेल, प्राकृतिक गैस और कोयला के अकूत भंडार हैं। इस कारण यहां पारिस्थितिकी तंत्र गड़बड़ाने लगा है। नतीजतन, यहां पाए जाने वाले जलीय और थलीय जीव ध्रुवीय भालू, सील, बैल्गा वेल, नर वेल, नीली वेल और वेलर्स के अस्तित्व का संकट पैदा हो गया है।
उत्तरी ध्रुव हमारे पृथ्वी ग्रह का सबसे सुंदर उत्तरी बिंदु है। मान्यता है कि यहीं पर पृथ्वी की धुरी घूमती है। यह स्थल आर्कटिक महासागर में स्थित है। यहां अत्यधिक ठंड पड़ती है, क्योंकि छह माह तक सूर्य लुप्त रहता है। यहां हमेशा सफेद बर्फीली चादर बिछी रहती है। इस भौगोलिक उत्तरी ध्रुव के निकट ही, चुंबकीय उत्तरी ध्रुव है। इसी चुंबकीय शक्ति से आकर्षित होकर कंपास की सुई दिशा-संकेत देती है। उत्तरी तारा या ‘ध्रुवतारा’ उत्तरी ध्रुव के आकाश पर निरंतर चमकता दिखाई देता है। शताब्दियों से नाविक इसी तारे को देखकर यह अनुमान लगाते रहे हैं कि वे उत्तर से कितनी दूर हैं। यह क्षेत्र आर्कटिक परिधि भी कहलाता है। क्योंकि यहां अर्धरात्रि के सूर्य (मिडनाइट सन) और ध्रुवीय रात (पोलर नाइट) का अद्वितीय दृश्य देखने को मिलता है। दुनिया की नब्बे फीसद बर्फ इसी अंटार्कटिका में जमी हुई है। इसलिए इसे पृथ्वी का शीतालय (फ्रिज) भी कहा जाता है।
यहां की बर्फीली परतों में धरती को मिलने वाला सबसे अधिक मात्रा में पानी संग्रहित है। लेकिन अब बढ़ते तापमान और बढ़ती मानवीय गतिविधियों के चलते आर्कटिक और ग्रीनलैंड में निरंतर बर्फ पिघल रही है। शोध बताते हैं कि इस प्रायद्वीप में चारों ओर तैरने वाली बर्फ में दस फीसद की कमी आई है। बर्फीली बारिश होने के बाद भी बर्फ न्यूनतम मात्रा में जम रही है। 2022 की तुलना में 2023 में बर्फ बहुत कम जमी है।
जलवायु परिवर्तन के अनेक दुष्परिणाम देखने में आ रहे हैं। इनमें से एक उत्तरी और दक्षिणी ध्रुव क्षेत्रों में पृथ्वी पर बढ़ते तापमान के चलते बर्फ का पिघलना भी है। अत्यधिक गर्मी या सर्दी पड़ना भी इसी के कारक माने जा रहे हैं। वैज्ञानिकों की यह चिंता तब और ज्यादा बढ़ गई, जब अंटार्कटिका में तैर रहे हिमनद (ग्लेशियर) टाटेन के पिघलने की जानकारी अनुमानों से कहीं ज्यादा निकली। इससे समुद्र का जलस्तर बढ़ने की भी आशंका जताई जा रही है। वाशिंगटन विश्वविद्यालय के पाल बिनबेरी द्वारा किए गए एक अध्ययन रपट के मुताबिक, ‘अध्ययन से पहले हमें लगता था कि टाटेन हिमखंड की बर्फ स्थिर है। लेकिन जलवायु परिवर्तन के असर के चलते इसकी स्थिरता में बदलाव आ रहा है और तेजी से पिघल रहा है। यह सबसे तेज गति से चलायमान हिमखंड है। इसके पिघलने के खतरे ज्यादा हैं, क्योंकि यह अगर अधिक तापमान वाले क्षेत्र में पहुंच गया तो और ज्यादा तीव्रता से पिघलेगा।
अगर अंटार्कटिका की बर्फ इसी तरह पिघलती रही तो दक्षिणी महासागर के चारों ओर समुद्री जल स्तर बढ़ेगा, इस कारण अन्य समुद्रों पर भी इसका प्रभाव पड़ सकता है। इन समुद्रों का जल स्तर बढ़ा, तो पृथ्वी के उत्तरी गोलार्ध पर भी इसका असर दिखाई देगा। बर्फ के पिघलने से वायुमंडलीय परिसंचरण का स्वभाव भी बदल जाता है। अंटार्कटिका के ईद-गिर्द ही दक्षिणी महासागर फैला हुआ है। धरती पर उत्सर्जित होने वाले कार्बन डाइआक्साइड की सबसे बड़ी मात्रा को सोखने का काम यही महासागर करता है। वर्ष भर में जितना कार्बन उत्सर्जित होता है, उसका लगभग बारह फीसद यह सागर सोख लेता है। लेकिन ऐसा तभी संभव हो पाता है, जब अंटार्कटिका की बर्फ बनी रहे। अब वह समय आ गया है कि धरती के बढ़ते तापमान को युद्ध स्तर पर नियंत्रित करने के कारगर उपाय हों।
Date:29-04-24
चुनावी रेवड़ी से बचना होगासतीश सिंह
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (आरबीआई) के पूर्व गवर्नर डी सुब्बाराव ने फ्रीबीज (मुफ्त उपहार) या रेवड़ी संस्कृति की नीति से सरकार को बचने की सलाह दी है क्योंकि राजनीतिक दल चुनाव जीतने के लिए वोटरों को मुफ्त बिजली – पेयजल, बेरोजगारों को मासिक भत्ता, लैपटॉप, स्मार्टफोन, साइकिल आदि देने का लालच देकर अपने पक्ष में वोट देने के लिए प्रेरित करते हैं, और सत्ता में आने के बाद वादों को पूरा करने के लिए सरकारी खजाने को खाली कर देते हैं, जिससे राज्य और केंद्र सरकार का वित्तीय अनुशासन नकारात्मक रूप से प्रभावित होता है, और फ्रीबीज पर पैसे खर्च किए जाने के कारण विकासात्मक कार्यों को धक्का लगता है अर्थात सड़क, स्कूल, अस्पताल, बिजली, पानी आदि की व्यवस्था सरकार नहीं कर पाती है, जिससे आर्थिक गतिविधियां धीमी पड़ जाती हैं, और विकास दर में गिरावट दर्ज की जाती है।
फ्रीबीज के चक्कर में राज्य सरकारें राजकोषीय उत्तरदायित्व और बजट प्रबंधन अधिनियम (एफआरबीएम) की सीमा का उल्लंघन करती हैं राज्य के वित्तीय स्वास्थ्य के लिए घातक होता। एफआरबीएम अधिनियम के तहत सुनिश्चित किया जाता है कि राजस्व घाटा, राजकोषीय घाटा, कर राजस्व और कुल बकाया देनदारियां निर्धारित सीमा से अधिक नहीं हों। अगर ऐसा करना जरूरी हो तो वह सिर्फ आपदा की स्थिति में ही किया जाना चाहिए। सुब्बाराव का कहना है कि फ्रीबीज के कारण कुछ राज्य सरकारें एफआरबीएम की सीमा का उल्लंघन कर रही हैं, जिसके कारण कर्ज के दलदल में फंसती जा रही हैं। इसलिए राज्य सरकारों और केंद्र सरकार को वित्तीय अनुशासन बनाकर रखना चाहिए। सुब्बाराव के अनुसार मोदी सरकार को फ्रीबीज रोकने के मुद्दे पर राजनीतिक दलों के बीच सहमति बनानी चाहिए और जरूरत पड़ने पर मामले में ‘श्वेत पत्र’ पेश करने से भी नहीं हिचकिचाना चाहिए। इस मुद्दे पर सभी राजनीतिक दलों के बीच गहन बहस की जानी चाहिए और फ्रीबीज रोकने के लिए ठोस नीति बना कर जल्द से जल्द उसे अमल में लाना चाहिए। जनता को मुफ्त उपहारों की लागत और लाभ के बारे में भी जागरूक किया जाना चाहिए। सरकार की जिम्मेदारी होनी चाहिए कि इस बारे में लोगों को कैसे शिक्षित करती है ? भारत जैसे गरीब देश में यह भी सरकार की जिम्मेदारी है कि सबसे कमजोर वर्ग को हर तरह का सुरक्षा कवच प्रदान करे और यह भी सुनिश्चित करे कि गरीब या सुविधाओं से वंचित जनता बिना फ्रीबीज के आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बन सके।
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने हाल में लोक सभा में श्वेत पत्र के माध्यम से संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (यूपीए या संप्रग) सरकार के 10 वर्षों के कार्यकाल की नाकामियों और मोदी सरकार के 10 सालों के कार्यकाल की उपलब्धियों को जनता के समक्ष रखा था ताकि जनता तय कर सके कि किस सरकार ने अपने कार्यकाल के दौरान जनता, समाज और देश की बेहतरी के लिए शिद्दत से प्रयास किया है। आम तौर पर ‘श्वेत पत्र’ के जरिए सरकार कानून पेश करने से पहले नीतिगत प्राथमिकताएं प्रस्तुत करती है, और इसकी मदद से विवादास्पद नीतिगत मुद्दों पर जनता की राय ली जाती है।
उल्लेखनीय है कि सुब्बाराव से पहले भी मामले में सर्वोच्च अदालत सरकार को फ्रीबीज बंद करने के लिए नसीहत दे चुकी है। सर्वोच्च अदालत ने बीते महीनों में केंद्र सरकार से पूछा था कि क्या चुनाव अभियानों के दौरान फ्रीबीज के लिए वादा करना और सत्ता में आने के बाद उसे अमलीजामा पहनाना आर्थिक रूप से व्यवहार्य है? कुछ समय पहले निर्वाचन आयोग ने भी राजनीतिक दलों द्वारा फ्रीबीज देने के लिए वादा करने और फिर सत्ता में आने के बाद फ्रीबीज पर खर्च करने की बढ़ती प्रवृति पर सवाल उठाया था? फ्रीबीज से अर्थव्यवस्था का बुनियादी ढांचा कमजोर होता है, और सरकार को अपनी व्यय प्राथमिकताओं में से विकास की प्राथमिकता से किनारा करना पड़ता है। राज्यों के राजस्व के स्रोत सीमित होते हैं। इसलिए राज्यों का बजट फ्रीबीज के कारण बेपटरी हो जाता है, और विकासात्मक कार्यों को पूरा करने के लिए सरकार को कर्ज लेना पड़ता है। आज कई राज्य सरकारें कर्ज में तय सीमा से अधिक डूबी हुई हैं। पंजाब ने सकल राज्य घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) का 53.3 प्रतिशत कर्ज ले रखा है, जो कर्ज लेने वाले सभी राज्यों से सबसे ज्यादा है। केंद्रीय बैंक के अनुसार किसी भी राज्य पर उसकी जीएसडीपी के 30 प्रतिशत से अधिक कर्ज नहीं होना चाहिए। पंजाब के अलावा अरुणाचल प्रदेश, बिहार, गोवा, हिमाचल प्रदेश, केरल, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, राजस्थान और पश्चिम बंगाल पर भी उनके जीएसडीपी से बहुत ज्यादा कर्ज है, और रिजर्व बैंक इस पर चिंता जता चुका है।
फ्रीबीज स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव को प्रभावित करती है, जिससे सही प्रतिनिधि संसद या विधानसभा में नहीं जा पाते। फलतः जनता, समाज और देश के लिए समीचीन कानून का निर्माण नहीं हो पाता। मुफ्त बिजली या दूसरी सुविधाएं मिलने पर जनता सुविधाओं का बेजा इस्तेमाल करती है, जिससे संसाधनों की बेवजह बर्बादी होती है। यूरोप के कुछ देश फ्रीबीज संस्कृति की वजह से ही आर्थिक संकट से जूझ रहे हैं। पड़ोसी देश श्रीलंका और पाकिस्तान का भी फ्रीबीज संस्कृति के कारण बुरा हाल है। भारत में आज भी कई ऐसे क्षेत्र हैं, जहां अपेक्षित विकास नहीं हुआ है। लिहाजा, उपेक्षित क्षेत्र में विकास को सुनिश्चित करने के लिए सब्सिडी देना जरूरी है। उदाहरण के तौर पर अक्षय ऊर्जा को बढ़ावा देने के लिए घरों की छतों या दूसरी जगहों पर सौर पैनल स्थापित करने के लिए सब्सिडी दी जा रही है। यह नियम भी बनाना चाहिए कि बजट का कितना प्रतिशत जन-कल्याणकारी कार्यों पर खर्च किया जाए और यह भी सुनिश्चित किया जए कि जिन जन-कल्याणकारी योजनाओं पर पैसे खर्च किए गए हैं, क्या उससे आम जनता लाभान्वित हुई है? अगर किसी जन-कल्याणकारी योजना से जनता को कोई लाभ नहीं हुआ है, या उनके जीवन स्तर में कोई सुधार नहीं हुआ है, तो वैसी योजनाओं को जारी रखने का कोई औचित्य नहीं है। जनता को भी आत्मावलोकन करने की जरूरत है कि फ्रीबीज से उन्हें लाभ हो रहा है, या नहीं? यदि नहीं, तो उन्हें ऐसे लोक-लुभावन वादों के झांसे में नहीं आना चाहिए।
Date:29-04-24
मालदीव विस्तारसंपादकीय
मालदीव जलवायु परिवर्तन के परिणामों के चलते पृथ्वी पर सबसे संवेदनशील देशों में से एक है। मालदीव की सरकार जलवायु संबंधी मुद्दों पर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर एक मजबूत आवाज रही है, पर वह घरेलू स्तर पर पर्यावरण संरक्षण की नीतियों की लगातार अवहेलना कर रही है। यह दुख और चिंता की बात है। जलवायु परिवर्तन के कारण समुद्र का स्तर बढ़ रहा है, मालदीव जैसे निचले द्वीप राष्ट्रों को खतरे का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे देशों के लिए समाधान है, समुद्र तल से तलछट को स्थानांतरित कर नई भूमि बनाना । इस काम को समुद्र किनारे मिट्टी भरकर अंजाम दिया जाता है और मालदीव यदा-कदा यही कर रहा है। मालदीव अपने अस्तित्व को बचाने के लिए यह प्रयास कर रहा है, पर पर्यावरण की दृष्टि से स्वयं उसके लिए यह प्रयास घातक सिद्ध हो सकता है। मालदीव को सोच-विचार के साथ ही आगे बढ़ना चाहिए। उसका अस्तित्व महत्वपूर्ण है और बड़े पैमाने पर उसके स्थायित्व के लिए दुनिया को चिंतित होना चाहिए। यह एक बड़ी सोच का विषय होना चाहिए कि जब किसी देश का भूगोल मिट जाएगा, तब उसके सांस्कृतिक, सामाजिक और राजनीतिक अस्तित्व को कैसे बचाया जा सकेगा ?
गौर करने की बात है कि मालदीव अंतरराष्ट्रीय पर्यटन से होने वाली आय पर निर्भर है और जैसे-जैसे उसके द्वीपों पर अस्तित्व का संकट बढ़ेगा, वैसे-वैसे पर्यटन से उसकी कमाई भी घटती चली जाएगी। इसलिए मालदीव की चेष्टा स्वाभाविक है कि वह अपने द्वीपों का विस्तार करे, पर वहां विकास परियोजनाओं को आगे बढ़ाते समय स्थानीय समुदायों की चिंताओं की उपेक्षा की गई है। यह उन निवासियों के लिए बहुत हानिकारक है, जो पहले से ही मौसम के बदलते मिजाज, समुद्र के बढ़ते स्तर और बाढ़ के प्रभाव से जोखिम में हैं। मालदीव के सरकारी अधिकारी सफाई पेश करते हैं कि बढ़ती आबादी और सीमित भूमि वाले देश के लिए भूमि पुनर्ग्रहण आवश्यक है। योजनाबद्ध उद्देश्य – पर्यटक रिसॉर्ट्स और गेस्टहाउसों के लिए बंदरगाह, हवाई अड्डे और कृत्रिम द्वीप देश के आर्थिक विकास के लिए अहम हैं। हालांकि, मालदीव के अनेक लोगों में नाराजगी भी है। खेती, मछली पकड़ने और जमीन की नमी पर असर साफ दिख रहा है। आजीविका भी प्रभावित हो रही है। खराब ढंग से हो रहे इस विकास ने द्वीपों से प्राकृतिक संसाधन छीनने शुरू कर दिए हैं। ताजे पानी, सार्वजनिक भूमि और फलों के पेड़ों जैसे प्राकृतिक संसाधनों तक पहुंच से लोग वंचित होने लगे हैं।
सरकार ने पर्यावरण नियामकों की अनदेखी की है और एक नया हवाई अड्डा बनाने के लिए द्वीप के 70 प्रतिशत मैंग्रोव या जल संपदा को दफना दिया है। इतना ही नहीं, जिन लोगों की आजीविका प्रभावित हुई है, उन्हें पांच साल बाद भी मुआवजा नहीं दिया गया है, इससे लोगों में भी नाराजगी है। यह मालदीव का आंतरिक मामला है और किसी दूसरे देश को इसमें हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए, पर आखिर ऐसे देशों के पास बचने के क्या विकल्प हैं ? दुनिया में जब समुद्री जल स्तर बढ़ेगा, तब बारी-बारी अनेक देश डूबेंगे, ऐसे में, क्या हमारे पास कोई योजना है ? क्या संयुक्त राष्ट्र ने इस बारे में कुछ सोच रखा है ? जिन देशों का अस्तित्व खतरे में है, उन्हें तो खासतौर पर सजग रहना चाहिए। पर्यावरण संबंधी नियम-कायदों का युद्ध स्तर पर पालन करना चाहिए, ताकि दूसरे देशों को भी प्रेरणा मिले।
Date:29-04-24
अमीरों की संपत्ति गरीबों में बांटने की मंशाआलोक जोशी, ( वरिष्ठ पत्रकार )
कहां तो तय था चरागां हर एक घर के लिए,
कहां चराग मयस्सर नहीं शहर के लिए
दुष्यंत की ये पंक्तियां यहां सही बैठती हैं या नहीं, इस पर लंबी बहस हो सकती है, मगर इस वक्त देश में जो बहस चल रही है, उसमें इन पंक्तियों का ही नहीं, किसी भी कविता या गजल का इस्तेमाल हो सकता है। यहां बात सिर्फ इतनी है कि एक तरफ तो देश को आगे बढ़ाने, तरक्की तेज करने, शेयर बाजार में जबर्दस्त उछाल और पूरी दुनिया में भारत का डंका बजने की कहानी चल रही है, जबकि दूसरी तरफ अचानक औरतों के मंगल सूत्र छिनने से लेकर हमारी आपकी विरासत पर टैक्स लगने जैसी बातें भी चुनावी मैदान के बीचोबीच घमासान का कारण बन चुकी हैं।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस पर जबर्दस्त निशाना साधा और चुनाव के मौसम में ही नजर आने वाले प्रवासी कांग्रेस के नेता सैम पित्रोदा ने उन्हें और उनकी पार्टी को मानो इसके लिए मसाला भी दे दिया। अब दोनों तरफ से जबर्दस्त गोलाबारी चल रही है। इस चक्कर में एक बात तो यह हुई कि जिन लोगों को पता भी नहीं था कि कांग्रेस के चुनाव घोषणापत्र में लिखा क्या है, वे भी ज-खोजकर उसे पढ़ने में जुट गए हैं। सैम पित्रोदा ने क्या कहा? राहुल गांधी के बयान से जोड़कर उसे देखने पर क्या तस्वीर बनी ? प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कांग्रेस पर क्या-क्या आरोप लगाए, इस पर वाद-विवाद प्रतियोगिता हो सकता है कि आगे लंबे समय तक जारी रहे, मगर सवाल यह है कि विरासत पर टैक्स लगाने से क्या अमीर-गरीब के बीच की खाई पाटी जा सकती है?
यह कोई अनूठा विचार नहीं है। सैम पित्रोदा ने तो अमेरिका का उदाहरण दिया था कि वहां एक सीमा के बाद विरासत में मिलने वाली संपत्ति पर 55 प्रतिशत टैक्स लगता है। आर्थिक सहयोग संगठन ओईसीडी में ऐसे 24 देश हैं, जहां किसी न किसी रूप में विरासत पर टैक्स लगता है। सब जगह टैक्स की दरें अलग- अलग हैं। पीडब्ल्यूसी के अनुसार, फ्रांस में 60 प्रतिशत और जापान में 55 फीसदी टैक्स है, जबकि जर्मनी और दक्षिण कोरिया में टैक्स की दर 50 प्रतिशत है। उधर, अमेरिका और ब्रिटेन 40 फीसदी की दर से कर वसूलते हैं। हालांकि, ओईसीडी के अनुसार, उसके सदस्य देशों की 52 प्रतिशत संपत्ति मात्र दस फीसदी लोगों के हाथों में सिमटी हुई है। हालांकि, साथ में वह यह भी बताता है कि विरासत के टैक्स से इन देशों में नाममात्र की कमाई होती है।
भारत में यह मसला और भी पेचीदा है, क्योंकि यहां यह विचार पहली बार नहीं आया है। 1953 में संसद बाकायदा कानून पास करके एस्टेट ड्यूटी या मृत्यु कर लगाने का फैसला किया था। तब एक लाख रुपये से ऊपर की संपत्ति पर टैक्स लगाने की व्यवस्था थी । उस वक्त यह भी बहुत बड़ी रकम होती थी और इस पर टैक्स शुरू होता था 7.5 फीसदी से। मगर 20 लाख रुपये की संपत्ति के मालिक की मृत्यु पर 85 फीसदी तक टैक्स लगता था । तर्क यही था कि एक सीमा से ऊपर कमाने वालों को अपनी संपत्ति में से वापस समाज को हिस्सा देना चाहिए। मगर तब इस टैक्स को बचाने के लिए तमाम जुगत व जुगाड़ भी शुरू हुए और इस टैक्स का विरोध भी। तब भी 1985 तक यह जारी रहा। राजीव गांधी की सरकार में वित्त मंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह ने फैसला किया कि इस टैक्स की वसूली में जितना झंझट और खर्च है, उसके मुकाबले न तो वसूली हो रही है और न ही इससे गैर-बराबरी खत्म करने का उद्देश्य पूरा हो रहा है। इसलिए यह टैक्स खत्म कर दिया गया।
उसके बाद भी बार-बार इस टैक्स की वापसी के सुझाव आते रहे हैं। 2012 में पी चिदंबरम इसके पक्ष में बोल रहे थे, तो उसके बाद एनडीए सरकार के वित्त मंत्री अरुण जेटली और वित्त राज्य मंत्री जयंत सिन्हा, दोनों ही इसके पक्ष में तर्क देते रहे। हालांकि, आज भाजपा कांग्रेस पर इसके लिए हमलावर है, लेकिन अब उसके ही अपने नेताओं के पुराने बयान निकालकर दिखाए जाने लगे हैं। चूंकि, कांग्रेस घोषणापत्र जारी करते समय राहुल गांधी ने यह कहा था कि देश में किसके पास कितनी संपत्ति है, इसका एक सर्वे कराया जाएगा, तो सैम पित्रोदा के बयान के साथ जोड़कर यह मानना मुश्किल नहीं है कि उसके बाद अमीरों की संपत्ति लेकर गरीबों में बांटने का इरादा है।
ऐसे में, सवाल यह भी है कि दुनिया के जिन देशों में ऐसा टैक्स लग रहा है, क्या वहां आर्थिक समानता है? ब्रिटेन में तो इस वक्त मुद्दा गरम है कि क्या ऋषि सुनक की सरकार चुनाव से पहले विरासत पर टैक्स कम करने जा रही है? उनकी पार्टी चुनाव सर्वेक्षणों में कमजोर दिख रही है और यह संभावना बढ़ रही है कि वोटरों को लुभाने के लिए ऐसा कोई लोक-लुभावन फैसला हो सकता है। अमेरिका, जर्मनी और फ्रांस जैसे देशों में इस टैक्स की ऊंची दरों के बावजूद क्या गरीब और अमीर की खाई कम हुई है? इसका जवाब कोई भी हां में नहीं दे सकता।
मगर किसी भी संवेदनशील और जागृत समाज को इस सवाल से लगातार दो-चार होते रहना पड़ता है कि लोग तरक्की की दौड़ में पीछे छूटते जाते हैं, उन्हें सहारा देने के लिए क्या किया जाए? क्या मुफ्त राशन, मुफ्त घर और मुफ्त बिजली-पानी देते रहना ही काफी है या कुछ ऐसा करना होगा कि उन्हें रेस में बराबरी के मौके मिल सकें? आय कर हो या संपत्ति करया विरासत पर कर, सबके पीछे भावना तो यही रही, पर कामयाबी मिलना आसान नहीं है। जिस दौर में भारत में मृत्यु कर लगा करता था, उस दौर में अमीरों को संपत्ति कर या वेल्थ टैक्स भी देना पड़ता था, जिनसे कोई खास फायदा नहीं हुआ, क्योंकि टैक्स इतना भारी था कि उसे बचाने के लिए कोशिश करना काफी मुनाफे का सौदा था। इसीलिए, ऐसे जुगाड़ और जतन करने का एक पूरा कारोबार भी खड़ा हो गया।
अभी ‘इन्हेरिटेन्स टैक्स’ पर विवाद के बाद उद्योगपति हर्ष गोयनका ने एक्स पर पोस्ट में मार्के की बात लिखी है। उनका कहना है कि सारे व्यापारी/ कारोबारी इस टैक्स पर चिंतित थे। सैम पित्रोदा का शुक्रिया कि उन्होंने बात उठाई और सरकार का शुक्रिया कि उसने इतने जोर-शोर से इसका विरोध किया। हालांकि, उन्होंने चुटकी भी ली कि टैक्स बचाने का इंतजाम करने में लगी सीए बिरादरी को बड़े बिजनेस का नुकसान हो गया।
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विश्व प्रसिद्ध अर्थशास़्त्री थॉमस पिकेटी का मानना है कि आर्थिक असमानता एक समस्या है, और अमीरों पर उच्च कर लगाना ही इसका समाधान है। उन्होंने असमानता को वैश्विक समस्या के रूप में पेश करने के लिए दुनियाभर के समाजविज्ञानीयों को शामिल किया है।
भारत के संदर्श में –
पिकेटी की यह अवधारणा पश्चिमी वामपंथियों के बीच चर्चा का गंभीर मुद्दा हो सकती है, लेकिन भारत के नीति निर्माताओं के लिए यह कोई चिंता का बड़ा विषय नहीं होना चाहिए। क्यों ?
इसकी तुलना अगर 1947 के बाद के तीन दशकों से करें, जब गरीबी में रहने वाले लोगों की संख्या में वृद्धि हुई थी। असमानता तब कम थी, क्योंकि लोग समान रूप से गरीब थे। इसकी तुलना ब्रिटिश राज से करें, जिसके दौरान जनता गरीबी और अकाल में डूब गई थी। अतः यह कहना सरासर गलत है कि आज के भारतीय औपनिवेशिक और समाजवादी काल की तुलना में बदतर हैं।
इसका मतलब यह नहीं है कि आर्थिक सुधारों के बाद असमानता नहीं बढ़ी है। बेंगलुरू में काम करने वाले एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर की उत्पादकता और आय उत्तर प्रदेश के एक ग्रामीण कृषि मजदूर की तुलना में कई गुना अधिक हुई है। लेकिन आर्थिक असमानता अपने आप में समस्या नहीं कही जा सकती है। समस्या इसके प्रभावों में है। अनुभवजन्य साक्ष्य दर्शाते हैं कि उच्च समानता कुछ मामलों में उच्च वृद्धि का कारण बन सकती है, और अन्य में इसके विपरीत भी हो सकता है। भारत के संदर्भ में हमें चिंता यह करनी चाहिए कि क्या गरीबों की कीमत पर अमीर और अधिक अमीर हो रहे हैं?
कुछ बिंदु –
आर्थिक असमानता के नकारात्मक प्रभावों से कैसे निपटा जा सकता है?
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित पवन पई के लेख पर आधारित। 7 अप्रैल, 2024
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हाल ही में भारत सरकार ने तीन सेमीकंडक्टर इकाइयों की स्थापना को मंजूरी दी, जिनमें भारत का पहला सेमीकंडक्टर फैब्रिकेशन संयंत्र शामिल होगा। इस उद्योग को स्थापित करने की जरूरतें निम्नलिखित हैं –
भारत के पास ये सभी इकोसिस्टम हो गए हैं। दुनिया में जितने सेमीकंडक्टर उद्योग से जुड़े इंजीनियर हैं, उनमें से एक तिहाई भारत में ही हैं।
सेमीकंडक्टर इकाइयों की स्थापना से होने वाले लाभ –
आगे की राह –
इस क्षेत्र की सफलता के लिए सरकारी संरक्षण और निजी क्षेत्र के निवेश, दोनों की आवश्यकता होगी।
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Date:27-04-24
महिला हितैसी कानूनों का दुरूपयोगक्षमा शर्मा, ( लेखिका साहित्यकार हैं )
दहेज अधिनियम और अन्य महिला कानूनों के दुरुपयोग की खबरें लगातार आती रहती हैं। उच्चतम न्यायालय ने ही इसे एक बार ‘कानूनी आतंकवाद’ कहा था, लेकिन इसके बावजूद इस मोर्चे पर कोई सुधार नहीं हो रहा है। एक महिला ने अपने पति से परिवार अदालत में तलाक ले लिया, लेकिन इसके छह महीने बाद उसने दहेज निरोधी अधिनियम के तहत पूर्व पति और उसके घर वालों के खिलाफ मानसिक प्रताड़ना का केस दर्ज करा दिया। पुलिस ने एफआइआर दर्ज कर पति को चार्जशीट किया।
इस पर उसने उच्च न्यायालय की शरण ली और अपने खिलाफ आपराधिक कार्यवाई समाप्त करने की मांग की। उच्च न्यायालय ने उसकी अपील निरस्त कर दी। इसके बाद उसने उच्चतम न्यायालय का रुख किया। उसके वकील ने उच्चतम न्यायालय में यह भी कहा कि महिला ने पहले भी जब घरेलू हिंसा अधिनियम के तहत अपील की तो अदालत ने इसे नहीं माना था और महिला ने भी इस मामले को नहीं बढ़ाया था। वकील ने यह तर्क भी दिया कि जब परिवार अदालत द्वारा शादी समाप्त की जा चुकी है तो इस तरह की शिकायत साफ तौर पर कानून का दुरुपयोग है।
उच्चतम न्यायालय ने संविधान के अनु. 142 के तहत मिले विशेषाधिकारों का उपयोग करते हुए मामले को खारिज कर दिया। उसने यह भी कहा कि तलाक के बाद लोगों को उत्पीड़न से बचाना जरूरी है। इस मामले में पीड़ित व्यक्ति को दस साल तक न्यायालय के चक्कर काटने पड़े। इन वर्षों में उसने और उसके परिवार ने कितनी मुसीबत झेली होगी, इसकी कल्पना नहीं की जा सकती। सोचिए कि जिनके पास साधन-संसाधन न हों, वे क्या करें?
अदालतें दहेज प्रताड़ना और दुष्कर्म के झूठे मामलों में स्त्रियों को फटकार तो लगाती रहती हैं, लेकिन कानूनों का दुरुपयोग इसलिए नहीं थम रहा, क्योंकि उन्हें झूठा मामला बनाने पर कोई सजा नहीं मिलती। बदले की भावना, पति के परिवार वालों के साथ न रहना, जमीन-जायदाद के मसले, कई बार पुरुष मित्र के साथ जाने की चाहत आदि को लेकर 498-ए का खूब दुरुपयोग हो रहा है। ऐसे मामलों में आदमी की पहचान भी बार-बार उजागर की जाती है। कई बार उसके फोटो भी छपते हैं। नौकरी चली जाती है।
जेल भी जाना पड़ता है। कुछ के तो सारे पैसे और पूरी बचत तक खर्च हो जाती है। यह अफसोस की बात है कि कानूनों ने पुरुषों और उनके परिवार को ऐसे दानवों के रूप में बदल दिया है, जो किसी स्त्री के आरोप लगाते ही अपराधी मान लिए जाते हैं। आरोपित को अपराधी बनाने का चलन हमारे यहां बेहद आम है। मीडिया का एक हिस्सा इसमें बढ़-चढ़कर भाग लेता है। आखिर यह कैसे मान लिया गया है कि कानून का काम सिर्फ एक पक्ष को न्याय देना है। स्त्री या पुरुष, जो भी अपराधी हो उसे सजा मिले, लेकिन किसी के आरोपित बनते ही उसे अपराधी सिद्ध कर देना कहां का न्याय है?
कायदे से जिस पर आरोप लगा है, वह जब तक अपराधी साबित न हो जाए, तब तक उसकी पहचान उजागर न की जाए। ऐसा करने से बहुत से निरपराधों को बचाया जा सकता है। ऐसा नहीं है कि हमारे नीति-नियंता इन बातों को नहीं जानते, लेकिन नारी हित के नाम पर क्रूर कानून बदलने की कोई कोशिश नहीं की जाती। क्या इसलिए कि उन्हें महिलाओं के वोट चाहिए और जरा सा भी परिवर्तन करेंगे तो महिला हितों के नाम पर दुकानदारी करने वाले शोर मचाएंगे? विकसित देशों में शायद ही कहीं ऐसे कानून हों, जहां एक पक्ष को सत्यवादी मान लिया जाए और दूसरे को बिना प्रमाण अपराधी। आखिर पुरुषों के मानवाधिकारों के बारे में कब सोचा जाएगा या पुरुष होने का मतलब मनुष्य होना नहीं है?
हाल में कर्नाटक उच्च न्यायालय ने भी दहेज निरोधी अधिनियम के दुरुपयोग पर चिंता जाहिर की। उसने एक मामले में फैसला दिया कि बहुत बार महिलाएं पति के रिश्तेदारों तक को इस एक्ट में आरोपित बना देती हैं, जबकि उनके खिलाफ कोई सुबूत नहीं होता। वे अलग भी रहते हैं। जो घटनाएं हुई ही नहीं होतीं, उनका उल्लेख किया जाता है, जिससे 498-ए का केस बनाया जा सके। उक्त मामले में पति के आठ रिश्तेदारों को आरोपित बनाया गया था। न्यायालय ने पति और उसकी मां के खिलाफ मामले को जारी रखा, मगर रिश्तेदारों के खिलाफ मामले को खारिज कर दिया।
बीते कुछ समय में तो ऐसे मामले भी प्रकाश में आए हैं कि पति के परिवार से भारी-भरकम रकम लेकर मामले को खत्म किया गया। अब जिनके पास पैसे हैं, वे तो ऐसे समझौते कर सकते हैं, लेकिन जिनके पास नहीं, वे क्या करें? कहां जाएं? आखिर उच्चतम न्यायालय तक कितने लोग पहुंच सकते हैं? निःसंदेह महिलाएं और उनके परिवार दहेज से परेशान रहते हैं। जिन महिलाओं को दहेज के चलते तंग किया जाए, कानून उनकी पूरी मदद करे, लेकिन इसके साथ ही निरपराधियों को फंसाने की कोशिश पर रोक लगाई जाए।
हरियाणा के एक परिचित ने बताया कि वहां ऐसे गिरोह बन गए हैं, जो महिला कानूनों की आड़ में ब्लैकमेल करके वसूली करते हैं। सरकारों और महिलाओं के लिए काम करने वाले लोगों को इस ओर जरूर सोचना चाहिए। कानूनों का दुरुपयोग उनकी विश्वसनीयता कम करता है। वक्त की मांग यह है कि महिला कानूनों को जेंडर न्यूट्रल बनाया जाए। कानून किसी एक पक्ष को डराने के लिए नहीं, सभी पक्षों को न्याय देने के लिए होते हैं। राजनीतिक दलों को भी सोचना चाहिए कि उनके वोटर पुरुष भी हैं। कहीं यह तो नहीं मान लिया गया कि आखिर वे जाएंगे कहां, इसे या उसे वोट तो देंगे ही? आखिर नेता पुरुषों को न्याय दिलाने के लिए क्यों कुछ करना नहीं चाहते? राजनीतिक विमर्श में उनसे जुड़े मुद्दों को भी शामिल किया जाना चाहिए।
Date:27-04-24
भारत को उभरते क्षेत्रों पर देना होगा ध्यानसंपादकीय
बीते कुछ दशकों की बात करें तो भारतीय अर्थव्यवस्था का एक चमकदार पहलू रहा है सेवा निर्यात की गति। इसने न केवल कारोबारी अंतर को थामे रखने में मदद की है बल्कि यह देश में रोजगार निर्माण का स्रोत भी रहा है। इनमें उच्च कौशल वाले रोजगार शामिल हैं। सेवा क्षेत्र में देश की सफलता को देखते हुए इस बात का परीक्षण करना सही होगा कि वैश्विक स्तर पर हम कहां हैं और भविष्य की क्या संभावनाएं हैं।
भारतीय रिजर्व बैंक के ताजा मासिक बुलेटिन में प्रकाशित एक शोध आलेख कहता है कि पिछले तीन दशकों में यानी 1993 से 2022 के बीच डॉलर के संदर्भ में भारत का सेवा निर्यात 14 फीसदी से अधिक की समेकित सालाना वृद्धि दर से बढ़ा। यह 6.8 फीसदी की वैश्विक सेवा निर्यात वृद्धि की तुलना में काफी अच्छा है। इसके परिणामस्वरूप समान अवधि में सेवा निर्यात में भारत की हिस्सेदारी 0.5 फीसदी से बढ़कर 4.3 फीसदी जा पहुंची। इसकी बदौलत भारत दुनिया में सातवां सबसे बड़ा सेवा निर्यातक बन गया। 2001 में भारत 24वें स्थान पर था।
फिलहाल दूरसंचार, कंप्यूटर और सूचना सेवा निर्यात के क्षेत्र में भारत दुनिया में दूसरे और सांस्कृतिक तथा मनोरंजक सेवा निर्यात में छठे स्थान पर है। भारत को तकनीकी प्रगति और उसे अपनाने से फायदा हुआ है। भारत के कामकाजियों में अंग्रेजी बोलने वाले लोग अच्छी खासी तादाद में हैं और इंजीनियरिंग के क्षेत्र में भी अनेक प्रतिभाएं हैं। इसके अलावा घरेलू डिजिटल बुनियादी ढांचे और नीतिगत ध्यान ने भारत को सूचना प्रौद्योगिकी और उससे संबद्ध सेवाओं के क्षेत्र में अहम वैश्विक हिस्सेदारी हासिल करने में मदद की है।
यह बात बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों द्वारा भारत में ग्लोबल कैपेबिलिटी सेंटर्स (जीसीसी) की स्थापना के कारण भी महसूस की जा सकती है। 2015-16 से 2022-23 तक भारत में जीसीसी की संख्या 60 फीसदी बढ़कर 1,600 से अधिक हो चुकी है।
दुनिया भर में डिजिटल तकनीक को अपनाने का सिलसिला बढ़ा है और भारत भी साफ तौर पर इससे लाभान्वित हुआ है। डिजिटल आपूर्ति वाली सेवाओं के निर्यात में 2019 से 2022 के बीच 37 फीसदी का इजाफा हुआ और यह भारत के लिए बहुत मददगार साबित हुआ।
तकनीकी क्षेत्र से इतर भारत का यात्रा निर्यात भी मजबूत रहा है, हालांकि वह अभी भी महामारी के असर से जूझ रहा है और इसमें आंशिक हिस्सेदारी पर्यटन की भी है। भारत ने परिवहन सेवा निर्यात में भी अच्छा प्रदर्शन किया है और आय के मामले में इसकी रैंक 2005 के 19वें से सुधरकर 2022 में 10वीं हो गई है।
भारत ने वैश्विक सेवा व्यापार में प्रतिस्पर्धी क्षमता भी प्रदर्शित की है, खासतौर पर दूरसंचार और सूचना प्रौद्योगिकी से संबंधित क्षेत्रों में। परंतु सवाल यह है कि क्या मध्यम से दीर्घ अवधि के दौरान यह मजबूती बरकरार रहेगी? भारतीय रिजर्व बैंक के अर्थशास्त्रियों के शोध ने दिखाया है कि बाहरी मांग और मूल्य प्रतिस्पर्धा सेवा निर्यात को बहुत अधिक प्रभावित करती है। उदाहरण के लिए वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद में एक फीसदी का इजाफा देश के सेवा निर्यात में 2.5 फीसदी बढ़ोतरी लाता है।
इसके अलावा वास्तविक प्रभावी विनिमय दर में एक फीसदी इजाफा वास्तविक सेवा निर्यात में 0.8 फीसदी की गिरावट ला सकता है। चूंकि वैश्विक आर्थिक वृद्धि के आने वाले वर्षों में अपेक्षाकृत कमजोर रहने की आशंका है ऐसे में सेवा निर्यात को भी प्रतिकूल हालात का सामना करना पड़ सकता है।
हालिया विश्लेषण बताता है कि विकसित अर्थव्यवस्था वाले देश अपने तट के आसपास के देशों में कारोबार पर जोर दे रहे हैं। ऐसा भूराजनीतिक तनाव बढ़ने के कारण हुआ है। यह भारतीय निर्यातकों के लिए भी चुनौती बन सकता है। इतना ही नहीं भारत के लिए आर्टिफिशल इंटेलीजेंस खतरा भी है और अवसर भी। अभी यह भी स्पष्ट नहीं है कि यह मध्यम अवधि में सेवा व्यापार को कैसे प्रभावित करेगी। भारत को दूरसंचार और सूचना प्रौद्योगिकी सेवा निर्यात में तुलनात्मक रूप से बढ़त हासिल है लेकिन उसे अपने निर्यात में विविधता लाने और अन्य उभरते क्षेत्रों पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है।
Date:27-04-24
शंका समाधानसंपादकीय
एक बार फिर सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया कि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन यानी ईवीएम पर नाहक सवाल उठाना उचित नहीं है। इससे शक ही पैदा होता है। अदालत ने ईवीएम संबंधी सभी याचिकाओं को खारिज कर दिया। दरअसल, ईवीएम को लेकर आशंका जाहिर की जा रही थी कि उसे बाहर से नियंत्रित किया और मतों में गड़बड़ी की जा सकती है। अदालत के सामने इस पर रोक लगाने की गुहार लगाई गई थी। इसके पक्ष में कई ऐसे प्रमाण भी दिए गए थे कि कहां-कहां कुल पड़े मतों और मशीनों में पड़े मतों की संख्या में अंतर पाया गया। विपक्षी दल इसे लेकर काफी आक्रामक थे और लगातार आशंका जाहिर कर रहे थे कि सत्तापक्ष मशीनों के जरिए मतदान प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है। इसमें कई स्वयंसेवी संगठन और विशेषज्ञ भी शामिल थे, जिनका दावा था कि ईवीएम को बाहर से संचालित किया जा सकता है। हालांकि भारत निर्वाचन आयोग लगातार तर्क दे रहा था कि ईवीएम सौ फीसद सुरक्षित हैं और उनमें किसी प्रकार की गड़बड़ी की गुंजाइश नहीं है। इस मामले ने इतना तूल पकड़ लिया था कि आम मतदाता के भीतर भी यह भ्रम पैदा हो गया कि ईवीएम में गड़बड़ी करके कोई पार्टी अपने पक्ष में मतों की संख्या बढ़ा सकती है।
ईवीएम पर संदेह जाहिर करते हुए अदालत में गुहार लगाने वालों की मांग थी कि मतदान के बाद जो पर्ची कट कर बक्से में गिरती है उसे मतदाता के हाथ में दिया जाए और वह उसे खुद अलग बक्से में डाले फिर मशीन के साथ ही उन पर्चियों का मिलान कर अंतिम रूप से मतों की गणना की जाए। मगर सर्वोच्च न्यायालय ने उस मांग को खारिज कर दिया। दरअसल, इस तरह मतदान की गोपनीयता का उल्लंघन होने का खतरा था। मगर इसमें अदालत ने निर्वाचन आयोग को निर्देश दिया है कि वह मशीनों में चुनाव चिह्न निर्धारित हो जाने के बाद उन्हें सीलबंद कर दे। उसने एक और रास्ता खोल दिया है कि अगर कोई प्रत्याशी किन्हीं मशीनों के बारे में शिकायत दर्ज कराता है, तो विशेषज्ञों से उनकी जांच कराई जाए। उस जांच का सारा खर्च संबंधित प्रत्याशी को उठाना पड़ेगा। इसे बहुत से लोग बड़ी राहत की बात मान रहे हैं। इस तरह गड़बड़ियों की जांच हो सकेगी। पर अब यह तो तय है कि ईवीएम को लेकर जिस तरह के भ्रम बने हुए थे, वे याचिकाकर्ताओं के मन से काफी हद तक दूर हो चुके होंगे।
हालांकि यह पहला मौका नहीं था, जब ईवीएम पर संदेह जताते हुए अदालत में गुहार लगाई गई थी। इसके पहले भी कई मौकों पर इसे चुनौती दी गई थी। पिछले आम चुनाव के वक्त भी इस मसले को काफी ल दिया गया था। हालांकि निर्वाचन आयोग ने बार-बार मशीन की निर्दोषिता सिद्ध करने की कोशिश की थी, पर उस पर किसी को विश्वास नहीं हो रहा था। अब सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद इस पर संदेह की कोई गुंजाईश नहीं रह गई है। राजनीतिक दलों को मशीन पर शक करने के बजाय मतदाताओं अधिक भरोसा करने की जरूरत है। मशीन पर शक करने से नाहक मतदाताओं के भीतर भ्रम पैदा हुआ है। हालांकि निर्वाचन आयोग को भी इसे हार जीत की तरह नहीं लेना चाहिए, उसे ईवीएम को विश्वसनीय बनाए रखने के जो भी उपाय हो सकते हैं, उन्हें अपनाने में उसे गुरेज नहीं होना चाहिए।
Date:27-04-24
विकसित देश बनने की चुनौतियांजयंतीलाल भंडारी
इन दिनों पूरी दुनिया की निगाहें भारत के 2047 तक विकसित देश बनने के संकल्प पर लगी हुई हैं। दरअसल, आने वाले तेईस वर्षों में भारत को विकसित देश बनाना एक चुनौतीपूर्ण लक्ष्य है। इस समय दुनिया में चालीस ही देश विकसित हैं, जिनमें प्रमुख रूप से औद्योगिक रूप से विकसित यूरोपीय देश हैं। भारत अभी विकासशील देश है। इसे विकसित देश बनाने के लिए लगातार आठ से नौ फीसद वार्षिक विकास दर प्राप्त करना जरूरी है। देश की मौजूदा प्रति व्यक्ति आय, जो करीब 2600 डालर है, उसे करीब 12 हजार डॉलर तक पहुंचाने, मजबूत आर्थिक सुधारों, कृषि एवं श्रम सुधारों, अधिक पूंजीगत व्यय अधिक बुनियादी ढांचा परियोजनाओं, राजकोषीय आदर्श, सांस्कृतिक और राष्ट्रीय विकास के मूल्य, स्वास्थ्य और शिक्षा क्षेत्र में अधिक गुणवत्तापूर्ण विकास तथा गरीबी और भ्रष्टाचार उन्मूलन की राह पर रणनीतिक रूप से तेजी से आगे बढ़ना प्रमुख चुनौतियां है।
इसमें कोई दो राय नहीं कि भारत के विकसित राष्ट्र बनने की संभावनाओं के कई आधार हैं। भारत दुनिया में वैश्विक मंदी की चुनौतियों के बीच आर्थिक विकास की डगर पर लगातार तेजी से आगे बढ़ रहा है। 10 अप्रैल को एशियाई विकास बैंक (एडीबी) ने वित्तवर्ष 2024 2025 के लिए भारत के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का वृद्धि दर अनुमान बढ़ाकर सात फीसद कर दिया। उसने पहले 6.7 फीसद वृद्धि का अनुमान लगाया था। उसने कहा कि सार्वजनिक और निजी निवेश के बेहतर परिदृश्य और सेवा क्षेत्र की मजबूत स्थिति को देखते हुए जीडीपी वृद्धि दर अनुमान को बढ़ाया गया है। भारत में बुनियादी ढांचे के विकास पर केंद्र और राज्य सरकारों के पूंजीगत निवेश और निजी कंपनियों के निवेश बढ़ने, सेवा क्षेत्र के मजबूत प्रदर्शन तथा उपभोक्ता के आत्मविश्वास में सुधार की बदौलत वित्तवर्ष 2024-25 में वृद्धि को बढ़ावा मिलेगा।
वस्तुओं के निर्यात में सुधार और विनिर्माण तथा कृषि उत्पादन बढ़ने से वित्तवर्ष 2025 26 भी वृद्धि दर बढ़ेगी। एडीबी का संशोधित अनुमान भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) द्वारा चालू वित्तवर्ष के लिए लगाए गए सात फीसद वृद्धि के अनुमान के अनुरूप है। आरबीआइ की मौद्रिक नीति समिति ने कहा है कि इस वर्ष 2024 में दक्षिण-पश्चिमी मानसून के अच्छा रहने की उम्मीद है, जिससे कृषि गतिविधियों में तेजी आएगी। इसके साथ ही शहरों में मांग बनी रहने और ग्रामीण बाजारों में मांग बढ़ने से निजी खपत में भी तेजी आएगी। तमाम बाजार संकेतक सकारात्मक दिखाई दे रहे हैं। इससे विकसित भारत की डगर आगे बढ़ेगी। दुनिया की प्रमुख वैश्विक क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों ने कहा है कि विनिर्माण, निवेश और निर्यात के मद्देनजर भारत में स्थितियां उपयुक्त हैं। भारत में कई अहम आर्थिक सुधार हुए और उनका सकारात्मक असर दिखाई दे रहा है। वैश्विक स्तर पर प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में गिरावट के रुझान के बीच भारत दुनिया के सर्वाधिक एफडीआइ प्राप्त करने वाले प्रमुख देशों में शामिल है भारत का विदेशी मुद्रा भंडार भी तेजी से बढ़ा है। भारत ने एक उत्पादक राष्ट्र के रूप में आधार तैयार किया है।
भारतीय अर्थव्यवस्था के बाहरी झटकों से उबरने की क्षमता देश के टिकाऊ विकास की बुनियाद बन गई है। इसमें कोई दो मत नहीं कि इस समय भारत के पास टिकाऊ विकास के अभूतपूर्व अवसर हैं। वैश्विक राजनीतिक और आर्थिक मंचों पर भारत को विशेष अहमियत दी जा रही हैं। भारत वैश्विक मंच पर बड़ी भूमिका के लिए तैयार हैं। तेजी से बढ़ते भारतीय बाजार के कारण भारत के मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) बढ़ रहे हैं। प्रवासी भारतीय लगातार अधिक विदेशी धन भेज रहे हैं। देश के वैज्ञानिकों द्वारा अंतरिक्ष, कृत्रिम बुद्धिमता, सेमीकंडक्टर, ऊर्जा तथा नए तकनीकी विकास के कारण आर्थिक विकास को गति मिल रही है। चीन के प्रति बढ़ती नकारात्मकता के मद्देनजर भारत नए वैश्विक आपूर्तिकर्ता देश के रूप में उभरकर सामने आया है।
भारत द्वारा 2023 में आयोजित की गई जी -20 की सफल अध्यक्षता से नए आर्थिक लाभों का सिलसिला शुरू हो गया है। इस समय भारत जीडीपी के मद्देनजर दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। भारत से आगे अमेरिका, चीन, जर्मनी और जापान हैं। जापान की अर्थव्यवस्था से इसी साल 2024 में भारतीय अर्थव्यवस्था आगे निकल सकती है। वैश्विक क्रेडिट रेटिंग एजेंसी क्रिसिल ने अपनी नई रपट में कहा कि भारत आर्थिक वित्तीय तथा संरचनात्मक सुधारों के कारण वर्ष 2031 तक निम्न मध्यम से उच्च मध्यम आय वाला देश बन जाएगा और विकसित भारत की डगर आगे बढ़ेगी। इन आधारों की बुनियाद के साथ भारत 2047 तक विकसित देश की संभावनाएं रखता है। भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के मकसद से देश के प्रमुख सरकारी विभागों ने अभी से अगले पांच साल के लिए विकास कार्यों की रूपरेखा बनाने पर काम शुरू कर दिया है। इनमें खासतौर से कृषि, बुनियादी ढांचा, शिक्षा, रोजगार उद्योग, सेवा क्षेत्र, व्यापार, स्टार्टअप, हरित ऊर्जा, स्वास्थ्य, कौशल विकास, महिलाओं का उत्थान, गरीबी में कमी लाने, संतुलित क्षेत्रीय विकास, प्रभावी न्याय व्यवस्था, दुनिया में भारत की नई भूमिका जैसे विकसित राष्ट्र बनने के प्रमुख विषय शामिल हैं। इन विभिन्न क्षेत्रों के विकास की लंबी अवधि की रणनीति से भारत द्वारा वर्ष 2047 तक तीस लाख करोड़ डालर की विकसित अर्थव्यवस्था बनाने का लक्ष्य रखा गया है। लेकिन भारत को विकसित राष्ट्र बनाने की संभावनाओं के बीच यह भी ध्यान देना होगा कि विकसित देश बनने की विभिन्न चुनौतियों का सामना करके सफलता प्राप्त की जाए अब लगातार देश की जीडीपी बढ़ाने के साथ प्रतिव्यक्ति आय और आम आदमी की खुशहाली पर ध्यान देना होगा।
हाल ही में संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी नई मानव विकास सूचकांक (एचडीआइ) रपट में भारत 193 में से 134वें स्थान पर है। विश्व खुशहाली रपट 2024 में 143 देशों में भारत को 126वां स्थान दिया गया है। हालांकि पिछले दस वर्षों में बहुआयामी गरीबों में बड़ी कमी आई है, लेकिन अब बकाया पंद्रह करोड़ से अधिक गरीबों को नई मुस्कुराहट देने का जोरदार अभियान आगे बढ़ाना होगा। कृषि श्रमिक, भूमि और अन्य सुधारों की जरूरत बनी हुई है। जीडीपी के अनुपात में हमारा शोध एवं विकास क्षेत्र पर कुल व्यय केवल 0.64 फीसद है। यह 2.71 फीसद के वैश्विक स्तर से बेहद कम है। देश में बेहतर शिक्षा, बेहतर स्वास्थ्य और पोषण सुनिश्चित कराने के साथ ही शांति कायम रखने और सुरक्षा चाक- चौबंद रखने के जरूरी ऊंचे लक्ष्यों पर ध्यान देना होगा। देश में उन्नीस करोड़ से अधिक महिलाओं को सवैतनिक श्रमशक्ति में शामिल करने की रणनीति को अमलीजामा पहनाना होगा। हमारे शक्तिशाली सेवा क्षेत्र के जरिए विकास पर ध्यान केंद्रित करते हुए आगे बढ़ना होगा। ऐसे में उम्मीद की जा सकती है कि देश वर्ष 2047 तक विकसित भारत बनाने के लक्ष्य के समक्ष दिखाई दे रही चुनौतियों का सामना करते हुए सफलता के शिखर पर पहुंचने में अवश्य कामयाब होगा।
Date:27-04-24
हथियारों की होड़ चिंताजनकललित गर्ग
शांति ‘के तमाम उपायों के बीच दुनिया भर में सैन्य खर्च शस्त्रीकरण एवं घातक हथियारों की होड़ खतरे की घंटी हैं। शस्त्रीकरण के भयावह दुष्परिणामों से समूचा विश्व भयाक्रांत है। हर पल आणविक हथियारों के प्रयोग को लेकर दुनिया डर के साये में जी रही है। इसीलिए आज अयुद्ध, निशस्त्रीकरण एवं शांति की आवाज चारों ओर से उठ रही हैं। शक्ति संतुलन के लिए शस्त्र निर्माण एवं शस्त्र संग्रह की बात से किसी भी परिस्थिति में सहमत नहीं हुआ जा सकता क्योंकि इससे अपव्यय तो होता ही है, साथ ही गलत हथियारों के हाथों में पड़कर दुरुपयोग की आशंकाएं बढ़ जाती हैं।
ताजा घटनाक्रम को देखें तो एक और रूस और यूक्रेन आमने-सामने हैं, दूसरी तरफ इस्राइल और ईरान के बीच तल्खी भी चरम पर है। चीन और ताइवान के बीच भी रह-रह कर युद्ध के बादल मंडरा रहे हैं। ऐसे माहौल में सवाल स्वाभाविक है कि क्या सचमुच दुनिया तीसरे विश्व युद्ध की ओर बढ़ते हुए घातक हथियारों की प्रयोगभूमि बन रही है? सवाल और भी हैं। स्टॉकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट की हथियारों पर ताजा रिपोर्ट ऐसे ही सवाल खड़े कर रही है। दुनिया सीधे-सीधे दो खेमों में बंट गई है। स्टॉकहोम की रिपोर्ट के आंकड़े चौंकाने वाले ही नहीं, डराने वाले भी हैं। शांति के तमाम उपायों के बीच दुनिया भर में सैन्य खर्च का बढ़ना एवं नये-नये हथियारों का बाजार गरम होना, चिंताजनक है। रिपोर्ट में खास बात यह है कि दुनिया में सर्वाधिक सैन्य खर्च करने वाले देशों में भारत चौथे नंबर पर बरकरार है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा हथियार आयातक देश बन चुका है। रिपोर्ट में इस बात का खुलासा हुआ है। भारत ने बीते पांच साल में दुनिया में सबसे ज्यादा हथियार खरीदे। रिपोर्ट में बताया गया है कि यूरोप का हथियार आयात 2014-18 की तुलना में 2019- 23 में लगभग दोगुना बढ़ा है, जिसके पीछे रूस यूक्रेन युद्ध बड़ा कारण माना जा रहा है। इसके अलावा, पिछले पांच वर्षों में सबसे ज्यादा हथियार एशियाई देशों ने खरीदे। इस लिस्ट में रूस- यूक्रेन युद्ध ने देश के रक्षा निर्यात को काफी प्रभावित किया है। इस कारण पहली बार रूस हथियार निर्यात में तीसरे स्थान पर पहुंच गया है तो अमेरिका पहले और फ्रांस दूसरे नम्बर पर हैं। पिछले 25 सालों में पहली बार अमेरिका एशिया और ओशिनिया का सबसे बड़ा हथियार आपूर्तिकर्ता रहा।
अमेरिका की हथियारों की होड़ एवं तकनीकीकरण की दौड़ पूरी मानव जाति को ऐसे कोने में धकेल रही है, जहां से लौटना मुश्किल हो गया है। अब तो दुनिया के साथ-साथ अमेरिका स्वयं ही हथियारों एवं हिंसक मानसिकता का शिकार है। अमेरिका ने दुनिया पर आधिपत्य स्थापित करने एवं अपने शस्त्र कारोबार को पनपाने के लिए जिस अपसंस्कृति को दुनिया में फैलाया है, उससे पूरी मानवता पीड़ित है। अमेरिका ने नई विश्व व्यवस्था ( न्यू वर्ल्ड ऑर्डर) की बात की है, खुलेपन की बात की है। लगता है कि ‘विश्व मानव’ का दम घुट रहा है, और घुटन से बाहर आना चाहता है। विडंबना देखिए, अमेरिका दुनिया का सबसे अधिक शक्तिशाली और सुरक्षित देश है, लेकिन उसके नागरिक सबसे अधिक असुरक्षित और भयभीत नागरिक हैं। वहां की जेलों में आज जितने कैदी हैं, दुनिया के किसी देश में नहीं हैं। कई वाकये हो चुके हैं कि किसी रेस्तरां, होटल या फिर जमावड़े पर अचानक किसी सिरफिरे ने गोलीबारी शुरू कर दी और बड़ी तादाद में लोगों को मार डाला। 2014 में अमेरिका में हत्या के दर्ज सवा चौदह हजार मामलों में अड़सठ फीसद मामलों में बंदूकों का इस्तेमाल किया गया था।
दरअसल, मनुष्य के भयभीत मन को युद्ध एवं हथियारों की विभीषिका से मुक्ति दिलाना जरूरी है। युद्धरत देशों में शांति स्थापित aकर, युद्ध-विराम करके विश्व को निर्भय बनाना चाहिए। निश्चय ही यह किसी एक या दूसरे देश की जीत नहीं, बल्कि समूची मानव जाति की जीत होगी। यथार्थ यह है कि अंधकार प्रकाश की ओर चलता है, पर अंधापन मृत्यु – विनाश की ओर रूस ने अपनी शक्ति एवं सामर्थ्य का अहसास गलत समय पर गलत उद्देश्य के लिए कराया है। युद्ध से तबाही रूस- यूक्रेन की नहीं, बल्कि समूची दुनिया की तबाही होगी, क्योंकि रूस परमाणु विस्फोट करने को विवश होगा जो दुनिया की बड़ी चिंता का सबब है। बड़े शक्तिसंपन्न देशों को युद्ध विराम के प्रयास करने चाहिए। लेकिन प्रश्न है कि जो देश हथियारों के निर्माता हैं, वे क्यों चाहेंगे कि युद्ध विराम हो जब तक शक्तिसंपन्न देशों की शस्त्रों के निर्माण एवं निर्यात की भूख शांत नहीं होती तब तक युद्ध की आशंकाएं मैदान में, समुद्र में, आकाश में तैरती रहेंगी।
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द्वितीय विश्व युद्ध के बाद 1948 में बनाए गए ‘जनरल एग्रीमेंट ऑन टैरिफ्स एंड ट्रेड (GATT)’ के स्थान पर 1 जनवरी 1995 में विश्व व्यापार संगठन (WTO) की स्थापना की गई थी। इसे द्वितीय विश्व युद्ध के बाद सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय व्यापारिक सुधार बताया गया है। WTO की शुरूआत के बाद विवाद निस्तारण की नई प्रक्रिया शुरू हुई। परंतु वर्तमान में मुक्त व्यापार का राजनीतिक परिदृश्य बदल गया है, एवं WTO की प्रासंगिकता पर प्रश्न चिन्ह खड़ा होता है।
वर्तमान परिदृश्य –
सेवा क्षेत्र का व्यापार तेजी से बढ़ रहा है, और इसमें आगे और वृद्धि होने की उम्मीद है। वैश्वीकरण का अगला दौर सेवा व्यापार से उत्पन्न होगा, जिसे वैश्वीकरण 4.0 का नाम दिया जाएगा।
वैश्विक समृद्धि में महत्वपूर्ण योगदान के बावजूद WTO बड़ी कारोबारी शक्तियों के अनुकूल नहीं रह गया है, और अगर कुछ नाटकीय नहीं घटित होता है, तो यह अपने अंतिम पड़ाव पर है।
भारत के लिए आगे की राह –
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27 April 2024
प्रश्न -459 हिमालयीन ग्लेशियर की वर्तमान स्थिति क्या है? इसके क्या प्रभाव हो सकते हैं? आपदा प्रबंधन की दृष्टि से क्या-क्या उपाय किये जाने चाहिए? (200 शब्द)
Question – What is the current status of Himalayan glacier? What effects can this have? What measures should be taken from the point of view of disaster management? (200 words)
नोट : इसका उत्तर आपको हमें नहीं भेजना है, यह आपके स्वयं के अभ्यास के लिए है।
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Date:26-04-24
A Matter Of TrustSC’s varied verdicts on state acquisition of pvt properties have been confusing. And people are suspicious of govtsTOI Editorials
Nine-judge benches in the Supreme Court are infrequent. But when they are formed and reach a decision, it should settle substantive questions of law. According to the National Judicial Data Grid, there are 136 pending cases (main and connected matters) for nine-judge benches. One such bench began its work this week to settle an issue that’s been a cause of confusion for over four decades.
Not always in harmony | This case gives a sense of how the intersection of laws and judicial interpretation doesn’t always lead to clarity. It sometimes leads to questions over the efficacy of constitution benches.
The origin goes back to 1977 when a seven-judge bench, interpreting Article 39(b), in a 4:3 decision concluded that privately owned resources did not fall within the scope of material resources of a community. In 1983, a five-judge bench relied on the minority opinion to interpret some laws. This was upheld by a nine-judge bench in 1997. However, in 2002, another bench wanted these inconsistent verdicts resolved. Over two decades later, SC has got down to it.
Current case | Maharashtra in 1986 passed a law that allowed a state body to acquire certain properties for restoration if 70% of owners consented. This law stated that it aimed to fulfil the principles advocated by the Constitution’s Article 39(b). A body representing property owners challenged it, but there was no result. In 2019, this law was amended again to make time-bound redevelopment mandatory, failing which the state could take over the property.
Eminent domain | SC’s bench will resolve accumulated inconsistencies, but there’s a larger public policy issue at stake here. Every economically successful country has used the doctrine of eminent domain. It means the state can acquire private property to serve public interests. That’s been the prerequisite for transformational infra development. The key however is that there has to be trust in the claim that forcible acquisition of private property is for a public purpose.
Trust, missing element | Property owners in Maharashtra who are litigating believe the law’s real intent is to help real estate firms. Similar distrust among farmers has also stalled adjustments in India’s land acquisition legislation.
SC’s inconsistency across benches has created avoidable delays. It should end this time. But questions about efficacy will remain because if people lack trust in a law’s intent, the answer lies in the governance system.
Date:26-04-24
चुनावों के बीच समाजवाद और पूंजीवाद का द्वंद्वसंपादकीय
निजी संपत्ति को लेकर समाजवादी और पूंजीवादी सोच का शाश्वत द्वंद्व एक बार फिर सबसे बड़ी कोर्ट में ही नहीं, एक सबसे पुरानी और दूसरी सबसे बड़ी पार्टी को चुनावी अखाड़े में लाया है। सवाल है कि क्या निजी संपत्ति को समाज का संसाधन मानते हुए उसे व्यापक लोक कल्याण के लिए राज्य द्वारा इस्तेमाल किया जा सकता है? आज से कुछ दशक पहले तक जनमानस में स्टेट सोशलिज्म की मार्क्सवादी अवधारणा सही मानी जाती थी। लेकिन चूंकि इसमें निजी संपत्ति के लिए प्रोत्साहन के तत्व विलुप्त थे लिहाजा विकास के लिए जरूरी उद्यमिता का अभाव पाया गया । विकासहीनता ने इस सिस्टम के प्रति पूरी दुनिया में अरुचि पैदा की। नतीजतन नैतिक रूप से सही होने के बावजूद समाजवादी अवधारणा और उसकी राजनीतिक परिणति- कम्युनिज्म- अपने जन्म-स्थान से भी तिरोहित हो गई। आजाद भारत में पूंजीवाद खत्म करने के लिए निजी संपत्ति को मौलिक अधिकार से हटा दिया गया और नीति निदेशक तत्व के अनुच्छेद 39 (बी) में निजी संपत्ति को सामाजिक संसाधन माना गया। इसे चुनौती मिली भी तो सन् 1977 में। सुप्रीम कोर्ट की सात सदस्यीय बेंच ने 4-3 से इसे गलत माना लेकिन बाद की कई बेंचों ने माइनॉरिटी राय को उद्धृत करते हुए राज्य के अधिकारों को बहाल रखा। अब एक बार फिर नौ-मेम्बर बेंच ने इसे सुनना शुरू किया है। आम चुनावों के बीच ये मुद्दा सरगर्मियां बढ़ाएगा।
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हमारे पर्वतीय पर्यटन स्थल बढ़ते ट्रैफिक से काफी समय से घुटन का अनुभव कर रहे हैं। यही नहीं, इन क्षेत्रों में बढ़ता प्लास्टिक कचरा, कई वन्य पशुओं का उन्मूलन और दक्षिण भारतीय नीलगिरी वनों में हाथियों का अवैध शिकार, बिजली के तारों से हाथियों की मौत, रेलवे ट्रैक पर हाथियों की मौत चिंता का विषय हैं। इन मुद्दों पर दायर की गई याचिका की सुनवाई करते हुए मद्रास उच्च न्यायालय ने कुछ महत्वपूर्ण निर्णय दिए है।
सुरम्य और सुखद जलवायु वाले सभी पर्वतीय स्थल पिछले कुछ दशकों से अपने बुनियादी ढांचे पर दबाव से निपटने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। दूसरी ओर इनकी अर्थव्यवस्थाएं पर्यटन पर निर्भर करती है। ऐसे में मद्रास उच्च न्यायालय का यह प्रयास प्रशंसनीय है। आशा है कि इन स्थलों से जुड़े राज्य स्थायी पर्यटन, और पर्यावरण की सुरक्षा को सक्षम करने के उपाय सुनिश्चित करेंगे।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित मोहम्मद इमरानुल्लाह एस के लेख पर आधारित। 3 अप्रैल, 2024
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Date:25-04-24
Just Bad IdeasInheritance & wealth taxes are wrong responses to the social fallout of economic transformationTOI Editorials
Inheritance tax was the hot button topic yesterday in India’s dynamic election campaign landscape. Sam Pitroda, chairman of Indian Overseas Congress, suggested it though the idea doesn’t feature in the Congress manifesto. But it attracted attention because a tax to address the political fallout of inequality has gained global currency. A prominent advocate is Joe Biden, who proposed a wealth tax that received strong pushback.
None of these ideas are new. They haven’t caught on because they are impractical. For example, US doesn’t have a federal inheritance tax. Only six states, and not the ones that house tech giants, have some sort of inheritance tax. If they haven’t spread, it’s because they can lead to a flight of capital.
Uneven flow of benefits | The world’s in the middle of a new industrial revolution (IR), led by communications technology. It’s following the pattern of the previous IRs. The benefits of technological transformation flow unevenly. Typically, labour is at the tail end of the transformation as upgrading human skills to meet new requirements takes time. Govts are trying to manage the immediate fallout of this transformation by sometimes coming up with bad ideas.
Wealth, a mirage? | Financial markets reward creators and innovators in this transformation through hyperinflation of share prices. This notional wealth is the source of attention, particularly through ideas such as Biden’s wealth tax, which proposed taxing unrealised capital gains. That is, the notional appreciation would be taxed. Elon Musk’s fluctuating fortune shows how unworkable this idea is. Two years ago, his notional gains were huge. Now, his net worth is eroding in the wake of a sharp fall in share value.
Inequality is real | The uneven pace of the flow of benefits, however, does have real world consequences. In India, this comes through a weakening link between four decades of robust GDP growth and the structure of employment. Job creation at the mass level hasn’t kept pace with economic growth, catalysing damage control by political parties. Expanding the welfare state has been the go-to approach for all of India’s political parties.
People matter | Subsidies however are a short-term fix. And redistribution through measures such as inheritance and wealth tax is wholly counterproductive. The only ways out are a recalibration of policies that inhibit labour-intensive manufacturing, and a massive investment in upgrading human capital. Skilling is the only long-term solution.
Date:25-04-24
बढ़ती आर्थिक खाई का मुद्दा चुनावों से नदारद हैसंपादकीय
प्रजातंत्र के मूल सिद्धांतों में से एक है- ऐसी अर्थनीति, जिससे आर्थिक विकास का लाभ सबको समान रूप से मिले। अगर एक प्रतिशत लोगों के पास देश की 40.1% संपत्ति और 22.6% आय हो और यह खाई लगातार बढ़ रही हो तो क्या सरकार पर उसकी आर्थिक नीतियों को बदलने का जन- दबाव नहीं होना चाहिए? आर्थिक असमानता खत्म करना जनमत हासिल करने की पूर्व शर्त होनी चाहिए और अपरिहार्य भी । सरकार की नीति ऐसी होनी चाहिए कि शिक्षा, स्वास्थ्य और कौशल विकास के लिए टेक्नोलॉजी जल्द से जल्द नीचे के वर्ग तक पहुंचे ताकि पूंजी की भूमिका न्यूनतम रहे। पूंजीगत निवेश के नाम पर सरकार का जोर अगर अंतरराष्ट्रीय स्तर के एयरपोर्ट, हाईवे या ऐसे उद्योगों को बढ़ाने पर हो, जिनमें पूंजी का प्रभुत्व तो हो लेकिन उनके अनुपात में नौकरियां कम सृजित हों तो इसे ‘जॉबलेस ग्रोथ’ कहते हैं। यही कारण है भारत की जीडीपी तो बढ़ रही है, लेकिन मानव विकास सूचकांक में 34 साल से देश वहीं का वहीं है और पहली बार विनिर्माण से ज्यादा मजदूर, निर्माण कार्यों में या ढाबों जैसे असंगठित क्षेत्रों में बेहद कम दिहाड़ी पर काम कर रहे हैं। इसमें दो राय नहीं है कि अपने दम पर 8-9 करोड़ रोजगार देने वाला एमएसएमई सेक्टर बुरी हालत में है। विपक्ष पर संपत्ति हड़पने का आरोप लगाकर कहीं एक गंभीर मुद्दे को जन-विमर्श से हटाया तो नहीं जा रहा ?
Date:25-04-24
चुनावी राजनीति का हिस्सा बनी विदेश नीतिहर्ष वी. पंत, ( लेखक आब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में उपाध्यक्ष हैं )
भारतीय राजनीति पारंपरिक रूप से घरेलू मुद्दों पर केंद्रित रही है और विदेशी मामलों के स्तर पर बात अमूमन चीन एवं पाकिस्तान तक सीमित रहती आई है। हालांकि नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद यह रवैया बदला है। मोदी ने विदेश नीति जैसे विषय को राजनीति की मुख्यधारा में शामिल किया है। अब उनकी इस नीति की छाप भाजपा के चुनावी घोषणा पत्र पर भी दिखाई दे रही है, जिसे सत्तारूढ़ दल ने ‘संकल्प पत्र’ का नाम दिया है।
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता से लेकर देश को विकसित राष्ट्र बनाने और शीघ्र ही भारत को विश्व की तीसरी सबसे बड़ी आर्थिकी बनाने के संकल्प की पूर्ति में विदेश नीति की प्रभावी भूमिका रहने वाली है। इसकी महत्ता को समझते हुए भाजपा ने अपने संकल्प पत्र में विदेश एवं सामरिक नीति को महत्व देते हुए वैश्विक पटल पर भारत के विस्तार को साकार रूप देने संबंधी कई पहलुओं को शामिल किया है। मोदी की नीति में ‘विश्वबंधु भारत’ और वसुधैव कुटुंबकम् जैसी संकल्पनाएं भारत को विश्वपटल पर एक जिम्मेदार शक्ति के रूप में स्थापित करने पर बल देती हैं। प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में भारत अपनी आर्थिक, सामरिक एवं सांस्कृतिक शक्ति के दम पर वैश्विक विस्तार के प्रयास में लगा है।
मोदी के नेतृत्व में भाजपा का दृष्टिकोण यही दर्शाता है कि भारत को वैश्विक समस्याओं का प्रभावी समाधान प्रस्तुत करने वाले देश के रूप में देखा जाए। इस समय पूरी दुनिया अस्थिरता एवं कोलाहल के दौर से गुजर रही है। वैश्विक ढांचा छिन्न-भिन्न है और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं की आभा कमजोर हो रही है। ऐसे अस्थिर हालात में भारत की स्थिति अपेक्षाकृत स्थिर रही है। इसके पीछे मोदी की सक्रिय विदेश नीति और विभिन्न राष्ट्राध्यक्षों के साथ उनके सहज एवं आत्मीय संबंधों की अहम भूमिका रही है।
अपने इसी प्रभाव का इस्तेमाल करते हुए भारत कोविड संकट से लेकर रूस-यूक्रेन युद्ध और इन दिनों पश्चिम एशिया में चल रहे हिंसक टकराव से स्वयं को अलग रखने एवं अपने हितों की पूर्ति में सफल रहा है। ऐसी स्थिति में विपरीत ध्रुवों वाले देश भी भारत की ओर उम्मीद लगाकर देख रहे हैं। इस परिदृश्य में भारत ने एक जिम्मेदार देश की भूमिका निभाते हुए अपने स्तर पर समाधान का प्रयास किया है। इससे भारत की अंतरराष्ट्रीय साख एवं कद बढ़ा है।
कोविड महामारी के समय से विश्व अंतरराष्ट्रीय संगठनों की अक्षमता की समस्या से जूझ रहा है। हाल के विभिन्न हिंसक टकरावों के दौरान भी संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की निष्प्रभावी भूमिका देखी गई है। यही कारण है कि मोदी ने विभिन्न मंचों से बार-बार संयुक्त राष्ट्र सुधारों की बात दोहराई है। भाजपा के संकल्प पत्र में भी इसे दोहराया गया है कि सुरक्षा परिषद में सदस्यता प्राप्त कर भारत वैश्विक मामलों में व्यापक भूमिका निभाएगा।
भारी उथल-पुथल के दौर से जूझ रही दुनिया में वैश्विक ढांचा बहुत तेजी से बदल रहा है। नेतृत्व के स्तर पर उत्पन्न हो रहे निर्वात को प्रभावी रूप से भरने के लिए मोदी के नेतृत्व में भारत सक्रिय भूमिका निभा रहा है। गत वर्ष नई दिल्ली में आयोजित जी-20 शिखर सम्मेलन में अफ्रीकी संघ को समूह का सदस्य बनाने में मिली सफलता से लेकर ग्लोबल साउथ यानी विकासशील देशों के मुद्दों को मुखरता से उठाने तक भारत ने सक्षम नेतृत्वकर्ता का परिचय दिया है।
आइएमएफ एवं विश्व बैंक जैसी संस्थाओं में अपेक्षित सुधारों और उसमें विकासशील देशों को उचित प्रतिनिधित्व देने की आवाज उठाने में भारत खासा मुखर रहा है। कोविड महामारी में टीके पहुंचाने से लेकर तुर्किये से लेकर नेपाल और सीरिया तक प्राकृतिक आपदा में भारत ने अपने संबंधों की परवाह किए बिना वहां राहत पहुंचाने में तत्परता दिखाई है। भाजपा के संकल्प पत्र में इसी दृष्टिकोण को दोहराया गया है कि भारत प्राकृतिक या किसी अन्य प्रकार की आपदाओं में मानवीय सहयोग एवं सहायता प्रदान करने में आगे रहेगा। इससे भारत के प्रति वैश्विक धारणा सकारात्मक होगी और वह एक स्वाभाविक नेतृत्वकर्ता के रूप में उभरेगा।
चूंकि भारत एक संवेदनशील भौगोलिक क्षेत्र में अवस्थित है तो पड़ोसियों के साथ संबंध भी खासे अहम हो जाते हैं। भाजपा ने ‘पड़ोसी प्रथम’ की अपनी नीति में निरंतरता का वादा किया है। भाजपा के संकल्प पत्र में उल्लेख है कि पार्टी के शासन में देश भारतीय उपमहाद्वीप में जिम्मेदार एवं भरोसेमंद साझेदार के रूप में समूचे क्षेत्र को प्रोत्साहन की नीति पर चलेगा। इसके साथ ही परेशानी का सबब बनने वाले सीमा पार आतंकवाद और चीन के साथ संतुलन की दृष्टि से प्रभावी कदम उठाने की बात भी की है।
भाजपा ने चीन सीमा पर उन्नत बुनियादी ढांचा विकसित करते रहने पर जोर दिया है। साथ ही हिंद महासागर में मुक्त आवाजाही एवं सामुद्रिक सुरक्षा का भी आश्वासन दिया है। पार्टी ने पाकिस्तान सीमा पर भी बुनियादी ढांचे को बेहतर बनाते रहने का संकल्प लिया है। इसके अलावा, आतंक पर अंकुश के लिए भाजपा ने कांप्रिहेंसिव कन्वेंशन अगेंस्ट इंटरनेशनल टेररिज्म पर संयुक्त राष्ट्र में सर्वानुमति बनाने के लिए प्रयासरत रहने का उल्लेख किया है।
दुनिया भर में फैले भारतवंशियों के प्रभाव को देश के हित में उपयोग करना भी भाजपा के एजेंडे में है। भाजपा के संकल्प पत्र में उल्लेख है कि वह भारत की प्रगति में भारतवंशियों को सक्रिय रूप से शामिल कर उनकी आवश्यकता के समय उन्हें अपेक्षित समर्थन भी उपलब्ध कराएगी। मोदी सरकार के दौरान भारतवंशियों को साधने के विशेष प्रयास भी किए गए हैं।
पार्टी का वादा है कि भारत के अंतरराष्ट्रीय प्रभाव को बढ़ाने के लिए राजनयिकों और भारत के मिशनों की संख्या में भारी बढ़ोतरी की जाएगी, क्योंकि जिस प्रकार से देश के हितों का विस्तार हो रहा है, उनकी पूर्ति के लिए मानवीय संसाधनों का अभाव दिखता है। इसी कड़ी में कुछ दिन पहले ही कई देशों में डिफेंस अटैचियों की नियुक्ति भी की गई है। ऐसे में पार्टी का संकल्प पत्र सरकार की नीति में निरंतरता और क्षमता विस्तार की आकांक्षाओं को ही दर्शाता है।
Date:25-04-24
चुनावी राजनीति का हिस्सा बनी विदेश नीतिडॉ रमेश ठाकुर
कांकेर (छत्तीसगढ़) में पिछले दिनों केंद्रीय सुरक्षा बलों ने एक ऑपरेशन के तहत बड़ी संख्या में नक्सली मार गिराए। उनके पास से बड़ी मात्रा में हथियार और गोलाबारूद बरामद हुए। बहरहाल, कांकेर मुठभेड़ को लेकर कांग्रेस और सत्तारूढ़ पार्टी के बीच जम कर वाकयुद्ध जारी है। देश विगत 70 वर्षों से नक्सल आतंक झेलता आया है इसलिए समस्या को राजनीतिक चश्मे से देखने का कतई कोई औचित्य नहीं है?
समस्या को जड़ से मिटाने की राष्ट्रीय नीति के प्रति सभी को एक समान विचार रखने चाहिए। केंद्र सरकार ने बीते दस वर्षों से नक्सल उन्मूलन की नीति पर एक निरंतरता बनाई हुई है जिसके अच्छे परिणाम भी मिल रहे हैं। आंकड़ों पर गौर करें तो 2004-14 के यूपीए के दस सालों में नक्सली हमलों या मुठभेड़ों में सुरक्षा बलों के 1,750 जवानों की शहादत हुई थी, लेकिन 2014-23 में इसमें करीब 72 फीसद तक कमी आई। इस दौरान सुरक्षा बलों के 485 जवानों की जान गई। इसी अवधि में नागरिकों की मौत की संख्या 68 फीसद घटकर 4,285 से 1,383 हुई। 2009 में यूपीए सरकार ने ऑपरेशन ‘ग्रीन हंट’ शुरू किया था। सीआरपीएफ को इसके लिए खास तरह के टास्क दिए गए। यहां तक कि सेना को भी लगाया गया। लेकिन, ऑपरेशन ‘ग्रीन हंट’ सुरक्षा बलों के लिए ही काल बन गया। अप्रैल- 2010 में नक्सलियों ने दंतेवाड़ा में एक ही दिन सीआरपीएफ के 76 जवानों की हत्या कर दी। घरेलू मोर्चे पर ऑपरेशन ‘ब्ल्यूस्टार’ के बाद सुरक्षा बलों की सबसे ज्यादा मौतों की यह घटना बन गई। यूपीए में अलग-अलग समय पर तीन गृह मंत्री बने- शिवराज पाटिल, चिदंबरम और सुशील शिंदे। नक्सलवाद पर तीनों की अलग-अलग राय थी। यूपीए सरकार में ही हिंसक नक्सलियों को गुमराह और नेक इरादे वाले लोगों के रूप में वर्णन किया गया। यूपीए सरकार ने ही मलकानगिरि के कलक्टर विनीत कृष्णा के बदले में आठ माओवादियों को रिहा किया। उसी दौरान माओवादी समर्थकों का एक पढ़ा-लिखा वर्ग भी तैयार हुआ जिन्हें आज अर्बन नक्सली कहा जाता है।
फिलहाल, केंद्र सरकार अब दावा करती है कि उसने हिंसक वाम आंदोलन और उग्रवाद के खिलाफ जोरदार अभियान छेड़ा है। 2015 में मोदी सरकार ने आतंकवाद और उग्रवाद के खिलाफ ‘राष्ट्रीय नीति और कार्य योजना’ शुरू की थी जिसमें हिंसा के प्रति ‘जीरो टॉलरेंस’ की बात कही गई। किसी भी तरह की हिंसा से निपटने के लिए पुलिस और सुरक्षा बलों का आधुनिकीकरण शुरू कर दिया। प्रशिक्षण के लिए विशेष तौर पर फंड जारी किए। सरकार ने हिंसा प्रभावित राज्यों की सहायता के लिए विशेष बुनियादी ढांचे को मजबूत करने की योजना पर भी काम शुरू किया। सुरक्षा जरूरतों में आने वाले खर्चों के लिए अलग से धनराशि जारी की। इस पूरे काम की निगरानी के लिए भी मोदी सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल में अमित शाह के नेतृत्व में गृह मंत्रालय में अलग डिवीजन बना दिया है। इसे वामपंथी उग्रवाद प्रभाग नाम दिया गया। वामपंथी उग्रवादियों का मुकाबला करने और राज्य पुलिस बलों की क्षमता को बढ़ाने के लिए राज्यों में इंडिया रिजर्व बटालियन का भी गठन किया गया है।
लगातार ऑपरेशन से माओवादियों और नक्सलियों के पांव उखड़ गए हैं। 2014-23 के बीच वामपंथी उग्रवाद से संबंधित हिंसा में 52 फीसद से अधिक की कमी आई है। कुल मौतों में भी 69 फीसद की कमी आई है। सुरक्षा बलों के हताहतों की संख्या इस समय काफी कम है। यह बड़ी उपलब्धि है। विगत वर्षों में उग्रवादी गुटों के कई सदस्य आत्मसमर्पण करने को भी मजबूर हुए। केंद्र सरकार ने कई मर्तबा वामपंथी उग्रवादियों को हिंसा छोड़ने और बातचीत करने का प्रस्ताव दिया। उनके लिए केंद्र ने कई विकास परियोजनाएं भी करने की बात कही जिनमें वामपंथी उग्रवादग्रस्त क्षेत्र में 17,600 किमी. सड़कों को मंजूरी दी। ढाई सौ किलेबंद पुलिस स्टेशन स्थापित करने का काम भी शुरू हुआ। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों के लिए सड़क आवश्यकता योजना को केंद्र सरकार ने आठ राज्यों आंध्र प्रदेश, बिहार, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, ओडिशा और उत्तर प्रदेश के 34 जिलों में लागू किया है। इस योजना में 5,362 किमी. सड़कों का निर्माण हो चुका है। नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में मोबाइल कनेक्टिविटी बढ़ाने के लिए अगस्त, 2014 में मोबाइल टावरों की स्थापना को भी मंजूरी दी गई। अब तक 4885 मोबाइल टावर लगाए गए हैं। दूसरे चरण में 2,542 मोबाइल टावर और लगाए जा रहे हैं। सबसे बड़ी बात यह है कि सरकार ने वामपंथी उग्रवाद के पीड़ित परिवारों के लिए मुआवजे को 2017 में 5 लाख से बढ़ाकर 20 लाख कर दिया था, और अब इसमें बढ़ोतरी करके 40 लाख कर दिया गया है, लेकिन नक्सली फिर भी नहीं मान रहे । अब उनके खिलाफ पुलिस टेक्नोलॉजी ‘मिशन’ शुरू हुआ है ताकि उन पर अंतिम प्रहार किया जाए। कांकेर मुठभेड़ उसी का हिस्सा है।
Date:25-04-24
समान आय वितरणसंपादकीय
भारत में असमानता शुरू से ही अकादमिक विषय रही है, पर इस विषय का सियासत में अचानक गूंज उठना बहुत हद तक सुखद भी है और विचारणीय भी। कोई दोराय नहीं कि किसी सरकार की नीतियों की वजह से ही किसी देश में आर्थिक असमानता बढ़ती है और भारत में आजादी के पहले से ही घोर असमानता रही है। मगर इधर आर्थिक उदारीकरण की नीतियों के बाद आर्थिक असमानता बढ़ी है। अत: ऐसे में आय के पुनर्वितरण की चर्चा शायद गलत नहीं कही जाएगी। इस पर हरेक पार्टी का अपना-अपना नजरिया हो सकता है। फिलहाल, सत्ता पक्ष और विपक्ष का इस मोर्चे पर परस्पर भिन्न विचार अचरज में नहीं डालता है। खासकर, कांग्रेस के घोषणापत्र के बाद यह विषय उसके विरोधियों के लिए एक हथियार बन गया है। वैसे, कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने इस पर सफाई दी है कि देश के जिन चुनिंदा 22 अमीरों या कंपनियों को सरकार की ओर से 16 लाख करोड़ रुपये की राहत मिली, उसमें से थोड़ी सी राशि उनसे वापस लेकर देश के 90 प्रतिशत लोगों या गरीबों में वितरित कर दी जाएगी।
मतलब, कांग्रेस ने साफ कर दिया है कि आय-पुनर्वितरण का विषय चंद उद्यमियों तक सीमित है, जिनसे धन वापस लेकर गरीबों में बांटा जाना है। काश! यह विषय वाकई गंभीर विमर्श का विषय बन पाता। दरअसल, हमारे देश में तमाम राजनीतिक पार्टियां बड़े उद्यमियों या बड़ी कंपनियों से चंदा लेती हैं, तो स्वाभाविक है, उनसे बहुत कड़ाई की उम्मीद नहीं की जा सकती। कॉरपोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व (सीएसआर) का उदाहरण तो हमारे सामने है। सरकार सीएसआर के तहत कंपनियों के मुनाफे का एक छोटा हिस्सा वसूलना चाहती थी, पर कंपनियां इसके लिए तैयार नहीं हुईं। तब कंपनियों को ही कहा गया कि वे मुनाफे का करीब दो प्रतिशत हिस्सा समाज-कल्याण पर स्वयं खर्च करें और सरकार को केवल सूचना दे दें। हमारे देश में भले ही लोक-कल्याण की राजनीति होती है, पर देश मूलत: पूंजीवादी स्वभाव रखता है। ऐसे में, साल 2000 के बाद भारत में असमानता तेजी से बढ़ रही है। एक प्रतिशत सबसे अमीर लोगों के पास देश की 22 प्रतिशत से ज्यादा आय और 40 प्रतिशत से ज्यादा संपत्ति है। एक विकासशील देश में ऐसी असमानता निश्चित रूप से राजनेताओं का प्रिय विषय बने, तो इससे देश को लाभ होगा। आगामी सरकारों को देर-सबेर यह मुद्दा वाकई गंभीरता से उठाना पड़ेगा, इस पर कोरी राजनीति देश के किसी काम नहीं आएगी।
ठीक इसी तरह विरासत कर का मुद्दा भी अचानक उभर आया है। विरासत कर अमेरिकी अर्थव्यवस्था का एक पहलू है, जहां किसी अमीर व्यक्ति के निधन के बाद उसकी संपत्ति का पूरा हिस्सा उत्तराधिकारी तक नहीं जाता है, करीब 55 प्रतिशत हिस्सा सरकार ले लेती है। सच्चे पूंजीवादी देशों में शेयर की भावना प्रबल होती है, जबकि कथित क्रोनी कैपिटलिज्म में कमाई को लोग शुद्ध रूप से निजी पुरुषार्थ मानते हैं। यह संजीदा विषय है, भारत में इसकी चर्चा लोगों को नाराज कर सकती है, लेकिन यह विषय इंडियन ओवरसीज कांग्रेस के अध्यक्ष सैम पित्रोदा ने कभी उठाया था और आज उनकी निंदा हो रही है। कांग्रेस ने उनकी टिप्पणी से पल्ला झाड़ लिया है, पर उसे सियासी नुकसान हो सकता है। भाजपा ने इसे मुद्दा बना लिया है। हालांकि, सियासत अक्सर समस्याओं के बखान में ज्यादा खर्च होती है, क्योंकि समाधान के रास्ते लंबे होते हैं, पर ये रास्ते देर-सबेर तय करने पड़ेंगे।
Date:25-04-24
हिमालय पर पल-पल सिमटते विशाल हिमनदों को बचाइएकालचांद साईं
गंगोत्री, मोटर मार्ग से पहुंचने का आखिरी पड़ाव है। इससे आगे गोमुख की तरफ जाने की तमन्ना रखने वालों को पैदल सफर करना होता है। गंगोत्री नेशनल पार्क के बीचोबीच भागीरथी का बायां किनारा चौदह किलोमीटर का रास्ता नापकर आपको भोजबासा पहुंचा देता है। सफर के बीच के मनोहारी दृश्य पदयात्रा की थकान को कम कर देते हैं, लेकिन अत्यधिक ऊंचाई के कारण भोजबासा पहुंचते-पहुंचते दम फूलने लगता है। भारी थकावट के बावजूद ऑक्सीजन की कमी से वहां नींद नहीं आती। इस कठिन यात्रा में पांच किलोमीटर और चलकर आप गंगोत्री ग्लेशियर देख पाते हैं। पर्यावरण प्रेमियों की नींद इस कारण उड़ी हुई है कि गंगोत्री ग्लेशियर निरंतर पिघलते हुए पीछे खिसकता चला जा रहा है। इस ग्लेशियर को बचा न सके, तो गंगा का क्या होगा?
वर्षों से इस खतरे की बात होती रही है। समूचे हिमालय के ग्लेशियरों पर संकट साफ नजर आ चुका है, परंतु उनके सिकुड़ने की चिंता के बीच नया संकट हमारे सामने है। प्रदूषण और तापमान में धीरे-धीरे हो रही बढ़ोतरी के कारण बर्फ पिघलने से हिमनदों के बीच हजारों नई झीलें आकार ले चुकी हैं या फिर उनका आकार बड़ा हो गया है। देहरादून के वाडिया हिमालय भू-विज्ञान संस्थान का अध्ययन यह निष्कर्ष निकाल चुका है और इसरो की ताजा चर्चित रिपोर्ट ने भी इसकी पुष्टि की है। ऐसी झीलों का मुहाना अचानक खुलने से खतरनाक बाढ़ आ सकती है।
हिमालयन रिवर बेसिन में कुल करीब 28,043 ग्लेशियर झीलें हैं, इनमें से 23,167 झीलें पांच हेक्टेयर से छोटी हैं। लंबे समय से हिमालय पर रिसर्च के दौरान पाया गया कि प्रतिवर्ष दो से 51 मीटर की रफ्तार से ग्लेशियर पिघल रहे हैं। ऐसे में, इस निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है कि अगले 100 साल में कई छोटे ग्लेशियरों का अस्तित्व मिट जाएगा और बहुत से पिघलकर आधे रह जाएंगे। पिघलते हिमनदों के कारण ग्लेशियर झीलों का दायरा बढ़ रहा है। ग्लेशियर के पतले होने की औसत दर साल 2000 से 2020 के बीच करीब तीन गुना बढ़ी है। ग्लेशियर ही पूरे साल नदियों को पानी देने में मददगार हैं। इनके जरिये बाकी जलस्रोत भी रीचार्ज होते हैं। ग्लेशियरों की क्षति या उनके आकार-प्रकार में बदलाव से सदानीरा नदियों को पानी के संकट का सामना करना पड़ जाएगा। नदियों का अस्तित्व ग्लेशियरों से जुड़ा है।
ग्लेशियरों के पिघलने के पीछे दो कारण हैं। पहला, ग्लोबल और दूसरा स्थानीय। पहला कारण ग्लोबल है। सारी दुनिया में तापमान बढ़ रहा है, उसका असर हिमालय पर स्वाभाविक रूप से दिख रहा है। संसार के एक देश के प्रदूषण का प्रभाव हजारों किलोमीटर दूर दूसरे देश को भी झेलना पड़ता है। वाडिया इंस्टीट्यूट के पूर्व वैज्ञानिक डॉक्टर पीएस नेगी का एक रिसर्च बताता है कि यूरोप से तेज हवाओं के साथ उड़कर आया उद्योगों का कार्बन हिमालयी बर्फ की सतह पर चिपका पाया गया। इस तरह के प्रदूषण और ग्लोबल वार्मिंग के कारणों को रोकना स्थानीय नागरिकों या सरकार के लिए संभव नहीं है। दूसरा कारण स्थानीय है। हिमालयी राज्यों में पर्यटन तेजी से बढ़ रहा है। नैनीताल एरीज की रिसर्च का परिणाम बड़ी चेतावनी के रूप में सामने आया है। यह शोध बताता है कि पहाड़ों पर कुल प्रदूषण में से 80 फीसदी हिस्सा मोटर वाहनों से निकलने वाले धुएं का है। दस साल में वाहनों की तादाद दो सौ गुना बढ़ गई है। इसका दुष्प्रभाव सीधा हिमालय की सेहत पर पड़ रहा है। पहाड़ पर भारी मशीनरी का बेधड़क इस्तेमाल, जंगलों में तेजी से बढ़ती मानव गतिविधियां, जंगलों की आग के अलावा बड़े पैमाने पर नदियों में पड़ रहा मलबा हिमालय के समूचे प्राकृतिक तंत्र को रौंद रहा है।
अब सवाल उठता है कि क्या इन दुष्प्रभावों को रोकने के लिए कदम उठाए जा सकते हैं? जवाब है- तबाही से बचने के लिए हमें दीर्घकालिक योजनाओं पर आज से ही सोचना होगा, कल देर हो जाएगी। पर्यावरण आधारित विकास को प्रोत्साहित करना होगा। सही और समेकित विकास का रास्ता पर्यावरण को कम नुकसान पहुंचाकर भी तैयार किया जा सकता है। दौड़ती-भागती दुनिया अगर ग्लेशियरों के पिघलने की रफ्तार नहीं रोक पाई, तो इसके भयावह नतीजे निकलेंगे।
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कुछ समय से भारत सरकार सेमींकडक्टर को अपने विनिर्माण की महत्वकांक्षा के केंद्र में रखकर चल रही है। फिलहाल पूरे विश्व को सेमींकडक्टर चिप की आपूर्ति मुख रूप से ताईवान करता है। हाल ही में वहाँ आए भूकंप के कारण उसका यह उद्योग खतरे में पड़ गया है। भारत के लिए इस क्षेत्र में आगे बढ़ने का यह अच्छा अवसर है।
इस पर कुछ बिंदु –
इन सभी दृष्टिकोणों से भारत में सेमीकंडक्टर चिप विनिर्माण का भविष्य उज्जवल कहा जा सकता है। इसका लाभ उठाया जाना चाहिए।
‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 4 अप्रैल, 2024
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Date:24-04-24
Power of NOTAA negative vote is also a message, a call for change. It should not be reduced to only symbolism.TOI Editorials
On May 7 when Gujarat goes to polls, it will be to decide the fate of 25 seats instead of the usual 26. Surat’s winner has been chosen on a technicality, leaving voters unable to exercise their choice. BJP’s Mukesh Dalal has been elected unopposed because papers of other candidates have been rejected or withdrawn. Had election reforms been carried out in earnest, even now Surat could have had a contest. NOTA would still be in the fray.
Negative vote | One of SC’s landmark electoral reform verdicts came in 2013 (PUCL vs UOI). NOTA was given the go-ahead, recognising the powerful messaging of a negative vote. SC’s verdict aimed to use NOTA to nudge change in two areas. Voters unhappy with choices on the ballot could still have the motivation to turn out and send a message. This, in turn, could push political parties to improve candidate selection. NOTA didn’t do badly in Surat in LS 2019 – it came third.
Half-baked reform | Responding to SC’s verdict, EC issued an order to add NOTA to the ballot. But it was a half-baked reform. NOTA was just a symbolic presence. Therefore, the power of a negative vote to induce change remained shackled.
States show the way | The Constitution empowers state election commissions to conduct panchayat and urban civic elections. Some SECs stood up and recognised the spirit of SC’s 2013 verdict. NOTA has been considered a “fictional electoral candidate”. And if NOTA wins, elections have to be held again. SECs of Maharashtra, Haryana and Delhi have since 2018 given weight to NOTA, thereby, finishing the reform that was at the core of SC’s verdict.
Signals matter | NOTA hasn’t always been well received by politicalparties. Sometimes, in a close contest, NOTA’s vote share exceeds the difference between the winner and second placed candidate. Congress’s Bhupesh Baghel, for instance, wanted NOTA scrapped.
A negative vote is a powerful signal to stakeholders. Voters are putting in an effort to express frustration. It’s a call for change. And EC should follow state election bodies in recognising a negative vote’s message.
Date:24-04-24
How to Deal with Unrequited LoveET Editorials
The clear majority for incumbent Maldivian president Mohamed Muizzu and his People’s National Congress in Sunday’s parliamentary election will see that country move even closer to China than before. Beijing’s growing influence is a concern. But New Delhi mustn’t sulk at the prospect of unrequited affection, but act with creativity — leveraging old cultural ties, building partnerships to address shared challenges, and furthering arules-based order to guard against a shift in the balance of power and ensure that the region remains democratic. Sending Muizzu a congratulatory message can be a first step.
Geopolitics, domestic preoccupations and conflicts in Ukraine and West Asia has left the coast virtually clear for China to increase its influence in the region. While the Maldives gets cosierwith Beijing and Pakistan remains China’s client state, other countries will continue to weigh options, shopping for the best deal. India’s actions during Sri Lanka’s economic crisis and its engagement with Bangladesh provide a template. Such engagements don’t foreclose China’s influence. But it gives India a foothold as a reliable, non-threatening partner.
Trade and defence are important pillars, but India must build on collaborations in climate-change mitigation, energy transition and access, disaster resilience, connectivity, health and education. It must also leverage intergovernmental bodies such as the International Solar Alliance and Coalition for Disaster Resilient Infrastructure, as well as partnerships such as Quad to keep the faith of growth for all in the neighbourhood.
Date:24-04-24
Insuring the futureWhile broadening eligibility, health insurance must be made affordable.Editorial
The Insurance Regulatory and Development Authority of India (IRDAI), the apex regulator of insurance products, has asked companies to enable a wide demographic of citizens to benefit from health insurance. Most significantly, it directs insurance providers to make health insurance available to senior citizens, as those above 65 are currently barred from issuing new policies for themselves. This is clearly an acknowledgement of demographic changes underway in India. Though India’s population figures have not been officially accounted for since 2011, estimates from the UN Population Fund and experts suggest that India’s is nearly level with China and may have surpassed it sometime in 2023. The India Ageing Report, 2023, which draws from UN projections, estimates that India’s cohort of seniors — those above 60 — will increase from about 10% of the population (149 million in 2022) to 30% (347 million) by 2050. That is more than the current population of the U.S. Several of the most developed countries already have their senior demographic (65-plus) ranging from 16% to 28%. That is already precipitating considerable worry within these populations on access to health care, affordable medicine and appropriate care-giving infrastructure to support them. Some of these economically developed countries have government-funded public health systems and others are entirely dependent on private health care, with cost being a significant determinant in access to quality care. In many of these countries, there is no entry barrier to health insurance policies, though, following principles of actuarial economics from centuries ago, health insurance gets progressively, and sometimes exponentially, more expensive as age advances.
Already the small, single-digit percentage of India’s economic elite can afford the equivalent of “family floater” plans that take care of individuals and their parents at a cost lower than what individual senior-citizen health insurance would cost. If the only effect of the IRDA’s recent circular is to provide many more unaffordable health insurance policies, it would be equivalent to admiring the icing on an inedible cake. Much has been made of the next two decades being critical to India’s future, on the reasoning that this is the time that India must reap its ‘demographic dividend’. This is premised on a large proportion of the workforce moving out of agriculture and inevitably followed by a breakdown of the traditional care-giving structure for the aged. The experience in several southern Indian States is telling. Thus, broadening the eligibility of health insurance should be accompanied by a massive upgradation of affordable health care.
Date:24-04-24
कानून के अमल के लिए विशेषज्ञ तैयार करने होंगेसंपादकीय
नई अपराध न्याय प्रणाली को चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) ने नए युग की जरूरतों के अनुरूप बताया है। आईपीसी, सीआरपीसी और एविडेंस एक्ट की जगह लाए गए तीनों नए कानून आगामी 1 जुलाई से देश भर में लागू होंगे। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता की धारा 532 के तहत ट्रायल, गवाही, साक्ष्य की रिकॉर्डिंग, समन और वारंट आदि प्रक्रियाओं को पूर्णतः इलेक्ट्रॉनिक करने और सात साल से अधिक की सजा वाले सभी अपराधों की तफ्तीश, छापों और जब्ती के दौरान वीडियोग्राफी और फॉरेंसिक एक्सपर्ट की उपस्थिति की अनिवार्यता के प्रावधान को सीजेआई ने क्रांतिकारी बताया। लेकिन सीजेआई ने यह भी कहा कि इसके लिए संसाधन, विशेषज्ञों और उपकरणों की भारी जरूरत होगी। भारत में कुल लगभग 18 हजार थाने हैं। क्या इनके लिए फॉरेंसिक विशेषज्ञ उपलब्ध हैं? अनुसंधान में अब डीएनए टेस्ट का काफी प्रयोग होने लगा है, लेकिन यह मात्र कुछ ही जगह संभव है और रिपोर्ट में तीन-तीन साल लगते हैं, जबकि नया कानून तीन साल में फैसला देने की बाध्यता करता है। कहां हैं ऐसे विश्वविद्यालय और संस्थान, जहां कुछ माह में बैलेस्टिक विज्ञान की शिक्षा देकर विशेषज्ञ तैयार किए जा सकेंगे ? फिलहाल केवल एक संस्था (नेशनल फॉरेंसिक साइंसेस यूनिवर्सिटी) है, जो पूरी तरह अपराध-विज्ञान की शिक्षा देती है। उत्तर भारत में केवल दो समुन्नत राजकीय प्रयोगशालाएं हैं जहां डीएनए टेस्ट संभव है। क्या नए कानून की अनिवार्य शर्तों के अनुरूप माइक्रोबायोलॉजी के इस पहलू विशेषज्ञ अपेक्षित संख्या में मिल सकेंगे? देश की अदालतों में लंबित मामलों के भार को देखते हुए क्या किसी भी संगीन मामले में तफ्तीश कुछ माह में और तीन साल में फैसला संभव है? यह न भूलें कि आज भी देश का 40 प्रतिशत पुलिस बल गैर पुलिस कार्यों जैसे सुरक्षा के नाम पर मंत्री को सलामी ठोकने में व्यस्त रहता है।
Date:24-04-24
मतदाताओं में उत्साह क्यों नहीं दिख रहा?अभय कुमार दुबे, ( अम्बेडकर विवि, दिल्ली में प्रोफेसर )
पहले दौर (102 सीटें) के मतदान-प्रतिशत में दिख रही सात फीसदी की बड़ी गिरावट ने राजनीति के पंडितों के बीच इस एहसास को पुख्ता कर दिया है कि लोकसभा के इस चुनाव में वोटरों के बीच उत्साह की कमी है। आम तौर पर लोगों में अनमनापन दिखता है।
मतदाताओं में सत्ताधारी दल के खिलाफ कोई जाहिर नाराजगी तो नहीं है, लेकिन उसे फिर से चुनने के लिए किसी तरह का जोश भी दिखाई नहीं दे रहा है। विपक्षी दल भी सरकार के खिलाफ और अपने पक्ष में कोई राजनीतिक लहर पैदा कर पाने में असमर्थ लग रहे हैं। शेयर मार्केट में भले तेजड़ियों का जोर हो, चुनावी राजनीति पर मंदड़िए ही हावी दिख रहे हैं।
ऐसे ठंडे माहौल का प्रमाण दो आंकड़ों से मिलता है। सीवोटर-एबीपी के एक सर्वेक्षण में 57 हजार से ज्यादा लोगों से पूछा गया कि आपकी समस्याएं (बेरोजगारी, महंगाई, घटती आमदनी, भ्रष्टाचार वगैरह) दूर करने की क्षमता किस पार्टी के पास लग रही है।
इसके जवाब में 32 फीसदी ने भारतीय जनता पार्टी और 18 फीसदी ने कांग्रेस का नाम लिया। लेकिन 46 फीसदी लोगों का कहना था कि उन्हें यह क्षमता किसी पार्टी में नहीं दिखती। जिन चार फीसदी लोगों ने ‘पता नहीं’ वाला जवाब दिया, उन्हें भी तार्किक दृष्टि से इसी तीसरी श्रेणी में रखा जा सकता है।
यानी पचास फीसदी लोगों को अपनी समस्याओं से निजात दिलाने के लिए किसी पार्टी पर भरोसा नहीं है। यह आंकड़ा बताता है कि दस साल तक शासन करने के बावजूद सत्ताधारी दल ज्यादा से ज्यादा एक तिहाई लोगों का भरोसा ही जीत पाया है, और पूरे एक दशक तक विरोध की राजनीति करने वाले दल पांचवें हिस्से से भी कम लोगों को उम्मीद बंधा पाए हैं।
दूसरा आंकड़ा 18 से 25 साल के बीच के वोटरों से ताल्लुक रखता है। वोट डालने के लिए सबसे ज्यादा उत्सुकता पहली और दूसरी बार वोट डालने वाले मतदाता को होनी चाहिए। नौजवान बेचैनी से 18 साल पूरे होने का इंतजार करते हैं, ताकि वोटर के तौर पर अपना पंजीकरण करवाने के बाद मतदान केंद्र की तरफ जाने का अधिकार प्राप्त कर सकें।
लेकिन चुनाव आयोग के आंकड़े बताते हैं कि इस बार पहली बार वोट डालने के लिए सारे देश में औसतन 38 फीसदी नए मतदाताओं ने ही पंजीकरण करवाया है। 18 वर्ष पूरे कर चुके 62 फीसदी युवकों में वोट डालने की ललक ही नहीं है।
जाहिर है कि हमारा युवा मन, राज्यों और केंद्र में जिस तरह की गवर्नेंस आजकल मिल रही है, उसमें किसी तरह की आशा की किरण नहीं देखता। चुनावशास्त्रियों की बातों पर अगर यकीन किया जाए तो 2019 में युवाओं ने बढ़-चढ़ कर वोट किया था, जिससे भाजपा को बेहतर वोट प्रतिशत और ज्यादा सीटों के साथ वापसी करने में मदद मिली थी।
उस चुनाव में भाजपा बहुतेरी सीटों पर बहुत कम अंतर से जीती थी। केवल उत्तर प्रदेश में ही ऐसी सीटों की संख्या 18 थी। इस बार का कम मतदान ऐसी सीटों के समीकरणों को उलट-पुलट सकता है। आखिरकार ऐसी क्या बात है जो वोटरों में उत्साह नहीं पैदा हो रहा है?
अगर मान लिया जाए कि वोटर गवर्नेंस से संतुष्ट नहीं हैं तो फिर वे सरकार से नाराज क्यों नहीं हैं? आंकड़े तो बता रहे हैं कि कम ही सही पर विपक्ष के मुकाबले उनमें सरकारी पार्टी पर भरोसा थोड़ा अधिक ही दिखता है।
लेकिन दूसरी तरफ सीएसडीएस-लोकनीति का बड़े करीने से किया गया सर्वेक्षण बताता है कि इस सरकार को तीसरी बार चुनने की इच्छा व्यक्त करने वाले वोटरों की संख्या तीन फीसदी गिर गई है। यानी पिछली बार विपक्ष और सरकार के बीच आठ फीसदी का अंतर था, जो इस बार घटकर पांच फीसदी ही रह गया है। राजनीतिशास्त्रियों के मुताबिक सत्ताधारी दल के लिए यह कोई आरामदेह स्थिति नहीं है, और न ही यह विपक्ष को किसी भी तरह से आश्वस्त करने के लिए पर्याप्त है।
भारत के चुनावी इतिहास की जानकारी रखने वालों ने याद दिलाया है कि जब पं. जवाहरलाल नेहरू ने देश की जनता के सामने 1962 में तीसरी बार प्रधानमंत्री बनने का दावा पेश किया तो उन्हें 361 सीटें मिली थीं। कांग्रेस के बाद लोकसभा में सबसे बड़ा दल कम्युनिस्ट पार्टी थी, लेकिन उसके पास केवल 29 सीटें थीं।
ये संख्याएं बताती हैं कि नेहरू को तीसरी बार भी मतदाताओं ने शिद्दत से पसंद किया था। लेकिन आज जमाना बदल चुका है। क्षेत्रीय राजनीति की परिघटना उभर आई है, जिसने राष्ट्रीय पार्टियों के प्रभाव-क्षेत्रों को पहले के मुकाबले सीमित कर दिया है।
दूसरे, सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा के नाम पर पिछले दस साल से लगातार सभी तरह के सत्तारूढ़ दल अपने-अपने तरीके से लाभार्थियों की एक दुनिया बनाने में लगे हुए हैं। इनमें सबसे आगे केंद्र की एनडीए सरकार ही है, जिसने लोगों के खातों में सीधे आर्थिक मदद भेजने का सिलसिला शुरू किया है। प्रश्न यह है कि क्या इस ‘डायरेक्ट ट्रांसफर ऑफ मनी’ की मतदान के प्रति इस अनमनेपन में कोई भूमिका है?
मौजूदा हालात इशारा करते हैं कि रोजगार देने और महंगाई घटाने में अर्थव्यवस्था की अक्षमता से पैदा होने वाला क्षोभ अभी तक तीखे राजनीतिक गुस्से में नहीं बदल पाया है। विपक्ष की कमजोरी ने भी इसमें हाथ बंटाया है, और लाभार्थियों की नई दुनिया ने भी राहत की छोटी-छोटी रकमों के जरिए लोगों में और इंतजार करने की क्षमता पैदा की है।
Date:24-04-24
भ्रामक विज्ञापनों का मामलासंपादकीय
यह अच्छा हुआ कि पतंजलि आयुर्वेद के भ्रामक विज्ञापनों के मामले की सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने जहां बाबा रामदेव एवं उनके सहयोगी बालकृष्ण के वकील से कुछ और सवाल पूछे, वहीं इंडियन मेडिकल एसोसिएशन यानी आइएमए से भी कई ऐसे प्रश्न किए, जिनका संतोषजनक उत्तर वह शायद ही दे पाए। पता नहीं आइएमए इस सवाल का क्या जवाब देगी कि आखिर एलोपैथ चिकित्सक गैर जरूरी एवं महंगी दवाइयां लिखने के साथ कुछ खास दवाओं की पैरवी क्यों करते हैं, लेकिन यह किसी से छिपा नहीं कि एलोपैथ चिकित्सा क्षेत्र में भी सब कुछ ठीक नहीं। इसी कारण सुप्रीम कोर्ट को आइएमए से यह कहना पड़ा कि वह अपना घर ठीक करे। आइएमए के पदाधिकारी इस तथ्य से अनजान नहीं हो सकते कि तमाम एलोपैथ चिकित्सक कई बार दवाओं की उपयोगिता के आधार पर नहीं, बल्कि निजी लाभ के लिए उनकी बिक्री बढ़ाने का अतिरिक्त जतन करते हैं। इस क्रम में वे दवा कंपनियों से महंगे उपहार लेने के साथ ही उनके खर्चे पर विदेश यात्राएं करते हैं। कुछ तो नकदी भी लेते हैं। इसी कारण कुछ दिनों पहले केंद्रीय रसायन एवं उर्वरक मंत्रालय ने फार्मा कंपनियों के लिए एक संहिता जारी कर इस सब पर रोक लगाने के सख्त निर्देश दिए थे। आखिर यह काम आइएमए पहले ही अपने स्तर पर क्यों नहीं कर सकी?
यह भी अच्छा हुआ कि सुप्रीम कोर्ट ने उन कंपनियों पर भी निगाह टेढ़ी की, जो भ्रामक विज्ञापनों के जरिये ऐसे उत्पादों का प्रचार करती हैं, जो शिशुओं और स्कूली बच्चों के साथ बुजुर्गों के स्वास्थ्य पर प्रतिकूल असर डालते हैं। सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार से भ्रामक विज्ञापनों के खिलाफ कार्रवाई का विवरण मांग कर बिल्कुल सही किया, क्योंकि अनेक कंपनियां भ्रामक विज्ञापन देने के मामले में बेलगाम दिखती हैं। इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि पिछले कुछ समय से ऐसे विज्ञापनों की बाढ़ सी आई हुई है, जो मिलते-जुलते नाम वाले उत्पाद के सहारे ऐसे उत्पादों का प्रचार करते हैं, जो सेहत के लिए बेहद हानिकारक हैं। यह और कुछ नहीं कि सरकार और उसकी नियामक संस्थाओं की आंखों में धूल झोंकने वाली गतिविधि है। इस मामले में विडंबना यह है कि सरोगेट विज्ञापन के सहारे हानिकारक उत्पादों का प्रचार कई अभिनेता और खिलाड़ी भी करने में लगे हुए हैं। इस पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाने की आवश्यकता है। पतंजलि मामले के सुप्रीम कोर्ट में पहुंचने के बाद जिस तरह कुछ लोगों ने आयुर्वेद के खिलाफ अभियान छेड़ दिया है, उसका भी संज्ञान लिया जाना चाहिए। पतंजलि के भ्रामक विज्ञापन के आधार पर इसका कोई औचित्य नहीं कि आयुर्वेद को ही खारिज किया जाने लगे। जैसी महत्ता एलोपैथ की है, वैसी ही आयुर्वेद और कुछ अन्य चिकित्सा पद्धतियों की। चूंकि सभी चिकित्सा पद्धतियों की अपनी सीमाएं भी हैं, इसलिए उन्हें एक-दूसरे से सीख लेनी चाहिए।
Date:24-04-24
कई समस्याओं का एक समाधानविकास सारस्वत, ( लेखक इंडिक अकादमी के सदस्य एवं वरिष्ठ स्तंभकार हैं )
भाजपा ने चुनावी घोषणा पत्र में भारत को वैश्विक उत्पादन का केंद्र बनाने का संकल्प लिया है। आर्थिक विकास प्रधानमंत्री मोदी की प्राथमिकता रहा है। जहां कांग्रेस भारत को 2043 तक विश्व की तीसरी बड़ी आर्थिकी बनाने की बात करती थी, वहीं मोदी ने अगले कार्यकाल में ही इस लक्ष्य की प्राप्ति का संकल्प लिया है। 2026-27 तक पांच ट्रिलियन (लाख करोड़) डालर की अर्थव्यवस्था और 2047 तक भारत को विकसित देश बनाने के संकल्प में उत्पादन क्षेत्र का बड़ा महत्व रहने वाला है। यह संकल्प इस मायने में महत्वपूर्ण है कि वियतनाम, मेक्सिको, थाइलैंड और मलेशिया के साथ भारत अब तक ‘चाइना प्लस वन’ की दौड़ में देखा जाता था। ‘चाइना प्लस वन’ का अर्थ है विश्व की दिग्गज कंपनियां चीन से इतर अन्य देशों में भी उत्पादन इकाइयां स्थापित करें। इस नीति के उलट भाजपा का घोषणा पत्र चीन को हटाकर भारत को उत्पादन का वैश्विक केंद्र बनाने की बात कर रहा है।
भारतीय उद्योगों को निर्यात केंद्रित बनाने और चीन के साथ बढ़ते व्यापार घाटे को पाटने के लिए नीति आयोग 2023 से काम कर रहा है। इसके अंतर्गत निर्यात वृद्धि क्षमता वाले उत्पादों को चिह्नित कर चीन में टैरिफ और गैर-टैरिफ बाधाओं, नियामक तंत्र और बाजार पहुंच संबंधी चिंताओं की गहन पड़ताल हो रही है। आयोग का यह अध्ययन विशिष्ट उत्पादों पर चीनी निर्भरता की जगह दूसरे एशियाई देशों से सप्लाई चेन ढूंढ़ने और बदलती वैश्विक सप्लाई चेन में भारतीय संभावनाएं तलाशने पर भी जोर देगा। चीन के साथ भारी व्यापार घाटा और उत्पादन क्षेत्र में भारत की अपेक्षाकृत कमजोर स्थिति कई अन्य समस्याओं की तरह मोदी सरकार को विरासत में मिली। भारत में लचर समाजवादी नीतियों के विपरीत डेंग के नेतृत्व में उदारीकरण ने चीन को निर्णायक बढ़त प्रदान की। फिर भी, 2003 तक चीन के साथ हमारा व्यापार घाटा बहुत अधिक नहीं था, पर 2004 के बाद संप्रग सरकार ने घाटे की अनदेखी कर ‘द्विपक्षीय व्यापार’ को बढ़ाने पर बल दिया। इसका चीन ने पूरा फायदा उठाया। व्यापार घाटे की चिंता से बेफिक्र पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने चीनी प्रधानमंत्री वेन जियाबाओ के भारत आगमन पर एकपक्षीय बढ़ते व्यापार को अपनी ‘उपलब्धि’ बताया, जबकि मौजूदा सरकार के प्रयासों से देश में इलेक्ट्रानिक्स विशेषकर मोबाइल फोन उत्पादन, विंड टरबाइन और दवा जैसी वस्तुओं के उत्पादन में अभूतपूर्व तेजी आई है।
भारत जैसी बड़ी आबादी वाले देश में उत्पादन ही रोजगार सृजन का प्रमुख माध्यम बन सकता है। इस मोर्चे पर अपेक्षित लाभ उठाने के लिए लैंड बैंक, पूंजी की लागत, आधारभूत ढांचा और सुदृढ़ कानून व्यवस्था आदि सुनिश्चित करने की आवश्यकता है। उद्योग जगत और समाज को भी अपने व्यवहार में बड़ा परिवर्तन लाना पड़ेगा। प्रतिस्पर्धा और विरोध के बावजूद भारत को यदि चीन से कुछ सीखना भी पड़े तो उससे संकोच न किया जाए। चीन ने खुद अपने आर्थिक उत्थान की शुरुआत अमेरिकी तकनीक और दुश्मन माने जाने वाले ताइवान, जापान समेत अन्य देशों के निवेश से की थी। अपनी चीन यात्राओं के दौरान मुझे चीनी समाज और उत्पादन क्षेत्र को निकट से देखने का अवसर मिला है। नीतियों से लेकर आधारभूत ढांचे और समाजिक मोर्चे तक चीन ने स्वयं को उत्पादन उन्मुख अर्थतंत्र की तरह विकसित किया है। दक्षिण में झुहाई से लेकर उत्तर में तियानजिन तक 3000 किमी का तटीय क्षेत्र छोटे-बड़े उद्योग क्षेत्रों से पटा हुआ है। न सिर्फ अलग-अलग शहर विशिष्ट उत्पादों के उत्पादन केंद्र बने हुए हैं, बल्कि कई शहरों की पूरी अर्थव्यवस्था उनके विशाल थोक बाजारों पर आधारित है। सात किमी लंबे, चमचमाते विश्वस्तरीय बाजार से अकेला यीवू शहर सालाना पंद्रह अरब डालर का निर्यात कर रहा है।
अप्रवासी मजदूरों पर निर्भर भारतीय उत्पादन केंद्रों में कार्मिकों के लिए रिहाइश एक बड़ी समस्या रही है, जबकि चीन ने इसका निदान सार्वजनिक आवासीय व्यवस्था के जरिये किया है। हालांकि डार्मिटरी लेबर रिजीम नामक इस व्यवस्था की आलोचना भी होती है, परंतु अब कुछ यूरोपीय देश भी इसका अनुसरण कर रहे हैं। चीन का स्कूली पाठ्यक्रम भी उत्पादन तंत्र की आवश्यकताओं को समायोजित करता है। मिडिल स्कूल के बाद हर बच्चा जोंगकाओ नामक परीक्षा में बैठता है, जहां हाईस्कूल स्तर पर ही अकादमिक और व्यावसायिक विद्यार्थियों की छंटनी हो जाती है। परिणामस्वरूप 47% यानी लगभग आधे विद्यार्थी व्यावसायिक शिक्षा में दाखिला लेते हैं। बहुत हद तक स्वायत्त इन व्यावसायिक शिक्षा केंद्रों को अपना पाठ्यक्रम तय करने की छूट होती है। फलस्वरूप एक तिहाई पाठ्यक्रम में सामान्य विषय, एक तिहाई में चुने हुए व्यवसाय से संबंधित कौशल विकास और शेष एक तिहाई पाठ्यक्रम स्थानीय उद्योग की मांगों पर आधारित होते हैं। चार वर्षीय पाठ्यक्रम का अंतिम वर्ष स्थानीय उद्योग में प्रशिक्षु के रूप में बीतता है। व्यावसायिक शिक्षा शुल्क भी सरकारी एवं औद्योगिक अनुदानों से पूरा हो जाता है।
परंपरा विशेषकर कन्फ्यूशियन मूल्य चीनी उद्योग को ठहराव देते हैं। इन मूल्यों में श्रम एवं श्रमिक की गरिमा के साथ-साथ निरंतर सीखते रहने पर बल रहता है। चीनी नववर्ष का अत्यधिक महत्व उद्योग और व्यापार में लेनदेन को उसी वर्ष तक सीमित रखने पर बल देता है, जिसके चलते अर्थव्यवस्था चलायमान रहती है। महिलाओं की बराबरी की भागीदारी भी चीनी सफलता का बड़ा कारण है। भारतीय अर्थनीति में एक बड़ी खामी निषेधात्मक आयात शुल्क लगने से भी हुई है। ऐसे शुल्क उन उद्योगों को हतोत्साहित करते हैं, जो आयातित मध्यवर्ती माल पर निर्भर हैं। अर्थशास्त्री विरल आचार्य का मानना है कि भारत उन्हीं क्षेत्रों में संरक्षणवादी है, जहां उसके पास ‘चीन प्लस वन’ के रूप में उभरने का अवसर है। नीति आयोग के सदस्य अरविंद विरमानी मानते हैं कि कपड़े की आयात दरों को सरलीकृत और कम करके भारत अपने परिधान निर्यात को सहज ही दोगुना कर सकता है। उल्लेखनीय है कि चीन की आर्थिक सफलता में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले पहले पांच स्पेशल इकोनमिक जोन को आयात शुल्क के दायरे से पूरी तरह बाहर रखा गया था। आशा की जानी चाहिए कि लोकलुभावन चुनावी वादों के इस दौर में नीतिगत परिवर्तनों को महत्व दिया जाएगा, ताकि देश एक नई दिशा ले। भारत में उद्योगीकरण ही देश को उन्नति की ओर अग्रसर कर आमजन का जीवन स्तर सुधार सकता है।
Date:24-04-24
कचरे के पहाड़संपादकीय
देश की राजधानी और व्यवस्था के स्तर पर अन्य जगहों के मुकाबले ज्यादा बेहतर होने के दावे के बावजूद अगर दिल्ली में कई जगह कचरे के पहाड़ खड़े दिखते हैं, तो यह अपने आप में एक अफसोसनाक तस्वीर है। विडंबना है कि लंबे समय से इस समस्या के उत्तरोत्तर गंभीर होते जाने और कई बार बड़ा मुद्दा बनने के बाद भी अब तक इसका हल निकालने की कोई गंभीर पहल नहीं दिखती। यह बेवजह नहीं है कि सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात पर हैरानी जताई है कि दिल्ली में हर रोज ग्यारह हजार टन ठोस शहरी अपशिष्ट पैदा होता है, जिसमें से तीन हजार टन कचरे का उचित निपटान नहीं किया जाता। शीर्ष अदालत ने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र और आसपास के इलाकों में वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग की रिपोर्ट पर कहा कि यह स्तब्ध करने वाली बात है कि ठोस कचरा प्रबंधन नियम, 2016 को लागू हुए आठ साल गुजर चुके हैं, मगर अब तक दिल्ली में इस पर ठीक से अमल नहीं हुआ है। दिल्ली में उपराज्यपाल और सरकार के बीच जिस तरह की खींचतान चलती रहती है, उसमें इसके लिए किसे जिम्मेदार माना जाएगा!
सर्वोच्च न्यायालय ने इस मुद्दे पर दिल्ली नगर निगम, नई दिल्ली नगरपालिका परिषद और दिल्ली छावनी बोर्ड को नोटिस जारी किया है। क्या इन इकाइयों को अपने दायित्व का अहसास नहीं है? यह समझना मुश्किल नहीं है कि दिल्ली में अगर रोजाना ग्यारह हजार टन अपशिष्ट निकलता है और उसमें से तीन हजार टन कचरे का उचित निपटान नहीं हो पाता, तो आखिर उसका क्या होता है और आसपास के इलाकों की आबोहवा पर उसका क्या असर पड़ता होगा। गौरतलब है कि दिल्ली में भलस्वा, गाजीपुर और ओखला स्थित कचरा पट्टियों पर जितने बड़े पैमाने पर अपशिष्ट जमा होता गया है, उससे आसपास के इलाकों में कई तरह की समस्याएं पैदा हो गई हैं। सोमवार को गाजीपुर कचरा पट्टी में आग लग गई थी, जिसे बुझाने में अठारह घंटे लग गए। कचरे के निपटान की जिम्मेदारी सरकार के संबंधित नागरिक निकाय की है। मगर सवाल है कि उसकी निगरानी करने और पूरे कचरे के निपटान या प्रबंधन को सुनिश्चित करने का दायित्व किसका है?
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कुछ बिंदु –
जल संकट से निपटने के सिलसिले में नीति आयोग ने 2018 में एक समग्र जल प्रबंधन सूचकांक की शुरूआत की थी, जिसमें देश के राज्यों में जल प्रबंधन के स्तर पर रुझानों को बताया गया था। राज्यों के प्रदर्शन में बहुत विषमता देखी गई थी।
अतः भारत के विविधतापूर्ण भौगोलिक, जलवायविक एवं सामाजिक-आर्थिक परिदृश्य के अनुसार रणनीति बनाई जानी चाहिए।
आकंड़ो के अनुसार, तो 78% शहरी निकाय पानी से संबंधित प्रशासन पर विफल पाए गए हैं। इनमें सुधार के लिए निकायों को जल प्रबंधन से जुड़े अपने डेटा और सूचना तक पहुँच को प्राथमिकता पर रखना होगा।
राज्यों को अपने प्रयास बेहतर करने होंगे। ‘जल शक्ति अभियान’ और ‘जल जीवन मिशन’ जैसी पहल के माध्यम से केंद्र सरकार इस मोर्चे पर अपनी प्रतिबद्धता दिखा रही है। इसके साथ ही अमृत 2.0, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना और अटल भूजल योजना जैसे कार्यक्रम उस बहुस्तरीय रणनीति को दर्शाते हैं, जो बढ़ती मांग और जलवायु अनिश्चितताओं के बीच निरंतर जल आपूर्ति और सक्षम प्रबंधन को सुनिश्चित करते हैं।
विभिन्न समाचार पत्रों पर आधारित। 9 अप्रैल, 2024
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Date:23-04-24
Male Gets AggroMuizzu’s majority may be a challenge for New Delhi. But selling out to China won’t help MaldivesTOI Editorial
Maldivian President Mohamed Muizzu’s People’s National Congress securing a two-thirds majority in the archipelago nation’s parliament may further complicate New DelhiMale ties. Muizzu has made no secret about his anti-India and pro-China stance since he assumed office last year. With the legislature solidly in his pocket, there’s little to stop him from tilting fully towards Beijing. However, this won’t be the first time Maldives has tried to play off India and China.
Chequered past | India has been first-responder for Maldives by dint of geography. From Operation Cactus in 1988 to the 2014 Maldives water crisis, New Delhi has promptly aided Male when requested. However, former Maldivian president Maumoon Abdul Gayoom started the game of leveraging China over India in the 1990s in response to Maldives’ growing democratic movement. This provided an entry-point for Beijing.
Growing Chinese presence | Having gained access to infra projects in Maldives, in subsequent years China would slowly expand its footprint. Even during perceived pro-India president Mohamed Nasheed’s tenure, a Sino-Maldivian agreement on Chinese supply of military hardware and training had surfaced. The pro-China momentum was further consolidated under the presidencies of Mohammed Waheed and Abdullah Yameen.
Divided polity | Maldivian politics today is split down the middle between those who favour better ties with India and those who seek greater Chinese assistance. True, much of this may be political posturing as Muizzu’s ‘India Out’ campaign suggests. But Male is walking a dangerous line.
Strategic landmines | It’s one thing for Muizzu to order Indian troops engaged in rescue and rehabilitation missions out, quite another to allow a Chinese spy ship to dock in Maldives as happened in Feb. China wants to strategically encircle India. Male shouldn’t play along. Becoming a Chinese vassal will eventually undermine Maldivian sovereignty. Or ensnare it in debt trap. Look at Cambodia and Sri Lanka for examples. Is Muizzu selling out to Beijing?
Date:23-04-24
नहीं सुधर रहे है सरकारी स्कूलजगमोहन सिंह राजपूत, ( लेखक शिक्षा, सामाजिक सद्भाव और पंथक समरसता के क्षेत्र में कार्यरत हैं )
सौ वर्ष पहले महात्मा गांधी ने कहा था कि भारतीयों की खुशी के लिए आशा की एकमात्र किरण है शिक्षा के प्रकाश का सभी तक पहुंचना। उनकी प्राथमिकता में ‘पंक्ति के अंतिम छोर पर खड़ा व्यक्ति’ ही था, जो आज भी देश में है। इसकी खबरें हर दिन पढ़ने को मिलती हैं। हाल में दिल्ली उच्च न्यायालय ने दिल्ली के सरकारी स्कूलों की स्थिति के संबंध में सब कुछ वही कहा है, जो शिक्षा से जुड़े लोग लगभग हर अवसर पर अपनी चिंता के रूप में व्यक्त करते रहे हैं।
टूटी मेज-कुर्सियां, अनुपस्थित अध्यापक, अनेक विषय पढ़ाने को मजबूर शिक्षक जैसी कमियों पर अनेक दशकों से चर्चा होती रही है। दिल्ली सरकार ने स्कूल सुधारों के संबंध में बड़ी घोषणाएं की थीं। उनकी प्रशंसा भी होती रही, लेकिन न्यायालय की टिप्पणी से स्पष्ट हो जाता है कि संभवतः प्रयास पर कम, लेकिन प्रचार-प्रसार पर अधिक जोर था। न्यायालय ने शिक्षा सचिव से कहा कि एक क्लासरूम में 146 बच्चे नामांकित थे, क्या इतने बच्चों के साथ न्याय संभव है? जब दिल्ली में यह स्थिति है तो देश के दूसरों हिस्सों के स्कूलों का अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है।
भारत में सरकारी स्कूल व्यवस्था में ऐसे अनेक उदाहरण मिल जाएंगे, जहां एक अध्यापक सालों-साल एकमात्र शिक्षक रहा होगा। यह निर्णय तो सरकारें ही लेंगी कि शिक्षा के अवसर भारत में अधिक उपलब्ध हैं या फिनलैंड में, जहां के माडल का अनुसरण करने का दिल्ली सरकार का दावा है। पिछले कुछ वर्षों से दिल्ली में फिनलैंड की शिक्षा व्यवस्था की खूब चर्चा हुई। वहां दिल्ली के कुछ अध्यापकों का प्रशिक्षण भी हुआ। उससे बड़ी उम्मीदें जुड़ीं।
दिल्ली उच्च न्यायालय के आकलन के पश्चात भी आशा बनाए रखने के अलावा कोई विकल्प नहीं। हालांकि उम्मीदें अक्सर टूटती हैं, लेकिन हम विचलित नहीं होते हैं। देश के अनेक शहरों में सरकारी स्कूलों में बच्चों के आने-जाने के लिए कोई सरकारी बस सेवा तक नहीं है। आखिर गरीब कामगारों के जो बच्चे केवल इस कारण स्कूल नहीं जा पा रहे हैं, उनके आवागमन की चिंता कौन करेगा? वादा तो निश्शुल्क वाहन व्यवस्था का था।
कस्तूरबा गांधी आवासीय विद्यालयों और कंपोजिट स्कूलों की स्थापना से भी बड़ी आशाएं थीं, लेकिन इन स्कूलों और अन्य सरकारी स्कूलों के निरीक्षण में पाया गया कि कई जगह नामांकन अपेक्षा से अत्यंत कम हैं। एक कंपोजिट स्कूल में कक्षा एक में केवल छह छात्र नामांकित थे, उपस्थित कोई नहीं मिला। इस स्थिति में मध्याह्न भोजन इत्यादि की क्या व्यवस्था रहती होगी? वरिष्ठ अधिकारी ऐसे अवसरों पर अपनी अप्रसन्नता व्यक्त करते हैं, चेतावनी देते हैं और सारा दोष प्राचार्य या अंतरिम प्रभारी पर थोप देते हैं। इस दयनीय स्थिति को परिवहन व्यवस्था से जोड़कर ओझल कर दिया जाता है।
दशकों से देश में एक-वर्षीय बीएड पाठ्यक्रम उत्तीर्ण कर स्कूल अध्यापक बन जाना एक बड़े वर्ग के युवाओं के लिए लक्ष्य प्राप्त कर संतोषपूर्ण जीवन बिताने का रास्ता खोल देता था। वे प्राथमिक कक्षाओं से लेकर माध्यमिक तक पढ़ाते थे, जबकि उनका प्रशिक्षण केवल माध्यमिक कक्षाओं में पढ़ाने के लिए होता था। प्राइमरी अध्यापकों के प्रशिक्षण के लिए भी अलग व्यवस्थाएं थीं। इनमें सुधार और परिवर्तन भी होते रहे। 1986/92 की शिक्षा नीति में हर जिले में केंद्र द्वारा बड़ी सहायता देकर डिस्ट्रिक्ट इंस्टीट्यूट आफ एजुकेशन एंड ट्रेनिंग की स्थापना इस दिशा में बड़ी पहल थी।
अब यह निर्णय लिया जा चुका है कि आगे से एक-वर्षीय पाठ्यक्रम समाप्त कर दिए जाएंगे। उच्चतम न्यायालय ने असमंजस की उस स्थिति का निराकरण कर दिया है, जिसमें पहले से प्राथमिक पाठशालाओं में नियुक्त हजारों बीएड उपाधिधारी सेवा से हटाए जाने वाले थे। व्यावसायिक उपाधियों के संबंध में निर्णय भविष्य को ही नहीं, बल्कि अनेक अन्य सामाजिक और आर्थिक पक्षों को ध्यान में रखकर लिए जाने से उनकी स्वीकार्यता और उपयोगिता दोनों ही साथ-साथ संभाले जा सकते हैं।
भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश जस्टिस जेएस वर्मा ने 2012 में अपनी रिपोर्ट में यह तथ्य रखा था कि देश के 10,000 बीएड कालेजों में प्रशिक्षण की गुणवत्ता पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा। वे वास्तव में डिग्री बेच रहे हैं। इसे 2020 की नई शिक्षा नीति में भी दोहराया गया। उसमें समाधान भी सुझाए गए। वे कितनी गहनता से लागू किए जा सकेंगे, इस पर यही कहा जा सकता है कि नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में शिक्षकों के लिए जो चार-वर्षीय प्रशिक्षण प्रारंभ करने की शुरुआत हुई है, वह शिक्षा की गुणवत्ता में अप्रत्याशित वृद्धि कर सकती है। एनसीईआरटी ने अपने चार क्षेत्रीय शिक्षा संस्थानों में यह कार्यक्रम प्रायोगिक तौर पर 1964-65 में प्रारंभ किया था। इसमें उत्तीर्ण छात्र-अध्यापक हर जगह सराहे गए। आशा करनी चाहिए कि सभी राज्य सरकारें बिना लाग-लपेट इसे लागू करेंगी और संस्थानों को सभी संसाधन उपलब्ध कराएंगी।
नई शिक्षा नीति के क्रियान्वयन से अनेक आशाजनक संभावनाएं उभरी हैं। इनमें अध्यापक प्रशिक्षण में सुधार अत्यंत महत्वपूर्ण तथा भविष्योन्मुखी है। शिक्षा जगत में ऐसा भी बहुत कुछ है, जिससे छुटकारा पाना आवश्यक है। इसमें सबसे पहले आती है व्यवस्थागत शिथिलता। इसके कारण अधिकांश सुधार केवल कागजों तक रह जाते हैं। यदि शिक्षक प्रशिक्षण पूरी तरह व्यापारियों से मुक्त कराया जा सके, अध्यापकों की नियुक्ति नियमित और समय पर होने लगे तो देश की सकारात्मक ऊर्जा और बौद्धिक संपदा में भारी वृद्धि होगी। ऐसा कर सकने की पूरी क्षमता देश के पास है, बस उसका प्रदर्शन किया जाना चाहिए।
Date:23-04-24
नया ध्रुवसंपादकीय
मालदीव में पिछले वर्ष मोहम्मद मुइज्जू ने राष्ट्रपति चुनाव जीता, तभी साफ हो गया था कि वहां की सत्ता अब नए रास्ते पर बढ़ चली है। अब वहां हुए संसदीय चुनाव में भी मुइज्जू की पार्टी पीपुल्स नेशनल कांग्रेस ने दो तिहाई से ज्यादा सीटों पर बड़ी जीत दर्ज कर ली है। इससे स्पष्ट है कि मालदीव का रुख पहले के मुकाबले बिल्कुल अलग होगा और प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से उस पर चीन का असर दिखेगा। दरअसल, संसदीय चुनाव को मुइज्जू की सबसे बड़ी राजनीतिक परीक्षा के तौर पर देखा जा रहा था। हालांकि मुइज्जू और उनकी पार्टी की राजनीति को देखते हुए पिछले कुछ महीनों के दौरान मालदीव पर चीन के हावी होने को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सकारात्मक नहीं माना जा रहा था और वहां के संसदीय चुनाव पर उसका असर पड़ने की उम्मीद की जा रही थी। मगर ऐसा नहीं हुआ। अब मालदीव में मुइज्जू की पार्टी की भारी जीत को चीन के समर्थन और भारत के विरोध पर आधारित उनकी नीतियों पर मुहर के तौर पर देखा जाएगा।
गौरतलब है कि राष्ट्रपति का पदभार संभालने के बाद मुइज्जू ने भारत के प्रति अपने पूर्वाग्रहों को छिपाया नहीं और ‘भारत को बाहर करो की नीति पर चलते हुए भारतीय सैनिकों को वापस भेजना शुरू कर दिया था। दूसरी ओर, पर्यटन से जुड़ी अर्थव्यवस्था, खाद्य सुरक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं के लिए भारत पर अपनी निर्भरता को कम करने के साथ-साथ मालदीव ने तुर्किए और अन्य कई देशों के साथ समझौते किए। खासकर चीन के प्रति मुइज्जू का झुकाव सभी जानते हैं। उनके राष्ट्रपति बनने के बाद मालदीव की कई बड़ी परियोजनाओं का काम चीन की कंपनियों को मिल चुका है। मालदीव और चीन के बीच सैन्य समझौता भी हुआ था। सच यह है कि चीन प्रकारांतर से मालदीव पर अपना नियंत्रण कायम करना चाहता है और इसी वजह से उसे कुछ विशेष महत्त्व देता है। अब वहां की संसद में अपनी पार्टी का बहुमत होने से देश में चीन के निवेश या अन्य सहयोग संबंधी फैसलों को लागू करने में मुइज्जू को कोई बाधा नहीं होगी। मगर मालदीव पर चीन का बढ़ता प्रभाव भारत के लिए चिंता की बात है।
Date:23-04-24
सेहत में सहारासंपादकीय
गंभीर और ऐसी बीमारियों, जिनके इलाज में भारी रकम खर्च करनी पड़ती है, स्वास्थ्य बीमा लोगों के लिए बहुत बड़ा सहारा वित होता है स्वास्थ्य बीमा शुरू करने का मकसद भी यही था कि लोगों को स्वास्थ्य पर होने वाले खर्च की चिंता से मुक्त रखा जा सके। मगर इसमें एक बढ़ी अड़चन वी कि पैंसठ वर्ष से अधिक उम्र के लोग स्वास्थ्य बीमा नहीं खरीद सकते थे। आमतौर पर ज्यादातर लोगों को इसी उम्र के बाद स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां देती है। मगर स्वास्थ्य बीमा न खरीद पाने के चलते वे निराश हो जाते थे। फिन, कैंसर, हृदय रोग एड्स जैसी कुछ गंभीर बीमारियों से ग्रस्त लोगों को इसकी सुविधा उपलब्ध नहीं थी। इसके अलावा स्वास्थ्य बीमा खरीदने के बाद अलीस महीने तक उसका लाभ नहीं उठाया जा सकता था अब भारतीय बीमा विनियामक एवं विकास प्राधिकरण ने इन अड़चनें को दूर करते हुए नियम जारी किया है कि पैंसठ वर्ष से अधिक आयु के लोग भी स्वास्थ्य बीमा खरीद सकेंगे। यानी अब किसी भी उम्र में स्वास्थ्य बीमा खरीदा जा सकता है। बीमा कंपनियां अब कैंसर एड्स और हृदय रोग जैसी बीमारियों की वजह से किसी को बीमा देने से इनकार नहीं कर सकती खरीदने के उस महीने बाद उसका लाभ उठाया जा सकेगा।
बीमा क्षेत्र को विस्तार देने और प्रतिस्पर्धी बनाने के मकसद से इस क्षेत्र में निजी बैंकों और विदेशी कंपनियों के लिए सौ फीसद निवेश का रास्ता खोला गया था फिर बीमा कंपनी बदलने की भी छूट दे दी गई थी। निस्संदेह इससे बीमा कंपनियों में प्रतिस्पर्धा बढ़ी और लोगों को इसका लाभ मिलना भी शुरू हो गय नगर स्वास्थ्य बीमा के मामले में कई तरह की अड़चनें बनी हुई थीं। उन और कुछ गंभीर बीमारियां इस रात में बड़ी याथा थी अब उनके हट जाने से निस्संदेह बहुत सारे लोगों के लिए आसानी हो जाएगी अप जिस तरह जलवायु परिवर्तन और बदलती स्थितियों के चलते अनेक प्रकार की नई-नई राह रही है और बहुत सारे लोगों के लिए इलाज कराना मुश्किल होता जा रहा है उसमें बीमा कंपनियों का वृद्धावस्था की ओर बढ़ती आबादी को इस सुविधा से वोचत रखना उचित नहीं था। दुनिया के अनेक देशों में वृद्धों की सेहत पर विशेष ध्यान दिया जाता है, मगर जिस तरह हमारे देश में सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं पर योश और उनमें सुविधाओं का अभाव बढ़ता गया है, उसमें बुजुर्ग आबादी की सेहत का ध्यान रखना चुनौती बनता गया है। ऐसे में स्वास्थ्य बीमा की को लार्चाला बनाने से कुछ बेहतर नतीजे मिल सकते है। मगर अब भी स्वास्थ्य योजनाओं को पुख्ता पारदर्शी और प्रभावशाली बनाने की जरूरत रेखांकित की जाती रहती है। केंद्र सरकार ने आयुष्मान योजना के तहत करोड़ों लोगों को स्वास्थ्य बीमा की सुविधा उपलब्ध करा रखी है। कुछ लोग कंपनियों आदि की सामूहिक बीमा के अंतर्गत आते हैं कुछ लोगों ने निजी स्तर पर स्वास्थ्य बीमा ले रखा है। मगर चूंकि स्वास्थ्य बीमा की सुविधा का लाभ निजी अस्पतालों में ही लिया जाता है. यहां इनके दायें आदि को लेकर कई तरह की अनियमितताओं की शिकायतें मिलती रहती है। कोरोना काल के बाद स्वास्थ्य बीमा की वार्षिक किस्तें पचास फीसद से अधिक बढ़ चुकी है। इसलिए स्वास्थ्यमा नियमों को लचीला बनाने के साथ-साथ इन्हें व्यावहारिक और पारदर्शी बनाने की दिशा में भी भरोसेमंद कदम उठाने की जरूरत है।
Date:23-04-24
सुधारिए हाल, वरना हर शहर में सुलगेंगे कचरे के पहाड़अनिल प्रकाश जोशी
दिल्ली में कचरे के एक पहाड़ में फिर आग लग गई, जिसे दूर-दूर तक लोगों ने देखा और लाखों लोगों को बड़ी परेशानियों का सामना करना पड़ा। बेशक, दुनिया की सबसे बड़ी चुनौतियों में अब अपशिष्ट या कूड़ा-कचरा भी शामिल हो चुका है। पृथ्वी हो या आकाश, हमने ऐसे हालात पैदा कर दिए हैं कि इस ब्रह्मांड का कोई कोना ऐसा नहीं बचा, जहां मनुष्यों द्वारा उत्पादित कूड़ा न फैला हो। अंतरिक्ष में ही देख लीजिए, करीब 93 हजार टन ठोस कूड़ा-कचरा वहां झूल रहा है। इसे लेकर संयुक्त राष्ट्र आह्वान भी कर चुका है कि जिन अंतरिक्ष एजेंसियों ने अंतरिक्ष में कूड़ा पैदा किया है, वे उसे वापस धरती पर लाएं।
खैर, आईपीसीसी की रिपोर्ट के अनुसार, अगर यही रफ्तार रही, तो साल 2050 तक 3.4 गीगाटन शहरी कूड़ा-कचरा होगा। आने वाले समय में यह कूड़ा इसलिए भी बढ़ता चला जाएगा, क्योंकि हमारे शहर 17 प्रतिशत की दर से विकसित हो रहे हैं। आने वाले दिनों में विकास की रफ्तार को और तेज होना है, तो आज की तुलना में कई गुना ज्यादा कचरे के लिए हमें तैयार रहना चाहिए। शहरों में कचरा इसलिए भी ज्यादा पैदा हो रहा है, क्योंकि वहां विकल्प के अभाव में प्रति व्यक्ति प्लास्टिक का उपयोग या उपभोग बढ़ेगा। एक आंकड़े के अनुसार, कूड़ा पैदा करने के मामले में अमेरिका का स्थान सबसे ऊपर है। अमेरिका प्रति व्यक्ति 2.3 किलोग्राम से ज्यादा कूड़ा प्रतिदिन पैदा करता है। इसी तरह चीन और ऑस्ट्रेलिया में भी प्रति व्यक्ति कचरा उत्पादन ज्यादा है। भारत की अगर बात करें, तो प्रति व्यक्ति 0.62 किलोग्राम कचरा प्रतिदिन पैदा करता है। हम भारतीय जब ज्यादा तेज विकास करते हुए ज्यादा कचरा पैदा करने लगेंगे, तब क्या होगा? दिल्ली के गाजीपुर जैसे कूड़े के न जाने कितने पहाड़ शहर-दर-शहर खड़े नजर आएंगे? दुनिया भर के आंकड़ों व शोध से पता चला है, अभी तक दुनिया में करीब 70 प्रतिशत कचरा लैंड फिल या पहाड़ों के रूप में बदल दिया जाता है। इस कचरे में से फिर इस्तेमाल योग्य मात्रा महज 11 प्रतिशत है, जबकि बड़ा प्रतिशत जला दिया जाता है।
इसके बावजूद दुनिया में बहुत से शहर या देश ऐसे हैं, जिन्होंने अच्छे उदाहरण पेश किए हैं। इनमें जर्मनी सबसे अव्वल है, जहां सबसे ज्यादा रीसाइक्लिंग होती है। वहां 66.1 प्रतिशत कचरे का निस्तारण रीसाइक्लिंग के जरिये हो जाता है। इसी तरह, सिंगापुर भी शून्य कचरे के लिए जाना जाता है।
अपने देश में भी कुछ शहर कचरा प्रबंधन में पहचान बनाए हुए हैं। अहमदाबाद 15 करोड़ मैट्रिक टन कचरा पैदा करता है, पर वहां कूड़ा संग्रह का तरीका ऐसा है कि 98 प्रतिशत कचरे को एकत्र कर लिया जाता है। सूरत, नवी मुंबई और मैसूरु की भी अपनी पहचान है। स्वच्छता और कचरा संग्रह में इंदौर का भी अपना स्थान है। ऐसे शहरों से दिल्ली ने कितना सीखा है?
हमारे शहरों में एक बड़ी कमी दिखाई देती है कि सही शोध का अभाव है। वैसे दुनिया में ‘सात आर’ का नारा है, जिसमें काम चल रहा है। री-थिंक, री-फ्यूज, री-ड्यूस, री-यूज, री-पेयर, री-गिफ्ट, री-साइकिल। कचरा पैदा करने से पहले सोचिए, इनकार कीजिए, घटाइए, दोबारा इस्तेमाल कीजिए, मरम्मत कीजिए, फिर उपहार दीजिए और पुनर्रचना कीजिए। कचरे का फिर इस्तेमाल करने के मामले में भारत की स्थिति सुधरी है, पर हमें बडे़ प्रयासों की जरूरत है, ताकि शहर-दर-शहर न कचरे के पहाड़ बनें और न हर गरमी उनमें भयंकर आग लगने की नौबत आए।
बेशक काम हो रहा है, प्लास्टिक से सड़कें बनाई जा रही हैं, कचरे से कंपोस्ट बनाया जा रहा है, ऊर्जा में भी उपयोग हो रहा है। फिर भी मात्र 10 से 15 प्रतिशत काम ही इस दिशा में हुआ है। अपने देश में ऐसे संस्थानों को बढ़ावा देना होगा, जो कचरा प्रबंधन पर वैज्ञानिक ढंग से काम करें। कचरे के स्थानीय उपयोग पर ही ज्यादा फोकस करना होगा। प्राकृतिक ढंग से ज्यादातर कचरे का उपचार स्वयं प्रकृति ही कर लेगी, इस दिशा में ज्यादा शोध की जरूरत है। पुणे जैसे कुछ शहरों ने कचरे से बिजली बनाने की कोशिश की है, इस पर ज्यादा काम करना होगा। बहुत कुछ संभव है, लेकिन सबसे जरूरी है शासकीय इच्छाशक्ति!
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विश्व में होने वाले युद्धों की परंपरा कोई नई नहीं है। लेकिन वर्तमान में संयुक्त राष्ट्र एवं मानवाधिकार जैसी वैश्विक संस्थाओं के होते हुए रूस-यूक्रेन, इजरायल-फिलिस्तीन-ईरान में चलते चले जा रहे युद्धों का कारण क्या है?
राजनीतिक सैन्य औद्योगिक गठजोड़ – हथियार कंपनियों को युद्धों से लाभ होता है। ये कंपनियां राजनीतिक दलों को अच्छा खासा चंदा देती हैं। नौकरियों का सृजन करती हैं। इसलिए सत्ताधारी दल पर इनका प्रभाव होता है।
बाइडन को देखें – युवा डेमोक्रेट्स के विरोध के बावजूद, बाइडन इजरायल को हथियार भेजना जारी रखे हुए हैं। वे युद्ध का विरोध कर रहे प्रदर्शनकारियों की बात भी सही ठहराते हैं। लेकिन दूसरी ओर डरते हैं कि हथियारों की सप्लाई बंद करते ही उनका चुनाव अभियान खतरे में पड़ सकता है।
अफ्रीका की स्थिति – पूरा महाद्वीप हथियारों और संघर्षों से भरा पड़ा है। विश्व की सभी प्रमुख हथियार निर्माता कंपनियों की मौजूदगी यहाँ है। रूस, चीन, अमेरिका और फ्रांस बड़ी मात्रा में यहाँ हथियार सप्लाई करते हैं।
वैश्विक हथियार उद्योग आज पहले से कहीं अधिक शक्तिशाली है। और जब इसके हित नेताओं के हितों से जुड़ते हैं, चाहे वे लोकतंत्र में हो या निरंकुशता में, तो युद्ध बड़ा व्यवसाय बन जाता है, और मौतें महज आंकड़े बन जाती हैं।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 2 अप्रैल, 2024
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Date:22-04-24
Travel, With Care For Local ConcernsTackle anti-tourism ‘movements’ with sensitivityET Editorials
Tourism is one of the key things that make the world — and the world economy — go round. But there’s a countercultural movement at play, especially in the major tourism-driven economies in Europe. The €109 bn that 85.1 million international tourists generated for Spain’s economy last year, for instance, is unable to drown out increasing anxiety that many Spaniards, particularly in cities like Barcelona, are experiencing. The crescendo of ‘¡Vete a casa!’ — ‘Go home!’ — in some of the country’s major tourist centres is as real as the nearly 13% that tourism contributes to its economy. The pushback is neither new nor limited to Spain or Europe. For tourism to remain a vibrant economic sector, it will require balancing the right to travel with respecting the rights of residents. As more and more Indians travel for leisureand bleisure (business plus leisure), we also need to keep a balancing act that requires localisation, innovation and sensitivity in mind.
UN World Tourism Organisation reported an estimated 1.3 bn international arrivals in 2023 — 88% of pre-Covid numbers. Growing affluence and burgeoning service industries make tourism a strong economic sector, particularly for local economies. In 2023, travel and tourism directly accounted for 9.1% of global GDP. But fatigue and creeping community anxiety noticeable in urban tourist destinations is a result of a failure to manage capacities and changes that servicing a growing tourist influx demands.
Problems such as outpricing residential properties need deft balancing of travellers’ and residents’ rights. Policies for investing in tourism must be based on supporting initiatives that also elevate local priorities beyond the likes of local merchandise sales and turnstile proceeds at tourist destinations and landmarks.
Date:22-04-24
An Export-Minded Self-Reliance MixET Editorials
India is trying to enlarge its global presence in manufacturing while offering tariff-based protection for local production. These seemingly contradictory policy objectives need to be calibrated carefully to attain the desired outcome. By itself, export promotion, if pursued vigorously, can raise the share of manufacturing in economic output. Protection, however, has a poorer record in enabling local industry to acquire global scale. It has been India’s experience as well till the economic reforms of the 1990s that led to liberalisation. The infant industry argument had been taken well past its economic rationale, leading to a balance of payments crisis. Over the next quarter century, India brought down import duties to competitive levels. Yet, the trade deficit in manufacturing did not yield expected improvement.
Now the situation is different. Global supply chains are seeking resilience, and protection for domestic manufacturing India offers is for all takers, not just local companies. This blunts the infant industry case somewhat while allowing global capital time to seed value chains in the country. Tariff protection is a necessary defence the rest of the world is adopting to excess Chinese manufacturing capacity. Any economy offering a manufacturing base in a ‘China Plus One’ scenario will have to build a temporary fence around Chinese exports.
This approach has a better chance of attaining the goal of self-reliance while expanding India’s footprint in manufacturing exports. It gets around the issue of access to technology and capital that is usually a fallout of protective trade. It also steers the economy away from being swamped by goods from exportoriented free trade partners. A rising share of manufacturing in an economy the size of India’s also helps to rebalance global economic growth against China. Export orientation and selfreliance need not be as contradictory as orthodox economic policymaking would suggest. Finding the right mix is key. This time, India may just have found the right blend.
Date:22-04-24
Sobering assessmentThe richer nations must show more support for the poorest countriesEditorial
The global economy has avoided the spectre of a debilitating recession, with the IMF last week raising its forecast for worldwide aggregate growth in 2024 to 3.2%, from the 2.9% it had projected in October. The IMF has underlined the fact that the global economy has, with surprising resilience, ridden out several adverse shocks as well as ‘significant central bank interest rate increases aimed at restoring price stability’ and sustained the growth momentum, largely on the back of advanced economies led by the U.S. undergirding demand. However, the Fund has also pointed to a growing gulf between the economic north and south by observing: “A troubling development is the widening divergence between many low-income developing countries and the rest of the world. For these economies, growth is revised downward, whereas inflation is revised up.” These poorest countries, in Africa and including some Latin American, Pacific island and Asian nations, had also suffered the most scarring from the COVID-19 pandemic in terms of estimated drop in output relative to pre-pandemic projections, and were struggling to recover. To compound their woes, these economies were now saddled with a mounting debt service burden that was severely impairing their ability to spend on vitally needed public goods including better education, health care and social nets to improve food security.
The IMF’s twin development lender, the World Bank, has, in a separate report, pointed out that for the first time in this century, half of the world’s 75 poorest countries were experiencing a widening income gap with the wealthiest economies, marking a “historic reversal” of development. As the World Bank Group’s Chief Economist Indermit Gill observed in a blog post on the lender’s site, “[the 75 poorest countries] are home to a quarter of humanity — 1.9 billion people… and are home to 90% of people facing hunger or malnutrition”. More distressingly, while these countries were midway through what he termed, potentially ‘a lost decade’, Mr. Gill averred that the rest of the world was “largely averting its gaze” even as the governments in at least half these nations were mostly paralysed by debt distress. Citing the examples of South Korea, China and India as countries that had transitioned from being borrowers of low-interest loans from the World Bank’s International Development Association into economic powerhouses that were today IDA donors, the Bank’s chief economist stressed it was imperative that the world’s richer countries financially support the poorest nations. Given that the world needs to tap every reserve of economic potential to achieve universal peace and prosperity, it can ill afford to turn its back on a quarter of its people.
Date:22-04-24
The challenges of renewable energySukanya Khar,Kaveri Iychettira, [ Researcher at the School of Public Policy at IIT Delhi ]
At a recent speech, the United Nations Climate Change Executive Secretary Simon Stiell said the “next two years are essential in saving our planet.” Record-breaking heat, shortage of water, and other environmental issues are regular headlines in the context of the need to achieve development, increase employment, and reduce poverty and inequality, among others. Yet, the linkages between the pathways of development, sustainability, and climate change mitigation are far from well-understood. Our current models of development drive greenhouse gas (GHG) emissions, are unsustainable, and inequitable. Although India aims to achieve Net Zero GHG emissions by 2070, mainly led by a massive transition to large-scale renewable energy, the implications of such a transition on developmental or sustainability outcomes are unclear at the local and national levels.
Examining solar parks
Let us take the example of large-scale solar parks — a key pillar of India’s mitigation strategy. We have 214 sq. km of land under solar parks, but some studies estimate that we may need 50,000-75,000 sq. km, which is about half the size of Tamil Nadu, to achieve our Net Zero targets.
At the local level, farmers in villages near India’s two largest solar parks – in Bhadla in Rajasthan and Pavagada in Karnataka – report different experiences. In Bhadla, farmers have lost sacred common lands called Orans and pastoralists are faced with shrinking grazing lands, forcing some to sell their livestock at throwaway prices. Such losses have led to protests demanding recognition of common land under the Forest Rights Act (FRA), 2006. On the other hand, many farmers in Pavagada were content with the steady annual income they received by leasing out land for solar parks. This land was drought-stricken and did not yield significant agricultural income. All the same, water security issues and economic disparity between large and small landowners are challenges for the region.
At a more regional or national scale, solar parks may compete for essential natural resources. Solar panels require large amounts of water for their regular cleaning. Yet, our current national-level estimates for the land available for solar parks do not account for the availability of nearby water sources. Similarly, the land needed for solar parks may compete with other productive activities — agriculture and related livelihoods, with the potential for impacts on food security. Impacts on biodiversity loss with the construction of large-scale solar parks are also location-specific, and under-researched. For instance, open natural systems such as deserts provide essential ecosystem services that, if disturbed, would cause ecological damage and even contribute to climate change. Crucially, all of these resource requirements and impacts on livelihoods and biodiversity are subject to uncertainty regarding feasibility and economic viability of other emerging low carbon technologies and the changing climate itself.
Different approaches
Large-scale renewable energy development can avoid reproducing the injustices of past large-scale infrastructure projects, while being sensitive to developmental objectives. Experimenting with ownership models is one approach. The parks need not necessarily be owned by the state or private companies. Community initiatives could help generate revenues for the communities, further promoting small businesses and upskilling, improving incomes, stimulating local economies, and improving energy access.
Solar and wind park development is exempted from Environmental and Social Impact Assessment. The legal and regulatory architecture must be revised and strengthened to limit adverse social and environmental consequences. In terms of impacts on small and medium landowners where private land is being used, there is no mechanism to monitor if a fair price is paid to those leasing their land. Involving local governance units in the planning and siting processes can provide an opportunity to align local developmental objectives with solar park development.
Wasteland classification needs a significant overhaul. Recognition of commons under the FRA would help improve environmental and equity outcomes by granting land ownership to communities dependent on commons. If such land is to be leased or acquired for solar parks, solar park development corporations will have to engage with local governance units such as the Gram Sabha to initiate the project.
Encouraging research and experimenting with ‘agrivoltaics’ is another way to think about sustainably developing renewable energy. Agrivoltaics pair solar with agriculture, creating energy and providing space for crops, grazing, and native habitats under and between panels. Thus, farmers can grow crops while also being ‘prosumers’ — producers and consumers — of energy.
Many of these challenges and opportunities relate to solar in particular, but similar issues abound with other mitigation technologies. Wind energy, for instance, has adverse consequences on bird ecosystems. Large-scale renewable energy projects could have positive employment outcomes at the district level, but they lead to massive employment shifts between sectors at the national level. Adequate skilling and training programmes targeting the unskilled and poorer populations are essential to protect them.
Seize the opportunity
We are at the cusp of a second green revolution, this time involving energy. We have an opportunity to anticipate the unintended consequences of this revolution, and align our technological, economic, and institutional structures to maximise synergies between sustainability, climate change mitigation, and development related outcomes.
Date:22-04-24
गहराता जा रहा है धरती का संकटरमन कांत, ( लेखक भारतीय नदी परिषद के अध्यक्ष हैं )
मानव गतिविधियों के चलते हमारी धरती अनेक प्रकार के झंझावत झेल रही है। बेतरतीब विकास और प्राकृतिक संसाधनों के अंधाधुंध दोहन से पृथ्वी का संकट गहरा रहा है। यही कारण है कि आए दिन किसी न किसी हिस्से में प्राकृतिक तबाही होती रहती है। दुबई शहर बेमौसम बरसात के कारण कराह उठा। 16 अप्रैल को हुई घनघोर बारिश ने वहां जनजीवन अस्त-व्यस्त कर दिया। वहां एक ही दिन में 250 मिलीमीटर से भी अधिक बरसात हुई। दुबई में इतनी बरसात दो वर्षों में होती है। दुबई की सारी चकाचौंध प्रकृति के एक झटके से बेरौनक हो गई। दुबई में बारिश के कहर के तीन दिन बाद पाकिस्तान ने प्रकृति की मार झेली। वहां हुई जोरदार बारिश के कारण 80 से अधिक लोगों की जान गई और सैकड़ों घर क्षतिग्रस्त हो गए। हिमाचल प्रदेश में भी अप्रैल माह में हिमपात देखने को मिल रहा और वह भी उस समय जब देश के कई हिस्सों में समय से पहले गर्म हवाएं चल रही हैं। बीते दिनों हैदराबाद में भी भारी बारिश देखने को मिली। ऐसी घटनाएं विश्व भर में अब कहीं अधिक देखने को मिल रही हैं। प्रकृति का ऐसा व्यवहार जहां चिंतनीय है, वहीं यह सोचने पर भी मजबूर कर रहा है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? यह तथ्य किसी से छुपा नहीं कि इन सब घटनाओं के मूल में जलवायु परिवर्तन है। जलवायु परिवर्तन के दुष्परिणाम वर्ष भर नए-नए रूप में प्रकट होते ही रहते हैं।
यह सर्वविदित है कि मानव की प्रकृति के प्रतिकूल गतिविधियां धरती का तापमान लगातार बढ़ा रही हैं। महासागर हों या पहाड़, नदियां हों या खेती की जमीन सब जगह प्रकृति कराह रही है। अनेक देशों में पहाड़ी क्षेत्रों के जलाशय सूख रहे हैं और वन क्षेत्र सिकुड़ रहे हैं। इसी कारण आए दिन जब जंगली जानवर अपनी प्यास बुझाने बाहर आते हैं तो मानव के साथ उनका संघर्ष होता है। जंगलों की घटती नमी के कम होने और अत्यधिक तापमान के कारण जंगलों में आग लगने के मामले भी बढ़ रहे हैं। बरसाती नदियां सूख रही हैं तो बड़ी नदियों में पानी की मात्रा लगातार घट रही है। खेती वाली जमीन में कार्बन तत्व लगातार घट रहा है। इससे अन्न उत्पादन पर भी असर पड़ा रहा है। एक ही देश के अलग-अलग हिस्से सूखे और बाढ़ की चपेट में आ रहे हैं। जलवायु परिवर्तन की समस्या बढ़ाने के कारणों में बढ़ती आबादी और उसका उपभोक्तावाद भी शामिल है। अधिक आबादी की जरूरतें पूरी करने के लिए तथा अधिक से अधिक उपभोग करने की प्रवृत्ति के चलते प्रकृति के संसाधनों का अधिक दोहन हो रहा है। उपभोक्तावाद के चलते ही कार्बन डाईआक्साइड, क्लोरो फ्लोरो कार्बन और मीथेन जैसी ग्रीनहाउस गैसें अधिक मात्रा में वातावरण में पहुंच रही हैं। उपभोग की वस्तुओं के निर्माण से लेकर दैनिक जरूरत के पानी की खपत लगातार बढ़ रही है, जबकि उसका संरक्षण उस अनुपात में नहीं किया जा रहा है।
कई देशों में जगह-जगह कचरे के पहाड़ बन रहे हैं। दुनिया में प्रति वर्ष लाखों टन प्लास्टिक कचरा उत्पन्न होता है, जिसके वर्ष 2050 तक कई गुना बढ़ने का अनुमान है। भारत में भी अच्छा-खासा प्लास्टिक कचरा पैदा होता है, जो विगत पांच वर्षों में दोगुना हुआ है। इसमें करीब 90 प्रतिशत कूड़े के ढेर, नदी और नालों में जाता है। प्लास्टिक कचरे से पृथ्वी की जैव-विविधता बुरी तरह प्रभावित होती है। इस कचरे के छोटे-छोटे कण धीरे-धीरे पानी में घुल जाते हैं। इसका मानव स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव होता है। प्लास्टिक का कचरा धरती के लिए एक बहुत बड़ा संकट बन गया है, लेकिन उसका उपयोग कम करने की कोई ठोस पहल नहीं हो रही है। प्लास्टिक के कचरे से महासागर अटे पड़े हैं। वह अन्य तरह से भी धरती की सेहत के लिए खतरा बन रहा है। इसी कारण इस वर्ष पृथ्वी दिवस की थीम धरती बनाम प्लास्टिक है। चूंकि प्लास्टिक से बहुत नुकसान हो रहा है इसलिए उससे छुटकारा पाने के लिए ठोस कदम उठाने ही होंगे।
पृथ्वी की संपूर्ण जैव-विविधता खतरे में पड़ गई है। मानव गतिविधियों के कारण पृथ्वी हांफने लगी है। उसकी ऐसी हालत किसी के भी हित में नहीं है। कोई दूसरी पृथ्वी नहीं है। अभी समय है चेतने का, सुधरने का और उपभोक्तावाद पर लगाम लगाने का। अगर हम अब भी नहीं चेते तो संकट इतना गंभीर हो सकता है कि उससे निपटना मुश्किल हो जाए। धरती को बचाने के उपाय अमल में लाने में पहले ही देर हो चुकी है। सरकारों के साथ समाज को भी यह समझना होगा कि आधुनिक जीवनशैली में बदलाव लाए बिना बात बनने वाली नहीं है। हमें भौतिकतावादी जीवन छोड़ना होगा। खाने-पीने की चीजों की बर्बादी रोकनी होगी और बिजली-पानी का किफायती उपयोग करना सीखना होगा। हमें यूज एंड थ्रो संस्कृति का परित्याग करना होगा। यह संभव नहीं कि कुछ लोग तो जीवनशैली बदलें और शेष लोग यह मानकर चलते रहें कि उन्हें ऐसा करने की आवश्यकता नहीं। यह सोच भी सही नहीं कि जलवायु परिवर्तन रोकने की जिम्मेदारी पर्यावरण संगठनों और सरकारों की है। सरकारें और पर्यावरण संगठन तभी कुछ हासिल कर पाएंगे, जब लोग भी उनका सहयोग करने के लिए तत्पर होंगे। यह तत्परता सभी को दिखानी होगी-उन्हें कुछ अधिक, जो एसी, लक्जरी कारों, विमानों आदि का प्रयोग अधिक करते हैं। धरती की रक्षा में उसके संसाधनों का अधिकाधिक उपभोग करने वालों की जिम्मेदारी अधिक है, क्योंकि भारत सरीखे देशों को गरीबों के जीवनस्तर में भी सुधार करना है।
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अगर भारत कुछ ऐसे उपाय कर पाता है, तो अन्य विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में उसको बेरोजगारी का समाधान जल्द मिल सकता है, क्योंकि इसका पैमाना और वैश्विक आउटपुट की प्रकृति तेजी से विकसित होने वाली है।
‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 01 अप्रैल, 2024
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Today's Daily Audio Topic-"जी-20 के सदस्य"
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13-09-2023 (Important News Clippings)
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Today's Life Management Audio Topic-"विचार और कल्पना"
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क्या कार्यपालिका अपने ही मामलों में अभियोजक और न्यायधीश हो सकती है?
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Today's Daily Audio Topic-"जी-20 की उपलब्धियां"
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12-09-2023 (Important News Clippings)
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Today's Life Management Audio Topic-"दूसरा मूलभूत सिद्धांत"
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ज्ञानवापी के संबंध में न्यायालयों का अन्याय
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Date:11-09-23
Delhi Delivers, In StyleThat a G20 consensus was achieved when geopolitics is so bitter was a real accomplishmentTOI Editorials
India has once again proved the sceptics wrong and done so in style. They had confidently predicted that the 2023 G20 leaders summit would fail to issue a joint statement, indeed becoming the first such summit with such failure. They were right insofar as the world has become more bitterly polarised over the last year and the shadow of these deep divisions was indeed long over many of the G20 meetings. But where they underestimated India was how strong its network of relationships is today and its determination to marshall these to build a meaningful consensus. The G20 New Delhi Leaders’ Declaration provides a pragmatic road map for how to continue imperative global cooperation when severe geopolitical discord threatens global wellbeing.
The declaration includes PM Modi’s words that today’s era must not be of war. Bringing the US and Russia to common ground on the language over the Ukraine war has been no mean feat. Being able to deliver this is an important piece of India’s image in the world growing with its G20 presidency. But there are also several others. The edit below highlights the importance of India’s successful advocacy for the inclusion of the African Union as a permanent G20 member. Also of immense interest was India, US, UAE, Saudi Arabia, France, Germany, Italy and the EU signing an MoU for a connective corridor from India to Europe via the Middle East. Analysts were quick to term this “the new spice route” because it is promising dramatically smoothened pathways for the flow of trade, technology and energy – plus a counter to China’s Belt and Road heft in global infrastructure.
But the ambitiousness of this corridor shall be matched by its difficulty levels. And no matter the enthusiastic endorsements by Joe Biden, Ursula von der Leyen etc details such as how it shall be financed are not yet known. In other words, big tests for the work of this summit shall continue well after its end. The feel-good consensus on climate issues shall have to be followed by concrete mobilisation of the trillions of dollars needed for developing countries to implement their nationally determined contributions. What this weekend categorically proved is that as countries navigate how to share responsibilities and rewards in today’s world, New Delhi’s voice of reason and clarity shall be invaluable.
Date:11-09-23
African DividendAfter G20 inclusion of AU, India must take ties with Africa to next levelTOI Editorials
The inclusion of the African Union (AU) as a permanent G20 member – an Indian initiative – has big geopolitical ramifications. Africa is potentially the next global growth hub. Plus, it has always been a massive reservoir of natural resources. Morocco has the largest phosphate reserves in the world, DR Congo is endowed with huge deposits of cobalt, and Nigerian gas can power all of Europe. However, hitherto Africa had little say at the global high table. It is this imbalance that the G20 inclusion of AU will look to address.
Of course, this is also a huge win for India. The latter’s Africa outreach has witnessed several crests and troughs over the decades. But sustained efforts have materialised in recent years with India trying to position itself as a viable alternative development partner to China. In fact, this is even visible on the defence front with India and Africa conducting the first-ever joint army chiefs conclave earlier this year. India is also emerging as a key defence supplier to Africa with Seychelles, Mauritius and Mozambique ranking as the top three Made-in-India arms importers between 2017 and 2022. Add to this, ongoing projects in healthcare, education, and solar power generation in Africa.
The G20 inclusion of AU adds fresh momentum to India-Africa ties that must be capitalised upon. First, the two sides should quickly finalise the dates of the much-delayed fourth India-Africa Forum Summit. Second, India needs to exert greater efforts in Francophone Africa where its presence has been traditionally weaker. And third, initiatives like the Asia-Africa Growth Corridor need greater energy. Speed is of the essence in Africa, as China has shown. After the G20 success, India should get cracking if it wants to reap the African dividend.
Date:11-09-23
A Trans-Europe-Asia Express Journey‘Big deal’, yes. But details will make the differenceET Editorials
The Europe-West Asia-India transit corridor reinforces Europe’s shift away from Russian energy sources in favour of supply from the Persian Gulf, a part of which is processed in India for re-export. The corridor also establishes an alternative to the Suez Canal, which is emerging as a choke point for just-in-time global supply chains. A rail bridge between the Mediterranean and the Indo-Pacific should improve access to manufacturing planning a shift out of China, thereby supporting India’s ambition of increasing its share of goods trade. The participatory nature of funding the railway and shipping lines provides an alternative template to China’s Belt and Road Initiative (BRI) for building trading infrastructure in developing economies. The US regains influence in West Asia, where it has been losing bargaining power over energy pricing, and in the Indo-Pacific, where China has stitched together the largest trading bloc.
For India, the corridor presents a partly overland trade route that has remained elusive because of political instability to the northwest. The inclusion of green energy and digital connectivity offers India bigger scope in areas it is building competitive advantage. India is offering its digital infra to interested nations and is planning a big push in becoming a low-cost green hydrogen producer. Accelerated logistics buildup domestically could serve a bigger portion of manufacturing trade from the Indo-Pacific, apart from its own exports. The corridor builds on strategic cooperation between the US and India involving transfer of dual-use technology to develop indigenous defence production.
It may be a ‘big deal’, as Joe Biden put it, but the details and timelines will make all the difference. Trade is fragmenting along ideology, ecology and finance. The corridor hopes to find sustainable solutions to all three. India’s inclusion, apart from the immediate benefits to trade, should draw it deeper into a value-based economic framework that falls short of a trade bloc the US is piloting for the Indo-Pacific.
Date:11-09-23
Get Trans-Atlantic Ducks in a RowET Editorials
A new, informal trans-Atlantic alliance is taking shape. It is building on India’s bilateral ties with the US on end of the pond, and with France on the other. With every interaction, a new iteration of this partnership comes into focus. The bookended bilateral meetings on the sidelines of the G20 Leaders’ Summit with the two democracies provides a glimpse into this entente cordiale. This is a second bilateral engagement with both countries in the space of less than three months. Underpinning these interactions is the growing acceptance that risks of fragmentation worldwide can be mitigated with dialogue and deeper engagement with emerging economies without disadvantaging any country.
The need for closer and diverse ties with emerging economies is a clear lesson of the pandemic and the Russian invasion of Ukraine. The emerging picture of these partnerships essays a new version of globalisation, one that is rooted in mutual economic and development benefits with a footprint of global benefits, and that isn’t along increasingly outdated notions of ‘East-West’.
We see increased engagement in the realms of space, nuclear energy, digital public infrastructure, critical technology, climate change and education. The India-US partnership in global semiconductor supply chains and India-US Initiative on Critical and Emerging Technology are examples. The other prong is a partnership in other regions, such as the US decision to co-lead the Indo-Pacific Oceans Initiative Pillar on Trade Connectivity and Maritime Transport, and India-France partnership in the Indo-Pacific and Africa. Ensuring a rulesbased order that leaves no one behind while protecting open global systems is the bedrock of this nascent alliance.
Date:11-09-23
भारत ने असंभव को संभव कर दिखायाशिवकांत शर्मा, ( लेखक बीबीसी हिंदी के पूर्व संपादक हैं )
भारत ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में वह हासिल कर दिखाया जिसे भूराजनीतिक संकटों के समाधान के लिए बने अंतरराष्ट्रीय मंच हासिल नहीं कर पा रहे थे। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद यूक्रेन युद्ध को रुकवाने के लिए कुछ नहीं कर पा रही और आमसभा जैसे मंचों के प्रस्ताव भी सर्वसम्मति से पारित न हो पाने के कारण निष्प्रभावी रहे। इसीलिए भारत की अध्यक्षता में नई दिल्ली में संपन्न जी-20 शिखर सम्मेलन के कुछ दिन पहले तक किसी को उम्मीद नहीं थी कि घोषणा पत्र पर सहमति बन पाएगी। चीनी राष्ट्रपति के इस सम्मेलन में न आने का अर्थ यह लगाया गया था कि चीन की मंशा भारत का खेल बिगाड़ने की है, परंतु भारतीय राजनयिकों के कौशल और अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में भारत के बढ़ते कद ने असंभव को संभव कर दिखाया। शिखर सम्मेलन के पहले दिन ही घोषणा पत्र पर आम सहमति जुटा कर भारत ने सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता की अपनी दावेदारी को भी मजबूत किया। इसीलिए अमेरिकी राष्ट्रपति बाइडन ने प्रधानमंत्री मोदी के साथ हुई द्विपक्षीय शिखर वार्ता में भारत की इस दावेदारी के समर्थन को दोहराया।
घोषणा पत्र में रूस का नाम न लेते हुए यूक्रेन में जारी युद्ध से हो रही मानवीय यातना और वैश्विक खाद्य एवं ऊर्जा संकट पर चिंता व्यक्त की गई। इस पर जोर दिया गया कि संयुक्त राष्ट्र चार्टर के मुताबिक सभी देशों को किसी अन्य देश की क्षेत्रीय अखंडता, संप्रभुता या राजनीतिक स्वतंत्रता के विरुद्ध धमकी या बलप्रयोग से बचना चाहिए। साथ ही परमाणु हथियारों के प्रयोग या प्रयोग की धमकी को भी अस्वीकार किया गया। यूक्रेन और यूरोप के देश ‘यूक्रेन में युद्ध हो रहा’ कहने और हमलावर का नाम न लेने से नाखुश हैं, परंतु यूक्रेन युद्ध के बाद से अमेरिका और नाटो और रूस एवं चीन के बीच बढ़ते तनाव के माहौल में नाम लिए बिना भी ऐसे घोषणा पत्र पर रूस और चीन की सहमति जुटाना किसी ऐतिहासिक उपलब्धि से कम नहीं। इस घोषणा पत्र से यूक्रेन युद्ध में तो किसी बदलाव के आसार नहीं, लेकिन इससे अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में यह संदेश अवश्य गया कि यदि कोई देश रूस को समाधान के लिए तैयार कर सकता है तो वह शायद भारत ही होगा।
55 देशों के संगठन अफ्रीकी संघ को जी-20 की सदस्यता दिलाकर इसे जी-21 में बदल देना भी भावी विकास और अंतरराष्ट्रीय कूटनीति की दृष्टि से भारत की बड़ी उपलब्धि है। अफ्रीकी संघ के सदस्य बनने से जी-20 में दक्षिणी देशों का प्रतिनिधित्व बढ़ेगा। अभी तक वहां जी-7 देशों, यूरोपीय संघ के 25 देशों, रूस, चीन और तुर्किए को मिलाकर उत्तर का पलड़ा भारी था। अफ्रीकी देशों की सदस्यता के बाद दक्षिणी देशों की संख्या बढ़ जाएगी। वैसे चीन और रूस दोनों अफ्रीकी देशों को सदस्यता दिलाने का श्रेय लेने की कोशिश कर रहे हैं। चीन ने पिछले दो-तीन दशकों से अफ्रीकी देशों में भारी निवेश किया है और रूस भी निवेश के साथ-साथ राजनीतिक उठापटक कराने में लगा रहता है, पर चीनी निवेश से अफ्रीकी देशों में कर्ज संकट पैदा हुआ है और रूस के भाड़े के सैनिक अफ्रीकी देशों में विद्रोह करा रहे हैं। भारत के अफ्रीका से हजारों साल पुराने व्यापारिक और सामाजिक रिश्ते हैं। भारत का स्वाधीनता आंदोलन अफ्रीकी देशों के स्वाधीनता आंदोलनों का प्रेरणास्रोत बना। गुटनिरपेक्ष आंदोलन का नेतृत्व करते हुए भारत हमेशा दक्षिणी देशों की आवाज बुलंद करता आया है। इसलिए अफ्रीकी संघ को उत्तर और दक्षिण के साझा मंच जी-20 की सदस्यता दिलाने से भारत को स्वाभाविक रूप से दक्षिण की आवाज बनने में मदद मिलेगी।
भारत केंद्रित विकास की दृष्टि से देखें तो देश को पश्चिमी एशिया से होकर यूरोप के साथ जोड़ने वाले परिवहन और ऊर्जा गलियारे की परियोजना इस शिखर सम्मेलन की सबसे बड़ी उपलब्धि साबित हो सकती है। हालांकि अभी इस परियोजना पर केवल सहमति ही बनी है, फिर भी अमेरिकी राष्ट्रपति का यह कहना महत्वपूर्ण है कि यह परियोजना केवल पटरियां बिछाने को लेकर नहीं है। यह गेमचेंजर साबित होगी। यह बंदरगाहों और रेल-मार्ग के जरिये भारत को ही नहीं, वरन दक्षिण-पूर्व एशिया को भी पश्चिमी एशिया के अरब देशों और यूरोप से जोड़ेगी। भारत इसे आपूर्ति शृंखला को सुदृढ़ बनाने वाले स्वच्छ ऊर्जा गलियारे के रूप में भी देखता है। पाकिस्तान के वीटो से बचने के लिए फिलहाल अरब प्रायद्वीप में एक तेज गति वाले रेल गलियारे का निर्माण होगा, जिसके दोनों छोरों पर भारत और यूरोप के लिए जहाजी संपर्कों का विकास किया जाएगा। परियोजना में अमेरिका, भारत, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात, फ्रांस, जर्मनी, इटली और यूरोपीय संघ हैं। सऊदी अरब और इजरायल के बीच संबंध बहाल करते हुए उसे भी शामिल किए जाने की योजना है।
भारत की अध्यक्षता में हुआ नई दिल्ली जी-20 शिखर सम्मेलन संतुलित विकास को लेकर अतीत में हुए संयुक्त राष्ट्र के विभिन्न शिखर सम्मेलनों की लंबी शृंखला में एक अहम कड़ी जैसा रहा। जून के अंत में पेरिस में पृथ्वी सम्मेलन हुआ था, जिसमें जी-20 सम्मेलन से एक ऐसे विश्व के निर्माण की आशा रखी गई थी, जिसमें गरीबी न रहे, पृथ्वी का संतुलन बहाल हो और कमजोर देशों के पास भी जलवायु परिवर्तन से पैदा होने वाले संकटों का सामना करने की सामर्थ्य हो। लगभग यही आशा नैरोबी में हुए अफ्रीका शिखर सम्मेलन में दोहराई गई। भारत ने नई दिल्ली के जी-20 शिखर सम्मेलन में खेमों में बंटी दुनिया को एक साझा घोषणा पत्र के लिए राजी करते हुए उत्तर और दक्षिण के बीच बने असंतुलन को दूर करने, नए गलियारे बनाकर आपूर्ति शृंखला को सुदृढ़ बनाने, ऋण संकट समाधान के लिए विश्व बैंक जैसी वित्तीय संस्थाओं को वित्तपोषित करने और जलवायु संकट से निपटने के लिए विश्व जैव-ईंधन अलायंस बनाने जैसी दर्जनों पहल कीं, जो दो सप्ताह बाद होने वाले सतत विकास लक्ष्य शिखर सम्मेलन और अगले साल होने वाले विकास-वित्त सम्मेलन को दिशा और गति देने में सहायक सिद्ध होंगी। एक धरती, एक परिवार और एक भविष्य के लक्ष्य को ध्यान में रखते हुए भारत ने भूराजनीतिक और आर्थिक खेमों में बंटी दुनिया को एक कुटुंब के रूप में जोड़ने का प्रयास करते हुए ऐतिहासिक सफलता हासिल की है।
Date:11-09-23
देश के नाम पर अनावश्यक विवादप्रो. निरंजन कुमार, ( लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में मूल्य संवर्धन पाठ्यक्रम समिति के अध्यक्ष हैं )
बहुत साल पहले हमने नियति के साथ वादा किया था और अब समय आ गया है जब हम अपनी प्रतिज्ञा को पूरा करेंगे…एक क्षण आता है, जो इतिहास में बहुत ही दुर्लभ होता है, जब हम पुराने से नए की ओर कदम बढ़ाते हैं, जब एक युग समाप्त होता है और जब लंबे समय से दबे हुए एक राष्ट्र के आत्मा को अभिव्यक्ति मिलती है।’ यह संदर्भ 14 अगस्त, 1947 की मध्य रात्रि को दिए गए भाषण का एक अंश है, जो भारत के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने दिया था। यह वक्तव्य हमारे स्वाधीनता संग्राम के दौरान उन सपनों की प्रतिध्वनि थी, जो स्वामी विवेकानंद, बाल गंगाधर तिलक, महर्षि अरविंद, रवींद्रनाथ टैगोर, महात्मा गांधी, सरदार पटेल और डा. आंबेडकर जैसे मनीषियों ने देखा था। उन विभूतियों का सपना ऐसे स्वतंत्र भारत का था, जिसका तंत्र अर्थात संरचना, विचार, अस्तित्व-पहचान सदियों की गुलामी के पट्टे को फेंककर नया बनेगा, मगर जी-20 से संबंधित आयोजन में देश के नाम ‘भारत’ को ‘इंडिया के बरक्स रखकर जिस तरह से अनर्गल विवाद खड़ा किया जा रहा है और ‘भारत’ शब्द को जिस तरह हिकारत से प्रस्तुत किया जा रहा है, उससे हमारे स्वाधीनता सेनानियों का आत्मा कराह रही होगा। क्या हो हमारे देश का नाम? भारत या इंडिया? आखिर इंडिया के स्थान पर भारत को प्राथमिकता क्यों न मिले?
संविधान के अंग्रेजी संस्करण में स्पष्ट है कि इंडिया यानी भारत, राज्यों का संघ होगा। हिंदी प्रति में लिखा गया है, भारत अर्थात् इंडिया, राज्यों का संघ होगा। संविधान सभा में ‘भारत बनाम इंडिया’ पर जोरदार बहस चली थी। कई लोगों का कहना था कि ‘इंडिया’ शब्द में गुलामी की गंध है, लेकिन भारत के साथ-साथ इंडिया शब्द को भी अपना लिया गया। इसके पीछे शायद औपनिवेशिक शासन का अचेतन मनोवैज्ञानिक दबाव रहा हो। जिस इंडिया शब्द के समर्थन में इतनी हायतौबा मच रही, वह ग्रीक भाषा से आया है। ईसा पूर्व पांचवीं सदी में ग्रीक लोगों ने सिंधु नदी के लिए ‘इंडस’ और इस क्षेत्र के लोगों को ‘इंडी’या ‘इंडोई’ कहा। यूनानी विद्वान हेरोडोटस ने ‘इंडी’ शब्द का इसी रूप में प्रयोग किया है। यही ‘इंडी’ शब्द दूसरी-तीसरी सदी में लैटिन भाषा में ‘इंडिया’ बना। अभी तक इस शब्द का अर्थ भौगोलिक क्षेत्र न होकर यहां के निवासी थे। नौवीं सदी में यह अंग्रेजी और अन्य यूरोपीय भाषाओं में प्रचलित हुआ। धीरे-धीरे ‘इंडिया’ का प्रयोग भौगोलिक भूभाग के लिए भी होने लगा। इतिहासकार इयान जे. बैरो अपने लेख ‘फ्राम हिंदुस्तान टू इंडिया नेमिंग चेंज इन चेंजिंग नेम्स’ में लिखते हैं कि 18वीं शताब्दी से अंग्रेजों ने ‘इंडिया’ शब्द का प्रयोग करना शुरू कर दिया था। ‘इंडिया’ शब्द का प्रयोग दरअसल भारत को मनोवैज्ञानिक-सांस्कृतिक रूप से पराधीन बनाने का एक उपक्रम भी था। इस प्रकार अंग्रेजी औपनिवेशिक-साम्राज्यवादी शासन की देन ‘इंडिया’ शब्द में ब्रिटिश गुलामी की गंध छिपी हुई है। ‘इंडिया’ शब्द में ‘कुलीनता’ का भाव भी झलकता है, जो इस देश की आम जनता, किसान, मजदूर और अन्य निम्न वर्ग को समाहित करता हुआ नहीं दिखता। समाज भाषा विज्ञान की दृष्टि से भी इंडिया शब्द से इस देश की किसी सांस्कृतिक परंपरा, भावबोध या अर्थवत्ता का परिचय नहीं मिलता।
‘इंडिया’ के बरक्स ‘भारत’ अभिधान को देखें तो यह ज्यादा प्राचीन है। ‘भारत’ का मूल शब्द ‘भरत’ का उल्लेख कम से कम 3,500 वर्ष पहले ऋग्वेद में मिलता है। भौगोलिक भूभाग के रूप में ‘भारत’ या ‘भारतवर्ष’ ब्रह्मपुराण और विष्णुपुराण में मिल जाता है जिसे अधिकांश विद्वान ईसापूर्व छठी सदी का ग्रंथ मानते हैं। इसके अलावा वायु पुराण और महाभारत में इस क्षेत्र का नाम भारत या भारतवर्ष ही है। ‘भारत माता की जय’ स्वाधीनता आंदोलन का सर्वाधिक भावात्मक नारा तो था ही, हमारे ‘राष्ट्रगान’ में भी केवल ‘भारत’ शब्द ही है। किसी देश के नामकरण की सार्थकता उसकी अर्थवत्ता में भी होती है। ‘भारत’ शब्द संस्कृत के ‘भ्र’ धातु से आया है, जिसका अर्थ है उत्पन्न करना, वहन करना, निर्वाह करना। तदनुसार भारत का शाब्दिक अर्थ हुआ-जो निर्वाह, उत्पन्न या वहन करता है। इस रूप में ‘भारत’ शब्द अत्यंत अर्थवान है। भारत का एक और अर्थ है-ज्ञान की खोज में संलग्न। अर्थात अपने सांस्कृतिक बोध, मूल्यवत्ता और अर्थवत्ता के धरातल पर भी ‘भारत’ नाम अधिक सार्थक है। इसके अलावा यह अभिधान सर्वसमावेशी भी है, अपने में सभी वर्ग, पंथ और समुदाय को समाहित करता है।
यह अनायास नहीं कि संविधान की आठवीं अनुसूची में उल्लिखित अधिकांश भाषाओं-पूर्व की असमिया एवं मणिपुरी से लेकर पश्चिम की गुजराती और मराठी तथा दक्षिण की तमिल, तेलुगु, कन्नड़ या मलयालम में इस देश को भारत, भारोत, भारतनाडु, भारता, भारतदेशम, भारतम आदि कहा जाता है, जो ‘भारत’ शब्द के ही पर्याय हैं। सामाजिक हो या सांस्कृतिक, मनोवैज्ञानिक हो या भाषा-विज्ञान, हर कसौटी पर ‘भारत’ नाम में ही इस देश का आत्मा विराजता है। संसार का कोई भी स्वाभिमानी देश विदेशी गुलामी के चिह्न और नाम स्वीकार नहीं करता। सीलोन, गोल्ड कोस्ट और रोडेशिया जैसे देश विदेशी नाम को त्याग कर अपने पूर्वकालिक नाम श्रीलंका, घाना और जिंबाब्वे अपना चुके हैं तो महान प्राचीन सभ्यता-संस्कृति वाला हमारा देश ‘भारत’ क्यों नहीं अपना सकता? ध्यान रहे हमारा एक और पड़ोसी देश बर्मा भी म्यांमार हो चुका है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पंच प्रण में गुलामी की मानसिकता को खत्म करना और भारत की विरासत पर गर्व करना भी है। नेहरू की प्रतिज्ञा को पूरा करने का आज सही समय है। ‘भारत’ हर दृष्टि से श्रेयस्कर नाम है। इसके विरोध का कोई औचित्य नहीं।
Date:11-09-23
कूटनीतिक कामयाबीसंपादकीय
तमाम बाधाओं के बावजूद दो दिवसीय जी20 शिखर बैठक के पहले दिन नेताओं की घोषणा में सहमति बन गई जिसमें मौजूदा भू-राजनीतिक परिदृश्य को लेकर स्पष्ट संकेत नजर आया और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के वैश्विक नेता के कद को और मजबूती मिली। निश्चित तौर पर यूक्रेन युद्ध पर बहुप्रतीक्षित वक्तव्य में बाली घोषणा के निंदा के स्वर यहां काफी हद तक शिथिल हो गए। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने कहा कि यह बदले हुए भू-राजनीतिक हालात का नतीजा है। बाली घोषणा में संयुक्त राष्ट्र के बहुसंख्यक मत की भाषा को दोहराते हुए ‘रूस द्वारा यूक्रेन पर हमले की कड़ी आलोचना’ की गई थी और मांग की गई थी कि ‘वह यूक्रेन से बिना शर्त और पूरी तरह बाहर निकल जाए।’ दिल्ली घोषणा में एक स्वतंत्र राज्य के विरुद्ध ‘क्षेत्र के अधिग्रहण’ में बल प्रयोग से परहेज करने को लेकर परोक्षा भाषा का प्रयोग किया गया।
हालांकि कौशलपूर्ण कूटनीतिक जीत के लिए भारत की सराहना की जानी चाहिए लेकिन इसका श्रेय जी7 को भी जाता है। अमेरिका के नेतृत्व में दुनिया के सात सबसे अमीर लोकतांत्रिक देश ऐसा राजनीतिक निर्णय लेते नजर आ रहे हैं जिससे शिखर बैठक की सफलता सुनिश्चित हो। इसके लिए उन्होंने यूक्रेन पर एक पुनराकलित समझौता वक्तव्य पर सहमति जताई। यह बात तो भारत के प्रति अमेरिका की पहल से ही स्पष्ट थी। राजकीय यात्रा के महज कुछ महीने बाद द्विपक्षीय बैठक और सैन्य तथा आर्टिफिशल इंटेलिजेंस के क्षेत्र में सहयोग को लेकर एक और संयुक्त वक्तव्य जारी करके अमेरिका ने इस बात के मजबूत संकेत दिए हैं कि पश्चिम भारत को लेकर अत्यधिक सकारात्मक है और मोदी भी उस लक्ष्य को हासिल करने के लिए अतिरिक्त प्रयास करने को तैयार हैं। दिल्ली घोषणा में धार्मिक सहिष्णुता को लेकर एक असाधारण पैराग्राफ शामिल किया गया है जो शायद इस विषय पर जी7 की किसी भी तरह की शंकाओं को संतुलित करने के लिए डाला गया हो।
दिल्ली घोषणा ने भारत और मोदी दोनों की इज्जत आफजाई की है। उदाहरण के लिए अफ्रीकी यूनियन को स्थायी सदस्यता देने की भारत की पहल का मान रखा गया। सन 1999 में शुरुआत के बाद पहली बार इस समूह की सदस्य संख्या बढ़ाई गई है। यूनियन के प्रमुख को पदासीन करने का मोदी का आमंत्रण भारत की उस महत्त्वाकांक्षा के पूरा होने की ओर संकेत करता है जिसके तहत वह दुनिया के विकासशील देशों खासकर प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर अफ्रीका का नेतृत्व करना चाहता है। सवाल यह है कि यह घटनाक्रम चीन और उसके राष्ट्रपति शी चिनफिंग के लिए क्या संदेश लिए हुए है जो इस आयोजन में शामिल नहीं हुए। शी का इस आयोजन से दूर रहने का निर्णय अस्वाभाविक था क्योंकि इससे पहले वह जी20 के हर आयोजन में शामिल हुए हैं। मोदी की पहल पर अफ्रीकी यूनियन को शामिल किया जाना भी चीन को रास नहीं आया होगा क्योंकि वह लंबे समय से अफ्रीका को अपने विशिष्ट प्रभाव वाला क्षेत्र मानता रहा है। इसके साथ ही दिल्ली घोषणा में विकासशील देशों को कर्ज राहत के मामले में साझा जिम्मेदारी के रूप में बहुमत की राय रखने में कामयाब रहा जबकि चीन का जोर इस बात पर रहा है कि बहुपक्षीय कर्जदाता भी कटौती करें।
परंतु भू-राजनीति के नजरिये से देखें तो यूक्रेन के बारे में जो असाधारण पैराग्राफ शामिल किया गया है उससे यही संकेत निकलता है कि समूह के सामने मौजूद इस सबसे अहम विषय पर चीन के हित (और रूस के भी) बरकरार रहे हैं। यह बात दिल्ली घोषणापत्र के सामने आने के बाद यूक्रेन की प्रतिक्रिया से भी जाहिर हुई जो उसने सार्वजनिक की। यूक्रेन के विदेश मंत्रालय ने एक वक्तव्य जारी करके कहा कि जी20 की संयुक्त घोषणा में ‘ऐसा कुछ नहीं है जिस पर गर्व किया जाए।’ भूराजनीतिक अनिवार्यताएं यही संकेत देती हैं कि कम से कम फिलहाल के लिए तो यूक्रेन अकेला पड़ गया है।
Date:11-09-23
सहमति के स्वरसंपादकीय
उम्मीद के मुताबिक जी20 के शिखर सम्मेलन में जिन बातों पर सहमति बनी है, उन्हें विश्व को बेहतर बनाने के प्रयासों का एक अहम हिस्सा कहा जा सकता है। इस ऐतिहासिक आयोजन के दौरान जी20 के मूल मकसद और इस समूह के सदस्य देशों के बीच अनेक मुद्दों पर बनी सहमति एक बड़ी उपलब्धि है। इसमें भारत की भूमिका जिस रूप में सामने आई है, उसे दुनिया भर में इसकी मजबूत उभरती छवि के तौर पर भी देखा जा सकता है। यह भारत के प्रधानमंत्री और अमेरिकी राष्ट्रपति के बीच हुई बातचीत में कई मुद्दों पर साथ देने के मामले में भी सामने आया। खासकर ‘नई दिल्ली घोषणापत्र’ पर सभी सदस्य देशों के बीच बनी सहमति में एक नई विश्व-दृष्टि की झलक मिलती है। खुद प्रधानमंत्री ने इस घोषणापत्र के बारे में जानकारी देते हुए कहा कि इसके साथ ही एक इतिहास रचा गया है; हम सर्वसम्मति और मनोभाव के साथ एकजुट होकर बेहतर, अधिक समृद्ध और समन्वित भविष्य के लिए सहयोग के साथ काम करने का संकल्प लेते हैं। निश्चित रूप से इस शिखर सम्मेलन में सद्भावना और औपचारिक प्रक्रियाओं के बीच यह एक महत्त्वपूर्ण घटनाक्रम है।
दरअसल, नई दिल्ली घोषणापत्र जिन बिंदुओं पर केंद्रित है, उन्हें विश्व भर में समावेशी विकास और लोकतंत्र को मजबूत करने के लिहाज से अहम माना जा रहा है। इसके मुख्य केंद्रीय मुद्दों में मजबूत, दीर्घकालिक, संतुलित और समावेशी विकास के साथ-साथ सतत विकास लक्ष्यों पर आगे बढ़ने में तेजी, दीर्घकालिक भविष्य के लिए हरित विकास समझौता, इक्कीसवीं सदी के लिए बहुपक्षीय संस्थाओं और बहुपक्षवाद को पुनर्जीवित करना आदि शामिल हैं। जाहिर है, आर्थिक सहयोग पर आधारित विकास के लिए काम कर रहे जी20 का नई दिल्ली घोषणापत्र भी इसके घोषित लक्ष्यों के अनुरूप है। इस आयोजन में यह भी उम्मीद थी कि सदस्य देशों के बीच रूस-यूक्रेन युद्ध को लेकर भी एक स्पष्ट राय सामने आएगी। इस मसले पर समूह के बाली में हुए पिछले शिखर सम्मेलन के रुख को ही दोहराया गया कि सभी देशों को किसी भी अन्य देश की क्षेत्रीय अखंडता और संप्रभुता या राजनीतिक स्वतंत्रता के खिलाफ क्षेत्रीय अधिग्रहण की धमकी या बल के उपयोग से बचना चाहिए। साथ ही परमाणु हथियारों का उपयोग या इसकी धमकी अस्वीकार्य है। इसके अलावा, सभी नेताओं ने आतंकवाद को अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा के लिए सबसे गंभीर खतरों में से एक बताया।
जाहिर है, मौजूदा विश्व में गंभीर चुनौतियों को संबोधित करते हुए सम्मेलन में फिर से व्यापक महत्त्व के मुद्दों पर साथ काम करने को लेकर सहमति बनी है। जी20 सम्मेलन से इतर भारत के लिए यह मौका कूटनीतिक तौर पर एक अतिरिक्त अवसर था, जिसमें अमेरिकी राष्ट्रपति और हमारे प्रधानमंत्री के बीच सीधी बातचीत को एक अहम पक्ष के रूप में दर्ज किया जा सकता है। इसमें दोनों देशों ने विश्व कल्याण, रक्षा साझेदारी को मजबूत करने समेत कई मुद्दों पर साथ काम करने का संकल्प लिया। अमेरिका के अलावा भारत ने कई अन्य देशों के साथ भी द्विपक्षीय वार्ता की, जिसमें आने वाले समय में दुनिया भर में आर्थिक, स्वास्थ्य, सामरिक और अन्य क्षेत्रों में उभर रही चुनौतियों का सामना करने के लिए नए आधुनिक तकनीकी संसाधनों से लेकर कूटनीतिक स्तर पर नई रूपरेखा के लिए सहमति बनी। कहा जा सकता है कि जी20 अपने घोषित उद्देश्यों को अब वैश्विक परिदृश्य में नया स्वरूप दे रहा है और भारत इसमें अब केंद्रीय भूमिका में है।
Date:11-09-23
घोषणा पत्र पर सर्वसम्मतिसंपादकीय
जी 20 समूह के कूटनीतिक मंच पर शनिवार को भारत ने ऐतिहासिक जीत हासिल की जब उसने जी-20 शिखर सम्मेलन में गतिरोध को समाप्त करते हुए समूह के सभी देशों को साझा घोषणा पत्र जारी करने पर सहमत कर लिया। ऐतिहासिक उपलब्धि इसलिए कि घोषणा पत्र को लेकर विवाद की बातें सामने आ रही थीं। यूक्रेन युद्ध के कारण माना जा रहा था कि साझा घोषणा पत्र तैयार किया जाना शायद संभव न हो, लेकिन नई दिल्ली घोषणा पत्र के सभी 83 पैराग्राफ पर सभी सदस्य देशों ने जिस तरह सहमति ताई, उसे भारत की बड़ी कूटनीतिक सफलता कहा जाएगा। बेशक, इसमें यूक्रेन युद्धका जिक्र नहीं है मगर वहां समग्र व स्थायी शांति स्थापना की कामना जरूर है। पहले सत्र की अध्यक्षता करते हुए पीएम नरेन्द्र मोदी ने अफ्रीकी यूनियन को जी-20 का नया सदस्य बनाने का प्रस्ताव किया जिसे सर्वसम्मति से स्वीकार किया गया। पीएम मोदी ने दिसम्बर, 2022 में बाली शिखर सम्मेलन में की यूनियन को समूहकी सदस्यता दिलाने का वादा किया था। अफ्रीकी यूनियन में 55 देश हैं, और इसके जी-20 में आने से समूह मजबूत होगा। भारत की अध्यक्षता के दौर में जी-20 में इस विस्तार को सार्थक और सकारात्मक पहल के रूप में याद किया जाएगा। अफ्रीकी यूनियन के देशों में इस पहलकदमी से भारत की साख बढ़ेगी। शिखर सम्मेलन भारत को चंद्रमा पर सफल चंद्रयान-3 मिशन पर बधाई दी गई। बड़ी बात यह कि शांति के लिए सभी वर्गों की प्रतिबद्धता को महत्त्वपूर्ण करार देते हुए आतंकवाद के सभी रूपों की निंदा की गई। शिखर सम्मेलन में भारत की पहलकदमियों और सभी देशों को साथ लेकर बढ़ने की भावना ने जी-20 शिखर सम्मेलन का हासिल बढ़ाया है। न केवल जी-20 समूह की सार्थकता को साबित किया है, बल्कि भारत के कुशल कूटनय का भी परिचय दिया। तस्दीक की है कि भारत सभी देशों खासकर बनिस्बत कमजोर देशों को भी साथ लेकर चलने की कुव्वत रखता है। जी-20 शिखर सम्मेलन का साझा घोषणा पत्र अब तक सर्वाधिक व्यापक घोषणा पत्र कहा जा सकता है क्योंकि इसमें महिला सशक्तिकरण, लैंगिक समानता के साथ पर्यावरणीय मुद्दों के प्रति गंभीरता दिखाई देती है। स्वच्छ जैव ईंधन के उपयोग को बढ़ावा देने की दिशा में तमाम सदस्य देशों को लामबंद करने की मंशा इस आयोजन में झलकी है। इस सफल आयोजन ने वैश्विक पटल पर एक बार फिर भारत की क्षमता की तस्दीक की है।
Date:11-09-23
भारत बनाम इंडियाविनीत नारायण
अब इंडिया हटाकर सिर्फ भारत नाम रखने के मोदी जी के फैसले को एक क्रांतिकारी कदम माना जा रहा है। ऐसे ही जैसे जी-20 के सम्मेलन को भारतीय सांस्कृतिक रंग देकर प्रधानमंत्री मोदी ने अपने इस नये इरादे का संकेत दे दिया है। उन्होंने जी-20 सम्मेलन में भारत की संस्कृति को ही आगे बढ़ाया, इंडिया का तो नाम तक कहीं आने नहीं दिया, तो कई कानूनविद् की भी टेढ़ी हुई। उनका कहना था कि बिना विधायिका की स्वीकृति के यह फैसला संविधान के विरुद्ध है। बीजेपी के राजनैतिक प्रतिद्वंद्वी इसे विपक्ष के ताजा गठबंधन ‘आई एन डी आई ए’ के खौफ से लिया गया कदम बताते हैं। वे ऐसे तमाम वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल कर रहे हैं, जिनमें मोदी जी पिछले चुनावों में जनता से बार-बार अपील करते हैं ‘वोट फोर इंडिया’।
विपक्ष का दावा है उसकी एकजुटता से बीजेपी घबरा गई है। इसलिए उसकी एकजुटता से डर कर यह नया शगूफा छोड़ा गया है। वैसे चुनाव अभी दूर हैं पर इस सबसे देश का माहौल चुनावी बन चुका है। इसलिए नरेन्द्र मोदी के इस मनोभाव के प्रगट होते ही देश भर में बहस शुरू हो गई कि आज तक ‘वोट फॉर इंडिया’, ‘मेक इन इंडिया’, ‘डिजिटल इंडिया’, ‘स्टार्ट अप इंडिया’ जैसी दर्जनों योजनाओं की शुरू करने वाले मोदी जी को अचानक यह ख्याल कैसे आया कि अब हम ‘इंडिया’ की जगह ‘भारत’ के नाम से जाने जाएंगे।
इसके साथ ही यह बहस भी शुरू हो गई है। कि रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया, स्टेट बैंक ऑफ इंडिया यूनियन बैंक ऑफ इंडिया, स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया, आईआईटी, आईआईएम, आईएमए आईएएस, आईपीएस, आईआरएस, आईएफएस, इंडियन नेवी, इंडियन एयरफोर्स, एअर इंडिया जैसी संस्थाओं को क्या अब अपने नाम बदलने पड़ेंगे? क्या फिर से नोटबंदी होगी और नये नाम से नोट छापे जाएंगे? फिर इंडियन ओशियन के नाम का क्या होगा? वैसे दुनिया भारत को इंडिया के नाम से ही जानती है 9 वर्षों में 74 से ज्यादा देशों की यात्रा कर चुके प्रधानमंत्री मोदी ने भी इंडिया का नाम ही आज तक प्रचारित किया है। इसलिए इंडिया अब सारी दुनिया में भारत का ब्रांड नेम बन चुका है। ऐसे में भारत नाम कैसे दुनिया के लोगों की जुबान पर चढ़ेगा? इस संदर्भ में सोशल मीडिया पर मनीष सिंह ने एक रोचक पोस्ट डाली है। वे पूछते है कि, कायदे आजम मुहम्मद अली जिन्ना को, भारत को इंडिया कहे जाने से क्या आपत्ति थी? मनीष की पोस्ट के अनुसार ऐसा दरअसल, दो कारण से हुआ; एक तो इंडिया का नाम, इतिहास में हमें ‘इंडस रिवर’ का देश होने की वजह से मिला था। इंडस जब पाकिस्तान में रह गई थी, तो इधर बिना इंडस, काहे का इंडिया? क्या आपको याद है, एक बार सुनील दत्त में अतिकवाद के दौर में पंजाब का नाम, खालिस्तान रखने का सुझाव दिया था।
उनका भी यही लॉजिक था कि पंजाब का मतलब, 5 नदियों का प्रदेश था। अब 60% पंजाब तो पाकिस्तान हो गया। भारतीय पंजाब में 5 नदियां तो थीं नहीं। उसको भी तोड़कर हरियाणा और हिमाचल बना दिया गया तो बचे इलाके को पंजाब कहने का कोई तुक नहीं अगर लोगों को ‘पवित्र स्थान’ यानी ‘खालिस्तान’ कहना है, तो कहने दो। बहरहाल, बात जिन्ना की हो रही थी। वे इस बात से वाकिफ थे, कि इंडिया को इंडिया कहे जाने पर पाकिस्तान को स्थायी राजनीतिक शर्मिंदगी भी उठानी पड़ती। इसका लॉजिक यह था कि डूरंड से तमिलनाडु तक सारा इलाका इंडिया कहलाता था। अब उसके दो टुकड़े हो रहे थे। अगर भारत अपने को इंडिया कहता है यानी पुराने देश का दर्जा, तो असली सक्सेसर स्टेट की पहचान तो इंडिया को ही मिलेगी। पाकिस्तान, इतिहास में मूल देश से टूटने और अलग होने वाला हिस्सा माना जाएगा तो उनकी चाहत यह थी कि इंडिया टूटा, और दो देश बने अगर एक खुद को पाकिस्तान कहता है, तो दूसरा खुद को भारत कहे।
मगर जिन्ना चल बसे। उनकी ख्वाहिश नेहरू भला काहे पूरी करते । 18 सितम्बर, 1949 को भारत के संविधान ने खुद का नामकरण किया, तो कहा ‘इंडिया, दैट इज भारत’। इस तरह हमने दोनों नाम क्लेम कर लिए। इस पर पाकिस्तान ने नेहरू को कभी दिल से माफ नहीं किया। आज भी, अगर आप पाकिस्तानी समाचार देखते हों तो याद करेंगे कि वे अपनी बोलचाल में इंडियन फौज या इंडियन पीएम या इंडिया नहीं कहते। वे हमेशा भारतीय फौज भारतीय पीएम या भारत ही कहते हैं क्योंकि दिल से आपको इंडिया स्वीकारते ही नहीं और भारत नाम खुशी से मानने को तैयार हैं और यही कारण है कि खबर आई, कि अगर भारत यूएन में अपना नाम इंडिया छोड़ने की सूचना देता है, तो पाकिस्तान का फटाफट बयान आया कि इस नाम को वे क्लेम करेंगे। फिर वो लिखेंगे पाकिस्तान, दैट इज इंडिया और सच भी यही है कि इंडस रिवर की वजह से इंडिया का नाम, हमसे ज्यादा, उन्हें ही सूट करेगा। पर पंडित नेहरू ने उनसे यह मौका छीन लिया था जो अब पाकिस्तानी को मिल सकता है।’
आगे आगे देखें होता है क्या? वैसे भारत नाम पर देश की भावना भी दो हिस्सों में बंटी है। उत्तर भारत अपने को भारत से जुड़ा महसूस करता है जबकि दक्षिण भारत इंडिया नाम से। ऐसे में इस फैसले के क्या राजनीतिक, आर्थिक और भावनात्मक परिणाम होंगे, वो तो समय ही बताएगा। फिलहाल नरेन्द्र मोदी ने मीडिया और राजनीतिक लोगों को विवाद और बहस का एक नया विषय थमा दिया है।
Date:11-09-23
जी-20 का संदेशसंपादकीय
भारत में आयोजित जी-20 के 18वें शिखर सम्मेलन की जितनी प्रशंसा की जाए, कम होगी। जब दुनिया में दो बड़े धु्रवों के बीच प्रत्यक्ष-परोक्ष युद्ध चल रहा हो, तब किसी वैश्विक मंच पर पूरी दुनिया की बेहतरी के लिए एक घोषणापत्र का जारी होना सुखद संकेत है। भारत को तन-मन-धन से अपने अथक प्रयासों के चलते ही यह कामयाबी मिली है। भारत की गुटनिरपेक्षता या स्वतंत्र चेतना ने भी शिखर सम्मेलन को सफल बनाया है। वैश्विक कूटनीति के मंच पर एक उत्तम आयोजक वही होता, जो मैत्री प्रयासों में अपनी ओर से कुछ जोड़कर दुनिया को रहने की बेहतर जगह बनाने की कोशिश को आगे बढ़ाता है। रविवार को जी-20 के आयोजन के समापन की घोषणा हो गई। ब्राजील में जब जी-20 का शिखर आयोजन होगा, तब भारत के आयोजन को याद किया जाएगा, सही मायने में तुलना होगी और दुनिया महसूस करेगी कि भारत के आयोजन में क्या खास था।
आर्थिक सहयोग, पर्यावरण, आतंकवाद के विरुद्ध संघर्ष, गरीब देशों को आर्थिक मदद और जमीनी स्तर पर सहयोग के अनेक रास्ते नई दिल्ली में खुले हैं या प्रशस्त हुए हैं। भ्रष्टाचार के विरुद्ध जो घोषणाएं हुई हैं, उनसे दुनिया में बड़ा परिवर्तन संभव है। गरीब और विकासशील देशों में सुख-शांति के लिए भ्रष्ट आचरण का अंत जरूरी है। भ्रष्टाचार के खिलाफ वैश्विक सहयोग और सूचना तंत्र को मजबूत करने पर जरूरी सहमति बनी है। एक बड़ा कदम जी-20 के देशों में बेरोजगारी दूर करने के लिए उठाया गया है। अगर इन देशों में बेरोजगारों का डाटा बेस पुख्ता तौर पर बन गया, तो कायाकल्प हो जाएगा। दुनिया के सकल घरेलू उत्पाद का 85 प्रतिशत इन्हीं देशों में मौजूद है और अब तो यह प्रतिशत और बढ़ गया है, पूरा अफ्रीका जी-20 में शामिल हो गया है। एक पृथ्वी, एक परिवार और एक भविष्य का नारा बुलंद करने वाले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रविवार को संयुक्त राष्ट्र सहित तमाम वैश्विक निकायों में सुधारों पर नए सिरे से जोर दिया है। प्रधानमंत्री ने कहा है कि यह प्रकृति का नियम है, जो लोग समय के साथ नहीं बदलते, वे प्रासंगिकता खो देते हैं। कोई दोराय नहीं कि इस आयोजन से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्य के रूप में भारत की मांग मजबूत हुई है।
इक्का-दुक्का देश ही अब भारत की राह में रोड़ा बन रहे हैं, उन्हें भी देर-सबेर हकीकत से रूबरू होना पड़ेगा। जी-20 के दौरान भारत की अध्यक्षता में यूरोप से भारत तक कॉरिडोर बनाने का जो फैसला हुआ है, वह किसी क्रांति से कम नहीं है। महत्वाकांक्षी भारत-मध्य पूर्व-यूरोप आर्थिक गलियारे (आईएमईसी) की घोषणा का स्वागत करते हुए इजरायली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने तो यहां तक कहा है कि यह हमारे इतिहास में सबसे बड़ी सहयोग परियोजना है। यह दुनिया का चेहरा बदल देगी। कुल मिलाकर, शिल्प, संस्कृति और स्वाद पर आधारित भारत का यह शिखर आयोजन दुनिया को मिलन-सद्भाव का मुखर संदेश भी है। प्रधानमंत्री ने शिखर सम्मेलन के दौरान एक प्रार्थना भी की है, स्वस्ति अस्तु विश्वस्य अर्थात संपूर्ण ब्रह्मांड में सौभाग्य हो। वास्तव में, भक्त प्रह्लाद ने नरसिंह भगवान से यह प्रार्थना की थी और भगवान से यह भी अनुरोध किया था कि भगवान उनके ईष्र्यरलु पिता के प्रति भी दयालु बने रहें। विश्व कल्याण की इसी भावना से भारत ओत-प्रोत रहा है और जी-20 का 18वां शिखर सम्मेलन उसी दिशा में स्वर्णिम पड़ाव के रूप में याद किया जाएगा।
Date:11-09-23
सम्मेलन की शिखर उपलब्धियांहरजिंदर, वरिष्ठ पत्रकार
शुरुआत ही सफलता के साथ हुई। जी-20 शिखर सम्मेलन के पहले ही सत्र में इसका कुनबा बढ़ गया। अफ्रीकी संघ को स्थायी सदस्य बनाए जाने के साथ ही अब अगली बार यह जी-21 कहलाएगा। अफ्रीकी संघ के शामिल होने का अर्थ यह है कि जी-20 में अब एक ऐसा संगठन जुड़ गया है, जिसके सदस्य 55 देश हैं। यूरोपीय संघ पहले ही जी-20 का हिस्सा है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब अध्यक्ष पद से इसकी घोषणा की और अफ्रीकी संघ के अध्यक्ष अजाली असौमानी को गले लगाया, तो असौमानी की प्रसन्नता देखने लायक थी। वह कोमोरोस नाम के एक छोटे से अफ्रीकी देश के राष्ट्रपति हैं। हिंद महासागर के एकदम आखिरी छोर पर बसा कोमोरोस द्वीप इतना छोटा देश है कि दुनिया के नक्शे पर उसे खोजना भी मुश्किल काम है। जी-20 के साथ जुड़े कार्यक्रमों में जिन विश्व नेताओं के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने द्विपक्षीय वार्ता की है, उनमें असौमानी भी एक हैं।
इससे हम यह भी समझ सकते हैं कि भारत की विश्व दृष्टि में अफ्रीका की अहमियत किस कदर बढ़ रही है। यहां एक और बात का जिक्र जरूरी है कि भारत ने इस सम्मेलन में जिन गैर-सदस्य देशों को अतिथि का दर्जा दिया, उनमें नाईजीरिया भी है। यह तो खैर पूरी दुनिया ही स्वीकार कर रही है कि अफ्रीका को नजरंदाज करके विश्व अर्थव्यवस्था के भविष्य के बारे में नहीं सोचा जा सकता। जब अफ्रीकी संघ को शामिल किए जाने की खबर आ रही थी, तब किसी ने भी सोचा नहीं था कि एक और बड़ी सफलता इंतजार कर रही है। पिछले साल जब जी-20 का शिखर सम्मेलन बाली में हुआ, तब उसके घोषणापत्र को अंतिम रूप देने में इंडोनेशिया को काफी पापड़ बेलने पड़े थे। यूक्रेन से टकराव पर रूस की निंदा करने का मामला इस कदर फंस गया था कि अंतिम समय तक यही डर था कि घोषणापत्र जारी भी हो पाएगा या नहीं।
यही आशंकाएं दिल्ली घोषणापत्र को लेकर भी थीं। रूस और चीन कह रहे थे कि जी-20 एक आर्थिक मंच है, यह भौगोलिक राजनीति का मंच नहीं है, इसलिए इसमें यूक्रेन युद्ध का जिक्र होना ही नहीं चाहिए, जबकि पश्चिमी देशों का कहना था कि इस युद्ध का जिक्र ही नहीं, बल्कि इसके लिए रूस की निंदा भी जरूरी है। एक राय यह भी थी कि जी-20 भले ही आर्थिक मंच है, लेकिन युद्ध आर्थिक विकास में सबसे बड़ी बाधा बनता है, इसलिए इसका जिक्र जरूरी है। फिर कुछ चेतावनियां भी थीं कि अगर उनके पक्ष को इसमें जगह नहीं मिली, तो वे सहमति नहीं देंगे।
भारत को एक साथ कई तल्खियों को साधना था और सबके हितों का भी ध्यान रखना था। एक ऐसा दस्तावेज तैयार करना था, जो किसी को चुभे भी न और उसमें आने से कोई बात बचे भी न। परदे के पीछे की तमाम मशक्कत के बाद भारतीय राजनयिक ऐसे घोषणापत्र को तैयार करने में कामयाब रहे, जिसमें सभी की पूरी सहमति थी। बेशक कुछ आलोचनाएं भी हो रही हैं। कहा जा रहा है कि नई दिल्ली घोषणापत्र में वह तेवर नहीं है, जो बाली घोषणापत्र में था। यह आलोचना भी है कि सबको खुश करने के चक्कर में इसे चूं-चूं का मुरब्बा बना दिया गया है, मगर ऐसा घोषणापत्र संभव भी नहीं था, जिसमें तलवारें तनी दिखाई दें। अंतरराष्ट्रीय मंच सहमतियों को एकजुट करके आगे बढ़ने के लिए होते हैं। यहां असहमतियों को तूल देने का अर्थ होता है आगे बढ़ने का रास्ता रोकना। पहले ही दिन घोषणापत्र को अंतिम रूप दे दिए जाने का अर्थ यह भी था कि आगे के सत्रों में पर्यावरण जैसे मुद्दों पर बिना तनाव बात हो सकी।
इस तरह के सम्मेलनों में अपनाए गए घोषणापत्र आते हैं और चले जाते हैं। कुछ तात्कालिक चर्चा के बाद वे इतिहास का विषय बन जाते हैं। शायद यही हश्र दिल्ली घोषणापत्र का भी होगा, लेकिन यह बात हमेशा याद की जाएगी कि भारत के राजनय ने तमाम तनावों के बीच भी सहमति का खाका खींचने में बड़ी आसानी से कामयाबी हासिल कर ली।
यह भी मुमकिन है कि दिल्ली में हुए जी-20 के शिखर सम्मलेन को आगे जाकर उतना न याद किया जाए, जितना कि उसी दौरान हुए कुछ दूसरे समझौतों के लिए याद किया जाएगा। खैर, शनिवार को भारत से यूरोप तक पश्चिम एशिया होकर जाने वाले जिस आर्थिक गलियारे को घोषणा हुई, वह परियोजना बहुत महत्वाकांक्षी है। इस कॉरिडोर को बनने में लंबा वक्त लग सकता है, लेकिन यह इस रास्ते में पड़ने वाले देशों को बहुत बड़ी उम्मीद बंधाने वाली परियोजना है।
एक दशक पहले चीन ने इसी तरह की एक योजना बनाई थी, जिसे वन बेल्ट, वन रोड का नाम दिया गया था। चीन उस मार्ग को आधुनिक सड़क का रूप देना चाहता है, जिस मार्ग से कभी रेशम के कपड़े यूरोप और पूरी दुनिया में पहंुचते थे। शुरू में इस योजना को लेकर जो उत्साह था, वह पिछले कुछ समय में ठंडा पड़ता हुआ दिखाई दे रहा है। यह परियोजना चीन से मिलने वाले आसान आर्थिक कर्ज पर आधारित थी, लेकिन पिछले कुछ समय में चीन से आर्थिक कर्ज लेने वाले देशों का जिस तरह से दीवाला पिटा है, उसके बाद बहुत से देशों की इसमें दिलचस्पी कम हो गई है।
जी-20 सम्मेलन के दौरान जिस गलियारे की घोषणा हुई है, उसकी तह में चीन की वन बेल्ट, वन रोड परियोजना के सबक भी हैं। दुनिया के बहुत से देश उस प्राचीन मार्ग को आधुनिक रूप देना चाहते हैं, जिससे कभी भारत के मसाले यूरोप और पूरी दुनिया तक पहंुचते थे। वैसे, इसे किसी एक देश से मिली आर्थिक मदद या कर्ज के आधार पर तैयार नहीं किया जाएगा। अभी तक जो सूचना है, उसके हिसाब से इसके रास्ते में पड़ने वाले देश आर्थिक सहयोग करेंगे। हालांकि, अमेरिका इसके रास्ते में नहीं है, मगर अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने जिस उत्साह से भाग लिया, वह बताता है कि अमेरिका भी इसमें अपना हित देख रहा है।
दिल्ली में जिस तरह का मजमा जुटा वैसे अंतरराष्ट्रीय सम्मेलनों की सफलता अक्सर उनके सुचारू रूप से संपन्न हो जाने से ही आंकी जाती है। ज्यादातर वे अपनी भव्यता और तस्वीरों के लिए याद किए जाते हैं, लेकिन इस जी-20 सम्मेलन को उसकी कुछ ठोस उपलब्धियों के लिए भी याद किया जाएगा। कुछ वे उपलब्धियां, जो सम्मेलन स्थल पर मिलीं और कुछ वे, जो इस दौरान हुई दूसरी बैठकों में मिलीं।
Date:11-09-23
महिलाओं को सशक्त बनाकर ही हासिल होगी सही संपन्नताअन्ना राय, वरिष्ठ आर्थिक सलाहकार और साथ में शैफालिका पांडा
आज के दौर में अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भूमिका सामाजिक न्याय के दायरे से कहीं अधिक व्यापक हो चुकी है। यह अब ऐसी आर्थिक अनिवार्यता बन चुकी है कि कोई भी राष्ट्र इसे नजरंदाज नहीं कर सकता। ऐसे शोधों की संख्या लगातार बढ़ रही है, जो बताते हैं कि कार्यस्थल पर लैंगिक विविधता के क्या लाभ हैं? इनसे यह भी पता चलता है कि यह रचनात्मकता को प्रोत्साहित करता है, उत्पादकता बढ़ाता है और उन्नति लाता है। द इकोनॉमिस्ट ने मैकिन्जे के एक शोध द पावर ऑफ पैरिटी के हवाले से बताया है कि यदि पुरुषों के बराबर महिलाएं भी कार्यबल में भाग लेती हैं, तो राष्ट्र अपने सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में पांच से लेकर 20 फीसदी तक इजाफा कर सकता है।
महिलाओं की सफलता और आर्थिक विकास में उनके योगदान का अकाट्य प्रमाण भारत में स्वयं सहायता समूहों की सफलता है। इन समूहों से ही माण देशी महिला सहकारी बैंक और स्व-रोजगार महिला संघ जैसी उपलब्धियां हमारे खाते में आई हैं। ग्रामीण महिला उद्यमियों के लिए छोटे-छोटे ऋण देने वाले इन प्रयासों ने बताया है कि महिला नेतृत्व वाले उद्यमों में परिवर्तनकारी क्षमता होती है। सवाल है, आखिर किस तरह हम सभी महिलाओं को पुरुषों के साथ आगे बढ़ने में सक्षम बना सकते हैं? जाहिर है, इसका हल बहुआयामी है, जिसमें कौशल, शिक्षा, पूंजी की उपलब्धता, नेटवर्क और मजबूत मेंटोरशिप स्ट्रैटिजी, यानी परामर्श की व्यवस्था समान रूप से महिलाओं के लिए उपलब्ध करानी होगी। हम व्यापक सामाजिक व आर्थिक विकास को आगे बढ़ाते हुए और बहुआयामी परामर्श ढांचा के माध्यम से महिलाओं की अनभिज्ञ क्षमता को उजागर कर सकते हैं।
विश्व स्तर पर महिला उद्यमियों के लिए मेंटोरशिप एक महत्वपूर्ण रणनीति के रूप में उभरी है, जिसमें उनकी विशिष्ट चुनौतियों और जरूरतों का ध्यान रखा जाता है। ‘वीमेन हू टेक’; ऐसी ही एक संस्था है, जो तकनीकी दुनिया में लैंगिक अंतर पाटने पर काम करती है। इसने अब तक 8,000 से अधिक स्टार्टअप को 20 करोड़ अमेरिकी डॉलर पूंजी जुटाने में मदद की है। ‘चेरी ब्लेयर फाउंडेशन’ तो भौगोलिक सीमाओं से भी परे जा चुका है, जो 6,000 से अधिक महिलाओं को व्यावसायिक कौशल बढ़ाने में मदद दे रहा है। ‘वी-कनेक्ट इंटरनेशनल’ हजारों व्यवसायों के लिए वैश्विक बाजार खोलता है, तो ‘टोरी बर्च फाउंडेशन’ के फेलोशिप कार्यक्रम के 27 फीसदी विजेता अपनी बिक्री 10 लाख डॉलर से ज्यादा करने लगे हैं। ये सब ऐसी सोच बनाने में भी मददगार हैं, जिसने लैंगिक अंतर को पाट दिया है और नवाचार, नेतृत्व व सशक्तीकरण को प्रोत्साहित किया है। जिस तरह से तमाम देश भू-राजनीतिक चुनौतियों और आर्थिक सुधार से जूझ रहे हैं, ऐसी सोच को आत्मसात करना वैश्विक विकास में नई जान फूंक सकता है।
भारत को जी-20 की अध्यक्षता तब मिली, जब वैश्विक सुधार महामारी के प्रभाव और भू-राजनीतिक तनाव से हलकान था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में महिला सशक्तीकरण की कहानी ‘महिला-नेतृत्व वाले विकास’ में ढल चुकी है। भारत का यह नवोन्मेषी नजरिया अब जी-20 का हिस्सा बन चुका है। इसमें ताउम्र सलाह-मशविरा जैसी सोच भी शामिल है, जिसमें माना जाता है कि महिला उद्यमियों की जरूरतें और चुनौतियां समय के साथ बदलती रहती हैं, जिनके समाधान के लिए अनुकूल परामर्श ढांचे की दरकार है। भारत की जी-20 अध्यक्षता के दौरान लॉन्च किया गया ‘जी-20 इम्पॉवर’ इसका बड़ा उदाहरण है, जो आकांक्षी महिला उद्यमियों को प्रोत्साहित करता है और स्थापितों का मार्गदर्शन करता है।
जाहिर है, महिलाओं के सशक्तीकरण में निवेश करना नैतिक अनिवार्यता और आर्थिक रणनीति, दोनों है। जैसे-जैसे हम आगे बढ़ रहे हैं, तमाम देशों को महिला सशक्तीकरण के साथ-साथ मेंटोरशिप में भी नवाचार, सहयोग व निवेश जारी रखना चाहिए। आर्थिक समृद्धि व सामाजिक उन्नति का मार्ग महिलाओं के योगदान से ही प्रशस्त होता है, और मार्गदर्शन इस यात्रा में एक महत्वपूर्ण कड़ी है। अब इन प्रयासों को और अधिक विस्तार देने का समय है, जिससे ज्यादा से ज्यादा समावेशी और समृद्ध भविष्य की राह तैयार हो सके।
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हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने राहुल गांधी पर चले मानहानि के मामले को लेकर इस कानून की निरर्थकता पर टिप्पणी की है। न्यायालय ने राहुल गांधी की सजा पर रोक लगा दी है। न्यायालय की टिप्पणी के प्रमुख बिंदु –
हमारे देश में सार्वजनिक बहसों, विशेषकर संसदीय बहसों का स्तर भी बहुत खराब हो जाता है। ऐसे में शीर्ष नेताओं से विशेष अपेक्षा की जा सकती है कि वे अभिव्यक्ति के स्थापित मूल्यों का ध्यान रखें।
विभिन्न समाचार पत्रों पर आधारित। 05 अगस्त, 2023
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Date:09-09-23
Continental Shift?Why it’s not quite Asia’s century yetTOI Editorials
During a brief visit to Indonesia this week for the Asean-India summit and the East Asia summit, PM Modi referred to the 21st century as the ‘Asian century’. The term began to gain traction in the 1990s when East Asia was the lodestar for economists seeking a universal template to crank up the pace of economic growth. Asia today is the world’s primary economic growth engine and home to the largest middle class. Three of the five biggest economies today are in Asia.
It’s not just economic competitiveness that leads to the label. Cultural richness stemming from being home to three of the four oldest river valley civilisations is complemented by contemporary Asia’s global impact on popular culture and food. Yet, there remain sceptics. One argument questions the very notion, arguing that Asia is not a natural bloc but more a creation of European geographers. Between central Asian republics and East Asian ‘tiger economies’, there’s not much of an overlap. But the more serious critique isolates factors beyond economics. Advocates of this argument say that if the 20th century was the American one, it was not just because of its economy or Hollywood. Bretton Woods is not just an American location. It represents the hegemony that shaped institutions of global governance.
Where is Asia’s influence? There’s no clear answer now. Modi’s speech called for the need to build a rules-based order. The remarks were directed against China, which may be the only strategic rival to the US but faces a big pushback to its leadership in Asia. In other words, Asia itself represents a battlefield of ideas. It’s the world’s most economically dynamic region, with deep integration through trade. But ‘Asian century’ is nowhere near being a done deal.
Date:09-09-23
Eastern hedgeIndia needs to build closer ties with ASEAN for economic, strategic reasons.Editorial
Prime Minister Narendra Modi’s whistle-stop summit sojourn to the Indonesian capital of Jakarta earlier this week was primarily aimed at deepening India’s engagement with the economically significant grouping of 10 Southeast Asian nations. Coming on the eve of India’s hosting of the G-20 summit in New Delhi as the current holder of the bloc’s presidency, Mr. Modi’s presence at the annual ASEAN-India summit was an opportunity to cement traditional ties with the neighbouring Asian economies at a time of heightened global trade uncertainty. As the trade facilitation body UNCTAD noted in its June 21 ‘Global Trade Update’, the ‘outlook for global trade in the second half of 2023 is pessimistic as negative factors’ including downgraded world economic forecasts, persistent inflation, financial vulnerabilities and geopolitical tensions dominate. Against this backdrop, the joint leaders’ statement on ‘Strengthening Food Security and Nutrition in Response to Crises’ at the ASEAN-India summit underscores the shared vulnerability the region perceives in the face of the ongoing heightened global food insecurity, which has been exacerbated by the war in Ukraine, climate change and national policy responses to inflationary pressures. India’s recent curbs on export of rice have triggered some alarm, with the prices of the regional staple reportedly nearing a 15-year high. The onset of an El Niño, which is historically associated with disruptive weather events, queers the ground further, and ASEAN leaders are justifiably wary.
Mr. Modi’s pitch, laying stress on the need for a rules-based post-COVID-19 world order and a free and open Indo-Pacific, was clearly directed at members among the Asian bloc who are increasingly disquieted by China’s recent muscle flexing and claims over the South China Sea. The Prime Minister’s not-so-veiled message to the ASEAN members is that India is a more reliable long-term strategic and economic partner, which has no territorial ambitions that could discomfit them. India also sought to position itself as a voice to amplify the concerns of the Global South, stressing that it would be mutually beneficial for all. For India, grappling as it is with an underwhelming free trade agreement (FTA) with the 10-nation grouping, trade ties with the eastern economies have grown in volume but asymmetrically, with imports far outpacing the country’s exports. The widening trade deficit and the perception that Chinese goods are taking advantage of lower tariffs under the FTA to find their way into the Indian market, have among other factors precipitated a review of the pact that is likely to be completed in 2025. In the meantime, India needs to stay closely engaged with the ASEAN members both as a trade hedge against the slowdown in its main western markets and to highlight its significance as an all-weather ally.
Date:09-09-23
हम भारत भाग्य विधाता भी कहते हैं और जय हिन्द भीबरखा दत्त, ( फाउंडिंग एडिटर, मोजो स्टोरी )
पिछले कुछ दिनों से बहस चल रही है कि क्या इंडिया का नामकरण अधिकृत रूप से भारत किया जा सकता है, जबकि संविधान का पहला अनुच्छेद स्पष्ट रूप से ‘इंडिया दैट इज़ भारत…’ कहकर राष्ट्र का दोहरा नामकरण करता है। इसकी क्रोनोलॉजी समझें। यह बात सबसे पहले संघ प्रमुख मोहन भागवत ने कही थी कि भारत को इंडिया पर प्राथमिकता दी जानी चाहिए। इसके कुछ दिनों बाद जब राष्ट्रपति की ओर से जी-20 नेताओं को निमंत्रण पत्र भेजे गए तो वहां उन्हें प्रेसिडेंट ऑफ भारत की तरह सम्बोधित किया गया था। इस पर विपक्ष की तीखी प्रतिक्रिया आई। क्योंकि संविधान ने राष्ट्र के संवैधानिक प्रमुख को प्रेसिडेंट ऑफ इंडिया निर्दिष्ट किया है, जिसे हिंदी में भारत के राष्ट्रपति कहा जाता है। विपक्ष ने पूछा कि क्या इसे बदलने के लिए संविधान में संशोधन किया जाएगा और क्या यह विपक्षी-गठबंधन का नामकरण इंडिया करने की प्रतिक्रिया में है?
जल्द ही बहस ने जोर पकड़ लिया। अमिताभ बच्चन और वीरेंद्र सहवाग ने इस पर टिप्पणियां कीं। अक्षय कुमार ने अपनी आगामी फिल्म की टैगलाइन बदल ली। प्रधानमंत्री इंडोनेशिया यात्रा पर गए तो अधिकृत घोषणा की गई कि भारत के प्राइम-मिनिस्टर आसियान-इंडिया समिट में शामिल होने जा रहे हैं! एक ही वाक्य में भारत और इंडिया शब्दों का इस्तेमाल करना विडम्बनापूर्ण था और इससे सियासत और गरमा गई।
सच कहें तो किसी देश का नाम बदलने की सम्भावनाएं बहुत कम होती हैं, क्योंकि यह अत्यंत कठिन प्रक्रिया है। हालांकि ऐसा नहीं है कि पहले ऐसा नहीं हुआ हो। सीलोन का नाम बदलकर श्रीलंका और बर्मा का नाम बदलकर म्यांमार किया जा चुका है- लेकिन इंडिया नाम के साथ वैसा कोई औपनिवेशिक संदर्भ नहीं जुड़ा है। इंडिया नाम ब्रिटिशों के आगमन से बहुत पहले से प्रचलित था। बचपन से ही हम अपने देश के लिए अनेक नामों का इस्तेमाल करते आ रहे हैं। हम अपनी रीढ़ सीधी करके और सिर उठाकर भारत भाग्य विधाता गाते थे। हम उतने ही गर्व से जय हिन्द भी कहते थे। और हम एक इंडियन या भारतीय के रूप में अपनी पहचान बताते आ रहे हैं। ऐसा कभी नहीं हुआ कि हम इनमें से किसी एक नाम को दूसरे से अधिक प्राथमिकता देते आए हों।
स्वयं प्रधानमंत्री ने अपनी हाल की सभाओं, इंटरव्यू, ट्वीट्स आदि में कई बार इंडिया शब्द का उपयोग किया है। हो सकता है मैं गलत साबित होऊं, लेकिन मुझे नहीं लगता कि सरकार अधिकृत रूप से इंडिया नाम को समाप्त करने की कोशिश करेगी। ज्यादा से ज्यादा वो एक प्रस्ताव पास करा सकती है कि अधिकृत पत्रों में भारत शब्द का ज्यादा उपयोग करें। वैसे भी जब जी-20 के लिए दुनियाभर के नेतागण राष्ट्रीय-राजधानी में जुटे हों, तब सरकार देश के नामबदल पर एक शोरगुल भरी बहस क्यों चाहेगी? इस विवाद के शुरू होने तक मैंने जी-20 के लोगो को देखा नहीं था। लेकिन अब उसे ध्यान से देखने पर नजर आता है कि हिंदी में भारत अंग्रेजी में इंडिया से पहले आता है। लेकिन दोनों नाम अपनी जगह पर मौजूद हैं और इससे किसी को कोई समस्या होने का कारण नजर नहीं आता।
सरकार द्वारा बुलाए संसद के पांच-दिवसीय विशेष-सत्र के एजेंडा पर रहस्य की चादर छाई हुई है। अफवाहों का दौर है। अभी तक किसी भी अफवाह की सच्चाई साबित नहीं हुई है, पर उन सबमें सच्चाई का कुछ न कुछ अंश अवश्य हो सकता है। एक देश एक चुनाव पर नया कानून बनाने को लेकर चले अटकलों के दौर के बाद इसके विकल्पों के परीक्षण के लिए पूर्व राष्ट्रपति की अध्यक्षता में एक विशेष पेनल की नियुक्ति हुई। इसके तुरंत बाद देश का नाम बदलने को लेकर अफवाहों का दौर चल पड़ा। एक तीसरी अफवाह भी है, महिला आरक्षण विधेयक पास कराना।
देश का नाम बदलने की बहस के राजनीतिक और सांस्कृतिक निहितार्थ क्या हैं? अव्वल तो इसके माध्यम से भाजपा इंडिया गठबंधन के इर्द-गिर्द निर्मित नैरेटिव को तोड़ना चाह सकती है। वैसे भी लुटियंस दिल्ली से लेकर खान मार्केट गैंग तक, अंग्रेजीदां, सोशल एलीट्स को हाशिए पर धकेलना हमेशा से भाजपा के सांस्कृतिक-युद्ध का हथियार रहा है। इंडिया को लेकर भी वही नीति अपनाई जा सकती है, जबकि यह नाम ब्रिटिश मूल का नहीं है। जो भी हो, प्रधानमंत्री ने हमेशा ही चौंकाने वाले कदमों की नीति अपनाई है। इसमें संदेह नहीं कि संसद के विशेष सत्र पर छाए रहस्य को लेकर मची हड़बड़ी को देखकर सरकार या उसके कुछ अंगों को विशेष आनंद आ रहा होगा। यह भी हो सकता है कि उन पांच दिनों में वह हो, जिसके बारे में हमने अभी बात तक नहीं की है!
Date:09-09-23
हमारे अंतरराष्ट्रीय उभार का आधारहर्ष वी. पंत, ( लेखक सामरिक मामलों के विश्लेषक एवं आब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के उपाध्यक्ष हैं )
नई दिल्ली में जी-20 शिखर सम्मेलन आयोजन के साथ ही अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का कद बढ़ना और तय है। भारत भू-राजनीति एवं भू-आर्थिकी केंद्र के रूप में स्थापित हो रहा है। दुनिया नई दिल्ली की दिखाई दिशा के अनुरूप सक्रिय हो रही है। आज भारत के नेतृत्व की साख को कहीं अधिक गंभीरता से लिया जा रहा है और अधिकांश राष्ट्र नई दिल्ली के साथ अपने संबंधों को मजबूत बनाना चाहते हैं। दुनिया में सबसे तेजी से वृद्धि करने वाली बड़ी अर्थव्यवस्था, अधिसंख्य युवा आबादी, गतिशील लोकतंत्र, वंचित वर्गों के कल्याण के भरसक प्रयासों के साथ ही विश्व कल्याण को समर्पित व्यावहारिक विदेश नीति वाला भारत अतीत की तमाम हिचक छोड़कर आगे बढ़ने के लिए तत्पर दिख रहा है। वैश्विक पटल पर भारत का यह उभार अर्से से लंबित था। प्रेक्षकों की हमेशा से यही शिकायत रही है कि भारत संभावनाओं से भरा ऐसा देश रहा है, जो अपनी क्षमताओं के साथ कभी न्याय नहीं कर पाया। अब चूंकि भारत अपने वादों पर खरा उतरने लगा है तो यह भी उसके प्रति वैश्विक झुकाव की एक बड़ी वजह है, क्योंकि इस दौरान नई दिल्ली ने खुद को आंतरिक रूप से मजबूत बनाने के साथ ही भारतीय राज्य की क्षमताओं को भी बखूबी रेखांकित किया है।
पिछले कुछ वर्षों में आंतरिक सुरक्षा की स्थिति में नाटकीय रूप से सुधार हुआ है। कई महत्वपूर्ण, किंतु अशांत क्षेत्रों में शांति बहाल हुई है। आतंकी हमलों के लिहाज से नाजुक देश में आतंकवाद पर व्यापक अंकुश लगाया गया है। जहां घरेलू आतंकी तत्वों पर निर्णायक प्रहार कर उन्हें काबू किया गया तो बाहरी आतंकी शक्तियों को भी किनारे रखने में कामयाबी मिली है। आंतरिक सुरक्षा के दृष्टिकोण से जम्मू-कश्मीर को अनुच्छेद 370 और 35-ए से मुक्ति दिलाना एक बड़ी उपलब्धि रही। स्वतंत्रता के बाद से कश्मीर घाटी में बनी यथास्थिति भारत के लिए भारी पड़ती जा रही थी। राजनीतिक एवं नीतिगत दृढ़ता का अभाव ही भारतीय नीति-नियंताओं के लिए इस जकड़न को दूर करने में बाधक बना हुआ था। इस लिहाज से मोदी सरकार के सुधारवादी एजेंडे की सफलता न केवल जम्मू-कश्मीर की जनता, बल्कि भारत के भविष्य की दृष्टि से भी बहुत अहम है। यह सही है कि जम्मू-कश्मीर से जुड़े संवैधानिक परिवर्तनों को जमीन पर आकार लेने में कुछ समय लगेगा, पर इस कदम ने भारत के दुश्मनों की नींद जरूर उड़ा दी है। लद्दाख को लेकर चीन की कुंठा इसी कदम का नतीजा है, क्योंकि इस दांव से समूचे क्षेत्र में भारत की पकड़ मजबूत होगी। यह चीन की बदनीयती और दूरगामी दुस्साहसिक लक्ष्यों के लिए झटका है। आखिरकार भारत अपनी कमजोरी वाले दायरे से बाहर निकलकर खुद को सशक्त बना रहा है तो इससे उनका असहज होना स्वाभाविक ही है, जो पूर्व की यथास्थिति के साथ सहज थे।
पूर्वोत्तर भारत भी एक ऐसा क्षेत्र है, जिस पर हाल के वर्षों में सरकार ने बहुत ज्यादा ध्यान दिया है। स्वतंत्रता के बाद से ही भारतीय नीति-निर्माताओं की ओर से इस क्षेत्र की व्यापक अनदेखी हुई, जिसके कारण भी समझ से परे हैं। अतीत से चला आ रहा यह रुख अदूरदर्शी भी रहा, जबकि यह वही क्षेत्र है जिस पर चीन रह-रहकर अपनी बुरी नीयत दिखाता रहा है। इसके बावजूद नई दिल्ली ने इस क्षेत्र को कभी राष्ट्रीय चेतना के साथ नहीं जोड़ा। इसी कारण भारत मात्र एक ‘दक्षिण एशियाई शक्ति’ के रूप में सिमटकर रह गया था, जबकि भारत का पूर्वोत्तर दक्षिण पूर्व एशिया के साथ संपर्क की नैसर्गिक कड़ी थी। उस पर ध्यान देकर हिंद-प्रशांत को लेकर भारत का दावा और मजबूत होता। अतीत की इन गलतियों को सुधारते हुए सरकार ने पूर्वोत्तर के साथ व्यापक रूप से सक्रियता आरंभ की है। उसे देश की मुख्यधारा से जोड़ने के गंभीर प्रयास हुए हैं। मणिपुर की हालिया अप्रिय घटनाओं के आलोक में उन प्रयासों को अनदेखा नहीं किया जाना चाहिए, जिनके चलते पूर्वोत्तर भारत में गवर्नेंस के स्तर पर जबरदस्त कायापलट हुआ है। इसी परिवर्तन का प्रभाव है कि पिछले कुछ वर्षों में पूर्वोत्तर भारत में अलगाववादी घटनाओं में भारी कमी आई है। जनता और सरकार में बढ़ते भरोसे का ही प्रमाण है कि पूर्वोत्तर के कई हिस्सों से सैन्य बल (विशेष शक्तियां), अधिनियम यानी अफस्पा को हटा दिया गया है या उसके प्रविधानों में भारी ढील दे दी गई है।
पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने लाल किले से अपने भाषण में वामपंथी चरमपंथ यानी नक्सलवाद को देश के समक्ष सबसे प्रमुख सुरक्षा चुनौती के रूप में चिह्नित किया था। एक समय देश में वामपंथी चरमपंथ से ग्रस्त बड़ा हिस्सा ‘लाल गलियारे’ के रूप में कुख्यात था। मौजूदा सरकार ने उस लाल गलियारे की रंगत ही बदल दी है। माओवादियों पर सुरक्षा बलों की मजबूत पकड़ से लेकर उनके वित्तीय स्रोतों पर प्रहार के साथ ही माओवादी नेतृत्व की कमर तोड़कर सरकार ने इस चुनौती का एक बड़ी हद तक कारगर तोड़ निकाला है। चाकचौबंद सुरक्षा व्यवस्था और विकास गतिविधियों की जुगलबंदी से सरकार ने माओवाद प्रभावित क्षेत्रों की सूरत बदल दी है। इसका ही परिणाम है कि देश के समक्ष माओवाद अब वैसी चुनौती नहीं है, जैसी कुछ साल पहले तक थी। विकास की बहती गंगा के सामने माओवादियों को अपनी वैचारिकी के दम पर नए रंगरूट भर्ती करना मुश्किल हो रहा है।
केवल आर्थिक समृद्धि या संसाधनों के मोर्चे पर बढ़त ही किसी देश को वैश्विक राजनीति में सिरमौर नहीं बनाती। भारत को लंबे समय तक एक ‘सशक्त समाज, किंतु कमजोर राज्य’ की दृष्टि से देखा गया। इस तथ्य को झुठलाया नहीं जा सकता कि आंतरिक मामलों पर प्रभावी पकड़ के बिना किसी भी देश का अंतरराष्ट्रीय वरीयता अनुक्रम में ऊपर चढ़ना बेहद कठिन है। वैश्विक नेतृत्व पर भारत की पकड़ तबसे मजबूत होनी आरंभ हुई, जब उसने आंतरिक सुरक्षा सुनिश्चित करने की क्षमता एवं प्रतिबद्धता दिखानी शुरू की। एक मजबूत राज्य जो अंदरूनी हलचलों पर नियंत्रण रखने में सक्षम हो, वही बाहरी स्तर पर राष्ट्रीय आर्थिक क्षमताओं का लाभ उठाने की स्थिति में होता है। यही वह सबक है जो भारतीय नीति-निर्माता देर से ही सही, लेकिन अब गंभीरता से सीख रहे हैं।
Date:09-09-23
सांस्कृतिक जड़ों की तलाशटी. एन. नाइनन
प्रधानमंत्री के रूप में अपने पहले कार्यकाल के अंत में नरेंद्र मोदी ने कहा था कि उन्हें इस बात का पछतावा है कि वह लुटियंस दिल्ली को नहीं जीत सके। लुटियंस दिल्ली का प्रयोग आमतौर पर अंग्रेजी भाषी कुलीनों या सत्ता प्रतिष्ठान के भारतीय संस्करण के लिए किया जाता है। अब जबकि उनका दूसरा कार्यकाल समापन की ओर बढ़ रहा है तो मोदी सत्ता प्रतिष्ठान पर जीत हासिल करने में नहीं बल्कि उसे विस्थापित करने में कामयाब रहे हैं, जो न केवल राजधानी बल्कि पूरे देश को नया रूप देने की उनकी व्यापक योजना का हिस्सा है।
दिल्ली में इस व्यापक प्रयास का एक हिस्सा पुराने कुलीनों की रिहाइश पर कब्जा या उन्हें ध्वस्त करना भी है। थिंक टैंक और नागरिक समाज के विभिन्न संगठन जो अपने ढंग से काम करना चाहते थे उनकी फंडिंग रोक दी गई है या वहां ऐसे लोगों को तैनात कर दिया गया है जो सरकारी सोच विचार रखते हैं। अन्य संस्थानों से कहा गया है कि वे अपने बोर्ड और अपने चर्चा वाले पैनलों में सरकार के लोगों को स्थान दें।
जिमखाना क्लब (जिसके सदस्यों ने उसे एक सीमित क्लब में बदल दिया है) का प्रशासन अब सरकार के पास है। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय को लगातार ऐसे कुलपतियों के अधीन रखा गया है जो संभव होने पर इसके चरित्र को बदल देंगे। जबकि उदारवादी शैक्षणिक संस्थान अशोक यूनिवर्सिटी को उदारवाद की सीमा समझा दी गई है। स्कूली पाठ्यपुस्तकों को नए सिरे से लिखा जा रहा है जबकि एक आज्ञापालन न करने वाले टेलीविजन चैनल को एक मित्र कारोबारी ने खरीद लिया है।
कोई यह दलील भी दे सकता है यह भारत द्वारा लुटियंस दिल्ली पर आक्रमण की कहानी नहीं है जैसा कि प्रस्तुत किया जा रहा है। इसके बावजूद इसमें ‘आइडिया ऑफ इंडिया’ यानी भारत के विचार को फिर से बताना शामिल है। दिल्ली के वास्तु मानचित्र में परिवर्तन करके, नए कानूनों को हिंदी नाम देकर, नाम बदलने की होड़ और धर्मनिरपेक्ष स्थानों पर हिंदू छवियों और प्रतीकों को अधिक स्थान देकर सरकार यह स्पष्ट कर रही है कि वह उत्तर औपनिवेशिक भारत की पहचान को पीछे छोड़कर एक ‘नए भारत’ को जन्म दे रही है जिसकी जड़ें कहीं अधिक गहरी सांस्कृतिक हैं। माफ कीजिएगा नए भारत को क्योंकि इंडिया और हिंदू का भाषाई मूल एक ही है और विदेशी है। बहरहाल नाम बदलने के असर को लेकर चिंता देखने को मिल सकती है। मुद्दा नाम परिवर्तन, सत्ता परिवर्तन और पहचान की राजनीति से परे जाता है। अब इस धारणा को चुनौती पेश की जा रही है कि यूरोपीय जागरण ने ऐसे विचार पेश किए जिनकी सार्वभौमिक वैधता है। उदाहरण के लिए व्यक्तिगत स्वतंत्रता, समता और व्यक्ति के व्यापक अधिकारों को फ्रांस की क्रांति के समय उल्लिखित किया गया था और वे 150 वर्ष बाद संयुक्त राष्ट्र के सार्वभौम मानवाधिकार घोषणा पत्र में भी नजर आए। भारत के संविधान ने मौलिक अधिकारों के साथ आत्मज्ञान के उन मूल्यों को प्रदर्शित किया। परंतु अलेक्सांद्र दुगिन (कथित तौर पर पुतिन के पसंदीदा) जैसे रूसी विचारक तथा अन्य ने पश्चिमी सार्वभौमिकता को लोकप्रिय राष्ट्रवाद के विरुद्ध खड़ा किया तथा व्यक्तिगत अधिकारों को सामूहिक बेहतरी के समक्ष। तर्क यह है कि सार्वभौमिकता सांस्कृतिक अंतरों को समाप्त करती है, इसका प्रतिवाद यह होगा कि उदारवाद इन अंतरों से निपटने का मार्ग देता है। सांस्कृतिक सापेक्षता परंपरा से जुड़े कई कुलीनों को स्वाभाविक रूप से आकर्षक लगती है हालांकि अब कोई भी ‘एशियाई मूल्यों’ की हिमायत नहीं करता। दिक्कत यह है कि सांस्कृतिक जड़ों वाली राजनीतिक व्यवस्था की खूबसूरती अक्सर उसे धारण करने वाले की आंखों में होती है। तमिलनाडु के राजनेताओं ने हाल ही में सनातन धर्म की परंपरा पर हमला किया। चीन चाहेगा कि अंतरराष्ट्रीय संबंधों में कन्फ्यूशियस के विचारों के अनुरूप सौहार्द का प्रवाह हो, लेकिन क्षेत्र के छोटे देश इस पर आपत्ति प्रकट कर सकते हैं। इस बीच व्लादीमिर पुतिन के मन में रूस और यूक्रेन के इतिहास, संस्कृति और पहचान का लेकर जो समझ है वह हम सब देख ही रहे हैं। जब कोई व्यक्ति संस्कृति में निहित हल की ओर देखता है तो उसे सावधान रहना चाहिए कि यह कहां जा सकता है।
अगर कोई इंगलहार्ट-वेल्जेल के विश्व के सांस्कृतिक मानचित्र का रुख करे जो दो अक्षों पर चित्रित है तो भारत ने पारंपरिक से धार्मिक-तार्किक मूल्यों की ओर नैसर्गिक बदलाव को पलट दिया है। उसने अस्तित्व मूल्यों पर ध्यान केंद्रित किया है जो स्व अभिव्यक्ति के मूल्यों से अलग हैं। यह विश्लेषणात्मक ढांचा हमें समझा सकता है कि आखिर क्यों मोदी सरकार द्वारा दिया जा रहा सांस्कृतिक जोर उन लोगों को प्रभावित कर सकता है जो आत्म साक्षात्कारी कुलीनों का हिस्सा नहीं हैं। भारत कभी विरोधाभासों से मुक्त नहीं रहा है। प्यू रिसर्च के 2017 के एक सर्वे की रिपोर्ट में कहा गया है कि बहुत बड़ी तादाद में भारतीय जहां लोकतंत्र की कीमत समझते हैं वहीं बड़ी तादाद में वे अधिनायकवादी और एक मजबूत नेता के शासन या सैन्य शासन को भी सही मानते हैं। मोदी काफी हद तक एक मजबूत नेता हैं और वह ‘भारत को लोकतंत्र की जननी’ बताते हुए एकदम सही नजर आते हैं।
Date:09-09-23
दिखानी होगी समझदारीसंपादकीय
दक्षिण एशियाई देशों के संगठन आसियान-भारत शिखर सम्मेलन और पूर्वी एशिया शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 21वीं सदी को एशिया की सदी बताया। उन्होंने कहा कि इसके लिए कोविड-19 महामारी के बाद नियम आधारित विश्व व्यवस्था का निर्माण करना होगा और मानव कल्याण के लिए सभी प्रयासों की जरूरत है। लेकिन इस संदर्भ में अहम सवाल यह है कि क्या 21वीं सदी को एशिया की सदी बनाने के महती काम में चीन का सहयोग प्राप्त होगा जिसकी विस्तारवादी नीतियों से सभी पड़ोसी देश परेशान हैं। राजनयिक हलकों में चीन के सबसे बड़े पैरोकार भारतीय मूल के एक विद्वान किशोर मेहबूबानी ने ‘एशिया की सदी’ शीर्षक से एक चर्चित पुस्तक में लिखा है कि दुनिया के पिछले 2 हजार साल के इतिहास में 1800 वर्ष के कालखंड में भारत और चीन दुनिया के सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देश रहे हैं। पिछली दो सदियों के दुर्दिन कालखंड से ऊपर उठकर अभी दोनों देशों के सामने दुनिया का सिरमौर बनने का अवसर है। साथ ही लेखक मेहबूबानी चेतावनी भी दी है कि आपसी संघर्ष के कारण भारत और चीन यह अवसर गंवा भी सकते हैं। अगर दोनों देशों के बीच हुए पिछले कुछ घटनाक्रमों को देखा जाए तो संतोष की बात दिखती है कि पूर्वी लद्दाख में दोनों देशों की सेनाएं आमने-सामने हैं। बावजूद इसके सीमा पर सामान्य रूप से शांति कायम है। भारत और चीन दोनों देश हिंसक वारदात की पुनरावृत्ति रोकने के लिए तत्पर दिखाई देते हैं। चीन का राजनीतिक नेतृत्व यह भी बुद्धिमत्ता परिचय दे तो संबंधों को पटरी पर लाया जा सकता है। विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कई बार दोहराया है कि द्विपक्षीय संबंधों को फिर से पटरी पर लाने के लिए सीमा से सेना को पीछे हटाना तथा सामान्य स्थिति कायम रखना एक आवश्यक शर्त है। लेकिन अफसोस ऐसा नहीं हो रहा। अभी पिछले दिनों की बीजिंग ने ‘चीन के मानक मानचित्र’ का 2023 संस्करण जारी किया था जिसमें ताइवान, दक्षिण चीन सागर, अरुणाचल प्रदेश और अक्साई चीन को चीनी क्षेत्र के रूप में शामिल किया जिसका भारत समेत कई देशों ने कड़ा प्रतिवाद किया। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के सामने आत्मावलोकन का अवसर है। यदि सचमुच 21वीं सदी को एशिया की सदी बनाना है तो उसे विस्तारवादी नीति त्यागनी होगी और सीमाओं को लेकर मनमाना रवैया छोड़ना होगा।
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09 September 2023
प्रश्न–427 – न्यायिक व्यवस्था में सुधार की दृष्टि से मध्यस्थता अधिनियम, 2023 की भूमिका का मूल्यांकन कीजिए। (250 शब्द)
Question–427 – Evaluate the role of the Mediation Act, 2023 from the point of view of reforming the judicial system. (250 words)
नोट : इसका उत्तर आपको हमें नहीं भेजना है, यह आपके स्वयं के अभ्यास के लिए है।
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08-09-2023 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"डार्क पैटर्न"
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Today's Life Management Audio Topic-"अच्छे विचार अच्छी किरणें"
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Date:07-09-23
India that is BharatThere is no need for one name to be given primacy over the other.Editorial
India and Bharat have both evoked the same emotions among patriots for decades, but these labels of pride have now been weaponised for narrow political ends. The Bharatiya Janata Party government at the Centre has decided to use Bharat instead of India in some official communication and documents, a practice that its representatives say will now expand. ‘India, that is Bharat,…’ is how the Constitution of India names the country, and the use of one or the other has been largely contextual all this while. The cultural echoes of Bharat have never been in doubt, and the current hype around it is more about a campaign to discard the use of India, as if both cannot exist in harmony. India, according to this telling, is a foreign imposition, and hence unsuitable for national dignity. Bharat, linked as it is to various ancient sources, goes beyond the geographical and cultural landscape that constitutes the modern republic of India. In that sense, both names are an outcome of India’s nation-building journey. Labouring to tease out the foreign from the native in the expanse of this nation that hosts a multitude of ethnic, linguistic, and genetic diversity and that has been formed as a result of millennia of migrations and cross-currents of human interactions serves no purpose other than creating new flashpoints in society.
This farcical hubbub hoisted upon the country should have been allowed to dissipate and recede, but the knee-jerk reaction of the Opposition gave it the aura of a fundamental identity question before the nation. The Rashtriya Swayamsevak Sangh has been asking for privileging the use of Bharat over India for long, but the Opposition bloc’s decision to label itself INDIA as an acronym also might have influenced the BJP’s hurry in the naming exercise. Far from demonstrating a nation’s strength and pride, the government’s name game undermines the confidence and soft power of the nation. Bharat has been part of popular culture, political and cultural idioms, and literature across many Indian languages. Similarly, India is also used by millions within and outside the country who yearn for its progress. It is possible that contexts and constituencies of these proper nouns might vary, but that is the very reason to desist from attempting to impose the use of one and edge out the other. Whether it is India or Bharat, the essence of the meaning that it conveys remains the same. The needless juxtaposition of the two names should not affect the bonding of the inhabitants in the pursuit of a misplaced cultural combat. Let India and Bharat coexist as they have always been.
Date:07-09-23
India, Bharat and a host of implicationsThe tradition of using India in English and Bharat in Hindi is wise and constitutionally correct; why change it?Vivek Katju is a retired Indian Foreign Service officer.
There are historical, ideological, constitutional and international implications associated with the words Bharat and India. A political dimension has been added to these names/words arising out of some Opposition parties coming together under the banner and acronym INDIA (for the ‘Indian National Developmental Inclusive Alliance’). For these parties in the Opposition, the unprecedented use of ‘President of Bharat’ instead of ‘President of India’ (as seen in an invitation card by the President to the heads of States and governments and Chief Ministers for an official banquet on the occasion of the G-20 summit) is on account of the Narendra Modi government’s concern that ‘INDIA’ may become politically potent.
Keeping politics aside it would be useful to examine some of the other aspects, mentioned in the first sentence, to arrive at a degree of clarity on Bharat and India.
From the pages of history
A brief look at the controversy raised by the Muslim League over the name India in 1947 would be in order. The transfer of power from the British to Indian hands in 1947 was through the British Parliament’s Indian Independence Act of 1947. It created two dominions — India and Pakistan — and released the Princely States from British paramountcy, thereby, technically making them independent and sovereign. At the same time, the British advised the Princely states to join one of the two dominions. Most did so before August 15, 1947. Thus, two dominions came into being in what was British India and the Princely states in the sub-continent.
Pakistani leaders favoured that India should be named either Hindustan or Bharat. They argued that two ‘successor’ states had emerged from the dissolution of the British Indian empire: Pakistan and Hindustan or Bharat. India’s position was that it was the successor state to British India, in terms of international law, and that Pakistan had seceded from India. Hence, while India retained its international personality, including its membership of the United Nations (UN), Pakistan, as a new state created through secession, would have to take steps to acquire an international personality. The matter was finally decided in India’s favour, and Pakistan was compelled to take steps to establish its international status, including applying for a membership of the UN, which, incidentally, Afghanistan opposed.
India retained the name ‘India’ in all international and multilateral fora. Thus, the country’s international personality was and continues to be denoted by the word India. Generally, whenever the English language is used in international, multilateral or bilateral settings, the word India is used. The latest example is the Joint Statement issued on August 25 on Prime Minister Modi’s visit to Greece. It is available on the Ministry of External Affairs website and it is entitled ‘India-Greece Joint Statement’. The last sentence of this document says “Prime Minister Narendra Modi extended an invitation to Prime Minister Mitsotakis to visit India”. In letters of credence in English given by the President of India to Ambassadors-designate, under the lion’s emblem the words (in Hindi), Rashtrapati, Bharat Gantantra are written and under them the words President, Republic of India written in English. Thus, in Hindi, Bharat is used while in English it is India.
Under the 58th Amendment
For an authoritative background of the English and Hindi versions, it is best to turn to the 58th Amendment of the Constitution done in 1987. Its ‘Statement of Objects and Reasons’ mentions that “The Constitution of India was adopted by the Constituent Assembly in English. A Hindi translation of the Constitution, signed by the members of the Constituent Assembly, was also published in 1950 under the authority of the President of the Constituent Assembly in accordance with a resolution adopted by that Assembly”.
The 58th Amendment empowered the President to have published under his authority the authoritative text ‘in the Hindi language’ of the Constitution which could be used in the legal process too. Thus, the Hindi text of the Constitution published by the government following the amendment is ‘authoritative’.
The English language version of the Constitution is entitled “Constitution of India’ Its Article 1(1) is “India, that is Bharat, shall be a Union of States”. The primacy in this formulation is given to the word India. The Hindi version is titled ‘Bharat ka Samvidhan’. Article 1(1) in the Hindi version reads “Bharat artharth India, rajyon ka sangh hoga”. The word “artharth” means “that is”. Clearly, in the Hindi version, primacy is given to the word Bharat. The logic of the formulations has led to the practice of using the word India in the English language and Bharat in Hindi. That practice has prevailed in internal documents as well as international documents which are generally in English. Thus, the Gazette published in English is called the ‘Gazette of India’, and in Hindi it is ‘Bharat ka Rajpatra’.
It is true that the words India and its variants such as Hind in Arabic are of foreign origin. It is generally believed that these were used by foreigners to denote the land south and east of the Indus or Sindhu river. During Afghan and Mughal rule, the northern areas of the Indian subcontinent were largely referred to as Hindustan, and later the Europeans, especially the British, roughly referred to not only the northern region but also to all the subcontinent as India. However, for them, it was a geographical expression. The rise of a consciousness that all the people living in the Indian subcontinent constituted a single nation was a product of the Indian Renaissance; one of its streams sought ancient roots for Indian nationalism. That gave rise to the idea, especially among sections particularly devoted to the revival of India’s ancient civilisational past, that it was unacceptable that the country and nation should carry a name given by foreigners. For them the preferred word was Bharat with its variations in different languages. For others such as Netaji Subhas Chandra Bose, a syncretic word, perhaps acceptable to most people, including those believing in different faiths, was more useful. That word was Hind. It is used even today and the emotive expression “Jai Hind” is used by public personalities and the highest office holders. In her speech on Independence Day this year, the President of India, Droupadi Murmu, concluded by saying “Jai Hind, Jai Bharat”.
The risk of alienation
It is now clear that the Sangh Parivar and the Narendra Modi government wish to use the word, Bharat. Their preference for Bharat instead of the word India is clear. The use of the formulation ‘President of Bharat’ in the G-20 invitation is a giveaway. They may also begin to use ‘Bharat’ in the English language in the government’s internal documents. The problem is that they cannot do so internationally unless they officially change the country’s name to Bharat and drop India. By doing so, they may alienate parts of the country which prefer India to Bharat.
In any event, the tradition of using India in English and Bharat in Hindi is wise and constitutionally correct. Should its change be a priority now?
Date:07-09-23
फैसले से उम्मीदसंपादकीय
सुप्रीम कोर्ट ने तत्कालीन जम्मू-कश्मीर राज्य को विशेष दर्जा देने वाले संविधान के अनुच्छेद 370 को निरस्त करने के केंद्र सरकार के फैसले को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर मंगलवार को अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। इससे पूर्व प्रधान न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ के नेतृत्व वाली पांच न्यायाधीशों की पीठ ने इस मामले में सोलह दिन तक मैराथन सुनवाई की। जस्टिस संजय किशन कौल, जस्टिस संजीव खन्ना, जस्टिस बीआर गवई और जस्टिस सूर्यकांत भी पीठ में शामिल हैं। मैराथन सुनवाई के दौरान अदालत ने केंद्र सरकार के 5 अगस्त, 2019 के फैसले की संवैधानिक वैधता, पूर्ववर्ती राज्य को दो केंद्रशासित प्रदेशों में विभाजित करने वाले जम्मू कश्मीर पुनर्गठन अधिनियम की वैधता, 20 जून, 2018 को जम्मू कश्मीर में राज्यपाल शासन तथा 19 दिसम्बर, 2018 को राष्ट्रपति शासन लगाए जाने और 3 जुलाई, 2019 को इसे विस्तारित किए जाने समेत विभिन्न मुद्दों पर संबद्ध पक्षों के विचार और दलीलें सुनीं। केंद्र सरकार के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में 20 याचिकाएं दायर की गई थीं। दो याचिकाकर्ता शाह फैसल और शेहला राशिद ने सुनवाई शुरू होने से पहले ही अपनी याचिकाएं वापस ले ली थीं। इस प्रकार नेशनल कॉन्फ्रेंस के सांसद मोहम्मद अकबर लोन मुख्य याचिकाकर्ता के रूप में रह गए। सुनवाई के दौरान उस समय एक विवाद और जुड़ गया जब 2018 में लोन द्वारा जम्मू-कश्मीर असेंबली में कथित तौर पर ‘पाकिस्तान जिंदाबाद’ नारा लगाए जाने से संबंधित मुद्दा सुनवाई के दौरान उठाया गया। इस पर शीर्ष अदालत ने लोन को भारत के संविधान के प्रति निष्ठा की शपथ लेने और देश की संप्रभुता को बिना शर्त स्वीकार करने के लिए हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया। मंगलवार को लोन द्वारा हलफनामा पेश किए जाने पर शीर्ष अदालत ने इसका अध्ययन किए जाने की बात कहते हुए अनुच्छेद 370 पर अपना फैसला सुरक्षित रख लिया। यह मामला उस समय तूल पकड़ गया था जब खुद लोन के वकील कपिल सिब्बल ने सुनवाई के दौरान कहा कि लोन हलफनामा नहीं देते तो वे मामले से खुद को अलग कर लेंगे। लंबी सुनवाई के बाद फैसले की घड़ी आ चुकी है। उम्मीद है कि फैसले से मामले के सबसे जटिल पहलू, कि संविधान सभा (जम्मू-कश्मीर की यह संविधान सभा 1957 में खत्म हो गई थी) की सहमति बिना अनुच्छेद 370 खत्म नहीं किया जा सकता, पर स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
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Today's Daily Audio Topic-"तीन महत्वपूर्ण वक्त्तव्य"
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06-09-2023 (Important News Clippings)
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Today's Life Management Audio Topic-"एक उम्दा विचार"
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भारत में शैक्षणिक नैतिकता का संकट
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Date:05-09-23
Tiers apart‘One nation, one election’ militates against federalism, tiered governance.Editorial
In a multi-tiered governance system such as the one in India, a Union of States, electoral democracy works by allowing people to choose their representatives for each tier based on their perception of who is best suited to represent them for each specific tier. There is a reason why there is a demarcation of power between the Union, States and local body institutions and why there is a voter mandate every five years to elect representatives for Parliament, Assemblies and local bodies. The demarcation allows for specific roles for each representative across these tiers and suggests varied voter choices that could be based on party affiliation, candidate strength, ideological positions or simple socio-economic reasons specific to each constituency. That some States such as Andhra Pradesh and Sikkim hold simultaneous Assembly and parliamentary polls is a coincidence as their electoral cycle has coalesced with that of parliamentary polls. The BJP-led Union government’s trial balloon, exploring the feasibility of simultaneous elections for all levels through a committee led by former President Ramnath Kovind, militates against the foundational idea of multi-tiered governance and is anti-federalist. Dangerously, one of the committee’s terms of reference — to “examine and recommend, if the amendments to the Constitution [for the purpose of holding simultaneous elections] would require ratification by the States” — is a proposition that is anti-constitutional and will not stand legal scrutiny. It also advances a motive that would curtail many Assemblies much before their scheduled tenures — an untenable prospect.
Ostensibly, the proposal speaks of the need for simultaneous elections as a cost-cutting exercise allowing voting in parliamentary, Assembly, municipal and panchayat elections in one go. It also stems from the flawed notion that governments are forever in campaign mode because of frequent Assembly elections. First, there is no study to prove that there will be significant cost-saving with simultaneous elections and in any case, the costs incurred in the conduct of elections are not essentially wasteful as there is a multiplier effect to campaign spending and economic activity around polls. Elections for different levels also allow voters to hold their representatives to account and for their specific grievances to be noted. Second, the conduct of various elections at different points of time is to only elect representatives for these tiers and is not a referendum on just one tier or even an individual leader at every point of time, as the BJP has sought to make it. Those in civil and political society who are committed to India’s federal structure should argue for separation of the Lok Sabha election from polls to Assemblies as the campaign issues and democratic choices vary. In any case, unless the term of each Lok Sabha and Assembly is fixed, and premature dissolution for whatever reason is barred, the idea is unworkable.
Date:05-09-23
A ‘distraction’ balloon in the winds of federalismThe ‘one nation one election’ proposal, premised on flimsy grounds, is politically unfeasible, administratively unworkable and constitutionally unviable.Praveen Chakravarty is a political economist and Chairman of the Congress party’s Data Analytics & Shashi Tharoor is a three-term Member of Parliament (Congress) and Chairman of Professionals Congress.
The ‘one nation one election’ proposal mooted yet again by the Narendra Modi government is deeply flawed. The reasons for the proposal are fallacious. The idea is unimplementable. It is nothing but a ‘distraction’ balloon floated to tide over the negative headlines about the Prime Minister’s cronyism and the Chinese President Xi Jinping’s snub to the G-20 summit.
The government argues that India is in a ‘permanent campaign’, to borrow the words of the American political commentator Sidney Blumenthal. India has had either a State or a national election every year for the last 36 years. This devours enormous financial resources and efforts, and the time of the government and political parties is the seeming concern. An election held constantly in some part of the country with a ‘model code of conduct’ distracts from governance and leads to policy paralysis. This is the essence of the opening argument in the notification issued a few days ago to constitute a panel to study a ‘one nation one election’.
Do not conflate these two
Except ‘India’ does not have an election every year, one of India’s States does. There is a fundamental difference between the two. When there is an election in say Bengal, with the Trinamool Congress, the Congress, the Bharatiya Janata Party (BJP) and the Left contesting, a Tamil Nadu governed by the Dravida Munnetra Kazhagam or the All India Anna Dravida Munnetra Kazhagam is not impacted. An election in Assam with a model code of conduct does not stop road projects or ‘development’ in Gujarat. So, when there are elections in a few States, ‘India’ is not in an election mode; some of India’s States are. All of India’s major political parties are not in an election mode, only some are. It is important to not conflate the two, since this notion is the basis for all arguments used to propagate the ‘one election’ idea.
The national parties with a Delhi-based high command culture such as the Congress and the BJP are the ones that may feel the pressure of constant elections because municipal or State elections held in any part of the country involve their national leadership — especially, when the campaigners-in-chief of the BJP, for a local body to a State election held anywhere in the country, also happen to have the important jobs of Prime Minister and Home Minister, it can feel like they are being stretched in a ‘permanent campaign’ and sidetracked from governance. But if the BJP chooses or wants to fight all elections in the country with the Prime Minister as their campaigner-in-chief and the Home Minister as their sole election in-charge, it is their flaw and not the nation’s problem. It is certainly not a virtue for a Prime Minister to be so frequently relegating the duties of his office, meant to serve all citizens, to a lower priority such as the electoral interests of his party.
Each of India’s States has different political cultures and parties. Why should the basic constitutional structure of the country be changed for two national leaders to help balance their campaign and governance schedules, under the alibi of perennial elections? The one election idea is only for the convenience of the BJP’s campaign and smacks of arrogance and ignorance of India’s political diversity. Furthermore, this is an attack on and an affront to India’s federalism. Today, an elected Chief Minister of a State has the powers to recommend dissolution of their State legislatures and call for early elections, as Telangana Chief Minister K. Chandrashekar Rao (KCR) did in 2018, breaking the cycle of simultaneous State and Parliament elections in the State. Under a ‘one election’ framework, KCR will not have the right to do this. Why should these powers be taken away from the States and only the Union government have the powers to dictate the election schedule for every State? This is yet another blow to India’s federalism.
Misleading arguments
Yet another misleading argument put forth in support of the idea is that between 1951-52 and 1967, India had simultaneous elections, and hence it is appropriate to revert to that system. That was not by design but by happenstance, since all States started off the block at the same time and had stable tenures in the first two decades after Independence. It is a testament to India’s plurality and the need for diverse political representation that a plethora of regional parties mushroomed over the last six decades to govern various States as per their own election schedules as the State’s politics warranted. It is foolhardy and regressive to forcibly re-synchronise the election schedules of various States by design.
Cost savings is the other reason cited for a concurrent elections proposal, something that even knowledgeable political commentators fall for but one that is deceptive.
Various estimates by the Election Commission, NITI Aayog and the government show that the costs of conducting all State and parliamentary elections in a five-year cycle work out to the equivalent of ₹10 per voter per year. The NITI Aayog report has also said that when elections are synchronised, it will cost the equivalent of ₹5 per voter per year. If any, in the short term, simultaneous elections will increase the costs for deploying far larger numbers of electronic voting machines and control units. So, it is laughable to imply that India’s federalism needs to be subverted, political diversity thwarted, and the constitutional structure amended to save ₹5 for every voter in a year. The government could have saved that amount just by not building the grand ‘Central Vista’ in Delhi. Political parties and candidates may spend a lot more money on elections than the government but that is not the tax-payers’ money. On the contrary, there is economic research to suggest that such election spending by parties and candidates actually benefits the economy and the government’s tax revenues by boosting private consumption and serving as a stimulus.
The government’s logic is incompatible with the vagaries of a parliamentary system in a large and diverse democracy. A single election calendar may work in a presidential system where the survival of the executive is not dependent upon a legislative majority. In India’s parliamentary democracy, this is ipso facto a non-starter and one should not be wasting the nation’s time deliberating on this.
Unitarism in the form of efficiency
‘One nation one election’ is a politically unfeasible, administratively unworkable and constitutionally unviable proposition. The idea is premised on flimsy and shallow grounds of cost savings, policy paralysis and governance interference. It is nothing but a deliberate ploy of the Narendra Modi government to move the headlines away from cronyism and China. That it chose to use ‘one nation one election’ to deflect attention is a reflection of its dismal lack of belief in India’s federal democratic parliamentary structure. The real implicit message underlying the Modi government’s ‘one election’ distraction is the clear ideological divide in Indian politics today — the BJP’s “India is a uniform nation and polity” versus the INDIA alliance’s “India is a union of diverse states and polities”. Those of us who believe in the real India will never seek to shoehorn it into a deranged fantasy of unitarism dressed up as efficiency.
Date:05-09-23
Living in the age of moral dystopiaConformism is the norm today. Humanism, justice, and freedom have all been consigned to the deep freeze, to be retrieved at some indefinable point in future.ziya salam
We are living in the age of moral dystopia, a norm-less era where it is difficult for men and women to be human and convenient for the state to be less than neutral, just, and fair. Leaders not only fail to keep their pledges, but they are not even expected to keep them. The government wears its majoritarian colours with pride, unabashed and unedifying. In a tragic case of downward filtration, it all percolates down to everyday lived experience of the faceless multitudes. Monuments, offices, and houses all seem to be judged by the faith or political predilections of their builders and occupants. If you question the actions of the government or the actions of non-state actors taking out hate marches, you become the most vulnerable. Conformism is the norm today. Humanism, justice, and freedom have all been consigned to the deep freeze, to be retrieved at some indefinable point in future.
A changed value system
Take the case of activist-public speaker Yogita Bhayana, who helped rebuild the shop of an old Muslim man days after goons had set it on fire in Gurugram. The moment this news was shared on social media along with the video of the grateful man, many trolled Ms. Bhayana. Some advised her, rather sarcastically, to go and help another 50-60 men down the road who had suffered too. Others reminded her of the Hindu women in the neighbourhood. In a not-too-distant past, Ms. Bhayana would have been hailed for promoting communal harmony. But not today.
Now, the value system has changed, and shared living is no longer a cherished ideal for millions. It is to each their own, as Anis discovered in Nuh around the same time. He had given shelter to three Hindu men who faced a danger to their life from an approaching mob. The men were grateful to be alive. A day later, his house was damaged by a bulldozer, which went on an overdrive in the State. Finally, the Punjab and Haryana High Court stepped in, stating clearly, “Apparently, without any demolition orders and notices, the law-and-order problem is being used as a ruse to bring down buildings without following the procedure established by law. The issue also arises whether the buildings belonging to a particular community are being brought down under the guise of law-and-order problem and an exercise of ethnic cleansing is being conducted by the State.”
Moral fibre was long since damaged, but this tattered? How else does one explain the sordid and public humiliation of women in Manipur and the whataboutery that followed in the top echelons of power? How does one even attempt to rationalise women handing over women to a mob? Or people marching in favour of the men accused of gang-rape of an eight-year-old girl in Kathua?
Today, we wish to hold to account a king or an invader for the ignominy he probably visited some 400 or 1,000 years ago. But we find our lips glued together when it comes to seeking justice for victims in Manipur or Haryana. We talk of invaders and how they broke many a place of worship, some real and some imagined, and set about righting historical wrongs. And how do we do that? By attacking the place of worship of the faith of the monarch who died hundreds of years ago. And so, we have had repeated attacks on mosques in Uttar Pradesh, Delhi, and now Haryana. We have stayed quiet. After all, what is a mosque but a dhancha or structure, as senior BJP leader L.K. Advani once said with respect to the Babri Masjid? Now, Uttar Pradesh Chief Minister Yogi Adityanath says the same about Gyanvapi. There is no regret, no sense of shame. It is just history on rewind. And we just watch.
These are indeed times of moral foibles. Every nation has its moments of neuroses. In our case, it is collective short-term amnesia. We watch and we forget. We read and we move on. Be it a man being lynched, a shop being demolished, or a woman being brutalised, our memory seems to be like a sieve. We retain very little. Are we weary of the daily sordid spectacle? Probably. Are we too occupied with the daily goings-on to really care? Most likely. Either way, it emboldens intolerant, even violent non-state actors to do what they do. If it were about a mosque here or a shop there, the rot or the mob would have been controllable. It is not, and there lies the problem.
The lack of intervention
Today, the executioners of injustice don’t need a mob with its tridents, hammers and pickaxes. Today, bulldozers get down to work. Even as a man’s life’s earning in the form of a tiny shop or a small concrete dwelling is razed to the ground, yesterday’s mob member is today’s selfie-seeker. Some make a video to upload on social media. We saw a cow vigilante pounce upon a weak man and record himself harassing and abusing him. We saw how a policeman on a train killed his supervising officer and three Muslim passengers and then made a video hailing Prime Minister Narendra Modi and Mr. Adityanath even as one of the bleeding men took his last breath near his boots. People often make videos, but few attempt to save the life of innocent people. As for bulldozer victims, they are spectators to their own destruction, brick by brick, slab by slab. Sections of the media, meanwhile, hail the rising pile of debris as a proof of instant justice.
The ferocity of destruction through bulldozers, the bestiality of mob lynchings, the brutalisation of a large segment of our population — we have seen it all. Quietly, maybe even wearily. Anomie is a lived experience in ‘New India’.
Date:05-09-23
तेजी से बढ़ रहा जलवायु परिवर्तन का खतरानितिन देसाई
वर्ष 2023 में जून और जुलाई में दर्ज औसत वैश्विक तापमान ने अब तक के सारे रिकॉर्ड तोड़ दिए हैं। जंगलों में आग लगने की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं और 20 वर्ष पहले की तुलना में अब दोगुना वन क्षेत्र ऐसी घटनाओं से प्रभावित हो रहा है। वैश्विक स्तर पर समुद्र की सतह के औसत तापमान ने मई, जून और जुलाई में दर्ज पूर्व के सभी आंकड़ों को पीछे छोड़ दिया है। सेंटर फॉर साइंस ऐंड एनवायरनमेंट के अनुसार 2022 में 365 दिनों में 314 दिन ऐसे रहे जब कहीं न कहीं मौसम में अप्रत्याशित बदलाव होने की घटनाएं हुई थीं। इन बातों से स्पष्ट है कि जलवायु परिवर्तन से जुड़े जोखिम से तत्काल निपटने की आवश्यकता है और इन्हें बिल्कुल भी टाला नहीं जा सकता है।
जलवायु परिवर्तन से जुड़े जोखिम समाप्त या कम करने के लिए पिछले 30 वर्षों से चले आ रहे प्रयास कारगर नहीं रहे हैं। वर्ष 1990 से लेकर 2019 के बीच दुनिया में पर्यावरण के लिए हानिकारक गैसों (ग्रीनहाउस गैस) का उत्सर्जन 30 अरब टन कार्बन डाइऑक्साइड समतुल्य या सीओ2ई (कार्बन डाइऑक्साइड सहित मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड सहित अन्य गैस) से बढ़कर 48 अरब टन सीओ2ई हो गया। हानिकारक गैसों के उत्सर्जन के लिए विकसित देश पूरी तरह जिम्मेदार बताए जाते हैं। इन देशों को मूल रूप से उत्सर्जन कम करने की जिम्मेदारी से मुक्त रखा गया था।
इन हानिकारक गैसों के उत्सर्जन में विकासशील देशों की बढ़ती भूमिका यूनाइटेड नेशंस फ्रेमवर्क कन्वेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (यूएनएफसीसीसी) का उल्लंघन नहीं है। यूएनएफसीसीसी के कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज (सीओपी) की 1995 में जर्मनी के बर्लिन में आयोजित हुई पहली बैठक में टिकाऊ आर्थिक वृद्धि और गरीबी खत्म करने के विकासशील देशों की आवश्यकताओं को वाजिब बताया गया। यह बात भी स्वीकार की गई कि पूर्व में और वर्तमान समय में वैश्विक स्तर पर हानिकारक गैसों के उत्सर्जन में विकासशील देशों की हिस्सेदारी सर्वाधिक रही है और विकासशील देशों में प्रति व्यक्ति उत्सर्जन का स्तर अब भी तुलनात्मक रूप से कम है। इस बिंदु को भी समझा गया कि विकासशील देशों में सामाजिक एवं विकास संबंधी आवश्यकताएं पूरी करने के लिए उत्सर्जन की मात्रा दुनिया में बढ़ेगी।
मगर इसमें अब संशोधन करना जरूरी है क्योंकि चीन को विकासशील देशों की सूची से बाहर किया जाना चाहिए। इसका कारण यह है कि 1990 से 2019 के बीच चीन का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन 2.8 से बढ़कर 8.9 टन सीओ2ई हो गया था। यह 2019 में पश्चिमी यूरोप के प्रति व्यक्ति उत्सर्जन को भी पार कर गया। इस अवधि में चीन का उत्सर्जन जितना बढ़ा वह उत्सर्जन में वैश्विक स्तर पर हुई बढ़ोतरी का 54 प्रतिशत है। चीन और भारत को इस मामले में एक ही सूची में रखने का कोई औचित्य नहीं है। भारत का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन 2019 में 1990 में चीन के उत्सर्जन की तुलना में अब भी कम है। मेरा आशय यह है कि जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर मूलभूत चुनौती से निपटने का उत्तरदायित्व अब भी विकसित देशों के कंधों पर होना चाहिए, बस इसमें एक सुधार यह किया जाना चाहिए कि चीन को भी यह उत्तरदायित्व साझा करने के लिए कहा जाना चाहिए।
वर्ष 1990 से 2020 की अवधि में अनुबंध 1 (हानिकारक गैसों के उत्सर्जन में कटौती के लिए संदर्भित 36 देश) के देशों द्वारा उत्सर्जन में 272.4 करोड़ टन सीओ2ई की कमी जरूर आई, मगर हमें यह बात भी समझनी चाहिए कि इसका एक बड़ा कारण यह था कि रूस और पूर्वी यूरोपीय देशों (अनुबंध 1 में शामिल) में उत्सर्जन में भारी कमी दर्ज की गई। यह कमी जलवायु के अनुकूल नीतियों से नहीं आई बल्कि इन देशों में अत्यधिक ऊर्जा पर आधारित उद्योगों में कमी के कारण आई। अनुबंध 1 के देशों के उत्सर्जन में आई कमी में रूस एवं पूर्वी यूरोपीय देशों की हिस्सेदारी 80 प्रतिशत से अधिक रही है। 2007 के बाद केवल पश्चिमी यूरोपीय देशों में उत्सर्जन में भारी कमी आई है।
विकसित देश और चीन अब भी जलवायु प्रबंधन के जोखिमों से निपटने में सबसे बड़ी बाधा साबित हो रहे हैं। अनुबंध 1 देशों का प्रति व्यक्ति उत्सर्जन 2019 में 12.4 टन सीओ2ई था और इनमें चीन की हिस्सेदारी 8.9 सीओ2ई थी। चीन का यह आंकड़ा भारत के 2.5 टन सीओ2ई उत्सर्जन और विकासशील देशों के 4.3 टन सीओ2ई उत्सर्जन से बहुत अधिक रहा। चूंकि, जलवायु से जुड़े जोखिम संचयी उत्सर्जन पर निर्भर करते हैं मगर 1990 से पहले के हुए उत्सर्जन पर विचार करें तो अनुबंध 1 देशों की जिम्मेदारी कहीं अधिक ठहरती है।
दुर्भाग्यवश जलवायु परिवर्तन रोकने का अभियान वैश्विक जलवायु कूटनीति से संचालित नहीं हो रहा है। पेरिस समझौते ने जलवायु कूटनीति की दिशा दो मायनों में बदल दी है। पहली बात, उत्सर्जन कम करने में विकसित देशों की भागीदारी कमजोर बनाई गई है और दूसरी बात यह कि विकासशील देशों के कंधों पर भी जिम्मेदारी डाल दी गई है।
जलवायु संबंद्ध न्याय की अनदेखी का असर अधिक उत्सर्जन करने वाले विकासशील देशों की शून्य उत्सर्जन योजना पर भी दिखता है। भविष्य को ध्यान में रखते हुए वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी 1.5 डिग्री सेल्सियस से नीचे रखने का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए कुल वैश्विक उत्सर्जन 500 अरब टन सीओ2ई से नीचे रहना चाहिए। इस तरह, प्रति व्यक्ति उत्सर्जन वर्तमान समय में और शून्य उत्सर्जन का लक्ष्य प्राप्त करने की समयसीमा के बीच औसतन 1.8 टन रहना चाहिए। कुछ समय पहले इस समाचार पत्र में प्रकाशित गणना दर्शाती है कि उत्सर्जन करने वाले बड़े देशों द्वारा शून्य उत्सर्जन के लिए घोषित तिथि के अनुसार अमेरिका का उत्सर्जन 5-7 टन, चीन का 4-6 टन, यूरोपीय संघ और ब्रिटेन का 2-3 टन, रूस का 5-8 टन और जापान का 4-5 टन रहेगा। भारत यह लक्ष्य प्राप्त करने के लिए तुलनात्मक रूप से अच्छी स्थिति में है क्योंकि इसका सालाना औसत प्रति व्यक्ति उत्सर्जन 1.5-2.3 टन के दायरे में रहेगा। हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि इसमें पूर्व में हुए उत्सर्जन के लिए किसी तरह की जवाबदेही नहीं ली गई है। अमेरिका और अन्य विकसित देश यह जवाबदेही लेने से इनकार कर चुके हैं।
इस बात की आशंका बढ़ गई है कि हम वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी 1.5 से 2 डिग्री से नीचे सीमित नहीं रख पाएंगे। जलवायु परिवर्तन का खतरा वैश्विक पारिस्थितिकी-तंत्र को चरम सीमा पार करने के करीब ले जा रहा है और खतरा अब वास्तविक लगने लगा है। हमें विकसित एवं विकासशील देश दोनों में उत्पादन एवं उपभोग के ढर्रे में बड़े बदलाव लाने की जरूरत है। मगर यह उन लोगों की तरफ से स्वतः नहीं होगा जिनके पास सरकारों एवं अन्य संस्थाओं में निर्णय लेने के अधिकार हैं। कुछ मायनों में विकसित देशों में चुनौती कहीं अधिक है जहां मौजूदा उत्पादन एवं उपभोग प्रारूप जलवायु खतरे को बढ़ाता है। विकासशील देशों में मुख्य मुद्दा भविष्य के विकास को नई दिशा देने से जुड़ा है। यह मौजूदा उत्पादन एवं उपभोग के प्रारूपों में बदलाव लाने की तुलना में अधिक आसान है।
जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए सरकारों के बीच हुए समझौते पर हमारी निर्भरता कारगर साबित नहीं हुई है। इसका समाधान यह है कि दुनिया और चीन में जलवायु परिवर्तन से जुड़े खतरे को कम करने के लिए बड़े जन आंदोलन को बढ़ावा देने की जरूरत है। जलवायु परिवर्तन रोकने की दिशा में काम करने वाले सर्वाधिक प्रभावशाली गैस-सरकारी संगठन एवं शोध संस्थाएं विकसित देशों में हैं। इनका दृष्टिकोण विकासशील देशों को लेकर भेदभाव पूर्ण रहता है और वे प्रायः पश्चिमी देशों की सरकारों के पैमाने के आधार पर दुनिया में हानिकारक गैसों के बढ़ते उत्सर्जन का आकलन एवं इसके लिए जिम्मेदारी तय करते हैं।
हमें भी भारत सहित विकासशील देशों में जलवायु संरक्षण के लिए काम करने वाले समूहों एवं शोध कार्यों में लगे संगठनों को बढ़ावा देना ताकि वे वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन रोकने के अभियान में अधिक से अधिक भूमिका निभा सकें। हमारा लक्ष्य केवल उन्हीं चीजों का प्रसार नहीं होना चाहिए जो हम अपने स्तर पर कर रहे हैं बल्कि अमेरिका, चीन एवं अन्य विकसित देशों द्वारा वादे पूरे नहीं करने की तरफ भी पूरी दुनिया का ध्यान आकृष्ट करने की दिशा में भी काम करना चाहिए।
Date:05-09-23
कृषिम मेधा से बड़े बदलावों की आहटअरिमर्दन कुमार त्रिपाठी
पिछले महीने 18 अगस्त को भारत सरकार के संचार, इलेक्ट्रानिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री ने बंगलुरु में त्रिआयामी यानी थ्रीडी प्रिंटिंग प्रौद्योगिकी से बने एक डाकघर के भवन का उद्घाटन किया। देश में इस प्रौद्योगिकी से निर्मित यह पहला भवन है, जो सामान्य बजट से तीस फीसद सस्ता और वर्तमान भवन निर्माण की प्रक्रिया की तुलना में कम यानी पैंतालीस दिनों में बनने के लक्ष्य के बावजूद तैंतालीस दिन में ही बन कर पूरा हो गया था। डिजिटल क्रांति के दौर में यह प्रयोग निश्चित रूप से खुशी का विषय है, क्योंकि जो व्यापक समाज आज तक किसी साफ्टवेयर से घर का नक्शा बनाकर और उसका प्रिंट निकाल कर खुश हो जाता था, उसने अब सीधे घर ही ‘प्रिंट’ करना शुरू कर दिया है। इसमें सिर्फ स्याही नहीं, बल्कि अलग-अलग उपयोग के लिए अलग-अलग धातु का प्रयोग हो रहा है। तब यह देखने की बात होगी कि यह भविष्य में घर के साथ और क्या-क्या ‘प्रिंट’ कर सकता है। यह अपने आप में कारखाना हो सकता है, जिसमें सब कुछ साफ्टवेयर संचालित है और वैश्विक स्तर पर इसके उत्पादों को धरातल पर उतारने के लिए कृत्रिम मेधा का अधिकतम उपयोग हो रहा है।
ऐसे में यह कहने में किसी को संकोच नहीं होना चाहिए कि त्रिआयामी यानी थ्रीडी प्रिंटिंग प्रौद्योगिकी भारत जैसे विकासशील देश में विनिर्माण के क्षेत्र में एक आमूलचूल बदलावों की पहल कर सकती है। जाहिर है, इसमें लागत और समय दोनों कम लगेंगे, साथ ही सुदूर और दुर्गम स्थानों पर विनिर्माण का काम न्यूनतम जोखिम के साथ संपन्न किया जा सकता है। ढांचागत विकास के साथ ही यह प्रौद्योगिकी लघु और कुटीर उद्योग को नया रूप दे सकती है। मानव के साथ जानवरों के हड्डी वाले अंग, खिलौने, घर में रखने वाले सजावट के सामान, फर्नीचर, बर्तन आदि बनाने के लिए ऐसे उपक्रमों की संख्या तेजी से बढ़ेगी और पारंपरिक मशीनें धीरे-धीरे पीछे छूटती जाएंगी और डिजिटल प्रौद्योगिकी की भूमिका बढ़ती जाएगी। उत्पादों के डिजाइन और स्वरूप में विविधता और आकर्षण और अधिक बढ़ेगा। उद्योगों की एक ही सांचे से बड़े पैमाने पर उत्पादन की प्रवृत्ति पर नए सिरे से विचार करने के लिए उपभोक्ताओं का दबाव बढ़ेगा।
ऐसे में कृत्रिम मेधा आधारित थ्रीडी प्रिंटिंग के एक नई औद्योगिक क्रांति के आधार बनने की पूरी संभावना है। अंकटाड की प्रौद्योगिकी और नवाचार रपट- 2023 में कहा गया है कि थ्रीडी प्रिंटिंग का बाजार तेजी से बढ़ रहा है। वैश्विक स्तर पर 2020 में इसका मूल्य बारह बिलियन डालर था, जो 2030 तक बढ़कर इक्यावन बिलियन डालर होने की उम्मीद है। साथ ही यह उद्योग कुल मिलाकर तीन से पांच मिलियन नई कुशल नौकरियां पैदा करेगा। इस क्रम में सहायक नौकरियों की भी मांग तेजी से बढ़ रही है, क्योंकि उद्योग को इंजीनियरों, साफ्टवेयर विकासकर्ता, सामग्री वैज्ञानिकों के साथ बिक्री, विपणन और अन्य विशेषज्ञों की आवश्यकता पड़ेगी।
कृत्रिम मेधा एक माध्यम है, इसका उपयोग समाज और व्यक्ति के कमोबेश सभी पहलू में हो सकता है। वर्तमान में जिन क्षेत्रों में इसका उपयोग नहीं दिख रहा है, उसमें इसका उपयोग भविष्य में नहीं होगा, यह बात शायद ही कोई समझदार व्यक्ति स्वीकार करे। उदाहरण के लिए विगत कई वर्ष से गणतंत्र दिवस के सार्वजनिक समारोह में सीसीटीवी कैमरों के माध्यम से आतंकवादियों को खोजने का प्रयोग कृत्रिम मेधा के भरोसे से ही चल रहा है, जो चेहरे पहचान कर पूर्व चिह्नित आतंकवादी या अपराधी की सार्वजनिक उपस्थिति और सक्रियता से पुलिस नियंत्रण कक्ष में सुरक्षाकर्मियों को आगाह कर सकता है। इसी तरह, एक प्रयोग रेलवे शुरू कर रहा है, जिसमें यात्रियों के सामान को उसके साथ जोड़कर उसकी चोरी की संभावना पर सुरक्षाकर्मियों को संकेत भेज सकता है। इसी क्रम में कृत्रिम मेधा के आधार पर थ्रीडी प्रिंटिंग से देश में समुद्री पुल एवं एक मानचित्र के आधार पर सीमा पर चारदिवारी का निर्माण संभव है। किसी व्यक्ति के दांत या पैर की हड्डी बनाकर इलाज में चिकित्सकों का सहयोग और मरीजों को लाभ पहुंचाने का काम हो रहा है।
आज कृत्रिम मेधा की व्यावसायिक संलिप्तता लगभग हर उद्योग के विकास और स्वचालन में पाई जा सकती है। इसलिए देश में इसकी व्यापकता के आंकड़ों का सटीक अनुमान लगाना तो कठिन है, लेकिन बीती फरवरी में नैसकाम के हवाले से सरकार ने संसद में बताया कि भारत में कृत्रिम मेधा से लगभग 4,16,000 पेशेवरों के लिए रोजगार के सृजन का अनुमान है। इसके अलावा, सन् 2035 तक कृत्रिम मेधा द्वारा भारत की अर्थव्यवस्था में 957 बिलियन अमेरिकी डालर के अतिरिक्त योगदान देने की उम्मीद है। इसके वर्तमान वैश्विक बाजार में 2020 की तुलना में 2021 में निजी निवेश 103 फीसद बढ़कर 96.5 बिलियन डालर हो गया था। अकेले अमेरिका में उद्योगों और व्यवसायों में कृत्रिम मेधा आधारित कुशल लोगों की मांग तेजी से बढ़ी है। 2010 और 2019 के बीच ऐसे लोगों की मांग में दस गुना वृद्धि हुई। हालांकि भारतीय संदर्भों में इससे सतर्क होने की भी आवश्यकता है, क्योंकि इन स्थितियों में कुशल कामगारों की जरूरत तो बनी रहेगी, लेकिन अकुशल कामगारों के रोजगार का संघर्ष और बढ़ेगा। यही नहीं, जब छोटे व्यवसायों के उत्पाद-निर्माण में स्वचालन बढ़ेगा, तो अकुशल या जरूरत के मानकों पर अक्षम लोगों की बड़े पैमाने पर छंटनी होगी, जो आजकल अक्सर सुनने को भी मिल जाती है। यह नहीं भूलना चाहिए कि यातायात के तमाम साधनों के बीच आज भी कोलकाता में हाथ से खींचने वाला रिक्शा इसी तर्क पर बना हुआ है कि ऐसे रिक्शा चालकों की कुशलता इसी कार्य में सर्वोत्तम है। यह उनके जीवन-भरण का एकमात्र साधन के साथ मजबूरी भी है।
एक माध्यम के तौर पर कृत्रिम मेधा का नकारात्मक उपयोग भी समांतर रूप से चल रहा है। त्रिआयामी यानी थ्रीडी प्रिंटिंग प्रौद्योगिकी की सहायता से हम फोरेंसिक साक्ष्य तैयार कर सकते हैं, कृत्रिम मेधा से इनका तथ्यगत विश्लेषण कर सकते हैं, जिनसे अपराध को रोकने में सहायता मिल सकती है, लेकिन इन्हीं माध्यमों से शातिर अपराधों को भी बढ़ावा मिल रहा है। सेंसर आधारित ड्रोन से किसी मरीज तक जल्दी से दवा पहुंचाई जा रही है, लेकिन ऐसे ही ड्रोन से हथियारों और नशा की सामग्रियों की अंतरराष्ट्रीय तस्करी आज एक चुनौती बन कर उभरी है। दूसरी तरफ यह सोचने का समय है कि हमारी डिजिटल उपस्थिति से मिले डेट दरअसल शोधों के विकास और सहायक ‘मशीन लर्निंग’ में केंद्रीय भूमिका निभा रहे हैं, लेकिन हम इन सब प्रक्रियाओं से पूरी तरह से या तो अनभिज्ञ हैं या इसके लिए कुछ कर पाने में असमर्थ। देश की लगभग डेढ़ सौ करोड़ की आबादी में से एक बड़ी संख्या में लोग किसी न किसी रूप में इस डिजिटल दुनिया से जुड़े हैं और यह हर जुड़ाव डिजिटल संसाधन तैयार कर रहा है, जिनका मुक्त दोहन निजी कंपनियों द्वारा हो रहा है।
ध्यान रखने बात है कि डिजिटल दुनिया में नित्य बदलाव हो रहे हैं, लेकिन इसके नियमन का काम आज भी सन् 2000 में बने नियम से काम चलाया जा रहा था। हालांकि अभी संसद से डिजिटल व्यक्तिगत डेटा संरक्षण अधिनियम, 2023 पास हुआ है, जिसमें भारतीय डेटा संरक्षण बोर्ड बनाने की बात हुई है। यह बोर्ड कैसे भारतीय डिजिटल डाटा का संसाधन और निजता की सुरक्षा करता है, यह तो समय बताएगा, लेकिन कृत्रिम मेधा से तेजी से बन रहे बाजार में हमारी मौलिक भागीदारी किस रूप में हो रही है, यह विचारणीय है, ताकि विश्व में सबसे बड़ी आबादी और सबसे अधिक इंटरनेट डाटा खपत करने वाले देश के रूप में हमारी भूमिका सिर्फ मजदूर या खरीदार तक ही सीमित न रहे। अगर आज इन उपायों पर तेजी से अमल नहीं किया गया, तो यह न तो समय के साथ न्याय होगा और न ही हमारी क्षमताओं की अलग से वैश्विक पहचान होगी।
Date:05-09-23
जिनपिंग का न आनासंपादकीय
दुनिया को शांति का संदेश देने वाले गौतम बुद्ध के देश भारत में जी-20 शिखर सम्मेलन की तैयारियां आखिरी चरण में हैं और यह दुनिया के लिए किसी खुशखबरी से कम नहीं है। दूसरी ओर, कुछ अफसोस की खबर है कि इस सम्मेलन में भाग लेने के लिए चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग नहीं आ रहे हैं। यह सूचना तो पिछले सप्ताह से ही आ रही थी, पर अब इसकी आधिकारिक पुष्टि हो गई है। रूसी राष्ट्रपति पुतिन पहले ही यूक्रेन के साथ युद्ध की वजह से मना कर चुके हैं। इसके पीछे भले ही कोई गहरी कूटनीति न हो, मगर देखने वाले रूस-चीन के शीर्ष नेताओं की बेरुखी का कोई तो मतलब निकालेंगे। इससे यह भी अंदेशा होता है कि ये दोनों नेता जी-20 को लेकर पर्याप्त गंभीर नहीं हैं। ऐसा इसलिए भी होगा, क्योंकि जी-20 में शांतिप्रिय पश्चिमी देशों का वर्चस्व है। इसके अलावा, शांति के पक्षधर और पंचशील की बुनियाद रखने वाले युद्ध विरोधी भारत के पास इसकी अध्यक्षता है, जिसे लेकर शुरू से चीन असहज है। जी-20 के सदस्य देश यह बात जानते हैं कि चीन लगभग हरेक मोर्चे पर भारत के प्रयासों का विरोध करता आया है। फिर भी यह सच है, अमेरिका सहित अनेक देश होंगे, जिन्हें शी जिनपिंग के दिल्ली न आने से निराशा होगी।
दरअसल, दुनिया के देशों को यह समझना होगा कि इस वक्त चीन और रूस, दोनों ही अपने हिसाब से दुनिया को संचालित करना चाहते हैं। दोनों की मंशा अपने पड़ोसी देशों की संप्रभुता को नष्ट करने की है और साथ ही, इस सरासर अन्यायपूर्ण व अमानवीय कृत्य में वे जी-20 जैसे मंचों का समर्थन भी चाहते हैं। कैसे भुला दिया जाए कि पुतिन यूक्रेन के खिलाफ बाकायदा युद्ध लड़ रहे हैं, तो चीन ताइवान व भारतीय इलाकों पर लगातार गिद्धदृष्टि गड़ाए बैठा है? इसके बावजूद दुनिया में निरंतर सशक्त होते भारत को न तो निराश होना चाहिए और न हार मानकर बैठ जाना चाहिए। दुनिया के प्रति भारत की अपनी स्वतंत्र नीति है और उसी के अनुरूप आचरण जारी रहना चाहिए। ध्यान रहे, हमारी प्रगति के प्रति प्रतिकूल नजरिया रखने वाले देशों की चलती, तो भारत में कभी जी-20 का आयोजन नहीं होता और न अध्यक्षता मिलती। भारत ने जो भी पाया है, अपने प्रयासों से पाया है और आगे भी उसे अपने पुरुषार्थ से ही सफलताएं हासिल होंगी। आज भारत-चीन द्विपक्षीय संबंधों में गिरावट के लिए अकेले चीनी राष्ट्रपति जिम्मेदार हैं। एकाधिक ऐसे उदाहरण हैं, जिनसे यह सिद्ध किया जा सकता है कि चीन संबंधों को सामान्य बनाना नहीं चाहता है। खैर, इस सप्ताह भारत में होने वाले शिखर सम्मेलन में शामिल होने के लिए चीनी प्रधानमंत्री ली केकियांग आ रहे हैं। उम्मीद करनी चाहिए कि जोड़ने-जुड़ने के शिखर मंच पर चीन की ओर से तोड़ने-टूटने की बातें नहीं होंगी।
आज भारत में सर्वपल्ली राधाकृष्णन को याद किया जा रहा है। राधाकृष्णन एक ऐसे नेता थे, जिन्होंने चीन के निर्माता माओत्से तुंग का गाल थपथपाकर अपनापन जताया था। जिन्होंने सोवियत संघ के नेता स्टालिन से कहा था कि शीत युद्ध से अपना हाथ पीछे खींच लीजिए। जाहिर है, न स्टालिन माने और न चीन। आज दार्शनिक राधाकृष्णन का देश भारत दुनिया के तमाम दिग्गज नेताओं के लिए पलक-पांवड़े बिछा रहा है, सच्चे मन से शांति के प्रयास कर रहा है, उसे अपने प्रयासों में कोई कमी नहीं करनी चाहिए। दिल्ली के आयोजन को ऐसे ऐतिहासिक बनाना चाहिए कि आने वाले वर्षों में दुनिया याद करे।
Date:05-09-23
हम औरत को कब तक कमतर समझेंगेविभूति नारायण राय, ( पूर्व आईपीएस अधिकारी )
एक दिन के अंतराल से दो खबरें आईं। दोनों देश में महिलाओं की स्थिति को एकदम विपरीत कोण से रेखांकित करती हैं। पहली खबर आई राजस्थान में प्रतापगढ़ जिले के एक सुदूर गांव से, जहां एक आदिवासी महिला को उसके ससुरालियों ने निर्वस्त्र करके घुमाया। उसका कुसूर था कि वह अपनी पसंद के मर्द के साथ रहना चाहती थी। दूसरी खबरी थी कि इसरो ने तमिल ग्रामीण पृष्ठभूमि की मुस्लिम महिला निगार शाजी के नेतृत्व में देश का पहला मेगा सूर्य मिशन आदित्य एल वन सफलतापूर्वक प्रक्षेपित कर दिया है। भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने एक बार कहा था कि भारत में बैलगाड़ी और हवाई जहाज साथ-साथ चलते हैं। दोनों खबरें देश में औरतों की स्थिति के इसी विरोधाभास को रेखांकित करती हैं।
जो खबर राजस्थान से आई, वह किसी भी प्रदेश से आ सकती है। कुछ ही दिनों पहले मणिपुर में इससे भी भयंकर घटना प्रकाश में आई थी। मीडिया ऐसी घटनाओं की रिपोर्टिंग करता ही रहता है, इसलिए किसी एक दल को इसके लिए जिम्मेदार ठहराने का कोई औचित्य नहीं है। न तो यह समस्या एक राजनीतिक दल के कुशासन की देन है और न ही इसका हल किसी शून्य से उपजेगा। यह हमारे मन में गहरी पैठी दुर्भावनाओं की उपज है और इसका सामना भी बड़ी सांस्कृतिक क्रांति से ही हो सकेगा। राजनीतिक दल तो अपने सकारात्मक हस्तक्षेपों से परिवर्तन के लिए उत्प्रेरक का काम कर सकते हैं।
कानून समय सापेक्ष होते हैं। वे समाज में व्याप्त मूल्यों को प्रतिबिंबित करते हैं। श्रम विभाजन से विकसित मनुष्य जाति का इतिहास ्त्रिरयों को पुरुषों से कमतर आंकने में विश्वास करता रहा है और उसी के अनुसार, निर्मित कानूनों ने भी उसे निचले पायदान पर रखा। भारत में प्रचलित वर्तमान कानून और उन्हें लागू कराने वाली संस्था पुलिस 1860 के दशक में निर्मित हुई और तब तक इस बात की कल्पना भी असंभव थी कि स्त्री और पुरुष कानून के समक्ष समान हैं, इसलिए यह स्वाभाविक ही था कि विवाह, संपत्ति, उत्तराधिकार या यौनिक शुचिता के मसलों में कानून का पलड़ा पुरुषों के पक्ष में झुका हुआ था। यह तो आधुनिक शिक्षा के प्रसार और उसके फलस्वरूप बदलते मूल्यबोध से ही संभव हुआ है कि स्त्री को काफी हद तक कानूनी बराबरी मिल सकी है।
काफी कुछ बदली परिस्थितियों के बावजूद ऐसा क्योंकर है कि अभी भी भारतीय समाज के भिन्न हिस्सों से अपमानजनक ढंग से औरतों की परेड जैसी खबरें आती रहती हैं? इसका एक ही कारण समझ में आता है कि अभी भी हम उन्हें बराबरी का हक देने के लिए तैयार नहीं हैं। कानून बना देने भर से काम नहीं चलता, सोच बदलने के लिए एक लंबी यात्रा करनी पड़ती है और संभवत: हम उसी संक्रमण से गुजर रहे हैं।
मुझे इस विषय में एक दिलचस्प अनुभव याद आ रहा है। अपनी एक नियुक्ति के दौरान मैंने अनुभव किया कि पारिवारिक हिंसा की शिकार महिलाएं पुलिस थानों में अपनी शिकायतें लेकर जाती तो हैं, पर आमतौर से पुलिस कार्रवाई से संतुष्ट नहीं हो पाती हैं। तब तक हर थाने में महिला पुलिसकर्मियों की नियुक्ति होने लगी थी और हर जिले में महिला थाने भी कार्यरत हो गए थे। पीड़ित महिलाओं की सबसे बड़ी शिकायत थी कि पति या ससुराली जनों की शारीरिक या भावनात्मक हिंसा की शिकार होकर थाने पहुंचने पर उनकी पीड़ा को कमतर करके आंका जाता है। काउंसलिंग के नाम पर अक्सर उन्हें ही सलाह दी जाती है कि परिवार बचाने के लिए थोड़ी-बहुत हिंसा उन्हें बर्दाश्त करनी ही चाहिए। मजेदार बात थी कि इस तरह की सलाह कोई महिला पुलिसकर्मी ही देने लगती थी। कहीं न कहीं काउंसलिंग का मकसद पीड़िता को उसी परिवार में वापस भेजने के लिए तैयार करना होता, जिसकी हिंसा से त्रस्त होकर वह पुलिस के पास आई थी। कई बार तो कोई महिला पुलिसकर्मी अपना ही उदाहरण देने लगती कि कैसे पारिवारिक हिंसा झेलकर उसने अपना दांपत्य ‘बचाया’ है। यह शायद हमारी सामाजिक संरचना की विशेषता है कि ज्यादातर मामलों में पीड़िता आसानी से इस सलाह को मान भी जाती है। दिक्कत तब आती है, जब घर बचाने के चक्कर में वापस जाने वाली फिर पिटकर पुलिस के पास आती है और थाने से निराश होकर वरिष्ठ अधिकारियों के चक्कर लगाने लगती है। ऐसे ही कुछ निराशाजनक मामलों से दो चार होने के बाद मैंने अधीनस्थ पुलिसकर्मियों को संवेदनशील बनाने के लिए कुछ करने की सोची थी।
लखनऊ की सक्रिय महिला कार्यकर्ताओं की मदद से विभिन्न थानों में कार्यरत महिला व पुरुष पुलिसकर्मियों की एक कार्यशाला आयोजित की गई। यह बहुत अप्रत्याशित नहीं था कि भाग लेने वालों में से अधिकांश मानते थे कि थोड़ी-बहुत पारिवारिक हिंसा तो चलती ही रहती है। उनमें से ज्यादातर मानते थे कि पुलिस के हस्तक्षेप के बाद घर ‘टूटने’ की आशंका बढ़ जाती है। आम सहमति थी कि दोनों पक्षों की काउंसलिंग कर दांपत्य बचाने की कोशिश करनी चाहिए, पर ज्यादातर के पास इस प्रश्न का कोई स्पष्ट उत्तर नहीं था कि हिंसा की शिकार को ही हर बार समर्पण कर एक तकलीफदेह रिश्ता बचाने का प्रयास क्यों करना चाहिए? हम सभी जानते थे कि यह समझ किसी पीड़िता के आर्थिक, पारिवारिक और सामाजिक यथार्थ से जुड़ी हुई है और इसे बदलने में बहुत वक्त लगेगा। पुलिसकर्मी भी उसी समाज से आते हैं, जिसका अंग पीड़िता है।
घरेलू हिंसा की ही तरह स्त्री के विरुद्ध सामाजिक हिंसा भी खास तरह के मूल्यबोध की उपज है। अपने शरीर पर उसका अधिकार नहीं है, इसलिए निर्वस्त्र करके घुमाना दंड देने का आदिम तरीका है। युद्धों में विजित को सबक सिखाने के लिए उसके पक्ष की स्त्रियों को अपमानित किया जाता था। आज भी सांप्रदायिक हिंसा के दौरान बलात्कार वहशी आनंद के अतिरिक्त कई बार दूसरे समुदाय को दंड देने के लिए होता है। चुड़ैल बताकर भी स्त्री को निशाना बनाया जाता है। हालिया समय में संपत्ति में बराबरी के हक ने भी हिंसा के नए रूप सामने ला दिए हैं।
प्रतापगढ़ में निर्वस्त्र घुमाई जाती और इसरो के सूर्य मिशन का नेतृत्व करती स्त्रियाँ की असंबद्ध छवियां भारत की सच्चाई है। उम्मीद की जानी चाहिए कि दूसरी वाली छवि ज्यादा प्रभावी होकर बार-बार हमारे सामने आए और पहली वाली छवि धीरे-धीरे ओझल होते-होते इतिहास की किताबों का हिस्सा बन जाए।
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हाल ही में भारतीय प्रधानमंत्री मोदी और श्रीलंका के राष्ट्रपति रानिल विक्रमसिंधे ने दोनों देशों के बीच आर्थिक साझेदारी, कनेक्टिविटी और समृद्धि को उत्प्रेरित करने की दृष्टि से संयुक्त बयान जारी किया है। कुछ मुख्य बिंदु –
कुछ महत्वपूर्ण, जो छूट गया –
भारत और श्रीलंका के बीच ऐतिहासिक संबंध रहे हैं। तमिल व अन्य मुद्दों पर बीच में कटुता का वातावरण बन गया था। जब तक विवादास्पद मुद्दों का सौहार्दपूर्ण समाधान नहीं निकाला जाता है, तब तक दोनों देशों के बीच समझौते का कोई भी दृष्टिकोण अधूरा माना जाएगा।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधरित। 25 जुलाई, 2023
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Date:04-09-23
1 Nation, Many QuestionsOne-time elections are an intuitively appealing idea. But will they make govts work better?TOI Editorials
The attempt to explore the feasibility of holding simultaneous elections in India across all levels of government got off to a controversial start. Adhir Ranjan Chowdhury, Congress leader in Lok Sabha and the only opposition politician in the eight-member committee headed by former president Ram Nath Kovind, opted out of it. The Kovind committee has been tasked with studying the issue.
India had simultaneous elections for the first 15 years. However, unstable coalitions after the 1967 elections led to a breakdown in the synchronicity of government formation. Five years ago, the law commission explored the subject in a draft report. It concluded that significant legislative changes would be needed, including constitutional amendments which should be ratified by at least half the state assemblies. The commission suggested that the goal could be reached gradually by bunching assembly elections in batches till we finally hold them together. As an overarching principle, simultaneous elections are an appealing goal. However, since it involves significant disruption in a politically charged atmosphere, including prospective delimitation, it’s important to weigh the costs and benefits.
The most frequently cited reasons for the transition are that it will improve governance and costs of conducting elections will come down. The governance argument is unconvincing. First, governance issues at local bodies like municipalities are unrelated to elections. State governments have been reluctant to devolve power, which has led to underfunded and often fragmented urban governance systems. In case of state assemblies, election-influenced disruption comes at the tail end of the term. If a government fails to perform till that phase, the problem is unlikely to be solved by simultaneous elections.
On the cost front, there’s no doubt that simultaneous elections will help EC. But the elephant in the room is the real spending by political parties. Delhi-based CMS estimated that between 1998 and 2019, aggregate Lok Sabha poll expenditure by political parties increased from ₹9,000 crore to over ₹55,000 crore. We seem to have the most expensive elections globally, which impact governance. The Kovind committee should examine the issue in all its dimensions.
Date:04-09-23
Small Towns Getting Big Deal for JobsTech pushing gig economy into the hinterland.ET Editorials
India’s job market is moving out of its metropolises and into its tier-2 and -3 cities. The middle class is growing at its most rapid pace in these towns, and both white and blue collar employment is tracking the associated rise in consumption. Principal exports of goods and services are served from these locations, and companies are ramping up hiring closer to talent pools. Manufacturing and pharmaceuticals are clustered beyond the metros as are skilling opportunities for those in the IT industries. Financial services are radiating out, creating strong demand for manpower. Technology is pushing the gig economy into the hinterland. GoI and state governments are doing their bit, too, by plugging connectivity and infrastructure gaps.
Delhi and Mumbai are already in the list of the world’s top 10 megacities. But India has a sizable number of urban agglomerations that are actually pushing its urbanisation. Economic output is concentrating in these cities ferociously. Demand for housing and transportation are the most powerful propellers followed by healthcare and education services. All these industries have a big multiplier effect on employment. Realignment of global supply chains should contribute to the process by developing new manufacturing clusters with allied growth in indirect jobs in services.
Migration is principally intra-state, which makes radial urbanisation the natural course to follow. The cost of replenishing infrastructure in metro cities outweighs greenfield investments in tier-2 towns where land and labour are cheaper and demand is stronger. Job-seekers find it a compelling option in terms of cost of living. Since these are the growth markets, career progression is also reasonably assured. Skilling needs are also being addressed: a big slice of the team that placed a craft on the lunar surface are from small towns with initial education outside the top drawer of the country’s technical institutes. India is sustaining its economic growth on talent that cannot emigrate. Jobs need to go where it is to be found.
Date:04-09-23
चुनाव प्रस्ताव पर हो व्यापक विमर्शसंपादकीय
पिछले सप्ताह केंद्र सरकार ने दो महत्त्वपूर्ण राजनीतिक प्रस्ताव लाकर सबको चकित कर दिया। पहले सरकार ने 18 से 22 सितंबर के बीच संसद का विशेष सत्र आयोजित करने की घोषणा कर दी। हालांकि, सरकार ने यह सार्वजनिक नहीं किया कि विशेष सत्र की कार्य सूची क्या होगी। मगर सरकार की तरफ से जो दूसरी राजनीतिक घोषणा की गई वह अधिक चौंकाने वाली थी। सरकार ने कहा कि देश में लोकसभा एवं विधानसभाओं के चुनाव साथ-साथ आयोजित करने की संभावनाओं का पता लगाने के लिए पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में एक उच्च स्तरीय समिति गठित की गई है। गृह मंत्री अमित शाह, राज्यसभा में विपक्ष के पूर्व नेता गुलाम नबी आजाद, 15वीं वित्त आयोग के पूर्व चेयरमैन एन के सिंह, लोकसभा के पूर्व महासचिव सुभाष कश्यप और पूर्व मुख्य सतर्कता अधिकारी संजय कोठारी समिति के अन्य सदस्य होंगे। लोकसभा में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी को इस समिति में शामिल किया गया था, मगर उन्होंने यह प्रस्ताव स्वीकार नहीं किया।
दिलचस्प बात यह है कि इस समिति का गठन ऐसे समय में हुआ है जब देश में एक के बाद एक कई चुनाव होने वाले हैं और अगले वर्ष लोकसभा चुनाव संपन्न होने के बाद यह प्रक्रिया समाप्त होगी। जहां तक समिति के सदस्यों के चयन की बात है तो यह बिंदु विचारणीय है कि चुनावों के समय में संशोधन लाने का प्रस्ताव राजनीतिक विषय है, इसलिए इसमें अधिक प्रतिनिधित्व होना चाहिए था।
समिति लोकसभा, राज्य विधानसभाओं, नगर निगम और पंचायतों के चुनाव एक साथ आयोजित करने से संबंधित संवैधानिक एवं अन्य पहलुओं पर विचार करेगी और अपने सुझाव सरकार को सौंपेगी। देश में सभी स्तरों का चुनाव एक साथ आयोजित करने का विषय नया नहीं है और इसकी पहले भी विवेचना हो चुकी है। विधि आयोग और व्यक्ति, लोक शिकायत, विधि एवं न्याय पर विभाग-संबंधित संसद की स्थायी समिति भी इस प्रस्ताव का अध्ययन कर चुकी है। वास्तव में देश में 1952 से 1967 तक लोकसभा एवं राज्य विधानसभाओं के चुनाव साथ-साथ ही हो रहे थे। मगर 1968 और 1969 में विभिन्न कारणों से कार्यकाल पूरा होने से पहले ही राज्य विधानसभाओं के भंग होने के बाद चुनाव आयोजित करने के समय बदल गए। कई बार लोकसभा भी समय से पहले भंग हो चुकी है।
लोकसभा एवं राज्य विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराने का प्रस्ताव का आधार कम से कम सिद्धांत रूप में मजबूत प्रतीत होता है। यद्यपि, आदर्श आचार संहिता से विकास कार्य प्रभावित होते हैं मगर इससे भी बड़ी समस्या यह है कि राजनीतिक दल लगातार चुनाव अभियान में लगे रहते हैं, जिससे नीति-निर्धारण पर प्रतिकूल असर होता है। अंतरराष्ट्रीय बाजार के अनुसार ईंधन के मूल्य तय करने में भी कई बार चुनावी नफा-नुकसान के चक्कर में देर हो जाती है। चुनाव साथ-साथ कराने का एक लाभ यह भी होगा कि धन की बचत- सरकारी कोष एवं राजनीतिक दल दोनों के लिए- होगी। हालांकि, जैसा कि पिछली कई रिपोर्ट में रेखांकित किया गया है, संविधान एवं अन्य कानूनों- लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम 1951 आदि- में संशोधन के अतिरिक्त कुछ व्यावहारिक कठिनाइयां भी होंगी।
राज्य विधानसभाओं या लोकसभा के समय पूर्व भंग होने की आशंका बनी रहेगी। इन स्थितियों में निर्धारित समय से पहले चुनाव नहीं कराने के दूसरे परिणाम भी हो सकते हैं। यह सुझाव दिया गया था कि विधानसभाओं का कार्यकाल बढ़ा दिए जाए या एक सीमा तक इसे कम कर दिया जाए। लोकसभा के निर्धारित कार्यकाल से पहले भंग होने की स्थिति से बचने के लिए विधि आयोग और चुनाव आयोग ने सुझाव दिया था कि अविश्वास प्रस्ताव के साथ एक वैकल्पिक सरकार के लिए विश्वास का प्रस्ताव भी रखा जाए। मगर यह एक पर्याप्त समाधान नहीं होगा। सरकार के पास सदन का विश्वास होना महत्त्वपूर्ण है, भले ही विपक्ष एक वैकल्पिक सरकार देने में स्वयं को समर्थ पाए या नहीं। इस प्रकार, कोविंद समिति को ऐसे सभी सुझावों पर सावधानी से विचार करना होगा। समिति चाहे तो अपने सुझाव सौंपने से पहले व्यापक विचार-विमर्श कर सकती है और ऐसा करना उचित भी होगा। सरकार के लिए भी आवश्यक है कि वह इस प्रस्ताव पर किसी तरह की जल्दबाजी नहीं दिखाए क्योंकि इन बदलावों के महत्त्वपूर्ण राजनीतिक परिणाम हो सकते हैं।
Date:04-09-23
चुनाव का समयसंपादकीय
सरकार लंबे समय से चाहती रही है कि लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ कराए जाएं। प्रधानमंत्री कई मौकों पर दोहरा चुके हैं कि ‘एक राष्ट्र एक चुनाव’ का विधान होना चाहिए। इसे लेकर निर्वाचन आयोग मंथन भी कर चुका है। विधि आयोग ने भी इस पर अपने विचार दिए हैं। अब लगता है कि यह व्यवस्था लागू करने की कोई सूरत बन सकेगी। इसके लिए केंद्र ने पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद की अध्यक्षता में एक समिति गठित कर दी है। यह समिति किस तरह इस विचार को व्यावहारिक रूप दे पाती है, देखने की बात है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव अलग-अलग समय पर कराने से सरकारी खजाने पर भारी बोझ पड़ता है। सरकारी कर्मचारियों का काफी समय इनकी तैयारियों और इन्हें संपन्न कराने में जाया हो जाता है। ऐसे में सारे चुनाव एक साथ कराने से सार्वजनिक धन की काफी बचत होगी। हालांकि निर्वाचन आयोग बता चुका है कि इसके लिए उसे बड़ी संख्या में वोटिंग मशीनों और दूसरे उपकरणों की जरूरत पड़ेगी। मगर अलग-अलग चुनावों पर आने वाले खर्च की तुलना में इन संसाधनों को जुटाना कोई बड़ा काम नहीं माना जा सकता। असल मुश्किल संविधान संशोधन और फिर यह सुनिश्चित करने की है कि भविष्य में भी चुनाव एक साथ होते रहें। इसका क्या विधान होगा, यह एक जटिल काम है।
आजादी के शुरुआती वर्षों में लोकसभा और विधानसभाओं के चुनाव एक साथ ही हुआ करते थे। मगर करीब बीस वर्षों बाद कुछ विधानसभाएं और फिर लोकसभा अपना तय कार्यकाल पूरा नहीं कर पाई, जिसके चलते वह चक्र टूट गया और फिर टूटता ही गया। अब स्थिति यह है कि साल में कई चुनाव कराने पड़ते हैं। इस तरह चुनावों का मौसम कई बार साल भर बना रहता है। इससे राजनीतिक दलों के नेताओं को अपना काफी वक्त इसमें देना पड़ता है। निर्वाचन आयोग को भी पूरे समय अपना ध्यान कहीं न कहीं चुनाव की तैयारियों पर लगाए रखना पड़ता है। सुरक्षाबलों और सरकारी कर्मचारियों को अपने नियमित कामकाज छोड़ कर इनमें शामिल होना पड़ता है। चुनाव खर्च का बजट लगातार बढ़ता गया है। इस पर काबू पाना निश्चित रूप से अच्छा विचार है। मगर इसके लिए कई विधानसभाओं के कार्यकाल में कटौती और कई के कार्यकाल में विस्तार करना आसान नहीं होगा। जिन विधानसभाओं के चुनाव कुछ समय पहले ही हुए हैं और उनका कार्यकाल तीन साल से अधिक है, उन्हें यह फैसला स्वीकार्य नहीं होगा। फिर, यह संवैधानिक प्रावधान का उल्लंघन होगा।
एक साथ चुनाव कराने की व्यवस्था लागू होने के बाद फिर भी यह सवाल बना रहेगा कि अगर आगे कभी लोकसभा या कोई विधानसभा अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाती, बीच में ही सरकार गिर जाती है, तो उस स्थिति में क्या होगा। ऐसे में मध्यावधि चुनाव के बजाय क्या तब तक वैकल्पिक व्यवस्था लागू रखी जाएगी, जब तक कि अगले चुनाव का समय नहीं आ जाता? ऐसा नियम बनाने से पूरी शासन-प्रणाली गड़बड़ा सकती है। इसलिए केंद्र सरकार की ताजा पहल पर विपक्षी दलों का कहना है कि अगर यह व्यवस्था लागू होती है, तो पूरा संघीय ढांचा ही खतरे में पड़ सकता है। इस महीने बुलाए गए संसद के विशेष सत्र में सरकार इसकी क्या रूपरेखा पेश करती है, सारी कवायद उसी पर निर्भर करेगी। पर यह अपेक्षा स्वाभाविक है कि किसी भी रूप में इसका ढांचा अव्यावहारिक नहीं होना चाहिए।
Date:04-09-23
अब सूर्य की ओरसंपादकीय
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान केंद्र ने एक और ऐतिहासिक मुकाम हासिल कर लिया। योजना के अनुसार, आदित्य-एल1 का संचालन सफलतापूर्वक चल रहा है। भारत ने इसरो के ही पीएसएलवी रॉकेट के साथ अपना पहला सौर अभियान शुरू किया है और भारत ऐसा करने वाला दुनिया का तीसरा देश है। एशिया में इससे पहले किसी भी देश ने सौर अभियान नहीं चलाया है। अब आदित्य एल 1 यान 125 दिन की यात्रा करके सूर्य के करीब एक ऐसी परिक्रमा कक्ष में पहुंच जाएगा, जहां से सूर्य का अध्ययन सुरक्षित ढंग से किया जा सके। सूर्य के पास जाना वैसे तो खतरे से खाली नहीं है, क्योंकि उसके पास जाने की कोशिश करने वाली कोई भी चीज खाक हो सकती है। कुल मिलाकर, सूर्य अभी पृथ्वी के विज्ञान से बहुत दूर है। आदित्य एल 1 पृथ्वी से महज 15 लाख किलोमीटर दूर जाकर उसकी परिक्रमा करने लगेगा, जबकि पृथ्वी से सूर्य 15 करोड़ किलोमीटर दूर है। मतलब, सूर्य की ओर जाने के बावजूद आदित्य-एल1 तुलनात्मक रूप से पृथ्वी के ही करीब रहेगा। सूर्य के 15 लाख किलोमीटर दूर पहुंचना असंभव है, इस दिशा में अमेरिका या नासा की कुछ कोशिशें नाकाम हुई हैं।
आदित्य-एल1 के साथ खास बात यह है कि यह सूर्य को सतत देखेगा और किसी भी प्रकार के ग्रहण का शिकार नहीं होगा। अंतिम रूप से इस यान के साथ सात पेलोड या उपकरण संलग्न रहेंगे। इन उपकरणों के जरिये जो आंकड़े या तथ्य अंतरिक्ष में जुटाए जाएंगे, वे सब पृथ्वी पर अध्ययन के लिए उपलब्ध होंगे। इसमें सबसे महत्वपूर्ण पेलोड या उपकरण विजबिल एमिशन लाइन कोरोनाग्राफ ( वीईएलसी) को माना जा रहा है। यह उपकरण विश्लेषण के लिए प्रतिदिन लगभग 1,440 सौर छवियों को दर्ज करेगा। यह यान सौर शक्ति की मदद से अपने लिए ऊर्जा पैदा करने में सक्षम है और यही नहीं, आगे अपनी निर्धारित कक्ष में स्थापित होने के लिए भी यह यान ऊर्जा पैदा कर सकता है। इस अभियानका प्राथमिक उद्देश्य प्रतिदिन 24 घंटे सूर्य का निरीक्षण करने की क्षमता को बढ़ाना है। सूर्य के अवलोकन से उसकी गतिविधि पर बारीकी से नजर रखने में मदद मिलेगी। आदित्य-एल1 द्वारा किए अवलोकन से सूर्य की सतह और सौर तूफानों के दौरान उच्च- ऊर्जा कणों के उत्सर्जन के बीच संबंध को समझने में मदद मिलेगी।
उधर, चंद्रयान- 3 पूरी तरह से सफल रहा है और चांद पर मौजूद रोवर को इसरो ने साइलेंट मोड में डाल दिया है। अब सबकी नजर नयान पर टिक गई है। आदित्य-एल1 के प्रक्षेपण के अवसर पर केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने बताया है कि देश का अगला अंतरिक्ष अभियान गगनयान की पहली परीक्षण उड़ान होगी। सब कुछ ठीक रहा, तो भारत अक्तूबर महीने में गगनयान को प्रक्षेपित करेगा। विगत अनेक महीनों से गगनयान की तैयारी को अंतिम रूप दिया जा रहा है। गगनयान अभियान के तहत चार अंतरिक्ष यात्रियों को पृथ्वी के 400 किलोमीटर दूर मौजूद कक्ष में भेजने की योजना है। योजना के अनुसार, गगनयान सात दिन अंतरिक्ष में परिक्रमा करने के बाद पृथ्वी पर लौट आएगा। यहां धरती पर अंतरिक्ष यात्रियों की सफल या सुरक्षित वापसी ही सबसे बड़ी चुनौती है। जहां एक ओर इसरो को पूरी सुरक्षा और सफलता सुनिश्चित करने के बाद ही कदम आगे बढ़ाना चाहिए, वहीं सरकार की जिम्मेदारी है कि वह इन अभियानों में संसाधन या किसी भी प्रकार की कमी न आने दे।
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केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने लगभग एक वर्ष से एकल-उपयोग प्लास्टिक (सिंगल यूज प्लास्टिक) पर प्रतिबंध लगा रखा है। यह प्रतिबंध प्लास्टिक वस्तुओं के निर्माण, आयात, भंडारण, वितरण, बिक्री और उपयोग पर है। फिर भी यह अभी भी शहरों में नालियों को जाम कर रहा है। दरअसल, राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों ने इस मुद्दे को जरा भी गंभीरता से नहीं लिया है। कर्नाटक में कई स्थानों के साथ ही बेंगलुरू की नगरपालिका ने इस नियम को कड़ाई से लागू किया है। इसके लिए जागरूकता अभियान और दंडात्मक उपायों को सक्रिय रखा है।
आखिर एकल उपयोग प्लास्टिक बंद क्यों नहीं होता?
प्लास्टिक कचरा नगरों में बाढ़ और जलभराव का एक बहुत बड़ा कारण बना हुआ है। अतः इसके उपयोग पर प्रतिबंध लगाना ही एकमात्र उपाय दिखाई देता है। इससे पहले सरकार को इसके विकल्प पर काम कर लेना चाहिए।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 25 जुलाई, 2023
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Date:02-09-23
‘एक देश, एक चुनाव’ से जुड़े भ्रम दूर करने होंगेसंपादकीय
दो लोकसभा चुनावों (2014 और 2019 ) के बीच देश में लगभग तीन दर्जन से ज्यादा राज्य विधानसभाओं के चुनाव हो चुके हैं। नए अपुष्ट लेकिन विश्वसनीय आंकड़े के अनुसार वर्ष 2024 के आम चुनाव में करीब एक लाख करोड़ रुपए खर्च होंगे। एक आम चुनाव में 25 लाख कर्मचारी/अधिकारी और लाखों अन्य पुलिस एवं पैरामिलेट्री फोर्सेस के लोग महीनों तक व्यस्त रहते हैं। प्रशासनिक तारतम्यता इतने लम्बे वक्त तक टूट जाती है। फिर केंद्र-राज्य में समन्वय की समस्या आती है। अगर एक साथ चुनाव होंगे तो यह सब कुछ बचेगा। यह भी मानना गलत है कि एक साथ चुनाव कराने से केंद्र में सत्तारूढ़ दल को फायदा मिलेगा। लॉ कमीशन का मानना है कि साथ चुनाव होने से मतदान का प्रतिशत बढ़ जाता है। संशय दूर करने के लिए ही कोविंद समीति देश भर में घूमेगी और लोगों की राय जानना चाहेगी। उधर विशेष सत्र में इस पर चर्चा संभव नहीं है, क्योंकि समिति को अपनी रिपोर्ट देने में कम से कम कुछ माह लगेंगे। दूसरा संविधान के अनुच्छेद 83, 85, 172, 174 और 356 में संशोधन करना होगा। ऐसे संशोधनों के लिए दोनों सदनों में दो-तिहाई बहुमत चाहिए जो फिलहाल सरकार के पास नहीं है। इसके अलावा अनुच्छेद 368 के तहत आधे से ज्यादा राज्यों की सहमति भी चाहिए। विशेष सत्र का उद्देश्य कुछ अन्य जनोपयोगी कानून बनाना हो सकता है।
Date:02-09-23
एक साथ चुनाव की पहलसंपादकीय
केंद्र सरकार ने एक देश-एक चुनाव पर पूर्व राष्ट्रपति राम नाथ कोविन्द की अध्यक्षता में एक समिति गठित कर यह स्पष्ट कर दिया कि वह लोकसभा चुनाव के साथ विधानसभा चुनाव कराने को लेकर गंभीर है। यह कोई नया विचार नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी एक लंबे समय से एक साथ चुनाव की पैरवी करते रहे हैं। उनके पहले लालकृष्ण आडवाणी भी इसकी आवश्यकता जताते रहे हैं। 2018 में विधि आयोग ने भी एक देश-एक चुनाव की पहल का समर्थन करते हुए एक रिपोर्ट दी थी, जिसमें यह रेखांकित किया गया था कि इसके लिए कुछ संवैधानिक संशोधन करने होंगे। यह कोई बहुत कठिन कार्य नहीं। विगत में निर्वाचन आयोग भी यह कह चुका है कि वह लोकसभा के साथ विधानसभा चुनाव कराने में सक्षम है। इस पर आश्चर्य नहीं कि एक देश-एक चुनाव पर समिति गठन की घोषणा होते ही कुछ नेताओं ने उसका विरोध करना शुरू कर दिया है। कुछ ने तो इसे असंभव या फिर असंवैधानिक भी बता दिया है। ऐसे नेता इस तथ्य की जानबूझकर अनदेखी कर रहे हैं कि 1967 तक लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ ही होते थे। यह सिलसिला मुख्यतः इसलिए बाधित हो गया, क्योंकि अनुच्छेद 356 का मनमाना इस्तेमाल करके राज्यों में राष्ट्रपति शासन लगाया जाने लगा।
जो लोग लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराए जाने के विचार का विरोध कर रहे हैं, उन्हें इससे परिचित होना चाहिए कि कई देशों में एक साथ ही चुनाव होते हैं। कुछ देशों में तो केंद्र के साथ राज्यों और स्थानीय निकायों के चुनाव भी एक साथ करा लिए जाते हैं। यह भी एक तथ्य है कि 2019 में लोकसभा चुनाव के साथ ही आंध्र प्रदेश, ओडिशा, अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम में विधानसभा चुनाव कराए गए थे। यदि चार राज्यों में विधानसभा चुनाव लोकसभा चुनाव के साथ हो सकते हैं तो सभी राज्यों में क्यों नहीं? कुछ क्षेत्रीय दल इस तर्क के जरिये एक साथ चुनाव के विचार का विरोध करते रहे हैं कि लोकसभा चुनाव राष्ट्रीय मुद्दों पर होते हैं और यदि ये मुद्दे राज्यों के मुद्दों पर हावी हो जाएंगे तो इससे उन्हें नुकसान होगा। यदि ऐसा है तो फिर यह तो हो ही सकता है कि लोकसभा चुनाव के दो–ढाई वर्ष बाद सभी राज्यों के विधानसभा चुनाव एक साथ करा लिए जाएं। इससे भी समय और संसाधनों की अच्छी-खासी बचत होगी। अच्छा हो कि एक साथ चुनाव की पहल का विरोध कर रहे नेता दलगत हितों से ऊपर उठकर राष्ट्रीय हितों को प्राथमिकता दें और इस पर ध्यान दें कि बार-बार चुनाव होते रहने से एक तो संसाधनों की बर्बादी होती है और दूसरे आचार संहिता लागू होते रहने के कारण विकास के काम भी अटकते हैं। इसके अलावा राजनीतिक दल रह-रहकर चुनाव होते रहने के चलते सदैव चुनावी मुद्रा में बने रहते हैं और राष्ट्रहित के विषयों पर कम ध्यान दे पाते हैं।
Date:02-09-23
शून्य कार्बन का लक्ष्यवीरेंद्र कुमार पैन्यूली
पृथ्वी का तापमान बढ़ाने में कार्बन डाई आक्साइड का योगदान लगभग सत्तर फीसद है। इसलिए पृथ्वी के बढ़ते तापमान को रोकने के लिए वायुमंडल में कार्बन उत्सर्जन को कम से कम करना जरूरी है। 2050 तक शून्य कार्बन उत्सर्जन करना आवश्यक हो गया है। इसके साथ ही जो कार्बन वायुमंडल में मौजूद है, उसको भी कम करना आवश्यक है। यह जैविक और रासायनिक तरीकों से किया भी जा रहा है। इसको ‘कार्बन आफसेट’ करना भी कहा जाता है। इसमें कार्बन अवशोषकों के रूप में वनों तथा हरियाली की प्रमुख भूमिका है।
जीवाश्म इंधनों का उपयोग करने वाले उद्योग अपने कार्बन उत्सर्जन को ‘कार्बन कैप्चर स्टोरेज’ तकनीक अपना कर वायुमंडल में जाने से रोक रहे हैं। ऐसी तकनीकों में कार्बन उत्सर्जन को प्रणालियों में ही पकड़ कर, वायुमंडल में पहुंचने से पहले, समुद्र की तलहटियों, तेल या गैस के खाली कुंओं में भूमिगत कर भंडारिध्त कर दिया जाता है, जिससे उसका फिर वायुमंडल में लौटना संभव नहीं हो पाता।
अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्य प्रमाणन के बाद वायुमंडल में कार्बन डाई आक्साइड न जाने देने या वहां से इसे हटाने के लिए ‘कार्बन क्रेडिट’ दिए जाते हैं। एक मीट्रिक टन कार्बन डाई आक्साइड या उसके समतुल्य ग्रीन हाऊस गैसों को वायुमंडल में जाने से रोकने या उन्हें वायुमंडल से बाहर करने वाले को एक ‘कार्बन क्रेडिट’ दिया जाता है। जो उद्यम या प्रतिष्ठान उपकरणों, पद्धतियों या तकनीक के बदलावों से अपने कार्बन उत्सर्जन पहले की अपेक्षा कम कर देते हैं, तो वे भी ‘कार्बन क्रेडिट’ पाने के हकदार हो जाते हैं। ‘कार्बन क्रेडिट’ के संदर्भ में मुख्य बात यह है कि अब इसके बड़े-बड़े खरीदार इसका मूल्य भी लगा रहे हैं। पेरिस समझौते में निहित प्रवधानों के अनुसार संयुक्त राष्ट्र की यूएनडीपी की निगरानी में देशों द्वारा प्रमाणित ‘कार्बन क्रेडिट कमोडिटी’ के तौर पर कार्बन बाजार में खरीदा और बेचा भी जा रहा है। इसलिए कार्बन क्रेडिट अर्जित करना पर्यावरण सुधार के साथ आय का जरिया भी हो सकता है।
2021 में वैश्विक स्वैच्छिक कार्बन बाजार करीब दो अरब डालर का था। 2020 के मुकाबले यह चौगुना था। 2030 तक यह दस से चालीस अरब डालर तक का हो सकता है। इसकी वजह है कि अमेरिका, यूरोप, कोरिया, चीन आदि देश अत्यधिक कार्बन उत्सर्जन के कारण बंदी से बचने के लिए समतुल्य कार्बन क्रेडिट बाजार से खरीद कर अपने बढ़े कार्बन उत्सर्जन की भरपाई करने लगे हैं। वर्तमान में एक कार्बन क्रेडिट से एक टन कार्बन डाई आक्साइड या उसके बराबर ग्रीन हाऊस गैसों के उत्सर्जन की भरपाई की जा सकती है।
लगभग हर देश अपनी अलग कार्बन व्यापार प्रणाली बना रहा है। इनमें एकरूपता नहीं है। जैसे इंग्लैंड की अलग है, भारत की अलग है। यूरोपीय संघ की अपनी कार्बन व्यापार प्रणाली- ईटीएस- ग्रीन हाउस गैसों के लिए है। अब तो वह कार्बन कर भी लगा रहा है। हाल में देशों के लिए इसे आसान बनाने और एकरूपता लाने के लिए संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम यानी यूएनडीपी ने डीपीजी नाम से एक मंच भी बनाया है।
भारत भी इसमें पीछे नहीं रहना चाहता है। हाल में भारत ने अपनी ‘कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग’ योजना सीसीटीएस घोषित की है। सरकार मानती है कि इससे देश को ‘संपूर्ण शून्य’ का लक्ष्य हासिल करने में आसानी होगी। साथ ही उद्योग भी अपने कार्बन उत्सर्जन कम करने के लिए कार्बन व्यापार की बाजार आधारित प्रक्रियाओं का लाभ लेंगे। भारत चाहता है कि देश का आंतरिक कार्बन व्यापार फले-फूले। ‘ऊर्जा संरक्षण संशोधन विधेयक 2022’ में ही केंद्र सरकार ने ‘कार्बन ट्रेडिंग फ्रेमवर्क’ स्थापित करने के लिए अधिकृत किया हुआ था। निस्संदेह इसे लेकर अब सही मायने में मानव संसाधन और तकनीकी कामों की शुरुआत भर हुई है।
कार्बन व्यापार में चीन, अमेरिका, रूस, जर्मनी, दक्षिण कोरिया बड़े निर्यातक हैं। इन देशों में जिन कंपनियों का कार्बन उत्सर्जन देश के सालाना कार्बन उत्सर्जन का साठ फीसद से ज्यादा है, वे अपने उत्सर्जन की भरपाई ‘कार्बन क्रेडिट’ खरीद कर करना आसान मानती हैं। प्रति इकाई कार्बन क्रेडिट के बाजार भाव में मांग के अनुसार उतार-चढ़ाव आता रहता है। मसलन, चीन में सरकार की कार्बन उत्सर्जन रोकने पर सख्ती की नीति के कारण उद्योग कार्बन क्रेडिट खरीदने की होड़ में हैं। इससे वहां कार्बन क्रेडिट के भाव में तेजी आई है। दूसरी तरफ, इंग्लैंड में राजनीतिक कारणों से कार्बन क्रेडिट का भाव यूरोप से भी नीचे चला गया था। पर यह भी तो है कि जब दाम बहुत नीचे गिर जाएंगे तब तो प्रदूषण जारी रखना लाभ का सौदा ही रहेगा।
स्वैच्छिक कार्बन बाजार में सबसे ज्यादा ‘कार्बन क्रेडिट’ अवनत वनों के सुधार और उनकी पुनर्स्थापना के लिए दिए जाते हैं। इनमें सालाना वृद्धि भी कई गुना हो रही है। हवाई और समुद्री परिवहन, इस्पात और बिजली उत्पादन तथा पेट्रोलियम शोधन क्षेत्र की इकाइयां ‘कार्बन आफसेट’ या ‘कार्बन क्रेडिटों’ को खरीद कर ही अपना व्यवसाय बनाए हुए हैं। इनमें बड़े पैमाने पर वनीकरण के माध्यम से हुए कार्बन आफसेट के लिए दिए गए कार्बन क्रेडिट भी होते हैं।
जंगल लगाने या कार्बन अवशोषक के रूप में सुधारने के लिए दिए गए ‘कार्बन आफसेट क्रेडिट’ सबसे ज्यादा विवादों में रहते हैं। मई 2023 में दुनिया में वाशिंगटन आधारित प्रमुख ‘कार्बन क्रेडिट सर्टिफायर कंपनी’ ‘वीरा’ पर भी यह आरोप लगे थे कि उनसे पाए गए दसियों लाख भ्रामक गलत कार्बन आफसेट क्रेडिट का ब्योरा देकर कतिपय प्रतिष्ठानों ने अपनी-अपनी जलवायु और जैवविविधता के प्रति प्रतिबद्धता पूरी की थी। आरोपग्रस्त ‘वीरा’ के तत्कालीन मुख्य कार्यकारी अधिकारी को इस पर अपना पद छोड़ना पड़ा था। उस पर आरोप था कि उसने उन वर्षा वनों को, जो संकट में थे ही नहीं, उन्हें करीब एक अरब ‘वीसीएस वेरिफाइड कार्बन स्टैंडर्ड’ के क्रेडिट दिए थे।
आज वीरा समेत अन्य कार्बन क्रेडिट प्रमाणीकरण कंपनियां भी मानती हैं कि जंगलों से संदर्भित कार्बन आफसेट आकलन में अभी पूर्णता नहीं आई है। वन स्थितियों की आधारभूत संरचना में छेड़छाड़ करके ज्यादा कार्बन आफसेट दिखाया जा सकता है। अभी दलदली क्षेत्रों के कार्बन क्रेडिट प्रमाणीकरण की शुरुआत भर है। फिर भी वायुमंडल के कार्बन डाई आक्साईड को कम करने के लिए वनीकरण सबसे बेहतर प्राकृतिक तकनीक है।
‘कार्बन क्रेडिट’ विक्रेता के कंधे पर चढ़ कर कुछ भारी कार्बन उत्सर्जन करने वाली नामी-गिरामी कंपनियां अपने को संपूर्ण शून्य कार्बन और नकारात्मक कार्बन उत्सर्जक घोषित करके भी अपनी छवि सुधारने का प्रयास कर रही हैं। इसे यों समझ लीजिए कि किराए की कोख से संतान पैदा करवा रही हैं। कोई भी उद्यम, जो अपने कार्बन डाई आक्साइड के उत्सर्जन में कमी लाने की दिशा में ‘कार्बन फुटप्रिंट’ अगर कम नहीं कर पा रहा है, तो दूसरों ने जो कार्बन आफसेट किया है और उन्हें उससे जो कार्बन क्रेडिट मिला है, उसको खरीद कर अपना कार्बन उत्सर्जन वैसे ही जारी रखता है, जिस ढर्रे पर करता रहा है। इसलिए स्थानीय स्तर पर जहां प्रदूषण हो रहा है वहां प्रदूषण होते रहने की संभावनाएं बनी रहती हैं। उसे दूर करने में कहीं और से खरीदे कार्बन क्रेडिट से मदद नहीं मिलेगी।
अगर कहीं से कार्बन क्रेडिट खरीद कर स्थानीय स्तर पर प्रदूषण करना जारी रखा जाए, तो इसे न्यायिक नहीं कहा जा सकता है। यह ऐसा ही जैसे एक जगह का लगा विविधता भरा जंगल काट कर दूरस्थ स्थल पर नए पेड़-पौधे उगा कर यह कहना कि सब पटरी पर ले आया गया है। कार्बन प्रदूषण पर कटौती करना जनस्वास्थ्य पर पड़ने वाले कुप्रभाव को कम करने के लिए आवश्यक है।
Date:02-09-23
मजबूत होता भारतडॉ. जयंतीलाल भंडारी
इन दिनों प्रकाशित हो रही वैश्विक आर्थिक संगठनों की रिपोर्ट में कहा जा रहा है कि लड़खड़ाती वैश्विक अर्थव्यवस्था के बीच भारत मजबूत स्थिति में है। हाल ही में 31 अगस्त को प्रकाशित राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय की रिपोर्ट के मुताबिक अप्रैल से जून 2023 की तिमाही में भारत की विकास दर 7.8 फीसद रही है, जो दुनिया में सर्वाधिक है।
उल्लेखनीय है कि 22 अगस्त को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दक्षिण अफ्रीका के जोहानिसबर्ग में ब्रिक्स बिजनेस फोरम लीडर्स डायलॉग में कहा कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में चुनौतियों और उथल-पुथल के दौर के बीच भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती प्रमुख अर्थव्यवस्था है। इस समय एक मजबूत आर्थिक देश के रूप में भारत दुनिया के सामने खड़ा है। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार द्वारा मिशन मोड में किए जा रहे सुधारों से भारत में कारोबारी सुगमता में वृद्धि हुई है। भारत में दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा स्टार्टअप इकोसिस्टम है और देश में 100 से अधिक यूनिकार्न हैं। साथ ही जल्द ही भारत पांच ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के रूप में उभरकर दुनिया के लिए विकास का इंजन बन जाएगा। गौरतलब है कि 23 अगस्त को प्रकाशित एसएंडपी ग्लोबल मार्केट इंटेलिजेंस रिपोर्ट के मुताबिक इस समय लड़खड़ाती हुई वैश्विक अर्थव्यवस्था पर का बादल छाए हुए हैं। वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए 2023 में लगभग 2.5 प्रतिशत की वृद्धि दर संभावित की गई है। यह अगले वर्ष 2024 में और घटकर 2.4 फीसद रह सकती है।
यदि हम वैश्विक परिदृश्य को देखें तो पाते हैं कि पिछले वर्ष के दौरान तेजी से मौद्रिक नीति सख्त होने से वैश्विक आवास, बैंक ऋण और औद्योगिक क्षेत्र में कमजोरी आई है। स्पष्ट है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था के हालात चुनौतीपूर्ण हैं। चीन, अमेरिका और जापान जैसी अर्थव्यवस्थाओं से भी चिंताजनक संदेश हैं। अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडन ने चीन की अर्थव्यवस्था को एक ऐसे टाइम बम की संज्ञा दी है, जो कभी भी फट सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि जब बुरे लोगों को दिक्कत होती है तो वे बुरे काम करते हैं। दुनिया की वित्तीय एजेंसियां यह टिप्पणी कर रही हैं कि चार दशक से विकास कर रहे चीन के लिए अब अवसान का समय आ गया है। खासतौर से चीन की अर्थव्यवस्था से वैश्विक आर्थिक जोखिम उभरती जा रही हैं। वित्त वर्ष 2023-24 की डगर पर चीन की अर्थव्यवस्था निराशाओं और मुश्किलों से घिरी हुई है। कोविड- 19 की सुस्ती के बाद चीन की अर्थव्यवस्था के द्वारा रफ्तार पकड़ने की उम्मीद थी, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया है। चीन के बाजार में सुस्त उपभोक्ता खर्च, निर्यात में गिरावट, बड़ी-बड़ी कंपनियों का दिवालियापन, युवाओं में बेरोजगारी से निराशा का बनता नया रिकॉर्ड, बढ़ते सरकारी ऋण, घरेलू मांग में कमी, फूड से लेकर मकानों के मूल्यों में भारी गिरावट, कारोबारी गतिविधियों का धीमी होना, निवेशकों के चेहरे पर निराशा, मांग की तुलना में अधिक उत्पादन, सामाजिक सुरक्षा की चिंता में अधिक बचत की प्रवृत्ति के कारण बाजार में खरीदी में कमी जैसी जटिल स्थितियों के बीच अब चीनी अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के रास्ते सीमित हो गए हैं। जहां चीन में इस समय मुद्रा संकुचन (मनी डिफ्लेशन) की स्थिति है वहीं अमेरिका में मुद्रा स्फीति (मनी इनफ्लेनेशन ) की स्थिति है । अमेरिका मार्च 2022 से अब तक 11 बार ब्याज दरों में इजाफा करने के बाद भी मुद्रास्फीति का सामना कर रहा है। अमेरिका असाधारण ऋण से भी गुजर रहा है। पिछले तीन वर्षों में उसके कर्ज में करीब 8 लाख करोड़ डॉलर का इजाफा भी हुआ। परिणामस्वरूप रेटिंग एजेंसी फिच ने अमेरिका की क्रेडिट रेटिंग को ए प्लस से कम करके एएए कर दिया है।
जापान में भी हालात अच्छे नहीं हैं। जापान में मुद्रास्फीति बढ़ी हुई है। जापान में इसके लिए खाद्यान्न, ईंधन और टिकाऊ वस्तुओं की ऊंची कीमतें उत्तरदायी हैं। डॉलर के मुकाबले येन की कीमत में भारी गिरावट आई है। उल्लेखनीय है कि विभिन्न नई वैश्विक रिपोर्टों के मुताबिक वर्ष 2023 में भारत की अर्थव्यवस्था सबसे तेज गति वाली होगी। भारत की विकास दर 2023 में 5.9 फीसद व 2024 में 6.1 फीसद अनुमानित है। दुनिया के प्रमुख आर्थिक और वित्तीय संगठनों की रिपोर्टों में कहा जा रहा था कि दुनिया की पांचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था का दर्जा रखने वाला भारत वर्ष 2027 तक जापान और जर्मनी को पीछे छोड़कर दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था के रूप में उभरकर सामने आएगा। वैश्विक अर्थव्यवस्था की बढ़ी हुई अनिश्चितताओं के बीच भारत का मजबूत आर्थिक प्रदर्शन दुनिया में भारत की अहमियत बढ़ा रहा है।
भारत में उद्योगों को आगे बढ़ाने के लिए चलाए गए विशेष अभियान मील का पत्थर बनते जा रहे है। यद्यपि दुनियाभर में भारत सबसे तेज और आकर्षक अर्थव्यवस्था वाले देश के रूप में रेखांकित हो रहा है, लेकिन हमें देश की नई लॉजिस्टिक नीति 2022 और गति शक्ति योजना की अभूतपूर्व रणनीतियों से भारत को आर्थिक प्रतिस्पर्धी देश के रूप में तेजी से आगे बढ़ाना होगा। शोध और नवाचार पर व्यय बढाया जाना होगा। शिक्षा और कौशल उन्नयन पर उच्च निवेश करना होगा। दुनिया की सबसे अधिक युवा आबादी वाले भारत को बड़ी संख्या में युवाओं को डिजिटल कारोबार के दौर की और नई तकनीकी योग्यताओं से सुसज्जित किया जाना होगा। जहां हमें भारत-अमेरिका के बीच निर्मित नई साझेदारी का पूरा लाभ लेना होगा, वहीं दुनिया के विभिन्न देशों के साथ शीघ्रतापूर्वक मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) को आकार देना होगा।
हमें यह बात भी ध्यान में रखना है कि चीन की आर्थिक कमजोरी भी भारत के लिए चिंताजनक है | भारत के लिए चीन दूसरा सबसे बड़ा आयातक और चौथा सबसे बड़ा निर्यातक देश है। ऐसे में चीन की अर्थव्यवस्था पर सतर्क निगाहें जरूरी हैं। हमें ध्यान में रखना है कि दुनिया के कोने-कोने की अधिकांश अर्थव्यवस्थाओं में जो चुनौतियों की तेज लहरें निर्मित हो रही हैं, उनके बीच भी हमें आसानी से तैर कर दूर तक जाने के लिए सतर्कता और सावधानी के साथ देश से निर्यात बढ़ाने और व्यापार घाटे की चुनौती को कम करने के लिए रणनीतिक कदम उठाए जाने की जरूरत बनी हुई है।
Date:02-09-23
एक साथ चुनावसंपादकीय
एक देश एक चुनाव पर विचार की गंभीर पहल बहुत महत्वपूर्ण और आकर्षक है। उससे भी दिलचस्प यह है कि इस विचार को लागू करने की व्यावहारिकता का पता लगाने के लिए बनाई गई समिति का अध्यक्ष पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद को बनाया गया है। पूर्व राष्ट्रपति के नेतृत्व में विशेषज्ञों की टीम अध्ययन करेगी कि क्या पूरे देश में लोकसभा चुनाव के साथ ही तमाम विधानसभाओं के चुनाव कराना संभव है? समिति के प्रकार से ऐसा लगता है कि केंद्र सरकार एक देश एक चुनाव का मन बना चुकी है, अब वह केवल इस बात पर काम करेगी कि फैसले को कैसे लागू किया जा सकता है। जाहिर है, भारत जैसे विशाल देश में विधानसभा चुनावों के साथ लोकसभा चुनाव कराना कतई आसान नहीं है। एक देश एक चुनाव का फैसला अगर लिया जाता है, तो क्रांतिकारी होगा। लोकतंत्र में स्थिरता भले आएगी, पर सियासी दलों के लिए समस्या बढ़ जाएगी। सरकारों को गिराने की साजिशों पर लगाम लगेगी, पर राष्ट्रपति शासन की जरूरत बढ़ जाएगी। कहीं बहुमत न होने की स्थिति में चुनाव का लंबा इंतजार भी करना पड़ सकता है। ऐसी तमाम आशंकाओं और संभावनाओं पर पूर्व राष्ट्रपति की अध्यक्षता में विचार होगा।
यह सर्वज्ञात बात है कि साल 1967 तक देश में विधानसभाओं और लोकसभा के चुनाव साथ ही होते थे। संयुक्त विधायक दल के दौर और केंद्रीय स्तर पर कांग्रेस के अंदर खींचतान के कारण एक देश एक चुनाव का क्रम टूट गया। अब देश में जरूरत के मुताबिक चुनाव होते रहते हैं। मध्यावधि चुनाव भी हुए हैं। क्या एक देश एक चुनाव की स्थिति में मध्यावधि चुनाव की संभावना खत्म हो जाएगी? क्या राजनीतिक दल इस पर सहमत हो सकेंगे? पूर्व राष्ट्रपति को सभी संबंधित पक्षों से चर्चा करके आगे का रास्ता तय करना पड़ेगा। संविधान विशेषज्ञों की भी जरूरत पड़ेगी। एकाधिक संविधान संशोधन भी करने पड़ेंगे। केंद्रीय संसदीय कार्य मंत्री प्रह्लाद जोशी ने आश्वस्त किया है कि समिति की रिपोर्ट आएगी, जिस पर चर्चा होगी। संसद परिपक्व है और घबराने की जरूरत नहीं है। वैसे एक देश एक चुनाव का विचार नया नहीं है। वर्तमान प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसके पक्ष में चर्चा कर चुके हैं। विधि आयोग की सिफारिश भी इसके पक्ष में है। इस विषय पर सर्वदलीय बैठक भी हो चुकी है, मगर इस पर एकराय नहीं बन सकी थी। अब देश के राजनेताओं को इस साहसिक फैसले के लिए तैयार होना चाहिए।
एक देश एक चुनाव से निस्संदेह चुनावी खर्च में भारी कमी आएगी और समय भी खूब बचेगा। राजनीतिक पार्टियों को भी शासन-प्रशासन के लिए ज्यादा समय मिलेगा और चुनावी कामकाज जल्दी निपट जाया करेंगे। ज्यादातर बड़ी व राष्ट्रीय पार्टियां हमेशा ही चुनावी मुद्रा में रहती हैं, जिससे अनेक बड़े फैसले टलते रहते हैं। इस साल नवंबर-दिसंबर में पांच राज्यों- मिजोरम, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, तेलंगाना और राजस्थान में विधानसभा चुनाव होने हैं और इसके बाद अगले साल मई-जून में लोकसभा चुनाव। शायद हर साल चार से पांच राज्यों में चुनाव की नौबत आती है। बहरहाल, इस विषय पर समिति गठन के बाद राजनीति भी तेज हो गई है, जबकि यह ठीक नहीं है। इसके लिए राजनीतिक दलों में समन्वय होना जरूरी है। अगर आने वाले दिनों में किसी दल को इस विचार का विरोध करना है, तो उसे ज्यादा गंभीर तथ्य और तर्क के साथ सामने आना होगा।
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उत्तर लिखने के अभ्यास के लिए प्रश्न - 426
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Today's Daily Audio Topic-"चावल निर्यात का अर्थ"
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01-09-2023 (Important News Clippings)
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Today's Life Management Audio Topic-"विचारों से बनती हैं तरंगें"
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अफ्रीका में छुपा भारत का हित
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Today's Daily Audio Topic-"चाँद से संदेश"
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31-08-2023 (Important News Clippings)
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Today's Life Management Audio Topic-"संसार का मूल तत्व"
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30-08-2023 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"कृषि क्षेत्र की आय"
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Today's Life Management Audio Topic-"तर्क एवं विज्ञान"
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भारत-फ्रांस साझेदारी की विशेषता
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Today's Daily Audio Topic-"कुछ जरूरी खबरें"
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25-08-2023 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"रिफ्रेंडम"
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Today's Life Management Audio Topic-"प्रकृति से संवाद"
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Today's Daily Audio Topic-"ब्रिक्स सम्मलेन में भारत"
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Today's Life Management Audio Topic-"चन्द्रयान का अद्भुत नजारा"
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24-08-2023 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"अनुच्छेद 370 पर सुनवाई"
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Today's Life Management Audio Topic-"कोई तो रिश्ता जरूर होगा"
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Today's Daily Audio Topic-"ब्रिक्स टॉपिक की तैयारी"
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Today's Life Management Audio Topic-"जिन्दगी के समीकरण"
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Today's Life Management Audio Topic-"पढ़ाई का उपयोग"
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उत्तर लिखने के अभ्यास के लिए प्रश्न - 424
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18-08-2023 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"डिजिटल सुरक्षा विधेयक (3)"
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Today's Life Management Audio Topic-"साहित्य के लाभ"
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Today's Life Management Audio Topic-"ज्ञान का हृदयस्थल है साहित्य"
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Today's Daily Audio Topic-"डिजिटल सुरक्षा विधेयक (2)"
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16-08-2023 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"डिजिटल सुरक्षा विधेयक"
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Today's Life Management Audio Topic-"ज्ञान की अखंडता"
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14-08-2023 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"मध्यस्थता कानून"
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Today's Life Management Audio Topic-"स्वतंत्रता और अनुशासन"
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उत्तर लिखने के अभ्यास के लिए प्रश्न - 423
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Today's Daily Audio Topic-"निर्वाचन आयुक्तों की संबंधी विधेयक"
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11-08-2023 (Important News Clippings)
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Today's Life Management Audio Topic-"ज्ञान के प्रति अखंड दृष्टि"
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Today's Daily Audio Topic-"दिल्ली सेवा कानून"
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10-08-2023 (Important News Clippings)
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Today's Life Management Audio Topic-"कहाँ साहित्य और कहाँ विज्ञान"
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09-08-2023 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"संविधान की आत्मा"
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Today's Life Management Audio Topic-"एक आत्मकथ्य"
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परिवारवाद की राजनीति की विफलता
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08-08-2023 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"लाइसेंस राज की वापसी (दो)"
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Today's Life Management Audio Topic-"सर्वोत्तम संबंध है मित्रता"
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07-08-2023 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"लाइसेंस राज की वापसी (एक)"
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Today's Life Management Audio Topic-"रसीले हों संदेश"
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उत्तर लिखने के अभ्यास के लिए प्रश्न - 422
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04-08-2023 (Important News Clippings)
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Today's Life Management Audio Topic-"तीव्र महत्वाकांक्षा"
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सीएसआर की प्रभावशीलता में कमी
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03-08-2023 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"कुछ खबरें"
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Today's Life Management Audio Topic-"महत्वाकांक्षा में संयोग"
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उच्च शिक्षा में भारत की उपलब्धि से जुड़े कुछ तथ्य
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Today's Daily Audio Topic-"अनुच्छेद 243"
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Today's Life Management Audio Topic-"महत्वाकांक्षा के सह उत्पाद"
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Today's Daily Audio Topic-"चावल निर्यात पर प्रतिबंध का विरोध"
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01-08-2023 (Important News Clippings)
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Today's Life Management Audio Topic-"महत्वाकांक्षा का मूल्यांकन (एक)"
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Today's Daily Audio Topic-"चावल निर्यात पर प्रतिबंध"
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Today's Daily Audio Topic-"बोधगम्यता (दो)"
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Today's Life Management Audio Topic-"महत्वाकांक्षी समाज का सच"
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संगठित घृणा का संगठित प्रतिकार
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19-07-2023 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"बोधगम्यता (एक)"
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Today's Life Management Audio Topic-"महत्वाकांक्षा के बीज"
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लैंगिक असमानता से जुड़े कुछ तथ्य
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Today's Life Management Audio Topic-"'गीता का ज्ञान' पुस्तक (दो)"
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18-07-2023 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"रुपये का अंतर्राष्ट्रीयकरण"
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17-07-2023 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"चंद्रयान-3"
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Today's Life Management Audio Topic-"'पुस्तक गीता का ज्ञान"
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15-07-2023 (Important News Clippings)
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कुरुक्षेत्र : जलवायु अनुकुल खेती
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Kurukshetra : Climate Sustainable Agriculture
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योजना : आत्मनिर्भर भारत सहकारी समितियों के माध्यम से
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Yojana : ATMANIRBHAR BHARAT THROUGH COOPERATIVES
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उत्तर लिखने के अभ्यास के लिए प्रश्न - 419
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Today's Daily Audio Topic-"कुछ समाचार"
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14-07-2023 (Important News Clippings)
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Today's Life Management Audio Topic-"बहिर्मुखी व्यक्तित्व"
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देश में अवैध खनन पर कुछ बिंदु
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13-07-2023 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"होमवर्क का हल (2)"
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Today's Life Management Audio Topic-"व्यक्तित्व की सही समझ"
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वर्षा-जल को तो बचाना ही होगा
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Today's Daily Audio Topic-"कुछ खबरें"
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12-07-2023 (Important News Clippings)
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Today's Life Management Audio Topic-"अन्दर से निकलें"
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11-07-2023 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"होमवर्क का हल (एक)"
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Today's Life Management Audio Topic-"बहिर्मुखता की ओर"
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10-07-2023 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"चीन द्वारा प्रस्तुत चुनौती"
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Today's Life Management Audio Topic-"अस्तित्व को चुनौती"
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ताइवान जलडमरूमध्य का भारत के लिए महत्व
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कुरुक्षेत्र : जल उपयोग दक्षता बढ़ाना ज़रूरी
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Kurukshetra : Technologies for Sustainable Agriculture Development
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08-07-2023 (Important News Clippings)
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Yojana : VISION SAHAKAR SE SAMRIDDHI From PLANNING TO REALISATION
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उत्तर लिखने के अभ्यास के लिए प्रश्न - 418
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07-07-2023 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"एक प्यारा सा होमवर्क"
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Today's Life Management Audio Topic-"सत्य का स्वीकार्य"
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समान नागरिक संहिता लागू करने का पुनः प्रयास
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06-07-2023 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"प्री 2023 का एक प्रश्न"
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Today's Life Management Audio Topic-"इगो और अंतर्मुखता"
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05-07-2023 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"चयन की क्षमता"
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Today's Life Management Audio Topic-"व्यक्तित्व में बदलाव"
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न्यूनतम समर्थन मूल्य की जद्दोजहद
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Today's Daily Audio Topic-"भारत-अमेरिका समझौता"
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04-07-2023 (Important News Clippings)
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Today's Life Management Audio Topic-"संयुक्त व्यक्तित्व"
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प्रोजेक्ट टाइगर की सफलता से संबंधित कुछ तथ्य
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Today's Daily Audio Topic-"देह पर नारी का अधिकार"
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03-07-2023 (Important News Clippings)
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Today's Life Management Audio Topic-"हम शिष्य बने रहें"
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गर्भपात पर अधिकार की अवहेलना
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कुरुक्षेत्र : अपशिष्ट जल प्रबंधन के प्रयास
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01-07-2023 (Important News Clippings)
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Kurukshetra : Rainwater Harvesting for Sustainable Agriculture
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योजना : जी20 में समग्र स्वास्थ्य पर विचार-विमर्श
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Yojana : MISSION LIFE LIFESTYLE FOR ENVIRONMENT
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उत्तर लिखने के अभ्यास के लिए प्रश्न - 417
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30-06-2023 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"राष्ट्रीय शोध फाउंडेशन"
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Today's Life Management Audio Topic-"व्यवहार में विशुद्धता असंभव"
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वित्तीय समावेशन में बढ़ते भारत के कदम
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29-06-2023 (Important News Clippings)
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आज 'Current Content' नहीं डाला जाएगा (29-06-2023)
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28-06-2023 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"रूसी इतिहास के मुख्य टॉपिक्स"
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Today's Life Management Audio Topic-"दोनों व्यक्तित्वों के संकट"
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राजद्रोह : आयोग की गलतियाँ
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27-06-2023 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"साकू देश"
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Today's Life Management Audio Topic-"दो व्यक्तित्व"
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एक विश्व, सार्वभौमिक स्वास्थ्य
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26-06-2023 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"प्रश्न को समझें"
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Today's Life Management Audio Topic-"अन्तर्मुखी की रचनात्मकता"
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24-06-2023 (Important News Clippings)
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कुरुक्षेत्र : वनीकरण और जल संवर्धन
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Kurukshetra : Water Conservation and Multiple Use Management
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योजना : आयुष समग्र स्वास्थ्य और आरोग्य जीवन का विज्ञान
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Yojana : DIRECT BENEFIT TRANSFER IN INDIA A GLOBAL ROLE MODEL
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उत्तर लिखने के अभ्यास के लिए प्रश्न - 416
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Today's Daily Audio Topic-"इरड़ा का नया नियम"
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23-06-2023 (Important News Clippings)
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Today's Life Management Audio Topic-"कौन सा व्यक्तित्व है लाभकारी"
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सिख अलगाववादियों की समस्या
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22-06-2023 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"दिल्ली राज्य पर अध्यादेश"
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Today's Life Management Audio Topic-"अन्तर्मुखी"
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समलैंगिक विवाह मामले में न्यायालय ही निर्णय ले
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Today's Daily Audio Topic-"कुछ प्रश्नों के उत्तर"
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Today's Life Management Audio Topic-"दो तरह के व्यक्तित्व"
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21-06-2023 (Important News Clippings)
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भारत के स्वास्थ्य ढांचे की कमियां और मजबूती के उपाय
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20-06-2023 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"कुछ खबरें"
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Today's Life Management Audio Topic-"बहिर्मुखी-अन्तर्मुखी"
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19-06-2023 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"पृष्ठभूमि जानना जरूरी है"
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Today's Life Management Audio Topic-"उदात्तीकरण"
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भारत-नेपाल संबंधों की वर्तमान स्थिति
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17-06-2023 (Important News Clippings)
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कुरुक्षेत्र : सामुदायिक भागीदारी से जल संरक्षण
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Kurukshetra : 2023: Year of International Water Commitments and What it Means for Rural India
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योजना : मिशन लाइफ पर्यावरण के लिए जीवनशैली
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Yojana : NON-POSSESSION THE GANDHIAN THOUGHT
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उत्तर लिखने के अभ्यास के लिए प्रश्न - 415
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Today's Daily Audio Topic-"मध्य-पूर्व एशिया"
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16-06-2023 (Important News Clippings)
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Today's Life Management Audio Topic-"जिन खोजा तिन पाइयां"
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15-06-2023 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"शाबाश, सोचना शुरू करने के लिए"
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Today's Life Management Audio Topic-"एक सच्ची ताजी कहानी"
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देश में महिलाओं की उन्नति से संबंधित कुछ तथ्य
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14-06-2023 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"उत्तर सही लेकिन सटीक नहीं"
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Today's Life Management Audio Topic-"किया लेकिन मिला नहीं"
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एर्दोगन की जीत से लोकतंत्र को मिलता सबक
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Today's Daily Audio Topic-"असफलता क्यों ?"
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Today's Life Management Audio Topic-"हम बदल सकते हैं"
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13-06-2023 (Important News Clippings)
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माउंट एवरेस्ट से जुड़ी पारिस्थितिकीय चुनौती
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12-06-2023 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"कुछ खबरें"
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Today's Life Management Audio Topic-"दुश्मनों से दोस्ती"
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राजदंड की शक्ति के सही मायने
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कुरुक्षेत्र : हस्तशिल्प विकास कार्यक्रम
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Kurukshetra : Making Villages Water Sufficient
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योजना : भारत में सीधे लाभ हस्तांतरण योजना 'डीबीटी' वैश्विक रोल मॉडल
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Yojana : AYUSH UNVEILING THE SCIENCE OF LIFE FOR HOLISTIC HEALTH AND WELL-BEING
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10-06-2023 (Important News Clippings)
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उत्तर लिखने के अभ्यास के लिए प्रश्न - 414
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09-06-2023 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"कुछ समाचार"
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Today's Life Management Audio Topic-"प्रतिशोध एवं प्रतिशोध"
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08-06-2023 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"परीक्षा का एक प्रश्न"
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Today's Life Management Audio Topic-"हमारा अपना विरोधाभास"
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सोशल मीडिया के माध्यम से जासूसी
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07-06-2023 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"कुछ समाचार"
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Today's Life Management Audio Topic-"मिला, पर देंगे नहीं"
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प्रशांत द्वीप देशों तक भारत की स्मार्ट पहुंच हो
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06-06-2023 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"कुछ जरूरी समाचार"
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Today's Life Management Audio Topic-"बदला"
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दक्षिण-पूर्वी एशियाई देशों का हित साधता क्वाड
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Date:05-06-23
Tragically Off-TrackWhy is it that, despite CAG & House committee warnings, safety isn’t front and centre for railways?TOI Editorials
Railway minister Ashwini Vaishnaw yesterday clarified some aspects of the horrific triple-train collision in Odisha on Friday. Chennai-bound Coromandel Express veered off its line and crashed into a goods train at high speed. Consequently, its bogies derailed and hit a passenger train travelling in the opposite direction on a parallel line. Vaishnaw said prima facie a technical glitch with the signalling system had been identified. Collision, derailment and signalling all fall within the ambit of railway safety. The Balasore tragedy is yet another terrible reminder that this has been an area of systemic weakness.
Two institutions that exercise oversight over safety issues in railways, the parliamentary standing committee on railways and CAG, have repeatedly flagged problems. Between December 2016 and March 2023, they had issued at least three reports – all showing that railways fell short of safety standards when benchmarked against its internal protocols. First, there’s the funding aspect for safety. Acknowledging the challenge of safety, in 2017-18 a fund named Rashtriya Rail Sanraksha Kosh (RRSK) was started to carry out safety-related work in a systematic manner. Most of this funding comes from the general budget that imparts stability to the flow of resources.
In March 2023, the parliamentary committee pointed out that not once had the annual funding been spent fully. It’s not money that’s the primary problem. The core issue is the attitude to safety. For example, CAG in a report on derailments showed that RRSK’s allocation had begun to see an increasing proportion diverted to what was termed as “nonpriority”. The Odisha accident has catalysed a debate on Kavach, a technological application that aids a locomotive pilot by automatically triggering the brake system. Kavach’s rollout is still at an early stage but the challenges faced by locomotive pilots are well known. In December 2016, a parliamentary committee said that locomotive pilots pass a signal almost every kilometre and lack enough technological backup. In addition, exigencies often lead to drivers overshooting the 10-hour work shift. Between 2016-17 and 2020-21, derailments constituted 75% of consequential train accidents and collisions another 5%. Notwithstanding that, the railway ministry has been lax about following its own protocol on inspections and track renewals, according to the CAG. GoI aims to increase the average speed of trains. More than 19,000 ply. Is this aim consistent with the railways’ casual attitude to safety?
Date:05-06-23
Middle East PlayIran’s new naval alliance may be ambitious, but India should be wary of China’s growing influence in the regionTOI Editorials
Iran has said it is forming a naval alliance that will include Saudi Arabia, three other Gulf states, and, surprisingly, India and Pakistan. While the shape and form of this alliance is yet to be revealed, it nonetheless represents a significant geopolitical shift underway in the Middle East. Iran has been trying to mend relations with several Gulf Arab nations following a Beijing-mediated deal between Tehran and Riyadh in March. These efforts have already seen results such as the return of Syria’s Bashar al-Assad to the Arab League.
There are two important dynamics here. First, it appears that Iran and Saudi Arabia are finally coming to the realisation that their regional proxy war is harming both. Both Riyadh and Tehran are looking at new options to manage regional equations. Second, the US has been progressively disengaging from the Middle East and pivoting towards East Asia. Thus, Washington is no longer seen as a regional problem solver. On the contrary, Trump’s decision to withdraw from the Iran nuclear deal and Biden’s to not join back have cast the US as unreliable.
Enter China with its economic partnership plans for the region. Also, Washington’s pledge to create an alliance of democracies to counter autocracies in the wake of the Ukraine war sits uncomfortably with Middle East regimes. But if China’s footprint grows here, it is bad news for India, which relies on the Middle East for energy and the remittance economy. New Delhi would be far more comfortable working with Washington in the region. Therefore, it should help boost platforms like I2U2 (India, Israel, US and UAE) to stay in the Middle East game and counter China.
Date:05-06-23
The Delhi ordinance is an unabashed power-grabThe ordinance, an attack on federalism and democracy, erodes judicial independence, is an act of constitutional subterfuge and destroys established norms on bureaucratic accountabilityMathew Idiculla is a legal consultant and a visiting faculty at Azim Premji University, Bengaluru
On May 19 this year, the Union government promulgated an ordinance to amend the Government of National Capital Territory of Delhi (NCTD) Act, 1991 that effectively nullified the Supreme Court judgment of May 11 on the powers over bureaucratic appointments in Delhi. After an eight-year long protracted legal battle, a five-judge Constitution Bench led by the Chief Justice of India D.Y. Chandrachud had unanimously held that the elected government of Delhi had legislative and administrative powers over “services”.
The ordinance removes Entry 41 (services) of the State List from the Delhi government’s control and creates a National Capital Civil Service Authority, consisting of the Chief Minister, Chief Secretary and Principal Secretary-Home, to decide on service matters in Delhi. Decisions of the Authority will be made through majority voting, which means that two Union-appointed bureaucrats could overrule the Chief Minister. Further, the ordinance provides that if a disagreement arises between the Authority and the Lieutenant Governor (LG), the decision of the LG shall prevail. The ordinance raises multiple legal and political questions regarding federalism, democracy, bureaucratic accountability, executive law-making, and judicial review. Several Opposition parties, barring the Congress, have supported the Aam Aadmi Party (AAP) government in its opposition to the ordinance. Congress leader Ajay Maken said that “cooperative federalism principles don’t fit” Delhi since it is the “National Capital”. In this context, it is important to examine how the ideas of federalism fit in unique contexts such as Delhi.
Asymmetric federalism and Delhi
The position of Delhi in India’s federal constitutional scheme is not straightforward. The Supreme Court, in its May 11 verdict, had noted that the addition of Article 239AA in the Constitution accorded the National Capital Territory of Delhi (NCTD) a “sui generis” status. The Court held that there is no “homogeneous class” of Union Territories and States; rather, India’s Constitution has several examples of special governance arrangements which treat federal units differently from each other. It noted that the special provisions for States under Article 371 are in the nature of “asymmetric federalism” made for “accommodating the differences and the specific requirements of regions”.
Scholars of federalism have long argued that for countries with deep social cleavages along ethnic, linguistic, and cultural lines, an asymmetric model of federalism, which accommodates the interests of various social groups through territorial units, is desirable. India’s federal system has been described as asymmetric due to the special status it accorded Jammu and Kashmir under Article 370 (before its dilution) and special protections under Article 371, and 5th and 6th Schedule Areas.
What is striking about the Court’s judgment is that it used the asymmetric federalism framework to clarify the position of the NCTD in India’s federal scheme. It remarked that though NCTD is not a full-fledged State, since its Legislative Assembly is constitutionally entrusted to legislate upon subjects in the State and Concurrent Lists, the insertion of Article 239AA created a “asymmetric federal model” for the NCTD. So, while the NCTD remains a Union Territory, the “unique constitutional status conferred upon it makes it a federal entity”.
While the invocation of asymmetric federalism for Delhi is interesting, the Court was a mute spectator when this idea was annihilated in Jammu and Kashmir. Nevertheless, an articulation of the underlying principles of federalism in this case is welcome. The Court noted that the principles of federalism and democracy are interlinked since the States’ exercise of legislative power gives effect to people’s aspirations and that federalism creates “dual manifestation of the public will” in which the priorities of the two sets of governments “are not just bound to be different, but are intended to be different”. Such a clear expression of the federal principle punctures hollow exhortations of “cooperative federalism” that have been weaponised to centralise Indian politics.
The law and politics of federalism
The presidential ordinance is problematic at different levels. First, the government’s swift and brazen act of undoing a Constitution Bench judgment does not augur well for judicial independence. While the legislature can alter the legal basis of a judgment, it cannot directly overrule it. Further, executive law-making through an ordinance, as the Supreme Court held in D.C. Wadhwa (1987), is only to “meet an extraordinary situation” and cannot be “perverted to serve political ends”. Most crucially, adding an additional subject of exemption (services) to the existing exemptions (land, public order, and police) of Delhi’s legislative power listed in Article 239AA, without amending the Constitution, is arguably an act of constitutional subterfuge. Finally, creating a civil services authority where bureaucrats can overrule an elected Chief Minister destroys long-established norms on bureaucratic accountability.
For all of these reasons, the ordinance is a direct assault on federalism and democracy. Such an unabashed power-grab by the Union government needs to be opposed by all who care for the future of India as a federal democracy. However, Opposition parties do not often take a position on federalism on first principles or articulate it as a normative idea. Hence, AAP cheered the dilution of Article 370, and now the Congress refuses to oppose this ordinance. This poses limits for federalism to act as a counter-hegemonic idea. As the foundations of India’s constitutionalism are threatened, we need a new politics of federalism that reflects and articulates the underlying values of federalism consistently.
Date:05-06-23
तकनीकी खामी का प्रश्नसंपादकीय
सबसे भयानक रेल दुर्घटनाओं में से एक बालेश्वर रेल हादसे में यह तथ्य सामने आना गंभीर चिंता का कारण बनना चाहिए कि इलेक्ट्रानिक इंटरलाकिंग सिस्टम में गड़बड़ी के कारण यह दुर्घटना हुई। विस्तृत जांच रिपोर्ट इस पर और विस्तार से प्रकाश डालेगी, लेकिन एक ऐसे समय जब देश में ट्रेनों की संख्या और उनकी गति बढ़ती चली जा रही है, तब उनके सुरक्षित संचालन के लिए त्रुटिहीन तकनीक का उपयोग सुनिश्चित किया जाना अनिवार्य है। यदि यह सच है कि दक्षिण पश्चिम रेलवे के एक पूर्व अधिकारी ने इलेक्ट्रानिक इंटरलाकिंग सिस्टम की अनदेखी होने की बात कही थी तो फिर इसकी तह तक जाना चाहिए कि उनकी रिपोर्ट को गंभीरता से लिया गया या नहीं?
इसी के साथ इस प्रश्न का उत्तर भी मिलना चाहिए कि इलेक्ट्रानिक सिग्नल मेंटेनर सही तरह काम करता है या नहीं? ट्रेनों के संचालन में ऐसी किसी तकनीक के इस्तेमाल की अनुमति नहीं दी जा सकती, जो पूरी तरह भरोसेमंद न हो या फिर जिसमें गड़बड़ी होने की तनिक भी गुंजाइश रहती हो। चूंकि बालेश्वर हादसा बहुत ही भयावह है और इस तरह के हादसे स्वीकार्य नहीं, इसलिए उसकी केवल सघन जांच ही नहीं होनी चाहिए, बल्कि यह भी सुनिश्चित किया जाना चाहिए कि भविष्य में इस तरह के हादसे न हों। यह सुनिश्चित करके ही उस भरोसे को बहाल किया जा सकता है, जो बालेश्वर रेल हादसे के बाद डिगा हुआ सा दिखने लगा है।
रेल मंत्री की ओर से बालेश्वर हादसे की जांच सीबीआइ से कराने की सिफारिश यह बताती है कि मामला बहुत गंभीर है, लेकिन मुद्दा केवल दुर्घटना के लिए जिम्मेदार कारणों और लोगों की पहचान ही नहीं, बल्कि यह भी है कि ट्रेनों का सुरक्षित संचालन कैसे सुनिश्चित हो। इसके लिए ऐसी भरोसेमंद तकनीक विकसित करनी होगी, जिसमें न तो किसी खामी के लिए गुंजाइश रहे और न ही किसी मानवीय भूल के लिए। यह अच्छी बात है कि बालेश्वर रेल हादसे को लेकर लगभग एक स्वर से यह मांग उठी है कि उसकी गहनता से जांच हो, लेकिन इसी के साथ विरोधी दलों के कुछ नेता रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव के त्यागपत्र की मांग करने में जुट गए हैं।
यह मांग करने वालों को अपने आप से यह प्रश्न करना चाहिए कि क्या रेल मंत्री का त्यागपत्र उन कारणों का निवारण करने में सहायक सिद्ध होगा, जिनके चलते इतना बड़ा हादसा हुआ और जिसमें 275 रेल यात्री मारे गए और एक हजार के करीब घायल हो गए? यह विडंबना ही है कि अश्विनी वैष्णव से त्यागपत्र मांगने वालों में वे पूर्व रेल मंत्री भी हैं, जिनके समय भी बड़े रेल हादसे हुए और तब उन्होंने त्यागपत्र देने की कोई आवश्यकता नहीं समझी। रेल मंत्री से त्यागपत्र मांगने वालों को इसकी अनदेखी नहीं करनी चाहिए कि उन्होंने रेलवे की हालत सुधारने और ट्रेनों के सुरक्षित संचालन की दिशा में उल्लेखनीय कार्य किया है।
Date:05-06-23
खतरे के संकेतसंपादकीय
ओडिशा में हुए दशक के सबसे बड़े रेल हादसे ने भारतीय रेलवे की गलत प्राथमिकताओं की समस्या को एक बार फिर रेखांकित कर दिया है। वह समस्या है सुरक्षा और रखरखाव के बजाय वंदे भारत ट्रेन और बुलेट ट्रेन परियोजनाओं में निवेश को तरजीह देना। यद्यपि अभी विस्तृत रिपोर्ट की प्रतीक्षा है लेकिन रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने कहा है कि ओडिशा के बालासोर में तीन रेलगाड़ियों की टक्कर की बुनियादी वजह थी इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग सिस्टम में खराबी। इस खराबी की वजह से चेन्नई की ओर जा रही शालीमार-चेन्नई कोरोमंडल एक्सप्रेस उसी ट्रैक पर खड़ी मालगाड़ी से टकरा कर बेपटरी हो गई। इस बीच विपरीत दिशा में चल रही एक अन्य सवारी गाड़ी यशवंतपुर-हावड़ा सुपरफास्ट ट्रेन बेपटरी हुए डिब्बों से भिड़ गई जिससे 275 लोगों की मौत हो गई और 1,100 से अधिक लोग घायल हो गए। वैष्णव ने कहा कि गलत सिग्नल के लिए जिम्मेदार लोगों की पहचान कर ली गई है चीजों को पहले जैसा बनाने के प्रयास किए जा रहे हैं।
ये प्रयास काफी देर से किए जा रहे हैं। सिग्नल देने की प्रणाली में खामियां नई नहीं हैं। पहले भी कई बार इन पर सवाल उठाए जा चुके हैं। उदाहरण के लिए इस वर्ष फरवरी में ही रेलवे अधिकारियों ने एक अन्य जोन में सिग्नलिंग प्रणाली में गंभीर खामियों की ओर इशारा किया था। मैसूरु के निकट संपर्क क्रांति एक्सप्रेस और एक माल गाड़ी के बीच टक्कर को लोको पायलट की सतर्कता की वजह से टालने में कामयाबी मिली थी क्योंकि उसने पाया था कि सवारी गाड़ी को गलत लाइन पर भेज दिया गया है। 2018 में दक्षिण भारत के मार्गों पर चलने वाले लोको पायलटों ने एक सप्ताह के भीतर सिग्नल प्रणाली में तीन गंभीर संकट उजागर किए थे। इन सभी मामलों में एक्सप्रेस ट्रेनों को गलत मार्ग पर आगे बढ़ा दिया गया था। एक मामले में तो ट्रेन को क्रॉसिंग पार करने का सिग्नल दे दिया गया था जबकि वहां से वाहन गुजर रहे थे। इन मामलों में भी लोको पायलटों की सतर्कता के कारण समय रहते ट्रेनों को रोका जा सका था। जरूरी नहीं है कि तेज गति से चलने वाली ट्रेनों को हमेशा ऐसे समय पर रोक कर खतरा टाला जा सके। बालासोर हादसा भी ऐसी ही घटना का परिणाम है।
दुर्घटना के बाद से यह सवाल भी बार-बार उठ रहा है कि उस मार्ग पर ट्रेनों के बीच आमने-सामने की भिड़ंत रोकने के लिए बनी ‘कवच’प्रणाली क्यों नहीं स्थापित की गई थी। स्वदेश में विकसित यह चेतावनी प्रणाली न केवल लोको पायलट को समय रहते आसन्न भिड़ंत के बारे में जानकारी देती है बल्कि जब उसे लगता है कि उसी पटरी पर कोई और ट्रेन आ रही है तो वह एक खास दूरी पर रहते स्वत: ब्रेक लगा देती है। इस प्रणाली का परीक्षण भी बहुत मंथर गति से हुआ है और दक्षिण मध्य रेलवे सिस्टम के दो सेक्शन में इसे परखा गया है। सुरक्षा और रखरखाव के अलावा अतीत में नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक ने एक गंभीर कमी की ओर इशारा किया था और वह यह कि भारत सरकार स्वदेश में विकसित उच्च गति वाली ट्रेनों की शुरुआत कर रही है और एक बुलेट ट्रेन परियोजना में करोड़ों रुपये की राशि मंजूर की गई है।
वंदे भारत ट्रेन निस्संदेह स्थानीय इंजीनियरिंग की सफलता हैं लेकिन विडंबना यह है कि 180 किलोमीटर प्रति घंटे की अपनी उच्चतम गति से कोसों दूर वे औसतन 83 किमी प्रति घंटे की रफ्तार से चल रही हैं। ऐसा आमतौर पर पटरियों की खराब स्थिति के कारण है। हालांकि मंत्री ने कहा है कि उनके लिए पटरियों को बेहतर बनाया जा रहा है। यह मानना होगा कि 2016 के बाद से बड़ी दुर्घटनाओं में कमी आई है लेकिन बालासोर दुर्घटना एक चेतावनी है। हर रोज करीब 2.5 करोड़ लोग रेलों में सफर करते हैं। उनमें से कई देश के गरीब और मध्यवर्ग से ताल्लुक रखते हैं जो वंदे भारत जैसी महंगी ट्रेनों में सफर नहीं कर सकते। वे हवाई जहाज या बुलेट ट्रेन (जब वह शुरू हो जाएगी) में भी नहीं चल सकते। भारतीय रेल को उन्हें सुरक्षा की दृष्टि से आश्वस्त करना चाहिए।
Date:05-06-23
हरित अर्थव्यवस्था में बड़े बदलाव लाने वाली पहलवंदना गोम्बर
जिस सप्ताह नए संसद भवन का उद्घाटन हुआ उसी समय भारत की शीर्ष तेल निर्यातक कंपनी तेल एवं प्राकृतिक गैस निगम (ONGC) की तरफ से ऊर्जा क्षेत्र से जुड़ी एक बड़ी घोषणा हुई। ओएनजीसी ने कहा कि वह वर्ष 2030 तक स्वच्छ ऊर्जा परियोजनाओं में 1 लाख करोड़ रुपये निवेश करने की योजना को कार्य रूप देने में जुटी है। ओएनजीसी के चेयरमैन अरुण कुमार सिंह ने कहा कि ओएनजीसी इस दशक के अंत तक अक्षय ऊर्जा में अपनी वर्तमान क्षमता 200 मेगावॉट से बढ़ाकर 10,000 मेगावॉट करना चाहती है। सिंह ने कहा, ‘भारत में 2040 तक जीवाश्म ईंधन की मांग बढ़ती रहेगी मगर इसी दौरान हमें हरित ऊर्जा की दिशा में भी प्रयास तेज करना होगा। हमें इसलिए ऐसा करना होगा कि जीवाश्म ईंधन के परंपरागत इस्तेमाल के बीच हरित ऊर्जा के भी इस्तेमाल को बढ़ावा मिलता रहे।’
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार पहली बार इस साल निवेशक तेल उत्पादन से अधिक सौर ऊर्जा में निवेश करेंगे। आंकड़ों के आधार पर बात करें तो जीवाश्म ईंधन में होने वाले प्रत्येक 1 डॉलर निवेश के बदले लगभग 1.7 डॉलर अब स्वच्छ ऊर्जा के उत्पादन में लगाया जा रहा है। आईए के कार्यकारी निदेशक फतह बिरोल ने कहा कि पांच वर्ष पहले तक यह अनुपात 1-1 का था। इस वर्ष पूरी दुनिया में ऊर्जा क्षेत्र में 2.8 लाख करोड़ डॉलर निवेश का अनुमान है जिनमें लगभग 1.7 लाख करोड़ डॉलर स्वच्छ तकनीक में निवेश किए जाएंगे। यह रकम अक्षय ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहन, नाभिकीय ऊर्जा, ग्रिड, भंडारण, कम उत्सर्जन करने वाले ईंधन, क्षमता सुधार और ताप पंपों पर खर्च की जाएगी। 1 लाख करोड़ डॉलर से कुछ अधिक रकम कोयला, गैस एवं तेल में जाएगी। कुछ सरकारें स्वच्छ ऊर्जा क्षेत्र में रणनीतिक साझेदारी ले रही हैं। तेल क्षेत्र में भी पहले सरकारें रणनीतिक हिस्सेदारी लेती रही हैं। डेनमार्क ने कहा है कि वह पवन ऊर्जा परियोजनाओं में 20 प्रतिशत हिस्सेदारी लेगी। यह योजना सरकार और विपक्षी दलों के बीच 14 गीगावॉट क्षमता वाली पवन ऊर्जा क्षमता विकसित करने के सौदे का हिस्सा है।
फोर्ड- टेस्ला सौदा
इलेक्ट्रिक वाहनों (ईवी) की मांग बैटरी चार्ज करने की सुविधाओं के विकास पर पूरी तरह निर्भर है। ईवी चार्जर साझा करने को लेकर फोर्ड-टेस्ला के बीच हुआ समझौता इलेक्ट्रिक वाहनों के क्षेत्र में एक बड़ी प्रगति मानी जा सकती है। फोर्ड की तरफ से जारी एक बयान में कहा गया, ‘अमेरिका और कनाडा में फोर्ड के ईवी ग्राहकों के लिए 12,000 से अधिक टेस्ला सुपरचार्जर सुलभ होंगे। 10,000 डीसी फास्ट चार्जर ब्लूओवल चार्जर इस तंत्र (नेटवर्क) का पहले से ही हिस्सा हैं। इससे फोर्ड के ईवी ग्राहकों के लिए फास्ट चार्जिंग तक पहुंच आसानी से सुनिश्चित हो जाएगी।‘
टेस्ला द्वारा तैयार एडेप्टर फोर्ड के कम्बाइंड चार्जिंग सिस्टम (सीसीएस) युक्त ईवी की पहुंच टेस्ला के सुपरचार्जर तक आसान कर देगा। 2025 में फोर्ड नॉर्थ अमेरिकन चार्जिंग स्टैंडर्ड (एनएसीएस) कनेक्टर लगे इलेक्ट्रिक वाहनों की पेशकश करेगी। ब्लूमबर्गएनईएफ के अनुमानों के अनुसार 2022 के अंत तक सार्वजनिक ईवी-चार्जिंग कनेक्टर की संख्या 27 लाख थी। पिछले साल हुए निवेश का लगभग 80 प्रतिशत हिस्सा अत्यंत तेज गति से चार्ज करने वाले चार्जरों (अल्ट्रा फास्ट चार्जर) के विनिर्माण में लगाया गया।
सौर ऊर्जा परियोजना पर बड़ा दांव
ऑस्ट्रेलिया से सिंगापुर तक जल के अंदर से सौर ऊर्जा पहुंचाने की 20 अरब डॉलर की महत्त्वाकांक्षी योजना एक बार फिर पटरी पर आती दिख रही है। अरबपति माइक कैनन-ब्रूक्स द्वारा सन केबल परियोजना की परिसंपत्तियों के अधिग्रहण के बाद ये संभावनाएं जगी हैं। इस बारे में कैनन ब्रूक्स ने कहा, ‘हमारा सदैव मानना रहा है कि सन केबल सौर ऊर्जा ले जाने की संभावनाओं से परिपूर्ण है। हम यह भी जानते हैं कि ऑस्ट्रेलिया के लिए इसके क्या मायने हो सकते हैं।‘
इस सौदे के बाद कैनन-ब्रूक्स और क्विनब्रूक इन्फ्रास्ट्रक्चर पार्टनर्स का उत्तरी ऑस्ट्रेलिया में विशाल अक्षय ऊर्जा परियोजना पर नियंत्रण हो जाएगा। 4,200 किलोमीटर लंबे जल के अंदर से गुजरने वाले केबल के जरिये एशिया को बिजली के निर्यात की योजना पर प्रमुख निवेशकों के बीच विवाद हो जाने के बाद मामला बिगड़ गया था।
हरित हाइड्रोजन का विकास
अमेरिकी कंपनी पल्ग पावर ने फिनलैंड में तीन हरित हाइड्रोजन (ग्रीन हाइड्रोजन) संयंत्र लगाने की योजना तैयार की है। इन संयंत्रों की स्थापना पर 6 अरब डॉलर लागत आएगी। इस संबंध में कंपनी की तरफ से आए बयान में कहा गया कि वह पर्याप्त पूंजी जुटाने के लिए अपने वित्तीय साझेदारों के साथ मिलकर काम कर रही है। कंपनी ने कहा कि वह विश्वसनीय पक्षों से भी ऊर्जा खरीदने के संबंध में ठोस आश्वासन लेने की तैयारी में है। इन परियोजनाओं के संबंध में 2025-26 तक निवेश के संबंध में ठोस निर्णय ले लिया जाएगा।
कंपनी वैश्विक स्तर पर हरित हाइड्रोजन उत्पादन तंत्र तैयार कर रही है और अन्य संस्थानों सहित अमेरिकी ऊर्जा विभाग के ऋण कार्यक्रम कार्यालय से ऋण लेने का प्रयास कर रही है। कंपनी ने पिछले महीने कहा था कि रणनीतिक साझेदारों एवं मूलभूत ढांचे में निवेश करने वाली इकाइयां लगातार परियोजना में दिलचस्पी दिखा रही हैं।
फैशन कंपनियों से शुल्क
कपड़े की बरबादी रोकने के लिए नियामक कुछ खास उपायों पर विचार कर रहे हैं। इनके तहत फैशन कंपनियों को उत्पादन की मात्रा के आधार पर कुछ शुल्क का भुगतान करना होगा। कैलिफोर्निया, न्यूयॉर्क, स्वीडन, नीदरलैंड्स और इटली में अलग से कुछ नियमों के प्रस्ताव दिए गए हैं। इन नियमों के तहत फैशन कंपनियों को टेक्सटाइल रीसाइकलिंग कार्यक्रमों के लिए वित्त मुहैया कराना होगा। ब्रिटेन और यूरोपीय संघ में भी ऐसे ही नियमों पर विचार हो रहा है। एक्सटेंडेड प्रोड्यूसर रिस्पॉन्सिबिलिटी (ERP) पर केंद्रित इन योजनाओं के तहत ब्रांडों को उत्पादन पर फीस देनी होगी या पुनरावर्तन (रीसाइकलिंग) कार्यक्रमों चलाने के लिए रकम देनी होगी। कपड़ा के लिए ईपीआर कार्यक्रमों के समर्थकों को उम्मीद है कि इससे कपड़े का बेवजह जरूरत से अधिक उत्पादन नहीं होगा और इनसे रीसाइकलिंग में नवाचार बढ़ने के साथ ही उच्च गुणवत्ता वाले उत्पाद भी तैयार होंगे।
Date:05-06-23
हादसे की रेलसंपादकीय
ओड़ीशा के बालासोर में हुआ रेल हादसा यह बताने के लिए काफी है कि भारतीय रेल को अंतरराष्ट्रीय स्तर का बनाने का दावा चाहे कितना भी किया जाए, लेकिन यह सपना अभी हकीकत से दूर है। एक साथ तीन रेलगाड़ियों का आपस में टकराना इस बात की पुष्टि है कि या तो रेलगाड़ियों के परिचालन के प्रबंधन में घनघोर लापरवाही बरती गई या फिर रखरखाव और सुरक्षा के इंतजामों में व्यापक खामी है।
खबरों के मुताबिक, शनिवार शाम को यशवंतपुर से हावड़ा जा रही दुरंतो एक्सप्रेस के कुछ डिब्बे पटरी से उतर गए और विपरीत दिशा से आ रहे कोरोमंडल एक्सप्रेस से टकरा गए। इसके बाद दूसरी रेलगाड़ी की कई बोगियां भी पटरी से उतर गईऔर वहीं खड़ी मालगाड़ी से टकरा गई। इस तरह एक साथ तीन रेलगाड़ियों की टक्कर हो गई और सिर्फ इतने से ही हादसे की भयावता का अंदाजा लगाया जा सकता है। इस दुर्घटना में दो सौ पिचहत्तर लोगों की जान चली गई और ग्यारह सौ पिचहत्तर लोग घायल हो गए। सवाल है कि जिस दौर में समूची रेल व्यवस्था को आधुनिकतम स्वरूप देने की बात की जा रही हो, उसके बारे में इस घटना के बाद क्या राय बनेगी! इस हादसे के बाद स्वाभाविक ही इस बात पर भी चर्चा हो रही है कि चलती ट्रेन को सामने से आ रही किसी ट्रेन से टकराने से रोकने के लिए जिस ‘कवच’ नाम की व्यवस्था के इस्तेमाल की बात हो रही थी, क्या उसका दायरा और उसकी उपयोगिता अभी सीमित है? हालांकि इस घटना के बारे में आई खबरों में बताया गया कि एक रेलगाड़ी के डिब्बे पटरी से उतर गए और इस वजह से हादसा हुआ। लेकिन क्या दुर्घटना वाले मार्ग पर ‘कवच’ की व्यवस्था थी? इसके समांतर इस बात की पड़ताल करने की जरूरत है कि ट्रेन के बेपटरी होने का क्या कारण है। क्या पटरियों में पहले से कोई खामी थी, उससे कोई छेड़छाड़ की गई थी या फिर ट्रेन के परिचालन में कोई ऐसी चूक या लापरवाही हुई, जिसकी वजह से डिब्बे पटरी से उतरे। वजह चाहे जो हो, लेकिन सच यह है कि ट्रेन के सफर को सुरक्षित मान कर अपने-अपने घर या किसी गंतव्य के लिए चले बहुत सारे लोगों की जान चली गई या वे बुरी तरह हताहत हुए। सवाल है कि क्या इस चूक के लिए किसी की जिम्मेदारी तय की जाएगी!
दरअसल, पहले हुए इसी तरह के हादसों के मद्देनजर ऐसे इंतजाम किए जाने की जरूरत महसूस की गई थी कि अगर कभी ट्रेनों में आमने-सामने टक्कर की स्थिति बने तो ‘कवच’ की मदद से उससे बचा जा सके। ‘कवच’ का पूर्व परीक्षण भी हो चुका है। लेकिन अगर ताजा रेल दुर्घटना के बारे में शुरुआती कारणों को ध्यान में रखें तो ऐसा लगता है कि बचाव के इंतजामों पर नए सिरे से विचार करने की जरूरत है। हाल के दिनों में रेलयात्रा को बेहतर करने के क्रम में इस बात पर भी ज्यादा जोर दिया जा रहा है कि रेलगाड़ियों की रफ्तार और ज्यादा बढ़ाई जाए। सवाल है कि तेज रफ्तार से चलने वाली गाड़ियों के लिए क्या रेलगाड़ियों और पटरियों की गुणवत्ता और उनके रखरखाव के साथ-साथ निर्बाध रास्ते को लेकर भी क्या उसी अनुपात में काम किए गए हैं, ताकि लोगों की रेल यात्रा को पूरी तरह सुरक्षित बनाया जा सके? रेलवे में संरक्षा और सुरक्षा कर्मियों के कितने पद रिक्त हैं? बालासोर हादसे से यह साबित होता है कि यात्रा के बढ़ते खर्चे के बीच हर कुछ दिनों बाद सरकार की ओर से रेलगाड़ियों में सुविधाएं और सुरक्षा के साथ-साथ उसके सुरक्षित परिचालन को लेकर दिए जाने वाले आश्वासनों के बरक्स सच्चाई संतोषजनक नहीं है।
Date:05-06-23
ब्रिक्स की दमदारीसंपादकीय
दक्षिण अफ्रीका के केपटाउन में ब्रिक्स (ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका) देशों के विदेश मंत्रियों का दो दिवसीय सम्मेलन पिछले शुक्रवार को संपन्न हो गया। यह सम्मेलन पूर्व की अपेक्षा अधिक चर्चा का विषय बन गया था। इसलिए कि रूस-यूक्रेन में जारी जंग के बीच संपन्न हो रहा था, जबकि ब्रिक्स के स्तंभ देश रूस के राष्ट्रपति व्लीदिमीर पुतिन पर युद्ध अपराधी होने के आरोप में गिरफ्तारी वारंट जारी है। हालांकि यह ब्रिक्स सम्मेलन सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्षों एवं शासन प्रमुखों के अगले छह महीने बाद होने वाले शिखर सम्मेलन की तैयारी की एक पूर्वपीठिका के रूप में हुआ पर इसने अपनी निरंतर संघनित होती आंतरिकता एवं वैश्विक व्यवस्थाओं में नई व्यावहारिकता की आवश्यकता को रेखांकित किया है। ब्रिक्स का आत्मविश्वास डेढ़ दशक में ही अपनी बढ़ती स्वीकार्यता और तदनुरूप विशाल आकार की संभावनाओं से जाहिर होता है। कोई 19 देशों ने ब्रिक्स के चार्टर को अपने साझा आर्थिक-राजनीतिक विकास के लिए जरूरी माना है। इससे गोल्डमैन सैक्स का यह दावा सही साबित होता है कि 2050 तक वैश्विक अर्थव्यवस्था पर चार ब्रिक्स इकोनमी का प्रभुत्व होगा। इस दावे का आधार था कि ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती और उभरती बाजार अर्थव्यवस्थाएं हैं। संगठन देशों ने जिस तरह से आबादी, भूक्षेत्र एवं उत्पादन-कारोबार की वैश्विक भागीदारी में अपना अनुपात बढ़ाया है, उसको देखते हुए इसके अर्थशास्त्री ब्रिक्स को समूह-7 की तुलना में व्यापक, तीव्र गति से विकास करने वाला अधिक सक्षम मानते हैं। हालांकि वैश्विक अर्थव्यवस्था में मंदी के दुष्प्रभाव से इसमें भी लड़खड़ाहट आई लेकिन समय के साथ यह संभल गया। अब तो यह तमाम चुनौतियों से निबटते हुए अधिक सक्षम दिख रहा है। वैश्विक आर्थिकी के विकास में विकासशील देशों की उचित हिस्सेदारी की मांग करते हुए संयुक्त राष्ट्र और सुरक्षा परिषद में बदलाव के औचित्य को प्रतिपादित कर रहा है। हालांकि ऐसे मौकों पर बहुत सारे विशेषण गढ़े जाने का भी रिवाज रहा है कि हम दुनिया में समानता एवं सद्भाव के लिए काम करेंगे लेकिन ब्रिक्स आज जहां पर पहुंचा है, वहां से समानता और अधिकार की बातें फिजूल भी नहीं हैं कि दिग्गज देश उसकी अनसुनी कर दें। निस्संदेह इसका श्रेय भारत की स्वतंत्र विदेश नीति को जाता है।
Date:05-06-23
टूटा भरोसे का ‘कवच’विनीत नारायण
मंत्री अश्विनी वैष्णव ने बालासोर के बेहद खौफनाक रेल हादसे के एक दिन पहले टीवी के जरिए जनता को बताया था कि मोदी सरकार ने भारतीय रेल का कायाकल्प कर दिया है। उन्होंने यह भी दावा किया था कि ट्रेन दुर्घटनाओं को टालने के लिए मोदी सरकार ने विश्व की सबसे आधुनिक सुरक्षा प्रणाली ‘कवच’ को लागू कर दिया है। हकीकत यह है कि इस तकनीक को लागू करने का फैसला मनमोहन सिंह सरकार ने 2012 में ले लिया था। तब इसका नाम ‘ट्रैफिक कोलिजन अवायडेंस सिस्टम’ था। पुरानी योजनाओं के नाम बदल कर उन्हें अपनी नई योजना बताकर लागू करने में माहिर भाजपा सरकार ने 2022 में उसी योजना को ‘कवच’ के नाम से लागू किया था। प्रश्न है कि पिछले नौ वर्ष से केंद्र सरकार इस सुरक्षा प्रणाली पर कुंडली मारे क्यों बैठी थी?
‘कवच’ वह तकनीक है, जिसे लागू करने के बाद पटरियों पर दौड़ती रेलगाड़ी किसी दुर्घटना के अंदेशे से 400 मीटर पहले ही अपने आप रुक जाती है। शुरू में इसे दिल्ली-मुंबई और दिल्ली-हावड़ा के रूट पर लागू किया गया और दावा किया गया कि मोदी सरकार के ‘मिशन रफ्तार’ के तहत 160 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार से दौड़ने वाली रेलगाड़ी अपने आप रु क जाएगी। उल्लेखनीय है कि इस तकनीक का परीक्षण करने के लिए रेल मंत्री अिनी वैष्णव ने अपनी जान को जोखिम में डाला और पिछले साल मार्च में सकिंदराबाद में इंजन ड्राईवर के साथ बैठे और इस तकनीक का सफल परीक्षण किया जिसमें आमने-सामने से आतीं दो रेलगाड़ियों पर इसे परखा गया था।
रेल मंत्री ने बालासोर के दुखद हादसे से कुछ घंटे पहले ही दिल्ली में रेल मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारियों को संबोधित करते हुए ‘कवच’ के परीक्षण का विडियो भी दिखाया था। उन्होंने रेल अधिकारियों से सभी प्रमुख रेलगाड़ियों की गति को 160 किलोमीटर तक बढ़ाने की अपील की जिससे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का ‘मिशन रफ्तार’ गति पकड़ सके। पर अनहोनी को कौन टाल सकता है? बालासोर में जो हादसा हुआ उसमें एक नहीं, तीन-तीन ट्रेनें आपस में भिड़ीं। ऐसा हादसा दुनिया की रेल दुर्घटनाओं में होने वाले हादसों में शायद पहले कभी नहीं हुआ। उल्लेखनीय है कि इस रूट पर ‘कवच’ को अभी लागू नहीं किया गया था। इस हादसे में सैकड़ों लोग अकाल मृत्यु को प्राप्त हुए और हजार से ज्यादा गंभीर रूप से घायल हुए। राहत एवं बचाव कार्य करने वाले लोग दुर्घटना स्थल को देखकर दहल गए क्योंकि उनके सामने चारों तरफ लाशों का अंबार लगा था। रेलगाड़ी की कई बोगियां तो पूरी तरह पलट गई, जिनके पहिए ऊपर और छत जमीन पर आ गई थी।
काल के आगे किसी का बस नहीं चलता। कहते हैं कि जिसने जन्म लिया है, उसकी मृत्यु की घड़ी भी पूर्व निर्धारित होती है। इसलिए जिन परिवारों ने अपनों को खो दिया है, उनके प्रति पूरे देश की सहानुभूति है। सरकार से उम्मीद है कि वह जो भी कर सके वो सब इन परिवारों के लिए करे। मगर यहां एक गंभीर प्रश्न खड़ा होता है कि क्या हम रेल यात्रा के मामले में अपनी क्षमता से अधिक हासिल करने का प्रयास तो नहीं कर रहे? 11 करोड़ लोग भारतीय रेल में सफर करते हैं।
मालगाड़ी की जगह यात्री सेवाओं पर कहीं ज्यादा खर्च आता है क्योंकि यात्रियों की अपेक्षाएं बहुत ज्यादा होती हैं। ध्यान देने वाली बात यह है कि संपन्न वर्ग अब रेल यात्रा की जगह हवाई यात्रा को प्राथमिकता देता है जबकि आम आदमी विशेषकर मजदूर वर्ग के लिए रेल यात्रा ही एकमात्र विकल्प है। काम की तलाश में मजदूर देश के एक हिस्से से दूसरे हिस्से में आते-जाते रहते हैं। इन्हें 5 सितारा चमक-धमक की बजाय पेयजल, शौचालय और वेटिंग हाल जैसी बुनियादी सुविधाओं से ही संतोष हो जाता है। ऐसे में सरकार का रेलवे स्टेशनों और रेलगाड़ियों को 5 सितारा संस्कृति से सुसज्जित करना बड़ी प्राथमिकता नहीं होना चाहिए। अभी तो देश को अपने सीमित संसाधनों को आम जनता के स्वास्थ्य और शिक्षा पर खर्च करने की जरूरत है। मोदी जी हमेशा बड़े सपने देखते हैं। ‘मिशन रफ्तार’ को सभी प्रमुख रेलगाड़ियों पर लागू करना चाहते हैं। सत्ता में आते ही उन्होंने ‘बुलट ट्रेन’ का भी सपना दिखाया था जो अभी धरातल पर नहीं उतर पाया है। हमारे देश की जमीनी हकीकत यह है कि हम जापान और चीन की तरह न तो अपने कार्य के प्रति ईमानदारी से समर्पित हैं, और न ही अनुशासित हैं। परिणामत: सरकार की तमाम महत्त्वाकांक्षी योजनाएं लागू होने से पहले ही विफल हो जाती हैं।
यहां अगर उज्जैन के महाकाल का उदाहरण लें तो अनुचित न होगा। छह महीने पहले 856 करोड़ रुपये से हुआ मंदिर का सौंदर्यीकरण एक ही आंधी में धराशायी हो गया। ऐसे तमाम उदाहरण हैं, जब मतदाताओं को प्रभावित करने के लिए बड़ी-बड़ी योजनाओं को जल्दबाजी में, बिना गुणवत्ता का ध्यान रखे, लागू किया गया और वे जल्दी ही अपनी अकुशलता का सबूत देने लगीं। इसलिए रेल विभाग को नई तकनीकी और 5 सितारा संस्कृति अपनाने में जल्दबाजी नहीं करनी चाहिए। ऐसा न हो ‘आधी छोड़ सारी को धावे, आधी मिले न पूरी पावे।’
अंतिम प्रश्न है कि क्या रेल मंत्री अिनी वैष्णव को 1956 में तत्कालीन रेल मंत्री लाल बहादुर शास्त्री का अनुसरण करते हुए बालासोर की दुखद दुर्घटना की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए और विपक्ष की मांग का सम्मान करते हुए अपने पद से इस्तीफा दे देना चाहिए? मैं इसका समर्थक नहीं हूं क्योंकि आज की राजनीति में न तो राजनीतिज्ञों के नैतिक मूल्यों का शास्त्री जी के समय जैसा उच्च नैतिक स्तर बचा है, और न ही ऐसे इस्तीफों से किसी मंत्रालय की दशा सुधरती है। बजाय इस्तीफा मांगने के मैं रेल मंत्री को सुझाव देना चाहता हूं कि अपनी प्राथमिकताओं, क्षमताओं, उपलब्ध संसाधनों और आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग के करोड़ों रेलयात्रियों की सुविधा का ध्यान रखकर निर्णय लें। जो मौजूदा ढांचा रेल मंत्रालय का है, उसमें यथासंभव सुधार की कोशिश करें और अपने विभाग से भ्रष्टाचार को खत्म करें और कार्यकुशलता को बढ़ाएं। वही बालासोर के हादसे में मारे गए रेलयात्रियों के प्रति सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
Date:05-06-23
रेलवे के लिए सबकसंपादकीय
भारतीय रेलवे के इतिहास में एक बेहद दुखद और शर्मनाक हादसा दर्ज हो गया। ओडिशा के बालासोर जिले में स्थित बहानागा बाजार स्टेशन एक बहुत अविश्वसनीय हादसे का गवाह बन गया। इस हादसे को समझने में ही लगभग एक दिन का समय लग गया और जो गलती हुई है, उसका आकार-प्रकार तय करने में पता नहीं कितना समय लगेगा? केंद्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव ने रविवार को यह बताया कि दुर्घटना इलेक्ट्रॉनिक इंटरलॉकिंग में बदलाव की वजह से हुई है। रविवार सुबह तक 290 लोगों की मौत हुई है और करीब 1,000 लोग घायल हैं। रेलवे सुरक्षा आयुक्त ने मामले की जांच की है और घटना की वजहों के साथ-साथ इसके लिए जिम्मेदार लोगों की पहचान भी कर ली गई है। आमतौर पर रेलवे सामूहिक जिम्मेदारी के तहत दोषी या जिम्मेदार व्यक्ति के नाम उजागर करने से बचता है, पर अब यह परिपाटी बदलनी चाहिए। रेलवे ही नहीं, हर विभाग में जो गैर-जिम्मेदार लोग हैं, उन्हें चिह्नित करना चाहिए। बदलते दौर में सरकारों की जिम्मेदारी है कि किसी भी तरह की सेवा में नाकारा लोगों को बर्दाश्त न किया जाए।
साल 1995 के बाद यह सबसे घातक रेल दुर्घटना है और इससे बहुत कुछ सीखने की जरूरत है। पहले भी सुधार के अवसरों को हमने गंवाया है, पर अब सुधार से मंह चुराने की रत्ती भर भी गुंजाइश नहीं है। दुनिया में सबसे अधिक आबादी वाला भारत और उसका जरूरत से ज्यादा दबाव झेलता रेल ढांचा छटांक भर लापरवाही भी नहीं बर्दाश्त कर सकता। प्रधानमंत्री का दुर्घटनास्थल पर जाना और वहां रेल मंत्री का लगातार बचाव कार्य में जुटे रहना बेहतर संकेत है। सेवा के मामले में दिखावे का दौर अब पीछे छूट जाना चाहिए और हर सेवा को चाक-चौबंद करना प्राथमिकता होनी चाहिए। भारत अगर सुविधा व सेवा को सुरक्षित बनाने पर पूरा ध्यान लगाए, तो ऐसे हादसों से हम बच सकते हैं, लेकिन आम लोगों को भी सोचना पड़ेगा कि क्या हम अपनी सुरक्षा, सुविधा सुनिश्चित करने के लिए ही वोट देते हैं? समय बदल रहा है, जनता की सुरक्षा के प्रति हर नेता को सजग होना चाहिए। ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक के घटनास्थल पर पहुंचने से पहले ही पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी पहुंच गईं। वह कोशिश में लग गईं कि जान गंवाने वालों की संख्या को बढ़ाकर बताएं, ताकि राजनीति चमकाने में सुविधा हो। वैसे, वह रेल मंत्री रह चुकी हैं, तो आज जो रेल दुर्घटना हुई है, उसमें उनका भी कुछ तो योगदान बनता होगा? वस्तुत: यह रेल हादसा राजनीति नहीं, बल्कि नीति और नीयत का विषय है।
कवच सुरक्षा जल्दी से जल्दी पूरे देश में लागू हो, लेकिन यह हादसा कवच से जुड़ा नहीं है। इसमें दो यात्री गाड़ियां आमने-सामने से एक ही पटरी पर नहीं भिड़ी हैं। यहां इंटरलॉकिंग सिस्टम, सिग्नल, प्वाइंट और ट्रैक सर्किट में सुधार की जरूरत सामने आई है। कई सवाल खड़े हुए हैं। क्या हम अति आत्मविश्वास के साथ रेल दौड़ाने लगे हैं? क्या 120-130 किमी प्रति घंटा की गति से दो गाड़ियों को अगल-बगल की पटरियों पर विपरीत दिशा में दौड़ाने की तकनीकी व बुनियादी क्षमता हम हासिल कर चुके हैं? क्या स्टेशनों पर न रुकने की स्थिति में वहां गाड़ियों की गति को कम नहीं किया जा सकता? यात्रियों के भाग्य भरोसे रेलों को तेज दौड़ाने से पहले अपना पूरा इंतजाम देख लेना चाहिए। गति तभी तक अच्छी है, जब तक सुरक्षित है। ध्यान रहे, भारतीय रेलवे के मूल मंत्र में सुरक्षा सबसे पहले है।
Date:05-06-23
सबके सच्चे प्रयास से बनेगा पर्यावरणअनीता भटनागर, ( पूर्व आईएएस अधिकारी )
आज, यानी 5 जून विश्व पर्यावरण दिवस है। आज कुछ सरकारी आयोजन होंगे, विज्ञापन जारी किए जाएंगे, और वाट्सएप जैसे मीडिया मंचों पर शुभकामनाएं भेजी जाएंगी। आज बड़ी संख्या में पेड़ लगाए जाएंगे, चाहे सब स्थानों पर वातावरण पेड़ लगाने व उनके जीवित रहने के अनुकूल हो अथवा नहीं। कई लोग प्रदूषण से पर्यावरण को नुकसान, विलुप्त होते ध्रुवीय भालू, आर्कटिक व अंटार्कटिका के पिघलते ग्लेशियर और भविष्य की पीढ़ियों के प्रभावित होने के संबंध में अपनी बात रखेंगे। मगर आज भला कितने लोग सोचेंगे कि दूषित पर्यावरण अब आपदा में बदल गया है और उससे उनके भी अस्तित्व पर प्रभाव पड़ रहा है?
भारत में गत वर्ष अत्यधिक गरमी के कारण विभिन्न क्षेत्रों में 159 अरब डॉलर की आय का नुकसान हुआ। असहनीय तापमान से बाहर काम करने वालों की मानसिक विश्लेषणात्मक व शारीरिक क्षमता पर सीधा प्रभाव तो पड़ा ही, अंदर भवनों में कार्य करने वालों की उत्पादकता भी घटी। जलवायु पारदर्शिता रिपोर्ट- 2022 के अनुसार, 167 अरब श्रमिक घंटों का नुकसान केवल एक वर्ष में हुआ, जो 1990 से 1999 की 10 वर्ष की अवधि की तुलना में हुए नुकसान से 39 प्रतिशत अधिक है।
विश्व में भारत दुग्ध उत्पादन में प्रथम स्थान पर है, परंतु अत्यधिक तापमान और गरमी जल्दी प्रारंभ हो जाने के कारण मवेशियों का दूध उत्पादन घटा है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद् के शोध पत्र के अनुसार, अत्यधिक तापमान से कई मवेशी बीमार हो गए, कई की मृत्यु हो गई और कई के लिए कूलर लगवाने पड़े, जिसके परिणामस्वरूप दूध उत्पादन का खर्च 12 प्रतिशत बढ़ गया। पर्यावरण से खिलवाड़ का ही नतीजा है कि 2016 से 2021 के मध्य जलवायु की चरम घटनाओं से भारत में 360 लाख हेक्टेयर भूमि में फसल का, और किसानों को 37,500 लाख डॉलर का नुकसान हुआ। वर्ष 2023 में असामान्य तापमान से और उसके बाद कटाई के समय बारिश से गेहूं-उत्पादन तो प्रभावित हुआ ही, मार्च-अप्रैल में कुछ क्षेत्रों में सामान्य से 308 प्रतिशत अधिक बेमौसम बरसात से प्याज की भी 70 फीसदी फसल खराब हुई।
गत 30 वर्षों से वर्षा का स्वरूप लगातार बदलने से कृषि, वानिकी, मत्स्य उत्पादन आदि अनेक आर्थिक गतिविधियों पर असर पड़ा है। एक तरफ, पहाड़ों पर ग्लेशियर सिकुड़ते जा रहे हैं, तो दूसरी तरफ, कम अवधि में बहुत अधिक वर्षा होने से बाढ़ आ रही है, और अधिकांश जल संचित नहीं हो पा रहा। नतीजतन, सिंचाई की जब जरूरत होगी, हमें शायद पर्याप्त जल नहीं मिलेगा। ऐसा दिखने भी लगा है। 74 प्रतिशत गेहूं और 65 प्रतिशत धान की कृषि भूमि में 2030 तक जल की अत्यधिक कमी हो जाने की आशंका जताई गई है। पानी की कम उपलब्धता से उत्पादन, लाभ, निर्यात, ऊर्जा उत्पादन आदि सभी प्रभावित हो रहे हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार, जलवायु परिवर्तन से सर्दी की अवधि कम और गरमी की अवधि बढ़ रही है, जिससे मच्छरजनित विभिन्न बीमारियों, वायु प्रदूषण के कारण सांस व हृदय संबंधी रोगों में तेज वृद्धि हुई है। स्टेट ऑफ इंडिया एनवायरनमेंट-2022 के अनुसार, भारत में तीन करोड़ व्यक्तियों को पर्यावरण व जलवायु समस्याओं के कारण अपने निवास स्थान को छोड़कर कहीं और बसना पड़ा है। उत्तराखंड में तो अनेक जनपदों में घरेलू प्रवासन चिंताजनक स्तर पर पहुंच गया है।
यूएनईपी ने पर्यावरण दिवस का विषय बीट प्लास्टिक पॉल्यूशन रखा है। हर वर्ष 40 करोड़ टन से अधिक सिंगल यूज प्लास्टिक का उत्पादन होता है। विश्व में प्रत्येक मिनट 10 लाख प्लास्टिक बोतलें खरीदी जाती हैं और एक दिन में 144 करोड़ बोतलें। एक वर्ष में पांच ट्रिलियन प्लास्टिक बैग का उपयोग होता है । 2000 से 2010 के दशक में ऐसे प्लास्टिक उत्पाद का उपयोग गत 40 वर्षों के उपयोग से भी अधिक बढ़ गया। इसी गति से यदि उपयोग जारी रहा, तो 2050 तक यह आंकड़ा 110 करोड़ टन हो जाएगा।
हमारी सुख-सुविधा वाली जीवनशैली का नतीजा तमाम जीव-जंतुओं के साथ-साथ खुद पृथ्वी भी भोग रही है। ब्राजील से 1,140 किलोमीटर दूर कछुओं के आश्रय के एक टापू में पिघली प्लास्टिक चट्टानों का हिस्सा बन गई है। भूगर्भशास्त्र की दृष्टि से यह स्थिति भयावह हो सकती है। माइक्रो प्लास्टिक, यानी पांच मिलीमीटर से छोटे प्लास्टिक के कण अब सर्वव्यापी हैं। यह जमीन से 20 किलोमीटर ऊपर तक वातावरण में, समुद्र से उत्पादित नमक में, नवजात शिशु की नाल में और मां के दूध तक में पाए गए हैं। विश्व में प्रत्येक वर्ष 70 करोड़ टन प्लास्टिक के कचरे का केवल 10 प्रतिशत रीसाइकिल हो पाता है। यह कचरा हजारों किलोमीटर फेंकने या दफनाने के लिए भेजा जाता है। प्लास्टिक के जो गुण (टिकाऊपन और नष्ट न होने की क्षमता) हैं, वही समस्या भी है कि वह सदियों तक प्राकृतिक रूप से नष्ट नहीं हो सकती।
सरकार ने कुछ नीतियां बदली हैं, और कई योजनाओं को चालू किया है, परंतु जब तक हम सुविधाभोगी जीवनशैली में परिवर्तन नहीं लाएंगे, क्रांतिकारी बदलाव संभव नहीं है। प्रत्येक व्यक्ति को व्यक्तिगत रूप से सोचना है कि क्या पर्यावरण में बदलाव आया है, और उसमें उसका क्या योगदान है? अपनी गतिविधियों से हम पर्यावरण पर जो कुप्रभाव डाल रहे हैं, वह हमारे लिए तो नुकसानदेह है ही, दूसरों के लिए भी है। यह अच्छी बात है कि अब अक्सर पर्यावरण से संबंधित समाचार आते हैं, विभिन्न शहरों में वायु गुणवत्ता नापी जा रही है, और अब शहरों में जनसामान्य भी इसे समझने लगे हैं। मौसम विभाग अब तापमान तो बताता ही है,फील लाइक,यानी तापमान की तपिश भी बताने लगा है। ये सब पर्यावरण-संरक्षण के प्रति बढ़ते रुझान के उदाहरण हैं।
स्पष्ट है, हम में से प्रत्येक व्यक्ति को स्वयं सच्चाई का सामना कर निष्ठापूर्वक कदम उठाना है। बचपन में कहानी सुनी थी कि एक राजा ने अगली सुबह गांव के एक तालाब में सबसे केवल एक लोटा दूध डालने को कहा, ताकि तालाब दूध से भर जाए। मगर अगले दिन तालाब दूध के स्थान पर पानी से भरा था, क्योंकि कमोबेश हर किसी ने सोचा कि दूसरा तो दूध डालेगा ही, इसलिए उसके पानी डालने से क्या अंतर होगा? लिहाजा, हर किसी को महज 5 जून नहीं, हर दिन पर्यावरण संरक्षण को लेकर ईमानदारी दिखानी होगी।
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हाल ही में उच्च्तम न्यायालय ने प्रवर्तन निदेशालय यानि ईडी के पड़ताल के तरीके की शिकायत की सुनवाई करते हुए एक महत्वपूर्ण टिप्पणी की है। न्यायालय का कहना है कि एजेंसी अपना काम करे, लेकिन डर का वातावरण न बनाए।
यह मामला छत्तीसगढ़ सरकार से संबंधित है। दो हजार करोड़ रुपये के शराब घोटाले से जुड़े धनशोधन के आरोपों की पड़ताल करते हुए प्रवर्तन निदेशाालय बहुत आपाधापी में काम कर रहा है। ऐसा लग रहा है कि उसका उद्देश्य मुख्यमंत्री भूपेश बघेल को फंसाना है। राज्य के कई आबकारी अधिकारियों को गिरफ्तारी की धमकी दी जा रही है।
उच्चतम न्यायालय ने इस पक्ष पर महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि जांच के क्रम में इस प्रकार के व्यवहार से एक वास्तविक कारण भी संदिग्ध हो जाता है।
इससे पहले भी प्रवर्तन निदेशालय की कार्यशैली पर सवाल उठ चुके हैं। जांच एजेंसियों की सीमा को लेकर भी न्यायालयों ने कई बार स्पष्ट टिप्पणियां की हैं। इसके बावजूद प्रवर्तन निदेशालय के तरीके को लेकर न्यायालय में लगाए गए आरोपों से उसकी साख को ही नुकसान पहुंच रहा है। पिछले कुछ सालों में जांच एजेंसियों पर लगातार आरोप लगाए जा रहे हैं कि ये सरकार के इशारे पर काम कर रही हैं। हालांकि इस प्रकार के आरोप सभी के दौर में लगते रहे हैं। जरूरत इस बात की है कि किसी भी जांच एजेंसी के दायित्वों और कार्यशैली को लेकर सरकार और विपक्ष के बीच भरोसा मजबूत हो।
विभिन्न समाचार पत्रों पर आधाारित। 18 मई, 2023
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कुरुक्षेत्र : पारंपरिक हस्तशिल्प कौशल से महिलाएं बन रहीं आत्मनिर्भर
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Kurukshetra : Promotion and Development of Handloom and Handicraft Sector
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03-06-2023 (Important News Clippings)
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योजना : क्वांटम कम्प्यूटिंग परिवर्तनकारी प्रौद्योगिकी
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Yojana : AI CHATBOTS FUTURE AND CHALLENGES
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03 June 2023
प्रश्न–413 – भारत के संदर्भ में बढ़ रहे अकेलेपन के कारण क्या हैं? आप इसके लिए क्या-क्या उपाय सुझाना चाहेंगे। (250 शब्द)
Question–413 – What are the reasons for increasing loneliness in the context of India? What measures would you like to suggest for this? (250 words)
नोट : इसका उत्तर आपको हमें नहीं भेजना है, यह आपके स्वयं के अभ्यास के लिए है।
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02-06-2023 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"सिविल सर्वेंट की सोच"
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Today's Life Management Audio Topic-"दक्षता धर्म का मार्ग"
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श्रम-कानून संशोधन कितना उचित है?
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Date:01-06-23
It’s A Judgment CallUgandan law and Japanese court judgment show why only SC can greenlight same-sex marriageTOI Editorials
The Ugandan government passed a jaw-dropping anti-LGBTQ law, while a Japanese court rejected the country’s ban on same-sex marriage as unconstitutional. Proof again that courts have the crucial responsibility to defend these rights, especially in the face of political resistance. Social stigma and community prejudice are often mirrored in legislatures. Legislators are unlikely to take leaps of empathy beyond what the majority of their constituents want. Equal dignity and freedom, though, are a constitutional promise to each citizen. That’s why conferring equal rights to sexual minorities should be the courts’ domain.
Uganda’s new law is a standout example of anti-LGBTQ bigotry, even in a continent largely hostile to their rights. It imposes life imprisonment for anyone who has been in a consensual same-sex sexual encounter, and the death penalty for ‘aggravated homosexuality’, by which it means sexual contact with children and other vulnerable groups – as though they are all shades of the same thing. This law is a drastic violation of human rights, it makes ordinary loving and living impossible for LGBTQ persons.
Until five years ago, India was also among the former British colonies that used the law to harass, humiliate and deny consenting LGBTQ adults their rights. In 2018, Section 377 was read down, affirming the right to equality and non-discrimination, and the Puttuswamy judgment entrenched privacy as part of every citizen’s life and liberty, which means that the state cannot encroach into the individual domain, which includes consensual domestic and sexual arrangements. The right to same-sex marriage, being heard by the Supreme Court, should flow out of these judgments. The right to love and marry, have the protections and responsibilities of a family, cannot be denied by the state to any adult citizen. And only the courts can make this happen.
Date:01-06-23
Doth Protest Too Much About Protests?ET Editorials
Article 19(1)(b) of the Constitution provides all citizens the right to assemble peacefully and without arms. It also provides restrictions that are ‘sensible’ and ‘obligatory in the welfare of the sovereignty and integrity of India, the security of the State, friendly relations with foreign States, public order, decency or morals, or in relation to the disdain of court, offence, or incitement to an offence’. In other words, if the first half of the law provides the letter, the second half provides the spirit. For the latter to comply with the former, one needs to obtain a ‘no objection certificate’ (NOC) from the police station within the jurisdiction of which one plans the public gathering of protest. Indeed, it is the decision — marzi (wish), if you will — of the authorities to allow or revoke gatherings of this nature by invoking Section 144 of the Criminal Procedure Code (CrPC): curfew.
Going by this letter of law, gatherings per se can, indeed, cause ‘annoyance’ to ‘any person’ and be the source of ‘disturbance of public tranquillity’. By this reading, protests, even in a democratic space, are up for subjective hyper-scrutiny and cherry-picking. In other words, every protest can be deemed unlawful if the authorities choose to see it as being so.
By their very nature, ‘peaceful’ public protests are disruptive, anti-status quo-ist. For the allowance of such a democratic right to have any practical meaning, it would be wise to be more specific and detailed in law to define what amounts to ‘annoyance’ and ‘disturbance of public tranquillity’. All protests don’t take place in ‘Tiananmen Squares’. And they certainly don’t amount to challenging the ‘welfare of the sovereignty and integrity of India, the security of the State’.
Date:01-06-23
Status quo in TurkeyErdoğan must right the wrongs of the past and offer a new inclusive beginningEditorial
When Recep Tayyip Erdoğan’s Justice and Development Party (AKP) came to power in 2002, riding widespread resentment against the establishment amid economic woes, he was a political outsider — an Islamist in a system dominated by Kemalist secularists. Twenty years later, Mr. Erdoğan is the establishment — the military, traditionally the guardian of the old order, is under his thumb, institutions are at his command and the AKP, with close links to the ulema, remains a hegemonic political machine. But the economic and political situation of 2023 is comparable with that of 2002. Faced with a deepening economic crisis and accusations of backsliding democracy and freedoms, there has been widespread resentment against his long reign. The Opposition united to capitalise on this anger and managed to deny him a first round victory on May 14, but in Sunday’s run-off, he won 52.1% of the vote share, against Kemal Kılıçdaroğlu’s 47.9%. Mr. Kılıçdaroğlu has accepted the outcome, but called the election process “the most unfair in years”. He has a point. Mr. Erdoğan and his allies controlled the big media, shaping the information flow. State institutions, including the religious directorate (Diyanet), which controls mosques and appoints Imams, amplified the AKP propaganda. The President accused the Opposition of having ties with “terrorists” as a mainstream Kurdish party was backing his rival. Mr. Kılıçdaroğlu, a former bureaucrat from the minority Alevi community, led a spirited campaign, but failed to overcome the AKP’s Islamist populism.
Mr. Erdoğan, arguably the most powerful Turkish leader since Mustafa Kemal ‘Atatürk’, has reshaped the country’s polity and society over the past 20 years. Kemal Atatürk, who abolished the Ottoman Caliphate and secularised Turkey, saw the clergy as a threat to his vision for the country. Tensions between Kemalism and Islamism have always been there in Turkey’s modern history. But until Mr. Erdoğan’s rise to power, no Islamist leader had managed to upend the system. While doing so, he amassed powers, rewrote the Constitution, turning it into an executive presidency, got himself elected as the all-powerful President, stifled dissent, stepped up the war against Kurdish rebels, and jailed political rivals. Yet, this election was his biggest challenge. That he had to go into the second round, and with a lead of just three points, should remind him that Turkish society remains polarised. The battered economy needs urgent attention. A new term is an opportunity for Mr. Erdoğan, whose legacy has already been marred by his authoritarian tendencies and mismanagement of the economy, to right the wrongs and offer a new inclusive beginning. But it is unclear whether Turkey’s Islamist leader is ready for such a change.
Date:01-06-23
A parliamentary democracy or an executive democracyEven as the new Parliament has been inaugurated, what is overlooked is the increasing subordination of ‘Parliament’ in India’s ‘parliamentary democracy’Gautam Bhatia is a Delhi-based lawyer
Last week, a new Parliament building was inaugurated with both fanfare and controversy. In particular, the exclusion of the President of India — the formal head of the executive — from the inauguration, and the symbolism around the Sengol — a sceptre originally used to signify the transfer of power between Chola rulers — generated significant debate. Submerged beneath this debate, however, is an overlooked fact: the increasing subordination of the “Parliament” in India’s “parliamentary democracy.”
Parts of this story are familiar: we know that Bills are passed with minimal or no deliberation. We know that Parliament sits for fewer and fewer days in a year, and parliamentary sessions are often adjourned. We know that presidential ordinances have become a parallel if not dominant form of law-making.
By constitutional design
It is tempting to attribute all of this to unscrupulous or callous politicians. What that misses, however, is the understanding that the growing irrelevance of Parliament is not because of individual actions but a matter of constitutional design. In other words, the Indian Constitution, by its very structure, facilitates and enables the marginalisation of Parliament, and the concentration of power within a dominant executive.
How does this happen? Consider the various safeguards that parliamentary democracies generally tend to put in place against executive dominance or abuse. First, in order to enact its agenda, the executive must command a majority in Parliament. This opens up the space for intra-party dissent, and an important role for ruling party parliamentarians — who are not members of the cabinet — to exercise a check over the executive. Occasionally, ruling party backbenchers can even join forces with the Opposition to defeat unpopular Bills (as was the case with various Brexit deals in the U.K. House of Commons between 2017 and 2019). Second, the Opposition itself is granted certain rights in Parliament, and certain limited control over parliamentary proceedings, in order to publicly hold the executive to account. Third, the interests of Parliament against the executive are meant to be represented by the Speaker, a neutral and independent authority. And fourth, certain parliamentary democracies embrace bicameralism: i.e., a second “Upper House” that acts as a revising chamber, where interests other than those of the brute majority are represented (in our case, that is the Rajya Sabha, acting as a council of states).
When these features function as they should, it becomes very difficult for the executive to ride roughshod over Parliament and, in turn, opens up space for Parliament to act as the deliberative and representative body that it is meant to be.
A dilution, erasure
In India, however, each of these features has been diluted or erased over the years.
First, the possibility of intra-party dissent within Parliament has been stamped out by virtue of the Tenth Schedule to the Constitution, popularly known as the “anti-defection law”. Introduced through a constitutional amendment in 1985, the Tenth Schedule penalises disobedience of the party whip with disqualification from the House altogether. Ironically, as recent events have more than amply demonstrated, the Tenth Schedule has failed to fulfil the purpose for which it was enacted, i.e., to curb horse-trading and unprincipled floor-crossing. What it has done, however, is to strengthen the hand of the party leadership — which, in the case of the ruling party, is effectively the cabinet/executive — against its own parliamentarians. Intra-party dissent is far more difficult when the price is disqualification from Parliament.
Second, right from its inception, the Indian Constitution did not carve out any specific space for the political Opposition in the House. There is no equivalent, for example, of Prime Minister’s questions, where the Prime Minister has to face direct questioning of their record from the Leader of the Opposition as well as by other politicians. In other words, the manner of proceedings in Parliament are under the complete control of the executive, with no real constitutional checks upon how that control is exercised.
Third, this is exacerbated by the fact that the Speaker, in our system, is not independent. The Speaker is not required to give up membership of their political party, and is not constitutionally obligated to act impartially. This has led to an increasing trend, at both the central and the State levels, of Speakers acting in a blatantly partisan manner in order to advance the interests of the executive over the interests of the House. Not only does this affect the quality of the deliberations in the lower house (as the Speaker has control over the conduct of the House) but it also has a knock-on effect on the Upper House: as has been seen of late, when the ruling party wishes to avoid effective scrutiny in the Rajya Sabha over Bills, the Speaker simply classifies the Bill as a “money bill”, thus depriving the Rajya Sabha of the right to make amendments. This was seen most vividly in the case of the Aadhaar Act, where Rajya Sabha scrutiny was avoided in this precise manner, and many important, rights-protecting amendments could not be passed.
Role of the Upper House
Fourth, the role of the Upper House is undercut not only by the Speaker’s misclassification of Bills but also by the constitutionally-sanctioned ordinance making power. An ordinance is nothing more than executive legislation; and while, in theory, it is meant to be used only for an emergency, while Parliament is not in session, in practice, it is used as a parallel process of law-making, especially when the executive wants to bypass the Upper House altogether, at least for a period of time, and create a fait accompli.
When we put all of this together, what emerges is a picture where the only effective check upon the executive is one where the electorate has thrown up a fractured mandate and the ruling party is forced to govern in a coalition with allies with whom it does not always see eye-to-eye. In such a scenario, coalition partners can exercise something of a check upon the executive in Parliament.
However, when there is a single, majority ruling party, whether at the Centre or in the States, there is very little that Parliament can do. The anti-defection law wipes out intra-party dissent. The political Opposition’s scope for participation depends upon the discretion of the executive. Partisan Speakers further ensure that the executive is insulated from public embarrassment at the hands of the Opposition, by controlling the debate. And the Upper House is taken out of the equation, either by the misclassification of money Bills or by the use of ordinance power.
It is no wonder, then, that the quality of parliamentary deliberations has declined: it is simply a mirror of Parliament’s own structural marginalisation under the Constitution. Instead, what we have is greater and greater executive power: a situation that resembles presidential systems with strong executives, but without the checks and balances and veto points that those systems have; in effect, the worst of all worlds.
Therefore, even as the new Parliament is inaugurated, the urgent question that we must ask is whether in formal terms, India can continue to be called a parliamentary democracy, or whether we have gradually morphed into an executive democracy. And if, indeed, we want to return to parliamentarianism, what manner of constitutional changes and reforms that it would require.
Date:01-06-23
आर्थिक असमानता हो तो विकास का पैमाना बदलेंसंपादकीय
जीडीपी (सकल घरेलू उत्पाद ) देश के सभी उत्पादों और सेवाओं की मार्केट वैल्यू का कुल योग होती है। यह सच है कि भारत जीडीपी में ब्रिटेन को पछाड़ कर पांचवें स्थान पर है, लेकिन प्रति व्यक्ति आय के पैमाने पर दोनों देशों में 20 गुना अंतर है। इंडोनेशिया की प्रति व्यक्ति आय दूनी, ब्राजील की चार गुनी और चीन की छह गुनी है। इसके अलावा मानव विकास सूचकांक में हम पिछले 33 वर्षों में 130-135वें स्थान पर ही खड़े हैं। देश में पिछले 12 वर्षों से गरीबी का सांख्यिकी आकलन नहीं किया गया। वर्ल्ड बैंक के 2022 के अध्ययन अनुसार सन् 2019 तक 13.70 करोड़ लोग 46 रुपए प्रति दिन और 61.20 करोड़ लोग 78 रुपए प्रति दिन पर गुजारा कर रहे थे। कोरोना के बाद गरीबों की संख्या ढाई से पांच करोड़ और बढ़ गई। वहीं विश्व बैंक की पिछले वर्ष की रिपोर्ट भारत को सबसे असमानता वाले कुछ देशों में शुमार करती है, जहां ऊपर के 10% लोगों की आय नीचे के 50% लोगों से 22 गुना ज्यादा है। दरअसल यह आर्थिक असमानता सन 1990 के तथाकथित आर्थिक उदारीकरण की देन है, यानी किसी एक सरकार या काल की नहीं बल्कि गलत आर्थिक नीतियों से पैदा हुई है। आज जरूरत जीडीपी में वृद्धि देखकर खुश होने की नहीं बल्कि आर्थिक असमानता कम करने वाली नीतियां बनाने की है।
Date:01-06-23
हस्तक्षेप करे सरकारसंपादकीय
उद्घाटन के दिन यानी 28 मई को जंतर मंतर पर धरना दे रहे पहलवान अपना विरोध जताने के लिए नये संसद भवन तक नहीं पहुंच पाए। पुलिस बल के चलते उनके समर्थक किसान भी दिल्ली की सीमा में प्रवेश नहीं कर पाए। पुलिस ने पहलवानों सहित अनेक प्रदर्शनकारियों को गिरफ्तार किया और धरना स्थल जंतर मंतर भी खाली करा दिया। इस कार्रवाई से निराश – हताश पहलवानों ने अपने-अपने मैडल गंगा में प्रवाहित करने की घोषणा कर दी। ऐसा करने के लिए वे हरिद्वार में गंगा तट पर पहुंच भी गए, लेकिन भारतीय किसान यूनियन के नेता नरेश टिकैत के हस्तक्षेप से उन्होंने मैडल विसर्जन का कार्यक्रम तात्कालिक तौर पर स्थगित कर दिया है। नरेश टिकैत ने पहलवानों से पांच दिन का समय मांगा है यानी परोक्ष तौर पर उन्होंने सरकार को पांच दिन का समय दिया है कि वह वृजभूषण शरण सिंह की गिरफ्तारी करे अन्यथा किसी बड़े आंदोलन के लिए तैयार रहे। दूसरी ओर, पुलिस ने जो रुख अपनाया है, उससे नहीं लगता कि अगले पांच दिनों में वृजभूषण शरण सिंह की गिरफ्तारी हो सकेगी। यह भी स्पष्ट नहीं है कि गिरफ्तारी होगी भी या नहीं। यानी सरकार और पहलवानों के बीच प्रतिरोध की जो स्थिति बनी है, वह टूटती नहीं दिख रही है। पांच दिन वाद आंदोलनकारी क्या कदम उठाएंगे और उस पर सरकार की क्या प्रतिक्रिया होगी, यह तो आगे ही पता चलेगा। लेकिन जो हो रहा है, वह किसी भी सूरत अच्छा नहीं हो रहा है। इधर, देश के भीतर मोदी सरकार की छवि खराव हो रही है और देश के बाहर भारत की । यूनाइटेड वर्ल्ड रेसलिंग ने पहलवानों की गिरफ्तारी की निंदा की है। और 45 दिन के अंदर भारतीय कुश्ती महासंघ का चुनाव कराने की चेतावनी दी है। इसमें कोई संदेह नहीं है कि पहलवानों का आंदोलन मोदी विरोधियों का अखाड़ा वन गया है। हर मोदी विरोधी तत्व इस आंदोलन के जरिए अपनी रणनीति को आगे बढ़ाता दिख रहा है, लेकिन मात्र इस बहाने से कि पहलवानों का आंदोलन मोदी विरोधियों द्वारा प्रेरित है, सरकार अपने दायित्व से नहीं बच सकती। 28 मई को जिस तरह पहलवानों के साथ वल प्रयोग किया गया उससे सामान्य लोगों की नैतिक चेतना पहलवानों के साथ है, और सरकार के रवैये से जनसामान्य बेहद आहत है। इसलिए समय रहते इस समूची परिस्थिति का संज्ञान लिया जाना चाहिए और इससे पहले कि सरकार की छवि को ध्वस्त करने वाली कोई बड़ी घटना घटे, इस स्थिति का समुचित समाधान निकाला जाना चाहिए।
Date:01-06-23
खेती पर काबिज होने का खेलभारत डोगरा
हाल के वर्षो में किसानों के संकट का एक बड़ा कारण है कि उनकी आत्मनिर्भरता और स्वावलंबिता में भारी गिरावट आई है। वे कृषि की नई तकनीकों को अपनाने के साथ रासायनिक कीटनाशक, खरपतवारनाशक, रासायनिक खाद, बाहरी बीजों और उपकरणों पर बहुत निर्भर हो गए हैं।
जहां जमीनी स्तर पर किसान इन अनुभवों से गुजर रहे थे, वहां बड़ी-बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के स्तर पर ऐसे प्रयास भी चल रहे थे कि किसानों पर अपना नियंत्रण और बढ़ा लिया जाए। इस नियंत्रण को बढ़ाने का प्रमुख साधन बीज को बनाया गया क्योंकि बीज पर नियंत्रण होने से पूरी खेती-किसानी पर नियंत्रण हो सकता है। इसलिए बड़ी कंपनियों ने बीज क्षेत्र में पैर फैलाने आरंभ किए। जो बड़ी कंपनियां इस क्षेत्र में आई, वे पहले से कृषि रसायनों विशेषकर कीटनाशकों, खरपतवारनाशकों आदि के उत्पादन में लगी हुई थीं। इस तरह बीज उद्योग और कृषि रसायन उद्योग एक ही तरह की कंपनी के हाथ में केंद्रीकृत होने लगे। इसी समय के आसपास जेनेटिक इंजीनियरिंग में कुछ महत्त्वपूर्ण अनुसंधान हो रहे थे और वैज्ञानिक विशिष्ट गुणों वाले जीन को एक जीव से दूसरे जीव में प्रवेश दिला कर जीवन के विभिन्न रूपों को, उनके गुणों को बदलने की क्षमता प्राप्त कर रहे थे। जेनेटिक इंजीनियरिंग से प्राप्त फसलों को संक्षेप में जीएम (जेनेटिकली मोडीफाइड) फसल कहते हैं।
सामान्यत: एक ही पौधे की विभिन्न किस्मों से नई किस्में तैयार की जाती रही हैं जैसे गेहूं की दो किस्मों से गेहूं की एक नई किस्म तैयार कर ली जाए पर जेनेटिक इंजीनियरिंग में किसी भी पौधे या जंतु के जीन या आनुवांशिक गुण का प्रवेश किसी अन्य पौधे या जीव में करवाया जाता है जैसे आलू के जीन का प्रवेश टमाटर में करवाना या सुअर के जीन का प्रवेश टमाटर में करवाना या मछली के जीन का प्रवेश सोयाबीन में करवाना या मनुष्य के जीन का प्रवेश सुअर में करवाना आदि। जीएम फसलों के विरोध का एक मुख्य आधार यह रहा है कि ये फसलें स्वास्थ्य और पर्यावरण की दृष्टि से सुरक्षित नहीं हैं तथा यह असर जेनेटिक प्रदूषण के माध्यम से अन्य सामान्य फसलों और पौधों में फैल सकता है। अब इस बारे में व्यापक सहमति है कि इन फसलों का प्रसार होने पर ट्रांसजेनिक प्रदूषण से बचा नहीं जा सकता। इसलिए जीएम फसलों और गैर-जीएम फसलों का सहअस्तित्व नहीं हो सकता। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि जीएम फसलों की सुरक्षा या सेफ्टी प्रमाणित नहीं हो सकी है। इसके विपरीत पर्याप्त प्रमाण प्राप्त हो चुके हैं, जिनसे इन फसलों की सेफ्टी या सुरक्षा संबंधी गंभीर चिंताएं उत्पन्न होती हैं। यदि इनकी उपेक्षा की गई तो स्वास्थ्य और पर्यावरण की क्षति होगी जिसकी पूर्ति नहीं हो सकती, जिसे फिर ठीक नहीं दिया जा सकता। जीएम फसलों को अब दृढ़ता से रिजेक्ट कर देना चाहिए, अस्वीकृत कर देना चाहिए। जेनेटिक प्रदूषण का मूल चरित्र ही ऐसा है। वायु और जल प्रदूषण की गंभीरता पता चलने पर इनके कारणों का पता लगाकर उन्हें नियंत्रित कर सकते हैं, पर जेनेटिक प्रदूषण जो पर्यावरण में चला गया हो, वह हमारे नियंतण्रसे बाहर हो जाता है। जेनेटिक इंजीनियरिंग का प्रचार कई बार इस तरह किया जाता है कि किसी विशिष्ट गुण वाले जीन का ठीक-ठीक पता लगा लिया गया है और इसे दूसरे जीव में पंहुचा कर उसमें वही गुण उत्पन्न किया जा सकता है किंतु हकीकत इससे अलग और कहीं अधिक पेचीदी है।
कोई भी जीन केवल अपने स्तर पर या अलग से कार्य नहीं करता अपितु बहुत से जीनों के एक जटिल समूह के एक हिस्से के रूप में कार्य करता है। इन असंख्य अन्य जीनों से मिलकर और उनसे निर्भरता में ही जीन के कार्य को देखना-समझना चाहिए, अलगाव में नहीं। एक ही जीन का अलग-अलग जीवों में काफी भिन्न असर होगा क्योंकि उनमें जो अन्य जीन हैं, वे भिन्न हैं। विशेषकर जब एक जीव के जीन को काफी अलग तरह के जीव में पंहुचाया जाए तो, जैसे मनुष्य के जीन को सुअर में, तो इसके काफी नये और अप्रत्याशित परिणाम होने की संभावना है। इतना ही नहीं, जीनों के समूह का किसी जीव की अन्य शारीरिक रचना और बाहरी पर्यावरण से भी संबंध है। जिन जीवों में वैज्ञानिक विशेष जीन पंहुचाना चाह रहे हैं, उनसे अलग जीवों में भी इन जीनों के पंहुचने की संभावना रहती है, जिसके अनेक अप्रत्याशित परिणाम और खतरे हो सकते हैं।
बाहरी पर्यावरण जीन के असर को बदल सकता है और जीन बाहरी पर्यावरण को इस तरह प्रभावित कर सकता है, जिसकी संभावना जेनेटिक इंजीनियरिंग का उपयोग करने वालों को नहीं थी। एक जीव के जीन दूसरे जीव में पहुंचाने के लिए वैज्ञानिक जिन तरीकों का उपयोग करते हैं, उनसे अप्रत्याशित परिणामों और खतरों की संभावना और बढ़ जाती है। जेनेटिक इंजीनियरिंग के अधिकांश महत्त्वपूर्ण उत्पादों के पेटेंट बड़ी बहुराष्ट्रीय कंपनियों के पास हैं और वे अपने मुनाफे को अधिकतम करने के लिए इस तकनीक का जैसा उपयोग करती हैं, उससे इस तकनीक के खतरे और बढ़ जाते हैं। कृषि और खाद्य क्षेत्र में जेनेटिक इंजीनियरिंग की टेक्नोलॉजी मात्र लगभग छह-सात बहुराष्ट्रीय कंपनियों (और उनकी सहयोगी या उप-कंपनियों) के हाथ में केंद्रित हैं। इन कंपनियों का मूल आधार पश्चिमी देशों विशेषकर अमेरिका में है। कुछ समय पहले देश के महान वैज्ञानिक प्रोफेसर पुष्प भार्गव का निधन हुआ है। वे सेंटर फॉर सेलयुलर एंड मॉलीक्यूलर बॉयलाजी, हैदराबाद के संस्थापक निदेशक और नेशनल नॉलेज कमीशन के उपाध्यक्ष रहे। जीएम फसलों के विरुद्ध उनकी चेतावनी महत्त्वपूर्ण है। प्राय: जीएम फसलों के समर्थक कहते हैं कि वैज्ञानिकों का अधिक समर्थन जीएम फसलों को मिला है पर प्रो. भार्गव ने इस विषय पर समस्त अनुसंधान का आकलन करके स्पष्ट बता दिया कि अधिकतम निष्पक्ष वैज्ञानिकों ने जीएम फसलों का विरोध ही किया है। उन्होंने यह भी बताया कि जिन वैज्ञानिकों ने समर्थन दिया है, उनमें से अनेक किसी न किसी स्तर पर जीएम बीज बेचने वाली कंपनियों या इस तरह के निहित स्वाथरे से किसी न किसी रूप में जुड़े रहे हैं, या प्रभावित रहे हैं। आज जब शक्तिशाली स्वाथरे द्वारा जीएम खाद्य फसलों को भारत में स्वीकृति दिलवाने के प्रयास अपने चरम पर हैं, इस समय बहुत जरूरी है कि इस विषय पर तथ्य और शोध आधारित चेतावनियों पर ध्यान दिया जाए।
Date:01-06-23
शांति की कोशिशेंसंपादकीय
आंतरिक जटिलताओं में फंसे मणिपुर में शांति के लिए किए जा रहे प्रयास जितने आवश्यक हैं, उतने ही सराहनीय भी। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह मणिपुर के दौरे पर हैं और उनके क्रिया-कलाप से केंद्र और राज्य सरकार की गंभीरता का सहज ही एहसास हो जाता है। शांति बहाल करने के लिए अनेक फैसले लिए गए हैं और आने वाले दिनों में भी सरकारों को हर मुमकिन फैसले के लिए तैयार रहना चाहिए। मणिपुर में जल्द से जल्द शांति बहाल हो और स्थानीय समाजों में स्वाभाविक समन्वय फिर पैदा हो, इससे बेहतर और क्या हो सकता है? परस्पर सहमति से जो फैसले लिए गए हैं, उन्हें तत्काल लागू करना चाहिए, ताकि जमीनी स्तर पर लोगों में संतोष और सुरक्षा भाव की वापसी हो। मणिपुर में 3 मई से ही कर्फ्यू की स्थिति है और इंटरनेट सेवा भी बाधित है, इससे लोगों को निस्संदेह परेशानी हो रही होगी, सामान्य सुविधाओं की बहाली बहुत जरूरी है। गौर करने की बात है कि शांति की तलाश में केंद्रीय गृह मंत्री दस से ज्यादा प्रतिनिधिमंडल से मिल चुके हैं। मैतेई और कूकी, दोनों ही समुदायों के प्रतिनिधिमंडल मिलकर अपनी बात रख चुके हैं। कुकी नेताओं ने हिंसा की सीबीआई जांच के लिए कहा है, तो यह भी स्वागतयोग्य है। हिंसा शुरू करने वाले और फैलाने वाले तत्वों की पहचान बहुत जरूरी है।
मणिपुर में कानून-व्यवस्था को दुरुस्त करना, राहत व बचाव कार्यों में तेजी लाना, जातीय संघर्ष में मारे गए लोगों के आश्रितों को 10-10 लाख रुपये का मुआवजा देने और परिवार के एक सदस्य को नौकरी देने का फैसला कारगर हो सकता है। पीड़ितों के साथ सरकारों को खड़े हो जाना चाहिए और असामाजिक तत्वों को सबक सिखाने में कोई कसर नहीं छूटनी चाहिए। राज्य के कई इलाकों में हिंसक तत्वों ने कानून-व्यवस्था का मखौल उड़ाया है। मणिपुर की छवि को भी झटका लगा है, अत: सुरक्षा एजेंसियों को अपने स्तर पर पूरी सतर्कता बरतते हुए हिंसक तत्वों पर लगाम कसनी चाहिए। निर्दोष और विस्थापित लोगों को जल्द से जल्द उनके घर लौटने के लिए प्रेरित किया जाए और सुरक्षा का बेहतर माहौल दिया जाए। केंद्रीय गृह मंत्री ने उचित ही अधिकारियों को राज्य में शांति भंग करने वाली गतिविधियों से सख्ती से निपटने का निर्देश दिया है। दूसरी ओर, विभिन्न समूहों से कम से कम 15 दिन शांति बनाए रखने की अपील की गई है। जाहिर है, मणिपुर में दूरदराज के इलाकों में ऐसे बहुत से लोग होंगे, जो फंसा हुआ महसूस कर रहे होंगे, उन तक राहत पहुंचाना केंद्र व राज्य सरकार की पहली प्राथमिकता है।
यह मणिपुर व पूर्वोत्तर की राजनीति के लिए भी परीक्षा की घड़ी है। सभी राजनीतिक दलों को शांति प्रयासों में जुट जाना चाहिए। आदिवासी नेताओं, बुद्धिजीवियों और प्रमुख आदिवासी नागरिकों के साथ भी केंद्रीय गृह मंत्री की चर्चा का सार्थक परिणाम निकलना चाहिए। नए समय और आधुनिक होते समाज की रोशनी में स्थानीय लोगों को सकारात्मक योगदान देने के लिए सहर्ष आगे आना चाहिए। यह अच्छी बात है कि इतनी हिंसा के बावजूद स्थानीय स्तर पर सुरक्षा बलों ने संयम का परिचय दिया है। हिंसा फैलाने वालों को आतंकवादी नहीं समझा जा रहा है। हिंसा को संगठित हिंसा के बजाय जातीय हिंसा माना जा रहा है। वैसे, मौके का गलत फायदा उठाते हुए अलग राज्य की जो मांग उठी है, उस पर फिलहाल विचार करने से बचना चाहिए। अभी मणिपुर में गांव-गांव तक शांति की बहाली प्राथमिकता है।
Date:01-06-23
फिर विस्थापित विश्वास का मणिपुररामी निरंजन देसाई, ( विशेषज्ञ, पूर्वोत्तर मामले )
मणिपुर क्या फिर से संघर्ष के पुराने दिनों में लौट चला है? वहां थम-थमकर हो रही जातीय हिंसा ने इस सवाल को मौजूं बना दिया है। मणिपुर पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों से काफी अलग है। यहां के तमाम राज्यों में सशस्त्र संघर्ष हुए हैं, लेकिन वे सब अब अतीत बन चुके हैं। असम में ही सैकड़ों विद्रोही सक्रिय थे, लेकिन अब कमोबेश सभी शांत हैं। नगालैंड में तो नेशनल सोशलिस्ट कौंसिल ऑफ नगालैंड- इसाक मुइवा गुट के साथ केंद्र सरकार का समझौता भी नहीं हो सका है, लेकिन फिलहाल यहां पर शांति है।
मणिपुर की जनजातियां इसके चरित्र को जटिल बनाती हैं। हम बेशक उनको कानूनी रूप से अनुसूचित जनजाति न बुलाएं, लेकिन वे खुद को अनुसूचित जनजाति ही मानती हैं। फिर, उनके अंदर भी कई उप-जनजातियां हैं, जिनमें खूब आपसी तनाव रहा है। 1997 में ही कुकी और उसकी उप-जनजाति पाइटी में जबर्दस्त हिंसा हुई थी। नगा भी यहां काफी हैं। फिर, म्यांमार से भी काफी संख्या में लोग भागकर यहां आए हैं, जिनको चिन कहा जाता है। इन सबके बीच संघर्ष तो है ही, जनजातियों के भीतर भी तनाव है। इससे मणिपुर अन्य राज्यों से अलग प्रकृति का हो जाता है।
जिस नजरिये से हम दूसरे राज्यों को देख सकते हैं, मणिपुर को नहीं देख सकते। यहां छोटे-मोटे तनाव होते रहे हैं, लेकिन पिछले पांच-छह साल में इसने जो उपलब्धि हासिल की है, वह उल्लेखनीय है। दशक-डेढ़ दशक पहले तक यहां शाम में चार बजे के बाद कफ्र्यू लग जाया करता था। ठहरने के लिए ढंग की जगह नहीं मिलती थी। परिवहन भी सुगम और सुरक्षित नहीं था। मगर अब यहां नए-नए होटल बन गए हैं। आना-जाना भी आसान हो गया है। नौजवान भी अब ज्यादा दिखने लगे हैं, क्योंकि वे पहले अच्छी शिक्षा हासिल करने के लिए बेंगलुरु, दिल्ली चले जाते थे। तमाम तरह के कारोबार यहां शुरू हो चुके हैं। तरक्की की इन इबारतों से जातीय तनाव की आग मानो चिनगारी में बदल गई थी। मगर अब ताजा हिंसा के बाद माना जा रहा है कि आपसी अविश्वास की खाई इतनी गहरी हो जाएगी कि उसे पाट पाना काफी कठिन होगा। हाल-फिलहाल के दिनों में कुकी और मैतेई शायद ही एक-दूसरे पर भरोसा कर सकेंगे।
यह एक खतरनाक संकेत है। बेशक यहां अमन-चैन दिखने लगा था, क्योंकि सुरक्षा व्यवस्था बेहतर हुई है, और विकास के कई काम हुए हैं, लेकिन तमाम जनजातियों में आपस में प्रतिस्पद्र्धा भी है। और, दुर्भाग्य से इनमें से कई हथियारबंद समूह भी हैं। इस बार उन्होंने अपने हथियारों का प्रदर्शन किया है, चाहे वे लूटकर उन्होंने जुटाए हों या कहीं से उनको मिले हों। अतीत में यहां आलम यह था कि अलगाववादी गुटों की सक्रियता सब पर भारी पड़ती थी। इस कारण यहां के कई इलाके असुरक्षित माने जाते थे। राजधानी इंफाल को छोड़कर बाकी तमाम क्षेत्रों में विकास की रोशनी मानो पहुंच ही नहीं रही थी। नतीजतन, यहां पर्यटक भी नाममात्र के दिखते थे। मगर इन दिनों हालात काफी बदल चुके थे। मणिपुर को ‘न्यू रिफॉर्म्ड सेफ स्टेट’ यानी सुधार की नई राह पर आगे बढ़ता एक सुरक्षित राज्य माना जा रहा था। पिछले कुछ वर्षों में बनी यह तस्वीर मिनटों में ध्वस्त हो गई।
हमें यह समझना होगा कि गैर-कानूनी घुसपैठ यहां की सच्चाई है। म्यांमार में जब से सरकार बदली है, उसने पूर्वोत्तर को प्रभावित किया है। बांग्लादेश के साथ भी ऐसा ही है, जिसकी बिगड़ती सेहत पूर्वोत्तर को नुकसान पहुंचाती है। असल में, म्यांमार और भारत के सीमावर्ती इलाकों में बसी इन जनजातियों में पारिवारिक रिश्ता है। आतंकवाद के खिलाफ म्यांमार सरकार की कार्रवाई के बाद काफी संख्या में लोग सीमा पार से आए। वे मणिपुर ही नहीं, मिजोरम में भी बसे। वहां तो करीब 30 हजार शरणार्थियों को चिह्नित भी किया गया है। कोई यह पूछ सकता है कि जब मिजोरम में भी म्यांमार से प्रवासी आए, तो वहां ऐसा तनाव क्यों नहीं दिखता? असल में, मिजोरम में इनके समर्थन में आवाज उठी है। हालांकि, वहां भी जनसांख्यिकी में बदलाव का मसला आ सकता है, जिसका गवाह मणिपुर बना है। यहां के चुराचांदपुर इलाके की आबादी करीब दो दशक पहले तक 60 हजार थी, लेकिन अब यह बढ़कर लगभग छह लाख हो गई है। फिर, इस तरह का प्रवासन किसी खास समुदाय के पक्ष में होता है। चूंकि सीमा पार से आने वाले ज्यादातर लोग स्वजातीय कुकी बहुल इलाकों में बसते गए, इसलिए मैतेई खुद को असुरक्षित महसूस करने लगे। ऐसे प्रवासन अलगाववादियों के लिए भी खाद-पानी का काम करते हैं। नगा विद्रोह के दौरान हमने देखा ही था कि किस तरह से विद्रोहियों को चीन का साथ मिला। त्रिपुरा में ही विद्रोही गुटों को बांग्लादेश में प्रशिक्षण हासिल हुआ था।
आखिर इसका समाधान क्या है? जब मौजूदा तनाव शुरू हुआ था, तब कहा गया था कि उच्च न्यायालय ने राज्य सरकार को मैतेई को अनुसूचित जनजाति बनाने संबंधी सिफारिश करने के लिए ‘निर्देशित’ किया है, जबकि असलियत में यह प्रक्रिया शुरू भी नहीं हुई थी, क्योंकि इस मांग को राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग के हवाले किया जाना था। इतना ही नहीं, कुकी अब जंगली क्षेत्र में छठी अनुसूची लागू करने की मांग करने लगे हैं, जिससे यहां के स्वायत्त प्रशासनिक क्षेत्रों में स्थानीय परिषद को न्यायिक और दूसरी विधायी शक्तियां मिल जाएंगी। उल्लेखनीय है कि ऐसी हर परिषद को समान अधिकार नहीं दिए जाते। किसी-किसी को तो तमाम शक्तियों से वंचित भी रखा जाता है। हालांकि, ये तमाम अधिकार तभी मिलते हैं, जब समुदाय विशेष अपनी जिम्मेदारियों के प्रति गंभीर दिखता है।
विरोध जताना देश के नागरिकों का लोकतांत्रिक अधिकार है, और कुकी यदि यहीं तक सीमित रहते, तो कहीं ज्यादा प्रभावी हो सकते थे। मगर अब बात हिंसा और हथियार तक पहुंच गई है। चूंकि यहां की जनजातियां सिर्फ अलगाववादी गुट नहीं हैं, इसलिए इस मसले के समाधान में सिविल सोसाइटी की भूमिका काफी महत्वपूर्ण बन जाती है। सत्ता-प्रतिष्ठान निस्संदेह जरूरी होने पर सख्ती दिखाए, लेकिन अमन का रास्ता मिल-बैठकर बातचीत करने से ही निकलेगा। यहां के समुदाय अपने हितों के लिए अपनों की जान-माल और सुरक्षा को दांव पर नहीं लगा सकते। उनका यह रुख किसी भी सभ्य समाज में उचित नहीं कहा जाएगा।
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विश्व मौसम विज्ञान संगठन ने अगले दशक में तापमान के रूझान के अनुमानों पर अपना वार्षिक अपडेट जारी किया है। पूर्वानुमान चिंताजनक है। इस पर कुछ बिंदु-
जलवायु परिवर्तन का भारत पर कठोर प्रभाव होने की संभावना है, क्योंकि भारत कृषि-प्रधान देश हैए और यह लंबे समुद्री तटों से घिरा हुआ है।
भारत को आपदा संबंधी बुनियादी ढांचे में बड़े निवेश पर अपना पूरा ध्यान लगाना चाहिए।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 19 मई, 2023
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Date:31-05-23
SoO Very VitalWhy GoI, Imphal must not revoke the Suspension of Operations agreement with Kuki rebels in Manipur.TOI Editorials
Amit Shah’s ongoing visit to violence-hit Manipur is meant to chart a roadmap for peace. But peace won’t be easy given the huge trust gap between the state’s Meitei and Kuki communities. Addressing this deep polarisation will require long-term bridge-building between the communities. The state already has a strong tradition of women-led social groups who can play peacemakers. So, it’s welcome that Shah has already met a delegation of women leaders as part of his efforts to restore normalcy.
However, the immediate priority is to halt the violence. While state and central security forces have been carrying out targeted operations against miscreants, soldiers can’t be deployed at every location. Plus, Meiteis and Kukis continue to blame each other for the violence – Meiteis believe that Kuki militant outfits are instigating turmoil while Kukis put the blame on radical Meitei outfits like Arambai Tengol and Meitei Leepun. This in turn has led to some Manipur valley-based groups demanding that the Suspension of Operations (SoO) agreement with Kuki militants be revoked forthwith. But doing so would be adding more policy fuel to Manipur’s ethnic fire.
The SoO was inked between GoI, Manipur government and 25 Kuki militant groups in 2008. As per the agreement, the cadre of these outfits were to be confined to designated camps and their arms kept under lock. In fact, during an inspection of the army and state police earlier this month, the arms of the insurgents were found intact. Thus, there is no good reason for Manipur government and GoI to revoke the SoO, a move that is not only likely to exacerbate the current situation in Manipur but also have repercussions for other peace negotiations between Northeast insurgents and New Delhi.
Revoking the SoO could mean insurgents losing trust in the negotiationprocess. The last thing GoI wants, for example, is for the Naga negotiations to come undone. The Manipur government had viewed the SoO as a bugbear even before the current round of violence. It should forget this red herring and get down to fixing real policing issues.
Date:31-05-23
सोशल पुलिसिंग का खौफ होना भी जरूरी हैसंपादकीय
दिल्ली में एक 16 वर्षीय लड़की को एक सिरफिरे आशिक ने सरे- आम और सरे राह चाकू से गोदा, उसका सिर कुचला और मारकर चला गया। दर्जनों ने तमाशबीन बनकर देखा । समाजशास्त्र में ‘सोशल पुलिसिंग’ का जिक्र है। एक जमाने में चाचा-मामा, पिता के मित्र, बड़े भाई के परिचित और गांव-मुहल्ले के लोगों के डर से युवा गलत काम करने से या जवानी के अनैतिक भटकाव से बचते थे। खुलेआम मारपीट या लड़कियों पर फब्तियां कसने का खतरा यह था कि आसपास के लोग उसे पकड़ लेंगे। समाज की सामूहिक शक्ति का कम से कम छुटभैये अपराधियों में खौफ होता था। भारत में ब्रिटिश-काल से आज तक पुलिस – आबादी अनुपात बेहद कम रहा। आज प्रति दस लाख आबादी पर 151 पुलिसकर्मी हैं और बिहार जैसे राज्यों में मात्र 63, इनमें से भी तीन-चौथाई से ज्यादा गैर- पुलिस कार्यों, प्रोटोकॉल ड्यूटी, अभियोजन, अनुसंधान आदि में लगे रहते हैं। क्या 40 पुलिस वालों से दस लाख की आबादी पर प्रभावी नियंत्रण हो सकता है? लेकिन सोशल पुलिसिंग बेहद प्रभावी थी, जिससे सरेआम शारीरिक अपराध नहीं होते थे। फिर सामाजिक तानाबाना बदला और नैतिक मानदंडों की जगह चालाकी, धोखा, मौकापरस्ती और उदासीनता ने ले ली। लिहाजा सोशल पुलिसिंग की अनौपचारिक संस्था लगभग खत्म हो गई। किशोरावस्था में विपरीत लिंग के प्रति आकर्षण स्वाभाविक है। लेकिन देश के शहरी ही नहीं ग्रामीण इलाकों में भी देखने में आ रहा है कि किशोर युवा प्यार में निराशा पर या नाकामी के प्रतिकार में अक्सर किशोरियों पर तेजाब फेंक देते हैं या हत्या कर देते हैं। समाज को जरूरत है कि बाहर पढ़ने निकली हर बेटी को अपनी बेटी समझे ताकि सोशल (न कि मॉरल) पुलिसिंग का खौफ बना रहे।
Date:31-05-23
जैव-ईंधन का अर्थशास्त्रसंपादकीय
सरकार ने पेट्रोल में एथनॉल की मात्रा बढ़ाकर 20 प्रतिशत (ई20) करने की समयसीमा अब 2025 कर दी है। पहले उसने 2030 तक यह लक्ष्य हासिल करने की योजना बनाई थी। सरकार को अपने इस निर्णय पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है। नीतियों का विश्लेषण करने वाली निजी संस्था ऑर्कस ने पिछले सप्ताह जारी एक रिपोर्ट में कहा है कि पेट्रोल में मिलाने के लिए आवश्यक 13.5 अरब लीटर एथनॉल का उत्पादन करने के लिए जरूरी कच्चा माल उपलब्ध नहीं है। यह रिपोर्ट नीति आयोग के प्रतिनिधियों की उपस्थिति में जारी की गई थी। जैव-ईंधन राष्ट्रीय नीति, 2018 में गन्ना, चावल और मक्का जैसे कृषि उत्पादों के उपयोग से अल्कोहल उत्पादन बढ़ाने की बात की गई है। इन फसलों का इस्तेमाल मुख्यतः भोजन, चारा एवं अन्य उद्देश्यों के लिए भी होता है। जमीन एवं जल दोनों की कमी होने से इन फसलों का रकबा बढ़ाने की संभावनाएं सीमित हैं। चावल और गन्ना जैसी फसलों की सिंचाई की आवश्यकता अधिक होती है, वहीं मुर्गीपालन एवं स्टार्च (शर्करा) उद्योग के लिए मक्के का उत्पादन पर्याप्त नहीं हो रहा है।
वर्तमान समय में एथनॉल का ज्यादातर उत्पादन चीनी उद्योग में होता है। इस उद्योग को एथनॉल तैयार करने के लिए गन्ने के सभी उत्पादों (रस, तैयार चीनी) का इस्तेमाल करने की अनुमति दी गई है। पिछले वर्ष 36 लाख टन चीनी का उपयोग अल्कोहल बनाने के लिए किया गया था। इस वर्ष यह मात्रा बढ़कर 45 से 50 लाख टन हो सकती है। हमें यह अवश्य ध्यान में रखना चाहिए कि एक किलोग्राम चीनी तैयार करने के लिए 1,200 से 1,500 लीटर पानी की आवश्यकता होती है। दुनिया में सबसे बड़ा चीनी और अल्कोहल उत्पादक ब्राजील और कई अन्य देश जैव-ईंधन के लिए इसलिए अधिक गन्ना उगा पाते हैं कि उनके पास कृषि योग्य भूमि काफी मात्रा में उपलब्ध है। भारत में इसकी गुंजाइश नहीं है। भारत में इन फसलों की उत्पादकता भी वैश्विक औसत से कम है और भोजन एवं चारे की आवश्यकता पूरी करना पहला लक्ष्य होता है। यह सच है कि पिछले वर्ष भारतीय खाद्य निगम (एफसीआई) ने एथनॉल उत्पादन के लिए 10 लाख टन सब्सिडी युक्त चावल मद्य निर्माणशालाओं (डिस्टिलरियों) को दिया था। मगर एफसीआई ने अपना भंडार कम करने के लिए ऐसा किया था। बार-बार ऐसा कर पाना संभव नहीं है। अब तो चावल अधिशेष मात्रा में नहीं रहने से इसके निर्यात पर भी अंकुश लगाया जा रहा है। कुपोषण जैसी समस्या का सामना कर रहे और विश्व भुखमरी सूचकांक में फिसले भारत जैसे देश में चावल एवं मक्का जैसी फसलों का एथनॉल उत्पादन के लिए अधिक इस्तेमाल समझ-बूझ भरा कदम नहीं लगता है।
20 प्रतिशत एथनॉल मिश्रण के लक्ष्य पर पुनर्विचार करने का एक और कारण मौजूद है। इस समय देश में जितने वाहन हैं वे अधिक मात्रा में एथनॉल युक्त ईंधन से चलने के लिए उपयुक्त नहीं है। कम मात्रा में मिश्रण करने के लिए भी वाहनों में बदलाव की जरूरत होगी। इसके अलावा हानिकारक गैसों का उत्सर्जन रोकने का लक्ष्य भी इससे पूरा होता नहीं दिख रहा है। विभिन्न अध्ययनों से पता चला है कि पेट्रोल में थोड़ी मात्रा में अल्कोहल मिलाना वाहनों के इंजन में बदलाव (ई20- वाहन) पर होने वाले निवेश को उचित ठहराने के लिए पर्याप्त नहीं है। नीति आयोग की एक रिपोर्ट के अनुसार प्रत्येक चौपहिया वाहन पर करीब 3,000-4,000 रुपये और प्रत्येक दोपहिये पर अतिरिक्त 1,000 से 2,000 रुपये खर्च आएगा।
दूसरी पीढ़ी (2जी) की तकनीक के उपयोग से पेट्रोल में मिलाने के लिए एथनॉल तैयार करना अधिक व्यावहारिक तरीका हो सकता है। इस तकनीक के माध्यम से पराली, पुआल, डंठल जैसे फसलों के अवशेष से अल्कोहल तैयार किया जाता है। पानीपत (हरियाणा), बठिंडा (पंजाब), बारागढ़ (ओडिशा) और नुमालीगढ़ (असम) में कम से कम चार ऐसे 2जी एथनॉल संयंत्र लगाए जा रहे हैं। ऐसे और संयंत्र लगाने से पेट्रोल में मिलाने के लिए अधिक मात्रा में एथनॉल उपलब्ध होगा और फसलों के अवशेष जलाने से होने वाला वायु प्रदूषण भी कम हो जाएगा।
Date:31-05-23
एक-दूजे के काम आने वाला समाज चाहिएआनंद कुमार, ( समाजशास्त्री )
दिल्ली के सघन इलाके शाहाबाद डेरी में देर शाम सरेराह एक युवक ने जिस तरह से एक किशोरी की बर्बर हत्या की, उसने कई सवालों को जन्म दिया है। यह चिंता स्वाभाविक है कि राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में, जहां पुलिस चुस्त मानी जाती है और वह सीसीटीवी जैसे साधनों से सुसज्जित है, वहां कोई व्यक्ति इतनी बेफिक्री से हत्या करके कैसे फरार हो सकता है? हालांकि, जल्द ही कातिल को गिरफ्तार कर लिया गया, पर इसने दिल्ली पुलिस की साख को धूमिल जरूर कर दिया।
इस हत्याकांड में इससे भी बड़ा सवाल आम लोगों की संवेदनहीनता को लेकर है। इंसान से अपेक्षा होती है कि राह चलते भी यदि कोई चोटिल हो जाए, तो वह उसकी सहायता करे। एकाध अपवादों को छोड़ दें, तो हम ऐसा करते भी हैं। इतनी सहानुभूति हममें होनी ही चाहिए कि विपरीत परिस्थितियों में हम एक-दूसरे का हाथ थाम सकें। मगर दिल्ली की इस घटना का वीडियो बता रहा है कि किशोरी के ऊपर लगातार प्राणघातक हमले को लोग देखते रहे और हत्यारे को पकड़ने की कोशिश नहीं की गई। कातिल को रोकने की अपनी नैतिक जिम्मेदारी किसी ने नहीं समझी।
आज से कुछ वर्ष पहले दिल्ली के ही एक प्रमुख इलाके में निर्भया कांड हुआ था। उस समय भी हमारी संवदेनशीलता पर सवाल उठे थे। उस घटना में पहले चलती बस में लड़की के साथ बर्बरता की गई और बाद में उसे और उसके दोस्त को घायलावस्था में सड़क के किनारे धकेल दिया गया था। नग्न अवस्था और करीब-करीब मृतप्राय पड़े उन दोनों तक सहायता पहुंचने में कुछ वक्त लगा था, पर उनको मदद मिली जरूर, और अगले ही दिन से पूरी दिल्ली सड़कों पर आ गई थी। ताजा वारदात में आम लोगों में जिम्मेदारी का अभाव क्या एक नई प्रकार की दिल्ली बनने का संकेत है? क्या राजधानी में ऐसे इलाके भी हो गए हैं, जहां के लोग एक-दूसरे की परवाह नहीं करते? क्या इसका कारण लोगों का प्रवासी होना, एक-दूसरे से परिचित न होना या अमीर व गरीब की दिल्ली में फर्क होना है? निश्चय ही, यह दुखद घटना दिल्ली के बदलते वर्ग-चरित्र पर सवाल उठा रही है।
यह हत्या युवकों और युवतियों के परस्पर संबंधों के समाजशास्त्रीय विश्लेषण की भी मांग करती है। माना जा रहा है कि इस बर्बरता के पीछे एकतरफा प्रेम भी एक पहलू है। इसका पता तो जांच के बाद चलेगा, लेकिन हताश होकर मित्र यदि हत्या पर आमादा हो जाए, तो यह चिंता की बात जरूर है। प्रेम को आखिर हम किस तरह से समझ रहे हैं? यह दरअसल एक लगाव है, अपनत्व है, अपनी सार्थकता के लिए दूसरे के संग, साथ, मैत्री और स्नेह की तलाश है। मगर प्रेम यदि कोई वस्तु मान ली जाए, जिसमें स्नेह न मिलने की सूरत में प्रेमी की हत्या का भाव बन जाए, तो संवेदनशील समाज को चिंतन करना चाहिए। प्रेम संबंध मानव समाज में सहज जीवन की बहुत पुरानी आधारशीला है। इसे दुनिया की हर सभ्यता में महत्व दिया गया है। मगर अपने देश में यदि नई पीढ़ी इसे भौतिक और तामसिक दृष्टि से देख रही है, जिसके परिणामस्वरूप वह अपने प्रेम की हत्या करने से भी नहीं हिचक रही, तो हमें इसकी पड़ताल करनी चाहिए।
इसके विश्लेषण में सबसे पहले उंगली परिवार, परवरिश और परिवेश पर उठेगी। मुमकिन है, यह हत्यारा भी ऐसे परिवार में पैदा हुआ हो, जिसमें प्रेम की सर्वोच्चता नहीं रही होगी। दूसरी उंगली मीडिया पर उठती है। विशेषकर सोशल मीडिया के मंच प्रेम को लेकर यदि इस तरह का प्रशिक्षण दे रहे हैं कि स्त्री भोग की वस्तु है और युवकों को यह अधिकार है कि यदि लड़की उसके प्रस्ताव को नहीं मान रही, तो उसके जीने का अधिकार खत्म कर देना चाहिए, तो इसे जांचना आवश्यक है। समाजशास्त्री किसी भी समाज के नियंत्रण के लिए मीडिया और पुलिस की भूमिका को काफी अहम मानते हैं। यदि इन दोनों की मौजूदगी में हत्या हो रही है, तो इसका सीधा सा अर्थ है कि इनका समाज पर नियंत्रण कमजोर हो रहा है। लिहाजा दिल्ली की घटना दुखद है, उससे भी ज्यादा शर्मनाक और सबसे ज्यादा चिंतनीय है।
हिंसा समाज का विखंडन है और हत्या समाज का नाश। अगर आज के युवक-युवतियां हत्या के भाव से एक-दूसरे से संबंध बनाएंगे, या हत्या के आतंक में जीने की विवशता महसूस करेंगे, तो इसे जंगलराज कहना ही बेहतर है, जहां हर जानवर दूसरे से डरा हुआ है और मौका मिलते ही दूसरे की हत्या करने में संकोच नहीं करता। यह संवेदना का अंत, सहानुभूति का पतन और सामाजिकता पर सवाल है।
इस तरह की घटनाएं शिक्षा-व्यवस्था की भी कलई खोलती हैं। पठन-पाठन का बेहतर माहौल सकारात्मक जीवन की संभावना बेहतर बनाता है। इसमें विरासत में मिले मूल्यों का ज्ञान भी हमें होता है। हमें यही उम्मीद करनी चाहिए कि ऐसी घटना अपवाद हो, लेकिन यदि यह प्रवृत्ति बन रही है, जो हाल-फिलहाल की घटनाओं को देखकर लगता भी है, तो हमें सचेत हो जाना चाहिए। हमें अपनी शिक्षा-व्यवस्था की समाजशास्त्रीय पड़ताल करनी चाहिए।
मानवीय व्यवहार में होने वाले विचलन को थामने के लिए सामाजीकरण की प्रक्रिया को बेहतर बनाना आवश्यक होता है। इसके चार प्रमुख माध्यम हैं- परिवार, पड़ोसी, विद्यालय और राज्य-सत्ता। इन चारों की अलग-अलग जिम्मेदारी होती है। चूंकि हत्या कानून-व्यवस्था में हस्तक्षेप का मसला है, इसलिए ताजा घटना राज्य-सत्ता की जिम्मेदारी से जुड़ती है। हम यही अपेक्षा करेंगे कि हमारी शासन-व्यवस्था में कानून की साख को लेकर नई पीढ़ी में यदि कोई संदेह पनप रहा है, तो उसका तत्काल निवारण होना चाहिए। इस हत्यारे ने भी अपनी नाराजगी जाहिर करने के लिए हत्या जैसी कार्रवाई में कोई संकोच, भय या घबराहट नहीं महसूस की। यहां युवा संगठनों की भूमिका भी कमतर नहीं मान सकते। हमें अपनी युवा नीति के स्त्री-पुरुष संबंधी पक्ष की पड़ताल करनी होगी।
जहां तक समाज में बढ़ती संवेदनहीनता का मसला है, तो हमें समझना होगा कि यदि हम दूसरे के काम नहीं आ सके, तो खुद मुश्किलों में घिरने पर दूसरे की मदद के लिए तरस सकते हैं। यह सामाजीकरण मीडिया और परिवार के जरिये किया जा सकता है। इसमें सरकार की कोई खास भूमिका नहीं है। संवेदनशीलता दिखाने वाले नौजवानों को सम्मानित करने का काम तेज करना होगा। इसका अन्य बच्चों पर काफी ज्यादा असर पड़ता है। शिक्षण संस्थानों की भूमिका भी अहम है, हालांकि इसके लिए जरूरी है कि हर बच्चा शिक्षा पूरी करे।
Date:31-05-23
भारत से रोजी-रोटी के रिश्तों को क्या दिशा देगा नेपालपुष्परंजन, ( वरिष्ठ पत्रकार )
हर्क बहादुर गुरुंग को मालूम नहीं नेपाल की नई पीढ़ी कितना जानती है। गंडकी अंचल के लामजुंग में जन्मे गुरुंग ने पटना विश्वविद्यालय से भूगोल में एमए करने के बाद यूनिवर्सिटी ऑफ एडिनबर्ग से पीएचडी की थी। वह नेपाल के पहले स्कॉलर थे, जिन्हें डॉक्टरेट की उपाधि मिली थी। 15 पुस्तकें और 675 अकादमिक आलेख देने वाले डॉक्टर गुरुंग तराई और पहाड़ के बीच विभाजन रेखा खींच देने की वजह से बहुचर्चित हुए थे। उन्होंने नेशनल कमीशन ऑन पॉपुलेशन की अध्यक्षता भी संभाली थी। 1983 में गुरूंग कमीशन की रिपोर्ट नेपाल सरकार को सौंपी गई, जिसमें सुझाव था कि भारत-नेपाल के बीच जो लोग आवाजाही करते हैं, उनका प्रवेश पहचान पत्र या पासपोर्ट के आधार पर हो।
इस रिपोर्ट में 1971 की जनगणना के हवाले से स्पष्ट किया गया था कि तराई में रहने वाले 60 लाख 35 हजार 526 लोग विदेशी मूल के हैं। इनमें से 97.7 प्रतिशत लोग भारत में जन्मे हैं। वह दौर राजतंत्र का था और पंचायत प्रणाली वाली सरकार की नीतियां गुरुंग कमीशन की रिपोर्ट के आधार पर तय होनी थी। डॉक्टर गुरुंग 23 सितंबर, 2006 को ताप्लेजुंग में हुई एक दुर्घटना में 23 लोगों के साथ मारे गए थे। मगर जो कुछ वह बो गए, उसकी फसल काटने की कवायद समय-समय पर होती रही है। जो कुछ गुरुंग कमीशन ने 40 साल पहले सुझाया था, उस अवधारणा से नेपाली लीडरशिप मुक्त नहीं हो पाई। नेपाल में ईपीजी रिपोर्ट फिर चर्चा में है। डॉक्टर बाबूराम भट्टराई ने प्रधानमंत्री रहते 2011 में उभयपक्षीय विशिष्ट समूह बनाने का प्रस्ताव तत्कालीन भारतीय प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को दिया था। मनमोहन सिंह को लगा था कि यह बर्र के छत्ते में हाथ डालने जैसा है, चुनांचे वह इसे टाल गए थे।
जनवरी 2016 में तत्कालीन प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली ने एक बार फिर माहौल बनाया, उनके समकक्ष नरेंद्र मोदी भी ईपीजी पर सहमत हो गए। अंतत: भारत-नेपाल के प्रसिद्ध लोगों का आठ सदस्यीय समूह बना, जिसका नाम रखा गया- ईपीजी (इमीनेंट पर्सन्स ग्रुप)। नेपाल की ओर से इस समूह के संयोजक हैं, दिल्ली में नेपाल के राजदूत रह चुके भेख बहादुर थापा और भारत में भगत सिंह कोश्यारी इसका नेतृत्व कर रहे थे। ईपीजी की रिपोर्ट अब तक सार्वजनिक नहीं हुई है। इसमें चार-चार सदस्य दोनों ओर से हैं, लेकिन इनमें से तराई की भावनाओं को समझने वाला कौन-सा चेहरा है?
दिलचस्प है कि 2 जुलाई, 2018 को ईपीजी की नौवीं व आखिरी बैठक गुरुंग कमीशन की छाया से मुक्त नहीं हो पाई थी। समूह के सदस्य ‘ऑफ द रिकार्ड’ बातचीत में मानते हैं कि भारत-नेपाल संधि 1950 में बदलाव पर सहमति है। दूसरा, दोनों देशों की आवाजाही में लोगों के लिए पहचान पत्र दिखाना अनिवार्य किया जाए। तीसरा, नेपाल में काम करने के वास्ते वर्क परमिट हो। इससे भारत-नेपाल के बीच, बेटी-रोटी के संबंध पर क्या असर पड़ेगा?
प्रचंड 88 सदस्यीय जंबो शिष्टमंडल के साथ भारत यात्रा पर आ रहे हैं। 29 मई को 17 खरब 51 अरब 31 करोड़ का बजट पास तो हो गया, पर उसके लक्ष्य पूरे करने के वास्ते दिल्ली से भी आर्थिक मदद की जरूरत होगी। प्रचंड ने प्रतिनिधि सभा को चार दिवसीय भारत यात्रा के एजेंडे से अवगत करा दिया है। बांग्लादेश विद्युत निर्यात के वास्ते भारत से समझौता कर नया कॉरिडोर विकसित करना, भैरहवा एयरपोर्ट को हवाई रूट दिए जाने का प्रस्ताव, 136 किलोमीटर काठमांडू-रक्सौल रेल मार्ग, ऊर्जा समझौता, ई-वॉलेट, नेपाली टीवी को भारत में दिखाने की अनुमति मुख्य एजेंडा है। मगर लिपुलेख जैसे जो विवादित विषय हैं, क्या सुलझा लिए जाएंगे?
30 मई को अनलीशिंग नेपाल पुस्तक के लेखक सुजीत शाक्य ने कांतिपुर पोस्ट में अपने एक लेख में लिखा है, ‘पुष्पकमल दाहाल क्या पापुआ न्यू गिनी के प्रधानमंत्री की तरह मोदी के चरणों में लोट जाएंगे?’ प्रचंड ने अपने कालखंड में न्यू मोदी-लेखनाथ विद्युत प्रसारण लाइन तैयार कर प्रधानमंत्री मोदी से निजी संबंधों को प्रगाढ़ किया है। उनकी भारत यात्रा पर न सिर्फ चीनी लॉबी की नजर है, बल्कि अमेरिकी भी इसकी समीक्षा करेंगे कि प्रचंड किस दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।
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ऐसी आशंका व्यक्त की जा रही है कि 2024 के आगामी चुनावों को देखते हुए, लोकलुभावनवाद में किए गए वायदों से भारत की आर्थिक सुधार की धीमी गति पर बुरा प्रभाव पड़ सकता है। कुछ बिंदु –
कल्याण का ऐसा राजनीतिक स्वरूप बाजार तंत्र को तो बिगाड़ता ही है, साथ ही असमानता को भी बनाए रखता है। सार्वभौमिक संपत्ति के पुनर्वितरण के लिए नकद हस्तांतरण को वैश्विक स्तर पर सर्वश्रेष्ठ माना जा रहा है। भारत ने स्वतंत्रता के बाद से ही समावेशी विकास का असफल प्रयत्न किया है। दृष्टिकोण बदलते हुए अब समूहों में कल्याण की समान योजनाओं को चलाया जा रहा है। इस दृष्टिकोण ने अनेक वैश्विक संकटों से अर्थव्यवस्था को उबारा है। अब मुफ्त देनदारियों की प्रतिस्पर्धी घोषणाओं से इसे नष्ट नहीं किया जाना चाहिए। इससे भारत की विकास गति धीमी पड़ सकती है।
‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 16 मई, 2023
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30-05-2023 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"प्री परीक्षा (एक)"
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Today's Life Management Audio Topic-"अंतर्यात्रा"
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महिलाओं की पीड़ा को कम करने का एक प्रयास
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Date:29-05-23
New House, New WaysHow to add meaning to the new addition to India’s governance architecture.TOI Editorials
A grand ceremony and sharp political rhetoric greeted the new Parliament. If the splendour and hi-tech amenities reflected new ambitions, the war of tweets and statements pointed to a bitter political divide that can act as a drag on that ambition. So, as our MPs get ready to work from a swanky new office, they and, even more, their party leaders must ask what use is India’s new House for India if it can’t house thoughtful, civil debates and pass well-scrutinised laws that make things better for citizens. Which is to say it would be tragic were the ways of the old Parliament carry over to the new one.
It isn’t much of a Parliament when the din of hoots and heckles and raised fists, chairs and mikes are what make news. Debates that belong to Parliament play out on social media. Speeches suitable for election rallies are made in the House. The 15th Lok Sabha set a record as the least productive in terms of hours it met. BJP, then in opposition, believed obstruction of Parliament was a democratic form of protest. The 17th Lok Sabha is often criticised for hasty law-making without enough debate, due diligence or discussion.
If Lok Sabha and Rajya Sabha are Parliament’s heart and mind, parliamentary committees are its nerve-centre, deliberating year-round, scrutinising bills. Yet too often, bills are not sent to committees. In this Lok Sabha, barely 13% of bills were sent to committees till monsoon session 2022. This number was 27% in the 16th Lok Sabha. The 15th Lok Sabha sent 71% of its bills to committees. A country as vast, stratified and complex as this, an economy that will be the third largest in the world within the lifetime of many MPs must be governed by laws that have had the benefit of many close and diverse looks. The new Parliament must resuscitate the tradition of parliamentary committees being prime players in law-making.
The onus lies on parties, those who attended the ceremony and those who didn’t, to make the new Parliament new in a meaningful way. But, as per the well-understood precepts of parliamentary democracy, the biggest onus lies with the governing party. BJP and especially BJP’s leadership must therefore make the first moves on reviving India’s old parliamentary culture, in which debate and decorum coexisted happily. The party has accused the opposition of dishonouring the new Parliament. BJP must show it knows how to truly honour the splendid new addition to India’s governance architecture.
Date:29-05-23
Save The SummitIt’s 70 years since the ascent of Mt Everest. The climb is still a challenge. The bigger challenge is ecological.TOI Editorials
Seventy years ago when Tenzing Norgay and Edmund Hillary made the first official ascent of Mt Everest, it was understandably heralded as a great human achievement by the entire world. Reaching the 29,000 feet peak took extraordinary tenacity and teamwork. The following decades would see more men and women (like Japan’s Junko Tabei in 1975 and India’s Bachendri Pal in 1984) likewise overcome the inordinate altitude and physiological barriers and become heroes. But that collective sheen began to wear away in the nineties, as commercial expeditions took off.
Indeed, images of ‘traffic jams’ and ‘garbage mountains’ that have gone viral in recent years worry the larger public that where mountaineering was once an ode to the glory of the Everest region, it is now an ecological threat. The Hillary sentiment that “it’s not the mountain we conquer but ourselves,” is of course as valid today as in 1953. Why should humans feel the pull of one of the planet’s greatest physical and mental challenges, any less today? The more profound challenge though is to preserve this imposing landscape for future generations. Climate change is the unpredictable X factor but being kinder to the Himalayas is a choice humans can make.
For Nepal, which is celebrating the Hillary-Norgay achievement on scale, where people’s lives and opportunities have been dramatically transformed as a result of that ascent, the recalibration will not be easy, but it is necessary. Just as it is necessary in the Indian Himalayas, which too are reeling under over-commercialisation and overcrowding, with Joshimath being just one of the worrying flashpoints. If the romance of the great mountains is to endure for tourists, they have to do their part too. As the axiom goes, take nothing but pictures, leave nothing but footprints.
Date:29-05-23
दूरगामी नुकसान करते लुभावने वादेविवेक देवराय आदित्य सिन्हा, ( प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के प्रमुख और सिन्हा परिषद में अपर निजी सचिव-अनुसंधान हैं )
समकालीन राजनीतिक परिदृश्य में लोकलुभावनवाद का ही बोलबाला दिख रहा है। कई देशों के अलावा भारतीय राजनीति को भी यह पहलू प्रभावित कर रहा है। सत्ता की चाह में मतदाताओं को लुभाने के लिए राजनीतिक दल बड़े-बड़े सब्जबाग दिखाते हैं। हालांकि, सत्ता में आते ही वित्तीय बाधाओं के चलते ये वादे खोखले साबित होते हैं। ऐसे में कोई संदेह नहीं कि तात्कालिक लाभ के लिए दूरगामी नुकसान वाले ये वादे वित्तीय अनुशासन की धज्जियां उड़ाते हैं। शनिवार को नीति आयोग की बैठक में भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इसे लेकर चिंता प्रकट करते हुए राज्य सरकारों से यही कहा कि वे वित्तीय अनुशासन के दायरे में ही जनकल्याण करें। प्रधानमंत्री मोदी या अन्य लोगों की ऐसी चिंता अकारण भी नहीं। राजनीति में मुफ्त उपहारों की यह रेवड़ी संस्कृति धीरे-धीरे अपनी पैठ गहरी करती जा रहा है। इसका सबसे ताजा उदाहरण कर्नाटक विधानसभा चुनाव में देखने को मिला। वहां कांग्रेस द्वारा चुनाव के दौरान किए गए वादों ने अप्रत्याशित स्थिति उत्पन्न कर दी है। मुफ्त बिजली और बस यात्रा जैसे वादे कांग्रेस के लिए कारगर साबित हुए। यही कारण है कि तमाम लोगों ने अब बिजली के बिल भरना बंद कर दिए हैं, क्योंकि उन्हें उम्मीद है कि सरकार जल्द ही इस वादे को पूरा करेगी और उन्हें मुफ्त बस यात्रा की सौगात भी मिलेगी।
वास्तविकता यही है कि इस लोकलुभावनवाद ने चुनावी वादों और आर्थिक व्यावहार्यता के बीच तनाव की स्थिति बना दी है, जिसके सामाजिक कल्याण एवं स्थायित्व पर दूरगामी प्रभाव दिख सकते हैं। लोकलुभावनवाद के मुद्दे पर मंथन के लिए हमें दो बुनियादी पहलुओं की पड़ताल करनी होगी। पहला यही कि आखिर लोकलुभावनवाद क्या है? राजनीतिक परिप्रेक्ष्य में देखें तो यह ऐसी रणनीति प्रतीत होती है, जिसमें तात्कालिक आवश्यकताओं की पूर्ति वाले वादों को जनता के बीच व्यापक समर्थन मिलता है। हालांकि, आरंभिक स्तर पर लोकप्रियता के बावजूद दीर्घकालिक स्तर पर इनके व्यापक दुष्प्रभाव होते हैं। इनसे न केवल अन्य आवश्यक खर्चों के लिए संसाधनों की कमी पड़ती है, बल्कि वित्तीय स्थिति भी बिगड़ती है। दूसरा पहलू यही कि यदि लोकतंत्र में जनता की इच्छा ही सर्वोपरि है तो फिर लोकलुभावनवाद में क्या समस्या है? नि:संदेह, लोकलुभावनवाद में जनता की इच्छा प्रतिनिध्वनित होती है और यही लोकतंत्र का मूल अधिकार भी है, लेकिन सवाल यही है कि इनके समीकरणों में मूलभूत समस्याएं हैं। लोकलुभावन प्रवृत्तियों के चलते पार्टियां बड़े-बड़े वादे करती हैं और उस हिसाब से उनकी पूर्ति नहीं कर पातीं तो जनता का भरोसा घटता है। इन सबसे बढ़कर लोकलुभावन नीतियों से सरकारी खर्च में भारी बढ़ोतरी होती है। इनसे कुछ तात्कालिक लाभ भले ही मिल जाएं, लेकिन बजटीय घाटे, वित्तीय अस्थिरता और अंतत: किसी आर्थिक संकट की आशंका बढ़ जाती है। इससे जुड़ा विमर्श अक्सर सामाजिक विभाजन और ध्रुवीकरण को भी बढ़ावा देता है तो सामाजिक सद्भाव और एकता की भावना पर आघात करता है। इससे सतत विकास और नियोजन की प्रक्रिया प्रभावित होती है। इस कारण कई लचर नीतियां अस्तित्व में आ जाती हैं। भले ही लोकलुभावनवाद को आम आदमी के हितों की पैरवी करने वाला बताया जाता हो, लेकिन यह सामाजिक समावेशन की प्रक्रिया को उलटकर असमानता एवं अन्याय को बढ़ावा दे सकता है।
ऐसे में यह युवा मतदाताओं का दायित्व है कि वे लोकलुभावनवाद के संभावित दुष्प्रभावों को समझते हुए इस पर विराम लगाने के लिए आगे आएं, क्योंकि यह उनके भविष्य का प्रश्न है, जिसमें आर्थिक संतुलन को असंतुलित करने का जोखिम है। पंजाब का उदाहरण लें तो उसके बजट की पड़ताल कई चिंतित करने वाले रुझान दर्शाती है। राज्य की जीडीपी के अनुपात में कर संग्रह खतरे की घंटी बजाने वाला है। इससे केंद्रीय वित्तीय सहायता पर राज्य की निर्भरता बढ़ती जा रही है। वित्त वर्ष 2022-23 के संशोधित अनुमान में पंजाब पर 3,12,758 करोड़ रुपये का कर्ज दिखाया गया, जिसके अगले वित्त वर्ष में बढ़कर 3,27,050 करोड़ रुपये के स्तर को पार कर जाने के आसार हैं। ये महज कुछ आंकड़े नहीं, बल्कि आर्थिक आपदा के संकेतक हैं। ऐसे में लोकलुभावन योजनाओं के नकारात्मक दूरगामी पहलुओं को देखते हुए उन्हें लेकर सतर्कतापूर्ण रवैया अपनाना ही उचित है।
लोकलुभावनवाद के साथ एक बड़ी चिंता यही है कि इससे प्रतिद्वंद्वी राजनीतिक दलों के बीच बड़ी-बड़ी घोषणाएं करने की अंतहीन होड़ शुरू होगी। यह प्रतिस्पर्धी लोकलुभावनवाद समय के साथ चिंता बढ़ाता जाएगा। पेंशन योजना से लेकर मुफ्त बिजली तक इस सिलसिले पर कोई विराम नहीं लगेगा। हमारे जैसे विकासशील देश में जहां संसाधन सीमित हैं, वहां सामाजिक कल्याणकारी योजनाएं बेतरतीब होने के बजाय रणनीतिक स्वरूप वाली एवं लक्षित वर्ग को ध्यान में रखते हुए बनाना ही उचित है। अन्यथा संसाधनों के दुरुपयोग की चुनौती उत्पन्न होती है। दिल्ली का ही उदाहरण लें, जहां 200 यूनिट बिजली मुफ्त है। चार मंजिला बंगले की स्थिति में देखें तो वहां बिजली के चार अलग-अलग कनेक्शन संभव हैं। इससे वहां 1,600 यूनिट मुफ्त बिजली की संभावना बनी रहेगी। लोगों को इसकी इतनी आदत लग चुकी है कि जब दिल्ली सरकार ने इसे वैकल्पिक बनाया तो 58 लाख उपभोक्ताओं में से 48 लाख ने सब्सिडी के विकल्प को वरीयता दी। ये उदाहरण हमें हमारी दीर्घकालिक प्राथमिकताओं को समझने की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करते हैं। इस दिशा में यह आवश्यक होगा कि सरकारी खर्च संसाधन संपन्न लोगों पर न होकर वास्तविक जरूरतमंदों पर होना चाहिए। यह मुद्दा संसाधनों के न्यायसंगत वितरण को सुनिश्चित करने और असमानता को बढ़ने से रोकने से भी जुड़ा है। इन महत्वपूर्ण अंतरों को समझने पर ही हमारे राष्ट्र का भविष्य टिका हुआ है।
Date:29-05-23
गरीब बनाता महंगा इलाजजयप्रकाश त्रिपाठी
देश में स्वास्थ्य सेवाएं महंगी ही नहीं होती जा रहीं, मरीजों को गरीब भी बना रही हैं। लगातार बढ़ता चिकित्सा खर्च हर साल सात प्रतिशत आबादी को गरीबी रेखा के नीचे धकेल रहा है। आक्सफैम इंटरनेशनल की एक ताजा रिपोर्ट बताती है कि अगर भारत के अरबपतियों की पूरी संपत्ति पर दो फीसद की दर से एकमुश्त कर लगा दिया जाए, तो उसी राशि से देश में तीन साल तक कुपोषितों के पोषण के लिए 40,423 करोड़ रुपए की जरूरत पूरी की जा सकती है। इसी तरह देश के दस सबसे अमीर अरबपतियों पर पांच प्रतिशत का एकमुश्त कर लगा कर साल भर के लिए स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय और आयुष मंत्रालय के बजट की अच्छी-खासी भरपाई हो सकती है।
हमारे देश में आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना, स्वास्थ्य बीमा योजना, प्रधानमंत्री स्वास्थ्य सुरक्षा योजना, राज्य स्वास्थ्य प्रणाली संसाधन केंद्र योजना, जननी सुरक्षा योजना, सामाजिक स्वास्थ्य कार्यकर्ता (आशा) योजना, एनआरएचएम फ्लेक्सी पूल, राज्यों में 108 एंबुलेंस सेवा, इंद्रधनुष टीकाकरण, ग्रामीण स्वास्थ्य स्वच्छता जैसी अनेक आधारभूत व्यवस्थाओं, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के अंतर्गत राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन, राष्ट्रीय शहरी स्वास्थ्य मिशन, तृतीयक देखभाल कार्यक्रम, स्वास्थ्य चिकित्सा शिक्षा, राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (प्रजनन) आदि सरकारी इंतजामात के बावजूद दुनिया में सबसे ज्यादा (सालाना औसतन 11 लाख) नवजात बच्चों की मौतें भारत में हो रही हैं। हर साल दस लाख नवजात शिशुओं को गंभीर एचबीवी संक्रमण का खतरा रहता है। पैदा होने वाले प्रति एक हजार में से औसतन उनतीस नवजात की मौत हो जाती है। ‘सेव द चिल्ड्रेन’ संस्था के मुताबिक, विश्व में नवजात शिशुओं की कुल मौतों में से उनतीस फीसद अकेले भारत में होती हैं।
गरीब परिवारों के लिए यह सच कितना दुर्भाग्यपूर्ण है कि वे अपने बच्चों के इलाज का खर्च उठाने लायक नहीं रह गए हैं। अस्पतालों में भर्ती बच्चों पर केंद्रित एक अध्ययन से पता चलता है कि प्रति सौ परिवारों में से तेरह को इलाज में आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे ज्यादातर परिवार अगली धार के कार्यकर्ताओं, जैसे आशा, आंगनबाड़ी, सहायक नर्स मिडवाइव्स की पहुंच से भी वंचित हैं। आयुष्मान भारत योजना के साथ भी पहुंच का सवाल जुड़ा है। बेतहाशा महंगे दवा-इलाज ने तेईस फीसद मरीजों को चिकित्सा से वंचित कर दिया है। सत्तर फीसद लोग अपनी जेब से इलाज करा रहे हैं। मेडिकल कालेजों, अस्पतालों, प्रशिक्षित डाक्टरों और नर्सों की कमी के चलते स्वास्थ्य सेवाएं तो पहले से ही चरमराई हुई हैं। स्वास्थ्य के क्षेत्र में सरकारी खर्च एक दशक से ऊंट के मुंह में जीरा की तरह सकल घरेलू उत्पाद के लगभग 1.3 प्रतिशत पर ही टिका हुआ है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति का हाल यह है कि सरकारी स्वास्थ्य सेवाओं के मामले में भूटान, श्रीलंका और नेपाल जैसे गरीब देशों का भी सालाना खर्च भारत से ज्यादा है। देश में आबादी सात गुना बढ़ गई, पर स्वास्थ्य सुविधाएं दोगुनी भी नहीं हो सकी हैं।
देश के कुल लगभग सत्तर हजार अस्पतालों में से साठ फीसद में तो पर्याप्त बिस्तर तक नहीं हैं। आनुपातिक तौर पर प्रति पैंसठ मरीज पर मात्र एक बिस्तर की उपलब्धता है। चिकित्सा खर्च इस कदर जेब पर भारी पड़ रहा है कि हर साल कर्ज लेकर, संपत्तियां बेचकर इलाज कराने वाली सात-आठ प्रतिशत आबादी गरीबी रेखा से नीचे पहुंच जाती है। तेंतालीस फीसद कमाई इलाज पर खर्च हो जा रही है। ऐसे ज्यादातर मरीज कैंसर, हृदय और मानसिक रोगों से पीड़ित होते हैं। आयुष्मान भारत स्वास्थ्य योजना की न तो फिलहाल दस करोड़ परिवारों तक पहुंच बन पाई है, न प्राथमिक उपचार के लिए पूर्व घोषित डेढ़ लाख ‘हेल्थ ऐंड वेलनेस’ केंद्र बन सके हैं।
एक तो निजी अस्पताल आयुष्मान योजना की तय सरकारी दरों पर इलाज के लिए सहमत नहीं हैं। दूसरे, पर्वतीय प्रदेशों को छोड़ कर अन्य राज्य इस योजना के तहत चालीस प्रतिशत इलाज का खर्च उठाने से कतराते हैं। बंगाल सरकार ने तो आयुष्मान भारत योजना को राज्य की स्वास्थ्य योजना में मिश्रित कर दिया है। नतीजे स्पष्ट हैं कि योजनाएं कागजी होकर रह गई हैं। देश की सवा अरब से अधिक आबादी के लिए स्वास्थ्य का मौजूदा ढांचा नितांत अपर्याप्त हो चला है। शिक्षा और स्वास्थ्य के नाम पर 1990 के बाद से, देश में पता नहीं कितने अभियान, कार्यक्रम, नीतियां और निवेश सामने आ चुके हैं, तब भी स्वास्थ्य क्षेत्र में हालात जस के तस बने हुए हैं। देश में मानव संसाधनों का पारदर्शी इस्तेमाल न हो पाना भी इस विफलता की एक खास वजह है। अन्य क्षेत्रों की तरह स्वास्थ्य क्षेत्र के संसाधन भी मुट्ठी भर शक्तियों के हाथों में सिमट कर रह गए हैं। किसी जमाने में चिकित्सक को धरती का भगवान कहा जाता था, पर अब इस पेशे ने नई तकनीकों से लैस होकर बाजार का बाना ओढ़ लिया है।
सरकारें और स्थानीय प्रशासनिक अधिकारी ध्यान दें तो गरीबों का निजी अस्पतालों में मुफ्त इलाज हो सकता है। ऐसे मरीजों के लिए निजी अस्पतालों में दस फीसद आरक्षित बिस्तर मुहैया कराने का स्पष्ट प्रावधान है। 2007 में दिल्ली उच्च न्यायालय ने गरीब मरीजों को आरक्षित बिस्तर उपलब्ध न कराने पर अस्पतालों पर भारी जुर्माने का निर्णय दिया था। लगभग एक दशक पहले दिल्ली सरकार भी इस दिशा में पहल कर चुकी है।
स्वास्थ्य सेवाओं की स्थितियों के आकलन और उसके आधार पर भारत में चिकित्सा व्यवस्थाएं बनाने के लिए सन 1946 में जोसेफ विलियम भोरे के नेतृत्व में बनाई गई समिति ने प्रति चालीस हजार की आबादी पर एक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र बनाने का सुझाव दिया था। प्रत्येक पीएचसी में दो डाक्टर, एक नर्स, चार सार्वजनिक स्वास्थ्य नर्स, चार दाइयां, दो स्वच्छता निरीक्षक, दो स्वास्थ्य सहायक, एक फार्मासिस्ट और पंद्रह अन्य चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों को शामिल करने का सुझाव था। इस प्रस्ताव को 1952 में भारत सरकार ने स्वीकार भी कर लिया, लेकिन सभी सिफारिशें लागू नहीं हो सकीं। 1970 के दशक में डब्लूएचओ ने ‘सभी के लिए सेहत’ लक्ष्य निर्धारित किया। देश में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, जिला अस्पताल, मेडिकल कालेज विकसित हुए, बड़े-बड़े स्वास्थ्य संस्थान बने, लेकिन दुर्भाग्य है कि प्राथमिक स्वास्थ्य सेवाओं को जरूरतों के अनुकूल विकसित नहीं किया जा सका है। आज एम्स, पीजीआई जैसे बड़े संस्थान उसी का खमियाजा भुगत रहे हैं।
भारतीय चिकित्सा परिषद के अनुसार, नौ वर्ष पहले देश भर में करीब 9.40 लाख डाक्टर थे, जबकि प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को 1.5 लाख, उप-संभागीय अस्पतालों को 1.1 लाख, सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों को अस्सी हजार डाक्टरों की आवश्यकता थी। उसके बाद के पांच वर्षों में चार लाख और डाक्टर चाहिए थे। फिर इस दिशा में आगे हुआ क्या? प्रति सत्रह सौ मरीजों पर एक डाक्टर उपलब्ध है। सार्वजनिक स्वास्थ्य क्षेत्र में डाक्टरों और नर्सों के बहुत सारे पद रिक्त पड़े हैं। देश में स्वास्थ्य कर्मियों की संख्या में हो रही वृद्धि की गति बहुत ही धीमी है। भर्ती प्रक्रियाएं बुरी तरह अवरुद्ध हैं।
अन्य देशों की तरह हमारे यहां आज भी सभी नागरिकों के लिए कोई राष्ट्रीय स्वास्थ्य बीमा प्रणाली नहीं है, जिसका लाभ निजी कंपनियां उठा रही हैं। सार्वजनिक और निजी स्वास्थ्य देखभाल में भारी अंतर है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य गारंटी मिशन का मुख्य लक्ष्य तो प्रत्येक नागरिक को मुफ्त दवाएं, नैदानिक उपचार और गंभीर बीमारियों के लिए बीमा उपलब्ध कराना है, लेकिन इसकी भी अंतर्गत कथा हाथी के दांत जैसी है। शहरी और ग्रामीण भारत के बीच स्वास्थ्य सेवाओं के बुनियादी ढांचे में ही भारी अंतर है।
Date:29-05-23
बहिष्कार की राजनीतिसंपादकीय
नीति, आयोग की संचालन परिषद की शनिवार को संपन्न आठवीं बैठक का ग्यारह मुख्यमंत्रियों ने बहिष्कार किया। ये मुख्यमंत्री गैर-भाजपा शासित राज्यों के मुख्यमंत्री हैं। बैठक में मुख्य रूप से 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने के एजेंडे पर विमर्श किया गया और स्वास्थ्य, कौशल विकास, महिला सशक्तीकरण और बुनियादी ढांचे के विकास समेत कई मुद्दों पर मंथन हुआ। बैठक को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि भारत को 2047 तक विकसित देश बनाने के लिए राज्यों और जिलों को दीर्घकालीन दृष्टिकोण पत्र तैयार करना चाहिए। गौरतलब है कि 2047 में भारत अपनी आजादी के सौ साल पूरे करेगा। भाजपा ने नीति आयोग की बैठक का पार्टियां नये संसद भवन के बहिष्कार किए जाने को दुर्भाग्यपूर्ण और गैर-जिम्मेदाराना करार दिया है। पार्टी के वरिष्ठ नेता रविशंकर प्रसाद ने मोदी विरोध के नाम पर अपने ही राज्य के नुकसान पर कटाक्ष करते हुए बहिष्कार करने वाले मुख्यमंत्रियों से कहा कि आखिर, आप कहां तक जाओगे। उन्होंने दुख जताया कि सीएजी, सीईसी, चुनाव आयोग का पहले ही विरोध कर चुकीं इन मुख्यमंत्रियों की उद्घाटन के भी विरोध में हैं। विपक्ष की पार्टियों के इस प्रकार लगातार विरोध में रहने से धारणा बन गई है कि विपक्ष विरोध के लिए ही विरोध की राजनीति कर रहा है। यह धारणा विपक्ष के लिए अच्छी नहीं कही जा सकती क्योंकि मुद्दा ठोस भी हो तो संदेश यही जाता है कि विरोध के लिए विरोध किया जा रहा है। यही कारण है कि नीति आयोग की बैठक का बहिष्कार करने वाले मुख्यमंत्रियों के इस तर्क में भी आमजन का यकीन नहीं जमेगा कि सत्तारूढ़ भाजपा सरकार संघीय ढांचे का सम्मान नहीं कर रही है। बल्कि संदेश यही जा रहा है कि विपक्ष की आर्थिक महत्त्व के मुद्दों से ज्यादा राजनीति करने में रुचि है। दरअसल, नीति आयोग का विरोध बेतुका इसलिए लगने लगा है कि नीति आयोग का काम देश को दरपेश आर्थिक मुद्दों पर विमर्श करना है। क्या आर्थिक बेहतरी से जुड़े मुद्दों पर विमर्श के स्थान पर राजनीति करना उचित है। भले ही पक्ष और विपक्ष विकास की राजनीति करने का दम भरते हों लेकिन विपक्ष का रवैया वाकई खलने वाला ही है। क्योंकि नीति आयोग के सामने ही राज्यों के मुख्यमंत्री या वित्त मंत्री अपने-अपने राज्य का आर्थिक एजेंडा या दृष्टिकोण प्रस्तुत करके धन आवंटन की मांग करते हैं। उसी संस्था के प्रति बेरुखी समझ में आने वाला फैसला नहीं कहा जा सकता।
Date:29-05-23
सूखती अमेरिकी नदीसंपादकीय
दुनिया के लगभग सभी देशों में नदियां संकट में हैं। आज यह बड़ा सवाल है कि उन्हें कैसे बचाया जाएगा? अमेरिका में एक नदी कोलोराडो को बचाने के लिए जो कदम उठाए गए हैं, उन पर पूरी दुनिया की नजर है। गत सप्ताह सात अमेरिकी राज्यों ने आखिरकार फैसला कर लिया कि वे कोलोराडो नदी के पानी का कम से कम प्रयोग करेंगे। इस नदी के पानी का उपयोग अमेरिका और मैक्सिको के लोग करते हैं। कम से कम चार करोड़ लोगों को यह नदी पानी देती है। जल के अत्यधिक उपयोग, सूखे और जलवायु परिवर्तन के चलते अब यह नदी तेजी से सूख रही है। वैज्ञानिकों ने इस योजना का स्वागत किया है, लेकिन उनका मानना है कि नदी को बचाने के लिए इतना करना ही पर्याप्त नहीं है। नदी को बचाने के लिए स्थायी रूप से समाधान करने की जरूरत है। वाकई नदियां इस तरह से मुसीबत में हैं कि उनके लिए जो भी फौरी उपाय किए जाएं, वैज्ञानिकों को कम ही लगेंगे। जिन सात राज्यों ने नदी जल के प्रयोग को कम करने का फैसला किया है, क्या वे संयम बनाए रख सकेंगे? क्या नदी से जल का प्रयोग कम करने से नदी की स्थिति सुधरेगी?
फीनिक्स में एरिजोना स्टेट यूनिवर्सिटी की एक अर्थशास्त्री कैथरीन सोरेनसेन का कहना है कि ताजा कदम से मूलभूत समस्या नहीं बदलेगी, लेकिन उससे संकट को कम करने में मदद मिल सकती है। 2,300 किलोमीटर लंबी यह नदी रॉकी पर्वत से निकलकर कैलिफोर्निया की खाड़ी में गिरती है। पहले इस नदी के किनारे यहां के आदिवासियों की बसावट थी, नदी के सूखने से यह आबादी सबसे ज्यादा प्रभावित होगी। नदी पर जो खतरा मंडरा रहा है, उसकी चिंता काफी पहले से चली आ रही है, लेकिन अभी तक ठोस कदम नहीं उठाए गए थे। विवाद चल रहा था कि इसे संरक्षित करने के लिए अपने पानी के उपयोग में किसे कटौती करनी चाहिए। कैलिफोर्निया, एरिजोना और नेवादा जैसे राज्य इसके पानी का सर्वाधिक उपयोग करते हैं और तीनों ही राज्य नदी जल का प्रयोग कम करने पर सहमत हो गए हैं। बड़ा असर खेती पर भी पड़ने वाला है, क्योंकि एक बड़े क्षेत्र में किसानों को खेती के लिए पानी नहीं मिलेगा, लेकिन सरकारें उन्हें मुआवजा देंगी। किसानों को अपनी जमीन परती रखने के लिए 1.2 अरब डॉलर रखे गए हैं।
यह बात गौर करने की है कि विगत दो दशक से इस नदी क्षेत्र में सूखे की स्थिति बढ़ रही है। कम से कम सात सहायक नदियों का पानी कोलोराडो में गिरता है और इन सबकी स्थिति भी अच्छी नहीं है। साल 2000 से ही सूखे की स्थिति बनती रही है। उसी साल से जल स्तर में लगातार गिरावट आई है। इस नदी पर बने बांधों में भी पानी सूख रहा है और इससे जल विद्युत परियोजनाओं पर भी संकट मंडरा रहा है। लेक मीड और लेक पावेल, दोनों अभी लगभग 30 प्रतिशत भरे हुए हैं, जबकि 2000 में 95 प्रतिशत भरे हुए थे। अनुमान लगाया गया है कि नदी के बेसिन के ऊपरी हिस्से में एक डिग्री सेल्सियस तापमान की भी वृद्धि होती है, तो इसके प्रवाह में 9.3 प्रतिशत की गिरावट आती है। लगभग हर नदी में प्रवाह घट रहा है। दुनिया के पास अपनी नदियों को बचाने की क्या योजना है? आज गंगा नदी खतरे में है, कावेरी में बहाव 40 प्रतिशत से भी ज्यादा कम हो गया है। दुनिया की दस बड़ी नदियों पर खतरा मंडरा रहा है। अब समय आ गया है कि नदियों को बचाने के लिए दुनिया भर में ठोस और स्थायी उपाय किए जाएं।
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महाराष्ट्र और दिल्ली में हुई राजनीतिक घटनाओं से राज्यपाल और उपराज्यपाल की भूमिका को लेकर विवाद खड़ा होता रहा है। इस पर सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ का हाल ही का निर्णय काफी महत्वपूर्ण कहा जा सकता है।
कुछ बिंदु –
हालांकि, पीठ ने उद्धव सरकार को बहाल करने से रोक दिया, क्योंकि विश्वास मत से पहले ही इस्तीफा देने की रणनीतिक गलती हुई थी। अगर ऐसा नहीं होता, तो सरकार को बहाल किया जा सकता था।
दिल्ली का मामला –
दिल्ली में राज्य सरकार ने प्रशासनिक सेवा को नियंत्रित करने के केंद्र के अधिकार को चुनौती दी थी। अपने निर्णय में संविधान पीठ ने सत्ता और जिम्मेदारी के सरल संघीय सिद्धांत पर चलने पर जोर दिया है। पीठ ने निर्वाचित सरकार का पक्ष लेते हुए कहा है कि अगर वह अपने स्वयं के प्रशासनिक अधिकारियों को नियंत्रित नहीं कर सकती है, तो यह संविधान के तहत उसकी शक्तियों का निषेध होगा।
सार्वजनिक व्यवस्था, भूमि और पुलिस जैसे तीन विषयों को केंद्र के अधीन छोडकर, बाकी का प्रशासनिक नियंत्रण राज्य सरकार को दे दिया गया है।
एक अन्य प्रश्न रह जाता है कि क्या अविश्वास प्रस्ताव का सामना करने वाला अध्यक्ष अयोग्यता याचिकाओं पर निर्णय ले सकता है? यह एक बड़ी पीठ को भेजा जा रहा है। इस पीठ को नबाम रेबिया मामले में 2016 के सर्वोच्च न्यायालय के फैसले की फिर से जांच करके किसी नतीजे पर आना होगा।
न्यायालय के इस निर्णय में भाजपा के लिए स्पष्ट सबक है कि पार्टी के एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए राज्यपालों को धकेलने की एक सीमा होनी चाहिए। दूसरे, यदि वह दिल्ली में एक सशक्त राज्य सरकार नहीं चाहती है, तो उसे संसद में संशोधन प्रस्ताव लाना होगा।
उच्चतम न्यायालय का निर्णय ठोस है, और केंद्र सरकार को अपनी सीमा में रहने की चेतावनी देता हुआ लगता है। उम्मीद की जा सकती है कि केंद्र सरकार इस निर्णय की मर्यादा को बनाए रखेगी।
विभिन्न समाचार पत्रों पर आधारित। 12 मई, 2023
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Date:27-05-23
Sceptre & SubstanceSymbols acquire meaning when their promise is deliveredTOI Editorials
The Sengol, or sceptre, from Tamil Nadu that was presented to Jawaharlal Nehru in 1947 has become a symbol of how India has overtaken the erstwhile colonial ruler UK not just in economic size but other areas. This one sceptre has perhaps received more attention than the two that were part of the coronation ceremony of the UK’s latest monarch. More to the point, a sceptre, an ancient emblem of authority and used over centuries across different civilisations, is an emblem – it represents an underlying promise, without the promise delivered it’s just an over-decorated staff.
India’s Parliament is the primary vehicle for the promise of democratic governance. The smoothness of parliamentary functioning and the quality of its output will influence India’s future. And not just the Parliament sessions, it’s also work carried out in the interim by multiple committees that matters. For, they generate useful inputs for policy. In these areas, India’s parliamentary performance has fallen short. And that is far more significant than the choice of a sceptre. Symbols are undoubtedly important as they serve as a focal point. However, if the underlying substance falls short of expectations, a symbol can quickly lose its meaning.
India’s parliamentarians should heed the lessons of the hollowed-out UK monarchy. The pomp and regalia notwithstanding, it’s the scandals and double standards that get more attention globally. Strip a symbol of its underlying substance, all that’s left is a caricature. Parliament should avoid such a self-goal. India is at a critical moment, faced with a small window to reap its demographic dividend. Parliamentarians should focus on making the most of this limited opportunity. Symbols are all very good. But a productive Parliament is much, much better.
Date:27-05-23
Junta ConnectionFor Manipur, India must revisit its Myanmar policyTOI Editorials
Amit Shah has pitched for dialogue and promised to deal a fair hand to all stakeholders in still-tense Manipur. The state government, too, needs to step up – so far it has failed to anticipate the violence or clamp down on it. But there’s a foreign policy dimension to the crisis – neighbouring Myanmar is part of the problem. Last week, both GOI and Manipur told the Supreme Court that troubles began with the crackdown on poppy cultivation in Manipur hills by illegal immigrants from Myanmar. If true, New Delhi needs to have a serious word with Naypyidaw.
Since the Myanmar coup in 2021, India has avoided any criticism of the junta’s actions, which have included airstrikes on domestic population. This in turn has seen refugees flood across the border into India where many share ethnic kinship ties. While New Delhi has long-standing relations with the Burmese military and doesn’t want to push it into Beijing’s arms, it’s clear that the civil war in Myanmar is having direct repercussions on India’s Northeast.
New Delhi should recalibrate ties with the junta. It has cards to play here: The junta needs India’s support against powerful insurgents like the Arakan Army and is also wary of becoming a Chinese puppet. Plus, all democratic forces in Myanmar are ready to side with India, viewing China as the junta’s main sponsor. India should use this leverage and get the junta to halt its operations in the border regions, stem the flow of refugees into India. Restive Manipur will get some breathing space.
Date:27-05-23
THE HAPPINESS ENGINETo be happy, in life or work, end results are not relevant; it’s about cherishing the processHarsh Goenka, [ The writer is chairman, RPG Enterprises ]
The other day, I conducted a social experiment on Twitter. I posted: ‘Imagine a satisfied man sitting in a beautiful park on a hot day. Imagine another man sitting in an AC room overlooking the same park in a nice apartment block. What is most important — the cool comfort and the apartment, or being satisfied and in nature? Who is happier?’
About one-third of the responses felt it was but natural that the man overlooking the park sitting in cool comfort was happier. A smaller proportionpreferred the ‘satisfied’ man in the park. But most important was the significant percentage that had a more philosophical reaction to the question. My friend Pritish Nandy said happiness depended on the way you look at life and make life choices, while another said, ‘We mistake pleasure for happiness, and that is the problem. ’
This brings us to the fundamental question of happiness. Are our measures of happiness based on real parameters? Is true happiness something to be achieved at the end of a journey? Or is it the journey itself ?
We are born naturally happy. Natureitself is a source of happiness drawing us away from materialistic cravings. Which is probably one of the reasons why certain people, ensconced within a pure natural habitat, are among the happiest in the world. Happiness is also evident in the innocence of children. We all seek happiness, but seldom find it because we either allow other emotions to get ahead of us, or we seek it in the wrong places.
General thinking would have us believe that the man outdoors on a hot day is a lot more distressed than the one in the apartment. For many, the latter would seem more contented, happier and secure, while the man in the park, perhaps, suffering. There isawidespread belief that happiness comes with prosperity. Though financial security is important — and there appears to be a direct correlation among income, security and happiness — its impact begins to reduce after a certain threshold.
However, my little social experiment reveals a profound fact about us. We have got programmed to seek happiness through results. Achievements at the workplace, grades at school, recognition by peers. … It is this result-based gratification we tend to associate with happiness that has taken us away from our natural state of being happy with small things in life.
And, strangely, sometimes even an acco mplishment does not bring the jubilation we expect. I remember once after a particularly long and gruelling bout of negotiations during the acquisition of a company— which eventually ended favourably — I was rather surprised at my emotions. I was so sure that success would bring me the greatest happiness. Instead, there was just a sense of relief that it was over.
I learnt something very important that day that I have tried to practice ever since. That the end result is not relevant. It is the toil, the diligence, the breakthroughs, the slip-ups, the breaking-up and the making-up, and all the small building blocks of the deal that are so relevant. That happiness was to be found within those efforts.
How best could I pursue happiness through everyday routines? How best could I bring happiness into the deliberations by supporting someone, by bringing about reconciliation, by breaking a deadlock? How best could I discover and bring out moments of joy and simple delight in the seemingly intense job athand? It was about cherishing the process. The memories of the journey became more evident than the trophy at the end.
The need for course-correction becomes far greater as we get immersed into the world of social media and digital life. The farther we move away from family, face-to-face interactions and from engaging with the natural habitat around us, the more we may become disconnected with understanding and achieving happiness.
Happiness at the workplace has also become an important differentiator in a competitive talent landscape. Work-life balance is being increasinglysought. Besides spending time with family and friends, we must also work at other things that bring sustained happiness — practising gratitude, caring and giving, sustaining relationships, and working at mind and body wellness.
Simultaneously, it is important to maintain a positive outlook in general, practising fairness, breaking down barriers, being more transparent, being supportive and compassionate, observing integrity and focusing on collective functioning. As a philosopher had once famously said, ‘Happiness can never be external… it’s all in the mind, and it needs to be worked on continually. ’
So, perhaps both the man in the park and the man in the air-conditioned room may have been equally happy or unhappy — depending on their outlook and thinking.
Date:27-05-23
न्याय प्रक्रिया गलत हो तो बहुआयामी प्रभाव होते हैंसंपादकीय
उप्र के एक विपक्षी नेता को निचली कोर्ट ने भड़काऊ भाषण के आरोप में तीन साल की सजा दी। अगले ही दिन विधानसभा स्पीकर ने उनकी सदस्यता रद्द कर दी। कुछ माह बाद अब कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया। विधायकी रद्द होने से रिक्त हुई सीट पर चुनाव हुआ, जिसमें सत्ताधारी दल ने उस व्यक्ति को टिकट दिया जिसने ‘भड़काऊ भाषण’ का मुकदमा किया था। वह अब उस सीट से विधायक है। सजा से बरी करते हुए कोर्ट ने कहा कि निचली कोर्ट ने इस तथ्य को भी नहीं देखा कि जिस चुनावकर्मी की शिकायत पर एफआईआर लिखी गई उसने अपनी गवाही में कहा कि तत्कालीन कलेक्टर (रिटर्निंग ऑफिसर) ने मुकदमा करवाने के लिए दबाव डाला था। क्या निचली कोर्ट इसके लिए दोषी है? फिर अगर कलेक्टर दबाव डाल रहा है तो उसके खिलाफ क्या कार्रवाई हुई? कुछ यही स्थिति पश्चिम भारत के एक अन्य राज्य की है। सुप्रीम कोर्ट ने माना कि राज्यपाल और स्पीकर दोनों के गलत फैसलों से एक सरकार चली गई और दूसरी सत्ता में बनी हुई है। राहुल गांधी आठ साल खुद चुनाव भले न लड़ सकें लेकिन प्रचार कर सकेंगे। अगर ऊपरी कोर्ट ने उन्हें बरी कर दिया तो राहुल गांधी, कांग्रेस पार्टी, वायनाड की जनता, उस न्यायालय जिसने सजा दी और स्पीकर, जिनके आदेश से उन्हें निकाला गया- किसकी गलती मानी जाएगी ?
Date:27-05-23
चुनी हुई सरकारों को ठीक से काम करने देना चाहिएपवन के.वर्मा, ( लेखक, राजनयिक, पूर्व राज्यसभा सांसद )
वर्ष 1803 की बात है। नेत्रहीन मुगल बादशाह शाह आलम दिल्ली में लाल किले की प्राचीर में बैठे थे। वे यमुना पार पटपड़गंज में मराठों और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कम्पनी के बीच हुई लड़ाई के नतीजों का इंतजार कर रहे थे। लड़ाई में फिरंगियों की जीत हुई और दिल्ली उनके नियंत्रण में आ गई। एक ब्रिटिश रेजिडेंट को नियुक्त किया गया, जो दिल्ली का अघोषित शासक बन गया। दिल्ली के चतुर नागरिकों ने तब एक कहावत गढ़ी, जो सत्ता-परिवर्तन की इस विसंगति के बारे में थी- ‘अज दिल्ली ता पालम, सल्तनत-ए-शाह आलम’ यानी दिल्ली से पालम तक ही शाह आलम की सल्तनत है। दिल्ली की चुनी गई सरकार के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ है। मैं न तो आम आदमी पार्टी (आप) का सदस्य हूं, न ही उसके क्रियाकलापों का समर्थक हूं, लेकिन मैं यह जानता हूं कि मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने दो लोकतांत्रिक चुनाव जीते हैं। 2015 में उनकी पार्टी ने 70 में से 67 और 2020 में 70 में से 62 सीटें जीती थीं। ये सच है कि दिल्ली एक पूर्ण राज्य नहीं है। चूंकि वह राष्ट्रीय राजधानी है, इसलिए केंद्र के द्वारा वहां एलजी की नियुक्ति की जाती है। एलजी के नियंत्रण में भूमि, लोक-व्यवस्था और पुलिस से जुड़े मसले होते हैं। लेकिन दूसरी तमाम चीजों पर तो लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई सरकार का ही नियंत्रण है।
वर्ष 2015 में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने एक अधिसूचना जारी की थी, जिसके चलते भूमि, लोक-व्यवस्था और पुलिस के अलावा कुछ और सेवाओं का नियंत्रण एलजी के अधीन कर दिया था। दूसरे शब्दों में एक कार्यकारी आदेश के चलते निर्वाचित मुख्यमंत्री को उनके तहत सेवाएं देने वाले अधिकारियों की भर्ती और तबादले के अधिकार से वंचित करके इन अधिकारों को एलजी में निहित कर दिया गया था। जैसी कि अपेक्षा की जा सकती है, आम आदमी पार्टी सरकार ने इसका विरोध किया। मामला आखिरकार सर्वोच्च अदालत की पांच सदस्यीय संविधान-पीठ के सामने पहुंचा। इसके अध्यक्ष भारत के मुख्य न्यायाधीश हैं। 11 मई 2023 को अदालत ने एक ऐतिहासिक फैसले में सेवाओं के विभाग को पुन: दिल्ली की निर्वाचित सरकार के अधीन कर दिया। चूंकि दिल्ली एक पूर्ण राज्य होने के बजाय एक स्पेशल स्टेटस वाला राज्य है, इसलिए अदालत ने संविधान में वर्णित संघीय-व्यवस्था के सिद्धांतों का हवाला देते हुए कहा कि एलजी का अधिकार-क्षेत्र केवल भूमि, लोक-व्यवस्था और पुलिस तक सीमित है। दूसरे मामलों में उसे निर्वाचित सरकार की मंत्रिपरिषद के परामर्श से ही काम करना होगा। फैसले में यह भी कहा गया कि एलजी को दिल्ली सरकार के विरोधी के बजाय उसके सहयोगी की भूमिका निभानी चाहिए, ताकि सरकार सुप्रशासन के अपने वैध एजेंडा को लागू कर सके, जिसके लिए लोगों ने उसे चुनकर सत्ता में भेजा है।
दिल्ली के लोगों का लोकतांत्रिक चयन एक गैरजरूरी मसला नहीं है। वर्ष 1803 में जब ब्रिटिश रेजिडेंट ने दिल्ली के शासक की शक्तियों पर अतिक्रमण कर लिया था, तब दिल्ली की आबादी एक लाख के करीब थी। 1947 में वह सात लाख के आसपास थी। लेकिन आज दिल्ली मेट्रो एरिया की आबादी 3.3 करोड़ के आसपास आंकी जाती है! यह दुनिया के अनेक मंझोले आकार के देशों की कुल आबादी से भी अधिक है। वर्ष 2020 में दिल्ली के पात्र मतदाताओं की संख्या 1.46 करोड़ थी, जिनमें से 62.2 प्रतिशत ने अपने मताधिकार का उपयोग किया था। प्रतिशत के मामले में यह 2019 के आम चुनावों से भी 2.2% अधिक है। जब इतनी बड़ी संख्या में लोग वोट देते हैं तो वो चाहते हैं कि उनके द्वारा चुनी गई सरकार उनसे किए गए वादों को पूरा करे। लेकिन अगर सरकार का अपने ही अधिकारियों पर नियंत्रण नहीं होगा या एलजी उसका सहयोग नहीं करेंगे, तब तो वह ऐसा करने में असहाय हो जाएगी।
सर्वोच्च अदालत की संविधान-पीठ के निर्णय को एक अध्यादेश के माध्यम से रद्द करने का केंद्र सरकार का फैसला अविवेकपूर्ण और अलोकतांत्रिक है। भाजपा और आम आदमी पार्टी भले ही राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी हों, लेकिन आपस में संघर्ष करने का उचित माध्यम चुनाव हैं, मनमानीपूर्वक लाए गए अध्यादेश नहीं। इस तरह के कदमों से दिल्ली के लोगों के लोकतांत्रिक चयन की अवमानना होती है, इससे देश के संघीय-ढांचे को ठेस पहुंचती है, यह सर्वोच्च अदालत के विवेकशील निर्णय की उपेक्षा करता है, और यह कांग्रेस सरकारों के द्वारा अतीत में किए गए राज्यपाल की शक्तियों के दुरुपयोग के समान है, जिसकी भाजपा खुद नियमित आलोचना करती है। केंद्र सरकार को अपने इस निर्णय पर पुनर्विचार करना चाहिए।
Date:27-05-23
सेंगोल का इतिहाससंपादकीय
कांग्रेस का यह दावा चकित करने के साथ ही कई सवाल खड़े करना वाला भी है कि स्वतंत्रता के समय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को जो सेंगोल यानी राजदंड प्रदान किया गया था, उसका सत्ता हस्तांतरण से कोई संबंध नहीं। यदि यह सच है तो फिर नेहरू जी ने उसे स्वीकार क्यों किया था? बीते दिनों सेंगोल के बारे में जानकारी देते हुए गृह मंत्री अमित शाह ने जो फोटो जारी किए थे, वे तो यही बता रहे कि उसे समारोहपूर्वक नेहरू जी को सौंपा गया था। कांग्रेस बताए कि आखिर यह समारोह क्यों हुआ था और उसका क्या अभिप्राय था? ध्यान रहे कि यह समारोह उसी समय हुआ, जब 15 अगस्त को आधी रात सत्ता हस्तांतरण हो रहा था। कांग्रेस को यह भी बताना चाहिए कि तमिलनाडु में निर्मित यह सेंगोल जवाहरलाल नेहरू और फिर उनके पास से इलाहाबाद संग्रहालय तक पहुंचा कैसे? समझना कठिन है कि कांग्रेस सत्ता हस्तांतरण के एक महत्वपूर्ण प्रसंग की अनदेखी क्यों करना चाह रही है? कहीं इसलिए तो नहीं कि नेहरू जी ने सेंगोल को वह सम्मान नहीं दिया, जिसका वह हकदार था? वह उनकी निजी संपत्ति जैसा बन गया और फिर उसे इलाहाबाद संग्रहालय भेज दिया गया। वहां उसे सोने की छड़ी के रूप में प्रदर्शित किया गया।
निःसंदेह यह भी एक रहस्य है कि सेंगोल को राजदंड के स्थान पर चलने की छड़ी यानी बेंत के रूप में क्यों परिभाषित किया गया? कहीं इसका कारण यह तो नहीं कि नेहरू जी सेक्युलरिज्म की जिस अवधारणा से प्रेरित थे, उसमें उन्हें सत्ता हस्तांतरण की यह प्राचीन परंपरा रास न आई हो। वस्तुस्थिति जो भी हो, कांग्रेस सेंगोल के इतिहास को जिस तरह वर्णित कर रही है, उससे यही लगता है कि उसे यह अच्छा नहीं लग रहा कि इस ऐतिहासिक राजदंड को इलाहाबाद म्यूजियम से लाकर संसद के नए भवन में स्पीकर के आसन के पास स्थापित किया जा रहा है। समस्या केवल यह नहीं है कि सेंगोल के इतिहास को तोड़ा-मरोड़ा गया, बल्कि यह भी है कि उसे जनता से छिपाया भी गया। कोई नहीं जानता कि यह काम क्यों किया गया और कांग्रेस नए सिरे से उसमें भागीदार क्यों बन रही है? कांग्रेस अपने रवैये से यही प्रकट कर रही है कि उसे अपनी ही विरासत पर गर्व नहीं। अच्छा होता कि वह सेंगोल के मामले में विचित्र तर्क देने के स्थान पर मौन रहती, लेकिन शायद उसे अपनी विरासत के साथ देश की संस्कृति और परंपराओं की उपेक्षा करने की आदत सी पड़ गई है। उसकी इन्हीं आदतों के कारण यह कहा जाता है कि आज की कांग्रेस वह नहीं, जिसने देश को आजादी दिलाने में अग्रणी भूमिका निभाई थी। यह अच्छा नहीं हुआ कि कांग्रेस ने पहले संसद के नए भवन के उद्घाटन के बहिष्कार का फैसला किया और फिर सेंगोल के इतिहास की अलग व्याख्या करने मे जुट गई।
Date:27-05-23
प्राप्ति योग्य लक्ष्य या मरीचिका ?टी.एन.नाइनन
नरेंद्र मोदी सरकार ने यह लक्ष्य रखा है कि 2047 के पहले देश को ‘विकसित राष्ट्र’ का दर्जा दिलाना है। प्राथमिक तौर पर यह लक्ष्य बहुत ऊंचा नजर आता है और किसी को भी उचित ही यह आश्चर्य हो सकता है कि क्या 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने या इसी समय तक जीडीपी में विनिर्माण की हिस्सेदारी 25 फीसदी करने अथवा अगले वर्ष तक अर्थव्यवस्था को 5 लाख करोड़ डॉलर मूल्य की अर्थव्यवस्था बनाने की बातों की तरह यह भी कपोल कल्पना साबित होगी। इसके अलावा सरकार ने ‘विकसित’ देश को परिभाषित भी नहीं किया है और इसके लिए कोई एक अंतरराष्ट्रीय मानक नहीं है।
बहरहाल, विकास के विभिन्न सूचकांक मौजूद हैं जो आय के स्तर, स्वास्थ्य और शिक्षा के स्तर, जीवन की गुणवत्ता मसलन बिजली और पेयजल तक पहुंच आदि, काम की उपलब्धता, गरीबी और असमानता के स्तर, तकनीकी सुविधाओं आदि पर केंद्रित होते हैं। शुरुआती अनुमान एकदम स्वाभाविक है कि भारत ऐसे संकेतकों पर वांछित स्तर से काफी नीचे है। ऐसे में अगली चौथाई सदी के लिए तय लक्ष्य काफी महत्त्वाकांक्षी है। परंतु बिना महत्त्वाकांक्षा के भला कैसा जीवन? अगर 1947 से 2047 की अवधि पर गौर करें तो वहां तक पहुंचना बहुत श्रम साध्य काम है।
क्या भारत ऐसा कर सकता है? शुरुआती तौर पर भारत को अपनी प्रति व्यक्ति आय को 24 सालों में पांच गुना से अधिक बढ़ाना होगा जिसके लिए 7 फीसदी की सालाना वृद्धि की आवश्यकता होगी। चूंकि देश की आबादी भी निरंतर बढ़ेगी इसलिए जीडीपी में उससे तेज इजाफे की जरूरत होगी। चुनिंदा अवसरों को छोड़ दें तो अब तक यह मुश्किल साबित हुआ है। निश्चित तौर पर बहुत कम देश लंबे समय तक तेज वृद्धि हासिल कर सके हैं और भारत में अब तक ऐसा करने की संभावना नहीं दिखती। वास्तविकता यही है कि 2047 तक भारत उच्च आय वाला देश नहीं बन सकेगा।
अत्यधिक उच्च मानव विकास की श्रेणी तक पहुंचना अपेक्षाकृत आसान है क्योंकि देश ने बीती चौथाई सदी में मानव विकास के क्षेत्र में तेजी से सुधार किया है। उस दर को बरकरार रखने से भारत को अपने सूचकांक अंक को मौजूदा 0.633 से बढ़ाकर 2047 तक अति उच्च श्रेणी के लिए जरूरी 0.800 करने में मदद मिलेगी।
एक अन्य मानक की बात करें तो किसी देश के विनिर्मित वस्तुओं के निर्यात में उच्च तकनीक वाली वस्तुओं की हिस्सेदारी भी ऐसा ही एक मानक है। भारत की हिस्सेदारी 10 फीसदी है जो ब्राजील और रूस के समान है। वैश्विक औसत 20 फीसदी है और चीन में यह 30 फीसदी है। पाकिस्तान का आंकड़ा महज एक फीसदी है। शोध उत्पादन की बात करें तो भारत की कुल हिस्सेदारी तेजी से बढ़ी है और अब यह मात्रा के आधार पर चौथे स्थान पर है। परंतु ऐसे शोध उद्धरणों की तादाद के मुताबिक देखें तो यह नौवें स्थान पर है। उद्धरण स्तर के मामले में चीन पांच गुना ऊंचे स्थान पर है। तमाम प्रगति के बावजूद इस क्षेत्र में विकसित देशों के स्तर पर पहुंचने में काफी मशक्कत लगेगी।
एक आकांक्षी भारत में गरीबी के आंकड़ों के परीक्षण की बात करें तो 2.15 डॉलर प्रति दिन के अत्यधिक गरीबी का मानक तब लागू किया गया था जब भारत निम्न आय वाला देश था। अब भारत मध्य आय वर्ग वाला देश बन चुका है जहां यह लागू करना उचित नहीं होगा। ऐसे देशों के लिए मानक 3.65 डॉलर प्रति व्यक्ति प्रति दिन का है यानी करीब 90 रुपये। क्रय शक्ति समता के हिसाब से चार सदस्यों के परिवार के लिए प्रतिमाह 10,800 रुपये। इस हिसाब से आज लाखों गरीब हैं। उच्च मध्य आय वर्ग वाले देशों के मानक की बात करें तो जब भारत वहां पहुंचेगा तो यह मानक 6.85 डॉलर प्रति दिन हो चुका होगा। यह ध्यान में रखें कि अगर भारत 2047 तक विकसित देश का दर्जा पा भी जाता है तो भी वह विशिष्ट नहीं होगा। 80 से अधिक देश पहले ही विश्व बैंक द्वारा उच्च आय वाले देश घोषित किए जा चुके हैं जबकि भारत अभी भी निम्न मध्य आय वाला देश है। 65 से अधिक देशों को संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम ने मानव विकास के क्षेत्र में ‘अति उच्च’ स्तर वाला घोषित कर रखा है जबकि भारत ‘मध्यम’ स्तर पर ही है। भारत को पहले ‘उच्च श्रेणी’ में पहुंचना होगा। भारत बहुआयामी गरीबी को दूर करने से भी अभी काफी दूर है।
यानी भारत विकास के पथ पर तेजी से आगे बढ़ना तो चाहता है लेकिन वहां पहले ही काफी भीड़ है। अगर हम 2047 तक वहां पहुंच भी गए तो भी दूसरों से काफी पीछे ही रहेंगे। इन हकीकतों से यह प्रोत्साहन मिलना चाहिए कि हमारा देश मिथ्या अभिमान को त्यागे। बीते तीन दशकों का प्रदर्शन औसत से बेहतर है लेकिन अभी और मुश्किल काम सामने हैं। भारत को अपने प्रयास और तेज करने होंगे।
Date:27-05-23
सुधरेगा अपशिष्ट प्रबंधनअनिरुध्द गौड़
हाल में आए NGT के एक फैसले की बहुत चर्चा है, जिसमें एनजीटी ने बिहार सरकार (Bihar Govt) पर ठोस कचरे और सीवेज के वैज्ञानिक उपचार और प्रबंधन में विफलता के लिए 4000 करोड़ रुपये के मुआवजे/जुर्माने का आदेश दिया है। पीठ ने निर्देश दिए हैं कि इस रकम को रिंग फेंस खाते में रखा जा सकता है, जिसे मुख्य सचिव के निर्देशन में सिर्फ अपशिष्ट प्रबंधन की योजनाओं के संचालन में इस्तेमाल किया जाए।
राष्ट्रीय हरित अधिकरण यानी एनजीटी की स्थापना राष्ट्रीय हरित अधिकरण अधिनियम, 2010 के अंतर्गत भारत में 18 अक्टूबर, 2010 को हुई थी। भारत में एनजीटी की भोपाल, पुणो, कोलकाता और चेन्नई में चार क्षेत्रीय बेंच हैं जबकि नई दिल्ली में मुख्य बेंच है। एनजीटी ने पिछले कुछ वर्षो में ठोस कचरे और सीवेज के वैज्ञानिक उपचार एवं प्रबंधन में विफलता से पर्यावरण को हुए नुकसान की भरपाई के लिए सात राज्यों पर हजारों करोड़ रुपये के जुर्माने लगाए हैं। ‘पॉल्यूटर पे प्रिंसिपल’ (polluter pay principal) अर्थात प्रदूषण फैलाने वाले करें क्षति का भुगतान के सिद्धांत पर पर्यावरणीय मुआवजे और बहाली की लागत के लिए एनजीटी ने 2022 तक राज्यों पर करीब 28180 करोड़ और अन्य मामलों में 2000 करोड़ रुपये के जुर्माने तय किए। एनजीटी की स्थापना से पहले पर्यावरण से संबंधित मामले हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में निस्तारित होते थे, लेकिन अब राज्यों, सरकारी और प्राइवेट कंपनियों और व्यक्ति विशेष के खिलाफ दायर पर्यावरणीय मामलों का निस्तारण एनजीटी कर रहा है। उदाहरण के तौर पर ठोस कचरे और सीवेज के वैज्ञानिक उपचार एवं प्रबंधन के संबंध में 1996 में सुप्रीम कोर्ट में अलमित्रा एच पटेल बनाम भारत सरकार का मामला पहुंचा था और 18 साल चलने के बाद 2014 में एनजीटी को सौंपा गया। 8 वर्ष चले इस मामले में एनजीटी ने 8 सितम्बर, 2022 को एक आदेश में महाराष्ट्र पर 1200 हजार रुपये का जुर्माना लगाया।
एनजीटी ने आदेशों में राज्यों पर ठोस कचरा और सीवेज उत्पादन एवं उपचार के गैप के आधार पर जुर्माने की गणना की है। राज्यों में कहीं पर सीवेज कुप्रबंधन है तो कहीं ठोस कचरा। ऐसे भी मामले हैं, जहां पुराने कचरे से पर्यावरण को क्षति होती है। पर्यावरणीय क्षतिपूर्ति और पुनरुद्धार की लागत को बराबर मानते हुए सीवेज के लिए 2 करोड़ रुपये प्रति मिलियन लीटर प्रति दिन (MLD) और ठोस कचरे के लिए रुपये 300 प्रति मीट्रिक टन तय किया गया है। इसे ऐसे समझें कि तेलंगाना पर 3800 करोड़ रुपये के जुर्माने में 1824 एमएलडी अनउपचारित सीवेज पर 2 करोड़ रुपये प्रति एमएलडी के हिसाब से 3648 करोड़ रुपये और रुपये 300 प्रति मीट्रिक टन के हिसाब से 5.9 मिलियन टन लीगेसी कचरे पर 177 करोड़ रुपये का जुर्माना लगाया गया है। एनजीटी आगे भी और राज्यों पर ठोस कचरे और सीवेज कुप्रबंधन को लेकर जुर्माना लगा सकता है। हालांकि केंद्रीय प्रदूषण नियंतण्रबोर्ड और राज्य प्रदूषण नियंतण्रबोर्ड जुर्माना वसूली में पीछे रहे हैं क्योंकि जुर्माना एकत्र करना कठिन काम है। पीठ ने राज्यों के मुख्य सचिवों को इस फंड को दो खातों में जमा करने के निर्देश के साथ इस रकम को राज्य के सिर्फ ठोस कचरा और सीवेज प्रबंधन पर खर्च करने को कहा है। हर छह माह पर प्रगति रिपोर्ट भी मांगी है।
एनजीटी एक्ट के अनुसार असहमत पार्टी को 90 दिन के अंदर सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर करने का समय मिलता है। पार्टयिां अपना पक्ष रख कर अपेक्षा रखती हैं कि एनजीटी के आदेशों को निरस्त कर सुप्रीम कोर्ट राहत देगा। केंद्रीय प्रदूषण कंट्रोल बोर्ड की ठोस कचरा प्रबंधन की 2020-21 रिपोर्ट में बताया गया देश के 35 राज्य और केंद्रशासित प्रदेशों में कुल 160038.9 टन प्रति दिन (टीपीडी) कचरा निकलता है जिसमें से 95.4 प्रतिशत एकत्रित क्षमता होने के कारण 152749.5 टीपीडी कचरा ही एकत्रित हो पाता है, और 79956.3 टीपीडी (50 प्रतिशत) कचरा ही निस्तारित हो पाता है। जबकि 18.4 प्रतिशत 29427.7 टीपीडी कचरा लैंडफिल में रहता है। देखा जाए तो उत्पादन और निस्तारण प्रबंधन में काफी बड़ा गैप है। भारत में ही नहीं अपितु पूरे वि में पर्यावरण गंभीर मसला बना हुआ है। प्राकृतिक संसाधनों का प्रदूषित होना बेहद चिंताजनक है। पर्यावरण में मानवीय गलतियों से पर्यावरण में असंतुलन के तमाम मामले बढ़ रहे हैं। राज्यों के ठोस कचरा और सीवेज उपचार की विफलता पर एनजीटी के राज्यों पर करोड़ों की रकम के जुर्माने के आदेश राज्यों को कड़े निर्देश जरूर दिख रहे हो सकते हैं, लेकिन देखा जाए तो करोड़ों रुपये के जुर्माने की राशि उन पर ही खर्च होगी जिससे उनके अपशिष्ट प्रबंधन समृद्ध होंगे। राज्यों में स्वच्छता बढ़ेगी और गांव-शहरों का प्रदूषण कम होगा। एनजीटी को राज्यों के सीवेज उपचार संयंत्रों और कचरा साइटों के पुररुद्वार की पूरी उम्मीद है।
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27 May 2023
प्रश्न–412 – क्या पाठ्य पुस्तकों के पाठ्यक्रम को राजनीति से परे रखा जाना चाहिए? अपने विचारों को तर्कसंगतता के साथ प्रस्तुत कीजिये। (200 शब्द)
Question–412 – Should the curriculum of text books be kept out of politics? Present your thoughts with logic. (200 words)
नोट : इसका उत्तर आपको हमें नहीं भेजना है, यह आपके स्वयं के अभ्यास के लिए है।
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Date:26-05-23
An ordinance, its constitutionality, and scrutinyThe Union of India is unlikely to succeed in wresting power of ‘services’ in Delhi if the Government of National Capital Territory of Delhi (Amendment) Ordinance, 2023 is challengedBishwajit Bhattacharyya is a senior advocate in the Supreme Court of India and a former Additional Solicitor General of India
On May 19, 2023, the President of India exercised legislative power under Article 123 of the Constitution, during the period Parliament was in recess, to promulgate “The Government of National Capital Territory of Delhi (Amendment) Ordinance, 2023” (Ordinance). The ordinance negates a Constitution Bench judgment of the Supreme Court of India, which was delivered on May 11, that brought “services” under the Government of National Capital Territory of Delhi (NCTD).
Key issues
There are two issues here that require analysis: first, the scope of the Court’s verdict. Second, the constitutionality of the ordinance.
While interpreting Article 239AA(3)(a), the Court ruled, inter alia, that these were the points: The Legislative Assembly of the NCTD has competence over entries in List II and List III, except for expressly excluded entries of List II (entries 1, 2, 18 are excluded); the executive power of NCTD is co-extensive with its legislative power, that is, it shall extend to all matters with respect to which it has power to legislate; the Union of India has executive power only over three entries in List II over which the NCTD does not have legislative competence (entries 1, 2, 18).
Thus, essentially, the Court interpreted that out of the 66 entries in List II (the State list), while the executive power of the Government of NCTD covers 63 entries, that of the Union of India is restricted to the remaining three:: public order (entry 1), police (entry 2) and land (entry 18).
Consequently, executive power over “services” (entry 41) can be exercised exclusively by the Government of the NCTD. This interpretation of the Court is consistent with the wordings in Article 239AA(3)(a). But, this interpretation was negated by the Union of India, acting through its Council of Ministers under Article 74, by triggering extraordinary legislative power of the President under Article 123 in the promulgation of an ordinance on May 19.
What the ordinance did was to read/insert entry 41 of List II (State list) into Article 239AA(3)(a), thereby expanding the scope of excepted matter from three (1, 2, 18) to four (1, 2, 18, 41).
This could not have been done without amending Article 239AA(3)(a) of the Constitution. The power conferred on Parliament under Article 239AA(3)(b) is to make fresh laws — not to amend Article 239AA(3)(a) of the Constitution.
Alteration needs an amendment
Similarly, power conferred on Parliament under Article 239AA(7)(a) is to make laws for giving effect to or supplementing the provisions contained in various clauses of Article 239AA and for all matters incidental or consequential thereto. Such a power cannot be pressed into action to amend Article 239AA(3)(a) of the Constitution. Significantly, Article 239AA(7)(b) stipulates that Parliament’s law making under Article 239AA(7)(a) shall not be deemed to be an amendment of the Constitution for the purposes of Article 368. No such clause has been stipulated in Article 239AA(3)(a). Therefore, altering the scope of Article 239AA(3)(a) requires constitutional amendment under Article 368; there is not an iota of doubt.
Consequently, the ordinance promulgated under Article 123 of the Constitution to expand the scope of excepted matters in Article 239AA(3)(a) is void ab initio and is liable to be struck down for bypassing constitutional amendment. It amounts to a colourable exercise of power. Article 123 is no substitute for Article 368 (amendment of the Constitution) in Part XX.
Besides, when a Constitution Bench (five judges) of the Supreme Court declares/interprets the law (Article 239AA(3)(a)), the same is binding on all courts and authorities in India in terms of Articles 141 and 144, respectively. Could Articles 141 and 144 have been negated by Article 123 without a constitutional amendment?
Articles 123, 141, 144 are in Part V (The Union) of the Constitution. None has a non-obstante clause. The aid and advice of the Union Council of Ministers to the President under Article 74 could not have overridden Article 144. The basis of the Court judgment is Article 239AA(3)(a). To alter this basis, a constitutional amendment is necessary.
A perspective
The Union of India’s decision to prefer review (Article 137) and promulgate an ordinance (Article 123) simultaneously is ill-conceived; if the ordinance is challenged, the Union of India is unlikely to succeed through either route to wrest power of “services” in Delhi.
In the landmark seven-judge Bench verdict of the Supreme Court in the matter of Krishna Kumar Singh vs State of Bihar (2017) 2 SCC 136, the Court held that the satisfaction of the President under Article 123 is not immune from judicial scrutiny; powers under Article 123 is not a parallel source of law making or an independent legislative authority.
It was further held that the Court is empowered to look into the relevance of material placed before the President, but not its sufficiency or adequacy.
The ordinance is likely to be struck down since it expands excepted matters in Article 239AA(3)(a). Parliament alone can do this under Article 368.
Date:26-05-23
संसद में आज जो कुछ हो रहा है, पहले कभी नहीं हुआ थाडेरेक ओ ब्रायन, ( लेखक सांसद और राज्यसभा में टीएमसी के नेता। इस लेख के सहायक शोधकर्ता अंकिता दिनकर और शेन बैपटिस्ट हैं )
वर्ष 2014 में मोदी सरकार बनने से लेकर अब तक कुल छह ऐसे अवसर आए हैं, जब संसद में वो घटनाएं हुईं, जो पहले कभी नहीं हुई थीं। इस कालखण्ड में संसद के अनेक नियमों और परंपराओं को बदला गया है।
संसद एक भवन भर नहीं है, वह परम्पराओं, मूल्यों, नियमों का प्रतिष्ठान भी है, हमारे लोकतंत्र का आधार है। 2014 से लेकर अब तक छह ऐसे अवसर आए हैं, जब संसद में वो घटनाएं हुईं, जो इससे पहले कभी नहीं हुई थीं।
1. जब लोकसभा या राज्यसभा में कोई विधेयक प्रस्तुत किया जाता है तो हर सदस्य को डिवीजन द्वारा मतदान का अधिकार होता है। अगर एक भी सांसद कहता है- डिवीजन, तो पीठासीन अधिकारी का दायित्व है कि इस पर मतदान करवाए। यह ध्वनिमत से भिन्न होता है और इसके लिए इलेक्ट्रॉनिक रीति या पर्चियों का उपयोग किया जा सकता है। 2020 में तीन कृषि कानूनों को पारित करते समय राज्यसभा में ध्वनिमत कराया गया था। अनेक सदस्यों ने अपने अधिकार का इस्तेमाल करते हुए डिवीजन की मांग की, जिसे नहीं कराया गया। पीठासीन अधिकारी (उस समय तत्कालीन उपराष्ट्रपति वेकैंया नायडू उपस्थित नहीं थे) ने नियमों को दरकिनार कर दिया। यह इकलौती घटना नहीं। संसद सदस्यों को नियमित ही वोट बाय डिवीजन के अधिकार से वंचित किया जा रहा है। 27 जुलाई 2021 को माकपा के ऐलामराम करीम, 28 जुलाई 2021 को द्रमुक के तिरुचि शिवा और 3 अगस्त 2021 को अनेक सदस्यों ने डिवीजन की मांग की थी, जिसे अनसुना कर दिया गया।
2. 2016 में एक सज्जन को राज्यसभा सदस्य मनोनीत किया गया। वे उन 12 सदस्यों में से थे, जिन्हें राष्ट्रपति द्वारा नामित किया जाता है। अपने छह वर्षीय कार्यकाल के पांचवें वर्ष में उन्हें 2021 के पश्चिम बंगाल चुनावों के लिए भाजपा उम्मीदवार घोषित कर दिया गया। उन्होंने राज्यसभा सदस्यता छोड़ दी। पर चुनाव हारने के बाद तीन महीने के भीतर ही उन्हें पुन: राज्यसभा में मनोनीत कर दिया गया। यह पहली बार था, जब किसी व्यक्ति का एक ही कार्यकाल में दो बार मनोनयन किया गया हो और उन्होंने इस बीच चुनाव भी लड़ लिया हो!
3. जब बजट सत्र दूसरी अवधि के लिए पुन: प्रारम्भ होता है तो लोकसभा द्वारा पांच मंत्रालयों के लिए डिमांड फॉर ग्रांट्स पर चर्चा की जाती है। इन पांच के लिए बजट पर विस्तार से चर्चा की जाती है, जबकि शेष मंत्रालयों पर एक साथ मतदान किया जाता है। लेकिन इस साल बिना किसी चर्चा के इन पांचों मंत्रालयों का बजट पारित कर दिया गया। यह 2004-05 और 2013-14 में भी हुआ था, पर अंतर यह है कि 2004-05 में सरकार के विरुद्ध कोई अविश्वास प्रस्ताव नहीं पारित किया गया था। वहीं 2013-14 में बजट को बहस के बिना ही पारित कराने का निर्णय लोकसभा की बिजनेस एडवायजरी कमेटी ने विधानसभा चुनावों के मद्देनजर लिया था। इस बार ऐसा जिस कारण से किया गया, वह अभूतपूर्व है। राज्यसभा में विपक्ष नहीं सत्ता पक्ष की ओर से नारेबाजी की जा रही थी, जिससे पूरा बजट सत्र बेकार चला गया।
4. आम्बेडकर ने सभापति के त्यागपत्र को राष्ट्रपति को सौंपे जाने के प्रस्ताव का विरोध करते हुए उपसभापति की भूमिका को रेखांकित किया था। यह उपसभापति की जिम्मेदारी थी कि स्पीकर के पद को कार्यपालिका से स्वतंत्र बनाए रखें। संविधान का अनुच्छेद 93 कहता है कि सरकार के गठन के उपरांत लोकसभा को तुरंत एक स्पीकर और एक डिप्टी स्पीकर का चुनाव कर लेना चाहिए। लेकिन इस बार चार साल हो गए हैं और अभी तक कोई डिप्टी स्पीकर नियुक्त नहीं किया गया है।
5. बजट सत्र के दौरान वित्त विधेयक पारित किया जाता है। इस पर लोकसभा में वोटिंग होती है और इसे किसी कमेटी को परीक्षण हेतु नहीं भेजा जाता। राज्यसभा इस पर वोटिंग या संशोधन नहीं कर सकती। लेकिन सरकार वित्त विधेयक में गैर-वित्तीय मामलों का भी समावेश कर रही है। इसका फायदा उठाकर संसदीय निरीक्षण बिना ही कानूनों को पास किया जा रहा है। 2016 के वित्त विधेयक में रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया एक्ट 1934 में संशोधन का प्रावधान था। 2017 के वित्त विधेयक में मौजूदा ट्रिब्यूनलों में संरचनागत बदलाव सम्बंधी प्रावधान थे और उसके जरिए अनेक कानूनों में वैसे संशोधन किए गए, जिससे इलेक्टोरल बॉन्ड स्कीम लागू हो सकी। 2018 के वित्त विधेयक में तो आधे ऐसे प्रावधान थे, जिनका कराधान से कोई सम्बंध नहीं था।
6. 2017 में रेल बजट का आम बजट में विलय कर दिया गया। पृथक रेल बजट अतीत की बात हो चुका है। लेकिन आश्चर्य क्या? नए संसद भवन के साथ अब सेंट्रल हॉल को भी तो म्यूजियम में ही बदला जा रहा है!
Date:26-05-23
नए संसद भवन पर सस्ती राजनीतिजगमोहन सिंह राजपूत, ( लेखक शिक्षा, सामाजिक सद्भाव और पंथक समरसता के क्षेत्र में कार्यरत हैं )
पिछले छह दशकों में मैंने भारत की राजनीति में विपक्ष और उसके विद्वत-वर्ग सहयोगियों को इतना व्यथित, व्यग्र और उग्र कभी नहीं देखा, जितना आज देख रहा हूं। नरेन्द्र मोदी उन्हें चैन से बैठने नहीं दे रहे हैं। जो लोग बेरोजगारी, महंगाई, किसान, भाईचारे, महिला अत्याचार और चीन इत्यादि पर चर्चा न होने से चिंतित थे, उन्हें मोदी ने एक नई समस्या में उलझा दिया है। वह स्वयं तो जापान, आस्ट्रेलिया और पापुआ न्यू गिनी जैसे स्थानों पर सारे विश्व का आकर्षण-केंद्र बने, लेकिन भारत में उनके विरोधियों की नींद उड़ गई। मोदी नए संसद भवन का उद्घाटन करने जा रहे हैं, इस बात से उनके विरोधी इतने व्यथित हैं कि वे इस उद्घाटन समारोह का बहिष्कार करने पर तुल गए हैं। करीब 20 विपक्षी दलों के नेता सब कुछ भूलकर इस समारोह में किसी न किसी तरह मोदी के नाम के शिलापट्ट को नहीं देखना चाहते, जबकि पहले के प्रधानमंत्रियों ने संसद सौध का उद्घाटन किया या संसद की लाइब्रेरी की आधारशिला रखी। उसे वे याद भी नहीं करना चाहते। एक चर्चा में एक ‘सेक्युलर’ नेता जी कह गए-वे कुलीन लोग थे, उनकी बात अलग थी। विशेषाधिकारों में अनेक दशकों तक सराबोर रह चुका वर्ग मोदी को आज भी प्रधानमंत्री स्वीकार नहीं कर पाया है। बार-बार की असफलता से जनित उनकी व्यग्रता अब उग्रता में बदल गई है। यह आक्रोश उनकी सोचने की क्षमता को क्षीण करने के साथ उनकी भाषागत शालीनता को हर चुका है।
विपक्ष की ओर से नए संसद भवन के उद्घाटन का जैसा निकृष्ट तरीके से विरोध किया जा रहा है, उससे यदि कुछ साफ होता है तो यही कि भारत की राजनीति को अत्यंत निचले स्तर पर लाया जा चुका है। संवाद की संभावनाएं समाप्त की जा चुकी हैं। यदि ऐसा न होता तो प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नाम से लगने वाला शिलापट्ट उनके हृदय को विदीर्ण नहीं कर रहा होता। यदि विपक्ष कुछ पुरानी याद्दाश्त टटोले तो शायद उनकी पीड़ा कुछ कम हो जाएगी। क्या यह उचित और सांत्वनादायक नहीं होगा कि ये लोग याद करें कि अंडमान-निकोबार की सेलुलर जेल का नाम राजीव गांधी के नाम पर रखने के पीछे कौन सी मानसिकता काम कर रही थी? वहां तो विनायक दामोदर सावरकर और कितने ही अन्य स्वतंत्र सेनानियों ने अमानवीय यातना झेली थी, जो आज भी लोगों के मन-मानस को उद्वेलित करती है। दिल्ली के कनाट प्लेस को राजीव चौक नाम क्यों दिया गया? यह सब काम किस कदर आंख मूंद कर किया जाता था, इसका एक उदाहरण मुझे बार-बार याद आता है। नवोदय विद्यालयों की संकल्पना का श्रेय राजीव गांधी को जाना चाहिए, लेकिन उन्हें जवाहर नवोदय विद्यालय कहा जा जाता है। पंडित नेहरू ने बड़े-बड़े योगदान दिए, लेकिन नवोदय विद्यालयों से उनका कोई जुड़ाव नहीं रहा। देश में जवाहर नवोदय विद्यालय जैसे उदाहरणों की कमी नहीं।
नरेन्द्र मोदी की ओर से नए संसद भवन के उद्घाटन को लेकर जो व्याकुलता विपक्ष में देखी जा रही है, वह हताशा की ही अभिव्यक्ति है। यहां यह याद करना भी उचित होगा कि सत्ताच्युत नेता नए संसद भवन के निर्माण के समय से ही चिंतित हो उठे थे। उनकी ओर से निर्माण रोकने के हरसंभव प्रयास किए गए, जो असफल रहे। वास्तव में नए संसद भवन के शिलापट्ट पर नरेन्द्र मोदी के नाम को लेकर चिंता तो तभी पैदा हो गई थी। अब वह अभिव्यक्ति पा रही है, लेकिन बहुत ही छिछले तरीके से। विपक्ष का एक उद्घाटन समारोह को लेकर उभरा विघ्नसंतोषी स्वरूप भारत की राजनीति में अपरिपक्वता की पराकाष्ठा ही कही जा सकती है। विपक्ष की चिंता के विस्तार को देखकर लगता है कि उनके अनुसार देश के समक्ष कोई बड़ा संकट पैदा हो गया है। विरोध का स्रोत कांग्रेस पार्टी है, जिसे अनेक दशकों से केवल अपने परिवार के लोगों के नाम ही प्रत्येक स्थान पर देखने की आदत बन गई थी। यह उसी सोच का परिणाम है कि भारत में इस समय राजनीति में सारे विपक्ष का ध्यान सत्तापक्ष को हटाने में नहीं है। वह केवल एक व्यक्ति-नरेन्द्र मोदी को हटाने पर केंद्रित है। इसके लिए विपक्षी नेता किसी भी सीमा तक जा सकते हैं। उनके प्रयास 21 वर्षों से चल रहे हैं, जब मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री बने थे। इनमें दस वर्षों के दौरान केंद्र सरकार ने नैतिक-अनैतिक के अंतर को भूलकर हर वह प्रयास किया, जिससे मोदी को अपराधी घोषित किया जा सके और वर्ग-विशेष के एकमुश्त वोट बटोरे जा सकें। वे जितना तपाते रहे, मोदी उतना ही निखरते रहे। स्वार्थवश कुछ नेता लोग भले ही न मानें, व्यक्तिगत अनुभव के आधार पर यह कहा जा सकता है कि भारत और हर भारतीय का सम्मान वैश्विक स्तर पर पिछले आठ-नौ वर्षों में तेजी से बढ़ा है। प्रधानमंत्री ने प्रारंभ में जो विदेश यात्राएं कीं, उनकी आलोचनाओं को याद करिए। इन यात्राओं ने भारत को अप्रत्याशित लाभ दिए। याद करें कि जीरो-बैलेंस खाता खोलने की कैसे हंसी उड़ाई गई। इन खातों में जब किसान सम्मान राशि सीधे जमा होती है, तब कट या कमीशन वालों का दुखी होना स्वाभाविक है।
यदि विपक्ष ने गांधीजी का मनोयोग से अध्ययन किया होता, तो उन्हें मोदी के विरोध का रास्ता नजर आ जाता। वे जन सेवा को अपना सकते थे। गांव-गांव जाकर जन सेवा कर सकते थे। हाशिये पर मौजूद लोगों के साथ रहकर उनके जीवन से तादात्म्य स्थापित कर सकते थे। जनता के हृदय में स्थान वही बना सकता है, जो उसकी पीड़ा को समझता हो। विपक्षी नेता यही दिखा रहे हैं कि उन्हें जनता की पीड़ा से कोई मतलब नहीं और इसीलिए वे सस्ती राजनीति कर रहे हैं।
Date:26-05-23
नये संसद भवन पर दुखद विवादसंपादकीय
संसद भवन के उद्घाटन समारोह में कांग्रेस‚ टीएमसी‚ जेड़ीयू‚ आरजेड़ी‚ एनसीपी‚ सपा सहित बीस राजनीतिक पार्टियों ने शामिल न होने की घोषणा कर दी है। इनका कहना है कि जब संसद से ही लोकतंत्र को बहिष्कृत कर दिया गया हो‚ लोकतंत्र की मूल भावना का हनन कर दिया गया हो‚ तब संसद के नये भवन का कोई महkव नहीं है। विपक्षी दलों का समारोह बहिष्कार करने का तर्क या आरोप यह है कि इस भवन का उद्घाटन प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा न किए जाकर राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू द्वारा किया जाना चाहिए था। राष्ट्रपति को उद्घाटन के लिए आमंत्रित न करके भाजपा सरकार ने न केवल राष्ट्रपति का भारी अपमान किया है‚ बल्कि सीधे–सीधे लोकतंत्र पर हमला किया है। उन्होंने समारोह को पूरी तरह प्रधानमंत्री केंद्रित बताया है और नये संसद भवन के निर्माण पर भी सवालिया निशान लगाया है। इसमें कोई संदेह नहीं कि राष्ट्रपति संवैधानिक सत्ता का प्रमुख होता है और संसदीय परंपरा का अभिन्न अंग भी होता है। संसद के सत्र का प्रारंभ राष्ट्रपति के संबोधन से होता है। इस दृष्टि से देखा जाए तो संसद भवन के उद्घाटन के लिए राष्ट्र प्रमुख को ही प्राथमिकता पर रखा जाना चाहिएथा। सरकार ने प्रधानमंत्री से उद्घाटन कराने का निर्णय क्यों लिया है। इस बारे में कोई ठोस तर्क मौजूद नहीं है‚ सिवाय इसके कि लोक सभा अध्यक्ष ने नये संसद भवन का उद्घाटन करने के लिए राष्ट्रपति की बजाय प्रधानमंत्री को चुना है। विपक्ष ने इसे अलोकतांत्रिक कृत्य की संज्ञा दी है। विपक्ष चाहता तो इस मुद्दे को ज्यादा तूल न देता और संसद भवन के उद्घाटन जैसे अनुष्ठान में अपनी भागीदारी सुनिश्चित करके संसदीय परंपरा के प्रति अपनी निष्ठा का प्रदर्शन कर सकता था। प्रधानमंत्री मोदी के प्रति उसके भीतर जो असहमति‚ आक्रोश या निंदा का भाव है‚ उसे इस अवसर पर स्थगित कर सकता था। सरकार भी यहां विपक्ष की भावनाओं का ध्यान रखकर राष्ट्रपति को उद्घाटन के लिए आमंत्रित कर सकती थी। अब ये दोनों ही संभावनाएं समाप्त हो गई हैं। स्वस्थ लोकतंत्र के लिएयह शुभ नहीं है। भले ही सर्वोच्च न्यायालय में राष्ट्रपति से उद्घाटन कराने के लिए याचिका दायर की गई हो‚ लेकिन उसके वांछित परिणाम के बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता। सिर्फ अपेक्षा की जा सकती है कि लोकतंत्र के हित में दोनों थोड़ा झुकेंगे और एक दूसरे के लिए गुंजाइश बनाएंगे।
Date:26-05-23
संघवाद के नाम पर एकजुटताअनन्त मित्तल
केंद्रशासित प्रदेश दिल्ली में अफसरों की नियुक्ति का अधिकार केंद्र सरकार द्वारा अध्यादेश के जरिए केजरीवाल सरकार से लेकर एलजी यानी उपराज्यपाल को फिर सौंप देने से छिड़े राजनीतिक विवाद के बीजेपी बनाम विपक्ष की राजनीतिक शक्ल लेना तय है। आप सुप्रीम कोर्ट सहित सड़क से संसद तक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी व बीजेपी से विपक्षी सहयोग के बूते जोर आजमाइश करना चाहती है।
एलजी की बजाय दिल्ली की निर्वाचित केजरीवाल सरकार को अफसरों की नियुक्ति का अधिकार बीती 11 मई को सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने सौंपा था। पीठ के सर्वसम्मत फैसले में प्रधान न्यायाधीश न्यायमूर्ति डीवाई चंद्रचूड़ सहित कुल पांच न्यायाधीश शामिल थे। दिल्ली सरकार ने केंद्र सरकार के विरुद्ध सुप्रीम कोर्ट में अवमानना याचिका दायर की है। आप संयोजक अरविंद केजरीवाल द्वारा अध्यादेश को कानूनी जामा पहनाने से राज्य सभा में रोकने की दरख्वास्त को कांग्रेस के अलावा विपक्षी दलों के मुख्यमंत्रियों और नेताओं का समर्थन मिल रहा है। समर्थन जुटाने की मुहिम में केजरीवाल बिहार और पश्चिम बंगाल के मुख्यमंत्रियों नीतीश कुमार एवं ममता बनर्जी से मिल चुके हैं। केजरीवाल अब पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान सहित मुंबई में एनसीपी अध्यक्ष शरद पवार एवं यूबीटी शिवसेना अध्यक्ष उद्धव ठाकरे से मिलने गए हैं। हालांकि देश के सबसे बड़े विपक्षी दल कांग्रेस का समर्थन जुटाने के लिए आप ने अभी तक उसके किसी भी पदाधिकारी से मुलाकात का समय नहीं मांगा है। कांग्रेस द्वारा केजरीवाल की मुहिम को अभी तक समर्थन नहीं देने का स्पष्टीकरण भी दिया जा चुका है। कांग्रेस आलाकमान से उसकी दिल्ली एवं पंजाब इकाई के प्रमुख नेताओं ने आप को किसी भी मुद्दे पर समर्थन नहीं देने की अपील की है। गौरतलब है कि दिल्ली सहित पंजाब एवं गुजरात में भी कांग्रेस को आप ने सत्ता के हाशिये पर बैठा दिया है। राजस्थान‚ मध्य प्रदेश एवं छत्तीसगढ़ में भी आप ने आगामी विधानसभा चुनाव जोरशोर से लड़ने का ऐलान किया है। जाहिर है कि गुजरात की तरह आप इन राज्यों में जितने भी मत हासिल करेगी उससे सत्ता पाने में बीजेपी को फायदा और कांग्रेस का नुकसान तय है। यूं भी राष्ट्रीय दल का दर्जा मिलने के बाद आप के हौसले बुलंद हैं‚ और कांग्रेस तथा बीजेपी उसे अपना प्रबल राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी मानकर उसकी रोकथाम में सक्रिय हैं। इसके बावजूद केजरीवाल विपक्षी समर्थन बटोरने की मुहिम में जुटे हैं। उनके अनुसार सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ का साफ आदेश था कि उपराज्यपाल को दिल्ली सरकार की सलाह पर काम करना होगा। अध्यादेश लाकर बीजेपी ने दिल्ली वालों से छल किया है।
सुप्रीम कोर्ट के अनुसार अफसरों की नियुक्ति एवं तबादले के आदेश आगे से केंद्रशासित प्रदेश की निर्वाचित सरकार को जारी करने थे उन पर एलजी को अपने अधिकारों के अनुसार कार्रवाई करनी थी। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के कुछ देर बाद ही केजरीवाल सरकार ने सेवा सचिव आशीष मोरे को उनके पद से हटाने का आदेश एलजी को भेज दिया था। एलजी ने इस तबादला आदेश पर प्रतिक्रिया नहीं जताई जिसे आप ने रोक लगाने के रूप में प्रचारित किया। हालांकि बाद में मोरे ने केजरीवाल सरकार की बात मान ली मगर सुप्रीम कोर्ट से अधिकार मिलने के बाद मुख्यमंत्री ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में कथित नाकाबिल और भ्रष्ट अफसरों को हटाने का ऐलान करके केंद्र से फिर अदावत ले ली। उन्होंने कहा कि और‚ ईमानदारों को प्रमुख पदों पर नियुक्त किया जाएगा मगर एलजी की शह पर दिल्ली की निर्वाचित सरकार के काम बिगाड़ू अफसरों को केंद्र सरकार मझधार में कैसे छोड़ देतीॽ सुप्रीम कोर्ट के ११ मई के फैसले से पहले‚ सेवा विभाग को दिल्ली के उपराज्यपाल स्वतंत्र रूप में चला रहे थे जिसके खिलाफ ही आप की सरकार सर्वोच्च अदालत से न्याय मांगने गई थी। सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने साफ कहा कि अफसरों पर निर्वाचित सरकार का नियंत्रण न हो तो उनकी जवाबदेही कैसे तय होगी। अदालत ने कानून–व्यवस्था‚ पुलिस और जमीन के अलावा उपराज्यपाल से सभी मामलों में निर्वाचित सरकार की सलाह के अनुसार चलने को कहा था। आदेश के अनुसार अधिकारी यदि मंत्रियों को रिपोर्ट करना बंद कर दें या हुक्मउदूली करें तो फिर उनकी जवाबदेही के नियम बेमानी हो जाएंगे। इसलिए अधिकारियों की नियुक्त एवं तबादले का अधिकार निर्वाचित सरकार को देने का आदेश सुप्रीम कोर्ट ने दे दिया।
केजरीवाल सरकार और एलजी के बीच अधिकारों पर तनातनी पिछले नौ साल से केंद्र में मोदी सरकार बनने के बाद से ही जारी है। अध्यादेश लाने के साथ ही केंद्र सरकार ने भी सुप्रीम कोर्ट में फैसले की समीक्षा के लिए पुनर्विचार याचिका लगा दी है। फैसला तब भी कायम रहा तो केंद्र सरकार क्यूरेटिव पिटीशन दाखिल करके नये सिरे से दलील पेश कर सकती है। केंद्र के अध्यादेश में दिल्ली सरकार में अफसरों की नियुक्ति के मामले में एलजी के निर्णय को ही अंतिम बताया गया है। दिल्ली में सिविल सर्विसेज बोर्ड बना कर उसमें मुख्यमंत्री और दो वरिष्ठ नौकरशाहों के नामांकन का प्रावधान किया है। बोर्ड में बहुमत से हुआ फैसला ही मान्य होगा मगर विवाद होने पर एलजी निर्णायक होंगे।
अध्यादेश को केजरीवाल सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है। उनकी शिकायत है कि नियुक्ति एवं तबादले का अधिकार एलजी के पास होने से अफसर उनके मंत्रियों की एक नहीं सुनते। अपने चुनावी वायदे पूरे करने तथा प्रशासन को अपने एजंडे पर चलाने के लिए निर्वाचित सरकार को कम से कम ऐसे अफसर तो चाहिए जो उसकी प्राथमिकताओं को समझें! जनहित के फैसलों में भी नौकरशाही अड़चन डालती है। देखना है कि गर्मी की छुट्टियों के बाद सुप्रीम कोर्ट केंद्र और दिल्ली सरकार की याचिकाओं पर क्या रुख अपनाएगा। वैसे सर्वोच्च अदालत ने कुछ मामलों में अपने फैसले को उलटने वाले विधायी उपायों को पहले भी खारिज किया है। कुल मिलाकर बीजेपी की मोदी सरकार ने अध्यादेश लाकर संघवाद की रक्षा के मुद्दे पर विपक्ष को एकजुट होने का नया बहाना दे दिया है।
Date:26-05-23
उद्घाटन और शिकायतसंपादकीय
भारत वस्तुत: विविध मत-अभिमत से समृद्ध देश है। इस विशाल देश में कदम-कदम पर विरोध और विरोधाभासों का सामने आना सहज व स्वाभाविक है। भारत के नए संसद भवन परिसर का उद्घाटन एक खुशी का अवसर है, लेकिन इस खुशी के अवसर पर एक शिकायत राजनीतिक गलियारों से होती हुई सर्वोच्च न्यायालय में पहुंच गई है। एक अधिवक्ता ने राष्ट्रपति को उद्घाटन के अवसर पर आमंत्रित न किए जाने की शिकायत सर्वोच्च न्यायालय में कर दी है, इस याचिका को सुप्रीम कोर्ट भले पहली सुनवाई में ही टाल दे या खारिज कर दे, लेकिन यह अपने आप में मानीखेज है कि ऐसी शिकायत भी कोई कर सकता है। क्या ऐसा कोई कानून है, जो किसी सार्वजनिक कार्यक्रम में सांविधानिक पदों पर बैठी विभूतियों को आमंत्रित करने संबंधी कोई दिशा-निर्देश देता है? क्या केंद्र सरकार ने राष्ट्रपति को उद्घाटन कार्यक्रम में न बुलाकर कोई त्रुटि की है? अगर यह प्रक्रियागत त्रुटि है, तो क्या कानून के तहत भी कमी मानी जा सकती है? इसका फैसला सर्वोच्च न्यायालय को जल्दी करना होगा। यदि इस शिकायत को अदालत में ज्यादा समय तक सुना गया, तो इसका कोई विशेष लाभ नहीं होगा और इससे सिर्फ सियासत को बल मिलेगा।
28 मई को नए संसद भवन के उद्घाटन के लिए राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को आमंत्रित न करना विधायिका या कार्यपालिका द्वारा किया गया फैसला है और इसकी विवेचना अवश्य होनी चाहिए। यह राजनीति का विषय ही नहीं है, व्यावहारिकता से जुड़ा विषय है। ऐसे विषयों पर किसी भी व्यवस्था में बहस लगातार होती रहती है और समय के साथ उसमें सुधार भी होते रहते हैं। सर्वोच्च न्यायालय में दायर याचिका में यह शिकायत भी शामिल है कि राष्ट्रपति को ऐसे कार्यक्रम से बाहर रखना अपमान के बराबर है और गुहार लगाई गई है कि राष्ट्रपति को आमंत्रित करने के निर्देश केंद्र सरकार को दिए जाएं। न्यायपालिका अगर ऐसे फैसले करने लगेगी, तो जाहिर है, कार्यपालिका को बहुत समस्या होगी। क्या ऐसे में बेहतर यह नहीं है कि विधायिका ऐसे आयोजनों के बारे में एक प्रोटोकॉल बनाए कि कहां किसको बुलाना है और किसको नहीं बुलाना है? सार्वजनिक आयोजनों से जुड़े फैसलों को चार-पांच लोगों के विवेक पर छोड़ना क्या सही है? कम से कम राष्ट्रपति और राज्यपाल के मामले में आमंत्रण या कार्यक्रम संबंधी दिशा-निर्देश स्पष्ट होने चाहिए। अगर ये अभी तक नहीं बनाए गए हैं, तो बना लेने चाहिए, क्योंकि राजनीति की जो दशा-दिशा है, उसमें आने वाले समय में इस तरह के विवाद बढ़ते चले जाएंगे। ऐसे दिशा-निर्देश मजबूरी में अगर न्यायपालिका बनाने लगे, तो फिर विधायिका के स्वाभिमान को ही चोट लगेगी।
गौर करने की बात है कि दायर याचिका में संविधान के अनुच्छेद 79 का हवाला दिया गया है, जो बताता है कि एक संसद होगी, जिसमें राष्ट्रपति और दो सदनों का समावेश होगा। क्या राष्ट्रपति को उद्घाटन कार्यक्रम में न बुलाना अनुच्छेद 79 का उल्लंघन है? इस विवाद की पृष्ठभूमि यह भी है कि 11 राज्य सरकारों को नियंत्रित करने वाली 19 पार्टियों के एक संयुक्त बयान में नई संसद के उद्घाटन संबंधी फैसले को लोकतंत्र पर हमला बता दिया गया। क्या इसके पहले कभी राष्ट्रपति के पद को नजरअंदाज नहीं किया गया है? यहां अफसोसनाक उदाहरण गिनाने की जरूरत नहीं है, पर समय आ गया है, जब ऐसे गंभीर सवालों को राजनीति से ऊपर उठकर हल किया जाए।
Date:26-05-23
जातीय हिंसा की आग जल्दी बुझाई जाएसंजीब बरुआ, ( प्रोफेसर, बार्ड कॉलेज, न्यूयॉर्क )
इस महीने की 11 तारीख को, जब मणिपुर जातीय संघर्ष और हिंसा से जूझ रहा था, तब पड़ोसी राज्य मिजोरम से राज्यसभा सदस्य ने एक मार्मिक ट्वीट किया। यह सांसद हैं, मिजो नेशनल फ्रंट के के वनलालवेना, जिन्होंने लिखा था, ‘मणिपुर में मिजो जातीय समुदाय की तमाम जनजातियां सोच सकती हैं कि उनके पास अपना कोई सांसद नहीं है। मैं उन्हें बताना चाहता हूं कि मैं उनका सांसद हूं।’
उनका यह ट्वीट कुकी और मिजो के मजबूत जातीय-सांस्कृतिक जुड़ाव की ओर इशारा कर रहा था। ये दोनों यहां के उस बडे़ जनसमूह का हिस्सा हैं, जिनको अमूमन कुकी-मिजो-चिन कहकर संबोधित किया जाता है। हालांकि, इनके सामूहिक नाम ‘जू’ को कुछ हद तक सामाजिक स्वीकृति मिल चुकी है। वे पूर्वोत्तर भारत की पहाड़ियों, म्यांमार की चिन पहाड़ियों और बांग्लादेश के चटगांव पहाड़ी इलाके में रहते हैं। देश की भौगोलिक सीमा को पार कर चुके इस एकीकरण की कल्पना- और इसे बढ़ावा देने वाला बंधन- सैमुअल हंटिगंटन की प्रसिद्ध किताब द क्लैश ऑफ सिविलाइजेशन में बताई गई सभ्यता का एकीकरण से, जो युद्ध के समय में सजातीय देश के पीछे एकजुट होने को प्रेरित कर सकता है, विपरीत नहीं है। इस सांस्कृतिक निकटता को जानने के बाद ही हम उस आग को समझ सकते हैं, जिससे इन दिनों मणिपुर झुलस रहा है। इस सप्ताह की शुरुआत में भी हमने इंफाल में हिंसा का नया दौर देखा। बुधवार शाम तो एक राज्य मंत्री के घर पर भी हमला हुआ।
भारतीय संसद में पूर्वोत्तर के राज्यों से करीब 40 प्रतिनिधि हैं। अभी किसी भी सदन में मणिपुर से कुकी सांसद नहीं है। वनलालवेना के शब्दों का यह अर्थ लगाया जा सकता है कि मणिपुर के कुकी लोगों के पास बेशक कोई निर्वाचित सांसद नहीं है, पर राज्यसभा सदस्य के रूप में उनका एक प्रतिनिधि जरूर मौजूद है। इस भाव से कुकी, जिनके स्वजातीय लोग मणिपुर में हैं, उत्साहित लग रहे थे। इस ट्वीट को जबर्दस्त प्रतिक्रिया भी मिली, हालांकि कुछ लोगों ने तथाकथित ग्रेटर मिजोरम की मांग भी कर डाली।
मौजूदा संकट को समझने के लिए हमें लोगों की इस भावना पर भी गौर करना होगा। 1960 और 1970 के दशक में हुए मिजो विद्रोह में मणिपुर के कुकियों ने काफी सक्रिय हिस्सेदारी निभाई थी। मणिपुर नेशनल फ्रंट (एमएनएफ) की प्रमुख मांगों में एक मांग थी मिजो आबादी वाले क्षेत्रों का एकीकरण। इसी मांग ने अंतिम समय में एमएनएफ और केंद्र सरकार की वार्ता बेपटरी कर दी थी। अंतत: जिस समझौते पर हस्ताक्षर हुए, उसे आधिकारिक तौर पर मिजोरम समझौता कहा गया, न कि मिजो समझौता। इससे कुकी निराश हुए।
हाल के वर्षों में मिजोरम और मणिपुर पड़ोसी देश म्यांमार और बांग्लादेश की घटनाओं से काफी ज्यादा प्रभावित हुए हैं। भारत आने वाले शरणार्थी उन समुदायों से हैं, जो कुकी व मिजो से जुड़े हैं। हालांकि, शरणार्थियों को लेकर दोनों सूबों की सोच अलग-अलग रही। मिजोरम ने उनका गर्मजोशी से स्वागत किया। 2021 में मुख्यमंत्री जोरामथांगा ने खुलेआम केंद्र सरकार के उस बयान पर आपत्ति जताई थी, जिसमें सीमा पार करने के दौरान पकड़े गए लोगों को ‘अवैध अप्रवासी’ कहा गया था। विरोध गृह मंत्रालय के उस निर्देश का भी था, जिसमें म्यांमार के इन नागरिकों को शीघ्र उनके वतन भेजने की बात थी। उन्होंने कहा था, बेशक ‘विदेश नीति के कुछ मसले ऐसे हो सकते हैं, जिनमें भारत को सावधानी से आगे बढ़ने की जरूरत है, लेकिन हम इस मानवीय संकट से आंखें नहीं मूंद सकते, जो ठीक हमारे पड़ोस में पैदा हुआ है।’ यंग मिजो एसोसिएशन (वाईएमए) जैसे नागरिक समाज संगठन और चर्च समूह चिन शरणार्थियों को भोजन और आवास उपलब्ध कराने में जुट गए। उनके लिए धन जुटाने की खातिर स्थानीय स्तर पर ‘राइटियन रिलीफ’ (मिजो शब्द ‘राइटियन’ का अर्थ भाई होता है) नामक अभियान भी शुरू किया गया।
पिछले साल के अंत में मिजोरम ने कुछ सौ बांग्लादेशियों के लिए भी यही रणनीति अपनाई, जो चटगांव के पहाड़ी इलाकों से यहां दाखिल हुए थे। वे बांग्लादेशी सुरक्षा बलों व कुकी-चिन नेशनल आर्मी (केएनए) के बीच जारी जंग से भाग रहे थे। केएनए को बावम, पुंगखुआ, लुशाई, खुमी, म्रो और ख्यांग जैसे समूहों का प्रतिनिधि माना जाता है। ये सभी जातियां कुकी और मिजो से जुड़ी हुई हैं। मिजोरम कैबिनेट की एक बैठक में इनके लिए अस्थायी आश्रय, भोजन व अन्य राहत उपलब्ध कराने का फैसला भी किया गया।
यह मिजो सशस्त्र संघर्ष के इतिहास के एक पहलू की याद दिलाता है, जिसको शायद ही स्वीकार किया गया। दरअसल, मिजो गुरिल्ला लड़ाकों ने न सिर्फ तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान के चटगांव पहाड़ी इलाकों में शरण ली थी, बल्कि सीमा पार स्वजातीय रिश्तेदारों के बीच भी उन्होंने पनाह ले रखी थी। वास्तव में, एमएनएफ का मुख्यालय एक लुशाई (या मिजो) गांव महमूम में था, जो मौजूदा बांग्लादेश का इलाका है। हालांकि, मणिपुर में कुछ चिन शरणार्थियों को पुलिस ने गिरफ्तार किया। मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह का कहना था कि उन्हें इसलिए गिरफ्तार किया गया, क्योंकि वे अपनी नागरिकता का कोई दस्तावेज पेश नहीं कर सके। मुख्यमंत्री के अनुसार, ‘अवैध प्रवासियों को आश्रय देना’ राज्य के लिए ‘सबसे बड़ा खतरा’ है।’
हालात को जिस चीज ने और जटिल बनाया, वह था कुकियों को अतीत में विदेशी कहकर चिढ़ाना। यहां तक कि अफीम की खेती और नशे के खिलाफ राज्य सरकार के अभियानों में भी ‘विदेशी’ और ‘बाहरी’ जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया गया। कुकी को ऐसे अभियानों का खामियाजा भुगतना पड़ा, क्योंकि मणिपुर में अफीम अमूमन कुकियों द्वारा बसाए गए गांवों में ही उगाई जाती है। मुख्यमंत्री द्वारा अफीम की अवैध खेती विदेशियों द्वारा किए जाने वाले बयान ने भी तनाव बढ़ा दिया।
जाहिर है, यह तथ्य कि शरणार्थी कुकी व मिजो के सीमा पार स्वजातीय हैं और मिजोरम में उनका गर्मजोशी से स्वागत किया गया था, लेकिन मणिपुर में उनके साथ शत्रुतापूर्ण व्यवहार किया गया, अध्ययन का एक उल्लेखनीय विषय है। ‘जू’ समुदाय की नजर से देखें, तो दोनों राज्यों में उनकी ताकत में भारी अंतर है। मिजोरम में वे सत्ता के शीर्ष पर हैं, जबकि मणिपुर में मैतेई बहुल राजनीतिक व्यवस्था में उनका असर कमजोर है। इसी कारण वनलालवेना के ट्वीट और उस पर आई प्रतिक्रिया के गहरे निहितार्थ निकलते हैं।
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मणिपुर राज्य एक बार फिर से दंगे की चपेट में आ गया है। ये दंगे यहाँ के स्थानीय आदिवासी समूहों के बीच भड़के हैं। इन समूहों के बीच तनाव का पुराना इतिहास रहा है।
इस समस्या पर कुछ बिंदु –
फिलहाल सरकार ने अनुच्छेद 355 लगाकर कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी ले ली है। समस्या को सुलझाने के लिए सरकार को इसकी जड़ तक जाना होगा। दोनों पक्षों की भावनाओं और परंपराओं को समझना होगा। इसके बाद ही स्थिति को नियंत्रित किया जा सकता है।
विभिन्न समाचार पत्रों पर आधारित। 8 मई, 2023
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Date:25-05-23
Govt, GenderedStill too few women among administrators & given the needs of a big country, too few administratorsTOI Editorials
Women have bagged the top four spots in the Civil Services Exam 2022, the second year in a row. Even more significantly, women candidates recommended for appointment to various elite government services like IAS and IPS have overall risen from 24% to 34% since 2018. The improvement in gender equality in public administration this suggests is very welcome, as it has globally been found to be an important metric for a government more responsive and accountable to diverse public interests. However, if we zoom out to look at the larger picture, women in India remain far from reaching equal employment across all levels, sectors and positions in government – especially its highest offices.
A telling fact is that in seven decades, India has never had a woman cabinet secretary. The winds of change really only started blowing this century, with the first woman foreign secretary appointed in 2001 and the first woman finance secretary in 2011. But it is important to move all the faster now because there is much catching up to do. A 2021UNDP global report on gender equality in public administration for example assesses that women’s share of top leadership in India is only 12% compared to 29% in Singapore, 40% in Australia and 53% in Sweden.
What women’s recent UPSC performance indicates is that gender parity among civil servants is within reach with the right service policies – including for recruitment and promotions panels. In this context it is concerning that the committee on civil service reforms’ 2004 report wraps its analysis around enabling “women in the higher civil service to play their roles effectively as mothers and wives”. This mindset needs a serious update to encourage a more equal culture of care work in the senior bureaucracy, which should in turn support a more equal distribution at government workplaces downstream.
But it is not just women. Even in total officialdom India compares very poorly to countries like China and the US, with vacancies worsening the shortage. Last year a parliamentary committee reported yawning deficits between authorised and actual IAS strength – 57% in J&K and 31% in Jharkhand. As the most populous country, as a complex society and as a fast-growing economy, India needs at the governing wheel a bureaucracy that’s bigger and more inclusive in ways that matter.
Date:25-05-23
लोकसेवा में ज्यादा हिंदी व महिलाएं यानी नई सोचसंपादकीय
अगर यूपीएससी परीक्षा में शीर्ष की चार टॉपर्स महिलाएं हों, हर तीसरा अभ्यर्थी एक महिला हो और 933 में से 54 अभ्यर्थी हिंदी भाषा में परीक्षा देकर पास हुए हों, तो इसके समाजशास्त्रीय संकेत दूरगामी हैं। इस शीर्ष सेवा का चयनकर्ता यूपीएससी शायद अब यह समझने लगा है कि धारा प्रवाह अंग्रेजी बोलना या एक खास पैटर्न पर पूछे गए सवालों का एक खास ढंग से जवाब देना किसी व्यक्ति की ईमानदार प्रशासनिक क्षमता का नहीं बल्कि रटने की क्षमता का पैमाना है। वहीं, महिलाओं का शीर्ष सेवा में इतनी बड़ी तादाद में आना नारी सशक्तीकरण के लिए ही नहीं, अन्य लड़कियों को पढ़ने, नौकरी करने और अपने अधिकारों के लिए लड़ने को प्रेरित करेगा। अभिभावक भी लड़की तो पराया धन है की दकियानूसी सोच से बाहर निकलेंगे। उधर हिंदी माध्यम से परीक्षा देकर उत्तीर्ण हुए 54 अभ्यर्थी आज तक के इतिहास में सर्वाधिक हैं। इनमें से 29 ने हिंदी साहित्य को वैकल्पिक विषय के रूप में चुना था। गांवों में आज भी लाखों प्रतिभाशाली बच्चे हैं, जो हिंदी मीडियम सरकारी टाट-पट्टी वाले स्कूलों से पढ़ने के कारण अपेक्षाकृत छोटी नौकरियों तक ही अपनी उड़ान भर पाते हैं। फिर अगर एक युवा कलेक्टर गांव और गरीबी की तकलीफें झेलकर अपने वर्तमान मुकाम तक पहुंचेगा तो लोक सेवा में लोक भी होगा और सेवा भी ।
Date:25-05-23
दुनिया को डराने क्यों लगी है आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस?अंशुमान तिवारी, ( मनी-9 के एडिटर )
‘वे जब तक इसे समझेंगे नहीं, तब तक इससे डरेंगे नहीं। और जब तक इसे इस्तेमाल नहीं करेंगे, तब समझेंगे नहीं!’ यह संवाद है आने वाली फिल्म ‘ओपनहाइमर’ का। क्रिस्टोफर नोलन की यह फिल्म एटम बम के जनक जे. रॉबर्ट ओपनहाइमर पर है। लेकिन बमों के खतरे खत्म होते, उससे पहले ही इस अप्रैल में एक सनसनीखेज चिट्ठी ने सरकारों के पैरों तले जमीन हिला दी। एआई के उत्सव के बीच ओपन एआई के संस्थापक इलॉन मस्क, लेखक युवल नोहा हरारी, एआई से जुड़े वैज्ञानिकों, बड़ी कंपनियों के सीईओ और संस्थापकों ने खुली चिट्ठी जारी कर दी। पत्र ने सरकारों से पूछा कि क्या हम मशीनी झूठ का अम्बार लगा देना चाहते हैं? क्या हम मशीनी दिमागों को बनाकर सभ्यता पर नियंत्रण खोना चाहते हैं? क्या हम गैर निर्वाचित तकनीकी नेताओं को लोगों की जिंदगी तय करने की ताकत देना चाहते हैं? एआई की प्रयोगशालाएं कुछ भी करने पर उतारू हैं। उनकी जांच हो और ताजा शोध पर तत्काल प्रतिबंध लगे।
मशीनी दिमागों के आतंक वाली फंतासी फिल्मों की पटकथा जैसी इस चिट्ठी के बाद सरकारों में खौफ की लहर दौड़ गई। इटली ने ओपन एआई को अपने देश की सूचनाएं जुटाने से रोक दिया। यूरोपीय समुदाय एआई को नियंत्रित करने का कानून बनाने जा रहा है। मई के पहले सप्ताह में एआई कंपनियों के प्रमुख व्हाइट हाउस तलब कर लिए गए। कर्ज संकट और यूक्रेन युद्ध की फिक्र छोड़ बाइडेन और कमला हैरिस ने कृत्रिम दिमाग वालों से तीखे सवाल-जवाब किए। ‘रिस्पांसिबल एआई’ के लिए कानूनी उपाय शुरू कर दिए गए हैं। अमेरिकी कांग्रेस एआई की जांच के लिए केंद्रीय एजेंसी बनाने के विधेयक पर विचार रही है। किसी नई तकनीक को लेकर इतना डर पहली बार दिखा है।
रोजगार और बहुत कुछ : ब्रिटेन की टेलीकॉम कंपनी बीटी अगले कुछ सालों में 50000 नौकरियां खत्म करेगी। डेल बड़ी छंटनी का ऐलान कर चुकी है। 2022 में दुनिया की करीब 1048 सूचना तकनीक कंपनियों में 1.61 लाख लोगों की नौकरियां गई हैं। 2023 में छंटनी की रफ्तार और तेज है। इसकी वजह है एआई, जो 2021 में आया। रोजगारों का कत्लेआम शुरू हो गया है। गोल्डमैन सैक्शे ने बताया एआई कुछ वर्षों में 30 करोड़ नौकरियां निगल जाएगा। मेकेंजी कह रहा है पांच वर्ष में 80 करोड़ रोजगारों में उथल-पुथल होगी। भारत के आईटी उद्योग में नई नौकरियों की संख्या बीते एक साल में 65 फीसदी कम हुई है।
झूठ की मशीनें : राजनीतिक झूठ बहुत कुछ तबाह कर चुका है। स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी ने बताया है कि एआई सिस्टम्स मिनटों में लाखों गीगाबाइट सूचनाएं बना सकते हैं और पलक झपकते साक्ष्य और सबूत ही बदल सकते हैं। तब जरूरी बहसें वास्तविकता से हटकर उनके हाथ में होंगी, जो लोगों का राजनीतिक-आर्थिक इस्तेमाल करना चाहते हैं। एआई लोकतंत्र में सोशल ट्रस्ट यानी जन-विश्वास को मिनटों में ध्वस्त कर सकता है। एआई का 90 फीसदी मतलब डाटा मैनेजमेंट है। कंपनियों को डर है झूठे आंकड़े पढ़कर एआई ने कारोबार तहस-नहस कर दिया तब क्या होगा? मशीनों को मिल रही सूचनाओं की गुणवत्ता संदिग्ध है, इसलिए यूरोप के नियामक परेशान हैं कि एआई से नुकसान हुआ तो भरपाई कौन करेगा?
कुटिल मशीनें : 2020 में नेटफ्लिक्स पर डाक्यूमेंट्री कोडेड बायस बताती है कि फेस रिक्ग्नीशन सॉफ्टवेयर में नस्लवादी प्रोग्रामिंग की गई है। एआई में एल्गोरिदम बायस पैबस्त हैं, सुविधाओं व अवसरों के बंटवारे में राजनीतिक भेदभाव के प्रोग्राम तैयार हो रहे हैं। एआई रोगों की संभावना का सटीक आकलन तो कर लेगा मगर किसी खास समुदाय में रोग की संभावनाएं पता चलने के बाद उसके साथ बड़ा अन्याय हो सकता है। चीन में एक सोशल क्रेडिट सिस्टम बन रहा है, जो देश के 1.4 अरब लोगों को सामाजिक व्यवहार, नियम पालन आदि के आधार पर नंबर या ग्रेड देगा। डाटा के आधार पर एक सीमा तक ही न्याय किया जा सकता है। आंकड़े गलत हुए तो अनर्थ हो जाएगा। एआई तकनीकें पसंद के आंकड़े चुनकर नतीजे दे सकती हैं।
नए बम : क्रेमलिन पर ड्रोन हमले के बाद दुनिया कांप गई। स्लॉटरबॉट्स तैयार हैं। हथियार खुद फैसला करेगा कि किसको मारना है। आटोनॉमस वेपंस बन चुके हैं, जो सामूहिक जासूसी और एकमुश्त विनाश कर सकते हैं। अमेरिकी कांग्रेस को लगने लगा है कि एआई न्यूक्लियर हथियारों को भी अपने आप लांच कर सकता है। इसे रोकने एक विधेयक लाया गया है।
Date:25-05-23
रेवड़ी संस्कृति पर लगे विरामराहुल वर्मा, ( लेखक सेंटर फार पालिसी रिसर्च में फेलो हैं )
कर्नाटक में नवगठित कांग्रेस सरकार ने सत्ता संभालते ही चुनाव में किए गए पांच वादों को सैद्धांतिक स्वीकृति प्रदान की है। इन पांच वादों में हर गृहिणी को 2,000 रुपये प्रति माह भत्ता और घर को 200 यूनिट बिजली मुफ्त दी जानी है। गरीब परिवारों को हर महीने 10 किलो चावल और महिलाओं को नि:शुल्क बस यात्रा की सुविधा मिलेगी। वहीं, डिप्लोमाधारक बेरोजगारों को हर माह 1,500 और डिग्रीधारकों को 3,000 रुपये का बेरोजगारी भत्ता दिया जाएगा। एक मोटे अनुमान के अनुसार इन पांच वादों की पूर्ति के चलते राज्य सरकार के खजाने पर हर साल करीब 50,000 करोड़ रुपये का बोझ पड़ेगा। वित्त वर्ष 2022-23 के लिए कर्नाटक के बजट में 61,564 करोड़ रुपये के राजकोषीय घाटे का अनुमान लगाया गया जो राज्य के सकल घरेलू उत्पाद (जीएसडीपी) के 3.26 प्रतिशत के बराबर है। ऐसे में 50,000 करोड़ रुपये के अतिरिक्त व्यय से राज्य के खजाने पर बढ़ने वाले भारी बोझ का सहज ही आकलन किया जा सकता है। बहरहाल, कांग्रेस को कर्नाटक में मिली चुनावी सफलता के बाद अन्य राज्यों में भी राजनीतिक दलों ने इस तरह की लोकलुभावन पेशकश शुरू कर दी हैं। इससे पहले दिल्ली और पंजाब में आम आदमी पार्टी ने इसे सफलता का राजनीतिक सूत्र बना लिया। वहीं, अब कर्नाटक की कामयाबी से उत्साहित होकर कांग्रेस ने मध्य प्रदेश से लेकर हरियाणा में इस तरह की योजनाओं का एलान किया है। हरियाणा में तो कांग्रेस ने 100 गज के प्लाट तक देने का एलान किया है। आखिर जमीन जैसे दुर्लभ संसाधन को लेकर कोई पार्टी किस प्रकार ऐसा वादा कर सकती है। खासतौर से शहरी इलाकों में।
ऐसे में आगामी आम चुनाव से पहले इस प्रकार की घोषणाओं की बाढ़ आ सकती है। यह देश की आर्थिक स्थिति के लिए शुभ संकेत नहीं। भारतीय रिजर्व बैंक पूर्व में भी कई राज्यों को अनावश्यक खर्चों के लिए चेता चुका है। ऐसे में क्या यह नहीं सोचा जाना चाहिए कि चुनावी घोषणापत्रों को व्यावहारिक बनाने की दिशा में मंथन शुरू किया जाए। चूंकि रेवड़ियां बांटने में कोई भी दल किसी से पीछे नहीं है तो इसमें कोई सर्वमान्य हल आसानी से निकलता हुआ नहीं दिखता। इस मामले में चुनाव आयोग भी दलों के लिए कोई बाध्यकारी प्रविधान नहीं बना सकता। वहीं उच्चतम न्यायालय ने भी 2013 में कह दिया कि वह इसमें कोई व्यवस्था नहीं बना सकता और उसने गेंद राजनीतिक दलों के पाले में डाल दी, लेकिन दलों के स्तर पर इस विषय में कोई गंभीरता नहीं दिखती। कांग्रेस द्वारा पुरानी पेंशन योजना के जिन्न को बोतल से बाहर निकालना इसका एक बड़ा उदाहरण है, जिसकी आलोचना कांग्रेस की ओर झुकाव रखने वाले बुद्धिजीवी भी कर चुके हैं।
क्या मुफ्त उपहारों की पेशकश ही चुनावों में निर्णायक सिद्ध होकर किसी दल को सत्ता दिलाने में सहायक होती है। कर्नाटक के हालिया उदाहरण को ही देखें तो वहां केवल कांग्रेस ने ही नहीं, बल्कि भाजपा और जनता दल-सेक्युलर ने भी कमोबेश इसी प्रकार के वादे किए थे। स्पष्ट है कि चुनाव में केवल यही घोषणाएं ही मायने नहीं रखतीं। इस सिलसिले में 2015 में हमने दिल्ली में एक शोध किया था। शोध में शामिल एक समूह ने माना कि बिजली और पानी जैसी बुनियादी सुविधाएं उन्हें मुफ्त में मिलेंगी तो अच्छा है। वहीं जब उन्हें यह बताया गया कि इन सुविधाओं से सरकारी खजाने पर करीब 500 करोड़ रुपये का बोझ बढ़ेगा तो मुफ्त सुविधाओं को पसंद करने वालों की संख्या में लगभग 20 प्रतिशत की कमी आ गई। स्पष्ट है कि यदि जनता में इसे लेकर जागरूकता का प्रसार होगा तो संभव है कि राजनीतिक दलों को भी अपनी रणनीति बदलनी पड़ेगी। भले ही इस मामले में चुनाव आयोग और उच्चतम न्यायालय ने अपने लिए लक्ष्मण रेखा खींच दी हो, लेकिन कहीं न कहीं जनता, नागरिक समाज और राजनीतिक दलों सहित समूचे तंत्र से जुड़े अंशभागियों को इस मुद्दे का कोई कारगर हल निकालना होगा। जनता को राजनीतिक दलों से यह प्रश्न करना चाहिए कि इन वादों को पूरा करने के लिए वित्तीय संसाधन कहां से आएंगे, क्योंकि इसमें केवल वर्तमान की राजनीति का ही नहीं, बल्कि भविष्य के आर्थिक संतुलन का भी सवाल है। तब शायद दलों को इन वादों के साथ ही उन्हें पूरा करने की कार्ययोजना भी प्रस्तुत करनी पड़े और फिर जनता उसी आधार पर निर्णय करे।
फिलहाल लोकलुभावनवाद को लेकर प्रतिस्पर्धा जारी है, जिसमें सभी दल बड़े-बड़े वादे कर रहे हैं, परंतु वित्तीय संसाधनों के अभाव में राज्य उन्हें पूरा करने के लिए केंद्र से मदद की गुहार लगाने से भी गुरेज नहीं करते। जैसे पंजाब की कमान संभालते ही मुख्यमंत्री भगंवत मान ने केंद्र से 50,000 करोड़ रुपये का पैकेज मांगा। सीमित संसाधनों और वित्तीय अनुशासन को देखते हुए केंद्र सरकार के लिए ऐसे प्रस्तावों से इन्कार स्वाभाविक है। केंद्र की ऐसी प्रतिक्रिया को लेकर भी कुछ राज्यों में आक्रोश है, क्योंकि उनका मानना है कि जीएसटी के बाद करों के मोर्चे पर उनके पास अधिकार नहीं बचे। उन्हें करों में उनके योगदान के अनुपात में राजस्व साझेदारी में हिस्सेदारी नहीं मिलती। इस मामले में दक्षिण के राज्यों की शिकायत है कि कर संग्रह में उनका योगदान अधिक होने के बावजूद संसाधन आवंटन उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे राज्यों को ज्यादा होता है। संसाधनों की साझेदारी को लेकर तमिलनाडु के पूर्व वित्त मंत्री औपचारिक रूप से अपना पक्ष भी रख चुके हैं।
स्पष्ट है कि यदि रेवड़ी संस्कृति पर विराम लगाना है तो राजनीतिक दलों को अपना सुविधावादी दृष्टिकोण त्यागना होगा। एक राजनीतिक दल को मुफ्त उपहारों से जुड़ी अपनी योजना तो कल्याणकारी लगती है, लेकिन दूसरे दल की योजना रेवड़ी नजर आती है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी खुद एक ओर रेवड़ी संस्कृति से मुक्ति की बात करते हैं, लेकिन ऐसी पेशकशों के मामले में उनकी पार्टी भाजपा भी पीछे नहीं रहती। नि:संदेह, रेवड़ी संस्कृति पर अंकुश लगाना समय की मांग है, लेकिन इसके लिए सभी को जिम्मेदारी का भाव और संवेदनशीलता का परिचय देना होगा। अन्यथा भारत को विकसित देश बनाने का जो स्वप्न हम देखते हैं, वह पूरा होना कठिन होता जाएगा।
Date:25-05-23
जेनरेटिव एआई की चुनौतियां अपारनितिन देसाई
दुनिया भर में प्रयोग करने योग्य आर्टिफिशल इंटेलिजेंस (एआई) सॉफ्टवेयर के तेजी से उभार ने अर्थव्यवस्था और सुरक्षा पर इसके संभावित प्रभाव को लेकर एक व्यापक बहस छेड़ दी है। आमतौर पर हम जिस सॉफ्टवेयर का उपयोग करते हैं उसमें कोई स्वतंत्र रचनात्मकता नहीं दिखती है, उदाहरण के तौर पर लेखन से जुड़े सॉफ्टवेयर। हालांकि, यहां भी हम कुछ सरल एआई सॉफ्टवेयर देखते हैं जो वर्तनी की गलतियों को ठीक करते हैं और आप जब कोई संदेश या टेक्स्ट टाइप कर रहे होते हैं तो ये अगले शब्द का सुझाव देते हैं।
इन दिनों जो कुछ हम देख रहे हैं वह इससे बिल्कुल अलग है। यह एआई भाषा मॉडल पर आधारित है जो पूछे गए प्रश्न को समझने के लिए डिजाइन किया गया है और यह इंटरनेट पर उपलब्ध सामग्री के माध्यम से सवालों का विस्तृत जवाब तुरंत तैयार कर देता है। एआई का उपयोग आवाज और ग्राफिक्स बनाने के लिए भी किया जा सकता है। चैट जीपीटी भाषा से जुड़ा सॉफ्टवेयर है जिसका विस्तार पिछले साल अक्टूबर से काफी तेजी से हुआ है लेकिन इसकी वजह से एआई के बारे में कई चिंताएं भी उभरी हैं। मैंने रोजगार के प्रभाव के बारे में चैटजीपीटी पर एक प्रश्न पूछा और नियमित तथा दोहराए जाने वाले कार्यों को स्वचालित करने की क्षमता के बारे में संतुलित उत्तर मिला जैसे कि डेटा एंट्री, असेंबली लाइन वर्क, ग्राहक सेवा के साथ-साथ जेनरेटिव एआई में ग्राफिक डिजाइन, विज्ञापन और सामग्री निर्माण जैसे रचनात्मक उद्योगों में कुछ कार्यों को स्वचालित करने की रचनात्मक क्षमता की बात भी थी। इसमें बढ़ती आय असमानता का जिक्र हुआ जहां कम और मध्यम स्तर की दक्षता वाले श्रमिक पीछे रह जाते हैं। मशीन लर्निंग, डेटा विश्लेषण और सॉफ्टवेयर विकास जैसे क्षेत्रों में विशेष कौशल वाले कर्मचारियों के लिए नई नौकरियां तैयार करने की क्षमता की ओर भी इशारा किया। किसी भी तरह के तकनीकी विकास का प्रभाव विशेष रूप से हमेशा मौजूदा नौकरियों से जुड़े रोजगार पर पड़ता है लेकिन इससे नए रोजगार के मौके भी तैयार होते हैं जिस तरह मोटर कार ने पशुओं द्वारा खींची जाने वाली गाड़ियों की जगह ले ली।
भारत में, पर्याप्त रचनात्मक क्षमता वाली जेनरेटिव एआई, सॉफ्टवेयर और बिजनेस प्रोसेसिंग सेवाओं में मौजूदा रोजगार के स्तर पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकती है क्योंकि वे जो सेवाएं देते हैं उसे आसानी से एआई-आधारित प्रोग्राम के द्वारा पूरा किया जा सकता है।
लेकिन ऐसा करने के लिए एआई के खास उपयोग के लिए सेवाओं में कुछ समर्थन की आवश्यकता होगी, खासतौर पर तब जब इसका उपयोग सॉफ्टवेयर तैयार करने के लिए किया जाता है। यह वह क्षमता है जिसे हमारी आईटी और बीपीओ कंपनियों को अवश्य विकसित करनी चाहिए। संयोग से एआई, कम दक्ष श्रमिकों के लिए, अधिक सक्षम लोगों के साथ अंतर कम करने के लिए एक उपकरण देता है। उदाहरण के तौर पर खराब अंग्रेजी भाषा कौशल वाला एक कर्मी, एआई का उपयोग अंग्रेजी भाषा-शिक्षित कर्मी के रूप में उपयोगी बनने के लिए कर सकता है, जैसे कि मार्केटिंग या किसी अन्य गतिविधि में, जिसमें अंग्रेजी भाषा में संवाद करने की आवश्यकता होती है। हालांकि, अब एआई से जुड़ी बहस इसके रोजगार प्रभाव के बजाय सुरक्षा से जुड़े पहलुओं और उसके असर के बारे में ज्यादा है। जेनरेटिव एआई के उभार के साथ यह बहस अधिक व्यापक हो गई है जो एआई मॉडल का वह संदर्भ देता है जो मनुष्यों से स्पष्ट निर्देश लिए बिना ही अपने दम पर नई सामग्री, जैसे चित्र, वीडियो और टेक्स्ट बनाने में सक्षम हैं।
एक प्रभावशाली लेखक युअन हरारी ने तर्क दिया है कि भाषा मानव संस्कृति का आधार है और भाषा से जुड़ी अत्यधिक कुशल एआई प्रणाली, संस्कृति और मान्यताओं के विकास पर कब्जा कर सकती है। लेकिन एक पहलू यह भी है कि एआई सॉफ्टवेयर में आत्म-चेतना और महत्त्वाकांक्षा की कमी है। एक सटीक अनुमान यह लगाया जा रहा है कि इसका उपयोग कुछ आदमियों द्वारा दूसरों पर अपने प्रभाव को गहरा करने के लिए किया जा सकता है। किसी को यह भी ध्यान रखना चाहिए कि ओपन-सोर्स एआई ऐप तक कई लोगों की पहुंच होती है और इससे संस्कृति पर पड़ने वाले प्रभाव को लोकतांत्रिक बनाने में मदद मिलेगी।
असली चुनौती एआई के प्रतिकूल इस्तेमाल को रोकना भी है। चैटजीपीटी की एक प्रतिक्रिया के अनुसार, एआई संचालित निगरानी प्रणाली, गोपनीयता अधिकारों का हनन कर सकती है। इसके अलावा एआई-स्वचालित साइबर हमले, पारंपरिक सुरक्षा दायरे से बचने के लिए तैयार किए गए हैं और स्वायत्त रूप से मनुष्यों को लक्षित करने तथा हमला करने के लिए एआई संचालित हथियार डिजाइन किए गए हैं।
एआई फर्जीवाड़े और धोखाधड़ी के साथ फर्जी खबरों के प्रभाव को भी गहरा कर सकता है। इसमें भी सबसे खराब बात यह है कि इसमें आवाज तैयार करने की क्षमता है जिससे फर्जी कॉल की रफ्तार बढ़ सकती हैं और मिसाल के तौर पर परिवार के किसी सदस्य से किसी को किसी जगह तुरंत पैसे भेजने के लिए कहा जा सकता है।
क्या जेनरेटिव एआई मानव हस्तक्षेप के बिना घातक हो सकता है? सॉफ्टवेयर के माध्यम से नियंत्रित ड्रोन का मामला हीं लें। एक विशेष प्रकार के लक्ष्य पर हमला करने के लिए प्रोग्राम किया गया ड्रोन अपने खास लक्ष्य को चुनने के लिए स्वतंत्र है जो प्रोग्राम किए गए मानदंडों को पूरा करता है। लेकिन इसमें कुछ ऐसा नहीं है जिसे ड्रोन निर्धारित करता है। यह ड्रोन प्रोग्रामिंग करने वाले लोगों द्वारा ही निर्धारित किया गया है।
एआई में न्यूरल नेटवर्क्स की प्रोग्रामिंग आत्म-चेतना नहीं पैदा कर कर सकती है क्योंकि हम अभी भी इसके लिए तंत्रिका तंत्र के आधार को नहीं जानते हैं। एआई सॉफ्टवेयर में मनुष्यों की तरह किसी विकल्पों या पूर्वग्रहों का आकलन करने की क्षमता नहीं होती है जिससे सत्य के परे किसी खास मकसद से किसी जवाब को विकृत रूप दिया जा सकता है। नुकसानदेह और लाभकारी प्रभाव, मानव की चेतना और निर्णय पर निर्भर करते हैं। इसीलिए एआई का दुरुपयोग किसी विशिष्ट व्यक्ति की दुर्भावना पर निर्भर करेगा। अब प्राथमिक बहस इसके रोजगार पर पड़ने वाले प्रभाव के बारे में नहीं है। उस प्रभाव को नजरअंदाज नहीं किया जाता है और यह कोई संयोग नहीं है कि चैटजीपीटी बनाने वाले ओपनएआई के सैम अल्टमैन, सार्वभौमिक बुनियादी आय के सिद्धांत में विश्वास करते हैं जो संभवतः रोजगार के अवसरों में कमी की भरपाई करने के लिए है। लेकिन अब प्राथमिक चिंता एआई के व्यापक दुरुपयोग के डर से जुड़ी हुई है और इसी वजह से एआई बनाने और उपयोग करने के लिए एक नियामक व्यवस्था स्थापित करने को लेकर आम सहमति बनती दिखाई दे रही है। जी7 ने इस उद्देश्य के लिए एक कार्यकारी समूह स्थापित करने का प्रस्ताव रखा है और यूरोपीय संघ नियमन को तैयार करने की राह पर है।
एक स्तर पर बहस न केवल उपयोग के नियमन के बारे में है बल्कि यह दुरुपयोग के जोखिम को नियंत्रित करने के लिए एआई ऐप्स के मूल डिजाइन से जुड़ा है। यदि यह सरकारों द्वारा किया जाता है तो इसका उपयोग राजनीतिक लाभ के लिए किया जा सकता है। उदाहरण के तौर पर चीन ने एआई विकास पर कथित तौर पर नियंत्रण करना शुरू किया है। चीन में एआई ऐप्स के जारी होने से पहले आधिकारिक मंजूरी का प्रावधान शामिल किया गया है और उन्हें ‘समाजवाद के बुनियादी मूल्यों’ के अनुरूप ही पेश करना सुनिश्चित करने की आवश्यकता होती है! हालांकि इस प्रकार के राजनीतिकरण से बचना चाहिए। इंटरनेट का दुरुपयोग किया जा सकता है लेकिन यह हमारी स्वतंत्रता और लोकतंत्र का सबसे मजबूत आधार बना हुआ है।
भारत को एआई पर क्या रुख अपनाना चाहिए? हमें यह स्वीकार करना चाहिए कि यह भविष्य की तकनीक है। जिस तरह कई दशक पहले कंप्यूटरीकरण का दौर आया था ठीक उसी तरह ही हमें एआई विकसित करने और इसका उपयोग करने के लिए स्थानीय क्षमता तैयार करने के लिए काम करना चाहिए। एआई के मुख्य भाग की नींव एक भाषा मॉडल है, इसलिए भारत के लिए यह एक बड़ी चुनौती है क्योंकि यहां कई भाषाएं हैं। एआई सेवाओं के प्रावधान के लिए बहुत बड़े सर्वर सिस्टम की आवश्यकता होती है, विशेष रूप से उन लोगों के लिए जो ग्राफिक्स के लिए एआई की सेवाएं लेते हैं। एआई प्रदाताओं के रूप में बड़ी कंपनियों के लिए पूर्वग्रह है। यह भी एक अंतरराष्ट्रीय रुझान है और जितनी जल्दी हम अपने इन्फोटेक उद्योग को इसमें शामिल करते हैं, एआई बाजार में अपना महत्त्वपूर्ण स्थान कायम करने की हमारी संभावना उतनी ही बेहतर हो सकती है।
आज कंप्यूटर भाषा, गणितीय गणना और ग्राफिक डिजाइन से जुड़े कई काम करते हैं जिस काम को हमें कंप्यूटर दौर आने से पहले हाथ से धीरे-धीरे और थकाऊ तरीके से करना पड़ता था, जब हम वयस्क हो रहे थे। कंप्यूटर युग ने हमें उच्च स्तर की बौद्धिक गतिविधि पर ध्यान केंद्रित करने के लिए मुक्त किया, लेकिन हमें अज्ञात फर्जीवाड़े की घटनाओं का सामना भी करना पड़ रहा है। हमारे बच्चों के लिए भी एआई कुछ ऐसी ही स्थितियां तैयार करेगा और हमारा मुख्य कार्य उन्हें एआई द्वारा दिए जाने व्यापक अवसरों के लिए तैयार करना और यह सुनिश्चित करना है कि जोखिम का प्रबंधन किया जाए।
Date:25-05-23
समुद्र तट का सिकुड़ना चिंताजनकपंकज चतुर्वेदी
केंद्र सरकार के वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के अंतर्गत नेशनल सेंटर फॉर कोस्टल रिसर्च (NCCR) की ताजातरीन रिपोर्ट चेता रही है कि देश की समुद्री सीमा कटाव और अन्य कारणों के चलते सिकुड़ रही है। अकेले तमिलनाडु में राज्य के कुल समुद्री किनारों का कोई 42.7 हिस्सा संकुचन की चपेट में आ चुका है। हालांकि कोई 235.85 किमी. की तट रेखा का विस्तार भी हुआ है। जब समुद्र के किनारे कटते हैं, तो उसके किनारे रहने वाले मछुआरों, किसानों और बस्तियों पर अस्तित्व का संकट खड़ा हो जाता है। चिंता की बात है कि समुद्र से जहां नदियों का मिलन हो रहा है, वहां कटाव अधिक है। इससे नदियों की पहले से खराब सेहत और बिगड़ सकती है।
ओड़िशा के जिलों बालासोर, भद्रक, गंजम, जगतसिंघपुर, पुरी और केंद्रपाड़ा की लगभग 480 किमी. समुद्र रेखा पर भी कटाव का संकट गहरा गया है। ओड़िशा जलवायु परिवर्तन कार्य योजना, 2021-2030 में बताया गया है कि राज्य में 36.9 फीसद समुद्र किनारे तेजी से समुद्र में टूट कर गिर रहे हैं। यूनिर्वसटिी ऑफ केरल, त्रिवेंद्रम द्वारा किए गए और जून-22 में प्रकाशित हुए शोध में बताया गया है कि त्रिवेंद्रम जिले में पोदियर और अचुन्थंग के बीच के 58 किमी. के समुद्री तट का 2.62 वर्ग किमी. हिस्सा बीते 14 सालों में सागर की गहराई में समा गया। शोध बताता है कि 2027 तक कटाव की रफ्तार भयावह हो सकती है। वैसे इस शोध में एक बात और पता चली कि इसी अवधि में समुद्र के बहाव ने 700 मीटर नई धरती भी बनाई है। पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के तहत काम करने वाले चेन्नई स्थित नेशनल सेंटर फॉर सस्टेनेबल कोस्टल मैनेजमेंट के आंकड़े बताते हैं कि देश में कुल 6907 किमी. की समुद्री तट सीमा है, और बीते 28 सालों के दौरान हर जगह यह कुछ न कुछ क्षतिग्रस्त हुई ही है। देश में सर्वाधिक समुद्र तटीय क्षेत्र गुजरात में 1945.60 किमी. है, और यहां 537.50 किमी. कटाव दर्ज किया गया है, आंध्र प्रदेश के कुल 1027.58 किमी. में से 294.89, तमिलनाडु में 991.47 में से 422.94 किमी. में कटाव देखा जा रहा है। पुदुचेरी, जो कभी सबसे सुंदर समुद्र तटों के लिए विख्यात था, भी धीरे-धीरे अपने किनारों को खो रहा है। दमन दीव जैसे छोटे द्वीप में 34.6 प्रतिशत तट पर कटाव का असर सरकारी आंकड़े मानते हैं। केरल के कुल 592.96 किमी. के समुद्री तट में से 56.2 फीसद धीरे-धीरे कट रहा है। कोस्टल रिसर्च सेंटर ने देश में ऐसे 98 स्थानों को चिन्हित किया है, जहां कटाव तेजी से है। इनमें से सबसे ज्यादा और चिंताजनक 28 स्थान तमिलनाडु में हैं। पश्चिम बंगाल में 16 और आंध्र में 7 खतरनाक कटाव वाले स्थान हैं। कोई एक दशक पहले कर्नाटक के सिंचाई विभाग द्वारा तैयार ‘राष्ट्रीय समुद्र तट संरक्षण रिपोर्ट’ में कहा गया था कि सागर-लहरों की दिशा बदलना कई बातों पर निर्भर करता है। लेकिन इसका सबसे बड़ा कारण समुद्र के किनारों पर बढ़ते औद्योगिकीकरण और शहरीकरण से तटों पर हरियाली का गायब होना है। हवा का रु ख, ज्वार-भाटे और नदियों के बहाव में आ रहे बदलाव भी समुद्र को प्रभावित कर रहे हैं। कई भौगोलिक परिस्थितियां जैसे-बहुत सारी नदियों के समुद्र में मिलन स्थल पर बनीं अलग-अलग कई खाड़ियों की मौजूदगी और नदी-मुख की स्थिति में लगातार बदलाव भी समुद्र के अस्थिर व्यवहार के लिए जिम्मेदार हैं। ओजोन पट्टी के नष्ट होने और वायुमंडल में कार्बन मोनो आक्साइड की मात्रा बढ़ने से पृथ्वी का तापमान बढ़ रहा है। इससे समुद्री जल का स्तर बढ़ना भी इस तबाही का एक कारक हो सकता है।
मुंबई हो या कोलकता हर जगह जमीन के कटाव को रोकने वाले मेग्रोव शहर का कचरा घर बन गए हैं। पुरी समुद्र तट पर लगे खजरी के सभी पेड़ काट दिए गए। पर्यावरण (संरक्षण) अधिनियम, 1986 में तहत बनाए गए सीआरजेड में समुद्र में आए ज्वार की अधिकतम सीमा से 500 मीटर और भाटे के बीच के क्षेत्र को संरक्षित घोषित किया गया है। इसमें समुद्र, खाड़ी, उसमें मिलने आ रहे नदी के प्रवाह को भी शामिल किया गया है। ज्वार यानी समुद्र की लहरों की अधिकतम सीमा के 500 मीटर क्षेत्र को पर्यावरणीय संवेदनशील घोषित कर इसे एनडीजेड यानी नो डवलपमेंट जोन (किसी भी निर्माण के लिए प्रतिबंधित क्षेत्र) घोषित किया गया। इसे सीआरजेड-1 भी कहा गया। सीआरजेड-2 के तहत ऐसे नगर पालिका क्षेत्रों को रखा गया है, जो पहले से ही विकसित हैं। सीआरजेड-3 किस्म के क्षेत्र में वह समुद्र तट आता है, जो सीआरजेड-1 या 2 के तहत नहीं है। यहां किसी भी तरह के निर्माण के लिए केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय की अनुमति आवश्यक है। सीआरजेड-4 में अंडमान, निकोबार और लक्षद्वीप की पट्टी को रखा गया है। 1998 में केंद्रीय पर्यावरण मंत्रालय ने राष्ट्रीय समुद्र तट क्षेत्र प्रबंधन प्राधिकरण और इसकी राज्य इकाइयों का भी गठन किया ताकि सीआरजेड कानून को लागू किया जा सके। लेकिन ये सभी कानून कागज पर ही दिखते हैं।
Date:25-05-23
विकास योजनाओं पर हावी लोक-लुभावन राजनीतिपूजा मेहरा, ( सलाहकार संपादक, मिंट )
अर्थव्यवस्था ने कर्नाटक में भाजपा की सरकार बनाने में कोई बड़ी भूमिका नहीं निभाई थी, पर हार में हो सकती है। भ्रष्टाचार, महंगाई व ग्रामीण मतदाताओं की बदलती प्राथमिकताएं उन वजहों में शामिल थीं, जिनको राजनीतिक विश्लेषकों ने गिनाया है। अब भाजपा का राष्ट्रीय नेतृत्व कोई जोखिम नहीं लेना चाहता, इसलिए तमाम तरह की कवायदें की जा रही हैं। अगर सियासी पंडितों ने सही भांपा है, तो अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ी चिंता कर्नाटक के ग्रामीण मतदाताओं द्वारा भाजपा के कल्याणकारी उपायों की अनदेखी है। पार्टी ने ‘लाभार्थियों’ का एक खास वर्ग बनाने का दावा किया था। इस वोट बैंक में यह असंतोष राजनीतिक दलों के बीच प्रतिस्पद्र्धी लोक-लुभावन राजनीति बढ़ा सकता है। हमने पहले भी इस तरह की राजनीति देखी है।
साल 2019 के आम चुनाव के दरम्यान, ओडिशा और तेलंगाना की राज्य सरकारों ने किसानों को पैसा देकर ग्रामीण संकट दूर करने और कृषि क्षमता में सुधार लाने की कोशिश की थी। केंद्र सरकार ने इसे अपने लिए चुनौती माना और पीएम-किसान योजना के माध्यम से वह भी ऐसा करने लगी। किसानों के लिए वैकल्पिक आय कोई बुरा अर्थशास्त्र नहीं है। मगर विफलता यह थी कि सरकार ने पानी व बिजली जैसी कृषि सब्सिडी को वैकल्पिक आय का स्रोत बनाने का मौका गंवा दिया। इस बीच, अन्य वोट बैंकों के लिए पूरक आय (आवश्यक सुधारों को दरकिनार करते हुए) एक अलग संभावना की तरह दिखने लगी।
आगामी लोकसभा चुनाव के लिए कांग्रेस ने लोक-लुभावनवाद को हवा दे दी है। उसने पेंशन पर बहस को सफलतापूर्वक फिर से शुरू कर दिया, नतीजतन कई राज्य सरकारें इस बात की परवाह किए बिना कि इससे उनके खजाने पर कितना बोझ पड़ेगा, अपने कर्मचारियों के लिए पुरानी पेंशन योजना पर लौटने को मजबूर हुई हैं। केंद्र की मोदी सरकार अब तक इसकी काट नहीं निकाल सकी है। उसने सरकारी कर्मचारियों के लिए पेंशन में सुधार के लिए एक पैनल का गठन किया है। तमाम जानकारों के अलावा पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की अध्यक्षता वाले तत्कालीन योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया ने भी आगाह किया है कि पुरानी पेंशन योजना पर वापस लौटने से सरकारें दिवालिया हो जाएंगी। इस योजना को दिसंबर, 2003 में तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने बंद कर दिया था।
कर्नाटक में कांग्रेस सरकार ने पहले ही दिन अपने चुनावी वायदों को पूरा करने का फैसला किया- हर घर को 200 यूनिट मुफ्त बिजली, परिवार की महिला मुखिया को हर माह 2,000 रुपये, गरीबी रेखा के नीचे के परिवारों के हर सदस्य को प्रतिमाह 10 किलो चावल आदि। 2019 के आम चुनाव में भी कांग्रेस ने न्यूनतम आय योजना (न्याय) के तहत देश के गरीब परिवारों को हर वर्ष 72 हजार रुपये की सहायता देने का वादा किया था। मुमकिन है, आगामी चुनाव में इसे फिर से जारी किया जाएगा। तब खतरा यह होगा कि सत्तारूढ़ दल भी दबाव में ऐसी योजनाओं की ओर बढ़ेगा, भले ही ऐसे खर्च को संभालने की कोई व्यवस्था उसने न की हो।
समस्या यह है कि भारत अपने आर्थिक दर्द का इलाज लोक-लुभावनवाद में देख रहा है, जबकि आर्थिक सुरक्षा सिर्फ स्थायी आजीविका से मिल सकती है और लोगों की खर्च करने की क्षमता को बढ़ाकर बाजार को विस्तार दे सकती है, जो कि अर्थव्यवस्था के सतत विकास के लिए आवश्यक है। तथ्य यह है कि भारत की अर्थव्यवस्था लाखों अकुशल नौजवानों के लिए जरूरी रोजगार-सृजन नहीं कर पा रही। सरकार लोक-लुभावन खर्च से इन विफलताओं की भरपायी करने की सोचती है, जबकि डिजिटली ट्रांसफर किए जाने वाले पैसे गुणवत्तापूर्ण आजीविका का विकल्प नहीं हो सकते। साफ है, हमारा आर्थिक मॉडल सबके लिए सुखद नहीं है। इसको सुधारने के लिए अर्थशा्त्रिरयों से नीतिगत सलाह की दरकार है। सुधारों को लेकर राजनीतिक विश्वास छीजता जा रहा है। कांग्रेस और भाजपा, दोनों ही अपने पूर्व प्रधानमंत्रियों की प्रगतिशील आर्थिक नीतियों की धज्जियां उड़ाने को तैयार दिख रही हैं। यह अर्थव्यवस्था के लिए कतई शुभ नहीं।
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हाल ही में ‘द केरला स्टोरी’ नाम से एक फिल्म आई है, जो काफी विवादास्पद मानी जा रही है। पश्चिम बंगाल सरकार ने इस पर प्रतिबंध भी लगा दिया है। मद्रास और केरल में उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय में भी इस पर प्रतिबंध लगाने की याचिका दायर की गई थी। लेकिन इन न्यायालयों ने ऐसा करने से मना कर दिया है।
किसी भी प्रकार की कला पर प्रतिबंध इसलिए नहीं लगाया जा सकता कि वह कुछ लोगों या किसी विशेष समुदाय की पसंद या नापसंद है। अगर इस पर विवाद है भी तो फिल्म जैसी विधा के लिए उसका अपना सेंसर बोर्ड है, जो नियामक के रूप में काम करता है। अगर वह किसी फिल्म को रिलीज के लायक मानता है, तो उसका राजनीतिकरण नहीं किया जाना चाहिए। फिर हमारे देश में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता भी है।
‘केरला स्टोरी’ की आलोचना करने वाले इसे राजनीतिक प्रसार से जोड़ रहे है, और कुछ लोग इसे सामुदायिक संबंधों को खराब करने वाला मान रहे है। मुद्दा यह है कि दर्शकों को ऐसी फिल्में देखने दिया जाना चाहिए। इतना जरूर है कि जनता की आपत्तियों को दर्ज करने के लिए फिल्म प्रमाणन अपीलीय न्यायाधिकरण को बहाल किया जाना चाहिए। हमारे देश के न्यायालयों पर अन्य मामलों का वैसे ही बहुत बोझ है। फिल्म जैसी कला-विधा के खिलाफ अपील करने के लिए इनका इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 6 मई, 2023
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Date:24-05-23
Take Your PICIndia’s outreach to Pacific island countries is smart but needs a lot of policy work & a larger navyTOI Editorials
That PM Modi’s recent visit to Papua New Guinea – the first by any Indian premier – coincided with the US inking a defence agreement with the Pacific island nation wasn’t a coincidence. Pacific island countries (PIC) have emerged as a strategic battleground between the US and China, with Beijing trying to peel away some PICs in recent years. China inked its own security pact with the Solomon Islands last year. That sent alarm bells ringing. If the Chinese are able to establish a strong foothold in the islands, it would create a serious strategic-security headache for Washington in the south Pacific.
This is precisely why India and the US teaming up in the PIC region is a good idea. While Washington can provide security guarantees to the islands, New Delhi can position itself as a reliable development partner. That was the thrust of Modi’s 12-point action plan announced at the 3rd Forum for India-Pacific Islands Cooperation Summit. Ranging from steps to boost healthcare infrastructure in the islands, to setting up a regional IT and cybersecurity hub and providing desalination units to address water scarcity, New Delhi is rightly championing a demanddriven cooperation model that doesn’t burden the island nations.
But it’s important that the momentum behind these measures endures. Geographical distance between India and the PIC can lead to complacency setting back in. And China with deeper pockets and the world’s largest navy is better equipped for the push-and-pull of a long-term strategic tussle. Case in point, cashstrapped Sri Lanka has turned to Chinese oil and gas giant Sinopec to import, distribute and sell petroleum products despite Chinese loans playing a significant role in Colombo’s economic crisis.
Thus, if India is to counter Chinese influence or even apply strategic pressure on Beijing, it needs to have consistent outreach policies for important partner countries. In the long term, New Delhi has to sufficiently grow its economy to ensure a strong maritime component in its foreign policy. The Indo-Pacific is a seascape. A larger and modern Indian navy is needed for both countering Chinese adventurism and inspiring confidence among island partners.
Date:24-05-23
वित्तीय हालत अच्छी हो तो चुनाव- पूर्व घोषणाएं संभवसंपादकीय
वैश्विक बाजार में तमाम कमोडिटी (जिंसों) के दाम कम हैं। देश में पेट्रोलियम की बेहतर स्थिति है। इसके साथ ही सब्सिडी कम करने की वजह से केंद्र सरकार को चालू वित्तीय वर्ष में कुल करीब दो लाख करोड़ रुपए से ज्यादा की बचत हो रही है। इसके दो लाभ हैं। पहला, राजकोषीय घाटा 6. 4% से घटकर 5.9% हो सकता है और दूसरा, आम चुनाव के ठीक पूर्व के कुछ महीनों में जनता को कई किस्म की आर्थिक मदद/ पैकेज की घोषणा भी बगैर किसी अतिरिक्त चिंता के की जा सकती है। देश में तीन मुख्य सब्सिडीज हैं- फूड, फर्टिलाइजर और फ्यूल। वर्ष 22-23 के बजटीय अनुमान में इन पर कुल खर्च 3.18 लाख करोड़ रु. आंका गया, जो यूक्रेन युद्ध के कारण पुनरीक्षि अनुमान में बढ़कर 5.22 लाख करोड़ रु. हो गया। चालू वित्त वर्ष में इसके केवल 3.75 लाख करोड़ रु. यानी 28% कम होने का अनुमान है। इसमें रूस से मिल रहे सस्ते क्रूड के आयात और रिफाइंड पेट्रोलियम के निर्यात से प्राप्त लाभ को नहीं जोड़ा गया है। पांच किलो मुफ्त अनाज की स्कीम खत्म करना, मनरेगा पर खर्च में 29 हजार करोड़ रु. की कटौती के अलावा खादों के वैश्विक मूल्यों में भारी कमी भी भूमिका है। यूरिया जो कुछ माह पहले तक 900-1000 डॉलर प्रति टन था वह 400-500 डॉलर पर आ गया है। डीएपी के दाम भी 35% कम हुए हैं। लिहाजा आयात बिल काफी कम रहेगा। केंद्र की बजटीय स्थिति बेहतर होने का मतलब है कि सरकार नई स्कीमों के लिए पैसे दे सकती है। 2019 के चुनाव पूर्व सरकार ने किसान सम्मान राशि के रूप में हर चार माह में दो हजार रुपए देने की घोषणा की, जो आज भी जारी है। इस बार बेरोजगारी से असहाय हुए युवाओं के लिए मासिक राशि का ऐलान राजनीतिक रूप से लाभकारी हो सकता है।
Date:24-05-23
काले धन की अर्थव्यवस्थासंपादकीय
अंततः दो हजार के नोटों को बदलने का काम शुरू हो गया। भले ही रिजर्व बैंक ने इस संदर्भ में सभी बैंकों को निर्देश जारी किए हों, लेकिन ऐसा लगता है कि उन्हें लेकर वे असमंजस में हैं और इसीलिए उनके तौर-तरीकों में एकरूपता नहीं दिख रही है। हो सकता है कि आने वाले दिनों में इस समस्या का समाधान हो जाए कि दो हजार के नोट बदलने और उन्हें जमा करने के मामले में किस तरह के नियमों का पालन होना है, लेकिन इतना ही पर्याप्त नहीं होगा। रिजर्व बैंक ने दो हजार के नोट वापस लेने की घोषणा करते हुए कहा था कि वे वैध बने रहेंगे। प्रश्न यह है कि कब तक ? रिजर्व बैंक ने यह भी सूचित किया है कि नोट बदलने की समयसीमा यानी 30 सितंबर के बाद आगे आवश्यक निर्णय लिए जाएंगे। क्या तब तक उक्त प्रश्न अनुत्तरित रहेगा? जो भी हो, यह उल्लेखनीय है कि पहले दिन बैंकों में नोट बदलवाने या जमा कराने के लिए ज्यादा भीड़ नहीं दिखी। क्या इसका यह अर्थ है कि आम लोगों के पास दो हजार के अधिक नोट नहीं हैं? लगता तो ऐसा ही है, लेकिन इसी के साथ इसकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि सोने के दाम में उछाल आ गया है। इसके अतिरिक्त आभूषणों की खरीद में भी तेजी देखी जा रही है और डालर की खरीद में भी। इससे नोटबंदी के बाद के दिनों की याद ताजा हो रही है। तब पांच सौ और एक हजार के नोटों को बैंकों में जमा कराने के साथ आभूषणों और जमीन-जायदाद की खरीद में खपाया गया था। इसके चलते ही नोटबंदी के वांछित परिणाम नहीं मिल सके थे।
आशा की जाती है कि रिजर्व बैंक ने यह सुनिश्चित किया होगा कि दो हजार के नोट वापस लेने के उसके फैसले के पीछे जो उद्देश्य तय किए गए, वे पूरे होंगे। चूंकि दो हजार के नोट कुल करेंसी के 10 प्रतिशत के ही करीब हैं, इसलिए उन्हें वापस लेने के फैसले का अर्थव्यवस्था पर सीमित प्रभाव होगा। इसके बाद भी रिजर्व बैंक को उन तत्वें को सफल नहीं होने देना चाहिए, जो दो हजार के नोटों को मनचाहे तरीके से खपाने में लगे हुए हैं। इससे यही पता चलता है कि दो हजार के नोट कालेधन का जरिया बना लिए गए थे। शायद इसी कारण कई वर्ष पहले उनकी छपाई बंद कर दी गई थी। आम लोगों के बीच उनका प्रचलन भी कम हो गया था, लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि कालेधन वालों ने उनकी जमाखोरी नहीं की। यदि दो हजार के नोट वापस लेने के फैसले के बाद भी कालेधन वालों पर अंकुश नहीं लगता तो इससे यही साबित होगा कि यदि सरकार और रिजर्व बैंक डाल-डाल हैं तो वे पात- पात। अच्छा होगा कि काले धन की अर्थव्यवस्था पर अंकुश लगाने के नए उपाय खोजे जाएं।
Date:24-05-23
प्रभावी राष्ट्रीय नवाचार प्रणाली की तरफ कदम बढ़ाना जरूरीनौशाद फोर्ब्सनौशाद फोर्ब्स, ( लेखक फोर्ब्स मार्शल के को-चेयरमैन हैं और भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआईआई) के पूर्व अध्यक्ष और सेंटर फॉर टेक्नोलॉजी इनोवेशन ऐंड इकनॉमिक रिसर्च के चेयरमैन हैं )
लगभग 30 वर्ष से भी अधिक समय पहले तीन अर्थशास्त्रियों- ब्रिटेन में क्रिस फ्रीमैन, स्वीडन में बैंग्टेक लुंडवॉल और अमेरिका में रिचर्ड नेल्सन- ने राष्ट्रीय नवाचार प्रणाली (नैशनल इनोवेशन सिस्टम्स) के बारे में सोचना शुरू किया था। ये तीनों अर्थशास्त्री अलग-अलग देशों से थे और उन्होंने नवाचार को अंतरराष्ट्रीय एवं तुलनात्मक नजरिये से देखा। इससे हमें यह समझने में आसानी हुई कि एक प्रभावी नवाचार तंत्र तैयार करने में किन बातों की जरूरत होती है। नवाचार ज्यादातर कंपनियों में होता है इसलिए इनकी शुरुआत भी वहीं से हुई। किसी कंपनी की क्षमता इन दोनों बातों से प्रभावित होती है कि वे स्वयं क्या करती है और उनके इर्द-गिर्द संस्थानों में क्या हो रहा है।
व्यापार प्रणाली पूरी दुनिया के लिए या फिर सीमित सोच के साथ उत्पादन शुरू कर सकती है। शिक्षा प्रणाली हुनरमंद (या फिर नहीं) श्रमिक, इंजीनियर और शोधकर्ता उपलब्ध कराती है। सार्वजनिक वित्त पोषित शोध विज्ञान को बढ़ावा दे सकता है। लोक नीति शोध एवं विकास (आरऐंडडी) में सीधे या पेटेंट के जरिये निवेश को प्रोत्साहन दे सकती है। उद्यमशीलता की संस्कृति विभिन्न रूपों में निवेश को प्रभावित करती है। उद्यमी जिस रूप में ‘अच्छाई’ को परिभाषित करते हैं वृहद सांस्कृतिक कारक उसे (उस रूप को) प्रभावित कर सकते हैं।
आइए, चर्चा की शुरुआत कंपनियों के साथ करते हैं। भारतीय उद्योग को आरऐंडडी को मालिकाना प्रौद्योगिकी (प्रॉपराइटरी टेक्नोलॉजी) आधारित भविष्य तैयार करने के माध्यम के रूप में देखना चाहिए। भारतीय उद्योग को देश में आरऐंडडी पर खर्च सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 0.3 प्रतिशत से बढ़ाकर दुनिया (और चीन) के 1.5 प्रतिशत के बराबर करना चाहिए। भारतीय कंपनियां आंतरिक स्तर पर निवेश में दुनिया की तुलना में इतनी पीछे क्यों है? कहां संभावनाएं दिख रही हैं? पूरी दुनिया में औद्योगिक आरऐंडडी में जितना निवेश हो रहा है उनमें शीर्ष 2,500 कंपनियों द्वारा शोध एवं विकास पर किए जाने वाले खर्च की हिस्सेदारी 90 प्रतिशत है।
शीर्ष 10 क्षेत्रों की इसमें हिस्सेदारी 80 प्रतिशत तक है। इन 10 क्षेत्रों में पांच में शीर्ष 2,500 कंपनियों में भारत की कोई कंपनी नहीं है। कुछ क्षेत्रों में हम आरऐंडडी पर अधिकार ध्यान नहीं दे पा रहे हैं। हमारी सॉफ्टवेयर कंपनियां मुनाफा कमाने के लिहाज से तो बड़ी हैं मगर आरऐंडडी में निवेश के मोर्चे पर पीछे चल रही हैं। ये कंपनियां आरऐंडडी में 12 प्रतिशत के वैश्विक औसत (चीन के 10 प्रतिशत) का करीब 1 प्रतिशत निवेश कर रही हैं। इसके अलावा आरऐंडडी क्षेत्र में कोई बड़ा निवेशक भी नहीं है। भारतीय कंपनियां संयुक्त रूप से आरऐंडडी में जितना निवेश करती हैं दुनिया की 26वीं (आरऐंडडी में निवेश के लिहाज से) सबसे बड़ी कंपनी बॉश अकेले उससे अधिक निवेश करती है। आरऐंडडी में बड़े निवेशक कहां से आ सकते हैं?
इसी समाचार पत्र में मैंने अपने पिछले स्तंभ में भारत की सफलतम कंपनियों की चर्चा की थी। हमारे देश की शीर्ष 10 कंपनियां सॉफ्टवेयर (टीसीएस और इन्फोसिस), तेल परिष्करण (ओएनजीसी, रिलायंस और इंडियन ऑयल), धातु (टाटा स्टील और जेएसडब्ल्यू) और अन्य उद्योगों (एनटीपीसी, रिलायंस जियो और आईटीसी) में हैं। पिछले साल इन कंपनियों ने 44 अरब डॉलर का मुनाफा कमाया था। उन्होंने आरऐंडडी में अपने लाभ का करीब 2 प्रतिशत (1 अरब डॉलर से कम) निवेश किया। अब चीन की कंपनियों पर विचार करते हैं। चीन की सर्वाधिक मुनाफा कमाने वाली कंपनियां सॉफ्टवेयर, तेल परिष्करण, बेवरिजेज, खनन एवं निर्माण में हैं। उन्होंने पिछले साल 106 अरब डॉलर मुनाफा कमाया और इनमें 31 अरब डॉलर (29 प्रतिशत) आरऐंडडी पर खर्च किए। अमेरिका, जापान और जर्मनी की शीर्ष 10 कंपनियों ने अपने मुनाफे का क्रमशः 37, 43 और 55 प्रतिशत आरऐंडडी निवेश किया था।
भारतीय उद्योग जगत के लिए आरऐंडडी में निवेश के प्रति अधिक गंभीर रवैया अपनाना होगा। हमें प्रौद्योगिकी गहन (टेक्नोलॉजी -इन्टेंसिव) क्षेत्रों में उपस्थिति बढ़ानी होगी। इसके अलावा उन क्षेत्रों में वैश्विक औसत के करीब निवेश करना होगा जहां हम पहले से उपस्थित हैं। हमारी सर्वाधिक मुनाफा कमाने वाली कंपनियों में कुछ को आरऐंडडी पर भारी निवेश करना होगा। भारत में तकनीकी प्रतिभा की कमी नहीं है और हम चाहें तो दीर्घकालिक सफलता के लिए उनका इस्तेमाल कर सकते हैं।
इस चर्चा ने उद्योग को हमारे राष्ट्रीय नवाचार प्रणाली के केंद्र में लाकर खड़ा कर दिया है। मैं यह प्रस्ताव दूंगा कि कोई भी जीवंत राष्ट्रीय नवाचार प्रणाली की शुरुआत दृढ़ प्रतिस्पर्द्धी क्षमता के साथ होनी चाहिए। इसके अभाव में सार्वजनिक आरऐंडडी पर भारी निवेश के जरिये तकनीकी क्षमता विकसित करने का भारत का प्रयास सफल नहीं रहा है। पिछले 70 वर्षों में जापान, दक्षिण कोरिया, ताइवान, सिंगापुर और चीन की आर्थिक प्रगति से हम काफी कुछ सीख सकते हैं। इनमें प्रत्येक देश ने नवाचार क्षमता विकसित करने के लिए सिलसिलेवार उपाय किए। कंपनियां पहले निर्यात बाजार में मूल उपकरण विनिर्माताओं (ओईएम) के रूप में उतरीं और विदेशी ब्रांड को निर्यात करने लगीं। इससे उन्हें विश्व स्तरीय क्षमता प्राप्त करने में सहायता मिली और परिभाषा के हिसाब से उनके उत्पाद अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रतिस्पर्द्धा करने में सक्षम थे।
ये उद्योग मोटे तौर पर श्रम आधारित और बहुत प्रौद्योगिकी गहन – परिधान, फुटवेयर, खाद्य प्रसंस्करण- नहीं थीं। अगला चरण मूल्य श्रृंखला में तकनीक का अधिक इस्तेमाल करने वाले क्षेत्रों-कंज्यूमर ड्यूरेबल्स, इलेक्ट्रॉनिक असेंबली, वाहन एवं कल-पुर्जे एवं रसायन मद्यवर्ती (इंटरमीडिएट्स)- की तरफ बढ़ना था। जैसे कंपनियां इस क्षेत्र में शामिल हुईं उन्होंने प्रतिस्पर्द्धा में दीर्घ अवधि तक बने रहने के लिए आंतरिक स्तर पर आरऐंडडी में निवेश करना शुरू कर दिया। इसके बाद उच्च-तकनीकी क्षेत्रों- सेमीकंडक्टर, दवा (फार्मास्युटिकल्स), कंप्यूटर- में कदम बढ़ाने से आंतरिक स्तर पर आरऐंडडी में निवेश बढ़ने लगा। औद्योगिक शोध एवं विकास में तेजी से अधिक आधुनिक शोध प्रतिभा की जरूरत बढ़ने लगी।
ढांचे या सुखद घटना किसी भी लिहाज से सभी पांच पूर्वी एशियाई देशों की सरकारों ने सार्वजनिक वित्त पोषित आरऐंडडी में निवेश बढ़ाना शुरू कर दिया और इससे भी महत्त्वपूर्ण बात यह रही कि उन्होंने पश्चिमी देशों की तरह ही इस सार्वजनिक शोध को उच्च शैक्षणिक संस्थानों में स्थापित करना शुरू कर दिया।
इसका प्रभाव यह हुआ कि सार्वजनिक शोध लाभदायक रहा। इसका कारण यह नहीं था कि यह स्वयं में अधिक महत्त्व वाला था बल्कि श्रेष्ठ शोधकर्ता शिक्षा प्रणाली में साथ-साथ प्रशिक्षित होते गए। ये शोधकर्ता स्थानीय कंपनियों में तेजी से बढ़ते आधुनिक आंतरिक आरऐंडडी विभागों का प्रमुख हिस्सा बन गए। यह सिलसिला बढ़ता गया और प्रतिस्पर्द्धी उद्योग के बाद आधुनिक तकनीक पर पकड़ मजबूत होने लगी। कंपनियों में आंतरिक स्तर पर आरऐंडडी में निवेश बढ़ने से सार्वजनिक शोध भी होने लगे। इन देशों के आर्थिक इतिहास के अध्ययन से मैं इसी निष्कर्ष पर पहुंच पाया हूं।
1991 में आर्थिक उदारीकरण के बाद भारतीय उद्योग जगत पर प्रतिस्पर्द्धा करने का दबाव बढ़ा और देश नवाचार क्रम के पहले चरण में आ गया। इससे अगले चरण की शुरुआत वृहद अर्थ में नहीं हो पाई है। जैसा कि हमने पहले देखा था, भारतीय उद्योग आरऐंडडी पर जीडीपी का महज 0.3 प्रतिशत खर्च करने के साथ संतुष्ट रहा है जबकि वैश्विक औसत 1.5 प्रतिशत रहा है। हालांकि, कुछ क्षेत्र जरूर आगे बढ़े हैं।
वैश्विक औद्योगिक आरऐंडडी में जिन 10 प्रमुख तकनीक आधारित क्षेत्रों का दबदबा है उनमें भारत की कंपनियां औषधि एवं वाहन क्षेत्रों में कुछ हद तक मौजूद रही हैं। सर्वाधिक मुनाफा कमाने वाली हमारी कंपनियों में दवा क्षेत्र की भले ही उपस्थिति नहीं रही है मगर यह हमारे शीर्ष 50 आरऐंडडी निवेशकों की सूची में शामिल है। आरऐंडडी पर खर्च करने वाली 100 कंपनियों में 41 कंपनियों के साथ के साथ दवा क्षेत्र की भारतीय औद्योगिक आरऐंडडी पर खर्च में 34 प्रतिशत हिस्सेदारी है। इस क्षेत्र में बिक्री का 10 प्रतिशत के स्तर पर आरऐंडडी की गति विश्व के 16 प्रतिशत की तुलना में कम है मगर यह अनुपात अन्य दूसरे क्षेत्र की तुलना में शानदार है।
दवा क्षेत्र में एक विश्व स्तरीय नवाचार उद्योग लगाने की हमारे लिए सर्वश्रेष्ठ अवसर है। हमें यह करने के लिए क्या करना होगा? उद्योग जगत को अनिवार्य रूप से क्या करना चाहिए? नवाचार को समर्थन देने के लिए वृहद नवाचार तंत्र-सार्वजनिक स्वास्थ्य, आरऐंडडी गहन और नियामकीय प्रणाली को क्या किया जाना चाहिए? इन बातों की चर्चा इस आलेख के दूसरे हिस्से में होगी।
Date:24-05-23
मणिपुर की आगसंपादकीय
मणिपुर में एक बार फिर हिंसा भड़क उठी। फिर से वहां सेना को तैनात करना पड़ा। पांच दिनों के लिए इंटरनेट सेवाएं बंद करनी पड़ीं। करीब एक पखवाड़ा पहले जब हिंसा भड़की थी, तब अनेक घरों में आग लगा दी गई, कई लोग मारे गए थे। तब करीब दस हजार लोगों को हिंसाग्रस्त इलाकों से बाहर निकालना पड़ा था। उस वक्त सरकार ने उपद्रवियों को देखते ही गोली मारने का आदेश दिया था। उसके बाद करीब दस दिनों तक कोई उपद्रव नहीं हुआ, मगर सोमवार को एक बार फिर से इंफल इलाके में हिंसा भड़क उठी। बताया जा रहा है कि वहां मैतेई समुदाय के लोगों से जबरन दुकानें बंद कराई जाने लगीं, जिसे लेकर हिंसा भड़की। इस बार गनीमत है कि किसी के हताहत होने की खबर नहीं है। मगर कुछ घरों को इस बार भी आग के हवाले कर दिया गया। ऐसे में सवाल है कि मणिपुर की यह आग कब तक शांत होगी। विवाद दरअसल वहां के उच्च न्यायालय के इस आदेश पर शुरू हुआ कि उसने राज्य सरकार को मैतेई समुदाय को अनुसूचित जनजाति का दर्जा देने की दस साल पुरानी मांग पर विचार करने को कहा। इससे वहां के मान्यता प्राप्त जनजातीय समुदायों में ऐसी आशंका पैदा हुई कि सरकार मैतेई समुदाय को जनजाति का दर्जा दे सकती है और वे उनके संरक्षित भूभाग पर कब्जा करना शुरू कर सकते हैं।
मणिपुर में मुख्य रूप से तीन समुदाय के लोग रहते हैं। उनमें से नगा और कुकी मान्यता प्राप्त जनजातीय समुदाय हैं और उनका वहां के लगभग नब्बे फीसद संरक्षित पहाड़ी भूभाग पर कब्जा है। मैतेई समुदाय आबादी के लिहाज से इन दोनों जनजातियों से करीब दोगुना है, पर भूभाग का केवल दस फीसद हिस्सा उनके लिए मुक्त है। इस तरह वे मुख्य रूप से इंफल इलाके तक सीमित हैं। मगर मैतेई समुदाय हर दृष्टि से प्रभावशाली है। राजनीति में इसी समुदाय के विधायक अधिक हैं, साठ में से चालीस। 09मणिपुर में फिर बिगड़े हालात… इंफाल में घरों को किया आग के हवाले, लगाया गया कर्फ्यू, 5 दिन के लिए इंटरनेट भी बंद फिर प्रशासन में भी उन्हीं का दबदबा है। वे बरसों से मांग करते रहे हैं कि उन्हें भी जनजातीय समुदाय का दर्जा मिलना चाहिए। अगर ऐसा होता है तो मैतेई समुदाय को भी जनजातियों के संरक्षित भूभाग में प्रवेश का हक मिल सकता है। इसीलिए मान्यता प्राप्त जनजातियां आशंकित रहती हैं। इस तथ्य से वहां की सरकार अनजान नहीं है, मगर उसने कभी गंभीरता से इस मसले को निपटाने का प्रयास ही नहीं किया।
जबसे वहां नई सरकार आई है, तबसे जनजातीय लोगों में यह आशंका घर करती गई है कि वह मैतेई समुदाय को प्रश्रय दे रही है। उनकी यह आशंका तब आक्रोश में बदल गई, जब इस साल फरवरी में संरक्षित पहाड़ी इलाकों से अवैध लोगों को निकालने का अभियान शुरू किया गया। सरकार का कहना था कि बाहरी लोग वहां जाकर बस गए हैं, जबकि जनजातीय समुदायों का दावा है कि वे उन्हीं के बीच के लोग हैं। उसके बाद जब उच्च न्यायालय का आदेश आया, तो उनका आक्रोश फट पड़ा और वे आगजनी पर उतर आए। अब वहां की लड़ाई वर्चस्व की लड़ाई में बदलती जा रही है। ताजा हिंसा में जिन लोगों को गिरफ्तार किया गया है उनमें से एक पूर्व विधायक भी है, जिसका संबंध सत्तापक्ष से है। अगर वहां की सरकार इसी तरह समुदायों के बीच पैदा हुई वैमनस्यता को स्थायी रूप से समाप्त करने के बजाय तदर्थ भाव से सेना के बल पर रोकने का प्रयास करती रहेगी, तो यह आग शायद ही जल्दी शांत हो।
Date:24-05-23
निजता पर जोखिमसंपादकीय
आधुनिक तकनीकी के विस्तार के साथ-साथ सूचना और संवाद के क्षेत्र में सोशल मीडिया की भूमिका जगजाहिर है। आज हालत यह है कि दुनिया की ज्यादातर आबादी इसके दायरे में है और किसी न किसी रूप में लोग ट्विटर, फेसबुक, इंस्टाग्राम, वाट्सऐप जैसे सोशल मीडिया के मंचों का इस्तेमाल करते हैं। लेकिन इसका दूसरा पहलू यह है कि फेसबुक या अन्य सोशल मीडिया मंचों पर बेफिक्र होकर वक्त गुजारने वाले लोगों की निजता बुरी तरह प्रभावित हो रही है और इन मंचों के संचालक ऐसी लापरवाहियों के खिलाफ कार्रवाई के बावजूद खुद में सुधार को लेकर गंभीर नहीं हैं।
ताजा मामला सोशल मीडिया के मंच फेसबुक और वाट्सऐप का परिचालन करने वाली कंपनी मेटा से जुड़ा है, जिसमें उस पर निजता के नियमों के उल्लंघन का आरोप है। यूरोपीय संघ ने इस आरोप की पूरी पड़ताल के बाद मेटा को दोषी पाया और इस मामले में उस पर 1.3 अरब डालर का जुर्माना लगाया है। साथ ही यूरोपीय संघ ने उपयोगकर्ताओं से संबंधित किसी जानकारी को अमेरिका भेजे जाने पर भी रोक लगा दी। दरअसल, फेसबुक पर ऐसे आरोप लगाए गए थे कि वह उपयोगकर्ताओं की निजी जानकारी या डेटा आंग्ल-अमेरिकी खुफिया एजेंसियों के साथ साझा करती है और इसी की मदद से बड़े पैमाने पर लोगों की निगरानी की जाती है
लगभग पांच साल पहले यूरोपीय संघ में निजता के उल्लंघन से संबंधित सख्त कानून लागू होने के बाद किसी सोशल मीडिया मंच पर लगाया गया यह सबसे बड़ा जुर्माना है। इसी साल की शुरुआत में यूरोपीय संघ के डेटा से जुड़े नियमों का उल्लंघन करने की वजह से आयरलैंड ने मेटा पर 5.5 मिलियन यूरो का जुर्माना लगाया था। इससे पहले भी मेटा को निजता के नियमों का अनुपालन नहीं करने पर भारी जुर्माना देना पड़ा है। लेकिन इस तरह की सख्त कार्रवाइयों के बावजूद आम लोगों की निजता को भंग करने वाली जानकारी को मनमाने तरीके से किसी और को बेचे या भेजे जाने की प्रवृत्ति पर रोक नहीं लग पा रही है। समय-समय पर हो रही इस तरह की कार्रवाइयों से यह साफ है कि सोशल मीडिया पर अलग-अलग मंचों का परिचालन करने वाली कंपनियां अपने उपयोगकर्ताओं की निजता की न केवल सुरक्षा नहीं कर पा रही हैं, बल्कि अपनी मनमर्जी से और लोगों को जानकारी दिए बिना उनसे संबंधित संवेदनशील सूचनाएं किसी तीसरे पक्ष को बेच देती हैं या किसी परोक्ष समझौते तहत भेजती हैं। इस तरह का तालमेल सिर्फ कारोबारी मुनाफा कमाना भी हो सकता है और इसके पीछे व्यापक पैमाने पर लोगों की निजता पर निगरानी करने की मंशा भी संभव है।
यह सब जानते हैं कि लोगों के आम व्यवहार में इंटरनेट के शामिल होने का दायरा जैसे-जैसे बढ़ रहा है, वैसे-वैसे साइबर दुनिया में कई तरह के खतरे भी बढ़ रहे हैं। लेकिन आधुनिकी तकनीकी के विकास के इस चरम दौर में भी निजता और अन्य इंटरनेट उपयोग को लेकर जोखिम भी लगातार बढ़ते जा रहे हैं। कायदे से सोशल मीडिया के मंचों का संचालन करने वाले समूहों से लेकर इस तरह के अन्य संस्थानों की जिम्मेदारी थी कि वे आम लोगों की संवेदनशील जानकारियों की सुरक्षा के पुख्ता इंतजाम करें। मगर इसके बजाय वे खुद ही निजता के उल्लंघन में संकोच नहीं कर रही हैं और ऐसे करने को सही भी ठहराती हैं। सवाल है कि क्या मेटा या सोशल मीडिया के अन्य मंचों का संचालन करने वाली कंपनियां उपयोगकर्ताओं से संबंधित निजी जानकारियों को किसी तीसरे पक्ष को बेचना या भेजना ही अपने मुनाफे का जरिया मानती हैं या फिर क्या वे आम लोगों की निजता पर निगरानी के किसी व्यापक तंत्र का हिस्सा हैं?
Date:24-05-23
मणिपुर की चिंतासंपादकीय
मणिपुर की राजधानी इंफाल में सोमवार को भड़की हिंसा और आगजनी के बाद कफ्र्यू लगाने, इंटरनेट सेवाएं रद्द करने और सेना बुलाने की राज्य सरकार की विवशता समझी जा सकती है। निस्संदेह, यह दुखद स्थिति है, पर उपद्रवियों को काबू में करने का यह आखिरी रास्ता है, जिस पर कोई भी सरकार मजबूरी में ही कदम बढ़ाती है। पिछले कई हफ्तों से पूर्वोत्तर का यह सूबा अशांत है और वहां बड़ी संख्या में मैतेई व कुकी समुदाय के लोगों को हिंसा की वजह से अपने ही प्रदेश में दरबदर होना पड़ा है। अनगिनत घरों, उपासना स्थलों के राख होने और करीब 70 लोगों की मृत्यु के ब्योरे हालात की गंभीरता बताने के लिए काफी हैं। विडंबना यह है कि इस सूरते-हाल में जिन लोगों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे सामाजिक वैमनस्य व सामुदायिक खटास को मिटाने की कोशिश करेंगे, वही आग में घी डालने की कार्रवाई कर रहे हैं।
सोमवार को भड़की हिंसा के लिए एक पूर्व विधायक और उनके कुछ समर्थकों की गिरफ्तारी इसकी तस्दीक करती है। आरोप है कि पूर्व विधायक और उनके समर्थकों ने हथियार के जोर पर समुदाय विशेष के लोगों को अपनी दुकानें बंद करने को बाध्य किया, जिसके कारण इंफाल में हिंसा नए सिरे से भड़क उठी। यही नहीं, राज्य के कई सत्तारूढ़ विधायकों के सियासी सुर भी उकसाने वाले सुनाई पड़े हैं, जबकि उन्हें इस वक्त ऐसे किसी भी बयान या कदम से खास परहेज बरतना चाहिए, जो राज्य और केंद्र सरकार की शांति-स्थापना की कोशिशों को पलीता लगाते हों। इस वक्त शांति मणिपुर की पहली आवश्यकता है। इसके दो बड़े जातीय समुदायों के दिलों में एक-दूजे के लिए जो कटुता पैदा हुई है, उसे पाटने की हरमुमकिन कोशिश की जानी चाहिए। यह अफसोसनाक है कि जब केंद्र सरकार की राजनीतिक-आर्थिक सक्रियता से पूर्वोत्तर में स्थायी शांति की उम्मीदें जगने लगी थीं और लगने लगा था कि देश की मुख्यधारा से उसका जुड़ाव बढ़ रहा है, तब हिंसा के इस सिलसिले ने नई आशंकाओं और शक-शुब्हे को जन्म दे दिया है।
मणिपुर की स्थिति पर इसलिए भी विशेष ध्यान देने की जरूरत है कि पूर्वोत्तर के राज्यों का समूचा ताना-बाना एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है और इन राज्यों में कई जातीय समूहों के बीच हितों के टकराव का एक लंबा इतिहास है। ऐसे में, यदि मणिपुर के हालात लंबे वक्त तक तनावपूर्ण बने रहे, तो इसकी आंच अन्य सूबों में पहुंच सकती है। इसलिए केंद्र और राज्य सरकारों को विश्वास बहाली के लिए स्थानीय नेताओं को भरोसे में लेना चाहिए। हमने उपद्रवग्रस्त पंजाब, जम्मू-कश्मीर में यह देखा है कि ऊपर से थोपी गई रणनीति के बजाय स्थानीय कोशिशें ज्यादा प्रभावी साबित हुई थीं। पूर्वोत्तर में केंद्र सरकार ने पिछले नौ वर्षों में जितनी योजनाएं शुरू की हैं, उन्हें पूरा करने के लिए वहां शांति की दरकार है। फिर पूर्वोत्तर की सरकारों को यह नहीं भूलना चाहिए कि वे जिस ‘सशस्त्र बल विशेष शक्तियां कानून’ को हटाने के मनसूबे बांध रही हैं, यह तभी मुमकिन होगा, जब वहां स्थायी शांति की कोई सूरत नजर आएगी। वैसे भी सरहदी इलाका होने के कारण देश की सुरक्षा के लिहाज से इनमें से कई प्रांत संवेदनशील हैं। इसलिए मणिपुर में जल्द शांति बहाल हो और लोगों की जिंदगी पटरी पर लौटे, इसके लिए बीरेन सिंह सरकार को उपद्रवियों के खिलाफ सख्ती के साथ-साथ पीड़ितों के जख्म पर मरहम रखना होगा।
Date:24-05-23
फिर दिल्ली अध्यादेश और अदालतवृंदा भंडारी
बीते शुक्रवार की देर शाम राष्ट्रपति ने राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली (संशोधन) अध्यादेश, 2023 जारी किया, जिसने सेवाओं पर दिल्ली सरकार की शक्तियां छीन लीं। उसके बजाय केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त उप-राज्यपाल (एलजी) को दिल्ली सरकार के नौकरशाहों के स्थानांतरण व पोस्टिंग से जुड़े मसलों पर अंतिम फैसला लेने का अधिकार दे दिया गया। नए अध्यादेश में नौकरशाहों के ट्रांसफर-पोस्टिंग से संबंधित मुद्दों पर फैसले लेने के लिए एक वैधानिक निकाय राष्ट्रीय राजधानी सिविल सेवा प्राधिकरण का गठन किया गया है, जिसमें तीन सदस्य होंगे- दिल्ली के मुख्यमंत्री, यहां के मुख्य सचिव और प्रधान गृह सचिव। इसका अर्थ यह है कि निर्वाचित मुख्यमंत्री के फैसले को दो वरिष्ठ नौकरशाह, जो निश्चय ही जनता के चुने हुए प्रतिनिधि नहीं होंगे, वीटो या खारिज कर सकते हैं।
यह अध्यादेश सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ द्वारा 11 मई को सर्वसम्मति से पारित फैसले के मद्देनजर लाया गया है। इस फैसले में शीर्ष अदालत ने उप-राज्यपाल के बजाय लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई स्थानीय सरकार को दिल्ली की सेवाओं पर नियंत्रण का अधिकार दिया था। पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने माना था कि भूमि, पुलिस और पब्लिक ऑर्डर को छोड़कर जनता द्वारा निर्वाचित दिल्ली सरकार के पास ही नौकरशाहों के स्थानांतरण और पोस्टिंग के मुद्दे पर अंतिम विधायी और समान विस्तार वाली कार्यकारी शक्ति होनी चाहिए। अदालत के फैसले के पीछे तर्क यह था कि चूंकि सिविल सेवक सरकारी नीतियों के क्रियान्वयन में निर्णायक भूमिका निभाते हैं इसलिए निर्वाचित सरकार इतनी सक्षम होनी चाहिए कि वह अपनी सेवाओं में तैनात नौकरशाहों को नियंत्रित कर सके और उनकी जिम्मेदारी तय कर सके।
जाहिर है, ताजा अध्यादेश से प्रक्रियात्मक, औचित्य और बुनियादी मुद्दों से जुड़े तमाम तरह के सवाल पैदा हो गए हैं। सामान्यत: अध्यादेशों को संविधान के अनुच्छेद 123 के तहत तब जारी किया जाता है, जब संसद के दोनों सदनों का सत्र न चल रहा हो, और जब राष्ट्रपति को लगता है कि ऐसी परिस्थितियां पैदा हो गई हैं, जिसके लिए तत्काल कदम उठाने की आवश्यकता है। इस प्रकार, अनुच्छेद 123 बनाने के पीछे अति-आवश्यकता की भावना रही है।
सुप्रीम कोर्ट ने साल 2017 में कृष्ण कुमार सिंह बनाम बिहार सरकार के मामले में एक महत्वपूर्ण निर्णय दिया था, जिसका उल्लेख यहां उचित होगा। उस फैसले में कहा गया था कि अध्यादेश जारी करने की शक्ति राष्ट्रपति को इसलिए दी गई है, ताकि जब अप्रत्याशित हालात बन जाएं और उनसे निपटने के लिए विधायी उपायों की दरकार हो तब कोई सांविधानिक शून्य की स्थिति न बनने पाए। सात न्यायाधीशों की पीठ ने कहा था कि अध्यादेश जारी करना एक असाधारण शक्ति है, जिसका मकसद सांविधानिक जरूरतों को पूरा करना है।
आखिर वह असाधारण परिस्थिति थी क्या, जिसके लिए अभी कार्यपालिका को तत्काल हस्तक्षेप की जरूरत महसूस हुई। हमारी नजर स्वाभाविक तौर पर आठ दिन पहले दिए गए सुप्रीम कोर्ट के फैसले की तरफ जाती है। ताजा अध्यादेश का मुख्य उद्देश्य अदालती फैसले के प्रभाव को कम करना जान पड़ता है। केंद्र सरकार ने दावा किया था कि सुप्रीम कोर्ट में आने से पहले सेवाओं को नियंत्रित करने और दिल्ली में नौकरशाहों के स्थानांतरण की शक्ति में उसे सर्वोच्चता हासिल थी। जाहिर है, सर्वसम्मत फैसले में हारने के तुरंत बाद उसने यह अध्यादेश लाकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को कमतर करने का प्रयास किया है। अध्यादेश में कहा गया है कि यह इसलिए जारी किया गया है, क्योंकि यह व्यापक राष्ट्रीय हित में है कि लोकतांत्रिक रूप से चुनी गई केंद्र सरकार के जरिये पूरे देश के लोगों की कुछ भूमिका राष्ट्रीय राजधानी के प्रशासन में हो और अपनी राजधानी पर शासन करने की राष्ट्र की इस लोकतांत्रिका इच्छा को प्रभावी बनाने के लिए यह कदम उठाया जाता है। इस तरह से केंद्र ने (उप-राज्यपाल के माध्यम से) सेवाओं पर दिल्ली सरकार का अधिकार अपने हाथों में ले लिया।
यह जगजाहिर तथ्य है कि नौकरशाहों के स्थानांतरण और पोस्टिंग का अधिकार सीधे तौर पर शासन की दक्षता व प्रभावशीलता से जुड़ा होता है, क्योंकि ये (गैर-निर्वाचित) नौकरशाह ही होते हैं, जो नीतियों को जमीन पर लागू करने की व्यवस्था में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसीलिए, अध्यादेश की भाषा ऐसी जान पड़ती है कि केंद्र सब कुछ अपने हाथों में रखने के प्रयास कर रहा है, और लोकतांत्रिक जवाबदेही, प्रतिनिधि सरकार व सहकारी संघवाद के सिद्धांतों को कमतर करना चाहता है।
इस अध्यादेश को जारी करने का समय भी काफी खास है। सुप्रीम कोर्ट ने 11 मई को अपना फैसला सुनाया था और 19 मई की देर शाम अध्यादेश जारी कर दिया गया, जबकि उसी दिन शीर्ष अदालत छुट्टियों के लिए बंद हो रही थी। इसके साथ ही कुछ अन्य मसले भी इसके साथ नत्थी हैं। मसलन, अदालती फैसले के आधार को हटाकर, जो कि विधायी अधिनियम द्वारा किया जा सकता है, सुप्रीम कोर्ट के निर्णय को बेअसर करने की कसौटी पर क्या यह अध्यादेश खरा उतरता है, या सीधे-सीधे यह अदालत का विरोध है, जो अस्वीकार्य माना जाता है? अदालत को इस बात पर भी विचार करना होगा कि क्या यह अध्यादेश दिल्ली के शासकीय ढांचे से संबंधित संविधान के अनुच्छेद 239 (अ)(अ) में संशोधन किए बिना उसके फैसले को निष्प्रभावी बनाता है? सुप्रीम कोर्ट को संघवाद पर इस अध्यादेश के प्रभाव के बारे में भी गौर करना होगा, जो संविधान का एक बुनियादी हिस्सा है।
निस्संदेह, इस बात की पूरी संभावना है कि इस अध्यादेश को सुप्रीम कोर्ट के सामने चुनौती दी जाएगी। जब भी ऐसा किया जाएगा, यह लाजिमी है कि शीर्ष अदालत मामले की सुनवाई तत्काल आधार पर करे और शीघ्रता से इस मसले का निपटारा करे। देरी के कारण होने वाली न्यायिक सुस्ती कहीं इतनी लंबी न खिंच जाए कि यथास्थिति ही बनी रह जाए।
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एक समय हुआ करता था, जब सिगरेट को कैंसर और हृदय रोगों का कारण माना जाता था। आज मानव-जीवन में बढ़ते एकाकीपन को उतना ही घातक माना जा रहा है। एक बड़े चिकित्सक का मानना है कि अकेलेपन से त्रस्त व्यक्ति हृदय रोग या हृदयघात से पीड़ित हो सकता है।
जापान और अमेरिका जैसे देशों में इस समस्या से निपटने के लिए व्यय भी किया जाता है। लेकिन भारत जैसे देशों के लिए ऐसा कर पाना कठिन लगता है। इसका कारण यहाँ की सार्वजनिक स्वास्थ्य व्यवस्था का लचर होना है। एक अध्ययन के अनुसार उत्तर प्रदेश के वासी स्वास्थ्य पर होने वाले खर्च में से 71% अपनी जेब से देते हैं। ऐसे देश में एकाकीपन जैसी नगण्य समस्या के लिए राशि आवंटित करने का प्रश्न कहाँ उठ सकता है ?
भारत जैसे सांस्कृतिक विविधता वाले देश में 20 करोड़ से ज्यादा लोग मानसिक बीमारियों का शिकार हैं। वर्चुअल दुनिया में जी रहे युवाओं को अकेलेपन की समस्या अधिक है। अकेले पन से जन्मे अवसाद, चिड़चिड़ेपन, क्रोध और आत्महत्या की ओर प्रवृत्त होने वाले मामले हमारे देश में भी लगभग उतने ही हैं, जितने पश्चिमी देशों में। लगभग 42% कर्मचारी मानसिक रूप से बीमार है। इसमें सामाजिक और आध्यात्मिक संस्थाएं बहुत मदद कर सकती हैं। लोगों के समूहों को जोड़कर उन्हें अपने बारे में सोचने और बोलने में मदद कर सकती हैं। अपने परिवार और वास्तविक दुनिया के दोस्तों से जुड़कर भी अपनी भावनाओं को संतुलित किया जा सकता है।
भारत की संस्कृति और समाज में सामूहिकता पर बहुत बल दिया जाता है। अगर ऐसे समाज में अकेलापन एक समस्या बन रहा है, तो नीतिगत चिकित्सकीय दृष्टि से उस पर पर्याप्त ध्यान दिया जाना चाहिए।
विभिन्न समाचार पत्रों पर आधारित। 6 मई, 2023
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Date:23-05-23
Strangers & SecretsLatest spy scandal in DRDO shows more attention must be paid to the weakest security link: human fallibilityTOI Editorials
India’s defence research institution DRDO has asked 5,000-odd scientists to tread carefully on social media. The circular on “cyber discipline” came weeks after the arrest of Pradeep Kurulkar, a DRDO scientist at the rank of additional secretary, GoI. Kurulkar, investigators say, fell for a Pakistani “honey-trap”. The scientist is believed to have had access to over 50 DRDO establishments, including laboratories, and headed an R&D division that, among other remits, oversaw India’s missile launcher programmes. While the extent of the security breach is unlikely to be made public, it’s clear that DRDO was worried.
Cybersecurity of India’s military infrastructure is by and large comprehensive. But there are gaps in terms of cyber infra upgrades and adequate supply of tech expertise. Another point of concern is the integrity of hardware, which is largely not manufactured in India. But the weakest link is human error that has repeatedly emerged as a significant security threat. The last six years reportedly saw over 20 serving and retired army staff arrested for allegedly spying for Pakistan’s ISI. Old-fashioned “honey-traps” have morphed into social media, internet inducements, designed to exploit weaknesses of some defence and research personnel. What hasn’t changed is that once trapped, officials are blackmailed.
The army this year also issued a circular warning personnel against posting or forwarding official communication on WhatsApp, storing data on devices at home, and cautioned against strangers acting chummy. DRDO’s cyber-discipline guidelines are similar – do not entertain unknown numbers, avoid chats with unknown people, don’t share information etc. It may be a better idea to also train all military and defence research staff on how to check the IP address of the next friendly stranger who reaches out and make it mandatory for them to immediately report such encounters.
Date:23-05-23
संस्थाओं में मतभेद हो मगर एक दायरे मेंसंपादकीय
दुनिया का सबसे बड़ा व लिखित संविधान भारत का है। सैकड़ों विद्वानों ने इसे बनाया। संस्थाओं के लिए स्पष्ट भूमिका रखी। लेकिन आज इन संस्थाओं में द्वंद्व की स्थिति बनी है। गवर्नर का मुख्यमंत्री से द्वंद्व है, केंद्र का राज्यों से; केंद्रीय व राज्य विधायिकाओं में सत्ता पक्ष और विपक्ष आमने-सामने हैं। सुप्रीम कोर्ट और केंद्र के बीच एक अजीब युद्ध-रेखा खींची हुई है। कॉलेजियम ही नहीं, इसी कोर्ट द्वारा प्रतिपादित आधारभूत ढांचे के सिद्धांत के खिलाफ भी संवैधानिक पदों पर बैठे लोग जनमंचों से बोल रहे हैं। इन सब से ऊपर एक ताजा घटना अधिक चिंता का विषय है। सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ ने दिल्ली की व्यवस्था पर संविधान के आर्टिकल 239 एए (4) की पुनर्व्याख्या करते हुए कहा, ‘अगर सरकार का अपने मातहत काम करने वाले अधिकारियों पर नियंत्रण नहीं होगा तो त्रि-शृंखला वाली सामूहिक जिम्मेदारी का सिद्धांत (अफसरशाही की सरकार के प्रति, सरकार की विधायिका के प्रति और विधायिका की जनता के प्रति जवाबदेही) निरर्थक हो जाएगा। पीठ ने यह भी कहा कि प्रजातांत्रिक व्यवस्था में चुनी हुई सरकार के पास ही प्रशासन की शक्ति होती है । लेकिन फैसले के चंद दिनों में ही केंद्र ने अध्यादेश जारी कर अफसरों पर नियंत्रण के लिए नई त्रि-सदस्यीय संस्था ‘नेशनल कैपिटल सिविल सर्विस अथॉरिटी’ बना दी। दिल्ली सीएम की अध्यक्षता वाली इस संस्था में मुख्य सचिव व प्रमुख सचिव (गृह) सदस्य होंगे। इस आशय से आहूत बैठक में फैसला मौजूद और मतदान करने वालों के बहुमत से होगा। ऊंट किस करवट बैठेगा, समझना मुश्किल नहीं होगा। कार्यपालिका – न्यायपालिका के बीच मतभेद सामान्य है, लेकिन रोज ऐसा होना प्रजातंत्र के लिए घातक हैं।
Date:23-05-23
इन पांच सूत्रीय सुधारों से गवर्नेस की गाड़ी आगे बढ़ सकती हैविराग गुप्ता, ( सुप्रीम कोर्ट के वकील, अनमास्किंग वीआईपी पुस्तक के लेखक )
मोदी में सरकार ने प्रथम कार्यकाल की शुरुआत सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर अमल करते हुए नदियों को जोड़ने की परियोजना (आईएलआर) के लिए समिति बनाई थी। बगैर होमवर्क के उस प्रोजेक्ट पर आगे बढ़ने पर हजारों करोड़ के सरकारी धन की बर्बादी होती । उस समिति के सदस्य के नाते मैंने दो बड़े सुझाव दिए थे। पहला, नदियों को समवर्ती सूची में लाने के लिए संविधान संशोधन। दूसरा, नदियों में पानी के बहाव के नवीनतम आंकड़ों के लिए गणना। पहले मामले में तो सरकार ने कोई कदम नहीं उठाया। लेकिन जल स्रोतों की गणना से सही तस्वीर सामने आने से प्रोजेक्ट्स का सफल क्रियान्वयन हो सकेगा। उस समय के जल संसाधन राज्यमंत्री अर्जुन राम मेघवाल अब देश के नए कानून मंत्री हैं। वह अब न्यायिक सुधारों की गाड़ी को आगे बढ़ाकर गवर्नेस और विकास के एजेंडे को पटरी पर वापस ला सकते हैं-
पहला, जेलों में बंद गरीब कैदियों की रिहाई के लिए केंद्र सरकार ने बजट में विशेष प्रावधान किए हैं। सभी जिलों में विधिक सेवा अथॉरिटी भी हैं। लेकिन हकीकत में आनंद मोहन (पूर्व सांसद) जैसे लोग जेल से बाहर आ जाते हैं और गरीबों को जेल की सलाखें ही नसीब होती हैं। गरीब और वंचित वर्ग को न्याय दिलाने के लिए ‘आउट ऑफ बॉक्स’ ढर्रे से एक्शन की जरूरत है। सुप्रीम कोर्ट के नए फैसले से हजारों मजिस्ट्रेट का वेतन कई गुना बढ़ गया है। सुप्रीम कोर्ट के अनेक फैसलों को अमल में लाने के लिए अंडरट्रायल गरीब कैदियों की रिहाई के लिए संबंधित मजिस्ट्रेट को ओवरटाइम जिम्मेदारी देनी चाहिए। लॉ स्टूडेंट्स के साथ मिलकर कानून मंत्रालय इसे सफल बनाने का राष्ट्रीय अभियान शुरू करे तो लाखों गरीब परिवारों में खुशियों का उजाला बढ़ेगा।
दूसरा, कॉलेजियम के तहत नियुक्त जजों में शहरी वर्ग का वर्चस्व है। इससे न्यायिक व्यवस्था में असंतुलन के साथ भाई-भतीजावाद बढ़ रहा है। इसे खत्म करने के लिए जजों को नियुक्ति से पहले संविधान की तीसरी अनुसूची के तहत शपथपत्र देना जरूरी होना चाहिए। इस बारे में एनजेएसी फैसले के दौरान के एन गोविन्दाचार्य ने सन् 2015 में केंद्र सरकार और सुप्रीम कोर्ट को लिखित प्रतिवेदन दिया था। जिला अदालतों में नए जजों की संख्या बढ़ाने से पहले, हजारों रिक्त पदों को भरने की जरूरत है। उसके साथ अदालतों में जरूरी स्टाफ और इंफ्रास्ट्रक्चर मिले तो न्याय की गाड़ी आगे बढ़ेगी। हाईकोर्ट में प्रदेश की स्थानीय भाषा जानने वाले जजों की नियुक्ति होनी चाहिए।
तीसरा, संविधान के अनुसार सरकार और सुप्रीम कोर्ट के अधिकारों का स्पष्ट विभाजन है। लेकिन अदालतों का खासा समय मीडिया की सुर्खियां बटोरने वाली जनहित याचिकाओं (पीआईएल) पर जाया होता है। सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट की लिखित गाइडलाइंस के अनुसार संबंधित विभाग को लिखित प्रतिवेदन दिए बगैर पीआईएल दायर नहीं होना चाहिए। इस नियम का सख्ती से पालन हो तो लंबित मामलों के जल्द निष्पादन के साथ बेवजह की न्यायिक सक्रियता में कमी आएगी।
चौथा, कोरोना खत्म होने के बावजूद जजों और वकीलों को ऑनलाइन सुनवाई की सहूलियत है। नियमों में बदलाव के बगैर जज ऑनलाइन तरीके से घर से काम कर सकते हैं। उसी तर्ज पर पक्षकारों और कैदियों के लिए भी ऑनलाइन उपस्थिति के सिस्टम को भी बढ़ावा मिलना चाहिए। हाईकोर्ट की नई बेंचों पर निवेश करने की बजाय ई-कोर्ट के सिस्टम के विस्तार की जरूरत है। इसके लिए पासपोर्ट सेवा केंद्र की तर्ज पर हर जिले में न्याय केंद्र बनाना चाहिए। जिला अदालतों के माध्यम से हाईकोर्ट की फाइलिंग और हाईकोर्ट के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट की फाइलिंग हो सकेगी। इससे मुकदमा दायर करने के लिए गरीब लोगों को शहरों का चक्कर नहीं लगाना पड़ेगा और अदालतों में भीड़ भी कम होगी।
पांचवां, वीआईपी व रईस लोगों को बेल और गरीबों को जेल की सबसे बड़ी वजह अभिजात्य और लुटियंस सीनियर एडवोकेट्स का न्यायिक व्यवस्था में वर्चस्व है। उनकी वजह से आम लोगों के मामले दशकों तक घिसटते रहते हैं। सीनियर एडवोकेट का दर्जा सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट से मिलता है। कानून के अनुसार निजी स्कूल और अस्पतालों को गरीब और वंचित वर्ग के लोगों को एक निश्चित कोटा के अनुसार फ्री या रियायती दरों पर एडमिशन और इलाज देना होता है। इसलिए सीनियर एडवोकेट्स को भी सिर्फ पैसे कमाने की मशीन नहीं बनना चाहिए। जनता को न्याय दिलाने में सीनियर एडवोकेट्स के योगदान को सुनिश्चित करने के लिए बार काउंसिल को आगे आने के साथ सरकार को एडवोकेट्स एक्ट में जरूरी बदलाव करना चाहिए।
Date:23-05-23
एकतरफा फैसलेसंपादकीय
अर्थव्यवस्था में काले धन के प्रवाह पर नजर रखना और इस पर अंकुश लगाने के लिए उपाय करना सरकार के लिए स्वाभाविक सी बात है। तुलनात्मक रूप से अधिक परिपक्व अर्थव्यवस्थाओं में सर्वाधिक उत्पादक कार्यों को कर दायरे में लाने का पूरा ध्यान रखा जाता है ताकि कर वंचना या कर भुगतान में आनाकानी की गुंजाइश नहीं रह जाए। मगर यह पारदर्शी एवं प्रभावी तरीके से किया जाता है ताकि आम लोगों एवं करदाताओं को किसी तरह की असुविधा नहीं हो। वर्तमान भारतीय प्रशासन कई बार कह चुका है कि वह करदाताओं को परेशानी या अत्यधिक हस्तक्षेप से बचाना चाहता है। इस दिशा में सरकार ने मानव रहित कराधान (फेसलेस टैक्सेशन) सहित कई कदम भी उठाए हैं। मगर हाल में दो ऐसे अवसर आए हैं जिनसे पता चलता है कि सरकार कितनी जल्दी सुधार की दिशा से भटक जाती है।
हाल ही में 2,000 रुपये के नोट के संबंध में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की अधिसूचना ऐसा पहला उदाहरण है। आरबीआई ने पिछले सप्ताह कहा था कि 2,000 रुपये के नोट वापस लिए जाएंगे, यद्यपि इनकी वैधता बनी रहेगी। हालांकि, इस नवीनतम कदम का 2016 में की गई नोटबंदी की घोषणा से कुछ लेना देना नहीं है मगर इससे उस समय मची अफरा-तफरी की यादें एक बार फिर ताजा हो गई हैं। जब से 2,000 रुपये के नोट वापस लिए जाने की घोषणा हुई है तब से कई लोग यह समझ नहीं पा रहे है कि उनके पास ऐसे जो भी नोट हैं उन्हें कैसे बदलेंगे। ऐसी भी खबरें आ रही हैं दुकान एवं प्रतिष्ठान इन्हें लेने से मना कर रहे हैं। लोगों के मन से डर दूर करने के लिए आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास को पहल करनी पड़ी है। केंद्रीय बैंक ने कहा है कि 2,000 रुपये जारी करने का उद्देश्य पूरा हो गया है और इसकी ‘समय सीमा’ भी समाप्त हो गई है मगर यह पहल किसी विशेष अधिसूचना या 30 सितंबर की ‘अंतिम तिथि’ के बगैर भी की जा सकती थी। लिहाजा, इस बात को लेकर शक बहुत कम रह गया है कि नकदी और उच्च मूल्य वाले नकदी लेनदेन को कम से कम करना इस पहल का एक मकसद था। लेकिन सरकार 2016 के समय की नोटबंदी की तरह आम भारतीयों पर होने वाले प्रभाव को ध्यान में रखने में विफल रही।
कुछ दिनों पहले सरकार ने उदार धन प्रेषण योजना (एलआरएस) में कुछ बदलाव किए हैं। ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार ने 2,000 रुपये के नोट वापस लेने की तरह ही उसमें भी समझ-बूझ के साथ काम नहीं लिया है। एलआरएस के तहत भारतीय विदेश में निवेश या अन्य विशेष प्रयोजनों के लिए एक साल में अधिकतम 2,50,000 डॉलर तक भेज सकते हैं। अब सरकार ने ऐसे लेनदेन के लिए स्रोत पर काटे गए कर का स्तर बढ़ाने का निर्णय लिया है। अंतरराष्ट्रीय क्रेडिट कार्ड से होने वाले लेनदेन पर भी यह नियम लागू होगा। सरकार के इस कदम का काफी विरोध हुआ जिसके बाद उसने अपना रुख नरम किया है। सरकार ने कहा है कि 7 लाख रुपये से कम भुगतान 20 प्रतिशत विदहोल्डिंग टैक्स के दायरे में नहीं आएगा। यह अभी तय नहीं है कि यह सीमा कैसे लागू की जाएगी क्योंकि किसी व्यक्ति द्वारा वास्तविक समय में किए खर्च से संबंधित ब्योरा शायद ही उपलब्ध रहता है। यद्यपि ऐसे कर संबंधित व्यक्ति के साल के अंत में कर बिल में समायोजित किए जाएंगे मगर इससे कागजी माथापच्ची और अनुपालन बोझ काफी बढ़ जाएंगे।
कारोबारी व्यय से जुड़े पक्षों को स्रोत पर काटे गए कर के दायरे में लाने से भी अनावश्यक परेशानी होगी। खासकर, इससे मालिक या अपेक्षाकृत छोटे उद्यमों के कर्मचारियों के लिए झंझट बढ़ जाएगी। स्पष्ट है कि सरकार के इस कदम का उद्देश्य बेहतर प्रणाली की स्थापना किए बिना ही कर संग्रह और निगरानी बढ़ाना है। अगर सरकार वास्तविक समय में लेनदेन का ब्योरा रखने के लिए ठोस प्रयास करेगी तो इससे कर वंचना और रकम की हेराफेरी रुक जाएगी। सरकार को बार-बार अपने कदमों पर सफाई देने की शर्मिंदगी से बचने के लिए नागरिकों पर उसके निर्णयों के होने वाले प्रभावों की विवेचना पहले ही कर लेनी चाहिए। एक उपयुक्त कर प्रशासन में करदाताओं की चिंताओं के प्रति अधिक गंभीरता एवं उनकी परेशानियों को समझना पड़ता है।
Date:23-05-23
शहरों की सबसे बड़ी मजबूती संस्कृतिअमित कपूर और विवेक देवरॉय, ( कपूर इंस्टीट्यूट फॉर कंपीटीटिवनेस, इंडिया के चेयर एवं स्टैनफर्ड यूनिवर्सिटी में व्याख्याता और देवरॉय प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के चेयरमैन हैं। )
विशेषज्ञों का कहना है कि संस्कृति उतनी ही पुरानी है जितनी मानवता। मगर संस्कृति के साथ विशेष बात यह कि इसका निरंतर विकास होता रहता है। हमारा इतिहास क्या है और यह वर्तमान से किन मायनों में भिन्न है? शहरों में हम किस तरह अपने पूर्वजों के साथ जुड़ाव बरकरार रख सकते हैं?
शहरीकरण का प्रभाव किसी क्षेत्र में आबादी संरचना तक ही सीमित नहीं है बल्कि उस क्षेत्र के सांस्कृतिक ताने-बाने पर भी उतना ही दीर्घकालीन असर छोड़ता है। लोग शहरी बन सकते हैं और दीर्घ अवधि तक शहरी क्षेत्रों में रहने से विभिन्न संस्कृतियों के संपर्क में आ सकते हैं। लोग इन अवधारणाओं का आत्मसात करते हैं और उन्हें अपने साथ छोटे शहरों, गांवों में में जाते हैं। उन जगहों के लोग भी इन अवधारणाओं के प्रभाव में आ जाते हैं।
दूसरे रूप में शहरों में बाजारों के स्वरूप जिस तरह बदले हैं उनमें छोटे मगर महत्त्वपूर्ण सांस्कृतिक बदलावों की पहचान की जा सकती है। उदाहरण के लिए हम देख रहे हैं कि बड़े मॉल परंपरागत गल्ली-नुक्कड़ पर लगने वाले बाजारों की जगह ले रहे हैं। बड़े खुदरा सुविधा स्टोर खुलने से छोटे साप्ताहिक बाजार अपना अस्तित्व खोते जा रहे हैं। पिछले दो दशकों में आए इन बदलावों का शहरीकरण के साथ ही सर्वांगीण विकास से भी उतना ही वास्ता है। उपभोक्ताओं के प्रभाव से मांग की बदलती प्रवृत्ति से लोग उन प्रतिष्ठानों की तरफ रुख कर रहे हैं जहां उनकी विभिन्न प्रकार की मांगे पूरी हो रही हैं। शहरीकरण की तरह ही वैश्वीकरण के मामले में भी यह बात सटीक बैठती है। तेजी से बढ़ रही शहरी आबादी उन वस्तुओं से रूबरू हो रही है जिन्हें नियमित जिंस नहीं समझा जाता था। शहरों में रहने वाले लोग विक्रेताओं को इन वस्तुओं की सतत आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए कह रहे हैं।
ये बदलाव उतने अस्थायी नहीं हैं जितना लोग उन्हें समझ सकते हैं बल्कि वे किसी शहर में रहने के भाव को प्रभावित कर रहे हैं। धीरे-धीरे विलुप्त हो रहे छोटे बाजार का उदाहरण इन बदलावों के विरोध में या उन पुरानी परंपराओं के खिलाफ तर्क देने के लिए नहीं दिया जा रहा है। इसका आशय है कि ऐसे बदलाव न केवल अर्थशास्त्र का विषय हैं बल्कि इन्हें शहरीकरण के संदर्भ में भी समझने की चेष्टा की जानी चाहिए। ऐसे कई उदाहरण मिल सकते हैं जिनमें वैश्वीकरण की तरह ही शहरीकरण भी किसी शहर की संस्कृति में बदलाव ला रहा है। इसका उद्देश्य केवल इतना है कि शहरीकरण महानगरों के भविष्य की संस्कृति संस्कृति को नया रूप दे रहा है।
समाजशास्त्री पहले यह सोचा करते थे कि शहरीकरण ग्रामीण क्षेत्रों से शहरी क्षेत्रों की ओर आबादी के पलायन से अधिक कुछ नहीं है। इसे दूसरे शब्दों में कहें तो शहरीकरण का आशय एक भिन्न सामाजिक ढांचे में लोगों के पलायन या आगमन से है। अब हम यह भली-भांति समझ चुके हैं कि शहरीकरण प्रक्रियात्मक स्तर पर उलझा हुआ एवं बहु-आयामी है मगर हम शहरीकरण के रोजाना होने वाले असर को समझने के लिए किताबी बातों से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं। उदाहरण के लिए इस बिंदु पर विचार किया जा सकता है कि शहरीकरण के बीच सांस्कृतिक प्रारूप किस तरह बदलता है। शहरी संदर्भ में संस्कृति एवं विरासत की चर्चा ने सदैव संरक्षण एवं पुनर्स्थापन पर बहस को आगे बढ़ाया है। इस संदर्भ में शहरी विरासत में किसी क्षेत्र के परंपरागत व्यवहार और सांस्कृतिक भिन्नता के कारण नए व्यवहारों का विकास शामिल हैं। शहरी स्थानिक संरचना की भौतिक अभिव्यक्ति इस रूप में दिखती है कि किस तरह संस्कृति शहरी क्षेत्रों में जन्म लेती है। विभिन्न जातीय पृष्ठभूमियों से लोग पलायन करते हैं और शहरों में काम करते हैं जिससे नई संस्कृतियों का आपस में मेल-जोल बढ़ता है। महानगरों में संबंधित समुदायों द्वारा अपने सांस्कृतिक व्यवहारों का पालन करने से शहरी पहचान को और जीवंत बना देता है।
शहर व्यापार, संस्कृति, शोध, उत्पादकता, समाज की प्रगति, मानव जाति एवं अर्थव्यवस्था के केंद्र के रूप में काम करते हैं। संधारणीय शहरी विकास में परिवहन तंत्र, शहरी नियोजन, जल, स्वच्छता, कूड़ा प्रबंधन, आपदा-जोखिम में कमी, सूचना तक पहुंच, शिक्षा और क्षमता निर्माण आदि शामिल हैं। 2008 में ऐसा पहली बार हुआ था जब शहरी क्षेत्रों में ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में अधिक लोग रह रहे थे। इस उपलब्धि के साथ एक नई शहरी सहस्त्राब्दी की शुरुआत हुई है और अनुमान जताया जा रहा है कि 2050 तक दुनिया की दो तिहाई आबादी शहरी क्षेत्रों में रहेगी। हरेक साल लगभग 7.3 करोड़ लोग शहरों में आ रहे हैं और दुनिया की करीब आधी आबादी पहले ही शहरों में रह रही हैं। आंकड़ों के अनुसार महानगर क्षेत्र वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 70 प्रतिशत योगदान देते हैं। यूएन-हैबिटेट के अनुसार संयुक्त राष्ट्र के ‘न्यू अर्बन एजेंडा’ के साथ अब शहरों को मानव बसावटों के लिए अधिक टिकाऊ बनाकर विकसित करने, लचीला बनाने, सुरक्षित बनाने, वृद्धि एवं संपन्नता के लिए अधिक अनुकूल बनाने पर ध्यान है।
‘क्लचरः अर्बन फ्यूचर, ग्लोबल रिपोर्ट ऑन क्लाइमेट फॉर सस्टेनेबल अर्बन डेवलपमेंट’ शीर्षक नाम से यूनेस्को की एक रिपोर्ट में शहरों को अधिक टिकाऊ बनाने में और उनकी विशिष्ट पहचान में जान डालने में संस्कृति की भूमिका पर रोशनी डाली गई है। इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि अरबों लोगों तक आधारभूत ढांचा एवं सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए एक अच्छे आवास की व्यवस्था और हरित सार्वजनिक स्थान की अवश्य व्यवस्था होनी चाहिए। इनके अलावा सामाजिक अशांति एवं महामारी फैलने से रोकने में जरा भी ढिलाई नहीं बरती जानी चाहिए। नए शहरी कार्यसूची (एजेंडा) को इन एवं अन्य महत्त्वपूर्ण चुनौतियों पर अवश्य ध्यान देना चाहिए। दुनिया में बड़ी संख्या में महानगरों को देखते हुए शहरी जीवन की गुणवत्ता बनाए रखना, शहरी पहचान की रक्षा करना, स्थानीय संस्कृति को महत्त्व देना और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति, कला एवं धरोहर को टिकाऊ सामाजिक एवं आर्थिक विकास के स्तंभों के रूप में बरकरार रखना ऐसी ही एक चुनौती है।
शहरों के प्रति झुकाव, उनकी आविष्कारशीलता एवं टिकाऊ बने रहने की का श्रेय उनकी संस्कृति को जाता है। सांस्कृतिक कलाकृतियों, परंपरा एवं विरासत के कारण शहरी विकास ऐतिहासिक रूप से संस्कृति पर केंद्रित रहा है। संस्कृति के बिना शहर कंक्रीट एवं इस्पात के महज ढांचा मात्र हैं और ये सामाजिक पतन एवं बिखराव के जोखिम के मंडराते खतरे से जूझते रहते हैं। बिना संस्कृति के शहर जीवंत क्षेत्र का प्रतिनिधित्व नहीं करते हैं। संस्कृति शहरों की सबसे बड़ी मजबूती है। शहरी व्यवस्था मजबूत एवं टिकाऊ बनाए रखने के लिए शहरी नीतियों में सांस्कृतिक पहलुओं पर जोर दिया जाना चाहिए।
Date:23-05-23
गंगा का जीवनसंपादकीय
नदियों को स्वच्छ बनाने के लिए लंबे समय से चल रही तमाम योजनाओं और कार्यक्रमों के बावजूद यह अभियान अब तक कहां तक पहुंचा है, इसका अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि आज भी गंगा जैसी अहम नदी को स्वच्छ बनाने की कोई नई पहल करनी पड़ रही है। हालत यह है कि अलग-अलग मौके पर लागू दिशानिर्देशों के बावजूद कम से कम मलबा डालने पर भी रोक नहीं लगाई जा सकी है। अब एक बार फिर केंद्र सरकार ने गंगा नदी के किनारे मलबा डाले जाने या गावों का गंदा पानी नदी में गिराने से प्रदूषण का स्तर बढ़ने पर संज्ञान लिया है। इसके तहत सरकार नदी किनारे स्थित चार हजार गांवों से निकलने वाले लगभग चौबीस सौ नालों को चिह्नित करके इनकी ‘जियो टैगिंग’ करेगी। सरकार इनसे ठोस कचरा प्रवाहित होने से रोकने के लिए एक उपकरण ‘एरेस्टर स्क्रीन’ लगाएगी। यह गंगा नदी में अलग-अलग वजहों से होने वाले प्रदूषण को रोकने के अलावा किया जा रहा उपाय है। अब यह उम्मीद की जा सकती है कि इसके जरिए मानव-सभ्यता के लिए एक बेहद जरूरी नदी में फिर से जीवन भर सकेगा।
हालांकि यह अपने आप में एक सवाल होना चाहिए गंगा नदी को स्वच्छ बनाने के लिए दशकों से लागू गंगा कार्ययोजना या नमामि गंगे जैसे महत्त्वाकांक्षी कार्यक्रम और अन्य नीतियों के बावजूद आज भी इतनी बड़ी तादाद में ठोस कचरा या अन्य तरह की गंदगी बहाने वाले नालों पर कैसे रोक नहीं लग सकी। गौरतलब है कि गंगा नदी पर अधिकार संपन्न कार्यबल यानी ईटीएफ की पिछले महीने हुई ग्यारहवीं बैठक में यह जानकारी भी सामने आई कि उत्तरकाशी में सुरंग के निर्माण के कारण इसके मलबे को गंगा नदी के किनारे डाल दिया गया। इससे नदी के जल में ठोस कचरा का स्तर बढ़ गया। इससे जलमल शोधन संयंत्रों में गंदे पानी का शोधन करने में समस्याएं आ रही हैं। हैरानी की बात यह है कि करीब साढ़े तीन दशक से गंगा कार्ययोजना सहित अन्य तमाम कार्यक्रमों जैसे अभियानों के बीच क्या गंगा को प्रदूषित करने वाला यह कोई नया कारक खोजा गया है? अगर नहीं, तो इस समस्या को चिह्नित करने में इतना लंबा वक्त कैसे लग गया?
यह समझना मुश्किल नहीं है कि समस्या शायद योजनाओं या कार्यक्रमों नहीं होगी, उनके अमल में बरती गई लापरवाही या फिर गड़बड़ियों की वजह से किसी बड़ी और बेहद महत्त्वपूर्ण पहलकदमी का भी हासिल शून्य हो जा सकता है। सरकार की ओर से घोषणाएं करने में शायद ही कभी कमी की जाती है, मगर उन पर अमल को लेकर कहां चूक या लापरवाही बरती जा रही है, इस पर गौर करना कभी जरूरी नहीं समझा जाता। लगभग तीन साल पहले यह खबर आई थी कि सरकार 2022 तक गंगा नदी में गंदे नालों के पानी को गिरने से पूरी तरह रोक देगी और इस मसले पर एक मिशन की तरह काम चल रहा है। लेकिन हकीकत यह है कि इसके एक साल बाद चौबीस सौ से ज्यादा नाले चिह्नित किए गए हैं, जिनकी गंदगी और कचरे से गंगा का जीवन धीरे-धीरे छीज रहा है। यह स्थिति बताती है कि इस नदी के निर्मलीकरण के लिए चलाई जाने वाली योजनाओं की उपलब्धि वास्तव में कितनी है। नीतियों और योजनाओं के बरक्स उन पर अमल की यह तस्वीर राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी को भी दर्शाती है। अन्यथा क्या कारण है कि नदियों के प्रदूषण को दूर करने के क्रम में सबसे ज्यादा जोर गंगा को स्वच्छ बनाने पर ही दिया गया, मगर इसका हासिल आज भी संतोषजनक नहीं है!
Date:23-05-23
समूह सात सम्मेलन का हासिलविकेश कुमार बडोला
समूह सात देशों का उनचासवां सम्मेलन जापान के हिरोशिमा शहर में संपन्न हो गया। इसके साथ ही अमेरिका, भारत, आस्ट्रेलिया और जापान के क्वाड समूह ने भी अपना सम्मेलन हिरोशिमा में ही संपन्न कर लिया। क्वाड समूह की बैठक पहले आस्ट्रलिया में प्रस्तावित थी, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने घरेलू ऋण संकट के कारण क्वाड बैठक में सम्मिलित होने में असमर्थता प्रकट की थी।
जी-7 ने सम्मेलन में जिन संकल्पों को पूरा करने के लिए सामूहिक प्रस्ताव पारित किया, उनमें रूस द्वारा यूक्रेन पर थोपे गए अवैध युद्ध का विरोध करना, हर संभव तरीक से यूक्रेन का समर्थन करना, सार्वभौम सुरक्षा हेतु नाभिकीय शस्त्रों से मुक्त एक विश्व का अंतिम लक्ष्य प्राप्त करने के लिये निरस्त्रीकरण और परमाणु अप्रसार का प्रयास करना प्रमुख थे। इसके साथ ही आर्थिक उदारता और सुरक्षा के लिए समूह के विचारगत प्रस्ताव का समन्वय करना, समूह के सदस्य और बाहरी देशों के सहयोग द्वारा भविष्य की स्वच्छ ऊर्जा अर्थव्यवस्थाओं के मध्य सहयोग को बढ़ावा देना, अनुकूल वैश्विक खाद्य सुरक्षा हेतु भागीदार देशों के साथ मिलकर कार्य योजना शुरू करना भी है। वैश्विक अवसंरचनात्मक निवेश के लिए साझीदारी से गुणवत्तापूर्ण अवसंरचना के वित्तपोषण के लिए छह सौ अरब डालर एकत्र करने का लक्ष्य प्राप्त करना भी प्रमुख हैं।
इस सामूहिक प्रस्ताव में एक सशक्त और अनुकूल वैश्विक आर्थिक सुधार को बढ़ावा देने, वित्तीय स्थिरता बनाए रखने और जीविकाओं तथा सतत विकास का संवर्द्धन करने के लिए साथ कार्य करने, गरीबी कम करने तथा जलवायु और प्रकृतिगत संकट का समाधान निकालने का लक्ष्य है। सतत विकास लक्ष्यों की प्राप्ति में तेजी लाने, बहुपक्षीय विकास बैंकों (एमडीबी) को विकसित करने, अफ्रीकी देशों के साथ अपनी साझीदारी बढ़ाने तथा बहुपक्षीय मंचों पर अधिक से अधिक अफ्रीकी प्रतिनिधित्व का समर्थन करने, अपने ऊर्जा क्षेत्र के अकार्बनीकरण में तेजी लाने और नवीकरणीय ऊर्जा अपनाने पर बल है। प्लास्टिक जनित प्रदूषण को समाप्त करने तथा महासागरों की रक्षा करते हुए पृथ्वी को सुरक्षित बनाने, वन, प्रकृति और जलवायु हेतु ‘न्यू कंट्री पैकेजेज’ के माध्यम से सहयोग को अधिक करने पर जोर दिया गया है।
इतना ही नहीं, जी-7 ने दुनिया की हर प्रमुख समस्या को अपनी भावी कार्ययोजना का हिस्सा बनाया गया है। इसमें, विश्वभर में टीका निर्माण क्षमता के माध्यम से वैश्विक स्वास्थ्य क्षेत्र में निवेश करने, एक महामारी कोष बनाने, महामारी रोकथाम के लिए भावी अंतरराष्ट्रीय अनुबंध करने, सार्वभौमिक स्वास्थ्य सुरक्षा (यूएचसी) का लक्ष्य प्राप्त करने की तैयारी करने, अंतरराष्ट्रीय प्रवासन पर सहयोग बढ़ाने का संकल्प लिया गया है। इसके अलावा मानव तस्करी के विरुद्ध प्रयासों को सुदृढ़ करने, समावेशी कृत्रिम मेधा (एआइ) शासन स्थापित करने, परिचित लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुसार एआइ की विश्वसनीयता के संबंध में अपने सामान्य दृष्टिकोण और लक्ष्य की प्राप्ति करने, इस संबंध में पारस्परिक परिचालन के संदर्भ में उन्नत अंतरराष्ट्रीय संवाद स्थापित करने पर जोर है। दुनिया में कहीं भी बल या शक्तिपूर्वक क्षेत्रों की स्थिति बदलने और उस पर एकपक्षीय अधिकार के प्रयास करने तथा क्षेत्र पर अधिग्रहण करने का निषध करने, सार्वभौमिक मानवाधिकारों, लैंगिक समानता और मानव गरिमा को बढ़ावा देने, शांति, स्थिरता और समृद्धि को बढ़ावा देने में संयुक्त राष्ट्र की भूमिका और अंतरराष्ट्रीय सहयोग सहित बहुपक्षवाद के महत्त्व को दोहराने, नियम आधारित बहुपक्षीय व्यापार प्रणाली को मजबूत करने और डिजिटल प्रौद्योगिकियों के विकास के साथ तालमेल रखने जैसे संकल्प भी लिए गए हैं। जी-7 के अनुरूप, अंतरराष्ट्रीय भागीदारों के साथ एक ऐसी दुनिया बनाने का प्रयास होगा, जो मानव-केंद्रित, समावेशी और अनुकूल हो, जिसमें कोई भी पीछे न छूटे।
भारत की ओर से प्रधानमंत्री ने सम्मेलन में अपनी दस सूत्रीय कार्य योजना रखी, जिसके तहत एक समावेशी खाद्य प्रणाली तैयार कर दुनिया के सर्वाधिक अधिकारहीन लोगों पर ध्यान केंद्रित करने की आवश्यकता पर बल दिया गया। इस दस सूत्रीय कार्ययोजना में खाद्यान्न की बर्बादी कम करने, वैश्विक उर्वरक आपूर्ति शृंखला का अराजनीतिकरण, मोटे अनाज, समग्र स्वास्थ्य सुविधा का संवर्द्धन करने, डिजिटल स्वास्थ्य सुविधा को सुदृढ़ करने तथा विकासशील देशों की जरूरतों के अनुरूप अंतरराष्ट्रीय विकास माडल तैयार करने जैसे बिंदु हैं।
पहले के शिखर सम्मेलनों की तरह जी-7 का यह सम्मेलन भी औपचारिकताओं में दब गया। वास्तव में, इस तरह के सम्मेलन अपने सामूहिक उद्देश्यों को धरातल पर क्रियान्वित करने में सदा विफल रहे हैं। इसके पीछे सबसे बड़ा कारण यही है कि समूह सात के सदस्य देश एकत्र तो सामूहिक संकल्पों को पूरा करने के लिए होते हैं, पर सम्मेलन में सदस्य देशों के प्रमुखों की व्यक्तिगत रुचि अपने-अपने हित साधने में ही होती है। फिर सार्वदेशिक, सार्वभौमिक समस्याओं के लिए जो भी देश दोषी हैं, उनसे समूह के सदस्य देशों के द्विपक्षीय व्यावसायिक, आर्थिक, सामरिक और कूटनीतिक संबंध भी होते हैं। इसलिए कभी भी समूह के देश सामूहिक रूप में समस्याओं के लिए दोषी देशों के विरुद्ध कठोर अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई नहीं कर पाते हैं। यों ही समय व्यतीत होता रहता है और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय समस्याएं विसंगत से विसंगततर होती जाती हैं।
जी-7 में सम्मिलित अमेरिका, जापान, कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली और यूनाइटेड किंग्डम (इंग्लैंड) किसी न किसी रूप में चीन और रूस से दुष्प्रभावित हैं और इसीलिए इनके जी-7 के सामूहिक प्रस्तावों में हर वर्ष चीन और रूस के विरुद्ध प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप में कोई न कोई अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव भी होता ही है। इनके विपरीत विकासशील देश तटस्थ होते हैं, जो दुनिया के उसी देश के समर्थन में खड़े होते हैं, जिनसे उन्हें आर्थिक या अन्य प्रकार की सहायता मिलती है। ऐसे ही सहायकों के रूप में चीन और रूस भी सामने आते हैं। इन परिस्थितियों में भारत और आस्ट्रेलिया जैसे देश, जो विकसित होने से कुछ कदम दूर हैं, वे कई गुटों और समूहों में विभाजित देशों के लिए बड़े समर्थक या विरोधी सिद्ध हो सकते हैं। इसीलिए जी-7 हो, क्वाड या जी-20, पिछले साढ़े नौ वर्षों से भारत की भूमिका हर जगह महत्त्वपूर्ण हो चुकी है।
इसमें भारत की प्रगति की बड़ी भूमिका है। यह विश्व की चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है। फरवरी 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध प्रारंभ होने से लेकर अब तक सऊदी अरब को पीछे छोड़ कर बड़े परिष्कृत पेट्रोलियम तेल का निर्यातक बन चुका है। घरेलू अर्थव्यवस्था को स्थिर रखने, राजकीय भ्रष्टाचार का अंत करने और विश्व में मानवता के आधार पर एक स्थिर, पारदर्शी, वैध और बहुसमावेशी अर्थव्यवस्था बनने की ओर निरंतर बढ़ते भारत के प्रभाव का भला कौन-सा देश अपने हित में उपयोग नहीं करना चाहता।
जी-7 और क्वाड में चीन और रूस सम्मिलित नहीं थे, पर जी-20 में तो ये उपस्थित होंगे। इसीलिए जी-20 में दूसरा ही परिदृश्य देखने को मिलेगा। जो देश जी-7 में चीन का नाम लिए बिना हिंद-प्रशांत क्षेत्र में उसकी एकाधिकारवादिता का विरोध कर रहे हैं, वही देश उसके साथ जी-20 के इतर द्विपक्षीय वार्ता करते दिखाई देंगे। इसी प्रकार जी-7 के जो सदस्य देश यूक्रेन के समर्थन में रूस के प्रति विद्रोही बने हुए हैं, कल जी-20 में उन्हीं में से कुछ अपने हित साधने रूस के साथ द्विपक्षीय या त्रिपक्षीय वार्ता करते मिलेंगे। इस तरह की विरोधाभासी स्थितियां भला, जी-7 हो या जी-20, किसी भी समूह के लिए अपने सामूहिक लक्ष्य की प्राप्ति में कैसे सहायक हो सकती हैं! इस दृष्टि से देखने पर तो यही लगता है कि जी-7 के सार्वभौमिक उद्देश्य अभी पूरे नहीं हो सकते हैं।
Date:23-05-23
सुधार की वकालतसंपादकीय
संयुक्त राष्ट्र में सुधार को लेकर बहस और विमर्श अरसे से चला आ रहा है। भारत ने कई बार संयुक्त राष्ट्र के विस्तार को लेकर वैश्विक मंच पर अपना पक्ष रखा। इसके पांच स्थायी सदस्यों की संख्या को बढ़ाने का भी तर्क रखा, मगर हर बार उसे नकार दिया गया। अब हिरोशिमा में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जिस तरह यूएन की कार्यशैली को लेकर तेवर तीखे किए हैं, उसे नजरअंदाज करना न्यायोचित नहीं माना जा सकता है। प्रधानमंत्री ने बिना लाग-लपेट के कहा कि संघर्ष को रोकने में संयुक्त राष्ट्र नाकाम है। साफ है कि मोदी विश्व के इस सबसे बड़े मंच में सुधार की बात कह रहे हैं। वैसे भी पिछली सदी में बनाई गई वैश्विक संस्थाओं को 21 सदी के अनुरूप बनाया जाना चाहिए। जब तक इसमें मौजूदा विश्व की वास्तविकता प्रतिबंबित नहीं होती, तब तक यह मंच महज चर्चा की एक जगह (टॉक शॉप) बना रहेगा। इससे पहले, 15 मई को पूर्व स्वीडन में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा था कि हर गुजरते साल के साथ संयुक्त राष्ट्र की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े हो रहे हैंऔर इसकी बेहतरी के लिए इसमें सुधार होना चाहिए। गौरतलब है कि संयुक्त राष्ट्र को 1940 के दशक में बनाया गया था। उस समय भारत चार्टर का मूल हस्ताक्षरकर्ता था, लेकिन तब वह एक स्वतंत्र देश नहीं था और उस समय पांच देशों ने एक तरह से खुद ही स्वयं को चुन लिया था। ये पांच देश आज भी सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य हैं। रूस, ब्रिटेन, चीन, फ्रांस और अमेरिका सुरक्षा परिषद के स्थायी सदस्य हैं और उनके पास वीटो का अधिकार है। इसके अलावा दो साल के कार्यकाल के लिए 10 अस्थायी सदस्यों का चयन किया जाता है। भारत का अस्थायी सदस्य के रूप में कार्यकाल पिछले साल दिसम्बर में पूरा हुआ था। भारत सुरक्षा परिषद में सुधारों की लंबे समय से मांग करता रहा है। साफ है कि शांति बहाली के विचार के साथ शुरू हुआ संयुक्त राष्ट्र आज संघर्ष को रोक पाने में कतई समर्थ नहीं है। अस्तित्व में रहने के बावजूद संस्थाओं के शिथिल पड़े रहने से रूस-यूक्रेन समेत दुनिया में चल रहे तमाम संघर्ष को न तो खत्म किया जा सकता है और न सह अस्तित्व की वकालत की जा सकती है। दुनिया के उन देशों को भी इस बारे में संजीदगी से सोचना होगा। दुनिया बदल चुकी है, लिहाजा संस्थाओं में भी सुधार जरूरी है।
Date:23-05-23
चीन के विरुद्ध बनती व्यवस्था में भारत की बढ़ती भूमिकाहर्ष वी पंत, ( प्रोफेसर किंग्स कॉलेज लंदन )
जापान ने पिछले सप्ताह हिरोशिमा में जी – 7 शिखर सम्मेलन की मेजबानी की है, जिसमें भारत एक विशेष आमंत्रित सदस्य था । जापान में जी – 7 शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की उपस्थिति महत्वपूर्ण थी, क्योंकि इन दिनों भारत जी -20 की अध्यक्षता कर रहा है। यह भी गौरतलब है कि क्वाड की बैठक भी जापान में ही हुई, जो पहले सिडनी में होने वाली थी। जापान से ही प्रधानमंत्री मोदी पापुआ न्यू गिनी गए और वहां से सिडनी ।
जापानी प्रधानमंत्री फुमियो किशिदा के लिए यह शिखर सम्मेलन दुनिया को बदलते हुए जापान का दर्शन कराने का अवसर था । यह वह जापान है, जो अंतरराष्ट्रीय शांति व सुरक्षा में वैश्विक जिम्मेदारियों को उठाने के लिए पहले से कहीं अधिक इच्छुक है। धीरे-धीरे किशिदा जापान के सुरक्षा ढांचे को बदल रहे हैं। चीन का सैन्य उदय पहले से ही जापान के शांतिवादी रुख को चुनौती दे रहा था और अब यूक्रेन पर रूसी आक्रमण ने टोक्यो को अपनी रणनीतिक धारणाओं के मूल सिद्धांतों पर पुनर्विचार के लिए मजबूर कर दिया है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद से जापान अपनी सबसे गंभीर व जटिल सुरक्षा चिंता का सामना कर रहा है। जापान नीति के तहत यूक्रेन संघर्ष की शुरुआत से ही रूस के खिलाफ जी-7 के कदमों का प्रबल समर्थन करता रहा है।
युद्ध शुरू होने के तुरंत बाद जी-7 राष्ट्रों ने रूस पर कुछ सख्त आर्थिक प्रतिबंध लगाए और उसके बाद रूसी तेल, गैस के आयात पर प्रतिबंध लगा दिया। अभी हिरोशिमा में जी-7 के नेताओं ने कहा है कि वे युद्ध के मैदान में रूस के लिए महत्वपूर्ण वस्तुओं के निर्यात को प्रतिबंधित करने के उपाय करेंगे। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की सम्मेलन में मुख्य आकर्षण रहे। वह अमेरिका से अधिक रियायतें लेने में कामयाब रहे। वाशिंगटन ने यूक्रेन के लिए 3,750 लाख डॉलर के अपने 38वें सैन्य पैकेज की घोषणा की है।
इस बार जी – 7 के नेताओं ने चीन का नाम लिए बिना विरल एकता दिखाई है, उन्होंने बीजिंग की नीतियों को निशाना बनाया और मुकाबले का संकल्प भी लिया। विकसित दुनिया अपने व्यापार, निवेश और आपूर्ति श्रृंखलाओं को चीनी पकड़ से दूर करके चीन पर अपनी निर्भरता को कम करना चाहती है। इस लिहाज से देखें, तो भारत व अन्य आमंत्रित राष्ट्रों की वहां मौजूदगी महत्वपूर्ण थी । क्वाड शिखर सम्मेलन के चार सदस्य देशों ने यथास्थिति बदलने या अस्थिर करने या एकतरफा कार्रवाई करने की कोशिश के प्रति गंभीर चिंता व्यक्त करते हुए चीन पर निशाना साधा है।
इसके अलावा जी – 7 में वैश्विक भू-राजनीति की अति प्रतिस्पद्ध दुनिया में हाशिये पर धकेले जा रहे लोगों की चिंताओं को आवाज देने की कोशिश खुशी की बात है। यूक्रेनी राष्ट्रपति के साथ अपनी पहली आमने-सामने की बैठक के दौरान नरेंद्र मोदी ने रेखांकित किया कि यूक्रेन युद्ध न सिर्फ राजनीतिक या आर्थिक मामला है, बल्कि यह मानवीय मूल्यों से भी जुड़ा है। भारतीय प्रधानमंत्री ने इस युद्ध का समाधान खोजने के लिए जो भी संभव हो, करने का वादा किया है। हालांकि, इस समय दुनिया के एक बड़े हिस्से की चिंताएं कुछ और हैं, क्योंकि वैश्विक अर्थव्यवस्था कठिन हालात का सामना कर रही है। जापान के लिए, यूक्रेन पर जी-7 समकक्षों के साथ खड़ा होना यह सुनिश्चित करना है कि जब हिंद- प्रशांत में संकट का समय आएगा, तब पश्चिमी देश चीन के खिलाफ भी खड़े होंगे। जापान बढ़ती चुनौतियों का सामना करने के लिए आंतरिक क्षमताओं को मजबूत करने के साथ ही समान विचारधारा के देशों के साथ गठबंधन को तैयार है।
भारत और जापान, दोनों खुद को हिंद-प्रशांत क्षेत्र में मजबूत पक्ष के रूप में देखते हैं। इस लिहाज से जापान एशिया के रणनीतिक भूगोल को फिर से परिभाषित करने की जरूरत को स्पष्ट करने वाला पहला देश था और उसने संकेत कर दिया था कि भारत की सक्रिय भागीदारी बिना हिंद-प्रशांत सहयोग नहीं होगा। नरेंद्र मोदी ने अपनी जापान यात्रा के दौरान दोहराया है कि उनके एजेंडे में ऐसे महत्वपूर्ण मुद्दे हैं, जो यूरेशिया में तत्काल संकट या दुनिया भर में ऋण संकट से परे हैं। वैश्विक अव्यवस्था के लिए विश्वसनीय उत्तर खोजने की कोशिश करना जी-7 के लिए चुनौती है। ऐसा करने के लिए जी-7 को भारत जैसे नए साझेदारों की जरूरत है।
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हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने देश में तलाक से संबंधित एक अभूतपूर्व निर्णय दिया है। कुछ बिंदु –
भारत जैसे गरीब देश में लैंगिक भेदभाव बहुत अधिक है। बहुत सी महिलाएं आर्थिक रूप से स्वतंत्र नहीं हैं। ऐसे में उच्चतम न्यायालय ने तलाक के मामलों को निपटाने में ‘केयर एण्ड कॉशन’ (ध्यान और सावधानी) बरतने पर जो विशेष जोर दिया है, वह प्रशंसनीय कहा जा सकता है।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 3 मई, 2023
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Date:22-05-23
Capital ConundrumOrdinance on control of Delhi admin overturns SC’s correct argument on representative democracy.TOI Editorials
GoI last week enacted an ordinance overturning the Supreme Court’s days-old judgment that granted Delhi’s elected legislature control of bureaucracy/services and then moved the court for a review of the verdict. Many arguments are being put forward to justify the decisions. That ordinances are necessary when the executive feels a judgment overrides a fundamental priority. That many other governments have used ordinances. That governance of national capitals in many countries has involved special arrangements. That the SC judgment itself noted the Delhi government’s powers are subject to Parliament’s laws and thus the Centre is well within its right to enact a new governing body.
But the point still remains – the fundamental argument on which the SC judgment rested was that an elected government that has the popular mandate should have control over administrative services and that this control flows naturally from the meaning of representative democracy. SC also emphasised federalism in its verdict. That different governments will have different approaches to public administration is part of a big country’s federal character. As the court said: that “ideas of pragmatic federalism and collaborative federalism will fall to the ground if we are to say the Union has overriding executive powers even in respect of matters for which the Delhi legislative assembly has legislative powers. ” It’s these entirely logical SC arguments that have been overturned by the ordinance – and that’s why it is a deeply problematic decision.
The problematic nature of the ordinance isn’t mitigated by allusions to some AAP politicians’ alleged overbearing conduct visà-vis bureaucrats. If badly behaved elected politicians constituted a good reason to wrest control of administration from them, few governments in India will have the power to direct bureaucrats. Also, that Parliament’s power to enact laws on Delhi was noted by SC does not condone every such enactment. The ordinance is flawed in its staunch refusal to recognise the powers of an elected government.
Whether SC in its review will stick to the verdict of one of its constitutional benches is a fascinating question of law. But perhaps the question of how to govern Delhi cannot be settled thus. One of our columnists today makes a case for a ‘Two Delhi’ solution. Time has come to consider that or something akin to that. Delhi’s people don’t deserve this never-ending squabble.
Date:22-05-23
The Two Delhi SolutionThere’s a way out of the tussle. Centre should carve out for itself a Union Territory of New Delhi. Rest should become a new full state with its own police, administrative machinery.Arghya Sengupta, [ The writer is research director, Vidhi Centre for Legal Policy. ]
In the Shanti Parv of the Mahabharat, a dying Bhishma on his bed of arrows counsels Yudishthir on how to effectively rule Indraprasth. “Fire, debts, and enemies should be dealt with quickly and completely. If any remainder is left, they may keep growing. ” In Delhi, his wisdom, at least when it comes to political enemies, is being religiously adhered to.
GoI’s latest move is a late-night ordinance intended to reassert control over transfer and posting of bureaucrats in Delhi. That control, a subject of much past acrimony between GoI and the Delhi government, had been vested in the latter by a judgment of the Supreme Court earlier this month. In the matter of a week, the central government set up the National Capital Civil Service Authority, comprising the chief minister and two senior IAS officers, to take these calls. The final word would be with the lieutenant governor, who is appointed by the Union. The action was quick and complete, yet another measure that severely limits the powers of the Delhi government to pick its own officers.
Not contempt of court
Coming so close on the heels of a SC judgment holding to the contrary, it is natural that the first reaction of many has been to decry the move as contempt of court. But rhetorical value apart, this is mistaken at many levels. It is entirely open to democratically elected legislatures to overturn the effect of SC judgments by removing the basis for the judgment. In this case, the SC judgment itself noted that the power of the Delhi government would be subject to any law that the central government passed in this matter. This is what the central government has done by setting up the new authority.
Admittedly, its use of the ordinance power as well as its assertion that the state government shall have no exclusive powers in this matter, may be suspect. While the central government can reaffirm its own power to deal with theseissues, strictly speaking it cannot take away the state’s power to do so. But this is a technicality and challenging it in court might lead to a symbolic victory, nothing more. The central government will find other ways to achieve its aim “quickly and completely”. History shows us that when it comes to Delhi, this has usually been the pattern.
From Ambedkar to Advani
In the constituent assembly, local representative Deshbandhu Gupta evocatively pleaded Delhi’s case arguing that it could not be treated alongside other tiny chief commissioner’s provinces like Ajmer-Merwara and Panth-Piploda, as Ambedkar had proposed. Despite Gupta’s appeals, Ambedkar remained steadfast – though Delhi would be a state, Parliament would have overriding powers. This logic was taken forward by the States Reorganisation Commission in 1956. Though the Commission is known for having created a significant number of states, in Delhi’s case, it abolished the state. Its reasoning was straightforward: “The future of Delhihas to be determined primarily by the important consideration that it is the seat of the Union government. ”
The only real exception to this line of thinking was ironically a strategic move by the BJP government two decades back. In 2003, with a view to satisfy “the aspirations of the people of Delhi” Lal Krishna Advani introduced the State of Delhi Bill in Parliament. This made Delhi a full state on a par with every other state, with a nearly non-existent role forthe Union government. With this, they hoped to recapture power in the state.
However, the Congress government of Sheila Dikshit opposed the bill. Her opposition appeared to result in a shortterm victory with a return to government in the state. But it meant that statehood became a dead letter and no central government ever championed the cause again. The rest is history, reaffirmed every day through new forms of gridlock.
Road to Indraprasth
How long can this unworkable situation continue? Almost a decade on from the first AAP government in Delhi, two constitution bench judgments and regular clashes between three LGs and the CM, it is time to consider an alternative that works for all.
Since the central government has legitimate interests in ensuring protection of its own persons and property in the national capital, it should carve out for itself the Union Territory of New Delhi. This should comprise the area governed by NDMC where all major central government offices, embassies and other state landmarks like Rashtrapati Bhavan and India Gate are located. It should have its own police, municipal corporation and be directly governed by a department of the central government.
The rest of what is Delhi today – with an approximate population of 16 million people – should become a new full state of Indraprasth with its own police machinery. It should have a fully representative government and share in national revenues like every other state. Though it would be the smallest state in terms of area, in terms of population, it would be larger than 10 existing states. In terms of viability, it would produce more trade and commerce than many smaller states combined.
This solution may appear fanciful. But if indeed the Mahabharat is a holy book for those in a position of authority, they should heed another of Bhishma’s aphorisms: “A ruler may be hard as steel, but must also be soft as butter, according to the situation. ”
Date:22-05-23
Clipping Angel Wings Isn’t Cutting, But……tax not best way to reevaluate startupsET Editorials
Carve-outs for foreign investors facing angel tax will elicit amixed response from startups. True, exempting sovereigninvestors, allowing a broader spectrum of valuation methods, and the introduction of a valuation band will lessen the impact of the tax. But these are, at best, partial relief. The class of exempt foreign investors is conservative by nature, and their exposure to innately risky startups is limited. More ways to value startups do not address the issue of fair valuation being the only tax-efficient means to raise capital. The 10% safe harbour valuation may not be wide enough to cover fluctuations in macroeconomic variables. Valuation by merchant bankers could reduce the flexibility startup founders and venture capitalists have become accustomed to. Relief, while welcome, is meagre.
The government’s attempt to make startup valuations realistic through taxation coincides with an investment downturn. It risks diverting capital and entrepreneurship to friendlier jurisdictions. The cohort of India’s unicornswas unduly tilted in favour of incorporation abroad even before the imposition of angel tax on foreign investors. The original purpose of the tax was to curb pooling of unaccounted capital in the startup ecosystem. This was, subsequently, revised to include investor protection. Both these objectives will be met. But a tax is not the best way to go about it.
Particularly when the bets are on ideas. Investors with an appetite for risky innovation have their own yardsticks for valuing infant businesses. These need not conform to the officially acceptable definition of fair value. The government may be within its rights to know where the money is coming from. But it is introducing market imperfections by trying to set prices of companies. This increases constraints under which locally incorporated startups operate. Such interventions can also slow innovation in India, a market that offers enormous scope for deploying technologies like artificial intelligence (AI) based on the richness of data it is expected to generate.
Date:22-05-23
Reach Out to the Other Coast of Indo-PacificET Editorials
Be it at the Quad meeting on the sidelines of the G7 Summit in Hiroshima, Japan, or Prime Minister Narendra Modi’s bilateral with Ukraine’s President Volodymyr Zelenskyy on Saturday, India is showing its commitment to a free, open, rules-based order. Modi’s visit to Papua New Guinea, the first-ever by an Indian PM, to attend the summit of the Forum for India-Pacific Islands Cooperation (FIPIC), a partnership with 14 island nations, must be seen as a larger part of this engagement. Despite a sizeable population of Indian origin, New Delhi’s dealings with Pacific island states had been limited. Modi’s visit to Fiji, a visit by an Indian PM after 33 years, and the launch of FIPIC in 2014 changed that.
India has provided financial support, helped with capacity building through the Pacific Small Island Developing States (PSIDS) and the Coalition for Disaster Resilient Infrastructure (CDRI). However, a sustained political engagement and partnership has been lacking — the leader-level FIPIC meet was last held in 2015. India’s role as a flag bearer of the global south dovetails with its leadership in climate action. Therefore, engagement with Pacific island nations needs to be seen as the other ‘coast’ of New Delhi’s Indo-Pacific rubric as a whole.
For India to take on a more active role in this expanded IndoPacific, it has to rely on an out-of-the-box approach. Traditional foreign policy priorities will not serve when it comes to these small island nations existentially threatened by global warming. What gives India the edge over other countries is its partnership approach, building human and physical capacity with a focus on climate change and adaptation, clean energy, and capacity building when supplemented with historical ties.
Date:22-05-23
Capital quandaryDelhi’s quest for administrative autonomy is hostage to BJP-AAP rivalry.Editorial
The Centre has through an ordinance overturned a Supreme Court judgment of May 11 that held that the elected government of the National Capital Territory of Delhi had executive and legislative powers over its officials. The move has set in motion a new legal battle. The AAP government in Delhi has decided to challenge the ordinance, while the BJP government at the Centre has moved the Court to review its judgment. The National Capital Territory of Delhi Act (NCTD), 1991 created a unique administrative unit, and judicial interpretations have never completely resolved the conflicts between the Centre and the elected government of the NCTD all these years. The judgment held that Union Territories with a Legislative Assembly of their own are comparable to States, and their government’s executive powers would extend to all matters on which they are allowed to make laws. In Delhi’s case, law and order and land remained with the Centre, unlike other States. The Court also pointed out the absence of a law on services, and the lack of oversight by elected representatives over the officials under the present scheme. The ordinance purportedly removes the basis of the judgment by creating the National Capital Civil Service Authority. The Chief Minister is the chair, with the Chief Secretary and Principal Secretary, Home — both appointed by the central government — as members. The Central reclaimed all powers it lost in the judgment.
The Centre is well within its powers to overturn a judicial pronouncement through legislation. Whether the basis of the instant judgment has been removed by the ordinance remains an open question, but the more pertinent issue is the political intent of the Centre’s move. The Centre under the current BJP dispensation has been confrontational, rather than cooperative, with States in resolving governance issues. It has shown little regard for elected governments at lower levels, while claiming for itself all powers on the grounds of its electoral majority. Delhi being the national capital has to maintain a unique administrative character, and it should not be left to the exigencies of local politics. Equally, the voters of Delhi cannot be disenfranchised for extraneous reasons. The irony is that AAP itself has been a votary of centralisation, though it could swing to provincialism to suit its leaders in a changed situation. The AAP government had resorted to provincialist rhetoric in the past, also going to the extent of questioning the rights of people from other States to access health care and education in the national capital. It was also a cheerleader of the Centre’s brazen move that dismantled the State of Jammu and Kashmir into two Union Territories. Democracy and federalism are threatened by an unprincipled hunger for power, and AAP is both villain and victim.
Date:22-05-23
टकराव की शक्तिसंपादकीय
दिल्ली सरकार में अधिकारियों की तैनाती और तबादले को लेकर सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ का फैसला आया, तो लगा कि अब केंद्र और दिल्ली सरकार के बीच टकराव की नौबत नहीं आएगी। संविधान पीठ ने कुछ को छोड़ कर सभी विभागों के अधिकारियों के चयन और तबादले का अधिकार दिल्ली सरकार को दे दिया। मगर केंद्र सरकार को वह फैसला रास नहीं आया। शुक्रवार को उसने अध्यादेश जारी कर दिल्ली सरकार के अधिकारों का अधिग्रहण कर लिया। अधिकारियों की तैनाती और तबादले के लिए राष्ट्रीय राजधानी लोकसेवा प्राधिकरण का गठन कर दिया गया, जिसके अध्यक्ष दिल्ली के मुख्यमंत्री को और दो अन्य सदस्यों के रूप में प्रधान सचिव और केंद्रीय गृहमंत्रालय के प्रधान सचिव को नामित कर दिया गया। नियम बनाया गया कि सदस्यों के बहुमत के आधार पर नियुक्तियों और तबादलों से संबंधित फैसले होंगे। जाहिर है, इस आयोग में भी केंद्र सरकार की शक्ति अधिक रखी गई है, यानी केंद्र सरकार जिसे चाहेगी वही अधिकारी दिल्ली सरकार में तैनात किया जा सकेगा। इसे लेकर स्वाभाविक ही विपक्ष और मुख्य रूप से आम आदमी पार्टी ने विरोध शुरू कर दिया है। दिल्ली सरकार इस अध्यादेश को अदालत में चुनौती देगी। मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल आश्वस्त हैं कि यह अध्यादेश अदालत में एक दिन भी नहीं टिकेगा।
यह बात किसी को भी गले नहीं उतर रही कि आखिर केंद्र सरकार क्यों इस जिद पर अड़ी है कि दिल्ली सरकार को एक चुनी हुई सरकार के अधिकार हासिल न होने पाएं। वह उसकी सारी प्रशासनिक शक्तियां अपने हाथ में क्यों रखना चाहती है। शुरू से ही, दिल्ली के जो भी उपराज्यपाल नियुक्त हुए, वे केंद्र की इच्छाओं के अनुरूप ही काम करते रहे। इसे लेकर दिल्ली सरकार लगातार केंद्र पर आरोप लगाती रही कि वह उसे काम नहीं करने दे रही। पांच साल पहले भी वह अदालत गई थी कि उसके अधिकारों की व्याख्या की जाए। तब भी अदालत ने यही कहा था कि दिल्ली सरकार लोगों द्वारा चुनी हुई सरकार है, इसलिए उसे प्राशासनिक फैसले करने का अधिकार है। मगर किसी भी उपराज्यपाल ने उसे गंभीरता से नहीं लिया। वर्तमान उपराज्यपाल ने तो एक तरह से दिल्ली सरकार के सारे अधिकार अपने हाथों में लेने की कोशिश की। नगर निगम में भी उन्होंने संवैधानिक नियमों को ताक पर रखते हुए अपनी पसंद के दस सदस्य मनोनीत कर दिए। इसे भी सर्वोच्च न्यायालय ने अनधिकार चेष्टा करार दिया। फिर भी केंद्र ने अदालत के फैसले का सम्मान करना जरूरी नहीं समझा।
सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने उपराज्यपाल और चुनी हुई सरकार की शक्तियों की स्पष्ट व्याख्या कर दी थी, फिर भी केंद्र को वह रास नहीं आई, तो इससे यह भी जाहिर होता है कि उसे न तो संविधान के नियमों की परवाह है और न अदालत की संविधान पीठ का। आखिरकार वह अपने ही फैसले लागू करना चाहती है। इससे एक बार फिर केंद्र सरकार की किरकिरी हुई है। अब आम आदमी पार्टी को बैठे-बिठाए एक और मुद्दा मिल गया है भाजपा और केंद्र सरकार को घेरने का। इससे आम लोगों में केंद्र सरकार के कामकाज को लेकर कोई अच्छा संदेश नहीं गया है। लोकतंत्र में संविधान सर्वोपरि होता है और अगर कोई सरकार उसे दरकिनार करके अपनी जिद को ऊपर रखने का प्रयास करती है, तो उससे उसका पक्ष कमजोर ही होता है। अगर केंद्र के इस अध्यादेश को अदालत ने निरस्त कर दिया, तो फिर और किरकिरी होगी।
Date:22-05-23
दूर करना होगा भ्रमसंपादकीय
भारतीय रिजर्व बैंक ने 2,000 रुपए के नोट को चलन से बाहर करने की बीते शुक्रवार को घोषणा की। हालांकि इस मूल्य के नोट बैंकों में जाकर 30 सितम्बर तक जमा किए जा सकेंगे या बदले जा सकेंगे। रिजर्व बैंक ने एक बयान में कहा कि अभी चलन में मौजूद ये नोट 30 सितम्बर तक वैध मुद्रा बने रहेंगे। इसके साथ ही केंद्रीय बैंक ने बैंकों से 2,000 रुपए का नोट देने पर तत्काल प्रभाव से रोक लगाने को कहा है। इस घोषणा के बाद से ही लोगों को इसे बदलवाने में जिस तरह की परेशानी हो रही हैं, उससे लगता है कि यह फैसला जल्दबाजी में लिया गया है। बिना सोचे-समझे किया गया है। जनहित को प्रभावित करने वाले फैसले को एकाएक घोषित करने से पूर्व इसके प्रभाव एवं परिणाम का समुचित अध्ययन जरूरी है। मुद्रा और वैश्विक बाजार में उसकी कीमत का संबंध देश के हित एवं प्रतिष्ठा से जुड़ा होता है। ऐसे में करेंसी नोटों को बदले जाने या उन्हें चलन से बाहर करने और नये नोट चलन में लाने संबंधी तमाम फैसले एकाएक नहीं होने चाहिए। गौरतलब है कि नवम्बर, 2016 में एकाएक नोटबंदी की घोषणा के बाद दो हजार और पांच सौ रुपये के नये नोट जारी किए गए थे। बाद में अन्य राशियों के नए नोट भी जारी किए गए। पांच सौ रुपए के नये नोट को लेकर जनता को कोई परेशानी नहीं थी, लेकिन उसी समय लगने लगा था कि रोजमर्रा के भुगतान में 2 हजार रुपए के नोट का उपयोग दिक्कत भरा रहने वाला है। बाद में देखा भी गया कि सौ-दो सौ रुपये के सामान की खरीदारी पर भी दुकानदान 2000 रुपये का नोट स्वीकारने में आनाकानी करते थे। हालांकि ऑनलाइन भुगतान जैसे माध्यम और डिटिजलीकरण बढ़ने से यह समस्या तो नहीं रही, लेकिन यह जरूर देखा जा रहा था कि रोजमर्रा के जीवन में आम जन के लिए यह नोट खपाना या चलाना सरदर्द से कम नहीं होता। आम तौर पर यह नोट समस्या का सबब बना रहता है। अब इसे चलन से बाहर करने की कवायद शुरू हो चुकने के बाद अफरातफरी जैसी स्थिति है । लोग बैंकों और पेट्रोल पम्पों पर तो इन्हें चला पा रहे हैं, लेकिन ज्यादातर जगहों पर लोग इनके जरिए भुगतान स्वीकारने में रुचि नहीं दिखा रहे । कई जगहों पर तो लोगों में नोक-झोंक तक देखी गई है। बेशक, यह बात भी पक्की हो रही है कि जल्दी-जल्दी इस प्रकार के बदलाव जनता की परेशानी ही बढ़ाते हैं । एकाएक बदलाव करने की जल्दबाजी आमजन के हित में नहीं होती। 2016 में नोटबंदी के बाद यह बात साबित हुई थी और अब दो हजार के नोट के संबंध में एकाएक घोषणा किए जाने के बाद भी हो रही है।
Date:22-05-23
नई तकनीक को लेकर होने लगी चिंताओं की बरसातहरजिंदर, ( वरिष्ठ पत्रकार )
तकनीक और आशंकाओं का चोली-दामन का साथ रहा है। किसी भी बड़ी तकनीक का आगमन एक तरफ उम्मीदों के ज्वार जगाता है, तो दूसरी तरफ हाय-तौबा की गुंजाइश भी बनाता है। कई बार यह हाय-तौबा उम्मीदों से ज्यादा बड़ी और बहुत बड़ी हो जाती है। इन दिनों यही हो रहा है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, यानी एआई को लेकर हो रही चिंताओं की बरसात में उम्मीदों के नामलेवा लगातार कम होते जा रहे हैं।
खुद एआई विकसित करने वालों के भी विकेट गिर रहे हैं। कुछ समय पहले आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के पितामह माने जाने वाले ज्योफ्री हिंटन ने गूगल से इस्तीफा दे दिया। इसके साथ ही यह बयान भी नत्थी कर दिया कि एआई के लिए अपने योगदान पर उन्हें पछतावा है। सबसे लोकप्रिय एआई एप्लीकेशन चैट-जीपीटी के आला अधिकारी सैम अल्टमैन ने पिछले सप्ताह बयान दिया कि एआई का नियमन करना अब बहुत जरूरी हो गया है। ऐसी बहुत सारी चिंताएं कंप्यूटर से बनाई गई कृत्रिम बुद्धि के नैतिक पक्ष को लेकर हैं, और बहुत सारी इसकी वजह से होने वाले निजता के उल्लंघन को लेकर। एक तीसरी चिंता भी है- एआई की कोख से जन्म लेने वाली बेरोजगारी की। दुनिया की तमाम अर्थव्यवस्थाओं पर जिस तरह के बादल मंडरा रहे हैं, उसमें यह चिंता कुछ ज्यादा बड़ी हो गई है।
इस बार जो नई तकनीक पधार रही है, उसका असर अगर किसी वर्ग पर सबसे ज्यादा पड़ने वाला है, तो वह है समाज का पढ़ा-लिखा तबका। बाद में यह तकनीक कहां जाएगी, हम अभी ठीक से नहीं जानते, फिलहाल यह सबसे पहले लेखकों, पत्रकारों, साहित्यकारों, चित्रकारों, वकीलों, डॉक्टरों, सॉफ्टवेयर इंजीनियरों, शोधकर्ताओं, अध्यापकों और यहां तक कि वैज्ञानिकों व अर्थशा्त्रिरयों की जगह लेने को बेचैन दिख रही है। एक भारतीय न्यूज चैनल पर इन दिनों एक एआई एंकर मौसम का हाल बताती दिखाई देती है। उम्मीद की जा रही है कि जल्द ही वह खबरें पढ़ने और यहां तक कि तमाम विषयों पर बहस कराने के काम करती भी दिखाई देगी। टीवी एंकर के पेशे पर इस तरह का खतरा मंडराएगा, इसे कुछ महीने पहले तक किसी ने सोचा भी न था।
ये ऐसे वर्ग हैं, जिन्हें आज तक कोई तकनीक छूने की हिम्मत नहीं कर सकी। किसी तकनीक में ऐसी क्षमता और योग्यता थी भी नहीं। पर अब जो तकनीक आ रही है, उसमें क्षमता और योग्यता तो है ही, साथ ही इन पेशेवरों से ज्यादा कार्य-कुशलता भी है। ये समाज के ऐसे वर्ग हैं, जिनकी आवाज मायने रखती है और जो जनमत तैयार करने में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। जनमत तैयार करने की व्यवस्थाएं भी इन्हीं के नियंत्रण में रहती हैं। इसी कारण दुनिया के तकरीबन हर तरह के बुद्धिजीवी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का विरोध करते नजर आ रहे हैं। बुद्धिजीवी विरोध कर रहे हैं, पर मजदूरों के ट्रेड यूनियन चुप्पी साधे हुए हैं।
बेरोजगारी को लेकर मोटे तौर पर दो धारणाएं रही हैं। परंपरागत सोच यह कहती है कि लोगों का निठल्लापन ही उन्हें बेरोजगार बनाता है, यानी अगर कोई बेरोजगार है, तो इसमें दोष उसी का है, किसी और का नहीं, मगर आधुनिक अर्थशास्त्री मानते हैं कि बेरोजगारी व्यक्ति की कर्मण्यता का नहीं, अर्थव्यवस्था के कारगर होने का मामला है। जहां बडे़ पैमाने पर बेरोजगारी हो, वहां अगर दोष किसी को दिया जा सकता है, तो आर्थिक नीतियों और उन्हें बनाने वाले राजनेताओं को ही। यह बात अलग है कि अक्सर इसका दोष तकनीक पर मढ़ दिया जाता है।
एआई ऐसी दुनिया में आ रही है, जिसके पास अपनी बेरोजगारी की समस्या का पक्का इलाज नहीं है। ऐसे समाज को हरेक नई तकनीक डराती है। एआई भी इसका अपवाद नहीं है। ठीक यहीं एआई को लेकर एक अन्य समस्या भी है। हमने पिछली सदी में लोगों को यह समझाने की कोशिश की है कि पढ़ोगे-लिखोगे तो बनोगे नवाब। बेरोजगारी की समस्या जरूर है, पर लोग यह समझने लगे हैं कि पढ़कर ही वे सम्मानजनक रोजगार हासिल कर सकते हैं। लेकिन अब सबसे ज्यादा पढ़े-लिखे लोगों के रोजगार पर ही संकट मंडरा रहा है। इसीलिए एआई को ऐसी तकनीक माना जा रहा है, जो बहुत से स्थापित स्तंभों और मान्यताओं को उखाड़ देगी।
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पूरी दुनिया में एक ऐसा वातावरण बनाने की आवश्यकता पर राजनीतिक रूप से आम सहमति है, जहां किसी के अवसर को उसके जन्म तक सीमित न किया जाए। लेकिन जब वास्तविकता के धरातल पर ऐसा करने की बात आती है, तो असहमति ही दिखाई देती है।
उदाहरण के लिए 1990 के दशक के मध्य में, अरबपति टेक निवेशक पीटर थिएल ने अपनी पुस्तक ‘द डाइवर्सिटी मिथ’ में बताया है कि बहुसंस्कृतिवाद के नाम पर अमेरिकी विश्वविद्यालयों में उत्कृष्टता को कैसे कम किया जा रहा है। उनका यह भी कहना है कि समाज में फैले असमानता जैसे गंभीर मुद्दों से हमारा ध्यान हटाने के लिए विविधता (डायवर्सिटी) और पहचान (आईडेंटिटी) की राजनीति खेली जाती है।
भारत में इस स्थिति को बढ़ते देखा जा सकता है। आरक्षण का दायरा लगातार फैल रहा है। कई और समुदायों को विभिन्न आरक्षित सूचियों में शामिल कर लिया गया है। अब और भी अधिक जातियां, राजनीतिक दलों के संरक्षण के साथ इस सूची में आने के लिए आंदोलन कर रही हैं। पहचान की राजनीति करने वाले ये दल, थिएल के सिद्धांत को भले ही न मानें, लेकिन उनके अपने विकास ने सरकार में विविध आवाजों की जगह बना दी है। इसी प्रकार से, निजी क्षेत्र में भी यह माना जाने लगा है कि विविधता से बेहतर व्यावसायिक निर्णय लिए जा सकते हैं। हालांकि इस विचार के फलने-फूलने में अभी समय लगेगा।
असमानताओं से निपटने के प्रश्न पर तो हम विफल ही हैं। एक ओर जातिगत पहचान गहरी होती जा रही है, तो दूसरी ओर आय की असमानता बढ़ती जा रही है। सामाजिक गतिशीलता पर केवल एक प्रकार के प्रतिबंध की पहचान करने के बजाय, हमें इस बात पर सहमत होना चाहिए कि अवसर की कोई भी कमी किसी व्यक्ति की अपनी पूरी क्षमता तक जीने की क्षमता को प्रभावित करती है। यह किसी अर्थव्यवस्था की मध्यम अवधि की विकास क्षमता को सीमित करती है, जो बदले में व्यक्तियों के बीच आय की असमानता को बढ़ाती है। इस प्रकार यह दुष्चक्र चलता जाता है।
नीति निर्माताओं और उद्यमों को चाहिए कि वे इतिहास में हुए अन्यायों को व्यर्थ में ही ठीक करने के बजाय ऐसी नीतियों पर ध्यान दें, जो अवसर की समानता को बढ़ाएं।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 1 मई, 2023
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Date:20-05-23
Allopathy PlusIntegrative medicine is well worth researchingTOI Editorials
Last week, the Indian Council of Medical Research and GoI’s ayush ministry signed an MoU to promote and collaborate on integrative health research. Ayush is an umbrella term for relatively popular medicine systems outside allopathy. It encompasses dissimilar approaches such as ayurveda and homeopathy. Integrating allopathy with alternative approaches under the banner of integrative medicine has a long history. Long enough to spawn multiple dedicated journals. However, the equation remains uneasy as there are significant differences in the underlying approach to treatment.
Integrative medicine represents an attempt to go beyond dealing with symptoms. This makes practitioners of modern medicine wary because their system rests on standardisation. That discomfiture has however not deterred attempts at integration as research suggests that there is complementarity, particularly when it comes to picking adjunctive therapy to cope with symptoms such as chronic pain. For example, in 2012, doctors at AIIMS started research to see where yoga could effectively complement conventional treatment. The main fault-line between different approaches is the importance of randomised controlled trials in allopathy to establish the safety and efficacy of treatments. Other therapies don’t easily lend themselves to RCTs, inducing a level of scepticism among doctors.
Alternative therapies have survived the test of time and are often used in India by patients who also have access to allopathy. It’s not uncommon to find patients taking recourse to more than one kind of treatment. Given that, carrying out more research in these fields makes sense. However, it’s important that regulatory authorities curb misinformation on efficacy and risks. There are no magic cures. Alternative medicine shouldn’t lead to regulatory laxity.
Date:20-05-23
Humans-AI, Bhai-BhaiEncourage AI and society to co-evolveET Editorials
Online and offline training institutes are facing a scramble for courses in artificial intelligence (AI) and machine learning (ML), which have demonstrated society-altering possibilities since the launch late last year of ChatGPT. Technology giants are racing to incorporate chatbots trained on large language models (LLM) into their products. Universities have pumped up budgets for creating new courses and hiring faculty. Governments are allocating resources for certifying AI training. School children with no formal exposure to ML are using it to get ahead in exams. There is a gold rush in education to skill tomorrow’s workers to collaborate with AI. Individuals are lining up to ‘learn’ AI like earlier generations signed up to have shorthand and typing skills on their CVs.
Some of this is hype. Algorithms trained to deliver conversational applications are new. They tend to throw up inaccurate answers more often than their highlighted success with cracking legal and medical examinations. AI’s performance in open-ended environments is questionable. Best outcomes are available when human intelligence directs it to problems it can tackle. These are in the nature of better-informed micro-decisions that require data analytics beyond human capability. The big picture remains the forte of humans. This is unlikely to change as machines do not have the power to ask the right questions. Yet. Much like typewriting speed being no indicator of a person’s ability to write a novel.
Yet, harnessing AI requires human minds to interact with it from an early age. School boards banning its use are being shortsighted. The syllabus needs to adapt to train children to use AI to solve more complex problems. Denying AI access in formal schooling while allowing a parallel system that offers training in how to game the system is a lose-lose solution. Society is moving into a phase of augmented intelligence where man-machine coordination will be superior to either form of intelligence independently. AI must not be grafted to society. They should co-evolve.
Date:20-05-23
A change for the betterThe shifting of Kiren Rijiju from Law Ministry should end conflict with judiciaryEditorial
It is difficult not to see the removal of Union Minister Kiren Rijiju from the Law and Justice Ministry as a move by Prime Minister Narendra Modi to avoid any escalation in his regime’s confrontations with the judiciary in the one year left in his current tenure. Other considerations may have been at work in the shifting of Mr. Rijiju to the Ministry of Earth Sciences and the appointment of Arjun Ram Meghwal as Minister of State, with independent charge, in the Law Ministry, but the marked decline in Mr. Rijiju’s frequent fulminations against the Supreme Court collegium do indicate a desire to tone down his penchant for confrontation. While there is inaction or delay on the part of the government on some recommendations, quite a few appointments, including in the Supreme Court, have been made since February, indicating a thaw in the frosty relations between the executive and the judiciary. Apart from his vocal criticism of the collegium system of appointments, which many others indeed see as flawed and in need of reform, Mr. Rijiju had tended to voice unusually trenchant opinions not befitting one holding a portfolio that involves dealing with members of the superior judiciary. He once accused a few retired judges of being “an anti-India gang” who were trying to make the judiciary play the role of an opposition party. On another instance, he voiced concern over the collegium making public some intelligence inputs on the basis of which candidates recommended for appointment were deemed unsuitable by the government.
In choosing Mr. Meghwal, who represents the reserved constituency of Bikaner in Rajasthan, Mr. Modi may have also been looking for a suitable opportunity to accommodate a Minister from Rajasthan in a portfolio with a higher profile. The Rajasthan Assembly elections are due around the end of the year. Mr. Meghwal has begun his stint with an observation that there is no confrontation with the judiciary and that his priority would be to ensure speedy justice for all. One issue that requires resolution is the finalisation of a fresh Memorandum of Procedure for judicial appointments. Mr. Rijiju had said earlier this year that the government had emphasised to the Supreme Court the need for finalising the procedure soon. He had also mooted the idea of a ‘search-cum-evaluation committee’, with a government representative on it, for the appointment of Supreme Court judges and Chief Justices. It is expected that the government will continue to accord great importance to these two issues. While pursuing such initiatives, the government should avoid giving the impression that it wants to gain absolute control over the appointment of judges.
Date:20-05-23
लोकतंत्र में अभिव्यक्ति की आजादी सर्वोपरि हैसंपादकीय
सुप्रीम कोर्ट ने विवादास्पद फिल्म ‘द केरल स्टोरी’ पर ममता सरकार द्वारा लगाए प्रतिबंध पर स्थगनादेश दिया है और साथ ही तमिलनाडु सरकार को कहा है कि वह इस फिल्म को दिखाने वाले सिनेमा घरों की सुरक्षा सुनिश्चित करे। एक धर्म-विशेष की लड़कियों को कथित लव जिहाद के जरिए फंसाने, धर्मांतरण कराकर आईएसआईएस में शामिल कराने पर बनी इस फिल्म के ट्रेलर में पिछले दस साल में 32 हजार ऐसी लड़कियों के शिकार होने का आंकड़ा दिया गया है। इस आंकड़े का कोई प्रूफ न देने के कारण कोर्ट ने इस पर डिस्क्लेमर देने को कहा है। स्पष्ट आंकड़े का मतलब है- सुविचारित, वैज्ञानिक और व्यावहारिक अध्ययन। ऐसे आंकड़ों के स्रोत होते हैं राज्यों और केंद्र के क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरोज, एनआईए, दूतावास और विदेश मंत्रालय की रिपोर्ट । अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र का अपरिहार्य अंग है। सभी साहित्य सर्जना इसी आधार पर होती है, लेकिन सत्य का भ्रम नहीं होना चाहिए। तमिलनाडु में सिनेमा घर फिल्म को हिंसा के डर से नहीं दिखा रहे हैं। वहीं पश्चिम बंगाल सरकार प्रतिबंध का ठोस कारण नहीं दे पाई। कोर्ट के अनुसार शांति बहाली सरकार की जिम्मेदारी है। यानी दोनों राज्यों में अभिव्यक्ति की आजादी को कोर्ट ने सर्वोपरि माना।
Date:20-05-23
रिकार्ड रक्षा उत्पादनसंपादकीय
वित्त वर्ष 2022-23 में रक्षा उत्पादन का कुल मूल्य एक लाख करोड़ रुपये के आंकड़े से अधिक रहना एक उपलब्धि है। विशेष बात यह है कि निजी क्षेत्र की कुछ रक्षा इकाइयों से आंकड़ा मिलने के बाद इस मूल्य में बढ़ोतरी होने का अनुमान है। चूंकि यह पहली बार है, जब देश का रक्षा उत्पादन एक लाख करोड़ रुपये के पार पहुंचा, इसलिए यह एक मील का पत्थर है। यद्यपि यह पिछले वित्त वर्ष में ही स्पष्ट हो गया था कि एक लाख करोड़ रुपये के आंकड़े को छू लिया जाएगा, फिर भी ताजा आंकड़ा रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भर होने की दिशा में एक उल्लेखनीय कदम है। इसका श्रेय सरकार की ओर से उठाए गए प्रोत्साहन के उपायों को तो जाता ही है, उस पहल को भी जाता है, जिसके तहत निजी क्षेत्र को रक्षा सामग्री के उत्पादन में भागीदार बनाया गया। इसे इससे समझा जा सकता है कि पिछले सात-आठ वर्षों में उद्योगों को दिए गए रक्षा लाइसेंस में दो सौ प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई है। यदि देश को रक्षा उत्पादन के मामले में सचमुच आत्मनिर्भर बनना है तो इस सिलसिले को कायम रखते हुए निजी क्षेत्र को और अधिक प्रोत्साहन देना होगा तथा एक स्वस्थ प्रतिस्पर्धा पैदा करनी होगी। इस प्रतिस्पर्धा के कैसे नतीजे मिल सकते हैं, यह इससे साफ होता है कि वित्त वर्ष 2022-23 में रक्षा निर्यात 16,000 करोड़ रुपये तक पहुंचा। भारत इस समय 85 से ज्यादा देशों को रक्षा सामग्री का निर्यात कर रहा है।
यह स्वागतयोग्य है कि रक्षा उत्पादन क्षेत्र में कारोबारी सुगमता को बढ़ाने के साथ एमएसएमई एवं स्टार्टअप की भागीदारी के जरिये रक्षा उत्पादों के स्वदेशी डिजाइन, विकास एवं विनिर्माण को बढ़ावा देने का काम किया जा रहा है। इस पर आश्चर्य नहीं कि वित्त वर्ष 2024-25 तक 25 अरब डालर यानी 1.75 लाख करोड़ रुपये के रक्षा उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है। इसमें 35,000 करोड़ रुपये के सैन्य उत्पादों का निर्यात करने का लक्ष्य भी शामिल है। यह ध्यान रहे कि रक्षा सामग्री के देश में ही उत्पादन के बाद भी भारत सैन्य उत्पादों का बड़ा आयातक है। एक अनुमान के अनुसार अगले पांच वर्षों में भारतीय सैन्य बलों को 130 अरब डालर मूल्य के रक्षा उपकरण खरीदने हैं। चूंकि यह एक बड़ी राशि है, इसलिए स्वदेश में रक्षा उत्पादन के अभियान को और गति देनी होगी और ऐसा कोई लक्ष्य तय करना होगा, जिससे रक्षा सामग्री के आयात में अच्छी-खासी कमी की जा सके। यह सही है कि भारत तमाम प्रयासों के बाद भी हाल-फिलहाल अपनी आवश्यकता की हर सामग्री का उत्पादन नहीं कर सकता, लेकिन सरकार के नीति-नियंताओं को यह तो देखना ही होगा कि वे हथियार और रक्षा उपकरण देश में कैसे निर्मित हों, जिन्हें आसानी से बनाया जा सकता है। सरकार का उद्देश्य रक्षा सामग्री के आयातक के बजाय निर्यातक बनने का होना चाहिए।
Date:20-05-23
मानव जीवन के लिए खतरा नहीं एआइसचिन श्रीधर, ( लेखक भारतीय पुलिस सेवा के पूर्व अधिकारी हैं )
पिछले दिनों चैटजीपीटी के जनक सैम आल्टमैन ने कहा कि टेक कंपनियां जिस तरह एआइ (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी कृत्रिम बुद्धिमत्ता) के प्रयोग को तेजी से बढ़ावा दे रही हैं उससे दुनिया खतरे में पड़ सकती है। इसलिए सरकारों को इस पर नकेल कसनी होगी। यह स्वीकार करने में कोई संकोच नहीं कि आज एआइ की हर तरफ चर्चा हो रही है, लेकिन इसके बारे में लोगों की समझ काफी कम है। उन्हें लग रहा है कि भविष्य का संसार एआइ ही चलाएगी। इस धारणा की पुष्टि में विशेष प्रकार के साहित्य, फिल्मों और इंटरनेट मीडिया की भूमिका है। जैसे-रोबोट का राज आ जाएगा। कंप्यूटर सब नौकरी खा जाएंगे। कुछ लोग मिलकर सब चीजों को नियंत्रित कर लेंगे। आदि-इत्यादि। बहुत लोग यह भी मानते हैं कि एआइ के चलते सरकारों की अपने नागरिकों पर निगरानी बहुत बढ़ जाएगी या उससे भी बदतर हम बड़ी कंपनियों के दास बनते जाएंगे। हालांकि, ये सभी धारणाएं पूर्णतया झूठी नहीं है, किंतु क्या सच में स्थिति इतनी डरावनी है या इस इंडस्ट्री से जुड़े कुछ लोग इसे इतना भयावह दिखा रहे हैं? जैसा होता है कि नई खोज के साथ उससे जुड़े लोग और कंपनियां उसके प्रभाव को कुछ बढ़ा-चढ़ाकर ही बताती हैं। यह उनके हितों के संदर्भ में स्वाभाविक भी है। यह सच है कि आज के युग में एल्गोरिदम आधारित एआइ युक्त मशीनें जैसे चैटजीपीटी काफी हद तक हमारे लिए निर्णय ले रहे हैं। हम टीवी पर क्या देखते हैं? दुकान से क्या खरीदते हैं? या कैसा संगीत सुनते हैं? हमारी आदतों को समझकर इनसे जुड़े तमाम निर्णय अक्सर एल्गोरिदम आधारित तकनीक ले रही हैं। ये एल्गोरिदम हमारे जीवन को धीरे-धीरे बदल रहे हैं, लेकिन उसे पूरी तरह समझ पाना अभी संभव नहीं है। संभव है कि इनका प्रचलन बढ़ने के साथ-साथ हमारी जागरूकता बढ़ेगी। तब ही तय होगा कि एआइ नए युग का काला जादू है या एक ऐसी तकनीक है जिसे अंतत: हम मनुष्य ही हांकेंगे।
एआइ केवल तर्क पर काम कर सकती है, पर हम मनुष्य कहीं अधिक सूक्ष्म और जटिल जीव हैं। हम तर्कसंगत भी हैं और जानबूझकर अतार्किक भी। हमारे अंदर सुर भी हैं और असुर भी। मानव विशेषताओं की कई परते हैं जैसे-अंतर्ज्ञान, भावना, शरारत, पूर्वाग्रह और हठधर्मिता इत्यादि। जबकि एआइ युक्त मशीन के पास ये गुण नहीं हैं। वह केवल गणित, डाटा और तर्क पर ही आधारित है। एआइ तकनीक हमेश ‘स्थिर दुनिया’ के सिद्धांत पर काम कर सकती है। अगर कोई भी समस्या जहां नियम परिभाषित हैं, हालात स्थिर हैं और उनका हल निकालने के सिद्धांत सटीक हैं तो एआइ लाखों-करोड़ों आंकड़ों का विश्लेषण चुटकी में कर किसी भी प्रज्ञावान समूह को परास्त कर देगी, लेकिन जीवन की सभी समस्याएं हर बार गणित में तो नहीं बदली जा सकतीं। अधिकतर मुद्दों में अगर तर्क है तो कुतर्क भी है और वितर्क भी। बेतुके लोग भी होते हैं। भावनाएं भी जुड़ जाती हैं। चूंकि वास्तविक जीवन हमेशा गणित की तरह चलता नहीं, तो जैसे ही हम स्थिर दुनिया के सिद्धांत से थोड़ा सा हटे तब एआइ भी डगमगा जाएगी।
उदाहरण के लिए भारत के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने 1992 में बिहार में एक रैली के दौरान कहा था कि ‘कोई नहीं है रास्ता अब खाना पड़ेगा पास्ता?’ इस वाक्य के जरिये अटल जी उस समय की राजनीतिक स्थिति और देश के सामने मौजूद चुनौतियों के स्पष्ट समाधान की कमी पर अपनी निराशा व्यक्त कर रहे थे। यह तबसे भारत में एक लोकप्रिय सांस्कृतिक संदर्भ बन गया है और अक्सर उन स्थितियों का वर्णन करने के लिए उपयोग किया जाता है जहां कोई असहाय महसूस करता है। एआइ युक्त चैटजीपीटी से इस वाक्य के बारे में पूछा गया तो वह कोई स्पष्ट उत्तर नहीं दे सका और एक भूलभूलैया में उलझ गया।
वास्तव में करोड़ों डाटा बिंदुओं को जोड़कर, व्याकरण के नियमों के हिसाब से उत्तर तो कंप्यूटर दे सकता है, पर वह स्वयं उस उत्तर को समझ नहीं सकता। यानी कंप्यूटर कुल मिलाकर अत्यंत प्रभावशाली गणना मशीन है बस। एआइ में करोड़ों कंप्यूटर एक साथ आपकी पूछी समस्या का हल एकजुट होकर खोजने हेतु एक साथ टूट पड़ते हैं। हल निकाल भी लेते हैं, लेकिन उस हल को समझने की क्षमता उनके पास नहीं है। मनुष्य ने पृथ्वी पर यूं ही राज स्थापित नहीं कर लिया है। शेष जीव-जंतुओं की तुलना में सबसे अधिक और सबसे जल्दी मनुष्य ने ही सीखा और धीरे-धीरे पृथ्वी ‘होमो-सेपियंस’ यानी मनुष्य के आधिपत्य में आ गई। यकीन मानिए एक दिन ऐसा जरूर आएगा जब हम यह देखकर समझ जाएंगे कि कौन-सी चीज पूरी तरह कंप्यूटर के इस्तेमाल से बनी है और किसमें कंप्यूटर के ‘इनपुट’ के साथ में प्रकृति से मिली मानव बुद्धि का भी योगदान है।
एआइ वहां काम करती है जहां नियम परिभाषित होते हैं और स्थिति स्थिर होती है। वह संबद्धता और सह-संबंधता द्वारा काम करती है और जैसे कि ऊपर पूछे गए प्रश्न में ‘पास्ता’ और भारत के किसी ‘जन-नेता’ का कोई संबंध ही नहीं है तो कंप्यूटर को इतनी समझ नहीं है कि वह कहे, ‘यह क्या बेतुके सवाल पूछ रहे हैं आप?’ उसकी यह क्षमता नहीं है कि वह स्वयं समझ सके कि उसका उत्तर असंगत, मूर्खतापूर्ण है या फिर हास्यस्पद। एआइ समझने योग्य पाठ तो लिख सकती है, वीडियो बना सकती है, पेंट कर सकती है, सुझाव देने आदि में सक्षम हो सकती है, पर वह संसार को मनुष्य की प्राकृतिक बुद्धि की तरह न समझ सकती है, न अनुभव कर सकती है और न ही ग्रहण कर सकती है। सामान्य ज्ञान चाहे अधिक हो पर अंतर्ज्ञान, भावनात्मक बुद्धिमत्ता और प्रासंगिकता केवल मानव के पास है और रहेगी। तो जिस मानव की सूझबूझ ने ही इस एआइ को जन्म दिया है उसकी बुद्धि इस उत्पादित बुद्धि से सदैव दो पायदान आगे ही रहेगी।
Date:20-05-23
जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों से निपटने की दिशा में अगला कदमश्याम सरन, ( लेखक पूर्व विदेश सचिव हैं और 2007-10 के दौरान जलवायु परिवर्तन के मामले पर प्रधानमंत्री के विशेष दूत थे )
संयुक्त राष्ट्र महासभा के 29 मार्च, 2023 के प्रस्ताव (ए/आरईएस/77/276) को आम सहमति से अपनाए जाने के बाद जलवायु परिवर्तन जैसे संवेदनशील मुद्दे को लेकर एक उत्साह का वातावरण बना है। इस प्रस्ताव के जरिये जलवायु परिवर्तन के मामले में सदस्य देशों के दायित्व/बाध्यता के संबंध में अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (आईसीजे) से परामर्शदायी राय मांगी गई है। जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न चुनौतियों से निपटने की दिशा में इस प्रस्ताव को मील का पत्थर माना जा रहा है क्योंकि इसे 133 सदस्य देशों द्वारा सह-प्रायोजित किया गया था। हालांकि आईसीजे की परामर्शदायी राय सदस्य देशों पर कानूनी रूप से बाध्यकारी नहीं है। लेकिन यह नैतिक मायने तो रखता ही है।
आईसीजे से इस बात को लेकर भी कानूनी राय मांगी गई है कि आखिर उन देशों को क्या कानूनी अंजाम भुगतने होंगे जिनके कृत्यों और चूक से जलवायु को इस तरह से नुकसान होता है कि यह दूसरों को विशेष रूप से छोटे विकासशील द्वीपीय देशों और ‘वर्तमान और भविष्य की पीढ़ियों’ को प्रभावित करता है। इस प्रस्ताव को तैयार करने में लगभग चार साल लगे और इस अभियान का नेतृत्व दक्षिण-पश्चिमी प्रशांत महासागर के द्वीपीय देश वैनूआटू ने किया । अंततः इसे 18 देशों के एक कोर ग्रुप द्वारा संचालित किया गया, जिसे आईसीजेएजीरोफोर के रूप में जाना जाता है, जिसमें अन्य द्वीपीय राज्य, अफ्रीकी राज्य और यहां तक कि जर्मनी और पुर्तगाल भी शामिल हैं। भारत न तो इस समूह का हिस्सा और न ही इस प्रस्ताव का सह-प्रायोजक था। बहुपक्षीय मंचों पर जलवायु परिवर्तन के मुद्दे पर भारत की सक्रियता को देखते हुए यह असामान्य प्रतीत हो सकता है। लेकिन भारत की सोची समझी दूरी के अच्छे कारण हो सकते हैं। अमेरिका भारत की तरह आम सहमति का हिस्सा बना लेकिन अपने वोट पर एक बयान में अपनी आपत्तियों को स्पष्ट किया: ‘हमें गंभीर चिंता है कि यह प्रक्रिया हमारे सामूहिक प्रयासों को जटिल बना सकती है और हमें इन साझा लक्ष्यों को प्राप्त करने के करीब नहीं लाएगी।’ बयान में यह भी कहा गया है कि आईसीजे के समक्ष रखे गए मुद्दों को निर्दिष्ट मंचों पर चल रही बहुपक्षीय वार्ताओं में सबसे अच्छी तरह से संबोधित किया गया था। चीन ने कथित तौर पर इसी तरह की आपत्तियां व्यक्त की लेकिन आम सहमति में शामिल भी हो गया।
भारत इन विचारों को साझा करता है लेकिन देश के प्रतिनिधिमंडल ने मतदान से पहले या बाद में अपनी चिंता दर्ज कराने के लिए स्पष्टीकरण देने से परहेज किया।
यह प्रस्ताव वर्तमान कृत्यों और चूक पर केंद्रित है। जिसमें पृथ्वी के वायुमंडल में पहले से ही संचित ग्रीनहाउस गैसों के भंडार के लिए मुख्य रूप से जिम्मेदार देशों की ऐतिहासिक जिम्मेदारी की धारणा गायब है। आईसीजे की राय का उपयोग भारत जैसे देशों पर दोष मढ़ने के लिए किया जा सकता है, जिनके यहां इन ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन आर्थिक विकास के दौरान अनिवार्य रूप से बढ़ जाएगा। बावजूद इसके कि भारत ऐसे उत्सर्जन को सीमित करने और जीवाश्म ईंधन से ऊर्जा के नवीकरणीय और स्वच्छ स्रोतों की ओर तेजी से आगे बढ़ने की दिशा में महत्त्वाकांक्षी प्रयास कर रहा है।
ऑस्ट्रेलिया और जर्मनी जैसे औद्योगिक देशों और बाकी यूरोपीय संघ के देशों ने प्रस्ताव का समर्थन किया है और इसकी तरफदारी भी की है क्योंकि ऐतिहासिक जिम्मेदारी का विचार, जो 1992 के जलवायु परिवर्तन पर संयुक्त राष्ट्र फ्रेमवर्क कन्वेंशन (यूएनएफसीसीसी) का एक प्रमुख तत्त्व है, को इस प्रस्ताव में नजरअंदाज कर दिया गया है। इन देशों को वर्तमान और अनुमानित उत्सर्जन पर ध्यान केंद्रित करने और भारत जैसे देशों को निशाने पर लेने में खुशी होगी।
जलवायु परिवर्तन से ‘नुकसान और क्षति’ को लेकर मुआवजे जैसे महत्त्वपूर्ण मुद्दे का प्रस्ताव में कोई संदर्भ नहीं है। जबकि यह मुद्दा मिस्र के शर्म अल-शेख में यूएनएफसीसीसी के पिछले साल नवंबर में हुए सम्मेलन में इस बाबत लिए गए निर्णय के बाद बहुपक्षीय जलवायु परिवर्तन एजेंडे में प्रमुखता से शामिल रहा है। यह उन विकसित देशों के लिए एक रियायत रही होगी, जिन्होंने अपने जीवाश्म ईंधन-आधारित विकास के वर्षों के परिणामस्वरूप जलवायु परिवर्तन से पीड़ित देशों को क्षतिपूर्ति करने की अपनी कानूनी जिम्मेदारी की धारणा का कड़ा विरोध किया है। यह महत्त्वपूर्ण प्रश्न है जिसे आईसीजे के समक्ष रखा जाना चाहिए और भारत को इस पर ध्यान देना चाहिए।
19 अप्रैल, 2023 को जारी आईसीजे की एक प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, संयुक्त राष्ट्र के प्रस्ताव में उठाए गए मुद्दों पर सदस्य देशों से लिखित प्रस्तुतियां आमंत्रित की जाएंगी और अदालत को उसकी परामर्शदायी राय के लिए भेजा जाएगा। संयुक्त राष्ट्र और इसकी विशेष एजेंसियों को भी उठाए गए मुद्दों के संबंध में दस्तावेज जमा करने की अनुमति है। इन प्रस्तुतियों के प्राप्त होने और आईसीजे की वेबसाइट पर पोस्ट करने के बाद, सदस्य देशों और संयुक्त राष्ट्र और इसकी एजेंसियों द्वारा उन पर और टिप्पणियां आमंत्रित की जाती हैं। अंतिम चरण में, अदालत सार्वजनिक बैठकें आयोजित करती है, जिसमें सदस्य देशों के प्रतिनिधि मौखिक प्रस्तुति दे सकते हैं, भले ही उनमें से कुछ ने लिखित प्रस्तुतियां न दी हों। अदालत तब विचार-विमर्श समाप्त करेगी और अपने सामने रखे गए विभिन्न दृष्टिकोणों पर विचार करने के बाद अपनी परामर्शदायी राय देगी।
पिछले अनुभव के आधार पर, यह उम्मीद की जाती है कि अदालत साल के अंत तक या अगले साल की शुरुआत में अपनी परामर्शदायी राय की घोषणा करेगी।
भारत को उठाए गए मुद्दों पर अपने स्वयं के सुविचारित विचारों को दर्शाते हुए आईसीजे के सामने अपनी बात रखने में संकोच नहीं करना चाहिए। न ही उसे अन्य राज्यों की दलीलों पर टिप्पणी करने से हिचकना चाहिए। भारत को अदालत में सार्वजनिक सुनवाई में सक्रिय रूप से भाग लेना चाहिए। यह विचार किया जा सकता है कि चूंकि प्रस्ताव को भारी समर्थन मिला है, भारत के लिए यह सबसे अच्छा हो सकता है कि वह अदालत में भी अपनी मौजूदगी को सीमित रखे और प्रक्रिया को बाधित न करे। ऐसा न करने पर भारत के हितों का स्वत: नुकसान हो सकता है। एक, प्रस्तुतीकरण में यह इंगित किया जाना चाहिए कि यूएनएफसीसीसी या 1992 के रियो कन्वेंशन के रूप में पहले से ही एक जलवायु परिवर्तन संधि है, जिसमें जलवायु परिवर्तन को लेकर सदस्य देशों के कानूनी दायित्वों को स्पष्ट रूप से बताया गया है। आईसीजे को एक और कानूनी फ्रेमवर्क (ढांचा) स्थापित करने के बजाय यूएनएफसीसीसी के सिद्धांतों और प्रावधानों की वैधता की पुष्टि करनी चाहिए। दो, जलवायु परिवर्तन को लेकर कार्रवाई के लिए राज्यों के कानूनी दायित्वों को परिभाषित करने में, इक्विटी और न्यायसंगत बोझ साझा करने के मौलिक सिद्धांत को दोहराया जाना चाहिए।
तीसरा, जलवायु न्याय ऐतिहासिक उत्तरदायित्व के पहलू की उपेक्षा नहीं कर सकता। वैसे देश जो वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों के संचय और कहें तो मुख्य रूप से वैश्विक जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार हैं , उन्हें उत्सर्जन को कम करने और विकासशील देशों द्वारा इस दिशा में किए जा रहे प्रयासों की ज्यादा से ज्यादा मदद का बीड़ा उठाना चाहिए। साझा लेकिन अलग-अलग जिम्मेदारी और संबंधित क्षमताओं का सिद्धांत जो इसे दर्शाता है, उसे दोहराया जाना चाहिए। एक अलग पेपर में जलवायु परिवर्तन की चुनौती से निपटने के लिए भारत द्वारा अपनाए गए महत्त्वाकांक्षी उपायों का विवरण होना चाहिए।
और चौथा, प्रस्तुतीकरण में यह इंगित किया जाना चाहिए कि यह मुट्ठी भर औद्योगिक देश थे जिन्होंने क्योटो प्रोटोकॉल के तहत अपने कानूनी दायित्वों का खुलेआम उल्लंघन किया और अनुपालन प्रक्रिया के तहत दंडात्मक प्रावधानों का बगैर सामना किए इससे बचकर निकल गए। शुरुआती तौर पर अदालत को इन बातों को ध्यान में रखना चाहिए और अपनी विश्वसनीयता बढ़ानी चाहिए।
Date:20-05-23
झीलों की सेहतसंपादकीय
जलवायु परिवर्तन का असर अब दुनिया की बड़ी झीलों पर भी नजर आने लगा है। एक अध्ययन में यह खुलासा हुआ है कि दुनिया की करीब आधी बड़ी झीलों का जलस्तर कम हो रहा है। ऐसे समय में जब पेयजल का गंभीर संकट महसूस किया जा रहा है और पानी के प्राकृतिक स्रोतों के संरक्षण पर जोर दिया जा रहा है, यह नया खुलासा और चिंता पैदा करता है। अमेरिका के वर्जीनिया विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने लगातार अट्ठाईस सालों तक अध्ययन करने और उपग्रह से ली गई लाखों तस्वीरों के आधार पर यह खुलासा किया है। सरकारों और सामाजिक संगठनों के लिए चेतावनी है यह झीलों का जलस्तर कम होने की बड़ी वजह मानव उपभोग और बढ़ती गर्मी बताई गई है। इस तरह सरकारों और जल संचय के लिए काम करने वाले सामाजिक संगठनों के लिए यह चेतावनी की घंटी है। झीलें एक प्रकार का प्राकृतिक जलाशय हैं, जिनके पानी का उपभोग पेयजल और उद्योगों आदि के काम में किया जाता है। जिस तरह नदियों का जलस्तर घटते जाने की वजह से दुनिया के अनेक शहरों में पेयजल का गहरा संकट पैदा हो गया है, उसी तरह झीलें अगर सिकुड़ती गईं, तो यह संकट और गंभीर होता जाएगा।
झीलों, जलाशयों और अन्य प्राकृतिक जलस्रोतों के सूखते जाने को लेकर लगातार अध्ययन होते रहे हैं, उनके आंकड़ों से वजहें भी स्पष्ट हैं। मगर उनके संरक्षण को लेकर जिन व्यावहारिक उपायों की अपेक्षा की जाती है, उन पर अमल नहीं हो पाता। झीलों का स्रोत आमतौर पर पहाड़ों से आने वाला पानी होता है। वह बर्फ के पिघलने या फिर वर्षाजल के रूप में संचित होता है। मगर जलवायु परिवर्तन की वजह से जिस तरह दुनिया भर में गर्मी बढ़ रही है, उसमें कई जगह पहाड़ों पर पहले की तरह बर्फ नहीं जमती और न पर्याप्त वर्षा होती है। पेयजल संकट के मुहाने पर भारत, बारिश की बूंदों की अनदेखी और भूजलस्तर गिरने से बिगड़ रहे हालात फिर उनसे जो पानी पैदा होता है, उसका अनुपात बिगड़ चुका है। बरसात की अवधि कम और बारिश की मात्रा कम या अधिक होने से या तो झीलों में पर्याप्त पानी जमा नहीं हो पाता या फिर बहुत कम समय में बहुत ज्यादा पानी इकट्ठा होकर नीचे की तरफ बह जाता है और फिर साल के बाकी दिनों में उनमें पानी न आने से उनका स्तर नीचे चला जाता है।
दूसरा कारण पहाड़ों पर लगातार बढ़ रही पर्यटन संबंधी और औद्योगिक-वाणिज्यिक गतिविधियां हैं। हमारे यहां उत्तराखंड के पहाड़ इसके बड़े उदाहरण हैं। वहां बड़े पैमाने पर शुरू हुई विकास परियोजनाओं की वजह से न सिर्फ पहाड़ों के धसकने और स्खलित होने की घटनाएं बढ़ी हैं, बल्कि अनेक प्राकृतिक जल स्रोतों पर संकट मंडराने लगा है। वहां की नदियों और पहाड़ी झरनों का मार्ग अवरुद्ध हुआ है। बहुत सारी झीलों के पानी का अतार्किक दोहन बढ़ा है। उनका बड़े पैमाने पर औद्योगिक इकाइयों के लिए इस्तेमाल होने लगा है। मेड़बंदी: तपती धरती पर पानी बचाने का जखनी मॉडल यह भी उनके जल स्तर के घटने का बड़ा कारण है। पर्यटन उद्योग को बढ़ावा देने का एक नुकसान यह भी हुआ है कि झीलों में व्यावसायिक गतिविधियां बढ़ी हैं, जिसके चलते उनमें कचरा जमा होता गया है। उनकी नियमित गाद निकालने की व्यवस्था न होने से वे उथली होती गई हैं। कई झीलों का पाट सिकुड़ता गया है। यह सरकारों की उपेक्षा का नतीजा तो है ही, सामाजिक संगठनों की उदासीनता का भी पता देता है। पहले सामुदायिक सतर्कता से प्राकृतिक जल स्रोतों की सुरक्षा सुनिश्चित होती थी, मगर अब वह परंपरा लगभग समाप्त हो गई है। झीलों की सेहत सुधारनी है, तो यह उदासीनता और उपेक्षा का भाव त्यागना होगा।
Date:20-05-23
मधुर संबंध बनेगेसंपादकीय
केंद्रीय कें द्रीय कानून मंत्री किरण रिजिजू को न्यायपालिका से जुबानी जंग की कीमत चुकानी पड़ी। न्यायपालिका और कॉलेजियम सिस्टम पर आक्रामक रुख अख्तियार करने वाले रिजिजू के चलते सरकार भी असहज थी। इससे पहले कोई भी राजनेता या मंत्री न्यायपालिका को लेकर इतना तल्ख नहीं रहा। किरण को फिलहाल पृथ्वी विज्ञान मंत्री बनाया गया है और उनकी जगह अर्जुन राम मेघवाल को कानून मंत्रालय का स्वतंत्र प्रभार सौंपा गया है। कानून मंत्री का पदभार संभालने के बाद मेघवाल का बयान कि ‘न्यायपालिका और सरकार में कोई मतभेद नहीं है, बल्कि दोनों के बीच सौहार्दपूर्ण संबंध हैं। संविधान में सबकी अपनी सीमाएं हैं और उसी के हिसाब से काम होता है।’ अशय साफ है कि सरकार और न्यायपालिका के बीच रिश्तों में कसैलापन था । रिजिजू जिस तरह बिना लाग-लपेट के कॉलेजियम सिस्टम की बखिया उधेड़ते रहे, उससे एक बात तो साफ दूरियां दिखती थी। कभी जजों की नियुक्ति प्रक्रिया को ‘अंकल जज सिंड्रोम’ करार देना हो या ‘कुछ जज भारत विरोधी गिरोह का हिस्सा’ऐसे बयानों को कानून मंत्री के तौर पर किसी भी तरह से उचित नहीं ठहराया जा सकता है। हां, लंबित मामलों पर कार्य करने के तौर-तरीकों को बदलने की जगह बेवजह के विवादित बयानों का सहारा लिया जाएगा तो हालात और ज्यादा खराब ही होंगे। इस बात को लगता है सरकार ने समझा; तभी उन्हें इस पद से हटाया भी गया । इस बदलाव में एक खास बात यह रही कि मेघवाल जिस राज्य राजस्थान से आते हैं वहां इस साल के अंत तक विधानसभा चुनाव होने हैं। राजस्थान में वसुंधरा राजे के नेतृत्व को लेकर पार्टी के शीर्ष नेतृत्व में मतभिन्नता रही है। मेघवाल को अहम मंत्रालय की जिम्मेदारी देकर पार्टी राज्य में एक संदेश दिया है। चूंकि मेघवाल दलित समुदाय से आते हैं तो निःसंदेह राज्य में इस तबके के वोटरों को अपने पक्ष में करने में उन्हें आसानी होगी। बहरहाल, कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि सरकार के आखिरी साल में कुछ महत्त्वपूर्ण विधेयक आ सकते हैं। लिहाजा, ऐसे मंत्री की जरूरत होगी जो सबको साथ मिलाकर चल सके और सरकार के काम को सहजता से पूरा कर सके। मेघवाल इस मामले में सर्वोत्तम चयन हो सकते हैं क्योंकि उनका भारतीय प्रशासनिक अधिकारी के तौर पर लंबा अनुभव रहा है। देखना है, इस फेरबदल के बाद न्यायपालिका के साथ सरकार के संबंध कैसे रहते हैं।
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Date:08-05-23
Listen Patiently to Manipur’s GrievancesET Editorials
Sustained efforts by the army and Assam Rifles to rescue civilians and restore normalcy can provide the opening for dialogue to ensure sustained peace in a Manipur that has spiralled out of control. The proximate cause for violence that started on May 3 was the Manipur High Court order recommending scheduled tribe (ST) status for the Meitei community. But this was aconflict long in the making with deep complex historical roots. Resolution will require effort, listening, addressing grievances and compromise.
Meitei are plainspeople, account for 53% of Manipur’s population, and are concentrated in the central valley, about 10% of the state’s land area. They are also politically dominant. With increased pressure on land, this has become an issue. Tribal groups (about 47%) can buy land in the valley and hills. But the Kukis, part of tribal groups, feel victimised. Recent evictions by the government from forest lands, and the tough stance on Chin community members fleeing from Myanmar, have deepened this sense. The state government’s efforts to clamp down on poppy cultivation in the hills has not helped.
A divide-and-rule approach to the Meitei and Kuki communities can be traced to the colonial era. Little has been done to address long-festering grievances and administrative fault lines. Resolution requires bringing together all communities, addressing their concerns and finding locally viable solutions. No single group is a victim here — at least 50 persons have been killed since violence broke out last week. It is a time to act with responsibility and sensitivity. Politicians and others who have used social media to blame rivals only to inflame passions in an already inflammatory situation should be called out.
Date:08-05-23
More than a storyFalse narratives and propaganda should be countered, but not through a ban.Editorial
The demand for a ban on The Kerala Story, a film apparently based on the instances of a few women joining the Islamic State, is ill-conceived. It is to the credit of the Supreme Court and the High Courts of Kerala and Madras that they did not yield to the clamour for proscribing the movie. It garnered adverse publicity because of a teaser that made an exaggerated claim that 32,000 girls have gone missing in Kerala, presumably to join the terrorist group. However, the film-makers have agreed to withdraw the teaser and carry a disclaimer that the film’s content is fictional. The film’s more notable feature is that it has been denounced as undisguised propaganda. Those seeking the ban accuse its makers of trying to stoke communal passions and the projecting of a fake narrative against Muslims. However, even if that is true, any ban on the film will be counter-productive. Bans can be overturned by courts, and they tend to evoke curiosity about the film and often end up making more people form opinions on its content. In effect, it enhances the propaganda value, and furthers the ulterior motive, if any. It is now legally settled that once a film has been certified by the statutory authority, there is really no case to ban one. Laws pertaining to public order indeed empower the police and local authorities to stop a film’s screening, but it will be perilous to do so every time a group demands a ban.
Reports from Tamil Nadu and Kerala suggest that threats of protests have resulted in multiplexes and some cinema owners choosing not to screen the film. It is normally the local authorities who have a duty to provide adequate security, as ruled by the Supreme Court. However, rather than the law, it is prudent assessment of the ground situation that helps them make a decision. What is also condemnable is the attempt to make political and electoral capital out of The Kerala Story. The Prime Minister himself has alleged that only those who support terrorism will criticise such a movie. It does not behove high constitutional functionaries to communalise the debate over the film. Protests against an allegedly false narrative about a State or a community will not amount to backing terrorism. The fear that the film purportedly grapples with — that young people may be targeted for radicalisation — should be addressed by isolating extremist elements and fostering better understanding among communities. The mischief wrought by a false projection of reality is best undone through exposing the falsehood and the underlying motive, and not through hasty bans.
Date:08-05-23
Most women who got divorced were pushed towards itThe share of divorced women who faced sexual abuse from their husbands during marriage was two times higher than what currently married women face.Rebecca Rose Varghese & Vignesh Radhakrishnan
On May 1, the Supreme Court said that in cases of a marriage being “wrecked beyond hope of salvage,” the cooling-off period of six to 18 months would only “breed misery and pain.” It held that its extraordinary discretion under Article 142 of the Constitution can be used to provide justice for couples trapped in bitter marriages.
This judgment may help ease the suffering of Indian women who wish to be divorced. Data show that a higher share of divorced/separated Indian women endured emotional, physical and sexual harassment from their most recent husband than currently married women. A higher share of divorced/separated women also experienced restrictions on their mobility and had a limited say in their spending decisions during their marriage compared to currently married women. A higher share of divorced women had faced suspicion from their (then) husbands during marriage. These conclusions are based on the National Family Health Survey-5.
The share of divorced women who experienced emotional violence (insults, humiliation, threats) from their most recent husband during marriage was two times higher than currently married women (Table 1). The share of divorced women who experienced sexual violence (42.9%) was also twice the share of currently married women (27.3%). Similarly, the share of divorced women who experienced physical violence during pregnancy was two and a half times higher than currently married women (Table 2).
About 21% of divorced/separated women were accused by their most recent husband of being unfaithful during the marriage compared to 10.1% of currently married women. Similarly, the share of divorced/separated women who experienced marital control by their husbands, when the couple was together, was much higher than the share of currently married women (Table 3). So, data show that in most cases, the decision of women to separate from their husbands was a result of years of physical and emotional abuse. And the perception held by some that “couples break the nuptial tie for flimsy or selfish reasons” in recent times, as observed by the Kerala High Court in September last year, is not true for a majority of the cases.
The recent Supreme Court judgment will help women to move on with their lives quickly, as data show that the share of divorced women who were employed was much higher than currently married women. As shown in Table 4, 49.1% of divorced/separated women were employed compared to only 26.6% of currently married women. Their freedom of movement was much higher than currently married women (Table 5). Moreover, they had a higher say over monetary decisions, with 72.8% divorced women allowed to make their own spending decisions (Table 6).
While the share of divorced/separated women who faced abuse from their most recent husbands was high, it is important to note that the share of currently married women who endure such pain are only relatively small in number. Over 30% of currently married women have faced either emotional, physical or sexual violence in their lives. Close to 80% of them have never revealed this to anyone, which partly explains the very low divorce rates in India.
Moreover, while divorced women have gained relatively more autonomy after divorce, their freedom is not absolute (Table 5), with only around 70% of them allowed to go alone to many places and have money that they can decide how to use.
Date:08-05-23
अनुचित है मजहब आधारित आरक्षणहृदयनारायण दीक्षित, ( लेखक उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष हैं )
गरीबी और अभाव पंथ-मजहब आधारित नहीं होते। भारत भी धर्म, पंथ, मजहब या रिलीजन विश्वासी समूहों के करार का परिणाम नहीं है। यह संप्रभु संवैधानिक सांस्कृतिक राष्ट्र है। पंथ मजहब आधारित आरक्षण या विशेषाधिकार समता के मूल अधिकार का अतिक्रमण हैं। संविधान के अनुच्छेद 15 में ‘पंथ, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्म स्थान के आधार पर भेद का निषेध है।’ मगर यहां मजहबी आधार पर आरक्षण है। कर्नाटक सरकार ने मुस्लिमों को मिलने वाले चार प्रतिशत पंथ आधारित आरक्षण को उचित ही समाप्त किया है। उन्हें आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के 10 प्रतिशत कोटे में शामिल किया गया है। मुस्लिमों को मिल रहा चार प्रतिशत आरक्षण अब वोक्कालिगा और लिंगायत में समायोजित कर दिया गया है। इस पर राजनीति गरमा गई है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने कहा है कि हम सत्ता में आने के बाद इसे बहाल करेंगे। यह मामला सर्वोच्च न्यायालय में है।
संवैधानिक विषयों पर विचार के लिए संविधान सभा की कार्यवाही महत्वपूर्ण है। विभिन्न समुदायों को विशेष रक्षोपाय के लिए सभा ने सरदार पटेल की अध्यक्षता में ‘अल्पसंख्यकों, मूलाधिकारों आदि संबंधी परामर्शदात्री समिति’ गठित की थी। समिति की सिफारिशों पर सभा की एक बैठक अगस्त 1947 में हुई थी। उसमें पटेल ने कहा था, ‘पूर्वी पंजाब और पश्चिम बंगाल में कुछ कठिनाइयां हैं। इस प्रश्न पर आगे विचार होगा।’ डा. राधाकृष्णन ने कहा था, ‘हम समिति की रिपोर्ट को स्वीकार नहीं कर रहे हैं। हमने कुछ संशोधन किए हैं। हम सुव्यवस्थित प्रजातांत्रिक राज्य की स्थापना कर रहे हैं।’ संविधान सभा में 25-26 मई, 1949 को बहस हुई। पटेल ने कहा, ‘पूर्वी पंजाब और प. बंगाल को लेकर हमारे सुझाव अपूर्ण थे। विभाजन का प्रभाव अज्ञात था। इसलिए इस पर विचार करने के लिए एक उपसमिति नियुक्त की गई थी। उपसमिति ने प्रतिवेदन दिया। कुछ मुस्लिम प्रतिनिधियों ने संविधान पारित होने के बाद कहा था कि अब सब रक्षण समाप्त हो जाने चाहिए। यह अल्पसंख्यकों के हित में है।’ पटेल ने कहा कि, ‘एक असांप्रदायिक राज्य के लिए और अल्पसंख्यकों के हित में अच्छा यही है कि वे बहुसंख्यकों की सद्भावना तथा न्याय बुद्धि पर विश्वास करें।’ मोहम्मद इस्माइल ने कहा कि, ‘प्रतिवेदन के अनुसार अल्पसंख्यकों ने स्वयं माना है कि रक्षण समाप्त करना चाहिए। मैं नहीं जानता कि समिति कैसे संतुष्ट हो गई। मेरा दावा है कि समूचा मुस्लिम समुदाय रक्षण छोड़ने के पक्ष में नहीं है। एक वर्ग को दूसरे वर्ग से अलग करने के लिए मजहब को आधार बनाने में कोई हानि नहीं है।’ वह पंथ-मजहब आधारित विभाजन को उचित मान रहे थे। जेडएच लारी ने कहा, ‘अल्पसंख्यकों को राष्ट्र का अभिन्न अंग बनने का प्रयत्न करना चाहिए।’ उन्होंने आगे कहा कि, ‘आपको अनुसूचित जातियों के हितों की चिंता है। मुसलमानों की चिंता नहीं है।’ एस. नागप्पा ने कहा, ‘हम नहीं समझते कि हमें पंथक अल्पसंख्यक होने के कारण आरक्षण मिल रहा है। हमारे साथ दुर्व्यवहार हुआ। फिर भी हम धर्म पर अड़े रहे। हम अनुसूचित जातियों ने देश पर अरब से आक्रमण नहीं किया है।’ नजीरुद्दीन अहमद ने कहा, ‘मुस्लिमों के लिए स्थानों का रक्षण मुस्लिमों के लिए ही हानिप्रद होगा।’ सभा के उपाध्यक्ष डा. एचसी मुखर्जी ने कहा, ‘हम मजहब आधारित अल्पसंख्यकों को मान्यता नहीं दे सकते। पंथक वर्गों के लिए रक्षण तत्काल समाप्त हो जाने चाहिए।’ आरके सिंधवा ने कहा, ‘सांप्रदायिक संघर्ष के कारण भारी बर्बादी हुई है। समझ नहीं आता कि लोग अभी भी सांप्रदायिक रक्षण क्यों चाहते हैं।’ इसी क्रम में पं. नेहरू ने कहा, ‘मेरे सहयोगी उपप्रधानमंत्री ने प्रस्ताव रखा है। इसका अर्थ है कि जो बात बुरी है हम उसका त्याग कर रहे हैं। हम सदा के लिए इसे समाप्त कर रहे हैं। पृथक निर्वाचन और सभी पृथकतावादी बातों से देश का भयानक अहित हुआ है। सभी वर्ग अपनी विचार प्रणाली अपना सकते हैं, मगर यह अल्पसंख्यक-बहुसंख्यक पंथ आदि के आधार पर नहीं किया जा सकता। मैं समझता हूं कि स्थान रक्षण की व्यवस्था को उठा लेना ही सिद्धांततः सही है।’ तजम्मुल हुसैन ने कहा, ‘हम अल्पसंख्यक नहीं हैं। यह शब्द अंग्रेजों ने निकाला था। वे चले गए। अब इस शब्द को डिक्शनरी से निकाल देना चाहिए।’ तब अनुसूचित जातियों के आरक्षण पर लगभग सभी सदस्य सहमत थे, मगर मजहब-रिलीजन के आधार पर रक्षण देने का विरोध लगभग सभी सदस्यों ने किया। खरगे को इन बातों पर ध्यान देना चाहिए।
दो दिसंबर, 1948 को संविधान सभा में मोहम्मद इस्माइल और मोहम्मद ताहिर ने अल्पसंख्यक रक्षोपाय के प्रश्न उठाए। मौलाना हजरत मोहानी ने आवेश में आकर कहा कि अगर किसी के दिमाग में है कि वह पर्सनल ला में दखल दे सकता है तो उससे कहूंगा कि इसका नतीजा बुरा होगा। कार्यवाही में धमकी भरे आपत्तिजनक अंश नहीं छापे गए। जब पूरा देश विभाजन को लेकर व्यथित था तब दारुल उलूम देवबंद के तत्कालीन कुलपति ने कहा था, ‘हम पाकिस्तान को एक इस्लामी राज्य होने के नाते बधाई देते हैं, लेकिन चिंता यह है कि जो मुसलमान भारत में रह गए हैं, अब वे और भी अल्पसंख्यक हैं। इस देश में उनके सामूहिक जीवन का क्या होगा? शरीयत-ए-पाक के मुताबिक सिर्फ एक ही रास्ता है कि वे अपने शरीय संगठन कायम करें। हिंदुस्तान की मुस्लिम जमातें और फिरकें एक हों।’ यानी उनका आशय यही था कि वे अलग रहना चाहते हैं और सेक्युलर राज्य नहीं मानते।
सांप्रदायिकता को लेकर न्यायालयों ने भी कई मार्गदर्शन दिए हैं। इनमें सर्वोच्च न्यायपीठ द्वारा समान नागरिक संहिता की बात भी है। 2005 में सर्वोच्च न्यायपीठ ने अल्पसंख्यकवाद की प्रवृत्ति पर रोक लगाने का परामर्श दिया कि रिलीजन-मजहब के आधार पर अल्पसंख्यक दावों को महत्व देने से विशेष संरक्षण की मांग को बढ़ावा मिलेगा। मजहब आधारित सिद्धांत से एक नए विखंडन का सामना करना पड़ सकता है। संविधान सभा और न्यायालयों के निर्देश मार्गदर्शी हैं। संविधान निर्माता एक मजबूत राष्ट्र चाहते थे। कर्नाटक मामले में संविधान सभा की बहसें मार्गदर्शी और राष्ट्रहितकारी हैं। वस्तुत:, पंथ मजहब आधारित विशेषाधिकार राष्ट्रीय एकता-अखंडता के शत्रु हैं।
Date:08-05-23
दूर होती लाजिस्टिक लागत की चुनौतीडा. जयंतीलाल भंडारी, ( लेखक एक्रोपोलिस इंस्टीट्यूट आफ मैनेजमेंट स्टडीज एंड रिसर्च, इंदौर के निदेशक हैं )
हाल में प्रकाशित विश्व बैंक के लाजिस्टिक प्रदर्शन सूचकांक, 2023 में भारत छह पायदान की छलांग के साथ 139 देशों की सूची में 38वें स्थान पर पहुंच गया है। भारत 2018 में इस सूचकांक में 44वें तथा 2014 में 54वें स्थान पर था। पीएम गति शक्ति योजना और नई लाजिस्टिक्स नीति के क्रियान्वयन से भारत में लाजिस्टिक लागत में कुछ कमी आने के संकेत मिलने लगे हैं। आधुनिकीकरण एवं डिजिटलीकरण से भी भारत का लाजिस्टिक प्रदर्शन बेहतर हुआ है। सामान्यतया वस्तु के उत्पादन में कच्चे माल की लागत पहले क्रम पर और मजदूरी की लागत दूसरे क्रम पर होती है। फिर लाजिस्टिक लागत का क्रम आता है। लाजिस्टिक लागत का मतलब है उत्पादों एवं वस्तुओं को उत्पादित स्थान से गंतव्य स्थान तक पहुंचाने तक लगने वाले परिवहन, भंडारण एवं अन्य खर्च। लाजिस्टिक लागत कम या अधिक होने में बुनियादी ढांचे की अहम भूमिका होती है। यदि बुनियादी ढांचे की सुविधाएं उपयुक्त हों तो तेजी से सामान पहुंचने, परिवहन संबंधी चुनौतियां और ईंधन की लागत कम होने से भी लाजिस्टिक लागत कम हो जाती है। यदि निर्धारित समय में बुनियादी ढांचे संबंधी परियोजनाएं पूरी हो जाती हैं तो भी लाजिस्टिक लागत में कमी आती है।
उल्लेखनीय है कि भारत सरकार की गति शक्ति योजना करीब 100 लाख करोड़ रुपये की महत्वाकांक्षी परियोजना है, जिसका लक्ष्य देश में एकीकृत रूप से बुनियादी ढांचे का विकास करना है। वस्तुतः देश में सड़क, रेल, जलमार्ग आदि से जुड़े जो इन्फ्रास्ट्रक्चर हैं, वे अलग-अलग 16 मंत्रालयों और विभागों के अधीन हैं। इनके बीच में सहकार एवं समन्वय बढ़ाना गति शक्ति योजना का मुख्य ध्येय है। इस योजना के तहत विभिन्न विभागों की अवसंरचना विकास से जुड़ी गतिविधियों को एक केंद्रीकृत डिजिटल पोर्टल के तहत लाया जा रहा है। साथ ही रेलवे, सड़क, बंदरगाह, जलमार्ग, हवाई अड्डे, सार्वजनिक परिवहन और लाजिस्टिक्स इन्फ्रास्ट्रक्चर के रूप में चिह्नित किए गए सात इंजनों के तहत भारतमाला (राजमार्ग), सागरमाला (तटीय नौवहन), उड़ान (वायु सेवाओं), भारत नेट (दूरसंचार सेवाओं), रेलवे विस्तार और अंतर्देशीय जलमार्ग विस्तार जैसी महत्वपूर्ण योजनाओं को समन्वित रूप से आगे बढ़ाया जा रहा है। वस्तुतः, नई लाजिस्टिक नीति गतिशक्ति योजना की अनुपूरक है। इसका प्रमुख लक्ष्य माल परिवहन की लागत घटाकर सभी उद्योगों को बढ़ावा देना और वैश्विक व्यापार में भारत की हिस्सेदारी बढ़ाना भी है। लाजिस्टिक नीति के जरिये देश में अगले दस वर्षों में लाजिस्टिक्स सेक्टर की लागत को घटाकर 10 प्रतिशत तक लाया जाएगा।
चूंकि वर्तमान में लाजिस्टिक्स का ज्यादातर काम सड़कों के जरिये होता है, अत: अब नई नीति के तहत रेल ट्रांसपोर्ट के साथ-साथ शिपिंग और एयर ट्रांसपोर्ट पर भी जोर दिया जा रहा है। लगभग 50 प्रतिशत कार्गो को रेलवे के जरिये भेजे जाने का लक्ष्य रखा जा रहा है और सड़कों पर ट्रैफिक को कम किया जा रहा है। देश में बुनियादी ढांचे का तेजी से निर्माण होने लगा है। ऐसे में इंजीनियरिंग, डिजिटलीकरण और बहु-साधन परिवहन जैसे क्षेत्रों पर जोर देकर माल ढुलाई क्षमता में सुधार किया जा रहा है। लाजिस्टिक्स क्षेत्र में ड्रोन का भी इस्तेमाल शुरू हुआ है। नई लाजिस्टिक नीति से भारत पर वैश्विक निवेशकों का विश्वास बढ़ रहा है। ऐसे में कई कंपनियां सस्ती लाजिस्टिक लागत की संभावना से भारत में प्रवेश कर रही हैं।
केंद्र सरकार सड़क और रेल मार्ग में सुधार पर ध्यान दे रही है। प्रमुख शहरों और औद्योगिक एवं कारोबारी केंद्रों के बीच की दूरी कम करने के लिए एक तरफ डेडिकेटेड फ्रेट कोरिडोर के जरिये रेल मार्ग से माल ढुलाई को तेज करने की कवायद कर रही है। लगभग हर हिस्से में ग्रीनफील्ड हाईवे प्रोजेक्ट चल रहे हैं। इसके साथ ही राजमार्गों पर आधारित इंडस्ट्रियल कोरिडोर भी बनाए जा रहे हैं। देश का लगभग 95 प्रतिशत विदेश व्यापार समुद्री मार्ग से होता है। देश में नवीनतम बंदरगाह नीति के तहत बंदरगाह ‘लैंडलार्ड माडल’ की शुरुआत की गई है। इसके साथ सरकार के स्वामित्व वाले प्रमुख बंदरगाहों की परिचालन जिम्मेदारियां निजी क्षेत्र को सौंपने की रणनीति के कारण बंदरगाह विकास और संचालन में घरेलू और विदेशी निजी क्षेत्र की भागीदारी तेजी से बढ़ी है। इससे कई निर्यात-आधारित उद्योगों की प्रतिस्पर्धी क्षमता बढ़ी है।
निश्चित रूप से भारत उद्योग-कारोबार में विश्व के अन्य देशों से प्रतिस्पर्धा इसलिए नहीं कर पा रहा है, क्योंकि भारत में लाजिस्टिक्स खर्च करीब 13-14 प्रतिशत है। यह अमेरिका, चीन, जापान, जर्मनी जैसे देशों से बहुत अधिक है। भारत के मैन्यूफैक्चरिंग हब बनने में अधिक विनिर्माण लागत सबसे बड़ी चुनौती रही है। ऐसे में लाजिस्टिक लागत घटने से अन्य प्रतिस्पर्धी देशों की तुलना में भारत में मैन्यूफैक्चरिंग लागत में कमी देश को मैन्यूफैक्चरिंग हब बनने की डगर पर तेजी से आगे बढ़ाएगी। लाजिस्टिक लागत घटने से भारत में प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में भारी बढ़ोतरी भी हो सकेगी। उम्मीद है पीएम गतिशक्ति योजना, नई लाजिस्टिक नीति और नई विदेश व्यापार नीति के कारगर क्रियान्वयन से भारत में लाजिस्टिक लागत को और घटाने में मदद मिलेगी। इसके बाद ही इस समय वैश्विक व्यापार में भारत का जो हिस्सा दो प्रतिशत से भी कम है, वह 2030 तक बढ़कर करीब छह प्रतिशत हो पाएगा। साथ ही इस समय भारत का जो निर्यात 770 अरब डालर है वह 2030 तक बढ़कर 2000 अरब डालर हो सकेगा।
Date:08-05-23
बेदखल होती मानव मेधासिद्धायनी जैन
प्रकृति के अनेक अनसुलझे रहस्यों को मनुष्य ने अपनी बुद्धिमता के दम पर सुलझाया है, लेकिन उसके द्वारा विकसित कृत्रिम बुद्धिमता ही अब उसके भविष्य के लिए बड़ी चुनौती मानी जा रही है। महत्त्वपूर्ण है कि आधुनिक कृत्रिम मेधा के प्रणेता जेफ्री एवरेस्ट हिंटन तक ने न केवल अपनी ही बनाई एआइ तकनीक को मानवता के लिए खतरनाक बताया है, बल्कि इस तकनीक के विकास के लिए क्षमा मांगते हुए गूगल की नौकरी भी छोड़ दी है। जेफ्री हिंटन ने सन 1970 में प्रयोगात्मक मनोविज्ञान में स्नातक करने के बाद सन 1978 में कृत्रिम मेधा यानी आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस विषय में डाक्टरेट की थी। मनोविज्ञान और तकनीक दोनों के विद्यार्थी होने के कारण वे इस बात को बहुत अच्छी तरह समझ सकते हैं कि अगर कोई भी मशीनी तकनीक मानव नियंत्रण के परे चली गई, तो वह सृष्टि और मनुष्यता का कितना नुकसान कर सकती है।
जेफ्री हिंटन हमारे दौर के अकेले वैज्ञानिक नहीं हैं, जिन्होंने तकनीक के अनियंत्रित होने के खतरों की ओर ध्यान आकर्षित किया और जिम्मेदार लोगों का आह्वान किया है कि वे इस खतरे के प्रति सजग रहें। स्टीफन हाकिंग्स ने भी कृत्रिम मेधा के मोह के खतरों के प्रति वैज्ञानिकों को सचेत करते हुए कहा था कि मशीनों को बुद्धि देना मानव इतिहास की सबसे बुरी घटना साबित हो सकती है। पिछले दिनों एक कृत्रिम मेधा तकनीक द्वारा लगातार झूठी खबरों को प्रसारित करना बताता है कि जिस तकनीक को हम मनुष्य की बुद्धिमता के विकल्प के तौर पर आजमाना चाहते हैं, वह अगर मनमर्जी पर उतर आई तो कैसे-कैसे गुल खिला सकती है। उस ‘टूल’ द्वारा कई लोगों की मृत्यु की झूठी खबर इंटरनेट माध्यमों पर प्रसारित की गई। इन खबरों में अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन की मृत्यु की झूठी खबर भी शामिल थी।
महात्मा गांधी उन क्षेत्रों में तकनीक के उपयोग के विरोधी थे, जहां वे मानव श्रम के उपयोग की संभावनाओं के लिए खतरा बन जाएं। कृत्रिम मेधा का आधुनिक स्वरूप आने वाले समय में लाखों लोगों के रोजगार छीन सकता है। तब जबकि जनसंख्या और बेरोजगारी- दोनों में इजाफा हो रहा है, यह प्रवृत्ति सामाजिक ढांचे के लिए एक नई चुनौती बन सकती है। वस्तुओं के उत्पादन की प्रक्रिया में गुणवत्ता नियंत्रण, उत्पादन, उत्पादों के लदान जैसे काम अगर रोबोट करने लगें, तो मानव श्रम की उपयोगिता समाप्त हो सकती है। लेखन, संपादन, अनुवाद, शिक्षा, चिकित्सा जैसे कितने ही क्षेत्र हैं, जहां कृत्रिम मेधा मनुष्य के लिए खतरा बन रही है। कहते हैं कि कृत्रिम मेधा तकनीक अपनी मशीनों या कंप्यूटर की प्रोग्रामिंग के हिसाब से ही काम कर सकेगी। लेकिन मूर का एक सिद्धांत है कि मशीनें खुद में ही कई गुना सुधार की सामर्थ्य रखती हैं। कंप्यूटर तकनीक ने इस बात को साबित भी किया है।
कृत्रिम मेधा तकनीक के पक्षधरों का कहना है कि मशीनें केवल वही काम करेंगी, जिनके लिए उन्हें प्रोग्राम किया गया है, जबकि मानवीय बुद्धिमता का आकाश अनंत है। लेखन, खेल, कला जैसे क्षेत्रों में, जहां कल्पना और विचारशीलता नए आयाम लेती है, मशीन शायद मनुष्य का मुकाबला न कर सके। मगर 10 फरवरी, 1996 की उस घटना को याद कीजिए जब एक कंप्यूटर ने महान शतरंज खिलाड़ी गेरी कास्पोरोव को हरा दिया था।
ऐसा नहीं कि कृत्रिम मेधा मनुष्य के लिए एकदम नया अनुभव है। चालक रहित कारों का प्रयोग, गूगल असिस्टेंट, एलेक्सा या सिरी का उपयोग, कंप्यूटर के माध्यम से विविध आंकड़ों का विश्लेषण या वर्गीकरण जैसी चीजें लोग लंबे समय से कर रहे हैं। हो सकता है कि भविष्य में हमारे हाथ की घड़ियों में ऐसी तकनीक शामिल हो जाए, जो हमारी कलाई की फड़कन को पढ़कर ही भविष्य में हो सकने वाले रोगों के प्रति हमें सचेत कर दे। हमारे कदम, हमारी हृदय गति और हमारा रक्तचाप पढ़ने वाले कलाई-बंध तो पहले ही बाजार में आ चुके हैं। अब तो कुछ ऐप्स का उपयोग करके मोबाइल के माध्यम से भी हम बहुत सारी शारीरिक गतिविधियों का स्वास्थ्य की दृष्टि से मापन कर सकते हैं।
दरअसल, मोबाइल फोन पर ही सबसे ज्यादा कृत्रिम मेधा का नियंत्रण देखा जाता है। आप किसी विषय की एक या दो वीडियो देखते हैं और अचानक आपके मोबाइल पर उसी विषय के वीडियो और उनसे संबंधित विज्ञापन आने लगते हैं। आपके शहर से संबंधित विज्ञापन आपके परदे पर आकर आपका मन लुभाने की कोशिश करते हैं। यह उस तकनीक के कारण होता है, जिसे अल्गोरिदम कहते हैं और जो कृत्रिम मेधा तकनीक का एक महत्त्वपूर्ण उपादान है। अल्गोरिदम के माध्यम से कृत्रिम मेधा आपकी रुचि और आपकी जरूरतों को पकड़ने की कोशिश करती है और इस आधार पर बाजारवादी शक्तियां आपकी सामर्थ्य का अपने हित में उपयोग करने का प्रयास करती हैं। सोशल मीडिया मंच द्वारा अपने उपयोगकर्ताओं का डेटा किसी को बेचने के मूल में यही लालच और यही तकनीक है।
कृत्रिम मेधा का इतिहास करीब सत्तर वर्ष पुराना है। अमेरिका के कंप्यूटर विज्ञानी जान मैकार्थी ने सबसे पहले सन 1956 में कृत्रिम मेधा की संकल्पना प्रस्तुत करते हुए उसकी संभावनाओं पर चर्चा की थी। उनका मानना था कि कृत्रिम मेधा कंप्यूटर विज्ञान का ही एक अंग होगा और इसका बुनियादी उद्देश्य ऐसे उपकरण बनाना होगा, जो बुद्धिमता पूर्वक किसी मानव नियंत्रण के बिना अपना काम कर सके। कृत्रिम मेधा पर काम तो 1950 के दशक में ही शुरू हो चुका था, लेकिन इसको पहचान 1970 के दशक में मिलने लगी। इस मामले में जापान ने बाकायदा ‘फिफ्थ जनरेशन’ (पांचवीं पीढ़ी) नामक एक परियोजना शुरू की थी, जिसमें सुपर कंप्यूटर के विकास के लिए दस वर्षीय कार्यक्रम की रूपरेखा तैयार की गई थी। जापान के बाद ब्रिटेन ने ‘एल्वी’, यूरोपीय संघ ने ‘एस्प्रिट’ जैसी योजनाएं शुरू कीं और कृत्रिम मेधा पर नए-नए शोधकार्य दुनिया भर में शुरू हो गए।
ऐसा नहीं कि कृत्रिम मेधा की महत्ता को पूरी तरह नकार दिया जाना चाहिए। अगर इसकी मदद से गंभीर रोगों का निदान सहजता से होता है, कृत्रिम मेधा वाले उपकरण वंचित वर्ग के लिए सहज सुलभ और सस्ता उपचार संभव बना सकते हैं, गंभीर बीमारियों की संभावना को पहले ही पहचाना जा सकता है, उपेक्षित समाज को सस्ती, श्रेष्ठ और सार्थक शिक्षा दे सकते हैं, मौसम का सटीक अनुमान लगा सकते हैं, सुरक्षा संदर्भों में हमारी मदद करते हैं, तो यह वरेण्य है। मगर अगर इनसे लोगों में रोजगार के प्रति चिंता बढ़ती है, तो हमें सजग रहना होगा। भारत जैसे देशों में, जहां जनशक्ति बड़ी संख्या में मौजूद है, लोगों को काम के अवसरों की अपनी महत्ता है। हालांकि औद्योगीकरण के समय भी ऐसे ही खतरों को रेखांकित किया गया था, लेकिन समय ने साबित किया कि जीवन उस नदी की तरह है, जो विपरीत परिस्थितियों में भी अपनी श्रेष्ठता और सार्थकता का प्रवाह बनाए रख सकता है। हां, किसी भी परिस्थिति में मशीन को मनुष्य के नियंत्रण से मुक्त किया जाना मानवता के हित में नहीं होगा, क्योंकि वैज्ञानिकों, दार्शनिकों, लेखकों, चिंतकों ने नियंत्रणमुक्त मशीनों के खतरों को बार-बार समझाया है।
दिल के साथ दिमाग का संतुलित और संयमित उपयोग मनुष्य को शेष प्राणियों में श्रेष्ठ बनाता है। कृत्रिम मेधा मनुष्य जाति के लिए एक बेहतर उपलब्धि हो सकती है, बशर्ते इसका उपयोग मनुष्यता के कल्याण के लिए और मनुष्य के नियंत्रण में हो।
Date:08-05-23
मामूली नहीं है मसलासंपादकीय
मणिपुर में अब तक 54 लोगों के मारे जाने की खबरें हैं, हालांकि आधिकारिक तौर पर कोई संख्या नहीं बताई गई है। गवनर्मेंट लैंड सर्वे व हाई कोर्ट के आदेश के बाद समूचा राज्य हिंसा की चपेट में आ गया। दस सालों से मांग कर रहे मैतई समुदाय को जनजाति का दर्जा देने को अदालत के कहते ही आदिवासियों के साथ झड़पें चालू हो गई। कुकी आदिवासी बहुल चुराचंद जिले से तनाव की शुरुआत हुई जहां ट्राइबल फोरम के आठ घंटे के बंद के ऐलान के बाद पुलिस और उपद्रवियों में झड़पें शुरू हो गई। कुकी और नागा सड़कों पर आ गए। राज्य की पहाड़ी जनजातियों को स्पेशल कांसिटय़ूटशनल प्रिविलेज प्राप्त हैं, जो मैतई को अब तक नहीं मिले थे। इसलिए वे पहाड़ी इलाकों में जमीन नहीं खरीद सकते थे। मैतई कहते हैं, उन्हें पहाड़ी इलाकों से अलग किया जा रहा है। 1949 में मणिपुर के भारत में विलय से पहले उन्हें जनजाति का दर्जा मिला ही हुआ था। उनका कहना है, उनके पूर्वजों की जमीन, भाषा, संस्कृति और परंपराओं की रक्षा के लिए यह जरूरी है जबकि कुकी कहते हैं, मैतई पहले ही संपन्न हैं, उनका राज्य में दबदबा है। ऐसे में उनके अधिकार कमजोर पड़ सकते हैं। मणिपुर के साठ विधायकों में चालीस मैतई समुदाय से हैं। यह झगड़ा जातिगत भले ही है परंतु इसकी बुनियाद में आर्थिक-सामाजिक स्तर भी शामिल हैं। राज्य सरकार आरोप लगाती रही है कि संरक्षित जंगलों और वन अभ्यारण में गैर-कानूनी तौर पर अफीम की खेती की जाती है जबकि आदिवासी इसे पैतृक जमीन बता कर सरकार की मंशा पर आपत्ति जता रहे हैं। केंद्र सरकार द्वारा मणिपुर में अनुच्छेद 355 लगा कर कानून व्यवस्था की जिम्मेदारी लेने का मतलब है कि स्थिति बेहद गंभीर हो चुकी है। इसका मतलब है कि राज्य सरकार कानून एवं व्यवस्था के मसले पर असफल रही है। कहते हैं कि कई महीनों से चिंगारी भड़क रही थी। कई बार सरकारी तंत्र स्थिति की गंभीरता आंकने में पूर्णतया असफल सिद्ध होता है। इस तरह के संघर्ष अनूठे नहीं हैं। मगर इनको सुलझाने में सिर्फ एहतियात बरते जाने से बात नहीं बनती, बल्कि दोनों पक्षों की भावनाओं और परंपराओं को भी समझना जरूरी होता है।
Date:08-05-23
तय हों निजी जिम्मेदारियांऋतुपर्ण दवे
जितनी रफ्तार से हम विज्ञान के साथ रचते-बसते और जीने की नई-नई तरकीबें सीखते जा रहे हैं, ठीक वैसे ही तमाम चुनौतियां मुंह बाएं आ खड़ी हैं। वास्तव में यह दौर इंटरनेट मीडिया का है, जिससे हर हाथ को दुनिया तक अपने संदेशों को पहुंचाने की बड़ी ताकत मिली। अक्सर यही स्वतंत्रता के उपयोग और दुरुपयोग से झूठे संदेश या फेक न्यूज समाज, देश-दुनिया के लिए बड़ी चुनौती बन जाती हैं। इस पर लगाम या कहें झूठे प्रसार को लेकर भारत सहित दुनिया भर में तमाम जतन किए जा रहे हैं, लेकिन सच यही है कि यह बड़ी चुनौती है। अक्सर लोग उनके मोबाइल में आए या बनाए मैसेजों को बिना सोचे-समझे और बुद्धि-विवेक से काम लिए सीधे आगे बढ़ा देते हैं, या फॉर्वड कर देते हैं। बस, इसी खेल के चलते बेहद कामियाब इंटरनेट तकनीक बड़ी चुनौती बन गई है।
जब इंटरनेट नहीं था तब लोग अखबारों पर ही खबरों के लिए निर्भर थे। लोग पहले अखबारों को ढ़ूंढ़ कर कतरनों की फोटो कॉपी करा प्रसारित करते थे। आज ठीक उलट है, जहां झूठी खबरें पलक झपकते ही लाखों लोगों द्वारा बिना सत्यता जांचे शेयर या ट्वीट-रिट्वीट हो जाती हैं। इसी आड़ में अक्सर लोग अपनी निजी दुश्मनी तक भंजा लेते हैं, और दुनिया झूठ के फरेब को काफी देर बाद समझ पाती है। लेकिन तक नफा-नुकसान का बड़ा खेल अपना गुल खिला चुका होता है। सोशल कहें या इंटरनेट मीडिया जो भी, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का जरिया मान लेना भी कुतर्क है क्योंकि इसका जितना बड़ा दायरा है, उतने ही बंधन। ऐसी स्वतंत्रता और अनाप-शनाप कुछ भी लिख, पढ़ और बोलने की आजादी किसी को नहीं है, जो किसी दूसरे के मान-सम्मान या निजता को चोट पहुंचाती हो। इसका ताजा उदाहरण हाल में राहुल गांधी की लोक सभा सदस्यता खत्म कर देने के उदाहरण से समझा जा सकता है।
अक्सर गैर-भरोसेमंद स्रेतों और आधी-अधूरी जानकारियों के चलते ही फेक न्यूज या झूठी खबर इतनी तेजी से फैलती यानी वायरल होती हैं कि अक्सर समझदार लोग भी गच्चा खा जाते हैं। कई मौकों पर देखने में आता है कि ऐसी खबरों से शहर से लेकर गांव और घर-घर लोग बेचैन हो जाते हैं। उत्तेजना फैल जाती है, और लोग और समूह बेसिर पैर की बातों के चलते गुस्से में आकर बड़ी-बड़ी घटनाएं तक कर बैठते हैं। ऐसे तमाम और दर्जनों क्या लाखों उदाहरण मिलेंगे जहां दुनिया भर में कई प्रांत और देश तक झूठी खबरों की झुलसन में बदहाल-बेहाल होते देखे गए। वाकई में सोशल मीडिया एक ऐसा बिना बारूद का बम गोला बन चुका है, जिससे शहर के शहर आग के शोलों से जल उठते हैं। सरकारों और जिम्मेदारों के लिए सूचना का यह सोशल तंत्र नॉन सोशल होकर वो रूप दिखाता है कि एक निर्जीव साधन जिंदा और समझदार लोगों की आपसी टकराहट में आग में घी और पेट्रोल का काम करता है। करीब सवा दो बरस पहले दुनिया ने खास उदाहरण देखा जिसमें दुनिया का दारोगा कहलाने वाले अमेरिकी संसद परिसर में हुई हिंसा के बाद माइक्रो ब्लॉगिंग वेबसाइट ट्विटर ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पर्सनल अकाउंट को स्थायी रूप से सस्पेंड कर दिया क्योंकि आशंका थी कि आगे भी उनके हैंडल से हिंसा के और भड़काने की जोखिम का खतरा था। उनके फेसबुक और इंस्टाग्राम अकाउंट्स को भी अनिश्चितकाल तक के लिए अनिश्चितकाल तक के लिए सस्पेंड कर दिया। हालाकि पारदर्शिता की दुहाई देकर लगी रोक के बावजूद दुनिया में कहीं कोई फर्क दिखा नहीं।
अब तो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म में कमाई के नाम पर ब्लू टिक बेचकर झूठी शान-ओ-शौकत के दिखावे से आगे कितना कुछ घटेगा, अंदाजा मुश्किल है। अक्सर नीले और नारंगी सही लकीर वाले अकाउंट पाने की कशमकश रुपयों की गर्मी से खत्म हो गई। अब केंद्र सरकार का सूचना प्रौद्योगिकी संशोधन नियम, 2023 जो 2021 के संशोधन नियमों के साथ 6 अप्रैल, 2023 को जारी होते ही लागू हो गया है। जहां कई इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कुछ कुठाराघात तो कई सोशल मीडिया में फेक न्यूज की पहचान करने के सरकार के अधिकार को सही मानते हैं। हालाकि एडिटर्स गिल्ड ऑफ इंडिया का भी मानना है कि यह प्रेस की आजादी पर हमला है। अब इलेक्ट्रॉनिकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय के अधीन एक संस्था तय करेगी कौन सी सोशल मीडिया पोस्ट या खबर भ्रामक है। इसके दायरे में गूगल, फेसबुक, ट्विटर, यू-ट्यूब से लेकर हर तरह की समाचार और गैर-समाचार कंपनियां आएंगी। सच तो यह है कि यह विशेषाधिकार कानून मध्यस्थ को उसके यूजर के किसी भी आपत्तिजनक सामग्री ऑनलाइन पोस्ट करने पर उन्हें कानूनी कार्रवाई होने से बचाता है, लेकिन फर्जी या गलत जानकारी को न हटाने की स्थिति में प्लेटफॉर्म्स भी जद में होंगे तथा कंटेंट को परोसने वाला यूजर तो दोषी होगा ही। यकीनन, सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म सेवा देने वाले से ज्यादा सेवा लेने वाले की जिम्मेदारियों और सोच से ही समाज में सकारात्मक जिम्मेदारियां निभा सकता है।
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हाल ही में भारत दुनिया में सबसे अधिक आबादी वाला देश हो गया है। इसके साथ ही भारत को जनसांख्यिकीय लाभांश भी मिल रहा है। लेकिन क्या युवा जनसंख्या का लाभ लेने के लिए भारत ने तैयारी कर रखी है? इससे जुड़े कुछ बिंदु –
रोजगार सृजन कैसे हो सकता है ?
आज यह कहा जा रहा है कि चीन अमीर होने से पहले ही वृद्ध हो रहा है। भारत को समय पर सही कदम उठाते हुए इस रास्ते से बचने की कोशिश करनी चाहिए।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित डी.सुब्बाराव के लेख पर आधारित। 5 अप्रैल, 2023
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Date:06-05-23
The Lonely Aren’t AloneCan & should govts really combat loneliness?TOI Editorials
Way back in 1964, when the then US surgeon general linked cigarettes to cancer and heart disease, his report went on to impact healthcare policies all around the world. Today’s surgeon general Vivek Murthy’s advisory is that loneliness is as dangerous as smoking, and significantly raises the risks of heart disease as well as stroke. But it’s likely to move only a few rich countries to shift a little expenditure towards social connection targets. This is not at all because “the epidemic of loneliness and isolation” is frozen at the rich west’s boundaries. Neither poverty nor geography provide any immunity at all.
Still, measuring loneliness is widely seen as inherently imprecise.
Variations such as the interview’s location and the interviewer’s characteristics can majorly swing responses, which in any case can reveal more about normative desires than what the respondent feels. Countries like India anyway lack the kind of deep associative data that Murthy can cite, which is reflective of a larger healthcare deficit here. In the most populous state of UP, out-of-pocket estimates are an eye-watering 71% of total health expenditure. In the US, on the other hand, even if monies were allocated for schemes Murthy recommends, what he doesn’t address is how these would sidestep the “polarisation” that has unhealthily shrunk discussion networks in the first place.
Finally, and most importantly in the Indian context, solitude as a choice should not get extinguished before it has even lived. Remember how the forced domestic confinement of Covid was nightmarish for many, even if many others felt acutely thankful for how family held them through the pandemic. Likewise, women and young people may prefer new-age autonomy over some idealised intergenerational family cohesion. What is key is to feel agency. And for everyone who is lonely, knowing that they are a multitude may be some comfort.
Date:06-05-23
India’s StoriesNo film, disliked by right or left, should be bannedTOI Editorials
That the Supreme Court and the high courts of Madras and Kerala refused to stall the release of a film, The Kerala Story , is right in principle – films or books or art should not be banned, whoever likes or dislikes them. But the other point is that these are not questions for courts. An overburdened judiciary has far more pressing matters to attend to. On films, the censor board is the (often ham-handed) regulator. If it okays a movie, the matter should end there. True, in India, it often doesn’t, and often likes and dislikes are coarse political strategies. For example, the ungodly fuss over a song in Pathaan . But because freedom of expression often seems fragile, it’s important to have a one-step clearance – the censors, in this case.
The Kerala Story is being called a piece of political propaganda by its critics, and some are arguing it will vitiate community relations. And those who are enthused by it have themselves taken repeated offence at many films, including those on OTT platforms. All of these objections from all sides, whether articulated thoughtfully or crudely, cite audiences’ sensitivity and feelings. The point is to let audiences see these films.
What film regulation in India needs is for the censors to adopt a very light touch, and the restoration of the film certification appellate tribunal. Making high courts the venue of appealing a censor board decision is illogical. The world’s largest film industry is, sadly, nowhere near being its freest.
Date:06-05-23
Ethnic quagmireViolence in Manipur could have been avoided had the government stayed above the frayEditorial
The concept of “unity in diversity” is not an abstract one. In a multi-ethnic national or provincial setting, the accommodation of differences in a way that bestows socio-cultural recognition of identities while striving for constitutional unity and equality through governance is a must for progress. The conditions for a conflict arise when identities tighten up and become exclusivist, leading to grievances over perceived neglect of one group. But good governance that focuses on accommodation and dialogue helps stem the possibilities of a deterioration of such conditions into violence. The spurt of violence in Manipur that led to mass displacement, the loss of lives, vandalisation of houses, churches, temples besides arson across five districts, might have been a consequence of a long-standing hill-valley identity divide in the State, but it was also avoidable. The trigger was a rally called by the All Tribal Students’ Union, Manipur, on Wednesday, protesting the move to concede a demand for ST status, following a High Court order, to the Meiteis, the majority group. The tribal groups are opposed to this demand which is not uniformly endorsed by all sections of the Meiteis. While the grievance that according ST status would eat into the reservation pie for the hill tribal communities seems to be somewhat valid, their raging concern that this will compromise traditional land ownership is not entirely born out of reason and has been used by tribal leaders to whip up hysteric anti-valley sentiments. The conflagration was also the consequence of brewing discontent against what tribal groups perceived as the State government’s biased actions.
If the State’s Bharatiya Janata Party-led government had acted with alacrity and removed the perception that it was biased towards one dominant section, this situation would not have come to pass. In its over-zealousness in a “war against drugs”, the government had indulged in eviction drives which included one that had affected a Kuki village in March and had prompted some of the BJP’s tribal MLAs to raise this issue of a perceived bias in governance and seek a change in the party’s State leadership. Evictions ostensibly done for forest protection and in the name of removing “outsiders” tend to cause passions to rile up among people dependent upon the hills for a livelihood; doing so without recourse to resettlement and compensation only heightens a sense of injustice among those affected. With the Union government taking charge of security, a tamping down of the violence should follow, but for the grievances to melt down, the faltering State government must convene an all-party mechanism to reach out to the people across ethnic divides.
Date:06-05-23
छोटी खेती को उत्पादक नहीं बताना साजिश हैसंपादकीय
पिछले पांच दशकों में खेती की औसत जोत (प्रति किसान परिवार खेत का आकार ) 2.28 से 1.06 हेक्टेयर हो गई, जबकि खाद्यान्न उत्पादन छह गुना कहा। चावल, गेहूं फल, सब्जी और गन्ना उत्पादन में भारत दुनिया में दूसरे स्थान पर जबकि दूध और कपास उत्पादन में पहले और अंडा मछली में तीसरे स्थान पर पहुंचा कोई सामान्य बुद्धि का व्यक्ति भी नहीं करेगा कि लगातार छोटी होती जात की जगह खेती का कॉर्पोरेटाइजेशन होने से ही कृषि क्रांति होगी। हाल के कुछ दशकों मैं छोटी खेती का दानवकरण किया गया है, ताकि पूंजीपति एक बार फिर जमीन के मालिक बन किसानों को पूर्णतः मजदूर बना दे। यह लघु व किसान ही हैं, जिनका पूरा परिवार छोटी से जमीन पर खेती सब्जी और दाल ही नहीं उगा रहा, बल्कि उसी जमीन पर पशुपालन भी कर रहा है। लेकिन देश में श्रम का मूल्य भी अनाज और अन्य कृषि उत्पादों की कीमतों की तरह कम होते रह गया है। किसी जमीन की उपादेयता नापने के लिए प्रति हेक्टेयर उपज की जगह कुल आउटपुट लेना ही छोटी जोत वाली खेत का सच बतायेगा
Date:06-05-23
लोकतंत्र को कमजोर करता विलंबित न्यायसीबीपी श्रीवास्तव, ( लेखक सेंटर फार अप्लायड रिसर्च इन गवर्नेंस के अध्यक्ष हैं )
समानता और स्वतंत्रता जैसे मूलभूत लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा तभी संभव है जब प्रत्येक व्यक्ति तक सही समय पर न्याय उपलब्ध हो। भारतीय न्यायिक तंत्र में न्याय का अर्थ निष्पक्षता है तो इस कारण इसकी उपलब्धता में देरी अंतत: नैसर्गिक न्याय और लोकतंत्र दोनों के विरुद्ध हो जाती है। संविधान में न्याय को लोकतंत्र का सर्वोपरि मूल्य मानकर ही उसके सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक स्वरूपों का उल्लेख उद्देशिका में भी किया गया है। ऐसे में यह राज्य का पहला दायित्व है कि वह प्रत्येक व्यक्ति तक अविलंब न्याय वितरण सुनिश्चित करे। देश में लंबित मुकदमों के बोझ से यह चुनौती बड़ी विकराल हो जाती है। दिसंबर 2022 तक कुल पांच करोड़ लंबित मामलों में से 4.3 करोड़ से अधिक मामले जिला और अधीनस्थ न्यायालयों में लंबित हैं। वहीं, अगस्त 2022 तक उच्चतम न्यायालय में लंबित मामलों की कुल संख्या 71,411 थी। ऐसे में बड़ा प्रश्न यही है कि हम अपने न्याय तंत्र में लगातार बढ़ते हुए बैकलाग से कैसे निपटेंगे कि आम आदमी को समय से न्याय मिले?
उच्चतम न्यायालय ने 1979 में हुसैन आरा खातून बनाम बिहार राज्य मामले में त्वरित सुनवाई के अधिकार को मान्यता देते हुए उसे अनुच्छेद 21 के अंतर्गत जीवन के अधिकार में शामिल किया था। न्यायालय ने कहा था कि त्वरित सुनवाई आपराधिक न्याय तंत्र का मूल तत्व है और सुनवाई में देरी अपने आप में किसी व्यक्ति को न्याय से वंचित करना है। ब्रिटेन में 1215 में आए मैग्नाकार्टा की धारा 40 में यह उल्लेख किया गया था कि ‘हम किसी को न्याय के अधिकार से वंचित या विलंबित नहीं करेंगे।’ चूंकि मैग्नाकार्टा को मानवाधिकारों का पहला वैश्विक चार्टर कहा जाता है और उस हिसाब से देखें तो न्याय मिलने में विलंब एक प्रकार से मानवाधिकारों का भी उल्लंघन है। अमेरिकी संविधान के छठे संशोधन में भी त्वरित सुनवाई को प्राथमिकता की बात कही गई है। स्पष्ट है कि त्वरित न्याय या सुनवाई का सीधा संबंध लोकतांत्रिक मूल्यों और मानवाधिकारों की गरिमा से है।
देश में प्रति दस लाख लोगों पर 21 न्यायाधीश हैं। जबकि विधि आयोग के हिसाब से यह संख्या कम से कम 50 होनी चाहिए। स्वाभाविक है कि इससे न्यायाधीशों पर बोझ बढ़ता है और कार्यकुशलता प्रभावित होती है। इस बीच उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की स्वीकृत संख्या 2014 में 906 की तुलना में 2020 में बढ़कर 1,079 हो गई है तो अधीनस्थ न्यायालयों में भी न्यायाधीशों की संख्या 2014 में 19,518 से बढ़कर 2020 में 24,225 हुई है। फिर भी, यह बढ़ोतरी अपर्याप्त है। लंबित मामलों के अंबार पर दृष्टि डालें तो सरकार ही सबसे बड़ी वादी या कहें कि मुकदमेबाज है। इसका एक कारण सरकारी क्षेत्र की वह कार्यसंस्कृति भी है, जहां शिकायत निवारण तंत्र सुदृढ़ नहीं होता। इससे तमाम मामले अदालत की देहरी तक पहुंच जाते हैं। इस बढ़ते बोझ का असर अन्य मामलों पर पड़ता है।
संप्रति डिजीटलीकरण कई क्षेत्रों में बहुत उपयोगी सिद्ध हुआ है तो न्यायिक क्षेत्र में भी उसका लाभ उठाने हेतु बजट में ई-कोर्ट के लिए 7,000 करोड़ रुपये दिए गए हैं, मगर निचली अदालतों में आवश्यक बुनियादी ढांचे के अभाव में यह योजना तुरंत परिणाम देने में शायद ही सफल हो। समय के साथ आ रहे परिवर्तनों और संशोधित कानूनों के कारण भी नए प्रकार के विवाद सामने आने लगे हैं। इससे भी लंबित मामलों की संख्या में वृद्धि की समस्या गंभीर हुई है। इसका संज्ञान लेते हुए 2008 में न्यायमूर्ति एन. जगन्नाथ राव की अध्यक्षता में गठित एक समिति ने न्यायिक प्रभाव मूल्यांकन की संकल्पना पर कार्य करने की सिफारिश की थी। इससे नए मामलों के पंजीकृत होने से न्यायपालिका पर पड़ने वाले वित्तीय बोझ का भी मूल्यांकन किया जा सकेगा। इसमें कोई संदेह नहीं कि न्यायपालिका प्रौद्योगिकी की सहायता से बुनियादी ढांचे में सुधार की राह पर है, लेकिन मध्यस्थता और उसके केंद्रों में सुधार के लिए बजटीय आवंटन अब भी कम है। मद्रास और दिल्ली जैसे प्रमुख उच्च न्यायालयों के अपने मध्यस्थता केंद्र हैं, लेकिन ऐसे और केंद्र बनाने के लिए भारी संसाधनों की आवश्यकता होगी। दरअसल, मध्यस्थता अदालत औपचारिक रूप से मामला शुरू किए बिना पक्षकारों के बीच विवादों को हल करने का एक तंत्र है। इसमें विवाद समाधान के लिए एक तटस्थ व्यक्ति (मध्यस्थ) नियुक्त किया जाता है और उसका निर्णय कानूनी रूप से लागू करने योग्य होता है। यह औपचारिक अदालती मामले की तुलना में किफायती है तो इसके लिए व्यापक बुनियादी ढांचे के विकास की आवश्यकता है।
सैकड़ों साल पुराने कानून भी न्यायिक प्रक्रिया में देरी की वजह बने हुए हैं। इस कारण न्यायालय का समय और संसाधन क्षेत्राधिकार, कार्रवाई के कारण, नोटिस की पर्याप्तता, वाद के संशोधन और अन्य प्रक्रियात्मक मामलों पर तर्कों में बर्बाद होते हैं। विधि आयोग ने भी कानूनों में सुधारों के लिए 14वीं, 27वीं, 41वीं, 48वीं, 54वीं, 71वीं, 74वीं, 77वीं, 79वीं और 144वीं रिपोर्ट के माध्यम से इस समस्या की ओर बार-बार संकेत दोहराया है। इस दिशा में मोदी सरकार ने कुछ पहल की है, लेकिन यह गति और तेज करनी होगी। कानून की जटिल शब्दावली भी ससमय न्याय में बड़ा अवरोध है, जिससे तमाम पहलुओं की व्याख्या करना एवं समझना मुश्किल हो जाता है। इसलिए कानूनों को सरल बनाना भी उतना ही आवश्यक है। न्यायिक तंत्र में एक प्रमुख अंशभागी होने के कारण अधिवक्ता वर्ग की भूमिका भी महत्वपूर्ण है, इसलिए उन्हें भी अपनी जिम्मेदारियों का परिचय देना होगा। वे भी हड़ताल जैसे कदम उठाने से बचें। हरीश उप्पल बनाम भारत संघ, 1988 मामले में उच्चतम न्यायालय ने कहा कि वकीलों को हड़ताल पर जाने या बहिष्कार के आह्वान का कोई अधिकार नहीं होगा, यहां तक कि सांकेतिक हड़ताल भी नहीं, मगर इसके बावजूद समय-समय पर हड़तालें आम हैं। यदि हमें समय से न्याय सुनिश्चित करना है तो इन अवरोधों को दूर करते हुए, न्यायिक प्रक्रिया के प्रत्येक स्तर पर सकारात्मक दृष्टिकोण के साथ ही पर्याप्त संवेदनशीलता का भी परिचय देना होगा।
Date:06-05-23
मणिपुर की आगसंपादकीय
मणिपुर में फैली व्यापक हिंसा के मद्देनजर अब इस उपद्रव में शामिल लोगों को देखते ही गोली मारने का आदेश दे दिया गया है। वहां भारी संख्या में सेना, असम राइफल्स और स्थानीय पुलिस बल को तैनात किया गया है। वहां की स्थिति का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि नौ हजार से अधिक लोग विस्थापित हो चुके हैं। मणिपुर सरकार का कहना है कि लोग गलतफहमी के चलते हिंसा पर उतारू हो गए हैं। मगर सवाल है कि यह गलतफहमी पैदा कैसे हुई, क्या सरकार ने उसे दूर करने का कोई प्रयास किया। अगर सरकार ने सचमुच गंभीरता से इस मसले को सुलझाने का प्रयास किया होता, तो शायद यह नौबत ही न आने पाती। दरअसल, मणिपुर उच्च न्यायालय ने बुधवार को एक आदेश दिया, जिसमें कहा गया है कि सरकार मैतेई समुदाय के लोगों को आदिवासी समुदाय का दर्जा देने पर विचार करे। मैतेई लोग अपने को आदिवासी समुदाय में शामिल करने की मांग कर रहे हैं इसी को लेकर दूसरे आदिवासी समुदाय के लोगों ने हिंसक प्रदर्शन शुरू कर दिया। हालांकि यह मामला नया नहीं है, मैतेई समुदाय लंबे समय से अपने को आदिवासी समुदाय में शामिल करने की मांग कर रहा है। इसी संबंध में अदालत का दरवाजा खटखटाया गया था। मगर इस हिंसक प्रदर्शन की असली वजह अदालत का फैसला नहीं, बल्कि सरकार का रवैया है।
घायल बीजेपी विधायक को किया गया एयरलिफ्ट, आर्मी को मिले फ्लैग मार्च के ऑर्डर, जानिए ताजा हालात इस साल फरवरी में जब सरकार ने पहाड़ी इलाकों से अवैध प्रवासियों को निकालना शुरू किया था, तभी पहली बार हिंसा भड़की थी। वहां की नगा और कुकी समुदाय की तैंतीस जातियों को जनजाति का दर्जा मिला हुआ है और उनके लिए चिह्नित भूभाग पर किसी गैर-जनजातीय समुदाय के व्यक्ति का कब्जा नहीं हो सकता। मगर जिन लोगों को प्रवासी बता कर बाहर निकाला गया, कुकी समुदाय उन्हें अपने लोग बता रहा था। दरअसल, विवाद की असल वजह यही है कि अगर अदालत के कहने पर सरकार ने मैतेई समुदाय को जनजाति का दर्जा दे दिया, तो वे नगा और कुकी के लिए आरक्षित भूखंडों पर भी कब्जा जमाना शुरू कर देंगे। मैतेई समुदाय वहां आर्थिक और राजनीतिक रूप से काफी ताकतवर है। उनके हिस्से में भूखंड बेशक कम हो, पर संख्या बल में वे जनजातीय समुदायों से काफी अधिक हैं और प्रदेश की राजनीति में साठ में से चालीस विधानसभा सीटों पर काबिज हैं। मिजोरम के लोगों को हिंसा के बीच से निकालने के लिए जारी हैं प्रयास, सरकार के नोटिस में क्या है ऐसे में जनजातीय समुदायों को भय है कि मैतेई समुदाय उनका हक छीन लेगा। मैतेई समुदाय का कहना है कि मणिपुर के भारत में विलय से पहले उसे जनजातीय समुदाय का दर्जा मिला हुआ था, इसलिए उसकी पुरानी पहचान लौटा दी जाए। इसी पर विचार के लिए अदालत ने कहा है।
ऐसा नहीं कि मणिपुर सरकार जनजातीय और गैर-जनजातीय समुदायों के बीच लंबे समय से चल रहे इस संघर्ष से अनजान है। जब फरवरी में उसने प्रवासियों को बाहर निकालने का अभियान शुरू किया, तभी उसे इन दोनों के बीच सामंजस्य बिठाने का प्रयास करना चाहिए था। पूर्वोत्तर में जातीय संघर्ष जब-तब हिंसक रुख अख्तियार कर लेता है और उसके चलते वहां का सारा जन-जीवन अस्त-व्यस्त हो जाता है। नाहक लोग मारे जाते हैं। ऐसे में अगर सरकार कह रही है कि गलतफहमी के चलते लोग हिंसक हो उठे हैं, तो उस गलतफहमी को दूर करने की जिम्मेदारी भी उसी की है। मगर अभी तक उसकी तरफ से कोई ऐसी पहलकदमी नहीं देखी गई है। वह सेना के बल पर लोगों के विरोध को दबाने का प्रयास कर रही है। इस तरह विरोध शायद ही दबे।
Date:06-05-23
मणिपुर में तनावसंपादकीय
मणिपुर में आदिवासियों और बहुसंख्यक मैतेई समुदाय के बीच भड़की हिंसा बहुत दुखद और निंदनीय है। तनाव इतना बढ़ गया है कि हजारों लोग विस्थापित होने या अपना घर छोड़ने को मजबूर हो गए हैं। स्थिति यहां तक बिगड़ गई थी कि उपद्रवियों को देखते ही गोली मारने के आदेश पारित हो गए थे। मणिपुर के अनेक इलाकों में सेना को स्थिति संभालने के काम में लगाया गया है। बड़ी संख्या में प्रभावित लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया है। आखिर ऐसा क्यों हुआ? अपेक्षाकृत शांत मणिपुर में इस तरह से जातीय हिंसा क्यों भड़की? इसके लिए कौन जिम्मेदार है? अव्वल तो लोगों को संवेदना और समझदारी का परिचय देना चाहिए था, पर यह एक दुखद सामाजिक पहलू है कि जातियों या समुदायों के बीच दूरियां या अविश्वास की भावना बढ़ रही है। इससे भी बढ़कर चिंता की बात यह है कि समाज में स्वार्थ तेजी से बढ़ रहा है। किसी भी तरह के सरकारी लाभ के लिए लोग पहले की तुलना में ज्यादा लालायित हैं और दुखद रूप से यह भी चाहते हैं कि सरकारी लाभ उनके अलावा किसी और को न मिले।
दरअसल, मामला यह है कि 19 अप्रैल को मणिपुर उच्च न्यायालय ने भारतीय जनता पार्टी की अगुवाई वाली राज्य सरकार से एसटी सूची में मैतेई जाति को भी शामिल करने पर विचार के लिए केंद्र सरकार से सिफारिश करने को कहा था। मैतेई लोगों की राज्य में आबादी लगभग 53 प्रतिशत है। न्यायालय के इस आदेश ने आदिवासियों के बीच चिंता पैदा कर दी है, जो पहाड़ी जिलों में रहते हैं और राज्य की आबादी का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा हैं। मणिपुर में नौकरियों और शिक्षा में एसटी के लिए 31 प्रतिशत आरक्षण है और अनुसूचित जनजातियों को लगता है कि उनके लाभ में कटौती हो जाएगी। कुकी जनजाति में ज्यादा गुस्सा है और छात्र संगठन उपद्रव पर उतर आए हैं। हालांकि, यह अच्छी बात है कि सरकार ने पूरी कड़ाई से स्थिति पर नियंत्रण किया है और आने वाले दिनों में भी राज्य सरकार को केंद्र के साथ मिलकर पूरी सतर्कता के साथ हिंसा पर नियंत्रण रखना चाहिए। आसपास के राज्यों में भी चिंता है। यह समय संयम व समझदारी बरतने का है। जिन आदिवासियों में असंतोष फैला है, उन्हें विश्वास में लेना चाहिए। उन्हें आश्वस्त करना चाहिए कि उनके आरक्षण लाभ में किसी तरह की कटौती नहीं होगी।
मणिपुर का तनाव दूसरे राज्यों और राजनीतिक दलों के लिए एक सबक की तरह होना चाहिए। जो पार्टियां आरक्षण की राजनीति में अपना लाभ देखती हैं, उन्हें सतर्क हो जाना चाहिए। आरक्षण राजनीति का विषय नहीं है, लेकिन यह दुर्भाग्य है कि ज्यादातर राजनीतिक दलों के लिए यह एक आसान भावनात्मक मुद्दा होता है। राजनीतिक दलों को अमन-चैन के हित में आरक्षण की राजनीति से देर-सबेर निकलना ही होगा। केंद्र सरकार को ऐसा तंत्र विकसित करना चाहिए कि पिछड़ी जातियों की सही पहचान हो और उन्हें जरूरत के हिसाब से आरक्षण का लाभ मिल जाए। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह मणिपुर के हालात पर निगाह रखे हुए हैं, उन्होंने कर्नाटक का चुनावी दौरा छोड़ दिया है। यह वाकई सतर्क रहने का समय है, अब चुनाव का मौसम बनने लगा है, असामाजिक तत्व, अपराधी और आतंकवादी लगातार चुनौतियां खड़ी करेंगे। कश्मीर में राजौरी में हुआ आतंकी हमला भी गंभीर चुनौती है। ऐसे में, सरकार की जिम्मेदारी बहुत बढ़ गई है। देश का कोई भी कोना हो, हिंसक तत्वों को फन फैलाने का मौका नहीं मिलना चाहिए।
Date:06-05-23
नई दिशा की और शांगहाई सहयोगअरविन्द गुप्ता, ( पूर्व राजनयिक एवं डाइरेक्टर वीआईएफ )
गोवा में संपन्न शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के विदेश मंत्रियों की बैठक हमारे रुतबे में इजाफा करती दिखी। इसमें न सिर्फ जुलाई में राष्ट्राध्यक्षों की प्रस्तावित बैठक का एजेंडा तय किया गया, बल्कि ईरान और बेलारूस को सदस्य देश का दर्जा देने पर भी बात हुई। बैठक में इस विषय पर भी चर्चा हुई कि रूसी और मंदारिन के अलावा अब अंग्रेजी को भी इसकी आधिकारिक भाषा बना देनी चाहिए। बैठक में अफगानिस्तान, आतंकवाद, कनेक्टिविटी, आर्थिक सहयोग और वैश्विक समस्याओं से जुड़े मसलों पर भी विचारों का आदान-प्रदान हुआ।
इस बैठक में शामिल होने के लिए पाकिस्तान के विदेश मंत्री का भारत आना खबरों में है। करीब 12 साल बाद किसी पाकिस्तानी विदेश मंत्री ने भारत का दौरा किया है। वैसे, बिलावल भुट्टो जरदारी के भारत आने से दोनों देशों के रिश्तों पर कोई सकारात्मक असर नहीं पड़ा है। इसकी एक वजह खुद बिलावल हैं, जिन्होंने कुछ दिनों पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ अपशब्दों का इस्तेमाल किया था। भारत ने भी स्वाभाविक ही कोई उम्मीद नहीं बांधी थी, क्योंकि पाकिस्तान पुराना कश्मीर राग अलापता रहता है और अनुच्छेद 370 को बहाल करने की मांग करता है।
बैठक में हमारे विदेश मंत्री एस जयशंकर ने सीमा पार आतंकवाद का मुद्दा उठाया, जो परोक्ष रूप से पाकिस्तान पर निशाना था। इसके जवाब में पाकिस्तानी विदेश मंत्री ने कहा कि हमें अपने कूटनीतिक हितों को साधने के लिए आतंकवाद का इस्तेमाल करने से बचना चाहिए। मगर बाद में पत्रकार-वार्ता में इसका करारा जवाब देते हुए एस जयशंकर ने बिलावल भुट्टो को आतंकवाद का प्रवक्ता और पाकिस्तान को आतंकवाद को समर्थन देने वाला देश कहा। उन्होंने यह भी कहा कि पाकिस्तान भली-भांति समझ ले कि अनुच्छेद 370 अब एक इतिहास हो गया है।
बहरहाल, इस संगठन की अध्यक्षता हमारे पास होने के गहरे निहितार्थ हैं। यह संगठन लगातार अपना महत्व बढ़ा रहा है। 2001 में इसके अस्तित्व में आने के वक्त इसके सदस्यों की संख्या पांच थी, जबकि आज आठ देश इसके सदस्य हैं। उम्मीद है, अगली बैठक में ईरान और बेलारूस भी इसका हिस्सा बन जाएंगे। इसके सदस्य देशों की विश्व आबादी में हिस्सेदारी करीब 42 फीसदी है और विश्व जीडीपी में लगभग 25 फीसदी। 19वीं सदी के सामरिक चिंतक हाफर्ड मैकिंडर ने कभी कहा था कि जो यूरेशिया पर राज करेगा, वही पूरी दुनिया पर शासन करेगा। जाहिर है, इस संगठन का सामरिक महत्व काफी व्यापक है।
यह अब बहुध्रुवीय दुनिया का एक महत्वपूर्ण मंच है। रूस-यूके्रन युद्ध के चलते पिछले दिनों वैश्विक स्थिति बिगड़ी है, चीन और अमेरिका में भी तनाव बढ़ चला है, रूस और चीन सामरिक रूप से एक-दूसरे से ज्यादा करीब आ रहे हैं, एससीओ भी नई विश्व व्यवस्था की पुरजोर वकालत कर रहा है, जो अमेरिका की अगुवाई वाली पश्चिमी व्यवस्था से अलग हो।
कहने को तो विदेश मंत्रियों की इस बैठक में राष्ट्राध्यक्षों की बैठक का एजेंडा तय किया गया, पर भारत ने 2018 में एससीओ को जो एसईसीयूआरई (संक्षेप में सिक्योर) फ्रेमवर्क दिया है, उसकी तरफ तेज कदम बढ़ाए गए हैं। सिक्योर का यहां अर्थ है- सिक्योरिटी (सुरक्षा), इकोनॉमिक कॉरपोरेशन (आर्थिक सहयोग), कनेक्टिविटी (जुड़ाव), यूनिटी (एकता), रिस्पेक्ट फॉर सॉवर्निटी ऐंड इंटीग्रिटी (संप्रभुता व अखडता का सम्मान) और एनवायरन्मेंट प्रोटेक्शन (पर्यावरण सुरक्षा)। भारत ने इन मामलों में एससीओ को नई दिशा दी है। उसने कई तरह की नई पहल की है। चाबहार बंदरगाह के बहाने मध्य एशिया को कनेक्टिविटी की नई उम्मीद दी है। बनारस को एससीओ टूरिज्म कैपिटल घोषित किया गया है। स्टार्ट-अप और पारंपरिक चिकित्सा पद्धति (जैसे आयुर्वेद) के कार्यसमूह बनाए गए हैं।
इस संगठन पर शुरुआती डेढ़ दशक तक रूस व चीन का दबदबा रहा। इसके शुरुआती दस्तावेज इन दोनों देशों के प्रभाव में ही तैयार हुए, मगर बतौर अध्यक्ष भारत इसे संतुलित बनाने में सफल रहा है। हम दक्षिण एशिया के देश हैं, और मध्य एशिया से भी हमारे अच्छे रिश्ते हैं। उन देशों की नजर में चीन व रूस के बरअक्स भारत ही उनकी आवाज बन सकता है। उनकी उम्मीद गलत नहीं है। हम लगातार अपनी क्षमताएं बढ़ा रहे हैं, जिसका लाभ मध्य एशिया के देशों को मिल रहा है। चूंकि भारत व मध्य एशियाई देशों के विदेश मंत्रियों का एक अन्य मंच भी अस्तित्व में है, जिसके कारण मध्य एशिया की आर्थिक उन्नति व कनेक्टिविटी में हम अनवरत योगदान दे रहे हैं, इसलिए एससीओ को नई दिशा देने की भारत की पहल का वे देश भी समर्थन करते हैं। चीन की बेल्ट रोड इनीशिएटिव के संतुलन में भी भारत नेतृत्व की भूमिका निभा रहा है।
बदलते हुए वैश्विक परिदृश्य का एससीओ पर भी असर पड़ा है। सितंबर, 2022 में शंघाई सहयोग संगठन की समरकंद बैठक में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सार्वजनिक तौर पर रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन को नसीहत दी थी कि यह युग जंग का नहीं, हमें तमाम विवादों का निपटारा आपसी बातचीत से ही करना चाहिए। मोदी के इस मंत्र का इस्तेमाल जी-20 की बाली बैठक में भी किया गया। यह भारत की मजबूती का संकेत था। हम एससीओ में भी शामिल हैं और क्वाड (भारत, जापान, ऑस्ट्रेलिया व अमेरिका का समूह) में भी। चूंकि दोनों समूहों में हम सकारात्मक भूमिका निभा रहे हैं, इसलिए एससीओ को लेकर पश्चिमी देशों की आशंकाएं भी कुछ कम हो सकती हैं। उनको यह भरोसा हो सकता है कि एससीओ पश्चिमी देशों के खिलाफ कोई समूह नहीं बनेगा।
स्पष्ट है, शंघाई सहयोग संगठन को हम नया आयाम भी दे रहे हैं और नई ऊर्जा से लैस भी कर रहे हैं। इन सबने वैश्विक मंचों पर भारत की उपस्थिति को कहीं ज्यादा गरिमामय बनाया है। गोवा बैठक में चीन के विदेश मंत्री ने कहा है कि एससीओ सदस्य पश्चिमी देशों की दखलंदाजी के रवैये का मिलकर विरोध करें। रूस की भी कुछ ऐसी ही मान्यता है। भारत ने एससीओ में सुधार और आधुनिकीकरण का आह्वान किया है। साफ है, एससीओ को भविष्य में नई दिशा देने में चीन व रूस के साथ भारत की भूमिका महत्वपूर्ण रहेगी।
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05 May 2023
प्रश्न–409 – भिन्न सुनाई देने के बावजूद भक्तों एवं सूफियों की भाव-भूमि समान थी। सिद्ध कीजिये। (200 शब्द)
Question–409 – Despite sounding different, the sentiments of devotees and Sufis were similar. Prove it. (200 words)
नोट : इसका उत्तर आपको हमें नहीं भेजना है, यह आपके स्वयं के अभ्यास के लिए है।
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Date:05-05-23
Imphal On BoilNormalisation in Northeast is key to solving inter-ethnic tensions. India must also talk to MyanmarTOI Editorials
The sudden outbreak of violence in Manipur once again highlights the delicate ethnic equations in the Northeast and the need to handle them carefully. The current strife follows a tribal solidarity march called by the All Tribal Students’ Union Manipur (ATSUM) in protest against perceived moves to grant Scheduled Tribe status to non-tribal Meiteis. In fact, the Manipur high court had recently asked the state government to send a recommendation to the Centre on the Meiteis’ demand. But tribals in the state fear this will erode their access to reservation benefits. Meanwhile, the Meiteis, though numerically in majority, mainly inhabit the Imphal valley, which accounts for just a tenth of the state’s total land area. The community cites its own historic indigenous tribe status to bolster its ST claim.
Tensions between hill tribes and Meiteis in Manipur aren’t new. But what appears to have precipitated the situation is the influx of Burmese refugees into the state since the military coup in Naypyidaw in February 2021. With the Burmese junta continuing operations against ethnic insurgents in the neighbouring country, this stream of refugees never waned. With many of the refugees coming from Myanmar’s Chin state and who share ethnic kinship ties with the Kuki tribe in Manipur, ethnic equations have been further complicated. There are two factors here that need immediate attention. First, the situation in Myanmar has a direct impact on Northeast border states like Manipur. While GoI has maintained long-standing ties with the Burmese military, the latter’s actions since the 2021 coup have created serious problems for the Northeast region. And minus a refugee policy, we are ill-equipped to properly deal with this fresh crisis. Therefore, India needs to urge Naypyidaw to cease the civil war in Myanmar and establish its own comprehensive refugee management system.
Second, blunt instruments are bad choices for solving Northeast’s problems. The region needs normalisation to uncage its economic potential. Steps such as suspension of mobile internet for five days in Manipur to control the law and order situation are highly disruptive. Add to this the application of the draconian AFSPA. Only all-round economic growth can reduce inter-ethnic tensions in the Northeast. GoI needs to facilitate this long-term solution.
Date:05-05-23
Bitter-Half Of Working StoryYes, more women are at work. But most of these jobs are informal. And much of the upswing in employment is distress-driven following the pandemic. Women are taking up invisible forms of work, mostly unpaidPhalasha Nagpal, [ The writer is consultant at Oxford Policy Management and works on skills, livelihoods, social inclusion in LMIC. Views are personal ]
Female labour force participation rate (current weekly status) has increased from 16% in 2017-18 to 21% in 2021-22, while the unemployment rate has declined from 4% to 2%, according to the recent Periodic Labour Force Survey (PLFS) report. It means around 22. 5 million more women have joined the workforce or are actively seeking work. This was achieved despite the devastating and disproportionate impact of Covid-19 on women and young girls.
What drives this increase? Is it a survival strategy forced by Covid-19? Is it structural shifts? Or is it a result of changes in restrictive traditional norms? Is it transitory or long-term? PLFS has some answers.
Agriculture remains the most ubiquitous employment. Data points to its increasing feminisation as women’s share increased from around 57% in 2017-18 to 63% in 2021-22. In contrast, men’s share fell from around 40% to 37% for the same period. Most other sectors – construction, trade, restaurant, transport, storage and communications – remain male-dominated.
Self-Employed & Unpaid
The report classifies workers into casual labour, salaried/wage workers and self-employed. Women in casual labour and in regular/wage employment have declined by 6% and 4% respectively.
By contrast, the share of self-employed women drastically increased by 10% to stand at 62%. A closer look showed the majority of self-employed women work as part-time or full-time helpers in their household enterprises and are without pay (60%), while a lower percentage are employers and own-account workers (40%).
Meanwhile, rural women’s workforce participation emerged as the key driver of women’s employment, having shot up by almost 22% vis-à-vis the 2% for urban women, compared to pre-pandemic levels. For the same period, the share of men working as casual labour and regular/ wage workers has remained constant(23-24%) as has that for the self-employed (52-53%) who mostly work as employers or own-account workers (81%).
These shifts point to the increasing informalisation of women’s work – an increased share in agriculture sector, higher participation in rural areas, and a sharp uptick in self-employment, alongside simultaneous decrease in salaried, wage and casual labour work. This is not the case for men.
Two things are clear. First, the distribution of women’s labour force has changed since the pandemic. Second, these shifts are deeply gendered, underpinned by existing and new Covid-19-induced gendered expectations and norms.
Evidence suggests compared to men, women were hit worse by Covid-19 in terms of loss of jobs, economic distress, and an increased burden of household work, up by as much as 30%.
To cope with these crises, while balancing gender-based domestic roles, self-employment became an obvious choice for many, especially given the control over time. Plenty instances exist of women setting up petty businesses or being an extra pair of hands in household enterprises to enable households to smooth over financial distress. Women took up more insecure forms of employment commanding less wages, often characterised by poor work conditions, exploitation, and risks to safety.
Covid-Hit & Distressed
Rural and self-employed women are the hardest hit in terms of earned incomes. Average earnings of selfemployed women dipped from Rs 5,407 in July-September 2021 to Rs 5,311 in AprilJune 2022. These figures mean a large percentage of self-employed women would be classified as living in extreme poverty as per World Bank’s poverty line. Sectoral shifts from manufacturing and services to agriculture and less remunerative employment also dampened earnings.
A salaried/ wage worker woman, for instance, earns 64% less each month after a shift to self-employment.
Finally, gender-wage inequality has also increased. For the self-employed, men have gone from earning 2. 2 times more than women in 2017-18 to 2. 6 times in 2020-21. These trends demand serious attention.
Much of the upswing in women’s employment is distress-driven. Women are subsidising their households’ economics at personal cost by increasingly taking on invisible forms of work, which are undervalued, unrecognised, and mostly unpaid. In doing so, they have become worse off with exacerbated social, gender, economic and health inequities. These effects are more pronounced for the poorest and most marginalised, the uneducated and unskilled women – the section largely driving the upswing in overall numbers.
These trends are unsustainable. Aspirations and choices should motivate women’s decision to join the workforce rather than a pandemic-induced necessity. This calls for reconfiguration of what women do and what women are able to do.
To transform what women do, transition must be made out of low-paying low-productivity roles into work that offer sustainable livelihood. Structural reforms, such as greater access to opportunities in lucrative sectors such as manufacturing, and job roles, and supporting women up the agricultural value chain, such as providing market access, can go a long way. Equally, this requires nudging shifts in gender norms that restrict women’s decisions to join work.
To enhance what women are able to do requires greater access to genderresponsiveopportunities through flexible work, part-time roles, hyper-local opportunities so women can balance domestic roles with paid work. It also requires empowering them with skill-sets (quality and demand-driven technical, vocationalskills and soft skills) and resources (safe and affordable transport, mentorship, etc) so they can take on more remunerative jobs.
Date:05-05-23
‘डबल इंजिन’ का नारा कितना कारगर है ?राजदीप सरदेसाई वरिष्ठ पत्रकार
‘डबल इंजिन सरकार’ का नारा अब राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन गया है। हर राज्य के चुनाव के दौरान बीजेपी इसे दोहराती है, ताकि वोटरों तक संदेश पहुंचे कि राज्य और केंद्र में एक ही पार्टी का शासन होगा तो लोगों तक विकास का फायदा पहुंच पाएगा। यह पीएम की बड़ी छवि को प्रतिबिम्बित करने के लिए भी है, जहां मोदी हर चुनाव में बीजेपी के ट्रम्पकार्ड बने हुए हैं। लेकिन कर्नाटक में दिलचस्प सवाल यह है कि क्या पीएम की लोकप्रियता वहां की सरकार के खिलाफ चल रही लहर का सामना कर पाएगी?
अब तक ‘डबल इंजिन’ अवधारणा को मिश्रित सफलता मिली है। महज छह माह पहले, हिमाचल प्रदेश में बीजेपी सत्ता में वापसी नहीं कर पाई। जबकि यहां पीएम ने मतदाताओं से कहा था, ‘कमल को दिए गए वोट आशीर्वाद के रूप में सीधे मोदी के खाते में आएंगे।’ इससे उलट, गुजरात में हुए चुनावों में जबरदस्त सफलता मिली। लेकिन इस ‘डबल इंजिन’ प्रोपेगंडा में कर्नाटक कहां फिट बैठता है? पिछले कुछ वर्षों में कर्नाटक की बीजेपी सरकार को भ्रष्टाचार के आरोप झेलने पड़े हैं। ‘डबल इंजिन’ टैग का यह भी मतलब है कि केंद्र भी भ्रष्टाचार के दाग से पूरी तरह बच नहीं सकता। प्रधानमंत्री के नारे ‘न खाऊंगा, न खाने दूंगा’ की नैतिक चमक फीकी पड़ती है, जब विधायक कैश के साथ पकड़े जाते हैं या जब कर्नाटक कॉन्ट्रैक्टर एसोसिएशन आरोप लगाता है कि परियोजनाओं को अनुमति देने के लिए 40 फीसदी कमीशन मांगा जाता है। भले आरोप साबित न हुए हों, लेकिन यह आंकड़ा जन विमर्श का हिस्सा है।
कर्नाटक के मुख्यमंत्री बोम्मई मृदुभाषी हैं। उनमें येदियुरप्पा जैसे जननेता वाले गुण नहीं हैं। येदियुरप्पा जैसी शख्सियत को बीजेपी की मौजूदा सत्ता संरचना में दुर्लभ माना जाता है। एक मजबूत क्षेत्रीय क्षत्रप, जिनका खुद का जनाधार है, खासतौर पर लिंगायत समुदाय में। उन्हें ‘मार्गदर्शक मंडल’ में धकेलने का प्रयास सफल नहीं हुआ और पार्टी को उन्हें मजबूरन स्टार प्रचारक बनाना पड़ा। इसके अलावा, जहां बीजेपी राज्य स्तर पर नेतृत्व की कमी से जूझ रही है, वहीं कर्नाटक में कांग्रेस के पास स्थापित स्थानीय नेताओं की भरमार है। साधन-सम्पन्न डीके शिवकुमार और भीड़ खींचने वाले सिद्धारमैया भले ही एक-दूसरे को पसंद न करते हों, लेकिन इन दो नेताओं की राजनीतिक समझ और जमीनी जुड़ाव इतना है, जिसका कर्नाटक में मुकाबला करना बीजेपी के लिए मुश्किल है। सिद्धारमैया की मुख्यमंत्री के रूप में लागू किए गए गरीब कल्याणकारी कार्यक्रमों के कारण अच्छी छवि है। दूर-दराज के गांवों में मतदाता मुख्यमंत्री के रूप में सिद्धारमैया और प्रधानमंत्री के रूप में मोदी को पसंद करते हैं।
इससे पता चलता है कि बीजेपी को प्रधानमंत्री मोदी के जाने-पहचाने तूफानी प्रचार अभियान का रास्ता अपनाने के लिए मजबूर क्यों होना पड़ा है। क्योंकि उनके पास यही आखिरी रास्ता है। बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा ने तो यहां तक कह दिया कि ‘अगर कर्नाटक के लोग मोदी का आशीर्वाद पाना जारी रखना चाहते हैं, जो बीजेपी को वोट दें।’ इससे पता चलता है कि ‘डबल इंजिन’ की अवधारणा भारत जैसी विविध संघीय व्यवस्था में राजनीतिक और संवैधानिक रूप से खतरों से भरी हुई है। संविधान को इस तरह बनाया गया है, जिससे सुनिश्चित हो सके कि केंद्र, राज्य के प्रति कोई भेदभाव न कर सके। इंदिरा गांधी के दौर में, इस वादे को दबदबे वाली केंद्र सरकार ने तोड़ा था, जिसने राज्यों में विपक्षी सरकारों को खारिज करने के लिए कई बार अनुच्छेद 356 का दुरुपयोग किया। मोदी युग में, ‘सहकारी संघवाद’ फिर से खतरे में है। विपक्षी पार्टियों द्वारा शासित राज्यों की सरकारों को डर है कि केंद्र पक्षपातपूर्ण तरीके से काम कर रहा है।
राजनीतिक रूप से, यह सांस्कृतिक विशिष्टता के इतिहास वाले राज्यों में क्षेत्रीय भावना को पुनर्जीवित भी कर रहा है। हमने ऐसा बंगाल में देखा था, जब प्रधानमंत्री के ‘दीदी ओ दीदी’ वाले मजाक ने ममता बनर्जी को घायल बंगाली उप-राष्ट्रवाद की भावना को दोबारा जगाने का मौका दिया था। अब ऐसा ही कुछ हम कर्नाटक में होते हुए देख रहे हैं, जहां कांग्रेस कन्नडिगा गौरव से जोड़कर कई मुद्दे उठाने की कोशिश कर रही हैै। कर्नाटक चुनाव भविष्य के लिए यह सबक दे सकते हैं कि राज्य के चुनाव पूरी तरह स्थानीय मुद्दों पर लड़े जाते हैं, जबकि आम चुनाव केंद्रीय नेतृत्व के लिए एक जनमत संग्रह की तरह हैं। अगर यह धारणा बढ़ती है कि ‘डबल इंजिन’ मॉडल वास्तव में रिमोट से चलने वाली दिल्ली-केंद्रित शासन प्रणाली है, तो यह राज्यों की सरकारों और नेताओं की क्षेत्रीय चिंताओं को और बढ़ाएगा।
Date:05-05-23
आशंकाओं के बीच एआइ से जुड़ी संभावनाएंसृजन पाल सिंह,( पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम के सलाहकार रहे लेखक कलाम सेंटर के सीईओ हैं )
वैश्विक स्तर पर नौकरी और रोजगार के मामले में इस समय सबसे बड़ा परिवर्तन मशीन लर्निंग और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआइ के मोर्चे पर देखने को मिल रहा है। हाल के समय में एआइ ने ऊंची छलांग लगाई है। इस तकनीकी नवाचार ने पूरे परिदृश्य को ही बदल दिया है। एआइ की उपयोगिता ने दुनिया भर में एक नई बहस छेड़ दी है। एआइ के प्रयोग से उत्पादन की प्रक्रियाओं और ज्ञान के संचय को स्वचालित करना संभव हुआ है। यह उन लोगों के काम करने में भी सक्षम है, जिनके लिए किसी विशेष कौशल अथवा दक्षता की आवश्यकता होती है। इतना ही नहीं, एआइ उस काम को कम कीमत पर जल्दी एवं अधिक मात्रा में करने में सक्षम है, जो किसी एक व्यक्ति के लिए अपनी शारीरिक क्षमता से कर पाना संभव नहीं। एआइ के इसी बढ़ते चलन का परिणाम है कि दिग्गज वैश्विक सलाहकार संस्था मैकिंजी ग्लोबल इंस्टीट्यूट का अनुमान है कि वर्ष 2030 तक दुनिया भर में आटोमेशन यानी स्वचालन से 80 करोड़ श्रमिक विस्थापित हो जाएंगे। वहीं, गोल्डमैन सैक्स ने भविष्यवाणी की है कि बीते दिनों चर्चा में आए चैटजीपीटी जैसे एआइ प्लेटफार्म्स के कारण बहुत कम समय में ही 30 करोड़ से अधिक नौकरियां खतरे में पड़ सकती हैं।
भारत एआइ के लिहाज से उन नाजुक देशों में है, जिन पर इस नई तकनीक का प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका जताई जा रही है। यह कुशलता निर्भर और श्रम सघन नौकरियों के लिए एक खतरा है, क्योंकि उनमें किए जाने वाले कई काम मशीन द्वारा आसानी से किए जा सकते हैं और उनके लिए उन्नत स्वचालन की आवश्यकता नहीं होती है। भारत के 80 प्रतिशत से अधिक श्रमिक अकुशल हैं, जिन्हें अपने काम का औपचारिक प्रशिक्षण न के बराबर मिला है। भूटान को छोड़ दें तो दक्षिण एशिया के सभी देशों में अकुशल श्रमिकों की संख्या हमारे देश में सबसे अधिक है। इनमें लाखों निजी सुरक्षाकर्मी, दिहाड़ी मजदूर, ड्राइवर और ऐसे श्रमिक शामिल हैं, जो अर्थव्यवस्था के अनौपचारिक क्षेत्र में काम करते हैं।
भारत की कामकाजी आबादी जहां अगले 20 वर्षों में 16 करोड़ बढ़ जाएगी, वहीं शोध संस्थान फारेस्टर के एक विश्लेषक माइकल ओ’ग्रेडी के अनुसार, आटोमेशन के कारण 6.3 करोड़ नौकरियां खत्म हो जाएंगी और 24.7 करोड़ नौकरियों पर समाप्त होने का खतरा उत्पन्न हो जाएगा। इनमें से अधिकांश नौकरियां वेटर, निर्माण कार्य में लगे श्रमिकों और फैक्ट्री मजदूरों की होंगी, जिन कार्यों को सीखने के लिए अधिक समय नहीं लगता है। भारी सामानों की ढुलाई का जो काम पहले इंसान करते थे, अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से चलने वाले औद्योगिक रोबोट्स के जरिये तेजी से, कम खर्च में और अधिक सुरक्षित रूप से किया जा सकेगा। दुनिया भर में और भारत में भी अनेक फैक्ट्रियों ने, जैसे कि अमूल ने पिछले दशक में यही प्रयास किया है कि निर्माण में मानवीय निर्भरता को यथासंभव कम किया जाए। यह स्थिति एआइ के आगमन से एक नए आयाम पर पहुंच जाती है। अब इससे भी अधिक उन्नत प्रक्रियाएं, जैसे कि सप्लाई चेन का प्रबंधन, आइटी परिचालन, बुनियादी ढांचा डिजाइन, परियोजना की तैयारी और गोदामों के प्रबंधन का काम मानवीय निर्भरता के बिना भी कहीं अधिक सुगमता से किया जा सकता है।
गूगल और टेस्ला जैसी कंपनियां सेल्फ ड्राइविंग यानी स्वचालित कारों के अनुसंधान और विकास पर लाखों डालर का निवेश कर रही हैं। ये कारें मानवीय हस्तक्षेप के बिना अपने दम पर चलने में समक्ष होंगी, क्योंकि वे आसपास के इलाके को समझने के लिए जीपीएस, आप्टिकल कैमरे और अल्ट्रासाउंड जैसी तकनीकों का उपयोग करती हैं। इससे अन्य वाहनों या यात्रियों को कोई खतरा भी नहीं होता। संभव है कि इस आविष्कार का मतलब यही होगा कि उबर या ओला जैसी कंपनियां भविष्य में सेल्फ-ड्राइविंग टैक्सियां चलाएंगी। तब शायद उन्हें ड्राइवरों की आवश्यकता ही न पड़े। ड्राइवरों को वेतन, छुट्टी और बीमा वगैरह देने से भी ये कंपनियां बची रहेंगी। ये ऐसे खर्चे हैं जिनकी आवश्यकता एक सेल्फ-ड्राइविंग कार को नहीं पड़ती। इस स्थिति में भारत में लाखों लोगों की आजीविका खतरे में पड़ सकती है। एक अनुमान के अनुसार भारत के लगभग पांच प्रतिशत कामगार परिवहन क्षेत्र में कार्यरत हैं, जिनमें दो करोड़ ट्रक ड्राइवर और हेल्पर तथा 1.2 करोड़ आटो रिक्शा ड्राइवर शामिल हैं। आटोमेशन के चलते निकट भविष्य में ऐसी नौकरियों के खत्म होने का खतरा है, क्योंकि एआइ के कारण उनकी प्रकृति ही बदल जाएगी।
एआइ एक ऐसी सुनामी की तरह है जो प्रायद्वीप के तटों को खतरे में डाल देती है। अब हमारे पास दो ही विकल्प हैं। या तो हम इसकी ताकत के आगे घुटने टेक दें और डूब जाएं, या इस लहर के वेग पर सवारी करें और पूरी दुनिया को उस ऊंचाई से देखें। अगर भारत को एआइ की अगली लहर से बचना चाहता है तो उसे भविष्य के लिए खुद को तैयार करना होगा। सबसे पहले, भविष्योन्मुखी शिक्षा केंद्रों का निर्माण करने की आवश्यकता है। छात्रों को स्कूल स्तर से ही तकनीकी शिक्षा दी जानी चाहिए और हमें ऐसे केंद्रों की स्थापना करनी होगी जहां हर तालुका में व्यक्ति अपनी कुशलता को बढ़ा सके। इससे जो लोग एआइ के कारण विस्थापित हुए हैं, वे आसानी से इसका लाभ लेकर अपनी क्षमता को बढ़ाएंगे और नौकरी के वैश्विक बाजार की योग्यता के अनुरूप प्रतिस्पर्धी बन जाएंगे एआइ की सहायता से इंसान अपनी क्षमता को सभी बंधनों से मुक्त कर संभावनाओं के अनेक द्वार खोल सकता है। संभव है कि यह ऐसे उद्योगों का निर्माण कर दे जिनके बारे में किसी ने सुना भी न हो। इससे लाखों नागरिकों के लिए नौकरी के अवसर पैदा हो सकते हैं। बस हमें अपनी शिक्षा प्रणाली को ऐसा बनाना होगा कि हम भविष्य के अवसरों के लिए तैयार रहें। ऐसी अनूठी शिक्षा का लाभ भारत के लोग तभी उठा सकेंगे जब हम भविष्य के प्रति गंभीरता दिखाकर उसी दिशा में अपनी रणनीति बनाएंगे।
Date:05-05-23
फसल बीमा की हकीकतविनोद के शाह
रबी फसल की कटाई से कुछ दिन पूर्व हुए मौसम परिवर्तन से देश के अठारह राज्यों में खेत में खड़ी फसलें वर्षा और ओलावृष्टि से बुरी तरह प्रभावित हुर्इं। देश में इस वर्ष गेहूं की बुआई 343.2 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में हुई थी, जो अभी तक का सर्वाधिक कीर्तिमान है। मगर देखते ही देखते कास्तकारों की आय पर मौसम ने जैसे डाका डाल दिया। मध्यप्रदेश, राजस्थान में तीन लाख हेक्टेयर फसलें पूरी तरह नष्ट हो गर्इं। अन्य राज्यों में चना, मसूर, सरसों, मसाले और सब्जियों-फलों की फसलों को अत्यधिक नुकसान हुआ है। नष्ट होने से बची फसलों की गुणवत्ता बुरी तरह से प्रभावित हुई है।
फसलों की गुणवत्ता प्रभावित होने से किसानों की आय में चालीस फीसद तक की गिरावट का अनुमान है। प्रभावित राज्यों की सरकारों ने पचास फीसद से अधिक फसलों के नष्ट होने पर अपने राजस्व कोष से बीस हजार से लेकर पचास हजार रुपए प्रति हेक्टेयर की मदद का एलान किया है। मगर यह मदद उन क्षेत्रों के लिए है, जहां फसलें पचास फीसद से अधिक नष्ट हुई हैं। गुणवत्ता प्रभावित होने और उत्पादन कम आने पर यह राहत उपलब्ध नहीं है।
सन 2016 में केंद्र सरकार ने राज्यों के साथ मिलकर फसल नुकसान और मौसमी प्रकोप से उत्पादन कम आने पर क्षतिपूर्ति के लिए प्रधानमंत्री फसल बीमा की शुरुआत की थी। इसमें भी उत्पादन में पचास फीसद से अधिक के नुकसान पर क्षति का प्रावधान किया गया है। गुणवत्ता प्रभावित होने से किसान के नुकसान की भरपाई का इसमें कोई प्रावधान नहीं है।
बीमा कंपनियों की क्षति शर्तें, आकलन विधि सिर्फ बीमा कंपनियों के लिए फायदेमंद रही हैं। पीड़ित किसानों को तो लागत मूल्य भी प्राप्त करना मुश्किल होता है। गत वर्षों में जब अलग-अलग राज्यों में फसलें बड़े पैमाने पर नष्ट हुई थीं, बीमा दावा अदा करने के बाद भी बीमा कंपनियां मुनाफे में रही हैं। 2019 में मध्यप्रदेश के किसानों को पचास फीसद से अधिक फसल के नुकसान के बाद उनके खातों में दो रुपए से लेकर दो सौ रुपए तक की राशि अदा की गई थी। बीमा कंपनियां क्षति आकलन एजंसियों को क्षति कम दर्शाने का प्रोलभन देती हैं, तो पीड़ित किसान नुकसान को ठीक लिखने के लिए एजंसी को रिश्वत देता है। बीमा दावों से फसल नुकसान की पर्याप्त भरपाई न होने से परेशान किसानों ने स्वैच्छिक आधार पर फसल बीमा का ‘प्रीमियम’ अदा करना बंद कर दिया है। देश के सात राज्यों- आंध्रप्रदेश,पंजाब, पश्चिम बंगाल ने प्रधानमंत्री फसल बीमा का राज्य अंशदान देना बंद कर दिया है। इससे इन राज्यों में प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना बंद हो चुकी है। देश में कृषि से जुड़े किसानों की संख्या करीब 10.20 करोड़ है, लेकिन वर्ष 2022-23 में प्रधानमंत्री फसल बीमा में पंजीकृत किसानों की संख्या मात्र 93.44 लाख रही, जो कि 2021-22 की तुलना में उन्नीस फीसद कम है। यह किसानों के प्रधानमंत्री फसल बीमा से मोहभंग का सबूत है। नुकसान की तुलना में बहुत कम क्षतिपूर्ति, समय से बीमा दावों का भुगतान न होना और राजस्व सर्वे इकाइयों का भ्रष्टाचार प्रधानमंत्री फसल बीमा पर किसानों के विश्वास को कमजोर करता है।
किसानों को बीमा प्रीमियम खरीफ फसल के लिए उनके बीमाधन का दो फीसद, रबी और तिलहनी फसलों के लिए डेढ़ फीसद, बागवानी और फलों के लिए आधा फीसद ही अदा करना होता है। शेष प्रीमियम राशि की अदायगी केंद्र और राज्य सरकार आधा-आधा करती हैं। राज्य सरकारें अपने हिस्से की राशि कभी तय समय पर अदा नहीं करती हैं। 2016 से पहले फसल बीमा किसान की ऋण साख के आधार पर हुआ करता था। सहकारी बैंकों में किसान क्रेडिट कार्ड सीमा अधिकतम ढाई लाख रुपए प्रति किसान है, जिससे पीड़ित किसान को इस अनुपात से ज्यादा बीमा दावा मिलने का प्रावधान नहीं था। प्रधानमंत्री फसल बीमा में इस प्रावधान में सुधार कर बीमा धन किसान की उपलब्ध कृषि भूमि के रकबे के आधार पर तय किया गया है। मगर अब भी प्राकृतिक नुकसान का आकलन व्यक्तिगत खेत को न मानकर राजस्व हलके में शामिल गांवों के कुल नुकसान का औसत निकाल कर किया जा रहा है। इससे वास्तविक नुकसान पीड़ित किसान को उसकी क्षति से बहुत कम की भरपाई हो पा रही है। दूसरी तरफ आगजनी जैसी घटनाओं में किसान को बहत्तर घंटे में बीमा दावा आवेदन के माध्यम से बीमा कंपनी को सूचना देनी होती है। गांव का अशिक्षित किसान बहत्तर घंटों में कैसे सूचना दे सकता है? गांवो में ईमेल तकनीक सहित बिजली जैसी सुविधाओं का अभाव है। सरकार और नौकरशाही जानती है कि किसान के पास त्वरित संचार तंत्र नहीं है। उसे अपने फसल बीमा का पालिसी नंबर तक नहीं मालूम, क्योंकि किसान को लिखित बीमा बांड उपलब्ध कराने की बाध्यता बीमा कंपनियों पर लागू नहीं है।
प्रति वर्ष फसल उत्पादन का आकलन सरसरी तौर पर प्रत्येक राजस्व हलके से चुनिंदा किसानों के खेत में एक तय क्षेत्रफल में खड़ी फसल के आधार पर किया जाता है। इस तरह चार-छह नमूने के औसत परिणामों से उस इलाके का अधिकतम उत्पादन तय कर लिया जाता है। यह प्रक्रिया किसानों को सूचना दिए बगैर पूरी कर ली जाती है। जिस वर्ष फसल को प्राकृतिक नुकसान होता है, उस वर्ष में उत्पादन न्यूनतम स्तर पर होता है, लेकिन आगामी तीन वर्षों तक यह न्यूनतम उत्पादन आंकड़ा किसान के फसल उत्पादन के आंकड़े को प्रभावित करता रहता है। इसलिए वास्तविक अधिकतम उत्पादन का आंकड़ा कभी दर्ज ही नहीं होता है। जबकि वैज्ञानिक अध्ययन में प्रत्येक कृषि भूमि में उपयोग किए गए बीज की गुणवत्ता, सिंचाई की मात्रा, बुआई का समय आदि के आकलन से फसल का उत्पादन तय होता है। यह अलग-अलग किसानों द्वारा अपनाई गई तकनीक पर आधारित होता है। इसलिए एक हलके के कुछ किसानों के खेतों के नमूने लेने की पद्धति फसल नुकसान की वास्तविक क्षतिपूर्ति कभी नहीं कर सकती।
कृषि वैज्ञानिक सिंचित भूमि में गेहूं का अधिकतम उत्पादन साठ से अस्सी क्विंटल प्रति हेक्टेयर तय करते हैं। मगर प्रधानमंत्री फसल बीमा में कंपनियों ने विगत छह वर्षों में औसत के आधार पर अधिकतम उत्पादन पैंतालीस क्विंटल से अधिक रिकार्ड में दर्ज ही नही किया है। वास्तविक गेहूं उत्पादन और बीमा कंपनी के आंकलित उत्पादन में चालीस फीसद से अधिक का अंतर है। यह अंतर दलहनी और तिलहनी फसलों में भी इसी प्रकार का है। इन हालात में बीमा कंपनियों से वास्तविक फसल क्षतिपूर्ति की अपेक्षा भला कितनी की जा सकती है।
फसल नुकसान आकलन के लिए पिछले साल से रिमोट सेंसिंग तकनीक और ड्रोन सर्वेक्षण के प्रयोग शुरू हुए हैं। मगर उत्तर प्रदेश के किसानों ने शिकायत की थी कि ड्रोन द्वारा नुकसान आकलन में बीमा कंपनियां नष्ट फसलों के स्थान पर हरी-भरी फसलों की तस्वीर लगा कर दावा अदा करने से बचती रहीं। बीमा एजंट के रूप में राष्ट्रीय और सहकारी बैंक फसल की किस्म लिखते समय अनाज और दलहनी फसल प्रत्येक किसान के खाते में साठ और चालीस फीसद के अनुपात में लिखते हैं। बीमा एजेंट बैंकों द्वारा दर्ज फसल की किस्म में अंतर के कारण रिमोट सेंसिग सर्वेक्षण और ड्रोन सर्वेक्षण भी बेमानी साबित हो रहे हैं। फसल बीमा होने के बाबजूद राज्य सरकारों द्वारा अपने राजस्व कोष या आपदा प्रबंधन कोष से किसानों को क्षतिपूर्ति देने के लिए कदम उठाना भी प्रधानमंत्री फसल बीमा की उपयोगिता पर सावालिया निशान लगाता है।
Date:05-05-23
सहिष्णु हो सरकारसंपादकीय
सप्रीम कोर्ट में समलैंगिकों की शादी को कानूनी मान्यता देने के लिए चल रही सुनवाई में सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि सरकार एक समिति गठित करेगी। कमेटी समस्याओं को सुनेगी और समलैंगिक विवाहों को कानूनी मान्यता देने के मुद्दे को हुए विना वास्तविक मानवीय चिंताओं को दूर करने के उपाय तलाशेगी। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने याचिकाकर्ताओं से कहा, ये अपने सुझाव दें और बताएं क्या कदम उठाए जा सकते हैं। अदालत का कहना है, समलैंगिकों को समाज से बहिष्कृत नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने सरकार से उसका इरादा भी पूछा और उनकी सुरक्षा और कल्याण के लिए वह क्या कर रही है. यह भी पूछा। पिछले छह दिन से चल रही सुनवाई में सरकार ने अपनी कि वैध शादी क्या और किसके हैं, दलीलें दीं। केंद्र का कहना है कि वह हर निजी रिश्ते को मान्यता देने के लिए बाध्य नहीं है। ना ही उसे नई परिभाष के लिए मजबूर किया जा सकता है। सरकार का यह भी सवाल है एलजीबीटीक्यूआईए प्लस में शामिल इस प्लस में लोगों के लभगभ 72 शेड्स और श्रेणियां शामिल जो 160 कानूनों को प्रभावित कर सकती हैं। मेहता ने अदालत से कहा कि यह कौन तय करेगा बीच है। यह बहस लंबे समय से चल रही है। क्योंकि मुद्दा समलैंगिकों के शारीरिक संबंध तक ही सीमित नहीं है, यह स्थिर और भावनात्मक संबंध भी है जिसे अभी तक सामाजिक और पारिवारिक रूप से मान्यता नहीं मिली है। हालांकि समलैंगिकों को अब सबसे बड़ी अदालत से ही उम्मीदें हैं। अदालत ने उनके साथ काफी सकारात्मक रुख रखते हुए सरकार को विचार करने के लिए बाध्य किया है। वास्तव में वह केवल महानगरों के वाशिंदों की सोच या चुनाव नहीं है। तेजी से वह विचार देश भर में चर्चा का केंद्र बन रहा है। अपनी सरकारें ऐसे किसी भी मामले को टरकाने में ही अपनी भलाई समझती हैं जिस पर समाज का बड़ा वर्ग नकारात्मक विचार रखता हो या विरोध उठने की आशंका हो इस सचाई से मुकरा नहीं जाना चाहिए कि सरकार के संदेह भी बेवजह नहीं हैं। क्योंकि समय रहते इनसे निपटने में कोताही बरती गई तो ये भविष्य में और भी जटिल हो सकते हैं। उम्मीद की जानी चाहिए कि वह समिति सरकार की आशंकाओं और समलैंगिकों की मांगों और समस्याओं को समझते हुए अदालत को सकारात्मक उपाय सुझाने का प्रयास करेगी।
Date:05-05-23
सिरे से गायब नैतिकताराजनीति रजनीश कपूर
भारतीय राजनीति में कई ऐसे नेता हुए हैं, जिन्होंने नैतिकता को अपने पद से ऊपर माना है। परंतु इन नेताओं को आप उंगलियों पर ही गिन सकते हैं। आजकल के नेताओं में पहले जैसे नेताओं की तुलना में नैतिकता ना के बराबर रह गई है। आजकल के नेता नैतिकता से अधिक अपनी कुर्सी को ज्यादा महत्त्व देते हैं। इसीलिए आजकल के नेताओं पर जनता को उतना भरोसा नहीं रहा।
नैतिकता की बात करें तो 1956 में महबूब नगर रेल हादसे में 112 लोगों की मौत होने पर तत्कालीन रेल मंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था। शास्त्री जी की तरह ही बिहार के वर्तमान मुख्यमंत्री एवं वाजपेयी सरकार में रेल मंत्री रहे नीतीश कुमार ने भी 1999 में गैसल में एक बड़ी रेल दुर्घटना की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए मंत्री पद से इस्तीफा दे दिया था । देश के चौथे वित्त मंत्री टीटी कृष्णामाचारी ने 1958 में मुद्रा घोटाले के चलते मंत्री पद से इस्तीफा दिया था। 1962 के युद्ध में चीन से मिली शिकस्त के बाद तत्कालीन रक्षा मंत्री वीके कृष्ण मेनन ने भी नैतिकता के आधार पर अपने पद से इस्तीफा दिया था। ऐसे कई नेता हुए हैं, जिन्होंने नैतिकता के आधार पर त्यागपत्र दिए। परंतु बीते कुछ सालों में आप यदि किसी नेता को, चाहे वो किसी भी दल का क्यों न हो, विवादों में पाएंगे तो आपको उनके इस्तीफे की खबर कहीं नहीं मिलेगी।
ऐसा क्यों है कि आजकल के नेता नैतिकता को इतना महत्त्व नहीं दे रहे? हमें हमारे बचपन में शास्त्री जी जैसे नेताओं के किससे सुनाए जाते थे कि वो कितने सरल व्यक्तित्व के नेता थे परंतु आजकल के नेता विवादों में आते हो और आक्रामक हो जाते हैं। ऐसे विवादों को विरोधी दलों की साजिश बता कर पल्ला झाड़ लेते हैं। विवाद पर बात करना या सफाई देना तो दूर की बात है।
दिल्ली के जंतर मंतर पर धरने पर बैठे देश मशहूर खिलाड़ी खेल महासंघ में अनियमितताओं के चलते एक नेता के खिलाफ मोर्चा खोल कर बैठे हैं। सुप्रीम कोर्ट के दबाव के चलते इन नेता जी पर दिल्ली पुलिस ने एफआईआर भी दर्ज कर दी है, परंतु ये नेता जी किन्हीं कारणों से अपने पद से इस्तीफा नहीं दे रहे और कुश्ती महासंघ की कुर्सी पर चिपके हुए हैं। वे कहते हैं प्रधानमंत्री या उनके दल के कोई वरिष्ठ नेता यदि उनसे इस्तीफा देने को कहेंगे तो वे तुरंत इस्तीफा दे देंगे। यहां पाठकों को याद दिलाना जरूरी होगा कि भाजपा के वरिष्ठ नेता आडवाणी जी पर जब हवाला कांड में आरोप लगा था तो उन्होंने अपने पद से तुरंत इस्तीफा दे दिया था। यदि कोई नेता किसी बड़े दल का सदस्य है, तो वो चाहे कुछ भी करे, कोई उसके खिलाफ आवाज उठाए तो उसे कोई फर्क नहीं पड़ता। वो अपने मोहल्ले में रहने वालों को अपनी ताकत का अहसास कराते हुए सभी नियम-कानून को तोड़ने में देर नहीं लगाता। फिर वो चाहे गैर- कानूनी निर्माण हो या कब्जा ही क्यों न हो। यदि कोई पड़ोसी आवाज उठाए तो वो नेता उसके साथ दबंगई करता है, बिना यह देखे कि उसका विरोध कोई महिला या वृद्ध कर रहा है। वो उसे धमकाता भी है, और ऐसी धमकियों से बाकी लोगों को भी डरा देता है। यदि वो नेता किसी बड़े पद पर नहीं होता तो राजनैतिक दल उससे पल्ला झाड़ कर उसे अपने दल से निलंबित कर देते हैं। परंतु यदि उस नेता का कद काफी ऊंचा होता है, तो राजनैतिक दल चुप्पी साध लेता है।
राजनीति के महाज्ञानी चाणक्य द्वारा अच्छे शासक के गुणों को परिभाषित किया गया है। यहीं वे गुण हैं जो नेता बनने से पहले, अच्छे इंसान और अच्छे नागरिक के रूप में दिखने चाहिए। आजकल के नेताओं को गांधी, नेहरू शास्त्री, इंदिरा, वाजपेयी जैसा विनम्र और मृदुभाषी होना चाहिए। इतिहास गवाह है कि भारत की जनता ने बड़बोले और दंभी नेताओं की बजाय विनम्र और मृदुभाषी व्यक्तित्व को अपने नेता के रूप में पसंद किया है। जिन दलों और नेताओं में घमंड की झलक दिखाई दी, जनता ने उन्हें अपने वोट से वंचित करने में देर नहीं की। योग्य नेता में सही समय पर सही निर्णय लेने की क्षमता होनी चाहिए। सही समय पर अहम फैसले लेने से बचने और फैसलों को टालने वाले नेताओं को जनता का समर्थन कभी नहीं मिला। यह गुण नेतृत्व क्षमता का पहला और अनिवार्य गुण माना जाता है।
पुरानी पीढ़ी के सफल नेता, चाहे किसी भी दल के रहे हों, अगर सालों तक जनता के प्रिय बने रहे तो इसी गुण के कारण इसलिए नैतिकता के पैमाने पर जो खरा उतरता है, वही राजनीति में आगे तक जाता है। आने वाली पीढ़ियां भी उसे याद रखती हैं, और उसकी नैतिकता के उदाहरण दिए जाते हैं। आजकल के नेताओं को पुरानी पीढ़ी के नेताओं से ऐसा ही कुछ सीखना चाहिए न कि उन्हें मार्गदर्शक मंडल में डाल कर छोड़ देना चाहिए।
Date:05-05-23
उतर भारत का सियासी दबदबा और दक्षिण की शिकायतमनु जोसेफ, ( पत्रकार और उपन्यासकार )
भारतीय जनता पार्टी अपने प्रतिद्वंद्वियों को कई तरह से परेशान किए रहती है। प्रतिद्वंद्वी भी तरह-तरह के आरोप लगाते रहते हैं। अन्य दलों ने समय-समय पर भाजपा पर उनके नेताओं को खरीदने के आरोप भी लगाए हैं। यह भी कहा जाता है कि भाजपा अपने द्वारा नियुक्त राज्यपालों का उपयोग उन राज्यों को पंगु बनाने के लिए करती है, जिनको वह नहीं चलाती है। कई राजनीतिक दल भाजपा पर अपने प्रतिद्वंद्वियों को फंसाने के लिए प्रवर्तन निदेशालय का इस्तेमाल करने के आरोप लगाते हैं।
भाजपा पर कई आरोप हैं, पर इनमें से किसी ने भी चुनाव में इस पार्टी के प्रदर्शन को प्रभावित नहीं किया है, खासकर उत्तर भारत में। वह एक दुर्जेय राजनीतिक ताकत बन गई है। वह अब दक्षिण में पैठ बढ़ाने की कोशिश कर रही है और अब तक सिर्फ कर्नाटक में सफल हुई है, जहां 10 मई को मतदान होने हैं। लोगों को आभास है कि अगर यहां भाजपा की रणनीति जारी रही, तो दक्षिण में देर-सबेर उसकी जमीन तैयार हो जाएगी। पांच दक्षिणी राज्यों, तमिलनाडु, केरल, आंध्र, तेलंगाना और कर्नाटक में उत्तर भारत से स्पष्ट अंतर है। इन राज्यों के बीच भी अनेक असमानताएं हैं, लेकिन उनकी एक सामूहिक शिकायत रही है- उत्तर भारत का राजनीतिक प्रभुत्व। गौर कीजिए, जब मोदी तमिलनाडु जाते हैं, तो उन्हें वहां गरीबों से भी अंग्रेजी में बात करनी पड़ती है। एक राष्ट्रवादी प्रधानमंत्री का भारतीयों से अंग्रेजी में बात करना अजीब लग सकता है, पर ऐसा ही है। हिंदी उत्तर भारत का प्रतीक बनी हुई है और दक्षिण का दंभ यह है कि उसे अंग्रेजी अधिक सुहाती है। दक्षिण का राजनीतिक तेवर सुनिश्चत करता है कि भारतीय राष्ट्रवादी जैसा कोई नहीं हो सकता, सिर्फ उत्तर भारतीय राष्ट्रवादी हैं।
परंपरागत रूप से दक्षिण भारतीय राजनेताओं ने केंद्र सरकार की शक्तियों को नापसंद किया है, खासकर जब केंद्र में एक पार्टी के नियंत्रण वाली सरकार रही है। कांग्रेस की तरह ही भाजपा ने भी दक्षिणी राज्यों को एक तरह से परेशान ही किया है। हाल ही में, तमिलनाडु ने अपने राज्यपाल के खिलाफ प्रस्ताव पारित किया। राज्य के मुख्यमंत्री एम के स्टालिन ने उन सभी राज्यों को पत्र लिखा था, जो भाजपा शासित नहीं हैं। स्टालिन ने सलाह दी कि अन्य गैर-भाजपा शासित राज्य भी अपने राज्यपाल के खिलाफ तमिलनाडु के समान ही प्रस्ताव पारित करें।
साल 2022 में जब केंद्र सरकार ने लोगों को मुफ्त उपहार देने की कुछ राज्यों की आदत पर सवाल उठाए थे, तब तमिलनाडु के वित्त मंत्री पी त्यागराजन ने एक पत्रिका से कहा, या तो आप जो कह रहे हैं, उसके लिए आपके पास सांविधानिक आधार होना चाहिए, या इस मामले में आपके पास विशेषज्ञता होनी चाहिए… या आपके पास ऐसा कुछ होना चाहिए, जो हमें बताए कि आप हमसे बेहतर जानते हैं या आपके पास बेहतर प्रदर्शन का रिकॉर्ड होना चाहिए।
कुछ दिनों पहले जब नरेंद्र मोदी ने तेलंगाना का दौरा किया, तब मुख्यमंत्री चंद्र्रशेखर राव उनके साथ सार्वजनिक कार्यक्रमों में शामिल नहीं हुए। केरल, आंध्र और कर्नाटक के प्रमुख नेताओं ने भी केंद्र के बाहुबल के प्रति अपनी नापसंदगी व्यक्त की है। कुल मिलाकर, केंद्र में जो भी सरकार हो, उसे दक्षिण के राज्यों के अनुकूल चलना ही सही है। कहीं ऐसा न हो कि एक ऐसे दक्षिण भारतीय शक्तिशाली व्यक्ति का उदय हो जाए, जो पूछ ले कि उत्तर को छोड़कर दक्षिण क्या खो देगा? ऐसा मजबूत व्यक्ति एक हिंदू पार्टी का प्रमुख हो सकता है और पांच राज्यों में समान रूप से एक लोकप्रिय व्यक्ति हो सकता है, जैसे कुछ दक्षिण भारतीय अभिनेता पूर्व में रहे हैं। ऐसा व्यक्ति राजनीतिक स्टारडम हासिल करने के लिए भाजपा द्वारा इस्तेमाल योजना का ही अनुसरण कर सकता है।
हालांकि, एक तर्क यह भी है कि हालात कैसे भी हों, भारत की अवधारणा को कुछ नहीं हो सकता। भारतीय बुद्धिजीवियों को खुश करने का सबसे त्वरित तरीका यह है कि उनसे पूछा जाए कि भारत को एक साथ क्या रखता है। मैंने जवाब में अंग्रेजी, क्रिकेट,और बॉलीवुड, सुना है, लेकिन मुझे लगता है, एक राष्ट्र बस आदत है। जैसे-जैसे समय बीतता है, यह आदत मजबूत होती चली जाती है, जिसे छोड़ना कठिन होता है और दक्षिण भारत भी एक आदत है।
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Date:04-05-23
अपने बच्चों को मोबाइल के एडिक्शन से बचाना जरूरीचेतन भगत, ( अंग्रेजी के उपन्यासकार )
हाल ही में भारत आए एपल के सीईओ टिम कुक ने माता-पिता को सलाह दी कि बच्चों का स्क्रीन टाइम कम करें। उन्होंने कहा, ‘अब बच्चे पैदाइशी डिजिटल हो गए हैं। इसलिए सीमाएं तय करना जरूरी है।’ भारतीय बच्चों पर किए गए विभिन्न सर्वेक्षणों के नतीजे चेताने वाले हैं। करीब 1000 बच्चों और उनके माता-पिता पर किए गए सर्वे में सामने आया कि 92% छात्र बाहर खेलने की बजाय मोबाइल गेम खेलना पसंद करते हैं। करीब 82% स्कूल से लौटकर फोन मांगते हैं। लगभग 78% बच्चों को खाना खाते हुए फोन देखने की आदत है। लोकल-सर्कल द्वारा किए एक अन्य सर्वे के मुताबिक 9-13 वर्ष के बच्चों के पास दिनभर स्मार्टफोन रहता है। अन्य रिपोर्ट बताती हैं कि भारतीय बच्चे सबसे जल्दी स्मार्टफोन पाने वाले बच्चों में शुमार हैं। हम अक्सर देखते हैं कि बच्चे खाना खाते हुए मोबाइल देख रहे हैं। उन्हें मोबाइल दिया जाता है ताकि बड़े लोग बातें कर सकें। हो सकता है आपके बच्चे भी फोन पर बहुत वक्त बिता रहे हों। हमें यह रोकना होगा। फोन का दिमाग पर वैसा ही असर हो रहा है, जैसा नशीले पदार्थों का होता है। स्मार्टफोन के ज्यादा इस्तेमाल की न्यूरोकेमिस्ट्री वही है, जो नार्कोटिक ड्रग की होती है। स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी की प्रो. ऐना लेंब्के के मुताबिक ‘हम अपनी पसंद का डिजिटल ड्रग ले रहे हैं और इसमें स्मार्टफोन का इस्तेमाल भी शामिल है। यह डिजिटल वायरों में उलझी पीढ़ी के लिए नशे की सुई की तरह है।’
वे सही हैं। एक तरह से हम सभी को लत लग चुकी है। पर बच्चों में फोन की लत भयानक हो सकती है। सभी को इसके आम नुकसान तो पता हैं- एकाग्रता की कमी, सुस्ती, आंखों पर जोर और समय की बर्बादी। हालांकि यह कम ही समझा गया है कि डिवाइस की भी लत लग सकती है और नतीजे घातक हो सकते हैं। जब भी हमें आनंद की अनुभूति होती है तो दिमाग में डोपामाइन नाम का न्यूरोकेमिकल रिलीज होता है। डोपामाइन की वजह से हम आनंद देने वाला वैसा ही अनुभव या पदार्थ और चाहते हैं। यह खाना, शराब, धूम्रपान, ड्रग्स, वीडियो गेम, पोर्नोग्राफी या फोन देखते रहना भी हो सकता है। अगर यह अनुभव हमसे छीना जाता है तो उसे पाने की और इच्छा होती है। विड्रॉल सिम्प्टम (लत छोड़ने पर शरीर पर होने वाले असर) भी दिखते हैं। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हमारे दिमाग में आनंद और दर्द एक ही जगह प्रोसेस होते हैं। दिमाग हमेशा आनंद और दर्द को एक-दूसरे से संतुलित करने की कोशिश करता है। जब हमें ड्रग या स्मार्टफोन नहीं मिलता तो हम असहज महसूस करने लगते हैं और फिर इनका ज्यादा इस्तेमाल करना चाहते हैं। इसलिए हममें से ज्यादातर लोग लगातार फोन खोजते, उठाते, देखते रहते हैं। हमारी आनंद की अनुभूति की व्यवस्था का एक और पहलू किसी चीज का आदी होना भी है। कुछ समय बाद हमें आसानी से मिल रहे आनंद की आदत हो जाती है। फिर हम सामान्य महसूस करने के लिए लत वाली चीजे इस्तेमाल करते हैं। धूम्रपान की लत वाला कोई भी व्यक्ति आपको यह बता देगा। इसी तरह एक बार आपको फोन की लत लग जाती है और फोन आपसे छीन लिया जाता है तो आप सिर्फ दर्द में रहते हैं। दर्द, एंग्ज़ायटी (चिंता), निरुत्साह, अवसाद और चिढ़चिढ़ेपन में बदल जाता है। फिर किसी चीज में आनंद नहीं आता। क्या आपके बच्चे में भी ऐसे लक्षण दिखते हैं? इसका कारण फोन हो सकता है।
एक बार आपके बच्चे को फोन की लत लग गई, तो उसके दिमाग में आनंद पैदा करने वाली व्यवस्था गड़बड़ा जाएगी। वह अब दर्द और गिरे हुए मनोबल का जीवन जिएगा। इससे भी बुरा यह है कि बहुत कम उम्र में ऐसा होने पर उसके दिमाग के बढ़ते हुए न्यूरोसर्किट पर गहरा असर पड़ सकता है। बच्चे के लिए सामान्य महसूस करना हमेशा के लिए मुश्किल हो जाएगा। वे दूसरे नशीले पदार्थों की तरफ भी जा सकते हैं। कृपया अपने बच्चों को फोन इस्तेमाल न करने दें या उन्हें यह आसानी से उपलब्ध न कराएं। बड़े बच्चों के मामले में भी फोन के इस्तेमाल पर नजर रखें। बतौर माता-पिता आपको पता होना चाहिए कि वे क्या और कितनी देर देख रहे हैं। इसके समाधान के लिए, जिन बच्चों को लत लग चुकी है, उन्हें डिजिटल डिटॉक्स की सलाह दी जाती है। आदर्श रूप में, बच्चे से कम से कम तीस दिन के लिए फोन ले लेना चाहिए (या बेहद जरूरी काम के लिए ही देना चाहिए)। उसे व्यायाम या खेल जैसी गतिविधियां रोज करना चाहिए। बच्चों को अच्छी परवरिश देना हम भारतीयों की जिम्मेदारी है।
Date:04-05-23
साइबर खतरासंपादकीय
कोई भी व्यक्ति या समाज अपनी सामान्य दिनचर्या में मौजूदा दौर के किसी नई तकनीकी के भी इस्तेमाल को लेकर सहज हो जाता है तो इसके पीछे उसके जरिए कामकाज के सुरक्षित होने को लेकर आश्वस्ति का भाव होता है। बल्कि कई बार तकनीक के उपयोग को इसी दलील पर बढ़ावा दिया जाता है कि वह पुराने तौर-तरीकों के मुकाबले ज्यादा सुरक्षित, पारदर्शी और सुविधाजनक है। लेकिन एक ताजा अध्ययन में बताया गया है कि आनलाइन गतिविधियों में धोखाधड़ी या ठगी के मामलों में जिस कदर बढ़ोतरी हो रही है और जल्दी इससे निपटने के प्रयास नहीं हुए तो आने वाले वक्त में डिजिटल दुनिया बहुत सारे लोगों के लिए एक परेशान करने वाला अनुभव साबित होगा। भारत में इंटरनेट आधारित कामकाज या अन्य गतिविधियों के अभी बहुत वक्त नहीं बीते हैं, लेकिन अभी ही जो तस्वीर उभर कर सामने आ रही है, वह चिंता पैदा करने के लिए काफी है। रिपोर्ट के मुताबिक पिछले तीन साल में करीब उनतालीस फीसद भारतीय परिवार आनलाइन वित्तीय धोखाधड़ी के शिकार हुए हैं। वैसे तमाम लोग हैं, जिन्हें एटीएम या डेबिट कार्ड या फिर क्रेडिट कार्ड के इस्तेमाल करते हुए ठग लिया गया। इसके अलावा, इंटरनेट आधारित कारोबार और बैंक खाते को लिंक कराने से लेकर अन्य कई अन्य तरीके से लोगों के साथ धोखाधड़ी हुई।
यह स्थिति तब है जब भारत में अभी बहुत बड़ा क्षेत्र सारे काम के लिए आनलाइन पर पूरी तरह निर्भर नहीं हुआ है। आमतौर पर कोई भी तकनीक अपने आप में किसी काम को आसान बनाने का जरिया होती है। लेकिन किसी भी तकनीक का सुरक्षित होना इस बात पर निर्भर करता है कि उसका उपयोग करने वाला व्यक्ति उसके बारे में किस स्तर तक प्रशिक्षित है। पिछले कुछ सालों के दौरान समूची दुनिया में अमूमन हर क्षेत्र में डिजिटल गतिविधियों को प्रोत्साहित किया गया है। बल्कि कई जगहों पर तो इसके जरिए कोई काम कराना लगभग अनिवार्य बना दिया गया है। खुद सरकारी महकमों में सारे कामकाज को आनलाइन बनाने का प्रयास चल रहा है। लेकिन हकीकत यह है कि इंटरनेट के प्रसार के साथ-साथ ठगी, धोखाधड़ी जैसे अपराधों के पुराने तरीके भी बदल कर इसी मुताबिक नए हो रहे हैं। साइबर ठगों का एक नया संजाल खड़ा हो रहा है, जो स्मार्टफोन या कंप्यूटर जैसे इंटरनेट आधारित यंत्रों को हैक करके बड़े अपराधों को भी अंजाम दे रहा है।
आए दिन ऐसी खबरें आती हैं जिसमें ठगी के लिए लोगों के मोबाइल पर संदेश भेजा जाता है या उन्हें उलझाने वाली बात की जाती है। अगर वे इस जाल में फंस कर कोई पासवर्ड या पिन नंबर आदि साझा करने लगते हैं तो कुछ ही देर में उनके बैंक खाते से पैसे गायब हो जाते हैं। आधार कार्ड जैसे संवेदनशील दस्तावेज का ब्योरा जिस तरह बिना हिचक हर जगह दे दिया जाता है, उसके कई खतरे हैं। फिर ऐसी वेबसाइटें भी हैं, जो खरीदारी के नाम पर उपभोक्ता से पैसे तो ले लेती हैं, मगर उन्हें सामान नहीं मुहैया कराया जाता या फिर खराब उत्पाद भेज दिया जाता है। इसके अलावा, अन्य तरह की कुछ अवांछित गतिविधियां भी हैं, जिनमें उलझा कर पैसे ठग लिए जाते हैं या निजता में घुसपैठ कर भयादोहन किया जाता है। यह ध्यान रखने की जरूरत है कि शहर से लेकर गांवों तक डिजिटल तकनीकी के बढ़ते इस्तेमाल के साथ-साथ उसी अनुपात में अगर इसके सुरक्षित उपयोग के मामले में आम लोगों को जागरूक, सावधान और प्रशिक्षित नहीं किया गया तो यह आधुनिक तकनीक सुविधा या फायदे के बजाय ज्यादा नुकसान का ही वाहक बनेगा। खुद सरकार को डिजिटल गतिविधियों को पूरी तरह सुरक्षित बनाने के लिए एक ठोस और चौकस तंत्र बनाना चाहिए।
Date:04-05-23
ऑनलाइन ठगीसंपादकीय
पिछले तीन साल के दौरान करीब 39 प्रतिशत भारतीय परिवार किसी न किसी ऑनलाइन वित्तीय धोखाधड़ी का शिकार हुए और इनमें से 24 प्रतिशत को ही उनका पैसा वापस मिल पाया। यह सनसनीखेज खुलासा लोकल सर्किल्स की मंगलवार को जारी रिपोर्ट में किया गया है। रिपोर्ट के मुताबिक, सर्वे में 23 प्रतिशत लोगों ने कहा कि वे क्रेडिट या डेबिट कार्ड से की गई धोखाधड़ी का शिकार बने । तेरह प्रतिशत का कहना था कि उन्हें खरीद, बिक्री और वर्गीकृत वेबसाइट उपयोगकर्ताओं द्वारा धोखा दिया गया। सर्वे में देश के 331 जिलों के 32 हजार लोगों की राय ली गई। इनमें 66 प्रतिशत पुरुष और 34 प्रतिशत महिलाएं थीं। ऑनलाइन भुगतान और डिटिजलीकरण के माध्यमों के उपयोग से जीवन में सहूलियत बढ़ी है, लेकिन इसी के साथ लोगों के साथ बैंक खाता धोखाधड़ी और अन्य तरीकों से चूना लगाने के मामले भी तेजी से बढ़े हैं। ऐसे अपराधों को काबू में रखने के लिए साइबर थाने खोले गए हैं, और पुलिस स्टाफ को भी साइबर अपराधों से पार पाने में सक्षम बनाने की गरज से प्रशिक्षित किया जा रहा है। लेकिन हालत ये है कि इस प्रकार के अपराध तेजी से बढ़ रहे हैं। बेशक, इन्हें रोकने के लिए पुलिस और अन्य एजेंसियों खासी सतर्क रहती हैं । लेकिन मात्र इतने भर से ही बात नहीं बनेगी। लोगों को भी सतर्क और जागरूक होना पड़ेगा । जरूरी है कि लोग अपने एहतियात बरतें। लेन देन डिटिजल किए जाने पर एक प्रकार की सहूलियत का अहसास होता है, लेकिन इस दौरान जरा भी लापरवाह हुए नहीं कि साइबर अपराधी अपना काम कर जाते हैं। एटीएम पर धोखाधड़ी के मामले आये दिन सुनने में आते हैं। बीते 9 साल में भारत में डिटिजल कायाकल्प हुआ है, इस दौरान देश में स्मार्टफोन, यूपीआई या आधार- आधारित लेन देन का बड़े स्तर पर चलन बढ़ा है। लेकिन इसी के साथ साइबर सुरक्षा और साइबर अपराध की चुनौतियां भी देश के सामने तेजी से उभरी हैं। इस मामले में भारत के लिए यह निराशाजनक खबर है कि मैसाच्यूस्ट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॅजी ने ऑनलाइन और साइबर ठगी का सर्वाधिक निशाना बन सकने वाले 20 देशों की जो सूची बनाई है, भारत उसमें 17वें स्थान पर है। यकीनन इसी से जाहिर हो जाता है कि हमें साइबर सुरक्षा और साइबर अपराधों को रोकने के लिए खासे प्रयास करने होंगे। निवेश करना होगा।
Date:04-05-23
गरमी में ऐसी बारिशसंपादकीय
भारत के ज्यादातर इलाकों में अभी भी बारिश और हल्की ठंडी हवा से मौसम खुशगवार बना हुआ है। मई का महीना शुरू हो गया है, लेकिन अभी ढंग से गरमी की शुरुआत नहीं हुई है। कुछ राज्यों में तो पंखे बंद रखने की स्थिति बनी हुई है। अप्रैल में भी सामान्य से कम तापमान रहा था और मई में भी देश के ज्यादातर इलाकों में सामान्य से कम तापमान की स्थिति रहेगी। पश्चिमी विक्षोभ की वजह से यह स्थिति बन रही है और कुल मिलाकर मई में मौसम कहीं भी ज्यादा परेशान नहीं करेगा। भारतीय मौसम विभाग के विस्तारित पूर्वानुमान के अनुसार, इस महीने पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान और गुजरात सहित उत्तर-पश्चिम और पश्चिम-मध्य भारत में दिन के समय तापमान सामान्य से कम रहेगा। इसके विपरीत, पूर्व-मध्य, पूर्व, पूर्वोत्तर और प्रायद्वीपीय भारत में अधिकतम तापमान सामान्य से कुछ अधिक रहेगा। अच्छी बात यह है कि रात के समय पारा का स्तर देश के अधिकांश हिस्सों में सामान्य और सामान्य से नीचे बना रहेगा। एक अनुमान यह भी है कि बिहार, झारखंड, ओडिशा, गंगीय पश्चिम बंगाल, पूर्वी उत्तर प्रदेश में निवासियों को इस माह में कुछ गरमी का सामना करना पड़ सकता है।
मार्च-अप्रैल में उत्तर भारत के ज्यादातर इलाकों में सामान्य से 60 प्रतिशत से भी ज्यादा बारिश हुई है। पूर्वोत्तर के राज्यों के अलावा कर्नाटक और केरल के ही कुछ इलाके ऐसे हैं, जहां सामान्य से बहुत कम बारिश हुई है। आम तौर पर मई में अधिकतम तापमान 40 डिग्री सेल्सियस से ऊपर होता है, पर इस बार ऐसा नहीं हो रहा है। गरमी से सबसे ज्यादा राहत का एहसास राजस्थान, दिल्ली, पश्चिमी उत्तर प्रदेश और हरियाणा सहित देश के कुछ हिस्से में होने वाला है। ऐसा इन इलाकों में सामान्य से अधिक बारिश की वजह से हो रहा है। मई में भी अनेक इलाकों में सामान्य से अधिक बारिश होगी। मौसम विभाग के अनुमान के मुताबिक, यह संभव है कि वर्ष के इस समय उत्तर पश्चिमी भारत को प्रभावित करने वाला पश्चिमी विक्षोभ पूर्वी भारत के मौसम को प्रभावित न करे। हालांकि, कुछ वैज्ञानिकों का कहना है कि इस बार गरमियों के दिन सूखे रहेंगे और खूब तपेंगे। बारिश से जो राहत मिल रही है, वह सप्ताह भर के समय में बीत जाएगी।
कुल मिलाकर, मौसम में जो हो रहा है, वह अनिश्चित ही है। इस अनिश्चितता की वजह स्थानीय भी हो सकती है, लेकिन ऐसा पूरे विश्व में हो रहा है। मौसम से जुड़ी अनिश्चितताएं बढ़ती चली जा रही हैं, जिनका व्यापक असर अर्थव्यवस्था और जनजीवन पर हो रहा है। इस मौसम में सब्जियों की खेती में धूप का बहुत महत्व होता है, लेकिन इधर कुछ दिन ऐसे बीते हैं, जब सूरज को कम ही तपते देखा गया है। घर या दफ्तर में बैठने वालों के लिए तो यह मौसम खुशी की बात है, लेकिन वास्तव में यह खेती-किसानी के अनुरूप नहीं है। ऐसे मौसम का असर स्वास्थ्य पर भी पड़ सकता है। ऐसे मौसम में चिकित्सक खान-पान को ठीक रखने की सलाह देते हैं। अब जलवायु परिवर्तन इतना महत्वपूर्ण मसला बन गया है कि मौसम के प्रति हर व्यक्ति को सजग रहना होगा। मौसम विभाग ने 6 मई को बंगाल की खाड़ी से एक तूफान के उठने की आशंका जताई है। उम्मीद करनी चाहिए कि यह तूफान ज्यादा खतरे न पैदा करे। उधर, पहाड़ों में यात्रा का समय है, कुछ जगहों से भूस्खलन की भी शिकायत आई है, अत: समुद्र किनारे से मैदानों और पहाड़ों तक इस मौसम में सावधानी समय की मांग है।
Date:04-05-23
संयुक्त राष्ट्र में भारत का दमदार दावाकंवल सिब्बल, ( पूर्व विदेश सचिव )
संयुक्त राष्ट्र में सुधार की भारत की बढ़ती मांग के गहरे निहितार्थ हैं। विदेश मंत्री एस जयशंकर इसके लिए काफी सक्रिय हैं। हम सुरक्षा परिषद् में स्थायी सदस्य के रूप में शामिल होना चाहते हैं, जिसमें हमें जापान, जर्मनी और ब्राजील का साथ मिल रहा है। सुधार की यह मांग सिर्फ स्थायी सदस्यों के लिए नहीं, अस्थायी सदस्यों के लिए भी है। इसकी वजह यह है कि सुरक्षा परिषद में लातीन अमेरिका व अफ्रीका का कोई स्थायी प्रतिनिधित्व नहीं है। अभी इसमें कुल 15 सदस्य हैं, जिनमें से पांच (चीन, फ्रांस, रूस, अमेरिका व ब्रिटेन) स्थायी हैं और शेष अस्थायी। स्थायी देशों में भी चीन (एशियाई) को छोड़कर बाकी सभी राष्ट्र पश्चिम के हैं। सुधार इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि सुरक्षा परिषद में आने वाले मसले अमूमन विकासशील देशों से जुड़े होते हैं, जबकि उनकी कोई भागीदारी इसमें नहीं है।
सवाल है कि हमें क्यों इसका हिस्सा बनना चाहिए? दरअसल, भारत विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र होने के साथ-साथ अब सबसे बड़ी आबादी वाला देश भी है। हम शुरू से संयुक्त राष्ट्र में सक्रिय भूमिका निभाते रहे हैं। निरस्त्रीकरण का मसला हो या शांति अभियानों का, हमने बढ़-चढ़कर हर जिम्मेदारी निभाई है। ऐसे वक्त में, जब आर्थिक और राजनीतिक रसूख में हो रहे बदलाव के कारण अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था तेजी से बदल रही है और हम एक बड़ी भूमिका निभाने को उत्सुक हैं, तब संयुक्त राष्ट्र में सुधार ही हमारी राह आसान बना सकती है। यही नहीं, चीन हमारे हितों को लगातार चोट पहुंचा रहा है, इसलिए एशिया में ताकत के संतुलित बंटवारे के लिए भी यह सुधार अनिवार्य है।
हालांकि, इस राह में रोड़े भी कम नहीं हैं। सुरक्षा परिषद को लेकर जब यह तर्क दिया जाता है कि इसमें यूरोप का प्रतिनिधित्व अधिक है, तब जर्मनी को इसमें शामिल करने से उसका दबदबा और बढ़ जाएगा। इसी तरह, जापान को लेकर भले ही हमारा रुख सकारात्मक है और एशियाई देश होने के नाते सुरक्षा परिषद में उसके शामिल होने को लेकर हम हिमायती हैं, लेकिन वह जी-7 का भी सदस्य है, जो उन्नत अर्थव्यवस्थाओं का समूह है। चूंकि जापान पश्चिम के साथ है, इसलिए सुरक्षा परिषद में उसके शामिल होने का अर्थ होगा, परिषद् पर पश्चिमी प्रभाव बढ़ना। एक तथ्य यह भी है कि रूस शायद ही जर्मनी को लेकर राजी हो, जबकि जापान और भारत को लेकर चीन का रुख सकारात्मक नहीं रहेगा। फिर, ‘कॉफी क्लब’ में भी गहरे मतभेद हैं, जिसमें जर्मनी के नाम पर इटली, तो भारत के नाम पर पाकिस्तान का इनकार बना रह सकता है। ब्राजील को लेकर भी इस टोली के एक सदस्य अर्जेंटीना की आपत्ति है।
हमें निस्संदेह कई देशों का समर्थन हासिल है, फ्रांस, ब्रिटेन, रूस और अमेरिका जैसे स्थायी सदस्यों ने हमारा साथ देने का खुलेआम एलान किया है। मगर यह उनको भी मालूम है कि हाल-फिलहाल ऐसा होना संभव नहीं है। हां, हमारा समर्थन करके वे कूटनीतिक लाभ जरूर कमा रहे हैं। इसमें अमेरिका की स्थिति कहीं ज्यादा उलझी हुई प्रतीत होती है। वह संयुक्त राष्ट्र के सीमित विस्तार का हिमायती है। वह सुरक्षा परिषद में स्थायी और अस्थायी सहित कुल 21 सदस्य चाहता है। अगर ऐसा होता है, तो अफ्रीका के खाते में दो सीटें आ सकती हैं, लेकिन वे दो सदस्य कौन होंगे, इसको लेकर अफ्रीकी यूनियन में एकता नहीं है। नाइजीरिया और दक्षिण अफ्रीका अपना दावा जरूर पेश कर रहे हैं, लेकिन अरब दुनिया के देश भी खुद को अफ्रीका का हिस्सा बताते हैं। इसीलिए, जब तक अफ्रीका कोई फैसला नहीं लेगा, बात शायद ही आगे बढ़ेगी। फिर, सुरक्षा परिषद में दावा करने वाले देशों की संख्या 25 से अधिक है। जाहिर है, 21 देशों की बाध्यता आकांक्षी मुल्कों में तनाव बढ़ाने का ही काम करेगी।
विकासशील देशों में यह भावना तो है कि संयुक्त राष्ट्र में सुधार होना चाहिए, लेकिन इसके लिए महासभा में दो-तिहाई बहुमत की भी दरकार है, जिसको लेकर फिलहाल तस्वीर साफ नहीं है। हमारी कोशिश यह भी है कि महासभा में संयुक्त राष्ट्र के विस्तार के सिद्धांत गढ़ लिए जाएं। यह प्रयास अरसे से चल रहा है, लेकिन मुश्किल यह है कि महासभा के अध्यक्ष यदि इस मसले को आगे बढ़ाते हैं, तो चीन अड़ंगा डाल देता है। वह अध्यक्ष तक को पद से हटाने में सफल हो जाता है। परदे के पीछे की इस राजनीति की काट ब्राजील, जापान और जर्मनी के साथ मिलकर निकाली जा रही है। एक बार नियम तैयार कर लिए गए, तो हमारी उम्मीदवारी की मांग कहीं ज्यादा मुखर हो सकती है। फिर, दो-तिहाई सदस्यों का साथ मिलने को लेकर अभी भले ही अस्पष्टता है, पर पिछले कुछ वर्षों के साझा बयानों पर गौर करें, तो 80 से अधिक देशों ने हमारा समर्थन करने का भरोसा दिया है। यही नहीं, महासभा के चुनावों में हमें काफी अधिक वोट मिलते हैं। मगर तमाम उम्मीदों के बावजूद स्थायी सदस्यता का प्रयास जटिल मसला है। इसके कूटनीतिक जोखिम का गुणा-भाग हमें पहले करना होगा।
कुछ लोग जी-20 से भी उम्मीद लगाए बैठे हैं। मगर यह मंच हमारी ज्यादा मदद नहीं कर सकेगा। इसकी संभावित बैठक में बेशक सभी देश हमारा समर्थन करें, लेकिन असलियत में वह कितना प्रभावी होगा, कहना मुश्किल है। चीन को यहां भी अपवाद नहीं मान सकते। फिर, रूस-अमेरिका और चीन-अमेरिका के रिश्ते फिलहाल इतने बिगड़ गए हैं कि कोई आम सहमति बनाना काफी दुरूह काम होगा।
ऐसे में, हाल-फिलहाल भारत का सुरक्षा परिषद में शामिल होना मुश्किल है। हां, अगले चार-पांच साल बाद बात बन सकती है, जब हमारी गिनती विश्व की तीसरी सबसे बड़ी आर्थिक ताकत में होने लगेगी। हमें इसके लिए वैश्विक समर्थन की भी जरूरत होगी, जिसकी तरफ भारत सरकार ने कदम बढ़ा दिए हैं। नई दिल्ली न सिर्फ जरूरत के समय अन्य देशों की मदद कर रही है (कोरोना टीके की आपूर्ति इसका बड़ा उदाहरण है), बल्कि कैरिबियाई या प्रशांत महासागर के देशों के साथ अपने संबंध कहीं ज्यादा मजबूत बना रही है। जैसे-जैसे हमारी वैश्विक भूमिका बढ़ती जाएगी, संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की स्थायी सदस्यता का हमारा दावा कहीं ज्यादा मजबूत होता जाएगा।
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हाल ही में भारत के विशाल भू-क्षेत्र को देखते हुए सूरज की रोशनी को बेहतर तरीके से इस्तेमाल करने का सुझाव दिया गया है। कॉर्नेल के एक अध्ययन के अनुसार दिन के उजाले का उचित उपयोग न करने से हम 4.1 अरब डॉलर या जीडीपी के 0.2% का नुकसान उठा रहे हैं। इसके अलावा स्वास्थ्य की हानि भी कर रहे हैं।
विशेषज्ञों का सुझाव है कि 1947 से पूर्व की तरह ही भारत को दो टाइम जोन में बांट दिया जाना चाहिए। काउंसिल ऑफ साइंटिफिक रिसर्च या (सीएसआईआर) का भी ऐसा ही मानना है। ऐसा इसलिए, क्योंकि भारत के पूर्वीं और पश्चिमी भागों के सूर्यास्त में लगभग 90 मिनट का अंतर होता है। अतः पूर्वी और पूर्वोत्तर भागों में मार्च से अक्टूबर के बीच घड़ी को एक घंटा आगे बढ़ाया जा सकता है। इससे दिन के उजाले के एक अतिरिक्त घंटे का इस्तेमाल किया जा सकेगा।
इस पर होने वाले बड़े निवेश को देखते हुए ऐसा करने का विचार टाला जा रहा है। दूसरे लॉजिस्टिक के समन्वय का प्रश्न खड़ा हो जाने की आशंका है।
डेलाइट सेविंग टाइम या ग्रीष्मकाल में अधिक प्रकाश प्राप्त करने के लिए घड़ियों को एक घंटे आगे बढ़ाने की प्रणाली, अमेरिका जैसे देशों में अच्छी तरह काम कर रही है। इस प्रकार का प्रयोग ऊर्जा की बचत करता है। कार्बन फुटप्रिन्ट में कटौती करता है। पर्यावरणीय संतुलन को बनाए रखने में मदद करता है। इस पर गंभीरता से विचार किए जाने की जरूरत है।
‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 15 अप्रैल, 2023
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Date:03-05-23
JCBs Not The AnswerUnauthorised colonies are an Indian urban reality. Demolishing them is both cruel and economically irrational.TOI Editorials
Over two days, thousands of people were rendered homeless and their homes demolished in New Delhi in the area around Tughlaqabad Fort. Following years of legal battles and a Delhi HC order, the Archaeological Survey of India (ASI) planned the process. The unfortunate turn of events encapsulated the failure of the capital’s urban governance system, aided by corruption that allows people to acquire government identification documents and voting rights, but not clear legal title to houses they have purchased. For sure, this is not unique to Delhi. Similar problems exist in many other urban centres.
India’s first-ever urban master plan was designed for Delhi in 1962. It was followed by six decades of failure as none of the master plans checked the proliferation of the “silent sprawl”. Unrealistic master plans in Delhi, and other big cities, were overwhelmed by the emergence of cities as India’s main engine of economic growth. Today, the Delhi Development Authority estimates that at least 5 million live in unauthorised colonies spread over 175 sq km. Inhabitants of these colonies are integral to the capital’s economic and social life.
Without them, the city will hollow out.
Successive governments in Delhi have recognised this and tried to regularise these colonies. In December 2019, GoI enacted a law to recognise the property rights of residents of unauthorised colonies. Property titling not just safeguards a lifetime’s savings, it also opens the door to greater access to the formal financial system. This has been the underlying motive of other state governments that have worked out schemes to regularise properties in urban growth engines such as Mumbai and Bengaluru. It shouldn’t be forgotten that in some cases civic authorities have even levied and collected property tax prior to regularisation. It shows that unauthorised colonies are not black spots. They show up in the documents of different arms of the state. Yet, as it happened in Tughlaqabad, they remain highly vulnerable to clearance drives.
Despite laws to protect them, outcomes have been unsatisfactory, reducing opportunities for millions of urban dwellers. It’s unfair they have to pay the price for failures in urban planning and corruptionin the executive. Also, solutions have to be realistic. Relocating people miles from their workplace is cruel when Indian cities have a poor public transport system. Unauthorised colonies are our urban reality. Fast-tracking property titles is the only way out.
Date:03-05-23
A good divorceIrretrievable breakdown of marriage should be a ground for divorce.Editorial
Not all marriages are happy, and not all divorces are unhappy. For those who want to opt out of a bad marriage, Monday’s Supreme Court ruling on divorce will be seen as a good move. Leaning on the “guiding spirit” of Article 142(1) of the Constitution to do “complete justice” in any “cause or matter”, a Constitution Bench said it could use this extraordinary discretionary power to grant divorce by mutual consent to couples trapped in bitter marriages. It also aims to spare couples the “agony and misery” of waiting six to 18 months for a local court to annul it, as stipulated under Section 13B of the Hindu Marriage Act, 1955. The Bench, headed by Justice Sanjay Kishan Kaul, observed that the law of divorce, built predominantly on assigning fault, fails to serve broken marriages. It pointed out that if a marriage is wrecked beyond hope, public interest lies in recognising this fact, not upholding a ‘married’ status regardless. The Court said it could use Article 142 to quash pending criminal or legal proceedings, be it over domestic violence or dowry, against the man or woman. Continuing in this strain, the Bench said the Supreme Court could grant divorce on the grounds of an “irretrievable breakdown of marriage” if the “separation is inevitable and the damage is irreparable”. Under the Hindu Marriage Act, irretrievable breakdown of marriage is not yet a ground for divorce.
In its judgment, there was a word of caution that the grant of divorce would not be a “matter of right, but a discretion which is to be exercised with great care… keeping in mind that ‘complete justice’ is done to both parties.” Several factors would be considered by the Supreme Court before invoking Article 142 in matrimonial cases, including duration of marriage, period of litigation, the time the couple has stayed apart, the nature of pending cases, and attempts at reconciliation. The Court will have to be satisfied that the mutual agreement to divorce was not under coercion. In India, while divorcees have doubled in number over the past two decades, the incidence of divorce is still at 1.1%, with those in urban areas making up the largest proportion. But the divorce numbers do not tell the whole story; there are many women, particularly among the poor, who are abandoned or deserted. Census 2011 revealed that the population which is “separated” is almost triple the divorced number. In a country which is largely poor, where gender discrimination is rife and many women are still not financially independent, the Court’s stress on “care and caution” and not to rush into a quick divorce must be welcomed. After all, marriage equality is not a reality for all.
Date:03-05-23
मजबूत लोकतंत्र की पहली शर्त – स्वतंत्र प्रेससंपादकीय
एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए चार मूल तत्वों का होना जरूरी है- बहुमत का शासन, अल्पसंख्यकों के अधिकारों की मान्यता, संवैधानिक सरकार और सबसे महत्वपूर्ण संवाद के जरिए शासन कोई चुनी हुई सरकार यह कहकर शासन नहीं चला सकती कि वह जनता के वोटों से एक निश्चित समय के लिए चुनी गई है। लिहाजा उस काल-खंड के बाद ही जनता को जवाब देगी। सरकारें जनहित में काम करें, यह उनका मूल दायित्व है न कि कोई अहसान । इसके बरअक्स प्रेस की असली भूमिका लोक-कल्याण के मुद्दों को जन-धरातल तक पहुंचना, मुद्दों के हर पहलू से लोगों को वाकिफ कराना और लोगों की व्यक्तिगत और सामूहिक चेतना को बेहतर करने के लिए तर्क – शक्ति को समृद्ध करना होता है। कई बार सरकारें ऐसी भूमिका को नकारात्मक मानते हुए प्रेस फ्रीडम को अपने खिलाफ मानने लगती हैं, लेकिन उनका सोचना गलत है। दरअसल, प्रेस की मदद से जनता किसी सरकार के कार्यों का सही आकलन करे, यह जनता के लिए ही नहीं, सरकार के भी दीर्घकालिक हित में होता है। यही कारण है कि अमरीकी संविधान निर्माताओं ने सन् 1789 में संविधान को अंगीकार करने के दो साल बाद ही पहला संशोधन करके अभिव्यक्ति की आजादी के साथ ‘प्रेस फ्रीडम’ को हमेशा संसदीय शक्तियों से परे करार दिया। भारत के संविधान निर्माताओं ने इससे भी व्यापक दृष्टिकोण अपनाते हुए अनुच्छेद 19 (1) (अ) में इसे ‘हर नागरिक की अभिव्यक्ति की ‘आजादी’ के रूप में मौलिक अधिकार बनाया। यह अलग बात है कि संविधान अंगीकार करने के डेढ़ साल में ही पहला संशोधन करके अनुच्छेद 19 (2) में तीन और नए प्रतिबंध- लोक-व्यवस्था, मित्र देशों से संबंध और किसी अपराध के लिए उकसाना जोड़ दिए गए। भारत में भले ही अभिव्यक्ति की आजादी सभी नागरिकों के लिए हो, लेकिन व्यवहार में औपचारिक प्रेस को यह स्वतंत्रता न केवल देना बल्कि उसे मजबूत करना प्रजातंत्र की पहली शर्त है।
Date:03-05-23
प्रेस आजाद है लेकिन अंकुश लगाने की कोशिशें भी जारीपवन के. वर्मा, ( लेखक, राजनयिक, पूर्व राज्यसभा सांसद )
हर साल 3 मई को यूएन और यूनेस्को द्वारा विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस मनाया जाता है। हमारी तमाम स्वतंत्रताएं कमोबेश मीडिया की आजादी से जुड़ी हैं। भारत में संविधान के 19वें अनुच्छेद ने अभिव्यक्ति की आजादी को बुनियादी अधिकारी निर्दिष्ट किया है, जिसमें मीडिया की स्वतंत्रता भी निहित है। प्रेस स्वतंत्रता दिवस की 30वीं वर्षगांठ एक अवसर है कि हम देश में मीडिया की आजादी का संतुलित विश्लेषण करें।
एक बात तो साफ है, भारत के लोग बीते सात दशकों में लोकतंत्र के अभ्यस्त हो चुके हैं और वे प्रेस की आजादी को महत्व देते हैं। वे सरकारी प्रोपगंडा और तटस्थ समाचार के बीच के भेद को भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से जानते हैं। यह कोई आज की बात नहीं है। 1975-77 में आपातकाल के दौरान जब सरकार के नियंत्रण वाला दूरदर्शन उसके गुण गाता था, तब भी ग्रामीण क्षेत्रों तक के लोग वास्तविकता जानने के लिए बीबीसी रेडियो लगा लिया करते थे। सरकारें चाहे जिस विचारधारा की हों, वे ऐसे ‘सहयोगी’ मीडिया को महत्व देती हैं, जो उनकी प्राथमिकताओं को सामने रखे, नीतियों का प्रचार करे और उनकी कम से कम आलोचना करे। चूंकि मैं भारत के दो राष्ट्रपतियों के प्रेस सेक्रेटरी की भूमिका निभा चुका हूं और विदेश मंत्रालय के अधिकृत प्रवक्ता के रूप में भी सेवाएं दे चुका हूं, इसलिए मैं इस बात को व्यक्तिगत तौर पर जानता हूं। सरकार अनेक तरीकों से लक्ष्यों को अर्जित कर सकती है : वे मीडिया बना सकती हैं, विचारकों को प्रभावित कर सकती हैं, मीडिया आउटलेट्स पर स्वामित्व रखने वाले कॉर्पोरेट्स से मैत्री बना सकती हैं इत्यादि। लेकिन मीडिया प्लेटफॉर्मों को धमकाने, उन पर दबाव बनाने, उन्हें दंडित करने- जिसमें उन्हें विज्ञापन नहीं देना भी शामिल है- लोकतंत्र की सीमारेखा को लांघने वाली गतिविधि कहलाएगी।
क्या सरकार ने यह सीमारेखा लांघी है? हां और ना दोनों। यह तो कोई भी नहीं कह सकता कि भारत में स्वतंत्र मीडिया नहीं है। लेकिन यह भी नहीं कहा जा सकता कि उस पर अंकुश लगाने की कोशिशें नहीं हुई हैं। विश्व प्रेस स्वतंत्रता इंडेक्स में भारत 2022 में दुनिया के 180 देशों में 150वें स्थान पर था। यह अब तक की सबसे निचली रैंकिंग थी। उसकी पोजिशन 2017 के बाद से ही निरंतर गिरती रही है। यह इंडेक्स रिपोर्टर्स विदाउट बॉर्डर्स नामक एक अंतरराष्ट्रीय एनजीओ बनाता है। वे अपनी रैंकिंग के लिए अनेक महत्वपूर्ण सूचकांकों का उपयोग करते हैं। इनमें मीडया की स्वायत्तता, उस पर राजनीतिक दबाव, नेताओं और सरकार को जवाबदेह ठहराने की आजादी, पत्रकारों की निजी और पेशेवर सुरक्षा आदि शामिल हैं।
सरकार ने इस रिपोर्ट से असहमति जताई है। लेकिन हाल के समय में कुछ परेशान कर देने वाले ट्रेंड्स उभरे हैं, जिनकी अनेदखी नहीं की जा सकती। पहला यह है कि सरकार की किसी भी तरह की आलोचना को राष्ट्रविरोधी या राष्ट्रीय सुरक्षा के विरुद्ध करार दे दिया जाता है। संविधान ने अनुच्छेद 19(2) में राज्यसत्ता को अधिकार दिए हैं कि वह भारत की सम्प्रभुता व एकता की रक्षा, राज्य की सुरक्षा, सार्वजनिक व्यवस्था कायम रखने, अदालत की अवमानना या लोगों को उकसाने वाली किसी भी कार्रवाई पर रोक लगाने के लिए अभिव्यक्ति की आजादी पर ‘समुचित प्रतिबंध’ लगा सकती है। लेकिन वर्ष 2020 में जब एक मलयाली चैनल मीडिया वन टीवी को सरकार द्वारा ब्लॉक कर दिया गया था तो सर्वोच्च अदालत ने इस आदेश को उलटते हुए स्पष्ट कहा था कि सरकारी नीतियों की आलोचना को अनुच्छेद 19(2) में निर्धारित मानकों के अनुरूप नहीं माना जा सकता है। वर्ष 2021 में जब दिवंगत पत्रकार विनोद दुआ पर राजद्रोह का मामला दर्ज किया गया था तो सर्वोच्च अदालत ने एफआईआर को खारिज करते हुए मीडिया पर मनमानी कार्रवाई की प्रवृत्ति को आड़े हाथों लिया था। सर्वोच्च अदालत ने कहा है कि प्रेस की जिम्मेदारी है सत्ता को सच बताना और सरकार इसे नीतियों की आलोचना करार देते हुए उस पर अंकुश नहीं लगा सकती। 2015 में श्रेया सिंघल बनाम भारत सरकार मामले में सर्वोच्च अदालत ने आईटी एक्ट के अनुच्छेद 66(ए) को भी समाप्त कर दिया था, क्योंकि यह ‘आपत्तिजनक’ समझी जाने वाली सोशल मीडिया पोस्ट्स के आधार पर लोगों को गिरफ्तार करने की अनियंत्रित शक्तियां पुलिस को देता था।
Date:03-05-23
तलाक की अवधिसंपादकीय
भारतीय समाज में विवाह एक सामाजिक परंपरा है, लेकिन यह इस संबंध में बने कानून के दायरे में भी है। अगर किन्हीं कारणों से पति और पत्नी के बीच दरार आ जाती है और सुलह नहीं हो पाती तथा संबंध आखिर अलगाव के रास्ते की ओर बढ़ जाता है, तो इसके लिए एक कानूनी प्रक्रिया रही है। उसमें अंतिम फैसले तक पहुंचने से पहले खास अंतराल भी तय किया गया है। मगर इस मसले पर जिस तरह की नई परिस्थितियां बन रही हैं और जैसी जटिलताएं उभर रही हैं, उसके मुताबिक इस संबंध में नई व्यवस्था की जरूरत महसूस की जा रही थी। यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट की एक पांच सदस्यीय पीठ ने अब विवाह विच्छेद या तलाक को लेकर यह व्यवस्था दी है कि वह हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13-बी के मुताबिक आपसी सहमति से तलाक लेने के लिए निर्धारित छह से आठ महीने की प्रतीक्षा अवधि को समाप्त करने के लिए संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत विशेष शक्तियों का उपयोग कर सकती है। जाहिर है, अब अगर पति और पत्नी के आपसी रिश्तों में किसी भी वजह से आ गई दरार को खत्म कर पाना मुमकिन नहीं हो पा रहा है, तो उसके हल के रूप में तलाक लेने के लिए पहले की तरह कम से कम छह महीने तक इंतजार करने की जरूरत नहीं रह जाएगी।
शीर्ष अदालत ने इस बिंदु पर कहा कि पति-पत्नी के बीच आई दरार को पाटना संभव नहीं हो पा रहा है तो ऐसी शादी को आपसी सहमति के आधार पर छह महीने से पहले भी खत्म किया जा सकता है। दरअसल, हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13-बी के मुताबिक अभी तक जो व्यवस्था रही है, उसमें आपसी सहमति से तलाक की मांग करने वाला प्रस्ताव दाखिल करने के बाद पक्षकारों को दूसरा प्रस्ताव पेश करने से पहले कम से कम छह महीने और अधिकतम अठारह महीने तक इंतजार करना पड़ता था। इसका उद्देश्य यह था कि तलाक के लिए अर्जी देने वाले दोनों पक्षों को अपने फैसले पर आत्मनिरीक्षण करने के निर्णय पर फिर से विचार करने का अवसर मिल सके। ऐसे मामले भी हैं, जिनमें आपसी विवाद तात्कालिक तौर पर तो अलगाव की स्थिति पैदा करता है, लेकिन थोड़ा वक्त बीतने के साथ दोनों पक्षों के भीतर थोड़ी नरमी आती है और कभी अलग होने का फैसला बदल भी सकता है। ऐसी स्थिति में कानूनन पति और पत्नी के नए रुख के आधार पर ही अदालत का फैसला आता है।
कई मामलों में तलाक का प्रस्ताव अदालत में पेश किए जाने के बाद कानूनी तौर पर निर्धारित प्रतीक्षा की अवधि कठिनाई बनती देखी गई। अब सुप्रीम कोर्ट के नए फैसले के बाद इस मसले की जटिलता थोड़ी आसान हुई है। यह छिपा नहीं है कि वक्त के साथ लोगों के सोचने-समझने और खुद को बरतने का तौर-तरीका बदला है। खासकर अगर पति और पत्नी के बीच किन्हीं वजहों से ऐसी दरार आ गई हो, जिसके हल की कोई भी गुंजाइश न बची हो तो ऐसे में साल-डेढ़ साल की अवधि इंतजार करना बेमानी लगता है। कभी-कभी एक पक्ष तलाक को अंतिम हल मानता है, मगर दूसरा पक्ष इसका विरोध करता है। ऐसी स्थिति में शीर्ष अदालत का ताजा फैसला नई दिशा देगा। किसी भी सामाजिक बदलाव और इसके लिए लोगों को तैयार होने में थोड़ा वक्त लगता है और उसका हल कई बार कानून के जरिए निकालना आसान होता है।
Date:03-05-23
सामाजिक सुरक्षा से टिकाऊ विकासअरविंद कुमार मिश्रा
वैश्वीकरण के साथ सामाजिक सुरक्षा का प्रश्न अब किसी एक देश का मुद्दा नहीं रह गया है। संयुक्त राष्ट्र द्वारा घोषित सत्रह सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करने के लिए सार्वभौमिक सामाजिक सुरक्षा अनिवार्य शर्त है। सामाजिक सुरक्षा का स्तर गरीबी, असमानता, जातिगत और जेंडर भेद को समाप्त करने का सबसे अहम जरिया है। इसके जरिए औपचारिक क्षेत्र को संगठित कार्यबल में तब्दील किया जा सकता है। भारत की अध्यक्षता में आयोजित जी-20 के वार्षिक सम्मेलन में सार्वभौमिक सामाजिक सुरक्षा का मुद्दा चर्चा में है। इसके कार्यसमूह में श्रम-20 द्वारा पांच बड़े मुद्दों को उठाया गया है। पहला, श्रमिकों का प्रवासन, दूसरा, असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों की सामाजिक सुरक्षा, तीसरा, कौशल प्रशिक्षण और कौशल उन्ययन (नियोक्ता की भूमिका और दायित्व), चौथा, कार्य का बदलता स्वरूप और पांचवां, टिकाऊ तथा सम्मानजनक आजीविकाओं को प्रोत्साहन।
ये पांचों मुद्दे सार्वभौमिक सामाजिक सुरक्षा से जुड़े हैं। इसकी जरूरत को अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आइएलओ) द्वारा जारी विश्व सामाजिक सुरक्षा रिपोर्ट 2020-22 के तथ्यों से समझा जा सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक, विश्व में तिरपन फीसद आबादी सामाजिक सुरक्षा से वंचित है। छियालीस प्रतिशत लोग ही रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, पेंशन जैसी किसी एक सामाजिक सुरक्षा का लाभ हासिल कर पा रहे हैं। 18.6 प्रतिशत बेरोजागर युवकों को मुश्किल से बेरोजगारी भत्ता मिल पाता है। 26.4 प्रतिशत बच्चों को ही सामाजिक सुरक्षा की चादर नसीब है। गंभीर दिव्यांगता के शिकार सिर्फ 33.4 प्रतिशत लोग समाज की मुख्यधारा में शामिल हैं। आज भी छियालीस फीसद महिलाएं मातृत्व अवकाश से वंचित हैं। तैंतीस फीसद आबादी को स्वास्थ्य से जुड़ी सामाजिक सुरक्षा योजनाओं के दायरे में लाया जाना है। बाईस फीसद बुजुर्ग वृद्धावस्था पेंशन न मिलने से जीवन के अंतिम पड़ाव पर चुनौतियों से जूझते हैं।
दुनिया भर का पचासी फीसद कारोबार जी-20 देशों के बीच होता है, जबकि पैंसठ फीसद आबादी यहां रहती है। विश्व के कुल कार्यबल का इकसठ प्रतिशत हिस्सा असंगठित क्षेत्र में आता है। अफ्रीका में 85.8 फीसद रोजगार असंगठित क्षेत्र में हैं। एशिया और प्रशांत क्षेत्र में 68.6 और 68.6 फीसद अरब देशों में तथा अमेरिका में चालीस प्रतिशत और यूरोप में यह अनुपात 25.1 फीसद है। सार्वभौमिक सामाजिक सुरक्षा के स्तर को प्रभावी बनाकर असंगठित क्षेत्र को संगठित क्षेत्र में रूपांतरित करने में मदद मिलेगी। आइएलओ ने 1952 में हुए सम्मेलन के दौरान सामाजिक सुरक्षा के न्यूनतम नौ आधार बताए थे। इनमें स्वास्थ्य देखभाल, बीमारियों में बीमा लाभ, बेरोजगारी भत्ता, वृद्धावस्था पेंशन, कार्यस्थल पर मुआवजा, पारिवारिक सुरक्षा, मातृत्व लाभ, अशक्तता और उत्तरजीविता लाभ शामिल हैं।
2016 में विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन ने संयुक्त रूप से सार्वभौमिक सामाजिक सुरक्षा पर काम करने का आह्वान किया। अगर जी-20 देशों के बीच सार्वभौमिक सामाजिक सुरक्षा पर ठोस सहमति बनती है, तो प्रवासन से जुड़ी चुनौतियां का समाधान होगा। घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों ही प्रवासन की चुनौतियां अलग हैं। वर्तमान में अंतरराष्ट्रीय प्रवासी श्रमिकों को भविष्य निधि, स्वास्थ्य, शिक्षा जैसी योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाता है। इन प्रवासी श्रमिकों को सामाजिक सुरक्षा योजना का लाभ देने के लिए तीन व्यवस्थाएं हो सकती हैं। दो देशों के बीच द्विपक्षीय करार हो, ब्रिक्स, बिम्सटेक और अफ्रीकी संघ इसे लागू करें, ठीक वैसे ही जैसे यूरोपीय यूनियन ने किया है। मगर यदि इसे वैश्विक आवरण देना है, तो जी-20 देशों के बीच बहुपक्षीय समझौता ठोस विकल्प होगा।
सामाजिक सुरक्षा की कोई भी कार्ययोजना श्रमिक, नियोक्ता, सरकार और श्रम संगठनों के एकजुट प्रयासों से ही संभव है। दुनिया भर में श्रमिक संगठन अपनी विचारधारा के आधार पर श्रम सुधार और निर्णयों को प्रभावित करते हैं। भारत में जी-20 के अंतर्गत आयोजित श्रम-20 में भारतीय और अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठनों ने जिस प्रकार एकजुटता दिखाई, वह अच्छा संकेत है। जी-20 के पिछले कुछ सम्मेलन श्रम जगत को लेकर प्रतिबद्धताएं जाहिर करने तक ही सीमित रहे हैं। 2020 में रोम घोषणा-पत्र में डिजिटल संसाधनों से श्रम क्षेत्र में सामाजिक सुरक्षा को गति देने का आह्वान किया गया, वहीं 2022 का बाली घोषणा-पत्र सामाजिक सुरक्षा पर केंद्रित लच्छेदार भाषणों तक सीमित रहा। 2015 में तुर्किए जी-20 सम्मेलन के दौरान ‘अंटाल्या यूथ गोल’ पर सहमति बनी। इसके अंतर्गत 2025 तक बेरोजगारी का दंश झेल रहे युवाओं के अनुपात में पंद्रह फीसद कटौती की जानी थी। हालांकि उस सम्मेलन के आठ साल बीत जाने के बाद जी-20 के वार्षिक सम्मेलनों में यह मुद्दा सिर्फ घोषणा-पत्र में उल्लेख किए जाने तक सीमित है।
सामाजिक सुरक्षा योजनाओं पर खर्च बढ़ाकर ही सतत विकास लक्ष्य हासिल किए जा सकते हैं। सबसे पहले इन योजनाओं को वित्त पोषण और संसाधन जुटाने के लिए घरेलू स्तर पर टिकाऊ वित्त की व्यवस्था खड़ी करनी चाहिए। भारत में सामाजिक सुरक्षा पर जीडीपी का लगभग 1.4 प्रतिशत व्यय होता है। इंडोनेशिया में यह 1.3 फीसद, दक्षिण अफ्रीका में 5.5, चीन में 7.7, ब्रिटेन में 15.1 और अमेरिका में 18.9 प्रतिशत है। इसमें सार्वजनिक सामाजिक सुरक्षा व्यय में वैयक्तिक और परिवारों को मुहैया कराई जाने वाली सेवाओं और स्थानांतरण पर खर्च और सामूहिक सेवाओं पर व्यय शामिल है। सार्वभौमिक सामाजिक सुरक्षा के लिए आवश्यक टिकाऊ वित्त व्यवस्था करने की अहम जिम्मेदारी जी-20 में शामिल जी-7 (अमेरिका, कनाडा, फ्रांस, जर्मनी, इटली, जापान और ब्रिटेन) की भी है। इन देशों के पास दुनिया के सत्तासी फीसद आर्थिक संसाधन हैं।
भारत के लिए जी-20 का वर्तमान आयोजन वैश्विक दक्षिण की आवाज बनने का बड़ा मौका है। इससे आखिरकार वैश्विक उत्तर और वैश्विक दक्षिण के बीच आर्थिक असमानता की खाई कम होगी। अमेरिका में 64.3 फीसद, एशिया और प्रशांत क्षेत्र में 44, अरब देशों में 40, जबकि अफ्रीकी देशों में सिर्फ 17.4 प्रतिशत लोगों को कोई एक सामाजिक सुरक्षा हासिल है। इथियोपिया के आदिस अबाबा में जी-20 सम्मेलन के दौरान सतत विकास लक्ष्यों को हासिल करने के लिए ‘इंटिग्रेटेड नेशनल फाइनेंस फ्रेमवर्क’ अस्तित्व में आया था। इसे व्यावहारिक रूप से अब तक लागू नहीं किया जा सका है। सार्वभौमिक सामाजिक सुरक्षा ऐसी हो, जो आर्थिक रूप से हर व्यक्ति के लिए सुलभ हो, वहीं यह वहनीय हो। इससे क्षेत्रीय असमानता भी दूर होगी। आर्थिक महाशक्तियों में भी सामाजिक सुरक्षा का दायरा बहुत बेहतर नहीं है। यूरोप और मध्य एशिया में सामाजिक सशक्तिकरण पर आधारित योजनाएं सरकार प्रायोजित पहल में सिमटी हैं।
भारत में जनधन, आधार और मोबाइल (जेएएम) के जरिए सामाजिक सुरक्षा योजनाओं को नई ऊंचाई दी जा रही है। आधार के जरिए 318 केंद्रीय योजनाओं और राज्यों की 720 योजनाएं संबद्ध हैं। यह नकद हस्तांतरण योजना को सफल बनाने में सबसे कारगर जरिया बनी है। 2022-23 के आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक 135.2 करोड़ आधार नंबर जारी किए जा चुके हैं। इनमें 75.3 करोड़ नागरिकों तक राशन मुहैया कराने और 27.9 करोड़ उपभोक्ताओं तक एलपीजी सिलेंडर पहुंचाने में आधार पहचान-पत्र के रूप में इस्तेमाल किए जा रहे हैं। इसी तरह 75.4 करोड़ बैंक खाते आधार से जोड़े जा चुके हैं। दुनिया की सबसे बड़ी रोजगार गारंटी योजना मनरेगा आर्थिक और सामाजिक सशक्तिकरण का बड़ा जरिया बनी है। इसके शहरी संस्करण पर भी विचार होना चाहिए। भारत में अस्सी फीसद लोग असंगठित क्षेत्र में हैं। आइएलओ के मुताबिक देश की 24.4 प्रतिशत आबादी सामाजिक सुरक्षा के दायरे में है। समग्र रूप से कहें तो सामाजिक संरक्षण पर जितना अधिक खर्च होगा, गरीबी का स्तर उतना ही निम्न होता चला जाएगा।
Date:03-05-23
अलगाव में सहूलियतसंपादकीय
सुप्रीम कोर्ट ने तलाक को लेकर महत्त्वपूर्ण फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने कहा है, यदि पति-पत्नी के रिश्ते टूट चुके हों, उनमें सुलह की गुंजाइश ना बची हो तो परिवार अदालत भेजे बिना ही तलाक को मंजूरी दी जा सकती है। इसके लिए छह महीने का इंतजार जरूरी नहीं होगा। अदालत ने वे मुद्दे भी तय किए, जिनके आधार पर शादी में सुलह की संभावनाओं को परे माना जा सकेगा। अदालत दंपति के बीच बराबरी, गुजारा भत्ता, बच्चों की कस्टडी भी तय करेगी। यह मुद्दा संविधान पीठ के पास विचार के लिए भेजा गया था जिसमें हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 13बी के तहत आपसी सहमति से तलाक की प्रतीक्षा अवधि को माफ किए जाने का सवाल था । डिवीजन बेंच ने यह मामला 2016 में पांच जजों की संविधान पीठ को रेफर किया था। पांच याचिकाओं की लंबी सुनवाई के बाद सितम्बर, 2022 में फैसला सुरक्षित रखते हुए संविधान पीठ ने कहा था, सामाजिक परिवर्तन में थोड़ा समय लगता है। कानून लाना आसान होता है मगर लोगों को राजी करना मुश्किल। दुनिया भर में सबसे कम 1.1% तलाक अपने यहां होते हैं। हालांकि इधर के वर्षों में शादी टूटने के मामले बढ़ते नजर आ रहे हैं। बावजूद इसके कानूनी प्रक्रिया इतनी जटिल है कि दंपति कानूनन संबंध विच्छेद की बजाय अलगाव कुबूल कर लेते हैं । सामाजिक / पारिवारिक स्थितियां जिस तेजी से बदल रही हैं, लोगों की सोच में भी उसी तरह परिवर्तन नजर आ रहा है। वे कलहपूर्ण संबंध को ढोते रहने को राजी नहीं हैं। जिन मामलों में आपसी कलह इतनी बढ़ जाती है कि तलाक ही अंतिम परिणति नजर आती हैं, उनको इस फैसले के बाद संविधान की धारा 142 के तहत परिवार अदालतों के चक्कर नहीं काटने होंगे। अदालतों में तलाक के हजारों मामले सालों से पेंडिंग हैं। ये दंपति अलग हो कर नया जीवन शुरू करने की आस में वकीलों / अदालतों के चक्कर लगाते-लगाते थक जाते हैं । जब रिश्ते इतने बिगड़ चुके हों और वे आपसी सहमति से अलग होने को राजी हों तो बिलावजह मामले को लटकाने का कोई मकसद नहीं होता । वास्तव में बुरी शादियों में फंसे लोग कई दफा मानसिक तौर पर बीमार हो जाते हैं। नतीजतन, मामला खुद को हानि पहुंचाने तक भी पहुंच जाता है। इसलिए जहां सुलह की गुंजाइश कतई नजर ना आ रही हो, उन्हें जबरन इस ऊहापोह में लटकाए रहने से राहत मिल सकती है। वास्तव तो यह फैसला स्वयं दंपति का होता है कि वे इसे निभाने को राजी हैं, या अलग होने को । इसका सम्मान होना चाहिए।
Date:03-05-23
ताकि तलाक अभिशाप नहीं, नए जीवन का मोड़ बन जाएकमलेश जैन, ( वरिष्ठ अधिवक्ता, सुप्रीम कोर्ट )
पहली मई को सर्वोच्च न्यायालय की पांच जजों की संविधान पीठ ने शिल्पा शैलेश और वरुण श्रीनिवासन के मुकदमे में पति-पत्नी के बीच वर्षों से चली आ रही उलझनों का स्थायी निवारण कर दिया। इसके साथ तीन अन्य दंपतियों (नीति मालवीय बनाम राकेश मालवीय, अंजना किशोर बनाम पुनीत किशोर, और मनीष गोयल बनाम रोहिणी गोयल) के मुकदमों का भी फैसला सुनाया गया। कुल 61 पृष्ठों में आए इस निर्णय से तलाक आसान बनाने की दिशा में उल्लेखनीय कदम बढ़ाए गए हैं। दरअसल, वैवाहिक मामलों में दरार पिछले दो-ढाई दशकों में बढ़ी है। इस दरम्यान संसद से नए-नए कानून बने, जिनकी वजह से रिश्तों में सुधार होने के बजाय उलझन बढ़ती गई और अदालतों पर तलाक के मुकदमों को बोझ बढ़ता गया। इसकी शुरुआत 1983 से हुई है, जब 25 दिसंबर को भारतीय दंड संहिता में धारा 498-ए जोड़ा गया। इसने पत्नी को दहेज के लिए प्रताड़ित करने या अन्य प्रकार की क्रूरता करने के लिए पति और उसके परिजनों के विरुद्ध मुकदमा दर्ज करना आसान बना दिया। इसके तहत एफआईआर दर्ज होते ही पूरा परिवार, चाहे वह अलग-अलग राज्यों में रहता हो, गिरफ्तार कर लिया जाता, बेशक मुकदमे की विवेचना बाद में होती।
इस बाबत एक जनहित याचिका (रिट पिटिशन नंबर 8/2003) मैंने खुद सर्वोच्च न्यायालय में 2003 में डाली थी, जिसमें न्यायालय ने कहा था कि वह ऐसा करने में असमर्थ है। उसने इसके लिए संसद और भारतीय विधि आयोग को आदेश व याचिका की कॉपी भेजने की बात कही थी। बाद के वर्षों में बदलाव हुआ, और अब परिवार जेल नहीं जाता, सिर्फ पति जा सकता है, वह भी स्पष्ट आधार पर। घरेलू हिंसा कानून का भी इसी तरह बेजा लाभ उठाया जाता रहा, जबकि इसमें आप सभी समस्याओं को एक ही अदालत में रख सकते हैं, जैसे तलाक, भरण-पोषण का खर्च, अलग घर या उसी घर में ठीक से रहने की व्यवस्था, बच्चों का समाधान, क्रूरता (मानसिक, शारीरिक, आर्थिक, यौनिक आदि) से छुटकारा आदि। इसमें पति या किसी रिश्तेदार को जेल भेजे बिना सभी समस्याओं का समाधान संभव है। मगर कुछ स्त्रियों को यह रास्ता पसंद नहीं। ऐसे मामलों में अक्सर लड़का ही झुकता है, ताकि उसका परिवार शांति से रह सके। इसके लिए वह बतौर मुआवजा बड़ी राशि देने को भी तैयार हो जाता है।
सर्वोच्च न्यायालय का ताजा फैसला इन तमाम मुश्किलों का समाधान कर सकता है। यह फैसला इस आधार पर किया गया है कि जिस रिश्ते में ऐसी खाई बन गई है, जिसको पाटा न जा सके, उसमें तलाक के लिए छह महीने का इंतजार आखिर क्यों किया जाए? अगर पति-पत्नी में वर्षों का अलगाव है, तो उसका यही अर्थ है कि उनमें जुड़ने की इच्छा मर चुकी है। इसका मकसद यह भी है कि युवावस्था में जुड़े जोड़े अनंतकाल तक अदालतों में दौड़ते-दौड़ते बूढ़े न हो जाएं, बल्कि वे समय से नए जीवन की शुरुआत कर सकें। आज स्थिति यह है कि निचली अदालतों से लेकर, उच्च व सर्वोच्च न्यायालयों तक तलाक के मुकदमों की भरमार है। 2018 की एक रिपोर्ट के मुताबिक, सिर्फ उत्तर प्रदेश के परिवार न्यायालय में 61,000 से अधिक मुकदमे लंबित थे। भले ही, अपने देश में तलाक की दर दुनिया में सबसे कम 1.1 प्रतिशत है, लेकिन संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट कहती है कि पिछले 20 वर्षों में तलाकशुदा लोगों की संख्या दोगुनी हुई है, जिसका अर्थ है कि भारत में रिश्तों के टूटने की दर बढ़ने लगी है।
जब पति-पत्नी में संबंध विच्छेद ही एकमात्र रास्ता हो, तो यह प्रक्रिया जितनी सरल हो, उतना अच्छा। इसके लिए संसद को आगे आना होगा। जैसे, ‘इरिट्रीवबल ब्रेकडाउन ऑफ मैरिज’ का जिक्र कानून में नहीं है, जबकि न्यायालय करीब एक दशक से इस आधार पर तलाक दे रहा है। ऐसा नहीं है कि इस फैसले के बाद तलाक के मुकदमे कम हो जाएंगे, इसकी संख्या बढ़ भी सकती है, पर त्वरित न्याय की दिशा में इसका लाभ मिलेगा। इसी तरह, तलाक, मुआवजा, बच्चों का निर्णय, घरेलू हिंसा का समाधान आदि एक ही फोरम पर हो, तो कहीं अच्छा होगा। उम्मीद है, संसद ऐसे मामलों में पर्याप्त संजीदगी दिखाएगी।
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हाल ही में बंबई उच्च न्यायालय ने एक महत्वपूर्ण फैसले में एक अकेली कामकाजी महिला को एक बच्चे को गोद लेने की अनुमति दे दी है। कानूनन एकल व्यक्ति किसी बच्चे को गोद ले सकता है। अविवाहित पुरूषों के लड़कियों को गोद लेने की मनाही है।
न्यायालय का यह निर्णय जिला न्यायालय के निर्णय को पलटते हुए दिया गया है। पहले निर्णय में महिला को गोद लेने की स्वीकृति इसलिए नहीं दी गई थी, क्योंकि आशंका थी कि कामकाजी होने के कारण वह बच्चे का पूरा ध्यान नहीं रख सकती है। इस प्रकार जिला न्यायालय ने बच्चे के कल्याण को सबसे ऊपर रखा था।
उच्च न्यायालय ने पारिवारिक व्यवस्था को सबसे ऊपर रखते हुए पति-पत्नी और बच्चे की मानक परिवार की परिभाषा को पूर्वाग्रह बताया है। न्यायालय का मानना है कि यह परिवार का सबसे लोकप्रिय और मानक प्रारूप हो सकता है, लेकिन एकमात्र नही।
परिवार को ऐसी इकाई के रूप में परिभाषित किया गया है, जहाँ सदस्य एक दूसरे की चिंता करते है। कोई जरूरी नहीं है कि पत्नी-पति इकाई वाला मॉडल एक बच्चे को पालने के लिए सबसे अच्छा प्रारूप हो। न्यायालय का यह निर्णय उस समय और भी महत्वपूर्ण हो जाता है, जब उच्चतम न्यायालय समलैंगिक विवाह के प्रति इसलिए सकारात्मक दृष्टिकोण दिखा रहा हों कि वे भी एक परिवार का विकल्प बन सकते हैं।
‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 18 अप्रैल, 2023
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Date:02-05-23
Walking a tightrope in ChhattisgarhSocial justice questions pose a dilemma for the Congress governmentShubhomoy Sikdar
As Chhattisgarh Chief Minister Bhupesh Baghel drives the Congress towards this year’s Assembly elections, the rear-view mirror shows months of turmoil over the question of reservation and the challenge of maintaining a social coalition he has built in a State dominated by socio-economically disadvantaged groups.
The fact that the Supreme Court granted interim relief on Monday to the Chhattisgarh government on its plea challenging a State High Court order on reservations of September 2022 has come as a breather for Mr. Baghel. However, it opens up new possibilities of conflict. The apex court stayed the High Court order setting aside 58% reservation (32% for Scheduled Tribes, 14% for Other Backward Classes and 12% for Scheduled Castes or 32-14-12) in government jobs and educational institutions.
In the seven months since the last order, recruitment and admissions have stalled. There has been palpable anger directed at the government, especially among the tribal people — a traditional vote bank for the Congress. Some factions of the Sarva Adivasi Samaj were even planning to field their own candidates in the Assembly elections. They say they will still do so if they have to settle for anything less than what the 32-14-12 formula provides for.
Last time, when the Congress won riding on a strong anti-incumbency wave against the 15-year-old BJP government, it almost swept the tribal seats and made deep inroads into the OBC vote bank of the BJP.
Besides filing a Special Leave Petition in the Supreme Court against the High Court order, the government also passed two Amendment Bills that take the total quota in the State to 76%. It has kept the 32% quota intact for STs, increased the quote for OBCs from 14% to 27% and that of SCs from 12% to 13% as well as introduced a 4% reservation for Economically Weaker Sections (EWS) (32-27-13-4). Both the Bills are, however, awaiting the Governor’s assent since last December.
This is where the perception challenge for the Congress begins. Mr. Baghel has made several public appeals to the Governor and even written to the Prime Minister seeking the inclusion of the two Bills in the Ninth Schedule of the Constitution so that they are beyond judicial review. But Congress sources privately acknowledge that it was unlikely that the Governor would sign them before the elections. The Congress has accused the BJP of playing backdoor politics using the Raj Bhavan, but it first has to field questions on why the 58% quota was set aside by the High Court in the first place.
A return to the 32-14-12 formula following the Supreme Court order is also not without challenges. If the tribal people’s concerns have been addressed by the stay, it would also mean that SCs do not stand to gain that extra 1% that the 32-27-13-4 formula provides for, making it tough for the government to keep them happy. The perception loss for the OBC communities — down to 13 from 27 — will be even bigger as the amendment Bills have created a frenzy that will be difficult to contain.
There are added complexities associated with OBC politics in the State vis-a-vis reservations. A higher quantum of reservations for OBCs would allow Mr. Baghel to consolidate different constituents of the OBC umbrella, such as the Sahus and the Kurmis. But a return to the 58% formula would rob him of the opportunity to bridge the gap between these two major OBC groups who tend to go in opposite directions every election. Also, since there likely won’t be any anti-incumbency wave in the Congress’ favour, it may also make local factors more pivotal in the OBC-dominated seats. Experts say such a situation will allow the BJP to be selective in its wooing of the OBC communities. There is also a prevailing view within some sections of the tribal people that because of Mr. Baghel’s OBC politics, reservation for them has been affected, and bringing a separate Bill for ST reservation would have settled matters much earlier.
Since the EWS quota doesn’t place any restrictions on caste, those outside the caste reservation ambit are also feeling aggrieved with a return to the 32-14-12 formula that leaves nothing for the poorer sections of the general castes. While much fewer in number in the population, the upper castes send a significant number of MLAs to the State Assembly and form a pressure group by themselves.
Date:02-05-23
समलैंगिक शादी का दर्जा लिव-इन संबंधों जैसा होविराग गुप्ता, ( लेखक और वकील )
सरोगेसी के माध्यम से पिता बनने की चाहत रखने वाले सलमान खान कानूनी अड़चनों में फंसे हैं। तलाक, गर्भपात और गोद लेने की प्रक्रिया को आसान बनाने के लिए प्रयास करने के बजाय समलैंगिक शादियों को कानूनी मान्यता देने के लिए सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हो रही है। सरकार, बार काउंसिल, न्यायविद, पूर्व जज और धार्मिक संगठनों ने इस सुनवाई का विरोध किया है। जजों ने भी मान लिया कि कानून बनाने का अधिकार संसद को है। 50 साल पुराने केशवानंद भारती मामले में शक्तियों के विभाजन की संवैधानिक लक्ष्मण रेखा सरकार सहित न्यायपालिका के लिए भी बाध्यकारी हैं। उसके बावजूद हजारों लम्बित मामलों को दरकिनार करके इस मामले में लम्बी अकादमिक बहस के नाम पर सुप्रीम कोर्ट का कीमती वक्त जाया होने से जनता में बेचैनी और निराशा है। याचिकाकर्ताओं की सतरंगी अवधारणाओं से भरपूर बहस के सीधे प्रसारण से कमजोर हो रही अदालतों की गरिमा के पांच पहलुओं को समझने की जरूरत है :
1. कोलकाता हाईकोर्ट जज के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि सुनवाई वाले मामलों में जजों का इंटरव्यू देना गलत है। सुप्रीम कोर्ट के नवतेज सिंह जौहर फैसले से भारत में समलैंगिक संबंधों को अनापराधिक बनाया गया था। ब्रिटिश उच्चायोग में उस फैसले की चौथी वर्षगांठ पिछले साल अगस्त 2022 में मनाई गई। उस कार्यक्रम में जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा था कि समलैंगिकों का लम्बा सफर बाकी है। दस साल पहले जस्टिस सिंघवी की बेंच के फैसले के अनुसार कानून में बदलाव का हक सिर्फ संसद को है। फैसले के खिलाफ क्यूरेटिव याचिका को दरकिनार करके नई पिटीशन पर फैसला देकर 2018 में समलैंगिकता को अनापराधिक बना दिया गया। वर्तमान सुनवाई से पूरे मामले को अगले पड़ाव में ले जाने की कोशिश हो रही है। जजों के व्यक्तिगत आग्रह से कानून में बदलाव को कॉलेजियम सिस्टम से समझने की जरूरत है, जिसे संविधान की मनमाफिक व्याख्या के कई फैसलों से सुप्रीम कोर्ट ने लागू कर दिया।
2. इस बारे में कानूनी बदलाव के लिए एनसीपी सांसद सुप्रिया सुले के निजी बिल को संसद ने कुछ साल पहले मंजूरी नहीं दी थी। क्या उस रिजेक्शन को संसद के निर्णय की अभिव्यक्ति नहीं माना जाना चाहिए? केंद्र ने इस मामले में राज्य सरकारों से राय मांगी है। संघीय व्यवस्था में राज्यों का पक्ष सुने बगैर मामले में एकतरफा सुनवाई करना संविधान के प्रतिकूल है।
3. अंग प्रत्यारोपण, आयकर, उत्तराधिकार, गोद लेने, पेंशन, अनुकम्पा नियुक्ति जैसे कई मामलों में विवाहित लोगों को जो हक हासिल हैं, उनकी आड़ में समलैंगिक जोड़े नए कानून की मांग कर रहे हैं। अनुच्छेद-14 की समानता का सिद्धांत दो अलग वर्गों पर लागू नहीं हो सकता। अर्बन इलीट की सरकारी दलील को सीजे ने ठुकरा दिया है। लेकिन समलैंगिकों की 8 से 10 फीसदी आबादी के दावों में भी याचिकाकर्ताओं ने अधिकृत आंकड़े नहीं दिए हैं। पश्चिमी देशों के अनुसरण की बात करें तो ईयू के सख्त डाटा सुरक्षा कानून को लागू करने के लिए सुप्रीम आदेश भी अविलम्ब पारित होना चाहिए।
4. कानून के अनुसार लड़की की शादी की न्यूनतम उम्र 18 और लड़के की 21 साल है। जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के तहत सिंगल व्यक्ति किसी लड़की को गोद नहीं ले सकता। कई राज्यों ने थर्ड जेंडर को ओबीसी की मान्यता दी है। अंतर्निहित शक्तियों के इस्तेमाल से सुप्रीम कोर्ट अगर आदेश पारित भी कर दे तो उसे अमली जामा पहनाने के लिए अनेक पर्सनल लॉ और 160 से ज्यादा दूसरे कानूनी प्रावधानों में बदलाव तो संसद से ही होगा।
5. इस सुनवाई के बाद करोड़ों मुकदमों की पेंडेंसी के खात्मे, अदालतों में बेहतर इन्फ्रास्ट्रक्चर, कॉलेजियम में सुधार और अंडरट्रायल्स की रिहाई जैसे मसलों पर भी अनुच्छेद 142 की शक्तियों का क्रांतिकारी इस्तेमाल हो तो पंचपरमेश्वर जजों के साथ संविधान का भी मान बढ़ेगा। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों से लिव-इन रिलेशन को रजिस्ट्रेशन के बगैर शादी जैसा दर्जा मिल ही चुका है।
Date:02-05-23
अपनी आबादी का नियंत्रण व नियोजन हमें ही करना हैडॉ. अनिल प्रकाश जोशी, ( पद्मश्री से सम्मानित पर्यावरणविद् )
अपने देश की आबादी अब लगभग 142 अरब हो चुकी है। दुनिया भर की भी इस तरफ नजर है कि इस बढ़ती आबादी को भारत कैसे झेलेगा और आने वाले समय में इसकी क्या रणनीति होगी? बढ़ती आबादी के बहुत-से मतलब होते हैं। जहां एक तरफ बेरोजगारी देश को बोझ में डाल रही है, वहीं दूसरी तरफ भोजन, आवास की चिंता के साथ आम लिविंग स्टैंडर्ड भी खतरे में आ जा रहा है। दूसरी बड़ी चुनौतियों में पारिस्थितिकीय परिवर्तन भी है। चाहे वह खेती-बाड़ी की बात हो या पानी की या फिर जंगल-जमीन के मुद्दे हों, इन सबने नई आपदाओं की कतार खड़ी कर दी है।
अगर भोजन को ही देख लें तो क्लाइमेट चेंज के कारण यह मानकर चला जा रहा है कि 30 प्रतिशत भोजन उत्पादन की कटौती सिर्फ इसलिए हो गई, क्योंकि क्लाइमेट ने हमारा साथ नहीं दिया, जो कि पारम्परिक तरीके से हमारी खेती का हिस्सा हुआ करता था। एक आंकड़े के अनुसार अपने देश में करीब 20 करोड़ लोग भूखे सोते हैं। साथ में यह भी सत्य है कि एफएओ के अध्ययन के अनुसार भारत में 40 प्रतिशत भोजन की बर्बादी होती है। अगर बढ़ती आबादी को बर्बाद होते फूड के साथ जोड़ लें तो हम भोजन की चुनौती को निपटा सकते हैं। प्रबंधन कैसे बेहतर हो, यही बड़ा सवाल है। आज भोजन बर्बादी करीब 92 हजार करोड़ रुपए के बराबर हो गई है, इतने में हम आबादी के भोजन-संकट का हल कर सकते हैं।
आंकड़े बताते हैं कि 2050 तक हमको आज की तुलना में 70 प्रतिशत और भोजन की आवश्यकता होगी। मात्र भोजन ही नहीं बल्कि डेयरी प्रोडक्ट या अन्य की खपत में भी बढ़ोतरी होगी। संकट यह है कि पहले ही क्लाइमेट चेंज के कारण ये उत्पादन 30 प्रतिशत नीचे जा चुका है। दूसरे तरफ कुछ मुद्दे हैं, जिनको हम नकार रहे हैं और जिन पर हमने शुरुआती रूप में कभी बहुत ध्यान नहीं दिया। पानी- जो कि पीने से लेकर और खेती-बाड़ी तक के लिए जरूरी है, उस पर भी संकट मंडरा चुका है। एक आंकड़ा सामने आया है कि 1950 में जहां 5000 क्यूबिक मीटर पानी प्रति व्यक्ति उपलब्ध था, वह 2016 में 1500 के करीब चला गया और 2050 में यह 1200 के लगभग होगा।
बढ़ती शहरी आबादी ने भूमिगत जल का बेतहाशा दुरुपयोग इस हद तक कर दिया है कि कई शहर डार्क जोन में जा चुके हैं। वनक्षेत्र भी घट रहा है। ऐसे में इतनी बड़ी आबादी की प्राकृतिक और पारिस्थितिकी आवश्यकताओं को गम्भीरता से लेना पड़ेगा।
हमें नहीं भूलना चाहिए कि इतनी बड़ी आबादी में हमारे पड़ोस का देश चीन दुनिया के आर्थिक शिखर पर पहुंच चुका है। उसने आबादी को ज्यादा शोर-शराबे का हिस्सा नहीं बनने दिया, बल्कि अपनी जनशक्ति का उसने जिस तरह से उपयोग किया है, वह एक बड़ा उदाहरण हम सबके लिए है। अगर आप चीन की आर्थिकी को गम्भीरता से देखें तो जहां उसने बड़े प्रयोग करके अपने देश की आर्थिकी को मजबूत किया, वहीं दुनिया भर के खुदरा बाजार में भी पकड़ बनाई। चीन ने अपनी आबादी का कौशल-विकास किया और एक्सपोर्ट करके अपना रसूख बनाया। ऐसे में हम इस हो-हल्ले में न पड़ते हुए कि हम 142 करोड़ हो गए, नए रास्तों और प्रबंधनों की चिंता करे तो बेहतर होगा। अपनी आबादी का नियंत्रण और नियोजन तो हमें ही करना है।
हम ढेर सारे संसाधनों से युक्त हैं। हमारे पास हर तरह की सम्भावनाएं हैं। पर्यटन की दृष्टि से भारत सर्वोपरि साबित हो सकता है। आज यह मानकर चला जा सकता है कि हमने अपने पर्यटन का मात्र 30 प्रतिशत से ज्यादा लाभ नहीं उठाया है। दूसरी बड़ी बात यह है कि इस बड़ी आबादी को हम एक जनशक्ति के रूप में उपयोग में लाए। अपने देश में सूखती हुई नदियों, बंजर पड़ी भूमि या पारिस्थितिकी से संदर्भित तमाम तरह के कार्यों को इस बड़ी जनशक्ति से जोड़ा जा सकता है। इसमें प्रधानमंत्री का लोकल फॉर वोकल नारा काम आ सकता है।
Date:02-05-23
सहजता से तलाकसंपादकीय
गंभीर विवाद की स्थिति में तलाक का सुगम होना जरूरी है और इस दिशा में सर्वोच्च न्यायालय का फैसला बहुत सराहनीय है। न्यायालय संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी शक्तियों के अनुसार, न सुधरने योग्य आधार पर एक विवाह को भंग कर सकता है और दोनों पक्षों को परिवार न्यायालय में भेजे बिना भी तलाक दे सकता है। फिलहाल, परिवार न्यायालय में आपसी सहमति से भी तलाक प्राप्त करने के लिए छह से 18 महीने तक इंतजार करना पड़ता है। न्यायालय के नए फैसले के बाद तलाक के लिए प्रतीक्षा अवधि का महत्व नहीं रह जाएगा। यह तथ्य किसी से छिपा नहीं है कि तलाक की स्थिति पैदा होने पर विवाह में किसी न किसी पक्ष को बहुत पीड़ा या प्रताड़ना से गुजरना पड़ता है। वास्तव में कानून के तहत प्रतीक्षा अवधि की व्यवस्था तलाक के फैसले पर पुनर्विचार के लिए है, पर इस अवधि का इस्तेमाल अक्सर नकारात्मक ढंग से परेशान करने के लिए होता है। कई ऐसे मामले हैं, जहां तलाक के आकांक्षी पर एक-एक पल भारी पड़ता है। ऐसे में, सर्वोच्च न्यायालय का फैसला पीड़ितों के लिए बड़ी राहत है। जब जरूरी होने पर तत्काल तलाक की सुविधा हो जाएगी, तब बाकी रिश्तों पर भी सकारात्मक असर पड़ेगा।
इसमें शक नहीं कि भारत में तलाक लेने की प्रक्रिया को समझ-बूझकर जटिल बनाया गया है। प्रक्रिया ऐसी है कि लोग समझौता करके जीना पसंद करते हैं, तलाक लेना महंगा भी है और इसमें मानसिक रूप से लंबी पीड़ा से गुजरना पड़ता है। सर्वोच्च न्यायालय की खंडपीठ ने अब साफ कर दिया है कि अदालत अनुच्छेद 142 के तहत ऐसे मामलों में भी विवाह को भंग कर सकती है, जहां एक पक्ष तलाक के लिए सहमत नहीं है। अदालत में यह मामला काफी पहले से ही चल रहा था। जून 2016 में दो न्यायाधीशों की पीठ ने पक्षकारों को परिवार अदालत में भेजे बिना तलाक देने के लिए अनुच्छेद 142 के तहत अदालत की शक्तियों के प्रयोग के संबंध में मामले को पांच न्यायाधीशों की बड़ी पीठ के पास भेज दिया था। अब न्यायमूर्ति संजय किशन कौल, संजीव खन्ना, ए एस ओका, विक्रम नाथ और जे के माहेश्वरी की पीठ ने साफ कर दिया है कि अनुच्छेद 142 के तहत अदालत की शक्तियां वैधानिक सीमाओं से मुक्त हैं। पीठ ने कहा कि सांविधानिक प्रावधान अदालत को पक्षकारों के बीच पूर्ण न्याय के लिए कोई भी आदेश जारी करने का अधिकार देता है। किसी परिस्थिति में तलाक देने के लिए अदालत अपने विवेक के प्रयोग से फैसला ले सकती है और यही उचित है। कई मामलों में अदालतों को यह पता होता है कि किसी पक्ष के साथ अन्याय हो रहा है, पर प्रतीक्षा अवधि देने की बाध्यता न्याय की राह रोक लेती है।
भारत में हिंदू धर्म में विवाह संस्कार का जो स्वरूप है, उसके अनुसार, तलाक की कोई मान्य व्यवस्था नहीं है, लेकिन संविधान के तहत तलाक की जो व्यवस्था है, उसमें सुधार की बहुत गुंजाइश है। अगर कोई जोड़ा साथ नहीं रहना चाहता है, तो इस स्थिति में तलाक के लिए ठोस या तय वजह जरूरी नहीं है। जोडे़ के बीच तलाक के लिए सहमति को अदालत में पर्याप्त माना जा सकता है। बदलते दौर में यह जरूरी भी है। आखिर कोई तलाक के लिए व्यभिचार, परित्याग, धर्मांतरण और पागलपन जैसे कारणों का इंतजार क्यों करे? अनजाने में भी किसी जोड़े या किसी पक्ष के साथ क्रूरता न हो। ऐसे में, विवाह या विवाह विच्छेद से जुड़े कानूनों को उदार बनाना पड़ेगा।
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भारत का संविधान अनुच्छेद 19 के माध्यम से मीडिया की स्वतंत्रता की रक्षा करता है। अन्य मौलिक अधिकारों की तरह यह स्वतंत्रता भी अबाधित नहीं है। इस पर राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे कुछ उचित प्रतिबंध लगे हुए हैं।
संविधान, प्रतिबंध की तर्कसंगतता का परीक्षण करने के लिए बेंचमार्क का विवरण नहीं देता है। संवैधानिक न्यायालय भी तर्कसंगतता का परीक्षण करने के लिए एक मानक का उपयोग करने में ढीले रहे हैं। इसका नतीजा यह हुआ है कि सभी स्तरों पर सरकारें पत्रकारों पर शिकंजा कसने के लिए मनमाने ढंग से प्रतिबंधों का इस्तेमाल कर रही हैं, और इस तरह मीडिया की स्वतंत्रता को प्रतिबंधित कर रही हैं।
उच्चतम न्यायालय का महत्वपूर्ण कदम –
उच्चतम न्यायालय का पूरा निर्णय संवैधानिक अधिकारों के बचाव में अत्यंत महत्वपूर्ण कहा जा सकता है। उम्मीद है कि अब सरकारें अपने खिलाफ कहे जाने पर पत्रकारिता के लिए प्रतिबंधों का इस्तेमाल सोच-समझकर करेंगी।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 7 अप्रैल, 2023
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Date:01-05-23
Equally Unequal?Are identity-based efforts to create social mobility taking policy energy away from bigger aspects of inequality?TOI Editorials
Politically and policy-wise, there is broad agreement across the modern world about the need to create an environment where one’s opportunities are not limited by one’s birth. But when it comes to the exact interventions through which policymakers, public institutions and private bodies should equalise opportunities, the disagreements are vehement. In the mid-1990s for example, billionaire tech investor Peter Thiel co-authored The Diversity Myth about how excellence was being undermined at American universities in the name of multiculturalism. With the debate having grown many times in urgency and volume since then, Thiel is doubling down on the argument. He is saying that the focus on diversity and identity politics is “a giant machine to redirect our attention” from more serious issues facing society, such as inequality.
In India of course this period has seen the scope of reservation really spread, many more communities have made it to various reserved ‘lists’, even more are aspiring and agitating to be included, with different political parties’ active patronage. Identity-based parties wouldn’t touch Thiel’s argument with a bargepole and indeed their own growth has deepened democracy by giving voice to more diverse voices in government. In the private sector likewise, the idea has spread that diversity in hiring brings an invaluable check against monocultural groupthink and makes for better business decisions. While the practice of this idea still leaves a lot to be desired, its ideational foundations now look immovable.
Yet, as far as the goal of tackling glaring inequalities is concerned we are looking at a great failure. Caste identities are only getting further entrenched even as increasing income inequality is being documented by economists. Instead of identifying only one kind of restraint on social mobility, we should agree that any lack of opportunity affects a person’s ability to live up to their potential, which limits the medium-term growth potential of an economy, which in turn further limits individuals at the bottom of the income distribution… and so the vicious cycle goes. In summary, the evidence calls for a serious consideration of what Thiel calls “divertissement”. Policymakers should not be allowed to exploit the rhetoric of correcting historical injustices to neglect the work of creating an enabling environment for enterprises and jobs. Dignity and material well-being should not be an either/or choice.
Date:01-05-23
Gender-Budgeting, Unleash the ‘Crazy’Empower women, empower economyET Editorials
Empowering women — whether in the boardroom, workplace or household — is not just about bridging the gender gap. It is also a strategic means to empower India’s economy as a whole. For this reason alone, genderbudgeting — revealing the different impacts of spending and revenue decisions on women and men — is imperative. This was the singular idea pitched by Times Group vice chairperson and managing editor Samir Jain in his welcome address at last week’s ET Awards of Corporate Excellence. Using the trope of the ‘crazy Indian woman’ — unleashing the indomitable spirit of the woman who is ‘bold, fearless, and unstoppable’ and who ‘redefines rules, reshapes narratives, and reinvigorates all’ — Jain made a case for finance minister Nirmala Sitharaman to consider studying various models of gender-budgeting across the world and implement more policy decisions through this unbridling prism.
Over 90 countries follow some kind of gender-budgeting. The ratio of countries following its principles went up to over 60% in OECD countries from 44% eight years ago. This is not just about gestures; it is also about driving numbers. India adopted genderbudgeting in 2005, and gender budget statements have been produced by the finance ministry in expenditure budgets. Whether it’s ‘Beti Bachao, Beti Padhao’ or ‘Ujjwala’, impacts of such schemes on the uplift of women in this country is apparent. And this uplift — whether in the form of participation in the workforce, or greater say in decisionmaking — is tied at the hip to India’s growth.
But India needs to push this envelope farther. The ratio of spending on gender budgets has hovered around 5% all these years. The outlay for gender budget in the current year is ₹2. 23 lakh crore — 4. 95% of the total budget of ₹43. 03 lakh crore. There’s only one way for this to go: up. Gender-budgeting also can lead to transformation in qualitative terms. For a country that is hungry for new ideas, innovations, different ways of doing business, women at the forefront can be the obvious, radical, ‘crazy’ force.
Date:01-05-23
FIRst and Foremost, Take Them SeriouslyET Editorials
The inexplicable delay in filing a first information report (FIR) against Wrestling Federation of India (WFI) president Brij Bhushan Singh on the basis of complaints of sexual harassment is as unfortunate as it was not unexpected. Failure of the Delhi Police to respond to complaints of violation of law is illustrative of an ineffective justice system. A Supreme Court order finally greased the wheels in this instance. But depending on court intervention should hardly be a standard operating procedure.
FIR is the formal lodging and registration of a complaint of a crime or a cognisable offence. It marks the start of the process of investigation to establish whether a crime has indeed been committed or not, and identifying the perpetrators of the crime if it has been committed. In delaying registering the FIR against the WFI chief, the Delhi Police effectively turned a deaf ear to the complainants. The manner in which FIRs are registered —or not — cannot be a matter of police whim. When the investigative arm of justice tarries or rejects such action due to not taking complainants seriously, an inherent bias becomes evident. And it is this bias — against voices taken ‘less seriously’, and in favour of people in power — that has to be removed for FIRs to be a competent investigative instrument.
The process of registering FIRs itself must be made less discretionary. All citizens must feel that the police are there for them, and not just for those cases that come with a ‘need to take action’ signal from above. This case involving the aggrieved wrestlers at least made headlines. ‘Headline-less’ cases fare even worse in what can be as random as roulette. A systemic seriousness must be injected into the very process of filing an FIR.
Date:01-05-23
Desperate for justiceWrestling needs to be rescued from its feudal culture of exploitation.Editorial
India’s leading wrestlers, especially women supported by their male counterparts, have again taken to the streets in Delhi. If the first protest was during the winter in January, the latest is happening in peak summer at Jantar Mantar. That both the biting cold and the searing heat did not diminish these athletes’ determination to air their sexual-harassment grievances against the Wrestling Federation of India (WFI) office-bearers, especially its president Brij Bhushan Sharan Singh, is a reflection of their trauma. It also reveals their sheer despondency as even the Oversight Committee led by Olympian Mary Kom set to clean up the system, has not yielded any results. That three inconclusive months have lapsed since the first public complaint is another pointer to the inhumane reaction that often trails sexual-harassment allegations. First there is silence from people in authority, then there are furious denials, and third, insinuations are allowed to seep in about the victim’s morality. Brij Bhushan may have stepped aside from the day-to-day functioning of the WFI but this sports administrator, essentially a BJP MP from Uttar Pradesh, has enough clout to stymie efforts to prise him out from the federation.
Wrestling harks back to India’s rural heartland, especially North India, and is seen by sportspersons as an opportunity to escape the suffocating feudal atmosphere. The trust in a coach or official borders on blind devotion and this trait gets exploited. To not accept gender-violence as a sordid reality and to sweep it under the political-rivalry carpet does no good to Indian sport. This is not about the central government pitted against the opposition; it is about fairness in dealing with athletes. The Indian Olympic Association president, P.T. Usha, an icon for many, made it worse by stating that the athletes are tarnishing the country’s image. Be it Vinesh Phogat, Sakshi Malik or Bajrang Punia, who have led the protests, their quest for justice and desire for a complete overhaul of the WFI structure are genuine endeavours. The Supreme Court’s directive that forced the Delhi Police to lodge a first information report against Brij Bhushan is a step in the right direction. More was expected from the larger sporting fraternity but with the exception of Olympic gold medallists Abhinav Bindra and Neeraj Chopra, the rest, especially the much-feted cricketers, have responded feebly. Kapil Dev and a few other players besides Sania Mirza voiced their concern through social media. But these remain the few volleys of resistance. India’s medal-winning wrestlers deserve better.
Date:01-05-23
India, its SDG pledge goal, and the strategy to applyThe country needs to replicate its COVID-19 response plan to succeed in meeting its SDG targets — one that is also pioneering and a nation-wide effort.S.V. Subramanian is a Professor of Population Health and Geography at Harvard University. He is the Principal Investigator of the India Policy Insights initiative at the Geographic Insights Lab at Harvard
The Prime Minister, Narendra Modi, while addressing the first meeting of Finance Ministers and Central Bank Governors under India’s G20 Presidency, held on February 24-25, 2023, expressed concern that “progress on Sustainable Development Goals (SDG) seems to be slowing down”. Regardless of the global progress that has been made to date, the sheer population size of India means that realising Sustainable Development Goals (SDGs) at a global scale is intrinsically tied to the success of India. There is considerable confidence in India becoming the third largest economy in the world over the next decade. However, translating this growth into progress on social and human development must be equally valued. Seen from this perspective, the Prime Minister’s concern deserves immediate attention.
India’s progress is mixed
The SDGs framework sets targets for 231 unique indicators across 17 SDG goals related to economic development, social welfare and environmental sustainability, to be met by 2030. Roughly halfway to the deadline, where does India currently stand with regards to progress on these indicators? Are there lessons from India’s recent mobilisation for COVID-19 (a comprehensive response that demonstrated India’s ability to deliver at scale for its population) that could be adapted for the SDGs?
A recent study (https://bit.ly/3LJtAYR) assesses India’s progress on 33 welfare indicators, covering nine SDGs and providing a mixed picture of positive and concerning trends.
The good news is that India is ‘On-Target’ to meeting 14 of the 33 SDGs, including indicators for neonatal and under-five mortality, full vaccination, improved sanitation, and electricity access, all of which have substantially improved in the last five years. Unfortunately, the national ‘On-Target’ designation does not apply equally across all districts. While neonatal and under-five mortality are currently both ‘On-Target’ for the country, 286 and 208 districts (out of 707 districts), respectively, are not. Similarly, significant progress on access to improved sanitation excludes 129 districts that are not on course to meet this SDG indicator.
Indicators such as eliminating adolescent pregnancy, reducing multidimensional poverty, and women having bank accounts have improved across a vast majority of the districts between the years 2016 and 2021.
Of concern, for 19 of the 33 SDG indicators, the current pace of improvement is not enough to meet SDG targets. Despite a national policy push for clean fuel for cooking, more than two-thirds (479) of districts remain ‘Off-Target’. Similarly, some 415 and 278 districts are ‘Off-Target’ for improved water and handwashing facilities, respectively.
Of heightened concern are SDG indicators for women’s well-being and gender inequality. No district in India has yet succeeded in eliminating the practice of girl child marriage before the legal age of 18 years. At the current pace, more than three-fourths (539) of districts will not be able to reduce the prevalence of girl child marriage to the SDG target of 0.5% by 2030. Unsurprisingly, other critical and related indicators such as teenage pregnancy (15-19 years) and partner violence (physical and sexual) that may be tracked back to child marriage are issues that India needs to escalate as priorities. Despite the overall expansion of mobile phone access in India (93% of households), only 56% women report owning a mobile phone, with 567 districts remaining ‘Off-Target’. More detailed geographical exploration of the SDG indicators is available at: https://bit.ly/3oTyjhz.
Lessons from the COVID-19 approach
Designing and implementing a policy response to a pressing issue is best viewed as an “optimisation problem” relying on political will, responsive administration, adequate resources, and sound data. India adopted an “optimisation” approach to the COVID-19 pandemic and thus, it was given the focus and resources necessary to succeed. There are lessons from this strategy that can inform and optimise India’s approach to its SDG targets.
First, strong and sustained political leadership supported by a responsive administrative structure at all levels, from national to the district level, was critical to the success both of India’s COVID-19 vaccination programme and its efficient rollout of a comprehensive relief package. This rare, nimble political-administrative synergy was willing to learn and undertake course corrections in real-time. Creating a similar mission-oriented ethos that is assessment-oriented and which provides adequate support for accomplishing India’s district-level SDGs is now urgently needed.
Second, India’s success with COVID-19 was largely possible both because of the existing digital infrastructure, as well as new, indigenous initiatives such as the Co-WIN data platform, and the Aarogya Setu application. Following these examples, India must put in place a coordinated, public data platform for population health management, by consolidating its many siloed platforms into an integrated digital resource for district administrators, as well as State and national policy makers.
Finally, a targeted SDG strategy delivered at scale must be executed with the same timeliness of India’s COVID-19 relief package. As early as March 2020, the Government of India had put in place the ₹1.70 lakh crore Pradhan Mantri Garib Kalyan Yojana, later augmented to nearly ₹6.29 lakh crore, which included the Pradhan Mantri Garib Kalyan Anna Yojana (₹3.91 lakh crore until December 2022) covering 800 million people. Key to this relief programme was a mix of spending to provide direct in-kind and economic support, as well as measures aimed at revitalising the economy, small businesses, and agriculture. This was critical in blunting the adverse effects of COVID-19, especially for vulnerable and the socio-economically disadvantaged groups. It also measurably demonstrated the value of a proactive, government-supported programme specifically aimed at improving people’s well-being.
A decadal plan
India needs to innovate a new policy path in order to meet the aspirations of its people in the decade ahead — there is no historical precedence for a democratic and economically open nation on how to deliver development to a billion-plus people in a manner that is healthy and sustainable. In successfully delivering a real-time response to the COVID-19 pandemic, India has proved that it is possible to deliver at scale in such an ambitious and comprehensive manner. To succeed in meeting its SDG targets, especially those related to population health and well-being, basic quality infrastructure, and gender equality, a similar concerted, pioneering, nation-wide effort would be the need of the hour.
Date:01-05-23
नफरत के खिलाफसंपादकीय
राजनीति का मुद्दा बनाने या अन्य किसी भी माध्यम से भाषणों के जरिए नफरत फैलाने वाली गतिविधियों पर सर्वोच्च न्यायालय ने पहले भी कई बार हिदायत दी है और इस पर लगाम लगाने के लिए किए जाने वाले उपायों के बारे में पूछा है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि न तो सरकार, राजनीतिक दलों, टीवी मीडिया और समूचे तंत्र को इस पर गौर करना जरूरी लगा और न ही इसके गंभीर नतीजों के खतरे को समझा गया। इस मसले पर एक तरह से गंभीर उदासीनता और उपेक्षा जैसे हालात के बाद अब सुप्रीम कोर्ट ने जो सख्त रुख अख्तियार किया है, वह बिल्कुल स्वाभाविक है और एक तरह से इस समस्या का ठोस हल निकालने की हिदायत है। शीर्ष अदालत ने शुक्रवार को घृणा फैलाने वाले भाषण के मामलों में राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को तत्काल कार्रवाई करने का निर्देश दिया। अदालत ने साफ कहा कि जब भी कोई नफरत फैलाने के मकसद से भाषण देता है तो बिना किसी शिकायत के स्वत: संज्ञान लेकर उस मामले में प्राथमिकी दर्ज किया जाए; अगर घृणा भाषण से जुड़े मामलों में प्राथमिकी दर्ज करने में देरी हुई तो उसे अदालत की अवमानना माना जाएगा।
इस सख्त निर्देश से पहले सुप्रीम कोर्ट ने कई बार सरकारों, राजनीतिक पार्टियों और इसे बढ़ावा देने वाले टीवी चैनलों को चेताया था कि इस प्रवृत्ति पर रोक लगाने के लिए हर संभव कदम उठाए जाएं। इसी क्रम में अदालत ने पिछले साल अक्तूबर में दिल्ली, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड की सरकारों को सख्त कार्रवाई करने का निर्देश दिया था। लेकिन जैसा कि जाहिर है, यह केवल कुछ राज्यों तक सीमित समस्या नहीं रह गई है। शायद यही वजह है कि अब सुप्रीम कोर्ट ने अपने पुराने आदेश का दायरा बढ़ाते हुए देश के सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को ये निर्देश दिए हैं कि घृणा भाषणों के प्रति किसी भी स्तर पर नरमी न बरती जाए। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में कार्रवाई करते हुए इस बात की परवाह करने की जरूरत नहीं है कि नफरत फैलाने वाले भाषण देने वाले का धर्म क्या है। कई बार जब इस तरह के मामले सामने आते हैं तो उसमें कई बार धार्मिक पहचान का मामला कार्रवाई को प्रभावित करने लगता है। इसलिए अदालत की इस चिंता को समझा जा सकता है कि हम धर्म के नाम पर कहां पहुंच गए हैं, यह बेहद दुखद है।
दरअसल, कभी इक्का-दुक्का उदाहरणों में सिमटे रहने वाली यह समस्या पिछले कुछ समय से कई स्तर पर चुनौतियां खड़ी कर रही हैं। सच यह है कि अगर इस पर रोक नहीं लगाई गई तो यह देश के लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के ताने-बाने को बुरी तरह प्रभावित कर सकती है। यह समझना मुश्किल नहीं है कि महज राजनीतिक हित साधने के लिए अगर कोई व्यक्ति या नेता नफरत के बोल के जरिए लोगों को भड़काने की कोशिश करता है तो उसका मकसद अपने धर्म को बचाना नहीं, बल्कि आम लोगों की सोच-समझ को विकृत बनाना होता है। वह लोगों को भड़का कर उन्हें उन्मादी और अपनी सोच-समझ से वंचित और यहां तक कि हिंसक मानसिकता का बना देना चाहता है। जबकि सच यह है कि किसी भी समाज में लोग आमतौर पर शांति और सद्भाव से जीना चाहते हैं। सवाल है कि घृणा भाषणों के जरिए किस तरह देश या धर्म बचाने का दावा किया जाता है। अगर यह समय रहते नहीं समझा गया तो हर समुदाय और सबको इसका व्यापक नुकसान झेलना पड़ सकता है। इसलिए इस मसले पर सुप्रीम कोर्ट ने जो सख्ती दिखाई है, वह वक्त की जरूरत है और देश के लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता के ढांचे को बचाने की सलाह है।
Date:01-05-23
तकनीकी दुनिया बनाम वास्तविक समाजज्योति सिडाना
आज की दुनिया में वास्तविक और भ्रम के बीच अंतर करना उतना ही कठिन हो गया है, जितना दूध से पानी को अलग करना। डिजिटल क्रांति ने मानव समाज को इतना कृत्रिम बना दिया है कि सच या झूठ, यथार्थ या आभासी, वास्तविक या परछाई में अंतर ही नहीं किया जा सकता। इस कृत्रिम मशीनी समाज में रहते हुए मनुष्य भी खुद को मशीन समझने लगा है। जिस तरह से मशीन में भावनाएं नहीं होतीं, उसी तरह अब मनुष्य भी भावना रहित हो गया है। उसे कोई फर्क नहीं पड़ता कि उसके आसपास क्या हो रहा है, परिवार के युवा, बुजुर्ग या फिर बच्चे किन तनावों से गुजर रहे हैं, समाज या देश किन समस्याओं से जूझ रहा है, क्योंकि वे तो केवल आभासी दुनिया की सैर में व्यस्त रहते हैं। एक ऐसी काल्पनिक दुनिया, जिसमें वह सब करना संभव है जो वास्तविक दुनिया में करना संभव नहीं होता।
उदविकासवादी मानते हैं कि समाज और संस्कृति का विकास विभिन्न चरणों से होकर गुजरा है और प्रत्येक अगला चरण पहले चरण से अधिक विकसित होता गया। हम जंगली अवस्था से बर्बर अवस्था और फिर बर्बर अवस्था से सभ्य अवस्था की ओर बढे। यानी प्रथम चरण में मनुष्य पूरी तरह प्रकृति पर निर्भर था। वह अपनी हर आवश्यकता को प्रकृति से पूरा करता था और स्वस्थ और खुश रहता था। फिर बर्बर अवस्था में वह मानव निर्मित परिवेश का हिस्सा बना और तीसरे चरण में उच्च और विकसित तकनीक के प्रयोग ने उसके जीवन को ही मशीन में बदल दिया। आज मनुष्य मशीन को नियंत्रित नहीं करता, बल्कि मशीन मनुष्य को नियंत्रित करने लगी है। नतीजतन, आज कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस) स्वाभाविक बुद्धि पर हावी होती जा रही है।
कृत्रिम बुद्धि के वर्चस्व का ही नतीजा है कि कुछ समय पूर्व एक्टोलाइफ नामक कंपनी के एक वीडियो में यह दावा किया गया कि अगर किसी महिला को स्वास्थ्य कारणों से गर्भाशय निकलवाना पड़ा तो उसे अब तनाव की जरूरत नहीं होगी, क्योंकि इसके बावजूद वे मां बन सकेंगी। या फिर कोई पुरुष नपुंसकता से पीड़ित है तो भी उसकी पत्नी मां बन सकेगी। अगर उस वीडियो के जरिए भावी दुनिया के संकेत समझें तो कृत्रिम गर्भाशय में बच्चा कृत्रिम बुद्धिमत्ता की निगरानी में नौ महीने तक रहेगा। यानी अगर सचमुच संभव हुआ तो अब बच्चे को जन्म देने के लिए इंसानी कोख की भी जरूरत नहीं है, क्योंकि मशीन महिला के गर्भ की तरह ही सुरक्षित होगी और वह एक स्वाभाविक गर्भ की तरह ही काम करेगी। खबरों के मुताबिक, कृत्रिम बुद्धि आधारित अभिभावकीय बाजार पूरी दुनिया में अभी करीब 5,238 करोड़ रुपए के पार जा चुका है। वर्ष 2028 में इसके करीब तेरह हजार करोड़ रुपए के होने की उम्मीद है।
अनुमान लगाया जा सकता है कि बाजार में हर रिश्ता, हर भावना अब बिकाऊ है। या कहें कि भावनाओं का बाजार वस्तुओं के बाजार पर भारी होता जा रहा है। एक मशीन (कृत्रिम कोख) के लिए यह दावा करना कि वह बच्चे के लिए ‘तीसरे अभिभावक’ की भूमिका निभाएगी, बच्चे की जिंदगी में आ रही जिन मुश्किलों को अभिभावक नहीं समझ पाते, उन्हें यह यंत्र (पेरेंटाफ नमक ऐप) समझने में मदद करेगी, कितना विरोधाभासी प्रतीत होता है। जिस मशीन को खुद मनुष्य ने तैयार किया, जिसमें सारा डेटा खुद मनुष्य ने भरा, वही यंत्र मनुष्य की बुद्धि और सामर्थ्य को चुनौती दे रही है। यह चिंता का विषय भी है।
इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि डिजिटल दुनिया से पहले भी लोगों को समस्याएं और चुनौतियां मिलती थी और वे अपनों से अधिक अनुभवी लोगों की सहायता से उन परेशानियों का सामना करते थे। यहां तक कि बच्चे के पैदा होने के बाद उसकी देखभाल कैसे की जाए, उसे खाने के लिए क्या दिया जाए, बच्चे का टीकाकरण कैसे और कब कराया जाए, आदि सभी सवालों के जवाब के लिए कृत्रिम बुद्धि की सहायता से ‘जननी’ नामक एक ऐसा वाट्सऐप मंच बना है जो नई पीढ़ी के अभिभावकों की मदद करता है। सवाल है कि अब ऐसा क्या हो गया कि मनुष्य कृत्रिम दुनिया में जीने को बाध्य हो गया है। आखिर क्यों परिवार की भूमिका का निर्वाह मशीनों को हस्तांतरित किया जा रहा है? शायद समाज और परिवारों में उत्पन्न संकट की स्थिति इसके लिए जिम्मेदार है। दादी-नानी और चाची-मौसी की भूमिका अब बाजार निर्मित उपकरणों या संस्थाओं ने ले ली है।
परिवार का आकार सिकुड़ते-सिकुड़ते इतना छोटा हो गया है कि उसमें से अनेक रिश्ते अब गायब हो गए हैं। लोग इतने आत्मकेंद्रित हो गए हैं कि उनके लिए परिवार का मतलब केवल पति-पत्नी और उनके बच्चे हैं। वैसे दादा-दादी या चाचा-चाची अब साथ नहीं रहते। अगर रहते भी हैं तो यह नई पीढ़ी के अभिभावक और बच्चे अब उन्हें पहले की तरह समय और महत्त्व नहीं देते, बल्कि उन्हें बोझ समझते हैं। यहां तक कि अनेक बार घर के बुजुर्गों के साथ समायोजन नहीं कर पाने के कारण या उनकी सेवा करने से बचने के कारण उन्हें वृद्ध आश्रम छोड़ आते हैं, क्योंकि बुजुर्ग पीढ़ी के सुझाव इस नई पीढ़ी को अब रोक-टोक लगते हैं। नई पीढ़ी को लगता है कि बुजुर्गों का काम अब तकनीक से लिया जा सकता है और वह बुजुर्गों की तरह कोई रोक-टोक या सवाल-जवाब भी नहीं करती और न ही जबरदस्ती की सलाह देती है। यह समझना मुश्किल नहीं है कि जिस व्यवस्था का कोई विकल्प मिल जाता है. फिर उसको बदलने में लोग नहीं हिचकते। यही कारण है कि आज के समय में समाज में वृद्धाश्रमों की संख्या में वृद्धि देखी जा सकती है।
पर यह भी सच है कि जब से परिवारों के आकार छोटे हुए हैं या परिवार संस्था का विघटन हुआ है, लोगों का एक दूसरे पर विश्वास कम हुआ है, लोग स्वार्थ केंद्रित हुए हैं, समूह हित का स्थान व्यक्तिगत हितों ने ले लिया है। समाज में हर तरफ चाहे निजी संबंध हो, राजनीति हो, अर्थव्यवस्था हो, बिखराव की स्थिति उत्पन्न हो गई है। इस विश्वास के संकट के कारण ही लोग व्यक्तियों से ज्यादा मशीनों पर भरोसा करने लगे हैं। लेकिन लोग यह कैसे भूल जाते हैं कि जब से उन्होंने मनुष्य की जगह मशीनों को चुना है, तब-तब प्रकृति को चुनौती दी है। जब प्रकृति को चुनौती मिलती है तो वह कितना विकराल रूप ले सकती है, यह बताने की जरूरत नहीं होनी चाहिए। आदिम युग से आज के उत्तर-आधुनिक या डिजिटल युग तक मनुष्य के अस्तित्व को बनाए रखने के लिए रोटी, कपड़ा और मकान ही मुख्य आवश्यकताएं हैं। उसके अलावा जीवन को स्वस्थ और खुशहाल बनाने के लिए सामाजिक संबंधों का सहज होना, उनमे विश्वास और प्यार होना जरूरी है जो इस मशीनी युग में कहीं खो गया है। लेकिन लगता नहीं है कि किसी को भी इसकी चिंता है। यह सच है कि पूर्व के समाजों की तुलना में वर्तमान दौर में लोगों के पास अनेक विकल्प उपलब्ध हैं, जिनके आधार पर वे अपने जीवन को आकार देने में सक्षम हुए हैं। आज बच्चों के पालन-पोषण से लेकर अनेक जरूरी काम स्वचालित मशीनें या रोबोट कर देते हैं। फिर मानव समाज में मानवीय संबंधों और भावनाओं की जरूरत ही कहां रह जाती है।
लोगों को यह समझना होगा कि जीवनशैली में बदलाव के अनेक विकल्प हो सकते हैं, लेकिन सामाजिक संबंधों, भावनाओं और परिवार का कोई विकल्प नहीं हो सकता और मशीनें तो बिल्कुल नहीं। अगर समय रहते सामाजिक संबंधों के महत्त्व को नहीं समझा तो यह कथन कि ‘विकसित मस्तिष्क के कारण मनुष्य पशुओं से श्रेष्ठ है’, गलत साबित हो जाएगा। एक तरफ व्यक्ति वास्तविक संबंधों की उपेक्षा कर रहा है और दूसरी तरफ आभासी और कृत्रिम संबंधों की तलाश में वास्तविक जीवन जीना ही छोड़ने को आतुर है। आज जब नौ महीने कोख में रखने वाली मां से संबंध तोड़ने या उसे उपेक्षित करने में ही बच्चे नहीं हिचकते, तो कृत्रिम कोख में पलने वाले बच्चे को अपनी मां से और मां को अपने बच्चे से कितना और कैसा लगाव होगा। बाजार केवल लाभ देखता है, भावनाएं नहीं।
Date:01-05-23
खिलाड़ी ही हों अधिकारीविनीत नारायण
जब भी कभी किसी खेल महासंघ में कोई विवाद उठता है तो उसके पीछे ज्यादातर मामलों में दोषी गैर–खिलाड़ी वर्ग से आए हुए व्यक्ति ही होते हैं। खेल और खिलाड़ियों के प्रति असंवेदनशील व्यक्ति अक्सर ऐसी गलती कर बैठते हैं‚ जिसका खमियाजा उस खेल और उससे जुड़े खिलाड़ियों को उठाना पड़ता है। यदि ऐसे खेल महासंघों के महत्वपूर्ण पदों पर राजनेताओं या गैर–खिलाड़ी वर्ग के व्यक्तियों को बिठाया जाएगा तो उनकी संवेदनाएं खेल और खिलाड़ियों के प्रति नहीं‚ बल्कि उस पद से होने वाली कमाई और शोहरत के प्रति ही होगी।
पिछले कई दिनों से देश का नाम रोशन करने वाली देश की बेटियां दिल्ली के जंतर–मन्तर पर धरना दे रही हैं। इन्हें आंशिक सफलता तब मिली जब देश की शीर्ष अदालत ने दिल्ली पुलिस को आड़े हाथों लेते हुए एफआईआर दर्ज करने के निर्देश दिए। देश के लिए मेडल जीतने वाली इन महिला पहलवानों को हर किसी का समर्थन मिल रहा है‚ सिवाय देश के सत्तारूढ़ दल के। कारण साफ है‚ इन महिला पहलवानों ने जिसके खिलाफ मोर्चा खोला है‚ वो भारतीय कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष एवं उत्तर प्रदेश से भाजपा के बाहुबली नेता ब्रजभूषण शरण सिंह हैं। इन पर कुछ महिला पहलवानों के साथ यौन शोषण का आरोप है। महिला पहलवानों की मांग है कि केवल एफआईआर ही नहीं ब्रजभूषण शरण सिंह की गिरफ्तारी भी हो। इसके साथ ही यह भी कहा है कि जब तक इस मामले की जांच पूरी नहीं हो जाती तब तक उनको कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष पद से हटा दिया जाए और नैतिकता के आधार पर वे संसद से भी इस्तीफा दें।
कैसी विडंबना है‚ जब भी देश का नाम रोशन करने वाले ये खिलाड़ी कोई पदक जीत कर देश लौटते हैं‚ तो देश का शीर्ष नेतृत्व इन्हें पलकों पर बिठा कर इनका जोरदार स्वागत करता है। इन्हें सरकारी पदों पर नौकरी भी दी जाती है। इनके सम्मान में होने वाले स्वागत समारोह की तस्वीरों को मीडिया में खूब फैलाया जाता है परंतु जैसे ही इनके आत्मसम्मान की बात उठती है तो सरकार‚ चाहे किसी भी दल की क्यों न हो‚ इनसे मुंह फेर लेती है‚ और इन्हें अपनी लड़ाई लड़ने के लिए सड़कों पर उतरना पड़ता है। ऐसा ही कुछ देश की इन बहादुर बेटियों के साथ भी हो रहा है। जब जनवरी में इन महिला पहलवानों ने ब्रजभूषण शरण सिंह के खिलाफ मोर्चा खोला था तो सरकार ने इन्हें आश्वासन दिया था कि मामले की जांच होगी और दोषी को उचित सजा दी जाएगी। परंतु जब कई महीनों बाद भी कुछ नहीं हुआ तब इन पहलवानों ने दोबारा मोर्चा खोला। इस बार देश के किसान और अन्य सामाजिक और राजनैतिक दल भी इनके समर्थन में उतर आए। मामले में नया मोड़ तब आया जब सुप्रीम कोर्ट ने इसका संज्ञान लेते हुए दिल्ली पुलिस को लताड़ा और एफआईआर न लिखने का कारण पूछा। सुप्रीम कोर्ट के दबाव में आकर दिल्ली पुलिस ने एफआईआर लिखने का आश्वासन तो दिया पर धरना देने वाले पहलवानों ने आशंका जताई कि पुलिस हल्की धाराओं में एफआईआर दर्ज करेगी और सारी कोशिश मामले को रफा–दफा करने की होगी।
बात–बात में हम अपनी तुलना चीन से करते हैं जबकि अंतरराष्ट्रीय खेलों में मेडल जीतने के मामले में चीन हमसे कहीं आगे है। उधर अमेरिका‚ जिसकी आबादी भारत के मुकाबले पांचवां हिस्सा है‚ मेडल जीतने में भारत से बहुत ज्यादा आगे है। कारण स्पष्ट है कि जहां दूसरे देशों में खिलाड़ियों के खान–पान और प्रशिक्षण पर दिल खोल कर खर्च किया जाता है वहीं भारत में इसका उल्टा होता है। अरबों रु पया‚ जो खेलों के नाम पर आवंटित होता है‚ का बहुत थोड़ा हिस्सा ही खिलाड़ियों के हिस्से आता है। यह पैसा या तो भ्रष्टाचार की बलि चढ़ जाता है‚ और या खेल संघों के नियंत्रक बने हुए राजनेताओं और दूसरे सदस्यों के पांच सितारा ऐशो–आराम पर उड़ाया जाता है। पाठकों को याद होगा कि कुछ दिनों पहले समाचार आया था कि राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ियों को नगर निगम के शौचालय में खाना परोसा जा रहा था।
अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धाओं में भाग लेने वाले खिलाड़ी बहुत छोटी उम्र से ही अपनी तैयारी शुरू कर देते हैं। इनमें से ज्यादातर देश के अलग–अलग हिस्सों से ऐसे परिवारों से आते हैं‚ जिनकी आर्थिक स्थिति मजबूत नहीं होती। फिर भी वे परिवार पेट काट कर इन बच्चों को अच्छी खुराक‚ घी‚ दूध‚ बादाम आदि खिला कर और स्थानीय स्तर पर उपलब्ध प्रशिक्षण दिलवा कर प्रोत्साहित करते हैं। फिर भी इन खिलाडि़यों को अक्सर चयनकर्ताओं के पक्षपातपूर्ण रवैये और अनैतिक आचरण का सामना करना पड़ता है। कभी–कभी तो इनसे रिश्वत भी मांगी जाती है। ऐसी तमाम बाधाओं को झेलते हुए भी भारत के ये बेटे–बेटी हिम्मत नहीं हारते। पूरी लगन से लक्ष्य की ओर बढ़ते रहते हैं। इनकी परेशानियों का इससे बड़ा प्रमाण क्या होगा कि अंतरराष्ट्रीय पदक जीतने के बाद भी इन्हें अपने आत्मसम्मान की रक्षा के लिए सड़कों पर संघर्ष करना पड़ रहा है। जब अंतरराष्ट्रीय पदक विजेताओं के साथ ऐसा दुर्व्यवहार हो रहा है‚ तो बाकी के हजारों खिलाड़ियों के साथ क्या होता होगा‚ यह सोच कर भी रूह कांप जाती है।
जब कभी ऐसे विवाद सामने आते हैं‚ तो सारे देश की सहानुभूति खिलाड़ियों के साथ होती है। हो भी क्यों नॽ ये खिलाड़ी ही तो अंतरराष्ट्रीय खेलों में भारत का परचम लहराते हैं‚ और हर भारतीय का मस्तक ऊंचा करते हैं। भारत जैसे आर्थिक रूप से प्रगतिशील देश ही नहीं‚ पश्चिम के विकसित देशों में भी‚ उनके खेल प्रेमी नागरिकों की संख्या लाखों करोड़ों में होती है। स्पेन में फुटबॉल हो‚ इंग्लैंड़ में क्रिकेट हो या अमेरिका में बेसबॉल या अन्य खेल हों‚ स्टेडियम दर्शकों से खचाखच भरे होते हैं‚ और माहौल लगातार उत्तेजक बना रहता है। खेल में हार–जीत के बाद प्रशंसकों के बीच प्रायः हिंसा भी भड़क उठती है। कभी–कभी तो हिंसा बेकाबू भी हो जाती है। यह इस बात का प्रमाण है कि हर खिलाड़ी के पीछे उसके लाखों करोड़ों चाहने वाले होते हैं। आम मान्यता है कि लोकतंत्र में राजनेता हर उस मौके का फायदा उठाते हैं‚ जहां भीड़ जमा होती हो। खिलाड़ियों की जीत पर तो फोटो खिंचवाने और स्वागत समारोह करवाने में हर स्तर के राजनेता बढ़–चढ़ कर हिस्सा लेते हैं। फिर यह कैसी विडंबना है कि उन्हीं खिलाड़ियों को आज अपनी इज्जत बचाने के लिए धरने प्रदर्शन करने पड़ रहे हैं।
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इस रिपोर्ट का महत्वपूर्ण संदेश यह है कि छोटे लेकिन लगातार सुधारों से न्याय व्यवस्था की स्थिति को बहुत बदला जा सकता है। इस पक्ष पर ध्यान देने की जरूरत है।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 6 अप्रैल, 2023
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Date:29-04-23
Wrestling InjusticeProtests are integral to a democracy – and vitalTOI Editorials
Indian Olympic Association president PT Usha, an Indian sporting legend, feels wrestlers protesting in public are sullying the image of the country. The wrestlers’ protests, the second time this year, are to express their dissatisfaction with the administration’s response to their sexual harassment complaint against the sidelined president of the Wrestling Federation, Brij Bhushan Singh. It can’t be easy for Olympic medallists and serious sportspeople to take to the streets and put up with the attendant discomfort. This should make Usha and other sports administrators think again.
Protests are inherent to a democracy. No grievance redressal mechanism can be perfect. Sometimes they fall far short of qualifying as even acceptable. In a democratic framework, a protest is the default option to express deep dissatisfaction. Remember Colin Kaepernick, an American football quarterback who in 2016 began to kneel during his country’s national anthem as a show of protest against racial injustice? It catalysed conversation globally and even the Indian cricket team took the knee five years later. To reiterate the point that protesters are the ones taking the risk, keep in mind Kaepernick’s sports career ended prematurely. Therefore, instead of accusing protesters of tarnishing India’s image, IOA should make a sincere effort to understand their fear.
Protests don’t affect a country’s image. It’s the insensitivity of people in power – sports administrators in this case – that reflects poorly on reputation. A protest is a symptom of an underlying problem. It also acts as a pressure relief valve. The decision of Delhi Police to register an FIR on the basis of the sexual harassment allegations is a step in the right direction. It does, however, beg the question: Shouldn’t it have happened without the protest? And since it didn’t, Usha and others should understand why protests are necessary – and sometimes vital.
Date:29-04-23
Gifting Beyond the Confines of ‘Family’Allow tax design to expand the ‘familial’ET Editorials
Unlike in the West, the notion of what comprises ‘family’, or individuals who share similar levels of familiality, is more expansive in India. A distant cousin, an ‘honorary’ niece, even an unrelated ‘rakhi’ brother/sister can be as close as ‘bloodline’. In this context, the solitary window for tax-free gifts at weddings, though significant, may not be adequate. Gift tax in India has been used principally as an anti-abuse mechanism. Yet, the policing intent behind taxing gifts to unrelated individuals blocks the path for sincere gifts above a limit. This neither reconciles with India’s innate notion of extra-familial ‘family’ nor with its position on estate duties.
Assets can be willed to any person outside a donor’s legal heirs without inviting tax. The tax system favours gifting to an unrelated individual only afterthe death of the donor. This can lead to unwarranted delay as the decision to give is almost always taken during the donor’s lifetime. The gift tax emerged as a regulatory backstop to curb avoidance in countries that have an inheritance tax. In the Indian context, it merely stymies gifting. GoI should consider expanding the definition of ‘family’ in the Companies Act and allow, say, three persons of the gifter’s choice, regardless of whether they fall under the straight and narrow category of ‘kith and kin’ or not.
High net-worth individuals face another set of constraints imposed by the Companies Act on transfer of assets beyond family members. Disclosures by board members on relatives leave no scope to include unrelated individuals who may become the beneficiaries of asset transfer. Corporate governance would be better served if directors are allowed to disclose their intent to transfer shareholding to beneficiaries beyond their immediate family. To the extent that this encourages wealth dispersion, the tax treatment of gifts can provide a lighter touch to regulation than a blunt instrument like an inheritance tax. Carve-outs have been provided for gifts to institutions. Individuals are the beneficiaries of gifts intermediated thus. Tax design should allow for interpersonal gifts beyond the tight term of ‘family’.
Date:29-04-23
मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में नौकरियों की भरमार हैपंकज बंसल, ( डिजिटल रिक्रूटमेंट प्लेटफॉर्म और वर्क यूनिवर्स के सह-संस्थापक )
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा था कि मेक इन इंडिया की बात करते समय हम न केवल कम्पनियों को भारत में कॉस्ट-इफेक्टिव मैन्युफेक्चरिंग के लिए निमंत्रित करते हैं, बल्कि उन्हें अपने उत्पादों के लिए एक बड़ा बाजार मुहैया कराने का अवसर भी देते हैं। भारत का मैन्युफेक्चरिंग सेक्टर तेज गति से आगे बढ़ रहा है। मैन्युफेक्चरिंग निर्यात 418 अरब डॉलर के स्तर को छू चुके हैं, जो कि विगत वर्ष की तुलना में 40% का उछाल है। भारत में मैन्युफेक्चरिंग का ग्लोबल-हब बनने की क्षमता है। भारत के पास मैन्युफेक्चरिंग के उच्च गुणवत्ता और कम लागत वाले विकल्प मौजूद हैं और उसके पास कुशल कामगारों की भी कमी नहीं। मैन्युफेक्चरिंग सेक्टर भारत की जीडीपी में 16% का योगदान देता है और उसके कारण 2.7 करोड़ लोगों को रोजगार मिला है। विकास और रोजगार को और बढ़ावा देने के लिए सरकार वर्ष 2030 तक बुनियादी ढांचे पर सौ ट्रिलियन रुपए खर्च करने की योजना बना रही है। अध्ययन बताते हैं अकेले मोबाइल मैन्युफेक्चरिंग से डेढ़ लाख तक नए अवसर रचे जा सकेंगे।
लॉकडाउन का असर
कोविड-19 ने ग्लोबल मैन्युफेक्चरिंग सेक्टर पर खासा असर डाला था। खासतौर पर चीन को इससे बहुत झटका लगा। एक समय चीन को दुनिया की फैक्टरी कहा जाता था। लेकिन कोविड के कारण वैश्विक सप्लाई-चेन बुरी तरह से प्रभावित हुई थी। इससे दुनियाभर की कम्पनियों को पता चला कि किसी एक देश पर जरूरत से ज्यादा निर्भरता के कितने खतरे हैं। यही कारण है कि आज अनेक देश चीन के विकल्प की तलाश कर रहे हैं। इसे चाइना-प्लस-वन रणनीति कहा जा रहा है। इसके तहत कम्पनियां अपने मैन्युफेक्चरिंग ऑपरेशंस को चीन के बजाय भारत जैसे देशों की ओर ले जा रही हैं ताकि अपने जोखिम को कम कर सकें। इन बदलावों का लाभ उठाकर भारत सक्रियतापूर्वक खुद को मैन्युफेक्चरिंग निवेश के नए केंद्र की तरह प्रमोट कर रहा है। मिसाल के तौर पर, हाल के समय में सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री में बहुत तेजी आई है। इसी परिप्रेक्ष्य में कर्नाटक और तेलंगाना जैसे राज्यों में सेमीकंडक्टर फैक्टरियां स्थापित करने को लेकर फॉक्सकॉन जैसी ग्लोबल कम्पनी ने रुचि दर्शाई है। परिणामस्वरूप, अनुमान हैं कि सेमीकंडक्टर इंडस्ट्री में 12 से 15 प्रतिशत की वैश्विक तेजी दर्ज की जाएगी और भारत में भी नौकरियों के नए अवसर निर्मित होंगे।
रोजगार के अवसर
आने वाले वर्षों में मैन्युफेक्चरिंग सेक्टर के तमाम सेगमेंट्स में नौकरियों के अवसर निर्मित होंगे। हनीवेल की निर्देशक दीप्ति विज के मुताबिक टेक्नोलॉजी और डिजिटलाइजेशन के सुमेल से इंजीनियरिंग और मैन्युफेक्चरिंग इंडस्ट्री तेजी से विकसित हो रही है। इससे टेक्नोलॉजी, सॉफ्टवेयर, इंजीनियरिंग, हेल्थकेयर आदि में नौकरियों के नए अवसर निर्मित हो रहे हैं। अब जब ग्लोबल मैन्युफेक्चरिंग सेक्टर इंडस्ट्री 4.0 की ओर बढ़ रहा है तो उत्पादकता, गुणवत्ता और दक्षता बढ़ाने के लिए संस्थान टेक्नोलॉजी की मदद लेना चाहते हैं। ऑटोमेशन, रोबोटिक्स, एआई की मदद से सेक्टर में बुनियादी बदलाव आ रहे हैं। इससे एआई, एमएल, आईओटी, बिग डाटा एनालायटिक्स, क्लाउड कम्प्यूटिंग आदि में नौकरियों के नए अवसर भी निर्मित हुए हैं। साथ ही सुरक्षा के लिए सेफ्टी इंजीनियर्स और सिक्योरिटी सुपरवाइजर्स के लिए भी काम के मौके बढ़े हैं। वहीं लीन मैन्युफेक्चरिंग का फोकस कम क्षति और कम लागत से अधिक से अधिक उत्पादन और गुणवत्ता पर केंद्रित है। इस एप्रोच के लिए एक भिन्न प्रकार के माइंडसेट की जरूरत होती है, जिसके लिए संस्थान लीन मैन्युफेक्चरिंग, सिक्स सिगमा, टोटल क्वालिटी मैनेजमेंट आदि में अनुभवी पेशेवरों की तलाश कर रहे हैं। मैन्युफेक्चरिंग में ग्रोथ के लिए निरंतर इनोवेशन की भी जरूरत है, जिससे रिसर्च एंड डेवलपमेंट प्रोफेशनल्स की मांग बढ़ी है। क्लाइमेट चेंज के मद्देनजर ग्रीन मैन्युफेक्चरिंग से सम्बंधित पेशेवरों की मांग में भी इधर निरंतर इजाफा हुआ है। रिन्युएबल एनर्जी, वेस्ट रिडक्शन और सस्टेनेबल मैन्युफेक्चरिंग की दिशा में काम करने वाले प्रोफेशनल्स की बाजार में जरूरत महसूस की जा रही है।
आज भारत के मैन्युफेक्चरिंग सेक्टर में अपार सम्भावनाएं हैं। चूंकि सरकार भी इस क्षेत्र के विकास के लिए कमर कसे हुए है, इसलिए इसमें संदेह नहीं कि आने वाले समय में यह और तेजी से आगे बढ़ेगा।
Date:29-04-23
नहीं सुधरेगा चीनसंपादकीय
चीनी रक्षा मंत्रालय का यह कहना इसलिए आश्चर्यजनक है कि भारत और चीन की सीमा पर स्थिति आमतौर पर स्थिर है, क्योंकि एक दिन पहले ही रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने अपने चीनी समकक्ष से साफ तौर पर कहा था कि सीमा पर तनाव की स्थिति है और उससे समूचे संबंधों पर प्रभाव पड़ रहा है। उन्होंने चीनी रक्षा मंत्री से हाथ मिलाने से भी मना कर दिया था और उनके इस प्रस्ताव को भी अस्वीकार कर दिया था कि सीमा विवाद को परे रखते हुए संबंधों को सामान्य बनाने की दिशा में आगे बढ़ा जाना चाहिए। स्पष्ट है कि चीन सीमा विवाद को सुलझाने से न केवल इन्कार कर रहा है, बल्कि इस प्रयास में भी है कि भारत उसकी अनदेखी कर दे। यह तब है, जब भारत की ओर से पिछले एक अर्से से बार-बार यह कहा जा रहा है कि सीमा पर शांति कायम किए बिना रिश्तों में सुधार संभव नहीं है। यदि चीन इस साधारण सी बात को समझने के लिए तैयार नहीं दिख रहा तो इसका सीधा मतलब है कि उसकी नीयत में खोट है और वह अपनी ही चलाना चाहता है। इसकी अनदेखी नहीं की जानी चाहिए कि सीमा पर तनाव बनाए रखकर चीन भारत के सैन्य संसाधनों पर बोझ डाल रहा है। भारत को चीन से लगती सीमा पर न केवल अतिरिक्त चौकसी बरतनी पड़ रही है, बल्कि अपने सैन्य खर्च को भी बढ़ाना पड़ रहा है।
चीन का रवैया किसी भी सूरत में मित्र देश वाला नहीं है। चीन केवल भारतीय हितों की अनदेखी ही नहीं कर रहा है, बल्कि उन्हें चोट पहुंचाने की भी कोशिश कर रहा है। वह खुद तो भारतीय हितों को लेकर बेपरवाह है, लेकिन यह चाहता है कि भारत उसके हितों के मामले में संवेदनशीलता का परिचय दे। भारत को इसे न केवल अस्वीकार करना होगा, बल्कि चीन के समक्ष प्रकट भी करना होगा। समझना कठिन है कि जब चीन कश्मीर और अरुणाचल को लेकर अवांछित टिप्पणियां करता रहता है, तब भारत तिब्बत, ताइवान और हांगकांग के विषयों पर मौन क्यों धारण किए रहता है? अब जब यह स्पष्ट हो चुका है कि चीन अपने अड़ियल रवैये से बाज नहीं आने वाला, तब फिर भारत के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि वह उसके प्रति अपनी रीति-नीति बदले। रीति-नीति में यह बदलाव इस तरह होना चाहिए कि चीन पर उसका असर पड़ता दिखे। इसमें संदेह है कि शंघाई सहयोग संगठन और ऐसे ही अन्य बहुपक्षीय मंचों पर चीन को कठघरे में खड़ा करने और उसे आईना दिखाने से उसकी सेहत पर कोई असर पड़ने वाला है। उसकी सेहत पर असर तब पड़ेगा, जब भारत ऐसा कुछ करेगा, जिससे उसके हित प्रभावित होंगे। भारत को इस नतीजे पर पहुंचने में देर नहीं करनी चाहिए कि चीन आसानी से सुधरने वाला नहीं है।
Date:29-04-23
जनांकिकीय लाभ की असली कहानीटी. एन. नाइनन
अधिकांश प्रकाशनों ने संयुक्त राष्ट्र के एक संगठन की इस बात को बिना किसी आलोचना के स्वीकार कर लिया है कि भारत इस महीने दुनिया का सर्वाधिक आबादी वाला देश बन गया है। आकलन के मुताबिक भारत की 142.9 करोड़ की आबादी चीन की जनसंख्या से मामूली अधिक है। आधुनिक जनगणना शुरू होने के बाद यह पहला मौका है जब भारत ने जनसंख्या में चीन को पीछे छोड़ा है। विश्व बैंक संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों को दोहराता है, हालांकि उसका दावा है कि वह अनेक स्रोतों से प्राप्त आंकड़ों का इस्तेमाल करता है। वैसे उनमें से कोई आंकड़ा संयुक्त राष्ट्र के इस दावे का समर्थन नहीं करता है कि भारत अब सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश है।
महत्त्वपूर्ण बात है कि न तो चीन और न ही भारत इस दावे का समर्थन कर रहा है। भारत का अनुमान है कि 2023 तक उसकी आबादी 138.3 करोड़ रहेगी जबकि चीन की दिसंबर की जनगणना के अनुसार उसकी आबादी 141.2 करोड़ है। अमेरिकी जनसंख्या ब्यूरो जनसंख्या के आंकड़ों का भारत के नमूना पंजीयन व्यवस्था से मिलान करता है जो जन्म और मृत्यु के आंकड़ों, प्रवासन के आंकड़ों, कोविड से होने वाली मौतों आदि को दर्ज करता है। उसका मानना है कि 2023 में भारत की जनसंख्या करीब 139.9 करोड़ रह सकती है। चीन के लिए ब्यूरो ने 141.3 करोड़ का जो आंकड़ा दिया है, भारत का आंकड़ा उससे कम है। वहीं वर्ल्डमीटर नामक एक स्वतंत्र डिजिटल एजेंसी के अनुसार भारत की मौजूदा आबादी 141.8 करोड़ है जबकि चीन की आबादी 145.5 करोड़ है।
यह अंतर बहुत मामूली नजर आता है और लगता है कि आबादी के मामले में अगर भारत अभी चीन से आगे नहीं है तो अगले कुछ वर्षों में वह हो जाएगा। परंतु यह ध्यान देने लायक है कि संयुक्त राष्ट्र आबादी को लेकर अपने अनुमान में लगातार गलत साबित होता रहा है। सन 2010 में उसने कहा था कि अबाबादी के मामले में भारत 2021 तक चीन से आगे निकल जाएगा और 2025 तक भारत की आबादी चीन से 6.3 करोड़ अधिक हो जाएगी। 2021 के मामले में वह पूरी तरह गलत साबित हुआ और 2025 वाले मामले में भी वह गलत ही साबित होगा। सन 2015 में उसने कहा था कि 2050 तक भारत की आबादी 170 करोड़ का स्तर पार कर जाएगी। लब्बोलुआब यह कि आबादी पर संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों की छानबीन करनी होगी, उसे जस का तस स्वीकार नहीं किया जा सकता है क्योंकि वे गलत साबित हो सकते हैं।
अहम बात यह है कि चीन की आबादी अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच चुकी है जबकि भारत की आबादी निरंतर बढ़ रही है। ऐसे में कई पर्यवेक्षकों का कहना है कि भारत के पास युवा आबादी का लाभ रहेगा और आबादी का बड़ा हिस्सा कामगार आयु का होगा। ऐसे में भारत के पास एकबारगी जनांकिकीय लाभ भी होगा। परंतु बीती चौथाई सदी में जितनी बार इस लाभ की बात की गई वास्तव में इसका उतना फायदा नहीं उठाया जा सका। एक ऐसे देश में जहां सफलताओं का जश्न उनके वास्तव में घटित होने के पहले ही मना लिया जाता है वहां इस बात की संभावना अधिक है कि जनांकिकीय फायदा भी यूं ही गंवा दिया जाएगा। चीन ने उचित ही कहा है कि लोगों की तादाद के साथ उनकी गुणवत्ता भी मायने रखती है। भारत की आबादी की वृद्धि अपने आप में शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं की नाकामी का परिणाम है। अभी भी एक निरक्षर भारतीय महिला औसतन तीन बच्चों को जन्म देती है जबकि शिक्षित महिलाओं की प्रजनन दर 1.9 है। उत्तर प्रदेश में क्रूड जन्म दर (एक खास अवधि में एक खास भौगोलिक क्षेत्र में होने वाले जन्म) केरल से दोगुनी है। वहीं क्रूड मृत्यु दर (एक खास समय में खास क्षेत्र में कुल मौतें) की बात करें तो मध्य प्रदेश में यह केरल से आठ गुनी है। उच्च मृत्यु दर माताओं को ज्यादा बच्चे पैदा करने के लिए प्रोत्साहित करती है। केवल शिक्षा और अच्छी जन स्वास्थ्य सेवा ही इस चक्र को रोक सकती है। सकारात्मक बात यह है कि देश की आबादी में एक दशक में होने वाली वृद्धि आधी रह गई है। सन 1960, 1970 और 1980 के दशक के 24 फीसदी से कम होकर बीते दशक में यह 12 फीसदी से कम रह गई। इसमें और कमी आ रही है। देश के दक्षिण और पश्चिम में स्थित राज्यों की उर्वरता दर पहले ही प्रतिस्थापन स्तर से नीचे है। केवल गरीब, कम शिक्षित और कम विकसित राज्यों में ही आबादी में इजाफा जारी रहने वाला है।
जनांकिकीय लाभांश का लाभ केवल तभी लिया जा सकता है जब मानव संसाधन विकसित किया जाए और इससे पहले कि कुछ दशक बाद जनांकिकीय बदलाव हो, उनका उत्पादक इस्तेमाल सुनिश्चित किया जा सके। तब तक अगर मौजूदा रुझानों से देखें तो भारत एक उच्च-मध्य आय वाला देश रह सकता है जो मध्य आयु की ओर बढ़ रहा हो। भारत का जीवन स्तर दक्षिण-पूर्वी एशिया और लैटिन अमेरिका के कुछ हिस्सों या चीन जैसा होने में कम से कम 20 वर्ष का समय लगेगा। उनकी प्रति व्यक्ति आय भारत से करीब ढाई गुना है।
Date:29-04-23
कार्रवाई की कसौटीसंपादकीय
काफी जद्दोजहद के बाद शुक्रवार को दिल्ली पुलिस ने सर्वोच्च न्यायालय को सूचित किया कि भारतीय कुश्ती महासंघ यानी डब्लूएफआइ के अध्यक्ष और सांसद बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ एक नाबालिग सहित सात महिला पहलवानों के यौन उत्पीड़न और धमकी देने के आरोपों पर वह प्राथमिकी दर्ज करेगी। गौरतलब है कि बृजभूषण शरण सिंह पर लगे आरोपों के संदर्भ में अब तक कार्रवाई न होने की स्थिति में महिला पहलवानों को आंदोलन तक का रास्ता अख्तियार करना पड़ा। हालांकि कुछ समय पहले जनवरी में भी पीड़ितों की ओर से पहली बार इन आरोपों के साथ सार्वजनिक रूप से अपना विरोध और दुख जाहिर किया गया था। मगर तब केंद्रीय युवा और खेल मामलों के मंत्री अनुराग ठाकुर की ओर से उचित कार्रवाई सुनिश्चित कराए जाने के आश्वासन पर महिला पहलवानों ने अपना विरोध वापस ले लिया था। लेकिन विडंबना यह है कि तीन महीने के बाद भी इस मसले पर कोई सक्रियता नहीं दिखी और पीड़ितों को एक बार फिर दिल्ली के जंतर मंतर पर अपना विरोध प्रदर्शन शुरू करना पड़ा। जब उन्होंने बृजभूषण शरण सिंह के खिलाफ एफआइआर के उनके अनुरोध पर तत्काल सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट का रुख किया और शीर्ष अदालत ने दिल्ली पुलिस को नोटिस जारी कर कहा कि मामला दर्ज क्यों नहीं किया गया है, तब जाकर अदालत को प्राथमिकी दर्ज किए जाने के बारे में सूचित किया गया।
जाहिर है, पुलिस ने अब जिन शिकायतों पर प्राथमिकी दर्ज करने की बात कही, उनके कानूनी रूप से ठोस आधार थे। सवाल है कि आखिर क्या कारण रहे कि इस मसले के उठने के बाद से ये आधार मौजूद होने के बावजूद दिल्ली पुलिस ने कानूनी कार्रवाई शुरू करने में इतना लंबा वक्त लगाया। हैरानी की बात यह है कि इस मामले में शिकायत सामने आने पर संवेदनशील तरीके से कार्रवाई करने के बजाय पुलिस की ओर से यहां तक कहा गया कि प्राथमिकी दर्ज करने से पहले आरोपों की जांच करने की जरूरत होगी। क्या पुलिस इस तरह की सभी शिकायतों के मामले में ऐसा ही मानदंड अपनाती है? अगर कानून सबके लिए बराबर है, तो अलग-अलग आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई को लेकर सक्रियता के पैमाने अलग-अलग क्यों हो जाते हैं? क्या यह अपने आप में आरोपी को बचाने की कोशिश और कानून के शासन को सवालों के कठघरे में खड़ा करना नहीं है? यह बेवजह नहीं है कि इस समूचे मामले में पुलिस के रवैये पर सवाल उठ रहे हैं कि वह पद और कद को देख कर कार्रवाई का स्तर तय करती है।
हालांकि बृजभूषण शरण सिंह अगर अपने ऊपर लगे यौन-उत्पीड़न के आरोपों से इनकार कर रहे हैं तो सबसे पहले उन्हें संगठन और अपनी गरिमा का खयाल रखते हुए कोई स्पष्ट फैसला आने तक के लिए अपने पद से हट जाना चाहिए था और कानूनी प्रक्रिया में सहयोग करना चाहिए था। लेकिन जो हो रहा है, वह सबके सामने है। दरअसल, इस समूचे प्रसंग में एक अहम पक्ष यही है कि जिस कद और पद के व्यक्ति के खिलाफ महिला पहलवानों ने यौन उत्पीड़न जैसे गंभीर आरोप लगाए हैं, उसमें अपेक्षया ज्यादा शिद्दत से कार्रवाई की जरूरत है। अंतरराष्ट्रीय पटल पर एक सबसे महत्त्वपूर्ण खेल के रूप में कुश्ती के क्षेत्र में देश को आगे बढ़ाने की कमान जिस व्यक्ति के हाथ में है, अगर वही यौन उत्पीड़न जैसे जघन्य आरोपों के कठघरे में खड़ा है, तो उसके नेतृत्व में इस खेल और इसके खिलाड़ियों के भविष्य की कल्पना ही की जा सकती है। जरूरत इस बात की है आरोपी के रसूख पर ध्यान न देकर पीड़ितों की शिकायत पर पुलिस और कानून अपना काम ईमानदारी से करे।
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29 April 2023
प्रश्न–408 – अज्ञात का भय हमें उससे ज्यादा पंगु बना देता है, जितना कोई आततायी बनाता है। उक्त विषय पर एक सारगर्भित निबंध लिखिए। (शब्द 1000-1200)
Question–408 – The fear of the unknown paralyzes us more than the actions of any terrorist. Write a concise essay on the above topic. (Words 1000-1200)
नोट : इसका उत्तर आपको हमें नहीं भेजना है, यह आपके स्वयं के अभ्यास के लिए है।
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Date:28-04-23
समलैंगिक जोड़ों को कानूनी संरक्षण देना आवश्यक हैअमेरिका तक में 60 के दशक में इंटररेशियल मैरिज का समर्थन चुनावी नुकसान माना जाता थाडेरेक ओ ब्रायन, ( लेखक सांसद और राज्यसभा में टीएमसी के नेता हैं )
मेरे सांसद बनने से भी पहले साल 2006 की बात है, जब मैंने एक याचिका पर हस्ताक्षर किए थे। इस याचिका में मांग की गई थी कि भारतीय दंड संहिता की धारा 377 को अपराध के दायरे से मुक्त किया जाए। उस दस्तावेज पर जिन सौ से भी ज्यादा गणमान्यजनों ने दस्तखत किए थे, उनमें झुम्पा लाहिड़ी, श्याम बेनेगल, विक्रम सेठ, कौशिक बसु आदि भी शामिल थे। 2018 में सर्वोच्च अदालत के पांच जजों की संवैधानिक पीठ ने वयस्कों के बीच सहमति से निर्मित समलैंगिक सम्बंधों को एकमत से अपराध के दायरे से मुक्त कर दिया।
विक्रम और आलोक की कहानी : पिछले सप्ताह जब सर्वोच्च अदालत में सेम-सेक्स मैरिज (या बेहतर हो अगर इसे कहें ‘मैरिज इक्वेलिटी’) पर सुनवाई चल रही थी, तब मैंने अपने और अपनी पत्नी तोनुका के अनेक समलैंगिक मित्रों से बात की। उनमें विक्रम डॉक्टर और उनके पार्टनर आलोक हिसारवाला भी शामिल थे। विक्रम पत्रकार हैं तो आलोक वकील। उन्होंने अपनी कहानी इन शब्दों में सुनाई : ‘जब हम मिले, तब गे होना गैरकानूनी था और हम एक ऐसे भारत की कल्पना भी नहीं कर सकते थे, जिसमें हम खुलकर एक कपल की तरह जीते और हमारे परिवारों के द्वारा इसे पूरी तरह से स्वीकार किया जाता। आज 24 साल बाद हम गोवा में ठीक यही कर रहे हैं, और जहां यह बहुत कमाल है, वहीं यह बहुत नॉर्मल भी मालूम होता है। इसलिए हमें खुद को बार-बार यह याद दिलाना पड़ता है कि जब हमने शुरुआत की थी, तब हम कहां पर थे और आज हम कितने खुशनसीब हैं, जो इस मुकाम तक पहुंचे हैं। इस सबके दौरान शादी की सम्भावना तो दूर-दूर तक नहीं थी, इसलिए हम इसके बारे में कभी विचार तक नहीं करते थे। लेकिन यही बात आज के समलैंगिक जोड़ों पर लागू नहीं होती। आखिर किसी युवा समलैंगिक को इस मुकाम तक पहुंचने के लिए हमारी तरह 18 साल क्यों इंतजार करना पड़े? क्योंकि यह एक विशेषाधिकार नहीं है, यह सभी के लिए एक सामान्य अधिकार है और इसमें इच्छुक जोड़ों को विवाह करने का हक भी होना चाहिए।’
केवल अर्बन-एलीट्स के लिए नहीं : यह केवल शहरी कुलीनों का ही प्रश्न नहीं है। हकीकत इससे एकदम विपरीत है। लीला और उर्मिला की ही कहानी देख लीजिए। वे भोपाल में पदस्थ पुलिस कर्मचारी थीं, जिन्होंने 1987 में विवाह करने का निर्णय लिया। उन्हें तुरंत निलंबित कर दिया गया और 48 घंटों तक लॉकअप में रखा गया। समाज में एलजीबीटीक्यू लोगों को जिस तरह के पूर्वग्रहों और भेदभाव का सामना करना पड़ता है, यह उसकी एक बानगी है। आज भी इस समुदाय के जोड़ों के द्वारा आत्महत्या करने की खबरें नियमित रूप से आती रहती हैं। जेएनयू की प्रोफेसर निवेदिता मेनन जोड़ती हैं कि अंतर्जातीय, अंतर्धार्मिक शादियों के विरुद्ध हिंसा और समलैंगिकों के द्वारा की जाने वाली आत्महत्या की खबरें किन्हीं अलग इतिहासों का नहीं, बल्कि एक साझा इतिहास का हिस्सा हैं, जिसमें स्त्री-पुरुष के सम्बंध को अनिवार्य और विवाह की संस्था को उसका श्रेष्ठ प्रतिनिधि समझा जाता है। इसे बदलने के लिए सेम-सेक्स मैरिज के इच्छुक जोड़ों के लिए स्पेशल मैरिज एक्ट ऑफ 1954 में उपयोग किए जाने वाले शब्दों पति और पत्नी को बदलकर स्पाउस या जीवनसाथी करना एक अच्छा कदम होगा।
लेखक और मेरे गे-मित्र सिद्धार्थ दुबे ने समलैंगिकों और साधारण नागरिकों के अधिकारों के लिए बहुत लड़ाइयां लड़ी हैं। उन्होंने मुझसे कहा था कि मुझे निश्चित रूप से पता है कि भारत में सेम-सेक्स मैरिज के लिए जल्द ही कानून बनेगा, क्योंकि हमारे पास आज भी सच्चे न्यायाधीश हैं। वे न्याय की भावना को समझते हैं और कट्टता का विरोध करते हैं। लेकिन राजनीति इसके आड़े आती है। अमेरिका का ही उदाहरण ले लीजिए, जहां 1960 के दशक में इंटररेशियल मैरिज के समर्थन को चुनावी नुकसान समझा जाता था। तब अदालतों को हस्तक्षेप करना पड़ा और इंटररेशियल मैरिज से प्रतिबंध को हटाना पड़ा। यही स्थिति आज भारत में है। मेरी पत्नी तोनुका बंगाली हिंदू हैं और मैं एंग्लो-इंडियन रोमन कैथोलिक हूं। 2006 में हमारी शादी स्पेशल मैरिज एक्ट के तहत हुई थी। अगर वह कानून नहीं होता तो हमारे लिए विवाह कर पाना असम्भव था। वैसा ही कानूनी संरक्षण समलैंगिकों को भी मिले।
Date:28-04-23
जनसंख्या-वृद्धि को लेकर घबराने की जरूरत नहीं हैअगर दो समूहों की प्रजनन दर के अंतराल को पाटना है तो आर्थिक विकास करना होगानीरज कौशल, ( कोलंबिया यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर )
संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक इस सप्ताहांत में भारत चीन को पीछे छोड़कर दुनिया का सबसे ज्यादा आबादी वाला देश बन चुका होगा। इसका कई लोगों ने यह निष्कर्ष निकाला है कि भारत जनसंख्या-विस्फोट के दौर से गुजर रहा है और इस पर अंकुश लगाने की जरूरत है। लेकिन ऐसा मानने वाले भूल कर रहे हैं। भारत जनसंख्या-विस्फोट के दौर से नहीं गुजर रहा है। वास्तव में, आजादी के बाद से भारत में जनसंख्या-वृद्धि आज अपने सबसे न्यूनतम स्तर पर है। भारत की प्रजनन-दर प्रति-महिला 2.0 है। जनसांख्यिकी के जानकारों ने जिसे रिप्लेसमेंट लेवल माना है, जिस पर आकर जनसंख्या स्थिर हो जाती है, यह दर उससे कम है। रिप्लेसमेंट रेट को सामान्यतया प्रति-महिला 2.1 माना जाता है। पांच ही राज्यों की प्रजनन दर रिप्लेसमेंट लेवल से अधिक है और इनमें भी तीन ही बड़े हैं- बिहार, झारखंड और उत्तर प्रदेश। दो राज्य छोटे हैं- मणिपुर और मेघालय। इनमें से भी चार ऐसे हैं, जो रिप्लेसमेंट लेवल से थोड़ा ही अधिक हैं और उनकी प्रजनन दर तेजी से घट रही है। भारत के सभी राज्यों में बिहार की प्रजनन दर सबसे अधिक 3 है, लेकिन उसमें भी गिरावट दर्ज की जा रही है। संक्षेप में, भारत को जनसंख्या-नियंत्रण के लिए कोई कदम उठाने की जरूरत नहीं है। कुछ दशकों में आबादी वृद्धि दर स्वत: स्थिर हो जाएगी और 2050 के बाद उसमें गिरावट आने लगेगी।
आज अनेक लोग देश की वर्तमान जनसांख्यिकी को अत्यंत खतरे की स्थिति की तरह देखते हैं। इनमें संघ प्रमुख मोहन भागवत और यूपी सीएम योगी आदित्यनाथ उल्लेखनीय हैं। वैसे अंदेशे न केवल निराधार हैं, बल्कि वे इतिहास का एक ऐसा दृष्टिकोण भी सामने रखते हैं, जो त्रुटिपूर्ण है। यह ऐसा दृष्टिकोण है, जो लोगों को खाने वाले मुंह के रूप में गिनता है। यानी जितने लोग होंगे, उतने लोगों को हमें खिलाना होगा। लेकिन इसका वैकल्पिक विचार यह है कि लोग इनोवेशन करने वाला दिमाग, उत्पादन करने वाले हाथ, सृजन करने वाली प्रतिभा और परवाह करने वाला दिल भी होते हैं। दूसरे शब्दों में लोगों को ह्यूमन कैपिटल की तरह देखा जा सकता है। ऐतिहासिक डाटा और शोध इस दूसरे नजरिए की पुष्टि करते हैं।
जनसंख्या वृद्धि को खतरे की घंटी की तरह देखने का एक साम्प्रदायिक कोण भी है। संघ प्रमुख जनसंख्या नियंत्रण के साथ ही जनसंख्या संतुलन की भी बात करते हैं। यहां पर कुछ तथ्यों को सामने रखा जा सकता है। पहली बात तो यह कि जहां मुस्लिमों की प्रजनन दर हिंदुओं से अधिक है, वहीं इन दोनों के बीच का अंतराल अब तेजी से घट रहा है। इसका यह मतलब है कि मुस्लिमों की प्रजनन दर हिंदुओं की प्रजनन दर की तुलना में अधिक तेजी से घट रही है। वर्ष 1992 में मुस्लिमों की प्रजनन दर हिंदुओं की प्रजनन दर की तुलना में प्रति-महिला एक शिशु अधिक की थी। लेकिन वर्ष 2021 में यह आंकड़ा एक के बजाय 0.4 तक पहुंच गया है।
दूसरी बात यह है कि भारत में प्रजनन दर को समझने की कुंजी देश के भूगोल और आर्थिक स्थिति में निहित है। इसकी तुलना में धर्म प्रजनन का एक कमजोर निर्धारक-तत्व है। मिसाल के तौर पर, जम्मू-कश्मीर, पश्चिम बंगाल और असम- इन तीन राज्यों में सघन मुस्लिम आबादी है, इसके बावजूद इन राज्यों में मुस्लिमों की प्रजनन दर बिहार और यूपी के हिंदुओं की तुलना में कम है। इसका कारण धार्मिक अंतर नहीं है। वास्तव में इसके मूल में भौगोलिक भेद है। तीसरे, देश के जिन पांच राज्यों या केंद्रशासित प्रदेशों में मुस्लिमों की सघन आबादी (20 प्रतिशत से अधिक) है, वहां प्रजनन दर रिप्लेसमेंट रेट से बहुत नीचे है, जिसका मतलब है कि इनमें से कुछ राज्यों की आबादी वास्तव में कम हो रही है। जम्मू-कश्मीर और लक्षद्वीप में यह 1.4 प्रति-महिला है, जो कि अत्यंत कम है। पश्चिम बंगाल में यह 1.6, केरल में 1.8 और असम में 1.9 प्रति-महिला है और ये सभी कम दरें हैं। चौथी बात यह कि हिंदुओं और मुस्लिमों की प्रजननशीलता में जो अंतर है, उसकी तुलना एक ही आर्थिक स्तर पर करने पर वह लगभग विलीन हो जाता है। इसका यह मतलब है कि अगर दोनों समूहों की प्रजनन दर के अंतराल को पाटना है तो इसके लिए आर्थिक विकास करना होगा- सबका विकास। जैसे ही आर्थिक समृद्धि के फल निम्न आय समूहों तक पहुंचेंगे और स्त्रियों की शैक्षिक दशा सुधरेगी, हिंदुओं और मुस्लिमों की प्रजनन दर का अंतर समाप्त हो जाएगा।
Date:28-04-23
चुनौतियां बढ़ा रही बढ़ती आबादीडा. एके वर्मा, ( लेखक सेंटर फार द स्टडी आफ सोसायटी एंड पालिटिक्स के निदेशक एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं )
संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या प्रभाग के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार एक जुलाई 2023 तक चीन को पछाड़कर भारत विश्व का सर्वाधिक जनसंख्या वाला देश बन जाएगा। उस समय तक भारत की जनसंख्या 142 करोड़ 86 लाख और चीन की जनसंख्या 142 करोड़ 56 लाख अनुमानित है। यह उपलब्धि है या चुनौती? चीन एक गैर-लोकतांत्रिक साम्यवादी देश है, जो नागरिकों की स्वतंत्रता और अधिकारों को कुचल कर इतनी बड़ी आबादी पर शासन करता है, मगर हमें तो लोकतांत्रिक शासन द्वारा इतनी बड़ी जनसंख्या का विकास और लोककल्याण करना है। इसके अलावा हमारी सांस्कृतिक, मजहबी, जातीय, भाषाई और क्षेत्रीय आदि विविधताएं हैं, जो संघीय व्यवस्था में चुनावों के दौरान अलगाववादी प्रवृत्तियों को बल देती हैं। इसके चलते विभिन्न राजनीतिक दलों द्वारा भिन्न-भिन्न राज्यों में विकास और लोक कल्याण के मुद्दों पर असहमति होती है। फिर सरकारों के निर्णयों पर न्यायपालिका पहरा देती है, जिससे जनसंख्या नियंत्रण, विकास एवं लोक कल्याण पर केंद्र और राज्य सरकारें निर्णय लेने के लिए चीन की तरह स्वतंत्र और निरंकुश नहीं।
विशाल जनसंख्या किसी देश का विपुल संसाधन है और गंभीर समस्या भी। सभी पार्टियों की सरकारों को इससे रूबरू होना पड़ेगा। चुनावी स्पर्धा के समय विभिन्न दल सरकारी नीतियों को राजनीतिक लाभ-हानि की दृष्टि से देखते हैं। जब जनसंख्या नियंत्रण की बात होती है तो अधिकांश दल उसे मुस्लिम-विरोधी कह देते हैं, क्योंकि उन्हें वे अपने ‘वोट-बैंक’ के रूप में प्रयोग करते हैं। चीन ने जनसंख्या नियंत्रण का सराहनीय काम अवश्य किया, जो 1980 में केवल ‘एक बच्चा’ पैदा करने का कानून बनाने के कारण संभव हुआ। यह कानून 2016 तक प्रभावी रहा। क्या ऐसा कोई कानून भारत में संभव है? यदि जनसंख्या नियंत्रण न हो सका तो इसका सबसे पहला शिकार भारतीय लोकतंत्र ही होगा। देश में मुस्लिम जनसंख्या पाकिस्तान के बराबर हो गई है। ऐसे में देखना होगा कि 2047 में बाह्य शक्तियों द्वारा प्रायोजित कहीं 1947 की पुनरावृत्ति न हो। लोकतंत्र में संख्या का महत्व है। यदि जनसंख्या असंतुलन इसी प्रकार बढ़ता रहा तो इसका चुनाव परिणामों पर गंभीर असर पड़ेगा।
स्वतंत्रता एवं अधिकारों की बड़ी गठरी लेकर चलने वाले लोकतांत्रिक समाज में जनसंख्या विस्फोट से अराजकता उत्पन्न हो सकती है। साथ ही भोजन, सुरक्षा, आवास, पेयजल, स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार आदि के लिए संघर्ष तेज हो सकता है। यहां तक कि शासन में सैन्य-हस्तक्षेप की आशंका भी बढ़ सकती है। आज भी अनेक अवसरों पर सरकार को कानून व्यवस्था बनाए रखने के लिए अर्धसैनिक बलों और कुछ स्थितियों में सैन्य बलों का प्रयोग करना ही पड़ता है। इस प्रवृत्ति पर विराम लगाना होगा। यदि हमें लोकतंत्र को बचाना है तो जनसंख्या नियंत्रण तो करना ही पड़ेगा।
बढ़ती जनसंख्या अहम मानव संसाधन भी है। इसमें 68 प्रतिशत युवाओं और 48.5 प्रतिशत महिलाओं की भागीदारी संकेत करती है कि यदि उनका सदुपयोग किया जाए तो देश विकास की अभूतपूर्व ऊंचाइयां छू सकता है। इसके लिए शिक्षा और स्वास्थ्य में निवेश बढ़ाना होगा। नई शिक्षा नीति का उद्देश्य अच्छा है, मगर उसे जिस ढंग से लागू किया गया, उसने अध्ययन-अध्यापन को प्रभावित किया है। अब शिक्षा व्यवस्था मात्र परीक्षा केंद्रित बनकर रह गई है। असंख्य स्व-वित्तपोषित उच्च शिक्षण संस्थाओं के भारी भ्रष्टाचार के कारण ‘बोगस’ संस्थानों से निकले छात्र श्रेष्ठ शिक्षण संस्थाओं के छात्रों से ज्यादा अंक प्राप्त कर आगे निकल रहे हैं। क्या यह सब सरकार के संज्ञान में नहीं? शिक्षा व्यवस्था देश को ऐसी फसल दे रही है, जिसका दुष्परिणाम भावी पीढ़ियों को भुगतना पड़ेगा। यही बात स्वास्थ्य क्षेत्र में लागू होती है। यद्यपि सरकार ने ‘आयुष्मान भारत’ योजना में 10 करोड़ परिवारों को पांच लाख का वार्षिक स्वास्थ्य बीमा उपलब्ध कराया है। वहीं, कृषि में रसायनों के अतिशय प्रयोग से हर घर में बीमारियों ने पैर पसार दिए हैं। शिक्षा एवं स्वास्थ्य में अमीर और गरीब के लिए समानांतर व्यवस्थाएं पनप गई हैं, जो समाज को वर्ग संघर्ष में धकेल कर लोकतंत्र के लिए खतरा बन सकती हैं।
बेतहाशा बढ़ती आबादी रोजगार के लिए भी चुनौती है। किसी पार्टी के पास सबको रोजगार देने का कोई कल्पवृक्ष नहीं। स्वरोजगार ही कारगर विकल्प है, जिस पर सरकार गंभीरता से काम कर रही है। इसके बावजूद समस्या गंभीर है। इस कारण बेरोजगार युवा सामाजिक शांति एवं सुरक्षा के लिए संकट बन सकते हैं। लोकतंत्र में सत्ता-परिवर्तन होता रहता है। परस्पर दोषारोपण के बजाय सभी राजनीतिक दलों को मिलकर इस समस्या का समाधान खोजना चाहिए। यदि युवाओं को सही दिशा नहीं मिली, तो वे टेक्नोलाजी का प्रयोग कर अपनी मेधा को समाज विरोधी कार्यों में लगा सकते हैं। युवाओं को भी इस समस्या का समाधान ढूंढ़ना है। यह केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं। चीन ने इसका समाधान स्वरोजगार में ही तलाशा, लेकिन हमें तो स्वरोजगार के वर्तमान प्रयोगों के अतिरिक्त अन्य विकल्पों जैसे ‘एक परिवार-एक रोजगार’, शिक्षित युवाओं को बेरोजगारी भत्ता आदि पर भी विचार करना पड़ेगा। केंद्र सरकार की लगभग 700 जिलों में ‘एक जिला-एक उत्पाद’ की अप्रत्याशित सफलता के बाद हरियाणा और उत्तर प्रदेश की ‘एक ब्लाक-एक उत्पाद’ जैसी योजनाओं को पूरे देश में लागू कर स्वरोजगार के नए-नए रास्ते खोजने होंगे।
बढ़ती आबादी का दंश सबसे ज्यादा गांवों, छोटे कस्बों-शहरों और बड़े नगरों में देखने को मिलेगा। वहां रिहायशी और व्यावसायिक क्षेत्र में अनधिकृत अतिक्रमण पैदल चलने वालों के साथ यातायात एवं परिवहन को अभी ही बुरी तरह प्रभावित कर रहा है। वहां आवास, बिजली, सड़क, हवा और पानी आदि पर समस्याएं उत्पन्न होंगी और संघर्ष बढ़ेंगे। उनसे निपटने के लिए स्थानीय सरकार को सक्रिय, सचेत एवं सशक्त करना होगा, ताकि लोक व्यवस्था दुरुस्त रहे और जनसंख्या विस्फोट लोकतांत्रिक व्यवस्था के चरमराने का कारण न बने।
Date:28-04-23
नए विषय पर बहस तेजसंपादकीय
समलैंगिक विवाह पर सर्वोच्च न्यायालय में सुनवाई सबकी जिज्ञासा का केंद्र बनती जा रही है, तो आश्चर्य नहीं। इस अधिकार के लिए प्रयासरत समूह अपनी दलील को अभी नहीं, तो कभी नहीं के अंदाज में आगे बढ़ा रहे हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने गुरुवार को गैर-विषमलैंगिक समूहों पर केंद्र सरकार की दलीलें सुनी हैं। सर्वोच्च न्यायालय में दायर 15 से ज्यादा याचिकाओं पर लगातार सुनवाई हो रही है और एक से बढ़कर एक पहलू सामने आ रहे हैं। वास्तव में, केंद्र सरकार ने शीर्ष अदालत से अनुरोध किया है कि समलैंगिक विवाह को कानूनी मंजूरी देने संबंधी विषय को संसद पर छोड़ दिया जाए। केंद्र की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने प्रधान न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ को दोटूक बताया है कि शीर्ष न्यायालय एक बहुत जटिल विषय को देख रहा है और इसके बहुत गहरे सामाजिक प्रभाव पड़ेंगे। ऐसे संबंधों को मान्यता देने की बात हो या इनके बीच विवाह को मंजूरी देने का सवाल, हर हाल में भारतीय समाज में बड़े-बड़े बदलावों की आशंका है। समाज का ढांचा भी बदलेगा और लोगों की सोच में भी व्यापक बदलाव आएंगे। परिवारों का रूप-स्वरूप बदल जाएगा, तो संबंधों की संज्ञाएं और परिभाषाएं भी बदलेंगी।
सरकार सर्वोच्च न्यायालय को यह बताने की कोशिश कर रही है कि ऐसे विवाह को मंजूरी देने के लिए अनेक कानूनों में बदलाव करने पड़ेंगे। एक अनुमान है कि ऐसे 150 से ज्यादा कानून या कानूनी पहलू होंगे, जिन पर इस मंजूरी का प्रभाव पड़ेगा। एक कानून बदल देने भर से ऐसे विवाह की राह आसान नहीं हो जाएगी। कई तरह के सवाल उठ रहे हैं कि ऐसे जोडे़ में पति कौन, पत्नी कौन कैसे तय होगा? पितृसत्तात्मक समाज का ढांचा भी शायद बदल जाएगा, क्योंकि जिन परिवारों में दो लड़कियों के बीच विवाह होगा, वहां पितृसत्ता का सवाल ही पैदा नहीं होगा। जो बच्चे होंगे या जो बच्चे गोद लिए जाएंगे, उनका पिता कौन होगा और माता कौन? भारत में सर्वोच्च न्यायालय ने जिस विस्तार से इस बहस को शुरू किया है, इसकी गूंज देर तक सुनाई पड़ेगी। यह बात भी उठ रही है कि ऐसी बहस अमेरिका में भी नहीं हुई है। कई लोगों को यह लग सकता है कि यह बहस गैर-जरूरी है, पर जब समाज में इस मोर्चे पर पीड़ितों या गुहार लगाने वालों की संख्या बढ़ रही है, तब उन्हें नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता।
हालांकि, यह ध्यान रखने की बात है कि केंद्र सरकार का रुख इस मामले में दायर याचिकाओं के प्रतिकूल ही है। केंद्र सरकार का रुख यह है कि सुप्रीम कोर्ट पहले तय करे कि क्या यह मामला उसके विचार के योग्य है? फिर भी सर्वोच्च न्यायालय सुनवाई करके ही किसी नतीजे पर पहुंचना चाहता है। यह मामला केवल बहुसंख्यकों के धर्म से जुड़ा हुआ नहीं है। इस्लामिक धार्मिक संस्था जमीयत-उलेमा-ए-हिंद द्वारा भी इसी तरह के विचार व्यक्त किए गए हैं, जिसमें कहा गया है कि समलैंगिक विवाह जैसी धारणाएं पश्चिमी संस्कृति से पैदा होती हैं, जिसके पास कट्टरपंथी नास्तिक विश्व दृष्टि है और इसे भारत पर थोपा नहीं जाना चाहिए। राष्ट्रीय बाल अधिकार संरक्षण आयोग ने एक अध्ययन पर भरोसा करते हुए समलैंगिक जोड़ों को गोद लेने के अधिकार देने का विरोध किया है। बार काउंसिल ऑफ इंडिया की भी मर्जी है कि यह मामला केंद्र सरकार पर छोड़ दिया जाए। बीच बहस में सबसे जरूरी है कि संभलकर कदम बढ़ाए जाएं।
Date:28-04-23
बराबरी की भागीदारी से ही टिकती है कोई शादीअर्चना दत्ता, ( पूर्व महानिदेशक, दूरदर्शन और आकाशवाणी )
पिछले दिनों एक खबर आई, जिसमें बताया गया कि अफ्रीकी देश मॉरिटानिया का समाज किस तरह से महिला के तलाक का जश्न मनाता है, कैसे उसका परिवार उसकी वापसी का स्वागत करता है और किस तरह वह एक नाकामयाब रिश्ते के कलंक से मुक्त नए जीवन की शुरुआत करती है। पूरे उत्तरी अफ्रीका और पश्चिम एशिया में यह चलन आम है। यहां महिलाओं की सुंदरता और चयन का अधिकार अमूमन बहु-विवाह के कारण बनते है। इस तरह की सोच दरअसल परिवार और विवाह से जुड़े विचारों में बदलाव का संकेत है, क्योंकि तलाक को लंबे समय से पितृसत्तात्मक व्यवस्था के लिए चुनौती माना जाता रहा है।
दुनिया के कई समाज अब भी इसी विश्वास में जीते हैं कि ‘शादियां स्वर्ग में तय होती हैं’। यह ऐसा पवित्र बंधन है, जिससे वर और वधू ही नहीं बंधते, बल्कि उनके परिवार भी जुड़ते हैं। इसे तोड़ना गलत है। भारत भी इसका अपवाद नहीं है। 2018 में 1.6 लाख परिवारों पर किए गए एक सर्वेक्षण से पता चला कि 93 फीसदी भारतीयों की शादी उनके माता-पिता ने तय की थी, जबकि ऐसी शादी का वैश्विक औसत करीब 55 फीसदी था। भारत में तलाक की सालाना दर भी कम थी। यहां हर 1,000 शादियों में 13 विवाह ही टूटते हैं, और यह भी अमूमन पुरुषों द्वारा किया जाता है, क्योंकि समाज महिलाओं को इस अधिकार के इस्तेमाल से रोकता है। चूंकि कार्यबल में औरतों की कम भागीदारी है, जिस कारण वे आर्थिक मामलों में पुरुषों पर निर्भर रहती हैं, इसलिए उन्हें नाकामयाब विवाह को निभाने के लिए मजबूर होना पड़ता है।
वैवाहिक वेबसाइटों से मिले आंकडे़ बताते हैं, विवाह के बाजार में भी महिलाओं के प्रति भेदभाव किया जाता है, और जो महिलाएं कामकाजी हैं, उन्हें पुरुषों द्वारा उन लड़कियों की तुलना में करीब 15 फीसद कम प्रतिक्रियाएं मिलती हैं, जो काम नहीं कर रही हैं। फिर भी, विवाह पैटर्न पर संयुक्त राष्ट्र की वैश्विक रिपोर्ट कहती है कि तलाक पाने या संबंध तोड़ने वाले वयस्कों (35-39 वर्ष के आयु-वर्ग में) का अनुपात दोगुना हुआ है। यह 1970 के दशक में दो फीसदी था, जो 2000 के दशक में बढ़कर चार फीसदी हो गया। हालांकि, 1995 से 2017 तक के ओईसीडी फैमिली डाटाबेस ने मिश्रित प्रवृत्ति का संकेत दिया है, क्योंकि उसके मुताबिक, 18 देशों में तलाक के मामले बढ़े हैं, तो 12 में कम हुए हैं।
क्या रिश्तों की यह टूटन महिलाओं और पुरुषों को अलग-अलग प्रभावित करती है? लॉन्गिट्यूडनल रिसर्च प्रोजेक्ट (1984-2015) ने आर्थिक, घरेलू, स्वास्थ्य, सामाजिक और जीवन के अन्य पहलुओं पर तलाक के असर का मूल्यांकन करने के लिए 18,030 विवाहित और 1,220 तलाकशुदा व्यक्तियों पर शोध किया। यह अध्ययन बताता है कि महिलाएं ही अमूमन तलाक के तनाव से जूझती हैं, क्योंकि उनके लिए परिवार की आमदनी घट जाती है, घर का मालिकाना हक खोने का खतरा बढ़ जाता है और दोबारा वैवाहिक जीवन जीने की संभावना भी कम होती है। इतना ही नहीं, एकल अभिभावक की जिम्मेदारी उन पर कहीं ज्यादा होती है, जबकि पुरुष ऐसे प्रभावों से क्षणिक जूझते हैं। स्पष्ट है, तलाक महिलाओं को कहीं ज्यादा प्रभावित करता है। हालांकि, जर्मनी जैसे कुछ देशों में औरतों को कुछ आर्थिक मदद दी जाती है, और अध्ययन यह भी बताते हैं कि तलाक के बाद पुरुषों का स्वास्थ्य तेजी से गिरता है और उनमें मौत की आशंका बढ़ जाती है।
यही कारण है कि यूएनवुमेन ने दुनिया के सभी देशों से परिवार-अनुकूल नीतियां लागू करने का आग्रह किया है। मॉरिटानिया में ही तलाक के बढ़ते मामलों के कारण ऐसे अभियान चलाए गए, जिनमें पारिवारिक सद्भाव व बच्चों के विकास पर जोर दिया गया। जाहिर है, परिवारों की भलाई के लिए विवाह संस्था को मजबूत बनाना पड़ेगा। इसके लिए, हमें विवाह के बुनियादी मूल्य, यानी समान भागीदारी पर जोर देना होगा, जिसके लिए कार्य-नीतियों और शिक्षा प्रणाली में सुधार आवश्यक है। साथ ही, हमें जीवन के हर क्षेत्र में भाग लेने के लिए महिलाओं के अधिकार का समर्थन करना होगा। इसके अनुरूप लक्ष्य बनाना ही कारगर साबित होगा।
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भारत में एनसीईआरटी के माध्यम से इतिहास के पाठ्यक्रम को लगातार बदला जा रहा है। स्कूलों में पढ़ाए जाने वाले इतिहास पर कड़वे मतभेद न तो नए हैं, और न ही भारत तक सीमित है। समय के साथ और विभिन्न सामाजिक आंदोलनों और राजनीतिक व्यवस्थाओं के साथ व्याख्याएं बदलती हैं।
अमेरिका में नस्लवाद थ्योरी विवाद के बाद से अलग-अलग राज्य जिम क्रो कानूनों और सिविल राइट्स मूवमेंट को अलग-अलग तरीके से पढ़ाते आ रहे हैं। ब्रिटेन में अभी भी इस बात को लेकर द्वंद है कि साम्राज्य के अत्याचारों को पाठ्यपुस्तकों में किस सीमा तक स्वीकार किया जाए।
हाल ही में उत्तर प्रदेश सरकार ने घोषणा की है कि वे यूपी बोर्ड की पढ़ाई, एनसीईआरटी के तर्कसंगत पाठ्यक्रम के अनुसार कराएंगे। इस तर्कसंगत पाठ्यक्रम में गुणवत्ता से समझौता किया जा रहा है। इतिहास से मुगल शासकों से संबोधित सामग्री को हटाया जा रहा है। गांधीजी की हत्या, आपातकाल से सत्ता के दुरूपयोग या 2002 के गुजरात दंगों के बाद आरएसएस पर प्रतिबंध लगाने जैसे विषयों को अपने तरीके से प्रस्तुत किया जा रहा है। इसके प्रति कोई जवाबदेही भी नहीं दिखाई जा रही है।
जब संशोधन इस प्रकार के हों कि हमारे समृद्ध इतिहास के तथ्यों को नए तथ्यों के साथ आसानी से बदला जा सके, तो यह एक प्रकार के खतरनाक चलन को जन्म देता है।
कुल मिलाकर, पाठ्यक्रम में किए जाने वाले परिवर्तन बहुत अच्छे नहीं कहे जा सकते हैं, क्योंकि भारत में पहले ही स्कूलों की शिक्षा के परिणाम कमजोर हैं। अतः सरकारों को पाठ्यक्रम में बदलाव इस दृष्टि से करना चाहिए कि वे भारत के करोड़ों बच्चों के भविष्य को मजबूती प्रदान कर सकें।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 6 अप्रैल, 2023
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Date:27-04-23
Promising BillRajasthan’s initiative on a gig workers’ welfare board heralds good tidings.Editorial
With an estimated eight million people employed in an industry built on the back of the smartphone revolution, “gig” work has become a major source of jobs for youth in India. It goes without saying that in a country where informal labour and unemployment have defined the nature of the jobs market in the last decade, the gig economy has been a beneficial outlet of employment. This is especially true of youth and migrant workers, as they seek a ready and quick means of securing finances and flexible hours — an option used by informal workers who have used gigs for moonlighting. With growing smartphone use and a reliance on apps for daily needs and purposes, the gig economy is only set to flourish in terms of usage and opportunities. Yet, increased competition among platforms and the availability of a cheap labour force have led to a lowering of incentives for gig workers even as their workload and uncertainty of work hours have increased significantly relative to pay, which has also become insufficient for many. Adding this to the fact that gig workers are not recognised as “workers” but partners by most aggregating platforms and that they lack any social security or related benefits due to them as “workers”, working conditions have become increasingly harsh in an industry that is no longer a fledgling one. This is now evident in growing flash strikes by gig workers.
Seen in this light, the decision by the Rajasthan government, to deliver a Rajasthan Platform-based Gig Workers (Registration and Welfare) Bill, 2023, should be welcomed, even if it will be introduced before the Assembly elections later this year. While the draft Bill envisages a “welfare board” that will design welfare policies and hear grievances of gig workers on a piece rate basis, the specificities of the policies and how they might benefit the workers are still un clear. The board is expected to work towards a social welfare corpus which will be financed by a cess on the digital transactions made by consumers on the platforms that utilise the gig worker labour. This schema is not unfamiliar — platform workers in the transport sector in Thailand and Malaysia, for instance, benefit from health and accident insurance as well as social security that is financed by a deduction of 2% for every ride. Recently, the Union government passed the Code on Social Security (one of four labour codes), which also allowed for some social security for gig workers, but the scheme only remains on paper without proper implementation. If Rajasthan’s pioneering draft Bill takes off, other States could be compelled to utilise similar measures to ensure the welfare of gig workers.
Date:27-04-23
नासूर बने नक्सलीसंपादकीय
नक्सलियों से बातचीत करके उन्हें सही राह पर लाने की कोशिश करना वक्त की बर्बादी है। दंतेवाड़ा की घटना यही स्पष्ट करती है कि नक्सली न केवल आंतरिक सुरक्षा के लिए चुनौती बने हुए हैं बल्कि उन तक अत्याधुनिक हथियार भी पहुंच रहे हैं। यह भी साफ है कि उनके दुस्साहस का दमन करने के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना शेष है। नक्सलियों की गतिविधियों के लिए कुख्यात छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा जिले में जिस तरह डिस्ट्रिक्ट रिजर्व फोर्स के एक वाहन को बारूदी सुरंग से उड़ा दिया गया और जिसके चलते 10 जवानों और एक वाहन चालक को अपनी जान गंवानी पड़ी, उससे यही पता चलता है कि नक्सली अब भी बेलगाम बने हुए हैं। यह घटना इसलिए अधिक चिंताजनक है, क्योंकि पिछले कुछ समय से एक तो नक्सलियों की सक्रियता कम होती दिख रही थी और दूसरे, ऐसे दावे भी किए जा रहे थे कि उनके दुस्साहस का दमन करने में सफलता मिली है। दंतेवाड़ा की घटना यही स्पष्ट करती है कि नक्सली न केवल आंतरिक सुरक्षा के लिए चुनौती बने हुए हैं, बल्कि उन तक अत्याधुनिक हथियार भी पहुंच रहे हैं। यह भी साफ है कि उनके दुस्साहस का दमन करने के लिए अभी बहुत कुछ किया जाना शेष है। यह शेष काम प्राथमिकता के आधार पर किया जाना चाहिए। इसमें केंद्र एवं राज्य सरकारों को हर स्तर पर सहयोग और समन्वय कायम करना चाहिए। इसी के साथ इस सवाल का जवाब भी खोजा जाना चाहिए कि नक्सली एक बार फिर वैसी ही घटना को अंजाम देने में कैसे सफल हो गए, जैसी वह इसके पहले भी कई बार कर चुके हैं?
आखिर यह कैसे संभव हो गया कि नक्सलियों ने दंतेवाड़ा जिले के अरनपुर थाने से महज दो किमी दूर एक सड़क पर बेहद शक्तिशाली बारूदी सुरंग लगा दी? यह तथ्य इसलिए और अधिक चिंता पैदा करने वाला है, क्योंकि जिस सड़क पर बारूदी सुरंग लगाई गई, वह कोई निर्जन रास्ता नहीं था। स्पष्ट है कि कहीं न कहीं सुरक्षा और चौकसी में चूक हुई। यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि अतीत में भी इस तरह की चूक से कई घटनाएं घट जाने के बाद भी जरूरी सबक नहीं सीखे जा रहे हैं। इसकी तह तक जाने की जरूरत है कि क्या नक्सल विरोधी अभियान के लिए तय किए गए सुरक्षा संबंधी मानकों का पालन किया गया? इसी तरह इस पुराने सवाल का जवाब भी खोजना होगा कि नक्सली हर तरह के घातक हथियार एवं विस्फोटक हासिल करने में कैसे समर्थ हैं और उन्हें स्थानीय स्तर पर समर्थन मिलने के कारण क्या हैं? इन कारणों का निवारण किए बगैर बात बनने वाली नहीं है। नक्सलियों के साथ उनके दबे-छिपे समर्थकों और उन्हें वैचारिक खुराक देने वालों के प्रति भी कठोरता का परिचय देना होगा। नक्सली इसलिए किसी नरमी के पात्र नहीं हो सकते, क्योंकि वे ऐसे घातक शत्रु हैं, जिनका उद्देश्य बंदूक के बल पर मनमानी करना है। वे नक्सलवादी विचारधारा की आड़ में लूट, हत्या और उगाही का धंधा करने वाले गिरोहों के अलावा और कुछ नहीं। उनसे बातचीत करके उन्हें सही राह पर लाने की कोशिश करना वक्त की बर्बादी ही है। अच्छा होगा कि केंद्र और राज्य सरकारें उनके संपूर्ण सफाए की कोई ठोस रणनीति बनाएं।
Date:27-04-23
माफिया और राजनीति की मिलीभगतप्रदीप सिंह, ( लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं वरिष्ठ स्तंभकार हैं )
भारतीय राजनीति में अपराध और राजनीति दूध और पानी की तरह घुल-मिल गए हैं। अपराधी साथ न हों तो नेता को लगता है कुछ कमी है। इसीलिए राजनीति में सबको चाहिए एक माफिया। माफिया वोट दिलाने वाला हो तो सोने पर सुहागा और ऊपर से मुसलमान हो तो फिर क्या ही कहना। उसे संरक्षण और प्रोत्साहन देकर मान लिया जाता है कि मुसलमानों के लिए जितना किया जा सकता है, कर दिया। संदेश दिया जाता है कि देखो तुम्हारे समाज के माफिया को भी हम गले लगाते हैं। अब वोट नहीं दोगे तो कब दोगे? ‘मर्ज बढ़ता गया, ज्यों ज्यों दवा की’ वाली कहावत यूं ही नहीं बनी। राजनीति के अपराधीकरण को रोकने की बातों के बीच बिहार सरकार ने जिला अधिकारी जी. कृष्णैया की हत्या में सजा काट रहे एक बाहुबली नेता आनंद मोहन सिंह को बाहर निकालने के लिए नियम ही बदल दिया। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इस पर ऐसे खुशी मना रहे हैं जैसे कोई बड़ी उपलब्धि हासिल कर ली हो। नीतीश राज में थोड़ी शराब पीने वाला जेल में रहेगा और हत्या की सजा भोग रहा अपराधी स्वतंत्र। जंगलराज ने आनंद मोहन और शहाबुद्दीन जैसे तमाम माफिया पैदा किए। अब सुशासन बाबू उन्हें महिमामंडित कर रहे हैं।
कानून के राज पर जब वोट बैंक भारी पड़ जाता है तो राजनीति के अपराधीकरण को कोई रोक नहीं सकता। माफिया और गुंडों को नेता अपनी सुरक्षा की सीपी में मोती की तरह पालता है। उसकी कीमत नेता ही समझता है। माफिया डान अतीक अहमद और उसका भाई मारा गया। समाज से अपराधियों की संख्या कम हुई, लेकिन जिन्होंने उसका इस्तेमाल किया, वे गमजदा हैं। कुछ ऐसे भी हैं जिन्हें लग रहा है कि मरा अतीक भी उन्हें वोट दिला सकता है। इसलिए वे तरह-तरह की बातों से उसका बचाव कर रहे हैं। वे दरअसल अतीक का नहीं, बल्कि अपने वोट बैंक का बचाव कर रहे। नेता की जान वोट बैंक नाम के तोते में बसती है। अब अतीक जैसों की सप्लाई कम हो रही है तो जेल से निकालकर लाया जा रहा है। ये माफिया बड़े जतन से तैयार किए जाते हैं। इन्हें कानून की नजर से बचाकर रखा जाता है। राजनीतिक संरक्षण से इनके आतंकी साम्राज्य को स्थापित किया जाता है। फिर एक समय आता है जब ये कानून से नहीं, बल्कि कानून इनसे डरता है। यह इनकी परम अवस्था होती है। इनको पालने वाला नेता निश्चिंत हो जाता है कि अब यह अपनी समानांतर सरकार चला सकता है। जरा कल्पना कीजिए उस व्यवस्था की, जिसमें पुलिस वाले गुंडे को सलामी देते हों और न्यायाधीश खौफ के मारे उसका मुकदमा सुनने से इनकार कर देते हैं।
माफिया के पनपने और उसके ताकतवर होने से ज्यादा चिंता की बात है उसके पैरोकारों की बढ़ती जमात। राजनीति के पतन का अनुमान लगाइए कि अतीक के मारे जाने पर उप्र के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव कहते हैं कि भाजपा सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ रही है। मतलब यह कि अतीक सांप्रदायिक सौहार्द का प्रतीक था। सवाल उठाए जा रहे हैं कि पुलिस सुरक्षा में मार दिया गया। इस देश में इससे ज्यादा कड़ी सुरक्षा में देश की प्रधानमंत्री की हत्या हो गई। देश के पूर्व प्रधानमंत्री और पंजाब के तत्कालीन मुख्यमंत्री की हत्या हो गई। पूर्व सेनाध्यक्ष एएस वैद्य की हत्या हो गई। यहां दो गुंडों के मारे जाने पर मातम मनाया जा रहा है, जिसके दो बेटे विभिन्न अपराधों के आरोप में अभी जेल में हैं और बीवी फरार है।
देश के दो राज्यों की स्थिति देखिए। उत्तर प्रदेश में जहां माफिया और गुंडे त्राहि-त्राहि कर रहे हैं तो बगल के बिहार में माफिया बम-बम है। यही अंतर है कानून के राज और जंगलराज में। बिहार का घटनाक्रम बता रहा है कि माफिया का राज आता है तो कानून का राज दुम दबाकर पिछले दरवाजे से निकल जाता है। वहीं, जब कानून अपने रौद्र रूप में आता है तो अपराधियों को छिपने के लिए पूरी धरती कम पड़ने लगती है। एक राज्य में पुलिस दौड़ा रही है और अपराधी भाग रहे हैं तो दूसरे में अपराधी के स्वागत में नेता पलक-पांवड़े बिछाए खड़े हैं। सवाल है कि दो राज्यों में इतना बड़ा अंतर क्यों है? इसी से समझ में आ सकता है कि राजनीति का अपराधीकरण रुक क्यों नहीं रहा? पहला प्रश्न है कि राजनीति के अपराधीकरण को रोकना कौन चाहता है, बल्कि ज्यादा सही सवाल यह होगा कि इसे रोकना कौन चाहेगा? वही रोकना चाहेगा जो माफिया को वोट बैंक के रूप में नहीं देखता, जो माफिया का आर्थिक साम्राज्य बनवाकर उसका दोहन नहीं करता। जो अवैध कब्जे, हत्या, लूट और दुष्कर्म के खिलाफ ‘जीरो टालरेंस’ की नीति पर चलने की इच्छाशक्ति रखता हो। उत्तर प्रदेश और बिहार में यही फर्क है। संगठित अपराध और अपराधियों के उन्मूलन की नेतृत्व के स्तर पर इच्छाशक्ति उत्तर प्रदेश सरकार में नजर आती है तो बिहार में इसका ठीक उलटा है। वहां अपराधी को गले लगाने की आतुरता दिखती है।
राजनीति के अपराधीकरण को रोकने और आरोपित नेताओं को जल्दी सजा दिलाने के लिए विशेष एमपी-एमएलए अदालतें बनीं, लेकिन बात आगे बढ़ नहीं रही। अब मांग की जा रही है कि अपराध साबित होने और सजा मिलने पर न केवल आजीवन चुनाव लड़ने पर रोक लगे, बल्कि चुनाव प्रचार या पार्टी पदाधिकारी बनने पर भी प्रतिबंध लगे। चुनाव सुधार और कानून में बदलाव की तत्काल और सख्त जरूरत है। यह उम्मीद छोड़ देनी चाहिए कि पार्टियां अपनी सामाजिक जिम्मेदारी समझेंगी और ऐसे लोगों से दूरी बनाकर रखेंगी, क्योंकि जाति और मजहब की राजनीति के साथ जाति और संप्रदाय के माफिया का लोभ नेताओं के लिए छोड़ना आसान नहीं है।
अतीक और उसके भाई का मामला ज्वलंत प्रमाण है कि देश का राजनीतिक जीवन कितना दूषित हो चुका है। एक माफिया के मारे जाने के बाद भी उसके समर्थन में जिस तरह के तर्क प्रस्तुत किए जा रहे हैं, वे किसी आपराधिक कृत्य से कम नहीं हैं। हाल में सुप्रीम कोर्ट ने प्रतिबंधित संगठनों से जुड़े अपने फैसले में कहा कि उनसे संबंध रखना भी अपराध की श्रेणी में आता है। ऐसे ही माफिया से संबंध रखने वाले नेताओं को सजा दिलाने के लिए जब तक कानून नहीं बनेगा, तब तक माफिया राज रुकने वाला नहीं है।
Date:27-04-23
नक्सली कहरसंपादकीय
छत्तीसगढ़ के दंतेवाड़ा में नक्सलियों के हमले में ग्यारह जवानों की शहादत से एक बार फिर यही जाहिर हुआ है कि राज्य में इस मसले के हल के लिए चलने वाली तमाम कवायदों के बावजूद हिंसक समूहों की मौजूदगी कायम है। नक्सली आज भी घात लगा कर इतना बड़ा नुकसान पहुंचाने में कामयाब हो जा रहे हैं। हालांकि ऐसी हर घटना के बाद सरकार और संबंधित महकमों की ओर से यही भरोसा दिया जाता है कि इसके जिम्मेदार लोगों को बख्शा नहीं जाएगा और नक्सलियों के खात्मे के लिए अभियान तेज किया जाएगा। मगर सवाल है कि हर कुछ समय बाद नक्सली समूह सुनियोजित हमले को अंजाम देकर बड़ा नुकसान कर देते हैं, उसमें जवानों की जान चली जाती है तो इसे किस तरह की सुरक्षा-व्यवस्था के तौर पर देखा जाएगा! गौरतलब है कि दंतेवाड़ा के एक इलाके में नक्सलियों की मौजूदगी की सूचना के बाद डीआरजी बल यानी डिस्ट्रिक रिजर्व गार्ड की एक टुकड़ी को वहां भेजा गया था। वापसी के क्रम में नक्सलियों ने अरनपुर मार्ग पर ‘इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस’ यानी आइईडी विस्फोट कर दिया, जिसमें डीआरजी के दस जवान और एक वाहन चालक की जान चली गई। इस हमले से साफ है कि डीआरजी जवानों के अभियान की जानकारी नक्सलियों को पहले लग गई थी और इसीलिए उन्होंने योजना बना कर यह हमला किया।
यह इस तरह की कोई पहली घटना नहीं है। ऐसे हमले के बाद सरकार और सुरक्षा बलों की सख्ती जब बढ़ती है तब ऐसे समूह कुछ वक्त तक शांत पड़ जाते हैं, लेकिन फिर मौका मिलते ही हिंसक हमले के जरिए अपनी मौजूदगी दर्ज कराने की कोशिश करते हैं। बुधवार को हुई घटना में जिस डीआरजी के जवानों की जान गई, वे छत्तीसगढ़ पुलिस के खास जवान हैं, जिन्हें केवल नक्सलियों से लड़ने के लिए भर्ती किया गया है। इस प्रशिक्षित समूह की विशेषता यह है कि इस समूह में आत्मसर्पण करने वाले और बस्तर के वातावरण में पले-बढ़े लोग शामिल होते हैं। ये लोग चूंकि जटिल जंगल और उसमें अपनी गतिविधियां संचालित करने वाले नक्सलियों के काम करने की प्रकृति को समझते हैं, इसलिए उनके जरिए कई मौकों पर अहम कामयाबी दर्ज की गई है। शायद यही वजह है कि डीआरजी के जवान खासतौर पर नक्सलियों के निशाने पर थे। हालांकि इस तरह के हमलों में कई मौकों पर सीआरपीएफ के जवानों पर भी घातक हमले किए गए हैं।
विचित्र यह है कि इस तरह की हिंसा के सहारे व्यापक राजनीतिक मुद्दों का हल खोजने का दावा करने के बावजूद नक्सली समूह अपने लक्षित तबकों के बीच भी किसी ठोस हल का रास्ता नहीं दर्शा पाए हैं। दूसरी ओर, इन नक्सलियों के घातक हमलों से निपटने के लिए सरकार की ओर से अब तक जितनी भी कोशिशें और नीतिगत पहलकदमी हुई, उनका असर सिर्फ तात्कालिक महत्त्व के रूप में ही दर्ज किया जा सका। आखिर यह कैसे संभव हुआ कि दंतेवाड़ा जैसी संवेदनशील जगह में सुरक्षा बलों की टीम किसी अभियान पर गई और उसकी पूरी खबर नक्सलियों को लग गई? जाहिर है, हिंसा को ही अपना राजनीतिक हथियार मानने वाले नक्सली समूहों के खिलाफ सुरक्षा के प्रत्यक्ष मोर्चों के साथ-साथ एक मजबूत और सुगठित खुफिया तंत्र वक्त की जरूरत है। लेकिन इस पहलू पर भी शायद ठोस और रणनीतिक तरीके से काम करने की जरूरत है कि बेहद मुश्किल भौगोलिक क्षेत्र के रूप में जंगल में अपनी गतिविधियां संचालित करने वाले नक्सलियों के बरक्स प्रभावित इलाकों में अभावों और मुश्किल में जीवन गुजारते आम लोगों के भीतर सरकार और प्रशासन के प्रति भरोसा पैदा किया जाए, ताकि जरूरत पड़ने पर वे नक्सलियों से निपटने में एक अहम सहयोगी की भूमिका निभा सकें।
Date:27-04-23
कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर नियंत्रण से ही आम लोगों को फायदाप्रांजल शर्मा, ( डिजिटल नीति विशेषज्ञ )
जिस तरह से अंतरिक्ष की दौड़ में दुनिया मसरूफ है, कृत्रिम बुद्धिमत्ता, यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) को विकसित करने को लेकर भी वह उसी तरह व्यस्त है। अमेरिका और चीन में तमाम कंपनियां नए प्रकार के एआई उपकरणों और प्लेटफॉर्म में निवेश कर रही हैं, जो व्यापार, सरकार व समाज की मदद कर सकते हैं। हालांकि, कई बड़े उद्योगपति और तकनीकीविद् इससे भयभीत भी हैं। एलन मस्क सहित 1,000 से अधिक ऐसे लोगों ने उन्नत एआई उपकरणों को विकसित न करने की गुजारिश की है। अपने ‘खुले खत’ में उन्होंने चेताया है कि ये ‘समाज और मानवता के लिए बड़ा खतरा’ बन सकते हैं। जाहिर है, जेनरेटिव आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की यह नई लहर रोमांचक तो है, लेकिन समाज के लिए चुनौती भी पैदा कर सकती है।
चैटजीपीटी इसी जेनरेटिव एआई का उदाहरण है। यह इंसानों की तरह हरेक प्रश्न के उत्तर दे सकता है। इसका इस्तेमाल मुद्दों का आकलन करने और विश्लेषण में भी किया जा सकता है। इतना ही नहीं, यह इंसानों जैसे तर्क का इस्तेमाल करके जवाब भी दे सकता है। जैसे, यह न्यायालय के आदेश का अध्ययन करके प्रश्नों के उत्तर दे सकता है। यह बीमा पॉलिसी के दावे को भी पढ़ सकता है और बता सकता है कि दावे का भुगतान किया जाना चाहिए अथवा नहीं? इसी कारण जेनरेटिव एआई से कई उद्योगों के प्रभावित होने की बात भी कही जा रही है। मुमकिन है, यह मौजूदा विज्ञापनों का विश्लेषण करके नए विज्ञापन बनाए, जिससे कंपनियों के लिए नए दर्शकों तक पहुंचना आसान हो सकता है। यह नए आइडिया और विचार पैदा कर सकता है, जिनका इस्तेमाल करके कलाकारों और डिजाइनरों को नए काम में मदद मिल सकती है। मनोरंजन के क्षेत्र में ही यह नए वीडियो गेम, फिल्म और टीवी शो बना सकता है, जिससे कंटेंट क्रिएटर्स को नए दर्शक मिल सकते हैं। कानूनी मामलों में ही यह डाटा का विश्लेषण कर सकता है और उसका इंसानों की तरह विश्लेषण कर सकता है। डाटा को चार्ट और ग्राफ में बदलने में भी यह सक्षम हो सकता है।
ऐसे में, एआई समर्थक यह स्वाभाविक कहते हैं कि इसे इंसानी कामों के लिए बतौर सहायक इस्तेमाल किया जाना चाहिए। जैसे, एक वकील तमाम फैसलों को पढ़ने या केस फाइल करने संबंधी विश्लेषण के लिए चैटजीपीटी की मदद ले सकता है। मगर, डर यह भी है कि इसका इस्तेमाल गलत कामों में हो सकता है। कुछ स्कूलों ने अपने विद्यार्थियों के लिए चैटजीपीटी का उपयोग प्रतिबंधित कर दिया है, क्योंकि वे इसके माध्यम से लेख नकल कर रहे थे। इतना ही नहीं, चिंता यह भी है कि लोगों के बीच गलत सूचनाओं को फैलाने में इसका इस्तेमाल किया जा सकता है। चूंकि चैटजीपीटी मानव व्यवहार की नकल कर सकता है, इसलिए यह फर्जी सूचनाएं गढ़ सकता है और साइबर सुरक्षा के लिए जोखिम पैदा कर सकता है। जरा सोचिए कि तब ‘फिशिंग’ हमले (जिसमें लोगों को ठगने के लिए फर्जी लिंक वाले ई-मेल आदि भेजे जाते हैं) कितनी मजबूती से किए जाएंगे। डाटा लीक भी इससे जुड़ा एक बड़ा खतरा है। हाल ही में, सैमसंग के कुछ कर्मचारियों ने विश्लेषण के लिए कुछ संवेदनशील जानकारियां चैटजीपीटी में दर्ज की, लेकिन ये लीक हो गईं, क्योंकि डाटा का इस्तेमाल चैटजीपीटी खुद सीखने के लिए करता है।
चैटजीपीटी का दुरुपयोग न हो, यह सुनिश्चित करने के लिए विशेषज्ञ सरकारी नियमन की मांग कर रहे हैं। अमेरिकी सरकार ने इससे जुड़ी सामाजिक चुनौतियों से निपटने की तैयारी कर ली है। भारत भी एआई के इस्तेमाल को बढ़ावा दे रहा है। खबर है कि नई संसद ‘डिजिटल’ होगी, जिसमें एआई पर आधारित ‘स्पीच टु टेक्स्ट इंजन’ संसदीय कार्यवाही के दौरान तुरंत अनुवाद कर देगा। ऐसे में, यह सुनिश्चित करने के लिए नियम बनाने की मांग हो रही है कि लोग एआई और चैटजीपीटी से गुमराह न हों। बेशक, एआई की राह रोकना सही नहीं होगा, लेकिन सरकार, नियामक संस्थाओं और कंपनियों को उन प्रौद्योगिकियों से समाज की सुरक्षा के उपाय जरूर करने चाहिए, जिनको नियंत्रित करना और समझना फिलहाल मुश्किल है।
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भारत में राजद्रोह कानून की शुरूआत औपनिवेशिक काल में हुई थी। भारतीय दंड सहिता 1860 के कानून में धारा 124ए के तहत इसे जोड़ा गया था। इस धारा को उपनिवेश विरोधी आवाजों के विरूद्ध उपयोग में लाया जाता था।
हाल ही में पाकिस्तान ने इस कानून को समाप्त कर दिया है। 156 साल से जीवित इस कानून का उपयोग अलग-अलग सरकारों ने विपक्ष, पत्रकारों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और यहाँ तक कि छात्र प्रदर्शनकारियों सहित आलोचकों को डराने और चुप कराने के लिए किया है।
ज्ञातव्य हो कि अक्टूबर, 2022 में उच्चतम न्यायालय ने केंद्र को इस धारा के तहत कोई भी नई प्राथमिकी दर्ज नहीं करने और कानून की समीक्षा करने के लिए अतिरिक्त समय दिया था।
पाकिस्तान ने इस कानून को खत्म करके प्रगतिशील कदम उठाया है। भारत में भी इसे जल्द-से-जल्द खत्म किया जाना चाहिए।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 01 अप्रैल, 2023
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Date:26-04-23
बोस के एक सदी से भी पुराने शोध की पुष्टि हुईसंपादकीय
इजराइल के वैज्ञानिकों की टीम पेड़-पौधों की खुशी और दर्द में निकली आवाजों को सुनने में सफल हुई है। यह शोध भारतीय नोबेल पुरस्कार विजेता जगदीशचंद्र बेस के 105 वर्ष पुराने और दुनिया को चौकाने वाले शोध की तस्दीक है, जिसमें वनस्पतियों में वेदना होने की बात कही गई थी। कष्ट में प्लांट्स से निकली आवाजें हवा में संदेश के रूप में है शीर्षक इस नए शोध को कित शोध-पत्रिका सेल ने छाप है। नए शोध में टमाटर और तम्बाकू के पौधों के पास अल्ट्रासोनिक यंत्र रखकर पाया गया कि पौधे पानी के अभाव में और अस्ति होने पर एक घंटे में कई दर्जन बार 20 से 100 किलो की क्वेंसी पर आवाज करते हैं, जिन्हें मनुष्य तो नहीं पर जानवर और पास के अन्य पौधे 10 से 16 फीट तक की दूरी से सुन लेते हैं। जानवर उसी अनुसार तय करता है कि इस प्लांट पर अंडे है या यह अब कमजोर हो गया है। इन पौधों की रिकॉर्डिंग साउंड-प्रूफ चैम्बर में भी की गई और कोलाहल भरे ग्रीनहाउस चैम्बर में भी शांत व खुशी के क्षणों में ये पौधे हर घंटे एक या दो आवाज करते हैं और (फूलों के तोड़ने से आहत भी नहीं होते, लेकिन आस्त अशांत प्यासे होने पर बार-बार संदेश देते हैं। बेस और बाद के शोध में प्लांट्स में कम्पन का पता तो चला था, लेकिन ध्वनि वाला यह शोध बिलकुल नया है और अगर इन साउंड के पैटर्न का पूरा अध्ययन हो सकेगा तो मानव और पौधों के बीच संवाद भी सम्भव है। बहरहाल इस क्रांतिकारी शोध से आने वाले दिनों में किसानों को पौधों को कब पानी देना है या कौन कीड़ा पते खा रहा है आदि बताया जा सकेगा। जगदीशचंद्र बोस ने सन् 1918 में ही बता दिया था सभी प्लांट्स अपने वातावरण के प्रति संवेदनशील होते हैं।
Date:26-04-23
राज्यों का विकाससंपादकीय
केरल की यात्रा पर गए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के इस कथन से शायद ही कोई असहमत हो सके कि जब देश के सभी राज्य तेजी से विकास करेंगे, तभी देश उन्नति करेगा। यह अच्छी बात है कि पिछले कुछ समय से विभिन्न राज्य सरकारें विकास के मामले में एक-दूसरे से प्रतिस्पर्धा कर रही हैं और अपने यहां अधिक से अधिक निवेश लाने और उद्योग-धंधों को स्थापित करने पर बल दे रही हैं। यह सिलसिला कायम रहना चाहिए। इससे अच्छा और कुछ नहीं कि विभिन्न राज्य विकास के मामले में एक-दूसरे से होड़ करें, लेकिन इस होड़ को बढ़ावा देने के साथ केंद्र सरकार को यह भी देखना चाहिए कि कोई भी राज्य विकास के मोर्चे पर सुस्ती का शिकार न होने पाए, क्योंकि देश को आर्थिक और सामाजिक रूप से सबल बनाने का लक्ष्य तभी पूरा हो सकता है, जब विकास के मामले में पीछे छूट गए राज्य भी तेजी के साथ तरक्की करें। इसी कारण केंद्र सरकार उन राज्यों पर विशेष ध्यान दे रही है, जो अन्य राज्यों की तुलना में अपेक्षित गति से आगे नहीं बढ़ सके हैं।
इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि प्रधानमंत्री अनेक अवसरों पर यह कह चुके हैं कि देश का पूर्वी हिस्सा आर्थिक रूप से उतना सशक्त नहीं, जितना अन्य हिस्से हैं। केंद्र सरकार ने अपने स्तर पर इसके लिए जतन भी किए हैं कि बंगाल, बिहार, ओडिशा, झारखंड आदि के साथ पूर्वोत्तर क्षेत्र के राज्य विकास के मामले में अन्य राज्यों के समकक्ष खड़े हों। इसके कुछ सकारात्मक परिणाम भी सामने आए हैं, लेकिन इसी के साथ यह चिंताजनक है कि कई राज्य आमदनी की तुलना में खर्च अधिक कर रहे हैं। इसके चलते उनका घाटा बढ़ता जा रहा है। यह शुभ संकेत नहीं। न तो आर्थिक नियमों की अनदेखी की जानी चाहिए और न ही वित्तीय अनुशासन की। दुर्भाग्य से ऐसा हो रहा है और वह भी तब, जब नीति आयोग के साथ रिजर्व बैंक रह-रहकर यह रेखांकित करता रहता है कि गैर जरूरी खर्चे कई राज्यों की आर्थिक सेहत बिगाड़ रहे हैं। इसके बाद भी ऐसे राज्य चेतने से इनकार कर रहे हैं। इससे भी अधिक चिंता की बात यह है कि वे लोकलुभावन नीतियों को अपना रहे हैं। इसी कारण पिछले कुछ समय से रेवड़ी संस्कृति की चर्चा हो रही है। विडंबना यह है कि कई राज्य सरकारें रेवड़ी संस्कृति की पैरवी करने में लगी हुई हैं। रिजर्व बैंक का कहना है कि किसी भी राज्य का कर्ज उसकी जीडीपी के 30 प्रतिशत से अधिक नहीं होना चाहिए, लेकिन कई राज्य ऐसे हैं, जो इस लक्ष्मण रेखा की परवाह नहीं कर रहे हैं। कुछ राज्य तो ऐसे हैं, जो अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा ब्याज चुकाने में खर्च कर रहे हैं। यह और कुछ नहीं आमदनी अठन्नी और खर्चा रुपैया वाली कहावत को चरितार्थ करना है।
Date:26-04-23
चीन से चौकन्ना रहने का समयहर्ष वी.पंत, ( लेखक आब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में अध्ययन एवं विदेश नीति प्रभाग के उपाध्यक्ष हैं )
चीन सीमा से सटे गांवों में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए भारत ने प्रयास तेज कर दिए हैं। इसके अंतर्गत ‘वाइब्रेंट विलेजेस प्रोग्राम’ जैसी महत्वाकांक्षी घोषणा की गई है। इसमें चीन से लगी 3,400 किमी की सीमा पर लगभग 3,000 गांव चिह्नित किए गए हैं, जहां आधारभूत सुविधाओं को बेहतर बनाया जाएगा। इन सीमावर्ती गांवों में सड़क निर्माण के लिए ही 2,500 करोड़ रुपये का आवंटन हुआ है। अरुणाचल प्रदेश में पनबिजली परियोजनाओं के मोर्चे पर भी गति बढ़ाई जा रही है। भारत-तिब्बत सीमा पुलिसकर्मियों के लिए सुविधाओं को बेहतर बनाया जा रहा है। दूरसंचार कंपनियों से कहा गया है कि वे अरुणाचल के उस तवांग जिले में मोबाइल कनेक्टिविटी को सुधारें, जहां गत वर्ष दिसंबर में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच झड़प हुई थी। सीमा पर बुनियादी ढांचे से जुड़ी यह व्यापक योजना चीन द्वारा अरुणाचल के कुछ हिस्सों का नाम बदलने के बीच शुरू हुई है। चीन इन गांवों को तिब्बत का हिस्सा बताता आया है। सरकार द्वारा इन क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे को बेहतर बनाने का उद्देश्य यहां जीवन की गुणवत्ता बेहतर बनाना है, ताकि स्थानीय निवासी वहां रहने के लिए प्रेरित हों और आजीविका की राह में दूसरे शहरों की ओर पलायन न करें। इस प्रकार यह पूरी कवायद सीमावर्ती सुरक्षा को चुस्त-दुरुस्त बनाने पर केंद्रित है।
सीमावर्ती क्षेत्रों में अवसंरचना बनाकर और सैन्य-नागरिक जुगलबंदी से स्थलीय एवं सामुद्रिक सीमा का अतिक्रमण करना चीनी तिकड़म का एक प्रमुख हिस्सा रहा है। इस साल चीन ने तिब्बत और शिनजियांग को जोड़ने वाली नई रेलवे लाइन बिछाने का एलान किया है। यह रेल लाइन वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी एलएसी के बहुत करीब और उस अक्साइ चिन से होकर गुजरेगी, जिस पर भारत का दावा है कि चीन ने उसे जबरन कब्जाया हुआ है। इसी प्रकार 2021 में घोषित परिवहन योजना के अनुसार चीन अपनी मुख्य भूमि को ताइवान से जोड़ने के लिए एक एक्सप्रेस-वे और सुपरफास्ट रेल मार्ग तैयार कर रहा है। ये कुछ ऐसी मिसालें हैं, जो यथास्थिति को बदलने की चीनी मंशा प्रकट करती हैं। जबसे चीन ने अपनी सेना का आधुनिकीकरण आरंभ किया है तब से दक्षिण चीन सागर में उसके अतिक्रमण एवं कब्जे की घटनाएं बढ़ी हैं। इसके बाद वह सैन्य ठिकाने और अन्य अवसंरचना खड़ी करता है। मछली पकड़ने वाले अपने जहाजों की सुरक्षा की आड़ में चीन ने स्कारबोरो शोल का प्रभावी नियंत्रण अपने हाथ में ले लिया है, जिस पर फिलीपींस का दावा है। सोवियत संघ के पतन से चीन ने एक सबक यह सीखा कि उसे अपने आंतरिक इलाकों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी। तिब्बत पर कब्जे के 70 साल बाद भी वह न तो दलाई लामा का आध्यात्मिक प्रभाव और न ही भारत एवं तिब्बत के बीच सांस्कृतिक संबंधों को खत्म कर पाया है। यह चीन के लिए बड़ी चिंता का विषय है। इसी कारण चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग द्वारा तिब्बत सीमा की सुरक्षा की आवश्यकता को रेखांकित करने के बाद खबरें आईं कि तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र में गांव बसाकर वहां चीन के प्रति वफादार लोग बसाए जा रहे हैं। चीनी सरकारी मीडिया द्वारा इसे शिनजियांग स्वायत्त क्षेत्र बताना भी यही दर्शाता है कि स्थानीय आबादी को ‘चीनी रंग’ में रंगने को लेकर शासन की व्यग्रता कितनी बढ़ती जा रही है।
उल्लेखनीय है कि चीन ने पिछले वर्ष भूमि सीमा कानून बनाया है। यह कानून चीनी सेना और चीन के सशस्त्र पुलिस बल को सीमा की सुरक्षा बनाए रखने की जिम्मेदारी सौंपता है। इस कानून के अनुसार नागरिक सीमावर्ती अवसंरचना की सुरक्षा के दायित्व से बंधे हैं। इसमें सीमा पर बुनियादी ढांचे को उन्नत करना और लोगों की नए सिरे से बसावट पर भी जोर है। इसमें राजनीतिक शिक्षा की जरूरत भी जताई गई है, ताकि लोगों में चीनी राष्ट्र के प्रति जुड़ाव का सामुदायिक भाव मजबूत हो। हाल में ऐसे संकेत भी मिले कि अरुणाचल से सटे क्षेत्रों में चीनी सेना सैन्य शिक्षा को बढ़ावा दे रही है। इस उपक्रम में ऐसी रणनीति बनाई जा रही है, जो चीन के साम्राज्यवादी राजवंशों और आधुनिक साम्यवादी तानाशाहों के बीच कड़ियां जोड़ती है। साम्राज्यवादी चीन में ऐसा किसान-सैनिक गठजोड़ बना था, जिसमें वफादार सैनिकों को धन के बदले जमीन दी जा जाती और जब भी राज्य को उनकी सेवाओं की जरूरत पड़ती तो उन्हें वापस मोर्चे पर बुला लिया जाता था।
करीब तीन साल पहले सीमा पर चीन के साथ छिड़ा गतिरोध वार्ताओं के तमाम दौर गुजरने के बाद भी हल होने का नाम नहीं ले रहा। हालांकि, कुछ क्षेत्रों में तनातनी आंशिक रूप से घटी है, लेकिन कुछ सीमावर्ती गांवों के नाम बदलकर चीन ने अरुणाचल में नया मोर्चा खोल दिया है। सीमावर्ती गांवों से जुड़ी नई योजना के माध्यम से यही लगता है कि भारत सरकार सीमा पर चीनी षड्यंत्रों से निपटने को लेकर चौकन्नी है। इस योजना का खाका पेश करते समय गृहमंत्री अमित शाह ने दोटूक कहा कि देश की एक इंच भूमि पर कब्जा नहीं होने दिया जाएगा। यह अतीत में भारत के उस रुख के सर्वथा विपरीत है कि ‘चीन ने जो जमीन कब्जाई है, वहां तो घास का एक तिनका भी नहीं उगता।’ यह चीनी चुनौती से निपटने की राह में भारत के नए आत्मविश्वास को दर्शाता है। स्पष्ट है कि देश की क्षेत्रीय अखंडता के मामले में सरकार कोई कोताही नहीं बरत रही और न कोई समझौता करने को तैयार है। यही कारण है कि चीन और पाकिस्तान द्वारा दबाव और आलोचना के बावजूद जम्मू-कश्मीर के विशेष दर्जे को खत्म करने के रुख पर भारत सरकार अडिग रही। पिछले महीने ही अरुणाचल में जी-20 से जुड़ी एक बैठक आयोजित हुई तो मई में एक बैठक श्रीनगर में प्रस्तावित है। वैसे, चीन जैसे प्रपंच दुनिया के लिए नए नहीं हैं। 1990 के खाड़ी युद्ध से पहले इराक ने एक आधिकारिक नक्शा प्रकाशित कर उसमें कुवैत को अपना हिस्सा दिखाया था, जिसे दुनिया ने अनदेखा कर दिया। इसलिए यह कहना गलत नहीं होगा कि अपनी स्वतंत्रता के लिए निरंतर चौकसी आवश्यक है। इसलिए हमें नक्शों से जुड़ी चीनी सनक को गंभीरता से लेते हुए उसका समय से करारा जवाब देना होगा।
Date:26-04-23
प्लास्टिक पर प्रतिबंध में नाकामीसंपादकीय
एक बार इस्तेमाल होने वाले (सिंगल यूज) प्लास्टिक उत्पादों पर प्रतिबंध लगाए जाने के तकरीबन 10 महीने बाद भी देश के अधिकांश हिस्सों में उनका इस्तेमाल आम है। हालांकि इनका थोक इस्तेमाल करने वाले कुछ कारोबारियों ने जैविक रूप से अपघटन योग्य विकल्प अपना लिए हैं लेकिन अधिकांश अन्य उत्पादक, विक्रेता और उपभोक्ता अभी भी पहले की तरह बदस्तूर ऐसे प्लास्टिक का प्रयोग कर रहे हैं। ज्यादा चिंता की बात यह है कि त्यागे गए प्लास्टिक उत्पादों के संग्रह और सुरक्षित निपटारे के क्षेत्र में भी कोई खास सुधार देखने को नहीं मिला है। ऐसे में सार्वजनिक प्रदूषण की समस्या और बढ़ी है। सिंगल यूज प्लास्टिक न केवल सड़कों पर बिखरे रहते हैं बल्कि कचरा फेंकने की जगहों पर भी इन्हें बड़ी तादाद में देखा जा सकता है। इसके अलावा अब यह प्लास्टिक नदियों और समुद्र के रूप में हमारे जल स्रोतों में भी मिलने लगा है। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) ने हाल ही में कहा था कि अभी भी अर्थव्यवस्था के निचले दायरे में निपटान योग्य प्लास्टिक की सामग्री, खासतौर पर पतले कैरी बैग का इस्तेमाल बदस्तूर जारी है। केरल में 23 मार्च से 4 अप्रैल तक प्लास्टिकरोधी अभियान चलाया गया और इस दौरान 25 टन निषिद्ध प्लास्टिक जब्त किया गया। राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में भी हालात बहुत बेहतर नहीं हैं। वहां 100 दिन के प्लास्टिक रोधी अभियान का समापन 22 अप्रैल को हुआ और इस अवधि में 14,000 किलो निषिद्ध प्लास्टिक की सामग्री जब्त की गई। देश के सभी महानगरों में दिल्ली सबसे अधिक प्लास्टिक कचरा उत्पादित करने वाला राज्य है।
प्लास्टिक प्रदूषण की समस्या के मूल में प्लास्टिक कचरा प्रबंधन नियमों के कमजोर प्रवर्तन को जिम्मेदार माना जा सकता है। केंद्र सरकार ने ऐसे प्लास्टिक उत्पादों के इस्तेमाल पर प्रतिबंध लगाया जो सीमित उपयोग के थे लेकिन जो बहुत अधिक कचरा करते थे। परंतु इसके प्रवर्तन का काम राज्यों और उनके प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को सौंपा गया था जिन्होंने अपनी जिम्मेदारी निभाने में ढिलाई बरती। पूरा दोष केंद्र सरकार पर भी नहीं डाला जा सकता है। उसने विभिन्न समूहों के दबाव को नकारते हुए प्रतिबंध लगाकर जहां उल्लेखनीय प्रतिबद्धता का प्रदर्शन किया, खासकर प्लास्टिक स्ट्रॉ के थोक उपभोक्ताओं की इस मांग को नामंजूर कर दिया जो कह रहे थे कि उन्हें उचित विकल्प अपनाने के लिए और अधिक समय दिया जाए लेकिन वह बाद में जरूरी कदम उठाने में नाकाम रही। इसके अलावा वह प्लास्टिक कचरा प्रबंधन का प्रभावी ढांचा तैयार करने की प्रक्रिया में राज्यों को साथ लेकर चलने में भी नाकाम रही है। हालांकि स्थानीय सरकार ने 2019 में ही प्लास्टिक कचरा प्रबंधन के नियम बना दिए थे लेकिन अभी इन्हें औपचारिक रूप से अधिसूचित किया जाना बाकी है। कई अन्य राज्यों में प्लास्टिक कचरा प्रबंधन के मानक केवल कागज पर हैं। यही वजह है कि अधिकांश निषिद्ध और जैविक रूप से अपघटित न होने वाला कचरा घरेलू कचरे में मिल जाता है और वर्षों तक वातावरण में बना रहता है। उसके जलने से जहरीला धुआं निकलता है। इसका बड़ा हिस्सा नदियों और समुद्र में मिल जाता है जो जलीय जैव विविधता को नुकसान पहुंचाता है।
प्लास्टिक उत्पादों पर प्रतिबंध लगाने में नाकामी की एक अन्य प्रमुख वजह है, उनके सस्ते विकल्पों का पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध नहीं हो पाना। इस दिशा में शोध करने में ज्यादा निवेश नहीं किया गया है। सरकार ने भी इस काम के लिए कोई वित्तीय या अन्य प्रोत्साहन नहीं मुहैया कराया। जरूरत इस बात की है कि इस समस्या को समग्रता में निपटाने के लिए बहुमुखी रणनीति अपनाई जाए। ऐसे में उत्पादन से लेकर ऐसे प्लास्टिक की बरामदगी, पुनर्चक्रण और निस्तारण तक को ध्यान में रखना होगा। इस दिशा में छिटपुट उपाय काम नहीं आएंगे।
Date:26-04-23
ऑपरेशन कावेरीसंपादकीय
अफ्रीका के तीसरे सबसे बड़े देश सुडान में पिछले दस दिनों से जारी हिंसा और उथल-पुथल में सैकड़ो लोग मारे गए और हजारों घायल हो गए हैं। अन्य देशों की तरह भारत मे भी सुझन में फंसे अपने नागरिकों को स्वदेश वापस लाने के लिए ‘ऑपरेशन कावेरी शुरू किया है। ईद के अवसर पर युद्ध विराम लागू होने के बाद भारत ने अपने रेस्क्यू अभियान तेज कर दिया है। ऑपरेशन कावेरी के तहत आईएनएस सुमेधा 278 लोगों को लोकन पोर्ट सुडान से जेद्दा के लिए रवाना हो गया है जेद्दा में और सऊदी अरब में भारतीय वायुसेना के दो विमान इन भारतीयों को रेस्क्यू करने के लिए तैनात हैं। सूडान और आसपास के क्षेत्रों में करीब चार हजार भारतीय नागरिक हैं। पिछले कुछ वर्षों के दौरान पश्चिम एशिया और अफ्रीकी देशों के साथ भारत के राजनयिक संबंध काफी मजबूत हुए हैं। राजनयिक कुशलता की घर भी पैनी हुई है जिसके चलते आंतरिक या बा संकटों के कारण मुसीबत में फंसे देशों से अपने नागरिकों को सुरक्षित स्वदेश लाने में भारत को सफलता मिली है। अभी पिछले वर्ष यूक्रेन में फंसे भारतीय छात्रों को नई दिल्ली रेस्क्यू किया गया था सूडान पूर्वी अफ्रीका का सबसे बड़ा देश है। बताया जा रहा है कि वर्तमान में सोना के खानों पर कब्जा करने के लिए अर्द्धसैनिक बल और सेना के बीच लड़ाई चल रही है। अप्रैल 2019 में एक लोकप्रिय आंदोलन के बाद क्रूर तानाशाह ओमर अल बशीर को सत्ता से हटना पड़ा था। अंतरिम लोकतांत्रिक सरकार का अंतरराष्ट्रीय बिरादरी ने स्वागत किया था, लेकिन सेना का नेतृत्व करने वाले जनरल अब्देल फतेह बुरहान और अर्द्धसैनिक बल रैपिड सपोर्ट फोर्स का नेतृत्व करने वाले मोहम्मद हमदान दगालों के बीच सत्ता संघर्ष से देश में लोकतंत्र की स्थापना की मांग करने वाले लोगों की उम्मीदों को गहरा झटका लगा है। यही वजह है कि 2019 के बाद से सूान राजनीतिक अस्थिरता, संघर्ष और हिंसा के दौर से गुजर रहा है। वर्तमान समय में देश की राजधानी खार्तुम संघर्ष का केंद्र बना हुआ है। पूरा शहर वीरान है लाखों लोग घरों में अपने को बंद कर लिये है। हालांकि सऊदी अरब और अमेरिका द्वारा मध्यस्थता करने के सकारात्मक परिणाम आए हैं। दोनों युद्धरत पक्षों ने 72 घंटे के संघर्ष विराम पर सहमति दी है। संघर्ष और तनाव के बीच संयुक्त राष्ट्र के महासचिव एंतोनियो गुटेरेश की ओर से तनाव में कमी और लड़ाई रोकने की कोशिशें की जा रही हैं।
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भारत के कार्यबल में महिलाओं की घटती भागीदारी के बारे में कहा जा रहा है (विशेषकर बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे छोटे देशों की तुलना में)। आंकड़ों की सच्चाई कुछ और ही बताती है –
सच्चाई यह है कि भारत में 25.30 आयुवर्ग के युवा, बड़ी संख्या में उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे है। इनमें महिलाओं की संख्या अधिक है। इनमें से अधिकांश के कार्यबल में शामिल होने की संभावना है। श्रीलंका और बांग्लादेश के आंकड़ों में 35 वर्ष के आसपास की महिलाओं के आँकड़े लिए गए हैं। इससे अंतर स्पष्ट हो जाता है।
भारत में बढ़ते शिक्षा के प्रसार के बाद अब महिला श्रम भागीदारी की संभावना और भी अच्छी है। हमारे नीति निर्माताओं, अंतरराष्ट्रीय संगठनों को इसे स्वीकार करके पहचानना शुरू करना चाहिए। इसके बाद स्थिति में बदलाव साफ दिखाई देगा।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित सुरजीत एस भल्ला और तीर्थतनमय रॉय के लेख पर आधारित। 31 मार्च, 2023
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Date:25-04-23
Invest By Keeping an Eye Out For Our IITsET Editorials
All is not well with India’s elite higher education institutions. High dropout rates, allegations of discrimination and harassment, even cases of student suicides are a concern. Which is why the central decision-making body of the Indian Institutes of Technology (IITs), the IIT Council, deciding to focus on these issues is a welcome step. Fixing IITs to enable its students to perform at their best is an investment in India’s future.
Pressure to keep up with performance, intense competition, debts — including of the non-tuition kind — has led to many cases of stress and dropouts among students. Competition has intensified, be it in admission (there are now 23 IITs), getting high-paying good jobs or opportunities abroad, despite more opportunities. Costs have risen, even as scholarships and fellowships have increased. But so have aspirations, resulting in an explosion of non-tuition debt. The increased diversity in the student population, a positive development, means informal support systems of the past that relied on social networks of a largely homogenous student body are no longer fit for purpose. The decision to increase counselling and guidance for students is a wise move.
Then there is the inability of students to keep up with the academic load. Dropout rates are particularly high among students from reserved categories. In 2021, about 63% of undergraduate dropouts in the last five years at the top seven IITs were from reserved categories. This does not mean students from general categories do not drop out. What it shows is a school education system that does not equip students properly for the next level. Allowing students to drop out and return, providing them the required assistance, will help improve the health of the IITs.
Date:25-04-23
The many benefits of marriage equalitySame-sex marriage equality will enable the LGBTQ+ community’s sense of belonging and will help them gain the acceptance they are seeking in societyRadhika Piramal, [ Vice Chairperson and Executive Director of VIP Industries Ltd. ]
Last week, the Supreme Court started hearing petitions from lesbian, gay, bisexual, transgender and queer (LGBTQ+) petitioners seeking same-sex marriage equality. The hearings were widely covered by the media in India because the issue of marriage equality for LGBTQ+ persons is sometimes seen as controversial.
I am a happily married lesbian who chose to legally marry my same-sex partner in the U.K. in 2011 because I did not have the right to marry her in India, even though the institution of marriage is of fundamental importance to Indian society. In India, getting married is one of the highlights of becoming an adult. Remaining single and not being married is frowned upon by the entire family as married couples are generally seen as more accepted and respectable than a non-married couple in our traditional culture.
Therefore, excluding LGBTQ+ persons from marriage excludes us from the full benefits of participating in family and community life. It excludes us from acceptance in society. Why is there opposition to two LGBTQ+ persons taking vows in front of family, friends, colleagues, and the community? Why can we not be recognised as spouses under the law?
Distortion of the union
A common reason given is that marriage is defined as a union between a man and a woman only, so to allow LGBTQ+ persons to marry would somehow distort this union. But I don’t see how some LGBTQ+ citizens getting married takes anything away from the millions of marriages of heterosexual couples.
We know by now that same-sex attraction is a natural part of human society, not any crime or illness. The fact is that some people of the same sex fall in love with each other and want to get married. We want to make life-long promises to each other, gain respect and recognition of our families and community, and join the families of our partners as a son-in-law or a daughter-in-law.
LGBTQ+ marriage takes nothing away from those “straight” couples who already enjoy marriage equality, yet it means everything to the lives of those LGBTQ+ couples seeking this fundamental right.
Marriage benefits a couple in tangible and intangible ways. Many people may not appreciate these until they get married. Tangible benefits include the ability to open joint bank accounts, jointly buy or rent a property, jointly own and share financial assets, be recognised as a relative under the Indian Income Tax Act, access a spouse’s health and life insurance, and inherit a spouse’s assets if one partner dies. These are essential protections which most heterosexual couples take for granted, but they are denied to members of the LGBTQ+ community.
Intangible benefits include gaining legitimacy, respect and affection from society and being able to participate fully in all family events. Marriage equality enhances family bonds and encourages unity.
Others may wonder, if Indian society is ready for this change? Public opinion has changed considerably in the private sector over the last five years. Human resource (HR) practices of leading companies have progressed a long way since the Supreme Court de-criminalised homosexual acts by striking down Section 377 of the Indian Penal Code (IPC) in 2018.
Protecting employees
Efforts to improve diversity and inclusion in the Indian workplace have gathered momentum. Many corporations have applied core HR principles of fairness, equality and non-discrimination to their LGBTQ+ employees and have re-written their equal opportunity and anti-discrimination policies to explicitly protect LGBTQ+ employees from discrimination, bullying and harassment. Some companies extend benefits such as spouse health insurance to same-sex partners of their employees. However, these policies have been challenging to implement with insurance companies as same-sex partners are not legally recognised as spouses.
These inclusive and fair policies have not led to negative consequences or backlash from the majority workforce. In fact, it has been the opposite — inclusive policies which encourage a diverse workforce have resulted in more loyalty and engagement as employees feel they can be their authentic selves at work and still fully belong to their organisation, a feeling they may not get at home.
It is now time for this sense of belonging to be felt at home too, which starts with belonging to the family and being allowed to marry. LGBTQ+ citizens deserve the right to participate in one of society’s major institutions. We deserve to be treated equally under the law in our country.
Being allowed to marry will enable our sense of belonging and will help to gain the acceptance we are seeking in society.
Date:25-04-23
सामूहिक प्रयासों से दूर हो सकता है अकेलापनसंपादकीय
आईटी हब बेंगलुरु के एक प्रोफेशनल ने लिखा कि 58 लाख रुपए के पैकेज के बावजूद वह अकेलेपन का शिकार है। तीन दशक पहले रॉबर्ट पुटनम ने अपनी पुस्तक ‘बोलिंग अलोन’ में लिखा था कि नए दौर में ‘सामाजिक पूँजी (सोशल कैपिटल) खत्म हो रही है, जिससे व्यक्ति बड़ी आय के बावजूद आत्मिक सुख से वंचित और जीवन से उदास है। सोशल कैपिटल वह अदृश्य पूंजी है, जो परिजनों, मित्रों, रिश्तेदारों, औपचारिक और अनौपचारिक संस्थाओं और राज्य अभिकरणों पर व्यक्ति के भरोसे की मात्रा से तय होती है। व्यक्ति की आय से मिलने वाली खुशी क्षणिक और सीमित होती है, लेकिन आत्मसंतोष के लिए सामाजिक पूंजी की जरूरत होती है। चूंकि रॉबर्ट पुटनम एकेडेमिक दुनिया से नहीं थे, लिहाजा समाजशास्त्रियों ने आदतन इस व्यापक शोध को खारिज कर दिया, लेकिन बाद के दिनों में न केवल समृद्ध पश्चिमी दुनिया बल्कि उसी मॉडल पर आगे बढ़ते भारत और चीन में भी आज यह स्थिति महामारी बन चुकी है। हाल के दिनों में अमेरिकी सरकार ने इस स्थिति का संज्ञान लेते हुए सोशल कैपिटल बढ़ाने के लिए दर्जनों मेगा प्रोजेक्ट्स शुरू किए हैं। भारत में भी अगर इसे सरकार और सामाजिक स्तर पर नहीं शुरू किया गया तो इसके व्यक्तिगत और सामाजिक-मनोवैज्ञानिक कुप्रभाव होंगे, जिसका सीधा असर आर्थिक विकास पर पड़ेगा। जैसे पिछले तीन दशकों में जीडीपी बढ़ती गई, लेकिन मानव विकास सूचकांक वहीं का वहीं रहा, कुछ वैसी ही स्थिति चमकते कॉर्पोरेट वर्ल्ड में काम कर रहे युवाओं की भी है। सोशल कैपिटल तत्काल बढ़ाना जरूरी है।
Date:25-04-23
बदलता हुआ मौसम किसानो – मजदूरों के लिए अशुभ संकेतवरुण गांधी, ( सांसद, पीलीभीत, उत्तर प्रदेश )
पिछले साल अप्रैल-मई के बीच 35 करोड़ भारतीयों को अप्रत्याशित गर्मी झेलनी पड़ी थी। इनमें 25.4 करोड़ तो लगातार 300 घंटे यानी तकरीबन 12 दिन से अधिक समय तक इस झुलस की चपेट में रहे। 1990 से 2019 के बीच पंजाब, हरियाणा, यूपी, बिहार, राजस्थान के ज्यादातर जिलों में पारे में औसतन 0.5-0.9 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि हुई। इस दौरान देश के 54 फीसद जिलों में सर्दियों के तापमान में भी इसी तरह की वृद्धि देखी गई। 2021 से आगे 2050 तक उम्मीद है कि कम से कम 100 जिलों में दो से 3.5 डिग्री तक और 455 जिलों में 1.5 से दो डिग्री तक तापमान बढ़ जाएगा। इसी तरह 485 जिलों में सर्दियों के पारे में भी 1-1.5 डिग्री के बीच बढ़त अनुमानित है।
शहरी तापमान में इस तरह की तेज वृद्धि अस्वाभाविक और दुर्लभ है। ऐसा बीते 300 वर्षों में तो कम से कम नहीं ही देखा गया है। जाहिर तौर पर जलवायु परिवर्तन के साथ स्थानीय मौसम का मन-मिजाज बिगड़ रहा है और हम अप्रैल-मई के तापमान को हर तीन साल में रिकॉर्ड ऊंचाई तक पहुंचने की आशंका को सच होता देख रहे हैं। ऐसे में अर्थव्यवस्था का 40 फीसद और उसके कार्यबल के 75 फीसद को निकट भविष्य में अत्यधिक तापमान के बीच कार्य करना होगा। आईएमडी के अनुसार शहरी तापमान लगातार बढ़ रहा है और मार्च 2022 पिछले 122 सालों में सबसे गर्म रहा है। हमारे शहर अर्बन हीट आइलैंड इफेक्ट से घिरे हैं, जिससे वहां बाहरी ग्रामीण इलाकों के मुकाबले तापमान 4-12 डिग्री ज्यादा रहता है। इस बीच आर्द्रता ने भी तापमान को बढ़ाया है। हाल में उत्तरी भारत में मौसम में महत्वपूर्ण परिवर्तन नजर आया है। जनवरी में ठंड के बाद फरवरी और मार्च की शुरुआत में गर्मी के साथ बीते कुछ हफ्तों में ओलावृष्टि और भारी बारिश इस परिवर्तन को जाहिर करते हैं।
सर्दी का मौसम छोटा होने और अधिकतम तापमान बढ़ने से पारिस्थितिकी संतुलन के साथ पौधों की वृद्धि भी प्रभावित होगी। इसे एक उदाहरण से भी समझ सकते हैं। भारत का 90 फीसद जीरा उत्पादन गुजरात व राजस्थान में होता है। मौसम के हालिया परिवर्तन का नतीजा यह है कि राजस्थान में ज्यादातर जीरे की फसल नष्ट हो गई है। ऐसी ही दुर्दशा सरसों, इसबगोल और अरंडी के साथ भी देखी जा रही है। कृषि फसल के नुकसान से आगे तापमान का यह परिवर्तन हमें सूखे और उच्च मृत्यु दर की ओर भी ले जा रहा है। 1899 में भारत में औसत बारिश 45 इंच होती थी। आज वर्षा के दीर्घकालिक औसत से 11 इंच की कमी हम देख रहे हैं। अप्रत्याशित रूप से चढ़े पारे से बारिश की कमी और अकाल का खतरा बढ़ा है। इस कारण 4,76,000 वर्ग मील क्षेत्र प्रभावित हुआ और इससे तकरीबन 10 से 45 लाख भारतीयों की मृत्यु हुई है।
1899 में भारतीय अकाल आयोग ने इस पर प्रकाश डाला कि उस वर्ष मौसम के परिवर्तन का एक बड़ा नतीजा अकाल था। बढ़ते तापमान ने शहरों में जीवन को तेजी के साथ मुश्किल बना दिया है। भारत में भारी काम करने वाले मजदूरों को प्रचंड गर्मी के कारण पहले से ही प्रतिवर्ष 162 घंटे का नुकसान उठाना पड़ता है। बेतहाशा गर्मी के कारण दिन में छाया में भी काम करने में श्रमिकों के प्रतिघंटे काम के समय में 15-20 मिनट की उत्पादकता में कमी दर्ज की गई है। जाहिर है कि तापमान में वृद्धि के कई तरह के प्रभाव पड़ते हैं और यह श्रम उत्पादकता को तो सीधे तौर पर प्रभावित करता है। एक अनुमान के मुताबिक बदली हुई स्थिति में भारत के 50 फीसद कार्यबल को उनके काम के घंटों के दौरान गर्मी का असर उठाना पड़ सकता है। इस कार्यबल में खेतों में मेहनत करने वाले सीमांत किसान, निर्माण स्थलों पर काम करने वाले मजदूर और सड़कों पर उपज बेचने वाले रेहड़ी-पटरी वाले शामिल हैं। गैरस्थायी तौर पर दिहाड़ी कमाने वाले भी इससे प्रभावित होंगे। आदर्श रूप से प्रत्येक शहरी नागरिक के लिए उसके परिवेश में कम से कम सात पेड़ होने चाहिए, पर ऐसा है नहीं।
Date:25-04-23
नए युग में प्रवेश करता अंतरिक्ष क्षेत्रडा. सुरजीत सिंह, ( लेखक अर्थशास्त्र के प्रोफेसर हैं )
पिछले दिनों केंद्रीय मंत्रिमंडल ने भारतीय अंतरिक्ष नीति, 2023 को मंजूरी प्रदान की। इसके अनुसार अंतरिक्ष अनुसंधान एवं निर्माण संबंधी कार्य भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) द्वारा संचालित किए जाएंगे। साथ ही अंतरिक्ष उत्पाद एवं सेवा संबंधी गतिविधियां जैसे उपग्रह निर्माण तथा उपग्रह प्रक्षेपण आदि कार्यों के लिए निजी क्षेत्र को बढ़ावा दिया जाएगा। यानी विकसित देशों की तरह अब भारत का निजी क्षेत्र भी न सिर्फ उपग्रह निर्माण में सहयोग करेगा, बल्कि अपने निजी प्रक्षेपण स्टेशन भी विकसित कर सकेगा। वर्ष 2020 में ही सरकार ने उपग्रहों की स्थापना और संचालन के क्षेत्र में 100 प्रतिशत एफडीआइ की अनुमति निजी क्षेत्र को दी थी, जिसके परिणामस्वरूप विगत तीन वर्षों में देश में लगभग 150 स्टार्टअप्स की वृद्वि हुई है। अब इस क्षेत्र को निजी निवेशकों के लिए और अधिक आकर्षक बनाने की पहल नई अंतरिक्ष नीति में की गई है। इसके लिए विभागवार बिजनेस माडल विकसित किए गए हैं, जो उपग्रह निर्माण, राकेट एवं प्रक्षेपण स्टेशन बनाना, डाटा संग्रह और प्रसार आदि कार्यों को संचालित करेंगे। इससे न सिर्फ इस क्षेत्र में नए बुनियादी ढांचे के निर्माण को प्रोत्साहन मिलेगा, बल्कि अनुसंधान, शिक्षा, स्टार्टअप और उद्योगों को भी बढ़ावा मिलेगा। जाहिर है तेजी से चमक बिखेरता अंतरिक्ष विज्ञान भारतीय अर्थव्यवस्था में नया अध्याय लिखने के लिए तैयार है, जो अंतरिक्ष अर्थशास्त्र के विकास को एक नई उड़ान प्रदान करेगा।
वैश्विक अंतरिक्ष बाजार में अभी भारत का योगदान चार प्रतिशत से भी कम है, जिसे बढ़ाकर 10 प्रतिशत करने में यह नीति एक मील का पत्थर साबित होगी। स्वदेशी उपग्रह के निर्माण और उपग्रह प्रक्षेपण की कम तुलनात्मक लागत के कारण वैश्विक स्तर पर भारत तेजी से आगे बढ़ रहा है। 2017 में इसरो ने कीर्तिमान स्थापित करते हुए 104 उपग्रहों को एक साथ अंतरिक्ष की कक्षा में स्थापित किया था, जिसमें 101 स्वदेशी उपग्रह थे। इस उपलब्धि के कारण भारत उपग्रहों के प्रक्षेपण करने वाले पसंदीदा देश के रूप में उभरा है। संयुक्त राष्ट्र कार्यालय के अनुसार 2010 तक हर साल करीब 60 से 100 सेटेलाइट लांच किए जाते थे। हाल के वर्षों में इसमें तेजी आई है। वर्ष 2020 में 1,283 उपग्रह लांच किए गए। कुछ दशक पहले वैश्विक अंतरिक्ष क्षेत्र में कुछ ही देशों का वर्चस्व था। भारतीय विज्ञानियों की मेहनत एवं दूरदर्शिता का ही परिणाम है कि इस मोर्चे पर भारत अब विकसित देशों के साथ खड़ा है। इंडियन स्पेस एसोसिएशन के अनुसार वर्ष 2020 में भारत का अंतरिक्ष बाजार 9.6 अरब डालर था, जो सरकार एवं निजी सहभागिता से 2025 तक बढ़कर 13 अरब डालर हो जाएगा। वैश्विक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था 2020 में 450 अरब डालर की थी, जो 2025 तक बढ़कर 600 अरब डालर होने की संभावना है।
अंतरिक्ष विज्ञान के क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर भारत की साख बढ़ने का प्रमुख कारण यह है कि पिछले एक दशक में इस क्षेत्र में विकास के अनेक नए आयाम स्थापित किए गए हैं। आज वैश्विक स्तर पर इसरो छठी सबसे बड़ी अंतरिक्ष एजेंसी के रूप में स्थापित हो चुका है। 2014 में भारत विश्व में पहली बार में ही सफलतापूर्वक मंगल पर पहुंचने वाला देश बन चुका है। 2017 में 100 से अधिक उपग्रह भेजने वाला विश्व का पहला देश बन चुका है। हाल में इसरो ने रियूजेबल लांच व्हीकल (आरएलवी) के प्रक्षेपण में बड़ी सफलता हासिल की है। यह उपग्रह को अंतरिक्ष में स्थापित कर वापस लौट आएगा, जिससे न सिर्फ इसकी लागत में कमी आएगी, बल्कि मानव को अंतरिक्ष में घुमाने में भी इसका प्रयोग किया जा सकेगा। 2024 तक अंतरिक्ष में मानव एवं रोबोट को भेजने की योजना है। देश की खगोलीय क्षमता को बढ़ाने के लिए महाराष्ट्र के हिंगोली में लीगो (लेजर इंटरफेरोमीटर ग्रेविटेशनल-वेव आब्जर्वेटरी) की स्थापना की मंजूरी दी गई है। यह वेधशाला 2030 तक तैयार हो जाएगी।
अंतरिक्ष क्षेत्र के विस्तार ने भारत के आर्थिक जीवन की दशा एवं दिशा, दोनों में बदलाव ला दिया है। बदलते समय के साथ अंतरिक्ष क्षमताएं आधुनिक समाज की जरूरत बनती जा रही हैं। विभिन्न उद्देश्यों वाले उपग्रहों के प्रक्षेपण से मीडिया, इंटरनेट एवं 5जी, विमानन, रक्षा, रिटेल, एयरोस्पेस आदि क्षेत्रों में तेजी से बदलाव आ रहे हैं। मौसम की भविष्यवाणी, मत्स्य पालन, शहरी प्रबंधन, जंगलों के संसाधनों का मानचित्रण, कृषि उपज, भूजल और जल संग्रहण क्षेत्र के विश्लेषण में अंतरिक्ष विज्ञान महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (जीपीएस) कवरेज के बढ़ने से सामाजिक समस्याओं का प्रबंधन आसान हुआ है। भारतीय क्षेत्रीय नेविगेशन सेटेलाइट सिस्टम द्वारा अब भारत अपने पड़ोसी क्षेत्रों में सटीक सेवाएं प्रदान कर रहा है। अंतरिक्ष विज्ञान की मदद से सामाजिक एवं आर्थिक लाभ के साथ-साथ पड़ोसी देशों से अच्छे संबंध स्थापित करने में भी मदद मिलती है। साथ ही राष्ट्र के व्यापार संतुलन पर भी सकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
कुल मिलाकर वर्तमान वैश्विक परिस्थितियों और पड़ोसी देशों चीन एवं पाकिस्तान के साथ घटते विश्वास में भारतीय अंतरिक्ष नीति, 2023 एक मील का पत्थर साबित होगी। इस क्षेत्र में व्यावसायीकरण के नियमों पर बल देते हुए देशहित को ही सर्वोपरि महत्व देना होगा। नए युग में प्रवेश कर रहे भारत के अंतरिक्ष क्षेत्र के वाणिज्यिक उपयोग से अंतरिक्ष अर्थशास्त्र को बढ़ावा मिलेगा, जिससे न सिर्फ भारत की वैश्विक आर्थिक हिस्सेदारी बढ़ेगी, बल्कि यह देश के आर्थिक विकास के महत्वपूर्ण प्रवर्तक के रूप में भी उभरेगी।
Date:25-04-23
सरकार को लोगों के करीब लाने की दरकारअजय छिब्बर, ( लेखक इक्रियर में सीनियर विजिटिंग प्रोफेसर हैं और जॉर्ज वाशिंगटन यूनिवर्सिटी के इंस्टीट्यूट फॉर इंटरनैशनल इकनॉमिक पॉलिसी में विजिटिंग स्कॉलर हैं )
भारत अगले 25 वर्षों में विकसित अर्थव्यवस्था बनने की तैयारी कर रहा है, इस दिशा में बड़ी छलांग लगाने के लिए एक महत्त्वपूर्ण पहलू यह है कि सरकार को स्थानीय स्तर पर शासन कार्यों का हस्तांतरण करना होगा। विकसित अर्थव्यवस्थाओं की एक विशेषता यह होती है कि इसमें स्थानीय शासन के स्तर पर राजस्व और जिम्मेदारियों का भारी आवंटन किया जाता है।
इनमें प्राथमिक शिक्षा, स्वास्थ्य देखभाल, बुनियादी कानून व्यवस्था और नागरिक बुनियादी ढांचा जैसे कि नाले, जल आपूर्ति, सड़क का रखरखाव और स्थानीय स्तर पर जोन तैयार करना और नियमन आदि शामिल हैं। 16 वें वित्त आयोग का गठन किया जा रहा है और इसका उपयोग इस बदलाव के लिए एक योजना तैयार करने के लिए किया जा सकता है। निश्चित रूप से इस कदम की मदद से संविधान के 73 वें और 74 वें संशोधनों को भी मजबूती से लागू किया जा सकता है, जिसका उद्देश्य स्थानीय शासन को सशक्त बनाना था।
भारत की राज्य और स्थानीय स्तर पर खर्च की हिस्सेदारी, कुल खर्च के 60 प्रतिशत पर है जो विकास के स्तर पर काफी अधिक है। 14 वें वित्त आयोग ने संसाधनों के विभाज्य पूल हिस्से का लगभग 10 प्रतिशत राज्य के स्तर पर अंतरित कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप इसकी कुल हिस्सेदारी 42 प्रतिशत हो गई। 15 वें वित्त आयोग ने मूल रूप से विभाज्य पूल हिस्सेदारी बनाए रखी थी लेकिन जम्मू-कश्मीर के केंद्र शासित प्रदेश बनने पर इसके लिए भी प्रावधान करना था इसलिए इसने 1 प्रतिशत वापस रखा और राज्यों के लिए 41 प्रतिशत छोड़ दिया।
नतीजतन, राज्य और स्थानीय स्तर पर किया जाने वाला खर्च जो 2013-14 में लगभग 50 प्रतिशत था, वह बढ़कर कुल सरकारी खर्च का लगभग 60 प्रतिशत हो गया। हालांकि अन्य बड़े संघीय व्यवस्था वाले देश कम खर्च करते हैं। ब्राजील राज्य और स्थानीय स्तर पर लगभग 50 प्रतिशत, जर्मनी 46 प्रतिशत, अमेरिका लगभग 40 प्रतिशत और इंडोनेशिया लगभग 35 प्रतिशत खर्च करता है। केवल कनाडा और चीन ही इन स्तरों पर करीब 70 प्रतिशत से अधिक खर्च करते हैं। दुनिया भर में राज्य और स्थानीय स्तर के खर्च को देखें तो इसमें भारत की हिस्सेदारी अधिक है।
14वें वित्त आयोग ने केंद्र से राज्यों को शक्ति स्थानांतरित करने की पहल की लेकिन इससे कोई मदद नहीं मिली। लखनऊ, पटना, या मुंबई में खर्च करने के लिए अधिक पैसा उपलब्ध होने से वास्तव में इन राज्यों के लोगों को मदद नहीं मिलती है अगर यह सरकार से स्थानीय स्तर तक नहीं पहुंचता है। केंद्र से राज्यों को शक्ति हस्तांतरण का प्रस्ताव लगभग एक दशक पहले 14 वें आयोग ने दिया था और से 15 वें वित्त आयोग ने इसे स्वीकार भी कर लिया था तो अब केंद्र से राज्यों को सत्ता हस्तांतरण करने की प्रक्रिया बदली नहीं जा सकती है क्योंकि अब बहुत देर हो चुकी है।
सत्ता के वास्तविक हस्तांतरण के लिए, अब पूरा ध्यान पंचायतों और महापौरों जैसे स्थानीय संस्थानों को अधिक संसाधन मुहैया कराने के तरीके सुनिश्चित करने पर होना चाहिए जैसा कि 13 वें वित्त आयोग के अध्यक्ष विजय केलकर ने 2019 में सुखमय चक्रवर्ती व्याख्यान में भी कहा था। इसके बिना, राष्ट्रीय शिक्षा नीति, स्वच्छ भारत, स्मार्ट सिटी जैसी भारत की कई महत्त्वाकांक्षी योजनाएं कागज पर महज एक भव्य डिजाइन की तरह बनी रहेंगी, लेकिन उनके क्रियान्वयन में बाधा आती रहेगी।
उदाहरण के तौर पर स्थानीय स्कूलों में शिक्षकों की भर्ती और उनकी निगरानी के लिए अधिक अधिकार मिले बिना, शिक्षकों की अनुपस्थिति की समस्या का समाधान नहीं निकाला जा सकता है, भले ही हम अपनी शिक्षा नीति और पाठ्यक्रम का कितना ही आधुनिकीकरण क्यों न कर लें। इसी तरह, कई स्मार्ट सिटी परियोजनाएं शहर के महापौरों की अक्षमता से बाधित हो रही हैं क्योंकि वे योजना में अपना योगदान देने में सक्षम नहीं हैं।
बेहतर क्रियान्वयन के अलावा, सरकारी कर्मचारियों, शिक्षकों और स्वास्थ्य कर्मचारियों की भर्ती करने की लागत भी घट जाती है यदि भर्ती, राज्य स्तर की तुलना में स्थानीय प्रशासन के स्तर पर की जाती है। इसके अलावा एक ही समय में सेवाएं देने की लागत में सुधार होने के साथ ही इसे अधिक प्रभावी और निगरानी योग्य बनाया जा सकता है।
आगे भारत को स्थानीय शासन की हिस्सेदारी पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए जो बहुत कम है। भारत का स्थानीय सरकारी खर्च, कुल सरकारी खर्च के 4 प्रतिशत से भी कम है। यह हिस्सा अधिकांश विकसित अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में बहुत कम है लेकिन यह चीन जैसी केंद्रीकृत सत्ता वाली सरकार की तुलना में भी बहुत कम है, जहां स्थानीय सरकारी खर्च, सरकार द्वारा किए जाने वाले कुल खर्च के 50 प्रतिशत से अधिक है।
हालांकि चीन इसमें सबसे अलग है लेकिन अधिकांश विकसित अर्थव्यवस्थाओं में यह हिस्सेदारी भारत की तुलना में बहुत अधिक है। यूरोपीय संघ के 28 देश स्थानीय स्तर पर 23.2 प्रतिशत खर्च करते हैं जबकि कनाडा 21 प्रतिशत और अमेरिका 29 प्रतिशत खर्च करता है। लैटिन अमेरिका में स्थानीय शासन का खर्च लगभग 12.7 प्रतिशत है और अधिकांश विश्लेषकों का मानना है कि यह बहुत अधिक होना चाहिए।
यदि भारत को 2047 तक एक विकसित अर्थव्यवस्था बनने की दिशा में अपना रास्ता तैयार करना है तो उसे राज्य-स्तरीय खर्च को स्थानीय सरकारों तक अधिक हस्तांतरण के लिए एक योजना तैयार करनी होगी और अधिक मात्रा में स्थानीय सरकारी राजस्व जुटाने के मौके तैयार करने होंगे।
स्थानीय शासन को भी अपने संसाधन जुटाने की अनुमति दी जानी चाहिए। ऐसा करने का सबसे अच्छा तरीका संपत्ति करों और उपयोगकर्ता शुल्क में वृद्धि की अनुमति देना है। भारत में संपत्ति कर की दर बहुत कम है जो इसके कुल कर राजस्व का लगभग 0.5 प्रतिशत है और सकल घरेलू उत्पाद के महज 0.1 प्रतिशत से थोड़ा अधिक है।
OECD देश औसतन, संपत्ति कर के तहत कुल कर राजस्व का लगभग 5.6 प्रतिशत (सकल घरेलू उत्पाद का लगभग 1.9 प्रतिशत) ही संग्रह कर पाते हैं, वहीं दक्षिण कोरिया 15.1 प्रतिशत और अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा उच्चतम स्तर पर 11-12 प्रतिशत से अधिक संपत्ति कर संग्रह करते हैं। ब्रिक्स देशों में चीन संपत्ति करों के माध्यम से अपने राजस्व का लगभग 10 प्रतिशत संग्रह करता है जबकि रूस और दक्षिण अफ्रीका 4 से 5 प्रतिशत के बीच संपत्ति कर संग्रह करते हैं।
संपत्ति करों को नजरअंदाज करना सबसे मुश्किल है और अनुचित रूप से पंजीकृत संपत्तियों के लिए भी इसका भुगतान किया जाना चाहिए। शायद इसी वजह से उनके कर संग्रह की लागत भी अपेक्षाकृत कम है और वे आमदनी नहीं बल्कि संपत्ति पर कर लगाते हैं। उच्च स्तर की संपत्ति करों से जुड़ी आपत्तियों जैसे कि कम आय वाले बुजुर्ग मालिकों से वसूली जाने वाली संपत्ति कर आदि पर विभिन्न नियमों के माध्यम से नियंत्रण किया जा सकता है जिससे बुजुर्गों को छूट मिल जाती है।
कई विकसित देशों में संपत्ति करों के अलावा, स्थानीय सरकार के उपयोग के लिए राजस्व जुटाने के मकसद से नगरपालिका स्तर की आय और व्यावसायिक करों का भी उपयोग किया जाता है। लेकिन भारत में, स्थानीय शासन के लिए राजस्व जुटाने का सबसे आसान तरीका आवास और वाणिज्यिक संपत्ति पर संपत्ति कर लगाना ही होगा जो पूरे राज्य में एकसमान रूप से लागू होता है। 15 वें वित्त आयोग ने राज्यों को अनुदान दिया है, बशर्ते वे अपनी संपत्ति कर दरों को अद्यतन करते हुए कर संग्रह में सुधार करें। इस तरीके का उपयोग स्थानीय सरकारी संसाधनों को बढ़ाने के लिए 16वें वित्त आयोग द्वारा दर बढ़ाने पर चर्चा करने के लिए किया जा सकता है।
जिम्मेदारियों और संसाधनों को स्थानीय शासन के स्तर पर अंतरित करने का काम रातोरात नहीं किया जा सकता है। इसके लिए स्थानीय शासन की सेवाओं की वितरित करने की क्षमता में सुधार करने की आवश्यकता होगी जो अब राज्य सरकारों के माध्यम से की जा रही हैं, लेकिन इसके लिए एक योजना तैयार की जानी चाहिए।
यदि भारत को 2047 तक विकसित अर्थव्यवस्था बनाना है तो 16वां वित्त आयोग इस चर्चा को शुरू करने के लिए एक अच्छा मंच साबित होगा।
Date:25-04-23
विदेश नीति का दमखमडॉ. आर.के. सिन्हा
सूडान में सेना और अर्धसैनिक बल के बीच चल रहे भीषण गृहयुद्ध के चलते वहां हालात तो बद से बदतर होते चले जा रहे हैं। ऐसे में वहां फंसे हजारों भारतीयों को सुरक्षित स्वदेश लाने को लेकर सारा देश चिंतित है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सूडान में फंसे भारतीयों को जल्द से जल्द सुरक्षित निकासी के लिए विदेश मंत्रालय के अधिकारियों को निर्देश दे दिए हैं। मतलब यह कि अब सरकार एक्शन मोड में आ गई है।
यह बदले हुए मजबूत भारत का नया चेहरा है। अब जहां पर भी भारतवंशी या भारतीय संकट में होते हैं, तो भारत सरकार पहले की तरह हाथ पर हाथ धर कर नहीं बैठती। आपको याद ही होगा कि रूस-यूक्रेन जंग के कारण हजारों भारतीय मेडिकल छात्र-छात्राएं यूक्रेन में फंस गए थे। उन्हें सरकार तत्काल सुरक्षित स्वेदश लेकर आई। भारत के हजारों विद्यार्थी यूक्रेन में थे। वे वहां पर मेडिकल, डेंटल, नर्सिंग और दूसरे पेशेवर कोर्स कर रहे थे। ये रूस-यूक्रेन जंग को देखते हुए वहां से निकल कर स्वदेश आना चाहते थे। पहले तो किसी को समझ में ही नहीं आ रहा था कि इतनी अधिक संख्या में यूक्रेन की राजधानी कीव और दूसरे शहरों में पढ़ रहे भारतीय नौजवानों को स्वदेश कैसा लाया जाएगा। पर इच्छाशक्ति हो तो सब कुछ संभव है। यह साबित करके दिखाया गया। अब अफगानिस्तान में गृहयुद्ध के दिनों की ही बात को जरा याद कर लें। भारतीय वायु सेना और एयर इंडिया के विमान लगातार अफगानिस्तान से भारतीयों को लेकर स्वदेश आते रहे थे। भारत के हजारों करोड़ रु पये के प्रोजेक्ट फंस गए थे। इन प्रोजेक्ट्स से हजारों भारतीय जुड़े हुए थे। इन्हीं भारतीयों को सुरक्षित निकाला जा रहा था। अफगानिस्तान की सत्ता पर तालिबान के नियंतण्रके बाद ही आने वाली परिस्थितियों को भांपते हुए भारत सरकार सक्रिय हो गई थी। जाहिर है, ये सब कदम उठाने के बाद भारत सरकार का इकबाल न केवल देश के अंदर बल्कि विदेशों में भी बुलंद हुआ। अब आगे बढ़ने से पहले 1972 के दौर में चलते हैं। अब भी बुजुर्ग हो रहे भारतीयों को याद ही होगा कि सन 1972 में अफ्रीकी देश युगांडा के तानाशाह ईदी अमीन ने अपने देश में रहने वाले हजारों भारतीयों को रातों-रात आदेश दे दिया था कि वे सभी 90 दिनों में देश को छोड़ दें। हालांकि वे भारतीय ही युगांडा की अर्थव्यवस्था की जान थे। पर सनकी अमीन कभी भी और कुछ भी कर देता था। उसके फैसले से वहां पर दशकों से रहने वाले भारतवंशियों के सामने बड़ा भारी संकट खड़ा हो गया था। तब ब्रिटेन ने उन भारतीयों को अपने यहां शरण दी थी। तब हमारी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की सरकार ने उन भारतवंशियों के लिए कुछ नहीं किया था। ऐसा उन्होंने क्यों किया यह लोगों को अचम्भे में डालने वाला था क्योंकि, वे कोई कमजोर प्रधानमंत्री तो थी नहीं उस समय बांग्लादेश की आजादी और पाकिस्तान के 93,000 सैनिकों के आत्म समर्पण के बाद उनकी शोहरत का डंका बज रहा था लेकिन, उन्होंने कोई ठोस कदम नहीं उठाए। पता नहीं क्यों? भारतीय युगांडा में लुटते-पिटते रहे थे, लेकिन हमने घडियाली आंसू बहाने के सिवा कुछ नहीं किया था। उन भारतीयों को हमसे अभी तक गिला है जो होना भी चाहिए। क्या हम सात समंदर पार जाकर बस गए बहादुर उधमी भारतीयों से सिर्फ यही उम्मीद रखें कि वे भारत में आकर निवेश करें? पर अब भारत चुनौती का सामना करता है। भारत की बदली हुई विदेश नीति के चलते ही हमने टोगो में जेल में बंद पांच भारतीयों को सुरक्षित रिहा करवाया था। ये सब के सब केरल से थे। भारत सरकार 2015 में यमन में फंसे हजारों भारतीयों को सुरक्षित स्वदेश लाई थी। वह अपने आप में एक मिसाल है। अब भारत सरकार के सामने सूडान से भारत के नागरिकों को लाने की ब़ड़ी चुनौती है। प्रधानमंत्री मोदी खुद सूडान से भारतीयों को वापस लाने के काम पर लगातार नजर रख रहे हैं। सूडान में चल रहे गृह युद्ध में कुछ भारतीयों के हताहत होने की भी खबरें हैं। सूडान में 3000 से अधिक भारतीय इस समय फंसे हैं। राजधानी खार्तूम में संघर्ष की वजह से इनकी निकासी में मुश्किलें आ रही हैं।
बहरहाल, यह दुखद है कि भारत के मित्र देश सूडान में इतना गंभीर आतंरिक संकट चल रहा है। भारतीय विशेषज्ञ सूडान के वानिकी क्षेत्र के विकास में सन 1910 से सक्रिय हैं। महात्मा गांधी ने 1935 में इंग्लैंड जाते समय पोर्ट सूडान का दौरा किया था और सूडान में बसे भारत वंशियों से मुलाकात की थी। पंडित जवाहरलाल नेहरू भी 1938 में सूडान गए थे। भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त सुकुमार सेन ने 1953 में पहले सूडानी संसदीय चुनाव का निरीक्षण किया। 1957 में स्थापित सूडानी चुनाव आयोग ने भारतीय चुनाव कानूनों और प्रथाओं से प्रेरणा प्राप्त की। भारत ने फरवरी 1954 में स्थापित सूडानीकरण समिति को वित्तीय सहायता प्रदान की, जिसे स्वतंत्रता के बाद सूडानी सरकार में ब्रिटिश कर्मचारियों की जगह लेने का काम सौंपा गया था। भारत ने मार्च 1955 में खार्तूम में अपना दूतावास खोला। सूडान ने उसके चंदेक सालों के बाद राजधानी के चाणक्यपुरी में अपना दूतावास स्थापित किया। अब भारत यह भी चाहेगा कि वहां पर हालात शांतिपूर्ण हो जाएं और वहां से सारे भारतीयों को सुरक्षित निकाल लिया जाए।
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राहुल गांधी को सूरत की एक अदालत ने लोकसभा की सदस्यता के अयोग्य ठहरा दिया था। इसे लेकर न्यायिक समुदाय सकते में है। हालांकि यह कोई अंतिम फैसला नहीं था। इसके लिए अपीलीय न्यायालय है। लेकिन मुख्य मुद्दें से जुड़े कुछ बिंदुओं को ध्यान में रखा जाना चाहिए।
राष्ट्रपति की भूमिका –
विचारणीय मुद्दा –
परिपक्व लोकतंत्रों के लोगों को बिना डर के हास्य का आनंद लेने के लिए तैयार रहना चाहिए। बहुदलीय लोकतंत्र में पक्ष और विपक्ष के नेताओं की छिटाकशीं कोई नई बात नहीं है। इसके लिए किसी को लंबे समय तक चुनावी प्रक्रिया से दूर नहीं रखा जाना चाहिए।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित पीण्डीण्टीण् आचार्य के लेख पर आधारित। 27 मार्च, 2023
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Date:24-04-23
Love’s Crash LandingSpecial Marriage Act’s 30-day notice serves only to hurt personal liberties. End this crueltyTOI Editorials
Even as the Supreme Court considers whether Indians should have the right to same-sex marriages, its deliberations have highlighted a peculiar impediment to the supposedly settled right to opposite-sex marriages. CJI Chandrachud has noted that the 30-day notice under the Special Marriage Act, 1954, is “patriarchal” and lays couples “open for invasion by the society”. The common filmic trope of parental opposition to a young man and young woman choosing each other instead of abiding by the parental choice of marriage partner, unfortunately reflects a common mindset. An overwhelming majority of marriages in India indeed continue to be “arranged” and solemnised via religious personal laws. That too is a “choice”. The question here is whether the SMA notice period is serving any purpose other than inconveniencing and endangering individuals making a different choice. It isn’t.
The procedure of publishing a notice dates back to SMA’s first incarnation in 1872, when it was rammed through against vehement opposition. When independent India’s Parliament passed the Act of 1954 to enable marriage of any two Indians, whether professing the same or different religions or no religion at all, it was a very progressive measure for the times. But times have moved on, and the law must do the same. That marriage under personal laws is expeditious and does not require any publication of notice is an entitlement whose unfairness has grown glaring. Interfaith couples are caught between the increasing hazards around conversion and the increasing moral policing of SMA noticeboards. Of course, these boards also promote community persecution of inter-caste couples.
SC had underlined in the 2018 Hadiya case: “Our choices are respected because they are ours. Social approval for intimate personal decisions is not the basis for recognising them. ” It is bad enough that toxic ideas of religious, caste and even class “honour” continue to wreak brutalities on individuals in 21st century India. But constitutional courts can protect personal liberty from disapproving and dangerous busybodies and Parliament can amend SMA’s 30-day notice period. At least public institutions must not facilitate medieval mindsets.
Date:24-04-23
We Don’t Get History. So, Let’s Not Study ItIndia’s liberals & rightwingers have a poor grasp on how to read the past. Why burden kids with the subject?Srijana Das
We live in richly ironic times and few moments have been more amusing than the controversy over NCERT lopping off large chunks of history from school books. The greatest outrage came over the dropping of Mughal history from prescribed readings for our E&Y (earnest and young). Liberal drawing rooms were ablaze over their cocktails while newspaper pages frothed passionately with ‘Mughal-e-Azam’-type defences. Right-tilting types weren’t to be left out of the fun either. The Mughals were no Hrithik Roshan, they sneered, they were Amrish Puri-esque. They captured India through perfidious torture and lorded over its suffering masses while dreaming of Samarkand (apparently, the road back was blocked). Nahin, yelled the liberals, the Mughals gave us ice-cream, poetry and fine pyjamas and taught us how to live nicely together in peace (their chopping off each other’s limbs were just royal-people tantrums). With an awestruck salaam, we should learn more, not less, about the‘ zille subhanis ’ of Mughlai Paratha fame.
Those fond of the inviting discipline of history find all this fervent arguing over its fragments frustrating. It was trying, for instance, to see how much press the now-banished Mughals got but how little the apparently deleted Industrial Revolution received. This phase of time shows us how a society, driven by science, innovation and markets, can break the chains of fatalistic feudalism and become a thriving and equitable economy. One would’ve thought that India, which aims to be a five-trillion-dollar power, would want its kids to learn more about this iconic era, where all that was solid, in Marshall Berman’s words, melted into air. That air scattered the seeds of epochalprogress. But in it also brewed the ill-winds of today’s climate crisis. Altogether, the Industrial Revolution is key history and the relative lack of comment over its waning is surprising.
Perhaps the relative silence there – compared to the moaning over the Mughals – reflects how poorly India’s liberals have actually fared at history.
Choosy about course correction
After all, the greatest lesson our own history teaches us is the travesty of caste. We know from our lessons of its architecture of cruelty, its sophistry of resourcegrabbing, its psychological imprisonment into the realms of ‘clean’ and ‘unclean’ (and thus, rich and poor or honoured and reviled) from which even birth and death could not release a soul. We know of its everyday brutalities, of water and land denied, spaces cordonedoff, the fevered rhetoric of ‘impure’ shadows even. We know how this superstructure broke countless humanbeings and slowed our nation to a fraction of what it might have been without such elaborate social torture, its fruits reaching a ‘clean’ few.
Yet, we liberals read this history with less application than we give, say, a recipe for French bouillabaisse. We fail our own history for otherwise, how do we wear our surnames so unquestioningly? These adorn our given names like pennants of smug pride, stuck atop our liberal little castles of self. Their continuation shows much, including how badly we’ve flunked time. The whole point of learning the past is to correct the present and construct a better future.
Making history a burden
Sadly, despite India having many fine serious historians (and abundant history-chatterers at every mohalla lit fest too), the integral point of the subject has eluded us. There are only two ways we see history – as with the Mughals, we use it as a magic carpet that weaves in and out of marbled monuments, landing us in the secularism we claim (bearing our caste names all the while). Or, we use history as a stick to beat the present with, breaking down hard-fought ideas of civility and sense. In either case, our failure lands our young with a burden they don’t deserve. Why carry on with this charade?
History is a tapestry of time wretched and grand, composed of beauty and bathos, whispers and sighs, iron and dreams, borders and armies, brutalities and saints, peasants, philosophers and revolutionaries, impatient with the old, longing for the new. History is so much more than moth-balled kings and queens. If we can’t give this subject – which in fact shows humanity our future possibilities – the seriousness it deserves, why study it at all? We’re failing it anyway. Spare the kids this ride through humanity’s Jurassic Park. Bring on the economics and science instead.
Date:24-04-23
India as most populous can be more boon than baneWith a mix of right policies, there are greater prospects for demographic advantage than demographic disasterSrinivas Goli is an Associate Professor of Fertility and Social Demography at the International Institute for Population Sciences (IIPS), Mumbai
China is projected to hand over the baton of the most populous country to India by mid-2023. But for India, there are greater prospects for demographic advantage than serious concerns. The country must focus on reaping the available demographic dividend.
Considering the limited information for both China and India, especially in the absence of the Census 2021, it is difficult to predict the exact date on which this demographic order will change. United Nation reports suggest that India will have a population of 142.86 crore by mid-2023, which is 2.9 million higher than China’s population of 142.57 crore. So, what are the opportunities and costs from being the most populous country? While the debate on population growth in India is not new, there are general and pessimistic views over this change in demographic rank order. Population control, therefore, is widely being seen as a panacea to avoid a grim future. There is a need to look deeper into the issue from an empirical and scientific perspective. Is it a dividend or a disaster? To answer this, we need to understand: the nature of population growth, size and its composition, as well as mechanisms through which a country translates demographic bonus into economic dividend.
Population growth, size, composition
Population in itself is not a burden. Instead, it is the nature of population growth, size and its composition that decides when a population becomes a “resource” or a “burden”. Population is a resource as long as the country’s carrying capacity is intact. Carrying capacity is not just per capita availability of natural resources; it is a dynamic concept which changes according to changing technology, the efficiency of production and consumption systems of a country.
A deeper look into the trends of population growth, size and composition gives one an idea of whether India has an over-population that can disrupt carrying capacity. With total fertility rate of 2.0 in 2023, India is already at replacement level fertility, meaning two children replacing their parents. This indicates that the population is on a path toward stabilisation. However, it continues to experience positive growth, but in a decelerated mode until 2064, from which point it will become negative growth. The peak of India’s population size will be around 169.6 crore in 2063.
However, if we look at only the total population size, which is often assumed as the number of mouths to feed, it is grossly misleading. We need to look at the age composition of the population which tells us about available support ratios in the form of the number of the working age population (15-64 years) against the dependent population (0-14 years and 65 years and above).
Looking at the population composition of India, there are greater prospects for demographic dividend than a disaster. With 68% of the working age population in 2023, the country continues to have a demographic window of opportunity for the next 35 years to reap an economic dividend.
However, the availability of a demographic window of opportunity in itself will not automatically turn into economic dividend. The country needs to work on the key mechanisms which translate a demographic bonus into economic dividend.
Relevant mechanisms
There are four key mechanisms that translate a demographic bonus to economic dividend: employment, education and skills, health conditions and governance.
Employment or job creation is an important mechanism to translate demographic bonus to economic dividend. If India is able to generate sufficient and quality jobs for its bulging working age population, realisation of demographic dividend will become a reality.
Education, skills generation and ensuring a healthy lifespan by preventing diseases and disabilities are also important channels that translate demographic opportunity into economic gains. A skilled and healthy workforce is critical not only for better productivity of an economic activity but it also reduces excessive public spending and helps in greater capital creation.
Good governance, reflected through conscientious policies, is another important aspect for reaping demographic dividend as it helps in creating a healthy environment for increasing efficiency and productivity of the population.
In perspective
Opportunities and costs are the two sides of the coin when it comes to being the world’s largest populous country. However, a relatively younger population of India provides higher support ratios — there is lesser disease, disability and caring burden. India’s opportunity must be looked at in comparison to the consequences of population decline and ageing across some countries that include Japan, China, the United States and other major economies. A majority of them have been implementing pronatalist policies to improve birth rates. However, these actions have shown to be largely ineffective. Once fertility tends to decline, it is hard to reverse it.
In this context, India has the potential to become a worldwide market for both production and consumption, with lower manufacturing costs due to a relatively cheaper workforce. This is very much evident in India’s IT sector.
Available demographic opportunity in the form of a greater share of the working age population has the potential to boost per capita GDP by an additional 43% by 2061, provided the socio-economic and political enabling environment is conducive.
At the same time, a total fertility rate of less than 1.8 may not be economically beneficial for India. Therefore, drastic population control methods run the risk of inducing forced population ageing, which would result in the nation “getting old before getting rich”.
What is causing more damage than climate change and economic harm is invisible and unsustainable production, consumption and unequal distribution more than visible population size.
What the country needs are policies that support an enabling environment that can provide high-quality education, good health care, respectable employment opportunities, good infrastructure, and gender empowerment. If India falls short in this, its “demographic dividend” can become a “demographic disaster”.
Date:24-04-23
A new troika for India’s northeast regionThe goal of connecting a large part of South Asia with Southeast Asia can be steered by the triad of Bangladesh, India and Japan using the northeast as a focal pointRajiv Bhatia is Distinguished Fellow, Gateway House, and a former Ambassador to Myanmar
The region comprising India’s eight northeastern States (Arunachal Pradesh, Assam, Manipur, Meghalaya, Mizoram, Nagaland, Tripura and Sikkim) is undergoing dramatic change. It has overcome several (but not all) security challenges and is now heading toward economic development. Political changes have been helpful. So is the extensive web of linkages with neighbouring Bangladesh. Besides, Japan has emerged as a significant development partner for both India and Bangladesh.
The third India-Japan Intellectual Dialogue (April 11–12, 2023), hosted by the Asian Confluence (ASCON), in Agartala, Tripura, was an ideal opportunity to assess the evolving thinking of experts and policymakers. It showed that the current decade may produce path-breaking changes in the northeast, bringing the troika of Bangladesh, India and Japan closer.
Vision and opportunities
One of the most important projects is the development of Matarbari Deep Sea Port (DSP) on the southeastern coast of Bangladesh. It is being constructed with Japanese assistance and is scheduled to be operational in 2027. A recent ASCON study envisages this port to be “a game changer”. To be optimally viable, the port will have to cater to the needs of Bangladesh and India’s northeast. The long-term vision is for Bangladesh and the northeast to become a hub and key industrial corridor of this region, serving a population of 220 million.
Hiroshi Suzuki, Japan’s Ambassador to India, emphasised at the conference that while increased connectivity of roads and railways is important, it is not enough without the creation of regional industrial value chains. Hence, rapid industrialisation in the sectors where the northeast enjoys competitive advantage assumes significance. This plan is sound because it ensures that the new connectivity links will be fully utilised and productive. Roads and ports must be accompanied by job opportunities that can come only from new industrial enterprises set up with national and foreign investment. A joint focus on comprehensive connectivity and accelerating industrialisation in Bangladesh and the northeast is likely to be a priority.
The northeast is blessed with vast natural resources. Its strategic location, sharing borders with Nepal, Bhutan, China, Bangladesh and Myanmar, is an asset. Creating value chains and manufacturing products should encompass diverse sectors such as agro-processing, man-made fibres, handicrafts, assembly of two-wheelers and perhaps mobile phones, and pharmaceuticals. The population, with its good education, already excels in the services sector drawing potential investor attention.
The challenges
Of course, there are challenges that can be addressed by expanding policy convergence and taking people along. Also, Japan as a single investor in the northeast is unworkable. Indian companies too must invest. India must ease restrictions on the flow of investments from Bangladesh. The three governments should also forge closer linkages of economic cooperation.
An important argument was advanced by Bangladesh’s Shahriar Alam, Minister of State for Foreign Affairs. He stressed that Dhaka and New Delhi have succeeded in “almost restoring” the pre-1965 infrastructure connectivity between India and Bangladesh and are now going beyond it. But, Mr. Alam added, Bangladesh which has facilitated so much connectivity, now needs “reciprocity” from other countries (read: India) so that it is better connected with other neighbours (read: Nepal, Bhutan and Myanmar). By facilitating it, India can assist Bangladesh in becoming an integral part of the Act East Policy.
Two additional points require consideration. First, when issues of regional cooperation and integration are discussed, scant attention seems to be paid to the Bay of Bengal Initiative for Multi-Sectoral Technical and Economic Cooperation (BIMSTEC), which is self-defeating. This must change so that the grouping progresses towards its vision of establishing the Bay of Bengal Community (BOBC).
Second, the goal of connecting a large part of South Asia with Southeast Asia requires an astute pilot. This leadership can come from the triad of Bangladesh, India and Japan (BIJ). A BIJ Forum should be launched first at the level of Foreign Ministers, a move that will be welcome in the northeast.
Date:24-04-23
जाति की राजनीति उभारने की कोशिशहरेंद्र प्रताप, ( लेखक बिहार विधान परिषद के पूर्व सदस्य हैं )
क्या अगले लोकसभा चुनाव में जातिगत गणना एक चुनावी मुद्दा बनेगी? पिछले दिनों कर्नाटक में एक चुनावी सभा में राहुल गांधी ने 2011 की जनगणना के आंकड़े सार्वजनिक कर देश में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) की संख्या बताने, आरक्षण से 50 प्रतिशत की सीमा हटाने तथा दलितों-आदिवासियों को आबादी के अनुसार आरक्षण देने की मांग की। राहुल गांधी की मांग का बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने समर्थन किया है। बिहार सरकार ने अपने खर्च से बिहार में जातीय गणना की शुरुआत कर दी है। हाल में इसके दूसरे चरण की शुरुआत हुई है। गत दिनों बिहार के मुख्यमंत्री ने अपने पैतृक घर पहुंचकर गणनाकर्ता को अपने और अपने परिवार के बारे में जानकारी दी।
वर्ष 1931 की जनगणना में बिहार और ओडिशा में जातीय जनगणना का जो विवरण दर्ज है उसमें कुल 97 जातियों की संख्या जिले के साथ प्रकाशित है। वर्णित 97 में से 14 जातियां-बेटकट, चासा, गदबा, गंडा, घसुरिया, गोडरा, गोरवा, इरिका, कंदरा केला, कोली, कोलता, महुरिया और मांगन अब ओडिशा में रहती हैं। यानी वर्ष 1931 में बिहार और झारखंड में 83 जातियां ही रहती थीं। बिहार सरकार ने जातीय गणना के लिए 214 जातियों को जो कोड दिया है उसमें मुस्लिम पंथ की 29 जातियों का उल्लेख है। शेष बचीं 185 जातियों में से अगर 83 जातियों को निकाल दिया जाए तो 102 जातियों का उल्लेख वर्ष 1931 की जनगणना के समय नहीं था। ये 102 जातियां कब और किसने बनाईं? 1931 की जनगणना में जातीय जनगणना के आंकड़े अगड़े-पिछड़े के रूप में नहीं, बल्कि अंग्रेजी वर्णमाला के अनुसार थे।
वर्ष 1951 में संविधान के अनुच्छेद-15 में संशोधन कर धारा-दो में उपधारा-चार एवं पांच को जोड़ा गया। यह सामाजिक-शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े हुए लोगों को राष्ट्र की मुख्यधारा में लाने के लिए राज्य को विशेष उपबंध करने की शक्ति प्रदान करता है। अनुसूचित जाति एवं जनजाति के अलावा पिछड़ा वर्ग का यह क्रम आगे बढ़कर पिछड़ा और अति पिछड़ा हुआ। बिहार में तो नीतीश कुमार ने अनुसूचित जाति या दलित को भी दलित और महादलित में विभाजित कर दिया। जबकि भारत का तथाकथित प्रगतिशील, वामपंथी, समाजवादी तबका भारत में हिंदू समाज के अंदर जातियों की उत्पत्ति और उनके साथ हुए भेदभाव का सारा दोष हिंदू धर्म ग्रंथों और ब्राह्मणों के ऊपर मढ़ता रहा है।
जाति व्यवस्था-वर्ण व्यवस्था पर समय-समय पर हुए शोध प्रकाशित भी होते रहे हैं। साल 2016 में कोलकाता स्थित नेशनल इंस्टीट्यूट आफ बायोमेडिकल जीनोमिक्स (एनआइबीएमजी) के विज्ञानियों ने डीएनए के जरिये देश में वंशावलियों का पता लगाया और इस नतीजे पर पहुंचे कि गुप्तकाल में जाति ने संस्थाबद्ध रूप लिया। यानी 1500 से 1600 वर्ष पूर्व। अर्थात 70 पीढ़ी पहले भारत में दूसरी जातियों से मेलजोल और शादी-विवाह एकाएक बंद हो गए थे। प्राचीन ग्रंथों में चार वर्ण की चर्चा तो है, पर वर्तमान में जो जातियां हैं उनकी उत्पत्ति पर शोध की आवश्यकता है। भारत में परंपरागत व्यवसाय के कारण लोगों को जाति की ज्यादा पहचान मिली। लोहा से लोहार, सोना से सोनार, कुंभ-घड़ा से कुम्हार, तेल से तेली आदि। आज भी ये व्यवसाय तो हैं, पर क्या टाटा में लोहा गलाने वालों को लोग लोहार कहते हैं या बाटा कंपनी में काम करने वालों को चर्मकार कहते हैं? नहीं, वे तो इंजीनियर या प्रोडक्शन सुपरवाइजर कहलाते हैं। इन जातियों का अब क्या महत्व है?
वर्ष 1974 में बिहार आंदोलन के समय लोकनायक जयप्रकाश नारायण ने भारत की वर्तमान जाति व्यवस्था पर प्रहार करते हुए आंदोलनकारियों से इससे ऊपर उठने की बात की थी। उन्होंने ‘जनेऊ पहनना’ छोड़ने की भी अपील की थी। अन्य को छोड़ दें तो क्या अपने को जेपी का अनुयायी कहने वाले लोगों ने अपने नाम में जाति सूचक शब्दों को लिखने से परहेज किया? जातियों के सम्मेलन का आयोजन अब तो लगभग सभी राजनीतिक दल कर रहे हैं, पर इसका विस्तार सबसे ज्यादा जेपी आंदोलन से निकले लालू प्रसाद यादव के शासन में हुआ। उन्होंने 1990 से 1994 के बीच लगभग 32 जातियों का सम्मेलन किया। स्वयं नीतीश कुमार ने भी पटना में अपनी जाति का ‘कुर्मी’ सम्मेलन करवाया था। प्रश्न यह है कि सामाजिक, आर्थिक, शैक्षणिक मोर्चे पर पिछड़ी अपनी जाति की प्रगति के लिए जातीय नेता या दल क्या करते हैं? अदालतों में 50 प्रतिशत मुकदमे अपनी जाति और कुटंबियों के साथ हैं। अगर जातीयता होती तो अदालतें मुकदमों के बोझ से उबर जातीं। क्या यह सही नहीं कि आज भी शादी-विवाह जाति में ही होते हैं और बेटी-बहन के विवाह के लिए लोग जमीन बेचते हैं या गहने। पैसे के अभाव में कई बच्चों की पढ़ाई नहीं हो पाती। उस समय जातिवादी नेता कहां लापता हो जाते हैं?
सत्ता-संपत्ति के बल पर कई नेता समाजशास्त्री, शोधार्थी और इतिहासकार बन बैठे हैं। प्रभु श्रीराम के पुत्र लव और कुश, सम्राट अशोक आदि की जाति को इन्होंने किस शोध के आधार पर घोषित किया? जाति गणना के आंकड़े प्रकाशित होने के बाद जिन जातियों की जनसंख्या प्रतिशत में गिरावट दर्ज होगी, क्या वे परिवार नियोजन को अपनाएंगी? स्थानीय निकायों में तो पिछड़े/अति पिछड़ों के लिए आरक्षण की शुरुआत हो गई है। क्या जातिगत जनगणना के बाद लोकसभा और विधानसभा में जातिगत आधार पर सीटों के आरक्षण की मांग नहीं उठेगी? देश ने 1990 में आरक्षण के पक्ष-विपक्ष में सामाजिक विभाजन और सामाजिक कटुता का दंश झेला है। क्या देश को फिर उसी तरफ धकेलने का षड्यंत्र तो नहीं किया जा रहा है?
Date:24-04-23
सतर्कता पर सवालसंपादकीय
जनतंत्र में लोकसेवकों की जिम्मेदारी सबसे अहम मानी जाती है। इसलिए कि यही विधायिका के निर्णयों को क्रियान्वित करते, योजनाओं को उनके लक्ष्य तक पहुंचाने में मदद और सार्वजनिक धन का समुचित उपयोग सुनिश्चित करते हैं। इसलिए लोकसेवा दिवस पर प्रधानमंत्री ने लोकसेवकों से अपील की कि वे राष्ट्र निर्माण में अपनी भूमिका को विस्तार दें। वे हर फैसले से पहले इन सवालों के बारे में जरूर सोचें कि सत्ता में बैठी राजनीतिक पार्टियां सरकारी धन का इस्तेमाल देश के विकास में कर रही हैं, अपने दल के विस्तार में या वोट बैंक बनाने के प्रयास में वे उसे लुटा रही हैं। जाहिर है, उनका इशारा उन सरकारों की तरफ था, जो मुफ्त की सेवाएं और सुविधाएं देकर अपना जनाधार बढ़ाने का प्रयास करती देखी जाती हैं। यह प्रवृत्ति पिछले कुछ सालों में तेजी से बढ़ी है। अब चुनावों में हर राजनीतिक दल बिजली, पानी, स्वास्थ्य सुविधाएं आदि मुफ्त में उपलब्ध कराने के बढ़-चढ़ कर दावे करता देखा जाता है। कई राज्यों में इस पर अमल भी हो रहा है। यह काम वे सरकारें भी कर रही हैं, जो खासे वित्तीय संकट से गुजर रही हैं। मगर सवाल है कि क्या प्रशासनिक अधिकारियों की सतर्कता से यह प्रवृत्ति वास्तव में रुक जाएगी।
सरकारी धन के दुरुपयोग की एक लंबी शृंखला है। उसमें अनाप-शनाप खर्चे भी शामिल हैं। अनेक बार रेखांकित किया जा चुका है कि राजनेताओं को दिखावे और तड़क-भड़क वाला जीवन जीने से परहेज करना चाहिए। उन्हें अपने खर्चों को सीमित करने पर ध्यान देना चाहिए। मगर चुनाव खर्च से लेकर निजी जीवन तक उनके खर्चे में कहीं भी कोई कमी नजर नहीं आती।
यही बात प्रशासनिक अधिकारियों के मामले में देखी जाती है। इस तरह सरकारी खजाने का बड़ा हिस्सा जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों की सुविधाएं जुटाने पर खर्च हो जाता है। फिर लोकलुभावन योजनाओं की घोषणा इसी मकसद से की जाती है कि लोग अगले चुनाव में भी उन्हें ही चुन कर सत्ता तक पहुंचाएंगे। हर चुनावी वर्ष में लुभावनी योजनाओं की झड़ी-सी लग जाती है। इस मामले में कोई भी राजनीतिक दल पीछे नहीं है। फिर तर्क दिए जाते हैं कि जन कल्याण के लिए योजनाएं शुरू करना या पुरानी योजनाओं को विस्तार देना, उनके मद में धन का आबंटन बढ़ाना एक कल्याणकारी सरकार का दायित्व है। ऐसे में प्रशासनिक अधिकारियों के लिए सत्ता पक्ष का हाथ रोकना आसान नहीं होता।
फिर सवाल लोकसेवकों यानी प्रशासनिक अधिकारियों की जवाबदेही का भी है। वे खुद कितने निष्ठावान रह गए हैं, इस पर प्रश्नचिह्न लगातार गाढ़ा ही होता गया है। छिपी बात नहीं है कि हर सत्ता पक्ष प्रशासनिक अधिकारियों और पुलिस का इस्तेमाल अपने मन मुताबिक करने का प्रयास करता है। इसीलिए जब भी सरकार बदलती है, तो बड़े पैमाने पर अधिकारियों के तबादले किए जाते हैं। अगर कोई अधिकारी वास्तव में सरकार के कामकाज पर अंगुली उठाने का प्रयास करता है, तो तबादलों और मुकदमों के चक्र में ऐसा फंसाया जाता है कि वह अपना काम ठीक से कर ही नहीं पाता। ऐसे में प्रशासनिक अधिकारियों की सत्ता से करीबी बनाए रखने की प्रवृत्ति बनती गई है। वे महत्त्वपूर्ण और ‘कमाई’ वाले माने जाने वाले पदों पर पहुंचने के लिए प्रकट रूप से जोड़-तोड़ भी करते देखे जाते हैं। ऐसे में यह सवाल अनुत्तरित ही रह जाता है कि क्या वास्तव में प्रशासनिक अधिकारी अपने दायित्वों का निष्ठापूर्वक निर्वाह कर पाएंगे!
Date:24-04-23
खतरों से कैसे बचेंविनीत नारायण
जब देश में सोशल मीडिया का इतना प्रचलन नहीं था तब जीवन ज्यादा सुखमय था। तकनीक की उन्नति ने हमारे जीवन को जटिल और तनावग्रस्त बना दिया है। आज हर व्यक्ति चाहे वो फुटपाथ पर सब्जी बेचता हो या मुंबई के कॉर्पोरेट मुख्यालय में बैठकर अरबों रुपए के कारोबारी निर्णय लेता हो, 24 घंटे मोबाइल फोन और सोशल मीडिया के मकडज़ाल में उलझा रहता है। जिसका बेहद खराब असर हमारे शरीर, दिमाग और सामाजिक संबंधों पर पड़ रहा है।
नई तकनीक के आगमन से समाज में उथल-पुथल का होना कोई नई बात नहीं है। सामंती युग से जब विश्व औद्योगिक क्रांति की ओर बढ़ा तब भी समाज में भारी उथल-पुथल हुई थी। पुरानी पीढ़ी के लोग जीवन में आए इस अचानक बदलाव से बहुत विचलित हो गए थे। गांव से शहरों की ओर पलायन करना पड़ा, कारखाने खुले और शहरों की गंदी बस्तियों में मजदूर नारकीय जीवन जीने पर विवश हो गए। यह सिलसिला आज तक रुका नहीं है। भारत जैसे देश में तो अभी भी बहुसंख्यक समाज, अभावों में ही सही, प्रकृति की गोद में जीवनयापन कर रहा है। अगर गांवों में रोजगार के अवसर सुलभ हो जाएं तो बहुत बड़ी आबादी शहर की तरफ नहीं जाएगी। इससे सरकारों पर भी शहरों में आधारभूत ढांचे के विस्तार का भार नहीं पड़ेगा। पर ऐसा हो नहीं रहा। आज़ादी के 75 वर्षों में जनता के कर का खरबों रुपया ग्रामीण विकास के नाम पर भ्रष्टाचार की बलि चढ़ गया।
पाठकों को लगेगा कि सोशल मीडिया की बात करते-करते अचानक विकास की बात क्यों ले आया, दोनों का सीधा नाता है। जापान और अमरीका जैसे अत्याधुनिक देशों से लेकर गरीब देशों तक इस नाते को देखा जा सकता है। इसलिए चुनौती इस बात की है कि भौतिकता की चकाचौंध में बहक कर क्या हम हमारे नेता और हमारे नीति निर्धारक, देश को आत्मघाती स्थिति में धकेलते रहेंगे या कुछ क्षण ठहरकर सोचेंगे कि हम किस रास्ते पर जा रहे हैं? इस तरह सोचने की जरूरत हमें अपने स्तर पर भी है और राष्ट्र के स्तर पर भी। याद कीजिए कोरोना की पहली लहर जब आई थी और पूरी दुनिया में अचानक अभूतपूर्व लॉकडाऊन लगा दिया गया था, तब एक हफ्ते के भीतर ही नदियां, आकाश और वायु इतने निर्मल हो गए थे कि हमें अपनी आंखों पर यकीन तक नहीं हुआ। कोरोना के कहर से दुनिया जैसे ही बाहर आई फिर वही ढाक के तीन पात। आज देश में अभूतपूर्व गर्मी पड़ रही है, अभी तो यह शुरूआत है। अगर हम इसी तरह लापरवाह बने रहे तो क्रमश: निरंतर बढ़ती गर्मी कृषि, पर्यावरण, जल और जीवन के लिए बहुत बड़ा खतरा बन जाएगी। अकेले भारत में आज कम से कम 10 करोड़ पेड़ लगाने और उन्हें संरक्षित करने की ज़रूरत है। अगर हम सक्रिय न हों तो कोई भी सरकार अकेले यह कार्य नहीं कर सकती। चलिए वापस सोशल मीडिया की बात करते हैं जो आज हमारे जीवन में नासूर बन गया है। राजनीतिक उद्देश्य से 24 घंटे झूठ परोसा जा रहा है। जिससे समाज में भ्रम, वैमनस्य और हिंसा बढ़ गई है। किसी के प्रति कोई सम्मान शेष नहीं बचा। ट्रॉल आर्मी के मूर्ख युवा देश के वरिष्ठ नागरिकों के प्रति जिस अपमानजनक भाषा का प्रयोग सोशल मीडिया पर करते हैं उससे हमारा समाज बहुत तेज़ी से गर्त में गिरता जा रहा है। सोशल मीडिया के बढ़ते हस्तक्षेप ने हमारी दिनचर्या से पठन-पाठन, नियम-संयम, आचार-विचार और भजन-ध्यान सब छीन लिया है। हम सब इसके गुलाम बन चुके हैं।
तकनीक अगर हमारी सेवक हो तो सुख देती है और अगर मालिक बन जाए तो हमें तबाह कर देती है। कुछ जानकार अभिभावक इस बात के प्रति सचेत हैं और वे अपने बच्चों को एक सीमा से ज्यादा इन चीजों का प्रयोग नहीं करने देते हैं। पर उन परिवारों के बच्चे जिनमें माता-पिता को काम से फुर्सत नहीं है उन पर इसका बहुत ज्यादा विपरीत प्रभाव पड़ रहा है। आए दिन समाचार आते रहते हैं कि स्मार्ट फोन की चाहत में युवा वर्ग चोरी, हिंसा और आत्महत्या तक के कदम उठा रहा है। समाज ऐसा विकृत हो जाए तो डिजिटल इंडिया बनने का क्या लाभ? समाज के व्यवहार को कानून बनाकर नियंत्रित नहीं किया जा सकता और इस मामले में तो बिल्कुल नहीं किया जा सकता। इसलिए जरूरत इस बात की है कि हम खुद से शुरू करके अपने परिवेश में कुछ प्राथमिकताओं को फिर से वरीयता दें।
अपनी और अपने परिवार की एक अनुशासित दिनचर्या निर्धारित करें जिसमें भोजन, भजन, पठन-पठान, व्यायाम, मनोरंजन, सामाजिक संबंध आदि के लिए अलग से समय निर्धारित हो। इसी तरह स्मार्ट फोन, इन्टरनैट व टी.वी. के लिए भी एक समय सीमा निर्धारित की जाए जिससे हम अपने परिवार को तकनीक के इस मकडज़ाल से बाहर निकालकर स्वस्थ जीवन चर्या दे पाएं। जहां तक संभव हो हम अपने घर और परिवेश को हरे-भरे पेड़ पौधों से सुसज्जित करने का गंभीर प्रयास करें। विश्वभर में मंडरा रहे गहरे जल संकट को ध्यान में रखकर जल की एक-एक बूंद का किफ़ायत से प्रयोग करें और भू-जल स्तर बढ़ाने के लिए हर सम्भव कार्य करें। आधुनिक फास्टफूड के नाम पर कृत्रिम, हानिकारक रसायनों से बने खाद्य पदार्थों की मात्रा तेजी से घटाते हुए घर के बने ताजे पौष्टिक व पारम्परिक भोजन को प्रसन्न मन से अपनाएं। अगर हम ऐसा कर पाते हैं तो हम, हमारा परिवार और हमारा समाज सुखी, संपन्न और स्वस्थ बन जाएगा। अगर हम ऐसा नहीं करते तो बिना विषपान किए ही हम आत्महत्या की ओर बढ़ते जाएंगे।
अच्छा जीवन जीने का सबसे बढ़िया उदाहरण उज्जैन के एक उद्योगपति अरुण ऋषि हैं, जिनके भाषण और साक्षात्कार देश के अखबारों में चर्चा का विषय बने रहे हैं। हमेशा खुश रहने वाले गुलाबी चेहरे के अरुण ऋषि का दावा है कि उन्होंने न तो कभी किसी दवा का सेवन किया और न ही किसी सौंदर्य प्रसाधन का प्रयोग किया। इसीलिए कभी बीमार नहीं पड़े। पिछले दिनों दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के डाक्टरों को ‘सेल्फ मैनेजमेंट’ (अपने शरीर का प्रबंधन) विषय पर व्याख्यान देते हुए श्री ऋषि ने डाक्टरों से पूछा कि क्या वे स्वस्थ हैं ? उत्तर में जब श्रोता डाक्टरों की निगाहें नीचे हो गईं तो उन्होंने फिर पूछा कि जब आप खुद ही स्वस्थ नहीं हैं, तो अपने मरीजों को स्वस्थ कैसे कर पाते हैं ? मतलब यह कि अपनी दिनचर्या को व्यवस्थित करके ही हम स्वस्थ रह सकते हैं, और लंबी उम्र जी सकते हैं।
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दक्षिण एशियाई देशों पर चीन के लगातार बढ़ते प्रभाव के बीच, भारत के लिए अपने सभी पड़ोसी देशों से अच्छे संबंध बनाए रखने की चुनौती बढ़ी है।
वर्तमान स्थितियों से जुड़े कुछ बिंदु –
अब भारत के पास एक ही रास्ता बचता है कि वह पड़ोसी देशों में चल रही विकास योजनाओं को जल्दी पूरा करने की कोशिश करे। चीन से प्रतिस्पर्धा करना आसान नहीं है। लेकिन भारत के पास और कोई चारा भी नहीं है। हमें अपनी ‘पड़ोसी पहले’ की नीति को धार देने की जरूरत है।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 30 मार्च, 2023
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Date:22-04-23
Quantum JumpGoI does well to fund R&D in computing’s next revolutionTOI Editorials
GoI’s seed fund of Rs 6,000cr ($730m) for the National Quantum Mission (NQM) for 2023-24 through 2030-31 is a fillip to R&D in quantum tech, whose applications are in multiple stages of experimentation and prototypes globally. It is a quirk of quantum computing that for India to prioritise $730 million for the mission is an expensive call, yet for the field of study, a modest fund. In the “elite club” of six with public-funded quantum initiatives, China has allocated $15. 3 billion (2021-2025), EU $7. 2 billion and the US $1. 2 billion. China also has the largest share of patents in quantum tech.
It is a measure of the mind-bending nature of quantum that the ground-breaking research of 1970s and 1980s into the phenomenon of entanglement, the heart of quantum science, was recognised with a Physics Nobel only in 2022. The Laureates had shown that entangled particles (physically apart yet linked) can ferry information over massive distances. This has far-reaching implications for quantum communications tech (QCT), of key strategic significance to India and one of the four verticals for the mission’s R&D. QCT allows a country to secure its critical infrastructure with quantum cryptographyto make it “unhackable”. Conventional data networks are putty in the face of quantum computing if the latter is applied to organise a cyberattack.
Challenges to build quantum infra are formidable. The first step is for public-funded research institutes to collaborate with startups and firms to develop the initial intermediate-sized supercomputers. At present, India only has a basic quantum computer Qsim that allows researchers to simulate quantum computation. Hardware aside, talent gap is a bottleneck. In 2021, for 290 quantum tech masters’ grads globally, there were 851 jobs. Barely 16% of the world’s universities offer degrees in the field. This is the ecosystem India is entering. Yet GoI’s commitment to fundamental science and endeavour is a great beginning. NQM could not have come a day sooner. QED.
Date:22-04-23
Terror on the roadIndia needs to rethink its Kashmir strategy and attitude to PakistanEditorial
In another spectre of violence in Jammu and Kashmir (J&K), five soldiers were killed and another critically injured in a terror attack on April 20 in the Rajouri-Poonch Sector, close to the Line of Control (LoC) in the Jammu division. Preliminary reports have suggested that terrorists — their numbers and affiliations are not known immediately — attacked, in inclement weather, an Army vehicle that was on a counter-insurgency patrol between Bhimber Gali-Poonch in the Rajouri sector. The attack also comes at a time when J&K is working diligently to host a G-20 Tourism Working Group meeting, in May. Separately, Pakistan’s Foreign Minister Bilawal Bhutto Zardari is likely to attend a Shanghai Cooperation Organisation (SCO) meeting in Goa next month, which has kindled the possibility of fresh India-Pakistan engagement. The attack raises the question about the management of patrols in sensitive locations in the region which has seen a spike in militant violence in the recent past, including a terror attack on a village on January 1 this year that left seven civilians dead. The fact that the Army vehicle was on an unaccompanied drive and remained unattended immediately after the attack is a matter of serious concern.
The images of the Army vehicle on fire and charred bodies have reignited memories of and visuals from the Pulwama attack in 2019. On February 14 that year, a convoy of buses with Central Reserve Police Force jawans was on the Jammu-Srinagar national highway way in Pulwama’s Lethpora area when a suicide bomber in an explosive-laden car managed to breach security. Forty personnel lost their lives in the terror attack that shocked the political class, the military establishment and the country. With Indian intelligence agencies pointing to the role of the Jaish-e-Muhammad (JeM), India sent its fighter jets across the Line of Control to strike JeM training camps in Balakot, Pakistan, inflicting casualties and damaging the terror infrastructure there. India’s strident response to cross-border terror was noticed internationally, and became a topic of campaign during the Lok Sabha election soon after. However, terror emanating from Pakistan has failed to ebb, which is evident from the rising violence in J&K over the past three years, especially after the government decided to end the region’s semi-autonomous status on August 5, 2019. Claims on the subject made recently by the then J&K Governor Satya Pal Malik, in interviews, have brought to the fore fresh questions about the intent behind the political class while approaching the issue of terrorism in the country. Perhaps it is time India reviewed its strategy in Kashmir, including the current freeze on talks with Pakistan.
Date:22-04-23
नए दौर में दरकती विवाह संस्था के खतरे क्या हैंसंपादकीय
महानगरों में लिव-इन रिलेशनशिप की खबरें इन दिनों आम होती जा रही है। पर कई बार इनके बीच कटुता इतनी बढ़ जाती है कि ‘लिव-इन रिलेशन’ उतनी ही सहजता से ब्रेक-अप में बदल जाता है। इसके साथ ही सदियों से स्थापित मजबूत भारतीय विवाह संस्था तेजी से दरक रही है। दरअसल पश्चिमी सभ्यता अंगीकार करते हुए हम यह नहीं जानते कि वहां राज्य की दृष्टि में व्यक्ति सर्वोच्च है। अगर कोई भूखा है तो उसे पुलिस वाला न केवल सरकारी प्रबंध से भोजन कराएगा बल्कि उसके लिए आजीविका का साधन भी राज्य उपलब्ध कराएगा। बाद भी एक ऐसा उपभोक्ता समाज चाहता है जो आत्मनिर्भर है। अमेरिकी कंज्यूमर प्रोडक्ट कंपनियां ‘सेल्फ लव’ (यानी अपने से प्यार करो) के नए नारे से युवाओं को लुभा रही है। ऐसा मुक्कं केवल अपनी खूबसूरती, अपनी व्यक्तिगत इच्छाओं की पूर्ति को ही जीवन का अंतिम सत्य समझता है। एक सर्वे के अनुसार अमेरिका में 80 प्रतिशत युवा इस नई ‘सेल्फ लव’ की जीवन शैली के कारण आज अकेलेपन का शिकार है। लेकिन बाजारवाद इसे प्रमोट कर रहा है, क्योंकि समूह में लोग कम खर्च करते हैं अकेले ज्यादा यानी बाजार तय करेगा हम पत्नी को कितने दिन और कितना प्यार करें!
Date:22-04-23
तेजी से बढ़ती गिग इकोनॉमी से निर्मित हुए हैं नए अवसरपंकज बंसल, ( डिजिटल रिक्रूटमेंट प्लेटफॉर्म )
गिग इकोनॉमी के उदय से नौकरियों की तलाश करने वालों को अपनी रुचि और कौशल के अनुरूप काम करने के बेहतर अवसर मिले हैं। साथ ही इससे उन्हें वह फ्लेग्जिबिलिटी भी मिलती है, जिसकी उन्हें जरूरत थी। हाल के सालों में गिग इकोनॉमी तेजी से बढ़ी है। इससे उन लोगों के लिए नए अवसर निर्मित हुए हैं, जो परम्परागत रोजगार के बजाय फ्रीलांस या शॉर्ट-टर्म कॉन्ट्रैक्ट्स में रुचि रखते हैं। डिकोडिंग जॉब्स 2023 रिपोर्ट के मुताबिक अनुमान लगाया गया है कि भारत में गिग-वर्कफोर्स 2025 तक बढ़कर 110 लाख लोगों की हो जाएगी। नीति आयोग की 2022 रिपोर्ट का भी पूर्वानुमान है कि 2030 तक गिग इकोनॉमी बढ़कर 2.35 करोड़ कामगारों की हो सकती है। जहां गिग-वर्क लोगों को अपनी शर्तों पर काम करने और काम के घंटे चुनने की आजादी देता है, वहीं इसमें कुछ चुनौतियां भी हैं। इस परिदृश्य को समझते हैं।
क्यों बढ़ रही है गिग इकोनॉमी
आज के डायनैमिक मार्केट में व्याप्त अस्थिरता का सामना करने के लिए गिग-वर्क एक आकर्षक समाधान बनकर सामने आए हैं। अनेक बिजनेस अपने भविष्य की सम्भावनाओं के प्रति अनिश्चित हैं और फुलटाइम कर्मचारियों को नौकरी पर रखने से संकोच कर रहे हैं। ऐसे में गिग-वर्क एक लचीला और किफायती विकल्प मुहैया कराता है। अतीत के ट्रेंड्स बताते हैं कि गिग शैली सफल रही है। मिसाल के तौर पर, उबर जैसे राइड-शेयरिंग प्लेटफॉर्म्स ने ट्रांसपोर्टेशन उद्योग में क्रांति ला दी है। वहीं अपवर्क और फाइवेर्र जैसी फ्रीलांस वेबसाइटों ने वैश्विक बाजार को अपनी सेवाएं मुहैया कराना सरल बना दिया है। इनकी सफलता से हेल्थकेयर और मार्केटिंग में भी गिग-वर्क बढ़ा है। यह संस्थाओं के लिए एक महत्वपूर्ण प्रतिभा-प्रबंधन रणनीति साबित हुआ है। कम्पनियां किसी विशेष टास्क या प्रोजेक्ट के लिए तुरंत ही किसी फ्रीलांसर या स्वतंत्र कॉन्ट्रैक्टर की मदद ले लेती हैं, जिससे उनकी पहुंच विभिन्न प्रकार की स्किल्स, विशेषज्ञता और प्रतिभाओं तक हो जाती है।
चुनौतियां और अवसर
गिग-वर्करों को अकसर भुगतान में देरी या अनियमितता की स्थिति का सामना करना पड़ता है, क्योंकि उनके काम की प्रकृति रेगुलर नहीं होती। उन्हें किसी पूर्णकालिक कर्मचारी जितने लाभ और सुरक्षा नहीं मिल पातीं। वे हेल्थकेयर, रिटायरमेंट प्लान, पेड लीव आदि का लाभ नहीं ले पाते। मौजूदा परिदृश्य में गिग-वर्करों के सामने नौकरियों के सीमित अवसरों की भी चुनौती है। इसके बावजूद उनका भविष्य उजला है। संस्थाएं गिग-वर्क के लिए तैयारियां कर रही हैं और उसके लिए ग्राउंडवर्क कर रही हैं। वे ऐसी टेक्नोलॉजी और प्रक्रियाओं में निवेश कर रही हैं, जिनकी मदद से वे गिग-वर्करों को सुगमता से अपने से जोड़ सकें। 2024 की तीसरी तिमाही तक गिग-कार्यों का पैमाना बढ़ जाएगा। एवाइन जैसे गिग प्लेटफॉर्म देशभर के वर्करों को ढेरों अवसर मुहैया कराते हैं। 15 लाख गिग पार्टनरों और 11 करोड़ पूर्ण किए जा चुके प्रोजेक्ट्स के साथ एवाइन गिग-वर्क के लिए एक भरोसेमंद मंच बन चुका है। अब गिग-इकोनॉमी ब्लू-कॉलर जॉब्स के दायरे से बाहर निकलकर व्हाइट-कॉलर जॉब्स के क्षेत्र में प्रवेश कर रही है, क्योंकि विशेषकर टेक सेक्टर में हाई-स्किल्ड गिग-वर्करों की मांग में 240 फीसदी का इजाफा हुआ है।
आगे की राह
गिग-वर्क की टॉप कैटेगरी ऑडिटिंग, इनविजिलेशन, डाटा ऑपरेशंस बनी हुई हैं। छोटे शहरों और कस्बों में भी गिग-वर्क पार्टिसिपेशन में बढ़ोतरी हुई है। इतना ही नहीं, महिलाएं भी गिग-वर्क के लिए आगे आ रही हैं और उनके गिग-वर्क रजिस्ट्रेशनों में 187 फीसदी का इजाफा हुआ है। देश में गिग-वर्क के भविष्य को सुरक्षित करने के लिए सरकार ने सोशल सिक्योरिटी कोड 2020 के जरिए कदम उठाए हैं, जिसमें गिग-वर्करों के लिए सामाजिक सुरक्षा के उपायों सहित ग्रैच्युटी भी शामिल है। महात्मा गांधी ने कहा था कि भविष्य इस पर निर्भर करता है कि आप आज क्या करते हैं। गिग-वर्क के संदर्भ में यह बात अपनी स्किल्स को बढ़ाने और पर्सनल ब्रांड को स्थापित करने के परिप्रेक्ष्य में समझी जा सकती है। इसमें अपनी अपस्किलिंग करने व विशेषज्ञता बढ़ाने के लिए प्रशिक्षण लेना शामिल है, साथ ही अपने काम को शोकेस करते हुए क्लाइंट्स को आकृष्ट करने के लिए अपनी ऑनलाइन मौजूदगी दर्ज कराना भी जरूरी है। गिग इकोनॉमी से उनके लिए अवसर निर्मित हुए हैं, जो परम्परागत रोजगार के बजाय फ्रीलांस या शॉर्ट-टर्म कॉन्ट्रैक्ट्स में रुचि रखते हैं। भारत में गिग-वर्कफोर्स 2025 तक बढ़कर 110 लाख लोगों की हो जाएगी।
Date:22-04-23
लोक सेवकों की जिम्मेदारीसंपादकीय
लोक सेवा दिवस पर लोक सेवकों को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने यह जो कहा कि यदि उन्होंने अपने दायित्वों का निर्वहन सही तरह नहीं किया तो न केवल देश का धन लुट जाएगा, बल्कि करदाताओं के पैसे भी बर्बाद हो जाएंगे, वह एक यथार्थ है। समस्याओं के समाधान और विकास योजनाओं को गति देने में जितनी महती भूमिका लोक सेवकों की है, उतनी अन्य किसी की नहीं। सरकारें कितनी भी अच्छी योजनाएं बना लें, उनका सही तरह क्रियान्वयन तब तक संभव नहीं, जब तक लोक सेवक उन्हें जमीन पर उतारने के लिए तत्पर नहीं होते। लोक सेवकों से केवल यही अपेक्षित नहीं होता कि वे सरकारी योजनाओं पर सही तरह अमल करें। उनसे यह भी अपेक्षित होता है कि वे जनता की समस्याओं के समाधान को लेकर सचेत रहें। उनका एक अन्य दायित्व यह भी होता है कि वे सरकारी तंत्र में व्याप्त भ्रष्टाचार पर लगाम लगाएं। भ्रष्टाचार को तभी बल मिलता है, जब लोक सेवक या तो उसकी अनदेखी करते हैं या फिर अपने अधिकारों का मनमाना इस्तेमाल करते हुए उसमें शामिल हो जाते हैं। यह किसी से छिपा नहीं कि भ्रष्टाचार के अनेक मामलों में नेताओं और नौकरशाहों की मिलीभगत होती है। यदि नौकरशाह चाह लें तो वे न केवल हर तरह के भ्रष्टाचार पर लगाम लगा सकते हैं, बल्कि उन भ्रष्ट नेताओं के इरादों पर पानी भी फेर सकते हैं, जो अपनी जेबें भरने की कोशिश में रहते हैं।
यह अच्छी बात है कि प्रधानमंत्री ने लोक सेवकों को उनके दायित्वों की याद दिलाते हुए यह रेखांकित किया कि उनकी सक्रिय भागीदारी के बिना देश का तेज गति से विकास संभव नहीं, लेकिन उन्हें यह भी देखना होगा कि उन लोक सेवकों को सही राह पर कैसे लाया जाए, जो अपना काम ढंग से नहीं करते अथवा जो भ्रष्ट नेताओं से हाथ मिला लेते हैं। इसके लिए प्रशासनिक सुधारों की दिशा में आगे बढ़ना होगा। एक ओर जहां ऐसा वातावरण बनाने की आवश्यकता है कि लोक सेवक बिना किसी भय-संकोच अपना काम कर सकें, वहीं दूसरी ओर उनके कार्यों की सतत निगरानी भी सुनिश्चित करनी होगी। निःसंदेह सरकारें सब कुछ नहीं कर सकती, लेकिन ऐसा माहौल तो बना ही सकती हैं कि जो भी कार्य होने हैं, वे सरलता से हों। इस लक्ष्य की प्राप्ति लोक सेवकों की सजगता से ही संभव है। सरकारी तंत्र के कामकाज के तौर-तरीके बदलने के कैसे सकारात्मक प्रभाव होते हैं, इसे इससे समझा जा सकता है कि करीब तीन लाख करोड़ रुपये गलत हाथों में जाने से बचे हैं। यह एक बड़ी उपलब्धि है, लेकिन सरकारी योजनाओं को अभी और प्रभावी तरीके से जमीन पर उतारने की चुनौती है। सौभाग्य से अब वह स्थिति नहीं, जिसमें सरकारी कोष के एक रुपये में से 90 पैसे बिचौलियों की भेंट चढ़ जाते थे, लेकिन सरकारी तंत्र में भ्रष्टाचार तो अभी भी है।
Date:22-04-23
गंभीर हो रहा पृथ्वी पर मंडराता खतरागिरीश्वर मिश्र, ( लेखक पूर्व कुलपति हैं )
व्यस्त दैनिक जीवन में हम सब कुछ अपने को ही ध्यान में रखकर सोचते-विचारते हैं और करते हैं। उस पृथ्वी को भूल जाते हैं, जिस पर हमारा यह जीवनयापन हो रहा है और हमारी बदलती जीवनशैली के कारण इसके अस्तित्व पर ही संकट के बादल मंडरा रहे हैं। जबकि भारतीय चिंतन परंपरा में प्रकृति के सभी तत्वों को प्राथमिकता मिलती आई है। पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश जैसे पंच महाभूत जीवन से घनिष्ठ रूप से संबंधित हैं। वनस्पति, जल, अंतरिक्ष और पृथ्वी को लेकर वैदिक चिंतन में प्रकृति की महिमा का बड़ा बखान किया गया है। वर्ष चक्र की एक यज्ञ के रूप में कल्पना करते हुए ऋग्वेद में वसंत ऋतु को ‘घी’, ग्रीष्म को ‘समिधा’ शरद को ‘हवि’ कहा गया है। पृथ्वी पर वनस्पति, पशु-पक्षी और मनुष्य साथ-साथ रहते आए हैं। वे सहजीवी रहे हैं। सहजीवन में आदान-प्रदान होता है और परस्पर निर्भरता को पहचानते हुए प्रकृति की रक्षा भी की जाती है। प्रकृति ‘माता’ की भांति पूज्य है। वेद में भूमि को मां और स्वयं को पृथ्वी की संतति कहा गया है: माता भूमि: पुत्रोहम् पृथिव्या:। पृथ्वी के प्रति आभार का सहज भाव भारतीय समाज में रहा है। प्रकृति के विभिन्न पक्ष ईश्वर के प्रत्यक्ष शरीर कहे गए हैं। पीपल, नीम और वट के वृक्षों की पूजा की प्राचीन परंपरा रही है। प्राणवायु देने वाले वृक्षों के बिना जीवन की कल्पना ही नहीं की जा सकती। विभिन्न वनस्पतियों के औषधीय गुणों को आयुर्वेद में महत्वपूर्ण स्थान मिला है और ‘वृक्षायुर्वेद’ एक शास्त्र के रूप में विकसित हुआ।
नदी, वृक्ष और पशु-पक्षी मिलकर पारिस्थितिकी का निर्माण करते हैं। पारिस्थितिकी के संतुलन में इनका समान महत्व है। लोक मानस में अभी भी गीतों, कथाओं, जीवन-संस्कारों, लोकाचारों, रीति-रिवाजों तथा उपासना के यज्ञादिक कृत्यों में विभिन्न पौधों और वृक्षों की जीवंत उपस्थिति बनी हुई है। आम्र-पल्लव, दूर्वा और तुलसी-दल के बिना पूजा विधि पूरी नहीं होती। गंगा जैसी नदियों को भी शादी-विवाह जैसे अवसरों पर न्योता देने की प्रथा है। इनमें स्नान कर पुण्य-लाभ कमाने का आकर्षण अभी भी बना हुआ है। कुंभ की परंपरा इसका प्रत्यक्ष प्रमाण है। प्रकृति के प्रति आकर्षण का एक आधार यह भी है कि नैसर्गिक परिवेश का सौंदर्य आत्मिक तृप्ति देने वाला होता है। सागर, वन, झील, पर्वत, वृक्ष और नदी की संगत हमारे आध्यात्मिक जीवन, सृजन और सामुदायिक जीवन को समृद्ध बनाती है। उसका स्वाद लेने के लिए लोग दुर्गम स्थानों की यात्रा करते नहीं थकते। इतिहास से पुष्टि होती है कि नदियां पूरे विश्व में मानव सभ्यता की जननी रही हैं। उन्हीं के निकट संस्कृतियों के विकास की गाथाएं लिखी जाती रही हैं।
भारत में प्राकृतिक संसाधनों को संग्रह कर उपभोग किया जाता रहा, परंतु बाजार केंद्रित अर्थव्यवस्था के साथ संसाधनों के असीमित उपयोग की लालसा बढ़ी। अंग्रेजी उपनिवेश के दौरान उनके अपने हितों के लिए जंगलों की कटाई और खनन का दौर शुरू हुआ और प्राकृतिक संपदा का घोर शोषण आरंभ हुआ। निर्वनीकरण और बांधों का निर्माण आज भी जारी है। यह दुखद है कि पर्यावरण जैसे गंभीर प्रश्न के साथ भी प्रतीकात्मक ढंग से व्यवहार किया जाता है। पर्यावरण की शुद्धता और स्वच्छता का सवाल जीवन से जुड़ा है, परंतु सत्ता और कारपोरेट दुनिया की मिलीभगत के बीच जल, जीवन और जंगल पर बड़ा खतरा मंडरा रहा है। प्रकृतिभक्षी दृष्टि के चलते पारिस्थितिक असंतुलन के फलस्वरूप अब आए दिन अतिवृष्टि, अनावृष्टि, बाढ़, अकाल और तूफान जैसी प्राकृतिक आपदाओं के संकट छाए रहते हैं। प्रजातियां लुप्त हो रही हैं। जैव विविधता घट रही है। आधी सदी से कम समय में पक्षियों, स्तनधारियों, मछलियों, उभयचरों और सरीसृपों में औसतन 68 प्रतिशत कमी आई है। जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र की रक्षा और पुनर्स्थापना आवश्यक है। इस दृष्टि से संयुक्त राष्ट्र द्वारा जीडीपी में प्रकृति के सच्चे मूल्य को भी शामिल करने की बात कही जा रही है।
कृषि योग्य भूमि बनाने के उपक्रम में 50 प्रतिशत वृक्ष खत्म हुए हैं। समुद्र के उपयोग में भारी बदलाव से सामुद्रिक पारिस्थितिकी भी बदली है। उर्वरकों और कीटनाशकों के प्रयोग की वजह से रसायन भारी मात्रा में पर्यावरण को प्रदूषित कर रहे हैं। भूमि का क्षरण हो रहा है। वन आवरण घटने पर है। नदियों के जल स्तर में गिरावट आ रही है। भूजल स्तर घट रहा है। ग्लेशियर खिसक रहे हैं। जीवन शैली में आए बदलाव से तरह–तरह की गैसों का उत्सर्जन हो रहा है। प्रकृति और मनुष्य के बीच संघर्ष का परिणाम पर्यावरण संकट के रूप में आ रहा है। हवा, पानी और भोजन जैसे जीवन के लिए अनिवार्य तत्व घोर प्रदूषण की गिरफ्त में आ रहे हैं। मौसम में बदलाव को लेकर पृथ्वी पर आपातकाल लगाने जैसी स्थिति उभर रही है। पृथ्वी पर हावी हो रहे मनुष्य ने प्राकृतिक संसाधनों की पूरी शृंखला को तनावग्रस्त बना दिया है।
संपूर्ण जैविक विश्व एक इकाई है और मनुष्य को इससे अलग नहीं रखा जा सकता। अन्य तत्वों की तरह वह भी पर्यावरण की व्यवस्था का ही एक हिस्सा है। इसलिए समग्र प्रकृति के साथ जुड़कर और तालमेल के साथ ही आगे बढ़ा जा सकता है। इस दिशा में धरती की सीमा में ही उपभोग और उत्पादन एकमात्र विकल्प है। इसके लिए आमजन के मन में प्रकृति प्रेम का भाव पैदा करना होगा। जल संरक्षण, वृक्षारोपण और जैविक खेती की ओर ध्यान देना होगा। जीव जगत की पारस्परिकता को स्वीकार करते हुए दायित्व बोध जगाना होगा और आत्मीय रिश्ता बनाना होगा। प्रकृति को देखने और उसे महत्व देने के नजरिये को बदलना होगा। इस पृथ्वी दिवस पर हमारा यही संकल्प होना चाहिए।
Date:22-04-23
शहरी समस्याओं के बीच लचीलेपन पर एक नज़रअमित कपूर और विवेक देवरॉय, ( कपूर इंस्टीट्यूट फॉर कंपीटिटिवनेस, इंडिया में चेयर और स्टैनफर्ड यूनिवर्सिटी में लेक्चरर हैं। देवरॉय प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के चेयरमैन हैं )
दुनिया भर के शहर पहले की तुलना में आपस में बहुत अधिक जुड़े हुए हैं और उनकी आबादी का घनत्व भी काफी अधिक बढ़ गया है। इसके सामाजिक और आर्थिक लाभ बहुत अधिक हैं लेकिन इसके साथ ही दिक्कतें भी बढ़ रही हैं। किसी भी शहर के सामने कई तरह की दिक्कतें आती हैं। इनमें प्राकृतिक आपदाओं से लेकर अचानक घटित होने वाली घटनाएं भी शामिल हैं जो आबादी के लिए खतरा उत्पन्न करती हैं।
इसके अलावा अत्यधिक बेरोजगारी, सामाजिक सुरक्षा ढांचे की कमी तथा असमान सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था, गरीबी का प्रभाव आदि समय के साथ किसी समुदाय के सामाजिक ढांचे को क्षति पहुंचाते हैं और तब लगने वाले झटके और अधिक नुकसानदेह हो जाते हैं। आज मांग ऐसे शासन ढांचे की है जो जोखिम को कम करें और बदलते हुए हालात से निपटें। इस संदर्भ में जरूरत इस बात की है कि हम अधिक समायोजन वाला माहौल तैयार करें ताकि जीवन की सुगमता और कारोबार करने की सहजता में सुधार लाया जा सके और शहरी व्यवस्था के लचीलेपन में और अधिक इजाफा किया जा सके।
संयुक्त राष्ट्र का इंसानी बसावट कार्यक्रम यानी यूएन हैबिटेट शहरी लचीलेपन को जिस प्रकार परिभाषित करता है उसका दूसरे शब्दों में यही अर्थ निकलता है कि शहरी लचीलापन दरअसल किसी शहर की व्यवस्था, उसके कारोबारों, समुदायों तथा लोगों की वह क्षमता है जिसके माध्यम से वे तमाम मुश्किलों और तनावों का सामना करते हुए भी हालात से निपटते हैं और समृद्ध होते हैं।
एक शहर अपने बुनियादी ढांचे को मजबूत करके तथा उसकी स्थिरता को चुनौती देने वाले मसलों की बेहतर पहचान करके अपना दायरा तथा अपने रहवासियों की बेहतरी सुनिश्चित कर सकता है। ऐसा करके ही वह यह सुनिश्चित कर सकता है कि तमाम कठिनाइयों के बावजूद शहर का विकास होता रहे। यह शहरीकरण, जलवायु परिवर्तन और वैश्वीकरण जैसे वैश्विक रुझानों को हल करने का मानक भी बनता है।
शहरी लचीलेपन की एक आवश्यकता यह भी है कि शहर अपनी क्षमताओं और अपने समक्ष मौजूद खतरों को व्यापक रूप से परखते रहें। खासतौर पर अपने सर्वाधिक संकटग्रस्त नागरिकों को ध्यान में रखते हुए। शहरी शासन अक्सर खंडित संरचना वाला होता है जहां विभिन्न टीमें संकट से निजात पाने की योजनाएं बनाती हैं, वे टिकाऊपन के मसले पर नजर रखती हैं, आजीविका पर ध्यान केंद्रित करती हैं और अधोसंरचना तथा भू उपयोग नियोजन पर काम करती हैं। आपस में जुड़ी हुई दुनिया में अलग-थलग नियोजन की मदद से शहरीकरण के दायरे को परिभाषित नहीं किया जा सकता है। शहर लोगों और स्थानों से मिलकर बनते हैं और इनमें अक्सर तेजी से परिवर्तन होता है। अगर लचीला शहरी भविष्य तैयार करना है तो यह आवश्यक है कि हम स्थान आधारित एकीकृत समावेशी, जोखिम से बचाव वाली और भविष्योन्मुखी ढंग से समस्याओं को संबोधित करें और उनके हल विकसित करें। जो शहर अपने नियोजन और विकास में लचीलेपन को मूल में रखते हैं वे उसके लाभ को अधिक बेहतर तरीके से हासिल कर पाते हैं। इसमें आबादी, अधोसंरचना, अर्थव्यवस्था और पर्यावरण आदि से संबंधित दबावों और झटकों को बेहतर ढंग से सहने की शक्ति शामिल है।
शहरी क्षेत्र की अन्य चुनौतियां मसलन शहरी आबादी का बढ़ता प्रतिशत (संयुक्त राष्ट्र विश्व शहरीकरण संभावना परियोजना के अनुसार दुनिया की 68 फीसदी आबादी शहरों में रहेगी) आदि ने दबाव बढ़ाया है और इसकी वजह से शहरी बुनियादी ढांचे में तत्काल निवेश बढ़ाने की आवश्यकता है। शहरी जलवायु परिवर्तन शोध नेटवर्क के अनुसार करीब सभी शहर जोखिम में हैं और 70 फीसदी शहर पहले ही जलवायु परिवर्तन का असर झेल रहे हैं। उदाहरण के लिए चूंकि सभी शहरी इलाकों में 90 फीसदी हिस्सेदारी तटीय इलाकों की है इसलिए दुनिया के अधिकांश शहरों में बढ़ते जल स्तर और तूफान के कारण बाढ़ का खतरा भी बहुत अधिक है। हकीकत यह है कि 84 फीसदी से अधिक शहर जहां आबादी की वृद्धि सबसे तेज है, उनमें से अधिकांश एशिया और अफ्रीका में स्थित हैं। इन देशों को जलवायु के क्षेत्र में बड़े खतरों का सामना करना है। सच यह भी है कि कई उच्च जोखिम वाले शहर चुनौतीपूर्ण देशों में स्थित हैं। ये देश कम विकसित हैं, कम आय वाले हैं और कई मामलों में तो ये छोटे द्वीप समूह रूपी देश हैं। शासन संबंधी कमियां और संसाधन की सीमा हालात को और मुश्किल बनाती है। इस संदर्भ में विश्व बैंक का अनुमान है कि दुनिया भर में सालाना 4.5 लाख करोड़ डॉलर की राशि को शहरी बुनियादी ढांचा क्षेत्र में निवेश करने की आवश्यकता है। बुनियादी ढांचे को जलवायु परिवर्तन की दृष्टि से अनुकूल बनाने के लिए 9 फीसदी से 27 फीसदी के प्रीमियम की आवश्यकता होगी। ये तमाम बातें इस बात पर वजन देती हैं कि शहरी लचीलेपन को कहीं अधिक गंभीरता से देखने की आवश्यकता है।
बीते एक दशक से अधिक वक्त में शहरी लचीलापन अंतरराष्ट्रीय विकास की चर्चाओं में प्रमुख जगह ले चुका है। इसने अंतरराष्ट्रीय विकास के लक्ष्यों के ढांचे में खुद को टिकाऊ शहरी विकास के बुनियादी सिद्धांत के रूप में स्थापित किया है, मिसाल के तौर पर पेरिस समझौता। शहरी लचीलेपन की बुनियादी बातों को आर्थिक, सामाजिक और जलवायु लचीलेपन में बांटा जा सकता है। आर्थिक लचीलापन टिकाऊपन के नए वित्तीय ढांचे पर आधारित है। सामाजिक लचीलापन सामाजिक संरक्षण को मजबूत करने या सामाजिक सुरक्षा ढांचे को व्यापक बनाने के इर्दगिर्द केंद्रित है। वहीं जलवायु लचीलापन पर्यावरण के अनुकूल निवेश तथा बेहतर बहुस्तरीय सहयोग पर आधारित है।
इन जोखिमों से सुरक्षा का सबसे बेहतर तरीका यही है कि बेहतर शहरी नियोजन और प्रबंधन किया जाए। सक्रिय शहरी प्रबंधन रणनीति और अधोसंरचना विकास योजनाओं की बात करें तो इन जोखिमों को ध्यान में रखना उल्लेखनीय बात है। इस संदर्भ में संभावित रुख यह हो सकता है कि सभी शहरी निवासियों को अनिवार्य सेवाएं उपलब्ध कराई जाएं और उन परिवारों पर ध्यान दिया जाए जो सबसे अधिक संवेदनशील स्थिति में हैं। नए विकास को दिशा देने के लिए, प्राकृतिक आपदाओं पर आंकड़े जुटाने तथा जलवायु परिवर्तन की घटनाओं को दर्ज करने के लिए जोखिम संबंधी नियोजन को अंजाम दिया जाना चाहिए। शहरी विकास की प्रक्रिया में भागीदारी का इस्तेमाल होना चाहिए और एक ऐसा रुख विकसित करना चाहिए जो तमाम नगर निकाय संस्थाओं में संस्थागत समन्वय बढ़ाने वाला हो तथा मानव तथा वित्तीय संसाधनों को मजबूती प्रदान करने वाला हो।
Date:22-04-23
G-20 में मोटे अनाज को बढ़ावा देने का बेहतरीन अवसरसुरिंदर सूद
दुनिया की 20 सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के समूह G-20 के शीर्ष कृषि शोध संस्थाओं के प्रमुखों के लिए प्राथमिकताएं तय हो गई हैं। वाराणसी में इनकी तीन दिवसीय बैठक आयोजित हुई थी। उन्हें कृषि क्षेत्र के समक्ष चुनौतियों से निपटने के लिए विज्ञान आधारित रणनीति तैयार करनी है। कृषि क्षेत्र के समक्ष ये चुनौतियां समय के साथ विकराल होती जा रही हैं। एक तरफ फसल आधारित खाद्य पदार्थों, भोजन, ईंधन और रेशे की आवश्यकताएं बढ़ती जा रही हैं मगर दूसरी तरफ इन आवश्यकताओं की पूर्ति करने में कृषि क्षेत्र की क्षमता लगातार कम पड़ती जा रही है। कृषि योग्य भूमि का आकार लगातार कम होने एवं इसका क्षरण बढ़ने, प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन, जैव-विविधता में कमी और फसलों की कटाई के बाद होने वाले भारी नुकसान इसके प्रमुख कारण हैं। कुछ अन्य कारणों, मसलन रूस-यूक्रेन युद्ध की वजह से आपूर्ति व्यवस्था में बाधा आने से खाद्य पदार्थों एवं उर्वरकों की कीमतों पर दबाव, मौसम में होने वाले असामान्य बदलाव, सूखा, बाढ़ और कीट एवं फसलों में बढ़ती बीमारियां भी इसके लिए जिम्मेदार हैं।
कोविड-19 महामारी से भी वैश्विक स्तर पर खाद्य संकट (food crisis) और गहरा गया है। यह महामारी थम जरूर गई है मगर इसका असर अब भी देखा जा रहा है। कई विकासशील एवं खाद्यान्न की कमी का सामना कर रहे देशों में स्थानीय स्तर पर भी समस्याएं बढ़ गई हैं। खासकर, उन देशों को अधिक समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है जो खाद्यान्न, उर्वरक और ईंधन की मांग पूरी करने के लिए इनके आयात पर निर्भर हैं। कोविड महामारी के प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष असर के कारण दुनिया में भूखे एवं कुपोषण के शिकार लोगों की संख्या 15 करोड़ तक बढ़ गई है।
दूसरी तरफ, खाद्यान्न देने वाली फसलों की संख्या में भारी कमी आई है। वैसे खाने योग्य उत्पाद देने वाले हजारों पौधे हैं मगर इनमें 40 प्रतिशत से भी कम का उत्पादन वाणिज्यिक स्तर पर बड़े पैमाने पर होता है और इनका व्यापार भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिक नहीं हो पा रहा है। सच्चाई यह है कि दुनिया की आबादी की अधिकांश खाद्य जरूरतें तीन फसलें- चावल (Rice), गेहूं (Wheat) और मक्का (Maize)- पूरी करती हैं। प्राकृतिक आपदाओं जैसे कीट-पतंग, बीमारी या अन्य कारणों से इन फसलों की आपूर्ति में बाधा खाद्य प्रणाली का ढांचा कमजोर कर सकती है जिसका सीधा असर खाद्य सुरक्षा पर होगा। किसी भी सूरत में चाहे, परिस्थितियां सामान्य ही क्यों ना रहें तब भी 2030 तक भुखमरी एवं कुपोषण के प्रभावों को खत्म करने का लक्ष्य (टिकाऊ विकास लक्ष्य) पूरा कर पाना मुश्किल होगा।
भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के महानिदेशक हिमांशु पाठक के अनुसार वाराणसी में आयोजित सम्मेलन का मुख्य लक्ष्य ‘स्वस्थ लोगों एवं धरती के लिए टिकाऊ कृषि एवं खाद्य प्रणाली’ पर ध्यान केंद्रित करना है। इस लक्ष्य के तहत चर्चा और संभावित बहुपक्षीय सहयोग के लिए चार क्षेत्र चिह्नित किए गए हैं। इनमें खाद्य सुरक्षा मजबूत बनाने एवं पोषण में सुधार के लिए विज्ञान एवं तकनीक का बेहतर इस्तेमाल, जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए कृषि क्षेत्र को सबल बनाना, कृषि क्षेत्र में डिजिटलीकरण और कृषि शोध एवं विकास में सार्वजनिक-निजी भागीदारी बढ़ाना शामिल हैं। इस बैठक के लिए मेजबान देश का प्रमुख लक्ष्य भोजन के रूप में कम इस्तेमाल होने वाले एवं अक्सर दरकिनार किए जाने वाली फसलों, खासकर मोटे अनाज (कदन्न) की भूमिका को रेखांकित करना है। इस बात को समझने की जरूरत है कि ये अनाज भोजन में विविधता लाने के साथ ही पोषण की गुणवत्ता में सुधार करने की क्षमता रखते हैं। इसके अलावा कृषि क्षेत्र पर जलवायु परिवर्तन के असर को कम करने के साथ ही ये कम उपजाऊ, क्षरित एवं गैर-सिंचित भूमि पर निर्भर छोटे किसानों की जीविका सुरक्षित करने में भी अहम योगदान दे सकते हैं। इस कदम के पीछे मूल तर्क यह है कि तकनीक एवं आवश्यक तत्त्वों की मदद से इन तीनों अनाज- चावल, गेहूं एवं मक्का- के उत्पादन में बढ़ोतरी से खाद्य की पर्याप्त आपूर्ति जरूर सुनिश्चित हो गई है मगर मोटे अनाज आदि का उत्पादन बढ़ाकर खाद्य सुरक्षा को और अधिक मजबूत बनाया जा सकता है। ये फसलें कृषि कार्यों के लिए प्रतिकूल माहौल में भी अपना वजूद कायम रखती हैं। इन फसलों के जीन में सुधार और बेहतर उत्पादन तकनीक पर बहुत अधिक सार्वजनिक निवेश की भी जरूरत भी नहीं होती है। किसानों को भी इन फसलों के उत्पादन पर उर्वरकों, कीटनाशकों और सिंचाई आदि पर अधिक लागत नहीं आती है। एक और ध्यान देने योग्य बात यह है कि सूक्ष्म अनाज जैसे चावल एवं गेहूं पर शोध एवं विकास पर किए गए निवेश से मिलने वाले लाभ अब कम होने लगे हैं। मगर मोटे अनाज एवं प्राथमिकता की सूची से बाहर अन्य अनाज का उत्पादन बढ़ाने की संभावना काफी अधिक है। नई पादप प्रजनन तकनीक की मदद से ऐसा करना काफी आसान हो गया है।
इस बात को ध्यान में रखते हुए भारत ने मोटे अनाज और अन्य उपेक्षित मगर पोषक तत्त्वों से भरपूर और प्रतिकूल मौसम सहने में सक्षम अनाज के लिए एक नई पहल शुरू करने का प्रस्ताव दिया है। ‘मोटे अनाज एवं अन्य प्राचीन अनाज अंतरराष्ट्रीय शोध’ नाम से शुरू की गई इस परियोजना के तहत विभिन्न फसलों पर काम करने वाली शोध संस्थानों को एक दूसरे से जोड़ने और उत्पादन बढ़ाने और रोग एवं कीटनाशक प्रबंधन पर उनके शोध के बीच समन्वय स्थापित करने के लिए एक ढांचे की स्थापना की जाएगी। यह परियोजना ‘महर्षि’ के नाम से भी जानी जाती है। इसके तहत शोधकर्ताओं को एक दूसरे से जोड़ने और वैज्ञानिकों एवं आम लोगों को आवश्यक जानकारी देने के लिए एक इंटरनेट प्लेटफॉर्म तैयार किया जाएगा। शोध कार्यों को बढ़ावा देने और जागरूकता बढ़ाने के लिए युवा वैज्ञानिकों को पुरस्कार भी दिए जाने की योजना है। यह संस्थान हैदराबाद स्थित भारतीय कदन्न अनुसंधान संस्थान (IIMR) में स्थापित किया जाएगा जहां अंतरराष्ट्रीय अर्द्ध-शुष्क उष्णकटिबंधीय फसल अनुसंधान संस्थान के साथ परस्पर सहयोग बढ़ाया जाएगा। यह संस्थान तेलंगाना में पाटनचेरु में स्थापित किया जाएगा। इस संस्थान का सचिवालय G-20 के सदस्य देशों में बारी-बारी से व्यावहारिक उद्देश्य से अस्थायी रूप से स्थापित किए जा सकते हैं। अगर यह प्रस्ताव G-20 के मुख्य कृषि वैज्ञानिकों की बैठक में स्वीकार हो जाता है तो यह कदन्न (मिलेट) एवं अन्य उपयोगी खाद्य फसलों के विकास के लिए किसी वरदान से कम नहीं होगा। इन फसलों पर आवश्यकतानुसार शोध एवं विकास कार्य नहीं हो पा रहे हैं।
Date:22-04-23
समझौते की राहसंपादकीय
यह अपने आप में विडंबना ही है कि भारत के भीतर ही दो राज्यों के बीच सीमा का मसला करीब पांच दशकों तक उलझा रहा और उसे लेकर दोनों ओर से दावे किए जाते रहे। लेकिन इस मामले में इतने लंबे वक्त के बाद अब जाकर हल का जो रास्ता निकला है, उससे उम्मीद बंधी है कि अरुणाचल प्रदेश और असम इस मुद्दे से आगे निकल कर अब अपने क्षेत्राधिकार में अन्य समस्याओं के हल पर ध्यान देंगे। दरअसल, गुरुवार को केंद्रीय गृहमंत्री की मौजूदगी में असम और अरुणाचल प्रदेश की सरकारों ने अपने बीच पुराने सीमा विवाद को खत्म करने के लिए एक समझौते पर हस्ताक्षर किए। इसके साथ ही यह माना जा रहा है कि पूर्वोत्तर के इन दोनों राज्यों की सीमा पर स्थित एक सौ तेईस गांवों से जुड़ी समस्या का भी हल हो गया है।असम और अरुणाचल प्रदेश लगभग आठ सौ चार किलोमीटर लंबी सीमा साझा करते हैं। लेकिन 1972 में जब अरुणाचल प्रदेश को केंद्रशासित प्रदेश घोषित किया गया था, उसके बाद से ही दोनों राज्यों के बीच यह विवाद चल रहा था। अरुणाचल का दावा था कि मैदानी हिस्सों में कई वन क्षेत्र पारंपरिक रूप से आदिवासी प्रमुखों और समुदायों के होते थे, लेकिन एकतरफा फैसले के तहत उस जमीन को खत्म हो सकता है असम और अरुणाचल सीमा विवाद, अमित शाह की उपस्थिति में दोनों राज्य करेंगे पर साइन दरअसल, इस इलाके में अलग राज्यों के गठन के वक्त ही सीमा के सही निर्धारण को लेकर स्पष्टता नहीं बन पाई थी और यही इस पूरे विवाद की जड़ रही। इसी वजह से समय-समय पर पिछले पचास साल से दोनों राज्यों के बीच आपस में खींचतान चलती रहती थी। यही नहीं, इसी विवाद की वजह से असम और इलाके के चार राज्यों- मेघालय, मिजोरम, नगालैंड और अरुणाचल प्रदेश के बीच अक्सर हिंसा की घटनाएं भी होती रही हैं। इक्का-दुक्का उदाहरणों को छोड़ दिया जाए तो देश भर में अमूमन सभी राज्यों की सीमाओं को लेकर आमतौर पर कोई बड़ी उठापटक या खींचतान नहीं रही है। नए राज्यों के गठन या किसी राज्य के विभाजन को अंतिम रूप दिए जाने के पहले ही अगर सीमा-क्षेत्र का स्पष्ट निर्धारण कर लिया जाए तो शायद इस उलझन से बचा जा सकता है। यह समझना मुश्किल है कि असम और अरुणाचल प्रदेश के बीच का विवाद इतने लंबे वक्त तक क्यों खिंचता रहा। अब इस संबंध में एक रास्ता निकल सका है तो जाहिर है कि इस मसले का समाधान पहले भी निकल आता। मगर ऐसा लगता है कि अब तक इसके लिए ईमानदार राजनीतिक इच्छाशक्ति के साथ ठोस पहल नहीं हो सकी थी। हालांकि पिछले साल जुलाई में असम और अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्रियों ने ‘नामसाई घोषणापत्र’ के जरिए अपने बीच के सीमा विवाद को खत्म करने का संकल्प लिया था। उसमें विवादित गांवों को पहले के एक सौ तेईस के बजाय छियासी तक सीमित करने का फैसला लिया गया था। अच्छी बात है कि टकराव और हिंसा तक के हालात से गुजरने के बाद अब जाकर इस पुराने लंबित विवाद को एक तरह से ‘सौहार्दपूर्ण’ तरीके से सुलझाया गया है। यह एक अहम उपलब्धि है। खासतौर पर पूर्वोत्तर के राज्यों में उथल-पुथल और अक्सर हिंसक टकराव के अतीत को देखते हुए कहा जा सकता है कि इस समझौते से देश के संघीय ढांचे को मजबूत करने और राज्यों के बीच आपसी संबंधों को बेहतर बनाने में मदद मिलेगी। उम्मीद की जानी चाहिए कि इस विवाद का खत्म होना न केवल असम और अरुणाचल प्रदेश में, बल्कि पूर्वोत्तर के अन्य राज्यों में भी सर्वांगीण विकास और शांति का रास्ता साफ करेगा।
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22 April 2023
प्रश्न–407 – (अ) क्या धर्म एवं नैतिकता समान हैं? (100 शब्द)
(ब) आप सुख एवं खुशी में से स्वयं के लिए किसका चयन करेंगे, और क्यों? (100 शब्द)
Question–407 -(a) Are religion and morality the same? (100 words)
(b) Between pleasure and happiness, which one would you choose for yourself, and why? (100 words)
नोट : इसका उत्तर आपको हमें नहीं भेजना है, यह आपके स्वयं के अभ्यास के लिए है।
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Date:21-04-23
It’s The QualityA big cohort of working age population is a huge positive or a dangerous negative. It’s up to govtsTOI Editorials
After over two centuries of being the world’s most populous country, China is expected to be overtaken by India on July 1. The epochal potential of this UNFPA estimate is rooted in the idea that while India’s demography shall keep pushing growth, China’s shrinking population shall shrink its future. But this idea of demography being destiny has a huge caveat, related to the quality of the human capital concerned. The statements coming out of Beijing are seeking to downplay the population trend, but they makea fair point in underlining their “high-calibre workforce”. India simply cannot afford any complacency about being the country with a 254 million cohort aged 15-24 years but must instead work with full energy to ensure many more of them can cash the “talent dividend” advantage that Chinese officials are currently boasting.
Other East Asian economies also made the economic shift from agriculture to manufacturing on the basis of achievements in education and skilling. In India, the combined lack of jobs and job-worthiness has meant that the farm sector’s share in the country’s employed labour force continues to be over 45%, even as its GDP contribution is under 20%. In a changed global environment, new jobs need to come as much from services as manufacturing, and record growth in service exports is good news on this front. But the smart policymaking that can maximise today’s opportunities needs smart data. And on this front it is unconscionable that there is no word from GoI on when Census 2021 shall finally be conducted.
Opposition meanwhile is chasing a caste census, which amounts to an ostrich dance over a painfully inadequate pie. Parliament was told by the Centre last year that between 2014-2022 it had given 700,000 jobs to 220 million applicants – that’s a success ratio of 0. 32%! So when netas feed the sarkari jobs mania, it is really discontent they are feeding. Even if the fifth largest economy inexorably rolls on to become the fourth and third largest with time and a growing population, high unmet per capita needs will threaten its peace. Around a 40% labour force participation rate, around 10% for women, as indicated by CMIE surveys, is a ticking social bomb. Only by facilitating much, much better education and opportunities for our young can we realise the hope of an “Indian century”.
Date:21-04-23
How To Make India A Human Capital PowerhouseInvest in the young people of the most populous nation, in their nutrition, education & skilling. Build on the progress already achievedAmitabh Kant, [ The author is G20 Sherpa, India. ]
UNFPA’s estimate that India has just surpassed China to become the most populous country in the world can be framed another way – by 2030, over 1 billion Indians will be within the working age group of 15-64. This will position India as a powerhouse of human capital and the largest producer of human resources in the world. This presents us with an unprecedented opportunity to leverage our phenomenal demographic dividend.
India’s young are already a big asset. There are over 100 unicorns and more than 80,000 startups. Indian startups are innovating in core sectors such as healthcare, education, agriculture and financial services. India also has the largest pool of STEM graduates and at 47%, is the global leader in STEM women graduates. This youth bulge, if correctly nurtured, will yield critical thinkers, change makers and leaders who will drive India’s growth story in the next few decades.
It is imperative now more than ever to invest in the overall well-being of this young population through a convergent approach across sectors like health, nutrition, education, skill development and financial inclusion.
With 26% of the population in the age group of 10-24, the welfare of adolescents and young adults across urban and rural India must be a key priority for all development programmes. Investment in primary healthcare through schemes like PMJAY, national nutrition missions and education initiatives, including NEP, are already making a difference.
With improved outcomes in health, nutrition and education the young will be better prepared to enter the workforce and contribute to the economy. At that juncture, investment in skill development will play a pivotal role.
To go from ‘Skill India’ to a ‘Skilled India’, the participation of the private sector is pivotal. A private sector-led skilling ecosystem will also ensure that skill development is demand driven and addresses the needs of the market. That’s the key for young, educated people to get jobs. Entrepreneurship is also an important pillar of job creation.
With more skilled young people joining the formal workforce, consumption will increase, giving a fresh boost to the economy. This increase in purchasing power will be fortified by India’s exemplary financial inclusion and digital payments ecosystem. The stellar success of PMJDY accounts, Ru-Pay cards and the UPI platform has already pulled millions into the formal economy.
To fully reap benefits of the demographic dividend, we must also acknowledge that women are the most significant stakeholders in this endeavour. PM Modi has called for prioritising women-led development in the G20 agenda.
● In the coming years, with the increase in India’semployable population, women’s labour force participation rates in India are set to improve.
● The number of women who have a bank account they operate themselves has increased significantly from 53% in 2015-16 to 79% in 2019-21.
● There has been a significant decline in MMR, IMR and U5MR.
● There is greater awareness around women’s sexual health – including hygienic menstrual products and contraceptives.
● Greater access to education, healthcare and specifically family planning services has led to delaying the age at marriage and a decline in fertility in the country.
● India has now achieved a Total Fertility Rate of 2. 0, below the replacement level of 2. 1
This indicates that population explosion is a thing of the past and now what remains is how we make the most of the current composition of our populace. Let’s also remember that to build successful communities led by the young, greater emphasis must be laid on climate action and sustainability as environmental changes are increasingly impacting social and economic dynamics across the world.
For India, the tag of the ‘most populous nation in the world’ is complemented by its position as the world’s largest democracy and fifth largest economy.
India is getting closer to its goal of becoming a global manufacturing hub and can also potentially become the startup capital of the world with one of the largest digital user bases, an enabling policy environment and access to large pools of capital.
India’s G20 presidency is a good reminder that we must utilise our young population, which means we have a low dependency ratio, to achieve sustained and resilient growth. India can become the nerve centre for exporting skilled manpower to the world.
Date:21-04-23
Keep Business Clean From GreenwashingET Editorials
‘Sustainable’ and ‘low carbon’ are buzzwords. As national governments set targets and formulate policies to tackle environmental challenges, a growing number of companies are making voluntary environmental pledges as well. However, with little or no evidence and substantiation of these claims, the potential for ‘greenwashing’ — advertising or marketing spin in which green PR and green marketing are deceptively used — is immense, as has been demonstrated by the Bureau of Indian Standards (BIS) in the case of claims of so-called ‘100% biodegradable plastic products’. Government must develop clear guidelines and criteria on how companies should prove their environmental claims, having these claims checked by an independent and accredited verifier, and a robust environmental labelling scheme that is transparent and reliable.
Acommon approach with clear guidelines will help consumers to make informed choices and aid businesses that take environmental commitments seriously. Requiring businesses to back up claims of green goods and services will provide a level playing field. This will have the benefit of boosting competition among different providers and businesses. This, in turn, will help step up the pace at which economies transition to more sustainable production and consumption patterns. The capacity to credibly measure the environmental sustainability of businesses will add to the credibility of Indian businesses and products, opening global opportunities.
Given the size and diversity of the Indian market and the range of consumers and price sensitivities, regulatory oversight that is not heavy-handed but firm is critical. Self-reporting must be complemented with a robust compliance regime, with disincentives for greenwashing.
Date:21-04-23
Numbers gamecreate economic opportunities to reap the demographic dividendEditorial
The latest State of World Population Report, an authoritative analysis by the UN, has officially stamped what has been known for a while: that India will become the most populous country in mid-2023, surpassing China’s 142.5 crore by about 3 million. These estimates are based on official country data as well as extrapolating birth, mortality and international migration trends. India has had a vacillating relationship with the size of its population. In the ‘socialist’ era, the growing population was a convenient excuse to explain India’s poverty and the state’s inability to improve average standards of living. These seeded deranged ‘sterilisation’ programmes that violently compromised dignity and freedom. Globalisation and the opening up of the economy in the 1990s saw India as a vast, untapped market, with ‘fortunes at the bottom of the pyramid’ that framed population as an advantage. India’s large working age population — or the demographic dividend — relative to the developed countries, where the workforce was ageing, has provided labour-wage arbitrage and valuable economic opportunities. Indian numbers are behind the skilled and unskilled labour that power workforces in West Asia and Africa, undergird business process outsourcing projects from developed European countries and the United States, and are increasingly a significant component of university enrolment abroad.
This relative prosperity, though unable to solve India’s crisis of economic inequality, has, however, busted the myth of forced sterilisation and legal limits on family sizes being key to population control. Despite overtaking China, India’s population growth is slowing. The National Family Health Survey reported in 2021 that the total fertility rate had, for the first time, dipped to below the replacement level of 2.1. India’s population is forecast to grow from its current 1.4 billion to 1.67 billion in 2050 before settling at 1.53 billion in 2100, with the peak at 1.7 billion sometime in 2064, according to UN estimates. While the pendulum of opinion regarding population has swung from ‘disadvantage’ to ‘advantage’ in national discourse, it is relevant to analyse the question while factoring in newer developments. Earlier population debates did not account for the climate crisis and the fact that many migrants, after years of skilled and unskilled labour abroad, were becoming permanent immigrants: over 16 lakh Indians have renounced citizenship since 2011, including 2,25,620 people in 2022, the highest during the period, the External Affairs Minister told Parliament in February. Economic opportunity, more than national pride, shapes the working population’s aspiration and, in its absence, a naturally decelerating population will be of limited advantage.
Date:21-04-23
लोकतंत्र को चाहिए माफिया से मुक्तिप्रकाश सिंह, ( लेखक उत्तर प्रदेश पुलिस के महानिदेशक रहे हैं )
प्रयागराज में माफिया डान अतीक के मारे जाने के बाद ऐसा हंगामा मचा हुआ है जैसे राष्ट्रीय स्तर के किसी बड़े प्रतिष्ठित नेता की हत्या हो गई हो। पिछले 60 वर्षों में मुझे याद नहीं आता कि किसी खूंखार अपराधी के मारे जाने के बाद इतना विवाद खड़ा हुआ हो। ऐसा क्यों हो रहा है? आज की तारीख में विरोधी पार्टियां एकजुट होकर भाजपा को कठघरे में खड़ा कर रही हैं। इसका मुख्य कारण 2024 के लोकसभा चुनाव हैं। विरोधी दल उत्तर प्रदेश की योगी सरकार की छवि मलिन कर अपनी राजनीति चमकाना चाह रहे हैं। इसी कारण एक आपराधिक घटना को तूल दिया जा रहा है। आखिर यह अतीक अहमद था कौन? प्रयागराज में एक तांगे वाले का लड़का, जिसने 17 साल की उम्र में हत्या करके अपराध की दुनिया में प्रवेश किया और फिर कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। उसने हर प्रकार के अपराध किए। मसलन-हत्या, डकैती, बलवा, मारपीट, अपहरण, सरकारी कामकाज में दखल देना, दूसरे की जमीन हड़पना आदि। उसके विरुद्ध कुल 101 एफआइआर दर्ज हैं। आश्चर्य की बात यह है कि उसे पहले किसी अभियोग में सजा नहीं मिली थी। राजनीतिक संरक्षण मिला होने के कारण प्रशासन अतीक के सामने खुद को असहाय पाता था। पुलिस अधिकारियों और मजिस्ट्रेट पर तो वह हावी था ही, इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज भी उससे खौफ खाते थे। उसे केवल जमानत देने के मामले में ही एक के बाद एक 10 जजों ने उसकी सुनवाई में अपनी असमर्थता प्रकट की थी। अतीक को पहली सजा योगी जी के कार्यकाल में ही मिली, जब 28 मार्च 2023 को उसे आजीवन कारावास की सजा हुई।
देश में माफिया की समस्या करीब 50 साल पहले शुरू हुई थी। मुंबई में सबसे पहले माफिया गिरोह का उद्भव हुआ। कालांतर में इनका जाल अन्य शहरों में भी फैलता गया। महाराष्ट्र में दाऊद इब्राहिम, हाजी मस्तान, याकूब मेनन और वर्धराजन मुदलियर के नाम प्रमुख रहे। उत्तर प्रदेश में मुख्तार अंसारी, अतीक अहमद, सुंदर भाटी, श्रीप्रकाश शुक्ला इत्यादि के नाम आते रहे। बिहार में शहाबुद्दीन की चर्चा रही। उल्लेखनीय है कि भारत सरकार ने 1993 में एनएन वोहरा के नेतृत्व में एक कमेटी का गठन किया कि वह इस समस्या का गहन अध्ययन कर उससे निपटने के सुझाव दे। कमेटी ने रिपोर्ट में लिखा था कि माफिया गिरोह कई क्षेत्रों में समानांतर सरकार चला रहे हैं। रिपोर्ट को लेकर संसद में बड़ा हंगामा मचा था, परंतु कोई सकारात्मक कदम नहीं उठाया गया और उठाया भी कैसे जाता? आज हमारे लोकतंत्र में ऐसी विकृतियां आ गई हैं कि सभी पार्टियों ने अपने दरवाजे अपराधियों के लिए खोल दिए हैं। देश में आज कुख्यात अपराधियों, भ्रष्ट नेताओं और अधिकारियों का एक घिनौना गठजोड़ बन गया है। इसे तोड़ना अत्यंत आवश्यक है। अन्यथा यह हमारे लोकतंत्र को भस्म कर देगा। इसे तोड़ना कोई बहुत मुश्किल नहीं है। इसके लिए केवल दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति चाहिए। योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद उत्तर प्रदेश में माफिया का राजनीतिक संरक्षण समाप्त हो गया है, साथ ही उनकी आर्थिक नस भी सरकार ने दबाकर उन्हें निस्तेज किया है। माफिया सरगना के विरुद्ध प्रभावी कानूनी कार्रवाई की जा रही है। मुख्तार अंसारी अभी बांदा जेल में है, उसे एक अभियोग में 10 साल की सजा हो चुकी है।
माफिया विरोधी किसी भी अभियान में कहीं न कहीं कोई चूक हो जाना स्वाभाविक है। ऐसी ही एक चूक 15 अप्रैल को पुलिस से हो गई जब वह अतीक अहमद और उसके भाई अशरफ को डाक्टरी जांच के लिए ले जा रही थी। तीन गुमनाम युवा अपराधियों ने एकाएक मौके पर पहुंचकर अतीक और अशरफ की गोली मार कर हत्या कर दी। पुलिस अभिरक्षा में जानलेवा हमला दुर्भाग्यपूर्ण था और नि:संदेह पुलिस से लापरवाही हुई, परंतु इससे यह निष्कर्ष निकालना कि प्रदेश पुलिस ने इन दोनों अभियुक्तों की हत्या की योजना बनाई थी, सर्वथा गलत होगा। सरकार ने घटना के 24 घंटे के अंदर ही न्यायिक जांच के आदेश दिए। जाहिर है कि वह अपना दामन साफ दिखाना चाहती है। पांच पुलिसकर्मियों को निलंबित भी किया जा चुका है।
घटना की गहराई में जाने के लिए आवश्यक है कि इन तीनों युवा अपराधियों से गहन पूछताछ हो। यह जानना जरूरी है कि बांदा, हमीरपुर और कासगंज के इन युवकों को किसने मिलाया और इनकी टीम बनाई, किस व्यक्ति ने इन्हें हत्या करने के लिए प्रेरित किया, तुर्किये के बने हथियार दिए। जाहिर है कि उन्हें पैसा भी दिया होगा। यह पता लगाया जाना चाहिए कि हत्या के पीछे उद्देश्य क्या था? पुलिस की विवेचना एवं न्यायिक जांच में सच्चाई सामने आ जानी चाहिए। तब तक आरोप और प्रत्यारोप का दौर बंद होना चाहिए। उपरोक्त घटना के पहले अतीक के बेटे असद और उसके साथी गुलाम मोहम्मद को स्पेशल टास्क फोर्स ने एक मुठभेड़ में 13 अप्रैल को झांसी जनपद में मार गिराया था। पुलिस के अनुसार वे दोनों उस पुलिस काफिले को निशाना बनाने की फिराक में थे, जिसमें अतीक को गुजरात से उत्तर प्रदेश ले जाया जा रहा था।
विदेशी मीडिया ने इन घटनाओं को बहुत दुर्भाग्यपूर्ण तरीके से प्रस्तुत किया। बीबीसी ने एक पूर्व सांसद के मारे जाने का उल्लेख किया है, माफिया डान का नहीं। न्यूयार्क टाइम्स ने इस बात पर चिंता प्रकट की कि भारत में ‘एक्स्ट्रा जूडिशियल किलिंग्स’ बढ़ती जा रही हैं। स्पष्ट है कि पश्चिमी जगत अभी भी अपनी औपनिवेशिक मानसिकता एवं श्रेष्ठतावाद से ऊपर नहीं उठ पाया है। न्यूयार्क टाइम्स को शायद यह बताने की आवश्यकता है कि अमेरिका में हर वर्ष पुलिस द्वारा करीब 1,000 व्यक्ति मार दिए जाते हैं।
अतीक-अशरफ हत्याकांड में पूरा दोष पुलिस के मत्थे मढ़ा जा रहा है। पुलिस का दोष अवश्य है, परंतु क्या मजिस्ट्रेट और जजों की कोई जिम्मेदारी नहीं बनती। वहीं नेताओं का एक वर्ग सत्ता के लिए किसी से भी सांठगांठ करने को तत्पर रहता है। अगर माफिया, नेता और सरकारी कर्मियों का यह गठजोड़ नहीं तोड़ा गया, पुलिस को बाहरी दबाव से मुक्त करने की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए और संसद एवं विधानसभाओं में आपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों की संख्या इसी तरह बढ़ती रही तो भविष्य में और भी अधिक जघन्य घटनाएं घटित होती रहेंगी।
Date:21-04-23
बढ़ती जनसंख्या से भी मिले आजादीमनु गौड़, ( लेखक जनसंख्या नीति विशेषज्ञ हैं )
आज से 75 साल पहले पृथ्वी के 2.4 प्रतिशत भूभाग पर 14.9 प्रतिशत आबादी वाले भारत को स्वतंत्रता मिली। इसी के साथ तेजी से बढ़ रहे भारतवासियों के अच्छे जीवन के लिए अच्छी शिक्षा-चिकित्सा, पर्याप्त भोजन और रोजगार आदि उपलब्ध कराने की चिंता की जाने लगी। आजादी के तुरंत बाद सरकार को समझ आ चुका था कि इतनी बड़ी आबादी के लिए संसाधन उपलब्ध कराना भविष्य में कठिन होगा। 1951 में स्वतंत्र भारत की पहली जनगणना कराई गई और पाया गया कि भारत की कुल जनसंख्या लगभग 36 करोड़ है। इसी को ध्यान में रखते हुए भारत ने 1952 में दुनिया का पहला परिवार नियोजन कार्यक्रम प्रारंभ किया। इसके बावजूद 1961 की जनगणना में भारत की आबादी बढ़कर लगभग 44 करोड़ होने के साथ चिंताएं और बढ़ीं। इसी को ध्यान में रखते हुए वर्ष 1963 में भारत सरकार द्वारा देश का पहला विस्तृत कंडोम वितरण कार्यक्रम चलाया गया। उस कंडोम का नाम ‘कामराज’ रखा गया, परंतु तत्कालीन कांग्रेस पार्टी के अध्यक्ष का नाम के. कामराज होने के कारण उसका नाम बदल कर ‘निरोध’ रख दिया गया। वर्ष 1966 में भारत के नागरिकों को परिवार नियोजन के लिए गर्भ निरोधक सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए हिंदुस्तान लेटेक्स लिमिटेड नामक एक पीएसयू की स्थापना की गई। इस सबके बावजूद 1971 की जनगणना में देश की आबादी बढ़कर लगभग 55 करोड़ हो गई। अभी तक परिवार नियोजन हमारे संविधान का अंग नहीं था। वर्ष 1976 में संविधान के 42वें संशोधन द्वारा संविधान की सातवीं अनुसूची में वर्णित समवर्ती सूची में जनसंख्या नियंत्रण और परिवार नियोजन को जोड़ा गया। जनसंख्या नियंत्रण के लिए वृहद स्तर पर लक्ष्य आधारित नसबंदी कार्यक्रम भी चलाए गए। उस समय भारत में लगभग 62 लाख लोगों की नसबंदी कराई गई। इन सभी प्रयासों के बाद भी 1981 की जनगणना में देश की जनसंख्या बढ़कर लगभग 68 करोड़ हो गई।
पिछली सदी के छठे दशक में भारत के जनसंख्या नियंत्रण कार्यक्रमों को दृष्टिगत रखते हुए चीन ने भी इस दिशा में प्रयास शुरू किए और चीन को उस लक्ष्य की पूर्ति में सफलता भी मिलने लगी। 1979 में भारत की प्रति व्यक्ति आय और अर्थव्यवस्था चीन के लगभग बराबर थी। जबकि चीन क्षेत्रफल और संसाधनों की दृष्टि से भारत से तीन गुने से भी अधिक बड़ा है। जनसंख्या नियंत्रण के पश्चात चीन की अर्थव्यवस्था भारत की तुलना में आज कहां है, इसे बताने की आवश्यकता नहीं।
जनसंख्या नियंत्रण के उद्देश्य से 1983 में देश का पहला निजी विधेयक संसद में प्रस्तुत किया गया। तब से लेकर आज तक विभिन्न दलों के 45 सांसदों ने संसद में जनसंख्या नियंत्रण के लिए निजी विधेयक पेश किए। नेशनल हेल्थ पालिसी, 1983 में बताया गया कि कुल प्रजनन दर (टीएफआर) में गिरावट की मौजूदा दर के हिसाब से भारत वर्ष 2000 में प्रतिस्थापन स्तर यानी 2.1 टीएफआर को प्राप्त कर लेगा। जबकि वर्तमान राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे-5 के अनुसार देश ने उस दर को 2022 में प्राप्त किया। यह सिद्ध करता है कि जिस तेजी से हमारी जनसंख्या कम होनी चाहिए थी, उतनी तेजी से कम नहीं हुई। भारत की बढ़ती जनसंख्या की चिंता के बाद भी 1991 की जनगणना के अनुसार भारत की जनसंख्या 68 करोड़ से बढ़कर लगभग 85 करोड़ हो गई।
जनप्रतिनिधि एवं अधिकारी समाज के लिए एक आदर्श बनें। उन्हें देखकर अन्य देशवासी भी कम बच्चों को जन्म देने के लिए प्रेरित हो सकें, ऐसी मंशा से पीवी नरसिंह राव सरकार द्वारा दो महत्वपूर्ण निर्णय किए गए। पहला 79वां संविधान संशोधन विधेयक पेश किया गया। इसके जरिये विधायकों और सांसदों को दो बच्चों की नीति के दायरे में लाना था। यदि वह बिल संसद में पास हो जाता तो दो से अधिक बच्चों वाला कोई भी व्यक्ति विधायक या सांसद नहीं बन सकता था, परंतु अनेक सांसदों और दलों के विरोध के कारण उस बिल पर चर्चा नहीं हो सकी। इसके बाद आल इंडिया सर्विसेज कंडक्ट रूल्स, 1968 में संशोधन करके 17ए जोड़ा गया। उसके अनुसार भारतीय प्रशासनिक सेवा, भारतीय पुलिस सेवा एवं भारतीय वन सेवा के सभी अधिकारियों पर दो से अधिक बच्चों को जन्म देने पर प्रतिबंध लगा दिया गया, परंतु जनसंख्या नियंत्रण के उद्देश्य से बने इस नियम का आज तक पालन नहीं किया जाता। वर्ष 2000 में भारत में नई जनसंख्या नीति लागू की गई। इसके बावजूद भारत की जनसंख्या 2011 की जनगणना के अनुसार 2001 में 102 करोड़ से बढ़कर 121 करोड़ हो गई। लाल किले से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी भी जनसंख्या विस्फोट के विषय में देश को आगाह कर चुके हैं, जिसे गंभीरता से लेने की आवश्यकता है। कोविड-19 के कारण 2021 में होने वाली जनगणना समय से नहीं हो पाई, जिससे जनसंख्या के वर्तमान आंकड़ों के बारे में नहीं बताया जा सकता, लेकिन हाल में आई संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष की रिपोर्ट के अनुसार भारत ने जनसंख्या में चीन को पीछे छोड़कर विश्व में प्रथम स्थान प्राप्त कर लिया है।
सोचने की बात है कि जनसंख्या नियंत्रण के विषय में विश्व में सबसे पहले सोचने वाला हमारा देश आज दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश बन चुका है और फिर भी कुछ बुद्धिजीवी जनसंख्या नियंत्रण के लिए उचित नीति बनाने के विरोध में लगातार कुतर्क करते हैं। जब हम आजादी के 75 वर्षों बाद आजादी का अमृतकाल मना रहे हैं तब एक प्रश्न मन में जरूर आना चाहिए कि भारत को कब मिलेगी बढ़ती आबादी से आजादी?
Date:21-04-23
जनसंख्या बलसंपादकीय
आबादी किसी भी देश की तरक्की का बड़ा आधार होती है, मगर इसके साथ ही संसाधनों पर उसका बोझ बढ़ने से कई दुश्वारियां भी पैदा होती हैं। इसलिए स्वाभाविक ही आबादी के मामले में भारत के शीर्ष पर पहुंचने को लेकर एक तरफ उत्साह है, तो दूसरी तरफ चिंताएं भी गहरी हुई हैं। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष के आंकड़ों के मुताबिक भारत ने आबादी के मामले में चीन को पीछे छोड़ दिया है। हालांकि कुछ लोगों में इस आंकड़े को लेकर भ्रम की स्थिति बनी रही कि भारत इस पायदान पर अभी पहुंच गया है या दो महीने बाद यानी जून तक पहुंचेगा। मगर बहस इस बात पर होनी चाहिए कि इस जनसंख्या वृद्धि के निहितार्थ क्या हैं। ताजा आंकड़े जारी होने के बाद चीन ने कहा है कि उसके पास अब भी नब्बे करोड़ से अधिक लोगों का गुणवत्ता वाला मानव संसाधन है। चीन की पीड़ा समझी जा सकती है। दरअसल, जनसंख्या के बल पर ही उसने नब्बे के दशक से आर्थिक तरक्की की है। हालांकि पंद्रह से चौंसठ साल आयुवर्ग की कामकाजी आबादी के मामले में चीन अब भी भारत से आगे है। भारत की अपेक्षा उसके पास इस आयुवर्ग के एक करोड़ लोग अधिक हैं। मगर चौदह साल से कम उम्र की आबादी के मामले में भारत की तुलना में चीन काफी पिछड़ गया है। यानी आने वाली कामकाजी पीढ़ी भारत के पास अधिक होगी। इसी तरह चीन में जीवन की अवधि भारत की अपेक्षा अधिक होने की वजह से उस पर बुजुर्ग आबादी का बोझ अधिक है।
माना जा रहा है कि भारत अपनी आबादी के बल पर विकास के रास्ते पर तेजी से आगे बढ़ेगा। पिछले कुछ सालों में इसकी विकास दर पर इसका असर भी साफ देखा गया है। हालांकि चीन ने अपनी प्रजनन दर पर काफी अंकुश लगाया है। भारत भी इस दिशा में सतर्क है और उसकी प्रजनन दर 2.2 से घट कर 2.0 पर आ गई है। इसलिए वह अनिवार्य परिवार नियोजन जैसी योजना पर कोई कदम नहीं बढ़ा रहा। हालांकि उसे संसाधनों पर बढ़ते आबादी के दबाव को कम करने में काफी वक्त लगेगा। एक तरफ जलवायु परिवर्तन के चलते खाद्यान्न उत्पादन पर असर देखा जा रहा है, तो दूसरी तरफ रोजगार के मोर्चे पर अपेक्षित कामयाबी नहीं मिल पा रही है। इससे संबंधित तमाम योजनाएं अपने लक्ष्य तक नहीं पहुंच पा रही हैं। ऐसे में विकास दर की रफ्तार कितनी तेज होगी, फिलहाल दावा करना मुश्किल है।
शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने में सरकार को खासी मशक्कत करनी पड़ती है। आबादी अधिक होने का ही नतीजा है कि इन दोनों क्षेत्रों में सरकार पर्याप्त बजटीय आबंटन नहीं कर पाती। चौदह साल तक की उम्र के सभी बच्चों को मुफ्त और अनिवार्य शिक्षा का कानून होने के बावजूद साठ फीसद से कम ही बच्चे उच्चतर माध्यमिक कक्षाओं तक पहुंच पाते हैं। ऐसे में कौशल विकास संबंधी योजनाओं की सफलता भी प्रश्नांकित होती रहती है। फिर सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं पर जनसंख्या का अधिक दबाव होने की वजह से गुणवत्तापूर्ण सुविधाएं उपलब्ध कराना चुनौती बना हुआ है। इसके चलते कई तरह की सामाजिक विसंगतियां भी नजर आती हैं। जनसंख्या का दबाव खेती-किसानी, वनभूमि, पर्यावरण पर भी साफ देखा जाता है। खेत का जोत घट रहा है, मकानों के लिए जगह की जरूरत बढ़ रही है, इसके लिए पर्यावरण पर अतिक्रमण भी बढ़ रहा है। इस तरह जो आबादी एक तरफ वरदान नजर आ रही है, वही दूसरी तरफ मुसीबत बन रही है।
Date:21-04-23
जनसंख्या की चुनौतीसंपादकीय
संयुक्त राष्ट्र द्वारा जारी ताजा आंकड़ों के अनुसार भारत की जनसंख्या 142.86 करोड़ हो गई है और अब भारत आबादी के मामले में चीन को पीछे छोड़कर दुनिया के शीर्ष पर आ पहुंचा है। चीन की आबादी निरंतर कम हो रही है जबकि भारत की आबादी बढ़ रही है। बढ़ती आबादी दशकों से चिंता का विषय रही है और समय-समय पर इसके नियंत्रण के प्रयास भी किए जाते रहे हैं। कुछ वर्ष पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लाल किले से अपने भाषण में इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया था, लेकिन अभी तक जनसंख्या नियंत्रण की कोई ठोस नीति या रणनीति सामने नहीं आ पाई है। इस बढ़ती जनसंख्या को लेकर कतिपय विद्वानों का मानना है कि भारत को इससे परेशान होने की जरूरत नहीं है। देश की कुल आबादी में 25 फीसद लोग 0.14 साल के आयुवर्ग के हैं। यानी देश की आबादी का बहुत बड़ा हिस्सा युवा है जो वस्तुतः भारत की शक्ति है। अन्य किसी भी देश की तुलना में भारत की यह युवा शक्ति वस्तुतः उसकी कार्यशक्ति है और इसमें प्रगति की अपार संभावनाएं मौजूद हैं। अगर भारत की अपनी युवा शक्ति का नियोजन कर लेता है तो इससे उसके लिए अवसरों के द्वार भी खुल सकते हैं। दूसरी ओर, वर्तमान भारत की जो जटिल स्थितियां हैं वे दूसरी ओर इशारा करती हैं। इतनी विशाल युवा शक्ति का सही इस्तेमाल केवल तभी हो सकता है जब उसके लिए शिक्षा और स्वास्थ की सुविधाएं उपलब्ध हों, लेकिन वर्तमान भारत ऐसा करने में कहीं से भी सक्षम दिखाई नहीं देता। बेरोजगारों की एक विराट फौज यहां खड़ी है जिसकी भूमिका को सामाजिक तौर पर परखा जाए तो यह निराशा ही नहीं, चिंता पैदा करने वाली स्थिति है। कुल मिलाकर भारत के पास न तो वह शिक्षा व्यवस्था है जिससे कि वह युवाओं को इतना सक्षम बना सके कि वे इस औद्योगिक युग में अपनी भूमिका तलाश सकें और न ही उसके कृषि और उद्योग क्षेत्र में ऐसे अवसर हैं। जिनसे जुड़कर ये युवा देश की अर्थव्यवस्था में अपना योगदान दे सकें। वस्तुतः भारत की विराट आबादी उसकी सबसे विराट समस्या है। अगर अब जनसंख्या नियंत्रण के मजबूत उपाय नहीं किए गए और व्यावहारिक नीतियां नहीं बनाई गईं तो गंभीर समस्याएं खड़ी हो सकती हैं और अराजकता की ऐसी स्थिति पैदा कर सकती है जिस पर नियंत्रण करना किसी भी सरकार के लिए संभव ही न रहे।
Date:21-04-23
वार्ता से क्या हासिलडॉ. एन. के. सोमानी
भूटान नरेश जिग्मे खेसर नामग्याल वांगचुक पिछले दिनों भारत के दौरे पर आए। तीन दिन के भारत प्रवास के दौरान उन्होंने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, विदेश मंत्री एस. जयशंकर, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत भाल से मुलाकात की। तमाम मुलाकातों और द्विपक्षीय वार्ताओं के दौरान दोनों देशों द्वारा राष्ट्रीय हितों से जुड़े विभिन्न मुद्दों एवं द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने जैसे सामान्य स्तर के पहलुओं पर चर्चा किए जाने के समाचार तो हैं, लेकिन दौरे की बड़ी उपलब्धि क्या रही या रणनीतिक रूप से किस देश को क्या हासिल हुआ ऐसा अभी तक खुलकर सामने नहीं आया है । हां, विदेश सचिव विनय क्वात्रा ने दौरा संपन्न होने के बाद संयुक्त घोषणा पत्र की जानकारी देते हुए मीडियाकर्मियों से यह जरूर कहा कि भारत और भूटान अनुकरणीय संबंध साझा करते हैं, जो विश्वास, सद्भावना और आपसी समझ की विशेषता है।
डोकलाम मामले में भूटान के बदले हुए रुख की पृष्ठभूमि के बीच भूटान नरेश का भारत दौरा न केवल भारत, बल्कि चीन के रणनीतिक हल्कों में भी उत्सुकता का कारण बना हुआ था। लेकिन संयुक्त घोषणा में इस बात का कोई उल्लेख नहीं किया गया कि डोकलाम पर भूटान का स्टैंड क्या रहा । ऐसे में सवाल यह कि डोकलाम को लेकर भारत भूटान के प्रति इतना संजीदा क्यों नहीं है। कहीं ऐसा तो नहीं कि चीन को लेकर भारत इन दिनों जिस डिफेंसिव मोड पर है, उसकी प्रतिछाया भारत भूटान रिश्तों पर भी पड़ रही हो। पिछले दिनों भूटान के प्रधानमंत्री लोटे शेरिंग बेल्जियम की यात्रा पर गए थे। यात्रा के दौरान उन्होंने एक अखबार को इंटरव्यू में कहा कि डोकलाम विवाद में भारत, चीन और भूटान बराबर के पक्षकार हैं, कोई छोटा-बड़ा नहीं है। जब भी भारत-चीन चाहेंगे भूटान बातचीत करने के लिए तैयार रहेगा । निस्संदेह शेरिंग का वक्तव्य भारत को असहज करने वाला था। इससे पहले भूटान ने कभी भी डोकलाम मसले पर चीन को पक्षकार नहीं माना था। इसके अलावा शेरिंग ने डोकलाम में अतिक्रमण के सवाल पर चीन को क्लीन चिट देते हुए कहा कि चीन ने भूटान की सीमा में किसी तरह का कोई अतिक्रमण नहीं किया है जब कि सेटेलाइट तस्वीरों में भूटान की जमीन पर चीन द्वारा बसाए गए गांव साफ देखे जा सकते हैं। तस्वीरों में खुलासा हुआ कि चीन डोकलाम पठार के 9 किमी पूर्व दिशा की ओर भूटान के क्षेत्र में एक गांव बसा लिया है।
यह वही जगह है, जहां 2017 में भारत और चीन के सैन्य बलों के बीच झड़प हुई थी जबकि भूटानी पीएम कह रहे थे कि ये कथित बस्तियां भूटानी क्षेत्र में नहीं आतीं। शेरिंग का बयान उनके पांपरिक स्टैंड से अलग और नया था। उनके बयान पर चीनी प्रभाव की झलक देखी जा सकती थी। दूसरी ओर भारत का हमेशा से कहना है कि डोकलाम मसले पर चीन का कोई दखल नहीं होना चाहिए। 2019 तक भूटान भी भारत के इस स्टैंड पर उसके साथ खड़ा था। ऐसे में सवाल है कि नेपाली पीएम ने भारत को परेशान करने वाला बयान क्यों दिया। कहीं ऐसा तो नहीं कि डोकलाम के मोर्चे पर भूटान चीन की आड़ में भारत से किसी तरह की सौदेबाजी की इच्छा रखता हो। कयास तो ये भी लगाए जा रहे हैं कि भूटान अपनी जमीन चीन को सौंप सकता है। पीएम शेरिंग की मंशा पर सामरिक हल्कों में भी सवाल उठाए गए थे।
आर्थिक रूप से अल्पविकसित राष्ट्र भूटान की अर्थव्यवस्था कमजोर है, तथा वह मदद के लिए भारत और चीन पर निर्भर है। भूटान के सामाजिक-आर्थिक विकास में भारत का योगदान 1961 में उस वक्त ही शुरू हो गया था जब भारत ने भूटान की पहली और दूसरी पंचवर्षीय योजनाओं को आगे बढ़ाने में वित्तीय मदद की थी। 2018-23 के बीच भारत ने भूटान ‘के विकास के लिए 4500 करोड़ की वित्तीय सहायता दी है। भूटान भी भारत को प्रति वर्ष करोड़ों रुपयों की बिजली बेचकर अपनी अर्थव्यवस्था को विकसित कर रहा है। लैंडलॉक्ड देश होने के कारण भूटान अपनी जरूरतों का 75 प्रतिशत सामान भारत से आयात करता है। उसका 95 प्रतिशत निर्यात भी भारत से ही है। भारत भूटान के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) का भी सबसे बड़ा स्रोत है। | भूटान भारत की सुरक्षा चिंताओं को लेकर संधि से भी बंधा हुआ है। भारत की सहमति के बिना किसी तीसरे देश से सीमा संबंधी समझौता नहीं कर सकता। ऐसे में भूटान के भीतर एक तबके का मानना है कि भारत पर भूटान की इतनी निर्भरता ठीक नहीं है, और अर्थव्यवस्था के मोर्चे पर उसे चीन के साथ भी संबंध मजबूत बनाने चाहिए।
दूसरी ओर, चीन भारत भूटान संबंधों को अपनी विस्तारवादी नीतियों में बाधा मानता है। दूसरे दक्षिण एशियाई देशों की तरह भूटान में भी वह पैठ जमा रहा है। इसी साल जनवरी में चीन के कुनमिंग शहर में सीमा संबंधी मुद्दे पर चीन-भूटान विशेषज्ञों की बैठक हुई थी। दोनों देश सीमा विवाद सुलझाने के लिए बातचीत में तेजी लाने पर सहमत हुए हैं। पिछले पांच-छह सालों के दौरान चीन ने जिस कूटनीतिक तरीके से भूटान के रुख में बदलाव किया है, उससे भारत की सुरक्षा चिंता बढ़ी है। डोकलाम झड़प भी उसकी विस्तारवादी नीति का ही हिस्सा है। चीन चाहता है कि इस ट्राइजंक्शन को अंतरराष्ट्रीय मानचित्र पर सात किमी. दक्षिण में दिखाया जाए जिससे तकनीकी तौर पर पूरा डोकलाम इलाका चीन के कब्जे में आ जाए। सच तो यह है कि रणनीतिक रूप से महत्त्वपूर्ण डोकलाम भूटान से कहीं अधिक भारत के लिए जरूरी है। डोकलाम भारत-चीन संघर्ष में चीन के विरुद्ध भारत को एक सैन्य विकल्प प्रदान करता है। अगर डोकलाम पर चीन का नियंत्रण हो जाता है, तो भारत के पूर्वोतर राज्य सिलीगुड़ी तक चीन की सीधी पहुंच हो जाएगी। यही वजह है कि डोकलाम मामले में भूटान के बदले हुए रुख की पृष्ठभूमि के बीच भूटान नरेश का भारत दौरा न केवल भारत, बल्कि चीन के रणनीतिक हल्कों में भी उत्सुकता का कारण बना हुआ था। भारत दौरे के दौरान भूटान नरेश जिस सहज और सरल तरीके से भारतीय नेताओं से मिले हैं, उससे स्पष्ट है कि वे भारत के साथ द्विपक्षीय संबंधों को विस्तार देने के साथ-साथ डोकलाम मुद्दे पर भारत की चिंताओं को समझते हैं। इसके बावजूद डोकलाम पर भूटान नरेश की आश्चर्यजनक चुप्पी भारत के सामरिक हल्कों में हैरानी का कारण बनी हुई है। यह हैरानी तब और अधिक बढ़ जाती जब भारत भी इस मुद्दे पर पूरी तरह से चुप्पी साधे हुए है।
Date:21-04-23
सेहत की दुनिया में नए हक का आगाजराजीव दासगुप्ता, ( प्रोफेसर, जेएनयू )
आबादी के मामले में भारतीयों की संख्या विश्व में सर्वाधिक होने के साथ ही यह सवाल भी तैरने लगा है कि समाज के आखिरी छोर पर खड़े नागरिक तक बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं कैसे पहुंचाई जाएं? मानव विकास रिपोर्ट, 2020 के मुताबिक, अस्पतालों में हर 10,000 भारतीयों पर महज पांच बेड उपलब्ध थे, और इतनी ही आबादी पर डॉक्टरों की संख्या आठ के करीब। हालांकि, पिछले साल संसद में सरकार ने बताया कि भारत में डॉक्टर और मरीज का अनुपात 1:834 हो गया है, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन के मानक (प्रति हजार लोगों पर एक डॉक्टर) से बेहतर है। यह स्वास्थ्य ढांचे की सुधरती तस्वीर का एक महत्वपूर्ण संकेत है।
इस परिप्रेक्ष्य में 21 मार्च को राजस्थान सरकार का स्वास्थ्य का अधिकार कानून लागू करना काफी अहम है। यह कानून राज्य के प्रत्येक निवासी को हरेक सरकारी और कुछ निजी अस्पतालों में मुफ्त इलाज का हक देता है। निस्संदेह, स्वास्थ्य काफी जरूरी मसला है। सतत विकास लक्ष्य- 2030 का एक प्रमुख एजेंडा भी सभी की स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंच, यानी सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज है। केंद्र सरकार ने इसी लक्ष्य के मद्देनजर आयुष्मान भारत प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना की शुरुआत की थी। आयुष्मान भारत कार्यक्रम के दो स्तंभों में से एक प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना (पीएमजेएवाई) का उद्देश्य दूसरे और तीसरे स्तर के अस्पतालों में भर्ती होने संबंधी खर्चों से लोगों को आर्थिक सुरक्षा देना है। राजस्थान सरकार का यह स्वास्थ्य का अधिकार भी सतत विकास लक्ष्य के अनुरूप ही है।
राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के 60वें (2004), 71वें (2014) और 75वें (2017-18) दौर में यह पाया गया था कि करीब तीन चौथाई क्रमश: 79.3, 75 और 70 प्रतिशत लोगों ने निजी क्षेत्र में बतौर बाह्य रोगी इलाज कराया। 75वें दौर के सर्वे में शामिल 58 फीसदी लोगों ने निजी अस्पताल में भर्ती होकर इलाज की बात कही। इतना ही नहीं, 60वें दौर में निजी क्षेत्र में इलाज का औसत खर्च 25,408 रुपये पाया गया था, जो 75वें दौर में बढ़कर 34,552 रुपये हो गया। जाहिर है, बेहतर स्वास्थ्य सुविधा अब खर्चीली कवायद है। खासतौर से निजी अस्पतालों में महंगे इलाज के बारे में हम जानते ही हैं।
ऐसे में, राजस्थान सरकार की ताजा पहल लोगों को राहत पहुंचाती नजर आ रही है। इस अधिनियम के मुताबिक, डॉक्टरों से परामर्श लेना, दवा, जांच, आपातकालीन देखभाल सहित तमाम स्वास्थ्य सेवाएं मुफ्त उपलब्ध कराई जाएंगी। यहां तक कि जिन मामलों में कानूनी जांच-पड़ताल की आवश्यकता होगी, उनमें भी कोई सरकारी या निजी अस्पताल महज पुलिसिया कार्रवाई न होने की बात कहकर इलाज करने से मना नहीं कर सकेगा।
आखिर इलाज के क्रम में आर्थिक सुरक्षा क्यों जरूरी है? संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक, सार्वभौमिक स्वास्थ्य सुविधा का अर्थ है, हर व्यक्ति को, हरेक जगह बिना किसी आर्थिक चिंता के जरूरी स्वास्थ्य सुविधाओं की उपलब्धता। मगर चिंता इसलिए बढ़ गई है, क्योंकि यह माना जा रहा है कि ठोस प्रयासों की कमी और अपर्याप्त निवेश के कारण विश्व इस सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज के लक्ष्य से भटक रहा है। कोविड-19 महामारी के सबक, डिजिटल स्वास्थ्य तकनीक जैसे नवाचार और समुदाय आधारित सेवाओं से निश्चय ही प्राथमिक स्वास्थ्य तंत्र को मजबूत बनाया जा रहा है, ताकि सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज पाया जा सके, फिर भी, सतत विकास लक्ष्य के 33 संकेतकों में से 19 में भारत अभी लक्ष्य से दूर है। विशेष रूप से गरीबी मिटाने, भुखमरी खत्म करने, बेहतर स्वास्थ्य और समृद्धि से जुड़े लक्ष्यों को पाने के लिए हम अनवरत प्रयास कर रहे हैं। इस लक्ष्य तक पहुंचने का आधा सफर सितंबर, 2023 में पूरा हो जाएगा। जाहिर है, केंद्र व राज्य सरकारें अब जो कुछ भी कर रही हैं, वे हमारी खुशहाली के लिए सुखद साबित होंगी।
ऐसे में, इस कानून की कमियों पर गौर करना उल्लेखनीय होगा। इसकी आलोचना इस वजह से हो रही है कि यह केवल राजस्थान के लोगों तक सीमित है। हालांकि, अधिनियम में ‘निवासी’ को राज्य के मूल बाशिंदे या वर्तमान में राज्य में रहने वाले नागरिक के रूप में परिभाषित किया गया है। कानूनी जानकारों का यह भी कहना है कि मुफ्त स्वास्थ्य सेवाएं देने के बाद निजी अस्पताल अपने खर्च किस तरह से सरकार से वसूल सकेंगे, इसके बारे में भी पर्याप्त प्रावधानों का अभाव है। नतीजतन, निजी अस्पताल संविधान के अनुच्छेद 19 (1) (जी) का उल्लंघन कर सकते हैं। इसी तरह, जिला स्वास्थ्य प्राधिकरण को शिकायतों के लिए वेब पोर्टल पर एक कार्रवाई रिपोर्ट अपलोड करना अनिवार्य किया गया है, लेकिन यह साफ नहीं है कि कौन-कौन से लोग इस रिपोर्ट को देख सकेंगे। इससे इलाज से जुड़े रोगी की निजता के अधिकार का उल्लंघन हो सकता है।
जाहिर है, सार्वजनिक स्वास्थ्य का ऐसा मॉडल तैयार करना जरूरी है, जिसमें दूरी, भौगोलिक इलाके या जनसंख्या घनत्व को ध्यान में रखते हुए सभी तक स्वास्थ्य सेवाएं पहुंच सकें। इसमें सभी स्तरों पर गुणवत्ता और सुरक्षा मानकों का ख्याल रखना होगा। यह ऐसा पक्ष है, जिससे सभी राज्य सरकारों ने नेक मंशा के बावजूद संघर्ष किया है। ताजा कानून के बेहतर क्रियान्वयन के लिए राजस्थान सरकार को मानव संसाधन से जुड़ी अपनी नीति को भी विकसित और संस्थागत बनाना होगा, ताकि हर जगह पर्याप्त संख्या में स्वास्थ्यकर्मी मौजूद रहें। ग्रामीण स्वास्थ्य सांख्यिकी-2022 से पता चलता है कि सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में सर्जन, प्रसूति-रोग या स्त्री-रोग विशेषज्ञ, बाल रोग विशेषज्ञ और रेडियोग्राफर की सर्वाधिक कमी वाले राज्यों में राजस्थान भी एक है। स्वास्थ्य के अधिकार की सफलता पर इसका महत्वपूर्ण प्रभाव पडे़गा।
पूरे देश के लिए यह कानून एक रोल मॉडल बन सकता है। हालांकि, सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज के संदर्भ में देखें, तो यह सतत विकास लक्ष्यों को पाने की दिशा में एक उल्लेखनीय कदम है। कोरोना महामारी ने बताया है कि हमें हर इंसान तक स्वास्थ्य सेवाएं सुनिश्चित करनी ही होंगी। ऐसे में, स्वास्थ्य तंत्र को मजबूत किए बिना स्वास्थ्य का अधिकार प्रभावी रूप से क्रियान्वित नहीं किया जा सकेगा। इस नए कानून को इसी पैमाने पर परखा जाएगा और अन्य राज्यों में भी इसकी मांग उठेगी।
Date:21-04-23
खराब इतिहास के लिए अपना भविष्य दांव पर न लगाएंसी पी राय, ( स्वतंत्र राजनीतिक विचारक )
इतिहास में बहुत-सी लड़ाइयां हुई हैं, नवाबों की नवाबों से, राजाओं की राजाओं से, भाइयों की भाइयों से और उनमें भी खूब लूटपाट हुई, हत्याएं हुईं, धोखे भी हुए।
आज अगर बदला लेने का कोण देखा जाए, जाति का आधार खोजा जाए तथा नफरत फैलाना ही मकसद हो जाए, तो हजारों साल पहले एक लड़ाई हुई थी, जिसमें एक ब्राह्मण की बहन के साथ कुछ हुआ, फिर एक क्षत्रिय की पत्नी के साथ हुआ और फिर क्षत्रिय ने ब्राह्मण को सिर्फ मारा नहीं, बल्कि उसका राजपाट भी खत्म कर दिया। अब क्या उस घटनाक्रम को आज घृणा के लिए इस्तेमाल किया जाए और दो जातियां लड़ मरें?
उसके बाद एक परिवार के बीच में बड़ा झगड़ा हुआ, यहां भी पत्नी की बेइज्जती तथा राजकाज पर कब्जे का मामला था, यहां भी नफरत के सूत्र खोजने हों, तो खोज सकते हैं। किसने किसको भड़काया? किसने छल किया? कौन महाभारत रोक सकता था, पर नहीं रोका? यह अलग बात है कि युद्ध के बाद या तो चारों तरफ लाशें थीं या रोती हुई विधवाएं और अनाथ बच्चे। युद्ध भूमि में रोता हुआ, अफसोस करता एक विजेता था तथा पश्चाताप की आग में जलता या हताशा से ग्रस्त एक वृद्ध भी था, जो युद्ध रोक सकता था, पर सत्ता के अंध समर्थन में सच के साथ खड़ा न हो सका? आज उसकी जाति तय करके नफरत फैलाई जा सकती है कि इसकी वजह से कभी महाविनाश हुआ था। एक सम्राट ने तो अपने भाइयों को ही मार डाला। स्वधर्मी राजाओं पर हमले किए। पता नहीं, कितने लाख लोग मारे गए, कितने सारे वंश साफ हो गए, तो यहां भी नफरत के बिंदु खोजकर आज मारकाट हो सकती है? ऐसी हजारों कहानियां इतिहास में दर्ज हैं और उनके आधार पर आज बदला लेने के लाखों सूत्र मौजूद हैं, तो क्या ऐसे सूत्र खोजे जाएं और आज उनका हिसाब-किताब किया जाए?
पौराणिक दौर से अब आधुनिक इतिहास पर आते हैं। न जाने कितने आक्रमण, युद्ध सीमा विस्तार तथा संपदा की लूट के लिए किए गए। हिंदू राजा की ओर से मुसलमान भी लड़े और मुसलमान बादशाह की ओर से हिंदू भी शहीद हुए। बाहर से मुट्ठी भर मुसलमान ही तो आए थे, उन्होंने करोड़ों हिंदुओं को लूट भी लिया और सदियों तक राज भी किया। ऐसे ही मुट्ठी भर अंग्रेज भी आए थे और भारत का खून भी चूसा और सदियों राज किया, तो किसके बूते? भारत के ही हिंदू और मुसलमान के बूते पर, क्योंकि आदेश मुगल या अंग्रेज का होता था, पर जुल्म करने वाले और गोली चलाने वाले, लूट तथा हत्या करने वाले तो हिन्दुस्तानी ही थे। एक फर्क है मुगल और अंग्रेज में कि मुगल आक्रमणकारी बनकर आए, पर यहीं का होकर रह गए। बेशक सत्ता के लिए विरोधियों पर जुल्म तब भी हुए होंगे और आज भी होते हैं।
वैसे पहले भारत इतना संपन्न था कि दुनिया की जीडीपी में इसका 25 प्रतिशत हिस्सा था और अंग्रेजों के जाते-जाते यह विपन्न हो चुका था। आज अगर नफरत ही करनी है, तो तीन तरह के लोगों से करनी चाहिए। पहला, उन राजाओं से, जिन्होंने मुगलों व अंग्रेजों को आमंत्रित किया, उनकी सहायता की और उन्हें यहां स्थापित करने में मदद की। दूसरा, उन लाखों हिन्दुस्तानियों से नफरत करनी चाहिए, जिन्होंने मुगलों और अंग्रेजों की ओर से जुल्म किए। तीसरा, नफरत उन अंग्रेजों से होनी चाहिए, जो भारत को चूसकर खोखला कर गए। आरएसएस के संघचालक मोहन भागवत ने ही बयान दिया है कि अंग्रेजों के आने से पहले भारत 71-72 प्रतिशत साक्षर था, जबकि इंग्लैंड सिर्फ 17 प्रतिशत। हालांकि, आज ऐसी नफरत से ज्यादा जरूरी है जागरूक होना, सुधार करना, फिजूल की लड़ाई से बचना।
जब मैं छोटा था, तब गांव में पड़ोसी से खूब विवाद होता था, लाठी, भाले तक निकल आते थे। आज मेरा परिवार ज्यादा संपन्न व प्रभावशाली है, जबकि पड़ोसी का परिवार उतना नहीं है। क्या अब हमें मौका देखकर पड़ोसी से बदला लेना चाहिए? कदापि नहीं। अब लड़ने की जरूरत ही नहीं है। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि अपने समय में खूब लड़ने वाले दादा, पिता, चाचाओं ने हमारी पीढ़ी को लड़ाई से दूर रखा, तो हम आगे निकल गए। हमें भी आने वाली पीढ़ियों को यही शिक्षा देनी चाहिए, नफरत से बचाकर सही मायने में शिक्षित व सक्षम बनाना चाहिए।
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संसदीय लोकतंत्र में शक्तियों का पृथक्करण किया जाता है। सरकार के विधायी, कार्यकारी और न्यायिक कार्यों का विभाजन करके नियंत्रण और संतुलन बनाने का प्रयास किया जाता है। हाल ही में इजरायल की नेतन्याहू सरकार ने न्यायपालिका पर कार्यपालिका का प्रभुत्व बनाने के लिए कोशिश शुरू कर दी है। अगर यह सफल हो जाता है, तो इससे विश्व के कई लोकतंत्र प्रभावित होंगे।
संविधान की सीमा सिद्धांतों तक ही है। संविधान के इस ढांचे का जनहित में उपयोग करके विधायिका कानून बनाती है। ये कानून संविधान के अनुसार बनाए गए हैं या नहीं, इसकी जांच न्यायपालिका करती है। यहाँ पर सरकार और न्यायपालिका के बीच कभी-कभी विरोधाभास दिखाई देता है। एक तरफ जन प्रतिनिधित्व होता है, और दूसरी तरफ संविधान विशेषज्ञ। इस स्थिति को टालने के लिए सन् 1951 में भारत में पहला संविधान संशोधन किया गया था। इसमें नौंवीं अनुसूची को शामिल करके कुछ कानूनों को न्यायिक समीक्षा से परे कर दिया गया था।
मूल संरचना सिद्धांत का सुरक्षा कवच –
शक्तियों का पृथक्करण सिद्धांत, किसी लोकतंत्र का आवश्यक अंग है। इसके अभाव में शक्ति केंद्रित हो जाएगी। लोकतंत्र का स्वरूप कमजोर हो जाएगा। भारत में संविधान की बुनियादी संरचना पर डटे रहने का सिद्धांत, दो दशकों तक जद्दोजहद के माध्यम से विकसित हुआ है। इस बीच में पूर्ण बहुमत वाली सरकारों ने नियंत्रण और संतुलन की प्रणाली की सीमाओं का लगातार परीक्षण किया है। इस सिद्धांत को जन प्रतिनिधियों और न्यायिक समीक्षा के बीच टकराव के रूप में प्रस्तुत करना गलत है।
हाल ही के एक प्रकरण ने इसका उदाहरण भी दे दिया है। न्यायपालिका की नियुक्तियों और तबादलों पर न्यायपालिका के एकाधिकार को तोड़ने के लिए एक संवैधानिक संशोधन करके एनजेएसी (नेशनल ज्यूडिशियल अपांइटमेण्ट कमीशन) बनाने के लिए विधेयक लाया गया था। इसका पारित होना, न होना अलग मुद्दा है। लेकिन न्यायपालिका और विधायिका के बीच इस प्रकार के छोटे-मोटे संघर्ष चलना अच्छा संकेत है। यह दिखाता है कि शक्ति केंद्रित नहीं है। इस प्रणाली का बने रहना ही सार्वजनिक हित में है।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 29 मार्च, 2023
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Date:20-04-23
The GeM In What Govt BuysCommerce & Industry minister argues a transition to GoI’s online platform for procurement led to savings by departments & transparency and fair competition for vendorsPiyush Goyal
The Government e Marketplace (GeM) crossed a historic milestone at the end of 2022-23: GoI and state governments, official agencies, public sector undertakings and cooperatives purchased goods and services worth more than Rs 2 lakh crore ($24 billion) through more than five million online transactions in a single financial year – a testimony to PM Narendra Modi’s commitment to inclusive development, transparency, efficiency and corruptionfreegovernance.
GeM is truly a gem that has replaced the obsolete Directorate General of Supplies & Disposals (DGS&D). Befittingly, Vanijya Bhawan, the new office building of the commerce and industry ministry, has been built on the land once occupied by DGS&D.
At the foundation stone laying ceremony of the building, Modi rightly observed: “Now this more than 100 years old organisation has been closed and it has been replaced by a body based on digital technology – Government e Marketplace. GeM has completely revolutionised the way the government procures the goods required by it. ”
Seven spectacular years of GeM
GeM has grown spectacularly since it was set up in August 2016. The total value of transactions on the portal almost doubled in 2022-23 to Rs 2. 01 lakh crore from Rs 1. 07 lakh crore in the previous fiscal. The trailblazing journey began with business worth Rs 422 crore in 2016-17.
The portal was launched to align public procurement of goods and services with Modi’s mission of ‘Minimum Government and Maximum Governance’ and his strategy of using technology to make government systems honest, effective and accessible to all.
GeM’s transparent practices such as competitive bidding have helped government departments and undertakings save about Rs 40,000 crore of taxpayer’s money. Such initiatives have helped theModi government in substantially raising welfare expenditure without compromising on fiscal health.
Transformation from manual to digital
In this context, GeM’s significance goes far beyond its phenomenal growth in financial terms, which itself would make any e-commerce major jealous. The new system replaces age-old manual processes that were riddled with inefficiencies and corruption. Government procurement used to be opaque, time-consuming, cumbersome and prone to corruption and cartelisation.
● Only a privileged few could break through huge entry barriers.
●Buyers had no choice but to purchase sub-standard goods at high, nonnegotiable rates from the privileged, often unscrupulous suppliers.
● Potential sellers had to run from pillar to post, completely at the mercy of the facilitating agency, to get empanelled, and then to get timely payments.
In contrast, there is hardly any human interface in vendor registration, order placement and payment processing through the technology-driven platform. At every step, SMS and e-mail notifications are sent to the buyer, the head of her/his organisation, paying authoritiesand sellers.
The paperless, cashless and faceless GeM gives buyers the freedom to buygoods and services directly from unlimited sellers at competitive rates. This new, competitive system has transformed public procurement and given MSMEs and small businessmen access to sought-after government orders.
Independent research validates GeM
Hard data and insightful third-party analyses testify GeM’s success. An independent study conducted by the World Bank and IIM Lucknow estimated an average 10% savings from the median price. The World Bank noted that with the addition of every new bidder, savings increased by 0. 55%.
A study by Boston Consulting Group (BCG) showed that annual cost savings in 2021-22 were in the range of 8%-11%. Modi appropriately summed up GeM’s objective as “Minimum Price and Maximum Ease, Efficiency and Transparency”.
The portal is home to:
● More than 11,500 product categories.
● Over 3. 2 million listed products.
● It has over 280 service categories with more than 2. 8 lakh service offerings.
GeM is catering to diverse procurement needs of more than 67,000 government buyer organisations, which have together saved about Rs 40,000 crore. It gives equal opportunity to all buyers and sellers.
About 60% of orders by value from states have gone to micro and small enterprises. States have also placed orders worth Rs 1,109 crore on startups, demonstrating the ease of access for the relatively underprivileged business people, including those in far-flung areas.
Given the scale and complexities involved in realigning the old, deeply entrenched procurement processes, this is one of the largest change-management exercises globally.
The portal’s transformational success bodes well for the entire economy because the ‘gem’ is magnifying efficiency and integrity during the ‘Amrit Kaal’ as India marches to become a developed country by 2047 under the decisive and visionary leadership of Modi.
Date:20-04-23
Throw Light On an Exceptional DecisionET Editorials
Sunlight, as in nature so in jurisprudence, is an effective fumigating agent. It is especially so in democracy. In dealing with the Supreme Court’s order asking GoI and the Gujarat government to produce relevant documents leading to the August 2022 remission of the sentence of 11 convicts in the heinous case of the gangrape of Bilkis Bano and murder of seven of her family members during the 2002 Gujarat riots, GoI has reportedly claimed privilege. It has also sought time to come to a final decision by next week whether to file a review petition against the court order to produce the documents. It would serve everyone well, including itself, if the government shares the relevant files with the court.
Sections 123 and 124 of the Indian EvidenceAct, 1872, provide a government ‘privilege’ to not disclose communications made in official confidence when ‘public interests’ are thought to suffer by their disclosure, outweighing the perceived ‘harm’ their concealment may cause. The court, however, is right to provide important context when it stated that this case can’t be compared with ‘standard’ rape and murder cases for which remissions usually apply. It also was careful to underline the fact that the government may very well have a valid reason — and, therefore, a case — to have prematurely released those found guilty. But its reasoning for coming to such an exceptional decision should be shared with the court. Opaqueness doesn’t help its case of coming across as being objective.
Legally, as it has politically, the ‘pardon’ of those found guilty of rape and murder in the case may hold water. But a moral hurdle —something that still matters in a democracy — will be cleared only once the reasoning for such an action is brought to light.
Date:20-04-23
The caste imperativeCaste census, even if morally flawed, can help in targeting of quota benefitsEditorial
With the Congress party joining the chorus for an updated caste census, there seems to be an emerging consensus among the political opposition on the need for this exercise. While the parties committed to reservations in the northern belt — the SP and the RJD in particular — have made this demand as a reaction to the expansion of reservation benefits to economically weaker sections among “forward” castes using income criteria, the Congress’s pivot towards supporting this stems from the party’s new political emphasis on expanding its support base. With the Mandal Commission report of 1980, that was based on caste census data of 1931, still remaining the basis of identifying backwardness and determining the extent of reservation to the OBCs, the need for a comprehensive census that provides data to support, or evaluate existing reservation quotas, or to assess demands for them remains pertinent. Such a diligent exercise would also serve a legal imperative allowing the government to answer the Supreme Court’s call for quantifiable data. But counting castes is not easy. An inherent weakness is evident in how the government described the Socio-Economic and Caste Census in 2011: as being riddled with infirmities that made the data collected unusable. Data here recorded 46 lakh different castes, sub-castes, caste/clan surnames, which required adequate parsing before being used for proper enumeration. The survey’s hurried conduct, without utilising the Census Commissioners and the Office of the Registrar General properly, also rendered it problematic.
A more thoroughgoing exercise would entail an adequate consolidation of caste/sub-caste names into social groups based on synonymity and equivalence of the self-identified group names revealed by respondents in the census. Marking these groups against the OBC/SC/ST lists for each State would build a useful database, which can be utilised in the decennial Census. The data obtained this way can be used to parse aggregated socioeconomic information for these groups. But with the government having postponed the long-delayed 2021 Census and not acquiescing to the demand of including caste counts, questions remain whether an effective caste census is possible. There is of course the risk of reification of caste identities even as the constitutional order seeks to build a casteless society. But with caste-based identification still predominant, such a census seems politically imperative, even if morally flawed, for the purpose of addressing socioeconomic inequities through facile reservation quotas that confer income benefits and a degree of social justice without actually advancing the cause of a truly casteless society.
Date:20-04-23
महिलाओं के लिए काम के अवसर लगातार घट रहे हैंसंपादकीय
नारी-उत्थान की बात करने वाले नेता पिछले कई दशकों से उनके काम के लगातार घटते अवसरों को लेकर चुप हैं। सरकारी आंकड़ों, सीएमआईई की रिपोर्ट और एक निजी यूनिवर्सिटी के अध्ययन में कुछ नए तथ्य सरकार को तत्काल हस्तक्षेप करने को मजबूर कर सकते हैं। भारत दुनिया में सबसे नीचे के 20 ऐसे देशों में है, जहां महिलाओं के नौकरी करने का प्रतिशत सबसे कम है। देश में जहां 37 करोड़ पुरुष कुछ न कुछ रोजगार में लगे हैं, वहीं केवल 3.90 करोड़ यानी 10% महिलाएं ही नौकरी या काम करती हैं। इनमें वे महिलाएं भी हैं, जो कम से कम एक घंटे रोजाना घर से बाहर जाकर काम करती हैं। इसके ठीक उलट जहां वर्ष 2004 में महिला रोजगार दर 35% थी, सन् 2022 में वह घटकर 25% रह गई है। मैकिन्जी की रिपोर्ट (2018) के अनुसार अगर भारत की महिला वर्कफोर्स पार्टिसिपेशन रेट में मात्र 10% वृद्धि हो जाए, तो जीडीपी 15% बढ़ सकती है। लेकिन ऐसा लग रहा है कि सरकार के तमाम कानून जिनके तहत महिलाओं की कार्यबल में भागीदारी सुनिश्चित की जाती है, आज भी नजरअंदाज हो रहे हैं। जहां एक ओर महिलाओं में शिक्षा बढ़ी है, वहीं परिवार उन्हें आज भी घर-बच्चे संभालने वाली सदस्य से ज्यादा नहीं समझता । वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट कहती है कि भारत में औपचारिक और अनौपचारिक क्षेत्रों में महिलाओं की भागीदारी पिछले दो दशकों में घटी है।
Date:20-04-23
बढ़ते तापमान के कारण हीट एक्शन प्लान जरूरी हो गए हैंहीट स्ट्रेस से अमीर लोग ज्यादा प्रभावित नहीं होते। इसकी मार गरीबों पर अधिक पड़ती हैडॉ. चन्द्रकान्त लहारिया, ( जाने माने चिकित्सक )
कुछ दिन पूर्व पंजाब सरकार ने शासकीय कार्यालयों का समय बदलकर सुबह साढ़े सात से दोपहर दो बजे तक कर दिया। ऐसा प्रत्यक्ष रूप से पॉवरग्रिड पर लोड घटाने के लिए किया गया था, ताकि बिजली की बढ़ती मांग को सुनियोजित किया जा सके। लेकिन इसके मूल में है जलवायु परिवर्तन का असर, ग्लोबल वॉर्मिंग और बढ़ता तापमान। अभी तो गर्मियां शुरू ही हुई हैं और पूरे देश का पारा चढ़ चुका है। कई शहरों में यह पहले ही 40 डिग्री को पार कर चुका है। अप्रैल की शुरुआत में ही मौसम विभाग ने कह दिया था कि इस बार की गर्मियां बहुत विकट साबित होने जा रही हैं। यह कोई संयोग नहीं है। दिसम्बर 2022 को भारत में बीते 122 वर्षों का सबसे गर्म दिसम्बर पाया गया था। हीट स्ट्रेस के कारण केवल बढ़ते तापमान की ही समस्या नहीं है, बल्कि उमस भी एक बड़ी दिक्कत है। जब तापमान और उमस का मिला-जुला असर हमारे शरीर के 37 डिग्री तापमान से अधिक हो जाता है तो हम हीट स्ट्रेस का अनुभव करने लगते हैं।
बीती सदी में भारत का सालाना औसत तापमान 0.7 डिग्री बढ़ गया है। विगत बीस सालों में भारत में उससे पहले के दो दशकों की तुलना में हीट-वेव्ज़ की संख्या लगभग ढाई गुना बढ़ गई है। शहरी क्षेत्र ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में 2 डिग्री अधिक गर्म हैं। वास्तव में हीट स्ट्रेस सभी को एक तरह से मुश्किलों में नहीं डालता। अमीर लोग इससे अधिक प्रभावित नहीं होते। इसकी मार गरीबों पर ज्यादा पड़ती है। हीट स्ट्रेस के कारण बीमारियां बढ़ती हैं और सैकड़ों लोग मृत्यु के शिकार होते हैं। इसका किडनी, लिवर और हार्ट सहित लगभग सभी महत्वपूर्ण अंगों पर असर पड़ता है। क्लाइमेट चेंज और हीट स्ट्रेस के दूसरे भी परिणाम हैं। उनका असर सामाजिक-अर्थव्यवस्था पर पड़ता है। फसलें खराब होती हैं। मवेशियों की मृत्यु हो जाती है। खेतों में काम करना मुश्किल हो जाता है। क्लाइमेट चेंज और बढ़ते तापमान का भारत में कृषि क्षेत्र पर निरंतर दबाव पड़ रहा है।
हीट स्ट्रेस से कामकाजी आबादी की उत्पादकता भी एक तिहाई कम हो जाती है। भारत आज भी एक लेबर-इंटेंसिव देश है, विशेषकर कृषि और निर्माण क्षेत्र में। भीषण गर्मी से काम और आमदनी में कमी आती है। तापमान बढ़ने से बिजली की मांग में भी इजाफा होता है, जिससे बिजली कटौती होती है और औद्योगिक उत्पादन घट जाता है। अनुमान लगाए गए हैं कि हीट स्ट्रेस से जीडीपी को तीन से पांच प्रतिशत तक का नुकसान होता है। क्लाइमेट चेंज के जारी रहने से हीट-वेव्ज़ की चुनौतियां भी निरंतर बढ़ेंगी। ऐसे में यह जरूरी हो गया है कि केंद्र और राज्यों की सरकारों सहित नगरीय प्रशासन इसे गम्भीरता से लेकर इसका सामना करने की योजना बनाएं। वर्तमान में भारत के 23 राज्य एक हीट एक्शन प्लान पर काम कर रहे हैं। इसमें तापमान के साथ ही उमस को भी जोड़ा जाना चाहिए। इनका विकास स्थानीय परिस्थितियों के मद्देनजर करना चाहिए। टेक्नोलॉजी की मदद से हीट वेव्ज़ का पूर्वानुमान लगाया जा सकता है और लोगों को अत्यधिक तापमान के प्रति सचेत करते हुए उनसे यथासम्भव घर पर रहने, बहुत सारा पानी पीने, अपने कामकाज के समय में बदलाव लाने आदि का आग्रह किया जा सकता है। विशेषकर खुले में काम करने वाले असंगठित क्षेत्र के लोगों के लिए यह ज्यादा जरूरी है। समर-शेल्टर्स बनाए जाने चाहिए। कुछ राज्य कूल रूफ पॉलिसी भी विकसित कर रहे हैं, जिसके चलते भवनों की छतों के निर्माण में ऐसी सामग्री के उपयोग को बढ़ावा दिया जा रहा है, जो सूर्य की रोशनी को प्रतिबिम्बित करते हुए घर को ठंडा बनाए रखती हैं।
धरती के बढ़ते तापमान के लिए मनुष्य ही जिम्मेदार हैं। एक बेहतर अर्बन इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण के लिए दीर्घकालीन नीतियां बनाने की जरूरत है। हीट वेव की स्थिति में सरकारों को अनौपचारिक क्षेत्र के कामगारों को मुआवजा-मदद मुहैया करानी चाहिए। शहरों में पेयजल की सर्वत्र उपलब्धता सुलभ होनी चाहिए। हम अकसर बाढ़ या वायु प्रदूषण की चर्चा करते हैं। अब समय आ गया है कि हम ग्लोबल वॉर्मिंग और हीट स्ट्रेस को भी अपनी चर्चाओं में नियमित सम्मिलित करें। पंजाब जैसी स्थिति दूसरे राज्यों और शहरों में भी निर्मित हो सकती है और हर राज्य के पास विंटर और समर कैपिटल की लग्जरी नहीं होती है।
Date:20-04-23
जनसंख्या नियोजनसंपादकीय
आखिरकार भारत जनसंख्या के मामले में चीन को पीछे छोड़कर विश्व का सबसे अधिक आबादी वाला देश बन गया। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार अब भारत की आबादी एक अरब 42 करोड़ 86 लाख हो गई है। निःसंदेह यह कोई उपलब्धि नहीं है, क्योंकि चीन के मुकाबले भारत का क्षेत्रफल कहीं अधिक कम है। यह सही है कि भारत की जनसंख्या वृद्धि दर में गिरावट आ रही है, लेकिन वह इतनी धीमी है कि अभी कुछ वर्षों तक जनसंख्या बढ़ती रहेगी। इसे देखते हुए यह आवश्यक है कि भारत जनसंख्या के स्थिरीकरण के लिए आवश्यक उपाय करे। यह सभी की सहभागिता से ही संभव है। अब जब भारत दुनिया की सबसे अधिक आबादी वाला देश बन गया है, तब फिर जनसंख्या नियोजन के भी उपाय किए जाने चाहिए। इससे इन्कार नहीं कि इस दिशा में कुछ कदम उठाए गए हैं, लेकिन उन्हें पर्याप्त नहीं कहा जा सकता। हमारे नीति-नियंता इससे अनभिज्ञ नहीं हो सकते कि यदि जनसंख्या का नियोजन सही तरह से न हो तो फिर अधिक आबादी एक बोझ का रूप ले लेती है। ऐसा न होने पाए, इसके लिए तत्काल प्रभाव से आवश्यक कदम उठाए जाने चाहिए। चूंकि देश की आबादी का एक बड़ा हिस्सा युवाओं का है इसलिए उसके अपने लाभ भी हैं, लेकिन ये लाभ तभी अर्जित किए जा सकते हैं, जब इस युवा आबादी को समुचित शिक्षा के साथ रोजगार के अवसर मिल सकें। इसके लिए हमें अपनी शिक्षा व्यवस्था पर विशेष ध्यान देना होगा, ताकि ऐसे युवा तैयार हो सकें जो देश की प्रगति में सहायक बन सकें।
इसकी अनदेखी नहीं की जानी चाहिए कि विभिन्न औद्योगिक संगठन इसकी शिकायत करते रहते हैं कि उन्हें जैसे कुशल और दक्ष युवाओं की आवश्यकता है, वैसे उपलब्ध नहीं हो पा रहे हैं। इसका प्रमुख कारण शिक्षा व्यवस्था में व्याप्त खामियां हैं। यह अच्छी बात है कि मोदी सरकार ने युवा आबादी को ध्यान में रखकर कौशल विकास की पहल की है, लेकिन अभी इस दिशा में बहुत कुछ किए जाने की आवश्यकता है। कौशल विकास के जो भी कार्यक्रम चल रहे हैं, वे कसौटी पर खरे नहीं उतर पा रहे हैं। बढ़ती आबादी को देखते हुए हमें इसके भी जतन करने होंगे कि युवाओं को उनकी योग्यता और क्षमता के हिसाब से काम दिया जा सके। यह तब संभव होगा, जब उद्योग-धंधों के विकास को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाएगी। यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि सभी युवाओं को चाहकर भी सरकारी नौकरियां प्रदान नहीं की जा सकतीं। यह एक शुभ संकेत है कि तकनीक आधारित नए-नए उद्योग-धंधे बढ़ रहे हैं और उनमें अच्छी-खासी संख्या स्टार्टअप की है, लेकिन इसकी अनदेखी भी नहीं की जानी चाहिए कि एक बड़ी संख्या में हमारी आबादी उस कृषि पर निर्भर है, जिसकी उत्पादकता कम है। स्पष्ट है कि कृषि पर निर्भर आबादी को उद्योग-धंधों में खपाने की आवश्यकता है।
Date:20-04-23
स्वास्थ्य व्यवस्था को बदलने वाला कानूनजब तक स्वास्थ्य बजट में भारी बढ़ोतरी नहीं होगी, तब तक लोगों को स्वास्थ्य का सही अधिकार नहीं मिल पाएगा।नचिकेत मोर, ( लेखक स्वास्थ्य विशेषज्ञ हैं )
राजस्थान में स्वास्थ्य का अधिकार कानून यानी राइट टू हेल्थ एक्ट लागू हो गया। राजस्थान देश का पहला राज्य है, जहां लोगों को अब स्वास्थ्य का अधिकार मिलेगा। इस कानून के लागू होने का मतलब है कि यदि राज्य का कोई भी नागरिक बीमार होता है तो उसे सरकारी और चुनिंदा प्राइवेट अस्तपालों को इलाज देना होगा। अगर उस व्यक्ति के पास पैसे नहीं हैं तो सरकार की ओर से उसके इलाज का खर्चा उठाया जाएगा। फिलहाल मुफ्त इलाज की सुविधा केवल सरकारी अस्पतालों में है। कानून बनने के साथ ही इसे लेकर तरह-तरह की चर्चाएं भी होने लगी हैं। एक तरफ डाक्टरों का कहना है कि उनके पेट पर लात मारकर लोगों को एक खोखला-सा अधिकार दिया जा रहा है, जिसे डाक्टर चाहें तो भी अमल नहीं कर पाएंगे, क्योंकि बगैर पैसों के वे काम नहीं कर पाएंगे। वहीं इस कानून के समर्थकों का कहना है कि यह एक आवश्यक अधिकार है और राजस्थान सरकार की पहल सराहनीय है।
चाहे आप डाक्टरों की बात मानें या न मानें, एक बात साफ है कि जब तक राज्य सरकार स्वास्थ्य सेवा के अपने बजट में दोगुना-तिगुना बढ़ोतरी नहीं करेगी, तब लोगों को यह अधिकार सही मायने में दे नहीं पाएगी। हालांकि सरकार ने अपना बजट कुछ हद तक जरूर बढ़ाया है, परंतु यह बहुत ही कम है। अगर वह इसके लिए पूरा पैसा देना चाहे तो उसे अन्य मदों में से अपने बजट में कटौती करनी पड़ेगी। आज की तारीख में सरकार शायद इस तरह की कटौती के लिए तैयार नहीं है। इसे एक उदाहरण से समझें। सिजेरियन एक बहुत ही महत्वपूर्ण सर्जरी है, जिसकी जरूरत औसतन 20 प्रतिशत गर्भवती महिलाओं को पड़ती है। राजस्थान में दो ही ऐसे जिले हैं, जिनमें सरकार आज की तारीख में करीब 15 प्रतिशत गर्भवती महिलाओं को सिजेरियन की सेवा उपलब्ध कर पा रही है। जाहिर है पूरे राज्य में इसे 20 प्रतिशत तक लाने के लिए सरकार को काफी पैसा खर्च करना पड़ेगा और अगर इन जिलों में अस्पताल ही नहीं हों तो सरकार इस अधिकार को पूरा करने में असफल रहेगी। कुछ जिलों में प्राइवेट अस्पताल जरूर हैं, जहां इस अधिकार की सहायता से लोग सिजेरियन करवा सकते हैं, परंतु ऐसे जिले बहुत कम हैं। अधिकांश जगह दोनों भी नहीं हैं। इस स्थिति को देखते हुए कई लोगों का कहना है कि सरकार ने इस कानून को जल्दबाजी में बिना सोचे-समझे और बगैर पैसों का इंतजाम किए सिर्फ वोट बटोरने के लिए बनाया है। सच्चाई जो भी हो, लेकिन यह साफ है कि सरकार को अब जनता की आवाज सुननी पड़ेगी और उसके इलाज के लिए पैसों का प्रबंध करना पड़ेगा। भारत के किसी राज्य ने आजादी के 70 साल बाद भी स्वास्थ्य जैसा मूल अधिकार देना जरूरी नहीं समझा।
अपने देश में प्रायः देखा गया है कि एक बार दिया हुआ वचन न तो वापस लिया जा सकता है और न ही इसे और राज्यों में फैलने से रोका जा सकता है। एक के बाद एक राज्यों में पुरानी पेंशन की उठती मांग इसका ताजा उदाहरण है। अधिकार देने की बात कर अपने हाथों में खुद ही हथकड़ी पहन लेना एक चतुर नेता का दांव भी हो सकता है। इससे वह पार्टी वालों को और सरकार पर दबाव डालने वाले लोगों से कह सकता है कि भाई अब यह तो करना ही पड़ेगा, क्योंकि बात मुंह से निकल चुकी है। अगर हम किसी स्थापित व्यवस्था में बदलाव चाहते हैं तो उसमें असंतुलन लाना एक जरूरी कदम होता है। इस असंतुलन से ही एक नई संतुलित व्यवस्था उपजती है। बगैर असंतुलन के न हमारे देश को आजादी मिली और न ही स्वास्थ्य व्यवस्था में कोई परिवर्तन आ सकता है।
यहां यह ध्यान रखना जरूरी है कि स्वास्थ्य में सिर्फ डाक्टर, दवाइयां और पैसा ही नहीं आते हैं। स्वास्थ्य एक व्यापक सोच है। जैसे-शुद्ध हवा, पानी, तनावमुक्त वातावरण। जब सरकार इस कानून पर गंभीरता से गौर करेगी तो उसे यह बात साफ नजर आ जाएगी कि और भी बहुत कुछ करना है। अगर कम पैसों में इस अधिकार को पूरा करना है तो उसे सोचना पड़ेगा कि कैसे बीमारियों को रोका जाए। हमारे शहरों में हृदय रोग तेजी से बढ़ रहे, परंतु ऐसे फुटपाथों की संख्या कम हो रही है, जिन पर लोग आसानी से चल सकें। टीबी और दमा की बीमारियां कम नहीं हो रही हैं, लेकिन इमारतों की डिजाइन में हवा-पानी तो दूर, उनमें रहने वाले सूरज की एक किरण देखने के लिए भी तरस जाते हैं। अगर सरकार इस पर ध्यान नहीं देगी तो बात नहीं बनेगी।
जब 1972 में सरकार ने वन्यजीव संरक्षण अधिनियम लागू किया, तब शायद उसकी सोच रही होगी कि कुछेक जगहों पर शेर-भालू आदि को बचाकर टूरिज्म को बढ़ावा दिया जा सकेगा। इस तरह से रोज-रोज परेशान कर रहीं स्वयंसेवी संस्थाएं चुप हो जाएंगी और विदेश में पर्यावरण के नाम पर सस्ते में वाहवाही प्राप्त हो जाएगी, लेकिन हर अधिनियम देश की कानूनी व्यवस्था का एक स्थायी अंग बन जाता है और जनता को अपने अधिकारों के प्रति प्रेरित करता है। सरकार ने सपने में भी सोचा नहीं होगा कि वही वन्यजीव संरक्षण अधिनियम, 2020 में सरकार को हाथियों के आने-जाने के लिए सुपरस्पीड हाईवे के नीचे एक बड़ी सुरंग बनाने के लिए मजबूर कर देगा। यह राइट टू हेल्थ एक्ट भी इसी तरह का कानून है, जिसकी सहायता से पूरे देश की स्वास्थ्य प्रणाली में बदलाव लाया जा सकता है।
Date:20-04-23
जाति पर जोरसंपादकीय
इस वर्ष कई प्रमुख राज्यों के विधानसभा चुनाव होने हैं और उसके पश्चात 2024 में लोकसभा चुनाव भी निर्धारित हैं। ऐसे में विपक्षी दलों को शायद शक्तिशाली भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की ताकत का मुकाबला करने के लिए एक साझा मुद्दा मिल गया है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिखकर मांग की है कि सामाजिक-आर्थिक और जाति जनगणना के आंकड़े जारी किए जाएं। यह जनगणना 2011-12 में की गई थी और इसमें 25 करोड़ परिवारों को शामिल किया गया था। हालांकि इसके आंकड़े जारी नहीं किए गए। कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने भी मांग की है कि इन आंकड़ों को जारी किया जाए। उन्होंने दलील दी है कि जाति आधारित आरक्षण में 50 फीसदी की सीमा समाप्त हो चुकी है। ऐसी मांगें नई नहीं हैं लेकिन जिस समय यह बात उठाई गई है उससे यही संकेत मिलता है कि मूल विचार है सामाजिक न्याय को चुनावी मुद्दा बनाना। अभी यह देखना होगा कि क्या चुनाव में यह कारगर साबित होता है लेकिन फिलहाल देश जिस मोड़ पर है वहां जातीय राजनीति पर ध्यान केंद्रित करना सही नहीं प्रतीत होता।
निश्चित रूप से जाति आधारित जनगणना का विचार अधिक आरक्षण की ओर ले जाने वाला है और इससे सरकारी व्यय में बदलाव आएगा। क्षेत्रीय दलों ने इस विचार का जमकर समर्थन किया है। बिहार में तो जाति आधारित जनगणना हो भी रही है। मांग तो यह भी थी कि हर दशक में होने वाली जनगणना जो 2021 में महामारी के कारण टाल दी गई, उसमें भी जाति आधारित सूचना जुटाई जाए। दलील दी गई कि ऐसी पिछली जनगणना 1931 में की गई थी जब भारत ब्रिटिश उपनिवेश था और अभी भी बेहतर सामाजिक न्याय सुनिश्चित करने के लिए हालात की समीक्षा की आवश्यकता है। सरकारी नौकरियों और शैक्षणिक संस्थानों में जाति के आधार पर आरक्षण देने के रूप में सकारात्मक कार्यवाही की जाती रही है। चूंकि 2021 की जनगणना को आगे बढ़ा दिया गया और समाचार बताते हैं कि शायद 2024 के लोकसभा चुनावों के पहले यह जनगणना न हो सके तो इसलिए यह एक अहम चुनावी मुद्दा बन सकता है।
सरकार ने 2021 में संसद को बताया था कि नीतिगत रूप से उसने निर्णय लिया है कि वह अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के अलावा शेष आबादी को जाति के आधार पर अलग-अलग नहीं गिनेगी। परंतु राजनीतिक दृष्टि से अभी यह स्पष्ट नहीं है कि अगर यह मुद्दा चुनावी दृष्टि से जोर पकड़ गया तो भाजपा क्या करेगी। अभी तक भाजपा जाति से परे धार्मिक पहचान का सफलतापूर्वक लाभ उठाने में कामयाब रही है। ऐसे में वह राजनीतिक रूप से कोई कसर छोड़ना नहीं चाहेगी।
ऐसे में संभव है कि राजनीतिक बहस में जाति और धर्म की बातें नजर आएं। बल्कि जाति आधारित जनगणना स्वयं सामाजिक विभाजन को बढ़ाने वाली साबित होगी। अन्य पिछड़ा वर्ग जिस पर सबसे अधिक ध्यान है वह कोई एक समान समूह नहीं है। उसमें कई उप जातियां हैं तथा अलग-अलग जातियों को अलग-अलग राज्यों में भिन्न-भिन्न दर्जे दिए गए हैं। इसके अलावा कई राज्यों में प्रभावशाली जातियां इस श्रेणी में आरक्षण की मांग कर रही हैं। आरक्षण पर नए सिरे से विचार करने पर ऐसी मांग उठ सकती हैं जिनको पूरा करना मुश्किल हो सकता है।
ऐसे में यह अहम है कि भारतीय राजनीतिक बहस जाति और धर्म की खाई से ऊपर उठे और आर्थिक विकास पर ध्यान दे। इसमें दो राय नहीं है कि वंचितों और गरीबों को उचित अवसर मिलने चाहिए लेकिन केवल आरक्षण बढ़ाने से लाभ नहीं होगा। भारत को ज्यादा तादाद में अच्छी गुणवत्ता वाले रोजगार और सभी स्तरों पर बेहतर शैक्षणिक संस्थान चाहिए। भारतीय राज्य की इन्हें उपलब्ध कराने में असमर्थता ही वह बुनियादी वजह है जिसके चलते आरक्षण की मांग लगातार बढ़ रही है। इससे अल्पावधि में राजनीतिक दलों को मदद मिल सकती है लेकिन इससे समस्या हल नहीं होगी।
Date:20-04-23
रिहाई पर सवालसंपादकीय
अपराध और दंड के संदर्भ में एक मशहूर उक्ति का उल्लेख अक्सर किया जाता रहा है- ‘न्याय न केवल होना चाहिए, बल्कि वह होते हुए दिखना भी चाहिए।’ विडंबना यह है कि कई बार किसी अपराध के साबित हो जाने के बाद सजायाफ्ता दोषियों के बारे में भी सरकारों का रुख ऐसा होता है, जो समूची न्याय की अवधारणा को ही कठघरे में खड़ा कर देता है। जाहिर है, न्याय में भरोसा करने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए यह एक असहज करने वाली स्थिति होती है। शायद यही वजह है कि सुप्रीम कोर्ट ने बिलकिस बानो के मामले की सुनवाई करते हुए मंगलवार को गुजरात सरकार को फटकार लगाते हुए यह कहा कि जब समाज को बड़े पैमाने पर प्रभावित करने वाले जघन्य अपराधों की सजा में छूट पर विचार किया जाता है तो सार्वजनिक हित को ध्यान में रखते हुए शक्ति का प्रयोग किया जाना चाहिए। गौरतलब है कि बिलकिस बानो ने गुजरात सरकार पर अपने मामले के दोषियों को समय से पहले रिहा करने का आरोप लगाया है। इस मामले पर सुनवाई के दौरान शीर्ष अदालत ने जो सख्त टिप्पणियां की हैं, वह न्याय के संदर्भ में सरकारी रवैये को आईना दिखाने जैसा है।
दरअसल, इस मामले में न सिर्फ एक गर्भवती महिला से सामूहिक बलात्कार किया गया, बल्कि उसके सात रिश्तेदारों की हत्या कर दी गई थी। सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि हमने गुजरात सरकार को इस संबंध में सभी साक्ष्य पेश करने के लिए कहा था… हम जानना चाहते हैं कि क्या गुजरात सरकार ने अपना विवेक लगाया है; अगर हां, तो बताएं कि आपने किस सामग्री को दोषियों की रिहाई का आधार बनाया है। हैरानी की बात यह है कि अदालत में गुजरात सरकार ने उम्रकैद के सजायाफ्ता दोषियों की रिहाई से जुड़े दस्तावेज दिखाने के आदेश का विरोध किया। जबकि अगर सरकार इस मसले पर खुद को सही मानती है तो उसे कम से कम अदालत के कहने पर पूरी पारदर्शिता जरूर बरतनी चाहिए। स्वाभाविक ही गुजरात सरकार के इस रुख पर अदालत ने एक तरह से चेतावनी देते हुए कहा कि रिकार्ड पेश नहीं किए गए तो इस मामले में कोर्ट की अवमानना के आरोप में कार्यवाही चल सकती है और अगर कारण नहीं बताए जाते हैं तो हम अपना निष्कर्ष निकाल लेंगे। सवाल है कि इतने संवेदनशील मामले में सभी दोषियों की रिहाई का फैसला करने से पहले सरकार को क्या अपने विवेक का प्रयोग करना जरूरी नहीं लगना चाहिए था!
गौरतलब है कि बिलकिस बानो के मामले में बलात्कार और हत्या की जैसी प्रकृति थी, उसकी गंभीरता के मद्देनजर सभी दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाई गई थी। लेकिन इस मामले के सभी ग्यारह दोषियों को पिछले साल पंद्रह अगस्त को रिहा कर दिया गया था। रिहाई के बाद सार्वजनिक रूप से इन सबका स्वागत करने की जैसी खबरें आई थीं, उसे लेकर बहुत सारे लोगों के बीच उचित ही दुख और आक्रोश फैला था। सवाल है कि ऐसा करके इस जघन्य अपराध की पीड़ित और उनके परिजनों के साथ-साथ न्याय में भरोसा रखने वाले सभी लोगों को किस तरह का संदेश दिया गया था? एक प्रश्न यह भी है कि ऐसी रिहाई का व्यापक सामाजिक प्रभाव क्या पड़ेगा? इस संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट की चिंता को समझा जा सकता है कि आज यह बिलकिस के साथ हुई घटना का सवाल है, कल ऐसा किसी के साथ भी हो सकता है। यह ध्यान रखने की जरूरत है कि सामूहिक बलात्कार और हत्या जैसे जघन्य अपराध के दोषियों के प्रति कोई सरकार नरम रवैया अख्तियार करती है, मगर इससे न्याय की धारणा को चोट पहुंचती है।
Date:20-04-23
निजता का सम्मान जरूरीसंपादकीय
सेम सेक्स मैरिज को कानूनी मान्यता देने की मांग करने वाली याचिकाओं की सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार ने नया एफीडे़विट दाखिल किया है। इसमें सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों का नजरिया मांगने को कहा गया है। केंद्र सरकार चाहती है‚ इस मामले में सुनवाई ही ना हो क्योंकि यह बहुत संवेदनशील मुद्दा है। इस पर अदालत का कहना है‚ यह कवायद आने वाली पीढ़ियों के लिए हो रही है। जबकि याचिकाकर्ता चाहते हैं‚ सेम सेक्स मैरिज को भी कानूनी मान्यता मिले‚ क्योंकि यह उनका अधिकार है। शादी उनका मौलिक अधिकार हो ताकि उन्हें लांछनों से मुक्ति मिले। साथ ही‚ स्पेशल मैरिज एक्ट में उन्हें उचित पहचान मिले। हैट्रोसेक्सुअल ग्रुप के तौर पर वे मांग कर रहे हैं‚ पति–पत्नी की बजाय जीवन साथी शब्द का प्रयोग कर इसे जेंड़र न्यूट्रल बनाया जाए। वे चाहते हैं‚ उन्हें कमतर ना आंका जाए और दोयम दर्जे का बर्ताव ना हो। घरों में निजता बनी रहे। वे कह रहे हैं कि माना जाता है‚ हम सामान्य नहीं हैं यानी हम अल्पसंख्यक हैं तो हमारे अधिकार समान हैं। सरकार की दलील है कि उसे कानून व परंपराओें का भी ख्याल रखना है। वह मानती है कि इसे मान्यता देने से पर्सनल लॉ व सामाजिक मान्यताओं की तबाही हो सकती है। सरकार पहले ही कह चुकी है कि कानून बनाना अदालत का काम नहीं है। क्योंकि उसे लगता है कि इससे तलाक‚ भरण–पोषण‚ विरासत‚ गोद लेने सरीखी दिक्कतें आएंगी। चूंकि अपनी सरकारें सामाजिक मामलों‚ रीति–रिवाजों‚ मान्यताओं को लेकर हमेशा मध्यमार्ग तलाशती हैं। बहुसंख्य लोगों की सोच या उनके विचारों पर सीधा प्रहार करने से बचती है। हालांकि दुनिया के तमाम देश तेजी से सेम–सेक्स मैरिज को कानूनी मान्यता दे रहे हैं। बावजूद इसके अपने यहां अभी इस पर खुल कर बात भी नहीं हो रही। यह सच है कि शादी सुरक्षा का भाव देती है‚ इससे दंपति सामाजिक व पारिवारिक तौर पर बंध जाता है। उत्तराधिकार‚ गोद लेना या सरोगेसी‚ टैक्स में छूट व सरकारी अनुकंपाओं के लिए भी शादी का बहुत महत्व है। हम बहुत परंपरावादी और परिवार वाले लोग हैं। हमारे लिए इस तरह के क्रांतिकारी बदलावों को अपना पाना आसान नहीं है। यह दुस्साहसिक साबित हो सकता है। मगर यह भी सच है कि निजता या व्यक्तिगत चुनाव का सम्मान करना सभ्य समाज के लिए जरूरी है। यह भी समझने की जरूरत है‚ गे असामान्य या बीमार लोग नहीं हैं। समाज और सरकार को लचीला रुख अपनाना ही होगा।
Date:20-04-23
आबादी में अव्वलसंपादकीय
फिर एक रिपोर्ट ने बता दिया है कि आबादी के मामले में भारत अब चीन से आगे निकल गया है। संयुक्त राष्ट्र की ‘द स्टेट ऑफ वर्ल्ड पॉपुलेशन रिपोर्ट, 2023’ आई है, जिसका शीर्षक एट बिलियन लाइव्स, इनफिनिट पॉसिबिलिटीज : द केस फॉर राइट्स ऐंड चॉइस है। बुधवार को जारी रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत की जनसंख्या 1 अरब, 42 करोड़, 86 लाख होने का अनुमान है, जबकि चीन की जनसंख्या 1 अरब, 42 करोड़, 57 लाख है। मतलब आबादी में भारत अब चीन से 29 लाख आगे निकल गया है। यह संकेत बहुत महत्वपूर्ण है। भारत में इस बार जनगणना नहीं हुई है, पर जनसंख्या के इस अनुमान को किसी पक्ष ने ठोस चुनौती नहीं दी है। संयुक्त राष्ट्र ने 1950 से जनसंख्या के आंकड़े एकत्र करना शुरू किया था और उसके बाद भारत पहली बार दुनिया में आबादी के मामले में सबसे आगे निकल गया है। संयुक्त राष्ट्र के अधिकारियों के अनुसार, चीन की आबादी पिछले साल ही अपने चरम पर पहुंचकर गिरने लगी है। वहां गिरावट का क्रम आने वाले वर्षों में जारी रहेगा। गौर करने की बात है कि अभी भारत की जनसंख्या वृद्धि दर बढ़ रही है, जबकि चीन की वृद्धि दर साल 1980 से घटती चली जा रही है।
हालांकि, भारत अभी युवा बहुल देश है, जबकि चीन में बूढ़ों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। वहां 20 करोड़ से ज्यादा लोगों की आयु 65 वर्ष से अधिक है, भारत में अभी इस वय के महज सात प्रतिशत लोग हैं। वैसे चीन में लोगों का जीवन भारत की तुलना में लंबा है। चीन में महिलाओं की जीवन प्रत्याशा 82 है, जबकि भारत में 74 है। चीन में पुरुषों की जीवन प्रत्याशा 76 वर्ष है, जबकि भारत में 71 है। यह बिल्कुल संभव है कि अपने यहां जीवन-स्तर को सुधारकर चीन ने अपनी आबादी को नियंत्रित किया है। आबादी पर नियंत्रण के लिए स्वास्थ्य सेवाओं का विकास सबसे जरूरी है और भारत को भी इस दिशा में अपने प्रयास तेज करने चाहिए। वैसे चीन में आबादी नियंत्रण का काम बहुत कड़ाई के साथ किया गया है, जबकि भारत में उदारता भी ज्यादा आबादी की एक बड़ी वजह है। चीन ने काफी पहले एक संतान की नीति को लागू कर दिया था, जबकि भारत अभी भी दो संतान की नीति को ही बढ़ा रहा है। लोकतंत्र में आबादी को कड़ाई से नियंत्रित करने में अपनी समस्याएं हैं, स्वत: स्फूर्त नियंत्रण की उम्मीद करना और जागरूकता के लिए पहल करते रहना भारत की मजबूरी है।
हालांकि, संयुक्त राष्ट्र के विशेषज्ञ यह भी मानते हैं कि भारत में बढ़ती युवा आबादी अर्थव्यवस्था को मजबूत रखने का काम कर रही है और आगे करीब दस साल तक करेगी। अत: तेज विकास का लाभ उठाते हुए भारत को आबादी नियंत्रण के प्रयासों को तेज करना होगा, ताकि साल 2035 से भारत की आबादी में गिरावट शुरू हो जाए। अमृत काल इस मामले में भारत के लिए परीक्षा का समय है। आजादी की सौवीं वर्षगांठ के समय तक भारत अपनी आबादी को पूरी तरह से नियंत्रित कर ले, तो इससे बेहतर कुछ नहीं हो सकता। ज्यादा आबादी दुख की वजह नहीं है। समाज में बढ़ती असमानता और गरीबी ने मुश्किल में डाल रखा है। भारत जब सबसे ज्यादा आबादी वाला देश हो गया है, तब उसे बार-बार यह याद भी दिलाया जाएगा। मतलब, युद्ध स्तर पर आबादी को जल्द से जल्द स्थिर करने के अलावा हमारे पास कोई विकल्प नहीं है।
Date:20-04-23
हिंद महासागर में घुसपैठ करता ड्रैगनसी उदय भास्कर, ( निदेशक, सोसाइटी ऑफ पॉलिसी स्टडीज )
हिंद महासागर की गहराई में स्थित 19 समुद्र तलों के मंदारिन नाम जारी करने के बाद चीन के जहाज महासागर के मध्य में अनुसंधान व सर्वेक्षण का काम कर रहे हैं, जिसके बारे में कहा जा रहा है कि वे हिंद-प्रशांत में पनडुब्बियों की आवाजाही को लेकर नक्शा तैयार कर रहा है। इसका अर्थ है कि हिंद महासागर के प्रमुख दावेदार के रूप में चीन अपना दावा ठोक रहा है। उसकी समुद्री रणनीति पर यदि हम गौर करें, तो इसके कयास लगाए भी जा रहे थे।
जाहिर है, वह जल्द से जल्द हिंद महासागर में अपनी स्थायी मौजूदगी चाहता है, जिसका विस्तार जिबूती से कोको द्वीप समूह तक हो सकता है। उसकी इस मंशा का पता तभी चल गया था, जब 2008-09 के अंत में उसने ‘एंटी-पायरेसी’ गश्त शुरू कर दी थी। अगर यह संभव हो गया, तो भारत को बड़ा नुकसान हो सकता है। अव्वल तो यहां अपनी मजबूत स्थिति से हमें समझौता करना पड़ेगा, और फिर एक ऐसे देश के साथ हमें समुद्री क्षेत्र साझा करना होगा, जो हमारे लिए प्रतिकूल भी है और प्रादेशिक विवादों को न्योतने वाला भी। ऐसे में, कई और गलवान हमें परेशान कर सकते हैं।
हिंद महासागर में चीन की गतिविधियों के हमारी सुरक्षा और सामरिक हितों के संदर्भ में कई गहरे निहितार्थ हैं। आशंका है कि चीन हमारे समुद्री ढांचे पर निगरानी तेज कर देगा, विशेष रूप से नौसेना के ठिकानों पर उसकी नजर बनी रहेगी। अगर कोको द्वीप समूह पर चीन के साजो-सामान बढ़ते हैं, तो अंडमान और निकोबार द्वीप समूह तक उसकी जद में आ जाएंगे। इन सबसे पहले उसने अरुणाचल प्रदेश के कई इलाकों का नामकरण करके यह बताने की कोशिश की थी कि भारतीय हिस्सों पर उसका दावा अब भी कायम है। गलवान, 2020 की घटना के बाद वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर तनाव कहीं ज्यादा बढ़ गया है। अरुणाचल प्रदेश का मसला भी, जिसको लेकर द्विपक्षीय सहमति बनती हुई लग रही थी, अचानक से खबरों में आ गया है, जो साफ बता रहा है कि हमें कहीं अधिक प्रभावकारी जमीनी उपाय करने होंगे।
आखिर हमारी रणनीति क्या होनी चाहिए? हमें ऐसी समुद्री रणनीति बनानी चाहिए, जो सिर्फ नौसेना-केंद्रित न हो, बल्कि समावेशी हो। इसके अलावा जरूरी यह भी है कि महासागर में जरूरी ढांचे के निर्माण के लिए पर्याप्त आर्थिक मदद दी जाए। यह समझना होगा कि किसी भी राष्ट्र की समुद्री क्षमता केवल नौसेना और तटरक्षक बल तक सीमित नहीं होती। समुद्री वाणिज्यिक जहाज, बंदरगाह और हॉर्बर, मछली पालन, नीली अर्थव्यवस्था के साझेदार, तटीय इलाकों में संपर्क जैसे तमाम तत्वों को भी उसमें शामिल करना पड़ता है और उनकी सहभागिता लगातार बढ़ानी पड़ती है। क्या चिंताजनक नहीं है कि दुनिया के शीर्ष 20 बंदरगाहों में भारत के हाथ खाली हैं? बड़े-बड़े मालवाहक जहाज श्रीलंका जाते हैं, जहां माल उतारकर उसे भारत भेजा जाता है। भारत ने गहरे समुद्र में मछली पकड़ने को लेकर भी पर्याप्त निवेश नहीं किया, जिससे बड़े पैमाने पर विदेशी जहाज अवैध रूप से मछली मार रहे हैं।
भारत का जहाज-निर्माण भी वैश्विक स्तर से काफी नीचे है। यह स्थिति तब है, जब भारत में एशिया का पहला जहाज निर्माण यार्ड- हिन्दुस्तान शिपयार्ड था। आज चीन और दक्षिण कोरिया जैसे देश जहाज-निर्माण में वैश्विक नेता बन गए हैं, लेकिन हमने ऐसा कोई प्रयास संजीदगी से नहीं किया। भारत अपने खतरों को हिमालय की नजर से देखता है, और समुद्री चुनौतियों की अनदेखी करता है। दिक्कत यह भी है कि हमारे राजनीतिक नेतृत्व का ज्यादातर ध्यान चुनावों पर होता है और उनकी नजर में पाकिस्तान कहीं बड़ा खतरा है। फिर भी, उम्मीद यही है कि हिंद महासागर की इस चुनौती पर हमारा सत्ता-प्रतिष्ठान उचित गौर करेगा।
हमें वैश्विक मंचों पर भी चीन को घेरना होगा। बीजिंग जिस तरह की विस्तारवादी नीतियों को आगे बढ़ाता है, वह तमाम देशों के लिए चिंता का सबब है। अच्छी बात है कि बीजिंग का विरोध करने वाले समान सोच के कई राष्ट्र एक समूह बनाने के लिए आपस में बातचीत कर रहे हैं। हालांकि, सच यह भी है कि कोई भी देश चीन के साथ अपने आर्थिक रिश्तों की कीमत पर आगे नहीं बढ़ना चाहेगा, और यही इस पूरे मसले की सबसे बड़ी विसंगति है, जिससे हमें जूझना होगा। हर देश अपने हितों को सर्वोपरि रखना चाहेगा। हालांकि, भारत क्वाड समूह का भी हिस्सा है। लिहाजा यह देखना दिलचस्प होगा कि यह गुट किस तरह से समुद्री क्षेत्र में चीन से निपट सकेगा?
क्या इसके बरअक्स, हम तिब्बत जैसे पुराने मसलों पर चर्चा शुरू कर सकते हैं? निस्संदेह, भारत को भी बातचीत का रास्ता बंद नहीं करना चाहिए। बीजिंग से वार्ता लगातार होनी ही चाहिए, भले इसके ठोस परिणाम न निकल पाएं। मगर दलाई लामा के बाद तिब्बत को लेकर एक गेम प्लान भी हमें तैयार करना चाहिए। इसका हमें फायदा मिल सकता है। विदेश मंत्रालय को सक्रियता दिखाने की जरूरत है। चीन के बारे में भारत को एक श्वेत पत्र जारी करना चाहिए। साथ ही, ऐसी रणनीति भी बनानी चाहिए कि देश के बुनियादी हितों की रक्षा करने में वे समर्थ हों। देश के पहले राष्ट्रीय समुद्री सुरक्षा समन्वयक के रूप में सेवानिवृत्त वाइस एडमिरल जी अशोक कुमार की नियुक्ति सुखद है, पर इसका असर देखना शेष है।
भारत की विविधता और यहां के लोकतंत्र को लेकर चीन की अपनी चिंताएं हैं। देखा जाए, तो शुरुआत से ही वह इसको लेकर परेशान रहा है। हालांकि, उसके लिए तनाव दक्षिण चीन सागर में भी बढ़ रहा है, जहां अंतरराष्ट्रीय जल-क्षेत्र में नौ-परिवहन की स्वतंत्रता संबंधी अधिकारों को लेकर विवाद है। दिलचस्प है कि चीन ने यह दावा कृत्रिम द्वीपों के आधार पर किया है, जिसे अमेरिका स्वीकार नहीं कर रहा। उसने उन इलाकों में अपने जहाज भी भेजे हैं। आसियान के कई राष्ट्र और क्वाड के सदस्य देश भी ‘नाइन डैश लाइन’ को लेकर चीन के दावे को खारिज करते हैं, लेकिन मौजूदा वक्त में बीजिंग को नाराज करने का जोखिम नहीं उठाना चाहते। ऐसे में, जापान के हिरोशिमा में प्रस्तावित जी-7 के शिखर सम्मलेन में कुछ बात बन सकती है, जिसमें आठ अन्य नेताओं के साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विशेष तौर पर आमंत्रित किए गए हैं। मुमकिन है, कि इसमें चीन की नीतियों से प्रत्यक्ष तौर पर प्रभावित देश इस बात पर आम राय बना सकें कि आखिर बीजिंग से किस तरह से निपटा जाए?
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हाल के कुछ वर्षों में अंगदान का महत्व बहुत बढ गया है। वह इसलिए, क्योंकि अंगों के प्रत्यारोपण पहले से अधिक सफल होने लगे हैं। इस सफलता से अनेक जिन्दगियों को बचाया जा रहा है। अंगों के प्रत्यारोपण की संभावनाएं बहुत बढ़ गई है। लेकिन भारत में अंगदान की संख्या बहुत कम है।
इस मामले से जुडे़ कुछ बिंदु –
हाल ही में प्रधानमंत्री ने भी अंगदान के लिए रजिस्टर करने की अपील की है। भारत सरकार को अंगदान के लिए डोमिलाइल प्रतिबंध को हटाना चाहिए। अंगदाताओं में वृद्धि के बिनाए बढ़ी हुई मांग से अंगों के अवैध व्यापार को बढ़ावा मिलता जाएगा। आर्थिक रूप से कमजोर लोगों का शोषण होता रहेगा। भारत सरकार को चाहिए कि व्यवस्था में फैली इन कमियों का दूर करने के लिए एक सार्थक योजना बनाए।
‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 28 मार्च, 2023
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Date:19-04-23
The future of India’s civil society organisationsIn the prevailing political climate, civil society needs to collaborate with other progressive stakeholders to move forward.Pushparaj Deshpande is the Director of the Samruddha Bharat Foundation, a multi-party platform that furthers India’s constitutional promise. He is also the series editor of the ‘Rethinking India’ series.
The Bharatiya Janata Party (BJP) government’s systematic suffocation of civil society over the last nine years has ensured that most governments no longer listen to civil society organisations (CSO) or movements, either in the pre-legislative stage or in the redress of lacunae in the implementation of government schemes. Given that advocacy is effectively dead, the ability of civil society to shape policy and public discourse has shrunk drastically. Because civil society is seen to be the new frontier for war and foreign interference, there has been a systematic clampdown on CSOs lobbying for greater constitutional and civic freedoms. Therefore, activists, journalists, academics and students have been targeted by a plethora of the state’s governing instruments and non-state actors (who have resorted to violence and abuse, online and offline). This has been further exacerbated by restricting the access of CSOs to resources (including cancelling Foreign Contribution (Regulation) Act clearances, revoking 12A/80-G licences, imposing retrospective taxes, and pressuring private companies and philanthropists to redirect funding).
Because the BJP government has re-conceptualised vikas (development) as the furtherance of large projects, rather than citizen’s well-being, civil society is being vilified as disruptive to India’s development trajectory — and therefore anti-national. This portends a grave threat to the system’s integrity because civil society is an indispensable safety valve for tensions in a polity.
A drastic structural adjustment
All this has been coupled with the BJP spearheading a structural adjustment of India’s civil society landscape. By positioning many institutions from the Sangh Parivar, the BJP is fostering a ‘New Civil Society for New India’. Apart from being the primary recipient of government patronage, the Sangh’s CSOs are also the principal beneficiary of Corporate Social Responsibility funds (whether this is as quid pro quo for clearances/licences/exemptions by BJP governments, or through blatant coercion is anybody’s guess). Moreover, these Sangh institutions have access to and influence over select departments in State governments (primarily education, culture, personnel as well as Dalit and Adivasi welfare). Apart from the profound programmatic implications this has (activities related to the welfare of women, Dalits, Adivasis, students, human rights and freedoms are increasingly shaped by the Sangh’s ideological imperatives), this has also altered the civil society landscape in India. All other CSOs/movements are slowly being circumscribed as a result of the financial and political clout the Sangh’s CSOs can muster. That this endeavour has not fully succeeded so far is testament to the legitimacy that India’s CSOs/movements still enjoy among Indians. However, while most civil society actors are aware of the existential threat they face, they have not displayed nimbleness in reorienting their normative and operational methodologies. They still cling to outdated tactics whose overall utility is fast diminishing. Sanctioned, and therefore sanitised, protests at Jantar Mantar in New Delhi, Townhall in Bengaluru or Azad Maidan in Mumbai are undoubtedly cathartic to the constituency that activists influence, and keep the flock together. But they do nothing to shape the thinking or action of BJP governments. Similarly, articles/papers, speeches at think tanks/conferences/symposiums, and petitions/open letters do not shame governments into any substantive course correction. Even lobbying legislators to raise issues is ineffective — the Union government either does not let Parliament function or ignores uncomfortable issues.
Additionally, progressive CSOs fail to blend socio-cultural values with welfare/constructive work or calls to protect constitutional values. Consequently, they are unable to reshape hearts and minds, and thereby guide mass consciousness. Given that vast sections of society have been radicalised (highlighted in a 2017 study by the Centre for the Study of Developing Societies and Konrad-Adenauer-Stiftung), this is a major shortcoming of progressive civil society. Anecdotal evidence from various States suggests that local communities instrumentally secure benefits from progressive CSOs/movements, but ideologically align with the BJP. This dichotomy has resulted in psychological fatigue among key activists, who naturally question the foundational rationale of their work.
A realignment is needed
This situation is untenable for various reasons. First, because of the financial and structural constraints imposed on them, CSOs/movements are bleeding conscientious youngsters, who naturally need some financial sustenance. Second, without sustained support, CSOs cannot positively mould public discourse or make a tangible impact on the nation at large. And third, with governments consciously avoiding CSOs/movements, their ability to shape policy is diminished (which adversely impacts organisational morale). It seems unlikely that the BJP government would take any steps to redress these problems. So, what is the way forward for progressive civil society in India?
Faced with a drastically reduced spectrum of options, some progressives will migrate to safer avenues; others may limit the scope of their work, and still others may even re-align with the BJP. The net result is that civil society will be unable to speak truth to power, amplify the voices of the most vulnerable, enrich policies/legislation through constructive feedback, or further the collective good. This is obviously not in the peoples’ or the national interest. We need to collectively forge a plan of action for this sector’s future.
The one possibility that could emerge is that young activists could be inducted into political parties, either within the party organisation or in an aligned body. This could create an institutionalised moral force within the parties (which could balance electoral compulsions with ethical/human rights considerations). This would afford parties a layered systemic approach to thorny issues.
Currently, many parties consciously avoid direct exposure to difficult issues that could adversely impact them electorally (a real concern because of the ability of the powers that be to manufacture false narratives). This includes communal disturbances, atrocities against Dalits and women, championing the rights of activists fighting for Adivasi rights or civic and political freedoms. In stark contrast, if an aligned civil society organisation took up such issues (both within and outside the party organisations), it would ensure that a party remains connected to genuine community problems, while allowing for a permeable wall of separation. There is a precedent to this, when the Congress Movement (the Gandhian constructive movement) complemented the Congress system (which has always been an electoral and governance machine).
Given the prevailing political climate, CSOs will need to urgently collaborate with other progressive stakeholders (for which they will need to shed their studied aversion to each other and political parties). Some civil society stakeholders would argue against this, either because they can continue raising funds and attracting global attention when harassed. But those isolated examples do not address the systemic corrosion that the sector faces today. In fact, in the near future, the BJP could well resort to using the continued existence of these ‘celebrity’ activists as proof of their tolerance towards civil society in general. We need to find structural solutions to structural problems. This is our historic responsibility.
In that spirit, private philanthropies and companies need to realise that they are the only lifeline for progressive CSOs today. Yes, it is infinitely easier to support organisations that work on ‘soft’ issues that may not invite the wrath of the powers that be. It is even easier to look the other way. But inaction today will directly contribute to the extinction of civil society, arguably the fifth pillar of Indian democracy. Transcending instrumental exigencies, conscientious Indians must find the courage to work together and silently devise new methods of collaboration. Only through such a principled coalition can we first safeguard, and eventually further, the constitutional idea of India.
Date:19-04-23
फेक और मिसलीडिंग की परिभाषा कैसे तय होगीसंपादकीय
सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ‘आईटी संशोधन नियम’ लेकर आया है। इसके एक फैक्ट चेकिंग यूनिट बनाई जाएगी, जो के खिलाफ ‘फेक और मिसलीडिंग’ (झूठा और भ्रामक ) कंटेंट का पता कर उसे हटाने के लिए मेटा, यू-ट्यूब, ट्विटर जैसे सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को बाध्य करेगी। फेक न्यूज वह है जिसमें दिए गए तथ्य का अस्तित्व ही नहीं होता, लिहाजा इसकी पहचान आसान है। लेकिन भ्रामक कंटेंट कैसे चिह्नित किया जाएगा? उदाहरण के लिए सरकार ने हाल ही में दावा किया कि शिक्षा पर खर्च राशि में सन् 2014 के मुकाबले कई गुना वृद्धि हुई है, लेकिन बजट या जीडीपी के प्रतिशत के रूप में यह व्यय लगभग वहीं का वहीं है। अब अगर कोई सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर यह बात लिखता है, जो सरकार के दावे को झुठलाती हो तो क्या इसे भ्रामक माना जाएगा? कई बार सरकार खर्च के संख्यात्मक आंकड़े देती है, जो मुद्रास्फीति के कारण बढ़े दिखते हैं, लेकिन वे प्रतिशत में कम होते हैं तो क्या इन्हें भ्रामक माना जा सकता है ? तर्क शास्त्र में दो प्रमुख दोषों का जिक्र है- पहला, अपने निष्कर्ष को साबित करने के लिए चुनिंदा तथ्यों को ही लेना । और दूसरा, उसी काल-खंड तक के तथ्य देना जिससे मंतव्य सिद्ध होता हो । विपक्षी दलों पर ईडी के बढ़ते छापे की खबर एक सत्य है, जिससे सरकार उनके भ्रष्ट होने का दावा करती है, लेकिन अगर कोई कंटेंट यह बताता है कि इन मामलों में सजा की दर नगण्य है तो क्या इसे सरकार के खिलाफ भ्रामक खबर कहा जाएगा? स्वतंत्र मीडिया का मूल कार्य ही सरकार की दुराग्रह – शून्य आलोचना करना होता है। फिर सरकार को जनता जनहित का काम करने के लिए ही तो चुनती है। आलोचना का स्वागत होना चाहिए।
Date:19-04-23
दो पुराने दुश्मनों की नई दोस्ती के पीछे छिपे हुए समीकरणमनोज जोशी, ( ‘अंडरस्टैंडिंग द इंडिया चाइना बॉर्डर’ के लेखक )
चीन ने जिस तरह से सऊदी अरब और ईरान के बीच सुलह कराई, वह एशिया में वर्चस्व के लिए बढ़ते संघर्ष का सबूत है। इससे मध्य-पूर्व में नए समीकरण भी उभरे हैं, क्योंकि अभी तक यहां अमेरिका ही मुख्य खिलाड़ी की भूमिका में होता था। एक मायने में इस करारनामे से 2016 से पहले की यथास्थिति बहाल हुई है, जब सऊदी ने ईरान से सम्बंध तोड़ लिए थे। इन दोनों के रिश्ते 1979 के बाद से ही अच्छे नहीं थे। ईरान में शाह की हुकूमत का तख्तापलट कर दिया गया था। ईरानी क्रांति की अगुवाई शिया धर्मगुरु कर रहे थे और इससे ऐतिहासिक शिया-सुन्नी टकराव भी उभर आए।
अभी यह देखा जाना शेष है कि दोनों देशों में कूटनीतिक सम्बंध बहाल होने से क्या वो तमाम मसले भी हल हो सकेंगे, जिनके कारण उनमें फूट पड़ी थी। दोनों ही पक्षों के लिए पीछे हटना और समझौता करना सरल नहीं होगा। दूसरी तरफ चीन भी उन्हें ऐसे ही समाधान सुझाने की कोशिश करेगा, जो दुनिया के बारे में उसके मौजूदा नजरिए के अनुरूप हों। लेकिन हमें किसी गलतफहमी में नहीं रहना चाहिए। केवल चीन के कहने भर से सऊदी अरब और ईरान ने हाथ नहीं मिला लिया होगा, कुछ उनकी भी जरूरतें रही होंगी। इन दोनों की नई-नवेली दोस्ती का शुरुआती सबूत तो इसी बात से मिल जाएगा कि क्या वे यमन-टकराव का कोई हल निकाल सकते हैं। यह टकराव हाउथी मूवमेंट और सऊदी के नेतृत्व वाले सैन्य गठजोड़ के बीच जारी है। हाउथी मूवमेंट को ईरान का समर्थन प्राप्त है, जिसने यमन सरकार का तख्तापलट कर दिया था।
खुद ईरान के पास अंदरूनी समस्याओं की कमी नहीं है। वह राजनीतिक और आर्थिक दोनों मोर्चों पर मुश्किलों का सामना कर रहा है। हिजाब के मसले पर ईरान में महिलाओं का जो आंदोलन हुआ, वह एक गम्भीर बीमारी का लक्षण भर था। ईरान पर पश्चिमी जगत ने अनेक पाबंदियां थोप रखी हैं और मुल्लाओं के नेतृत्व में संचालित होने वाला यह मुल्क अंदरूनी तनावों से जूझ रहा है। उसे उम्मीद है कि चीन 2015 की न्यूक्लियर डील को बहाल करने में अधिक सक्रिय भूमिका का निर्वाह करेगा, क्योंकि उसकी नाकामी के कारण ही ईरान को व्यापक सैक्शंस का सामना करना पड़ा है। जहां तक सऊदी अरब का सवाल है, वह विकास के एक पोस्ट-ऑइल युग पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। लेकिन इजरायल और ईरान से सुरक्षागत-खतरों की अनदेखी भी वह नहीं कर सकता। उसने संकेत दिए हैं कि इजरायल से सम्बंध सुधारने के लिए वह यूएई और बहरीन द्वारा स्थापित अब्राहम अकॉर्ड में सम्मिलित हो सकता है। लेकिन उसे अमेरिकी सुरक्षा की गारंटी चाहिए, साथ ही वह एक न्यूक्लियर सहयोग संधि भी चाहता है। सऊदी अरब एक अरसे से ईरान की ओर से एटमी और मिसाइल खतरे को टालने की कोशिशें करता आ रहा है। उसकी मौजूदा स्थिति यह है कि वह खुद एटमी हथियार नहीं चाहता, लेकिन अगर ईरान परमाणु बम बना लेता है तो सऊदी को भी मन मारकर वैसा ही करना पड़ेगा।
मध्य-पूर्व के प्रति चीन का रवैया भारत से विपरीत नहीं है। उसने खुद को किसी भू-राजनीतिक पचड़े में उलझाने के बजाय उस क्षेत्र की सभी महत्वपूर्ण ताकतों- इजरायल, सऊदी अरब और ईरान से अच्छे सम्बंध कायम रखने की कोशिशें की हैं। चीन इस क्षेत्र से बड़ी मात्रा में तेल का आयात करता है। लेकिन यूक्रेन-रूस युद्ध से समीकरण बदल सकते हैं। जैसे-जैसे रूस और चीन के सम्बंध मजबूत हो रहे हैं, रूस और ईरान के सम्बंधों में भी गर्मजोशी आ रही है। वास्तव में विश्लेषकों का मत है कि अगर ईरान की खाड़ी में हालात बिगड़ते हैं तो चीन के ईरान का साथ देने की सम्भावनाएं अधिक हैं। दूसरी तरफ सऊदी अरब के अमेरिका से ऐतिहासिक मधुर सम्बंध किसी से छुपे नहीं हैं। ये और बात है कि आज अमेरिका की सऊदी-तेल पर निर्भरता पहले जितनी नहीं रह गई है।
Date:19-04-23
राजनीति में अपराधियों को पालने वाली सोच को मारेंनवनीत गुर्जर
अतीक को मरना ही था और वह मरता भी, लेकिन कानून के हाथों से। कितने निरपराधों को उसने मौत तक पहुंचाया, कितनों की जमीनें, मकान हड़पे! जिसने भी आवाज उठाई, उसका कंठ दबा दिया और यह सब कानून से दूर जाकर ही वह करता रहा, इसलिए उसे ऐसी ही मौत मरना था, तर्क यह दिया जा सकता है। लेकिन लोकतंत्र की राह में यह तर्क सही नहीं कहा जा सकता।
सवाल यह उठता है कि अतीक यह सब कर रहा था तब हमारी पुलिस, हमारा कानून और ये राजनीति जिसका वह भी सक्रिय सदस्य बन बैठा था, कर क्या रही थी? महज 27 साल की उम्र में वह विधायक बन बैठा था। कभी किसी पार्टी से, कभी किसी दूसरी पार्टी से और कभी निर्दलीय भी। किसने दिया उसे राजनीति में प्रवेश? उसके बाहुबल का, उसके डर का इस्तेमाल करके यह राजनीति क्यों वर्षों पल्लवित और पोषित होती रही? तब किसी को उसके द्वारा किए गए, या किए जा रहे अत्याचार क्यों दिखाई नहीं दिए? ये पुलिस, ये व्यवस्था, तब क्यों सब कुछ देखकर भी अनजान बनी रही? राजनीति का अपराधीकरण जब तक सख्ती से रोका नहीं जाता, इस तरह के अपराधी पनपते रहेंगे और किसी न किसी रास्ते विधानसभाओं, लोकसभा में जाते रहेंगे।
दरअसल, हमारी व्यवस्था को पानी सिर से ऊपर तक चले जाने के बाद ही होश क्यों आता है। कई बार तो होश आता ही नहीं है और फिर वही होता है जो हुआ! आज भी हालात ये हैं कि हमारी राजनीतिक पार्टियां निर्विवाद रूप से राजनीति का अपराधीकरण रोकने पर एकमत नहीं हो पाई हैं। हत्या या ऐसे अपराधों के जिन पर आरोप हों, भले ही उन्हें सजा न मिल पाई हो, उन्हें चुनाव का टिकट क्यों दिया जाता है?
कहा जा सकता है कि कानून या पुलिस या सरकारें जब अपना काम समय पर नहीं करतीं तो इस तरह के गैंगवार पनपते हैं और फिर वह गैंग अपने हिसाब से, अपना न्याय करने पर आमादा हो जाता है, लेकिन इसे किसी भी हाल में सही नहीं ठहराया जा सकता।
जब हम याकूब को आधी रात को भी कोर्ट खुलवाकर अपना पक्ष रखने का मौका देते हैं तो लोकतंत्र का महान उदाहरण पेश होता है। आखिर उसे फांसी दी जाती है, लेकिन कानून के अनुसार।
एक तरफ हम कानून के राज की बात करते हैं और दूसरी तरफ लॉरेंस विश्नोई जेल में बैठकर इंटरव्यू देता है। सुकेश के तरह-तरह के फुटेज जेल से बाहर आ जाते हैं। सत्येंद्र जैन का किसी से पांव दबवाते हुए फुटेज भी जेल के भीतर से ही आता है। फिर कौन-सा कानून का राज काम कर रहा है? कमजोरी तो कानून व्यवस्था की ही है। अतीक को जब पुलिस घेरे में गोली मारी जाती है तो यह किसकी अनदेखी से हुआ? क्या कोई गैंग था जो अतीक द्वारा पूछताछ में राज खुलने के भय से परेशान था और इन्हीं राज को दफन करने के लिए उसने कुछ शूटर्स हायर कर इस घटना को अंजाम दिया? न्यायिक जांच में यह कड़ी खुलनी ही चाहिए ताकि छिपे हुए चेहरों के बीच का अतीक सामने आ सके।
अतीक जैसे आततायियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी ही चाहिए। होती भी, और वही होना था जो हुआ, यानी मौत की सजा। लेकिन हर सजा में, हर फैसले में न्याय होता हुआ दिखना चाहिए। चंद शूटर्स की गोलियों की आवाज में न्याय देखना उचित नहीं कहा जा सकता।
हिंसा के बदले हिंसा, हमारी न तो परम्परा है और न ही रिवाज। हिंसा का जवाब कानूनी रास्ते से कड़ा दंड ही होना चाहिए। दरअसल, भीड़ या गैंगवार के जरिए जब न्याय देखा जाता है तब होता यह है कि एक आततायी या गुंडा मारा जाता है और दूसरा पैदा होता है। …और यह चेन फिर लम्बी चलती जाती है। इसका कोई अंत नहीं होता।
Date:19-04-23
जातिगत जनगणनासंपादकीय
कांग्रेस ने जिस तरह जातिगत जनगणना की मांग की, उससे यह साफ है कि वह अपनी रणनीति बदल रही है और उन क्षेत्रीय दलों के साथ खड़ी हो रही है, जो यह चाहते हैं कि इसका पता लगाया जाए कि देश में किस जाति की कितनी संख्या है। यह समय बताएगा कि कांग्रेस जातिगत जनगणना की अपनी मांग के सहारे क्षेत्रीय दलों को अपने साथ खड़ा कर पाएगी या नहीं, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि उसने लंबे समय तक सत्ता में रहते समय इसकी आवश्यकता नहीं समझी कि जातियों की गणना कराई जाए। कहीं कांग्रेस जातिगत जनगणना की मांग इसलिए तो नहीं कर रही है, ताकि स्वयं को पिछड़े वर्गों के हितैषी के रूप में पेश कर सके और उस आरोप से पीछा छुड़ा सके कि राहुल गांधी ने मोदी उपनाम को लेकर जो बयान दिया था और जिसके कारण उनकी सदस्यता गई, उससे उन्होंने पिछड़ों का अपमान किया? वस्तुस्थिति जो भी हो, कांग्रेस की ओर से जातिगत जनगणना की मांग इसलिए हैरानी का विषय है कि एक समय उसके नेता जातिविहीन समाज बनाने की बातें किया करते थे। क्या यह विचित्र नहीं कि वही अब जातीय भावना को उभारने का काम कर रहे हैं। जातिगत जनगणना केवल जातीयता को उभारने का ही काम नहीं करेगी, बल्कि जातिवाद की राजनीति को भी बल देगी। यह किसी से छिपा नहीं कि यह राजनीति किस तरह जातीय वैमनस्य को भी बढ़ाने का काम करती है।
जातिगत जनगणना भले ही सामाजिक न्याय के नाम पर की जा रही हो, लेकिन उसका मूल उद्देश्य अगड़ों-पिछड़ों की राजनीति को धार देने के साथ इस पर जोर देना है कि जिसकी जितनी संख्या हो, उसकी उतनी ही भागीदारी हो। यह भी स्पष्ट है कि जातिगत जनगणना की मांग के पीछे एक इरादा जातिगत आरक्षण को बल देना है। यह एक विडंबना ही है कि जब इसका अध्ययन और आकलन किया जाना चाहिए कि आरक्षण की व्यवस्था ने गरीब और पिछड़े वर्गों का कितना उत्थान किया है, तब जातिगत आरक्षण पर जोर दिया जा रहा है। इससे इन्कार नहीं कि देश में अभी भी ऐसे निर्धन वर्ग हैं, जिनका सामाजिक-आर्थिक उत्थान करने के लिए विशेष उपायों की आवश्यकता है, लेकिन इन उपायों पर अमल करने के पहले यह भी तो देखा जाना चाहिए कि आरक्षण व्यवस्था अपने मौजूदा स्वरूप में कितनी कारगर है और उन उद्देश्यों को पूरा कर पाई है या नहीं, जिनके तहत इस व्यवस्था को अमल में लाया गया था। वास्तव में आरक्षण की एक ऐसी व्यवस्था बनाने की आवश्यकता है, जिससे यह सुनिश्चित हो सके कि पात्र लोग ही यानी निर्धन-वंचित तबके ही लाभान्वित हो सकें। चूंकि वर्तमान में लोग पीढ़ी दर पीढ़ी आरक्षण का लाभ उठा रहे हैं, इसलिए वे तबके आरक्षण के लाभ से वंचित हो रहे हैं, जो वास्तव में उसके हकदार हैं।
Date:19-04-23
जातिगत जनगणना के निहितार्थसंपादकीय
देश में जातिगत जनगणना के सवाल पर कांग्रेस क्षेत्रीय दलों के साथ खड़ी हो गई है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्किार्जुन खड़गे ने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को चिट्ठी लिखकर जाति पर आधारित जनगणना शुरू करने की मांग की है। जनता दल (यू), राजद, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी के अलावा दक्षिण भारत की द्रमुक भी जातिगत जनगणना का समर्थन कर रही हैं। कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने कर्नाटक में पार्टी का चुनाव अभियान शुरू करते हुए न केवल जातीय आधारित जनगणना की मांग की बल्कि आरक्षण से 50 फीसद कैपिंग को हटाने की मांग भी कर दी। कांग्रेस ने जातिगत आधार पर जनगणना के मुद्दे पर अपना जो स्टैंड लिया है उससे यह लगता है कि पार्टी आलाकमान ने यह मान लिया है कि अब अगड़ी जातियां कांग्रेस को अपना वोट नहीं देंगी। इसलिए अब कांग्रेस पार्टी ओबीसी, दलित और अल्पसंख्यकों को टारगेट करने के लिए जातिगत जनगणना की मांग कर रही है। भारत में अनेक जातियां और उनकी उपजातियां हैं। इनकी वास्तविक संख्या कितनी हैं, इनकी आर्थिक स्थिति क्या है, इसकी प्रमाणिक जानकारी नहीं है। एससी और एसटी की जनगणना तो प्रत्येक 10 वर्ष पर होती है, लेकिन ओबीसी सहित अन्य अगड़ी जातियों की नहीं होती। इसलिए ओबीसी की संख्या का निर्धारण करने के लिए इसके नेता केंद्र पर जातिगत जनगणना का दबाव डालते रहते हैं। यह मान लिया गया है कि भारत में चुनाव को सबसे अधिक जातियां ही प्रभावित करती हैं। लिहाजा सभी राजनीतिक दल जाति की पहचान लेकर वोटबैंक को मजबूत करते हैं। इसमें दो राय नहीं है कि सभी जातियों का सामाजिक-आर्थिक उत्थान होना चाहिए। लेकिन केंद्र की सत्ता में रहने वाली पार्टियां किसी-न-किसी बहाने से जातिगत जनगणना को टालती रहती हैं। उन्हें लगता है कि इससे समाज में और विभाजन होगा एवं समावेशी विकास की अवधारणा पर गहरी चोट लगेगी। जातिगत जनगणना नहीं कराने का एक यही भी कारण है कि आंकड़ों में भिन्नता होगी। अगर ओबीसी की आबादी 52 फीसद से घट जाती है तो सव्रे की तकनीक को लेकर नया विवाद हो सकता है और अगर बढ़ जाती है तो सत्ता में हिस्सेदारी की मांग और बढ़ेगी। लेकिन यह ऐसा मुद्दा है जिसे आज नहीं तो कल केंद्र को मानना ही पड़ेगा। बिहार में जातिगत गणना शुरू हो गई है। देश और बिहार की राजनीति पर इसका गहरा असर पड़ सकता है।
Date:19-04-23
मातृहंता !संपादकीय
यह कृतघ्नता की पराकाष्ठा है! दिल्ली के कीर्ति नगर इलाके के मानसरोवर गार्डन में लंदन से लौटे एक बेटे ने दौलत की खातिर बिस्तर से लगी बूढ़ी मां का जिस तरह कत्ल किया, और जो ब्योरे अब सामने आए हैं, वे हतप्रभ करने वाले हैं। 78 साल की बूढ़ी और लाचार महिंदर कौर के यह गुमान में भी नहीं होगा कि जिसे अपनी कोख से जन्म दिया, पाला-पोसा और अपने बुढ़ापे का सहारा के तौर पर देखा, वही उनका कातिल बन जाएगा! वह बूढ़ी मां कितनी तड़पी होगी, फ्लैट के गेट तक उसने अपनी जर्जर काया को कैसे खींचा होगा, यह सोचकर ही सिहरन पैदा हो जाती है। चंद रोज पहले हुई इस वारदात को आरोपी बेटे ने दुर्घटना बताने की कोशिश की थी, मगर मौका-ए-वारदात के साक्ष्यों ने जांच दल के मन में शुरुआत में ही शुब्हा पैदा कर दिया था, और अब तफ्तीश के बाद हुए खुलासे इस दुनिया के सबसे पवित्र रिश्ते को कठघरे में खड़ा कर गए हैं।
यह पहली वारदात नहीं है, जब किसी बेटे ने ऐसे नृशंस कृत्य को अंजाम दिया हो। नवंबर 2022 में दिल्ली के ही पालम इलाके में एक 25 साल के युवक ने अपने माता-पिता, दादी और बहन की चाकू गोदकर हत्या कर दी थी। मगर इन दोनों अपराधों के बीच जीवन-स्तर, परवरिश, आर्थिक हैसियत और उम्र का एक बड़ा फासला है। पालम कांड का आरोपी बेरोजगार युवा और नशे की गिरफ्त में था, जबकि मानसरोवर गार्डन राजधानी की पॉश कॉलोनियों में शुमार होती है, आरोपी शख्स की उम्र भी दोगुनी है और वह लंदन में अपने दूसरे भाई-बहन के साथ रहता था। ये ब्योरे बताते हैं कि हमारे परिवार में खून के रिश्ते भी अब कितने खोखले होते जा रहे हैं और हमें अपने मूल्यों के प्रति किस कदर संवेदनशील होने की जरूरत है। एनसीआरबी के आंकड़ों के मुताबिक, साल 2021 में बिहार में सबसे ज्यादा 815 लोगों की हत्या जमीन व मिल्कियत के लिए हुई, तो उत्तर प्रदेश में भी ऐसी हत्याओं का आंकड़ा सैकड़ों में था। जाहिर है, ऐसी ज्यादातर हत्याओं के आरोपी रक्त संबंधी ही होते हैं। इसलिए सरकारों और समाज-शा्त्रिरयों को इस घातक प्रवृत्ति पर गहन विमर्श करने की जरूरत है।
मानसरोवर गार्डन की घटना एक अन्य विडंबना को भी उजागर करती है। माता-पिता अपने बच्चों के लिए ऊंचे-ऊंचे ख्वाब संजोते हैं। उन्हें साकार करने के लिए वे अपनी जिंदगी में तमाम तरह के समझौते करते हैं, लेकिन जब बच्चे किसी अन्य मुल्क में चले जाते हैं, तो उनमें सिर्फ भौगोलिक दूरियां ही नहीं आती, नजरिये में भी फर्क आता है। एक बड़ी संख्या में महिंदर कौरों की जिदंगी तन्हा अपने बच्चों की राह तकते गुजर जाती है। ऐसी अनगिनत गाथाएं इसी अखबार की सुर्खियां बन चुकी हैं, जिनमें परदेसी बच्चों के एकाकी मां-बाप अपने फ्लैट या मकान में कंकाल-रूप में बरामद हुए। यह दुराव भूगोल और संसाधनों से अधिक रिश्तों से अपनाइयत के खत्म होते जाने का है। निस्संदेह, सभी बच्चे एक से नहीं होते और हमें अपने बच्चों के लिए बेहतर ख्वाब देखने ही चाहिए, मगर इसके साथ ही उनके भीतर मानवता हमेशा जिंदा रहे, इसका उद्यम भी करते रहना चाहिए। सुदूर मुल्कों में गए अपनों से संवाद बनाए रखें, उन्हें उनकी जिम्मेदारियों का एहसास भी कराते रहें, ताकि वे हमारे पारिवारिक मूल्यों से गाफिल न होने पाएं। श्रवण कुमारों के इस देश में कुपुत्र व मातृहंता हमेशा से रहे हैं, मगर ये अपवाद ही रहें, यही प्रयास होना चाहिए।
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मानव जीवन में विज्ञान और तकनीक वरदान और अभिशाप, दोनों तरह की भूमिका निभाते रहे हैं। फिलहाल हम सोशल मीडिया को लेकर इसी द्वंद का सामना कर रहे हैं। जीवन में इसकी घुसपैठ इतनी ज्यादा हो चुकी है कि इसे अलग रखना मुश्किल हो रहा है। दुनिया भर में हर आयु और वर्ग के लोग इससे प्रभावित हो रहे हैं।
सोशल मीडिया से किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रभाव को देखते हुए अमेरिका के दो स्कूल बोर्ड ने फेसबुक और इंस्टाग्राम की पेरेन्ट कंपनी मेटा जैसी कंपनियों पर केस कर दिया है। यह माना जा रहा है कि स्नैपचैट, टिक-टॉक आदि लत लगाने वाले प्लेटफॉर्म हैं।
कंपनियों की जवाबदेही क्या है ?
– सामान्यतः ये सभी मंच अंडरएज या अवयस्कों के लिए बनाए गए प्रतिबंधों का पालन करते हैं।
– कानून के द्वारा दी गई अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को लेकर सभी सोशल मीडिया मंचों को एक सीमा तक कानूनी सुरक्षा मिली हुई है।
– सभी मंच किशोरों में सोशल मीडिया को लेकर बढ़ती निर्भरता को नियंत्रित रखने के लिए मार्गदर्शन भी देते हैं।
समाधान –
सच्चाई यह है कि किसी भी नई प्रौद्योगिकी का आकर्षण हमेशा से ही ज्यादा रहता चला आया है। रेडियो की जगह टीवी ने ली और अब उसकी जगह सोशल मीडिया ले रहा है। इतना ही नहीं, उन्नत होती प्रौद्योगिकी तो एआई के माध्यम से वर्चुअल रिएलिटी की ऐसी सामग्री ला रही हैं, जिनका आकर्षण कई गुना ज्यादा है। ऐसा वही कंपनियां कर रही हैं, जिनसे स्कूल बोर्ड को परेशानी है। इसका समाधान यही है कि सामग्री बनने पर सबसे पहले उचित और व्यावहारिक प्रतिबंध लगना चाहिए। इस तक पहुंच के लिए ऐसी तकनीकी लेयर बनाई जानी चाहिए कि अभिभावक और स्कूल, दोनों ही इसे नियंत्रित करने में सक्षम हो। अंतिम लक्ष्य प्रौद्योगिकी को सीमित न करते हुए भविष्य की पीढ़ियों की रक्षा का होना चाहिए।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 28 मार्च, 2023
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Date:18-04-23
All It Takes To Be a Family Is Be FamilialET Editorials
It took a Bombay High Court judgment to allow a woman and a child, the former a working single woman who is not the latter’s biological mother, to find a family in each other. By law, single persons can adopt children — barring single men adopting girls. The single-judge bench overturning the district court’s earlier order, therefore, does not break new ground. The earlier verdict turning down the woman’s application to adopt her sister’s daughter was not because she was a single woman but because of ‘concerns’ that as a single workingwoman, she would not be able to give the child ‘personal attention’. Thankfully, the high court stated that all that mattered was the Central Adoption Resource Authority finding her to be fit as an adoptive parent. The rest were just concerns of a ‘medieval’ mindset.
The district court had rightly put the welfare of the child above all else. Where it showed its poor judgment was its bias against a workingsingle woman — a bias against anything straying from the standard family unit template. It is this aspect that makes the judgment important. Especially at a time when the legal validity of different types of family arrangements — including same-sex marriage — are being contested.
A family — parivar — is defined by a tight, close unit, looking out and caring for one another and, indeed, dependent on its members. There is no cookie-cutter ‘husband-wife-kids’ module, even as this may be its most popular and attested format, while the ‘joint family’ was de rigueur in some other time. All that matters for family members is to be familial for each other. Conversely, there is nothing that guarantees a wife-husband unit, by default, to be the best format to bring up a child if either parent is deemed unfit.
Date:18-04-23
Sudan’s tragedyThe feuding Generals should agree on a time-bound transition to democracyEditorial
For 30 years, Omar al-Bashir, a former military officer, ruled Sudan with an iron hand and indiscriminate violence. When he was toppled in April 2019 in a mass uprising, many hoped that the resource-rich country in the Horn of Africa would finally get a chance to move towards a freer society with a representative and responsive administration. But the tragedy of Sudan is that the monstrous regime that Mr. Bashir built outlasted his reign. Within two years of his fall, the military was back, and now, a power struggle between the top two generals has pushed Sudan to the brink of a civil war. Dozens of civilians have already been killed in fighting that broke out on Saturday in Khartoum and other parts of the country between the military and the Rapid Support Forces (RSF), a notorious paramilitary group. Despite international calls for truce, Lt.Gen. Abdel Fattah al-Burhan, the military chief as well as the head of the Sovereignty Council, the transitional administration, and his deputy, Lt.Gen. Mohamed Hamdan Dagalo, who commands the RSF, have refused to negotiate, blaming each other for the attacks. Mr. Dagalo, who has close ties with Russia’s Wagner private military company and Saudi Arabia, claims that the RSF has taken control of the presidential palace and has vowed to bring Gen. Burhan to justice, while the military has dismissed such claims and launched air strikes against RSF sites.
Just two years ago, the two generals stood hand in hand when they ousted a civilian transition government and took over the reins of the country. Faced with international isolation and domestic pressure, they agreed to transfer power back to the civilians. But differences emerged on who should control the post-transition military. Gen. Burhan supports the integration of the RSF into the regular military and transition to civilian government to take place in two years, while Gen. Dagalo, who fears that he would lose his clout, wants to delay it by 10 years. Discord grew into mistrust and mistrust led to fighting. And the fighting could drag the country, which has a history of internal strife, into an all-out civil war. Sudan’s generals are known for their scant regard for the welfare of their people. The country is struggling with an economic crisis, with rocketing inflation and a burning hunger problem. The last thing Sudan wants now is a civil war. If the priority of the generals is to address Sudan’s basic problems, they should pay attention to the call for a truce and dialogue, and commit themselves to a timeline-sensitive democratic transition. Decades of military rule in Sudan have resulted in a lot of atrocities. Generals Burhan and Dagalo should not tread the same course.
Date:18-04-23
सुविधानुसार सच का पैमाना बदलना कुतर्क हैसंपादकीय
दूध कर्नाटक में चुनावी मुद्दा बन गया है। देश में दूध का सबसे बड़ा ब्रांड अमूल अब इस राज्य में विस्तार कर रहा है, जिससे वहाँ के दुग्ध-किसानों का नुकसान होगा। राज्य सरकार का कहना है कि यह संस्था के सिद्धांतों के खिलाफ है। वहां के सहकारी नदिनी ब्रांड का अभी तक पूरे बाजार पर कब्जा था। विपक्ष इसे सरकार और केंद्र के खिलाफ मुद्दा बना चुका है। इसी बीच नंदिनी ब्रांड ने केरल में अपने अनेक आउटलेट खोलकर दूध बेचना शुरू किया है। इससे केरल नाराज है। इसका तर्क भी वही है, जो कर्नाटक का अमूल के खिलाफ है। वह भी यही आरोप लगा रहा है। कि कर्नाटक को कोई अधिकार नहीं है कि वह दूसरे राज्य में जाकर दूध बेचे और वहां के मिल्क ब्रांड ‘मिल्मा और किसानों का अहित करे। यह सच है कि दूध का उत्पादन और कीमतें बहुत कुछ भौगोलिक और स्थानीय कारकों, खेती की प्रकृति और राजनीतिक-सामाजिक कारणों पर निर्भर है, जिस पर दुग्ध उत्पादक किसानों का कोई नियंत्रण नहीं होता। कई राज्यों में दुग्ध उद्योग में सहकारी आंदोलन उतना प्रबल नहीं रहा है। वहीं कर्नाटक और गुजरात में कृषि क्षेत्र ज्यादा होने से गा भी उपलब्ध हैं और मोटा अनाज भी पशु आहार के लिए पैदा होता है। कर्नाटक का आबादी घनत्व 389 व्यक्ति प्रति किमी है और गुजरात का 308 जबकि बिहार का 1250, केरल 870 और पश्चिमी बंगाल का 1028, लिहाजा प्रति लीटर दूध की लागत भी केरल या बिहार के मुकाबले कम होती है। लेकिन इन सबसे अलग कुछ राज्य दूध-अभाव वाले हैं जिनके लिए दूसरे राज्यों से दूध लेना मजबूरी है। केन्द्रीय स्तर पर दुग्ध-विपणन नीति बनाने से ही समस्या का हल संभव होगा।
Date:18-04-23
क्या ए आई के विकास पर रोक लगाने की जरूरत हैनीयल फर्ग्युसन लेखक, ( ब्लूमबर्ग के स्तम्भकार और ग्रीनमेंटल के संस्थापक )
ऐसा रोज-रोज नहीं होता कि डरा देने वाला पूर्वानुमान मुझे पढ़ने को मिलता हो, जैसा कि हाल ही में टाइम पत्रिका में एलीजेर यूडकोव्स्की के एक लेख में मुझे मिला। उन्होंने कहा कि अगर हम एक सुपरह्यूमन स्मार्ट एआई बनाते हैं तो यह मनुष्यजाति के अंत की शुरुआत होगी। और यह किसी सुदूर-अतीत में नहीं होगा। यह पढ़कर मैं सोचने लगा कि क्या साइंस-फिक्शन के 200 वर्षों के इतिहास ने हमें एआई के लिए तैयार नहीं किया है? युडकोव्स्की को अच्छी तरह से पता है कि वे क्या कह रहे हैं। वे बर्कले स्थित मशीन इंटेलीजेंस रिसर्च इंस्टिट्यूट के प्रमुख हैं और एआई के मसले पर लम्बे समय से लिख रहे हैं। उन्होंने चेतावनी दी है कि कोई अनजाने ही एक घातक एआई बना सकता है। मिसाल के तौर पर, हम उससे कहें कि वह क्लाइमेट चेंज पर रोक लगा दे और वह यह निष्कर्ष निकाले कि यह तो होमो सेपियंस के समूल-नाश से ही सम्भव है।
आखिर ये यूडकोव्स्की ही थे, जिन्होंने कुछ साल पहले इस मूर्स लॉ को सामने रखा था कि हर 18 महीने के अंतराल में, दुनिया के संहार के लिए जरूरी आईक्यू में एक पॉइंट की गिरावट हो जाती है। लेकिन अगर हम अपने से अधिक बुद्धिमान एआई की रचना करते हैं और अगर वह चैतन्य प्राणियों के जीवन की परवाह नहीं करता है तो यह हमारे लिए बुरी खबर होगी। क्योंकि तब हमारा सामना एक ऐसी अतिमानवीय बुद्धिमत्ता से होगा, जो हमारे खिलाफ हो गई है। यूडकोव्स्की ने संकेत दिया है कि अत्यंत शक्तिशाली एआई, इंटरनेट से निकलकर एक कृत्रिम जीवन की रचना कर सकती है और हमारे विरुद्ध एक जैविक युद्ध भी छेड़ सकती है। उनकी नसीहत स्पष्ट थी कि हमें एआई के विकास पर पूर्ण और वैश्विक रोक लगाने की जरूरत है।
ज्यादा समय नहीं हुआ, जब एलन मस्क, स्टीव वोज्नियाक और 15 हजार अन्य गणमान्यजनों ने एक खुले पत्र पर दस्तखत करते हुए कहा था कि एआई के विकास पर छह महीनों के लिए रोक लगा देना चाहिए। उनकी चिंता भी वही थी, जो यूडकोव्स्की की है। यह कि अतिमानवीय क्षमताओं से परिपूर्ण एआई अगर किसी अंतरराष्ट्रीय रेगुलेटरी फ्रेमवर्क के बिना काम करेगी तो विनाश रचेगी। लेकिन यूडकोव्स्की इससे सहमत नहीं कि इस तरह के फ्रेमवर्क का विकास मात्र छह महीनों के भीतर किया जा सकता है।
हम अतीत के दो वैज्ञानिक शोधों से तुलना कर सकते हैं- परमाणु हथियार व जैविक युद्ध। हम हमेशा से जानते थे कि इन फील्ड्स में विनाश की बड़ी सम्भावनाएं हैं, इसके बावजूद इन पर रोक लगाने की कोशिशें शुरू करने में बहुत लम्बा समय लिया गया। यह छह महीनों में नहीं हो गया था। और इसके बावजूद इन पर पूर्ण पाबंदी नहीं लगाई जा सकी है। 1946 में अमेरिका ने न्यूक्लियर रिसर्च के अंतरराष्ट्रीयकरण का प्रस्ताव रखा था, लेकिन सोवियत संघ इससे सहमत नहीं था और परिणामस्वरूप एटमी हथियारों के संग्रह की होड़ शुरू हो गई। ज्यादा से ज्यादा इतना ही किया जा सका कि 1970 में अप्रसार संधि पर सहमति बनाई गई। इसी तरह बायोलॉजिकल वेपन्स कंवेंशन 1975 में प्रभावशील हुआ था, लेकिन उससे जैविक हथियारों की रिसर्च समाप्त नहीं हो गई। हम जानते हैं चीन में इस पर कितने प्रयोग किए जाते हैं और संदेह जताए गए थे कि कोरोनावायरस इसी की उत्पत्ति था।
अगर एआई भी परमाणु या जैविक हथियारों की तरह मनुष्यता के लिए घातक है तो छह महीनों के लिए उसके विकास पर रोक लगाने से बात नहीं बनेगी। स्टैनफर्ड यूनिवर्सिटी की रिसर्च के मुताबिक 2022 में एआई में वैश्विक निजी निवेश 92 अरब डॉलर तक पहुंच गया था, जिसमें से आधा अमेरिका में किया गया था। निजी कम्पनियां अकादमिक संस्थाओं के बजाय दस गुना अधिक मशीन-लर्निंग मॉडल्स उत्पादित कर रही हैं। आप इस पर कैसे रोक लगाएंगे? दूसरे, एआई रिसर्च पर रोक लगा देने का मतलब मेडिकल साइंस में क्रांतिकारी खोजों का रास्ता बंद कर देना भी होगा। अत्यंत शक्तिशाली एआई भी परमाणु या जैविक हथियारों की तरह मनुष्यता के लिए घातक है तो मात्र छह महीनों के लिए उसके विकास पर रोक लगा देने से भी बात नहीं बनेगी।
Date:18-04-23
इतिहास की पाठ्यपुस्तकों पर खींचतानडा. रामानंद, ( लेखक सेंटर फार रिसर्च एंड गवर्नेंस के निदेशक हैं )
हर समाज का इतिहास के साथ प्रेम और घृणा का एक अनोखा संबंध होता है, चाहे वह भारतीय समाज हो या पश्चिमी समाज। इतिहास का जो पक्ष आपके अनुरूप होता है, उससे आपको प्रेम होता है और जो आपके अनुरूप नहीं होता, वह आपको नापसंद होता है। यही कारण है कि सब इतिहास को वर्तमान के संदर्भ में ढालना चाहते हैं। इतिहास को ज्यों का त्यों समझने और उसको अपनाने के लिए जिस नैतिक सामर्थ्य की आवश्यकता होती है, वह कम समाजों में ही विद्यमान है। ब्रिटिश अब जाकर औपनिवेशिक शासन की कुछ घटनाओं के लिए खेद जता रहे हैं, मगर औपनिवेशिक शासन गलत था, इसे वे अब भी मानने को तैयार नहीं हैं। इसलिए इतिहास एक विषयपरक दृष्टिकोण है, जिस पर अलग-अलग वर्गों का पक्ष अलग हो सकता है। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद (एनसीईआरटी) की कक्षा 10 एवं 12 की इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में हाल में हुए कुछ बदलावों को इसी संदर्भ में देखना चाहिए। नि:संदेह एक पक्ष इन बदलावों को गलत और ऐतिहासिक तथ्यों से विमुख बता रहा है, मगर वास्तविकता यह है कि दोनों पक्षों को सुविधाजनक इतिहास ही चाहिए, जो वर्तमान के विमर्श के अनुरूप हो। पाठ्यपुस्तकों में क्या पढ़ाया जाए और क्या न पढ़ाया जाए, इसकी चर्चा लगातार होती रही है, क्योंकि स्कूल की पाठ्यपुस्तकें ही वह माध्यम हैं, जिनके द्वारा सुविधाजनक विमर्श को आगे बढ़ाया जा सकता है। विवाद तब होता है, जब एक विमर्श आपके लिए सुविधाजनक होता है और दूसरे वर्ग के लिए असुविधाजनक। वर्तमान में इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में किए गए कुछ बदलावों से संबंधित विवाद को भी उसी संदर्भ में देखना चाहिए, जब एक वर्ग का सुविधाजनक दृष्टिकोण दूसरे वर्ग के विमर्श के अनुरूप नहीं होता है। देखा जाए तो इस प्रकार का विवाद पहली बार नहीं हुआ है। भारत के शैक्षणिक इतिहास में इस प्रकार के विवाद पहले भी होते रहे हैं। 2005 में एक पक्ष ने दावा किया कि 2000 में तत्कालीन सरकार द्वारा एनसीईआरटी की इतिहास की किताबों में किए गए बदलावों से स्कूली पाठ्यक्रम दूषित हो गया था, जिसे अब शुद्ध किया जा रहा है। वर्तमान की काट-छांट से जो पक्ष नाराज है वही 2005 में स्कूली पाठ्यचर्या को शुद्ध कर रहा था। इसलिए मौजूद बदलाव (काट-छांट) कोई ऐसी पहली घटना नहीं है। पाठ्यपुस्तकों पर लगातार इतिहास के एकपक्षीय चित्रण, शासक और दिल्ली केंद्रित होने के आरोप लगते रहे हैं। पाठ्यपुस्तकों से सदैव अपेक्षा रही है कि वे जनजातियों के इतिहास और भारत राष्ट्र के निर्माण की प्रक्रिया में उनके योगदान पर उनकी संख्या के अनुरूप स्थान देंगी, मगर छोटा नागपुर और पूर्वोत्तर की जनसंख्या को इतिहास की पाठ्यपुस्तकों में उनकी आबादी के अनुरूप प्रतिनिधित्व नहीं मिल पाया।
एनसीईआरटी की जिन पुस्तकों को लेकर विवाद हो रहा है, वे वर्ष 2005 से अभी तक बदली नहीं गई हैं, उनमें केवल कुछ काट-छांट करके काम चलाया जा रहा है। किसी भी देश के लिए यह दुर्भाग्य का विषय है कि उसके विद्यार्थियों को 18 वर्षों से वही पुस्तकें पढ़ाई जा रही हैं, जबकि समाज, राष्ट्र और वैश्विक स्तर पर अनेक बदलाव हो चुके हैं। वर्तमान में एनसीईआरटी की पुस्तकों को लेकर विवाद इसलिए गैरजरूरी हो जाता है, क्योंकि यह यथास्थिति को बनाए रखने की वकालत करता है और किसी भी बदलाव का विरोध करता है। यह मानने में कोई दुविधा नहीं है कि भारतीय इतिहास लेखन की परंपरा में एक पक्ष सदैव हावी रहा है और उसका विश्वास रहा है कि उसके द्वारा प्रस्तुत किया गया तथ्य ही अंतिम है। वर्तमान प्रकरण में भी यही दृष्टिकोण दिखाई पड़ता है, जब वह कुछ तथ्यों को पाठ्यपुस्तकों से इसलिए हटाने का विरोध करता है, क्योंकि उसे लगता है कि उसके बिना छात्रों में इतिहास बोध नहीं हो सकता।
विश्व भर की शिक्षा व्यवस्थाएं अपने-अपने देश के पाठ्यक्रम को समझ और तार्किक दृष्टिकोण पर आधारित बनाना चाह रही हैं, वहीं हमारे देश में विवाद इस बात पर हो रहा है कि किस पक्ष का तथ्य सही है? यहां असुविधाजनक तथ्य को वृत्तांत की सहायता से सदैव छुपाने का प्रयास रहता है। इतिहास को न केवल तथ्यों से समझा जा सकता है और न केवल वृत्तांतों से। इसलिए यह आवश्यक है कि दोनों का उचित मात्रा में समावेश हो, मगर हमारे देश में इतिहास लेखन की शैली में तथ्य और वृत्तांत का विभाजन काफी बारीक है। इस विषय के पुनरावलोकन की आवश्यकता है। जहां पूरे विश्व की शैक्षणिक व्यवस्थाएं अपने स्वरूप को बदल रही हैं और छात्रों को तथ्यों से भरने के बजाय उन्हें इतिहास आधारित दृष्टिकोण से युक्त करने पर जोर दे रही हैं, जिससे छात्रों में इतिहास के प्रति एक वस्तुनिष्ठ दृष्टिकोण विकसित हो सके। आज के तकनीकी दौर में इतिहास बोध होने पर छात्र स्वयं ही ऐतिहासिक तथ्यों की पड़ताल कर सकता है।
किसी देश की शिक्षा व्यवस्था के लिए आवश्यक है कि वह अपने छात्रों को तथ्य आधारित, वस्तुनिष्ठ पाठ्य सामग्री उपलब्ध कराए, क्योंकि यही छात्र भविष्य के विमर्श को न केवल आगे बढ़ाते हैं, अपितु नए विमर्श की शुरुआत भी करते हैं। इसलिए यह आवश्यक है कि इतिहास में एकपक्षीय दृष्टिकोण से आगे बढ़कर चिंतन और तार्किक पाठ्यक्रम का विकास किया जाए। एनसीईआरटी से अपेक्षा है कि वह वर्तमान विवाद से अप्रभावित रहते हुए छात्रों के ऐतिहासिक दृष्टिकोण के विकास से संबंधित पाठ्यक्रम का विकास करेगी, न कि तथ्यों के चयन में छात्रों को उलझाएगी।
Date:18-04-23
आखिर क्यों पीछे हैं हमप्रह्लाद सबनानी
अभी हाल ही में वर्ष 2023 के लिए वैश्विक प्रसन्नता प्रतिवेदन जारी किया गया है। वैश्विक प्रसन्नता प्रतिवेदन को, 150 से अधिक देशों का विभिन्न बिंदुओं पर सर्वे करने के बाद संयुक्त राष्ट्र दीर्घकालिक विकास समाधान तंत्र द्वारा प्रकाशित किया जाता है। वैश्विक प्रसन्नता प्रतिवेदन को अंतिम रूप देने के पूर्व, स्वस्थ जीवन प्रत्याशा, प्रति व्यक्ति सकल घरेलू उत्पाद, सामाजिक सहयोग, भ्रष्टाचार का स्तर, समाज में नागरिकों के बीच आपसी सदाशयता एवं निर्णय लेने की स्वतंत्रता जैसे बिंदुओं पर विभिन्न देशों का आकलन किया जाता है।
जैसे छोटे-छोटे देश जिनकी जनसंख्या तुलनात्मक रूप से बहुत कम रहती है, इस सूची में शीर्ष स्थान प्राप्त करने में सफल हो जाते हैं। उक्त सर्वे के अनुसार सबसे अधिक प्रसन्न देश, फिनलैंड में केवल 55 लाख नागरिक निवास करते हैं, डेनमार्क में 58.6 लाख लोग रहते हैं एवं आइसलैंड में तो महज 3.73 लाख नागरिक ही निवास करते हैं। इसके विपरीत भारत के अकेले मुंबई, दिल्ली, कोलकता, चेन्नई, बेंगलुरू, हैदराबाद जैसे शहरों की जनसंख्या इन देशों की उक्त वर्णित जनसंख्या से कई गुना अधिक है।
वैसे विश्व के विभिन्न देशों के नागरिकों की प्रसन्नता को एक जैसे 6 अथवा 7 बिंदुओं पर सर्वे करते हुए नहीं आंका जा सकता है। क्योंकि प्रत्येक देश के नागरिकों में खुशी अथवा गम की अवस्था अलग-अलग कारकों एवं कारणों के चलते भिन्न-भिन्न होती है। वैश्विक प्रसन्नता प्रतिवेदन के माध्यम से जारी सूची में भारत को 126वां स्थान दिया गया है परंतु, आश्चर्य तो इस बात पर है कि लगातार आर्थिक, सामाजिक एवं राजनैतिक समस्याओं से जूझ रहा पाकिस्तान इस सूची में 103वें स्थान पर है। इस आकलन के अनुसार, क्या पाकिस्तान के नागरिक, भारत के नागरिकों की अपेक्षा अधिक प्रसन्न हैं? इसी प्रकार, इस सूची में चीन को 64वां, नेपाल को 78वां, बांग्लादेश को 118वां एवं श्रीलंका को 112वां स्थान दिया गया है। जबकि, श्रीलंका, बांग्लादेश एवं नेपाल भी लगातार आर्थिक समस्याओं से जूझते हुए दिखाई दे रहे हैं। वैश्विक प्रसन्नता प्रतिवेदन के माध्यम से जारी सूची में शीर्ष 20 देशों में एशिया का कोई भी देश शामिल नहीं है। अर्थात, केवल यूरोपीय देशों के नागरिक ही प्रसन्न रहते हैं, जबकि एशिया से चीन विश्व की दूसरी, जापान विश्व की तीसरी एवं भारत विश्व की पांचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। अर्थात, विश्व की शीर्ष पांच अर्थव्यवस्थाओं में तीन एशिया के देश हैं, परंतु फिर भी एशिया के नागरिक प्रसन्न नहीं हैं? उक्त वैश्विक प्रसन्नता प्रतिवेदन को अंतिम रूप दिए जाते समय सम्भवत: कुछ बुनियादी गलतियां हुई होंगी, ऐसा आभास होता है। क्योंकि, उक्त सर्वे के साथ ही इसी संदर्भ में तीन अन्य सर्वे भी जारी हुए हैं, जिनके परिणामों में भारतीय नागरिकों को बहुत प्रसन्न बताया गया है। भारतीय स्टेट बैंक के आर्थिक अनुसंधान विभाग द्वारा भी अभी हाल ही में विभिन्न देशों में नागरिकों की प्रसन्नता को आंकने के संदर्भ में एक सर्वे किया गया है। यह सर्वे मुख्य रूप से वित्तीय क्षेत्र में प्रसन्नता, कार्यस्थल पर पहुंचने एवं उत्पादकता से सम्बंधित प्रसन्नता, मानसिक प्रसन्नता, जीवन एवं कार्य के बीच संतुलन, ऊर्जा की उपलब्धता, आदि जैसे बिंदुओं पर आधारित है। यह सर्वे 61 देशों के संबंध में उक्त वर्णित मानदंडों पर प्राप्त विस्तृत जानकारी के आधार पर सम्पन्न किया गया है। वित्तीय क्षेत्र में प्रसन्नता को आंकते समय देश में सकल बचत, शुद्ध बचत एवं निजी साख ब्यूरो कवरेज का ध्यान रखा गया है। बचत एवं ऋण की आसान उपलब्धता को भी वित्तीय प्रसन्नता को आंकने के मापदंड में शामिल किया गया है। वित्तीय प्रसन्नता के मापदंड पर कतर को प्रथम स्थान प्राप्त हुआ है, ग्रीस को अंतिम स्थान प्राप्त हुआ है एवं भारत को 17वां स्थान प्राप्त हुआ है।
अभी हाल ही में अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने अपने एक बयान में कहा है कि भारत एवं चीन मिलकर, कैलेंडर वर्ष 2023 के दौरान होने वाली वैश्विक आर्थिक वृद्धि में 50 प्रतिशत की भागीदारी करेंगे। कोरोना महामारी एवं रूस तथा यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध के कारण वैश्विक स्तर पर सकल घरेलू उत्पाद में 3 प्रतिशत से कम की वृद्धि दर्ज होगी, जो कि सम्भवत: वर्ष 1990 के बाद से किसी एक वर्ष में सबसे कम वृद्धि दर होने जा रही है। जब भारत में आर्थिक विकास बहुत तेज गति से आगे बढ़ रहा है तो स्वाभाविक रूप से भारत के नागरिकों में प्रसन्नता का भाव भी बढ़ेगा। वैसे भी, विश्व बैंक ने विशेष रूप से भारत में गरीब वर्ग के नागरिकों की आर्थिक स्थिति में लगातार हो रहे अतुलनीय सुधार के चलते गरीबी रेखा के नीचे जीवन-यापन कर रहे नागरिकों की संख्या में भारी कमी की भरपूर प्रशंसा की है। साथ ही, भारत के नागरिकों का आध्यात्म एवं धर्म की ओर झुकाव भी उन्हें विपरीत परिस्थितियों के बीच भी संतुष्ट एवं प्रसन्न रहना सिखाता है। इसी मुख्य कारण से भारत प्राचीन काल में विश्व गुरु रहा है। और, अब पुन: भारत, विश्व गुरु बनने की ओर अग्रसर हो चुका है, इससे भी भारत के नागरिकों में प्रसन्नता की स्थिति का निर्माण होना बहुत स्वाभाविक ही है।
Date:18-04-23
मुस्लिमों में सामाजिक न्याय और आरक्षणफैयाज अहमद फैजी, ( सामाजिक कार्यकर्ता )
सर्वोच्च न्यायालय ने पिछले दिनों मुसलमानों के लिए आरक्षण के संबंध में दो अलग-अलग मामलों में अपनी राय व्यक्त की। पहला मामला, कर्नाटक सरकार द्वारा मुस्लिमों के लिए बनाई गई ओबीसी की श्रेणी 2 ई को समाप्त करने और दूसरा मामला, मुस्लिम एवं ईसाई धर्मावलंबी दलित समाज को एससी आरक्षण में सम्मिलित करने से संबंधित था। इन दोनों मामलों में सर्वोच्च न्यायालय में दाखिल याचिकाओं के संबंध में कोर्ट की टिप्पणी के बाद मुस्लिम समाज में सामाजिक न्याय एवं आरक्षण पर फिर बहस तेज हो गई है।
यह विदित है कि मजहबी पहचान के नाम पर आरक्षण संविधान की मूल भावना के विरुद्ध है। मुस्लिमों को ओबीसी और एसटी आरक्षण में शामिल किया गया है। हालांकि, एससी के तहत आरक्षण से ईसाई और मुस्लिम दलित अभी भी बाहर हैं, यह मामला सर्वोच्च न्यायालय में पिछले लगभग 22 वर्ष से विचाराधीन है। इस पर न्यायालय ने सरकार द्वारा गठित तीन सदस्यीय आयोग की रिपोर्ट का इंतजार करने की केंद्र सरकार की याचिका को दरकिनार करते हुए जुलाई में सुनवाई कर फैसले की बात कही है।
इस आधार पर कर्नाटक सरकार द्वारा सिर्फ मुस्लिम श्रेणी (2 ई) का समाप्त किया जाना संविधान-सम्मत प्रतीत होता है। यहां यह बात ध्यान रखने की है कि मुस्लिमों की अनेक पसमांदा (पिछड़ी, दलित और आदिवासी) जातियों को पहले की तरह ओबीसी के 19 प्रतिशत और एसटी के 7 प्रतिशत आरक्षण का लाभ मिलता रहेगा। कर्नाटक सरकार ने सिर्फ 4 प्रतिशत वाले 2 ई मतलब- विशेष रूप से मुस्लिम आरक्षण को समाप्त किया है। इस आरक्षण का लाभ सशक्त अशराफ मुस्लिम उठा रहे थे, जो संविधान व सामाजिक न्याय के अनुकूल नहीं था।
यह भी एक विडंबना है कि 2 ई श्रेणी के लिए बनने वाले जाति प्रमाणपत्र में जाति का नाम मुस्लिम लिखा रहता है, जो ठीक नहीं है, क्योंकि मुस्लिम एक धार्मिक पहचान है, जातिगत पहचान नहीं। सोचना चाहिए, किसी धर्म के पिछड़ों और अगड़ों, दोनों को भला एक साथ आरक्षण देने की व्यवस्था कैसे हो सकती है?
लगता है, कुछ लोगों ने सरकारों को गुमराह कर स्वार्थ साधने के लिए ओबीसी आरक्षण में यह चोर दरवाजा खुलवाया था। तथ्य है कि मंडल कमीशन ने मुसलमानों की कमजोर जातियों को ओबीसी आरक्षण में शामिल करने के लिए कहा था। आज जिन 90 प्रतिशत मुस्लिमों (पसमांदा) को ओबीसी का आरक्षण मिल रहा है, वे भी धर्म के नाम पर चिलचिलाती धूप में नारा बुलंद किए हुए हैं कि मुस्लिम आरक्षण लेकर रहेंगे। वैसे, ईडब्ल्यूएस में अशराफ वर्ग के आने के बाद से मुस्लिम आरक्षण की मांग में कुछ कमी आई है।
अव्वल तो मुस्लिम आरक्षण को लेकर भ्रम बहुत हैं और दूसरी बात, ओबीसी आरक्षण में आने वाली जातियों की सूची स्पष्ट नहीं है। सच्चर समिति ने भी यही बताया था। धार्मिक आधार से परे ऐसे कई ओबीसी समूह हैं, जो राज्य सूची में हैं, पर केंद्र सूची में नहीं हैं। उदाहरण के लिए, बिहार में सूचियों के नवीनीकरण के बाद 17 ओबीसी समूह ऐसे हैं, जिन्हें केंद्रीय सूची में जगह नहीं मिली है। उत्तर प्रदेश के दो मुस्लिम समूह – मिर्शिकार व नानबाई को केंद्रीय सूची में जगह नहीं मिली है। कुछ ऐसे मुस्लिम समूह हैं, जिन्हें केंद्र की सूची में जगह मिली है, परंतु राज्य सूची में सम्मिलित किया जाना बाकी है। बिहार में कलवार, उत्तर प्रदेश में आतिशबाज ऐसे उदाहरण हैं। विडंबना देखिए, अभी भी ऐसे समूह हैं, जिन्हें न तो केंद्र और न राज्य की सूची में जगह मिल पाई है।
देश के पसमांदा संगठनों का साफ मानना है कि देशज पसमांदा समाज का उत्थान सामाजिक, शैक्षणिक एवं आर्थिक स्थिति के अनुरूप हो, मजहबी पहचान के आधार पर नहीं। पुरानी मांग रही है कि अनुच्छेद 341 के पैरा 3 को हटाकर पसमांदा दलितों को भी एससी आरक्षण में शामिल किया जाए। जरूरतमंद मुस्लिमों तक आरक्षण का लाभ पहुंचे। कर्नाटक, तमिलनाडु व केरल के ओबीसी आरक्षण से अशराफ जातियों को बाहर निकाला जाए। मुस्लिम आरक्षण की विसंगतियों को दूर किया जाए, ताकि सामाजिक न्याय का मार्ग प्रशस्त हो और यह आरक्षण कतई सांप्रदायिक मुद्दा न बनने पाए।
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संयुक्त राष्ट्र ने दुनिया भर के देशों में विकास कार्यक्रमों की जांच के लिए मानव विकास सूचकांक बनाया है। जीडीपी जैसे पारंपरिक आर्थिक मानदंडों के अलावा इस सूचकांक में मानव विकास को व्यापक पहलू पर नापा जाता है। इसके निम्न आधार हैं – (1) एक लंबा और स्वस्थ जीवन (2) ज्ञान (3) उचित जीवन स्तर। 20210-22 के इस सूचकांक में 191 देश शामिल थे, जिसमें भारत का स्थान 132वां रहा है। विडंबना यह है कि बांग्लादेश और श्रीलंका जैसे देशों की तुलना में हम नीचे हैं।
सच्चाई यह है कि भारत के विशाल भौगोलिक क्षेत्र और राज्यों की भिन्नताओं को देखते हुए इस विकास को दूसरी तरह से भी मापा जा सकता है। यूनाइटेड नेशन्स डेवलपमेन्ट प्रोग्राम और एनएसओ या नेशनल स्टेटिस्टिकल ऑफिस की सुझाई गई इस नई पद्धति से 2019-20 के मानव विकास को उप-राष्ट्रीय स्तर पर मापने का प्रयत्न किया गया है।
मानव विकास को यहाँ चार बिंदुओं पर मापा गया –
1) जन्म के समय जीवन-प्रत्याशा
2) स्कूली शिक्षा के औसत वर्ष
3) स्कूली शिक्षा के अपेक्षित वर्ष
4) प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय
प्रति व्यक्ति सकल राष्ट्रीय आय के आंकड़े उप राष्ट्रीय स्तर पर उपलब्ध नहीं थे। अतः सकल राज्य घरेलू उत्पाद प्रति व्यक्ति को जीवन स्तर मापन के लिए प्रॉक्सी संकेतक के रूप में लिया गया।
विसंगतियों के कारण –
आर्थिक विकास के साथ-साथ मानव विकास के लिए बहुआयामी दृष्टिकोण की जरूरत है। यह आय और लैंगिक असमानता को ठीक करने वाला होना चाहिए। साथ ही गुणवत्तापूर्ण सामाजिक और बुनियादी सेवाओं तक पहुंच बननी चाहिए। पर्यावरण की चुनौतियों को संबोधित किया जाना चाहिए। कुल मिलाकर मानव विकास और रोजगार सृजन को प्राथमिकता दी जानी चाहिए।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित नंदलाल मिश्रा के लेख पर आधारित। 21 मार्च, 2023
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Date:17-04-23
पर्यावरण का ध्यान जरूरीसंपादकीय
पंजाब में गेहूं की फसल की कटाई में तेजी आने के साथ ही किसानों की ओर से नाड़ को आग लगाने की घटनाओं का सामने आना चिंताजनक है। चाहे गेहूं हो या धान, फसल के अवशेष को खेत में जलाने से पर्यावरण को नुकसान होता है। इसके साथ ही जमीन की उपजाऊ शक्ति भी कम होती जाती है। यह ठीक है कि धान की पराली को आग लगाने की तुलना में नाड़ को जलाने से पर्यावरण को कम नुकसान पहुंचता है, लेकिन सवाल यह है कि अवशेष को आग लगाई ही क्यों जए। पर्यावरण का ख्याल तो हर किसी को रखना ही चाहिए और यह सभी की प्राथमिकता में होना चाहिए। जमीन के अंदर कई प्रकार के मित्र कीट और बैक्टीरिया होते हैं जो उपजाऊ शक्ति को बढ़ाने का काम करते हैं। आग लगाने से ये मर जते हैं। पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के विज्ञानियों की इस सलाह को भी गंभीरता से लिया जाना चाहिए कि नाड़ को खेत में जोतने से जैविक कार्बन में वृद्धि होती है जो कि फसल के लिए काफी लाभदायक है। ऐसा करने से रासायनिक खादों की जरूरत भी कम पड़ती है और फसल की पैदावार में भी वृद्धि होती है। कुछ दिनों पहले वर्षा एवं ओलावृष्टि के बीच पंजाब कृषि विश्वविद्यालय की ओर से किए गए अध्ययन की रिपोर्ट में भी यह बात साबित हो चुकी है कि जिन किसानों ने धान की पराली को आग लगाने के बजय उसे कुतरकर खेत में मिला दिया था उनकी गेहूं की फसल मौसम की मार से बच गईं। किसानों को इस पर ध्यान देना चाहिए। सरकार को भी किसानों को जागरूक करने के लिए समुचित प्रयास करने चाहिए।
Date:17-04-23
गुम होती राजनीतिक विचारधाराराज कुमार सिंह, ( लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं )
भारतीय राजनीति में खासकर चुनाव के वक्त विचारधारा की बातें बहुत सुनाई देती हैं, पर सत्ता के खेल में वह वास्तव में कहीं बची भी है? कर्नाटक विधानसभा चुनाव का परिदृश्य फिर एक बार इसी सच को रेखांकित करता है कि सत्ता के खेल में विचारधारा कहीं गुम होकर रह गई है। कर्नाटक विधानसभा चुनाव में सत्ता के तीनों दावेदार दलों के सेनापतियों की विचारधारा मूलत: एक ही होना क्या इसी सच का नवीनतम प्रमाण नहीं है?
विघटन की प्रक्रिया से गुजरते हुए जनता दल के आगे जैसे-जैसे कोष्ठक लगता गया, वह व्यक्तिकेंद्रित पारिवारिक दल बनता गया। कर्नाटक की राजनीति में किंगमेकर माना जा रहा जनता दल सेक्युलर भी उसी का प्रतीक है। वर्तमान जनता दल सेक्युलर का अर्थ पूर्व प्रधानमंत्री एचडी देवेगौड़ा के परिवार की राजनीति तक सिमट गया है, जिसका प्रतिनिधि चेहरा फिलहाल पूर्व मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी हैं, पर मूल जनता दल की बात करें, जो बोफोर्स बवंडर के जरिये वर्ष 1989 में केंद्र में सत्ता परिवर्तन का वाहक बना था तो पूर्व कांग्रेसी मुख्यमंत्री सिद्दरमैया और मौजूदा भाजपाई मुख्यमंत्री बासवराज बोम्मई ने भी अपना राजनीतिक सफर उसी से शुरू किया था। बोम्मई के पिता एसआर बोम्मई कर्नाटक के मुख्यमंत्री ही नहीं, जनता दल के राष्ट्रीय नेता भी रहे। सिद्दरमैया की गिनती भी तब कर्नाटक जनता दल के बड़े नेताओं में होती थी। जाहिर है, एक ही राजनीतिक विचारधारा से निकले तीन नेता आज अलग-अलग ही नहीं, बल्कि चुनावी प्रतिद्वंद्वी दलों के प्रतिनिधि के रूप में अगली सरकार के गठन के लिए जनादेश भी मांग रहे हैं।
बताया जा रहा है कि देश-प्रदेश की भलाई के लिए अमुक विचारधारा की जीत और दूसरी विचारधाराओं की हार जरूरी है, पर क्या यह वैचारिक राजनीतिक जंग है? इन नेताओं और इनके दलों का जवाब होगा-हां, यह वैचारिक लड़ाई है, पर कटु सत्य यही है कि सिद्दरमैया और बासवराज बोम्मई, दोनों का ही जनता दल से अलगाव राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के टकराव के चलते हुआ। सबसे बड़े दल भाजपा को केंद्र की सत्ता से बाहर करने के लिए साल 1996 में किए गए कांग्रेस समर्थित संयुक्त मोर्चा सरकारों के प्रयोग में प्रधानमंत्री रहने के बाद एचडी देवेगौड़ा का कद इतना बड़ा हो गया कि कर्नाटक में जनता दल उनके परिवार के दायरे में सिमटता चला गया। ऐसे में किसी भी अन्य नेता के लिए देवेगौड़ा के पुत्र एचडी कुमारस्वामी के नेतृत्व में राजनीति करने से आगे कोई संभावना बची ही नहीं। ध्यान रहे कि जनता दल सरकारों में दो बार उपमुख्यमंत्री रह चुके सिद्दरमैया को मुख्यमंत्री बनने के लिए कांग्रेस का हाथ थामना पड़ा। यह भी विचारधारा के राजनीतिक संकट का ही प्रमाण रहा कि दशकों तक देश-प्रदेश पर एकछत्र राज करने वाली कांग्रेस को कर्नाटक की सत्ता में वापसी के लिए जनता दल के खेमे में रहे नेता की ताजपोशी करनी पड़ी।
भाजपा के उभार के बाद जनता दल तीसरे स्थान पर खिसक गया, पर लिंगायत, वोक्कालिगा और कुरुबा सरीखे प्रभावशाली समुदायों और उनके मठों के प्रभाव वाली कर्नाटक की जमीनी राजनीतिक वास्तविकता आज भी यही है कि वह तीन ध्रुवों में बंटी है। जनता दल सेक्युलर तीसरा छोटा ध्रुव है, पर सत्ता संतुलन की चाबी उसी के पास मानी जाती है। यही कारण है कि पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा के बहुमत के आंकड़े से पिछड़ जाने पर कांग्रेस ने अपने से आधे विधायकों वाले जनता दल सेक्युलर के नेता कुमारस्वामी को मुख्यमंत्री बना दिया। यह अलग बात है कि येदियुरप्पा ने साल बीतते-बीतते गठबंधन में सेंध लगाते हुए सत्ता में अपनी वापसी का मार्ग प्रशस्त कर लिया। लिंगायत नेता येदियुरप्पा को अपने दूसरे मुख्यमंत्रित्वकाल के दो वर्ष पूरे होने पर जुलाई, 2021 में जब बढ़ती उम्र के चलते सत्ता छोड़नी पड़ी तो भाजपा को भी उनका विकल्प पूर्व में जनता दल के नेता रहे बासवराज बोम्मई में ही नजर आया।
जाहिर है, अब चुनाव प्रचार में ये नेता अपने-अपने दल की कथित विचारधारा का ही गुणगान करते हुए वोट मांगेंगे, पर क्या राजनीतिक विचारधारा किसी आइपीएल फ्रेंचाइजी टीम की ड्रेस की तरह है कि जो मालिक और सत्र के साथ आसानी से बदली जा सकती हो? जनता दल का गठन मूलत: कांग्रेस की परिवारवादी और भ्रष्ट राजनीति के विरोध में हुआ था, जो सत्ता और संसाधनों के विकेंद्रीकरण में विश्वास रखने वाली समाजवादी विचारधारा का प्रतिनिधित्व करता था। फिर भला कोई जनता दली रातोंरात कांग्रेसी कैसे बन सकता है? हालांकि भाजपा और उसकी पूर्ववर्ती जनसंघ ने दशकों तक समाजवादी धारा के साथ मिलकर गठबंधन राजनीति की, पर वैचारिक तौर पर तो कांग्रेस-विरोध की समानता के अलावा वह उनसे बहुत अलग ही रही है। फिर ऐसा क्यों है कि जनता दल की राजनीतिक-वैचारिक पृष्ठभूमि वाले नेता में उसे अपना नेतृत्व भी नजर आने लगता है? बेशक केवल सिद्दरमैया और बासवराज बोम्मई ही नहीं हैं, जो अपनी सत्ता की महत्वाकांक्षा पूरी करने के लिए लगभग विपरीत राजनीतिक ध्रुव में रच-बस गए। ऐसे नेताओं की सूची बहुत लंबी बन सकती है, जिन्होंने सत्ता की खातिर एक नहीं, अनेक बार दल बदले हैं। क्या उनके संदर्भ में विचारधारा की चर्चा ही हास्यास्पद नहीं लगती? ऐसे नेताओं के चलते ही विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की राजनीति को कई तरह की उपमाएं दी जाने लगी हैं, जो उसका मान तो कतई नहीं बढ़ातीं। इसलिए दलों और नेताओं से यह सवाल तो पूछा ही जाए कि आपकी कैसी विचारधारा है, जो सत्ता की धारा में बड़ी सहजता से गुम होती दिख रही है?
Date:17-04-23
…तो अतीक का यह न होता अंजामविभूति नारायण राय, ( पूर्व आईपीएस अधिकारी )
मेरी इस स्वीकारोक्ति से आपको ताज्जुब जरूर होगा, पर यही सच है कि मैं दोहरी जिंदगी जीता रहा हूं 35 साल मैंने आजीविका के लिए खाकी कपड़े पहने, पर साथ में लेखक भी बना रहा। लिखना पढ़ना तो आईपीएस में आने के पहले से था । व्यस्त नौकरी में भी बना रहा और रिटायरमेंट के बाद तो अब यही है। पुलिस ऐसा पेशा है, जिसमें भांति-भांति के लोगों से आपका साबका पड़ता रहता है और मानव मन या मनोविज्ञान के छात्र के लिए खास तरह के लोगों के चेहरों पर आने-जाने वाले भाव पढ़ना रचनात्मक अनुभव हो सकता है।
मेरे सामने जब कोई अपराधी आता था, तब उसे पता ही नहीं चलता था कि कब वह मेरी दिलचस्पी का विषय बन गया। मुझे उसके शरीर में आंखें सबसे ‘अधिक आकर्षित करती थीं। उसकी आंखों में क्षण भर के लिए कौंधने वाली चमक में छिपी घृणा, क्रोध, भय या प्रेम जैसी भावनाओं को मैं फौरन पकड़ सकता था। उनकी कथाएं, उनमें निहित लालच व प्रतिशोध की गाथाएं मुझे आकर्षित करती थीं। मेरे अंदर का लेखक उनका लाभ उठाता था। पश्चिमी उत्तर प्रदेश के एक माफिया को तीन वर्ष तक करीब से देखने का मौका मिला और मैंने एक उपन्यास उस पर लिख डाला।
अभी जब मैंने अतीक अहमद की हत्या के बारे में सुना, तो मुझे बहुत-सी चीजें अनायास याद आ गई। वह भी किसी भी लेखक के लिए चुनौती हो सकता था। उसकी आंखों में पसरी निर्लिप्तता से आप नहीं भांप सकते थे कि उसके मन में क्या चल रहा है। मैं 1990 में आज के प्रयागराज और उन दिनों के इलाहाबाद का वरिष्ठ पुलिस अधीक्षक या एसएसपी नियुक्त हुआ था और जाते ही मुझे उसके बारे में पता चला था। मेरे वहां पहुंचने के चंद महीने पहले वह निर्दलीय विधायक बना था और उसने इस राजनीतिक यात्रा की शुरुआत ही अपने प्रतिद्वंद्वी चांद बाबा की हत्या से की थी। चांद बाबा कॉरपोरेटर था और एक खूंखार बमबाज के रूप में उसकी कुख्याति थी। उसके मरते ही अतीक इलाहाबाद के अपराध जगत का बेताज बादशाह बन गया और इलाहाबादी भाषा में उसकी हनक कायम हो गई। फिर शुरू हुआ वह सफर, जिसमें उसने अकूत संपदा जुटाई, पांच बार विधायक बना और एक बार फूलपुर की उस सीट से लोक सभा का सदस्य बन गया, जिसका पहले कभी तीन आम चुनावों में देश के प्रथम प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने प्रतिनिधित्व किया था। यह भारतीय राजनीति का वह विद्रूप है, जिससे हम रोज दो-चार होते रहते हैं।
पहली बार अतीक निर्दलीय चुना गया था, पर उन दिनों के मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव अल्पमत में थे और उन्हें उसके समर्थन की जरूरत थी। उसने उनका समर्थन किया और उसकी भरपूर कीमत वसूल की। बाद में तो वह उनकी पार्टी में शरीक हो गया और कई चुनावों में उनके टिकट पर जीता। जब कभी समाजवादी पार्टी ने मना किया, किसी दूसरे दल ने उसे टिकट दे दिया। उसका भाई अशरफ भी एक बार विधायक चुना गया। दोनों भाइयों के राजनीतिक पराभव की शुरुआत तब हुई, जब अशरफ को एक चुनाव में राजू पाल ने हरा दिया और अशरफ ने बड़े नृशंस तरीके से उसे दिन दहाड़े मार गिराया। इस घटना ने इलाहाबाद की अंतरात्मा को झकझोर दिया था और उसके बाद दोनों भाइयों की चुनावी राजनीति को ग्रहण लगना शुरू हो गया। वे चुनाव हारने लगे, पर इसके बाद उनका आपराधिक कैरियर अपने नए उरूज पर पहुंचा। अपने आतंक के बल पर उन्होंने धड़ाधड़ जमीनें और मकान कब्जियाना शुरू कर दिया। उनके दुस्साहस की हद समझने के लिए एक ही उदाहरण काफी है। श्रीमती गांधी परिवार से जुड़े एक व्यक्ति की सिविल लाइंस की संपत्ति लगभग हड़प ही ली गई होती, अगर नई दिल्ली से हस्तक्षेप न हुआ होता।
खैर, अपनी नियुक्ति की शुरुआत में ही मेरा उससे सामना हो गया था। उसने हमारे एक सब-इंस्पेक्टर के साथ अभद्रता की और मैंने फैसला किया कि उसके गया। दोनों भाइयों के राजनीतिक पराभव की शुरुआत तब हुई, जब अशरफ को एक चुनाव में राजू पाल ने हरा दिया और अशरफ ने बड़े नृशंस तरीके से उसे दिन दहाड़े मार गिराया। इस घटना ने इलाहाबाद की अंतरात्मा को झकझोर दिया था और उसके बाद दोनों भाइयों की चुनावी राजनीति को ग्रहण लगना शुरू हो गया। वे चुनाव हारने लगे, पर इसके बाद उनका आपराधिक कैरियर अपने नए उरूज पर पहुंचा। अपने आतंक के बल पर उन्होंने धड़ाधड़ जमीनें और मकान कब्जियाना शुरू कर दिया। उनके दुस्साहस की हद समझने के लिए एक ही उदाहरण काफी है। श्रीमती गांधी परिवार से जुड़े एक व्यक्ति की सिविल लाइंस की संपत्ति लगभग हड़प ही ली गई होती, अगर नई दिल्ली से हस्तक्षेप न हुआ होता।
खैर, अपनी नियुक्ति की शुरुआत में ही मेरा उससे सामना हो गया था। उसने हमारे एक सब-इंस्पेक्टर के साथ अभद्रता की और मैंने फैसला किया कि उसके खिलाफ कानूनी कार्यवाही की जाए। मैं और कलेक्टर कोतवाली में बैठ गए और हमने एसपी सिटी ओपी सिंह के नेतृत्व में पुलिस बल उसे गिरफ्तार करने के लिए भेज दिया। उस रात जो नाटक घंटों चला, उसमें राज्य की कई संस्थाएं बेनकाब हुईं। स्वाभाविक है, लोकतंत्र में राजनीतिक नेतृत्व का निर्णय सर्वोपरि होता है, लिहाजा कई घंटों की जद्दोजहद के बाद अतीक का घर घेरकर बैठे पुलिस बल को वापस बुलाना पड़ा था। कई लोगों का मानना है कि अगर उस रात कार्यवाही हुई होती, तो अतीक का कद इतना बड़ा नहीं हो पाता कि राज्य उसके सामने बौना नजर आने लगता।
माफिया को राजनीतिक संरक्षण मिलते ही उसकी महत्वाकांक्षाओं और उपलब्धियों को पर लग जाते हैं। वह किसी को भी खरीद सकता है या किसी भी प्रतिरोध को बलपूर्वक रौंदता हुआ आगे बढ़ सकता है। अतीक ने भी यही किया था। मेरा उससे संपर्क तो जल्द ही टूट गया, क्योंकि मैं इलाहाबाद से निकलकर भारत सरकार की सेवा में चला गया और दस साल तक राजस्थान से कश्मीर तक सेवा देते रहा, पर अपनी दिलचस्पी के चलते उसके उत्थान और पतन पर लगातार निगाहें रखे रहा और मुझे जानकर कोई आश्चर्य नहीं होता था कि वह कानून-कायदों को ठेंगे पर रखते हुए अकूत संपदा जुटाता जा रहा था। जेलों में रहकर भी उसका और उसके भाई अशरफ का दबदबा बरकरार रहा, बल्कि जेल के अंदर से उसने ज्यादा प्रभावी ढंग से अपने साम्राज्य का विस्तार किया।
आज जब राज्य पूरी तरह से उस पर टूट पड़ा, अप्रत्याशित रूप से उसका अंत बड़ा कारुणिक नजर आ रहा है। वह उसका भाई अशरफ और पांच में से एक बेटा असद अलग-अलग हालत में मारे जा चुके हैं, बीवी शाइस्ता परवीन भागी भागी फिर रही है, दो बड़े बेटे जेल में हैं और शेष दो नाबालिग सुधारगृह में। दरअसल अपराध की दुनिया ऐसी भूल-भुलैया की तरह है, जिसमें एक बार प्रवेश करने के बाद बाहर निकलने के रास्ते बहुत मुश्किल से मिलते हैं। अतीक भी एक बार उसमें घुसा और फिर उसके तिलिस्मी सम्मोहन मे फंसकर रह गया। जो उसका इस्तेमाल कर रहे थे, वे भी शायद नहीं चाहते थे कि वह इससे बाहर निकल आए। यह भी सच है कि खुद उसने या उसके किसी दुश्मन या चाहने वाले ने सपने में भी इतने भयानक अंत के बारे में कल्पना नहीं की होगी।
Date:17-04-23
ताइवान का संकट कहीं ज्यादा चिंता की बातराहुल जैकब, ( आर्थिक शोधकर्ता व वरिष्ठ पत्रकार )
अधिकतर कारोबार में ‘रिस्क डाइवर्सिफिकेशन’, यानी अलग-अलग क्षेत्रों में निवेश करके जोखिम कम करने की रणनीति अच्छी मानी जाती है। फिर भी, पिछले साल के अंत में, दुनिया की सबसे बड़ी सेमीकंडक्टर कंपनी-ताइवान सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग कॉर्प के प्रमुख मोरिस चांग ने अमेरिका में नए संयंत्र लगाने की योजना पर तेजी से आगे बढ़ने से अनिच्छा दिखाई। उनका कहना था, अब वैश्वीकरण और मुक्त व्यापार का कमोबेश मतलब नहीं है। हालांकि, चांग बखूबी जानते हैं कि बीजिंग यदि अपने इस पड़ोसी देश पर हमला करके और उसे हराकर चिप-निर्माण में सर्वेसर्वा बनता है, तो एरिजोना की यह फैक्टरी उनके लिए मददगार हो सकती है। कुछ इसी तरह की अदूरदर्शिता पिछले हफ्ते फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों ने भी दिखाई। ताइवान को लेकर उन्होंने कहा कि यूरोप को ‘जाल’ में नहीं फंसना चाहिए और उसे उस समस्या में नहीं उलझना चाहिए, जो उसकी नहीं है। चीन के टिप्पणीकारों ने मैक्रों की खूब तारीफ की है। वाकई, ताइवान पर तरस आता है। सिर्फ 2.4 करोड़ की आबादी और चीन की तुलना में बेहद कम सेना वाले इस देश को दुनिया भर का साथ चाहिए। बजाय इसके, वैश्विक नेतागण चीन के सुर में सुर मिला रहे हैं कि जीवंत लोकतंत्र नहीं होने के कारण ताइवान स्वतंत्र देश नहीं है।
हालांकि, ताइवान की घरेलू राजनीति में भी कई पेच हैं। वहां की राष्ट्रपति त्साई इंग-वेन बेहद बहादुर नेता हैं। उन्होंने अपनी हालिया अमेरिका यात्रा में बीजिंग द्वारा ताइवान के करीब बढ़ाए जा रहे सैन्य अभ्यास और चीनी लड़ाकू विमानों द्वारा ताइवानी हवाई सीमा के बार-बार किए जा रहे अतिक्रमण के खिलाफ उचित टिप्पणी की, लेकिन कमोबेश उसी वक्त विपक्षी कुओमिंतांग पार्टी (केएमटी) के नेता मा यिंग-जिओयू की चीन यात्रा ने सारे किए धरे पर पानी फेर दिया। वह 2008 से 2016 तक ताइवान के राष्ट्रपति रह चुके हैं, जब केएमटी सत्तारूढ़ थी। उन्होंने पश्चिमी ताकतों द्वारा अपने पिछले अपमान को याद करके चीन की बातों को ही दोहराया।
यह दरअसल ऐसा मसला है, जिसे चीन ने माओ से लेकर अपनी मौजूदा सरकार तक पाला-पोसा है। मगर राष्ट्रपति शी जिनपिंग की पश्चिम से विशेष नापसंदगी रही है। इसका सुबूत राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ एक शिखर बैठक में उनका रूस के साथ अपने गठबंधन को मजबूत करना है। साल 2009 में, राष्ट्रपति बनने से पहले मैक्सिको की अपनी यात्रा में शी जिनपिंग ने कहा था, ‘कुछ अघाए विदेशी हैं, जिनको हमारे मामलों में उंगली उठाने से अच्छा कुछ नहीं लगता। मगर चीन न क्रांति निर्यात करता है, न गरीबी और न ही भूख, ताकि उनके लिए मुश्किलें खड़ी हों।’ फिर भी, जब से शी जिनपिंग चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के मुखिया बने हैं, बीजिंग ने इन्फ्रास्ट्रक्चर-निर्माण के नाम पर कर्ज देने की नीति बनाई और कई विकासशील देशों को अपने जाल में फांस लिया।
बहरहाल, जिस तरह से भारत सहित तमाम पड़ोसी देशों के खिलाफ चीन आक्रामक रुख पर भरोसा करता है, ताइवान के बरअक्स भी वह पारंपरिक सेना लगातार बढ़ा रहा है। इसे सिर्फ इस उदाहरण से समझ सकते हैं कि चीन की नौसेना के पास 400 जहाज हैं, तो ताइवान के पास महज 26। द इकोनॉमिस्ट में छपी एक रिपोर्ट बताती है कि ताइवान की सेना द्वारा महंगे एफ-16 विमान खरीदने जैसे गलत कदम उठाने से यह सैन्य विषमता और बढ़ गई है, जबकि उसे एंटी-मिसाइल डिफेंस जैसे उपायों पर ध्यान देना चाहिए था।
इन्हीं सब कारणों से यह असंभव लगता है कि अगर ताइवान को अधीन करने की कोशिश होती है, तो वह यूक्रेन की तरह वीरता दिखाएगा। इतना ही नहीं, केएमटी अगले साल आम चुनाव जीत सकती है और मुमकिन है कि यहां भी हांगकांग की तरह शासन-व्यवस्था शुरू की जाए। ऐसे वक्त में, जब रूस-यूक्रेन संकट का चौतरफा असर पड़ा है, कुछ नेता ताइवान में भी ऐसी ही जंग में हाथ सेंकना चाहते हैं। मगर कहीं ज्यादा परेशानी की बात यह है कि ताइवान दुनिया भर में सेमीकंडक्टर निर्माण की धुरी है। करीब 90 फीसदी उन्नत चिप यहीं बनते हैं। ऐसे में, इस आसन्न भू-राजनीतिक संकट को लेकर हमें कहीं अधिक चिंता करनी चाहिए।
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हाल ही में सूरत के एक न्यायालय ने मानहानि के मामले में कांग्रेस नेता राहुल गांधी को सजा सुना दी है। यह मामला 2019 में चुनाव के दौरान का है। इस मामले में उन्हें दो साल की सजा सुनाई गई है। आपराधिक मानहानि के मामले राजनीति में बढ़ते जा रहे हैं। आजकल बहुत से नेता ऐसा कुछ बोल जाते हैंए जिसका कोई ठोस प्रमाण नहीं होता है। इस मामले से जुड़े कुछ बिंदु –
मानहानि को लेकर कांग्रेस नेता को दो वर्ष की सजा और संसद से अयोग्य करार दिया जाना उचित कहा जा सकता है, लेकिन भावना और व्यवहार में खराब इस कानून को समाप्त करने के लिए सरकार और न्यायालयों को मुस्तैद रहना चाहिए।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 25 मार्च, 2023
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Date:15-04-23
Maximise Hay When The Sun ShinesET Editorials
India needs to manage daylight much better than it does. Maximising it is also a good place to start to be more energy efficient. Not using daylight properly comes at a cost — $4. 1 billion, or 0. 2% of GDP, according to a Cornell study, in addition to health impacts. Experts have suggested multiple time zones in India, perhaps reverting to the pre-1947 system of two time zones, as proposed by the Council of Scientific and Industrial Research (CSIR)-National Physical Laboratory, India’s official time keeper. But considering the huge investments required, as well as the logistical exercise of coordination, make this idea unattractive. Daylight savings is a more practical option.
Daylight savings time, or summertime, is the system of advancing clocks by an hour to get more light out of the day. This would permit using the extra hour of daylight in summer months between March and October. And it would avoid using lights on winter mornings because the sun rises later. This system will be particularly useful in the eastern and northeastern parts of the country. To further maximise use of daylight, a shift away from uniform opening hours at workplaces can be advantageous. The sun sets roughly 90 minutes later in western parts of the country than in the eastern parts. In northeast and eastern states, establishments could begin work an hour earlier than elsewhere. It would allow people here to match their working hours to environmental cues, while giving a head start to others elsewhere.
Advancing time to maximise use of daylight has energy-saving potential, which will significantly alter energy usage, cut down India’s carbon footprint and help leverage the natural resource of sunlight. It’s about maximising hay when the sun shines.
Date:15-04-23
इतिहास में बदलाव जरुरी है पर हम बदलेंगे क्यापवन के. वर्मा लेखक, ( राजनयिक, पूर्व राज्यसभा सांसद )
इतिहास के नैरेटिव को बदलने की जरूरतों से मैं पूर्णतया सहमत हूं। पर सवाल यह है कि किसे बदला जाना चाहिए? इतिहास बहसतलब विषय है, जिसमें अकसर व्यक्तिगत पूर्वाग्रह हावी रहते हैं। देखा जाए तो सरकार को इसमें निर्णयकर्ता की भूमिका नहीं निभानी चाहिए, क्योंकि उसके विचारधारागत झुकाव होते हैं। दुविधा की यह स्थिति एनसीईआरटी द्वारा हाल में इतिहास की प्रस्तुति में किए गए विवादास्पद बदलावों के केंद्र में है।
सबसे पहली बात तो यह कि हम स्वीकार करें शैक्षिक पाठ्यक्रमों को नई सूचनाओं के आधार पर अपने में संशोधन करना चाहिए और अतीत में की गई भूलों में सुधार करना चाहिए। मिसाल के तौर पर, सरस्वती नदी का बखान ऋग्वेद की 45 ऋचाओं में किया गया है। आधुनिक वैज्ञानिक तथ्यों जैसे हाइड्रोलॉजिकल और ड्रिलिंग डाटा, ओश्नोग्राफी, मोर्फो-डायनैमिक्स, सैटेलाइट डाटा आदि से स्पष्ट हो गया है कि 2500 से 1900 ईस्वी पूर्व के बीच यह नदी सूखना शुरू हो गई थी। इसका यह मतलब हुआ कि अगर ऋग्वेद के लेखक सरस्वती नदी की व्यापकता का बखान कर रहे थे तो वे 2500 ईस्वी पूर्व से पहले भारत में मौजूद थे। यानी भारत दुनिया की सबसे प्राचीन सभ्यताओं में से एक है और यह थ्योरी बेबुनियाद है कि 1500 ईस्वी पूर्व में आर्य कहीं बाहर से भारत में आए थे!
दूसरे, विशेषकर वामपंथी इतिहासकारों द्वारा पूर्व में कोशिशें की गई थीं कि तुर्क-इस्लामिक आक्रांताओं ने भारत में जैसी क्रूरता का परिचय दिया था, दूसरे धर्मों के प्रति शत्रुता दिखलाई थी और विध्वंस किया था, उसे डाउनप्ले करें। लेकिन इस इतिहास की भी फिर से पड़ताल करने का समय आ गया है। इतिहासकार विल ड्यूरैंट ने कहा है कि भारत पर इस्लामिक आक्रमण सम्भवतया उसके इतिहास का सबसे रक्तरंजित अध्याय है। इस सच्चाई को स्वीकार किया जाना चाहिए। यह भी कहा जाना चाहिए कि अतीत की बातें अब बीते कल का हिस्सा बन चुकी हैं, आज मुस्लिम भारत का उतना ही हिस्सा हैं, जितने कि दूसरे हैं और वे देश की गंगा-जमुनी तहजीब में योगदान देते हैं।
तीसरे, हमें अपने इतिहास के नैरेटिव को व्यापक और समृद्ध बनाने की जरूरत है। इसके लिए हमें प्राचीन भारत की महान उपलब्धियों को अधिक मान्यता देना होगी। हमें अपने इतिहास और स्वाधीनता संग्राम के उपेक्षित नायकों को भी महत्व देना सीखना होगा। साथ ही हमें भारत के इतिहास को केवल उत्तरी भारत के इतिहास तक सीमित करने की प्रवृत्ति से बचना होगा। हमें कृष्णदेव राय, राजा भोज, राजराजा चोल जैसे महान शासकों को भी दूसरे सम्राटों जितना सम्मान देना होगा, जिन्होंने भारतीय संस्कृति का प्रसार उसकी सीमाओं से परे किया था। चौथे, हमें अपनी महान विरासत का कैरीकेचर बनाने की कोशिशों को तिलांजलि देना होगी। इसे हम दीनानाथ बत्रा स्कूल ऑफ हिस्ट्री कह सकते हैं। वे हिंदू संस्कृति को महिमामंडित करना चाहते हैं, इसलिए वे अपनी किताबों में लिखते हैं कि वैदिक युग में भी कारें हुआ करती थीं। तब वे अनश्व रथ कहलाती थीं। वे यह भी कहते हैं कि आधुनिक स्टेम सेल रिसर्च भी प्राचीन भारतीयों ने कर रखी थी, वरना मांस के एक लोथड़े से कौरवों की सौ देहों का निर्माण कैसे होता? उनका दावा है कि महाभारत काल में लाइव टेलीकास्ट की सुविधा थी, जिसका प्रयोग करते हुए संजय ने धृतराष्ट्र को युद्ध का पूरा हाल सुनाया। प्राचीन भारत की वास्तविक उपलब्धियों को महत्व देने की समूची परियोजना इस तरह की अतिरंजनाओं से हास्यास्पद बन जाती है।
यही कारण है कि इतिहास पर पुनर्विचार एक जटिल विषय है, इसे केवल मुगलों को पाठ्यक्रम से हटाने तक सीमित नहीं किया जा सकता। बदलाव जरूरी है, लेकिन यह तब खतरनाक बन जाता है, जब वह एक गैर-शैक्षिक और पक्षपातपूर्ण एजेंडा का पालन करने लगता है। अनेक प्रतिष्ठित इतिहासकारों ने एनसीईआरटी द्वारा किए बदलावों की आलोचना की है, जिसके चलते मुगल भारत, साम्प्रदायिक दंगों, हिंदू चरमपंथ के प्रति गांधी की अरुचि और आपातकाल के संदर्भों को दोहरावपूर्ण बताकर हटा दिया गया है। इसका सबसे अच्छा समाधान यही होगा कि इतिहासकारों की एक स्वतंत्र पैनल गठित की जाए, जिसमें हर विचारधारा के विद्वान सम्मिलित हों। वे ही तय करें कि हमें क्या दुरुस्त करने की जरूरत है। पर क्या कोई भी सरकार इसकी अनुमति देगी? इतिहास पर पुनर्विचार जटिल विषय है, इसे मुगलों को पाठ्यक्रम से हटाने तक सीमित नहीं किया जा सकता। बदलाव जरूरी है, पर वह तब खतरनाक हो जाता है, जब वह एक गैर-शैक्षिक एजेंडा बन जाता है।
Date:15-04-23
मुस्लिम महिलाओं के अधिकार में सेंधनाइश हसन, ( लेखिका इस्लामिक विषयों की जानकार हैं )
हाल में विभिन्न मुस्लिम संगठनों के प्रतिनिधि केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह से मिले। उन्होंने उनसे कई विषयों पर बात की, लेकिन किसी को नहीं पता कि क्या उन्होंने मुस्लिम महिलाओं से जुड़े किसी विषय पर चर्चा की? यह प्रश्न इसलिए, क्योंकि मुस्लिम महिलाओं से जुड़े प्रश्नों पर वैसी चर्चा नहीं हो रही, जैसी होनी चाहिए। उदाहरण स्वरूप कुछ समय पहले मद्रास हाई कोर्ट ने जब ‘खुला’ (पत्नी द्वारा तलाक की पहल) पर फैसला दिया, तब उसे लेकर मुस्लिम समाज के बीच वैसी बहस नहीं हुई, जैसी होनी चाहिए थी। ज्ञात हो कि मद्रास हाई कोर्ट के जस्टिस सी. सरवनन ने वर्ष 2017 के एक मामले में तमिलनाडु तौहीद जमात की शरीयत काउंसिल द्वारा जारी खुला प्रमाण पत्र को रद करते हुए कहा था कि मुस्लिम महिलाएं खुला के जरिये शादी खत्म करने के अधिकार का इस्तेमाल फैमिली कोर्ट में कर सकती हैं, शरीयत काउंसिल जैसी निजी संस्थाओं में नहीं। हाई कोर्ट ने यह भी कहा कि खुला के मामले में इस तरह की निजी संस्थाओं द्वारा जारी प्रमाण पत्र अवैध हैं। यह एक अति महत्वपूर्ण फैसला है। अब जरूरी है कि तीन तलाक की तरह ही खुला पर भी बहस अपने अंजाम तक पहुंचे। यहां यह जानना जरूरी है कि खुला क्या है? खुला का शाब्दिक अर्थ है ‘कोई चीज निकालना या दूर धकेलना।’ पति को कुछ मुआवजा देकर पत्नी द्वारा शादी खत्म करना खुला है। कुरान में खुला द्वारा विवाह को भंग करने का अधिकार केवल पत्नी को प्राप्त है, पति को नहीं। इसके लिए उसे न तो पति की सहमति लेने की जरूरत है और न ही किसी काजी/मौलवी के पास जाने तथा उनकी रजामंदी लेने की। पत्नी स्वयं अपने पति को खुला भेज सकती है और शादी को भंग कर सकती है। यह विशेषाधिकार उसे प्राप्त है। इस प्रकार तलाक और खुला का असर एक ही है, वह है शादी को बर्खास्त करना।
खुला की वैधता के संबंध में कई ऐतिहासिक दस्तावेज हैं। जैसे-कुरान (2:229), हदीस बुखारी (68:11), मुंशी बुजलुल रहीम बनाम लतीफुन्निसां वाद (1861) तथा 1945 में उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले में शफीकुन पुत्री करीम बख्श द्वारा अपने पति मोहम्मद इस्हाक को आठ आने के स्टांप पेपर पर खुलानामा भेजकर अपनी शादी को बर्खास्त करना। ये चार तथ्य यह साबित करते हैं कि महिलाएं खुला बहुत आसानी से लेती रही हैं। उनके लिए पति की सहमति की जरूरत नहीं थी। समय के साथ पितृसत्ता की मजबूत जड़ों और मौलवियों के वर्चस्व ने महिलाओं के उस अधिकार में सेंध लगा दी, जिसका प्रयोग कर वे पति से छुटकारा पा सकती थीं। इस अधिकार में मजहबी संस्थाएं रोड़ा बन चुकी हैं। पिछले दो-तीन दशकों में मजहबी संगठन बहुत तेजी से उभरे हैं। उनके द्वारा तैयार दस्तावेजों में लिखा गया कि खुला के लिए पति की सहमति जरूरी है। ये दस्तावेज कुरान में महिलाओं को दिए अधिकारों से मेल नहीं खाते, परंतु वे अदालतों तक भी पहुंच गए। इसी का परिणाम हुआ कि महिलाएं खुला पाने के लिए दर-दर भटकने को मजबूर हो गईं।
कई बार ऐसा देखा गया है कि महिलाओं ने जब भी अपने पतियों से खुला पर सहमति मांगी तो उन्होंने प्रतिशोधवश सहमति देने से इनकार किया। धार्मिक संगठनों ने महिलाओं को उसी घर में भेज दिया, जहां उन पर हिंसा हो रही थी। ऐसी स्वनिर्मित अदालतों को समाप्त किया जाना महिलाओं के हक में एक बेहतर कदम तो होगा ही, साथ ही समाज में गैर-बराबरी की जड़ों पर भी चोट करेगा। पितृसत्ता के इन पहरेदारों ने अपनी अलग विधि ही ‘कवानीने इस्लामी’ के नाम से बना डाली, जो पूर्णतः अमानवीय है। हमने तीन तलाक के संबंध में महिलाओं के संघर्ष के दौरान भी ऐसा ही देखा कि तीन तलाक को सही साबित करते हुए मौलवी सड़कों पर उतर आए थे, परंतु न्यायालय ने कुरान के संदर्भ को ही सही मानते हुए तीन तलाक पर पाबंदी का एलान किया।
मद्रास हाई कोर्ट का फैसला इस मायने में अहम है कि शरीयत के नाम पर गली-गली फैली अदालतें नाइंसाफी पर टिकी हैं, जो मुस्लिम महिलाओं को खुला, तीन तलाक, तलाक ए हसन, तलाक ए एहसन, फस्ख निकाह कराने के लिए बैठी हैं। ऐसी उम्मीद जगी है कि अब उन पर देश भर में रोक लग सकेगी। जब ऐसी शरई अदालतों के प्रमाण पत्र कहीं मान्य ही नहीं होंगे तो महिलाएं वहां जाएंगी ही क्यों, भारत में आज जो मुस्लिम विधि लागू है वह हनफी विधि है, जो 1937 में मौलवियों द्वारा होशियारी से न्यायालयों में स्थापित करा दी गई। इस विधि के अंतर्गत भी खुला के लिए पति की सहमति अनिवार्य मानी जाती है। नशे की हालत में भी यह सहमति वैध है। ऐसा एक वाद रशीद अहमद बनाम अनीसा खातून में भी देखा गया। मुस्लिम महिलाओं के लिए एक तरफ कुआं दूसरी तरफ खाई है। बात सहमति की है ही नहीं। बात यह है कि कुरान में पति की सहमति-असहमति का उल्लेख ही नहीं है। यहां स्वेच्छा से पति की सहमति का पेच लगाकर खुला का अधिकार भी पति को ही दे दिया गया है। इस तरह फैमिली कोर्ट से भी मुस्लिम महिला को खुला का प्रमाण पत्र हासिल करना आसान नहीं होता। इसलिए मुस्लिम पर्सनल ला में सुधार किया जाए, नहीं तो कोर्ट में भी इस कमजोर कानून का लाभ पितृसत्ता के पहरेदारों को ही मिलेगा और मुस्लिम महिलाएं वहां भी इंसाफ पाने से वंचित रह जाएंगी। हां, इस परिदृश्य में समान नागरिक संहिता का प्रश्न वैकल्पिक रूप में बना रहे तो कोई हर्ज न होगा।
Date:15-04-23
जलवायु परिवर्तन और जीडीपीसंपादकीय
सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की आधुनिक अवधारणा करीब नौ दशक पुरानी है। इसे सन 1944 में ब्रेटन वुड्स सम्मेलन में औपचारिक रूप से प्राथमिक आर्थिक उपाय के रूप में अपनाया गया जिसका परिणाम अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) और विश्व बैंक की स्थापना के रूप में सामने आया। आलोचक तब से अब तक इसे मिली प्राथमिकता की आलोचना करते रहे हैं क्योंकि यह कल्याण, असमानता और मानव विकास जैसे मुद्दों को शामिल नहीं करता। जीडीपी आर्थिक गतिविधियों के कारण पर्यावरण को होने वाली क्षति को भी शामिल नहीं करता। जलवायु परिवर्तन का सामना कर रहे लोगों पर पड़ने वाले प्रभाव भी इसके दायरे से बाहर हैं। विडंबना यह है कि पेड़ों को काटने का काम जीडीपी बढ़ाता है। बाद में दोबारा पौधरोपण करने से भी ऐसा ही होता है।
परंतु इसी वजह से जीडीपी अपनी मौजूदा खासियत में से कुछ गंवा सकता है। कार्बन उत्सर्जन और जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए बढ़ते प्रयासों पर विचार कीजिए। नवीकरणीय ऊर्जा क्षमताएं तैयार करने में भारी निवेश किया जा रहा है, बिजली से चलने वाले वाहनों पर जोर दिया जा रहा है और कई उद्योगों को नए सिरे से आविष्कृत किया जा रहा है। कुछ देशों में कोयला आधारित बिजली संयंत्र बंद किए जा रहे हैं और नवीकरणीय ऊर्जा पर जोर दिया जा रहा है। पेट्रोल और डीजल से चलने वाली कारों पर जोर कम हो रहा है। जल्दी ही उनकी तादाद में कमी आने लगेगी और बिजली चालित वाहनों की राह आसान होगी। आने वाले दशक में कई बड़े पारंपरिक उद्योग चलन से बाहर होने लगेंगे।
ऐसे उथलपुथल वाले दौर मंथन में जीडीपी भ्रामक हो सकती है। केवल एनडीपी (विशुद्ध घरेलू उत्पाद यानी जीडीपी में से अवमूल्यन को हटाने से प्राप्त उत्पाद) के माध्यम से ही मंथन को समझा जा सकता है। अगर कोई कोयला चालित बिजली स्टेशन हटाकर उसकी जगह पवन या सौर ऊर्जा संयंत्र स्थापित किया जाता है तो एनडीपी द्वारा आकलित आर्थिक गतिविधियों में होने वाली विशुद्ध वृद्धि में कोयला चालित संयंत्र को रद्द किया जाना शामिल होगा जबकि जीडीपी के आंकड़े भ्रामक होंगे क्योंकि उसमें केवल सौर या पवन ऊर्जा से होने वाला उत्पादन दर्ज किया जाएगा।
अर्थव्यवस्थाओं में उत्पादक परिसंपत्ति बढ़ने के साथ अवमूल्यन पहले ही महत्त्वपूर्ण हो चुका है। पिछली सदी की चौथी तिमाही में भारत के जीडीपी और एनडीपी के बीच का अंतर 6 फीसदी से थोड़ा अधिक था। अब यह करीब 12 फीसदी हो चुका है। कार्बन उत्सर्जन को नियंत्रित करने की कोशिश बढ़ने के साथ ही दोनों उपायों के बीच का अंतर बढ़ना चाहिए। ऐसा इसलिए कि गहन कार्बन उत्सर्जन वाली उत्पादन सुविधाओं की जगह स्वच्छ विकल्प अपनाए जाएंगे। उदाहरण के लिए रेलवे अभी भी नए डीजल इंजन अपने बेड़े में शामिल कर रही है। उनमें से कई को जल्दी ही विराम दे दिया जाएगा क्योंकि रेलवे अपने सभी मार्गों का विद्युतीकरण कर रही है।
इन्हें तथा ऐसे ही अन्य बदलावों को दर्ज करने से वह पूरा अवमूल्यन दर्ज नहीं होगा जिसे शामिल करने की आवश्यकता है क्योंकि आम वृहद आर्थिक आंकड़े भले ही वे विनिर्मित पूंजी के अवमूल्यन को दर्ज कर लें लेकिन वे प्राकृतिक पूंजी मसलन जल संसाधन, वन संपदा, स्वच्छ ऊर्जा आदि की अनदेखी करते हैं। भारत का भूजल स्तर दशकों से गिर रहा है और उसकी वजह से खेती वाले राज्यों में संकट की स्थिति बन रही है। वायु प्रदूषण लोगों के स्वास्थ्य को प्रभावित कर रहा है। गंगा के मैदान में बढ़ता तापमान लोगों के स्वास्थ्य पर असर डालेगा। हिमालय में बन रहे बांध पर्यावरण को क्षति पहुंचा रहे हैं। जोशीमठ इसका उदाहरण है। स्वयं बांधों को भी नुकसान पहुंच सकता है। 2021 में दो निर्माणाधीन बांध बह गए।
इन चीजों से निपटने के लिए तथा औद्योगिक परिवर्तन लाने के लिए बड़े पैमाने पर बदलाव की आवश्यकता होगी। इसका एक परिणाम पूंजी-उत्पादन अनुमान बढ़ना हो सकता है। उच्च पूंजी-उत्पादन अनुपात का सीधा अर्थ वृद्धि में धीमापन होता है। ऐसे में आर्थिक गतिविधियों के प्रमुख कारक के रूप में जीडीपी कम विश्वसनीय रह जाती है। एनडीपी पर करीबी नजर रखना भी पर्याप्त साबित नहीं होगा। इसके अलावा देश को परिसंपत्तियों और देनदारियों की बैलेंसशीट में सालाना बदलाव पर भी नजर रखनी चाहिए। इनमें प्राकृतिक और मानव संसाधन शामिल हैं। जीडीपी और एनडीपी को ऐसी बैलेंस शीट के साथ देखा जाना चाहिए, ठीक वैसे ही जैसे कंपनी के शेयर धारक आय और व्यय दस्तावेजों के साथ परिसंपत्तियों और देनदारियों पर नजर रखते हैं। अक्सर बैलेंस शीट ही अधिक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज होती है। जलवायु परिवर्तन के कारण अर्थव्यवस्थाएं जहां नए तौर तरीके अपनाएंगी, वहां आर्थिक उपायों का स्वरूप भी बदलेगा।
Date:15-04-23
बदलते मौसम की विनाशलीलासुरेश सेठ
इस कृषि प्रधान देश में किसानी पेशा नहीं, बल्कि जीने का ढंग है। मगर वक्त बदल गया। अब भारत कृषि प्रधान देश की जगह डिजिटल भारत कहलाना चाहता है। उसकी इंटरनेट क्षमता भी दुनिया के बहुत बड़े देशों का मुकाबला करती है और जहां तक मोबाइल से सोशल मीडिया अपनाने की बात है, शहर ही नहीं, गांवों तक में हर जगह मोबाइल नजर आते हैं। मगर फिर भी देश की रीढ़ की हड्डी को खेती-बाड़ी ही कहना चाहिए, क्योंकि उद्योगीकरण के विकास पर मंदी का पक्षाघात हो जाता है। कोरोना काल में अगर कोई धंधा बच निकला था या अपने पैरों पर खड़ा रहा तो वह खेती-बाड़ी ही था, जिससे आज भी देश की आधी जनसंख्या जुड़ी है।
मगर किसानों की त्रासदी का अंत नहीं। विकसित देशों की तरह यहां खेती-बाड़ी के बाद फसलों को लघु, कुटीर और मध्यम उद्योगों की सहायता से तैयार माल बना कर बेचा नहीं जाता। अब जो कुटीर, लघु और मध्यवर्ग को विकास के दमामे पूरे देश में बजाए गए हैं, उनमें भी खेतिहर की समस्याओं का अंत नहीं हुआ, क्योंकि धनकुबेर इस क्षेत्र की निर्यात संभावनाओं के कारण अपना हस्तक्षेप करना चाहते हैं और गरीब किसान के पास इतना धन नहीं कि वह फसल बीजने-काटने के बाद अगला कदम उसके विनिर्माण का भी उठा ले।
इतनी सदियों के खेती-बाड़ी के धंधे को जीवन धन की तरह अपनाने के बावजूद आज भी देश की खेती-बाड़ी का ढांचा चरमराता नजर आता है। किसानों का दृष्टिकोण अब खेती को एक जीवन-अर्थ न मानकर पेशा बनाने का हो तो गया, लेकिन उसकी संभावनाओं को पूरी तरह से उपयोग नहीं किया जा सका, क्योंकि खेती कल भी जीवन निर्वाह थी, आज भी जीवन निर्वाह है। वही फसल चक्र आज भी किसान के पल्ले पड़ा है। यानी गेहूं के बाद धान और धान के बाद गेहूं।
सरकार ने खेती-बाड़ी के विविधिकरण की बहुत बातें की हैं। नई फसलें उगाने का आग्रह किया जाता है, लेकिन किसान की इस विविधिकरण के बावजूद त्रासदी का अंत नहीं होता। कभी मौसम खलनायक बन जाता है, कभी नियमित मंडियों में उसकी विविध फसलों को उचित सम्मान नहीं मिलता। मौसम के परिवर्तन ने फसलों को मार दिया। यही हाल दलहन का हो रहा है। किसान के पास कोई और रास्ता नहीं, सिवाय फसल चक्र को अपनाए रखने के, क्योंकि वह उसे निम्नतम रोजी-रोटी की गारंटी तो दे देता है।
मगर लगता है, इस बार यह गारंटी भी नहीं मिलेगी। देश की मुख्य फसल है गेहूं। गेहूं की फसल खेतों में तैयार खड़ी थी, तब पर्यावरण प्रदूषण का तोहफा जलवायु का असाधारण परिवर्तन उस पर वज्रपात बनकर इस बार गिरा। आंधी, तूफान, ओलावृष्टि, बर्फबारी का अब कोई वक्त नहीं रहा। जलवायु के ये असाधारण परिवर्तन किसानों पर वज्रपात की तरह गिरते हैं और उनके खेतों में लहलहाती फसलें धरती पर बिछ जाती हैं। बारिश होती है, गेहूं के डंठल उसमें डूब जाते हैं और गेहूं के दाने छोटे रह जाते हैं। अब की बात करें तो मौसम की मार के कारण बड़ा घाटा उठाने की स्थिति में नजर आ रहे हैं, क्योंकि आंधियां, तेज हवाएं और बेमौसमी बारिश उनकी मेहनत को धरती पर पटक रही हैं।
अब भी जलवायु विभाग जो नई चेतावनियां दे रहा है, वे यही हैं कि पीली चेतावनी अभी आपका पीछा नहीं छोड़ेगी। हो सकता है, पूरा अप्रैल का महीना भी मौसम के इसी उतार-चढ़ाव में गर्क हो जाए। मार्च के दिनों में भारी गर्मी पड़ने लगी थी। लगा था बसंत का महीना उड़न-छू हो गया। अब यह बारिश-तूफान चला आया पश्चिमी विक्षोभ के कारण। खेतों के खेत गेहूं की फसल खो रहे हैं। मध्यप्रदेश, राजस्थान और उत्तर प्रदेश में 5.23 लाख हेक्टेयर जमीन पर गेहूं की फसल क्षतिग्रस्त हो गई। पंजाब पर सबसे ज्यादा असर हुआ है। पंजाब और हरियाणा में इस साल लगभग 34 लाख हेक्टेयर गेहूं बीजा गया था। अब जो आंधी, तूफान और धारासार बारिश हुई, उसने हमारे फसल चक्र में रबी की मुख्य फसल गेहूं का बंटाधार कर दिया है। इसके साथ-साथ छोटी अतिरिक्त फसलें भी गईं।
अनुमान था कि जून 2023 तक एक साल में हम 11.22 करोड़ टन गेहूं का उत्पादन कर लेंगे, लेकिन बेमौसमी बारिश ऐसी आई कि फसल कटाई की योजनाएं धरी की धरी रह गर्इं। पंजाब से लेकर मध्यप्रदेश तक फसल मंडियों में न्यूनतम समर्थन मूल्य पर फसल खरीद तो शुरू हुई, लेकिन गेहूं की आवक कहां हैं? खेतों में बिछ गई फसलों में से गेहूं के मरते हुए दाने को कैसे निकालें? हरियाणा में 1,02,627 नुकसान ग्रस्त किसानों ने मुआवजे के लिए पंजीकृत करवाया है। यहां 5.7 लाख एकड़ भूमि में नुकसान हुआ बताते हैं। यह लगातार दूसरा साल है, जब पंजाब और हरियाणा के किसान यही भाग्य झेल रहे हैं। पंजाब में तो फसलों का इतना नुकसान हो गया कि 13 लाख हेक्टेयर फसल तबाह हो गई लगती है। अब अफसरों और विधायकों को मैदान में उतारा जा रहा है कि वे नष्ट फसलों वाले खेतों की गिरदावरी करें और उनका मुआवजा देने का प्रबंध किया जाए।
पंजाब के मुख्यमंत्री ने कहा था कि कि बैसाखी से पहले मुआवजा दे देंगे, लेकिन मौसम विभाग कहता है कि पीली चेतावनी ने पीछा नहीं छोड़ा। पंजाब के पंद्रह जिले बारिश और ओलावृष्टि से बार-बार ग्रस्त हो रहे हैं। कहा जा रहा है कि पूरे अप्रैल में मौसम की यही असाधारण करवट रहेगी। किसान अपनी आंखों के सामने अपनी मेहनत को बर्बाद होता देखेगा। यह किसान उन सभी गेहूं बीजने वाले राज्यों में घुटनों में सिर दिए बैठा है, जहां मौसम की मार ने उसकी फसलों को तबाह कर दिया। पंजाब सरकार ने मुआवजा 25 प्रतिशत बढ़ाकर पंद्रह हजार तो कर दिया, लेकिन किसान संगठन कहते हैं कि नुकसान तो अस्सी हजार रुपए प्रति एकड़ तक हुआ है। पंद्रह हजार मुआवजा क्या करेगा, कम से कम पचास हजार चाहिए। इसके लिए किसानों ने रेल पटरियों पर धरना भी लगा दिया।
मगर सवाल है कि ऐसे मौसम का नुकसान क्या केवल खेती-बाड़ी में ही होता है। क्या कस्बों और शहरों का व्यावसायिक जीवन अव्यवस्थित नहीं हो जाता। वे पहले ही मंदी की मार झेल रहे थे, अब मौसम खलनायक हो गया तो उन्हें भी अपना भाग्य डूबता नजर आ रहा है। ऐसी हालत में तत्काल मुआवजा कोई समाधान नहीं है। असली समाधान तो यह है कि इसके मूल कारण पर्यावरण प्रदूषण से जूझा जाए और इससे जूझने के लिए बाहुबली देशों के सहयोग का इंतजार न किया जाए। उन्होंने तो अपने वक्त में कार्बन उत्सर्जन करके पर्यावरण प्रदूषण की यह हालत कर दी। अब न जी-20 के मंच से और न ही क्वाड देशों के समूह में से उनकी आवाज ही उठती है कि वे पर्यावरण प्रदूषण से जूझने के लिए अपना सौ अरब डालर का व्यय कर देंगे। वे तीस अरब से आगे जाने के लिए तैयार नहीं हैं।
तो रास्ता क्या है? केवल एक कि भारत तीसरी दुनिया के देशों का नेतृत्व करे और अपने सीमित साधनों के साथ पर्यावरण प्रदूषण की इस विनाशलीला से जूझना शुरू करे। इसे अब और स्थगित नहीं किया जा सकता। केवल बजट में इसके लिए धनराशि आबंटित करने से कुछ नहीं होगा। संघर्ष के ये तेवर तेजी से नजर आने चाहिए। भारत नेतृत्व करेगा तो शेष विश्व भी अपने इस आसन्न संकट का संज्ञान लेकर अपना योगदान देगा।
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15 April 2023
प्रश्न–406 – मंदिर वस्तुकला की नागर एवं द्रविड़ शैलियों के अन्तर को स्पष्ट कीजिये। (200 शब्द)
Question–406 – Explain the difference between Nagara and Dravida styles of temple architecture. (200 words)
नोट : इसका उत्तर आपको हमें नहीं भेजना है, यह आपके स्वयं के अभ्यास के लिए है।
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Date:14-04-23
State Your Case, LordshipJudge recusals for vague reasons are increasing. CJI should lead the process for procedureTOI Editorials
Now that another judge – the fourth, in fact – has recused himself from hearing the Maharashtra-Karnataka border wrangle on Belagavi, there’s an urgent need for the Supreme Court to reform the recusal system – in plain words, raise the bar for recusals. The judge reportedly recused himself since Karnataka is his home state. Let’s assume that this is the actual reason – reasons for recusal are mostly shrouded in opacity. Then it is mystifying, for all judges must belongto some state or the other. Would origin invariably impinge on judgment? The three other judges who earlier recused themselves from this particular case were from Karnataka too.
Recusal is a grave matter; it deals with the impartiality of a judge. Recusal is advised even if a judge believes he can be impartial but his conflict-of-interest (pecuniary or otherwise) or obiter dicta (views, remarks made in passing) is such that without recusal, the independence of the bench is seen to be under a cloud. However, when recusal is sought without substantial reason, it raises as much doubt –exiting a case abruptly halts proceedings, leaving all concerned in the lurch while a new bench is decided. Justifying non-recusal and allowing opaqueness about recusal are equally damaging to the trust reposed in the courts, especially since these are constitutional courts.
Citing state-of-origin as a source of bias surely fails the reasonfor-recusal test? Alas, there is no such codified test. India has no laiddown procedure for judges to stand down from cases. Judges have increasingly argued it is desirable to specify reasons for recusal to meet constitutional norms of transparency. Given the uptick in judges withdrawing on reasons that are apparently vague, a protocol is necessary. CJI should step in. Otherwise, recusals will engender more suspicion than admiration.
Date:14-04-23
अपराधियों को राजनीति में आने से कैसे रोका जाएसंपादकीय
चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि अपराधियों को चुनावी राजनीति में आने से रोकना उसके वश की बात नहीं है। इसके लिए संसद को कानून बनाना होगा। दरअसल आज लोकसभा के 43% और राज्य सभा के 31% सांसदों पर आपराधिक मुकदमे चल रहे हैं। लोक सभा सांसदों में लगभग हर तीसरे पर संगीन जुर्म के मामले हैं। चौंकाने वाली बात यह है कि ऐसे सांसदों में बिहार (साक्षरता दर में सबसे पीछे) से भी हैं और केरल (सबसे साक्षर) से भी। तो क्या इसका यह निष्कर्ष निकाला जाए कि वोटर निरक्षर हो या शिक्षित, इससे फर्क नहीं पड़ता कि उसका नेता आपराधिक प्रवृति का है या नहीं? इस विरोधाभास के दो मूल कारण हैं। पहला, जनता का वोट देते समय पार्टी या जाति या सम्प्रदाय के प्रति रुझान होना और दूसरा, चूंकि हर दल उपरोक्त बातों के आधार पर ही टिकट देता है, लिहाजा अपराधी-दबंग लोग इस प्रक्रिया में लाए जाते हैं और जनता के पास विकल्प नहीं होता। सुप्रीम कोर्ट जिस याचिका पर सुनवाई कर रहा था, उसमें याचना यह थी कि ऐसे किसी भी व्यक्ति पर जिसके खिलाफ कोर्ट ने चार्ज फ्रेम कर दिए हों, उसे चुनाव लड़ने से रोका जाए। अभी तक कानूनन केवल उन्हीं लोगों को चुनाव से 6 साल के लिए वंचित किया जाता है, जिन्हें कोर्ट ने दो या दो साल से ज्यादा की सजा सुनाई हो ।
Date:14-04-23
सूचनाओं की होड़ में गलत तथ्यों की जांच कौन करेगा ?डेरेक ओ ब्रायन, ( लेखक सांसद और राज्यसभा में टीएमसी के नेता हैं, इस लेख के सहायक-शोधकर्ता वर्णिका मिश्रा और आयुष्मान डे हैं। )
पहला दृश्य : यह 2018 है और अमित शाह राजस्थान में रैली को सम्बोधित कर रहे हैं। वे कहते हैं, हम जनता तक जो मैसेज चाहें, पहुंचा सकते हैं, फिर चाहे वह सही हो या गलत, भला लगे या बुरा। हम ऐसा इसलिए कर सकते हैं, क्योंकि हमारे वॉट्सएप समूहों से 32 लाख लोग जुड़े हैं।
दूसरा दृश्य : यह 2023 है और जेपी नड्डा कर्नाटक में एक रैली को सम्बोधित कर रहे हैं। वे कहते हैं, भारत के इतिहास में आज तक कोई प्रधानमंत्री मोदी जी जितना महान नहीं हुआ है। उन्होंने 22,500 विद्यार्थियों को लाने के लिए रूस-यूक्रेन युद्ध रुकवा दिया था। बाद में नड्डा के इस दावे को झूठा साबित कर दिया गया था, किसी विदेशी एजेंसी के द्वारा नहीं, बल्कि खुद भारत के विदेश मंत्रालय के द्वारा।
जब देश के गृह मंत्री और सत्तारूढ़ पार्टी के अध्यक्ष का यह ट्रैक रिकॉर्ड हो तो पिछले हफ्ते केंद्र सरकार द्वारा सूचना प्रौद्योगिकी नियमों में किए गए संशोधनों पर हमें करीब से नजर रखना होगी। सरकार ने खुद को एक फैक्ट-चेकिंग संस्था के रूप में नियुक्त कर दिया है! लेकिन वो इसे ठीक से परिभाषित करने में नाकाम रही है कि फर्जी जानकारी, गलत जानकारी और गुमराह करने वाली जानकारी में क्या अंतर है।
फैक्ट-चेकिंग का कारोबार : आज देश में 50 करोड़ वॉट्सएप यूज़र और 30 करोड़ फेसबुक यूज़र हैं। ऐसे में भारत खुद को दुनिया का सबसे बड़ा फैक्ट-चेकिंग स्पेस कह सकता है। इंटरनेशनल फैक्ट-चेकिंग नेटवर्क या आईएफसीएन के द्वारा भारत में ग्यारह संस्थाओं को सत्यापित किया गया है। इनमें निष्पक्ष फैक्ट चेकिंग माध्यमों के अलावा अनेक ऐसे समाचार-संगठन शामिल हैं, जिनके पास अपने फैक्ट चेकिंग प्लेटफॉर्म्स हैं। किसी निश्चित और मानक संचालन-प्रणाली के अभाव में आईएफसीएन ही इकलौती अधिकृत संस्था बन जाती है। तमाम फंड्स भी उसके माध्यम से ही वितरित होते हैं। इसका यह भी मतलब है कि कोई वेरिफाइड फैक्ट-चेकर है, यह तय करने का एकाधिकार भी उसी के पास है। एक मायने में आज फैक्ट-चेकिंग एक कारोबार बन चुका है। कोई संस्था फलां संख्या में फैक्ट-चेक करती है और बदले में उसे भुगतान किया जाता है। इसमें क्वालिटी से ज्यादा क्वांटिटी का महत्व होता है। ऐसे माहौल में मासिक बिलिंग टारगेट पूरा करने के लिए जगजाहिर बातों के भी फैक्ट-चेक किए जाते हैं।
आज मेट्रो शहरों के युवा रोज औसतन दो घंटा अपने मोबाइल फोन से कंटेंट को एक्सेस करने में बिताते हैं। कंटेंट क्रिएटर्स समझ गए हैं कि उनका कंटेंट जितना सनसनीखेज होगा, उतने ही व्यूज़ उनको मिलेंगे, और उतनी ही उनकी कमाई होगी। इससे ज्यादा से ज्यादा फैक्ट-चेकर्स को भी काम मिलता है, लेकिन फैक्ट-चेकिंग की गुणवत्ता का कोई निश्चित मानदंड नहीं होने के कारण आउटपुट अच्छा नहीं मिलता।
बड़ी टेक-कम्पनियों की भूमिका : यहां फेसबुक जैसी बड़ी टेक-कम्पनियों की भूमिका पर भी नजर डालना जरूरी है। फेसबुक राजनेताओं के फैक्ट-चेक करने से इनकार करता है। मार्क जकरबर्ग ने अधिकृत तौर पर कहा है कि ऐसा इसलिए है, क्योंकि राजनेताओं की पहले ही बहुत सख्त निगरानी की जाती है। लेकिन जकरबर्ग सैन फ्रांसिस्को में बैठे हैं और उन्हें भारत जैसे देश के सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य का कोई अंदाजा नहीं है। जब फेसबुक खुद ही राजनेताओं के फैक्ट-चेक नहीं करता तो उसके फैक्ट-चेकिंग पार्टनरों को भी इसमें कोई तुक नहीं नजर आती। कारण सरल है। क्योंकि तब उसका भुगतान कौन करेगा? यह जानी-मानी बात है कि फेसबुक के फैक्ट-चेकिंग पार्टनर कुछ मीडिया समूहों ने भाजपा के द्वारा निर्मित कंटेंट की जांच करने से इनकार कर दिया है।
गलत सूचनाओं से संघर्ष के लिए हमें समस्या की जड़ में जाना होगा और वह है भरोसेमंद मीडिया कंटेंट और जनसाक्षरता का अभाव। फैक्ट-चेक करना एक अल्पकालिक समाधान है, बड़ी चुनौती यह है कि आम यूज़र में वे बुनियादी कौशल कैसे विकसित करें, जिनकी मदद से वे गलत सूचनाओं को खुद ही पहचानकर उनके प्रसार पर रोक लगाएं। आज देश में सोशल मीडिया पर बेबुनियाद अफवाहें फैलाकर लोगों को निशाना बनाया जा रहा है। ऐसे में फेक-न्यूज़ का खुलासा करना ही काफी नहीं, गलत सूचनाओं के विरुद्ध लड़ाई को एक दूसरे स्तर पर ले जाना होगा। बेहतर होगा कि इसकी शुरुआत स्कूली छात्रों से करें। सरकार के तथ्यों की जांच करना मीडिया का काम है, लेकिन अब खुद सरकार ही फैक्ट-चेकर्स के तथ्यों की जांच करना चाह रही है। गलत सूचनाओं से संघर्ष के लिए हमें समस्या की जड़ में जाना होगा।
Date:14-04-23
यूपीआई की डिजिटल क्रांति सफल बनाएंगे छह मंत्रविराग गुप्ता, ( लेखक और वकील )
सिंगापुर से समझौते के बाद यूपीआई यानी यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस का जलवा जी-20 और वैश्विक स्तर पर बढ़ना देश के लिए गौरव की बात है। नीति आयोग के पूर्व सीईओ अमिताभ कांत के अनुसार अमेरिका और यूरोप से 11 गुना और चीन से चार गुना ज्यादा डिजिटल पेमेंट भारत में हो रहे हैं। नोटबंदी के बाद 130 करोड़ आधार, 85 करोड़ इंटरनेट, 78 करोड़ स्मार्टफोन, 43.76 करोड़ जन-धन खाते, सस्ता डाटा और ई-कॉमर्स में बढोतरी से यूपीआई पेमेंट ने लम्बी छलांग लगाई है। 2022 के अंत में डिजिटल वॉलेट से 126 लाख करोड़ रुपए के लेन-देन हुए थे। इस क्रांति को भारतीय अर्थव्यवस्था की मजबूती में तब्दील करने के लिए सरकार और रिज़र्व बैंक को इन 6 मंत्रों पर मंथन की जरूरत है-
1. गूगल ने एक नया लाइव टीवी पेश किया है जिसमें 800 से ज्यादा टीवी चैनल फ्री में देख सकते हैं। यूपीआई के बाजार में फोन-पे और गूगल-पे के पास 80% से ज्यादा हिस्सेदारी है। बड़े पैमाने पर कारोबार कर रही डिजिटल पेमेंट कम्पनियों का बिजनेस मॉडल क्या है? कहीं ये कम्पनियां डेटा के अवैध कारोबार से तो मुनाफा नहीं कमा रहीं? पारदर्शित नहीं बरती गई तो डिजिटल कम्पनियां बैंकिंग और देश की अर्थव्यवस्था को नुकसान भी पहुंचा सकती हैं।
2. फेसबुक और वाट्सएप जैसी कम्पनियां पिछले कई सालों से अवैध तरीके से डेटा के कारोबार के साथ लोगों की गोपनीयता का उल्लंघन कर रहे हैं। इस मामले में केन्द्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में कहा है कि मॉनसून सत्र में डेटा सुरक्षा कानून का विधेयक पेश किया जाएगा। पिछले कई सालों से लम्बित यह कानून क्या लोकसभा चुनावों के पहले लागू हो पाएगा?
3. परंपरागत बैंकिंग में केवाईसी की सख्त व्यवस्था को डिजिटल पेमेंट कम्पनियां नजरअंदाज कर रही हैं। यूपीआई के विस्तार के साथ लोगों में डिजिटल साक्षरता का प्रसार उस अनुपात में नहीं हुआ। रेगुलेटर की सुस्ती से जनता का डेटा, फोन नम्बर और बैंक खातों के विवरण थर्ड पार्टी को लीक हो रहे हैं। साइबराबाद पुलिस ने एक गैंग का पर्दाफाश किया है, जिसने 70 करोड़ डेटा की चोरी की है। पुलिस ने एक गिरोह का पर्दाफाश किया है जो लोगों के निजी डाटा को चीनी कम्पनी के सर्वर पर अपलोड करने के बाद ही लोन की रकम जारी करती थी। साइबर और वित्तीय अपराध पूरे देश में महामारी की तरह फैल रहे हैं. इससे निपटने के लिए बनाई गई टोल फ्री नम्बर और हेल्पलाइन की सुविधा के बावजूद अधिकांश लोगों को ठगी के पैसे वापस नहीं मिलने से लोगों का ऑनलाइन पेमेंट पर भरोसा कमजोर हो रहा है।
4. संसद द्वारा बनाए गए कानूनों के तहत चल रहे बैंक अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। उनके अनेक सामाजिक उत्तरदायित्व हैं, जिनसे बड़े पैमाने पर रोजगार सृजन भी होता है। आरबीआई के डिप्टी गवर्नर टी. रबीशंकर ने पिछले साल आगाह करते हुए कहा था कि डिजिटल पेमेंट के अराजक विस्तार से परम्परागत बैंकिंग व्यवस्था खतरे में पड़ सकती है। यूपीआई के बाद एटीएम, क्रेडिट कार्ड और डेबिट कार्ड के इस्तेमाल में कमी आई है। डिजिटल कम्पनियों को क्रेडिट लाइन के तहत लोन जारी करने की इजाजत मिलने से बैंकों में सन्नाटा और बढ़ सकता है।
5. कारोबार बढ़ाने और रिझाने के लिए शुरुआती दौर में कम्पनियां ग्राहकों को इंसेंटिव और बोनस देती थीं। लेकिन अब बड़े विस्तार के बावजूद ये कंपनियां नियमों और मर्चेंट डिस्काउंट रेट (एमडीआर) जैसे भुगतान के दबाव से बाहर रहना चाहती हैं। बैंक इन कम्पनियों को करोड़ों रुपए की स्विचिंग फीस का भुगतान करते हैं, लेकिन बदले में इन कम्पनियों से उन्हें कोई आमदनी नहीं होती। नेशनल पेमेंट कॉरपोरेशन ऑफ इण्डिया ने इन कम्पनियों का एकाधिकार रोकने के लिए नवम्बर 2020 में 30% की कारोबारी लिमिट (टीपीएपी) का नियम बनाया था, जिसे अभी तक लागू नहीं किया गया।
6. लॉकडाउन के बाद पूरी दुनिया में डिजिटल पेमेंट बढ़ने से बैंक करेंसी का चलन कम हो गया। लेकिन भारत में डिजिटल पेमेंट की क्रांति के बावजूद नगदी की बढोतरी खतरनाक है। डिजिटल के औपनिवेशिक दौर में बचपन में पढ़े गए लेख को नए सिरे से समझने की जरूरत है। उसमें कहा गया था कि ‘विज्ञान एक अच्छा सेवक लेकिन खराब स्वामी है।’ 21वीं सदी में आत्मगौरव से भरपूर इतिहास को लिखने के लिए पुख्ता लगाम से डिजिटल के घोड़े की सवारी करने की जरूरत है। यूपीआई सिस्टम में 381 बैंक शामिल हैं, जिनमें रोजाना औसतन 26 करोड़ ट्रांजेक्शन हो रहे हैं। वहीं क्षमता प्रतिदिन 100 करोड़ ट्रांजेक्शन की है। पर कुछ पहलुओं पर गौर करने की जरूरत है।
Date:14-04-23
बदलते वक्त में प्राकृतिक खेती की जरूरतनृपेंद्र अभिषेक नृप
कृषि में बढ़ते रासायनिक खादों और दवाओं के उपयोग से फसलों और फिर इसका सीधा प्रतिकूल प्रभाव स्वास्थ्य पर पड़ रहा है। प्राकृतिक खेती एक रासायनिक खाद मुक्त यानी पारंपरिक कृषि पद्धति है। इसे कृषि-पारिस्थितिकी आधारित विविध कृषि प्रणाली माना जाता है, जो जैव विविधता के साथ फसलों, पेड़ों और पशुधन को एकीकृत करती है। सरकार ने देश भर में प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए भारतीय प्राकृतिक कृषि पद्धति यानी बीपीकेपी को प्रश्रय देकर राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन की शुरुआत की है, ताकि किसान खेतों में रासायनिक खादों का उपयोग कम कर सकें।
राष्ट्रीय प्राकृतिक खेती मिशन के तहत पंद्रह हजार क्लस्टर यानी समूह विकसित करके साढ़े सात लाख हेक्टेयर क्षेत्र को इसकी परिधि में लाया जाएगा। प्राकृतिक खेती शुरू करने के इच्छुक किसानों को क्लस्टर सदस्य के रूप में पंजीकृत किया जाएगा और इसके साथ ही प्रत्येक क्लस्टर में पचास हेक्टेयर भूमि के साथ पचास या उससे अधिक किसानों को शामिल किया जाएगा। क्लस्टर एक गांव भी हो सकता है और उसमें दो-तीन आसपास के गांवों को भी शामिल किया जा सकता है।
इस मिशन के तहत बुनियादी ढांचे के निर्माण के लिए तीन वर्ष तक प्रति वर्ष पंद्रह हजार रुपए प्रति हेक्टेयर की वित्तीय सहायता मिलेगी। इस वित्त पोषण में इस बात का ध्यान रखा जाएगा कि किसान प्राकृतिक खेती के लिए प्रतिबद्ध हों। अगर कोई किसान प्राकृतिक खेती का उपयोग नहीं करता है, तो उसे बाद की किस्तों का भुगतान नहीं किया जाएगा। इन सबके अलावा, प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए क्रियान्वयन ढांचे, संसाधनों, क्रियान्वयन की प्रगति, किसान पंजीकरण, ब्लाग आदि की जानकारी प्रदान करने वाला एक वेब पोर्टल भी शुरू किया गया है।
देश में गैर-रासायनिक खेती को प्रोत्साहित करने के लिए खरीद पर भले जोर दिया जा रहा हो, पर हकीकत में सारे प्रयास अभी तक आधे-अधूरे हैं। सरकार ने 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य रखा था, लेकिन इसमें अभी तक कोई विशेष सफलता हाथ नहीं लगी है। उत्पादन और मूल्य प्राप्ति में अनिश्चितता की वजह से किसान उच्च लागत वाली कृषि के दुष्चक्र में फंस गया है। लगातार गिरता उत्पादन और फसलों में बढ़ती बीमारियां कृषि क्षेत्र की जटिलताओं को और बढ़ा रही हैं। इस स्थिति से किसानों को बाहर निकालने और उनके दीर्घकालिक कल्याण के लिए प्राकृतिक खेती की तरफ रुख करने से सकारात्मक परिणाम मिल सकते हैं।
दुनिया की बढ़ती जनसंख्या एक गंभीर समस्या है। लोगों को भोजन की आपूर्ति के लिए मानव द्वारा अधिक से अधिक उत्पादन करने के लिए तरह-तरह के रासायनिक खादों, जहरीले कीटनाशकों का उपयोग, प्रकृति के जैविक और अजैविक पदार्थो के बीच आदान-प्रदान के चक्र यानी ‘इकोलाजी सिस्टम’ को प्रभावित करता है, जिससे भूमि की उर्वरा शक्ति खराब हो जाती है, साथ ही वातावरण प्रदूषित होता और मानव स्वास्थ्य में गिरावट आती है।
भारत में ग्रामीण अर्थव्यवस्था का मुख्य आधार कृषि है और यह बड़ी आबादी की आय का मुख्य साधन भी है। हरित क्रांति के समय बढ़ती जनसंख्या और आय के मद्देनजर उत्पादन बढ़ाने पर जोर दिया गया। तब अधिक उत्पादन के लिए खेती में अधिक मात्रा में रासायनिक उर्वरकों और कीटनाशकों के उपयोग पर जोर दिया गया। अब इसकी वजह से सीमांत और छोटे किसानों के पास कम जोत में अत्यधिक लागत आ रही है और जल, भूमि, वायु प्रदूषित हो रहा है, खाद्य पदार्थ भी जहरीले हो रहे हैं। इसलिए इन सभी समस्याओं से निपटने के लिए प्राकृतिक कृषि पर सरकार बल दे रही है।
प्राकृतिक खेती एक अनूठा माडल है, जो कृषि-पारिस्थितिकी पर निर्भर है। इसका उद्देश्य उत्पादन की लागत को कम करना और सतत कृषि को बढ़ावा देना है। प्राकृतिक खेती मिट्टी की सतह पर सूक्ष्म जीवों और केंचुओं द्वारा कार्बनिक पदार्थों के विखंडन को प्रोत्साहित करती और धीरे-धीरे मिट्टी में पोषक तत्त्वों को जोड़ती है। हालांकि, जैविक खेती में जैविक खाद, वर्मी-कंपोस्ट और गाय के गोबर की खाद का उपयोग किया जाता है तथा इन्हें जोते हुए खेत में प्रयोग किया जाता है।
भारत सरकार द्वारा सहायता प्राप्त प्राकृतिक कृषि क्षेत्र अब 4.09 लाख हेक्टेयर तक पहुंच गया है। इस कार्य के लिए आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और केरल सहित आठ राज्यों में 49.81 करोड़ रुपए का आबंटन किया गया है। भारत में वर्तमान में शून्य बजट प्राकृतिक कृषि पर ध्यान दिया जा रहा है। इसके तहत प्राकृतिक खेती के तरीकों का एक समूह तथा एक जमीनी किसान आंदोलन तैयार हो रहा है, जो भारत के विभिन्न राज्यों में फैल रहा है। शून्य बजट प्राकृतिक कृषि एक ऐसी पद्धति है, जो लागत कम करने के साथ ही जलवायु पर निर्भर कृषि तथा किसानों को स्थानीय संसाधनों का उपयोग करने के लिए प्रोत्साहित करती और कृत्रिम उर्वरकों और कीटनाशकों के उपयोग को समाप्त करती है। इस तरह मृदा स्वास्थ्य और मानव स्वास्थ्य को नुकसान से बचाती है।
शून्य बजट प्राकृतिक खेती, एक अनूठा तरीका है, जिसमें बाजार से बीज, उर्वरक और पौधों के संरक्षण, रसायनों जैसे महत्त्वपूर्ण उपादानों की खरीद के लिए कोई मौद्रिक निवेश करने की आवश्यकता नहीं होती है। यह व्यापक, प्राकृतिक और आध्यात्मिक कृषि प्रणाली है। किसान उर्वरकों और कीटनाशकों के बिना फसल की स्थानीय किस्मों को उगा सकते हैं। चूंकि यह शून्य बजट खेती है, इसलिए इसमें किसी संस्थागत ऋण की आवश्यकता नहीं होगी और मानव श्रम पर निर्भरता भी कम से कम हो जाएगी। शून्य बजट प्राकृतिक खेती विभिन्न कृषि सिद्धांतों के माध्यम से मिट्टी की उर्वरता में सुधार लाने की एक कारगर पद्धति है।
प्राकृतिक खेती कई अन्य लाभों, जैसे कि मिट्टी की उर्वरता और पर्यावरणीय स्वास्थ्य की बहाली, और ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन का शमन या उनमें कमी लाते हुए किसानों की आय बढ़ाने का मजबूत आधार प्रदान करती है। यह प्राकृतिक या पारिस्थितिकीय प्रक्रियाओं, जो खेतों में या उसके आसपास मौजूद होती हैं, पर आधारित होती है। किसानों की आमदनी दोगुना करने के साथ ही अनाज का उत्पादन भी वर्तमान की तुलना में दोगुना करने के सरकार द्वारा निर्धारित लक्ष्य खेती की इसी विधि से हासिल किए जा सकते हैं। यही नहीं, शून्य बजट प्राकृतिक खेती के तहत जो फसल उगाई जाती है उसकी पैदावार भी काफी अच्छी होती है।
‘भारत में आर्गेनिक और प्राकृतिक खेती से संपूर्ण लाभ के प्रमाण’ नामक रिपोर्ट प्राकृतिक खेती के दृष्टिकोण और फायदे के बारे में सबूतों के आधार पर बताती है कि गैर-रासायनिक खेती को व्यापक विस्तार दिया जा सकता है। यह रिपोर्ट भविष्य की नीतियों के लिए एक स्पष्ट रास्ता दिखाती है कि सिर्फ पैदावार के बजाय जैविक या प्राकृतिक खेती के विभिन्न फायदों को समग्रता से देखा जाना चाहिए। वैज्ञानिक समुदाय और नीति निर्माता इन तथ्यों पर ध्यान देंगे और गैर-रासायनिक खेती को प्रोत्साहित करेंगे। 2014-19 के बीच 504 बार दर्ज पैदावार के परिणाम बताते हैं कि प्राकृतिक खेती के जरिए उच्चतम पैदावार इकतालीस फीसद, आंशिक रसायन आधारित एकीकृत खेती में पैदावार तैंतीस फीसद और रासायनिक खेती में महज छब्बीस फीसदी पैदावार रही। इन सबके अलावा एक अच्छी बात यह है भी कि इस बार के आम बजट में रासायनिक खेती की जगह प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने की घोषणा की गई है। इसमें राज्यों को भी प्रोत्साहित करने की बात कही है, ताकि वे अपने कृषि विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम को नए सिरे से प्राकृतिक खेती के आधार पर तैयार कर सकें। समय की मांग है कि इस दिशा में और बड़े कदम उठाए जाने चाहिए।
Date:14-04-23
सशक्त राष्ट्र के निर्माताआचार्य पवन त्रिपाठी
20 वीं सदी में भारत के राजनीतिक एवं सामाजिक परिदृश्य को जिन दो महान शख्सियतों ने सबसे ज्यादा प्रभावित किया है, वो हैं महात्मा गांधी और बाबासाहेब डॉ. भीमराव आंबेडकर । यदि कहा जाए कि दोनों पुण्य आत्माओं का महत अवदान मूल्यांकन से परे हैं, तो यह अतिशयोक्ति न होगी। स्वयं गांधी जी कहा करते थे कि डॉ. आंबेडकर की उपलब्धियां ‘दृढ़ हौसले का चमत्कारिक नतीजा’ हैं।
आज आंबेडकर जयंती का अवसर है। बाबासाहेब के जीवन को समग्र रूप से आत्मसात करने का पल है। बाबासाहेब का जीवन एक कालखंड मात्र नहीं था, बल्कि संघर्ष की ऐसी कहानी थी, जिसमें समाज के हर वर्ग के लिए कुछ आदर्श एवं मूल्य निहित हैं। उनके जीवन में समाज के प्रति समर्पण और समाज निर्माण का एक अद्भुत संकल्प स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है। जिन संघर्षो और अवरोधों के बीच बाबासाहेब ने अपने जीवन को जिया उसकी शायद ही कोई दूसरी मिसाल हो । भारतीय समाज व्यवस्था, आर्थिक तंत्र, राजनैतिक प्रक्रियाओं एवं सभ्यता की उपलब्धियों के प्रति बाबासाहेब की समझ अतुलनीय थी।
भारतीय संविधान के निर्माण में उनके अभूतपूर्व योगदान के लिए उन्हें ‘भारतीय संविधान का पितामह’ कहा जाता है। भारतीय संविधान में बहुमूल्य योगदान तथा इस देश को एक नई दिशा देने वाले बाबासाहेब समता, स्वतंत्रता और समरसता के सौंदर्य के स्वाभाविक प्रतीक पुरुष थे। संविधान के प्रति उनकी भावना इस हद तक जुड़ी थी कि वे कहते थे संविधान मात्र वकीलों का दस्तावेज नहीं, बल्कि हमारे जीवन का माध्यम है।’ उन्होंने यह भी कहा था, ‘यदि मुझे लगेगा कि संविधान का दुरुपयोग हो रहा है तो सबसे पहले मैं ही इस संविधान को जलाऊंगा।’ देश की आजादी के बाद, देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती एक ऐसे समावेशी, आदर्श एवं भविष्यवादी संविधान की रचना की थी, जो देश को एक दिशा दे सके और आने वाले कालखंड में भारतीय प्रजातंत्र की जड़ों को मजबूती प्रदान करता रहे। आज हमारे पास एक ऐसा विस्तृत, सशक्त और समावेशी संविधान है, जिसमें समाज के सभी वर्ग, वर्ण, धर्म या संप्रदाय गौरव महसूस करते हैं। पूरा श्रेय बाबासाहेब को ही जाता है। इस संविधान की सबसे खूबसूरत बात यही है कि यह समाज के सभी वर्गों को समानता, एकरूपता एवं एकात्मकता के साथ लेकर चलने की बात करता है। समानता के समर्थक बाबासाहेब ने शिक्षा को लिंगेतर माना और कहा था, ‘शिक्षा का अधिकार जितना पुरुष का है, उतना ही महिलाओं का भी।’ सन 1951 में बाबासाहेब ने ‘भारत के वित्तीय कमीशन’ की स्थापना की। देश में प्रजातंत्र को मजबूती देने के लिए निष्पक्ष चुनाव आयोग की परिकल्पना उन्हीं की थी। उनकी सोच का ही सुखद परिणाम है कि आज भारत दुनिया के सबसे बड़े और सशक्त लोकतंत्र के रूप में सुस्थापित है।
यही दृष्टि यही विजन आज प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की कार्यशैली में भी देखने को नजर आता है। ‘सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास, सबका प्रयास की उनकी सोच शत-प्रतिशत बाबासाहेब के जीवन- अनुभव और आदर्शों से ही प्रेरित है। एक बार प्रधानमंत्री जी ने बाबासाहेब के बारे में कहा था कि ‘अगर बाबासाहेब नहीं होते तो आज मैं भी नहीं होता!’ निश्चित रूप से, बाबासाहेब के विजन का ही परिणाम है कि समाज के अंतिम छोर पर खड़ा व्यक्ति अपनी सामर्थ्य से सर्वोच्च शिखर को हासिल कर सकता है। मोदी जी हमेशा बाबासाहेब के विचारों से प्रभावित और प्रेरित रहे हैं। जब वे 2010 में गुजरात के मुख्यमंत्री थे तो उन्होंने एक भव्य ‘संविधान गौरव यात्रा’ आयोजित की थी। ऐसा करने वाले वे देश के पहले और अकेले राजनेता हैं। केवल यही नहीं, उनकी यह पदयात्रा बाबासाहेब के विचारों और संविधान के प्रति उनकी अटूट आस्था एवं निष्ठा का परिचायक है। समाज और राष्ट्र की प्रगति और उत्थान को लेकर बाबासाहेब के विचार अनुकरणीय हैं। वे हमेशा मानते थे कि अगर किसी समाज की प्रगति को नापना हो तो वहां की महिलाओं के शिक्षा के स्तर को जांच लें। माननीय प्रधानमंत्री जी की ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ की सोच उनकी इसी सोच का विस्तार है, जिसे मोदी जी ने नीतिगत रूप से लागू किया है। स्वच्छ भारत, अंत्योदय योजना, उज्ज्वला योजना, डीबीटी, जनधन खाता, राष्ट्रीय शिक्षा नीति जैसे उनके प्रयास बाबासाहेब की आर्थिक सामाजिक सशक्तीकरण के सपनों को पूरा करने का अनूठा प्रयास है। कश्मीर विषय पर भी बाबासाहेब की सोच और उनके विचार एकदम स्पष्ट थे। संविधान की रचना के समय जब धारा 370 को लेकर चर्चा हो रही थी, एक घटना को जानना बहुत ही जरूरी है। प्रधानमंत्री नेहरू ने शेख अब्दुल्ला को इस विषय पर बाबासाहेब से मिलकर चर्चा करने की सलाह दी थी।
डॉ. आंबेडकर ने शेख अब्दुल्ला से मुलाकात के दौरान कहा, ‘यदि आप चाहते हैं कि भारत आपकी सीमाओं की रक्षा करे, आपकी सड़कें बनवाए, आपको खाना, अनाज पहुंचाए, फिर तो इस राज्य को भी वही स्टेटस मिलना चाहिए, जो देश के दूसरे राज्यों का है। इसके उलट, आप चाहते हैं कि भारत सरकार के पास आपके राज्य में सीमित अधिकार रहें और भारतीय लोगों के पास कश्मीर में कोई अधिकार नहीं रहे, अगर आप इस प्रस्ताव पर मेरी मंजूरी चाहते हैं तो मैं कहूंगा कि ये भारत के हितों के खिलाफ है। भारतीय कानून मंत्री के हिसाब से मैं ऐसा कभी नहीं करूंगा।’ मोदी ने बाबासाहेब के जीवन से जुड़े पांच विशेष स्थलों को ‘पंच तीर्थ’ के रूप में विकसित किया, ताकि आने वाली पीढ़ी को उनके जीवन और आदशों से प्रेरणा मिलती रहे।
डॉ. अविडकर कहा करते थे, ‘हम शुरू से लेकर अंत तक भारतीय हैं और मैं चाहता हूँ कि भारत का प्रत्येक मनुष्य भारतीय बने, अंत तक भारतीय रहे और भारतीय के अलावा कुछ न बने।’ उनके अनुसार, ‘महान प्रयासों को छोड़कर इस दुनिया में कुछ भी बहुमूल्य नहीं है।’ आज मोदी जी ने बाबासाहेब के इन्हीं आदर्शों को ‘राष्ट्र सर्वप्रथम, हमेशा सर्वप्रथम ‘ के सिद्धांत के रूप में आत्मसात कर लिया है। एक बार फिर हम उनके एक अन्य कथन को अपने जीवन का मूलमंत्र बनाएं- ‘जीवन लंबा नहीं, बल्कि बड़ा और महान होना चाहिए।’ बाबासाहेब के जन्मदिन पर उनके प्रति हम सबकी यही सच्ची श्रद्धांजलि होगी।
Date:14-04-23
अभी हम आंबेडकर का बहुत असर देखेंगेबद्री नारायण, ( निदेशक, जीबी पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान )
बाबा साहेब भीमराव आंबेडकर की जो निर्मिति है, वह लोकतंत्र की यात्रा के साथ-साथ विकसित और व्यापक होती जा रही है। आंबेडकर ऐसे समय में आए, जब औपनिवेश का समय था, तब उन्होंने वंचित समाज के मुद्दे उठाए। उस समय उनका जो प्रभाव था, आज उससे कई गुना ज्यादा हो गया है। उन्होंने पूरे समाज को प्रभावित किया और हम देख रहे हैं, लोकतंत्र में उनकी जगह निरंतर बढ़ती चली जा रही है।
आज चाहे कोई राजनीतिक दल हो, कोई भी विचार हो, आंबेडकर सबकी जरूरत बन गए हैं। भारतीय समाज की आज जो राजनीति है, उसके अधिकतर हिस्से को आंबेडकर ने प्रभावित कर रखा है। वह आज भी समाज को संबोधित कर रहे हैं और इसका सिद्धांत भी है और व्यवहार भी। वह समस्या भी बताते हैं और समाधान भी देते हैं, इसलिए आंबेडकर हमारे लोकतंत्र में विचार-व्यवहार में निरंतर साथ खड़े मिलते हैं। उनके निर्माण में नए-नए रंग जुड़ते जा रहे हैं, जैसे एक तरफ आंबेडकर वाम की जरूरत हैं, तो दक्षिणपंथ की भी जरूरत हैं। वह दलित समूह की जरूरत तो हैं ही, व्यापक भारतीय राजनीति की भी जरूरत हैं।
वक्त के साथ उनके साथ नए-नए तत्व जुड़ते जा रहे हैं। उन्होंने दलित समाज, भारतीय समाज और लोकतंत्र के लिए भी खूब चिंतन किया है। आंबेडकर के प्रभाव में दलित व वंचित समुदाय लगातार सतर्क और जागरूक होते जा रहे हैं। आंबेडकर के प्रभाव में इन समुदायों का लोकतांत्रिक मूल्य भी बढ़ता जा रहा है। जाहिर है, जब उसका मूल्य बढ़ रहा है, तो सबकी जरूरत भी बढ़ रही है। इन समुदायों में जागरूकता बढ़ने में शिक्षा की भी बड़ी भूमिका है, आंबेडकर खुद भी शिक्षा को बहुत मूल्यवान मानते थे। राजनीति में भी आंबेडकर के नए-नए स्वरूप बन रहे हैं। दक्षिण भारत में एक अलग तरह का आंबेडकरवादी आंदोलन है, महाराष्ट्र में अलग आंबेडकर हैं, तो उत्तर प्रदेश, बिहार जैसे राज्यों में अलग हैं।
एक पहलू यह भी है कि आंबेडकर ने अपने विचारों से जो चेतना पैदा की, वह अलग से रेखांकित करने योग्य है। ऐसा अक्सर देखा गया है कि जब कोई विचारक चला जाता है, तो वह बहुत प्रासंगिक नहीं रह जाता है। एक समय आता है, जब लोग विचारक को भूल जाते हैं। अगर आंबेडकर को हम देखें, तो वह अपने समय में चुनाव हार गए थे, लेकिन आज आंबेडकर इतने सशक्त हैं कि उनके नाम पर सत्ता परिवर्तन हो सकता है। उनके नाम पर सरकार जा सकती है और बन भी सकती है।
इसके अलावा प्रशासन में भी आंबेडकर का असर पड़ा है। जो समूह चेतस हुए हैं, वह शासन-प्रशासन और विकास में अपनी हिस्सेदारी के लिए लगातार प्रयासरत हैं। यह आज के समय का सच है कि हर जगह वंचिंतों को हिस्सा देना पड़ रहा है। अब सवाल यह है कि जब इतनी हिस्सेदारी मिल रही है, तो दलित या वंचित समूहों में इतनी गरीबी या इतना अभाव क्यों है? इसकी एक ही वजह है कि शिक्षा का प्रसार अभी उतने गहरे तरीके से नहीं हुआ है। वंचित समूह में अभी तक एक छोटा हिस्सा ही शिक्षित व जागरूक हुआ है। जैसे-जैसे उन तक चेतना पहुंचेगी, शिक्षा पहुंचेगी, उनमें विकास की आकांक्षा भी बढ़ेगी। अच्छे जीवन की कामना की चाह पैदा होगी, जब यह चाह पैदा होगी, तब लक्ष्य प्राप्त करने की शक्ति भी आएगी।
ऐसे में, आंबेडकर का अभी तक जो असर हुआ है, वह बहुत थोड़ा ही है। उनका बहुत बड़ा असर होना शेष है, जब ऐसा होगा, तब यह एक बड़ा खजाना होगा, जिससे भारतीय समाज संपन्न और सजग होगा। जब तमाम वंचितों तक रोशनी पहुंचेगी, तब हमारा लोकतंत्र भी बदल जाएगा।
अब प्रश्न उठता है कि जब यह होगा, तो उसके पहले क्या बदलाव होंगे? वास्तव में ऐसे बदलाव होने भी लगे हैं। वामपंथी पार्टियां और भाजपा भी आंबेडकर को याद कर रही हैं, उन्हें जरूरी मान रही हैं। अपनी योजनाओं में आंबेडकर को शामिल करके चल रही हैं। सभी राजनीतिक पार्टियां जब यह काम करने लगेंगी, तब आंबेडकर की चेतना धीरे-धीरे हर जगह फैल जाएगी। उनका नाम-विचार फैलेगा। एक समय आएगा, जब गुणात्मक परिवर्तन होगा और तब बड़े बदलाव आएंगे, वंचित-दलित ज्यादा बड़े पैमाने पर संगठित होंगे।
आजादी की लड़ाई जब चल रही थी, तब एक तरफ गांधी उसका प्रतिनिधित्व कर रहे थे, तो दूसरी तरफ, आंबेडकर भी अलग स्तर पर सक्रिय थे। वह आजादी को व्यापक स्वरूप में देख रहे थे। उनका यह कहना था कि आजादी मिले, तो दलित मुक्ति भी हो, यह नहीं कि आजाद तो हम हो जाएं, लेकिन वंचितों की स्थिति जस की तस रहे। आजादी की लड़ाई में वह भले आगे न दिखे हों, ट्रेन न जलाए हों, नारे न लगाए हों, लेकिन वह आजादी के व्यापक विचार पर काम कर रहे थे। आजादी मिलने के बाद जो भारत बनना था, उस पर चिंतन शुरू कर चुके थे। एक पक्ष यह मानता है कि गांधीजी के संदर्भ में उनका विरोध सही नहीं था, लेकिन वंचित-दलितों का तबका यह मानता है कि उस समय यह विवाद होना जरूरी था। आंबेडकर को लगता था कि गांधीजी दलित मुद्दों को ठीक से संबोधित नहीं कर रहे हैं। आंबेडकर आधुनिकतावादी थे, बाहर से पढ़कर आए थे, गांधी भी बाहर पढ़े थे, लेकिन वह भारतीय पारंपरिक मानस के दायरे में थे। गांधीजी चाहते थे कि आजादी के बाद सब मिलकर काम करें, बाघ और बकरी भी एक घाट पर मिल जाएं, पर तब बकरी का पक्ष रखने वाला भी तो कोई होना चाहिए था और यह काम आंबेडकर ने किया। गांधीजी और आंबेडकर का विरोधाभास होना ही था। यह सकारात्मक था, अगर यह नहीं होता, तो भारतीय आजादी भी पूरी नहीं होती। आज गांधीजी भी जरूरी हैं और आंबेडकर भी।
आज आंबेडकर से बहुत कुछ सीखा जा सकता है, पर उनमें दो गुण ऐसे हैं, जो हर भारतीय में होने चाहिए। समानता के प्रति वह प्रतिबद्ध थे, वह हर चीज को समानता की दृष्टि से देखते थे और हर भारतीय में समानता के प्रति आग्रह आज बहुत जरूरी है। दूसरा गुण यह है कि आंबेडकर पढ़ते बहुत थे, उनमें ज्ञान की आकांक्षा बहुत थी। यह एक ऐसा गुण है, जिसकी कमी को आज भारतीय राजनीति में भी सबसे ज्यादा महसूस किया जा रहा है। एक अच्छे लोकतंत्र के लिए ज्ञान की आकांक्षा हर किसी में होनी ही चाहिए।
Date:14-04-23
सरकार से जुड़ी फर्जी खबरों को रोकने की गंभीर कोशिशपवन दुग्गल, ( साइबर कानून विशेषज्ञ )
ऑनलाइन दुनिया में खुद से जुड़ी भ्रामक और फर्जी सूचनाओं के खिलाफ सरकार सक्रिय हो गई है। सूचना प्रौद्योगिकी नियम-2021 में संशोधन करके एक ऐसी नियामक इकाई के गठन का फैसला किया गया है, जो सरकार से जुड़ी सूचनाओं की सच्चाई बताएगी। यह न सिर्फ ‘फैक्ट चेक’ करेगी, बल्कि ‘फर्जी’ और ‘झूठी’ सूचनाओं के रूप में ऐसी खबरों को चिह्नित भी करेगी। ऐसी खबरों को ऑनलाइन मंचों से हटाना अनिवार्य होगा। ऐसा न करने पर संबंधित व्यक्ति के खिलाफ कानूनी कार्रवाई भी की जा सकेगी।
जाहिर है, ऑनलाइन खबरों और सूचनाओं की विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए यह सब किया जा रहा है। ऐसा करना जरूरी था। खासतौर से, कोरोना-काल के बाद से भारत फर्जी खबरों के एक नए दौर से गुजर रहा है। इसमें भारतीय इंटरनेट उपभोक्ता डिजिटल ऑथर, डिजिटल ट्रांसमीटर और डिजिटल ब्रॉडकास्टर बन गए हैं। यह एक नई क्रांति है, जिसे मैं ‘भारत की महान उल्टी क्रांति’ कहता हूं। इसमें हर कोई बिना सोचे-समझे इंटरनेट पर डाटा की उबकाई कर रहा है। उसे यह तक नहीं पता कि इससे उसकी निजता कितनी प्रभावित हो रही है? इन सबसे घर-घर तक फेक न्यूज का जाल पहुंच गया है। चूंकि इससे निपटने के लिए कोई खास कानून अपने देश में अब तक नहीं बन सका है, इसलिए आईटी नियमों के तहत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म के लिए दिशा-निर्देश जारी किए गए और अब फैक्ट चेक करने वाली नियामक इकाई बनाने की बात कही गई है। सरकार मानती है कि सरकारी एजेंसियों व संस्थानों के संदर्भ में कई तरह की फर्जी खबरें प्रसारित होने लगी हैं, जिनका निवारण जरूरी है। यह इकाई केवल सरकार से जुड़ी सूचनाओं की विश्वसनीयता जांचेगी, बाकी खबरों से इसका कोई सरोकार नहीं होगा। यह एकमात्र ऐसी इकाई होगी, जो बताएगी कि सरकार के बारे में प्रकाशित जानकारी सच है या गलत? उसका फैसला सर्वोपरि होगा।
चूंकि मौजूदा सरकार पारदर्शिता पर ज्यादा भरोसा करती है, इसलिए वह चाहती है कि लोगों तक सत्यापित सूचना पहुंचे। अगर कोई शख्स फैक्ट चेक यूनिट के नतीजों से खुद को पीड़ित महसूस करेगा, तो उसके पास ऊपरी अधिकारियों और विभाग के पास अपनी शिकायत दर्ज करने का मौका होगा। कई लोग इसीलिए भी इसकी आलोचना कर रहे हैं, क्योंकि उनकी नजर में यह अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार का हनन है। वे अन्य देशों का उदाहरण दे रहे हैं। उनका यह भी मानना है कि यह कवायद सरकार द्वारा अपने विरुद्ध प्रसारित होने वाली खबरों को नियंत्रित करने का एक प्रयास है और इससे सरकार विरोधियों को निशाना बनाया जाएगा। ऐसी आशंकाएं खारिज नहीं की जा सकतीं, पर यदि किसी को लगता है कि इससे उसके अधिकारों को चोट पहुंच रही है, तो वह मानवाधिकारों की रक्षा के लिए हाईकोर्ट में संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत और सर्वोच्च न्यायालय में अनुच्छेद 32 के तहत याचिका दायर कर सकता है। हालांकि, हमें यह समझना चाहिए कि मौलिक अधिकार असीमित नहीं है। सरकार इसके प्रयोग पर ‘औचित्यपूर्ण’ प्रतिबंध लगा सकती है।
इस प्रयास को सकारात्मक नजर से देखना होगा। सोशल मीडिया के प्लेटफॉर्म इतने दूषित हो चुके हैं और वहां इस तरह के भ्रामक नैरेटिव गढ़े जा रहे हैं कि सरकार के सामने कहीं-न-कहीं अपना पक्ष रखना जरूरी हो गया है। पूर्व में, ऐसे कई लोग हिरासत में लिए जा चुके हैं, जिन्होंने सच के साथ छेड़छाड़ करके माहौल खराब करने की कोशिश की थी।
इसके अलावा, सरकार के पास इतना अधिकार तो होना ही चाहिए कि वह अपने खिलाफ प्रसारित की जा रही बातों पर सफाई दे सके। हालांकि, सरकार चाहे, तो इस इकाई के कथित दुरुपयोग से जुड़ी चिंताओं का इलाज सिर्फ एक उपाय से कर सकती है। वह इस फैक्ट चेक यूनिट को स्वायत्त बना सकती है। फिलहाल इसकी पूरी रूपरेखा सामने नहीं आई है, पर माना जा रहा है कि मौजूदा नियम-कानूनों के आधार पर ही इसका गठन होगा। लोगों के व्यापक हित को देखते हुए ऐसे प्रयासों का हमें स्वागत करना चाहिए।
The post 14-04-2023 (Important News Clippings) appeared first on AFEIAS.
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Date:13-04-23
Axe Some ActsAs long as central, state laws on preventive detention exist, their abuse is almost inevitableTOI Editorials
Two separate cases in the Supreme Court this week highlighted the abuse of India’s web of preventive detention laws that confer the executive with extraordinary powers. In one case, SC ticked off the UP government for inappropriately invoking the National Security Act in a case with political undertones. In another case (Pramod Singla vs UoI), the bench pointed out that India’s preventive detention laws are a colonial legacy with a potential to be misused.
Preventive detention laws are used in anticipation of a crime. At the central level, they have existed in different forms from 1950, with the draconian NSA introduced over four decades ago. Between 2017 and 2021, annual detentions under NSA ranged between 483 and 741. Keep in mind that SC has said that laws with arbitrary detention powers must be used only in the rarest of rare cases. Also, since it centres on a potential crime, courts must give every benefit of doubt to the detenu. This cardinal principle is not followed often enough. In the case pertaining to the UP government’s detention under NSA, the detenu was forced to approach SC following a delay in Allahabad HC in deciding his plea.
GoI data shows that in 2021, preventive detention cases increased by almost 24% to 1. 1 lakh. States, which have their own preventive detention laws, are among the worst offenders, no matter which party is in power. Last year, Madras HC criticised the state for indiscriminate use of the Goondas Act to trigger preventive detentions. Given the politicisation of the police, inevitably the abuse of preventive detention laws has political undertones. The colonial legacy of preventive detention laws means they are often used in cases catalysed mainly by political differences.
The root of the problem is both the intent and wording of laws which provide a broad reading of circumstances under which constitutional rights can be suppressed. This has been the case since 1950. A recent example is the IT Rules 2021 and its amendments that can open the door to action against views deemed officially “unfavourable”. Given that SC rulings have unambiguously stated that conditions under which a fundamental right can be suppressed have to be narrowly defined, shouldn’t some of the most egregious portions of India’s web of preventive detention laws be read down? As long as they are part of the statute, they are bound to be abused.
Date:13-04-23
Skill over chanceAuthorities must create an environment for healthy online gamesEditorial
Tamil Nadu Governor R.N. Ravi’s assent, on April 7, to the Bill prohibiting online gambling and regulating online games in the State, has brought closure to a controversial issue. Almost all parties, including the AIADMK and the BJP, have backed the legislation, now called the Tamil Nadu Prohibition of Online Gambling and Regulation of Online Games Act. The passage of the Bill has seen ups and downs. About a month ago, the Governor returned the Bill, on the grounds that the State Assembly had “no legislative competence” to enact such a law. In late March, the House re-adopted and sent the Bill back to him. In the meantime, Union Minister of Information and Broadcasting Anurag Thakur had, referring to the presence of “betting and gambling” in the State List (Entry 34), clarified in Parliament that online gambling too came under the jurisdiction of States. The news that the piece of legislation had received the assent of the Governor came out on April 10 — the day the House had adopted a resolution urging the President and the Union government to ensure time-bound gubernatorial assent to Bills passed.
The Governor’s approach to the Bill — of late assent — is in contrast to when he approved an identical ordinance in October last. His meeting with e-gaming industry representatives, even as the Bill was under his consideration, came in for criticism. Adding to the intrigue was the Raj Bhavan’s silence over four months when the Bill was with the Governor. In fact, on the day that the Raj Bhavan returned the Bill to the Assembly (March 8), there was no official word from the Governor’s side in support of his stand. Mr. Ravi could have deflected criticism had he made his stand open, as he had done to a Bill that he had returned in February 2022, seeking exemption for students of the State from the National Eligibility-cum-Entrance Test (NEET) for medicine (this Bill is awaiting presidential assent). Further, with the Centre having notified the IT (Intermediary Guidelines and Digital Media Ethics Code) Rules, there should be no confusion as far as enforcing the law is concerned — which has to be done in conjunction with the IT Act, 2000. Addiction to online gaming has resulted in financial distress in many a family and also caused serious health issues. Even while seeking to implement the law banning online gambling and online games of chance (rummy and poker), the proposed Tamil Nadu Online Gaming Authority should ensure a balance: no restrictions on online games permitted under the Act as well as monitoring of online game providers. In an ever-evolving digital world, it would be in the interests of all to create an environment for healthy online games.
Date:13-04-23
संवैधानिक संस्थाओं की गरिमा बरकरार रहेसंपादकीय
तमिलनाडु विधानसभा ने एक प्रस्ताव पारित कर केंद्र सरकार से कहा है कि वह कानून बनाकर राज्यपालों को बाध्य करे कि वे राज्य विधायिकाओं से पारित किसी भी विधेयक को अनुमति देने के संबंध कोर्ट की एक तीन सदस्यीय बेंच ने सरकारी वकील से पूछा कि किस अधिकार से दिल्ली के उप राज्यपाल (एलजी) ने बगैर राज्य मंत्रिमंडल की सहायता और सलाह के एमसीडी में दस सदस्यों को नामित कर दिया। दिल्ली सरकार का आरोप था कि इन कृत्यों से अति उत्साहित हो अधिकारी सीधे एलजी को भेजने लगे हैं। अभी दो दिन पहले एलजी ने सीएम पर तंज कसते हुए कहा कि कुछ लोग आईआईटी से पढ़ने के बाद भी अशिक्षित रह जाते हैं। दरअसल सीएम खड़गपुर आईआईटी से पड़े हैं। उधर उपराष्ट्रपति ने एक बार फिर सलाह दी है कि राजनीतिक लोग विदेश की भूमि पर भारत की आलोचना न करें। यह टिप्पणी कांग्रेस नेता राहुल गांधी के इंग्लैंड में दिए गए बयान से उपजे विवाद के बाद आई है भारत में राज्यवल और स्पीकर की संस्था लगतार विवाद के घेरे में रही हैं। लगभग उन सभी राज्यों में जहां गैर-भाजपा दलों का शासन है राज्यपाल और चुनी हुई सरकार के बीच हर दिन एक अजीब द्वंद्व देखने को मिल रहा है।
Date:13-04-23
भारत का अपने अतीत से टकराव आज भी जारी हैमिन्हाज मर्चेंट लेखक, ( प्रकाशक और सम्पादक )
क्या इतिहास की पुस्तकों में रद्दोबदल किया जाना चाहिए? क्या शहरों के नाम बदले जाने चाहिए? इन सवालों का जवाब इस पर निर्भर करता है कि क्या इतिहास की मूल पुस्तकों में ही तथ्यों को तोड़-मरोड़कर नहीं पेश किया गया था और क्या कुछ शहरों के नाम जनसंहार व लूट का महिमामंडन करने वाले नहीं प्रतीत होते हैं? एनसीईआरटी एक स्वायत्त संस्था है, जो शिक्षा मंत्रालय के तहत काम करती है। इन दिनों इस बात के लिए उसकी आलोचना की जा रही है कि उसने 12वीं कक्षा के विद्यार्थियों की पाठ्यपुस्तकों से मुगल दरबार सम्बंधी अध्यायों को हटा दिया। पूर्व शिक्षा मंत्री कपिल सिब्बल इससे बहुत गुस्साए। उन्होंने कहा कि भारत के इतिहास से मुगलों के ‘योगदान’ को काटा-छांटा जा रहा है। इसके प्रत्युत्तर में एनसीईआरटी के निदेशक दिनेश प्रसाद सकलानी ने कहा कि यह झूठ है। मुगलों से सम्बंधित कोई चैप्टर्स हटाए नहीं गए हैं। पाठ्यपुस्तकों को नई शिक्षा नीति के अनुसार 2024 में फिर से छापा जाना है।
देश में जनमत पहले ही बहुत विभाजित था, इस विवाद से वह और ध्रुवीकृत हुआ है। अलबत्ता शहरों के नाम बदलना हमारे यहां कोई नई बात नहीं है। चार मेट्रो शहरों में से तीन के पुराने नाम बदले गए हैं- मुम्बई, चेन्नई और कोलकाता। ऐसा उनके स्थानीय नामों को महत्व देने के लिए किया गया। हाल में महाराष्ट्र के उस्मानाबाद का नाम बदलकर धराशिव और औरंगाबाद का नाम बदलकर छत्रपति सम्भाजीनगर किया गया। इन दोनों नामकरणों को बॉम्बे हाईकोर्ट में चुनौती दी गई है और आगामी 20 और 21 अप्रैल को इन पर सुनवाई होगी। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि नामकरण का विचार उद्धव ठाकरे सरकार का था और इसे एकनाथ शिंदे की सरकार द्वारा अमल में लाया गया। ऐसा हिंदुओं व मुसलमानों के बीच साम्प्रदायिक तनाव पैदा कर उसका राजनीतिक फायदा उठाने के लिए किया गया है। इसके जवाब में शिंदे-फडणवीस सरकार ने बॉम्बे हाईकोर्ट में शपथ-पत्र दायर करते हुए कहा है कि अधिकतर नागरिकों ने बदलाव का स्वागत किया है। स्थानीय प्रशासन के द्वारा कराए एक सर्वेक्षण से पता चला कि 4 लाख लोगों ने नए नामकरण का स्वागत किया है, जबकि 2.7 लाख इसके विरोध में थे।
बीते वर्षों में अनेक छोटे शहरों के नाम बदले गए हैं, जिन पर इतना विवाद नहीं हुआ। इनमें इलाहाबाद (अब प्रयागराज), होशंगाबाद (अब नर्मदापुरम), खिजराबाद (अब प्रतापनगर) और मियां का बाड़ा (अब महेशनगर हॉल्ट) शामिल हैं।मुगलसराय और हबीबगंज रेलवे स्टेशनों और दिल्ली के मुगल गार्डन के नाम भी बदले गए हैं। लेकिन भविष्य में यह इतना आसान नहीं होगा। जस्टिस जोसेफ और नागरत्न की एक सुप्रीम कोर्ट बेंच ने प्राचीन भारतीय ग्रंथों के आधार पर शहरों के नाम बदलने की एक याचिका को खारिज कर दिया है। जस्टिस जोसेफ ने कहा कि हिंदू धर्म की आध्यात्मिक परम्परा महान है और कोई भी वेद, उपनिषदों, गीता की ऊंचाइयों को छू नहीं सकता। हम उसे छोटा न बनाएं और अपनी महानता को जानकर भी उदार बने रहें। संसार अतीत में भारत की ओर सम्मान से देखता था और आज भी देखता है। मैं ईसाई होने के बावजूद हिंदू धर्म का बड़ा प्रशंसक हूं।
इस पूरे विवाद से एक परिप्रेक्ष्य उभरकर सामने आता है। वो यह है कि भारतीय सेकुलरिज्म के वास्तविक अर्थों को वोट बैंक की राजनीति वाले अल्पसंख्यकवाद की संतुष्टि के लिए दशकों तक ताक पर रखा जाता रहा है। अब बहुसंख्यक समुदाय के द्वारा इसके विरोध में प्रतिक्रिया की जा रही है, जिससे ध्रुवीकरण की स्थिति निर्मित हुई है। इससे जो साम्प्रदायिक विघटन की स्थिति बनी है, उससे दोनों विचारधाराओं के नेताओं को लाभ मिलता है। भारत दुनिया का इकलौता ऐसा देश होगा, जो सदियों तक अपने को गुलाम बनाकर लूटने वालों और अपने लोगों का कत्ल करने वालों का महिमामंडन करता है। क्या भारत के राष्ट्रीय-चरित्र में ही कोई गड़बड़ है, जिससे वह ऐसी आत्महीनता का प्रदर्शन करता है? इतिहास विजेताओं द्वारा लिखा जाता है। लेकिन भारत में इतिहास-लेखन उन लोगों के द्वारा किया जाता रहा है, जो किन्हीं शासकों के विजय-अभियानों के नैरेटिव को सदियों बाद भी प्रश्रय देते हैं। यह एक बौद्धिक दोष है, क्योंकि हमारे इतिहासकार और शिक्षाविद् एक ऐसे सच्चे कथानक का निर्माण करने में नाकाम रहे हैं, जो हमें अपने विभाजित अतीत का एक सही-सही चित्र हमें दिखलाता हो। सेकुलरिज्म का वोट बैंक की राजनीति के लिए दशकों तक दुरुपयोग किया जाता रहा है। अब बहुसंख्यक समुदाय द्वारा इसके विरोध में प्रतिक्रिया की जा रही है, जिससे ध्रुवीकरण की स्थिति बनी है।
Date:13-04-23
एआई से रोजगार को कितना खतराअजय मोहंती, ( लेखक इंटरनेट उद्यमी हैं )
आइए देखते हैं कि दुनिया भर में विभिन्न प्रकार के मीडिया में आई कुछ सुर्खियों का: ‘चैट जीपीटी: 10 ऐसे रोजगार जो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी कृत्रिम मेधा द्वारा छीने जाने के सर्वाधिक जोखिम में हैं’, ‘चैटजीपीटी के कारण किन नौकरियों पर है खतरा?’, ‘इन नौकरियों को चलन से बाहर कर सकता है चैटजीपीटी।’ ऐसी सुर्खियों के बाद विस्तार से बताया जाता है कि किस प्रकार की नौकरियों को खतरा है, कौन से पद जोखिम में होंगे और किन उद्योगों पर अधिक खतरा मंडरा रहा है वगैरह…वगैरह।
मुझे स्वीकार करना होगा कि इन खबरों को पढ़कर मुझे ऐसा महसूस होता है मानो मैं सन 1840 के दशक के मैनचेस्टर में पहुंच गया हूं जब कपड़ा बुनने वाली मशीनें सामने आई थीं। मैं अनिच्छापूर्वक सुनता हूं कि शायद मुझे इस तरह के शब्द सुनने को मिलें, ‘प्रकृति के बाद श्रम ही हर प्रकार की संपदा का बुनियादी स्रोत है, प्रकृति ऐसे पदार्थ मुहैया कराती है जिन्हें श्रम संपत्ति में बदलता है। हकीकत में यह हर प्रकार के मानव अस्तित्व का बुनियादी आधार है।’ प्रिय पाठको आपको पता ही होगा कि ये शब्द फ्रेडरिक एंगेल्स के हैं। अपने समय के महान दार्शनिकों में शामिल रहे एंगेल्स एक अमीर जर्मन परिवार से आते थे। उनके पिता ने उनहें परिवार की बुनाई मिलों में से एक चलाने के लिए मैनचेस्टर भेजा था। उन्होंने बहुत जल्दी यह काम छोड़ दिया और कार्ल मार्क्स के साथ मिलकर मार्क्सवादी दृष्टिकोण पर काम करना शुरू कर दिया। आइए देखते हैं कि किस प्रकार के और कितने रोजगारों के जाने के बारे में बात की जा रही है?
गोल्डमैन सैक्स के मुताबिक अमेरिका और यूरोप में मौजूदा रोजगार में करीब दो तिहाई किसी न किसी हद तक आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के कारण आने वाले स्वचपालन की जद में हैं। कुल काम का करीब एक तिहाई पूरी तरह आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के जरिये किया जा सकता है। बिज़नेस इनसाइडर की वेबसाइट मैकिंजी इंस्टीट्यूट के हवाले से कहती है कि सॉफ्टवेयर डेवलपर, वेब डेपलपर, कंप्यूटर प्रोग्रामर, कोडर और डेटा साइंटिस्ट जैसे तकनीक आधारित कामों के सबसे अधिक प्रभावित होने की आशंका है। उसके बाद पत्रकारिता, विज्ञापन जगत की कॉपी राइटिंग और विधिक सलाहकार जैसे कामों का नंबर आएगा।
जब हम नाराजगी से भरे पूर्वानुमान जताने वालों को देखते हैं तो एक बात साफ नजर आती है और वह यह कि वे सभी इस बात पर सहमत हैं कि चैटजीपीटी तथा उस जैसे अन्य इंसानी टेक्स्ट तैयार करने में सक्षम सॉफ्टवेयरों की मजबूती लोगों को चिंतित कर रही है। दूसरे शब्दों में प्रबंधन सलाहकारों से लेकर निवेश बैंकों तक पूंजीवादी मान्यताओं वाले तमाम पर्यवेक्षक वही कह रहे हैं जो फ्रेडरिक एंगेल्स और उनके मित्र कार्ल मार्क्स ने 1840 के मध्य में कहा था।
मैं जिस स्वप्न में था वहां उपरोक्त बातें फ्रेडरिक एंगेल्स कह रहे थे। मैंने सपने में देखा कि मैं फुसफुसाकर उनसे कह रहा हूं, ‘लेकिन श्रीमान एंगेल्स, आपके प्रति पूरे सम्मान के साथ मैं कहना चाहता हूं कि क्या आपको यह नहीं नजर आता है कि कपड़ा इतना सस्ता बुना जा रहा है कि भारत के गरीब से गरीब किसान भी कॉटन की धोती और कुर्ता पहन सकते हैं और अब वे अर्द्ध नग्न अवस्था में नहीं दिखते जैसा कि पीढि़यों से नजर आता रहा है।’ सपने में वह कह सकते थे, ‘लेकिन श्रीमान बालकृष्णन, मेरे लिए सबसे अधिक मायने यह रखता है कि हाथों से कताई-बुनाई करने वाले बेरोजगार होते जा रहे हैं…यह बात ज्यादा मायने रखती है बजाय इस बात के कि भारतीय किसान अब बेहतर कपास के कपड़े पहन पा रहे हैं।’
चूंकि मुझे ऐसी तकनीक के सामने आने की प्रतीक्षा करनी होगी जो मुझे सन 1840 के मैनचेस्टर के समय में ले जाए इसलिए मुझे कम से कम चैटजीपीटी को लेकर अपनी बात कह लेने दीजिए जो आज हमारे चिंतकों के बीच चिंता का विषय बना हुआ है। इसके लिए मैं अतीत के कुछ उदाहरणों का इस्तेमाल करूंगा।
सबसे पहले बात करते हैं स्टेनोग्राफी की। सन 1970 के दशक के बॉम्बे में जब मैंने पहली बार काम करना शुरू किया था तब प्रमुख सेवा उद्योगों यानी विज्ञापन एजेंसियों, प्रकाशन कंपनियों और बैंकों के कुल कर्मचारियों में से एक चौथाई स्टेनोग्राफर होते थे। उसके बाद ही पर्सनल कंप्यूटर, माइक्रोसॉफ्ट वर्ड और उसके समान अन्य उपाय सामने आए। छह वर्ष से भी कम अवधि के भीतर स्टेनोग्राफर की भूमिका सिमट गई। पर्सनल कंप्यूटर और वर्ड प्रोसेसिंग करने वाले सॉफ्टवेयर न केवल आधिकारिक पत्र लिखने में मददगार साबित हुए बल्कि वे विज्ञापन की कॉपी, आलेख तथा अन्य दस्तावेज तैयार करने में भी सहायता करने लगे। इस प्रकार हमने स्टेनोग्राफर्स को विदाई दी।
अगली बारी लेखाकारों और बुककीपर्स की थी। सन 1970 के दशक के आखिर में बैंकों और कारोबारों में इनकी तादाद कुल कामगारों का करीब दसवां हिस्सा होती थी। उसके बाद अंकेक्षण सॉफ्टवेयर आ गए जिन्होंने ऐसे आधे से अधिक लोगों के रोजगार समाप्त कर दिए। सन 1980 में करीब 10 लाख बैंक कर्मी यह कहते हुए विरोध में हड़ताल पर चले गए कि कंप्यूटर एक पूंजीवादी उपकरण है जो लोगों की नौकरियां छीनेगा।
परंतु उपरोक्त तमाम बातों के विपरीत ध्यान दीजिए कि कैसे हमारा सबसे प्रिय साथी यानी मोबाइल फोन, इंसानी व्यवस्था के बीच अपनी जगह बनाने में कामयाब रहा है। इसने हम में से हर किसी को छायाकार बना दिया है। इसके अलावा इसकी बदौलत सभी वित्तीय सेवाओं का लाभ लेने लगे हैं। इस बीच बैंक शाखाओं और उनमें नजर आने वाले प्रबंधक और लिपिकों की पहुंच सीमित होती जा रही है। अब किसी को रिकॉर्ड और कैसेट प्लेयर तथा टेलीविजन की भी जरूरत नहीं महसूस होती है। हम ये सारा काम अपने छोटे से मोबाइल फोन पर कर लेते हैं और चुटकियों में अपनी पसंद की चीज देख लेते हैं। इस बीच मैंने कभी नहीं देखा कि किसी ने छायाकारों, बैंकरों या मोबाइल फोन के आगमन से प्रभावित किसी अन्य क्षेत्र के लिए लेख लिखे हों और चिंता या शोक जताया हो।
क्या यह संभव है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस , चैट जीपीटी आदि हमारे वैसा ही कुछ करें जैसा कि मोबाइल फोन ने किया? यानी हम सभी को शब्दों को रचनात्मक ढंग से बरतने वाला बनाने का काम? क्या वह दुनिया को एक ऐसा स्थान बनाने का उपाय साबित हो सकता है जहां शब्दों के साथ रचनात्मक होना उसी तरह आसान होगा जिस तरह मोबाइल फोन ने तस्वीरों और संगीत आदि के साथ किया है?
Date:13-04-23
खतरे में ताइवानसंपादकीय
चीन के विस्तारवादी हौसले बढ़ते ही जा रहे हैं और लगता है उसकी इस हसरत का स्वशासित ताइवान ताजा शिकार होने जा रहा है। अपने छोटे पड़ोसी देश के चारों ओर तीन दिवसीय व्यापक युद्धाभ्यास के बाद चीनी सेना ने घोषणा कर दी है कि वह लड़ाई के लिए पूरी तरह तैयार है। चीन का आक्रामक बयान अमेरिकी प्रतिनिधि सभा के अध्यक्ष केविन मैक्कार्थी और ताइवान की राष्ट्रपति साई इंग-वेन की मुलाकात के तुरंत बाद आया है। चीन की सेना ने पहले ही कह दिया था कि उसका ‘जॉइंट स्वॉर्ड’ युद्धाभ्यास लड़ाई की तैयारी के लिए की रही गश्त है और ताइवान को चेतावनी है। चीन का कहना है कि हमारे सैनिक लड़ने के लिए तैयार हैं और किसी भी समय ताइवान की स्वतंत्रता के किसी भी रूप को पूरी तरह से नष्ट करने और विदेशी हस्तक्षेप के प्रयास को रोकने के लिए दृढतापूर्वक संकल्पित हैं। ताजा ‘जॉइंट स्वॉर्ड’ युद्धाभ्यास पिछले अगस्त में चीन द्वारा किए गए उन अभ्यासों के ही समान था, जब अमेरिका की प्रतिनिधि सभा की तत्कालीन अध्यक्ष नैन्सी पेलोसी की ताइवान यात्रा के खिलाफ उसने ताइवान के आसपास समुद्र में लक्ष्यों पर मिसाइल हमले शुरू किए थे। हालांकि हमले छोटे थे। चीन की यह कार्रवाई ऐसे समय की गई जब उसके आक्रामक रवैये के बावजूद अमेरिकी प्रतिनिधि सभा के अध्यक्ष केविन मैक्कार्थी ने अमेरिका के कैलिफोर्निया में ताइवान की राष्ट्रपति साई इंग-वेन की मेजबानी की। लगता है अमेरिका भी ताइवान को बढ़ावा देकर चीन को उकसाने का काम कर रहा है। अमेरिका की राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के प्रवक्ता जॉन किर्बी ने बाइडन प्रशासन के इस रुख को फिर दोहराया है कि राष्ट्रपति साई का अमेरिका आना किसी नियम का उल्लंघन नहीं है। इसका सैन्य कार्रवाई के जरिए जवाब देने का कोई मतलब नहीं बनता। चीन ने साई की अमेरिकी यात्रा से जुड़े लोगों के खिलाफ यात्रा तथा वित्तीय प्रतिबंध लगाए हैं और सैन्य गतिविधियों में वृद्धि कर दी है। प्रतीत होता है कि चीन सैन्याभ्यास करने के लिए अमेरिका और ताइवान में मेलजोल बढ़ने को युद्ध का बहाना बनाना चाहता है। चीन ताइवान को अपने क्षेत्र का हिस्सा बताता है, जबकि ताइवान का कहना है कि यह स्वशासित द्वीप संप्रभु राष्ट्र है और चीन का हिस्सा नहीं है। फिलहाल, ताइवान जलडमरूमध्य में तनाव चरम पर है।
Date:13-04-23
आस्था को उग्रता की क्या जरूरतआनंद कुमार, ( समाजशास्त्री )
हमारे सामाजिक जीवन में शक्ति-प्रदर्शन का स्थायी महत्व है। सभी लोग ताकतवर या रसूखदार से ही संबंध बनाए रखने में अपनी भलाई समझते हैं। आमजन में यह भरोसा काफी कम है कि शक्तिहीन के साथ न्याय होगा। यही वजह है कि हम अपनी सामाजिक जिंदगी में निजी और सामूहिक स्तर पर शक्ति-प्रदर्शन के अवसरों की तलाश में रहते हैं। इसे तो अब अपने तीज-त्योहार और आस्था में कर्मकांड के रूप में शामिल कर लिया गया है। यही वजह है कि हर तीन-चार महीने के बाद कोई न कोई ऐसा पारंपरिक पर्व या अवसर आता है, जिसमें समाज के अंदर के उप-समूह अपनी-अपनी दावेदारी पेश करते रहते हैं।
हमारे यहां धार्मिक जुलूसों और आयोजनों का एक सामाजिक संदर्भ भी है। हम इसे अपनी आस्था का प्रदर्शन तो बताते ही हैं, इसमें हम अपनी ताकत का प्रदर्शन भी करते हैं। इसी कारण, जब कोई त्योहार सामने आता है, तो धर्म को मानने वालों से ज्यादा कानून और व्यवस्था चलाने वालों की नींद उड़ जाती है।
हाल के दिनों में हमने यह भी देखा है कि बगैर किसी उत्तेजना या स्पष्ट कारण के सांप्रदायिक व सामुदायिक अस्मिता का उग्र प्रदर्शन किया जा रहा है। आखिर ऐसी उग्रता की जरूरत क्यों है? जबकि, इंसान शांतिपूर्ण जीव है और सामुदायिक जीवन में शांति व युद्ध की स्थिति में शांति का पलड़ा ही भारी रहता है। मगर शांति के दो आधार होते हैं- पहला, शांति तब संभव है, जब हम एक-दूसरे के साथ न्यायपूर्ण व्यवहार करें, और दूसरा, जब समाज में प्रतिरोध या दावेदारी नहीं हो, यानी सबकी मौन स्वीकृति हो। देखा यही गया है कि असंतुलन की स्थिति में उग्रता की जरूरत पड़ती है, इसीलिए समाजशा्त्रिरयों का सुझाव होता है कि अगर समाज में अकारण हिंसा, उग्रता या उद्दंडता की प्रवृत्ति दिख रही है, तो इसका मतलब है कि समाज को संचालित करने वाले संस्थान या नियमों में सुधार की जरूरत है। यह महज इंसानों के अंदर के पशु के प्रबल होने का संकेत नहीं है, बल्कि यह बताता है कि हमारा समाज कमजोर पड़ता जा रहा है। इसीलिए संकेतों में यह सुझाव दिया जाता रहा है कि जिस समाज में द्वंद्व और तनाव को सुलझाने के शांतिपूर्ण रास्ते बंद हो गए, उस समाज को जाग जाना चाहिए, क्योंकि वह अराजकता की ओर बढ़ रहा है, और कोई भी समाज अराजक जिंदगी को बहुत दिनों तक बर्दाश्त नहीं कर सकता।
धार्मिक और सांस्कृतिक आदर्शों से जुड़े प्रतीक, त्योहार और परंपरा में उग्रता कितनी घातक हो सकती है, इसका एहसास हमें खूब है। हमने इस्लाम को आतंकवाद से जुड़ते देखा है, तो खालिस्तान आंदोलन के समय सिख धर्म का रिश्ता अलगाववादियों से बताने का शर्मनाक परिणाम पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी की हत्या के बाद देश भर में सिख-हिंसा के रूप में भुगता है। आजकल हिंदू धर्म के मानने वालों में अप्रत्याशित उग्रता का माहौल है। रामनवमी जैसे सौजन्यतापूर्ण आयोजन भी आक्रामक जुलूस में बदलने लगे हैं, जिसका एकमात्र मकसद अन्य धर्मावलंबियों, खासतौर से मुसलमानों को अपनी ताकत दिखाना होता है। यह बेहद चिंता की बात है। इससे बाकी धर्म के लोग भी शिष्टता के बजाय अशिष्ट आचरण का सहारा लेने लगेंगे।
भारतीय समाज की यह दशा बहुत चिंतनीय है। ऐसी परिस्थिति अंग्रेज राज के समापन के समय भी पैदा हुई थी, जिसकी कीमत हमने हिन्दुस्तान के बंटवारे के रूप में चुकाया है। अगर हमारा धर्म नीति, नैतिकता और न्याय का वाहक नहीं रह जाएगा, तो धर्म व अधर्म के बीच का फर्क खत्म हो जाएगा। फिर प्रह्लाद और उसके राक्षस पिता हिरण्यकश्यप के बीच भला क्या अंतर रह जाएगा? द्रौपदी, दुयार्धन और युधिष्ठिर के बीच जो बुनियादी फासला है, उस पर भला कैसे भरोसा करेंगे? राम और रावण के बीच में सीता आखिर राम की क्यों प्रतीक्षा करेगी?
सवाल महज धर्मों के बीच का नहीं है। धर्म के अंदर भी कमजोर और मजबूत के रूप में भेद कायम है। भारतीय संस्कृति में पिछली कुछ शताब्दियों में दबंग जातियों का प्रभुत्व बढ़ा है। इसमें लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं, विशेषकर चुनावी पद्धति ने आग में घी डालने का काम किया है। इसका परिणाम यह निकला है कि जातिगत हिंसा हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का अनिवार्य दोष बन गई है। हम अन्य जातियों की छोटी-छोटी घटनाओं या बातों पर भी हिंसा का प्रदर्शन करने लगे हैं। दूसरी जातियों की खुशियों से हमें जलन क्यों होनी चाहिए? दिक्कत यह है कि सिर्फ हिंसा नहीं होती, उसका जमकर राजनीतिकरण भी किया जाता है, जो निंदनीय है। वंचित भारत पर प्रभु वर्ग के व्यवहार पर सत्ता-प्रतिष्ठान अमूमन खामोश रह जाता है, ताकि चुनाव पर उसके असर को परख सके। हमें लैंगिक हिंसा को भी इसी श्रेणी में रखना चाहिए। औरत होने की सजा हमारे समाज का सबसे शर्मनाक पक्ष है, जिस पर चिंतन आवश्यक है। इसमें सिर्फ पुलिस पर भरोसा करने से काम नहीं चलेगा। हमें समाज के जरूरी संस्थानों को भी निगरानी के दायरे में लाना होगा। समाज का प्रभुत्वशाली वर्ग वंचित भारत (स्त्री, दलित, आदिवासी, पिछड़े आदि) के साथ न्यायसंगत, यानी शिष्टाचार या नीतिगत सम्मान का आचरण नहीं कर पाया है, जो हमारे स्वराज्य का अंधकार पक्ष है। जब तक यह स्थिति बनी रहेगी, हमारा लोकतंत्र दोषपूर्ण माना जाएगा।
हमें मौजूदा समय की हिंसा, उग्रता या उद्दंडता की घटना को तात्कालिक नहीं, बल्कि दीर्घकालिक पणिाम की नजरों से देखना चाहिए। अनीति और उग्रता का आधार यदि धर्म बन रहा है, तो सिर्फ उस धर्म में नहीं, उसके अनुयायियों में भी गड़बड़ी है। अक्सर घबराया और डरा हुआ जीव ही हमला करता है। ऐसे में, यदि हम भय के कारण उग्र हो रहे हैं और स्वार्थवश दूसरों के साथ अन्यायपूर्ण व्यवहार कर रहे हैं, तो हम अपने पांव पर खुद कुल्हाड़ी मार रहे हैं। दिखावे की प्रवृत्ति और धार्मिक व संख्या बल का प्रदर्शन कमजोर पड़ते समाज की निशानी है। और, समाज को मजबूती तब तक नहीं मिल सकती, जब तक सद्भाव बढ़ाया नहीं जाएगा। यह भारत में संभव है, क्योंकि शांति का हमारा एक लंबा इतिहास रहा है और अमन-चैन हमारे समाज की आधारशिला है। जब तक यह नहीं होगा, तब तक देश के निर्माण की बात भूल ही जाइए!
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प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना या पीएमजेएवास के माध्यम से केंद्र सरकार देश में दुनिया की सबसे बड़ी स्वास्थ्य बीमा योजना चला रही है। इसमें लगभग 10.8 करोड़ परिवार शामिल हैं। इसका अनुसरण करते हुए कई राज्यों ने अपनी स्वास्थ्य बीमा योजनाएं चलाई हैं। इनमें राजस्थान सरकार की बीमा योजना का स्वरूप बहुत व्यापक है। इससे संबंधित कुछ बिंदु –
राजस्थान के डॉक्टर इस विधेयक से खुश नहीं है। लेकिन उनके पास इसका विरोध करने का कोई पुख्ता आधार भी नहीं है। राज्य स्वास्थ्य प्राधिकरण में इंडियन मेडिकल एसोसिएशन को प्रतिनिधित्व दिया गया है। यह शिकायत निवारण निकाय के रूप में कार्य करेगा। इस कानून को प्रभावशाली सही मायने में तब माना जाएगा, जब राज्य सरकार समय पर प्रतिपूर्ति कर सकेगी। राज्य सरकार का प्रयास निसंदेह सराहनीय है, क्योंकि स्वास्थ्य पर होने वाला खर्च आर्थिक रूप से एक बड़ा झटका देता है। इस कानून से इस व्यय में संतुलन की उम्मीद की जा सकती है।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 23 मार्च, 2023
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Date:12-04-23
Build The AnswerLadakh or Arunachal, India’s counter to China’s border tactics must be via capability enhancementTOI Editorials
India-China border tensions appear to be moving east as New Delhi and Beijing trade verbal salvos over Arunachal Pradesh. Amit Shah’s visit to the northeastern state not only saw him launch GoI’s Vibrant Villages Programme but also reiterate the point about defending every inch of Indian territory. Unsurprisingly, Beijing protested by asserting its so-called claims over ‘south Tibet’.
The larger geopolitical context is this: while Indian and Chinese troops continue to be engaged in their border standoff in eastern Ladakh, Beijing wants New Delhi to normalise relations and compartmentalise the border dispute. The truth is Beijing has no interest in resolving the border row since it enjoys considerable natural military advantages along the LAC. The latter have been further reinforced since the 2020 Galwan clashes through fresh construction of roads, bridges and helipads on the Chinese side. And as China prepares for an intensification of the strategic competition with the US and the Quad, it wants to hold the border dispute as leverage over India. Thus, India has no choice but to rapidly reduce the border infra gap to prevent further Chinese salami chopping. Beijing understands strength. It’s true that GoI has quickened the pace of infra development. But more needs to be done. The VVP scheme is a wellintentioned attempt at preventing out-migration from remote border villages to make them natural defences. But its success will depend on speed and quality of implementation.
Bear in mind that as the birthplace of the sixth Dalai Lama, Arunachal assumes salience for China’s Tibet question. India must start preparing for future tussles over the declaration of the next Dalai Lama. Countering China will require a multidimensional approach.
Date:12-04-23
Building safeguardsMisuse of detention power renders need to stick to procedure paramountEditorial
The Supreme Court’s observation that preventive detention laws are a colonial legacy and confer arbitrary powers on the state is one more iteration of the perennial threat to personal liberty that such laws pose. For several decades now, the apex court and High Courts have been denouncing the executive’s well-documented failure to adhere to procedural safeguards while dealing with the rights of detainees. While detention orders are routinely set aside on technical grounds, the real relief that detainees gain is quite insubstantial. Often, the quashing of detention orders comes several months after they are detained, and in some cases, including the latest one in which the Court has made its remarks, after the expiry of the full detention period. Yet, it is some consolation to note that the Court continues to be concerned over the misuse of preventive detention. In preventive detention cases, courts essentially examine whether procedural safeguards have been adhered to, and rarely scrutinise whether the person concerned needs to be detained to prevent prejudice to the maintenance of public order. Therefore, it is salutary that the Court has again highlighted that “every procedural rigidity, must be followed in entirety by the Government in cases of preventive detention, and every lapse in procedure must give rise to a benefit to the case of the detenu”.
Some facts concerning preventive detention are quite stark: most detentions are ultimately set aside, and the most common reason is that there is an unexplained delay in the disposal of representations that the detainees submit against their detention to the authorities. Failure to provide proper grounds for detention, or delay in furnishing them, and sometimes giving illegible copies of documents are other reasons. In rare instances, courts have been horrified by the invocation of prevention detention laws for trivial reasons — one of the strangest being a man who sold substandard chilli seeds being detained as a ‘goonda’. An unfortunate facet of this issue is that Tamil Nadu topped the country (2011-21) in preventive detentions. One reason is that its ‘Goondas Act’ covers offenders who range from bootleggers, slum grabbers, forest offenders to video pirates, sex offenders and cyber-criminals. The law’s ambit is rarely restricted to habitual offenders, as it ought to be, but extends to suspects in major cases. Across the country, the tendency to detain suspects for a year to prevent them from obtaining bail is a pervasive phenomenon, leading to widespread misuse. Preventive detention is allowed by the Constitution, but it does not relieve the government of the norm that curbing crime needs efficient policing and speedy trials, and not unfettered power and discretion.
Date:12-04-23
इस फैसले से न्यायालयों का बोझ कुछ कम होगासंपादकीय
विगत संविधान दिवस पर बोलते हुए राष्ट्रपति ने कहा था कि ओडिशा और झारखंड में अनेक गरीब विचाराधीन कैदी इसलिए वर्षों से जेल में है क्योंकि वे जमानत राशि जमा नहीं कर सकते। उन्होंने पूछा कि ऐसे में ज्यादा जेल बनाने की जगह क्या उन्हें छोड़ा जाना उचित नहीं होगा? इसके बाद वित्तमंत्री ने बजट भाषण में बताया कि सरकार ऐसे लोगों की जमानत राशि देने की स्कीम लाएगी। अब गृहमंत्रालय ने नई स्कीम की घोषणा की है, जिसके तहत राज्य सरकारों को यह राशि इस आशय के साथ दी जाएगी कि वे गरीब विचाराधीन कैदियों की पहचान कर उन्हें रिहा करने का प्रबंध करें। एनसीआरबी के अनुसार देश की जेलों में तीन लाख 71 हजार से ज्यादा विचाराधीन कैदी बंद हैं। इनमें से अधिकांश वर्षों से जमानत न देने के कारण दिला नहीं हो पा रहे हैं। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट ने एक सुनवाई के दौरान कहा था कि केवल इस वर्ग के कैदियों के मामले निपटाने में देश की कोट्र्स को 700 वर्ष लगेगे। आज भारत में चार में से हर तीन कैदी इस वर्ग के हैं जबकि वैश्विक औसत तीन में एक का है। इसमें हर माह 5 हजार व कैदी और जुड़ जाते हैं। 54 कामनवेल्थ देशों (जो ब्रिटेन के उपनिवेश रहे हैं) में जों की दी हुई समान अपराध न्याय प्रणाली है। इनमें से बांग्लादेश में इस वर्ग के कैदी 80% हैं। इसके बाद भारत का स्थान है। एक लोकतांत्रिक देश के लिए यह चिंता का विषय हो सकता है कि जेलों में 76% ऐसे लोग बंद है, जिन पर अभी कोई अपराध सिद्ध नहीं हुआ है और उससे ज्यादा गंभीर बात यह है कि इनमें से अधिकांश गरीबी के कारण जमानत मिलने के बावजूद बांड न भर पाने के कारण बंद हैं। नई योजना सराहनीय कदम है।
Date:12-04-23
बदलते मौसम के असर से खेती पर संकटअंशुमान तिवारी, ( मनी-9 के एडिटर )
इतिहास हमारे लिए ज्यादा मूल्यवान है? हजार दो हजार साल पुराना वाला या कि जो हमारे सबसे करीब का है? किसी समाज के लिए वह इतिहास शायद ज्यादा प्रासंगिक है, जिससे उसका भविष्य प्रभावित होता है। आइए मिलिए अपने करीब इतिहास से जिसे हम गढ़ रहे हैं। यह इतिहास हमारे वर्तमान में पैर में कील की तरह धंस गया है। भारत की अर्थव्यवस्था के पैरों में कील का असर कुछ ज्यादा ही गहरा है। बीते साल जल्दी आई गर्मी गेहूं (रबी) की फसल चाट गई थी। फिर मानसून के दौरान शुरुआती सूखे और बाद की बाढ़ ने खेती को तितर-बितर कर दिया। अब गर्मी का तूफान यानी एल निनो आ रहा है। मानसून संकट में होगा। सूखे की मुनादी बजने लगी है। 2008 और 2014 की डरावनी यादें लौट रही हैं। यही तो है हमारा सबसे करीब इतिहास मौसम के असर से खेती एक बड़े संकट से मुकाबिल है!
साझा ताजा इतिहास
अमेरिकी ओश्नोग्राफिक एजेंसी और ग्लोबल कार्बन एटलस ने बताया कि 2010 से 2019 का दशक 140 साल के दर्ज – इतिहास में सबसे गर्म था। इसमें भी 2019 में मानव इतिहास में सबसे ज्यादा तापमान दर्ज हुआ और समुद्री तापमान में भी रिकार्ड बढ़ोतरी हुई। बीते 30 साल में समुद्रीय जलस्तर दोगुना हो गया है। पर्यावरण पर अंतरसरकारी पैनल ने 2022 तक तापमान बढ़त को 1.09 डिग्री पर रोकने का लक्ष्य रखा था। यह संकल्प कब का टूट चुका है।
आपदाओं का अर्थशास्त्र
भयावह आंकड़े उगल रहा है। 2022 में दुनिया को पर्यावरणीय आपदाओं से 360 अरब डॉलर का नुकसान हुआ । विश्व के प्रमुख रिइंश्योरेंस ब्रोकर गैलगर ने बताया कि इसमें केवल 140 अरब डॉलर के नुकसानों का बीमा था। इसके बाद जो डूबा सो गया। अमेरिका के नेशनल एनवायरमेंट सेंटर का आकलन है कि अकेले अमेरिका में ही वर्ष 2022 में करीब 18 आपदाओं में प्रति संकट एक अरब डॉलर से ज्यादा का नुकसान हुआ। अमेरिका से बाहर बीते साल की सबसे बड़ी आपदा पाकिस्तान की बाढ़ थी, जिससे 15 अरब डॉलर का नुकसान हुआ। की कोई सुरक्षा नहीं थी। भारत में तो फसल बीमा ही अभी कायदे से उगा नहीं। जोशीमठ के पहाड़ों से लेकर मैदानी खेतों तक गुस्साई हुई प्रकृति जीविका को निगल रही है।
काहे का सामान्य मानसून
खेती जीडीपी में 15 फीसदी का हिस्सा रखती है मगर 45 फीसदी आबादी को रोजगार देती है। मौसम के असर से भारत की खाद्य सुरक्षा की बुनियाद में तीन बड़ी दरारें पड़ गई हैं। एक बार बार बढ़ने वाली गर्मी और पानी की कमी, दूसरी अचानक होने वाली भारी बारिश और तीन- उपजाऊ मिट्टी का क्षरण । सामान्य मानसून अब कहीं से भी सामान्य नहीं है। जैसे 2022 में शुरुआत के वक्त मानसून सामान्य था, लेकिन खरीफ की बुवाई के मौसम में पूरी कृषि-पट्टी आंशिक सूखे से जूझती रही। बुवाई में देरी हुई। मानसून की देर वापसी दोहरी मुसीबत है। बीते साल उत्तर की अनाज पट्टी के कई इलाकों में मानसून देर से आया और जाते-जाते भारी बाढ़ छोड़ गया। मानसून की यह तुनकमिजाजी फसलों की बुवाई और कटाई (हार्वेस्ट) दोनों को उलट-पुलट कर देती है। इससे पूरा चक्र बिगड़ गया। क्रिसिल के एक अध्ययन में यह भी पता चला कि सामान्य बारिश वाले इलाकों की संख्या में लगातार कमी आ रही है। जरूरत से कम और ज्यादा बारिश स्थाई हो चली है। बीते कुछ वर्षों में सितम्बर- अक्टूबर की बाढ़ एक तरह से नियम बन गई है। मानसून के समाप्त पर होने वाली वर्षा मौसम के औसत से 47 फीसदी ज्यादा है।
आ गया सूखा गले तक
वर्ल्ड मीटरोलॉजिकल ऑर्गेनाइजेशन की ग्लोबल क्लाइमेट रिपोर्ट 2022 बताती है कि उत्तर प्रदेश के गेहूं से लेकर दार्जीलिंग में चाय की खेती तक मौसम ही बड़ी मुसीबत है। पर्यावरण पर अंतरराष्ट्रीय अंतरसरकारी समिति का आकलन है कि 21वीं सदी में तापमान में एक से चार डिग्री की बढ़त से भारत में धान के उत्पादन में 10 से 30 फीसदी और मक्का की पैदावार में 25 से 70 फीसदी की कमी आएगी। 2018 में सरकार ने आर्थिक सर्वेक्षण में बताया था कि पर्यावरण में बदलाव से अगले 25 से 30 सालों में भारत की कृषि आय में 18 फीसदी तक की कमी हो सकती है। गैर-सिंचाई वाले इलाकों में कमाई 25 फीसदी घट जाएगी। बीते बरस फसल तो बच गई, लेकिन भोजन की महंगाई ने नहीं छोड़ा।
कहां है सुरक्षा कवच
सरकारों को तत्काल अनाज भंडारण में बड़ा निवेश करना होगा, क्योंकि अब मौसम का कोई भरोसा नहीं रह गया है। प्रसंस्करण की मदद से मौसमी खाद्य महंगाई को सम्भाला जा सकता है मगर टैक्स तो कम हों। कृषि शोध में तत्काल बदलाव करने की जरूरत है। ऊंचे तापमान पर जल्दी तैयार होने वाले अनाज दलहन और सब्जियों की नई पीढ़ी चाहिए। भारत ने पिछले साल पांच तूफानों का सामना किया, जिनमें तीन बड़े व्यापक असर वाले थे। जर्मनवॉच ग्लोबल क्लाइमेट इंडेक्स और काउंसिल फॉर एनर्जी एनवायरमेंट एंड वाटर की रिपोर्ट बताती हैं कि 1970 से 2019 के बीच भारत में पर्यावरण की आक्रामकता में अभूतपूर्व बढ़त हुई है। भारत उन बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में है, जहां पर्यावरण सबसे मारक हो चला है। अप्रत्याशित घटनाओं के खतरे के सूचकांक में भारत अब शीर्ष 20 देशों में शामिल है। अर्थव्यवस्था के विकास के सभी ख्वाबों पर मौसम भारी पड़ने वाला है। इस आह को असर होने के लिए एक उम्र नहीं चाहिए। भोजन का खर्च या ग्रॉसरी का बिल देखिए, असर शुरू हो चुका है!
Date:12-04-23
बेटियों की सेहतसंपादकीय
देश में हाशिये के तबकों के परिवारों की बच्चियों के स्कूलों तक पहुंच सकने के कितने स्तर रहे हैं, उनकी राहों में क्या बाधाएं रही हैं, यह जगजाहिर है। आजादी के बाद से समय-समय पर सरकारों ने लड़कियों की पढ़ाई-लिखाई को लेकर कई तरह की योजनाएं लागू कीं, नीतिगत फैसले किए। लेकिन आज भी कई ऐसे पहलू छूटे हुए हैं, जिनकी वजहों पर गौर करना बहुत जरूरी नहीं समझा गया और जिनके चलते बड़ी तादाद में स्कूली छात्राएं बीच में ही पढ़ाई छोड़ देती हैं। ये वजहें स्कूली पढ़ाई-लिखाई में गुणवत्ता के सवालों से इतर कुछ ऐसी स्थितियों से जुड़ी हो सकती हैं, जिन्हें निजी समस्याओं के तौर पर देखा जाता है, मगर वे स्कूली लड़कियों के जीवन और स्वास्थ्य को प्रभावित करती हैं। मसलन, स्कूलों में लड़कियों के लिए साफ-सुथरे शौचालय से लेकर माहवारी जैसे कुछ बिंदु उनके लिए विशेष इंतजाम की जरूरत को रेखांकित करते हैं। इस लिहाज से देखें तो सोमवार को सुप्रीम कोर्ट की ओर से राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को यह नोटिस जारी करना बेहद अहम है, जिसके तहत माहवारी स्वच्छता को लेकर एक स्पष्ट नीति बनाने का निर्देश दिया गया है।
गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट में दायर एक जनहित याचिका में मांग की गई है कि स्कूलों में छठी से बारहवीं की लड़कियों को मुफ्त सैनिटरी पैड दिया जाए और सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग से शौचालय की व्यवस्था की जाए। अनेक अध्ययनों में यह रेखांकित किया गया है कि स्वच्छता सुविधाओं तक पहुंच की कमी और माहवारी से जुड़े सामाजिक व्यवहार के कारण बहुत सारी लड़कियां स्कूल की पढ़ाई बीच में ही छोड़ देती हैं। शिक्षा की सूरत बदलने को लेकर सरकारें समय-समय पर अनेक नीतिगत फैसले लेती रही हैं और नए कार्यक्रमों की घोषणा करती रही हैं। लेकिन गुणवत्ता आधारित शिक्षा के सवाल के अलावा एक अहम पहलू यह है कि अगर इसमें लड़कियों की पढ़ाई-लिखाई निर्बाध जारी रहने के लिए जरूरी कारकों पर गौर करने के साथ इसमें मौजूदा कमियों को दूर नहीं किया जाता है तो कोई बेहद अहम पहलकदमी भी आधे-अधूरे नतीजे देगी। यह सभी जानते हैं कि किशोरावस्था में लड़कियों को सेहत से जुड़ी किन जटिलताओं का सामना करना पड़ता है और उसके क्या कारण रहे हैं।
सच यह है कि आबादी के एक बड़े तबके के बीच सामाजिक और आर्थिक चुनौतियों से पार निकल कर किसी तरह स्कूल पहुंची लड़कियां माहवारी से उपजी दिक्कत, पीने के साफ पानी और शौचालय जैसी बुनियादी जरूरतों के अभाव से दो-चार होती हैं। माहवारी में स्वच्छता सुनिश्चित करने के लिए जरूरी प्रशिक्षण और संसाधनों के अभाव के चलते वे अपेक्षित सावधानी नहीं बरत पातीं। इसी तरह, स्कूलों में अलग शौचालय का अभाव उनके लिए एक बड़ी समस्या होती है। इसलिए स्कूलों में लड़कियों के लिए अलग और स्वच्छ शौचालयों की व्यवस्था करने के साथ-साथ कम कीमत वाले सैनिटरी पैड मुहैया कराने पर एक समान नीति वक्त का तकाजा है। इसके समांतर, सरकार को इस सामाजिक जड़ता को दूर करने के लिए भी नीतिगत पहल करने की जरूरत है, जिसके तहत कई समुदायों में आज भी माहवारी को लेकर नकारात्मक धारणाएं हैं। इसका खमियाजा आखिर लड़कियों को ही भुगतना पड़ता है। दरअसल, कई बार दिखने में पारंपरिक चलन या सामान्य मानी जानी जाने वाली बातें समाज के एक बड़े हिस्से के लिए वंचना का काम करती हैं और यहां तक कि इनकी वजह से उनके अधिकारों का भी हनन होता है। इसलिए ऐसे मामूली दिखने वाले बिंदुओं पर भी गौर करके उसकी जटिलता को दूर करना एक लोक कल्याण का दावा करने वाली सरकार की जिम्मेदारी होनी चाहिए।
Date:12-04-23
आत्मनिर्भर भारत की बुनियाद छोटे उद्यमसत्येंद्र किशोर मिश्र
आजादी के समय भारतीय अर्थव्यवस्था गरीबी, बेरोजगारी, प्रतिव्यक्ति निम्न आय, निरक्षरता और औद्योगिक पिछड़ेपन की जकड़ में थी। यह स्वीकृत तथ्य है कि औद्योगीकरण के जरिए आर्थिक विकास की मजबूत बुनियाद पर बेहतर सामाजिक-आर्थिक लक्ष्य हासिल किए जा सकते हैं। दो हजार वर्षों से अधिक का भारतवर्ष का गौरवशाली आर्थिक संपन्नता का इतिहास दरअसल, लघु उद्योगों के रूप में उद्यमिता, हस्तशिल्प और कौशल की परंपरा ही थी। भारत में नियोजन के शुरुआती दौर में लघु उद्योगों को नजरंदाज कर, बड़े उद्योगों के जरिए औद्योगिक विकास की कोशिशें तो उसके अच्छे नतीजे भी दिखे। बाद में उदारीकरण तथा वैश्वीकरण के कारण बाजारवाद, निजीकरण और प्रतिस्पर्धी माहौल भी सामने आया। बड़े और भारी उद्यागों की सीमाएं भी दिखीं। गरीबी, बेरोजगारी और मुद्रास्फीति के मामलों में विफल साबित हुए। अनुकूल पूंजी-उत्पाद अनुपात तथा रोजगार की ऊंची संभावनाएं लघु उद्योगों की महत्त्वपूर्ण विशेषता है। शायद बहुत देर से औद्योगिक विकास में लघु उद्योगों की भूमिका को पहचानते हुए, इसके विकास की कोशिशें हुर्इं। समझना होगा कि ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ की संकल्पना में इसे रफ्तार देने की जरूरत है।लघु उद्योग, आर्थिक विकेंद्रीकरण कर आय तथा संपत्ति की असमानताओं के साथ-साथ भौगोलिक असंतुलन को कम करते हैं। उपभोक्ताओं को विविधता और विकल्प उपलब्ध कराते हैं। स्थानीय ज्ञान और कौशल, कलात्मकता का कम पूंजी के साथ उपयोग करते हैं, साथ ही बड़े उद्योगों के सहायक उद्यम का भी कार्य करते हैं। भारत में सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों यानी एमएसएमई को ‘विकास का इंजन’ और ‘अर्थव्यवस्था का पावरहाउस’ जैसे विशेषणों से नवाजा जाता है। समावेशी विकास में शायद सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भूमिका एमएसएमई क्षेत्र की हो सकती है। आज भारत में सवा छह करोड़ से अधिक एमएसएमई इकाइयों में ग्यारह करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार प्राप्त है। एमएसएमई की जीडीपी में तीस फीसद तथा निर्यात में अड़तालीस फीसद से अधिक योगदान के साथ आर्थिक विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका है। एमएसएमई कुल औद्योगिक इकाइयों में पंचानबे फीसद से अधिक हिस्से के साथ भारत की सामाजिक-आर्थिक प्रगति की बुनियाद है।
भारतीय अर्थव्यवस्था में एमएसएमई क्षेत्र की लगभग 6.34 करोड़ इकाइयों में से विनिर्माण क्षेत्र की इकाइयों का जीडीपी में 6.11 फीसद, सेवा क्षेत्र की इकाइयों का जीडीपी में 24.63 फीसद तथा सकल विनिर्माण उत्पादन में 33.4 फीसद योगदान है। एमएसएमई क्षेत्र ग्यारह करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार प्रदान करने के साथ भारत के कुल निर्यात में लगभग अड़तालीस फीसद योगदान करता है। लगभग इक्यावन फीसद एमएसएमई इकाइयां ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित हैं, जिनमें बड़ी संख्या में ग्रामीण कार्यबल को संयोजित होने का अवसर उपलब्ध होता है। कुल एमएमएमई उद्यमों में निन्यानबे फीसद से अधिक सूक्ष्म उद्यम हैं। समावेशी विकास को बढ़ावा देने के साथ-साथ बड़े पैमाने पर ग्रामीण क्षेत्रों में रोजगार सृजन में इनकी विशेष भूमिका है। भारत में विशाल असंगठित कार्यबल को देखते हुए रोजगार की दृष्टि से एमएमएमई क्षेत्र की जिम्मेदारी बढ़ जाती है।
मगर पिछले कुछ वर्षों से एमएसएमई क्षेत्र लगातार अनेक प्रकार की गंभीर समस्याएं झेल रहा है। एशियाई विकास बैंक के अनुसार कोरोना महामारी के दौरान इस क्षेत्र में रोजगार तथा विक्रय राजस्व में काफी गिरावट आई। कच्चे माल की लागतों में तीस से पचास फीसद की बढ़ोतरी दर्ज की गई, जबकि यह क्षेत्र महामारी से पूर्व के स्तर तक पहुंचने को अब भी प्रयासरत है। अधिकांश एमएसएमई के पास लागतों में बढ़ोतरी की भरपाई करने के लिए पर्याप्त पूंजी नहीं है। बावजूद इसके, एमएसएमई क्षेत्र भारत के आर्थिक विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हुए औद्योगीकरण की ओर बढ़ रहा है। एमएसएमई क्षेत्र वैश्विक बाजार, डिजिटल कौशल विकास तथा किफायती उद्यम प्रौद्योगिकी के माध्यम से वैश्विक प्रतिस्पर्धी बाजार में खुद को स्थापित करने को तत्पर है।
एमएसएमई क्षेत्र का विकास भारतीय अर्थव्यवस्था की बुनियादी जरूरत है, जो इसे वैश्विक आर्थिक संकटों तथा प्रतिकूलताओं को झेलने में ताकत तथा जुझारूपन प्रदान करता है। देश भर में इक्यावन फीसद एमएसएमई इकाईयां ग्रामीण क्षेत्रों में हैं और बाकी उनचास फीसद नगरीय क्षेत्रों में स्थित हैं। यानी, लगभग सवा तीन करोड़ ग्रामीण क्षेत्रों में तथा शेष 3.09 करोड़ इकाइयां नगरीय क्षेत्र में स्थापित हैं। सर्वाधिक 2.3 करोड़ एमएसएमई इकाइयां व्यापार में लगी हुई हैं। विनिर्माण क्षेत्र में लगभग 1.97 करोड़ एमएसएमई इकाइयां उत्पादक कार्यों के माध्यम से अर्थव्यवस्था के औद्योगिक विकास में योगदान कर रही हैं। इस क्षेत्र की अस्सी फीसद इकाइयां पुरुषों के स्वामित्व में हैं और इसके मात्र पांचवें हिस्से का स्वामित्व महिलाओं के पास है।
एमएसएमई इकाइयों में से लगभग आधे पर स्वामित्व ग्रामीण तथा नगरीय दोनों क्षेत्रों में अन्य पिछड़े वर्ग का है, जबकि अन्य के स्वामित्व में लगभग एक तिहाई है। अनुसूचित जाति के स्वामित्व में 12.45 फीसद तथा अनुसूचित जनजाति के स्वामित्व में मात्र 4.10 फीसद एमएसएमई इकाइयां हैं। सबसे खराब स्थिति अनुसूचित जनजाति की है, विशेषकर नगरीय क्षेत्र में मात्र 1.43 फीसद एमएसएमई इकाइयों का मालिकाना हक यानी उनका संचालन अनुसूचित जनजाति के हाथों में हैं।एमएसएमई इकाइयों के बढ़ते आकार के साथ अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति तथा ओबीसी का हिस्सा घटता हुआ है। मध्यम आकार की एमएसएमई इकाइयों में ओबीसी का स्वामित्व 23.85 फीसद, अनुसूचित जनजाति का 1.09 फीसद तथा अनुसूचित जनजाति का अमूमन शून्य है। सूक्ष्म तथा लघु एमएसएमई के जरिए औद्योगीकरण को बढ़ावा देकर न केवल असंगठित क्षेत्र में रोजगार की दशा और दिशा सुधारी जा सकती है, बल्कि सामाजिक-आर्थिक असमानता को भी कम किया जा सकता है।
राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण तथा एमएसएमई वार्षिक रिपोर्ट 2022-23 के आंकड़ों के अनुसार, एमएसएमई क्षेत्र में कुल 11.10 करोड़ रोजगार में से विनिर्माण में 3.6 करोड़, व्यापार में 3.88 करोड़ तथा अन्य क्षेत्रों में 3.62 करोड़ लोग रोजगार में लगे हैं। अनुमानत: 6.31 करोड़ सूक्ष्म उद्यमों में 10.8 करोड़ व्यक्ति कार्यरत हैं, जो उद्योग में कुल रोजगार का लगभग सत्तानबे फीसद है। एमएसएमई क्षेत्र की 3.31 लाख लघु तथा 0.05 लाख मध्यम आकार की इकाइयों में क्रमश: 32 लाख (2.88 फीसद) तथा 1.8 लाख (0.16 फीसद) लोगों को रोजगार प्राप्त है।एमएसएमई क्षेत्र में नगरों में प्राप्त रोजगार की कुल संख्या 6.12 करोड़ है, जबकि ग्रामीण क्षेत्र में रोजगार की संख्या 4.98 करोड़ से अधिक है। एमएसएमई क्षेत्र में रोजगार का वितरण लिंगानुसार देखने पर पता चलता है कि तीन चौथाई से अधिक, 8.5 करोड़ पुरुषों को एमएसएमई क्षेत्र में रोजगार प्राप्त है, जबकि 2.7 करोड़ महिलाओं को, जो कि इस क्षेत्र में कुल श्रमबल के एक चौथाई से कम हैं। रोजगार में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने की सख्त जरूरत है।
स्वतंत्रता के बाद से लघु, सूक्ष्म और मझोले उद्योग एक लंबा सफर तय कर चुके हैं, पर भारत के औद्योगीकरण में एमएसएमई का योगदान कभी एक-सा नहीं रहा है। शुरुआती दशकों में एमएसएमई क्षेत्र की उच्च रोजगार क्षमता को देखते-समझते हुए भी, उनकी भूमिका को सही ढंग से पहचाना नहीं जा सका। शायद भारतीय अर्थव्यवस्था में उनके महत्त्व को समझा ही नहीं जा सका। जबकि एमएसएमई क्षेत्र के विकास के लिए तेज और विशेष प्रयास की जरूरत थी। नए भारत में आत्मनिर्भर भारत की बुनियाद एमएसएमई क्षेत्र ही बन सकता है। भारत के असंगठित क्षेत्र को सामाजिक-आर्थिक विकास का हिस्सा बनाने के लिए भी एमएसएमई क्षेत्र की भूमिका को आगे बढ़ाने की सख्त जरूरत है।
Date:12-04-23
चीन को तल्ख जवाबसंपादकीय
चीन की दंबगई का उसी के अंदाज में जवाब देने में केंद्र की मोदी सरकार कोई कसर नहीं छोड़ती है। हाल में चीन ने अपने फैसले से भारत के साथ तनातनी को मजाहिरा किया। पहला, उसने अरुणाचल प्रदेश के 11 जगहों के नाम चीनी भाषा में जारी किए। इस घोषणा का सीधा सा अर्थ इन भारतीय क्षेत्रों पर अपना दावा करना है। दूसरा, चीन में तैनात भारत के दो पत्रकारों को संदेश भेजा कि उनका चीनी वीजा रोक दिया गया है और वे चीन नहीं लौट सकेंगे। ये सारा घटनाक्रम यह बताने को काफी है कि भारत का अपने पड़ोसी देश के साथ रिश्ता कितना तल्ख है। शायद चीन की इसी हनक का जवाब देने के लिए गृहमंत्री अमित शाह ने चीन से सटे सीमावर्ती इलाके का दौरा किया। शाह ने बिना लाग-लपेट के चीन को यह संदेश दिया कि भारत उसकी बंदरघुड़कियों से डरने वाला नहीं है और भारत की सुई की नोक बराबर जमीन पर कोई कब्जा नहीं कर सकता है। चीनी समकक्ष के साथ भले भारतीय प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति की आधिकारिक मुलाकातें होती रही हों, मगर संबंधों में सहजता का अभाव दिखता है। यहां तक कि लद्दाख में पैंगोंग झील में वर्ष 2021 में दोनों सेनाओं के बीच हिंसक झड़प के बाद कमांडर स्तर की वार्ता भी रिश्तों को सामान्य नहीं बना सकी है। रह-रहकर चीन अपनी करतूतों से बाज नहीं आता है। शाह ने अरुणाचल प्रदेश जाकर और वहां से चीन को कड़े शब्दों में भारत की मंशा जताकर यह संदेश देने की भरसक कोशिश की है कि भारत को लेकर चीन को अब तो अपनी समझ का दायरा बढ़ाना चाहिए कि अब किसी दबाव में नहीं आने वाला। चीन की विस्तारवादी नीतियों और उसकी हमेशा पड़ोसी देशों के प्रति आक्रामक तरीके से बर्ताव करना किसी भी सभ्य देश के बर्दाश्त के बाहर की चीज है। दरअसल, यह जरूरी भी था। चीन की कुटिल चाल का सही और सधे रूप में जवाब इसी तरह होना चाहिए। हां, सिर्फ जुबानी खर्च करने के बजाय कुछ केंद्र सरकार को सीमावर्ती इलाकों में आधारभूत संरचना को मजबूत करना होगा। वैसे, भारत ने इस दिशा में काम शुरू किया भी है। ‘वाइब्रेंट विलेज’ कार्यक्रम शुरू करने के पीछे यही मकसद है कि सीमा से लगते उन गांवों में बुनियादी ढांचा मजबूत हो। फिलहाल अरुणाचल, सिक्किम, उत्तराखंड, हिमाचल और लद्दाख के कुल 2,967 गांवों को विकसित करने की योजना है।
Date:12-04-23
जेल में भी जिंदगी से जद्दोजहदसुशील देव
एक तो जेल उसके अंदर भी परेशानी। देश में ज्यादातर जेलों की हालत खराब है। कुछ तो बेहतर हालत में हैं, मगर अधिकांश जेलों में क्षमता से अधिक कैदी भरे हुए हैं। इससे सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है कि भीड़-भाड़ वाले जेलों में कैदियों की हालत क्या होती होगी? किस तरह से उन्हें शौच-पेशाब, नहाना-खाना या सोने-बैठने में दिक्कत आती होगी। मीडिया के जरिए समय-समय पर जेलों की ऐसी व्यथा-कथा बाहर आती रहती है। मगर इसे लेकर न तो जेल प्रशासन और न ही सरकार के स्तर पर किसी प्रकार की गंभीरता देखी जाती है। सनद रहे कि सर्वोच्च अदालत तक चिंता जता चुकी है कि जेलों में क्षमता से अधिक कैदी रखना मानवाधिकार का उल्लंघन है।
विशेषज्ञों के मुताबिक खास तौर पर विचाराधीन कैदियों का लंबे समय तक जेलों में बने रहना चिंता का विषय है। 1970 में राष्ट्रीय जेल जनगणना से पता चला था कि जेल के 52 फीसद कैदी मुकदमे की प्रतीक्षा कर रहे थे। तब से धीरे-धीरे यह सिलसिला आगे ही बढ़ रहा है। यानी जेल में भीड़-भाड़ को कम करना है तो विचाराधीन कैदियों की संख्या को काफी कम करना होगा। भले ही यह अदालतों के बिना संभव नहीं, परंतु इस दिशा में न्याय प्रणाली के तीनों अंगों को सामंजस्यपूर्ण ढंग से कार्य करना चाहिए। हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्रालय ने लोक सभा में जानकारी दी है कि देश भर की जेलों में बंद 1400 से अधिक कैदी अपनी सजा काटने के बाद जुर्माने की राशि का भुगतान नहीं कर पाने की वजह से अभी भी जेलों में बंद हैं। इनकी रिहाई समय से हो जाती तो शायद जेलों का भार कम होता। गौरतलब है कि जेलों में कैदियों को क्षमता से ज्यादा रखने के मामले में देश का सबसे बड़ा राज्य उत्तर प्रदेश है। यहां कैदियों की संख्या लगभग दोगुना है। दूसरे नंबर पर बिहार और तीसरे नंबर पर मध्य प्रदेश व महाराष्ट्र की जेलें हैं। इन जेलों में कैदियों का बहुत बुरा हाल है। इसके अलावा क्षमता से अधिक कैदी रखने वाले राज्यों में असम, छत्तीसगढ़, गोवा, गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक और पश्चिम बंगाल जैसे राज्य शामिल हैं। मतलब साफ है कि कैदियों को जेलों में रखने में असंतुलन बड़े राज्यों में ज्यादा है। अगर हम दिल्ली के तिहाड़ की एक जेल, नंबर-4 की बात करें तो वहां 740 की जगह 3700 से अधिक कैदी बंद हैं। यहां नहाने-धोने या टॉयलेट जाने के लिए लंबी लाइन लगानी पड़ती है। कई बार आपसी लड़ाई-झगड़े के कारण जेल प्रशासन को बहुत मशक्कत करनी पड़ती है। उन पर नजर रखने में संघर्ष करना पड़ता है। दूसरी ओर कोरोना जैसी महामारी भी कई जेलों के लिए चिंता का सबब बन गई थी। एशिया की सबसे बड़ी जेल तिहाड़ में 80 प्रतिशत ऐसे कैदी हैं, जिन्हें अदालत से जमानत मिलने के बाद भी सलाखों के पीछे रहना पड़ रहा है। उनके पास जुर्माना के राशि चुकाने तक के पैसे नहीं। इस प्रकार दिल्ली में कुल 16 जेल हैं, जो करीब-करीब क्षमता से अधिक कैदियों से भरे हैं। नेशनल क्राइम रिकॉर्डस ब्यूरो यानी एनसीआरबी के मुताबिक देश में कुल 1412 जेलों में अपने निर्धारित क्षमता से अधिक कैदी बंद हैं। इसमें साल-दर-साल बढ़ोतरी ही होती जा रही है, जबकि जेलों की संख्या में मामूली वृद्धि हुई है। सर्वोच्च अदालत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश एनवी रामना के मुताबिक आज आपराधिक न्याय प्रणाली में प्रक्रिया ही सजा बन गई है। इस वजह से भी जेलों में कैदियों की संख्या लगातार बढ़ रही है। इसलिए अंधाधुंध गिरफ्तारी से लेकर जमानत हासिल करने में आ रही मुश्किलों के कारण विचाराधीन कैदियों को लंबे समय तक कैद में रखने की प्रक्रिया पर तत्काल ध्यान देने की जरूरत है। अंडर ट्रायल के तौर पर कैदियों का सालों से बंद रहना उचित नहीं है। फास्ट ट्रैक अदालतों की स्थापना व खुली जेल बनाना इसके उपाय हो सकते हैं। इसके अलावा कई न्यायिक प्रक्रिया में तेजी लाने के लिए त्वरित कदम उठाए जाने की जरूरत है। दुनिया के कई अन्य देशों की तुलना में भारतीय जेलों में कैदियों की अपेक्षाकृत कम संख्या होने के बावजूद कई समस्याएं हैं। भीड़-भाड़, अंडर-ट्रायल, कैदियों की लंबे समय तक हिरासत, असंतोषजनक रहने की स्थिति, उपचार कार्यक्रमों की कमी और जेल कर्मचारियों के उदासीनता के कारण असंतुलन की स्थिति है। यहां तक कि अमानवीय नजरिए ने आलोचकों का ध्यान खींचा है। भारत में जेलों की स्थिति के बारे में देश के बाहर भी अच्छी छवि नहीं है।
कुल मिलाकर देश के जेलों की स्थिति बहुत ही दयनीय है। ऐसे में सरकार को जेलों के प्रति अधिक से अधिक संवेदनशील होना चाहिए। क्योंकि जो व्यक्ति अपराधी के रूप में कैद हैं, वह एक जीवित इंसान भी हैं, जिन्हें पूर्ण रूप से और सम्मान से जीने का अधिकार है। राष्ट्रपति द्रोपदी मुर्मू इस मुद्दे पर अपना मत जता चुकी हैं कि जेलों में बहुत से लोगों को ना तो अपने मौलिक अधिकारों या कर्तव्यों के बारे में पता है, और ना ही संविधान की प्रस्तावना के बारे में जानकारी। बाहर आने पर समाज द्वारा बुरे बर्ताव की चिंता उन्हें अलग सताती है। इसलिए जेलों की बुनियादी ढांचे में सुधार के साथ पुनर्वास संबंधी उपयोगी कदम उठाना श्रेयस्कर होगा।
Date:12-04-23
अपराध मुक्त राजनीतिसंपादकीय
देश की विधायी संस्थाओं से आपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों को दूर करने की मंशा से सुप्रीम कोर्ट में दायर एक याचिका के संदर्भ में केंद्रीय चुनाव आयोग ने जो शपथ-पत्र दायर किया है, उसके गहरे निहितार्थ हैं। आयोग ने अपने हलफनामे में स्पष्ट कहा है कि वह राजनीति को पूरी तरह अपराध-मुक्त करने को प्रतिबद्ध है, पर वह प्रदत्त शक्तियों के दायरे में ही इससे संबंधित कदम उठा सकता है। प्रकारांतर से आयोग का यही कहना है कि उसके पास इतने कानूनी अख्तियार ही नहीं कि वह निर्णायक फैसले ले सके। जाहिर है, आला अदालत ने चार हफ्तों में केंद्र सरकार से जवाब मांगा है कि जिन नेताओं के खिलाफ आरोप-पत्र दायर हो चुके हैं, या आरोप तय हो चुका है, उनके चुनाव लड़ने पर क्यों न रोक लगा दी जाए? आयोग ने याचिकाकर्ता द्वारा की गई इस मांग के प्रति अपनी पूर्ण सहमति जताई है।
राजनीति के अपराधीकरण का मसला नया नहीं है। पिछले कई दशकों से इस संदर्भ में संसद से सड़क तक विमर्श होता रहा है, लेकिन इससे कोई फर्क नहीं आया, बल्कि विधायी संस्थाओं में दागियों की आमद बढ़ती गई और तमाम पार्टियां नैतिकता को ताक पर रखकर जीतने की क्षमता के आधार पर ऐसे लोगों को टिकट बांटती रहीं। आलम यह है कि आज लोकसभा में बैठने वाले 43 फीसदी माननीयों के खिलाफ आपराधिक मुकदमे चल रहे हैं, तो वहीं उच्च सदन में बैठने वाले 39 प्रतिशत सदस्यों के विरुद्ध विभिन्न प्रकरणों में मामले लंबित हैं। देश की दो प्रमुख राष्ट्रीय पार्टियों भाजपा और कांग्रेस के 145 लोकसभा सदस्यों के खिलाफ आपराधिक मुकदमे सुनवाई के विभिन्न स्तरों पर हैं। निस्संदेह, देश की राजनीति को दागियों से निजात दिलाने के लिए तो संसद को ही कानून बनाना होगा, पर क्या ये पार्टियां ऐसा करेंगी? ऐसे में, सुप्रीम कोर्ट से अपेक्षाएं बढ़ जाती हैं। मगर यह भी देखना होगा कि राजनीतिक विद्वेष के तहत कई मुकदमे दायर किए जाते हैं। ऐसे में, त्वरित सुनवाई और गलत मुकदमे करने वालों को हतोत्साहित करने की जरूरत है।
बहरहाल, चुनाव आयोग की यह बात अपनी जगह दुरुस्त है कि उसके पास सीमित कानूनी अधिकार हैं, मगर क्या यह सच नहीं है कि अपने सीमित अधिकारों के अधिकतम सदुपयोग से टीएन शेषन ने इस संस्था के लिए अभूतपूर्व प्रतिष्ठा अर्जित की? नजीर के तौर पर, आचार संहिता की शुचिता सुनिश्चित करने के लिए उन्होंने जो कदम उठाए थे, उससे उम्मीदवारों व राजनीतिक पार्टियों में भय पैदा हुआ था, दुर्योग से वह इन दिनों तिरोहित हो चला है! एक लोकतंत्र की कामयाबी का यह बुनियादी उसूल है कि उसमें सभी पक्षों को समान अवसर मिले, पर अब यह आम बात है कि कई चरणों में चुनाव के दौरान मतदान वाले इलाकों में चुनाव प्रचार खत्म होने के बाद भी इलेक्ट्रॉनिक मीडिया का इस्तेमाल करते हुए कुछ दल अपना प्रचार करते रहते हैं और आयोग के पास इससे निपटने का कोई तरीका नहीं है। सांप्रदायिक आधार पर ध्रुवीकरण करने और वोट मांगने के कारण चुनाव आयोग ने देश के एक दिग्गज नेता से छह वर्षों तक मताधिकार का अधिकार छीन लिया था। क्या आयोग को यह याद दिलाने की जरूरत है कि उसके पास आज भी कितने अहम अधिकार हैं? लोकतंत्र की सफलता लिखित कानूनों से अधिक सांविधानिक संस्थाओं की विश्वसनीयता से तय होती है। चुनाव आयोग को यह भी याद रखना चाहिए।
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भारत के तीन राज्यों में सबसे ज्यादा भूजल का उपयोग होता है। इनमें भी पंजाब और हरियाणा सबसे ऊपर हैं। पंजाब में धान के लिए सबसे ज्यादा पानी लगता है। पंजाब के लिए यह फसल उपयुक्त नहीं है। फिर भी इसे यहाँ बड़ी मात्रा में उगाया जा रहा है। न्यूनतम समर्थन मूल्य और मुफ्त बिजली के सरकारी प्रोत्साहन से किसान, इन्ही फसलों के लिए प्रोत्साहित हो रहे हैं।
भारत की कृषि नीति ऐसी होनी चाहिए, जो क्षेत्र-विशिष्ट फसलों के लिए किसानों को बढ़ावा दे सके। इस नीति में भूजल के संरक्षण पर राज्य-सरकारों को भी सब्सिडी जैसा कोई प्रोत्साहन देना होगा। इसका सीधा सा अर्थ है कि राजनीतिक दलों को कुल पैदावार और कुल कृषि सब्सिडी के आंकड़ों से बाहर निकलकर भू-जल संरक्षण को मुख्य मुद्दा बनाना होगा।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 22 मार्च, 2023
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Date:11-04-23
Who Moved My Milk?Amul vs Nandini battle is meaningless. India needs both to expand nationally and shake things upTOI Editorials
Milk has been added to Karnataka’s already heady election campaign brew. The proximate cause is that Amul took to social media to announce online deliveries in Bengaluru. This advertisement was interpreted in the context of an observation by Amit Shah in December that cooperation between Amul and Nandini can do wonders. He was referring to the umbrella brands of Gujarat Cooperative Milk Marketing Federation and Karnataka Milk Federation. To make sense of it, consider India’s unique milk political economy.
India is the world’s largest milk producer, with 222. 1 million tonnes production in 2021-22. But it’s witnessed a slowdown in output growth recently. In the three years to 2021-22, the average annual growth rate was 5. 5%. In each of the preceding five years, output grew at over 6%. Preliminary indications are that output was stagnant in 2022-23. Almost half the milk produced is consumed locally. The rest enters the urban market, which is the growth area. GOI information shows that milk cooperatives and private players’ share of the liquid milk market is expected to touch 54% by 2026, from 41% now.
This is the commercial backdrop to the battle between Amul and Nandini. Of the two big milk co-ops, GCMMF is bigger. Care Ratings estimates it has a market share of 40-73% in pouched milk and different milk products. KMF, though, offers stiff competition. In 2020-21, interstate sales accounted for more than 15% of its revenue. Co-ops impart a unique dimension to milk and milk product markets. For example, in Karnataka the government provides incentives to them. Consequently, they have little flexibility over procurement or end-product pricing. In a difficult phase such as the lockdowns, government inflexibility imparts a floor to procurement prices. When there’s a shortage, concern about inflation makes governments reluctant to raise product prices.
Dairy is often the primary source of income of many landless households and marginal farmers. So, it’s in their best interest if successful brands like Amul and Nandini procure and sell across markets. It will be particularly helpful for farmers in states that lack both a sound cooperative movement and incentives for private players. Coming back to Karnataka, it’s unlikely milk will be more important than caste and corruption allegations. GoI now needs to pay attention to the production slowdown.
Date:11-04-23
The Populist RajWhy Rajasthan’s old pension scheme & the Right to Health Bill are both examples of dangerously irresponsible ways to court votersArvind Panagariya, [ The writer is Professor of Economics at Columbia University ]
Populism in policy and programmes is of two kinds: responsible and irresponsible. Responsible populism promotes policies and programmes that win votes, are feasible within the available financial and physical resources and advance the overall social welfare. Irresponsible populism also helps win votes but fails to meet the resourcefeasibility condition or advance overall social welfare.
Two recent initiatives in my home state, Rajasthan, illustrate what I mean by irresponsible populism. The first, adopted last year, is the switch from the new to old pension system (NPS to OPS) for state employees hired after January 1, 2004. The second, passed by the state assembly this past March 27, is the Rajasthan Right to Health Bill, 2022. Each of these measures enjoys popularity with at least some sections of the society, raises questions about resource feasibility and arguably undermines the overall welfare of the state. From a national welfare viewpoint, each also runs the risk of tempting other states to follow suit, thereby compounding the damage.
Switching to OPS frees the employees and the government from having to contribute to the corpus from which the former receive pension under NPS. This naturally makes the switch popular with the employees as well as the incumbent government. But it is not so good for future taxpayers who must then foot the pension bill. It also leads to redistribution from many future taxpayers to a few retired employees and from the younger future generation to the latter.
The Rajasthan Right to Health Bill, 2022, represents similar irresponsible populism. In this case, the problem is the grant of a right for whose delivery the state lacks financial as well as human resources. In this context, it may be recalled that the last social goal to be given the status of a legal right in the country was education for children aged 6 to 14. Legislation implementing this right came into force on April 1, 2010. By that date, 96% of children aged 6 to 14 were already in school, making the right well within reach. Such is not the case in the area of health services in Rajasthan.
Current healthcare resources in Rajasthan fall far short of those necessary to make good on a legally enforceable right to health. Moreover, the state is not in a position to expand these resources significantly in the forthcoming years. Sustained mismanagement of finances and poor governance have led the state to become the second most indebted among the major states of the country. To make matters worse, the fiscal deficit as a proportion of Gross State Domestic Product (GSDP) in the state has been among the highest in recent years, raising questions about the sustainability of the state’s debt.
Unsurprisingly, as passed by the legislative assembly, the right to health bill places the entire burden of delivery on the existing healthcare institutions. To public healthcare institutions, it obligates to provide free outdoor and indoor patient department services, medicines, diagnostics, emergency transport, procedure, and emergency care to all. To private healthcare institutions, it obligates to provide emergency treatment and care, including obstetric treatment and care, to all without prepayment or police clearance. State residents are additionally given the right to free healthcare services from any clinical establishment.
These are demanding obligations even in the case of public health institutions in which doctors and medical staff are already overworked and overburdened. But in the case of private health institutions, the obligations are a surefire recipe for exit to other states. Unsurprisingly, the entire private healthcare establishment in Rajasthan decided to go on a preemptive strike even before the bill was passed by the assembly.
After 17 days of total shutdown of private healthcare services, the state government came to the negotiating table on April 4 and substantially (though not wholly) accepted the demands of the striking doctors. It has agreed to exempt from the law all multi-speciality private hospitals with 49 or fewer beds as also hospitals established without government assistance in the form of land and building at subsidised rates. But the law will apply to private medical college hospitals, hospitals established on PPP mode, those benefiting from subsidies on land and those run by trusts.
But even this agreement raises several questions. Will private medical colleges and trust-run hospitals not choose to go to other states in the future? Are public and included private healthcare establishments enough to genuinely deliver on the wide-ranging rights the act confers? Does the state, which found itself lacking resources to deliver on the 25% quota for children from the economically weaker section in private schools under the Right to Education Act, have the resources to reimburse private hospitals for services they will render to patients at no charge? Why would any resident pay private hospitals for any services when they are guaranteed free of charge under the new act?
Governments have special responsibility when considering populist schemes with large recurring costs attached to them. Towards the end of their tenure, if expecting to be voted out of power, there may be extra temptation for such schemes in the hope of turning likely defeat into victory. But the temptation must be resisted in the larger interest of the citizenry.
Date:11-04-23
Bringing the Edges Closer to the CentreET Editorials
New Delhi is being smart as it makes the right moves to bring the ‘periphery’ to its ‘centre’. If GoI’s Vibrant Villages Programme that was kicked off on Monday from Kibithoo, a border village in Arunachal Pradesh, is meant to send a message to Beijing, it is also a timely move per se to bring infrastructural heft and mainstream opportunities to India’s edges. The frame, after all, holds the whole picture.
Infra-building in relatively neglected areas is a critical part of nation-building and -maintaining that bears strategic as well as developmental intent. Claiming Indian territory as its own — and inventing place names while at it — has been SOP for Beijing. The periodicity of these claims has only increased with Xi Jinping’s aggressive foreign policy coming at the same time as India’s growing global role. The push of border security is now being matched with the pull of developmental seriousness. Reversing this neglect of border areas gives India a different, positive take on the term ‘deep state’. Decades of neglect has pushed locals to leave home in search of jobs and opportunities undermining an organic system of life. Relevant state governments would do well to help implement this centrally sponsored scheme properly to create economic opportunities, ensure basic services and create linkages with other parts of the state and country.
Done properly with local participation in the 2,967 villages in 46 blocks across 19 districts in four states and one Union territory, this push will contribute a stronger — and, indeed, happier — border, and ensure that those living in these areas are equal partners and beneficiaries of India’s economic growth and development. Undisputed territories indisputably need that kind of attention.
Date:11-04-23
Right lessonsWider, transparent consultations are needed in shaping the curriculumEditorial
The arbitrary and surreptitious deletion of several portions from various textbooks by the NCERT betrays bad faith and lack of professionalism but, in the prevailing political climate, it is not entirely surprising. The ruling BJP has made the creation of a new knowledge ecosystem across all fields central to its politics. Among the key deletions, which the NCERT describes as rationalisation of syllabus, are references to the dislike of Hindutva extremists for Gandhi, a ban on the Rashtriya Swayamsevak Sangh after his assassination, entire chapters on the history of the Mughals, references to the 2002 communal riots in Gujarat, the Naxalite movement, the Emergency and discussions on social movements. History texts have been targeted in particular, and 250 historians from leading Indian and foreign universities have pointed out that those who prepared them through a process of consultation and wide-ranging discussions were all kept in the dark. These changes are not limited to school textbooks. The UGC draft syllabus for bachelor-level history has also been altered, “leading to a plainly prejudiced and irrational perception of our past”, according to the Indian History Congress. The NCERT has sought to characterise its failure to be transparent as an “oversight”, but remains firm on the revision.
Knowledge expands continuously, and syllabus revision is essential for a robust education system. What is taught to the younger generation is a collective decision of a society in which formal education is a critical part. The values and ethics of the collective are reflected in education, which evolve over time. In India, education has evolved with an aim to promote national integration, critical thinking, and scientific temper. As any society matures, it might be able to process darker episodes of the past with more equanimity. There is also the question of deciding the appropriate levels at which learners are introduced to various levels of knowledge. For all these reasons, textbooks and pedagogy need to be revised periodically. The trouble is when this exercise is carried out in a politically partisan manner, and in disregard of expertise. It turns out to be toxic when strife, not harmony, is promoted through formal education. India’s growth and development depends almost entirely on educating its bursting young population with vocational and social skills and shaping youngsters into caring citizens of a pluralistic nation. They should learn history with the aim of not repeating its tragedies in order to build a harmonious future. There should be wider, more transparent consultations in shaping the curriculum at all levels.
Date:11-04-23
Burning brightIndia must balance conservation efforts with the rights of forest dwellersEditorial
India’s tiger population in 2022 was at least 3,167 cats, according to the results of the quadrennial census of the tiger population. The previous such exercise, in 2018, estimated the number to be 2,967. There is a fair chance that the 2022 numbers may be revised upwards as a full analysis of the census numbers remains to be done. Being the 50th year of Project Tiger, it is notable that governments, since 1973, have consistently devoted attention to ensuring that tigers — generally vulnerable to environmental degradation and extinct in several countries — continue to populate India’s forests. Being able to ensure an increase in tiger numbers without relying on fenced reserves and by engaging the participation of forest-dwelling communities in conservation are distinct traits of India’s big cat conservation approach. However, this does not mean that tiger numbers are ordained to grow in perpetuity. The ‘Status of Tiger’ report warns that all of India’s five main tiger zones, while largely stable, face challenges of deforestation and loss of tiger habitat. The Western Ghats, while one of the most biodiverse spots globally, also hosts some of India’s most populous tiger reserves. In 2018, 871 unique tigers were photographed, but this time, only 824 were captured. Over the years, there is an increasing presence of tigers outside protected reserves. In the case of the Western Ghats, however, these numbers are on the decline, with only populations within protected forests stable, the report says.
From nine tiger reserves in 1973 to 53 today, the increase in numbers has not translated to all of these reserves becoming suitable habitats for tigers. Serious conservation efforts are needed to help, for instance, tiger population recovery in Jharkhand, Odisha, Chhattisgarh, Telangana, and Andhra Pradesh. Wildlife habitats here face various threats that include habitat encroachment, hunting, conflicts with humans, unregulated cattle grazing, excessive harvesting of non-timber forest products, fires, mining, and expanding infrastructure. Experts have said India’s reserves, in their present state, ought to be able to sustain populations of up to 4,000, and with expanded efforts at improving fledgling reserves, these numbers can increase. But, care has to be taken to maintain the delicate balance between making the ground fertile for conservation and keeping the rights of forest-dwelling communities intact. Showcasing conservation efforts ought not to come at the expense of ensuring the right to livelihood and dignified living of communities, who often live the closest to these majestic wild creatures. The cheetah, the leopard, the lion and the tiger can co-exist in India only with the right incentives in place for all stakeholders.
Date:11-04-23
दूध को लेकर केंद्र सरकार पसोपेश मेंसंपादकीय
इधर देश में दूध के दाम लगातार बढ़े हैं। लम्पी वायरस से एक लाख 86 हजार पशुओं की मौत से इस वर्ष दुग्ध उत्पादन स्थिर है। उधर जनता में दूध की मांग बढ़ी है। केंद्र ने ऐलान किया कि जरूरत हुई तो दुग्ध उत्पादों खासकर घी और मक्खन का आयात किया जाएगा। विपक्षी नेता शरद पवार ने इसका जबरदस्त विरोध करते हुए कहा कि इससे देश के दुग्ध उत्पादक किसानों का बड़ा अहित होगा क्योंकि दाम गिर जाएंगे। उधर सरकार की दुविधा यह है कि आम चुनाव आ रहे हैं। महंगाई दर्शाने वाले उपभोक्ता सूचकांक में दूध और दूध के उत्पादों का वजन 6.61% है यानी अगर कीमतें और बढ़ीं तो महंगाई मध्यम वर्ग को नाराज करेगी। लेकिन अगर दूध की कमी और उत्पादन लागत बढ़ने से कीमतें और ऊपर गईं तो इसे रोकने के लिए आयात करना ही एकमात्र रास्ता होगा। यानी सत्ता पक्ष के लिए एक तरफ विशाल मध्यम वर्ग (जिसमें ज्यादा शहरी आबादी है) है, तो दूसरी तरफ देश के 62% किसान, जिनकी आय आयात होने से गिरेगी। दरअसल देश में डेयरी उद्योग को लेकर दीर्घकालीन योजना न होना एक बड़ा कारण है। शहरीकरण और गांवों में भी बढ़ती जनसंख्या के कारण कृषि भूमि पर दबाव है और चरागाह खत्म होने लगे हैं। एनएसएसओ के सर्वे के अनुसार एक औसत किसान की आय जहां खेती से लगातार घट कर मात्र 37% रह गई है और मजदूरी से बढ़कर 40% पहुंच गई है, वहीं पशुपालन एक आशा की किरण है, जिससे वह आय का 16% हासिल करता है। भारत आज दूध की दुनिया में सबसे बड़ा उत्पादक होते हुए भी आयात करने को मजबूर इसलिए है कि गो-संवर्धन की नीति लचर है।
Date:11-04-23
तकनीकी बदलावसंपादकीय
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) यानी कृत्रिम मेधा को व्यापक रूप से अपनाए जाने की स्थिति में न केवल उत्पादकता में सुधार होता है बल्कि रोजगार के रुझान में भी बड़ा परिवर्तन देखने को मिलता है। हाल ही में गोल्डमैन सैक्स द्वारा कराए गए एक अध्ययन में कहा गया है कि कुल वैश्विक रोजगार का 18 फीसदी यानी करीब 30 करोड़ रोजगार एआई से प्रतिस्थापित किए जा सकते हैं। ऐसा होने से अगले 10 वर्ष में वैश्विक उत्पादकता में 1.5 प्रतिशत अंकों की बढ़ोतरी होगी। एक दशक में यह राशि 7 लाख करोड़ डॉलर के बराबर होगी। हालांकि भारत ऐसे देशों में शामिल होगा जहां रोजगार पर अपेक्षाकृत कोई खास असर नहीं होगा, लेकिन हमारे यहां उत्पादकता लाभ भी कम होंगे। उत्पादकता वृद्धि केवल 0.7 फीसदी अंक हो सकती है जबकि भारत के कुल काम में 11-12 फीसदी स्वचालित हो सकता है।
इसका असर मुश्किल में डालने वाला हो सकता है। एक नई तकनीक से हासिल होने वाला कम उत्पादकता लाभ निराशाजनक हो सकता है जबकि रोजगार के अवसरों में 11-12 फीसदी की कमी का भी गहरा असर होगा। ऐसा इसलिए कि बेरोजगारी पहले ही काफी अधिक है। इसके बावजूद मौजूदा नीतिगत प्रतिक्रिया समझदारी भरी नजर आती है। हालांकि व्यापक रूप से एआई को अपनाने के राजनीतिक असर को देखते हुए इस पर सीमित नीतिगत जोर को कम करके आंका जा रहा हो। केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिकी एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्री अश्विनी वैष्णव ने हाल ही में संसद को बताया कि सरकार की फिलहाल एआई के इस्तेमाल को लेकर वृद्धि संबंधी नियमन या कानून बनाने जैसी कोई मंशा नहीं है। हालांकि उन्होंने इससे जुड़े जोखिम और नैतिक चिंताओं को स्वीकार करते हुए कहा कि सरकार ने जवाबदेह कृत्रि मेधा के मानकीकरण तथा बेहतर व्यवहार को अपनाने को लेकर प्रयास शुरू कर दिए हैं। गोल्डमैन सैक्स के अध्ययन में जेनरेटिव एआई मसलन चैट जीपीटी आदि पर ध्यान केंद्रित किया गया है जिसने इसके काम के दायरे को बहुत अधिक बढ़ा दिया है। विभिन्न भाषाओं, स्वर और वीडियो आदि में सहज भाषाई निर्देशों की बदौलत इंसानों के समान सामग्री तैयार कर पाने की क्षमता के कारण जेनरेटिव एआई का उपयोग करना आसान है। इसके अलावा अध्ययन में खालिस अंकेक्षण क्षमता में हुए भारी इजाफे का भी हवाला दिया गया जो एआई द्वारा अपनाए जाने वाले जटिल कामों के तेज लाभ को सक्षम बनाता है।
विभिन्न सरकारी विभागों तथा अदालतों में होने वाले लिपिकीय काम का बड़ा हिस्सा स्वचालित तरीके से किया जा सकता है लेकिन इसके चलते कई स्थायी रोजगार समाप्त हो जाएंगे। जेनरेटिव एआई का अलगोरिद्म पहले ही तस्वीरों के वर्गीकरण तथा पाठ करने में मनुष्यों के औसत कौशल को पार कर चुका है। अध्ययन में कहा गया है कि एआई आधारित स्वचालन का भारत पर न्यूनतम असर होगा। यह केन्या, वियतनाम, नाइजीरिया, चीन और थाईलैंड से ऊपर है। वहां 11 से 16 फीसदी काम प्रभावित होगा। सबसे अधिक असर हॉन्गकॉन्ग पर होगा और उसके बाद इजरायल, जापान, स्वीडन, अमेरिका और ब्रिटेन का स्थान आता है। इन देशों में 25 से 30 फीसदी काम स्वचालित हो सकते हैं। विकसित देश इससे अधिक प्रभावित होंगे जहां दो तिहाई तक काम किसी न किसी हद तक स्वचालित होंगे।
अमेरिका और यूरोप का विस्तार से विश्लेषण करने पर पता चलता है कि 46 फीसदी कार्यालयीन और प्रशासनिक काम, 44 फीसदी विधिक काम और 37 फीसदी वास्तु एवं इंजीनियरिंग काम स्वचालित किए जा सकते हैं। इनमें से आखिरी आंकड़ा वाकई दिलचस्प है क्योंकि ये कौशल वाले रचनात्मक कार्य हैं जहां जटिल गणितीय आकलन तथा रेखांकन आदि की जरूरत होती है। अगर नियामकीय बंदिशें नहीं लगाई जाती हैं तो इससे भारत को एआई आधारित क्षमताएं विकसित करने में मदद मिलेगी। बहरहाल, एआई की अपरिहार्यता को देखते हुए जरूरत इस बात की है कि नीतियों को सक्रिय बनाया जाए। देश की आईटी श्रम शक्ति को प्रेरित किया जाना चाहिए कि वह एआई को लेकर शोध करे, नीति निर्माताओं को उत्पादकता बढ़ाने पर जोर देना चाहिए और वैकल्पिक रोजगार अवसर तैयार करने चाहिए। चूंकि बड़ी कंपनियां भारत में अपने क्षमता केंद्र स्थापित कर रही हैं इसलिए भारत के लिए भी अवसर है कि वह इस तकनीकी बदलाव का लाभ ले।
Date:11-04-23
बाघ का जीवनसंपादकीय
कुछ साल पहले तक देश में बाघों की कम संख्या को लेकर चिंता जताना एक तरह से सिलसिला बन गया था। इसके मद्देनजर बाघों के संरक्षण के लिए भी विशेष और लक्ष्य आधारित कार्यक्रम चलाए गए। शायद व्यापक स्तर पर किए गए लगातार प्रयासों का ही यह नतीजा है कि एक ताजा रिपोर्ट में बाघों की संख्या को लेकर आए नए आंकड़े पर काफी राहत महसूस की जा रही है। प्रधानमंत्री ने रविवार को बाघ परियोजना के पचास साल पूरे होने पर एक रिपोर्ट जारी की, जिसके मुताबिक 2022 में देश में बाघों की संख्या तीन हजार एक सौ सड़सठ दर्ज की गई है, जबकि 2018 में यह संख्या दो हजार नौ सौ सड़सठ थी। यानी चार साल के दौरान बाघों की तादाद में दो सौ की बढ़ोतरी हुई। जाहिर है, इस पशु के जीवन के सामने जिस तरह के संकट मंडरा रहे हैं, उसमें इसके संरक्षण को लेकर किए गए उपायों से अब इसकी आबादी में लगातार इजाफा हो रहा है और चिंता के बरक्स एक स्तर पर संतोषजनक कामयाबी मिली है।
यों भी सांस्कृतिक दृष्टि से देखें तो प्रकृति की रक्षा करना भारत में आम जनजीवन का हिस्सा रहा है। रिपोर्ट जारी करने के मौके पर प्रधानमंत्री ने भी इसका जिक्र किया। लेकिन पर्यावरण में होने वाले उतार-चढ़ावों के समांतर बढ़ती इंसानी आबादी के साथ रिहाइशी इलाकों के विस्तार की वजह से अनेक जंगली पशुओं के प्राकृतिक आवास का दायरा सिमटा और उनका सामान्य जीवन बाधित हुआ। मैदानी इलाकों में बाढ़ जैसी कई वजहों से भी घास के मैदानों पर आफत के साथ हिरणों की आबादी में कमी आई और इसका सीधा असर वन्यजीवों की खाद्य शृंखला पर पड़ा। इसका मुख्य खमियाजा पहले से ही संकट में पड़े बाघों को ज्यादा भुगतना पड़ा। हालांकि बाघों के जीवन पर यह संकट भारत के अलावा दुनिया भर में चिंता का कारण बना है। इसलिए बाघों को बचाने के मामले में विश्व स्तर पर पर्यावरणविदों के बीच व्यापक सहमति बनी। इन्हीं प्रयासों के तहत ‘इंटरनेशनल बिग कैट्स अलायंस’ यानी आइबीसीए बनी, जिसमें ऐसे देश शामिल हैं, जहां इस प्रजाति के सात पशु- बाघ, शेर, तेंदुआ, हिम तेंदुआ, पुमा, जगुआर और चीता पाए जाते हैं। जहां तक भारत का सवाल है तो देश में कुल तिरपन बाघ संरक्षित क्षेत्र हैं, जहां लगभग तीन चौथाई बाघों की भिन्न प्रजातियां रहती हैं।
गौरतलब है कि करीब पांच दशक पहले जब बाघ संरक्षण को लक्षित इस परियोजना की शुरुआत की गई थी, तब हालत थी कि ‘बड़ी बिल्ली’ प्रजाति में गिने जाने वाले इस पशु की संख्या इतनी कम थी कि इसके खत्म होने की आशंका जताई जाने लगी थी। लेकिन इस परियोजना पर अमल के बाद भारत ने न सिर्फ बाघों को बचाया है, बल्कि उसकी आबादी में विस्तार के लिए बेहतरीन पर्यावरण तैयार किया। सन 2006 में तो बाघों की गिनती महज एक हजार चार सौ ग्यारह रह गई थी और तब इस मसले पर उपजी चिंता के बाद सरकार की ओर से ज्यादा गंभीर और व्यवस्थित प्रयास शुरू हुए। उसके बाद हर चार साल के अंतराल के आंकड़ों में इसकी संख्या में तेजी से सुधार होता गया। अब नए आंकड़ों में बाघों की गिनती तीन हजार से ऊपर पहुंच जाने के बाद कहा जा सकता है कि देश में इस पशु के संरक्षण के लिए लागू योजना के तहत संतोषजनक उपलब्धि हासिल की जा सकी है। मगर यह ध्यान रखने की जरूरत है कि पर्यावरण से लेकर पर्यावास तक के मामले में बाघों का जीवन जिस तरह स्थानीय परिस्थितियों से अभिन्न है, उसे संतुलित बनाए रखना जरूरी है, ताकि लंबे समय में हासिल इस राहत को कायम रखा जा सके।
Date:11-04-23
सुशासन में सहयोगी तकनीक संरचनासुशील कुमार सिंह
नागरिक केंद्रित व्यवस्था में सुशासन के लिए तैयार डिजिटल अवसंरचना एक महत्त्वपूर्ण स्थान ले चुकी है। ई-गवर्नेंस एक ऐसा क्षेत्र और साधन है, जिसके जरिए नौकरशाही का समुचित प्रयोग करके व्यवस्था की कठिनाइयों को समाप्त किया जा सकता है। इसके अलावा, आनलाइन सेवा देकर सीधे और बिना रुकावट के कार्य संस्कृति को बनाए रखना आसान है। अब देश की विकास यात्रा कमोबेश डिजिटलीकरण पर निर्भर है। ऐसे में डिजिटल अवसंरचना को मजबूत बनाना न केवल समय की मांग, बल्कि आम आदमी तक पहुंच बनाने का सशक्त जरिया है। बशर्ते आम आदमी समावेशी और बुनियादी विकास की चुनौतियों से मुक्त होकर सुजीवन की राह पर हो। गौरतलब है कि एक मजबूत आधारभूत डिजिटल ढांचे से उत्पादकता बढ़ा कर जीवन की गुणवत्ता में वृद्धि करने वाली सेवाओं को समुचित किया जा सकता है। ई-सुविधा, ई-अस्पताल, ई-याचिका और ई-अदालत जैसे कई ऐसे फलक हैं, जिनसे सुशासन को ऊंचाई देना संभव है।
गौरतलब है कि इलेक्ट्रानिक सेवा (ई-सेवा) 1999 में आरंभ किए गए ‘ट्विन्स प्रोजेक्ट’ का ही परिवर्द्धित संस्करण है, जिसे भुगतान की बुनियादी सेवाओं के लिए हैदराबाद-सिंकदराबाद युगल शहरों में शुरू किया गया था, जो अब पूरे देश में फैल चुका है। गौरतलब है कि डिजिटल अवसंरचना तकनीक, नेटवर्क, तंत्र और प्रक्रियाओं का एक ऐसा संग्रह है, जो मानव घटकों के साथ मिलकर सूचना प्रणाली को सुदृढ़ बनाने में मदद करता है। जाहिर है, इसका विकास इंटरनेट जैसी व्यापक और सघन संरचना से ही संभव है। भारत की 140 करोड़ की आबादी में लगभग अस्सी करोड़ की इंटरनेट तक पहुंच है। अनुमान है कि 2025 तक यह आंकड़ा नब्बे करोड़ हो जाएगा। भारत में डिजिटल संपर्क को बढ़ावा देने की दिशा में व्यापक प्रयास किए गए हैं। मगर अभी सभी तक इसकी पहुंच संभव नहीं हुई है, ऐसे में ई-गवर्नेंस में निहित सुशासन सामाजिक-आर्थिक विकास की दृष्टि से और सुधार की बाट जोह रहा है।
डिजिटल भुगतान जैसी पहल ने वित्तीय सेवाओं को अधिक समावेशी और किफायती बना दिया है। वस्तु एवं सेवा कर इसी डिजिटल अवसंरचना के माध्यम से संग्रह के मामले में नित निए कीर्तिमान बना रहा है। ई-कामर्स के क्षेत्र में हो रही वृद्धि इसी संरचना का एक और उदाहरण है। डिजिटल प्रौद्योगिकी के उपयोग से ई-कामर्स राजस्व वर्ष 2017 के उनतालीस अरब अमेरिकी डालर से बढ़ कर वर्ष 2020 में एक सौ बीस अरब डालर हो गया था। कृषि बाजार और ग्रामीण कृषि बाजार की आधारभूत कमियां भी इसी के चलते काफी हद तक दूर हुई हैं। देश भर में लगभग बाईस हजार ऐसे ग्रामीण कृषि बाजार संचालित हैं, जो किसानों को स्थानीय स्तर पर अपनी उपज बेचने में मदद करते हैं।
हालांकि इस अवसंरचना का लाभ सभी किसानों तक तभी पहुंचेगा, जब उनकी आर्थिक स्थिति बेहतर होगी। राष्ट्रीय स्वास्थ्य पोर्टल, नेशनल टेलीमेडिसिन नेटवर्क और ई-अस्पताल समेत आनलाइन पंजीकरण प्रणाली ने स्वास्थ सेवा की दिशा में कार्य को सरल बनाया है। गौरतलब है कि सार्वजनिक अस्पतालों में आनलाइन पंजीकरण, शुल्क का भुगतान, रक्त उपलब्धता की जानकारी आदि जैसी सेवाओं की शुरुआत 2015 में हो गई थी। डिजिटल अवसरंचना का शिक्षा के क्षेत्र में भी योगदान बहुत तेजी से बढ़ा है। ‘स्वयंप्रभा’ बत्तीस राष्ट्रीय चैनलों के माध्यम से शैक्षणिक ई-सामग्री का प्रसारण करने वाला एक कार्यक्रम है और ‘ई-पाठशाला’ भी इसी से जुड़ा एक महत्त्वपूर्ण मंच है। नेशनल डिजिटल लाइब्रेरी में पैंसठ लाख से अधिक पुस्तकें उपलब्ध हैं। यह अंग्रेजी समेत तमाम भारतीय भाषाओं की पुस्तकों तक निशुल्क पहुंच प्रदान करती है। कोविड-19 के समय ई-शिक्षा कारोबार को भी बढ़ावा मिला। ‘आडिट ऐंड मार्केटिंग’ की शीर्ष एजेंसी केपीएमजी और गूगल की ‘भारत में आनलाइन शिक्षा 2021’ शीर्षक से जारी रिपोर्ट में 2016 से 2021 के बीच ई-शिक्षा का कारोबार आठ गुना बढ़ने की बात कही गई थी।
गौरतलब है कि 2016 में ई-शिक्षा कारोबार महज पच्चीस करोड़ डालर का था, जबकि 2021 में यह दो अरब डालर तक पहुंच गया। जाहिर है, डिजिटल अवसंरचना के बगैर यह आंकड़ा संभव नहीं था। इस दिशा में उत्तरोत्तर वृद्धि जारी है। अब तो डिजिटल विश्वविद्यालय भी तेजी से बढ़ रहे हैं। हालांकि जब तक देश में बुनियादी समस्याएं व्याप्त रहेंगी, डिजिटल अवसंरचना के बावजूद आम आदमी में बड़ा सुधार संभव नहीं होगा। ताजा आंकड़े बताते हैं कि भारत वैश्विक भूख सूचकांक में 107वें स्थान पर है। उन्नीस करोड़ लोग भुखमरी के कगार पर और सत्ताईस करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे हैं। 2011 की जनगणना के अनुसार हर चौथा व्यक्ति अशिक्षित है। बेरोजगारी और महंगाई का लगातार बढ़ते रहना इस बात का सूचक है कि आम आदमी को डिजिटल अवसंरचना और ई-गवर्नेंस समेत सुशासन का व्यापक लाभ नहीं मिल पा रहा है।
भारत में 2006 में राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस योजना का अनावरण किया गया था। इस नीति के अंतर्गत सेवाओं को वेब-सक्षम बनाया गया। डिजिटलीकरण की प्रक्रिया को तेज करने के लिए सार्वजनिक निजी भागीदारी पर जोर दिया गया। इसके बावजूद डिजिटल अवसंरचना के मार्ग में अनेक चुनौतियां अब भी व्याप्त हैं। विषम और दुर्गम क्षेत्रों में जनसंख्या के कम घनत्व और प्राकृतिक बाधाओं के चलते इंटरनेट का न पहुंच पाना डिजिटल सुविधा में रुकावट है। ग्रामीण क्षेत्रों में अब भी इंटरनेट तक सीमित पहुंच इसमें बड़ी बाधा है। भारत में ढाई लाख पंचायतें, साढ़े छह लाख गांव और लगभग सात सौ जिले हैं, जहां कोई न कोई स्थानीय समस्या बाधक है। कुशल कामगारों, इंजीनियरों और प्रबंधकों के आभाव में डिजिटल जुड़ाव को मजबूत ढांचा दे पाना पूरी तरह संभव नहीं है। साइबर सुरक्षा संबंधी चिंताएं भी बनी हुई हैं।
डिजिटल अवसंरचना के क्षेत्र में मानकीकरण का भी लगभग आभाव है। इसमें तकनीकी बदलाव की दरकार आए दिन बनी रहती है। गौरतलब है कि 10 फरवरी, 2023 को भारत के साथ दक्षिण एशियाई देशों के समूह आसियान की डिजिटल मंत्रियों की तीसरी बैठक का आयोजन हुआ था। उसमें साइबर सुरक्षा में कृत्रिम बुद्धिमत्ता का उपयोग तथा अगली पीढ़ी की स्मार्ट सिटी और ‘सोसायटी 5.0’ में ‘इंटरनेट आफ थिंग्स’ के प्रयोग को बढ़ावा देने की बात निहित थी।
सुशासन, ई-शासन और डिजिटलीकरण का ताना-बाना एक समूची व्यवस्था का परिचायक है। भारत को हाईस्पीड ब्राडबैंड के निर्माण पर ताकत लगाने के साथ-साथ डिजिटल अवसंरचना को सशक्त करने की आवश्यकता है। रोचक यह भी है कि 2018 में भारत में साफ्टवेयर निर्माण करने वाले लोगों की संख्या अमेरिका से अधिक थी। तकनीक, संसाधन और धन के अभाव में भारत का युवा सक्षम उद्यमशीलता को हासिल कर पाने में कठिनाई महसूस कर रहा है। अगर इन्हें आधारभूत संरचना उपलब्ध कराई जाए, तो डिजिटल अवसंरचना को बड़ी ताकत में बदला जा सकता है और आत्मनिर्भर भारत की अवधारणा को बल मिल सकता है।
इंटरनेट की गति, नेटवर्क की सुरक्षा और कौशल से ही डिजिटल अवसंरचना को बड़ा किया जा सकता है, जिसके चलते ई-गवर्नेंस को भी व्यापक स्वरूप मिलेगा। सरकार का काम आसान होगा, जनता का हित सुनिश्चित करना संभव होगा, साथ ही भ्रष्टाचार, जो विकास की जड़ में मट्ठा डालने का काम कर रहा है, उससे भी उबरने का मौका मिलेगा। मगर यह सब बिना जनता को मजबूत किए, संभव नहीं होगा। पहले समावेशी ढांचे को फौलादी बनाया जाए, तब कहीं डिजिटल ढांचा बुलंदी को प्राप्त करेगा और बिना बुलंद डिजिटल ढांचे के प्रतिस्पर्धा से भरे विश्व में स्वयं को प्रथम बनाए रखना संभव नहीं होगा।
Date:11-04-23
बढ़ी जंगल की शानसंपादकीय
भारत पारिस्थितिकी और अर्थव्यवस्था के बीच संघर्ष में विश्वास नहीं करता बल्कि इन दोनों के बीच सह-अस्तित्व को महत्व देता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र का यह कथन देश में बाघों के अस्तित्व के लिए कितना आश्वस्तकारी साबित हुआ है यह रविवार को सारी दुनिया ने महसूस किया। जब दुनिया ने यह देखा कि अपने अस्तित्व के लिए जूझते बाघों की संख्या में भारत में खासी वृद्धि हुई है। वन्यजीवों की सुरक्षा एक सार्वभौम मुद्दा है। समस्त देश ‘बिग कैट’ प्रजातियों के संरक्षण एवं सुरक्षा को लेकर गंभीर हैं। ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ के 50 साल पूरे होने के अवसर पर एक कार्यक्रम में मोदी ने इंटरनेशनल बिग कैट अलायंस (आईबीसीए) की शुरुआत की। भारत में 2022 में बाघों की संख्या 3,167 थी । पचास साल पहले लुप्त प्रायः जंगल के इस राजा की प्रजाति में यह उल्लेखनीय वृद्धि पूरे देश के लिए गर्व की बात है। देश में 2006 में बाघों की संख्या 1411, 2010 में 1706, 2014 में 2,226, 2018 में 2,967थी जो 2022 में बढ़कर 3, 167 हो गई है। प्रधानमंत्री ने कहा कि ‘प्रोजेक्ट टाइगर’ की सफलता न सिर्फ भारत, बल्कि पूरी दुनिया के लिए गर्व का विषय है। भारत ने न सिर्फ बाघों को बचाया है, बल्कि उनकी आबादी बढ़ने के लिए अनुकूल पारिस्थितिकी भी तैयार की । भारत ऐसा देश है जहां प्रकृति की रक्षा करना हमारी संस्कृति का हिस्सा है।वन्यजीवों के फलने फूलने के लिए पारिस्थितिकी का फलना फूलना महत्वपूर्ण है। भारत में यही हो रहा है। वन्यजीवों का संरक्षण सिर्फ एक देश का नहीं है बल्कि वैश्विक मुद्दा बन गया है। प्रधानमंत्री का कहना था कि चीते दशकों पहले भारत में विलुप्त हो गए थे। नामीबिया और दक्षिण अफ्रीका से चीतों को भारत लाया गया। यह विदेशों से चीतों का पहला सफल स्थानांतरण था। अब ये मध्य प्रदेश के कुनो राष्ट्रीय उद्यान में फल फूल रहे हैं। मादा चीतों ने चार शावकों को भी जन्म दिया है। बाघ जैसा शानदार जीव आज अवैध शिकार के कारण खतरे में है। जुलाई 2019 में प्रधानमंत्री ने ‘वैश्विक नेताओं के गठबंधन’ का आह्वान किया था और एशिया में अवैध शिकार एवं अवैध वन्यजीव व्यापार पर दृढ़ता से अंकुश लगाने की बात कही थी। आईबीसीए की शुरुआत इसी पहल का नतीजा है। इससे भारत ही नहीं पूरी दुनिया में बाघों की रक्षा होगी।
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हाल ही में भारत-अफ्रीका की दस दिवसीय फील्ड ट्रेनिंग एक्सरसाइज संपन्न हुई है। यह अफ्रीका के साथ रक्षा क्षेत्र में भारत का पहला ऐसा अभ्यास है। इसके साथ ही मध्यम और लघु उद्योगों को सहयोग देने के लिए अफ्रीकी संघ के साथ एक समझौता किया गया है।
अभी तक अफ्रीका में भारत के प्रयास कम रहे हैं। लेकिन विकास और प्रगति की इस साझेदारी से संबंधों के बेहतर होने की उम्मीद की जा सकती है।
‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 21 मार्च, 2023
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Date:10-04-23
The Politics Of DeletionWriting, or revising, any textbook is an official statement made by the state, and thus invariably an ideological project, whether or not ‘pressure is eased’ on students.Hilal Ahmed, [ The writer is associate professor, CSDS. ]
The public debate on the revision of NCERT textbooks, especially the deletion of a few crucial references and sections related to the Mughal era, seems to follow an expected trajectory.
NCERT has taken the official line arguing that such revisions are made to reduce the burden on students so as to make the curriculum “learner-friendly”. This technical explanation has been criticised by non-BJP parties and liberal intelligentsia. In a statement last week, around 250 historians criticised the “selective dropping of chapters…” exposing “the non-academic partisan agenda of the regime”, saying that “there was no attempt to consult members of the team that prepared the textbooks”.
It is argued that the revision of history textbooks is politically motivated, which underlines the ideological unease of Hindutva with Mughal rule. The historians’ statement said that the deletions had as backdrop “the larger ideological agenda of misconstruing the history of the people of the Indian subcontinent”. These claims are not entirely new. The NCERT has revised the textbooks in 2017 and 2019, at both times citing the same technical justification. The secular critique of Hindutva history is also well-known.
The textbook controversy, however, has an interesting politics of its own. Educationists such as Krishna Kumar and Manish Jain who have worked extensively on the history of textbooks in South Asia remind us that textbook writing is a complex intellectual project. A textbook makes a definitive mark on a young mind and helps him/her explore the world of knowledge. Thus, the writing of, or revision and deletion from, any textbook cannot entirely be reduced to administrative technicalities. Textbooks are the official statement made by the state, and precisely in this sense, it is an ideological project.
The revision of history and political science textbooks, in any case, are more sensitive. These subjects encourage students to reflect on issues of contemporary relevance. They are also taught to historicise social and political phenomena in such a way that a logical coherence between the past and the present can be established. This pedagogical expectation poses a challenge of a different kind. A student is expected toreflect independently on a social and political issue while navigating the textbook. The original NCERT books on history and political science were written to address this challenging task.
The recent revision/deletions, therefore, are problematic because of two very specific reasons. First, books, especially textbooks, are not written in fragments. Every chapter addresses a set of historical political questions in such a way that the learner should be able to understand them in their entirety. At the same time, each chapter is connected to the overall thematic concern of the syllabus. For instance, the chapter on Mughal court provides students a foundation to make sense of the historical realities of medieval India. This historical background eventually provides logical context to the political developments that took place in the later Mughal period: the disintegration of Mughal empire, rise of European powers and eventually the establishment of Company rule. This historical placing sequentially empowers students to make interconnections in different events and episodes to draw their own meanings of the past.
Thus, the argument that deletions are made to ease pressure is misleading and in a way contrary to the basic principles of social science teaching.
This brings us to the second problem with this exercise. The references that were identified as “repetitive” in these books underline a very specific pattern. “Mughal India”, “communal riots”, “Gandhi’s dislikeof Hindu extremists” and “Emergency” are seen as academically undesirable.
These topics have already found a public of their own in the last decade. BJP politicians and ideologue of Hindutva directly or indirectly question the manner in which medieval history has been taught in the country. There have been a few attempts to recorrect these historical “mistakes”.
For instance, the National Monument Authority is seriously considering a proposal to denationalise some of the Monuments of National Importance. It is argued that the conservation of monuments has always been guided by a “slave-mentality”; hence we must review the status of protected sites of national importance. Interestingly, the monuments that are identified as less-important belong to a particular category – mosque, tombs, graveyards.
The concept note prepared by Indian Council of Historical Research (ICHR), “Bharat: Loktantra ki Janani” is another example in this regard. This note was widely circulated to provide a broad overview of the new thematic concern of the government – “India: The Mother of Democracy”.
The note freely uses terms like Hindu mind, Bharat and Bhartiyata interchangeably to create the impression that Hindu, and for that matter, non-Hindu, constitute the prime contradiction of India’s past and present. It also defines non-Hindus as invaders and does not include their contribution to the Indian story of democracy.
The removal of references related to Mughal India in NCERT textbooks, in this sense, is linked to a much wider politics of deletion that is committed to produce a politically driven narrative of fragmented history.
This politics of deletion, however, is based on a negative perception of India’s past and present. It recognises deletion as the only possible mode to appropriate the past as history. For this reason, it is almost impossible for these actors to offer a constructive, inclusive, logical, coherent, and student-friendly version of India’s history. After all, construction is a positive virtue, which the political forces often underestimate.
Date:10-04-23
Project HumanContinued success of tiger conservation & efforts on other big cats depend on keeping people out of forests.TOI Editorials
PM Modi on Sunday launched the International Big Cats Alliance at an event to commemorate 50 years of Project Tiger, one of the most successful stories in the global wildlife conservation movement. The new effort to conserve the world’s seven major cats – tiger, lion, leopard, snow leopard, cheetah, puma and jaguar – will have a positive spin-off on forest conservation. Modi observed that India’s policy approach has been to sidestep framing the issue as an ecology versus economy one. Policy recognises their inter-linkage.
However, if this approach is to be truly meaningful, two laws that enable the coexistence of ecology and the economy need a lot more work. A bill to introduce amendments to the 50-year-old Wild Life (Protection) Act was introduced in Parliament in December 2021. Prior to receiving presidential assent a year later, the bill received inputs from wildlife groups when it was scrutinised by a parliamentary standing committee. Some of those suggestions relating to wildlife corridors should find their way into a newer iteration of this law. Human-animal conflict is a serious problem that can undermine efforts such as Project Tiger. The conflict can be minimised if there’s a more practical approach to limiting human presence in corridors by engaging stakeholders there. Absent their cooperation, the problem can’t be solved.
The Forest (Conservation) Amendment Bill was introduced in the Lok Sabha on March 29. It has far too many exemptions that will open the door to human activity in forests. This will only aggravate human-animal conflict. A general clause in the bill that exempts forests within 100 km of international borders from the purview of the law will endanger areas rich in biodiversity. To build on Project Tiger’s success, we need to protect our forests better. That effort will also rub off on the economy.
Date:10-04-23
Unease of Doing Parliament BusinessET Editorials
A parliamentary democracy where Parliament is barely functional doesn’t speak well of a democracy, no matter its credentials as the largest in the world. The Budget session that ended last week is the least productive in the last five years. Instead of the 133. 6 scheduled hours, Lok Sabha worked 45. 9 hours. Rajya Sabha worked 32. 3 of its 130 scheduled hours. Parliament was routinely disrupted with the post-recess session reduced to a slugfest between the treasury benches and Opposition. This unease of doing parliamentary business is shameful.
Discussion is central to democracy, and Parliament is the arenafor it. It is where people’s representatives discuss and debate issues and laws, and ask questions and hold government to account. When Parliament is low on productivity, it is the people who get short-shrifted. Laws get passed without discussion or get held up; government gets away without explaining its policies and actions. This my-way-or-highway approach is not new. But explaining away such unprofessionalism by tu-tu mein-mein simply won’t hold water.
The Business Advisory Committee in both Houses, comprising MPs from all parties in the House, is tasked with inclusion and allocation of time for government and other business. The party in government is vested in ensuring a functioning Parliament as it is critical to their legislative agenda. Reason and argument, not decibel levels, are the measure of parliamentary productivity. With Parliament proceedings freely available in the public domain, people can easily determine those responsible for the dysfunction. Water seeks its own level. The citizenry should demand more from its representatives.
Date:10-04-23
Draconian rulesNew amendment rules on intermediary guidelines amount to censorship.Editorial
With the advent of social media — the product of the evolution of the Internet into a sphere of communication that allows for relatively unfettered user-generated content — the problem of misinformation has taken a grotesque form. Express measures to curb misinformation, called “false news” and the somewhat inaccurate “fake news”, are a must. However, this raises the question whether the Union government or its divisions can be the regulating entity. In the IT (Intermediary Guidelines and Digital Media Ethics Code) Amendment Rules, 2023, the Union government has added a provision of a fact-check unit to identify fake or false or misleading online content related to the government. Against such content identified by this unit, intermediaries, such as social media companies or net service providers, will have to take action or risk losing their “safe harbour” protections in Section 79 of the IT Act, which allows intermediaries to avoid liabilities for what third parties post on their websites. This is unacceptable and problematic. Also, Section 69A of the IT Act, 2000 elucidates the procedure to issue takedown orders, which these notified amendments could bypass. They also run afoul of Shreya Singhal vs Union of India (2015), a verdict with clear guidelines for blocking content.
Without a right to appeal or the allowance for judicial oversight, the government cannot sit on judgment on whether any information is “fake” or “false” as the power to do so can be misused to prevent questioning or scrutiny by media organisations. Takedown notices have been issued by the government for critical opinion or commentary on social media platforms, with several having to comply with them and only a few such as Twitter contesting them in courts. By threatening to remove a platform’s immunity for content that is flagged by a government unit, it is clear that the Union government intends to create a “chilling effect” on the right to speech and expression on online platforms. To keep the establishment — which includes the executive government of the day — on its toes and to speak truth to power is a non-negotiable and salient role of journalism in a democracy. In India, freedom of the press is guaranteed through Article 19 of the Constitution, with media rights and public right to free speech derived from this Article. It stands to reason that any relationship between the government and the media should be one kept at arm’s length, with the media having sufficient freedom. The government being the arbiter on what constitutes “false” or “fake” news and having the power to act upon platforms for publishing these will amount to draconian censorship.
Date:10-04-23
लंबित मामलेसंपादकीय
यह तथ्य सामने आना चकित करता है कि संविधान पीठ में भी कई मामले लंबित हैं। इससे भी हैरान करने वाली बात यह है कि इनमें से कुछ मामले डेढ़-दो दशक पुराने हैं। आम तौर पर संविधान पीठ में वही मामले भेजे जाते हैं, जो व्यापक महत्व के होते हैं। होना तो यह चाहिए कि ऐसे मामले प्राथमिकता के आधार पर सुने और निपटाए जाएं। कोई नहीं जानता कि ऐसा क्यों नहीं हो रहा है। संविधान पीठ में लंबित मामलों के प्रभाव का आकलन केवल उनकी संख्या के आधार पर नहीं किया जा सकता, क्योंकि अनेक ऐसे मामले हैं, जिनका असर निचली अदालतों और उच्च न्यायालयों में चल रहे मामलों पर भी पड़ेगा। संविधान पीठ के समक्ष विचाराधीन मामलों के लंबित रहने का औचित्य इसलिए नहीं बनता, क्योंकि इस समय सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीशों का कोई भी पद रिक्त नहीं है। इससे यही पता चलता है कि पर्याप्त संख्या में न्यायाधीशों के बाद भी मामले लंबित रह सकते हैं। उन कारणों की तह तक जाने की जरूरत है, जिसके चलते न्यायाधीशों की पर्याप्त संख्या भी लंबित मामलों के निपटारे में सहायक नहीं बन पा रही है। इनमें एक कारण तो तारीख पर तारीख का सिलसिला है और दूसरा यह कि सुप्रीम कोर्ट हर मामले को सुनना आवश्यक समझने लगा है।
यद्यपि सुप्रीम कोर्ट की ओर से कई बार यह कहा जा चुका है कि जनहित याचिकाओं की आड़ में उसके पास तमाम फालतू की याचिकाएं आने लगी हैं, लेकिन उसकी ओर से ऐसे कोई उपाय नहीं किए गए हैं, जिससे उसके पास ऐसी याचिकाएं न आएं। इसका परिणाम यह है कि जनहित याचिकाएं दायर किया जाना एक उद्योग का रूप ले चुका है। कुछ वकील, संस्थाएं और समूह ऐसे हैं, जिनका काम ही है नित-नई याचिकाएं दायर करना। यदि सुप्रीम कोर्ट अपना समय और ऊर्जा ऐसी याचिकाओं को सुनने में लगाएगा, जिन्हें उसे नहीं सुनना चाहिए तो फिर वह राष्ट्रीय महत्व के मामलों को सुनने का समय ही नहीं निकाल सकेगा। यह मानने के अच्छे-भले कारण हैं कि वर्तमान में यही हो रहा है और इसी कारण संविधान पीठ के समक्ष लंबित मामलों की संख्या बढ़ गई है। आवश्यक केवल यह नहीं है कि संविधान पीठ में लंबित मामलों के निपटारे में तत्परता दिखाई जाए, बल्कि यह भी है कि अन्य मामलों का निष्पादन भी प्राथमिकता के आधार पर हो। जब तक सुप्रीम कोर्ट अपने समक्ष लंबित मामलों को जल्द निपटाने का काम नहीं करता, तब तक उसकी ओर से निचली अदालतों को ऐसा उपदेश देने का कोई मतलब नहीं कि वे मामलों की सुनवाई तेजी से करें। पहले उसे स्वयं उदाहरण पेश करना चाहिए। ऐसा करके ही वह निचली अदालतों को प्रेरित कर सकता है। अच्छा हो कि सुप्रीम कोर्ट ऐसी कोई व्यवस्था बनाए, जिससे सभी मामलों का निपटारा एक तय समय में हो सके।
Date:10-04-23
इतिहास पर सस्ती राजनीतिहृदयनारायण दीक्षित, ( लेखक उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष हैं )
वास्तविक इतिहासबोध राष्ट्र की विशेष शक्ति होता है। सच्चा इतिहासबोध राष्ट्र बोध जगाता है। बच्चों को वास्तविक इतिहासबोध की शिक्षा देना राष्ट्र राज्य का कर्तव्य है। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान एवं प्रशिक्षण परिषद यानी एनसीईआरटी ने सम्यक विचार के बाद दसवीं, ग्यारहवीं और बारहवीं कक्षा के लिए इतिहास की पुस्तकों का पाठ्यक्रम संशोधित किया है। इस पर विवाद हो गया है। कांग्रेस, माकपा और शिवसेना (उद्धव गुट) सहित कई पार्टियों ने पाठ्यक्रम संशोधन पर कड़ा विरोध किया है। विशेषकर मुगल साम्राज्य, दिल्ली दरबार, अकबरनामा, बादशाहनामा और कुछ राजनीतिक दलों के उदय वाले अंश विवाद का विषय बने हैं। मुगल शासकों और उनके साम्राज्य, पांडुलिपियों की रचना, रंग चित्रण, राजधानियां, दरबार, उपाधियां एवं उपहार, शाही परिवार, शाही मुगल अभिजात वर्ग वाले अंश ठीक ही हटाए गए हैं। मार्क्सवादी इरफान हबीब सहित कई इतिहासकारों ने संशोधन के विरोध में हस्ताक्षर अभियान चलाया है। इसमें वे भाजपा की विचारधारा खोज रहे हैं। मल्लिकार्जुन खरगे का कहना है कि इतिहास को बदलने की कोशिश हो रही है। सच को झूठ और झूठ को सच बताया जा रहा है। सपा सांसद शफीकुर्रहमान बर्क और कपिल सिब्बल भी विरोध जता चुके हैं। माकपा नेता सीताराम येचुरी ने भी एनसीईआरटी के निर्णय को सांप्रदायिक बताया। वहीं, कई शिक्षाविदों और नेताओं ने एनसीईआरटी की पहल का समर्थन किया है। एनसीईआरटी निदेशक ने इस बहस को अनावश्यक बताते हुए कहा कि, ‘विशेषज्ञ समिति ने सिफारिश की थी कि ऐसे अध्यायों को हटाने से बच्चों के ज्ञान पर कोई असर नहीं पड़ेगा। इसलिए एक अनावश्यक बोझ हटाया जा सकता है।’
इतिहास सर्वोच्च मार्गदर्शक होता है। विकृत इतिहास पराक्रमी राष्ट्र के लिए क्षतिकारक होता है। देश में इतिहास के प्रतिष्ठित नायकों की उपेक्षा की बात होती रही है। सुहेल देव और मार्तण्ड वर्मा जैसे प्रेरक व्यक्तित्व इतिहास से बाहर हैं। भारतवासियों पर इतिहास की उपेक्षा के आरोप लगाए जाते रहे हैं। अल बरूनी ने कहा था कि, ‘हिंदू घटनाओं के ऐतिहासिक क्रम पर ध्यान नहीं देते। वे अपने सम्राटों के कालक्रमानुसार वर्णन में लापरवाह हैं। इसी तरह एल्फिंस्टन को सिकंदर के पहले किसी भी घटना का निश्चित समय दिखाई नहीं पड़ता।’ हालांकि, सत्य इतर है। भारत में इतिहास संकलन यूरोप से भिन्न है। गांधीजी भी राजाओं के विवरण को सच्चा इतिहास नहीं मानते थे। उन्होंने ‘हिंद स्वराज’ में लिखा, ‘इतिहास जिस अंग्रेजी शब्द हिस्ट्री का अनुवाद है और जिस शब्द का अर्थ बादशाहों या राजाओं की तवारीख होता है। हिस्ट्री में दुनिया के कोलाहल की ही कहानी है। राजा लोग कैसे खेलते थे। कैसे बैर करते। यह सब हिस्ट्री में मिलता है।’ यह सही नहीं कि भारत के लोग इतिहास की उपेक्षा करते थे। देश में इतिहास संकलन की अपनी परंपरा रही है। अमरकोश के अनुसार इतिहास का नाम ‘पुरावृत्त’ था। विश्वामित्र ने श्रीराम को पुरावृत्त सुनाया था।
बच्चे भारत का भविष्य हैं। उन्हें विरूपित इतिहास पढ़ाना खतरनाक है। इतिहास के पाठों की रचना सतर्कतापूर्वक की जानी चाहिए। एनसीईआरटी का निर्णय इस दृष्टि से महत्वपूर्ण है। आखिर बच्चों को विश्व राजनीति में अमेरिकी दबदबा पढ़ाने का क्या तुक, जबकि यह एक विचार मात्र है। ऐतिहासिक तथ्य नहीं। कथित हिंदू चरमपंथियों की गांधी के प्रति नफरत भी एक कल्पना है। इन्हें हटाना सर्वथा उचित है। बेशक भारत में विविध राजनीतिक विचारधाराएं हैं। सबको अपनी विचारधारा के अनुसार लोकमत बनाने का अधिकार है, लेकिन अपने मन का इतिहास गढ़ना और पढ़ाना अनुचित है। वामपंथी इतिहासकारों ने इतिहास का विरूपण किया है। वैसे भी, एनसीईआरटी का यह कदम पहला नहीं है। वर्ष 2002 में भी इतिहास की विषयवस्तु को लेकर राजनीतिक आरोप लगे। उस समय केंद्र सरकार पर शिक्षा और इतिहास के ‘भगवाकरण’ का आरोप लगाया गया था।
संप्रति मुगल साम्राज्य के अंश हटाने को लेकर बड़ी आक्रामकता है। वस्तुत:, मुगल साम्राज्य का केंद्रीय विचार मजहबी श्रेष्ठता और हिंदुओं के अपमान की व्यथा कथा है। आखिर इसके महिमामंडन का क्या तुक? बाबर श्रीराम जन्मभूमि मंदिर ध्वंस के मुख्य अभियुक्त हैं। अपवाद छोड़कर मुगल साम्राज्य के कालखंड में हिंदू तीर्थ यात्राओं पर भी टैक्स था। मुगल साम्राज्य में हिंदू उत्पीड़न एक तथ्य है, लेकिन वामपंथी इतिहासकारों ने मुगल शासन का मनगढ़ंत तरीके से महिमामंडन किया। औरंगजेब घोर सांप्रदायिक, उत्पीड़क एवं अत्याचारी था। डा. राधाकृष्णन ने ‘धर्म और समाज’ में औरंगजेब द्वारा अपने अध्यापक को लिखे पत्र का उल्लेख किया है, ‘तुमने वस्तुओं के संबंध में अनेक अव्यक्त प्रश्न समझाए। इनका मानव समाज के लिए कोई उपयोग नहीं। तुमने यह समझाने की चेष्टा नहीं की कि शहर पर घेरा कैसे डाला जाता है और सेना को कैसे व्यवस्थित किया जाता है।’ यह पत्र औरंगजेब की हिंसक मनोदशा प्रकट करता है। उसने सगे भाई दारा शुकोह की हत्या कराई। शुकोह की गलती यही थी कि वह भारतीय दर्शन और वेदांत के प्रति उत्सुक था।
इतिहास और वर्तमान का संबंध अविभाज्य है। हम इतिहास के प्रेरक अनुभवों से शक्ति अर्जित करते हैं। भूलों से सीखते हैं। इतिहास सहित सभी विषयों का पुनरीक्षण आवश्यक है। एनसीईआरटी वही कर रही है। वह हर साल पाठ्यक्रम की समीक्षा करती है। अन्य विषयों के पाठ्यक्रम में भी संशोधन हुआ है, मगर मुगलों को लेकर बहुत हायतौबा है। इतिहास के संशोधन का सीधा संबंध बच्चों के भविष्य से जुड़ा है। मूलभूत प्रश्न है कि बच्चे क्या पढ़ें? और क्यों पढ़ें? उन्हें सही इतिहास पढ़ाया जाना चाहिए। इससे वे अपने भविष्य को ज्ञानवान और समृद्ध बनाएंगे। वे राष्ट्र के आधारभूत तथ्यों से परिचित होंगे। राष्ट्र निर्माण का कार्य करेंगे। फर्जी और मनगढ़ंत तथ्यों के आधार पर इतिहास लेखन देश के लिए हानिकारक है। आर्यों को विदेशी बताना भी ऐसा ही तथ्य है। इस पर भी विचार की दरकार है। इतिहास राष्ट्र का मार्गदर्शी होता है, लेकिन उसका सत्य होना अनिवार्य है। विभिन्न राजनीतिक दल एनसीईआरटी के इस निर्णय को राजनीतिक स्वार्थ सिद्धि के लिए ही गलत बता रहे हैं।
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पिछले कुछ समय से चरमपंथियों के सक्रिय होने की खबरें लगातार आ रही हैं। इन मामलों की तेजी को सिख खालिस्तानी अलगाववादी अमृतपाल सिंह की धरपकड़ के समाचारों से समझा जा सकता है। सुरक्षा एजेंसियों ने खुलासा किया है कि इस अलगावादी के तार आईएसआई और इस्लामिक स्टेट से जुड़े हुए हैं।
मामला केवल यहीं तक सीमित नहीं है। पंजाब सरकार ने उच्च न्यायालय में अर्जी लगाई है कि डेरा सच्चा सौदा के प्रमुख राम रहीम को बार-बार पेरोल दिए जाने से पंजाब की जेल में बंद कैदी बंदी सिंह की रिहाई की मांग तेज होने लगी है।
इसी प्रकार, महाराष्ट्र में इस्लाम विरोधी रैलियां बढ़ गयी हैं। पूरे राज्य में सकल हिंदू समाज के नाम से फैले कट्टरपंथी हिंदू समूह ने पुलिस की नाक में दम कर रखा है।
ऐसे मामलों में प्रशासन और पुलिस इंटरनेट को प्रतिबंधित करके फर्जी खबरों को फैलने से रोकने का प्रयत्न करते हैं। लेकिन यह कोई समाधान नहीं है। इतना करने से दोषियों को पकड़ा नहीं जाता। इससे राज्य भर की आर्थिक गतिविधियों को हानि पहुँचती है। प्रतिबंध से सही खबरें भी लोगों तक नहीं पहुंच पाती हैं। इससे लोगों की चिंता बढ़ती है। गलत खबरों को फैलने से रोकने के लिए सरकार को तकनीक के बड़े स्तर पर जाना चाहिए।
अमृतपाल की धरपकड़ का प्रयास जी 20 सम्मेलन के दो दिन बाद शुरू किया गया। इस बीच वह ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों तरह से सक्रिय रहा। इस प्रकार के चरमपंथी धार्मिक संगठनों को अनुमति देने वाले राजनीतिक दल और उनका आदेश मानने को मजबूर पुलिस की यह नीति खतरनाक है। किसी भी व्यक्ति या दल को देश की एकता और अखंडता को तोड़ने की अनुमति नहीं दी जा सकती है। इसकी रक्षा का प्रयत्न करना प्रशासन का कर्तव्य है।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधरित। 21 मार्च, 2023
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Date:08-04-23
Remove Bumps on The Learning CurveET Editorials
Writing a textbook is a challenging task. It requires the author(s) to be able to explain complex issues in a simple and interesting manner without dumbing things down to the lowest-commondenominator level — that, too, to young, impressionable minds. Syllabus reading is about instilling a sense of reasoning, context and ‘truthfulness’. This is especially true of ‘subjective’ subjects like history and political science that are habitually contested by adults (sic). The latest controversy about textbook excisions becomes especially problematic when the very process of syllabus-making seems to be shrouded in opaqueness and fanciful improvisation.
History being the most contentious of subjects — ‘Who controls the past controls the future’ being George Orwell’s operative words from his ‘off-syllabus’ 1949 novel ‘Nineteen EightyFour’ — a better understanding of the past requires bringing different perspectives together within the covers of the textbook, which is not to be confused, or passed on, as a manifesto. In the context of the National Council of Educational Research and Training (NCERT) excisions, the most worrying aspect is not the excisions themselves — they can be put back — but the process by which they were taken out, if any.
What is required of a liberal, open, democratic society — no matter what pointers to past ‘statist censorship’ under various regimes may have been — is to establish and nurture a transparent, dialogue-based process that ensures that any charge of ideological bias, or fashionable ad-hocism pegged to ‘ideology’, is not just avoided but seento be avoided. One must spare young minds the usual whataboutery of contemporary politics and let them learn about the world, with its warts and all. It is hard enough.
Date:08-04-23
नई शिक्षा नीति का फोकस नौकरियों के निर्माण परपंकज बंसल, ( डिजिटल रिक्रूटमेंट प्लेटफॉर्म और वर्क यूनिवर्स के सह-संस्थापक )
भारत के शिक्षा तंत्र की लम्बे समय से यह कहकर आलोचना की जाती रही है कि वह तोता-रटंत की प्रणाली का पालन करता है, उसका पाठ्यक्रम आउटडेटेड है और उसमें शोध व इनोवेशन के ज्यादा अवसर नहीं हैं। इस पृष्ठभूमि में राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2022 एक स्वागतयोग्य कदम है। शिक्षा मंत्री डॉ. धर्मेंद्र प्रधान कहते हैं, नई शिक्षा नीति का ध्यान इस पर केंद्रित है कि स्कूलों में विद्यार्थियों को इस तरह से प्रशिक्षण दें कि उनके रोजगार पाने की सम्भावनाओं में वृद्धि हो। साथ ही भारतीय भाषाओं को भी महत्व दिया जाए। तो देखते हैं मौजूदा परिदृश्य में नई शिक्षा नीति क्या प्रभाव डाल सकती है।
शिक्षा प्रणाली को रीस्ट्रक्चर करना
नई शिक्षा नीति का लक्ष्य भारत की शिक्षा प्रणाली को सिरे से बदलकर उसे उसकी पुरानी परिपाटी से बाहर लाना है। इसके लिए उसे मौजूदा पाठ्यक्रमों में अहम बदलाव करना होंगे, शिक्षा की परम्परागत रीतियों को बदलना होगा और छात्रों में क्रिटिकल-थिंकिंग और समस्याओं को सुलझाने वाले कौशल का विकास करना होगा।
डिजिटल एजुकेशन व स्किल्स पर फोकस
कोविड के दौरान डिजिटल शिक्षा की जरूरत पर सबका ध्यान गया था। यही कारण है कि नई शिक्षा नीति में टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल को महत्व दिया गया है। यह नीति उच्च-गुणवत्ता के डिजिटल संसाधनों- जिनमें ई-बुक्स, ई-कंटेंट और ऑनलाइन कोर्स शामिल हैं- तक सबकी पहुंच सुनिश्चित करने पर ध्यान केंद्रित करती है। वह राष्ट्रीय शैक्षिक प्रौद्योगिकी फोरम नामक एक स्वायत्त संस्था के विकास पर भी जोर देती है। साथ ही उसका फोकस नए जमाने की डिजिटल स्किल्स पर भी है, जिससे विद्यार्थी जॉब-रेडी बन सकें। व्हीबॉक्स के सीईओ निर्मल सिंह के मुताबिक डिजिटल स्किल्स पर फोकस से टीयर-2 और टीयर-3 शहरों में माइक्रो-आंत्रप्रेन्योर्स के सृजन में मदद मिलेगी, जिससे 2030 तक पांच करोड़ अतिरिक्त नौकरियां निर्मित हो सकती हैं।
कौशल-आधारित पाठ्यक्रम
नई शिक्षा नीति उद्योग और शिक्षा के सहयोग के महत्व को समझती है और उनके बीच के अंतराल को पाटने के लिए ऐसे कौशल-आधारित पाठ्यक्रम का विकास करना चाहती है, जो उद्योग-केंद्रित हो। इससे उच्च शिक्षा संस्थान विद्यार्थियों को नौकरियों के लिए तैयार बना सकेंगे। शिक्षा नीति का सुझाव है कि प्रोफेसरों के रूप में इंडस्ट्री-प्रोफेशनल्स और विशेषज्ञों को नियुक्त किया जाए, ताकि कक्षाओं में उनके वास्तविक अनुभवों का लाभ विद्यार्थियों तक पहुंचाया जा सके।
विविधतापूर्ण शिक्षा
नई शिक्षा नीति यह भी प्रस्ताव रखती है कि विद्यार्थियों को वैसी विविधतापूर्ण शिक्षा दी जाए, जिसमें कला, मानविकी, विज्ञान और कौशल-आधारित पाठ्यक्रमों का समावेश हो। सनस्टोर यूनिवर्सिटी के सीईओ आशीष मुंजाल ने एक चर्चा में कहा था कि क्रिटिकल थिंकिंग स्किल्स 21वीं सदी के जॉब-मार्केट में सफल होने के लिए बहुत जरूरी हैं। नई शिक्षा नीति का विज़न यह है कि पेशेवर संस्थानों को 2030 तक उच्च शिक्षा के मल्टीडिसिप्लिनरी संस्थानों में परिवर्तित कर दिया जाए। स्टेम प्रोग्राम्स के अंडरग्रैजुएट्स व पोस्ट-ग्रैजुएट्स को सलाह दी जाती है कि वे अपनी पढ़ाई में 8 से 18 प्रतिशत तक सामाजिक विज्ञानों और मानविकी अध्ययन की शाखाओं का भी समावेश करें, ताकि उन्हें बुनियादी महत्व के विषयों की जानकारी मिले।
चयन-आधारित क्रेडिट प्रणालियां और प्रवेश व निर्गम के एकाधिक विकल्प
नई शिक्षा नीति ने जो चयन-आधारित क्रेडिट प्रणाली और प्रवेश व निर्गम के एकाधिक विकल्पों को सामने रखा है, उससे एक लचीली प्रणाली का विकास हुआ, जो क्रेडिट के ट्रांसफर की सुविधा दे सके और कुछ अनिवार्य व कुछ चयनित विषयों के सामंजस्य से अधिक विकल्प प्रस्तुत करे। मुंजाल कहते हैं, इससे विद्यार्थी अपनी पसंद के कोर्स चुन सकेंगे और अपने कॅरियर के लक्ष्य तय कर सकेंगे। इससे हमारी उच्च शिक्षा प्रणाली अधिक प्रगतिशील बन सकेगी।
रिसर्च और इनोवेशन को बढ़ावा
सरकार एक ऐसा इकोसिस्टम बनाना चाह रही है, जो शिक्षा में उद्यमिता, रचनात्मकता और इनोवेशन को बढ़ावा दे। नई शिक्षा नीति ने एक राष्ट्रीय शोध फाउंडेशन के गठन का प्रस्ताव रखा है, जिसे आगामी पांच वर्षों में 50 हजार करोड़ की वित्तीय मदद दी जाएगी, ताकि भारतीय शिक्षा के विभिन्न क्षेत्रों में रिसर्च को बढ़ावा दिया जा सके।
Date:08-04-23
विराम का अर्थसंपादकीय
भारतीय रिजर्व बैंक के रेपो दरों को अपरिवर्तनीय रखने के फैसले पर कुछ लोगों को हैरानी है। इसलिए कि जिस तरह उपभोक्ता मूल्य सूचकांक पर आधारित महंगाई छह फीसद से ऊपर बनी हुई है और दुनिया के बैंक अपनी ब्याज दरों में लगातार बदलाव कर रहे हैं, उसे देखते हुए उम्मीद की जा रही थी कि भारतीय रिजर्व बैंक भी अपनी दरों में कम से कम पच्चीस आधार अंक की बढ़ोतरी करेगा। मगर रिजर्व बैंक का कहना है कि फिलहाल महंगाई काबू में है, विदेशी निवेश आ रहा है, आर्थिक विकास दर अनुमान के मुताबिक सुदृढ़ बनी हुई है, इसलिए अभी रेपो दरों में किसी प्रकार के बदलाव की जरूरत नहीं है। इस फैसले को रिजर्व बैंक ने विराम बटन दबाना बताया है। यानी आगे स्थितियों के मुताबिक रेपो दरों में बदलाव संबंधी कदम उठाए जाएंगे। रिजर्व बैंक ने दरअसल यह फैसला उद्योग परिसंघ की सलाह पर किया है। इस फैसले से निस्संदेह उन लोगों ने राहत की सांस ली है, जिन्होंने घर, वाहन, कारोबार आदि के लिए बैंकों से कर्ज लिया है। पिछले वित्तवर्ष में महंगाई पर काबू पाने के मकसद से रेपो दरें छह बार बढ़ाई गई थीं। इससे कर्ज लेने वालों पर पहले ही बोझ बढ़ गया है।
दरअसल, रेपो दरों में बदलाव से बाजार में पैसे का प्रवाह प्रभावित होता है। अगर रेपो दरें कम हैं, तो बाजार में पैसे का प्रवाह बढ़ जाता है। ब्याज दरें बढ़ने से लोग खर्च कम करने का प्रयास करते हैं, इस तरह महंगाई पर काबू पाया जा सकता है। रिजर्व बैंक के रेपो दरों में बढ़ोतरी से इस मामले में सकारात्मक नतीजे नजर आए हैं। इसके अलावा जो लोग भविष्य की सुरक्षा के लिहाज से बैंकों में पैसे जमा रखते हैं, उन्हें ब्याज अधिक मिलता है। इस तरह सेवानिवृत्त और वरिष्ठ नागरिकों के लिए ऊंची ब्याज दरें अच्छी मानी जाती हैं। मगर उद्योग जगत के लिए यह अच्छा नहीं होता, क्योंकि उन्हें न सिर्फ कर्ज पर अधिक ब्याज चुकाना पड़ता है, बल्कि उनकी उत्पादन लागत बढ़ जाती है, वस्तुओं की कीमतें बढ़ने से लोग खरीद-फरोख्त कम करते हैं। इस तरह उन पर दोहरी मार पड़ती है। इसलिए उद्योग समूह रेपो दरों को यथावत रखने के पक्ष में था। मगर वैश्विक आर्थिक स्थितियों को देखते हुए यह दावा करना मुश्किल है कि रिजर्व बैंक अपने इस फैसले पर कब तक कायम रह पाएगा।
रिजर्व बैंक ने आर्थिक विकास दर के अपने अनुमान में मामूली बढ़ोतरी कर साढ़े छह फीसद कर दिया है। हालांकि दुनिया की तमाम रेटिंग एजेंसियां इस अनुमान को घटा रही हैं। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने कहा है कि चालू वित्तवर्ष में दुनिया की आर्थिक विकास दर तीन फीसद रहने का अनुमान है। जाहिर है, ऐसी स्थिति में भारत को निर्यात के मोर्चे पर काफी संघर्ष करना पड़ेगा। अभी तो आयात में कटौती करके वह अपना व्यापार घाटा पाटने में सफल रहा है, मगर यह लंबे समय तक व्यवहार में नहीं लाया जा सकता। फिर, जब अमेरिकी फेडरल और दूसरे देशों के बैंक अपनी ब्याज दरें इसलिए बढ़ा रहे हैं कि उनकी बाहर गई पूंजी वापस लौट आए, तो भारत के सामने रुपए की कीमत को स्थिर रख पाने की चुनौती बनी रहेगी। जहां तक महंगाई की बात है, अब भी वह रिजर्व बैंक द्वारा तय सहन क्षमता के मानक से ऊपर है। इसलिए देखने की बात है कि रिजर्व बैंक का यह विराम बटन कब तक दबा रहता है।
Date:08-04-23
सरकार का सही फैसलासंपादकीय
ऑनलाइन गेमिंग पर रोक लगाकर केंद्र सरकार ने वाकई बेहद प्रशंसनीय काम किया है। गुरुवार को इलेक्ट्रिानिक्स व आईटी मंत्रालय ने इस संबंध में अधिसूचना जारी की। अब सभी ऑनलाइन गेम को सेल्फ रेगुलेटरी आग्रेनाइजेशन (एसआरओ) की अनुमति लेनी होगी। यानी सभी ऑनलाइन गेम को अपनी साइट पर यह बताना होगा कि उनकी साइट एसआरओ से मंजूरी प्राप्त है। रमी, तीन पत्ती और फ्री फायर गेम को लेकर विवाद ज्यादा था। ऑनलाइन गेम ने पिछले कुछ वर्षो में आमजन खासकर युवाओं में अपनी पैठ बना रखी थी। एक रिपोर्ट के अनुसार ऑनलाइन गेम्स बच्चों के व्यवहार पर काफी असर डाल रहे हैं। खासकर हिंसक प्रवृत्ति वाले गेम्स मस्तिष्क पर ज्यादा बुरा असर डाल रहे हैं। कई बार ये तथ्य भी प्रकाश में आए कि बच्चे गेमिंग के चक्कर में पैसे चुरा रहे हैं। दरअसल, देश में ऑनलाइन गेमिंग और ऑनलाइन गैंबलिंग के बीच कोई स्पष्ट कानूनी अंतर नहीं है। अधिकांश ऑनलाइन गेमिंग पोर्टल, जिनमें सट्टेबाजी या गैंबलिंग (जुआ) शामिल हैं, वो अपने ऐप या उत्पाद को ‘कौशल वाले खेल’ के तौर पर बतात हैं। देशभर में इसके अभूतपूर्व तरीके से फैल जाने के कारण ज्यादातर राज्य सरकारें ऑनलाइन गेमिंग पर प्रतिबंध लगाने के समर्थन में हैं। तमिलनाडु सरकार का तर्क है कि इन ऑनलाइन सट्टेबाजी खेल में किशोर और वयस्क अपनी पूरी कमाई और बचत का नुकसान कर रहे हैं। इसके कारण वैवाहिक संबंधों में खटास और अलगाव की घटनाओं को रोका नहीं जा सकता है। बहरहाल, इन सबके केंद्र में भारी-भरकम कमाई है। अनुमान है कि वर्ष 2027 तक ऑनलाइन गेमिंग का कारोबार भारत में 8.6 अरब डॉलर तक पहुंच जाएगा। 2022 में ऑनलाइन गेमिंग का कारोबार 2.6 अरब डॉलर से अधिक का है। अलबत्ता, ऑनलाइन गेमिंग को लेकर अस्पष्टता और नीति के अभाव में यह साफ नहीं हो पा रहा था कि किस प्रकार के गेम को इजाजत मिलनी चाहिए और किसे नहीं। कुछ समय पूर्व कई सारे सेलिब्रिटी का गेमिंग को लेकर प्रचार करने पर भी सवाल खड़े हुए थे। देखना है, अब सरकार की सख्ती के बाद इस पर पूर्ण रूप से रोक लग पाती है या चोरी-छिपे यह ‘ खेल’ चलता रहेगा।
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08 April 2023
प्रश्न–405 – जनांकिकी लाभांश के लिए भारत को कौन-कौन से कदम उठाने चाहिए, और क्यों? स्पष्ट करें। (200 शब्द)
Question–405 – What steps should India take for its demographic dividend, and why? Explain. (200 words)
नोट : इसका उत्तर आपको हमें नहीं भेजना है, यह आपके स्वयं के अभ्यास के लिए है।
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Date:07-04-23
Article 19 ReduxSC struck a blow for media freedom in the Media One case. The criteria it used will hopefully limit arbitrary restrictionsTOI Editorials
Article 19 of the Constitution protects freedom of the media. Like other fundamental rights this freedom isn’t unfettered. It’s subject to reasonable restrictions, of which national security is one. The Constitution, however, doesn’t detail a benchmark to test the reasonableness of a restriction. So far, constitutional courts have been loose in using a standard to test reasonableness. A fallout of this situation is that governments at all levels have been using restrictions arbitrarily to clamp down on journalists and thereby restrict media freedom. That may – hopefully – soon be a thing of the past.
The Supreme Court on Wednesday made an important intervention in its verdict on the Madhyamam Broadcasting Limited vs Union of India. It upheld media freedom guaranteed under Article 19 while simultaneously fleshing out a set of tests to determine if a restriction on this right is reasonable. Effectively, it establishes a benchmark for the judiciary to examine restrictions on a fundamental right. The case involved GoI revoking permission to an existing news channel Media One on the ground of national security. When the channel challenged the decision in Kerala HC, there were two developments. GoI made its national security case in a sealed envelope which denied the appellant a fair chance to defend itself. Also, HC held that the scope of judicial review in the matter of national security is limited.
The matter went to SC, which decided the case in favour of Media One on both procedural and substantive grounds. However, the real significance of the judgment comes from the standards it set for restrictions based on national security and the use of sealed envelopes, which tilts the playing field against the appellant. Governments henceforth will have to defend both against a four-step proportionality standard. Rights can’t be overturned in an arbitrary fashion. GoI’s action against Media One failed to meet the proportionality standards.
SC also unsealed the envelope that led to GoI’s order being overturned on substantive grounds. IB’s contention that Media One is “anti-establishment” because of its criticism of security forces and judiciary was rejected by the court. SC held that in this case GoI had used the national security restriction in a “cavalier manner”. Step back and it’s apparent that many governments in India are using restrictions to shut down journalism that questions their narrative. It’s in defence of this constitutional right that SC’s judgment is critical – and hopefully a turning point.
Date:07-04-23
Free Speech: 1 Big Bench, 1 BenchmarkMedia freedom cannot depend on which judges are hearing the case and who is the litigantR Jagannathan, [ The writer is editorial director, Swarajya magazine ]
Few people can fault the Supreme Court for upholding a media channel’s right to free speech and criticism of the government. In a case involving a Malayalam channel, Media One, owned by Madhyamam Broadcasting Ltd, a two-judge bench headed by Chief Justice DY Chandrachud, ordered the restitution of the channel’s broadcasting licence within four weeks.
Inconsistent judgments
The judgment, which will surely be hailed as a clear statement by the highest court in favour of media freedom, had this to say: “Denying security clearance to a media channel on the basis of the views which the channel is constitutionally entitled to hold produces a chilling effect on free speech and in particular on press freedom…The restriction on the freedom of the press compels citizens to think along the same tangent. A homogenised view would pose grave dangers to democracy. ”
No doubt about that. But mark the words above which sanctify views that a channel is “constitutionally entitled to hold”. The Constitution does not say what views one can hold, but it does prescribe many restrictions to freedom of speech, especially those which can harm social peace and public order. Article 19(2) provides several reasons to curtail free speech “in the interests of the sovereignty and integrity of India, the security of the state, friendly relations with foreign states, public order, decency or morality or in relation to contempt of court, defamation or incitement to an offence”.
Since this is a wide range of restrictions, one wonders how the courts are going to judge which restriction on speech, whether it is an ordinary citizen or the media, is valid in which case. In fact, court judgments in matters of free speech have often seemed whimsical. Even as the CJI’s bench was delivering this judgment, there is another bench looking at “hate speech” without even defining the term.
Yet another bench (not yet constituted)is to look at the laws on sedition. And some past judgments have gone both ways. One SC judgment of 2010, delivered by two future chief justices, P Sathasivam and HL Dattu, upheld the ban on a book that was critical of Islam with these words: “We are not against your right (to free speech). But we are more for public interest and public peace in the country. ”
In 2017, another bench, this time led by another CJI, Dipak Misra, of which the current CJI was member, refused to ban a book by Kancha Ilaiah titled Samajika Smugglerlu Komatullu , which allegedly defamed the entire vysya community, on grounds of upholding free speech. A recent trial court judgment upheld a complaint against Rahul Gandhi for his alleged remarks on the surname Modi, for which he has been sentenced to two years in prison for defamation.
Law, not judges’ views, should matter
The point one is getting at is this: If high principles of free speech have to be upheld by the courts, they have to be reasonably consistent. Not for nothing did another future SC judge note that what the court decides is not necessarilybased on core principles, but on an individual judge’s ideas about it.
Saurabh Kirpal, a senior advocate whose name has been recommended for elevation to the apex court by the collegium, said at a literary festival: “Depending on where your matter goes, who those two judges are, the outcome can be completely, radically different.Some judges will have a very conservative mindset, some will have a liberal mindset, some are inherently anti government, and some are inherently pro-government. This is not party political, this is not an ideological belief that the government is right or wrong, this is just their view. ”
Which is why one should ask: If judgments depend on who is sitting on a bench or who is the litigator, how can there be any sense among the public that justice is being delivered impartially? We saw a demonstration of that when another bench was hearing a hate speech case filed against some Hindu organisation in Maharashtra. The bench, headed by Justice KM Joseph, was hearing a petition by a Muslim from Kerala, but was reported to have smiled when the solicitor general pointed out that other hate speeches were targeting Brahmins in Tamil Nadu and Hindus in Kerala.
Free speech guidelines needed
The SC bench that heard Nupur Sharma’s plea to club all cases against her also made remarks that were prejudicial to her case, and its statements were criticised by many retired judges. Few benches anywhere in India have had anything to say about the mobs demanding Nupur Sharma’s beheading, which surely must count as an unreasonable exercise of free speech rights.
The bottomline: SC must not leave it to individual judges and specific cases to decide the law, which can only result in contradictory guidelines on free speech. It is time to constitute a full bench of seven or nine judges to review all free speech judgments (or those curtailing them) of the past, both at the apex court level and the high courts.
This is the only way an average citizen can know what are the real limits to free speech, and what is a legitimate exercise of this right. Hate speech must also be clearly defined, and guidelines laid down for police forces to determine when a speech actually constitutes a threat to public order of a magnitude where things may go out of control.
We cannot have arbitrary justice.
Date:07-04-23
Open justiceThe Supreme Court of India strikes a blow for both media freedom and open justiceEditorial
The Supreme Court verdict setting aside the denial of broadcasting permission to Malayalam channel MediaOne is one that protects the media against arbitrary action and bars the use of undisclosed national security considerations as a pretext to shut down an outlet. The Court has struck a blow for media freedom by ruling that the government could not term critical coverage or airing of critical opinions as “anti-establishment”, and so initiate action. It said: “The use of such a terminology… represents an expectation that the press must support the establishment.” The denial of security clearance to a media channel on the basis of views it was entitled to hold “produces a chilling effect on free speech and particularly on press freedom”. The Bench also cited substantive grounds to allow MediaOne’s petitions: that security clearance cannot be denied based on its alleged anti-establishment stance or a bald claim that its shareholders have links with the Jamaat-e-Islami. The Court has rightly found fault with the approach of the Kerala High Court, which had accepted material in a sealed cover on why the Home Ministry denied security clearance to the channel. It expressed surprise that the High Court did not explain how it felt the denial of security clearance was justified even after noting that the gravity of the issue was not discernible from the files.
A significant aspect of the judgment is that it seeks to end the casual resort to ‘sealed cover procedure’ by courts by suggesting an alternative approach to state claims of immunity from publication in public interest. Drawing upon both Indian and foreign jurisprudence, the Bench has said it is now an established principle of natural justice that relevant material must be disclosed to the affected party, ensuring that the right to appeal can be effectively exercised. It acknowledges that confidentiality and national security could be “legitimate aims for the purpose of limiting procedural guarantees”. However, a blanket immunity from disclosure of all reports could not be granted and that the validity of the involvement of such considerations must be assessed by the use of relevant tests. It could be ascertained if there is proof that non-disclosure is in the interest of national security and whether a reasonable person would come to the same inference from it. In a bid to balance the public interest in non-disclosure with the one in ensuring a fair hearing, the Court has mooted alternatives such as redacting sensitive portions and providing a gist of the material given to the affected party. The Court could also appoint an amicus curiae, who could be given access to the material whenever the state claims immunity from disclosure.
Date:07-04-23
वैश्विक आर्थिक ढांचे को आकार देता भारतहर्ष वी.पंत, ( लेखक आब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में रणनीतिक अध्ययन कार्यक्रम के निदेशक हैं )
एक ऐसे दौर में जब वैश्विक आर्थिक ढांचा तमाम चुनौतियों से जूझ रहा है और हाल-फिलहाल किसी बड़ी राहत के आसार नहीं दिखते, तब भारतीय अर्थव्यवस्था ने अपेक्षाकृत बढ़िया प्रदर्शन कर उम्मीद जगाई है। भारत तमाम बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में कोविड-19 महामारी के दुष्प्रभावों से कहीं बेहतर तरीके से निपटने में सफल रहा। तमाम भू-राजनीतिक एवं भू-आर्थिक समस्याओं के बावजूद उसकी आर्थिक वृद्धि में तेजी कायम है। इसी कारण अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने विश्व अर्थव्यवस्था में भारत को ‘चमकता बिंदु’ बताया। 2023 की वैश्विक वृद्धि में 15 प्रतिशत योगदान अकेले भारत का रहा है। प्रभावी डिजिटलीकरण के साथ-साथ अनुशासित राजकोषीय नीति और पूंजीगत निवेश के लिए पर्याप्त संसाधनों जैसे पहलुओं के दम पर भारत न केवल महामारी के चंगुल से अपनी अर्थव्यवस्था को बाहर निकालने में सफल रहा, बल्कि वैश्विक आर्थिक सुस्ती के दौर में भी अपनी वृद्धि को चुस्त बनाए हुए है। इसी बीच मोदी सरकार ने नई विदेश व्यापार नीति (एफटीपी) पेश की है। इस नीति का उद्देश्य 2030 तक देश के निर्यात को बढ़ाकर दो ट्रिलियन (लाख करोड़) डालर करना है। अतीत की नीतियों में जहां एक तय अवधि हुआ करती थी, उसके उलट इसमें ऐसा नहीं है। यानी इसमें समय पर आवश्यकतानुसार संशोधन की गुंजाइश है। इसने उस व्यापार नीति की जगह ली है, जिसकी अवधि 2020 में समाप्त हो गई थी, लेकिन कोविड महामारी के चलते नई नीति में विलंब हो गया। जहां विश्व अर्थव्यवस्था मंदी को लेकर संघर्षरत है, वहीं नई व्यापार नीति के माध्यम से भारत ने वैश्विक आर्थिक ढांचे में अहम किरदार के रूप में उभरने की नई प्रतिबद्धता एवं आकांक्षा का संकेत दिया है।
भू-राजनीतिक स्तर पर विश्व की बड़ी शक्तियों में विभाजन साफ दिखने के साथ ही उनके बीच की विभाजक-रेखाएं निरंतर चौड़ी होती जा रही हैं। विश्व स्तर पर शक्ति को लेकर ध्रुवीकरण नई हकीकत है, जिसके साथ सभी राष्ट्रों को ताल मिलानी होगी। चीन की अपने इर्दगिर्द जारी आक्रामकता और यूक्रेन पर रूसी आक्रमण से विकसित देशों के पास विकास से जुड़े एजेंडे पर आगे बढ़ने की गुंजाइश कम हो गई है। वहीं शीत युद्ध के बाद भू-आर्थिक क्षेत्र में वैश्विक आर्थिक ढांचे को लेकर बनी सहमति भी दरक रही है। राजनीतिक विश्वास बनाने के लिए व्यापार एवं तकनीकी सहयोग अब विश्वास आधारित व्यापार एवं तकनीक साझेदारी की राह तैयार कर रहा है। आर्थिक उदारीकरण पर बहस का नेतृत्व करने वाले देश अब अप्रत्याशित रूप से उससे पीछे हट रहे हैं। वैश्विक ढांचे में कई मोर्चों पर जो चुनौतियां उभर रही हैं उन्हें भारत के लिए एक मौके के रूप में देखा जा रहा है और भारतीय नीति-निर्माता यह सुनिश्चित करने में लगे हैं कि वैश्विक राजनीतिक एवं आर्थिक ढांचे में देश इस बार अपने लिए विशेष भूमिका बनाने का अवसर न गंवाए।
यदि भारत को वैश्विक व्यापार परिदृश्य में एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में अपना उभार सुनिश्चित करना है तो इसके लिए प्राथमिकताएं तय करनी होंगीं, जो नई व्यापार नीति में स्पष्ट दिखती हैं। यह नीति निर्यातकों के लिए डिजिटलीकरण की प्रक्रिया को और आगे बढ़ाकर प्रक्रियाओं को सुसंगत बनाने, ई-कामर्स निर्यात को बढ़ाने, एमएसएमई यानी छोटे एवं मझोले उद्यमों के लिए पर्याप्त प्रविधान करने और अन्य देशों के साथ रुपये में व्यापारिक लेनदेन करने पर ध्यान देती है। भारत का निर्यात 2020-21 के 500 अरब डालर से बढ़कर इस साल 750 अरब डालर के रिकार्ड ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच गया, लेकिन वैश्विक व्यापार में अभी भी उसकी हिस्सेदारी बहुत कम है। ऐसे में भारत के लिए गतिशील विदेश व्यापार नीति पर आगे बढ़ना बहुत आवश्यक है, जो देश की बढ़ती आकांक्षाओं के साथ-साथ नए भू-आर्थिक परिदृश्य के अनुरूप प्रतिक्रिया देने में सक्षम हो। इसी दिशा में भारत ने मुक्त व्यापार समझौतों यानी एफटीए को लेकर अपना रवैया बदला है। कुछ देशों के साथ उसके एफटीए हो गए हैं तो कई के साथ बातें चल रही हैं। असल में यह भारत का आर्थिक उभार ही है, जिसने पिछले तीन दशकों में उसकी विदेश नीति की दशा-दिशा को आकार दिया है। भारतीय नीति-निर्माताओं को देश के राजनीतिक-आर्थिक उभार के अनुरूप समायोजन करना पड़ा और उन्होंने उसी अनुरूप विदेश नीति को नया रूप दिया। भारत के आर्थिक कायाकल्प ने ही उसे उभरते वैश्विक ढांचे के केंद्र में ला दिया है। बढ़ती आर्थिक-सामरिक ताकत के दम पर ही भारत नए वैश्विक ढांचे में एक शक्ति के रूप में स्थापित हो रहा है। भारतीय अर्थव्यवस्था द्वारा शानदार परिणाम देने के बाद भारतीय लोकतंत्र का आकर्षण भी और बढ़ गया है। भारत की आर्थिकी ने पहले से ही वैश्विक सामरिक समीकरणों को बदलना शुरू कर दिया है और उभरते शक्ति संतुलन में भी उसका खासा प्रभाव दिखता है। यदि आज भारत वैश्विक ढांचे में ‘प्रमुख खिलाड़ी’ की भूमिका का दावा करने में सक्षम है तो यह भारतीय आर्थिक विकास गाथा के जीवंत एवं गतिशील होने की वजह से उपजे आत्मविश्वास का ही परिणाम है। आज यदि भारत एक जिम्मेदार वैश्विक अंशभागी की भूमिका निभा सकता है तो इसी कारण कि उसकी आर्थिक क्षमताएं उसे यह संभावना प्रदान करती हैं।
अब उभार ले रहे वैश्विक ढांचे में शक्तियां खुली प्रतिस्पर्धा कर रही हैं। इस स्थिति में वैश्विक संस्थान निस्तेज हो रहे हैं और आर्थिक वैश्वीकरण विखंडित हो रहा है। भारत इन सभी पहलुओं से जुड़ी बहस के केंद्र में है। आज पूरी दुनिया भारत की आवाज को इसीलिए सुनती है, क्योंकि लोकतांत्रिक भारत पांच ट्रिलियन डालर की आर्थिकी बनने के लिए प्रयास कर रहा है। विश्व उसकी विकास गाथा में विश्वास करने के साथ ही उसे पोषित भी कर रहा है। भारत अपना आर्थिक रुतबा बढ़ाकर ही वैश्विक ढांचे में अपेक्षित दर्जा प्राप्त करने में सफल हो पाएगा। इसीलिए कोई हैरत की बात नहीं कि भारत विश्व के साथ आर्थिक सक्रियता के मामले में अतीत की अपनी हिचक और असहजता को पीछे छोड़ रहा है। नई विदेश व्यापार नीति भी इसी रुझान को दर्शाती है।
Date:07-04-23
उच्च शिक्षा में विदेशी संस्थाओं का प्रवेशडा. हरबंश दीक्षित, ( लेखक तीर्थंकर महावीर विश्वविद्यालय के विधि संकाय में प्रोफेसर एवं डीन हैं )
उच्च शिक्षा में विदेशी संस्थाओं की भागीदारी के लिए कानूनी ढांचे को अंतिम रूप दिया जा रहा है। इसके लिए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी यूजीसी ने ‘यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन (सेटिंग अप एंड आपरेशन आफ कैंपसेज आफ फारेन हायर एजुकेशनल इंस्टीट्यूशंस इन इंडिया) रेगुलेशंस, 2023’ नाम से मसौदा जारी किया है। इसके मुताबिक विश्व में 500 तक की रैंकिंग वाली संस्थाओं को देश में कैंपस खोलने की अनुमति होगी। इसके लिए उन्हें यूजीसी की अनुमति लेनी होगी। मसौदे में इन संस्थाओं को पर्याप्त स्वायत्तता का प्रस्ताव है। उन्हें भारतीय या विदेशी छात्रों के प्रवेश के लिए नियम बनाने, शुल्क निर्धारित करने, अपना पाठ्यक्रम तय करने तथा शिक्षकों की नियुक्ति के लिए नियम बनाने की छूट होगी। फारेन एक्सचेंज मैनेजमेंट एक्ट (फेमा), 1999 के अधीन रहते हुए उन्हें अपनी आय को देश के बाहर भेजने की भी छूट होगी।
ऐसा माना जा रहा है कि विदेशी संस्थाओं के आने से उच्च शिक्षा के क्षेत्र में एक सकारात्मक बदलाव आएगा। हमारी संस्थाओं को अपने स्तर को निखारने की प्रेरणा मिलेगी। अंतरराष्ट्रीय अकादमिक सहयोग से प्रगति के नए रास्ते खुलेंगे और अध्ययन के लिए विदेश जाने वाले छात्रों को अपने यहां रोक कर विदेशी मुद्रा की बचत हो सकेगी। मसौदे में कहा गया है कि विदेशी संस्थानों को अपनी प्रवेश प्रक्रिया तथा शुल्क तय करने का अधिकार होगा। यह भारतीय शिक्षण संस्थाओं पर लगाई गई पाबंदी के ठीक उलट है। भारतीय शिक्षण संस्थाओं को अपनी मर्जी से शुल्क तय करने का अधिकार नहीं है। निजी संस्थाओं पर भी निगरानी रखने के लिए नियामक संस्थाएं हैं। उसके बाद अदालतें भी समय-समय पर जनहित में दिशा-निर्देश जारी करती रहती हैं। पीए इनामदार बनाम महाराष्ट्र (2005) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि शिक्षा ‘व्यापार’ नहीं, अपितु ‘सेवा’ है, इसलिए निजी संस्थाएं भी शिक्षण संस्थाओं को अपने व्यापार के रूप में नहीं चला सकतीं। पिछले साल महाराष्ट्र सरकार ने निजी मेडिकल कालेजों की मेडिकल की फीस को सात गुना बढ़ाकर 24 लाख रुपये तक करने की अनुमति दी थी, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने इसे रद कर फिर स्पष्ट किया कि शैक्षिक संस्थानों को व्यापारिक केंद्र नहीं बनाया जा सकता, क्योंकि शिक्षा व्यापार नहीं, अपितु सेवा है। ऐसी कल्पना करना भी कठिन है कि कोई विदेशी संस्था भारत में सेवा करने के लिए अपना कैंपस खोलेगी। मुनाफा कमाना ही उनका मूल उद्देश्य होगा। अदालतों द्वारा तय किए गए दिशा-निर्देशों से अलग हटकर उन्हें मुनाफा कमाने की छूट हासिल हो जाएगी। यह शिक्षण संस्थाओं में मुनाफाखोरी की संस्कृति को बढ़ावा देगा। यह अपने देश की शिक्षण संस्थाओं के लिए भी कठिनाइयां पैदा करेगा।
हमारे देश की शिक्षण संस्थाओं को सरकारी और अदालतों के दिशा-निर्देशों के अनुसार काम करना होता है, जबकि विदेशी संस्थाओं पर कोई पाबंदी नहीं रहेगी। ऐसे में हमारी संस्थाओं को तमाम बंदिशों के साथ उन संस्थाओं से मुकाबला करना होगा, जिन्हें स्वतंत्र रूप से कुछ भी करने का अधिकार होगा। यह व्यवस्था न्यायपूर्ण नहीं है। विदेशी संस्थाओं को केवल मुनाफा कमाने की ही छूट हासिल नहीं है। चूंकि इसके उपयोग के बारे में कोई दिशा-निर्देश नहीं है, अतः उसका उपयोग किसी गैर-शैक्षणिक कार्य के लिए भी हो सकता है। यह चिंता का विषय है।
मसौदे के अनुसार विदेशी संस्थाओं को शिक्षकों की नियुक्ति करने के मामले में अपने मानक निर्धारित करने तथा अपने पाठ्यक्रम और उसकी विषयवस्तु तय करने का अधिकार होगा। शिक्षण संस्थाएं राष्ट्र के उन्नयन की आधारशिला होती हैं। पाठ्यक्रम के माध्यम से छात्र केवल जानकारी ही नहीं हासिल करते, अपितु उनके माध्यम से उनका मानसिक अभिमुखीकरण भी होता है। शिक्षण-संस्थाओं पर यह गुरुतर दायित्व होता है कि वे छात्रों को सकारात्मक दिशा दें, किंतु कई बार ऐसा नहीं भी होता। कुछ संस्थाएं ऐसे सोच के मुताबिक अपने छात्रों को तैयार करती हैं, जो उनके एजेंडे को प्रसारित करने और उसे लागू करने में मदद करें। अपनी शिक्षण संस्थाओं पर निगरानी रखने का व्यापक तंत्र उपलब्ध है, किंतु विदेशी संस्थाओं के संबंध में केवल यह कहा गया है कि वे ऐसे पाठ्यक्रम संचालित नहीं करेंगी, जो राष्ट्रीय हित के प्रतिकूल हों। यह शब्दावली अस्पष्टता की सीमा तक व्यापक है। इस पर विचार करने की जरूरत है और हो सके तो नियामक संस्था बनाने का विकल्प भी सोचा जा सकता है, ताकि राष्ट्रीय हित की अनदेखी को रोका जा सके।
सरकार ने आजादी के बाद शिक्षा पर भरपूर ध्यान दिया। गरीबों और वंचितों के लिए इसके दरवाजे खुले। यही कारण है कि आम परिवारों के बच्चे आज दुनिया भर की प्रतिष्ठित संस्थाओं में शीर्ष पदों पर हैं। समाज के वंचित वर्गों को आरक्षण और स्कालरशिप देकर उनके और राष्ट्र की प्रगति का मार्ग प्रशस्त किया गया। यूजीसी के मसौदे में इसके बारे में ‘जरूरत-आधारित स्कालरशिप’ दिए जाने का सुझाव देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली गई है। परिणामस्वरूप, विदेशी संस्थाओं को यहां के नागरिकों से मोटी फीस लेकर मुनाफा कमाने की छूट होगी, किंतु सामाजिक सरोकारों के लिए उनकी जवाबदेही नहीं होगी। यह उच्च शिक्षा के क्षेत्र में गहरी खाई पैदा करेगा। केवल संपन्न वर्ग के छात्र ही वहां पढ़ पाएंगे और उनके सहपाठी के रूप में समाज के वंचित वर्ग का छात्र मौजूदा नहीं होगा, जिसके साथ बैठकर सामाजिक समरसता का आचरण विकसित होता है। नीति-निर्माताओं को इस पर भी ध्यान देने की जरूरत है।
Date:07-04-23
अभिव्यक्ति पर पहरासंपादकीय
सर्वोच्च न्यायालय ने एक बार फिर अभिव्यक्ति की आजादी को रेखांकित करते हुए केंद्र सरकार को नसीहत दी है कि राष्ट्रीय सुरक्षा के हवाई दावों के जरिए मीडिया पर अंकुश नहीं लगाया जा सकता। दरअसल, केंद्रीय गृह मंत्रालय ने करीब डेढ़ साल पहले एक मलयालम टीवी चैनल का नवीकरण यह कहते हुए रोक दिया था कि उसका संचालन राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से खतरनाक है। केरल उच्च न्यायालय ने भी केंद्र के उस फैसले को उचित ठहराया था। तब चैनल के प्रबंधकों ने सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष गुहार लगाई थी और उसने फैसला आने तक चैनल को अपना प्रसारण जारी रखने की इजाजत दे दी थी। अब उस मामले में फैसला सुनाते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि किसी चैनल का नवीकरण न करना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार का हनन है। किसी चैनल या मीडिया संस्थान पर इसलिए रोक नहीं लगाई जा सकती कि वह सत्ता के विरोध में विचार प्रकाशित-प्रसारित करता है। सरकार की आलोचना राज्य की आलोचना नहीं होती। सरकार की नीतियों के खिलाफ विचार प्रकट करना मीडिया का धर्म है और इसी से लोकतंत्र को मजबूती मिलती है। अगर सरकार इसलिए किसी चैनल पर प्रतिबंध लगा देती है कि वह उसके विरोध में विचार प्रकट करता है, तो इससे यह ध्वनित होता है कि सरकार केवल उन्हीं संचार माध्यमों को चलने देना चाहती है, जो उसके पक्ष में खबरें या वैचारिक सामग्री परोसते हैं।
इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने केरल उच्च न्यायालय को भी आड़े हाथों लिया और बंद लिफाफे में सरकार की तरफ से पेश किए गए साक्ष्यों पर एतराज जताया। गौरतलब है कि बंद लिफाफे में सुझाव या साक्ष्य पेश करने पर सर्वोच्च न्यायालय कई मौकों पर तल्ख टिप्पणी कर चुका है और उसकी स्प्ष्ट राय है कि कोई भी दस्तावेज गोपनीय तरीके से पेश नहीं किया जाना चाहिए, उसे सार्वजनिक रूप से लोगों के सामने आने देना चाहिए। फिर संबंधित चैनल पर यह भी आरोप था कि उसके मालिकों में से अधिकतर का संबंध जमात-ए-इस्लामी-हिंद से है। सर्वोच्च न्यायालय ने इस आरोप को खारिज करते हुए कहा कि इससे मीडिया के अधिकारों को बाधित नहीं किया जा सकता। स्वाभाविक ही, अदालत के इस फैसले से अभिव्यक्ति की आजादी को लेकर एक और नजीर कायम हुई है। यह ठीक है कि मीडिया की आजादी का हमारे संविधान में उस तरह स्पष्ट उल्लेख नहीं है, जिस तरह अमेरिका आदि लोकतांत्रिक देशों में है, मगर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के तहत मीडिया को यह अधिकार मिला हुआ है। इस तरह के अनेक फैसलों से मीडिया की स्वतंत्रता रेखांकित हुई है और उसे लोकतंत्र के चौथे स्तंभ के रूप में स्वीकृति प्राप्त है।
मगर सरकारें अक्सर मीडिया की निष्पक्षता और सरकारी नीतियों, फैसलों के विरुद्ध मुखरता से असहज महसूस करती देखी जाती हैं। उन पर अंकुश लगाने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपनाती रही हैं। ऐसे अखबारों और समाचार चैनलों के हिस्से का विज्ञापन रोकना सरकारों का आसान हथकंडा है, जो उसके खिलाफ लिखते-बोलते हैं। इसे लेकर भी कुछ अखबारों ने कुछ साल पहले सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। तब भी अदालत ने सरकारों को ऐसी ही कड़ी फटकार लगाई थी। पिछले कुछ सालों से मीडिया की भूमिका को लेकर निराशा प्रकट की जाती रही है। ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय ने न सिर्फ मीडिया के अधिकारों को सुरक्षा प्रदान की है, बल्कि यह भी संकेत दिया है कि उन्हें सरकार के फैसलों पर अपनी निष्पक्ष भूमिका का निर्वाह करना चाहिए।
Date:07-04-23
संसद में कितना कामसंपादकीय
भारत में विगत दिनों में संसदीय कामकाज बुरी तरह प्रभावित रहा है और बिना किसी ठोस नतीजे पर पहुंचे दोनों सदनों की कार्यवाही अनिश्चित काल के लिए स्थगित हो गई। निस्संदेह, यह अफसोस और चिंता की बात है। कामकाज के आंकडे़ दुखद और याद रखने लायक हैं। 17वीं लोकसभा के 11वें सत्र अर्थात बजट सत्र के दौरान लोकसभा की कुल 25 बैठकें हुईं, जो करीब 45 घंटे 55 मिनट तक चलीं। सत्ता पक्ष जहां विपक्ष को जिम्मेदार ठहरा रहा है, वहीं ज्यादातर विपक्षी दलों के अनुसार, सत्ता पक्ष ने खुद ही नारेबाजी से कामकाज विरोधी माहौल बनाए रखा। आधिकारिक रूप से यही कहा गया है कि अडानी मामले की जांच के लिए एक संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) की मांग को लेकर विपक्षी दल लगातार हंगामा करते रहे हैं, जिससे संसद का चलना मुश्किल हुआ है। संवाद या समन्वय प्रयासों की कमी भी खली है। संसद की गरिमा और जरूरत के प्रति संवेदनशील नेताओं के लिए यह समय चुनौतियों से भरा हुआ है। शायद चुनाव तक ऐसा ही माहौल बना रहेगा।
लोकसभा की ही छाया राज्यसभा में भी दिखी है। सभापति जगदीप धनखड़ भी चिंता जताते हुए यह मानते हैं कि संसद में बहस, संवाद, विचार-विमर्श और चर्चा की सर्वोच्चता प्रभावित हुई है। राज्यसभा में बजट सत्र के पहले भाग में 56.3 प्रतिशत कामकाज हुआ था, जबकि इसके दूसरे भाग में महज 6.4 प्रतिशत ही काम हो सका है। कुल मिलाकर, बजट सत्र में राज्यसभा में महज 24.4 प्रतिशत समय काम हो सका है। पास या फेल के पैमाने पर अगर देखें, तो यह सत्र फेल हो गया है। लगभग 103 घंटे और 30 मिनट समय बर्बाद हुआ है। यह सहज ही सोचा जा सकता है कि अगर राज्यसभा इन 100 घंटों में से पचास घंटे भी देश की किसी बड़ी समस्या पर विचार करती, तो एक दिशा हासिल होती, देशवासियों का ज्ञान बढ़ता। अब सदन में तीखी राजनीति देखकर लोगों ने क्या सीखा है, यह अलग सवाल है। बीता हुआ समय लौटकर नहीं आता। आज के नेताओं की बात करें, तो राजनीति का मौका भी लौटकर नहीं आता। मतलब, संसद की कीमत पर खूब राजनीति हुई है और आगे भी होगी। नुकसान किसे हुआ है, पैसा किसका बर्बाद हुआ है, यह माननीय सांसदों को सोचना चाहिए। कुछ सांसद होंगे, जो इस पर जरूर सोचेंगे, पर ज्यादातर सांसद चुनावी तैयारियों में लग जाएंगे।
अगर चुनावी सोच हावी हो गई है, तो संसद में कामकाज आगामी सत्रों में भी मामूली ही होगा। आगामी लोकसभा चुनाव से पहले तीन सत्र संभावित हैं। विचारवान सांसदों को यह सोचना होगा कि आगे के सत्रों में कैसे कितना काम करना है। यह दुख की बात है कि लोकसभा की तरह ही राज्यसभा में भी राजनीति हावी है। पहले यह सोचा गया था कि राज्यसभा में ज्यादा गंभीरता के साथ विचार-विमर्श की स्थिति बनी रहेगी, लेकिन राज्यसभा का भी चूंकि जरूरत से ज्यादा राजनीतिकरण हो गया है, इसलिए वहां लोकसभा का अनुसरण मात्र होता है। लोकतंत्र में राजनीति से बचा नहीं जा सकता, लेकिन जरूरत से ज्यादा राजनीति से जरूर बचना चाहिए। गौर करने की बात है, नेताओं के बीच जुबानी हमले जरूरत से ज्यादा तीखे हो चले हैं। किसी को गहरे घाव दिए जा रहे हैं, तो पलटकर मिल भी रहे हैं। भाषा और संवेदना का स्तर बना रहे, संविधान के प्रति आदर रहे, तो राजनीति भी सहज होगी और संसद को भी कामकाज में सुविधा होगी।
Date:07-04-23
विदेश में व्यापार बढ़ाना अब देशी विकास की बुनियाद हैराकेश मोहन जोशी, ( प्रोफेसर, आईआईएफटी )
पिछले दिनों भारत की नई विदेश व्यापार नीति जारी हो गई। विश्व व्यापार और उद्यमी समुदाय की बदलती जरूरतों को पूरा करने के लिए इस नीति को भविष्योन्मुख, लचीला और गतिशील बनाया गया है। इस नई शुरुआत का लक्ष्य 2030 तक भारतीय निर्यात को 2 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंचाना है। अच्छी बात है, लक्ष्य तक पहुंचने की रणनीति नई विदेश व्यापार नीति में निहित है। भारत अगर नई नीति का प्रभावी क्रियान्वयन करे, तो तय वक्त से पहले ही लक्ष्य तक पहुंच सकता है।
नई नीति विदेश में व्यापार बढ़ाने का एक व्यापक और एकीकृत दस्तावेज है। पहले की व्यापार नीति की घोषणाएं मुख्य रूप से अल्पकालिक उपायों तक ही सीमित रहती थीं, जो मुख्य रूप से कुछ प्रोत्साहनों पर केंद्रित रहती थीं। यही कारण है, पिछली विदेश व्यापार नीतियां कुछ रणनीतिक इरादों के बावजूद टिकाऊ नहीं होती थीं। इस बार भारतीय उत्पादों को निर्यात योग्य या विश्व स्तर पर प्रतिस्पद्र्धी बनाने पर ज्यादा ध्यान दिया गया है। यह देखा गया है कि निर्यात की प्रक्रिया इतनी जटिल होती है कि इस मद में दी जाने वाली वित्तीय रियायतें अक्सर बेकार चली जाती हैं। इसके चलते निर्यात को स्थिरता नहीं मिल पाती है। विशेष रूप से लंबी अवधि में निर्यातकों को अंतरराष्ट्रीय बाजार में प्रतिस्पद्र्धी बनाने में परेशानी आती है। इसमें भी कोई रहस्य नहीं है कि वित्तीय सब्सिडी का एक बड़ा हिस्सा लाभार्थियों तक पहुंचने से पहले ही काफी हद तक रिस जाता है।
वैसे, निर्यात के मोर्चे पर लक्ष्य बनाकर पहल की वजह से भारत का इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद निर्यात वित्त वर्ष 2016 में 6 अरब डॉलर से 162 प्रतिशत बढ़कर वित्त वर्ष 2022 में 16 अरब डॉलर का हो गया। इंजीनियरिंग उत्पाद निर्यात 81 प्रतिशत बढ़कर 62 अरब डॉलर से 112 अरब डॉलर का हो गया, भारत का खिलौना निर्यात 89 प्रतिशत बढ़कर 29 करोड़ डॉलर से 54.60 करोड़ डॉलर तक पहुंच गया। ऐसे ही प्रयासों की जरूरत है।
निर्यातकों के लिए कई उपाय किए गए हैं। प्रक्रियाओं को निर्यातकों के लिए आसान बनाया गया है। फलों और सब्जियों के निर्यात को भी बढ़ावा दिया जाएगा। क्लस्टर आधारित आर्थिक विकास की सुविधा के लिए मौजूदा 39 शहरों के अलावा, चार नए शहरों, फरीदाबाद, मुरादाबाद, मिर्जापुर और वाराणसी को भी उत्कृष्टता का शहर घोषित किया गया है। मतलब, इन शहरों में भी आयात-निर्यात की सुविधाएं बढ़ेंगी।
डेयरी उद्योग के लिए भी विशेष उपाय किए गए हैं। अभी दूध उत्पादन में विश्व स्तर पर भारत की 24 प्रतिशत हिस्सेदारी है, लेकिन विश्व निर्यात में हिस्सेदारी 0.5 प्रतिशत से भी कम है। दुनिया के एक बड़े दूध उत्पादक भारत को अभी लंबा रास्ता तय करना है। ई-कॉमर्स निर्यात को बढ़ावा देने पर भी विशेष जोर है, जिसके वर्ष 2030 तक 200-300 अरब डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है। ई-कॉमर्स निर्यात हब बनाए जाएंगे। छोटे ई-कॉमर्स निर्यातकों के लिए भी सुविधाएं बहुत बढ़ाई गई हैं। भारतीय मुद्रा रुपये में व्यापार को प्रोत्साहन दिया गया है।
एक और अच्छी बात है कि नई विदेश व्यापार नीति के प्रभावी क्रियान्वयन के लिए राज्य सरकारों को सक्रिय रूप से जुड़ना होगा। जिला स्तर पर भी आयात-निर्यात की सुविधाओं का विस्तार करना होगा। अब नई नीति एक जिला-एक उत्पाद योजना (ओडीओपी) और जिला निर्यात केंद्रों को प्रोत्साहित कर रही है। इसके अलावा, यह नीति विदेशों में भारतीय दूतावासों की सक्रिय भागीदारी की भी मांग करती है। यह विश्व बाजार में भारतीय उत्पादों के प्रवेश को सुगम बनाने के लिए किया गया बड़ा रणनीतिक बदलाव है।
हालांकि, फायदा तब होगा, जब भारतीय दूतावासों में तैनात भारतीय व्यापार सेवा (आईटीएस) के अधिकारियों का एकमात्र मकसद व्यापार को बढ़ावा देना हो। व्यापार और भारत में निवेश बढ़ाने पर उन्हें समर्पित भाव से ध्यान देना होगा। ऐसे प्रशिक्षित अधिकारियों को भारतीय उत्पादों के लिए नए बाजार की भी खोज करनी चाहिए। भारतीय ब्रांडों को मजबूती देने के लिए काम करना चाहिए। भारत का विदेश व्यापार तभी ज्यादा तेजी से बढ़ेगा, जब व्यापार विकास से जुड़े तमाम देशी संगठन मिलकर काम करेंगे।
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Date:06-04-23
Facts Of The MatterBy deleting chunks of history from textbooks, what NCERT is hurting most is quality of education.TOI Editorials
Bitter differences over the history to be taught in school textbooks are neither new, nor confined to India. But this debate has higher stakes here because school learning outcomes are poor and improving them is critical to empowering millions. A grounding in objective facts, and before that the idea of shared objective facts, is the minimum bedrock for India’s progress. When textbook revisions take place in a way that suggests the facts of our dense history can be replaced by ‘new facts’ with every ‘new mood of the nation’, it entrenches the dangerous disease that goes by the name of ‘WhatsApp University’ instead of remedying it.
With the Yogi government notifying last week that UP board schools will fully teach NCERT’s ‘rationalised’ syllabi from the 2023-24 session, these ‘rationalisations’ made last year have come under the spotlight again. Unfortunately, the quality that is standing out is lack of reason. When quizzed about the deletion of content on Mughal rulers or how RSS was banned after Gandhi’s assassination or the Emergency’s abuses of power or the 2002 Gujarat riots, the NCERT director has tried to offload all agency onto the ‘expert committees’ and called the debate itself ‘unnecessary’. But BJP leaders have done this defence no favours by welcoming how NCERT has moved ‘Akbar, Babar, Shahjahan, Aurangzeb’ from the history books to the ‘dustbin’.
Interpretations change with time and with different social movements and political dispensations. This happens everywhere. As do changes in emphasis. In the US the critical race theory controversy has highlighted how differently different states teach the Jim Crow laws and the civil rights movement. The UK continues to be embattled in how much of the Empire’s depredations to acknowledge inside the classrooms. But such interchanges have a very different shape than something that happens, for example, in Bangladesh – which leader announced the country’s independence changes every time Awami League and BNP switch governments. Writing fresh narratives advances discourse. Simply deleting facts creates epistemic fractures that wound and ultimately disable conversation.
Date:06-04-23
The Just In JusticeA detailed report on the legal system shows how and why the poor are its biggest victims.TOI Editorials
India’s database on justice delivery indicators resides in silos, making it hard to derive a coherent big picture. India Justice Report 2022, a multi-organisation effort, pulls together 102 indicators to rank the capacity of states across four major justice delivery mechanisms – police, judiciary, prisons and legal aid. In the third edition of IJR, Karnataka topped the ranking. Five of the top six places are taken up by states from southern India. These positions aren’t fixed – an important message of IJR 2022 is that small but consistent improvements lead to big jumps in ranking. That’s how Karnataka jumped 13 places since IJR 2020 to the top in 2022.
Former CJI UU Lalit, who’s written the foreword to IJR, fears that India’s capacity to satisfactorily deliver justice lags its demand. The data in the report bears out his apprehension. This is the foremost challenge in the criminal justice system. To illustrate, 77% of India’s prison population is made up of undertrials, people who haven’t been convicted. On average, they are spending longer time in prison than before. Undertrials serving more than five years in prison have more than doubled to 11,490 in the period between December 2017 and December 2021. The message from the data has led IJR 2022 to conclude that while there are 50 million pending cases, the dismal fact is that they are taking longer to resolve. This will only worsen India’s capacity to deliver justice.
According to Lalit, 70% of litigants in criminal cases are below the poverty line. In this context, India’s justice delivery system has been weakened by an alarming decline in legal aid provision. Between 2020 and 2022, IJR data showed that there was a 67% decline in legal services clinics. There were just 4,742 clinics at the end of 2022. This may well be an explanatory factor in deterioration of other indicators such as the average length of time spent in jail by undertrials. While debates about the collegium hog attention, the plumbing of the justice delivery system is being neglected. Our focus needs reorientation.
Date:06-04-23
Promote Governance Over Capital ControlsSEBI recasting promoters will help startups.ET Editorials
The Securities and Exchange Board of India (Sebi) is stepping in to declare founders with a stake of 10% or more in startups as promoters when filing for public issues. This follows halving the lock-in period for promoter holdings post-issue, a move designed to facilitate listing for startups. The idea was to ease rules that ensure promoters have skin in the game after taking their companies public so that startup founders are not deterred by blocked capital. This has had a considerable effect on public issues of startups that have spawned a healthy crop of unicorns. Now, Sebi is tightening requirements on promoter status in the interest of investor protection that is raising the hurdle for listing by startups.
By lowering the threshold for declaring founders as promoters, the markets regulator is aligning oversight to the shareholding patterns of startups where founders repeatedly dilute their stakes in multiple funding rounds leading up to a listing. On paper, startup founders have little control over the management of their companies with holdings far below the 25% cut-off for promoters that ensuresboard representation. Yet, they typically have a larger say in management than shareholders with similar holdings in traditional companies. The concept of control is fluid, and Sebi is making its intervention as of now on merits.
Regulation of startups has to keep pace with the rate of their evolution, and setting new shareholding thresholds for promoters may be premature. The regulator’s intervention is pooling in a bloc of equity held by founders and strategic investors, which serves the original intent of locking in promoter holdings to protect shareholder interests. The ensuing compliance burden on startup founders may not be sizeable to deter them from listing. Particularly, if Sebi provides carve-outs for startup founders that can establish their distance from management control. Improvements in governance outweigh the bigger capital controls in Sebi’s move.
Date:06-04-23
आखिर दुनिया हमारे बारे में क्या सोचती है?संपादकीय
वैश्वीकरण के बाद से हर देश की अर्थव्यवस्था पूरी दुनिया से जुड़ गई है। रूस-यूक्रेन युद्ध होता है, तो दुनिया की कुल जीडीपी विकास दर 30 साल के निम्नतम स्तर 2.2% पर आ जाती है। भारत और चीन विदेशी पूंजी निवेशकों के लिए पलक-पांवड़े यूं ही नहीं बिछाते। लिहाजा दुनिया का हर देश दूसरे देश की सामाजिक-आर्थिक-राजनीतिक परिस्थितियों पर लगातार नजर रखता है । अगर किसी देश का वित्तीय घाटा बढ़ रहा है तो विदेशी पूंजी नहीं आएगी और अगर नहीं आई तो देश की इकोनॉमी पर असर पड़ेगा। सरकार को यह भी नहीं भूलना चाहिए कि टेक्नोलॉजी के इस दौर में कोई भी सच्चाई एक क्षण में ही पूरी दुनिया में प्रसारित हो जाती है। अगर भारत सरकार वर्ल्ड बैंक की ‘ईज ऑफ डुइंग बिजनेस’ रिपोर्ट में देश के 50-60 रैंक ऊपर आने पर सार्वजनिक रूप से अपनी पीठ थपथपाती अपनी पीठ थपथपाती है, तो बाकी दूसरी रैंकिंग को खारिज नहीं किया जा सकता। गर्व होता है कि दुनिया के बड़े राष्ट्र, भारत और उसके नेता की प्रशंसा कर रहे हैं और इसको चुनाव के समय जनता को प्रभावित करने के लिए इस्तेमाल किया जाता है, लेकिन अगर कोई ग्रेटा थन्बर्ग या ब्रिटेन की संसद किसानों के आन्दोलन को लेकर या जर्मनी का विदेश मंत्री कांग्रेस नेता की सजा और संसद की सदस्यता रद्द होने पर कोई टिप्पणी करते हैं, तो इसे आतंरिक मामलों में दखल नहीं कहा जाना चाहिए। आखिर सरकार जी-20 के प्रतिनिधियों को भारत भ्रमण कराकर देश की अच्छी छवि दिखाने की कोशिश इसीलिए तो कर रही है। देश की छवि किसी के बिगाड़ने या बनाने से नहीं बिगड़ती। हमें सकारात्मक पहलुओं पर ध्यान देने की जरूरत है।
Date:06-04-23
15 मिनट शहर’ की परिकल्पना की ओर बढ़ रही है दुनियापार्थ लोया, ( पूर्व छात्र यूनिवर्सिटी ऑफ कैलिफोर्निया )
दफ्तर जाने के लिए हममें से कितने ही लोग घरों से कई घंटों पहले निकलते हैं। बड़े शहरों में कहीं भी आने-जाने में 45 मिनट से एक घंटा आसानी से लग जाता है। परंतु यदि आप सिर्फ 15 मिनट के ही भीतर अपने गंतव्य स्थान तक पहुंच जाएं तो आपको कैसा लगेगा? मैं यहां परिवहन के कोई नए साधन की बात नहीं कर रहा हूं, बल्कि बात कर रहा हूं ‘15 मिनट शहर की।’ जी हां, यह शहर को विकसित करने का एक नया तरीका है, जिसमें आपकी जरूरत की हर संभव चीज या आपका गंतव्य 15 मिनट की ही दूरी पर होंगे।
यूरोप के कई शहर जैसे फ्रांस की राजधानी पेरिस एवं स्पेन के शहर बार्सिलोना इस परिकल्पना को अपना रहे हैं। इसके पीछे पर्यावरण का संरक्षण करना मुख्य वजह है। उदाहरण के तौर पर किसी भी बड़े शहर को देख लीजिए। लाखों लोग रोज एक जगह से दूसरी जगह परिवहन करते हैं, क्योंकि उनके स्कूल या दफ्तर घर से काफी दूर रहते हैं। फल और सब्जियां भी यहां पर नहीं उगतीं। वह आती हैं सैकड़ों किलोमीटर दूर के गांवों से। इससे अत्यधिक कार्बन उत्सर्जन होता है, जो पर्यावरण के लिए बेहद हानिकारक है।
वर्ष 2016 में पेरिस शहर ने अपनी सीन नदी के किनारे बने एक प्रमुख मार्ग को एक पार्क में बदल दिया। करीब 40 हजार वाहनों के रोज गुजरने से वह मार्ग प्रदूषण का बहुत बड़ा कारण बन गया था। उस मार्ग पर व्यस्त समय पर बहुत जाम लगता था और वह सीन नदी के तट को अप्रिय बना रहा था, जो कि यूनेस्को का विश्व विरासत स्थल है। पेरिस की प्रथम महिला मेयर ऐनी हिडैल्गो ने शहर को 15 मिनट शहर बनाने के अपने संकल्प के तहत यह कदम उठाया। इस संकल्प के अंतर्गत पेरिस में साइकल से और पैदल चलने को बढ़ावा दिया जा रहा है, वहीं कारों के प्रयोग को कम किया जा रहा है। बढ़ती कारों से शहरों को भी यातायात सुगम बनाने के लिए कई सारे चौड़े मार्ग बनाने पड़ते हैं, जिससे शहर की जमीनें, रहवासियों की जरूरतें जैसे पार्क इत्यादि के बजाय सड़क बनवाने में खर्च करनी पड़ती है।
सड़क निर्माण से अक्सर जमीन के दाम बढ़ जाते हैं और उसे सामान्य वर्ग के लोग खरीद नहीं पाते। इस कारण लोगों को दूर जाकर रहना पड़ता है। परंतु रोजगार के लिए उन्हें शहर के मध्य बने दुकान-दफ्तरों पर ही निर्भर रहना पड़ता है। इस वजह से आमतौर पर शहरों के दायरे बढ़ जाते हैं और ज्यादा लोगों को लंबी-लंबी दूरियों से आवागमन करना पड़ता है।
अब बात भारत की। हमारे छोटे शहर पहले से ही 15 मिनट शहर हैं, क्योंकि वहां पर किसी भी जगह 15 मिनट में पहुंचा जा सकता है। लेकिन बढ़ते विकास के साथ ये शहर भी धीरे-धीरे कारों की गिरफ्त में आ रहे हैं। ऐसे में इनके विकास के दौरान ज्यादा सड़कें बनाने के बजाय सार्वजनिक परिवहन को बेहतर बनाने पर जोर दिया जाना चाहिए ताकि समाज के सभी तबके उसका उपयोग कर सकें।
Date:06-04-23
कार्बन उत्सर्जन की समस्या का दशकों पुराना हलप्रसेनजित दत्ता, ( लेखक बिज़नेस टुडे और बिज़नेस वर्ल्ड के पूर्व संपादक और संपादकीय परामर्श संस्था प्रोजैक व्यू के संस्थापक हैं )
दुनिया भर की कंपनियां और देश अब सात दशक पुरानी एक तकनीक की ओर बढ़ रहे हैं जिसे पहले कभी इतनी तवज्जो नहीं दी गई। वे इसके माध्यम से उत्सर्जन को विशुद्ध शून्य स्तर पर ले जाना चाहते हैं। यह सब हाल के दिनों में शुरू हुआ जब यह पता चला कि मौजूदा स्वच्छ ऊर्जा तकनीकों को आक्रामक ढंग से अपनाने भर से इन लक्ष्यों को हासिल नहीं किया जा सकेगा।
कार्बन कैप्चर ऐंड स्टोरेज (सीसीएस) अथवा इसका नया संस्करण कार्बन कैप्चर, यूटिलाइजेशन ऐंड स्टोरेज (सीसीयूएस) दोनों ही नई तकनीक नहीं हैं। इसके बुनियादी प्रयोगों की जड़ें सन 1920 के दशक में जाती हैं, हालांकि जमीन में कार्बन डाई ऑक्साइड को दबाने की पहली बड़ी परियोजना सन 1972 में टैक्सस ऑयलफील्ड ने शुरू की थी।
तब से सीसीएस और सीसीयूएस परियोजनाओं को यूरोप के देशों और अमेरिका में टुकड़ों में शुरू किया गया। हालांकि यह कभी भी पर्यावरण को लेकर लड़ाई में मुख्य रूप नहीं ले सका। एक तकनीक के रूप में इसने कभी भी कंपनियों या नीति निर्माताओं को बहुत उत्साहित नहीं किया।
नीति निर्माताओं को यह इतनी आकर्षक नहीं लगी कि वे इसे लेकर कर रियायत प्रदान करें अथवा कंपनियों को इसे अपनाने को प्रेरित करने के लिए अन्य प्रोत्साहन प्रदान करें। कंपनियों के लिए प्रतिफल की तुलना में कंपनी की लागत का समीकरण स्पष्ट नहीं था।
इसके अलावा बड़ी, मुनाफा कमाने वाली लेकिन प्रदूषण फैलाने वाली कंपनियों के लिए पर्यावरण की दृष्टि से खुद को बेहतर साबित करने के कई उपाय मौजूद थे। सौर ऊर्जा संयंत्र और पवन ऊर्जा संयंत्र स्थापित करने से लेकर पौधरोपण कार्यक्रम संचालित करने और कार्बन क्रेडिट खरीद तक बड़ी कंपनियों के पास अनेक विकल्प थे जिनकी मदद से वे खुद को पर्यावरण के अनुकूल साबित कर सकती थीं।
कई जलवायु विज्ञानी भी बड़े सीसीयूएस संयंत्र स्थापित करने के पक्ष में नहीं थे। वे इस तकनीक को व्यापक पैमाने पर प्रोत्साहित भी नहीं करना चाहते थे। उनको लगता था कि इससे एक नैतिक सवाल खड़ा हो सकता है। उनका मानना था कि अगर कार्बन कैप्चर लोकप्रिय हो गया तो विभिन्न कंपनियां और देश उत्सर्जन कम करने और स्वच्छ ऊर्जा के उत्पादन में कम रुचि लेंगे।
अंत में, कई सरकारों ने भी सोचा कि प्राकृतिक कार्बन सिंक यानी वन और समुद्र आदि उत्सर्जन को सोखने के लिए पर्याप्त हैं जबकि नीति निर्माताओं को स्वच्छ ऊर्जा तकनीक पर ध्यान देने के साथ-साथ कोशिश करनी चाहिए कि कुल उत्सर्जन में कमी आए।
अब इस विचार में बदलाव आया है। अगर कुछ और नहीं तो कम से कम पिछले कुछ वर्षों ने यह दिखाया है कि जलवायु परिवर्तन के खिलाफ लड़ाई आसान नहीं है। इस मामले में समीकरण आसान नहीं हैं। सौर, पवन और हाइड्रोजन को अपनाने तथा हरित ऊर्जा तकनीक को अपनाने की दिशा में अपेक्षित प्रगति नहीं हो रही है। ऐसे में प्रदूषण फैलाने वाले ईंधन को अपनाने की दिशा में अपेक्षित प्रगति नहीं हो पाएगी।
रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण तेल बाजार में जो उथलपुथल मची उसके कारण कोयले की मांग ने नए सिरे से जोर पकड़ा है। न तो हरित हाइड्रोजन तकनीक और न ही भंडारण तकनीक ही इतनी तेजी से विकसित हो सकी हैं कि कोयला, तेल, गैस अथवा पेट्रोकेमिकल आधारित ईंधनों का स्थान ले सकें।
अंत में कई उद्योग मसलन उर्वरक और सीमेंट और यहां तक कि इस्पात उद्योग में भी इन ईंधनों का कोई विकल्प मौजूद नहीं है। औद्योगिक कार्बन कैप्चर में केवल कार्बन डाई ऑक्साइड उत्सर्जन से निपटने का प्रयास नहीं किया जाता है बल्कि सल्फर ऑक्साइड, नाइट्रोजन ऑक्साइड और अन्य कणों से निपटना भी इस प्रक्रिया का हिस्सा है। ऐसे में यह कई प्रदूषण फैलाने वाले उद्योगों का सही विकल्प है।
कार्बन डाई ऑक्साइड उत्सर्जन का इस्तेमाल भी कई उद्योगों में किया जा सकता है। उर्वरक से लेकर तेल रिकवरी और उसे सिंथेटिक रसायन और ईंधन में बदलने तक के काम में उसका इस्तेमाल होता है। अगर ऐसा है भी तो कुल उत्सर्जन का बहुत कम हिस्सा ही इसमें इस्तेमाल होता है। कैप्चर की गई अधिकांश गैसों को जमीन या समुद्र के बहुत नीचे गहराई में दफना दिया जाता है। इन्हें तेल या गैस की खाली हो चुकी खदानों में या कोयले अथवा भूमिगत खदानों में दफन कर दिया जाता है जहां अब खनन नहीं होता। मौजूदा आकलन के मुताबिक तो ये गैस हजारों साल तक वहीं दफन रहेंगी। इन खदानों में दफन करने के बाद शायद ही कभी गैस बाहर निकली हो।
यूरोप, ब्रिटेन, अमेरिका, चीन, मलेशिया तथा अनेक अन्य स्थानों पर ऐसी अनेक परियोजनाएं चल रही हैं। अंतराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी के अनुसार फिलहाल करीब 45 टन क्षमता संचालित है और दुनिया भर में ऐसी 35 वाणिज्यिक परियोजनाएं चल रही हैं। 200 और सीसीयूएस संयंत्र निर्माण के अलग-अलग चरणों में है और उनके 2030 तक तैयार हो जाने की उम्मीद है जो 22 करोड़ टन कार्बन डाई ऑक्साइड को ग्रहण करेगा।
उत्तरी अमेरिका और यूरोप ने हाल के दिनों में इस दिशा में तेजी से प्रगति की है और औद्योगिक केंद्र विकसित कर रहे हैं ताकि बड़े सीसीयूएस सुविधाओं को किफायती ढंग से तैयार किया जा सके। ऐसे एक क्लस्टर के अंदर मौजूद कंपनियां परियोजना और परिचालन लागत को साझा कर सकती हैं। एशिया प्रशांत भी बहुत पीछे नहीं है।
शुरुआती ढिलाई के बाद भारत भी इस तकनीक को अपनाता नजर आ रहा है। नीति आयोग ने गत नवंबर में ‘कार्बन कैप्चर, यूटिलाइजेशन ऐंड स्टोरेज (सीसीयूस) पॉलिसी फ्रेमवर्क ऐंड इट्स डेवलपमेंट मैकेनिज्म इन इंडिया’ जारी किया लेकिन कई प्रायोगिक परियोजनाएं इससे बहुत पहले शुरू कर दी गई थीं।
भारत के लिए सीसीयूएस उत्सर्जन लक्ष्यों को हासिल करने के मामले में खास महत्त्वपूर्ण साबित हो सकता है। आबादी के आकार के कारण हम दुनिया के तीसरे सबसे बड़े उत्सर्जक हैं, हालांकि हमारा प्रति व्यक्ति उत्सर्जन बहुत कम है। स्वच्छ ऊर्जा पर पूरा जोर देने के बावजूद हम जीवाश्म ईंधन पर निर्भर बने हुए हैं। सबसे अहम बात यह है कि कोयले का हमारा भंडार और कोयल से गैस बनाने की हमारी परियोजनाएं भी सीसीयूएस को हमारे लिए उपयोगी बनाती हैं।
Date:06-04-23
सहयोग का तकाजासंपादकीय
इसमें कोई दो राय नहीं कि भारत और भूटान के बीच सदियों से मधुर संबंध रहे हैं और अच्छे पड़ोसी होने के नाते दोनों देशों में कई स्तर पर आपसी सहयोग पर आधारित तालमेल लंबे समय से कायम रहा है। लेकिन नई परिस्थितियों में दुनिया भर में बदलते समीकरण के दौर में ऐसे रिश्तों को मजबूती देने के लिए नए कार्यक्रमों पर जोर देना, उसमें स्पष्टता लाना समय की जरूरत होती है। इस लिहाज से देखें तो मंगलवार को नई दिल्ली में भूटान के राजा और भारत के प्रधानमंत्री की मुलाकात के दौरान आपसी संबंधों को दृढ़ करने को लेकर जिस तरह नीतिगत स्तर पर बातचीत आगे बढ़ी, वह एक महत्त्वपूर्ण घटनाक्रम है। खासतौर पर दोनों देशों के बीच सुरक्षा के मुद्दे पर तालमेल बढ़ाने पर जो सहमति बनी और ‘पहले से ही घनिष्ठ संबंधों’ को विस्तार देने के मकसद से पांच सूत्रों पर आधारित रूपरेखा तैयार की गई, वह निश्चित रूप से भारत और भूटान के लिए बेहद उपयोगी साबित होगा। यों भी भारत में भूटान को लेकर अतीत में कभी कोई द्वंद्व नहीं रहा है। यह भारत का हमेशा ही करीबी सहयोगी रहा है। बल्कि पिछले कुछ सालों में द्विपक्षीय संबंधों को लेकर दोनों देशों के बीच काफी प्रगति हुई है।
दरअसल, भारत में मौजूदा सरकार ने ‘पड़ोसी प्रथम की नीति’ की तरजीह दिया है। इसी के तहत भारत एक परस्पर सहयोगी पड़ोसी और नजदीकी मित्र के रूप में भूटान को महत्त्व देता रहा है। औपचारिक सद्भावनाओं और कार्यक्रमों के जरिए संबंधों में मजबूती को पुष्टि मिलती है। मगर भारत ने अपनी ओर से नीतिगत स्तर पर परस्पर सहयोग आधारित नीति ही अपनाई है, जिसमें एक दूसरे की गरिमा को कायम रखना एक अहम पक्ष होता है। भूटान नरेश के ताजा दौरे में भी भारत के साथ विविध क्षेत्रों में सहयोग को और व्यापक बनाने के मकसद से जो खाका तैयार किया गया, उसमें मुख्य रूप से पांच सूत्रों पर जोर दिया गया। इसमें अर्थव्यवस्था और विकास में साझेदारी के साथ-साथ भारत भूटान में व्यापार, संपर्क और निवेश के तहत बुनियादी ढांचा, रेल, हवाई संपर्क और अंतर्देशीय जलमार्ग विकसित करने में सहयोग करेगा। इसके अलावा, दीर्घकालिक और सतत व्यापार सुविधा के उपाय और ऊर्जा सहित अभिनव क्षेत्रों में सहयोग के रास्ते तलाशे जाएंगे।
जाहिर है, भूटान नरेश की भारत यात्रा दोनों देशों के बीच पहले से कायम मित्रवत संबंधों को ताजगी देने और उसमें मजबूती लाने की कवायद है। लेकिन यह ध्यान रखने की जरूरत है कि भारत और भूटान, दोनों की सीमा से सटा देश चीन आज जिस तरह की बिसात रच रहा है, अगर समय रहते उसे नहीं समझा गया तो उससे नई जटिलताएं खड़ी होंगी। मसलन, हाल में चीन ने भारत के सीमाई इलाकों में जिस तरह की हरकतें की हैं, उसे वह औपचारिक शक्ल देने की फिराक में है और दूसरे देशों को भी अपने प्रभाव में लेना चाहता है। शायद इसी संजाल की वजह से भूटान के प्रधानमंत्री ने हाल ही में अपने एक साक्षात्कार में डोकलाम को लेकर एक उलझा हुआ बयान दिया था। उन्होंने भूटान के सीमावर्ती इलाकों में चीन की ओर से गांव बसाने के मसले पर भी कहा कि कोई अतिक्रमण नहीं हुआ। भूटान का यह रुख अगर अंतिम नहीं भी है तो इस तरह की अस्पष्टता से निश्चित रूप से एक भ्रम की स्थिति बनेगी। बेहतर हो कि भूटान चीन के दबाव में आए बिना भारत के साथ आपसी सहयोग और सम्मान पर आधारित रिश्ते की अहमियत को समझे। अतीत से लेकर अब तक घनिष्ठ संबंधों की बुनियाद पर एक मजबूत भविष्य का निर्माण दोनों देशों के लिए वक्त का तकाजा है।
Date:06-04-23
स्वास्थ्य सेवाओं से वंचित लोगयोगेश कुमार गोयल
विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्लूएचओ दुनिया के सभी देशों की स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं पर आपसी सहयोग और मानक विकसित करने वाली वैश्विक संस्था है, जिसका प्रमुख काम दुनिया भर में स्वास्थ्य समस्याओं पर नजर रखना और उन्हें सुलझाने में सहयोग करना है। इस संस्था ने ‘स्माल पाक्स’ जैसी बीमारी को जड़ से खत्म करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और टीबी, एड्स, पोलियो, रक्ताल्पता, नेत्रहीनता, मलेरिया, सार्स, मर्स, इबोला जैसी खतरनाक बीमारियों के बाद कोरोना की रोकथाम में जुटी रही है। इस संस्था के माध्यम से प्रयास किया जाता है कि दुनिया का प्रत्येक व्यक्ति शारीरिक, मानसिक और सामाजिक रूप से पूर्ण स्वस्थ रहे। इसका पहला लक्ष्य वैश्विक स्वास्थ्य सुधार रहा है, लेकिन इस लक्ष्य की प्राप्ति के लिए यह सुनिश्चित किया जाना बेहद जरूरी है कि समुदाय में सभी लोगों को अपेक्षित स्वास्थ्य सुविधाएं मिलें। मगर कोरोना विषाणु के सामने जब अमेरिका जैसे विकसित देश को भी बेबस देखा गया और वहां स्वास्थ्य कर्मियों के लिए जरूरी सामान की भारी कमी नजर आई, तब पूरी दुनिया को अहसास हुआ कि अब भी जन-जन तक स्वास्थ्य सुविधाएं पहुंचाने के लिए बहुत कुछ किया जाना बाकी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन खुद मानता है कि दुनिया की कम से कम आधी आबादी को आज भी आवश्यक स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध नहीं हैं।
हालांकि बीते दशकों में नवीनतम तकनीकों की बदौलत स्वास्थ्य क्षेत्र में क्रांतिकारी बदलाव आया है, लेकिन एड्स, कैंसर जैसी घातक बीमारियों के अलावा जिस प्रकार लोगों में हृदय रोग, मधुमेह, तपेदिक, मोटापा, तनाव जैसी स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं तेजी से बढ़ रही हैं, उसमें स्वास्थ्य क्षेत्र की चुनौतियां निरंतर बढ़ रही हैं। जहां तक भारत की बात है, विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार यहां प्रतिवर्ष 58 लाख लोगों की मृत्यु कैंसर, मधुमेह, पक्षाघात, हृदय रोग और फेफड़ों की बीमारियों के कारण होती है, जो विश्व में सर्वाधिक है। हालांकि सरकार का दावा है कि आने वाले वर्षों में आधुनिक चिकित्सा पद्धति और तकनीक की मदद से टीबी, कैंसर तथा एड्स जैसी जानलेवा बीमारियों से बचाव के कारगर रास्ते तलाश लिए जाएंगे और लोग स्वस्थ जीवन जीने लगेंगे। मगर विशेषज्ञों के मुताबिक आने वाले समय में कुछ बीमारियां बड़ी परेशानी बन कर उभरेंगी।
इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आइएमए) के अनुसार देश में सिरोसिस के मरीजों की संख्या बढ़ रही है, इसके अलावा टायफाइड जैसी जलजनित और संक्रामक बीमारियों पर काबू पाने की बड़ी चुनौती है। वर्तमान में देश में बुजुर्गों की आबादी करीब चार फीसद है, जिसके 2050 तक चौदह फीसद तक बढ़ने की उम्मीद है। ऐसे में डिमेंशिया यानी स्मृतिभ्रंश जैसी बीमारी बड़े पैमाने पर उभर सकती है। माना जा रहा है कि डिमेंशिया के मरीजों की संख्या इस दौरान 197 फीसद तक बढ़ सकती है। इन परिस्थितियों में वृद्धों को घरेलू देखभाल के लिए विशेष सेवाओं की बड़े पैमाने पर जरूरत पड़ेगी। 2050 तक देश में उन्नीस करोड़ से भी ज्यादा हृदय रोगी होने का अनुमान लगाया जा रहा है। इंटरनेशनल डायबिटीज फेडरेशन की एक रिपोर्ट के अनुसार देश में मधुमेह रोगियों की संख्या 2030 तक 10.1 करोड़ और 2045 तक 13.42 करोड़ हो सकती है। इसी प्रकार करीब 29.3 फीसद लोग उच्च रक्तचाप की समस्या से पीड़ित हैं, जिनकी संख्या बढ़कर 69.3 फीसद तक हो सकती है।
आक्सफैम इंटरनेशनल के असमानता को लेकर जारी सूचकांक के अनुसार भारत जीडीपी के हिसाब से अपने नागरिकों के स्वास्थ्य पर खर्च करने के मामले में 161 देशों के मुकाबले 157वें स्थान पर है। स्वास्थ्य पर किए जाने वाले खर्च के मामले में भारत ब्रिक्स देशों और अपने पड़ोसी देशों पाकिस्तान (4.3 फीसद), बांग्लादेश (5.19 फीसद), श्रीलंका (5.88 फीसद), नेपाल (7.8 फीसद) आदि से बहुत पीछे है। अमेरिका अपनी जीडीपी का 16.9, जर्मनी 11.2, जापान 10.9, कनाडा 10.7, यूके 9.8 और आस्ट्रेलिया 9.3 फीसद स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करते हैं। भारत में बच्चों में वेस्टिंग (ऊंचाई के अनुसार कम वजन) की वर्तमान स्थिति 19.3 फीसद पर है, जो वर्ष 2000 के 17.15 फीसद से भी खराब अवस्था में है। देश के एक चौथाई बच्चे आज भी टीकाकरण कार्यक्रम से वंचित हैं।
इस साल केंद्रीय बजट में स्वास्थ्य के लिए कुल वित्तीय आबंटन सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 2.1 प्रतिशत रखा गया है, जबकि नीति आयोग, ग्रामीण सांख्यिकी, नेशनल मेडिकल काउंसिल के आंकड़ों के मुताबिक जीडीपी का 2.5 फीसद से ज्यादा स्वास्थ्य पर खर्च करने की जरूरत है। विभिन्न आंकड़ों के मुताबिक देश में 543 मेडिकल कालेज हैं, जबकि कम से कम 600 मेडिकल कालेज, 50 एम्स तथा 200 सुपर स्पेशियलिटी अस्पतालों की आवश्यकता है। कुल 810 जिला अस्पताल (डीएच) तथा 1193 उपमंडल अस्पताल (एसडीएच) हैं। 2018-19 के आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार साठ फीसद प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों में केवल एक डाक्टर उपलब्ध है, जबकि पांच फीसद में एक भी डाक्टर नहीं है। करीब बत्तीस फीसद ग्रामीणों को नजदीक के किसी अस्पताल तक जाने के लिए आज भी कम से कम पांच किलोमीटर चलना पड़ता है।
केंद्र की गत वर्ष ग्रामीण स्वास्थ्य रिपोर्ट में बताया गया था कि ग्रामीण क्षेत्रों के पांच हजार से भी ज्यादा सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों में बाईस हजार विशेषज्ञ डाक्टरों की जरूरत है, जबकि स्वीकृत पद 13637 ही हैं और इनमें अब भी 9268 पदों पर नियुक्ति नहीं है। रिक्त पदों को लेकर कई राज्यों में तो स्थिति बेहद दयनीय है। जहां 2005 में विशेषज्ञ डाक्टरों की 46 फीसद कमी थी, वह अब 68 फीसद हो चुकी है। ग्रामीण क्षेत्रों में प्रशिक्षित डाक्टरों के अलावा नर्सिंग स्टाफ, रेडियोग्राफर, लैब टेक्नीशियन आदि सहयोगी मेडिकल स्टाफ की भी काफी कमी है। ग्रामीण भारत में प्रति सत्तर हजार आबादी पर सरकारी अस्पतालों में डब्लूएचओ के अनुशंसित स्तर से बेहद कम, मात्र 3.2 बिस्तर हैं। ग्रामीण स्वास्थ्य देखभाल को लेकर ऐसी सरकारी उदासीनता अत्यधिक चिंताजनक है और चिंता की बात है कि डब्लूएचओ तथा यूनिसेफ जैसी संस्थाओं द्वारा भी इस दिशा में कोई सार्थक प्रयास होता नहीं दिख रहा। हालांकि, सार्वभौमिक, सस्ती और गुणवत्तायुक्त स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से सरकार द्वारा राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन, आयुष्मान भारत जैसे कुछ कार्यक्रमों के माध्यम से सकारात्मक पहल की जा रही है।
2018 में लांसेट जर्नल में छपी एक रिपोर्ट में कहा गया था कि भारत में करीब चौबीस लाख लोग हर साल केवल इसीलिए मर जाते हैं, क्योंकि उन्हें खराब स्वास्थ्य सेवाएं मिलती हैं। आठ लाख से ज्यादा लोगों की मौत स्वास्थ्य सेवाओं की अपर्याप्तता के कारण हो जाती है। यह बेहद चिंताजनक स्थिति है कि भारत उन देशों में है, जहां एक आम नागरिक स्वास्थ्य सेवाओं के लिए अपनी जेब से सर्वाधिक पैसा खर्च करता है और इसमें सबसे ज्यादा पैसा दवाएं खरीदने पर खर्च होता है। नागरिकों को मिलने वाली स्वास्थ्य सेवाओं का अठहत्तर फीसद हिस्सा निजी अस्पतालों और डाक्टरों के माध्यम से ही मिल रहा है। देश के करीब अस्सी फीसद नागरिकों के पास कोई भी स्वास्थ्य बीमा नहीं है। ऐसे में समझा जा सकता है कि सामान्य आम नागरिक के लिए सस्ते और कारगर इलाज की सुविधा मिलना कितना मुश्किल है।
हाल ही में सरकार ने माना है कि स्वास्थ्य सेवाओं की असमानता दूर करने और स्वास्थ्य देखभाल संबंधी नब्बे फीसद जरूरतों को प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के माध्यम से दूर किया जा सकता है, लेकिन इसके लिए जरूरी है कि इन स्वास्थ्य केंद्रों की कमी को दूर करने के गंभीर प्रयास करते हुए डाक्टरों की भारी कमी को भी दूर किया जाए।
Date:06-04-23
जब फसलों और किसानों का दुश्मन बनने लगा मौसमपी एस पाण्डेय, ( कुलपति, आरपीसीएयू, पूसा )
बेमौसम बारिश ने किसानों को पंजाब से बिहार तक चिंता में डाल रखा है। जो नुकसान हुआ है, उसका अनुमान लगाया जा रहा है। कहीं-कहीं 80 प्रतिशत तक नुकसान की चर्चा हो रही है। आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? व्यापकता में देखें, तो आज संपूर्ण विश्व जलवायु परिवर्तन और उससे होने वाले दुष्परिणामों से प्रभावित है। एक ओर, जहां हम आधुनिकता और विकासवाद की बात करते हैं, तो वहीं दूसरी ओर, खाद्यान्न सुरक्षा, पोषण सुरक्षा और आर्थिक सुरक्षा को पूरी तरह पाने में हम पिछड़ रहे हैं। एक आंकड़े के मुताबिक, संपूर्ण विश्व में वर्ष 2021 में करीब 2.3 अरब लोग खाद्यान्न सुरक्षा से प्रभावित हुए थे, जो विश्व की आबादी का 29.3 प्रतिशत था। अगर हम पोषण सुरक्षा की बात करें, तो पूरे विश्व में वर्ष 2020 में 3.1 अरब लोग मानक पौष्टिक आहार से वंचित थे, यानी किसानों के पास कोई विकल्प नहीं है, कृषि उत्पादन बढ़ाना ही होगा। किसानों को हौसला बुलंद रखना होगा।
वैज्ञानिकों की मानें, तो समस्या बढ़ सकती है। वैश्विक तापक्रम में लगातार वृद्धि हो रही है। अगले 20 वर्ष में विश्व का तापक्रम 1.5 डिग्री सेल्सियस से ज्यादा बढ़ने की आशंका है। बढ़ती गरमी, अल्प वार्षिक वर्षा, असमय तेज बारिश, ओलापात व आंधी-तूफान की तीव्रता को हम सभी महसूस कर रहे हैं। भारत ही नहीं, विश्व भर में कृषक एक ही मौसम में बाढ़ व सुखाड़, दोनों झेल रहे हैं।
बदलते मौसम के चलते उत्तर प्रदेश, बिहार के कई हिस्सों में मौसम की चरम घटनाएं बढ़ रही हैं। खासकर उत्तर बिहार में जैसा कि वैज्ञानिक तथ्य एवं अनुसंधान बताते हैं कि जलवायु बहुत बदल गई है। अनिश्चितता बढ़ गई है। पिछले 20 वर्षों के दौरान अप्रैल व मई महीने में वर्षा की मात्रा बढ़ गई है। इसका नकारात्मक असर यह पड़ा है कि गेहूं की फसल बुरी तरह प्रभावित हो रही है, जो इस क्षेत्र की मुख्य रबी फसल है। इस मौसम में अधिकांश वर्षा गरज-तूफान के साथ होती है। नई बात नहीं है, इस मौसम में ओलावृष्टि भी होती है। इस वर्ष मार्च के अंत और अप्रैल की शुरुआत में मुजफ्फरपुर, पूर्वी चंपारण, पश्चिमी चंपारण, सारण, शिवहर और मधुबनी जिलों में ओलावृष्टि देखी गई। ऐसी बारिश ने कई जगहों पर गेहूं की फसल को गिरा दिया और दानों को बिखेर दिया। इसके अलावा कई स्थानों पर तेज हवा के चलते आम और लीची के कोमल नए फल भी गिरे हैं। अनेक प्रखंडों में मार्च एवं अप्रैल 2023 में बेमौसम बरसात और ओलावृष्टि से गेहूं में 15 से 80 प्रतिशत नुकसान की सूचना है।
अगर पीछे मुड़कर देखें, तो 7 अप्रैल, 2018 को उत्तर बिहार के कई जिलों में हुई ओलावृष्टि सबसे विनाशकारी थी। पूर्वी चंपारण, सीतामढ़ी, गोपालगंज, मुजफ्फरपुर, समस्तीपुर, दरभंगा और वैशाली जिले गंभीर रूप से प्रभावित हुए थे। तब इन जिलों की करीब 50 फीसदी गेहूं की फसल पूरी तरह बर्बाद हो गई थी। मगर प्रतिकूल स्थितियों के बावजूद ध्यान देने की बात है कि बिहार में चलाई गई योजना- जलवायु अनुकूल कृषि कार्यक्रम- रामबाण साबित हो रही है और यहां के किसान मौसम की मार के बावजूद अच्छी फसल, अच्छी उत्पादकता ले रहे हैं। गेहूं, मक्का आदि की उत्पादकता विपरीत स्थितियों के बावजूद बढ़ी है। कृषि विकास दर बढ़ाने में सरकारी प्रयास व जलवायु अनुकूल कृषि कार्यक्रम में सहभागिता को सर्वोपरि माना जा रहा है। जलवायु अनुकूल कृषि कार्यक्रम वर्ष 2019 से आठ जिलों और 2020 से शेष 30 जिलों के 190 गांवों में करीब 60 हजार एकड़ क्षेत्र में चलाए जा रहे हैं।
आज चक्र आधारित कृषि-प्रणाली को समयबद्ध तरीके से और जलवायु अनुकूल कृषि तकनीक के साथ लागू करना जरूरी है। कृषि केंद्रों से जुड़कर ऐसे आजमाए गए तरीके किसानों को सीखने पड़ेंगे, ताकि कम लागत में अधिक उत्पादन हासिल हो सके। कृषि कोई ऐसा मोर्चा नहीं है, जहां हम हार मान जाएं। किसानों को निराशा से दूर रहते हुए समय अनुकूल कृषि तौर-तरीके सीखने पड़ेंगे। अच्छी बात है, कृषि कार्यक्रम में मिल रही सफलता और भविष्य में खाद्यान्न की बढ़ती मांग को देखते हुए सरकार चौथे कृषि रोड मैप में इस योजना को और बड़े रूप में लाने की सोच रही है।
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पिछले एक दशक में पुरूषों और महिलाओं के बीच वेतन असमानता बढ़ गई है। उच्च वेतन स्तर पर यह अधिक है। हाल ही में राष्ट्रीय सांख्यिकीय कार्यालय की लैंगिक समानता पर जारी एक रिपोर्ट में ऐसी असमानता स्पष्ट की गई है। इस असमानता के कुछ कारण हैं –
समाधान –
इनमें से कुछ कारकों को मनरेगा के द्वारा संबोधित किया गया है।
सच यह है कि कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी में गिरावट पहले ही शुरू हो गई थी। महामारी के साथ यह और तेज हो गई। फिलहाल, जिन राज्यों में तेजी से वेतन असमानता बढ़ रही है, उन्हें नीतिगत परिवर्तन करने की जरूरत है। अपने स्तर पर केंद्र मनरेगा आवंटन में अधिक सतर्क हो सकता है।
‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 20 मार्च, 2023
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Date:05-04-23
The Beijing BugMany other democracies are now as suspicious of TikTok as India was when it banned the app firstTOI Editorials
With Australia’s ban on TikTok over spying concerns, the Chinese-owned short video app now is prohibited from government phones and devices in the US, UK, Australia, Canada, New Zealand, EU institutions, France and Belgium, while India outright banned it in 2020. The US is mulling a complete ban following a spying incident. Concerns that TikTok is leveraged for espionage were proved correct when recently its China-based parent company Byte Dance fired employees in China and the US who had tracked IP addresses of journalists using the app, in a bid to ascertain if they were in the same location as employees suspected of information leaks.
Big Tech companies that tailor content for users gather massive data in practices not unlike spying. Collection of data and targeting of users is integral to Big Tech business models. Devices are constantly informing companies what we do, where we are. What makes TikTok aparticular threat is its parent company’s jurisdiction based in China.
This, TikTok too realises. It tried to distance itself from Byte Dance when its CEO faced a US legislators’ committee recently. But claims of TikTok’s independence fell flat in the face of a testy Beijing statement saying it would “strongly oppose” any forced sale or takeover of TikTok.
Spying apart, anxieties about addiction to the app are real but can hardly be restricted to TikTok. Addiction to Snapchat, YouTube or Instagram is just as worrying. The difference perhaps lies in how much control governments can exert on social media companies. Beijing regulates TikTok’s domestic version, Douyin, with time controls and screen limits for those aged below 14 with its algorithm pushing educational videos and politically approved content.
But TikTok’s appeal remains unchanged for users. That no short video app has come close to TikTok, often an enabling tool for selfexpression, points to a serious gap in the market. However, the bigger issue is that the app’s operational design raises several red flags. While TikTok should continue to be banned in India, the real test for our tech abilities will be to produce an Indian alternative to this hugely popular platform.
Date:05-04-23
Make In India. Indians Need ItIndia’s workforce will soar just as China’s declines. Service sector’s record makes it clear it’s not up to this huge jobs challenge. Manufacturing is the only lifeline to reap demographic dividendDuvvuri Subbarao, [ The writer is a former governor of Reserve Bank of India ]
The UN projection that India would overtake China as the most populous country on the planet during April has triggered much talk of India being poised for a demographic dividend. The most high-profile example of a demographic dividend is the East Asian tiger economies – Hong Kong, Singapore, Korea and Taiwan – which posted astonishing growth rates in the 1980s.
Among the things that helped make the ‘miracle’ were their demographic transitions – falling fertility rates and rising working age populations. As the burden of providing for dependents declined, the workers could save more, which turned into more investment which in turn expanded jobs and accelerated growth, putting the economies on a virtuous cycle.
Bring women workers back
India is roughly similarly positioned. The fertility rate declined to replacement level last year, and with a median age of 28 years, significantly lower than 38 in the United States and 39 in China, India can boast of the largest workforce in the world for at least the next 25 years. The timing is helpful too. India’s workforce will soar just as China’s is set to decline. Is it then India’s turn to produce a growth miracle on the back of a demographic dividend?
Alas, a demographic dividend is not inevitable. It will materialise if and only if India is able to generate jobs for the millions of youth who are flooding the labour market.
According to the Centre for Monitoring the Indian Economy, our unemployment rate in March was 7. 8%. This is almost certainly an underestimate because of the huge ‘disguised unemployment’. Hundreds of millions of people who are locked in agriculture andother informal sectors on low wages are counted as fully employed.
More distressingly, the female labour force participation rate in India is not only low compared even to other South Asian economies but is declining, suggesting that millions of women have opted out of the labour force.
Chase higher productivity
It’s quite common for even people with postgraduate degrees to apply for low-level government jobs. Last year, Railways received over 12 million applications for 35,000 non-technical posts, setting off a stampede at the recruitment centres, which is a telling commentary on the size of the employment problem and the quality of education.
In a 2020 report, the McKinsey Global Institute estimated that by 2030 India needs to create at least 90 million new non-farm jobs to accommodate fresh entrants into the labour force as also workers who will move from agriculture to more productive nonagriculture jobs. If measures are taken to correct their historical under-representation, at least an additional50 million women could return to the workforce, making the job creation challenge substantially bigger.
Where are jobs going to come from? The stereotype view, shaped no doubt by our high-profile software industry, is that the services sector has been a big job creator. That’s a misperception. The software industry accounts for just a few million jobs in a nearly one billion workforce. The large majority of jobs created in the services sector have been the low wage, low productivity type in the informal sector – such as those of security guards.
Notwithstanding that disappointing record, there is a growing view that India should focus on the services sector because of the promise it holds for growth and for jobs going forward. The demand for services, it’s argued, will grow as aging populations in rich countries will consume more services than goods. From the supply side, advances in digital technologies have made it possible to deliver even high-end services at a distance (think telemedicine), as amply demonstrated during the lockdowns.
Meet high demand for low-wage goods
India should certainly leverage on this growing opportunity by strengthening its human capital and skill endowment. But that’s a long haul and can’t be an effective solution to its intensifying jobs challenge in the short to medium term.
That makes manufacturing the only possible option for meeting the jobs challenge. Underlying the government’s ‘Make in India’ campaign is the hope and expectation that India can replicate the China model of export of manufactures to the rich world. That will be a big challenge simply because the world today is a lot different from the one China faced when it opened up in the 1980s.
China leveraged on offshoring which was then gaining popularity as an efficient mode of production. Today with all the hostility towards globalisation, India is staring at ‘friend shoring’ and reshoring of production while at the same time advances in robotics and machine learning are rapidly eroding the comparative advantage of cheap labour.
Such despair is possibly misplaced. India imports goods worth over $100 billion annually from China. If even half of this can be made at home by productivity improvement, it will mean millions of jobs. And as Arvind Panagariya of Columbia University argues in his book, India Unlimited , even in a difficult world where global merchandise trade is under threat, there is still a huge demand for low-wage goods. India’s share in global trade is so small that even a small increase in share can mean a big gain.
The common lament today is that China will get old before it gets rich. India should try to avoid a similar fate.
Date:05-04-23
Invented namesChina’s ‘renaming’ of areas in Arunachal Pradesh is a new low in ties with IndiaEditorial
India has summarily rejected China’s attempt to lay claim over areas of Arunachal Pradesh after it issued new official names for them. In a fresh attempt on Sunday, the Chinese Ministry of Civil Affairs said it would “standardise” 11 place names in what China calls “South Tibet or Zangnan”, an area consistently controlled by India. The names, in Mandarin, Tibetan and Pinyin (English transliteration), with latitude and longitude markings that pertain to points in Arunachal, including one close to capital Itanagar, leave little doubt that China’s list, the third such since 2017, is a deliberate affront to India’s territorial sovereignty. The Ministry of External Affairs statement, that “invented names” will not alter the reality that Arunachal Pradesh is an integral part of India, mirrors what India had said in 2021 when China “renamed” 15 places; in 2017, there were six names. It would be a mistake, given the timing, to assume that the Chinese decision is a repetition of its previous attempts. The move in 2017 was seen as retaliation after the Dalai Lama’s visit to Tawang. In 2021, the move followed China’s new “Land and State Border Law”, that virtually authorised the government to reclaim territories claimed by China, and was seen as a way to reassert its claim over the State as a whole.
There could be many factors behind the latest move: China’s reaction after the Indian Army rebuffed a PLA attempt to take over a post at Yangtse in the Tawang sector of the Line of Actual Control (LAC) in December 2022, an angry response to New Delhi’s decision to hold a G-20 engagement group meeting on Innovation technology in Itanagar which the Chinese embassy had boycotted, or an indication of more serious designs ahead. Above all, it reflects the nadir in ties and the lack of meaningful dialogue for three years since the amassing of Chinese troops at the LAC in 2020 and transgressions that have led to scuffles, including the deadly encounter at Galwan. While many rounds of talks have ensued, and there has been disengagement at some standoff points, political relations have not been resumed, although there have been some meetings between Foreign and Defence Ministers, and Prime Minister Narendra Modi spoke briefly with Chinese President Xi Jinping at the G-20 summit in Indonesia last year. It is necessary, in light of China’s latest act of belligerence, that the government shows more clarity on the nature of its conversations thus far. Until the government probes the reasons behind China’s moves and the motivation for its persistent aggressions, it will be hard to prepare for a future course of action, even as it counters China’s false narrative and a renaming of areas that are firmly within India’s boundaries.
Date:05-04-23
खुशी को मापने के क्या तरीके होने चाहिए ?चेतन भगत, ( अंग्रेजी के उपन्यासकार )
पिछले साल एक ग्लोबल हंगर इंडेक्स रिपोर्ट आई थी, जिसमें भारत को 122 देशों में 107वें क्रम पर रखा गया था। हंगर इंडेक्स में भारत को उत्तर कोरिया, इथियोपिया, सूडान, रवांडा, नाइजीरिया और कॉन्गो से भी पीछे पाया गया था! तब भी मेरे मन में सवाल उठा था कि हम इस तरह की त्रुटिपूर्ण रिपोर्टों को इतनी गम्भीरता से क्यों लेते हैं और दुनिया में उन्हें इतना कवरेज क्यों मिलता है? अब वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट आई है। इस रिपोर्ट में आंकड़ों की मशक्कत से बेतुके नतीजे निकाले गए हैं। रिपोर्ट में भारत को 136 देशों में से 126वें क्रम पर पाया गया है। यानी भारत दुनिया के सबसे नाखुश देशों में से एक है! रिपोर्ट के मुताबिक युद्धों या अंदरूनी टकरावों की मार झेल रहे या लगभग दिवालिया हो चुके यूक्रेन, इराक, बुर्कीना फासो, फलस्तीन, म्यांमार, बांग्लादेश, श्रीलंका और पाकिस्तान जैसे देश भारत से अधिक प्रसन्न हैं। चलो, कम से कम हमारे पड़ोसी तो खुश हैं!
वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट को संयुक्त राष्ट्र द्वारा समर्थित एक एनजीओ ने जारी किया है, जिसका नाम है सस्टेनेबल डेवलपमेंट सॉल्यूशंस नेटवर्क। कितना भला नाम है, नहीं? यह एक छोटी-सी संस्था है, जिसका सालाना राजस्व 11 मिलियन डॉलर का है। इसमें भी अधिकतर हिस्सा अनुदानों से प्राप्त होता है। उसके द्वारा जारी रिपोर्ट एक पीडीएफ डॉक्यूमेंट है, जिसमें तीन ऐसी चीजें हैं, जो इस तरह की रिपोर्ट्स के लिए जरूरी मानी जाती हैं। पहली, यह रंग-बिरंगी है और इसका आकल्पन बहुत सुंदरता से किया गया है, दूसरी, इसमें बहुत सारे आंकड़े और तालिकाएं हैं और इसमें ‘रिग्रेशन को-इफिशिएंट’ जैसे शब्दों का उपयोग किया गया है, जिन्हें सुनकर हमें लगे कि हम कोई बहुत एकेडमिक चीज पढ़ रहे हैं, तीसरी, इसमें विभिन्न नस्ली समुदायों के लोगों की बहुत सारी तस्वीरें हैं। इस तरह की रिपोर्टों में प्रस्तुत की जाने वाली तस्वीरों के लिए भी इस तरह की गाइडलाइंस होती हैं एक, वे किसी परिवार की तस्वीरें होनी चाहिए या उनमें किसी महिला को बच्चों के साथ दिखाया जाना चाहिए, दो, चित्रों में दिखाई देने वाले लोग गरीब होने चाहिए, इसके बावजूद उनके चेहरों पर मुस्कराहटें होनी चाहिए, तीन, चित्रों में किसी विकासशील देश के लोग गांव में खड़े दिखाए जाने चाहिए, जिनके पास उनकी फसलें या मवेशी हों और चार, तस्वीरों के साथ एक वर्चु-सिगनलिंग वाला उद्धरण होना चाहिए, जिसमें एक बेहतर दुनिया के निर्माण की कामना की गई हो।
वर्ल्ड हैप्पीनेस रिपोर्ट में यह सब है। यह हर देश में प्रसन्नता के स्तरों को मापने और उसे रैंकिंग देने का दावा भी करती है। प्रसन्नता- यह शब्द कितना बड़ा और भावपूर्ण है, भूख की तरह। लेकिन आप प्रसन्नता की माप कैसे करेंगे? क्या पूरी दुनिया में घूमकर लोगों से पूछा जाएगा कि क्या आप खुश हैं? यकीनन नहीं। वह तो बहुत ही आसान हो जाएगा। वैसे भी तीसरी दुनिया के गरीब लोगों को क्या पता कि खुशी किस चिड़िया का नाम है? हम उन्हें बताएंगे कि खुशी क्या होती है और उसके मानदंड भी हम ही तय करेंगे।
तो क्या हैं वे मानदंड? इसके लिए वे गैलप वर्ल्ड पोल पर निर्भर रहते हैं। पोल में लोगों से पूछा जाता है कि वे अपने जीवन में किस मुकाम पर होना चाहते हैं और उसकी तुलना में वर्तमान में वे कहां हैं। इसे 1 से 10 तक के स्केल पर मापा जाता है। अगर कोई व्यक्ति खुद को कम रैंकिंग देता है तो इसका यह मतलब है कि उसका देश नाखुश है! यानी अगर मुझको लगता है कि मुझे जीवन में किसी मुकाम पर पहुंचना चाहिए, लेकिन मैं अभी उस मुकाम पर नहीं हूं तो इसका यह मतलब है कि मैं अप्रसन्न हूं? सर्वेक्षण में इस तरह के सवाल हर देश के 500 से 2000 लोगों से पूछे जाते हैं। इसका यह मतलब है कि 2000 लोगों के द्वारा कही गई बातों के आधार पर 1 अरब 40 करोड़ लोगों वाले देश के बारे में निर्णय ले लिए जाते हैं!
रिपोर्ट बनाने वाले मेधावियों ने खुशी की माप के लिए कुछ और फैक्टर्स जोड़े हैं, जैसे प्रतिव्यक्ति आय (यानी वो पहले ही इस नतीजे पर पहुंच जाते हैं कि जो अमीर है वह सुखी है), आप कितनी दान-दक्षिणा देते हैं (यह बात भी अमीरों के पक्ष में जाती है), आपके यहां कितना भ्रष्टाचार है, आपको समाज-कल्याण के कितने लाभ मिलते हैं (अमीर देशों के खाते में एक और पॉइंट), आप निर्णय लेने के लिए कितने स्वतंत्र हैं (पश्चिम के व्यक्तिवादी समाज की तुलना में हमारा समूहवादी समाज इस बिंदु पर जाहिर है, अच्छा स्कोर नहीं कर सकेगा) आदि इत्यादि।
इन मानदंडों पर दुनिया का सबसे खुशहाल देश कौन-सा है? फिनलैंड, जो कि लगातार छह सालों से पहले स्थान पर आ रहा है। यह देश उत्तरी ध्रुव के निकट है और इसके कुछ स्थानों पर सर्दियों में तापमान शून्य से 40 डिग्री नीचे चला जाता है। उसके कुछ हिस्सों में तो दो महीने तक सूर्य नहीं निकलता।
वहां के लोग ज्यादा बातें वगैरा नहीं करते। आप इसे दुनिया का सबसे खुश देश कहते हैं? क्या आप कभी हमारा आईपीएल देखने आए हैं, सर? या आपने हमारी शादियों और त्योहारों को देखा है? और क्या इस तरह की रिपोर्ट बनाने वालों ने दुनिया में डिप्रेशन के स्तरों को मापा है? क्या उन्होंने तलाक की दरें देखी हैं? या इस बात का आकलन किया है कि बूढ़े लोग पश्चिम की तुलना में भारत में अपने बच्चों या नाती-पोतों से कितनी आसानी से मिल पाते हैं? या ईश्वर से अपने सम्बंधों के चलते लोग जीवन में कितनी शांति का अनुभव करते हैं? क्या ये तमाम बातें अप्रासंगिक हैं और केवल पैसों से जुड़े मानदंडों को ही प्रासंगिक माना जाएगा?
Date:05-04-23
युवा आबादी को छोटे व मंझोले उद्योगों से ही नौकरियां मिलेंगीसमावेशी विकास के लिए एमएसएमई ही सबसे बेहतर विकल्प है। उसमें आ रही समस्याओं को नजरअंदाज नहीं कर सकतेडॉ. अरुणा शर्मा, ( प्रैक्टिशनर डेवलपमेंट इकोनॉमिस्ट और इस्पात मंत्रालय की पूर्व सचिव )
भारत की आबादी 1.4 अरब है, जिसमें से 65% आबादी 35 वर्ष से कम आयु की है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी की 1 मार्च 2023 की रिपोर्ट के अनुसार 7.45% युवा ऐसे हैं, जिन्हें नौकरियां नहीं मिल रही हैं। इस कारण भारत की 3.7 ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी की ग्रोथ समावेशी नहीं रह जाती है। हमारे सामने चुनौती है कि न केवल इस ग्रोथ स्टोरी को जारी रखें, बल्कि साथ ही रोजगार के अवसर भी पैदा करें। यह एमएसएमई यानी छोटे और मंझोले उद्योगों द्वारा ही किया जा सकता है। भारत में रोजगारों का जो परिदृश्य है, उसमें आज भी कृषि क्षेत्र द्वारा सबसे ज्यादा 42% रोजगार सृजित किए जाते हैं, सेवा क्षेत्र का योगदान 32% और उद्योग क्षेत्र का 25% का है। लेकिन केवल कृषि और सेवा से दीर्घकालीन और गुणवत्तापूर्ण रोजगार नहीं मिल सकते, इसके लिए उद्योग पर फोकस जरूरी है।
बड़ी संख्या में एमएसएमई के बंद होने की समस्या : उद्यम पोर्टल में रजिस्टर्ड एमएसएमई की बात करें तो मौजूदा वित्त वर्ष में यह 18.04 लाख पंजीयनों तक पहुंच गई है, जबकि विगत वित्त वर्ष में कोई 10 हजार एमएसएमई बंद हुए हैं। मौजूदा वित्त वर्ष में बंद होने वाली एमएसएमई की संख्या 2016 से 2022 के दौरान बंद हुए एमएसएमई की कुल संख्या से भी अधिक है। सरकार द्वारा अनेक कदम उठाए जाने के बावजूद महामारी के उपरांत एमएसएमई को चुनौतियों का सामना करना पड़ा है। कुल पंजीयनों में से 0.59% यानी 30,997 ने रजिस्ट्रेशन रद्द करवा दिए, 67% ने अनियतकालीन रूप से अपने उद्यम को बंद कर दिया और एसआईडीबीआई के एक सर्वेक्षण के मुताबिक 50 हजार से ज्यादा ने नौकरियां गंवाईं। जो सेक्टर देश में युवाओं को रोजगार देने में सबसे ज्यादा सक्षम है, वही ऐसी समस्याओं से जूझ रहा है, जिनका सामना नहीं किया गया है।
ऑटो मोड में एनपीए घोषित करने की समस्या : बड़ी कम्पनियों को कॉर्पोरेट टैक्स में कटौती का लाभ मिल जाता है, लेकिन एमएसएमई को करों में छूट नहीं दी जाती। महामारी के दौरान और उसके बाद कार्यशील पूंजी बड़ी समस्या बन गई थी और एक छोटे प्रतिशत को यह प्रदान की गई थी, लेकिन मौजूदा पूंजी/कार्यशील पूंजी ऋण और इस नए अतिरिक्त कर्ज की प्रणाली को सुधारने के बजाय एमएसएमई पर पुराने और नए कर्जों की किश्तों के भुगतान का बोझ लाद दिया गया। समस्या तब और बढ़ गई, जब रिटेलरों, सेलरों, ट्रेडरों आदि के 90 दिनों के अनपेड लोड को डिफॉल्टर्स घोषित करने के बजाय ऑटो मोड में एनपीए घोषित कर दिया गया।
जीएसटी से सम्बंधित समस्याएं : जीएसटी के पांच वर्ष पूर्ण होने पर गुड्स एंड सर्विसेस टैक्स नेटवर्क की वित्त वर्ष 2021-22 की एक रिपोर्ट के मुताबिक जीएसटी के लिए रजिस्टर की गई कुल कम्पनियां 1.45 करोड़ हैं, जिनमें से 78% राजस्व संग्रह निजी और सार्वजनिक कम्पनियों, न्यासों, विदेशी और अन्य शासकीय संस्थाओं से प्राप्त होता है, जबकि स्वामित्व वाली फर्मों से प्राप्त होने वाला जीएसटी राजस्व संग्रह 13.28% और साझेदारी फर्मों से प्राप्त होने वाला जीएसटी राजस्व संग्रह 7.29% है। वहीं 69.80% कुल कर-संग्रह मंझोले और बड़े उद्योगों से प्राप्त होता है, 16.67% छोटे उद्योगों से और केवल 13.53% जीएसटी माइक्रो एंटरप्राइजेस से प्राप्त होता है। ऐसे में यह सुझाव दिया गया है कि माइक्रो और छोटी इकाइयों के लिए जीएसटी दरों में राहत दी जाए।
डिजिटल भुगतान को हतोत्साहित करना : डिजिटल भुगतान की ओर शिफ्ट सुरक्षा कारणों से हुआ है, लेकिन आरटीजीएस और एनआईएफटी पर सेवा शुल्क लेकर इसे हतोत्साहित किया जा रहा है। एनपीसीआई का कहना है कि यूपीआई नि:शुल्क है, तब तो यही सिद्धांत किसी भी तरह के डिजिटल भुगतान पर लागू होना चाहिए, फिर वह आईएमपीएस हो, आरटीजीएस या एनआईएफटी हो। वैसे भी ये मुद्रा की छपाई में आरबीआई का लगने वाला पैसा बचा रहे हैं और नगदी के आदान-प्रदान में बैंकों का होने वाला व्यय भी कम कर रहे हैं। देश में समावेशी विकास को बढ़ावा देने के लिए एमएसएमई ही सबसे बेहतर विकल्प है। उसमें आ रही समस्याओं को नजरअंदाज करने से विकास एकतरफा होकर रह जाएगा।
Date:05-04-23
चीन की चालबाजीसंपादकीय
जब भी किसी वैश्विक मंच पर मौका मिलता या किसी मुद्दे पर द्विपक्षीय बातचीत का सिलसिला चलता है, तो चीन, भारत के प्रति अपनी मैत्री भावना का प्रदर्शन ही करता है। मगर फिर मौका मिलते ही वह अपनी विस्तारवादी नीतियों को आगे बढ़ाने में जुट जाता है। इसी का ताजा उदाहरण है कि भारत वाले हिस्से में अरुणाचल की ग्यारह जगहों के नाम उसने बदल दिए हैं। पिछले पांच सालों में यह तीसरी बार है, जब चीन ने अरुणाचल में गांवों, नदियों, दर्रों आदि के नाम बदल कर अपना नया नाम दे दिया है। इससे पहले 2017 में छह और 2021 में पंद्रह जगहों के नाम बदल दिए थे। उसके ताजा कदम को भी वहां के नागरिक मामलों के मंत्रालय ने मंजूरी दे दी है। इस पर भारत के विदेश मंत्रालय ने सख्त एतराज जताया है। मंत्रालय ने कहा है कि नाम बदल देने से हकीकत नहीं बदल जाती। दरअसल, चीन सदा से अरुणाचल को अपना हिस्सा मानता रहा है, इसलिए उसे भारत के नक्शे में दर्शाता ही नहीं। मगर पिछले पांच-सात सालों में जिस तरह भारत के हिस्से वाले विवादित इलाकों पर उसने न सिर्फ अपना हक तेजी से जताना शुरू किया है, बल्कि इसके लिए दोनों देशों की सेनाएं भी आमने-सामने हो जाती रही हैं, उसे लेकर चिंता गहराना स्वाभाविक है।
चार साल पहले गलवान घाटी में दोनों देशों की सेनाएं इसलिए गुत्थमगुत्था हो गई थीं कि चीन ने भारत वाले इलाके में निर्माण गतिविधियां तेज कर दी थी और उसके सैनिक भारतीय इलाके में घुस आए थे। करीब साल भर तक वहां तनाव बना रहा। फिर जब दोनों देशों की सेनाओं ने पीछे हटने का फैसला किया, तब भी चीन ने भारत के हिस्से वाले बड़े भूभाग पर अपनी दावेदारी बनाए रखी थी। कुछ सूत्रों के हवाले से यहां तक दावा किया गया कि चीन ने उन इलाकों में अपने गांव बसा लिए थे। उसके बाद चीन के विदेश मंत्रालय और सेना के वरिष्ठ अधिकारियों की तरफ से आश्वस्त किया गया कि चीन भारत के भीतर अशांति पैदा नहीं करेगा। मगर फिर भी उसकी हरकतें नहीं रुकीं। करीब ढाई साल पहले उसने अरुणाचल में पंद्रह जगहों के नाम बदल कर मानकीकृत कर दिया था। अब ग्यारह और स्थानों के नाम बदल दिए हैं। हालांकि कोई भी देश किसी जगह का नाम इस तरह अपने नक्शे में नहीं बदल सकता। इसके लिए उसे संयुक्त राष्ट्र में सूचना देनी पड़ती है। फिर उसके प्रतिनिधि उन इलाकों का सर्वेक्षण और दौरा कर उन नामों के बारे में रायशुमारी करते हैं। तब उन जगहों के नाम बदलने की इजाजत दी जाती है। ऐसे में चीन न सिर्फ भारत के खिलाफ, बल्कि अंतरराष्ट्रीय कानूनों के विरुद्ध भी मनमानी कर रहा है।
छिपी बात नहीं है कि अरुणाचल वाले इलाके में घुसपैठ करके चीन न सिर्फ अपनी सीमा का विस्तार करना चाहता है, बल्कि इस तरह अपनी सेनाओं की तैनाती कर भारत पर लगातार दबाव बनाए रखना चाहता है। अरुणाचल का इलाका उसके लिए सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण है, इसलिए वह वहां जब-तब घुसपैठ की कोशिश और भारतीय सेना को छकाने का प्रयास करता रहता है। मगर भारत भी उसकी चालबाजियों से अच्छी तरह वाकिफ है, इसलिए उस इलाके में सख्त चौकसी बना रखी है। इसीलिए चीन किसी भी तरह बल पूर्वक पैठ बनाने में सफल नहीं हो पाता। मगर इस घटना से एक बार फिर भारत सरकार विपक्ष के निशाने पर जरूर आ गई है।
Date:05-04-23
इलाज का हकसंपादकीय
राजस्थान में करीब एक पखवाडे़ से आंदोलित निजी डॉक्टरों और राज्य सरकार के बीच हुए समझौते के बाद वहां चिकित्सा का अधिकार कानून धरातल पर लागू करने का मार्ग प्रशस्त हो गया है। राज्य के निजी चिकित्सकों ने अपनी हड़ताल खत्म कर दी है, और यह स्वागतयोग्य कदम है। अलबत्ता, मरीजों की परेशानियों को देखते हुए हड़ताल बहुत पहले खत्म हो जानी चाहिए थी। बहरहाल, राजस्थान अपने नागरिकों को चिकित्सा का कानूनी अधिकार देने वाला देश का पहला सूबा बन गया है। इसके लिए गहलोत सरकार की सराहना की जानी चाहिए, क्योंकि इस कानून का सबसे अधिक लाभ हाशिये के लोगों को होगा। वे न सिर्फ अब गंभीर बीमारियों के इलाज की आर्थिक चिंता से मुक्त हो सकेंगे, बल्कि इस कानून ने उन्हें सशक्त बना दिया है कि आपात स्थिति में अस्पताल या डॉक्टर उन्हें उपचार-पूर्व वैधानिक या वित्तीय औपचारिकता पूरी करने को बाध्य नहीं कर सकेंगे। यदि उनके पास उस वक्त पैसे न हो, तो राज्य सरकार बाद में उसकी भरपायी करेगी। इस कानून से वहां के लोगों के संविधान प्रदत्त जीने के अधिकार को मजबूत आधार मिलेगा। यकीनन, देश के अन्य सूबों की सरकारों को राजस्थान से सबक लेना चाहिए।
नए समझौते के मुताबिक, इस कानून के दायरे से वे निजी अस्पताल बाहर रहेंगे, जिन्होंने सरकार से किसी तरह की कोई रियायत नहीं ले रखी है। जाहिर है, मरीजों को सरकारी अस्पतालों के अलावा अब निजी-सार्वजनिक भागीदारी में चलने वाले अस्पतालों, मेडिकल कॉलेजों व सरकार से जमीन या इमारत बनाने में रियायत व माली मदद लेने वाले चिकित्सा संस्थानों में भी अब मुफ्त इलाज की सुविधा मिल जाएगी। राजस्थान देश के उन चंद सूबों में से एक है, जहां सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में कई अच्छी पहल हुई हैं। चाहे सभी मरीजों को मुफ्त दवा-जांच की सुविधा मुहैया कराने की योजनाएं हों या फिर प्रत्येक परिवार को मुख्यमंत्री चिरंजीवी स्वास्थ्य बीमा योजना के तहत 25 लाख रुपये तक के इलाज का आर्थिक संरक्षण, ये सुविधाएं लोक-कल्याणकारी राज्य की कसौटी पर खरी उतरती हैं।
सरकार की मंशा कितनी भी अच्छी क्यों न हो, अगर उसकी नीतियों को लागू करने वाला तंत्र पारदर्शी और नेकनीयत न हो, तो अपेक्षित वर्ग को उसका लाभ नहीं मिल पाता। यह कोई ढकी-छिपी बात नहीं है कि कई निजी अस्पताल अमानवीय स्तर तक मरीजों का आर्थिक दोहन करते हैं और पीड़ित उचित फोरम पर इसकी शिकायत इसलिए नहीं करते कि दोहरा आर्थिक भार उठाने की उनकी हालत नहीं बचती। राजस्थान के स्वास्थ्य मंत्री परसादी लाल मीणा ने माना ही है कि मुख्यमंत्री चिरंजीवी स्वास्थ्य बीमा योजना होने के बाद भी कई अस्पताल मरीजों से पहले रकम जमा कराने की मांग कर रहे थे! देश में, सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाओं पर कितना अधिक दबाव है व निजी क्षेत्र की इसमें कितनी अहम भूमिका है, यह हमने महामारी के दौरान देखा है। इसलिए निजी अस्पतालों के हितों का संरक्षण करते हुए भी उनकी स्वेच्छाचारिता पर अंकुश लगाने की जरूरत महसूस की जाती रही है। देश में स्वास्थ्य व शिक्षा के क्षेत्र में विषमता की जो खाई निरंतर गहरी होती जा रही है, उसे पाटने में शिक्षा और चिकित्सा का अधिकार जैसे कानून रामबाण साबित हो सकते हैं। सवाल है कि क्या सरकारें इन बुनियादी क्षेत्रों में पर्याप्त निवेश करने को तैयार हैं? जब तक इनमें ढांचागत सुधार नहीं होगा, ऐसे कानून सार्थक बदलाव नहीं ला सकेंगे।
Date:05-04-23
आखिर क्यों पीछा नहीं छोड़ रहे दंगेओ पी एस मलिक, ( सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी )
अपने देश में उपद्रव या दंगे पीछा छोड़ने को तैयार नहीं हैं। पश्चिम बंगाल, बिहार, महाराष्ट्र, गुजरात में रामनवमी के समय और उसके बाद जो हुआ है, वह सबके सामने है। इन बलवों को देखने के अलग-अलग ढंग हो सकते हैं, लेकिन समग्र रूप से इसे दो भागों में करके देखा जाता है। सबसे पहले तो इसके कारणों को जानना चाहिए और फिर यह जानना चाहिए कि इसे कैसे नियंत्रित किया जा सकता है? आखिर ऐसा हरेक साल या नियमित अंतराल पर होता क्यों है?
सबसे पहले तो हमारे यहां जो धार्मिक कार्यक्रम या लोक-व्यवहार हैं, वे ज्यादातर सड़कों पर ही होते हैं। जैसे धर्म के नाम पर जुलूस निकलना, शोभायात्रा निकलना, खुलेआम भजन-कीर्तन होना, नमाज या सामूहिक प्रार्थना का आयोजन होना। खुलकर अगर कहें, तो भारत के दो प्रमुख धार्मिक समुदायों के ज्यादातर धार्मिक व्यवहार सड़कों पर ही होते हैं। यहीं से विवादों की गुंजाइश पैदा होती है।
ऊपर से हमारे यहां दुर्भाग्य से हर बात पर राजनीति होने लगी है। अब हर मुद्दा राजनीति से प्रभावित होने लगा है। धर्मनिरपेक्ष राजनीति हावी हो जाए, तो कोई बात नहीं, लेकिन कोई समुदाय विशेष अपने धर्म को लेकर हावी होने की कोशिश करता है, तो बात हिंसा की होने लगती है। धर्म के नाम पर हिंसा हो या जाति के आधार पर, दोनों ही चिंता के विषय हैं। पुलिस को यह बात अच्छी तरह से पता है, वर्ग वैमनस्य का माहौल बनता है, तो हिंसा भड़कती है।
पुलिस की भाषा में समूह पूर्वाग्रह या ‘ग्रूप प्रीज्यूडिसेस’ का भी महत्व है, जिसमें एक-दूसरे के प्रति शक, नफरत मौजूद होती है। जब समूह पूर्वाग्रह बढ़ता है, तो आग में घी का काम करता है। आपसी शक और संदेह, अफवाह की स्थिति हावी हो जाती है। यदि दो समुदायों के बीच कहीं शक-संदेह होगा, तब बात तथ्य-तर्क की नहीं होगी, ऐसे में, हिंसा भड़क सकती है। पुलिस या प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह ऐसे समूह पूर्वाग्रह पर निगाह रखे। पुलिस को हर पल सावधान रहना चाहिए, समाज में जरा भी वैमनस्य रहने दिया जाएगा, तो वह मौका मिलते ही चिनगारी का काम कर सकता है। इसमें अब सूचना व संचार क्रांति का आशातीत योगदान हो गया है।
अब बात नियंत्रण की आती है। इसमें समाज और शासन-प्रशासन, दोनों की मुख्य भूमिका है। समाज की भूमिका प्राथमिक रूप से महत्वपूर्ण है। समाज में जब तनाव दिखता है, तब सद्भावना समितियों की बैठकें बुलाई जाती हैं। जहां उपद्रव की आशंका बन रही है, वहां पहले की कार्रवाई (या प्रोएक्टिव एक्शन) खास बन जाती है। मान लीजिए, कुछ सुलग रहा है, तो उसका सही अनुमान लगाकर पहले से सक्रिय होकर पुलिस को काम करना चाहिए। इसके बाद भी अगर हिंसा होती है, तो यह तय है कि क्या करना है। स्थानीय स्तर पर पुलिस, प्रशासन अगर सजग है, तो हिंसा या उपद्रव होते ही कार्रवाई करके संभाल लिया जाता है।
मैं उत्तर प्रदेश के लगभग उन सभी जिलों में काम कर चुका हूं, जो सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील माने जाते हैं। मुरादाबाद, आजमगढ़/मऊ, प्रयागराज, बनारस, बहराइच, ये सब संवेदनशील जिले हैं। यहां मैं रहा और मैंने बहुत कुछ देखा है। बनारस की बात बताता हूं। नवंबर 1989 में लोकसभा चुनाव होने थे। राम जन्मभूमि आंदोलन चल रहा था, शिला यात्राएं निकाली जा रही थीं। पूर्वी और मध्य भारत की ज्यादातर शिलाएं बनारस से होकर गुजर रही थीं। वहां तनाव बढ़ गया, हमने कहा भी कि संसदीय चुनाव का समय है, उपद्रव मत कीजिए, जो करना है, चुनाव में मतदान से कीजिए। बहुत समझाया, लोग नहीं माने, 9 नवंबर को शिलान्यास हुआ और फिर 11 को फसाद शुरू हो गया। हमने वहां फायरिंग की, तो उपद्रव शांत हो गया। कफ्र्यू नहीं लगाना पड़ा। तब भागलपुर में भी दंगा हुआ था, जिसमें सैकड़ों लोग मारे गए। यह निर्भर करता है कि आप हालात को कैसे संभालते हैं? पुलिस ढीली पड़ जाए, तब भी मुसीबत और ज्यादा कड़ाई बरते, तो भी मुसीबत! बल के प्रयोग का एक सिद्धांत है। बल का इस्तेमाल ज्यादा किया जाए, तो उसका महत्व खत्म हो जाता है। इसलिए, बल का प्रयोग अनुपात में करना चाहिए। बल को छोटे स्वरूप में काम करना चाहिए। आम लोगों को बचाने के लिए ही बल का इस्तेमाल होना चाहिए।
एक स्वर्णिम नियम है कि पुलिस कोई नई परंपरा न शुरू होने दे। जो यात्राएं पहले से चल रही हैं, वे अच्छे से चलें, लेकिन कोई नई शुरुआत न हो। नई परंपरा शुरू होने से समस्या भी शुरू होती है। असामाजिक लोगों को मौका मिलता है। यात्रा मार्ग और समय तय हो। दो धर्मों के त्योहार अगर साथ पड़ें, तो ज्यादा सावधानी बरती जाए।
इधर चिंता बढ़ रही है, क्योंकि शासक जैसा कहेगा, वैसे ही पुलिस चल रही है। पुलिस को जनोन्मुख बनाया जाए, इस बारे में हम केवल सुनते आए हैं। हमें समझना होगा, जरूरत से ज्यादा राजनीति सबके लिए बोझ बन जाती है। पुलिस या प्रशासन हर बात के लिए राजधानी की ओर देखने लगता है। पहले ऐसा नहीं होता था। अब ऐसा हो गया है, मानो किसी सर्जन के हाथ बांध दिए जाएं और कहा जाए कि ऑपरेशन करो। आज पुलिस को ऐसा ही करना पड़ता है। पुलिस की हर चीज में अड़ंगा है, ऊपरी निर्देश उन पर हावी हो गए हैं। ऐसे में, स्थानीय स्तर पर कोई अधिकारी जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं होता है। इसके कारण स्थानीय प्रशासन की विश्वसनीयता भी खत्म हो रही है तथा पुलिस के पेशेवर रुख में कमी आई है। यह बात भी स्पष्ट रूप से समझ लेनी चाहिए कि शांति-व्यवस्था व पुलिस, दोनों राज्य सरकारों के विषय हैं। दरअसल, पुलिस से आप चाहते क्या हैं, अब यही स्पष्ट नहीं है। जब यह स्पष्ट न हो, तो सारा कौशल धरा का धरा रह जाता है। राज्यों में खुफिया तंत्र भी विफल सा ही है।
बलवों-दंगों को संभालने के नियम-कायदे एसओपी (स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर्स) तय हैं, उनके पहले, दौरान और बाद में क्या करना है। इनकी नियमित ड्रिल होनी चाहिए, पर होती नहीं है। समाज को बल के प्रयोग की इजाजत नहीं है, वह सिर्फ प्रयासों में सहयोग कर सकता है। बल प्रयोग पुलिस ही कर सकती है, तो उसे जरूरत के समय पीछे नहीं हटना चाहिए। शांति की कीमत पर पुलिस को कोई हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं होना चाहिए। वह किसी दल की नहीं, संविधान की शपथ लेती है। उसे इस शपथ को निभाना होगा।
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संसद के बजट सत्र का दूसरा चरण गतिरोध में है। सत्तारूढ़ भाजपा चाहती है कि कांग्रेस नेता राहुल गांधी लंदन में की गई अपनी हाल की टिप्पणी के लिए माफी मांगें। भाजपा का आरोप है कि राहुल गांधी ने भारत में लोकतांत्रिक पतन की बात कहकर देश की छवि को खराब किया है। जबकि उपलब्ध साक्ष्य बताते हैं कि उन्होंने भारतीय लोकतंत्र की चुनौतियों को घरेलू स्तर पर सुलझाने और विदेशी ताकतों की किसी भी भूमिका से इंकार की बात कही थी। दूसरी तरफ, विपक्षी दल चाहता है कि अडानी समूह की कंपनियों के खिलाफ संदिग्ध वित्तीय लेन-देन और बेईमान व्यापार-धंधों के आरोपों की जांच के लिए एक संयुक्त संसदीय समिति बनाई जाए।
लोकंतत्र के पक्ष में –
सरकार की विश्वसनीयता को बनाए रखने के लिए जरूरी है कि वह आरोपों के विरूद्ध स्पष्टीकरण व प्रमाण प्रस्तुत करे। संसदीय समिति का गठन करे। सरकार के पास बहुमत होने का अर्थ यह नहीं है कि वह अपनी मनमानी कर सके। भाजपा को इससे बचना चाहिए और लोकतंत्र की रक्षा के लिए काम करना चाहिए।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 18 मार्च, 2023
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Date:04-04-23
संसदीय समितियों की मनरेगा पर चिंता जायजसंपादकीय
चालू वित्त वर्ष में मनरेगा पर बजट राशि में भारी कटौती को लेकर न केवल अर्थशास्त्रियों के एक बड़े वर्ग बल्कि ग्रामीण विकास एवं पंचायती राज पर बनी संसदीय समिति ने भी चिंता व्यक्त की है। कृषि पर बनी समिति ने भी लगातार दस वर्षों से बजट राशि खर्च न करने पर सरकार की आलोचना की थी। समिति ने मनरेगा की उपयोगिता के बारे में पिछले तीन वर्षों का रिकॉर्ड देते हुए कहा कि इस योजना में राशि कम करने का औचित्य नहीं था। समिति ने पूछा कि किस आकलन के आधार पर स्वयं विभाग ने केवल 98 हजार करोड़ रुपए की मांग की और क्यों वित्त मंत्रालय ने वर्तमान बजट प्रस्ताव में उसे घटा कर महज 60 हजार करोड़ कर दिया। समिति का मानना है कि कोरोना काल में यानी 2020-21 और 21-22 के दो वित्त वर्षों में जहां क्रमशः 61,500 करोड़ और 73,000 करोड़ रुपए का प्रस्ताव था, वहीं वास्तविक खर्च 1, 11,500 करोड़ और 99, 117 करोड़ रुपए हुआ । विगत वर्ष भी वास्तविक खर्च 89,400 करोड़ रुपए का रहा। ऐसे में तीन वर्षों के अनुभव के बावजूद बजट सीमित रखना कहीं से उचित नहीं है। समिति के अनुसार इन तीन वर्षों में मनरेगा योजना करोड़ों ग्रामीण बेरोजगारों के लिए आशा की किरण बनी रही। अर्थशास्त्री मानते हैं कि बेरोजगारी अभी भी पूर्ववत है और मनरेगा इस वर्ष भी मददगार होगा। समिति ने विभाग से ‘पुरजोर संस्तुति’ की है कि वह बेरोजगारी पर जमीनी स्थिति का व्यापक जायजा ले और अधिक राशि आबंटन मांगे। समिति के अनुसार वित्त विभाग को भी पुनर्विचार करके इस राशि को बढ़ाना चाहिए। पिछले एक सप्ताह में दो संसदीय समितियों की चिंता सरकार के लिए खतरे की घंटी है।
Date:04-04-23
सीबीआइ की साखसंपादकीय
केंद्रीय जांच ब्यूरो के स्थापना दिवस के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने इस एजेंसी की प्रशंसा करते हुए जिस तरह यह कहा कि भ्रष्टाचार के मामलों की जांच में उसे हिचकने की आवश्यकता नहीं है, उससे यदि कुछ स्पष्ट हो रहा है तो यही कि सीबीआइ के भ्रष्टाचार विरोधी अभियान में और तेजी आने के ही आसार हैं। इसका संकेत इससे भी मिलता है कि उन्होंने विपक्षी दलों पर निशाना साधा। उन्होंने यह संकेत एक ऐसे समय दिया, जब विपक्षी दल और खासकर कांग्रेस यह आवाज उठाने में लगी हुई है कि केंद्रीय एजेंसियों का दुरुपयोग किया जा रहा है। कुछ विपक्षी दल तो इस शिकायत के साथ सड़क पर उतरने के अतिरिक्त सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा भी खटखटा चुके हैं। विपक्षी दल कुछ भी कहें, वे राजनीतिक भ्रष्टाचार से इन्कार नहीं कर सकते। नेताओं और नौकरशाहों के भ्रष्टाचार के मामले खत्म होने का नाम नहीं ले रहे हैं। क्या विपक्षी दल यह चाहते हैं कि इन मामलों की जांच न हो अथवा वे इस नतीजे पर पहुंच गए हैं कि राजनीतिक भ्रष्टाचार पर लगाम लग गई है? उनका निष्कर्ष जो भी हो, देश की जनता इसकी अनदेखी नहीं कर सकती कि भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरे नेताओं अथवा उनके करीबियों के यहां से अकूत संपदा मिलती रहती है। जनता इससे भी परिचित है कि कुछ नेता और नौकरशाह किस तरह रातों-रात अरबपति बन जाते हैं।
भ्रष्टाचार के खिलाफ सीबीआइ की सख्ती कायम रहनी ही चाहिए, लेकिन इसके साथ ही इस पर विचार भी होना चाहिए कि क्या यह एजेंसी नेताओं-नौकरशाहों और अन्य प्रभावशाली लोगों से जुड़े मामलों की जांच सही तरह कर पा रही है? दावा कुछ भी किया जाए, आम जनता के मन में इस जांच एजेंसी की छवि ऐसी नहीं कि वह रसूख वालों और विशेष रूप से नेताओं के मामलों की जांच तत्परता से कर पाती है और दोषी लोगों को समय रहते सजा दिला पाती है। यह किसी से छिपा नहीं कि ऐसे मामलों की जांच किस तरह लंबी खिंचती रहती है? भ्रष्ट तत्वों को मुश्किल से ही उनके किए की सजा मिल पाती है। यह सही है कि समय के साथ सीबीआइ कहीं अधिक सक्षम हुई है और उसकी कार्यप्रणाली भी बदली है, लेकिन यह प्रश्न अनुत्तरित है कि वह बड़े लोगों के मामलों की जांच में प्रभावी क्यों नहीं सिद्ध हो पाती? यदि सीबीआइ को अपनी छवि में सुधार करना है और जनता के बीच एक प्रभावी जांच एजेंसी के रूप में अपनी पहचान बनानी है तो उसे अपने में कुछ बदलाव करने होंगे। इसी के साथ उसे इस छवि से भी मुक्त होना होगा कि उसका राजनीतिक इस्तेमाल होता है। यह किसी से छिपा नहीं कि अतीत में उसका राजनीतिक इस्तेमाल होता रहा है। इसी कारण एक समय उसे पिंजरे में कैद तोते की संज्ञा दी गई थी।
Date:04-04-23
भारत के सेवा निर्यात की गतिशीलताअजय शाह, ( लेखक एक्सकेडीआर फोरम में शोधकर्ता हैं )
निर्यात की गतिशीलता आज के भारत के लिए खासतौर पर महत्त्व रखती है। इस मामले में दो क्षेत्र एकदम अलग नजर आते हैं: आईटी निर्यात और अन्य कारोबारी सेवाएं। ये दो ऐसे क्षेत्र हैं जहां भारत का प्रदर्शन अच्छा रहा है। इनका आकार उल्लेखनीय हो रहा है। निजी और सरकारी क्षेत्रों के निर्णय लेने वाले इस व्यापक रुझान से लाभान्वित हो सकते हैं।
खपत, निवेश और सरकारी व्यय, सभी को कठिन परिस्थितियों का सामना करना पड़ रहा है। भारत में सेवा निर्यात सबसे उम्मीद भरा क्षेत्र है। भारत में निर्यात का आकलन अमेरिकी डॉलर में करते आए हैं ताकि मुद्रास्फीति की समस्या आड़े न आए। परंतु अमेरिका में भी हाल के वर्षों में मुद्रास्फीति की स्थिति ठीक नहीं रही है। इसलिए हमने 2012 के अमेरिकी डॉलर के वास्तविक संदर्भों में मूल्यांकन किया है।
निर्यात कुल मिलाकर 2.9 फीसदी (मुद्रास्फीति समायोजित अमेरिकी डॉलर में) की चक्रवृद्धि दर से बढ़ा। इसे दोगुना होने में तकरीबन 23 वर्ष की अवधि लगेगी, वहीं वस्तु निर्यात सालाना 1.2 फीसदी की चक्रव़ृदि्ध दर से बढ़ा जो इस दर से 56 वर्ष में दोगुना होगा।
निर्यात की गतिशीलता सेवा क्षेत्र में निहित है। सेवा क्षेत्र कुल निर्यात सालाना 5.7 फीसदी की चक्रवृद्धि दर से बढ़ा जो इस गति से 12 वर्ष में दोगुना होगा। यहां महत्त्वपूर्ण बात है अन्य कारोबारी सेवाएं जो सालाना 8.7 फीसदी की चक्रवृद्धि दर से बढ़ी, जो आठ वर्ष में दोगुना होगी।
भारत को काफी लंबे समय से आईटी और आईटी सक्षम सेवा क्रांति के लिए जाना जाता है। सिटीकॉर्प ओवरसीज सॉफ्टवेयर लिमिटेड (सीओएसएल) सन 1980 के दशक के मध्य में एसईईपीजेड में फलफूल रही थी और इन्फोसिस का आईपीओ सन 1994 में आया। लेकिन अब जबकि उस दौर के दिग्गज भी अपने-अपने करियर के एकदम आखिरी पड़ाव पर पहुंच रहे हैं, आईटी क्रांति के तोहफे लगातार सामने आ रहे हैं। आईटी सबसे बड़ा उद्योग बन गया है और उससे होने वाले निर्यात में लगातार इजाफा जारी है। भारत में सबसे महत्त्वपूर्ण आर्थिक विचार है भारतीय मानव संसाधन के ऊपरी क्रम का इस्तेमाल करके उत्पादन के लिए सस्ते श्रमिकों की तलाश करना और आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन यानी ओईसीडी के सदस्य देशों में उसकी बिक्री करना।
आईटी तथा ‘अन्य कारोबारी सेवाओं’ को शामिल करने पर हमारा सालाना निर्यात करीब 310 अरब डॉलर का है। अकेले इन दोनों क्षेत्रों से सालाना 300 अरब डॉलर का निर्यात हासिल करना एक अत्यंत उल्लेखनीय संभावना है। भारतीय अर्थव्यवस्था के आकार को देखें तो यह आंकड़ा बहुत बड़ा है।
इसका निजी क्षेत्र के लिए भी बहुत महत्त्वपूर्ण अर्थ है। फिर चाहे हमें गैर वित्तीय कंपनियों की कारोबारी योजना पर विचार करें या फिर वित्तीय कंपनियों को लेकर उद्योग जगत के एक्सपोजर पर, यह परिदृश्य निर्यात आधारित आईटी और आईटी सक्षम सेवाओं के महत्त्व पर जोर देता है। फिर चाहे यह प्रत्यक्ष रूप से हो या सहवर्ती कार्यक्रमों की सहायता से।
सेवा निर्यात की इस कहानी में दरें निर्धारित करने वाला कदम मानव संसाधन में निहित है। इस श्रम शक्ति के सभी तत्त्व ज्ञान की पर्याप्तता की समस्या से जूझ रहे हैं। आम लोग, सेवा नियोक्ता और ज्ञान आधारित संस्थानों को ज्ञान को हासिल करने और फैलाने पर जोर देने की आवश्यकता है ताकि देश में बड़ी तादाद में ऐसे लोग तैयार हो सकें जो विकसित अर्थव्यवस्था वाले देशों में इंजीनियरिंग तथा अन्य क्षेत्रों में उच्च रोजगार हासिल कर सकें। आवश्यकता इस बात की है कि सरकार इस क्षेत्र में प्रतिस्पर्धी शोध को लेकर फंडिंग मुहैया करा सके जो स्वायत्त अथवा निजी ज्ञान संस्थानों को दी जा सकती है। यह काम बिना प्रबंधन के नियंत्रण, केंद्रीकरण अथवा नियमन के होना चाहिए।
वस्तु निर्यात के क्षेत्र में कमजोर प्रदर्शन नीति निर्माताओं द्वारा विगत 20 वर्षों में अपनाए गए तौर तरीकों को लेकर सवाल पैदा करता है। वैश्विक व्यापार में भारत की हिस्सेदारी में इजाफा हुआ है। यह इजाफा चीन के साथ दुनिया की संबद्धता में आई कमी के साथ ही देखने को मिला है लेकिन यह पहलू निर्यात की सफलता के लिए पर्याप्त नहीं है। जरूरत इस बात की है कि रणनीतिक सोच अपनाया जाए और नीतियों को नए सिरे से तैयार किया जाए।
कर व्यवस्था में बड़े पैमाने पर बदलाव की आवश्यकता है। उदाहरण के लिए उपकरों को समाप्त करना और आयात पर एकदम सहज जीएसटी तथा निर्यात पर कोई जीएसटी न होना। मुक्त व्यापार समझौतों (एफटीए) को लेकर हो रही गतिविधियों के कारण व्युतक्रम शुल्क ढांचे (वह ढांचा जहां इनपुट पर लगने वाले कर की दर आउटपुट पर लगने वाले कर की दर से अधिक होती है) के कारण अनेक प्रकार की विषमताएं उत्पन्न हो रही हैं। सन 1991 से 2011 के बीच के दौर में व्यापार गतिरोधों को एकपक्षीय ढंग से हटाने का रुख उल्लेखनीय है क्योंकि भारत के लिए महत्त्वपूर्ण निर्यात केंद्रों में व्यापार गतिरोध कम हैं और भारत के लिए एफटीए से चाहने को कुछ खास नहीं है।
एक काम जो भारत से होने वाले निर्यात में एकदम सहजता से मदद कर सकता है वह है हर प्रकार के सीमा शुल्क और उपकरों को समाप्त करना। वस्तु उत्पादकों और सेवा उत्पादकों दोनों को कच्चे माल के लिए कम कीमत चुकाने से लाभ मिलेगा। साथ ही जीरो रेटिंग के चलते उन्हें जीएसटी का पूरा रीफंड भी मिलेगा। इसके अलावा नीति निर्माताओं को भी खुद को नए सिरे से तैयार करना होगा ताकि भारत में काम करने वाली कंपनियों को भारत में होने वाली कठिनाइयों से निजात दिलाई जा सके। इसमें कर प्रशासन, पूंजी नियंत्रण, विदेशों में काम करने में मिलने वाली आर्थिक स्वायत्तता, विदेशी श्रमिक, एफएटीएफ/पीएमएलए, कंपनी अधिनियम का बोझ, श्रम कानून, नियामक आदि शामिल हैं।
पारंपरिक तौर पर हमारी समझ यह कहती है कि मजबूत विकास, मजबूत सरकारी संस्थानों की मौजूदगी में ही संभव है। चीन और भारत में वृद्धि उस समय एक पहेली बन कर सामने आई जब कमजोर संस्थानों के होते हुए भी वृद्धि देखने को मिली। यह पहेली तब हल हुई जब देखा गया कि वृद्धि टुकड़ों में अर्थव्यवस्था के उन हिस्सों में देखने को मिली जहां सरकार के साथ संबद्धता कम थी। चीन में ऐसा एसईजेड में हुआ जहां चीन की सरकार ने स्वायत्तता प्रदान की थी। भारत में ऐसा सेवा निर्यात में हुआ जहां भारतीय श्रम शक्ति वैश्विक अर्थव्यवस्था से संबद्ध है और सरकार से उसका संपर्क सीमित है।
क्या और अधोसंरचना इसमें मददगार होगी? सन 1990 के दशक तथा 2000 के दशक के सुधारों ने ब्रॉडबैंड के विस्तार में मदद की और सेवा निर्यात क्रांति की जमीन तैयार की। यह बात अधोसंरचना के पक्ष में पारंपरिक दलीलों के साथ जाती है। लेकिन निजी निवेश 2011 में चरम पर पहुंचा। यही वह समय था जब भौतिक अधोसंरचना में भी सुधार हो रहा था। यहां निर्यात की सफलता और बेहतर अधोसंरचना के रिश्ते को लेकर सवाल पैदा होता है।
Date:04-04-23
जीवाश्म ईंधन से दूरी बनाना जरूरीसुनीता नारायण, ( लेखिका सेंटर फॉर साइंस ऐंड एन्वायरनमेंट से संबद्ध हैं )
जब कोयला और प्राकृतिक गैस दोनों जीवाश्म ईंधन हैं तो इनके बीच अंतर करने का क्या तुक है? मैंने अपने स्तंभ के पिछले अंक में यह प्रश्न पूछा था क्योंकि यह जलवायु न्याय से जुड़ा हुआ प्रश्न है और उससे भी महत्त्वपूर्ण बात, यह उस गति और पैमाने की व्यवहार्यता से जुड़ा हुआ है जिस गति से जीवाश्म ईंधन पृथ्वी के गर्म होने के लिए जिम्मेदार है। तथ्य यह है कि दुनिया की आबादी के करीब 70 फीसदी ने कार्बन उत्सर्जन में योगदान नहीं दिया है लेकिन आज यह आबादी ऊर्जा के लिए कोयले पर बहुत हद तक निर्भर है। अमीर देशों ने कोयले से प्राकृतिक गैस का रुख कर लिया है जो अपेक्षाकृत स्वच्छ है। प्राकृतिक गैस, कोयले की तुलना में मीथेन के अलावा लगभग आधी कार्बन डाईऑक्साइड छोड़ती है। परंतु ऊर्जा की उनकी आवश्यकता को देखते हुए समझ सकते हैं कि इन देशों ने अतीत में बहुत अधिक उत्सर्जन किया और अभी भी कर रहे हैं। यह वैश्विक कार्बन बजट में उनकी हिस्सेदारी की तुलना में एकदम असंगत है। अब स्वच्छ ऊर्जा में बदलाव का बोझ उन देशों पर है जो उत्सर्जन के लिए सबसे कम जिम्मेदार हैं और इस बदलाव की दृष्टि से भी सबसे कम सक्षम हैं। यह न केवल अनुचित है बल्कि हकीकत से दूर भी है। यह बात जलवायु परिवर्तन से लड़ाई को और अधिक कठिन बनाती है।
मौजूदा वैश्विक प्रयास दो स्तरों पर हो रहे हैं। पहला, गरीब देशों में कोयला आधारित ताप बिजली परियोजनाओं को वित्तीय सहायता बंद करना। दूसरा, ताप बिजली घरों को बंद करने और नवीकरणीय ऊर्जा की ओर बढ़ने के लिए वित्तीय सहायता उपलब्ध कराना। जी7 देशों के जस्ट एनर्जी ट्रांजिशन पार्टनरशिप (जेईटी-पी) में अब दक्षिण अफ्रीका, इंडोनेशिया और वियतनाम शामिल हैं। अभी इस बात पर चर्चा जारी है कि क्या जेईटी-पी बदलाव के लिए जरूरी मात्रा में फंड मुहैया करा सकेगी। नई नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं की लागत अभी भी कोयला आधारित परियोजनाओं की स्थापना लागत से दो से तीन गुनी है। यह स्थिति तब है जबकि सौर और पवन ऊर्जा की लागत में लगातार कमी की गई है। यानी जब तक वित्तीय मदद जरूरत के मुताबिक नहीं होगी तब तक स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में अपेक्षित बदलाव देखने को नहीं मिलेगा।
ऐसे में क्या विकल्प शेष हैं? आइए भारत के संदर्भ में बात करते हैं जहां हमें कोयले को जलाने के कारण प्रदूषित हो रही हवा की समस्या से निपटना है। वैश्विक राजनीति की स्थिति चाहे जितनी खराब हो हम कोयले का बचाव करने वाल नहीं बन सकते। स्थानीय वायु प्रदूषण को कम करना और जलवायु परिवर्तन का मुकाबला करना हमारे हित में है। लेकिन हमें ऐसा करते समय अपने हितों को ध्यान में रखना होगा। हमारी रणनीति ऐसी होनी चाहिए कि हम देश में विद्युतीकरण की दर बढ़ाएं ताकि हम अपने लाखों औद्योगिक बॉयलरों में कोयले की खपत को कम कर सकें। ये बॉयलर किफायती नहीं रह गए हैं और बहुत अधिक प्रदूषण फैला रहे हैं। हमें गाड़ियों को भी बिजली चालित बनाने की ओर बढ़ना होगा ताकि शहरों में प्रदूषण को कम किया जा सके।
लाख टके का सवाल यह है कि यह बिजली आखिर उत्पन्न कैसे होगी? यहां हमें जेईटी-पी को शामिल करना चाहिए। हमारा पहला काम है कोयले पर निर्भरता कम करन जबकि इस बीच हम ऊर्जा आपूर्ति में इजाफा कर रहे हैं। इसका अर्थ यह है कि भारत सरकार ने जो कदम उठाने की प्रतिबद्धता जताई है, उसी दिशा में हमें और आगे बढ़ना होगा। कोयले के इस्तेमाल को सीमित करने और स्वच्छ प्राकृतिक गैस तथा नवीकरणीय ऊर्जा में निवेश करना है। देश के ऊर्जा मिश्रण में कोयले से बनने वाली बिजली की निर्भरता को 70 फीसदी से कम करके 50 फीसदी करना है। इसके लिए नवीकरणीय ऊर्जा के लक्ष्य को 2030 तक 450 गीगावॉट से बढ़ाकर 650 से 700 गीगावॉट करना होगा। इस पैमाने पर बदलाव लाने के लिए काफी धन की जरूरत होगी, खासतौर पर अगर हमें नवीकरणीय ऊर्जा की नई क्षमताओं की लागत को कम रखना हो ताकि ऊर्जा की कीमत कम रह सके। यहां अंतरराष्ट्रीय साझेदारी की जरूरत पड़ सकती है। वित्तीय लागत कम करने और अतिरिक्त वित्तीय सहायता हासिल करने, दोनों कामों में उसकी जरूरत पड़ेगी। जेईटी-पी को इस पर ही ध्यान देना चाहिए ताकि किफायती दरों पर धन जुटाया जा सके और भविष्य में स्वच्छ ऊर्जा मिल सके।
यह सवाल फिर भी बाकी है कि हम मौजूदा कोयला संयंत्रों का क्या करेंगे? हमें इन संयंत्रों को भी स्वच्छ बनाने का प्रयास करना होगा। केंद्र सरकार के पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने 2015 में मानक उत्सर्जन को लेकर जो अधिसूचना जारी की थी उसे लागू करने में और टालमटोल नहीं करनी चाहिए। इससे मौजूदा बिजली संयंत्रों से होने वाले स्थानीय वायु प्रदूषण में कमी आएगी। हमें प्राकृतिक गैस आधारित बिजली संयंत्रों का भी रुख करना चाहिए। हमारे देश में 20 गीगावॉट क्षमता ऐसी है जिसका परिचालन नहीं हो रहा है, उसे गति देने की आवश्यकता है। इसके लिए हमें सस्ती दरों पर प्राकृतिक गैस चाहिए और हमारी यही मांग होनी चाहिए। इसके अलावा हमें यह देखना होगा कि मौजूदा कोयले का कैसे बेहतर इस्तेमाल किया जाना चाहिए? पुराने संयंत्रों को बंद किया जाना चाहिए लेकिन इसके लिए ऐसी योजना तैयार करनी चाहिए जिससे श्रम और भू संसाधनों का स्वच्छ ऊर्जा में सही इस्तेमाल हो सके।
वैश्विक समुदाय को अपने प्रस्तावों पर नए सिरे से काम करने की जरूरत है। पहले जेईटी-पी को स्वच्छ ऊर्जा बदलाव के लिए सक्षम बनाना होगा। इसे नई अधोसंरचना को स्वच्छ बनाने और जलवायु परिवर्तन के लिहाज से बेहतर बनाने के लिए इस्तेमाल किया जाना चाहिए। इसका मतलब यह हुआ कि वित्तीय सहायता की लागत को उभतरे बाजारों के अनुकूल बनाना। वैश्विक ऊर्जा परिवर्तन की प्रक्रिया में कोयला और प्राकृतिक गैस आदि सभी शामिल होने चाहिए। इससे न केवल यह पता चलेगा कि अमीर देशों का प्राकृतिक गैस का कोटा खत्म हो चुका है बल्कि उभरती अर्थव्यवस्था वाले देशों को किफायती दर पर गैस भी उपलब्ध होगी। ये देश वैश्विक तथा स्थानीय उत्सर्जन की दोहरी समस्या से जूझ रहे हैं। जलवायु परिवर्तन का विज्ञान समावेशन और जवाबदेही की राजनीति भी है। हमें इस बात को समझना होगा।
Date:04-04-23
खुशहाली के पैमाने पर सवालरवि शंकर
हाल ही में ‘यूएन सस्टेनेबल डेवलपमेंट सल्यूशन नेटवर्क’ ने विश्व खुशहाली रिपोर्ट 2023 जारी की। यह रिपोर्ट डेढ़ सौ से अधिक देशों के सर्वेक्षण के आधार पर जारी की जाती है। इस वर्ष रिपोर्ट में एक सौ छत्तीस देशों को शामिल किया गया। इसमें खुशहाली को मापने के लिए छह प्रमुख कारकों का उपयोग किया जाता है- सामाजिक सहयोग, आय, स्वास्थ्य, स्वतंत्रता, उदारता और भ्रष्टाचार की स्थिति। एक बार फिर ‘वैश्विक खुशहाली सूचकांक’ में फिनलैंड सर्वोच्च स्थान पाने में कामयाब रहा। इसे लगातार छठवीं बार सर्वोच्च स्थान मिला है। डेनमार्क दूसरे और तीसरे स्थान पर आइसलैंड है।
पिछले वर्ष की तरह इस वर्ष भी शीर्ष बीस देशों के आंकड़ों में कुछ विशेष परिवर्तन नहीं हुए हैं। एक छोटा-सा परिवर्तन यह है कि लिथुआनिया ने बीसवें स्थान पर पहुंच कर शीर्ष बीस में अपनी जगह बना ली है। वहीं भारत एक सौ छत्तीस देशों की सूची में एक सौ पच्चीसवें स्थान पर है। जबकि इस सूची में पिछले साल एक सौ छियालीस देश शामिल थे, तब भारत को एक सौ पैंतीसवें स्थान पर रखा गया था। पिछली बार के मुकाबले भारत की ‘रैंकिंग’ में सुधार जरूर हुआ है, लेकिन सूची में उसका नाम नेपाल, चीन और बांग्लादेश जैसे अपने पड़ोसी देशों से भी नीचे है। यहां तक कि जंग लड़ रहे रूस और यूक्रेन भी इस सूची में भारत से आगे हैं। रूस सत्तरवें और यूक्रेन बानबेवें पायदान पर है। इस मामले में अफगानिस्तान सबसे निचले पायदान पर है या कहें कि रिपोर्ट के मुताबिक, यह सबसे ज्यादा दुखी देश है। इसके अलावा पायदान में नीचे रहने वाले देशों में लेबनान, जिम्बाब्वे, डेमोक्रेटिक रिपब्लिक आफ कांगो जैसे देश हैं। शीर्ष बीस देशों की सूची में एशिया का एक भी देश शामिल नहीं है।
खुशहाली सूचकांक में किसी देश की स्थिति जानने के लिए उसकी जीडीपी, वहां जीवन की गुणवत्ता और जीवन प्रत्याशा को देखा जाता है। जाहिर है, इस रिपोर्ट में वही मानक रखे गए हैं, जिन्हें लोगों को एक सामान्य जीवन जीने के लिए न्यूनतम माना गया है, पर अफसोस कि भारत इन पर खरा नहीं उतर पाया और हमारे पड़ोसी देश, जो खुद ही अपनी आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक मुश्किलों और बदहाली से जूझ रहे हैं, वे खुशहाली के मामले में भारत से आगे निकल गए। सवाल है कि हम प्रसन्न समाजों की सूची में क्यों नहीं अव्वल आ पा रहे हैं। इस पर आत्ममंथन की जरूरत है।
खुशहाली सूचकांक के लिए अर्थशास्त्रियों और विभिन्न क्षेत्रों के विशेषज्ञों की एक टीम व्यापक स्तर पर शोध करती है। यह टीम समाज में सुशासन, प्रति व्यक्ति आय, स्वास्थ्य, जीवित रहने की उम्र, भरोसा, सामाजिक सहयोग, परोपकार, दान भावना, स्वतंत्रता और उदारता आदि को आधार बनाती है। रिपोर्ट का मकसद विभिन्न देशों के शासकों को आईना दिखाना है कि उनकी नीतियां लोगों की जिंदगी खुशहाल बनाने में कोई भूमिका निभा रही हैं या नहीं?
खैर, दुनिया में खुशहाली मापने की यह रिपोर्ट कुछ संदेह पैदा करती है। पिछले साल भारत से ऊपर जिन देशों को रखा गया था, उनमें कई देश राजनीतिक और आर्थिक संकटों से जूझ रहे थे। जैसे, मैक्सिको को छियालीसवां स्थान दिया गया था। दुनिया जानती है कि यह देश सालों से आंतरिक मादक पदार्थ के युद्ध में फंसा हुआ है। वहां इतनी गरीबी है कि उसके नागरिक बेहतर जिंदगी की तलाश में अमेरिका में अवैध घुसपैठ करते हैं। इसलिए अमेरिका को मैक्सिको के साथ लगने वाली अपनी अंतरराष्ट्रीय सीमाओं पर दीवार खड़ी करनी पड़ गई थी।
ऐसे ही, पिछले साल चीन को बहत्तरवां स्थान दिया गया था। क्या यूरोप और अमेरिका इस बात से अनजान हैं कि उनके देशों की बड़ी से बड़ी तकनीकी कंपनियां चीन में व्यापार नहीं कर सकतीं? वहां बीते सात दशक से लोकतंत्र नहीं है और एक ही पार्टी की सरकार है। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी ने हांगकांग, तिब्बत, ताइवान, और मंगोलिया में जातीय जनसंहार किए हैं। जिन पर अमेरिका और यूरोप के तमाम विश्वविद्यालयों के शोध उपलब्ध हैं। यही नहीं, कोरोना से पूरी दुनिया में मौतों का अकेला जिम्मेदार चीन था और आज भी वह इस महामारी से उबर नहीं सका है।
पिछले साल की रिपोर्ट में गृहयुद्ध और आतंकवाद से ग्रस्त लीबिया को छियासीवां, कैमरून को 102वां, नाइजर को 104वां, नाइजीरिया को 118वां, माली को 123वां, चाड को 130वां, इथोपिया को 131वां और यमन को 132वां स्थान दिया गया था। जबकि पाकिस्तान और श्रीलंका अपने दौर के सबसे बड़े वित्तीय संकट से गुजर रहे हैं और उन्हें क्रमश 121वां और 127वां स्थान दिया गया था।
इस साल भी यही सब देश भारत से आगे हैं। सबसे आश्चर्यजनक तो यूक्रेन का स्थान है। पिछली बार जब वह रूस के खिलाफ युद्ध लड़ रहा था, तब उसे अट्ठानबेवां स्थान दिया गया था। आज भी वह जंग लड़ और दुनिया से मदद मांग रहा है। फिर भी यूक्रेन की खुशहाली पहले से बढ़ गई है। इस बार की रिपोर्ट में यूक्रेन को बानबेवें पायदान पर रखा गया है। क्या इससे बड़ा कोई पाखंड हो सकता है?
हालांकि देखा जाए तो इन देशों की जगह भी कोई खास अच्छी नहीं है, लेकिन विषम हालात के बावजूद भारत से अच्छी है। जबकि भारत में न तो कोई आर्थिक संकट है, न यह युद्ध से ग्रस्त है और न ही यहां राजनीतिक अस्थिरता है। कोरोना महामारी से निपटने में भी हमारी सरकारों की सकारात्मक भूमिका रही है। सवाल है कि अगर सकल घरेलू उत्पाद खुशी को मापने का पैमाना है, तो उस पर भी कैसे सवा सौ देश भारत से बेहतर हो सकते हैं? अगर भ्रष्टाचार में कमी या उसकी गैरमौजूदगी खुश होने का आधार है, तो अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देश कैसे भारत से बेहतर हैं? असल में जिन छह पैमानों पर खुशी को मापा गया है, वे अपने आप में अधूरे हैं। यह रिपोर्ट एक राजनीतिक एजेंडे से ज्यादा कुछ और नहीं नजर आती।
यह माना जा सकता है कि भारत में खुशहाली को बढ़ावा देने में यहां की जनसंख्या सबसे बड़ी बाधा है। भारत में कई तरह का भारत है। एक अमीर और खुशहाल भारत है, तो उसमें एक गरीब भारत भी है। गरीब भारत भी विकास कर रहा है, लेकिन आबादी इतनी ज्यादा है कि अभी देश को समग्रता में खुशहाल देशों में अव्वल स्थान बनाने में वक्त लगेगा। सबसे खुशहाल देश फिनलैंड की आबादी महज पचपन लाख है, उसके लिए विकास आसान है। भारत के मुंबई, दिल्ली, कोलकाता जैसे शहरों में इससे कहीं ज्यादा लोग रहते हैं। खुश देशों की सूची में दूसरे स्थान पर रहे डेनमार्क में 58.6 लाख लोग रहते हैं, तीसरे स्थान के देश आइसलैंड में तो महज 3.73 लाख लोग होते हैं। ऐसे में इन देशों से भारत की तुलना नहीं की जा सकती है।
देश में पिछले नौ वर्षों में केंद्र सरकार द्वारा लोगों के जीवन में बदलाव लाने के लिए कई योजनाएं क्रियान्वित की गई हैं, जिनका लाभ लोगों को मिल रहा है। भारत की गिनती इस समय विश्व के सबसे युवा देश में हो रही है। फिर भी ‘वैश्विक खुशहाली सूचकांक’ में भारत को कमतर आंकना सवाल खड़े करता है। निश्चित ही वैश्विक स्तर पर खुशहाली का यह सूचकांक देश के बहुआयामी विकास का एक आईना है। देश के समावेशी विकास को अगर यह आईना झुठलाता है तो इस विषय पर गंभीर चिंतन-मनन की आवश्यकता है।
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Date:03-04-23
Bot’s The Problem?Controversy over AI tech is yet another reminder why India must urgently get a data protection lawTOI Editorials
Italy has temporarily suspended ChatGPT for data breach and will further investigate Open AI, the maker of ChatGPT, on its data collection practices. The move followed a data breach in the chatbot tool where users’ chat history and payment details were compromised. In a separate development, an AI-focused ethics group in the US has called for its federal trade commission to investigate OpenAI for violating consumer protection rules. As Microsoft integrated ChatGPT in its search to find popular applications worldwide, multiple concerns – ethical and legal – have been flagged, not least ChatGPT’s ability to produce mass misinformation.
Governance at the speed of technology is a dream even for advanced economies. EU is working on an AI regulatory framework. Among analyses of its proposal is one that argues it does not go far enough to protect fundamental rights in relation to biometric applications such as emotion recognition, where machines recognise/simulate human emotions, and AI polygraphs, where machines detect deception by individuals – tools likely in the palm of our hands in the not so far away future. Yes, these are fields in AI an average Indian is likely unfamiliar with. We did not know of ChatGPT either but now it is ubiquitous. The point is that advanced tech seamlessly integrates into our lives without our recognising the pitfalls. The upshot is a few companies control our use of the internet, which still holds the promise of being a democratic space. Thus the need for the government to regulate.
The Italian watchdog has said it will investigate ChatGPT’s compl iance with General Data Protection Regulations (GDPR) 2018, EU’s privacy and security law applicable on any organisation in the world as long as they collect data from people in EU. India has no standalone data protection law yet. Technology long outpaced the provisions under IT Act, 2000. The data protection bill was to be introduced this Parliament session, but the session was washed away, as were our hopes of taking a step towards a legal framework to secure our data.
Date:03-04-23
Why India Should Be Betting on BhutanET Editorials
The three-day visit to India by Bhutan’s king Jigme Khesar Namgyel Wangchuck, on the invitation of President Draupadi Murmu, that starts today is an opportunity for India to engage and provide structure to its ‘Neighbourhood First’ policy. A free, democratic, open South Asia is central to this strategy. India may not have the advantage of China’s deep pockets. But it offers a deep commitment to building partnerships with countries big and small. This is what New Delhi must convey in its meetings with Wangchuck and Bhutan’s ministers. Prime Minister Lotay Tshering’s interview to the Belgian newspaper, La Libre, last week has raised concerns and eyebrows, given recent Sino-Bhutanese talks on the border issue. GoI has rightly not reacted to it, preferring a more proactive engagement with Bhutan.
New Delhi must demonstrate the longterm advantages of a stronger relationship with India. Sri Lanka and Bangladesh offer good examples of the benefits of a closer relationship with India. Developing Bhutan’s hydroelectric potential and its energy systems is one among many areas where New Delhi and Thimphu can gain by deepening cooperation. Education is another. The visit should focus on boosting trade, developing capacities to address challenges like climate change. India should impress on the need to ensure that Bhutan does not barter away its strategic advantages as that could endanger its democracy.
India has made the focus on its neighbourhood an important element of its engagement. At its core is the belief that sovereign nations working together to mutual benefit, without seeking to dominate or control, can help grow economies and address developmental issues in a manner that promotes stable, free and open societies in South Asia.
Date:03-04-23
Same-sex marriages: A matter for ParliamentThe push to formalise the institution of same-sex unions must come from representative bodies such as Parliament and not the courtsG. S. Bajpai is the Vice-Chancellor at National Law University Delhi, Ankit Kaushik is an Assistant Professor at RGNUL, Punjab
The Supreme Court, in Supriyo v. Union of India, has referred the matter relating to legalisation of same-sex marriages to a Constitution Bench. Unlike the matter pertaining to decriminalisation of Section 377, which the Central government had left to the Court to decide, the affidavit submitted by it in the present case opposes such legalisation. The Centre’s stance has come under fire from sections of civil society, advocates, academics and scholars. Let us examine its line of reasoning.
The core of the Centre’s argument is that same-sex marriage does not find any recognition within Indian traditions, ethos, culture and the societal conception of the institution of marriage. It has been argued that marriage is a sacrament between a biological male and a biological female to form a holy union to conceive children. Consequently, it is argued that Parliament, and not the Court, is the right institution to debate and decide if same-sex marriages should be legalised.
The language of rights
Since it is unlikely that the Court will acquiesce to or reject the Centre’s stance without evaluating the same on its own merits, it is crucial to understand the foundational basis for this argument. Multiple authors have addressed the Centre’s argument through legal lenses, such as by saying that it is a duty of the Court to address the violations of fundamental rights which result directly from a non-recognition of same-sex marriages. Like in the Navtej Johar and Joseph Shine cases, where the Supreme Court faced questions of sexuality, autonomy, social equality and social legitimisation, the question of same-sex marriages too boils down to the competing interests of the rights of a society to conserve traditions with all their infirmities and the right of an individual to enjoy his constitutional freedoms with all his idiosyncrasies.
Arguing in the language of rights might give legitimacy to the content of the petition, but it side-steps the point pertaining to societal conceptualisations of the institution of marriage. Marriage is predominantly a social institution. The Centre’s stance, thus, finds a backing in four interrelated sub-arguments. First, the question of same-sex marriage has the potential to alter how we conceive a family — the building block of society. Most conventional definitions of marriage adhere to the Centre’s conceptualisation of the institution and generally identify marriage as a socially accepted union of individuals for procreation. While same-sex marriages are not a threat to this understanding, they demand a nuanced alteration/adaptation of it. This requires deliberation at a social level first.
Second, the current legislative framework promotes the conventional understanding of marriage. Marriages in India are administered through a complex legal structure with a religious genesis. They are consequently governed by the Hindu Marriage Act, 1955; the Parsi Marriage and Divorce Act, 1936; the Christian Marriage and Divorce Act, 1957; and Muslim Personal Laws which do not have any strict legislative framework. All marriage laws, except for the Special Marriage Act (SMA) of 1954, recognise marriages between a man and a woman. Parliament enacted SMA to facilitate inter-religious marriages. Therefore, the legislative intent behind the use of gender-neutral language in Section 4 of the SMA cannot be presumed, in and of itself, to be in favour of same-sex marriages either.
Third, as distinct from the constitutional morality adopted in the Navtej Johar case, which recognises consummation for purposes other than procreation, religious and societal morality still conceptualises intercourse as a procreative activity. This is why various laws pertaining to marriage mandate the consummation of marriage. For instance, Section 12 of the Hindu Marriage Act provides that where a marriage has not been consummated owing to the impotence of one of the parties, the said marriage is voidable.
This also answers the logical question of whether a marriage subsisting between a couple unable to procreate is a challenge to the idea of a valid marriage. In the legal conception of marriage, procreation remains a basic requirement. The same can be gauged from the above-mentioned provisions, which make marriages voidable on the basis of impotence and lack of consummation. Consequently, the parties to the marriage would not be labelled as ‘divorcees’ but merely as ‘unmarried.’
A broader social context
Fourth, conventional conceptualisations of family and marriage are facing evolutionary challenges. The idea of live-in relationships is just as ideationally confrontational to marriage as same-sex marriages. Even though they are judicially recognised, live-in relationships are not equated to marriage under the law. The social acceptability of such relationships remains in a state of limbo. The apprehensions of the Centre regarding the conceptual alteration of the family unit, therefore, are not actually as regressively homophobic as they may seem prima facie. Instead, they are generalised to a broader social context. Much like live-in relationships, the issue of legal recognition of same-sex unions too requires a broader debate in society and the legislature.
It is not our case that the decisions of same-sex couples to reside together in a union do not deserve legal recognition. The rights issues are substantial and must be addressed immediately. Nevertheless, given the implications of recognising same-sex unions as a couple, the push to formalise the institution of same-sex unions must come from representative bodies such as Parliament.
Date:03-04-23
ऊर्जा आत्मनिर्भरता की दिशा में भारतविवेक देवराय और आदित्य सिन्हा, ( देवराय प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के प्रमुख और सिन्हा परिषद में अपर निदेशक-अनुसंधान हैं )
एक ऐसे समय में जब भारत वैश्विक आर्थिक महाशक्ति बनने के लिए प्रयासरत है तब इस लक्ष्य पूर्ति की दिशा में ऊर्जा आत्मनिर्भरता बहुत महत्वपूर्ण होगी। ऊर्जा आत्मनिर्भरता टिकाऊ विकास की एक अहम निर्धारक के रूप में उभरी है। अच्छी बात है कि भारत ने इसके लिए आवश्यक प्रयास भी आरंभ कर दिए हैं। अक्षय ऊर्जा और परमाणु बिजली के साथ ही ऊर्जा सक्षमता पर जोर दिया जा रहा है। ऐसा करके भारत भू-राजनीतिक तनावों और वैश्विक आर्थिक मंदी जैसे बाहरी झटकों से जुड़े जोखिमों को कम कर सकता है। ऐसे झटकों से आपूर्ति श्रंखला बिगड़ने के साथ ही एकाएक महंगाई बढ़ने की आशंका होती है। ऊर्जा आत्मनिर्भरता घरेलू उद्योगों के विकास, रोजगार सृजन और तकनीकी नवाचार में भी उत्प्रेरक की भूमिका निभाती है। इससे देश की आर्थिक क्षमताओं एवं सामरिक स्वायत्तता में भी वृद्धि होती है। ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनना न केवल टिकाऊ एवं समावेशी आर्थिक वृद्धि के लिए आवश्यक है, अपितु यह भारत को बाहरी झटकों से बचाए रखने के साथ ही मजबूत आर्थिकी की बुनियाद भी रखता है।
अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए भारत अभी बड़ी हद तक बाहरी स्रोतों पर निर्भर है। अपनी जरूरत का 90 प्रतिशत तेल और 80 प्रतिशत कोयला भारत आयात करता है। इस अत्यधिक निर्भरता का समाधान निकाला जाना बहुत महत्वपूर्ण है, क्योंकि आयात से देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ता है। ऐसे में ऊर्जा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की दिशा में कदम बढ़ाना तत्काल आवश्यक हो गया है। ऊर्जा स्वायत्तता में व्यापक आर्थिक लाभ भी निहित हैं। इसमें स्वच्छ ऊर्जा की भूमिका बहुत बढ़ गई है। इसे अपनाने से महंगाई के विरुद्ध भी भारत रक्षा कवच बना सकता है, क्योंकि अक्षय ऊर्जा के स्रोतों, इलेक्ट्रिक वाहनों में काम आने वाली बैटरियों और हाइड्रोजन इन्फ्रास्ट्रक्चर की लागत लगातार घटने पर है। केवल इलेक्ट्रिक परिवहन की दिशा में बढ़कर ही भारत 2047 तक तकरीबन 2.5 ट्रिलियन (लाख करोड़) डालर तक की बचत में सक्षम हो सकता है।
वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी बने रहने के लिए भारतीय उद्योगों को भी हरित इस्पात उत्पादन जैसी पर्यावरण हितैषी तकनीकें अपनानी होंगी, जैसे कि यूरोपीय संघ जैसे प्रमुख निर्यात बाजार ने कार्बन निरपेक्षता के लिए प्रतिबद्धता जताई है। इंडिया एनर्जी एंड क्लाइमेट सेंटर की ‘पाथवेज टू आत्मनिर्भर भारत’ शीर्षक से प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में संक्रमण का कर राजस्व पर बहुत ही कम प्रभाव पड़ने का अनुमान है। फिलहाल जीवाश्य ईंधन पर टैक्स, ड्यूटी और रायल्टी का केंद्र और राज्य सरकारों के राजस्व में 12 प्रतिशत का योगदान है। स्वच्छ ऊर्जा विकल्पों की ओर आक्रामक रूप से जोर दिए जाने के बावजूद 2030 के मध्य तक जीवाश्म ईंधन उपभोग और उससे संबंधित कर राजस्व के 2020 के स्तर से नीचे जाने के आसार नहीं हैं।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत ने पिछले नौ वर्षों के दौरान अक्षय ऊर्जा के मोर्चे पर उल्लेखनीय प्रगति की है। इन वर्षों में सरकार ने देश के अक्षय ऊर्जा ढांचे का खासा विस्तार किया है। भारत ने 31 दिसंबर, 2022 तक 167.75 गीगावाट अक्षय ऊर्जा क्षमता स्थापित करने में सफलता प्राप्त की, जो बहुत विविधतापूर्ण भी है। इसमें 63.30 गीगावाट सौर ऊर्जा, 46.85 गीगावाट लार्ज हाइड्रोपावर, 41.93 गीगावाट पवन ऊर्जा, 10.73 गीगावाट बायोपावर, 4.94 गीगावाट स्माल हाइड्रोपावर और 6.78 गीगावाट परमाणु बिजली क्षमता शामिल है। वहीं 78.75 गीगावाट की कुल क्षमता वाली अक्षय ऊर्जा से जुड़ी कई परियोजनाएं निर्माणाधीन अवस्था में हैं। जबकि 32.60 गीगावाट की अतिरिक्त क्षमता निविदा प्रक्रिया में है। नरेन्द्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद देश में सौर ऊर्जा क्षमताओं में भारी बढ़ोतरी हुई है। सौर ऊर्जा क्षमताओं के लिहाज से 16,340 मेगावाट की क्षमता के साथ राजस्थान शीर्ष पर है और उसके बाद 8,500 मेगावाट के साथ गुजरात दूसरे और 7,885 मेगावाट के साथ कर्नाटक तीसरे स्थान पर है। यह भी उल्लेखनीय है कि 2022 में देश की सौर ऊर्जा बिजली उत्पादन क्षमता 38 प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि के साथ 95.15 अरब यूनिट हो गई।हरित ऊर्जा की ओर भारत का मौजूदा रुझान एक आकर्षक एवं आवश्यक आख्यान प्रस्तुत करने के साथ ही टिकाऊ वृद्धि के प्रति देश के समर्पण को भी रेखांकित करता है। यह परिवर्तन चुनावी प्रोत्साहनों से परे होने के साथ ही पर्यावरण-हितैषी ऊर्जा समाधानों में निजी निवेश को प्रोत्साहित करने के भारत सरकार के समन्वित प्रयासों को भी दर्शाता है। नियामकीय बाधाओं को दूर कर उद्यमों को हरित ऊर्जा के मोर्चे पर अवसर तलाशने में सक्षम बनाना इस कायाकल्प का एक अहम पहलू है। सौर, पवन और बायोगैस जैसे अक्षय ऊर्जा के स्रोतों में बड़े पैमाने पर हरित रोजगार अवसर उपलब्ध कराने की क्षमताओं को देखते हुए निजी क्षेत्र के निवेश के लिए इसमें विशेष वित्तीय प्रेरणा का भाव है। हरित ऊर्जा क्षेत्र में संभावित उपक्रमों की तुलना वर्तमान की सोने की खदानों और तेल के कुओं जैसे लुभावनी संभावनाओं वाले क्षेत्रों से की जा रही है।
अच्छी बात यही है कि पर्यावरण अनुकूल आर्थिक वृद्धि की महत्ता भारत सरकार के शीर्ष स्तर पर समझी जा रही है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बीते दिनों 2047 में भारत की स्वतंत्रता के सौवें वर्ष के पड़ाव की दिशा में जिन चार क्रांतिकारी परिवर्तन वाले अवसरों को चुना है, हरित ऊर्जा उनमें से एक है। चालू वित्त वर्ष के बजट में शून्य-कार्बन उत्सर्जन और ऊर्जा सुरक्षा की दिशा में प्राथमिकता वाले 35,000 करोड़ रुपये के पूंजी निवेश का प्रविधान किया गया है। हरित हाइड्रोजन, जैव खाद, आफ-ग्रिड सौर और ऊर्जा संरक्षण जैसे विविध क्षेत्रों का समर्थन कर भारत ने असल में एक टिकाऊ भविष्य सुनिश्चित करने की अपनी अटूट प्रतिबद्धता दर्शाई है। हरित ऊर्जा की ओर यह झुकाव पर्यावरणीय हित के साथ ही व्यापक आर्थिक लाभ, रोजगार सृजन और वित्तीय विस्तार का माध्यम भी बन रहा है। परिणामस्वरूप, अक्षय ऊर्जा को अपनाने में भारत की निरंतर प्रगति विद्वत शोध-अनुसंधान और विश्लेषणात्मक अन्वेषण के लिए उर्वर आधार उपलब्ध कराएगी।
Date:03-04-23
निशाने पर एआईसंपादकीय
इंटरनेट पर सूचनाओं के आधार पर पनपी कृत्रिम बुद्धिमत्ता का साम्राज्य क्या अब खतरा बनने लगा है? यह आभासी बुद्धिमत्ता, अर्थात एआई तकनीक इतनी मजबूती से सामने आ रही है कि अच्छे-अच्छे वैज्ञानिकों व उद्यमियों को भी आशंकाएं घेरने लगी हैं। इटली में तो एआई चैटजीपीटी को प्रतिबंधित कर दिया गया है। वहां न केवल एआई सेवा को अवरुद्ध किया जाएगा, बल्कि गोपनीयता संबंधी चिंताओं की भी व्यापक जांच की जाएगी। इतालवी एजेंसी का मानना है कि एआई का इस्तेमाल करने वाले लोगों के बारे में व्यक्तिगत जानकारी एकत्र करने के लिए सिस्टम के पास उचित कानूनी आधार नहीं है। डाटा एल्गोरिद्म को प्रशिक्षित करने में सहायता के लिए जुटाया जाता है, जिससे चैटजीपीटी को सवालों के जवाब देने में सुविधा होती है। यह एक तरह से हमसे ही चुपचाप सूचनाएं या डाटा लेकर वापस हमें ही बेचने की बुद्धिमत्ता है। सवाल है कि इंटरनेट हमसे जो सूचनाएं ले रहा है और उसका जो नानाविध प्रयोग कर रहा है, क्या उसके लिए हमारी मंजूरी ली गई है?
चैटजीपीटी सेवा देने से पहले न तो आयु की जांच हो रही है और न जरूरी नियमों की पालना हो रही है, ऐसे में, इटली इस पर प्रतिबंध लगाने वाला दुनिया का संभवत: पहला देश बन गया है। इंटरनेट की दुनिया में अनेक तरह के कानूनों का दुरुपयोग हो रहा है, सामाजिक और आर्थिक नियम-कायदों की अवहेलना हो रही है। एआई पहले उतनी बड़ी ताकत नहीं थी, लेकिन अब इतनी बड़ी ताकत हो गई है कि यह तकनीक स्वत: काम करने लगी है। बार-बार इंसानों से मंजूरी लेने की जरूरत भी नहीं है। आप दो चीजों की खोज करते हैं, तो तीसरी चीज स्वयं एआई आपके लिए जुटा लाती है। अनेक विशेषज्ञों को यह लगने लगा है कि यह कहीं न कहीं हमारे अनुरूप चलते हुए सेवा का आभास कराते हुए हमारा दुरुपयोग करती है। शायद एक दिन आएगा, चैटजीपीटी या एआई जनित सेवाएं इंसानी व्यवहार पर हावी हो जाएंगी और समाज का संचालन शुरू कर देंगी। इटली में चिंता तो पहले से जारी थी, लेकिन प्रतिबंध का फैसला तब आया, जब कई विशेषज्ञों ने नई एआई प्रणालियों के विकास पर रोक लगाने का आह्वान किया। यह आशंका जताई जा रही है कि नए एआई उपकरण बनाने की हड़बड़ी खतरनाक साबित हो सकती है।
यूरोपीय उपभोक्ता संगठन बीईयूसी ने गुरुवार को यूरोपीय संघ और अधिकारियों से जांच की मांग की है। विशेष रूप से चैटजीपीटी व ऐसी अन्य सेवाओं पर निगरानी रखने के लिए कहा है। गोपनीयता संबंधी समस्याओं के समाधान के लिए विनियमन की ओर भी इशारा किया गया है। ऐसे कानूनों का अभाव है, जो सूचना या गोपनीयता की रक्षा कर सकें। आने वाले दिनों में यह संभव है कि पूरे यूरोप में ही चैटजीपीटी पर प्रतिबंध लग जाए। चैटजीपीटी के संचालकों को अपने बचाव के लिए अब ज्यादा सक्रिय होना होगा। उन्हें लोगों को आश्वस्त करना होगा कि इसका दुरुपयोग नहीं होगा। अनुमान है कि विगत दो महीनों में चैटजीपीटी का उपयोग दुनिया के 10 करोड़ लोगों ने किया है। यह तकनीक जिज्ञासा का केंद्र बनी हुई है, मगर क्या इस नई तकनीकी को ज्यादा समय तक रोके रखा जा सकता है? कोई भी नई तकनीक आती है, तो उसका विरोध होता है और अंतत: जब वह विकसित हो जाती है, तब सब उसके इस्तेमाल के लिए विवश हो जाते हैं। एआई और चैटजीपीटी के साथ ऐसा नहीं होगा, कहना मुश्किल है।
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हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने भारत में समलैंगिक विवाह को मान्यता प्रदान करने से संबंधित मामले को संविधान पीठ के पास भेजने का निर्णय लिया है। एक तरह से न्यायालय के इस कदम को लैंगिक समानता सुनिश्चित करने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम माना जा सकता है। दूसरी ओर, इसे विधायिका के क्षेत्र में न्यायपालिका का हस्तक्षेप भी माना जा सकता है।
पक्ष में तर्क –
सरकार का पक्ष – (विपक्ष में)
तथ्य यह है विवाह को एक पवित्र संस्कार मान लेने से समलैंगिकों के विवाह के सामाजिक और आर्थिक अनुबंध को कमजोर नहीं माना जा सकता है। अब देखना यह है कि विधायिका समाज में ऐसे दूरगामी परिवर्तनों के लिए स्वीकृति दे पाती है या नहीं ? एक उत्तरदायी सरकार को इस ज्वलंत सामाजिक मुद्दे पर विवेक और कौशल दिखाना चाहिए। विधायी निष्क्रियता, न्यायिक हस्तक्षेप को आमंत्रित करेगी।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 15 मार्च, 2023
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Date:01-04-23
Get Back, DocsRajasthan doctors’ protest is utterly unreasonableTOI Editorials
Patients in Rajasthan have been put to great hardship for over 10 days as the medical fraternity has been agitating against the state’s Right to Health Bill, which was passed by the assembly on March 21. Doctors from private establishments want it to be rolled back. The Indian Medical Association on March 28 issued a media statement threatening “aggressive action to protest” if there’s no rollback. But the doctors’ conduct is unacceptable, and patients have borne the cost of the disruption.
Private sector doctors fear that the bill will undermine their business model as they will be forced to offer free treatment. Let’s take a look at the legal obligation. Indian jurisprudence has used the Constitution’s Article 21 to conclude that no one can be denied emergency medical services as the “golden hour” is often the difference between life and death. Also, Tamil Nadu in 2021 introduced a scheme whereby all hospitals had to provide emergency treatment to stabilise victims. The cost is reimbursed by the state if the patient can’t pay. Therefore, Rajasthan’s RTH bill is not wholly novel or something IMA is unacquainted with.
Coming to RTH, it’s taken six months to make its way through the assembly. During that time, the state government made changes to the original draft to offset the medical fraternity’s fears. For RTH to take effect, rules have to be framed. It’s only then that details about the kind of private establishment covered by RTH and the reimbursement process will be clear. Doctors have reason to be wary of payment delays but there’s opportunity to discuss these matters with the government. Of course, we wouldn’t be in this position if India had effective public healthcare. Governments need to spend more torealise it.
Date:01-04-23
Lahore LessonIf Pak HC can scrap sedition law, surely SC can do itTOI Editorials
Lahore high court deserves high praise for scrapping Pakistan’s sedition law, calling it inconsistent with the country’s constitution. The progressive move should inspire us. In October 2022, our Supreme Court granted the Centre additional time to review the colonial law, telling the Centre to not register fresh FIRs under Section 124A. This was a follow-up on SC’s order of May 2022 that put on hold the contentious sedition law.
In Pakistan, as in India, the sedition law is legacy of the colonial penal code for the subcontinent – the India Penal Code 1860 in which Section 124A, the section on sedition, was added as an amendment in 1870. From the very start, Section 124A was used against anti-colonial voices against whom no other charges could be slapped. That the law has survived 156 years is testament to how successive governments in Pakistan and even in consistently democratic India have viewed freedom of speech. The law, over the decades, has been used variously to intimidate and silence critics including opposition, journalists, human rights activists and even student protesters.
In the current political turmoil in Pakistan, Lahore HC reading down the sedition law is historic; it also unencumbers Imran Khan. Our SC should not allow the government any more ifs or buts. Scrap sedition. It’s a law that needs no crime to be committed. It’s a wrong law used to punish for wrong reasons the wrong people.
Date:01-04-23
India’s semiconductor mission might need a compassThe facts on the ground, especially in connection with the Semi-Conductor Laboratory, do not support the country’s ambitious plansSaurabh Dutta Chowdhury, [ currently working at power integrations (NASDAQ: POWI), and has 30 years experience in semiconductor fabrication. ]
The United States Department of Commerce and its Indian counterpart have recently concluded a memorandum of understanding in March 2023 to ensure that subsidies by each country do not come in the way of India’s semiconductor dreams, as espoused by the much publicised semiconductor policy launched in December 2021. The U.S. Department of State has also engaged with India to beef up sector-specific export control laws in the semiconductor space — which India has agreed to, as in recent media reports.
While these seem pre-conditions in a long dance orchestrated by bureaucrats on both sides, will they lead to a global major such as Intel to invest in India in order to set up a greenfield 300mm wafer fabrication plant costing over $10 billion? The premise of this question is based on the ongoing two-year dance between Intel and Indian government ministers who were seen courting the Intel CEO at Davos, and New Delhi hoping that Intel Foundry Services (a business unit within Intel formed after Intel’s takeover of the U.S.-Israel based Tower Jazz Speciality Foundry) will build a greenfield plant, most likely in Dholera, Gujarat.
The facts on the ground do not support such an eventuality in a world where Intel remains preoccupied with setting up fabs inside the U.S. So where does Indian semiconductor policy need to go from here?
The Semi-Conductor Laboratory (SCL) was set up in Mohali in 1983 by the then central government, with the vision of creating an electronics ecosystem in an era when Keltron, Uptron and Webel were fledgling entities in a pre-liberalised India aimed at consumer electronics. However, shocks, of the opening up of markets for consumer goods in 1991 and a fire that broke out in 1989 at the SCL, dashed these hopes. Some funding from the central exchequer to revive the plant to a 180 nm node pilot line to meet the strategic needs of the country did come by but the facility has, by and large, remained an unfulfilled dream in its mission of creating a domestic semiconductor ecosystem. SCL Mohali can be viewed as a technology stack similar to others such as Aadhaar, Aarogya Setu and the Unified Payments Interface (UPI) acting as a force multiplier effect, encouraging many integrated circuit design startups in India to consider designing for India.
The way forward
The institutional framework for such a shift in focus already exists with the transfer of SCL back to the Ministry of Electronics and Information Technology (MeITy) after a 15-year stint as a laboratory within the Department of Space, as part of the new semiconductor policy announcement in December 2021. However, a year into such an announcement, no joint venture partner has been found, keeping SCL employees in limbo. During this period, the focus at MeITY seems aimed at attracting Intel into India to set up a fab. This can be inferred from the wording of the request for proposals and signalling from MeITY Ministers. However, Intel primarily operates at <22nm node and 300mm, requiring over $10 billion in upgrade cost to the SCL.
An alternate approach could be to leverage human and capital assets at the SCL to build on what exists in a targeted manner, to jumpstart the semiconductor mission by taking advantage of recent technological breakthroughs in a class of semiconductors that do not need advanced lithography equipment. The “More than Moore” segment of >180 nm node involving mixed signal analog (BCD and SiGe), wide bandgap (GaN, GaAs, Silicon Carbide) for RF and power markets leveraging existing lithography capability already in place at the SCL. In this scenario, an investment of $50-$100 million may result in the development of Indian solutions for automotive electronics (EV traction inverters/on board chargers), PV-Inverters, 5G infra-power amplifiers, railway electronics (traction inverters), creating the Indian equivalent of Bosch, Siemens, ABB, Mitsubishi Electric, Thales and ELTA.
However, the upgrade has to be backed by subsidies aimed at fabless design houses with proven design (sales of >$100 million per year) willing to fabricate at the SCL in the 180nm+ node (and possibly transfer process intellectual patents if they have any). The subsidies have to be aimed at global design companies with products aimed at India-specific markets such as motor drives for BLDC fans or e-bike chargers. Unfortunately, the existing DLI/PLI schemes provide no such incentives to proven global fabless design companies.
The recent efforts by the India Semiconductor Mission to open up subsidies to global small and medium-sized enterprises in the upstream supply chain are welcome because an existing facility like the SCL will benefit from this. But this is not enough in itself unless coupled with the incentives defined above and also upgrades targeted at different sets of players.
The stakes are high as a lack of clarity and inaction may lead to India completely missing out on the semiconductor fabrication bus, yet again, unless there is course correction on incentive targets. Finally, to execute this vision in the next five years, the SCL needs a full-time director with prior “More than Moore” foundry experience than have a career scientist from the Department of Space, as is the case now. This is because there is a multifaceted market that needs to be served.
Date:01-04-23
लोकतंत्र में भले ही कमियां हो फिर भी वह बेहतर हैंपवन के. वर्मा, ( लेखक, राजनयिक, पूर्व राज्यसभा सांसद )
यह सितम्बर 1982 था। इंदिरा गांधी सोवियत संघ की राजकीय यात्रा पर थीं। यात्रा के दौरान क्रेमलिन में भारतीय और सोवियत प्रतिनिधिमंडलों के बीच इंदिरा गांधी और लियोनिद ब्रेज्नेव की अध्यक्षता में वार्ता हुई। श्रीमती गांधी ने पंजाब में बढ़ते उग्रवाद पर चिंता जताई। जब वे बोल रही थीं तो ब्रेज्नेव ऊंघने लगे। उनकी तबीयत तब ठीक नहीं रहती थी और वे बहुत उम्रदराज भी थे। उनके समीप बैठे सोवियत विदेश मंत्री अंद्रेई ग्रोम्यको ने उन्हें जगाया। ब्रेज्नेव ने ग्रोम्यको के कान में कहा- ‘वे क्या बोल रही हैं, मुझे एक भी शब्द समझ नहीं आ रहा।’ तब ग्रोम्यको ने उन्हें बताया कि भारत की प्रधानमंत्री अपने एक राज्य पंजाब के बारे में बात कर रही हैं, जहां अलगाववादियों द्वारा खालिस्तान के निर्माण की बढ़ती मांग से वो चिंतित हैं। ब्रेज्नेव- जो अब पूरी तरह से जाग चुके थे- ने अचानक हस्तक्षेप करते हुए कहा- ‘महोदया, आप ऐसी चीजों को होने की अनुमति कैसे दे सकती हैं? सोवियत संघ को देखें। 1917 से ही हम अलगाववादी ताकतों को कुचलते आ रहे हैं और हम अब तक एक संयुक्त संघ बने हुए हैं।’ नवम्बर 1982 में ब्रेज्नेव का निधन हो गया। 1991 में सोवियत संघ 15 भिन्न राष्ट्रों में टूट गया। जबकि पंजाब आज भी भारतीय संघ की लोकतांत्रिक मुख्यधारा का हिस्सा है!
इन दोनों स्थितियों का एक ही कारण है- लोकतंत्र। भारत में लोकतंत्र था, सोवियत संघ में नहीं था। जब सर्वसत्तावादी ताकतें राज्यतंत्र से छेड़छाड़ करने लगती हैं तो चीजें नियंत्रण से बाहर होने लगती हैं। मिखाइल गोर्बाचेव जब सुधारों की बात करते थे तो वे गलत नहीं थे। उन्होंने ग्लासनोस्त यानी खुली व्यवस्था और पेरेस्त्रोइका यानी पुनर्निर्माण की बात कही थी। लेकिन अलोकतांत्रिक और नियंत्रणवादी सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी लोकतांत्रिक सुधारों की अभ्यस्त नहीं थी, जिससे हालात काबू से बाहर हो गए। सोवियत साम्राज्य टुकड़े-टुकड़े होकर बिखर गया। इतिहास से हमें कई जरूरी सबक मिलते हैं। उनमें से एक यह है कि लोकतंत्र में भले कमियां हों, लेकिन यह दूसरी प्रणालियों से बेहतर है, क्योंकि यह आकांक्षाओं, बहुलताओं और असंतोष के प्रेशर कुकर के लिए सेफ्टी वॉल्व का काम करता है और विस्फोट की स्थिति निर्मित होने से रोकता है।
आजकल भारत और चीन की ताकत की बहुत तुलना की जाती है। इसमें संदेह नहीं कि चीन जीडीपी, प्रतिव्यक्ति आय, बुनियादी ढांचे और फौज के पैमाने पर भारत से आगे है। लेकिन सोवियत संघ की तरह उसमें भी एक महत्वपूर्ण आयाम का अभाव है, और वह है- लोकतंत्र। मेरा मानना है कि देर-सबेर चीन को भी उन प्रणालीगत संकटों का सामना करना पड़ेगा, जिनके चलते यूएसएसआर में अंदरूनी संघर्ष टकराव आए थे। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी को अपने हठ का त्याग करते हुए लोगों में बढ़ते असंतोष को समायोजित करना होगा, जिसे हमने जीरो कोविड नीति के विरोध में उभरते हुए देखा था। अरसे से दमित प्रतिरोध को जैसे ही प्रकट होने का अवसर मिलता है, वह बड़े पैमाने पर अराजकता की स्थिति निर्मित कर सकता है।
चीन की अंदरूनी समस्याएं लोकतंत्र के अभाव के कारण निर्मित हुई हैं। वहां की कम्युनिस्ट पार्टी ने वन चाइल्ड पॉलिसी का जो एकतरफा फरमान जारी कर दिया था, उसके चलते आज वहां जनसांख्यिकी सम्बंधी कठिनाइयां उत्पन्न हो गई हैं। उसकी कामकाजी आबादी घट रही है। आज यह स्थिति है कि हर कामकाजी व्यक्ति को दो सेवानिवृत्त लोगों का खर्च उठाना पड़ रहा है। चीन के राज्यशासित उद्योग भी चाहे जितने उत्पादक हों, उनमें उद्यमिता या इनोवेटिव भावना नहीं है। 2007 में उसकी जीडीपी विकास दर 14.2 प्रतिशत थी, जो आज 3 प्रतिशत रह गई है। अगर उसका आर्थिक विकास बाधित हुआ तो अंदरूनी टकरावों के चलते वहां बिखराव की स्थिति निर्मित हो सकती है। जबकि भारत की ताकत उसका लोकतंत्र है। उसकी आर्थिक विकास दर धीमी हो सकती है, लेकिन उसकी बुनियाद मजबूत है। जब लोग चुनावों, अभिव्यक्ति की आजादी, असहमति, स्वतंत्र न्यायपालिका, निष्पक्ष मीडिया, स्वायत्त संस्थाओं और मुखर विपक्ष के आदी हो जाते हैं तो किसी कीमत पर उनके साथ छेड़खानी नहीं होने देते, क्योंकि तब उससे न केवल देश का विकास बल्कि उसकी एकता भी खतरे में पड़ जाती है। लोकतंत्र का जिन्न बोतल से बाहर आने के बाद फिर उसमें प्रवेश नहीं करता। इस बात को आज भारत में लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित सरकारों- जिनमें केंद्र सरकार भी शामिल है- को याद रखना चाहिए।
Date:01-04-23
पश्चिम एशिया में चीन का बढ़ता दखलडा. अभिषेक श्रीवास्तव
पश्चिम एशिया के दो बड़े तेल उत्पादक देश और एक-दूसरे के प्रमुख प्रतिद्वंद्वी रहे ईरान और सऊदी अरब ने चीन की मध्यस्थता के कारण पुनः कूटनीतिक संबंधों को बहाल करने और दूतावासों को फिर से खोलने पर सहमति व्यक्त की है। मालूम हो कि दोनों देशों के बीच तनाव वर्ष 2016 में तब आरंभ हुआ था, जब सऊदी अरब में शिया धर्मगुरु निम्र अल-निम्र के साथ 47 लोगों को आतंकवाद के आरोप में फांसी पर चढ़ा दिया गया था। उस घटना के बाद ईरान में जबरदस्त विरोध हुआ तथा प्रदर्शनकारी सऊदी अरब के दूतावास में घुस गए। उसके बाद ईरान और सऊदी अरब के बीच व्यापार, निवेश और सांस्कृतिक संबंध खत्म हो गए। फिर दोनों देशों ने एक-दूसरे देशों में अपने दूतावासों को बंद कर दिया।
सऊदी अरब और ईरान, दोनों ही पश्चिम एशिया के ताकतवर देश हैं और क्षेत्रीय प्रभुत्व के लिए वर्षों से एक-दूसरे के खिलाफ प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से लड़ रहे हैं। ऐतिहासिक रूप से सऊदी अरब स्वयं को मुस्लिम दुनिया का एकमात्र नेता मानता रहा है, लेकिन 1979 में ईरान में हुई इस्लामिक क्रांति ने उसके इस एकाधिकार को चुनौती दी। सऊदी अरब और ईरान के बीच विवाद की असली वजह दशकों पुराने धार्मिक मतभेद हैं। दोनों इस्लाम के अलग-अलग पंथ को मानते हैं। ईरान में ज्यादातर शिया मुसलमान हैं, वहीं सऊदी अरब एक सुन्नी बहुल मुस्लिम देश है। यह धार्मिक विभाजन दूसरे पश्चिम एशियाई देशों में भी दिखता है, जहां सुन्नी और शिया मुसलामानों के अलग-अलग समूह हैं। धार्मिक समूहों में बंटे पश्चिम एशिया के कुछ देश समर्थन के लिए ईरान की तरफ देखते हैं और कुछ सऊदी अरब की तरफ। जाहिर है कि लंबे समय से चले आ रहे सऊदी अरब-ईरान के इस संघर्ष को पश्चिम एशिया की स्थिरता के लिए समाप्त करने की आवश्यकता थी, क्योंकि यह न सिर्फ दोनों देशों के लिए, बल्कि क्षेत्रीय शांति के लिए भी नुकसानदेह साबित हो रहा था।
पश्चिम एशियाई क्षेत्र में चीन की दिलचस्पी रातों-रात नहीं बढ़ी है। अपनी वैश्विक भूमिका में विस्तार के लिए चीन कई अंतराष्ट्रीय योजनाएं चला रहा है। वन बेल्ट वन रोड परियोजना के माध्यम से चीन एशियाई और अफ्रीकी देशों में अपनी उपस्थिति दर्ज करने के लिए पिछले दशक से प्रयासरत है। चीन वन बेल्ट वन रोड पहल के तहत पाकिस्तान के ग्वादर बंदरगाह से ईरान के चाबहार बंदरगाह तक ढांचागत निर्माण को बढ़ावा दे रहा है। इसके साथ ही नई सिल्क रोड के तहत चीन-पाकिस्तान इकोनमिक कारिडोर की तर्ज पर तेहरान को शिनजियांग से जोड़ने जा रहा है। इससे चीन मध्य एशियाई देशों (कजाकिस्तान, किर्गिस्तान, उज्बेकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान) से होते हुए तुर्की के रास्ते यूरोप तक पहुंचने में सफल होगा। पश्चिम एशिया में चीन की बढ़ती भूमिका ने अमेरिका और रूस के लिए खतरे कि घंटी बजा दी है। अमेरिका तथा यूरोपीय देशों के रूस-यूक्रेन युद्ध में व्यस्त होने का लाभ उठाते हुए चीन पश्चिमी एशिया में ज्यादा सक्रिय हुआ है। ईरान तथा सऊदी अरब के बीच शांति समझौता कराकर चीन ने वैश्विक जगत में अपनी विश्वनीयता बढ़ने का भी प्रयास किया है।
भारत के दृष्टिकोण से ईरान तथा सऊदी अरब समान रूप से महत्वपूर्ण हैं। हाल के वर्षों में पश्चिम एशियाई देशों खासकर खाड़ी देशों के साथ भारत ने अपनी सांस्कृतिक एवं व्यापारिक साझेदारी का विस्तार किया है। इसमें संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के साथ व्यापक आर्थिक साझेदारी समझौता भी शामिल है। ईरान का चाबहार बंदरगाह भारत के लिए महत्वपूर्ण है, जिसके द्वारा भारत की महत्वपूर्ण परियोजना नार्थ-साउथ ट्रांसपोर्ट कारिडोर संचालित होती है। वहीं सऊदी अरब भारत के लिए रणनीतिक तथा व्यापारिक रूप से महत्वपूर्ण है।
भारत ने इस समझौते का स्वागत किया है, लेकिन दोनों देशों के बीच संबंध बहाली नहीं, अपितु पश्चिम एशिया में चीन की उपस्थिति ने भारतीय नेतृत्व को सशंकित करने का भी काम किया है। भारत का पश्चिम एशियाई देशों से काफी खास रिश्ता रहा है। पश्चिम एशिया के देशों में बड़ी संख्या में प्रवासी भारतीय रहते हैं, जो हर साल लगभग 35-40 अरब डालर भारत भेजते हैं, जबकि चीनी नागरिकों की उपस्थिति इस क्षेत्र में काफी कम है। भारत में बड़ी संख्या में मुस्लिम समुदाय की आबादी है, जिस कारण भारत-पश्चिम एशिया के बीच नैसर्गिक साझेदारी संभव है। वहीं चीन की उइगुर मुसलमानों के प्रति दमनकारी नीति तथा इस्लाम धर्म के प्रति असंतुलित व्यवहार उसको इस क्षेत्र का सहज साझेदार बनने में अड़चन पैदा कर सकता है। पाकिस्तान और श्रीलंका में चीनी हस्तक्षेप के बाद बिगड़ते आर्थिक हालात को देखते हुए सभी देश सशंकित हैं। ऐसे में ईरान में चीन की उपस्थिति भारतीय निवेश एवं सुरक्षा के लिए मुश्किलें पैदा कर सकती है। इसके साथ ही भारत की मध्य एशिया तक होने वाली पहुंच भी बाधित हो सकती है। इस क्षेत्र में चीन की तालिबान से वार्ता भी चल रही है। ऐसे में अफगानिस्तान में तालिबान का लंबे समय तक सत्ता में रहने के प्रबल आसार बन रहे हैं, जिससे भारतीय हित गंभीर रूप से प्रभावित हो सकते हैं। चीन की इस क्षेत्र में उपस्थिति भारतीय कंपनियों को ईरान और अफगानिस्तान में रणनीतिक निवेश और व्यापारिक संभावनाओं को भी हतोत्साहित कर सकती है। यद्यपि ईरान- सऊदी अरब की संधि के जरिये रूस तथा अमेरिका को पीछे छोड़कर चीन ने अपनी वैश्विक भूमिका प्रदर्शित की है, जिसके द्वारा चीन वैश्विक समुदाय का भरोसा जीतने का प्रयास कर रहा है, परंतु अभी यह अनुमान नहीं लगाया जा सकता कि इस संधि के बाद पश्चिम एशिया की भू-राजनीति में कितनी स्थिरता आएगी। जो भी हो, पश्चिम एशिया में चीन की दखलंदाजी ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में एक नए आयाम की शुरुआत की है।
Date:01-04-23
और ज्यादा मिले अधिकारएस.एम. खान, ( लेखक सीबीआई के प्रवक्ता (1989-2002) रहे हैं )
केंद्रीय जांच ब्यूरो (सेंट्रल ब्यूरो ऑफ इंवेस्टिगेशन – सीबीआई ) इस वर्ष एक अप्रैल को अपनी स्थापना के साठ वर्ष पूरे होने पर हीरक जयंती मना रहा है। सीबीआई की स्थापना एक अप्रैल, 1963 को भारत सरकार के प्रस्ताव संख्या 3/31/61-टी/एमएचए के जरिए की गई थी और दिल्ली स्पेशल पुलिस एस्टेब्लिशमेंट एक्ट, 1963 से इसे वैधानिक शक्तियां मिली थीं। अपनी स्थापना के बाद से ही सीबीआई चर्चा में रही है। इसने अपने कामकाज से आमजन का विश्वास अर्जित किया है, और अब तक अपने अस्तित्वकाल में इस संगठन को अच्छे खराब दौर से भी गुजरना पड़ा है।
सीबीआई का केंद्रीय पुलिस एजेंसी के रूप में गठन किया गया था, जिसे सार्वजनिक सेवकों के भ्रष्टाचार, केंद्रीय वित्तीय कानूनों की उल्लंघना, आर्थिक धोखेबाजी और आतंकवादी अपराध समेत गंभीर किस्म के खास तरह के अपराधों की जांच का जिम्मा सौंपा गया था। राज्य सरकारों की सहमति के उपरांत केंद्रीय मंत्रिमंडल में पारित एक प्रस्ताव के जरिए सीबीआई का न्यायाधिकार क्षेत्र विभिन्न राज्यों तक विस्तारित किया गया लेकिन आज तक सीबीआई को अपनी वैधानिक स्थिति की मजबूती के लिए किसी अखिल भारतीय विधान का संबल नहीं मिल सका है। स्थिति यह है कि यह संस्था भ्रष्टाचार और केंद्र सरकार के कर्मचारियों के खिलाफ कदाचार के अन्य मामलों की जांच के लिए जरूरी वैधानिक प्राधिकार देने वाले वैधानिक संबल से वंचित है।
यही कारण है कि भ्रष्टाचार निरोधक कानून, भारतीय अपराध संहिता और अन्य कानूनों के तहत जांच के लिए आज भी इसे राज्य सरकारों से अनुमति मिलने या न मिलने की स्थिति का सामना करना पड़ता है। कई राज्यों ने तो किसी जांच के अधबीच में ही सीबीआई को दी गई जांच की अपनी सहमति को रोक कर सीबीआई की जांच में अवरोध खड़े कर दिए। आज की तारीख में आठ राज्यों – छत्तीसगढ़, केरल, पश्चिम बंगाल, झारखंड, मेघालय, मिजोरम, पंजाब, राजस्थान और तेलंगाना- अपने यहां सीबीआई को कार्य करने से रोका। इनमें से अधिकांश राज्य विपक्ष शासित हैं। अनेक वार संसद में बिल लाकर चर्चा की जा चुकी हैं ताकि सीबीआई को अखिल भारतीय स्तर पर कामकाज करने में किसी की अनुमति लेने की न्दरकार न रहे लेकिन ऐसा न हो सका। तमाम कारणों में एक बड़ा कारण यह रहा कि अनेक राज्यों ने इस प्रयास का यह कह कर विरोध किया कि इस प्रकार की कवायद भारत के संघीय ढांचे के विरुद्ध होगी क्योंकि कानून व्यवस्था, जिसमें मामलों की जांच भी शामिल है, राज्यों का विषय है। अभी केंद्र में राजग सरकार शासन में है, और अनेक राज्यों में भी उसकी सरकारें हैं, इसलिए अच्छा समय है कि सीबीआई को अखिल भारतीय स्तर पर अधिकारों से प्राधिकृत किया जाए। यह तथ्य बहुतों को पता नहीं होगा कि 2013 में सीबीआई को गुवाहाटी उच्च न्यायालय ने अपने एक आदेश में ऐसा संगठन घोषित कर दिया था जिसके पास कोई वैधानिक अनुमोदन नहीं है। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश पर स्थगनादेश पारित करके स्थिति को संभाला था। बहरहाल, सुप्रीम कोर्ट के स्थगनादेश के तहत सीबीआई कामकाज कर रहा है।
अपनी स्थापना के बाद से ही सीबीआई का राजनेताओं के साथ खट्टा-मीठा संबंध रहा है। हमेशा मांग की जाती है कि किसी मामले की सीबीआई जांच कराई जाए लेकिन वही राजनेता जब स्वयं सीबीआई जांच के घेरे में आ जाता है, तो जांच की आलोचना करते हुए अन्य मामलों में सीबीआई जांच की मांग करने लग पड़ता है। बहरहाल, सीबीआई ने अपने पेशेवर कामकाज से लोगों का दिल जीता है। अपनी सक्षमता का अहसास कराया है, और निष्पक्ष जांच के लिए आज देश के नागरिक इस एजेंसी पर विश्वास करते हैं। न केवल नागरिकों, बल्कि सरकार, न्यायपालिका, विधायिका, मीडिया का भी इस एजेंसी में पूरा विश्वास जब-तब झलक पड़ता है। लेकिन राजनीतिक रूप से संवेदनशील मामलों में इसे निशाने पर लिए जाने की प्रवृत्ति भी देखने को मिलती है। हमेशा से इसे सत्ताधारी राजनीतिक पार्टी के टूल के रूप में आलोचना का शिकार बनाया जाता है। आरोप लगाए जाते हैं कि सत्ताधारी राजनीतिक पार्टी अपने विरोधियों का इस एजेंसी के जरिए उत्पीड़न कर रही है।
ऐसे आरोप लगते रहे हैं कि सीबीआई सत्ताधारियों या उनके करीबियों के साथ अलग तरह से व्यवहार करती है, और राजनीतिक रूप से संवेदनशील मामलों में इसका व्यवहार निष्पक्ष नहीं होता। सीबीआई में प्रतिष्ठित पुलिस अधिकारी शामिल होते हैं, और ऐसे कामकाजी मुद्दे हैं, जो इसके स्वतंत्र कामकाज को अवरोधित किए रहते हैं और इस संगठन को इसके लिए पूरी तरह केंद्र सरकार और राज्य सरकारों पर निर्भर रहना पड़ता है। सीबीआई भारत सरकार के कार्मिक एवं प्रशासनिक सुधार मंत्रालय से जुड़ा कार्यालय भर है। इस कारण प्रशासनिक और वित्तीय मामलों में इसे केंद्र सरकार की स्वीकृति की दरकार रहती है। हालांकि यह विशुद्ध जांच एजेंसी है, और अपराध संहिता के प्रावधानों के तहत कार्य करती है, और अदालतों के प्रति जवाबदेह होती है, लेकिन इसके बावजूद मामलों की जांच के समय और जांच की गति को लेकर जब-तब सवालों से घिर जाती है। जांच के समय को लेकर बेशक, इसे घेरा जाता हो लेकिन वैधानिकता या कानूनी प्रक्रिया के तहत इसकी जांच पर उंगली नहीं उठाई जा सकती। लोग कहने लगे हैं कि सीबीआई जांच को तेज या मद्धिम करके राजनीतिक गठजोड़ किए जाते हैं।
सार्वजनिक हित में जरूरी है कि सीवीआई को अखिल भारतीय न्यायाधिकार प्रदान किया जाए। अपने परिचालन में इसे राज्य सरकारों की मंजूरी की दरकार नहीं रहने दी जाए। नेशनल इंवेस्टिगेशन एंड एन्फोर्समेंट डायरेक्टर तक को ऑल इंडिया ज्यूरिडिक्शन प्रदान कर दिया गया है, और उसे राज्य सरकारों की मंजूरी की जरूरत नहीं होती। मामलों की निष्पक्ष जांच के मद्देनजर निष्पक्ष जांच एजेंसी के रूप में सीबीआई की क्षमता का लाभ उठाया जाना चाहिए। केंद्र और राज्यों में सत्तारूढ़ लोगों का दायित्व है कि सीबीआई को पेशेवर तरीके से दायित्व निवर्हन में कारगर बनाएं क्योंकि यह सार्वजिनक हित में है कि किसी मामले को निष्पक्ष जांच के बाद उसके तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाया जाए।
Date:01-04-23
अब भूटान भी बीजिंग से तालमेल बिठाने लगा हैअभिजीत अय्यर मित्र, ( सीनियर फेलो आईपीसीएस )
भूटान के प्रधानमंत्री लोतेय शेरिंग के एक इंटरव्यू ने न सिर्फ डोकलाम (या डोकाला) विवाद को गरम कर दिया है, बल्कि भारत के साथ भूटान के मैत्रीपूर्ण रिश्ते पर बर्फ की चादर भी डाल दी है। दरअसल, भारत से सलाह-मशविरा करके ही भूटान किसी अन्य देश के साथ अपने संबंध आगे बढ़ा सकता है। ऐसा एक समझौता उसने हमारे साथ किया है, जिसके एवज में नई दिल्ली ने उसकी सुरक्षा का जिम्मा उठाया था। मगर अब दोस्ती की यह गांठ कमजोर पड़ती दिख रही है। इसका पता सबसे पहले तब चला था, जब द भूटनीज अखबार ने भारत-विरोधी खबरें छापनी शुरू कीं। भूटान में एक तरह की तानाशाही है, इसलिए यह अखबार उसी तरह भूटानी सरकार का मुखपत्र माना जाता है, जैसे चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के अखबार।
साल 2017 का डोकलाम विवाद हमारे लिए आंख खोलने वाला प्रकरण था। डोकलाम मूलत: भूटान का क्षेत्र है, और चीन ने वहां निर्माण-कार्य शुरू कर दिया था। चूंकि भूटान की सुरक्षा हम अपनी जिम्मेदारी मानते आए हैं और डोकलाम में एक ऐसा त्रिकोणीय जंक्शन है, जहां भारत, भूटान और चीन मिलते हैं, इसलिए नई दिल्ली ने प्रमुखता से इस मसले को उठाया। इसके एक साल के बाद शोधकर्ता डेमियन साइमन ने खुलासा किया कि चीन ने डोकलाम से सटे पश्चिमी भूटान के करीब 18 किलोमीटर हिस्से पर कब्जा कर लिया है। इस खुलासे का भारत में तैनात भूटान के तत्कालीन राजदूत ने पुरजोर खंडन किया था, लेकिन जब वहां की तस्वीरें डेमियन ने साझा कीं, तब उन्होंने चुप्पी साध ली। दुखद यह था कि हमने भी इसे कोई खास महत्व नहीं दिया।
अब आलम यह है कि भारत और भूटान का रिश्ता उस मोड़ पर पहुंच चुका है, जहां भूटानी प्रधानमंत्री सीधे बात न करके विदेशी अखबारों के जरिये हम तक संदेश पहुंचा रहे हैं। उनका ताजा साक्षात्कार दो-तीन वजहों से कहीं ज्यादा चिंतित करता है। लोतेय शेरिंग ने कहा है कि डोकलाम विवाद के तीन पक्ष हैं, जिनमें चीन भी एक अहम किरदार है। और, भूटान-चीन सीमा विवाद को लेकर दो तरह की वार्ता चल रही है। एक बातचीत में डोकलाम और पश्चिमी भूटान को शामिल नहीं किया गया है, क्योंकि चीन से सटे इलाकों में भी उसके सीमा विवाद हैं, जबकि दूसरी वार्ता हिन्दुस्तान और चीन के साथ संयुक्त रूप से हो रही है, जिसमें डोकलाम शामिल है। स्पष्ट है, भूटान ने भारत की सलाह के बिना चीन के साथ द्विपक्षीय बातचीत शुरू कर दी है, यानी उसने भारत के साथ किए गए समझौते को तोड़ने का एकतरफा एलान कर दिया है। भूटानी प्रधानमंत्री अपने साक्षात्कार में पश्चिमी भूटान पर चीन के कब्जे को भी स्वीकार करते हुए दिखे। डेमियन साइमन तो यह भी बता रहे हैं कि अब चीन ने उस 18 किलोमीटर से कहीं ज्यादा जमीन अपने कब्जे में कर ली है।
हमारी कूटनीति के लिहाज से यह काफी गंभीर घटनाक्रम है। भूटान अपनी जितनी जमीन चीन को देगा, बीजिंग के साथ हमारी सीमा का उतना ही विस्तार होता जाएगा। हम यही मानते आए हैं कि भूटान हमारे साथ है, लेकिन अब लगता है कि वह चीन के पाले में चला गया है और बीजिंग के साथ उसने कोई गुप्त समझौता कर लिया है। अगर ऐसा हुआ है, तो यह आशंका बढ़ जाएगी कि चीन के सैनिक सिलिगुड़ी कॉरिडोर पर कब्जा करने के लिए भूटानी जमीन का इस्तेमाल कर सकते हैं। चूंकि यह इलाका ऊपरी पहाड़ी पर है और हम नीचे, इसलिए यह हमारे लिए एक विषम भौगोलिक परिस्थिति होगी।
दूसरा खतरा यह है कि अगर भूटान ने अपनी 10-15 प्रतिशत जमीन चीन को दे दी है, तो चीनी हुक्मरां अब मैकमोहन रेखा के औचित्य को खत्म करने का दबाव हम पर बना सकते हैं। एक अन्य आशंका यह भी है कि सामरिक महत्व के इन इलाकों का इस्तेमाल चीन हमारी सैन्य आपूर्ति शृंखला को नुकसान पहुंचाने के लिए कर सकता है। बेशक, चीन को दी गई जमीन पर भूटानी नागरिक कमोबेश नहीं रहते, पर वहां से बीजिंग के लिए भारत पर निशाना बनाना आसान हो सकता है। साफ है, द भूटनीज की खबरों से शुरू हुआ भूटान का भटकाव अब कहीं ज्यादा तेज नजर आ रहा है। ऐसे में, हमें भी अपनी कूटनीतिक चूक को जल्द से जल्द दुरुस्त कर लेना चाहिए।
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01 April 2023
प्रश्न–404 – उच्चतम न्यायालय ने केंद्र सरकार से निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति के लिए एक समीति गठित करने का निर्देश दिया है। इस निर्देश का आलोचनात्मक मूल्यांकन कीजिये। (250 शब्द)
Question–404 – The Supreme Court has directed the Central Government to set up a committee for the appointment of Election Commissioners. Critically evaluate this instruction. (250 words)
नोट : इसका उत्तर आपको हमें नहीं भेजना है, यह आपके स्वयं के अभ्यास के लिए है।
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Date:31-03-23
Women Not In Job Market? It’s A MythTheir labour force participation has increased. And there’s a surge in female enrolment in higher education. Wait till those groups come on board.Surjit S Bhalla & Tirthatanmoy Das, [ Bhalla is former Executive Director IMF; Das is Associate Professor, IIM Bangalore. ]
In our previous article “A Jobful Economy” we documented the employment results emerging from almost 30 years of NSSO/ PLFS survey data on employment (since 2017/18, the PLFS data). No one doubts the success of the Indian growth story in terms of GDP growth – annual per capita growth of 4. 5% over 30 odd years, and now expected to be the fastest growing major economy over the next five.
We revisit the PLFS data to examine a prominent misunderstanding, or misinterpretation, about the Indian economy. In particular, questions have been raised about the low female labour force participation rate (FLFPR) in India, especially compared to neighbouring countries like Bangladesh and Sri Lanka. The latter countries have FLFPR in the mid-30s ie, about 35% of working age women work.
In India the PLFS number is in the mid-20s. Why this large gap between comparable countries? Valid question because the socio-cultural environment in the three countries is similar.
Aggregate data doesn’t pass smell test
The low FLFPR in India fails the “smell test” or the “duck test”. If it walks like a duck, it is a duck. We know that 15% of pilots in India are women – the highest in the world. We also know that according to the World Bank, 42. 7% of women in India were STEM graduates in 2018. We also know that more women go to college in India than men. So why is the FLFPR in India so low?
If we go back two decades, NSSO data for 2004/5 did show FLFPR to be 35%. But in 2011/12 this figure had dropped to 26. 1% (current weekly status). Why did thishappen?
For two reasons – first, the ILO definition changed, and while not mandatory for all statistical agencies to accept the change, India did so. The ILO now said that production towards home consumption (eg care-taking of cattle for milk consumed at home) would no longer be counted as “work for pay or profit”.
If the definition had not changed, there would have been an extra 38 million in the female workforce in 2011. The change in definition of work can explain about half of this difference – unpaid family workers declinedby 18 million. What explains the other 20 million? They went into education. Both Sri Lanka and Bangladesh had completed the transition to male-female gender equality by 2011.
Education will be the differentiator
The big story – we believe the biggest story – about structural change in India is the enrolment of women in India at all levels of education. The new generation (those between 25 and 30 years today) will cause the LFPR to systematically increase because higher education, all other things being equal, does lead to greater work participation.
Think of the counter-factual – why would a person, after finishing college education, not want to work? To be sure, there is the question of family, and having babies. But wait – Indian women have a fertility rate less than the replacement rate of 2. 1 and dropping. Andattitudes around the world (and in India) towards childcare are changing.
Three different definitions of LFPR are presented – weekly status, long-term employment (usual status), and weekly LFPR adjusted for education (i. e. you are considered “in work force” if you are attending school). The percentage of men and women enrolled in school (all data for those above 15 years) are also reported.
Three conclusions follow
● First, that there is tremendous catch-up in female enrolment – from two-fifths of male enrolment in 1983 to now 83 %. In the dominant enrolment age group 15-22 years, the ratio is 95%.
● Second, labour force participation rates for women are now equal to, or higher, than the level observed in 2011 (no change in definition 2011 onwards).
● Adjusted weekly status (for all women) is now at 38. 7%, some two percentage points above 2011.
The issue of “low” FLFPR for India should be treated as an ex-issue, as an issue which has ceased to be. This increased education and FLFPR for India augurs very well for our growth prospects, which our policy-makers, international organisations and markets, should begin to acknowledge, and recognise.
Date:31-03-23
समलैंगिक विवाह को वैध बनाने के खतरेडा. ऋतु सारस्वत, ( लेखिका समाजशास्त्र की प्रोफेसर हैं )
समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने की मांग कर रही याचिकाओं का केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में विरोध किया है। कहा है कि इसकी मान्यता से स्वीकार्य सामाजिक मूल्यों में संतुलन प्रभावित होगा। यकीनन मूल्यों और परंपराओं को दकियानूसी कहने वाला सोच इसे भारत का पिछड़ापन कहेगा, परंतु समलैंगिक विवाह को मान्यता देने पर भविष्य में इसके क्या परिणाम होंगे? यह विचारणीय बिंदु है। परंपरागत रूप से विवाह और संतानोत्पत्ति एक-दूसरे से जुड़े हुए हैं, परंतु एक वर्ग विवाह के प्रजनन अर्थ को खारिज करता है। यह कोई संयोग नहीं कि जिन देशों ने समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता दी है, वहां सबसे कम प्रजनन दर है। नीदरलैंड, स्वीडन और कनाडा में समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता है और वहां की जन्म दर प्रति महिला लगभग 1.6 बच्चे हैं, जो 2.1 की प्रतिस्थापन प्रजनन दर से बहुत नीचे है। जनसंख्या संबंधी अंतरराष्ट्रीय आंकड़े भी यही बता रहे हैं कि जिन दस देशों में अध्ययन के समय समलैंगिक विवाह को अनुमति थी, उनकी प्रजनन दर दुनिया के 193 देशों से कम थी। यहां संभवत: यह तर्क देने का प्रयास किया जाएगा कि कम जन्म दर का कारण विषम-लैंगिक युगलों द्वारा प्रजनन के प्रति घटती रुचि है, परंतु विभिन्न शोध इस तथ्य को इंगित कर रहे हैं कि समलैंगिक विवाह एक जन्म विरोधी मानसिकता को बढ़ावा देता है और हम जानते हैं कि जनसंख्या में गिरावट समाज पर जबरदस्त सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक तनाव डालती है।
समलैंगिक विवाह की पैरवी करने वाले यह तर्क देते हैं कि यद्यपि वे सामान्य रूप से बच्चों को जन्म नहीं दे सकते, परंतु बच्चों को गोद लेकर या शुक्राणु दान से वे अभिभावक बन सकते हैं और बच्चों की बेहतर परवरिश कर सकते हैं। ‘नो बेसिस : व्हाट द स्टडी डोंट टेल अस अबाउट सेम-लिंग पैरेंटिंग’ नामक शोध उन सभी शोधों पर प्रश्न उठाता है, जो निरंतर यह तथ्य स्थापित करने का प्रयास कर रहे हैं कि समलैंगिकों के बच्चे विषमलैंगिक अभिभावकों के बच्चों से बिल्कुल भिन्न नहीं हैं। ‘ए न्यू स्टडी आफ यंग एडल्ट्स कंसीव्ड थ्रू स्पर्म डोनेशन’ बताता है कि सामाजिक और आर्थिक सुनिश्चितता के बावजूद भी शुक्राणु दान के माध्यम से जन्म लिए बच्चों में जैविक माता-पिता की संतानों की अपेक्षाकृत मादक द्रव्यों का सेवन, अपराध की ओर झुकाव तथा अवसाद की आशंका अधिक रहती है। वहीं आस्ट्रेलिया में हुए एक अध्ययन में विषमलैंगिक विवाहित जोड़ों के बच्चों की तुलना में समलैंगिक जोड़ों के बच्चों का प्रदर्शन सामाजिक एवं अकादमिक स्तर पर खराब पाया गया। समलैंगिक विवाह के वैधीकरण से उत्पन्न सबसे बड़ी त्रासदी वयस्कों पर नहीं, बल्कि बच्चों से जुड़ी है। समलैंगिक विवाह यह सिद्ध करने की चेष्टा है कि मातृहीन अथवा पितृहीन बच्चे समाज की वास्तविकता हैं। दुर्भाग्यपूर्ण यह है कि समाज स्वयं जानबूझकर बच्चों के लिए स्थायी रूप से मातृ अथवा पितृहीन परिवारों का विकल्प उपलब्ध करवाकर उनके भविष्य को अंधकार में धकेलने को तत्पर दिखाई दे रहा है।
समलैंगिक विवाह के संदर्भ में एक तर्क यह भी दिया जाता है कि कानूनी मान्यता प्राप्त होने पर ऐसे युगलों के संबंध कहीं अधिक स्थिर होंगे। हालांकि मैसाचुसेट्स के अध्ययन में पाया गया कि केवल एक साल या उससे कम में ही उन्होंने अपने रिश्ते को तोड़ने की बात की। स्वीडन में पुरुषों की साझेदारी में तलाक का जोखिम विषमलैंगिक विवाह से संबंधित जोखिम की तुलना में 50 प्रतिशत अधिक दिखाई दिया। यदि समलैंगिक साझेदारी की अस्थिर प्रकृति विवाह के आदर्श का हिस्सा बन जाती है तो यह समाज की सामान्य विवाह पद्धति को गंभीर रूप से प्रभावित करेगी। समलैंगिक संबंधों की पैरवी करने वालों का यह तर्क हो सकता है कि समाज के हित के लिए हम अपने व्यक्तिगत चुनाव का त्याग क्यों करें। एक क्षण को उनके इस विचार को स्वीकार कर भी लिया जाए तो भी उन्हें उन तथ्यों से परिचित होना जरूरी है जिससे किंचित वे अपरिचित हैं। ‘होमोसेक्सुअलिटी एंड द पालिटिक्स आफ ट्रुथ’ के लेखक डा. जे. सतीनोवर बताते हैं कि समलैंगिक अपने जीवन में 25 से 30 वर्ष गानरिया (यौन संसर्ग से उत्पन्न रोग), सिफलिस, एड्स, आंत्र संक्रमण तथा अन्य यौन संचारित रोगों से ग्रस्त रहते हैं। ‘इंटरनेशनल जर्नल आफ एपिडेमियोलाजी’ में प्रकाशित शोध बताता है कि अन्य पुरुषों की तुलना में समलैंगिक और उभयलिंगी पुरुषों की जीवन प्रत्याशा कम रहने की आशंका रहती है। यूएस सेंटर फार डिजीज कंट्रोल एंड प्रिवेंशन के 2010 के अनुसार समलैंगिक पुरुषों में अन्य की तुलना में नवीन एचआइवी के लक्षण की दर 44 प्रतिशत अधिक थी। वहीं महिलाओं के साथ यौन संबंध रखने वाली महिलाओं में बैक्टीरियल जिनोसिस, हेपेटाइटिस सी और एचआइवी जोखिम व्यवहार की उच्च दर पाई गई है। जिन महिलाओं के बच्चे नहीं हुए हैं या जिन्होंने स्तनपान नहीं कराया, उनमें इसके आसार और अधिक हो जाते हैं। वहीं, शारीरिक ही नहीं, समस्याएं मनोरोगों की भी हैं। ‘नीदरलैंड्स मेंटल हेल्थ सर्वे एंड इंसिडेंस स्टडी’ में कहा गया है कि समान लिंग यौन व्यवहार करने वाले लोगों को मनोरोग विकारों के लिए अधिक जोखिम होता है।
इसलिए यह जरूरी है कि समलैंगिक जीवन की विशिष्टताओं के कारण उनके शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के खतरों से उन्हें बचाया और चेताया जाए, न कि समलैंगिक विवाह जैसे मुद्दों पर बहस को प्राथमिकता देकर नई सामाजिक एवं सांस्कृतिक चुनौतियों को आमंत्रित किया जाए।
Date:31-03-23
हरियाली की दीवारसंपादकीय
कई वर्षों तक चली चर्चाओं के पश्चात आखिरकार सरकार ने गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली तक विस्तारित अरावली पर्वत श्रृंखलाओं में पांच किलोमीटर चौड़ी हरियाली की पट्टी बनाने की भव्य परियोजना शुरू कर दी है। ऐसा भूमि के मरुस्थलीकरण और अपघटन से निपटने के लिए किया जा रहा है। अरावली को दुनिया की सबसे पुरानी पर्वत श्रृंखलाओं में गिना जाता है और उसे कई मायनों में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र यानी एनसीआर की जीवन रेखा तथा थार मरुस्थल एवं पश्चिमोत्तर के उर्वर मैदानों के बीच का प्राकृतिक बफर क्षेत्र भी माना जाता है।
इसे उचित ही अरावली ग्रीन वॉल का नाम दिया गया है तथा यह वनाच्छादित क्षेत्र न केवल भूमि अपघटन की समस्या से निपटने, जैव विविधता का संरक्षण करने तथा जलवायु परिवर्तन को कम करने संबंधी देश की कई अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं से निपटने के काम आएगा बल्कि इसके पारिस्थितिकी से जुड़े कई लाभ भी होंगे। बहरहाल इस परियोजना से वांछित लाभ प्राप्त होने की संभावना काफी हद तक इस बात पर निर्भर है कि सरकार अवैध खनन, अचल संपत्ति माफिया के अतिक्रमण तथा पहाड़ी इलाकों में होने वाले अन्य अवैध खनन को कितने प्रभावी ढंग से रोक पाती है। दिलचस्प बात यह है कि इस परियोजना की शुरुआत वन एवं पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने गुरुग्राम के निकट टिकली नामक गांव में एक पौधा लगाकर की। यह हरियाणा का वह इलाका है जो भू-कानूनों के उल्लंघन के लिए जाना जाता है।
अरावली ग्रीन बेल्ट बनाने का विचार संभवत: अफ्रीका की ग्रेट ग्रीन वॉल से आया है जिसे अफ्रीका के 11 देश मिलकर तैयार कर रहे हैं ताकि सहेल इलाके का मरुस्थलीकरण कम किया जा सके और सहारा रेगिस्तान का विस्तार रोका जा सके। इसके अलावा उनका लक्ष्य जल संरक्षण को बढ़ावा देने और समूचे उत्तरी अफ्रीका में जमीन के उपयोग में सुधार करने का भी है। इसी प्रकार अरावली परियोजना भी वर्षा जल संरक्षण और भूजल स्तर में सुधार के लिए काम करेगी। खासतौर पर एनसीआर में ऐसा किया जाएगा जहां जल स्तर अत्यधिक नीचे जा चुका है। इसकी वजह से कुछ इलाकों में जमीन धसकने की घटनाएं भी घट रही हैं। इसके अलावा यह इलाका थार मरुस्थल से धूल उठने की घटनाओं पर भी लगाम लगाएगा जिसके चलते दिल्ली में वायु प्रदूषण फैलता है। यह हरित पट्टी शायद पूरी तरह निरंतरता में न बने लेकिन यह कुछ ऐसे इलाकों को शामिल करेगी जहां हरियाली की बहुत अधिक आवश्यकता है तथा जिन्हें खनन आदि से भी बचाने की आवश्यकता है।
गुजरात, राजस्थान और दिल्ली में इस परियोजना के दायरे में आने वाली 63 लाख हेक्टेयर जमीन में से 23 लाख हेक्टेयर जमीन अभी खराब जमीन की श्रेणी में आती हैं। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ने सैटेलाइट के जरिये मरुस्थलीकरण और जमीन के खराब स्तर को लेकर जो मानचित्र तैयार किया है उसके मुताबिक इन राज्यों का 50 फीसदी से अधिक हिस्सा अलग-अलग स्तरों पर जमीन की गुणवत्ता में गिरावट का शिकार है। इन इलाकों में हरियाली बढ़ाने से 2.5 अरब टन का अतिरिक्त कार्बन सिंक तैयार करने में मदद मिलेगी। साथ ही 2030 तक 2.6 करोड़ हेक्टेयर इलाके का वनीकरण करने और जमीन की गुणवत्ता सुधारने में भी मदद मिलेगी।
महत्त्वपूर्ण बात यह है कि अरावली ग्रीन वॉल योजना के कृषि-वानिकी और चारागाह विकास जैसे भाग में स्थानीय वृक्ष, झाड़ियां और घास लगाने की बात शामिल है ताकि वे बचे रह सकें और स्थानीय समुदायों को आजीविका में बेहतर सहारा मिल सके। परियोजना में सतह पर मौजूद जल संरचनाओं और नदियों के जल भराव क्षेत्र को नए सिरे से बेहतर बनाने की बात शामिल है। इन नदियों में बनास, साहिबी और लूनी शामिल हैं जो अरावली के पहाड़ों से ही निकलती हैं और कच्छ के रन के पारिस्थितिकी और सामरिक दृष्टि से अहम इलाके में बहती हैं जो पाकिस्तान की सीमा से लगा हुआ है। बहरहाल, सरकार को राज्य सरकारों, शोध संस्थाओं, सामाजिक नागरिक संस्थानों का सहयोग और सक्रियता प्राप्त करने के लिए विशेष प्रयास करने होंगे। सबसे अहम बात यह है कि उसे स्थानीय समुदायों की मदद लेनी होगी ताकि पौधरोपण की देखभाल की जा सके और इस महत्त्वाकांक्षी परियोजना से सतत लाभ हासिल हो सके।
Date:31-03-23
खतरनाक घालमेलसंपादकीय
सुप्रीम कोर्ट का यह कहना सबकी आंखें खोल देने वाला है कि जब राजनीति और धर्म अलग हो जाएंगे और नेता धर्म के जरिए राजनीति में ऊंचे मुकाम हासिल करने का ख्वाब छोड़ देंगे तभी हेट स्पीच को खत्म किया जा सकता है। हेट स्पीच को दुष्चक्र बताते हुए कोर्ट ने कहा कि इससे फायदा उठाने के प्रयास में छोटी मानसिकता के लोग ऐसे-ऐसे भाषण देते हैं जिनसे हालात में तनाव के सिवा कुछ हासिल नहीं होता। कोर्ट की टिप्पणियां नफरती भाषण देने वालों के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज करने में विफल रहने को लेकर राज्यों के खिलाफ अवमानना याचिका पर सुनवाई के दौरान सामने आईं। कोर्ट ने कहा लोगों को खुद को संयमित रखना चाहिए। वे दूसरे समुदायों को अपमानित न करने का संकल्प क्यों नहीं ले सकते। एक याचिकाकर्ता के वकील ने जस्टिस केएम जोसेफ की अध्यक्षता वाली बेंच के सामने महाराष्ट्र में कई रैलियों में दिए गए नफरती भाषणों के संबंध में एक समाचार रिपोर्ट का हवाला दिया था। इस पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने समाचार रिपोर्टों के आधार पर याचिका दायर करने पर आपत्ति की । इस पर बेंच ने कहा कि हम समझते हैं कि क्या हो रहा है। तब सॉलिसिटर जनरल ने कहा, कि याचिकाकर्ता को सभी धर्मों में नफरत फैलाने वाले भाषणों को इकट्ठा करने और समान कार्रवाई के लिए अदालत के समक्ष रखने का निर्देश दिया जाए। सालिसीटर जनरल जैसे ऊंचे स्तर से याचिकाकर्ता जैसे व्यक्ति से ऐसी अपेक्षा न्यायसंगत नहीं लगती। यह काम तो पूरी तरह सरकारों का है कि ऐसी घटनाओं पर नजर रखें और आवश्यक कार्रवाई करें। इसी कर्त्तव्य का निर्वहन करते हुए बेंच ने पूछा कि प्राथमिकी दर्ज करने के बाद क्या कार्रवाई की गई। कहा कि शिकायत दर्ज करने से अभद्र भाषा की समस्या का समाधान नहीं होने वाला। तब सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि नफरत भरे भाषणों के संबंध में 18 प्राथमिकी दर्ज की गई हैं। पिछले साल अक्टूबर में सुप्रीम कोर्ट ने जोर देकर कहा था कि संविधान भारत को धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र के रूप में देखता है, और दिल्ली, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड सरकारों को अभद्र भाषा के मामलों पर सख्त कार्रवाई करने और शिकायत की प्रतीक्षा किए बिना दोषियों के खिलाफ मामले दर्ज करने का निर्देश दिया था । सरकारों को ऐसे मामलों में तुरंत और कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए।
Date:31-03-23
कड़ाई पर चिंतासंपादकीय
देश के सर्वोच्च न्यायालय की ओर से एक सलाह या राय आई है कि विधायकों और सांसदों को सजा सुनाने के मामले में निचली अदालतों को सावधान रहना चाहिए। दरअसल, सांसद और विधायक को दो साल या उससे अधिक की सजा होते ही सदस्यता से हाथ धोना पड़ता है। सर्वोच्च न्यायालय की यह राय लक्षद्वीप के सांसद मोहम्मद फैजल के मामले में सामने आई है। फैजल को कोर्ट से राहत मिली है और सदस्यता भी बहाल हुई है, पर क्या राहुल गांधी की भी बहाल होगी? आज यही सवाल ज्यादा चर्चा में है। न्यायमूर्ति जोसेफ और न्यायमूर्ति नागरत्ना की पीठ ने लक्षद्वीप के सांसद मोहम्मद फैजल व केंद्र शासित प्रदेश लक्षद्वीप की ओर से दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए यह बात कही है। हालांकि, ध्यान देने की बात है कि मोहम्मद फैजल को हत्या की कोशिश के मामले में 10 साल कैद की सजा सुनाई गई थी और उसके बाद ही उनकी सदस्यता गई थी, जबकि राहुल गांधी को तो मानहानि के मामले में दो साल की सजा सुनाए जाने के बाद ही सदस्यता से हाथ धोना पड़ा है और उन्हें अब सरकारी बंगले से भी निकलना पड़ रहा है।
ध्यान रहे, अतिरिक्त सॉलिसिटर जनरल के एम नटराज ने अदालत को बताया कि जन-प्रतिनिधित्व कानून की धारा 8(3) के मुताबिक, यदि किसी सांसद अथवा विधायक को दो या उससे ज्यादा साल की सजा होती है, तो उसकी सदस्यता स्वत: तत्काल चली जाती है। इसमें कोई शक नहीं कि फैजल अहमद या राहुल गांधी के साथ जो हुआ है, वह कानून के तहत ही हुआ है। यह भी ध्यान देने की बात है कि पहले जब आपराधिक किस्म के सांसदों पर कार्रवाई नहीं होती थी, तब अदालत की नाराजगी सामने आती थी, पर अब अदालत की कृपा से ही जब कड़ा कानून है और उसे लागू किया जा रहा है, तब नरमी की जरूरत बताई जा रही है। यह एक तरह से विडंबना है। कड़े कानून होने के फायदे भी हैं और नुकसान भी। यह भी सही है कि अगर कड़े कानून न हों, तो अपराधियों में भय नहीं होगा और किसी भी रसूखदार को सजा देने में परेशानी आएगी। लेकिन अब जो सर्वोच्च न्यायालय की सलाह है, उसे किस तरह से लागू किया जाएगा, यह एक बड़ा प्रश्न है। कहीं ऐसा न हो कि उदारता बरतने की नसीहत फिर दागियों का पोषण करने लग जाए!
निचली अदालतों में कानून सम्मत अधिकतम सजा देने की परंपरा है और यह कतई गलत नहीं है। अनेक मामलों में निचली अदालतों ने नरमी बरती है और ऊपरी अदालतों में उनकी खूब आलोचना भी हुई है। अत: अदालतें इस बात पर पूरी तरह सहमत हैं कि रसूखदार और आम आदमी पर कार्रवाई के मामले में भेदभाव नहीं बरता जाना चाहिए। न्याय किसी गरीब या शोषित के लिए उदार हो सकता है, लेकिन किसी रसूखदार या अपराधी के लिए उसे कतई उदार नहीं होना चाहिए। कहीं न कहीं हमारा कानून उदार है, तभी तो दागी पृष्ठभूमि के सैकड़ों नेता विधानसभाओं और संसद में बैठे हैं। दागियों की संख्या किसी को भी विचलित कर देती है। अपराधियों के साथ सही ढंग से न्याय हो, तो उनमें से कोई भी चुनाव लड़ने तक की योग्यता नहीं जुटा सकेगा। वस्तुत: एक न्यायाधीश की सलाह को उनकी निजी सलाह के रूप में ही लेना ज्यादा बेहतर है, क्योंकि अभी इस मामले में सुनवाई जारी है। क्या अंतिम फैसले में भी सांसदों-विधायकों को सजा देते हुए सावधानी बतरने की बात होगी, इसका इंतजार करना चाहिए।
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सरकार ने 2023 में 5% की वार्षिक आर्थिक विकास दर का लक्ष्य रखा है। पिछले 25 सालों में यह सबसे कम है। यह अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के 5.2% के पूर्वानुमान से भी कम है। इसे बढ़ाया जाना चाहिए।
चीन की तुलना में भारत की विकास दर-
चीन में विकास का चरम दौर समाप्त हो चुका है। इसकी विकास दर लगातार गिरती जा रही है। 2028 तक इसके 3% से थोड़ा और नीचे जाने का अनुमान है। इसके बावजूद 2022 में 19.2 खरब डॉलर के जीडीपी के साथ चीन मजबूती से खड़ा हुआ है। चीन की आर्थिक चुनौतियों का एक बड़ा कारण उसकी गिरती जनसंख्या दर है। 60 वर्षों में यह सबसे अधिक गिरी है। यहाँ के लोग अमीर हुए बिना ही वृद्ध हो चले हैं। फिर, चीन ऐसा देश नही है, जहाँ अमेरिका की तरह कुशल अप्रवासी रहना चाहें।
संयुक्त राष्ट्र के अनुसार भारत की लगभग 12 करोड़ जनसंख्या 15-19 आयु वर्ग की है। जबकि चीन में यह 30-34 आयुवर्ग की है। भारत की जीडीपी, चीन की जीडीपी का पांचवां हिस्सा है। आर्थिक सर्वेक्षण से पता चलता है कि मध्यम अवधि में भारत की विकास दर 7-8% तक पहुँच सकती है।
भारत की आर्थिक नीतियों की दिशा जनसांख्यिकीय लाभांश के पूरे उपयोग की ओर होनी चाहिए। हमारी युवा जनसंख्या को रोजगार के क्षेत्र में पर्याप्त अवसर तभी मिल सकेंगे, जब मध्यम अवधि में विकास दर का लक्ष्य 7-8% रखा जाएगा।
सकल घरेलू उत्पाद के स्तर के संदर्भ में मात्रात्मक (क्वान्टिटेटिव) लक्ष्य निर्धारित करने के बजाय, विकास दर बढ़ाने पर फोकस होना चाहिए। चीन और भारत की अर्थव्यवस्था के बीच के गैप को भरने का एकमात्र उपाय यही है।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 10 मार्च, 2023
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Date:30-03-23
Neighbours, Big & SmallBhutan to Bangladesh, New Delhi must prepare to compete with China in the development space.TOI Editorials
In a statement bound to raise a few eyebrows in New Delhi, Bhutan’s PM Lotay Tshering said that China has an equal say in resolving the Doklam dispute. This is different from Bhutan’s 2019 position that the existing tri-junction point between India, China and Bhutan at Doklam should not be unilaterally disturbed. That Bhutan is signalling a more accommodating stance today is perhaps because of current geopolitical realities.
While India and China are locked in their own border disputes along the LAC, other countries in the neighbourhood fear getting caught in the tussle. So, it’s not surprising they will sometimes sway between the two Asian giants. But this presents a strategic challenge for India. Given China’s deeper pockets, Beijing is in a better position to use dollar diplomacy to its advantage in these countries. This is precisely what a recent report by a consortium, including the World Bank highlights. China has handed out $240 billion worth of bailout loans to 22 developing countries over two decades. Around 80% of those funds were doled out between 2016 and 2021 when Beijing’s BRI projects picked up steam.
However, forcing Nepal, Bangladesh, and Sri Lanka to let go of Chinese funds will have the opposite impact and build up resentment against India. This risk is particularly real in Nepal where the 2015 blockade seriously hurt Indian interests. Meanwhile, relations with Bangladesh too could go south if the Sheikh Hasina governmentis unable to balance ties with India with Bangladesh’s development imperatives. Against this backdrop, New Delhi needs to switch to a smarter approach, drop the Big Brother attitude and play up its own attractiveness by timely completion of development projects. Competing with China for the development space won’t be easy. But it’s necessary to sharpen our ‘Neighbourhood First’ policy.
Date:30-03-23
Human life, above allOpposition of doctors to the right to health comes from baseless misgivings.Editorial
It is confounding how something that is stridently ‘good’ in ethical and legal terms can run into a wall of opposition built on narrow professional and commercial interests. As in the case of the Right to Health Act that was passed in Rajasthan last week, and the unprecedented kerfuffle that followed, with doctors in the State vehemently protesting what they called a ‘draconian law’. The Right to Health is in sync with the constitutional guarantee of right to life, and other components of the Directive Principles. That no person seeking health care should be denied it, on the grounds of access and affordability, is an acceptable proviso. The Rajasthan Right to Health Act, 2022, addresses these key issues of access and affordability. It “seeks to provide protection and fulfilment of rights, equity in relation to health and well-being for achieving the goal of health care for all through guaranteed access to quality health care for all residents of the State, without any catastrophic out-of-pocket expenditure”. The law, which also provides for a social audit and grievance redress, gives every resident of the State the right to emergency treatment without paying a single paisa to any health-care institution, and specifies that private health-care institutions would be compensated for the charges incurred for such treatment.
The doctors who came out in large numbers to protest the law on the streets of Jaipur said they were distrustful of the government’s promise of recompense for expenses incurred for treating patients during an emergency. To the charge that there is no detailing of the process, health right activists have pointed out that it would be a function of the Rules, not the law itself. The protesting doctors also claimed to be apprehensive of the government’s interference in their functioning once the law is enforced. Ironically, all of them believe that health care is a right of the people; only, they believe that the State would have to be the sole provider. However, this is scarcely the first such exposition of the right to health. In 1989, the Supreme Court observed that “every injured citizen brought for medical treatment should instantaneously be given medical aid to preserve life and thereafter the procedural criminal law should be allowed to operate in order to avoid negligent death”. Having transformed a progressive ideal into law, Rajasthan should now strive to gain the trust of the doctors through demonstrable action. It is also incumbent upon the doctors to rise above the differences, and work with the government to save human lives.
Date:30-03-23
युवाओं में खेल के प्रति रुझान कैसे पैदा होगा ?संपादकीय
विश्व महिला बॉक्सिंग चैंपियनशिप में 22 वर्षीय नीतू घंघास ने मंगोलियाई बॉक्सर को 5-0 से हराकर चैंपियनशिप जीती। यहां तक पहुंचाने में उनके पिता ने नौकरी दांव पर लगाई, ट्रेनिंग के लिए कर्ज लिया। लेकिन नीतू के पिता को क्यों आर्थिक कष्ट झेलना पड़ा ? क्या यह स्थानीय प्रशासन, राज्य और केंद्र सरकारों का दायित्व नहीं था कि वे उसकी प्रतिभा को न केवल पहचानें, बल्कि उसे उभारें और सुनिश्चित करें कि अभिभावकों को इसके लिए अपनी जमीन-जायदाद न बेचनी पड़े। क्या ऐसी खेल नीति नहीं बनानी चाहिए कि बच्चों की कद-काठी परखी जाए। उनका रुझान देखा जाए और अभिभावकों को चिंता मुक्त करते हुए इन बच्चों को सरकारें खेल और यथेष्ट शिक्षा के लिए शुरू से ही तैयार करें। समस्या का एक और पहलू भी है। देश के बहुतेरे राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी अकसर मुश्किलों में जीवन-यापन करते दिखाई देते हैं। ऐसे में कौन-से अभिभावक चाहेंगे कि उनका बच्चा खेलों की ओर रुख करे और भविष्य अनिश्चित करे। लिहाजा सरकारें यह भी सुनिश्चित करें कि ऐसे बच्चों को उनकी सफलता के स्तर के अनुरूप आजीवन भरण-पोषण की गारंटी दी जाए। डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट के अनुसार भारत में 11- 17 साल के 74% बच्चे 30 मिनट भी रोजाना मैदान में नहीं खेलते और 16-39 साल के 59% युवा रोज तीन घंटे ऑनलाइन गेमिंग में व्यस्त रहते हैं।
Date:30-03-23
लोकतंत्र के आधारस्तम्भों पर उठ रहे हैं कई सवालराहुल से माफी की आड़ में संसद की कार्यवाही में व्यवधान की गलत परम्परा शुरू हो रही हैविराग गुप्ता, ( लेखक और वकील )
राहुल गांधी के मामले पर तीन बातें हो रही हैं।
1. कांग्रेस का यह कहना कि अदाणी मामले में भ्रष्टाचार के आरोपों पर जांच और जवाब के बजाय राहुल की जुबान को बंद करने की कोशिश की जा रही है।
2. भाजपा का दावा कि राहुल के खिलाफ वह नहीं बल्कि अदालतें और कानून काम कर रहे हैं।
3. यह सियासी आकलन कि अगले आम चुनाव के समर को जीतने के लिए राहुल को उभारना भाजपा की व्यापक रणनीति का हिस्सा है। इन आरोप-प्रत्यारोपों से एक बात साफ है कि भारत में सभी दलों के नेताओं की राजनीति के केंद्र में आम जनता के बजाय सत्ता हासिल करना प्रमुख हो गया है। हालिया घटनाओं के बरक्स लोकतंत्र के पांच खम्भों के दायरे में कानून के शासन के यथार्थ को समझने की जरूरत है।
1. संसद : राहुल गांधी की सदस्यता तुरंत रद्द हो गई। लेकिन लक्षद्वीप के सांसद मो. फैजल के मामले में अदालत के आदेश पर दो महीनों तक अमल नहीं हुआ। संविधान के अनुच्छेद-141 के तहत सुप्रीम कोर्ट का फैसला देश की सभी अदालतों में मान्य होता है। लेकिन उन फैसलों को पूरी मान्यता देने के लिए संसद से कानून में बदलाव जरूरी है। अभी हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार आईटी एक्ट की धारा-66-ए को हटाने के लिए संसद में बिल पेश किया गया था। तो उसी तर्ज पर सुप्रीम कोर्ट के 2013 के फैसले को लागू करने के लिए संसद से जनप्रतिनिधित्व कानून में बदलाव क्यों नहीं होना चाहिए?
2. सरकार : हिंडेनबर्ग रिपोर्ट में लगे संगीन आरोपों को जांच के बगैर खारिज नहीं किया जा सकता। तो फिर जेपीसी के गठन पर सत्ता पक्ष को ऐतराज क्यों है? संसद की कार्यवाही में विपक्ष के हंगामे और गतिरोध को अनाधिकारिक मान्यता मिल चुकी है। लेकिन राहुल से माफी की आड़ में सत्ता पक्ष द्वारा संसद की कार्यवाही में व्यवधान डालने से गलत परम्परा शुरू हो रही है। इस वजह से बगैर चर्चा के लोकसभा में 45 लाख करोड़ के बजट का पारित होना संसदीय व्यवस्था का दुर्भाग्य है।
3. विपक्ष : सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में मांग की गई है कि विरोधी नेताओं के खिलाफ जांच एजेंसियों के दुरुपयोग को रोकने के लिए गाइडलाइंस बनें। संविधान के अनुसार पुलिस का विषय राज्य सरकारों के अधीन आता है। लेकिन विपक्षी दलों वाले राज्यों में सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार पुलिस सुधार की शुरुआत नहीं हो रही है। मध्यप्रदेश और गुजरात में भाजपा की राज्य सरकारों ने बीबीसी की डॉक्यूमेंट्री वाले मामले में विधानसभा में असंवैधानिक तरीके से प्रस्ताव पारित किए। उसी तर्ज पर दिल्ली में आम आदमी पार्टी के मुख्यमंत्री केजरीवाल ने अदाणी मामले पर विधानसभा में लम्बी चर्चा कर डाली, जो कि संविधान सम्मत नहीं है।
4. न्यायपालिका : अदाणी मामले पर भी सुप्रीम कोर्ट द्वारा गठित जांच कमेटी के औचित्य पर सवाल उठ रहे हैं। गुजरात हाईकोर्ट से स्टे हटने के बाद भाजपा विधायक के मुकदमे पर सीजेएम अदालत ने आनन-फानन में राहुल को अधिकतम सजा सुना दी। सूरत की अदालत की कुशलता और तेजी को सभी अदालतें अपना लें तो मुकदमों के बढ़ते बोझ के कैंसर से पूरे देश को मुक्ति मिल सकती है। राजनीतिक मामलों से जुड़े कई फैसलों की टाइमिंग और टोन से न्यायपालिका की साख को बड़ा खतरा हो रहा है।
5. मीडिया : बेमौसम बारिश और ओलों से ग्रामीण अर्थव्यवस्था और किसानों की कमर टूटने की खबरों पर अंग्रेजी अखबारों में सन्नाटा है। पाकिस्तान से जुड़े पंजाब में आतंकवाद की नई फसल को बोकर राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए बड़ा संकट खड़ा करने वाले अमृतपाल के गायब होने पर मीडिया में गहन जांच रिपोर्ट नहीं आईं। उसके बजाय टीवी चैनलों में सारस कथा और माफिया अतीक पर चर्चा चलती रही। यह मीडिया में बढ़ रही गिरावट को दर्शा रहा है।
कानून का शासन भी एक पक्ष : आपातकाल के अनुभवों से सबक लेते हुए जिसकी लाठी उसकी भैंस के प्रचलन को जड़ से खत्म करने की जरूरत है। लेकिन महाराष्ट्र मामले से साफ है कि स्पीकर, राज्यपाल और चुनाव आयोग जैसे संस्थान संविधान के बजाय सरकार की मंशा से संचालित हो सकते हैं। राज्य और केंद्र की सरकारें संवैधानिक संस्थाओं को मजबूत करते हुए कानून का शासन लागू करें तो ही वंचित वर्ग को सही अर्थों में सामाजिक-आर्थिक न्याय का वाजिब हक मिल सकेगा।
Date:30-03-23
नगर निकायों की नाकामीसंपादकीय
इस पर आश्चर्य नहीं कि नगर निकाय शहरों के ढांचे में सुधार करने में असफल सिद्ध हो रहे हैं। उनकी यह असफलता इसलिए चिंताजनक है कि जैसे-जैसे शहरी आबादी की बेहतर जीवनशैली को लेकर उम्मीदें बढ़ रही हैं वैसे-वैसे नगर निकाय उन्हें पूरा करने में नाकाम हो रहे हैं। इसके चलते शहरी जीवन अनेक समस्याओं से घिरता चला जा रहा है। शहरों में बेहतर जीवन स्तर की जो कल्पनाएं की जाती हैं वे पूरी नहीं हो रही हैं। हमारे शहर विस्तार तो ले रहे हैं, लेकिन उनमें सुविधाओं का स्तर सिमट रहा है। शहरी ढांचे में सुधार करने और आवश्यक मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने की बातें तो बहुत होती हैं, लेकिन उनके अनुरूप काम नहीं हो रहा है। चूंकि शहरी ढांचे को सुधारने की गति धीमी है और शहरों में आबादी तेजी से बढ़ती चली जा रही है इसलिए शहरी जीवन और अधिक कष्टकारी होता जा रहा है। हमारे शहर केवल अव्यवस्थित विकास, गंदगी और ट्रैफिक जाम आदि से ही नहीं जूझ रहे हैं, बल्कि वे प्रदूषण से भी ग्रस्त हैं। जब भी विश्व के प्रदूषित शहरों की गणना होती है तो उनमें भारत के शहर प्रमुखता से नजर आते हैं। हमारे नीति-नियंता अनियोजित विकास से होने वाली समस्याओं की गंभीरता को समझने के लिए तैयार नहीं। यह स्थिति तब है जब वे दुनिया के दूसरे शहरों से शहरी ढांचे को सुधारने की सीख भी लेते रहते हैं। शहरों की दुर्दशा का कारण केवल अनियोजित विकास ही नहीं है। इसके साथ-साथ दूरदर्शी और टिकाऊ योजनाओं का अभाव भी है। शहरी ढांचे को सुदृढ़ करने के मामले में ऐसी योजनाएं मुश्किल से ही बनती हैं जो अगले पचास-सौ वर्षों को ध्यान में रखकर बनाई जाती हों। यही कारण है कि नई सड़कें और फ्लाईओवर कुछ ही वर्षों में अपर्याप्त सिद्ध होने लगते हैं।
हमारे शहरों की समस्याएं इसलिए भी नहीं दूर हो पा रही हैं, क्योंकि ऐसे नगर-नियोजकों का अभाव है जो शहरी ढांचे को सुदृढ़ करने के विशेषज्ञ हों। देश के छोटे-बड़े शहरों की एक बड़ी समस्या उनकी देखरेख करने वाले नगर निकायों की शिथिलता है। वे अकुशलता, लालफीताशाही और भ्रष्टाचार के साथ-साथ सस्ती राजनीति का अड्डा बन गए हैं। यह जो आशा की जा रही थी कि नगर निकायों के निर्वाचित प्रतिनिधियों से लैस हो जाने से उनकी कार्यप्रणाली सुधर जाएगी वह पूरी नहीं हो सकी है। उचित यह होगा कि इस संदर्भ में हमारे नीति-नियंता गंभीरता से विचार करें कि कमी कहां है। शहरों के आधारभूत ढांचे को सुदृढ़ करने के लिए जितने धन की आवश्यकता होती है उतना नगर निकाय कठिनाई से ही जुटा पाते हैं। ऐसे नगर निकायों की गिनती करना कठिन है जो आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हों। स्थिति यह है कि कई नगर निकाय तो अपने कर्मचारियों को वेतन देने लायक संसाधन भी नहीं जुटा पाते। समय आ गया है कि इन सब कारणों पर नए सिरे से नीर-क्षीर ढंग से विचार किया जाए।
Date:30-03-23
नफरत की सियासतसंपादकीय
राजनेताओं के नफरती और भड़काऊ भाषणों को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने एक बार फिर कड़ी टिप्पणी की है। एक मामले पर दो दिनों तक चली सुनवाई में अदालत ने केंद्र सरकार से पूछा कि ऐसे नफरती भाषणों के खिलाफ अब तक क्या कार्रवाई हुई है। हालांकि सर्वोच्च न्यायालय पहले भी अलग-अलग मामलों की सुनवाई करते हुए राजनेताओं और धार्मिक संगठनों से जुड़े लोगों को सार्वजनिक मंचों से बोलते वक्त संयम बरतने की नसीहत दे चुका है, मगर इस प्रवृत्ति में कोई सुधार नजर नहीं आता। स्वाभाविक ही ताजा मामले में उसने इस पर तल्ख टिप्पणी की। दो न्यायाधीशों की पीठ ने कहा कि जब तक राजनीति में धर्म का समावेश होता रहेगा, ऐसे नफरती भाषणों पर अंकुश लगाना संभव नहीं होगा। भारत के लोग दूसरे समुदायों के लोगों का अपमान न करने का संकल्प क्यों नहीं लेते। अदालत ने जवाहरलाल नेहरू और अटल बिहारी वाजपेयी का उल्लेख करते हुए कहा कि उनके भाषणों को लोग दूर-दूर से सुनने आते थे। वैसी नजीर अब कोई नेता क्यों पेश नहीं करना चाहता। अदालत ने इस बात पर भी आपत्ति जताई कि लोग समुदाय विशेष को लेकर ही नफरती भाषणों के खिलाफ चुनिंदा तरीके से मुकदमे क्यों दर्ज कराते हैं। उनमें सभी समुदायों और पंथों के खिलाफ दिए गए नफरती भाषणों पर सख्ती क्यों नहीं दिखाई जाती।
सर्वोच्च न्यायालय लंबे समय से ऐसे भाषणों, बयानों और तकरीरों के खिलाफ सख्त रहा है। करीब दो महीना पहले में आयोजित सकल हिंदू समाज की रैली को लेकर निर्देश दिया था कि राज्य सरकार सुनिश्चित करे कि वहां कोई नफरती भाषण न होने पाए। उस रैली की वीडियो रिकार्डिंग का भी आदेश दिया था। जब जगह-जगह धर्म संसद करके समुदाय विशेष के खिलाफ नफरती और भड़काऊ भाषण दिए गए थे, तब भी अदालत ने सरकार को सख्त लहजे में इस पर काबू पाने को कहा था। मगर राजनीतिक दलों के प्रवक्ताओं और नेताओं को शायद ऐसे अदालती आदेशों-निर्देशों की कोई परवाह नहीं है। खुद सर्वोच्च न्यायालय ने इस बात का उल्लेख किया है कि टीवी चैनलों पर आए दिन राजनीतिक दलों के प्रवक्ता सांप्रदायिक सौहार्द बिगाड़ने वाले वक्तव्य देते रहते हैं। राजनेताओं से किसी भी ऐसे आचरण की अपेक्षा नहीं की जाती, जिससे सामाजिक ताने-बाने पर बुरा प्रभाव पड़ता हो। मगर इस दौर की राजनीति का स्वरूप कुछ ऐसा बनता गया है कि दूसरे धर्मों, संप्रदायों, समुदायों के खिलाफ नफरती भाषण देकर अपना जनाधार बढ़ाने का प्रयास किया जाने लगा है। जाहिर है, उसमें भाषा की मर्यादा का भी ध्यान नहीं रखा जाता।
सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी से स्पष्ट है कि इस प्रवृत्ति पर रोक लगाने के लिए सरकारों को संजीदगी दिखाने की जरूरत है। नफरती भाषणों के खिलाफ सख्त कानून हैं, मगर चिंता की बात है कि पुलिस और प्रशासन ऐसे मामलों पर चुनिंदा ढंग से कार्रवाई करते देखे जाते हैं। इसे लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने पूछा तो केंद्र सरकार की तरफ से पेश हुए वकील ने कहा कि ऐसे अठारह मामलों में प्राथमिकी दर्ज कराई जा चुकी है। मगर उन पर कार्रवाई क्या हुई, इसका जवाब उनके पास नहीं था। छिपी बात नहीं है कि किस-किस राजनीतिक दल के कौन-कौन से नेता और प्रवक्ता किन-किन मौकों पर क्या-क्या नफरती बोल बोल चुके हैं। मगर विडंबना है कि उन्हें रोकने की जरूरत नहीं समझी गई और वे ऐसे विद्वेष भरे भाषण देते रहते हैं। सर्वोच्च न्यायालय की ताजा टिप्पणी को राजनीतिक दल कितनी गंभीरता से लेंगे, कहना मुश्किल है।
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Date:29-03-23
Judging All SystemsIsrael’s judiciary vs executive tussle echoes across many democracies. Separation of power is vitalTOI Editorials
Israel’s PM Netanyahu on Monday said his government will pause its effort to pass laws that would have allowed the legislature to override the Supreme Court with a simple majority. Israel, a parliamentary democracy without a written constitution, is fractured between supporters and opponents of the Netanyahu government’s attempt to make the judiciary subservient to the legislature and political executive. These developments will echo in many other democracies. If there’s a perennial challenge common to them, it’s the system of checks and balances. Or the doctrine of separation of powers between the legislature, executive and judiciary.
Constitutions by their nature confine themselves largely to principles. It’s for the legislature to use this framework to design laws that reflect popular will. However, a democracy’s system of checks and balances to prevent abuse of power means that laws can be scrutinised by the judiciary to see if they are consistent with the constitution. This judicial review is the source of friction and is often portrayed as a battle between popular will and an unelected elite. India’s very first constitutional amendment in 1951 introduced the ninth schedule to shield some laws from judicial review. Across democracies, time and again, the power of judicial review is the locus of dispute between legislature and judiciary.
Separation of powers is intrinsic to a democracy. In its absence, power is concentrated, undermining the very idea of a democracy. India’s basic structure doctrine evolved through the working of the Constitution over two decades as successive governments, backed by a legislative majority, tested the boundaries of the system of checks and balances. The basic structure doctrine provides the guardrails to safeguard democracy. However, to posit frustration with this doctrine as a clash between popular will and obstructionism of the unelected is incorrect. Legislatures rarely display unanimity on this issue.
The one recent occasion when they did in India was in clearing a constitutional amendment, NJAC, to break down the judiciary’s unjustifiable monopoly over its appointments and transfers. However, NJAC, as Bibek Debroy has argued on this page, was poorly drafted. Critical aspects were loosely worded. GoI should take the initiative to build a consensus and come up with a tighter constitutional amendment. However, the friction between the judiciary and legislature is unlikely to end anywhere. It’s not a bug in a democratic system. Rather, it’s a sign that power is not concentrated.
Date:29-03-23
दागदार राजनीतिसंपादकीय
यह स्वागतयोग्य है कि सुप्रीम कोर्ट उस याचिका की सुनवाई करने को तैयार है, जिसमें यह मांग की गई है कि दोषियों को राजनीतिक पार्टी बनाने और किसी दल का पदाधिकारी बनने पर रोक लगाई जाए। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका को शीघ्र सुनने की आवश्यकता नहीं समझी, लेकिन यह आशा की जाती है कि वह उस पर गंभीरता से विचार करने के साथ ही ऐसा कुछ करेगा, जिससे किसी आपराधिक मामले में सजा पाए नेता किसी दल में पद न धारण कर सकें और न ही अपना राजनीतिक दल बनाने पाएं। ऐसी कोई व्यवस्था बनाना इसलिए आवश्यक है, क्योंकि कई ऐसे नेता हैं, जो सजायाफ्ता होने के बाद भी अपने दल में कोई न कोई पद धारण किए रहते हैं अथवा उन्होंने अपने राजनीतिक दल का गठन कर लिया है। यह और कुछ नहीं सजायाफ्ता नेताओं की ओर से पर्दे के पीछे से की जाने वाली राजनीति है। उनकी यह सक्रियता राजनीति के अपराधीकरण को रोकने के प्रयासों पर पानी फेरने का ही काम करती है। यह सही है कि ऐसे नेता चुनाव नहीं लड़ सकते, लेकिन वे राजनीति में सक्रिय रहकर उसे प्रभावित करने का काम तो करते ही हैं। ऐसे नेता कई बार दल विशेष के कर्ता-धर्ता बनकर उसकी रीति-नीति तय करने का भी काम करते हैं। इसी तरह वे यह मिथ्या प्रचार करके लोगों की सहानुभूति अर्जित करने की भी कोशिश करते हैं कि उन्हें राजनीतिक बदले की भावना के तहत जानबूझकर झूठे मामले मे फंसाया गया।
सजायाफ्ता नेता ऐसे कुतर्क भी खूब देते हैं कि सबसे बड़ी अदालत जनता है। कई बार वे अदालतों के फैसले को सरकार का फैसला करार देकर भी लोगों को गुमराह करने का काम करते हैं। राहुल गांधी इन दिनों यही कर रहे हैं। उन्हें आपराधिक मानहानि के मामले में सूरत की एक अदालत ने सजा सुनाई है और उसके चलते उन्होंने लोकसभा सदस्यता गंवा दी है, लेकिन वह और उनके साथी यही प्रचारित करने में लगे हुए हैं कि उन्हें सरकार ने सजा दी है, क्योंकि वे उसके विरुद्ध बोल रहे थे। स्पष्ट है कि वह पीड़ित होने का दिखावा इसीलिए कर रहे हैं, क्योंकि यह जान रहे हैं कि सांसद न रहते हुए भी कांग्रेस की राजनीति उनके ही इर्द-गिर्द घूमती रहेगी और उन्हें कुछ हमदर्दी हासिल हो जाएगी। कायदे से सजायाफ्ता नेताओं को राजनीति से दूर करने का काम राजनीतिक दलों को ही करना चाहिए, लेकिन वे न तो इसके लिए तैयार हैं और न ही चुनाव आयोग के उस प्रस्ताव को स्वीकार रहे हैं जिसके तहत इस पर बल दिया जा रहा है, जो नेता गंभीर आरोपों से दो-चार हों और जिनके खिलाफ आरोपपत्र दायर हो चुका हो, उनके चुनाव लड़ने पर रोक लगाई जाए। समझना कठिन है कि राजनीतिक दल इस प्रस्ताव को स्वीकार करने के लिए तैयार क्यों नहीं हैं?
Date:29-03-23
जनतंत्र की जड़ेंसंपादकीय
इजराइल में जिस तरह सरकार के खिलाफ लोग सड़कों पर उतरे और आखिरकार सरकार को घुटने टेकने पड़े, वह दुनिया की तमाम लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं के लिए एक सबक है। हालांकि यह विरोध प्रदर्शन पिछले करीब दस हफ्तों से चल रहा था और उसमें वहां के सरकारी महकमों के लोग भी शामिल हो गए थे। सेना के पायलटों ने भी उसे समर्थन दिया था। सेवानिवृत्त फौजी अफसर आंदोलन के समर्थन में थे। वहां का सबसे बड़ा मजदूर संगठन सड़कों पर उतर आया था। मगर प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू अभी परसों तक अपने फैसले पर अडिग थे। जब उनके फैसले के विरोध में वहां के रक्षामंत्री ने भी बयान दे दिया तो उन्हें बर्खास्त कर दिया गया। उसके बाद आंदोलन तेज हो गया। राष्ट्रपति इसाक हरजोग ने प्रधानमंत्री को न्यायपालिका में आमूल-चूल बदलाव संबंधी अपनी योजना को तत्काल रोकने को कहा। दुनिया भर के इजराइली दूतावासों को संदेश भेज दिया गया कि वे कामकाज रोक दें, केवल अति आवश्यक काम ही निपटाएं। हवाई सेवाएं रुक गई थीं। ऐसे में यह संभावना बढ़ गई थी कि नेतन्याहू अपने कदम वापस खींच सकते हैं। इतने बड़े आंदोलन के बाद भी अगर नेतन्याहू अपने फैसले पर अड़े रहते, तो निस्संदेह उसके भयावह परिणाम की आशंका थी।
दरअसल, पिछले महीने बेंजामिन नेतन्याहू ने संसद में वहां की न्यायपालिका में आमूल-चूल बदलाव संबंधी प्रस्ताव पारित करा लिया था। उसके तहत न्यायपालिका सीमित दायरे में ही काम कर सकती थी, उसके ऊपर सरकार का दबाव बना रहता। इसे लेकर लोगों में नाराजगी थी। उनका कहना था कि इससे लोकतंत्र कमजोर होगा। मगर नेतन्याहू का तर्क था कि इससे मतदाताओं को लाभ होगा। उनका मकसद केवल न्यायालयों को अपनी ताकत का जरूरत से ज्यादा इस्तेमाल करने से रोकना है। मगर विरोध प्रदर्शन कर रहे लोगों का आरोप था कि दरअसल, नेतन्याहू न्यायपालिका को अपनी मुट्ठी में कैद करके अपने ऊपर लगे भ्रष्टाचार के आरोपों को खत्म करना चाहते हैं। इस प्रस्ताव के लागू होने के बाद न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति में सरकार का हस्तक्षेप बढ़ जाएगा। इससे न्यायपालिका को किसी कानून को रद्द करने का अधिकार भी छिन जाएगा। यह बदलाव करके नेतन्याहू तानाशाह की तरह शासन करना चाहते हैं। फिर धीरे-धीरे इन प्रस्तावों के विरोध में प्रदर्शन इतना व्यापक और प्रचंड होता गया कि लोग नेतन्याहू के आवास के करीब तक पहुंच गए। सड़कें अवरुद्ध कर दी गईं। फिर अमेरिका ने भी नेतन्याहू को समझाया कि वे लोकतांत्रिक देश हैं और उन्हें लोकतंत्र की मर्यादाओं का पालन करना चाहिए।
लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं में न्यायपालिका सरकारी कामकाज पर नजर रखने और उसे मर्यादित रखने का एक कारगर तंत्र होती है। दरअसल, न्यायपालिका लोकतंत्र के संवैधानिक मूल्यों का प्रहरी है। इसलिए कई बार सत्तापक्ष उसकी वजह से असहज महसूस करता है। इस मामले में इजराइल अकेले नहीं है, जहां न्यायपालिका पर नकेल कसने की कोशिश की जा रही थी। पूरी दुनिया में लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं इसीलिए प्रश्नांकित होने लगी हैं कि उनमें से कइयों ने न्यायपालिका को कमजोर करके निरंकुश व्यवस्थाएं लागू करने का प्रयास किया है। हालांकि विरोध के स्वर हर जगह उठे हैं, मगर कई जगह सरकारें उन्हें दबाने में कामयाब रही हैं। इस लिहाज से इजराइल की अवाम ने नेतन्याहू के प्रयास को चुनौती देकर एक तरह से जीवंत लोकतंत्र होने का सबूत दिया। अब जैसी स्थिति वहां बन चुकी थी कि उस विरोध प्रदर्शन को दबाना सरकार के लिए संभव नहीं था। अच्छी बात है कि नेतन्याहू ने अपने कदम वापस ले लिए।
Date:29-03-23
उच्च शिक्षा में सुधार का बड़ा दांवहरिवंश चतुर्वेदी, ( डायरेक्टर, बिमटेक )
भारत में इन दिनों विदेशी उच्च शिक्षण संस्थानों के परिसरों की स्थापना सुर्खियों में है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग, यानी यूजीसी द्वारा जारी दिशा-निर्देश संबंधी मसौदे पर लोगों से सुझाव मांगने की मीयाद पूरी हो चुकी है और अब नजर सरकार के अगले कदम पर है। देखा जाए, तो यह कोई नया मामला नहीं है। पूर्ववर्ती यूपीए सरकार के दौरान भी इससे जुड़े करीब सात बिल तैयार किए गए थे, पर विरोध के कारण उनको पेश नहीं किया जा सका। तब यह कहा गया था कि ऐसे संस्थान हमारे विश्वविद्यालयों की सेहत बिगाड़ सकते हैं। मगर अब नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति में बताया गया है कि देश की उच्च शिक्षा को विश्व स्तर पर प्रतिस्पद्र्धी बनाने के लिए जरूरी है कि हमारे शिक्षण संस्थानों की सहभागिता बाहरी विश्वविद्यालयों के साथ बढ़े।
भारत में उच्च शिक्षा का एक बड़ा बाजार है। देश की करीब 1.4 अरब आबादी में उच्च शिक्षा पाने वाले विद्यार्थियों की संख्या 4.13 करोड़ है। आलम यह है कि हर साल छह से सात लाख छात्र अच्छी शिक्षा हासिल करने के लिए दूसरे देशों का रुख करते हैं। इसकी एक वजह यह भी है कि भारत के शीर्ष संस्थानों में कई बार कट ऑफ 99 से 100 प्रतिशत तक चला जाता है, जिसके कारण छात्रों की एक बड़ी संख्या बेहतर शिक्षा से दूर हो जाती है। सरकार इसी कमी को पाटना चाहती है, जिसके लिए विदेशी उच्च शिक्षण संस्थानों पर दांव खेला जा रहा है।
विदेशी विश्वविद्यालयों का आना कई मामलों में फायदेमंद हो सकता है। इससे हम ‘टैलेंट क्राइसिस’, यानी प्रतिभा के संकट से पार पाने में सफल हो सकते हैं। रिपोर्ट बताती है कि देश के 50 फीसदी कॉलेजों में जरूरत के आधे शिक्षक भी नहीं हैं। फिर, पिछले 30 वर्षों में उच्च शिक्षा, विशेषकर तकनीकी शिक्षा का जो विस्तार हुआ है, उसका नुकसान मानविकी व विज्ञान जैसे विषयों के छात्र-छात्राओं को उठाना पड़ा है। उनके लिए रोजगार के अवसर तुलनात्मक रूप से सिमटते गए हैं। हमारे यहां बेशक आईआईटी, आईआईएम जैसे उच्च श्रेणी के शिक्षण संस्थान हैं, और तमाम तरह के केंद्रीय विश्वविद्यालय भी, लेकिन देश का हर बच्चा इतना भाग्यशाली नहीं होता कि वह इन संस्थानों में दाखिला पा सके।
विदेशी उच्च शिक्षण संस्थान हमारे कई संस्थानों पर बीस साबित हो सकते हैं। वहां छात्र-छात्राओं को बेहतर सुविधाएं तो मिलेंगी ही, अच्छा पाठ्यक्रम, पठन-पाठन का अत्याधुनिक तरीका देश में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का माहौल और समृद्ध करेगा। इससे शिक्षकों में भी प्रतिस्पद्र्धी माहौल बढ़ेगा। फिलहाल भारत में करीब 15 लाख शिक्षक उच्च शिक्षण-कार्य में जुटे हैं, जिनमें से कई संसाधनों के अभाव में नई तकनीक से दूर हैं। विदेशी संस्थानों की आमद से उनमें तकनीक अपनाने की होड़ मच सकती है।
मगर इसकी कुछ कीमत भी हमें चुकानी पड़ सकती है। हमारे बेहतर शिक्षण संस्थानों को इसका बड़ा नुकसान हो सकता है। उनकी अच्छी फैकल्टी को विदेशी संस्थान सुविधाओं और तनख्वाह के नाम पर लुभाने की कोशिश कर सकते हैं। यूजीसी के दिशा-निर्देश संबंधी मसौदे में विदेशी संस्थानों के लिए किसी भी तरह के नियमन न होने की बात कही गई थी। वे नियम भी उन पर लागू नहीं होंगे, जिनसे हमारे शिक्षण संस्थान बंधे हुए हैं। जाहिर है, उनकी स्वायत्तता हमारे संस्थानों को चोट पहुंचाएगी। ऐसे में, उनको कम से कम 50 प्रतिशत फैकल्टी अपने मुख्य परिसर से लाना अनिवार्य किया जाना चाहिए, जिनके लिए यहां रहकर पढ़ाना आवश्यक बनाया जाए।
सवाल यह भी है कि कितने विदेशी विश्वविद्यालय भारत का रुख करेंगे? बोस्टन कॉलेज के पूर्व प्रोफेसर व भारत की उच्च शिक्षा पर शोध करने वाले अंतरराष्ट्रीय स्तर के शिक्षाविद फिलिप ऑल्टबैक का मानना है कि ऐसा शायद ही हो सकेगा। उनका कहना है कि नामचीन विदेशी विश्वविद्यालय भारत जैसे देशों में अपना परिसर नहीं बनाएंगे, क्योंकि उन्होंने अपने मूल देश से इतर कहीं और कैंपस नहीं खोले हैं। पिछले पांच दशकों में चंद अमेरिकी या यूरोपीय विश्वविद्यालयों ने अपने परिसर बाहर तभी खोले हैं, जब उनको बनी-बनाई इमारत जैसी कई तरह की रियायतें मिलीं। सिंगापुर, संयुक्त अरब अमीरात जैसे देशों में इन विश्वविद्यालयों के पहुंचने की यही मूल वजह थी। चीन ने तो ‘कम ऐंड बिल्ड योर कंट्री’ (आइए और अपने देश को बनाइए) जैसे अभियान चलाकर अनिवासी प्रोफेसरों को कई तरह की अतिरिक्त सुविधाएं देकर वापस मुल्क लौटने की पेशकश की थी, जिसका पर्याप्त लाभ उसे मिला। भारत इन सबसे अभी कोसों दूर है। हमारे कई प्रोफेसर विदेश के अनेक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में पढ़ा रहे हैं, लेकिन उनको वापस बुलाने की कोई गंभीर कोशिश हमने अब तक नहीं की है।
हकीकत यही है कि शिक्षा के क्षेत्र में हमारी स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। तमाम तरह की समितियों द्वारा छह फीसदी खर्च करने की सिफारिश के बावजूद हम अपनी राष्ट्रीय आय का बमुश्किल तीन फीसदी शिक्षा पर खर्च कर पा रहे हैं। आज देश के कुल उच्च शिक्षण संस्थानों में 75 फीसदी निजी हाथों में हैं। सरकार सार्वजनिक शिक्षा के मद में अपना खर्च लगातार घटा रही है। यह सही प्रवृत्ति नहीं है। उच्च शिक्षा किसी भी देश के समग्र विकास में उल्लेखनीय भूमिका निभाती है। यह आर्थिक विकास की रफ्तार बढ़ाने में भी मददगार है। अपने यहां भी जिन राज्यों में उच्च शिक्षा पर ज्यादा ध्यान दिया गया, उनकी आर्थिक तरक्की कहीं बेहतर है। तमिलनाडु, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक जैसे राज्य इसके ज्वलंत उदाहरण हैं। इसके विपरीत बिहार, उत्तर प्रदेश जैसे सूबों की खस्ता हालत भी हम देख सकते हैं।
जाहिर है, अपने संस्थानों का भी हमें कायाकल्प करना होगा। शिक्षण संस्थानों के पास इतने संसाधन तो होने चाहिए कि वे अत्याधुनिक तकनीक अपना सकें। जैसे, यदि हर कक्षा में स्मार्ट बोर्ड ही दे दिया जाए, तो पढ़ाने के तरीके में गुणात्मक सुधार आएगा। इससे प्रोफेसरों के काम आसान हो जाएंगे और वे कहीं अधिक सुगमता से पढ़ा सकेंगे। बेहतर यही होगा कि देश की शीर्षस्थ संस्थाओं के साथ साझेदारी करके विदेशी विश्वविद्यालयों को आने की अनुमति दी जाए। बीमा कंपनियों के मामले में साल 2000 में ऐसी ही शर्त रखी गई थी, जो काफी सफल रही थी। मुमकिन है कि इस बार भी दोनों पक्ष इससे फायदे में रहेंगे।
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पिछले 10 वर्षों में भारत की सांकेतिक प्रति व्यक्ति आय दोगुनी हो गई है। हालांकि, इसमें से दो तिहाई तो मुद्रास्फीति की देन है। इससे आय की असमानता ही बढ़ती है। इसके लिए नीतियों में परिवर्तन की जरूरत होती है। सरकार को चाहिए कि वह मुद्रास्फीति को नियंत्रित रखने के लिए रोजगार के अवसर बढ़ाए, वित्तीय समावेशन बढ़ाए और राजकोषीय संसाधनों के बड़े हिस्से का पुनर्वितरण करे। इसके कई कारण हैं –
भारत की मिश्रित नीतियों ने आर्थिक विकास की दिशा में आगे बढ़ने का प्रमाण दिया है। चीन की तुलना में हमने महामारी के बाद तेजी से विकास किया है। अब भारत को चाहिए कि वह वास्तविक प्रति व्यक्ति आय का लक्ष्य प्राप्त करे, जिससे असमानता न बढ़े।
‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 7 मार्च, 2023
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Date:28-03-23
Waste Is WinningCities’ effluent management is way behind target and a health hazard. Eco-friendly, inexpensive solutions existTOI Editorials
There is little surprise that nodal pollution body CPCB has found all 18 drains of Delhi that empty treated wastewater into the Yamuna fall short of chemical standards mandated before any drain reaches the river. Is it any surprise that 22% of Delhi’s untreated waste ends up in Yamuna? Wastewater, sewage treatment in India is abysmal; it lacks the iron, and political will, backed with funds, strict regulation, oversight framework and civic awareness that the gargantuan problem demands. The gap between sewage treatment capacities and sewage generated is widening. Truth is, states play catch-up and routinely throw big numbers of treatment plant capacities. Frenzied urbanisation, migrants pouring into cities and resultant population growth has led to unprecedented growth in wastewater – a ticking health bomb.
As per a Niti Aayog report, “of 72,368 million litres of urban wastewater that India generates daily, only 28% is treated. ” That means 72% wastewater is untreated and “maybe disposed of in rivers/lakes/groundwater”. Implementation is impeded by many issues, not least limited availability of land for treatment plants; residents fearing an economic hit as the odour and aesthetics lower land prices. Some Chinese cities addressed this by building plants underground. Illegal dumping, poorly managed drainage systems, multiple leakages, and conventional technology in existing treatment plants are other issues.
At least three laws, over 10 GoI policies and missions since 1985 exist to tackle India’s wastewater, polluted and dead rivers problems. It may be an idea to prioritise waste management before racing to add to the concrete jungle – which has meant constructing over wetlands and urban water bodies. Decentralised wastewater plants are just one of the many inexpensive and ecologically sustainable ways to address the problem. There are ways out. We seem to lack the urgency.
Date:28-03-23
Over-Social Media Use? Try Parental GuidanceFor ‘addiction’, curb consumption, not techET Editorials
At least two school boards in the US are suing social media companies like Meta, parent company of Facebook and Instagram, as well as Snapchat, TikTok and YouTube for being ‘addictive’ and contributing to a ‘teenage mental health crisis’. The latest lawsuit last week, perhaps not ironically, comes from a Silicon Valley county school board. This raises issues on liability of platforms for the content they carry. Usually, media platforms are provided some degree of legal protection for conducting their business so long as they follow limits to free speech set out by law. Restrictions on access by underaged individuals form an important subset of these rules, which technology companies adhere to. Going beyond, they also offer guidance to reduce overdependence on social media consumption by teenagers. That is one part of the solution to a rise in mental health concerns among the young. Schools and parents also have a role to play in enforcing restrictions over screen time.
Typically, consumption of media converges on the latest available technology, be it the printed word or augmented reality. Every technological iteration is superior to its predecessors in how humans interact with the information they consume. Television was more engrossing than radio and social media is more immersive, by design, than legacy platforms. Concerns over the social impact of TV, once a pressing issue, now seem overstated.
Frontiers for information consumption are shifting beyond content created by humans. The metaverse is, again, by design far more immersive than the current multimedia experience. Big Tech is placing huge bets on content created by AI and delivered through virtual reality. The ‘addiction’ frontier, too, is moving beyond social media and is being pushed out by the same companies school boards are having trouble with. The solution, of course, is to impose justifiable and practicable curbs on creation and consumption of content rather than limit the technology that makes both possible. Such solutions have been around since the invention of the printing press.
Date:28-03-23
To Make Everybody Donate Every BodyET Editorials
Organ donations have improved countless lives. Even though the need for organ transplants is rising in India, donations remain low. Only 4% of patients requiring an organ receive one. GoI’s amendments to organ transplant rules — removing age restrictions for receiving an organ and a registration fee — will lead to further rise in demand. But if not matched by increase in donors, it can boost illegal trade for organs, particularly kidney and liver.
The prime minister’s appeal to people to register as organ donors is an important intervention. Studies have found that India’s total organ donation shortage can be met if even 5-10% of victims of fatal accidents serve as organ donors. The idea of donating one’s organs after death has not caught on primarily due to the lack of awareness. A person declared brain dead is legally confirmed as dead since he or she no longer has any brain functions and will not regain consciousness or be able to breathe without support. However, organs remain viable for a short time and can be used to save lives. Familial reservations, fear and mistrust of proper use of organs, and religious and social stigma are other causes for the low number of donors.
Governments, medical professionals, religious and social leaders, and role models need to step up efforts to improve awareness and dent the barriers preventing people from registering as organ donors. GoI’s decision to do away with domicile restrictions for organ donation will also help improve equity in access of organs. However, without an increase in deceased organ donors, the increased demand will boost illegal organ trade by exploiting the economically vulnerable. GoI needs to ensure that these holes are plugged.
Date:28-03-23
मोबाइल कंटेंट के मामले में हमें अपना सेंसर-बोर्ड खुद बनना होगानंदितेश निलय,( लेखक और प्रेरक वक्ता )
सोशल मीडिया और उसके प्रभाव पर बहुत कुछ लिखा और सुना जा चुका है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश की ओर से यह चिंता फिर से रखी गई है। वे कहते हैं, ‘आज हम एक ऐसे युग में रहते हैं जहां लोगों में धैर्य और सहनशीलता की कमी हो रही है। आज हम उन दृष्टिकोण को स्वीकार करने के लिए तैयार नहीं हैं, जो हमारी राय से भिन्न हैं। झूठी खबरों के दौर में सच शिकार हो गया है।’
अगर हम उनकी चिंता पर गौर करें तो पाएंगे कि एक ओर हम अपनी प्रतिक्रियाओं में कैजुअल होते जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर असहमति एक कभी समाप्त ना होने वाले विद्वेष का रूप लेती जा रही है। और ये परिस्थितियां मानसिक विकारों की भी वजह बन रही हैं। उत्तर प्रदेश के ग्रामीण इलाकों के 13 से 75 वर्ष के बीच के 12 हजार लोगों पर एक व्यापक अध्ययन हुआ। इससे यह पता चला कि उनमें से 90% लोग गंभीर मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं से पीड़ित हैं। इस सर्वेक्षण का यह उद्देश्य था कि व्यक्ति का तनाव और इससे निपटने की क्षमता, अवसाद और सोशल मीडिया की लत के स्तर की जानकारी ली जाए! इस अध्ययन से पता चला कि हर छह सोशल मीडिया एडिक्ट्स में से एक व्यक्ति में अवसाद, चिंता और असामाजिक व्यवहार सहित स्वास्थ्य समस्याएं विकसित होने की आशंका है। यह तो हुई सोशल मीडिया से बनते नए सत्य का ग्रामीण चेहरा। अब शहर की ओर मुड़ते हैं।
लोकल सर्कल्स नामक सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म की हालिया रिपोर्ट के मुताबिक 55% शहरी भारतीय माता-पिता ने खुलासा किया है कि उनके 9 से 13 साल के बच्चों के पास पूरे दिन स्मार्टफोन की पहुंच है। 71% माता-पिता ने स्वीकार किया कि उनके 13 से 17 साल के बच्चे पूरा दिन स्मार्टफोन देखते हुए बिताते हैं। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि सोशल मीडिया पर निर्भरता और इसके अत्यधिक उपयोग से बच्चों को खराब नींद, तनाव, चिंता, अवसाद, चिड़चिड़ापन, कम आत्मसम्मान और ध्यान केंद्रित करने में कठिनाई की समस्याएं हो रही हैं। इंडियन मार्केट रिसर्च ब्यूरो के अनुसार 18-24 साल के युवा प्रतिदिन औसतन 28 मिनट सोशल मीडिया पर रील्स देखते हुए बिता रहे हैं।
सोशल मीडिया के विभिन्न माध्यमों पर मौजूद शॉर्ट वीडियोज़/रील्स के कंटेंट पर गौर करें। हालांकि यह आपकी सर्च हिस्ट्री के आधार पर एल्गोरिद्म आधारित सुझाव देता है। इसलिए आत्मविश्लेषण करने की जरूरत है कि आपका फोन आपके बारे में क्या कहता है। समय आ गया है कि अपने मोबाइल पर मौजूद कंटेंट के लिए हम खुद अपने सेंसर-बोर्ड बन जाएं और अच्छी दिमागी खुराक लें, क्योंकि सहजता से उपलब्ध स्तरहीन कंटेंट बच्चों और किशोरों का भविष्य बर्बाद कर रहा है। बच्चों को फोन से दूर रहने जैसी सीख देने वाले माता-पिता को खुद भी इससे दूरी बनानी होगी। हम अपने आप को डिजिटली डिटॉक्स करें। वो डोपोमाइन जो इस डिजिटल स्क्रीन को देखकर बनता है उसे थोड़ा विराम दें। अपना ध्यान सही कार्य में लगाएं। छह इंच की मोबाइल स्क्रीन भविष्य के लिए सबसे बड़ा खतरा बन रही है। शॉर्ट वीडियोज़, रील्स के नाम पर परोसा जा रहा कंटेंट सेंसरशिप से परे है, इसलिए बच्चों के लिए खतरा कहीं ज्यादा है।
Date:28-03-23
शहरी भारत का निर्माणसंपादकीय
यह बात पूरी तरह स्वीकार्य है कि भारत को अपने नागरिकों को बुनियादी सुविधाएं मुहैया कराने और बुनियादी ढांचे में सुधार करने के लिए बहुत भारी निवेश की आवश्यकता है। निवेश की आवश्यकता आने वाले वर्षों में और बढ़ेगी क्योंकि बहुत बड़ी तादाद में लोग शहरी इलाकों का रुख करेंगे और शहरीकरण की प्रक्रिया भी तेज होगी। एक अनुमान के मुताबिक 2019 से 2035 के बीच दुनिया में जो 20 सबसे तेजी से विकसित होने वाले शहर होंगे उनमें से 17 भारत के होंगे। यह एक बहुत बड़ा अवसर है। बढ़ता शहरीकरण दीर्घकालिक आर्थिक वृद्धि का टिकाऊ जरिया बन सकता है। शहरी इलाकों में कम निवेश की एक बड़ी वजह है नगर निकायों में संसाधनों की अत्यंत सीमित उपलब्धता। बहरहाल, सही नीतिगत हस्तक्षेप से हालात को बदला जा सकता है। जैसा कि इस समाचार पत्र ने सोमवार को एक रिपोर्ट में लिखा, केंद्र सरकार म्युनिसिपल बॉन्ड पर काफी अधिक जोर दे रही है।
सरकार ने अच्छी रेटिंग वाले 30 शहरों को चिह्नित किया है। सूरत और विशाखापत्तनम से भी आशा है कि वे जल्दी ही बॉन्ड बाजार का रुख करेंगे। बड़े शहरों की बात करें तो चेन्नई इस वर्ष बॉन्ड बाजार से पैसे जुटा सकता है। चिह्नित शहरों के नगर निकायों के बारे में जानकारी है कि वे ज्यादातर काम कर चुके हैं या वैसा करने की कोशिश कर रहे हैं। वे संपत्ति कर को तार्किक बना रहे हैं और बही खातों को दुरुस्त कर रहे हैं। वे राजस्व जुटाने वाली परियोजनाओं की भी पहचान कर रहे हैं। उदाहरण के लिए सूरत और विशाखापत्तनम मौजूदा परियोजनाओं का विस्तार करके निश्चित राजस्व तैयार करके फंड जुटाने की योजना बना रहे हैं। ऐसा लगता नहीं है कि इन बॉन्ड इश्यूज को किसी कठिनाई का सामना करना होगा। व्यापक स्तर पर देखें तो जहां केंद्र सरकार की सराहना की जानी चाहिए कि वह म्युनिसिपल बॉन्ड बाजार के दायरे और उसकी गहराई का विस्तार करने का प्रयास कर रही है और साथ ही जी20 के एजेंडे में टिकाऊ शहरी बुनियादी ढांचे को धन मुहैया कराने को भी आगे बढ़ा रही है। हालांकि ये अभी शुरुआती कदम हैं और काफी कुछ और करने की आवश्यकता है।
म्युनिसिपल बॉन्ड के जरिये धन जुटाने पर ध्यान इसलिए भी नहीं जा रहा है कि सार्वजनिक पटल पर इसे लेकर अधिक जानकारी उपलब्ध नहीं है। भारतीय रिजर्व बैंक ने नगर निकायों से संबंधित आंकड़ों को एकत्रित किया और 2022 में अपनी तरह की पहली रिपोर्ट प्रकाशित की जो अच्छी बात है। वह इसे सालाना कार्यक्रम बनाना चाहता है। ध्यान देने वाली बात यह है कि रिजर्व बैंक के आम सरकारी कर्ज के आकलन में केंद्र और राज्यों के कर्ज का हिसाब रखा जाता है। वह स्थानीय निकायों को बाहर रखता है क्योंकि उनके समेकित आंकड़े उपलब्ध नहीं होते। अब केंद्रीय बैंक इस अंतर को पाटना चाहता है जिससे सरकार की वित्तीय स्थिति को लेकर बेहतर तस्वीर सामने आएगी। रिजर्व बैंक के सैंपल में 201 नगर निकायों को शामिल किया गया जिससे पता चला कि 2017-18 में कर राजस्व प्राप्तियां सकल घरेलू उत्पाद की केवल 0.61 फीसदी थीं जबकि अनुमान था कि 2019 तक ये बढ़कर 0.72 फीसदी तक हो जाएंगी। नगर निगम सरकार के अन्य दो स्तरों से मिलने वाले अनुदान पर बहुत हद तक निर्भर करते हैं। स्थानीय निकायों को संवैधानिक समर्थन के बावजूद कुल राजस्व संग्रह में कोई खास बदलाव नहीं आया है।
नगर निकायों की आर्थिकी से जुड़ा एक और पहलू यह है कि उनकी संयुक्त उधारी सकल घरेलू उत्पाद की करीब 0.05 फीसदी है। इससे बाजार से फंड जुटाने की गुंजाइश बढ़ जाती है। बहरहाल, यह बात ध्यान दी जानी चाहिए कि कर्ज बढ़ाने के कुछ संभावित खतरे भी हैं। नगर निकायों को सुधार की जरूरत है और साथ ही राजस्व के सही स्रोतों की आवश्यकता है ताकि कर्ज अदायगी समय पर हो। कुल मिलाकर जहां बड़ी तादाद में नगर निकाय प्रतिभूति बाजार नियामक द्वारा तय शर्तों का पालन नहीं करते, वहीं समुचित सुधार के साथ बॉन्ड बाजार में भागीदारी बढ़ाना निश्चित रूप से शहरी भारत के निर्माण में मददगार साबित होगा।
Date:28-03-23
शहरी संपन्नता और टिकाऊ विकास में इसकी भूमिकाअमित कपूर और विवेक देवरॉय,( कपूर इंस्टीट्यूट फॉर कंपीटिटिवनेस देश, इंडिया में अध्यक्ष और स्टैनफर्ड यूनिवर्सिटी में व्याख्याता हैं। देवरॉय प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष हैं )
शहरीकरण और संपन्नता पर कोई अध्ययन हमें संपूर्ण एवं स्थायी विकास में इनकी भूमिका पर विचार करने की दिशा में ले जाता है। शहरीकरण 21वीं शताब्दी का सबसे महत्त्वपूर्ण वैश्विक रुझान रहा है। इसका कारण यह है कि लोगों के रहने की जगह के रूप में शहरों का विकास तेजी से हुआ है। शहरीकरण का अभिप्राय केवल आबादी के रुझान तक ही सीमित नहीं रहा है। यह एक लगातार बढ़ रही ताकत है और इसका इस्तेमाल सही दिशा में किया जाए तो दुनिया को कई गंभीर समस्याओं-जलवायु परिवर्तन, टिकाऊ विकास और वैश्विक सामाजिक मुद्दे-से निजात मिल सकती है।
इसमें कोई शक नहीं कि शहर बदलाव और वृद्धि के प्रमुख केंद्र बन गए हैं। शहर संबंधित पक्षों के बीच नए संपर्क स्थापित करने और संरचनात्मक समाधान देने में भी सक्षम रहे हैं। इससे उन प्रयासों को बल मिला है जो राष्ट्रीय मुद्दों सहित क्षेत्रीय एवं वैश्विक विकास को प्रभावित कर सकते हैं। हालांकि, शहरी क्षेत्रों में दीर्घावधि के लिए संपन्नता को बढ़ावा देने की संभावनाएं अपर्याप्त योजनाओं और सक्षम सरकार एवं कानूनी ढांचे के अभाव में कम होती जा रही है। अस्थिर संस्थान, स्थानीय प्रशासन की सीमित क्षमता और एक विश्वसनीय निगरानी व्यवस्था के अभाव से भी असर हो रहा है ।
ऐसे समय में जब वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में शहरों की भागीदारी 80 प्रतिशत से अधिक हो गई है, पूरा ध्यान जीडीपी से इतर वित्तीय उपायों पर केंद्रित होता जा रहा है। अगर शहरीकरण के लाभ और मूल्य नागरिकों में समान रूप से नहीं बांटे जाते हैं तो अनुमानित आर्थिक लाभ भी संपन्नता की गारंटी नहीं दे सकते हैं। इस लिहाज से उत्पादकता, पर्यावरण संरक्षण की दिशा में प्रयास, सामाजिक समानता रहन-सहन में सुधार और जीवन यापन से जुड़ी गुणवत्ता शहरीकरण के लाभ की तुलना में प्राथमिकता में पहले आते हैं। शहरीकरण से प्राप्त संपन्नता की गणना इकॉनमीज ऑफ लोकेशन और इकॉनमीज ऑफ एफिशिएंसी कारकों के आधार पर की जाती है। इकॉनमीज ऑफ लोकेशन सिद्धांत कहता है कि जब जमीन और परिसंपत्तियों शहरी क्षेत्रों और आधारभूत संरचनाओं के समीप होती हैं तो उनका मूल्य बढ़ता है। इकॉनमीज ऑफ एफिशिएंसी सिद्धांत कहता है कि किसी क्षेत्र में शहरीकरण बढ़ने से आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा मिलता है।
यूएन हैबिटेट की रिपोर्ट ‘द वर्ल्ड सिटी रिपोर्ट इनविजिजिंग इन द फ्यूचर ऑफ सिटीज’ में भी यह बात कही गई है कि समानता वाले शहरी भविष्य का लक्ष्य तब तक पूरा नहीं हो सकता है जब तक शहरीकरण की चुनौतियों के समाधान की दिशा में समावेशी और निर्णायक कदम नहीं उठाए जाते हैं। टिकाऊ मुद्दों के अनुरूप शहरी संपन्नता के लिए जीडीपी उपायों के लिए भी एक सतर्क नजरिये की जरूरत है तभी जाकर शहरी क्षेत्र विभिन्न परिस्थितियों से निपटने में सक्षम होंगे। टिकाऊ शहरी विकास को अधिक अनुकूल बनाने के लिए हमें यह समझना होगा कि वैश्विक विकास के मुद्दों के पहलुओं को एक दूसरे से जोड़ना होगा। इनमें द न्यू अर्बन एजेंडा, सेंडाई फ्रेमवर्क फॉर डिजास्टर रिस्क रिडक्शन, अदीस अबाबा एक्शन एजेंडा और पेरिस एग्रीमेंट ऑन क्लाइमेट चेंज ऐसे ही मुद्दे हैं। दूसरी अहम बात यह है कि शहरीकरण को टिकाऊ बनाना कई आयामों से जुड़ा है और कई पक्ष इस प्रक्रिया में शामिल होते हैं। इस वजह से पूर्व में उठाए कदमों से हटकर स्पष्ट बदलाव की ओर कदम उठाना जरूरी है। शहरीकरण को अधिक टिकाऊ बनाने की प्रक्रिया बहुआयामी और बहुपक्षीय है इसके लिए पुरानी दिशाओं से बदलाव की जरूरत है। इस दिशा में आगे बढ़ने के लिए अधिक तेज प्रयासों की जरूरत है, क्योंकि केवल पहले अपनाई गई रणनीति के साथ आगे बढ़ने से समानता और अन्याय और बढ़ेंगे, ना कि कम होंगे।
कोविड-19 महामारी के बाद उत्पन्न परिस्थितियों के बीच शहरी क्षेत्रों में संपन्नता को वहनीयता को जोड़ना महत्त्वपूर्ण हो गया है। इस वजह से शहरी भविष्य का सकारात्मक स्वरूप प्राप्त करने के लिए हमें अपना दायरा बढ़ाना होगा और शहरीकरण की तरफ महज बढ़ने के बजाय शहरी क्षेत्रों में क्रांतिकारी बदलाव लाने की दिशा में बढ़ना होगा। व्यावहारिक दृष्टिकोण से शहरी क्षेत्रों में आने वाले उतार-चढ़ाव की दिक्कतों को समझना और उनकी समीक्षा करना समुचित प्रशासनिक कार्यों के लिहाज से भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। विभिन्न स्थानीय सरकारी इकाइयां यह कार्य कर सकती हैं। सिटी रेजिलियंस इंडेक्स (सीआरआई) एक उपयोगी मानक साबित हो सकता है। सीआरआई का गठन इस उद्देश्य के साथ किया गया है कि सभी सदस्य इसका अनुपालन करेंगे और भविष्य में वहनीयता में आने वाले बदलावों पर नजर रखने के लिए इसका इस्तेमाल करेंगे ।
कोविड महामारी के बाद जलवायु परिवर्तन को ध्यान में रखते हुए दुनिया में आर्थिक गतिविधियों में एक अलग संतुलन और संरचना पर जोर दिया जा जा रहा है। अक्षय ऊर्जा, पर्यावरण के अनुकूल आर्थिक गतिविधियां और हरित रोजगार के जरिये यह संतुलन स्थापित करने का प्रयास भी शुरू हो गया है। लिहाजा, उत्पादकता को केवल परंपरागत नजरिये से नहीं देखा जाना चाहिए बल्कि इसे संपूर्ण शहरी टिकाऊ विकास के महत्त्वपूर्ण तत्त्व के रूप में भी देखा जाना चाहिए। शहरी उत्पादकता के लिए समकालीन वैचारिक ढांचे में संसाधनों के विविध रूप शामिल किए जाते हैं। इन संसाधनों का इस्तेमाल न्याय, पारदर्शिता, सह-उत्पादन, संचालन और पुनर्सृजन की दिशा में सुनियोजित सोच के साथ किया जाना चाहिए। कोविड महामारी एक महत्त्वपूर्ण बदलाव लाने वाली घटना रही है। इस महामारी के बाद एक टिकाऊ एवं अनुकूल शहरी भविष्य के लिए पर्यावरण के अनुकूल आर्थिक गतिविधियों को अपनाया जाना चाहिए।
बढ़ते शहरीकरण और आबादी के एक जगह सिमटने से आपदाओं का जोखिम बढ़ता जा रहा है। इसके अलावा, पिछले 50 वर्षों के दौरान विकसित एवं विकासशील देशों में शहरी योजना एवं ढांचा शहरीकरण के पुराने प्रारूप को दोहराते आ रहे हैं। हालांकि इस स्वरूप के अच्छे आर्थिक परिणाम भी दिखे हैं मगर इसके जरिये सामाजिक और वैश्विक पर्यावरण संबंधी चुनौतियों से सही तरीके से नहीं निपटा जा सका है। तेजी से उभरते देशों में बढ़ते शहरीकरण की वजह से शहर के इर्द-गिर्द भी गतिविधियां तेज हो गई हैं। ये गतिविधियां मुख्य तौर पर अनौपचारिक हैं। इनका नतीजा यह है कि शहरी क्षेत्रों का क्षेत्रफल बढ़ता जा रहा है और कई बड़े शहर महानगरों का रूप ले चुके हैं और बड़े नगर निगम बन गए हैं। मगर इनके साथ समस्या यह है कि इन क्षेत्रों में ऊर्जा इस्तेमाल पूरी क्षमता के अनुसार नहीं हो रहा है और पर्यावरण का ध्यान भी नहीं रखा जा रहा है। इस तरह, अर्थव्यवस्था के लिहाज से भी ये अनुकूल नहीं रह गए हैं। लिहाजा, शहरी संपन्नता के एक नए स्वरूप को टिकाऊ विकास को मजबूती देनी चाहिए। इसके लिए जरूरी है कि राष्ट्रीय विकास में शहरों की आर्थिक भूमिका को बढ़ावा दिया जाना चाहिए और शहरों से मिलने वाले अवसरों की पहचान की जानी चाहिए। इसके साथ ही शहरी संपन्नता के इन नए स्वरूप को वैश्विक पर्यावरण संबंधी चुनौतियों जैसे जलवायु परिवर्तन, ऊर्जा का अंधाधुंध इस्तेमाल और जल की कमी से भी निपटना चाहिए ताकि लोगों का जीवन आसान हो सके।
Date:28-03-23
इसरो ने किया सर ऊंचासंपादकीय
भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने एक बार फिर अपनी उपलब्धि से देश का सर ऊंचा किया है। ब्रिटेन स्थित वनवेब समूह 36 उपग्रहों को उनकी निर्धारित कक्षा में सफलतापूर्वक स्थापित करके रविवार को इसरो ने यह उपलब्धि हासिल की। इसरो के 43.5 मीटर लंबे एलवीएम3 रॉकेट को रविवार सुबह नौ बजे प्रक्षेपित किया गया। ब्रिटेन की वनवेब ग्रुप कंपनी ने पृथ्वी की निचली कक्षा में 72 उपग्रहों को प्रक्षेपित करने के लिए इसरो की वाणिज्यिक शाखा न्यूस्पेस इंडिया लिमिटेड (एनएसआईएल) के साथ करार किया है। इस करार के तहत यह वनवेब के लिए यह दूसरा प्रक्षेपण था। पहले 36 उपग्रह 23 अक्टूबर 2022 को प्रक्षेपित किए गए थे। वनवेव अंतरिक्ष से संचालित एक वैश्विक संचार नेटवर्क है जो सरकारों एवं उद्योगों को सम्पर्क सुविधा मुहैया कराता है। रॉकेट ने क्रमिक रूप से उपग्रहों को कई कक्षाओं में इसरो स्थापित किया। राकेट एलबीएम3 अपने लगातार छठे प्रक्षेपण में पृथ्वी की निचली कक्षा में 5,805 किलोग्राम पेलोड लेकर गया। वनवेब ने सभी 36 उपग्रहों से सिग्नल प्राप्त करने की पुष्टि की है। यह प्रक्षेपण वनवेव ग्रुप कंपनी का 18वां प्रक्षेपण था, जबकि इसरो के लिए 2023 का यह दूसरा प्रक्षेपण है। इससे पहले फरवरी में एसएसएलवी/डी 2- ईओएस07 का सफल प्रक्षेपण किया गया था। केंद्रीय मंत्री जितेंद्र सिंह ने सफल प्रक्षेपण के लिए इसरो की सराहना की। उन्होंने कहा मुझे ऐसे समय में अंतरिक्ष विभाग के साथ जुड़कर गर्व होता है, जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में भारत अंतरिक्ष प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में दुनिया का एक अग्रणी देश बनकर उभरा है। यह मिशन ब्रिटेन और भारतीय अंतरिक्ष उद्योग के बीच निरंतर गहरे होते संबंधों को दर्शाता है। यह एल.वी.एम.3 का छठा प्रक्षेपण है। इसे पहले इसे ‘जियोसिंक्रोनस सैटेलाइट लॉन्च व्हीकल ‘एम के थ्री’ के नाम से जाना जाता था। इसे चंद्रयान-2 सहित लगातार पांच मिशनों में तैनात किया गया था। इसरो ने अपनी सफलताओं से विज्ञान ही नहीं आर्थिक सफलताओं के भी नए आयाम स्थापित किए हैं। ऐसे वक्त में जब अमेरिका और अन्य नामचीन देशों के मिशनों को कई झटके लग चुके हैं और उनका अंतरिक्ष कार्यक्रम पिछड़ रहा है। पूरी दुनिया उपग्रह प्रक्षेपण के लिए इसरो की तरफ देख रही है। यह सफलता आर्थिक जगत में भी नाम ऊंचा करेगी।
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हाल के कुछ वर्षों में लगातार घट रही कुछ घटनाओं ने देश में लोकतंत्र की स्थिति पर सवाल खड़े कर दिए हैं। इस वर्ष के गणतंत्र दिवस की मनमोहक परेड में देश की सॉफ्ट और हार्ड पावर के भरपूर प्रदर्शन के बावजूद गिरते लोकतंत्र की सच्चाई ने चमक को कम कर दिया है।
क्षरण के संकेत – संवैधानिक अपराधों के बारे में बार-बार आने वाली रिपोर्टें हमारी गहराई और गुणवत्ता पर सवाल उठाती है। हाल ही के दिनों में विपक्ष के संसदीय बैठकों का बहिष्कार, राज्यसभा में प्रधानमंत्री के भाषण को बाधित करना, संसद की कार्यवाही को रिकार्ड करने के लिए विपक्ष के एक नेता पर अनुपातहीन दंड लगाया जाना तथा जन-प्रतिनिधियों की सीमा पार करने वाली घटिया गतिविधियाँ आदि कुछ ऐसे प्रमाण हैं, जिन्होंने संसद की पवित्रता का लगातार हनन किया है।
देश के एक नामी कॉलेज में 18 वर्षीय दलित छात्र का आत्महत्या करना और किसी स्कूल के 16 वर्षीय छात्र की सामान्य सी बात पर बुरी तरह पिटाई होना, ऐतिहासिक और सामाजिक असमानताओं के बने रहने की दर्दनाक याद दिलाता है। उत्तर प्रदेश में विपक्षी दल के एक विधायक को सड़क जाम करने के 15 साल पुराने मामले में दो साल की जेल की सजा दी गई है। यह अभियोजन प्रक्रियाओं की दमनकारी वास्तविकताओं को दिखाता है। इससे यही प्रमाणित होता है कि वर्तमान सरकार के राज में जैसे-जैसे न्याय का पहिया घूमता है, कैरियर नष्ट हो जाते हैं, प्रतिष्ठा बर्बाद हो जाती है और अपमान की अंतहीन गाथा में आत्माएं झुलस जाती हैं।
संविधान के उदारवादी स्वरूप की उस समय धज्जियां उड़ गईं, जब देश की सर्वोच्च अदालत ने छुट्टी के दिन विशेष बैठक में देशद्रोह के एक विकलांग अभियुक्त की जमानत निलंबित करने का फैसला किया था। संस्थागत अस्वस्थता के ऐसे उदाहरण भारत के संवैधानिक लोकतंत्र के क्षत-विक्षत भवन की छवि प्रस्तुत कर रहे हैं।
राजनीतिक विचार-विमर्श की कमी
लोकतांत्रिक हानि का सबसे प्रबल प्रमाण राजनीतिक बहसों की घटती संख्या और समय में मिल रहा है। नेता एक-दूसरे के लिए आहत करने वाले अपशब्दों का प्रयोग करते हैं। राजनीतिक भाषा पाखंड और व्यक्तिगत शत्रुता में डूबी हुई है। यह हमारी राजनीति की संकीर्णता को दर्शाती है।
भारत के क्षीण लोकतंत्र को केवल उदारीकरण के माध्यम से ही पुनर्जीवित किया जा सकता है। हमारी राजनीति को संकीर्ण पक्षपातपूर्ण दृष्टिकोण से ऊपर उठकर लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करनी होगी।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित अश्विनी कुमार के लेख पर आधारित। 1 मार्च, 2023
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Date:27-03-23
Go, Afspa, GoEvery N-E district freed of this draconian law represents an advance. But it’s time to consider full repealTOI Editorials
After 2022, when the Union home ministry considerably reduced the number of “disturbed areas” in Assam, Manipur and Nagaland, its review in 2023 is incremental in freeing districts from the tag, which operationalises the Armed Forces Special Powers Act or Afspa – the lawless law that gives unbridled power to armed forces and central police to search and arrest without warrant and shoot on suspicion for “maintenance of public order”. This year the “disturbed area” tag has been removed from one district in Nagaland. Now, eight of Nagaland’s 16 districts, including Dimapur, have it in full force while in five others, Afspa is imposed in parts. Of the three states that recently concluded state elections, Afspa was removed from Tripura in 2015, Meghalaya removed it in 2018 after 27 years. The Centre removed Afspa from 23 districts – plus partially from another district – of Assam’s 36 districts last year.
The removal of Afspa, in whatever measure, is always welcome, and it is always necessary to emphasise there is no place for such a law in modern India, especially when GoI has successfully brought militants to surrender, join peace talks and abandon arms. The 2020 Bodo Accord and the 2021 Karbi-Anglong pact played their part in addressing root causes of insurgencies.
All of North-East has suffered in Afspa’s shadow, notwithstanding the argument that crippling militancy required a special law to be in place. It bears repeating that the investigation into the killing of 14 people by soldiers during a botched operation in Nagaland’s Mon district in 2021 found it to be a case of mistaken identity. Given that governments in all northeastern states today are in alliance with the Centre, the climate is more amenable to a total removal of Afspa. That in 2023 a district was added to the Afspa list in Arunachal Pradesh as well as the limited repeal in Nagaland shows there is still some road to travel before the North-East can be free of this draconian law.
Date:27-03-23
Making sense of the disqualification of a Lok Sabha MPThe law on criminal defamation needs review as every elected political person faces the danger of being put out of the electoral process for yearsP.D.T. Achary, [ Former Secretary General of the Lok Sabha ]
The conviction, on Thursday, March 23, 2023, of Congress leader and now former Member of Parliament from Wayanad Rahul Gandhi by a Chief Judicial Magistrate’s court in Surat, Gujarat, and the issuance of a notification the next day by the Lok Sabha Secretariat of Mr. Gandhi’s disqualification raise some important constitutional and legal issues. The legal community is mystified by the harshness of the sentence, which is unprecedented in a defamation case. The issue will anyway be dealt with by the appellate courts. But the issues relating to the disqualification need to be examined carefully.
Section 8 of the Representation of the People Act, 1951 (RP Act) specifies the various offences, conviction for which entail the disqualification of a member of the legislature. Clause (3) of this section says that a person convicted of any offence other than those mentioned in the other two clauses, and sentenced to not less than two years shall be disqualified from the date of conviction. However, clause (4) has exempted sitting members from instant disqualification for three months to enable them to appeal against the conviction. This clause was struck down as ultra vires the Constitution by a two judge Bench of the Supreme Court on the ground that Parliament has no power to enact such an exemption for sitting members of the legislature (Lily Thomas vs Union of India, 2013). The effect of this judgment is that there is an instant disqualification of a sitting legislator as soon as he is convicted. However, the Court made it clear that in the event of the appellate Court staying the conviction and sentence, the disqualification will be lifted and the membership will be restored to him.
The role of the President
Section 8(3) of the RP Act which provides for disqualification on conviction has been subjected to judicial interpretation in a number of cases. A surface view of this provision is that the moment conviction and sentence are announced by the trial court, the member of the legislature will stand disqualified. Upon such disqualification, his seat in the legislature shall fall vacant under Article 101(3)(a). But a closer reading will reveal that the words “shall be disqualified” used therein cannot mean instant disqualification. If words like “shall stand disqualified” were used in this clause, they would have certainly meant instant disqualification without the intervention of any other authority.
The passive voice used in this clause implies that the person shall be disqualified by some authority. Who can that authority be? It cannot be the Secretary General of a House of Parliament or Secretary of a state legislature because the Constitution does not confer such power on them. Article 103 shows that the President of India is that authority who decides that a sitting member has become subject to disqualification in all cases which come under Article 102(1). Sub Clause (e) of this Article relates to all cases of disqualification under the RP Act 1951 which include disqualification on conviction and sentence under Section 8(3) of the Act.
There are differences of opinion on the scope of Article 103, which says that if any question arises as to whether any sitting Member has become subject to any of the disqualifications mentioned under Article 102(1), the question shall be referred to the President whose decision shall be final.
There is a view that this Article can be invoked only when a dispute arises on the fact of disqualification and not otherwise. But this Article covers disqualification arising on conviction for different offences under Section 8 of the RP Act 1951. In a case of conviction under this section, where is the question of disputes? This would mean that reference to the President of the question of disqualification of a sitting Member who has been convicted for an offence covered by Section 8 is a constitutional requirement. The Supreme Court, in Consumer Education and Research Society vs Union of India (2009), upholds this position. This judgment says that the President performs adjudicatory and declaratory functions here.
In cases where adjudication is not required, the President can simply declare that the sitting Member has become subject to disqualification. But the intervention of the President is essential under Article 103 even in cases where a sitting member has been convicted and the disqualification is supposed to take effect from the date of conviction. Section 8(3) of the RP Act does not say that in the case of a sitting Member, disqualification takes effect the moment the conviction is announced. The words “shall be disqualified” convey this sense.
The judgment in Lily Thomas has certain flaws. It says that Parliament cannot enact a temporary exemption in favour of sitting members of the Legislature. But Article 103 itself provides an exception in the case of sitting Members by stating that the disqualification of sitting Members shall be decided by the President. Thus, the Constitution itself makes a distinction between the candidates and sitting Members. This was ignored by the judgment and the Court struck down the three months window given to the sitting members to enable them to appeal against their conviction. Further, such a temporary exemption in favour of sitting members of the legislature is a reasonable requirement. They are not placed in the same situation as a candidate. A sudden disqualification will cause a lot of dislocation apart from the fact that the constituency will lose its representative.
Section 8(4) was enacted to deal with precisely such a situation. In the absence of a provision such as clause 4 of Section 8, the Lok Sabha Secretariat issued a notification on March 24, 2023 declaring that Mr. Gandhi stands disqualified. This notification has presumably been issued on the basis of the judgment in the Lily Thomas case. But Section 8 (3) uses the words “shall be disqualified” and does not specify which authority shall disqualify Mr. Gandhi. Therefore, the Lok Sabha Secretariat cannot perhaps declare him disqualified without referring the case to the President under Article 103 for a declaration, which is the normal procedure followed there. The authority to declare a sitting Member disqualified on the basis of the Court’s decision is not vested in the Lok Sabha Secretariat, either under the Constitution or the RP Act 1951. That power is vested in the President under Article 103. The sitting Member incurs disqualification on his being convicted and sentenced to two year imprisonment. But he “shall be disqualified” through a decision by the President. This appears to be the ratio of the Consumer Society Case (supra).
An issue to reflect on
The law on criminal defamation needs an urgent review. Many countries such as the United Kingdom and the United States have scrapped it. India’s neighbour Sri Lanka too has done away with it. It is indeed a surrealistic situation where senior political leaders get jailed for making humorous or off the cuff remarks in election speeches. In 1965, the Supreme Court had drawn the attention of the judicial system to the need for a liberal approach to rhetorical, hyperbolic or metaphoric words used by politicians in election speeches. The Court said, “… the atmosphere is usually surcharged with partisan feelings and emotions and the use of Hyperboles or exaggerated language or the adoption of metaphors and extravagance or expression in attacking one another are all part of the game. So when the question… is argued in the cold atmosphere of a judicial chamber some allowance must be made and impugned speeches must be construed in that light” — Kultar Singh vs Mukhtiar Singh (1965).
In our multi-party democracy, every political party is a potential ruling party. So, every political leader is exposed to the danger of being hauled up for defamation and put out of the electoral process for long years. People of mature democracies must be able to enjoy humour without any fear. People must learn to laugh at themselves. Otherwise, we will always be busy sending people to jail.
Date:27-03-23
सांस्कृतिक अवधारणा है हिंदू राष्ट्रहृदयनारायण दीक्षित, ( लेखक उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष हैं )
भारतीय राष्ट्रभाव अतिप्राचीन है। इसका मूल आधार हिंदू संस्कृति है। संप्रति हिंदू राष्ट्र पर विमर्श है। हिंदू संस्कृति के कारण यह हिंदू राष्ट्र है। कुछ लोग भारत को हिंदू राष्ट्र घोषित करने की मांग कर रहे हैं। उनका मंतव्य स्पष्ट नहीं है। राष्ट्र राजनीतिक इकाई नहीं है। यह सांस्कृतिक अनुभूति है। विराट विश्व हिंदू संस्कृति में एक परिवार है। पृथ्वी ब्रह्मांड की एक इकाई है। हिंदू संस्कृति में यह माता है। आकाश पिता हैं। हिंदू संस्कृति में वनस्पतियां अग्नि, वायु और जल भी देवता हैं। पूर्वजों में प्रकृति के प्रति आत्मीय भाव था। इसी संस्कृति से हिंदू राष्ट्र बना। राष्ट्र और राज्य भिन्न हैं। पं. दीनदयाल उपाध्याय ने लिखा है, ‘संयुक्त राष्ट्र वस्तुतः राष्ट्रों का संगठन नहीं है। राष्ट्रों के प्रतिनिधि के नाते उसमें राज्य ही प्रतिनिधित्व करते हैं। इसीलिए राज्य के विकारग्रस्त होते ही राष्ट्र अपने प्रतिनिधि बदल देता है। शासन पद्धति राज्य को राष्ट्र के हित में उपयोगी बनाने वाला तंत्र मात्र है, मगर कोई भी शासन पद्धति अपने राष्ट्र को नहीं बदल सकती। राष्ट्र स्थायी सत्ता है।’
हिंदू राष्ट्र संस्कृति सत्य है। तर्क-प्रतितर्क और वाद-विवाद हिंदू संस्कृति की विशेषता है। कुछ विद्वान हिंदू को मुसलमानों द्वारा दिया गया शब्द मानते रहे हैं। यह सही नहीं है। हिंदू शब्द का उल्लेख ईरानी ‘अवेस्ता’ में है, जो इस्लाम के उद्भव से सैकड़ों वर्ष पुराना है। डेरियस (522-486 ईसा पूर्व) के शिलालेख में भी हिंदू शब्द का उल्लेख है। उच्चतम न्यायालय ने 1976 में हिंदुत्व को संस्कृति बताया। 1995 में भी सर्वोच्च न्यायपीठ ने हिंदुत्व को पंथ-मजहब नहीं ‘जीवनशैली’ बताया। प्रतीत होता है कि हिंदू राष्ट्र घोषित करने की मांग का अर्थ संभवतः हिंदू राज्य से है, हिंदू राष्ट्र से नहीं। हिंदू संस्कृति प्राचीनतम है। ऋग्वेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद एवं रामायण-महाभारत से लेकर आज तक सांस्कृतिक निरंतरता लिए है। मार्क्सवादी विद्वान डीडी. कोसंबी ने ‘प्राचीन भारत की संस्कृति और सभ्यता’ में लिखा, ‘मिस्र की महान अफ्रीकी संस्कृति में वैसी निरंतरता देखने को नहीं मिलती जैसी हम भारत में पिछले 3000 या उससे भी अधिक वर्षों में देखते हैं। मिस्री और मेसोपोटामियाई संस्कृतियों का अतीत अरबी संस्कृति के पीछे नहीं जाता।’सांस्कृतिक निरंतरता महत्वपूर्ण है। प्राचीन काल से ही भारत में राष्ट्र संस्था सांस्कृतिक प्रवाह में थी। अथर्ववेद में सामाजिक सांस्कृतिक विकास के सूत्र हैं, ‘पहले वह शक्ति विराट थी। अव्यवस्थित थी। फिर परिवार संस्था का निर्माण हुआ। परिवारों ने जीवन को सामूहिक बनाया। सामूहिक विचार-विमर्श से सभा एवं समिति का विकास हुआ। लोककल्याण के इच्छुक ऋषियों ने तप किया। दीक्षा आदि नियमों का पालन किया। इससे राष्ट्र तथा राष्ट्र के बल का जन्म हुआ।
संस्कृति के अनेक तत्वों में कला, गीत और संगीत आदि प्रमुख हैं। परम चेतना एक। अभिव्यक्तियां अनेक। रूप, रस, गंध, नाद के आनंद हैं। हिंदू गीत-संगीत की परंपरा प्राचीन है। यहां छह मुख्य राग और 30 रागिनियां हैं। हिंदू दर्शन के अनुसार प्रत्येक राग अर्धदेवता हैं। इनका विवाह पांच रागिनियों से हुआ। महाभारत वन पर्व में इंद्र ने अर्जुन से कहा, ‘तुम नृत्य और गीत सीखो। वाद्य विद्या भी तुम्हें सीखनी चाहिए।’ हिंदू परंपरा में गायन, वादन और नर्तन आदि विधाएं थीं। ऋग्वेद में इसके साक्ष्य हैं। सामवेद का अर्थ ही ज्ञान गान है। इनसे ही उत्कृष्ट सामूहिक संस्कृति विकसित हुई। ऋग्वेद में सांस्कृतिक सामूहिक जीवन के संदर्भ में उल्लेख है, ‘हम परस्पर विचार-विमर्श करें। साथ-साथ चलें। सबके मन समान हों। मंत्र समान हों। समितियां समान हों। हमारे पूर्वज भी ऐसा ही करते थे।’
राष्ट्र सांस्कृतिक अवधारणा है और उसके गठन का आधार राजनीतिक प्रक्रिया नहीं। भारतीय चिंतन में ब्रह्मांड को एक जाना गया है। विविधता में एकता भारतीय संस्कृति की विशेषता है। भूमि, जन और संस्कृति की त्रयी भावात्मक रूप में राष्ट्र होती है। साथ-साथ रहते हुए भूमि के प्रति श्रद्धा विकसित होती है। संस्कृति नेतृत्व करती है और राष्ट्र बनता है। संस्कृति का मुख्य घटक भाषा है। संविधान में ‘सामासिक संस्कृति’ शब्द प्रयोग हुआ है। सर्वोच्च न्यायालय ने 1994 में कहा, ‘सामासिक संस्कृति का आधार संस्कृत भाषा और साहित्य है। इस देश के लोगों में अनेक भिन्नताएं हैं। वे गर्व करते हैं कि वे एक विरासत के सहभागी हैं। यह विरासत और कोई नहीं संस्कृत की विरासत है।’
राष्ट्र और नेशन एक नहीं। नेशनलिज्म का जन्म तो नौवीं-दसवीं शताब्दी के आसपास हुआ। सोलहवीं शताब्दी में इटली में नए युग को ‘ल रिनास्विता’ (पुनर्जन्म) कहा गया। 18वीं शताब्दी में फ्रांस ने इसे रिनेसां कहा। इटली के लोगों के लिए सभ्यता नई होकर जन्म ले रही थी। रोमन सभ्यता से फ्रांस और ब्रिटेन भी प्रभावित हुए थे। उन्होंने इटली की देखादेखी अपनी नई सभ्यता के युग को पुनर्जन्म कहना शुरू किया। पुनर्जागरण के बाद यूरोपीय शक्तियों ने अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका और आस्ट्रेलिया के मूल निवासियों को प्रताड़ित किया। उपनिवेश बनाए। वे लगभग एक भौगोलिक क्षेत्र में थे। एक नेशन होने का भाव जगाया गया। वस्तुत:, नेशनलिज्म में भूमि, जन और राजव्यवस्था तीन घटक हैं। जबकि भारतीय राष्ट्रवाद में भूमि, जन और संस्कृति तीन महत्वपूर्ण घटक हैं। राजव्यवस्था महत्वपूर्ण नहीं। यहां हजारों छोटे खंडों पर कई तरह की राजव्यवस्था थी। राजा थे। स्वाधीनता के समय भी सैकड़ों रियासतें थीं, पर राष्ट्र एक था और है। इस राष्ट्रीय एकता की नींव हिंदू मनीषियों ने डाली थी। मार्क्सवादी विचारक डा. रामविलास शर्मा ने लिखा है कि ‘अथर्ववेद और महाभारत में अनेक पंथों के राष्ट्र का जैसा वर्णन है वैसा अन्यत्र नहीं मिलता।’ भारत वैदिककाल के पूर्व से ही हिंदू राष्ट्र है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले ने सही कहा है कि ‘भारत पहले से ही हिंदू राष्ट्र है। हिंदू राष्ट्र सांस्कृतिक अवधारणा है। हम वर्षों से कह रहे हैं कि भारत हिंदू राष्ट्र है। इसे आर्यन, हिंदू या सनातन राष्ट्र भी कहा जा सकता है।’ राष्ट्र की मूलाधार संस्कृति को वैभवशाली बनाना चाहिए। सबके अधिकार समान हों। आजीविका और उपलब्धियों के अवसर समान हों। न कोई अल्पसंख्यक हो और न विशेष सुविधाएं। इसी से हिंदू राष्ट्र परम वैभवशाली होगा।
Date:27-03-23
जांच की हदेंसंपादकीय
अब केंद्रीय जांच एजंसियों के कथित दुरुपयोग का मामला सर्वोच्च न्यायालय में पहुंच गया है। चौदह विपक्षी दलों ने मिल कर इससे संबंधित याचिका दायर की है। इन दलों ने अदालत के समक्ष गुहार लगाई है कि गिरफ्तारी और हिरासत को लेकर केंद्रीय जांच एजंसियों के लिए दिशा-निर्देश जारी किए जाएं। हालांकि इसके पहले भी इसे लेकर कुछ व्यक्तिगत याचिकाएं दायर की गई थीं, जिन पर सर्वोच्च न्यायालय ने कोई दिशा-निर्देश देने के बजाय केवल टिप्पणी करके टाल दिया था। अब चौदह विपक्षी दल इसे लेकर एकजुट हुए हैं, तो सर्वोच्च न्यायालय ने उनकी याचिका स्वीकार कर ली है। इस तरह अब विपक्षी दल जो बाहर बयान दिया करते थे कि उन्हें सबक सिखाने के इरादे से सरकार केंद्रीय एजंसियों का दुरुपयोग कर रही है, वे अब सर्वोच्च न्यायालय के संवैधानिक दिशा-निर्देश का इंतजार करेंगे। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि पिछले कुछ सालों में भ्रष्टाचार पर नकेल कसने के मकसद से जांच एजंसियां काफी सक्रिय नजर आने लगी हैं, शायद उन्हें मुक्तहस्त भी किया गया है, जिसके चलते लगातार छापे पड़ रहे और भ्रष्टाचार के मामलों में जांचें तेज हो गई हैं। मगर खुद जांच एजंसियों की तरफ से जारी आंकड़ों के मुताबिक छापों और कार्रवाइयों की तुलना में दोषियों की पहचान बहुत कम हो पाई है। महज चार से पांच फीसद मामलों में दोष सिद्ध हुए हैं। बाकी में लोगों को नाहक परेशानी और बदनामी उठानी पड़ी है।
ऐसे में विपक्षी दलों की नाराजगी निराधार नहीं कही जा सकती। फिर यह भी स्पष्ट है कि केवल विपक्षी दलों के नेताओं के खिलाफ जांच एजंसियों का शिकंजा कसता है। उन नेताओं के मामलों में जांचें ठंडे बस्ते में डाल दी गई, जो पहले विपक्ष में थे, मगर फिर सत्तापक्ष में आ गए। विपक्षी पार्टियां उन नेताओं के नाम की सूची जारी करती रही हैं। सार्वजनिक मंचों से उनके नाम लेकर सवाल पूछती रही हैं कि अमुक अमुक के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं होती। दरअसल, जांच एजंसियों के खिलाफ विपक्षी दलों में एकजुटता दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया की गिरफ्तारी के बाद शुरू हुई। सारे दलों ने उसका विरोध किया था। यह भी देखा गया है कि भ्रष्टाचार, धन शोधन या फिर कर चोरी के मामले में जांच एजंसियां अपने दायरे के बाहर चली जाती हैं। जिन मामलों में आयकर विभाग को जांच करनी चाहिए, उनमें भी प्रवर्तन निदेशालय जांच शुरू कर देता है। फिर पुख्ता सबूतों के अभाव में भी कई लोगों को गिरफ्तार कर सलाखों के पीछे पहुंचा दिया गया है।
हालांकि सर्वोच्च न्यायालय पहले ही कह चुका है कि जांच एजंसियों को उनके काम से रोका नहीं जा सकता। धन शोधन और आयकर चोरी से जुड़े मामले अंतरराष्ट्रीय आतंकवाद से संबंधित भी हो सकते हैं। फिर उन्हें जांच से रोक कर एक तरह से भ्रष्टाचार के मामलों को बढ़ावा देना होगा। मगर ताजा याचिका विशेष रूप से जांच एजंसियों के कामकाज के तरीके को लेकर दायर की गई है, जिसमें वे मनमानी ढंग से गिरफ्तारियां करती, हिरासत में लेतीं और फिर लोगों को नाहक प्रताड़ित करती हैं। उनके कामकाज के तरीके और लक्ष्य बना कर छापे डालने आदि से स्पष्ट होता है कि वे केंद्र सरकार के इरादे के अनुरूप काम कर रही हैं। ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय उनके कामकाज को लेकर संवैधानिक हदें तय कर सकता है। संविधान में उनके दायरे तय हैं, सर्वोच्च न्यायालय उनके मद्देनजर उन्हें निर्देश दे सकता है। इसलिए स्वाभाविक ही उसके रुख पर सबकी नजर है।
Date:27-03-23
भविष्य का वैकल्पिक ईंधनसुशील कुमार सिंह
दुनिया में कच्चे तेल के लिए संघर्ष अपने आप में किसी महायुद्ध से कम नहीं है। यह तमाम देशों के लिए अक्सर चुनौती बनता रहा है। रोचक यह है कि तेल को लेकर अमेरिका जैसे देश कई खेल भी इसी दुनिया में खेलते रहे हैं। गौरतलब है कि अमेरिका भारत का रणनीतिक मित्र है और वर्षों से दोनों के संबंध कहीं अधिक सकारात्मक हैं, मगर ईरान से उसकी दुश्मनी की कीमत भारत को भी तब चुकानी पड़ी, जब उसने मई 2019 में ईरान से कच्चा तेल लेने पर प्रतिबंध लगा दिया था। आखिरकार इस ऊर्जा की भरपाई के लिए भारत को सऊदी अरब की ओर रुख करना पड़ा था, जो ईरान की तुलना में महंगा सौदा था। फरवरी, 2022 से बदले हालात के बाद रूस से भारत सस्ता तेल धड़ाधड़ खरीद रहा है, जबकि रूस-यूक्रेन युद्ध के चलते अमेरिका और यूरोप के कई देशों के अलग खेमे बने हुए हैं और भारत को ऐसा करने से रोक पाने में सक्षम भी नहीं हैं। भारत कच्चे तेल के मामले में आत्मनिर्भर नहीं है। वह अपनी जरूरत का महज सत्रह फीसद तेल उत्पादन कर पाता है, बाकी के लिए आयात पर निर्भर है। ऐसे में ई-20 ईंधन का स्वरूप इस निर्भरता को कम करने में मदद करेगा, मगर जिस गति से कच्चे तेल की आवश्यकता देश को है, उसे देखते हुए इसे अंतिम उपाय नहीं कहा जा सकता।
गौरतलब है कि ई-20 ईंधन का आशय पेट्रोल में एथेनाल के बीस प्रतिशत मिश्रण से है। अभी तक देश में मिलने वाले पेट्रोल में इसकी मिलावट महज दस फीसद होती थी। हालांकि इसे लेकर पेट्रोल के आयात पर असर पड़ेगा, मगर बड़ा असर लाने के लिए इलेक्ट्रानिक वाहन और एथेनाल मिश्रित पेट्रोल को पूरे देश में विस्तार देना होगा। फिलहाल ई-20 ईंधन को ग्यारह राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के चौरासी पेट्रोल पंपों पर उपलब्ध कराया जाएगा। गौरतलब है कि भारत सरकार ने ‘इंडिया एनर्जी वीक 2023’ में बीस प्रतिशत एथेनाल मिश्रित पेट्रोल को बीते फरवरी महीने में शुरू किया था और उम्मीद जताई गई थी कि इस पहल से पेट्रोल पर निर्भरता को कम किया जा सकेगा।
इसमें कोई दो राय नहीं कि जैव ईंधन को लेकर जितनी सक्रियता आई है, उसके लाभ भी विभिन्न आयामों में विस्तार लेंगे। ई-20 ईंधन कई लाभों से युक्त है, पर चुनौतियों से भी भरा हुआ है। भारत कृषि अर्थव्यवस्था वाला देश है, यहां व्यापक पैमाने पर कृषि अवशेष उपलब्ध हैं। ऐसे में जैव ईंधन के उत्पादन की संभावना अधिक रहेगी। फलस्वरूप, नई नगदी फसलों के रूप में ग्रामीण और कृषि विकास में यह मदद कर सकता है, बशर्ते नियोजनकर्ता किसानों की सक्रियता और महत्ता को ऊर्जा का केंद्र समझें, न कि महज एक साधन। शहर अकूत अपशिष्ट और कचरे से भरे पड़े हैं। इनका उपयोग कर ईंधन में बदलना संभव होगा, जो भोजन और ऊर्जा दोनों प्रदान कर सकती है। ई-20 ईंधन से वाहनों को चलाना तो आसान रहेगा ही साथ ही बड़ा लाभ यह होगा कि जहरीली गैसों से शहर मुक्त भी होंगे। कच्चा तेल खरीदने में तुलनात्मक कमी आएगी, इससे विदेशी मुद्रा के खर्च में कमी आएगी।
यह हरित ईंधन का एक ऐसा उदाहरण है, जिससे कार्बन डाईआक्साइड और हाइड्रो कार्बन आदि के उत्सर्जन में कमी संभव है। पड़ताल बताती है कि वर्तमान में भारत में एथेनाल की उत्पादन क्षमता लगभग एक हजार सैंतीस करोड़ लीटर है, जिसमें सात सौ करोड़ लीटर गन्ना आधारित और बाकी अनाज आधारित है। 2022-23 में पेट्रोल और एथेनाल वाले ईंधन की आवश्यकता पांच सौ बयालीस करोड़ लीटर थी, जबकि 2023-24 में यह बढ़ कर छह सौ अट्ठानबे करोड़ लीटर है। बता दें कि कच्चा तेल दुनिया के किसी देश से किसी भी कीमत पर शायद खरीदा जाना संभव है, मगर एथेनाल के औसत को बनाए रखना कहीं अधिक आवश्यक रहेगा। हालांकि आंकड़े इशारा कर रहे हैं कि एथेनाल के मामले में भारत परिपक्व है, मगर सरकार को यह नहीं भूलना चाहिए कि यह पूरी तरह किसान आधारित है और उन्हें इस ऊर्जा में मदद के बदले आर्थिक शुचिता बनाए रखना होगा।
महत्त्वपूर्ण यह भी है कि देश में ऐसी कारें कम हैं, जो ई-20 पेट्रोल से चल सकती हैं। हालांकि कई कंपनियां अपनी गाड़ियां ई-20 ईंधन के अनुरूप बना रही हैं। पूरे देश में जैसे-जैसे ई-20 ईंधन का विस्तार होगा, इससे चलने वाली गाड़ियों का निर्माण भी उसी के अनुरूप होगा। स्पष्ट है कि जैव ईंधन और हरित ईंधन पर निर्भरता लगातार बढ़ रही है, जिसमें कृषि अर्थव्यवस्था और किसानों को सुदृढ़ करने के संदर्भ निहित रहेंगे। गौरतलब है कि केंद्रीय मंत्रिमंडल ने जनवरी में राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन को मंजूरी दी, जिसका उद्देश्य भारत को स्वच्छ ऊर्जा का केंद्र बनाना है। तेल की बढ़ती कीमतें और डालर के मुकाबले गिरता रुपया न केवल कच्चे तेल के लिए मुसीबत बनता है, बल्कि देश के जनमानस को भी इसकी कीमत चुकानी पड़ती है। हालांकि सस्ता कच्चा तेल मिलने के बावजूद देश की जनता को सरकार ने इसका लाभ नहीं दिया है। तेल का खेल सरकारें भी खूब खेलती हैं और इससे अपनी तिजोरी आसानी से भर पाने में सफल होती हैं। जीएसटी लागू होने के बावजूद पेट्रोल, डीजल तथा रसोई गैस समेत ह पदार्थ अब भी इसके दायरे से बाहर हैं, जिसके उतार-चढ़ाव से जनता की जेब ढीली होती रहती है।
यह विडंबना ही है कि जो तबका नीतियों से सबसे अधिक प्रभावित होता है और जिसके लिए अधिकांश नीतियां बनाई जाती हैं, वही हाशिये पर है। भारत का किसान अन्न उत्पादन करके इस मामले में देश को आत्मनिर्भर बना रहा है। आज वही, चाहे गन्ना किसान हो या अनाज उत्पादन करने वाला, ई-20 ईंधन को भी बड़ा मुकाम दे सकता है। मगर क्या उसकी आय दोगुनी करना सरकार के लिए संभव है। साल 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य सरकार ने रखा था, मगर इस पर कुछ खास पता नहीं चला। सरकार इस कसौटी को और कस कर देखे, क्या पता किसानों की किस्मत ई-20 ईंधन के ईर्द-गिर्द पलटी मारे और उनकी आय दोगुनी हो जाए? मगर सरकार पहले इस बात की भी पड़ताल कर ले कि उनकी पहले आय क्या थी? हालांकि दिसंबर 2018 से प्रधानमंत्री किसान सम्मान निधि के माध्यम से प्रति चार महीने पर जो दो हजार रुपए सीमांत किसानों के खाते में जाते हैं, अब वे भी कई नई समस्याओं के चलते मामूली हो गए हैं।
गौरतलब है कि सरकार ने एथेनाल युक्त तेल को 2030 तक जारी करने का लक्ष्य रखा था, मगर इसे अभी शुरू कर दिया गया है। सात साल पहले लक्ष्य तक पहुंचने का जो श्रेय सरकार को जाता है, उसमें एथेनाल के लिए कच्चा माल उपलब्ध कराने वालों को भी निहित समझा जाए। 2013-14 की तुलना में आज एथेनाल का उत्पादन छह गुना तक बढ़ा है, जिससे लगभग चौवन हजार करोड़ रुपए की विदेशी मुद्रा बची है। इस स्थिति को देखते हुए सरकार ने 2025 तक देश में पूरी तरह ई-20 ईंधन की बिक्री का लक्ष्य रखा है। इसमें कोई दो राय नहीं कि एथेनाल इक्कीसवीं सदी के भारत की एक प्रमुख प्राथमिकता बन चुका है, क्योंकि यह पर्यावरण और किसानों के जीवन पर बेहतर प्रभाव डाल सकता है।
Date:27-03-23
भाषा पर सियासतसंपादकीय
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने भारतीय भाषाओं को समर्थन देने की पर्याप्त कोशिश नहीं करने और स्वार्थ के लिए उनके साथ ‘खेला’ करने का राजनीतिक दलों पर आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि गांवों, पिछड़े वर्ग के लोगों और गरीबों को ये दल चिकित्सक या इंजीनियर बनते नहीं देखना चाहते। प्रधानमंत्री मोदी ने कर्नाटक के चिक्कबल्लापुर जिले में मुद्देनहल्ली के सत्य साई ग्राम में निशुल्क स्वास्थ्य सेवाओं के लिए स्थापित ‘श्री मधुसूदन साई इंस्टीटयूट ऑफ मेडिकल साइंसेज एंड रिसर्च का शनिवार को उद्घाटन करते हुए कहा कि कन्नड़ समृद्ध भाषा है। पहले की सरकारों ने कन्नड़ में मेडिकल, इंजीनियरिंग शिक्षा की दिशा में कदम नहीं उठाया, बल्कि राजनीतिक स्वार्थ के लिए, वोट बैंक की राजनीति के लिए भाषाओं का ‘खेल’ खेला। प्रधानमंत्री ने कहा कि उनकी सरकार ने कन्नड़ समेत भारतीय भाषाओं में मेडिकल शिक्षा का विकल्प दिया है। मेडिकल क्षेत्र को विशेष तवज्जो दिए जाने की बात कहते हुए उन्होंने बताया कि 2014 से पहले देश में 380 से कम मेडिकल कॉलेज थे जिनकी संख्या बढ़कर आज 650 हो गई है। बेशक, 2014 के बाद से सरकार ने चिकित्सा क्षेत्र पर खासा ध्यान केंद्रित किया है। आधारभूत ढांचा तैयार करने की दिशा में तेजी से कार्य हुआ। यही कारण है कि सरकार दम भर रही है कि आने वाले दस सालों में जितने डॉक्टर तैयार होंगे उनकी संख्या बीते 75 साल के दौरान तैयार हुए चिकत्सकों की कुल संख्या से ज्यादा होगी। चिकित्सा और इंजीनियरिंग शिक्षण के लिए आधारभूत ढांचा जितना महत्त्वपूर्ण मुद्दा है, शिक्षण का भाषा का माध्यम भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। इस मामले में कोई पूर्वाग्रह या दुराग्रह नहीं होना चाहिए। जो छात्र प्रतिभाशाली हैं, उन्हें उस भाषा में पढ़ाई करने की सुविधा होनी चाहिए जिसमें वे पढ़ना चाहते हैं। इस दृष्टि से प्रधानमंत्री का कथन निश्चित ही वंचित तबकों के छात्रों के लिए सुखकारी है। लेकिन तकनीकी शिक्षण में दरपेश व्यावहारिक पक्ष पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। देखा गया है तकनीकी विषयों से संबंधित पाठय पुस्तकें अंग्रेजी के अलावा अन्य भाषाओं में बनिस्बत कम ही होती हैं। रेफरेंस के लिए भी ज्यादातर पुस्तकें अंग्रेजी में हैं। छात्रों को मनचाहे माध्यम से पढ़ाई में निश्चित ही अड़चन का सामना होगा। शिक्षण के माध्यम में विकल्प होने से निश्चित ही लेवल प्लेइंग फील्ड जैसी आदर्श स्थिति होगी। अलबत्ता, सबसे बड़ी चुनौती छात्रों के चयनित विषय में पाठयपुस्तकें मुहैया कराने के मामले में होगी।
Date:27-03-23
बयानबाजी और मानहानिविनीत नारायण
राहुल गांधी के ताजा विवाद पर पक्ष और विपक्ष तलवारें भांजे आमने-सामने खड़ा है। इस विवाद के कानूनी और राजनैतिक पक्षों पर मीडिया में काफी बहस चल रही है। इसलिए उसकी पुनरावृत्ति यहां करने की आवश्यकता नहीं है। पर इस विवाद के बीच जो विषय ज्यादा गंभीर है, उस पर देशवासियों को मंथन करने की जरूरत है। चुनाव के दौरान पक्ष और प्रतिपक्ष के नेता सार्वजनिक रूप से एक दूसरे पर अनेक आरोप लगाते हैं, और उनके समर्थन में अपने पास तमाम सबूत होने का दावा भी करते हैं। चुनाव समाप्त होते ही यह खूनी रंजिश प्रेम और सौहार्द में बदल जाती है। न तो वो प्रमाण कभी सामने आते हैं, और न ही जनसभाओं में उछाले गए घोटालों को तार्किक परिणाम तक ले जाने का कोई गंभीर प्रयास सत्ता पर काबिज हुए नेताओं द्वारा किया जाता है। कुल मिलाकर सारा तमाशा मतदान के आखिरी दिन तक ही चर्चा में रहता है, और फिर अगले चुनावों तक भुला दिया जाता है।
हमारे लोकतंत्र की परिपक्वता का यह एक उदाहरण है, जो हम आजादी के बाद से आज तक देखते आए हैं। हालांकि चुनावों में धन तंत्र, बल तंत्र और हिंसा आदि के बढ़ते प्रयोग ने लोकतंत्र की अच्छाइयों को काफी हद तक दबा दिया है। पिछले चार दशकों में लोकतंत्र को पटरी में लाने के अनेक प्रयास हुए पर उनमें विशेष सफलता नहीं मिली। फिर भी हम आपातकाल के अठारह महीनों को छोड़ कर कमोबेश संतुलित राजनैतिक माहौल में जी रहे थे। दुर्भाग्य से पिछले कुछ वर्षो में राजनीति की भाषा में बहुत तेजी से गिरावट आई है, और इस गिरावट का सूत्रपात्र सत्ता पक्ष के दल और संगठनों की ओर से हुआ है।
‘ट्रॉल आर्मी’ एक नया शब्द अब राजनैतिक पटल पर हावी हो गया है। किसी भी व्यक्ति को उसके पद, योग्यता, प्रतिष्ठा, समाज और राष्ट्र के लिए किए गए योगदान आदि की उपेक्षा करके यह ‘ट्रॉल आर्मी’ उस पर किसी भी सीमा तक जाकर अभद्र टिप्पणी करती है। माना जाता है कि हर क्रिया की विपरीत और समान प्रक्रिया होती है। परिणामत: अपने सीमित संसाधनों के बावजूद विपक्षी दलों ने भी अपनी-अपनी ‘ट्रॉल आर्मी’ खड़ी कर ली हैं। कुल मिलाकर राजनैतिक वातावरण शालीनता के निम्न स्तर स्तर पर पहुंच गया है। हर वक्त चारों ओर उत्तेजना का वातावरण पैदा किया जा रहा है, जो राष्ट्र के लिए बहुत अशुभ लक्षण है। इससे नागरिकों की ऊर्जा रचनात्मक और सकारात्मक दिशा में लगने की बजाय विनाश की दिशा में लग रही है। पर लगता है कि राष्ट्रीय नेतृत्व को इस पतन की कोई चिंता नहीं है।
जिस आरोप पर सूरत की एक अदालत ने राहुल गांधी को इतनी कड़ी सजा सुनाई है, उससे कहीं ज्यादा आपराधिक भाषा का प्रयोग पिछले कुछ वर्षो में सत्ताधीशों द्वारा सार्वजनिक मंचों पर बार-बार किया गया है। मसलन, किसी भद्र महिला को ‘जर्सी गाय’ कहना, किसी राज्य की मुख्यमंत्री को उस राज्य के हिजड़ों की भाषा में संबोधन करना, किसी बड़े राजनेता की महिला मित्र को ‘50 करोड़ को गर्ल फ्रेंड’ बताना, किसी बड़े राष्ट्रीय दल के नेता का बार-बार उपहास करना और उसे समाज में मूर्ख सिद्ध करने के लिए अभियान चलाना, किसी महिला सांसद को सांकेतिक भाषा में सूर्पनखा कह कर मजाक उड़ाना। ये कुछ उदाहरण हैं यह सिद्ध करने के लिए कि ऊंचे पदों पर बैठे लोग सामान्य शिष्टाचार भी भूल चुके हैं। यहां 1971 के भारत-पाक युद्ध के समय की एक घटना का उल्लेख करना उचित होगा। जब पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो ने भारत के संदर्भ में घोषणा की थी कि वे भारत से एक हजार साल तक लड़ेंगे। भारत की तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने रामलीला मैदान में एक विशाल जनसभा में पाकिस्तान या भुट्टो का नाम लिए बिना भुट्टों के कथन का बड़ी शालीनता से जवाब दिया था, ‘वे कहते हैं कि हम एक हजार साल तक लड़ेंगे, हम कहते हैं कि हम शांतिपूर्ण सहअस्तित्व से रहेंगे।’ ऐसे तमाम उदाहरण हैं, जब भारत के प्रधानमंत्रियों ने अपने ऊपर तमाम तरह के आरोपों और हमलों को सहते हुए भी अपने पद की मर्यादा का उल्लंघन नहीं किया। चाहे वे किसी भी दल से क्यों न आए हों। क्योंकि प्रधानमंत्री पूरे देश का होता है, किसी दल विशेष का नहीं। इस मर्यादा को पुन: स्थापित करने की आवश्यकता है। भगवान श्री कृष्ण गीता में कहते हैं : ‘यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जन:। स यत्प्रमाणं कुरु ते लोकस्तदनुवर्तते।।(3.21)’ अर्थात श्रेष्ठ पुरुष जैसा आचरण करता है, अन्य लोग भी वैसा ही अनुकरण करते हैं।
इस संदर्भ में सबसे ताजा उदाहरण जम्मू कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा का है, जिन्होंने पिछले हफ्ते ग्वालियर के एक शैक्षिक संस्थान में छात्रों को संबोधित करते हुए कहा, ‘गांधी जी के पास लॉ की कोई डिग्री नहीं थी। क्या आप जानते हैं कि उनके पास एक भी यूनिर्वसटिी की डिग्री नहीं थी। उनकी एकमात्र योग्यता हाई स्कूल डिप्लोमा थी।’ बीएचयू, वाराणसी के इंजीनियरिंग ग्रेजुएट का गूगल युग में ऐसा अहमक बयान किसके गले उतरेगा? जबकि सारा विश्व जानता है कि गांधी जी कितने पढ़े-लिखे थे और उनके पास कितनी डिग्रियां थीं? सिन्हा के इस वक्तव्य से करोड़ों देशवासियों की भावनाएं आहत हुई हैं। क्या देश भर की अदालतों में सिन्हा के खिलाफ मानहानि के मुकदमे दायर किए जाएं या राष्ट्रपति महोदया से अपने अधिकार का प्रयोग करते हुए उन्हें पद मुक्त किए जाने की अपील की जाए? क्योंकि मनोज सिन्हा कोई बेपढ़े-लिखे आम आदमी नहीं हैं, बल्कि एक संवैधानिक पद को सुशोभित कर रहे हैं।
जब शासन व्यवस्था में सर्वोच्च पदों पर बैठे व्यक्तियों की भाषा में इतना हल्कापन आ चुका हो और वे गैर-जिम्मेदारी से बोल रहे हों तो यह पूरे देश के लिए खतरे की घंटी है। इसे दूर करने के लिए राग-द्वेष के बिना समाज के हर वर्ग और राजनैतिक दल के नेताओं को सामूहिक निर्णय लेना चाहिए कि ऐसी गैर-जिम्मेदाराना शब्दावली के लिए भारतीय लोकतंत्र में कोई स्थान नहीं होगा। अन्यथा अभद्र भाषा की परिणति निकट भविष्य में पारस्परिक हिंसा के रूप में हर जगह दिखने लगेगी। यदि ऐसा हुआ तो देश में अराजकता फैल जाएगी जिसे नियंत्रित करना किसी भी सरकार के बस में नहीं होगा।
Date:27-03-23
हमारा चंद्रयानसंपादकीय
अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा ने पृथ्वी की एक तस्वीर जारी की है, जिसमें भारत रात के वक्त भी खूब चमक रहा है। यह चमक ऐसी है, मानो अंतरिक्ष से कोई भी देखे, तो आकर्षित हो जाए। अंतरिक्ष शुरू से ही जिज्ञासा और अनुसंधान का केंद्र रहा है। मगर एक तथ्य यह भी है कि भारत का अंतरिक्ष अभियान अभी समय से कम से कम दस साल पीछे चल रहा है। ऐसे में, भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) के अध्यक्ष एस सोमनाथ की ताजा घोषणाएं किसी खुशखबरी से कम नहीं हैं। पहली घोषणा यह है कि भारत का तीसरा चंद्र मिशन चंद्रयान-3 पूरी तरह से तैयार है और संभवत: इस साल के मध्य तक लॉन्च कर दिया जाएगा। इसरो प्रमुख ने अहमदाबाद में आयोजित चौथे भारतीय ग्रह विज्ञान सम्मेलन में यह घोषणा की है। अंतरिक्ष और ग्रहों की खोज के लिए भारतीय क्षमता आज एक जरूरी विषय है, जिस पर सभी अंतरिक्ष वैज्ञानिकों को पूरे मनोयोग से काम करना चाहिए। पिछले महीने से ही यह संकेत मिलने लगे थे कि चंद्रयान-3 पूरी तरह से तैयार है। लगातार परीक्षणों के बाद वैज्ञानिकों में यह विश्वास पैदा हुआ है कि चंद्र अभियान में इस बार कोई कमी नहीं रहेगी।
दूसरी महत्वपूर्ण घोषणा भारत के पहले सौर अभियान को लेकर है। आदित्य-एल1 भारत का पहला सौर अभियान है, इसे भी इसी साल के मध्य तक लॉन्च किया जाएगा। यह सूर्य को करीब से देखने की एक कोशिश है और अगर यह अभियान सफल रहा, तो भारत अंतरिक्ष विज्ञान में अलग श्रेणी के देशों में शामिल हो जाएगा। भारतीय वैज्ञानिक ही नहीं, बल्कि दुनिया के अन्य वैज्ञानिक भी इस सौर अभियान के नतीजों का इंतजार करेंगे। डॉक्टर सोमनाथ ने विश्वास जताया है कि हम इस अभियान को बड़ी सफलता दिलाएंगे। बहरहाल, सौर अभियान से ज्यादा महत्वपूर्ण हमारे लिए चंद्र अभियान है। चंद्रयान-1 पूरी तरह सफल रहा था, लेकिन चंद्रयान-2 की विफलता ने हमें एक तरह से पीछे धकेल दिया और अब चंद्रयान-3 की सफलता हर हाल में सुनिश्चित रहने में ही देशहित है। ऐसे अभियान जब सफल होते हैं, तब दुनिया में मजबूती का संदेश जाता है और जब नाकाम होते हैं, तब प्रतिकूल देशों को हंसने का मौका मिलता है। ऐसा चंद्रयान-2 के समय हुआ था। इसमें कोई संदेह नहीं कि वैज्ञानिकों को पूरी चुनौती स्वीकार करते हुए अंतरिक्ष अभियान को तेज करना चाहिए। यहां दूसरे देशों से प्रतिस्पद्र्धा का भाव जरूरी है। गौर करने की बात है कि जब से अंतरिक्ष में रूस और अमेरिका की होड़ खत्म हुई है, तब से कोई इंसान चांद पर नहीं गया है।
इसरो के अनुसार, चंद्रयान-3 की संरचना चंद्रयान-2 की तरह ही होगी। यह ऑर्बिटर, लैंडर और रोवर से लैस होगा। हालांकि, इस यान पर पिछले यान की तुलना में कम भार होगा। यहां प्राथमिक उद्देश्य लैंडर को चंद्रमा की कक्षा में ले जाना और उसे वहां सतह पर उतारना होगा। चंद्र अभियान के मामले में विगत दिनों में अमेरिका, जापान, चीन के अंतरिक्ष केंद्र कहीं बेहतर काम कर रहे हैं। चीन तो सबसे ज्यादा तेजी से आगे बढ़ रहा है। उसने अमेरिकी तकनीक से काफी कुछ सीखा है। भारत को भी मित्र देशों के साथ मिलकर अंतरिक्ष अभियान को तेज करना चाहिए। जापान के साथ भारत सहयोग करके चल सकता है। अमेरिका से भी हम सहयोग ले सकते हैं। अमेरिका चांद पर इंसानों को उतारने के अभियान में बहुत आगे बढ़ गया है, अब अंतरिक्ष यात्रियों के नाम की घोषणा का इंतजार है।
Date:27-03-23
उद्यमिता और नैतिकता को अगर हम संस्कृति बना लेंनन्दितेश निलय, ( जीवन मूल्य प्रशिक्षक )
यह वाकया 1973 का है, जब बांग्लादेश अकाल से जूझ रहा था। लोग इसलिए नहीं मर रहे थे कि वे किसी और की रोटी छीन नहीं पा रहे थे, बल्कि इसलिए कि उनकी थाली खाली थी। यही खालीपन उस शख्स को भी घेरे हुए था, जिसे आज ‘फादर ऑफ माइक्रो फाइनेंस’ कहा जाता है। जी हां, हम जिक्र कर रहे हैं मोहम्मद यूनुस का, जिन्हें उद्यमशीलता के लिए 2006 में नोबेल शांति पुरस्कार मिला था। मोहम्मद यूनुस बांग्लादेश में अर्थशास्त्र के प्रोफेसर थे। नौकरी छोड़ वह उद्यमी बन बैठे और जोहरा गांव को ही अपनी कार्यशाला बना लिया। माइक्रो फाइनेंस और ग्रामीण बैंक की शुरुआत की। लोग अपने पैरों पर खड़े हों और आत्मनिर्भर बनें, यही उद्यमशीलता की संस्कृति है। वह उसी जीवन मूल्य से प्रभावित हो रही थी, जिसकी चर्चा करते हुए स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि सिर्फ बुद्धि से दुनिया नहीं बनती, बल्कि दया और प्रेम से बनती है।
अगर हम भारत के संदर्भ में, और खासकर उत्तर भारत के कुछ राज्य बिहार और उत्तर प्रदेश को देखें, तो यह पाएंगे कि इन राज्यों में बेरोजगारी और गरीबी की समस्या शुरू से रही है और सिर्फ सरकार इस समस्या को दूर नहीं कर सकती। उत्तर भारत भी दक्षिण भारत की तरह एक सिलिकॉन वैली बन जाए और जिस तरह से ग्रेटर नोएडा व राजगीर जैसे उत्तर भारत के शहरों में तकनीक और पर्यटन का बदलाव नजर रहा है, यह उद्यमशीलता के लिए शुभ संकेत है। बिहार में सामाजिक उद्यमिता को लेकर शोध पत्र ‘समृद्धि : अ केस ऑफ इंटीग्रेटेड सोशल एंट्रप्रेनरशिप इन बिहार’ में संपन्नता को एक सामाजिक उद्यम के रूप में परखा गया है। बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में कैसे स्वरोजगार के सुनहरे अवसर पैदा करने के लिए पर्याप्त जगह मिले, जिससे वहां के लोगों की जीवन-शैली को समृद्ध और बेहतर बनाया जा सके?
अगर हम देश के स्तर पर देखें, तो स्टार्टअप इंडिया सीड फंड स्कीम और स्टार्टअप इंडिया, दो सबसे बड़ी सरकारी योजनाएं हैं। अन्य योजनाओं में प्रधानमंत्री मुद्रा योजना, स्टैंडअप इंडिया स्कीम और वेंचर कैपिटल असिस्टेंस स्कीम शामिल हैं। सरकारों ने बहुत प्रयास किए हैं, पर हमें मानना चाहिए कि पिछड़े इलाकों में उद्यमशीलता की संस्कृति को हम सब अपनी जीवन-शैली का हिस्सा नहीं बना पाए हैं। इसके कई कारण हो सकते हैं। आजादी के बाद श्रम निम्न वर्ग के हिस्से आया और उच्च मध्य वर्ग ने सुरक्षित नौकरी को सुरक्षा कवच बना लिया। उत्तर भारत की मानसिकता में अभी भी नौकरी ही स्वीकार्य है। यहीं से समाज में सिर्फ अपने लिए सोचना हमने सीखा है। उद्यमशीलता हमें सभी के बारे में सोचने को मजबूर करती है। यह हमसे संवेदना व नेतृत्व की आशा करती है, पर हम तो उससे दूर रहे हैं।
उद्यमशील व्यक्ति सिर्फ नौकरी नहीं देता, सरकारों के लिए एक मजबूत पुल भी बनता है। वह पुल तभी मजबूत रहता है, जब राजनीति समाज के हर व्यक्ति को साथ लेकर चले। बिहार तो सत्याग्रह की भूमि है और प्रथम विद्रोह की भी, पर यहां एक बड़ा तबका जहां सरकारी नौकरी की ओर मुड़ा, वहीं गरीब तबका दूसरे राज्यों में मजदूरी के लिए चल पड़ा। यह पलायन सामाजिक व्यवहार का हिस्सा बन गया। आज इन क्षेत्रों में क्या गांधीजी का दृष्टिकोण कारगर नहीं हो सकता? क्या हम यहां स्वास्थ्य और शिक्षा को उच्च प्राथमिकता नहीं दे सकते? हमें सीखना चाहिए, कभी खूब लड़ने-भिड़ने वाले जापान ने कैसे नैतिकता और उद्यमशीलता को संस्कृति का हिस्सा बना दिया। देश के अपेक्षाकृत पिछड़े क्षेत्रों के विकास के लिए स्थानीय योग्य लोगों को आगे आना होगा। एक सच्ची कथा मुझे याद आ रही है। एक डॉक्टर अपने परिवार के साथ अमेरिका में सुख से थे। उन्हें जन्मदिन पर पिता के पत्र का इंतजार रहता था। एक बार पत्र आया, पिता चाहते थे कि बेटा देश-समाज के प्रति कर्तव्य समझे और वापस भारत आए। उस डॉक्टर ने अपने विदाई भाषण में कहा, जो हिन्दुस्तान में पला-बढ़ा है, वही समझ सकता है कि पिता की इच्छा और उनका आदेश एक पुत्र के लिए क्या होता है। वह डॉक्टर अपोलो हॉस्पिटल के संस्थापक प्रताप सी रेड्डी हैं, जिनका भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र को बदलने में बड़ा योगदान है। हम यदि जरूरत समझ लें, तो बदलाव तय है।
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नेताओं को पूरे दिल से राजनीति करनी चाहिए। यही उनका पेशा है, और इसके लिए निष्ठावान रहना उनका कर्तव्य है। इस कथन का कारण आज के नेताओं की राजनीति और नैतिकता को सामान्यतः हानिकारक और स्वार्थपरक माना जाता है। लेकिन राजनीतिक वर्ग में राजनीति के साथ वैधता को लेकर बड़ा द्वंद चलता रहता है। ऐसा माना जाता है कि एक नेता को पूरे मन से राजनीति को अपना कर्तव्य मानकर करना चाहिए। लेकिन जहाँ नैतिकता और राजनीतिक दांवपेंचों के बीच भेद करने का अवसर आता है, वहाँ समस्या खड़ी हो जाती है। क्या इसका अर्थ यह समझा जाए कि राजनीति में नैतिकता की कोई गुंजाइश नहीं है?
चुनाव की धुरी पर घूमती राजनीति –
राजनीति को नैतिकताविहीन देखने की शुरूआत हाल ही में हुई है। गांधी के राष्ट्रीय आंदोलनों में राजनीति को आध्यात्मिकता से जोड़कर देखा जाता रहा। स्वयं गांधी, राजनीति को सत्याग्रही का नैतिक कर्तव्य मानते थे। ऐसी आदर्शवादी राजनीति की झलक संविधान सभा की चर्चाओं में भी मिलती है। शायद यही कारण है कि संविधान की प्रस्तावना में राजनीति को न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व जैसे समतावादी सामाजिक मूल्य प्राप्त करने के लिए एक वैध तंत्र के रूप में माना गया है।
सन् 1950 के दशक में प्रतिस्पर्धावाली चुनावी राजनीति की शुरूआत के साथ ही राजनीति के अर्थों में दो बड़े परिवर्तन हुए। (1) राजनीतिक दलों ने राजनीति को नैतिक आदर्शवाद से अलग नहीं किया। लेकिन राजनीतिक अस्तित्व बनाए रखने के लिए चुनाव जीतना जरूरी हो चला। (2) दलों ने विचारधारा का इस्तेमाल सत्ता और पदों की होड़ को सही ठहराने के लिए करना शुरू कर दिया।
इंदिरा गांधी के समय लगा आपातकाल (1975-77) इसका एक अच्छा उदाहरण है। आपातकाल को देश के विकास और उपलब्धि के लिए सही ठहराया गया। विपक्ष की आलोचना की गई। यहाँ तक कि उन पर देश विरोधी राजनीति करने के आरोप लगाए गए। इसके साथ ही चुनावों में जीत की होड़ ने टिकट आवंटन से लेकर बूथ पर कब्जा, जातिध्धर्म की राजनीति जैसे शक्ति-प्रदर्शन का बोलबाला कर दिया।
संविधान ही अंतिम लक्ष्य –
सन् 1990 के दशक से भारतीय अर्थव्यवस्था के वैश्वीकरण के साथ ही राजनीति का लोकप्रिय प्रतिनिधित्व प्रभावित हुआ। शीत युद्ध की समाप्ति और यूएसएसआर के विघटन ने एक ऐसा वातावरण बनाया, जिसमें राजनीतिक विचारधारा अपेक्षाकृत कम महत्वपूर्ण हो गई। बाजार अर्थव्यवस्था के पक्ष में राजनीतिक सहमति आकार लेने लगी। इस संदर्भ में, राजनीतिक वर्ग संविधान को नैतिकता के अंतिम स्रोत के रूप में पहचानने लगे। संविधान को आदर्शवादी दस्तावेज या ‘पवित्र पुस्तक’ के रूप में स्थान दिया जाने लगा। इसका कारण राजनीतिक वर्ग को नैतिकता से जोड़े रखना था। हालांकि चुनाव आधारित राजनीति या सार्वजनिक जीवन में नैतिक मूल्यों को बनाए रखने के लिए यह काम नहीं आया।
राजनीतिक दल अब हमें यह विश्वास दिलाना चाहते हैं कि राजनीति और संविधान, दो अलग-अलग संस्थाएं है। संविधान आदर्श है, जबकि राजनीति वास्तविकता है।
राजनीति की असैद्धांतिक और दोगली परिभाषा का व्यापक प्रसार करके यह सिद्ध करने का प्रयत्न किया जा रहा है कि इसमें नैतिकता के लिए कोई जगह नहीं है। यह सच नहीं है।
समकालीन भारत के जन-आंदोलन एक बहुत अलग तरह की राजनीति का प्रतिनिधित्व करते हैं। ये आंदोलन जाति, वर्ग, लिंग और सांप्रदायिकता के मुद्दों को उठाते हैं, ताकि न्याय, और समानता की राजनीति की जा सके।
राजनीति का यह संस्करण संविधान से ही प्रेरणा लेता है। यह हमें याद दिलाता है कि यह राजनीति केवल चुनावी प्रतिस्पर्धा नहीं है, बल्कि यह संभावनाओं का क्षेत्र है, अकल्पनीय के बारे में सोचने की कला है, और असंभव प्रतीत होने वाली चीजों को प्राप्त करने का दृढ़ विश्वास है।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित हिलाल अहमद के लेख पर आधारित। 27 फरवरी, 2023
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Date:25-03-23
1 Good Law, 1 BadRahul’s disqualification correct, defamation law problematicTOI Editorials
The law took its course. Wayanad MP Rahul Gandhi stands disqualified following conviction in a defamation case where a Gujarat court gave him two years jail – the conviction and sentence together disqualify him from Parliament. Gandhi can contest in the 2024 Lok Sabha elections only if his conviction is suspended/overturned, or if appellate courts reduce the jail term. Gandhi had, in 2013, rightly opposed a UPA ordinance to dilute a judicial verdict – the Supreme Court had junked a leeway in law that protected MPs from disqualification while their case was in appeal. His stand was forward-looking as a measure to protect democratic integrity. Criminalisation of politics in India is a serious concern. Almost 30% of 2019 Lok Sabha members stood accused of serious crimes such as corruption and murder; MPs disqualified have been convicted of graft, murder, smuggling, sexual assault and hate speech. Not the disqualification law, but the defamation law is where the rub is. There is no place for criminal defamation in a modern world. In 2016, after SC refused pleas to decriminalise defamation from three MPs, a bill on the same was introduced in Lok Sabha in 2017 by BJD’s Tathagata Satpathy. One way of looking at this particular case is that politicians must develop a thick skin to prevent burns from the scalding heat of campaigning – voters are smarter than to swallow breathing-fire rhetoric. That said, given the highly competitive political system, there’s a case for politicians to dial down on coarse political speeches too. As Gandhi appeals his case, there should be no disquiet among opposition about the disqualification law. But on decriminalising defamation, there is plenty to be done by Parliament or by the courts, to end a law bad in spirit and practice.
Date:25-03-23
Chilling effectCongress leader Rahul Gandhi’s conviction and jail term flags need to abolish criminal defamationEditorial
The rigours of the law and the tribulations of politics have come together to bedevil Congress leader Rahul Gandhi. An election-time jibe he had made in 2019 — ‘how come all of these thieves have Modi in their names?’ — has been declared by a court in Surat to be defamatory. Mr. Gandhi has been sentenced to two years in prison, the maximum sentence for criminal defamation, and disqualified from his membership in the Lok Sabha. Both the conviction and sentence raise legal questions. Does the remark amount to defaming anyone in particular, or to people with the surname ‘Modi’ as a group? Case law indicates that the expression ‘collection of persons’ used in Section 499 of the IPC, with reference to those who can be defamed, has to be an identifiable class or group and that the particular member who initiates criminal proceedings for defamation must demonstrate personal harm or injury by the alleged defamatory statement. It is difficult to sustain the argument that all those with the surname, and not merely the three individuals including Prime Minister Narendra Modi who were referred to, can be aggrieved persons. Also, it is not clear if the complainant, BJP MLA Purnesh Modi, had shown that he was aggrieved by the alleged slur either personally or as a member of the ‘Modi’ group.
The maximum sentence is also troubling. Statutes prescribe maximum jail terms so that trial courts use their discretion to award punishments in proportion to the gravity of the crime. It is questionable whether attacking an indeterminate set of people with a general remark will amount to defamation, and even if it did, whether it is so grave as to warrant the maximum sentence. The correctness of the judgment will be decided on appeal, but the political cost to Mr. Gandhi in the form of disqualification from the House and from electoral contest will have a lasting impact, unless he obtains a stay on the conviction rather than mere suspension of sentence. In a country that often frets over criminalisation of politics, corruption and hate speeches, it is ironic that criminal defamation should overwhelm the political career of a prominent leader. A modern democracy should not treat defamation as a criminal offence at all. It is a legacy of an era in which questioning authority was considered a grave crime. In contemporary times, criminal defamation mainly acts as a tool to suppress criticism of public servants and corporate misdeeds. In 2016, the Supreme Court upheld criminal defamation without adequate regard to the chilling effect it has on free speech, and to that, one must now add, political opposition and dissent. Opposition parties expressing dismay at the verdict against Mr. Gandhi should include abolishing criminal defamation in their agenda.
Date:25-03-23
कृषि वैज्ञानिकों को शोध की दिशा बदलनी होगीसंपादकीय
पयकिरण परिवर्तन का सबसे बड़ा असर कृषि पर पड़ रहा है। मार्च में बारिश हुई। बाकी कसर आंधी और ओलों ने पूरी कर दी। देश के बड़े हिस्से में खड़ी गेहूं और सरसों की फसल बर्बाद हो गई जबकि अंगूर, आम, धनिया, मिर्च और जीरा की फसलों पर भारी असर हुआ। पिछले वर्ष इससे उल्टा हुआ था। मार्च में जबरदस्त गर्मी पड़ी और पैदावार प्रभावित हुई। वर्ष 2021-22 में सितंबर से जनवरी तक समय-समय पर बारिश होती रही, लिहाजा धान की लहलहाती फसल खेतों में सड़ गई और रबी की फसलों पर असर पड़ा। इन तीन वर्षों का रिकॉर्ड बताता है कि दुनिया में हो रहे पर्यावरण परिवर्तन का पहला और सीधा असर मौसम की अनिश्चितता के रूप में हुआ है। खड़ी फसलों की बर्बादी का मतलब है किनों के की ही नहीं खाद-बीज पानी पर हुए खर्च की भी क्षति भारत में अधिकांश खेती बटाईदार खेत मजदूर करता है जबकि असली मालिक शहरों में रहता है। कोई भी सरकार लागत, श्रम के साथ खेत का किराया मुआवजे में नहीं दे सकती लिहाजा खेती के लिए आने वाला समय संकट का होगा। देश और दुनिया के कृषि वैज्ञानिकों को अपने शोध की दिशा बदलते मौसम के अनुरूप बदलनी होगी। पर्यावरण परिवर्तन वैश्विक मसला है और हल भी पूरी दुनिया को संयुक्त रूप से ना होगा लिहाजा भारत की पहली जरूरत है। कृषि की, जिससे देश के 62% लोग जुड़े हैं, इसके दुष्प्रभावों से सुरक्षित करना।
Date:25-03-23
सियासी शह-मात के खेल में कृपया संसद को न उलझाएयोगेंद्र नारायण,( पूर्व महासचिव राज्यसभा )
“संसद में फिलहाल एक अजीब स्थिति बन गई है। आमतौर पर होता यह है कि विपक्षी दल के सदस्य सदन के वेल में आते हैं या नारेबाजी करते हैं, मगर इस बार तो सत्ता पक्ष के सदस्य भी ऐसा ही कर रहे हैं और सदन नहीं चल रहा। यहां मुझे वे दो मामले याद आ रहे हैं, जब मैं राज्यसभा का महासचिव (साल 2002 से 2007 तक) था और सांसदों के इसी तरह के बर्ताव के बावजूद सदन अपना काम करने में सफल रहा था
पहली घटना 2003 की है। केंद्रीय सतर्कता आयोग (सीवीसी) की एक रिपोर्ट थी, जिसको संसद में पेश करने की मांग तत्कालीन विपक्षी पार्टी कांग्रेस कर रही थी। मगर सीवीसी ने जब वह रिपोर्ट सभापति को सौंपी थी, तब उसने इसको सार्वजनिक न करने की गुजारिश की थी। फिर भी, सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों तरफ से बहस हुई और अंत में सभापति ने उस रिपोर्ट को सार्वजनिक न करने का फैसला किया। इसके विरोध में कांग्रेस ने वाकआउट किया। करीब 14 दिन कांग्रेस सांसद सदन से बाहर रहे, लेकिन उन्होंने संसदीय कामकाज में कोई रुकावट नहीं डाली। हालांकि, उस दौरान सत्तारूढ़ राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन का नेतृत्व कर रही भारतीय जनता पार्टी ने भी कोई बिल पेश नहीं किया, ताकि बिना बहस उसे सदन की मंजूरी न मिले।
इसी तरह, भाजपा सांसद मुरली मनोहर जोशी ने इलाहाबाद यूनिवर्सिटी को केंद्रीय विश्वविद्यालय बनाने को लेकर एक बिल पेश किया। कांग्रेस ने ‘इंट्रोडक्शन’ के समय ही उसका विरोध किया, क्योंकि उसका मानना था कि चुनावी वर्ष में इस तरह के विधेयक पेश नहीं किए जाने चाहिए। मगर तत्कालीन एनडीए सरकार अड़ी रही। तभी ऐन वक्त पर प्रणब मुखर्जी ने वोट की मांग कर दी। इस मतदान में सत्तारूढ़ गठबंधन को मात खानी पड़ी, क्योंकि उसके कई सदस्य उस समय सदन में नहीं, बल्कि इधर-उधर थे। दरअसल, ऐसी किसी वोटिंग से पहले पूरे संसद परिसर में तीन बार घंटी बजाई जाती है और आखिरी घंटी के बाद सदन का दरवाजा बंद कर दिया जाता है। इसके बाद मतदान होने तक न कोई अंदर जा सकता है और न बाहर आ सकता है। उस हार को सत्ता पक्ष ने खुशी-खुशी स्वीकार किया। संसद में शोरगुल के बीच भी बिल पास होते रहे हैं। लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति हंगामे के बीच बिल को सदन की मंजूरी दिलाने में सफल रहे हैं। मगर मौजूदा स्थिति में न तो विपक्ष को अपनी बात रखने का मौका मिल रहा है, और न सत्ता पक्ष कोई बिल पेश कर रहा है।
संसदीय व्यवस्था में संसद चलाने की जिम्मेदारी सरकार की होती है। इसमें लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति भी मदद करते हैं। मौजूदा गतिरोध को खत्म करने के लिए बैठकों का दौर शुरू हो गया था। मगर इनका कोई नतीजा निकलता, उससे पहले ही सूरत की एक अदालत ने राहुल गांधी को विवादित बोल के लिए दो साल की सजा सुना दी। नतीजतन, शुक्रवार को दिन चढ़ते-चढ़ते लोकसभा से उनकी सदस्यता जाने संबंधी अधिसूचना भी जारी हो गई। यह फैसला संविधान के अनुच्छेद 102 (1)(ई) के प्रावधानों और जन-प्रतिनिधित्व कानून-1951 की धारा 8 के तहत लिया गया है। इन सबसे सियासी तापमान स्वाभाविक ही बढ़ गया है। मगर विपक्ष को इसका नुकसान कहीं अधिक हो रहा है। फिलहाल बजट तो संसद से पास हो जाएगा, लेकिन अभी न प्रश्नकाल चल रहा है, जिसमें विरोधी दल के नेता सरकार से सवाल कर सकते हैं, और न किसी बिल पर वे अपनी बात रख पा रहे हैं।
ऐसे में, अब सांसदों को सदन चलाने को लेकर गंभीर हो जाना चाहिए। अडानी-हिंडनबर्ग रिपोर्ट पर संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) गठित करने की विपक्ष की मांग को बेशक सत्ता पक्ष न माने, लेकिन उसे इस मामले पर बहस के लिए तैयार हो जाना चाहिए। इससे विपक्षी दलों को भी अपनी बात रखने का मौका मिलेगा। रही बात सत्ता पक्ष द्वारा मांगी जा रही राहुल गांधी की माफी की, तो अब वह चूंकि लोकसभा सदस्य नहीं रहे, इसलिए सत्ता पक्ष भी अपनी यह जिद छोड़े और सदन को सुचारु रूप से चलने दे। जन-प्रतिनिधियों को यह समझना चाहिए कि सियासी शह और मात के खेल में जनता के हितों की कतई अनदेखी नहीं हो।
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25 March 2023
प्रश्न–403 – दुरूपयोग किये बिना असीम शक्ति रखना सद्गुण का सर्वोच्च प्रमाण है। स्पष्ट कीजिये।
(200 शब्द)
Question–403 – To have infinite power without misusing it is the highest proof of virtue. Explain.
नोट : इसका उत्तर आपको हमें नहीं भेजना है, यह आपके स्वयं के अभ्यास के लिए है।
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Date:24-03-23
शिक्षित – समृद्ध समाज में भी स्त्री उत्पीड़न नहीं रुक रहासंपादकीय
माना जाता है कि शिक्षा से मनुष्य गुणी होता है, जबकि गरीबी और अभाव-जनित मानसिकता शोषण को जन्म देती है। न्यूजीलैंड और दक्षिण कोरिया शिक्षित भी हैं और संपन्न भी, लेकिन वहां की महिलाएं पुरुषों की हिंसा की शिकार होने से इतना डर गई हैं कि वे शादी में रुचि नहीं रखतीं । न्यूजीलैंड की सरकार ‘लव बैटर’ अभियान चला रही है, क्योंकि यहां की हर तीसरी महिला घरेलू हिंसा या यौन उत्पीड़न की शिकार है। आधुनिक युग में परिवार और विवाह जैसी संस्थाएं भारत में भी बदल रही हैं और औपचारिक विवाह की जगह लिव-इन रिश्तों को भी कोर्ट ने मान्यता दे दी है, लेकिन बेंगलुरु जैसे शहरों में लगातार बढ़ते तलाक के मामलों के निपटारे के लिए अतिरिक्त कोर्स बनाई जा रही हैं। आधुनिक भारत में जहां शिक्षित महिलाएं आर्थिक रूप से भी मजबूत हुई हैं और अपनी पसंद से हमसफर भी चुन रही हैं, रिश्ते में आने के बाद उन्हें कई तरह की प्रताड़नाएं झेलनी पड़ रही हैं। एक सर्वे बताता है कि दक्षिण कोरिया की महिलाओं ने इन्हीं कारणों से बाकायदा एक आन्दोलन के तहत शादी और बच्चे पैदा करने में रुचि लेना बंद कर दिया है, जिससे इस देश में 30 साल से कम उम्र के 90 प्रतिशत युवा अविवाहित हैं। खतरा यह है कि ऐसी सोच के बाद कई देशों में आबादी अचानक काफी कम होने लगेगी, जो नई चिंता को जन्म देगी।
Date:24-03-23
चुनौती बनते विदेश में पलते खालिस्तानीश्रीराम चौलिया,( लेखक जिंदल स्कूल आफ इंटरनेशनल अफेयर्स में प्रोफेसर और डीन हैं )
आस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, कनाडा और अमेरिका में खालिस्तानी चरमपंथियों द्वारा भारतीय दूतावासों, प्रवासियों और मंदिरों पर घृणा से प्रेरित हमलों और अपराधों का सिलसिला साफ दर्शाता है कि एक सुनियोजित अंतरराष्ट्रीय अभियान चलाया जा रहा है। इस मुहिम का लक्ष्य पंजाब में अलगाववादी ताकतों को पुनर्जीवित करना है। पश्चिमी लोकतांत्रिक देशों को अड्डा बनाकर उग्रवादी प्रचार, वित्तीय अनुदान और हिंसक गतिविधियों को तेज करके पंजाब में दोबारा नफरत की आग लगाने की चेष्टा हो रही है। समस्या केवल यह नहीं है कि खालिस्तानी अतिवादियों को उदार पश्चिमी देशों में शरण मिल रही है, बल्कि यह भी है कि वहां की सरकारें इस खतरे की अनदेखी करने में लगी हैं। इस पूरे फसाद की जड़ वही पाकिस्तानी खुफिया एजेंसी आइएसआइ है, जो दशकों से विदेशी धरती पर खालिस्तान समर्थकों को तैयार करने में सक्रिय रही है। यह मामला गिने-चुने सिरफिरे खालिस्तानी कट्टरपंथियों का नहीं, बल्कि भारत के विरुद्ध एक बड़े विदेशी षड्यंत्र का है। समय की मांग यही है कि पंजाब में कानून एवं व्यवस्था को बनाए रखने के साथ ही आपसी भाईचारे को कायम रखते हुए पश्चिमी देशों में रचे जा रहे इस भारत विरोधी प्रपंच से सख्ती से निपटा जाए।
खालिस्तान समर्थकों को लेकर भारतीय एजेंसियां पश्चिमी देशों पर पैनी नजर रखती आई हैं। ऐसे तत्वों के नापाक मंसूबों की जानकारी भी समय-समय पर संबंधित देशों से साझा की गई है। इसी माह की शुरुआत में ब्रिटिश खुफिया एजेंसी एमआइ-5 को विरोध-प्रदर्शन योजनाओं के बारे मे पहले ही सचेत कर उन्हें रोकने का आग्रह किया गया था। कुछ ब्रिटिश गुरुद्वारों में खालिस्तान समर्थकों की ओर से भारत मे हिंसक कार्रवाइयों हेतु चंदा इकठ्ठा करने संबंधी गतिविधियों से भारतीय एजेंसियों को इनकी खबर मिलती रही है। कथित खालिस्तान को लेकर जनमत संग्रह के बारे में भी भारतीय एजेंसियों ने विदेशी एजेंसियों को आगाह किया है कि ऐसे जनमत संग्रह पंजाब को ‘भारतीय कब्जे से मुक्त करने’ के नाम पर आयोजित किए जाते हैं और यह भारत की संप्रभुता एवं राष्ट्रीय सुरक्षा पर आघात का खतरनाक षड्यंत्र है। भारतीय एजेंसियों की सक्रियता के बावजूद कई षड्यंत्रों का भंडाफोड़ इसलिए नहीं हो पाता, क्योंकि जिन देशों में ऐसी गतिविधियां संचालित होती हैं, वे खालिस्तान समर्थकों को अपनी सुरक्षा के लिए खतरा नहीं मानते। इन देशों में अधिकाधिक ध्यान इस्लामिक जिहादी आतंक पर दिया जाता है और रत्ती भर भी खालिस्तान से जुड़ी गतिविधियों पर नहीं रहता। खालिस्तान समर्थकों को खुली छूट है, क्योंकि वे इन देशों के नागरिकों और अधिष्ठानों पर हमले नहीं करते। चूंकि वे पश्चिमी देशों का सिरदर्द नहीं, तो वे भी अपनी पुलिस और तंत्र को उनके पीछे लगाने को प्राथमिकता नहीं देते। ऐसे में भारत इन देशों में और क्या करे जिससे हमारे सरोकारों को लेकर जागरूकता और समानुभूति बढ़े? वास्तव में, हमें इस मुद्दे को पश्चिमी देशों के साथ ‘सामरिक साझेदारी’ और सहयोग का अहम विषय बनाना होगा। जिन देशों ने भारत के साथ ‘खुफिया साझेदारी’ पर सहमति जताई है, उन्हें खालिस्तानी-पाकिस्तानी मिलीभगत पर केंद्रित संयुक्त कार्रवाई को प्राथमिकता देने के लिए तैयार करना होगा।
मित्र राष्ट्रों के साथ ‘सुरक्षा सहयोग’ का अर्थ अक्सर चीन के विरुद्ध हिंद-प्रशांत क्षेत्र में तालमेल या जिहादी संगठनों के विरुद्ध एकजुट होकर लड़ने से लगाया जाता है, किंतु चुनौतियां उससे भी परे हैं। जैसे अब पाकिस्तान प्रायोजित खालिस्तानी षड्यंत्रों में बढ़ोतरी हो रही है। ऐसे में हमें मित्र राष्ट्रों के साथ विशेष बातचीत के जरिये सहमति बनानी होगी ताकि भारतीय सुरक्षा कर्मी और जासूसों को इन देशों में अधिक सहजता से कार्य करने की सहूलियत मिले। इंटरनेट पर फैले खालिस्तान समर्थकों के बीच संपर्क, समन्वय और वित्तीय प्रवाह की रोकथाम को प्राथमिकता देकर संबंधित देश को भारत के साथ मिलकर उग्रवाद से लड़ने के लिए तैयार करना होगा। कनाडा, ब्रिटेन, अमेरिका और आस्ट्रेलिया पहले ही ‘फाइव आईज’ नामक खुफिया सहयोग गठबंधन के सदस्य हैं और यदि हम खालिस्तान समर्थकों पर केंद्रित इसी प्रकार की नई बहुपक्षीय पहल का प्रस्ताव रखें तो वह प्रभावी होगी। एक जिम्मेदार लोकतांत्रिक शक्ति होते हुए भारत पश्चिमी देशों के भीतर उनकी संप्रभुता का उल्लंघन नहीं कर सकता। खुद अपने हाथों मित्र राष्ट्रों की धरती पर दुश्मनों का खात्मा न ही करें तो बेहतर, क्योंकि संप्रभुता संवेदनशील मुद्दा है और हमें इन देशों से घनिष्ठ संबंध बनाए रखने होंगे ताकि चीनी प्रतिरोध के लिए भूराजनीतिक गठजोड़ मजबूत रहे। हमारी कूटनीतिक उपलब्धि यही होगी कि हम पश्चिमी राष्ट्रों को विश्वास में लेकर उनकी सहमति से खालिस्तान समर्थकों पर प्रहार करें।
लंदन स्थित भारतीय उच्चायोग पर बीते दिनों खालिस्तान समर्थक तत्वों के हमले के बाद भारत ने नई दिल्ली में ब्रिटिश उच्चायोग पर सुरक्षा घेरा घटाकर ‘जैसे को तैसा’ वाला संदेश जरूर दिया, लेकिन इससे कड़ी कार्रवाई अपरिपक्व होगी, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय राजनय में बड़ी शक्तियां सिर्फ एक बिंदु को लेकर ही व्यापक रणनीतिक संबंध खराब नहीं करतीं। अगर पश्चिमी लोकतांत्रिक देशों के साथ भारत के रिश्ते बिगड़ते हैं तो यह खालिस्तानियों और उनके पाकिस्तानी सूत्रधारों की विजय मानी जाएगी, जिससे चीन भी संतुष्ट होगा। ऐसे में हमें पश्चिमी देशों को साक्ष्य देकर समझाना होगा कि खालिस्तानी पृथक नहीं, बल्कि पाकिस्तानी कठपुतली हैं और उनके संबंध प्रतिबंधित अंतरराष्ट्रीय आतंकी संगठनों के साथ हैं। बब्बर खालसा इंटरनेशनल और खालिस्तान जिंदाबाद फोर्स जैसे संगठनों की लश्कर-ए-तोइबा जैसे खूंखार और प्रतिबंधित जिहादी संगठनों से निकटता की पुष्टि हो चुकी हैं। हमें पश्चिमी देशों को समझाना होगा कि रावण के दस सिर होते हैं और वे इक्का-दुक्का तीर चलाएंगे तो उससे काम नहीं बनेगा। आतंकवाद को समग्र रूप से दिखाना और उसकी हर अभिव्यक्ति के विरुद्ध ठोस कार्रवाई कराना हमारी कूटनीति की अग्निपरीक्षा होगी।
Date:24-03-23
राहुल गांधी को सजासंपादकीय
मानहानि के मामले में सूरत की एक अदालत ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी को सजा सुना दी है और इसके राजनीतिक प्रभाव से कोई इनकार नहीं कर सकता। सत्ता पक्ष जहां राहुल गांधी के खिलाफ सक्रिय हो गया है, वहीं कांग्रेस और कई विपक्षी पार्टियां राहुल गांधी के बचाव में खड़ी हो गई हैं। कांग्रेस नेता को जिस टिप्पणी के लिए मानहानि का दोषी पाया गया है, वह साल 2019 में चुनाव के दौरान सामने आई थी। आपराधिक मानहानि के इस मामले में कांग्रेस नेता को दो साल की सजा हुई है और अदालत ने लगे हाथ उन्हें जमानत भी दी है। अब उनके पास तीस दिन का समय है, वह इस सजा के खिलाफ अपील करेंगे। कर्नाटक के कोलार में एक रैली में राहुल गांधी ने आश्चर्य जताया था कि कैसे सभी चोरों का उपनाम मोदी होता है अब जब फैसला सुनाया गया, तो वह अदालत में मौजूद थे और उनके वकील का तर्क था कि टिप्पणी इरादतन नहीं थी। हालांकि, अभियोग पक्ष की दलील थी कि आरोपी एक सांसद हैं और उन्हें अगर यूं ही जाने दिया गया, तो गलत संदेश जाएगा।
विशेषज्ञों का मानना है, कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष सीधे उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा नहीं खटखटा सकते, क्योंकि उनको सजा एक आपराधिक मामले में हुई है। हालांकि, कोई तीसरा पक्ष उच्च न्यायपालिका के हस्तक्षेप की मांग कर सकता है। यह बहस चल रही है कि क्या अदालत के इस फैसले से राहुल गांधी की संसद सदस्यता पर असर पड़ेगा? अगर सदस्यता पर असर पड़ा, तो जाहिर है, इससे बहुत से लोगों का हित प्रभावित होगा। खासकर वायनाड के लोगों को तकलीफ होगी, जहां से राहुल गांधी सांसद हैं। इस आधार पर भी फैसले को चुनौती दी जा सकती है। एक शिकायत यह भी है कि राहुल गांधी के खिलाफ सीआरपीसी की धारा 202 के तहत उचित कानूनी प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया है। उनके वकील ने यह भी तर्क दिया कि नरेंद्र मोदी को मामले में शिकायतकर्ता होना चाहिए था, क्योंकि याचिकाकर्ता पूर्णेश मोदी भाषण का लक्ष्य नहीं थे। अब यह विमर्श का विषय हो सकता है कि बचाव की इस दलील के बाद भी क्या कांग्रेस नेता की टिप्पणी को गैर-इरादतन कहा जा सकता है? राजनीति में तीखा प्रहार नई बात नहीं है, पर ऐसे प्रहार के बाद और भी मजबूत दलीलों के साथ नेताओं को आगे आना चाहिए।
आज जिस तरह की राजनीति हो रही है, उसमें कोई भी किसी के लिए उदारता की गुंजाइश नहीं छोड़ रहा है। ऐसे में, आशंका है, यह मामला आक्रामक रूप भी ले सकता है, क्योंकि इसकी आंच एक बड़े नेता की संसद सदस्यता पर पड़ रही है। चूंकि कांग्रेस माफी के पक्ष में नहीं लगती है, इसलिए उसे मजबूत अदालती लड़ाई की तैयारी रखनी पड़ेगी। इस पूरे मामले में तमाम राजनेताओं के लिए संदेश है। कोई भी टिप्पणी कानून के दायरे में रहते हुए ही करना जरूरी है। आजकल अनेक राजनेता बहुत कुछ ऐसा बोल रहे हैं, जिसका कोई ठोस प्रमाण नहीं है। इस मुकाम पर कांग्रेस की शक्ति के स्रोत महात्मा गांधी को याद करना बुरा नहीं है, लेकिन यह भी याद करना चाहिए कि महात्मा अपने मुकदमे कैसे लड़ा करते थे। किसी भी आरोप या किसी भी आंदोलन के लिए कितनी तैयारियां करते थे, कितने पत्र लिखते थे और इसके बावजूद कट्टर विरोधियों के प्रति भी उनके मन में विद्वेष भाव नहीं रहता था। देश में जब अमृतकाल चल रहा है, तब तमाम नेताओं के व्यवहार में भी इसकी झलक दिखनी चाहिए।
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हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने चुनाव आयोग की नियुक्ति किसी निष्पक्ष पैनल से कराए जाने के निर्देश दिए हैं। इस निर्देश में आयोग के सदस्यों की नियुक्ति के लिए प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और उच्चतम न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश को मिलाकर पैनल बनाने को कहा गया है। न्यायालय के इस निर्देश का स्वागत किए जाने के कई कारण हैं –
उच्चतम न्यायालय के इस निर्देश की आलोचना इस आधार पर की जा सकती है कि वह कार्यपालिका के कामों में हस्तक्षेप कर रहा है। इस आलोचना को खारिज करने के दो आधार दिए जा सकते हैं –
उच्चतम न्यायालय का निर्देश चुनाव आयोग को कार्यत्मक स्वतंत्रता प्रदान करके लोकतंत्र को मजबूती प्रदान करने वाला कहा जा सकता है।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित टी.के. अरूण के लेख पर आधारित। 3 मार्च, 2023
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Date:23-03-23
OOP Down PlanRajasthan’s Right to Heath Bill rightly targets reduction of huge out-of-pocket healthcare spendTOI Editorials
GoI’s PMJAY is the world’s largest health insurance scheme. It covers around 108 million families. As it came after many states instituted their own health insurance schemes, the coverage by government-funded health insurance schemes in India is wider. It spans about 148 million families. In a state such as Rajasthan, the state government’s health insurance coverage exceeds PMJAY – 7. 5 million of the 13. 4 million insured families are covered wholly by the state government. Given this extent of insurance coverage, why did the Rajasthan assembly legislate a Right to Health Bill this week?
The answer lies in the large quantum of out-of-pocket expenditure that characterises Indian healthcare spending. According to WHO, India’s OOP in 2019 was about 55%, way above the global average of 18%. It’s this gap in healthcare coverage that the state’s health act seeks to address. It’s pragmatic as it seeks to progressively reduce OOP. Consequently, the scope of legislation, which is limited to “residents” of Rajasthan, covers even diagnostic tests. Private healthcare providers who fall within the scope of this legislation will be reimbursed by the state government. Bringing them within its ambit was essential given their spatial spread. However, many details of this scheme, including the reimbursement process, will be fleshed out in the rules the government is expected to introduce.
Doctors in Rajasthan are unhappy with the bill. But they don’t have a convincing case. Through its iterations in the legislative process, the IMA has been given representation in the state health authority, which will function as a grievance redressal body. Eventually, timely reimbursement by the state will influence the efficacy of this legislation. On balance, it’s a positive effort as healthcare shocks often push economically vulnerable families back into poverty. Implemented well, this legislation can check it.
Date:23-03-23
खुशी के इंडेक्स में हमारी स्थिति पर चिंतन होसंपादकीय
कोरोना- पूर्व के तीन साल के मुकाबले महामारी के बाद लोगों में एक-दूसरे के प्रति मदद की भावना 25% बढ़ी है। हैप्पीनेस इंडेक्स में इस वर्ष यह जानने की भी कोशिश हुई कि लोगों में महामारी के बाद सोच और जीवन के प्रति क्या बदलाव आया है। वर्ष 2021 में लोगों में उदारता न केवल बढ़ी बल्कि 2022 में यह और ज्यादा हुई। जब कोरोना सगे-सम्बन्धियों और परिजनों का जीवन लील रहा था, लोगों में सकारात्मक भावनाएं खासकर सामाजिक सहयोग का भाव, नकारात्मक सोच के मुकाबले दूना हुआ। इस रिपोर्ट का निष्कर्ष बताता है कि मानव में किसी भी झंझावात से लड़ने की क्षमता उसे अन्य जीवों से अलग करती है। इस बार इंडेक्स में आकलन प्रति व्यक्ति आय के अलावा पांच अन्य पैमानों पर किया गया, जिसमें भ्रष्टाचार के प्रति लोगों की प्रतिक्रिया भी है। यह भी पता चला कि प्रति व्यक्ति आय और व्यक्ति की खुशी का कोई सीधा रिश्ता नहीं है, हालांकि हैप्पीनेस इंडेक्स में ऊपर के सभी 20 देश अपेक्षाकृत बेहतर आर्थिक स्थिति वाले हैं। लेकिन इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि भारत दुनिया में जीडीपी में पांचवें स्थान पर रहते हुए भी इस इंडेक्स में 126वें स्थान पर है। हम सकारात्मक भाव रखते हुए कह सकते हैं कि पिछले साल देश 136वें स्थान पर था। लेकिन तब कुल 150 देशों की रैंकिंग की गई थी। हमें चिंतन करने की जरूरत है।
Date:23-03-23
भ्रष्टाचार का मुद्दा आज कितना मायने रखता है ?आज देश के मतदाताओं पर सबसे ज्यादा प्रभाव राष्ट्रवाद के मसले का पड़ रहा हैसंजय कुमार, ( प्रोफेसर व राजनीतिक टिप्पणीकार )
हम भारतीय राजनीति में एक दुर्लभ क्षण के गवाह बन रहे हैं, जिसमें सत्तारूढ़ पार्टी ने संसद में गतिरोध उत्पन्न कर रखा है। वह राहुल गांधी से मांग कर रही है कि वे लंदन में कहे गए अपने कथित आपत्तिजनक कथनों के लिए क्षमायाचना करें। जब तक राहुल माफी नहीं मांगेंगे, संसद नहीं चलने दी जाएगी। दूसरी तरफ विपक्षी दल संसद के बाहर आंदोलन कर रहे हैं और अदाणी मामले पर संयुक्त संसदीय समिति के गठन की मांग कर रहे हैं। उनका आरोप है कि प्रधानमंत्री के द्वारा गौतम अदाणी को अत्यधिक लाभ पहुंचाए गए, जिनके चलते एलआईसी जैसी कम्पनियों को खासा नुकसान हुआ है। वहीं केंद्रीय एजेंसियां विभिन्न विपक्षी पार्टियों के नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप लगाकर उनसे तफ्तीश कर रही हैं और उन्हें गिरफ्तार कर रही हैं। एजेंसियों के द्वारा जितने नेताओं से सवाल पूछे गए हैं, उन पर छापे मारे गए हैं या उन्हें जेल भेजा गया है, उनकी सूची बहुत लम्बी है। इसमें नवीनतम नाम दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया का है। विपक्षी दल लोगों को यह बताने की कोशिश कर रहे हैं कि मौजूदा सरकार के द्वारा खासा भ्रष्टाचार किया जा रहा है, जिस पर अच्छी तरह से जांच-पड़ताल के लिए संयुक्त संसदीय समिति या जेपीसी का गठन करना जरूरी हो गया है। केंद्रीय एजेंसियों का इस्तेमाल करके सरकार भी उलटे यह दिखाना चाह रही है कि खुद विपक्षी नेता भ्रष्टाचार में डूबे हुए हैं। लब्बोलुआब यह है कि आज भ्रष्टाचार का मुद्दा राजनीति में गर्म बना हुआ है, इसके बावजूद क्या यह 2024 के चुनाव परिणामों को प्रभावित करने वाला मसला बन सकता है? और अगर ऐसा होता है तो इसका सबसे ज्यादा फायदा किसे मिलेगा?
अतीत में कम से कम दो बार ऐसा हुआ है कि भ्रष्टाचार के मसले पर केंद्र में सरकार बदल गई है। लेकिन बीते एक दशक में देश में राजनीति का जो रंग-ढंग रहा है, उसमें अब विश्वास करना मुश्किल लगता है कि भ्रष्टाचार एक ऐसा केंद्रीय महत्व का मुद्दा हो सकता है, जो 2024 में नरेंद्र मोदी को सत्ता से बेदखल कर सकता है। इसके तीन कारण मुझे सूझते हैं। पहला तो यह कि राजनीति अब बदल गई है। मतदाता अब राष्ट्रवाद और नेतृत्वशीलता के मुद्दे पर ज्यादा लामबंद होते हैं और यह बात नरेंद्र मोदी के पक्ष में जाती है। दूसरे, अगर लोगों में भाजपा के कथित भ्रष्टाचार या अदाणी से कथित सांठगांठ को लेकर बेचैनी की स्थिति निर्मित हुई भी तो उनमें विपक्षी पार्टियों का ट्रैक रिकॉर्ड देखकर उनसे बेहतर प्रदर्शन की उम्मीद नहीं जगती। उन्हें नरेंद्र मोदी ही किसी भी विपक्षी नेता की तुलना में ज्यादा भरोसेमंद लगते हैं। लोग मानते हैं कि प्रधानमंत्री भले हमेशा सही कदम नहीं उठाते हों, लेकिन उनकी मंशा सही रहती है और वे निजी हित के बजाय देश के कल्याण के लिए परिश्रम करते हैं। तीसरे, लोकनीति-सीएसडीएस सर्वेक्षण के परिणाम बताते हैं कि लोगों में बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार को लेकर बेचैनी जरूर है, लेकिन हाल ही में हुए विभिन्न विधानसभा चुनावों में इन मुद्दों का कोई प्रभाव नहीं नजर आया है। इसके बजाय वोटरों पर सबसे ज्यादा प्रभाव राष्ट्रवाद के मसले का पड़ा है। वास्तव में हाल में जितने विपक्षी नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप लगे हैं और उन्हें जेल भेजा गया है, उसमें अगर नरेंद्र मोदी के अदाणी से मेलजोल के आरोप प्रमाणित भी होते हैं, तो भी वे स्वयं को दूसरों की तुलना में बेहतर स्थिति में ही पाएंगे। अगर विपक्षी दल 2024 में भ्रष्टाचार को एक अहम मसला बनाने जा रहे हैं तो इससे भाजपा को चिंतित होने की कोई जरूरत नहीं मालूम होती है।
जिन 13 राज्यों में हुए चुनावों के आधार पर सर्वेक्षण के निष्कर्ष निकाले गए हैं, उनमें से 12 ऐसे थे, जिनके मतदाताओं ने कहा कि उनके राज्य में भ्रष्टाचार पहले की तुलना में बढ़ा है। इनमें से छह राज्यों में सत्तारूढ़ पार्टी ने फिर जीत दर्ज की। इनमें उन राज्यों के वोटर शामिल थे, जिनका मानना था कि भ्रष्टाचार पहले की तुलना में बढ़ा है। अधिकतर मतदाताओं की चिंता विकास सम्बंधी कार्यों को लेकर थी। लेकिन भ्रष्टाचार और विकास के बिंदु पर चिंता जताने के बावजूद वोटरों ने सत्तारूढ़ दल के विरुद्ध वोट नहीं दिया। 1989 में बोफोर्स घोटाले की सुई राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी थी और 2014 में ऐसी धारणा निर्मित हो गई थी कि यूपीए सरकार गले-गले तक भ्रष्टाचार में डूबी हुई है। इन दोनों ही अवसरों पर वोटरों ने केंद्र में सरकार बदल दी। लेकिन आज दूर-दूर तक वैसे हालात नजर नहीं आ रहे हैं।
Date:23-03-23
चिंता बढ़ाती रूस-चीन की निकटताहर्ष वी. पंत, ( लेखक आब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में रणनीतिक अध्ययन कार्यक्रम के निदेशक हैं )
हर एक गुजरते हुए दिन के साथ दुनिया और ध्रुवीकृत होती जा रही है। इसी सप्ताह चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग के रूस दौरे और जापानी प्रधानमंत्री फुमियो किशिदा की यूक्रेन यात्रा से यह ध्रुवीकरण और मुखरता से रेखांकित होता है। किशिदा के दौरे का उद्देश्य जहां यूक्रेन के साथ एकजुटता प्रदर्शित करना था तो चीनी राष्ट्रपति एक तीर से दो निशाने लगाने के मकसद से मास्को पहुंचे। एक तो उनकी मंशा रूस और यूक्रेन के बीच शांति के प्रयासों में मध्यस्थ की भूमिका में दिखने की रही, लेकिन इससे भी बढ़कर उनका लक्ष्य चीन-रूस संबंधों को और मजबूती प्रदान करना रहा। आज बड़े स्तर पर शक्ति का ध्रुवीकरण हो रहा है। यह एक व्यापक आधारभूत वास्तविकता है जो नए उभरते वैश्विक ढांचे को आकार दे रही है। इसमें भारत सहित सभी देशों के लिए भविष्य की दृष्टि से चिंता के संकेत छिपे हैं।
जहां तक रूस और यूक्रेन के बीच शांति के प्रयासों की बात है तो बीते दिनों सऊदी अरब और ईरान के बीच शांति कराने में मिली सफलता से उत्साहित चीन पश्चिम एशिया के बाद इस सिलसिले को यूरेशिया में भी दोहराकर वैश्विक नेतृत्व के मोर्चे पर अपनी साख और दावे को मजबूती देना चाहता है। वैसे, पश्चिम एशिया की राजनीति में अमेरिका की वजह से एक रिक्तता की स्थिति आई है और रियाद-तेहरान समझौता मुख्य रूप से कूटनीतिक रिश्तों को फिर से शुरू करने पर ही केंद्रित है। इसके उलट रूस-यूक्रेन के बीच किसी तरह के शांति समझौते की गुंजाइश फिलहाल नहीं दिखती। हालांकि, पुतिन ने इतना जरूर कहा है कि चीनी शांति प्रस्ताव के कई प्रविधान ऐसे हैं, जिन्हें यूक्रेन के साथ किसी संघर्ष विराम का आधार बनाया जा सकता है, लेकिन यह पश्चिमी देशों और कीव पर निर्भर करेगा कि क्या वे इसके लिए तैयार होंगे। उन्होंने यह भी कहा कि कोई भी शांति वार्ता रणभूमि की वास्तविकता से निर्धारित होगी। अभी तक दोनों ही पक्षों को ऐसा नहीं लगता कि वार्ता की मेज पर आने से उनके लिए कोई लाभ की स्थिति बनेगी। दूसरी ओर गत माह 12 सूत्रीय शांति प्रस्ताव तैयार करने के बावजूद यूक्रेन में शांति चीन की प्राथमिकता नहीं दिखती।
चीनी राष्ट्रपति के रूप में अप्रत्याशित रूप से तीसरा कार्यकाल मिलने के बाद शी पहली बार किसी विदेशी दौरे पर रूस गए, जो विश्व के दो सबसे शक्तिशाली तानाशाह देशों के बीच रिश्तों की मजबूती को दर्शाता है। दोनों देशों को ‘रणनीतिक साझेदार’ और ‘महान पड़ोसी शक्तियां’ बताते हुए शी ने कहा कि चीनी और रूसी रिश्ते ‘द्विपक्षीय संवाद की परिधि से परे’ जा चुके हैं। दोनों नेताओं की जुगलबंदी से यही संकेत मिले कि वित्त, परिवहन-ढुलाई एवं ऊर्जा के क्षेत्र में द्विपक्षीय रिश्ते और परवान चढ़ने जा रहे हैं। खासतौर से शी ने ऊर्जा, कच्चा माल और इलेक्ट्रानिक्स जैसे क्षेत्रों पर जोर देने की बात कही। असल में कई मोर्चों पर पश्चिमी देशों द्वारा अलग-थलग कर दिए गए रूस और चीन एक दूसरे के साथ सहयोग बढ़ाकर उससे हुए नुकसान की कुछ हद तक भरपाई कर सकते हैं। व्यापार और आर्थिकी के अतिरिक्त विश्व में बदलता शक्ति संतुलन भी दोनों देशों के रिश्तों की दशा-दिशा तय कर रहा है। इसके चलते पश्चिम में रूस और चीन के बीच मजबूत होते रक्षा संबंधों पर चिंता भी जताई जा रही है। नाटो के महासचिव ने हाल में चीन को चेतावनी दी थी कि वह रूस को घातक हथियार न उपलब्ध कराए। जो भी हो, अब इन दोनों देशों के रिश्तों में रूस कनिष्ठ सहयोगी की भूमिका में आ गया है। कुछ साल पहले तक इस साझेदारी में रणनीतिक उत्साह का अभाव था। अब कुछ पश्चिमी नीतियों का पहलू कहें या पुतिन और शी के अपने-अपने विदेशी एजेंडे पर टिके रहने का दांव, इस समय चीन-रूस गठजोड़ शीत युद्ध के उपरांत भू-राजनीति को नए सिरे से आकार देने वाली एक धुरी के रूप में उभरता दिख रहा है। वहीं, आर्थिक रूप से नाजुक और व्यापक स्तर पर अलग-थलग पड़े रूस की अपनी भू-राजनीतिक आकांक्षाओं के लिए चीन पर निर्भरता कहीं अधिक बढ़ गई है। जबकि अमेरिकी प्रभुत्व को चुनौती देने के लिए बीजिंग के लिए मास्को की अपनी उपयोगिता है। हालांकि, पश्चिम में चीन के जितने बड़े पैमाने पर आर्थिक हित जुड़े हैं, उसे देखते हुए वह किसी प्रकार के सैन्य टकराव में शामिल होने से परहेज ही करेगा।
जहां दुनिया ने देखा कि पुतिन ने अपने मित्र के स्वागत में लाल कालीन बिछवाया, वहीं चीनी नेता ने शायद ही किसी संभावित सैन्य सहयोग के संकेत दिए। हालांकि, अमेरिका के साथ बढ़ते टकराव विशेषकर हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बनती ऐसी स्थिति को देखते हुए शी को पुतिन की आवश्यकता महसूस होती है, लेकिन रूस के साथ ठोस सामरिक सहयोग यूरोप के साथ रिश्तों में बीजिंग के लिए नकारात्मकता का संदेश देगा। ऐसे में शी के लिए यह बड़ी सावधानी से संतुलन साधने की कवायद है, जिसमें पुतिन को अपने पाले में लाकर वह उभरते शक्ति संतुलन का पलड़ा अपने पक्ष में कर सकें। यह सब ऐसे समय में हो रहा है जब शी अमेरिका को खलनायक के रूप में चित्रित करने और चीन को जटिल समस्याओं का समाधान करने वाले देश के रूप में प्रस्तुत करने में लगे हैं। शी के रूस दौरे से पहले ही चीनी विदेशी मंत्री ने अपने यूक्रेनी समकक्ष के साथ वार्ता की थी। ऐसा अनुमान है कि मास्को से वापसी के बाद शी यूक्रेनी राष्ट्रपति जेलेंस्की से फोन पर बात करेंगे।
ऐसी कूटनीतिक कवायद से न तो यूक्रेन युद्ध का कोई समाधान निकलने से रहा और न ही इसमें ऐसी कोई मंशा दिखती है। शी का मुख्य उद्देश्य तो हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपने अनुकूल शक्ति संतुलन साधना है और पुतिन को कनिष्ठ साझेदार बनाना है, ताकि पश्चिम का ध्यान भटका सकें कि वह तो उनकी सहूलियत के साझेदार हैं। चीन और रूस की इस आकार लेती धुरी के भारतीय सामरिक समीकरणों की दृष्टि से भी गहरे निहितार्थ हैं। भारतीय सामरिक बिरादरी अभी तक इस मुद्दे पर बहस से बचती आई है। यदि नई दिल्ली उभरते वैश्विक शक्ति संतुलन का अपने पक्ष में अधिकाधिक लाभ उठाना चाहती है तो उसे यह रुख-रवैया बदलना होगा।
Date:23-03-23
बंधुता, समृद्धि और ध्रुवीकरणरथिन रॉय, ( लेखक ओडीआई, लंदन के प्रबंध निदेशक हैं )
भारत में अंतरसरकारी राजकोषीय रिश्तों का अब तक का एक अत्यंत सुखद और बंधुता दर्शाने वाला गुण रहा है-राज्यों के बीच करों के समांतर बंटवारे की दिशा में होने वाली प्रगति।
हर पांच वर्ष पर नियुक्त होने वाले वित्त आयोगों की अनुशंसा ने दोनों तरह के बंटवारे की अनुशंसा की है: केंद्र और राज्यों के बीच बंटवारा और राज्यों के बीच आपसी बंटवारा। राज्यों के बीच के राजस्व बंटवारे को एक फॉर्मूले से तय किया जाता है। इस फॉर्मूले में सबसे अधिक जोर ‘आय में अंतर’ के मानक पर दिया जाता है। यह राज्य की प्रतिव्यक्ति आय के उलट होती है। ऐसे में प्रति व्यक्ति आय जितनी कम होगी, राज्य को उतनी अधिक हिस्सेदारी मिलेगी।
सन 1991 के बाद से अब तक के सभी वित्त आयोगों की अनुशंसाओं में इस मानक को 48 से 60 फीसदी भार मिला। इसलिए समांतर बंटवारा बड़े पैमाने पर पुनर्वितरण है और उल्लेखनीय बात यह है कि अब तक किसी भी राज्य ने इसे लेकर कोई आपत्ति नहीं जताई है। इसी वजह से देश के सबसे गरीब राज्यों-बिहार और उत्तर प्रदेश को राज्यों को दिए जाने वाले कर में सबसे अधिक हिस्सेदारी प्राप्त होती है। अगर आबादी ही एक मात्र मानक होती तो उन्हें वर्तमान की तुलना में काफी कम हिस्सेदारी मिलती। उस स्थिति में शायद महाराष्ट्र को बिहार से अधिक हिस्सेदारी प्राप्त होती।
परंतु अमीर और गरीब राज्यों के रिश्ते को लेकर चलने वाली बहस में हाल ही में बदलाव आया है। इस बदलाव का सबसे वाकपटु और भावपूर्ण सार तमिलनाडु के वित्त मंत्री पलनिवेल त्यागराजन ने अपने वक्तव्य में इस तरह व्यक्त किया, ‘गरीब राज्यों को दिए जाने वाले पैसे का क्या होता है? उस पैसे से विकास क्यों नहीं हो पा रहा है? हमें इस पैसे को लेकर शिकायत नहीं है बल्कि शिकायत प्रगति को लेकर है।’
तीन दशक पहले यह दलील देना संभव था कि कुछ अप्रत्यक्ष करों को छोड़कर अधिकांश करों को उन स्थानों पर आय और खपत में बांटा नहीं जा सकता है जहां वे संग्रहित हुए। मुंबई में बनी एक फिल्म पर कर्नाटक में कर लग सकता है। मुंबई-दिल्ली उड़ान पर लगने वाला ईंधन कर उस जगह पर लगेगा जहां विमानन कंपनी विमान में ईंधन भरवाना चाहे। लेकिन सभी यात्रियों को अपने किराये में कर चुकाना होगा फिर चाहे वे कहीं से भी आते हों। एक बहुराष्ट्रीय कंपनी जो मुंबई में अपने मुनाफे की घोषणा करती है वह पूरे देश में बिक्री करके आय अर्जित कर रही होगी।
ये दलीलें आज भी वजन रखती हैं लेकिन दुख की बात है कि उतना नहीं जितना 30 वर्ष पहले रखती थीं। आज उत्तर प्रदेश, नेपाल से गरीब है और प्रति व्यक्ति आय के मामले में तमिलनाडु उतना ही अमीर है जितना कि इंडोनेशिया। इसका अर्थ यह हुआ कि इनमें खपत और आय कर का आधार पर कहीं अधिक बड़ा है। विभिन्न क्षेत्रों में असमानता जितनी अधिक होगी, लोगों को यह समझाना उतना ही मुश्किल होगा कि कर आधार को अलग संस्था के रूप में देखने की आवश्यकता है।
अमीर और गरीब राज्यों के बीच की असमानता लगभग हर आर्थिक पहलू में देखी जा सकती है। आय, परिसंपत्तियां और मनमानी क्रय शक्ति अमीर देशों में अधिक है। औपचारिक रोजगार और उच्च मूल्य वाले रोजगार भी उनके यहां अधिक हैं। यही वजह है कि सरकारी नौकरियों की भूख देश के गरीब राज्यों में कहीं अधिक है। विदेशी निवेश की आवक भी अमीर राज्यों में अधिक होती है। उनके यहां स्वास्थ्य सुविधाएं बेहतर हैं, साक्षरता दर अधिक है और सार्वजनिक सेवाएं भी गरीब राज्यों की तुलना में बेहतर हैं। ऐसे में त्यागराजन का सवाल उचित है। अगर बीते तीन दशकों के दौरान अमीर और गरीब राज्यों के बीच असमानता बढ़ने के बजाय कम हुई होती तो यह सवाल पैदा ही न होता। लेकिन तमाम बड़ी-बड़ी बातों से उलट समय के साथ असमानता में लगातार इजाफा हुआ है।
राजनीतिक मोर्चे पर भी कमियां हैं। देश के उत्तरी इलाके में स्थित राज्यों में लंबे समय से राजनीतिक ध्रुवीकरण की राजनीति हो रही है। दक्षिण के राज्यों के उलट उत्तर में यह राजनीतिक बहस में बहुत अहम स्थान रखती है। अधिकांश राजनीतिक अभिव्यक्तियां जाति और बहुसंख्यक धार्मिकता के इर्दगिर्द होती हैं। वहां चुनाव लड़ने और जीतने के मामलों में यही केंद्रीय बहस रहती है। आर्थिक कल्याण, समृद्धि और बेहतर दुनिया की साझा तलाश के बारे में हमारे चुनावों में कोई खास बात नहीं की जाती है। ध्रुवीकरण की सफलता के कारण ऐसी किसी पेशकश का दबाव भी नहीं है। प्रतिष्ठित राष्ट्रीय नेताओं और स्वतंत्रता सेनानियों की प्रतिष्ठा को धूल-धूसरित करते हुए मुस्लिमों को सताना, साथी देशवासियों को देशद्रोही ठहराना, असहमत लोगों को दंडित करना, जेल में डालना आदि तमाम काम ध्रुवीकरण को ही दर्शाने वाले हैं। यह जितना अधिक कारगर होगा, इसका उपयोग उतना ही अधिक आकर्षक होता जाएगा।
परंतु ध्रुवीकरण अथवा विभाजन की राजनीति पर किसी का एकाधिकार नहीं है। जब ऐसी घटनाएं अधिक घनीभूत हो जाती हैं और राजनीतिक दलों में इन्हें लेकर एक किस्म की होड़ या प्रतिस्पर्धा शुरू हो जाती है तो पूरा राजनीतिक प्रतिष्ठान ही सवालों के घेरे में आ जाता है। संविधान के अनुच्छेद एक में कहा गया है कि इंडिया जो भारत है वह राज्यों का एक संघ है। इस पर सवाल उठाते हुए देश के दक्षिणी राज्यों पर आधिकारिक ‘राष्ट्रीय’ हिंदी भाषा को थोपना, बहुसंख्यक एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए परिसीमन का इस्तेमाल, एकल संस्कृति थोपने को लेकर बहस आदि सभी विवाद उत्पन्न करते हैं और विभिन्न प्रकार के ध्रुवीकरण को जन्म देते हैं। कोई भी बुद्धिमान पर्यवेक्षक आसानी से यह समझ सकता है कि हमारे यहां ऐसी कोई राजनीतिक योजना नहीं है जो देश के हिंदीभाषी क्षेत्रों में रोजगारपरक वृद्धि लाए और हालात में तेजी से बदलाव लाने में सक्षम हो। ऐसी स्थिति में बंधुता को लेकर प्रश्नचिह्न लगना तय है।
ध्रुवीकरण की बहुत बड़ी कीमत चुकानी होती है। आर्थिक ठहराव तो इसकी अग्रिम कीमत भी है। अगर आर्थिक हालात को तत्काल सुधारने के प्रयास नहीं किए गए तो स्थितियां और तेजी से बिगड़ेंगी। आवश्यकता इस बात की है कि ध्रुवीकरण को त्यागकर समावेशी आर्थिक एजेंडे पर आगे बढ़ा जाए जो देश के गरीब इलाकों में समृद्धि लाने पर केंद्रित हो। यदि ऐसा नहीं किया गया तो चुनाव तो जीते जा सकेंगे लेकिन देश के सफल अस्तित्व के मूल में जो बंधुता है उसे अपूरणीय क्षति पहुंचेगी।
Date:23-03-23
अभाव की परतेंसंपादकीय
इसमें कोई दो राय नहीं कि मौजूदा दौर में दुनिया भर में विकास और अर्थव्यवस्था के मामले में नए अध्याय रचे जा रहे हैं, विज्ञान के मोर्चे पर अहम उपलब्धियों की वजह से बहुत सारे लोग अपनी जिंदगी को बेहतर बना रहे हैं। मगर इससे बड़ी विडंबना और क्या होगी कि इक्कीसवीं सदी के इसी चमकते दौर में आज भी विश्व की एक चौथाई से ज्यादा आबादी को पीने के लिए सुरक्षित पानी नहीं मिल पा रहा है। इसके समांतर साफ-सफाई के वैश्विक नारे बनने के दौर में सच यह भी है कि करीब आधी आबादी की पहुंच भी स्वच्छता तक नहीं है। गौरतलब है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जल पर पहले महत्त्वपूर्ण सम्मेलन के मौके पर संयुक्त राष्ट्र की ओर से मंगलवार को जारी एक रिपोर्ट में बताया गया है कि दुनिया की छब्बीस फीसद आबादी को सुरक्षित पेयजल नहीं मिल पाता है, जबकि बुनियादी स्वच्छता तक छियालीस फीसद लोगों की पहुंच नहीं है। अंदाजा लगाया जा सकता है कि जिन देशों में ऐसे हालात से दो-चार लोग किसी तरह अपनी जिंदगी गुजार रहे हैं, वहां नीतियां बनाने और उन पर अमल को लेकर किस स्तर तक लापरवाही बरती जाती है।
संयुक्त राष्ट्र की इसी रिपोर्ट में यह बताया गया है कि पिछले चार दशकों में विश्व स्तर पर पानी का इस्तेमाल लगभग एक फीसद प्रति वर्ष की दर से बढ़ रहा है। मगर एक हकीकत यह है कि धरती पर संसाधनों की एक सीमा है और अगर पानी के उपयोग में बढ़ोतरी की यही रफ्तार रही तो आने वाले वक्त में खड़ी होने वाली समस्या की बस कल्पना की जा सकती है। अभी ही स्थिति यह है कि एक ओर विकासशील और गरीब देशों में दूरदराज के इलाकों में रहने वाली एक बड़ी आबादी को पेयजल के लिए काफी जद्दोजहद करना पड़ता है, वहीं शहरों में पानी एक तरह से बाजार के हवाले हो चुका है। अब तक पीने के पानी पर प्राकृतिक अधिकार माना जाता रहा है, मगर सच यह है कि अब दुनिया की ज्यादातर आबादी या तो स्वच्छ पेयजल से वंचित है या फिर बिना आर्थिक कीमत चुकाए लोग अपनी प्यास तक नहीं बुझा सकते। इसी तरह, वैश्विक स्तर पर एक नारे के रूप में स्वच्छता के प्रचार के बावजूद आज भी छियालीस फीसद लोग अगर स्वच्छ माहौल से बाहर हैं, तो यह किसकी नाकामी का सबूत है ?
निश्चित रूप से दुनिया भर में पिछले कई दशकों से अलग-अलग देशों से लेकर संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय संगठनों की ओर से विकास केंद्रित सम्मेलनों, आयोजनों और नीतिगत पहलकदमियों के बरक्स यह एक विरोधाभासी स्थिति है कि इतनी बड़ी तादाद में लोगों को पीने का साफ पानी भी हासिल नहीं हो पा रहा। जबकि स्वच्छ पेयजल स्वस्थ जीवन के लिए पहली जरूरत है। खुद संयुक्त राष्ट्र की आमसभा में 2010 में ही अपनाए गए प्रस्ताव में पीने के साफ पानी और स्वच्छता को मानवाधिकार का दर्जा दिया गया था। सवाल है कि राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर होते रहे सम्मेलनों के निष्कर्ष कितने जमीन पर उतर सके और अगर ऐसा नहीं हो सका तो इसके लिए संबंधित पक्षों ने क्या किया ! आधुनिक तकनीकी की दुनिया में तमाम प्रयोगों और आविष्कारों के बावजूद हालत यह है कि उपयोग किए जा चुके या फिर समुद्री पानी को पीने लायक बनाने और उसे साधारण लोगों तक पहुंचा पाने के मामले में अपेक्षित कामयाबी हासिल नहीं की जा सकी है। बाकी मामलों की तरह स्वच्छ पेजयल का बाजार निजी क्षेत्रों को सौंप दिया जाता है, मगर सवाल है कि संयुक्त राष्ट्र की ओर से ही घोषित पेयजल और स्वच्छता का मानवाधिकार अपने नागरिकों को दिलाने को लेकर सरकारों की क्या जिम्मेदारी है!
Date:23-03-23
न्याय और समतासंपादकीय
सर्वोच्च न्यायालय के कुछ फैसले ऐसे होते हैं, जो व्यावहारिक रूप से व्यापक और अनुकरणीय होते हैं। एक ही मुकदमे में न्यायालय ने दो ऐसी टिप्पणियां की हैं, जिन्हें याद रखा जाएगा। पहली टिप्पणी का सार यह है कि अदालतों को लड़का-लड़की में भेद नहीं करना चाहिए। दूसरी टिप्पणी, किसी अपराधी को फांसी की सजा तभी सुनाई जाए, जब उसमें सुधार की कोई संभावना नहीं हो।देश के प्रधान न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति हिमा कोहली व न्यायमूर्ति पी एस नरसिम्हा ने सात साल के एक बच्चे के अपहरण व हत्या के दोषी याचिकाकर्ता सुंदरराजन की मौत की सजा को कम करते हुए ये टिप्पणियां की हैं। दोषी सुंदरराजन ने जुलाई 2009 में पीड़ित का स्कूल से लौटते समय अपहरण कर लिया था। निचली अदालतों में दोष सिद्ध हो चुका था, फिर भी अपराधी ने बचने के लिए सर्वोच्च न्यायालय में अपील की थी। अदालत ने दोषी की सजा कम की है, उसे फांसी से बचाया है, तो उसके पर्याप्त कारण भी गिनाए हैं।
बहरहाल, बात पहले लिंगभेद की। यह बात गौर करने की है कि सर्वोच्च न्यायालय ने इसी मामले में पहले लिंगभेद प्रेरित टिप्पणी की थी और अब सर्वोच्च न्यायालय ने ही सुधार की कोशिश की है। प्रधान न्यायाधीश के नेतृत्व वाली पीठ ने दोषसिद्धि के खिलाफ की गई अपील पर फैसला करते समय न्यायालय द्वारा पितृसत्तात्मक भाषा के इस्तेमाल पर आपत्ति जताई है। अदालत ने पहले टिप्पणी करते हुए इशारा किया था कि फिरौती के लिए विशेष बच्चे के अपहरण का विकल्प सुनियोजित था। मृतक के माता-पिता के चार बच्चे थे – तीन बेटियां और एक बेटा। इकलौते बेटे का अपहरण उसके माता-पिता के मन में अधिकतम भय उत्पन्न करने के लिए था। जान-बूझकर इकलौते पुत्र की हत्या करना, मृतक के माता-पिता के लिए गंभीर परिणाम होता है, पुत्र होता, तो परिवार के वंश को आगे बढ़ाता। ऐसी भाषा पर प्रधान न्यायाधीश ने रोष जताया है, तो यह स्वागतयोग्य है। पितृसत्ता या लिंगभेद के लिए संविधान में भी कोई जगह नहीं है, फिर अदालती व्यवहार व भाषा में यह भेद तो अचंभित करता है। अदालती फैसलों के ऐसे कई उदाहरण मिल जाएंगे, जिनमें लिंगभेद हावी दिखा है। सर्वोच्च न्यायालय के ताजा और सुखद टिप्पणी का असर सभी निचली अदालतों तक पहुंचे, तो भारत में समता और न्याय की बुनियाद मजबूत होगी। वाकई, अदालत के लिए यह मायने नहीं होना चाहिए कि कोई लड़का है या लड़की। अपराध सिर्फ अपराध है। पितृसत्तात्मक मूल्यों को व्यावहारिक रूप से अलविदा कहने का कार्य न्याय के मंदिरों में ही संपन्न होना चाहिए।
अब बात अधिकतम सजा की। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि किसी अपराधी को केवल अपराध की गंभीर प्रकृति के आधार पर मौत की सजा नहीं दी जा सकती। यह सजा तभी दी जाए, जब अपराधी में सुधार की कोई संभावना न हो। अदालतों को सुधार और पुनर्वास पर भी विचार करना चाहिए। इस मुकदमे में दोषी के सुधार की संभावना साफ दिखती है। जेल में उसका आचरण सही है, उसने डिप्लोमा भी किया है, अपराध के वक्त उसकी उम्र 23 वर्ष थी, इसलिए यह दुर्लभतम मामला नहीं है। कुछ उदारता दिखाने के बावजूद अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि याचिकाकर्ता या दोषी 20 साल के कारावास को पूरा करने तक किसी भी प्रकार की रियायत का हकदार नहीं होगा। बेशक, समग्रता में ये फैसले मिसाल रहेंगे।
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कश्मीरी पंडितों की हत्या के मामले लगातार सामने आ रहे हैं। भले ही इनमें से कुछ हमले कश्मीरी पंडितों के मन में भय पैदा करने के लिए किए जा रहे हों, लेकिन ये कहीं-न-कहीं हमारी रक्षा एजेंसियों की विफलता को दर्शाते हैं। दूसरी ओर, नागरिकों को निशाना बनाने वाले कट्टरपंथी तत्वों की कार्यप्रणाली हमेशा स्पष्ट रही है। ये हमले सरकार को दमन के लिए उकसाने के लिए किए जाते हैं। इससे राज्य की जनता में असंतोष भड़कता है, और यह आतंकवादी गतिविधियों में अधिक लोगों को लिप्त करता है।
सरकार क्या कर सकती है-
‘द हिंदू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 01 मार्च, 2023
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Date:22-03-23
Watering HolesIPCC & House committee reports are reminders on changing water use patterns. But it’s a political challenge.TOI Editorials
Two recent reports, one from IPCC and the other by a parliamentary standing committee, flagged India’s freshwater challenge. The IPCC report synthesised the science on climate change. Global warming, a dimension of climate change, has crosseda danger mark. IPCC’s synthesis report said that warming is now 1. 1°C above pre-industrial level. Some of the recent research identified 1. 5°C as a climate tipping point, but even at the current level of warming the incidence of extreme climate events is rising.
An important aspect of IPCC’s synthesis report is the impact of climate change on freshwater ecosystems. India, which has swathes subject to severe water stress, needs to pay particular attention. The parliamentary committee report on groundwater tabled in Lok Sabha this week has excellent data. Groundwater meets 67% of irrigation needs and is the source of 80% of drinking water. About 89% of the annual groundwater extraction of 218 billion cubic metres is for irrigation.
Therefore, a more rational use for irrigation will go a long way in conserving groundwater resources. Water is a state subject. However, its usage for irrigation is influenced by the overlap of GoI crop procurement policies and states’ approach to electricity subsidies. Consequently, the solution needs to be found jointly. Consider the pattern of irrigation. Two crops, paddy and sugarcane, corner more than 60% of irrigation supply. Among the three states where groundwater is overused are Punjab and Haryana. Both are critical to India’s food security, with Punjab contributing significantly to paddy, a crop it’s not suited for.
Farmers are responding to incentives such as free power and MSP. Agricultural policy needs to be calibrated to match crops to an appropriate agro-climatic zone. This will require a more region-specific approach by GoI, with states realigning subsidies to ensure India uses its groundwater better. All of that means politics has to think beyond usual headline goals like total farm output and total farmer subsidy, and look at many more variables – a process that’s bound to anger some powerful blocs. And that’s the biggest challenge.
Date:22-03-23
Bring Anime Energy To an Old FriendshipET Editorials
Japanese Prime Minister Fumio Kishida’s visit to India marks an important moment in the relationship between the two Asian nations. Agreeing to strengthen cooperation in security, trade and technology, and a closer partnership to ensure a rulesbased free and open Indo-Pacific region were the two prongs of Kishida’s visit. The Japanese prime minister put funds where intentions are by announcing $75 billion to bolster Japan’s Free and Open Indo-Pacific (FOIP) policy.
The ties between the two countries are historical and diverse — and, for most part, undervalued. But, now, they are getting forward-looking. Historically, India’s close ties with the Soviet Union put some amount of brakes in evolving Japanese-Indiaties that had evolved over centuries. The ‘Look East Policy’ developed by Prime Minister P V Narasimha Rao and then taken forward by Prime Minister Atal Bihari Vajpayee led to a real engagement with Japan. With PM Narendra Modi, India and a post-Shinzo Abe is making up for lost ground. Both democracies understand the danger that China poses, especially as it implements an aggressive foreign policy. Japan, remember, is the only other country that experiences China’s push for territory, making its relationship also defined by entanglement and contestation.
This explains why Kishida chose New Delhi to announce FOIP, a plan that includes mobilising finances and assistance for emerging economies, support for maritime security, and other infrastructure cooperation. Only a fraction of the immense potential of an India-Japan ‘indispensable partnership’ has been realised, especially in trade and investment. With Japan heading G7 and India G20, the increased engagement will have ramifications that go beyond the region and the two nations.
Date:22-03-23
कृषि नीति ऐसी बनाएं जिस पर अमल भी हो सकेसंपादकीय
मंडियों में गिरती कीमतों को लेकर महाराष्ट्र का प्याज उत्पादक आंदोलन कर रहा है और यूपी का आलू उगाने वाला किसान अवसाद में है। जबकि कर्नाटक / महाराष्ट्र के बड़े भाग का खेतिहर यह नहीं समझ पा रहा है कि अगर वे कोलार और जुन्नार मंडियों में अपना टमाटर सात-आठ रुपए किलो बेचने को मजबूर है तो वही टमाटर बेंगलुरु और पुणे में 30 रुपए किलो क्यों बिकता है? सन् 2016 से किसानों की आय दूनी करने की घोषणा के बाद वर्ष 2018-19 में मोदी सरकार ने ऑपरेशन ग्रीन्स घोषित किया था, जिसके तहत टॉप (टोमेटो, अनियन और पोटैटो ) योजना शुरू हुई थी, ताकि इनकी कीमतों को बेजा उतार-चढ़ाव से बचाया जा सके। तीन वर्ष बाद टॉप का विस्तार टोटल के रूप में करते हुए अन्य सब्जियों और फलों के साथ कुछ और जिंसों को भी इसमें शामिल किया गया। लेकिन पांच साल बीतने के बाद भी चालू वर्ष में तीनों प्रमुख सब्जियों के भाव मंडियों में जमीन पर हैं। उधर दूध के दाम लगातार बढ़ रहे हैं क्योंकि उत्पादन गिर रहा है। पशुओं के चारे, खासकर भूसे की कीमत अचानक इतनी बढ़ गई है कि किसान दुधारू पशुओं को भी चारा देने में असमर्थ हो रहे हैं। अनाज की कीमतें बढ़ती हैं तो महंगाई के नाम पर सरकारें असहज होने लगती हैं क्योंकि यह राजनीतिक मुद्दा बन जाता है। गेहूं निर्यात पर रोक की तरह सरकार को चारे पर भी सब्सिडी ऐलान करनी चाहिए।
Date:22-03-23
साजिश के चश्मे से राजनीति को देखने की समस्याएंअभय कुमार दुबे, ( अम्बेडकर विवि, दिल्ली में प्रोफेसर )
राजनीतिक समीक्षा का एक लोकप्रिय पहलू साजिश का चश्मा लगाकर नेताओं, पार्टियों और राजनीतिक घटनाक्रम की समझ बनाने से जुड़ा है। कोई कभी भी आपके कान में फुसफुसाकर कह सकता है कि अमुक नेता अमुक की जड़ काटने में लगा है। अगर आप इस खबर का प्रमाण मांगेंगे तो बदले में केवल एक अर्थपूर्ण मुस्कराहट मिलेगी। साजिश के चश्मे से देखने पर देश में हो रही हर घटना में विदेशी हाथ दिखाई पड़ सकता है। एक जमाने में जाने कितने नेताओं, पत्रकारों, बुद्धिजीवियों और संगठनों को या तो सीआईए का एजेंट कहा जाता था या केजीबी का। वह शीतयुद्ध का युग था और ऐसा कहने के लिए किसी को सबूत देने की जरूरत नहीं होती थी। यही कारण है कि इस रवैये की आलोचना करने के लिए पीलू मोदी को गले में तख्ती लटकाकर संसद आना पड़ा था। तख्ती पर लिखा था- मैं सीआईए एजेंट हूं।
हाल ही में भारतीय जनता पार्टी के प्रवक्ता हरीश खुराना ने एक बयान देकर साजिशों के बाजार को नए सिरे से गर्म कर दिया है। जैसे ही पूर्व-उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया का बंगला नई शिक्षा मंत्री आतिशी को आबंटित हुआ, वैसे ही उन्होंने अंदेशा व्यक्त कर दिया कि कहीं अरविंद केजरीवाल अपने प्रमुख सहयोगी से पल्ला छुड़ाने की कोशिश तो नहीं कर रहे हैं। बस, फिर क्या था। मीडिया इसे ले उड़ा और इस कयास में हकीकत के काल्पनिक रंग भरे जाने लगे। अगर षड्यंत्र-सिद्धांत (कॉन्स्पिरेसी थ्योरी) को दरकिनार कर दिया जाए तो इस घटना को इस तरह भी समझा जा सकता था कि जिस शिक्षा विभाग का कामकाज देखने की जरूरतों के तहत मनीष को यह बंगला मिला था, उन्हीं जरूरतों के तहत इसे नए शिक्षा मंत्री को आबंटित किया जा रहा है। ध्यान रहे कि दिल्ली में सत्ता से वंचित हो जाने वाले नेता सालों-साल बंगला आदि की सुविधाओं को भोगते रहते हैं। इसके कई उदाहरण हैं। बजाय इसके कि इसकी तारीफ की जाती, इसमें साजिश का कोण ढूंढ लिया गया।
बहरहाल, यह कोई पहली बार नहीं हुआ है। एक राजनीतिक समीक्षक के रूप में मैं न जाने कबसे इस तरह की फुसफुसाहटें सुन रहा हूं कि अमित शाह नरेंद्र मोदी को धोखा देने वाले हैं या नरेंद्र मोदी अमित शाह के बढ़ते रुतबे से सशंकित हैं। मैंने तो यह भी सुना है कि उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ और अमित शाह के बीच छत्तीस का आंकड़ा बन चुका है। मुझे यह भी बताया गया है कि सरकार के कई कदमों के पीछे अमेरिका या अन्य अंतरराष्ट्रीय ताकतों का हाथ है। मैंने कभी इन बातों पर यकीन नहीं किया। न ही मैं अपनी समीक्षा में इन्हें कोई तरजीह देता हूं। दरअसल यह सब दिमाग पर जोर डालने से बचने की कोशिश के सिवा कुछ और नहीं है। मेरा मानना रहा है कि राजनीतिक यथार्थ तक पहुंचना है तो सामाजिक और राजनीतिक शक्तियों के बनते-बिगड़ते संतुलन पर निगाह रखी जानी चाहिए। कॉन्स्पिरेसी थ्योरी थोड़ी देर के लिए आपका मनोरंजन कर सकती है और कुछ नहीं। यह बात सही है कि साजिशें राजे-महाराजाओं के जमाने में निर्णायक भूमिका अदा करती थीं। पर आज के जमाने में वे केवल उर्वर दिमागों की उपज रह गई हैं।
इन साजिशों की बातों पर जाएं तो संघ न जाने कब से मोदी को गिराने का षड्यंत्र कर रहा है। इसी तरह राहुल गांधी और प्रियंका गांधी के बीच मतभेदों की खबरें जाने कितनी बार उड़ाई जा चुकी हैं। जब प्रियंका राजनीति में खुलकर नहीं आई थीं तो यही कहा जाता था कि राहुल उन्हें नहीं आने दे रहे हैं। जब प्रियंका राजनीति में आ चुकी हैं तो अब इस बात को कोई याद नहीं कर रहा है।
इसी तरह एक बहुत बड़ी कॉन्स्पिरेसी थ्योरी ईवीएम हैक करने के अंदेशों की है। चुनाव आयोग को इससे टकराना पड़ा है। लेकिन इसका अंत होते हुए नहीं दिखाई देता। मेरा ख्याल है कि यह भी भाजपा की जीत के सामाजिक-राजनीतिक कारणों का विश्लेषण न कर पाने में विफलता का परिणाम है। राजनीति के आसमान में साजिश उसी तरह से प्रकट होती है, जैसे कभी अंतरिक्ष में उड़नतश्तरियां प्रकट होती थीं। न उड़नतश्तरियों का कोई प्रमाण मिला, न ही इन राजनीतिक साजिशों का। याद रखना चाहिए कि साजिश के चश्मे से राजनीति को देखने वाले हमेशा गलत आकलनों तक पहुंचते हैं।
Date:22-03-23
पंजाब की चुनौतीसंपादकीय
पंजाब एवं हरियाणा हाई कोर्ट ने यह सही प्रश्न पूछा कि आखिर खालिस्तान समर्थक और वारिस पंजाब दे संगठन का सरगना अमृतपाल सिंह पुलिस को चकमा देकर भाग कैसे गया? हाई कोर्ट ने इस पर भी अपनी नाखुशी प्रकट की कि जब अमृतपाल देश की सुरक्षा के लिए खतरा बन गया था तो फिर समय रहते उसके खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की गई? भले ही पंजाब पुलिस कह रही है कि वह जल्द ही भगोड़े अमृतपाल को पकड़ लेगी, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि तीन दिन बीत गए हैं और वह खाली हाथ है। पुलिस को न केवल अमृतपाल तक पहुंचना होगा, बल्कि उसके समर्थकों तक भी। संभव है कि वह पुलिस से बचने में इसीलिए समर्थ हो, क्योंकि उसे छिपाने वाले सक्रिय हो गए हैं। पंजाब में ऐसे तत्वों की संख्या इसीलिए बढ़ी है, क्योंकि अमृतपाल के खिलाफ समय पर कार्रवाई नहीं की गई। वह पिछले करीब छह माह से कानून एवं व्यवस्था को चुनौती देने के साथ युवाओं को उकसाने और वैमनस्य पैदा करने में लगा हुआ था। समझना कठिन है कि उसे यह सब करने की छूट कैसे मिली हुई थी और वह भी तब, जब वह हथियार और हिंसा की बात कर रहा था? उसने हथियारबंद लोग भी एकत्रित कर लिए थे और उन्हीं के बल पर वह एक थाने में धावा बोलने में समर्थ रहा। कायदे से इस घटना के बाद ही उसके खिलाफ कार्रवाई की जानी चाहिए थी, लेकिन पता नहीं क्यों इसमें देरी की गई? इस देरी के दुष्परिणाम से बचना है तो अमृतपाल की गिरफ्तारी जल्द करनी होगी। इसके साथ ही उसके समर्थकों पर भी निगाह रखनी होगी और उन तत्वों पर भी, जो माहौल बिगाड़ने में लगे हुए हैं। ऐसे ही तत्वों के कारण पंजाब के कई स्थानों पर इंटरनेट सेवाओं को बाधित करना पड़ा है।
पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान की मानें तो विदेशी ताकतों के साथ मिलकर माहौल खराब करने वालों को पकड़ लिया गया है, लेकिन अभी उनकी चुनौती खत्म नहीं हुई है। पहली चुनौती तो फरार अमृतपाल को पकड़ना है और दूसरी, अन्य अतिवादी एवं अलगाववादी तत्वों पर लगाम लगाना। यह इसलिए आसान नहीं, क्योंकि पंजाब में कई राजनीतिक, सामाजिक और धार्मिक समूह ऐसे हैं, जो दबे-छिपे स्वर में अमृतपाल जैसे तत्वों के पक्ष में बयानबाजी करते रहते हैं। इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि ऐसे तत्व अमृतपाल की निंदा करने के लिए तैयार नहीं। चूंकि पंजाब से अधिक खालिस्तान समर्थक देश से बाहर और विशेष रूप से कनाडा, आस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, अमेरिका आदि देशों में नजर आ रहे हैं, इसलिए पंजाब सरकार के साथ भारत सरकार को भी सतर्क रहना होगा। ये खालिस्तान समर्थक इंटरनेट मीडिया के माध्यम से दुष्प्रचार में जुट गए हैं। उनका दुस्साहस इतना अधिक बढ़ा हुआ है कि वे भारतीय राजनयिक केंद्रों को भी निशाना बना रहे हैं।
Date:22-03-23
व्यापक साझेदारीसंपादकीय
भारत और जापान के रिश्तों की गहराई और व्यापकता को देखते हुए जापान के प्रधानमंत्री फुमिओ किशिदा की भारत यात्रा काफी महत्वपूर्ण है। आर्थिक क्षेत्र में दोनों देशों का रिश्ता ऐतिहासिक रूप से मजबूत रहा है। जापान की कंपनियों ने भारत में भारी भरकम निवेश किया है और जापान की एजेंसियां अधोसंरचना विकास के लिए वित्तीय मदद मुहैया कराने में भी अग्रणी रही हैं। जापान के लिए भारत एक अहम आर्थिक और भू-आर्थिक साझेदार है। हालांकि जापान के नीति निर्माताओं को इस बात से बुरा भी लगा कि भारत ने न केवल क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी में शामिल होने से इनकार कर दिया बल्कि उसने हिंद-प्रशांत आर्थिक ढांचे के व्यापार संबंधी हिस्से को लेकर भी ठंडा रुख अपनाए रखा। भारतीय नीति निर्माताओं को अपने जापानी समकक्षों को प्राथमिकता के साथ इस बात को समझाना चाहिए कि आर्थिक साझेदारी को केंद्र में रखते हुए व्यापार और खुलेपन को लेकर उनका नया रुख क्या है।
इसके बावजूद दोनों देशों के पड़ोस को देखते हुए रिश्ते के रणनीतिक हिस्से में भी बीते दशकों में खासी बढ़ोतरी हुई है। खासतौर पर उस समय से जबसे दिवंगत शिंजो अबे और सत्ताधारी लिबरल डेमोक्रेटिक पार्टी ने राजनीति पर दबदबा कायम किया था। किशिदा को अबे की तुलना में अधिक उदारवादी माना जाता है। लेकिन व्यवहार में उन्होंने पूर्व प्रधानमंत्री की विदेश नीति को जारी रखा है जो आमतौर पर ‘मुक्त और खुले हिंद प्रशांत क्षेत्र’ के इर्दगिर्द है। यह विदेश नीति इस क्षेत्र में अमेरिका को सुरक्षा की गारंटी देने वाला अहम देश मानती है। परंतु इसके साथ ही वह जापान, आसियान और भारत को भी अपनी सामूहिक सुरक्षा और चीन से निपटने की दृष्टि से अहम मानती है। किशिदा भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का भी इस क्षेत्र को स्थिर बनाने में साझा हित है क्योंकि चीन की आक्रामकता के कारण यह क्षेत्र लगातार अस्थिर बना हुआ है।
भारत और जापान इस वर्ष क्रमश: जी20 और जी7 के अध्यक्ष हैं। भारत को इस वर्ष टोक्यो में आयोजित होने जा रही जी7 शिखर बैठक में बतौर पर्यवेक्षक आमंत्रित किया गया है। दोनों समूहों के बीच सहयोग अनिवार्य है। विकास और सुरक्षा दोनों मोर्चों पर यह सहयोग जरूरी है। हाल ही में जी7 ने जलवायु फाइनैंसिंग और ट्रांजिशन यानी कम उत्सर्जन की दिशा में बदलाव की फाइनैंसिंग को लेकर जो प्रस्ताव रखे हैं तथा विश्व बैंक जैसे बहुपक्षीय विकास बैंकों में सुधार को लेकर जो भी कुछ कहा है, उनके बारे में जी20 को ही निर्णय लेना होगा तभी वह अपनी पकड़ बना सकेगा। जी7 यह भी मानता है कि पर्यावरण की दिशा में व्याप्त गतिरोधों और व्यापार के खुलेपन को लेकर भविष्य में जो भी अंत:संबंध कायम होने हैं उन्हें ‘जलवायु क्लबों’ के माध्यम से अंजाम देना होगा जहां विभिन्न देश अगर उत्सर्जन को लेकर एक समान रुख अपनाते हैं तो व्यापारिक गतिरोध कमतर है। यह भी एक ऐसा सवाल है जिसे भारत की अध्यक्षता वाले जी20 को संबोधित करना होगा। भारत इस बात से अवगत है कि सितंबर में होने वाली बैठक में कम से कम उतना सामंजस्य तो दिखाना होगा जितना कि बाली में गत वर्ष इंडानेशिया की अध्यक्षता में नजर आया था। रूस द्वारा यूक्रेन पर आक्रमण किए जाने को लेकर व्याप्त मतभेद तब से अब तक और अधिक गहरे हो गए हैं। चीन के राष्ट्रपति शी चिनफिंग की ताजा मॉस्को यात्रा से भी यह बात साबित होती है। जी7 के अध्यक्ष के रूप में जापान एक अहम साझेदार है जो यह सुनिश्चित करने में मदद कर सकता है कि जी20 के अमीर देश युद्ध से इतर अन्य मुद्दों पर सहमति बनाने के क्रम में भारत के प्रयासों के साथ हैं। किशिदा भारत से कीव की अघोषित यात्रा पर गए हैं। इससे पता चलता है कि सुरक्षा मसलों को लेकर जापान कितना सक्रिय है।
Date:22-03-23
साझेदारी का सफरसंपादकीय
जापान के प्रधानमंत्री के ताजा भारत दौरे में एक बार फिर दोनों देशों के बीच सहयोग का सफर और आगे बढ़ा है। हालांकि जापान के साथ भारत के संबंध पहले भी आपसी सहयोग पर आधारित और सहज रहे हैं, लेकिन समय-समय पर होने वाले शिखर सम्मेलनों में इसे और मजबूती मिलती रही है। सोमवार को दोनों देशों के प्रधानमंत्रियों के बीच हुई बातचीत में सबसे अहम पहलू वैश्विक रणनीतिक साझेदारी के विस्तार का संकल्प है, जिसे शांतिपूर्ण, स्थिर और समृद्ध हिंद-प्रशांत के लिए बेहद महत्त्वपूर्ण कहा जा सकता है। साथ ही, हाल के वर्षों में द्विपक्षीय संबंधों में हुई प्रगति समीक्षा और रक्षा उपकरण सहित प्रौद्योगिकी सहयोग, व्यापार, स्वास्थ्य और डिजिटल साझेदारी पर विचारों का आदान-प्रदान दरअसल वक्त की जरूरत है। यह छिपा नहीं है कि बीते कुछ समय से विभिन्न स्तर पर चीन की ओर से जारी गतिविधियों की वजह से हिंद- प्रशांत क्षेत्र में कैसी चुनौतियां खड़ी हो रही हैं भारत के सामने वक्त रहते इस जटिलता को समझना और उसी मुताबिक अपने हित में कदम उठाना कई वजहों से जरूरी है। जापान के प्रधानमंत्री ने भी यह स्वीकार किया कि इस क्षेत्र में शांति और स्थिरता के लिए भारत अपरिहार्य है।
आधुनिक तकनीकी और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में जापान का दखल जगजाहिर रहा है। हालांकि अपनी क्षमता होने के बावजूद भारत को इसका अतिरिक्त लाभ मिलता रहा है, लेकिन रणनीतिक मोर्चे पर भी जापान के साथ सहयोग में मजबूती लाने की कोशिशों के संकेत समझे जा सकते हैं। यों भारत की ओर से यह स्पष्ट किया गया है कि दोनों देशों के बीच विशेष रणनीतिक और वैश्विक साझेदारी साझा लोकतांत्रिक मूल्यों और अंतरराष्ट्रीय पटल पर कानून के सम्मान पर आधारित है। पिछले कुछ सालों से वैश्विक परिदृश्य जिस तरह बदल रहा है, उसमें अलग-अलग देशों के बीच खड़े होने वाले नए समीकरणों का सिरा भविष्य में बनने वाली दुनिया से जुड़ा हुआ है। साफ देखा जा सकता है। कि महाशक्ति माने जाने वाले से लेकर विकासशील देशों के बीच बहुस्तरीय सहयोग के नए ध्रुव बन रहे हैं और इस दिशा में अमूमन सभी देश सक्रिय हैं। इस बीच अंतरराष्ट्रीय कूटनीतिक जगत में भारत की जैसी जगह बनी है, उस पर दुनिया के तमाम देशों की निगाह टिकी हुई है। इस लिहाज से देखें तो जापान के साथ प्रौद्योगिकी और व्यापार सहित अन्य संबंधों की जमीन को और मजबूत करने के साथ-साथ रणनीतिक साझेदारी पर आगे बढ़ना भारत के लिए वक्त का तकाजा भी है।
इसके अलावा, दुनिया तेजी से जिस तकनीक आधारित व्यवस्था की ओर बढ़ रही है, उसमें नई या आधुनिक प्रौद्योगिकी की अहमियत का अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है। खासतौर पर तकनीक आधारित व्यवस्था में माइक्रोचिप पर निर्भरता जिस कदर बढ़ने वाली है, उसके मद्देनजर सेमीकंडक्टर और अन्य अहम प्रौद्योगिकियों में विश्वस्त आपूर्ति श्रृंखला के महत्व पर भारत और जापान के बीच हुई बातचीत की उपयोगिता समझी जा सकती है। इस संदर्भ में देखें तो तकनीक और निवेश के लिहाज से जापान की एक खास जगह है, लेकिन सेमीकंडक्टर के मामले में भारत की कोशिश अब पूरी तरह आत्मनिर्भर होने की है। यह बेवजह नहीं है कि जापानी प्रधानमंत्री ने नई दिल्ली के साथ सहयोग तेजी से बढ़ने के साथ-साथ जापान के लिए भी महत्त्वपूर्ण आर्थिक अवसर पैदा होने की उम्मीद जताई। फिलहाल जापान जी – 7 और भारत जी-20 की अध्यक्षता कर रहा है। वैश्विक स्तर पर राजनीतिक और आर्थिक मोर्चों पर इन दोनों समूहों की जो भूमिका है, उसमें स्वाभाविक ही यह विचार का केंद्रीय बिंदु है कि आने वाले वक्त में अंतरराष्ट्रीय समुदाय में भारत और जापान को क्या भूमिका निभानी चाहिए।
Date:22-03-23
मनुष्य बनाम वन्यजीवसंपादकीय
देश के अलग-अलग राज्यों के वन क्षेत्रों और उसके आसपास बसी इंसानी बस्तियों से तेंदुए या बाघ के हमले में लोगों के मारे जाने की खबरें अक्सर आती रहती हैं। आम लोगों के सामने अपने स्तर पर बचाव के उपाय करने से लेकर सरकार से सुरक्षात्मक और वैकल्पिक इंतजाम करने की फरियाद करने के अलावा और कोई चारा नहीं होता है। दूसरी ओर, वन्यजीवों के संरक्षण से जुड़े कई प्रश्न भी बेहद अहम हैं, जिनके चलते कई बार इस समस्या का कोई ठोस हल निकालना मुश्किल होता है। लेकिन बाघ या तेंदुए के इंसानी बस्तियों में आ जाने या उनके हमले की वजह से होने वाली मौतें लगातार चिंता का विषय बनती गई हैं। महाराष्ट्र में सोमवार को राज्य के वन मंत्री ने विधानसभा में बताया कि वहां चंद्रपुर जिले में अकेले पिछले साल बाघों और तेंदुओं के हमले में तिरपन लोगों की मौत हो गई। हालांकि इस दौरान अलग-अलग घटनाओं में चौदह बाघों के अलावा भालू और मोर सहित पचास से ज्यादा अन्य वन्यजीव भी मारे गए। जाहिर है, वन्यजीवों और मनुष्य के बीच जीवन की स्थितियों में बदलाव और टकराव के चलते अब ऐसे हालात पैदा होने लगे हैं कि नाहक जान जाने की घटनाओं की निरंतरता बढ़ने लगी है।
दरअसल, वक्त के साथ बढ़ती आबादी या अन्य वजहों से जंगल के आसपास के गांवों में रिहाइशी इलाकों का विस्तार हुआ है। इससे वन क्षेत्रों का दायरा कम होता गया है और जंगली पशुओं के प्राकृतिक पर्यावास के क्षेत्र सिमटते गए हैं। इसका सीधा असर वन्यजीवों के जीवन पर पड़ता है और उसमें बाघ या तेंदुए जैसे पशुओं के लिए भोजन से लेकर अधिवास तक के मामले में असहज स्थितियां पैदा होती हैं। इसके अलावा, वनों में अवैध शिकार करने वालों की वजह से भी संरक्षित पशुओं के सामने संकट खड़ा होता है पारिस्थितिकी और जैव विविधता की कसौटियों और अनिवार्यताओं को समझने वाले तमाम लोग यह जानते हैं कि एक ओर जहां मनुष्य का जीवन अनमोल है, वहीं पशुओं और खासतौर पर कुछ विलुप्तप्राय जीवों का संरक्षण प्राकृतिक संतुलन के लिए कितना जरूरी है। लेकिन इस मामले में सरकार से लेकर आम लोगों तक की लापरवाही अलावा अवैध रूप से जानवरों का शिकार करने वाले गिरोहों की ओर से जंगल और उसके आसपास के इलाकों में ऐसे दबाव पैदा हो रहे हैं कि उसमें रहने वाले कई पशुओं के भीतर असुरक्षा की स्थिति में आक्रामक प्रवृत्ति में बढ़ोतरी हो रही है।
हालांकि वन्यजीव खुद ही अपने लिए सहज और प्राकृतिक पर्यावास की ओर रुख करते हैं। लेकिन इस क्रम में उनका सामना इंसानी आबादी से होता है। बचाव की कोशिश में हुए संघर्ष की वजह से नाहक ही जान जाने के हालात पैदा होते हैं। कभी जंगली इलाकों का दायरा बड़ा था और इंसानी बस्तियों की भी सीमा थ। तब मनुष्य और पशु, दोनों को अपनी जीवन स्थितियों में एक दूसरे से बहुत बाधा नहीं आती थी। लेकिन बढ़ती आबादी के साथ कृषि भूमि का विस्तार, शहरीकरण और औद्योगीकरण में वृद्धि के मकसद से जंगलों की कटाई की वजह से वनक्षेत्र सिकुड़ते गए। इसकी वजह से बाघ, तेंदुआ और हाथी जैसे कुछ पशुओं के अक्सर इंसानी बस्तियों की ओर चले जाने और मनुष्यों पर हमले की घटनाएं बढ़ीं। जरूरत यह है कि जंगल क्षेत्रों के आसपास रहने वाली इंसानी आबादी को वन्यजीवों की प्रकृति और पारिस्थितिकी संतुलन में उनकी अनिवार्यता के बारे में जागरूक किया जाए और साथ ही इंसानों के जीवन के लिहाज से खतरनाक पशुओं के लिए सुरक्षित अभयारण्यों को और बेहतर बनाया जाए।
Date:22-03-23
दोस्ती का दमसंपादकीय
लगाव और रिश्तों की जो समझ जापान और भारत के बीच दिखती है, वैसा कुछ ही देशों के साथ परवान चढ़ता है। भारत दौरे पर आए जापान के प्रधानमंत्री फुमियो किशिदा और भारत के प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की द्विपक्षीय बातचीत में संबंधों की प्रगाढ़ता परिलक्षित होती है। क्षेत्रीय मसलों खासकर हिंद-प्रशांत क्षेत्र में शांति को लेकर दोनों देशों की सोच काफी स्पष्ट है। दोनों देशों के नेताओं के बीच हिंद-प्रशांत क्षेत्र की समृद्धि और स्थिरता संबंधी चुनौतियों से निपटने की रणनीति पर भी विस्तृत चर्चा हुई। दरअसल, हिंद-प्रशांत के इलाके में चीन की दादागीरी को लेकर न केवल भारत और जापान परेशान और चिंतित हैं, बल्कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र के बाकी देश भी चिंतातुर हैं। चीन की विस्तारवादी सोच की वजह से यह इलाका हाल के वर्षों में सुर्खियों में रहा है, और यहां हलचल बढ़ी हैं। जबकि भारत और जापान की सोच यह है कि इस इलाके में चीन की बेवजह की घुसपैठ और रोक-टोक न हो। भारत की मंशा शुरू से यह रही है कि यह इलाका समृद्ध हो । लिहाजा, यहां मौजूद संसाधनों का इस्तेमाल सकारात्मक रूप से और क्षेत्र के छोटे देशों की बेहतरी के लिए किया जाए। चूंकि जापान हिंद-प्रशांत क्षेत्र का सबसे महत्त्वपूर्ण देश है; इसलिए उसकी यहां बड़ी भूमिका है। भारत का साथ मिलने से निश्चित तौर पर जापान का आत्मविश्वास बढ़ेगा और वह यहां की समृद्धि को और ज्यादा व्यापक स्वरूप दे सकेगा। हिंद-प्रशांत क्षेत्र पिछले एक दशक में अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीतिक और भू-आर्थिक वातावरण में बदलाव के कारण बढ़े हुए फोकस का क्षेत्र रहा है। यह प्रतिस्पर्धा और सहयोग के क्षेत्र के रूप में उभरा है। महामारी के कारण कई चुनौतियों और अवसरों बढ़ाया गया है, जिनमें नियम-आधारित आदेश की आवश्यकता, व्यापार और आपूर्ति श्रृंखलाओं को फिर से संतुलित करना, बहुपक्षीय संस्थानों की कमजोरियों को संबोधित करना और वैक्सीन इक्विटी शामिल हैं। इस क्षेत्र में भारत की बेहद अनूठी स्थिति है। इस कारण हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन के बढ़ते दखल समेत कई समस्याओं का हल भारत कर सकता है। इस वजह से क्वाड में भारत का महत्त्व अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया से ज्यादा हो जाता है। निश्चित रूप से चीन के दबदबे की काट है भारत । निश्चित तौर पर दोनों देशों की दोस्ती न केवल नया आयाम गढ़ेगी, बल्कि वैश्विक संबंधों को भी नये सिरे से परिभाषित करेगी।
Date:22-03-23
धरती के पेट में अब लौटा दो पानीराजेंद्र सिंह, ( जलविद् और सामाजिक कार्यकर्ता )
आज पूरी दुनिया में व्यापक जल संकट है। भारत में एक तरफ ग्लेशियर का पिघलना और दूसरी तरफ बाढ़-सुखाड़ का बढ़ना आम होता जा रहा है। आमतौर पर नदियों में पानी घट रहा है। ग्लेशियर जब पिघलता है, तो ऊपर नदियों के उद्गम के पास ही लोग उसका उपयोग कर लेते हैं। ग्लेशियरों के पिघलने के कारण हमारे समुद्र पर भी उसका दुष्प्रभाव पड़ रहा है। नदियों में जो सतत प्रवाह है, उसमें भी धीरे-धीरे संकट बढ़ता जा रहा है। जल स्रोत संकट में आते जा रहे हैं। यह जो जल स्रोत का संकट है, उससे बचने के उपाय भी बहुत साफ हैं। जहां ग्लेशियर पिघल रहे हैं, उनके आसपास जंगलों का होना जरूरी है। जंगल नहीं होते हैं, तो सूरज से आने वाली लाल गरमी वहां का तापमान बढ़ा देती है और उस तापमान के चलते ग्लेशियर और तेजी से पिघलकर नीचे आने लगते हैं। जब वहां जंगल होते हैं, तो सूरज से आने वाली गरमी से धरती तपती नहीं है, उसे बुखार नहीं चढ़ता। ऐसा होने पर मौसम का मिजाज नहीं बिगड़ता है। ग्लेशियर के आसपास के इलाकों में हरियाली बढ़ाना अब बहुत जरूरी है, इन इलाकों में होने वाले कटाव को भी रोकना चाहिए।
हम अगर ग्लेशियरों को पिघलने से रोकना चाहते हैं, तो हम भारतीयों को कम से कम यह सोचना होगा कि जहां आज ग्लेशियर पिघल रहे हैं, वहां जंगल नहीं हैं, जबकि वहां पहले जंगल थे। पहले ग्लेशियर उतनी तेजी से नहीं पिघलते थे, लेकिन अब पिघलने लगे हैं। अत: जिस प्रमुख कारण से ग्लेशियर का पिघलना शुरू हुआ, उस पर हमें ध्यान देना पड़ेगा। यह साधारण तरीका है, इसके पीछे विज्ञान है। यह कोई रॉकेट साइंस नहीं है, लेकिन दुर्भाग्य से हमारी सरकारें इस काम को ध्यान से नहीं करतीं, इसलिए ग्लेशियर पिघल रहे हैं।
आज देश में नदियों और तालाबों की स्थिति तो और भी भयानक हो चली है। भारत की दो तिहाई छोटी नदियां नाले बनकर सूख गई हैं और जो बची हुई हैं, वे मैला ढोने वाली मालगाड़ी बन गई हैं। हम कह सकते हैं कि नदियों की हालत बहुत खराब है। जिस देश में नदियां सूखती हैं, वहां की सभ्यता भी सूखने लगती है। नदियों का हमारी सभ्यताओं व जीवन से गहरा रिश्ता है। हम सभी का स्वास्थ्य नदी के स्वास्थ्य से जुड़ा है, यदि हम नदियों को स्वच्छ बनाएंगे, तो नदियां हमारे स्वास्थ्य को ठीक रखेंगी और हमारे जीवन का जो कष्ट है, उसका समाधान कर देंगी।
नदियों को शुद्ध सदानीरा बनाने में अनेक छोटे-छोटे जलाशयों व तालाबों का योगदान होता है। पानी इन जलाशयों से जमीन के नीचे जाता है। अगर जलाशय ज्यादा साफ होते हैं, तो उनमें पानी भी ज्यादा रहता है। जलाशयों से भूजल का पुनर्भरण होता है। ताल, पाल, झाल ही धरती का पेट भरते आए हैं। पहले हमारे भूजल भंडार भरे हुए थे। जब जल भंडार भरे रहते हैं, तो उस राष्ट्र की मुद्रा का भी मूल्य बना रहता है। यदि ये भंडार खाली होते हैं, तो तालाब सूख जाते हैं, नदियां सूखने लगती हैं। नदियों की अविरलता, निर्मलता बचाकर रखना ही हमारे जीवन को ठीक करेगा।
पिछले 42 साल में मैंने 13 नदियों को पुनर्जीवित किया है, जिनमें से आठ नदियां तो राजस्थान की हैं। अरवरी, रूपारेल, सरसा इत्यादि नदियां सूख गई थीं, लेकिन अनवरत प्रयास से ये नदियां फिर पानीदार बन गई हैं। यह समझना चाहिए कि नदियों का उद्धार सभ्यताओं का पुनर्जीवन है। नदियां हमारी संस्कृति में हमेशा से आनंद का स्रोत रही हैं। यदि नदियां सूखती हैं, तो हमारी खुशियां भी घटती हैं।
यदि अब हम जल बचाने के काम में नहीं लगेंगे, तो ध्यान रहे, धरती पर बाढ़, सुखाड़ से स्थिति बिगड़ती जा रही है। जिस भारत भूमि पर आजादी के वक्त एक प्रतिशत से भी कम बाढ़ आती थी और तीन प्रतिशत से कम हम सुखाड़ भुगतते थे, वहां आज ये आपदाएं बढ़ गई हैं। आज भारत के 17 राज्यों के 365 जिले सुखाड़ या सूखे से प्रभावित होते हैं और देश के 190 जिले बाढ़ से प्रभावित होते हैं। सुखाड़ का बढ़ना वर्षा की कमी या अधिकता के चलते नहीं है। जो जलवायु परिवर्तन हुआ है, उसके चलते हमें यह पता ही नहीं चलता है कि कब बारिश होगी और कब नहीं? फसल चक्र भी वर्षा चक्र से कट गया है और यह कटना घातक है। जल संकट बढ़ गया है, तो आज किसान को बहुत मेहनत से अनाज उगाना पड़ रहा है।
हमें अब अपने आप से सीखना पड़ेगा। हम भारतीय कभी जल के मामले में दुनिया के गुरु हुआ करते थे। हम तब तक गुरु थे, जब तक हम भगवान को पहचानते थे। हमारे भगवान थे, भ से भूमि, ग से गगन, व से वायु, अ से अग्नि, न से नीर। ये जो पंच महाभूत हैं, इन्हीं को भारतीय जब तक भगवान मानते रहे, तब तक अपने नीर, नदी और नारियों का पूरा सम्मान करते रहे। यह जो भारतीय ज्ञान तंत्र था, इसमें आई कमी के कारण ही हम कष्ट झेल रहे हैं।
हम जल लूट लेते हैं और धरती का पेट खाली हो जाता है। जब धरती के पेट में पानी नहीं होता है, तब हम बेपानी होकर तरसते हैं। अच्छा समाज वह होता है, जो बुरे दिन आने से पहले ही संभल जाता है। राजस्थान के लोगों ने समझा। आज महाराष्ट्र, कर्नाटक व अन्य राज्यों में पानी की कमी के कारण आत्महत्या होती है, लेकिन राजस्थान में नहीं होती। राजस्थान के लोगों ने कम बारिश के बीच अपनी जिम्मेदारियों को समझा और सबसे कम बारिश होने के बावजूद वहां लोगों ने वर्षा की बूंदों को सहेजना शुरू किया। पानी एहसास या भाव से ही संरक्षित होता है।
कभी भारत में राजा पानी के लिए जमीन देते थे। प्रजा अपना पसीना लगाती थी। राजा पानी का काम करने वालों को खाना देते थे। जो लोग पानी के काम में नहीं लगते थे, उन्हें प्रेरित किया जाता था। भारत की जल व्यवस्था सामुदायिक, लेकिन विकेंद्रित थी। इसे जब हम समझेंगे, तभी दोबारा अपने को पानीदार बना सकेंगे। देश के शुभ की चिंता करनी पड़ेगी, शासक, संत, विद्वान, महाजन इत्यादि सभी को मिलकर प्रयास करने पड़ेंगे। हमें दूसरों से नकल करने की भी जरूरत नहीं है। हम अपनी विद्या पर लौट भर आएं, तो जगत को जल का उपयोग सिखा देंगे।
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भ्रष्टाचार, एक ऐसा दूषित तंत्र है, जो सरकार के साथ जनता के संबंधों को बीमार कर देता है। इसके मद्देनजर हाल ही में जी-20 समूह की बैठक रखी गई थी। इसमें भ्रष्टाचार विरोधी उपायों पर चर्चा की गई। इसी कड़ी में हम स्वतंत्रता के बाद से भारत सरकार के भ्रष्टाचार विरोधी कदमों पर एक नजर डालते हैं –
– सन् 1957 में सार्वजनिक क्षेत्र की एक कंपनी में हुई वित्तीय अनियमितता के चलते संसद में भ्रष्टाचार को रोकने के लिए बहस हुई। अंततः संथानम् समिति बनाई गई। इस समिति ने भ्रष्टाचार को मुख्य रूप से चार कारणों से जोड़ा था –
1) प्रशासनिक कामकाज में देरी।
2) नियामक तंत्र के गठन की अपेक्षा, सरकार का अपने ढंग से समस्याओं के हल पर भरोसा करना।
3) सरकारी अधिकारियों में निहित शक्तियों के प्रयोग में व्यक्तिगत विवेक की गुंजाइश का होना।
4) नागरिकों को प्रभावित करने वाले मुद्दों से निपटने के लिए बोझिल प्रक्रियाएं।
समिति ने माना कि –
भ्रष्टाचार की रोकथाम के लिए तकनीक कितनी कारगर –
– सार्वजनिक जीवन में जवाबदेही और पारदर्शिता से भ्रष्टाचार के मामलों में कमी देखी जाती है। इस हेतु आयोग ने सतर्कता प्रशासन के लिए तकनीक के माध्यम से सुरक्षात्मक उपाय अपनाए हैं।
– ऑनलाइन रेलवे टिकट आरक्षण, ऑनलाइन आयकर रिफंड का भुगतान तथा ऑनलाइन सम्पत्ति कर जमा करने की पहल से पारदर्शिता आई है।
जन-भागीदारी आवश्यक है –
भ्रष्टाचार की जड़ पर प्रहार करने के लिए मानवीय मूल्यों और व्यक्तिगत नैतिकता को उभारा जाना चाहिए। इसमें जनता को भी सहयोग करना होगा। जनता की भागीदारी के लिए आयोग ने शिकायत प्रबंधन प्रणाली विकसित की है।
लोकसेवकों के खिलाफ शिकायातों के लिए एक अलग व्हिसल ब्लोअर तंत्र है। इसमें एक पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराई जा सकती है। इस प्रणाली में शिकायतकर्ता की पहचान गुप्त रखी जाती है।
सार्वजनिक जीवन में सत्यनिष्ठा के विचार को बढावा देने के लिए नागरिकों और संगठनों के लिए अखंडता की रक्षा की प्रतिज्ञा तैयार की गई है। इसके द्वारा सभी क्षेत्रों में सत्यनिष्ठा और कानून के शासन के उच्चतम मानकों को बनाए रखने के लिए नागरिक प्रतिबद्ध हैं।
सन् 2000 से प्रतिवर्ष एक सतर्कता जागरूकता सप्ताह आयोजित किया जाता है। सन् 2010 में गठित जी-20 भ्रष्टाचार विरोधी कार्यसमूह ने सार्वजनिक और निजी क्षेत्र में क्षमता निर्माण, सर्वोत्तम प्रथाओं को बनाए रखने, विकास और राष्ट्रीय भ्रष्टाचार विरोधी रणनीतियों के कार्यन्वयन पर ध्यान केंद्रित किया है। इस प्रकार से भारत ने भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए जो ढांचा तैयार किया है, वह वैश्विक प्रथाओं के अनुरूप कहा जा सकता है।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित पी.डेनियल के लेख पर आधारित। 1 मार्च, 2023
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Date:21-03-23
Punjab To MaharashtraIf extremists, whatever their rhetoric, are allowed freedom of mischief, the result can turn dangerousTOI Editorials
Punjab is reeling. The operation to catch Khalistani separatist Amritpal Singh, who security agencies now reveal has “links” with both Pakistan’s ISI and the Islamic State, has also meant an internet ban for all of the state. He has been invested in by actors out to harm society’s fabric, India’s peace, finding a home in continuing grievances in some sections of Sikhs. The Khalistan issue has cropped up for a while, yet our surveillance and intelligence were caught unawares by Amritpal’s show of strength. The Sikh community has also long made public its vexation over slow progress on the 2015 sacrilege cases; trial of main accused Dera Sacha Sauda chief Ram Rahim and followers is yet to start. Punjab’s AAP government recently moved the high court saying Haryana’s frequent paroles to the Dera chief, a rape and murder convict, have renewed demands for release of ‘bandi singhs’ (Sikh prisoners) in Punjab’s jails.
Punjab and India can ill afford an episode of state vs far-right militancy. Yet far-right outfits seem to enjoy indulgence in other states too. In Maharashtra, openly Islamophobic rallies in various districts are on for months, organised by Sakal Hindu Samaj, a collaborative of hard-right Hindu outfits. Police should know nothing is local anymore, everything can turn viral and virulent.
To ban internet for simply a police chase, over fears of the spread of fake news, cannot help catch Amritpal but can cripple life – bulk of economic activity is via UPIs. A ban also stops real information, spreads anxiety and alienates the public – something the AAP government should think about. To counter fake news on social media, the state must work with and if necessary come down on Big Tech. GoI often demands content takedowns. Yet Sakal Hindu Samaj’s rallies, Ram Rahim’s videos and Amritpal’s speeches are easily available.
The crackdown on Amritpal started two days after G20 events in Amritsar were held under paramilitary bandobast. The message is clear. Political parties and police allowing extremist religious outfits unfettered public outreach online and offline is plain dangerous – maintaining law and order should not be chasing a chimera.
Date:21-03-23
Who’ll Grade NAAC?Complaints of wrongdoing have piled up too high. UGC & education ministry must step inTOI Editorials
The National Assessment and Accreditation Council was established by UGC in 1994 to serve the function of quality assurance. After a slowish takeoff, today its power is writ large across the entire higher education ecosystem. At universities and colleges, an impending NAAC visit sets off a tense flurry of activities from literally whitewashing to non-stop faculty conferencing. For students and parents, it can be the most influential guide for where to seek admissions. But as complaints mount about this accreditation system’s unreliability and corruption, UGC and the education ministry must stop watching from the sidelines. Step in and fix the rot.
From a little-known deemed university beating IISc to the top to another deemed university incredibly jumping five grades between two NAAC assessments to a private university receiving the highest achievable grade within just over a handful of years of establishment, the assessments themselves have been screaming for a closer look. This month Bhushan Patwardhan stepped down as chair of the NAAC executive committee while highlighting the awarding of questionable grades. At the same time the Joreel committee has listed how data verification is not following any scientific method, which is damning for a process built upon self-assessment by institutions. Even worse, more opacity rather than transparency is being built into the system.
As it is, the need to overhaul NAAC to meet current needs has been obvious for some time. It assesses outcomes poorly. It gives institutions credits for papers they say they have published without quizzing them on research connections with industry or patents won or new products/processes devised – as other international ranking agencies would be wont to. When the demands on education are changing rapidly, with game-changing AI inroads being one example, a static evaluation rubric can as likely do harm as good. Now add corruption to the mix, with subpar institutes wheedling better grades than their better teaching peers. Building systems to assess what is not easily measurable can take time. But cleaning the toxins that are now in our face must start today.
Date:21-03-23
That Synching Feeling Of Central BanksIndia relatively safe, but expect turbulenceET Editorials
Bank rescues in the US and the EU over successive weekends have stoked market concerns of contagion spreading from concerted global liquidity-tightening by central banks. Following the government-brokered takeover of Credit Suisse by UBS, the US Federal Reserve, European Central Bank (ECB) and central banks in Canada, England, Japan and Switzerland issued statements announcing coordinated action to improve market liquidity. These measures, however, are unlikely to satisfy shareholders of Silicon Valley Bank (SVB) and Signature Bank and Credit Suisse bondholders, who have taken it on the chin. Investor nerves are too frayed to be soothed by any action short of a pause in the Fed’s interest rate-hiking cycle after ECB delivered a half-percentage-point increase even as a systemically important Swiss bank was struggling.
Bank stocks and bonds led the global market rout as crisis lingered in US regional banks and the shotgun merger of a Swiss banking icon, both with government backstops, raised doubts over regulators’ ability to douse the fire. The pain promised by central bankers in their battle against decades-high inflation is showing up in credit markets where banks piled into bonds at peak prices that are falling precipitously with hardening yields. More such accidents may be waiting to happen if central bankers do not relent in their inflation-busting mission. Decisions by the Fed and Bank of England this week are signals markets worldwide will be looking at.
India’s relative isolation provides it some measure of protection if more financial dominoes were to fall. Its banks have built vastly superior capital buffers in the course of emerging from a bad loan crisis. They are required to value an overwhelming part of their bond portfolios at market prices, reducing the chances of nasty surprises. The Reserve Bank of India (RBI) has also been considerably gentle in synchronised central bank rate hikes. It will, however, have to deal with fresh turbulence in international capital markets.
Date:21-03-23
Finally, Making Friends, Partnerships in AfricaET Editorials
India’s renewed outreach to Africa — marked by the first-ever defence conclave, the start of a 10-day Africa-India Field Training Exercise from today, and an agreement with the African Union focused on supporting SMEs — is timely. It can counter China’s influence in the continent, for which Beijing has had a considerable head start. India provides an alternative model of engagement for Africa. But for it to be viable, New Delhi must stay the course, making it clear that unlike China, it does not seek dominance but partnership.
China surpasses India in its capacity to invest funds in Africa. But India can leverage factors such as a shared colonial experience, strong Indian communities integrated into the local society and economy, and similar developmental challenges. Coupled with an understanding of the challenges of development deficit and poverty in a world constrained by geopolitical complications, competitions and climate change, India is an ideal partner for Africa. Africa is a major market for defence equipment; India can be a supplier. But New Delhi’s engagement is not just about the market but building capacity. Beyond defence, India is, through the International Solar Alliance (ISI), driving resources and building capacities in Africa for faster solar deployment. Indian companies are developing hydrogen capacities in north Africa. India is also working with partners like Japan, the EU and Germany to build up local capacity. And, importantly, India along with South Africa are at the forefront of the fight for equitable access to Covid vaccines for Africa. India’s past efforts in Africa have remained low key. Rather than compete to exert dominance, India must focus on building a partnership for growth and development — and friendship.
Date:21-03-23
The wide disparities in human developmentGovernments must prioritise human development alongside economic growth to ensure that the benefits of growth are more evenly distributedNandlal Mishra, [ Senior research fellow at International Institude for Population Sciences, Mumbai ]
India is now one of the fastest-growing economies globally. However, this growth has not resulted in a corresponding increase in its Human Development Index (HDI). The HDI is a composite statistical measure created by the United Nations Development Programme to evaluate and compare the level of human development in different regions around the world. It was introduced in 1990 as an alternative to conventional economic measures such as Gross Domestic Product (GDP), which do not consider the broader aspects of human development. The HDI assesses a country’s average accomplishment in three aspects: a long and healthy life, knowledge, and a decent standard of living. According to the Human Development Report of 2021-22, India ranks 132 out of 191 countries, behind Bangladesh (129) and Sri Lanka (73).
Given India’s size and large population, it is critical to address the subnational or State-wise disparities in human development. Doing so will help India realise its demographic dividend. For this purpose, I have developed a new index using the methodology suggested by the UNDP and the National Statistical Office (NSO) which measures human development on a subnational level for 2019-20.
Calculating HDI
The HDI is calculated using four indicators: life expectancy at birth, mean years of schooling, expected years of schooling, and Gross National Income (GNI) per capita. Life expectancy estimates are taken from the Sample Registration System, and mean and expected years of schooling are extracted from National Family Health Survey-5. Since estimates for GNI per capita are unavailable at the subnational level, gross state domestic product (GSDP) per capita is used as a proxy indicator to measure the standard of living. GSDP (PPP at constant prices 2011-12) is gathered from the Reserve Bank of India’s Handbook of Statistics on Indian States. GSDP per capita is estimated using the population projection provided by the Registrar General of India’s office. The methodology involves calculating the geometric mean of the normalised indices for the three dimensions of human development while applying the maximum and minimum values recommended by the UNDP and NSO. HDI scores range from 0 to 1, with higher values indicating higher levels of human development.
The subnational HDI shows that while some States have made considerable progress, others continue to struggle. Delhi occupies the top spot and Bihar occupies the bottom spot. Nonetheless, it is worth noting that Bihar, unlike the previous HDI reports, is no longer considered a low human development State.
The five States with the highest HDI scores are Delhi, Goa, Kerala, Sikkim, and Chandigarh. Delhi and Goa have HDI scores above 0.799, which makes them equivalent to countries in Eastern Europe with a very high level of human development. Nineteen States, including Kerala, Maharashtra, Tamil Nadu, Haryana, Punjab, Telangana, Gujarat, and Andhra Pradesh, have scores ranging between 0.7 and 0.799 and are classified as high human development States.
The bottom five States are Bihar, Uttar Pradesh, Madhya Pradesh, Jharkhand, and Assam, with medium levels of human development. This category also includes States such as Odisha, Rajasthan, and West Bengal, which have HDI scores below the national average. The scores of these low-performing States resemble those of African countries such as Congo, Kenya, Ghana, and Namibia.
Despite having the highest SGDP per capita among larger States, Gujarat and Haryana have failed to translate this advantage into human development and rank 21 and 10, respectively. Conversely, Kerala stands out with consistently high HDI values over the years, which can be attributed to its high literacy rates, robust healthcare infrastructure, and relatively high income levels. Bihar, however, has consistently held the lowest HDI value among the States, with high poverty levels, low literacy rates, and poor healthcare infrastructure being the contributing factors. It is worth noting that the impact of COVID-19 on subnational HDI is not captured here. The full impact of COVID-19 on human development will be known when post-pandemic estimates are available.
Reasons for discrepancies
One of the main reasons for this discrepancy is that economic growth has been unevenly distributed. The top 10% of the Indian population holds over 77% of the wealth. This has resulted in significant disparities in access to basic amenities, healthcare and education. Another reason is that while India has made significant progress in reducing poverty and increasing access to healthcare and education, the quality of such services remains a concern. For example, while the country has achieved near-universal enrolment in primary education, the quality of education remains low.
Governments must prioritise human development alongside economic growth to ensure that the benefits of growth are more evenly distributed. This requires a multi-faceted approach that addresses income inequality and gender inequality; improves access to quality social services; addresses environmental challenges; and provides for greater investment in social infrastructure such as healthcare, education, and basic household amenities including access to clean water, improved sanitation facility, clean fuel, electricity and Internet in underdeveloped States. India must prioritise investments in human development and job creation, particularly for its youth.
Date:21-03-23
मध्य-पूर्व में चीन के बढ़ते प्रभाव पर नजर रखना जरूरीमनोज जोशी, ( ‘अंडरस्टैंडिंग द इंडिया चाइना बॉर्डर’ के लेखक )
हाल में चीन ने ईरान व सऊदी अरब के बीच करारनामा करवाया। दोनों देश आपस में संघर्षरत थे, लेकिन अब उनके बीच कूटनीतिक रिश्ते बेहतर होने की उम्मीद है। चीन के शीर्ष डिप्लोमैट वांग यी ने संयुक्त त्रिपक्षीय वक्तव्य पर दस्तखत किए थे। उन्होंने कहा, यह अनुबंध बताता है कि चीन एक विश्वसनीय मध्यस्थ की भूमिका निभाने में सक्षम है। वक्तव्य में भी कहा गया था यह समझौता चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की ‘उदारतापूर्ण पहल’ का परिणाम है। चीनी, ईरानी और सऊदी अधिकारियों के बीच चार दिनों तक चली वार्ता के बाद 10 मार्च को यह घोषणा की गई थी। संयोग से उसी दिन चीन में नेशनल पीपुल्स कांग्रेस का सत्र हुआ, जिसमें शी जिनपिंग को लगातार तीसरी बार राष्ट्रपति चुन लिया गया था। ऐसे में वह करारनामा चीनी कूटनीति के बारे में क्या नए संकेत करता है? यह कि उसमें अब एक नया आत्मविश्वास आ गया है या यह कि अब दुनिया पर पश्चिम का दबदबा घटता जा रहा है?
पिछले साल दिसम्बर में शी जिनपिंग ने सऊदी अरब की यात्रा की थी। वहां उन्होंने मेजबान के साथ तीन शिखर बैठकें कीं। वे गल्फ को-ऑपरेशन काउंसिल और अरब लीग के नेताओं से भी मिले। यात्रा के दौरान चीन और सऊदी अरब ने अनेक एमओयू साइन किए, जिनका मूल्य अरबों डॉलर का था। सभी पक्षों द्वारा जारी संयुक्त बयानों के साथ ही शी ने आठ विभिन्न सेक्टरों में चीन-अरब सम्बंधों को मजबूत बनाने का प्रस्ताव भी रखा। इनमें विकास और सुरक्षा सम्बंधी क्षेत्र भी शामिल थे। अगर अतिशयोक्ति नहीं करें तो कह सकते हैं कि चीन ने मध्य-पूर्व में अपने प्रभाव का दायरा बहुत बढ़ा लिया है।
चीन को अपनी जरूरत के 70% तेल और 40% प्राकृतिक गैस का आयात करना पड़ता है। इनमें से 20% की पूर्ति अकेले सऊदी अरब से होती है। जिनपिंग की यात्रा से ठीक पहले चीन और कतर ने 60 अरब डॉलर की डील साइन की थी, जिसके चलते चीन को हर साल 40 लाख टन तरल प्राकृतिक गैस मुहैया कराई जाएगी। यह अनुबंध 27 वर्षों के लिए किया गया है। लेकिन मध्य-पूर्व में चीन की रुचि केवल तेल और गैस के लिए नहीं है। वह 2020 से ही अरब-जगत का सबसे बड़ा व्यावसायिक सहयोगी है। 2021 में चीन-अरब व्यापार 330 अरब डॉलर को पार कर गया।
मार्च 2021 में चीन ने ईरान से 25 साल का अनुबंध किया था और 12 अरब देशों से भी इसी तरह की रणनीतिक साझेदारियां की थीं। चीन ने समय-समय पर इराक, ईरान, लीबिया, सूडान, यमन और इजरायल-फलस्तीन संघर्ष के मामलों में मध्यस्थता की, लेकिन इतनी ऐहतियात से कि उसका खासा प्रभाव नहीं पड़ा। 2013 में जिनपिंग ने बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव की घोषणा की थी। मध्य-पूर्व क्षेत्र उसका अहम आयाम है। वहां अभी तक इस इनिशिएटिव के चलते दो सौ से ज्यादा बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर और एनर्जी प्रोजेक्ट्स पूरे किए जा चुके हैं। आज यह इलाका चीन द्वारा निर्मित बंदरगाहों, सड़कों, पॉवर स्टेशनों, पाइपलाइनों, इमारतों से भरा पड़ा है। यहां तक कि वहां पर कुछ पूरे के पूरे शहर चीनी इंडस्ट्रीयल पार्कों और फ्री ट्रेड ज़ोन्स से भरे हैं।
भारत को इस पर नजर रखनी चाहिए, क्योंकि मध्य-पूर्व से हमारे गहरे हित जुड़े हैं। विशेषकर ईरान से मिलने वाला तेल हमारे लिए पेट्रोलियम का निकटतम स्रोत है। आज भी हम अपने तेल का 50% से ज्यादा वहां से आयात करते हैं। मध्य-पूर्व में मौजूद 80 लाख भारतीय प्रवासी भी कम महत्वपूर्ण नहीं, जो हर साल 30 से 40 अरब डॉलर की विदेशी मुद्रा भेजते हैं यही कारण है कि प्रधानमंत्री मोदी ने मध्य-पूर्व के देशों से मधुर सम्बंध कायम करने के लिए काफी कोशिशें की हैं और अनेक बार वहां की यात्राएं की हैं। सऊदियों ने भारत में 100 अरब डॉलर के निवेश की इच्छा जताई है। यूएई तो पहले ही हमारा बड़ा निवेशक है। इस साल गणतंत्र दिवस पर मिस्र के राष्ट्रपति फतह अल सिसी की मौजूदगी उस क्षेत्र से हमारे गहराते रिश्तों की बानगी थी। पर अमेरिका के दबाव में भारत ईरान से मधुर सम्बंध नहीं बना सका है।
Date:21-03-23
बेलगाम खालिस्तानीसंपादकीय
पंजाब में अतिवादी अमृतपाल सिंह और उसके साथियों के खिलाफ पुलिस की कार्रवाई के बाद लंदन स्थित भारतीय उच्चायोग और अमेरिका में सैन फ्रांसिस्को में भारत के वाणिज्य दूतावास को खालिस्तान समर्थकों ने जिस तरह निशाना बनाया, उसकी केवल निंदा-भर्त्सना ही पर्याप्त नहीं। भारत को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि ब्रिटेन और अमेरिका की सरकारें इन उपद्रवियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई करें। यह ठीक नहीं कि न तो लंदन में भारतीय उच्चायोग में कोई सुरक्षा व्यवस्था दिखी और न ही सैन फ्रांसिस्को के वाणिज्य दूतावास में। इससे भी खराब बात यह है कि इन दोनों भारतीय ठिकानों पर हमले के लिए जिम्मेदार खालिस्तानियों के विरुद्ध वैसी कार्रवाई नहीं हुई, जैसी अपेक्षित ही नहीं, आवश्यक थी। यह पहली बार नहीं, जब ब्रिटेन और अमेरिका में भारतीय हितों को चोट पहुंचाने वाले खालिस्तानियों के खिलाफ कार्रवाई के मामले में ढिलाई बरती गई हो। खालिस्तानियों के उपद्रव और उत्पात की एक लंबे समय से अनदेखी होती चली आ रही है। जैसा ब्रिटेन और अमेरिका में हो रहा है, वैसा ही कनाडा और आस्ट्रेलिया में भी। यह किसी से छिपा नहीं कि इन दोनों देशों में खालिस्तानियों ने किस तरह एक के बाद एक मंदिरों को निशाना बनाया। कनाडा और आस्ट्रेलिया के अधिकारियों ने मंदिरों को निशाना बनाए जाने की घटनाओं की निंदा तो की, लेकिन उपद्रवी तत्वों के खिलाफ कार्रवाई के नाम पर कुछ नहीं किया। यह महज दुर्योग नहीं हो सकता कि पश्चिमी देश अपने यहां के बेलगाम खालिस्तानियों के खिलाफ आवश्यक कार्रवाई करने के स्थान पर हाथ पर हाथ रखकर बैठने का काम कर रहे हैं। कहीं यह ढिलाई किसी सोची-समझी रणनीति का हिस्सा तो नहीं? भारत को इस प्रश्न की तह तक जाना होगा और इसका एक उपाय इन देशों से सीधे सवाल-जवाब करना है।
भारत विरोधी तत्वों के खिलाफ कार्रवाई करने में उन देशों की ओर से ढिलाई बरतना हैरान करता है, जो भारत के मित्र देश हैं और जिनके साथ विभिन्न विषयों पर द्विपक्षीय वार्ता का क्रम जारी है। यदि पश्चिमी देश अपने यहां के खालिस्तानियों को नियंत्रित करने में तत्परता का परिचय नहीं देते तो भारत को यह स्पष्ट करने में संकोच नहीं करना चाहिए कि भारतीय हितों के खिलाफ सक्रिय तत्वों के प्रति उनकी सुस्ती संबंधों को बिगाड़ने का काम करेगी। भारत को इन देशों के समक्ष अपनी आपत्ति दर्ज कराते हुए उन्हें इसके लिए बाध्य करना होगा कि वे खालिस्तानी चरमपंथियों के खिलाफ कार्रवाई करें। चूंकि खालिस्तानियों की हरकतें जिहादियों सरीखी होती जा रही हैं इसलिए इस नतीजे पर पहुंचने के अलावा और कोई उपाय नहीं कि उन्हें पाकिस्तान का सहयोग और समर्थन मिल रहा है। स्पष्ट है कि भारत को पाकिस्तान की हरकतों पर भी निगाह रखनी होगी। इसी के साथ इस पर भी ध्यान देना होगा कि विदेश में सक्रिय खालिस्तानी पंजाब में माहौल बिगाड़ने का काम न करने पाएं।
Date:21-03-23
दक्षिण एशिया का हो रहा वास्तविकता से सामनाहर्ष पंत और आदित्य गौड़ारा शिवमूर्ति, ( लेखक ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन, नई दिल्ली में क्रमशः उपाध्यक्ष (स्टडीज ऐंड फॉरेन पॉलिसी) और जूनियर फेलो हैं। )
चीन 6 मार्च को श्रीलंका को वित्तीय सहायता एवं ऋण पुनर्गठन का आश्वासन देने वाले द्विपक्षीय ऋणदाताओं की सूची में आखिरी देश के रूप में आखिरकार शामिल हो गया। इसके बाद अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) भी कोलंबो को 2.9 अरब डॉलर की राहत राशि पर अंतिम निर्णय लेने पर तैयार हो गया। श्रीलंका आईएमएफ और चीन के साथ बारी-बारी से बातचीत के माध्यम से लगातार तालमेल बैठाने के प्रयास में लगा हुआ है। श्रीलंका से जुड़े घटनाक्रम दक्षिण एशिया में एक बड़े बदलाव की ओर इशारा कर रहे हैं। बेल्ट एवं रोड इनिशिएटिव (बीआरआई) का हिस्सा रहे दक्षिण एशिया के दो प्रमुख देशों- पाकिस्तान और बांग्लादेश- ने वर्ष 2022 में आईएमएफ से वित्तीय सहायता मांगी थी। यह घटनाक्रम इस बात का संकेत है कि विकासशील देश आईएमएफ और पश्चिमी देशों से सहायता प्राप्त कर अपने आर्थिक हित सुरक्षित एवं स्थिरता बनाए रखना चाहते हैं। ध्यान देने योग्य बात यह है कि इस पूरी प्रक्रिया में वे चीन को भी नाराज नहीं करना चाहते हैं।
बदलते वैश्विक समीकरणों में चीन की भू-राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाएं बढ़ गई हैं। वह बदलते विश्व में अपने लिए अलग स्थान तलाश रहा है और इस प्रक्रिया में ‘ब्रेटन वुड्स सिस्टम’ के साथ उसका टकराव बढ़ता जा रहा है। चीन का यह रवैया आईएमएफ जैसे संस्थानों की बराबरी और उनकी जगह लेने की महत्त्वाकांक्षा का हिस्सा है। 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट और 2013 में बीआरआई की शुरुआत के बाद चीन के वित्तीय संस्थान एवं बैंक रणनीतिक दृष्टिकोण से महत्त्वपूर्ण समझे जाने वाले निवेश बड़े स्तर पर करते आए हैं। 2021 तक चीन 1.5 लाख करोड़ डॉलर मूल्य के ऋण आवंटित कर चुका था और इस दृष्टि से वह दुनिया का सबसे बड़ा कर्जदाता बन गया।
मगर दक्षिण एशिया में हाल में सामने आई आर्थिक तंगहाली चीन से ऋण लेने से जुड़े जोखिमों पर रोशनी डालती है। इस समय श्रीलंका पर चीन का 7 अरब डॉलर से अधिक का ऋण है। श्रीलंका पर फिलवक्त जितना विदेशी कर्ज है उसका यह करीब 20 प्रतिशत है। इस तरह, चीन सबसे बड़ा द्विपक्षीय ऋणदाता बन गया है। पिछले कई वर्षों के दौरान चीन ने दुनिया, खासकर दक्षिण एशिया में कर्ज का एक ऐसा जाल बुना है जिसमें श्रीलंका जैसे देश फंसते जा रहे हैं।
2017 में यह स्पष्ट हो गया था कि श्रीलंका में विदेशी मुद्रा भंडार घटता जा रहा है। इसे देखते हुए बीजिंग ने श्रीलंका का विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ाने के लिए नई वित्तीय सहायता की पेशकश की। श्रीलंका को आईएमएफ की शरण में जाने से रोकना चीन के हित में था। इसका कारण यह था कि अगर श्रीलंका आर्थिक सुधार, ऋण पर नुकसान सहने और ऋण पुनर्गठन के लिए प्रयास करता तो इससे चीन के आर्थिक हित प्रभावित होते।
2022 में श्रीलंका में आर्थिक संकट गहरा गया। कोलंबो ने चीन से 4 अरब डॉलर की सहायता मांगी और ऋण पुनर्गठन करने का आग्रह किया। मगर श्रीलंका के आग्रह को चीन ने गंभीरता से नहीं लिया। सहायता देना तो दूर की बात, चीन ने ऋण भुगतान निलंबित रखने और आर्थिक संकट से निकलने के लिए आईएमएफ से 2.9 अरब डॉलर की सहायता मांगने पर श्रीलंका से अपनी नाखुशी जाहिर कर दी। आईएमएफ ने श्रीलंका से वृहद आर्थिक सुधार करने का आग्रह किया और उसे अपने द्विपक्षीय ऋणदाताओं से ऋण पुनर्गठन का आश्वासन मांगने के लिए कहा। मगर चीन ऋण पुनगर्ठन के लिए तैयार नहीं हुआ जिससे श्रीलंका दो बार आईएमएफ द्वारा तय समय सीमा का पालन नहीं कर पाया। बाद में जब भारत और जापान श्रीलंका को दिए ऋणों के पुनर्गठन के लिए तैयार हुए तो चीन को भी आधे-अधूरे मन से आगे आना पड़ा। चीन का एग्जिम बैंक 4.1 अरब डॉलर ऋण के पुनर्गठन के लिए तैयार हो गया जबकि चाइना डेवलपमेंट बैंक जैसे दूसरे ऋणदाताओं ने अभी तक कोई आश्वासन नहीं दिया है।
पाकिस्तान का संकट भी श्रीलंका से कोई अलग नहीं है। पाकिस्तान ने चीन से 30 अरब डॉलर से अधिक राशि ऋण के रूप में ले रखी है। यह पाकिस्तान पर कुल विदेशी ऋण का 30 प्रतिशत है। पाकिस्तान के लिए चीन सबसे बड़ा ऋणदाता देश है। चीन ने चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे में 62 अरब डॉलर से अधिक निवेश किया है। मगर चीन से प्राप्त यह सहायता पाकिस्तान को राजस्व अर्जित करने, आर्थिक सुधारों को बढ़ावा देने या और अधिक प्रत्यक्ष विदेशी निवेश (एफडीआई) आकर्षित करने में विफल रही है। पाकिस्तान चीन से पहले ही काफी कर्ज ले चुका है और वह अब कोई चारा नहीं देख आईएमएफ से सहायता मांग रहा है। हालांकि 1.1 अरब डॉलर की आर्थिक सहायता के लिए आईएमएफ से बातचीत होने से संकट थोड़ा टल गया है। पाकिस्तान ने आईएमएफ की शर्त पूरी करने के लिए करों में इजाफा कर दिया है मगर वह अपने ऋण का पुनर्गठन कराने या चीन के साथ दोबारा बातचीत करने में विफल रहा है। चीन तब भी नए ऋणों के साथ पाकिस्तान की मदद कर रहा है। नवंबर 2022 में चीन ने पाकिस्तान को 8.75 अरब डॉलर की आर्थिक सहायता की पेशकश की थी। इसमें वाणिज्यिक ऋण, मुद्रा की अदला-बदली (करेंसी स्वैप) और मौजूदा ऋणों के नवीकरण (लोन रोलओवर) शामिल थे। पिछले दो महीने में चीन ने आर्थिक सहायता बढ़ा दी है और 2 अरब डॉलर मूल्य के ऋण को नए ऋण में बदल दिया है। ये दीर्घ अवधि में पाकिस्तान में ऋण संकट और बढ़ा देंगे।
इस बीच, आईएमएफ ने बांग्लादेश को भी 4.7 अरब डॉलर की आर्थिक सहायता इस वर्ष मंजूर कर दी है। बांग्लादेश ने पहले से एहतियात बरतते हुए यह मदद मांगी थी। इसका कारण स्पष्ट है क्योंकि विदेशी ऋण बांग्लादेश की आर्थिक वृद्धि के लिए महत्त्वपूर्ण रहे हैं। बांग्लादेश का विदेशी मुद्रा भंडार कम हो रहा था, ऊर्जा की किल्लत थी और घटते घरेलू उत्पादन के साथ निर्यात में कमी जैसी समस्याएं सिर उठा रही थीं। उस पर 72 अरब डॉलर का विदेशी कर्ज है जिसमें से 5 अरब डॉलर रकम चीन से मिली है। चीन से मिला कर्ज बांग्लादेश पर कुल विदेशी कर्ज का 7 प्रतिशत है। हालांकि चीन से मिला कर्ज बहुत अधिक नहीं है मगर बीजिंग बांग्लादेश के ऊर्जा क्षेत्र, भौतिक ढांचे, रेलवे और संपर्क परियोजनाओं में निवेश करता आया है जिसे देखते हुए थोड़ा सतर्क रहने की दरकार है।
बीजिंग की महंगी परियोजनाएं, वाणिज्यिक उधारी, अस्पष्ट बातचीत और ऋण पुनर्गठन में उसकी आनाकानी दक्षिण एशिया के देशों में आर्थिक संकट की आग को हवा दे रही हैं। ऋण संकट से निपटने के लिए चीन नए ऋणों की पेशकश कर रहा है मगर इनसे दक्षिण एशियाई देशों में संरचनात्मक कमजोरी और आर्थिक अस्थिरता और बढ़ती जा रही है। चीन से बेतहाशा उधारी के व्यापक परिणामों की आशंका को देखते हुए पश्चिमी देश और भारत दक्षिण एशियाई देशों को लगातार अति आवश्यक आर्थिक सुधार लागू करने और आईएमएफ से बातचीत करने की सलाह दे रहे हैं। अमेरिका ने पाकिस्तान को चीन पर आवश्यकता से अधिक निर्भरता कम करने को कहा है और भारत ने पेरिस क्लब देशों के साथ श्रीलंका को ऋण पुनर्गठन की सुविधा देने का आश्वासन दिया है।
परंतु तमाम आर्थिक उतार-चढ़ावों के बीच दक्षिण एशियाई देश चीन और पश्चिमी देशों दोनों के साथ मधुर संबंध बनाए रखेंगे। चीन इस क्षेत्र में भारत और उसके सहयोगी देशों का प्रभाव कम करने के लिए श्रीलंका, पाकिस्तान और बांग्लादेश को अधिक स्वायत्तता देगा। भारत जैसे देश भी दक्षिण एशिया में चीन का दबदबा कम करने के लिए श्रीलंका और बांग्लादेश आदि को आर्थिक सहायता देने में पीछे नहीं हटेंगे। चीन आर्थिक दृष्टिकोण से मजबूत है। इसलिए उसका सहयोग दक्षिण एशिया में आर्थिक सुधारों के लिए महत्त्वपूर्ण है। आईएमएफ से आर्थिक सहायता पाने में भी कमजोर देशों के लिए चीन का साथ आवश्यक है।
आईएमएफ की शर्तों और सलाह को अक्सर ‘पश्चिमी उपनिवेशवाद’ की चाल के तौर पर देखा जाता है मगर इसके विपरीत आईएमएफ छोटे और विकासशील देशों की अर्थव्यवस्थाओं को स्थायित्व देने का प्रयास कर रहा है। दूसरी तरफ, चीन संकीर्ण भू-राजनीतिक उद्देश्यों और कड़ी आर्थिक शर्तों के साथ कमजोर देशों को आर्थिक सहायता दे रहा है। वैश्विक स्तर पर विशेष दर्जा पाने की ललक और भू-राजनीतिक महत्त्वाकांक्षाओँ ने चीन को ब्रेटन वुड्स प्रणाली को चुनौती देने के लिए उकसाया है मगर कोविड महामारी के बाद की दुनिया में वास्तविकता कुछ अधिक पेचीदा हो गई है। श्रीलंका और पाकिस्तान में पैदा संकट एक विकल्प के रूप में चीन की भूमिका और इस पर निर्भरता के लिए चुकाई जा रही बड़ी कीमत को लेकर सवाल खड़ा कर रहे हैं। चीन से मिलने वाला सहयोग अब रामबाण नहीं रह गया है जैसा कि पहले समझा जा रहा था।
Date:21-03-23
संभावनाएं तलाशते भारत और बांग्लादेशब्रम्हदीप अलुने
पिछले पांच दशकों में भारत और बांग्लादेश के आपसी रिश्तों में कई उतार-चढ़ाव आए हैं। भारत को अपने इस पड़ोसी राष्ट्र से गंभीर सुरक्षा चुनौतियां मिलती रही हैं, लेकिन इसके समाधान को भारत ने परस्पर आर्थिक सहयोग बढ़ा कर ढूंढ़ा है और इसके अपेक्षित परिणाम भी सामने आ रहे हैं। भारत और बांग्लादेश के बीच एक मैत्री तेल पाइपलाइन की शुरुआत होने जा रही है। दोनों देशों के बीच यह पहली तेल पाइपलाइन होगी। इस परियोजना पर आने वाली लागत का अधिकांश भार भारत उठाने जा रहा है। इससे उत्तरी बांग्लादेश के सात राज्यों में हाई स्पीड डीजल पहुंचाया जाएगा।
भारत के लिए बांग्लादेश अहम पड़ोसी के साथ दक्षिण एशिया में बड़ा व्यापारिक साझेदार है भारत के लिए बांग्लादेश अहम पड़ोसी होने के साथ दक्षिण एशिया में उसका सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार भी है। भारत और बांग्लादेश के बीच करीब चार हजार किलोमीटर से ज्यादा की सीमा रेखा है और यह मुख्यत: असम, त्रिपुरा, पश्चिम बंगाल, मेघालय और मिजोरम को छूती है। बांग्लादेश और भारत सीमा के बीच पूर्वोत्तर की भौगोलिक परिस्थितियां घुसपैठ के अनुकूल हैं और पाकिस्तान की खुफियां एजेंसी आइएसआइ ने लंबे समय तक इसका फायदा उठाया। इससे घुसपैठ, तस्करी, मदरसों का जाल और नकली मुद्रा के अवैध कारोबार से भारत की समस्याएं बढ़ीं। मगर 2009 में शेख हसीना के बांग्लादेश की सत्ता में आने के बाद से दोनों देशों के बीच आपसी सहयोग बढ़ा है। पूर्वोत्तर भारत में चरमपंथी गतिविधियों पर लगाम लगाने में बांग्लादेश ने कई बार सहयोग किया है
दो साल पहले बांग्लादेश में फेनी नदी पर बने मैत्री सेतु के उद्घाटन से माहौल में गर्मजोशी आई है। इस पुल ने त्रिपुरा के सबरूम से चटगांव बंदरगाह की दूरी को बहुत कम कर दिया है। यह कारोबार और आवाजाही की दृष्टि से अहम है। बांग्लादेश की मदद से भारत को सुरक्षा के क्षेत्र में होने वाले खर्च में लाखों डालर की बचत हो रही है। चार हजार किलोमीटर से अधिक लंबी भारत-बांग्लादेश सीमा का इस्तेमाल पूर्वोत्तर भारत के कई चरमपंथी समूह करते थे। 2016 में बांग्लादेश और भारत के बीच पेट्रोपोल और बेनापोल के बीच व्यापार मार्ग की शुरुआत हुई, जो दोनों देशों के व्यापारिक संबंधों को मजबूत करने की दिशा में अहम माना गया। भारत की भौगोलिक सीमा की कठिनाइयों को देखते हुए बांग्लादेश ने चटगांव और मोंगला बंदरगाह, पूर्वोत्तर में व्यापार के लिए खोल दिए हैं।
हालांकि भारत और बांग्लादेश के आपसी रिश्तों को प्रभावित करने की चीन की कोशिशें भी बदस्तूर जारी हैं। वह दक्षिण एशिया के विभिन्न देशों को कर्ज के जाल में उलझा कर भारत पर सामरिक बढ़त लेना चाहता है और उसे इसमें सफलता भी मिली है। भारत के कई पूर्वोत्तर राज्यों की सीमाएं बांग्लादेश को छूती हैं। इन इलाकों की कठिन भौगोलिक स्थिति तथा विविध सांस्कृतिक परिस्थितियों ने भारत की चुनौतियों को बढ़ाया है। दक्षिण एशिया में भारत के सामर्थ्य को प्रभावित करने की चीनी बदनीयती में बांग्लादेश कहीं न कहीं मददगार बना है। वह खराब आधारभूत ढांचे के कारण कई मामलों में बहुत पिछड़ा हुआ है। चीन उसे ‘वन बेल्ट वन रोड’ परियोजना के तहत कई बड़ी परियोजनाओं में आर्थिक मदद मुहैया करा रहा है। चीन पद्मा नदी पर चार अरब डालर का एक ब्रिज रेलवे लाइन बना रहा है, जो बांग्लादेश के दक्षिणी-पश्चिमी और उत्तरी-पूर्वी इलाकों को जोड़ेगा। चीन और बांग्लादेश के बीच 2002 में रक्षा सहयोग पर समझौता हुआ था। वह बांग्लादेश को परमाणु ऊर्जा के विकास में भी सहायता कर रहा है।
कुनपिंग परियोजना के अंतर्गत चीन म्यांमा के रास्ते चटगांव और कुनपिंग को नौ सौ किलोमीटर लंबे राजमार्ग से जोड़ने की योजना बना रहा है, ताकि दोनों देशों के बीच व्यापार बढ़ सके। बांग्लादेश ने भी इस परियोजना के लिए हामी भर दी है। वह इस समय चीन से सर्वाधिक हथियारों का आयात कर रहा है। वह पाकिस्तान के बाद चीन से सैन्य हथियार खरीदने वाला दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश है। बांग्लादेश की प्रधानमंत्री शेख हसीना भी इस बात को मानती हैं कि चीन इस इलाके में बड़ी भूमिका निभा रहा है। भारत और बांग्लादेश के बीच नदी के पानी के बंटवारे को लेकर तो तनाव रहता ही है, अब चटगांव बंदरगाह पर चीन के प्रभाव से सामरिक चुनौतियां भी बढ़ गई हैं।
अब चीन के साथ अपने मजबूत संबंधों को आगे करके बांग्लादेश, भारत से सौदेबाजी की संभावनाएं भी तलाश रहा है। पूर्वोत्तर की सुरक्षा के लिए जरूरी है कि बांग्लादेश भारत को पारगमन मार्ग की सुविधा प्रदान करे। इस क्षेत्र का शेष भारत से जुड़ाव सिलीगुड़ी गलियारे द्वारा होता है, जो लगभग चालीस किलोमीटर चौड़ा है। यह एक ओर चीन तथा दूसरी ओर बांग्लादेश से घिरा हुआ है। भारत के पूर्वोत्तर क्षेत्र के लिए यह एकमात्र संपर्क मार्ग है। पारगमन मार्ग मिलने से भारत को बड़ा आर्थिक और सामरिक फायदा हो सकता है। जैसे कोलकाता और अगरतला के बीच की दूरी करीब बारह सौ किलोमीटर कम हो जाएगी। इसी प्रकार बांग्लादेश के चटगांव पत्तन को अगरतला रेल मार्ग से जोड़ दिया जाए, तो पूर्वोत्तर राज्यों से भारत के अन्य क्षेत्रों के लिए सामान की ढुलाई सरल हो जाएगी।
बांग्लादेश तीस्ता नदी के पानी को लेकर आशान्वित है और भारत से समझौता करना चाहता है। तीस्ता का पानी बांग्लादेश के लिए बहुत महत्त्वपूर्ण है। उसके उत्तरी इलाकों में पानी की किल्लत है और इसे सिक्किम के रास्ते उत्तरी बंगाल से होते हुए बांग्लादेश में प्रवेश करने वाली तीस्ता नदी ही पूरा कर सकती है। मगर भारत के लिए यह स्थिति कठिन है, क्योंकि पश्चिम बंगाल के उत्तरी हिस्से के किसान ऐसे किसी समझौते से संकट में पड़ सकते है। बांग्लादेश, भूटान और नेपाल के साथ व्यापार बढ़ाने के लिए भारत से ‘ट्रांजिट रूट’ चाहता है।
दोनों देशों के बीच अभी कई समस्याएं हैं, जिनका समाधान बहुत दूर नजर आता है। बांग्लादेश के जन्म का सबसे बुरा असर असम को झेलना पड़ता है। असम से अलग हुए मेघालय, मणिपुर, नगालैंड, त्रिपुरा को जनजातियों का राज्य माना जाता था और यहां अस्सी प्रतिशत जनजातियां निवास करती थीं। 1971 के बाद यहां की जनसंख्या में भारी बदलाव आया है और अब जनजातीय समूह अल्पमत में आ गए हैं। पूर्वोत्तर के जनसांख्यिकी बदलाव से सामाजिक और सांस्कृतिक पहचान खोने का संकट बढ़ा, तो जनजातीय समूहों ने हथियार उठा लिए और अब इन इलाकों में पृथकतावादी और हिंसक आंदोलनों का गहरा प्रभाव देखा जाता है। दूसरी तरफ पूर्वोत्तर में घुसपैठ और उग्रवाद की समस्या इतनी विकराल रही है कि यहां काम करने वाली सरकारें इन्हीं मुद्दों में उलझी रहती है, जिससे यह समूचा क्षेत्र प्राकृतिक संसाधनों की बहुलता के बाद भी गरीबी, पिछड़ेपन, जातीय हिंसा और सांप्रदायिक समस्याओं में बुरी तरह जकड़ा हुआ है।
म्यांमा से विस्थापित दस लाख रोहिंग्या शरणार्थियों का बोझ झेल रहे बांग्लादेश में आम राय यह है कि भारत ने इस मामले में अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाई। जबकि रोहिंग्या के कारण भारत की आंतरिक सुरक्षा पर संकट बढ़ा है। दोनों देशों के बीच करीब पचास से अधिक नदियां बहती हैं, लेकिन 1996 गंगा समझौते के बाद दोनों में पानी के बंटवारे को लेकर कोई समझौता नहीं हो पाया है। सीमा पर बाड़ लगाना बाकी है, कई स्थानों पर दोनों देशों की सेनाएं आमने-सामने आ जाती हैं। फरक्का बांध का विवाद बना हुआ है। बांग्लादेश और भारत के बीच मुक्त व्यापार समझौता नहीं है। बहरहाल, तमाम चुनौतियों के बीच भी भारत और बांग्लादेश के संबंध बेहतरीन दौर में हैं और इसका फायदा समस्याओं के समाधान की दिशा में उठाने की जरूरत है।
Date:21-03-23
सही है कार्रवाईसंपादकीय
अजनाला कांड के ठीक 22 दिन बाद पंजाब का कट्टरपंथी उपदेशक और ‘वारिस पंजाब दे’ का प्रमुख अमृतपाल सिंह अब पुलिस के निशाने पर है। पंजाब का माहौल बिगाड़ने की साजिश रचने का आरोप लगने और जांच में पाकिस्तानी एजेंट होने के शुरुआती सबूत मिलने के बाद पुलिस और सुरक्षा बलों ने उसके खिलाफ शिंकजा कस दिया है। एक दिन पहले तो यह खबर भी फैली कि अमृतपाल को पुलिस ने दबोच लिया है, मगर यह खबर गलत निकली। फिलहाल पुलिस ने उसके 78 करीबियों को गिरफ्तार किया है। उसके भाई और चाचा के सरेंडर करने की भी खबर है। 1980 के दशक में खालिस्तान राष्ट्र की मांग करने वाले जरनैल सिंह भिंडरावाले के कारण पंजाब के हालात काफी खराब थे। चारों ओर अराजकता और अफरातफरी का माहौल था। फिर वैसे ही हालात बनाने की साजिश अमृतपाल के जरिये पाकिस्तान रचने की कोशिश में है। पुलिस की तफ्तीश में यह पता चला है कि उसे पाकिस्तान की ओर से भारत में हिंसा फैलाने और तनाव बढ़ाने के वास्ते भारी-भरकम रकम दी गई है। करीब एक महीने पहले अमृतपाल ने अपने एक साथी को छुड़ाने के लिए सैकड़ों समर्थकों के साथ अजनाला थाने का घेराव किया था और पुलिस के खिलाफ हिंसक रवैया अख्तियार किया था। उस समय पुलिस की शिथिलता की चहुंओर र्भत्सना हुई थी। अब जबकि अमृतपाल के खिलाफ ढेर सारे सबूत जांच एजेंसियों के हाथ लगे हैं, उसे खुलेआम छोड़ना गलत होगा। पंजाब के हालात हाल के कुछेक वर्षो में खराब हुए हैं। सीमा पर स्थित यह सूबा काफी संवेदनशील है और पाकिस्तान लगातार इस धत्कर्म में लगा रहता है कि कैसे भारत में अस्थिरता फैलाई जाए। देर से ही सही मगर केंद्र और राज्य सरकार का यह कदम बेहद जरूरी था। उसके बारे में जो भी खबरें सामने आ रही हैं, वह चौंकाने के साथ-साथ डराती भी हैं। मानव बम बनाने की साजिश में शामिल होना सामान्य बात नहीं है। इसकी विस्तृत रूप से जांच होनी चाहिए। इस बीच, सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमिटी (एसजीपीसी) और अकाली दल (बादल) को भी राज्य की शांति के लिए ऐसे देश विरोधी तत्वों का समर्थन करने से बचना चाहिए। राजनीतिक स्वार्थ के वशीभूत होकर किसी अराजक तत्व की हां में हां मिलाना कहीं से भी न्यायोचित नहीं कहा जा सकता है। ऐसे लोगों की गिरफ्तारी से ही देश और समाज में शांति बहाल हो सकती है। बेवजह का समर्थन करना देश के साथ गद्दारी होगी।
Date:21-03-23
शत्रु संपत्ति से निजातसंपादकीय
देश में शत्रु संपत्तियों का रहना किसी संप्रभु देश में नागरिकों को हरगिज सुहाता नहीं है। इस संपत्तियों का शीघ्र से शीघ्र निस्तारण जरूरी होता है। केंद्रीय गृह मंत्रालय ने देश में मौजूद शत्रु संपत्ति के निपटारे की प्रक्रिया शुरू कर दी है। इन संपत्तियों को जल्द से जल्द बेचने की तैयारी चल रही है। ये वो संपत्तियां हैं, जिनके मालिक देश छोड़कर पाकिस्तान या चीन जा चुके हैं और वहीं की नागरिकता ले चुके हैं। देश में कुल 12,611 शत्रु संपत्तियां हैं। इनकी अनुमानित कीमत करीब एक लाख करोड़ रुपए है। गृह मंत्रालय के नोटिफिकेशन में ऐसी संपत्ति खाली कराने और बेचने की प्रक्रिया के लिए गाइडलाइंस जारी की गई हैं। इन संपत्तियों की जिला अधिकारी या डिप्टी कमिश्नर की मदद से बेदखली प्रक्रिया की जाएगी। ये संपत्तियां भारत के शत्रु संपत्ति के अभिरक्षक (सीईपीआई) के नियंत्रण में हैं। अगर शत्रु संपत्ति की कीमत एक करोड़ से कम आंकी जाती है तो पहले इन संपत्तियों पर काबिज लोगों से ही इन्हें खरीदने की पेशकश की जाएगी। अगर ये लोग इसे खरीदने में असमर्थता जताते हैं तो फिर इनका गृह मंत्रालय द्वारा निपटारा किया जाएगा। जिन शत्रु संपत्तियों की कीमत एक करोड़ से लेकर 100 करोड़ के बीच है, उन्हें ई-नीलामी के जरिए बेचा जाएगा या फिर केंद्र सरकार, शत्रु संपत्ति निपटारा कमेटी द्वारा सुझायी गई कीमत पर इन संपत्तियों को बेच देगी। देश में अभी तक कुल 12,611 अचल शत्रु संपत्तियों की पहचान हुई है। ये शत्रु संपत्तियां देश के 20 राज्यों और तीन केंद्र शासित प्रदेशों में फैली हुई हैं। इनमें से 12,485 संपत्तियां पाकिस्तान जा चुके लोगों की हैं, वहीं 126 संपत्तियां चीन की नागरिकता ले चुके लोगों की हैं। अभी तक सरकार द्वारा अचल शत्रु संपत्ति में से किसी की भी बिक्री नहीं की गई है। उत्तर प्रदेश में सबसे अधिक 6,255 शत्रु संपत्तियां हैं, इसके बाद पश्चिम बंगाल (4,088 संपत्तियां), दिल्ली (659), गोवा (295), महाराष्ट्र (208), तेलंगाना (158), गुजरात (151), त्रिपुरा (105), बिहार (94), मध्य प्रदेश (94), छत्तीसगढ (78) और हरियाणा में 71 शत्रु संपत्तियां हैं। अन्य राज्यों एवं केंद्र शासित प्रदेशों में भी शत्रु संपत्तियां हैं। पाकिस्तान और चीन में बस चुके लोगों की संपत्ति अब भारत में रहने का कोई मतलब नहीं है। इससे शत्रु संपत्तियों की स्थिति भी बदलेगी और देश के नागरिकों को भी भला प्रतीत होगा।
Date:21-03-23
ख़ुशी का सूचकांकसंपादकीय
सबसे खुश देशों की सूची का जारी होना एक ऐसी घटना है, जिस पर अनायास सबका ध्यान जाता है और इससे सबको खुश होने या खुश होने के लिए प्रयास करने की प्रेरणा मिलती है। साल 2023 के लिए ‘ग्लोबल हैप्पीनेस इंडेक्स’ जारी कर दिया गया है, जिसमें फिनलैंड ने लगातार छठी बार सर्वोच्च स्थान पाया है। यह बात भी गौर करने की है कि तीन अंकों का सुधार करके भारत इसमें 136वें स्थान पर पहुंचा है। भारत जैसे विशाल और असमान विकास वाले देश के लिए यह स्थान कितना मायने रखता है? अमीर व खुशहाल भारत है, तो उसमें एक गरीब भारत भी है। गरीब भारत भी विकास कर रहा है, लेकिन आबादी इतनी ज्यादा है कि अभी देश को समग्रता में खुशहाल देशों में आगे आने में वक्त लगेगा। सबसे खुशहाल देश फिनलैंड की आबादी महज 55 लाख है, उसके लिए विकास आसान है। भारत के मुंबई, दिल्ली शहर में इससे कहीं ज्यादा लोग रहते हैं। खुश देशों की सूची में दूसरे स्थान पर रहे डेनमार्क में 58.6 लाख लोग रहते हैं, तीसरे स्थान पर रहे देश आइसलैंड में तो महज 3.73 लाख लोग रहते हैं।
यह भी ध्यान देने योग्य है कि शीर्ष 20 देशों की सूची में एशिया का एक भी देश शामिल नहीं है। कुछ विडंबनाएं भी हैं, जो इस सूचकांक के महत्व को घटा देती हैं। चीन में लोगों को धार्मिक-आर्थिक आजादी भी सही ढंग से नहीं मिली है, पर वह 82वें स्थान पर है। नेपाल 85वें, तो बांग्लादेश 99वें स्थान पर है। आर्थिक रूप से बदहाल श्रीलंका 126वें स्थान पर और ऋण की गुहार लगाता पाकिस्तान 103वें स्थान पर है। ऐसे में, भारत की 136वीं रैंकिंग किसी को अचंभित भी कर सकती है। हैप्पीनेस इंडेक्स में किसी देश की स्थिति जानने के लिए उसकी जीडीपी, वहां जीवन की गुणवत्ता और जीवन प्रत्याशा को देखा जाता है। इस साल की रैंकिंग में 150 से ज्यादा देशों के इन डाटा का अध्ययन करने के बाद सूची तैयार की गई है। इस बार 2020 से 2022 तक देशों के औसत जीवन मूल्यांकन के आधार पर रिपोर्ट तैयार की गई है। भारत सरकार इस रिपोर्ट को कितनी गंभीरता से लेती है, यह देखने वाली बात है। वैसे इस सूचकांक के अलावा भी दो और सर्वे जारी हुए हैं। कंसल्टिंग फर्म हैप्पीप्लस की ‘द स्टेट ऑफ हैप्पीनेस 2023’ रिपोर्ट के अनुसार, देश में करीब 35 प्रतिशत उत्तरदाताओं ने 2022 में नकारात्मकता और दुख का अनुभव किया है, यानी 65 प्रतिशत लोग भारतीय अपेक्षाकृत खुश हैं। यह रिपोर्ट 36 राज्यों व केंद्र शासित क्षेत्रों के 14 हजार लोगों की प्रतिक्रिया के आधार पर तैयार की गई है। एक अन्य सर्वे भी है, जिसके अनुसार, भारत में कम से कम 84 प्रतिशत लोगों ने खुश होने का दावा किया है। जीवन संतुष्टि पर आधारित यह ‘इप्सोस ग्लोबल हैप्पीनेस सर्वे’ बताता है कि दुनिया भर में 73 प्रतिशत लोग संतुष्ट हैं।
बहरहाल, विश्व प्रसन्नता पर नवीनतम रिपोर्ट में एक आशावाद भी झलक रहा है। कोरोना महामारी से पहले की तुलना में विश्व समाज में आज परोपकार के भाव में लगभग 25 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। लोगों में विशेष रूप से अजनबियों की मदद करने की भावना भी बढ़ी है। एक और खास बात गौर करने लायक यह है कि तीन साल की महामारी का समग्रता में दुनिया की खुशी पर कोई खास प्रभाव नहीं पड़ा है। वैसे दुख या खुशी एक ऐसी अवस्था है, जिस पर किसी सर्वे के जरिये एकमत नहीं हुआ जा सकता। फिर भी, ऐसी सूचियों से सकारात्मक प्रेरणा लेने में ही सबकी भलाई है।
Date:21-03-23
बेहतर सड़को से आता तेज बदलावविभूति नारायण राय, ( पूर्व आईपीएस अधिकारी )
दिल्ली वालों को पता ही नहीं होगा कि उनकी थालियों में कब गाजीपुर के जमानियां तहसील की सब्जियां पहुंचने लगी हैं? दो करोड़ उपभोक्ताओं वाली दिल्ली एक बड़ी मंडी है और उत्तर प्रदेश, हरियाणा या राजस्थान के सटे इलाकों से भारी मात्रा में अपने खाने-पीने का समान खींचती रहती है। बस इस फेहरिश्त में एक नया नाम जुड़ गया है। पता नहीं, दिल्ली महानगरी को इससे कोई फर्क पड़ेगा या नहीं, पर इतना तो तय है कि जमानियां जैसे कस्बे और उसके आस-पास के गांव-देहात पर जरूर इससे बड़ा बदलाव आएगा। धीरे-धीरे यह दिखने भी लगा है। कैसे हुआ यह परिवर्तन?
पिछले दिनों दो प्रियजनों के निधन के चलते पूर्वी उत्तर प्रदेश के कुछ जिलों में जाने और वहां घूमने और हो रहे परिवर्तनों को करीब से देखने का मौका मिला। यह वही क्षेत्र है, जिसकी गरीबी की गाथा सुनाते हुए भारत की पहली लोकसभा के सदस्य विश्वनाथ सिंह गहमरी का गला रुंध गया था और सुनते-सुनते प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की आंखें भर आई थीं। फलस्वरूप पटेल आयोग का गठन हुआ, जिसने कड़ी मेहनत करके एक विस्तृत रिपोर्ट सरकार को सौंपी। आयोग की सिफारिशों के मुताबिक पूर्वी उत्तर प्रदेश की सड़कों, पुलों, रेलवे लाइनों और सिंचाई के क्षेत्रों में विशाल निवेश करने की जरूरत थी। यह अलग बात है कि नई-नई आजादी हासिल किए देश में न तो इतने संसाधन थे कि बड़े पैमाने पर निवेश हो सके और न ही भोजपुरी क्षेत्रों का कोई राजनेता ऐसा हस्तक्षेप करने में सफल हुआ, जिसके चलते केंद्र सरकार से वहां जरूरी निवेश आ सके।
दशकों से मैं इन इलाकों में गड्ढे और भीड़ भरी, तंग सड़कों पर चलने का इस कदर आदी था कि इस बार यहां एक्सप्रेस वे, हाई वे या फोरलेन से गुजरना किसी दूसरे लोक में विचरण करने जैसा लग रहा था। इन्हीं सड़कों में से एक पूर्वांचल एक्सप्रेस वे ने जमानियां के किसानों और दिल्ली मंडी की दूरियां इस हद तक घटा दी है कि शाम को लदान कर सब्जी का ट्रक सुबह सबेरे आढ़तियों के दरवाजे तक पहुंच जाता है। यह पूरा इलाका सब्जी, दूध, मछली या मांस उत्पादन की अपार संभावनाओं से भरा हुआ है। उन्नत सड़कों या बेहतर रेलवे संसाधनों से इसे दिल्ली, कोलकाता या मुंबई जैसे बड़े बाजारों से जुड़ने का मौका मिल रहा है। यह मौका ही उन जंजीरों को तोड़ सकता है, जिनसे जकड़ी हुई यहां की खेती पश्चिमी उत्तर प्रदेश या हरियाणा और पंजाब के मुकाबले उत्पादकता को लेकर बहुत पिछड़ी हुई लगती है।
भोजन की आदतों को लेकर भी कुछ ऐसे परिवर्तन हुए हैं, जो बड़े दिलचस्प लगते हैं। मेरी इस यात्रा में होली पड़ी और पता चला कि छोटे से बाजार कांखभार में दो बजे रात से ही बकरे कटने लगे थे। सूरज की पहली किरण फूटने के पहले ही कसाइयों की दुकानों के सामने खरीदारों की भीड़ लग गई थी। ये सारे बहुसंख्यक समुदाय के थे और अगड़ी, पिछड़ी, दलित सभी जातियों से आते थे। यह उनके लिए एक गंभीर सूचना हो सकती है, जो खान-पान की आदतों की राजनीति करते हैं। उन्हें एक व्यापक सर्वेक्षण करा कर अपनी जानकारी अद्यतन करनी चाहिए कि कितने हिंदू मांसाहार से गुरेज करते हैं? इससे उन्हें कुछ खास दिनों या क्षेत्रों को मांसाहार मुक्त बनाने की जिद पर पुनर्विचार करने में मदद मिलेगी। उस दिन मुझे एक लड़का अपनी मोटरसाइकिल पर बिठा कर एक दूसरी दुकान दिखाने ले गया, यह सूअर के मांस की थी। उसके सामने भी भीड़ थी और इस भीड़ में भी दलितों के साथ अगड़े और पिछड़े खड़े थे। कुछ के मन में थोड़ी हिचक थी और उन्होंने अपनी मोटरसाइकिलें कुछ दूरी पर खड़ी कर रखी थीं। मुझे पूरी उम्मीद है कि अगले साल तक यह झिझक भी खत्म हो जाएगी।
बहुत पहले किसी कृषि विशेषज्ञ के मुंह से सुना वाक्य कि बकरी किसान के लिए एटीएम का काम करती है, लाइब्रेरी के पड़ोस में रहने वाली उषा के मुंह से सुना। लगभग निरक्षर उषा ने किसी कृषि मेले में सुनकर इसे रट लिया है। वह हर साल ईद-बकरीद का इंतजार करती है, अब होली का भी करेगी। इस मौके पर भी बकरे अच्छे दाम देंगे। सूअर पालन को लेकर अभी भी वर्णगत हिचक है, पर बीएसएफ से रिटायर होकर आए सुभाष धोबी ने रास्ता दिखा दिया है। वह बड़े उत्साह से मुझे अपने फार्म पर ले जाता है और पूर्वोत्तर में तैनाती के दौरान हासिल हुनर से बनाया सफेद सूअरों का बाड़ा दिखाता है। वह बगल के दो बड़े तालाब में मछली पालन भी कर रहा है। यहां पहले साप्ताहिक बाजारों के दिन ही मांस-मछली की उपलब्धता होती थी, अब रोज मिलती है। कुछ वर्ष पूर्व हैदराबाद से ट्रकों से बर्फ लगी मछली आती थी। अब इन ट्रकों की संख्या कम हो गई है और आप पानी भरी हौदियों में तैरती मछलियों में से अपने सौदे का चुनाव कर सकते हैं। यह संभव हुआ, लोगों की भोजन संबंधी रुचियों व आदतों के बदलने से।
गांव सड़कों के जरिये बाजार से जुड़े, वहां मांग बढ़ी और लोगों ने अपनी जमीनों पर तालाब खुदवाने शुरू कर दिए और फिर मांग और खपत का सिलसिला शुरू हो गया। अगर कोई गंभीर अध्ययन हो, तो भोजन की आदतों में हुए इन परिवर्तनों को पकड़ा जा सकता है। आदतें बदली हैं, पर जरूरी नहीं कि जरूरी खाद्य सबकी थाली में पहुंच गए हों। मानवाधिकार कार्यकर्ता मुनीजा ने इसी क्षेत्र की कुछ दलित महिलाओं के साथ अपना एक अनुभव मुझसे साझा किया कि माताएं अपने बच्चों को सुबह जल्दी इसलिए नहीं उठातीं, क्योंकि वे उठते ही खाना मांगने लगते हैं। इत्तफाक से जिस दिन मैंने यह किस्सा सुना उसके दूसरे ही दिन मैं एक ऐसी जगह बैठा था, जहां दो बच्चे अपनी माताओं के हाथों पिट रहे थे। उनमें से एक इसलिए पिट रहा था कि उसकी मां दूध का गिलास हाथ में लेकर मिन्नतें कर रही थी कि वह दूध पी ले और बच्चा मान नहीं रहा था। दूसरा बच्चा बड़ी देर से दूध की जिद कर रहा था, यहां भी हार कर उसकी मां ने वही किया, जो दुनिया भर की गरीब माताएं ऐसे मौकों पर करती हैं, उसने रोते बच्चे को धुन डाला।
सड़कें, बाजार और इनसे जुड़ा विकास का कोई भी मॉडल तब तक बेमानी ही माना जाएगा, जब तक खान-पान की आदतों में बदलाव सभी की थालियों में न दिखने लगे।
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और क्या किया जाना चाहिए ?
भारत और इसकी अर्थव्यवस्था को हरा-भरा करने के लिए इस मिशन को विभिन्न विषयों से संबंधित ज्ञान की शक्ति चाहिए। इसके साथ ही हम अपनी प्राकृतिक पूंजी को पुनस्थापित और समृद्ध कर सकेंगे।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित कमल बावा, रवि चेल्लम्, शैनन ऑलसन, जगदीश कृष्णस्वासी, नंदन नॉन और दर्शन शंकर के लेख पर आधारित। 23 फरवरी, 2023
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Date:20-03-23
Pax Sinica?Saudi-Iran truce shows Beijing’s strategic ambition. But China’s faced big diplomatic failures too.TOI Editorials
The recent truce between Iran and Saudi Arabia with both nations agreeing to re-establish diplomatic ties certainly took many by surprise. Particularly because it was mediated by China, a country hitherto not known for its peace-making skills. But it is a sign of Beijing’s growing ambitions that it was willing to get involved in the tricky Middle East with its multiple sectarian and political fault lines. Over the past decade, Iran and Saudi Arabia have engaged in multiple proxy conflicts in the wake of the Arab Spring upheaval to increase their strategic footprint in the region. The most brutal of these has been the conflict in Yemen where Iran-backed Houthis have frustrated the Saudi-UAE military intervention in that country.
But hit with crippling sanctions, which followed when Trump unilaterally reneged on the Iran nuclear deal in 2018, and now facing domestic anti-hijab protests, Tehran needed strategic breathing space. While Riyadh’s testy relationship with the Biden administration, especially over Ukraine, gave it reason to spread out its strategic bets. China simply took advantage of this situation to bring the two Middle East rivals together and project itself as an alternative dealmaker to the US. Of course, this serves Beijing’s commercial interests as it sources more than 40% of its energy needs from the Gulf.
However, whether the Iran-Saudi deal survives and China’s new role sustains remain to be seen. For, China has now decided to strongly support Russia over Ukraine – much different from India’s nuanced position – and rewrite the international rules-based order. Plus, its debt-trap diplomacy has affected nations as diverse as Sri Lanka and Uganda. Even the China-Pakistan Economic Corridor has run into serious problems. This means there are limits to Beijing’s strategic outreach. And India – which is locked in a border standoff with China – should take this opportunity to step up its own international strategic outreach in tandem with countries like the US and Japan. The I2U2 platform in the Middle East and initiatives to strengthen defence ties with African nations must be bolstered. New Delhi must prepare for long-term strategic powerplay.
Date:20-03-23
It Pays to Fix Gender Wage DisparityMNREGA can provide an effective model.ET Editorials
Wage disparity between men and women has widened over the past decade, with the gap opening up further at higher wage levels. This is a key takeaway from a report by the National Statistics Office (NSO) released this week on gender parity across Indian states. The income effect is a leading measurable metric in wage parity that has been affected by the larger disruption of female labour participation on account of migration from towns to villages following Covid lockdowns. Other contributory factors that keep women’s pay lower than that of men include inability to work irregular hours, lack of mobility to reach job sites, and discontinuity of experience owing to family responsibilities. These apart, there is a large unmeasurable component of gender pay disparity that is accounted for by plain and simple discrimination.
Some of these factors are addressed by the Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Act (MNREGA) scheme that acted as a ballast during the pandemic’s reverse migration. Enhanced budgetary allocation to the scheme since 2020 absorbed some shock of the steep fall in women’s employment. MNREGA is an equal work, equal pay programme that provides signals to market wages for men and women. The work is done during the day and does not involve overtime, which otherwise tilts the balance towards men’s wages. The work is also done locally. So, lack of women’s personal mobility does not inhibit their earning capacity. Finally, MNREGA does not discriminate against women for returning to the workforce after a gap.
The rural job scheme has served its purpose during an economic crisis and has to be wound down as normalcy returns to the labour market. This requires more intervention by states to fix the damage to women’s workforce participation. The decline had set in before the pandemic and accelerated with its onset. States where the gender pay gap is accelerating need to devise policy responses to discourage the inequity. The Centre, on its part, could be more cautious in dialling back MNREGA allocations.
Date:20-03-23
वैश्विक डिजिटल क्रांति का अग्रदूत बना भारतविवेक देवराय और आदित्य सिन्हा, ( देवराय प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष और सिन्हा प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद में अपर निजी सचिव-अनुसंधान हैं )
बुनियादी ढांचे को पारंपरिक रूप से सड़कों, पुलों और इमारतों आदि जैसी भौतिक अवसंरचनाओं के साथ जोड़कर देखा जाता है। हजारों वर्षों से बुनियादी ढांचे का यह विचार मानव समाज के मूल में रहा है। इस दौरान सभ्यताओं ने अपने विकास के लिए नहरों और सड़कों से लेकर तमाम अन्य लोक निर्माण किए। हालांकि, हाल के वर्षों में बुनियादी ढांचे की संकल्पना भौतिक अवसंरचनाओं से कहीं आगे बढ़कर डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर और डिजिटल पब्लिक गुड्स तक चली गई है। डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर यानी डीपीआइ से आशय उन तकनीकी नवाचारों से है, जिनके माध्यम से समाज के एक बड़े वर्ग तक प्रमुख निजी एवं सार्वजनिक सेवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित हुई है। इसमें डिजिटल सत्यापन एवं पहचान, नागरिक पंजीयन, सुरक्षित डिजिटल लेनदेन और मुद्रा हस्तांतरण से लेकर निर्बाध डाटा विनिमय और सक्षम सूचना तंत्र भी शामिल हैं। भारत में 2009 से आधार के सूत्रपात के साथ ही इसकी जड़ें गहरी होती गईं। आधार पर आधारित डिजिलाकर और यूपीआइ जैसी सेवाएं अस्तित्व में आईं। डीपीआइ न केवल नागरिकों तक सेवाएं पहुंचाने में सरकारों को सक्षम बनाता है, बल्कि इससे पारदर्शिता और जवाबदेही भी बढ़ती है।
जलवायु परिवर्तन और प्रभावी पब्लिक फाइनेंस जैसे अहम वैश्विक मुद्दों से निपटने में अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी डीपीआइ की अहम भूमिका को समझता है। डीपीआइ के इस महत्व को रेखांकित करने में भारत विशेष भूमिका निभा रहा है। भारत ने डीपीआइ की मदद से ही अपनी 80 प्रतिशत आबादी के वित्तीय समावेशन में सफलता प्राप्त की है। अन्यथा इसमें करीब 46 साल लग जाते। वास्तव में आधार और इंडिया स्टैक की जुगलबंदी भारत के लिए व्यापक रूप से लाभदायक सिद्ध हुई है। इसने वित्तीय लेनदेन के स्वरूप से लेकर पीएफ निकासी के साथ-साथ पासपोर्ट एवं ड्राइविंग लाइसेंस और भूमि रिकार्ड सत्यापन जैसी कई सरकारी सेवाओं को सहज बना दिया है। अपनी इन्हीं क्षमताओं के चलते भारत विश्व में आकार ले रही इस डिजिटल क्रांति के अग्रदूत की भूमिका में दिख रहा है।
आधार से तो अधिकांश लोग परिचित हैं। जहां तक इंडिया स्टैक की बात है तो यह एक स्वदेशी डिजिटल असेट्स का नवाचारी संग्रह है। ई-गवर्नेंस और लोक सेवाओं में इसकी उपयोगिता सिद्ध हुई है। इस पर यूपीआइ, को-विन, आरोग्य सेतु और डिजिलाकर सहित तमाम अन्य आकर्षक एप्लिकेशन उपलब्ध हैं। इन्होंने हमारे जीवन, कामकाज और एक दूसरे से संवाद को सुगम बनाया है। इंडिया स्टैक को वैश्विक स्तर पर स्वीकार्यता मिल रही है। श्रीलंका, मोरक्को, फिलीपींस, गिनी, इथियोपिया और टोगो ने इंडिया स्टैक को सफलतापूर्वक लागू किया है। ट्युनीशिया, समोआ, युगांडा और नाइजीरिया जैसे कई अन्य देशों ने भी इसमें रुचि दिखाई है। इसके पीछे भारतीय माडल की उन्हीं संभावनाओं का असर है, जिनमें कल्याणकारी योजनाओं के मोर्चे पर क्रांतिकारी परिणाम प्रदान करने की क्षमताएं हैं। अब अनिवासी भारतीय यानी एनआरआइ भी यूपीआइ के जरिये वित्तीय लेनदेन कर सकते हैं। इसके लिए उनका फोन नंबर उनके स्थानीय बैंक के साथ पंजीकृत होना चाहिए। यह सेवा सिंगापुर, आस्ट्रेलिया, कनाडा, ओमान, कतर, अमेरिका, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और ब्रिटेन में शुरू भी हो गई है।
डिजिटल पब्लिक गुड्स का मुद्दा आखिर इतना महत्वपूर्ण क्यों है? असल में, इसने देश में सामाजिक कल्याणकारी कार्यक्रमों का जबरदस्त कायाकल्प किया है। डिजिलाकर जैसी सरकारी सेवाओं तक आसान पहुंच से कतार में लगे बिना ही स्कूल और कालेज के अंकपत्र तुरंत प्राप्त किए जा सकते हैं। इससे शासन-प्रशासन की सक्षमता बढ़ने के साथ ही सरकारी प्रक्रियाएं सुसंगत हुई हैं। प्रशासनिक लागत भी घटी है। जनधन-आधार-मोबाइल यानी जैम की त्रिशक्ति ने सुपात्र लाभार्थियों को शत प्रतिशत प्रत्यक्ष नकदी अंतरण का लाभ दिया है। इसमें कई सामान्य काम आटोमेटिक हो गए हैं। कागजी कार्रवाई की जरूरत घटी है, तो सरकारी परिचालन बेहतर हुआ है। डीपीआइ की मेहरबानी से नागरिकों तक सूचनाएं सहजता से उपलब्ध हो रही हैं, जिससे शासन में पारदर्शिता बढ़ी है। सरकारी व्यय, सार्वजनिक नीतियों और विधायी कामकाज पर इसकी छाप दिखती है, जिनमें जनभागीदारी बढ़ने के साथ व्यापक जवाबदेही की राह खुली है। सुगम वित्तीय लेनदेन से जीवन की गुणवत्ता सुधरी है। यूपीआइ से सेकेंडों में वित्तीय लेनदेन संभव हुआ है। नकदी जमा करने या निकालने के लिए बैंक में जाकर कागजी कामकाज और लंबी कतारों में खड़े होने की आवश्यकता नहीं रह गई है। वित्त वर्ष 2022 में ही 8,840 करोड़ वित्तीय डिजिटल लेनदेन में यूपीआइ की 52 प्रतिशत हिस्सेदारी थी, जिसमें कुल 126 लाख करोड़ रुपये के लेनदेन हुए। अथाह डाटा के प्रभावी विश्लेषण से डीपीआइ डाटा प्रबंधन में भी बहुत सहायक सिद्ध हुआ है। इससे बेहतर निर्णय प्रक्रिया सुनिश्चित होने के साथ ही साक्ष्य आधारित नीति-निर्माण संभव हुआ है, जिसने सामाजिक कल्याणकारी कार्यक्रमों की प्रभात्पोदकता में वृद्धि की है।
डीपीआइ में सामाजिक कल्याण की दशा-दिशा सुधारने के साथ ही आर्थिक वृद्धि को गति देने की भी भरपूर क्षमताएं हैं। वित्त मंत्रालय में मुख्य आर्थिक सलाहकार के अनुसार डीपीआइ क्रियान्वयन जीडीपी वृद्धि को एक प्रतिशत तक बढ़ा सकता है। स्पष्ट है कि डीपीआइ किसी राष्ट्र की आर्थिक स्थिति सशक्त बनाने के साथ ही उसके समग्र आर्थिक विकास को गति देने में सक्षम है। डीपीआइ और इंडिया स्टैक ने भारत में व्यक्तियों, बाजारों और सरकारों के कामकाज के तौर-तरीकों को नए तेवर दिए हैं। यही कारण है कि विश्व भर में उसकी स्वीकार्यता में निरंतर विस्तार हो रहा है। इससे एक सुखद भविष्य के संकेत दिखते हैं। ऐसा परिदृश्य जो कहीं अधिक सक्षम, पारदर्शी और समतापूर्ण समाज से परिपूर्ण होगा। उसमें डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर हमारे दैनिक जीवन का एक अभिन्न अंग बन जाएगा।
Date:20-03-23
सांठगांठ के दौर में भी वैश्विक ब्रांड का अभावशेखर गुप्ता, ( ‘दिप्रिंट’ के एडिटर-इन-चीफ तथा चेयरमैन हैं )
अदाणी विवाद ने हमारा ध्यान देश की राजनीतिक अर्थव्यवस्था के कई संबद्ध पहलुओं की ओर खींचा है। इनमें से पहला सबसे अहम और तात्कालिक है: विपक्ष का सांठगांठ का आरोप। जब हम इसके विस्तार में जाते हैं तो यह एक विस्तृत थीम बन जाती है जिसमें कारोबारी जगत की शीर्ष चार या पांच कंपनियां शामिल हैं।
आप इस सूची में अंबानी, टाटा, बिड़ला और वेदांत को शामिल कर सकते हैं। इन सभी को कारोबारी समूह कहा जा सकता है। इन सभी का दखल विविध कारोबारों में है। हालांकि यह कोई निर्णायक या व्यापक सूची नहीं है।
उदाहरण के लिए टाटा को ऐसा समूह कहा जाता है जो नमक से लेकर सॉफ्टवेयर तक सब बनाता है। वह वाहन भी बनाता है, सैन्य विमान भी, उसके पास एक बड़ा विमानन कारोबार भी है और वह स्टील भी बनाता है।
मुकेश अंबानी की रिलायंस इंडस्ट्रीज के कारोबार का दायरा भी बहुत व्यापक है। वह रिफाइनिंग से लेकर दूरसंचार तक और खुदरा कारोबार से लेकर बायोसाइंस शोध और मीडिया तक तमाम कारोबारों में है।
आदित्य बिड़ला समूह की रुचि धातु कारोबार खासकर एल्युमीनियम में है। इसके साथ ही वह दूरसंचार, सीमेंट और धागों समेत कई कारोबारों में है। वेदांत समूह ज्यादातर धातु कारोबार में है। इसके अलावा वह तेल एवं गैस उत्पादन में भी शामिल है।
इन सभी में तीन बातें साझा हैं। एक, ये सभी पारिवारिक नियंत्रण वाली या विरासती कंपनियां हैं। रिलायंस और बिड़ला के कारोबारी साम्राज्य की स्थापना पिछली पीढि़यों ने की थी। वेदांत और अंबानी पहली पीढ़ी के संस्थापक रहे हैं जो अपने कारोबारों पर सीधा नियंत्रण रखते हैं। परिवार के सदस्यों के अहम कारोबार पर नियंत्रण के मामले में इनमें फर्क हो सकता है। अदाणी समूह में जहां यह बहुत अधिक है, वहीं टाटा में बेहद कम। दूसरी बात, इन सभी का ज्यादातर कारोबार उन क्षेत्रों में है जहां सरकार की भूमिका निर्णायक है। इन क्षेत्रों में नियमन बहुत अधिक है और अक्सर (खासकर अदाणी के मामले में) एकाधिकार की स्थिति है। मुंबई हवाई अड्डे और बिजली वितरण के बारे में सोचिए या मुंद्रा बंदरगाह अथवा बिजली खरीद समझौतों वाले बड़े संयंत्रों के बारे में। यही बात रिफाइनिंग और दूरसंचार, खनन और तेल क्षेत्र की रियायतों पर भी लागू होती है। इन सभी में सरकार से सीधा और व्यापक संवाद आवश्यक है।
तीसरी और सबसे अहम बात, उनमें से किसी के पास वैश्विक भारतीय ब्रांड नहीं है। मैं समझता हूं कि टाटा समूह इसका विरोध करेगा क्योंकि उनके पास ताज होटल हैं और अब एयर इंडिया भी वापस उनके पास है। मैं थोड़ी विनम्रता से कहूंगा कि ताज अभी भी ऐसा होटल ब्रांड नहीं है जिसे दुनिया चकित होकर देखे। शायद इसलिए कि वह कई श्रेणियों में काम करता है। उसके होटलों में सुपर लक्जरी होटलों से लेकर सामान्य श्रेणी के जिंजर होटल तक शामिल हैं। एयर इंडिया तो सरकार के रवैये के कारण दशकों पहले मर चुकी थी और उसका पुराना वैभव वापस दिलाने में अभी समय लगेगा।
गौतम अदाणी की इस बात के लिए काफी आलोचना हुई कि वह नरेंद्र मोदी की सरकार के काफी करीबी हैं। खासकर इसलिए कि उनके प्रमुख कारोबारों के चलने के लिए सरकार की भूमिका काफी महत्त्वपूर्ण है। वह देश के तटीय इलाकों में बंदरगाहों का संचालन कर रहे हैं जिनका नियमन सरकार के हाथों में है, विदेशों में बंदरगाह खरीदना बिना सरकार की मदद के संभव नहीं। सवाल यह नहीं है कि यह अच्छी बात है या बुरी। इसे अक्सर सांठगांठ कहा जा सकता है।
इसी प्रकार जैसा कि द इकॉनमिस्ट ने अपने हालिया अंक में लिखा कि भारत में हवाई अड्डों, राजमार्गों, रेलवे, सुरंगों, मेट्रो समेत ढेर सारे निर्माण हो रहे हैं। ऐसे भारी भरकम बुनियादी ढांचे को तैयार करने के लिए काफी पैसे वाली कंपनियों की जरूरत होगी।
क्या आप इसके लिए बेकटेल जैसी दिग्गज वैश्विक कंपनियों का इंतजार करेंगे या चाहेंगे कि देश के कारोबारी समूह ऐसा करें? बिना सरकार का साथ मिले कोई ऐसा नहीं कर सकता है इसलिए यह कोई मुद्दा ही नहीं है। ऐसे में बहस इस विषय पर होनी चाहिए कि क्या बेकटेल समेत सभी के लिए समान परिस्थितियां हैं।
सरकार और कॉर्पोरेट की ‘साझेदारी’ (आप चाहें तो इसे गठजोड़ कह लें) की शुरुआत मोदी सरकार के आगमन से नहीं हुई। अदाणी समूह के कई बड़े लाइसेंस और पर्यावरण मंजूरियां संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन (संप्रग) सरकार के कार्यकाल में मिली थी। यकीनन वे जोर देंगे कि ये मंजूरियां सही सवाल पूछने और सभी प्रतिस्पर्धियों को समान अवसर देने के बाद प्रदान की गई थीं। तथ्य यह है कि एक बढ़ती हुई अर्थव्यवस्था में ऐसे तमाम क्षेत्र होते हैं जहां निजी क्षेत्र और सरकार को मिलकर काम करना होता है।
हम अदाणी के मामले पर विस्तार से बातचीत कर चुके हैं क्योंकि इन दिनों वह चर्चा में है। लेकिन ये सभी कारोबारी समूह अपना ज्यादातर कारोबार भारत में करते हैं और उन क्षेत्रों में करते हैं जहां सरकार का दखल है। उनका ज्यादातर राजस्व भी घरेलू है। हालांकि टाटा के सॉफ्टवेयर कारोबार जैसे कुछ अपवाद भी हैं।
इसे बेहतर ढंग से समझने के लिए हम भारत के कमजोर पूर्वी तट पर स्थित धामरा बंदरगाह का मामला ले सकते हैं। टाटा ने इसे अत्यंत विपरीत परिस्थितियों में तैयार किया। उसे पर्यावरण कार्यकर्ताओं के खास विरोध का सामना करना पड़ा क्योंकि संप्रग सरकार के कार्यकाल में उन्हें अधिक स्वतंत्रता प्राप्त थी। तमाम सवाल उठे और मुकदमे भी हुए। आरक्षित वन भूमि के इस्तेमाल से लेकर ऑलिव रिडली कछुओं के घोंसले बरबाद होने तक का प्रश्न उठा।
संप्रग के कार्यकाल में उसे बहुत देर बाद मंजूरी मिली क्योंकि शीर्ष नेता इतने समझदार नहीं थे कि वे पूर्व में एक और सक्षम बंदरगाह की महत्ता समझ सकें। आखिरकार टाटा ने इसे अदाणी को बेच दिया, वह एक अलग किस्सा है। कई लोग मानते होंगे कि टाटा को इसे अदाणी समूह को बेचने के लिए विवश किया गया होगा लेकिन हमें विचार करने की जरूरत है कि क्या भारत का सबसे पुराना और प्रतिष्ठित कारोबारी घराना इतना कमजोर हो गया है कि मोदी सरकार में उसका कोई माई-बाप नहीं?
तीसरा बिंदु है इन अत्यधिक शक्तिशाली भारतीय निकायों वैश्विक ब्रांड स्थापित करने में नाकामी। हम ब्रांड्स को तीन श्रेणियों में बांट सकते हैं: देश, कंपनी और उत्पाद ब्रांड। पहली श्रेणी में कुछ भारतीय ब्रांड हैं: योग, आयुर्वेद और शायद अध्यात्म। इंजीनियरिंग और गणित की प्रतिभा, आईआईटी और आईआईएम आदि, जेनेरिक दवाओं समेत कुछ अन्य को भी सूची में शामिल किया जा सकता है।
कई शक्तिशाली भारतीय कंपनी ब्रांड हैं जिनकी पहचान दुनिया भर में है। कम से कम कारोबारी क्षेत्र में: टाटा, रिलायंस, वेदांत और कुछ कंपनियां तथा कुछ कंपनियां जो समूह के भीतर हैं मसलन टीसीएस। कुछ अन्य टेक कंपनियां भी हैं मसलन इन्फोसिस, विप्रो और एचसीएल आदि।
यद्यपि इनमें से किसी ने ऐसा प्रॉडक्ट ब्रांड नहीं बनाया जो दुनिया पर काबिज हो। भारत के पास ऐसी अपनी कार या दोपहिया नहीं हैं, अपना सॉफ्टवेयर या ऑपरेटिंग सिस्टम नहीं है, कोई परफ्यूम या पेय तक नहीं है। हमारे ज्यादातर जीआई टैग कृषि उत्पादों के हैं और हमारे पास ऐसा कोई ब्रांड नहीं जो दुनिया भर की दुकानों पर नजर आता हो।
कॉर्पोरेट जगत गारमेंट का ब्रांड बनाने में नाकाम रहा और हमारी फैक्टरियों में बनकर निर्यात होने वाले कपड़े अंतरराष्ट्रीय स्टोर चेन के लेबल तले बेचे जाते हैं। उस लिहाज से हमारे वस्त्र निर्माता आउटसोर्सिंग का काम भी कर रहे हैं। मोदी सरकार भी उत्पादन संबद्ध प्रोत्साहन तथा अन्य रियायतों के साथ काफी हद तक ऐसे ही काम का वादा कर रही है।
भारत निर्यात के लिए ढेर सारे मोबाइल फोन बना रहा है जो अच्छी बात है लेकिन उनमें से किसी पर भारतीय ब्रांड का नाम नहीं है। चीन और कोरिया ने आधा दर्जन से अधिक ब्रांड तैयार किए हैं जिनका दुनिया में दबदबा है। विनिर्माण पर मोदी सरकार का जोर बहुत अच्छा और जरूरी कदम है लेकिन यह भारतीय विनिर्माण को उसी आउटसोर्सिंग की दिशा में धकेल रहा है जिसमें सॉफ्टवेयर उद्योग है।
सांठगांठ निंदायोग्य है और यह अच्छी बात है कि अब सांठगांठ पर इतनी बहस हो रही है लेकिन हमारी ताकतवर, अमीर और सफल कंपनियों तथा सरकारी नीति की सबसे बड़ी नाकामी यह है कि हमारी आर्थिक वृद्धि ब्रांड से रहित है।
Date:20-03-23
मैत्री पाइपलाइनसंपादकीय
भारत-बांग्लादेश संबंधों में शनिवार को एक या अध्याय जुड़ गया जब प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और बांग्लादेश की उनकी समकक्ष शेख हसीना ने उत्तरी बांग्लादेश में डीजल की आपूर्ति करने के लिए पाइपलाइन परियोजना का उद्घाटन किया। दोनों देशों के बीच यह पहली सीमा पार ऊर्जा पाइपलाइन है। वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए उद्घाटित परियोजना पर 377 करोड़ रुपये की लागत आई है, जिसमें से 285 करोड़ रुपये बांग्लादेश में पाइपलाइन बिछाने पर खर्च हुए हैं। यह खर्च भारत ने अनुदान के रूप में बांग्लादेश को दिया है। 131.5 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन से असम में नुमालीगढ़ से बांग्लादेश तक हर साल दस लाख मीट्रिक टन डीजल की आपूर्ति की जाएगी। भारत-बांग्लादेश फ्रेंडशिप पाइपलाइन की नींव सितम्बर, 2018 में रखी गई थी। यह पाइपलाइन बांग्लादेश के विकास को और गति देगी और दोनों देशों के बीच कनेक्टिविटी का भी उत्कृष्ट उदाहरण होगी। इस समय भारत से बांग्लादेश को डीजल आपूर्ति 512 किलोमीटर लंबे रेल मार्ग से की जाती है। जिससे परिवहन लागत बढ़ जाती है। इस परियोजना के क्रियान्वयन से इस खर्च से निजात मिलेगी। कार्बन उत्सर्जन भी कम होगा। बांग्लादेश के साथ भारत की रेल कनेक्टिविटी आजादी के बाद काफी समय तक ठप पड़ी रही। इससे दोनों देशों के बीच आवागमन और साज-सामान के वहन में परेशानी दरपेश थी। महसूस किया गया कि दोनों देशों के बीच 1965 से पहले के रेल संपर्क को बहाल किया जाए तो दोनों के बीच ऊर्जा कारोबार में काफी बढ़ोतरी हो सकती है। अभी भारत का बांग्लादेश के साथ पेट्रोलियम कारोबार एक अरब डॉलर से ज्यादा का है। भारत अभी बांग्लादेश को 1,100 मेगावाट से ज्यादा बिजली आपूर्ति कर रहा है। कोरोना महामारी के दौरान रेल संपर्क बहाल होने से बांग्लादेश को बहुत फायदा हुआ और वह रेलमार्ग के जरिए भारत से ऑक्सीजन की आपूर्ति प्राप्त कर सका। बांग्लादेश अच्छे से जानता है कि भारत के साथ कनेक्टिविटी बढ़ना उसके हित में है। खासकर ऊर्जा जरूरतों के मद्देनजर तो वह बनिस्बत कम लागत पर अपनी ऊर्जा जरूरतें पूरी कर सकता है। मैत्री सुपर थर्मल पावर प्लांट की दूसरी यूनिट को भी जल्द ही चालू किया जाएगा। बेशक, दोनों देशों के रेल और रोड कनेक्टिविटी बढ़ने से ऊर्जा सहयोग तेजी से बढ़ रहा है।
Date:20-03-23
एक ब्रांड की वापसीसंपादकीय
यह अपने आप में शोध का विषय है कि कोई ब्रांड कैसे खड़ा होता है और कैसे वह पतन की ओर चला जाता है। इसमें कोई संदेह नहीं कि शीतल पेय का कैंपा कोला ब्रांड लोग भूले नहीं हैं और बाजार के अध्ययन में यह बात सामने आई कि इस ब्रांड को फिर बाजार में लौटाया जा सकता है। रिलायंस कंपनी ने इसके लिए पहल की, जिससे बाजार और उद्यमियों में विचार-विमर्श का नया दौर शुरू हो गया है। कैंपा कोला की वापसी ने शीतल पेय बाजार में खलबली मचा दी है, कीमतें कम होना तय है। एक समय था, जब इसका स्लोगन ग्रेट इंडियन स्वाद हुआ करता था। यह ब्रांड 1970 के दशक में शीतल पेय बाजार में सबसे ज्यादा बिका करता था। धीरे-धीरे यह पतन की ओर बढ़ा और दिल्ली में इसके कार्यालय और बॉटलिंग प्लांट 2000-2001 में पूरी तरह से बंद हो गए। कुछेक बोतलों की आपूर्ति के साथ यह हरियाणा में थोड़ा बच रह गया था। अब रिलायंस कंपनी ने इसका जिम्मा उठाया है, जाहिर है, अब पेप्सी और कोका कोला जैसे ब्रांड को तगड़ी टक्कर मिलने वाली है। कैंपा कोला के आने से शीतल पेय बाजार बदलने वाला है।
प्योर ड्रिंक्स ग्रुप के पास जब यह ब्रांड था, तब इसका राज चलता था और अगर फिर यह ब्रांड चल निकले, तो कोई आश्चर्य नहीं। इस ब्रांड की शुरुआत 1949 में हुई थी और अब वापसी 2023 में हो रही है। ऐसे बहुत से ब्रांड हैं, जो लोगों की स्मृतियों में हैं। कई ब्रांड बंद हो गए, तो कुछ किसी तरह से अपना नाम घसीट रहे हैं। वास्तव में, उदारीकरण के बाद भारतीय ब्रांडों को जिस तरह से चुनौतियों का सामना करना पड़ा है, वह अलग से शोध का विषय रहा है। आज कहां हैं बिनाका टूथपेस्ट, डालडा वनस्पति, हमाम और मोती साबुन, गोल्ड स्पॉट पेय इत्यादि? एक शीतल पेय तो 1977 में जनता पार्टी सरकार के समर्थन से बाजार में उतारा गया था। नाम था 77 मतलब डबल सेवन, यह कोका कोला के देश से जाने के बाद उतारा गया था, मगर डबल सेवन ब्रांड इंदिरा गांधी सरकार के लौटते ही कमजोर पड़ गया। मतलब किसी ब्रांड के पीछे बाजार ही नहीं, तात्कालिक राजनीति की भी तगड़ी भूमिका होती है। बाद में साल 1991 में उदारीकरण की नीति के बाद 1993 में जब कोका कोला की देश में वापसी हुई, तब भारतीय बाजार में मानो भूचाल ही आ गया। भारतीय बाजार पर कब्जा करने के साथ ही बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने पुराने या कुछ जमे हुए ब्रांडों को खरीदना शुरू कर दिया। भारत में मुक्त बाजार व्यवस्था है, पर यहां विशुद्ध भारतीय ब्रांडों पर विशेष रूप से अध्ययन किया जाना चाहिए।
पुराने ब्रांडों को याद किया जा रहा है, तो एक समय टॉफी का सबसे प्रसिद्ध ब्रांड मॉर्टन हुआ करता था। आज बाजार में टॉफी और चॉकलेट के ढेरों ब्रांड हैं, पर एक समय मॉर्टन का जलवा था। अंग्रेजों के समय ही बिहार के मढ़ौरा में सी ऐंड ई मॉर्टन (इंडिया) लिमिटेड ने 1929 में अपने कारखाने में मॉर्टन टॉफी का उत्पादन शुरू किया था। उदारीकरण के दौर में ही 1997 में इस कारखाने पर ताला लग गया। मॉर्टन अब एक इतिहास है, उसकी वापसी की कोई चर्चा नहीं है। समय बदल गया, एक समय मढ़ौरा में ही चार कारखाने हुआ करते थे, 4,000 से ज्यादा लोगों को रोजगार मिला हुआ था, अब सन्नाटा है। यह तो एक मिसाल है। ऐसे बहुत से ब्रांड हैं, जिन्हें अगर लौटाया जाए, तो भारतीय उद्योग जगत के साथ ही देश की आत्मनिर्भरता को भी बल मिलेगा।
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पिछले कुछ समय से सरकार डिजटलीकरण पर लगातार जोर दे रही है। इसके मद्देनजर वर्जुअल बैरक और न्यायालयों की वर्चुअल सुनवाई भी आम हो चली है। पिछले दिनों उच्चतम न्यायालय ने न्यायालय की कार्यवाही के लाइव ट्रांसक्रिप्शन की अनुमति प्रदान की है। मुख्य न्यायाधीश का ऐसा मानना है कि इस प्रकार की उपलब्धता से आम जनता, छात्रों और शोधकर्ताओं को लाभ मिल सकता है।
इतना ही नहीं, तकनीक के माध्यम से न्यायालयों ने अपने पुराने दस्तावेजों को डिजटलीकरण शुरू कर दिया है। बाम्बे उच्च न्यायालय ने लगभग सन् 1800 से लेकर अब तक के काफी रिकॉर्ड को डिजिटाइज कर दिया है। इसी कड़ी में ओडिशा उच्च न्यायालय ने 2022 के मध्य तक लगभग 5.2 लाख फाइलों को डिजिटाइज कर दिया था। गत माहए दिल्ली उच्च न्यायालय ने डिजिटाइज की गई न्यायिक फाइलों के ऑनलाइन निरीक्षण के लिए नया सॉफ्टवेयर अपलोड किया है।
कुल मिलाकर, उच्चतम एवं उच्च न्यायालयों के ऐसे प्रयासों से कार्बन फुटप्रिंट को भी कम करने में मदद मिलती है। स्थायी और सुलभ न्याय व्यवस्था का लाभ सभी को मिलता है। लेकिन इसे सुचारू रूप से चलाने के लिए आए दिन होने वाले साइबर हमलों से सुरक्षा-कवच प्राप्त किया जाना जरूरी है। इस दिशा में सतर्क रहने की जरूरत है।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 24 फरवरी, 2023
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Date:18-03-23
House mattersThe government should not avoid a debate on issues of governance Editorial
The second leg of the Budget session of Parliament is in a deadlock. The ruling Bharatiya Janata Party (BJP) wants Congress leader Rahul Gandhi to apologise for remarks that he made in London recently about democratic backsliding in India; the Congress is insisting on the constitution of a Joint Parliamentary Committee (JPC) to probe allegations of dubious financial transactions and dishonest business practices against the Adani Group of companies. Available evidence suggests that Mr. Gandhi had categorically stated that the challenges to Indian democracy had to be sorted out domestically, and ruled out any role for foreign forces. With the Indian diaspora expanding, the ripple effects of politics in India are inevitable beyond the country’s geographical boundaries. In fact, the BJP has for long believed in cultural nationalism which is not contained within the geography of India. Mr. Modi has discussed national politics before audiences around the world. A democracy that does not allow criticism, including of democracy itself, is a contradiction in terms. Mr. Gandhi has not been able to speak in Parliament and explain his remarks; meanwhile, a BJP Member has initiated a process to terminate Mr. Gandhi’s Lok Sabha membership. It is an ill-advised move, and if carried out, will further amplify the fears of a democratic deficit in India.
In their clamour for an apology by Mr. Gandhi, BJP Ministers are also evading questions regarding government patronage of the Adani Group. The Congress has been seeking answers from the government on the links between the public sector Life Insurance Corporation of India and the State Bank of India with the Adani Group. The BJP and the government have been silent on this serious issue of governance that spans the government and the public and private sectors. Arbitrariness in decision making, followed by a lack of accountability, amounts to governance failure, if not collusion. The government, the Rajya Sabha chairman and the Lok Sabha Speaker should work with the Opposition for a discussion on the issues arising out of the Adani controversy. Coming clean is essential in maintaining the government’s credibility, the regulatory environment and the private sector. There have been precedents of a JPC in cases of financial scandals. The BJP has the numbers to get away with any disregard for parliamentary norms, but it should rise above that temptation and evolve as a true party of governance. Parliament has a role to play in fixing accountability, and the BJP should not avoid it and betray a new level of executive impunity.
Date:18-03-23
Endless delayConstitutional functions should not be held hostage to personal differencesEditorial
The frequency with which the conduct or inaction of Governors comes up for judicial scrutiny reflects poorly on the state of relations between incumbents in Raj Bhavans and the respective Chief Ministers. The Supreme Court will soon hear an extraordinary petition from the Telangana government, seeking a direction to the Governor, Dr. Tamilisai Soundararajan, to grant assent to Bills passed by the State Assembly. Recently, the apex court disposed of a petition from the Punjab Government that was aggrieved by an alleged delay in the Governor summoning the Assembly. The matter was resolved when it was submitted on behalf of the Governor that the Assembly would meet on the day desired by the State government. In earlier decades, a petition seeking a direction to Governors or questioning their inaction on constitutional matters would have been thrown out at the threshold itself. However, such is the extent to which the gubernatorial office is being overtly politicised by those holding it that courts may now be constrained to examine whether such inaction is justified. One sees a disturbing tendency in recent years of some Governors making use of the absence of a time-frame in the Constitution to indefinitely delay decisions. This tactic effectively stalls the elected regime’s legislative agenda.
The conflict between Raj Bhavan and the Chief Minister’s office witnessed in several States is quite acute in Telangana. Dr. Soundararajan has alleged that she is being boycotted by Chief Minister K. Chandrashekar Rao and that her queries are not being answered. The State government, for its part, is apparently upset that she may be trying to act independent of the Cabinet. A recent tweet from her account the day after the State government went to court — conveying a message that Raj Bhavan was closer than Delhi — indicates that her stand is linked to her view that the government is unfriendly and discourteous. These considerations ought not to matter on constitutional issues. The Governor can either grant assent to a Bill or decline it, or reserve it for the President’s consideration. In suitable cases, it may also be returned for reconsideration. However, none of this should be based on the Governor’s personal view on the Bill’s content. One can understand an occasional query if any Bill seemingly violates fundamental rights, but a relevant question that requires an authoritative pronouncement from the court is whether the Governor should decide on its legality or the legislature’s competence each time a Bill is presented for assent. As the Supreme Court remarked recently, dialogue between constitutional functionaries should not become a race to the bottom. Constitutional functions should not be held hostage to political and personal differences.
Date:18-03-23
क्या चैटजीपीटी नौकरियों के लिए एक खतरा है ?चैटजीपीटी को अपने काम को और बेहतर बना सकने वाले उपकरण की तरह देखेंपंकज बंसल, ( डिजिटल रिक्रूटमेंट प्लेटफॉर्म और वर्क यूनिवर्स के सह-संस्थापक )
‘जैसे -जैसे एआई टेक्नोलॉजी का विकास हो रहा है, इस बात को लेकर चिंताएं उठ खड़ी हुई हैं कि जल्द ही ये प्रणालियां मनुष्यों के द्वारा परम्परागत रूप से किए जाने वाले कार्यों की जगह ले लेंगी। ऐसी ही एक टेक्नोलॉजी ने हाल में सबका ध्यान अपनी ओर खींचा है और वह है चैटजीपीटी।
यह ओपनएआई द्वारा विकसित एक बड़ा लैंग्वेज-मॉडल है। लेकिन क्या सच में ही चैटजीपीटी नौकरियों के लिए एक खतरा साबित हो सकता है?’
अभी-अभी आपने यह जो पैराग्राफ पढ़ा, यह चैटजीपीटी ने लिखा था। क्या आपको पता चला?
चैटजीपीटी गत वर्ष 30 नवम्बर को लॉन्च किया गया था और एक महीने के भीतर इसके यूजर्स दस करोड़ की संख्या को पार कर चुके थे। तो आखिर यह काम कैसे करता है? सामान्यतया, हम इंटरनेट पर डाटा और सूचनाओं की खोज करते हैं। लेकिन चैटजीपीटी एक ऐसी जनरेटिव एआई टेक्नोलॉजी का उपयोग करता है तो फ्रेश कंटेंट मुहैया कराती है। सरल शब्दों में कहें तो चैटजीपीटी डाटा की खोज नहीं करता, बल्कि वह सूचनाओं को संकलित कर नया डाटा निर्मित करता है। चैटजीपीटी ने ट्यूरिंग टेस्ट को भी सफलतापूर्वक पास कर लिया है, जो किसी मशीन की मनुष्यों-जैसी बातचीत करने की क्षमता की सटीक तरह से और बिना कोई गलतियां किए माप करता है।
नौकरियों पर असर : अतीत में सामान्यतया यह माना जाता था कि रचनात्मक कार्य ऑटोमैशन से अप्रभावित रहेंगे। लेकिन चैटजीपीटी जैसे शक्तिशाली जनरेटिव एआई टूल्स के उदय से तस्वीर बदल रही है। जहां चैटजीपीटी ने कॉपीराइटिंग, मीडिया लेखन, फिक्शन लेखन, स्क्रीन-लेखन आदि में प्रभावी क्षमताओं का परिचय दिया है, वहीं वह रचनात्मक लोगों की विशिष्ट क्षमताओं की जगह लेने में अभी सक्षम नहीं है। रचनात्मकता के लिए समानुभूति, अंत:प्रेरणा, मानवीय व्यवहार और संस्कृति की गहरी समझ की जरूरत होती है और ये इतनी जटिल चीजें हैं कि मशीन के द्वारा इनका पूरी तरह से अनुसरण नहीं किया जा सकता। ऐसी अनेक भूमिकाएं हैं, जिनमें किसी बिजनेस-विज़न को वास्तविकता में तब्दील करने के लिए मानवीय-बुद्धिमत्ता की जरूरत होती है, जैसे कि प्रोग्राम मैनेजमेंट या एग्रेगेशन। यह एआई नहीं कर सकती। तो चलें, कुछ ऐसे बिजनेस वर्टिकल्स को देखें, जिनमें चैटजीपीटी हमारी मदद कर सकता है :
कस्टमर सर्विस : कम्पनियां चैटजीपीटी का इस्तेमाल सरल के साथ ही जटिल इंक्वायरियों का भी उत्तर देने के लिए कर सकती हैं। हालांकि अंतिम निर्णय लेने के लिए प्रश्नों का उत्तर देने से कहीं अधिक की जरूरत होगी। इसके लिए सक्रिय और तुरंत निर्णय लेने की क्षमता चाहिए, जो केवल मनुष्यों में हो सकती है।
प्रोग्रामिंग : जहां चैटजीपीटी कोडिंग में सहायता कर सकता है, वहीं इस बात की सम्भावना कम ही है कि वह हाई-लेवल डिजाइन के निर्माण में मनुष्यों की जगह ले सकता है। इन कार्यों को करने के लिए मनुष्यों की रचनात्मकता, आलोचनात्मक चिंतन, निर्णय-क्षमता जैसी स्किल्स की जरूरत है। ऐसे में चैटजीपीटी प्रोग्रामर्स और प्रोडक्ट डिजाइनर्स के लिए मददगार उपकरण ही साबित हो सकता है, वह उनकी जगह नहीं ले सकता। हां, बदलते टेक-लैंडस्केप में प्रासंगिक बने रहने के लिए अब सॉफ्टवेयर इंजीनियरों को समस्याओं का समाधान करने, डिजाइन थिंकिंग और प्रोजेक्ट मैनेजमेंट के लिए स्किल्स विकसित करना होंगी।
चैटजीपीटी की सीमाएं और भविष्य के अवसर : अंतत: चैटजीपीटी एक एल्गोरिद्म ही है, जो अपने सिस्टम में भरे गए डाटा पर निर्भर है। अभी इसमें केवल दिसम्बर 2021 तक का डाटा है, उसके बाद के प्रश्नों का सही उत्तर देने के लिए उसके पास न के बराबर डाटा है। सर्ज इंजिनों के विपरीत चैटजीपीटी अपने नॉलेज के स्रोत के बारे में भी नहीं बताता। हो सकता है कि चैटजीपीटी द्वारा उपयोग किए गए ट्रेनिंग डेटा की सीमाओं और उसके पूर्वाग्रहों का मूल्यांकन नहीं कर पाने से जनरेटेड-कंटेंट की गुणवत्ता प्रभावित हो।
आगे की राह : आविष्कार मनुष्यों की मदद के लिए होते हैं और वे नौकरियों के नए अवसर भी सृजित कर सकते हैं। समस्याओं को सुलझाने वाले पेशेवर अगर इस टूल पर महारत हासिल कर लें तो उनके इर्द-गिर्द एक नई इंडस्ट्री भी खड़ी हो सकती है।
अंत में, उत्सुकतावश मैंने चैटजीपीटी से पूछा कि इस लेख का शीर्षक क्या होना चाहिए? उसने जवाब दिया : ‘चैटजीपीटी : क्या यह नौकरियां छीन लेगा?’
Date:18-03-23
देश की अंदरूनी समस्याओं पर विदेश में बातें क्यों ?हम जो भी कहते या करते हैं, उसे पूरी दुनिया में देखा जाता है, इसे ध्यान में रखना चाहिएपवन के. वर्मा, ( लेखक, राजनयिक, पूर्व राज्यसभा सांसद )
राहुल गांधी द्वारा कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी और ब्रिटिश संसद में दिए भाषणों पर खासा विवाद खड़ा हो गया है। भाजपा राहुल गांधी से मांग कर रही है कि वे भारत को बदनाम करने के लिए माफी मांगें। यह तो साफ है कि देश की अंदरूनी समस्याओं के बारे में विदेश में बात करने के लिए बड़ी सूक्ष्मता और परिष्कार की आवश्यकता है। देश के भीतर राजनीतिक पार्टियां खुलेआम एक-दूसरे की आलोचना कर सकती हैं, लेकिन जब हम विदेश में होते हैं, तो उन्हीं बिंदुओं पर चर्चा करते समय यह खयाल रखते हैं कि हमारी बातों से देश की सार्वजनिक छवि को नुकसान न पहुंचे। इसका यह मतलब नहीं है कि देश के भीतर एक-दूसरे से भिन्न विचारों का दम घोंट दिया जाए। लेकिन विदेश में बोलते समय हमें श्रोताओं को यह बताना चाहिए कि हमारी दृष्टि में भारत का विचार क्या है और वर्तमान भारत उसके अनुरूप है या नहीं।
तब हम यह कह सकते हैं कि हर लोकतंत्र की तरह भारत भी परफेक्ट नहीं है और उसमें सुधार की जरूरत है, लेकिन अतीत में एकाधिक अवसरों पर भारत ने दर्शाया है कि वह अपनी अंदरूनी समस्याओं को लोकतांत्रिक रूप से सुलझाने में सक्षम है। ऐसा कहना व्यावहारिक भी है और विचारधारागत भी। व्यावहारिक इसलिए, क्योंकि जब हम देश की निंदा करते हैं तो यह आम भारतीय को अच्छा नहीं लगता, फिर वह चाहे भारतवासी हों या प्रवासी भारतीय। वे चाहते हैं कि देश में चाहे जितनी समस्याएं हों लेकिन विदेश में देश की छवि पर बट्टा नहीं लगना चाहिए। विचारधारागत इसलिए, क्योंकि कुछ भी पूरी तरह से अच्छा और पूरी तरह से बुरा नहीं होता। जब हम देश में हो रही घटनाओं की आलोचना करते हैं तो साथ ही हमें आने वाले कल में देश की क्षमताओं के प्रति आशाएं और विश्वास भी जताना चाहिए, क्योंकि तब वह अधिक विश्वसनीय, परिपक्व और वस्तुनिष्ठ होता है।
यही कारण है कि जब राहुल विदेशी श्रोताओं के सामने कहते हैं कि नरेंद्र मोदी देश के ढांचे को तहस-नहस कर रहे हैं और देश को विखंडन की ओर ले जा रहे हैं, तब वे किसी भी सूक्ष्म आकलन के लिए जगह नहीं छोड़ते। इससे बेहतर तरीका उन मूल्यों और आदर्शों को याद करना होता, जिन्होंने कांग्रेस को प्रेरित किया है, जिन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन को गति दी थी और जो हमारे संविधान में निहित हैं। इस संदर्भ में राहुल कह सकते थे कि अगर भारत के संविधान को कोई खतरा उत्पन्न होता है और नागरिकों की स्वतंत्रता का हनन किया जाता है तो कांग्रेस बढ़-चढ़कर इसका प्रतिकार करेगी। आखिर जब आपातकाल लगाया गया था, तब देश की जनता ने ही उसका प्रतिकार करते हुए कांग्रेस को परास्त कर दिया था। लेकिन अगर कोई यह संकेत करता है कि भारत के अंदरूनी मामलों को सुलझाने के लिए विदेशी हस्तक्षेप की जरूरत है, तो उसके लिए यह राजनीतिक आत्मघात से कम नहीं।
साथ ही, यह कहना एक बात है कि कांग्रेस मीडिया और न्यायपालिका जैसी संस्थाओं को पहुंचाई जा रही क्षति के विरुद्ध आंदोलन करेगी- जैसा कि उसने भारत जोड़ो यात्रा के माध्यम से करके दिखाया भी- पर यह कहना दूसरी बात है कि इन संस्थाओं का अस्तित्व ही अब समाप्त हो चुका है। इस तरह से तो आप भारत को एक ‘बनाना-रिपब्लिक’ के रूप में ही चित्रित करेंगे। मैं खुद एक डिप्लोमैट रहा हूं और देश की छवि की रक्षा करना मेरी पेशेवर जिम्मेदारी रही है। जब मैं राजनीति में आया तो अकसर मेरे श्रोताओं में विदेशी शामिल हुआ करते थे। जब भी मैंने देश की समस्याओं पर बातें रखीं, कभी सरकार को खारिज नहीं किया। हमेशा यही कहा कि भारतीय अपने मतभेदों को सुलझाने में सक्षम हैं और मुझे देश के भविष्य में पूरा भरोसा है।
वैसे भी जब राहुल लोकतंत्र और संवाद की बात करते हैं तो यह इसलिए निष्प्रभावी लगता है, क्योंकि वे लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित किसी पद पर हुए बिना एक ऐसी पार्टी के परोक्ष रूप से प्रमुख बने हुए हैं, जो किसी प्रकार की असहमति या आलोचना को बर्दाश्त नहीं करती। जब राहुल गांधी खुद कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में पार्टी के जी-23 नेताओं पर प्रहार करते हैं तो लोकतांत्रिक संवाद का कोई बहुत अच्छा उदाहरण नहीं प्रस्तुत कर रहे होते हैं। भाजपा ने भी राहुल की बातों की आलोचना करते हुए राष्ट्रवाद की भावनाओं को भड़काने की कोशिश करके बहुत संतुलित प्रतिक्रिया नहीं दी। आज भारत पर सबकी नजर है और हम अपने देश में जो भी कहते या करते हैं, उसे पूरी दुनिया में देखा जाता है, इसे ध्यान में रखा जाना चाहिए।
Date:18-03-23
मतांतरण रोधी कानूनसंपादकीय
यह आश्चर्यजनक है कि जब विभिन्न राज्यों के मतांतरण रोधी कानूनों को और प्रभावी बनाने एवं केंद्रीय स्तर पर ऐसा कोई कानून बनाने की आवश्यकता है, तब कुछ ऐसे लोग और संगठन भी हैं, जो ऐसे किसी कानून की कहीं कोई जरूरत नहीं समझ रहे हैं। इतना ही नहीं, वे राज्यों के ऐसे कानूनों को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट भी पहुंच गए हैं। उनकी याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए गत दिवस सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित राज्यों से उनके मतांतरण रोधी कानूनों पर तीन सप्ताह के अंदर जवाब मांगा है। यह तो स्वाभाविक है कि राज्य अपने मतांतरण रोधी कानूनों को उचित एवं आवश्यक बताएंगे, लेकिन अभी यह कहना कठिन है कि उनके संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट किस नतीजे पर पहुंचता है? सुप्रीम कोर्ट को किसी नतीजे पर पहुंचने के पहले इससे अवगत होना आवश्यक है कि छल-छद्म एवं लोभ-लालच से मतांतरण एक यथार्थ है और इसी कारण केंद्रीय स्तर पर मतांतरण रोधी कानून बनाने की मांग हो रही है। सुप्रीम कोर्ट को इससे भी परिचित होना चाहिए कि मत प्रचार की स्वतंत्रता का अनुचित लाभ उठाकर विभिन्न संगठन मतांतरण में जुटे हुए हैं। ऐसे संगठनों ने मतांतरण के जरिये देश के कई हिस्सों में जनसांख्यिकी को बदल दिया है। कहीं-कहीं तो इतना अधिक बदल दिया है कि सामाजिक और राजनीतिक समीकरण ही पूरी तरह बदल गए हैं। पूर्वोत्तर के अधिकांश राज्यों के साथ आदिवासी बहुल प्रांतों में यह काम इतने बड़े पैमाने पर किया गया है कि वहां का सामाजिक ताना-बना ही बदल गया है।
राज्यों के मतातंरण रोधी कानूनों को चुनौती देने वाले चाहे जो तर्क दें, इससे इनकार नहीं किया जा सकता कि छल-कपट और प्रलोभन के माध्यम से कराया जाने वाला मतांतरण देश की संस्कृति और आत्मा को परिवर्तित करने वाला काम है। यह काम स्वतंत्रता के बाद से ही जारी है। अब तो मतांतरण में जुटे संगठन देश के हर हिस्से और यहां तक कि पंजाब जैसे राज्यों में भी सक्रिय हो गए हैं। यह भी किसी से छिपा नहीं कि ऐसे संगठनों को विदेश से पैसा मिलता है और वे मतांतरण रोधी कानूनों में छिद्र तलाशने में भी सफल हैं। इसी कारण कई राज्यों को अपने ऐसे कानूनों में संशोधन करने पड़े हैं। अभी तक लगभग दस राज्यों ने मतांतरण रोधी कानून बना रखे हैं। यह कहना कठिन है कि इन राज्यों में धोखे और लालच से कराया जाने वाला मतांतरण थम गया है। चूंकि मतांतरण अब भी जारी है, इसलिए आवश्यकता इसकी है कि मत प्रचार की स्वतंत्रता की नए सिरे से व्याख्या की जाए। जब तक मत प्रचार की स्वतंत्रता की मनमानी व्याख्या करके उसकी आड़ ली जाती रहेगी, तब तक छल-कपट से कराए जाने वाले मतांतरण पर रोक लगने वाली नहीं है। अच्छा यह होगा कि सुप्रीम कोर्ट यह समझे कि मतांतरण राष्ट्र के मूल चरित्र को बदलने का काम कर रहा है।
Date:18-03-23
खुदकुशी की मानससंपादकीय
युवाओं में तनाव, अवसाद और फिर आत्महत्या की बढ़ती प्रवृत्ति को लेकर लंबे समय से चिंता जताई जाती रही है। इसे रोकने के लिए अनेक उपाय सुझाए गए हैं। तनाव दूर करने के लिए लगातार जागरूकता पैदा करने की कोशिश की जाती है। जगह-जगह सहायता और सलाह केंद्र खोले गए हैं। इसके बावजूद इस समस्या पर काबू पाना चुनौती है। सबसे चिंताजनक स्थिति तो यह है कि जिन चिकित्सकों के माध्यम से अवसाद जैसी स्थितियों से पार पाने की उम्मीद की जाती है, वे खुद इस समस्या से ग्रस्त होकर खुदकुशी करते देखे जाते हैं। ताजा आंकड़े के मुताबिक 2010 से 2020 के बीच साढ़े तीन सौ मेडिकल छात्रों, रेजिडेंट डाक्टरों और चिकित्सकों ने खुदकुशी कर ली। इसे लेकर इंडियन मेडिकल कांग्रेस ने चिंता जताई और चिकित्सकों और अस्पताल प्रबंधन से इस मामले में सकारात्मक वातावरण बनाने की सलाह दी है। चिकित्सकों में बढ़ते अवसाद के पीछे बड़ा कारण उन पर कामकाज का बढ़ता दबाव और तनाव है। आत्महत्या करने वालों चिकित्सकों का विश्लेषण करने से पता चला है कि वे अत्यंत मेधावी थे, सबसे तेज दिमाग थे, मगर उनका मानसिक स्वास्थ्य कमजोर था। वे अपने पेशेवर जीवन में उत्कृष्ट प्रदर्शन कर सकते थे।
चिकित्सा विज्ञान के अनुसार अवसाद अक्सर ऐसे लोगों को जल्दी अपनी गिरफ्त में ले लेता है, जो अतिरिक्त रूप से संवेदनशील, प्राय: मेधावी और कमजोर मानसिक स्वास्थ्य वाले होते हैं। ऐसे लोगों को सामाजिक संबल की बहुत जरूरत होती है। मगर हैरानी की बात है कि चिकित्सा के पेशे में रहते हुए भी लोगों को इस समस्या की पहचान नहीं हो पाती। ऐसा नहीं माना जा सकता कि अवसाद के लक्षण उनके आसपास रहने वाले लोगों को नजर न आए होंगे। अब तो यह भी छिपा तथ्य नहीं है कि अक्सर पढ़ाई-लिखाई, परीक्षा और काम के दबाव में युवाओं का मानसिक संतुलन बिगड़ जाता है। इसीलिए परीक्षा आदि के समय माता-पिता और अध्यापकों को विद्यार्थियों के प्रति विशेष रूप से ध्यान देने की सलाह दी जाती है। उन्हें स्रेह और प्रोत्साहन पूर्ण वातावरण देने का प्रयास किया जाता है। हैरानी की बात है कि चिकित्सा विज्ञान से जुड़े लोग भी इस मामले में अपने किसी पीड़ित सहकर्मी या सहपाठी के प्रति वैसे ही उदासीन नजर आ रहे हैं, जैसे समाज के सामान्य लोग देखे जाते हैं। अच्छी बात है कि इसे लेकर इंडियन मेडिकल कांग्रेस ने व्यापक रूप से सतर्कता अभियान चलाने की पहल की है।
अवसाद हमारे देश में एक गंभीर समस्या का रूप ले चुका है। खासकर युवा इसकी गिरफ्त में जल्दी आ जाते हैं, इसलिए कि उन पर पढ़ाई-लिखाई और पेशे आदि में अव्वल रहने का दबाव अधिक बढ़ा है। उनकी महत्त्वाकांक्षाएं भी बड़ी हैं। माता-पिता और समाज उन्हें अव्वल देख कर प्रसन्न तो होते हैं, उनकी नजीर भी देते हैं, पर उनके मानसिक स्वास्थ्य का अंदाजा लगाने में प्राय: विफल साबित होते हैं। इसी का नतीजा है कि मामूली विफलता पर भी कई युवा गहरे अवसाद में चले जाते हैं और धीरे-धीरे आत्महंता हो जाते हैं। पिछले दिनों देश के पचपन विश्वविद्यालयों के छात्रों में बढ़ते अवसाद और खुदकुशी की प्रवृत्ति पर चिंता जताई गई थी। कुछ तो युवाओं में यह समस्या इसलिए भी तेजी से घर कर रही है कि पढ़ाई-लिखाई कर चुकने के बाद भी उन्हें जीवन जीने का कोई बेहतर जरिया नजर नहीं आता। ऐसे में युवाओं को अपनी गिरफ्त में लेती इस समस्या के विभिन्न पहलुओं का बारीक अध्ययन और व्यावहारिक उपायों पर विचार की जरूरत है।
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18 March 2023
प्रश्न–402 – अ) ग्रीन हाइड्रोजन क्या है? राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन की उपयोगिता बतायें। (100 शब्द)
ब) क्या वर्ष 2023-24 के बजट को मध्यम वर्ग के लिए प्रस्तुत किया गया बजट कहना सही होगा? (100 शब्द)
Question–402 – a) What is green hydrogen? Explain the utility of National Green Hydrogen Mission. (100 words)
b) Would it be correct to call the budget of the year 2023-24 as the budget presented for the middle class? (100 words)
नोट : इसका उत्तर आपको हमें नहीं भेजना है, यह आपके स्वयं के अभ्यास के लिए है।
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Date:17-03-23
State Of HeadGovernors have been seen as partisan for decades. They should be accountable to Centre, state & Rajya SabhaTOI Editorials
Supreme Court’s strong words on the role of governors – while hearing the case related to the fall of MVA government – is another reminder of a problem that’s getting worse. Free India cut back in large measure powers the colonial British gave governors to control legislatures. Under the Constitution, a governor, in letter, enjoys powers to appoint ministers, summon legislatures, call for central rule and most importantly, give assent to bills passed in the state assembly – but in spirit for decades these have mostly been left for the executive and the legislature.
Still, there have been tussles before between governors and state governments. However, the frequency and the sharpness of the discord have gone up of late. Earlier this month, SC, hearing a Punjab CM vs governor case, said levels of discourse should not degenerate into a “race to the bottom”. Tamil Nadu, Kerala, Rajasthan, Telangana, Chhattisgarh and Bengal have all protested governors’ using their office in a manner that’s seen as slowing down or meddling in state government function. The tussles are multiple but governors not giving assent to bills passed by assemblies seems to be the biggest issue. It is also the most important – delaying assent to bills directly affects governance. Telangana’s CM, who faces voters later this year, has moved SC on this very reason, accusing the governor of “deliberate withholding” of assent – the governor has reportedly not signed seven bills since September, neither has she cleared the state budget.
In another matter, an EC opinion on Jharkhand CM has remainedin governor’s office in Ranchi for six months, an extraordinary fact, especially given that the governor in question was moved to Maharashtra in February. Among other friction points are governors’ refusal to convene assembly sessions, and vice-chancellor appointments. Of course, not every row is a constitutional impasse. Bengal CM’s run-ins with the earlier governor, who’s now VicePresident, played out on Twitter. One blocked the other, who responded with a spirited tweetstorm.
None of this is conducive to healthy democracy. For too long, governors have been perceived to be following the Centre’s writ, whichever the party in the Centre. One device to correct this and stem the spiral into ever more ruinous clashes is to urgently review appointments and removal of governors – making governors accountable to not just the Centre but also the state and Rajya Sabha.
Date:17-03-23
Peeling Away the Warehousing MessWaste of perishable food needs interventionET Editorials
India continues to grapple with warehousing seasonal vegetables like onions, potatoes and tomatoes, whose demand has become perennial. The demand-supply mismatch leads to wild swings in prices that provide false signals for subsequent crop seasons in the absence of effective price stabilisation mechanisms. Farmers also suffer due to the absence of alternative price discovery guideposts like futures contracts — as can be witnessed in the ongoing farmer agitations in Maharashtra over falling onion prices. They tend to make the least optimal choice — like letting their produce rot during a glut — because of a lack of access to market information. Vegetable farming is pockmarked with market failure at various levels, and state intervention is often delayed or inadequate to address them despite consistent recurrence.
Warehousing capacity in India is constrained by enforceability of contracts, as the latest crash in onion prices demonstrates. Cold store owners seek full payment upfront during a glut because they cannot be sure the farmer will show up to collect his stock as prices keep falling. Farmers, on their part, have no means to pay for storage if the market price falls below production costs. Price stabilisation efforts must reach all farmers so that they can sell a part of their crop at rates remunerative enough for them to pay for storage of the rest. This involves timely intervention using market intelligence. Onion prices have been trending downwards since the late kharif crop in November. But government procurement, income sops and transport subsidies have been made available since February. Moreover, the central agencies wheeled in for procurement do not have the capacity for intervention at this scale.
Solutions are to be found in strengthening market mechanisms around the production of perishables through stronger enforcement of farmer-warehouse transactions and improved information flows from futures trading. This should reduce the requirement for government intervention to clear markets. This apart, state capacity to intervene when needed has to be increased considerably to control horrific waste of perishable food in the country.
Date:17-03-23
The colonial past is still relevantColonialism cannot be a forgotten factor in understanding the problems and the dangers of today’s worldShashi Tharoor, [ Third-term Member of Parliament (Congress) from Thiruvananthapuram and the author of 24 books, including the Sahitya Akademi award-winning An Era of Darkness: The British Empire in India ]
As a writer who, in some circles, is blamed (or credited, depending on your point of view) for having brought colonialism once again into the public consciousness, it may surprise some that I concede the limitations of anti-colonialism as a relevant discourse in the 21st century. Thankfully, it is no longer fashionable in most of the developing world to decry the evils of colonialism in assigning blame for every national misfortune. Internationally, the subject of colonialism is even more passé, since the need for decolonisation is no longer much debated, and there are, after all, no empires left. Yet, it would not be wise to consign colonialism to the proverbial dustbin of history. As I have pointed out in my writings and speeches, much of what we are is a product of the colonial era, and many of our ills can be traced directly to the impact of imperialism and the policies of colonial rulers. Colonialism remains a relevant factor in understanding the problems and the dangers of the world in which we live.
Still in stalemate
To begin with, residual problems from the end of the earlier era of colonisation, usually the result of untidy departures by the colonial power, still remain dangerously stalemated. The dramatic events in East Timor in 1999 are no longer fresh in the memory, and the more recent woes of neither Afghanistan nor Myanmar, can be attributed to colonialism. But no closure seems in sight in western Sahara, Jammu and Kashmir or in those old standbys of Cyprus and Palestine, all messy legacies of colonialism. Fuses lit in the colonial era could ignite again, as they did in the Horn of Africa, between Ethiopia and Eritrea, where war broke out over a colonial border that the Italians of an earlier era of occupation had failed to define with enough precision, and, more recently still, between the government of Ethiopia and its Tigrayan minority.
But it is not just the direct results of colonialism that remain relevant: there are the indirect ones as well. The intellectual history of colonialism is littered with many a wilful cause of more recent conflict. One is, quite simply, careless anthropology: the Belgian classification of Hutus and Tutsis in Rwanda and Burundi, which reified a distinction that had not existed before, continues to haunt the region of the African Great Lakes. A related problem is that of motivated sociology: how much bloodshed do we owe, for instance, to the British invention of “martial races” in India, which skewed recruitment into the armed forces and saddled some communities (Punjabi Muslims, for instance) with the onerous burden of militarism? And one can never overlook the old colonial administrative habit of “divide and rule”, exemplified, again, by British policy in the subcontinent after 1857, systematically promoting political divisions between Hindus and Muslims, which led inexorably to the tragedy of Partition. Such colonial-era distinctions were not just pernicious; they were often accompanied by an unequal distribution of the resources of the state within the colonial society. Belgian colonialists favoured Tutsis, leading to Hutu rejection of them as alien interlopers; Sinhalese resentment of privileges enjoyed by the Tamils in the colonial era in Sri Lanka prompted the discriminatory policies after Independence, that in turn fuelled the Tamil revolt.
Danger from a ‘mixed’ history
A “mixed” colonial history within one modern state is also a potential source of danger. When a state has more than one colonial past, its future is vulnerable. Secessionism, after all, can be prompted by a variety of factors, historical, geographical and cultural as well as “ethnic”. Ethnicity or language hardly seem to be a factor in the secessions (one recognised, the other not) of Eritrea from Ethiopia and the “Republic of Somaliland” from Somalia. Rather, it was different colonial experiences (Italian rule in Eritrea and British rule in Somaliland) that set them off, at least in their own self-perceptions, from the rest of their ethnic compatriots. A similar case can be made in respect of the former Yugoslavia, where parts of the country that had been under Austro-Hungarian rule for 800 years had been joined to parts that spent almost as long under Ottoman suzerainty. The war that erupted in 1991 was in no small measure a war that pitted those parts of Yugoslavia that had been ruled by German-speaking empires against those that had not (or had resisted such colonisation).
Boundaries drawn in colonial times, even if unchanged after independence, still create enormous problems of national unity, especially in Africa. Civil conflict along ethnic or regional lines can arise when the challenge of nation-building within colonially-drawn boundaries becomes insurmountable. Where colonial constructions force disparate peoples together by the arbitrariness of a colonial map-maker’s pen, nationhood becomes an elusive notion. Older tribal and clan loyalties in Africa were mangled by the boundaries drawn, in such distant cities as Berlin, for colonially-created states whose post-independence leaders had to invent new traditions and national identities out of whole cloth. The result was the manufacture of unconvincing political myths, as artificial as the countries they mythologise, which all-too-often cannot command genuine patriotic allegiance from the citizenry they aim to unite. Civil war is made that much easier for local leaders challenging a “national” leader whose nationalism fails to resonate across his country. Rebellion against such a leader is, after all, merely the reassertion of history over “his” story.
Crisis of governance
State failure in the wake of colonialism is another evident source of conflict, as the by-product of an unprepared newly-independent state’s inability to govern. The crisis of governance in many African countries is a real and abiding cause for concern in world affairs today. The collapse of effective central governments — as manifest in Sierra Leone and South Sudan recently, and in Liberia and Somalia before that — could unleash a torrent of alarming possibilities: a number of “weak states”, particularly in Africa, seem vulnerable to collapsing in a welter of conflict.
Underdevelopment in post-colonial societies is itself a cause of conflict. The uneven development of infrastructure in a poor country, as a result of priorities skewed for the benefit of the colonialists, can lead to resources being distributed unevenly, which in turn leads to increasing fissures in a society between those from “neglected regions” and those who are better served by roads, railways, power stations, telecommunications, bridges and canals. Advancing underdevelopment in many countries of the South, which are faring poorly in their desperate struggle to remain as players in the game of global capitalism, has created conditions of desperate poverty, ecological collapse and rootless, unemployed populations beyond the control of atrophying state systems — a portrait vividly painted by Robert Kaplan in his book The Coming Anarchy, which suggests the real danger of perpetual violence on the peripheries of our global village.
Even in the third decade of the 21st century, therefore, it seems ironically clear that tomorrow’s anarchy might still be due, in no small part, to yesterday’s colonial attempts at order. I have no wish to give those politicians in post-colonial countries, whose leadership has been found wanting in the present, any reason to find excuses for their failures in the past. But in looking to understand possible future sources of conflict in our times, we have to realise that sometimes the best crystal ball is a rear-view mirror.
Date:17-03-23
विपक्ष व सत्तारूढ़ दल के लिए अलग नियम क्यों ?डेरेक ओ ब्रायन, ( लेखक सांसद और राज्यसभा में टीएमसी के नेता हैं )
हाल के समय में विशेषाधिकार प्रस्ताव खबरों में रहे हैं। केंद्रीय संचार, रेलवे, बिजली और सूचना-प्रौद्योगिकी मंत्री ने हाल ही में तब विशेषाधिकार प्रस्ताव का उल्लंघन कर दिया, जब उन्होंने कुछ गोपनीय ब्योरों को उजागर कर दिया। उन्होंने बताया कि पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन बिल पर संसद की स्टैंडिंग कमेटी की बैठक में क्या हुआ था। एक अन्य मामले में वायनाड के कांग्रेस सांसद के विरुद्ध लोकसभा में झारखंड के भाजपा सांसद द्वारा विशेषाधिकार प्रस्ताव लाया गया। यह प्रस्ताव उन 12 सांसदों के विरुद्ध भी चाहा गया था, जिन्होंने बजट सत्र के पहले चरण के दौरान कथित रूप से अनुचित व्यवहार किया था। एक राज्यसभा सांसद को निलम्बित कर दिया गया और उनके विरुद्ध भी विशेषाधिकार प्रस्ताव लाया गया, क्योंकि उन्होंने कथित रूप से अपने स्मार्टफोन पर सदन के भीतर चल रही कार्रवाइयों को रिकॉर्ड कर लिया था। राज्यसभा बुलेटिन के मुताबिक सदन के सभापति ने आम आदमी पार्टी के एक सांसद के विरुद्ध भी विशेषाधिकार प्रस्ताव लाना चाहा था। कारण बड़ा अजीब था। वे बारम्बार एक जैसे नोटिस सबमिट कर रहे थे! जबकि यह आम बात है।
आखिर ये विशेषाधिकार प्रस्ताव होते क्या हैं? संविधान संसद के दोनों सदनों और उनके सदस्यों को कुछ विशिष्ट अधिकार देता है, ताकि वे अपना कार्य सुगमता से कर सकें। जब इन अधिकारों-सुविधाओं का उल्लंघन किया जाता है तो इसे विशेषाधिकार का हनन कहा जाता है। ऐसे में संसद को विशेषाधिकार प्रस्ताव पारित करवाकर उल्लंघनकर्ता को दंडित करने का अधिकार है। विशेषाधिकार के हनन का प्रश्न कैसे उठाया जाता है? राज्यसभा में यह प्रश्न या तो किसी सांसद के द्वारा उठाया जा सकता है, या दुर्लभतम मामलों में पीठासीन अधिकारी खुद ऐसा कर सकता है। यह सदन में विचारणीय हो सकता है या इसे विशेषाधिकारों के परीक्षण के लिए गठित समिति को भेजा जा सकता है। गौरतलब है कि राज्यसभा की वेबसाइट पर विशेषाधिकार-समितियों की 70 उपलब्ध रिपोर्ट्स में से 66 ऐसी हैं, जिनमें विशेषाधिकार-हनन का प्रश्न किसी सांसद के द्वारा उठाया गया था। चार ही मामले ऐसे हैं, जिनमें सभापति ने स्वविवेक से इसे संदर्भित किया। इसकी तुलना पिछले महीने हुई घटनाओं से करें, जिनमें सभापति ने विशेषाधिकार सम्बंधी तीन प्रश्न स्वयं ही प्रस्तुत किए थे।
यहां बड़ा प्रश्न यह है कि जब संसद में विपक्षी सांसदों की आवाज दबा दी जाए, जब उनके माइक्रोफोन म्यूट कर दिए जाएं, संसद टीवी को सेंसर कर दिया जाए और स्पीच से वाक्य और कभी-कभी तो पूरे पैराग्राफ ही हटा दिए जाएं, तब वे क्या करें? जब जनप्रतिनिधियों को ही जनता के मामलों को उठाने की इजाजत नहीं दी जाएगी तो क्या उन्हें प्रतिरोध व्यक्त करने के लिए नए तरीकों की खोज नहीं करनी चाहिए? इस बारे में भाजपा के दो कद्दावर नेताओं सुषमा स्वराज और अरुण जेटली ने कुछ विचार व्यक्त किए थे। सुषमा स्वराज ने कहा था कि संसद को काम नहीं करने देना भी लोकतंत्र का एक स्वरूप है। वहीं अरुण जेटली ने कहा था कि कुछ अवसर ऐसे होते हैं, जब संसद में गतिरोध से देश का भला होता है। हमारी रणनीति हमें सरकार को बिना किसी जिम्मेदारी के संसद का इस्तेमाल करने की इजाजत नहीं देती।
फरवरी में बजट सत्र के पहले चरण में विपक्ष ने मांग की थी कि एलआईसी-एसबीआई फंड्स के अदाणी कम्पनियों द्वारा दुरुपयोग के मामले की जांच कराई जाए। यह एक वैध संसदीय नीति थी। फिर प्रतिरोध करने वाले सांसदों के विरुद्ध विशेषाधिकार प्रस्ताव लाने की क्या तुक है? विशेषाधिकार समितियों की आरम्भिक रिपोर्टों के मुताबिक इस तरह के गतिरोध संसदीय-विशेषाधिकारों के तहत नहीं आते हैं। समिति ने पाया है कि सदन में गतिरोध उत्पन्न करने वाले सदस्यों की मंशा किसी अन्य सदस्य को बोलने से रोकने की नहीं थी, न ही वे सभापति की वैधता को चुनौती दे रहे थे। वे केवल एक मसले पर अपने असंतोष को जाहिर कर रहे थे, क्योंकि उसे केंद्र सरकार द्वारा गम्भीरता से नहीं लिया जा रहा था। भाजपा के सदस्यों को न तो कभी सीबीआई-ईडी द्वारा निशाना बनाया जाता है, न ही भाजपा सांसदों की विशेषाधकिार समिति के द्वारा कभी जांच की जाती है। अगर ऐसा नहीं होता तो केंद्रीय आईटी मंत्री को गोपनीय सूचनाएं उजागर करने के लिए क्यों विशेषाधिकार नोटिस नहीं दिया गया?
Date:17-03-23
युद्ध के वातावरण में ध्रुवीकरणरघु ठाकुर
पिछले दिनों अचानक अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन यूक्रेन पहुंच गए और उन्होंने वहां के राष्ट्रपति जेलेंस्की से मुलाकात कर उन्हें पूरी मदद देने का भरोसा दिया। उनकी यात्रा गोपनीय रखी गई थी और यूक्रेन की राजधानी कीव पर अमेरिकी सुरक्षा विमानों का घेरा बना दिया गया था। अमेरिका के राष्ट्रपति की इस तरह की सुरक्षा स्वाभाविक है। मगर वह इस बात का भी संकेत है कि अमेरिकी प्रशासन रूस से कितना भयभीत है जो बाइडेन के दौरे की सूचना मिलने के तत्काल बाद रूस के राष्ट्रपति पुतिन ने अमेरिका के साथ तेरह साल पहले की गई परमाणु अप्रसारण संधि, जो परमाणु परीक्षण पर रोक लगाने को लेकर की गई थी, को एकतरफा निरस्त करने की घोषणा कर दी।
संधियों का एकतरफा निरस्त किया जाना अंतरराष्ट्रीय कानूनों की दृष्टि से गलत है और संयुक्त राष्ट्र के चार्टर और प्रस्ताव के भी खिलाफ है। पर पुतिन ने 21 फरवरी को ही अपने इस कदम की सफाई देते हुए कहा कि ‘रूस शुरुआत से जंग नहीं चाहता था। मारको ने तमाम कूटनीतिक प्रयास किए और नाटो के साथ शांति वार्ता का प्रस्ताव दिया, लेकिन नाटो और अमेरिका ने इन्हें मंजूर नहीं होने दिया।’ इस घोषणा से रूस ने अमेरिका, यूरोप और दुनिया को यह भी संकेत दे दिया कि अगर अमेरिका और यूरोप खुले तौर पर यूक्रेन का समर्थन करते रहेंगे या युद्ध में हिस्सेदारी करेंगे, तो अब रूस परमाणु हथियारों का प्रयोग करने के लिए स्वतंत्र है। इस लेकर स्वाभाविक ही दुनिया भर में चिंता पैदा हो गई है। किसी भी स्थिति में परमाणु हथियारों का इस्तेमाल पूरी मानवता के लिए विनाशकारी साबित होगा।
यह आश्चर्य की बात है कि रूस की इस घोषणा के बाद संयुक्त राष्ट्र ने युद्ध रोकने का कोई स्पष्ट निर्देश नहीं दिया। इतना अवश्य हुआ कि संयुक्त राष्ट्र में रूस की सेनाओं की यूक्रेन से वापसी का प्रस्ताव रख गया उस प्रस्ताव पर लगभग एक सौ बयालीस देशों ने अपना समर्थन व्यक्त किया कि रूसी सेनाओं को यूक्रेन से वापस बुलाया जाना चाहिए। मगर यह आश्चर्यजनक है कि भारत ने उस प्रस्ताव पर मतदान से अलग रहने का निर्णय किया। यह एक प्रकार से विश्व जनमत से अलग होना है। इसकी प्रतिक्रिया विश्व में सरकारी स्तर पर कितनी हुई, इसका आकलन करना अभी कठिन है। क्योंकि ऐसे फैसले सरकारें अमूमन अपने हितों को ध्यान में रख कर लिया करती हैं, पर विश्व जनमत में अवश्य इसकी प्रतिक्रिया भारत के खिलाफ हुई है। अब दुनिया का आम इंसान युद्ध नहीं चाहता और अपनी आजादी को कायम रखना चाहता है दुनिया में अब ताकतवर बनने के लिए अपनी अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाना ही सही रणनीति मानी जाती है। हथियारों की होड़ वेशक देखी जाती है, पर उनका इस्तेमाल किसी भी देश की ताकत को बढ़ाने के बजाय कुछ कम ही कर देता है।
मगर रूस शायद अब भी हथियारों के बल पर ही अपनी ताकत दिखाने का पक्षधर है। रूस में व्लादिमीर पुतिन द्वारा संविधान संशोधन कर 2035 तक राष्ट्रपति बने रहने का प्रस्ताव एक प्रकार से लगभग आजीवन इस पद पर बने रहने का प्रस्ताव है और चूंकि रूसी व्यवस्था एक अर्थ में सैन्य नियंत्रित व्यवस्था है. इसलिए जनमत का असंतोष वा विरोध सार्वजनिक रूप से उजागर नहीं हो पाता। दूसरे, रूसी समाज के मन में छिपा राष्ट्रवाद भी पुतिन का मानसिक रूप से सहायक है, क्योंकि आम रूसी पुराने वूएससआर के (व्यापक रूस) पुराने स्वरूप को पुनः हासिल करना चाहता है जो देश रूस से बिखराव के बाद अलग हुए उन्हें किसी भी तरह या बल प्रयोग द्वारा रूस में वापस मिलाने के प्रति उनकी मूक सहमति है, इसलिए भले यूरोप या अमेरिका नियंत्रित मीडिया कितना भी प्रचार करे, अभी तक रूस में पुतिन के खिलाफ कोई सशक्त आवाज नहीं उठ पाई है।
चीन ने भी रूस का समर्थन किया है। दरअसल, इन दोनों देशों में कई तरह की समानताएं हैं। जिस प्रकार रूस अपने अलग हुए धड़ों को मिलाना चाहता है, उसी प्रकार चीन भी अपने पड़ोसी देशों के संबंध में वही कर रहा है। उसने तिब्बत को हड़प लिया, हांगकांग पर कब्जा किया, ताईचान आदि कई देश उसके निशाने पर हैं। यानी एक अर्थ में अलग-अलग क्षेत्रों में रूस और चीन का एक ही एजेंडा है पर भारत को इस विश्व जनमत के अलगाव से क्या भौतिक या नैतिक लाभ होगा, यह कहना कठिन है। माना कि रूस भारत को बड़ी मात्रा में और कम दरों पर गैस उपलब्ध करा रहा है, पर अपने स्वार्थ के लिए इस इक्कीसवीं सदी में किसी देश की आजादी को बलात छिनते देखना द्रोपदी के चीर हरण और भीष्म पितामह की मूक दर्शक जैसी वैश्विक पुनरावृत्ति है।
इसी बीच विदेशमंत्री एस जयशंकर ने यह कह कर कि चीन की अर्थव्यवस्था भारत से कई गुना बड़ी है, इसलिए चीन से लड़ना संभव नहीं है, चीनी शासकों के मनोबल को और बढ़ा दिया है। भारतीय सेना में निराशा का वातावरण पैदा हुआ है। यह एक प्रकार से भारत की सीमाओं पर चीन द्वारा 1962 के बाद किए गए कब्जे को वापस लेने के संकल्प से पीछे हटना है। एक राष्ट्र के विदेशमंत्री के नाते उनका यह बयान अपरिपक्क और कूटनीति के खिलाफ माना जा रहा है। एस जयशंकर की छवि पिछले दिनों एक बेवाक मंत्री के रूप में सामने आई थी, जब उन्होंने यूरोप और अमेरिका को स्पष्ट शब्दों में उत्तर देकर आईना दिखाया था। अब उनके कथन से न केवल उनकी छवि एक कमजोर विदेशमंत्री की बनी है, बल्कि समूची सरकार ही कठघरे में खड़ी हो गई है। चीन पहले ही भार में अपनी विस्तारवादी नीति पर आगे बढ़ रहा है, इस बयान से उसे रोकना और मुश्किल होगा।
अफगानिस्तान में भी भारत तालिबान को विभिन्न प्रकार से आर्थिक मदद देकर शांति खरीद रहा है। हालांकि यह सौदा कब तक लाभकारी होगा, वह कहना कठिन है भारत सरकार के बयानों और कदमों से भारत की वैश्विक छवि अमेरिका के पिछलग्गू देश की बनी है और भारत विश्वगुरु बनने के बजाय विदेश नीति के मामले में अमेरिका का शिष्य बन रहा है। यूक्रेन में अभी तक 9100 से अधिक सैनिक मारे जा चुके हैं। ब्रिटिश रक्षा मंत्रालय का अनुमान है कि युद्ध शुरू होने के बाद से अभी तक करीब तीन लाख लोग मारे गए हैं। यूक्रेन के अधिकांश जिले, शहर रूसी हमलों में तबाह हो चुके हैं। यूक्रेन का संरचनात्मक ढांचा बहुत हद तक क्षतिग्रस्त हो चुका है। अमेरिका और यूरोप की आर्थिक सहायता से कब तक यूक्रेन लड़ता रहेगा, यह कहना कठिन है, क्योंकि अंततः नुकसान तो यूक्रेन को ही उठाना पड़ रहा है। यूक्रेन के नागरिकों की राष्ट्रीयता और बहादुरी सराहनीय है कि वे अपने नृल्क की आजादी के लिए सब कुछ कुर्बान करने को तैयार हैं।
रूस के दूसरे देशों को कब्जाने के कदमों को रोका जाना चाहिए, क्योंकि यह नहीं हुआ तो इन्हीं की पुनरावृत्ति के लिए चीन तैयार बैठा है विश्व के स्तर पर मानवता और स्वतंत्रता पीड़ित और पराजय की ओर हैं हिंसा और ताकत विजय और विस्तार की ओर हैं। रूस- यूक्रेन बुद्ध एक ऐसा बड़ा वैश्विक संकट है, जो समूची दुनिया को बुद्ध के खतरों में ढकेल सकता है। भारत और सारी दुनिया को इस पर गहन चिंतन-मनन करना चाहिए, वरना इक्कीसवीं सदी दुनिया के नए राजाओं की मिल्कियत जैसी बन जाएगी। विश्व पूंजीवाद के बाद यह विश्व सामंतवाद का रूपांतरण दुनिया में लोकतंत्रात्मक व्यवस्था को ही विफल सिद्ध कर सकता है।
Date:17-03-23
राज्यपाल की गरिमासंपादकीय
किसी राज्य में सत्ताधारी पार्टी में असंतोष का अभिप्राय यह नहीं होता कि राज्यपाल सरकार को सदन में बहुमत साबित करने के लिए कह दे । यह कार्यविधि खतरनाक हो सकती है। महाराष्ट्र के मामले में की गई सुप्रीम कोर्ट की तल्ख टिप्पणी ने इस बात को बिलकुल स्पष्ट कर दिया है। उच्चतम न्यायालय बुधवार को साफ कहा कि सत्तारूढ़ दल में विधायकों के बीच केवल मतभेद के आधार पर बहुमत साबित करने को कहने से एक निर्वाचित सरकार पदच्युत हो सकती है। राज्य का राज्यपाल अपने कार्यालय का इस्तेमाल इस नतीजे के लिए नहीं होने दे सकता। प्रधान न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ ने कहा, ऐसा करना लोकतंत्र के लिए शर्मनाक तमाशा होगा। संविधान पीठ ने पिछले साल महाराष्ट्र में अविभाजित शिवसेना में एकनाथ शिंदे के नेतृत्व में हुई बगावत के बाद जून, 2022 में महाराष्ट्र में पैदा हुए राजनीतिक संकट को लेकर दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान महाराष्ट्र के राज्यपाल की ओर से सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता के उपस्थित होने के बाद यह सख्त टिप्पणी की। मेहता के मुताबिक उस समय राज्यपाल के पास कई सामग्री थीं, जिनमें शिवसेना के 34 विधायकों के हस्ताक्षर वाला पत्र और निर्दलीय विधायकों का तत्कालीन मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे नीत सरकार से समर्थन वापस लेने का पत्र शामिल थे। इसके अलावा नेता प्रतिपक्ष सदन में बहुमत साबित करने की मांग कर रहे थे। पीठ के अनुसार नेता प्रतिपक्ष का पत्र मायने नहीं रखता क्योंकि वह हमेशा कहेंगे कि सरकार ने बहुमत खो दिया है, या विधायक नाराज हैं। इस मामले में विधायकों द्वारा जान को खतरा बताए जाने वाले पत्र भी प्रासंगिक नहीं है। हालांकि तत्कालीन राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी ने तब ठाकरे को सदन में बहुमत साबित करने को कहा था। हालांकि, ठाकरे ने सदन में बहुमत प्रस्ताव पर मतदान होने से पहले ही इस्तीफा दे दिया था जिससे शिंदे के नये मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ लेने का रास्ता साफ हो गया था। पार्टी के विधायकों के बीच मतभेद का आधार कुछ भी हो सकता है, लेकिन क्या यह सदन में बहुमत साबित करने को कहने के लिए पर्याप्त आधार हो सकता है? बिलकुल नहीं ऐसे घटनाक्रम से राज्यपालों के कार्यकलाप पर सवाल उठते हैं, और पद की गरिमा भी गिरती है।
Date:17-03-23
हिन्दुस्तानी शहर आखिर इतने प्रदूषित क्यों हैंविवेक चट्टोपाध्याय, ( शोधकर्ता, सीएसई )
यह बेहद चिंताजनक तथ्य है कि दुनिया के 15 प्रदूषित शहरों में से 12 भारत के हैं। स्विस कंपनी आईक्यूएयर ने मंगलवार को ‘वर्ल्ड एयर क्वालिटी रिपोर्ट’ जारी की, जिसमें कहा गया है कि भारत साल 2022 में दुनिया का आठवां सबसे प्रदूषित देश रहा। ताजा आंकड़ों के अनुसार, सबसे प्रदूषित भारतीय शहरों का पीएम2.5 स्तर 53.3 है। दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों की रैंकिंग में दो भारतीय शहर टॉप पर हैं। पहले स्थान पर दिल्ली के पास स्थित भिवाड़ी है और दूसरे पर खुद दिल्ली है।
प्रदूषित शहरों की सूची जब भी जारी होती है, भारतीय शहरों का उसमें होना अब एक आम बात है। अब यह सूचना चौंकाती नहीं है। अंतरराष्ट्रीय दिशा-निर्देशों या पैमानों के हिसाब से देखें, तो वाकई हमारे शहरों में ज्यादा प्रदूषण है। हमारे पैमाने थोडे़ कमजोर हैं, लेकिन हम अपने मानकों पर भी प्रदूषित हैं। समय-समय पर दिशा-निर्देश जारी होते रहते हैं कि पीएम2.5 का क्या स्तर होना चाहिए और हमारे शहरों में इसका स्तर ज्यादा पाया जाता है। अब तो स्थिति ऐसी हो गई है कि हमें शहरों में ही नहीं, बल्कि उनके आसपास के इलाकों, यहां तक कि गांव के स्तर पर भी कदम उठाने की जरूरत है। अभी तक प्रदूषण को कम करने के प्रयास शहरों तक ही सीमित हैं, जबकि शहरों के अलावा भी बडे़ इलाके प्रदूषण से पीड़ित हो रहे हैं। प्रदूषण कम करने की योजनाएं अब केवल शहर केंद्रित न रहें, उनका दायरा बढ़ाना पडे़गा। ‘ग्रीन ट्रिब्यूनल’ ने आदेश दिया था कि राज्य स्तर पर एक्शन प्लान बनाए जाएं, मगर अनेक राज्यों में यह अब तक नहीं बना या बनाया जा रहा है। सारे सूबों का एक्शन प्लान बन जाए, उसके बाद जिम्मेदारी तय होनी चाहिए। हर राज्य अपनी-अपनी स्थिति को देखते हुए तय करे कि प्रदूषण को कब तक कितना कम कर देना है।
अभी प्रदूषण घटाने का जो राष्ट्रीय कार्यक्रम है, वह पीएम पार्टिकल्स पर केंद्रित है। इसमें ओजोन, नाइट्रोजन व अन्य प्रदूषक तत्वों को भी लाया जाना चाहिए। प्रदूषण निगरानी का दायरा बढ़ना चाहिए। योजना बना देना या दिशा-निर्देश जारी कर देना काफी नहीं है, जमीनी स्तर पर कार्यों की निगरानी करनी पड़ेगी। केवल कुछ लोगों को जिम्मेदारी दे देने से कुछ नहीं होगा, ऊपर से दबाव बहुत जरूरी है, ताकि सही काम हो।
स्वच्छता सर्वेक्षण हर साल होता है, इसके साथ ही प्रदूषण निवारण योजनाओं और किसने प्रदूषण घटाने के लिए कितना काम किया, इसका भी सर्वेक्षण होना चाहिए। लोगों के सामने आना चाहिए कि किस शहर में प्रदूषण घटाने के लिए क्या किया गया और उसमें कितनी कामयाबी मिली। अगर किसी शहर में लगातार नाकामी हासिल हो रही है, तो वह भी सबके सामने आनी चाहिए। शहरों को एक-दूसरे से प्रदूषण घटाना सीखना होगा। यह भी जरूरी है कि प्रदूषण के मामले में रैंकिंग बनाते वक्त सिर्फ सरकार फैसले न करे, इसमें तीसरे पक्ष और मीडिया को भी शामिल करना चाहिए। प्रदूषण घटाने की निगरानी में शोधकर्ताओं व छात्रों को भी शामिल किया जाए।
प्रदूषण दूर करने और योजना बनाने में इसलिए भी दिक्कत आ रही है, क्योंकि इस काम में चार-पांच विभाग शामिल रहते हैं। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड को जिम्मेदारी दी गई है, पर इस काम में अधिक विभागों की भागीदारी होने के चलते मुश्किल आ रही है। दिल्ली की ही बात करें, तो कूड़े के पहाड़ हट नहीं रहे हैं। ऐसे में, यह देखना चाहिए कि क्या सरकारों या विभिन्न विभागों के बीच पर्याप्त समन्वय है? सफाई का काम मौसमी नहीं है, यह काम साल भर समान रूप से चलना चाहिए, तभी नतीजे दिखेंगे। निरंतर काम और लगातार निगरानी से ही हवा सांस लेने लायक हो सकती है।
शहरों में प्रदूषण के बड़े स्रोतों का पता लगाना पड़ेगा और उन पर ज्यादा ध्यान देना होगा। ऐसा नहीं है कि सुधार के लिए कुछ नहीं किया जा रहा है। हां, प्रदूषण ज्यादा बढ़ जाने पर रोकथाम के उपाय बडे़ शहरों में ही ज्यादा देखे जाते हैं। लोग भी जागरूक हुए हैं, पर इसमें सबकी भागीदारी जरूरी है। भारत में चार हजार से ज्यादा शहर हैं, पर ज्यादातर शहरों में प्रदूषण की निगरानी नहीं हो रही है। शहरों में प्रदूषण, गंदगी कम करने के लिए लोगों को जागरूक होना पड़ेगा और अंतत: इसे राजनीतिक स्तर पर प्रभावी मुद्दा बनाना पड़ेगा।
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हाल ही में पश्चिम बंगाल में एडेनोवायरस के तेजी से फैलने के समाचार आ रहे हैं। पिछले कुछ समय से जूनोटिक रोगों यानि पशुओं से इंसानों में फैलने वाले रोगों के मामले बढ़ते जा रहे हैं। इस प्रकार के रोग बैक्टीरिया, वायरस, पैरासाइट और फंगाई के कारण होते है।
कुछ बिंदु –
व्यापक मोर्चे पर, केंद्र और राज्य सरकारों को स्थानीय अधिकारियों के साथ मिलकर, मानवीय और भौतिक बुनियादी ढांचे को विकसित करने के लिए एक रोडमैप विकसित करना चाहिए। स्वच्छ आवास, सुव्यवस्थित अपशिष्ट और कचरा प्रबंधन होना चाहिए। वेक्टर रोगों (जो मच्छरए मक्खी आदि से फैलते हैं) के प्रति जागरूकता अभियान चलाया जाना चाहिए। इस प्रकार, स्वास्थ्य सेवा तंत्र को प्राथमिकता देकर मानव स्वास्थ्य को बेहतर रखा जा सकता है।
‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 28 फरवरी, 2023
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Date:16-03-23
कहीं विकास की यह गलत दिशा तो नहीं है ?संपादकीय
जिस दिन दक्षिण भारत के चुनाव वाले एक राज्य में एक राजमार्ग का उद्घाटन कर उसे विकास का नया आयाम बताया जा रहा था, उसी दिन देश की राजधानी दिल्ली के पॉश इलाके से सटी झुग्गी बस्ती में सात व पांच वर्ष के दो सगे भाइयों को दो दिन के बीच आवारा कुत्तों ने हमले में नोचकर मार दिया। इस घटना पर दिल्ली की सभी स्थानीय इकाइयों जैसे नगर महापालिका और प्रशासन को सतर्क होना चाहिए था, लेकिन शायद गरीब का बच्चा उन्हें एक्शन में लाने के लिए पर्याप्त कारण नहीं बन पाया। दिल्ली नगर निगम पर ‘आप’ का कब्जा है और पुलिस प्रशासन केंद्र सरकार के अधीन है। राजनीतिक वर्ग इस बात पर विवाद करता रहा कि विदेश जाकर सरकार की बुराई करना देश का अपमान है या नहीं। वह यह भूल गया कि सोशल मीडिया के जरिए पूरी दुनिया यह जानेगी कि वैश्विक जीडीपी में पांचवें स्थान पर गर्व से खड़े भारत की राजधानी में रहने वाले गरीब के बच्चे शौच के लिए आज भी पास के जंगल में जाते हैं और वहां आवारा कुत्तों का शिकार बनते हैं। चिंता इस बात पर है कि देश की औसत प्रति व्यक्ति आय से पांच गुना आय वाले इस शहर के संभ्रांतीय चरित्र वाले लोग इन बच्चों की मौत पर सड़कों पर नहीं आए। ना ही श्रद्धांजलि के रूप में इंडिया गेट पर दिए जलाए। उधर पुलिस ने कहा है कि उसने नगर निगम को कुत्ते पकड़ने की सूचना दे दी है। जांच जारी है।
Date:16-03-23
बंदूक के विरुद्धसंपादकीय
अमेरिका में आए दिन ऐसी खबरें आती रहती हैं कि किसी सिरफिरे ने अपनी बंदूक से कहीं स्कूल में तो कभी बाजार में अंधाधुंध गोलीबारी शुरू कर दी और उसमें नाहक ही लोग मारे गए। प्रथम दृष्टया यह कोई आपराधिक या आतंकवादी घटना की तरह लगती है, जिसमें सुनियोजित तरीके से ऐसी वारदात को अंजाम दिया जाता है। कई मामलों में ऐसा संभव भी है। लेकिन इसके पीछे एक बड़ा कारण वहां आम लोगों के लिए हर तरह के बंदूकों की सहज उपलब्धता है। कोई घातक हथियार साथ में होने के बाद मामूली बातों पर होने वाले झगड़े या फिर बेवजह ही किसी के उन्माद से ग्रस्त हो जाने पर कैसे नतीजे सामने आ सकते हैं, अमेरिका ने उसे करीब से देखा है, जहां हर साल सैकड़ों लोग इसकी वजह से मारे जाते हैं। किसी भी संवेदनशील समाज को इस स्थिति को एक गंभीर समस्या के रूप में देखना-समझना चाहिए। यह बेवजह नहीं है कि जिस अमेरिका में ज्यादातर परिवारों के पास अलग-अलग तरह की बंदूकें रही हैं, वहां अब इस हथियार की संस्कृति के खिलाफ आवाजें उठनी शुरू हो गई हैं।
इसी के मद्देनजर अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन ने मंगलवार को बंदूक के दुरुपयोग पर अंकुश लगाने से संबंधित एक नए कार्यकारी आदेश पर हस्ताक्षर कर दिए। इसके तहत बंदूक की बिक्री के दौरान की जाने वाली ‘पृष्ठभूमि जांच’ को बेहतर बनाया जाएगा। इसके जरिए बाइडेन ने मंत्रिमंडल को बंदूक हिंसा से जूझ रहे समुदायों के समर्थन के लिए एक बेहतर सरकारी तंत्र बनाने का निर्देश दिया है। यह छिपा नहीं है कि बिना किसी वजह के की गई गोलीबारी में किसी प्रियजन को गंवाने वालों को किस तरह के मानसिक आघात और अन्य मुश्किलों से जूझना पड़ता है। अब नए आदेश के तहत शोक और आघात का सामना करने वाले लोगों को अधिक मानसिक स्वास्थ्य सहायता, पीड़ितों और लंबी पुलिस जांच प्रक्रिया के दौरान बंद होने वाले कारोबारों को वित्तीय मदद भी मुहैया कराने का प्रावधान किया गया है। लेकिन सबसे ज्यादा जरूरत बंदूकों की निर्बाध बिक्री करने वाले और उसके खरीदारों पर अंकुश लगाने की थी। अब संघीय लाइसेंस प्राप्त बंदूक कारोबारियों के लिए नियम बनाने का निर्देश गया है, जिसके तहत डीलरों की पृष्ठभूमि की जांच जरूरी होगी।
दरअसल, मामूली बातों पर आवेश में आकर बंदूक चला देने के पीछे हाथ में हथियार होने से जुड़ा मनोविज्ञान काम करता है। यों भी हिंसा के स्वरूप में ज्यादा विकृति और क्रूरता हथियारों की सुलभता पर निर्भर है। हत्या की ऐसी घटनाएं आमतौर पर इसलिए होती हैं कि गुस्से या अपनी कुंठाओं पर काबू नहीं रख पाने वाले किसी उन्मादी व्यक्ति के पास गुस्से में होने के वक्त बंदूक उपलब्ध थी। ऐसे मामले आम हैं, जिनमें आपसी वाद-विवाद में आक्रोश और उत्तेजना के चरम पर पहुंच जाने के बाद भी दो लोगों या पक्षों में सुलह हो जाती है, क्योंकि उनके पास तकरार के वक्त हथियार नहीं रहा होता है। अब अमेरिका में हुई ताजा कवायद की अहमियत यह भी है कि लंबे समय से बंदूकों की सहज उपलब्धता का खमियाजा उठाने के बाद वहां के लोगों ने अपने स्तर पर भी इसके खिलाफ मोर्चा खोलना शुरू कर दिया है और वहां जनता के एक बड़े हिस्से के बीच आक्रोश काफी बढ़ गया है। पिछले साल जून में भारी तादाद में लोगों ने सड़कों पर उतर कर बंदूकों की खरीद-बिक्री से संबंधित कानून को बदलने की मांग की। जरूरत इस बात की है कि इस समस्या के पीड़ितों को राहत देने के साथ-साथ बंदूकों के खरीदार से लेकर इसके निर्माताओं और बेचने वालों पर भी सख्त कानून के दायरे में लाया जाए।
Date:16-03-23
एक अलग तरह के विवाह की मांगआनंद कुमार, ( समाजशास्त्री )
समलैंगिक विवाह को लेकर भारत ही नहीं, दुनिया भर में बड़ी बहस चल रही है। दरअसल, मानव जीवन में विवाह नामक संस्था का केंद्रीय स्थान है और इसे वयस्क जीवन में मर्यादा स्थापित करने वाली व्यवस्था माना जाता है। चूंकि हर धर्म में इस संस्था को बड़ी सावधानी से संजोया गया है, इसलिए विभिन्न परंपराओं में परिवर्तन संभव होने के बावजूद विवाह से जुड़ी मान्यताओं और परंपराओं में फेरबदल शायद बदलाव की आखिरी सीमा होती है। इसकी वजह यह भी है कि विवाह की व्यवस्था को मानव समाज की लगभग तमाम संस्कृतियों में परिवार और प्रजनन, यानी नई पीढ़ी के निर्माण से जोड़कर देखा गया है।
समलैंगिक विवाह में निस्संदेह संतान उत्पत्ति की भूमिका समाप्त हो जाती है, लेकिन विवाह का एक अन्य पक्ष है, स्नेह की डोर। ऐसे कई उदाहरण हैं, जिनमें बिना पूर्व जान-पहचान के शादी होती है, पर वे इसलिए असफल नहीं मानी जातीं, क्योंकि उनमें स्त्री और पुरुष मिलकर संतान को जन्म देते हैं, नई पीढ़ी का निर्माण करते हैं। इसी कारण समलैंगिक विवाह के समर्थकों को विवाह से जुड़ी पारंपरिक दृष्टि से लड़ना पड़ रहा है कि जिस विवाह में संतान के जन्म की गुंजाइश न हो, वह भला कैसे निभेगा? इसके जवाब में समलैंगिक विवाह के समर्थक सिर्फ स्नेह या प्रेम पक्ष की ओर इशारा कर पाते हैं।
फिलहाल, दुनिया भर में पश्चिमीकरण की हवा चल रही है और अमेरिका से लेकर जर्मनी व फ्रांस तक में समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता मिल चुकी है। ऐसे में, भारतीय समाज में पश्चिमीकरण से प्रभावित लोगों के बीच समलैंगिक विवाह के पक्ष में माहौल बनाना मुश्किल नहीं होगा, लेकिन इसे पूरे समाज की मंजूरी दिलाने के लिए सिर्फ कानूनी व्यवस्था पर्याप्त नहीं होगी, इसीलिए समलैंगिक विवाह को लेकर जो सामाजिक चिंतन है, उस पर समाजशा्त्रिरयों की निगाह दोनों पक्षों पर है। देखा जाए, तो समलैंगिक विवाह को व्यक्तिगत जीवन के अधिकार क्षेत्र का निर्णय मानने वाले भी अनुचित नहीं कह रहे हैं। पसंद के दोस्त के साथ सहजीवन की स्वतंत्रता भी व्यक्ति की स्वतंत्रता में निहित है। ऐसा भी नहीं कि हमारे समाज में समलैंगिक नहीं रहे हैं, पर मित्रता का निर्वाह करने वाले दो स्त्री या दो पुरुष को समाज में सम्मानजनक जोड़ा नहीं माना जाता। यह एक चुप्पी का क्षेत्र रहा है।
वैसे यह बात छिपी नहीं है कि अब तक भारतीय समाज को अनेक बार विवाह संस्था की समीक्षा की जरूरत महसूस हुई है। जब देश पर ब्रिटिश सरकार काबिज थी, तब उसके दो बड़े दोष सामने आए थे, जिस पर समाज सुधारकों और परंपरावादियों के बीच खुली बहस भी हुई थी। एक था बाल विवाह का चलन, जिसके खिलाफ अंग्रेजी राज की मदद से समाज सुधारकों ने जब कानून बनवाए, तब तमाम पारंपरिक संस्थानों व प्रतिष्ठानों की तरफ से प्रखर विरोध के स्वर उठे। उनका तर्क था कि इससे उनकी संस्कृति नष्ट हो जाएगी, लेकिन धीरे-धीरे हमने बाल विवाह को एक अनुचित परंपरा के रूप में देखना शुरू कर दिया। इसके खिलाफ अब सामान्य जनमत बन चुका है। इसी तरह, विधवा विवाह को लेकर भी बगावत जैसी परिस्थितियां बनीं। शुरू-शुरू में तो ऐसी शादियों में विधवाओं पर लांछन तक लगाए गए। मगर बाद में यह भी परंपराविरोधी और क्रांतिकारी काम माना गया। हालांकि, इन दोनों के अलावा पिछले 100 साल में विवाह संस्था में कुछ अन्य बदलाव भी हुए, जैसे- तलाक (विशेषकर हिंदुओं में इसे लेकर बहुत विवाद था) और तलाकशुदा स्त्री या पुरुष का विवाह। समाजशा्त्रिरयों का मानना है कि ऐसा ही बदलाव समलैंगिक विवाह को लेकर भी मुमकिन है, पर समाज की स्वीकृति पाने के लिए अभी धैर्य रखना पड़ेगा, अच्छे तथ्यों व अकाट्य तर्कों की जरूरत पडे़गी।
यह कोई छिपा रहस्य नहीं है कि समाज का एक उल्लेखनीय हिस्सा ऐसे संबंधों को जीता है, अब यह गैर-कानूनी भी नहीं है, पर अभी ऐसे लोगों को सम्मान की नजर से नहीं देखा जाता है। इसीलिए समलैंगिक विवाह को मंजूरी एक बड़ा बदलाव होगा और इस बदलाव को सहज बनाना इसके समर्थकों की बड़ी जिम्मेदारी होगी। अगर वे आक्रामक हुए और उन्होंने प्रगतिशील व परंपरावादी जैसा वर्गीकरण किया, तो मुश्किलें पेश आएंगी। रही बात परंपरा के पक्षधरों की, तो समाजशा्त्रिरयों का अनुमान है कि वे धीरे-धीरे बदलाव के लिए तैयार हो जाएंगे, ऐसा पहले हुआ है।
आज पश्चिमी दुनिया में समलैंगिक विवाह को मान्यता मिल चुकी है। हालांकि, इसमें भी 30-40 वर्षों का वक्त लगा। इसका चर्च ने विरोध किया, परिवार बचाओ आंदोलन खड़े किए गए और तमाम सांस्कृतिक व सामाजिक तर्क परोसे गए, पर आहिस्ता-आहिस्ता समलैंगिकता में रुझान रखने वाले लोगों ने कानून व राज-सत्ता को अपने पक्ष में कर लिया। भारत में यह प्रक्रिया तुलनात्मक रूप से धीरे-धीरे चली है। हमने हाल-फिलहाल ही समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर निकाला है। जाहिर है, भारतीय समाज के समाज वैज्ञानिक विश्लेषण में समलैंगिकता कोई नई परिघटना नहीं है, पर समलैंगिक विवाह एक नए प्रकार का प्रबंध होगा, जिसे स्वीकार करने में कम से कम एक पीढ़ी का वक्त लग जाएगा। फैसला सुप्रीम कोर्ट की पांच सदस्यीय संविधान पीठ को लेना है और फैसला आसान नहीं है।
समाज की रचना के लिए जिन बुनियादी संस्थाओं की व्यवस्था की गई है, उनमें यौन या वयस्क जीवन के लिए विवाह और परिवार नामक दो संस्थाएं बुनियाद हैं। इन संस्थाओं में धर्म, वर्ग, क्षेत्र आदि के आधार पर विविधता तो है, पर एक ही प्रकार के लोगों का परस्पर विवाह नई बात होगी, क्योंकि परिवारों या विवाहों में समलैंगिकता वाला पक्ष कहीं सामने नहीं आया है। हालांकि, एक ही परिवार में विवाह की परंपरा दिखती है। जैसे, मिस्र के राजपरिवार में शुद्धता के नाम पर भाई व बहन की शादी होती थी, पर बाद में यह भी त्याज्य हो गया। ऐसे में, भारत का कानून यदि समलैंगिक विवाह को मान्यता देता है, तो समाजशास्त्रीय अध्ययन में समलैंगिक जोड़ों के विवाह या परिवार का नया अध्याय जुड़ेगा। समलैंगिक संबंध का नैतिक और ऐतिहासिक आधार पर पक्ष-विपक्ष स्पष्ट है, पर दुनिया में ऐसा कोई समाज नहीं दिखा है, जहां समलैंगिकता मुख्य प्रवृत्ति रही हो। हमारा समाज स्त्री-पुरुष संबंध की बुनियाद पर ही टिका है।
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दुनिया भर में स्वच्छ ऊर्जा को बढ़ावा देने और जीवाश्म ऊर्जा की खपत को कम करने के उद्देश्य से कार्बन ट्रेडिंग की जाती है। यह सब कार्बन बाजार के माध्यम से किया जाता है। पहले कार्बन बाजार और कार्बन ट्रेडिंग को कुछ बिंदुओं में समझते हैं –
कार्बन बाजार और कार्बन ट्रेडिंग –
कार्बन डाइ ऑक्साइड के उत्सर्जन में कमी को बढ़ावा देने के लिए एक ऐसा तंत्र विकसित किया गया है, जो इन गैसों के उत्सर्जन को नियंत्रित करने पर काम करे। इसे प्रभावी बनाने के लिए इसे मुद्रा से जोड़ दिया गया है।
कार्बन ट्रेडिंग का सीधा मतलब है- कार्बन डाइ ऑक्साइड का व्यापार। क्योटो प्रोटोकाल में प्रदूषण कम करने के लिए दो तरीके सुझाए गए थे। प्रदूषण में कमी को कार्बन क्रेडिट की यूनिट में नापा जाना था।
पहले तरीके में विकसित देशों को ऐसी तकनीकें विकसित करने पर निवेश करना था, जो औद्योगिक गतिविधियों को कम प्रदूषण पर संपन्न कर सकें। दूसरे, विकसित देश की कंपनियां अगर खुद से प्रदुषण में कमी न कर सकें, तो वे विकासशील देशों से कार्बन क्रेडिट खरीद लें।
इस व्यापार में प्रत्येक देश या उसके अंदर मौजूद विभिन्न सेक्टर को एक निश्चित मात्रा में कार्बन उत्सर्जन करने की सीमा दी जाती है। यदि किसी देश ने अपनी निर्धारित सीमा का कार्बन उत्सर्जित कर लिया है, फिर भी वह उत्पादन जारी रखना चाहता है, तो वह ऐसे किसी देश से कार्बन खरीद सकता है, जिनका कार्बन उत्सर्जन निर्धारित सीमा से कम रहा हो।
हर देश को कार्बन उत्सर्जन की सीमा का आवंटन यूनाइटेड नेशन्स फ्रेमवर्क कनवेंशन ऑन क्लाइमेट चेंज (यूएनएफसीसीसी) द्वारा किया जाता है।
भारत की नीतियां –
भारत ने ऊर्जा संरक्षण अधिनियम, 2022 पारित किया है। इस वर्ष के अंत तक इस मामले में वह और भी बारीकियों को स्पष्ट करने की नीति बना रहा है।
कार्बन उत्सर्जन में कमी के लिए भारत लगातार प्रतिबद्ध रहा है। इसके चलते उसको निर्धारित उत्सर्जन सीमा से काफी कम उत्सर्जन का लाभ मिल सकता है। 2030 तक उत्सर्जन को और भी कम करने का लक्ष्य रखा गया है।
इस हेतु भारत ने परफॉर्म, अचीव एण्ड ट्रेड ( पीएटी ) योजना शुरू की है। इसमें 1000 से अधिक उद्योगों को एनर्जी सेविंग सर्टिफिकेट की खरीद और ट्रेडिंग करनी है।
2015 से पीएटी चक्र से उत्सर्जन में 3.5% की कमी हुई है। क्या कार्बन ट्रेडिंग सार्थक रूप से उत्सर्जन में कमी ला सकती है?
भारतीय संदर्भों में यह एक ऐसा प्रश्न है, जिसका उत्तर दशकों बाद ही दिया जा सकता है। अगर यह घरेलू वित्त जुटाने और जीवाश्म ईंधन से दूर जाने में तेजी लाने में हमें सक्षम करता है, तो यह एक प्रकार से हमारी जीत ही होगी।
अंत में, सरकार को उद्योगों पर इस प्रकार का कुछ दबाव बनाना चाहिए कि वे कार्बन बाजार में भाग लें। अगर भारत चाहे, तो खाली पड़ी 15 लाख हेक्टेयर भूमि पर पेड़ लगाकर अच्छी कमाई कर सकता है।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 23 फरवरी, 2023
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Date:15-03-23
Something Brewing?Three bank collapes in the US are a matter of global concern. Indian policymakers should keep close watch.TOI Editorials
It was a crisis foretold. A week ago, all was well in the US financial system. Since then, three banks have collapsed, with Silicon Valley Bank being the most consequential one. American regulators, aware of the gravity of the situation, have invoked “exception” clauses in their play book to insure deposits that weren’t earlier covered. Their hope is that it will tamp down on the panic and prevent a contagion. Given the size and influence of the US financial system, all regulators must harbour the same hopes.
Two Indian reports warned of the risks. In December 2022, RBI’s bi-annual financial stability report flagged it. Next month, the Economic Survey highlighted the risks of financial contagion. Step back and look at the context. Last year, the world witnessed the most synchronised monetary tightening in 50 years by way of interest rate increases. The tightening also happened to be faster than commonly seen in earlier episodes. It took place on the heels of a build-up of private debt when interest rates were low, and a surge in inflation in 2022. In short, it was the recipe for a perfect storm as these conditions make it more likely that poor investment decisions will be caught out.
On the face of it, India is not vulnerable. In the second quarter of 2022, the average core debt of the non-financial sector for the world was 248% of GDP. In the case of India, it was 170% of GDP, with only government debt at 82% close to the global average of 88%. But it would be unwise to drop one’s guard based on historical data. For example, IMF had pointed out that 2022 was a year in which many debt ratios improved globally. It was mainly because nominal GDP grew fast following a surge in inflation.
Moreover, one of the lessons of 2008 is that there are often invisible links between the balance sheets of tightly regulated entities and others operating in a lax environment. The convulsions in the Indian money market in 2008 took policymakers by surprise. Since the heightened risk to financial stability in the backdrop of increasing rates is a phenomenon backed by considerable evidence, it’s important for India’s policymakers to be prepared. Financial markets are increasingly interconnected and it’s hard for any country, let alone a large emerging market like India, to decouple from the world.
Date:15-03-23
Inertia, interventionLegislative inaction on social issues will legitimise judicial intervention.Editorial
The Supreme Court’s decision to refer to a Constitution Bench the issue of granting legal recognition to same-sex marriages can be seen as an important step towards ensuring gender equality, despite apprehension that it is encroaching on the legislative domain. Petitioners before the Court view the idea of giving of legal status for marriages between people belonging to the same sex as a natural consequence of the 2018 judgment decriminalising homosexuality. The government, however, contends that there is no need to depart from the heteronormative understanding of marriage. And even if there ought to be such a change, it must come from the legislature. The question before the Court is whether it should interpret provisions of marriage laws in India, especially the Special Marriage Act, 1954, as permitting marital unions between same-sex couples. The Act allows the solemnisation of a marriage between any two persons and is used by those who are unable to register their marriages under their respective personal laws. The Union government has argued that the decriminalisation of consensual relations between adults of the same sex has removed the stigma attached to homosexuality, but has not conferred the right of marriage. And that the state is entitled to limit its recognition to marriages involving heterosexual couples. There is no discrimination, it claims, in keeping same-sex couples out of the definition of marriage.
In terms of the equality norm, the central question is not very complicated. It can be recognised that no civil right available to married heterosexual couples ought to be denied to those who belong to the same gender. The incidental consequences on issues of property and succession may not pose insurmountable difficulties. The Centre’s other argument, invoking religious norms and cultural values, against recognising same-sex marriages is weak and inadequate. It is futile to argue that it will undermine faith or rock societal values. The mere fact that many people consider marriage to be a sacrament or a holy union is not enough to deny equal status to the union of people of the same sex or to undermine its essential character as a social and economic contract. Whether the remedy ought to take the form of recognition of same-sex marriages, and, if so, whether it should be through judicial intervention or legislative action, is the question. That the legislature should be involved in bringing about far-reaching changes that may impact the personal laws of all religions is indeed an acceptable proposition. A responsive government that wants to treat this as a matter of policy and not cede space to the courts would act on its own to consider the right of any two people, regardless of gender, to marry or found a family. Legislative inaction on burning social issues will legitimise and invite judicial intervention.
Date:15-03-23
किसान की खेती से आय बढ़े तभी फायदासंपादकीय
महाकवि घाघ ने पेशे का वर्गीकरण किया था, ‘उत्तम खेती, मध्यम बान, निकृष्ट चाकरी, भीख निदान’ यानी खेती, व्यापार, नौकरी और भिक्षावृत्ति को क्रमशः ऊपर से नीचे की श्रेणी में रखा था। आज की स्थिति पर गौर करें। एनएसएसओ के सिचुएशन एनालिसिस सर्वे की रिपोर्ट के अनुसार पिछले आठ वर्षों में किसानों की कुल आय खेती से लगातार घटी है, जबकि मजदूरी से बढ़ी है। सन् 2014 की सर्वे रिपोर्ट के अनुसार औसत किसान खेती से कुल आय का 48% कमाता है, जबकि मजदूरी से 32%, लेकिन सन् 2021 की रिपोर्ट में बताया गया कि उसकी आय खेती से 37% रह गई है और मजदूरी से 40 प्रतिशत । तीसरा साधन है पशु-पालन, जिससे आय इसी काल में 12% से 15% हुई। यानी कुल मिलाकर खेती लगातार लाभकर होती जा रही है और किसानों को मजबूरन अपने श्रम को बेचने का सहारा लेना पड़ रहा है। वर्ष 2020-21 में कृषि पर संसदीय स्थाई समिति की एक रिपोर्ट ने चिंता व्यक्त की कि बजट में कृषि पर खर्च के लिए जो राशि निर्धारित की गई, पिछले दस वर्षों में उससे काफी कम खर्च किया गया। उदाहरण के लिए वर्ष 2019-20 में कुल बजट राशि से 28% कम खर्च हुआ, जो आ तक के दस वर्षों में सबसे कम था। चौंकाने वाली बात यह कि इसी वर्ष फरवरी 2019 में केंद्र सरकार ने किसान सम्मान निधि के नाम पर 11 करोड़ किसानों को हर साल छह हजार रु. की आर्थिक मदद देना शुरू की। विशेषज्ञों की चिंता यह है कि बजट राशि से किसानों की कृषि और उत्पादकता में दीर्घकालीन बेहतरी होती, लेकिन आज बजट का 55% नकदी के रूप में दिया जा रहा है। यानी किसान उपरोक्त कवि को गलत ठहराता हुआ अंतिम पायदान पर याचक बन गया है।
Date:15-03-23
संस्थागत सुधारों का सही समयजीएन वाजपेयी, ( लेखक सेबी और एलआइसी के पूर्व चेयरमैन हैं )
किसी समाज में शासन की शैली ही एक राष्ट्र-राज्य के ढांचे को आकार देती है। विविधतापूर्ण समाज वाले भारत ने विदेशी दमनकारी शक्ति से स्वतंत्रता के बाद सार्वभौमिक वयस्क मताधिकार वाले प्रतिनिधिमूलक लोकतंत्र की राह चुनी। महान राजनीतिक दार्शनिक अरस्तू ने कहा था, ‘जहां तक स्वतंत्रता और समानता का प्रश्न है तो कुछ व्यक्तियों की दृष्टि में ये मुख्य रूप से लोकतंत्र में ही पाई जाती हैं और इनकी प्राप्ति तभी संभव है, जब सरकार में सभी लोगों की समान हिस्सेदारी होगी।’ संभवत: इसी पहलू से प्रभावित होकर हमारे संविधान निर्माताओं ने ‘एक व्यक्ति-एक वोट’ जैसी संकल्पना का सूत्रपात किया। वस्तुत:, भारतीय राष्ट्र राज्य समतावादी मूल्यों के तानेबाने पर बुना हुआ एक न्यायपूर्ण राज्य है। संविधान की प्रस्तावना में सभी आदर्श लोकतांत्रिक मूल्यों का समावेश भी इसकी पुष्टि करता है। नि:संदेह, संविधान निर्माताओं की इन मूल्यों में अगाध आस्था थी। संविधान सभा में अपने एक भाषण में डा. बीआर आंबेडकर ने लोगों से ‘अराजक तौर-तरीकों और नायक पूजा के परित्याग के साथ ही केवल राजनीतिक ही नहीं, अपितु सामाजिक लोकतंत्र की दिशा में कार्य करने का’ आह्वान भी किया था। ऐसे में इसकी पड़ताल आवश्यक हो जाती है कि स्वतंत्रता के 75 वर्षों में भारत ने न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व सुनिश्चित करने में कितनी प्रगति की है। स्मरण रहे कि अपेक्षित नीतिगत परिणामों की प्राप्ति के लिए प्राधिकारों और प्रतिनिधियों के साथ एक संस्थागत ढांचे के निर्माण की भी आवश्यकता होती है। प्रतिष्ठित ब्रिटिश राजनेता बेंजामिन डिजरायली ने यथार्थ ही कहा है, ‘व्यक्तियों से समुदाय का निर्माण हो सकता है, किंतु यह संस्थान ही होते हैं जो किसी राष्ट्र का निर्माण करते हैं।’ इन समतावादी मूल्यों को साकार रूप देने के लिए हमारे संविधान ने न्यायपालिका, नागरिक और पुलिस प्रशासन जैसे संस्थानों के गठन की राह दिखाई है। न्यायपालिका में चुने हुए जनप्रतिनिधि नहीं होते। उनके समक्ष जनप्रतिनिधियों की तरह हर पांच वर्ष के बाद नए जनादेश की अनिवार्यता नहीं होती। न्यायपालिका स्वतंत्र एवं अधिकारों से सशक्त है, लेकिन उसमें स्पष्ट जवाबदेही का अभाव है। उसकी स्वतंत्रता या अधिकारों में सेंध के किसी भी प्रयास का समाज की ओर से जोरदार प्रतिरोध होता है।
नागरिक प्रशासन पर जीवन की गुणवत्ता, आजीविका और अवसर उपलब्ध कराने का दारोमदार होता है। नागरिक प्रशासन के कामकाज से आम जन खिन्न हैं। ऐसा महसूस किया जाता है कि कुछ विशेष लोगों के पास अथाह संसाधनों और अवसरों तक पहुंच की सुविधा है, जबकि एक बड़े वर्ग को समानतापूर्वक व्यवहार के लिए संघर्ष करना पड़ता है। यह बात पानी, स्वच्छता, स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी सामाजिक अवसंरचनाएं सुनिश्चित करने से लेकर कामकाज और व्यावसायिक प्रशिक्षण तक पर लागू होती है। इसी प्रकार, जीवन, स्वतंत्रता एवं संपत्ति की रक्षा को लेकर आम आदमी के प्रति पुलिस प्रशासन का व्यवहार भी संतोषजनक नहीं। साधन संपन्न लोग अक्सर जघन्य अपराध करके भी बच निकलते हैं और आम आदमी को बुरे व्यवहार के साथ ही उत्पीड़न का दंश भी झेलना पड़ता है। न्यायिक तंत्र द्वारा न्याय देने में देरी होती है। अंतिम फैसला आने में वर्षों बीत जाते हैं। ‘न्याय में देरी अन्याय के समान है’ वाली कहावत भारत में अधिकांश अदालती मामलों पर सटीक बैठती है। न्याय प्रक्रिया में विलंब वित्तीय रूप से भी बहुत महंगा पड़ता है, क्योंकि आर्थिक रूप से कमजोर लोगों के लिए उसका व्यय वहन करना आसान नहीं। संस्थागत ढांचे की कमियां तमाम तरह की गड़बड़ियों और भ्रष्टाचार के लिए द्वार खोलती हैं। तंत्र में पारदर्शिता एवं जवाबदेही के अभाव के साथ-साथ अनुचित आचरण का बोलबाला है। इन संस्थानों के परिचालन का व्यापक विश्लेषण दो मूलभूत बाधाओं की ओर संकेत करता है। पहला तो यही कि इन संस्थानों का ढांचा औपनिवेशिक काल की विरासत से जुड़ा है। दशकों से इन संस्थानों से मांग और अपेक्षाएं बढ़ने के साथ ही उनके स्वरूप में भी विविधता आई है। इन संस्थानों के ढांचे और परिचालन में अभी तक किए गए मामूली परिवर्तन अपेक्षित परिणामों की दृष्टि से अपर्याप्त रहे हैं। दूसरा संकेत यही है कि ये संस्थान भ्रष्टाचार के केंद्र बन गए हैं। जवाबदेही के अभाव ने भ्रष्टाचार को बेलगाम और व्यापक बना दिया है। ऐसे में यह आवश्यक ही नहीं अनिवार्य हो चला है कि इन संस्थानों का नए सिरे से कायाकल्प किया जाए। इसमें कोई संदेह नहीं कि भ्रष्टाचार एक मानवीय प्रवृत्ति है, जिसे पूरी तरह समाप्त करना तो संभव नहीं, किंतु शिक्षा, जवाबदेही, पारदर्शी और तकनीक के उपयोग से उस पर लगाम अवश्य लगाई जा सकती है। इस दिशा में यदि समय रहते दृढ़ इच्छाशक्ति और पर्याप्त उत्साह के साथ काम नहीं किया गया तो जनता का जो विश्वास पहले ही डगमगाया हुआ है, वह पूरी तरह समाप्त हो जाएगा। अमेरिकी राजनेता हेनरी क्ले ने उचित ही कहा है कि, ‘सरकार एक न्यास है एवं अधिकारी उसके न्यासी और न्यास एवं न्यासी लोगों के लाभ के लिए ही गठित होते हैं।’
समय-समय पर तमाम सामाजिक-राजनीतिक पंडित दूसरी पीढ़ी के सुधारों की बात करते रहते हैं, लेकिन उनके सुझाव कतिपय आर्थिक कारकों जैसे पूरक सुधारों तक सीमित रह जाते हैं। वास्तव में, दूसरी पीढ़ी के सुधारों में समूचे संस्थागत ढांचे के पुनरुत्थान की बात होनी चाहिए। सुधारों के संबंध में पूर्व अमेरिकी राष्ट्रपति जीआर फोर्ड का यह कथन सदैव प्रासंगिक रहेगा, जिसमें उन्होंने कहा था, ‘कोई महान राष्ट्र अपने दायित्वों से मुंह नहीं मोड़ सकता। जिन दायित्वों से आज मुंह मोड़ लिया जाए तो वे भविष्य में किसी विकराल संकट का रूप धारण कर लेते हैं।’ हम भी एक महान राष्ट्र का निर्माण चाहते हैं और ऐसा राष्ट्र समतावादी समाज की संकल्पना को साकार किए बिना आकार नहीं ले सकता। एक ऐसा समाज जिसे न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व की पूर्णता प्राप्त हो।
Date:15-03-23
घरेलू बचत का बदलता रुझानपरमजीत सिंह वोहरा
पिछले दिनों जब भारतीयों की बचत के आधिकारिक आंकड़े घोषित हुए, तो एक बार फिर यह प्रमुखता से स्थापित हुआ कि भारतीय अर्थव्यवस्था को सिर्फ लोगों की क्रय क्षमता से जोड़ कर देखना तर्कसंगत नहीं है। वैसे तो पुराने समय से ही भारतीय समाज में आर्थिक बचत करने की परंपरा रही है, लेकिन वैश्वीकरण के इस दौर में जब भौतिकवादी जीवन आर्थिक विकास का प्रतिबिंब माना जाता है, तब भी अगर आम भारतीय अपनी आर्थिक बचत के प्रति जागरूक है, तो यह निश्चित रूप से भारत के आर्थिक विकास के लिए एक अच्छा संकेत है।
भारतीय अर्थव्यवस्था में अगर हम आर्थिक बचत के आंकड़ों का विश्लेषण करें, तो 2004 से 2010 तक वर्ष-दर-वर्ष आर्थिक बचत और जीडीपी का प्रतिशत लगातार बढ़ता रहा। 2010 में आर्थिक बचत 36.9 प्रतिशत थी, जो आज तक का अधिकतम स्तर है। उस दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था की प्रतिवर्ष विकास दर भी तेजी से बढ़ रही थी। 2011 के बाद से आर्थिक बचत के आंकड़ों में कमी देखी गई है और इसके कारणों में आर्थिक विकास की दर में कमी आना, महंगाई का ऊपरी स्तर पर चले जाना तथा शुरुआती कुछ वर्षों में देश की राजनीतिक सत्ता के प्रति असंतोष की भावना मुख्य थी। इसी बीच कोरोना महामारी ने एक वैश्विक संकट के रूप में दस्तक दी, जिसने संपूर्ण समाज के लिए आर्थिक परेशानियां भी एकाएक पैदा कर दी। 2020-21 के दौरान भारतीय अर्थव्यवस्था में आर्थिक बचत जीडीपी का 28 प्रतिशत थी, क्योंकि पूर्णबंदी के दौरान बड़ी मात्रा में लोगों का रोजगार चला गया था। फिर भी सकारात्मक रुख इस बात से स्पष्ट होता है कि 2021-22 में आर्थिक बचत जीडीपी के तीस प्रतिशत से ऊपर रही। यानी भारतीयों में आर्थिक बचत का रुझान लगातार बरकरार है।
जब भी आर्थिक बचत की बात होती है, तो व्यक्ति के दिमाग में दो प्रश्न एक साथ उठते हैं। पहला, शायद प्रति व्यक्ति खर्चा कम हो रहा है, इसलिए आर्थिक बचत बढ़ रही है। दूसरा, प्रति व्यक्ति वित्तीय आय बढ़ रही है, जिससे आर्थिक बचत भी बढ़ रही है। ये दोनों प्रश्न परस्पर विरोधाभासी हैं। पहला प्रश्न नकारात्मक रुख लिए है, तो दूसरा सकारात्मक सोच का है। इन सबके बीच एक बात और चकित करती है कि भारतीयों का आर्थिक बचत करने का रुझान बड़ी तेजी से बदल रहा है। भारतीयों के रुख को किसी एक पक्ष पर अनुमानित करना बड़ा मुश्किल है। मसलन, पिछले एक दशक में घरेलू बचत का बैंकिंग जमाओं में हिस्सा बड़ी तेजी से गिरा है। यह बात वर्षों से चली आ रही इस सोच को एकाएक दरकिनार कर देती है कि भारतीयों के लिए आर्थिक निवेश की पहली प्राथमिकता बैंकों में जमा करना है। 2011 के दशक तक घरेलू बचत का अट्ठावन प्रतिशत बैंकों की जमाओं में सम्मिलित होता था, जो कि 2020-21 में घट कर अड़तीस प्रतिशत ही रह गया। अगले वर्ष 2021-22 में यह आंकड़ा तेजी से घट कर पच्चीस प्रतिशत के स्तर पर आ गया। इसका एक कारण बैंक की जमाओं पर मिलने वाले ब्याज में तेजी से आई गिरावट है। दूसरा कारण कोरोना प्रभावित वर्षों में प्रति व्यक्ति आय में आई गिरावट है।
गौरतलब है कि पिछले कुछ वर्षों से निवेश को लेकर बैंकिंग क्षेत्र मुख्य आकर्षण का केंद्र नहीं रहा है, लेकिन भारतीयों की घरेलू बचत लगातार बढ़ रही है। स्पष्ट है कि आर्थिक निवेश के कई दूसरे स्रोत लोगों की प्राथमिकता में शामिल हो रहे हैं। मसलन, कोरोना महामारी के दौरान बीमा की तरफ आकर्षण तेजी से बढ़ा। भारत में जीवन बीमा आर्थिक निवेश का सदा प्रमुख स्रोत रहा है। प्रत्येक भारतीय को जीवन बीमा में आर्थिक निवेश का विचार पारिवारिक सोच के रूप में प्राप्त होता है। कोरोना महामारी के दौरान चिकित्सा बीमा की तरफ लोगों का रुझान एकाएक तेजी से बढ़ा, पर यह स्थायी रूप नहीं ले पाया। अगले वित्तवर्ष में ही इसमें कमी देखी गई। बीमा व्यवसाय के लिए यह बड़ी चिंता का विषय है कि क्यों भारत में आज भी बीमा का चलन बहुत कम है? कोरोना महामारी के वर्ष में जरूर यह 3.8 प्रतिशत से एकाएक बढ़ कर 4.2 प्रतिशत हो गया था। गौरतलब है कि बीमा का वैश्विक औसत आंकड़ा सात प्रतिशत है और कई विकसित देशों- अमेरिका, ब्रिटेन आदि- में तो यह दस प्रतिशत से ऊपर रहता है। बीमा कंपनियों को इस संबंध में जरूर सोचना चाहिए कि भारत में प्रीमियम की लागत इस संदर्भ में अधिक तो नहीं है?
इस बात की तस्दीक इन दिनों प्रमुखता से हो रही है कि अब भारतीयों की आर्थिक बचत का रुख बड़ी तेजी से भारतीय पूंजी बाजार की तरफ हो रहा है। आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2021-22 में दस लाख नए निवेशक भारतीय पूंजी बाजार से जुड़े हैं, जिन्होंने म्यूचुअल फंड में सिप (सिस्टमैटिक इन्वेस्टमेंट प्लान) के माध्यम से आर्थिक निवेश किया। इसमें एक वर्ष के दौरान ही घरेलू बचत का चार प्रतिशत से अधिक रुझान भारतीय पूंजी बाजार की तरफ देखने को मिला है। इसमें ‘हिस्सेदारी’ में प्रत्यक्ष निवेश तथा म्यूचुअल फंड दोनों एक मुख्य विकल्प के रूप में उभर कर सामने आए हैं। पिछले वित्तवर्ष में बड़ी संख्या में ‘आइपीओ’ में निवेश का विकल्प भी पूंजी बाजार में आर्थिक निवेश के लिए उपलब्ध था, जिनके माध्यम से कंपनियों ने बड़ी मात्रा में पूंजी जुटाई। एलआइसी का आइपीओ तो सबसे अधिक चर्चा में रहा। नए दौर के स्टार्टअप में ‘पेटीएम’ और ‘जोमैटो’ के आइपीओ ने भी खूब चर्चा बटोरी। शायद यही मुख्य कारण था कि कोरोना काल में जब आर्थिक मंदी का दौर था, तब भी भारतीय पूंजी बाजार ने लगातार बढ़त बनाए रखी, क्योंकि उस समय बड़ी संख्या में नए निवेशक भारतीय पूंजी बाजार से जुड़े। उस दौरान वैश्विक निवेशकों की पहली प्राथमिकता भी चीन के बजाय भारत ही रहा। यह भी देखने को मिला कि भारतीयों का पेंशन तथा भविष्य निधि (प्रोविडेंट फंड) में भी निवेश के प्रति रुझान खूब बढ़ा है।
एक बात, जो आर्थिक बचत के आंकड़ों के विश्लेषण के बीच में एक विकट स्थिति को इंगित करती है, कि भारतीय समाज में इन दिनों महंगी कारों और महंगे घरों (फ्लैट्स) की खरीदारी तेजी से बढ़ रही है। इससे इस चिंता को बल मिलता है कि कहीं भारत में अमीरों और गरीबों के बीच बढ़ रही आर्थिक असमानता ही तो नहीं इस आर्थिक बचत की तेजी का प्रतीक है? एक रिपोर्ट के मुताबिक 2020-21 और 2021-22 में करीब चार लाख करोड़ रुपए का वित्तीय निवेश भवन निर्माण की विभिन्न परियोजनाओं में भारतीयों द्वारा किया गया। इस संदर्भ में यह भी सोचा जा सकता है कि शायद कोरोना महामारी की वजह से कई अप्रवासी भारतीय अपने मुल्क लौटे हैं और उन्हीं द्वारा बहुतायत में इन घरों की खरीदारी की गई है। जमीन की तरह इस दौरान सोने और चांदी में भी निवेश के प्रति रुझान देखने को मिला है। यह भी समझना होगा कि पिछले वित्तवर्ष में महंगाई के आंकड़े हमेशा ऊपर ही रहे हैं, चाहे इसके पीछे कुछ वैश्विक कारण हों, जिनमें रूस-यूक्रेन युद्ध या रुपए के मुकाबले डालर का तुलनात्मक रूप से अधिक मजबूत होना। इन स्थितियों ने भारतीय निवेशकों को यह सोचने पर मजबूर किया है कि सात प्रतिशत से अधिक की महंगाई दर के सामने पांच प्रतिशत की बैंक जमाओं का ब्याज निश्चित रूप से नकारात्मक ही है। इसीलिए शायद उन्होंने अपने रुख को मोड़ते हुए शेयर बाजार आदि को प्राथमिकता देने की कोशिश की है।
Date:15-03-23
समाज की सोच में आ रहा बदलावसुशील देव
भारत में यौन शिक्षा को लेकर अभी भी चर्चा रहस्यमयी या मायावी बनी हुई है। कोई भी इस विषय पर खुलकर चर्चा नहीं करना चाहता जबकि यह मसला सामाजिक तौर पर बेहद गंभीर है। विश्व की कई संस्थाएं इसे समाज के लिए अग्रणी मुददों में गिनती हैं। यूनेस्को के मुताबिक 39 फीसदी देशों के पास अभी यौन शिक्षा को लेकर राष्ट्रीय नीति बनी हुई हैं, वहीं दुनिया के मात्र 20 फीसदी देशों में यौन शिक्षा पर कानून है। चौंकाने वाली बात यह है कि जिस सेक्स एजुकेशन यानी यौन शिक्षा को लेकर लोग आपस में खुलकर बात नहीं करना चाहते, उसी यौन शिक्षा पर दुनिया के कुछ देशों में कानून भी लागू हो चुका है। यह कानून यौन शिक्षा के प्रति वहां जागरूकता का संदेश दे रहा है। यूनेस्को की एक रिपोर्ट के मुताबिक मात्र 20 फीसदी देशों में यह कानून लागू है जबकि 39 फीसदी देशों के पास इस शिक्षा को लेकर राष्ट्रीय नीति तैयार हो चुकी है। रिपोर्ट यह भी कहा गया है कि प्राथमिक शिक्षा में यौन शिक्षा 68 फीसदी देशों और माध्यमिक शिक्षा में 76 देशों में अनिवार्य हो गई है जबकि ज्यादातर देशों में यौन और घरेलू व्यवहार तथा लैंगिक हिंसा जैसे विषय शामिल हैं।
भारत की बात करें तो कुछ आंशिक पहल को छोड़कर यहां अभी इस मसले पर कोई ठोस नीति या कानून नहीं बन पाया है। दो तिहाई गर्भनिरोधक मुद्दे को स्कूली पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना अच्छा कदम माना जा सकता है। मगर खुलकर इसकी पैरवी सरकारी स्तर पर अभी भी नहीं हो पाई है । पाठयक्रम के अंर्तगत विस्तृत कामुकता शिक्षा, कामुकता के ज्ञान, भावनात्मक, शारीरिक और सामाजिक पहलुओं के बारे में पढ़ाने अथवा सीखने का पाठ्यक्रम शामिल है। इसका मकसद बच्चों में ज्ञान, दृष्टिकोण और मूल्यों को समझाना है। यह उनके स्वास्थ्य, सम्मान और कल्याण का अहसास कराने के लिए उन्हें सशक्त बनाएगा। रिपोर्ट में कहा गया है कि कामुकता मानव जीवन का अभिन्न अंग है। हालांकि रिश्ते और सेक्स के बारे में युवाओं को वैज्ञानिकता के साथ विकसित करना थोड़ा मुश्किल है।
मगर यह भी सच्चाई है कि भ्रमित करने वाली जानकारी या संदेश बचपन से वयस्क होने तक उनके जीवन मूल्यों को और सहज बना देते हैं। बचपन में घरों के अंदर मां-बाप या बुजुर्गों के माध्यम से इस शिक्षा की नींव पड़नी चाहिए। फिर स्कूलों में शिक्षकों या गुरुजनों के माध्यम से यौन शिक्षा आधारित यौन शिक्षा ज्ञान का प्रसार होना चाहिए। हालांकि हमारे देश में ऐसे विचारों को लेकर विरोध भी हुए हैं। बुद्धिजीवियों का एक वर्ग इसकी आलोचना करता है, और कहता है कि भारतीय सभ्यता-संस्कृति के लिए यह उपयुक्त नहीं है। सनद रहे कि 2007 में हालांकि भारत सरकार ने किशोर शिक्षा कार्यक्रम की शुरुआत की थी। मगर तब भी अंतरंग संबंधों के बारे में खुलकर बातचीत नहीं हुई। स्थिति यह है कि आज भी हम बगैर शर्म या हिंचक के ‘सेक्स’ शब्द भी बोल नहीं सकते। मगर युवाओं में उनके शरीर में होने वाले परिवर्तनों की जानकारी के लिए भी यह शिक्षा जरूरी। इसकी पैरवी करने वाले, विरोध करने वालों से ज्यादा हैं। आज लड़कियों के मासिक धर्मचक्र के बारे में उन्हें समझाने की जरूरत है। सेक्स के बारे में जागरूकता इसलिए भी जरूरी है कि गर्भधारण के समय एचआईवी, एड्स जैसी बीमारियों से कैसे बचाव किया जाए, उन्हें पता होनी चाहिए या उन्हें निरोधक सामग्री खरीदने में शर्म महसूस न हो, इसलिए भी यह शिक्षा जरूरी है।
विशेषज्ञों के मुताबिक रेप या जबरदस्ती वाले शारीरिक संबंधों को समाप्त करने के लिए इस शिक्षा को महत्त्वपूर्ण माना गया है। महिला एवं बाल विकास विभाग के अध्ययन के मुताबिक ज्यादातर बच्चे आज इस तरह की शिक्षा के अभाव में यौन उत्पीड़न के शिकार हो रहे हैं। समाज में यौन उत्पीड़न के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। यौन अपराध बढ़ रहे हैं। भारत में आज भी यौन शिक्षा को लेकर खुलकर चर्चा नहीं हो रही है। इसे सार्वजनिक बोलचाल में आज भी भारी झिझक एवं बेचैनी के साथ प्रस्तुत किया जाता है। विरोध में तर्क है कि कामुकता के बारे में शिक्षा निजी मामला है, और यह भारतीय संस्कृति के खिलाफ जाती है। यह किशोरों को अनैतिकता और स्वच्छता की ओर ले जाती है, इसलिए सरकार को किसी भी रूप में इस शिक्षा को बढ़ावा दिए जाने का सुझाव नहीं दिया गया।
हालांकि भारत की हालिया नई शिक्षा नीति में इसे लेकर कुछ मामूली तब्दीली जरूर हुई है। इससे हमारे समाज का कितना भला होगा, कहना मुश्किल है। लेकिन हम दावे के साथ कह सकते हैं कि हमारी सामाजिक सोच के स्तर में भी इस विषय को लेकर बदलाव आया है, और बात ‘गुड टच और बैड टच’ से आगे निकली है। इससे हमारे देश के बच्चों में यौन शिक्षा के प्रति जागरूकता आएगी और हमारे युवाओं की सोच में बदलाव आएगा। जाहिर है कि इससे देश भी बदलेगा ।
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हमारी संसदीय प्रक्रिया में, सांसदों का यह कर्तव्य है कि वह सरकार के कामों पर निरीक्षण और संतुलन का हिसाब बनाए रखें। हाल ही में कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने अपने एक भाषण के दौरान कार्यपालिका की जवाबदेही की बात कही थी। इस पर सरकार के ही एक मंत्री ने उन पर सदन के विशेषाधिकार के हनन का आरोप लगाया है। यह बहुत ही अजीब है। महत्वपूर्ण मुद्दों पर सरकार से जवाब मांगने के लिए ऐसा आरोप लगाया जाना बिल्कुल ठीक नहीं है।
संसद को मुक्त बहस और चर्चा का मंच बना रहना चाहिए। लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति से यह अपेक्षा की जाती है कि वे सदस्यों को अनुशासित करने के बजाय संसद की गरिमा और महिमा को बनाए रखने का प्रयास करें।
संसद में विपक्षी नेता पर लगाया गया आरोप, विधायिका पर कार्यपालिका के कुटिल वर्चस्व का उदाहरण प्रस्तुत करता है। संसद ही नहीं, बहुत से राज्यों में भी इस प्रकार की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। ऐसे कई मुख्यमंत्री हैं, जो अपनी शक्ति के दम पर अपनी पार्टी पर नियंत्रण तो रखते ही हैं, विपक्ष को भी नियंत्रित करते हैं, और विधानसभा को बहुत हल्के में लेते हैं। इन सबके मद्देनजर विधानसभा की बैठकें कम हो गई हैं, और बहसें छिछली हो गई हैं।
कुछ बड़े लोकप्रिय नेता तर्क देते हैं कि वे सीधे जनता के प्रति जवाबदेह हैं। जबकि सच्चाई यह है कि लोग निर्वाचित सरकार से अपने चुने हुए प्रतिनिधियों के माध्यम से जवाबदेही चाहते हैं, और विधायिका को उस बातचीत में मध्यस्थता करने का अधिकार है। लोकतांत्रिक प्रक्रिया की रक्षा के लिए सरकार को संसदीय अधिकारों का दुरूपयोग न करते हुए, अपनी जवाबदेही दिखानी चाहिए। तभी लोकतंत्र को सफल माना जा सकता है।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 18 फरवरी, 2023
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Date:14-03-23
Married Or PartneredPolitics won’t defy a largely traditional society. So, civil unions may be a good first step for same-sex couplesTOI Editorials
GoI has told the Supreme Court it opposes same-sex marriage, arguing such marriages would not be ‘compatible’ with the ‘Indian family unit’, and ‘clearly distinct’ classes cannot be treated identically. The executive’s and the legislature’s views on this are informed substantially by much of Indian society’s traditionalism and conservatism. But it is SC’s job to uphold fundamental rights, with or without popular endorsement. CJI has, hearteningly, observed that “atypical manifestations of the family unit” deserve legal protection.
Parts of the world have already legally enshrined marriage equality. Religious leaders have also buckled – staunchly religious countries like Ireland have legalised same-sex marriage after a referendum, majority opinion has swung in places like Australia and the US. Taiwan’s courts have legalised it, and even in Japan, where same-sex marriage remains illegal, 256 municipalities and 12 prefectures have ‘partnership oath systems’. Other jurisdictions that have held off on legalising same-sex marriage allow registered civil unions or domestic partnerships, which seek no religious validation, but bring most of the rights and responsibilities of a legal couple – to be at a hospital bedside, to have and raise children together, to own and inherit assets or operate a bank account together, be counted as family in matters of tax or immigration, to qualify for spousal support, get employment benefits and so on.
These civil unions, which can be also applied to anyone regardless of sexual orientation or gender, are more popular than traditional marriage in places like France and northern Europe. This is something India’s courts and lawmakers should seriously study. In fact, if the political class is discomfited by the notion of queer marriage, it should see civil union as a smart solution. And those rightly demanding marriage equality can also see this as a step forward.
India has the Special Marriage Act, a civil law that operates outside the personal laws of each religious community. There can be no argument that this Act must allow all classes of citizens the right to marry. But stifling social conservatism is a reality that politicians won’t ignore. Therefore, civil unions can be a good beginning. And not just for queer couples. SC has had to intervene many times in favour of live-in heterosexual couples. Civil unions, therefore, are an option for any two people seeking legal basis for their relationship.
Date:14-03-23
Indian Documentaries, Up On Our Watch ListET Editorials
This year’s Academy Awards point to a trend gestating for some time now. Kartiki Gonsalves’ Tamil film, The Elephant Whisperers, which won the Oscar for Best Documentary Short Film (along with RRR for Best Original Score for ‘Naatu Naatu’), will now be sought after by viewers on Netflix. Set in the Mudumalai National Park, the film is ostensibly about a wounded, frail baby elephant being reared to recovery and the bond that develops between him and his two human ‘parents’. But with its stunning cinematography and delicate storyline, The Elephant Whisperers is about humans cohabiting with species in nature as part of the same community. As one of the key characters tells us, ‘We live off the forest, but we also protect it. ’ This is a powerful, moving film the Oscar has deservedly brought up on our ‘Watch List’.
Another Indian documentary, Shaunak Sen’s All That Breathes, about two brothers in Delhi who devote their lives to rescuing injured birds, was nominated in the Best Feature Documentary category. Together, both films mark the quiet ‘rise to the surface’ of Indian documentary films.
Quality documentaries, from Gautam Ghose’s 1989 documentary on the life of shehnai maestro Bismillah Khan Sange-Meel Se Mulaqat (Meeting a Milestone) to Nishtha Jain’s 2012 Gulabi Gang, about a group of women in Bundelkhand who take up the fight against gender violence and caste oppression, have been around. But television, a vital platform for this genre worldwide, has largely shrugged these films off in India, citing lack of viewer interest. Streaming services may be changing that: bringing documentaries like Smriti Mundhra’s The Romantics on the cinematic ‘House of (Yash and Aditya) Chopras’ to our screens.
Date:14-03-23
स्वास्थ्य में स्तरीय शोध की तत्काल जरूरत हैसंपादकीय
इन्फ्लुएंजा की H3N2 किस्म ज्यादा संक्रामक है। नीति आयोग ने केंद्र के सभी संबंधित मंत्रालयों के साथ स्थिति का जायजा लिया है। स्वास्थ्य मंत्रालय ने सभी राज्यों को अलर्ट रहने को कहा है और डॉक्टरों ने मास्क और सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करने की हिदायत दी है। विकास के इस दौर में दुनिया एक अदृश्य वायरस के सामने लगातार बौनी दिखाई दे रही है। यह सच है कि माइक्रोबायोलॉजी के क्षेत्र में सेलुलर बायोलॉजी, जेनेटिक इंजीनियरिंग और वायरोलॉजी अभी अपेक्षाकृत नई विधाएं हैं और इन पर शोध बहुत भरोसेमंद नहीं हैं। यह भी सच है कि जेनेटिक बदलाव या म्युटेशन को समझने के वैज्ञानिक टूल्स भी अभी इतनी तेजी से विकसित नहीं हो सके हैं, जितनी तेजी से स्वयं वायरस की प्रकृति बदल रही है। लेकिन विश्व के वैज्ञानिक समुदाय को इस नए संकट को देखते हुए पूरी बौद्धिक शक्ति इसमें झोंकनी होगी। मुश्किल यह है कि कुछ देश विज्ञान के नाम पर जेनेटिक बदलाव के प्रयोगों को गुप्त तौर पर कर रहे हैं ताकि इसे हथियार की तरह इस्तेमाल किया जा सके। वुहान में किए जा रहे जेनेटिक शोध को चीन ने विश्व समुदाय को नहीं बताया था। हालांकि इन सबके लिए ‘नागोया प्रोटोकॉल’ तैयार किया गया और तब से डब्ल्यूएचओ ने कई बैठकें भी कीं, लेकिन वैश्विक रूप से सही प्रोटोकॉल और उसके तहत क्रांतिकारी रूप से शोध करने की स्थिति आज भी नहीं बनी है। रोजाना दुनिया के लिए खतरा बने वेश बदल कर पैदा होने वाले वायरस के खिलाफ वैश्विक स्तर पर जेनेटिक साइंस के शोध को नई ऊंचाइयां देनी होंगी और इनके म्युटेशन और प्रसार की शक्ति को रोकने के तरीके खोजने होंगे। ज्यादा आबादी वाले देशों में मास्क व सोशल डिस्टेंसिंग लंबे समय तक नहीं चला सकते।
Date:14-03-23
अधिक स्वतंत्र निर्वाचन आयोग की दिशा मेंटी टी राम मोहन
सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त और निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति एक ऐसी समिति द्वारा की जाएगी जिसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष (उनकी अनुपस्थिति में सबसे बड़े विपक्षी दल का नेता) तथा देश के मुख्य न्यायाधीश शामिल होंगे।
अब तक ये नियुक्तियां राष्ट्रपति द्वारा प्रधानमंत्री की सलाह पर की जाती हैं। देखा जाए तो इस मामले पर पूरा अधिकार प्रधानमंत्री के पास ही था लेकिन अब ऐसा नहीं होगा। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है कि उसने जो प्रक्रिया सामने रखी है वह तब तक जारी रहेगी जब तक कि संसद इस विषय में कोई कानून नहीं बना देती। जैसा कि इस निर्णय में कहा भी गया है कि निर्वाचन आयोग के पास महत्त्वपूर्ण शक्तियां हैं। निर्वाचन आयोग एक राजनीतिक दल का पंजीयन कर सकता है। वह राजनीतिक दलों को मान्यता दे सकता है और उन्हें चुनाव चिह्न आवंटित कर सकता है। जब किसी राजनीतिक दल का विभाजन होता है तो वह तय कर सकता है कि कौन सा धड़ा मूल पार्टी है। वह राजनीतिक दलों को आदर्श आचार संहिता के उल्लंघन के लिए दंडित कर सकता है। किसी प्रत्याशी को चुनाव प्रचार करने से रोक सकता है। अगर इनमें से किसी भी शक्ति का दुरुपयोग किया गया तो स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों की प्रक्रिया बाधित हो सकती है। सभी राजनीतिक दल इस बात को लेकर मुखर रहे हैं कि चुनाव आयोग अपनी शक्तियों का दुरुपयोग करता रहा है। इसके बावजूद किसी सरकार ने चुनाव आयोग की नियुक्तियों में कार्यपालिका के दखल को कम करने का प्रयास नहीं किया। ये नियुक्तियां अफसरशाही में से की जाती रहीं। कोई भी सरकार हो, वह ऐसे अफसरशाहों को चुनती रही जो उसके अनुकूल हों। बीते वर्षों में कई समितियों और स्वयं निर्वाचन आयोग ने नियुक्ति प्रक्रिया में आमूलचूल बदलाव की अनुशंसा की लेकिन वह हो न सका।
अब सर्वोच्च न्यायालय ने दखल देना उचित समझा। उसके निर्णय का स्वागत हुआ क्योंकि लोकतंत्र के लिए स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव जरूरी हैं। सही मायनों में स्वतंत्र निर्वाचन आयोग एक अनिवार्य शर्त है।
इस दौरान न्यायालय को कुछ कठिनाइयों का भी सामना करना पड़ा। संविधान के संबंधित अनुच्छेद को पढ़ने पर लगता नहीं कि न्यायालय को हस्तक्षेप का अधिकार है। निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति से संबंधित संविधान के अनुच्छेद 324(2) में कहा गया है, ‘निर्वाचन आयोग में मुख्य निर्वाचन आयुक्त तथा उतनी तादाद में निर्वाचन आयुक्त होने चाहिए, जितना कि राष्ट्रपति समय-समय पर तय करें। मुख्य निर्वाचन आयुक्त तथा अन्य आयुक्तों की नियुक्ति संसद की ओर से राष्ट्रपति द्वारा इस बारे में बनाए गए कानून के अनुसार होनी चाहिए।’
संविधान ने निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति के लिए कानून बनाने का काम संसद पर छोड़ दिया। सर्वोच्च न्यायालय का 169 पन्नों का निर्णय पढ़ने लायक है क्योंकि यह इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप का न्यायिक और संवैधानिक आधार बताता है। उसने इस विषय में संविधान सभा की बहसों का भी उल्लेख किया। यह स्पष्ट है कि संविधान सभा के सदस्य नहीं चाहते थे कि निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति पूरी तरह कार्यपालिका के हवाले हो। वे चाहते थे कि ये नियुक्तियां कुछ तय मानकों के अनुसार हों। इन्हीं अपेक्षाओं को पूरा करने के लिए भीमराव आंबेडकर ने संशोधन पेश किया जो संसद को इस नियुक्ति प्रक्रिया के लिए कानून बनाने की इजाजत देता है।
संसद ने कानून पारित नहीं किया। हमारा निर्वाचन आयोग ऐसा नहीं है कि जो उस स्वतंत्रता की आश्वस्ति देता हो जैसा कि संविधान निर्माताओं ने चाहा था। अदालती फैसले में अहम बात यह है उसने निर्वाचन आयोग की स्वायत्तता और नागरिकों के बुनियादी अधिकारों के इस्तेमाल को जोड़ दिया है।
मतदान का अधिकार बुनियादी अधिकार नहीं है। लेकिन मतदान के समय अभिव्यक्ति की आजादी के अधिकार को सर्वोच्च न्यायालय अभिव्यक्ति की आजादी का ही हिस्सा मानता है जो एक बुनियादी अधिकार है। मतदाता खुद को तब तक स्वतंत्र ढंग से अभिव्यक्त नहीं कर सकते जब तक कि उनके पास जरूरी सूचना न हो। एक स्वतंत्र निर्वाचन आयोग यह सूचना मुहैया करा सकता है।
इतना ही नहीं स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों का अर्थ यह है कि प्रत्याशी और राजनीतिक दलों के साथ किसी तरह का भेदभाव न हो। अगर ऐसा होता है तो यह समता के बुनियादी अधिकार का उल्लंघन होगा। अगर निर्वाचन आयोग स्वतंत्र नहीं हुआ तो नागरिक अभिव्यक्ति और समता के अपने मूल अधिकार का प्रयोग नहीं कर पाएंगे। सर्वोच्च न्यायालय का मौजूदा हस्तक्षेप इस लिहाज से भी अहम है।
कार्यपालिका द्वारा निर्वाचन आयोग की नियुक्तियां उसकी स्वायत्तता को किस प्रकार प्रभावित करती है? सर्वोच्च न्यायालय पहले कह चुका है कि अगर किसी व्यक्ति को दूसरे के किसी कदम से लाभ होता है तो वह इसके बदले जरूर कुछ करेगा। निर्वाचन आयुक्त एक ऐसा पद है जिसे कई अफसरशाह लेना चाहते हैं। अगर कार्यपालिका किसी व्यक्ति को इस पद पर नियुक्त करती है तो वह निश्चित रूप से कार्यपालिका के प्रति उपकृत महसूस करेगा। ऐसे में एक समिति द्वारा नियुक्ति होने से उसके निष्पक्ष होने की संभावना बढ़ जाएगी।
सर्वोच्च न्यायालय कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका के बीच शक्ति विभाजन को लेकर पूरी तरह जागरूक है। वह समझता है कि निर्वाचन आयोग के सदस्यों की नियुक्ति की प्रक्रिया तय करके वह विधायिका के क्षेत्र में दखल दे रहा है। निर्णय में इस मसले का भी ध्यान रखा गया।
न्यायालय ने कहा कि कानून बनाना पूरी तरह विधायिका का क्षेत्र नहीं है। समय-समय पर दुनिया भर की संवैधानिक अदालतों ने कानून बनाए हैं और नए अधिकारों का सृजन किया है। इतना ही नहीं सबसे बड़ी अदालत हर उस जगह पर दखल दे सकती है जहां वह देखते है कि कर्तव्यों का पालन नहीं हो पा रहा है।
संविधान निर्माताओं ने साफ तौर पर एक कानून की जरूरत की बात कही थी जो निर्वाचन आयोग के सदस्यों के चयन की प्रक्रिया बताए। संसद सात दशकों तक ऐसा कानून नहीं बना सकी जिसकी वजह से सर्वोच्च न्यायालय को दखल देना पड़ा।
न्यायालय की दलीलें बहुत ठोस हैं। उसके निर्णय को पढ़ने वाला कोई भी व्यक्ति समझ सकता है कि यहां न्यायपालिका ने अनाधिकार चेष्टा नहीं की है। उसने बस इस बात पर जोर दिया है कि जब तक संसद उपयुक्त कानून नहीं बना लेती है तब तक ऐसी व्यवस्था कायम रह सकती है। अब बेहतर यही होगा कि संसद खुद कोई ठोस हल सुझाए जो संविधान निर्माताओं के सोच के अनुरूप हो।
Date:14-03-23
अवधारणा बनाम अधिकारसंपादकीय
समलैंगिक विवाह को मौलिक अधिकार बनाने की मांग स्वाभाविक ही संवैधानिक तकाजे और विवाह संबंधी सामाजिक अवधारणा के बीच बहस का विषय बन गई है। सर्वोच्च न्यायालय में हलफनामा दायर कर केंद्र सरकार ने कहा कि वह समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने के पक्ष में नहीं है। भारतीय समाज में विवाह की अवधारणा एक स्त्री और पुरुष के बीच के संबंधों पर आधारित है, जिससे संतानोत्पत्ति हो सके। अगर समलैंगिक विवाह को मान्यता दी जाती है, तो उससे स्वीकृत सामाजिक मूल्यों और व्यक्तिगत कानूनों के बीच का नाजुक संतुलन बुरी तरह प्रभावित होगा। एक समलैंगिक जोड़े ने सर्वोच्च न्यायालय में अपने विवाह को मान्यता देने की गुहार लगाई थी, जिस पर अदालत ने सरकार से जवाब मांगा था। उसी संबंध में केंद्र का ताजा जवाब आया है। हालांकि समलैंगिक विवाह को मान्यता देने संबंधी कई याचिकाएं दिल्ली उच्च न्यायालय और दूसरी अदालतों में लंबित हैं। इस तरह सर्वोच्च न्यायालय में उठे मामले में जो भी फैसला आएगा, वह तमाम ऐसी याचिकाओं में मिसाल बनेगा। केंद्र के हलफनामे के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले पर विचार के लिए संविधान पीठ का गठन कर दिया है, जो इससे संबंधित संवैधानिक पहलुओं पर विचार करने के बाद किसी निर्णय पर पहुंच सकेगी।
सरकार के इस तर्क को सिरे से नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि भारत जैसे देश में विवाह स्त्री और पुरुष का एक पवित्र बंधन माना जाता है। इसलिए समाज कभी दो समान लिंग के व्यक्तियों का पति-पत्नी की तरह रहना स्वीकार नहीं कर सकता। ऐसे में कोई भी सरकार ऐसा कोई विधान बनाने को तैयार नहीं हो सकती, जो सामाजिक मूल्यों के विरुद्ध जाता हो। मगर सवाल यह भी है कि जब समाज खुद बदलती स्थितियों के मुताबिक अपने मूल्यों में बदलाव करता रहता है, तो कानूनों में लचीलापन लाने से क्यों परहेज होना चाहिए। दुनिया के करीब तीस देशों में समलैंगिक विवाह को मान्यता प्राप्त है, पर वहां भी लंबे संघर्ष के बाद ही समलैंगिकों को यह अधिकार मिल सका। इसी तरह भारत में भी साढ़े चार साल पहले तक समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी में रखा गया था, मगर सर्वोच्च न्यायालय ने दो समलैंगिकों को साथ रहने की कानूनी आजादी प्रदान कर दी। पर उन्हें विवाह की इजाजत देने को लेकर कई कानूनी अड़चनें हैं, जो दूसरे विवाहों के लिए बनाए गए हैं। मसलन, घरेलू हिंसा, संबंध विच्छेद के बाद गुजारा भत्ता, ससुराल-मायका, पितृ-मातृधन पर अधिकार जैसे मसले जटिल साबित होंगे। उन देशों में भी इन पक्षों पर उलझन बनी हुई है, जहां समलैंगिक विवाह को मान्यता प्राप्त है।
मगर इसका दूसरा संवैधानिक पहलू यह भी है, जिसके आधार पर विवाह को मान्यता प्रदान करने की गुहार लगाई गई ह, कि जब हर व्यक्ति को अपनी पसंद के व्यक्ति से विवाह करने का मौलिक अधिकार प्राप्त है, तो फिर समलैंगिकों को इससे वंचित क्यों रखा जा सकता है। मगर सरकार इसे मौलिक अधिकार के क्षेत्र में नहीं मानती। सर्वोच्च न्यायालय के सामने यही पेच है, जिसे संविधान पीठ विचार करके सुलझाने का प्रयास करेगी। कई विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि ऐसे जोड़ों को विवाह की कानूनी इजाजत न मिलने से वे न सिर्फ एक मौलिक अधिकार, बल्कि अनेक अधिकारों से वंचित रह जाते हैं। सर्वोच्च न्यायालय समलैंगिक जोड़ों के प्रति उस तरह नहीं देख सकता, जिस तरह आम समाज देखता है। इसलिए स्वाभाविक ही उसके फैसले की तरफ निगाहें लग गई हैं।
Date:14-03-23
सामाजिक ढांचा न बिगड़ेसंपादकीय
समलैंगिक विवाह को कानूनी मान्यता देने का विरोध करके केंद्र ने ठीक ही किया है। ऐसे विवाहों से व्यक्तिगत कानूनों और स्वीकार्य सामाजिक मूल्यों का संतुलन बिगड़ने की आशंका गलत नहीं है। उच्चतम न्यायालय के समक्ष दाखिल हलफनामे में सरकार ने कहा कि भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के जरिये इसे वैध करार दिये जाने के बावजूद, याचिकाकर्ता देश के कानूनों के तहत समलैंगिक विवाह के लिए मौलिक अधिकार का दावा नहीं कर सकते हैं। केंद्र का यह कथन कितना समीचीन है कि विवाह, कानून के एक संस्था के रूप में, विभिन्न विधायी अधिनियमों के तहत कई वैधानिक परिणाम हैं। इसलिए, ऐसे मानवीय संबंधों की किसी भी औपचारिक मान्यता को सिर्फ दो वयस्कों के बीच गोपनीयता का मुद्दा नहीं माना जा सकता है। अपने हलफनामे में केंद्र ने कहा कि भारतीय लोकाचार के आधार पर ऐसी सामाजिक नैतिकता और सार्वजनिक स्वीकृति का न्याय करना और उसे लागू करना विधायिका का काम है। केंद्र ने कहा कि भारतीय संवैधानिक कानून न्यायशास्त्र में किसी भी आधार के बिना पश्चिमी निर्णयों को इस संदर्भ में आयात नहीं किया जा सकता है। सच है कि समलैंगिक व्यक्तियों के बीच विवाह को न तो किसी असंहिताबद्ध कानून या किसी संहिताबद्ध वैधानिक कानूनों में मान्यता दी जाती है और न ही इसे स्वीकार किया जाता है। इसलिए भारतीय दंड संहिता की धारा 377 के बावजूद, याचिकाकर्ता देश के कानूनों के तहत समलैंगिक विवाह को मान्यता देने के मौलिक अधिकार का दावा नहीं कर सकते हैं। केंद्र का यह तर्क कितना समसामयिक है कि संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत मौलिक अधिकार कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अधीन हैं और इसे देश के कानूनों के तहत मान्यता प्राप्त करने के लिए समलैंगिक विवाह के मौलिक अधिकार को शामिल करने के लिए विस्तारित नहीं किया जा सकता है, जो वास्तव में इसके विपरीत है। वस्तुत: विवाह/मिलन/संबंध तक सीमित विवाह की प्रकृति में विषमलैंगिक होने की मान्यता पूरे इतिहास में आदर्श है और राज्य के अस्तित्व और निरंतरता दोनों के लिए मूलभूत आधार है। इस स्थिति में कोई भी परिवर्तन पूरे सामाजिक ढांचे को बिगाड़ सकता है। इस मामले में आधुनिकता की होड़ में पश्चिम का अंधानुकरण करने की जरूरत नहीं है। बहरहाल वह मामला संविधान पीठ को चला गया है जो 18 अप्रैल से इसकी सुनवाई करेगी।
Date:14-03-23
भारतीय सिनेमा का बिगुल नाटू-नाटूजयंती रंगनाथन, ( कार्यकारी संपादक, हिंदुस्तान )
फिल्मों के लिए दिया जाने वाला सबसे पहला और सबसे महत्वपूर्ण पुरस्कार है ऑस्कर। 1929 में पहली बार यह पुरस्कार दिया गया था। 94 साल से ऑस्कर की विरासत चली आ रही है और पूरी दुनिया में इसे सबसे प्रतिष्ठित माना जाता है।
इस वक्त जब हम एसएस राजमौलि की बहुभाषीय (मूल तेलुगू) फिल्म आरआरआर के लोकप्रिय गाने नाटू-नाटू को सर्वश्रेष्ठ मौलिक गीत और द एलिफेंट व्हिस्परर्स को सर्वश्रेष्ठ डॉक्यूमेंट्री का ऑस्कर मिलने की खुशियां मना रहे हैं, मैं जरा पीछे जाना चाहूंगी। आज हमने जो हासिल किया है, उसकी तैयारी बहुत पहले से हो रही थी। मैं उस समय को याद करना चाहती हूं, जब दादा साहब फाल्के ने मुंबई के अमेरिका-इंडिया पिक्चर पैलेस में द लाइफ ऑफ क्राइस्ट फिल्म देखी थी। बात है सन 1910 की। फाल्के पहली बार पिक्चर देख रहे थे और अभिभूत होकर ताली बजा रहे थे। इसके बाद लगातार कई दिनों तक उन्होंने यह फिल्म देखी, अपनी पत्नी को भी दिखलाई। फिर एक दिन निर्णयात्मक स्वर में बोले, ‘मैं भी हिंदी में धार्मिक और मिथकीय चरित्र पर फिल्में बनाऊंगा।’ उनकी बात पर यकीन किसी को न हुआ, पर अगर उन्होंने उस दिन यह निर्णय नहीं लिया होता, तो शायद आज हम खुशियां नहीं मना रहे होते।
फिल्म बनाने की तकनीक सीखने के लिए फाल्के पानी जहाज से इंग्लैंड गए और वहां तीन महीने रहकर जब मुंबई आए, तो उनके मन में ख्वाब जन्म ले चुका था। उनके लिए इस सपने को पूरा करना कतई आसान नहीं था। लगातार फिल्में देखते रहने से उनकी आंखें जवाब देने लगीं, पर वह रुके नहीं। 1913 में पहली हिंदी फिल्म राजा हरिश्चंद्र बना ही डाली। वह एक शुरुआत थी हिन्दुस्तान में फिल्म निर्माण व फिल्म से आम लोगों के जुड़ने की। मूक फिल्मों के दौर में भी यह बात साफ हो गई थी कि हिन्दुस्तानियों के लिए फिल्म देखना तीन घंटे के मनोरंजन से कहीं अधिक है।
एक बेहतर दौर आया, जब एक तरफ, मुंबई में राज कपूर, महबूब खान, वी शांताराम, गुरु दत्त जैसे दिग्गज थे, तो बंगाल में सत्यजित रे, ऋत्विक घटक, मृणाल सेन जैसे माहिर निर्देशक। दक्षिण भारत में तेलुगू, तमिल व मलयालम सिनेमा भी फल-फूल रहे थे। के बालचंद्र, एनटी रामाराव, अडूर गोपाल कृष्णन जैसे कई निर्माता-निर्देशक हुए, जो भारतीय सिनेमा को दुनिया के सामने बहुत सम्मान और चाहत के साथ ले गए।
हमारी फिल्में तब भी हॉलीवुड की फिल्मों से बहुत अलग होती थीं और आज भी हैं। हम हिन्दुस्तानियों का डीएनए और हमारी समझ भी अलग है। वही फिल्में लोगों तक पहुंचतीं और चल पाती थीं, जिनमें कला, मनोरंजन और संदेश के साथ कोई सपना भी होता था। हमारे सुख-दुख के साथ जुड़ा सिनेमा जीवन के साथ जुड़ गया। राज कपूर जब टखने से ऊपर पैंट और ढीली शर्ट पहनकर आवारा हूं गाते हैं, तो लोग उनके किरदार को आत्मसात कर लेते हैं। मदर इंडिया, दो आंखें बारह हाथ, मुगल-ए-आजम, श्री420 जैसी फिल्मों ने विदेश में भी खूब नाम कमाया। सत्यजित रे की पथेर पांचाली को कान्स में सर्वश्रेष्ठ ह्यूमन डॉक्यूमेंट का पुरस्कार मिला था। यह फिल्म बाफ्ता पुरस्कारों के लिए भी नामांकित की गई थी।
उन्नीस सौ सत्तर के दशक के बाद फिल्मों को नए नायक और अभिप्रायों की जरूरत पड़ी। यह वह वक्त था, जब मुंबई में एंग्री यंग मैन और दक्षिण में नायकन अपनी छाप छोड़ने लगा था। आजादी के पच्चीस साल बाद देश के नौजवान उद्देश्यहीन, कुंठित व बेरोजगारी से बेहाल थे और इन सबको फिल्मों में जैसे आवाज मिल गई। ‘हालचाल ठीकठाक है, सब कुछ ठीकठाक है, बीए किया है, एमए किया, लगता है सब कुछ ऐंवे किया, आपकी दुआ से सब ठीकठाक है’, इस स्वर के साथ नई पीढ़ी को अपना नायक मिल गया, जो अकेले खलनायक से लड़ने चल पड़ता था।
एक वक्त हमारी फिल्मों के लिए अंडर वर्ल्ड का लगा पैसा, वीडियो पायरेसी, बंद होते सिंगल स्क्रीन चुनौती थे। धीरे-धीरे हमने इन चुनौतियों से पार पा लिया और आज यहां तक पहुंच गए कि हमारी फिल्में कथानक, तकनीक और प्रस्तुति के लिहाज से किसी भी हॉलीवुड फिल्म से कमतर नहीं हैं। हॉलीवुड के पास अगर अवतार है, तो हमारे पास बाहुबली है। उनके पास एक्शन थ्रिलर मिशल इंपॉसिबल और टॉपगन हैं, तो हमारे पास स्पाई सीरीज टाइगर और पठान हैं। हमारी फिल्में विदेश में भी अब अरबों का व्यवसाय कर रही हैं और यही वजह है कि हॉलीवुड के महान कलाकार और निर्देशक अब हिन्दुस्तानी फिल्मों का हिस्सा बनने को आतुर हैं।
सही मायने में पैन इंडिया की बात तो अब जाकर हुई है। तेलुगु और तमिल में बनने वाली फिल्में हिंदी में डब होकर उसी दिन रिलीज होती हैं और सफलता भी पाती हैं। इसलिए जब एसएस राजमौलि अपनी फिल्म आरआरआर के साथ ऑस्कर के लिए जाते हैं, तो समूचा हिन्दुस्तान इस फिल्म से इत्तफाक रखता है।
एक बात और। ऑस्कर में नामांकित होना और अवॉर्ड पाना कतई आसान नहीं है। सालों से हमारे फिल्मकार अपनी फिल्में वहां ले जाते रहे हैं और अपनी पहचान बनाने की कोशिश करते रहे हैं। मदर इंडिया, लगान और सलाम बॉम्बे जैसी फिल्में ऑस्कर में नामांकित होकर अंतिम दौर तक पहुंची थीं। हर साल हमारे यहां से ऑस्कर के लिए फिल्म नामांकित होती है। इसके बाद यह निर्माता और उनकी टीम का दायित्व होता है कि वहां जाकर अपनी फिल्म की मार्केटिंग करें और चयन समिति के सदस्यों को अपनी फिल्म दिखाएं। राजमौलि और उनकी टीम ने यह काम बखूबी किया है। नाटू-नाटू गाना बेशक संगीतकार एमएम कीरवानी की सर्वश्रेष्ठ धुन नहीं है, पर यह गाना हम हिन्दुस्तानियों का सही तरह से प्रतिनिधित्व करता है। आजादी की लड़ाई में जूझ रहे नायकों को जब नाचने की चुनौती मिलती है, तो वे ऐसा समा बांध देते हैं कि अंग्रेज स्त्री-पुरुष भी थिरकने से खुद रोक नहीं पाते हैं। इस गीत की सुंदरता इसके शब्दों या धुन में नहीं, बल्कि उस रौनक में है, जो अब हम सबके भीतर है।
वैसे नाटू-नाटू को गोल्डन ग्लोब अवॉर्ड मिलने के बाद से ही ऑस्कर का दावेदार माना जा रहा था, पर जो अवॉर्ड भारतीय डॉक्यूमेंट्री शॉर्ट फिल्म द एलिफेंट व्हिस्परर्स को मिला है, वह भी लगभग तय माना जा रहा था। दक्षिण भारत के एक गांव के दंपती और उनके गोद लिए हाथी के बच्चे रघु पर बनी बेहद खूबसूरत और दिल को छूने वाली मानवीय फिल्म है। ये दोनों उपलब्धियां हम हिन्दुस्तानियों को विश्व-पटल पर कहीं ऊंचा स्थापित करती हैं।
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हाल ही में पर्यावरण मंत्री ने उद्योग जगत से आहृान किया है कि वे रिसाइक्लिंग पर विचार करें। भारत में कचरा-प्रबंधन से जुड़े कुछ तथ्य –
वह रोजगार के नए अवसरों का सृजन कर सके। स्वास्थ्य की दृष्टि से लाभकारी सिद्ध हो।
वेस्ट को वैल्थ में बदलना अच्छा और जरूरी है। लेकिन इससे भी जरूरी संसाधनों और धन को बर्बादी से रोकना है।
‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 18 फरवरी, 2023
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Date:13-03-23
Reimagining the urban-rural dichotomyThe rural-urban continuum has drawn wide attention in recent yearsSrikumar Chattopadhyay, ( geographer, was with the Centre for Earth Science Studies and is now with the Gulati Institute of Finance and Taxation, Thiruvananthapuram )
The traditional dichotomy of rural and urban, and the accordingly mandated governance structure, seems inadequate to understand and act upon poverty, undernourishment, education, health, environmental management or even development. For, between the two extremes lies an intermediate settlement formation where rural and urban functions coexist without distinguishable boundaries. Such formations evolve due to interactions of a complex set of geographical, cultural, economic and historical processes. The rural-urban continuum or urban-rural continuum has drawn wide attention in recent years. Under this axiom, it is acknowledged that the transition from rural to urban follows a graded curve of development, and opportunities for social and economic development depend on one’s location along this curve.
Nuanced perspectives
A 2021 World Bank Policy Research Working Paper, ‘Economic and social development along the urban-rural continuum-New opportunities to inform policy,’ advocated adopting the notion of urban catchment areas delienated along an urban-rural continuum. Identification of such areas would help understand urban-rural interconnections, which is important for making policy decisions across development sectors and for addressing issues related to environment and natural resources management. This would support geographically nuanced perspectives in development, required to address increasing spatial inequality.
A 2008 report of the Desakota Study Team, ‘Re-imagining the Rural Urban Continuum,’ was based on studies in eight countries around the world including India. It stressed on understanding the changing relationship between ecosystems and livelihoods under diversified economic systems across the rural-urban continuum as this has important policy implications at all levels. The term Desakota is an Indonesian usage to designate the formation of rural-urban continuum.
In India, Kerala is well known for the rural-urban continuum in the coastal plain. This was noted even by Moroccan traveller Ibn Batuta in the 14th century. The trend further spread over the lowlands and adjoining midlands and highlands. Geographical factors supported by affirmative public policy promoting distributive justice and decentralisation have increased rural-urban linkages and reduced rural-urban differences in major parts of Kerala. In recent years, the rural-urban continuum has developed in various parts of the country, although the underlying factors propping them up are different from those noted in Kerala. The urban industrial interaction fields in India are spreading by linking rural areas and also small towns around the mega cities and urban corridors penetrating rural hinterlands.
Collapsing barriers
In 30 years, technology and economic globalisation have increased mobility of resources and people, and enhanced inter- and intra-country connectivity. The extension of transport and communication systems, improved access to energy, increased affordability private and public transport as well as penetration of economic and other networks into remote areas promote a rural-urban continuum. The barriers due to physical distance is melting as increasing rural-urban linkages have given rise to diffused network regions. Rural hinterlands are connected to multiple urban centres. The movement of goods, people, information and finance between sites of production and consumption has strengthened linkages between production and labour markets. As the pull factors grow, push factors driving populations out from both rural areas and urban areas are also intensifying. In the process, a mixed economy zone of primary and secondary-tertiary sectors has evolved.
The rural-urban continuum areas also witness changing ecosystems. Agriculturally productive lands are being given for other uses. Food security zones are being reconfigured. Areas for pollutant filtering are declining. There is an increase in waste dump, enhanced disaster risk, and elevated vulnerability. The access of local people to water, food, fuel, fodder and fibre from ecosystems is reducing. At the same time, intermediary market institutions are emerging to provide these goods, which has significant implications for the local people. There is also escalation of market value of land, which further marginalises them.
Discussions on social and economic development and environmental issues and their inter-linkages are not complete without acknowledging the rural-urban continuum. Viewing social and economic transformation through this lens will help identify challenges for improving both urban and rural governance and opportunities for enhanced access to employment, services, institutional resources and environmental management. The institutional connections between rural and urban areas operate at different levels for various development sectors. The key challenge of decision-making is to build rural-urban partnership. To achieve this, a systems approach is recommended where the city and the surroundings form a city region for which a perspective plan is prepared integrating rural and urban plans within a common frame. The city and the rural areas will finally move towards a post-urban world where the rural-dichotomy will no longer exist. It is important that the rural urban linkages are better mapped, for which satellite-based settlement data and its integration with Census data may be useful.
Date:13-03-23
सहयोग का सफरसंपादकीय
भारत और आस्ट्रेलिया के बीच कूटनीतिक संबंध पहले से ही सहज रहे हैं, लेकिन मौजूदा दौर में तेजी से बदलते वैश्विक परिदृश्य में दोनों देशों ने जैसे सरोकार दिखाए हैं, वे कई लिहाज से अहम हैं। चीन ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर राजनीतिक और आर्थिक क्षेत्र में जैसी दखल दी है और खासकर हिंद-प्रशांत क्षेत्र में उसके आक्रामक रुख के चलते पड़ोसी और सीमा से सटा देश होने के नाते भारत में जैसी चिंता पैदा की है, उसके मद्देनजर स्वाभाविक ही भारत को अपने हर मोर्चे पर मजबूत विकल्प खड़े करने के लिए अतिरिक्त प्रयास करने की जरूरत महसूस हो रही है। आर्थिक सहयोग और व्यापार समझौते को पूरा करने पर सहमति बनी आस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथनी अल्बनीज की ताजा भारत यात्रा और इस दौरान आपसी सहयोग की दिशा में बढ़े कदम को इसी संदर्भ में देखा जा सकता है। गौरतलब है कि इस दौरान रक्षा संबंधों को प्रगाढ़ बनाने के साथ-साथ भारत और आस्ट्रेलिया के बीच व्यापक आर्थिक सहयोग और व्यापार समझौते को जल्द से जल्द पूरा करने पर सहमति बनी। उम्मीद जताई गई है कि इस साल के पूरा होते-होते समझौते को अंतिम स्वरूप दे दिया जाएगा।
दरअसल, पिछले साल ही भारत और आस्ट्रेलिया के बीच आर्थिक सहयोग और व्यापार समझौते पर हस्ताक्षर हुए थे और उसी को अब जमीनी स्तर पर उतारने के लिए तेजी से काम चल रहा है। आस्ट्रेलिया भारत को मुख्य रूप से कच्चे माल का निर्यात करता है, जबकि भारत से वह परिष्कृत वस्तुओं का आयात करता है। यही स्थिति दोनों देशों के लिए अनुकूल और फायदेमंद अवसरों का निर्माण करती है। इसी क्रम में द्विपक्षीय सुरक्षा सहयोग को दोनों देशों के बीच व्यापक रणनीतिक साझेदारी के एक महत्त्वपूर्ण स्तंभ के रूप में देखा गया है। पिछले कुछ सालों के दौरान रक्षा क्षेत्र में हुए उल्लेखनीय समझौते के तहत एक-दूसरे की सेनाओं के लिए साजो-सामान के समर्थन से लेकर सुरक्षा एजंसियों के बीच नियमित और उपयोगी सूचनाओं का आदान-प्रदान होता रहा है। अब उस तंत्र को और मजबूत करने पर बात बढ़ी है। आतंकवाद और आतंकी संगठनों के खिलाफ साझा और ठोस लड़ाई पर बनी सहमति को वक्त का तकाजा कहा जा सकता है। साथ ही दोनों पक्षों ने खेल, नवाचार, दृश्य-श्रव्य उत्पादन और सौर उर्जा के क्षेत्रों में आपसी सहयोग के लिए चार समझौतों पर हस्ताक्षर किए।
अल्बनीज की यात्रा के दौरान एक अहम बिंदु यह भी रहा कि भारत के प्रधानमंत्री ने उनके सामने आस्ट्रेलिया में पिछले दिनों कुछ मंदिरों पर हमलों को लेकर आपत्ति दर्ज कराई। जब दो देशों के बीच सहयोग का विस्तार होता है, तो उसमें सांस्कृतिक स्तर पर एक-दूसरे का खयाल रखना जरूरी पक्ष होता है। यही वजह है कि आस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री ने कहा कि धार्मिक स्थलों पर हमलों के लिए जिम्मेदार किसी भी व्यक्ति को कानूनी सख्ती का सामना करना पड़ेगा। भारत और आस्ट्रेलिया अगर सुरक्षा सहित हर मोर्चे पर आपसी सहयोग के तंत्र को व्यापक बनाने की कोशिश कर रहे हैं तो इसका असर चीन की कूटनीति पर भी पड़ेगा। यह किसी से छिपा नहीं है कि चीन भारतीय सीमा में अक्सर नाहक दखल देता और जानबूझ कर विवाद पैदा करने की कोशिश करता रहा है। चीन शायद इसलिए भी ऐसा कर पाता है कि भारत का सहिष्णु और धीरज का रुख उसे अपनी मनमानी के अनुकूल लगता है। मगर सच यह है कि भारत ने इस मसले को हमेशा ही संवेदनशील माना है। अपने स्तर पर मोर्चे को मजबूत करने के अलावा अन्य देशों के साथ-साथ आस्ट्रेलिया से रणनीतिक साझेदारी को व्यापक स्वरूप देना इसी का हिस्सा है।
Date:13-03-23
मशीनी मेधा से पैदा होती चुनौतियांसंजीव राय
कृत्रिम मेधा यानी ‘आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस’ (AI) को लेकर चर्चा तेज हो गई है। जैसे-जैसे मानवीय जीवन की जटिलताएं बढ़ रही हैं, मनुष्य वैकल्पिक तरीकों से उनका समाधान निकालने का प्रयास कर रहा है। एक तरफ देश और दुनिया की बढ़ती आबादी है, जिसके लिए संसाधनों की चिंता करनी है, वहीं मनुष्य द्वारा किए जाने वाले कई काम अब कृत्रिम मेधा की मदद से किए जा रहे हैं। कृत्रिम मेधा युक्त मशीन वैसे ही काम कर रही है, जैसे मनुष्य करता है। निरंतर शोध का परिणाम है कि इस मशीन से गलती कम और काम की गति तेज हो रही है। विद्यार्थी के सीखने के तरीके के आधार पर उसको सहयोग देने, भाषा प्रसंस्करण करने, आनलाइन गेम खेलने से लेकर रोगों के उपचार, सर्जरी तक कृत्रिम मेधा की जरूरत पड़ रही है।
तकनीक के सहयोग से विद्यार्थियों को निर्देश और व्याख्यान दिए जा सकते हैं। कृत्रिम मेधा का उपयोग करके उत्तर कुंजी की मदद से परीक्षा का मूल्यांकन और आंकड़ों के जरिए छात्रों के परिणाम का विस्तृत विश्लेषण किया जा सकता है। यही नहीं, उत्तर पुस्तिका में जो गलती छात्रों से हुई है, कृत्रिम मेधा के सहयोग से उसे भी आसानी से रेखांकित किया जा सकता है। कृत्रिम मेधा की शुरुआत 1956 में जान मैकार्थी द्वारा की गई थी। इसके लिए कंप्यूटर द्वारा निर्मित रोबोटिक प्रणाली तैयार की जाती है, फिर उसे मानव मस्तिष्क के आधार पर साफ्टवेयर की मदद से प्रोग्रामिंग करके सोचने-समझने और चलाने का प्रयास किया जाता है।
कृत्रिम मेधा विश्लेषण करती है कि मानव मस्तिष्क कैसे सोचता, समझता और सीखता है, फिर उस विश्लेषण के आधार पर अपना ‘अल्गोरिद्म’ बनाती और काम करती है। ऐसे ही यह विद्यार्थियों के कौशल और दक्षता का मूल्यांकन करके उन्हें उच्च दक्षता के लिए निर्देशित कर सकती है। कुछ कंपनियां कृत्रिम मेधा का उपयोग करके अलग-अलग उम्र के बच्चे के लिए रुचिकर गणित-भाषा के लिए आनलाइन और वीडियो गेम बना रही हैं। भाषा के व्याकरण, शब्द और वाक्य विन्यास जैसी अशुद्धियों को ठीक कर रही हैं। इस तरह के ऐप आने से भाषा-संपादन के लिए दूसरों पर निर्भरता कम होती जा रही है।
अस्सी के दशक से पांचवीं पीढ़ी का कंप्यूटर बनाने की परियोजना शुरू हुई और फिर सुपर कंप्यूटर बनने लगे। 1997 आते-आते ऐसे सुपर कंप्यूटर बन गए, जिनका मस्तिष्क सामान्य मनुष्य से तेज चलने लगा। ‘डीप ब्लू’ नामक आइबीएम के कंप्यूटर का दिमाग इतना तेज हो गया कि उसने शतरंज के एक मशहूर खिलाड़ी को हरा दिया था। उसकी सफलता ने ऐसे कंप्यूटर बनाने का रास्ता खोला, जो कठिन गणितीय गणना, वित्तीय माडलिंग, बाजारों का रुझान, गंभीर खतरों का विश्लेषण आदि कर सकें। ‘डीप ब्लू’ के बाद की पीढ़ी के ‘वाटसन’ नामक कंप्यूटर ने फरवरी, 2011 में कृत्रिम मेधा के सहयोग से शतरंज के दो मशहूर खिलाड़ियों को लाखों लोगों के सामने हरा दिया।
आज हर जरूरत के अनुसार अलग-अलग तरह के कृत्रिम मेधा के माडल तैयार हैं- कुछ पूर्णत: प्रतिक्रियात्मक हैं, तो कुछ की स्मृति सीमित है। मगर जिस तरह से विकसित और विकासशील देशों में शोध जारी हैं, आने वाले दिनों में मनुष्य के मस्तिष्क को सबसे बड़ी चुनौती कृत्रिम मेधा के माडल से मिलने वाली है। नए दौर के माडल मस्तिष्क सिद्धांत और आत्म-चेतन के आधार पर कार्य करेंगे। इसकी झलक ‘चैट बोट’ के कई विकल्पों से मिलती है। इसके कुछ प्रमुख उदहारण, अलेक्सा, गूगल का अस्सिटेंस होम, एप्पल का सीरी आदि हैं। ये सभी ‘चैट बोट’, मशीनी प्रशिक्षण और आपके दिशा-निर्देश पर काम करते हैं। ‘चैट बोट’ दो तरह के होते हैं। एक, जो मौखिक निर्देश पर काम करते हैं और दूसरे, लिखित निर्देशन पर काम करते हैं।
इन दिनों ‘चैट जीपीटी’ बहुत चर्चा में है। एक तरह का ‘कंप्यूटर साफ्टवेयर लैंग्वेज माडल’ है, जो ‘की-इनपुट कमांड’ के आधार पर जानकारी देता है। कुछ दिनों पहले इसे जारी किया गया और देखते-देखते इसकी लोकप्रियता दुनिया भर में फैल गई। आपको कोई चिट्ठी बनानी है, कोई छोटा लेख लिखना है, कोई प्रस्ताव बनाना है, यह सब काम ‘चैट जीपीटी’ दस मिनट में कर देगा! इसके आने से ऐसी आशंका है कि लाखों लोगों की नौकरी चली जाएगी। इससे शोध कार्य और ‘कापी राइट’ भी प्रभावित होने वाले हैं। मान लीजिए, किसी छात्र को पर्यावरण पर एक लेख लिखना है और वह ‘चैट जीपीटी’ की मदद से वह लेख लिख दे, तो उस लेख का वास्तविक लेखक कौन हुआ, ‘चैट जीपीटी’, वह छात्र या ‘चैट जीपीटी’ ने जहां से सामग्री ली? मगर अभी यह जानना एक समस्या है कि ‘चैट जीपीटी’ कहां से सामग्री ले रहा है और वह जानकारी कितनी तथ्यपरक है?
कृत्रिम मेधा की मदद से चौबीस घंटे काम करने वाली एक मशीन मिल जाएगी। वह स्वचालित तरीके से काम करेगी और गलतियां भी कम करेगी। मगर सवाल है कि क्या यह मशीन मानवीय रचनात्मकता का मुकाबला कर पाएगी? स्कूल-कालेज-विश्वविद्यालयों के अनेक प्रशासनिक कार्य, कक्षा में हाजिरी लेना आदि कृत्रिम मेधा की मदद से होगा, लेकिन शिक्षण के लिए एक ‘हाइब्रिड माडल’ के उभरने की संभावना है। मैथ्यू लिंच शिक्षा में कृत्रिम मेधा की बहुत संभावना देखते हैं। वे शिक्षक की पाठ योजना से लेकर भाषा सीखने, परीक्षा की तैयारी और छात्रों-अभिभावकों के साथ संवाद, व्यावसायिक प्रशिक्षण और मानव संसाधन के व्यवस्थापन आदि में इसकी उपयोगिता देखते हैं।
उच्च शिक्षा में कृत्रिम मेधा आजकल शोध कार्य में अकादमिक चोरी रोकने के लिए प्रयुक्त होती है। शोध छात्र को शोध प्रबंध के मौलिक होने का एक प्रमाणपत्र लेना होता है, तभी वह विश्वविद्यालय में अपना शोधकार्य प्रस्तुत कर पाता है। कुछ साफ्टवेयर, शोधकार्य में किसी दूसरे से ली गई एक-एक लाइन को पकड़ लेते हैं। मगर अब ‘चैट जीपीटी’ को शोध में अकादमिक लेखन के लिए उपयोगी भी माना जा रहा है, क्योंकि इसके सहयोग से सामग्री का अनुवाद, लंबे लेख को संक्षेप में लिखने आदि में मदद मिल रही है। मगर इसकी सीमा यह है कि यह मौलिक विचार नहीं प्रस्तुत कर सकता। यह उपलब्ध सामग्री ही प्रस्तुत करता है और वह भी बिना संदर्भ के। इस तरह इसमें किसी और की सामग्री का इस्तेमाल होने और कभी पक्षपातपूर्ण रवैए का खतरा भी है।
भारत सरकार ने कृत्रिम मेधा के महत्त्व को पहचानते हुए शैक्षणिक संस्थानों में उत्कृष्टता केंद्र बनाने का निर्णय किया है। भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान हैदराबाद और कुछ अन्य संस्थान अब कृत्रिम मेधा में स्नातक कार्यक्रम चला रहे हैं। ऐसी संभावना है कि आने वाले दिनों में ‘चैटबोट’, ‘रोबोटिक्स’, ‘मशीन लर्निंग’ न सिर्फ शिक्षा और शिक्षक प्रशिक्षण में शामिल हो जाएंगे, बल्कि इनके अपने काम के मूल्यांकन की एक पद्धति भी विकसित हो जाएगी। इसके बढ़ते प्रभाव से अकादमिक कार्यों की गुणवत्ता कैसी होगी, यह तो आने वाले वक्त में पता चलेगा।
दुनिया भर में कृत्रिम मेधा, ‘रोबोटिक्स’, ‘डिजिटल मैन्युफैक्चरिंग’, ‘बिग डाटा इंटेलिजेंस’, ‘रियल टाइम डाटा’ और ‘क्वांटम कम्युनिकेशन’ के क्षेत्र में शोध, प्रशिक्षण, मानव संसाधन और कौशल विकास का कार्य बढ़ता जा रहा है। बहुत सारी कंपनियां इनका उपयोग व्यापारिक हित में कर रही हैं। कृत्रिम मेधा अब कई अरब डालर का उद्योग बन गया है। मगर इसमें व्यक्ति से लेकर राष्ट्र तक की गोपनीयता भंग होने का खतरा भी है, जिसमें सुरक्षित डेटा रखना एक चिंता की बात है। कुछ लोग मानते हैं कि कृत्रिम मेधा पर अत्यधिक निर्भरता मनुष्य की निजता और गरिमा के लिए खतरा हो सकता है। मगर यह तो तय है कि कृत्रिम मेधा हमारे रहन-सहन, काम करने, पढ़ने-पढ़ाने, शोध के तरीकों में व्यापक बदलाव लाने वाली है।
Date:13-03-23
सुधार की तेज होती पहलजयसिंह रावत
सर्वोच्च अदालत की पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने आखिरकार, निर्वाचन आयोग की निष्पक्षता और विश्वसनीयता सुनिश्चित करने के लिए निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति की सरकारी व्यवस्था को बदलने का ऐतिहासिक फैसला ले ही लिया। मौजूदा व्यवस्था की खामियों के कारण आयोग की निष्पक्षता पर तो सवाल उठते ही रहे साथ ही इसकी विश्वसनीयता भी सवालों के घेरे में रही। आज हालत यह है कि आयोग निष्पक्षता से फैसले लेता भी है, तो उस पर उंगली उठ ही जाती है क्योंकि सरकारी नियंत्रण और सत्ताधारी दलों की कारगुजारियों पर से नजर फेर देने की मजबूरी के कारण उसकी विश्वसनीयता का ह्रास होता गया है।
आज हमारे सामने विश्व की जो लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था है, वह हजारों सालों के अनुभवों का फल होने के साथ ही मानव सभ्यता का बेहतरीन पड़ाव भी है। भारत दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, इसलिए बेहतरीन लोकतांत्रिक शासन की मिसाल पेश करने की जिम्मेदारी भी भारत की ही है। लेकिन सत्ता की हवस हर हाल में अपने पक्ष में व्यवस्थाएं चाहती है। इसीलिए अब तक निर्वाचन आयोग सरकार के नियंत्रण से मुक्त नहीं हो पाया। वास्तव में जब तक निर्वाचन आयोग में सुधार नहीं आता तब तक राजनीतिक भ्रष्टाचार से मुक्ति नहीं मिल सकती। देखा जाए तो भ्रष्टाचार की गंगोत्री चुनाव से ही बहनी शुरू होती है। मसलन, कौन नहीं जानता कि बिना धन-बल चुनाव जीतना नामुमकिन है। देश में भ्रष्टाचार और अनाचार की यही असली जड़ है। निर्वाचन आयोग विपक्ष के उम्मीदवारों पर नजर तो रखता है मगर सत्ताधारियों पर उसकी नजर नहीं पड़ती। जो लोग अनुचित तरीकों से सत्ता में आएंगे, उनसे सदाचार की अपेक्षा कैसे की जा सकती है।
अगर सरकारें स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव चाहती हैं, तो स्वतंत्र निर्वाचन आयोग से डर क्यों? जब सीबीआई के निदेशक की नियुक्ति एक कमेटी द्वारा कराई जा सकती है, तो फिर निर्वाचन आयोग के सदस्यों की नियुक्ति निष्पक्ष एवं स्वतंत्र व्यवस्था के तहत क्यों नहीं? सीबीआई सरकारी विभाग है, कोई संवैधानिक संस्था नहीं। उसके निदेशक के चयन के लिए नई व्यवस्था इसलिए की गई ताकि वह स्वतंत्र एवं निष्पक्ष होकर कर दूध का दूध और पानी का पानी कर सके। जब सीबीआई की निष्पक्षता के लिए प्रधानमंत्री की अध्यक्षता में प्रतिपक्ष के नेता और प्रधान न्यायाधीश या उनके द्वारा नामित एक जज की कमेटी की आवश्यकता महसूस की गई तो निर्वाचन आयोग के सदस्यों के लिए ऐसी ही कमेटी क्यों नहीं। सीबीआई ही नहीं, मुख्य सतर्कता आयोग, मुख्य सतर्कता आयुक्त, राज्यों के सूचना आयोगों के सदस्यों और राज्यों के लोकायुक्तों और केंद्र के लोकपाल के गठन के लिए भी स्वतंत्र कमेटी के गठन की व्यवस्था है। लोकतंत्र की मजबूती और उसके लिए चुनाव व्यवस्था की शुचिता के लिए चुनाव सुधार हेतु कमेटियों का गठन होता रहा है, और समितियों की सिफारिशों पर महत्त्वपूर्ण निर्णय भी लिए जाते रहे हैं। जैसे मतदाताओं की न्यूनतम उम्र सीमा 18 वर्ष करना, फोटो पहचान पत्र की व्यवस्था, ईवीएम मशीनों का चलन, मतदान से पहले चुनावी सर्वेक्षणों पर रोक और नोटा की शुरुआत आदि कई नई व्यवस्थाएं शुरू हुईं मगर चुनाव आयोग को निष्पक्ष और सरकार के नियंत्रण से मुक्त करने की दिशा में प्रयास नहीं हुए।
चुनाव सुधार की दिशा में सबसे पहले 1990 में दिनेश गोस्वामी कमेटी का गठन हुआ। समिति ने सिफारिश की थी कि राजनीतिक दलों को चुनाव आयोग के साथ पंजीकरण कराना चाहिए और अपने धन के स्रोतों का खुलासा करना चाहिए। यह भी सिफारिश की कि चुनावों में धन और बाहुबल के इस्तेमाल पर रोक लगाई जानी चाहिए। गोस्वामी समिति के बाद 1998 में इंद्रजीत गुप्त समिति ने सिफारिश की कि स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनाव सुनिश्चित करने के लिए चुनाव आयोग के पास अधिक शक्तियां होनी चाहिए। यह भी सिफारिश की कि राजनीतिक दलों को अपने वार्षिक लेखा परीक्षित खातों को चुनाव आयोग को प्रस्तुत करने की आवश्यकता होनी चाहिए।
इसके बाद 2001 में संविधान के कामकाज की समीक्षा के लिए गठित राष्ट्रीय आयोग ने सिफारिश की कि लोक सभा और राज्य विधानसभाओं के चुनावों में आनुपातिक प्रतिनिधित्व की प्रणाली शुरू हो। 2015 में विधि आयोग ने चुनाव में धन और बल के इस्तेमाल को आपराधिक कृत्य मानने की सिफारिश की। उसके बाद 2017 में एक विशेषज्ञ कमेटी ने ईवीएम के साथ वीवीपैट की व्यवस्था की सिफारिश की। मगर अब तक निर्वाचन आयोग को सरकार के चंगुल से मुक्त करने की बात किसी ने नहीं की। मुख्य निर्वाचन आयुक्त समेत सभी सदस्यों की नियुक्ति केंद्र सरकार अपनी सुविधानुसार करती है, लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद प्रधानमंत्री, लोक सभा प्रतिपक्ष के नेता और सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश की कमेटी आयोग के सदस्यों का चयन करेगी।
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हाल ही में चुनाव आयोग ने भाजपा, कांग्रेस और सीपीएम के प्रतिनिधियों को त्रिपुरा विधानसभा चुनावों के मद्देनजर नोटिस जारी किया था। यह नोटिस उन्हें चुनाव के ठीक एक दिन पहले तक सोशल मीडिया पर ट्वीट करने के विरूद्ध जारी किया गया था।
चुनाव आयोग का पक्ष –
आस्ट्रेलिया में भी मतदान पहले चुनाव प्रचार पर रोक का प्रावधान है, जिसे ‘ब्लैक आउट पीरिएड’ के नाम से जाना जाता है। वहाँ भी सोशल मीडिया के कारण इस कानून की विफलता की समस्या आ रही है। अतः अब समय आ गया है, जब चुनाव आयोग को इस समस्या से मुक्त करने के लिए संसद कोई हल निकाले।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 18 फरवरी, 2023
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Date:11-03-23
The Real AIpocalypseIt’s not colonisation by the machines but by Western algorithms that India needs to ward off – with our own hardware, software, chips and large language modelsChetan Bhagat
Artificial intelligence has become thehottest sector since the company OpenAI launched its AI bot called ChatGPT on November 30 last year. This is a query tool, like a search engine, which gives intelligent, thought-through answers in perfect English sentences. It can do college assignments, write computer code, help you plan a party and suggest an itinerary for your next holiday. We could even have asked ChatGPT to write this column and it may have written it better!
ChatGPT has acquired 100 million users in a matter of two months and made search-engine giant and near monopoly Google nervous enough to announce its own AI-query tool Bard. It’s an AI arms race now. Chipmakers, software providers, internet companies – allare trying to take the lead in this technology.
Many experts say we are at a turning point where AI gets close to humans in intelligence and is set to surpass us. This is associated with three main implications/fears.
● Will AI take away all the jobs? Who will hire annoying, smart humans when an obedient, servile machine will be smarter?
● Will some countries take the lead in AI, giving them ahuge advantage? Will the rich, developed countries get disproportionate intelligence as well, creating even more inequality?
● Will machines control humans in the future? Will super smart computers and their own AI-generated algorithms run the world? Could they eventually harm humans? If this is all too confusing and scary, well, it should be. AI is a technology like none other. It can use itself to keep advancing itself.
On the first issue of jobs, AI will certainly eliminate certain human tasks – just as computers and automated machines did a few decades ago. Accounting software took away the need to do paper ledger bookkeeping. Knitting machines took away the need to hand-knit sweaters. This time, AI will take away more complex and intelligent tasks. It could take over a lot of advisory work – travel, legal, financial and even medical advice for instance.
Yet, this doesn’t mean there will be massive jobeliminations. Raw intelligence is a wonderful thing, but one needs more than that in life. You need the human touch, an emotional connect, in most advisory roles. A bot may give you legal advice, but won’t you ultimately need a trusted human lawyer to sign off on it?
An accountability vacuum
AI also cannot do something vital that humans do – take accountability. If some AI-generated advice goes wrong, who is responsible?
Hence, at least in the foreseeable future, AI will still require a human to make it useful. Jobs will change rather than get eliminated.
On the second fear, it is indeed true that the few countries taking the lead in AI are at a huge advantage. India must evolve our own AI models, so we have more representative AI.
● The country’s small AI industry needs a hardware upgrade.
● So we must invest in advanced chip design and manufacturing on a priority basis.
● This is no less important than roads and airports.
Make no mistake, if the West imposes their AI on us, it will be another way we will get controlled. We do not want this digital colonisation.
On the third, far-fetched but still plausible fear of AI taking over the world and controlling humans, this istechnically possible. For there are no theoretical limits to a system of intelligence that can keep self-improving to become even more intelligent. AI can reach a level of super-intelligence beyond human comprehension. If AI-based systems run the world, there is a chance they can make decisions overriding us. This AI apocalypse theory, however, is improbable for now.
The human brain is very complex and involves several aspects other than intelligence. We feel things. We react to things based on our feelings and in an unpredictable manner. If you haven’t slept well the night before, you may get irritated and shout at a coworker if he missed a deadline. If you slept well and are in a good mood, you may be more patient and supportive. That’s called being human.
On AS: Artificial Stupidity
We have emotional states, linked to our physiological and physical states, which dictate a lot of our decisions. Our intelligence might tell us to avoid eating jalebis and yet we might find them impossible to resist when someone places them in front of us. What are we doing in such cases then? Being stupid? Being human is being stupid sometimes.
While we do have AI, it does not yet have AS, or Artificial Stupidity, built into it and integrating the two will be a tough task. Only humans can be intelligent and stupid, each in a unique manner.
● Also, we must realise the difference between intelligence and power.
● If intelligence was all it took to run the world, nerdy professors would rule us.
● Like all powerful things, AI will ultimately be controlled by the rich and powerful humans, not machines.
Power doesn’t come automatically with intelligence; humans have to give power to someone. Right now, it seems unlikely that we will hand machines the power to control us. In the very long term, well, who knows?
What we do know is that AI will have a massive impact in the coming decades. India must view it as a strategic industry and enable massive investments in it across all levels – public and private, in hardware and software. Artificial intelligence is here to stay, let’s use our natural intelligence to harness it for the benefit of our nation.
Date:11-03-23
The Supreme Court Must Be Supremely CarefulIn EC case, judges accepted petitioners’ arguments on media ‘bias’ without a detailed studyDhananjay.Mahapatra
Recently, the Supreme Court using its omnibus powers under Article 142 of the Constitution virtually legislated to prescribe a new selection procedure for chief election commissioner and election commissioners in a bid to make the body – constitutionally tasked to conduct free and fair elections – truly independent and neutral.
In the judgment, Justice KM Joseph-led five-judge constitution bench adversely remarked on media, relying on petitioners’ arguments, a 2012 report of the Hindu newspaper and a report by ‘Citizens Commission on Elections’, which was headed by former SC judge Madan B Lokur and included ex-CIC Wajahat Habibullah, a former IAS officer close to former PMs Indira Gandhi and Rajiv Gandhi.
Adverse comments were on three counts – it could be disastrous for the country as certain sections of media, guardians of the rights of citizenry, are overlooking the vice of electoral malpractices (paragraph 164); certain sections of media are “unashamedly partisan” (paragraph 223); and third, the need for an independent EC because of the influence of certain section of media on elections (paragraph 225).
SC is a court of record. It invariably bases findings and conclusions on unimpeachable documents. Did any petitioner submit documents or independent surveys, which meticulously analysed the role of each newspaper, television channel and web news portal to enable court to conclude that “a section of the media” has become “biased”, and forgotten its role as guardian of citizens’ rights.
Independence and integrity of media in publishing news or columns depends on the conviction and character of reporters or columnists. It is difficult to regulate these qualities in scribes through laws enacted by Parliament, rulings of SC or model guidelines framed by EC. We have seen how the best of journalists are dictated to by politicians, corporate media lobbyists to attempt to push under the carpet ills that plague the polity, corporate world and judiciary. Citizens have immense faith in the judiciary. Does it mean they do not know about unscrupulous elements within?
Decriminalisation of politics has been a utopian idea since Independence. The 1991 Vohra Committee report on politician-criminal-police nexus revealed how the unholy alliance influenced governance right from the 1950s. A series of SC’s judgments to address this issue yielded little result. It is akin to believing the Prevention of Corruption Act and numerous SC rulings would erase corruption from India.
In its EC judgment, SC said, “Criminalisation of politics, a huge surge in the influence of money power, the role of certain sections of the media where they appear to have forgotten their invaluable role and have turned unashamedly partisan. ” Two paragraphs later, “The electoral scene in the country is not what it was in the years immediately following the country becoming a republic. Criminalisation of politics, with all its attendant evils, has become a nightmarish reality. The faith of the electorate in the very process, which underlies democracy itself, stands shaken. The impact of ‘big money’ and its power to influence elections, the influence of certain sections of media, makes it also absolutely imperative” to create a process for infusing independence in EC’s functioning.
Alas! SC appeared unaware of the reality of political battlefields. The first recorded incidence of booth capturing was in 1957 at Rachiyari polling station in Bihar’s Begusarai district. For decades thereafter,bullet-aided booth capturing was the most potent means for powerful politicians to destroy opponents. Surprisingly, Parliament waited till March 1989 to insert Section 58A in the Representation of People Act, which empowered EC to postpone/countermand elections on receiving reports about booth capturing.
SC can surely comment on media based on a countrywide independent survey. Relying on reports of commissions, which included former judges and bureaucrats whose decisions have been debated, and on arguments of lawyers who praise media when it treats their words as gospel, is surely assumption that poses danger to SC’s character as a court of record.
Will SC permit citizenry to make an assumption about honesty and integrity of judges basis statements of two former CJIs? On December 22, 2002, then CJI SP Bharucha had said: “More than 80% of judges are honest and incorruptible. ” Did he mean a little less than 20% are dishonest and corrupt? That would be worrisome given the sanctioned strength of judges in constitutional courts.
In November 2010, then CJI SH Kapadia had said, “I will prove that within the current [collegium] system, in the next two years, when I am CJI, that good judges can be appointed. ” Will this enable citizenry to assume appointments made on collegium’s recommendations to constitutional courts prior to 2010 were not so good? What is the guarantee that all appointments made after CJI Kapadia’s retirement were good? These are dangerous assumptions, when not backed by data collected independently. But what is independent data these days when even surveyors have various loyalties?
Date:11-03-23
डेट से इक्विटी की ओरटी एन नाइनन
हिंडनबर्ग रिसर्च ने शॉर्ट सेलिंग के माध्यम से अदाणी समूह पर जो हमला किया उसका एक अनचाहा लेकिन अच्छा परिणाम भावी ‘राष्ट्रीय चैंपियंस’ (बड़े कारोबारी समूह जिनकी योजना सरकारी योजना और प्रोत्साहन के अनुरूप भारी भरकम निवेश करने की है) के लिए यह हुआ है कि वे अपनी महत्त्वाकांक्षाओं को पूरा करने के क्रम में अत्यधिक ऋण लेने के खतरों के प्रति सचेत हुए हैं। हिंडनबर्ग के निशाने पर रहे कारोबारी गौतम अदाणी बीते कुछ सप्ताहों के दौरान तेजी से कर्ज चुकाकर अपने समूह के आत्मविश्वास को बहाल करने की कोशिश में लगे हैं। वेदांत समूह के अनिल अग्रवाल भी मध्यम अवधि में एक लाख करोड़ रुपये से अधिक का कर्ज चुकता करके ऋण शून्य स्थिति प्राप्त करने की बात कर रहे हैं। मुकेश अंबानी ने तीन साल पहले लगातार इक्विटी सौदों की मदद से 1.6 लाख करोड़ रुपये का कर्ज चुकाकर ऐसा ही किया था। परंतु अदाणी का कर्ज बहुत अधिक यानी लगभग 3.39 लाख करोड़ रुपये का है, हालांकि वह खुद इस आंकड़े को काफी कम बताते हैं। ऋण से जल्दी निजात पाना आसान नहीं है। अग्रवाल ने हाल ही में अपने नियंत्रण वाली दो जिंक उत्पादक कंपनियों के विलय का प्रयास किया जिसे सरकार ने रोक दिया। सरकार की इनमें से एक कंपनी में अल्पांश हिस्सेदारी थी। अदाणी ने शेयरों का वचन देकर कर्ज चुकता करने की बात कही थी लेकिन कर्जधारक अतिरिक्त शेयरों की मांग कर रहे हैं क्योंकि अदाणी समूह के शेयरों की कीमतें गिरी हैं। इससे एक ऑस्ट्रेलियाई समूह के द्वितीयक बाजार निवेश ने उसके शेयरों की कीमत बढ़ा दी है।
जाहिर है इस समय बाजार में डेट की जगह इक्विटी ने ले ली है। इसका परिणाम कर्ज चुकाने की बढ़ी हुई लागत के रूप में सामने आ सकता है क्योंकि केंद्रीय बैंकों ने ब्याज दरों में इजाफा किया है। इसके साथ ही बॉन्ड धारकों की जोखिम को लेकर बढ़ी हुई जागरूकता के कारण भुगतान का समय करीब आते ही रोल ओवर (किसी वित्तीय व्यवस्था को विस्तारित करना) मुश्किल हो जाता है। इसके बाद प्रतिष्ठा का भी मसला है। कर्ज अदायगी से क्रेडिट रेटिंग में गिरावट रुक सकती है। वैश्विक बाजार कारोबारी नहीं चाहते कि उनके पास जो निवेश पत्र हैं उनमें 30 फीसदी या इससे अधिक की गिरावट आए। ऐसा होने के कारण कम से कम तीन अंतरराष्ट्रीय बैंकों ने कहा कि वे अदाणी समूह के प्रपत्र स्वीकार नहीं करेंगे। लेकिन प्रतिष्ठा का मसला यहीं तक सीमित नहीं है। इसका आभास अदाणी को तब हुआ जब फ्रांस की दिग्गज ऊर्जा कंपनी टोटाल ने प्रस्तावित संयुक्त उपक्रम से दूरी बना ली। कई लोग यह भी याद करेंगे कि कैसे महत्त्वाकांक्षी, कर्ज लेने को आतुर कारोबारियों की एक पुरानी पीढ़ी ने भारी भरकम परियोजनाएं शुरू कर दी थीं जिनका कर्ज बेतहाशा बढ़ गया था और बाजार की हकीकत बदलने के साथ ही वे कारोबारी भी डूब गए थे। व्यापक अर्थव्यवस्था को इसकी कीमत चुकानी पड़ी क्योंकि बैंकों की बैलेंस शीट पर भी इसका असर पड़ा और वित्तीय क्षेत्र आधे दशक तक बुरी तरह प्रभावित रहा। इस बार उस घटना का दोहराव होने के पहले ही लगाम लगा दी गई। भले ही हिंडनबर्ग के सभी आरोप सही नहीं हों लेकिन इस बात के लिए उसका शुक्रगुजार रहना चाहिए कि उसने वक्त रहते एक किस्म की चेतावनी दी।
ऐसे में सवाल यह है कि बड़ी परियोजनाओं की फंडिंग कैसे होगी। भारत की हरित ऊर्जा, सेमी कंडक्टर, दूरसंचार, रक्षा और परिवहन अधोसंरचना संबंधी महत्त्वाकांक्षाएं इन्हीं चुनिंदा बड़ी कंपनियों पर निर्भर हैं। रिलायंस और टाटा समूह दोनों के पास पर्याप्त नकदी है लेकिन अदाणी को अब अपनी निवेश योजनाओं पर नए सिरे से विचार करना होगा। हिंडनबर्ग मामले के बाद अदाणी समूह पहले की कुछ निवेश योजनाओं को ठप कर चुका है। अब यह देखना होगा कि क्या वेदांत समूह जिसने सेमी कंडक्टर परियोजना के लिए फॉक्सकॉन के साथ समझौता किया है, उसे अभी अपनी कुछ योजनाओं को इसी तरह बंद करना पड़ेगा? जेएसडब्ल्यू समूह की बात करें तो उसका कर्ज करीब एक लाख करोड़ रुपये है। इसे प्रबंधनयोग्य माना जा रहा है लेकिन उसके पास भी और अधिक कर्ज की गुंजाइश नहीं है।
इससे संकेत मिलता है कि भारत को बड़ी कंपनियों का एक व्यापक आधार चाहिए। कई कंपनियों ने अपने कर्ज-इक्विटी अनुपात में हाल के वर्षों में सुधार किया है लेकिन क्या वे इतनी बड़ी हैं कि भारी-भरकम परियोजनाओं को संभाल पाएं? अगर नहीं तो सरकार को इसके लिए सरकारी क्षेत्र पर ही भरोसा करना होगा। यहां मुश्किल यह है कि बजट के जरिये दिया गया पूंजी निवेश पहले ही बहुत अधिक है और अगर सरकार आगे और मदद करती है तो राजकोषीय गणित का बिगड़ना तय है। आखिर में कुछ योजनाओं पर पुनर्विचार करना ही होगा।
Date:11-03-23
विकास के बजाय उपहार का सहाराविनोद के शाह
जनता को मुफ्त सुविधाएं बांटने के फेर में केंद्र और राज्य सरकारें कर्ज के बोझ तले दबती जा रही हैं। वित्तवर्ष 2022-23 में केंद्र सरकार ने 4.36 लाख करोड़ रुपए की सबसिडी बांटी है। आगामी वित्तवर्ष 2023-24 में केंद्र ने सबसिडी को कम जरूर किया है, लेकिन कोरानाकाल से जारी मुफ्त राशन योजना को दिसंबर 2023 तक विस्तार दे दिया है। राष्ट्रीय खाद्यान्न योजना के अंतर्गत देश भर में मुफ्त अनाज लेने वाले लाभर्थियों की संख्या करीब नब्बे करोड़ है। केंद्रीय मंत्री संसद में स्वीकार कर चुके हैं कि राज्यों में फर्जी राशन कार्डों के माध्यम से 55.37 लाख अपात्र लाभार्थी योजना का लाभ ले रहे हैं। वित्तवर्ष 2022-23 में केंद्र ने मनरेगा पर नब्बे हजार करोड़ रुपए खर्च किए।बदले में पच्चीस फीसद विकास कार्य भी देश में नहीं दिखाई दिए हैं। रिजर्व बैंक का आकलन है कि बीते वर्ष में राजस्व में एक फीसद की अवश्य वृद्धि हुई है, लेकिन केंद्रीय बजट में सबसिडी का हिस्सा सात फीसद तक पहुंच गया है। यानी सरकार जीएसटी और अन्य करों के माध्यम से वसूली कर रही है, तो उससे कई गुना राशि मुफ्त में बांट रही है।
सत्तारूढ़ राजनीतिक दलों में चुनाव जीतने के लिए मुफ्त रेवड़ी की घोषणा एक सुलभ उपाय के रूप में प्रतिष्ठित हुआ है। इससे देश का बुनियादी ढांचा चरमरा गया है। अब देश के आम आदमी की मानसिकता गरीब बनकर जीवन यापन की हो चुकी है। वह अपने स्तर से ऊपर आना भी नहीं चाहता, क्योंकि उसे मिलने वाली मुफ्त और अनुदान आधारित योजनाओं के छिन जाने का डर है! देश के दस राज्य अपनी कर्ज लेने की अंतिम सीमा रेखा पार कर चुके हैं। आरबीआइ की रिपोर्ट बताती है कि इन राज्यों ने मुफ्त बांटने की योजनाओं पर रोक नहीं लगाई, तो राज्यों में विकास की स्थिति श्रीलंका और पाकिस्तान जैसी होगी। इस रिपोर्ट के मुताबिक देश के तीस राज्यों ने अप्रैल 2022 से दिसंबर 2022 तक नौ माह की अवधि में 2.28 लाख करोड़ रुपए का कर्ज लिया था, जबकि अगले तीन माह जनवरी 2023 से मार्च 2023 तक 3.34 लाख करोड़ रुपए का कर्ज लेने की कतार में शामिल थे।
आरबीआइ की रिपोर्ट में घोषित दस राज्यों- पंजाब, केरल, बिहार, राजस्थान, पश्चिम बंगाल, आंध्रप्रदेश, उत्तर प्रदेश, हरियाणा, झारखंड, मध्यप्रदेश के हालात ये हैं कि इनकी समस्त आय का नब्बे फीसद हिस्सा कर्मचारियों की तनख्वाह, पेंशन, ब्याज, सबसिडी पर खर्च हो रहा है। सभी व्यय के बाद इन राज्यों में विकास के लिए दस फीसद हिस्सा भी नहीं बच रहा है। सवाल यह भी है कि क्या ये राज्य लिए गए कर्ज कभी लौटा पाएंगे? स्थितियां बदतर हैं, लेकिन चुनावी प्रबंधन के लिए मुफ्त घोषणाओं में कोई भी सरकार पीछे नहीं है। रिजर्व बैंक की गणना के अनुसार सरकार के वित्तीय अनुशासन में कर्ज का बोझ उस राज्य की जीडीपी के तीस फीसद से अधिक नहीं होना चहिए, लेकिन पंजाब 53.3 फीसद, राजस्थान 40 फीसद, बिहार 38, उत्तर प्रदेश 34, मध्यप्रदेश 32 फीसद का बोझ लिए बैठे हैं। इन राज्यों को और अधिक कर्ज देने से वित्तीय संस्थाएं परहेज कर रही हैं, लेकिन जरूरतमंद राज्य अचल संपतियां और प्रतिभूति गिरवी रख कर भी कर्ज मांगने की कतार में शामिल हैं।
इन राज्यों में जो नागरिक नियमित कर अदा कर रहा है, उस पर और अधिक कर, विकास अधिभार लाद कर राज्य आय के संसाधन विकसित कर रहे हैं। इनकी स्वास्थ्य और शिक्षा जैसी अति आवश्यक सुविधाएं पिछड़ चुकी हैं। आवश्यक सेवाओं में भी नियमित भर्ती के स्थान पर संविदा और अतिथि कर्मचारी नियुक्त किए जा रहे हैं। अर्थशास्त्री मानते हैं कि अतिआवश्यक सेवाओं को छोड़ कर उन योजनाओं पर, जिनका प्रतिदान शून्य हो, राज्य की जीडीपी हिस्सेदारी एक फीसद से अधिक की नहीं होनी चहिए। मगर मुफ्त और अनुदान आधारित योजनाओं में पंजाब राज्य की 2.7, आंध्र प्रदेश 2.1, मध्यप्रदेश 1.5 और राजस्थान की 2.0 फीसद हिस्सेदारी है। पंजाब की आबादी करीब तीन करोड़ है और उस पर कर्ज तीन लाख करोड़ रुपए से अधिक का है। इस तरह राज्य के प्रत्येक नागरिक पर एक लाख का कर्जा है। राज्य के पच्चीस फीसद युवा बेरोजगार हैं। राज्य सरकार रोजगार के अवसर पैदा नहीं कर पा रही है। अमूमन यह स्थति उन सभी राज्यों की है, जिन्हें आरबीआइ ने संवेदनशील राज्यों की श्रेणी में रखा है।
विश्व बैंक का आकलन है कि देश के नगर निकायों को स्थानीय विकास, जल निकासी और जल प्रदाय के लिए आगामी पंद्रह वर्षों में 840 अरब डालर की दरकार है। नगर निकाय अभी तक केंद्र और राज्य सरकार से मिलने वाली आर्थिक सहायता पर निर्भर रहते आए हैं। राजनीतिक कुप्रबंधन के कारण निकाय अपने आय के स्रोत विकसित करने में विफल रहे हैं। कर्ज में डूबे राज्यों की मुफ्त घोषणाओं ने सबसे अधिक नगरीय विकास को प्रभावित किया है संस्थाओं में तकनीकी कर्मचारियों की भर्ती के बजाय ठेके से काम लिया जा रहा है। इसके चलते नागरिक सेवाओं में गुणवत्ता और उत्तरदायित्वों का अभाव होने लगा है। नागरिक सेवाओं की बेहतर बहाली के बजाय, सरकारें सिर्फ वोट प्रबंधन कर सत्ता हासिल करने में जुट गई हैं। किसान सम्मान निधि के अंतर्गत प्रति वर्ष देश के किसानों को साठ हजार करोड़ रुपए तक की राशि केंद्र सरकार देती है। कई राज्य सरकारें इसके अलावा भी आबंटन कर रही हैं। मगर देश में कृषि क्षेत्र की हालत यह है कि अगर प्रकृति तनिक भी विचलित हो जाए तो किसानों के पास अगले दिन की व्यवस्था नहीं है। सवाल है कि हम किसानों को योजनाओं के माध्यम से कितना सक्षम बना पाए हैं? आज देश के प्रत्येक किसान परिवार पर औसतन 74,121 रुपए का कर्ज है। जबकि प्रति परिवार मासिक आय मात्र 10,218 रुपए है।
अर्थशास्त्रियों की चेतावनी है कि शिक्षा और स्वास्थ्य पर अनुदान के बजाय सारी मुफ्त योजनाएं देश को गर्त में उतारने के लिए है। तीन बड़े हिंदी राज्यों मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में विधानसभा चुनाव होने हैं। आरबीआइ की सूची में मध्यप्रदेश और राजस्थान अपनी कर्ज सीमा लांघ कर संवेदनशील इलाके में पहुंच चुके हैं। इन राज्यों को अपने कर्मचारियों के मासिक वेतन और पेंशन के लिए भी कर्ज लेना पड़ रहा है। मप्र सरकार का दावा है कि वह जन्म के पूर्व से लेकर अंत्येष्टि तक गरीबों को आर्थिक सहायता उपलब्ध कराती है। अब राज्य सरकार ने प्रदेश की 2.50 लाख से कम आय वाली प्रत्येक महिला को एक हजार रुपए मासिक पेंशन देने का फैसला किया है। इस लाडली बहना योजना पर सरकार पांच साल में करीब इकसठ हजार करोड़ रुपए खर्च करेगी। जबकि राज्य के हालात ये हैं कि अमृत 2.0 योजना में केंद्र सरकार द्वारा राशि देने के इनकार करने से राजधानी भोपाल सहित पूरे प्रदेश की जलनिकासी व्यवस्था में सुधार नहीं हो पा रहा है। सरकार अपनी प्रतिभूति और अचल संपति को गिरवी रख कर बाजार से कर्ज लेने को मजबूर है। छत्तीसगढ़ पर कर्ज उसके सकल घरेलू उत्पाद का 28 फीसद है। मगर कर्ज लेकर मुफ्त बांटने में वह एक कदम भी पीछे नहीं है।
आर्थिक विशेषज्ञों का मानना है कि वित्तवर्ष 2023-24 में राज्यों में कर संग्रह पिछले साल की अपेक्षा दो फीसद कम रहेगा। आगामी वर्षों में अब राज्यों को केंद्र की बैसाखी छोड़ अपने आय के स्रोत विकसित करना होगा। मगर मुफ्त बांट कर सत्ता प्राप्ति का सूत्र राज्यों को दिवालिया और नागरिकों को आश्रित बना रहा है।
Date:11-03-23
बेलगाम नहीं अब क्रिप्टोसंपादकीय
क्रिप्टोकरेंसी और वर्चुअल पैसे को कभी न कभी कानून के दायरे में तो था। भारत सरकार ने इन पर शिकंजा कस दिया है। अब मुद्रा के इन प्रकारों के कारोबार पर कड़ी निगरानी रहेगा। केंद्र सरकार इन पर धनशोधन (मनी लांड्रिंग) की रोकथाम संबंधी कानून लागू कर दिए हैं। केंद्र सरकार ने इस संबंध में 7 मार्च को गजट अधिसूचना जारी कर दी है, जिसमें कहा गया है कि क्रिप्टोकरेंसी को खरीदना – बेचना, रखना और इससे जुड़ी सेवाओं पर अब एंटी-मनी लांड्रिंग कानून लागू होंगे। भारतीय क्रिप्टो एक्सचेंजों को अब से वित्तीय खुफिया इकाई भारत को संदिग्ध गतिविधियों की सूचना देनी होगी। अधिसूचना में स्पष्ट किया गया है कि वर्चुअल डिजिटल एसेट्स और फिएट करेंसी के बीच एक्सचेंज, वर्चुअल डिजिटल एसेट्स के एक या अधिक रूपों के बीच एक्सचेंज और डिजिटल एसेट्स का ट्रांसफर, वर्चुअल डिजिटल एसेट्स का सुरक्षित रखरखाव या प्रशासन या वर्चुअल डिजिटल एसेट्स पर नियंत्रण को सक्षम करने वाले उपकरण और भागीदारी किसी जारीकर्ता की वर्चुअल डिजिटल संपत्ति की पेशकश और बिक्री से संबंधित वित्तीय सेवाओं का प्रावधान अब धनशोधन की रोकथाम (मनी लांडिंग) कानून, 2002 के तहत लाया जाएगा। क्रिप्टोकरेंसी को लेकर कानून और नियमों को भारत में अभी तक अंतिम रूप नहीं दिया गया है, भारतीय रिजर्व बैंक अनेक बार उनके इस्तेमाल के प्रति आगाह कर चुका है। आरबीआई के गवर्नर शक्तिकांत दास ने इसी साल जनवरी में कहा था कि क्रिप्टोकरेंसी जुए के बराबर है, क्योंकि उनका कथित मूल्य केवल आभाष दिलाता है। इसका समर्थन करने वाले इसे संपत्ति या वित्तीय उत्पाद कहते हैं, लेकिन इसमें वस्तुतः कोई अंतर्निहित मूल्य नहीं होता। इसका मुकाबला करने के लिए आरबीआई ने अपना ई-रुपया या केंद्रीय बैंक डिजिटल मुद्रा (सीबीडीसी) लांच किया है। भारतीय रिजर्व बैंक का विचार है कि क्रिप्टोकरेंसी पर प्रतिबंध लगाया जाना चाहिए क्योंकि वे भ्रामक योजनाओं के समान हैं। पिछले बजट में केंद्र ने वर्चुअल मुद्राओं से आय पर तीस प्रतिशत टैक्स लगाने की घोषणा की थी। इसके लेनदेन पर एक प्रतिशत टीडीएस काटने की बात भी तय की गई थी। नई व्यवस्था इन पर पूर्ण निगरानी रख पाएगी।
Date:11-03-23
‘स्व-जागरूकता’ ज्यादा जरूरीमयंक गंगवार, ( विशेषज्ञ, व्यावसायिक शिक्षा एवं कौशल विकास विभाग, उप्र )
युवाओं की उपलब्धता के अनुसार देश के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश के व्यावसायिक शिक्षा एवं कौशल विकास विभाग द्वारा युवाओं के सर्वांगीण विकास के लिए अनेक प्रकार के प्रशिक्षण कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं। ये प्रशिक्षण कार्यक्रम तकनीकी, सेवा क्षेत्र, व्यावहारिक, जीवन व भाषा कौशल जैसे विषयों का समावेश रखते हैं। जब हम कौशल प्रशिक्षित युवाओं से रू-ब-रू होते हैं, तो पाते हैं कि वे तकनीकी रूप से अर्थ- कुशल हैं तथा जैसे-जैसे वे पृथक-पृथक रोजगार से जुड़ते हुए अनुभवी होते जाएंगे, वे पूर्ण कुशलता और कार्यकुशलता की ओर कदम बढ़ाएंगे। यहां सबसे महत्त्वपूर्ण बात ये है कि सूचना प्रौद्योगिकी व उससे संबंधित सेवाओं के विस्तार का लाभ यह हुआ है कि है युवा अपने हुनर में कुशलता को कम समय में प्राप्त कर ले रहे हैं।
अब बात आती है कि युवाओं में तकनीकी व व्यावहारिक कौशल के साथ-साथ अन्य कौन सा कौशल सर्वाधिक होना चाहिए? यह बड़ा महत्त्वपूर्ण मसला है और इस बारे में अब तक उतनी गंभीरता से समाधान नहीं तलाशे गए हैं, जितनी होनी चाहिए थी। इसका उत्तर खोजने के प्रयास में जब हम पिछले 10 वर्षों के अपने कार्यकाल पर नजर दौड़ाते हैं, तो पाते हैं कि कौशल व अनुभव से ज्यादा जरूरी है ‘स्व-जागरुकता’ । कोई भी व्यक्ति कौशल व अनुभव तो कभी भी प्राप्त कर सकता है, किन्तु स्व- जागरूक व्यक्ति अपने कार्यों को बेहतर तरीके से पूरा करता है। उसमें सीखने की क्षमता अधिक होती है तथा वह अपने उच्च एवं सहयोगियों के साथ बेहतर व्यवहार करता है, जिससे पूरे सिस्टम की उत्पादकता बढ़ती है।
शोध बताते हैं कि 90 प्रतिशत से अधिक लोग दशति हैं कि वे स्व-जागरूक हैं किंतु वास्तविकता में ये मात्र 15 से 20 प्रतिशत लोगों में ही परिलक्षित होती है। हम जब किसी भी सफल कार्य का अध्ययन अथवा मूल्यांकन करते हैं तथा उससे जुड़े हुए किसी अग्रणी सदस्य से बात करते हैं, तो पाते है कि उसका उत्तर होता है कि इसे मैं लाया था अथवा इसे मैंने किया है, जबकि वास्तविकता में कार्य को सफल बनाने में सम्पूर्ण टीम अथवा दल का योगदान होता है। सरकारी सेवा में लोगों से अत्याधिक संवाद के बाद यह पाया कि ज्यादातर सफल लोग दो शब्दों का उपयोग बहुत अधिक करते हैं एक ‘मैं’ और दूसरा ‘हम’ । ‘मैं’ का अधिक उपयोग कम विनम्रता को और हम का अधिक उपयोग टीम में अपनी स्थिति में भ्रम को प्रदर्शित करता है। लोगों से ये सवाल करने पर कि ‘आपके साथी आपके बारे में क्या ख्याल रखते हैं? सामान्य रूप से यही उत्तर मिलता है कि ‘बढ़िया, जो यह दर्शाता है कि प्रक्रियाएं सम्भवतः कम रचनात्मक हैं तथा व्यक्ति अपने मूल्यांकन के प्रति गम्भीर नहीं है। आमतौर पर यह माना जाता है कि युवा वर्ग में सामान्य रूप से धैर्य कम होता है। इस नाते उनको अपने व्यक्तित्व में स्व-जागरूकता को जीवन के शुरुआती दौर में विकसित करने का प्रयास करना चाहिए। स्व- जागरूकता को विकसित करने के लिए प्रत्येक युवा को नियमित अंतराल पर अपने मूल्यों व कार्यशैली का परीक्षण करते रहना चाहिए। इसके साथ-साथ युवाओं को अपने अपने आप से दो सवाल हमेशा पूछते रहना चाहिए, पहला कि आप क्या श्रेष्ठ कर सकते हैं तथा दूसरा आपकी क्षमता क्या हैं?
जूम वीडियो एप्लीकेशन के मुख्य कार्यपालक अधिकारी (सीईओ) एरिक युआन ने कहा है कि प्रत्येक व्यक्ति विशेषकर युवाओं को दिन के अंत में 15 मिनट तक एक व्यायाम करना चाहिए, जिसमें अपने आप से कुछ सवाल पूछें कि आज दिन भर क्या किया, कोई गलती तो नहीं की, जो किया वे लोगों को लाभ देगा कि नहीं और क्या सुधार कल करने हैं? एक तरह से युवाओं को दिनभर की गतिविधियों को लेकर काफी गंभीर रहने की जरूरत है। किंतु अधिकतर परिस्थितियों में पाया जाता है कि ये सब सोचने तक सीमित रह जाता है। अतः प्रत्येक युवा को अपने अन्दर स्व-जागरूकता को विकसित करने का प्रयास करना चाहिए तथा उसे अपनी जीवनचर्या का अभिनन अंग बना लेना चाहिए।
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11 March 2023
प्रश्न–401 – चीन के साथ तनावपूर्ण संबंधों को देखते हुए भारत द्वारा हाल ही में किये गये उपायों का विवरण दीजिये। ये उपाय कहाँ तक फलीभूत होंगे, स्पष्ट कीजिये। (200 शब्द)
Question–401 – In view of the strained relations with China, identify the recent measures taken by India in this regard. Explain to what extent these measures will be fruitful. (200 words)
नोट : इसका उत्तर आपको हमें नहीं भेजना है, यह आपके स्वयं के अभ्यास के लिए है।
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Date:10-03-23
Think 8% PlusIndia should know that its estimated medium-term growth isn’t sufficient given its demographic structureTOI Editorials
China’s annual session of the National People’s Congress saw an unusual prognosis on its economic trajectory. The government targeted an annual economic growth rate of 5% in 2023, the lowest in over 25 years. It’s also lower than IMF’s 5. 2% forecast. If IMF seems veering towards optimism, consider its five-year forecast. China’s growth rate is expected to steadily decelerate and fall to a little over 3% by 2028. The country’s scorching growth phase is over.
Yet, China will be a colossus on the global economic stage with its 2022 nominal GDP at $19. 2 trillion. However, a slowdown in China’s growth rate will make it harder to catch up with the US as its economic performance has provided ballast for its strategic ambition. China’s economic challenge will be all the more acute because it’s also turned a demographic corner. In 2022, its population shrank for the first time in 60 years because of declining fertility. China’s big challenge is that it’s growing old before getting rich. Moreover, unlike the US, it’s not a magnet for skilled immigrants.
China’s experience has some takeaways for India, which has a GDP about one-fifth that of China. The Economic Survey estimated that India’s potential output can rise to 7-8% in the medium-term. Most forecasts place the likely GDP growth for 2023-24 below the medium-term potential. Admittedly, the global economic scenario is not rosy but neither have the worst-case scenarios anticipated a year ago shown up. India’s potential output needs to be located in the context of its demographic transition. UN projections show that the largest segment of the population is between the 15-19 age group at around 120 million. In contrast, China’s bulge comes in the 30-34 age group.
This large cohort that is entering the job market in India may not find adequate opportunities if the medium-term potential is 7-8%. It begs the question if India’s economic growth ambitions are in sync with its demographic transition. Keep in mind potential output is what can be realised if the economy is firing on all cylinders. Instead of setting quantitative targets in terms of GDP level, policy should steer the focus to enhancing economic growth rate. Given the existing gap between the economic size of China and India, the only way to narrow the gap and secure India’s strategic aims is to grow faster than 8%.
Date:10-03-23
The Deep BiasInstitutions have to be more sensitive to students who face insidious forms of social discriminationTOI Editorials
After an IIT Bombay Dalit student, Darshan Solanki, died by suicide last month, an internal probe has attributed it to depression over his poor academic performance, ruling out caste bias. His family rejects this finding. Suicide has complex causes and cannot be reduced to any pat reason. Plus, mental health is not simply a story inside a mind, social discrimination can be a factor. Merely months before this death, two surveys within IIT Bombay had documented how Dalit and Adivasi students deal with the pressures of discrimination on campus.
Other bright and promising Dalit and Adivasi students have been driven to depression and suicide in India’s best educational institutions. Many institutions define ‘meritorious’ and deserving at the point of the entrance test alone. But many of these students fight immense odds: schooling disadvantages, poor resources, subpar teaching assistance and low English or tech skills. On campus, the academic pressure and high stakes are intensified for them. Unfortunately, our elite institutions have downplayed these difficulties when students drop out, or even die by suicide. They claim these students do not meet exacting academic standards, instead of making a genuine effort for those who have made it this far into their care.
The IIT-Bombay probe panel noted that Solanki was sensitive about his JEE rank and having been laughed at for language barriers and for voicing doubts about computer use – but did not link the tragedy to these experiences, which so many students have reported. As an IIT-Bombay faculty member wrote, institutions ignore systemic causes by casting such suicides as isolated and individual matters. Universities have to genuinely make room for all their students. Narrow definitions of merit are of no use to those students who most desperately need help.
Date:10-03-23
Media raids and breaking the silence on press freedomIn upholding press freedom, the higher judiciary needs to revive the doctrine of ‘effect and consequence’ and act without fear or favour while considering the canvas of heavy-handed executive actionsApar Gupta is the Co-founder and Executive Director of the Internet Freedom Foundation, India
On February 14, 2023, the Income Tax Department carried out a “survey action” on the offices of the British Broadcasting Corporation (BBC) in New Delhi and Mumbai. After continuing this survey for three days, a press release was issued by the Central Board of Direct Taxes (CBDT) citing an alleged evasion of taxes on remittances and discrepancies in BBC’s transfer pricing mechanism. Many media organisations such as the Press Club of India have described the raids as “deeply unfortunate”; the Editors Guild termed them as “intimidation”. Even those who may favour the tax survey will confess that the tax scrutiny is a natural outcome of the BBC’s two-part documentary series, “India: The Modi Question”, which the BBC released on January 17, 2023. In an emergency secret order issued by the Ministry of Electronics and Information Technology, the documentary’s web links were blocked on January 20, 2023. The timing and nature of the events points to something being rotten in the state of Denmark.
Chilling message
At the root of these “survey actions” is an attempt to instil fear and self-censorship that begins with knocking on the doors of the offices of journalists. Today, these actions have become sinister as they now involve the seizure of devices. Hence, an unpleasant surprise turns into severe shock when journalists, as in the case of the BBC, are treated as potential criminals.
The CBDT press release gives us clues when it states that “crucial evidences by way of statement of employees, digital evidences and documents” were gathered. There are more pointers such as the one provided by the BBC which said that on February 19, 2023, “journalists’ computers were searched, their phones were intercepted and information was sought from them about their working methods”. Even if the case of the CBDT is perceived as legitimate, it would at its very best be limited to an accounting and financial investigation. Without any clear and compelling reasons to extend a digital dragnet on working journalists, this is what can be defined as a fishing expedition. It becomes important here to consider the wider trend of the extraction of sensitive data from journalists by using the tax and police departments across India.
Since 2018, there have been at least 10 reported instances of device searches that impact press freedom. Beginning with the Quint, they have gone on to include the proprietors and senior editors of publications such Alt News, Bharat Samachar, Dainik Bhaskar, NewsClick, The Wire, the Independent and Public-Spirited Media Foundation (IPMSF) and journalists such as Fahad Shah, Rupesh Kumar Singh and Siddique Kappan. This anecdotal list presents an incomplete data set as the Union government has stoutly defended its inability to keep count.
Half truth in the executive response
In a parliamentary response dated August 10, 2022, the Ministry of Home Affairs has stated that since “police” and, “law and order”, are topics within the competence of State governments, it cannot “centrally maintain” device seizures of journalists. This is a half truth for two reasons. The first is that the Crime in India report queries data from State governments and can easily be extended to include data on device seizures of journalists. Second, many of the searches and seizures have been performed by central agencies such as the Income-Tax Department and such a record can be maintained and published by the Ministry of Finance. Such institutional evasion only increases suspicion about the bona fides of prosecutions and also represents a lack of intent for any studied consideration by the executive, particularly the Union government. It also unearths a myopic, yet widely held, belief that protection of freedom of speech, especially its most critical voices, is a democratic duty limited to the courts.
Here, the popular view of trial courts as a bulwark against threats to our constitutional rights is rhetorical to legal academics and trial court practitioners who honestly assess their role. Their underlying institutional cultures are what lawyer Abhinav Sekhri terms as “rooted in the avowed colonial mentality of maximising state interests while depriving any semblance of protection to the accused persons”.
This analysis has been dealt with in a paper that specifically looks at powers to unlock smartphones, drawing from the Code of Criminal Procedure, 1973 — the procedural law to govern criminal cases in India. It indicates that specific legal provisions provide for unfettered discretion to police officers apart from a carceral spirit that resides within our criminal justice system, deeply ingrained and practised for decades. This results in outcomes where criminal courts rarely check the police for their investigatory practices and evidence collection.
It is here that one may find an answer to the questionable legality of the CBDT’s “survey action”, as pointed out by tax experts such as Deepak Joshi. Without any fear of sanction, or checks on their powers, investigating officers in a “survey action” will freely conduct a more invasive, “search and seizure”. Oblivious to the limitations and spirit of the text in the Income Tax Act, 1961, abuses will only increase given the perceptible political interests and the impossibility for any real sanction.
A way out
In the absence of such checks and balances and also the unlikely event of systemic reforms, what is the role that constitutional courts play? Here, there is adequate room for the application and development of doctrines for press freedom. The first cluster requires the application of the fundamental right to privacy drawn from the Supreme Court’s judgment in K.S. Puttaswamy vs Union of India (2017). More than five years since the judgment was first pronounced, its application to the criminal justice system here is awaited in cases of electronic evidence. Resurrecting the D.K. Basu guidelines as relevant for a digital India may also be a way out. Stricter procedural safeguards are required today due to digitisation, as the Supreme Court of the United States noted in Riley vs State of California. It said: “Cell phones differ in both a quantitative and a qualitative sense from other objects that might be kept on an arrestee’s person.”
Such guidelines will only provide partial relief. It will require case specific and clear pronouncements on facts that consider how legal processes are abused in the device seizures of journalists. This recent trend is an adaptation of an old template where a muscular executive sidesteps a direct response to a critical article and in bad faith directs legal scrutiny on the publication itself. Such mischievous government actions have been considered by the Supreme Court in several press freedom cases, leading to the partial expansion of the “direct and inevitable” to the “effect and consequence” test.
However, as jurist Rajeev Dhawan observed in 1986, “the partial attention paid to the operational and institutional needs of the press… seems to have died out”. There has indeed been a long and tragic silence on press freedom over decades.
The Supreme Court needs to revive and apply the doctrine of “effect and consequence” to consider a broader canvas of executive actions that will shape the practices of our criminal courts. For instance, in the BBC case, a relevant fact for a court to determine is not limited to allegations of tax evasion but whether the scrutiny is prompted by a documentary that is critical of the Prime Minister. Today, for a free and fair press, not only journalists but even our courts need to act without fear or favour.
Date:10-03-23
आईना दिखाते आंकड़ों से भी गिरती है गरिमासंपादकीय
तकनीकी ने संचार की सीमाएं खत्म कर दीं। किसी राजनीतिक नेता देश की गरिमा पर असर नहीं पड़ता। भारत के किसी विपक्षी नेता द्वारा प्रजातांत्रिक मूल्यों को लेकर सरकार की विदेश में आलोचना से देश की साख नहीं गिरती, लेकिन जब देश या विदेश की मकबूल संस्थाएं आंकड़ों के साथ बताती हैं कि पिछले कुछ वर्षों में ईडी या अन्य संस्थाएं चार गुना ज्यादा मुकदमे कर रही हैं और इनमें से 95% विपक्षी नेताओं के खिलाफ हैं और दोष-सिद्धि की दर मात्र 1% है, तब जरूर दुनिया में भारत को लेकर नकारात्मक भाव बनता है। जब यूएनडीपी भारत को मानव विकास सूचकांक में 130 से 132वें स्थान पर फिसलते पाता है, भारत की साख तब भी गिरती है। क्या इस रिपोर्ट को अंतरराष्ट्रीय साजिश कहेंगे? वैसे यह रिपोर्ट यूएनओ की संस्था भारत सरकार के ही आंकड़ों के आधार पर तैयार करती है। अगर वर्ल्ड बैंक भारत को ईज ऑफ डुइंग बिजनेस में सात वर्षों में 146वें स्थान से 63वें स्थान पर पाता है तब इसे हम साजिश क्यों नहीं कहते ? अगर देश में अमीर-गरीब के बीच दशकों से खाई बढ़ रही है और कोई संस्था उसे हर वर्ष दिखा रही है तो यह देश के खिलाफ साजिश कैसे हो सकती है ? अगर आलोचना से प्रजातंत्र मजबूत होता है तो सरकार की आलोचना या किसी कदम पर सुप्रीम कोर्ट जाना देश-विरोध कैसे माना जा सकता है?
Date:10-03-23
एआई में तरक्की करना अब हमारे लिए भी जरूरीचेतन भगत, ( अंग्रेजी के उपन्यासकार )
आज एआई से ज्यादा हॉट कोई दूसरा सेक्टर नहीं है। चैटजीपीटी की लॉन्चिंग के बाद से तो इस क्षेत्र में उत्साह और रोमांच नई ऊंचाइयों पर चला गया है। चैटजीपीटी एक क्वेरी-टूल है, जो किसी सर्च-इंजिन की तरह काम करता है। यह किसी भी क्वेरी का बुद्धिमत्तापूर्ण उत्तर दे सकता है। यह कॉलेज असाइनमेंट्स कर सकता है, कम्प्यूटर कोड्स लिख सकता है, किसी पार्टी की प्लानिंग में आपकी मदद कर सकता है और यह भी बता सकता है कि आपको कहां छुटि्टयां बिताना चाहिए। हम यह कॉलम भी चैटजीपीटी से लिखवा सकते थे और शायद वह बेहतर लिखता। चैटजीपीटी के 10 करोड़ से ज्यादा यूजर्स हो चुके हैं। उसने गूगल को भी अपना एक एआई-क्वेरी टूल लॉन्च करने के लिए मजबूर कर दिया है। चिपमेकर्स, सॉफ्टवेयर प्रोवाइडर्स, इंटरनेट कम्पनियां सभी इस होड़ में शामिल हैं। विशेषज्ञों का कहना है हम इतिहास के अहम मोड़ पर आ चुके हैं, क्योंकि एआई जल्द ही मनुष्य की बुद्धिमत्ता को पार कर जाएगी। इसके तीन खतरे हैं।
पहला, इसका नौकरियों पर असर पड़ेगा। सवाल है कि क्या एआई सभी नौकरियां खा जाएगी? आखिर जब एक वफादार और बुद्धिमान मशीन आपका काम अच्छे से कर सकती है तो कोई परेशानियां पैदा करने वाले मनुष्यों को क्यों नौकरी पर रखेगा? दूसरा, क्या इससे असमानता बढ़ेगी, क्योंकि अमीर देश एआई में तरक्की करके दुनिया पर दबदबा कायम कर सकते हैं? तीसरे, क्या भविष्य में मशीनें मनुष्यों को नियंत्रित करने लगेंगी? यह बहुत साइंस फिक्शन किस्म का डर है कि क्या स्मार्ट कम्प्यूटर्स और एआई के द्वारा जनरेटेड एल्गोरिदम्स मनुष्यों को नुकसान पहुंचा सकते हैं?
सबसे पहले नौकरियों की बात करें। इसमें संदेह नहीं कि एआई मनुष्यों द्वारा किए जाने वाले कुछ कार्यों को हथिया लेगी, जैसा कि कुछ दशक पूर्व कम्प्यूटरों और ऑटोमैटेड मशीनों ने किया था। अकाउंटिंग सॉफ्टवेयरों ने बही-खाते का काम करने वालों की नौकरियां छीन ली थीं। सिलाई मशीनों ने हाथ से स्वेटर बुनने वालों को बेकार कर दिया। लेकिन एआई इनसे कहीं जटिल और बुद्धिमत्तापूर्ण कार्यों को करने में सक्षम है। वह पर्यटन, कानूनी, वित्तीय और चिकित्सकीय परामर्श-सम्बंधी कार्यों को कर सकती है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि बड़े पैमाने पर लोग नौकरियां गंवाएंगे, क्योंकि ह्यूमन-टच और इमोशनल-कनेक्ट की जरूरत हमेशा बनी रहेगी, खासतौर पर परामर्श-सम्बंधी भूमिकाओं में। एआई जिम्मेदारियां भी नहीं ले सकती, जो कि मनुष्य ले सकते हैं। अगर कोई एआई जनरेटेड परामर्श गलत साबित हुआ तो इसके लिए किसे जवाबदेह ठहराया जाएगा? अगर यह लेख एआई ने लिखा होता और यह आपको पसंद नहीं आता तो आप किसको ट्रोल करते?
दूसरे, यह डर जायज है कि अमीर देश एआई के इस्तेमाल से दबदबा कायम कर सकते हैं। चूंकि अधिकांश इंटरनेट अंग्रेजी में है, इसलिए पश्चिमी डाटाबेस के प्रति उसका स्पष्ट झुकाव रहेगा। अगर भारत इस क्षेत्र में कुछ करना चाहता है तो उसे अपने स्वयं के एआई मॉडल्स पर काम करना शुरू कर देना चाहिए। अगर पश्चिम हम पर एआई थोपेगा तो यह एक तरह का डिजिटल उपनिवेशवाद साबित होगा।
तीसरे, तकनीकी रूप से यह सम्भव है कि एआई भविष्य में विकसित होकर मनुष्यों को नियंत्रित करने लगे। क्योंकि खुद में निरंतर सुधार करने वाली इंटेलीजेंस पर थ्योरिटिकली कोई पाबंदी नहीं है। एआई उस सुपर-इंटेलीजेंस तक पहुंच सकती है, जो मनुष्यों की क्षमता से परे है। अगर एआई-आधारित सिस्टम्स दुनिया को चलाने लगे तो सम्भव है वे हमें ओवरराइड करने वाले निर्णय लेने लगें। लेकिन निकट-भविष्य में इसके होने की सम्भावना नहीं है। क्योंकि मनुष्य का दिमाग बहुत जटिल होता है और उसमें बुद्धिमत्ता के अलावा भी दूसरी क्षमताएं हैं। हम महसूस कर सकते हैं और उनके आधार पर चीजों पर अनप्रेडिक्टेबल तरीके से प्रतिक्रियाएं दे सकते हैं। नींद पूरी होने या न होने से आपका व्यवहार बदल सकता है। यह मनुष्य होने की भावनात्मक अवस्था है, जो हमारी शारीरिक स्थिति से सम्बद्ध है। हमारे अनेक निर्णय इस पर आधारित होते हैं। मनुष्य भावनाओं में बहकर मूर्खतापूर्ण चीजें भी कर सकते हैं। साथ ही बुद्धिमत्ता का सम्बंध अनिवार्यत: ही सत्ता से नहीं होता। बहुत सम्भव है कि एआई का संचालन दूसरी इंटेलीजेंट मशीनों के बजाय अमीर और ताकतवर मनुष्यों के ही हाथ में रहे।
Date:10-03-23
चीनी आयात पर अंकुशसंपादकीय
चीन से रोजमर्रा की वस्तुओं के आयात को कठिन बनाने की तैयारी स्वागतयोग्य है। एक ऐसे समय जब चीन शत्रुतापूर्ण रवैया अपनाए हो, तब इसका कोई औचित्य नहीं कि आयातित सामग्री के मामले में उस पर निर्भरता बढ़ती चली जाए। चीनी वस्तुओं के आयात को कम करने के प्रयास कोरोना काल में ही शुरू कर दिए गए थे, लेकिन उनमें वांछित सफलता नहीं मिली। गलवन घाटी में चीनी सैनिकों से खूनी मुठभेड़ के बाद भी ऐसे जतन किए गए, जिससे चीन से होने वाली आयात में कमी आए, लेकिन बात नहीं बनी और उलटे कुछ ही समय पहले यह आंकड़ा सामने आया कि उसके साथ होने वाला व्यापार घाटा सौ अरब डालर तक पहुंच गया है। यह ठीक नहीं, क्योंकि कूटनीति का तकाजा यह कहता है कि जिस देश के साथ संबंध तनावपूर्ण हों, उसके यहां से होने वाले आयात पर निर्भर नहीं रहा जाना चाहिए। आखिर देश में भी आसानी से बनाई जाने वाली सामग्री का भी आयात चीन से क्यों करना पड़ रहा है, इस प्रश्न का उत्तर सरकार से अधिक उद्योग जगत को देना चाहिए। वह चीन की चुनौती का सामना तभी कर पाएगा, जब शोध एवं अनुसंधान पर जोर देने के साथ वस्तुओं की गुणवत्ता एवं उनकी उत्पादकता पर भी ध्यान देगा। यह मानने के अच्छे-भले कारण हैं कि हमारा उद्योग जगत चीन की चुनौती का जवाब देने के मामले में इच्छाशक्ति का परिचय नहीं दे रहा है। एक ओर जहां उद्योग जगत को इस चुनौती का सामना करने के लिए आगे आना चाहिए, वहीं दूसरी ओर सरकार को भी यह देखना चाहिए कि आखिर उसके तमाम प्रयासों के बाद भी चीन से होने वाले आयात में कमी क्यों नहीं आ रही है?
सरकार को यह भी देखना चाहिए कि चीन मुक्त व्यापार की आड़ में अपनी वस्तुओं का भारत में भंडारण तो नहीं कर रहा है? ध्यान रहे कि इस तरह की बातें रह-रहकर सामने आती रहती हैं कि चीन भारत में अपना माल डंप कर रहा है। यह ठीक नहीं कि चीन से अनेक ऐसी वस्तुएं मंगाई जा रही हैं, जिन्हें एक समय भारत में ही बनाया जाता था। ऐसा क्यों हुआ, इसके कारणों की पहचान कर उनका निवारण करने की आवश्यकता है। यह ठीक है कि अब गुणवत्ता संबंधी नियमों को कठोर कर चीन से होने पर आयात पर अंकुश लगाने की तैयारी की जा रही है, लेकिन यह भी देखना होगा कि इन नियमों में छिद्र न तलाश लिए जाएं। यह एक शुभ संकेत है कि इस वर्ष होली पर भारतीय बाजार में चीनी पिचकारियों का दबदबा नहीं दिखा। स्पष्ट है कि यदि कोशिश की जाए, तो ऐसी ही कामयाबी आगे भी अर्जित की जा सकती है। ऐसा तब संभव होगा, जब उन वस्तुओं का निर्माण हर हाल में देश में ही सुनिश्चित किया जाएगा, जिन्हें चीन से मंगाया जाता है।
Date:10-03-23
खेल और कूटनीतिसंपादकीय
राष्ट्रों के प्रमुख खेल, सांस्कृतिक आयोजनों आदि में शिरकत करके भी अपने देशों के रिश्ते प्रगाढ़ करने का प्रयास करते हैं। जब भी किसी मित्र देश का शीर्ष नेतृत्व मेहमान बन कर आता है, तो उसे अपने देश की ऐतिहासिक, सांस्कृतिक विरासत से परिचित कराया जाता है। मुलाकात, बातचीत, समझौतों आदि के लिए ऐसी जगहों का चुनाव किया जाता है, जहां से कोई बड़ा संदेश दिया जा सके। क्रिकेट और फुटबाल चूंकि दुनिया के सबसे लोकप्रिय खेल हैं, इसलिए उनके बड़े आयोजनों में भी राष्ट्रों के प्रमुख हिस्सा लिया करते हैं। इस समय भारत और आस्ट्रेलिया की क्रिकेट टीमें प्रतिस्पर्धा कर रही हैं, जिसके तहत अहमदाबाद के मोटेरा स्टेडियम में चौथा और अंतिम टेस्ट मैच खेला गया। आस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री एंथोनी अल्बनीज इस मैच से एक दिन पहले ही भारत पहुंचे थे। इस तरह एक अच्छा अवसर था, जब दोनों देशों के प्रमुख उस मैच में हिस्सा लेकर अपनी मित्रता की मजबूती प्रदर्शित करें। आस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री को लेकर भारतीय प्रधानमंत्री मोटेरा स्टेडियम पहुंचे और दोनों नेताओं ने अपने-अपने देशों के खिलाड़ियों का उत्साहवर्धन किया। स्वाभाविक ही, इससे दर्शकों में भी दोनों देशों के बीच प्रगाढ़ होते रिश्तों का खुशनुमा संदेश गया।
भारत और आस्ट्रेलिया के बीच दोस्ती का यह पचहत्तरवां साल है। पिछले कुछ सालों में दोनों देशों के बीच व्यापारिक-वाणिज्यिक संबंध लगातार प्रगाढ़ होते गए हैं। इस बार की भारत यात्रा पर भी आस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्री ने एलान किया कि गुजरात में आस्ट्रेलियाई विश्वविद्यालय अपना परिसर खोलेगा। दोनों देश शिक्षा के क्षेत्र में रिश्तों को मजबूत बनाने की दिशा में आगे बढ़ेंगे। कुछ दिनों पहले ही विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने घोषणा की कि विदेशी विश्वविद्यालयों को भी भारत में अपने परिसर खोलने की इजाजत दी जाएगी। इस तरह आस्ट्रेलिया पहला देश होगा, जिसने अपने किसी विश्वविद्यालय का परिसर खोलने का एलान किया है। आस्ट्रेलिया, भारत का सत्रहवां बड़ा व्यापारिक सहयोगी देश है और भारत आस्ट्रेलिया का नौवां सबसे बड़ा व्यापारिक सहयोगी देश। दोनों देशों के बीच व्यापारिक रिश्तों में कभी खटास नहीं देखी गई। यहां तक कि कोरोना प्रभाव के चलते जब दुनिया भर में व्यापारिक गतिविधियां प्रभावित हुईं, तब भी दोनों देशों के बीच व्यापारिक गतिविधियां लगातार बढ़ीं। उस दौरान आस्ट्रेलिया को भारत का निर्यात एक सौ पैंतीस फीसद बढ़ा। भारतीय वस्तुओं के लिए आस्ट्रेलिया एक बड़ा बाजार है। और ऐसे वक्त में जब भारत अपना निर्यात बढ़ाने पर जोर दे रहा है, आस्ट्रेलिया के साथ उसके रिश्तों में बढ़ती गर्मजोशी से स्वाभाविक ही सकारात्मक नतीजे निकलेंगे।
भारत का जोर हमेशा से छोटे देशों के साथ मिल कर व्यापारिक गतिविधियों को बढ़ावा देने पर रहा है, ताकि पश्चिमी और ताकतवर देशों के बरक्स एक मजबूत गठजोड़ तैयार किया जा सके। आस्ट्रेलिया के साथ रिश्तों की अहमियत इस दृष्टि से बड़ी है। अब रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद दुनिया में जिस तरह महाशक्तियों का ध्रुवीकरण हो रहा है, उसमें व्यापारिक गतिविधियों के समीकरण बदलते देखे जा रहे हैं। ऐसे में भारत जैसे देशों को अपने व्यापारिक सहयोगियों का अलग तंत्र विकसित करना ही होगा। क्रिकेट मैच एक ऐसा अवसर होता है, जब दुनिया भर के दर्शक उससे जुड़े होते हैं। ऐसे में जब भारतीय और आस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री एक साथ मोटेरा स्टेडियम पर उतरे तो वह एक तरह से पूरी दुनिया के लिए एक संदेश था। चीन, रूस, अमेरिका, फ्रांस आदि इससे संकेत ले सकते हैं कि भारत केवल उन पर निर्भर नहीं है, वह छोटी अर्थव्यवस्थाओं को एक मंच पर लाने और उनका नेतृत्व करने का दम रखता है।
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हाल ही में सरकार ने केंद्रीय बजट 2022-23 से 2025-26 तक के लिए वाइब्रेंट विपेज प्रोग्राम की शुरूआत की है। इस कार्यक्रम में अगले तीन वर्षों तक 48,000 करोड़ आवंटित करने का फैसला किया गया है।
इस योजना से जुड़े कुछ मुख्य बिंदु-
इस कार्यक्रम के कार्यान्वयन के लिए पर्याप्त प्रशिक्षित और संवेदनशील कर्मियों का दल तैयार किया जाना चाहिए। इसके साथ यह रणनीतिक सुरक्षा के दृष्टिकोण और एक समावेशी समाज सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण सिद्ध हो सकता है।
‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 17 फरवरी, 2023
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Date:08-03-23
महिला सशक्तीकरण की गाथाद्रौपदी मुर्मु
गत वर्ष संविधान दिवस के अवसर पर मैं उच्चतम न्यायालय द्वारा आयोजित समारोह में समापन भाषण दे रही थी। न्याय के बारे में बात करते हुए मुझे अंडर-ट्रायल कैदियों का खयाल आया और उनकी दशा के बारे में बोलने से मैं स्वयं को रोक नहीं पाई। मैंने अपने दिल की बात कही और उसका प्रभाव भी पड़ा। आज अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर मैं आपसे उसी तरह कुछ विचार साझा करना चाहती हूं, जो सीधे मेरे दिल की गहराइयों से निकले हैं।
मैं बचपन से ही समाज में महिलाओं की स्थिति को लेकर व्याकुल रही हूं। एक ओर तो किसी बच्ची को ढेर सारा प्यार-दुलार मिलता है और शुभ अवसरों पर उसकी पूजा भी की जाती है। वहीं दूसरी ओर उसे जल्द ही यह आभास हो जाता है कि हमउम्र लड़कों की तुलना में उसके जीवन में अवसर एवं संभावनाएं कम हैं। महिलाओं को उनकी सहज बुद्धिमत्ता के लिए आदर मिलता है। पूरे कुटुंब में सबका ध्यान रखने वाली, परिवार की धुरी के रूप में उनकी सराहना की जाती है तो दूसरी ओर परिवार से जुड़े और यहां तक कि उनके ही जीवन से संबंधित महत्वपूर्ण निर्णयों में उनकी कोई भूमिका नहीं होती और यदि होती भी है तो अत्यंत सीमित।
एक छात्रा, अध्यापिका और बाद में एक समाज सेविका के रूप में घर के बाहर के परिवेश में ऐसे विरोधाभासी रवैये ने मुझे स्वयं हैरान किया। अक्सर मैंने यही महसूस किया है कि हममें से अधिकांश लोग व्यक्तिगत स्तर पर तो पुरुषों और महिलाओं की समानता को स्वीकार करते हैं, लेकिन सामूहिक स्तर पर वही लोग आधी आबादी को सीमाओं में बांधना चाहते हैं। यद्यपि मैंने अधिकांश व्यक्तियों को समानता की प्रगतिशील अवधारणा की ओर बढ़ते देखा है, किंतु सामाजिक स्तर पर पुराने रीति-रिवाज और परंपराएं पुरानी आदतों की तरह हमारा पीछा नहीं छोड़ रही हैं। विश्व की सभी महिलाओं की यही व्यथा-कथा है। महिलाएं अपना जीवन बाधाओं के बीच ही शुरू करती हैं। 21वीं सदी में जब हमने हर क्षेत्र में कल्पनातीत प्रगति कर ली है, तब भी कई देशों में कोई महिला राष्ट्राध्यक्ष नहीं बन सकी है। इससे भी दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि दुनिया के तमाम हिस्सों में आज भी महिलाओं को दोयम दर्जे का माना जाता है। यहां तक कि स्कूल जाना भी किसी लड़की के लिए जिंदगी और मौत का सवाल बन जाता है।
हालांकि, सदैव ऐसी स्थिति नहीं रही। भारत में ही ऐसे कालखंड भी रहे, जब महिलाएं निर्णय लिया करती थीं। हमारे शास्त्रों और इतिहास में ऐसी महिलाओं का उल्लेख मिलता है जो अपने शौर्य, विद्वत्ता और प्रभावी प्रशासन के लिए जानी जाती थीं। आज भी अनगिनत महिलाएं अपनी पसंद के क्षेत्रों में कार्य करके राष्ट्र निर्माण में योगदान दे रही हैं। अंतर केवल इतना है कि उन्हें एक साथ दो स्तरों पर अपनी योग्यता तथा उत्कृष्टता सिद्ध करनी पड़ती है-अपने कार्यक्षेत्र में भी और घरों में। फिर भी वे शिकायत नहीं करतीं, लेकिन समाज से केवल इतनी आशा जरूर करती हैं कि वह उन पर भरोसा करे।
इधर एक विचित्र स्थिति भी उत्पन्न हुई है। हमारे यहां जमीनी स्तर पर निर्णय लेने वाली संस्थाओं में महिलाओं का अच्छा प्रतिनिधित्व है, लेकिन जैसे-जैसे हम ऊपर की ओर बढ़ते हैं तो महिलाओं की संख्या घटती जाती है। यह तथ्य राजनीतिक संस्थाओं के संदर्भ में भी उतना ही सच है जितना नौकरशाही, न्यायपालिका और कारपोरेट जगत के लिए। जिन राज्यों में साक्षरता दर बेहतर है, वहां भी यही स्थिति दिखती है। स्पष्ट है कि केवल शिक्षा द्वारा ही महिलाओं की आर्थिक और राजनीतिक आत्मनिर्भरता को सुनिश्चित नहीं किया जा सकता है। मेरा दृढ़ विश्वास है कि समाज में व्याप्त मानसिकता को बदलने की जरूरत है। एक शांतिपूर्ण और समृद्ध समाज निर्माण के लिए महिला-पुरुष असमानता पर आधारित जड़वत पूर्वाग्रहों को समझना तथा उनसे मुक्त होना जरूरी है। सामाजिक न्याय और समानता को बढ़ावा देने के लिए सुविचारित प्रयास किए गए हैं, परंतु ये प्रयास महिलाओं का प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करने की दिशा में पर्याप्त सिद्ध नहीं हुए। जैसे शिक्षा प्राप्त करने तथा नौकरियां हासिल करने में महिलाएं पुरुषों की तुलना में बहुत पीछे रहती हैं। उनके इस पिछड़ेपन का कारण सामाजिक रूढ़ियां हैं न कि कोई साजिश।
तमाम दीक्षा समारोहों में शामिल होने का मेरा अनुभव यही बताता है कि यदि महिलाओं को अवसर मिले तो वे शिक्षा में पुरुषों से प्रायः आगे निकल जाती हैं। भारतीय महिलाओं तथा हमारे समाज की इसी अदम्य भावना के बल पर मुझे विश्वास होता है कि भारत महिला-पुरुष के बीच न्याय के मार्ग पर विश्व समुदाय का पथ-प्रदर्शक बनेगा। ऐसा कतई नहीं है कि पुरुषों ने आधी आबादी को पीछे रखकर कोई बढ़त हासिल की है। सच यही है कि यह असंतुलन मानवता को हानि पहुंचा रहा है, क्योंकि मानवता के रथ के दोनों पहिए बराबर नहीं। मुझे विश्वास है कि यदि महिलाओं को मानवता की प्रगति में बराबरी का भागीदार बनाया जाए तो हमारी दुनिया अधिक खुशहाल होगी।
महिलाओं के लिए हानिकारक पूर्वाग्रहों और रीति-रिवाजों को कानून बनाकर अथवा जागरूकता के माध्यम से दूर किया जा रहा है। इसका सकारात्मक प्रभाव होता है। वर्तमान संसद में महिलाओं का प्रतिनिधित्व सबसे अधिक है। कहने की आवश्यकता नहीं कि विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र की राष्ट्रपति के रूप में मेरा चुनाव महिला सशक्तीकरण की गाथा का एक अंश है। मेरा मानना है कि महिला-पुरुष न्याय को बढ़ावा देने के लिए ‘मातृत्व में सहज नेतृत्व’ की भावना को जीवंत बनाने की आवश्यकता है। महिलाओं को प्रत्यक्ष रूप से सशक्त बनाने के लिए ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ जैसे सरकार के अनेक कार्यक्रम सही दिशा में बढ़ते हुए कदम हैं। हमें इस तथ्य को स्वीकार करना चाहिए कि श्रेष्ठ तथा प्रगतिशील विचारों के साथ तालमेल बनाने में समाज को समय लगता है। समाज मनुष्यों से ही बनता है, जिनसें आधी संख्या महिलाओं की होती है। ऐसे में सामाजिक प्रगति को गति देने के लिए आज मैं आप सबसे अपने परिवार, आस-पड़ोस अथवा कार्यस्थल में एक बदलाव लाने के लिए स्वयं को समर्पित करने का आग्रह करना चाहती हूं। ऐसा कोई भी बदलाव जो किसी बच्ची के चेहरे पर मुस्कान बिखेरे। ऐसा बदलाव जो उसके लिए जीवन में आगे बढ़ने के अवसरों में वृद्धि करे।
Date:08-03-23
बरकरार रहे निष्पक्षतासंपादकीय
सर्वोच्च न्यायालय के पांच न्यायाधीशों के संविधान पीठ ने गत सप्ताह सर्वसम्मति से उस विषय पर फैसला सुनाया जिसे ‘संवैधानिक निर्वात’ माना जाता रहा है। परंतु न्यायालय ने इसे दूर करने के लिए जो तरीका अपनाया वह बुनियादी समस्या को हल नहीं कर सकता और इसे केवल अंतरिम हल के रूप में ही देखा जा सकता है। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त (सीईसी) तथा निर्वाचन आयुक्तों (ईसी) की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा की जानी चाहिए और यह नियुक्ति उस समिति की अनुशंसा पर होनी चाहिए जिसमें प्रधानमंत्री, लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष (अगर नेता प्रतिपक्ष न हो तो सबसे बड़े विपक्षी दल का नेता) और सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश शामिल हों।
इस बात में कोई संदेह नहीं है कि निर्वाचन आयोग को स्वतंत्र और कार्यपालिका के किसी भी प्रभाव से मुक्त होना चाहिए। केंद्र और राज्यों के स्तर पर स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों के संचालन के लिए यह आवश्यक है। नागरिक समाज के विभिन्न हिस्सों में भी इस बात को लेकर चिंता रही है कि सीईसी और ईसी की नियुक्ति की मौजूदा प्रक्रिया निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता को सीमित कर सकती है।
हालांकि आयोग में बीते तमाम वर्षों में अत्यंत ठोस और विश्वसनीय छवि वाले लोग नियुक्त हुए और उन्होंने अनेक सुधारों के साथ चुनावों को और अधिक विश्वसनीय बनाया, यह बात भी सही है कि हाल के वर्षों में राजनीतिक दलों ने उसके आचरण पर चिंता जाहिर की है। चाहे जो भी हो लेकिन प्रधानमंत्री या कैबिनेट की सलाह पर सीईसी और ईसी की नियुक्ति संविधान अथवा संविधान सभा की भावना के अनुरूप नहीं है। यह भी एक अंतरिम व्यवस्था थी।
सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय ने इस संदर्भ में संविधान सभा की बहसों का विस्तार से विश्लेषण किया। संविधान के अनुच्छेद 324(2) में कहा गया है, ‘निर्वाचन आयोग में मुख्य निर्वाचन आयुक्त तथा इतने ही निर्वाचन आयुक्त शामिल होने चाहिए…। मुख्य निर्वाचन आयुक्त तथा अन्य निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति संसद द्वारा इस बारे में निर्मित कानूनों के अनुसार होनी चाहिए और उन्हें राष्ट्रपति की मंजूरी हासिल होनी चाहिए।’ चूंकि संसद ने इन तमाम वर्षों में कोई कानून नहीं बनाया इसलिए नियुक्तियां राष्ट्रपति द्वारा प्रधानमंत्री की सलाह पर की जाती रहीं। प्रासंगिक अनुच्छेद की पृष्ठभूमि के बारे में बात करें तो निर्णय में कहा गया कि देश के संस्थापक बुजुर्गों का यह इरादा कतई नहीं था कि निर्वाचन आयोग की नियुक्तियों के मामले में कार्यपालिका ही समस्त निर्णय ले।
बहरहाल, चूंकि यहां मामला निर्वाचन आयोग की स्वायत्तता का है तो ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा राष्ट्रपति को अनुशंसा करने के लिए समिति गठित किए जाने से कोई खास फर्क नहीं पड़ेगा। उदाहरण के लिए केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) के निदेशक की नियुक्ति भी ऐसे ही एक पैनल द्वारा की जाती है लेकिन उस पर भी उसके आचरण के लिए निरंतर हमले होते रहते हैं। हकीकत में सीईसी और ईसी की नियुक्ति की प्रक्रिया में प्रवेश करने का अर्थ यह है कि देश की सबसे बड़ी अदालत को भी आलोचनाओं का सामना करना होगा।
ऐसे में उपयुक्त यही होगा कि संविधान सभा ने सीईसी और ईसी की नियुक्ति को लेकर जैसा सोचा था, उस प्रकार का एक व्यापक कानून लाया जाए और इसके साथ निर्वाचन आयोग की स्वायत्तता को लेकर अन्य पहलुओं पर भी ध्यान दिया जाए। इस संदर्भ में यह बात भी ध्यान देने लायक है कि कानून को केवल कार्यपालिका को अधिकारसंपन्न नहीं बनाना चाहिए। यह भी अहम होगा कि बनने वाला कानून निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता की स्थापना करते हुए उसे सभी संदेहों से परे करे।
Date:08-03-23
महिलाओं में वित्तीय साक्षरता की जरूरतअजय जोशी
आज के दौर में महिलाएं हर क्षेत्र में पुरुषों से कदम से कदम मिला कर चल रही हैं, मगर फिर भी कई मामलों में वे पीछे रह जाती हैं। उनमें एक मुख्य क्षेत्र है महिलाओं की वित्तीय साक्षरता का। इस मामले में न केवल गरीब, ग्रामीण और अनपढ़ महिलाएं पीछे हैं, बल्कि शहरी मध्यवर्ग और उच्च वर्ग की पढ़ी-लिखी महिलाओं में भी वित्तीय साक्षरता और जानकारी का अभाव देखा जाता है।
‘ग्लोबल फाइनेंशियल लिटरेसी एक्सीलेंस सेंटर’ (जीएफएलई) द्वारा 2020-21 में जारी रिपोर्ट के अनुसार, भारतीय वयस्क आबादी का केवल चौबीस प्रतिशत वित्तीय मामलों में साक्षर है। अन्य प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में भारत की वित्तीय साक्षरता दर सबसे कम है। महिलाओं के मामले में तो स्थिति और चिंताजनक है। यह राज्यवार चार प्रतिशत से 50 प्रतिशत के बीच है। महाराष्ट्र, दिल्ली और पश्चिम बंगाल जैसे महानगरीय क्षेत्रों में क्रमश: 17 प्रतिशत, 32 और 21 प्रतिशत की वित्तीय साक्षरता दर है। बिहार, राजस्थान, झारखंड और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य, जहां गरीबी अधिक है, वहां साक्षरता दर कम है। ये आंकड़े अंतरराज्यीय असमानताओं को भी प्रदर्शित करते हैं। गोवा में महिलाओं की पचास प्रतिशत की उच्चतम वित्तीय साक्षरता दर है, जबकि छत्तीसगढ़ में वित्तीय साक्षरता की भारी कमी है। वहां वित्तीय साक्षरता दर सबसे कम, मात्र चार प्रतिशत, है।
आजकल जब बैंकों के माध्यम से लेनदेन बढ़ रहा है, क्रेडिट कार्ड और डेबिट कार्ड का चलन आम हो गया है और अब तो इसके आगे ‘कैशलेस’ लेनदेन पर जोर बढ़ रहा है, तब महिलाओं का एक बहुत बड़ा वर्ग बैंक के सामान्य कामकाज भी नही कर पाता। बैंक में रुपया जमा कराने या निकालने का काम हो या एटीएम कार्ड का उपयोग करना, सभी कामों के लिए अधिकांश महिलाएं अपने पति, पुत्र, भाई या किसी अन्य रिश्तेदार पर निर्भर हैं। इसका महिलाओं को कई बार खमियाजा भी भुगतना पड़ता है। उनके खाते से बड़ी रकम का गबन भी हो जाता है। कम निकालने का कह कर ज्यादा रकम उनके खाते से निकाल ली जाती है। एटीएम का गलत उपयोग कर लिया जाता है। बिना उस महिला की जानकारी के उसके खाते में अपना नामांकन करा लिया जाता है। खाली चेक पर हस्ताक्षर करा लिए जाते हैं, फिर मनमानी रकम भरकर निकाल ली जाती है। थोड़ा बहुत आनलाइन व्यवहार करने वाली महिला को ‘रिवार्ड पाइंट’ के आधार पर या नकद राशि मिलने के नाम पर ‘ओटीपी’ मांग कर या कोई लिंक भेज कर उस पर क्लिक करवा कर उसके बैंक खाते में जमा रकम साफ कर दी जाती है। इस तरह की बहुत-सी घटनाओं की खबरें आए दिन अखबारों में छपती रहती हैं। अधिकतर मामलों में कोई कार्रवाई नहीं होती और पीड़िता का पैसा डूब जाता है। कई बार महिला के पुरुष रिश्तेदार जानबूझ कर उसे बैंक की कार्यप्रणाली से परिचित होने नहीं देते।
महिलाओं में वित्तीय साक्षरता न होने के दो तरह के प्रभाव होते हैं। एक तो यह कि महिलाएं रुपए-पैसे के लेनदेन में पूरी तरह पुरुष रिश्तेदारों पर निर्भर हो जाती हैं। उनको ऐसा कुछ भी काम करने का आत्मविश्वास ही नहीं रहता और किसी वजह से वे रिश्तेदार नहीं रहते, तो उनका पूरा वित्तीय कामकाज ठप्प हो जाता है। दूसरे, वित्तीय साक्षरता की कमी की जिम्मेदार कई बार खुद महिलाएं भी होती हैं। वे इस काम को सीखने और करने में आलस करती हैं। कुछ तकनीकी बातें सीखने और समझने की कोशिश ही नहीं करतीं। इस उदासीनता का नुकसान भी उनको उठाना पड़ता है। जब बैंक आदि के सामान्य कामों में महिलाओं की यह स्थिति है तो भला वे निवेश कहां करना है, कब करना है, कितना करना है और कैसे करना है, कितना बीमा करवाना है जैसी बातों की उनसे जानकारी की अपेक्षा करना तो बेमानी है। इस कारण भी महिलाएं गलत जगह और गलत आदमी के माध्यम से निवेश करके या तो अपना पैसा डुबा देती या फंसा लेती हैं।
आजकल विधवा और परित्यक्ता महिलाओं द्वरा एकाकी जीवन बिताने की प्रवृत्ति भी बढ़ती जा रही। ऐसे में उनको अपने बच्चों की पढ़ाई-लिखाई, शादी विवाह, आवास निर्माण आदि कार्यों के लिए बड़ी धनराशि की जरूरत पड़ती है। बचत न होने के कारण उनको ऋण लेने की आवश्यकता पड़ती रहती है। वित्तीय साक्षरता के अभाव में वे सेठ-साहूकारों या निजी संस्थाओं के चंगुल में फंस जाती हैं। वहां उनको भारी ब्याज दरों पर ऋण लेना पड़ सकता है, जिसको चुकाना उनके लिए मुश्किल हो जाता है। यहां तक कि उनकी संपति कुर्क होने की नौबत आ जाती है।
एक मजबूत वित्तीय शिक्षा की व्यवस्था महिलाओं को प्रभावी ढंग से अपनी बचत और निवेश का प्रबंधन करने में सहायक हो सकती है। इससे वे अपनी बचत को इस प्रकार निवेश कर सकती हैं, जिससे उन्हें अपने अधिक से अधिक लाभ मिल सके और जमा राशि भी सुरक्षित रहे। इसी प्रकार महिलाओं की सामाजिक सुरक्षा की दृष्टि से उनका उपयुक्त बीमा कवर होना भी जरूरी है। बीमारी की दशा में इलाज पर खर्च होने वाली भारी-भरकम राशि की व्यवस्था हेतु स्वास्थ्य बीमा का कवर भी जरूरी है, ताकि उनको और उनके परिवार को बीमारी की दशा में इलाज करवाने में कठिनाई का सामना न करना पड़े। यह भी महिलाओं की वित्तीय साक्षरता द्वारा ही संभव है।
केंद्र सरकार ने इस वर्ष के आम बजट में लोगों में आर्थिक साक्षरता बढ़ाने के लिए गैर-सरकारी स्वयात्तशासी संस्थाओं के माध्यम से इस दिशा में प्रयास के प्रावधान किए हैं। भारतीय रिजर्व बैंक ने ‘वित्तीय साक्षरता योजना’ नामक एक परियोजना शुरू की है, जिसका उद्देश्य स्कूल और कालेज के छात्रों, महिलाओं, ग्रामीण और शहरी गरीबों, रक्षाकर्मियों और वरिष्ठ नागरिकों सहित विभिन्न लक्षित समूहों में केंद्रीय बैंक और सामान्य बैंकिंग अवधारणाओं के बारे में जानकारी का प्रसार करना है। वित्तीय शिक्षा के लिए राष्ट्रीय रणनीति 2020-2025 बनाई गई है। इसके अंतर्गत डिजिटल लेन-देन की सुविधा, डिजिटल लेन-देन की सुरक्षा, लेन-देन में सावधानी, ग्राहकों के हितों की सुरक्षा के संबंध में आवश्यक व्यवस्थाएं करने के प्रावधान किए गए हैं। ‘सेबी’, रिजर्व बैंक और अन्य संस्थाएं भी समय-समय पर विज्ञापनों के माध्यम से बैंक लेन-देन और आनलाइन धोखाधड़ी से बचाव के संबंध में जानकारियां देती रहती हैं, ताकि वित्तीय साक्षरता बढ़ सके। इन सभी में महिलाओं की अधिकाधिक सहभागिता की जरूरत बताई गई है।
आज देश की लगभग 1.4 अरब की आबादी, जिसमें आधे से अधिक महिलाएं हैं, उनमें वित्तीय जागरूकता का लंबे समय तक चलने वाला प्रभाव पड़ेगा। देश के स्कूल, कालेज, महिलाओं के स्वयं सहायता समूहों, आंगनबाड़ी केंद्रों आदि में वित्तीय शिक्षा को महत्त्व देते हुए उनमें कार्यरत महिलाओं को वित्तीय साक्षरता के संबंध में विशेष प्रशिक्षण देने की आवश्यकता है, ताकि वे अपने स्तर पर समूह से जुड़ी महिलाओं को आवश्यक जानकारी दे सकें। शहरी और ग्रामीण क्षेत्रों में कार्यरत बैंकों को भी समय-समय पर महिलाओं को वित्तीय लेनदेन की जानकारी देने हेतु कार्यक्रम चलाने चाहिए, ताकि वे बैंकिंग संबंधी जानकारियां प्राप्त कर सकें।
जरूरत इस बात की है कि जिन महिलाओं को बैंक और वित्तीय कामकाज की जानकारी नहीं है, उन्हें आगे बढ़ कर सीखने की कोशिश करनी चाहिए। कम से कम, बैंक में खाता खोलना, चेक भरना, जमा करवाना, रुपया निकालना, जमा कराना, एटीएम का उपयोग, आनलाइन भुगतान करना आदि जैसी सामान्य कामकाजी बातों की जानकारी तो आज के दौर में बहुत जरूरी हो गई है।
Date:08-03-23
2047 Is Not 1996. Why India Needs A Higher BenchmarkNiti Aayog’s former VC argues using South Korea as yardstick won’t do for our developed country targetRajiv Kumar
Surjit Bhalla in an article in this paper (Developed by 2047? Yes; February 20, 2023) has tried to quantify PM Modi’s call for making India a developed economy. He has suggested that we adopt the level of per capita income in PPP terms that South Korea had reached in 1996, the year it was admitted as a member of the OECD.
Thus, the implicit suggestion is that we should take OECD membership as the criteria for being categorised as a developed country.
Bhalla cites this level of per capita income as $18,000. This is loosely based on South Korea’s level of per capita income in 1996. It is then argued that with India’s current per capita income of $6,027 (constant 2011 international dollars), it can easily reach this level of per capita income by securing a growth rate of 4. 8% over the next 25 years.
Problems with a benchmark income
There are serious problems in selecting $18,000 per capita income as our target for 2047 and use it to give India the tag of a developed economy.
Consider some countries which exceeded that benchmark in 2021.
● Belarus ($19,757)
● Libya ($21,965)
● Malaysia ($26,333)
● Mexico ($19,086)
● Dominican Republic ($18,626)
By no stretch of our imagination can these countries be categorised as being developed even on the simple criterion of per capita incomes. We should also look at the quality of life, the state of the environment and other SDG parameters before recognising a country as being developed.
Do we really want India in 2047 to be similar tocountries mentioned above with the quality of life they have at present? The answer must be an emphatic no.
National security needs call for more
At $18,000 per capita income, the size of our economy in 2047 will be $28 trillion. With its current per capita income of $17,603, China will most likely reach the current OECD average per capita income level of $44,827 by 2047 by growing a mere 3. 8% over the next 25 years. It will then be the world’s largest economy at $63 trillion.
With an economic size less than half of China, India will face an unacceptable security deficit.
With our current per capita incomes at $6,592 (constant 2017 international dollar), can we possibly reach a level of $44,827 by 2047 and stake our claim to be a full-fledged OECD member?
To reach that level, per capita incomes will have to grow annually at 7. 95% for the next 25 years. Given an average population growth rate of 0. 7% over the next 25 years, it implies a GDP growth in real termsat about 8.6%.
This growth rate may seem unrealistic given that in the past our highest potential rate of growth has been estimated at 8%.
However, we can define another target. Nineteen of the 38 OECD members currently have an average per capita income of $33,106. To reach this level by 2047, India will have to achieve growth of 6. 7% in per capita incomes. This is eminently achievable.
Given that we are today in a ‘sweet spot’ internationally and that the large number of structural reforms during the last eight years have laid an even stronger foundation for higher rate of growth, we should as a nation surely strive to achieve this goal.
We need to grow faster
Such an aspirational target would help mobilise our entrepreneurs, farmers, scientists and the civil society in a nation-wide effort to make economic development the top most priority for the entire population. The goal has the motivational power to make development a Jan Aandolan, or a peoples’ movement.
It goes without saying that we will have to achieve this ambitious goal while ensuring that our economic growth remains ecologically sustainable and inclusive both in inter-personal and inter-regional terms.
At this level of per capita incomes, the size of the Indian economy in 2047 will be $54 trillion. This will be within catching distance of the Chinese economy, especially as our demographic advantage will then be significantly better than China’s.
The target, when achieved, will allow us to escape the middle-income trap and ensure that our firms and farmers attain global competitiveness and help raise India’s share in the global economy to levels commensurate with our share in world population. Most importantly, it will ensure that Indians get the quality of life they aspire for and deserve.
Date:09-03-23
Investment divideSouth and West are attracting more FDI than North and East. The latter group must understand whyTOI Editorials
Even granting that both are headed into assembly elections this year, the squabble between Karnataka and Telangana on who bagged the latest foreign investment is healthy competition. Yes, there were typical pre-poll anxieties and image management on display. Both states’ governments raced to social media to claim wins. Letters from the foreign investor were tweeted, a letter of intent was seemingly confused with a done deal. But theatrics aside, that Apple partner and Taiwanese contract manufacturer Foxconn has set its eyes on investing in Telangana and/or Karnataka – in another sign of small but significant shifts away from its main manufacturing base in China – is good news for both states and all around.
At a time when global investor summits are quite the rage, CMs from almost all states beaming from hoardings and ads, and apparently wooing foreign investors in multiple ways, bulk of the FDI flows into Maharashtra, Karnataka, Tamil Nadu, Gujarat, Telangana. All these states are ahead in infrastructure, network capacity, policy stability and reasonably strong in law and order. Little wonder they are also destinations for the bulk of India’s migrant workers.
There’s a difference between South/West and North/East here. UP, MP, Bengal or even Bihar and Jharkhand may be high on intent and big on their outreach to investors – yet MoUs worth lakhs of crores that some states claim have barely moved beyond a summit’s photo-ops. Can rhetoric and claims bring in the global investor? No. And that is what state governments need to understand. Where infrastructure is deficient, connectivity scratchy, law and order sketchy, where fiefdoms, political or otherwise, run their writ with particular venom, where women don’t feel safe, where literacy levels are lower than average, there the investor will certainly not step.
Date:09-03-23
सांस्कृतिक कूटनीति का हिस्सा हैं जी-20 की बैठकेंशॉम्बी शार्प, ( संयुक्त राष्ट्र के भारत में रेजिडेंट को-ऑर्डिनेटर )
भारत की जी-20 की अध्यक्षता जटिल ग्लोबल मुद्दों के लिए उम्मीद की किरण है। दुनिया की पांचवी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला भारत जी-20 देशों की सूची में शामिल अकेला निम्न मध्यम आय वाला देश है, जो विकासशील अर्थव्यवस्थाओं की परेशानियों को करीब से जानता- समझता है। उसकी कोशिशों का ही नतीजा है कि जी -20 को आर्थिक सहयोग के मंच के रूप में देखा जा रहा है।
दुनिया की 85% जीडीपी और 80% ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन के संदर्भ में जी-20 देशों की भूमिका अहम है। इस मीटिंग में भारत यूएन के सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल की रफ्तार और संजीदगी सुधारने के लिए एसडीजी एक्सिलरेशन एक्शन प्लान भी लेकर आएगा। कुछ महीने पहले प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने संयुक्त राष्ट्र महासचिव के साथ पर्यावरण के लिए नई जीवनशैली पहल शुरू कर इस दिशा में ठोस कदम उठाने का जन-आंदोलन शुरू कर दिया है। जी-20 मीटिंग के तुरंत बाद सस्टेनेबल डेवलपमेंट गोल पर संयुक्त राष्ट्र असेंबली में 2023 एसडीजी समिट होगा, जहां 2015 में तय किए गए इन लक्ष्यों का रिव्यू किया जाएगा।
हाल ही में सूडान के संवेदनशील इलाके अबेई में संयुक्त राष्ट्र अंतरिम सुरक्षा बल के साथ भारत की महिला शांति सैनिकों की बटालियन की तैनाती, संयुक्त राष्ट्र काउंसिल रेजोल्यूशन 1325 के मुताबिक हुई है । यह संयुक्त राष्ट्र मिशन में महिला शांति सैनिकों की भारत की सबसे बड़ी एकल इकाई है। भारत हमेशा से ही संयुक्त राष्ट्र के लिए सेना और सुरक्षा दल भेजने में अग्रणी रहा है। महिला स्वास्थ्यकर्मियों की पहली टीम को 1960 में कॉन्गो भेजा गया था। 2007 में लाइबेरिया में शांति के मिशन में भेजी कई यूए की पहली महिला पुलिस टुकड़ी में भी भारत की सक्रिय भागीदारी थी। महिलाएं शांति बहाली के साथ मानव अधिकारों की सुरक्षा के लिए शिद्दत से काम करती हैं। जहां वे तैनात होती हैं, उस इलाके की बेटियां भी शांति व राजनीतिक प्रक्रियाओं का हिस्सा बनने का सपना देखने लगती हैं। इसका बड़ा उदाहरण लाइबेरिया है, जहां लगभग 9 सालों में भारत की शांतिरक्षक सैनिकों ने स्वास्थ्य सेवाओं और मानव हित से जुड़ी सेवाओं में ऐसा काम किया कि उस देश में पुलिस सेवाओं में निकली नौकरियों में महिलाओं ने चार गुना ज्यादा आवेदन किए।
7,500 किमी की तटीय रेखा के साथ भारत ऐसे ताकतवर देशों में शुमार है, जिसके पास समुद्र में सबसे बड़े एक्सक्लूसिव इकोनॉमिक जोन हैं यानी जहां ब्लू इकोनॉमी या समुद्री अर्थव्यवस्था में भरपूर संभावनाएं हैं। चाहे वो समुद्री संसाधनों की बात हो या शिपिंग की – संसाधनों का दोहन पूरी जिम्मेदारी के साथ हो, इस मकसद से भारत ने हाल ही में ब्लू इकोनॉमी पर राष्ट्रीय नीति का ड्राफ्ट तैयार किया है। समुद्र अर्थव्यवस्था ही नहीं बल्कि पूरे जीवनचक्र के लिए अनमोल खजाना है। लेकिन एक खौफनाक सच यह भी है कि एक तरफ क्लाइमेट चेंज का ट्रिपल प्लेनेटरी क्राइसिस बढ़ रहा है, वहीं जैव- विविधता कम हो रही है। समुद्री तल का बढ़ना, जल का अम्लीकरण और प्रदूषण ऐसे खतरे हैं, जिनकी अनदेखी भारी पड़ सकती है। ऐसे में भारत जी-20 ओशंस डायलॉग की राह आसान बनाएगा और ब्लू इकोनॉमी के संरक्षण और संवर्धन में श्रेष्ठ उदाहरण पर विमर्श करेगा। जी-20 मीटिंग के एजेंडा में आतंकवाद की फंडिंग का मुद्दा भी है, जिस पर भारत पहले से ही काम कर रहा है।
भारत का एक मजबूत सांस्कृतिक पहलू भी है, जिसे दिखाने के लिए जी-20 की 200 से ज्यादा बैठकें दिल्ली से बाहर ऐसे शहरों में रखी गई हैं, जिनकी अपनी पहचान है। इन देशों के प्रतिनिधि इन शहरों के झरोखों के जरिए भारत की विविधता और सांस्कृतिक व ऐतिहासिक धरोहरों, खासकर यूनेस्को विश्व विरासत स्थलों को करीब से जान सकेंगे। यह सांस्कृतिक कूटनीति का हिस्सा है। संयुक्त राष्ट्र जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल जैसे आयोजनों के जरिए भारत और दुनिया के बीच सांस्कृतिक पुल बनाने पर काम कर रहा है। वसुधैव कुटुंबकम् की थीम पर होने जा रही जी-20 समिट ने हमें एक धरती, एक परिवार, एक भविष्य का आधार दिया है और पूरी उम्मीद है कि इस रिश्ते से जुड़े देश एक साथ मिलकर ही समाधानों पर काम करेंगे।
Date:09-03-23
एक शहर से उम्मीदेंसंपादकीय
बदलते समय के साथ बनारस में सुविधाओं और सहूलियतों का बढ़ना सुखद व आवश्यक है। बनारस या वाराणसी अपने रंग-ढंग का अकेला शहर है। नई दिल्ली अगर देश की राजनीतिक राजधानी है और मुंबई व्यावसायिक, तो बनारस को हम धार्मिक राजधानी कह सकते हैं। विगत आठ-नौ वर्ष से बनारस की रूपरेखा जिस तरह से बदल रही है, वह किसी से छिपा नहीं है। किसी भी बड़े बदलाव के साथ कुछ विवाद जुड़े होते हैं, लेकिन अंततः बदलाव का लाभ शहर और देश को होता है। दुनिया का यह सबसे प्राचीन जीवंत शहर अगर विकसित होगा, तो इससे न केवल देश की शोभा बढ़ेगी, बल्कि दुनिया में धर्म का आकर्षण भी बढ़ेगा। काशी विश्वनाथ मंदिर के आसपास जो विकास हुआ है, जिस तरह से वहां खुले प्रांगण में होली मनाने के भव्य दृश्य सामने आए हैं, उससे साफ लगता है, बनारस पहले की तुलना में ज्यादा आकर्षक हो गया है। कुछ साल पहले ऐसे प्रांगण की कल्पना कठिन थी, लगता नहीं था कि बाबा विश्वनाथ के दरबार में श्रद्धालुओं के लिए इतनी जगह निकल आएगी। बनारस में शहरी विकास पर बहुत ध्यान दिया गया है। दस से ज्यादा ऐसी परियोजनाएं चल रही हैं, जिनसे इसका कायाकल्प होना तय है।
देश में पहली बार किसी शहर में रोपवे परिवहन व्यवस्था निर्मित हो रही है। वाराणसी कैंट रेलवे स्टेशन से गोदौलिया चौक तक 3,850 मीटर लंबी रोपवे लाइन के बीच पांच स्टेशन पड़ेंगे। इससे शहर में सड़कों को भी राहत मिलेगी। शहर बहुत पुराना है, समय और जरूरत के हिसाब से गलियां-सड़कें संकरी हो गई हैं, लेकिन परिवहन के वैकल्पिक इंतजामों पर विचार और काम लगातार जारी है। गंगा घाटों और नौका विहार पर निरंतर काम हो रहा है। इस शहर पर आबादी का दबाव भी बहुत ज्यादा है। आज से पचास साल पहले बनारस की आबादी सात लाख भी नहीं थी, पर अब 17 लाख से ज्यादा हो गई है। यह स्थिति तब है, जब औद्योगिक रूप से यह इलाका बहुत आगे नहीं है। यदि यहां विगत दशकों में रोजगार बढ़ाने पर ज्यादा ध्यान दिया जाता, तो आबादी और ज्यादा तेजी से बढ़ती। यह एक ऐसा क्षेत्र है, जहां से कोई जाना नहीं चाहता, पर रोजगार की पर्याप्त व्यवस्था से ही यहां लोगों को खुशहाल रखा जा सकता है। आबादी का दबाव शहर पर ही नहीं, यहां गंगा पर भी है। गंगा की स्वच्छता के लिए काम हुए हैं, पर कितने हुए हैं, कितने की अभी और गुंजाइश है, इसे परखते रहना चाहिए। गंगा की पवित्रता में बनारस की शोभा निहित है।
भौतिक विकास के साथ-साथ बनारस का शैक्षणिक, धार्मिक व आध्यात्मिक विकास भी जरूरी है। बनारस को आधुनिक ज्ञान-विज्ञान व मूल भारतीय विचार का नेतृत्व करना चाहिए। अगर देश में किसी तरह की भ्रमपूर्ण स्थिति बने, तो बनारस को भ्रम निवारण के लिए सामने आना चाहिए। उदाहरण के लिए, भारत में कौन-सा त्योहार कब मनाया जाएगा, इसका फैसला बनारस को एकमत से करना चाहिए। इस बार होली 7 को है या 8 मार्च को, इस बारे में स्पष्टता नहीं थी । क्या होली, दिवाली जैसे महत्वपूर्ण त्योहारों के बारे में ज्यादा विद्वतापूर्ण और तार्किक फैसला बनारस से आ सकता है? प्राचीन काल से बनारस भारतीय ज्ञान का मौलिक केंद्र रहा है, ऐसे में, यहां से तिथि या पंचांग संबंधी अपेक्षा कतई अनुचित नहीं है। विद्वानों के बीच वाद- विवाद का अपना महत्व है, लेकिन बनारस स्वयं को पुनः शिक्षा व शोध का सर्वश्रेष्ठ केंद्र बनाए, तो यह देश की जीत होगी।
Date:09-03-23
ताकि किसी छोटे निवेशक का पैसा न डूबेसतीश सिंह, ( बैंकिंग व आर्थिक विशेषज्ञ)
ਮले ही नेशनल सिक्योरिटीज डिपॉजिटरी लिमिटेड ( एनएसडीएल) और सेंट्रल डिपॉजिटरी सर्विसेज लिमिटेड (सीडीएसएल) के आंकड़ों के अनुसार, अगस्त 2022 में डीमैट खातों की संख्या 10 करोड़ से अधिक हो गई है, लेकिन आज भी शेयर बाजार में निवेश करने वाले देश के अधिकांश निवेशक वित्तीय रूप से निरक्षर हैं। इसी वजह से अडानी मामले में बड़ी संख्या में निवेशकों को नुकसान उठाना पड़ा और देश के सर्वोच्च न्यायालय को उनके हित सुरक्षित रखने के लिए सरकार को निर्देश देना पड़ा। अदालत ने शेयर बाजार के नियामकीय तंत्र को इतना मजबूत बनाने की बात कही कि छोटे निवेशकों को शेयर बाजार में होने वाले उतार-चढ़ाव की वजह से आए दिन होने वाले नुकसान से निजात मिल सके। हालांकि, निवेशकों को वित्तीय रूप से साक्षर बनाने की कहीं अधिक जरूरत है, ताकि वे खुद उचित निर्णय लेकर शेयर बाजार में निवेश कर सकें।
रेपो दर में हालिया वृद्धि से बैंकों की पूंजी लागत बढ़ गई है, जिसकी भरपाई के लिए उन्होंने ऋण दर में बढ़े हुए रेपो दर के अनुपात में वृद्धि की है, ताकि उनके मुनाफे में बढ़ोतरी हो और वे बढ़ी हुई जमा लागत की भरपाई मुनाफे से कर सकें। फिलहाल, कर्ज के महंगा होने के बाद भी उधारी की मांग में कमी नहीं आ रही है। लिहाजा, बैंकों को छोटे निवेशकों से जमा लेने के लिए अपने सामर्थ्य के अनुसार जमा दर में इजाफा करना पड़ रहा है, ताकि उनके जमा आधार का फलक विस्तृत हो और वे जरूरतमंदों, कारोबारियों और आम जन की कर्ज – जरूरतों को पूरा कर सकें।
बैंकों द्वारा जमा को आकर्षित करने के लिए चलाई जा रही मुहिम की वजह से बैंक जमा आधार में हाल में मामूली वृद्धि हुई है। रिजर्व बैंक के वित्तीय स्थायित्व रिपोर्ट (एफएसआर) के अनुसार, 16 दिसंबर को समाप्त पखवाड़े में जमा में वृद्धि की दर पिछले साल की समान अवधि की तुलना में 9.4 प्रतिशत बढ़ी है, जबकि पिछले पखवाड़े की तुलना में यह 9.9 प्रतिशत ज्यादा है। रिजर्व बैंक के आंकड़ों के मुताबिक, 16 दिसंबर को समाप्त पखवाड़े में बैंकिंग व्यवस्था में समग्र जमा 173.53 लाख करोड़ रुपये रहा है, जो इसके पहले के पखवाड़े में 175.24 लाख करोड़ रुपये था। हालांकि, कर्ज की मांग में तेजी बनी होने के कारण बैंकों के लिए जमा में वृद्धि उसी अनुपात में करना अब भी एक बड़ी चुनौती बनी हुई है, क्योंकि 16 दिसंबर को समाप्त पखवाड़े में बैंकिंग व्यवस्था से कर्ज की मांग 17.4 प्रतिशत बढ़ी है। यह जमा वृद्धि से बहुत अधिक है।
ऐसे में, बैंक की मियादी जमा (फिक्स्ड डिपॉजिट) योजना में निवेश फायदेमंद है। भारत में शुरू से ही यह निवेश का सबसे सुरक्षित और आकर्षक विकल्प माना जाता रहा है, लेकिन बीते कुछ वर्षों से इसकी ब्याज दरों में उल्लेखनीय कमी आने की वजह से छोटे निवेशकों ने शेयर बाजार का रुख कर लिया है, लेकिन आए दिन सटोरियों या वित्तीय अज्ञानता की वजह से उनको वहां नुकसान उठाना पड़ रहा है।
फिलहाल सस्ती दर पर पूंजी जुटाने के लिए बैंक मियादी जमा की ब्याज दरों में बढ़ोतरी कर रहे हैं। भारतीय स्टेट बैंक पांच से दस वर्षों की मियादी जमा पर वरिष्ठ नागरिकों को 7.5 प्रतिशत की दर से ब्याज दे रहा है, जबकि गैर वरिष्ठ नागरिकों को इस अवधि के लिए 6.5 प्रतिशत की दर से ब्याज दी जा रही है। उसने 400 दिनों के लिए अमृत कलश नाम से एक नई मियादी जमा योजना भी शुरू की है, जिस पर वरिष्ठ नागरिकों को 7.6 प्रतिशत की दर से ब्याज दिया जा रहा है। इस योजना का लाभ 31 मार्च, 2023 तक उठाया जा सकता है।
पंजाब नेशनल बैंक पांच वर्षों की मियादी जमा पर वरिष्ठ नागरिकों को सात प्रतिशत की दर से ब्याज दे रहा है, जबकि पांच वर्षों से अधिक और 10 वर्षों तक की अवधि वाली मियादी जमा पर वह वरिष्ठ नागरिकों को 7.3 प्रतिशत की दर से ब्याज दे रहा है। वहीं, गैर वरिष्ठ नागरिकों को तीन से दस वर्षों की अवधि वाली मियादी जमा पर बैंक 6.5 प्रतिशत की दर से ब्याज की पेशकश कर रहा है।
सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया वरिष्ठ नागरिकों को तीन से दस वर्षों की अवधि वाली मियादी जमा पर 6.92 प्रतिशत की दर से ब्याज दे रहा है। केनरा बैंक तीन साल से अधिक और पांच साल की अवधि तक की मियादी जमा पर वरिष्ठ नागरिकों को सात प्रतिशत की दर से ब्याज दे रहा है, जबकि 15 लाख रुपये से अधिक और दो करोड़ रुपये से कम राशि की मियादी जमा पर 7.45 प्रतिशत की दर से वरिष्ठ नागरिकों को ब्याज दे रहा है।
बैंक ऑफ इंडिया पांच से दस वर्षों की मियादी जमा पर आम नागरिकों को 6.75 प्रतिशत की दर से ब्याज दे रहा है, जबकि वरिष्ठ नागरिकों को दो से पांच वर्षों की अवधि के लिए 7.25 प्रतिशत की दर से ब्याज दे रहा है। बैंकों की तुलना में कुछ गैर बैंकिंग वित्तीय संस्थान, जैसे यूनिटी स्मॉल फाइनेंस बैंक मियादी जमा पर नौ प्रतिशत की दर से ब्याज दे रहा है, जबकि सूर्योदय स्मॉल फाइनेंस बैंक 8.51 प्रतिशत की दर से ब्याज दे रहा है।
फिलहाल, कारोबारियों की सुस्ती से उबरने की जद्दोजहद के कारण कर्ज के महंगे होने के बावजूद उधारी के उठाव में तेजी बनी हुई है। इसलिए, बैंक जमा आधार बढ़ाने के लिए विशेषकर छोटे निवेशकों को आकर्षक ब्याज देने की पेशकश करके उन्हें लुभाने की कोशिश कर रहे हैं। मौजूदा परिप्रेक्ष्य में जमा दर में बैंकों द्वारा और भी बढ़ोतरी की जा सकती है, क्योंकि अभी महंगाई उच्च स्तर पर बनी हुई है, उधारी में तेज उठाव बना हुआ है और ऐसे कयास लगाए जा रहे हैं कि भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) आगामी मौद्रिक समीक्षाओं में रेपो दर और बढ़ा सकता है। लिहाजा, निवेशकों को सुरक्षित एवं आकर्षक निवेश के मौजूदा मौके को कतई गंवाना नहीं चाहिए, लेकिन साथ ही, उन्हें सावधान रहने की भी जरूरत है, क्योंकि कुछ गैर बैंकिंग वित्तीय संस्थान जमा पर ज्यादा ब्याज देने की पेशकश कर रहे हैं और कुछ साल पहले जमा पर ज्यादा ब्याज देने वाले कुछ सहकारी बैंक दिवालिया हो चुके हैं। ऐसे में, निवेशकों को लालच से बचने की सलाह भी दी जा रही है, जो लाजिमी है।
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हाल के कुछ वर्षों में भारत के मध्यवर्ग का तेजी से विस्तार हुआ है। अगर संख्या की दृष्टि से बात करें, तो लगभग एक-तिहाई जनसंख्या मध्यवर्ग के घेरे में आ चुकी है। इसको देखते हुए सरकार ने बजट में प्रत्यक्ष करों को कम करने का निर्णय लिया है। मध्य-वर्ग के लिए यह राहत की बात है। जनसंख्या के बड़े भाग के मध्य वर्ग में शामिल होने के पीछे के सरकार के प्रयासों को चार भागों में बांटकर देखा जा सकता है।
1) सम्पन्नता (मुद्रास्फीति में नियंत्रण के माध्यम से समृद्धि)
– 2014 और 2022 के बीच आठ वर्षों में, वार्षिक मुद्रास्फीति 4.6% थी।
– कई वैश्विक संकटों के बावजूद 2022 में कज्यूमर प्राइस इंडेक्स 5.7% पर था। यह जी-20 समूह के कई देशों से काफी कम था।
– 2014 में स्टूडेंट लोन 14% था, जो 2022 में गिरकर 8% रह गया था।
– ऋण की दरों में समग्र गिरावट से मध्यवर्गीय परिवारों के लिए घर और कार खरीदना आसान हुआ।
– जीएसटी की ‘एक राष्ट्र-एक कर’ पहल से अनुमानित 18 लाख करोड़ रुपये की सकल बचत हुई है।
– पीएम मुद्रा योजना के 38 करोड़ लाभार्थियों में से 12 करोड़ मध्यम वर्ग के व्यक्ति थे।
– ठोस मौद्रिक नीतियों और बैंकिंग प्रणाली को मजबूत करने से सकल एनपीए घटकर 5.8% हो गया है।
2) सुरक्षित भविष्य (स्वस्थ भविष्य की सुरक्षा)
– सस्ती स्वास्थ्य सेवा और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा जीवन स्तर में सुधार के लिए महत्वपूर्ण होती है। दोनों ही पहलुओं पर सरकार ने बेहतर काम किया है।
– पिछले नौ सालों में 353 नए विश्वविद्यालायों की स्थापना की गई है।
– 15 नए एम्स और 261 नए मेडिकल कॉलेज खोले गए हैं।
– 2014 में जहाँ भारत के केवल नौ विश्वविद्यालय ही वैश्विक सूची में थे, वहीं 2023 में 41 विश्वविद्यालय शामिल हो गए हैं।
– 50-90% सस्ती जेनेटिक दवाओं का वितरण 9,000 जन औषधि केंद्रों पर किया जा रहा है।
– आयुष्मान भारत के 5 लाख केंद्र हैं।
3) श्रेष्ठ जीवन (एक बेहतर जीवन)
– 2022 तक 1.65 लाख कि.मी. राष्ट्रीय राजमार्गों का निर्माण किया गया है। यह दुनिया में दूसरा सबसे बड़ा सड़क नेटवर्क है।
– भारत के 20 शहरों में मेट्रो कनेक्टिविटी है। हम विश्व स्तर पर तीसरे सबसे बड़े मेट्रो नेटवर्क बनने से एक साल दूर हैं।
– भारत में प्रति व्यक्ति मोबाइल डेटा खपत सबसे अधिक है।
– 5 जी कनेक्टिविटी तेजी से बढ़ती जा रही है। यह ऑनलाइन शिक्षा में जबरदस्त लाभकारी हो सकती है। यह टेलीमेडिसिन और सरकारी सेवाओं के प्रभावी वितरण में सफलता प्रदान करेगी।
– शहरी योजनाओं में 18 खरब रुपये से अधिक का निवेश किया गया है। इससे आवास, परिवहन, नल जल कनेक्शन और अपशिष्ट प्रबंधन में मदद मिली है। पावर सप्लाई बढ़ी है।
4) सरलता (परेशानी मुक्त जीवन)
– भारत के कैशलेस डिजिटल भुगतान पारिस्थितिकी तंत्र को दुनिया में सर्वश्रेष्ठ माना जाता है।
– डिजिटलीकरण की शुरूआत के साथ डिजिलॉकर, पेपरलेस सर्टिफिकेट ऑथेटिंकेशन और डिजिटल लाइफ सर्टिफिकेट की सुविधा बढ़ती जा रही है।
अनेक क्षेत्रों में भारत की बढ़ती वैश्विक प्रतिष्ठा ने हमारे बीच गर्व की एक नई भावना पैदा की है। एक ओर तो देश में गरीबों और कमजोरों को बुनियादी सेवाएं प्रदान करने की व्यापक व्यवस्था हैए वहीं दूसरी ओर मध्यम वर्ग के लिए समृद्धि को बढ़ावा देने के लिए सरकार की प्रतिबद्धता है। ऐसा तंत्र दुनिया के लिए एक वैकल्पिक विकास मॉडल साबित हो रहा है।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित परमेश्वर अय्यर के लेख पर आधारित। 14 फरवरी, 2023
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Date:07-03-23
Per-Capita Income Up, Now to Spread ItPush policy horizon further for redistributionET Editorials
India’s nominal per-capita income has doubled in the previous 10 years. Two-thirds of that, however, is on account of inflation, which by itself tends to increase income inequality. That calls for deeper policy intervention to control inflation, increase government employment, improve financial inclusion and redistribute a bigger slice of fiscal resources. Social choice driven by equity has a significant contribution to the pace of economic growth at every level of per-capita income. Government employment has a bigger impact on inequality at high per-capita income levels, while fiscal transfers work better at the lower end. Inflation, however, has a uniform effect irrespective of an economy’s development stage.
Enhanced welfare in India over the previous 10 years is being counteracted by inflation, which has been in large measure within the legally mandated policy band. Yet, the bias for the consumer price index (CPI) has been to stay predominantly above target. This is over a period when inflation in capital-surplus economies has stayed underwhelmingly below monetary targets. That imposes a set of policy imperatives on India’s ability to improve its trade and investment performance. Tighter integration with the global economy helps India to reduce the interest rate differential, making inflation control more effective.
India’s policy mix broadly conforms to the accepted economic wisdom on pushing growth. The evidence is in the pace of its recovery from the pandemic in relation to that of China. It can push this advantage further to attain the required rate of real per-capita income growth that does not reinforce inequality. Non-democratic China made rapid increases in per-capita income through a social contract not available to India. There is, however, a wide room for improvement through investment, fiscal transfers and financial inclusion. The policy horizon needs to be pushed further so that redistribution reinforces growth. This particular social contract is sustaining structural changes to the Indian economy.
Date:07-03-23
Re- Not De-Globalise, Minus the Salty BitsET Editorials
World Trade Organisation (WTO) director-general Ngozi Okonjo-Iweala is right in saying what the world needs is ‘reglobalisation’, not ‘de-globalisation’. Those in disagreement would argue that the head of the multilateral trade body is hardly likely to argue against globalisation. But the fact is that open global trade has been beneficial for growth and development — lifting millions out of poverty — allowing many developing countries to grow, create jobs and improve lives. But there is no denying that the late 20th-century version of globalisation did leave much of the globe behind. Okonjo-Iweala’s call for re-globalisation is a reminder of that, as well as a call for calibrated correction.
Reforming globalisation to ensure that benefits reach those left behind and address its discontents will require strengthening bodies like WTO and its mechanisms. The call for diversifying supply chains and decentralising manufacturing in the aftermath of disruptions due to the Covid pandemic and Russian invasion of Ukraine is an opportunity. It opens up the possibility to take the benefits of global trade to a wider set, increasing the capacity of countries without undermining global interdependence.
India has benefited from globalisation. At the same time, it also knows its pitfalls. This mixed experience, and the need to ensure that developing countries are not left behind (again) gives India an important voice in this reconfiguring. It should be at the forefront of ensuring that trade is used as a tool to tackle global challenges such as climate change in a manner that is beneficial to all rather than becoming an obstacle to growth, job creation and tackling poverty. Globalisation bears the sweets. Just take out the salty bits.
Date:07-03-23
The anti-defection law is facing convulsionsIn the Maharashtra case, disqualification proceedings under the 10th Schedule should have been given primacy over the proceedings on the symbols orderP.D.T. Achary is former Secretary General of the Lok Sabha
After long years of legislative meanderings, Parliament enacted the anti-defection law (10th Schedule) in 1985 to curb political defection. The volume, intensity, recklessness and uncontrolled venality seen in defections in the 1960s and thereafter almost came to a stop after this. Defections not only caused the frequent fall of governments but also caused great instability in political parties with power-seeking politicians wreaking havoc on political parties. The Supreme Court of India in its first comprehensive judgment in the Kihoto Hollohan case characterised it as a political evil and upheld the right of Parliament to curb this evil through legislative mechanism.
Years have passed and this promise of political stability seems to be ending with the anti-defection law facing convulsions in Indian legislatures, especially in the last five years. The happenings in the State of Maharashtra are an example.
Sound objectives
But before dealing with the questions of constitutional importance that have arisen in the Maharashtra Assembly, and which are presently before the Supreme Court, it is necessary to make a few general points about the scheme of the anti-defection law in India. In fact, a closer reading of this law will show that this enactment had a two-point objective. The first was to curb the act of defection by disqualifying the defecting member. The second was to protect political parties from debilitating instability. The fact is that frequent defections from even well-organised political parties leave them weak. They find themselves incapable of keeping their flock together as politicians have a tendency to abandon a sinking ship and move out in search of greener pastures. Indian democracy is based essentially on a party system where stable parties are a sine qua non of a stable democracy. Representatives elected otherwise than as members of parties cannot run a government, which is a very complex institution that demands unity of purpose, ideological clarity and cohesiveness — objectives that can only come from organised, ideologically-driven political parties. This is true of every democratic country in the world.
That this objective is the principal focus of the anti-defection law is clear from two provisions enacted in the 10th Schedule, namely the provision of a split in a political party and that of a merger of two political parties. Although ‘split’ has ceased to be a defence against disqualification with the deletion of paragraph three of the Schedule, a closer look at this erstwhile provision is necessary for a proper understanding of the true objective of this law. Under this paragraph, if a split occurs in a political party resulting in a faction coming into existence, and one-third of the legislators move out of the party and join that faction, those members could get an exemption from disqualification. The point to note here is that one-third of the legislators would get protection only if there was a split in the original political party. So, the split in the original political party is the pre-condition for exempting one-third of legislators from disqualification.
In other words, if there was no split in the original political party and one-third of the legislators only moved out, all of them would be liable to be disqualified. With the deletion of this paragraph, a split in the original party is no longer a defence against disqualification. Even when a political party has split, the legislators will not get any protection. That would be the impact of the deletion of paragraph three. But the point is that in order for the legislators to claim protection, a split in the original party was always necessary.
The merger issue
In paragraph four which protects defecting members from disqualification, the condition is merger of the original political party with another party and two-thirds of the legislators agreeing to such a merger. Here too, as in split, merger of the political party is the pre-condition to seek exemption from disqualification. One thing that becomes clear from an analysis of the omitted paragraph on split and the paragraph on merger is that the legislators do not have the freedom to bring about a split or merger as they are legally restrained by the anti-defection law. It is the original political party in both cases which takes that decision.
The argument that the Speaker cannot make a roving inquiry into the split or merger is specious as the Speaker takes the decision only after ascertaining the fact of the split. The same applies to the merger. Only a merger of the original political party provides the basis for claiming protection from disqualification under paragraph four. Of course it contains another assertion — namely, the merger will be deemed to have occurred only if two-thirds of the legislators agree to such merger. This simply means that for exempting defecting legislators from disqualification, merger is taken into account only if two-thirds of legislators have agreed to it. A merger of parties can take place outside the legislature but it has no consequence unless two-thirds of the members agree to it.
The crux of the Maharashtra case
In the Maharashtra case, interesting constitutional questions have arisen. The first question that should have been decided by the Court was on whose whip is valid. The whole issue could have been settled on that point. It is true that the breakaway group of the Members of the Legislative Assembly chose its own whip, who also reportedly issued whips to all the MLAs of the Shiv Sena. But the question as to whose whip is valid should have been decided on the basis of the explanation (a) to paragraph 2(1)(a), which says that an elected member of a House shall be deemed to belong to the political party by which he was set up as a candidate for election as such member. This explanation makes it unambiguously clear that the party which can legally issue the whip is the Shiv Sena led by Uddhav Thackeray as this is the party which set them up as candidates in the last election. It should not be forgotten that the anti-defection law was enacted to punish defectors, not to facilitate defection.
The Supreme Court by allowing the Election Commission of India to go ahead and decide the petition under paragraph 15 of the symbols order has put the cart before the horse. The 10th Schedule is a constitutional law and the disqualification proceedings under it should have been given primacy over the proceedings under paragraph 15 of the symbols order which is a subordinate legislation. As it happened, the ECI gave a flawed order which has made the operation of the 10th Schedule irrelevant and complicated.
The propositions made in this article can be summed up as follows: legislators have no freedom under the 10th Schedule to split or bring about a merger of their party with another. Only the original party can do that and the legislators have the choice to agree or not to agree to it. A whip can be legally issued only by the original political party which set them up as candidates in the election. The Court could have settled it as the first and foremost issue which would have done complete justice to the original political party, the Shiv Sena led by Mr. Thackeray, as in the mandate of Article 142 of the Constitution.
Date:07-03-23
How to become a green hydrogen superpowerGreen hydrogen will be a critical industrial fuel of the 21st century. India is well-positioned to show leadershipArunabha Ghosh is CEO, Council on Energy, Environment and Water.
The 2023 Union Budget has allocated ₹19,700 crore for the National Green Hydrogen Mission. This will set in motion a programme that can position India as a green hydrogen (super)power. Why is this important and what will it take?
India has committed to 50% electricity capacity from non-fossil sources by 2030. But an energy transition in industry is needed at the same time. Most industrial greenhouse gas emissions in India come from steel, cement, fertilizers and petrochemicals.
Green hydrogen holds the promise of fuelling industrial growth while simultaneously reducing industrial emissions. Splitting water into hydrogen and oxygen is energy-intensive. When this energy comes from renewable/non-fossil sources, we get green hydrogen. It can serve as an energy source (heavy industry, long-distance mobility, aviation, and power storage) and an energy carrier (as green ammonia or blended with natural gas).
India is targeting at least five million tonnes of production by 2030, which is larger than that of any single economy. This would create demand for 100-125 gigawatts (GW) of renewable energy, 60-100 GW of electrolysers, investment opportunity of ₹8 lakh crore, and cut 50 MMT of annual emissions. With abundant sunshine and significant wind energy resources, India is geographically blessed to become one of the lowest-cost producers of green hydrogen.
Five priorities
For the vision to convert into reality, government and industry must act in sync along five priorities. First, domestic demand is critical. If we are not a big player domestically, we cannot be a major player in the international market. The mission introduces a Strategic Interventions for Green Hydrogen Transition (SIGHT) fund for five years, with ₹13,000 crore as direct support to consume green hydrogen. This will encourage heavy industries to increase demand, offering economies of scale by which suppliers can reduce prices.
Blending mandates for refineries can be another demand trigger. Urea plants have been exempted. Over time, targets can be ratcheted up with blending mandates rising (including for urea fertilizers). Another approach is to leverage government procurement. As the second-largest steel producer in the world, can India aspire to become the largest green steel producer? Costs of green steel, made from green hydrogen, are currently much higher, but could be reduced with economies of scale and changes in production technologies. A share of government procurement of steel could be nudged towards green steel. India could later position itself as a green steel exporter.
Second, India can be an attractive destination for domestic and foreign investment. Green hydrogen production projects announced/underway in India are far fewer compared to others. Green hydrogen is difficult and expensive to transport. The mission envisions green hydrogen hubs to consolidate production, end use and exports. A mission secretariat can ensure project clearance is streamlined and reduce financial risks.
Third, the SIGHT fund offers ₹4,500 crore to support electrolyser manufacturing under the performance-linked incentive scheme. Currently, manufacturers are importing stacks and assembling them. We must become more competitive — with targeted public funding — in manufacturing the most critical and high-value components of electrolysers in India. Not targeting value addition would result in electrolyser technologies and production again getting concentrated. China could end up controlling 38% of electrolyser capacity by 2030. Electrolyser technology must be improved to achieve higher efficiency goals, specific application requirements, be able to use non-freshwater, and substitute critical minerals.
Fourth, establish bilateral partnerships to develop resilient supply chains. Globally, about 63 bilateral partnerships have emerged; Germany, South Korea and Japan have the most. Using yen- or euro-denominated loans for sales to Japan or to the EU, respectively, could reduce the cost of capital and help us become export competitive.
Many bilateral deals focus on import-export but few deal with technology transfer or investments. India must cooperate with like-minded countries on trade, value chains, research and development, and standards. The mission allocates ₹400 crore for R&D, which can be leveraged to crowd in private capital into technology co-development. Indian companies should consider joint projects in countries with good renewable energy resources and cheap finance.
Finally, India must coordinate with major economies to develop rules for a global green hydrogen economy. In the absence of common global frameworks, attempts for rules and standards are being driven by collectives of private corporations rather than through structured intergovernmental processes. There are already signs of conflicting regulations and protectionist measures in major markets. These put India’s ambitions at risk.
India’s G20 presidency is an opportunity to craft rules for a global green hydrogen economy. These rules must address operational threats, industrial competitiveness and strategic threats. India should promote a global network on green hydrogen via which companies could collaborate. Green hydrogen will be a critical industrial fuel of the 21st century. India is well-positioned to show leadership — in our collective interest and that of the planet.
Date:07-03-23
आय के नए तथ्यों से हम खुश हों या चिंतितसंपादकीय
एनएसओ के ताजा आंकड़ों के अनुसार पिछले आठ वर्षों में प्रति व्यक्ति आय वर्तमान मूल्य पर लगभग 86 हजार से बढ़कर 1.72 लाख यानी दूनी हो गई है। लेकिन यह अर्धसत्य है। अगर इस काल की महंगाई को घटाकर देखा जाए यानी 2011 के स्थिर मूल्य को पैमाना माना जाए तो यह आय बहुत कम मात्र 35% बढ़ी है। इसमें भी असली आय ऊपर के 20% लोगों की ही बढ़ी, जबकि नीचे के 80% की पहले से कम हुई है। जहां देश में लग्जरी कारों, सौंदर्य प्रसाधनों, महंगे स्मार्ट फोन और गाड़ियों की बिक्री लगभग दूनी हो गई है, वहीं दो-पहिया वाहनों, टूथपेस्ट, तेल-साबुन जैसे रोजमर्रा के सामानों की बिक्री शहरों के मुकाबले कस्बों-गांवों में कम हो गई है। खरीदी गई कारों में हर तीसरी एक करोड़ रुपए से ज्यादा की है। दरअसल प्रति व्यक्ति आय से यह नहीं पता चलता कि असली आय गरीब की बढ़ी या अमीर की, क्योंकि इसकी गणना सकल राष्ट्रीय आय से आबादी में भाग देकर निकाली जाती है। उदाहरण के लिए अंबानी और प्रवासी मजदूर की आय के योग का आधा होगा प्रति व्यक्ति आया दरअसल सरकारें अक्सर प्रतिशत की जगह संख्या बताने के साथ यह भी नहीं बतातीं कि उस काल में इंफ्लेशन कितना बढ़ा ? अर्थात उसी काल में उसी वस्तु / सेवा को खरीदने में कितना कम ज्यादा देना पड़ा है। सरकार को यह चिंता करनी चाहिए कि अगर रोजमर्रा की चीजें खरीदने में 80% लोग अक्षम हैं तो सबसे ज्यादा नौकरियां देने वाला एमएसएमई सेक्टर और बुरी हालत में आ जाएगा। चूंकि ये श्रमिक मूलतः ग्रामीण भारत से आते हैं, लिहाजा इनका बेरोजगार हो वापस लौटना ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर और बोझ होगा और आर्थिक कमजोरी चक्रीय रूप से बढ़ती जाएगी।
Date:07-03-23
पूर्वोत्तर में भाजपा की सफलता महत्वपूर्ण हैहिंदू-मुस्लिम वाला फॉर्मूला उत्तर-पूर्व में उस तरह नहीं चल पाया है, जिस तरह से वह हिंदी पट्टी या पश्चिम बंगाल में चलता है।शेखर गुप्ता, ( एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’ )
उत्तर-पूर्व के तीन छोटे-छोटे राज्यों (जिनकी कुल आबादी करीब एक करोड़ होगी और जिनमें कुल पांच लोकसभा सीटें हैं) के चुनाव-नतीजों ने भाजपा के पक्ष में एक बार फिर आश्चर्यजनक समर्थन की पुष्टि कर दी है। लेकिन हम कुछ अलग सवाल उठा रहे हैं। चुनाव का ताल्लुक तो राजनीति और दलीय समीकरणों से होता है, तो क्या इन नतीजों का विश्लेषण अपेक्षाकृत गैर-राजनीतिक पहलू से किया जा सकता है? इसलिए, आगे कुछ कहने से पहले हम नतीजे घोषित होने के ठीक बाद उस शाम को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जश्न के मूड में जो कुछ कहा, उस पर गौर करते हैं। बगावतों के बारे में उन्होंने कहा, पहले उत्तर-पूर्व में होने वाले चुनावों के नतीजे जब आते थे तब दिल्ली और देश के दूसरे भागों में चर्चा इस बात की होती थी कि चुनावों के दौरान वहां हिंसा कितनी हुई। इसके बाद उन्होंने भाषण देने के अपने खास अंदाज में बताया कि अब कितना बुनियादी अंतर आ गया है, उत्तर-पूर्व अब न तो दिल्ली से दूर है और न दिल से। अगर आप अपना राजनीतिक झुकाव और वोट देने की पसंद को परे रखें तो आपको उनकी बात में काफी दम दिखेगा।
आज अगर हम उत्तर-पूर्व यानी उसकी कभी की ‘सात बहनों’ और बाद में जुड़े सिक्किम पर नजर डालें तो वहां लगभग कोई बगावत नहीं नजर आएगी। मानना पड़ेगा कि अब दुर्लभ छोटी घेराबंदियां, मुठभेड़ें बढ़ गई हैं। लेकिन हथियारबंद पुलिस और बदमाशों के बीच ऐसी मुठभेड़ें हिंदी पट्टी के किसी राज्य में पूरे उत्तर-पूर्व में ऐसी मुठभेड़ों के मुकाबले ज्यादा हो रही हैं। इसे अलगाववादी बगावत नहीं कहा जा सकता। एकमात्र बागी गुट नेशनलिस्ट सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नगालैंड करीब एक दशक से शांत है और वार्ताओं की अटूट शृंखला में भाग ले रहा है। इस क्षेत्र के बड़े हिस्से में आर्म्ड फोर्सेस स्पेशल पावर्स एक्ट (एएफएसपीए) हटा लिया गया है। बेशक यह प्रक्रिया 2014 के बाद नहीं शुरू हुई, जब मोदी सरकार सत्ता में आई। यह पिछली एनडीए सरकार के जमाने से जारी है। तब त्रिपुरा के तत्कालीन माकपाई मुख्यमंत्री माणिक सरकार और केंद्र के तत्कालीन गृह मंत्री लालकृष्ण आडवाणी के बीच तालमेल से एएफएसपीए को राज्य के सभी 70 पुलिस थाना क्षेत्रों से एक-एक करके हटाने की शानदार प्रक्रिया चलाई गई थी। यह सब एक तरह से संयोग से चला, जब तक कि गड़बड़ी से ग्रस्त कोई इलाका अछूता नहीं बचा। इसके बाद सुस्ती-सी आ गई। लेकिन मोदी सरकार ने इसे फिर शुरू किया। बांग्लादेश के साथ रिश्ते सुधारने से भी काफी मदद मिली। वह अपने यहां पाए जाने वाले भारतीय उग्रवादियों को करीब एक दशक से भारत को खुशी-खुशी सौंप रहा है।
करीब तीन दशकों से मैं लिखता रहा हूं कि उत्तर-पूर्व हमें भारत में कई दशकों से बगावत विरोधी एक अनूठे सिद्धांत का आश्चर्यजनक स्वरूप प्रस्तुत करता रहा है। इसे ग्राफ के रूप में देखिए। राज्य में अलगाववादी हिंसा जैसे-जैसे बढ़ने लगी, सत्तातंत्र की ओर से उसका जवाब भी बढ़ने लगा। एक समय ऐसा आया जब बागियों को एहसास हुआ सत्तातंत्र बहुत सख्त है और वे उससे कभी जीत नहीं पाएंगे, चाहे वे कितना भी नुकसान पहुंचा दें या कितनी भी हत्याएं कर डालें। इस समय तक वे थक चुके थे और सुलह करना चाहने लगे थे। और सरकार ने भी उदारता बरती। जीत का दावा करने या निर्णायक वार करने की जगह उसने राजनीतिक सुलहनामा प्रस्तुत किया। तुम्हें क्या चाहिए? अपनी पहचान बनाए रखने के लिए अपना राज्य चाहिए? कुछ विशेष कानून चाहिए? अपने राज्य में राजनीतिक ताकत चाहिए? तुम्हें यह सब मिलेगा, बस भारतीय संविधान को कबूल कर लो। अगर तुम्हें यह जस का तस पसंद नहीं है तो हम विशेष प्रावधान जोड़ सकते हैं (नगालैंड के लिए अनुच्छेद 371, और शिलांग शांति समझौता, 1975)। सबसे महत्वपूर्ण बात यह कि हम तुम्हें राजनीतिक सत्ता भी सौंप देंगे।
अब इस क्षेत्र में काफी कुछ बदल चुका है। अगर हम छलांग मारकर मोदी के दौर में आ जाएं, तो सबसे बड़ा फर्क यह दिखेगा कि इस क्षेत्र के अंदर और गलती से ‘मेनलैंड’ कहे जाने वाले क्षेत्र के बीच आवाजाही की सुविधा अविश्वसनीय रूप से सुधर गई है। किसी भी क्षेत्र तक पहुंचने की असुविधा ही इस क्षेत्र और दिल्ली के बीच एक बड़ी बाधा थी। पिछले नौ वर्षों में हाईवे की संख्या में नाटकीय वृद्धि हुई है, रेल कई और इलाकों तक पहुंच रही है और हवाई यात्रा में चमत्कारी सुधार हुआ है, किसी बड़े महानगर से किसी राज्य में जाकर अगली सुबह लौट आया जा सकता है। या इसका उलटा भी हो सकता है। शांति, सम्पर्क और भारत की उछाल मारती अर्थव्यवस्था ने उत्तर-पूर्व के सुपर प्रतिभाशाली युवाओं को रोजगार के लिए देश भर में फैलने का मौका प्रदान किया है। इसने मानसिक तथा भावनात्मक जुड़ाव के साथ राष्ट्रीय भावना और भारतीयता को भी बढ़ावा दिया है। इस बीच, मोदी सरकार ने अपना राजनीतिक, राष्ट्रवादी अभियान भी चलाया है। उसने इस क्षेत्र में 19वीं-20वीं सदी में अंग्रेजी हुकूमत से लड़ने वाले नायकों-नायिकाओं के योगदान को प्रचारित किया है, मसलन- रानी गाइडिंलिउ (नगा), कनकलता बरुआ (असम), यू तिरोट सिंग (खासी), बीर टिकेंद्रजीत सिंह (मेतेई, मणिपुर) आदि। मुगल हमलावरों को परास्त करने वाले लचित बरफुकन को राष्ट्रीय नायक का दर्जा दिया गया है। लेकिन भाजपा ने कुछ बड़ी गलतियां भी की। इसका महत्वपूर्ण उदाहरण नए नागरिकता कानून सीएए और एनआरसी की खिचड़ी है। पर उसने जल्द ही अपनी गलती पहचान भी ली है।
Date:07-03-23
कब खुलेगी चुनाव सुधारों की बहुप्रतीक्षित फाइल ?अभय कुमार दुबे, ( अम्बेडकर विवि, दिल्ली में प्रोफेसर )
सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयोग का गठन करने के नियम बदल दिए हैं। अब प्रधानमंत्री, विपक्ष के नेता और सर्वोच्च न्यायाधीश को मिलाकर बनी कमेटी जिन नामों की सिफारिश करेगी, राष्ट्रपति उन्हीं में से आयोग के मुखिया और उनके सहयोगी आयुक्तों को चुनेंगे। हम सभी को उम्मीद हो चली है कि इन नई प्रक्रिया से यह आयोग अधिक स्वायत्त, स्वतंत्र और सरकारी दबावों से मुक्त बनेगा। यह हमारे लोकतंत्र के लिए एक खुशखबरी है। जैसा कि संविधान के अनुच्छेद 324 में पहले से ही दर्ज था, यह व्यवस्था तब तक चलती रहेगी जब तक संसद आयोग के गठन के बारे में कानून नहीं बना देती। यहां सोचने की बात यह है कि अगर संसद पिछले तिहत्तर सालों में अपनी यह जिम्मेदारी निभा देती तो सुप्रीम कोर्ट को यह हस्तक्षेप करने की जरूरत नहीं पड़ती। जाहिर है कि न इस सरकार और न ही किसी और सरकार ने इस बारे में पहलकदमी लेने की कोशिश की। यह हालत निर्वाचन आयोग के गठन की ही नहीं है, बल्कि चुनाव सुधारों के समग्र प्रश्न की भी है। चुनाव प्रक्रिया को बेहतर बनाने, चुनाव प्रणाली में सुधार लाने, उसमें खर्च होने वाली रकम के नियमन में, उस पर से बाहुबल-धनबल-जातिबल का रुतबा हटाने के मामले में दिया गया हर सुझाव ठंडे बस्ते में डाला जाता रहा है।
चुनाव-सुधारों की जरूरत की ओर सबसे पहले सत्तर के दशक में जयप्रकाश नारायण का ध्यान गया था। उन्होंने न्यायमूर्ति वी.एम. तारकुण्डे की अगुआई में एक समिति गठित की, जिसकी रपट 1975 में सामने आई। इसके बाद से कई कमेटियों, आयोगों और अध्ययनों का सिलसिला शुरू हो गया। 1990 में दिनेश गोस्वामी कमेटी गठित की गई। 1998 में इंद्रजीत गुप्ता कमेटी ने मुख्य रूप से चुनाव में खर्च होने वाले धन की समस्या पर विचार किया। 1999 में विधि आयोग ने 170 पृष्ठ की रपट जारी की, जिसमें व्यापक चुनाव सुधारों की सिफारिशें की गई थीं। निर्वाचन आयोग भी अस्सी के दशक से ही चुनाव सुधारों के लिए तरह-तरह की पहलकदमियां लेता रहा है। सर्वोच्च न्यायालय के कई फैसलों ने भी कई पहलुओं से चुनाव-प्रक्रिया को सुधारा है। विरोधाभास यह है कि इन प्रयासों के बावजूद चुनाव-प्रक्रिया से धनबल, बाहुबल और अपराधीकरण को बहिष्कृत नहीं किया जा सका है। इसका सबसे बड़ा कारण है दलों की हिचक, जिससे भारतीय लोकतंत्र निर्वाचन की आदर्श संरचनाओं से दूर बना हुआ है।
जन-प्रतिनिधित्व कानून की धारा 77 की उपधारा (1) का ताल्लुक चुनाव में होने वाले खर्चे से है। मूलत: इसका मतलब था उम्मीदवार के दोस्तों और रिश्तेदारों या उसके एजेंटों द्वारा किए जाने वाले व्यय को भी खर्च सीमा के तहत लाना। खर्च सीमा के उल्लंघन का अर्थ था चुनाव लड़ने पर छह साल की पाबंदी। 1975 में सुप्रीम कोर्ट ने इस संबंध में उठे विवाद पर विचार करके फैसला दिया था कि दोस्तों, एजेंटों और राजनीतिक दलों द्वारा किया जाने वाला खर्च भी उम्मीदवार द्वारा किए जाने वाले व्यय में शुमार किया जाना चाहिए। अगर सुप्रीम कोर्ट की बात मान ली जाती तो चुनाव को धनबल के जरिए प्रभावित करने पर काफी हद तक रोक लग सकती थी। लेकिन फैसला आने के फौरन बाद एक अध्यादेश जारी करके उपधारा (1) में एक व्याख्या जोड़कर इसे निष्प्रभावी कर दिया गया। बाद में यह अध्यादेश संसद द्वारा जन-प्रतिनिधित्व अधिनियम में संशोधन की तरह पारित हो गया। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट कई बार अपने प्रेक्षणों में संसद से अपील कर चुका है कि वह इस मसले पर इस प्रकार का विधि-निर्माण करे, जिससे चुनाव में धनबल के कारण विकृतियां न आएं, पर अभी तक हमारे विधिकर्ताओं के कान पर जूं भी नहीं रेंगी है। विधि आयोग इंद्रजीत गुप्ता कमेटी की वह सिफारिश मान चुका है, जिसमें प्रयोगात्मक रूप से चुनावों की आंशिक सरकारी फंडिंग का सुझाव दिया गया था। पर अभी तक यह सुझाव की शक्ल में ही है। इसकी जगह जो लागू किया गया है, उसे हम इलेक्टोरल बांड्स के नाम से जानते हैं। इससे तो फंडिंग की विकृतियों में इजाफा ही हुआ है।
Date:07-03-23
प्रदूषण के कारणों की पड़ताल केवल कोयले तक ही सीमित क्यों ?सुनीता नारायण
जलवायु परिवर्तन पर जब भी बात होती है तो आखिर कोयला ही क्यों निशाने पर आता है? कोयले की तरह ही प्राकृतिक गैस भी एक जीवाश्म ईंधन है, जो गैस उत्सर्जित करती है और वैश्विक तापमान में बढ़ोतरी का कारण बनती है। मगर इसकी चर्चा कोई क्यों नहीं करता? मैं समझ रही हूं कि यह प्रश्न असहज है मगर इसका उत्तर जानना भी आवश्यक है। मैं इस बात की गंभीरता समझती हूं कि कार्बन डाईऑक्साइड गैस का उत्सर्जन कम करना जरूरी है। मगर हम जो कुछ भी कर रहे हैं उन्हें लेकर सभी बिंदुओं पर स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए।
पर्यावरणविद् होने के नाते मैं भली-भांति समझती हूं कि कोयले का इस्तेमाल ठीक नहीं है और इससे वातावरण में जो धुआं उठता है वह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। कोयले का इस्तेमाल इस वजह से भी अच्छा नहीं माना जा सकता क्योंकि हजारों लघु एवं मझोली औद्योगिक इकाइयों में यह जलाया जाता है जहां प्रदूषण नियंत्रित करना महंगा है या इससे होने वाले प्रदूषण पर नजर रखना मुश्किल होता है। इसके अलावा ताप विद्युत संयंत्रों में भी कोयले का इस्तेमाल होता है। इससे स्थानीय स्तर पर प्रदूषण फैलता है। कई ताप विद्युत संयंत्र पुराने हैं और इन्हें नया रूप देना संभव नहीं है। इनमें ऐसी तकनीकी उपकरण नहीं लगाए जा सकते हैं जो पार्टिक्यूलेट मैटर (पीएम), सल्फर डाईऑक्साइड या नाइट्रोजन ऑक्साइड आदि का उत्सर्जन नियंत्रित करते हैं।
यही कारण है कि वायु प्रदूषण रोकने के लिए दिल्ली में कोयले का इस्तेमाल प्रतिबंधित कर दिया गया है। राष्ट्रीय राजधानी में पुराने पड़ चुके कोयला आधारित ताप विद्युत संयंत्र बंद कर दिए गए हैं। दिल्ली के 100 किलोमीटर के दायरे में कोयले का इस्तेमाल रोक दिया गया है। ईंधन के रूप में कोयले का इस्तेमाल करने वाले सभी भट्ठियों को प्राकृतिक गैस या अन्य स्वच्छ ऊर्जा का इस्तेमाल करने के लिए कहा गया है। ऐसा नहीं करने पर इन्हें बंद किया जा सकता है। मूल लक्ष्य उद्योगों और वाहनों को ऊर्जा के स्रोत के रूप में बिजली के इस्तेमाल के लिए प्रोत्साहित करना है। यह बिजली अक्षय ऊर्जा के स्रोतों से पैदा की जाएगी। हालांकि अंतरिम अवधि में प्राकृतिक गैस का इस्तेमाल एक विकल्प है। कोयले की तुलना में इसके इस्तेमाल से वायु कम प्रदूषित होती है। अब दिक्कत यह है कि प्राकृतिक गैस के दाम बढ़ गए हैं। यूक्रेन संकट और यूरोप में ऊर्जा के स्रोत के रूप में प्राकृतिक गैस की जरूरत दोनों आंशिक रूप से दाम में बढ़ोतरी के लिए उत्तरदायी हैं। इस समय यूरोप में प्राकृतिक गैस की मांग बढ़ गई है जिससे इसकी उपलब्धता प्रभावित हुई है। इसका सीधा असर भारत में स्वच्छ ऊर्जा की तरफ बढ़ने के प्रयासों पर हो रहा है।
मैं कोयले के इस्तेमाल की पक्षधर नहीं हूं मगर मेरा प्रश्न फिर भी कोयला बनाम प्राकृतिक गैस के इर्द-गिर्द है क्योंकि स्थानीय और वैश्विक प्रदूषण का विज्ञान एक जैसा नहीं है। कोयला जलाने पर जितनी मात्रा में कार्बन डाईऑक्साइड और मीथेन गैस निकलती है उनका आधा प्राकृतिक गैस के इस्तेमाल से उत्सर्जित होता है। ये स्थानीय स्तर पर प्रदूषण फैलाने वाले नहीं हैं। ये लंबे समय तक वातावरण में अपना अस्तित्व बनाए रह सकते हैं जिससे वैश्विक तापमान बढ़ता है।
कार्बन डाईऑक्साइड और मीथेन दोनों के प्रबंधन के दो तरीके हो सकते हैं। पहली तकनीक के तहत ईंधन के रूप में कोयले और प्राकृतिक गैस की क्षमता बढ़ाई जा सकती है या अक्षय ऊर्जा की तरफ कदम बढ़ाया जा सकता है। दूसरी तकनीक के तहत इन दोनों ईंधन का इस्तेमाल जारी रखा जा सकता है मगर कार्बन डाईऑक्साइड गैस का भूमिगत भंडारण करना होगा। प्राकृतिक गैस के मामले में मीथेन गैस का भंडारण सावधानीपूर्वक करना होगा और वातावरण में इसका स्राव रोकना होगा। मैं इसलिए यह कह रही हूं ताकि हम स्थानीय और वैश्विक प्रदूषण में अंतर करने की जरूरत समझ सकें और दोनों को एक साथ जोड़कर नहीं देखें। जलवायु परिवर्तन के लिहाज से कोयला और प्राकृतिक गैस दोनों ही खराब हैं। ईंधन के इन दोनों स्रोतों पर निर्भरता धीरे-धीरे कम करने के लिए रणनीति तैयार करने की जरूरत हैं। अगर ऐसी बात है तो कोयले का इस्तेमाल कर अपनी अर्थव्यवस्था खड़ी करने वाला यूरोपीय संघ गैस को भविष्य के ईंधन के रूप में देख रहा है?
यूरोपीय संघ गैस को हरित ईंधन के तौर पर प्रचारित कर रही है। तेल एवं गैस कंपनियां इसे आवश्यक ऊर्जा स्रोत बता रही हैं और अधिक से अधिक गैस निकाल रही हैं। वास्तव में अब यह तर्क दिया जाने लगा है कि प्रश्न प्राकृतिक गैस पर लगातार निर्भरता का नहीं है, बल्कि उत्सर्जन कम करने की जरूरत अधिक हो गई है। यह भी कहा जा रहा है कि हरित ऊर्जा के इस्तेमाल की तरफ कदम बढ़ाने के लिए ‘ग्रीन हाइड्रोजन’ (अक्षय ऊर्जा या अन्य हरित ईंधन की मदद से उत्पन्न हाइड्रोजन) आवश्यक नहीं है। प्राकृतिक गैस से तैयार ‘ब्लू हाइड्रोजन’ भी हरित ईंधन होता है मगर इसके लिए उत्सर्जन कम करने और कार्बन डाईऑक्साइड का सावधानी पूर्व भंडारण करना पड़ता है। इस तरह, पूरा जोर अब उत्सर्जन कम करने पर है न कि जीवाश्म ईंधन (प्राकृतिक गैस) का इस्तेमाल धीरे-धीरे कम करने पर है। मैं एक बार फिर पूछती हूं कि कोयले के मामले में भी उत्सर्जन कम करने पर चर्चा क्यों नहीं की जा सकती है?
इंटरनैशनल इंस्टीट्यूट ऑफ सस्टेनेबल डेवलपमेंट ऐंड यूनिवर्सिटी कॉलेज, लंदन के ग्रेग मटीट एवं अन्य ने ‘नेचर क्लाइमेट’ में प्रकाशित एक पत्र में इस बात पर चर्चा की है कि किस तरह जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी समिति (आईपीसीसी) ने गैस एवं तेल पर निर्भरता कम करने की आवश्यकता का कमजोर आकलन लिया है। कोयले पर निर्भरता पर पूरी तरह समाप्त करने की तुलना में 2030 तक गैस का इस्तेमाल केवल 14 प्रतिशत कम करने की जरूरत बताई गई है। आईपीसीसी ने कहा है कि कोयले पर निर्भरता अगले 10 वर्षों में पूरी तरह समाप्त किए जाने की जरूरत है तभी औद्योगिक काल से पूर्व की तुलना में तापमान में बढ़ोतरी 1.5 डिग्री सेल्सियस से नीचे रहेगी। पत्र में कहा गया है कि तापमान में बढ़ोतरी 1.5 डिग्री सेल्सियस से कम रखने का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए कोयला, तेल एवं गैस से होने वाले उत्सर्जन में बड़ी कटौती करनी होगी। उनका कहना है कि जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी समिति का अपरिपक्व आकलन कोयले पर निर्भर दक्षिणी गोलार्द्ध के देशों पर भारी दबाव डाल रहा है। वास्तव में पत्र में कहा गया है कि विकासशील देशों को किसी भी अन्य देश की तुलना में दोगुना रफ्तार से स्वच्छ ऊर्जा की तरफ बढ़ना होगा।
प्रश्न यह है कि पश्चिमी देशों को प्राकृतिक गैस के बेरोक-टोक इस्तेमाल की अनुमति क्यों दी जानी चाहिए। मैं ये प्रश्न स्वच्छ ऊर्जा की तरफ कदम बढ़ाने की जरूरत से इनकार करने के लिए नहीं पूछती हूं, बल्कि इसलिए पूछती हूं कि इनके कुछ प्रत्युत्तर सामने आ सकें। ये प्रत्युत्तर एक साझा एवं स्वच्छ भविष्य तैयार करने में मदद करेंगे।
Date:07-03-23
पूछताछ और सियासतसंपादकीय
सीबीआई ने बिहार की पूर्व मुख्यमंत्री राबड़ी देवी से उनके घर जाकर पूछताछ की है और इसके बाद राजनीतिक सरगर्मी का बढ़ना स्वाभाविक ही है। नौकरी के बदले जमीन का मामला नया नहीं है। समय-समय पर सीबीआई की सक्रियता बढ़ती है, जिससे एक तरफ जहां दूध का दूध और पानी का पानी होने की उम्मीद बंधती है, तो वहीं दूसरी तरफ, राजनीति भी तेज हो जाती है। सीबीआई अधिकारी सुबह पूर्व मुख्यमंत्री के आवास पर पहुंचे और बताया जाता है कि पूछताछ के लिए दिन और समय का चयन आरोपी पक्ष ने ही किया था। विशेष रूप से, दिल्ली की एक अदालत द्वारा 27 फरवरी को राजद प्रमुख और पूर्व रेल मंत्री लालू प्रसाद यादव व बेटी मीसा भारती के साथ 14 अन्य लोगों को 15 मार्च को अदालत में पेश होने के लिए समन जारी करने के एक हफ्ते बाद यह पूछताछ हुई है। मतलब, आने वाले दिनों में बिहार की राजनीति में सरगर्मी बनी रहेगी।
देर-सबेर इस मामले में राबड़ी देवी से पूछताछ होनी ही थी और यह औचक हुई पूछताछ नहीं है। वैसे, इस मामले में सीबीआई को काफी पहले ही जांच और कार्रवाई पूरी कर लेनी चाहिए थी। यह मामला 2005-06 का है, जब लालू प्रसाद यादव रेल मंत्री हुआ करते थे। सीबीआई के आरोप पत्र में तत्कालीन रेलवे महाप्रबंधक का नाम भी शामिल है। शिकायत है कि इस घोटाले में नौकरी या कोई मदद देने के लिए परोक्ष रूप से भूमि के रूप में रिश्वत ली गई। वैसे यह मामला इतना सीधा या सुलझा हुआ नहीं है, वरना जांच एजेंसियां काफी पहले ही इस मामले का सही समापन कर चुकी होतीं। अगर योग्यता को ताक पर रखकर किसी को नियुक्ति दी गई है, तो कहने की जरूरत नहीं कि यह बहुत गंभीर मामला है। नियुक्ति करते हुए कुछ अन्य चालाकियों की भी शिकायत है, लेकिन अब सीबीबाई को आगे आकर तेजी के साथ इस मामले को न्याय के अंजाम तक पहुंचाना चाहिए। भ्रष्टाचार के मामले में अगर इतनी देरी की जा रही है, तो यह निंदनीय है और अगर भ्रष्टाचार के नाम पर लंबे समय तक कोई मामला खींचकर किसी को परेशान किया जा रहा है, तब तो और दुखद है। केंद्रीय एजेंसियों को अपनी विश्वसनीयता की ज्यादा चिंता होनी चाहिए और एजेंसियां जितनी जल्दी न्याय तक पहुंचेंगी, देश-समाज के लिए उतना ही अच्छा होगा। भ्रष्टाचार के मामले में किसी को राजनीतिक स्तर पर बचाने या फंसाने की साजिश के लिए रत्ती भर गुंजाइश नहीं होनी चाहिए। जब ऐसी कोई गुंजाइश छूट जाती है, तब ऐसे मामलों पर सियासत तेज होती है।
आम आदमी पार्टी के नेता मनीष सिसोदिया के मामले में जिस तरह से कुछ विपक्षी पार्टियां एकजुट विरोध के साथ सामने आई हैं, उसे नजरंदाज नहीं किया जा सकता। इस विरोध की अपनी राजनीति हो सकती है और इसका जमीनी राजनीतिक असर चुनावों में साफ दिख सकता है, पर इसका सटीक जवाब पूरा सच सामने लाकर जांच एजेंसियां ही दे सकती हैं। हालांकि, ऐसे मामलों में सभी पार्टियां समान रूप से मुखर नहीं हैं। सबका अपना-अपना पक्ष है। पर जांच एजेंसियों के आगे ऐसे जितने भी मामले हैं, उनमें उनकी समान सक्रियता दिखनी चाहिए। भ्रष्टाचार के खिलाफ राजनीतिक एकजुटता की बात हर पार्टी करती है, पर जब एकजुट कार्रवाई का मौका आता है, तब सबका दोहरापन दिख जाता है। राजनीतिक पार्टियों के साथ ही जांच एजेंसियों को भी यह देखना चाहिए कि देश का हित किसमें है।
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हाल ही में केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के एक पूर्व न्यायाधीश और एक पूर्व भारतीय सेना कमांडर की राज्यपाल के रूप में नियुक्ति की है। सरकार का यह कदम कुछ कारणों से उचित नहीं कहा जा सकता है। इसे कुछ बिंदुओं में समझते हैं –
1) गवर्नर का पद, ब्रिटिश शासन की विरासत के रूप में बनाए रखा गया है। इस पद की लोकतंत्र में वैधता के प्रश्न पर संविधान सभा के सदस्यों में काफी बहसबाजी हुई थी। अंततः इसे गणतंत्र में शामिल कर लिया गया। इस शर्त पर कि राज्यपाल, केंद्र और राज्यों के बीच एक कड़ी के रूप में तो काम करेगा, लेकिन कुछ विशेष परिस्थितियों को छोड़कर उसका पद बहुत ही सजावटी होगा। राज्यपाल को जिन विशेष परिस्थितियों में विवेकाधीन शक्तियां प्रदान की गई हैं, संविधान में वे ठीक ढंग से परिभाषित नहीं हैं। यही कारण है कि राज्यपाल की भूमिका के हस्तक्षेप से लोकतंत्र के लिए गंभीर प्रश्न खड़े हो जाते हैं।
2) हाल के कुछ वर्षों में झारखंड, केरल, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में राज्यपालों ने कार्यपालिका के राजनीतिक और विधायी कार्यों में दखलअंदाजी की कोशिश की है। यह विवादास्पद है।
3) 2014 से केंद्र में भाजपा का नेतृत्व चला आ रहा है। इस बीच सरकार ने सेनाए पुलिस खुफिया विभागों और न्यायालय से सेवानिवृत्त अनेक अधिकारियों की राज्यपाल के रूप में नियुक्ति की है। इससे तनाव उत्पन्न हो रहा है। ये सभी विभाग ऐसे हैं, जिनके पदाधिकारियों को अपनी वर्तमान भूमिकाओं में पक्षपात पूर्ण राजनीति से दूर रहने की आवश्यकता है। लेकिन सरकार ने इस प्रकार का ट्रेंड सेट कर दिया है कि महत्वपूर्ण विभागों के जिम्मेदार पदों पर आसीन लोगों की निष्ठा संदेह के घेरे में आ जाती है। सरकार को इस प्रकार के निर्णयों से बचना चाहिए। लोकतंत्र की पवित्रता में राज्यपाल के पद की गरिमा को बनाए रखने का प्रयास किया जाना चाहिए।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 14 फरवरी, 2023
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Date:06-03-23
विपक्षी दलों का पत्रसंपादकीय
सही है कि ऐसी कोई सरकार नहीं, जिस पर केंद्रीय जांच एजेंसियों का दुरुपयोग करने का आरोप न लगता हो। केंद्रीय जांच एजेंसियों के दुरुपयोग की शिकायत करने वाले दलों की मानें तो मनीष सिसोदिया को बिना किसी प्रमाण गिरफ्तार किया गया। यदि ऐसा है तो अदालत ने उन्हें जमानत देने से मना करते हुए सीबीआइ के रिमांड पर क्यों भेजा? दिल्ली की शराब नीति के मामले में पूर्व उप मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया की गिरफ्तारी के बाद आठ विपक्षी दलों की ओर से लिखा इस आशय का पत्र कई प्रश्न खड़े करता है कि केंद्रीय एजेंसियों का दुरुपयोग किया जा रहा है। इस पत्र में आम आदमी पार्टी के साथ सात अन्य विपक्षी दलों के नेताओं ने भी हस्ताक्षर किए हैं। सबसे पहले तो यही प्रश्न उठता है कि आखिर आम आदमी पार्टी को छोड़कर केवल सात विपक्षी दल ही इस नतीजे पर क्यों पहुंचे कि केंद्रीय एजेंसियों का दुरुपयोग किया जा रहा है?इसके अतिरिक्त यह प्रश्न भी उठता है कि तृणमूल कांग्रेस की प्रमुख और बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी इस पत्र पर हस्ताक्षर कैसे कर सकती हैं? क्या बंगाल के शिक्षक भर्ती घोटाले को अनदेखा कर दिया जाए? शिक्षकों की भर्ती में घोटाला किया गया और बेहद बेशर्मी के साथ किया गया, यह निष्कर्ष कलकत्ता उच्च न्यायालय का है। क्या तृणमूल कांग्रेस समेत अन्य दल यह चाहते हैं कि देश की जनता यह विस्मृत कर दे कि शिक्षक भर्ती घोटाले में गिरफ्तार बंगाल के मंत्री पार्थ चटर्जी की करीबी अर्पिता मुखर्जी के यहां से करोड़ों की नकदी बरामद की गई थी? यदि तृणमूल कांग्रेस पार्थ चटर्जी को निर्दोष मानती है तो फिर उसने उन्हें पार्टी से निलंबित क्यों किया?
केंद्रीय जांच एजेंसियों के दुरुपयोग की शिकायत करने वाले दलों की मानें तो मनीष सिसोदिया को बिना किसी प्रमाण गिरफ्तार किया गया। यदि ऐसा है तो अदालत ने उन्हें जमानत देने से मना करते हुए सीबीआइ के रिमांड पर क्यों भेजा? इससे भी महत्वपूर्ण सवाल यह है कि यदि शराब नीति में कहीं कोई खामी नहीं थी तो फिर घोटाले का शोर मचते ही उसे वापस क्यों लिया गया? क्या विपक्षी दल इसकी जिम्मेदारी ले सकते हैं कि दिल्ली सरकार की ओर से वापस ली गई शराब नीति में कहीं कोई खामी नहीं थी और उससे शराब विक्रेताओं को कहीं कोई अनुचित लाभ नहीं मिल रहा था? एक सवाल यह भी है कि क्या चिट्ठी लिखने वाले विपक्षी दलों के नेता मनीष सिसोदिया समेत जो अन्य नेता घपले-घोटालों के आरोप में केंद्रीय एजेंसियों की जांच के दायरे में हैं, उनके निर्दोष होने का प्रमाण दे सकते हैं? यह हैरानी की बात है कि विपक्षी नेताओं की चिट्ठी में उन लालू यादव का भी जिक्र है, जिन्हें चारा घोटाले में सजा सुनाई जा चुकी है। यह सही है कि ऐसी कोई सरकार नहीं, जिस पर केंद्रीय जांच एजेंसियों का दुरुपयोग करने का आरोप न लगता हो, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि राजनीतिक भ्रष्टाचार पर पूरी तरह लगाम लग गई है। राजनीतिक भ्रष्टाचार एक कटु सच्चाई है। इसी प्रकार यह भी एक सच है कि राजनीतिक दल अपनी राजनीति चलाने के लिए धन का प्रबंध घपलों-घोटालों के जरिये भी करते हैं। इसी कारण नेताओं के घपले-घोटाले सामने आते रहते हैं।
Date:06-03-23
जनजाति समाज को उकसाने का प्रयासहरेंद्र प्रताप, ( लेखक बिहार विधान परिषद के पूर्व सदस्य हैं )
झारखंड विधानसभा के बाद बंगाल विधानसभा में भी आगामी जनगणना के लिए सरना कोड लागू करने का प्रस्ताव पारित किया गया है। जनगणना करते समय हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई, बौद्ध, जैन, अन्य और उल्लेख नहीं-ऐसे कालम में जनगणना का विवरण प्रकाशित किया जाता है। आम जनगणना की तरह ही जनजाति बंधुओं के लिए की गई जनगणना का विवरण भी इसी तरह प्रकाशित होता है। 1951 की जनगणना के समय पारसी और यहूदियों के लिए भी कालम होता था, पर 1961 के बाद उन्हें अन्य के कालम में जोड़ दिया गया। जनजाति समाज के कुछ लोग भी अपनी जाति को ही अपना पंथ लिखवा देते थे। ऐसे फिरके/जाति को भी अब अन्य के कालम में डाल दिया जाता है।
वर्ष 1961 में देश की जनसंख्या 43,92,34,771 थी, जिसमें जनजाति वर्ग की संख्या 2,98,79,249 थी। 2011 की जनगणना के समय देश की जनसंख्या 1,21,08,54,977 थी, जिसमें जनजाति वर्ग की संख्या 8,41,65,326 थी। 1961 की जनगणना के समय जनजाति समाज की जनसंख्या में 89.59 प्रतिशत हिंदू, 0.20 प्रतिशत मुस्लिम, 5.53 प्रतिशत ईसाई तथा 4.18 प्रतिशत अन्य की संख्या थी। 2011 की जनगणना में खुद को हिंदू लिखवाने वाली जनजातियों की संख्या घटकर 80.50 प्रतिशत हो गई तो ईसाई जनसंख्या 5.53 से बढ़कर 9.87 प्रतिशत तथा अन्य की जनसंख्या 4.18 से बढ़कर 6.78 प्रतिशत हो गई। 2011 की जनगणना में देश में अन्य लोगों की कुल आबादी 70,95,408 थी, जिसमें केवल झारखंड में यह संख्या 40,12,622, बंगाल में 7,74,450, मध्य प्रदेश में 5,84,338, छत्तीसगढ़ में 4,88,097 तथा ओडिशा में 4,70,267 थी। पूर्वोत्तर के प्रांतों में अपने को अन्य कालम में लिखवाने वाले कालांतर में ईसाई बनते गए। जैसे-अरुणाचल में 1971 में अन्य 63.45 प्रतिशत तथा ईसाई 0.78 प्रतिशत थे, परंतु 2011 में अन्य घटकर 26.20 प्रतिशत हो गए तो ईसाई बढ़कर 30.26 प्रतिशत हो गए। नगालैंड में 1951 में अन्य 49.50 प्रतिशत तथा ईसाई 46.04 प्रतिशत थे, पर 2011 में अन्य घटकर 0.16 प्रतिशत हो गए तो ईसाई बढ़कर 87.92 प्रतिशत हो गए। मणिपुर में 1951 में अन्य 21.55 प्रतिशत तथा ईसाई 11.87 प्रतिशत थे, पर 2011 में अन्य घटकर 8.88 प्रतिशत रह गए तो ईसाई बढ़कर 41.28 प्रतिशत हो गए। ईसाई बहुल मेघालय में भी 1961 में अन्य 42.92 प्रतिशत तथा ईसाई 35.21 प्रतिशत थे, पर 2011 में अन्य घटकर 8.70 प्रतिशत तो ईसाई बढ़कर 74.59 प्रतिशत हो गए।
2011 की जनगणना के अनुसार नगालैंड में कुल जनजाति समाज के 98.21 प्रतिशत, मणिपुर में 97.42 प्रतिशत, मिजोरम में 90.07 प्रतिशत, मेघालय में 84.42 प्रतिशत तथा अरुणाचल प्रदेश में 40.92 प्रतिशत लोग ईसाई बन गए हैं, पर जिस तरह पूर्वोत्तर के राज्यों में ईसाइयों को जनजाति समाज के लोगों का मतांतरण कराने में सफलता मिल रही थी, उन्हें वैसी सफलता पूर्वी भारत के बंगाल, झारखंड और ओडिशा में नहीं मिल पा रही थी। झारखंड में 1961 में ईसाई 11.21 प्रतिशत तथा अन्य 18.45 प्रतिशत थे, लेकिन 2011 में अन्य बढ़कर 46.41 प्रतिशत तो हुए, पर ईसाई केवल 13.87 प्रतिशत ही हुए। बंगाल में 1961 में ईसाई 2.75 प्रतिशत तथा अन्य 1.78 प्रतिशत थे, लेकिन 2011 में ईसाई बढ़कर 6.49 प्रतिशत तो अन्य 14.62 प्रतिशत हो गए। पूर्वी भारत के राज्यों के जनजाति बंधु अपने को हिंदू ही कहते थे। ईसाई मिशनरियों ने योजनापूर्वक हिंदू के बदले जनजाति बंधुओं को सरना, मुंडा, उरांव, हो आदि लिखवाने को कहते थे। चूंकि जनगणना में इसके लिए अलग से कोई कालम नहीं रहता था, अतः उन्हें अन्य के कालम में डाल दिया जाता था। 2011 की जनगणना के अनुसार झारखंड में इसी अन्य में संथाल लिखवाने वालों की संख्या 10,08,997, उरांव लिखवाने वालों की संख्या 10,49,077, हो लिखवाने वालों की संख्या 8,69,362 तथा मुंडा लिखवाने वालों की संख्या 6,05,335 है। जनजाति समाज का ईसाइकरण करने में असफल विदेशी ताकतें उन्हें सरना कोड के नाम पर आंदोलन चलाने को उकसाती रहीं, पर उन्हें सफलता नहीं मिल रही है। झारखंड और बंगाल के प्रस्ताव के तहत अभी भले ही संथाल, उरांव, मुंडा, हो अपने को सरना कोड में लाने को तैयार हो जाएं, पर क्या भविष्य में वे एक ही कोड को स्वीकार कर पाएंगे? क्या भविष्य में कोई अन्य कोड की मांग नहीं उठेगी? क्या सरना कोड को स्वीकार कर सभी मतांतरित ईसाई, ईसाई पंथ छोड़ देंगे? 1996 में असम में बोडो और संथाल लोगों के बीच संघर्ष हुआ था। पूर्वोत्तर के खासी, गारो, जयंतिया, राभा, बोडो, झारखंड के खरवार, भूमिज, कोल और बंगाल के भूटिया, लेपचा, तमांग आदि जनजाति समाज के लोग भी अपनी अलग पहचान को लेकर काफी सजग और संघर्षशील रहे हैं।
वास्तव में एक तरफ ‘विविधता में एकता’ की बात तो दूसरी तरफ ‘यूनिटी इन डाइवर्सिटी इज थ्रेट टू अवर आइडेंटिटी’ की बात करने वाले समय-समय पर सरना कोड का मुद्दा उठाकर अपनी-अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकते रहते हैं। जनजाति समाज को उकसाने का कोई भी प्रयास गृहयुद्ध को निमंत्रण देगा। वोटवैंक की राजनीति के लिए देश के राजनीतिक दलों को आग से नहीं खेलना चाहिए। विदेशी ताकतें और उनके द्वारा पोषित एनजीओ तो इस आग को हवा देने को तैयार बैठे हैं। जनजाति संगठनों को विश्वास में लेकर इस विषय पर गहन चिंतन करना समय की मांग है। कुल जनसंख्या में हिंदू आबादी का प्रतिशत घटना देश को एक और विभाजन की ओर धकेल देगा।
Date:06-03-23
नियामकीय स्वतंत्रतासंपादकीय
सर्वोच्च न्यायालय ने भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) को मुश्किल हालात में डाल दिया है। सर्वोच्च न्यायालय ने गत सप्ताह एक उच्चस्तरीय समिति का गठन किया जिसकी अध्यक्षता सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश अभय मनोहर सप्रे को सौंपी गई है। इस समिति को ‘हालात का समग्र आकलन करना है जिसमें वे प्रासंगिक कारक शामिल हैं जिनके चलते हाल के दिनों से प्रतिभूति बाजार में उतार-चढ़ाव है।’ समिति में भारतीय स्टेट बैंक के पूर्व चेयरमैन ओ पी भट्ट, इन्फोसिस के सह-संस्थापक नंदन नीलेकणी, बैंकर के वी कामत, सेवानिवृत्त न्यायाधीश जे पी देवधर तथा प्रतिभूति कानूनों के विशेषज्ञ अधिवक्ता सोमशेखर सुंदरेशन शामिल हैं। माना जा रहा है कि यह यह समिति इस बात का आकलन करेगी कि क्या अदाणी समूह या अन्य कंपनियों के मामले में प्रतिभूति कानूनों के कथित उल्लंघन के मामलों में नियामकीय स्तर पर कुछ नाकामी रही है। समिति से यह भी अपेक्षा है कि वह भारतीय निवेशकों के संरक्षण के लिए नियामकीय ढांचे को मजबूत बनाने को लेकर भी कुछ सुझाव देगी।
हाल के दिनों में अदाणी समूह के शेयरों के साथ जो भी हुआ उससे इतर भी निश्चित रूप से नियामकीय ढांचे में सुधार की गुंजाइश है लेकिन इस मामले से निपटने का यह सही तरीका नहीं है। सेबी संचालन ढांचे में सुधार को लेकर लगातार काम कर रहा है और उसने भी अतीत में इसके लिए विशेषज्ञ समिति का गठन किया है। चूंकि नियामक अमेरिका के हिंडनबर्ग रिसर्च (जिसने अदाणी समूह के शेयरों पर शॉर्ट पोजिशनिंग से कमाई की) द्वारा लगाए गए आरोपों के विभिन्न पहलुओं की जांच कर रहा था तो इसे जारी रहने देना चाहिए। हकीकत में सर्वोच्च न्यायालय ने अपने आदेश में कहा कि सेबी को यह जांच करनी चाहिए कि क्या अदाणी समूह की कंपनियों ने प्रतिभूति अनुबंध (नियमन) नियम 1957 के नियम 19ए का उल्लंघन किया। इसके अलावा अगर किसी शेयर को लेकर ऐसी कोई गतिविधि हुई है तथा क्या संबंधित पक्ष के लेनदेन की कानून तथा नियमन के मुताबिक जानकारी नहीं दी गई।
चूंकि मामले की पड़ताल सेबी द्वारा की जा रही है इसलिए यह स्पष्ट नहीं है कि विशेषज्ञ समिति के गठन से कैसे मदद मिलेगी। यह समिति नियामक की स्थिति को कमजोर कर सकती है। हालांकि सूचनाओं के लिए यह काफी हद तक नियामक पर ही निर्भर करेगी। चूंकि सेबी आरोपों की जांच की प्रक्रिया में है इसलिए यह स्पष्ट नहीं है कि जांच खत्म होने तक समिति किसी नतीजे पर कैसे पहुंचेगी। नियामकीय ढांचे को मजबूत करने की बात करें तो प्रतिभूति बाजार नियामक इसके लिए पूरी तरह सशक्त है।
व्यापक स्तर पर देखें तो यह कहा जा सकता है कि नियामक को अदाणी समूह के शेयरों के मामले में तथा उनकी शेयरधारिता के रुझानों को लेकर अधिक सक्रियता बरतनी चाहिए थी लेकिन यह मामला ऐसा भी नहीं था कि न्यायालय हस्तक्षेप करे और इसके लिए समिति का गठन करे। हालांकि यह बात सही है कि अदाणी समूह के शेयरों के बाजार मूल्य को करीब 10 लाख करोड़ रुपये की क्षति पहुंचती है लेकिन इनमें खुदरा और म्युचुअल फंड की हिस्सेदारी काफी हद तक सीमित थी। इसके अलावा कोई समस्या सामने नहीं आई तथा शेयर बाजार सुचारु रूप से काम कर रहे हैं। वित्तीय बाजारों में अस्थिरता तो रहती ही है तथा बड़ी तादाद में निवेशकों के निरंतर कदमों से मूल्य निर्धारण होता है।
जिन शेयरों पर सवाल उठे हैं उनके मामले में भी निवेशकों उन्हें खरीदते समय ही जोखिम का पता होना चाहिए था। हालांकि निवेशकों को बाजार की अस्थिरता से बचाने का कोई तरीका या जरूरत नहीं है। उदाहरण के लिए अमेरिका में कुछ बड़ी प्रौद्योगिकी कंपनियों का बाजार पूंजीकरण 2022 में 50 फीसदी तक घट गया क्योंकि बाजार के हालात बदल गए थे। बाजार ऐसे ही काम करते हैं।
Date:06-03-23
भ्रष्टाचार की जड़ेंसंपादकीय
हर राजनीतिक दल सत्ताधारी दल पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए चुनाव में मतदाता को अपनी ओर खींचने का प्रयास करता है। हर दल का दावा होता है कि सत्ता में आने के बाद वह पूरी व्यवस्था को भ्रष्टाचार मुक्त कर देगा। मगर होता इसके उलट है। हर साल भ्रष्टाचार की दर कुछ बढ़ी हुई ही दर्ज होती है। भारत की गिनती सर्वाधिक भ्रष्टाचार वाले देशों में की जाती है। ऐसे में यह नई बात नहीं है कि सर्वोच्च न्यायालय ने छत्तीसगढ़ सरकार में मुख्य सचिव रहे एक प्रशासनिक अधिकारी के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले में सुनवाई करते हुए इस प्रवृत्ति को कैंसर बताया। अदालत ने कहा कि यह पूरे समुदाय के लिए शर्म की बात है कि हमारे संविधान निर्माताओं के मन में जो ऊंचे आदर्श थे, उनका पालन करने में लगातार गिरावट आ रही है। यह बात हर कोई स्वीकार करता है कि भ्रष्टाचार के चलते धन के समान वितरण का संवैधानिक तकाजा कहीं हाशिए पर चला गया है, मगर इस पर अमल कम ही लोग करने को तैयार दिखते हैं। इसलिए हैरानी की बात नहीं कि जिस दिन सर्वोच्च न्यायालय ने अदालतों को यह नसीहत दी कि उन्हें भ्रष्टाचार के मामलों में किसी भी तरह की रियायत नहीं बरतनी चाहिए, उसी दिन कर्नाटक और झारखंड में रिश्वत से जमा की गई भारी रकम पकड़ी गई।
हमारे देश में अब यह सर्वस्वीकृत तथ्य है कि बिना रिश्वत के कोई काम नहीं हो सकता। विकास परियोजनाओं में ठेकेदारी पानी हो, सरकारी नौकरी पानी हो, यहां तक कि तहसील-तालुका से अपनी जमीन-जायदाद के कागजात हासिल करने हों, तो बिना रिश्वत के काम नहीं चल सकता। बहुत सारे सरकारी विभागों में तो अलग-अलग काम के लिए बकायदा दरें निर्धारित हैं। हर ठेके में ऊपर से लेकर नीचे तक के अधिकारियों-मंत्रियों आदि के कमीशन तय होते हैं। विचित्र तो यह भी है कि बहुत सारी जगहों पर किसी अधिकारी से मिलाने तक के लिए चपरासी पैसे मांग लेता है। इस तरह सरकारी महकमों में भ्रष्टाचार खुल्लम खुल्ला चलता है। यह कोई छिपी बात नहीं है। एक सामान्य आदमी भी किसी मामूली सरकारी कर्मचारी के ठाठ-बाट से अंदाजा लगा सकता है कि उसकी ‘ऊपरी’ कमाई कितनी होती होगी। हालांकि केंद्र और राज्य सरकारों ने बहुत सारे कामों में पारदर्शिता लाने के मकसद से खिड़कियों पर कतार लगाने और अधिकारियों के चक्कर काटने की परंपरा खत्म करके इंटरनेट के जरिए काम कराने की व्यवस्था कर दी है। पर हकीकत यही है कि इसके बावजूद भ्रष्टाचार का आंकड़ा लगातार बढ़ रहा है।
भ्रष्टाचार की जड़ें सबको पता हैं। हर मंत्री और अधिकारी उन्हें पहचानता है, मगर दिक्कत यह है कि भ्रष्टाचार मिटाने का संकल्प सिर्फ नारों तक सिमट कर रह गया है। उसके लिए कोई राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं दिखाई देती। जब खुद मंत्री और उनके सचिव इस खेल में शामिल पाए जाते हैं, तो भ्रष्टाचार को मिटाने की उम्मीद भला किससे की जाए। एक बार चुनाव जीतने के बाद जनप्रतिनिधियों की संपत्ति में कई सौ गुना की वृद्धि देखी जाती है। पिछले कुछ सालों में पड़े आयकर और प्रवर्तन निदेशालय आदि के छापों में कितने ऐसे नाम उभर कर आए। मगर फिर खुद राजनीतिक दल ऐसी कार्रवाइयों को बदले की भावना से उठाए जा रहे कदम बताने पर तुल जाते हैं। इस आरोप को खारिज भी नहीं किया जा सकता। हर सत्तापक्ष भ्रष्टाचार मिटाने के नाम पर ऐसा भेदभाव करता दिखता रहा है। इसलिए भ्रष्टाचार की जड़ों पर तब तक प्रहार संभव नहीं है, जब तक कि राजनीतिक नेतृत्व इसे लेकर खुद गंभीर न हो।
Date:06-03-23
भूकंप से बचाव की तैयारीअखिलेश आर्येंदु
नीदरलैंड के सर्वेक्षणकर्ता हूगरबीट्स ने तुर्किये और सीरिया के बारे में भूकंप को लेकर जो भविष्यवाणी की थी, उसी ने भारत के बारे में भी भविष्यवाणी की है। ये दुनिया के पहले शोधकर्ता हैं जो भूकंप की भविष्यवाणी का दावा कर रहे हैं। हालांकि दुनिया के वैज्ञानिकों का कहना है कि उनके दावों के पीछे कोई वैज्ञानिक प्रमाण नहीं है। गौरतलब है कि हूगरबीट्स जो खुद को भूकंपीय शोधकर्ता बताते हैं, सौर प्रणाली भूमिति सूचकांक के सहारे सटीक भविष्यवाणी करने का दावा करते हैं। तुर्कीये और सीरिया के भूकंप को लेकर उनका दावा सच बताया जा रहा है। मगर सवाल है कि क्या भारत के बारे में जो भूकंप आने की भविष्यवाणी उन्होंने की है, उसे तुर्कीये में आए भूकंप की भविष्यवाणी से जोड़ कर देखना चाहिए?
भूकंप पर शोध करने वाले यूनाइटेड स्टेट्स जियोलाजिकल सर्वे का कहना है कि भूकंप की भविष्यवाणी करने का कोई विश्वसनीय तरीका नहीं है। बावजूद इसके अगर भविष्यवाणी कुछ हद तक भी सही साबित होती है तो हूगरबीट्स की भविष्यवाणी को पूरी तरह खारिज नहीं किया जाना चाहिए। हमें यह देखना है कि भविष्यवाणी सच हो या न हो, लेकिन जिस खतरनाक क्षेत्र में दिल्ली और दूसरे कई इलाके आते हैं, उस नजरिए से भी भूकंप से बचने की बेहतर तैयारी पूरी मुस्तैदी के साथ करने की जरूरत है। इससे भूकंप के प्रति हमारी लापरवाही खत्म होगी और खतरनाक पैमाने पर भूकंप आने पर भी काफी जान-माल की रक्षा हो पाएगी।
वैज्ञानिकों के मुताबिक पूरा भारतीय उपमहाद्वीप धीरे-धीरे भूकंप वाले खतरनाक क्षेत्र में आता जा रहा है। कब उच्च स्केल का भूकंप आ जाए, कहना मुश्किल है। इसलिए भू-वैज्ञानिक भूकंप से बचने के लिए आम आदमी में सजगता बढ़ाने पर जोर देते रहे हैं। वैज्ञानिकों के मुताबिक दिल्ली, दिल्ली के आसपास और देश का पश्चिम-उत्तर क्षेत्र भूकंप की दृष्टि से अतिसंवेनशील क्षेत्र है। इसलिए हर वक्त, हर उम्र और हर वर्ग के लोगों में सजगता और संवेदनशीलता की जरूरत है। महज ज्यादा तादाद में वेधशालाएं स्थापित करने से उच्च स्तर के भूकंपों से जान माल से पूरी तरह बचाव करना नामुमकिन है।
भू-वैज्ञानिकों के मुताबिक धरती के अंदर दिनोंदिन हलचल बढ़ रही है। पिछले दो सालों में दो दर्जन से ज्यादा भूकंप के छोटे झटके महसूस किए गए। लोगों में दहशत होना लाजमी है, बावजूद इसके भूकंप के प्रति लोगों में वैसी सजगता और तैयारी नहीं है। आमतौर पर ज्वालामुखी या धरती के पपड़ी के भीतर गहरे आंदोलन होने या टेक्टोनिक प्लेटों के विस्थापन या आपस में टकराने की वजह से उच्च स्तर के भूकंप आते हैं। भारत-नेपाल में धरती के नीचे ये क्रियाएं तेज गति से चलती रहती हैं। यही वजह है कि साल में दर्जनों भूकंप की घटनाएं दर्ज होने लगी हैं। दुनिया के सबसे सक्रिय भूकंपीय इलाकों में भारत, तुर्कीये, उत्तर अफ्रीकी और दक्षिण अमेरिकी देश शामिल हैं। दिल्ली में छोटे स्तर के भूकंप आते ही रहते हैं, जिसकी वजह भारतीय प्लेटों में कंपन है। मगर उच्च रिक्टल स्केल का भूकंप भी आ सकता है, यह कब आएगा यह अनुमान लगाना मुश्किल है। पर जिस क्षेत्र में दिल्ली आती है और जिस प्लेट के ऊपर बसी है, इससे कभी भी कोई बड़ा भूकंप का झटका आ सकता है। वहीं हम यह नहीं कह सकते कि उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, उत्तराखंड, हरियाणा, जम्मू-कश्मीर जैसे राज्य भूकंप के नजरिए से ज्यादा खतरनाक नहीं हैं। भूकंप इसलिए ज्यादा विनाशकारी साबित होता है कि ज्यादातर भवन अवैज्ञानिक ढंग से बनाए जाते हैं। जो मानक भूकंपरोधी भवन बनाने के तय किए गए हैं उसका पालन न निजी तौर पर घर बनाते वक्त आम लोग करते हैं और न भवन निर्माता। देखा गया है कि बहुत कम तीव्रता के भूकंप आने पर भी इमारतें हिलने लगती हैं और उनमें दरारें पड़ जाती हैं। भारत के भूकंप का उच्च जोखिम वाला देश होने की वजह भवन या घर बनाने में भूकंपरोधी नियमों का पालन न करना तो है ही, भूकंप से बचाव की सजगता की बेहद कमी भी है।
भारत दुनिया की सबसे घनी और बड़ी आबादी वाला देश होने की वजह से उच्च पैमाने के भूकंप से जान-माल का नुकसान होने की संभावना ज्यादा रहती है। इसे देखते हुए भारत सरकार ने 2026 तक और सौ भूकंप वेधशाला तैयार करने का निर्णय किया है। इसी क्रम में अब तक पैंतीस वेधशालाओं को रोस्टर से जोड़ दिया गया है। इससे भूकंप के स्तर की बेहतर जानकारी मिलने में सहूलियत हो जाएगी।
हिमालयी क्षेत्र भूकंप का उच्च जोखिम वाला क्षेत्र है। यहां उच्च पैमाने का भूकंप आने की हमेशा प्रबल संभावना बनी रहती है। भूकंप का कोई पूर्वानुमान नहीं लगया जा सकता, इसलिए चिंता और बढ़ जाती है। ऐसे में इससे डरने के बजाय बचाव की बेहतर तैयारी होनी चाहिए। आजादी के पहले हिमालयी क्षेत्र में 1897 में शिलांग, 1905 में कांगड़ा, 1934 में बिहार-नेपाल और असम में बड़ा भूकंप आया, जिसमें हजारों लोग मारे गए और लाखों घायल हुए थे। फिर चालीस साल तक इस क्षेत्र में कोई बड़ा भूकंप नहीं आया। 1991 में उत्तरकाशी, 1999 में चमोली और 1915 में नेपाल में उच्च तीव्रता का भूकंप आया, जिसमें हजारों लोगों की मौत हो गई थी। इसे देखते हुए भूकंप के प्रति सजगता और इससे बचने की पुख्ता तैयारी की जरूरत है। भूकंप आने पर जान-माल का नुकसान कम से कम हो, इसके लिए जरूरी है कि चौबीस घंटे भूकंप के प्रति सजग रहें और दूसरों को भी सजग करते रहें। भूकंप के पहले, भूकंप के वक्त और भूकंप के बाद लोगों में इससे निपटने की रणनीति कैसी हो, इस बात की सजगता जरूरी है।
वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर भूकंप के प्रति जन सामान्य में बेहतर तैयारी और सजगता हो तो भूकंप से नुकसान नाममात्र का ही होगा। इसलिए वाडिया भू-विज्ञान संस्थान हिमालय क्षेत्र के स्कूलों और गांवों में जाकर लोगों को जागरूक करने का कार्य करता है। इससे इस क्षेत्र के लोगों में भूकंप के प्रति सजगता और संवेदनशीलता आई है। गौरतलब है हिमालय क्षेत्र में साठ वेधशालाएं कार्य कर रही हैं, जो भूकंप की हर गतिविधि की पल-पल की जानकारी देती रहती हैं। मगर सोशल मीडिया, टीवी चैनलों और अखबारों के जरिए आम लोगों के जान-माल को भूकंप से बचने के लिए सतर्क और सजग किया जा सकता है। भूकंप से जान-माल से बचाव न हो पाने की वजह यह भी है कि भूकंप आने का वक्त और अंतराल के बारे में वैज्ञानिक कुछ बता पाने की हालात में नहीं हैं। भूकंप आता है, तो लोग मनाते हैं कि वे बचे रहें, लेकिन कुछ साल गुजरता है और फिर भूल जाते हैं कि भूकंप फिर आ सकता है और उससे उनकी जान जा सकती है या गंभीर रूप से घायल हो सकते हैं। इसलिए मानसिक और आर्थिक दोनों तरह से भूकंप से बचने के लिए तैयार रहना जरूरी है। यह सोच कर हम नहीं बच सकते हैं कि ईश्वर जैसा चाहेगा वैसा ही होगा। और यह सोच बनाना भी ठीक नहीं कि इंसान के हाथ में कुछ भी नहीं है। यह सब खुद को तसल्ली देने के लिए तो हम कर सकते हैं, लेकिन प्राकृतिक आपदाओं से बचने के लिए सजगता और छद्म अभ्यास के जरिए बेहतर बचाव का उपाय हो सकता है।
Date:06-03-23
कड़ा दंड मिलेसंपादकीय
अफवाह किस कदर वैमनस्यता और हिंसक माहौल तैयार करती है, यह तमिलनाडु में उत्तर भारतीयों खासकर बिहार-झारखंड के मजदूरों के साथ घटित वाकये से समझा जा सकता है। अच्छी बात यह हुई कि बिहार और तमिलनाडु सरकार ने इस मामले में त्वरित सक्रियता दिखाई और कथित भय का जो वातावरण बना था, वह समाप्त हुआ। दरअसल, उत्तर भारत के प्रवासी मजदूरों के साथ हिंसा और बिहार के 12 मजदूरों की फंदा लगाकर हत्या किए जाने की झूठी खबर और मारपीट के वीडियो वायरल किए जाने के बाद देश भर में यह समाचार तेजी से फैला कि तमिलनाडु में हिंदी बोलने लोगों के साथ बेहद बुरा बर्ताव हो रहा है, और प्रवासी मजदूरों की बड़ी संख्या अपने गृह राज्य लौटने को विवश है। पूरे प्रकरण में बिहार के विपक्षी दलों की भूमिका भी नकारात्मक दिखी और बिना पड़ताल किए सभी लोग इस खबर को सच मान बैठे। यहां तक कि जिन नेताओं सोशल मीडिया मंच पर लाखों प्रशंसक थे, उन्होंने भी अफवाह को विस्तार दिया। जबकि इसके उलट तमिलनाडु भाजपा के अध्यक्ष ने इस तरह की खबरों को बकवास बताया और मारपीट का खंडन किया। प्रशंसा तमिलनाडु और बिहार सरकार की भी करनी चाहिए, जिन्होंने तुरंत इस खबर का खंडन किया। बिहार सरकार ने अधिकारियों की एक टीम तमिलनाडु भेजी वहीं तमिलनाडु सरकार ने भी प्रवासी मजदूरों की सुरक्षा का वादा किया। बहरहाल, अब जो बात सामने आ रही है, उसके मुताबिक तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन के जन्मदिन – जिसमें बिहार के उप मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने भी शिरकत की- के अगले ही दिन बिहारी प्रवासी मजदूरों के साथ मारपीट और हत्या किए जाने की झूठी खबर फैलाई गई। इ मामले में अब तक भाजपा के एक नेता और दो पत्रकारों के खिलाफ देश भर में ‘जहर’ फैलाने का केस दर्ज किया जा चुका है। देश की अमन-शांति के साथ इस तरह का बिगाड़ करने वालों के खिलाफ सख्त कार्रवाई जरूरी है। ऐसा करने के पीछे किन लोगों का दिमाग था, इसका खुलासा जरूरी है। चूंकि तमिलनाडु के तिरुपुर में देश का 40 फीसद से ज्यादा सूती कपड़ों का कारोबार होता है, जिसे प्रवासी मजदूर ही संभालते हैं। अन्य छोटे और मध्यम उद्योगों, होटल, भारी उद्योग और कंस्ट्रक्शन कंपनियों में अधिकांश मजदूर बिहार के हैं, और ऐसी खबरों से व्यवसाय चौपट हो सकता है। चुनांचे, सरकार को ऐसे तत्वों की पहचान कर ऐसी कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए जो नजीर बन सके।
Date:06-03-23
निष्पक्ष हों संवैधानिक संस्थाएंविनीत नारायण
भारत निर्वाचन आयोग में चुनाव आयुक्तों और मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति को लेकर सर्वोच्च अदालत की 5 सदस्यीय संवैधानिक बेंच ने पिछले गुरुवार को ऐतिहासिक फैसला सुनाया। फैसले के बाद भारत निर्वाचन आयोग में आयुक्तों की नियुक्ति पर केंद्र का सीधा हस्तक्षेप घटेगा। कोर्ट ने फैसला सुनाते समय इस बात पर जोर डाला कि संविधानिक संस्थाओं का निष्पक्ष होना लोकतंत्र के लिए बहुत आवश्यक है। सभी राजनैतिक दलों ने फैसले का स्वागत किया जा रहा है। शीर्ष अदालत के 378 पन्नों के इस ऐतिहासिक फैसले के पीछे 1997 का ‘विनीत नारायण बनाम भारत सरकार’ का फैसला है।
इस फैसले में प्रवर्तन निदेशालय, सीबीआई और सीवीसी के निदेशकों की नियुक्ति और उनके कार्यकाल को लेकर दिशा- निर्देश दिए गए थे, जिससे जांच एजेंसियों को सरकारी दखल अलग रख कर निष्पक्ष और स्वायत्त रूप से कार्य करने की छूट दी गई थी परंतु सवाल उठता है कि क्या जांच एजेंसियां सरकार के दबाव से मुक्त हुई ? ऐसा क्या हुआ कि उसी शीर्ष अदालत ने सीबीआई को ‘पिंजरे का तोता’ कहा? दरअसल, पिछले कुछ वर्षों से चुनाव आयोग की कार्यशैली को लेकर विपक्षी दलों में ही नहीं, बल्कि लोकतंत्र में आस्था रखने वाले हर जागरूक नागरिक के मन में भी अनेक प्रश्न खड़े हो रहे थे। सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव आयुक्त अरुण गोयल की नियुक्ति की फाइल मांग कर भारत सरकार की स्थिति को असहज कर दिया था पर इसका सकारात्मक संदेश देश में गया। सर्वोच्च न्यायालय ने चुनाव आयोग की विवादास्पद भूमिका पर टिप्पणी करते हुए 1990-96 में भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त रहे टीएन शेषन को याद किया और कहा है, ‘देश को टीएन शेषन जैसे व्यक्ति की जरूरत है । ‘
सर्वोच्च न्यायालय ने यह टिप्पणी 2018 से लंबित कई जनहित याचिकाओं की संवैधानिक पीठ के सामने चल रही सुनवाई के दौरान की जिनमें मांग की गई है कि चुनाव आयोग के सदस्यों का चयन भी कॉलेजियम प्रक्रिया से होना चाहिए। बहस के दौरान पीठ के अध्यक्ष न्यायमूर्ति जोसेफ ने कहा कि यह चयन सर्वोच्च न्यायालय के ‘विनीत नारायण बनाम भारत सरकार’ फैसले के अनुरूप भी क्यों नहीं हो सकता है? जिसके अनुसार चयन समिति में तीन सदस्य हों – भारत के प्रधान न्यायाधीश, प्रधानमंत्री और लोक सभा में नेता प्रतिपक्ष ।
यह मांग सर्वथा उचित है क्योंकि चुनाव आयोग का वास्ता देश के सभी राजनैतिक दलों से पड़ता है। उसके सदस्यों का चयन केवल सरकार करती है तो जाहिरन ऐसे अधिकारियों को चुनेगी जो उसके इशारे पर चले। इस फैसले के आधार पर जब तक संसद द्वारा कानून पास
नहीं हो जाता तब तक इसी फैसले के दिशा- निर्देशों के अनुसार चुनाव आयुक्तों की नियुक्तियां होंगी। पिछले कुछ वर्षों से सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों की अवहेलना करते हुए जिस तरह मुख्य जांच एजेंसियों के निदेशकों की नियुक्ति और सेवा विस्तार किए जा रहे हैं, उससे इन एजेंसियों की स्वायत्तता और निष्पक्षता पर स्वाल उठ रहे हैं। यदि किसी जांच एजेंसी के निदेशक को इस बात का पता है कि शीर्ष अदालत के आदेश के तहत उसकी नियुक्ति पारदर्शिता से हुई है तो उसे उसके दो साल के निश्चित कार्यकाल से कोई नहीं हटा सकता, परंतु यदि उसके नियुक्ति पत्र में कुछ ऐसा लिखा जाए कि उस निदेशक का कार्यकाल एक निश्चित अवधि ‘ या अगले आदेश तक’ वैध है, तो उस पर अप्रत्यक्ष रूप से सरकारी दबाव बना रहता है। ऐसे में वो निदेशक कितना स्वायत्त या निष्पक्ष रहेगा कहा नहीं जा सकता। भाजपा के वरिष्ठ नेता अरुण जेटली ने राज्य सभा में कहा था, ‘यह खतरा बड़ा है, रिटायर होने के बाद सरकारी पद पाने की इच्छा रिटायर होने से पहले जज के फैसलों को प्रभावित करती है, यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता के लिए खतरा है।’ एक अन्य बयान में जेटली ने कहा था, ‘रिटायर होने से पहले दिए जाने वाले फैसले रिटायर होने के बाद मिलने वाले पद के प्रभाव में दिए जाते हैं । ” जेटली का बयान न सिर्फ जजों पर लागू होता है, बल्कि जांच एजेंसियों और कुछ संविधानिक पदों पर नियुक्त लोगों पर भी लागू होता है। ऐसे में इस ऐतिहासिक फैसले का स्वागत किया जाना चाहिए, परंतु सरकार जिस भी दल की हो वो ऐसी नियुक्तियों के लिए भेजे जाने वाले नामों के पैनल में केवल अपने चहेते अधिकारियों के ही नाम भेजती है।
ऐसे में नियुक्त करने वाली समिति के पास इन्हीं नामों में से एक का चयन करने का विकल्प रहता है। यदि महत्त्वपूर्ण पदों पर नियुक्त होने वाले व्यक्तियों की सूची को सार्वजनिक किया जाए और बेदाग छवि वाले सेवानिवृत्त अधिकारियों की राय भी ली जाए तो ऐसी नियुक्तियों को निष्पक्ष माना जा सकता है। इस दिशा में व्यापक दिशा-निर्देशों की भी आवश्यकता है। ऐसा होता है तो जनता का विश्वास न सिर्फ नियुक्ति की प्रणाली में बढ़ेगा, बल्कि इन संस्थाओं की कार्यशैली में भी बढ़ेगा। जांच एजेंसियां हों या चुनाव आयोग या कोई अन्य सांविधानिक संस्था यदि वो निष्पक्ष और स्वायत्त रहती है तो लोकतंत्र मजबूत रहता है | यदि ऐसा नहीं होता तो लोकतंत्र खतरे में आ सकता है। इसलिए सर्वोच्च अदालत के फैसले का स्वागत करते हुए इसे कानून का रूप दिया जाना चाहिए और साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाए कि सभी नियुक्तियों को पारदर्शिता से किया जाए न कि पक्षपात के साथ ।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी अपने हर चुनाव अभियान में इस बात पर जोर देते हैं कि सभी विपक्षी दल भ्रष्टाचार में आकंठ डूबे हैं जबकि भाजपा ईमानदार सरकार देने का वायदा करती है। पिछले हफ्ते कर्नाटक के भाजपा विधायक के बेटे को किसी ठेकेदार से 40 लाख की रिश्वत लेते लोकायुक्त ने गिरफ्तार करवाया। उसके घर से 8 करोड़ रुपये भी बरामद हुए। इसी राज्य में पिछले वर्ष एक ठेकेदार ने सार्वजनिक रूप से आरोप लगाया था कि भाजपा सरकार का मंत्री उससे 40 प्रतिशत कमीशन मांग रहा है। कर्नाटक का तो यह एक उदाहरण है पर क्या जनता कह सकती है कि उनके राज्य में भाजपा के सत्ता के आने बाद भ्रष्टाचार खत्म हो गया या कम गया? तो क्या वजह है कि पिछले वर्षों में सीबीआई और ईडी के छापे केवल विपक्षी दलों के नेताओं पर ही पड़े हैं? इस विवाद से बचने को जरूरी है कि मोदी जी जांच एजेंसियों और संविधानिक संस्थाओं की पारदर्शिता और स्वायत्तता सुनिश्चित करें।
Date:06-03-23
जी20 से क्या और कितना पाएंगे हमआलोक जोशी, ( वरिष्ठ पत्रकार )
दिल्ली और गुरुग्राम में बीते हफ्ते जी20 की धूम रही। इस महीने की शुरुआत राजधानी दिल्ली में दो दिन के विदेश मंत्री सम्मेलन से हुई। साथ ही, गुरुग्राम में 1 से 4 मार्च तक भ्रष्टाचार निरोधक कार्य समूह की बैठक भी चलती रही और बात सिर्फ दिल्ली या गुरुग्राम की नहीं है। इस साल की शुरुआत से अब तक कोलकाता, पुणे, तिरुवनंतपुरम, चंडीगढ़, जोधपुर, चेन्नई, गुवाहाटी, बेंगलुरु, कच्छ के रन, इंदौर, लखनऊ, खजुराहो जैसी जगहों पर कहीं एक, और कहीं एक से ज्यादा आयोजन हो चुके हैं।
जी20 का अठारहवां शिखर सम्मेलन दिल्ली के प्रगति मैदान में 9 और 10 सितंबर को होना है। तब दिल्ली में जी20 समूह के राष्ट्राध्यक्षों या शासनाध्यक्षों का जमावड़ा होगा और यह जी20 के अध्यक्ष के तौर पर भारत की पारी का समापन समारोह भी होगा। यह बात थोड़ी हैरत जरूर जगाती है कि जी20 यानी 19 देशों और यूरोपीय संघ को मिलाकर बने इस संगठन के इतिहास में 17 साल बाद भारत को इसकी मेजबानी का मौका क्यों मिला या इससे पहले यह मौका आखिर क्यों नहीं मिल पाया?
जी20 की स्थापना सन 1999 में एशियाई वित्तीय संकट के बाद हुई थी, लेकिन इसके पीछे 1975 में बने जी7 या सात देशों का समूह था। ये सात देश थे- अमेरिका, जापान, जर्मनी, ब्रिटेन, फ्रांस, इटली और कनाडा, यानी यह उस वक्त के सबसे अमीर देशों का संगठन था। इसकी सालाना बैठकों में अर्थनीति के साथ-साथ राजनीति और सुरक्षा से जुड़े मसलों पर भी चर्चा होती थी। साल 1998 में रूस को भी इस समूह का सदस्य बनाया गया और तब से इसे जी8 कहा जाने लगा। हालांकि, 2014 में रूस को बाहर करके इसे फिर से जी7 बना दिया गया। इसकी वजह थी कि रूस ने यूक्रेन के प्रांत क्रीमिया पर कब्जा कर लिया था। वैसे, रूस जी20 का सदस्य है, लेकिन इस बार फिर रूस के यूक्रेन पर हमले का सवाल इस संगठन में विवाद का विषय बना हुआ है।
जी7 की बैठकें अब भी अलग से होती रहती हैं, लेकिन जैसे अमीर आदमी को हमेशा यह फिक्र बनी रहती है कि उसके आसपास अमन-चैन है या नहीं, उसी तरह 1999 के एशियाई मुद्रा संकट के बाद इन अमीर देशों को यह चिंता सताने लगी कि ऐसी मुसीबतों को कैसे कम से कम किया जाए। यह विचार भी बना कि शायद दुनिया के आर्थिक वर्तमान और भविष्य की फिक्र करते वक्त उन देशों को भी साझेदार बनाना जरूरी होगा, जो आर्थिक नक्शे पर तेजी से अपनी पहचान बना रहे हैं। तभी जी8 की पहल पर जी20 की शुरुआत हुई। तब से अब तक जो 17 सम्मेलन हुए हैं, उनमें से सिर्फ पांच ही हैं, जो जी8 सदस्यों, यानी अमीर देशों से बाहर हुए हैं। 2008 के विश्व आर्थिक संकट के बाद यह राष्ट्राध्यक्षों का सम्मेलन हो गया है
जी8 देशों ने जब जी20 बनाया, तब शायद सोचा भी नहीं होगा कि 2008 के संकट के बाद और फिर कोरोना के बाद की दुनिया में उनका यह कदम कितना दूरंदेशी भरा साबित होगा। अब जी20 देशों की हैसियत इस बात से समझी जा सकती है कि दुनिया की दो तिहाई आबादी इन्हीं देशों में रहती है, दुनिया की जीडीपी का 85 प्रतिशत हिस्सा इनके पास है और विश्व व्यापार में इनकी हिस्सेदारी 75 प्रतिशत से ऊपर है। आर्थिक पैमाने पर दुनिया के देशों की हैसियत में भी काफी उतार-चढ़ाव हो चुके हैं।
साफ है, 1999 और 2008 के बाद इस समूह के सामने सबसे बड़ी चुनौती खड़ी है। शायद यह उन दोनों संकटों से कहीं बड़ी और विकट समस्या भी है। इस मौके पर जी20 का अध्यक्ष और मेजबान होना भारत के लिए जितनी बड़ी चुनौती खड़ी करता है, शायद उतना ही बड़ा मौका भी साबित हो सकता है। बाली में पिछले साल हुए जी20 सम्मेलन में रूसी राष्ट्रपति पुतिन शामिल नहीं हुए थे और उनके विदेश मंत्री भी समय से पहले ही वापस लौट गए थे। हालांकि, उम्मीद है कि रूसी राष्ट्रपति पुतिन सम्मेलन के लिए नई दिल्ली आएंगे। यूक्रेन मामले पर गतिरोध की एक बड़ी वजह यह है कि ग्लोबल साउथ कहलाने वाले, यानी धरती के दक्षिणी हिस्से में मौजूद ज्यादातर गरीब देश ग्लोबल नॉर्थ या खासकर पश्चिम के अमीर देशों के सामने कमजोर नहीं दिखना चाहते। उनमें से अनेक रूस के पक्ष में न होते हुए भी अमेरिका का साथ देता हुआ भी नहीं दिखना चाहते। भारत से उम्मीद की जा रही है कि वह इस नाजुक वक्त पर दोनों पक्षों के बीच पुल का काम कर सकता है। यहां न सिर्फ दुनिया की समस्या सुलझने की उम्मीद है, बल्कि वैश्विक शक्ति समीकरणों में खुद भारत के लिए एक बेहतर भूमिका की गुंजाइश भी साफ दिखती है।
देश के पचास से ज्यादा शहरों में दो सौ से ज्यादा आयोजन हो रहे हैं। बजट में जी20 के लिए 990 करोड़ रुपये का इंतजाम अलग से किया गया है। यह सब सिर्फ इसलिए कि इससे भारत की हैसियत कुछ बढ़ सकती है। और वह भी एक ऐसे संगठन की अध्यक्षता पर, जो हर साल बारी-बारी से किसी न किसी देश को मिलती ही है। यह सवाल पूछा जा सकता है कि इससे हमारे देश को और जनता को भी कुछ मिलेगा क्या?
इस सवाल का सीधा जवाब मुश्किल है, लेकिन दो तरह से देखा जा सकता है। एक तो हैसियत बढ़ने का अर्थ यह होगा कि दुनिया की आर्थिक नीतियों में अपने हिसाब से फेरबदल के लिए दबाव बनाना आसान हो जाएगा। दूसरा, देश के पचास शहरों में दो सौ से ज्यादा कार्यक्रमों का अर्थ एक तरह से इन शहरों का, इनकी सांस्कृतिक संपदा का और भारत के तमाम किस्म के उत्पादों का पूरी दुनिया में प्रचार भी होगा। यह वैसे ही है, जैसे स्विट्जरलैंड या नीदरलैंड में भारतीय फिल्मों की शूटिंग से इन देशों के पर्यटन उद्योग को लंबे समय तक फायदा होता रहा। कितना फायदा होगा और कितने समय तक, यह हिसाब लगाना मुश्किल है। जैसे 1982 में हुए एशियाई खेलों या कॉमनवेल्थ गेम्स के दौरान शहर में हुए काम का फायदा आज तक दिल्ली में दिखता है, वैसे ही इन तमाम शहरों में काफी कुछ ऐसा भी होगा, जो आने वाले समय में फायदेमंद होगा।
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हाल ही में उच्चतम न्यायालय के पांच न्यायाधीशों की पीठ के एक फैसले ने इस सार्वभौमिक बहस पर प्रकाश डाला है कि देश के संविधान की व्याख्या कैसे की जानी चाहिए। एक सिद्धांत वह है, जो संविधान के प्रारूपकारों की व्याख्या से चिपके रहने की वकालत करता है। दूसरा पक्ष, इसे एक जीवित संविधान के रूप में देखना चाहता है, जिसमें इसकी व्याख्या समाज के परिवर्तन के अनुकूल होती रहे।
उच्चतम न्यायालय का पक्ष –
अपने हाल के निर्णय में न्यायालय ने एक धार्मिक समुदाय के अनुयायियों को बहिष्कृत करने की रिट याचिका पर विचार करते हुए जीवित संविधान के पक्ष में अपना झुकाव दिखाया है।
न्यायाधीशों की पीठ ने अपना पक्ष रखते हुए कहा है कि स्वतंत्रता का विचार स्थिर नहीं है। इसलिए बदलते सामाजिक रीति-रिवाजों के साथ तालमेल बैठाने के लिए न्यायिक व्याख्या को बदला जाना चाहिए।
पिछले पांच दशकों के महत्वपूर्ण निर्णय –
इस प्रकार, ऐसे बहुत से निर्णय दिए गए हैं, जो समाज में हुए परिवर्तनों से प्रेरित रहे हैं। अमेरिका में संविधान की मौलिकता को बचाए रखने की जड़ता की तुलना में, भारतीय न्यायालय के ये निर्णय कहीं बेहतर कहे जा सकते हैं।
मील का पत्थर बने ये निर्णय, संवैधानिक सिद्वांतों को समझने और लागू करने के तरीके में विधायिका और कार्यकारिणी को व्यावहारिक दृष्टिकोण अपनाने की समझ देते हैं। और व्यक्तिगत अधिकारों की रक्षा करते हैं।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 13 फरवरी, 2023
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Date:04-03-23
Judges Call It Right, But Jury’s Still OutOther landmark SC judgments haven’t produced the desired result. So, celebration of the verdict on EC is prematureArghya Sengupta & Aditya Prasanna Bhattacharya, [ The writers are with the Vidhi Centre for Legal Policy. ]
Some judgments feel like a victory for democracy. The decision of the Supreme Court to radically reform the method of appointment of chief election commissioner (CEC) and the two members of Election Commission is one such. The court held the President would no longer appoint the CEC on the sole advice of government. Instead, a committee of the Prime Minister, leader of the opposition in Lok Sabha and the CJI would advise the President. By wresting control of the appointment of members of EC from government, the court holds out the promise of free and fair elections, ensured by a truly independent watchdog. Democracy wins.
But when courts step in to legislate in such a manner, frustrated by Parliament’s unwillingness to act for 73 years, democracy also loses. Article 324 of the Constitution is a simple provision – the President would appoint members of the EC till such time Parliament makes a law.
As a matter of law, the court isn’t correct when it says the words demonstrate an intention of the drafters of the Constitution that in effect mandates Parliament to draft such a law. Such a mandate exists elsewhere in the Constitution – like Article 35 where Parliament is mandated to enact a law to punish offences relating to untouchability and forced labour. The framers certainly expected Parliament to be responsible and lay down a process of appointment that would safeguard the independence of the EC. But they consciously did not mandate it.
Quite to the contrary, aware that Parliament may take its own time, the framers themselves filled up any so-called vacuum by stating that the power of appointment would vest in the President till such a law was passed. There was no legal wiggle room for any judicial intervention in this case.
But the Constitution cannot simply be read as acharter of parliamentary powers, it is also a charter of duties. Irrespective of whether the court ought tohave intervened, it is clear Parliament failed its duty under Article 324 to enact a comprehensive law for EC appointments for the last seven decades.
Despite this abdication of duty, the court remains extremely respectful to Parliament and cognisant of its sovereign law-making power. That is why it neither lays down a new method for removal of election commissioners that would protect their independence nor directs the establishment of an independent secretariat, as the petitioners in the case had argued. It simply makes a “fervent appeal” to Parliament to bring in the necessary changes. On appointment, while it lays down a revised method, it clarifies that it would remain in force only till such time Parliament makes a law. Theoretically, Parliament could enact a law in the budget session itself and reassert its primacy in law-making. Seen this way, this is neither judicial activism nor restraint, the familiar lens through which SC judgments tend to get analysed. It is judicial statesmanship.
Unfortunately, we have been down a similar path before with little result. Judicial collegiums to appoint judges to SC and high courts were meant to stem the rot of politicisation that appeared to have taken hold in the higher judiciary. Much like the present judgment, that too felt path-breaking at the time, raising hopes of a new dawn of independence for the Indian judiciary.
Similarly, the power of appointment of the director of the Central Bureau of Investigation was also broadbased by SC through a similar committee in yet another landmark judgment.
However, as these judgments played out, the limitations of courtorchestratedrescue of democracy have become apparent. The alternative formulations may have broad-based the process of who appoints, but did little to introduce transparency in the process in how the appointment is made. Judicial collegiums are often perceived as nepotistic and the record of CBI directors appointed through the reformed process has been mixed at best. Worse, such judicial orders have been widely perceived by governments as hostile takeovers, leading to both overt and covert resistance. In this case, the court has appeared to take these lessons, striking a less strident and much more statesman-like tone.
But there is a bigger danger posed by such rescue acts. Converting straightforward political issues of appointments of officers to important posts, into complex legal issues makes it remote from the ordinary Indian. Despite the constitution of countless committees, the preparation of innumerable reports, and repeated promises of reform made by political parties, that the independence of EC is not structurally secured is a blot on our democracy. SC is right – Parliament shouldpass a law democratising the appointment of the commission and take steps to secure its institutional independence as well as the individual independence of the commissioners.
But for a law that will truly make EC independent in letter and spirit, the impetus for the reform must come from within the democratic process and not from the court that sits outside it. Judgments may be temporary band-aids on an open wound. But there is only one way a wound ever vanishes – it heals itself over time. So too will democracy in India.
Date:04-03-23
Carefulness is Next To GodlinessET Editorial
The Uttarakhand government’s proposal for a daily cap on the number of pilgrims at Badrinath, one of the pilgrimage towns that comprise the Char Dham, is the right move. Setting caps for other pilgrimage towns would be welcome, too. The state government must not give in to pressure to abandon the plan. Capping the number of pilgrims will ensure that these towns are hosting visitors in keeping with capacity. Rather than oppose the plan, the local temple authorities should welcome it as a way to preserve these tirtha sthans for generations to come.
The government’s plan is in keeping with a development pathway that seeks to ensure growth andsustainability. Orderly visits that a registration system can ensure that visitors are able to have a good, indeed spiritual, experience, facilities being commensurate to need, and the town is maintained properly. Priests and others opposing the proposal need to be reminded of the subsidence of Joshimath. Short-term economic benefits cannot be prioritised at the cost of long-term benefits and safety. Ensuring that historical and cultural sites are preserved must be a priority. Leveraging them for economic activity is good, but unchecked leveraging for commercial and economic benefits will only result in killing the golden goose. For the priests, preserving the religious and culturally relevant sites and ensuring that people live in harmony with nature should be a priority.
Concerns about the economic impact of limiting the number of visitors, however, must be considered seriously. The state government, local authorities, businesses and other stakeholders must work together to create new opportunities. But the first step is to recognise the need to conserve and preserve these holy places.
Date:04-03-23
Picking the watchdogCourt verdict on manner of choosing election panel is a boost to its independenceEditorial
The Supreme Court of India verdict taking away the power to appoint members of the Election Commission of India (ECI) from the sole domain of the executive is a major boost to the independence of the election watchdog. The Court has ruled that a three-member committee comprising the Prime Minister, the Leader of the Opposition in the Lok Sabha, or the leader of the single largest Opposition party, and the Chief Justice of India (CJI), will choose the Chief Election Commissioner (CEC) and Election Commissioners (EC) until a law in passed. As a constitutional body vested with plenary powers of superintendence, direction and control over elections, the ECI is a vital component of the republic that requires functional freedom and constitutional protection to ensure free and fair elections. It has been the practice that the President appoints the CEC and ECs on the advice of the Prime Minister, but the Constitution Bench has pointed out that the original intent of the Constitution makers was that the manner of appointment should be laid down in a parliamentary law. Article 324 says the President should appoint the CEC and Commissioners, subject to any law made in that behalf by Parliament. However, successive regimes have failed to enact a law. Justice K.M. Joseph, who has authored the main verdict, has based the Court’s decision on “the inertia” of the legislature and the perceived vacuum in the absence of a law.
Few would disagree with the Court’s fundamental proposition that the election watchdog should be fiercely independent and not be beholden to the executive; and there should be no room for an appointing authority to expect reciprocity or loyalty. The government’s argument that the existing system was working well and there was no vacuum was quite weak, as, admittedly, the convention now is that the Prime Minister chooses a name from among a database of high-ranking civil servants and advises the President to make the appointment. However, a relevant question is whether the presence of the CJI in the selection panel is the only way in which an institution’s independence can be preserved. There is no clear proof that the independence of the Central Bureau of Investigation Director, who is appointed by a panel that includes the CJI, or his nominee, has been preserved or enhanced. Further, the CJI’s presence may give pre-emptive legitimacy to all appointments and affect objective judicial scrutiny of any error or infirmity in the process. On its part, the government will be well-advised to enact a law — but not one that seeks to preserve the current convention to get around the verdict — that is in tune with the spirit of the Court’s emphasis on the ECI’s independence.
Date:04-03-23
In Punjab, fear of the return of ‘dark days’Terror and insecurity have gripped Punjab after an armed mob, led by radical preacher Amritpal Singh, laid siege to a police station in Ajnala on February 23 and got their demand fulfilled. While the people believe that there is no widespread pro-Khalistan sentiment, they perceive a breakdown of law and order in the State and demand immediate action against anti-social elements from the Punjab government, reportsVikas Vasudeva
Anil Kumar (name changed), a 62-year-old cloth merchant in Ajnala in western Punjab, was anguished. Having lived through the tumultuous period of the 1980s, when there was a decade-long insurgency in Punjab over the demand for ‘Khalistan’, or a sovereign state for Sikhs, he instantly knows when there is trouble brewing. Sitting in the main market of Ajnala, Anil recalled some of the incidents of last year in the border State which sent a chill down his spine: the murder of rapper and songwriter Sidhu Moosewala in Mansa district, the explosion at the Punjab Police’s Intelligence Wing headquarters in Mohali, and the killing of a Dera Sacha Sauda follower in Kotkapura in a shoot-out. The latest incident which has left him worried took place near his shop.
It happened on Thursday, February 23. Led by the self-styled Sikh preacher and pro-Khalistan propagator Amritpal Singh, a mob armed with swords, guns and sharp weapons barged into the Ajnala police station, a few kilometres from the International Border with Pakistan. They protested against the arrest of Amritpal’s close associate, Lovepreet Singh alias Toofan Singh, in an alleged kidnapping and theft case. Amritpal demanded that the First Information Report (FIR) filed against Lovepreet and him be cancelled, and his aide be released. Calling the FIR “politically motivated,” Amritpal issued a threat: if his demands were not met, “the administration would be responsible for whatever happens,” he said. He even warned the police about registering an FIR in the case surrounding the incident at Ajnala.
The stunned police gave in to his demand. Senior Superintendent of Police (Amritsar Rural) Satinder Singh said, “According to the evidence given by Lovepreet’s supporters, he was not present at the spot where the alleged incident (assault and kidnapping) occurred. So, the police submitted the evidence before the court for his discharge. We have set up a Special Investigation Team to probe the matter (FIR) based on which Lovepreet was arrested. Once its report is out, a decision will be taken.” Lovepreet was released after a local court issued the order.
Days after the incident, the Punjab government transferred 18 police officers, including Amritsar Commissioner of Police Jaskaran Singh. But despite six policemen getting injured in the violence at the station, the police are yet to register any FIR in the Ajnala matter. Punjab Director General of Police (DGP) Gaurav Yadav said “action will be taken against those who attacked the police” after “analysing the video footage.”
Anil said seeing the mob carrying weapons at Ajnala reminded him of the days when youngsters would walk the streets of Punjab, some four decades ago, flaunting guns and swords. “If a group of people can attack a police station, if a police station is not safe, then how can the people feel secure,” he asked. “Right now, I am as scared as I used to be during that period of terrorism. It’s not just me, many feel the same way.”
‘Fear is bound to creep in’
Three days after the incident, there was an uneasy calm in Ajnala. It was the last Sunday of the month. While the local market is usually closed on this day, it was open that Sunday as traders and shopkeepers were hoping to make up for the lost business of the previous three days.
Bittu, 50, a taxi driver, hardly had any business in the days following the mob incident in Ajnala. “There were barricades installed on the main road and at our taxi stand. Taxi operators did not come here because there was tension. Now, things seem to have settled down, but most people don’t seem to want to venture out unnecessarily,” he said.
Close to the police station complex, several police personnel, including the anti-riots force, were still deployed. The local police, however, asserted that the “situation was under control.”
Anil begged to differ. “Several instances of gangster-related incidents have taken place in the State. All these indicate that the incumbent government is weak,” he said. While he did not deny that there were crimes before the Aam Aadmi Party (AAP) came to power, now “there is no fear of the law,” Anil said. “If the situation is not brought under control immediately, it could become worse.”
The AAP government in Punjab, which came to power nearly a year ago, has largely been on the back foot over the breakdown of law and order. Punjab Chief Minister Bhagwant Mann has been downplaying the situation by asserting that no one will be allowed to disturb the hard-earned peace of the State and the government is committed to maintaining law and order. Days after the incident, he said ‘Khalistan’ supporters were receiving aid from Pakistan and other countries. Only a handful of people supported the pro-Khalistan movement, and the Punjab police is fully capable of handling the situation, he said.
But the people are not convinced. Parvez, a 32-year-old vegetable vendor, sits a few metres from the Ajnala police station. While attending to customers, he said, “What happened that day cannot be justified. An armed group of people laid siege to a police station. If the government is really strong, not even a leaf can move.”
Another shop owner said such incidents will cease to take place only if there is political will. “The government needs to tackle fringe elements who are vitiating the atmosphere. It needs to take immediate action against them. There is a strong bond between all the communities here. The majority of the people don’t support the pro-Khalistan narrative. But if violent incidents take place, fear is bound to creep in,” he said.
Narinder Bhamra, a Ludhiana-based industrialist and president of the Fastener Manufacturers Association of India, pointed out that the incident took place on the same day that the Punjab government held the Progressive Punjab Investors Summit at Mohali. “This leaves the impression that government is not in control of the situation on the ground. How can a few hundred anti-social elements attack a police station and get their demands accepted? And no FIR has been registered against those involved. What does this indicate? If this is the situation, let alone a new industry coming to the State, even the existing industry will think of moving out,” he said.
Increasing Militant activity
Amritpal, 30, is known to speak the language of separatism and secession. The radical preacher, who was born in 1993, hails from Amritsar district. He left India to work in his family’s truck-related business in Dubai in 2012. In 2022, he returned to take over as the head of Waris Punjab De, which was set up by actor-turned-activist Deep Sidhu, who died in a road accident in February last year. Amritpal’s anointment ceremony was held at Rode village in Moga district, which is the native village of the slain militant Jarnail Singh Bhindranwale, and reverberated with pro-Khalistan slogans. According to Sidhu, who rose to prominence during the agitation against the three farm laws, Waris Punjab De’s mission is to protect the rights and culture of Punjab and raise social issues.
Amritpal is a self-confessed follower of Bhindranwale and even dresses like him. Sporting a navy blue turban, a white robe, and a sword-sized ‘kirpan,’ the sacred dagger of the Sikhs, he is always surrounded by weapon-wielding guards. He has said that “glorification of weapons is not a crime.” Referring to the Khalistan movement, he said, “Has the Prime Minister or Home Minister ever said that they will stop people who talk about a ‘Hindu Rashtra’? It means there’s discrimination… Sikhs have their aspirations and Hindus have theirs, while they [Hindus] can freely talk about theirs, we [Sikhs] can’t. I firmly believe that it [the Khalistan movement] can’t be stopped from flourishing.”
The concern over Amritpal’s statements and activities is palpable beyond Ajnala, especially since there have been a series of incidents with Khalistan links in Punjab, which have rekindled fears of an armed militancy.
Last year, on April 29, a curfew was imposed in Patiala soon after a group that calls itself Shiv Sena (Bal Thackeray) clashed with pro-Khalistani activists. The Shiv Sena (Bal Thackeray) had sought permission to hold a march against the backdrop of the announcement by the banned Sikhs for Justice (SFJ) outfit to mark the foundation day of Khalistan. The following month, a few ‘Khalistan’ flags were found hung on the main gate and separatist slogans were found scribbled on the boundary walls of the Himachal Pradesh Legislative Assembly premises in Dharamshala. Both these incidents took place following an appeal by the SFJ leader.
In May, a rocket-propelled grenade was fired at the headquarters of the Punjab Police Intelligence Wing in Mohali. The police indicated that the Babbar Khalsa International, a terror organisation striving for a separate Sikh state, and a nexus of gangsters and Pakistan’s Inter-Services Intelligence were behind the attack.
On December 8, the National Investigation Agency arrested alleged terrorist and pro-Khalistan operative Bikramjit Singh, who was wanted in connection with the Tarn Taran bomb blast in Punjab in September 2019, after his extradition from Austria. Two people were killed in the blast. And on December 16, the Punjab police claimed that it had solved the rocket-propelled grenade attack on the Sarhali police station in Tarn Taran, by busting a foreign-controlled terror module.
Despite these incidents, it would be wrong to assume that there is a revival of a pro-Khalistan movement, said Kamaljot Singh, 25, from Ajnala. “I don’t think it’s going to happen. I don’t want it to happen. I believe that if everyone is united, only then will we prosper. While I appreciate Amritpal’s initiative against the drug menace, violence cannot be justified,” Kamaljot said.
‘Failure of intelligence’
Incidents such as the one at Ajnala and the lack of action taken against the mob will only “embolden radical elements,” said Shashi Kant, a former Punjab DGP, who has served in numerous intelligence agencies. “It equally raises questions about police Intelligence,” he said. “If the protesters were carrying the Guru Granth Sahib, what was the Intelligence doing? It was a total collapse of the Intelligence machinery.”
But Kant was also quick to praise the police. “When the protesters attacked the police while carrying the Guru Granth Sahib, the police exercised restraint. That is commendable,” he said.
Kant seemed nonplussed by the lack of action against Amritpal. He said, “This is a total failure on the part of the government, and it’s demoralising for the police. While I don’t see any revival of the Khalistan movement in the absence of popular support, concerns over the activeness of Khalistan sympathisers or pro-militant elements across Punjab and other States can’t be ignored.”
Since Punjab is a border state, law and order has always been a delicate domain and the government needs to handle such sensitive situations carefully, others said. “The State has been vulnerable to the machinations of inimical, and not necessarily all foreign, forces,” said Ronki Ram, Shaheed Bhaghat Singh Chair Professor of Political Science at Panjab University.
The Waris Punjab De has been making headlines ever since Amritpal took over as its head, Ram said. “The Ajnala incident needs to be located within the broader context of various public utterances by its current president and the responses to those by the State government. It seems like the law enforcement agencies took precautionary measures to prevent this from swelling into another issue of communal conflict. This is especially important at a time when the long-drawn-out [2015] ‘Bargari sacrilege’ case still remains under investigation. The line of action taken by the current regime is politically correct; a contrary stance could easily have led to an inflammatory situation. However, there is another equally important, but often neglected, dimension that needs to be boldly underlined, which is to figure out how to preempt such a situation from arising at all. There is a dire need to apply the lessons learned in the past.”
Ram also demanded to know why both the State government and prominent Sikh institutional bodies have been restrained in their statements after the events led by Amritpal. “This could lead to accusations of complicity, for political goals or other considerations,” he said.
While many are asking questions of the administration, Gurpinder, who runs a roadside dhaba at Rayya town on the busy Delhi-Amritsar National Highway, had a more immediate worry. “I usually get a handsome number of customers at the weekend. But this week hardly anyone has stepped in,” he said.
Anil was clear that if the situation worsens, he would leave Punjab. “It would be terrible if Punjab saw those dark days again,” he said.
Date:04-03-23
कमजोर आर्थिक विकास से रोजगार कम होंगेसंपादकीय
आरबीआई की मौद्रिक नीति समिति के एक सदस्य ने चेताया है। इनके अनुसार देश का आर्थिक विकास काफी कमजोर रहेगा और युवाओं की रोजगार मांग पूरा करना संभव नहीं होगा। आईआईएम अहमदाबाद के प्रोफेसर सदस्य का मानना है कि महंगाई रोकने के लिए ब्याज दरें बढ़ाने के फैसले से निवेश और उपभोक्ता व्यय कम होगा यानी मौद्रिक नियंत्रण के चलते मांग में कमी होगी, जिससे आर्थिक गतिविधि में ठहराव आएगा। उदाहरण देते हुए उन्होंने बताया कि ब्याज दर में वृद्धि से ईएमआई बढ़ेगी और तब लोगों के पास खर्च करने के लिए पैसा नहीं होगा। भारत में काफी बड़ी युवा आबादी है, जिन्हें रोजगार की सख्त जरूरत है और एमएसएमई सेक्टर बुरी स्थिति में है। यह इकलौता सेक्टर सबसे ज्यादा 12 करोड़ रोजगार देता है। दूसरी ओर लागत के मुकाबले खर्च ज्यादा होने से खेती से आय में कमी आई है। सिचुएशन एनालिसिस सर्वे के अनुसार खेती से वास्तविक आय पिछले आठ वर्षों में घटी है और उसकी आजीविका का साधन खेती न होकर छोटे-छोटे कारखाने या कंस्ट्रक्शन में मजदूरी ही रही है। अब इस सेक्टर का संकट उन्हें वापस गांव लौटने को मजबूर कर चुका है। सरकार ने इस वर्ष मनरेगा का बजट 89 हजार करोड़ से घटाकर 60 हजार करोड़ कर दिया है, जिसका सीधा असर होगा मजदूरों की विपन्नता। सरकार को इस सलाह पर गौर करना होगा अन्यथा स्थिति बिगड़ सकती है।
Date:04-03-23
क्या स्किल्स अब डिग्रियों से ज्यादा महत्वपूर्ण हैं ?पंकज बंसल, ( डिजिटल रिक्रूटमेंट प्लेटफॉर्म और वर्क यूनिवर्स के सह-संस्थापक )
हम सभी ने उन सफल आंत्रप्रेन्योर्स और सीएक्सओ की कहानियां सुन रखी होंगी, जिन्होंने बिना किसी पेशेवर योग्यता के कामयाबी हासिल की। पहले जहां कम्पनियों के लिए डिग्रियां ही सफलता का मानदंड होती थीं, वहीं अब वे ऐसे उम्मीदवारों को ज्यादा खोज रही हैं, जिनमें नई स्किल्स सीखने की तत्परता हो और जो अपने नॉलेज को उपयोगी बना सकें। अगर आप परम्परागत शैक्षिक रीतियों में विश्वास नहीं रखते तो आपको यह जानकर राहत मिल सकती है कि पेशेवर रूप से सफल होने के दूसरे रास्ते भी हैं। मशीन लर्निंग, ऑटोमैशन, एआई के क्षेत्र में हुआ विकास दुनिया को बदल रहा है। साथ ही वह विभिन्न सेक्टरों में नई भूमिकाएं भी रच रहा है। लेकिन स्किल्स के अभाव में इन भूमिकाओं के लिए उपयुक्त लोग नहीं मिल पा रहे हैं। यही कारण है कि मैं अब रीस्किलिंग और अपस्किलिंग के अवसरों पर ज्यादा जोर देने लगा हूं।
इंडिया स्किल्स रिपोर्ट के अनुसार 2023 में मात्र 50.3% ग्रैजुएट्स ही ऐसे हैं, जो नौकरी पाने के योग्य हैं। दूसरी तरफ, स्किल-आधारित भूमिकाओं में तेजी से इजाफा हो रहा है, जिससे विभिन्न उद्योगों में रोजगार-पात्रता का अंतराल बढ़ रहा है। वर्तमान में भारत की कार्यशक्ति के केवल 12 प्रतिशत लोगों के पास ही डिजिटल स्किल्स हैं। लेकिन इसी में उन पेशेवरों के लिए अवसर भी छुपे हैं, जो नए जमाने की स्किल्स को सीखने और खुद को नौकरियों के लिए तैयार करने के लिए अतिरिक्त परिश्रम करने को राजी हैं। ऐसे अनेक संस्थान और कम्पनियां हैं, जो अपस्किलिंग की बढ़ती मांग को ऑनलाइन और ऑफलाइन तरीकों से पूरा करने के लिए तैयार हैं। एजुटेक इंडस्ट्री की मांग में इसी के चलते खासा इजाफा हुआ है। अपग्रेड और बोर्ड इनफिनिटी जैसे बूटकैम्प्स सामने आए हैं, जो कौशल-विकास में लोगों की मदद करते हैं। उच्चशिक्षा में भी सनस्टोन एजुवर्सिटी जैसे अनेक अन्य प्लेयर्स उभरे हैं, जो छात्रों को कुशल बनाकर शिक्षा और कॉर्पोरेट्स के बीच के अंतर को पाटते हैं।
जॉन गार्डनर ने अपनी मस्ट-रीड किताब ‘कैन वी बी इक्वल एंड एक्सीलेंट टू’ में कौशल और पात्रता की प्रासंगिकता को बहुत अच्छी तरह से बताया है। उन्होंने कहा है कि अब पात्रताएं उसी तरह से बेकार सिद्ध होने लगेंगी, जैसे कि समय के साथ विरासत में मिले विशेषाधिकार अनुपयोगी हो जाते हैं। ऐसे में अगर कोई डिग्री या डिप्लोमा हासिल करना आपके मन का काम नहीं है तो आज के समय में इससे ज्यादा फर्क नहीं पड़ेगा। आप अपनी रुचि का कोई भी क्षेत्र चुन सकते हैं और किसी मोस्ट-वांटेड स्किल में महारत हासिल कर सकते हैं। सवाल यह है कि आज कौन-सी स्किल्स डिमांड में हैं?
स्किल्स इन डिमांड : आज जिस पैमाने पर डिजिटलाइजेशन हो रहा है, उसने हर इंडस्ट्री में टेक-पेशेवरों की मांग बढ़ा दी है। डेवोप्स, साइबरसिक्योरिटी, डाटा एनालिसिस, एआई, क्लाउड कम्प्यूटिंग आदि आज टॉप 10 मोस्ट इन-डिमांड स्किल्स में शुमार हैं। ब्लॉकचेन और मेटावर्स जैसी नई तकनीकों के आगमन ने नए अवसरों के लिए भी दरवाजे खोल दिए हैं। इसमें रोमांचक पहलू यह है कि ये तमाम कोर्सेस गैर-वैज्ञानिक पृष्ठभूमि वाले पेशेवरों के द्वारा भी सीखे जा सकते हैं। बात केवल टेक की ही नहीं है, सप्लाई-चेन प्रबंधन, डिजाइन थिंकिंग, प्रोजेक्ट प्रबंधन, प्रोडक्ट प्रबंधन, डिजिटल मार्केटिंग की स्किल्स का भी आज बहुत महत्व है। भारत सरकार का स्वयम् पोर्टल अनेक ऐसे डोमेन्स में नि:शुल्क प्रशिक्षण की सुविधा देता है। वहीं आईआईएम और एसपी जैन जैसे शीर्ष संस्थान भी कम लागतों पर डेडिकेटेड सर्टिफिकेट कोर्सेस मुहैया कराते हैं।
आगे की राह : अमेजन वेब सर्विसेस इनकॉर्पोरेशन की एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में डिजिटल स्किल्स की जरूरत 2025 तक बढ़कर नौ गुना हो जाएगी। आज 67 प्रतिशत रिक्रूटर्स ऐसे हैं, जो उम्मीदवार की शैक्षिक योग्यता के बजाय उसकी स्किल्स और तजुर्बे को ज्यादा महत्व देते हैं। गिग इकोनॉमी के उदय से भी नई स्किल्स विकसित हो रही हैं और लोग अब रिमोट-वर्किंग करने लगे हैं। ऐसे में सवाल यही है कि क्या आप बदलाव को अंगीकार करने और बदलते दौर के लिए जरूरी स्किल्स को सीखने के लिए तैयार हैं? क्योंकि इसी से आपके करियर की दिशा तय होगी। तो निरंतर सीखते रहें और अपनी स्किल्स को प्रासंगिक बनाए रखें।
Date:04-03-23
राहुल गाँधी के बोलसंपादकीय
कांग्रेस के वरिष्ठ नेता राहुल गांधी ने एक बार विदेश जाकर वैसी ही बातें कीं, जैसी करने से उन्हें हर हाल में बचना चाहिए था। वह देश में इस तरह की बातें करते ही रहे हैं कि मोदी सरकार के चलते भारतीय लोकतंत्र खतरे में है और सरकार से असहमत लोगों के साथ विपक्ष की आवाज दबाई जा रही है। उन्होंने यही सब बातें और अधिक अतिरंजित रूप में ब्रिटेन के कैंब्रिज विश्वविद्यालय में कीं। वह वहां यह भी कह गए कि भारत की सभी संस्थाओं और यहां तक कि न्यायालयों पर भी सरकार का कब्जा है। उन्होंने यह बात ठीक उस वक्त कही, जब कुछ ही घंटे पहले सर्वोच्च न्यायालय ने दो ऐसे फैसले दिए थे, जो सरकार के अधिकार क्षेत्र का अतिक्रमण करते हुए भी देखे गए। एक फैसले के तहत उसने निर्वाचन आयोग के आयुक्तों की नियुक्ति में सुप्रीम कोर्ट के प्रधान न्यायाधीश को भागीदार बनाया और दूसरे के तहत अदाणी मामले की जांच करने के लिए अपने हिसाब से एक समिति गठित की। सबसे हैरानी की बात यह रही कि राहुल गांधी ने पेगासस मामले को नए सिरे से उछाला और अपनी जासूसी का आरोप लगाते हुए यह हास्यास्पद दावा भी किया कि खुद खुफिया अधिकारियों ने उनसे कहा था कि उनका फोन रिकार्ड किया जा रहा है और उन्हें संभल कर बात करनी चाहिए। स्पष्ट है कि उन्होंने यह बताना आवश्यक नहीं समझा कि सुप्रीम कोर्ट की एक समिति ने इस मामले की जांच की थी और उसने यह पाया था कि उसके पास जांच के लिए आए फोन में से किसी में भी जासूसी उपकरण नहीं मिला। इनमें राहुल गांधी का फोन नहीं था, क्योंकि उन्होंने उसे जांच के लिए सौंपा ही नहीं था।
राहुल गांधी न सही, कम से कम उनके सहयोगियों और सलाहकारों को यह पता होना चाहिए कि उनकी घिसी-पिटी बातें और यह राग लोगों को प्रभावित नहीं कर रहा कि देश बर्बाद हो रहा है। वास्तव में यही कारण है कि कांग्रेस चुनावों में पस्त होती जा रही है। पूर्वोत्तर के तीन राज्यों में कांग्रेस को जो पराजय मिली, वह उसके खोखले चिंतन और दृष्टिहीनता का ही नतीजा है। राहुल गांधी अपने संकीर्ण राजनीतिक हितों के लिए किस तरह विदेश में देश को नीचा दिखाने पर तुले हुए हैं, इसका पता इससे चलता है कि उन्होंने यह कह दिया कि मोदी सरकार सिखों, ईसाइयों और मुसलमानों को दोयम दर्जे का नागरिक समझती है। यह एक किस्म की शरारत ही नहीं, देश को बदनाम करने की कोशिश भी है। अच्छा होता कि कोई उन्हें यह बताता कि भाजपा ने ईसाई बहुल नगालैंड में केवल 20 सीटों पर लड़कर 12 सीटें हासिल की हैं। किसी को राहुल गांधी को यह भी बताना चाहिए कि वह चीन का बखान करके भारत के जख्मों पर नमक छिड़कने का ही काम कर रहे हैं।
Date:04-03-23
मानवधिकारों का उल्लंघन हैं बाल विवाहडा. ऋतु सारस्वत, ( लेखिका समाजशास्त्र की प्राध्यापिका हैं )
हाल में उच्चतम न्यायालय ने महिला और पुरुष के लिए विवाह की न्यूनतम आयु एकसमान करने संबंधी याचिका खारिज कर दी। न्यायालय ने कहा कि कानून में संशोधन करना संसद के क्षेत्राधिकार में आता है। उल्लेखनीय है कि दिसंबर, 2021 में केंद्र सरकार ने विवाह के लिए महिलाओं की न्यूनतम आयु 18 वर्ष से बढ़ाकर 21 वर्ष करने का निर्णय लिया था। इस निर्णय से पूर्व विवाह की न्यूनतम आयु में बढ़ोतरी के संबंध में जया जेटली की अध्यक्षता में बनी समिति ने महिलाओं में कुपोषण, शिशु मृत्यु दर, मातृ मृत्यु दर, एनीमिया और अन्य सामाजिक मानकों तथा विवाह की न्यूनतम आयु के मध्य संबंध का अध्ययन कर रिपोर्ट दी थी और महिलाओं के लिए विवाह की न्यूनतम आयु बढ़ाने की अनुशंसा की थी। जैसा कि अपेक्षित था, केंद्र के इस निर्णय का विरोध हुआ और इस कारण यह निर्णय आज भी अधर में है। दुनिया भर के शोध यह बताते हैं कि 21 वर्ष से पूर्व गर्भ धारण करना महिला और उसके शिशु की सेहत के लिए अच्छा नहीं होता, परंतु मत-मजहब के नाम पर चलने वाली चाबुक मानव जीवन से कहीं अधिक परंपराओं के नाम पर समाज को चलाने की न केवल मंशा रखती है, अपितु इस इच्छा पूर्ति के लिए तमाम तरह के हथकंडे अपनाने से भी गुरेज नहीं करती।
विवाह की न्यूनतम आयु की बढ़ोतरी के विरोध में एक तर्क यह भी दिया जा रहा है कि पूर्व में बने 18 वर्ष की न्यूनतम आयु के अनुपालन में जब ढिलाई बरती जा रही है तो इसे बढ़ाने का क्या औचित्य? इस तर्क को सिरे से खारिज नहीं किया जा सकता। वास्तविकता यही है कि भारत में बाल विवाह की राष्ट्रीय औसत दर 23.3 प्रतिशत के करीब है। चिंताजनक यह है कि आठ राज्यों में बाल विवाह की दर राष्ट्रीय औसत दर से भी अधिक है। बाल विवाह का मुद्दा सिर्फ लड़कियों तक ही सीमित नहीं है। लड़के भी अल्पायु में ब्याह दिए जाते हैं। हालांकि न तो इस संबंध में शोधकर्ताओं का ध्यान जाता है और न ही इसकी कहीं कोई चर्चा होती है। कुछ गिने-चुने अध्ययनों के बीच 2019 में यूनिसेफ ने 82 देशों के बाल विवाह से संबंधित आंकड़े एकत्रित कर बताया कि दक्षिण अमेरिका, दक्षिण तथा पूर्वी एशियाई सहित कई अन्य देशों में बाल दूल्हों की अनुमानित संख्या करीब 11.5 करोड़ है। नीति निर्माताओं से लेकर शोधकर्ताओं के लिए यह चिंता का विषय इसलिए प्रतीत नहीं होता, क्योंकि गर्भधारण और उससे संबंधित जटिलताओं और जीवन जोखिम में डालने जैसे तथ्यों से लड़कों का वास्ता नहीं पड़ता, परंतु शारीरिक पीड़ा के समक्ष मानसिक पीड़ाओं की अवहेलना दुखदायी है। भारत में बाल विवाह पर किए गए तमाम शोध भी बाल-दूल्हों के मुद्दे को अनदेखा करते हैं। बाल दूल्हों को सामाजिक और सांस्कृतिक दबाव के चलते विवाह करने के लिए विवश किया जाता है, जिसके लिए वे शारीरिक एवं मानसिक रूप से परिपक्व नहीं होते।
शोध बताते हैं कि किशोरावस्था में परिवार का दायित्व लड़कों से उनका उज्ज्वल भविष्य छीन लेता है। शिक्षा छोड़कर उन्हें आर्थिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए अकुशल श्रम का हिस्सा बनना पड़ता है, जिसके चलते वे गरीबी के कुचक्र से बाहर नहीं निकल पाते। किशोरावस्था में विवाहित लड़कों के भीतर कुंठा एवं अवसादग्रस्तता उन्हीं के समकक्ष आयु के अविवाहित लड़कों की अपेक्षाकृत कहीं अधिक होती है। यही स्थिति बाल वधुओं की भी है। नवंबर 2022 में ‘द लैंसेट’ में प्रकाशित शोध ‘चाइल्ड मैरिज एंड मेंटल हेल्थ आफ गर्ल्स फ्राम उत्तर प्रदेश एंड बिहार’ बताता है कि विवाहित किशोरियों में अविवाहित किशोरियों की तुलना में अवसादग्रस्तता अधिक पाई गई है। इतना ही नहीं, विवाहित किशोरियों ने अपनी हमउम्र अविवाहित लड़कियों की तुलना में भावनात्मक, शारीरिक और यौन शोषण का अधिक सामना किया है।
अधिकांश नीतिगत उपायों ने बाल विवाह को कम करने या रोक लगाने के लिए सामाजिक-पारिस्थितिकी कारकों को लक्षित किया है और खराब मानसिक स्वास्थ्य को या तो विवाह के जोखिम अथवा परिणाम के रूप में अनदेखा किया है। इसकी अवहेलना नहीं की जा सकती कि मानसिक स्वास्थ्य की अनदेखी आत्महत्याओं के मामलों में बढ़ोतरी का प्रमुख कारण है। ‘एसोसिएशन आफ चाइल्ड मैरिज विद सुसाइडल थाट्स एंड अटेंप्ट्स अमंग गर्ल्स इन इथोपिया’ इस तथ्य की पुष्टि करता है। इस अध्ययन के अनुसार किशोरावस्था में विवाह तथा आत्मघाती विचारों के बीच उच्च संबंध पाया गया है। यूनिसेफ के मुताबिक बाल वधुओं को अपने पति एवं उसके परिवार के सदस्यों के हाथों शारीरिक और अन्य प्रकार की हिंसा का सामना करने का अधिक जोखिम होता है। कुपोषण, अलगाव और अवसाद की उच्च दर के साथ ही 18 साल की उम्र के बाद शादी करने वाली लड़कियों की तुलना में उच्च मृत्यु दर एवं रुग्णता का अनुभव भी अधिक करना पड़ता है। बाल-विवाह परिवार और समाज पर भी दीर्घकालीन प्रभाव डालता है। जिन समुदायों में बाल विवाह होते हैं, वहां निम्न शैक्षिक स्तर प्राप्ति के कारण उच्च भुगतान वाले रोजगार में भागीदारी घटती है, जिसके चलते आर्थिक विकास की गति धीमी हो जाती है। हमें यह स्वीकारना ही होगा कि बाल विवाह मानव अधिकारों का व्यापक उल्लंघन हैं तथा निर्णय लेने की क्षमता का क्षरण। बीते दिनों असम में बाल विवाह के विरुद्ध कठोर कार्रवाई यकीनन वहां भविष्य में बाल विवाह पर लगाम लगाएगी। ऐसे में क्या यह जरूरी नहीं कि अन्य राज्य भी तमाम राजनीतिक हितों को तिलांजलि देते हुए बाल विवाह कानून का उल्लंघन करने वालों के विरुद्ध कठोर अनुशासनात्मक कार्रवाई करें।
Date:04-03-23
लोकतंत्र की रैंकिंग का निर्धारण और उसकी खामियांआर जगन्नाथन, ( लेखक स्वराज्य पत्रिका के संपादकीय निदेशक हैं )
भारतीय लोकतंत्र में निश्चित तौर पर कमियां हैं। हमें इस बात में कोई संदेह नहीं होना चाहिए क्योंकि दुनिया का कोई भी लोकतंत्र अपने आप में संपूर्ण नहीं है। बहरहाल नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली सरकार इस बात को लेकर अनावश्यक रूप से नाखुश रही है कि बीते सालों में कई स्वतंत्र ‘थिंक टैंक’ जिनमें फ्रीडम हाउस से लेकर इकॉनमिस्ट इंटेलिजेंस यूनिट और स्वीडिश वी-डेम ( वराइटीज ऑफ डेमोक्रेसी) तक शामिल हैं ने, निरंतर लोकतांत्रिक सूचकांकों पर भारत की रैंकिंग कम की है।
यहां दो बातें महत्त्वपूर्ण हैं। पहला तो यह कि सरकार को ऐसी रिपोर्टों को केवल इसलिए खारिज नहीं कर देना चाहिए कि वे प्रतिकूल हैं, भले ही उनमें कुछ दिक्कत हो। अगर हमें उनकी प्रविधि गलत लगती है तो हमें उस गलती को चिह्नित करना चाहिए और रेटिंग एजेंसियों से बात करके उनमें सुधार कराना चाहिए।
समस्या तब खड़ी होती है जब ये रैंकिंग एजेंसियां भी उचित आलोचना को सीधे-सीधे केवल इसलिए नकार देती हैं कि ये सरकार के करीबी अधिकारियों की ओर से की गई है। वी-डेम के निदेशक स्टेफन लिंडबर्ग ने हाल ही में एक साक्षात्कार में कहा कि उनके संगठन ने भारत को जो रेटिंग दी वह ‘उचित’ थी। उन्होंने उन आरोपों की उपेक्षा कर दी कि जिन विशेषज्ञों का इस्तेमाल करके वी-डेम ने भारत को 2022 में 93 की निचली रैंकिंग दी थी वे भारत के प्रति पूर्वग्रह रखते थे। खासतौर पर ऐसा इसलिए कि रैंकिंग के दो आलोचकों संजीव सान्याल और आकांक्षा अरोड़ा ने उल्लेख किया कि लसोटो जहां 2014 में तख्तापलट हुआ था, उसे भारत से काफी ऊंची रैंकिंग दी गई। लिंडबर्ग ने संकेत किया कि लसोटो के साथ तुलना नस्लवादी हो सकती है। उन्होंने दावा किया कि वी-डेम के नतीजे उच्चस्तरीय गणित पर आधारित थे इसलिए उनमें गड़बड़ी नहीं हो सकती।
लिंडबर्ग ने खुलासा किया कि विशेषज्ञों ने पांच मानकों में से तीन का इस्तेमाल किया। इन सभी को गोपनीय रखा गया। इन विशेषज्ञों में ऐसे विद्वान शामिल थे जो अपने-अपने क्षेत्र के विशेषज्ञ हैं और भारत में न्यायपालिका अथवा चुनावों पर उनके वैज्ञानिक आलेख प्रकाशित है। उन्होंने यह भी कहा कि उनके पास भारत को लेकर व्यवस्थित वैज्ञानिक जानकारियां हैं।
भारत जैसे जटिल देश के बारे में किसी नतीजे पर पहुंचने के लिए विशुद्ध विज्ञान का सहारा नहीं लिया जा सकता है बल्कि इसके लिए व्यवहार विज्ञान अधिक उचित रहता जहां पूर्वग्रह असावधानीवश ही आ जाते, किसी देश को सजग ढंग से रैंकिंग में ऊपर या नीचे करने के लिए पूर्वग्रह की आवश्यकता ही न होती। वी-डेम का गुब्बारा सिडनी स्थित इंडियन सेंचुरी राउंडटेबल के निदेशक सल्वाटोर बैबोंस के शोध पत्र के कारण फूटने को है जिन्होंने लोकतंत्र पर भारत को रैंक करने के तरीकों को खारिज किया है। इस समय प्रोफेसर बैबोंस भारतीय लोकतंत्र पर एक पुस्तक के लिए शोध कर रहे हैं।
प्रोफेसर बैबोंस ने कहा है कि वी-डेम की रैंकिंग पांच उप सूचकांकों पर आधारित हैं जो हैं- निर्वाचित अधिकारी, सार्वभौमिक मताधिकार, निष्पक्ष चुनाव, एकत्रित होने की स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता।
इनमें से पहले दो मानकों में गंभीर खामी है और शेष तीन में भी पूर्वग्रहों की भरपूर गुंजाइश है। उदाहरण के लिए प्रमुख निर्वाचित पदाधिकारी और सार्वभौमिक मतदान पर मूल्यांकन रैंकिंग में शामिल देशों के संविधान के आधार पर हुआ। यानी अगर किसी देश का संविधान अधिकारियों के ‘निर्वाचन’ की बात कहता है तो उसे पूरे अंक मिलते हैं। ऐसे में इस आधार पर पूरे अंक पाने वाले देश थे क्यूबा, लीबिया, रूस, सीरिया और वियतनाम। 131 देशों को पूरे अंक मिले। भारत पीछे रह गया क्योंकि 2021 तक एंग्लो इंडियन समुदाय के दो लोकसभा सदस्य चयनित किए जाते थे। 2021 में यह कानून खत्म किया गया लेकिन इसके बावजूद 2022 में वी-डेम ने इसके चलते भारत को कम अंक दिए।
सबको मताधिकार के मामले में 174 देशों को पूरे अंक दिए गए जिसमें चीन, ईरान, उत्तर कोरिया, म्यांमार और वेनेजुएला शामिल हैं। इस मामले में दुनिया के सबसे बड़े अधिनायकवादी देशों और सबसे लोकतांत्रिक देशों को समान अंक मिले। यानी एकदलीय शासन वाला देश भी अगर सबको मताधिकार देता है तो उसे भी उतना ही लोकतांत्रिक माना जाएगा जितना बहुदलीय प्रणाली वाले देश को। बैबोंस कहते हैं कि बाकी तीन मानकों यानी स्वच्छ चुनाव, एकत्रित होने की आजादी और अभिव्यक्ति की आजादी की रैंकिंग विशुद्ध विशेषज्ञों की राय पर की गई। वह समस्या को रेखांकित करते हुए कहते हैं, ‘राजनीति विज्ञान कोई विज्ञान नहीं है, राजनीति विज्ञानियों द्वारा लोकतंत्र के संकेतकों का आकलन किसी रसायन विज्ञानी द्वारा किसी द्रव के तापमान का आकलन करने जैसा नहीं होता।’ यानी भारतीय लोकतंत्र को लेकर किसी विशेषज्ञ के ज्ञान को विशुद्ध नहीं माना जा सकता है और वह राजनीतिक, वैचारिक या व्यक्तिगत पूर्वग्रह से प्रभावित हो सकता है। उदाहरण के लिए एक न्यायाधीश कानून का विशेषज्ञ हो सकता है लेकिन हम अपने अनुभव से जानते हैं कि अलग-अलग न्यायाधीश एक ही अपराध के लिए अलग-अलग सजा निर्धारित कर सकते हैं। विशेषज्ञों की व्यक्तिपरकता का एक उदाहरण स्वच्छ चुनावों के मानकों पर भारत की कमजोर रैंकिंग से आता है। यह मानक दरअसल यह तय करता है कि चुनाव आयोग कितना सही और निष्पक्ष है। 2014 में भारत कुल चार अंकों में से 3.6 मिले थे जो अब घटकर 2.3 रह गए। यानी हम स्विट्जरलैंड के स्तर से फिसल कर जांबिया के स्तर पर आ गए। यह स्थिति तब है जबकि सत्ताधारी दल 2014 से जितने चुनाव जीता है करीब उतने ही हारा भी है।
प्रोफेसर बैबोंस कहते हैं, ‘वी-डेम की दिक्कत सांख्यिकीय गणना से नहीं बल्कि संकेतकों के गलत चयन, निर्णयों को समझने में समस्या और विशेषज्ञों के पूर्वाग्रह से संबद्ध है।’ संक्षेप में कहें तो समस्या मॉडल के साथ नहीं बल्कि आंकड़ों में है।
भारत को प्रोफेसर बैबोंस के शोध से दो सबक लेने चाहिए। पहला, उसे वी-डेम से बातचीत करके प्रेरित करना चाहिए कि वह अपनी प्रविधि में बदलाव लाए ताकि वह सही मायनों में भारतीय लोकतंत्र को दर्शा सके। इस बात की परवाह नहीं करनी चाहिए कि अंतत: हमें क्या रैंकिंग मिलती है। दूसरी बात, उसे अपने मानक तैयार करने चाहिए जिनके आधार पर भारत के विविध, बहुधर्मी, बहुसांस्कृतिक, बहुभाषी और बहुलतावादी लोकतंत्र का आकलन किया जा सके। हमारा लक्ष्य होना चाहिए अपनी रैंकिंग में सुधार न कि वी-डेम की व्यवस्था में बदलाव।
बहुलतावादी लोकतंत्र की बात करें तो भारत के आसपास ऐसे देश ज्यादा नहीं हैं। इसकी तुलना काफी हद तक अमेरिका या ब्रिटेन जैसे सांस्कृतिक विविधता वाले देशों से की जा सकती है। भारत एक ऐसा देश है जिसके जिलों का औसत आकार 100 से अधिक देशों के बराबर या उनसे बड़ा है। भारत का सबसे बड़ा राज्य आबादी के लिहाज से दुनिया भर में पांचवे स्थान पर है। ऐसे में सार्वभौमिक मानकों का इस्तेमाल करने से सही तस्वीर सामने नहीं आएगी। हमें हमेशा यह बात ध्यान में रखनी चाहिए।
Date:04-03-23
अड़ाणी पर समितिसंपादकीय
अमेरिका की वित्तीय शोध कंपनी और शॉर्ट सेलर हिंड़नबर्ग रिसर्च की रिपोर्ट के बाद अड़ाणी समूह की कंपनियों के शेयरों में हाल में आई भारी गिरावट की जांच के लिए आखिर शीर्ष अदालत ने बड़़ा कदम उठाते हुए विशेषज्ञों की समिति के गठन का आदेश दे दिया। हिंड़नबर्ग रिपोर्ट में अड़ाणी समूह पर शेयरों के भाव चढ़ाने में हेराफेरी का आरोप लगाया गया है। पूर्व न्यायाधीश एएमसप्रे समिति की अगुवाई करेंगे जो दो माह में अपनी रिपोर्ट देगी। हिंड़नबर्ग रिपोर्ट के बाद अड़ाणी समूह की कंपनियों का बाजार मूल्यांकन 140 अरब ड़ॉलर से अधिक घट चुका है। शीर्ष न्यायालय ने भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड़ (सेबी) को भी निर्देश दिया है कि वह इस मामले में अपनी जांच को दो माह में पूरा करे और स्थिति रिपोर्ट सौंपे। मुख्य न्यायाधीश ड़ी वाई चंद्रचूड़ और दो अन्य न्यायाधीशों की पीठ ने कहा है कि समिति पूरी स्थिति का आकलन करके निवेशकों को जागरूक करने और शेयर बाजारों की नियामकीय व्यवस्था की मजबूती के उपाय सुझाएगी। पीठ ने केंद्र सरकार‚ वित्तीय सांविधिक निकायों‚ भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड़ (सेबी) की चेयरपर्सन को निर्देश दिया है कि समिति को जांच में पूरा सहयोग दें। समिति देखेगी कि क्या अड़ाणी समूह या अन्य कंपनियों के मामले में प्रतिभूति बाजार के संदर्भ में कोई नियामकीय चूक तो नहीं हुई है। पीठ ने कहा कि बाजार नियामक सेबी ने खुलकर प्रतिभूति अनुबंध (नियमन) नियम‚ 1957 के कथित उल्लंघन का जिक्र नहीं किया है। पीठ ने समिति से बाजार नियमनों‚ शॉर्ट सेलिंग नियमनों या शेयर कीमतों में गड़बड़ी की जांच करने को भी कहा है। समिति का गठन केंद्र सरकार के लिए सख्त संदेश है। शीर्ष अदालत ने 17 फरवरी को विशेषज्ञों की प्रस्तावित समिति पर सीलबंद लिफाफे में केंद्र के सुझावों को लेने से इनकार कर दिया था। विपक्ष समिति के गठन से संतुष्ट नहीं है। हिंड़नबर्ग रिपोर्ट के सामने आने के बाद से ही प्रधानमंत्री पर हमलावर कांग्रेस का कहना है कि इस समिति की जांच से सिर्फ सेबी के नियमों का उल्लंघन होने या न होने के बारे में पता चलेगा‚ लेकिन इस पूरे प्रकरण को लेकर संसद में जो सवाल उठाए गए हैं उनके जवाब सिर्फ संयुक्त संसदीय समिति (जेपीसी) की जांच से ही मिल सकते हैं।
Date:04-03-23
दो-तिहाई बहुमत से ही बने चुनाव आयुक्तशिब्बन लाल सक्सेना, ( संविधान सभा के सदस्य )
डॉक्टर आंबेडकर ने हमें बताया कि उन्होंने निर्वाचन-आयोग को कार्यपालिका से बिल्कुल पृथक करने का प्रयास किया है…। इस संशोधन को ध्यानपूर्वक पढ़ने के पश्चात मैंने अपने संशोधनों का सुझाव रखा है, ताकि डॉक्टर आंबेडकर के संशोधन का वास्तविक उद्देश्य पूरा हो सके। …मेरे संशोधन का उद्देश्य यह है कि निर्वाचन आयोग कार्यपालिका से बिल्कुल पृथक हो। इसमें संदेह नहीं कि प्रांतीय कार्यपालिकाओं से उसका कोई संबंध नहीं रहेगा, किंतु यदि राष्ट्रपति इस आयोग को नियुक्त करेगा, तो इसका अर्थ यही है कि प्रधानमंत्री ही इस आयोग को नियुक्त करेगा। उसी की सिफारिश से अन्य निर्वाचन आयुक्त नियुक्त किए जाएंगे। इस कारण वे स्वतंत्र रूप से कार्य न कर सकेंगे।
इसमें कोई संदेह नहीं कि मुख्य निर्चाचन आयुक्त के एक बार नियुक्त होने पर उसे केवल दोनों सदनों के दो-तिहाई बहुमत से पदच्युत किया जा सकता है, अन्यथा नहीं। इससे निस्संदेह वह स्वतंत्र रूप से कार्य कर सकता है, किंतु यह भी संभव है कि कोई पदारूढ़ दल, जो आने वाले निर्वाचन में सफल होना चाहेगा, अपने दल के प्रति पक्की निष्ठा रखने वाले किसी व्यक्ति को मुख्य निर्वाचन आयुक्त नियुक्त कर दे। बहुत गंभीर आरोप लगाने पर ही उसे दोनों सदनों के दो-तिहाई बहुमत से पदच्युत किया जा सकता है, जिसका अर्थ है कि उसे पदच्युत करना बहुत कुछ असंभव ही है। इसलिए मैं यह चाहता हूं कि जो व्यक्ति नियुक्त किया जाए, वह सभी दलों का विश्वास-भाजन हो और उसकी नियुक्ति का समर्थन केवल बहुमत से ही न हो, बल्कि दोनों सदनों के दो-तिहाई बहुमत से हो। यदि केवल साधारण बहुमत ही आवश्यक समझा गया, तो पदारूढ़ दल से ही उसे बहुमत प्राप्त हो जाएगा।
मैंने दो-तिहाई बहुमत का प्रस्ताव रखा है और उसका अर्थ यह है कि अन्य दल भी उसकी नियुक्ति के लिए सहमत हों। इससे आयोग स्वतंत्र रूप से कार्य कर सकेगा और विपक्ष उसे कुछ न कह सकेगा। आयुक्तों व मुख्य निर्वाचन आयुक्त को राष्ट्रपति को नियुक्त करना चाहिए, किंतु उसे उन लोगों के नाम प्रस्तावित करने चाहिए, जिन्हें विधान मंडलों के दोनों सदनों के दो-तिहाई बहुमत का समर्थन प्राप्त हो। इस प्रकार कोई ऐसा व्यक्ति नियुक्त नहीं हो सकेगा, जो किसी दल-विशेष के प्रति निष्ठा रखता हो। मुख्य निर्वाचन आयुक्त केवल एक दल का विश्वास पात्र न होगा, बल्कि विधान मंडल के अधिकांश सदस्यों को उस पर विश्वास होगा। तभी वह अपनी की हुई नियुक्तियों के लिए दो-तिहाई बहुमत का समर्थन प्राप्त कर सकेगा। इसलिए जैसी कि डॉक्टर आंबेडकर ने अपना संशोधन उपस्थित करते हुए अपनी इच्छा प्रकट की है, यदि मूलाधिकार समिति की सिफारिशों के वास्तविक उद्देश्य को पूरा करना है, तो मेरे विचार से उन्हें यह उपबंधित करना चाहिए कि राष्ट्रपति नियुक्ति करेगा, किंतु संसद के दोनों सदन संयुक्त सत्र में उपस्थित तथा मत देने वाले सदस्यों के दो-तिहाई बहुमत से उस नियुक्ति का समर्थन करेंगे।
…वह कोई भी व्यक्ति हो, किंतु जो कोई भी चुना जाए, उसे संसद के दोनों सदनों के कम से कम दो-तिहाई बहुमत का विश्वास प्राप्त होना चाहिए, ताकि पदारूढ़ दल अपने ही किसी आदमी को देश को स्वीकार करने के लिए बाध्य न कर सके। …बहुमत का अर्थ केवल 51 प्रतिशत बहुमत से है, किंतु मैं चाहता हूं कि दो-तिहाई सदस्यों का बहुमत हो।
…सौभाग्य से हमारे प्रधानमंत्री महोदय स्वतंत्र विचार रखते हैं और निरपेक्ष हैं। इसलिए वह किसी उपयुक्त व्यक्ति को ही नियुक्त करवाएंगे। किंतु हम कह नहीं सकते कि हमें हमेशा इसी प्रकार का प्रधानमंत्री प्राप्त होगा। मैं यह चाहता हूं कि भविष्य में कोई प्रधानमंत्री इस अधिकार का दुरुपयोग न करे और इसलिए मैं चाहता हूं कि राष्ट्रपति के नाम-निर्देशन का समर्थन दो-तिहाई बहुमत द्वारा हो। इसमें कोई संदेह नहीं कि यदि किसी एक दल का अत्यधिक बहुमत होगा, तो संकट उपस्थित हो सकता है। …यह संभव है कि यदि प्रधानमंत्री चाहें, तो वह अपने दल के ही किसी व्यक्ति को नियुक्त कर सकते हैं, किंतु मुझे विश्वास है कि वह यह नहीं करेंगे। … केवल मुख्य निर्वाचन आयुक्त को ही स्थायी रूप से नियुक्त न किया जाए, बल्कि आयोग के तीन से लेकर पांच तक सदस्यों को भी स्थायी रूप से नियुक्त किया जाए और वे ही निर्वाचनों का संचालन करें।
( संविधान सभा में दिए गए भाषण का अंश )
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04 March 2023
प्रश्न–400 – भारत में विदेशी शिक्षण संस्थानों को अपने कैम्पस खोलने की अनुमति देने संबंधी नीति का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिये। (250 शब्द)
Question–400 – Critically examine the policy of allowing foreign educational institutions to open their campuses in India. (250 words)
नोट : इसका उत्तर आपको हमें नहीं भेजना है, यह आपके स्वयं के अभ्यास के लिए है।
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Date:03-03-23
Poll body buildingSC’s selection method will help EC & strengthen the election process. But judges’ selection needs reform tooTOI Editorials
A five-judge constitution bench of the Supreme Court on Thursday set in motion a process to loosen the grip of the political executive in choosing EC members. In a landmark judgment, the bench while considering a clutch of petitions seeking a neutral selection committee for EC reached a unanimous verdict that a committee composed of the PM, leader of the opposition or the largest opposition party, and CJI should be entrusted with the task till such time Parliament frames a suitable law. This judgment addresses the conflict of interest inherent in the current selection process for election commissioners.
EC is one of the most consequential constitutional bodies. It’s entrusted with the task of preparing electoral rolls and supervising elections. Article 324 of the Constitution, which deals with EC, left it to Parliament to legislate on the selection process. Getting it right was deemed so important that one of the suggestions in the constituent assembly was to get the selection ratified by a two-third majority of a joint session of Parliament. Later, in 1990, a constitution amendment bill was introduced in the Rajya Sabha to form a committee to select the chief election commissioner. This bill did not progress and was withdrawn four years later.
In 2015, the law commission recommended a selection committee similar to the one SC approved yesterday. SC’s decision, therefore, represents evolution rather than an arbitrary encroachment into the executive domain. Its main beneficiary will be EC. Governments so far have been unwilling to let go of their monopoly in selecting commissioners despite there being a clear conflict of interest. One outcome of it is that the institution’s credibility is being damaged by allegations of partisanship in a charged political atmosphere. Therefore, a selection committee with representation from the opposition and judiciary, will insulate EC from political attacks. This is essential to ensure continued faith in the electoral process.
SC’s judgment also asked for changes to ensure that the two election commissioners enjoy the same security of tenure that the CEC and apex court judges enjoy. These changes will kick in only after the 2024 general election when one of the commissioners retires. However, welcome as the SC verdict is, it also raises questions about the selection process for the judiciary. The collegium has been under attack from within and without. The selection process for the judiciary too needs reform.
Date:03-03-23
SC Corrects Error Of Commission, With One OmissionFor true functional independence, EC should also be made accountable to a parliamentary committeeTK Arun, [ The writer is former Opinion Editor, The Economic Times ]
By directing the Election Commission to be appointed by a non-partisan panel, the Supreme Court strengthens democracy. But more needs to be done for institutional independence. EC, as well as all other regulatory bodies made autonomous of the executive, should be made answerable to designated committees of Parliament. This is essential to ensure democratic accountability of all institutions to the ultimate sovereign, the people.
EC is the chief agent and arbiter of free and fair elections in the country. It is vital for the people and all political parties to have full faith in it. There have been a number of questions on EC’s decisions, and too many debates have been along party lines.
This makes the five-member constitution bench’s directive that selection of the CEC and other members of the Commission should be made by a panel comprising the PM, the leader of the opposition (LoP) and CJI, altogether welcome.
It gives the opposition and other critics of EC the satisfaction that newappointees would be free of any taint of partisanship. And that’s a good thing for BJP as well. For a party that enjoys genuine popular support, it is more than useful to solidify the idea that revealed popular preference is the result of nothing but free, democratic will.
Some people have voiced concern about SC transgressing its role as custodian of legal propriety to take on an executive role in the functioning of India’s democracy. There are two reasons to not lose much sleep over this.
For one, this is not the first time the court would play an executive role. In coming up with this arrangement for appointing a constitutional agent who should not just be non-partisan but also be seen to be non-partisan, SC has followed the precedent set for appointing the director of CBI. CBI head is appointed, as per the 2014 Lokpal Act, by a committee comprising the PM, LoP and CJI.
And the experience of the recent past does not suggest that having tasted executive power, SC would develop an appetite for much more of it.
The second, more fundamental reason is the wide ambit the Constitution has given SC in the working of the Indianstate, under Article 142: “The Supreme Court in the exercise of its jurisdiction may pass such decree or make such order as is necessary for doing complete justice in any cause or matter pending before it, and any decree so passed, order so made shall be enforceable throughout the territory of India in such manner as may be prescribed by or under any law made by Parliament and, until provision in that behalf is so made, in such manner as the President may by order prescribe. ”
The qualification at the end is reiterated by the present ruling as well. The constitution bench has said that the scheme it has prescribed would continue, till Parliament passes a law on the subject.
This sweeping power of the courtalso has not eroded Indian democracy.
This intervention from the judiciary is essential as the opposition, the normal source of resistance to government excess, is comatose, even as it traverses the country. For example, when a rival claimant to the opposition space was arrested, Congress attacked that leader, rather than the government.
But let’s come back to the central point: The court-mandated scheme is better than the arrangement it replaces but does not go far enough. Constitutional functionaries have to be not just appointed fairly, but also held to account thereafter, something missing in the Indian system.
Whether market regulator Sebi, pension regulator PFRDA, banking regulator RBI, insurance regulator IRDAI, central investigative agencies, CAG or EC, its chief must be held to account by a committee of Parliament.
In a democracy, people are the ultimate sovereign, and their elected representative should exercise that sovereignty. In recent times, elected representatives have seen their role more as voting automatons rather than as those who discuss the pros and cons of legislation or government conduct. That would change, by getting committees of legislators to hold autonomous functionaries to account.
Date:03-03-23
चुनाव आयोग की गरिमा बढ़ाएगा यह फैसलासंपादकीय
सुप्रीम कोर्ट की एक संविधान पीठ ने फैसले में कहा कि मुख्य व अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पीएम, लोक सभा में सबसे बड़ी विपक्षी पार्टी के नेता और सीजेआई की समिति द्वारा की जाए और यह व्यवस्था तब तक लागू रहेगी जब तक संसद नियुक्ति को लेकर कानून नहीं बनाती। अनुच्छेद 324 (2) के प्रावधान में संविधान निर्माताओं ने अपेक्षा की थी कि संसद चुनाव आयोग की निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए कानून बनाएगी। लेकिन वह नहीं हो सका। दो समान लेकिन अलग-अलग फैसलों में बेंच ने कहा कि चुनाव में पैसे, बाहुबलियों और मीडिया की पक्षपाती भूमिका बेहद बढ़ गई है। अलग से फैसले में जज की राय थी कि अभी अन्य चुनाव आयुक्तों को बगैर सीईसी की अनुशंसा के नहीं हटाया जा सकता, जबकि इनके हटाने की प्रक्रिया भी वही हो जो मुख्य आयुक्त को हटाने के लिए है। यानी सीईसी की अनुशंसा की बाध्यता न हो | बेंच ने फैसले में मुख्य और अन्य आयुक्तों के लिए अलग-अलग कार्यकाल पर भी प्रश्न चिह्न खड़ा किया और कहा कि एक मौजूदा चुनाव आयुक्त की नियुक्ति में इतनी जल्दबाजी करने की क्या जरूरत थी। जजों का मानना था कि प्रजातंत्र में विश्वास का अंतिम पड़ाव है- चुनाव प्रक्रिया की शुद्धता । भारत का प्रजातंत्र कमजोर है और अगर राजनीतिक वर्ग ने कानून-व्यवस्था के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को केवल हवाई बातों तक सीमित रखा तो प्रजातंत्र ढह जाएगा।
Date:03-03-23
चुनाव आयुक्तों का चयनसंपादकीय
सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के लिए तीन सदस्यीय पैनल बनाने की जो व्यवस्था दी, उससे वस्तुतः एक तरह का कलेजियम बनेगा, जिसमें प्रधानमंत्री और नेता विपक्ष अथवा लोकसभा में सबसे बड़े दल के नेता के साथ तीसरे सदस्य के रूप में सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश होंगे। इस फैसले के बाद चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति उसी तरह होगी, जैसे सीबीआइ निदेशक की होती है। पिछले कुछ समय से सीबीआइ निदेशक का चयन तीन सदस्यीय पैनल के माध्यम से हो रहा है। क्या यह कहा जा सकता है कि इससे सीबीआइ की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठने बंद हो गए हैं? हैरत नहीं कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की नई व्यवस्था बनने के बाद भी उनकी निष्पक्षता को लेकर सवाल उठने का सिलसिला कायम रहे। जो भी हो, सुप्रीम कोर्ट के निर्णय की व्याख्या इस रूप में होना स्वाभाविक है कि उसने कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में दखल देने का काम किया है। इसका कारण संविधान में यह दर्ज होना है कि चुनाव आयुक्त की नियुक्ति राष्ट्रपति की ओर से की जाएगी। सुप्रीम कोर्ट के फैसले के अनुसार उसके द्वारा तय की गई व्यवस्था तब तक लागू रहेगी, जब तक संसद कोई कानून नहीं बनाती। पता नहीं संसद सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के अनुरूप ही कानून बनाएगी या फिर उसमें कुछ हेरफेर करेगी, लेकिन यह प्रश्न उठना स्वाभाविक है कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की जैसी व्यवस्था आवश्यक समझी गई, वैसी उच्चतर न्यायपालिका के न्यायाधीशों की नियुक्ति के मामले में क्यों नहीं समझी जा रही है?
आखिर जिस तरह का पैनल चुनाव आयुक्त की नियुक्ति के लिए बनाने का आदेश दिया गया, वैसा ही न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए क्यों नहीं बनाया जाना चाहिए? यह ठीक नहीं कि जो सुप्रीम कोर्ट चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में कार्यपालिका से पारदर्शिता की अपेक्षा करे, वह न्यायाधीशों की नियुक्ति के मामले में इस अपेक्षा पर खरा न उतरे। इसका क्या अर्थ कि न्यायाधीश ही न्यायाधीशों की नियुक्ति करें? न्याय और नीति यही कहती है कि लोकतंत्र में व्यवस्था का कोई एक अंग जैसी नसीहत दूसरे अंगों को दे, वैसी पर खुद भी अमल करे। चुनाव आयोग की समस्या यह नहीं है कि उसके आयुक्तों की नियुक्ति किसी पैनल अथवा कलेजियम से नहीं होती। उसकी समस्या यह है कि स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनावों के लिए उसे जैसे अधिकार चाहिए, वैसे उसके पास नहीं हैं। चुनाव आयोग जैसे चुनाव सुधार चाह रहा है, वैसे राजनीतिक दलों को रास नहीं आ रहे हैं। इसमें संदेह है कि सुप्रीम कोर्ट का ताजा फैसला चुनाव सुधारों को आगे बढ़ाने का काम करेगा। अच्छा होता कि सुप्रीम कोर्ट इसकी भी चिंता करता कि चुनाव आयोग आवश्यक अधिकारों से लैस हो, ताकि स्वतंत्र एवं निष्पक्ष चुनावों को लेकर कोई संदेह न रहे और राजनीतिक दल उसे बेवजह निशाना बनाने से बाज आएं।
Date:03-03-23
पारदर्शिता का चुनावसंपादकीय
सर्वोच्च न्यायालय ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति के मामले में, इससे संबंधित कानून बनने तक, एक तदर्थ व्यवस्था दी है। इस व्यवस्था का स्वाभाविक ही स्वागत किया जा रहा है। सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रधानमंत्री, प्रधान न्यायाधीश और विपक्ष या लोकसभा में सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता की सलाह से राष्ट्रपति द्वारा किया जाए। अभी तक इनकी नियुक्ति सरकार की पसंद से ही की जाती रही है। दरअसल, संविधान में चुनाव आयुक्त की नियुक्ति को लेकर कोई प्रक्रिया नहीं सुझाई गई है। इस तरह सरकार ही अपनी पसंद के नाम इस पद के लिए सुझाती रही है, जिस पर राष्ट्रपति की मंजूरी मिल जाती रही है। मगर पिछले कुछ सालों से चुनाव आयोग के कामकाज को लेकर अंगुलियां उठती रही हैं। मांग की जा रही थी कि मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति के लिए भी कालेजियम जैसी कोई व्यवस्था बनाई जानी चाहिए। करीब पांच साल पहले कई याचिकाएं दायर की गई थीं। उन पर विचार करने के बाद सर्वोच्च न्यायालय की पांच सदस्यों की संविधान पीठ ने एकमत से स्वीकार किया कि इस मामले में कानून बनाया जाना चाहिए। जब तक कानून नहीं बन जाता, तब तक संविधान पीठ द्वारा तय प्रक्रिया का पालन किया जाए।
लोकतंत्र में निष्पक्ष और पारदर्शी चुनाव की महत्त्वपूर्ण भूमिका होती है। इसे सुनिश्चित कराना निर्वाचन आयोग का दायित्व है। मगर अनेक मौकों पर आरोप लगते रहे हैं कि निर्वाचन आयोग पक्षपातपूर्ण रवैया अपनाता और कार्रवाई करता है। इसलिए मुख्य चुनाव आयुक्त के पद पर ऐसे व्यक्ति को बिठाने की मांग की जाती रही है, जो खुद निष्पक्ष हो। चुनाव आयुक्त के कामकाज पर अंगुलियां इसलिए भी उठती रही हैं कि उनकी नियुक्ति चूंकि सरकार की इच्छा से होती है, इसलिए माना जाता है कि उनका झुकाव सरकार के प्रति होता है। हालांकि कई ऐसे मौके भी देखे गए हैं, जब कुछ मुख्य चुनाव आयुक्तों ने सरकार के विरुद्ध कड़ा रुख अख्तियार किया। मगर इस बार विवाद इसलिए गहरा हो गया कि वर्तमान मुख्य चुनाव आयुक्त की नियुक्ति में जिस तरह सरकार ने हड़बड़ी दिखाई और नियुक्ति संबंधी जरूरी प्रक्रिया का पालन भी नहीं किया गया, वह हैरान करने वाला था। उन्होंने रातोंरात अपने पद से इस्तीफा दिया और चौबीस घंटे के भीतर उन्हें मुख्य चुनाव आयुक्त की जिम्मेदारी सौंप दी गई। इस पर स्वाभाविक ही आपत्तियां दर्ज कराई गईं। तब सर्वोच्च न्यायालय ने सरकार से पूछा था कि उसे ऐसी क्या हड़बड़ी थी कि बिजली की रफ्तार से यह नियुक्ति करनी पड़ी।
अभी सर्वोच्च न्यायालय ने जो व्यवस्था दी है, उसमें चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में सरकार के लिए अपनी पसंद थोपना आसान नहीं होगा। इसमें विपक्ष या सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता और प्रधान न्यायाधीश की भागीदारी होने से सरकार भी ऐसे नामों का चुनाव करने से बचेगी। फिर, अभी तक जिन नियुक्तियों में विपक्ष के नेता की मौजूदगी अनिवार्य होती है। पर सरकार इस तर्क के आधार पर विपक्ष को उनमें शरीक नहीं करती रही है कि संवैधानिक नियमों के तहत किसी भी ऐसे दल के पास पर्याप्त संख्या न होने की वजह से विपक्ष का कोई नेता नहीं है, वह तर्क भी इसमें काम नहीं आने वाला। अदालत ने कहा है कि सबसे बड़े विपक्षी दल के नेता को इसमें शामिल करना होगा। इस तरह चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति में पारदर्शिता का भरोसा बना है।
Date:03-03-23
कारोबार में शोध और नवाचारजयंतीलाल भंडारी
इन दिनों राष्ट्रीय और वैश्विक स्तर पर प्रकाशित हो रही अध्ययन रिपोर्टों में यह बात उभर कर सामने आ रही है कि भारत में आर्थिक और औद्योगिक विकास को तेज करने के लिए सरकार के साथ-साथ देश के उद्योगों को भी शोध और विकास (आरएंडडी) पर अधिक ध्यान देना होगा। गौरतलब है कि नवीनतम रिपोर्टों के मुताबिक इस समय दुनिया के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का करीब दो फीसद शोध और विकास में व्यय किया जाता है। यूरोपीय संघ में आरएंडडी पर जीडीपी का करीब दो फीसद व अमेरिका, जापान और अन्य कई विकसित देशों में इस पर तीन फीसद से भी अधिक व्यय किया जा रहा है। जबकि इस समय भारत में इस पर जीडीपी का करीब 0.67 फीसद व्यय हो रहा है। इस समय दुनिया में शोध और विकास पर जो वार्षिक राशि व्यय की जाती है, उसमें अमेरिका, चीन, जापान, जर्मनी और दक्षिण अफ्रीका की हिस्सेदारी करीब तीन चौथाई से अधिक है। ये सभी देश आरएंडडी के बल पर उद्योग-कारोबार के क्षेत्र में दुनिया में अग्रणी हैं।
हाल ही में इंदौर में आयोजित ‘इंडियन सोसायटी आफ क्रिटिकल केयर मेडिसिन’ की उनतीसवीं वैश्विक क्रांफ्रेंस में स्वास्थ्य शोध क्षेत्र में अभूतपूर्व वैश्विक योगदान देने वाले फ्रांस के जैन लुइस टेबोल ने कहा कि भारत में ज्ञान का भंडार है, लेकिन शोध की कमी है। अगर भारत में सरकार के साथ उद्योग शोध और नवाचार (रिसर्च-इनोवेशन) पर अधिक ध्यान देंगे तो भारत दुनिया में स्वास्थ्य सहित विभिन्न आर्थिक और औद्योगिक क्षेत्रों में तेजी से ऊंचाई पर पहुंच सकेगा।
हालांकि शोध और नवाचार के मामले में पिछले एक दशक में भारत के कदम आगे बढ़े हैं, लेकिन अब भी दुनिया की प्रमुख अर्थव्यवस्था वाले देशों की तुलना में बहुत पीछे है। पिछले दिनों संयुक्त राष्ट्र की एजंसी ‘वर्ल्ड इंटलेक्चुअल प्रापर्टी आर्गेनाइजेशन’ (डब्ल्यूआइपीओ) द्वारा जारी ‘ग्लोबल इनोवेशन इंडेक्स’ 2022 में भारत चालीसवें स्थान पर पहुंच गया, जबकि 2021 में छियालीसवें पायदान पर था। 2015 में इक्यासीवें स्थान पर था। सबसे बड़ी बात है कि निम्न मध्यम आय वर्ग के वैश्विक नवाचार सूचकांक में भारत पहले स्थान पर पहुंच गया है। इस समूह में दुनिया के छत्तीस देशों को शामिल किया गया है। वैश्विक नवाचार सूचकांक में स्विट्जरलैंड पहले, अमेरिका दूसरे और स्वीडन तीसरे स्थान पर हैं। थाइलैंड, वियतनाम, रूस और ब्राजील जैसे देशों की तुलना में नवाचार के मामले में भारत आगे निकल चुका है।
गौरतलब है कि पिछले दिनों ‘स्मार्ट इंडिया हैकाथान’ समारोह को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि इस समय शोध और नवाचार सूचकांक में भारत की रैकिंग बढ़ रही है। शोध और नवाचार के कारण बुनियादी ढांचा, स्वास्थ्य, डिजिटल, कृषि, शिक्षा, रक्षा सहित विभिन्न क्षेत्रों में प्रगति हो रही है। भारत के नवाचार दुनिया में सबसे प्रतियोगी, किफायती, टिकाऊ, सुरक्षित और बड़े स्तर पर लागू होने वाले समाधान प्रस्तुत कर रहे हैं। आज भारत में सत्तर हजार से अधिक स्टार्ट-अप हैं, जिनमें सौ से अधिक यूनिकार्न हैं। ऐसे में भारत शोध और नवाचार को और अधिक प्रोत्साहन देते हुए देश को मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने सहित विभिन्न क्षेत्रों में विकास को नई रफ्तार देने की डगर पर आगे बढ़ रहा है।
कोविड-19 भारत में नए चिकित्सीय शोध और नवाचार को बढ़ावा देने का एक अवसर भी था। जब फरवरी-मार्च 2020 में देश में कोरोना संक्रमण की पहली लहर शुरु हुई, तब उसकी रोकथाम के लिए कोरोना टीके से संबंधित शोध और उत्पादन के विचार आने शुरू हुए थे। सामान्य तौर पर किसी बीमारी का टीका बनाने में कई वर्ष लगते हैं, लेकिन भारत में कोरोना विषाणु की चुनौती के मद्देनजर कुछ महीनों के अंदर इसका टीका बनाने का कठिन लक्ष्य पूरा किया गया। कृषि क्षेत्र को आगे बढ़ाने में भी कृषि संबंधी शोध और नवाचार की प्रभावी भूमिका है। केंद्रीय कृषि मंत्री के मुताबिक देश में कृषि शोध से जुड़ी सौ से अधिक रिसर्च इंस्टीट्यूट, पचहत्तर कृषि विश्वविद्यालयों और इंडियन काउंसिल आफ एग्रीकल्चरल रिसर्च (आइसीआर) के बीस हजार से अधिक वैज्ञानिकों के समर्पित शोध कार्य और नवाचार को बढ़ावा दिए जाने से कृषि क्षेत्र में विकास का नया अध्याय खुल रहा है।
इसके बावजूद इस क्षेत्र में भारत के उद्योग-कारोबार बहुत पीछे हैं। गौरतलब है कि यूरोपीय आयोग हर वर्ष शोध और नवाचार के मद्देनजर दुनिया की शीर्ष ढाई हजार कंपनियों की जानकारी प्रकाशित करता है। 2021 के आंकड़ों के मुताबिक इन कंपनियों में भारत की महज चौबीस कंपनियां शामिल हैं। जबकि अमेरिका की 822, चीन की 678, जापान की 233 और जर्मनी की 114 कंपनियां हैं। स्थिति यह है कि भारत में आंतरिक शोध और विकास में एक भी ऐसी बड़ी शोध निवेशक कंपनी नहीं है, जो दुनिया में पहली पचास बड़ी कंपनियों की सूची में शामिल हो। देश की शीर्ष कंपनी टाटा मोटर्स शोध और नवाचार के मामले में दुनिया में अट्ठावनवें स्थान पर है। इतना ही नहीं, दुनिया की शीर्ष सात कंपनियां पूरे भारत द्वारा शोध और नवाचार पर किए जा रहे निवेश की तुलना में अधिक निवेश करती हैं।
देश में सर्वाधिक मुनाफे वाली साफ्टवेयर, वित्तीय सेवा, पेट्रोकेमिकल्स और धातु प्रसंस्करण क्षेत्र से जुड़ी कंपनियां भी शोध और नवाचार पर व्यय के मामले में बहुत पीछे हैं। स्थिति यह है कि देश में भारी कमाई करने वाली दस साफ्टवेयर कंपनियां अपनी बिक्री का महज एक फीसद शोध और नवाचार में लगाती हैं, जबकि इस क्षेत्र की वैश्विक कंपनियों का शोध और नवाचार पर औसत व्यय दस फीसद है। इस मामले में पीछे रहने के कारण ही भारत कई अहम क्षेत्रों में आगे नहीं बढ़ पाया है। यही कारण है कि प्रौद्योगिकी हार्डवेयर, इलेक्ट्रानिक उपकरण, वैमानिकी, विनिर्माण सामग्री, रसायन, औद्योगिक अभियांत्रिकी, औषधि और वाहन क्षेत्रों में दुनिया के बाजार में भारतीय कंपनियों की पहुंच बहुत सीमित है।
शोध और नवाचार के बहुआयामी लाभ होते हैं। इसके आधार पर किसी देश में विभिन्न देशों के उद्यमी और कारोबारी अपने उद्योग-कारोबार शुरू करने संबंधी निर्णय लेते हैं। पूरी दुनिया की सरकारें भी वैश्विक नवाचार सूचकांक को ध्यान में रखकर अपने वैश्विक उद्योग-कारोबार के रिश्तों के लिए नीति बनाती हैं। जैसे-जैसे भारत में शोध और नवाचार बढ़ रहा है, वैसे-वैसे इसके लाभ दिखाई देने लगे हैं। इसके चलते हुए अमेरिका, यूरोप और एशियाई देशों की बड़ी-बड़ी कंपनियां अपने ‘ग्लोबल इन हाउस सेंटर’ (जीआइसी) तेजी से शुरू करती दिखाई दे रही हैं। ख्याति प्राप्त वैश्विक वित्तीय और वाणिज्यिक कंपनियां भारत में अपने कदम तेजी से बढ़ा रही हैं। इससे देश में प्रतिस्पर्धा का स्तर और रोजगार के अवसर बढ़ रहे हैं।
कोई छह-सात दशक में अमेरिका शोध और नवाचार पर अधिक खर्च करके सूचना प्रौद्योगिकी, संचार, दवा, अंतरिक्ष अन्वेषण, ऊर्जा और अन्य तमाम क्षेत्रों में तेजी से आगे बढ़ कर दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश बना है। भारत को भी आर्थिक शक्ति और विकसित देश बनने के लिए आरएंडडी की ऐसी सुविचारित रणनीति पर आगे बढ़ना होगा, जिससे सरकार, निजी क्षेत्र और शोध संस्थानों के बीच सहजीविता और समन्वय के सूत्र आगे बढ़ाए जा सकें। खासकर देश में बड़ी कंपनियों के भीतर भी शोध और विकास पर निवेश बढ़ाना होगा। उम्मीद है कि सरकार और देश के उद्योग-कारोबार जगत द्वारा देश के तेज विकास और आम आदमी के आर्थिक-सामाजिक कल्याण के मद्देनजर दुनिया के विभिन्न विकसित देशों की तरह भारत में भी शोध और नवाचार पर जीडीपी की दो फीसद से अधिक धनराशि व्यय करने की डगर पर आगे बढ़ा जाएगा।
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भारत एक महाद्वीप के आकार का विशाल देश है। वर्तमान में यहाँ जितने राज्य हैं, उनकी संख्या कहीं ज्यादा होनी चाहिए। ऐसा इसलिए, क्योंकि तभी उस क्षेत्र का विकास सही ढंग से हो सकता है। उदाहरण के लिए अगर उत्तर प्रदेश को ही लें, तो हम पाते हैं कि जनसंख्या के हिसाब से तो यह चौथा बड़ा देश हो सकता है। लेकिन सकल घरेलू उत्पाद में यह केन्या के आसपास ठहरता है। ऐसे और भी कई प्रमाण हैं, जो यह बताते हैं कि छोटे राज्य बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं।
कुछ बिंदु –
त्रिपुरा राज्य में होने वाले विधानसभा चुनावों में अलग तिप्रालैंड की मांग की जा रही है। त्रिपुरा पहले से ही एक छोटा राज्य है। उसके संदर्भ में भले ही यह मांग उचित न हो, लेकिन छोटे राज्यों का विचार देशहित में है।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 16 फरवरी, 2023
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Date:02-03-23
Empower ‘Indira Inc’,Up India Inc’s GamesTap the full potential of corporate talentET Editorials
There are two aspects to women and the workforce: one, labour force participation rate, or how many women relative to men are working in specific fields; two, the extent to which a level-playing field exists within these sectors, or the equal (or otherwise) treatment of professionals regardless of their gender. Here, we concern ourselves with a specific domain of special interest for ET readers – the corporate workplace. A new study by staffing firm CIEL HR reveals that out of 10 employees in India Inc, three comprise women. And, of these, only one woman makes it in a leadership team of 10. The study is indicative of women in India Inc – ‘Indira Inc’, if you will – dropping out of the talent pipeline at mid-to-senior levels.
Companies need to create and inculcate an atmosphere in which deserving women are considered – and consider themselves – for leadership positions at par with their deserving male colleagues. Hiring more women alone won’t disturb this boys’ club. Nor does creating mandatory quotas, which is patronising and will actually undervalue true talent. Studies find that a key reason why so few women make it to leadership roles is the inherently male construct of these roles, giving rise to questions such as ‘Can women have it all – a successful career and family?’ This ‘choice’ seems to be hardwired to ‘Indira Inc’ and needs to be shunted. Organisations will need to redefine work in a way both women and men find their place inside and outside the workplace. Often, gender-neutral approaches end up favouring men over women through unconscious bias. Subliminal biases need to be addressed by organisations and nixed, even at the cost of seeming ‘woke’.
Diversity requires reorienting and redefining existing structures, making them fit for purpose. Getting ‘Indira Inc’ empowered is ultimately about organisations tapping into an undervalued, underplayed reserve of talent. It’s sharp HR. This is not just about fixing a problem for women in India Inc but essentially about upping the game for India Inc itself.
Date:02-03-23
Net-zero, At What Cost?Prodipto Ghosh, [ The writer is distinguished fellow, The Energy and Resources Institute (Teri) ]
India has set its net-zero target at 2070. Such a target is well beyond any reasonable contribution to greenhouse gas (GHG) mitigation India may be expected to make. Given that it’s been announced, however, India’s dharma would demand it accomplishes it. Nevertheless, national policymakers have to consider whether this target is economically feasible.
The Energy and Resources Institute (Teri), Vivekananda International Foundation (VIF) in association with IIT Bombay (IITB), and McKinsey Global Institute recently looked at this question through quantitative modelling. Teri and McKinsey looked at a timeframe of 2050, and VIF-IITB at 2070.
Teri’s internal study made the critical assumption that the social discount rate is zero. It employed the engineering-economic MARKAL (market allocation) model. This mimics a central planner tasked with finding a mix of energy supply and demand technologies that would meet the energy requirements of all final demand commodities in the economy at least energy system cost over a specified planning horizon.
It assumed that GDP growth rates would be at 6.37% (2020-25), gradually falling to 3.5% (2045-50). Different technologies for GHG mitigation would reach commercialisation at different times and introduction into the system. The result was startling. The incremental (undiscounted) investment to reach near net-zero would total $113 trillion over the period. India’s current GDP is about $3 trillion.
The VIF/IITB study employs a different model, TIMES – The Integrated MARKAL-EFOM (Energy Flow Optimisation Model) 1 System – that also assumes a central planner who minimises the energy system cost to meet final demands of commodities in the economy. This model includes an hourly profile of energy demand, and the choice of energy technology at each time slice given various engineering constraints. It also permits the modeller to simulate scenarios with different mixes of technologies, and different GHG peaking years.
Crucially, the study assumes a social discount rate of 9%. No explicit GDP growth rates over 2020-70 were assumed. Instead, the energy demand in 2070 was estimated by considering the historical trends in increase in energy demand, decline in energy intensity of the economy, and the technical maximum share of electricity in the energy mix. The least-cost power generation mix in 2070, with emissions peaking in 2050, is 5% renewables and 95% nuclear. This is a very different proposition from the current focus on solar.
The energy system cost of the transition is $11.2 trillion, and the incremental investment cost is $6 trillion. These are discounted costs. Therein lies the key reason for the order of magnitude difference from the Teri results, apart from different target years.
The McKinsey study employs proprietary modelling tools that have varying levels of detail for different sectors. Power, transport, agriculture, steel and cement are modelled in detail, while buildings, waste and industrial sectors such as aluminium and ammonia are less finely grained. These models do not optimise energy system costs or GDP growth, but assume continued GDP and sectoral growth rates. Their internal structures are not open to review by other researchers. Whether the costs are discounted or not is unclear. Given these unknowns, the results of this study are not comparable with the other two.
The study considers two scenarios:
Line-of-sight (LoS) scenario, in which existing decarbonisation policies with assumptions about when new technologies would be deployed. Incremental investment cost till 2050 is $7.2 trillion.
Accelerated scenario (AS), involving aggressive policies, including carbon pricing. Incremental investment cost is $12.1 trillion.
What are policymakers to make of these model results?
If a policymaker today were to decide on a decarbonisation policy till 2070, she would likely discount future costs. But if policymakers at different times were to decide on decarbonisation options in their own times, they would not discount costs. One cannot meet capex or operation and maintenance (O&M) costs with discounted rupees or dollars. One must find real money.
Undiscounted, the incremental capex costs are likely of the same order as the total domestic savings over the period. If the capex for decarbonisation were to come from domestic savings alone, this would mean there could be very little fresh investment on productive capital, let alone on social infrastructure. Growth would come to a full stop.
Alternatively, most of the incremental capex could come from external sources. But large-scale inflows of forex would result in appreciation of the rupee, leading to shrinkage of exports and expansion of imports – so, increased unemployment, and possibly reduction of GDP growth. Rupee appreciation could be mitigated, but only by increasing public debt.
External sources of commercial finance are not cheap. There are mark-ups to the interest rate due to perceived country and exchange rate risks. So, reliance on commercial external finance may have the result of raising energy costs, reducing national competitiveness.
Whoever said public policymaking is easy?
Date:02-03-23
A message for maturityGovernors and Chief Ministers should respect constitutional boundariesEditorial
Constitutional functionaries cannot let rancour prevail over propriety. This is the substance and import of the Supreme Court’s advice to the Governor and Chief Minister of Punjab that they should display mature statesmanship in handling their differences. Governor Banwarilal Purohit was indeed way out of line when he indicated that he would act on the Cabinet advice to convene the Budget session of the Punjab Assembly only after he obtained legal advice on the Chief Minister, Bhagwant Mann’s response to some of his earlier queries. This stand forced the Aam Aadmi Party (AAP) government to approach the Court against the apparent refusal to call the Assembly session. However, the matter was resolved without judicial intervention, as the Court was informed that the Governor had summoned the House to meet as scheduled on March 3. The position regarding the Governor’s power to summon the House under Article 174 of the Constitution is now well-known. Even though it says the Governor shall summon the House from time to time “to meet at such time and place as he thinks fit”, a Constitution Bench had, in Nabam Rebia (2016), ruled that the Governor can summon, prorogue and dissolve the House only on the aid and advice of the Council of Ministers. It is hardly likely that Mr. Purohit was unaware of this, but he must have taken such a position because of the state of relations between Raj Bhavan and the Chief Minister’s office.
The Court’s observations covered Mr. Mann’s questionable position too. In response to the Governor questioning the sending of some school principals to Singapore for training, he had replied that he was responsible only to the people of Punjab and not to a Governor appointed by the Centre. He was obviously wrong, as it is laid down in Article 167 that it is the Chief Minister’s duty “to furnish such information relating to the administration of the affairs of the State and proposals for legislation as the Governor may call for…”. It is unfortunate that such instances of one-upmanship between Governors and Chief Ministers are becoming more frequent in various States. Both should be mindful of constitutional boundaries. Some Governors seem to believe that they can stretch their discretion to areas not specifically mentioned in the Constitution. The more germane reason for this is that incumbents in Raj Bhavan tend to take their role as the eyes and ears of the Union government too literally, and often get into the political domain. While they can indeed guide, caution or advise, they sometimes play the role of commentator, critic and even the opposition. This does not augur well for constitutional governance.
Date:02-03-23
नगर नियोजनसंपादकीय
प्रधानमंत्री ने शहरी नियोजन, विकास और स्वच्छता पर एक वेबिनार को संबोधित करते हुए यह सही कहा कि तेजी से शहरीकरण के साथ भविष्य के बुनियादी ढांचे का निर्माण करना महत्वपूर्ण है। अच्छा हो कि इसकी महत्ता को शहरों का नियोजन करने वाले भी समझें, क्योंकि हमारे शहर अनियेजित विकास का पर्याय बन गए हैं। शायद इसी कारण प्रधानमंत्री को यह कहना पड़ा कि शहरों का खराब नियोजन और योजना बनाने के बाद उस पर सही ढंग से अमल न करना हमारी विकास यात्रा के सामने बड़ी चुनौतियां पैदा कर सकता है। सच तो यह है कि खराब नियोजन ने पहले ही तमाम चुनौतियां पैदा कर दी हैं। इन्हीं चुनौतियों के कारण देश के छोटे-बड़े शहर गंभीर समस्याओं से जूझ रहे हैं। हमारे शहर कुल मिलाकर गंदगी, प्रदूषण, अतिक्रमण और अनियोजित विकास से उपजी अन्य समस्याओं से बुरी तरह जूझ रहे हैं। जो शहर जितना बड़ा है, वहां अनियोजित कालोनियों और झुग्गी बस्तियों की उतनी ही अधिक संख्या है। आम तौर पर ये कालोनियां और बस्तियां सरकारी जमीन पर अवैध कब्जा करके बसाई गई हैं। राज्य सरकारों और नगर निकायों में अवैध तरीके से बसाई गईं बस्तियों को खत्म करके उन्हें नियोजित तरीके से बसाने की इच्छाशक्ति ही नहीं दिखाई देती। इसी कारण जब-तब आधे-अधूरे मन से सरकारी जमीनों से अवैध कब्जे हटाने की कार्रवाई होती है। अधिकांशतः यह कार्रवाई किसी ठोस नतीजे पर पहुंचने के पहले ही खत्म हो जाती है।
सभी इससे परिचित हैं कि आज के युग में शहर आर्थिक विकास के इंजन हैं, लेकिन उन्हें संवारने का काम न तो राज्य सरकारों की प्राथमिकता में दिखाई देता है और न ही उनके नगर निकायों के एजेंडे में। नए शहरों के विकास में तो तब भी बेहतर नगर नियोजन की इच्छा दिखाई देती है, लेकिन पुराने शहरों में पुरानी व्यवस्थाओं का समुचित आधुनिकीकरण किसी के एजेंडे में नजर नहीं आता। यह ठीक है कि इस वर्ष के आम बजट में शहरी विकास को महत्व दिया गया है और कई ऐसी योजनाएं लाई गई हैं, जिनसे शहरों की सूरत निखारी जा सकती है, लेकिन बात तो तब बनेगी, जब राज्य सरकारें इन योजनाओं का लाभ उठाने के लिए सक्रिय होंगी। कहने को तो शहरीकरण के मामले में हर तरह की योजनाएं बनी हुई हैं, लेकिन आम तौर पर वे कागजों तक ही सीमित हैं। शहरीकरण की योजनाओं पर मुश्किल से ही अमल होता है। आम तौर पर अमल के नाम पर खानापूरी ही अधिक की जाती है। नगर निकायों की कार्यशैली को देखकर इस नतीजे पर नहीं पहुंचा जा सकता कि वे शहरों को संवारने के लिए प्रतिबद्ध हैं। शहर जिस तरह समस्याओं से घिरते चले जा रहे हैं, उन्हें देखते हुए यह कहना कठिन है कि वे नगरीय जीवन को सुविधासंपन्न बनाने और देश की अर्थव्यवस्था में योगदान देने के लिए तत्पर हैं।
Date:02-03-23
शिकायत का हकसंपादकीय
आधुनिक तकनीकी के विस्तार के साथ अब इसमें कोई दो राय नहीं है कि आने वाले वक्त में कामकाज से लेकर बहुत सारी दूसरे क्षेत्रों में डिजिटल निर्भरता बढ़ने वाली है। खासतौर पर सूचना और संचार के संदर्भ में इंटरनेट तक लोगों की बढ़ती पहुंच ने दुनिया के दायरे को छोटा बनाया है और इसी मुताबिक विचारों की अभिव्यक्ति के नए फलक भी खोले हैं। सोशल मीडिया के अलग-अलग मंच और उनके उपयोगकर्ताओं की तादाद में लगातार बढ़ोतरी से यह पता चलता है कि ज्ञान अर्जित करने से लेकर विचारों को जाहिर करने तक के लिए नए दरवाजे तो खुले हैं, मगर इसके साथ ही कई स्तरों पर जिम्मेदारी की भी जरूरत महसूस की जाने लगी है। दरअसल, सोशल मीडिया के मंचों ने अपने उपयोगकर्ताओं को अपने विचार जाहिर करने से लेकर अन्य गतिविधियों के लिए जगह तो मुहैया कराई है। लेकिन किसी अवांछित परिस्थिति के पैदा होने पर इसके लिए जिम्मेदारियों के निर्धारण की प्रक्रिया अब तक ठोस शक्ल नहीं ले सकी है। निश्चित तौर पर कुछ उपयोगकर्ता इसका बेजा इस्तेमाल करते हैं और ऐसे लोगों के खिलाफ शिकायत आने पर संबंधित सोशल मीडिया के नियंत्रक अपने स्तर पर निपटते भी हैं। लेकिन अगर शिकायत के कठघरे में खुद कोई सोशल मीडिया का मंच हो, तो ऐसी समस्या के हल के लिए भी एक तंत्र की जरूरत महसूस की जाती रही है।
इसी के मद्देनजर मंगलवार को सरकार की ओर से एक शिकायत अपीलीय समिति की शुरुआत की गई, जो सोशल मीडिया मंचों के फैसलों के खिलाफ उपयोगकर्ताओं की अपीलों पर गौर करेगी। उम्मीद की जा रही है कि इस समिति के जरिए उपयोगकर्ताओं के प्रति डिजिटल मंचों की जवाबदेही सुनिश्चित करने में मदद मिलेगी। यह एक ऐसी आनलाइन समाधान प्रणाली है, जिसमें मेटा यानी फेसबुक या ट्विटर जैसे मध्यस्थ मंचों के शिकायत अधिकारी के फैसले से पीड़ित कोई उपयोगकर्ता इससे संबंधित शिकायत दर्ज करा सकता है। सरकार की ओर से इसका मकसद यह बताया गया है कि शिकायत समाधान प्रणाली लोगों के प्रति जवाबदेह हो। यह सही है कि सोशल मीडिया के मंचों पर किसी फर्जी नाम वाले खाते से या फिर इसी तरह के अन्य स्रोतों का सहारा लेकर कई बार अवांछित हरकतें या गतिविधियां की जाती हैं। अगर इसके खिलाफ संबंधित मंचों के कार्यालयों में शिकायत भेजी जाती है तो वहां से जरूरी कार्रवाई होती है। लेकिन ऐसा भी देखा गया है कि कई बार सोशल मीडिया का कोई मंच खुद मनमाने फैसले लेने के आरोपों के कठघरे में खड़ा होता है। ऐसी स्थिति में अब उपयोगकर्ता के पास एक तंत्र है, जहां वह किसी सोशल मीडिया मंच के फैसले पर शिकायत दर्ज करा सकता है।
डिजिटल दुनिया में एक ओर जहां बेहद उपयोगी विचार, बहसें और अन्य सामग्रियों से लोग रूबरू हो रहे हैं, वहीं इसकी उपयोगिता का फायदा उठाने वाले कुछ लोगों की वजह से बहुस्तरीय परेशानियां भी खड़ी हो रही हैं। दूसरी ओर, इंटरनेट मध्यवर्ती कंपनियों की ओर से भी बड़ी संख्या में उपयोगकर्ताओं की शिकायतों को अनसुना किए जाने या फिर असंतोषजनक समाधान देने के मामले भी सामने आ रहे थे। जाहिर है, ऐसे में जिस इंटरनेट को ज्ञान और सुविधा के नए आकाश के तौर पर देखा जाता है, उसमें यह एक तरह से बाधक तत्त्व के रूप में काम करता है। इसलिए इंटरनेट को मुक्त, सुरक्षित, विश्वसनीय और जवाबदेह बनाने के मकसद से की गई ताजा पहल बेहद अहम है। मगर यह भी ध्यान रखने की जरूरत होगी कि कोई भी नई व्यवस्था नागरिकों की अभिव्यक्ति और स्वतंत्रता के समांतर उन पर निगरानी और अंकुश का जरिया न बने।
Date:02-03-23
मानव अंगों की बढ़ती जरुरतप्रमोद भार्गव
अंग प्रत्यारोपण की प्रक्रिया को सरल और सुलभ बनाने के लिए भारत सरकार ‘एक राष्ट्र-एक नीति’ लागू करने जा रही है। अब अंगदान और उसका प्रत्यारोपण देश के किसी भी अस्पताल में कराया जा सकता है। भारत सरकार ने मूल निवासी प्रमाणपत्र की बाध्यता को हटाते हुए आयु सीमा की बाध्यता भी खत्म कर दी है। अंग प्राप्त करने के लिए अब जरूरतमंद रोगी किसी भी राज्य में पंजीकरण करा सकते हैं। पंजीकरण के लिए अब मरीजों से कोई शुल्क भी नहीं लिया जाएगा। मालूम हो कि तेलंगाना, महाराष्ट्र, गुजरात और केरल जैसे राज्य अंगदान के पंजीकरण के बहाने पांच हजार से दस हजार रुपए के बीच शुल्क ले रहे थे। बीते दस सालों में अंग प्रत्यारोपण की मांग बढ़ी है, लेकिन उपलब्धता कम है। हालांकि 2022 में पंद्रह हजार से ज्यादा अंगों का प्रत्यारोपण हुआ है। केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के मुताबिक, अंग प्रत्यारोपण में सालाना सत्ताईस फीसद की दर से वृद्धि हो रही है। लिहाजा मांग के अनुपात में पूर्ति नहीं हो पा रही है। इसके मद्देनजर अब स्तंभ कोशिकाओं के जरिए अंगों का उत्पादन बढ़ाने की जरूरत है।
भारत में अंगों की अनुपलब्धता के कारण हर साल पांच लाख लोगों की मौत हो जाती है। दो लाख लोग यकृत, पचास हजार लोग हृदय और डेढ़ लाख लोग गुर्दा संबंधी बीमारियों से हर साल मरते हैं। हालांकि गुर्दा प्रत्यारोपण के लिए कई लोग अपना गुर्दा दान देने लगे हैं। लेकिन पूरे साल में पांच हजार रोगियों को ही गुर्दा दान में मिल पाते हैं। इनमें नब्बे फीसद गुर्दे महिलाओं के या निकटतम परिजनों के होते हैं। ऐसे में अंगों का कृत्रिम तरीके से उत्पादन जरूरी है।
मानव त्वचा की महज एक स्तंभ कोशिका (स्टेम सेल) को विकसित कर कई तरह के रोगों के उपचार की संभावनाएं उजागर हो गई हैं। स्तंभ कोशिका मानव शरीर के क्षय हो चुके अंग पर प्रत्यारोपित करने से अंग विकसित होने लगता है। करीब दस लाख स्तंभ कोशिकाओं का एक समूह सुई की एक नोक के बराबर होता है। ऐसी चमत्कारी उपलब्धियों के बावजूद समूचा चिकित्सा समुदाय इस प्रणाली को रामबाण नहीं मानता। शारीरिक अंगों के प्राकृतिक रूप से क्षरण या दुर्घटना में नष्ट होने के बाद जैविक प्रक्रिया से सुधार लाने की प्रणाली में अभी और सुधार की जरूरत है। इधर, वंशानुगत रोगों को दूर करने के लिए स्त्री की गर्भनाल से प्राप्त स्तंभ कोशिकाओं का भी दवा के रूप में इस्तेमाल शुरू हुआ है। इसके लिए गर्भनाल रक्त बैंक भी भारत समेत दुनिया में वजूद में आते जा रहे हैं। इसमें प्रसव के तत्काल बाद गर्भनाल काटने के बाद अगर इससे प्राप्त स्तंभ कोशिकाओं का सरंक्षण कर लिया जाए तो इनसे परिवार के सदस्यों का दो दशक बाद भी उपचार संभव है। गर्भनाल से निकले रक्त को शीत अवस्था में इक्कीस साल तक सुरक्षित रखा जा सकता है। लेकिन इस बैंक में रखने का शुल्क कम से कम एक-डेढ़ लाख रुपए है। ऐसे में यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि गरीब लोग इन बैंकों का इस्तेमाल कर पाएंगे? सरकारी स्तर पर अभी इन बैंकों को खोले जाने का सिलसिला शुरू ही नहीं हुआ है। निजी अस्पतालों में इन बैंकों की शुरुआत हो गई है और पचहत्तर से ज्यादा बैंक कोशिकाओं के संरक्षण में लगे हैं। इस पद्धति से जिगर, गुर्दा, हृदय रोग, मधुमेह, कुष्ठ और स्नायु जैसे वंशानुगत रोगों का इलाज संभव है।
महिलाओं के मासिक धर्म के दौरान निकलने वाले रक्त में जीवन को निरोगी और दीर्घायु बनाने की क्षमता पाई गई है। नए शोधों से पता चला है कि इस रक्त में स्तंभ कोशिकाएं प्रचुर मात्रा में होती हैं, जिनका उपयोग अनेक बीमारियों के उपचार में किया जा सकता है। मुंबई में इन कोशिकाओं के संरक्षण की दृष्टि से ‘मेंस्ट्रूअल स्टेम सेल’ बैंक भी शुरू हो चुका है। शोधों से पता चला है कि रजस्वला स्त्री के रक्त से मिलने वाली स्तंभ कोशिकाओं में सफलता की संभावना अस्थि मज्जा से निकाली गई कोशिकाओं की बनिस्बत सौ गुना अधिक होती है। इनके संग्रह के लिए चिकित्सा विशेषज्ञ की भी जरूरत नहीं होती। महिलाएं माहवारी के समय एक किट में रक्त को एकत्रित करके किट बैंक में जमा करा सकती हैं। भारत में गर्भाशय का प्रत्यारोपण भी शुरू हो गया है। पुणे में एक महिला ने अपनी मां के गर्भाशय का प्रत्यारोपण कराकर बच्ची को जन्म दिया है। रियो डि जेनेरियो में तो एक मृत महिला के गर्भाशय के प्रत्यारोपण से बत्तीस वर्षीय एक महिला ने स्वस्थ बच्ची को जन्म दिया है। महिलाओं की इस विलक्षणता को विज्ञान की दुनिया में चमत्कार माना जा रहा है।
लेकिन स्तंभ कोशिकाओं से उपचार की ये प्रणालियां अभी शैशव अवस्था में हैं। उपचार भी महंगा है। इस कारण जिगर और गुर्दे की बीमारियों में प्रत्यारोपण की सबसे ज्यादा मांग है। इसकी आपूर्ति के लिए सरकार की कोशिश है कि दिमागी तौर पर मृत लोगों से अंग प्राप्त किए जाएं। यह प्रत्यारोपण के लिए अंगों की आपूर्ति का सबसे अच्छा माध्यम है जिसे लोगों में जागरूकता पैदा करके पूरा किया जा सकता है। देश में हर साल पचास हजार लोग हृदय प्रत्यारोपण के इंतजार में रहते हैं। इनमें से महज दस-पंद्रह लोगों का ही हृदय प्रत्यारोपण हो पाता है। देश में अंग प्रत्यारोपण के जरूरतमंद लोगों की संख्या लगातार बढ़ रही है। लेकिन अंगदाता उस अनुपात में नहीं मिल रहे हैं।
देश में 640 चिकित्सा महाविद्यालय और अस्पताल ऐसे हैं, जिनमें अंग प्रत्यारोपण और स्तंभ कोशिका से उत्पादन का काम किया जा सकता है। इनमें अंग प्रत्यारोपण व उत्सर्जन के पाठ्यक्रम भी नवीन चिकित्सा शिक्षा में जोड़ दिए गए हैं। इसके बावजूद चंद चिकित्सा संस्थानों में ही अंग प्रत्यारोपण व उत्सर्जन की शल्य क्रिया सुविधा उपलब्ध है। इसलिए फिलहाल अंग प्रत्यारोपण के लिए सबसे कारगर पद्धति अंगदान ही है। इसकी आपूर्ति तीन प्रकार से की जा सकती है। पहला, कोई भी इंसान जीवित रहते हुए अपना गुर्दा या जिगर दान कर दे। दूसरे, किसी व्यक्ति के दिमागी रूप से मृत हो जाने पर उसके परिजनों की अनुमति से अंगदान कराया जाए। लेकिन इसमें अंगदान करने की समयसीमा होती है। समय रहते मृत व्यक्ति के अंग निकाल लिए जाएं, इसमें परिवार की इजाजत कानूनन जरूरी है। अगर जागरूकता से ऐसा संभव हो जाता है तो नब्बे फीसद महिलाओं को अपने गुर्दे दान करने की जरूरत नहीं पड़ेगी और अंगदान से संबंधित लैंगिक असमानता कालांतर में दूर होती चली जाएगी।
अहमदाबाद के प्रतिष्ठित गुर्दा अस्पताल के अंगदान से जुड़े एक अध्ययन में महिलाओं के प्रति लैंगिक असमानता का खुलासा हुआ है। महिलाएं अंग प्रत्यारोपण में पुरुषों से बहुत आगे हैं, लेकिन जब उन्हें अंगों की जरूरत पड़ती है तो नहीं मिल पाते। ‘द ट्रांसप्लांट सोसाइटी’ की अट्ठाइसवीं अंतरराष्ट्रीय कांग्रेस में पेश आंकड़ों से साफ हुआ है कि पुरुषों को गुर्दा दान करने में नब्बे फीसद उनकी पत्नियां होती हैं। अंगदान में महिलाओं का फीसद उनहत्तर है, जबकि पुरुषों का सिर्फ पच्चीस। वहीं 74.2 फीसद महिलाएं परिजनों को अंगदान करती हैं, लेकिन उन्हें महज 21.8 फीसद अंग दान में मिल पाते हैं। सत्तर प्रतिशत माताएं बच्चों को अंगदान करती हैं, जबकि तीस फीसद पिता ऐसा करते हैं। पचहत्तर फीसद दादी पोते-पोतियों के लिए अंगदान करती हैं, जबकि दादा पच्चीस फीसद ही करते हैं। यानी लैंगिक भेद यहां भी बरकरार हैं।
हालांकि बीते दस सालों में अंग प्रत्यारोपण की संख्या बढ़ी है। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार अंग प्रत्यारोपण की कुल संख्या 2013 में 4,990 से बढ़कर 2022 में 15,561 हो गई है। लेकिन साफ है कि अंग प्रत्यारोपण की जरूरत की पूर्ति अंगों के उत्पादन से ही संभव हो पाएगी। लिहाजा, इस जैव तकनीक को बढ़ावा देने की आवश्यकता है।
Date:02-03-23
इस्तीफों से संदेशसंपादकीय
भ्रष्टाचार के आरोप में गिरफ्तार दिल्ली के उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया और नौ महीने से बिना विभाग के मंत्री सत्येंद्र जैन ने मंगलवार को इस्तीफा दे दिया। सिसोदिया को आबकारी मामले में सीबीआई ने रविवार को गिरफ्तार कर लिया था‚ जबकि जैन मनी लॉन्ड्रिंग मामले में पिछले साल मई से तिहाड़ जेल में बंद हैं। सिसोदिया पर नईशराब नीति (फिलहाल वापस हो चुकी है) में कथित अनियमितता बरतने का आरोप है। दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के सबसे करीबी सिसोदिया के पास दिल्ली के कुल 33 विभागों में वित्त‚ गृह‚ शिक्षा समेत 18 विभाग थे वहीं जैन के पास गिरफ्तारी से पहले स्वास्थ्य‚ उद्योग समेत 7 मंत्रालय थे। केजरीवाल ने दोनों के इस्तीफे स्वीकार कर लिए हैं। विपक्ष जैन के इस्तीफे की मांग उनकी गिरफ्तारी के बाद से ही कर रहा था‚ जबकि सिसोदिया की गिरफ्तारी के बाद उनके सीबीआई की रिमांड़ पर लिए जाने के बाद से इस्तीफे का दबाव भी मुख्यमंत्री पर पड़़ने लगा। दरअसल‚ मंगलवार को उस समय घटनाक्रम बड़़ी तेजी से बदला जब अपनी गिरफ्तारी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचे सिसोदिया को निराशा हाथ लगी। प्रधान न्यायाधीश ड़ीवाई चंद्रचूड़ और जस्टिस पीएस नरसिम्हा की पीठ ने सिसोदिया की जमानत याचिका को यह कहते हुएसुनने से इनकार कर दिया कि सिर्फ इसलिए कि घटना दिल्ली में हुई है‚ आप सीधे–सीधे शीर्ष अदालत नहीं आ सकते जबकि आपके पास संबंधित निचली अदालत के साथ–साथ दिल्ली उच्च न्यायालय के पास जाने के भी उपाय हैं। हालांकि इन इस्तीफों को विपक्ष अपने दबाव का परिणाम बता रहा है‚ लेकिन आम आदमी पार्टी का कहना है कि दोनों के पास अहम विभाग थे‚ और जनता के काम प्रभावित न हों‚ इसलिए इस्तीफे हुए हैं। बहरहाल‚ इन इस्तीफों से इतना तो साफ है कि नैतिकता या राजनीतिक शुचिता नहीं थी‚ बल्कि मात्र इसलिए इस्तीफे दिए गए हैं ताकि सरकार के कामकाज सहज–सुचारु बने रहें। हालांकि विपक्षी कह रहे हैं कि मुख्यमंत्री घबरा गए हैं‚ और अपने मंत्रियों के इस्तीफों के जरिए उन्होंने राजनीतिक चाल चली है। मुख्यमंत्री के घबराने की बात पर वे खुलासा करते हैं कि शक की सुई मुख्यमंत्री केजरीवाल की तरफ बढ़ रही है। राजनीति में आरोप–प्रत्यारोप नईबात नहीं है‚ बल्कि रिवायत जैसा उपक्रम है। जरूरी है कि आरोपों से पाक–साफ होने तक आरोपी अपने संवैधानिक पद और जिम्मेदारियों से दूर रहे। राजनीतिक शुचिता और नैतिकता की भी यही दरकार है।
Date:02-03-23
गरमी ने किया बेहालसंपादकीय
प्रकृति लंबे समय से इशारे दे रही है। रह–रहकर दुनिया के किसी न किसी भाग में बाढ़‚ भूकंप या तूफानों के जरिए होने वाली क्षति के जरिए दुष्परिणामों को दिखा भी रही है‚ लेकिन विड़म्बना है कि दुनिया भर में इन संकेतों की ओर से आंखें मूंदी जा रही हैं जो भविष्य के लिए बर्बादी का निमंत्रण है। इस बार गर्मी ने फरवरी में ही चिंतित कर देने वाला रिकॉर्ड बना दिया। यह महीना पिछले 146 सालों के दौरान या कहें कि 1877 के बाद से अब तक का सबसे गर्म फरवरी का महीना रहा। यह मौसम का सामान्य बदलाव नहीं है‚ जिसे होते हुए देखते रहा जा सके। इसका मतलब है कि इस साल मार्च के महीने से ही जबर्दस्त गर्मी‚ यहां तक कि लू का भी सामना करना पड़़ सकता है। केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने मामले की संवेदनशीलता को भांपते हुए तेजी से बढ़ते तापमान के मद्देनजर राज्य सरकारों को लू से बचाव के उपाय करने के निर्देश दिए हैं। राज्यों से कहा है कि वे स्थिति पर लगातार निगाह रखें और आम जनता को इससे बचाव के बारे में जागरूक करें। तापमान की प्रति दिन और साप्ताहिक रिपोर्ट जारी की जानी चाहिए और नियमित रूप से स्थिति की समीक्षा होनी चाहिए। आम जनता को भी लू से बचाव के उपाय सुझाए गए हैं। लगातार पानी पीने और गर्म हवाओं के सीधे प्रभाव से बचने की सलाह दी गई है। अस्पतालों में भी लू प्रभावित रोगियों के इलाज के लिए पर्याप्त प्रबंध करने के निर्देश दिए हैं। देश में कुछ स्थानों पर तापमान पहले ही असामान्य स्तर पर पहुंच गया है और साल के इस समय के लिए अपेक्षित सामान्य तापमान से काफी अधिक विचलन की सूचना भी कुछ राज्यों और जिलों से मिली है। सारी जिम्मेदारी सरकार की ही नहीं होती‚ आम लोगों के लिए भी अपनी सामान्य समझ से काम लेते हुए जरूरी है कि नींबू–पानी‚ दही‚ छाछ‚ लस्सी‚ नमक के साथ फलों का जूस पिएं‚ घर में हवादार और ठंड़े स्थान पर रहें। ताजे फलों जैसे तरबूज‚ ककड़ी‚ नींबू‚ संतरा आदि का खूब सेवन करें और हल्के रंग के पतले–ढीले सूत्री वस्त्र पहनें। बाहर नंगे पैर न निकलें। खुली धूप में जाते समय छाता‚ टोपी‚ तौलिया या किसी अन्य कपड़े से सिर को ढंककर रखें। बच्चों और पालतू जानवरों को खड़े वाहन में नहीं छोड़े क्योंकि वाहन के अंदर का तापमान खतरनाक साबित हो सकता है। वक्त सरकार के साथ सहयोग करने का है।
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भारत ने चाहे लिथियम के दो बड़े भंडारों की खोज कर ली हो, लेकिन प्रयोग करने योग्य रिजर्व के आकार का निर्धारण, खदान का विकास और लिथियम के उत्पादन में अभी समय लगेगा।
भारत सरकार को एक महत्वपूर्ण खनिज रणनीति विकसित करनी चाहिए, जो जरूरतों का आकलन करे, आपूर्ति सुरक्षित करे, कुशल निष्कर्षण के लिए प्रौद्योगिकियों का विकास कर सके।
‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 13 फरवरी, 2023
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Date:01-03-23
‘Corruption primarily involves selfish exercise of powers…aided by opaque systems’Secretary, CVC writes on GoI’s transparency measures. G20 anti-corruption working group meets todayP Daniel
Corruption directly vitiates the relationship of the citizen with the state. Post-Independence, measures to remove corruption assumed great significance in India as the state evolved.
A major financial irregularity in a public sector company in 1957 triggered a debate in Parliament and led to the formation of a committee on the prevention of corruption, popularly called the Santhanam Committee with member of Parliament K Santhanam as chair.
In its report, the committee observed that corruption stemmed from a few broad categories. One, administrative delays; two, government arrogating to itself more than what it could handle by way of regulatory functions; three, the scope for individual discretion in the exercise of powers vested in state officials; and finally, cumbersome procedures to deal with issues that impact citizens on a day-to-day basis.
The committee also recognised that “it is also essential to evolve or apply common standard in matters relating to prosecution, departmental action and the award of punishment” and felt “that the time has come to put the entire Vigilance Organisation on a proper and adequate basis”. Accordingly, it recommended the creation of the institution of Central Vigilance Commission (CVC) to oversee and monitor vigilance administration of various central government organisations.
Framework to fight graft
GoI accepted the recommendation and notified in a resolution dated February 11, 1964, the creation of CVC, the first step towards establishing an effective vigilance administration mechanism for the country. Statutory status was conferred on the commission through the Central Vigilance Commission Act of 2003.
India’s federal constitutional structure ensurescentral and state governments have well-defined division of powers, functions and authority. Lokayukta, state vigilance commissions, anti-corruption bureaus are some state-level agencies to combat graft. At the Centre, CVC aside, the Central Bureau of Investigation, Enforcement Directorate, Serious Fraud Investigation Office, Comptroller and Auditor General and Lokpal are mandated to nurture accountability and probity in public life.
Using tech to curb corruption
Corruption primarily involves selfish exercise of powers, which operates in shadows, aided by opaque systems. Transparency is key to breaking this shadowy nexus and forms the basis for effective vigilance mechanism.
Since transparency and accountability in governance systems significantly reduce corruption in public life, the commission has shifted focus to preventive aspects of vigilance administration. Simplification of processes, identifying and implementing systemic improvement measures and removing discretionary powers, alongside transparency in service delivery mechanisms, are key preventive vigilance measures the commission emphasises.
Increased use of technology in the online railwayticket reservation system, online processing and payment of income tax refunds, online payment of property tax are among initiatives that have led to increased transparency and a reduction in the scope for discretion at the individual level.
Citizens’ participation is essential
Combating corruption is not merely a matter of making laws and creating institutions but is deeply rooted in human values and individual morals. The fight against corruption cannot be won without citizens’ support, participation and their active vigilance. Public participation is therefore essential to promote good governance and integrity, and to control corruption.
To ensure public participation, the commission has developed a complaint management system and a separate whistleblower mechanism for grievances against public servants. Complaints can be lodged on a portal (portal. cvc. gov. in) or in written communication. Naturally, the commission guarantees the complainant’s identity remains confidential via the whistleblower mechanism (Public Interest Disclosure and Protection of Informers Resolution).
To promote the idea of probity in public life, an integrity pledge has been designed for citizens and organisations. Here, citizens commit to uphold highest standards of probity and rule of law in all walks of life. The pledge can be accessed at pledge. cvc. nic. in
A vigilance awareness week, held every year since 2000, provides opportunity for the public to help eliminate corruption.
The G20 anti-corruption working group formed in 2010 has focussed on integrity and transparency in public and private sectors, capacity building, collections of best practices, and development and implementation of national anti-graft strategies. Through information and communications technologies, it has promoted public sector integrity. Given the focus areas, India’s framework to fight corruption is in sync with global practices.
Date:01-03-23
Unending ordealReligious polarisation can be reversed through democratic processes.Editorial
The death of Kashmiri Pandit and bank guard Sanjay Sharma at the hands of terrorist gunmen in Pulwama is yet another murder in a series of attacks on the minority community in the Valley. Sharma is the second Pandit to fall to terrorism in the Pulwama area after Janki Nath’s death in 1990 at the peak of militancy. While the murder could be a deliberate ploy by terrorists to strike fear into the minority community in the area, it also signals the failure of security agencies to adequately protect the poor residents. The modus operandi of the radical elements who are targeting civilians has always been clear — the attacks are meant to invite state retaliation and repression, in turn fomenting discontent and disaffection to garner more recruits to the cause. On Tuesday, after follow-up operations that resulted in the death of an Army jawan and two militants, security forces have asserted that Sharma’s attacker has now been slain. But this does little to mitigate the fear that has gripped Pandits in the Valley and Pulwama in particular. Last year, militant attacks resulted in the deaths of 29 civilians including three local Pandits, three other Hindus and eight non-local labourers and also caused the migration of 5,500 Pandit employees from the Valley.
All political parties including the separatists such as Hurriyat Conference, besides civil society organisations have condemned the attacks, but the repeated and brazen nature of the killings, at one level, point to a breakdown of relations between the administration and the citizenry, leading to the inability of the administration to anticipate and prevent such attacks. The fact that areas that were relatively safe for the minority community even during the peak of militancy have now become unsafe suggests that the administration must rethink its security-centric policies in the Valley. The Union Territory administration and the Union government have claimed that hard-edged moves such as the dilution of Article 370 and bifurcating the State in 2019 have helped curb militancy and were necessary to bring back normalcy in the Valley. But the repeated attacks on the minority community suggest otherwise — radical sections have sought to utilise the disaffection in the Valley to foment polarisation. Only an effective government by elected representatives of the people of the Valley can do more to rebuild trust between the administration and the citizenry. This will help isolate the radical sections and ease the workload of the security forces in Kashmir. Restoring statehood to Jammu and Kashmir and working towards the conduct of Assembly elections are now a clear imperative.
Date:01-03-23
India’s democracy, diminished and decliningThe truth about the nation’s state of democracy has taken the sheen away from what is otherwise an impressive story.Ashwani Kumar is Senior Advocate and a former Union Minister for Law and Justice.
The captivating Republic Day parade in January this year showcased the nation’s soft and hard power, sending out a message to the world of India’s arrival on the global scene. President Droupadi Murmu’s customary address to the Houses of Parliament during the Budget session, again in January, unfolded the government’s ambitious agenda and a shared national aspiration to join the ranks of the developed nations in the near future. But the truth about India’s declining democracy has taken the sheen away from an otherwise impressive story of the nation’s significant accomplishments.
An erosion of engagement
Recurring reports about constitutional transgressions interrogate the depth and the quality of our democratic engagement. In recent days, the expunging of parliamentary statements of Opposition leaders, which is questionable, the disruption of the Prime Minister’s speech in the Rajya Sabha, the disproportionate penalty of suspension imposed on an Opposition MP for recording the proceedings of the House, and exceptions apart, the nauseating puerilities of the people’s representatives, have denuded Parliament of its institutional sanctity. The suicide of an 18-year-old Dalit student in one of the country’s premier educational institutions because of ‘unbearable distress’ (allegedly on account of caste discrimination) and a 16-year-old Dalit student being beaten up by his principal as the boy is said to have drank water from the principal’s water bottle, are painful reminders of the persistence of historical and social inequities.
The conviction and the sentencing by a court in Uttar Pradesh of a sitting Member of the Legislative Assembly (Opposition party) for a two-year jail term in a 15-year-old case for blocking a road is perverse, considering the disproportionality of the sentence and its resultant consequence of depriving an elected member of his seat in the State Assembly. The oppressive reality of prosecutorial processes is writ large. As the wheels of justice grind on, careers are destroyed, reputations ruined and souls scarred in an unending saga of irremediable humiliation. Despite the Constitution’s libertarian promise, the nation was aghast when the highest court of the land decided, at a special sitting on a court holiday, to suspend the bail of a disabled accused who has been charged with sedition. Such illustrations of institutional malaise point unmistakably to an eroded edifice of India’s constitutional democracy.
Deteriorating conversation
But nowhere is the democratic deficit more pronounced as in the quality of our political discourse. The profanities hurled by leaders at each other, the personal broadsides laced with denigrating sarcasm and hurtful innuendoes have coarsened the fabric of democratic politics. The political language of our times, steeped in hypocrisy and intense personal animosities reflects the narrowness of our politics and vitiates it, infracts the dignitarian promise of the Constitution, and is destructive of the broader social accord.
We know that language, culture, imagination and histories are united in a tight embrace. The elegance of the spoken word, not its decibel, adds weight to the cause and enables leaders to engage with the people on the defining challenges of the age. Our venerated founders espoused their lofty ideals in prose and verse invested with soaring idealism and emotion that galvanised the nation in pursuit of larger causes. Their language mediated between the heart and the head. Indeed, the strongest criticism of injustice and malgovernance, as also expressions of fervent hope for national renewal, is best reflected in the depth and the dignity of the medium. The language of democracy is one of accommodation anchored in moderated thought and rational persuasion. It is not about hurting sensitivities but respecting them and recognising that political adversaries are not personal enemies to be mocked and crushed. Democracy, after all, is not about a strong man imposing his will “over the wreckage of the universe”. It is premised on a search for the middle ground and rejection of extremes, an objective best sub-served through elegant communication. The spoken words and speeches of leaders provide the benchmark of democracy. The standing of our public figures is tested through their utterances, which also tell us who we are. Evidently, therefore, India’s diminished democracy can be resurrected only through an ennobling political discourse defined by civil conversation founded in reason and faith in the power of decency to make a difference.
The challenge
The celebration of the Republic cannot be complete as long as our politics remains limited by narrow partisan perspectives and is driven by those whose projected concern at pervasive injustices is largely suspect, given their obsession with a compulsive pursuit of power for its own sake. The foundations of the Republic are predicated on a just exercise of peoples’ power by ruling dispensations of the day and on the Opposition’s fearless pushback against the abuse of power. The challenge for those who aspire to lead the nation in the fullness of its glory in these momentous times, is to imagine and consolidate a political universe rooted in the collective assertion of our moral judgment that answers the call of good conscience.
Date:01-03-23
नाम बदलने को लेकर सुप्रीम कोर्ट की नसीहतसंपादकीय
हिंदू धर्म में धर्मान्धता का कोई स्थान नहीं है, वर्तमान को हम अतीत का कैदी नहीं बना सकते और देश की संस्कृति सबको समाहित करने की रही है। अपने एक फैसले में इन विचारों के साथ सुप्रीम कोर्ट ने आगाह किया है कि विभाजनकारी अवधारणाओं को जिंदा रखने की कोशिश न की जाए। कोर्ट की सख्ती इस बात से समझी जा सकती है कि याचिकाकर्ता ने जब अपनी याचिका वापस लेने की अनुमति चाही तो बेंच ने यह प्रार्थना भी खारिज कर दी। कोर्ट का कहना था कि इतिहास के तमाम विवादास्पद मुद्दों में से कुछ को निकालकर एक खास मकसद से कोर्ट आना गलत है। कोर्ट का यह ऑब्जर्वेशन आने वाले दिनों में अहम होगा क्योंकि सड़कों, जिलों, संस्थाओं और भवनों के पुराने नाम बदलना हाल में नया चलन हो गया है। कोर्ट का मानना था कि यह सच है कि विदेशी आक्रांताओं ने राज किया और अत्याचार भी किए, लेकिन इतिहास बदला नहीं जा सकता और जो सत्य है हमें उसके साथ ही जीना होगा, क्योंकि हिन्दू धर्म जीने की पद्धति है और इसे संकीर्ण नजरों से न देखें। भारत एक धर्मनिरपेक्ष देश है जो कानून के शासन, धर्मनिरपेक्षता और संवैधानिक मर्यादाओं से बंधा हुआ है और जिसके मूल में व्यक्ति की समानता का सिद्धांत है। बेंच के एक जज ने कहा कि वह ईसाई हैं लेकिन हिन्दू दर्शन और धर्म को उन्होंने गहराई से पढ़ा है। ‘हिन्दुइज्म’ का मेटाफिजिक्स (दर्शन) अनूठा है जिसकी झलक हमें केवल वेदों, उपनिषदों और महान गीता में ही मिलती है। बेंच ने यह भी कहा कि ऐसे मुद्दे लाकर कोर्ट को विघटन का हथियार बनाने की कोशिश न की जाए।
Date:01-03-23
प्रवासी भारतीयों की सफलता में भारत के लिए हैं सबकनीरज कौशल, ( कोलंबिया यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर )
विदेशों में बसे प्रवासी भारतीय- जिन्हें अब इंडियन डायस्पोरा के बजाय इंडियास्पोरा कहा जाने लगा है- तेजी से उभर रहे हैं। बहुत सम्भव है कि 2024 में अमेरिका में होने जा रहे राष्ट्रपति चुनाव दो भारतीय मूल की महिलाओं के बीच लड़े जाएं। निकी हेली यूएन में अमेरिका की राजदूत और साउथ कैरोलिना की गवर्नर रह चुकी हैं। पिछले हफ्ते उन्होंने प्रेसिडेंशियल कैम्पेन शुरू किया। उधर उपराष्ट्रपति कमला हैरिस अमेरिका के इस सबसे ताकतवर पद पर आसीन होने की कगार पर पहुंच चुकी हैं।
साल 2025 में कनाडा की न्यू डेमोक्रेटिक पार्टी लीडर जगमीत सिंह प्रधानमंत्री पद के बड़े दावेदार बन सकते हैं। वे भी एक प्रवासी भारतीय के पुत्र हैं। अटलांटिक के दूसरी तरफ तो प्रवासी भारतीय पहले ही सफलता के झंडे गाड़ चुके हैं। ऋषि सुनक यूके और लियो वराडकर आयरलैंड के प्रधानमंत्री बन चुके हैं। अंतोनियो कोस्टा पुर्तगाल के प्रधानमंत्री हैं। ये तीनों प्रवासी भारतीयों की संतानें हैं। दूसरे अन्य देशों में भी भारतीय मूल के लोग तेजी से राजनीतिक सोपान पर ऊपर चढ़ रहे हैं। ये वो देश हैं, जहां पर इंडियास्पोरा बड़ी तादाद में है। मॉरिशस के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री दोनों भारतीय मूल के हैं। सिंगापुर के प्रधानमंत्री और गुयाना, सूरीनाम, सेशेल्स के राष्ट्रपतिगण भी भारतीय मूल के ही हैं। आर्थिक जगत में भी इंडियास्पोरा की कामयाबियां जगजाहिर हैं। एसएंडपी 500 की सूची में से 58 कम्पनियों के सीईओ ऐसे हैं, जिनका जन्म भारत में हुआ था। अगर आप इसमें भारतीयों की दूसरी पीढ़ी को जोड़ें तो यह संख्या और अधिक हो सकती है। यह हाल-फिलहाल रुकती नजर नहीं आती है, क्योंकि युवा भारतीय देश छोड़कर दुनिया के अमीर देशों में अपनी किस्मत आजमाने के लिए तत्पर हैं। विकसित देशों को भी बेहतरीन काम करने वालों की दरकार है, क्योंकि उनकी कामकाजी आबादी निरंतर घटती जा रही है। इंडियास्पोरा की इस कामयाबी का श्रेय उनके अपने कौशल और प्रतिभा के साथ ही उनके मेजबान मुल्कों को भी दिया जाना चाहिए। क्योंकि इन देशों ने भारतीय मूल के लोगों को ऐसा माहौल मुहैया कराया, जिसमें वे शैक्षिक, आर्थिक और सामाजिक दायरे में फल-फूल सकते थे। इन देशों ने धार्मिक और नस्ली बहुलता के विचार को अंगीकार कर लिया है, जबकि बहुतेरे भारतवासी अभी तक इसके लिए तैयार नहीं हो सके हैं। यह साफ है कि इन देशों में वैसा कॉर्पोरेट माहौल है, जिसमें नस्लीयता या सामुदायिकता के बजाय गुणवत्ता को ही सर्वाधिक महत्व दिया जाता है। वे भारतीय मूल के लोगों को अपने अग्रणी कॉर्पोरेशंस, यूनिवर्सिटीज, अदालतों और अस्पतालों की कमान सौंपने से हिचकिचाते नहीं। उन्हें खेल और सौंदर्य स्पर्धाओं में भी प्रतिभागिता करने का भरपूर अवसर दिया जाता है। ऐसे में भारत इंडियास्पोरा की कामयाबी से क्या सबक सीख सकता है?
पहली बात यह कि अगर हम भी दूसरे देशों के प्रवासियों से लाभान्वित होना चाहते हैं तो हमें दूसरों की संस्कृति, धर्म और नस्लीयता के प्रति अधिक खुलेपन का परिचय देना होगा। पूछा जा सकता है कि आखिर भारत को दूसरे देशों के प्रवासियों की जरूरत ही क्या है ? इसका सीधा-सरल उत्तर है- क्योंकि हाई- स्किल्ड भारतीय दुनिया में नाम कमाने के लिए देश छोड़कर जा रहे हैं। दूसरी बात यह कि दुनिया में जहां भी इंडियास्पोरा को सफलता मिली है, वह समान अवसरों के बिना सम्भव नहीं था। अगर भारत को दूसरे देशों के प्रवासियों की प्रतिभा का लाभ उठाना है तो यहां भी वैसे ही समान अवसर उन्हें मुहैया कराने होंगे। 2021 में अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन ने कहा था कि भारतवंशी आज अमेरिका पर अपना दबदबा कायम करने लगे हैं। वैसा उन्होंने भारतीय मूल की एक अमेरिकी नासा इंजीनियर की सराहना में कहा था। आगे उन्होंने यह भी जोड़ा कि अमेरिका इसीलिए विशिष्ट है, क्योंकि वह बहुलतापूर्ण है। यह भारत के मौजूदा हालात से ठीक विपरीत है, जहां आज बहुसंख्यकवाद और हिंदुत्व का बोलबाला होता जा रहा है।
Date:01-03-23
घर के काम में दक्षता स्त्रियों को आर्थिक लाभ से दूर कर रहीउज्ज्वल वीरेंद्र दीपक, ( लोक प्रशासन- कोलंबिया विवि, न्यूयॉर्क )
हाल ही में केरल उच्च न्यायालय ने एक आदेश में कहा कि एक महिला को मोटर दुर्घटना में हुई चोटों के लिए मुआवजे से इस आधार पर वंचित नहीं किया जाना चाहिए कि वह गृहिणी है। एक दुर्घटना में रीढ़ की हड्डी में चोट पाने वाली एक महिला को 40 हजार रुपए के मुआवजे पर आपत्ति जताते हुए विरोधी पक्ष ने कहा कि चूंकि वह एक गृहिणी थी और उसकी कोई आय नहीं थी इसलिए उसे अधिक मुआवजा देने की जरूरत नहीं है। हाईकोर्ट ने इसे ‘अपमानजनक’ करार देते हुए आदेश दिया कि गृहिणियों के मुआवजे को कामकाजी महिलाओं के बराबर माना जाना चाहिए। हाल के चुनावों के दौरान राजनीतिक दलों के घोषणापत्रों में महिलाओं के ‘सशक्तीकरण’ के लिए ‘आय समर्थन’- मासिक भुगतान के विभिन्न रूपों का वादा किया गया था। इन वादों ने महिलाओं में लैंगिक असमानताओं पर बहस छेड़ दी है।
गृह कार्य में महिलाओं की दक्षता उन्हें आर्थिक गतिविधियों से दूर कर रही है। देखभाल का काम करने वाली महिलाओं के पास वैतनिक कार्य में शामिल होने के लिए कम समय होता है, जिससे उनके जीवन भर की कमाई कम हो सकती है और गरीबी का खतरा अधिक हो सकता है। 2020 में स्कूल और डे केयर बंद होने से महिलाओं के लिए विश्व स्तर पर अनुमानित 512 अरब अतिरिक्त घंटों की अवैतनिक चाइल्ड केयर हुई | महामारी और लॉकडाउन का पुरुषों की तुलना में महिलाओं के रोजगार पर असमानुपातिक प्रभाव पड़ा है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन का अनुमान कि अवैतनिक देखभाल-कार्य महिलाओं को कार्य- बल में शामिल होने और बने रहने से रोकने वाली सबसे महत्वपूर्ण बाधाओं में से एक है। गृह कार्यों को महिलाओं की जिम्मेदारी के रूप में देखा जाता है और इसलिए अवैतनिक देखभाल-कार्य में लैंगिक असमानताएं दुनिया भर में देखी जाती हैं।
‘समय-उपयोग’ सर्वेक्षण एक देश या क्षेत्र के भीतर विभिन्न गतिविधियों जैसे भुगतान कार्य, शिक्षा, अवैतनिक कार्य और यहां तक कि अवकाश पर खर्च समय की मात्रा मापने के लिए प्रमाणित है। भारत का पहला ‘समय-उपयोग’ सर्वेक्षण 2019 में हुआ। इसके अनुसार भारतीय महिलाएं अपना 51% समय अवैतनिक कार्यों में व्यतीत करती हैं।
देखभाल के काम के मूल्य और देखभाल करने वालों का समाज में योगदान पहचानना जरूरी है। देखभाल करने वालों का समर्थन करने वाली नीतियां जैसे सवैतनिक माता-पिता की छुट्टी, लचीली कार्य व्यवस्था और सस्ती देखभाल, महिलाओं पर अवैतनिक देखभाल कार्य के बोझ को कम करने और लैंगिक समानता को बढ़ावा देने में मदद कर सकती हैं। घरेलू महिला कामगारों को श्रमिकों के रूप में पंजीकृत करने और उन्हें न्यूनतम मजदूरी, सामाजिक सुरक्षा जैसे अधिकार प्रदान करने से सकारात्मक बदलाव होंगे। लैंगिक समानता में परिवर्तन के अधिकांश संकेतकों पर दुनिया पीछे है। समय आ गया है कि हम ‘अवैतनिक देखभाल’ को मान्यता प्रदान कर उसे श्रम बल में उचित स्थान दें।
Date:01-03-23
पंजाब में मंडराता आतंक का सायाप्रकाश सिंह, ( सीमा सुरक्षा बल के महानिदेशक रहे लेखक 1987 से 1991 तक पंजाब में कार्यरत रहे )
पंजाब आतंकवाद के एक भयानक दौर से गुजर चुका है। कुछ दशक पहले पाकिस्तान ने खालिस्तान समर्थकों के पक्ष में अपनी पूरी ताकत झोंक दी थी। आतंकवादियों को आधुनिकतम हथियार उपलब्ध कराए और प्रशिक्षण दिया गया ताकि वे भारत की पश्चिमी सीमा को खंडित कर सकें। करीब 10 वर्षों तक पंजाब में मौत का नंगा नाच होता रहा। अंततोगत्वा आतंकवादियों और पाकिस्तान की हार हुई, परंतु देश को इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। इस दौरान 19,762 लोग मारे गए तो 1,719 सुरक्षाकर्मी बलिदान हुए। तब आतंकवाद की पराजय तो हुई, परंतु उसकी कुछ चिंगारी बची रह गई थी। पिछले करीब 30 वर्षों से पाकिस्तान इस चिंगारी को रह-रहकर हवा दे रहा है। प्रतीत होता है कि उसके प्रयासों को कुछ सफलता भी मिल रही है। 23 फरवरी को ‘वारिस पंजाब दे’ के प्रमुख अमृतपाल सिंह के समर्थकों ने अजनाला थाने पर हमला बोल दिया। उसकी मांग थी कि लवप्रीत उर्फ तूफान सिंह को रिहा किया जाए। लवप्रीत को अपहरण के एक मामले में गिरफ्तार किया गया था। अमृतपाल के समर्थक लाठी-डंडे, तलवार और राइफलों से लैस थे। वे बैरिकेड तोड़कर पुलिस कर्मियों पर आक्रमण करते हुए थाने में घुस गए। इसमें पुलिस अधीक्षक जुगराज सिंह सहित अन्य पुलिस कर्मी घायल हो गए। प्रदर्शनकारियों ने पुलिस पर इतना दबाव बनाया कि पुलिस को लवप्रीत को छोड़ने का आश्वासन देना पड़ा और अगले दिन वह रिहा भी हो गया।
पंजाब सरकार का कहना है कि खालिस्तान समर्थक श्री गुरु ग्रंथ साहिब को ढाल बनाकर थाने तक ले गए थे, ऐसी परिस्थिति में पुलिस ने बल प्रयोग करना उचित नहीं समझा। इस घटना की गंभीरता को अनदेखा करना बहुत बड़ी गलती होगी। आतंकवाद के दौर में भी पुलिस कर्मियों, केंद्रीय सशस्त्र बलों और यहां तक की फौज के जवानों पर भी आतंकवादी आक्रमण करते थे। अजनाला की घटना का वीडियो फुटेज जिसने भी देखा, उसे ऐसा लगा कि जैसे पंजाब पुलिस ने उपद्रवियों के सामने घुटने टेक दिए। सवाल यह है कि इतनी बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारियों को थाने तक पहुंचने क्यों दिया गया? अपराधियों की बात मानकर एक अपराधी को छोड़ना भी विचित्र था। थाने पर पुलिस कर्मियों के साथ हिंसा को लेकर अभी तक कोई एआइआर भी नहीं दर्ज की गई है।
बीते कुछ अर्से से पंजाब के हालात लगातार बिगड़ते जा रहे हैं। इसमें कोई संदेह नहीं कि खालिस्तान समर्थक पंजाब में फिर से आग लगाना चाहते हैं। खुफिया विभाग के अनुसार बब्बर खालसा इंटरनेशनल, इंटरनेशनल सिख यूथ फेडरेशन, खालिस्तान जिंदाबाद फोर्स और खालिस्तान कमांडो फोर्स के बचे-खुचे तत्व आज भी पाकिस्तान में अपना आधार बनाकर पंजाब में कुछ न कुछ गड़बड़ी के प्रयास करते रहते हैं। विदेश में, विशेषकर अमेरिका, इंग्लैंड, कनाडा और आस्ट्रेलिया में ‘वर्ल्ड सिख आर्गेनाइजेशन’ और ‘सिख्स फार जस्टिस’ भारत के विरुद्ध माहौल खराब करने में लगे हैं। समय-समय पर कुछ अशुभ संकेत भी दिखते रहे हैं। 2014 में दमदमी टकसाल ने स्वर्ण मंदिर परिसर में जरनैल सिंह भिंडरांवाला और अन्य आतंकी नेताओं की स्मृति में एक स्मारक बना लिया था। शुरू में तो इसका कुछ विरोध हुआ, परंतु धीरे-धीरे आवाज दब गई और इस स्मारक को एक तरह से मान्यता दे दी गई। 2016-17 में अलगाववादी तत्वों ने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कई कार्यकर्ताओं को निशाना बनाया और उनकी हत्या कर दी। 2018 में तत्कालीन मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने केंद्रीय गृह मंत्रालय से आग्रह किया था कि प्रदेश में आतंकवाद पनपने न पाए, इसके लिए एक योजना बनाई जाए। आपरेशन ब्लू स्टार की बरसी पर पंजाब और चंडीगढ़ में खुलेआम ‘खालिस्तान जिंदाबाद’ के नारे लगाए जाते हैं। राज्य सरकारें उसे अनदेखा करती आई हैं कि मुट्ठी भर लोगों के प्रदर्शन से कोई फर्क नहीं पड़ता। जबकि तथ्य यही है कि एक छोटी सी चिंगारी भी पूरे जंगल में आग लगा देती है। राष्ट्रीय सुरक्षा के मामले में हमें छोटी घटनाओं का भी संज्ञान लेना चाहिए और आवश्यक कार्रवाई की जानी चाहिए। दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हो रहा है।
कई और पहलुओं से भी पंजाब भीतर से खोखला होता जा रहा है। प्रदेश में मादक पदार्थों की समस्या बहुत गंभीर हो गई है। एक आकलन के अनुसार पंजाब में करीब 70 गिरोह सक्रिय हैं और इनमें कुल 500 सदस्य हैं। ये ठेके पर विरोधियों की हत्या कर देते हैं। खालिस्तान समर्थकों और इनके बीच भी साठगांठ हो गई है। प्रदेश में ड्रोन द्वारा हथियार और नशीले पदार्थों के गिराए जाने के भी मामले सामने आ रहे हैं। सीमा सुरक्षा बल के अनुसार पाकिस्तान ड्रोन द्वारा पंजाब पर एक तरह की बमबारी कर रहा है।
करीब छह माह पहले मैं चंडीगढ़ गया था। वहां एक सिख अधिकारी ने मुझसे कहा, ‘सर, हमें योगी आदित्यनाथ जैसा मुख्यमंत्री चाहिए या केपीएस गिल जैसा डीजीपी।’ दरअसल, आमजन राज्य में कमजोर नेतृत्व से परेशान हैं। सितंबर 2021 के बाद से अब तक पंजाब में चार पुलिस महानिदेशक बदले जा चुके हैं। स्पष्ट है कि सरकार शीर्ष पुलिस पद के साथ सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का उल्लंघन कर खिलवाड़ करने में लगी है। ऐसी दशा में पुलिस का कमजोर होना स्वाभाविक है। पंजाब पुलिस बिगड़ते हालात को सुधारने में पूरी तरह सक्षम है। इसी पुलिस ने 30 साल पहले आतंकवादियों की कमर तोड़ दी थी। बस आवश्यकता है तो स्पष्ट राजनीतिक निर्देशों की।
राष्ट्रीय सुरक्षा की दृष्टि से पंजाब की तुलना अन्य प्रदेशों से नहीं की जा सकती है। पंजाब का एक विशेष स्थान है। हम देख चुके हैं कि पंजाब में अस्थिरता का पाकिस्तान ने कितना लाभ उठाया और उसकी देश को कितनी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी थी। हमें सुनिश्चित करना होगा कि पंजाब में आतंकवाद फिर से न पनपने पाए और विदेश में भी खालिस्तान समर्थकों पर अंकुश लगाया जाए। यदि पंजाब सरकार आतंकवाद से निपटने में ढुलमुल नीति अपनाती है तो केंद्र को पूरा अधिकार होगा कि वहां राज्य सरकार को बर्खास्त कर राष्ट्रपति शासन लागू किया जाए। हमारी राष्ट्रीय सुरक्षा सर्वोपरि है।
Date:01-03-23
अतीत के बंदीसंपादकीय
अतीत को भुला देना कोई अच्छी बात नहीं, मगर अतीत से बंध कर भविष्य को चौपट कर बैठने से बुरा भी कुछ नहीं। अतीत की कड़वाहटें सबक हो सकती हैं। वे दोहराई न जा सकें, इसके लिए तैयार रहना एक स्वस्थ और सभ्य समाज का लक्षण है। अतीत को मिटाने की जिद से कड़वाहटें खत्म तो नहीं होतीं, नई कड़वाहटें जरूर पैदा हो जाती हैं। ऐसी ही कुछ बातें सर्वोच्च न्यायालय ने एक याचिका की सुनवाई करते हुए कहीं। एक वकील ने याचिका दायर कर मांग की थी कि आक्रांताओं की ओर से बदले गए प्राचीन, ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और धार्मिक स्थानों के मूल नामों का पता लगाने और दुबारा वही नाम रखने के लिए नामकरण आयोग गठित करने का आदेश दिया जाए। अतीत को वर्तमान और भविष्य पर हावी नहीं होने दिया जा सकता इस याचिका को खारिज करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अतीत को वर्तमान और भविष्य पर इतना हावी नहीं होने दिया जा सकता कि भारत अतीत का बंदी बन कर रह जाए। अदालत की इस टिप्पणी से शायद उन लोगों को कुछ सीख मिली होगी, जो मानते हैं कि जगहों, सड़कों, इमारतों आदि के नाम बदल देने से इतिहास भी बदल जाएगा। अतीत में आक्रांताओं ने जो किया, उसका बदला इस तरह लिया भी नहीं जा सकता।
यह कोई नई या पहली मांग नहीं है। इससे पहले भी अनेक जगहों पर विभिन्न संगठन मांग करते रहे हैं। कई सरकारों ने जगहों, सड़कों, बागों, इमारतों आदि के नाम बदले और अपनी रुचि के अनुसार उनके नाम रखे भी हैं। स्वाभाविक ही, इसे लेकर कहीं, विरोध तो कहीं चर्चाएं होती रही हैं। जगहों, इमारतों, सड़कों आदि का नामकरण इसलिए किया जाता है कि इस तरह हम अपने इतिहास, सभ्यता और संस्कृति से जुड़े व्यक्तियों और प्रतीकों को न सिर्फ सम्मान देते हैं, बल्कि उन्हें सुरक्षित रखने का भी प्रयास करते हैं। भारत सामासिक संस्कृति वाला देश है। समय-समय पर इसने अनेक विदेशी आक्रांताओं के आक्रमण झेले हैं। मगर उन आक्रांताओं में से जिन्होंने इस देश की संस्कृति और सभ्यता को समृद्ध करने में योगदान किया, उन्हें भी अपनी स्मृति में बचाए रखा है। उनके नाम पर भी जगहों के नाम रखे गए हैं। यह इस देश की उदारता है कि यहां विभिन्न धर्मों और आस्थाओं के लोग आए या विकसित हुए और उन्हें यहां अपनी पहचान के साथ रहने की आजादी मिली। ऐसे में जब हम नामों को बदलने का प्रयास करते हैं, तो एक तरह से अपनी सामासिकता और उदारता को भी नष्ट करने का प्रयास कर रहे होते हैं।
शब्दों की अपनी यात्रा होती है, वे खुद समय के साथ घिस कर अपनी मूल बनावट बदल लिया करते हैं। इसलिए बहुत सारे पुराने नाम बदल कर अब दूसरी शक्ल में चल पड़े हैं। इसलिए उन्हें बदल देने से कई अड़चनें तो पैदा हो सकती हैं, हासिल कुछ खास होने वाला नहीं। जब किसी जगह, इमारत या शहर का नाम बदला जाता है, तो सारे दस्तावेजों में उसे बदलना पड़ता है। मगर केवल भारत में नहीं, पूरी दुनिया में नाम बदलने का चलन देखा जाता है। नई सरकार आती है तो पिछली सरकार की योजनाओं तक के नाम बदल देती है। भारत में अगर इस तरह एक बार जगहों के नाम बदलने का आधिकारिक सिलसिला शुरू होगा, तो फिर उसका कोई अंत न होगा। जो नाम यहां के लोगों की जेहन में बसे हुए और सामासिक संस्कृति का सूत्र बन चुके हैं, उन्हें बने रहने देने में हर्ज ही क्या।
Date:01-03-23
क्यों हिंसक हो रहे हैं बच्चेरोहित कौशिक
हाल ही में इंदौर में एक छात्र द्वारा पेट्रोल डालकर जलाई गई कॉलेज की प्रिंसिपल की मौत हो गई। आरोपी छात्र के खिलाफ रासुका लगा दी गई है। कुछ दिनों पहले ही मार्कशीट न मिलने से गुस्साए एक पूर्व छात्र आशुतोष श्रीवास्तव ने इंदौर के बीएम फॉर्मेसी कॉलेज की प्रिंसिपल विमुक्ता शर्मा पर पेट्रोल छिड़क कर आग लगा दी थी। चार-पांच दिनों तक अस्पताल में मौत से जूझने के बाद उनकी मौत हो गई। इसी तरह अमेरिका के फ्लोरिडा से भी छात्र द्वारा की गई हिंसा की खबर प्रकाश में आई है।
फलोरिडा के मतांजस हाई स्कूल में एक छात्र ने अपने शिक्षक के सहयोगी को बुरी तरह पीटा क्योंकि उसने छात्र का वीडियो गेम छीन लिया था। कुछ समय पहले लखनऊ में पबजी खेलने से मना करने पर 16 साल के एक बेटे ने अपनी मां को मौत के घाट उतार दिया था। ये घटनाएं तो उदाहरण मात्र हैं। भारत समेत पूरे विश्व में इस तरह की घटनाओं में लगातार वृद्धि हो रही है। दुर्भाग्यपूर्ण हो है कि इस दौर में बच्चों और युवाओं में हिंसा की प्रवृत्ति बढ़ती जा रही है। दरअसल, बच्चों और युवाओं पर किसी न किसी रूप में बदलते समय का प्रभाव पड़ता ही है। इस दौर में पूरे विश्व में हिंसा का तत्व प्रभावी हो गया है।
हिंसा का यह तत्व प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से हमारे मानस को प्रभावित कर रहा है। हिंसा की भावना मात्र हिंसक दृश्यों को देखकर ही नहीं पनपती, बल्कि अगर किसी भी कारण से हमारे व्यवहार में परिवर्तन आ रहा है और हमारा दिमाग आसानी से उस परिवर्तन को स्वीकार नहीं कर पा रहा है, तो भी हमारे अंदर हिंसा की भावना पैदा होती है। दरअसल, नये दौर में दुनिया तेजी से बदल रही है। इसलिए इस माहौल में बच्चों का व्यवहार भी तेजी से बदल रहा है। इस बदलाव के कारण बच्चे अनेक दबाव झेल रहे हैं।
मनोवैज्ञानिकों का मानना है कि स्कूल-कॉलेजों के बच्चों और युवाओं द्वारा की जाने वाली हिंसा कुंठा और दबाव के कारण होती है। यह स्थिति बच्चों और युवाओं के संदर्भ में गंभीर समस्याओं को जन्म देती है। इसी कारण बच्चे अपने अंदर सहयोग और सदभाव की भावना विकसित नहीं कर पाते। स्कूल और कॉलेजों की शिक्षा प्रणाली भी बच्चों और युवाओं में मानिसक दबाव और तनाव पैदा कर रही है।
विडंबना यह है कि बदलते माहौल में बच्चों के मनोभाव और समस्याओं को समझने की कोशिश भी नहीं की जाती। यही वजह है कि बच्चे आत्मकेंद्रित होने लगते हैं। हमें गंभीरता से इस बात पर विचार करना होगा कि कहीं बच्चों को हिंसक बनाने में हमारा ही हाथ तो नहीं है ? अक्सर देखा गया है कि माताएं तो अपने बच्चों को समय दे देती हैं, लेकिन ज्यादातर पिता अपने बच्चों को समय नहीं दे पाते। दूसरी तरफ, सोशल मीडिया ने भी बच्चों और युवाओं के व्यवहार को बदलने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।
दरअसल, कोरोना काल में ऑनलाइन शिक्षा की मजबूरी के चलते भी बच्चों को मोबाइल की ज्यादा लत लगी । इस लत ने धीरे-धीरे इस तरह अपनी जड़ें जमा लीं कि इसके दुष्परिणाम बच्चों को अपनी चपेट में लेने लगे । परिवार भी बच्चों को मोबाइल और सोशल मीडिया से दूर रखने का कोई व्यावहारिक हल नहीं ढूंढ पाए। यही कारण है कि आज के बच्चे अनेक मनोवैज्ञानिक व्याधियों से ग्रस्त । दरअसल, हम बच्चों और युवाओं के मनोविज्ञान को समझने की कोशिश ही नहीं करते और सतही तौर पर उनकी समस्याओं पर बात करने लगते हैं। एक अध्ययन के अनुसार मोबाइल गेम खेलने वाले लगभग 95 फीसदी बच्चे तनाव की चपेट में आसानी से आ जाते हैं। करीब 80 फीसदी बच्चे गेम के बारे में हर समय सोचते रहते हैं। गौरतलब है कि विश्व स्वास्थ्य संगठन ने जून, 2018 में ऑनलाइन गेमिंग को एक मानसिक स्वास्थ्य विकार घोषित किया था। ऑनलाइन गेम उद्योग में भारत दुनिया में चौथे नंबर पर है। हमारे देश में 60 फीसदी से ज्यादा ऑनलाइन गेम खेलने वाले 24 साल से कम उम्र के हैं।
सवाल है कि क्या इस दौर में गंभीरता के साथ इस बात को लेकर चिंतन हो रहा है कि बच्चों और युवाओं में प्रतिशोध की भावना क्यों पैदा हो रही है? क्या कारण है कि आज हिंसक चरित्र बच्चों के आदर्श बन रहे हैं? क्यों बच्चों मैं धैर्य और संयम खत्म होता जा रहा है? इन सवालों के उत्तर ढूंढने की कोशिश की जाएगी तो उनके मूल में संवादहीनता की बात ही सामने आएगी। यह संवादहीनता द्विपक्षीय है यानी एक तरफ बच्चों का परिवार से संवाद नहीं है तो दूसरी तरफ परिवार का भी बच्चों से संवाद नहीं है। अगर कहीं परिवार का बच्चों से संवाद है, तो उसमें भी नकारात्मकता का भाव ज्यादा है। यही कारण है कि बच्चों और युवाओं में चिड़चिड़ापन बढ़ रहा है। जब तक बच्चों और युवाओं से परिवार और शिक्षण संस्थानों का सकारात्मक संवाद स्थापित नहीं होगा तब तक बच्चों में धैर्य और संयम जैसे गुण विकसित नहीं हो पाएंगे। इस दौर में जिस तरह से भारत समेत पूरे विश्व के बच्चों और युवाओं में हिंसा की भावना बढ़ रही है, उसे देखते हुए परिवार और शिक्षण संस्थानों को कई स्तरों पर प्रयास करने होंगे। इन प्रयासों के व्यावहारिक पहलुओं पर भी ध्यान देने की कोशिश करनी होगी।
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हाल ही में भारत के उद्योगों के लिए हरित यानि कम-कार्बन योजना लाए जाने पर जोर दिया जा रहा है। अभी तक भारत में स्वच्छ ऊर्जा को घरेलू बाजार को केंद्र में रखकर बढ़ावा दिया जाता रहा है। इसके साथ-साथ नवीकरणीय ऊर्जा की कीमत कम करने की लगातार कोशिश की जाती रही है।
इस प्रयास से जुड़े कुछ बिंदु –
हरित औद्योगिक योजना की वैश्विक स्थिति पर एक नजर –
भारत जैसी विकासशील अर्थव्यवस्थाओं के पास हरित औद्योगिक रणनीति और प्रौद्योगिकी न होने से उन्हें निवेश में कमी का सामना करना पड़ सकता है। भारत को अपने आर्थिक विकास के लिए इस प्रकार की प्रौद्योगिकी में नवाचार, अनुसंधान एवं विकास को तुरंत बढ़ावा देना चाहिए। इस क्षेत्र में पब्लिक-प्राइवेट और अकादमिक साझेदारी के साथ स्वच्छ ऊर्जा वेल्यू चेन में महारथ हासिल करने की ओर बढ़ना चाहिए।
‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 7 फरवरी, 2023
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Date:28-02-23
Bring States On the Same Capex PageFacilitation may deliver better resultsET Editorials
The Centre is monitoring capital expenditure by states, vital stakeholders in reviving private investment in the economy, on evidence of flagging capacity. GoI has accelerated its capex budget since the pandemic with matching allocations for states but has found greater slippage in their ability to exhaust budgets than among its own ministries and departments. States as a block have improved their fiscal balance over the past couple of years. However, individual performance is diverse. This affects any given state’s capability to commit to big capex plans. States have improved their revenue position largely on account of stable GST collections and robust devolution from the Centre on buoyant direct taxes. States, however, are less nimble at altering their revenue-capital expenditure mix.
Where commitments have been made to bigger capex, fiscal headroom gets in the way. The common experience has been to squeeze capital rather than revenue expenditure to secure fiscal balance. Again, where fiscal headroom permits, it is expedient to bump up revenue expenditure over capex. Then there are forecasting errors where state budgetary assumptions do not work, making the process less reliable. Finally, the variance in physical and social infrastructure deficits across states may not be mapped adequately through interest rate subvention for capex and tied assistance in centrally sponsored schemes.
One suggestion to break out of the uncertainty surrounding states’ capacity to ramp up capex is to create a dedicated fund they can tap into on need. States will also have to create more borrowing capacity by becoming transparent on off-budget liabilities. The capex push is coinciding with a nudge from the Centre for states to clean up their books. So, there could be some scheduling issues there. Also, the sooner states recover their fiscal balance relative to pre-pandemic levels, the easier it will be to reorient expenditure. GoI needs to bring states on the same page over capex. Facilitation may deliver better results than enhanced scrutiny.
Date:28-02-23
A New ‘New Normal’ For Zoonotic DiseasesET Editorials
A spike in adenovirus cases in West Bengal should serve as a warning for the country at large. While the Covid-19 pandemic is in our collective rear view, zoonotic diseases that are caused by germs like viruses, bacterial parasites and fungi are not. Preparedness and capacity to deal with them must increase across the board via the triple mechanism of prevention, surveillance, treatment. Government must not squander the hard lessons of the pandemic.
As the population grows, so does the demand for material resources such as food and fuel. As people earn more, demand rises further. Meeting these needs creates more opportunities for animal-to-human spillovers and higher prevalence of zoonotic diseases. Reducing possibilities of such spillovers is possible through better resource management. Also, there should be continued surveillance to identify a zoonotic disease and its spread potential, studies of the genomic structure to identify its impact on human health and development of drugs. Creating institutions, systems and capacity for continuous surveillance must become the new ‘new normal’. Governments should roll out plans to ensure accessible, affordable primary healthcare. For those better placed such as readers of this column, focus must shift to individual-specific check-up and treatment for specific bodies.
On the broader front, central and state governments along with local authorities must work together to develop a roadmap, ensuring human and physical infrastructure. Focusing on clean habitations, effective waste collection and management, and enhanced awareness among people is critical to improving human well-being and reducing the incidence of vector diseases. Improving health and healthcare systems must become a priority.
Date:28-02-23
मौलिक संस्कृति छोड़ने के नुकसान उठाने उठाने पड़ेंगेसंपादकीय
देश की राजधानी में फिर एक दरिंदे ने लिव-इन पार्टनर की हत्या कर दी। हाल के दौर में महानगरों में लिव-इन पार्टनर की नृशंस हत्या की घटनाएं लगातार बढ़ रही हैं। शहरीकरण, युवा पुरुषों और महिलाओं का अनजान शहरों में नौकरी करके आर्थिक रूप से सबल हो, स्वतंत्र निर्णय करना विवाह जैसी पारम्परिक मजबूत बंधन वाली भारतीय संस्था को बदल रहा है। चूंकि पश्चिमी समाज में औद्योगीकरण के बाद से ही परिवार, खासकर संयुक्त परिवार नाम की संस्था खत्म हो चुकी है और विवाह एक पारस्परिक अनुबंध से ज्यादा नहीं रहा, लिहाजा भारत में अभिजात्य वर्ग और बुद्धिजीवियों ने इस नई संस्कृति को नारी मुक्ति का नया पड़ाव मान लिया। इस रिश्ते में पारस्परिक लगाव का अभाव होता है, क्योंकि इसकी शर्तें सामाजिक दबाव से परे होती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने भी पश्चिम से आने वाली इस नई हवा को नागरिक स्वतंत्रता के चश्मे से देखकर इसे वैध करार दिया। दरअसल, हमने नारी स्वतंत्रता और व्यक्तिगत आजादी की पश्चिमी आधुनिक जीवन शैली को अंगीकार तो किया पर उनके कानून और औपचारिक आचार-व्यवहार के मानदंडों के प्रति आदतन प्रतिबद्धता को अपने व्यक्तित्व में शामिल नहीं किया। दूसरी ओर भारतीय मूल्यों को, जो नानी की कहानियों, मां की लोरियों और चाचा की डांटों, दादा- दादी और नाना-नानी के प्यार में मिलता था, उसे भी पीछे छोड़ दिया। देश एक ऐसे बदलाव के मुहाने पर है जहां वह नई सभ्यता के लिए मौलिक संस्कृति छोड़ रहा है।
Date:28-02-23
हम पंजाब में पुरानी गलतियों को दोहरा रहे हैंशेखर गुप्ता, ( एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’ )
पिछले कुछ दिनों में अमृतपाल सिंह के समर्थकों द्वारा पंजाब के अजनाला पुलिस थाने पर हमले के जो दृश्य सामने आए हैं, वे अगर हमें झटका नहीं पहुंचाते तो साफ है कि हम देशहित से जुड़े महत्वपूर्ण मसलों के प्रति कितने उदासीन और आलसी हो गए हैं। उन लोगों ने पाकिस्तान की सीमा से सटे उस क्षेत्र के पुलिस थाने को तहस-नहस कर दिया, जिसे आप संवेदनशील क्षेत्र कह सकते हैं। भीड़ ने अपने एक आदमी को रिहा करने पर सरकार को मजबूर कर दिया, जिसे अपहरण के मामले में गिरफ्तार किया गया था। अमृतसर के पुलिस प्रमुख के उस वीडियो को देखिए, जिसमें वे कह रहे हैं कि प्रदर्शन करने वालों ने साबित कर दिया कि गिरफ्तार आदमी के खिलाफ आरोप फर्जी हैं, इसलिए पुलिस एफआईआर वापस ले रही है।
1978 के बाद के उग्रवाद के दौर में हम पंजाब पुलिस को इस तरह आत्मसमर्पण करते देख चुके हैं। लेकिन तब वह परेशान और लाचार दिखती थी। आज तो वह बड़ी राहत महसूस करती, बेबाक लहजे से पेश आती दिख रही है। यह उस राज्य में हो रहा है, जिसमें कभी साइकिल चोरी के फर्जी आरोप के साथ दायर एफआईआर को आरोपित व्यक्ति की मौत होने तक खारिज करवाना असंभव था। तीन दशकों तक तो नहीं ही संभव था, जब तक किसी सरकार ने दिहाड़ी पर चल रही वीपी सिंह सरकार की तरह अपने गृह मंत्री मुफ्ती मोहम्मद सईद की अपहृत बेटी रुबैया सईद को छुड़ाने के एवज में गिरफ्तार आतंकवादियों को रिहा करके घुटने टेकने का प्रदर्शन नहीं किया था।
जरा सोचिए, तलवारों और बंदूकों से लैस एक भीड़ देश की सीमा पर स्थित बड़े पुलिस थाने पर हमला बोल देती है, गिरफ्तार संदिग्ध शख्स को रिहा कर दिया जाता है, और इसके बाद सरकार कहती है कि ‘खेद है, हमने गलती की’। इस सबके बाद भी अगर आप सोचते हैं कि इसका कोई नतीजा सामने नहीं आएगा, तो आप बड़े नादान हैं। आगे चलकर कुछ न हो और मैं गलत साबित हो जाऊं तो मुझे बड़ी खुशी होगी। लेकिन क्रूर सच्चाई यह है कि हम पंजाब के बीते बुरे दौर की गलतियां दोहरा रहे हैं। सरकार ने, चाहे वह पंजाब की हो या केंद्र की, अभी तक यह नहीं कहा है कि स्थिति नाजुक है।
इससे पहले ऐसा हमने 1978 से 1993 के बीच देखा। वह मानो कभी खत्म न होने वाली ‘हॉरर फिल्म’ जैसा था। उसने मुख्यतः हिंदू और सिख समेत सभी समुदायों के हजारों लोगों को लील लिया, अनगिनत हत्याएं हुईं, विवादास्पद फौजी कार्रवाई ऐसे पैमाने पर हुई, जैसी पहले कभी नहीं देखी गई थी। साम्प्रदायिक तनाव बढ़ा और एक पूरी पीढ़ी ने अलगाव को झेला। सामान्य स्थिति की ओर लौटने में 15 साल लग गए। आज बहुत कुछ वैसी ही स्थिति लग रही है, जैसी 1978 में 13 अप्रैल को बैसाखी वाले दिन थी। उस दिन अमृतसर में निरंकारियों की एक सभा में प्रदर्शन कर रहे भिंडरांवाले के समर्थकों पर गोलियां चलाई गई थीं, काफी खूनखराबा और मौतें हुई थीं।
मैं आपको बता दूं कि तब और अब में फर्क क्या है। भिंडरांवाले ने ‘खालिस्तान’ शब्द का कभी प्रयोग नहीं किया था, कभी नहीं। कई पत्रकारों ने उनका इंटरव्यू लिया, खुद मैंने 1983-84 में बीस से ज्यादा बार बातचीत की लेकिन उन्होंने कभी यह शब्द नहीं बोला। वास्तव में, अंतिम बार जब मैंने अकाल तख्त में उन्हें उनके प्रमुख साथियों के साथ देखा था, जब सेना ने ‘ऑपरेशन ब्लू स्टार’ के तहत मंदिर परिसर को घेरना शुरू किया था तब भी उन्होंने अलग देश की मांग नहीं की थी। अपने अंतिम सप्ताहों में, जब तनाव बढ़ रहा था और फौजी कार्रवाई अपरिहार्य दिख रही थी, तब उन्होंने तेवर बदल लिया था, फिर भी शब्दों का सोच-समझकर इस्तेमाल किया था। हम अक्सर पूछते थे कि क्या वे खालिस्तान चाहते हैं? या इस मांग के बारे में उनका विचार क्या है? वे शरारत भरी मुस्कान के साथ जवाब देते कि ‘मैंने कभी खालिस्तान की मांग नहीं की लेकिन बीबी (इंदिरा गांधी) ने मुझे यह दे दिया तो मैं ना नहीं कहूंगा।’ लेकिन अमृतपाल सिंह तो पहले दिन से ही खालिस्तान की बात कर रहे हैं। बेशक वह इसे केवल आत्म निर्णय के अधिकार की मांग के रूप में बोलते हैं और इसे किसी का भी लोकतांत्रिक अधिकार बताते हैं। इसके बाद वे यह भी कहते हैं कि अगर अमित शाह कहते हैं कि वे ‘खालिस्तान मूवमेंट’ को कुचल देंगे तो पहले याद कर लें कि इंदिरा गांधी का क्या हश्र हुआ था।
आजादी के बाद के पंजाब का इतिहास यही बताता है कि जब भी उसे कमजोर नेतृत्व मिला यानी ऐसा नेता जिसकी डोर दिल्ली के हाथ में हो और जो सिख धार्मिकता को अपने राजनीतिक दायरे में नहीं समेट पाया, तब-तब यह राज्य संकट में घिरता रहा। पंजाब में ‘कमजोर’ की परिभाषा कुछ अलग है। वहां इसे निर्वाचित सरकार के बहुमत से नहीं आंका जाता। ऐसा होता तो आज कोई समस्या नहीं होती। इस राज्य को मुख्यमंत्री के रूप में ताकतवर हस्ती चाहिए। सत्ता किस पार्टी के हाथ में है, इससे खास फर्क नहीं पड़ता। 1965 में जीटी रोड पर सोनीपत के पास पूर्व सीएम प्रताप सिंह कैरों की हत्या कर दी गई, जब वे चंडीगढ़ जा रहे थे। पंजाबीभाषियों के लिए अलग सूबे की जो मांग दबी हुई थी, वह फिर उभर आई। 1966 में राज्य का विभाजन कर दिया गया। कुछ समय शांति रही, जब तक 1972 में ज्ञानी जैल सिंह के नेतृत्व में कांग्रेस सरकार ने बागडोर नहीं संभाली। वे ऐसे घोर धार्मिक सिख की तलाश करने लगे, जो शिरोमणि गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी में अकाली दल को परेशान करे। इस तरह भिंडरांवाले को ढूंढ निकाला गया। इसके बाद की कहानी हम सबको पता है।
Date:28-02-23
अग्निपथ योजनासंपादकीय
दिल्ली उच्च न्यायालय ने अग्निपथ योजना को सही करार देकर उन सबके इरादों पर पानी फेरने का काम किया, जो राजनीतिक कारणों से इस योजना का विरोध करने में लगे हुए थे। यह सहज ही समझा जा सकता है कि इस योजना का विरोध राजनीतिक लाभ के लिए किया जा रहा था। इसी कारण उसके विरोध में तरह-तरह के कुतर्क दिए जा रहे थे। कई बार तो इन कुतर्कों का स्थान बेहूदे बयानों ने ले लिया, जैसे कि हाल में बिहार के सहकारिता मंत्री ने कहा कि अग्निपथ योजना के चलते देश की सेना नाकारा हो जाएगी। वह यहां तक कह गए कि जिसने भी इस योजना का प्रस्ताव बनाया हो, उसे फांसी पर चढ़ा दिया जाना चाहिए। इसके पहले जब इस योजना की घोषणा की गई थी, तब भी न केवल इसी तरह की बातें की गई थीं, बल्कि युवाओं और विशेष रूप से सेना में भर्ती के आकांक्षी युवकों को बरलगाने-भड़काने का भी काम किया गया था। इसी कारण इस योजना के विरोध में देश के कई हिस्सों में हिंसा भी हुई थी। यह मानने के अच्छे-भले कारण हैं कि इस हिंसा के पीछे स्वतःस्फूर्त आक्रोश के साथ ही कुछ लोगों की शरारत भी थी। यह कम आश्चर्य की बात नहीं कि इस योजना के खिलाफ विभिन्न उच्च न्यायालयों में करीब दो दर्जन याचिकाएं दायर की गईं, जिन्हें सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली उच्च न्यायालय को भेज दिया। उसने इस योजना को सही करार देते हुए कहा कि यह राष्ट्रीय हित में है।
यह समझा जाना चाहिए कि अग्निपथ योजना यह सुनिश्चित करने के लिए बनाई गई है कि हमारे सशस्त्र बल बेहतर ढंग से सुसज्जित हों। एक ऐसे समय जब युद्ध के तौर-तरीके बदल रहे हों, तब भारत के लिए यह आवश्यक था कि वह भी वर्तमान चुनौतियों को देखते हुए अपनी सेना को सक्षम बनाए। इस योजना के अमल में आने से एक तो भारतीय सेना की औसत आयु कम होगी और दूसरे, कहीं अधिक सक्षम सैनिक मिलेंगे। इस योजना के तहत भर्ती अग्निवीर चार साल के लिए सेवाएं देंगे। इनमें से 25 प्रतिशत की ही सेवाएं आगे ली जाएंगी। ऐसे नियम को लेकर यह जो माहौल बनाया जा रहा है कि आखिर चार साल बतौर अग्निवीर काम करने वाले युवा आगे क्या करेंगे? इसका उत्तर यह है कि उनके पास अवसरों की कोई कमी नहीं होगी। इसलिए नहीं होगी, क्योंकि उद्योग-व्यापार जगत को अनुशासित, दक्ष और कार्यकुशल युवाओं की जो तलाश रहती है, उसे अग्निवीर कहीं अधिक आसानी से पूरी करने में सक्षम होंगे। चार साल का सैन्य प्रशिक्षण अग्निवीरों को बेहतर नागरिक के रूप में निखारेगा। सैन्य प्रशिक्षण व्यक्तित्व के निर्माण में कितना अधिक सहायक होता है, इसका पता इससे चलता है कि कई देशों ने अनिवार्य सैन्य प्रशिक्षण के नियम बना रखे हैं।
Date:28-02-23
सुनियोजित तरीके से सिर उठाती कट्टरतादिव्य कुमार सोती, ( लेखक काउंसिल आफ स्ट्रेटेजिक अफेयर्स से संबद्ध सामरिक विश्लेषक हैं )
गत वर्ष इंग्लैंड के लेस्टर में भारतीय मूल के हिंदुओं पर पाकिस्तानियों द्वारा किए गए हमलों और हाल में आस्ट्रेलिया और कनाडा में हिंदू मंदिरों को खालिस्तानियों द्वारा निशाना बनाए जाने की घटनाओं के बीच ब्रिटिश सरकार के आतंकवाद निरोधक कार्यक्रम ‘प्रिवेंट’ को लेकर सामने आई ब्रिटिश सरकार की ही रिपोर्ट ने आतंकवाद और कट्टरपंथ को लेकर स्थापित विमर्श की जड़ों को हिलाकर रख दिया है। यह रिपोर्ट तीन साल की गहरी छानबीन के बाद जारी की गई है। रिपोर्ट के अनुसार ब्रिटिश एजेंसियां इस्लामिक कट्टरपंथ और दक्षिणपंथी कट्टरपंथियों को लेकर दोहरे मापदंड अपनाती हैं और इस्लामिक कट्टरपंथ से बड़ी नरमी से पेश आती हैं। यह बताती है कि ब्रिटेन की सुरक्षा को सिर्फ आतंकी संगठनों से खतरा नहीं, बल्कि सबसे अधिक खतरा उन कट्टरपंथी इस्लामिक संगठनों से है, जो प्रत्यक्ष आतंकी गतिविधियों में शामिल नहीं होते, परंतु लोगों का ब्रेनवाश कर ऐसा माहौल बनाते हैं, जो अचानक से लोगों को आतंकवाद के रास्ते पर ले जाता है। ऐसी स्थिति में सुरक्षा एजेंसियां आतंकी हमले और हिंसा को रोकने में अक्सर विफल रहती हैं, क्योंकि ऐसे संगठनों पर खुफिया एजेंसियों की कड़ी निगाह नहीं होती। इसी रिपोर्ट के अनुसार दक्षिणपंथी संगठनों के बारे में सरकारी नीति अलग है, जिसमें मुख्यधारा के दक्षिणपंथियों द्वारा विवादास्पद बातों पर दिए गए साधारण से बयान को भी हिंसा भड़काने के प्रयास के रूप में देखा जाता है। यह रिपोर्ट सिविल सोसायटी की आड़ में दुकान चलाने वाले ऐसे एनजीओ और अन्य सामाजिक संगठनों को भी कठघरे में खड़ा करती है, जो इस्लामिक कट्टरपंथ को सही ठहराने के लिए तमाम बहाने गढ़ते हैं और तालिबान जैसे आतंकी संगठनों के लिए सहानुभूति भरे बयान देते रहते हैं। रिपोर्ट के अनुसार ऐसे सभी एनजीओ से ब्रिटिश सरकार को अपने रिश्ते समाप्त करने के साथ ही आतंक निरोधक तंत्र को इस्लामिक कट्टरपंथ के पीछे की विचारधारा को गहराई से समझने की आवश्यकता है। ब्रिटेन में ईशनिंदा को लेकर बढ़ते हमलों और हत्याओं पर भी इसमें चिंता जाहिर की गई है। साथ ही कहा गया है कि कश्मीर को लेकर खड़े किए जाने वाले विमर्श अक्सर ब्रिटेन में हिंदुओं की सुरक्षा के लिए खतरा उत्पन्न कर देते हैं और उनके विरुद्ध हिंसा को बढ़ावा देते हैं। रिपोर्ट यह भी कहती है कि ईशनिंदा को लेकर लोगों को भड़काने वाले मौलाना अक्सर वही होते हैं, जो ब्रिटेन में भारत को लेकर दुष्प्रचार करते हैं। यह भी पाया गया कि ब्रिटेन में आतंकी गतिविधियों में लिप्त लोग अक्सर वे होते हैं, जो कश्मीर में भी आतंकवाद में संलिप्त रहे हैं। यह रिपोर्ट खालिस्तानी आतंकवाद को भी ब्रिटेन की सुरक्षा के लिए नए उभरते खतरे के रूप में चिह्नित करते हुए रेखांकित करती है कि खालिस्तानी संगठन भारत में की जाने वाली हिंसा को ब्रिटेन में महिमामंडित करने में जुटे हैं और भारत एवं ब्रिटेन की सरकारों के विरुद्ध सिखों पर अत्याचार का दुष्प्रचार कर रहे हैं। इस रिपोर्ट की सभी 34 सिफारिशों को ब्रिटिश सरकार ने स्वीकार कर लिया है।
अगर इस रिपोर्ट को भारतीय परिप्रेक्ष्य में देखें तो हम यह सब अन्य देशों के साथ भारत में भी होता देख सकते हैं। यह सर्वविदित है कि इस्लामी कट्टरपंथ को लेकर भारत में वामपंथी उदारवादियों का एक धड़ा हमेशा नरम रहता है और वह जिहादी आतंकवाद के हर हिंसक कृत्य को या तो अनदेखा करता है या फिर कोई तर्क देकर सहानूभूतिपूर्वक उसका बचाव करता है। जिहादी आतंकियों को बचाने की कोशिशों का पूरा देश साक्षी रहा है। भारत में सिविल सोसायटी के नाम पर चल रहे तमाम वामपंथी एनजीओ महीनों तक सीएए के विरोध में शाहीन बाग और जामिया जैसी जगहों पर इस्लामिक कट्टरपंथियों द्वारा की गई भड़काऊ बयानबाजी, जिसमें असम को भारत से काट देने की धमकी भी शामिल थी, को नजरअंदाज कर चुके हैं। इतना ही नहीं, दिल्ली दंगों का आरोप एक दक्षिणपंथी नेता के महीनों से जाम रखे गए राजधानी के एक भाग को खुलवाने के बयान पर मढ़ चुके हैं। सच यह है कि शाहीन बाग में महीनों तक चला कट्टरपंथ का नंगा नाच ही दिल्ली दंगों के लिए जिम्मेदार था, जिसे वहां काम कर रहे एनजीओ किसी सामान्य प्रदर्शन का रूप देना चाहते थे। इसी प्रवृत्ति की ओर ब्रिटिश सरकार की रिपोर्ट इशारा करती है।
यदि ब्रिटेन में ईशनिंदा को लेकर हिंसा के मामले बढ़ रहे हैं तो भारत में भी स्थितियां बहुत अलग नहीं हैं। नुपुर शर्मा प्रकरण के बाद ईशनिंदा को लेकर पिछले वर्ष भारत में आधा दर्जन हत्याएं और हत्या के प्रयास हुए। फिर से सिर उठाते खालिस्तानी कट्टरपंथ के बीच पंजाब में बेअदबी को लेकर हत्याएं आम होती जा रही हैं। बीते दिनों इंदौर में कट्टरपंथी सिख संगठनों द्वारा अपनी परंपरा के अनुसार गुरु ग्रंथ साहिब की पूजा करते आए सिंधी मंदिरों को लेकर आपत्ति जताई गई। इस मामले में टकराव सिंधी समुदाय की समझदारी से टल गया, क्योंकि उन्होंने ससम्मान गुरु ग्रंथ साहिब के स्वरूप गुरुद्वारों को सौंप दिए। इसके बावजूद सिंधी संतों को धमकियां मिलीं। यही स्थिति आस्ट्रेलिया और कनाडा में भी है, जहां खालिस्तानी लगातार हिंदू मंदिरों को निशाना बना रहे हैं। ब्रिटेन में तो भारतीय उच्चायोग की इमारत के मुख्य दरवाजे पर जाकर खालिस्तानी भारत के लिए अपशब्दों का प्रयोग कर चुके हैं। इसी तरह कश्मीर को लेकर भारत विरोधी विमर्श से उपजी घृणा पिछले वर्ष लेस्टर में भारतवंशी हिंदुओं और हिंदू धार्मिक स्थलों के विरुद्ध हिंसा के रूप में परिणत हुई थी। तब इसके पीछे तमाम कारण दिए गए थे, लेकिन अब ब्रिटिश सरकार की यह रिपोर्ट इंगित करती है कि कश्मीर को लेकर तथाकथित मानवाधिकार संगठनों एवं इस्लामिक कट्टरपंथियों द्वारा किए जा रहे दुष्प्रचार के चलते ही ब्रिटेन में हिंदूफोबिया के मामले बढ़ रहे हैं। ऐसे में आवश्यक है कि इस रिपोर्ट से निकले प्रमुख बिंदुओं पर भारत में भी ध्यान दिया जाए, क्योंकि इसमें खींचा गया खाका हुबहू भारत के सुरक्षा परिदृश्य और उसके चारों ओर बनाए जाने वाले विमर्श से मिलता है और आतंकवाद और कट्टरपंथ के विरुद्ध भारत की लड़ाई के अनुभवों से मेल खाता है।
Date:28-02-23
शहरों को मिले जीवंत स्वरूपवरुण गांधी, ( लोकसभा सदस्य लेखक ने ‘द इंडियन मेट्रोपोलिस: डिकंस्ट्रक्टिंग इंडियाज अर्बन स्पेसेस’ किताब लिखी है )
पेरिस 19वीं शताब्दी की शुरुआत तक संकरी मध्यकालीन सड़कों वाला एक घिनौना यूरोपीय शहर था। एक ऐसा शहर जहां लोग भीड़भाड़ वाले घरों में रहते थे और हर जगह महामारी तथा सड़ांध फैली थी। 1851 में लुई-नेपोलियन बोनापार्ट (प्रसिद्ध बोनापार्ट का भतीजा) तख्तापलट करके फ्रांस की सत्ता में आया। उसी समय पेरिस के शहरी परिदृश्य को नया स्वरूप देने के लिए बड़ी कोशिश हुई। हरे-भरे स्थानों के निर्माण पर विशेष ध्यान दिया गया। पेरिस में 80 घरों के बीच कम से कम एक पार्क की व्यवस्था सुनिश्चित की गई, जहां पहुंचने में लोगों को दस मिनट की पैदल दूरी से ज्यादा नहीं तय करना पड़े। इस तरह शहर के रूप-स्वरूप को नए सिरे से निखारा और संवारा गया। देखते-देखते पेरिस ‘रोशनी का शहर’ बन गया।
दरअसल शहरों के पास भी अपना एक जीवंत व्यक्तित्व होना चाहिए। विशेष रूप से भारत के शहरों को देखें तो हमारे ऐतिहासिक मंदिरों से जुड़े शहरों की विलक्षणता है कि वहां मंदिरों के साथ बस्तियां बसी हैं। इस तरह पूरे शहर के साथ एक मंदिर अर्थव्यवस्था विकसित हुई है। इसके बावजूद भारत में तमाम ऐसे शहर हैं, जहां शहरी विकास की कोई रूपरेखा या विचार नदारद है। भारत में शहरों का निर्माण उपयोगितावादी या समृद्ध जरूरतों को पूरा करने के लिए किया गया है। इसमें स्थानीय परंपराओं और सांस्कृतिक प्रभावों की जानबूझकर उपेक्षा की गई है। विशेष रूप से कई जरूरी लाभों को देखते हुए भारत में अधिक शहरी हरित स्थानों की स्पष्ट दरकार है। वानस्पतिक उपलब्धता के साथ कार्बन के खतरे से निपटने के लिए यह हरित व्यवस्था शहरों के साथ जरूरी है। भारत के पास शहरों के निर्माण की अपनी समझ और शैली होनी चाहिए, जो उनकी विरासत और स्थिरता के इर्दगिर्द निर्मित हो। देश में शहरों के निर्माण और नियोजन के लिए पाठ्यक्रम में बदलाव और क्षमता वृद्धि की भी जरूरत है। देश में कालेजों में टाउन प्लानिंग संबंधित कोर्स का घोर अभाव है। इसके कारण देश को हर साल सिर्फ 700 टाउन प्लानर्स ही मिल रहे हैं। इस तरह लगभग 11 लाख प्लानर्स की कमी है। इस कमी को दूर करने के लिए और अधिक कालेज स्थापित करने की आवश्यकता है। जरूरत इस बात की भी है कि स्थानीय आइआइटी और एनआइटी के लिए एक समर्पित योजना विभाग बनाने पर जोर दिया जाए। इस बीच हमें भारतीय आवश्यकताओं के अनुरूप नियम-कायदे बनाने के लिए और अधिक प्रयास करने होंगे। इसके लिए क्षेत्रीयकरण पर जोर एक बेहतर तरीका है। आगे चलकर शहरों को अपने बाहरी इलाकों में आम सार्वजनिक भूमि की पहचान करने और वन भूमि में उनको रूपांतरित करने की योजना बनानी चाहिए। इसके जरिये भौगोलिक और जैव विविधता से समृद्ध क्षेत्रों को विशेष रूप से और संवर्धित तथा सुरक्षित किया जा सकता है। गौरतलब है कि दिल्ली-एनसीआर के रीजनल प्लान में महज दस प्रतिशत वनक्षेत्र सुरक्षित रखने का प्रविधान रखा गया है। अरावली से लगे गुरुग्राम में इस तरह की योजनात्मक प्रतिबद्धता इसलिए भी जरूरी है, क्योंकि वहां यह बड़ा जलस्रोत है। हालांकि इस तरह के मास्टरप्लान को लागू करने के लिए स्थानीय वार्ड समितियों के साथ बेहतर समन्वय की आवश्यकता होगी।
इस संबंध में केंद्रीय पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय की नगर वन परियोजना एक आशाजनक पहल प्रतीत होती है। भारत में कम से कम 200 शहरी वन बनाने की बात की गई है। हालांकि यह कार्यान्वयन के स्तर पर बेहद लचर नजर आता है। वैसे इस तरह की कुछ पहल पहले भी हुई है, लेकिन उचित कार्यान्वयन के अभाव में अपेक्षित रूप से सफल नहीं हो पाईं। नतीजतन बेंगलुरु जैसे बड़े शहर में तुरहल्ली जंगल में कदाचार और अपशिष्ट डंपिंग की समस्या सामने आई है। हमें आगामी मास्टरप्लान में कुल और प्रति व्यक्ति शहरी वनक्षेत्र में वृद्धि पर बल देना चाहिए। हरित वानिकी को भी प्रोत्साहित किया जा सकता है। पुणे में वारजे वन का निर्माण इस दिशा में एक उल्लेखनीय कदम रहा। यह महाराष्ट्र की पहली शहरी वानिकी परियोजना मानी जाती है। इसमें 16 हेक्टेयर भूमि को जैव विविधता से समृद्ध क्षेत्र में परिवर्तित किया है, जिसमें पक्षियों की तमाम प्रजातियों, सरीसृपों और स्तनधारियों की पूरी श्रृंखला को शामिल किया गया है। इस दिशा में नागरिक समाज का प्रोत्साहन भी जरूरी है। इसके लिए चेन्नई में थुवक्कम एनजीओ एक मिसाल है, जिसके पास 1800 स्वयंसेवक हैं। इसकी मुहिम से तमिलनाडु के शहरी क्षेत्रों में 25 मियावाकी जंगल अस्तित्व में आए। इससे 9.2 एकड़ में 65 हजार से ज्यादा वृक्ष हरित आबोहवा सुनिश्चित कर रहे हैं।
कुछ समय पहले तक गुरुग्राम में ऐतिहासिकता की एक यादगार निशानी थी-काम सराय। 1820 में निर्मित यह संरचना यात्रियों, व्यापारियों, सैनिकों और आम लोगों के लिए एक पड़ाव स्टेशन के रूप में बनाई गई थी। इस निर्माण में एक विशिष्ट औपनिवेशिक उपस्थिति थी, जिसमें व्यापक मोटी दीवारें और छत ऊंची थीं। बाद में इसका इस्तेमाल स्थानीय सदर बाजार में व्यापार के लिए आने वाले व्यापारियों के घोड़ों और बैलों के एक पड़ाव के रूप में होने लगा। 1975 तक स्थानीय शहर थाना इस क्षेत्र में स्थापित हो गया था। 1994 में फिल्म बैंडिट क्वीन के कुछ दृश्यों की वहां शूटिंग की गई थी। 2020 के मध्य में एक बहुस्तरीय पार्किंग क्षेत्र के निर्माण के लिए इस संरचना को ध्वस्त कर दिया गया। स्पष्ट है कि अगर गंभीरता और तत्परता के साथ पहल नहीं की गई तो भारतीय शहरों की ऐतिहासिकता और हरियाली जल्द ही खो जाएगी।
Date:28-02-23
विकास का समावेशी ढांचासुशील कुमार सिंह
साम्राज्यवाद की समाप्ति के बाद भारत के समक्ष दो ही प्रमुख मुद्दे थे। पहला, राष्ट्र निर्माण और दूसरा सामाजिक-आर्थिक प्रगति। इसी पृष्ठभूमि में विकास प्रशासन का जन्म हुआ और समाज के बहुमुखी और नियोजित विकास पर जोर दिया जाने लगा। इस यात्रा को पचहत्तर वर्ष पूरे हो चुके हैं। इसमें कोई दुविधा नहीं कि आवाजविहीन, जड़विहीन और भविष्यविहीन विकास को तभी रोका जा सकता है, जब इसके लिए सुनियोजित और दूरदर्शी कदम निरंतर उठते रहें। इसी कड़ी में समावेशी विकास, विकास की एक ऐसी परिकल्पना है, जिसमें रोजगार के अवसर निहित होते हैं और यह गरीबी को कम करने में मददगार साबित होता है। अवसर की समानता तथा शिक्षा और कौशल के माध्यम से लोगों को सशक्त करना भी इसका निहित लक्ष्य है। बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराने, मसलन आवास, भोजन, पेयजल, स्वास्थ्य आदि समेत आजीविका के साधनों को निरंतर गतिशील बनाए रखना समावेशी विकास की लक्ष्योन्मुख अवधारणा है।
गौरतलब है कि देश कई ढांचों और उसमें निहित विकास की कई जमावटों से युक्त है, जिसमें सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और तकनीकी विकास समेत अन्य शामिल हैं। इसी के अंतर्गत इक्कीसवीं सदी के पहले दशक में समावेशी विकास को सशक्त करने की दिशा में मनरेगा योजना शुरू की गई थी। गौरतलब है कि इसे पहले नरेगा यानी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना नाम दिया गया था, फिर 2 अक्तूबर 2009 को इसमें महात्मा गांधी का नाम जोड़ते हुए इसे मनरेगा की संज्ञा दी गई। इस योजना के माध्यम से देश के करोड़ों नागरिकों को लाभ मिल चुका है। यह योजना ग्रामीण रोजगार की दृष्टि से एक क्रांतिकारी पहल है। इसने देश के समावेशी ढांचे को न केवल पुख्ता किया, बल्कि पलायन से लेकर गरीबी और भुखमरी आदि पर भी अंकुश लगाने में कारगर सिद्ध हुई है। अगर सुशासन की दृष्टि से देखें, तो यह शासन की ओर से उठाया गया ऐसा कदम है, जो लोक सशक्तिकरण के साथ कदमताल करता और निहित मापदंडों में बुनियादी विकास की दृष्टि से आजीविका की एक बेहतरीन खोज है।
केंद्रीय बजट 2023-24 में मनरेगा के लिए साठ हजार करोड़ रुपए आबंटित किए गए हैं, जो 2022-23 के बजट में तिहत्तर हजार करोड़ के मुकाबले अट्ठारह फीसद और संशोधित अनुमान से करीब बत्तीस फीसद कम है। किसी भी योजना की प्रगति और सफलता में निहित बजट कहीं अधिक महत्त्वपूर्ण होता है। बीते नौ वर्षों की पड़ताल बताती है कि सरकार मनरेगा को लेकर कहीं अधिक सकारात्मक रही है और हर बजट में अनुमान बढ़ी हुई दर में ही देखने को मिलते हैं, जबकि इस बार सरकार का रुख इससे कुछ ज्यादा ही विमुख हुआ है। मुख्य आर्थिक सलाहकार की मानें तो मनरेगा के लिए बजट आबंटन घटाने से रोजगार पर कोई असर नहीं पड़ेगा। गौरतलब है कि मनरेगा के बजट में कटौती हुई है, मगर पीएम आवास योजना, ग्रामीण और जल-जीवन मिशन आदि मदों में राशि अच्छी-खासी बढ़ा दी गई है। माना जा रहा है कि इस प्रकार की योजनाओं से ग्रामीणों को रोजगार मिलने की उम्मीद है। जबकि मनरेगा की तुलना रोजगार की दृष्टि से किसी अन्य से करना इसलिए संभव नहीं है, क्योंकि यह रोजगार की गारंटी योजना है, जबकि अन्य किसी मिशन में रोजगार की संभावना कम-ज्यादा के साथ वैकल्पिक होगी। मनरेगा में बजट की कटौती ग्रामीण रोजगार की दिशा में जारी समावेशी विकास के लिए भी नई समस्या बन सकती है। गौरतलब है कि कोरोना काल में बंदी के दौरान जब नगरों और महानगरों से करोड़ों कामगार अपने गांव-घर पहुंचे थे तो मनरेगा ने ही उनकी आजीविका चलाने में बड़ी भूमिका अदा की थी।
देखा जाए तो मनरेगा दुनिया का सबसे बड़ा सामाजिक कल्याण कार्यक्रम है, जिसने ग्रामीण श्रम में एक सकारात्मक बदलाव को प्रेरित किया है। आंकड़े बताते हैं कि कार्यक्रम के शुरुआती दस वर्षों में कुल तीन लाख करोड़ रुपए से अधिक खर्च किए गए और आजीविका और सामाजिक सुरक्षा की दृष्टि से यह गरीबों के लिए सशक्तिकरण का माध्यम बन गया। वर्ष 2013-14 में मनरेगा के तहत कार्यरत व्यक्तियों की संख्या लगभग आठ करोड़ थी, जो 2014-15 में घट कर पौने सात करोड़ के आसपास हो गई। उसके बाद इसमें बढ़ोतरी भी हुई और कमोबेश ग्रामीण बेरोजगारों के लिए यह संजीवनी का रूप लिए हुए है। इसमें महिलाओं की संख्या आधी और किसी वर्ष तो आधी से अधिक भी देखी जा सकती है। इसके तहत प्रत्येक परिवार के श्रम करने के इच्छुक वयस्क सदस्यों के लिए सौ दिन की गारंटी युक्त रोजगार, दैनिक बेरोजगारी भत्ता और परिवहन भत्ता, अगर पांच किलोमीटर दूर है, तो आदि का प्रावधान है। सूखा ग्रस्त क्षेत्रों और जनजातीय इलाकों में डेढ़ सौ दिनों के रोजगार का प्रावधान है। जनवरी 2009 से केंद्र सरकार सभी राज्यों के लिए अधिसूचित की गई मनरेगा मजदूरी दरों को प्रति वर्ष संशोधित करती है। मजदूरी का भुगतान न्यूनतम मजदूरी अधिनियम 1948 के तहत राज्य में खेतिहर मजदूरों के लिए निर्दिष्ट मजदूरी के अनुसार ही किया जाता है।
गौरतलब है कि 1992 में पंचायती राज व्यवस्था को तिहत्तरवें संविधान संशोधन के अंतर्गत संवैधानिक स्वरूप दिया गया। यह स्थानीय स्वशासन भारत विकास की कुंजी सिद्ध हुआ। इसी पंचायती राज व्यवस्था को मनरेगा के तहत किए जा रहे कार्यों के नियोजन, कार्यान्वयन और निगरानी हेतु उत्तरदायी बनाया गया है। इस तरह पंचायती राज व्यवस्था शासन के विकेंद्रीकरण के साथ समावेशी ढांचे को भी मजबूती बनाने में कारगर सिद्ध हो रही है। समावेशी विकास के लिए समावेशी ढांचे का होना आवश्यक है। गांवों में बुनियादी सुविधाएं न होना, गांवों से पलायन और शहरों में जनसंख्या का दबाव बढ़ना, कृषि से जुड़ी अर्थव्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ना, समावेशी विकास की दृष्टि से सही नहीं है। संयुक्त राष्ट्र ने 2030 तक गरीबी के सभी रूपों, मसलन बेरोजगारी, निम्न आय और भुखमरी आदि को समाप्त करने का लक्ष्य तय किया है। सरकार ने 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने का लक्ष्य तय किया था। विशेषज्ञों की राय है कि भारत में तीव्र समावेशी विकास का लक्ष्य प्राप्त करने के लिए कृषि क्षेत्र पर विशेष ध्यान देने की जरूरत होगी। इस बार के बजट में कृषि के लिए पैकेज तैयार करने समेत ग्रामीण डिजिटलीकरण को बढ़ावा देने आदि का संदर्भ दिखता है। मगर यह नहीं भूलना चाहिए कि मनरेगा समावेशी विकास का पर्याय है, जो न केवल आर्थिक विकास के लिए, बल्कि यह एक सामाजिक और नैतिक अनिवार्यता भी है। ग्रामीण क्षेत्रों में अब भी स्थायी या दीर्घकालिक रोजगार साधनों की आवश्यकता पूरी नहीं हुई है। ऐसा इसलिए कि मनरेगा को रोजगार के स्थायी साधन के रूप में शामिल करना उचित नहीं होगा। मनरेगा एक अकुशल कर्मचारियों को दिए जाने वाले रोजगार की गारंटी योजना है। जब तक ग्रामीण क्षेत्रों में कौशल निर्माण करना संभव नहीं होगा, तब तक स्थायी रोजगार की संभावना कमतर रहेगी।
गौरतलब है कि देश में कौशल विकास के पच्चीस हजार केंद्र हैं, जिनमें से ज्यादातर शहरी क्षेत्रों में हैं, जबकि चीन जैसे बराबर की आबादी वाले देश में पांच लाख ऐसे केंद्र हैं। दक्षिण कोरिया और आस्ट्रेलिया जैसे कम आबादी वाले देशों में भी कौशल केंद्रों की संख्या एक लाख है। फिलहाल, मनरेगा गरीब समर्थक और आजीविका से युक्त रोजगार गारंटी की एक ऐसी योजना है, जहां रूखे-सूखे विकास के बीच रोजगार की हरियाली को अवसर मिलता है। ऐसे में इसकी शक्ति को न घटाया जाए तो देश की ताकत बढ़ेगी और ग्रामीण जनता आर्थिक झंझवातों से कुछ हद तक निजात पाएगी।
Date:28-02-23
पंजाब में कुछ पक रहासंपादकीय
हाल में पंजाब में हुई दो घटनाओं ने सुरक्षा एजेंसियों को सतर्क कर दिया है । ये घटनाएं आने वाले वक्त में बढ़ने वाली दिक्कतों का संकेत दे रही हैं। एक घटना तरनतारन जिले की गोइंदवाल जेल में रविवार को गैंगस्टरों के बीच हुई हिंसक झड़प थी, जिसमें पंजाबी गायक सिद्ध मूसेवाला की हत्या में शामिल दो गैंगस्टर मारे गए। इनकी पहचान मनदीप सिंह उर्फ तूफान और मोहन सिंह उर्फ मनमोहन सिंह के रूप में हुई है। झड़प में तीसरा कैदी केशव गंभीर रूप से घायल हुआ है। ये तीनों ही मूसेवाला हत्याकांड में आरोपी हैं। तूफान अमृतसर के एक अस्पताल में कुख्यात गैंगस्टर रणबीर सिंह की हत्या में भी वांछित था। सिद्धू मूसेवाला के नाम से मशहूर पंजाबी गायक शुभदीप सिंह सिद्धू की 29 मई, 2022 को गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। जेल में यह झड़प विवादास्पद स्वयंभू सिख उपदेशक अमृतपाल सिंह के समर्थकों के अजनाला में किए गए हंगामे के दो दिन बाद हुई । खालिस्तान समर्थक अमृतपाल दुबई से लौटने के बाद से ही सुर्खियों में है। तलवार और हथियारों से लैस उसके समर्थक अपने एक साथी को छुड़ाने के लिए पुलिस से भिड़ गए थे और और थाने की जबरदस्त घेराबंदी कर ली थी। इस घटना में अनेक पुलिसकर्मियों को गंभीर चोटें आईं। विपक्ष की प्रमुख पार्टी शिरोमणि अकाली दल ने जेल में गैंगवार की स्वतंत्र जांच की मांग की है। उसका कहना है कि इसके पीछे कोई गहरी साजिश हो सकती है। खुफिया एजेंसियां भी अत्यंत सतर्क हो गई हैं क्योंकि अमृतपाल सिंह सिद्धू मूसेवाला के समर्थकों को प्रभावित करने की कोशिश में जुटा है। वह न सिर्फ भिंडरांवाला जैसे कपड़े पहनता है बल्कि उसके जैसी भाषा शैली भी अपनाता है। अजनाला थाने के बाहर हुई घटना को पाकिस्तान के अखबारों ने काफी बढ़ा चढ़ाकर छापा है और इसे खालिस्तान आंदोलन की सुगबुगाहट के तौर पर पेश किया है। इस घटनाक्रम से केंद्रीय गृह मंत्रालय भी चौकन्ना हो गया है और पंजाब पुलिस से व्यापक रिपोर्ट मांगी है। खुफिया एजेंसियां भी अमृतपाल के दुबई में रहने के दौरान की गतिविधियों को खंगालने जुट गई हैं। यह सतर्कता बेहद जरूरी है क्योंकि पाकिस्तान वर्तमान में जिन हालात से गुजर रहा है उनसे अपनी जनता का ध्यान हटाने के लिए भारत को परेशान करने वाली किसी भी हरकत को उकसाने का काम कर सकता है।
Date:28-02-23
अग्निपथ पर मुहरसंपादकीय
दिल्ली उच्च न्यायालय ने सैन्य भर्ती की अग्निपथ योजना को वैध करार दिया है, इससे न केवल सरकार का पक्ष मजबूत हुआ है, उन युवाओं के भ्रम भी दूर हुए हैं, जो भर्ती की तैयारी में लगे हैं। दिल्ली उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश सतीश चंद्र शर्मा और न्यायमूर्ति सुब्रमण्यम प्रसाद की पीठ ने रक्षा सेवाओं में पिछली भर्ती योजना के अनुसार बहाली और नामांकन की मांग वाली याचिकाओं को भी खारिज कर दिया। अग्निपथ योजना जब से आई है, समर्थन के साथ ही, उसका विरोध भी खूब हो रहा है। इस योजना के विरोधी विभिन्न मंचों पर सक्रिय हैं। अलग-अलग न्यायालयों में अग्निपथ योजना के खिलाफ याचिकाएं लगाई गई थीं। सर्वोच्च न्यायालय ने भी इस योजना को चुनौती देने वाली तमाम याचिकाओं को दिल्ली उच्च न्यायालय में सुनवाई के लिए हस्तांतरित करवा दिया था। शीर्ष अदालत ने सावधानी बरतते हुए केरल, पंजाब, हरियाणा, पटना और उत्तराखंड के उच्च न्यायालयों से भी कहा था कि वे अग्निपथ योजना के खिलाफ लंबित जनहित याचिकाओं को दिल्ली उच्च न्यायालय भेज दें या इसे किसी फैसले तक लंबित रखें। दिल्ली उच्च न्यायालय ने दिसंबर महीने में ही फैसला सुरक्षित रख लिया था और अब आया फैसला अनेक तरह की आशंकाओं को दूर कर रहा है।
गौरतलब है कि 14 जून को शुरू की गई अग्निपथ योजना के साथ भारत में सैन्य भर्ती की प्रक्रिया लगभग आमूल-चूल बदल चुकी है। करीब चार साल के लिए इस योजना के तहत भर्ती प्रस्तावित है, इसके बाद केवल 25 प्रतिशत सैन्य जवान ही नियमित सेवा में आगे के लिए रह जाएंगे। मतलब यह कि नियमित सेवाओं को खत्म नहीं किया जा रहा है, पर युवाओं को बढ़ावा दिया जा रहा है कि वह कुछ वर्ष के लिए सैन्य सेवा में आकर खुद को अनुशासित व प्रशिक्षित करें और बेहतर नागरिक के रूप में देश की सेवा करें। लगभग चार साल की सैन्य सेवा के बाद इन जवानों को एकमुश्त राशि देकर रिटायर कर दिया जाएगा। इसमें पेंशन का प्रावधान नहीं है और यही विवाद की जड़ है। पेंशन एक नीतिगत निर्णय है। अतः अदालत ने कहा कि इस योजना में हस्तक्षेप करने का कोई कारण नहीं मिला है। कोर्ट ने पक्षकारों को पूरा मौका दिया और उसके बाद ही फैसला आया है। हालांकि, जो असंतोष है, वह जारी रहेगा। जो लोग इस योजना को लेकर आशंकित हैं, उन्हें लगता है, चार साल की सेवा के बाद जवान क्या करेंगे? ऐसे सवाल अपनी जगह हैं, पर अल्पकालीन सेवा के बाद रिटायर हुए योग्य युवाओं का दूसरी नागरिक सेवाओं में क्या स्वागत नहीं होगा? यह भी ध्यान रखना चाहिए कि किसी सेवा या सुविधा में कोई कमी आती है, तो उसका विरोध या असंतोष स्वाभाविक है।
अदालत में केंद्र सरकार द्वारा दी गई दलीलें भी खूब चर्चा में रही हैं। सरकार ने साफ कहा था कि एक युवा, आधुनिक और भविष्योन्मुखी लड़ाकू बल विकसित करने के लिए, सेना में युवा रक्त के संचार के लिए, जो मानसिक व शारीरिक रूप से ज्यादा दुरुस्त आयु समूह है, उसे सरकार तरजीह दे रही है। सरकार ने यह भी कहा कि इस योजना को बहुत सोच-विचार के बाद लाया गया है। वैसे पेंशन सुविधा का जहां तक प्रश्न है, इसका समाधान आसान नहीं है, इस पर सरकार को अलग से सोचना चाहिए। एक दिन हर नागरिक को बूढ़ा होना है, हर किसी को पेंशन के रूप में इतना न्यायोचित धन तो मिलना ही चाहिए कि जिंदगी में किसी तरह का बुनियादी अभाव न हो ।
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हाल ही में अमेरिका ने एक चीनी गुब्बारे को मार गिराया है, जो उसकी सीमा में जासूसी करने के लिए उड़ रहा था। भले ही चीन जासूसी के आरोपों का खंडन करते हुए इसे मौसम-निगरानी उपकरण बताने की दुहाई दिए जा रहा है, लेकिन गुब्बारे की घटना से यह बिल्कुल स्पष्ट है कि चीनी जासूसी तकनीक तेजी से परिष्कृत होती जा रही है। पिछले वर्ष श्रीलंका के हंबनटोटा बंदरगाह पर चीनी जासूसी जहाज, शोध-पोत के रूप में लंगर डाले हुए था। यह उसकी बढ़ती जासूसी क्षमताओं का ही उदाहरण है।
दूसरा बिंदु, यह सोचने वाला है कि चीन के निरंकुश साम्यवादी शासन में, सरकार और नागरिक संपत्ति के बीच का अंतर कम होता जा रहा है। ऐसा देखने में आ रहा है कि वहां की सरकार; जासूसी, डेटा-संग्रह और ग्रे-जोन रणनीति को अंजाम देने के लिए नागरिक संसाधनों का भी इस्तेमाल कर रही है। चीनी असैन्य एजेंसियों और व्यवसायों के साथए किसी भी प्रकार के सहयोग को इस प्रकाश में देखे जाने की जरूरत है।
2020 में शेनजेन की एक तकनीकी कंपनी की जांच से पता चला था कि वह भारत के लगभग 10,000 प्रभावशाली लोगों का डेटा इकट्ठा किए हुए है। यह सब देखते हुए भारत को अत्यधिक सतर्कता बरतने की आवश्यकता है। इस हेतु हमें भी अपने जासूसी और इसका पता लगाने वाले उपायों को हाई-टेक बनाना चाहिए। उपलब्ध जानकारी बताती है कि अभी भारत इसमें बहुत पीछे चल रहा है। साथ ही, भारत को चीन के षड्यंत्रों का मुकाबला करने के लिए अमेरिका और अन्य समान विचारधारा और जरूरतों वाले लोकतंत्रों के साथ खुफिया सहयोग करना चाहिए।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 6 फरवरी, 2023
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Date:27-02-23
Intel Tells The TaleThat Amritpal’s dangerous influence has grown so much is a failure of state, central agenciesTOI Editorials
The storming of a police station near Amritsar by a radical Sikh outfit demanding the release of their associate from police custody, forcing his release by a court order soon after, is a study in intelligence failure at state and central levels. Amritpal Singh, whose militant followers clashed with police in Punjab’s Ajnala town near Amritsar, is no stranger to central intelligence agencies, nor state police. But police said they did not reckon the attackers would use the Sikh holy book as a shield to break the barricade. No one apparently had an inkling they would brandish swords or nearhijack the thana, although their mobike rally rode a 60-km distance.
That the radicalised 29-year-old has long advocated the demand for Khalistan on Facebook – justifying the renewed desire as a counter to calls for Hindu rashtra – cannot have skipped scrutiny by security agencies. Yet, he preaches free. Vocal on social media since at least 2015, Amritpal made joint appearances on voice-based network Clubhouse with Deep Sidhu, who flirted with the Khalistan idea but died last year days before the Punjab election. Amritpal reportedly never met Sidhu but was seen as a worthy successor to his outfit, also triggering local rivalries. In his own telling, security agencies questioned Amritpal on his return to India from Dubai. That such openly hostile social media accounts should be allowed to run when the Centre is known to demand suspension of accounts for much milder ‘dissent’ – and this is way beyond dissent – begs a review.
The Khalistan bogey has repeatedly reared its head the last few years, particularly loud before elections, but has also been dismissed as fringe activity since the clashes would occur in the UK or Australia. Electioneering also saw politicians trade charges on Khalistan. Amritpal’s swift takeover, upping the ante and successful siege last week is beyond social media swag. It bodes ill for Punjab, the border state in a fragile unsettled peace since the poor handling of sacrilege cases by the state. Plus, there’s the drugs scourge. Now, radicals are bound to be fired up. Therefore, governments and intelligence agencies should act now. Of course, in Punjab anyone claiming to speak for Sikh identity, even if he’s bad news as Amritpal is, has to be handled carefully. But careful handling is not the same as coddling. Intelligence agencies need to be intelligent.
Date:27-02-23
In Defence Of PoliticsParties would have us believe there’s no space for morally committed political endeavour. But people’s movements in today’s India speak of the politics of justice, inclusiveness and equalityHilal Ahmed, ( The writer is Associate Professor, Centre for the Study of Developing Societies )
Congress politician Jairam Ramesh tried hard to present the Bharat Jodo Yatra (BJY) as an ‘apolitical’ act. Introducing the new Congress move Hath Se Hath Jodo to mobilise voters, Ramesh made a categorical remark that unlike BJY, this new initiative was entirely ‘political’. This is not the first time Congress has made a distinction between moral claim and political acts. During the Delhi assembly election of 2015, the party published a poster captioned ‘Rajniti nahi, kajniti’.
Congress is not the only political party that adheres to this binary of politicsand morality. BJP is equally apprehensive about pure politics. Party brass often criticise the opposition for indulging in what they call vote-bank politics in order to make a claim for virtuous nationalistic resolve.
It is true politics is usually understood as a harmful, interest-oriented and selfish activity. But the unease of our political class with politics underlines a serious crisis of legitimacy. After all,politicians are supposed to wholeheartedly indulge in politics as their core professional duty. The distinction between moral claims and political acts, in this sense, is problematic. Does it mean that politics is completely devoid of ethics?
Centrality of elections
This negative perception of politics is relatively recent. The Gandhi-led national movement introduced a deeply spiritual idea of politics. Gandhi himself defined politics as a kind of moral duty of a satyagrahi. This idealistic imagination of politics is reflected in the constituent assembly debates. That may be the reason why the Preamble of the Constitution envisages politics as a legitimate mechanism to achieve egalitarian social values such asjustice, liberty, equality and fraternity.
Introduction of competitive electoral politics in the 1950s was the first major structural change that affected the established meanings of politics in two significant ways.
Although parties continued to celebrate politics as a moral ideological enterprise, winnability in elections emerged as a practical requirement for political survival. Parties began to use ideology to justify practical manoeuvring and war of positions.
Emergency regime of Indira Gandhi (1975-77) is a good example. Emergency was defended as a moral success to achievenation-building and progress; while the opposition was criticised, even refuted, for being involved in anti-national politics.
The centrality of elections also reconfigured the ‘end and means’ debate in politics. Gandhi’s famous statement that purity of means is always needed to achieve desired end did not work in the domain of election. From ticket distribution basis caste/religion to booth capturing, elections eventually became the most visible expression of power politics.
Constitution as a morality
The 1990s was a watershed moment in this regard. Globalisation of Indian economy directly impacted popular representation of politics. The end of Cold War and the dismantling of the USSR created an environment in which political ideology became relatively less significant. At the same time, a political consensus in favour of market economy began to take shape. In this volatile context, the election-centric meaning of politics was interestingly redefined.
The political class started to recognise the Constitution as the ultimate source of morality. The Constitution was appreciated as an end in itself whilepolitics was seen as a necessary yet imperfect mode to run the system. The Constitution became an ideological document, a ‘holy book’, to legitimise the moral existence of the political class.
This moral adherence to the Constitution is however not seen as inspiration for new standards in public life or to regain ethical values in election-centric politics. Political parties, it seems, want us to believe that politics and the Constitution are two different entities: Constitution is ideal , while politics is real.
AAP, for instance, came into existence with a commitment to establish a new ‘corruption free’ political culture. Its founders wrote a thoughtful party constitution to protect a few moral claims and principles. However, the success of the party in subsequent elections forced AAP establishment to give priority to political compulsions and requirements. At present, AAP does not defend itself as an idealist party; instead, it is very much interested in behaving like a political realist.
This wider acceptance of politics as an unprincipled, dubious, interestoriented activity creates an impression that there is no space for a morally committed political endeavour. This is not true. People’s movements in contemporary India represent a very different kind of politics. These movements raise the issues of caste, class, gender and communalism to make a case for a politics of justice, inclusiveness and equality.
This version of politics draws its inspirations from the Constitution itself. It reminds us that politics is not merely about electoral competitiveness; it is a realm of possibilities, an art to think of the unthinkable and a conviction to achieve what seems to be unachievable.
Date:27-02-23
Settling scoresKhera arrest shows how partisan police action is a serious threat to libertyEditorial
The brief arrest of Congress leader and its Media and Publicity Department chairman Pawan Khera, after he was deboarded from a Raipur-bound flight, for an allegedly unsavoury remark against Prime Minister Narendra Modi, is yet another instance of how criminal law can be misused to settle political scores. His lawyers managed to obtain an order from the Supreme Court that ensured his interim bail, but the episode highlights the cavalier use of the power to arrest under political instruction. It is one thing to denounce a comment as offensive or hurtful, but quite another to read into it crimes such as making assertions against national integration, outraging religious sentiments or causing enmity in society. It becomes an egregious misuse of power if police from a distant State travel all the way to effect an unwarranted arrest based on a complaint by someone claiming to be offended. The Assam Police, which had arrested Gujarat legislator Jignesh Mevani in April 2022 for calling Mr. Modi ‘a Godse worshipper’ on Twitter and produced him before an Assam court, tried to repeat the exercise against Mr. Khera, but were thwarted by the Court. It is disconcerting that the police in Bharatiya Janata Party-ruled States tend to act on complaints relating to events that have nothing to do with their jurisdiction, except for the incidental circumstance that it is reported as news in their geography too, as elsewhere.
Unwarranted insinuations against political leaders are not uncommon when party spokespersons talk to the media, and Mr. Khera’s use of ‘Gautamdas’ as the Prime Minister’s middle name may have touched a raw nerve among Mr. Modi’s supporters who saw in it a sly reference to allegations about his proximity to industrialist Gautam Adani. In fact, Mr. Khera had apologised for his comment. The police often tend to register cases for strident and unsavoury remarks made against those in power. However, the need to arrest someone in such cases is questionable. In most instances, as is the case with Mr. Khera, these comments seldom amount to the serious offences mentioned in the FIRs. Malicious or threatening speech may warrant arrest, but strident criticism or tasteless comments alone should not. Multiple FIRs in different jurisdictions and attempts to arrest those involved are part of a playbook common to rulers in many States. Often lost in the controversy is the fact that effecting arrest on charges that attract less than seven years in prison amounts to a flouting of the norms of arrest. Such egregious violations will continue as long as courts of law limit their protection to grant of bail or clubbing of FIRs, instead of hauling up the police officers and bureaucrats involved for their partisan action.
Date:27-02-23
Reducing painAll constraints on the road to gender equality must endEditorial
Many barriers on the road to gender equality have been removed, but many roadblocks remain. Women have fought hard to get to the present when, thanks to higher education and work opportunities, they can dream of balancing work and home, though couple equity is still not a reality for many. The battle for rights related to reproductive health has been a hard-fought one but women have been successful at persuading governments to initiate policy changes to improve their health and well-being. In India, the Maternity Benefit Act that was enacted by Parliament in 1961 has been amended from time to time to give women better benefits; for instance, paid maternity leave has been extended from the earlier 12 weeks to 26 weeks. It is in this context that the Supreme Court of India’s directive to a petitioner to approach the Union Ministry of Women and Child Development to frame a policy on menstrual pain leave has to be seen. Pointing out that there are different “dimensions” to it, a three-judge Bench led by Chief Justice of India D.Y. Chandrachud said the biological process must not become a “disincentive” for employers offering jobs to women. A petition had sought the Court’s direction to States to frame rules for granting menstrual pain leave for students and working women, but there are apprehensions that these could entrench existing stigma and also result in furthering discrimination.
In India, Kerala and Bihar have menstrual pain leave; the food delivery app Zomato has also introduced it. Indonesia, Japan, South Korea, Spain and Zambia have this policy included in labour laws. Many feminists have, however, decried the move, saying it will reinforce negative gender stereotypes. Also in India, there are other problems in need of addressing such as lack of sanitation facilities in school and at the workplace, especially in the informal sector. Between 2010 and 2020 the percentage of working women dropped from 26% to 19%, according to World Bank data. To encourage more women to join the workforce, it is imperative they have access to higher education and more opportunities. Sometimes, girls have to drop out from school simply because there are no toilets. In a world that should strive to become a better place for all, it is the responsibility of the wider society and governments to ensure that no section is left behind. Many countries are trying out four-day work days for a quality life, while others are offering paternity leave so that parenting can be, rightly, equally shared, and also to ensure employers do not see recruiting women as a disadvantage. All constraints on the road to gender equality and equity must be done away with.
Date:27-02-23
आहत होती संसदीय गरिमाहृदयनारायण दीक्षित, ( लेखक उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष हैं )
संसद संवैधानिक जनतंत्र का शीर्ष मंच है, लेकिन संसद की प्रतिष्ठा और गरिमा पर संकट है। यह रुझान कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी की बीते दिनों लोकसभा में आपत्तिजनक टिप्पणियों से पुन: पुष्ट हुआ। उन्होंने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर भी अनर्गल आरोप लगाए थे। लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने भाषण के आपत्तिजनक और असंसदीय अंश कार्यवाही से निकलवा दिए थे। केंद्रीय मंत्री प्रह्लाद जोशी ने भाषण के आपत्तिजनक अंश निकालने के लिए लोकसभा अध्यक्ष को पत्र लिखा था। भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने सदन के विशेषाधिकार भंग का नोटिस दिया। राहुल गांधी ने नोटिस के उत्तर में स्वयं को सही सिद्ध करने का प्रयास किया, लेकिन इससे भी अधिक दुर्भाग्यपूर्ण बात यह है कि उन्होंने अपने निर्वाचन क्षेत्र के कार्यक्रम में लोकसभा के भाषण के आपत्तिजनक अंशों को निकाले जाने की सार्वजनिक आलोचना भी की है। वह सरकार और अध्यक्ष को ही दोषी ठहरा रहे हैं। अध्यक्ष/सभापति का आसन सर्वोच्च होता है। कार्यसंचालन नियमों के अनुसार अध्यक्ष के विनिश्चय को चुनौती नहीं दी जा सकती। संसदीय नियमावली (नियम 353) के अनुसार सदन में आरोप लगाने से पूर्व अध्यक्ष और संबंधित व्यक्ति को सूचना देना अनिवार्य है। इस मामले में उन्हें अध्यक्ष और पीएम को सूचना देनी चाहिए थी। कांग्रेस के अन्य सांसदों के विरुद्ध भी विशेषाधिकार भंग का नोटिस विचारणीय है। उन पर सदन में अव्यवस्था फैलाने, सदन के ‘वेल’ में आने, नारेबाजी और कार्यवाही में बाधा डालने के आरोप हैं। विपक्षी सांसदों के इस आचरण से संसद की गरिमा को चोट पहुंची है।
सदन की कार्यवाही को विनियमित करना अध्यक्ष का अधिकार है। अध्यक्ष और राज्यसभा के सभापति यही कर रहे हैं। आज कांग्रेस इसकी निंदा कर रही है, लेकिन प्रधानमंत्री राजीव गांधी के समय सरकारी प्रस्ताव के माध्यम से 63 सांसदों का निलंबन हुआ था। तब कांग्रेस ने उसे सही ठहराया था। आज केवल विशेषाधिकार के नोटिस पर ही कांग्रेस पीठासीन अधिकारियों और सरकार पर आक्रामक है। लोकसभा सचिवालय द्वारा प्रकाशित ‘संसदीय पद्धति और प्रक्रिया’ में तत्कालीन प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह द्वारा लिखी भूमिका पठनीय है, ‘संसद में अनुशासनहीनता और अव्यवस्था से मर्यादा क्षीण होती है। नागरिकों में लोकतांत्रिक संस्थाओं के प्रति सम्मान का भाव जरूरी है। आवश्यक है कि संसद लोगों की दृष्टि में अधिकाधिक विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए व्यवस्थित ढंग से कार्य करे।’ कांग्रेस इससे प्रेरित नहीं होती। संसद में अनुच्छेद 105-1 व 2 के माध्यम से परिपूर्ण वाक् स्वातंत्र्य का अधिकार है, किंतु वाक् स्वातंत्र्य का अर्थ हंगामा या शोर मचाने की स्वतंत्रता नहीं है।
सदन में बोलने की निर्बाध स्वतंत्रता नियमों के अधीन ही राष्ट्रहितैषी है, लेकिन शोर और हंगामे के द्वारा कार्यवाही बाधित करना सदन का अवमान है। वाद-विवाद के दौरान उत्तेजना स्वाभाविक है, लेकिन सदन के भीतर दफ्ती या प्लेकार्ड लाना, शोर मचाना तात्कालिक उत्तेजना का परिणाम नहीं होता। प्लेकार्ड आदि लेकर आना सदन में अव्यवस्था फैलाने की सुविचारित योजना का परिणाम है। ऐसे मामलों में कठोर कार्रवाई का कोई विकल्प नहीं है। सदनों के भीतर व्यवस्था और अनुशासन की चिंता को लेकर पीठासीन अधिकारियों के कई सम्मेलनों में गंभीर विचार हुए हैं। 2001 में लोकसभा नियमावली में एक नया नियम जोड़ा गया था। इस नियम के अनुसार ‘अध्यक्षीय आसन के समक्ष शोर मचाने वाले सदस्य अध्यक्ष द्वारा नाम लेते ही स्वतः निलंबित हो जाते हैं।’ पीठासीन अधिकारी सदाशयता के कारण कड़ी कार्रवाई से बचते हैं, मगर कार्यवाही में बाधा डालना, नारेबाजी, आपत्तिजनक शब्दों का प्रयोग रोकने के लिए यथानियम दंडात्मक कार्रवाई का विकल्प ही क्या है? लोकसभा महासचिव रहे सीके जैन ने ‘आल इंडिया कांफ्रेंस आफ प्रिसाइडिंग आफिसर्स’ पुस्तक में यूरोपीय विद्वान वालटर लिपिमैन को उद्धृत किया है कि, ‘उच्च पदस्थ लोग संस्थाओं के संचालक-प्रशासक मात्र नहीं हैं। वे राष्ट्रीय आदर्शों, विश्वासों-अभिलाषाओं के संरक्षक होते हैं।’ विधायक-सांसद निर्वाचित होने पर साधारण से असाधारण हो जाते हैं। उनका आचरण आमजनों पर प्रभाव डालता है।
संविधान निर्माताओं ने गहन विचार-विमर्श के बाद संसदीय पद्धति अपनाई थी। संसद और विधानमंडल का प्राथमिक कर्तव्य विधि निर्माण, संविधान संशोधन, बजट पारण एवं कार्यपालिका को जवाबदेह बनाना है। संसद में व्यवधान से संसदीय कर्तव्य के निर्वहन में बाधा पैदा होती है। लोकसभा के स्वर्ण जयंती अधिवेशन (1997) में सर्वसम्मत प्रस्ताव पारित हुआ था कि, ‘सभा के कार्य संचालन संबधी पीठासीन अधिकारियों के निर्देशों के अनुपालन द्वारा संसद की प्रतिष्ठा का रक्षण और संवर्धन किया जाए।’ यह संकल्प बेनतीजा ही रहा। सदस्यों के आचरण और व्यवहार को लेकर समय-समय पर चिंता व्यक्त की जाती रही है। इसके लिए लोकसभा और राज्यसभा में आचार समिति का गठन किया गया था। आचार समिति सदस्यों के आचरण पर विचार के लिए सशक्त है।
गत सप्ताह राष्ट्रमंडल संसदीय संघ की गंगटोक में हुई बैठक में ओम बिरला ने विधायी सदनों के गतिरोध पर चिंता व्यक्त करते हुए कहा, ‘2001 में राष्ट्रपति और राज्यपाल के अभिभाषणों पर बाधा न डालने का निश्चय अध्यक्षों, मुख्यमंत्रियों और मुख्य सचेतकों की बैठक में लिया गया था, मगर ऐसा नहीं हो पाया। दलगत राजनीति इस संकल्प पर हावी हो गई है।’ बिरला ने राजनीतिक विमर्श में असंसदीय व्यवहार और अवांछनीय शब्दावली के इस्तेमाल को लोकतंत्र के लिए अशुभ बताते हुए भी यह कहा कि, ‘देश नेताओं की ओर देखता है, वे जो कहते-करते हैं, वह मिसाल बनता है। वे समाज को सकारात्मक संदेश देने वाले होने चाहिए।’ ऐसे में राजनीतिक दलतंत्र को भी जिम्मेदार बनाए जाने की आवश्यकता है। सभी दल अपने कार्यकर्ताओं को संसदीय प्रणाली और आचार व्यवहार का प्रशिक्षण दे सकते हैं। यह समय की मांग है। आदर्श संसदीय गति में ही राष्ट्र की प्रगति है।
Date:27-02-23
बेहतर इस्तेमाल के लिए भूमि क्षरण रोकना जरूरीसुरिंदर सूद
इस ‘महीने के आरंभ में पर्यावरण एवं जलवायु स्थिरता पर जी-20 देशों के कार्यशील समूह की बैठक हुई थी। इस बैठक में भूमि क्षरण रोकने को शीर्ष प्राथमिकताओं में शामिल किया गया था। यह विषय भारत के दृष्टिकोण से भी काफी महत्त्वपूर्ण है। भारत में कुल क्षेत्रफल के केवल 2.4 प्रतिशत हिस्से में कृषि कार्य होते हैं मगर यह दुनिया की 18 प्रतिशत आबादी के लिए खाद्यान्न का उत्पादन करता है। मगर इससे भी बड़ी चिंता की बात यह है कि भारत में इस कृषि योग्य भूमि के एक बड़े हिस्से की उत्पादकता एवं फसल को मजबूती देने की क्षमता कुप्रबंधन और अंधाधुंध मानवीय क्रियाकलापों के कारण समाप्त ही चुकी है। यह बड़ी संख्या में किसानों और अपनी आजीविका के लिए वन पर निर्भर लोगों लोगों के लिए शुभ संकेत नहीं है। भारत में प्रति हेक्टेयर कृषि योग्य भूमि की उपलब्धता 1950 में 0.48 लाख हेक्टेयर थी, जो अब कम होकर मात्र 0.16 हेक्टेयर रह गई है | यह 0.29 हेक्टेयर के वैश्विक औसत की तुलना में अत्यधिक कम है।
पिछले दो दशकों के दौरान लगभग सभी राज्यों में भूमि क्षरण बढ़ा है। खासकर, जैव-विविधता से परिपूर्ण मगर पारिस्थितिकी तंत्र के लिहाज से संवेदनशील देश के पूर्वोत्तर भाग में जमीन की गुणवत्ता का सर्वाधिक ह्रास हुआ है। देश के अन्य हिस्सों की बात करें तो मिट्टी एवं जलवायु संबंधी कारणों से राजस्थान में भूमि-क्षरण का खतरा सबसे अधिक रहता है और उसके बाद इस कड़ी में महाराष्ट्र और गुजरात आते हैं। देश में कोई भी राज्य भूमि – क्षरण के खतरे से अछूता नहीं है, बस कारण अलग-अलग हो सकते हैं। भूमि क्षरण के कई कारण हो सकते हैं जिनमें जंगल उजड़ना, भूमि के इस्तेमाल में अविवेकपूर्ण बदलाव, भूमि पर क्षमता से अधिक दबाव, त्रुटिपूर्ण कृषि कार्य, रासायनिक उर्वरकों का बेतहाशा इस्तेमाल, एक सीमा से अधिक जुताई और प्राकृतिक आपदा आदि शामिल है।
आश्चर्य की बात यह है कि हमारे पास इसे लेकर कोई निश्चित आंकड़ा नहीं है कि देश में कितना हिस्सा भूमि क्षरण के कारण प्रभावित हो रहा है। इस संबंध में जो अनुमान लगाए गए हैं वे अलग-अलग हैं और 10 लाख हेक्टेयर से कम से लेकर 30 लाख हेक्टेयर से अधिक के बीच हैं। ये अनुमान जमीन को वर्गीकृत करने के विभिन्न मानदंडों एवं विधियों पर आधारित हैं। यहां तक कि राष्ट्रीय मृदा सर्वेक्षण एवं भूमि नियोजन ब्यूरो और स्पेस ऐप्लिकेशन सेंटर (एसएसी) जैसी प्रतिष्ठित संस्थाओं के अनुमान भी एक दूसरे से भिन्न हैं। राष्ट्रीय मृदा सर्वेक्षण एवं भूमि नियोजन ब्यूरो ने भूमि क्षरण का अनुमान 14.7 करोड़ हेक्टेयर (देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र 32.887 करोड़ हेक्टेयर) लगाया है जबकि एसएसी ने यह आंकड़ा 9.64 करोड़ हेक्टेयर (कुल क्षेत्रफल का 29.3 प्रतिशत) रहने की बात कही है। नैशनल रेनफेड एरिया अथॉरिटी ऑफ इंडिया के अनुसार देश में भूमि क्षरण का आंकड़ा 12.1 करोड़ हेक्टेयर है, जो कुल क्षेत्रफल का 36.8 प्रतिशत है। इन तमाम आंकड़ों पर विचार करने के बाद यह माना जा सकता है कि देश की भूमि का करीब एक तिहाई हिस्सा अपनी गुणवत्ता खो चुका है।
अच्छी बात यह है कि देश में सरकारों को इस गंभीर विषय की जानकारी थी और न ही उनमें इस समस्य से निपटने के लिए इच्छाशक्ति की कमी थी। हां, यह प्रश्न अवश्य पूछा जा सकता है कि इस समस्या से निपटने के लिए जो प्रयास उन्होंने किए थे क्या वे काफी थे ? भारत दुनिया के उन 123 देशों में शामिल रहा है जिन्होंने 2030 तक भूमि क्षरण नियंत्रित करने का लक्ष्य तय किया है। इसका आशय यह है कि भूमि की है गुणवत्ता को उस स्तर तक ले जाना है जहा जैव-विविधता बनाए रखने के साथ खाद्य सुरक्षा संबंधी एवं अन्य जरूरतें पूरी होने के साथ ही सामान्य पारिस्थितिकी तंत्र से जुड़ी गतिविधियां सुचारु ढंग से चलती रहे। शुरू में भारत ने भूमि बहाली (लैंड रेस्टोरेशन) 2.1 करोड़ हेक्टेयर रखा था मगर 2029 में आयोजित यूनाइटेड नेशंस कन्वेंशन टू कॉम्बेट डिजर्टीफिकेशन पर 14वें कॉन्फरेंस ऑफ पार्टीज में यह लक्ष्य बढ़ाकर 2.6 करोड़ हेक्टेयर कर दिया था।
हालांकि पारिस्थितिकी तंत्र विशेषज्ञों के अनुसार यह लक्ष्य सरलता से प्राप्त किया जा सकता है मगर उनके अनुसार यह लक्ष्य पर्याप्त नहीं है । वैसे भूमि की गुणवत्ता में सुधार पर केंद्रित कई कार्यक्रम चल रहे हैं और इसके कुछ सकारात्मक परिणाम भी मिल रहे हैं। इंटरनैशनल यूनियन फॉर कन्जर्वेशन ऑफ नेचर की तरफ से जारी एक नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार भारत ने 2011-2018 के बीच 98 लाख हेक्टेयर जमीन की गुणवत्ता बहाल करने में कामयाब रहा है। इस तरह सालाना औसत दर 14 लाख हेक्टेयर जमीन रही है। अगर इसे और गति दे दी जाए तो 2030 तक 2.6 करोड़ हेक्टेयर जमीन की गुणवत्ता बहाल करने का लक्ष्य आसानी से हासिल किया जा सकता है।
मगर केवल यह लक्ष्य हासिल करना एक मात्र उद्देश्य नहीं हो सकता। यह लक्ष्य हासिल हो जाता है तब भी जमीन के एक बड़े हिस्से की गुणवत्ता कमजोर ही रहेगी । पुनर्ग्रहीत भूमि की स्थिरता एवं निरंतरता सुनिश्चित किए बिना भूमि बहाली का कार्य पूरा नहीं माना जाएगा। इसके साथ ही मौजूदा सामान्य जमीन के भौतिक, रासायनिक एवं जैविक स्वास्थ्य की रक्षा भी जरूरी है। हालांकि भूमि पुनर्ग्रहण पर आने लागत की तुलना में इसके फायदे को देखते हुए यह कार्य किए जाने योग्य है। वैश्विक अनुभव बताते हैं कि भूमि बहाली के लाभ भूमि पुनर्ग्रहण पर आने वाली लागत और भूमि क्षरण के दुष्परिणामों का 10 गुना तक हो सकते हैं।
एक अनुमान के अनुसार भारत में वर्ष 2014-15 के बीच भूमि क्षरण और भूमि के इस्तेमाल के प्रारूप में बदलाव से 3.17 लाख करोड़ रुपये का आर्थिक नुकसान हुआ है। यह आंकड़ा उस वर्ष के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 2.5 प्रतिशत के बराबर है। इस तरह, इतने भारी नुकसान से बचने के लिए भूमि सुधार के कार्यों में निवेश करना जरूरी है। हालांकि भूमि क्षरण से उत्पन्न समस्याओं का दीर्घावधि का समाधान खोजने के लिए भूमि की क्षमता के अनुसार उसके वर्गीकरण के आधार पर के एक समझ-बूझ वाली जमीन इस्तेमाल की नीति लागू करना जरूरी है।
Date:27-02-23
युद्ध से आहत विज्ञानसंपादकीय
यह युद्ध या संघर्ष के लिए लालायित लोगों के लिए सीखने का समय है। पहले कोरोना महामारी और उसके बाद रूस-यूक्रेन युद्ध, लगभग तीन साल से विज्ञान कुछ ज्यादा ही मुसीबतों से गुजर रहा है। दुनिया में सरकारों ने जिस गति से व्यापार को बहाल किया है, उस गति से विज्ञान के लिए काम नहीं हो पाया है। लगभग हर विज्ञान पत्रिका में शोध अभियानों और प्रयोगशालाओं पर हुए प्रहार संबंधी रिपोर्टें प्रकाशित हो रही हैं। ध्यान रहे, 24 फरवरी, 2022 को रूस ने डोनेत्स्क और लुहांस्क क्षेत्रों के स्वामित्व का दावा करते हुए यूक्रेन के पूर्वी क्षेत्रों पर आक्रमण किया। अब इसमें कोई शक नहीं है कि यह आधुनिक यूरोपीय इतिहास के सबसे बड़े सैन्य संघर्षों में से एक हो गया है। इस युद्ध ने शिक्षा और विज्ञान को सर्वाधिक प्रभावित किया है। यूक्रेन में अनुसंधान से जुड़ी लगभग 27 प्रतिशत इमारतें क्षतिग्रस्त या नष्ट हो गई हैं। इस देश के प्रमुख वैज्ञानिक अनुसंधान केंद्र, जैसे खारकीव इंस्टीट्यूट ऑफ फिजिक्स ऐंड टेक्नोलॉजी या दुनिया का सबसे बड़ा डेकामीटर-वेवलेंथ रेडियो टेलीस्कोप बर्बाद हो चुका है। इतना ही नहीं, यूक्रेन के मानव संसाधन को भी युद्ध में लगाया जा रहा है। वैज्ञानिकों को भी युद्ध संबंधी काम दे दिए गए हैं। रसायन विज्ञान, जीव विज्ञान और दूरसंचार में डिग्री रखने वाले यूक्रेनी युवाओं व अन्य लोगों के लिए सैन्य सेवा लगभग अनिवार्य कर दी गई है।
खुद को बहुत मजबूत समझने वाले हमलावर रूस का भी बुरा हाल है। युद्ध से पहले रूसी वैज्ञानिकों को दुनिया में हाथों-हाथ लिया जाता था, पर युद्ध के बाद पश्चिमी देशों ने रूस का बहिष्कार कर दिया है। रूसी अनुसंधान को बाहर से जो मदद मिल रही थी, वह भी लगभग बंद हो गई है। रूस में भी वैज्ञानिक अनुसंधान में लगे ज्यादातर लोगों को सामरिक सेवाओं के लिए मजबूर होना पड़ा है। यूरोपीय संगठन के तहत सेवा में लगे हजारों रूसी वैज्ञानिक इस साल अपना अनुबंध गंवाने वाले हैं। रूस अगर युद्ध में लगा रहा, तो वह विज्ञान के मोर्चे पर दशकों पिछड़ जाएगा। हालांकि, वह चीन और कुछ अन्य देशों से मदद ले रहा है, पर इतना पर्याप्त नहीं होगा।
एक बड़ा खतरा यूरोप के वैज्ञानिक संस्थानों को भी है। यह बात सर्वज्ञात है कि लगभग आधा यूरोप ऊर्जा के लिए रूस पर निर्भर है। दुनिया के सबसे शक्तिशाली एक्स-रे लेजर का घर बिजली की बढ़ती लागत से जूझ रहा है। यूरोपीय देश ऊर्जा का विकल्प तलाश रहे हैं, लेकिन इसमें कुछ समय लगेगा। पुतिन की हठधर्मिता अगर जारी रहती है, तो यूरोप रूस पर अपनी निर्भरता घटाते जाने को मजबूर होगा और इससे यूरोप ही नहीं, पूरी दुनिया में रूस का महत्व घट जाएगा। रूसी वैज्ञानिकों को दुनिया में कहीं भी सम्मेलनों में शामिल होने से रोका जाने लगा है, इसका एक बड़ा दुष्प्रभाव यह होगा कि योग्य व समर्पित वैज्ञानिक देश छोड़ने के लिए मजबूर हो जाएंगे। अकादमिक पतन के बाद रूस खुद को ब्रेन ड्रेन की नई लहर से बचा नहीं पाएगा। एक थोड़ा सकारात्मक पक्ष भी है, यह यूक्रेन के लिए फायदे की बात है कि उसके लगभग 6,000 वैज्ञानिक दुनिया के दूसरे देशों में शोध सुविधाओं का सर्वोत्तम लाभ उठा रहे हैं। यूक्रेन के वैज्ञानिकों के सहयोग के लिए दुनिया के तमाम संस्थान आगे आए हैं, जिससे यूक्रेन आने वाले समय में ज्यादा मजबूत होकर सामने आएगा। यूक्रेन को युद्ध के लिए ही नहीं, बल्कि वैज्ञानिक विकास के लिए भी आर्थिक मदद मिल रही है। बेहतरी इसी में है कि रूस युद्ध खत्म करने की राह जल्दी निकाले।
Date:27-02-23
सीमा पर बसे लोगों और गांवों को सशक्त बनाने का समयअनिल बलूनी, ( सांसद व मीडिया प्रमुख, भाजपा )
मैं सीमावर्ती राज्य उत्तराखंड से आता हूं। मैं जब भी उत्तरकाशी, चमोली, पिथौरागढ़ और चंपावत जिलों के सीमावर्ती गांवों में जाता था, तो वहां के पलायन की भयावह तस्वीर देखकर तरह-तरह की आशंकाएं मेरे मन में उत्पन्न होने लगती थीं, क्योंकि चीन की सीमा से सटे कई गांव तो बिल्कुल खाली हो गए थे। जब भी हमारी सीमा के आसपास चीनी सैनिकों की संदिग्ध गतिविधियां होती थीं, तो स्थानीय ग्रामीण ही इसकी जानकारी हमारी सुरक्षा एजेंसियों को देते थे, पर सीमा से सटे हुए गांव के खाली हो जाने की सूरत में सीमा पर अतिक्रमण की आशंकाएं प्रबल होने लगी थीं। कमोबेश यही हाल सीमा से लगे पूर्वोत्तर सहित देश के अन्य राज्यों का भी था। दुर्भाग्य की बात है कि कांग्रेस की सरकारों के समय सीमा का विकास नहीं करना ही नीति बन गई थी। इससे देश को काफी नुकसान हुआ, इसलिए इस दिशा में कंक्रीट प्लान बनाने की जरूरत थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ‘वाइब्रेंटविलेज प्रोग्राम’ देश की इसी जरूरत का उत्तर है, जो सीमावर्ती इलाकों के विकास और राष्ट्रीय सुरक्षा को सुदृढ़ करने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा।
पहले जिन इलाकों को सीमाओं का अंत मानकर नजरंदाज किया जाता था, वहीं से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने देश की समृद्धि का आरंभ मानकर काम शुरू किया। उन्होंने पिछले वर्ष अक्तूबर में माणा में कहा था कि उनके लिए सीमा पर बसा हर गांव देश का पहला गांव है। वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम का मुख्य उद्देश्य वास्तविक नियंत्रण रेखा के समीप स्थित गांवों में बुनियादी ढांचे को मजबूत कर आवासीय सुविधाओं को उन्नत बनाना है, ताकि प्रवासन को रोका जा सके। इसमें पानी, बिजली, सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य, संचार जैसी मूलभूत सुविधाओं के विस्तार और आजीविका विकास पर मुख्य रूप से ध्यान केंद्रित किया गया है। सीमांत गांवों में हर घर तक दूरदर्शन और शिक्षा संबंधित चैनलों की सीधी पहुंच भी सुनिश्चित की जाएगी। इससे आने वाले दिनों में चीन, पाकिस्तान, नेपाल, बांग्लादेश, म्यांमार, भूटान की सीमा से सटे गांवों की न सिर्फ तस्वीर बदलेगी, बल्कि वहां से पलायन भी रुक सकेगा।
वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम के कंसेप्टको 2022-23 के बजट में अंगीकार किया गया था। तब इस प्रोग्राम के लिए सीमा सड़क संगठन के बजट में 40 प्रतिशत की वृद्धि करते हुए 3,500 करोड़ रुपये कर दिया गया। इस बार के बजट में भी 43 प्रतिशत की वृद्धि के साथ सीमा सड़क संगठन के बजट को बढ़ाकर 5,000 करोड़ रुपये कर दिया गया है। देश के पांच राज्यों के 2,962 गांवों को इस योजना के तहत विकसित किया जाएगा।
भारत के सीमावर्ती गांव कांग्रेस सरकार की गलत नीतियों के कारण वर्षों से विकास से दूर रहे। इसका फायदा देश के दुश्मनों ने उठाया। न सिर्फ हमारी सीमा तक उनकी पहुंच आसान हो गई, बल्कि अवैध घुसपैठ की समस्या भी खड़ी हो गई। दूसरी ओर, चीन ने भारत से सटे इलाकों में अपना प्रभाव बढ़ाया, अपने बुनियादी ढांचे का तेजी से विकास किया, सैन्य गतिविधियां भी बढ़ाई और भारत की सीमा से सटे अपने इलाके में गांवों को बसाने की भी योजना शुरू की। साल 2018 में संसद की स्थायी समिति ने भी सीमावर्ती इलाकों में निरक्षरता, पिछड़ापन, गरीबी और सुविधाओं की कमी को देखते हुए उनके विकास का सुझाव दिया था। विविधता में एकता के साथ ही ‘एक भारत श्रेष्ठ भारत’ की परिकल्पना को साकार रूप देने के लिए स्नेह मिलन, विलेज टूरिज्म और वाइब्रेंट बॉर्डर टूरिज्म की पहल की गई है। इन कार्यक्रमों से देश की भाषा और संस्कृति का ज्यादा से ज्यादा प्रचार-प्रसार हो सकेगा और एकजुटता को बढ़ावा भी मिलेगा।
प्रधानमंत्री ने वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम को मजबूती देने के लिए पार्टी स्तर पर योजनाएं बनाने का आग्रह किया था। उनके आह्वान पर राष्ट्रीय अध्यक्ष जे पी नड्डा के नेतृत्व में सीमावर्ती गांवों तक पार्टी की पहुंच सुनिश्चित करने और वहां के लोगों से संपर्क स्थापित करने की कई योजनाएं बनीं। नहीं भूलना चाहिए कि सीमा पर बसे लोग देश के अग्रणी और सशक्त प्रहरी हैं। उन्हें पहली बार एहसास हो रहा है कि देश की सरकार उनकी चिंता कर रही है। यही बदलते भारत की कहानी है।
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भारत में मोटे अनाज को बहुत अधिक बढ़ावा दिया जा रहा है। इसी दिशा में भारत को विश्व.हब बनाने के उद्देश्य से सरकार ने बजट में भी इस पर प्रकाश डाला है। इसमें कोई दो राय नहीं है कि मोटे अनाज का उत्पादन और घरेलू उपभोग बढ़ाने से पोषण और पर्यावरण, दोनों को ही लाभ पहुंच सकता है। साथ ही, निर्यात भी बढ़ सकता है।
इस उद्देश्य को लेकर आने वाली चुनौतियों पर कुछ बिंदु –
हालांकि इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है, क्योंकि 2013 में सरकार ने खेती को विविध करने के उद्देश्य से पंजाब, हरियाणा और पश्चिम उत्तर प्रदेश जैसे मुख्य हरित क्रांति वाले राज्यों को धान के रकबे से दूर कर दिया था। हरियाणा सरकार ने भी धान से भिन्न फसल के लिए 7000/प्रति एकड़ नकद सब्सिडी का प्रस्ताव दिया था। ये तरीके विफल रहे थे।
अतः जब तक किसानों को मोटे अनाज के लिए सही मूल्य मिलने की गारंटी नहीं दी जाती है, तब तक वे इसकी पैदावार क्यों करना चाहेंगे। सरकार को चाहिए कि भारत को मोटे अनाज का वैश्विक हब बनाने के लिए किसानों को आर्थिक प्रोत्साहन देना शुरू करे।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 6 फरवरी, 2023
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Date:25-02-23
डिजिटल इंडिया के साथ एथिकल इंडिया भी होसंपादकीय
इंदौर में एक महिला प्रिंसिपल को एक छात्र ने पेट्रोल छिड़क कर जला दिया। कर्नाटक में एक डिलीवरी बॉय को आईफोन का पेमेंट मांगने पर चाकू मारा गया। डिजिटल इंडिया आधुनिक भारत का प्रतीक है लेकिन ये घटनाएं मूल्य शून्य होते भारत की एक नई इबारत भी लिख रही हैं। भारतीय समाज में मूल्यों, खासकर हजारों साल के अनुभव के आधार पर बनाए गए सकारात्मक मूल्यों का तेजी से अवसान हो रहा है। ऑनलाइन आर्डर देने पर गरम पिज्जा की 15 मिनट में डिलीवरी को भारत का विकास मानने वाला युवक मूल्य-विहीन और सोचने की शक्ति खोता हुआ मात्र एक कंज्यूमर बन गया है। दरअसल देश में मूल्यों के प्रति बच्चों में आग्रह और प्रतिबद्धता स्थापित करने वाली संस्थाएं इस दौर में विलुप्त हो गई हैं। यह स्थिति मल्टीनेशनल कॉर्पोरेट वर्ल्ड के लिए लाभकारी है, क्योंकि 13 घंटे रोज काम के बदले भारतीय पैमाने से ज्यादा पगार देकर वह एक ‘शिक्षित बंधुआ मजदूरों की फौज सहज में हासिल कर लेता है। मार्केट फोर्सेज को भी ऐसा ही उपभोक्ता चाहिए। लेकिन उपरोक्त घटनाएं यह बताती है कि देश उपभोक्ता समाज तो बन जाएगा, लेकिन व्यक्तिगत शांति और सामाजिक सौहार्द जिसे सामाजिक पूंजी (सोशल कैपिटल ) कहते हैं, जाती रहेगी। यानी व्यक्ति के ‘आत्मिक सुख’ की मात्रा क्षीण होती जाएगी। नैतिक मूल्य-विहीन समाज सुखी नहीं रह सकता।
Date:25-02-23
अच्छी नौकरियां तलाशने के तरीके भी अब बदल रहे हैंपंकज बंसल Taggd, ( डिजिटल रिक्रूटमेंट प्लेटफॉर्म और वर्क यूनिवर्स के सह-संस्थापक )
परम्परागत रूप से नौकरियों की तलाश में उम्मीदवारों को स्थानीय अखबारों और टेम्प एजेंसियों पर निर्भर रहना पड़ता था। ये प्रणालियां शायद आज भी उपयोगी हों, लेकिन अब वे जॉब-सीकर्स को पहले जितने अवसर मुहैया नहीं कराती हैं। इंटरनेट ने क्रांतिकारी बदलाव ला दिए हैं। वर्ष 2022 में लगभग 80 प्रतिशत जॉब-सर्च ऑनलाइन किए गए थे और कम्पनियों से उम्मीदवारों का सम्पर्क स्थापित करने में जॉब बोर्ड्स अहम भूमिका निभा रहे थे। उसी साल हर माह 25 करोड़ से ज्यादा यूनीक विजिटर्स भी दर्ज किए गए। लेकिन करियर की शुरुआत में ये प्लेटफॉर्म भले बहुत काम के साबित हों, उनकी अपनी सीमाएं भी हैं। वे बहुत औपचारिक हैं, भीड़भरे हैं, रिक्रूटर्स को अच्छी सीवी क्वालिटी नहीं मुहैया कराते और आज के समय की बदलती भूमिकाओं के लिए उपयुक्त नहीं हैं। ऐसे में आपको जॉब बोर्ड्स के परे जाना होगा। लेकिन कैसे? इसका जवाब नेटवर्किंग में है। मौजूदा दौर के 85 प्रतिशत से ज्यादा जॉब्स नेटवर्किंग के माध्यम से ही मिल रहे हैं। अपना पेशेवर नेटवर्क बनाने और नौकरियां तलाशने के लिए ये चार तरीके कारगर साबित हो सकते हैं :
1. टैलेंट कम्युनिटीज़ : ये समान पेशेवर रुचियों वाले व्यक्तियों के नेटवर्क्स हैं। वे अपने सदस्यों को उनकी स्किल्स दिखाने और वेबिनार, वर्कशॉप, कोर्सेस के जरिए इंडस्ट्री-विशेषज्ञों से संवाद करने का अवसर मुहैया कराते हैं। कम्युनिटी-माहौल से नियोक्ता और कर्मचारी को एक यूनीक नेटवर्किंग अनुभव मिलता है और उनके लिए एक-दूसरे से जुड़ना सरल हो जाता है। कम्पनियां भी ऐसी कम्युनिटीज़ में जॉब-ओपनिंग्स के बारे में पोस्ट करना पसंद करती हैं। उनके हाई-इंगेजमेंट के स्तरों के कारण दोनों पक्षों को जॉब-फिटनेस के बारे में राय बनाने का मौका मिलता है और परिणामस्वरूप साक्षात्कार आदि की प्रक्रियाएं सरल हो जाती हैं। नैस्कॉम (आईटी) और सियाम (ऑटोमोबाइल्स) जैसे इंडस्ट्री-फोरम के पास पेशेवर नेटवर्किंग को बढ़ावा देने वाली कम्युनिटीज़ हैं। आप टैग्ड के करियर सर्कल्स जैसे पीयर-नेटवर्कों का भी लाभ ले सकते हैं, जिनके पास फार्मास्युटिकल्स, आईटी, ऑटोमोबाइल आदि के लिए कम्युनिटीज़ हैं।
2. सिफारिशें : जॉब-रेफरेंस भी एक भरोसेमंद स्रोत है, जिसका इस्तेमाल कम्पनियों के द्वारा नियुक्तियों के लिए किया जाता है। यह एक तरह की वर्ड-ऑफ-माउथ मार्केटिंग है। अगर आप किसी ऐसी कम्पनी में काम करना चाहते हैं, जहां कोई आपको जानता है और आपकी जॉब-स्किल्स की पुष्टि कर सकता है तो उनसे आपको रिकमेंड करने का अनुरोध करें। कम्पनी आपकी प्रोफाइल पर खुशी से विचार करेगी। अध्ययनों में पाया गया है अधिकतर कम्पनियां ऐसे ही रेफरल्स के जरिए 40% कर्मचारियों की नियुक्ति करती हैं। सिफारिशी उम्मीदवारों की नियुक्ति की सम्भावना दूसरों से चार गुना अधिक होती है। ऑटोमोटिव, बीएफएसआई, आईटी, मैन्युफेक्चरिंग जैसी इंडस्ट्रीज़ तो सिफारिशों पर बहुत निर्भर करती हैं।
3. सोशल मीडिया : 2022 में 73% मिलेनियल्स को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों के जरिए काम मिला। 66% नियोक्ता नियमित रूप से सोशल मीडिया पर भर्तियों के बारे में पोस्ट करते हैं। लिंक्डइन इसमें सबसे भरोसेमंद रिक्रूटमेंट चैनल है, जिसके बाद फेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम का नम्बर आता है। सोशल मीडिया के जरिए सफलतापूर्वक नौकरियां खोजने के लिए यह जरूरी है कि आप वहां अपनी मौजूदगी कायम रखें और अपनी प्रोफाइल को अपडेट करते रहें।
4. वॉट्सएप्प : एक और लोकप्रिय साधन है वॉट्सएप्प। आपके फोन में मौजूद यह चैट मैसेंजर अपने नियोक्ताओं के द्वारा ग्रुप बनाकर भर्तियों के बारे में सूचनाएं फॉरवर्ड करने के लिए उपयोग किया जाता है। आईटी, एचआर, फाइनेंस, एडमिन भूमिकाओं के लिए सहायकों की तलाश में यह बहुत लोकप्रिय है।
अब सरकार भी ऐसा नया प्लेटफॉर्म विकसित कर रही है, जो नौकरियों की तलाश करने वालों को अपनी प्रतिभा दिखाने का मौका देगा। इसे स्किल्स का यूपीआई भी कहा जा सकता है और जॉब-सीकर्स को इस पर नजर रखना चाहिए। अगर आप नए काम की तलाश कर रहे हैं या करियर में बदलाव के बारे में विचार कर रहे हैं तो जॉब बोर्ड्स के परे जाकर डिजिटल जॉब मार्केट की पूर्ण सम्भावनाओं का अनुभव करना जरूरी है। इतनी सारी चैनल्स पर सक्रिय रहना भले मुश्किल लगे, दृढ़ता और धैर्य के फल हमेशा मीठ होते हैं!
Date:25-02-23
पंजाब में खतरे की घंटीसंपादकीय
पंजाब के अजनाला थाने में अपने एक साथी को रिहा कराने पहुंचे खालिस्तान समर्थकों की अराजकता के आगे पंजाब पुलिस जिस तरह असहाय दिखी, उससे उन दिनों का स्मरण हो आया, जब खालिस्तानी आतंकवाद चरम पर था। इन खालिस्तानी समर्थकों के हमले में पंजाब पुलिस के कई सिपाही गंभीर रूप से घायल हो गए और फिर भी पुलिस अधिकारी उस व्यक्ति को रिहा करने पर सहमत हो गए, जिसे अपहरण और मारपीट के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। किसी के लिए भी समझना कठिन है कि पंजाब पुलिस ने खालिस्तानी समर्थक और वारिस पंजाब दे नामक संगठन के प्रमुख अमृतपाल सिंह के नेतृत्व में हुई अराजकता के आगे इस तरह समर्पण क्यों कर दिया? इस प्रश्न का उत्तर पंजाब सरकार को भी देना चाहिए। इसलिए और भी, क्योंकि पुलिस पर हमला करने वालों पर कोई मामला दर्ज नहीं किया गया। खालिस्तानी समर्थक जिस समय अजनाला थाने पर चढ़ाई करने में लगे हुए थे, उस समय पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान मोहाली में निवेशकों को आकर्षित करने में लगे हुए थे। आखिर ऐसे माहौल में कौन पंजाब में निवेश करने को तैयार होगा? मान सरकार को यह पता होना चाहिए कि राज्य में कानून एवं व्यवस्था को जिस तरह चुनौती मिल रही है, उसके चलते निवेशक पहले से ही पंजाब से मुंह मोड़ने में लगे हुए हैं। पंजाब में सक्रिय खालिस्तान समर्थक एक ओर जहां कानून एवं व्यवस्था को चुनौती देने में लगे हुए हैं, वहीं दूसरी ओर नशे के सौदागर भी बेलगाम बने हुए हैं। इस सबसे रंगला पंजाब एक खोखला नारा भर बनता जा रहा है।
पंजाब में एक अर्से से खालिस्तान समर्थकों की सक्रियता बढ़ती जा रही है, लेकिन राज्य सरकार उन पर लगाम लगाने की इच्छाशक्ति का प्रदर्शन नहीं कर रही है। परिणाम यह है कि वे और अधिक दुस्साहसी होते जा रहे हैं। उन्होंने जिस तरह धार्मिक प्रतीकों की आड़ में अजनाला थाने पर धावा बोला, वह उनके दुस्साहस का भी परिचायक है और इसका भी कि वे उन्हीं तौर-तरीकों को अपना रहे हैं, जो भिंडरांवाले ने अपनाए थे। यह और कुछ नहीं खतरे की एक बड़ी घंटी है। पंजाब सरकार और उसकी पुलिस को तो चेतना ही होगा, राज्य के राजनीतिक एवं सामाजिक संगठनों को भी सजग होना होगा। यह शुभ संकेत नहीं कि कुछ राजनीतिक-सामाजिक संगठन खालिस्तान समर्थकों की अतिवादी गतिविधियों पर मौन रहना पंसद कर रहे हैं। इनमें से कुछ वे भी हैं, जिन्होंने अतीत में खालिस्तानी तत्वों को हवा दी थी। इसके कैसे भयावह नतीजे हुए, यह किसी से छिपा नहीं। चूंकि पंजाब में अराजकता का सहारा ले रहे तत्वों से जैसी सख्ती से निपटा जाना चाहिए, वैसी सख्ती नहीं दिखाई जा रही है, इसलिए केंद्र सरकार को भी चेतना चाहिए। इसलिए और भी, क्योंकि खालिस्तानी समर्थक देश के बाहर भी बेलगाम हो रहे हैं।
Date:25-02-23
सामाजिक पूंजीटी. एन. नाइनन
हाल के वर्षों में सरकार के बजट की एक आम आलोचना यह रही है कि उसका ध्यान हमेशा पूंजीगत निवेश पर केंद्रित रहता है और सामाजिक क्षेत्रों की अनदेखी की जाती है। उदाहरण के लिए सामाजिक क्षेत्रों की इस अनदेखी को रोजगार गारंटी योजना के वास्ते घटते आवंटन और शिक्षा के बजट में ठहराव में देखा जा सकता है। यह स्थिति तब है जब पात्र आयु वाले बच्चों में से 20 फीसदी माध्यमिक शिक्षा पूरी नहीं कर पाते, बीते कई सालों से प्राथमिक और सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों की संख्या वैसी की वैसी है और वास्तविक ग्रामीण पारिश्रमिक अभी भी महामारी के पहले वाले स्तर पर ही है।
वर्ष 2022-23 की आर्थिक समीक्षा में इस आलोचना को लेकर प्रतिक्रिया दी गई है। उसमें उपरोक्त सभी बातों को दर्ज करने के साथ ही यह भी दिखाया गया है कि तस्वीर केवल काली या सफेद नहीं है बल्कि उसके और भी पहलू हैं। ध्यान देने वाली बात है कि कुल सरकारी व्यय में सामाजिक क्षेत्र पर होने वाला सामान्य सरकारी व्यय (केंद्र और राज्यों का मिलाकर) लगातार बढ़ रहा है। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के प्रतिशत के रूप में भी इसमें इजाफा हो रहा है। वर्ष 2015-16 और 2022-23 (बजट अनुमान) के बीच जीडीपी हिस्सेदारी 6.6 फीसदी से बढ़कर 8 फीसदी हो गई (समीक्षा में कहा गया है कि यह 8.3 फीसदी हो गई क्योंकि उसके पास वर्तमान मूल्य पर जीडीपी के नए आंकड़े नहीं हैं)। इस बढ़ोतरी के साथ स्वास्थ्य की हिस्सेदारी बढ़ रही है जबकि शिक्षा में स्थिरता है।
इसका परिणाम यह हुआ कि स्वास्थ्य मानकों में सुधार हुआ तथा परिवारों को पानी और बिजली की उपलब्धता का दायरा बढ़ा। दुर्भाग्यवश आंकड़े अक्सर थोड़ा पुराने होते हैं। कई बार आंकड़े विरोधाभासी भी होते हैं। उदाहरण के लिए नमूना पंजीयन प्रणाली के मुताबिक 2020 में नवजात मृत्यु के मामले प्रति 1,000 में 28 थे जबकि राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) के 2019-21 के आंकड़ों में यह 38.4 है। इनमें से किस पर भरोसा किया जाए? एक रुझान के अनुसार विभागीय आधार पर प्रस्तुत ‘उत्पादन’ के दावे हमेशा स्वतंत्र सर्वेक्षणों में हासिल ‘निष्कर्षों’ से मेल नहीं खाते। उदाहरण के लिए स्वच्छ भारत की सार्वभौमिक पहुंच के दावों के बावजूद एनएफएचएस से पता चलता है कि बेहतर सफाई तक परिवारों की पहुंच 65 फीसदी से ऊपर नहीं गई है। उज्ज्वला योजना के तहत घरेलू गैस उपलब्ध कराने के तमाम लाभों की बात के बावजूद स्वच्छ ऊर्जा केवल 43 फीसदी परिवारों को उपलब्ध है।
संदर्भ बिंदुओं का भी मुद्दा है। प्रगति जांचने का एक तरीका है अतीत के साथ तुलना करना। एक और तरीका है अंतरराष्ट्रीय मानकों का इस्तेमाल करना। ऐसा करना कभी-कभी दिक्कतदेह हो सकता है। संजीव सान्याल इकनॉमिक टाइम्स में बच्चों के ठिगनेपन और कम वजन को लेकर विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों तथा अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन की महिलाओं की श्रम शक्ति भागीदारी की परिभाषा के मामले में इस बात को जोर देकर कहते हैं। पहले मामले में भारत के आंकड़े अस्वाभाविक रूप से ऊंचे है जबकि दूसरे में अस्वाभाविक रूप से कम।
यह बात ध्यान देने लायक है कि संयुक्त राष्ट्र मानव विकास सूचकांक में भारत की रैंकिंग वर्षों से कमोबेश एक जैसी बनी हुई है। इससे संकेत मिलता है कि हम न तो अन्य देशों से अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं और न ही बुरा। हालांकि उनमें से अधिकांश की वृद्धि दर भारत की तुलना में कमजोर है। इस सदी के दूसरे दशक में मानव विकास सूचकांक में भारत की प्रगति धीमी पड़ी है। हम इस मामले में मध्यम श्रेणी में ही बने हुए हैं। वियतनाम जैसे देश पहले ही ‘उच्च’ श्रेणी में पहुंच चुके हैं लेकिन भारत को मौजूदा दर पर वहां तक पहुंचने में यह पूरा दशक लग सकता है। कई सरकारी कार्यक्रमों को जहां उल्लेखनीय कामयाबी मिली है वहीं समग्र प्रदर्शन में सुधार नहीं हुआ है।
कई प्रकार के आंकड़ों के प्लेटफॉर्म के निर्माण का उल्लेख भी किया जाना चाहिए जिन्हें समीक्षा में सूचीबद्ध किया गया है। विभिन्न सरकारी कार्यक्रमों को इन्हीं पर निर्भर किया जाता है। 1,000 से अधिक केंद्र और राज्य सरकार की योजनाओं के तहत प्रत्यक्ष नकदी अंतरण के लिए इस्तेमाल होने वाले आधार तथा अत्यधिक सफल यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस के अलावा असंगठित क्षेत्र में श्रमिकों, छोटे कारोबारों, डिजिटल कारोबार आदि के पंजीयन के लिए तमाम प्लेटफॉर्म हैं। उदाहरण के लिए इनमें से कुछ आंकड़े मसलन वस्तु एवं सेवा कर चुकाने वालों के पंजीयन दोगुने होने का आंकड़ा आदि का इस्तेमाल कारोबारों के आकार और वृद्धि का हिसाब रखने के लिए किया गया है। परंतु व्यापक विश्लेषण के लिए ऐसे नतीजों तथा मेटा डेटा (किसी आंकड़े के विभिन्न पहलुओं को परिभाषित करने वाले आंकड़े) के और प्रमाण चाहिए। उदाहरण के लिए यह कि असंगठित क्षेत्र के 28.5 करोड़ कर्मचारियों को ई-श्रम पोर्टल पर पंजीयन से कैसे लाभ हुआ?
Date:25-02-23
अराजकता के पांवसंपादकीय
पंजाब में अमृतसर के अजनाला में एक पुलिस थाने में गुरुवार को जैसे हालात हो गए थे, उससे एकबारगी यह लगा कि शायद राज्य में कानून-व्यवस्था ढह चुकी है और अराजकता हावी है। हालांकि यह कहा जा सकता है कि ऐसी अप्रत्याशित स्थिति कहीं भी आ सकती है, लेकिन अगर इसके बरक्स पुलिस और शासन-व्यवस्था एकदम लाचार और इससे भी आगे उपद्रवियों के सामने समर्पण करती हुई दिखाई दे तब ऐसे में आम जनता अपनी सुरक्षा की उम्मीद किससे करेगी ! दरअसल, वहां पुलिस ने लवप्रीत सिंह नाम के व्यक्ति को अपहरण समेत कई अन्य आरोपों में गिरफ्तार किया गया था। लवप्रीत सिंह को वहां एक कट्टरतावादी सिख संगठन ‘वारिस पंजाब दे’ के प्रमुख अमृतपाल सिंह का करीबी माना जाता है, जो उसे रिहा कराने के मकसद से हजारों समर्थकों के साथ अजनाला थाने पर पहुंच गया गया था। भीड़ में कई लोग बंदूक और तलवार से भी लैस थे। अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि भीड़ के तेवर और दबाव के सामने वहां मौजूद पुलिसकर्मी लाचार दिखे।
यों प्रदर्शनकारियों से सीधे हिंसक तरीके से ही निपटना कोई बेहतर विकल्प नहीं माना जाता है, लेकिन एक तरह से समूचे प्रशासन का मूकदर्शक रहना एक विचित्र स्थिति थी। हैरानी की बात यह है कि अजनाला थाने का घेराव दिखने में अचानक हुई घटना लगती है, मगर सच यह है कि इसकी पृष्ठभूमि कई दिनों से तैयार हो रही थी और शायद पुलिस ने सुचिंतित तरीके से इस मामले से निपटने के लिए समय रहते कदम नहीं उठाए। सवाल है कि क्या अपने एक व्यापक तंत्र के बावजूद वहां की पुलिस को कट्टरतावादी संगठन के मुद्दे, उनके काम करने के तरीके और उसके संरक्षकों की प्रतिक्रिया का अंदाजा नहीं था ? अगर किसी संवेदनशील मामले में पुलिस ने इस संगठन के किसी व्यक्ति को गिरफ्तार किया भी था, तो क्या इससे पहले पूरी तैयारी जरूरी नहीं थी? आखिर क्या वजह है कि थाने पर हमले के बाद पैदा हुई स्थिति में पुलिस को अपना रुख नरम करना पड़ा? लवप्रीत सिंह की गिरफ्तारी के आधार कितने मजबूत थे कि अजनाला की एक अदालत ने उसे रिहा करने में ज्यादा वक्त नहीं लगाया? अगर महज उसके समर्थकों के प्रदर्शन के दबाव में आकर पुलिस ने अपने कदम पीछे खींचे तो इसे कानून-व्यवस्था के लिहाज से कैसे देखा जाएगा?
गौरतलब है कि ‘वारिस पंजाब दे’ और उसके मुखिया अमृतपाल सिंह को खालिस्तान से सहानुभूति रखने वाला माना जाता है। अगर इस धारणा में सच्चाई है तो समझा जा सकता है कि इस संगठन की चुनौती अब मौजूदा संदर्भों में किस रूप में खड़ी हो रही है। पंजाब में अतीत के दिन आज भी बहुत सारे लोग भूल नहीं सके होंगे और कोई नहीं चाहेगा कि वह त्रासदी फिर से खड़ी हो। लेकिन सरकार और पुलिस-प्रशासन का रवैया अगर बेहद सुचिंतित, परिपक्व और सावधानी से भरा नहीं रहा तो आने वाले वक्त में छोटी-छोटी घटनाएं कैसा मोड़ लेंगी, कहा नहीं जा सकता ! यह छिपा तथ्य नहीं है कि पंजाब में जब से आम आदमी पार्टी की सरकार बनी है, तब से कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर कई बार ऐसी हालत देखी गई है, मानो आपराधिक तत्त्वों को बेलगाम होने का मौका मिल गया हो। जबकि चुनावों के दौरान पार्टी ने राज्य की जनता से कानून-व्यवस्था को पूरी तरह दुरुस्त करने से लेकर नशामुक्ति जैसे कई बड़े वादे किए थे। यह ध्यान रखने की जरूरत है कि पंजाब देश का सीमावर्ती और संवेदनशील राज्य है। ऐसे में मामूली कोताही की वजह से भी कोई साधारण समस्या भी जटिल शक्ल अख्तियार कर ले सकती है।
Date:25-02-23
संयम के साथ कड़ाईसंपादकीय
पंजाब के अजनाला में बृहस्पतिवार को जो हुआ उसमें भविष्य के लिए बहुत अशुभ संकेत निहित है। जरनैल सिंह भिंडरावाले को अपना आदर्श मानने वाले खालिस्तान समर्थक संगठन ‘वारिस पंजाब दे’ के प्रमुख अमृतपाल सिंह के समर्थकों ने तलवार और बंदूकों के साथ मारपीट और अपहरण मामले में गिरफ्तार तूफान सिंह की रिहाई के लिए अजनाला पुलिस थाने पर हमला बोल दिया। हिंसक भीड़ ने बैरिकेडिंग तोड़ दिया और कई पुलिस वालों को घायल कर दिया। इतना ही नहीं पुलिस पर दबाव बनाया और तूफान की रिहाई के आदेश प्राप्त कर लिये। अमृतपाल के अनुसार उसके साथी को अकारण गिरफ्तार किया गया था। इस प्रकरण की सर्वाधिक चिंतनीय स्थिति यह थी कि पुलिस असहाय बनी रही। और अमृतपाल की गंभीर परिणाम भुगतने की चेतावनी के बावजूद उसके विरुद्ध किसी तरह की कार्रवाई नहीं की गई। अब इस कांड पर राजनीति भी शुरू हो गई है। इसे पंजाब में कानून-व्यवस्था के गहराते संकट के तौर पर भी बताया जा रहा है और भविष्य में खालिस्तानी हिंसा के दौर की वापसी की आशंका के तौर पर भी देखा जा रहा है। यह घटना निर्विवाद तौर पर खालिस्तानी तत्वों के फिर से मैदान में आ जाने का प्रमाण है। बिना किसी संदेह के कहा जा सकता है कि अगर इसे तत्काल नियंत्रित नहीं किया गया तो न केवल पंजाब सरकार बल्कि केंद्र सरकार के लिए भी गहरा संकट खड़ा हो जाएगा। इसलिए केंद्रीय स्वर यह है कि अमृतपाल और उनके समर्थकों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की जाए, उन्हें जेल में डाला जाए। लेकिन यह किसी भी सरकार के लिए बहुत आसान नहीं है। खालिस्तानी हिंसा का पिछला दौर इसे दिखा चुका है। एक टीवी साक्षात्कार में अमृतपाल ने कहा कि वह खालिस्तानी आंदोलन के रिवाइवल के लिए नहीं बल्कि पंजाब के लोगों के सर्वाइवल के लिए लड़ रहा है। वह चाहता है कि जिस तरह हिंदू राष्ट्र, समाजवाद, लोकतंत्र, तानाशाही जैसे मुद्दों पर बहस हो सकती है तो खालिस्तान के मुद्दों पर भी बहस हो। इससे पहले कि पंजाब में बेलगाम हिंसा का दौर शुरू हो अमृतपाल सिंह और उसके समर्थकों को वार्ता की मेज पर लाया जाना चाहिए और भारत स्वयं तथा पंजाब के लिए खालिस्तानी अवधारणा कितनी विनाशक हो सकती है, उन्हें समझाया जाना चाहिए। पहल अगर पंजाब के प्रबुद्ध और प्रभावशाली सिखों की ओर से हो तो अधिक फलदायी होगा।
Date:25-02-23
जन-भागीदारी से निकलेगा हलमनोज दुबे
गर्मी का पारा चढ़ने के साथ पानी को लेकर संकट की स्थिति फिर से हर तरफ बढ़ती दिख रही है। वैसे भी लचर जल प्रबंधन और जल संचयन के प्रति उदासीनता के कारण विश्व के कई देश आज जल संकट का सामना कर रहे हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण आने वाले समय में यह समस्या और गहरा सकती है। बात भारत की करें तो दुनिया में पीने योग्य जितना पानी है, उसका चार फीसद पानी भारत में है।
सरकारी आंकड़े बताते हैं कि वष्रा जल संरक्षण के लिए सरकारों द्वारा तमाम उपाय करने बावजूद हम बारिश के पानी से मात्र 300 मिलियन क्यूबिक मीटर ही रोक पा रहे हैं, जबकि वर्तमान में देश में 750-800 मिलियन क्यूबिक मीटर पानी की आवश्यकता है। 50 साल पहले हमारे देश में प्रत्येक व्यक्ति के लिए पांच हजार क्यूबिक मीटर पानी उपयोग के लिए उपलब्ध रहता था, लेकिन आज घटकर यह 1500 क्यूबिक मीटर रह गया है। यानी दुनिया में जिस देश में जल को जगदीश मानने की परंपरा थी, दुर्भाग्य से आज उस देश में ही सबसे ज्यादा कंटेंमनेटेडेड वाटर रिसोर्सेस हैं। हमें समझना होगा कि प्रकृति हमें एक चक्र के रूप में जल प्रदान करती है। हम इस चक्र का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा हैं और इस चक्र के थमने का अर्थ है, हमारे जीवन का थम जाना। प्रकृति के खजाने से हम जितना पानी लेते हैं, उसे वापस भी हमें ही लौटाना है। भूमिगत जल स्तर का लगातार नीचे खिसकते जाना भविष्य के लिए खतरे की घंटी है। इसलिए जरूरी है कि लोग प्राकृतिक जल संसाधनों को दूषित न होने दें और पानी को व्यर्थ न गवाएं। सरकारों के साथ-साथ समाज को भी जल संकट के प्रति गंभीर होना होगा। अच्छी बात यह है कि केंद्र सरकार इस बात को गंभीरता से समझ रही है कि लोगों में जल एवं प्रकृति के संरक्षण के प्रति सामूहिक चेतना का निर्माण करके ही जल संरक्षण के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है। आने वाली पीढ़ी को उसकी जरूरत के हिसाब से पानी मिल सके इसके लिए बेहद जरूरी है कि जल संरक्षण से जुड़े अभियानों में जनता को, सामाजिक संगठनों को और सिविल सोसाइटी को ज्यादा से ज्यादा जोड़ा जाए। स्वच्छ भारत अभियान इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। स्वच्छ भारत अभियान में जब लोग जुड़े, तो उनके भीतर एक नई चेतना का संचार हुआ। अब केंद्र के साथ ही सभी राज्य सरकारों को जन-भागीदारी की यही सोच जल संरक्षण के लिए भी जनता के मन में जगानी होगी। जल संरक्षण के लिए आज देश के प्रत्येक जिले में 75 अमृत सरोवर बनाए जा रहे हैं। विश्व में यह अपनी तरह का अनोखा अभियान है और अच्छी बात यह है कि इसमें जन-भागीदारी जुड़ी है। आने वाले समय में पेयजल की समस्या विकराल रूप धारण करे इससे पहले पॉलिसी लेवल पर भी पानी से जुड़ी परेशानियों के समाधान के लिए सरकारी नीतियों और ब्यूरोक्रेटिक प्रक्रियाओं से देश को बाहर आना होगा। जल संरक्षण के लिए केंद्र सरकार द्वारा शुरू की गई ‘अटल भूजल संरक्षण योजना’ एक संवेदनशील अभियान है और इसे उतनी ही संवेदनशीलता से आगे बढ़ाने की जरूरत है। भूजल प्रबंधन के लिए बनाए गए प्राधिकरण सख्ती से इस दिशा में काम करें, ये भी सुनिश्चित करना होगा। इसके साथ ही अगर जलवायु परिवर्तन के खतरों से निपटना है तो भूजल रिचार्ज के लिए सभी जिलों में बड़े पैमाने पर वाटर-शेड का निर्माण करने के बारे में राज्य सरकारों को विचार करना होगा। इसके अलावा पहाड़ी क्षेत्रों में स्प्रिंग शेड को पुनर्जीवित करने का जो कार्यक्रम शुरू किया गया है उस पर तेजी से काम करना होगा। जल संरक्षण के लिए वन क्षेत्रों को बढ़ाना सबसे ज्यादा जरूरी है। हाल के वर्षो में हमने देखा है कि ‘कैच द रेन’ अभियान ने लोगों के बीच एक आकषर्ण तो पैदा किया है, लेकिन सफलता के लिए अभी बहुत कुछ करना जरूरी है। इसमें दो राय नहीं कि बीते कुछ दशकों में जल संरक्षण की दिशा में ऐसी गंभीरता नहीं दिखाई गई जैसी वर्तमान केंद्र सरकार द्वारा दिखाई जा रही है। इसका सबसे अच्छा पहलू यह है कि अब इस दिशा में ऐसी योजनाएं तैयार हो रही हैं, जिनसे आमजन को जोड़ा जा रहा है।
इस बार के केंद्रीय बजट में स्वच्छ भारत मिशन (ग्रामीण) के लिए 7192 करोड़ रुपये और जल जीवन मिशन के लिए 70,000 करोड़ का बजट आवंटित है। वहीं, देश की नदियों को जोड़ने के लिए 3,500 करोड़ रुपये का प्रावधान बजट में है। साथ ही अटल भूजल योजना के लिए 1000 करोड़, नेशनल हाइड्रोलॉजी प्रोजेक्ट के लिए 500 करोड़, प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के लिए 8587 करोड़ आवंटित किए गए हैं। जल से जुड़े इन क्षेत्रों में मोदी सरकार द्वारा जारी भारी-भरकम राशि जल संकट से निपटने के प्रति उसकी प्रतिबद्धता को दर्शाती है, लेकिन लोगों को भी इस दिशा में गंभीरता से सोचना होगा। जल की सुरक्षा किसी सरकार या संगठन का ही नहीं, बल्कि देश की 140 करोड़ लोगों का सबसे बड़ा दायित्व होना चाहिए।
Date:25-02-23
पंजाब के डरावने संकेतसंपादकीय
पंजाब में जिस तरह से माहौल तनावपूर्ण हुआ है, वह गहरी चिंता और सजगता का विषय है। भीड़ ने सीधे पुलिस को निशाना बना दिया और दबाव इतना बढ़ा कि पुलिस भीड़ की मांग मानने के लिए मजबूर हो गई। कट्टरपंथी नेता अमृतपाल सिंह के करीबी सहयोगी लवप्रीत तूफान को पंजाब पुलिस ने शुक्रवार को रिहा कर दिया। इतना ही नहीं, उसे रिहा करते हुए पुलिस ने यह भी कहा कि वह दोषी नहीं है। हालांकि, सबने देखा है कि यह रिहाई तब हुई, जब अमृतपाल के हजारों समर्थकों ने अमृतसर में एक पुलिस थाने पर हमला बोल दिया और सीधे कानून-व्यवस्था को बिगाड़ने की धमकी दे दी। ध्यान रहे, तूफान को अपहरण और मारपीट के एक मामले में गिरफ्तार किया गया था, अब पता नहीं, उसके खिलाफ आगे कोई कार्रवाई हो पाएगी या नहीं। क्या पंजाब में कानून-व्यवस्था पर सवाल नहीं उठा है? क्या जिस तरह से संविधान की पालना होनी चाहिए थी, वह हुई है? यदि लवप्रीत तूफान दोषी नहीं है और उसे पुलिस ने गलत ढंग से गिरफ्तार किया था, तब भी यह पंजाब पुलिस के कामकाज पर गंभीर आक्षेप है।
वैसे यह पहला मामला नहीं है, जब धर्म की आड़ में की गई मनमानी के सामने समर्पण किया गया है। चूंकि इस देश में ऐसे धार्मिक प्रदर्शनों को होने दिया जाता है, इसलिए ऐसे प्रदर्शन कानून-व्यवस्था को धता बताने के लिए यहां-वहां सामने आते रहते हैं। क्या अमेरिका, कनाडा या यूके जैसे किसी अन्य देश में पुलिस के खिलाफ ऐसे हिंसक प्रदर्शन को कोई भी सत्ता मंजूर कर लेती? भारतीय व्यवस्था की उदारता के साथ ऐसे खिलवाड़ के लिए बेशक इस देश की राजनीति ही दोषी है। धर्मध्वजा थामकर उदारता का कैसा मखौल 2021 में 26 जनवरी- गणतंत्र दिवस पर नई दिल्ली में उड़ाया गया था, बहुतों को याद होगा। क्या ऐसे बेलगाम प्रदर्शनों को यह देश बर्दाश्त कर सकता है और इससे आखिर देश को क्या फायदा होता है? भारतीय लोकतंत्र के उदार साये में बनने वाले किसी भी संगठन को देश की एकता को सबसे ऊपर रखना चाहिए। ये भला कैसे संगठन हैं, जो कानून-सम्मत संघर्ष के बजाय हिंसा से न्याय छीनने या मनमानी करने को लालायित हैं? आज जिन देशों में सुरक्षित बैठकर कुछ लोग खालिस्तानी अलगाववाद को हवा दे रहे हैं, उन देशों के प्रति भारत को गंभीर हो जाना चाहिए। सिखी की जड़ें इस देश की गली-गली में पसरी हुई हैं, कोई उसे फिर सिर्फ भारतीय पंजाब की भौगोलिक सीमाओं में समेटकर कैसे देख सकता है? समग्र भारतीय मानस में पूरी सहजता के साथ विराज रहे सिख विचार, संस्कार व संस्कृति के अथाह विस्तार को संकीर्णता में समेटने की कोई भी गलती न केवल पंजाब, बल्कि भारत की संपूर्ण पहचान के लिए खतरा है।
पंजाब में सबसे ज्यादा सावधान वहां की राजनीति को रहना चाहिए। सबको इतिहास उठाकर देख लेना चाहिए, जब आतंकवाद था, तब सबसे भारी कीमत राजनीति ने ही चुकाई थी। धर्म की आंच पर वोटों की रोटियां सेंकना सबसे आसान है, लेकिन ध्यान रहे, ऐसी आंच जब आग में बदलती है, तब बहुत कुछ खाक होने लगता है। सुरक्षा एजेंसियों को सावधान हो जाना चाहिए। कोई उग्र युवा नेता अगर यह कह रहा है कि पुलिस ने बात नहीं मानी, इसलिए हिंसा हुई, तो आगे क्या आशंकाएं हैं, अनुमान लगा लेने में ही लाभ है। इस देश में किसी भी आस्था आधारित संकीर्ण खेमे को इतना मजबूत नहीं बनने देना चाहिए कि वह अदालत लगाकर फैसले सुनाने लगे।
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25 February 2023
प्रश्न–399 – अ) बॉम्ब साइक्लॉन क्यों आता है? (100 शब्द)
ब) मोरेन क्या होता है? हाल ही में यह शब्द चर्चा में क्यों आया था? (100 शब्द)
Question–399 – a) Why does a bomb cyclone occur? (100 words)
b) What is a moraine? Why was this term in the news recently? (100 words)
नोट : इसका उत्तर आपको हमें नहीं भेजना है, यह आपके स्वयं के अभ्यास के लिए है।
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Date:24-02-23
Everyone’s LosingA year into the Ukraine war, the talk is of more war. If others won’t, India should start a peace effortTOI Editorials
Costs of the year-old Ukraine war are many and counting. Putin’s invasion not only extracted a terrible price from Ukrainians and wrecked their economy – total cost estimated till last month is around $700 billion – it all but sabotaged a smooth postpandemic global economic recovery. Blasé assumptions about economies pricing in the costs of war ignore history lessons that wars have a way of suddenly getting nastier than usual. Therefore, countries that have influence should really work towards stopping the conflict.
But as a Biden-starring pack of Western leaders makes a beeline for Kyiv, the only narrative is about supplying Ukraine with more weapons. Even long-time European peace advocates such as Sweden and Switzerland have started prioritising lethal aid. There’s no denying what Putin has done. But that peace is not a conversation point in the West makes no sense. Just as Moscow knows Kyiv will not fall and its invasion will not achieve most of its initially stated objectives, Ukraine and its Western backers should know all talk of defeating Putin is just talk. What will this defeat entail? Putin will never countenance a loss of face. America will never want to be party to a war that invades Russian territory. And even inside Ukraine, what is victory? Withdrawal of all Russian troops from everywhere? Before Putin is pushed into that corner, what might his response be? And remember, US-led sanctions haven’t really affected Russia’s economy, so Putin could drag this war on for long. Plus, if – a big if – China aids Russia militarily, it would take the war to a new level of lethality. Another year of Russian bombardment of Ukrainian cities like Kharkiv, Kherson, Sumy, or Kyiv would cause immense misery. That would constitute a collective failure of the international community.
Hence the need for a peace formula. A realistic start would be restoring most of the status quo ante. Putin would have to pull his troops back east of the ‘line of contact’, while Kyiv would have to rein in its impulse to carry out military operations in Crimea, and perhaps temporarily some fudgy arrangements will have to be made for the Donbas region. But who will bell this cat? America’s not interested. China’s looking at gaining advantage. Why not India? GoI could begin small and invite Ukrainian and Russian negotiators to New Delhi for ceasefire talks. There needn’t be any result expected quickly. But hosting the resumption of dialogue will in itself be a contribution to finding peace.
Date:24-02-23
Justice.gov.inSC’s and many HCs’ digitisation programmes are excellent initiatives. But beware of hackersTOI Editorials
In an emulation-worthy application of AI in public affairs, the Supreme Court introduced live-transcription of court proceedings on a screen and on Wednesday published the transcripts on its website. CJI Chandrachud, chair of SC’s e-committee, announced the measure as a constitution bench met to hear arguments in the case of Shiv Sena’s split. Live transcripts are the latest in a series of digital measures in India’s courts in the last few years, with virtual hearings and e-filing no doubt getting a boost from pandemic lockdowns.
As CJI has observed, technology can make courts and records accessible to the general public, students, researchers and archivists. He’s credited with starting the digitisation of the Bombay high court library, with its 1. 25 lakh books and records, which date back to the 1800s. Other HCs have done their bit. In 2021 Orissa HC started a Record Room Digitisation Centre, the country’s first, and by mid-2022 it had reportedly digitised almost 5. 2 lakh files. Only last month Delhi HC introduced software for online inspection of digitised judicial files, another first. And in a different kind of but equally important reform, Kerala HC recently published two judgments in a regional language, Malayalam.
SC and HCs scaling up their digital infrastructure contributes to reducing their carbon footprint too. A sustainable and accessible court ecosystem is to everyone’s benefit. But bear in mind such a system is also vulnerable to breaches that can throw a workday into chaos. Recall the AIIMS ransomware episode. Therefore, while we applaud digitisation initiatives, we must also remind all courts that they pay equal attention to threats. For hackers, India’s digitised court records are a tempting target.
Date:24-02-23
क्या मोहल्ला क्लिनिक मॉडल?डॉ चंद्रकांत लहरिया, ( प्रख्यात चिकित्सक )
स्वास्थ्य क्षेत्र में किए जाने वाले सुधार राज्य या जिले की स्थिति पर निर्भर करते हैं। इसका ताजा उदाहरण पंजाब से सामने आया है। वहां नई सरकार ने दिल्ली के मोहल्ला क्लीनिक की तर्ज पर आम आदमी क्लीनिक शुरू किया है। लेकिन अब खबर आ रही है कि आम आदमी क्लीनिक वहां की स्वास्थ्य व्यवस्था को मजबूत करने के बजाय कमजोर कर रहे हैं. इस पर समय रहते ध्यान देने की जरूरत है।
दरअसल, मोहल्ला क्लीनिक ने दिल्ली जैसे शहरी इलाकों में स्वास्थ्य सेवा को एक नया आयाम दिया। मोहल्ला क्लिनिक खुलने के बाद नए डॉक्टरों और नर्सों की नियुक्ति की गई। सरकार ने वित्तीय प्रावधान भी बढ़ाया। झुग्गियों और गरीब वर्गों के करीब स्थित नए केंद्र बनाए गए और डॉक्टरों और स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता में वृद्धि हुई। इसके विपरीत, पंजाब में खोले गए आम आदमी क्लीनिक ज्यादातर पुराने केंद्रों के नए नाम हैं या पहले से उपलब्ध डॉक्टरों की नई पोस्टिंग हैं। अपेक्षित वित्तीय आवंटन भी नहीं बढ़ा है। पहले से स्थापित प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों का नाम बदलकर आम आदमी क्लीनिक करना चिंता का विषय है और पीछे हटने वाला कदम है।
मोहल्ला क्लिनिक को देशभर से सराहना मिल रही है। मैंने योजना की शुरुआत से ही इसकी सलाह दी है और मैं इस प्रकार के सामुदायिक क्लिनिक का बहुत बड़ा समर्थक हूं। ऐसे क्लीनिक शहरी क्षेत्रों में बीमारियों के इलाज के लिए एक उपयुक्त समाधान हैं – जहां अस्पताल भीड़भाड़ वाले हैं – लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों के लिए उपयुक्त नहीं हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों को एकीकृत स्वास्थ्य सेवाओं की आवश्यकता है, जिसमें बीमारियों की रोकथाम, मलेरिया-टीबी की रोकथाम और उपचार, टीकाकरण, गर्भवती महिलाओं की जांच और प्रसव आदि शामिल हैं। बीमार लोगों का इलाज करना भी जरूरी है। यह प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के कारण ही संभव है।
दिल्ली के मोहल्ला क्लीनिकों को निवारक सुविधाओं और समुदाय आधारित जांच और उपचार पर ध्यान केंद्रित करने के लिए उपलब्ध स्वास्थ्य सेवाओं का धीरे-धीरे विस्तार करने के समग्र विचार के साथ शुरू किया गया था। करीब सात साल पहले दिल्ली में स्वास्थ्य मंत्री के सभागार में भी इस तरह के प्रस्ताव को स्वीकार किया गया था, लेकिन मोहल्ला क्लीनिक के माध्यम से स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार नहीं किया गया. ऐसे में पंजाब सरकार की पूरी योजना को समझे बिना सिर्फ बीमारी के इलाज पर ध्यान देने, पहले के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को कमजोर करने की योजना पर पुनर्विचार करने की जरूरत है.
सरकारें कई वर्षों में एक बार स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार करती हैं। ऐसे मामलों में, राज्य या जिले की स्थितियों के आधार पर कोई भी संशोधन किया जाना चाहिए। मोहल्ला क्लीनिक से प्रेरणा लेते हुए तेलंगाना राज्य ने अप्रैल 2018 में स्लम क्लीनिक शुरू किया। उनकी कई गतिविधियां मोहल्ला क्लीनिकों से बेहतर हैं, लेकिन मीडिया की चकाचौंध और पूंजी की कमी के कारण उन पर कम ध्यान दिया जाता है। इसी तरह केंद्र सरकार ने 2018 में आयुष्मान भारत कार्यक्रम के तहत 1.50, 000 स्वास्थ्य और कल्याण केंद्रों की घोषणा की गई। इस योजना में कई सकारात्मक कदम थे, जिनमें स्वास्थ्य सेवाओं की उपलब्धता बढ़ाना और भवनों की मरम्मत और रखरखाव के लिए धन उपलब्ध कराना शामिल था। 2022 के अंत तक, आधिकारिक तौर पर 1,50,000 स्वास्थ्य और कल्याण केंद्र बनाए गए हैं। उनसे स्वास्थ्य सेवाओं तक पहुंचना आसान हो गया है और सवाल यह है कि क्या लोग अब पहले से ज्यादा स्वस्थ हैं। जवाब है, ज्यादा कुछ नहीं बदला है। ऐसा इसलिए है क्योंकि हेल्थ एंड वैलनेस सेंटर नए केंद्र नहीं हैं, बल्कि दशकों से बने प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों और उप-स्वास्थ्य केंद्रों के नए नाम हैं।
सरकारों को अधिक जवाबदेह होना चाहिए और स्वास्थ्य सुधारों के लिए ठोस कदम उठाने चाहिए, न कि सतही सुधारों के लिए। पंजाब सरकार को आम आदमी क्लीनिक शुरू करते समय स्वास्थ्य व्यवस्था को कमजोर न करने का ध्यान रखना चाहिए। दिल्ली में मोहल्ला क्लीनिकों को समग्र स्वास्थ्य देखभाल प्रदान करने की दिशा में आगे बढ़ना चाहिए। केंद्र सरकार को हेल्थ एंड वेलनेस सेंटर्स का स्वतंत्र मूल्यांकन करना चाहिए। स्वास्थ्य सेवाओं में सुधार होगा और भारत एक स्वस्थ देश तभी बनेगा जब सरकारें लोगों की जरूरतों को केंद्र में रखेंगी।
Date:24-02-23
महाशक्तियों के टकराव से त्रस्त विश्वहर्ष वी. पंत, ( लेखक आब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में रणनीतिक अध्ययन कार्यक्रम के निदेशक हैं )
यूक्रेन पर रूस के हमले को साल भर पूरा हो गया। यह द्वितीय विश्व युद्ध के उपरांत बने वैश्विक ढांचे की हमारी समझ से जुड़ा एक अहम पड़ाव है। आरंभ में लग रहा था कि यह युद्ध कुछ ही दिनों की बात है, क्योंकि रूस और यूक्रेन की सैन्य शक्ति में कोई बराबरी नहीं थी, लेकिन इस युद्ध का दूसरे वर्ष में खिंचना यही दर्शाता है कि रूसी सेना अपने अतीत की दुर्बल छाया मात्र बनकर रह गई है। यूक्रेनवासी जिस तरह रोज रूस के विरुद्ध खड़े हो रहे हैं, वह यही स्मरण कराता है कि रणभूमि में मिलने वाली सफलता केवल विशुद्ध शक्ति एवं बल पर ही निर्भर नहीं करती। युद्ध में अपने संसाधनों का प्रभावी उपयोग अधिक मायने रखता है। रूस की कमजोरी कई स्तरों पर उजागर हुई है। इसके साथ ही यूक्रेन संभवत: पश्चिम और रूस के बीच संघर्ष के आखिरी अखाड़े के रूप में उभरा है कि शीत युद्ध के उपरांत यूरेशियाई सुरक्षा ढांचे को किस प्रकार आकार दिया जाए। अब यह एक ऐसे युद्ध में बदल गया है, जिसे न तो रूस जीत सकता है और न यूक्रेन उसमें परास्त हो सकता है। अब यह युद्ध पश्चिम और पुतिन के बीच अहं और इच्छाशक्ति की लड़ाई बनकर रह गया है।
युद्ध के साल भर पूरा होने से ठीक पहले अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन ने यूक्रेन का दौरा किया। राष्ट्रपति बनने के बाद पहली बार अचानक यूक्रेन पहुंचे बाइडन ने यह दोहराया कि ‘यूक्रेन के लोकतंत्र, संप्रभुता और क्षेत्रीय अखंडता की रक्षा के लिए’ अमेरिका पूरी तरह प्रतिबद्ध है। इसी के साथ उन्होंने मास्को को संदेश भी दिया कि खतरनाक दौर में पहुंचे टकराव के बीच वाशिंगटन की पीछे हटने की कोई मंशा नहीं। असल में यूक्रेन संकट ने ट्रांस-अटलांटिक साझेदारी और नाटो जैसे उन ध्रुवों को नए तेवर दिए हैं, जो अपनी चमक खो रहे थे। हालांकि म्यूनिख सिक्योरिटी कांफ्रेंस के दौरान युद्ध समाप्त कर वार्ता आरंभ करने के पक्ष में कुछ प्रदर्शन हुए, लेकिन यूरोपीय नीति-नियंताओं ने यही दोहराया कि वे हथियार निर्माण का दायरा बढ़ाकर यूक्रेन को हथियारों की आपूर्ति जारी रखेंगे। नाटो के महासचिव जेंस स्टोलेनबर्ग के अनुसार यूक्रेन बड़ी तेज गति से उनके हथियारों का इस्तेमाल कर रहा है। दिलचस्प है कि जर्मनी ने ही यूरोप को तेजी से हथियार आपूर्ति की मांग करने के साथ ही नाटो सहयोगियों से रक्षा पर जीडीपी के दो प्रतिशत के बराबर लक्ष्य पर सहमति बनाने का आह्वान किया था। इस बीच रूसी सीमाओं तक नाटो की पहुंच को लेकर पुतिन के विरोध पर उनके हमले ने इसके विपरीत ही काम किया। इससे स्वीडन और फिनलैंड जैसे देशों का झुकाव भी नाटो की ओर हुआ है, जो दशकों तक तटस्थ बने रहे।
यूक्रेन युद्ध से पहले ही उथल-पुथल से गुजर रहे वैश्विक शक्ति संतुलन की स्थिति चीन-रूस धुरी से और ध्रुवीकृत हो गई है। अमेरिका और यूरोप दोनों ने चीन को चेताया है कि यदि उसने रूस को किसी तरह की सैन्य मदद पहुंचाई तो इसके विध्वंसक नतीजे होंगे। चीन ने अभी तक रूस का समर्थन जरूर किया है, लेकिन उसे किसी प्रकार की मारक क्षमता प्रदान करने वाली मदद उपलब्ध नहीं कराई है। दूसरी ओर यूक्रेन को पश्चिम से अत्याधुनिक टैंक और हथियार मिल रहे हैं। ऐसे में चीन का जरा सा भी सामरिक सहयोग रूसी हमलों की क्षमताओं को बढ़ाने के साथ ही रणभूमि में टिके रहने की उसकी क्षमताओं को ही बढ़ाएगा। यदि पश्चिम इन दोनों देशों की धुरी को तोड़ने के लिए आगे नहीं आएगा तो उनके रिश्तों की यह कड़ी मजबूत होती जाएगी। बीजिंग में यह माहौल बनाने की कोशिश हो रही है कि यूरेशिया में बढ़ते हुए टकराव से वे आजिज आ गए हैं और शांति एवं किसी सहमति के स्वरों की पैरवी सुनाई पड़ रही है। हालांकि उसके ऐसे स्वरों में आलोचना के सुर भी हैं कि ‘कुछ ताकतें’ इस युद्ध को लंबा खींचना चाहती हैं। बीजिंग-मास्को साझेदारी के पीछे रणनीतिक पहलू प्रत्यक्ष दिखते हैं जिनके जल्द ही किसी तार्किक परिणति पर पहुंचने के आसार हैं। यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की भी चीन को आगाह कर चुके हैं इस युद्ध में रूस को उसकी मदद से विश्व युद्ध की स्थिति उत्पन्न हो जाएगी। इस युद्ध में चीन के प्रवेश से टकराव केवल यूरेशियाई युद्ध के रूप में ही सीमित नहीं रहेगा, बल्कि इसके हिंद-प्रशांत क्षेत्र तक फैलने की आशंका होगी।
महाशक्तियों के बीच संघर्ष जहां इस दौर के एक प्रमुख पहलू के रूप में उभरा है, वहीं यूक्रेन युद्ध से उपजे उन दुष्प्रभावों की अनदेखा किया जा रहा है, जिनसे दुनिया का एक बड़ा हिस्सा जूझ रहा है। इस युद्ध के कारण खानपान, ऊर्जा और आर्थिक संकट ने पूरी दुनिया को त्रस्त किया है। बड़ी शक्तियों के निर्णायक रणनीतिक लाभ की चाह ने विकासशील देशों में अस्तित्व के संकट को दिन-प्रतिदिन और बढ़ा दिया है। हमारे पड़ोस में ही श्रीलंका, नेपाल, पाकिस्तान और यहां तक कि बांग्लादेश की नाजुक होती स्थिति यही दर्शाती है कि दुनिया ग्लोबल साउथ के समक्ष उत्पन्न समस्याओं का प्रभावी समाधान उपलब्ध कराने में नाकाम रही है।
अब जब यूक्रेन युद्ध अपने दूसरे वर्ष में प्रवेश कर रहा है तो विश्व एक संकट के मुहाने पर खड़ा दिखाई पड़ता है। इस समय वैश्विक नेतृत्व नदारद दिख रहा है और बहुपक्षीय ढांचे की अक्षमताएं भी उजागर हो रही हैं। हम बड़ी शक्तियों के रणनीतिक समीकरणों को आकार देने में हार्ड पावर का पुन: उभार होता देख रहे हैं। साथ ही यह भी देख रहे हैं कि युद्धों का चरित्र और स्वरूप तकनीकी पहलुओं के आधार पर किस प्रकार परिवर्तित होकर रणभूमियों को बुनियादी रूप से नया आकार दे रहा है। जो भी हो, साल भर की उथल-पुथल के बाद भी यूक्रेन में शांति के कोई संकेत नहीं दिखते। यह स्थिति यही दर्शाती है तमाम उदारवादी विरोध-प्रदर्शनों के बावजूद हिंसा वैश्विक राजनीतिक ढांचे के मूल में निंरतर रूप से बनी हुई है और हाल-फिलहाल वह इस केंद्र से ओझल होती भी नहीं दिख रही।
Date:24-02-23
निगरानी का तंत्रसंपादकीय
पुलिस और जांच एजंसियों की नियम-कायदों को ताक पर रख कर और मानवाधिकारों की परवाह किए बगैर मनमानीपूर्ण तरीके से कार्रवाई करने की कोशिश प्रकट तथ्य है। अपराधियों को सुधारने और आपराधिक मामलों में जानकारियां जुटाने के नाम पर कई बार गिरफ्तार किए गए लोगों की इस बेरहमी से पिटाई की जाती है कि वे हिरासत में ही जान गंवा बैठते हैं। इसे लेकर लंबे समय से अंगुलियां उठती रही हैं, मगर चिंता का विषय है कि हिरासत में होने वाली मौतों का आंकड़ा कम होने का नाम नहीं ले रहा। जिन राज्यों में सरकारों ने सुशासन के नाम पर पुलिस को मुक्तहस्त कर रखा है, वहां ऐसी मौतों का आंकड़ा अधिक है। इसी के मद्देनजर करीब दो साल पहले सर्वोच्च न्यायालय ने प्रवर्तन निदेशालय, राष्ट्रीय जांच एजंसी, केंद्रीय जांच ब्यूरो और देश के सभी पुलिस थानों को छह हफ्ते के भीतर अपने दफ्तरों में सीसीटीवी कैमरे और रिकार्डिंग उपकरण लगाने का आदेश दिया था। मगर पुलिस थानों में इस दिशा में कोई उल्लेखनीय प्रगति नहीं हो पाई है। अब सर्वोच्च न्यायालय ने सख्ती बरतते हुए कहा है कि सभी राज्य और केंद्र शासित प्रदेश की सरकारें अपने यहां के थानों में एक महीने के भीतर सीसीटीवी और रिकार्डिंग उपकरण लगाएं, नहीं तो उनके गृह सचिवों और मुख्य सचिवों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जाएगी। देखना है, इस कड़ाई का कितना असर हो पाता है।
कानून के मुताबिक गिरफ्तारी के बाद किसी भी व्यक्ति की मार-पिटाई करना वर्जित है। मगर पुलिस के कामकाज में अभी तक वही औपनिवेशिक ठसक बनी हुई है, इसलिए वह मार-पिटाई को अपना मुख्य हथकंडा मानती है। यही स्थिति प्रवर्तन निदेशालय, राष्ट्रीय जांच एजंसी और केंद्रीय जांच ब्यूरो का है। वे भी तथ्य उगलवाने के नाम पर ऐसी ज्यादतियां करते देखे जाते हैं। मगर पुलिस इस मामले में कुछ अधिक बदनाम है। वह तो रसूखदार लोगों के प्रभाव में कई बार, बेकसूर होने के बावजूद, किसी को सबक सिखाने के मकसद से भी उठा लाती और थाने में बंद कर इस कदर पिटाई करती है कि वह दम तोड़ देता है। ऐसे अनेक उदाहरण मौजूद हैं, जब पुलिस ने किसी को बेवजह मारा-पीटा और उसे मार डाला। इस तरह की यातना झेलने वालों में ज्यादातर गरीब तबके के लोग होते हैं। इसलिए सर्वोच्च न्यायालय ने थानों में कैमरे लगाने का आदेश दिया था, ताकि जब भी ऐसी शिकायतें आएं तो उन मामलों के तथ्यों को जाना-समझा जा सके। फिर इस तरह पुलिस पर एक मनोवैज्ञानिक दबाव भी रहे।
मगर साफ है कि न तो राज्य सरकारें पुलिस के कामकाज का तरीका बदलना चाहती हैं, न पुलिस खुद अपने को बदलना चाहती है। पुलिस सुधार को लेकर अब तक गठित आयोगों और समितियों ने कई मूल्यवान सुझाव दिए हैं, मगर उन पर केंद्र सरकार ने भी कभी गंभीरता से विचार करने की जरूरत नहीं समझी। इसलिए पुलिस मनमानी से बाज नहीं आती। जब भी हिरासत में मौत का मामला उठता है, तो वह किसी न किसी तरह अपने को पाक-साफ साबित कर लेती है। मगर अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग इस पर कई बार चिंता जता चुका है कि भारत में हिरासत में होने वाली मौतों का आंकड़ा चिंताजनक है। ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय की कड़ाई के बाद अगर थानों में कैमरे लगा भी दिए जाते हैं, तो पुलिस के कामकाज में बहुत बदलाव आएगा, इसका दावा करना मुश्किल है। कैमरे लगाने के बाद उनके संचालन और एक केंद्रीय इकाई द्वारा उन पर निगरानी रखने का तंत्र भी विकसित होना चाहिए।
Date:24-02-23
यूक्रेन युद्ध का एक सालसंपादकीय
इसमें कोई संदेह नहीं है कि इस समय वैश्विक स्तर पर राजनीतिक और रणनीतिक गतिविधियों में जो गतिविधियां सर्वाधिक चर्चाओं के केंद्र में है वह है अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन की यूक्रेन यात्रा और रूस- यूक्रेन युद्ध का एक वर्ष पूरा होना। 24 फरवरी 2022 को युद्ध आरंभ हुआ था और यह अभी भी जारी है। लोगों को याद होगा कि पिछले वर्ष दिसम्बर में यूक्रेन के राष्ट्रपति बलादिमीर जेलेंस्की ने भी युद्ध के बीच गोपनीय स्तर पर अमेरिका की यात्रा की थी। बाइडेन के साथ उनकी वार्ता तथा अमेरिकी संसद में उनके संबोधन को दुनिया भर में देखा-सुना गया था । जेलेंस्की की अमेरिका यात्रा से यह जाहिर हो गया था कि युद्ध लंबा खिंचेगा। अब बाइडेन की यूक्रेन यात्रा का रूसी राष्ट्रपति पुतिन पर जिस तरह का नकारात्मक प्रभाव पड़ा है उसके आलोक में कहा जा सकता है कि यह युद्ध कब समाप्त होगा, इसका सहज अनुमान लगाना भी मुश्किल है। पुतिन ने राष्ट्र के अपने संबोधन में यूक्रेन में रूसी कब्जे इलाकों से अपने सैनिकों को हटाने की अंतरराष्ट्रीय मांगों को खारिज कर दिया और परमाणु हथियारों पर नियंत्रण के लिए अमेरिका के साथ 1991 में हुए परमाणु संधि को निलंबित करने की घोषणा भी की। इससे दुनिया में परमाणु हथियारों की होड़ का खतरा भी बढ़ जाएगा। रूस यूक्रेन युद्ध के एक साल पूरा होने पर युद्ध के सैनिक और आर्थिक प्रभाव विश्व के अनेक देशों में महसूस किए जा रहे हैं। सबसे बड़ा संकट ऊर्जा सुरक्षा और खाद्य सुरक्षा को लेकर है। घरेलू उपयोग में आने वाली ऊर्जा की कीमतों में जो इजाफा हुआ है, उसके कारण यूरोपीय देशों को मुश्किलों का सामना करना पड़ रहा है। दूसरी ओर, यूक्रेन से खाद्यान्न आपूर्ति में रुकावट के कारण अफ्रीका सहित दुनिया के विभिन्न देशों में खाद्यान्न संकट पैदा हुआ। पुतिन ने अपनी सेना को परमाणु हथियारों से लैस करने की बात कहकर सभी को डरा दिया है। युद्ध को समाप्त करने में भारत की भूमिका अहम हो सकती है। प्रधानमंत्री मोदी प्रभावशाली मध्यस्थ के रूप में उभर सकते हैं। वर्तमान माहौल में इसे आशावादिता कहा जा सकता है, किंतु भारत की सलाह पर अमेरिका, प. देश और रूस यदि कूटनीति और संवाद का सहारा लें तो यह युद्धविराम और शांति की पहल हो सकती है।
Date:24-02-23
बातूनी मशीनें आगे बहुत काम आएंगीप्रांजल शर्मा, ( डिजिटल नीति विशेषज्ञ )
तकनीक की हर नई छलांग उत्साह भी पैदा करती है और चिंता भी लाती है। डीपमाइंड और ओपनएआई जैसी कंपनियों द्वारा बनाए गए नए स्मार्ट चैटबॉट्स ने लोगों का मन मोह लिया है। इनमें इंसानों की तरह सवालों के जवाब देने की क्षमता है। ये बारीकियों की व्याख्या कर सकते हैं, साथ ही, तथ्यों को विश्वास के साथ साझा भी कर सकते हैं।
ये चैटबॉट नए नहीं हैं। इंसानों के साथ संवाद करने में सक्षम कंप्यूटर प्रोग्राम या चैटबॉट्स की अवधारणा का 1950 के दशक से ही एक इतिहास रहा है। प्रारंभिक चैटबॉट्स को प्राकृतिक भाषा प्रसंस्करण और कृत्रिम बुद्धिमत्ता प्रौद्योगिकियों का परीक्षण करने के तरीके के रूप में विकसित किया गया था। शुरुआती चैटबॉट्स में से एक एलिजा है, जिसे 1960 के दशक में कंप्यूटर वैज्ञानिक जोसेफ वीजेनबाम ने बनाया था। एलिजा को भाषा पैटर्न की नकल के लिए डिजाइन किया गया था। यह कीवर्ड और वाक्यांशों का जवाब देकर उपयोगकर्ताओं के साथ सहज ढंग से संवाद कर सकता था। गौर कीजिएगा, उपरोक्त जवाब मुझे चैटजीपीटी ने दिया है, वही जो ओपनएआई द्वारा बनाया गया अग्रणी नया चैटबॉट है। मैंने चैटबॉट्स के इतिहास के बारे में सवाल पूछा था। जाहिर है, यह चैटबॉट्स के इतिहास पर शोध करने वाले किसी भी व्यक्ति के लिए एक व्यापक जवाब है। चैटजीपीटी को अभी तक का सबसे उन्नत चैटबॉट माना जा रहा है।
चैटजीपीटी को ओपनएआई द्वारा विकसित किया गया है, जो खोसला वेंचर्स और माइक्रोसॉफ्ट द्वारा समर्थित शोध प्रयोगशाला है। चैटजीपीटी का एक भाषा मॉडल है, जो इंसानों की तरह ही प्रतिक्रिया करता है। मैंने चैटजीपीटी से एक और सवाल पूछा, चैटबॉट अब तक कितने कारगर रहे हैं? मुझे जवाब मिला, पिछले कुछ वर्षों में चैटबॉट विकसित हुए हैं और अब अधिक परिष्कृत भी हो गए हैं। आज ग्राहक सेवा, ई-कॉमर्स और शिक्षा सहित विभिन्न क्षेत्रों में चैटबॉट का इस्तेमाल किया जाता है। वे वेबसाइटों, मैसेजिंग एप्स और अन्य प्लेटफॉर्म पर पाए जा सकते हैं और अक्सर इनका इस्तेमाल जानकारी प्रदान करने, सवालों के जवाब देने और टिकट बुक करने या आरक्षण करने जैसे कार्यों के लिए किया जाता है। कुछ चैटबॉट ज्यादा जटिल संवाद करने में भी सक्षम हैं और समय के साथ अपनी प्रतिक्रियाओं को बेहतर बनाने के लिए मशीन लर्निंग एल्गोरिदम का उपयोग करते हैं
तेजी से परिष्कृत होते चैटबॉट्स के नए सर्च इंजन बनने की संभावना के बारे में पहले ही बहस शुरू हो गई है। अभी चैटजीपीटी सहित अधिकांश चैटबॉट अपने लिए सूचनाएं एक विशाल, लेकिन सीमित दायरे से ही प्राप्त करते हैं। जैसे ,चैटजीपीटी का ताजा संस्करण 2021 के अंत तक संचित हुई सूचनाओं तक सीमित है। मतलब, चैटजीपीटी को साल 2022-23 के बारे में कोई सूचना नहीं है।
कोई शक नहीं कि चैटबॉट अपनी प्रतिक्रिया में कहीं अधिक मुखर हैं और किसी जिज्ञासा पर ज्यादा ध्यान केंद्रित करते हैं, जबकि ऐसा करना गूगल या बिंग जैसे सर्च इंजन के लिए मुश्किल है। हालांकि, चैटजीपीटी की इंसानों जैसी प्रतिक्रिया में सूचना स्रोत का जिक्र नहीं होता है और न ही कोई लिंक या उद्धरण दिया जाता है। अभी चैटजीपीटी द्वारा जुटाई गई सूचना उपयोगी भी है और पेचीदा भी, इसकी सत्यता की पुष्टि कठिन है। फिर भी, चैटजीपीटी के साथ आसान बातचीत ने दुनिया भर में धूम मचा दी है। उत्साही लोग तरह-तरह के हजारों सवाल पूछ रहे हैं। हर संवाद के साथ चैटबॉट का भी परीक्षण और प्रशिक्षण चल रहा है। चैटजीपीटी के साथ कोई भी लॉगिन और चैट कर सकता है। हर बातचीत आईटी वैज्ञानिकों के लिए शोध का हिस्सा है।
कुछ लोग चिंतित हैं कि छात्र अपना होमवर्क करने या निबंध लिखने के लिए चैटबॉट का उपयोग करेंगे। चैटबॉट के खूब सारे प्रयोग-उपयोग आने वाले दिनों में सामने आएंगे। हमें सतर्क रहना होगा। एक चैटबॉट सब कुछ नहीं जानता, जबकि इसका इजहार या इसकी अभिव्यक्ति या लेखन इंसानों की तरह ही है। इसकी जानकारी गलत और दोषपूर्ण भी हो सकती है। जरूरी है, हर उपयोगकर्ता हर जानकारी को परख ले और चैटबॉट द्वारा कही गई हर बात आंख मूंदकर न माने। ध्यान रहे, अभी कुछ चैटबॉट गलत बात भी कर रहे हैं, शादी तोड़ने की सलाह भी दे रहे हैं, तो करियर तबाह करने की धमकी भी। ऐसे जवाबों को लेकर बड़ी चिंता है। वैसे इसी तरह की चिंता तब व्यक्त की गई थी, जब गूगल और अन्य सर्च इंजन लॉन्च किए गए थे। अब चैटबॉट के साथ भी हमें सूचना के स्रोतों और तथ्यों के बारे में आश्वस्त होना पड़ेगा।
चैटबॉट्स को अभी भी कई बाधाओं या हदों को पार करना है। चैटबॉट्स के पास उपलब्ध डाटा या सूचनाओं को बढ़ाना है। विशेष चैटबॉट्स के लिए विशेष डोमेन भी मुमकिन है। मिसाल के लिए, एक हेल्थकेयर चैटबॉट केवल मरीजों के लिए हो सकता है, जबकि दूसरा केवल गणित के छात्रों के लिए। कई भाषाओं के विकल्पों के साथ डिजिटल संचार पाठ से आवाज की ओर बढ़ रहा है। डिजिटल दुनिया में हर शब्द स्वरबद्ध होता जा रहा है। एलेक्सा जैसे सर्च इंजन और आवाज आधारित अन्य सहायकों से आगे जाने के लिए चैटबॉट्स को ज्यादा मात्रा में सूचनाओं की जरूरत पड़ेगी। लोगों की तमाम जिज्ञासाओं को शब्दों से ही नहीं, स-स्वर शांत करना होगा।
चैटबॉट्स, सर्च इंजन व डिजिटल सहायकों के बीच पहले से ही एक स्तर का परस्पर संपर्क स्थापित है। वे एक-दूसरे के पूरक होने लगे हैं। मशीन लर्निंग और स्वर पहचान तकनीक भी तेजी से बदल रही है, जिससे आने वाले दिनों में कई पुराने काम खत्म होंगे, तो कई नए शुरू हो जाएंगे। विज्ञान रुकने वाला नहीं है। माइक्रोसॉफ्ट में चैटजीपीटी से भी अधिक शक्तिशाली एआई मॉडल विकसित करने पर काम चल रहा है। यह ज्यादा तेज, सटीक और सक्षम होगा।
अभी की बात करें, तो स्पैरो चैटबॉट में चैटजीपीटी की तुलना में कुछ बेहतर विशेषताएं हैं। स्पैरो में स्रोतों का हवाला देने की क्षमता है। जल्दी ही ऐसे चैटबॉट भी उपलब्ध होंगे, जो गलत सवालों को पहचानने में सक्षम होंगे। जैसे अगर कोई पूछेगा कि कार चोरी कैसे करें, तो चैटबॉट मुंह मोड़ लेंगे। ऐसे चैटबॉट की भी बाढ़ आ सकती है, जो चैटिंग से आगे बढ़कर हमारा साथ देंगे। वाकई, समझदारी से अगर इस्तेमाल हुआ, तो चैटबॉट हमारे बहुत काम आएंगे।
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2019 में लद्दाख को केंद्र शासित प्रदेश बनाया गया था। इसके कुछ समय बाद से यहाँ के स्थानीय लोगों और नौकरशाही के बीच लगातार खींचतान चल रही है। इसके कुछ कारणों में से एक यहाँ की नौकरशाही का रूखा व्यवहार और गैर-जिम्मेदाराना दृष्टिकोण भी बताया जा रहा है।
स्थानीय समूहों की प्रमुख मांगे –
लद्दाख की पहचान, संस्कृति और नाजुक वातावरण की सुरक्षा के लिए इन मांगों को महत्वपूर्ण बताया जा रहा है। इस हेतु केंद्र ने दो समितियां नियुक्त की हैं। पिछले दो वर्षों में ये समितियां समस्याओं के समाधान में नाकाम रही हैं।
ज्ञावव्य हो कि 2020 में चीनी सेना ने लद्दाख क्षेत्र से बड़ी घुसपैठ की थी। यह मामला अभी भी अनसुलझा है। लद्दाख के स्थानीय समुदायों में अशांति होने पर विदेशी और शत्रु ताकतें स्थितियों का लाभ उठा सकती हैं। अतः इस महत्वपूर्ण क्षेत्र की समस्याओं का त्वरित समाधान करना स्थानीय और देश हित में है।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 03 फरवरी, 2023
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Date:23-02-23
A clean gambleCarbon trading should help India to accelerate the shift away from fossil fuelEditorial
Later this year, the Centre is expected to clarify the specifics of a carbon trading market in India. An amendment to the Energy Conservation Act, passed in 2022 and, separately, approval by the UN Framework Convention on Climate Change via the Paris and Glasgow agreements ensured that carbon markets (where ‘carbon credits’ and ‘emission certificates’ can be traded) have acquired greater global currency. ‘Carbon markets’ are a catch-all term and need clarity, especially in the Indian context. A decade or more ago, they meant stock-market-like exchanges that traded in ‘carbon offsets’ made legitimate under the Clean Development Mechanism. Here, industrial projects in developing countries that avoided greenhouse gas emissions were eligible for credits that, after verification, could be sold to European companies that could buy them in lieu of cutting emissions themselves. Alongside are the EU-Emissions Trading Systems (ETS) where government-mandated emission limits on industrial sectors such as aluminium or steel plants require industries to either cut emissions or buy government-certified permits from companies that cut more emissions than required or were auctioned by governments. Carbon credits became valuable because they could be used as permits in EU-ETS exchanges. Such permits are a ‘right to pollute’ and being tradeable on an exchange, akin to shares, are expected to fluctuate in value depending on a company’s need to balance profitability and comply with pollution norms.
The objective of such markets is to incentivise investments in renewable energy sources. While India has maintained its right to grow its carbon emissions in the near future, it has committed to cutting the emissions intensity (emissions per unit of GDP) of its growth by 45% (of 2005 levels) by 2030. It has been doing this, partly, via the Perform, Achieve and Trade (PAT) scheme, where around 1,000 industries have been involved in procuring and trading energy saving certificates (ESCerts). Since 2015, various cycles of the PAT have shown emission reductions of around 3%-5%. The European Union, which runs the oldest emission trading scheme since 2005, had cut emissions by 35% from 2005-2019 and 9% in 2009, over the previous years. Whether carbon trading can meaningfully lead to emissions reductions in the Indian context is a question that can be answered only decades later. It would, however, be a victory in itself, if it is able to mobilise domestic finance and accelerate the shift away from fossil fuel. With that end in mind, the government must intervene to bring in the right amount of pressure on industry to participate in the market but not ignore proven non-market initiatives to achieve greenhouse gas reductions.
Date:23-02-23
India can become a biodiversity championThe Budget’s emphasis on green growth can improve the state of the country’s biodiversityKamal Bawa, Ravi Chellam , Shannon Olsson, Jagdish Krishnaswamy, Nandan Nawn & Darshan Shankar, ( The writers are a part of the Biodiversity Collaborative )
The sum and variation of our biological wealth, known as biodiversity, is essential to the future of this planet. The importance of our planet’s biodiversity was strongly articulated at the United Nations Biodiversity Conference in Montreal, Canada. On December 19, 2022, 188 country representatives adopted an agreement to “halt and reverse” biodiversity loss by conserving 30% of the world’s land and 30% of the world’s oceans by 2030, known as the 30×30 pledge. India currently hosts 17% of the planet’s human population and 17% of the global area in biodiversity hotspots, placing it at the helm to guide the planet in becoming biodiversity champions.
Programmes with potential
In response to this call, the Union Budget 2023 mentioned “Green Growth” as one of the seven priorities or Saptarishis. The emphasis on green growth is welcome news for India’s biological wealth as the country is facing serious losses of natural assets such as soils, land, water, and biodiversity.
The National Mission for a Green India aims to increase forest cover on degraded lands and protect existing forested lands. The Green Credit Programme has the objective to “incentivize environmentally sustainable and responsive actions by companies, individuals and local bodies”. The Mangrove Initiative for Shoreline Habitats & Tangible Incomes (MISHTI) is particularly significant because of the extraordinary importance of mangroves and coastal ecosystems in mitigating climate change. The Prime Minister Programme for Restoration, Awareness, Nourishment, and Amelioration of Mother Earth (PM-PRANAM) for reducing inputs of synthetic fertilizers and pesticides is critical for sustaining our agriculture. Finally, the Amrit Dharohar scheme directly mentions our biological wealth and is expected to “encourage optimal use of wetlands, and enhance biodiversity, carbon stock, eco-tourism opportunities and income generation for local communities”. If implemented in letter and spirit, Amrit Dharohar, with its emphasis on sustainability by balancing competing demands, will benefit aquatic biodiversity and ecosystem services. The recent intervention by the Ministry of Environment, Forest and Climate Change to stop the draining of Haiderpur, a Ramsar wetland in Uttar Pradesh, to safeguard migratory waterfowl is encouraging.
Must be science-based
It is critical that these programmes respond to the current state of the country’s biodiversity with evidence-based implementation. A science-based and inclusive monitoring programme is critical not only for the success of these efforts but also for documentation and distillation of lessons learnt for replication, nationally as well as globally.
New missions and programmes should effectively use modern concepts of sustainability and valuation of ecosystems that consider ecological, cultural, and sociological aspects of our biological wealth. With clear system boundaries, prioritisation of the benefits to ‘resource people’, and fund-services (rather than stock-flows) as the economic foundation for generating value has enormous potential for multiple sustainable bio-economies.
The future of our wetland ecosystems will depend on how we are able to sustain ecological flows through reduction in water use in key sectors such as agriculture by encouraging changes to less-water intensive crops such as millets as well as investments in water recycling in urban areas using a combination of grey and blue-green infrastructure.
As far as the Green India Mission is concerned, implementation should focus on ecological restoration rather than tree plantation and choose sites where it can contribute to ecological connectivity in landscapes fragmented by linear infrastructure. Furthermore, choice of species and density should be informed by available knowledge and evidence on resilience under emerging climate change and synergies and trade-offs with respect to hydrologic services.
Site selection should also be carefully considered for the mangrove initiative with a greater emphasis on diversity of mangrove species with retention of the integrity of coastal mud-flats and salt pans themselves, as they too are important for biodiversity.
Local community involvement
Finally, each of these efforts must be inclusive of local and nomadic communities where these initiatives will be implemented. Traditional knowledge and practices of these communities should be integrated into the implementation plans. Each of these programmes has the potential to greatly improve the state of our nation’s biodiversity if their implementation is based on the latest scientific and ecological knowledge. As a consequence, each programme should include significant educational and research funding to critically appraise and bring awareness to India’s biological wealth. In response to this need, we hope that the National Mission on Biodiversity and Human Wellbeing, already approved by the Prime Minister’s Science, Technology, and Innovation Advisory Council (PM-STIAC), will be immediately launched by the government. This mission seeks to harness the power of interdisciplinary knowledge — for greening India and its economy, to restore and enrich our natural capital for the well-being of our people, and to position India as a global leader in applied biodiversity science.
Date:23-02-23
बढ़ते तापमान से गेहूं की फसल पर संकटसंपादकीय
पर्यावरण में बदलाव के दुष्प्रभाव अब दिखने लगे हैं। उत्तर भारत के आधा दर्जन राज्यों में फरवरी में ही रिकॉर्ड तोड़ गर्मी होने लगी है और इसके मार्च में और गंभीर होने की खबर है। केंद्र सरकार ने इससे निपटने के लिए एक एक्सपर्ट समिति बनाई है। आईसीएमआर की एक संस्था ने एडवाइजरी जारी कर किसानों को सलाह दी है कि गेहूं की फसल को लगातार जांचें और अगर अचानक तापमान बढ़े तो उस पर स्प्रिंकलर से दोपहर में 30 मिनट तक पोटेशियम युक्त हल्की सिंचाई करें। स्काईमेट के अनुसार इस वर्ष तापमान औसतन 2-3 डिग्री ज्यादा बढ़ सकता है। हर एक डिग्री तापमान की वृद्धि पैदावार को असाधारण क्षति पहुंचा सकती है। एक सप्ताह पहले कृषि मंत्रालय ने गेहूं की रिकॉर्ड पैदावार का अनुमान लगाया था। लेकिन अब तापमान वृद्धि से पिछले साल की तरह इस साल भी स्थिति बदल सकती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि एक डिग्री सेल्सियस तापमान वृद्धि से गेहूं की फसल 6 प्रतिशत और चावल की 3.5% तक कम हो सकती है। ‘नेचर’ पत्रिका में छपे एक अध्ययन के अनुसार पर्यावरण प्रदूषण यानी ग्रीन हाउस इफेक्ट से ग्लेशियर के पिघलने का सबसे ज्यादा प्रभाव हिन्दुकुश क्षेत्र यानी भारत और पाकिस्तान पर पड़ेगा और अचानक बाढ़ और हिमस्खलन की घटनाएं होंगी, जिससे इन देशों के लाखों लोगों का जीवन संकट में आ जाएगा। कुल मिलाकर किसान के लिए आने वाले वर्ष संकट के हो सकते हैं।
Date:23-02-23
शिवसेना पर शिंदे गुट के कब्जे के क्या मायने हैं ?विराग गुप्ता, ( लेखक और वकील )
दल -बदल विरोधी कानून के अनुसार दो-तिहाई विधायकों वाले शिंदे गुट को अन्य पार्टी में विलय के बाद ही मान्यता मिल सकती थी। लेकिन स्पीकर, राज्यपाल, सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग के त्वरित आदेशों के बाद शिंदे ने सरकार बनाने के 9 महीने के भीतर ही शिवसेना पर कब्जा कर लिया। मामले में यू-टर्न के बाद अब ठाकरे गुट के विधायकों और सांसदों पर अयोग्यता की तलवार लटकने लगी है। इस मामले से जुड़े चार अहम बातों को समझना जरूरी है-
1. पार्टियों में तानाशाही
कागजों में दर्ज करोड़ों सदस्यों और कार्यकारिणी का विवरण पेश नहीं करने के बावजूद चुनाव आयोग पार्टियों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं करता। सुप्रीम कोर्ट के सादिक अली के 50 साल पुराने फैसले के अनुसार विधायक और सांसदों को मिले वोटों के आधार पर शिंदे गुट को शिवसेना का तीर-कमान सौंप दिया गया। शिंदे गुट ने पार्टी के 55 में से 40 विधायकों और 18 में से 13 सांसदों के समर्थन का दावा किया था। आयोग की गणना के अनुसार उन्हें लगभग 75 फीसदी वोट मिले। चुनाव चिह्न कब्जाने के लिए विधायक व सांसदों के विधायी दल को ही राजनीतिक पार्टी का पर्याय मानने पर आयोग की मुहर लगना गलत है। आयोग ने शिवसेना के 2018 के संविधान को मानने से इंकार कर दिया, जिसमें उद्धव ठाकरे को सर्वाधिकार हासिल थे। लेकिन कब्जा मिलने के बाद शिंदे ने भी प्रस्ताव के माध्यम से पार्टी पर एकाधिकार हासिल करके, कानून और आयोग दोनों को ठेंगा दिखा दिया है।
2. अप्रासंगिक दल-बदल विरोधी कानून
आयाराम-गयाराम युग में माननीय कहे जाने वाले विधायक छोटे स्तर पर दल-बदल करते थे। दल-बदल कानून के बाद अब हॉर्स ट्रेडिंग में भ्रष्टाचार के साथ संगठित आपराधिक तंत्र का भी संगम हो गया है। शिंदे गुट के दो-तिहाई विधायकों को अयोग्यता की अग्निपरीक्षा में खरे उतरने के बावजूद दूसरे दल में विलय के बाद ही मान्यता मिल सकती थी। इन सभी कानूनी पहलुओं को दरकिनार करके शिंदे गुट को सरकार बनाने, नए स्पीकर की नियुक्ति करने और अब पार्टी पर कब्जा करने की इजाजत मिल गई है। संगठित दल-बदल को सियासी और कानूनी मान्यता मिलने के बाद अब संविधान की दसवीं अनुसूची में कैद दल-बदल विरोधी कानून अप्रासंगिक-सा लगता है।
3. संवैधानिक नैतिकता का आलाप
चुनाव आयोग में लगभग 3000 पार्टियां रजिस्टर्ड हैं, जिनमें से 92 फीसदी ने पिछली आमदनी का विवरण फाइल नहीं किया। ऐसी पार्टियां हवाला व आपराधिक गतिविधियों में लिप्त हैं। कोई भी मान्यता प्राप्त पार्टी अपने सदस्यों का पूरा विवरण वेबसाइट में अपडेट नहीं करती। विवाद बढ़ने के बाद ठाकरे गुट ने चुनाव आयोग के सामने कई ट्रकों में 20 लाख से ज्यादा पार्टी सदस्यों का शपथ-पत्र पेश किया था। शिंदे गुट ने 10 लाख सदस्यों का विवरण देने के बाद 10 लाख सदस्यों का ऑनलाइन ब्यौरा देने की बात कही है। लेकिन अब उन बातों पर शायद ही कोई पारदर्शी बहस होगी। मिल-जुलकर सरकार चलाने वाले दोनों गुट परस्पर भ्रष्टाचार और संगठित अपराधों में लिप्त होने का आरोप लगा रहे हैं। चुनाव चिह्न पर आयोग के फैसले के बाद 2000 करोड़ की डील की बात की जा रही है। अरुणाचल प्रदेश और उत्तराखण्ड में अदालती हस्तक्षेप के बाद सरकारों की बहाली हो गई थी। लेकिन ठाकरे गुट को अब संवैधानिक नैतिकता की आड़ में सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिलना मुश्किल है। इंदिरा गांधी के समय कांग्रेस की तर्ज पर अब अगले चुनावों में नए सिरे से असली शिवसेना का निर्धारण होगा।
4. स्पीकर की घटती साख
अविश्वास प्रस्ताव लम्बित होने पर स्पीकर द्वारा विधायकों की अयोग्यता का निर्धारण नहीं हो सकता। इस बारे में नबाम रेबिया के 2016 के फैसले की संवैधानिकता की सुप्रीम कोर्ट नए सिरे से जांच कर रहा है। संविधान की दसवीं अनुसूची के अनुसार अयोग्यता के निर्धारण के लिए स्पीकर को न्यायाधिकरण का दर्जा दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस चंद्रचूड़ ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा है कि सत्ता में रहने वाली हर पार्टी स्पीकर का सियासी इस्तेमाल करती है। राज्यपाल, चुनाव आयोग और स्पीकर की विफलता के फलस्वरूप सुप्रीम कोर्ट में मुकदमेबाजी बढ़ना ठीक नहीं है। पार्टियों में शिकायत निवारण तंत्र की कमी के बारे में चुनाव आयोग की टिप्पणी पर सुप्रीम कोर्ट ठोस आदेश पारित करे।
Date:23-02-23
सामाजिक न्याय की नई और प्रभावी पहलशहजाद पूनावाला, ( लेखक भाजपा के राष्ट्रीय प्रवक्ता एवं राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य हैं )
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने जबसे पसमांदा मुसलमानों समेत समाज के हाशिये के वर्गों तक पहुंचने की अपील की है, तबसे मुस्लिम समाज में भी हलचल है और अन्य वर्गों में भी। मैं भी पसमांदा समाज से आता हूं। मेरे पिता का उपनाम जमादार था, जिनका पारंपरिक व्यवसाय सफाई करना था। कई राज्यों में मुस्लिम जमादार ओबीसी में आते हैं। मुसलमानों में पसमांदा का हिस्सा लगभग 85 प्रतिशत है। पसमांदा का अर्थ है-जो पीछे छूट गए। मुसलमानों में जुलाहा, कुंजरा, घोसी, मुस्लिम तेली, घनची, हलालखोर, धोबी, नट आदि पसमांदा हैं। विडंबना यह है कि छद्म पंथनिरपेक्षता की राजनीति करने वालों ने मुस्लिम समुदाय के मुट्ठी भर अभिजात्य वर्ग अर्थात अशराफ (सैयद, शेख, मुगल, पठान आदि) के साथ मिलकर राजनीतिक, शैक्षिक और आर्थिक संसाधनों पर कब्जा कर लिया। सत्ता के गलियारों से इस वर्ग की निकटता ने पसमांदा मुसलमानों को राजनीतिक रूप से अदृश्य और सामाजिक-आर्थिक रूप से अछूत बना दिया। इस अभिजात्य वर्ग ने एक अखंड मुस्लिम पहचान के नकली आख्यान को फैलाकर उसे अपने संकीर्ण राजनीतिक हित में इस्तेमाल किया। अयोध्या ढांचा ध्वंस, हिजाब मामला, सीएए, समान नागरिक संहिता, तीन तलाक, अनुच्छेद 370 जैसे पहचान की राजनीति के भावनात्मक मुद्दों को आगे कर और शिक्षा एवं सशक्तीकरण के लिए बुनियादी जरूरतों को नजरअंदाज कर पूरे विमर्श को ही ‘बहुसंख्यक बनाम अल्पसंख्यक’ की बहस में बदल दिया गया। इस अभिजात्य वर्ग ने मुसलमानों के बीच हिंदुत्व के बारे में भी भय फैलाया।
वास्तव में मुसलमानों के बीच सामाजिक न्याय आंदोलन का सबसे बड़ा दुश्मन छद्म पंथनिरपेक्ष आंदोलन रहा है, जो सांप्रदायिकता और उग्रवाद के बीज बोने के लिए जिम्मेदार है। यह आंदोलन आयातित इस्लामवादियों के लिए हमेशा एक पका हुआ फल रहा है। हम मुसलमानों के हितों का दावा करने वाले जो प्रमुख चेहरे देखते हैं, उनमें छद्म-पंथनिरपेक्षतावादी और वाम-उदारवादी भी शामिल हैं। ये अफजल गुरु और याकूब मेमन जैसे सजायाफ्ता आतंकियों का बचाव करने के लिए भी सक्रिय हो जाते हैं। ये रोज भारत में लोकतंत्र और पंथनिरपेक्षता के अंत की भविष्यवाणी करते हैं और मुसलमानों को यह महसूस करने पर मजबूर करते हैं कि उनकी पहचान और अस्तित्व को खतरा है। कभी-कभी तो ये जय श्रीराम नारे से भी भारतीय मुसलमानों को खतरे का अहसास कराने में सफल हो जाते हैं। इनका कहना है कि अगर मुसलमानों के पास किताब के लिए पैसा नहीं तो क्या हुआ, उसे हिजाब के लिए जिहाद करना चाहिए।
पसमांदा मुसलमानों की वास्तविक प्राथमिकता गुणवत्तापूर्ण आधुनिक शिक्षा, बैंकिंग, रोजगार, आवास और किफायती स्वास्थ्य सेवा तक पहुंच है, न कि समान नागरिक संहिता, जिसका उल्लेख संविधान में है। छद्म पंथनिरपेक्षतावादी यह शोर मचाते हैं कि ‘मुसलमान खतरे में हैं।’ अक्सर ये लिंचिंग से संबंधित आंकड़ों का हवाला देते हैं और भाजपा में मुसलमानों के प्रतिनिधित्व की कमी को मोदी की मंशा पर आक्षेप लगाने के लिए दर्शाते हैं, लेकिन जब कांग्रेस के समय हुए लिंचिंग के बड़े मामलों और दंगों के आंकड़े सामने रखे जाते हैं, तो चुप हो जाते हैं। यह एक तथ्य है कि कांग्रेस शासन में मुरादाबाद से लेकर भागलपुर तक और मुंबई से लेकर जलगांव तक दंगों में सैकड़ों मुसलमान मारे गए। छद्म पंथनिरपेक्षतावादी कांग्रेस के ठाकरे की शिवसेना से गठबंधन करने पर भी चुप रहना पसंद करते हैं और वह भी तब, जब वे 1993 के दंगों में शिवसेना का हाथ होने का आरोप लगाते रहते हैं।
जहां तक प्रतिनिधित्व का सवाल है तो आजादी के बाद से कांग्रेस का कोई मुस्लिम अध्यक्ष नहीं रहा। आम आदमी पार्टी, समाजवादी पार्टी, माकपा, राजद, राकांपा, द्रमुक आदि पार्टियों में भी कभी किसी मुस्लिम नेता को नेतृत्व नहीं मिला। इन पार्टियों ने पिछले 25 सालों में मुस्लिम बहुल जम्मू-कश्मीर के अलावा किसी मुसलमान को मुख्यमंत्री का पद नहीं दिया। लेखक खालिद अंसारी बताते हैं कि कैसे पहली से लेकर चौदहवीं लोकसभा तक मुस्लिम प्रतिनिधित्व केवल 5.3 प्रतिशत था। यदि हम 15:85 जनसंख्या अनुपात लागू करते हैं, तो पता चलता है कि पहली से चौदहवीं लोकसभा तक राष्ट्रीय जनसंख्या में 2.1 प्रतिशत हिस्सेदारी वाले अशराफ का प्रतिनिधित्व 4.5 प्रतिशत था। दूसरी ओर पसमांदा मुसलमान की 11.4 प्रतिशत हिस्सेदारी के बावजूद उनका केवल 0.8 प्रतिशत प्रतिनिधित्व रहा। साफ है कि अशराफ का प्रतिनिधित्व दोगुना रहा।
पीएम मोदी न केवल भाजपा को पसमांदा मुस्लिमों से जोड़ने का आह्वान कर रहे हैं, बल्कि उनके राजनीतिक सशक्तीकरण और सामाजिक-आर्थिक उत्थान के द्वार भी खोल रहे हैं। गुलाम अली खटाना का राज्यसभा में नामांकन, उत्तर प्रदेश सरकार में दानिश आजाद अंसारी को मंत्री बनाना इसके उदाहरण हैं। मैं स्वयं भाजपा का सबसे कम आयु का राष्ट्रीय प्रवक्ता हूं। जनधन, आयुष्मान भारत, पीएम-किसान, पीएम आवास, मुद्रा ऋण, नल से जल और उज्ज्वला आदि कई योजनाओं में मोहित और मोहम्मद, शिल्पा और सुल्ताना के बीच भेद किए बिना हाशिये के लोगों को लाभ प्रदान किया गया है। मुस्लिम वोट बैंक के तुष्टीकरण से परे पसमांदा मुसलमानों सहित सभी पिछड़े वर्गों के सामाजिक कल्याण की यह प्रतिबद्धता सामाजिक न्याय के एक नए युग की शुरुआत करेगी, जो कि बाबा साहब आंबेडकर का सपना था।
Date:23-02-23
यूपीआई: स्वागतयोग्य पहलसंपादकीय
नैशनल पेमेंट्स कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया (एनपीसीआई) द्वारा विकसित रियलटाइम भुगतान प्रणाली यूनिफाइड पेमेंट्स इंटरफेस (यूपीआई) ने देश में डिजिटल भुगतान व्यवस्था को क्रांतिकारी ढंग से बदला है। मंगलवार को भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास और मॉनिटरी अथॉरिटी ऑफ सिंगापुर के प्रबंध निदेशक रवि मेनन के बीच मोबाइल फोन के माध्यम से सीमापार लेनदेन के प्रदर्शन से पता चलता है कि इंडिया स्टैक प्लेटफॉर्म पर विकसित यह स्वदेशी तकनीक कितनी परिपक्व हो चुकी है।
हालांकि भारत और सिंगापुर के बीच का यह लिंक भविष्य की दिशा में एक अहम कदम है लेकिन अभी भी यह अपेक्षाकृत सीमित कवायद है और इसे एक तरह का परीक्षण ही माना जाना चाहिए।
इसकी मदद से उपयोगकर्ता यूपीआई आईडी, मोबाइल फोन या वर्चुअल पेमेंट एड्रेस के माध्यम से सिंगापुर पे नाउ के जरिये रोजाना 60,000 रुपये तक की राशि भेज सकेंगे। यह नकदी हस्तांतरण भारतीय स्टेट बैंक, इंडियन बैंक, इंडियन ओवरसीज बैंक और आईसीआईसीआई बैंक जैसे चुनिंदा बैंकों तक सीमित रहेगा। ये बैंक अपने मोबाइल ऐप्लिकेशन या अन्य बैंकिंग सुविधाओं के माध्यम से इसे अंजाम दे सकेंगे। थर्ड पार्टी सेवा प्रदाता मसलन फोनपे, गूगल पे अथवा पेटीएम इस अंतरराष्ट्रीय लिंक के दायरे से बाहर हैं। बहरहाल, इस प्रणाली को इन कंपनियों तक पहुंचने में बहुत अधिक समय नहीं लगेगा क्योंकि संख्या और राशि दोनों ही तरह से 90 फीसदी लेनदेन इन तीनों प्लेटफॉर्म के माध्यम से होता है।
इसमें दो राय नहीं कि यूपीआई को भारत में इस कदर विश्वसनीयता और कारोबार हासिल हुआ है कि यह सरकार के वित्तीय समावेशन और डिजिटल अर्थव्यवस्था हासिल करने के घोषित लक्ष्य को हासिल करने का एक अहम जरिया बना है। अप्रैल 2016 में इसे प्रायोगिक तौर पर शुरू किए जाने के पांच वर्ष बाद 2021 में यूपीआई वीजा, अलीपे, वीचैट पे और मास्टरकार्ड के बाद दुनिया का पांचवां सबसे बड़ा पेमेंट नेटवर्क बन गया। वर्ष 2022 में इसके जरिये होने वाले लेनदेन कुल लेनदेन का 91 फीसदी हो गए और 126 लाख करोड़ रुपये के साथ यह कुल लेनदेन का 75 फीसदी रहा। एनपीसीआई के लेनदेन संबंधी आंकड़ों के मुताबिक यूपीआई के माध्यम से होने वाले लेनदेन में आधे से ज्यादा 250 रुपये से कम के हैं। विभिन्न आय वर्ग और भौगोलिक इलाकों में यह समान रूप से प्रचलित है और इसकी स्वीकार्यता इस स्तर पर पहुंच गई है कि यह कम लागत पर अधिक वित्तीय समावेशन को प्रोत्साहन देगा। हकीकत में कंबोडिया, मलेशिया, थाईलैंड, फिलिपींस, वियतनाम, भूटान और सिंगापुर पहले ही क्यूआर कोड के माध्यम से यूपीआई भुगतान को स्वीकार कर रहे हैं। आरबीआई के आंकड़ों के मुताबिक आंतरिक धन प्रेषण में 5.7 फीसदी की हिस्सेदारी के साथ सिंगापुर अपेक्षाकृत काफी निचले स्तर पर है। ऐसे अंतरराष्ट्रीय भुगतान का वास्तविक परीक्षण तब होगा जब यह खाड़ी देशों या अमेरिका और कनाडा तक विस्तारित हो जो आने वाले धन प्रेषण के क्षेत्र में दबदबा रखते हैं। ऐसा होने पर यूपीआई सही अर्थों में समावेशी होगा क्योंकि तब वे हजारों कर्मचारियों को अपने दायरे में ले लेगा जिन्हें अपेक्षाकृत धीमी ऑनलाइन मुद्रा स्थानांतरण सेवाओं का भरोसा करना होता है और जिनके सेवा प्रदाता भारी भरकम शुल्क वसूल करते हैं। आगे वास्तविक चिंता धोखाधड़ी की है, हालांकि बैंकर कहते हैं कि यूपीआई की सहज और सुरक्षित व्यवस्था ने इस आशंका को काफी हद तक दूर किया है। आरबीआई के आंकड़ों से पता चलता है कि यूपीआई प्रणाली के साथ धोखाधड़ी बढ़ी है, हालांकि ऐसा आमतौर पर उपयोगकर्ता की असावधानी की वजह से होता है, न कि किसी हैक की वजह से। बहरहाल इन कमियों को दूर करना होगा तभी यूपीआई वास्तव में वैश्विक और स्थानीय बन सकेगा।
Date:23-02-23
कार्बन से होने वाला प्रदूषण और अस्थायी कामयाबीअजय शाह, ( लेखक एक्सकेडीआर फोरम में शोधकर्ता हैं )
जब कोई विकसित देश किसी खास उद्योग में प्रदूषण नियंत्रण की व्यवस्था करता है तो उन भारतीय प्रतिस्पर्धियों की मांग और मुनाफा बढ़ जाता है क्योंकि यहां प्रदूषण नियंत्रण कमजोर होता है। ये कंपनियां अपने लाभ के स्रोत के बारे में गंभीरता से विचार नहीं करतीं। उन्हें लगता है कि वे बहुत समझदार हैं और उन्हें अपनी श्रेष्ठता की बदौलत ही बाजार अर्थव्यवस्था का लाभ मिल रहा है। विकसित देशों में उत्पाद आयात किया जाता है और उस देश को उत्सर्जन से नहीं जूझना पड़ता है। वह उत्सर्जन भारत के स्थानीय लोगों को नुकसान पहुंचाता है। थोड़े बहुत बदलाव के साथ कार्बन डाइऑक्साइड यानी सीओ2 के उत्सर्जन के साथ भी ऐसा ही होगा।
विनिर्माण के किसी काम पर विचार करते हैं जो प्रदूषण फैलाता है। यह भूजल में भारी धातुएं पहुंचाने वाली कोई फैक्टरी हो सकती है। विकसित देशों में प्रदूषण नियंत्रण की व्यवस्था अपेक्षाकृत मजबूत है। बीते कई दशकों के दौरान नियमों को सख्त बनाने की प्रक्रिया चलती रही है। फैक्टरियों को महंगे प्रदूषण नियंत्रक उपकरण लगाने पर विवश किया गया। इससे स्थानीय उत्पादन की लागत में इजाफा हुआ।
तुलनात्मक रूप से हमारे देश में प्रदूषण नियंत्रण कमजोर है। नियमों का प्रवर्तन कमजोर है। ऐसे में मनमानी की गुंजाइश बनती है। भारत में उत्पादन करना सस्ता है। इससे पता चलता है कि प्रदूषण संबंधी क्रय-विक्रय इसकी वजह है, न कि हमारे यहां उत्पादकता बेहतर है।
बाजार में चरणबद्ध उभार हो रहा है जहां भारतीय कारोबारियों के उत्पाद वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धी नजर आते हैं। कठिन और वैश्विक रूप से प्रतिस्पर्धी बाजार में उनकी हिस्सेदारी बढ़ती है। कुछ वर्षों की तेज वृद्धि के बाद शेयर बाजार में उनका कद बढ़ जाता है। शेयर बाजार समुदाय मुनाफे की ढांचागत मजबूती और आय वृद्धि जैसी बातें करता है।
विकसित देशों के आर्थिक एजेंट इन वस्तुओं को सस्ती लागत पर आयात करते हैं जबकि उनका देश प्रदूषण से बचा रहता है। तथ्य यह है कि भारत के भूजल में भारी धातुओं के मिलने का सुदूर खरीदार के निर्णयों पर कोई असर नहीं होता है। विकसित देशों के खरीदारों को भारत से कोई सहानुभूति नहीं होती क्योंकि पश्चिमी देशों में राजनीति काफी हद तक पर्यावरण संरक्षण की दिशा में बढ़ गई है। इसमें कुछ भी नया नहीं है। यह पिछले काफी समय से चल रहा है। एक आदर्श दुनिया में राजनीतिक व्यवस्था को समृद्धि और स्वास्थ्य के बीच संतुलन कायम करना होता है और प्रदूषण नियंत्रण का एक समुचित स्तर हासिल करना होता है। जीवन के सांख्यिकीय मूल्य और प्रदूषण से होने वाले लाभ के बीच रिश्ता होना चाहिए। भारतीय राज्य की सीमाएं अक्सर हमें ऐसे प्रदूषण स्तर प्रदान करती हैं जो लागत-लाभ विश्लेषण में सही नहीं बैठते। अब इसे सीओ2 उत्सर्जन के तर्क में लागू करके देखते हैं। वैश्विक तापवृद्धि का मामला तमाम विकसित देशों में राजनीतिक दृष्टि से बहुत अहम है। ये तमाम देश लोकतंत्र हैं जहां सरकार की शक्ति का इस्तेमाल इस प्रकार किया जाता है जहां जनता के विचारों का प्रतिनिधित्व शायद ही होता है। यानी अलग-अलग प्रणाली के माध्यम से कार्बन उत्सर्जन को लेकर सख्ती की जा रही है।
भारतीय राज्य कार्बन उत्सर्जन कम करने में बहुत अधिक रुचि लेता नहीं दिखता। इससे प्रदूषण के मामले में मनमानेपन की स्थिति बनती है। विभिन्न उद्योगों के बीच हमें प्रदूषण फैलाने वाली कंपनियों की वैश्विक भागीदारी में इजाफा होता हुआ दिखेगा। उनका मुनाफा लगातार बढ़ेगा और उन्हें नायक के रूप में सराहा जाएगा।
परंतु एक अहम अंतर भी है। कार्बन उत्सर्जन पूरी पृथ्वी को नुकसान पहुंचाता है भले ही वह किसी भी जगह हो रहा हो। यह मामला ऐसा नहीं है जैसे कि जमीन में भारी धातु का मिलना भूजल को प्रभावित करता है और उसका असर स्थानीय होता है। विकसित देशों की कंपनियों को जब अपने देश में प्रदूषण के कारण संयंत्र बंद करने पड़ते हैं तो वे राजनीतिक स्तर पर बहुत अधिक हो हल्ला करती हैं। जाहिर है इससे वैश्विक उत्सर्जन के मामले में कोई सुधार नहीं होता। विकसित देशों के राजनेता भी इस बात का समर्थन नहीं करेंगे कि उनके देश के रोजगार भारत जैसे किसी उत्पादन केंद्र पर स्थानांतरित हो जाएंग भले ही इससे उत्सर्जन के मामले में लाभ हो रहा हो। ऐसे में विकसित देशों में कार्बन बॉर्डर कराधान होगा। इसके चलते आरोप-प्रत्यारोप, तनाव तथा देरी जैसी स्थितियां बनेंगी। इससे भारत में उत्सर्जन करने वाली कंपनियों को ही लाभ होगा लेकिन कार्बन-बॉर्डर कर ऐसी स्थिति में अवश्य आएगा जहां उनको मनमाने अवसरों को रोकना होगा।
इस कहानी का दूसरा हिस्सा अंतरराष्ट्रीय जटिलताओं का होगा जो भारत को बतौर सीओ2 उत्सर्जक झेलनी होगी। कम उत्सर्जन करने वाले विकसित देशों और विशुद्ध उत्सर्जक बन रहे भारत के बीच के रिश्तों में आगे चलकर बहुत अधिक समस्याएं आ सकती हैं। भारत पर अपने तौर तरीके बदलने का दबाव बनेगा। भारत को चीन से निपटने के लिए विकसित देशों की मदद चाहिए। कार्बन उत्सर्जन करते हुए भारत के लिए यह मदद हासिल करना मुश्किल होगा।
लब्बोलुआब यह है कि भारतीय कंपनियों को भले ही सीओ2 उत्सर्जन से जबरदस्त लाभ हासिल हुआ हो लेकिन प्रदूषण से जुड़े क्रय विक्रय एक समय के बाद बंद हो जाएंगे और इसमें कार्बन-बॉर्डर टैक्स और प्रदूषण नियंत्रण मानकों में सुधार की अहम भूमिका होगी। भारत की गैर वित्तीय कंपनियों और उनके फंडर्स के लिए यह बेहतर होगा कि वे इस समस्या के बारे में सुविचारित ढंग से विचार करें। अगर हम अंकेक्षण आंकड़ों के कुछ तिमाहियों के प्रदर्शन पर नजर डालें तो इससे ही भौतिक निवेश और वित्तीय पूंजी के आवंटन को उचित ठहराया जा सकता है। लेकिन अगर हम इसमें लगी शक्तियों को समझें तो हम यह जानते हुए इसका लाभ उठा सकते हैं कि यह सब अस्थायी है।
भारतीय कारोबारी परिदृश्य में कारोबारी सफलता की कई तिमाहियां आएंगी जिन पर अगर कदम उठाया जाए तो पूंजी का नष्ट होना सामने आएगा। गैर वित्तीय कंपनियों और वित्तीय विश्लेषकों के लिए बेहतर होगा कि वे देश के हर कारोबार को इस प्रकार देखना शुरू करें मानो वह आर्थिक सहयोग एवं विकास संगठन के स्तर के कार्बन कराधान के तहत संचालित हो। वस्तु एवं सेवा कर वाउचर जैसी व्यवस्थाओं की मदद से हर कंपनी की कार्बन तीव्रता से निपटना होगा। मजबूत कारोबारी मॉडल प्रतिस्पर्धी होते हैं और प्रति टन सीओ2 के लिए 100 डॉलर तक की कीमत चुकाने के बाद भी शेयर पर अच्छा प्रतिफल देते हैं।
Date:23-02-23
सुविधा और सावधानीसंपादकीय
आज तकनीक की रफ्तार इस कदर तेज और इसका दायरा इतना बड़ा है कि न केवल वक्त के लिहाज से, बल्कि बहुस्तरीय सुविधाओं के मद्देनजर भी यह आम जनजीवन का हिस्सा बनता जा रहा है। यों लगभग सभी क्षेत्रों में आधुनिक तकनीकी रोज नई ऊंचाई हासिल कर रही है, लेकिन खासतौर पर आर्थिक गतिविधियों में डिजिटल प्रणाली ने व्यापक पैमाने पर अपनी स्वीकार्यता बनाई है। यह बेवजह नहीं है कि आज भारी संख्या में लोग पैसों के लेनदेन के मामले में नगद पर निर्भर रहने के बजाय यूपीआइ जैसी डिजिटल सुविधा की ओर रुख करने लगे हैं। शायद इसी के मद्देनजर सरकार भी इस संदर्भ में एक तरह से स्पष्ट नीति पर चल रही है। गौरतलब है कि मंगलवार को प्रधानमंत्री ने ‘यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस’ यानी यूपीआई को भारत की सबसे पसंदीदा भुगतान प्रणाली बताया और कहा कि यह जल्दी ही नगदी लेनदेन को पीछे छोड़ देगी। दरअसल, भारत की ‘यूपीआई’ और सिंगापुर की ‘पे नाऊ’ प्रणाली के बीच संपर्क सुविधा की शुरुआत की गई है, जो दोनों देशों की त्वरित भुगतान प्रणाली को मोबाइल ऐप के माध्यम से सुविधाजनक, सुरक्षित, तेज गति से और सीमा पार धन हस्तांतरण में सक्षम बनाएगी।
इस सुविधा का सबसे बड़ा लाभ है कि अब भारत और सिंगापुर के लोग अपने मोबाइल फोन से उसी प्रकार धन का हस्तांतरण कर पाएंगे, जैसे वे अपने-अपने देशों में अभी करते हैं। आधुनिकी तकनीकी और इंटरनेट की दुनिया में व्यापक उपलब्धियों के दौर में यह स्वाभाविक ही है कि इसका उन क्षेत्रों में भी बेहतर सदुपयोग हो, जो किसी व्यवस्था को सुचारु बनाए रखने के लिहाज से अहम माने जाते हैं। किसी भी देश में आर्थिक गतिविधियों में आम लोगों की भागीदारी मुख्य रूप से अपनी जरूरतों के संदर्भ में लेनदेन के रूप में होती है। अब तक यह व्यवस्था नकद भुगतान के रूप में कायम रही है और लोग इसी के अभ्यस्त रहे हैं। लेकिन पिछले कुछ सालों में जब से इस क्षेत्र में डिजिटल माध्यम का विस्तार हुआ है, उसके बाद धीरे-धीरे सही, लेकिन बड़ी तादाद में लोग खरीद-बिक्री या फिर अन्य जरूरतों के मामले में पैसे के लेनदेन के लिए आनलाइन माध्यमों या मुख्य रूप से यूपीआई का उपयोग करने लगे हैं। हाल ही में आए एक आंकड़े के मुताबिक वित्त वर्ष 2021-22 में पंजीकृत यूपीआई लेनदेन पैंतालीस बिलियन रहा, जो पिछले तीन सालों में आठ गुना और पिछले चार सालों में पचास गुना बढ़ोतरी को दर्शाता है।
जाहिर है, वक्त के साथ बदलते दौर और आधुनिक तकनीकी से लैस होती व्यवस्था में लोगों की भागीदारी बढ़ रही है। इसे सकारात्मक बदलाव कहा जा सकता है। लेकिन हकीकत यह भी है कि डिजिटलीकरण के समांतर साइबर अपराधों का जोखिम भी बढ़ा है। आए दिन ऐसे मामले सामने आते रहते हैं, जिनमें पैसों के भुगतान या लेनदेन में कोई गड़बड़ी हो जाती है। अगर किसी व्यक्ति से खुद कोई चूक हो जाती है तो यह किसी तकनीक के उपयोग में उसके प्रशिक्षण में कमी का मामला हो सकता है। लेकिन सच यह भी है कि बहुत सारे लोग संगठित साइबर अपराधों का शिकार हो रहे हैं। इसमें लोगों की लापरवाही, असावधानी, कम जानकारी या फिर मोबाइल आदि संबंधित तकनीक और इंटरनेट के असुरक्षित होने जैसी वजहें हो सकती हैं। हालत यह है कि कई बार किसी संस्थान में इंटरनेट पर आधारित बेहद सुरक्षित माने जाने वाली व्यवस्था में भी साइबर हमला करने वालों ने सेंधमारी की और उसे भारी नुकसान पहुंचाया। ऐसी स्थिति में नगदी के लेनदेन की बढ़ती रफ्तार डिजिटल दुनिया के विस्तार का सूचक जरूर है, लेकिन इसे साइबर अपराधियों से पूरी तरह सुरक्षित बनाने के लिए भी चाकचौबंद व्यवस्था की जानी चाहिए।
Date:23-02-23
आखिर चुनावसंपादकीय
आखिरकार दिल्ली नगर निगम के महापौर और उप महापौर का चुनाव संपन्न हो गया। जैसी कि उम्मीद थी, दोनों पदों पर आम आदमी पार्टी को विजय हासिल हुई। पिछले साल दिसंबर के पहले हफ्ते में नगर निगम चुनाव के नतीजे आए थे और उसमें आम आदमी पार्टी को स्पष्ट बहुमत मिला था। इसलिए माना जा रहा था कि महापौर के पद पर भी उसी के प्रत्याशी की जीत होगी। शुरू में भाजपा ने कह दिया था कि वह इन दोनों पदों पर अपने उम्मीदवार नहीं उतारेगी। मगर जब आम आदमी पार्टी ने अपने उम्मीदवारों की घोषणा कर दी तो भाजपा ने भी अपने उम्मीदवार घोषित कर दिए। तभी से कयास लगाए जाने लगे थे कि जब सदन में भाजपा को किसी भी तरह से बहुमत हासिल नहीं है तो आखिर वह अचानक चुनाव मैदान में उतर क्यों रही है। वहीं आम आदमी पार्टी इसमें कोई साजिश तलाशने लगी। उसे आशंका थी कि भाजपा कोई तोड़फोड़ करके उसी तरह अपना महापौर बनाने का प्रयास करेगी, जिस तरह चंडीगढ़ नगर निगम में उसने किया था! इसके चलते उसने भाजपा की हर गतिविधि पर प्रतिक्रिया देनी शुरू कर दी। नतीजा यह हुआ कि तीन बार टलने के बाद अब चौथी बार चुनाव हो भी पाए, तो सर्वोच्च न्यायालय की दखल के बाद।
दिल्ली में आम आदमी पार्टी और भाजपा की तनातनी किसी से छिपी नहीं है। जब से वर्तमान उपराज्यपाल ने कार्यभार संभाला है, तब से दोनों के रिश्ते लगातार तनावपूर्ण बने हुए हैं। उसका असर नगर निगम चुनाव पर भी साफ दिखा। उपराज्यपाल ने बिना सरकार की सलाह के दस सदस्यों का मनोनयन कर दिया। फिर कहा कि ये सदस्य भी महापौर चुनाव में मतदान कर सकते हैं। इसे आम आदमी पार्टी ने संवैधानिक चुनौती दी और दोनों के बीच तल्ख बयानबाजी हुई, जिसे एक सरकार और उपराज्यपाल के बीच मर्यादित नहीं माना जाता। उपराज्यपाल अपने अधिकार क्षेत्र को लेकर अड़े रहे, तो आम आदमी पार्टी सरकार अपने अधिकारों को लेकर। इसी तनातनी में मामला सर्वोच्च न्यायालय में पहुंचा और वहां से फैसला आम आदमी पार्टी के पक्ष में आया। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया कि मनोनीत सदस्य इस चुनाव में मतदान नहीं कर सकते और उप महापौर का चुनाव महापौर की निगरानी में ही होगा। अदालत ने इसे लेकर कड़ी टिप्पणी भी की थी कि देश की राजधानी के महापौर चुनाव में इस तरह की राजनीतिक धींगामुश्ती हैरान करने वाली है। इस फैसले के बाद स्वाभाविक ही आम आदमी पार्टी की आशंकाएं दूर हो गर्इं और उसे अपनी जीत सुनिश्चित नजर आने लगी।
करीब दस साल बाद दिल्ली में फिर से एक महिला महापौर बनी हैं। वे युवा हैं और उत्साही भी। अपनी जीत के बाद उन्होंने चुनाव के समय किए गए वादों को पूरा करने और दिल्ली के लिए बेहतर काम करने का संकल्प दोहराया। दिल्ली के महापौर को नगर निगम को लेकर कोई फैसला लेने के लिए स्वतंत्र माना जाता है। ऐसे में नए महापौर के सामने चुनौती होगी कि उनकी पार्टी ने चुनाव के वक्त जिन कमियों पर भाजपा को घेरने का प्रयास किया था, उन्हें कैसे दूर करना है। कूड़े के पहाड़ हटाने की तरफ सबकी नजर रहेगी। फिर निगम के कर्मचारियों के वेतन आदि के मद में केंद्र से मिलने वाले धन को लेकर खींचतान चलती रहती है, उसमें कैसे संतुलन सधेगा, यह देखने की बात होगी। हालांकि उपराज्यपाल से भी अपेक्षा की जाती है कि वे निगम के कामकाज को सुचारु रूप से चलने का वातावरण बनाएंगे। राजनीतिक तल्खियां चुनावों तक ही रहनी चाहिए, उनका असर व्यवस्था पर नहीं पड़ना चाहिए।
Date:23-02-23
खत्म करना होगा काला धंधारत्नेश
भारत में नशे का धंधा तेजी से फल-फूल रहा है। इसकी व्यापकता इतनी बढ़ गई है कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को मुख्य सचिवों के दूसरे राष्ट्रीय सम्मेलन में कहना पड़ा कि राज्य सरकारें ड्रग्स से उत्पन्न चुनौतियों को केंद्र के सामने लाएं। इस समस्या के समूल नाश के लिए भी हर मुमकिन कोशिश करें क्योंकि यह आर्थिक-सामाजिक समस्याओं का कारण तो है ही साथ ही हमारे अस्तित्व के लिए भी खतरा है। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण भी इस समस्या के खतरों से बाबस्ता हैं। सीतारमण के अनुसार सोने की तस्करी तो सिर्फ अर्थव्यवस्था को चोट पहुंचाती है, लेकिन ड्रग्स की तस्करी हमारी कई पीढ़ियों को बर्बाद कर देती है।
संसद के शीतकालीन सत्र में 53 सांसदों ने ड्रग्स के नकारात्मक पहलुओं पर चर्चा की और इसके प्रसार पर लगाम लगाने की वकालत की। सांसदों की चिंता से सहमति जताते हुए गृह मंत्री अमित शाह ने कहा कि इसमें दो राय नहीं कि आज ड्रग्स से नई पीढ़ी बर्बाद हो रही है, अर्थव्यवस्था कमजोर पड़ने लगी है, और आतंकवाद को खाद-पानी मिल रहा है। केंद्रीय गृह मंत्री ने सभी संबंधित एजेंसियों को मिलकर काम करने के लिए निर्देशित किया है, और कहा है कि आपस में समन्वय, सहयोग और तालमेल बनाकर काम करें। अमित शाह ने यह भी कहा कि ड्रग्स की आय से अर्जित संपत्तियों को प्राथमिकता के आधार पर जब्त करके बेचने की भी आवश्यकता है, क्योंकि इससे सरकार के पास पैसे आएंगे और वह नशे के धंधे को रोकने में समर्थ हो सकेगी। आज ड्रग्स के साथ-साथ हथियार और गोला-बारूद की भी तस्करी की जा रही है। ड्रग्स और हथियार के बीच चोली-दामन का रिश्ता बनता जा रहा है। गृह मंत्री अमित शाह चाहते हैं कि ड्रग्स सरहद तक या फिर सरहद या बंदरगाह या एयरपोर्ट से पान की दुकान तक या स्कूल परिसर या कॉलेज परिसर तक न पहुंचे, इसके लिए समुचित उपाय करने की जरूरत है। गृह मंत्रालय की एक रिपोर्ट के अनुसार ड्रग्स के मामले में अभी तक 30,407 गिरफ्तारियां हुई हैं, और 27,578 केस दर्ज हुए हैं। देश में गांजा और हीरोइन की तस्करी सबसे अधिक होती है। उसके बाद अफीम, कोकीन और दूसरे रासायनिक ड्रग्स आते हैं। उल्लेखनीय है कि जलमार्ग, थलमार्ग, नभमार्ग के रास्ते आने वाले कूरियर और पार्सल द्वारा ड्रग्स की मात्रा जांच एजेंसियों द्वारा पकड़ी गई ड्रग्स की मात्रा से अधिक है अर्थात एजेंसियों द्वारा पकड़ी गई ड्रग्स नशे के काले धंधे का छोटा अंश मात्र है।
आज भी बहुत सारे जांच अधिकारियों को यह ज्ञात ही नहीं है कि नशे के धंधेबाजों की संपत्तियों को अपने अधिकार में लेकर उन्हें बेचा जा सकता है। यह ऐसा पक्ष है, जिस पर सरकार को विशेष ध्यान देने की आवश्यकता है। इसके लिए प्रशिक्षण, सेमिनार, वर्कशॉप द्वारा इस क्षेत्र में काम करने वाली एजेंसियों के कमर्चारियों और अधिकारियों को जागरूक किया जा सकता है। हर जोन में ऐसे अधिकारी को नियुक्त करने की भी व्यवस्था की जाए जो केवल वित्तीय अनुसंधान की निगरानी करे, जरूरी सुझाव दे और जरूरत पड़ने पर प्रभावशाली समाधान प्रस्तुत करने में समर्थ हो। सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय द्वारा 2019 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में 1 करोड़ 25 लाख लोग हेरोइन का सेवन करते हैं, जिनमें से 60 लाख लोग पूरी तरह से हेरोइन पर निर्भर हैं, जिन्हें प्राथमिकता के आधार पर चिकित्सा एवं पुनर्वासन की सुविधा उपलब्ध कराने की आवश्यकता है। हेरोइन के नशे में गिरफ्त लोग मुख्य रूप से पंजाब, हरियाणा, दिल्ली, महाराष्ट्र, राजस्थान, गुजरात, उत्तर प्रदेश और आंध्र प्रदेश के रहने वाले हैं। मंत्रालय द्वारा किए गए राष्ट्रीय सर्वेक्षण के अनुसार देश में 6 करोड़ से अधिक ड्रग्स का सेवन करने वालों में 10 से 17 आयु वर्ग के लोग सबसे अधिक हैं। एक रिपोर्ट के अनुसार 2022 में 14,967 किलो ग्राम हेरोइन की खेप पकड़ी गई जबकि 2019 में केवल 237 किलो ग्राम हेरोइन पकड़ी गई थी। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि ड्रग्स की तस्करी कितनी रफ्तार से बढ़ रही है।
ड्रग्स आसानी से पैसा कमाने का सबसे आसान रास्ता माना जाता है, लेकिन यह महज भ्रांति है, क्योंकि इसकी गिरफ्त में आने के बाद इंसान मौत के बहुत ही नजदीक चला जाता है, या फिर असमय काल-कवलित हो जाता है। चूंकि पुलिस या अन्य जांच एजेंसियों की गिरफ्त में नशे के धंधेबाज या नशे की लत के शिकार लोग अक्सर नहीं आते हैं, इसलिए लोग इस काले धंधे से डरने की जगह नशे के दलदल में धंसते चले जाते हैं। आम तौर पर जांच एजेंसियां जिन्हें पकड़ती हैं, वे केवल प्यादा भर होते हैं, असली खिलाड़ी कहीं दूर बैठकर कठपुतलियों को नचाता रहता है। हालांकि, नशे के काले धंधे को रोकने की दिशा में लगातार प्रयास हो रहे हैं। बीएसएफ, एसएसबी, असम राइफल्स, भारतीय तटरक्षक, एनआईए और आरपीएफ, एनसीबी, सीबीएन, राज्यों की पुलिस आदि को स्वापक औषधि और मन:प्रभावी पदार्थ अधिनियम, 1985 में अंतर्निहित अधिकार दिए गए हैं ताकि नशे के धंधे पर रोक लगाई जा सके। इस बहुआयामी लड़ाई में ड्रग्स की खपत कम करना अर्थात ड्रग्स की मांग घटाना भी अति महत्त्वपूर्ण है। यह तभी संभव है, जब ड्रग्स की गिरफ्त में जकड़े लोगों को सलाह एवं उपचार द्वारा स्वस्थ किया जाए। ऐसा प्रयास सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय द्वारा किया जा रहा है, जो नशे के आदी व्यक्ति के उपचार एवं पुनर्वास कार्य में जुटा हुआ है। इस क्रम में जांच एजेंसियों को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि ड्रग्स के जिन धंधेबाजों को गिरफ्तार किया गया है, उन्हें सक्षम न्यायालय द्वारा कम से कम 10 वर्ष या उससे अधिक की अवधि के लिए सश्रम कारावास की सजा सुनाई जाए। ड्रग्स के धंधेबाजों को 10 वर्ष या अधिक की सजा होती है तो उनके द्वारा अवैध रूप से अर्जित संपत्तियों को कब्जे में लेकर बेचने में जांच एजेंसियों को आसानी होगी और आरोपी जांच को प्रभावित भी नहीं कर सकेंगे। प्राय: होता यह है कि एक ही अधिकारी ड्रग्स की खेप पकड़ने से लेकर अदालत में जिरह करने और वित्तीय अनुसंधान करने तक का काम भी करता है, जबकि वह प्रत्येक कार्य में दक्ष नहीं होता। ऐसी स्थिति में बदलाव लाने की जरूरत है।
उम्मीद है कि सरकार जल्द ही इस दिशा में आवश्यक कार्रवाई करेगी क्योंकि इस साल गणतंत्र दिवस के अवसर पर नशामुक्त भारत की झांकी बताती है कि सरकार ड्रग्स के धंधेबाजों को नेस्तनाबूद करने के लिए कृत संकल्पित है।
Date:23-02-23
बेहतर दुनिया की चाबी भारत के पाससमीर सरन, ( प्रेजिडेंट, ओआरएफ )
साल 2020 के बाद से चार बड़ी प्रभावी घटनाएं हुई हैं। इन घटनाओं की एक छोटी अवधि में मानो दशकों बीत गए हैं। नियम आधारित प्रक्रियाओं के तहत, मुक्त, निष्पक्ष व्यापार और एक आर्थिक व्यवस्था के रूप में भारत की अलग साख बनी है। ये बहुत महत्वपूर्ण तत्व या पहलू हैं, इससे आगे बढ़कर यदि हमें एक नई विश्व व्यवस्था का निर्माण करना है, तो हमको और ज्यादा संतुलित, समावेशी व निष्पक्ष होना पड़ेगा।
चार प्रभावी घटनाओं में पहली है, अफगानिस्तान में पश्चिमी शक्तियों का आत्मसमर्पण। तालिबान की जीत सिर्फ एक जंगी जीत नहीं थी, बल्कि धोखे से यह लोगों की हार थी। दुनिया भर के उदारवादियों को अंधेरे में रखा गया था। विडंबना देखिए, जिसे अफगानिस्तान में शांति लाने का समझौता कहा जाता है, आज उस कुख्यात दोहा समझौते के अमेरिकी समर्थक अफगान महिलाओं के बारे में चिंताएं जाहिर कर रहे हैं। उनका पाखंड नग्न व निर्मम है। अफगानिस्तान में जो हालात बने हैं, उनसे अलग हालात की कल्पना दोहा सौदे के जरिये नहीं की जा सकती थी। भारत ने उस घातक सौदे से एक तरह से सैद्धांतिक दूरी बनाए रखी। तालिबानी हुकूमत के असली चरित्र को समझते हुए भारत काबुल में एक निर्वाचित और बहुलतावादी सरकार की मांग करता रहा। भारत अकेला मुल्क था, जिसने दबाव के बावजूद समझौता नहीं किया। आज भी यह अत्याचार करने वाली हुकूमत को मान्यता दिए बिना अफगानियों का समर्थन जारी रखे हुए है।
दूसरी घटना रूस-यूक्रेन युद्ध है। हमले व जवाबी हमले के चलते इसमें बहुत रक्तपात हुआ है। ऐसे में, हिंसा की समाप्ति और सही राजनय की तलाश के पैरोकार भारत की सैद्धांतिक स्वतंत्र स्थिति को ही आगे बढ़ने का एकमात्र सार्थक तरीका मानते हैं। भारतीय रुख जी-20 सम्मेलन और उसके बाद भी प्रतिध्वनित हुआ है। बाली में की गई जी-20 के नेताओं की घोषणा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के दृष्टिकोण को ही दोहराती है। दृष्टिकोण यही है कि शांति और स्थिरता की रक्षा करने वाली बहुपक्षीय प्रणाली को बनाए रखने की जरूरत है। भारतीय दृष्टिकोण शांतिपूर्ण समाधान के महत्व को रेखांकित करता है। कूटनीति और संवाद की भूमिका दर्शाता है। इसके अलावा, भारत ने लगातार संप्रभुता के सम्मान और मानवता के खिलाफ अपराधों की जांच के पक्ष में तर्क दिए, जिसमें संभवत: रूसी सेना द्वारा किए गए अपराध भी शामिल हैं।
तीसरी प्रभावी घटना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में घटित हुई है। भारत लंबे समय से एक खुली, स्वतंत्र और निष्पक्ष डिजिटल व्यवस्था का हिमायती देश रहा है। हालांकि, पिछले एक दशक में संयुक्त राज्य अमेरिका (यूएस) सिलिकन वैली के पक्ष में अपने संकीर्ण लाभ के लिए दबाव डालता रहा है। मगर अमेरिकी विरोध के बावजूद भारत ऐसे उपकरणों या कंपनियों का समर्थन करना नहीं चाहता था, जो किसी जवाबदेही के बिना डाटा प्रवाह के पक्ष में हैं। भारत ऐसी बड़ी कंपनियों के पक्ष में नहीं है, जो अपने पास भारतीय डाटा का भंडारण चाहती हैं। अमेरिका भले चिढ़े, मगर भारत सीमा पार डाटा प्रवाह को प्रतिबंधित करता दिखाई दिया। अमेरिका के भुगतान और ई-कॉमर्स कंपनियों द्वारा की जा रही परदादारी की कोशिशों को प्रतिबंधित किया। भारत ने बड़ी टेक कंपनियों के प्रति अपने अविश्वास को नहीं छिपाया। भविष्य की डिजिटल सेवाओं को प्रतिकूल शर्तों से आजाद करते हुए भारत ने बड़े दबावों को दूर करने के बाद अब स्थानीय स्तर पर डाटा के भंडारण पर अपने रुख को आसान बना लिया है।
ऐसा होने की एक वजह यह भी है कि अमेरिका की ओर से अब भारत पर दबाव नहीं है, क्योंकि अमेरिकी प्रशासन खुद अपने यहां कंपनियों से ज्यादा जवाबदेही चाहता है और उनके अधिक नियमन के भी पक्ष में है। विशिष्ट क्षेत्रों के लिए महत्वपूर्ण डाटा सुरक्षा की मांग करते हुए भारत विश्वसनीय भौगोलिक डाटा साझा करने की संभावनाएं टटोल रहा है। आज एक समावेशी, न्यायसंगत इंटरनेट भारत की प्राथमिकता है।
वर्ष 2021 ने भारत के चौथे ऐतिहासिक प्रभावी पल का संकेत दिया है। जलवायु सुधार पर चल रही वार्ताओं के 26वें दौर कॉप-26 में भारत ने 2070 तक उत्सर्जन को शून्य करने का लक्ष्य तय करके पृथ्वी की रक्षा के प्रति अपनी असाधारण प्रतिबद्धता दिखाई है। भारत ने स्वेच्छा से यह समय-सीमा लागू की है। हालांकि, इसका प्रति व्यक्ति उत्सर्जन कम है। भारत में प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन दो टन से भी कम है, यह अमेरिका से लगभग आठ गुना कम है। प्रधानमंत्री ने भारत के लाइफ (लाइफस्टाइल फॉर एनवायर्नमेंट) मिशन को भी लॉन्च किया। वह दुनिया के ऐसे शुरुआती नेताओं में से एक के रूप में उभरे हैं, जिन्होंने साफ तौर पर कहा कि जलवायु संरक्षण की दिशा में कदम बढ़ाने के लिए व्यक्तिगत जीवन शैली में बदलाव की जरूरत पडे़गी और हम ऐसे बदलावों को शुरू करने के लिए कदम उठाएंगे। गौर कीजिए, इसके ठीक विपरीत परिणाम एक अंतरराष्ट्रीय सर्वेक्षण में कॉप-26 के समय सामने आया। अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस व जर्मनी सहित 10 देशों में हुए सर्वेक्षण में पाया गया कि कुछ ही नागरिक अपनी जीवन शैली में महत्वपूर्ण बदलाव के इच्छुक हैं। 46 प्रतिशत उत्तरदाताओं का मानना था कि उन्हें ऐसा करने की जरूरत नहीं। विडंबना है, अमेरिका में गैस स्टोव पर संभावित प्रतिबंध को लेकर तेज बहस जारी है। वहीं, अमेरिकी राजनयिकों ने विकासशील दुनिया के लिए लंबे समय से ‘क्लीन कुकस्टोव’ का समर्थन किया है, लेकिन लगता है, उन्हें अपने घर में स्वच्छ जलवायु संबंधी कदम उठाने में दिलचस्पी नहीं है।
एक लोकतांत्रिक और ईमानदार वार्ताकार के रूप में भारत का प्रभाव उसे अद्वितीय नैतिक अधिकार प्रदान करता है। दरअसल, 21वीं सदी के बहुपक्षवाद के लिए भारत के लोग एक बड़ी जरूरत हैं। जी-20 भारत के लिए एक आदर्श मंच हो सकता है, जिसके जरिये वह कई विकसित व विकासशील देशों के मूल विचारों को प्रभावित कर सकता है। दुनिया में मानवता को सबसे आगे रखने, पृथ्वी-अनुकूल रुख अपनाने, शांति को बढ़ावा देने, वैश्विकता के केंद्र में समानता व समावेश को शामिल करने के बारे में भारत से बहुत कुछ सीखना है। ‘एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य’ के अपने लोकाचार के साथ भारत राह दिखा सकता है।
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हाल ही में सामने आए अडानी समूह के वित्तीय संकट ने देश की वित्तीय अस्थिरता को बढ़ा दिया है। इस समूह के शेयर लगभग 27% नीचे गिर गए। जनवरी से लेकर अब तक समूह ने 100 अरब डॉलर के बाजार मूल्य की सम्पत्तियाँ गंवा दी है। इस मुद्दे पर संसद स्थगित करनी पड़ी है। किसी एक समूह पर आए इस संकट का प्रसार अन्य फर्मों पर होने की आशंका बनी रहती है। सन् 2008 की आर्थिक मंदी के दौरान इसी प्रकार का ट्रेंड देखा गया था।
इसके प्रभाव पर कुछ बिंदु –
कंपनियों के संगठन, विभिन्न वित्तीय अधिकार क्षेत्रों के बीच एक कड़ी के रूप में काम करते हैं। इसलिए अडानी समूह के विदेशी बॉन्ड की समस्या भारत में फैल सकती है। 2008 के संकट की शुरूआत में मुद्रा बाजारों के गिरने के दौरान अमेरिकी नियामकों ने कोई कार्रवाई नहीं की थी। इसके परिणामस्वरूप इसका आतंक लगभग हर भौगोलिक क्षेत्र में फैल गया था।
आरबीआई और सेबी को सतर्कता के साथ नियामकों के अनुसार जल्द-से-जल्द कार्यवाही करनी चाहिए। यह स्थिति नियामक क्षमता की उतनी ही परीक्षा है, जितनी अडानी समूह के भविष्य की।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 3 फरवरी, 2023
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Date:22-02-23
BadministratorsNasty social media brawl between IAS & IPS officers points to a larger, worring trend.TOI Editorials
Aggressive exchanges are so ubiquitous in social media that it takes a special one to really shock us, and this is exactly what IPS officer D Roopa and IAS officer Rohini Sindhuri have served up. So nasty, personal and public has been the clash between the two senior women bureaucrats in Karnataka that it has even embarrassed the state government. In a high-pitched election season, opponents have tried to cast this unruly slugfest as a reflection of a weak government. In a counter, both officers were transferred yesterday. But what this startling clash has really put in focus is a larger, disturbing change that civil service ethos is undergoing through participation in social media.
Last year a parliamentary standing committee said there are 22% fewer IAS officers in the country than the sanctioned strength, and the sanctioned strength is not enough to begin with given the evolving needs of Indian administration. The thing is the private sector still isn’t attractive enough and big enough for government services to lose their charm, aka, prestige, power and job security. Ferocious competition for limited seats tells us that. Therefore, finding more applicants is not the issue. Governments will have to recruit more.
But besides quantity, quality has also emerged as a major issue. As D Subbarao has written on this page, lack of reform in incentives and penalties have helped ineptitude, indifference and corruption creep in. The permanent executive also suffers lack of functional independence from the political executive. However, the selfaggrandisement stimulated by social media addictions is a fresh big blow to the All India Services (Conduct) Rules, 1968 that are meant to govern both IAS and IPS officers. In social media, promoting work takes a distant second place to promoting the self. Social media activities of some bureaucrats make short shrift of not just “political neutrality” but “courtesy and good behaviour”, too.
In the present case Roopa reportedly shared private pictures of Sindhuri on social media. That an IPS officer would do this is bad enough, but, further, police did not register an FIR saying that they were consulting “the higher-ups for legal opinion”. Sindhuri’s public barrage of allegations against Roopa likewise bypassed official channels for a bigger stage. The reputational damage from ugly social media boil-ups will also extend beyond the individuals concerned. Service seniors and ministers must take note.
Date:22-02-23
Discipline, discussionParliament is the forum where the government is answerable to the people.Editorial
On Monday, Rajya Sabha Chairman Jagdeep Dhankhar directed the Privileges Committee, headed by Deputy Chairman and JD(U) Member of Parliament Harivansh, to investigate the “disorderly conduct” by 12 Opposition Members of Parliament that had led to multiple adjournments during the first leg of the Budget session. All through Prime Minister Narendra Modi’s 85-minute address, the Opposition kept raising slogans, which Sansad TV that does the live telecast of the proceedings blacked out — the camera did not pan towards the Opposition benches. Earlier, acting on a complaint filed by a BJP Member of Parliament, Mr. Dhankhar suspended Congress Member of Parliament Rajani Patil for allegedly recording the proceedings on her mobile phone. The Congress cried foul that due procedure had not been followed and that she had not been served a notice giving her a chance to explain her position. Mr. Dhankhar interjected the speech of Congress president and Leader of the Opposition in the Rajya Sabha Mallikarjun Kharge’s 88-minute speech during the Motion of Thanks to the President’s Address several times. The Opposition has protested the Chair’s repeated direction to “authenticate” remarks made during speeches. Mr. Kharge has pointed out that “it would be [an] inversion of the system of government if the opposition members are expected to carry out complete investigation, gather evidence and then raise the matter on the floor of the House”.
Six portions of Mr. Kharge’s speech were expunged from the Rajya Sabha records, while Congress leader Rahul Gandhi’s Lok Sabha speech got 18 cuts. Parliament is the platform where the Opposition has the responsibility to ask questions of the government, which the Council of Ministers has the responsibility to answer. There are parliamentary rules and norms that have evolved over time to achieve this objective. It will be a travesty of parliamentary democracy if the Opposition is penalised for seeking accountability from the government, which in turn is allowed to hide behind rules and obfuscate the issue. It is the government that is in custody of all the information, over which queries are raised in Parliament. The authenticity, or the lack of it, of any assumption that a Member of Parliament may express in the House must be clarified by the government, which is its duty. It is a strange situation that the government has not responded to the serious allegations that it faces of protecting private business interests at the cost of public interest, while those who are raising the questions face suspension in the name of discipline. Parliamentary discipline must ensure that discussions take place, and the government provides the answers.
Date:22-02-23
वैज्ञानिक सोच बनाना संवैधानिक जिम्मेदारीसंपादकीय
जादू-टोना, भूत भगाना, डायन और प्रेत के प्रभाव, स्वयं-भू बाबाओं की रातों-रात प्रसिद्धि और लाखों लोगों का अचानक उनकी ओर किसी वरदान की आशा में कूच करना क्या यह 21वीं सदी का नया भारत है? शिक्षा यानी व्यक्ति में तार्किक शक्ति का विकास। मानव विकास सूचकांक पर रसातल में जाते हमारे देश में कहने को तो लोकतंत्र है, लेकिन गरीब-अमीर के बीच खाई बढ़ती जा रही है। दशकों से न तो सरकारें करोड़ों गरीबों को अज्ञानता की खाई से निकाल सकीं, ना ही ये बाबा अपनी ‘अदृश्य शक्ति’ से इस देश को सदियों पुरानी गरीबी से उबार सके हैं। अनुच्छेद 51 (एच) में हर नागरिक का ‘वैज्ञानिक सोच, और जांच और सुधार की भावना ‘ विकसित करना संवैधानिक कर्तव्य है। लेकिन जिस तरह राजनीतिक स्वार्थ के लिए सरकारें और इनके मंत्री इन बाबाओं के सामने वोट के लिए नतमस्तक होते हैं, जिस तरह दुष्कर्म और हत्या के आरोप में बंदी इनमें से कुछ बाबाओं को ठीक चुनाव से पहले पैरोल पर छोड़ा उससे समाज में एक बड़ा अवांछित संदेश जाता है । राजनीतिक वर्ग इनके लाखों अनुयायियों के वोट के लिए बाबाओं के कहने पर अफसरों के ट्रांसफर-पोस्टिंग करते हैं, ठेके देते हैं और एक दुष्चक्र में गरीब अबोध जनता मूर्ख बनती है। अगर वैज्ञानिक सोच और जांच की भावना विकसित करना हर नागरिक का कर्तव्य है तो उससे ज्यादा वह राज्य का भी कर्तव्य है । स्व-नियुक्त गोरक्षकों का एक समुदाय के युवकों को सरेआम मारना भी उतना ही गलत है, जितना पुलिस उन्हें छोड़ देना या केस इतना कमजोर करना ताकि वे कोर्ट से छूट जाएं। असली नया भारत बनने की शर्तें आर्थिक से ज्यादा नैतिक हैं।
Date:22-02-23
विश्व को राह दिखाता भारतबिल गेट्स, ( लेखक माइक्रोसाफ्ट और बिल एंड मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन के सह-संस्थापक और ब्रेकथ्रू एनर्जी के संस्थापक हैं )
करीब दो दशक पहले मैंने निर्णय किया कि अपने संसाधनों का एक बड़ा हिस्सा समाज को वापस करूंगा। आरंभ से ही मेरा यही लक्ष्य था कि जो विषमता मैंने विश्व भर में देखी, उसे दूर करने की दिशा में मदद कर सकूं। अपने अभियान की शुरुआत में मैंने सबसे ज्यादा वैश्विक स्वास्थ्य पर ध्यान दिया, क्योंकि यह न केवल सबसे विकट विषमता, बल्कि ऐसी समस्या है, जिसका समाधान संभव है। आज भी वही स्थिति है। हालांकि समय के साथ बढ़ते वैश्विक तापमान के विध्वंसक परिणाम प्रत्यक्ष हुए हैं, जिनसे स्पष्ट हुआ है कि जलवायु परिवर्तन की चुनौती का तोड़ निकाले बिना आप गरीबों के जीवन की गुणवत्ता नहीं सुधार सकते। जलवायु परिवर्तन और वैश्विक स्वास्थ्य का मुद्दा असल में एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है। बढ़ता हुआ तापमान गरीबी दूर करने की कवायद को कठिन बनाएगा। इससे खाद्य सुरक्षा प्रभावित होगी। संक्रामक बीमारियों में वृद्धि होगी और संसाधनों की दिशा जरूरतमंद लोगों से भटक जाएगी। यह एक दुष्चक्र है। जलवायु परिवर्तन की दृष्टि से गरीबों की स्थिति सबसे नाजुक है। असल में जिस समुदाय पर जलवायु परिवर्तन की जितनी ज्यादा मार पड़ती है, वह उतना ही अधिक गरीबी के दलदल में धंसता जाता है। इस दुष्चक्र को तोड़ने के लिए हमें दोनों समस्याओं का एक साथ समाधान निकालने की आवश्यकता है।
जब मैं इस विषय में बात करता हूं तो अक्सर यही सुनता हूं कि, ‘एक ही समय पर दोनों समस्याओं का समाधान करने के लिए न तो पर्याप्त समय है और न ही संसाधन।’ एक समय में केवल एक ही चुनौती के समाधान का विचार चिंताजनक है। मैं इसे लेकर आग्रही हूं कि यदि हम सही राह का चयन करें तो एक साथ कई बड़ी समस्याओं को सुलझाने में सक्षम हो सकते हैं। उस स्थिति में भी जब विश्व कई संकट झेल रहा हो। इस मामले में भारत से बेहतर कोई और प्रमाण नहीं, जिसने उल्लेखनीय प्रगति की है। भारतीय कृषि अनुसंधान संस्थान यानी आइएआरआइ-पूसा में उगाए जा रहे नई पीढ़ी के चने के पौधों को ही देख लीजिए। चना भारत का एक प्रमुख भोज्य पदार्थ है। यह तमाम छोटे किसानों की आय का महत्वपूर्ण साधन है। पोषण के लिए भी इस पर भारी निर्भरता है, लेकिन बढ़ता तापमान चने की फसल के लिए खतरा है। बढ़ते तापमान से चने की उपज में 70 प्रतिशत तक गिरावट का अंदेशा है। इससे जीवन और आजीविका पर जोखिम मंडरा रहा है। इस चुनौती को देखते हुए गेट्स फाउंडेशन ने भारत के सार्वजनिक क्षेत्र और कृषि अनुसंधान पर गठित अंतरराष्ट्रीय समूह (सीजीआइएआर) के साथ मिलकर आइएआरआइ के शोधार्थियों को सहयोग दिया है। उन्होंने चने की ऐसी किस्में विकसित की हैं, जो 10 प्रतिशत तक उपज बढ़ाने के साथ ही सूखे की स्थिति का सामना करने में भी कहीं अधिक सक्षम हैं। इनमें एक किस्म तो किसानों के लिए उपलब्ध है, जबकि अन्य विकास के चरण में हैं। इस प्रकार भारत वैश्विक तापवृद्धि के दौर में अपने किसानों का साथ देने के साथ ही लोगों के खानपान-पोषण की चुनौती का सामना करने के लिहाज से भी बेहतर रूप से तैयार है। यह कहना कोई अतिशयोक्ति नहीं कि भारत में खेती का भविष्य पूसा के एक खेत में आकार ले रहा है। जलवायु, भूख और स्वास्थ्य जैसी चुनौतियों के दुर्जेय समझे जाने का एक कारण यह भी है कि हमारे पास उन्हें सुलझाने के सभी विकल्प अभी उपलब्ध नहीं हैं, लेकिन मैं आश्वस्त हूं कि आइएआरआइ के शोधार्थियों जैसे नवप्रवर्तकों के माध्यम से जल्द ही हमारे पास वे सभी उपाय होंगे।
भारत मुझे भविष्य के लिए आशा बंधाता है। भारत जल्द ही विश्व में सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश बनने के करीब है। यहां आप व्यापक स्तर पर समस्याएं सुलझाए बिना अधिकांश समस्याओं को नहीं सुलझा सकते। भारत ने यह सिद्ध किया है कि वह बड़ी चुनौतियों का सामना कर सकता है। देश ने पोलियो को जड़ से मिटा दिया है। एचआइवी संक्रमण घटा है। गरीबी में कमी आई है। बाल मृत्यु दर घटी है। स्वच्छता और वित्तीय सेवाओं का दायरा बढ़ा है। यह कैसे संभव हुआ? भारत ने विश्व को राह दिखाने वाला ऐसा नवाचार वाला तरीका अपनाया है, जिसमें सुनिश्चित किया गया कि समाधान उन लोगों तक पहुंचें, जिन्हें उनकी आवश्यकता है। डायरिया को रोकने वाली रोटावायरस वैक्सीन जब सभी बच्चों तक पहुंचानी मुश्किल थी तो भारत ने उसे स्वयं बनाने का फैसला किया। उसने विशेषज्ञों के साथ ही वित्तीय संसाधन प्रदाताओं (गेट्स फाउंडेशन सहित) के साथ कड़ियां जोड़ीं और फैक्टरी लगाने से लेकर वैक्सीन के प्रभावी वितरण का तंत्र बनाया। परिणामस्वरूप 2021 तक एक वर्ष तक के 83 प्रतिशत शिशुओं को रोटावायरस से कवच प्रदान किया गया। यह किफायती वैक्सीन अब विश्व के दूसरे हिस्सों में लगाई जा रही है। भारत भी जलवायु परिवर्तन के मुहाने पर है, मगर स्वास्थ्य के मोर्चे पर उसकी प्रगति जनता को अनुकूल बनाने के साथ ही अन्य चुनौतियों से निपटने में राह भी दिखाएगी।
नवप्रवर्तकों और उद्यमियों के कार्यों का प्रत्यक्ष अनुभव लेने के लिए मैं अगले सप्ताह भारत आ रहा हूं। उनमें से कुछ जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों को दूर करने के उपाय तलाशने में लगे हैं। जैसे ब्रेकथ्रू एनर्जी के फेलो विद्युत मोहन और उनकी टीम दूरदराज के कृषि समुदायों के लिए कचरे को जैव ईंधन एवं उर्वरक में परिवर्तित करने में जुटी है। वहीं कुछ अन्य तापवृद्धि से ताल मिलाने और सूखे के प्रति अपेक्षाकृत अनुकूल कृषि समाधान तैयार कर रहे हैं। गेट्स फाउंडेशन और ब्रेकथ्रू एनर्जी के उम्दा साझेदारों के प्रयासों से हो रही ऐसी प्रगति को देखने की मुझे भारी उत्सुकता है। स्मरण रहे कि दुनिया के अन्य देशों की भांति भारत के पास भी सीमित संसाधन ही हैं, लेकिन उसने दिखाया है कि इसके बावजूद कैसे प्रगति की जा सकती है। सार्वजनिक-निजी और परोपकारी क्षेत्र मिलकर सीमित संसाधनों को विपुल वित्तीय संसाधनों एवं ज्ञान के व्यापक भंडार में रूपांतरित कर सकते हैं, जिससे हम उन्नति की ओर उन्मुख होंगे। यदि हम साथ मिलकर काम करें तो एक ही साथ जलवायु परिवर्तन की चुनौती से जूझते हुए वैश्विक स्वास्थ्य की दशा भी सुधार सकते हैं।
Date:22-02-23
शोध एवं विकास पर देना होगा और ध्याननौशाद फोर्ब्स, ( लेखक फोर्ब्स मार्शल के को-चेयरमैन और सीआईआई के पूर्व अध्यक्ष हैं )
शोध एवं विकास एक बड़ा वैश्विक उद्यम है। दुनिया के कुल सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का दो फीसदी से थोड़ा अधिक शोध एवं विकास में व्यय किया जाता है। दुनिया के 180 से अधिक देशों में शोध एवं विकास में दो लाख करोड़ डॉलर से अधिक की जो राशि व्यय की जाती है उसमें अमेरिका, चीन, जापान, जर्मनी और दक्षिण अफ्रीका की हिस्सेदारी तीन चौथाई से अधिक है। उद्योगों का आंतरिक व्यय कुल शोध एवं विकास निवेश के दोतिहाई से थोड़ा अधिक है। इसमें भी उच्च शिक्षा और सरकारी प्रयोगशालाओं में व्यय 60:40 में बंटा हुआ है। उद्योगों की बात करें तो शीर्ष पांच उद्योगों- औषधि, वाहन, तकनीक, हार्डवेयर, सॉफ्टवेयर और इलेक्ट्रॉनिक्स पूरे औद्योगिक शोध एवं विकास में 73 फीसदी के लिए उत्तरदायी हैं। उन उद्योगों के भीतर भी यह चुनिंदा कंपनियों तक सीमित है। शीर्ष 20 कंपनियां वैश्विक औद्योगिक शोध एवं विकास व्यय के 22 फीसदी के लिए उत्तरदायी हैं।
भारत कहां है?
भारत इन सभी मोर्चों पर पीछे है। जैसा कि प्रचारित किया जाता है, हम दुनिया की पांचवीं बड़ी अर्थव्यवस्था हैं। परंतु शोध एवं विकास में निवेश के मामले में हम 16वें स्थान पर हैं। यहां तक कि इजरायल भी हमसे आगे है जिसका जीडीपी हमारे जीडीपी की तुलना में छठे हिस्से के बराबर और आबादी हमारे सौवें हिस्से के बराबर है। उद्योग जगत के आंतरिक शोध एवं विकास में तो हम और भी पीछे हैं। यहां हम 7 अरब डॉलर के निवेश के साथ पोलैंड और सिंगापुर के बीच 22वें स्थान पर हैं। यूरोपीय आयोग हर वर्ष हमें शोध एवं विकास के क्षेत्र में दुनिया के शीर्ष 2,500 निवेशकों की जानकारी देता है। ये कंपनियां वैश्विक औद्योगिक शोध एवं विकास के तीन चौथाई के लिए उत्तरदायी हैं। यानी पूरी तस्वीर में उनकी अहम भूमिका है। इन 2,500 में भारत की 24 फर्म हैं जबकि अमेरिका, चीन, जापान और जर्मनी की क्रमश: 822, 678, 233 और 114 फर्म हैं।
पीछे क्यों है भारत?
इसकी दो वजह हैं। पहली, हम प्रौद्योगिकी की दृष्टि से अहम कुछ क्षेत्रों में नहीं हैं। मसलन प्रौद्योगिकी हार्डवेयर, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, वैमानिकी, विनिर्माण सामग्री आदि की बात करें तो हम शीर्ष 10 में नहीं हैं जबकि रसायन और औद्योगिक अभियांत्रिकी में हमारी केवल एक फर्म है। औषधि, सॉफ्टवेयर और वाहन क्षेत्रों में हमारी सीमित पहुंच है।
दूसरी और सबसे अहम बात यह है कि हमारे देश में आंतरिक शोध एवं विकास में एक भी बड़ा निवेशक नहीं है। हमारी शीर्ष कंपनी टाटा मोटर्स का सालाना वैश्विक शोध एवं विकास खर्च 3.5 अरब डॉलर है और वह 58वें नंबर पर है।
दिलचस्प बात यह है कि दुनिया की शीर्ष सात कंपनियां शोध एवं विकास में पूरे भारत से अधिक निवेश करती हैं। होन्डा, क्वालकॉम और बॉश जो क्रमश: 24वें, 25वें और 26वें स्थान पर हैं, वे भी सात अरब डॉलर के साथ शोध एवं विकास में भारत से अधिक निवेश करती हैं।
हमारी सर्वाधिक मुनाफे वाली कंपनियां वित्तीय सेवा, पेट्रोकेमिकल्स, धातु प्रसंस्करण और सॉफ्टवेयर क्षेत्र में हैं। सॉफ्टवेयर में हमारे पास कुछ ऐसी कंपनियां हैं जो सबसे बढि़या मुनाफा कमाती हैं लेकिन वे शोध एवं विकास में पीछे हैं। वे अपनी बिक्री का एक फीसदी शोध विकास में लगाती हैं जबकि वैश्विक औसत 10 फीसदी है। अक्सर हमें यह सुनने को मिलता है कि हमारी सॉफ्टवेयर कंपनियां वैश्विक उत्पाद कंपनियों को सेवा प्रदान करती हैं। लेकिन चीन की 10 शीर्ष सॉफ्टवेयर कंपनियों में से भी ज्यादातर सेवा कंपनियां हैं। हमारी शीर्ष 10 सॉफ्टवेयर कंपनियां शोध एवं विकास में एक फीसदी निवेश करती हैं जबकि चीन का औसत 8 फीसदी है। इसी प्रकार पेट्रोकेमिकल्स और स्टील में भी शोध एवं विकास में किया जाने वाला निवेश बिक्री का बहुत छोटा हिस्सा है। हमारी वित्तीय सेवा कंपनियां शोध वाली सूची से गायब हैं। हमारी वित्तीय सेवा तकनीक पर बहुत हद तक निर्भर है। हमें आशा करनी चाहिए कि फिनटेक कंपनियां कि वे भी इस दिशा में आगे आएंगी।
चीन से तुलना
चीन के साथ तुलना खासतौर पर जानकारीपरक है। 2014 में जब एक किताब के लिए जानकारी जुटा रहा था तब पता चला कि चीन की 301 कंपनियों के मुकाबले भारत की 26 कंपनियां हैं। 2021 के ताजा आंकड़े दिखाते हैं कि हमारी 24 कंपनियों के मुकाबले चीन की 678 कंपनियां हैं। ध्यान दीजिए कि बीते कुछ वर्षों में दुनिया भर के उद्योग किस तरह बदले। औषधि क्षेत्र में भारत आठ से 11 कंपनियों तक पहुंचा जबकि चीन 21 से 79। रसायन में भारत शून्य से एक तथा चीन 10 से 33, वाहन क्षेत्र में भारत छह से पांच जबकि चीन 28 से 45 और सॉफ्टवेयर में भारत पांच से दो तथा चीन 32 से 73 ।
हमें अपने औद्योगिक ढांचे में बदलाव लाना होगा, अपनी कंपनियों को प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए बदलाव को आकार देना होगा, अपनी कंपनियों पर प्रतिस्पर्धी होने का दबाव बनाने के लिए व्यापार नीति का इस्तेमाल करना होगा तथा सार्वजनिक शोध प्रणाली में परिवर्तन करना होगा। लेकिन इन वृहद बदलावों को किसी अन्य आलेख के लिए छोड़ कर बात करते हैं कि मौजूदा भारतीय कंपनियों को क्या कदम उठाने चाहिए।
कुछ बातों के साथ शुरुआत की जा सकती है:
• शोध एवं विकास का व्यय क्या है? बिक्री का कितना प्रतिशत उस पर व्यय किया जाता है? दुनिया भर में समान उद्योग की 10-20 कंपनियों के साथ उसकी तुलना से क्या नतीजे मिलते हैं?
• शोध एवं विकास में कितने इंजीनियर और वैज्ञानिक लगे हैं? वैश्विक उद्योगों की 10-20 शीर्ष कंपनियों से इसकी तुलना के नतीजे क्या हैं?
• टर्नओवर के प्रतिशत के रूप में निर्यात की क्या भूमिका है? निर्यात में नए उत्पादों की क्या भूमिका है? कुल राजस्व हिस्सेदारी से अधिक या कम?
• टर्नओवर में नए उत्पादों का प्रतिशत? क्या नए उत्पाद औसत से अधिक मार्जिन पर बिकते हैं या कम?
हम अहमदाबाद विश्वविद्यालय, सीटीआईईआर और सीआईआई के के जरिये एक कार्यक्रम में इन्हीं सवालों से जूझ रहे हैं।
विदेशों में लगभग हर कंपनी प्रतिभाओं को जुटाने के लिए संघर्ष कर रही है। हमारे पास प्रतिभाएं प्रचुर मात्रा में हैं। हमारे नए इंजीनियरों को प्रशिक्षण और काम के अवसर की जरूरत है। विदेशी कंपनियां हमारी प्रतिभाओं को पहचानती हैं। शोध एवं विकास के 100 शीर्ष निवेशकों में दोतिहाई के शोध विकास केंद्र भारत में हैं। कम से कम भारतीय कंपनियों को जीई, बॉश और एमर्सन का मुकाबला करना होगा। इनमें से हर कंपनी ने भारत में शोध एवं विकास में हजारों इंजीनियरों को काम पर रखा है।
अंत में, हमें कंपनियों के भीतर भी इस क्षेत्र में निवेश बढ़ाना होगा। विभिन्न क्षेत्रों में तकनीकी निवेश की कमी को लेकर हमें अपनी हर बोर्ड बैठक और नीतिगत बैठक में चर्चा करनी होगी।
Date:22-02-23
बर्बरता की पराकाष्ठासंपादकीय
निक्की यादव हत्याकांड से जुडे़ छह लोगों की गिरफ्तारी के बाद दिल्ली पुलिस ने जिस तरह के खुलासे किए हैं, वे रोंगटे खडे़ करने वाले हैं। यह पूरा घटनाक्रम किसी त्रासद फिल्मी पटकथा से कम नहीं। बकौल पुलिस, इस कत्ल को अंजाम देने में पूरा परिवार शामिल था। पुलिस ने निक्की के पति और मुख्य आरोपी साहिल गहलोत, उसके पिता व चचेरे-मौसेरे भाइयों की भूमिका के बारे में जैसी-जैसी बातें बताई हैं, उनसे साफ प्रतीत होता है कि यह अकेले साहिल की करतूत नहीं है। मगर इस हत्याकांड का चिंताजनक पहलू यह भी है कि एक पूरा कुनबा नृशंस आपराधिक मानसिकता को जीता रहा और समाज इससे पूरी तरह गाफिल रहते हुए उसके जश्न में शरीक होता रहा। बर्बरता की इंतिहा देखिए कि इसी खानदान के एक शख्स ने, जिसने लोगों के जान-माल की हिफाजत की शपथ उठाकर खाकी वरदी पहनी थी, कथित हत्यारों को निक्की का शव फ्रीज में रखने की सलाह दी और उसके बाद वे साहिल की बारात लेकर निकल पड़े! निस्संदेह, यह अमानवीयता की पराकाष्ठा है।
महरौली के श्रद्धा वाल्कर हत्याकांड को अभी लोग भूले भी नहीं थे कि इस नए प्रकरण ने हरेक संजीदा इंसान को हिलाकर रख दिया है। श्रद्धा की हत्या का आरोप उसके लिव-इन पार्टनर आफताब पूनावाला पर है, और उस कत्ल की प्रकृति ने समाज में ऐसे रिश्तों की मंजूरी पर गंभीर बहस खड़ी कर रखी है; कुछ कट्टरपंथियों और संकीर्णतावादियों ने तो उस दुखद घटना से सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के मसाले भी जुटा लिए। मगर निक्की हत्याकांड ने फिर से यह साबित किया कि अपराधियों की कोई जाति, धर्म या रंग-रूप नहीं होता। इन दोनों हत्याकांडों से इतर भी हाल के दिनों में हत्या की ऐसी-ऐसी वजहें सामने आई हैं, जो कानून-व्यवस्था बनाए रखने वाली एजेंसियों के साथ-साथ शासन और समाज की परेशानी बढ़ाने वाली हैं। निक्की की हत्या के पीछे जिस तरह से षड्यंत्र बुने गए, वे शातिर दिमागों की ही उपज हो सकते हैं। ऐसे असामाजिक तत्वों को सख्त संदेश न मिला, तो भविष्य में जांच एजेंसियों की चुनौतियां काफी बढ़ जाएंगी।
श्रद्धा और निक्की हत्याकांड दो अलग-अलग पृष्ठभूमि के अपराध हैं, मगर ये दोनों रिश्तों के उथलेपन को समान रूप से उजागर करते हैं। प्रेमी और पति के कातिल बन जाने की इन दोनों वारदातों में खास तौर से लड़कियों के लिए गंभीर संदेश है कि जीवनसाथी के चयन में उन्हें किस किस्म की सावधानी और परिपक्वता दिखानी चाहिए। वे अपनी आजादी और खुदमुख्तारी से समझौता किए बिना यह चयन कर सकती हैं। मगर अपने परिजनों को गफलत या धोखे में रखकर कोई चुनाव अक्लमंदी भरा नहीं हो सकता। बताया जा रहा है कि निक्की ने अपने परिजनों से अपनी शादी छिपाए रखी थी। एक ऐसे दौर में, जब बड़ी संख्या में माता-पिता अपनी बेटियों को खुद से दूर अच्छी शिक्षा और करियर के लिए भेज रहे हैं, ऐसी घटनाएं उन्हें हताश करेंगी। इसलिए जांच एंजेसियों और न्यायपालिका पर यह जिम्मेदारी आयद है कि वे जल्द से जल्द इन लोमहर्षक हत्याकांडों के मुजरिमों को उनके अंजाम तक पहुंचाएं। वे जानती हैं कि इंसाफ में देरी अपराधियों के हौसले बढ़ाती है। दुर्योग से हम अपराधी तत्वों में यह खौफ पैदा करने में लगातार विफल हो रहे हैं कि वे बहुत दिनों तक कानून से बच नहीं सकेंगे। श्रद्धाओं और निक्कियों में भी यह भरोसा पैदा करने की जरूरत है कि वे बेधड़क पुलिस तक अपनी शिकायत लेकर जा सकें।
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गत वर्षों में महामारी और उसके बाद आई यूक्रेन युद्ध की स्थिति ने वैश्विक अर्थव्यवस्था पर विपरीत प्रभाव डाला है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनॉमी के डेटा के अनुसार, भारत में रोजगार और आय की स्थितियां कोविड पूर्व की स्थिति में नहीं पहुँच पाई हैं।
इससे जुड़े कुछ बिंदु-
चिंताजनक विकास प्रवृत्ति –
बड़े राजकोषीय घाटे को देखते हुए, व्यय को नियंत्रित करने के लिए भारत सरकार पर दबाव है। इसका समाधान राजस्व पक्ष के पुनर्गठन में निहित है। महामारी के दौरान धनी परिवारों को लाभ हुआ है। इनको मिलने वाले कर की छूट को कम कर दिया जाना चाहिए। इससे अप्रत्यक्ष करों की कीमत पर प्रत्यक्ष करों पर निर्भरता बढ़ती है। इस संदर्भ में यह याद रखा जाना चाहिए कि कार्पोरेट कर में छूट से निजी निवेश को कोई बढ़ावा नहीं मिला था।
बजट तो हितों को संतुलित करने का एक प्रयास होता है। इस पूरे कार्यक्रम में असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों के हित और सूक्ष्म, लघु व मध्यम दर्जे के उद्यमों को नहीं भूला जाना चाहिए। देश में रोजगार के अवसरों को बढ़ाने के लिए ये बड़ा आधार है।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित अमित बसोले के लेख पर आधारित। 24 जनवरी, 2023
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Date:21-02-23
Save HimalayasNumber of pilgrims and tourists in stressed areas must be capped. Globally, this is the accepted norm.TOI Editorials
The large cracks appearing on the Badrinath highway near subsidence-hit Joshimath pose big questions for the Char Dham Yatra, slated for late April. There are reports that even old cracks along the highway are re-emerging. If true, then lakhs of vehicles plying on the highway at the peak of the yatra will pose a serious risk to both the local environment and pilgrims. Surely, it’s clear by now that the fragile ecology of the Garhwal Himalayas is under tremendous stress. Hydroelectric projects, increased traffic and a construction spree ensured the carrying capacity of the Uttarakhand hills was breached years ago. In recent years, the state’s pilgrimage triumphalism – 17. 6 lakh made it to Badrinath in 2022 – had added to this. But it needn’t be pilgrimage vs environment.
The solution is caps on pilgrim and tourist numbers. There are many examples globally. Bhutan has long charted a path of ecotourism by charging foreign tourists a sustainable development fee of around $200 per person per night. It has even started charging Indian visitors Rs 1,200 per day as part of its ‘high value, low volume’ tourism strategy. This policy has worked very well for Bhutan’s ecology and its tourism industry.
There are similar policies in Central and South America. Costa Rica accounts for 4% of the world’s biodiversity and relies on tourism for 10. 3% of its GDP. Yet it has been an ecotourism champion with initiatives like the Blue Flag Ecology Programme under which a strict set of environmental criteria is laid down. All local stakeholders in the tourism industry – local community, hotels, travel agencies etc – work together to attain the coveted Blue Flag tag. In Chile, the tourism industry is allowed to operate only in sustainable ways within protected areas. Tourism stakeholders are then held accountable for any breaches in these agreements. Surely, the sensitive, understress Himalayan zone should be protected via similar strategies? Uttarakhand’s Chamoli district administration has indicated there may be a cap on pilgrims. Implement this without hesitation.
Date:21-02-23
House of horrorsAuthorities must not ignore what happens in homes run by NGOsEditorial
It is inconceivable that flagrant violations of law and human rights happen in plain sight, and when intervention finally happens, it is already too late for some. The case in point is the Anbu Jothi Ashram case in Tamil Nadu’s Villupuram district where — entirely by accident — the lid was blown off dark secrets and happenings inside the home. The issue came to light when police followed the thread of man missing complaints. Then one sordid fact after the other came to light, including sexual and physical abuse, bizarre scare tactics and even trafficking. The unlicensed home — the name translates to ‘flame of love’ — was providing shelter to persons on the fringes of society, physically and socially in need of support. It had been accommodating destitute women, abandoned senior citizens, beggars, alcohol addicts and persons with mental retardation or illness. Residents who were rescued later told tales of how they were held down with a mixture of fear, terror, and perversion; the owners also used monkeys to terrorise them. The home had been running for years until police first entered its premises last week to arrest four employees for running the centre without a valid permit. A total of 142 residents were rescued and relocated. Subsequently, as women residents of the home made sexual assault and torture charges against the owner Jubin Baby and his wife Maria, police arrested the couple. Another unit run by them near Puducherry was closed down and over 20 residents rescued. Following up, the National Commission for Women recorded testimonies of the rescued women, and the investigation has been handed over to the CB-CID.
The Anbu Jothi Ashram case should never have happened, given the safety mechanisms provided by the law, and rules crafted and enforced by the State. All care homes should be registered and periodic assessments carried out to allow them to continue to operate. How did this institution slip through the cracks? Laws in the social sector that serve persons in disadvantageous circumstances, must leave no loophole, no cracks that can be exploited. This case certainly speaks to chronic neglect in the sector, despite periodic exhortations and even raids on care homes to check their credentials. Exploitation in the social sector is particularly intolerable; it is tantamount to allowing the fence to eat the crop. Monitoring and supervision in the sector need to be fool-proof and corruption-free. Not only should authorities document every last flagrant violation at the ashram but also make an example of it — to serve as a crushing deterrent to any one who might toy with the idea of abusing those who seek sanctuary.
Date:21-02-23
Slow progress to creating a safe workplace for womenUnless society works incessantly to change the prevalent socio-cultural and economic structures, it could well be status quoR.K. Vij is a former Special Director General of Police of Chhattisgarh.
The recent case of allegations of sexual harassment that some of India’s sportswomen (wrestling) are said to have faced have shocked us. Those affected had to sit in protest in the capital to make themselves heard. This shows that any internal complaints committee (if there is one) does not function. Or, the wrestlers were not aware about it. The Vishaka guidelines on reporting harassment are meant to be followed by government and private institutions equally. In view of the sensitivity of the issue, the Union Sports Minister constituted an ‘oversight committee’ headed by a lady Olympic medal holder to investigate the charges levelled against the president of the Wrestling Federation of India.
Earlier, in February 2021, a leading woman journalist celebrated her victory — not because the accused person who has harassed her sexually was convicted, but because she was acquitted of accusations of defamation that have been levelled against her by the accused. The ‘truth’ of victimisation prevailed and it was held that a woman cannot be punished for raising her voice against abuse. She had raised her voice against her employer and a powerful politician. Though a specific offence relating to ‘sexual harassment’ (under Section 354-A) was inserted in the Indian Penal Code (IPC) in 2013, the allegations largely fell under Section 509 (i.e., to insult the modesty of a woman) of the IPC. The victim chose not to report the matter to the police, and there was no internal mechanism in place for the redress of complaints of sexual harassment as the Vishaka guidelines were framed by the Supreme Court of India in 1997. But this did not give the employer any liberty to violate the fundamental rights of a woman at the workplace.
Structural violence, data on workforce
Violence, in the form of sexual harassment at the workplace, is both direct and structural. While an enabling environment for reporting direct violence has shown a gradual improvement, indirect violence remains poorly addressed because it is embedded deep in our social and economic structures. It is more visible in the employment imbalance prevalent between men and women, in the organised and unorganised sectors. With more men at the workplace, they feel entitled and empowered to take undue advantage of the historical fact that the society is still patriarchal and women are not only in a minority but also occupy a few of the higher positions.
The numbers matter when it comes to power emanating from the majority. One musters courage to voice one’s grievance when there are sufficient numbers in support of the affected person. Also, much would depend on the tooth-to-tail ratio of any organisation. When the number of women in leadership positions are not enough to generate confidence in subordinates, women in lower positions feel reluctant to air their grievances.
The Periodic Labour Force Survey (PLFS) annual report available for 2020-21 shows that though the participation of women in the total labour force grew, i.e., Labour Force Participation Rate (LFPR) has gradually increased from 17.5% in 2017-18 to 25.1% in 2020-21, and the Worker Population Ratio (WPR) from 16.5% in 2017-18 to 24.2% in 2020-21, it is still much less when compared to men. The LFPR and WPR data published in the latest Quarterly Bulletin (April-June 2022) are not encouraging either. While LFPR is defined as the percentage of persons in the labour force among the persons in population (i.e., both employed and unemployed or seeking employment), WPR is the percentage of persons employed among the persons in population.
Start early, and at home
The absence of an enabling and safe working environment is one of the factors for the poor participation of women in the labour force. It is generally believed that most women do not complain of sexual harassment and the current redress mechanism is either non-existent or ineffective. They are more vulnerable to exploitation by their employer as they can be easily threatened with their job continuity for indecent favours.
Unless the mindset of treating men and women as equals is developed at an early stage of character formation during childhood, the stereotyped power relation between the two would be difficult to change later.
It would not be out of context to mention here a theory of criminology known as ‘nature versus nurture’. It says that both genetics and the environment affect an individual’s development. While genes may decide certain features of one’s personality at birth, it is social conditioning and the environment of the family and early schooling which matter the most during the growth of children. Unless both parents respect each other and treat their girl and boy child on a par in all respects, they grow up learning this inequality as a normal phenomenon, which may even lead to the development of criminal tendencies in men. Therefore, the beginning has to be made at home.
Fixing goals
Similarly, providing a safe work environment is the responsibility of the employer. The employer needs to ensure that the working environment is safe and women friendly. However, it has been observed that whenever allegations of sexual harassment are levelled against superior authorities, instead of getting the complaint inquired into expeditiously under the law, i.e., the Sexual Harassment of Women at Workplace (Prevention, Prohibition and Redressal), Act, 2013, the accused either resorts to multiple attempts at litigation to stall the due process or attempts to bring disrepute to the victim on flimsy grounds. The situation becomes more complex when the accused himself is at the helm of affairs, as in the examples given above.
Therefore, it is essential to fix goals to improve the workplace environment for women. The short-term goals may include providing the requisite women-friendly infrastructure, the constitution of internal complaint committees, and the spreading of awareness about the law and procedure of grievance redress.
Medium-term goals may include the increase of female participation in the labour force, improvement of tooth-to-tail ratio, and providing incentives to prevent drop-outs such as paid maternity leave. However, in the long-run, it is essential to address the deep-rooted structural and cultural violence which puts women in a disadvantageous position. Unless society as a whole works incessantly to bring about the required changes in the existing socio-cultural and economic structures to eliminate indirect violence, root and branch, the status quo may not change.
Date:21-02-23
Law to raise marital age is not enough as enforcement is poorRebecca Rose Varghese & Vignesh Radhakrishnan
On Monday, the Supreme Court dismissed a petition seeking to increase the minimum age of marriage of women in India from 18 years to 21 years. The Chief Justice of India, D.Y. Chandrachud, noted that the pow er to amend the law lies with Parliament.
The Prohibition of Child Mar- riage (Amendment) Bill was intro- duced in the Lok Sabha in Decem- ber 2021. The Bill proposes to raise the age of marriage for women from 18 to 21 years. But after Oppo- sition MPs demanded greater scru- tiny of the Bill, it was referred to the Parliamentary Standing Committee. The MP from Kollam, N.K. Premachandran, wanted to know “whether this law was enforceable or not”; the MP from Thoothukku- Kanimozhi Karunanidhi, sought opinions from civil society; and the MP from Baramati, Supri- ya Sule, wanted the House to “un- animously pass reforms related to women”.
Back then, MPs had raised ques- tions about the enforceability of the law, the Bill’s attack on perso- nal laws, and the poor labour force participation of young women.
The caution exercised by the Supreme Court and the advice of the Opposition MPs to scrutinise the Bill before passing it is well grounded. This is because, despite the legal age of marriage for wo- men being 18 years, almost 23% of women who were aged between 20 and 24 years in 2019-21 married before their 18th birthday. In fact, in the eastern States of Bihar and West Bengal, the share was over 40% (Map 1). In Assam, Andhra Pradesh and Rajasthan, the share was over 25%. The share was be- low 10% in Kerala, Himachal Pra- desh, Punjab and Uttarakhand, among other States.
Despite such a high share of women marrying before turning 18 years, only 1,050 cases were regis- tered under The Prohibition of Child Marriage Act in 2021, accord- ing to the National Crime Records Bureau. Such a small number of cases shows that reportage of un- derage marriages is negligible, re- sulting in limited enforcement of the law. These figures may go up in 2023 given the massive crackdown in Assam on child marriages lead- ing to over 3,000 cases.
With the Bill proposing to raise the legal age from 18 to 21, the question of enforcement gets even bigger. In India, over 60% of wo- men who were aged between 25 and 29 in 2019-21 married before their 21st birthday. In the eastern States of Bihar and West Bengal, the share was over 70% (Map 2). In Andhra Pradesh, Madhya Pradesh, Rajasthan, Telangana and Tripura, it was more than 65%. Even in Goa, the State with the least share of such women, one in five women aged between 25 and 29 in 2019-21 married before turning 21.
So, while laws can be changed, enforcement may remain weak as underage marriages are rarely re- ported. As concluded in the Data Point titled ‘Education, more than wealth, determines women’s mari- tal age’ (February 15), better-edu- cated women have had more con- trol over when they should get married for decades now. The Da- ta Point also showed that due to awareness and better negotiation powers, younger women have pushed up their median marriage age by many years compared to their mothers and grandmothers.
This progress can be seen in Chart 3, which shows the share of women aged 20-24 and 45-49 in 2019-21 who married before their 18th birthday. In all the States, ex- cept Assam, Meghalaya and Mani- pur, the share of such women in the 20-24 age group was much low- er than the share in the 45-49 age group. This is a reflection of the in- creasing power of negotiation aid- ed by better education levels among younger women.
Date:21-02-23
शिक्षा का माध्यम बनें मातृभाषाएंगिरीश्वर मिश्र, ( लेखक पूर्व कुलपति एवं शिक्षाविद् हैं )
आज शायद ही कोई इससे असहमत हो कि उच्च शिक्षा देश के सर्वतोमुखी विकास के लिए अत्यंत आवश्यक निवेश है। उसी की सहायता से विविधताओं और विषमताओं वाले भारत में सबको सामर्थ्यवान बनाना संभव हो सकेगा। इसके लिए आवश्यक होगा कि उच्च शिक्षा को अधिकाधिक समावेशी बनाया जाए। शिक्षा में भाषा एक अपरिहार्य अंग है, क्योंकि ज्ञान भाषा में ही निबद्ध होता है और उसका समुचित सहयोग लिए बिना शिक्षा की प्रगति सीमित ही रहेगी। भाषा समाज की विरासत और संपदा होती है, जिसमें जीवन के सहज स्वर गूंजते हैं। यदि शिक्षा अपनी भाषा में न होकर किसी पराई भाषा में हो, तब ज्ञान पाने का काम बड़ी कठिनाई वाला हो जाता है। दूसरी भाषा को अपनाना एक अतिरिक्त काम हो जाता है। इस परिप्रेक्ष्य में उच्च शिक्षा के लिए माध्यम पर विचार करते हुए हमारा ध्यान भारत की भाषाई विविधता पर जाता है, जो देश की एक प्रमुख सामाजिक विशेषता है। यहां हजार से अधिक भाषाएं हैं, जिनके प्रयोग करने वालों की संख्या भी बहुत बड़ी है। फिर भी भारतीय राजव्यवस्था में हिंदी को वैधानिक राजभाषा का दर्जा मिला हुआ है और अंग्रेजी सह राजभाषा है।
जहां तक उच्च शिक्षा के वर्तमान स्वरूप की बात है तो यह औपनिवेशिक पृष्ठभूमि में शुरू हुआ और किसी भारतीय भाषा की जगह विदेशी अंग्रेजी भाषा को उसके एकमात्र माध्यम के रूप में स्थापित किया गया। यह अंग्रेजी राज की सुविधा और उसके साम्राज्यवादी सोच के अनुरूप था। पश्चिमी ज्ञान को श्रेष्ठ मानते हुए भारत में उसके प्रसार के लिए अंग्रेजी उपयुक्त सिद्ध हुई। इस तरह भाषा और ज्ञान के विषय दोनों का ही आयात किया गया और हमारी उच्च शिक्षण संस्थाओं को उसके अनुसार ढाला गया। पठन-पाठन और मूल्यांकन आदि की पूरी व्यवस्था लंदन विश्वविद्यालय की तर्ज पर अपनाई गई। ऐसी औपनिवेशिक व्यवस्था में अंग्रेजी भाषा के साथ-साथ पश्चिमी ज्ञान और संस्कृति का विस्तार भी भारत में हुआ। उसे प्रामाणिक, प्रासंगिक और उपयोगी कहकर इस तरह प्रचारित-प्रसारित किया गया कि लोगों के मन में बैठ गया कि यही ठीक है। इसका स्वाभाविक परिणाम भारतीय ज्ञान परंपराओं और स्थानीय भाषाओं की सतत उपेक्षा के रूप में सामने आया। इस प्रक्रिया में भारत पश्चिमी ज्ञान के उपयोग की एक प्रयोगशाला बनता गया और देशज ज्ञान हाशिए पर जाता रहा या फिर उसे पश्चिमी ज्ञान के अनुकूल ढाला गया। भारत ज्ञान सृजन करने की जगह ज्ञान का अनुकरण और समायोजन करता रहा। विद्यार्थियों के लिए अंग्रेजी सीखना और पश्चिमी विषयों को सीखना और सुविधानुसार उनका उपयोग एक मानक काम बन गया। ऐसे में न केवल शिक्षा की जटिलता बढ़ गई, बल्कि देश की प्रकृति की समझ भी बिगड़ती गई। विद्यार्थी पर शिक्षा का भार बढ़ने के साथ ही एक हीनता की ग्रंथि का भी बीजारोपण हो गया। गुलामी की मानसिकता इतनी प्रचंड थी कि आज भी कई स्कूल अंग्रेजी न बोलने और हिंदी जैसी भारतीय भाषा बोलने पर दंडित करते हैं। तमाम लोगों के लिए अंग्रेजी अभी भी रौब झाड़ने का जरिया है। भारत में भाषाई गुलामी की दास्तान इतनी लंबी है कि उसके दुष्परिणाम का आकलन सरल नहीं। यह कहना ही पर्याप्त होगा कि भाषा से ही विचार, आचार और पूरी संस्कृति बनती-बिगड़ती है।
भाषा प्रयोग का एक पक्ष यह भी है कि भाषा की अभिव्यक्ति मौलिक अधिकार है, परंतु वास्तविकता कुछ अलग है। न्यायालय, विश्वविद्यालय, कार्यालय और रुग्णालय हर कहीं आज अंग्रेजी का वर्चस्व है। अलिखित रूप से भारतीय भाषाओं में अभिव्यक्ति पर बंदिश और अंग्रेजी को लेकर प्रलोभन का परिवेश बना हुआ है। यह स्थिति सामान्य मानवाधिकारों के हनन को भी व्यक्त करती है। स्मरण रहे कि लोकतंत्र की अपनी एक मर्यादा होती है, जहां सबके लिए अवसर की समानता, समता, बंधुत्व की व्यवस्था है और इन सबके लिए संवाद ही मुख्य आधार होता है। भारतीय भाषाओं की उपेक्षा के साथ समाज में बड़े-छोटे की दो कोटियां-अंग्रेजीदां और गैर-अंग्रेजीदां के रूप में खड़ी कर दी गईं जिसके दूरगामी आर्थिक, सामाजिक एवं सांस्कृतिक परिणाम हुए। उससे उपजने वाली असुविधा और दुविधा पसरती गई। उससे अंग्रेजी की श्रेष्ठता और प्रामाणिकता को बल मिलता रहा। साथ ही सामाजिक जीवन में ऊंच-नीच के भेदभाव और पूर्वाग्रह का भाषाई आधार स्वतंत्र भारत में दिन-प्रतिदिन मजबूत होता गया। लोकतंत्र में शासक और शासित या प्रजा तथा राजा के बीच की दूरी कम होनी चाहिए थी, लेकिन वह बढ़ती रही। भारतीय संविधान भी मूलतः अंग्रेजी में ही तैयार हुआ। परीक्षाओं और नौकरी में अंग्रेजी को प्राथमिकता का चलन अभी भी कायम है। इस माहौल में यही संदेश फैला कि भारतीय भाषाएं विचलन हैं और मानक भाषा सिर्फ अंग्रेजी है। इसका दबाव भाषाओं में अस्वाभाविक दखल के रूप में उभरने लगा। भारतीय समाज और संस्कृति को देखने का देशज की जगह विदेशी नजरिया प्रचलित हुआ और आधुनिक ज्ञान का विकास अपनी जड़ें अपेक्षित रूप से न जमा सका।
संसार के साथ हमारा रिश्ता भाषाई मध्यस्थता के बिना कठिन है। इसलिए भाषा सामाजिक सशक्तीकरण के विमर्श में प्रमुख पात्र है। फिर भी उसकी भूमिका को अनदेखा किया जाता है। अच्छी बात है कि वर्तमान सरकार देश को आत्मनिर्भर और स्वदेशी की दिशा में आगे ले जाने के लिए संकल्पबद्ध है। सरकार ने आत्मनिर्भर भारत की अवधारणा को विमर्श के केंद्र में लाकर सामर्थ्य के विषय में हमारे सोच को आंदोलित किया है। इसी कड़ी में नई शिक्षा नीति में मातृभाषा को शिक्षा के माध्यम के रूप में अवसर देने पर विचार किया गया है। बेहतर परिणाम के लिए यही आवश्यक है कि शिक्षा मातृभाषा में दी जाए। बहुभाषिकता के आलोक में मातृभाषा का आदर करते हुए भाषा की निपुणता विकसित करना अपरिहार्य है। अमृतकाल के संदर्भ में प्रधानमंत्री मोदी ने गुलामी की मानसिकता से मुक्त होने के लिए आह्वान किया है। इसके लिए मातृभाषाओं में शिक्षा की व्यवस्था आवश्यक ही नहीं अनिवार्य है। मातृभाषा दिवस पर यह संकल्प नए सिरे से लेना चाहिए।
Date:21-02-23
जलवायु संकट और खेती पर खतरेविनोद के शाह
दुनिया के सामने इस समय सबसे बड़ी चुनौती जलवायु संकट की है। जलवायु संकट के खेती पर पड़ रहे दुष्प्रभावों को गंभीरता से नहीं लिया गया तो निकट भविष्य में भारी खाद्यान्न संकट होगा। मगर हमारी सरकार सामने खड़े इस संकट से कृषि को बचाने में बेपरवाह दिखाई दे रही है। पिछले एक दशक में देश में बाढ़, सूखा, अत्यधिक ठंड, कम समय में बहुत अधिक बारिश, गर्म हवाओं और तापमान वृद्धि जैसे कारणों से फसलें निरंतर प्रभावित हो रही हैं। वैज्ञानिक अनुसंधान बता रहे हैं कि मौसम अब इसी तरह बदलता रहेगा। विश्व बैंक की एक रिपोर्ट कहती है कि आगामी पंद्रह वर्षों में जलवायु संकट के कारण पैदावार में कमी की वजह से भारत के साढ़े चार करोड़ लोग अत्यधिक गरीबी में जीवन यापन को मजबूर हो जाएंगे। अगले डेढ़ दशक में देश की धरती के तापमान में दो डिग्री सेंटीग्रेड की वृद्धि तय मानी जा रही है। नतीजतन, मानसून की तीव्रता में दस फीसद तेजी आएगी। यानी कम समय में बहुत अधिक बारिश, पानी की बूंदों का आकार बड़ा होने, बादल फटने और आकाशीय बिजली गिरने की आवृत्ति बढ़ेगी।
जलवायु संकट के कुप्रभावों को वापस कर पाना संभव नहीं है, लेकिन उपाय के तौर पर प्रतिकूल परिस्थितियों में पैदावार के बचाव की कार्ययोजना तैयार की जा सकती है। पिछले पांच वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि हिमाचल, उत्तराखंड सहित उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और महाराष्ट्र में आसमानी बिजली गिरने की घटनाओं में पंद्रह फीसद की दर से वृद्धि हुई है। कम समय में अत्यधिक बारिश से बाढ़ के हालात पैदा हो रहे हैं। बारिश के बाद इन्हीं स्थानों पर लंबे सूखे के हालात बने हैं। वैज्ञानिक अनुमान के मुताबिक तापमान में दो डिग्री की वृद्धि से देश का गेहूं उत्पादन एक करोड़ टन कम हो जाएगा। कार्बन डाईआक्साइड की वृद्धि से फसलों में प्रोटीन सहित अन्य तत्वों की मात्रा कम होगी। पशुओं की प्रजनन क्षमता में कमी के साथ उनकी दुग्ध उत्पादन क्षमता में गिरावट दर्ज होगी।
पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के एक अनुसंधान में जलवायु संकट से वर्ष 2050 तक चावल के उत्पादन में एक फीसद और मक्का तथा कपास के उत्पादन में क्रमश: तेरह और ग्यारह फीसद कमी आने की आशंका जताई गई है। पिछले साल फसल पकते समय अचानक गर्म हवाएं चलने से गेहूं उत्पादन के पूर्वानुमान में जबर्दस्त गिरावट दर्ज की गई थी। खरीफ फसलों में उड़द, मूंग, तिलहन सहित धान का उत्पादन 2022 में अनुमान से कम रहा। इसकी वजह मानसून में देरी और बारिश की अधिकता थी।
जलवायु संकट के चलते देश की कृषि में जीवांश की मात्रा तेजी से कम हुई है। कृषि योग्य मिट्टी में आवश्यक जैविक तत्व की मात्रा तीन से छह फीसद होने के बजाय सिर्फ 0.5 फीसद रह गई है। ईमानदारी से प्रयास किए जाएं तो मिट्टी के इस जीवांश सुधार में बीस वर्ष का समय लग जाएगा। मगर जैविकता नष्ट करने की प्रक्रिया जारी रही, तो आगामी पचास वर्षों में भारत की खेतिहर भूमि की उर्वरता पूरी तरह समाप्त हो जाएगी। आगामी दिनों में मौसम वैज्ञानिकों ने समय पूर्व तापमान में वृद्धि, उत्तर भारत में समय से पूर्व लू चलने की आशंका व्यक्त की है। इसके असर से दलहनी फसलों सहित गेहूं की फसल समय से पहले ही पक कर तैयार हो जाएगी और पैदावार में गिरावट की आशंका है।
वैश्विक जलवायु सूचकांक में जिन देशों पर सबसे नकारात्मक प्रभाव पड़ने वाला है, भारत उनमें चौदहवें स्थान पर है। भारत में 2050 तक औसत वर्षा के दिनों में साठ फीसद की गिरावट अनुमानित है, जिससे पैदावार में तेज गिरावट की आशंका है। पड़ोसी देशों में उत्पादन में गिरावट की विकराल स्थितियां संभव हो सकती हैं। जलवायु संकट के नतीजों से कृषि को बचाने के लिए भारत सरकार ने अभी तक कोई विशेष कार्ययोजना पेश नहीं की है। किसानों के लिए क्षणिक लाभ देने वाली घोषणाओं के बजाय पैदावार बचाने की योजनाएं तैयार कर समयबद्ध कार्य करने की आवश्यकता है।
इसके लिए सबसे पहले वर्षा जल संरक्षण और इस पर आधारित कृषि पर काम करना होगा। कम समय में अधिक वर्षा के अंदेशे के मद्देनजर वर्षा जल को न केवल खेतों में रोकना, बल्कि इसे जमीन के अंदर भी पहुंचाना है। प्रत्येक खेत में तालाब, मेंड़ बांधना और उन पर पेड़ लगाना अनिवार्य करना होगा। तेज गर्मी और कम समय की वर्षा में सिंचाई के लिए अब एकमात्र विकल्प वर्षा जल के संचयन से खेती करना है। इसके साथ भविष्य के लिए भूमिगत जल सुरक्षित बनाने के लिए वर्षा जल को नलकूपों के माध्यम से भूमि में उतारना आवश्यक होगा।
भारत भूमिगत जल के दोहन में दुनिया के शीर्ष स्थान पर है। इसके विपरीत भूमिगत जल संचय में देश का योगदान नगण्य है। जैविक कृषि से संबंधित एक अनुसंधान बताता है कि अगर कृषि भूमि की कार्बनिक क्षमता में एक फीसद की भी वृद्धि कर दी जाए, तो प्रति हेक्टेयर जमीन की जलधारिता में पचहत्तर हजार लीटर की वृद्धि संभव है। भीषण गर्मी में खेतों में संरक्षित जल को वाष्पीकरण से बचाने के लिए खेतों-तालाबों की ऊपरी सतह पर सोलर पैनल लगाकर पानी के वाष्पीकरण को रोकने के साथ खेतों में बिजली उत्पादन की योजना को मूर्त रूप दिया जाना चहिए।
देश के कृषि विश्वविद्यालय और अनुसंधान केंद्र अधिक पैदावार वाले बीज विकसित कर रहे हैं, जिन्हें अधिक सिंचाई की जरूरत होती है। जलवायु संकट की चुनौती के मद्देनजर अब इन्हें कम अवधि, कम सिंचाई और मौसमी परिवर्तन सहन करने वाले बीज विकसित करने की आवश्यकता है। फसलों को मौसमी परिवर्तन और सूखे से बचाने के लिए अब देश को हाइट्रोजेल तकनीक अपनाने की आवश्यकता है। विकसित देशों में लोकप्रिय हाइट्रोजेल बीज अंकुरण, जड़ वृद्धि सहित फसली पौधों को सूखे और गलन से बचाने का कार्य करते हैं। पानी के वाष्पीकरण को कम करने के साथ हाइट्रोजेल चालीस डिग्री सेल्सियस के उच्च तापमान तक कार्य करने में सक्षम होते हैं। ये अपने सूखे वजन से चार सौ गुना पानी अवशोषित कर सूखे के दौरान फसल की जड़ों तक पहुंचाने का कार्य करते हैं।
निरंतर सिचाई के पानी, हवा की आर्द्रता और ओस की बूंदों को अवशोषित कर आवश्यक समय में फसल को पानी की आपूर्ति करते हैं। यह तकनीक देश की कृषि पद्धति के अनुकूल होने के साथ पर्यावरण रक्षक और किफायती है। सरकार को इसे प्रोत्साहित करना चहिए। मिट्टी की जैविकता को बचाने के लिए गाय के गोबर और फसल अवशिष्टों से निर्मित खाद सबसे उत्तम है। देश में गेहूं, धान, मक्का और सोयाबीन की फसलों के सालाना अवशेष सालाना सात सौ लाख मीट्रिक टन बैठते हैं। इसका बीस फीसद प्रतिवर्ष किसान जला देते हैं, जो वातावरण में विषाक्त गैसों की मात्रा में वृद्धि, ओजोन परत के नुकसान, मिट्टी के जीवांश को नष्ट करने के साथ मृदा में उपलब्ध फास्फोरस और पोटाश को अघुलनशील बनाकर ठोस रूप में परिवर्तित करने के लिए जिम्मेदार है। इससे मिट्टी की उर्वरा शक्ति के साथ उसकी जल अवशोषण क्षमता को बहुत अधिक नुकसान होता है।
देश में नाइट्रोजन का अत्यधिक उत्सर्जन भी जलवायु संकट का एक बड़ा कारण है। नाइट्रोजन का सीमित उपयोग पौधों को आवश्यक पोषक तत्व देने और प्रोटीन निर्माण में आवश्यक है, लेकिन इसका अंधाधुंध इस्तेमाल मृदा की जल अवशोषण क्षमता और जैव विविधता के लिए अत्यधिक नुकसानदेह है। यूरिया के अंधाधुंध इस्तेमाल के खतरों से भी बचाना होगा। इससे बढ़ते जलवायु संकट की रफ्तार थोड़ी धीमी होगी और खेती किसानी को भी बचाया जा सकेगा।
Date:21-02-23
अब शायद लोकतांत्रिक हो जाए पुलिसविभूति नारायण राय, ( पूर्व आईपीएस अधिकारी )
उत्तर प्रदेश में कानपुर देहात के मडौली गांव की प्रमिला दीक्षित के 13 फरवरी को जल मरने की खबर पढ़कर क्या आपको वहां से हजारों मील दूर 17 दिसंबर, 2010 को ट्यूनीशिया के किसी बाजार में आत्मदाह करने वाले स्ट्रीट वेंडर मोहम्मद बोआजिजि की याद आई? प्रमिला दीक्षित की मृत्यु दुर्घटना, आत्महत्या या हत्या कुछ भी हो सकती है, ज्यादा आशंका तो दुर्घटना की ही लगती है, पर एक बात दोनों में समान है और वह है प्रशासन की संवेदनहीनता। मोहम्मद बोआजिजि की आजीविका के एकमात्र साधन उसके खोखे को प्रशासन ने बुलडोजर से गिरवा दिया था और विरोध स्वरूप उसने आग लगाकर आत्महत्या कर ली । इस अकेली घटना ने ‘अरब ्प्रिरंग’ नामक उस आंदोलन को जन्म दिया था, जिसके चलते तमाम अरब देश सुलग उठे और कई मुल्कों में सरकारें बदल गईं।
प्रमिला और उनकी बेटी के जल मरने की घटना से मोहम्मद बोआजिजि की याद मुझे इसलिए भी आई कि पिछले दिनों केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने हरियाणा और दिल्ली पुलिस के दो कार्यक्रमों में भाग लेते हुए व्यापक पुलिस सुधारों की बात की है। पिछली बार की घोषणाओं से फर्क यह है कि इस बार तीन प्रमुख कानूनों- भारतीय दंड संहिता (आईपीसी), दंड प्रक्रिया संहिता (सीआरपीसी) और भारतीय साक्ष्य अधिनियम (इंडियन एविडेंस ऐक्ट) में भी बड़े बदलाव की बात की गई है । मुख्य रूप से इन्हीं तीन कानूनों के जरिये देश में पुलिस और आपराधिक न्याय प्रणाली का तंत्र काम करता है। इसके पहले जब कभी पुलिस सुधारों का जिक्र होता था, तो मुख्य रूप से पुलिस को बेहतर संसाधन प्रदान करने की बातें होती थीं। अगर कुछ और सोचते, तो हम उनकी सेवा-शर्तों में कुछ सुधार की गुंजाइश पर बहस करते। प्रकाश सिंह केस और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा उसमें दिया गया फैसला पुलिस सुधारों को लेकर समाज, सरकार और न्यायालयों की एकांगी सोच का सबसे बड़ा उदाहरण है। इस सोच में पुलिस व जनता के रिश्तों में किसी बुनियादी परिवर्तन के लिए जरूरी इच्छाशक्ति का अभाव दिखता है।
गृह मंत्री अमित शाह द्वारा बुनियादी कानूनों में सुधार की घोषणा का स्वागत करते समय हमें उन जरूरतों और परिस्थितियों को देखना होगा, जिनके तहत ये कानून बने थे। साल 1857 के जन उभार को दबाने और ईस्ट इंडिया कंपनी से शासन अपने हाथों में लेने के बाद ब्रिटिश सरकार को स्वाभाविक रूप से कानून-कायदों का एक ढांचा खड़ा करने की जरूरत महसूस हुई, जिसमें जनता को न्याय मिलने का आभास तो होता ही रहे, साथ में किसी असंतोष को कुचलने के लिए सरकार के पास पर्याप्त औजार भी उपलब्ध हो सकें। इसीलिए 1860 के दशक में उपरोक्त तीनों कानून तो बने ही, एक अन्य महत्वपूर्ण कानून पुलिस ऐक्ट भी ब्रिटिश पार्लियामेंट से पास होकर भारत को मिला। अपने समय की जरूरतों और शासकों के हितों की रक्षा करने में समर्थ इन कानूनों ने डेढ़ सौ से अधिक वर्षों तक अपनी भूमिका बख़ूबी निभाई। इसमें भी कोई शक नहीं कि भारत जैसे महादेश में इतनी विस्तृत लिखित संहिता पहली बार तैयार की गई थी और यह भी सच है कि एक प्राचीन सभ्यता वाले देश में पहली बार कानून के समक्ष वर्ण, लिंग या सामाजिक स्तरीकरण को नजरंदाज कर सभी नागरिक कानून के समक्ष एक माने गए। एक अपराध के लिए ब्राह्मण या शूद्र को एक ही कानूनी प्रक्रिया से गुजरना पड़ता और उनके लिए दंड भी एक ही होते, पर यह भी सही है कि इन कानूनों में कुछ न कुछ ऐसा अंतर्निहित था, जो पुलिस को जनता की दोस्त बनने से रोकता था।
दुर्भाग्य से आजादी के बाद आए नए शासकों ने भी कोई ऐसे बुनियादी परिवर्तन नहीं किए, जिनसे पुलिस आम जन की मित्र और उनके प्रति जवाबदेह बन सकती। अगर कुछ बदलाव किए भी गए, तो वे ऊपरी रंग-रोगन अधिक थे, उनसे किसी बुनियादी बदलाव की अपेक्षा मृग मरीचिका ही साबित हुई। क्या हम गृह मंत्री की हालिया घोषणा में ऐसे किन्हीं परिवर्तनों के सूत्र तलाश सकते हैं, जो भारतीय पुलिस को विश्व के सबसे बड़े लोकतंत्र के अनुकूल बना सकें?
पिछले कुछ वर्षों में पुलिस क्रूरता बढ़ी है। राज्यसभा में एक प्रश्न का उत्तर देते हुए सरकारी पक्ष द्वारा बताया गया कि 1 अप्रैल, 2017 से 31 मार्च, 2022 तक की अवधि में 146 घटनाएं पुलिस अभिरक्षा में मृत्यु की हुई थीं। गुजरात जैसा राज्य, जिसे पारंपरिक रूप से हिंसा विरोधी समझा जाता है, 60 की संख्या के साथ इस शर्मनाक सूची में सबसे ऊपर है। सूची में उन अभागों का नाम तो शरीक ही नहीं है, जिन्हें पकड़कर तथाकथित मुठभेड़ों में मार दिया गया। दुर्भाग्य से, पुलिस की हिंसा को सामाजिक स्वीकृति हासिल है। अगर पुलिस किसी को अपराधी घोषित कर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने के पहले उसकी टांगों में गोली मार दे, तो जनता का प्रबुद्ध वर्ग भी इसे सहज स्वाभाविक मान लेता है। सत्ता की कुर्सी दौड़ में शरीक कोई भी राजनीतिक दल पुलिस हिंसा का सिद्धांतत: विरोध नहीं करता। कभी किसी चुनाव में सभ्य पुलिस का मुद्दा नहीं बनता।
कानपुर देहात की झोंपड़ी गिराते समय बुलडोजर का प्रयोग हुआ और वही उन असहाय मां-बेटी की तात्कालिक मृत्यु का कारण बना। बुलडोजर शायद सत्ता की हनक का प्रतीक बन गया है। जिस झोपड़ी को हटाने के लिए दो मनुष्य काफी होते, उसे हटाने के लिए एक दैत्याकार मशीन लाई गई, जिसके पास अपना कोई दिमाग नहीं है।
प्रकाश सिंह मामले में सर्वोच्च न्यायालय का फैसला मुझे कभी बहुत उत्साहजनक नहीं लगा था, क्योंकि इसमें पुलिस के महत्वपूर्ण पदों पर बैठे लोगों के चयन या उनकी नियुक्ति अवधि को लेकर कुछ दिशा-निर्देश जरूर जारी किए गए, पर किसी ऐसे बुनियादी बदलाव की परिकल्पना नहीं की गई, जिनसे पुलिस का औपनिवेशिक चरित्र बदलकर उसे लोकतांत्रिक बनाया जा सके। यह संभव हो सकता है, अगर गृह मंत्री अमित शाह की मुख्य कानूनों में बदलाव की घोषणा सिर्फ कागजों पर सीमित न रह जाए। ईमानदार परिवर्तन पुलिस को एक बल से जन सेवा संगठन में तब्दील कर सकते हैं। जरूरत सिर्फ इतनी है कि होने वाले परिवर्तन मात्र दिखावटी न हों। इसे परखने के लिए हमें अगले कुछ दिनों का इंतजार करना होगा।
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इसके साथ ही इनसे होने वाले लाभ की उम्मीद की जा सकती है।
‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 31 जनवरी, 2023
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Date:20-02-23
Sena Vs SenaShinde won the symbol. But Uddhav continues to hold good cards. Expect bitter fights over shakhasTOI Editorials
Although EC’s decision to recognise the faction led by Maharashtra CM Eknath Shinde as the real Shiv Sena gives an edge to that camp, Sena wars are far from over. EC relied on the ‘test of majority’ to find in favour of the Shinde faction. But both the Shinde and Uddhav Thackeray factions will continue to battle over the legacy of Bal Thackeray as well as for control of the Sena shakhas – the organisational backbone of the party. In fact, EC’s ruling has no bearing on the ownership of the party headquarters, Shiv Sena Bhavan, or the shakhas. This is because these are mostly owned by shakha pramukhs, local leaders and trusts. For example, Shiv Sena Bhavan is owned by Shivai Trust and not the party itself.
This sets the ground for a bitter, prolonged tussle between the two factions. True, if shakhas and shakha pramukhs voluntarily move to the Shinde camp, the transition will be smooth. After all, with the party name and symbol gone, many Shiv Sainiks are likely to calculate that their political future no longer lies with the Uddhav camp. But staunch Uddhav supporters will continue to pose a challenge for Shinde as highlighted by the skirmishes between the two camps in Dapoli, Ratnagiri, over control of a local shakha. That the Shinde camp is now indicating that it won’t try to take over Shiv Sena Bhavan shows Uddhav continues to hold some good cards. Plus, there is also the matter of control over Sena’s worker groups and unions that form a critical pillar of the party’s political clout and financial muscle. A bitter feud over these could even lead to serious law and order situations in Maharashtra.
Put together, there are two key takeaways here. First, even if the Sena organisation splits vertically among the two factions, the party is unlikely to regain its former clout in Maharashtra politics. Both factions are slated to play second fiddle to NCP or BJP in the foreseeable future. Second, EC’s ruling rued the lack of inner-party democracy in setting aside the amended 2018 Shiv Sena constitution as being undemocratic. But lack of inner-party democracy is a problem with several parties in the country. Therefore, the Shiv Sena factional war could throw up many more such episodes across the political spectrum. Thus, how Sena vs Sena plays out may have political implications beyond Maharashtra.
Date:20-02-23
Aldermen altercationBy barring Lieutenant-Governor’s nominees from voting, the Supreme Court of India has scuttled mischief in DelhiEditorial
The Supreme Court of India has rightly shot down the brazen and legally untenable claim that nominated members of the Municipal Corporation of Delhi (MCD) may be allowed to vote in the election of its Mayor. The Bharatiya Janata Party (BJP) sought to bend the rules to allow the 10 aldermen, nominated by the Lieutenant-Governor, to vote in the election, despite the law limiting the process to elected Councillors. That a question concerning a mayoral election should engage national attention is due to the political acrimony between the ruling BJP at the Centre and the Aam Aadmi Party (AAP), which runs the elected regime in the National Capital Territory of Delhi. The BJP sought to interpret the relevant provisions in the Constitution and the Delhi Municipal Corporation Act in such a way that the specific bar on nominated members voting in “meetings” of the corporation should not be applied to its first meeting, at which the Mayor and Deputy Mayor are elected. It takes a particularly perverse political imagination to argue that “meetings” do not include the “first meeting”. Three attempts to hold the mayoral election, following the MCD polls that took place in December 2022, were stalled by clashes between AAP and BJP councillors over this question. The verdict vindicates the position of AAP, which has 134 councillors in the 250-member Council, against the BJP’s 104.
It is unfortunate that before the Court, the Lt. Governor also took the questionable political stand that the restriction on the right to vote in Article 243R(2) of the Constitution and the proviso to Section 3(3)(b)(i) of the Act was limited to regular meetings, and not to the first meeting of the Council. The Court rejected the argument, noting that the law provides for the nomination of 10 people “with special knowledge and experience in municipal administration”, but without any voting right. In keeping with the Court’s order, Lt. Governor V.K. Saxena has now approved February 22 as the date for the election of the Mayor, Deputy Mayor and six members of the Standing Committee. Last year, Parliament passed a law to merge the three corporations in Delhi into a single entity, a decision criticised for reversing the trend of having compact local bodies for better delivery of civic services. Delhi’s lack of statehood is a source of conflict between the Centre and the elected regime in the capital territory, but the political protagonists should not allow Delhi’s administrative structures to be plagued by the tussle. The core message from a Constitution Bench judgment of 2018, that elected bodies should not be undermined by unelected administrators, is yet to hit home.
Date:20-02-23
विस्तारवाद के विरुद्धसंपादकीय
पिछले कुछ समय से यह साफ देखा जा सकता है कि भारत आतंकवाद और विस्तारवाद की भूख के खिलाफ जो सवाल उठाता रहा है, उसे अनेक देशों में न सिर्फ विचार के लिए जरूरी समझा जाने लगा है, बल्कि अब उन पर स्पष्ट रुख भी जाहिर किया जा रहा है। हालांकि इस तरह के मुद्दों पर वैश्विक स्तर पर लंबे समय तक उदासीनता छाई रही, जिसका खमियाजा यह हुआ कि आतंकवादी संगठनों का हौसला बढ़ा और नाहक दूसरे देशों की सीमाओं में दखल देने वाले चीन जैसे देश को अपना रास्ता निर्बाध लगा। लेकिन अब दुनिया में भारत के बढ़ते कद के साथ यह तस्वीर बदलने लगी है। गौरतलब है कि अमेरिकी सीनेट में एक द्विदलीय प्रस्ताव पेश किया गया है, जिसमें भारत की वास्तविक नियंत्रण रेखा पर यथास्थिति को बदलने की चीन की आक्रामकता का विरोध किया गया है। साथ ही अरुणाचल प्रदेश पर चीन के हर दावे को खारिज करते हुए इसे भारत के अभिन्न अंग के रूप में मान्यता देने की स्पष्ट वकालत की गई है।
इस प्रस्ताव को अमेरिका में भारत के पक्ष को लेकर बन रही राय और स्पष्टता के तौर पर देखा जा सकता है, मगर यह भी सच है कि विश्व के प्रभावशाली देशों में अब हो रही ऐसी पहलकदमी के लिए भारत को लंबे समय तक दुनिया को आईना दिखाना पड़ा है। यह किसी से छिपा नहीं है कि पाकिस्तान स्थित ठिकानों से अपनी गतिविधियां संचालित करने वाले आतंकी संगठनों को लेकर भारत ने तथ्यों के साथ संयुक्त राष्ट्र सहित तमाम अंतरराष्ट्रीय मंचों पर अपनी बात रखी। लेकिन तकनीकी जटिलताओं का हवाला देकर इस मामले में ज्यादातर देश कोई स्पष्ट रुख अख्तियार करने से बचते रहे। लेकिन एक महीने पहले संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की एक समिति ने पाकिस्तान स्थित आतंकवादी और लश्कर-ए-तैयबा में अनेक भूमिकाएं निभाने वाले अब्दुल रहमान मक्की को वैश्विक आतंकवादी घोषित कर दिया। इसकी मांग भारत काफी अरसे से कर रहा था। अब चीन को लेकर अमेरिकी सीनेट में जो पहलकदमी हुई है, उसकी अहमियत को भी इस दृष्टिकोण से देखा जा सकता है कि एक ओर जहां भारत को कूटनीतिक मोर्चे पर दुनिया को अपने पक्ष को सही साबित करने में कामयाबी मिल रही है, वहीं खुद कुछ देशों को यह हकीकत समझ में आने लगी है कि चीन और पाकिस्तान की ओर से प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से किस तरह नाहक दखलअंदाजी की जाती रही है।
दरअसल, चीन के मसले पर अमेरिकी सीनेट में इस प्रस्ताव की खास अहमियत इसलिए भी है कि इसे वहां के दोनों विरोधी दलों यानी डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन पार्टी के दो नेताओं की ओर से संयुक्त रूप से पेश किया गया है। यह वहां भारत को लेकर बन रही व्यापक सहमति का सूचक है। यह छिपा तथ्य नहीं है कि वास्तविक नियंत्रण रेखा पर यथास्थिति में छेड़छाड़ की मंशा से चीन आए दिन अपने सैन्य बलों के इस्तेमाल से लेकर विवादित क्षेत्रों में गांवों के निर्माण सहित उकसावे वाली कई तरह की कार्रवाइयां करता रहता है। यही नहीं, अक्सर चीन अरुणाचल प्रदेश को अपना क्षेत्र होने के दावे करता रहता है, जिससे उसकी आक्रामक और विस्तारवादी नीतियों की भूख का ही पता चलता है। अमेरिका में पेश प्रस्ताव में चीन की ऐसी हरकतों की साफ शब्दों में निंदा की गई है। यों भारत अपनी सीमाओं की रक्षा अपने स्तर पर करने में सक्षम है और हर मौके पर यह साबित भी हुआ है, लेकिन अब अगर अन्य बड़ी शक्तियों की ओर से भी चीन और पाकिस्तान को लेकर भारत के रुख को समर्थन मिल रहा है तो इसे वैश्विक स्तर पर सच का सामना की तरह देखा जा सकता है।
Date:20-02-23
संयम, नियम और नौकरशाहीअशोक कुमार
लोक कल्याणकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में लोक प्रशासन की गहन भूमिका स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से निरूपित की गई है। इस निमित्त राष्ट्रीय स्तर पर अखिल भारतीय सेवाओं के साथ-साथ राजस्व, तकनीकी और अभियंत्रण सेवाओं का गठन कर संघ लोक सेवा आयोग को महती जिम्मेदारी दी गई कि वह योग्य अधिकारियों का चयन करे। इसी प्रकार देश के हर राज्य में भी लोक सेवा आयोग का गठन करके उन्हें विभिन्न श्रेणी के राजपत्रित अधिकारियों के चयन के लिए प्राधिकृत किया गया। हर राज्य के जिले में इसके कप्तान के रूप में जिला कलेक्टर हैं, जिनके मातहत सभी विभागों के प्रशासनिक और गैर-प्रशासनिक सेवाओं के पदाधिकारियों की एक वृहद शृंखला निर्धारित है। प्रांत के मुख्यालय में सरकार के सबसे उच्च स्तरीय संगठन सचिवालय को राज्य के सर्वांगीण विकास और जन कल्याण सहित विधि व्यवस्था के कार्यों के लिए योजना निर्माण और इसके कुशल कार्यान्वयन की समीक्षा-सह-अनुश्रवण की जिम्मेदारी दी गई है, जहां अपने क्षेत्रीय कर्तव्यों के वृहद अनुभव से लैस भारतीय प्रशासनिक सेवा के वरिष्ठ अधिकारी पदसोपानीय क्रम में विभागाध्यक्ष घोषित हैं। ये अधिकारी अपनी टीम के साथ राज्य सरकार के द्वारा संचालित परियोजनाओं के लिए जिम्मेवार माने जाते हैं। किसी भी सरकार के कार्यों एवं दायित्वों के परिचालन के लिए निर्धारित की गई संरचनाओं और नियमों को समग्र रूप से हम नौकरशाही के नाम से भी जानते हैं। नौकरशाही की प्रमुख विशेषताओं में कर्मचारियों और अधिकारियों के बीच अच्छी प्रकार से परिभाषित प्रशासनिक कार्यों का विभाजन, कर्मियों की भर्ती और उनके करिअर की सुव्यवस्थित और तर्कसंगत तंत्र सह अधिकारियों में पदानुक्रम, शक्ति, अधिकार, कर्त्तव्य आदि का समुचित वितरण किया गया है।
नौकरशाही कार्मिकों का वह समूह है, जिसपर प्रशासन का केंद्र आधारित है। प्रत्येक देश का शासन और प्रशासन इसी के इर्दगिर्द घूमता है। इसे जहां अपने अधिक सकारात्मक कार्यों में कुशलतापूर्वक दायित्व निर्वहन में निपुण माना जाता है, वहीं इसके कुछ हिस्से नकारात्मक अर्थों में लालफीताशाही, भ्रष्टाचार, पक्षपात, अहंकार और आभिजात्य मन:स्थिति के लिए भी मशहूर हैं। इसका नैतिक असर प्रशासनिक क्षितिज के साथ-साथ जनमानस में भी एक असंतोष की लंबी रेखा खींच देता है, जिससे सकारात्मक कार्य करने वाले नौकरशाह के मानस पटल को भी निराशा की तरंग से अप्रत्यक्ष तौर पर भर देने में कमी नहीं करता।
लोक प्रशासन की स्थापना के पूर्व कालखंड में समाज में मानव प्रशासन की एक गुणात्मक विधा व्याप्त थी, जहां कोई उपाधि या डिग्री के बगैर जीवन कार्यों के संचालन के समस्त उपबंध मौजूद थे। परंपरागत मूल्यों के संवाहक और पालक हमारे पूर्वज हुआ करते थे, जिनके कुशल सह कठोर अनुशासन व्यवस्था से समाज में शांति, सद्भाव और समन्वय की शीतल त्रिवेणी प्रवाहित हुआ करती थी। आज हमारे कदम एक ओर चांद और मंगल ग्रहों की यात्रा कर चुकी है तो विज्ञान की प्रगति ने अनेक द्वार भी खोल दिए हैं।
बीते कुछ समय में अनेक राज्यों से ऐसी घटनाएं प्रकाश में आई हैं जो मानवीय चेतना को झकझोर कर रख देती हैं। बिहार राज्य के शीर्ष प्रशासनिक हल्के से दो ऐसे वाकए सुनने को मिले, जिससे बौद्धिक वर्ग हैरान तो हुआ ही, साथ ही पूरे प्रदेश में इसे असहज दृष्टि से देखा गया। राज्य मुख्यालय के अखिल भारतीय स्तर के दो पदाधिकारियों ने अपने अधीनस्थ अधिकारियों के साथ उन्हें अपमानित करने की कोशिश की। एक अधिकारी ने तो अपशब्दों तक का इस्तेमाल किया। इन दो घटनाओं ने पूरे प्रशासनिक, सामाजिक और राजनीतिक महकमे को आंदोलित कर दिया। एक मामला पटना उच्च न्यायालय तक पहुंच गया।
बुनियादी सवाल यह है कि प्रशासन के शीर्ष अधिकारियों से उनके अधीनस्थ अधिकारी और कर्मचारी शालीनता और सद्भाव की अपेक्षा करते हैं और जब उन्हें विपरीत आचरण झेलना पड़ेगा तो आखिर उस दायित्व पुंज का भविष्य क्या होगा, जिसमें दोनों को मिलजुल कर लक्ष्य को पाना है। सामाजिक ताने-बाने के सूत्र कहते हैं कि शब्द ब्रह्म स्वरूप हैं। किसी चूक से घायल जिह्वा के घाव भर तो जाया करते हैं, लेकिन उसी जिह्वा से निकले अपशब्द से घायल व्यक्ति के घाव कभी नहीं भरते। शब्दों की शक्ति अगाध और असीम है जो समाज में शांति भी स्थापित करती है और अशांति का दौर भी लाती हैं। हर सरकारी कर्मचारी और अधिकारी के लिए सेवा आचरण अनुशासनिक नियमावली बनी हुई है, जिसकी परिधि से वे सभी बंधे हुए हैं। किसी भी कर्मचारी या अधिकारी जो अपने कर्तव्य पालन में शिथिल या अकर्मण्य है, उसके विरुद्ध सेवा संहिता के विभिन्न धाराओं के अनुसार चरणबद्ध ढंग से कई कारवाई वर्णित हैं। इस प्रकरण में उनके विरुद्ध लघु और वृहद दंड का प्रावधान भी निरूपित है। प्रत्येक शीर्ष अधिकारी का यह कर्तव्य है कि वह टीम के नेतृत्वकर्ता की हैसियत से अपने अधीनस्थों से कुशल और सौम्यता के साथ पेश आए। जब कोई अधिकारी या कर्मचारी सरकारी नियमों के विरुद्ध आचरण अपनाता है तो उससे स्पष्टीकरण पूछते हुए विभागीय कारवाई की जा सकती है। उक्त कारवाई में उसकी प्रोन्नति बाधित करना, वार्षिक वेतनवृद्धि रोकना और सेवा से मुक्त करने जैसे कठोर नियम बने हुए हैं। प्रशासन पदसोपान के नियंत्रण पदाधिकारियों को जब अपने अधिकार क्षेत्र में इतनी बड़ी शक्ति प्राप्त है तो उन्हें अपशब्दों के प्रयोग से बचना चाहिए।
1980 के दशक में शीर्ष अधिकारियों में से इक्का-दुक्का ही शालीनता की सीमा पार करते थे, लेकिन तुरंत वे इसके लिए अधीनस्थ से खेद प्रकट कर मामले को आगे बढ़ने से रोक लेते थे। एक संदर्भ यह है कि 1977 में जब कर्पूरी ठाकुर पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने थे तो उन्होंने अपनी मंत्रिमंडल की प्रथम बैठक में उपस्थित अपने सभी मंत्रियों से संबंधित विभाग के प्रधान अधिकारियों के साथ अत्यंत शालीनता से व्यवहार करने का निर्देश दिया था। उनका यह निर्देश राज्य प्रशासन के गलियारे में सात्विक और प्रशंसनीय चर्चा का विषय बना था। कालांतर में यह संदेश प्रशासनिक क्षेत्रों में कारगर हुआ भी, लेकिन बाद के दौर में कुछ बड़े अधिकारियों ने अपने रोब से प्रशासनिक परिस्थिति में प्रतिकूलता का प्रवेश करा दिया। राम मनोहर लोहिया ने कहा था कि लोकतंत्र में उच्च ओहदे पर बैठे अधिकारियों को संयत भाषा का इस्तेमाल करते हुए अशिष्टता से बचना चाहिए, क्योंकि वे जहां हैं, जनमानस बड़ी बारीकी से उनकी प्रशासनिक गतिविधियों पर अपनी पैनी नजर रखे हुए है। लोहिया ने चिंतित मन से यह भी कहा था कि कुछ उच्च स्तरीय नौकरशाही अपना काम जिम्मेदारी और ईमानदारी के साथ नहीं करके हजारों लोगों का रोजाना मनोबल तोड़ती है।
यों बिहार ही नहीं, बल्कि देश के करीब सभी राज्यों में कुछ नौकरशाहों की ऐसी मानसिकता से साफ पता चलता है कि उनके रवैए में सुधार की जरूरत है। ऐसी श्रेणी के अधिकारी को अपनी पूरी सेवा में विवादों में घिरा रहना, एक जगह ठीक से नहीं टिकना सरकार के लिए सिरदर्द तो है ही, साथ ही उनका आचरण प्रशासनिक परिधि में चिंताजनक हालात उत्पन्न कर रहा है। जरूरत इस बात की है कि असंयमित भाषा से ग्रस्त शीर्ष अधिकारियों के विरुद्ध सेवासम्मत कार्रवाई हो। केंद्रीय कार्मिक एवं प्रशिक्षण मंत्रालय को भी अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों के प्रशिक्षण प्रकल्पों पर भी संशोधन करने पर विचार करना चाहिए, अन्यथा प्रशासनिक अराजकता के आगोश में एक दिन पूरे तंत्र के आ जाने का खतरा बना रहेगा।
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कुछ बिंदु-
लड़कियों के वयस्क होने पर भी छूट दी जानी चाहिए। इससे महिलाओं को भी लाभ मिल सकता है। कर में छूट के लाभ के प्रोत्साहन से लड़कियों के नाम पर निवेश की प्रवृत्ति बढ़ सकती है।
यूं तो सरकार ने बेटियों के सशक्तीकरण के लिए बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओं, कामकाजी महिला हॉस्टल, महिला ई-हाट, स्वाधार गृह, महिला प्रशिक्षण एवं रोजगार कार्यक्रम, महिला शक्ति केंद्र, उज्जवला योजना जैसे प्रयास किए हैं। ये सभी महिलाओं के उत्थान और सशक्तिकरण में योगदान दे रहे हैं। कर में छूट जैसे कदम इस प्रयास को और अधिक मजबूती प्रदान कर सकते हैं। अतः इस पर विचार किया जाना चाहिए।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 21 जनवरी, 2023
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Date:18-02-23
EC Needs A Smart FocusCooling-off periods are impractical in social media ageTOI Editorials
The Election Commission has issued notices to representatives of BJP, Congress and CPM for their tweets on February 16, polling day in Tripura assembly elections, and also the day before. EC’s notice to the political parties says that the tweets violate parts of Section 126 of the Representation of the People Act, 1951, the overarching law governing conduct of elections. It prohibits electioneering 48 hours ahead of polling. The aim’s to allow voters to decide without being “prejudiced” by last-minute appeals.
Notably, Australia has a similar provision called the blackout period. Both these periods are impossible to enforce in the age of social media and rapidly evolving communications technology. EC reacted to this development early and formed a committee to look into it. The committee’s suggestions made four years ago were largely in the nature of exhortations. But as EC’s most recent notices show, the appeals for fair play don’t work in a competitive political arena. So it’s time Parliament took the practical step of getting rid of the cooling-off period.
Australia too is having a problem with the blackout period as different media platforms feel it’s unfair. In India, retaining the cooling-off period may end up undermining EC’s credibility. This hard-won credibility rests on its track record of conducting complex multiphase elections in the world’s largest democracy. Ensuring it retains focus on its core responsibility is the best way to help EC. Saddling it with impossible tasks such as choking every form of political campaigning at the tail end, especially in multi-phase elections, makes no sense. Parliament needs to trust the maturity of voters.
Date:18-02-23
Waste to Wealth, Not Wealth to WasteET Editorials
Environment minister Bhupendra Yadav’s call to industry to consider recycling to deal with the nearly 11,000 billion tonnes of waste accumulated in the country is an important intervention as India seeks to green its economy and achieve net-zero emissions by 2070. It is, however, only part of the solution. India’s material resource consumption grew from 1. 8 billion tonnes in 1970 to 7 billion tonnes in 2015. It is projected to rise to about 14 billion tonnes in 2030. Economy-wide resource efficiency that uses less to create more, generates less waste, and reuses and recycles more will have financial, environmental and other benefits like creating new jobs and improved health outcomes. In this context, GoI must finalise the National Resource Efficiency Policy (NREP); a draft has been ready since 2019 and has been put out for public consultations.
At present, there are sectoral interventions like that by the ministry of electronics and information technology (MeitY). Though important, the lack of an overarching policy makes cross-sectoral collaborations and systemic efficiencies difficult, minimising benefits that can accrue from an economy-wide approach. A national policy that allows for sectoral peculiarities will help ensure primary resource consumption is at sustainable levels, create higher value with less material through circular approaches and minimise waste. Given geopolitical realities and supply chain disruptions, it is critical for material-resource security and improving economic resilience. The policy will also help focus on businesses that will help the economy grow while protecting the environment.
Converting waste to wealth is important. But even more so is to prevent the conversion of wealth and resources into waste.
Date:18-02-23
Executive fiatParliament should remain a forum for free debate and discussionEditorial
Congress leader Rahul Gandhi has stood by his statements made during his speech in the Lok Sabha on February 7, in his response to a charge of breach of privilege of the House that was raised by a Bharatiya Janata Party member and a Union Minister. It is strange that a Member of Parliament, whose duty it is to hold the executive accountable to Parliament, is being accused of breach of privilege of the House for seeking answers on crucial issues. Portions of Mr. Gandhi’s speech, made during a discussion on the ‘Motion of Thanks on the President’s Address’, that referred to Prime Minister Narendra Modi’s ties with industrialist Gautam Adani were expunged from the record of the House. When a member’s own rights are being curtailed in the name of parliamentary privilege, the very concept is being reduced to an instrument of executive fiat. Mr. Gandhi raised pertinent questions regarding the political patronage received by the Adani Group, which is in the eye of a storm after a short seller based in the United States brought to light dubious patterns in the group’s transactions and ownership. The government has not provided any answers. And, on top of it, the sword of privilege is being wielded against the Opposition leader. The expectations from the Speaker of the Lok Sabha and the Chairman of the Rajya Sabha are to protect the majesty of Parliament, particularly in its interactions with other branches of the state, rather than disciplining the members.
The parliamentary discussions on the Adani controversy, which were vitiated by the unreasonable restrictions on Opposition leaders, follow a devious trend of executive imperium over the legislative branch in some States too. Chief Ministers of many States command supreme powers — they control their parties, dominate over the Opposition, and take Assemblies for granted. Assembly sittings have become fewer and debates shallow. The argument that popular leaders now make is that they are answerable to the people directly — Mr. Modi also invoked the ‘blessing of 140 crore people,’ while speaking in Parliament on February 8, but the range of questions arising out of the Hindenburg report on the Adani Group remained unanswered. People seek accountability from the elected government through their elected representatives, and the legislature is mandated to mediate that interaction. Mr. Gandhi asked questions as he should. Asking him to adhere to parliamentary norms in doing so is par for the course. But more critically, the government should be required to respond to the allegations. It is a sign of erosion of parliamentary authority that it is not happening.
Date:18-02-23
12 करोड़ नौकरी देने वाला एमएसएमई निराश क्यों?संपादकीय
देश में 12 करोड़ लोगों को नौकरी और जीडीपी में 30% योगदान देने के बाद भी 6.5 करोड़ इकाइयों वाला एमएसएमई सेक्टर बुरी हालत में है। यह निष्कर्ष कंसोर्टियम ऑफ एसोसिएशन्स (सीआईए) ने बजट के बाद के पहले हफ्ते में किए एक मेगा सर्वे में पाया। इस सेक्टर के 72% उत्तरदाताओं ने कहा कि पिछले पांच वर्षों में उनकी स्थिति में या तो कोई बदलाव नहीं हुआ या वे छोटे हो गए हैं या फिर बंद हो गए हैं, जबकि 76% कोई लाभ नहीं कमा रहे हैं और उनके लिए बैंकों से लोन लेना सबसे बड़ी समस्या है। 87% ने बजट पर निराशा व्यक्त की है। जहां एक ओर वर्ल्ड बैंक की ‘ईज ऑफ डुइंग ‘बिजनेस’ रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत 2014 में 146वीं रैंक से सन् 2020 में 63वीं रैंक पर पहुंच गया है, जिसका जिक्र सरकार ने अपनी तारीफ में ताजा इकोनोमिक सर्वे में भी किया है, वहीं कंसोर्टियम की यह रिपोर्ट सरकार को जगाने वाली है। बेरोजगारी की बढ़ती समस्या का सार्थक हल भी एकमात्र इसी सेक्टर के कल्याण में है। करीब आधी इकाइयां मानती हैं कि आज भी व्यापार करना आसान नहीं है। रिपोर्ट में सरकार से मांग की गई है कि इस सेक्टर के लिए अलग स्वतंत्र मंत्रालय बने, जीएसटी एक्ट के प्रावधानों को इस सेक्टर के लिए आसान किया जाए और जटिल और पुराने कानूनों को खत्म किया जाए।
Date:18-02-23
सुप्रीम कोर्ट की समितिसंपादकीय
इस पर आश्चर्य नहीं कि सुप्रीम कोर्ट अदाणी मामले पर विशेषज्ञ समिति का गठन करने जा रहा है, जो अमेरिकी रिसर्च फर्म हिंडनबर्ग की रिपोर्ट और उसके प्रभाव की जांच करेगी। निःसंदेह इसकी तह तक जाने की आवश्यकता है कि हिंडनबर्ग की रिपोर्ट में कितनी सत्यता है, क्योंकि उसने भारतीय शेयर बाजार पर गहरा प्रभाव डाला है। इस रिपोर्ट के चलते जहां अदाणी समूह को हानि उठानी पड़ी, वहीं शेयर धारकों को भी। सुप्रीम कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि वह अपने अनुसार विशेषज्ञ समिति का गठन करेगा। आखिर जब सरकार स्वयं विशेषज्ञ समिति गठित करने के सुझाव से सहमत थी, तब फिर उसका सहयोग लेने से मना क्यों किया गया? सुप्रीम कोर्ट ने जिस तरह विशेषज्ञ समिति गठित करने में सरकार का सहयोग लेने से इनकार किया, इससे उसने उस पर अविश्वास ही प्रकट किया। इसके साथ-साथ उसने सरकारी एजेंसियों पर भी अविश्वास प्रकट किया। उसके रवैये से ऐसा कुछ ध्वनित होना स्वाभाविक है कि वह पारदर्शिता के नाम पर समानांतर व्यवस्था बनाना चाहता है। सुप्रीम कोर्ट का मंतव्य कुछ भी हो, लेकिन सरकार और उसकी एजेंसियों पर अविश्वास प्रकट करना ठीक नहीं। पता नहीं, सुप्रीम कोर्ट की ओर से गठित होने वाली विशेषज्ञ समिति में कौन सदस्य होंगे, लेकिन प्रभावी जांच के लिए उसमें नियामक एजेंसियों के लोग होने ही चाहिए।
अदाणी मामले में सुप्रीम कोर्ट की ओर से गठित की जाने वाली समिति से केवल यही अपेक्षित नहीं है कि वह हिंडनबर्ग की रिपोर्ट और उसके प्रभाव का आकलन करे, बल्कि यह भी अपेक्षित है कि वह ऐसे उपाय सुझाए, जिससे शेयर बाजार पर निवेशकों का भरोसा बढ़े और भविष्य में हिंडनबर्ग जैसी कोई रिपोर्ट किसी भारतीय कंपनी और हमारे शेयर बाजार पर नकारात्मक प्रभाव न डाल सके। इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि यह आशंका बढ़ गई है कि भविष्य में हिंडनबर्ग सरीखी संस्थाओं की ओर से अपने निहित स्वार्थों को पूरा करने के लिए भारतीय कंपनियों को निशाना बनाया जा सकता है। यह आशंका इसलिए और बढ़ गई है, क्योंकि हाल में अमेरिका के अरबपति निवेशक जार्ज सोरोस ने नए सिरे से मोदी सरकार पर निशाना साधा है। वह प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पुराने आलोचक हैं। इसमें हर्ज नहीं, लेकिन यह चिंता की बात है कि वह भारत में हस्तक्षेप करने के इरादे से लैस नजर आ रहे हैं। कई देशों में अनुचित हस्तक्षेप करने और वहां की सत्ताओं को अस्थिर करने के आरोपों का सामना कर रहे जार्ज सोरोस के इरादे ठीक नहीं, इसका पता इससे चलता है कि उनके हालिया बयान की निंदा कांग्रेस को भी करनी पड़ी। अब जब सुप्रीम कोर्ट अदाणी मामले में जांच के लिए विशेषज्ञ समिति गठित करने जा रही है, तब उचित यह होगा कि कांग्रेस संयुक्त संसदीय समिति गठित करने की अपनी मांग का परित्याग करे।
Date:18-02-23
विकास का आधार बनती अक्षय ऊर्जाडा. सुरजीत सिंह, (लेखक अर्थशास्त्र के प्रोफेसर हैं)
अक्षय ऊर्जा के कुशल उपयोग को बढ़ाने के लिए केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने आम बजट में हरित ईंधन, हरित ऊर्जा, हरित खेती, हरित गतिशीलता, हरित भवन और हरित उपस्कर से संबंधित अनेक कार्यक्रमों की घोषणा की है। बजट की सात प्रमुख प्राथमिकताओं में अक्षय ऊर्जा को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया है, जो पर्यावरण के प्रति सरकार की संवेदनशीलता को दिखाता है। हम जानते हैं कि जनसंख्या बढ़ने के साथ-साथ ऊर्जा की मांग भी बढ़ती जा रही है। एक अनुमान के अनुसार 2040 तक देश की बिजली खपत 1,280 टेरावाट प्रति घंटा हो जाएगी। दूसरी ओर पर्यावरण प्रदूषण और पारिस्थितिकी विनाश की गंभीर होती स्थिति एक चुनौती के रूप में हमारे सामने है। सीमित जीवाश्म-ईंधन आधारित ऊर्जा स्रोत हमारी भविष्य की इस मांग को पूरा करने में सक्षम नहीं हैं, इसलिए अक्षय ऊर्जा को भविष्य के विकास के आधार के रूप में सरकार निरंतर प्रोत्साहन दे रही है। सरकार का 2030 तक ऊर्जा की कुल मांग का 40 प्रतिशत उत्पादन अक्षय स्रोतों से करने का लक्ष्य है। 2030 तक 500 गीगावाट अक्षय ऊर्जा की क्षमता बढ़ाने के साथ-साथ एक अरब टन कार्बन डाईआक्साइड को कम करने का लक्ष्य भी रखा गया है। ज्ञातव्य है कि ग्लासगो शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 2070 तक शुद्ध-शून्य कार्बन उत्सर्जन करने की बात कही थी।
आज अक्षय ऊर्जा के क्षेत्र में भारत विश्व में चौथे स्थान पर है, जिसमें 36 प्रतिशत से अधिक सोलर, 31 प्रतिशत जलविद्युत एवं 25 प्रतिशत पवन ऊर्जा का योगदान है। इसके बावजूद यह क्षमता मात्र 166.4 गीगावाट है। अक्षय ऊर्जा क्षेत्र की असीमित उत्पादन की क्षमताओं एवं बड़े बाजार की संभावनाओं के कारण वित्त मंत्री ने बजट में हरित विकास के माडल को प्रमुखता से स्थान देते हुए भविष्य की रूपरेखा प्रस्तुत की है। इस बजट के माध्यम से सरकार ने नागरिकों के लिए सस्ती, सुरक्षित और टिकाऊ ऊर्जा उपलब्ध कराने के लिए एक विजन प्रस्तुत किया है, जिससे हरित ऊर्जा लोगों के जीवन का एक हिस्सा बन सके। वित्त मंत्री ने अक्षय ऊर्जा के संबंध में पंजीकरण और व्यापार की प्रक्रिया को सरल बनाया है, जिसके परिणामस्वरूप अक्षय ऊर्जा के अंतर्गत बिजली के उत्पादन और खपत के तरीके में क्रांतिकारी बदलाव आएगा। सोलर पैनल द्वारा अपनी खुद की बिजली का उत्पादन और उपभोग को बहुत बढ़ावा मिलेगा। अक्षय ऊर्जा आधारित मिनी-ग्रिड लाखों छोटे व्यवसायों और सामाजिक उद्यमियों को स्थानीय रोजगार सृजित करने तथा स्थानीय अर्थव्यवस्थाओं का निर्माण करने के लिए प्रोत्साहन देंगे। इस ऊर्जा का उपयोग करके स्थानीय सरकारें ग्रामीण समुदायों और क्षेत्रों की मदद कर लोगों के जीवन स्तर में गुणात्मक सुधार भी ला पाएंगी। महिला सशक्तीकरण, बेहतर स्वास्थ्य और शिक्षा की स्थिति में सुधार आने से गरीबी और बेरोजगारी जैसी चुनौतियों का हल भी निकाला जा सकेगा।
लद्दाख में 13 हजार मेगावाट क्षमता की परियोजना की स्वीकृति से स्पष्ट है कि सरकार अक्षय ऊर्जा उत्पादन क्षमता को बढ़ाने के लिए गंभीर है। वहीं दूसरी ओर अक्षय ऊर्जा के संदर्भ में संचालित कार्यक्रमों पर बल देने के लिए नीतिगत उपाय भी किए गए हैं। देश में ही हरित हाइड्रोजन के उत्पादन और उपयोग को बढ़ावा देने के लिए राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन पर फोकस किया गया है, जिसके लिए 19,744 करोड़ रुपये के परिव्यय को बजट में स्वीकृत किया है। इसी तरह इलेक्ट्रिक एवं हाइड्रोजन वाहन देश में एक नए युग की शुरुआत करेंगे। इलेक्ट्रानिक वाहनों को बढ़ावा देने के लिए वित्त मंत्री द्वारा एक विस्तृत रूपरेखा प्रस्तुत की गई है। इसके अतिरिक्त सौर सेल, लिथियम बैटरी, इलेक्ट्रिक वाहनों और चार्जिंग बुनियादी ढांचे के लिए विशाल विनिर्माण संयंत्र स्थापित करने को प्रोत्साहन देने के लिए आवश्यक पूंजीगत वस्तुओं और मशीनरी के आयात पर सीमा शुल्क में छूट दी गई है। अक्षय ऊर्जा में प्रयुक्त उपकरणों की कीमत कम होने से इसके बाजार को भी विस्तार मिलेगा। इसमें प्रयुक्त उपकरणों की लागत को और कम करने के लिए बजट में अनुसंधान एवं प्रौद्योगिकी पर विशेष फोकस किया गया है। उल्लेखनीय है कि अक्षय ऊर्जा के बाजार को 2030 तक लगभग पांच अरब डालर और 2050 तक 31 अरब डालर करने का लक्ष्य रखा गया है।
बजट में ग्रामीण क्षेत्रों में हरित विकास को बढ़ावा देते हुए अगले तीन वर्षों में एक करोड़ किसानों को प्राकृतिक खेती से जोड़ने के लिए 10,000 जैव-इनपुट संसाधन केंद्र स्थापित करना, वैकल्पिक उर्वरकों और रासायनिक उर्वरकों के संतुलित उपयोग को बढ़ावा देने के लिए पीएम प्रणाम कार्यक्रम, चक्रीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए गोबर धन योजना, वनीकरण को बढ़ावा देने के लिए मिश्टी एवं अमृत धरोहर कार्यक्रम पर विशेष फोकस किया गया है। इससे जैव-विविधता, पर्यटन के अवसरों और आय सृजन को प्रोत्साहन मिलेगा। प्रदूषण पर नियंत्रण के लिए 15 साल पुराने सभी सरकारी वाहनों की अनिवार्य रूप से स्क्रैपिंग के लिए राज्यों को आर्थिक मदद दी जाएगी। इंस्टीट्यूट आफ एनर्जी इकोनमिक्स एंड फाइनेंशियल एनालिसिस के अनुसार भारत के अक्षय ऊर्जा क्षेत्र के लक्ष्यों को पूरा करने के लिए 500 से 700 अरब डालर के नए निवेश की आवश्यकता होगी। उम्मीद है कि बजट में किए गए नीतिगत बदलावों से सार्वजनिक-निजी क्षेत्र की सहभागिता एवं विदेशी निवेश के बढ़ने से आधारिक संरचना मजबूत होगी। कुल मिलाकर पर्यावरण के साथ जीवनशैली के दृष्टिकोण पर बल देने वाला बजट यह स्पष्ट संदेश देता है कि आने वाले समय में भारत दुनिया की सबसे महत्वाकांक्षी अक्षय ऊर्जा परिवर्तनों का नेतृत्व करने के लिए तैयार है, जिसका मार्ग गांवों से होकर जाता है।
Date:18-02-23
चीन की सीमा तक रेललाइनसंपादकीय
पड़ोसी मुल्क चीन की करतूतों को देखते हुए भारत सरकार ने अब उससे निपटने का कुछ और तरीका खोजा है। अब सरकार ने रेलवे के जरिये पड़ोसी देशों नेपाल, बांग्लादेश, म्यांमार और भूटान के साथ परस्पर संपर्क मजबूत बनाने की परियोजनाओं को क्रियान्वित करने का फैसला किया है। इनमें सिक्किम में तिब्बत की सीमा पर नाथू ला दर्रे तक रेलवे लाइन बिछाने की योजना भी है। दरअसल, चीन भारत से सटी सीमा पर कभी रोड तो कभी नदी पर पुल तो कभी रेल चलाने के उपक्रम करता रहता है। इस पूरी कवायद के पीछे उसका एकमात्र उद्देश्य भारत को तनाव में डालना, सीमा पर निर्माण कार्य के जरिये इलाके में घुसपैठ करना और जासूसी से जुड़ा पक्ष भी रहता है। चीन यह धत् कर्म आज से नहीं कर रहा है। जब से देश आजाद हुआ उसके बाद से उसकी कुटिलता चरम पर रही। 1962 का युद्ध हो या डोकलाम या फिर पैंगोंग इलाके में घुसपैठ करने की साजिश करनी हो, उसने हमेशा से पड़ोसी धर्म के उलट काम किया है। यही कारण है कि भारत ने अब यह तय किया है। कि चीन को उसी की शैली में जवाब दिया जाए। इस बार के बजट में रेलवे के जरिये पड़ोसी देशों तक अपनी पहुंच सुनिश्चित करने के प्रावधान किए गए हैं। इसमें नेपाल के साथ- साथ रेलवे लिंक, भूटान के साथ दो लिंक, म्यांमार के साथ कम-से-कम एक महत्त्वपूर्ण लिंक और बांग्लादेश के चटगांव बंदरगाह से साथ त्रिपुरा के बिलोनिया तक रेल लिंक के अलावा सिक्किम में रंगपो से गंगटोक तक 69 किलोमीटर लंबी तथा गंगटोक से नाथू ला तक 260 किलोमीटर तक रेल संपर्क के लिए शुरुआती सर्वेक्षण के लिए पर्याप्त धनराशि आवंटित की गई है। भारत इस मसले को लेकर किस कदर गंभीर है इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि बजट के तुरंत बाद विदेश सचिव विनय मोहन क्वात्रा ने काठमांडू की यात्रा की और सुरक्षा मामलों को लेकर बात की। नेपाल की इस पूरे मामले में अहम भूमिका इसलिए भी दिखती है क्योंकि चीन काठमांडू तक रेलवे ट्रैक बिछाने को आतुर है। उसे लगता है ऐसा करके वह भारत को जोखिम में डाल सकता है। यानी चीन काठमांडू तक पहुंच बनाकर भारत पर बढ़त बनाने की कोशिश में जुटा हुआ है, जिसकी काट के लिए भारत की पहल का स्वागत किया जाना चाहिए। चीन की विस्तारवादी नीति को भोथरा करने के लिए यह बिल्कुल जरूरी कदम है।
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18 February 2023
प्रश्न–398 – (अ) समुद्री दस्युरोधी अधिनियम, 2022 का भारत के लिए औचित्य को स्पष्ट करें। (100 शब्द)
(ब) वन्य जीव संरक्षण संशोधन अधिनियम 2022 की उपयोगिता प्रतिपादित कीजिये। (100 शब्द)
Question–398 – (a) Justify the Anti-Maritime Piracy Act, 2022 for India. (100 words)
(b) Propound the usefulness of the Wildlife Protection Amendment Act 2022. (100 words)
नोट : इसका उत्तर आपको हमें नहीं भेजना है, यह आपके स्वयं के अभ्यास के लिए है।
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Date:17-02-23
Scottish LessonPull of regional identities needs to be managed by better federalismTOI Editorials
Scottish First Minister Nicola Sturgeon stepping down from her post marks a pivotal moment in British politics. The development should subdue Scottish nationalism and the desire to separate from the British Union – at least for the time being. Recall that Sturgeon had become the leader of the Scottish Nationalist Party (SNP) in the wake of the 2014 independence referendum when Scotland narrowly voted 55-45% to remain part of the UK. That result had boosted Scottish nationalists. But the UK Supreme Court recently blocked her plans for a fresh referendum and the next SNP leader has to rethink the way forward.
The larger story is that despite significant devolution of powers to Scotland within the UK, large sections of the Scottish population still feel their aspirations haven’t been met and the Union remains very English. For example, during the Brexit referendum despite every council in Scotland voting to remain in EU, the region had no choice but to follow the rest of the Union in leaving the European bloc. At the same time, studies have shown that even if it were to join EU afterwards, independence would leave Scotland significantly poorer than staying in the UK.
This larger story is playing out in many countries where different ethnicities or regions or languages etc have different voices and the Centre has to simultaneously reach out to all parts of the Union to hold it together and keep it strong. An overwhelming hold over power by one section of the republic gives oxygen to regional grievances. Case in point in India is the language issue where states like Tamil Nadu protest the centralised promotion of Hindi. The key to addressing regional grievances is better federalism, not lesser.
Date:17-02-23
How to Mainland The PeripheryET Editorials
The Cabinet’s decision to allocate ₹48,000 crore for the Vibrant Villages Programme over the next three years will help improve the pace of development in areas near the border and have long been neglected. Its two pillars — infrastructure and economic opportunities — will create linkages between the so-called ‘periphery’ and the ‘mainland’. Engagement with local communities, ensuring their participation in all facets of the infrastructural as well as ‘nation-maintenance’ project will determine its success. This intervention is important from the strategic-security perspective and in ensuring an inclusive society.
The programme will be rolled out in villages beyond the 10 km border zone in 19 districts and 46 border blocks across four states and one Union territory. While there will be no overlaps with the Border Area Development Programme, the two programmes must be complementary. Neglect of these regions has pushed most of the local population out in search of jobs and opportunities. There should be focus on economic opportunities in the area, job creation and rooting out bad actors to reinvigorate the surrounding areas. Creating linkages through improved infra with the rest of the country will help improve access and exchanges. Earmarking half of the allocation for physical and social infrastructure is a step in the right direction. Working with local communities to help them actualise economic opportunities will improve engagement.
Implementation will require ensuring adequate trained as well as sensitised personnel who can create a long-term, sustainable pathway for the future. But, first, to be successful, the programme must be collaborative and participatory. Neglect must not be replaced with diktats.
Date:17-02-23
क्या आर्थिक मॉडल को बदलने की जरूरत है?संपादकीय
यूयूएन सामाजिक विकास शोध संस्थान की एक रिपोर्ट में कहा गया कि हाल के वैश्विक स्वास्थ्य संकट के कारण दुनिया के दस अमीरों की संपत्ति दूनी हो गई जबकि 12 करोड़ लोग अति-गरीबी वाले वर्ग की गर्त में समा गए। रिपोर्ट के अनुसार कोरोना काल में हर 30 घंटे में एक नया डॉलर अरबपति (7 हजार करोड़ रुपए) पैदा हो रहा था। भारत में भी कोरोना के दौरान एक उद्योगपति की संपत्ति हर घंटे 90 करोड़ रुपए बढ़ रही थी। ऑक्सफैम की विगत माह प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार भारत के एक प्रतिशत पूंजीपतियों के पास सन् 2021 में ( जब कोरोना का चरम था) देश की 40.5 प्रतिशत पूंजी थी। ‘सर्वाइवल ऑफ द रिचेस्ट’ (डार्विन ने फिटेस्ट शब्द का प्रयोग किया था) शीर्षक की रिपोर्ट में बताया गया कि भारत में सन् 2012 से 2021 तक जो पूंजी निर्मित हुई उसमें 40 प्रतिशत से ज्यादा केवल एक प्रतिशत लोगों के पास गई, जबकि केवल तीन फीसदी ही नीचे के 50 प्रतिशत के पास पहुंची। इसके ठीक उलट जीएसटी की आय का 64 प्रतिशत नीचे के इसी 50 प्रतिशत वाले लोग कर के रूप में देते हैं, जबकि ऊपर का 10 प्रतिशत वर्ग केवल चार प्रतिशत। शायद आर्थिक मॉडल का दोष है कि आज भी देश स्वास्थ्य और शिक्षा जैसे सोशल सेक्टर में अपेक्षित खर्च नहीं कर रहा है। इस आर्थिक मॉडल को बदलना अच्छे प्रजातंत्र की पहली शर्त है।
Date:17-02-23
निर्यात को चाहिए नीतिगत मददसंपादकीय
केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बुधवार को उचित ही कहा कि भारतीय निर्यातकों को वैश्विक घटनाक्रम को ध्यान में रखते हुए और अधिक ग्रहणशील होना होगा। यह महत्त्वपूर्ण है क्योंकि 2021-22 में भारतीय निर्यातकों ने जो तेजी दर्ज की थी वह अब धीमी पड़ रही है। निर्यातकों को वैश्विक मांग में इजाफे से काफी मदद मिली क्योंकि दुनिया की अर्थव्यवस्था महामारी के कारण मची उथल-पुथल से निपट रही थी। अब जबकि वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला सामान्य हो रही है, फिर भी वैश्विक अर्थव्यवस्था धीमी पड़ रही है। ऐसा आंशिक रूप से इसलिए हो रहा है कि बड़े केंद्रीय बैंक मुद्रास्फीति को नियंत्रित करने के लिए मौद्रिक सख्ती अपना रहे हैं। हालांकि अब यह माना जा रहा है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था का प्रदर्शन पहले लगाए गए अनुमानों की तुलना में बेहतर होगा लेकिन इसके बावजूद इसमें उल्लेखनीय कमी आने का खतरा है। अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष के ताजा अनुमानों के मुताबिक 2023 में वैश्विक अर्थव्यवस्था 2.9 फीसदी की दर से वृद्धि हासिल कर सकती है। यह आंकड़ा इससे पहले जताए गए अनुमानों से 20 आधार अंक अधिक है। माना जा रहा है की 2022 में विश्व अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर 3.4 फीसदी रहेगी।
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष का अनुमान यह भी है कि 2023 में वैश्विक व्यापार की वृद्धि महज 2.4 फीसदी रह जाएगी जबकि 2022 में यह 5.4 फीसदी थी। दुनिया की आर्थिक और व्यापारिक वृद्धि में आ रही कमी भारत के कारोबारी आंकड़ों में भी नजर आ रही है। बुधवार को जारी आंकड़े बताते हैं कि जनवरी माह में भारत का वाणिज्यिक निर्यात सालाना आधार पर 6.5 फीसदी कम हुआ जबकि मासिक आधार पर इसमें 4.5 फीसदी की कमी आई। अप्रैल से जनवरी तक की अवधि में निर्यात 8.5 फीसदी बढ़ा। ध्यान रहे 2021-22 में इसमें 40 फीसदी का इजाफा देखने को मिला था जिसके चलते वाणिज्यिक वस्तु निर्यात 422 अरब डॉलर तक पहुंच गया था। चालू वर्ष में अब तक भारत ने 369.25 अरब डॉलर मूल्य की वस्तुओं का निर्यात किया है। मौजूदा हालात में अनुमान तो यही है कि कुल निर्यात पिछले वर्ष से बहुत अलग नहीं होगा। ध्यान देने वाली बात यह है कि आयात में भी कमी आई है। ऐसा आंशिक तौर पर जिंस की कम कीमतों के कारण हुआ है। यही वजह है कि व्यापार घाटा भी एक वर्ष में सबसे निचले स्तर पर आ गया है।
चालू वित्त वर्ष की दूसरी तिमाही में चालू खाते का घाटा सकल घरेलू उत्पाद के 4.4 फीसदी के बराबर हो गया है और इस बात में भी चिंता बढ़ाई है। हालांकि इस में कमी आने की भी उम्मीद है। विश्लेषकों का मानना है कि पूरे वित्त वर्ष में यह सकल घरेलू उत्पाद के 3 फीसदी से कम रह सकता है। यह बात भी ध्यान देने लायक है कि भारत के सेवा निर्यात में लगातार मजबूती आ रही है और माना जा रहा है कि चालू वर्ष में अब तक है 30 फीसदी से अधिक बढ़ चुका है। बहरहाल सतर्क दृष्टिकोण और बड़ी सूचना प्रौद्योगिकी कंपनियों द्वारा कम लोगों को काम पर रखा जाना बताता है कि इस मोर्चे पर भी दबाव उत्पन्न हो सकता है। यद्यपि भारतीय रिजर्व बैंक ने चालू खाते के घाटे की भरपाई को लेकर भरोसा जताया है लेकिन विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों के विशुद्ध विक्रेता बन जाने से बाह्य खाते पर एक बार फिर दबाव उत्पन्न हो सकता है। इस पर नजर रखनी होगी।
नीतिगत स्तर पर जहां अनुमान यह है कि 2024 में वैश्विक व्यापार वापसी कर लेगा, वहीं भारत को निर्यात को गति देने के लिए एक मजबूत व्यापार नीति की आवश्यकता है। केंद्रीय बजट में टैरिफ में और इजाफा न करके अच्छा कदम उठाया गया लेकिन इसके साथ ही अनुमान यह भी था कि वह टैरिफ कम करके भारतीय कारोबारियों को वैश्विक मूल्य श्रृंखला के साथ एकीकरण में मदद करेगा। बहरहाल सरकार ने वह प्रक्रिया शुरू नहीं करने का निर्णय लिया। बल्कि व्यापार को लेकर ऐसा कुछ खास नहीं कहा गया जो समेकित मांग का बड़ा जरिया बने। व्यापार के मोर्चे पर संभावनाओं के दोहन के लिए यह आवश्यक है कि नीतियों को भी बदलती वैश्विक हकीकतों के अनुरूप बनाया जाए। ऐसा करके ही हम स्थायी रूप से उच्च वृद्धि और बेहतर निर्यात हासिल कर सकेंगे।
Date:17-02-23
चैटजीटीपी पर दुनियाभर में मचा शोरशराबाअजित बालकृष्णन, ( लेखक इंटरनेट उद्यमी हैं )
चैटजीपीटी जैसे कृत्रिम मेधा आधारित उपायों के बारे में होने वाली तीखी बहसों को पढ़, देख और सुनकर मैं चिंतित हो जाता हूं लेकिन उन वजहों से नहीं जो आप सोच रहे होंगे। मैं इसलिए चिंतित हो जाता हूं कि मेरा देश यानी भारत हर उस मौके पर सामाजिक उथलपुथल का शिकार हो जाता है जब तकनीकी क्षेत्र में कोई बड़ी लहर आती है। हम एक ऐसे देश के बाशिंदे हैं जहां लंदन में शिक्षित एक वकील को उस समय राजनीतिक अवसर नजर आया जब बिहार के सुदूर चंपारण जिले में नील की खेती बरबाद हुई। उसने इस बरबादी के लिए तत्कालीन ब्रिटिश मालिकों द्वारा भारतीय श्रमिकों के शोषण को जिम्मेदार ठहराया जबकि हकीकत में इसकी वजह यह थी कि जर्मनी के वैज्ञानिकों ने कृत्रिम नील तैयार कर ली थी। यह कृत्रिम नील चंपारण में उत्पादित होने वाली वास्तविक नील की तुलना में बेहद सस्ती थी। उसके बाद की कहानी हम सब जानते हैं: वह चतुर अधिवक्ता कौन था और कैसे उसने इस अवसर का इस्तेमाल अंग्रेजों को भारत से बाहर निकालने में किया।
जब भी मैं इस बात की चर्चा करता हूं तो मुझसे कहा जाता है कि मैं 1917 की बात कर रहा हूं और हम तब से बहुत आगे निकल आए हैं। तब मैं कहता हूं कि दशकों तक हमारी आजादी की लड़ाई के ध्वज के बीच में चरखा हुआ करता था जो दरअसल भारत के कपास बुनकरों और हथकरघों के लिए एक प्रोत्साहन और मशीन से होने वाली कताई-बुनाई के विरोध में था। यह स्थिति तब थी जब सबको पता था कि मशीनों से उत्पादित होने वाला कपड़ा भारतीयों के लिए काफी सस्ता था। यही कारण है कि मैं इन दिनों चिंतित रहता हूं।
इन दिनों जो बात क्रांति की तरह चर्चा में है वह है चैटजीपीटी। यह कंप्यूटर विज्ञान से जुड़ी क्रांति है जो किसी भी तरह के सवालों के ऐसे उत्तर तैयार करती है जैसे उन्हें किसी इंसान ने दिया हो। इस तकनीक को एनएलपी अर्थात नैचुरल लैंगुएज प्रोसेसिंग कहा जाता है। यह उसी प्रकार का काम करती है जिस प्रकार 19वीं सदी के उत्तरार्द्ध में रसायन विज्ञानियों ने प्राकृतिक नील के साथ किया था और कृत्रिम नील तैयार कर दी थी।
लेकिन हमें इस बात से चिंतित क्यों होना चाहिए? मुंबई में हर रोज जब मैं काम के लिए निकलता हूं तो मुझे भारतीय संस्कृति का एक और रुझान हमेशा याद आता है। ऐसा तब होता है जब मैं माहिम में शीतला देवी मंदिर के पास से गुजरता हूं।
भारत में सदियों तक स्मालपॉक्स यानी चेचक जैसी बीमारी के कारण हर साल 15 लाख लोगों तक की मौत होती रही। हम इससे बचने के लिए बस शीतला माता की पूजा करते रहे ताकि चेचक के खौफ से बच सकें। मुंबई के माहिम स्थित शीतला देवी मंदिर के अलावा उत्तर और पूर्वी भारत के कई हिस्सों में ऐसे अनेक मंदिर हैं। हालांकि देश में चेचक की रोकथाम इन मंदिरों में की गई प्रार्थनाओं की बदौलत नहीं हुई बल्कि 20वीं सदी के आरंभ में मिली वैज्ञानिक सफलता की बदौलत शुरू हुए टीकाकरण ने इस बीमारी से निजात दिलाई।
बहरहाल देश में शीतला देवी के मंदिर निरंतर फल-फूल रहे हैं। हैजा, प्लेग और सैकड़ों अन्य बीमारियों के इलाज में सफलता तब मिली जब वैज्ञानिकों ने व्यवस्थित तरीके से इन बीमारियों की वजह का पता लगाया और इलाज तलाश किया।
नैचुरल लैंगुएज प्रोसेसिंग में भी वैसे ही प्रयोग और नवाचार हो रहे हैं। प्रयोगों का यह सिलसिला अब उत्पादन स्तर पर पहुंच गया है जिसे जीपीटी नामक तकनीकों के समूह (पूरा नाम जेनेरेटिव प्री-ट्रेन्ड ट्रांसफॉमर्स) के रूप में जाना जाता है। यहां मूल बात प्री-ट्रेन्ड अर्थात पूर्व प्रशिक्षित है। एक समांतर उदाहरण भी है: जब आपके पास वाहन चलाने का लाइसेंस हो और आप एक नए मॉडल की कार चलाने जाएं तो आप पहले से सीखे गए कौशल का इस्तेमाल करते हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो वाहन चलाने का पहले लिया गया प्रशिक्षण आपको बताता है कि कब एक्सिलरेटर दबाना है, कब ब्रेक लगाना है और कब गियर बदलना है।
कंप्यूटर विज्ञान की दुनिया ने बीते दो-तीन सालों में अपने अलगोरिद्म को पहले से प्रशिक्षित करना सीख लिया है जिससे वह एक खास पैटर्न का अनुकरण कर लेती है और सहज बुद्धि लगाकर अंदाजा लगा लेती है कि इसके बाद कौन से शब्द आ सकते हैं। इन रुझानों को सीखने के लिए उन्होंने विकिपीडिया और इंटरनेट पर मौजूद विभिन्न सामग्री का गहराई से अध्ययन किया है। ऐसा करके उन्होंने अपने अलगोरिद्म को इस प्रकार प्रशिक्षित किया है ताकि वे उन पैटर्न के आधार पर नई सामग्री तैयार कर सकें। यह ठीक उसी प्रकार है जैसे हम एक बार कार चलाना सीख लेने के बाद नए मॉडल की कार भी आसानी से चला लेते हैं। उस स्थिति में अगर आप विदेश में भी कार चला रहे हों तो आपका मस्तिष्क उस हिसाब से सुझाव देने लगता है। जीपीटी में जेनेरेटिव शब्द यहीं से आया है। उदाहरण के लिए चैटजीपीटी, जिसे लेकर इस समय चर्चाओं का बाजार गर्म है, उसने भी इंसानी भाषा के पैटर्न इसी तरह सीखे हैं। ऐसे जीपीटी के लाभ और उनकी लागत वैसी ही होगी जैसी कि बुनाई और कताई करने वाली मशीनों के लाभ और लागत तथा टीकों और जीन चिकित्सा की। जिस तरह बुनाई-कताई मशीनों ने कपड़ों को भारत के आम लोगों के लिए सस्ता किया और टीकों ने देश के आम लोगों को बीमारियों से निजात दिलाई उसी प्रकार जीपीटी भी शिक्षा, कानूनी सेवाओं, स्वास्थ्य सेवाओं तथा कंप्यूटर प्रोग्रामिंग सेवाओं को सस्ता बनाएंगे और देश के आम लोगों के लिए मददगार साबित होंगे। लेकिन इसका यह अर्थ भी हो सकता है कि शिक्षकों, अधिवक्ताओं, चिकित्सकों और कंप्यूटर प्रोग्रामर्स के लिए रोजगार और आय के अवसर सीमित हो जाएं।
इस एनएलपी क्रांति के बीच अगर हमें किसी बात को लेकर चिंतित होने की जरूरत है तो वह यह कि चैटबॉट आदि जिस प्रकार तैयार किए जाते हैं वे कई तरह के पूर्वग्रह समेटे हुए हो सकते हैं। इनमें नस्ली पूर्वग्रह हो सकते हैं। उदाहरण के लिए अपराधों का अनुमान लगाने में, भर्ती के समय लैंगिक भेदभाव करने में और भारत की बात करें तो जाति आधारित पूर्वग्रह भी हो सकते हैं। अगर इन पर नजर नहीं रखी गई तो इनसे सामाजिक स्तर पर अशांति उत्पन्न हो सकती है और ऐसे तकनीक विरोधी आंदोलन शुरू हो सकते हैं जैसे हम अतीत में देख चुके हैं।
Date:17-02-23
सरहद की सुरक्षासंपादकीय
सुरक्षा मामलों पर मंत्रिमंडलीय समिति (सीसीएस) ने विशेष रूप से चीन से लगती सीमा की सुरक्षा के लिए गठित भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आइटीबीपी) की सात नई बटालियन के गठन को मंजूरी दे दी है। सीमा पर चीन की लगातार सैन्य आक्रामकता के बावजूद पिछले एक दशक में पहली बार आइटीबीपी की बटालियनों की संख्या में इजाफे का फैसला किया गया है। अब 1,808 करोड़ की लागत और कम से कम नौ हजार नए जवानों के साथ आइटीबीपी चीन से लगती 3,488 किलोमीटर लंबी सीमा पर 47 नई सुरक्षा चौकियां बनाएगा और ये सभी अरुणाचल प्रदेश में होंगी। साथ ही पूर्वी लद्दाख तक हर मौसम में पहुंच के लिए सामरिक दृष्टि से बेहद अहम नीमू-पदम-दारचा सड़क मार्ग पर सिनकुन ला सुरंग के निर्माण को भी मंजूरी दी गई है। लगभग 16,580 फुट की ऊंचाई पर बनने वाली इस सुरंग के दिसंबर 2025 तक पूरा हो जाने के बाद पूर्वी लद्दाख के लिए इस सबसे छोटे बारहमासी रास्ते से सैन्य साजोसामान और रसद की तेजी से आपूर्ति आसान हो जाएगी। खास बात यह कि यह मार्ग चीनी और पाकिस्तानी तोपों की पहुंच से दूर है। इसके अलावा, समिति ने सीमाई गांवों के विकास और वहां से पलायन को रोकने के लिए ‘वाइब्रेंट विलेज कार्यक्रम’ (वीवीपी) का एलान किया है।
ये तीनों फैसले सीमा पर चीनी आक्रामकता से निपटने के लिए सरकार की रणनीति की ओर इशारा करते हैं। इसके तहत सीमाई इलाकों के गांवों में संपर्क सुविधाओं को बढ़ाया जाएगा, ताकि वे सुरक्षा बलों की आंख और कान का काम कर सकें। आइटीबीपी के जरिए निगरानी और त्वरित कार्रवाई की क्षमता बढ़ाने के साथ सैन्य साजोसामान और रसद की आपूर्ति के लिए सुरक्षित मार्गों का निर्माण होगा। अरुणाचल सीमा पर आइटीबीपी की सुरक्षा चौकियों और शिविरों के निर्माण से सामरिक रूप से महत्त्वपूर्ण इलाकों की निगहबानी और घुसपैठ की किसी भी कोशिश के खिलाफ तत्काल कार्रवाई की क्षमता में इजाफा होगा। सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ‘वीवीपी’ से सीमाई इलाकों में चीनी गतिविधियों के बारे में सूचनाओं का प्रवाह बढ़ेगा और इन गांवों में विकास से स्थानीय लोगों में भारत के प्रति भरोसा मजबूत होगा। सीमा पर अग्रिम सैन्य अड्डों तक हर मौसम में रसद की आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए सुरंगों का निर्माण भारत की प्राथमिकता है। ये सुरंगें सिर्फ आवाजाही के लिए नहीं, बल्कि गोला-बारूद, मिसाइल, ईंधन और खाने-पीने की चीजों के भंडारण के लिए भी उपयोगी हैं।
इसी के साथ सरकार को अब बारह किलोमीटर लंबी सासेर ला सुरंग के प्रस्तावित निर्माण को भी मंजूरी देने में देर नहीं करनी चाहिए, ताकि दारबुक-श्योक-दौलत बेग ओल्डी मार्ग पर चीनी हमले या बमबारी की जद में आने की स्थिति में उत्तर पूर्वी लद्दाख की सबसे अग्रिम हवाई पट्टी दौलत बेग ओल्डी तक पहुंचने का एक वैकल्पिक मार्ग कायम हो सके। यह स्वागतयोग्य है कि चीन सीमा को लेकर भारत सरकार अपने परंपरागत रक्षात्मक रुख से किनारा कर रही है। दशकों से तक सीमा पर सड़कों और अन्य आधारभूत ढांचे के निर्माण को लेकर सरकारें आशंकित रही हैं। उनका मानना था कि युद्ध की स्थिति में चीनी फौज इन सड़कों पर कब्जा कर आवाजाही के लिए इनका इस्तेमाल कर सकती है। निश्चित रूप से अब वह स्थिति नहीं है। भारत अब सीमा पर सड़क मार्गों और सैन्य तैयारी में काफी आक्रामक तरीके से इजाफा कर रहा है। अगर चीन की ‘सलामी स्लाइसिंग’ यानी छोटे-छोटे टुकड़ों में कब्जा करके कुछ सालों में इलाके का नक्शा बदल देने की रणनीति को विफल करना है तो सीमा पर निगरानी, संपर्क और सैन्य तैयारियां बढ़ाने का कोई विकल्प नहीं है।
Date:17-02-23
भ्रष्टाचार के बदलते स्वरूपज्योति सिडाना
एक अच्छा लोकतंत्र वह है, जिसमें राजनीतिक और सामाजिक न्याय के साथ-साथ आर्थिक न्याय की व्यवस्था भी है। इसमें नागरिक सर्वोपरि होता है। पर वर्तमान में पूंजीवाद के विस्तार के कारण बाजार सर्वोपरि हुआ है, जिसने नवउदारवादी व्यवस्था को उत्पन्न किया जो हस्तक्षेप की नीति की समर्थक है और राज्य के कल्याणकारी चरित्र को देश के आर्थिक विकास में बाधक मानती है। नवउदारवादियों का तर्क है कि राज्य को आर्थिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए, बल्कि मुक्त व्यापार या खुले बाजार का समर्थन करना चाहिए। जब बाजार स्वतंत्र होगा तो देश का विकास भी तीव्र गति से होगा। राज्य का कार्य केवल नीति निर्माण करना है, सेवा कार्य करना नहीं। यानी सड़क, रेल, पानी, बिजली, स्वास्थ्य जैसे सेवा कार्य राज्य के कार्य नहीं हैं, क्योंकि ऐसा करने के लिए वह समर्थ लोगों या पूंजीपतियों, व्यापारियों पर कर लगाते हैं और उससे एकत्र धन को असमर्थ या गरीब लोगों के कल्याण और उत्थान पर खर्च करते हैं। राज्य को इस कार्य के लिए अपने और जनता के बीच मध्यस्थ की जरूरत होती है, परिणामस्वरूप प्रशासन-तंत्र का उभार होता है। प्रशासन-तंत्र जैसी औपचारिक व्यवस्था के कारण लालफीताशाही उत्पन्न होती है, जो भ्रष्टाचार का एक स्वरूप है। इन सबके कारण देश का विकास अवरुद्ध हो जाता है। इसलिए नवउदारवादी व्यक्ति की स्वतंत्रता और कल्याणकरी राज्य की आलोचना करते हैं।
इसमें भी कोई संदेह नहीं है कि अपनी इन्हीं विशेषताओं के कारण वे पूरे विश्व को एक बाजार के रूप में देखते हैं। विशेष रूप से सोवियत संघ के विघटन के बाद या 1991 के बाद से उदारवाद, निजीकरण और वैश्वीकरण की प्रक्रियाओं ने बाजार केंद्रित विचारधारा को मजबूती प्रदान कर दी। वैश्विक गांव, वैश्विक बाजार, वैश्विक राजनीति की अवधारणाओं ने सभी देशों और सभी राज्यों के बीच की भौगोलिक सीमाओं को ही समाप्त कर दिया। अब जब बाजार स्वतंत्र है तो व्यक्ति और राज्य का नियंत्रण में होना स्वाभाविक है। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि बाजार के गैर-नियंत्रणकारी चरित्र ने आर्थिक असमानता में वृद्धि की है। हाल में आई आक्सफैम इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार भारत की एक प्रतिशत जनसंख्या के पास अब देश की कुल संपत्ति का चालीस प्रतिशत से भी अधिक हिस्सा है। जबकि नीचे की पचास फीसद आबादी के पास कुल संपत्ति का केवल तीन प्रतिशत हिस्सा है। या कहें कि 2022 तक भारत में अरबपतियों की संपत्ति में 121 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई। यह दलील भी दी जाती है कि अमीर-गरीब के बीच बढ़ती खाई और समाज में आर्थिक असमानता के लिए राज्य का कल्याणकारी चरित्र जिम्मेदार है। इसलिए राज्य को आर्थिक मामलों में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए। अप्रत्यक्ष रूप से यह व्यवस्था निजीकरण का समर्थन करती नजर आती है। आज हर क्षेत्र में निजीकरण अपने पैर प्रसार भी रहा है, जैसे शिक्षा, स्वास्थ्य, निर्माण कार्य, बिजली आदि।
बाजार केंद्रित अर्थव्यवस्था का यह कहना है कि प्रशासन-तंत्र के कारण भ्रष्टाचार पनपा, इसलिए अब प्रशासन-तंत्र की जरूरत नहीं है। अब तो ऐसा समय आ गया है जब भ्रष्टाचार के अनेक स्वरूप उभर कर आए हैं। उदाहरण के लिए हिंडनबर्ग की रिपोर्ट आने के बाद की तस्वीर देखी जा सकती है। एक तरफ आर्थिक असमानता, गरीबी और बेरोजगारी बढ़ रही है तो फिर कुछ लोगों की संपत्ति में इतना ज्यादा इजाफा कैसे हो रहा है? इसी तरह वर्ष 2016 में पनामा पेपर्स मामला सामने आया था, जिसमें भारत समेत दुनिया भर के रईसों की करमुक्त देशों में मौजूद संपत्तियों की जानकारी दी गई थी। बड़े पूंजीपतियों और उद्योगपतियों द्वारा विदेश में छद्म कंपनियां खोलने और कर बचाने का खेल भ्रष्टाचार का ही एक रूप है। न जाने कितने और पूंजीपति अरबों-खरबों का घोटाला करके देश छोड़ कर भाग गए।
भारत जैसे एक लोकतांत्रिक और कल्याणकारी राज्य में अपने नागरिकों को आधारभूत सुविधाएं देना सरकार का दायित्व है, पर जो कुछ दिया उसके बदले में मौन की संस्कृति अपनाने की स्थितियां बनाने को क्या कहा सकता है? शिक्षण संस्थाओं का मुख्य दायित्व लोगों को शिक्षित करना, समाज का सक्रिय सदस्य बनाना, शोषण से मुक्त करने के लिए जागरूक करना और देश के विकास में सहयोग देना है, लेकिन आज के दौर में शिक्षा अपनी इस भूमिका का निर्वाह न करके कुछ और ही कर रही है। शिक्षकों और विद्यार्थियों को गैर-शैक्षणिक कार्यों में लगा देना, परीक्षा करवाना, आवेदन जमा करना, अनेक समितियों में काम करना, मतदाता पत्र बनाने के लिए शिविर लगवाना, कुछ दिवस मनाना आदि कार्य करवाए जाते हैं, जिनका ज्ञान व्यवस्था से कोई प्रत्यक्ष सरोकार नहीं है। अब शिक्षण संस्थानों में पढ़ने-पढ़ाने के अलावा बहुत कुछ होता है, बस अध्यापन और शोध कार्य बहुत कम होता है। नतीतन, जब शिक्षण कार्य ही नहीं होता तो प्रश्नपत्र बाहर आने जैसे मामले भ्रष्टाचार के एक स्वरूप में उभरते हैं।
इतना ही नहीं, बाल अपराध बढ़ रहा है, हिंसक अश्लीलता एक नए किस्म के अपराध को उत्पन्न कर रही है। इसे रोकने के लिए कोई प्रभावी कदम दिखाई नहीं देता, क्योंकि इससे बाजार को लाभ मिलता है। बाजार सर्वोपरि हो गया है और समाज हाशिये पर आ गया है। अब वास्तव में राज्य का कल्याणकारी चरित्र हाशिये पर दिखाई देता है। सवाल है कि क्या लोकतंत्र की व्याख्या बिना भ्रष्टाचार होने की गुंजाइश बची है?
देश के विभिन्न राजनेताओं और अधिकारियों से क्या नियमित स्वरूप में पूछा या जांचा जाता है कि जब उन्होंने राजनीति या प्रशासन में प्रवेश किया था, तब उनकी संपत्ति कितनी थी और अब कितनी है? अगर उनकी संपत्ति में कम समय में अकूत वृद्धि दिखाई देती है तो कैसे? दरअसल, व्यवस्था के अंदर इतने छेद हो गए हैं कि हर जगह भ्रष्टाचार नजर आता है। उच्च पद पाने या सरकार का संरक्षण पाने के लिए संविधान की व्याख्या करने वाले ही अगर संविधान का उल्लंघन करने लगे और गलत निर्णय देने लगें तो संवैधानिक मूल्यों की रक्षा कैसे होगी, यह सोचने का विषय है।
जब जनतंत्र बाजार-तंत्र में बदल जाता है तो सरकार के स्वतंत्र रूप से नीति निर्माण करने के पक्ष पर भी प्रश्नचिह्न लग जाता है। सरकार किसके हित में नीतियों का निर्माण करती है, जैसे सवाल महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं। इसलिए आवश्यकता है कि कुछ सवालों पर समय रहते चिंतन-मनन किया जाए, ताकि आर्थिक असमानता को सीमित किया जा सके और समग्र विकास आकार ले सके। क्या कारपोरेट भ्रष्टाचार को स्वीकृति दी जा सकती है? क्या आर्थिक विसंगतियों को दूर करने में समाज वैज्ञानिक एक माध्यम बन सकते हैं? क्या समाज विज्ञान जनमत निर्माण का एक सशक्त माध्यम बन सकता है? आज जिस तरह से बाजार केंद्रित कौशल और तकनीकी ज्ञान को महत्त्व दिया जा रहा है, कहीं ऐसा तो नहीं कि लोगों को सामाजिक आंदोलनों से दूर करने के लिए सामाजिक विज्ञानों की उपेक्षा की जा रही है, ताकि बाजार शक्तियों को विरोध का सामना न करना पड़े।
शायद इसलिए समाज वैज्ञानिक भी गैर-राजनीतिक होते जा रहे हैं। करी नामक समाज वैज्ञानिक कहते हैं कि वर्तमान समाज बाजार समाज है, इसने स्थानीय समुदायों की दक्षताओं पर नकारात्मक प्रभाव उत्पन्न कर अपराध और विचलन को अवसर प्रदान दिए हैं। इसलिए समाज वैज्ञानिकों को एक जन शिक्षक की भूमिका में आना होगा जो लोगों को यह बताएंगे कि बाजार की स्वतंत्रता के सम्मुख क्या खतरे हैं और उसे निजी जगह, सार्वजानिक जगह और राजनीतिक जगह में समान रूप से सक्रिय होना होगा। तभी प्रत्येक तरह के भ्रष्टाचार को रोका या कम किया जा सकता है।
Date:17-02-23
जानकारी ही दिलाएगी सुरक्षारजनीश कपूर
साइबर अपराधों में लिप्त अपराधी हर दिन नये–नये ढंग से अपने शिकारों को फंसाने के तरीके खोजते रहते हैं। यदि आप जागरूक हैं तो आप इनके जाल में फंसने से बच सकते हैं। यदि आप घबराहट में कुछ ऐसा–वैसा कर बैठते हैं तो आप इनके जाल में आसानी फंस सकते हैं। आज इस कॉलम में एक ऐसे ही शिकार के बारे में बात करेंगे जो इन साइबर अपराधियों के जाल में फंसते–फंसते बचा।
पिछले सप्ताह मुझे मेरे मित्र विभव का घबराहट में फोन आया। उसकी घबराहट का कारण एक सीबीआई अधिकारी का उसे फोन पर धमकाना था। उसने मुझे फोन पर अपनी जो परेशानी बताई तो पहले तो मुझे हंसी आई फिर मैंने खुद को उसकी जगह में सोच कर उसे कानून के कुछ अहम पहलू बताए। मेरी सलाह सुन विभव शांत हुआ और अपने काम में जुट गया‚ परंतु जो कुछ उसके साथ दो दिनों में हुआ वो आपके साथ साझा करना आवश्यक है। उगाही के इस ढंग को यदि आप जान लेंगे तो शायद आप भी इन जालसाजों का शिकार होने से बच सकेंगे। कुछ दिन पहले विभव के पास व्हाट्सऐप पर एक वीडियो कॉल आई। उस कॉल में एक लड़की पहले तो काफी मित्रता भरे ढंग से बात करने लगी।
कुछ ही क्षण में वो महिला अश्लीलता पर उतर आई। विभव ने तुरंत अपने फोन की स्क्रीन का रुख अपनी पत्नी की और किया जो उस समय उसके साथ में बैठी थी। इसके बाद फोन को काट कर विभव ने उस नंबर को ब्लॉक कर दिया और इसे भूल गया‚ परंतु कुछ ही देर में उसके पास किसी दूसरे नंबर से कुछ संदेश आने लगे‚ जिसमें उसे ब्लैकमेल कर पैसे ऐंठने का प्रयास किया गया। विभव ने इन नंबरों को भी ब्लॉक कर दिया। दो दिनों तक कुछ नहीं हुआ। दो दिन के बाद विभव के पास किसी विक्रम गोस्वामी नाम के व्यक्ति का फोन आया। गोस्वामी ने खुद को सीबीआई का अधिकारी बताया। सीबीआई का नाम सुनते ही विभव ने चौंक कर पूछा कि क्या बात हैॽ गोस्वामी ने विभव को दो दिन पहले आई व्हाट्सऐप कॉल के अश्लील वीडियो की बात की। विभव पर इस अश्लील वीडियो को यूट्यूब पर अपलोड करने का आरोप लगा कर एक शिकायत का हवाला देते हुए गोस्वामी ने पहले तो सच्चाई पूछी। विभव ने उसे सब बात सच–सच बता डाली। जैसे ही गोस्वामी को लगा कि विभव थोड़ा घबराया हुआ है‚ उसने विभव को एक नंबर दिया और कहा कि यदि उसने ये वीडियो अपलोड नहीं किया तो इस नंबर पर यूट्यूब वालों को कह कर वीडियो को डिलीट करवाएं और उसकी पुष्टि का प्रमाण आधे घंटे में गोस्वामी को दे। ऐसा न करने पर शाम तक विभव को गिरफ्तार कर लिया जाएगा। विभव के लाख समझाने पर भी वो अधिकारी उसकी किसी बात का यकीन नहीं कर रहा था। बल्कि परिवार और समाज का हवाला देकर उसे और धमकाने लग गया। विभव ने गोस्वामी का फोन रखते ही मुझे फोन किया और पूरा किस्सा बयान किया। मैंने विभव को समझाया कि यदि उसने कुछ नहीं किया तो उसे घबराने की बिल्कुल भी जरूरत नहीं है। कानून का थोड़ा–बहुत ज्ञान होने के चलते मैंने उसे जो–जो बताया वो आप सभी के लिए भी समझना जरूरी है। पहला‚ यदि आपने सोशल मीडिया पर कुछ भी आपत्तिजनक अपलोड नहीं किया है तो आपको घबराने की कोई जरूरत नहीं। दूसरा‚ किसी भी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर कुछ भी अश्लील या आपत्तिजनक पोस्ट नहीं किया जा सकता। इस मामले में यूट्यूब की बात करें तो यूट्यूब के नियम इतने सख्त हैं कि अश्लील वीडियो उस पर नहीं डाले जा सकते। तीसरा‚ यूट्यूब या सोशल मीडिया पर होने वाले अपराध साइबर अपराध की श्रेणी में आते हैं और इनसे केवल पुलिस का साइबर सेल ही निपटता है। सीबीआई का हस्तक्षेप संगीन अपराधों में केवल राज्य सरकार के अनुरोध पर ही होता है। इसलिए यदि कोई भी अधिकारी खुद को सीबीआई का अधिकारी कहता है तो वो झूठ बोल रहा है। इस बात को ध्यान में रखते हुए पहले उस व्यक्तित का पूरा परिचय मांग लें। इसके साथ ही अपने जानकार मित्रों की मदद से यदि संभव हो तो उस अधिकारी की पहचान की पुष्टि करें।
जैसे ही विभव ने ये सब बातें सुनी उसकी घबराहट कम होने लगी। विभव ने मेरे कहने पर सीबीआई अधिकारी‚ विक्रम गोस्वामी का नंबर ट्रू–कॉलर नाम की ऐप पर खोजा और उसका स्क्रीनशॉट मुझे भेजा। स्क्रीनशॉट देख वही हुआ जिसका अंदाजा था। गोस्वामी ने अपने नाम के साथ दिल्ली पुलिस के पूर्व पुलिस कमिश्नर राकेश अस्थाना की फोटो लगाई हुई थी। मैंने विभव को कहा कि वो गूगल पर पूर्व पुलिस कमिश्नर राकेश अस्थाना को खोजे और इस अधिकारी की प्रोफाइल पिक्चर को मिला ले तो उसे इस नकली सीबीआई अधिकारी की असलियत पता चल जाएगी। इसी दौरान मैंने दिल्ली पुलिस की आईएफएसओ यूनिट पूर्व डीसीपी‚ केपीएस मल्होत्रा से इस किस्से को साझा किया। उन्होंने ऐसे गोरखधंधों से सभी को सावधान रहने को कहा। ऐसे नंबरों को तुरंत ‘रिपोर्ट एंड ब्लॉक’ करें। आप जानकार रहेंगे तभी तो सुरक्षित रहेंगे।
Date:17-02-23
डूब जाएंगे शहर, पर फिक्र किसे है?अक्षित संगोमला, ( शोधकर्ता, सीएसई )
समुद्र का बढ़ता हुआ जलस्तर भारत समेत तटीय आबादी वाले तमाम देशों के लिए एक बड़ा खतरा बनता जा रहा है। पिछले दिनों जारी विश्व मौसम विज्ञान संगठन की रिपोर्ट बता रही है कि 1901 से 1971 के बीच समुद्री जलस्तर में औसत वृद्धि दर सालाना 1.3 मिलीमीटर रही, जो 1971 से 2006 के बीच बढ़कर 1.9 मिलीमीटर प्रतिवर्ष हो गई। साल 2006 से 2018 के बीच तो यह वृद्धि दर हर साल 3.7 मिलीमीटर दर्ज की गई है। इसका अर्थ है कि 1901 से 2018 के बीच समुद्र जलस्तर में औसतन 0.20 मिलीमीटर की वृद्धि हुई है। इसीलिए इस रिपोर्ट की चर्चा करते हुए संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरस ने चिंता जाहिर की कि यदि हालात संभालने के प्रयास नहीं किए गए, तो बांग्लादेश, चीन, भारत, नीदरलैंड जैसे देशों के शहरों पर खतरा बढ़ने वाला है।
वाकई, समुद्री जलस्तर के बढ़ने से कई शहर खतरे में हैं। तटीय शहर या द्वीप ही नहीं, अब तो जोखिम का दायरा बढ़कर बडे़ शहरों तक पहुंच गया है। एशिया में बैंकॉक (थाईलैंड), मनीला (फिलीपींस), हो ची मिन्ह (वियतनाम), शेनजेन (चीन), दुबई (संयुक्त अरब अमीरात) जैसे शहरों पर खतरा ज्यादा है। भारत में भी मुंबई और कोलकाता जैसे बडे़ शहरों के डूबने की आशंका जाहिर की गई है। यही हाल, यूरोप, उत्तर और दक्षिण अमेरिका के शहरों का भी है। विडंबना है कि अब छोटे-छोटे द्वीपीय देशों की उतनी चर्चा भी नहीं होती, लेकिन कल्पना कीजिए कि यदि कैरेबियाई या प्रशांत के द्वीप डूबे, तो उनका अस्तित्व ही पूरी तरह से खत्म हो जाएगा और लोगों को वहां से निकालकर दूसरे देशों में बसाने के अलावा कोई दूसरा विकल्प दुनिया के पास नहीं होगा।
यह चिंता काफी बड़ी है। अगर ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन यूं ही जारी रहता है, तो साल 2100 तक ही समुद्र के जलस्तर में दो मीटर तक की वृद्धि हो सकती है, और साल 2300 तक इसके 15 मीटर तक बढ़ने की आशंका है। जलवायु परिवर्तन पर अंतर-सरकारी पैनल (आईपीसीसी) का आकलन है कि अगर मौजूदा स्थिति में सुधार के उपाय नहीं किए गए और ग्लोबल वार्मिंग की रफ्तार यही बनी रही, तो समुद्र का जलस्तर 15 मिलीमीटर सालाना की दर से बढ़ेगा, यानी अगले 10 साल में यह बढ़कर 15 सेंटीमीटर हो जाएगा और आगामी 50 साल में जलस्तर में 75 सेंटीमीटर तक की वृद्धि हो सकती है। जाहिर है, तब दुनिया के कई शहर डूब जाएंगे।
हमारे लिए विशेष चिंता की बात इसलिए है, क्योंकि एक रिपोर्ट यह भी बता रही है कि हिमालय की नदी घाटियों में रहने वाले लाखों लोगों पर ग्लोबल वार्मिंग का सीधा असर होगा। बताया जा रहा है कि जैसे-जैसे आने वाले दशकों में ग्लेशियर सिकुड़ते जाएंगे, सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदियों में पानी का बहाव बढ़ जाएगा और ज्यादा पानी समुद्र में जाने लगेगा। इससे समुद्र का जलस्तर बढ़ेगा और उसका खारा पानी इन नदियों के डेल्टा में पसर सकता है, जिससे यहां पर इंसानों के लिए रहना करीब-करीब नामुमकिन हो जाएगा।
स्पष्ट है, शहरों का डूबना सिर्फ एक भौगोलिक ढांचे का खत्म होना नहीं होता, बल्कि अनगिन सपनों और उम्मीदों का टूटना भी होता है। शहर के डूब जाने से वहां की आबादी को विस्थापन का दर्द झेलना पड़ता है। समुद्री जलस्तर में वृद्धि के कारण लोगों का पलायन होने भी लगा है, लेकिन इसको लेकर अभी तक कोई ठोस वैज्ञानिक अध्ययन नहीं किया गया है, लेकिन यह आशंका है कि तटीय इलाकों के समुद्र में समा जाने से दुनिया की करीब एक अरब आबादी प्रभावित होगी।
ऐसा नहीं है कि इसको रोकने के उपाय नहीं किए जा रहे हैं। एक बड़ी कोशिश तो यही हो रही है कि ग्लोबल वार्मिंग की रफ्तार थामी जाए। 19वीं सदी के अंत के बाद से पृथ्वी की सतह का औसत तापमान 1.1 डिग्री सेल्सियस बढ़ गया है। इतना ही नहीं, कार्बन उत्सर्जन कम होने के बावजूद यह माना जा रहा है कि दुनिया 10 से 15 साल के भीतर 1.5 डिग्री सेल्सियस की ग्लोबल वार्मिंग की सीमा पार कर जाएगी। इसे रोकने के लिए तमाम देश लगे हुए हैं। अगर इसमें सफलता मिल सकी, तो निश्चित तौर पर ग्लेशियरों के पिघलने के खतरे से कुछ हद तक हम बच सकते हैं। मगर यदि किसी कारणवश ऐसा न हो सका, तो उस सूरत के उपाय भी अमल में लाए जा रहे हैं।
सबसे पहली कोशिश यह है कि जल-प्लावन के जोखिम वाले तटीय इलाकों को फिर से मानव बस्ती बसाने लायक बनाना। इसके लिए समुद्री तटों पर कृत्रिम बालू डाला जाता है। तटों पर दीवारें खड़ी करना, बांध बनाना और तूफान के असर को कम करने के उपाय करना भी सरकारों की प्राथमिकता में हैं। एम्स्टर्डम (नीदरलैंड) में ऐसा प्रयोग हो चुका है, जो सफल साबित हुआ है। इससे समुद्र में समा चुकी भूमि को फिर से रहने लायक बनाया गया।
पारिस्थितिकी तंत्र को सुधारकर भी समुद्री जलस्तर के बढ़ने के खतरे को कम किया जा सकता है। इसके लिए मैंग्रोव (दलदल या नदियों के छोर पर उगने वाले उष्णकटिबंधीय वृक्ष) और प्रवालभित्तियों का संरक्षण या पुनर्जनन करने की कोशिश हो रही है। इसके अलावा, तटीय इलाकों में निर्माण कार्यों को रोककर और जोखिम वाली आबादी का नियोजित पुनर्वास करके भी इस खतरे से निपटने के प्रयास तमाम देशों द्वारा किए जा रहे हैं, जिनमें भारत भी शामिल है। अच्छी बात यह भी है कि अपने यहां तटीय इलाकों को लेकर एक विशेष नीति भी बनाई जा रही है, जिसे आने वाले समय में जारी किया जा सकता है।
कुल मिलाकर, कहा जा सकता है कि हालात प्रतिकूल जरूर हैं, लेकिन बेहतर भविष्य का दामन छोड़ा नहीं गया है। सरकारें अपने तईं प्रयास कर रही हैं, लेकिन उनको अभी और संजीदगी व तत्परता दिखानी होगी। निस्संदेह, यह एक क्रूर मजाक है कि ग्लोबल वार्मिंग के बढ़ने की एक बड़ी वजह विकसित देश हैं, लेकिन वे इसकी रफ्तार को घटाने को लेकर उतनी तत्परता से अपनी जिम्मेदारी नहीं निभाना चाहते। ऐसे में, संयुक्त राष्ट्र महसचिव का कहना सही जान पड़ता है कि हमें जलवायु संकट का समाधान करना ही होगा, तभी हम अपने डूबते शहरों को बचा पाएंगे।
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हाल ही में पर्यावरण मंत्रालय ने ग्रेट निकोबार में 72,000 करोड़ रुपये की योजना के लिए यहाँ की 130.75 वर्ग किमीण् वनभूमि के उपयोग की स्वीकृति दे दी है। इस योजना में एक ट्रांसशिपमेन्ट पोर्ट, एयरपोर्ट, बिजली संयंत्र और ग्रीनफील्ड टाउनशिप बनाई जानी है। द्वीप की संवेदनशील पारिस्थितिकी और शौम्पेन जैसी कई शिकारी मूल जनजातियों के लिए यह विनाशकारी हो सकता है। कुछ बिंदु –
अंडमान में भारत के कुछ सबसे बड़े मैंग्रोव हैं। तितलियों की आधी से अधिक, 40% पक्षी और 60% स्तनधारी जीवों की यहाँ पाई जाने वाली प्रजातियां स्थानिक हैं। आधुनिक परियोजनाओं के कारण ये हमेशा के लिए विलुप्त हो सकती हैं। यहाँ के स्थानीय समुदायों की अपने सामाजिक-आर्थिक बाधाएं हैं। 2019 में नीति आयोग ने इन द्वीपों के रणनीतिक महत्व को रेखांकित किया था। इनसे जुड़े समुद्री मार्गों के महत्व को समझते हुए भी, पारिस्थितिकीय संवेदनशीलता की अवहेलना नहीं की जा सकती है।
अतः इस द्वीप-समूह को विकसित करने की किसी भी योजना के लिए क्षेत्र पर पड़ने वाले पर्यावरणीय प्रभाव को गंभीरता से लिया जाना चाहिए।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 25 जनवरी, 2023
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Date:16-02-23
Union Of 100 StatesWhy India must have many small states. It will make for better economy and better politicsTOI Editorials
With assembly polls in Tripura today, all eyes are on TIPRA Motha and its demand for a separate state of Greater Tipraland. Motha’s leader Pradyot Debbarma has already indicated that he is willing to ally with any party that agrees to his statehood demand. However, given that Tripura is already small and a border state, carving out a Greater Tipraland isn’t a good idea, both security-wise and administratively.
Nonetheless, the idea of smaller states is absolutely valid. There are too many big states – by area, Rajasthan, UP, MP, Bihar, Maharashtra, Karnataka, Gujarat, Odisha, even Bengal are all too big to be administered with efficiency, and these can and should be subdivided into two or three or even more states. If UP were a separate country, it would be the fourth largest by population. But its per capita GDP is closer to Kenya’s. There is enough evidence to suggest that smaller states mostly tend to do better. According to the Eleventh Plan document the then newly created states of Uttarakhand and Chhattisgarh grew economically faster than their parent states – UP and MP respectively – between 2004-05 to 2008-09. That was down to partly to size and, relatedly, better decentralisation of resources.
Another reason a Union of small states is a good idea is that such a political model addresses what’s going to soon be a source of tension in Indian federalism. Smaller or medium size states or small bits of one or two large states like Maharashtra and Gujarat are doing most of the economic heavy lifting – but it is the larger states with larger populations that wield political power. This imbalance will deepen after delimitation. India is a continent-size country. It should have 100 states, or more.
Date:16-02-23
Judges and the lure of ‘political’jobsPost retirement, the judicial community should take a concerted decision not to accept any job stemming from political patronageA.P. Shah is former Chief Justice, Delhi High Court and Former Chairperson, Law Commission of India
Within a month of retiring from the Supreme Court of India, Justice S. Abdul Nazeer has been appointed Governor of Andhra Pradesh. Like many others, I believe it is no coincidence that he was a part of the Constitution Bench that decided the Ayodhya Ram Mandir land issue. In the tenure of the Narendra Modi-led government since 2014, he is the third Supreme Court judge who has received a high-profile political appointment soon after retirement, the other two being Justice P. Sathasivam (who was appointed Governor of Kerala), and Justice Ranjan P. Gogoi (who was appointed member of the Rajya Sabha).
These appointments are all signalling on the part of the government, letting the members of the higher judiciary know that they will be suitably rewarded if they issue favourable decisions. Dangling such a proverbial carrot is akin to corrupting the judges, and encouraging a culture of sycophancy even, as we are increasingly seeing among some judges in the apex court. Worse, this also makes the public have less faith in the judiciary itself. In 1980, Justice V. D. Tulzapurkar had said that “if judges start sending bouquets or congratulatory letters to a political leader on his political victory, eulogising him on assumption of high office in adulatory terms, the people’s confidence in the judiciary will be shaken.”
Chipping away at judiciary
While a Governor’s position may seem largely ceremonial, it is in fact a squarely political appointment. In any event, this appears to be a part of the ruling party’s strategic mission — a long game, if you will — to destabilise the judiciary, chipping away in small and big ways at various aspects of its functioning. If you step back and observe, the judiciary is slowly but surely being subtly weakened.
To be fair, this is not the first government that has ventured so far as to corrupt the judges in this fashion. Congress-led governments, notably under Indira Gandhi and Rajiv Gandhi, have done it too. But it is a cowardly defence that the Opposition party was equally guilty, and past precedent does not justify present transgressions. The larger objective, for any reasonable executive, should be to ensure the independence of the other arms of the governing mechanism, and that democratic values are preserved in all circumstances. However, a conclusively majoritarian mandate can make one heady with power, and compel the exploration of creative ways in which that power can be maintained and consolidated further. This is entirely the case with the Indian government today.
Hypocritical behaviour
The government’s behaviour is also hypocritical for it is deliberately paying no heed to its own manifesto articulated by its late leader, Arun Jaitley, that such post-retirement judicial appointments should be avoided. In fact, ‘inducing the judges’ by such appointments was a specific allegation directed by the Bharatiya Janata Party (BJP) against the Congress-led coalition.
The judiciary is no less culpable in this situation. Ideally, I would like to believe that Indian judges are made of stronger stuff, and not ones to be seduced thus. Judges should show moral responsibility and character, as Justice Akil Kureishi most recently did. After being unceremoniously disregarded for elevation, and shoved across the country to various High Courts, upon retirement, he said that the government’s stated ‘negative perceptions’ about him were a ‘certificate of independence’, and he was leaving the judiciary with ‘his pride intact’.
Judges must recognise that handouts from the government, in the form of such political appointments, are not one-way: there is a giver and there is a receiver. The Indian judiciary must distinguish between political favours and other post-retirement employment opportunities.
Demarcation of roles
There needs to be a demarcation between roles where the presence of a judicial authority is clearly valuable and even necessary, such as in a tribunal or a commission, and where it is not. Justice Gogoi, upon his appointment to the Rajya Sabha, had famously proclaimed that he intended to bridge the gap between the judiciary and the legislature, but his attendance record and public participation in parliamentary affairs suggest nothing of the sort. Similarly, Justice Sathasivam had said he had wanted to serve the people in his role as Governor, but surely, he could have achieved the same objective through other appointments, that would be more befitting of someone who had held the office of the Chief Justice of India.
Ideally, the judicial community should take a concerted decision on this, say, in the Chief Justices’ conference. The plenary should agree that judges should not take up any appointments upon retirement stemming from political patronage (with the nature of such appointments being clearly defined). Additionally, a cooling period of about two years should be considered a mandatory minimum before a judge agrees to take on any post-retirement adjudicatory role, in any case.
Justice Y.V. Chandrachud had said that the greatest danger to the judiciary lies within. Members of the judiciary cannot compromise judicial independence by trading it for a plum post-retirement sinecure. When one becomes a judge, one signs up to fulfil a promise of ensuring a fair and independent judiciary; this promise cannot be compromised at any cost. Our judges need to be gently reminded of this unwritten contract they have with the Indian people.
Date:16-02-23
सहयोग की उड़ानसंपादकीय
तेजी से बदलते वैश्विक परिदृश्य के बीच अब साफ देखा जा सकता है कि विकसित और महाशक्ति माने जाने वाले देशों के बीच भारत अपनी एक सशक्त उपस्थिति दर्ज कर रहा है। वह चाहे अलग-अलग देशों के बीच आर्थिक साझेदारी हो या रूस-यूक्रेन जैसी युद्ध की स्थिति, अमूमन सभी क्षेत्रों में भारत की अहमियत को अब दर्ज किया जा रहा है।
इस क्रम में पिछले दो दिनों में अमेरिका और फ्रांस से विमानों की खरीद को लेकर जो नया समझौता हुआ है, उसे न केवल भारत की मजबूत होती स्थिति, बल्कि अंतरराष्ट्रीय कूटनीति के लिहाज से भी एक बेहद अहम सौदा माना जा रहा है। गौरतलब है कि मंगलवार को भारत अमेरिका और फ्रांस की ओर से एअर इंडिया के चार सौ सत्तर विमानों के सौदे की घोषणा हुई। इसके तहत फ्रांस की एअरबस से ढाई सौ और अमेरिका की बोइंग से दो सौ बीस विमानों का सौदा तय हुआ है। इसमें एक महत्त्वपूर्ण पहलू यह है कि एअरबस के विमान में इस्तेमाल होने वाले इंजन के अलावा अन्य कई हिस्से ब्रिटेन की कंपनी बनाएगी। यानी इस सौदे में एक तरह से ब्रिटेन भी एक अहम पक्ष है।
उड्डयन और विमानन क्षेत्र में इस समझौते को एक बड़ी कामयाबी माना जा सकता है और इसके पूरा होने पर यह तस्वीर और साफ होकर उभरेगी। मगर इससे पहले संबंधित देशों में रोजगार के क्षेत्र में नए अवसरों के पैदा होने की जो उम्मीद बंधी है, वह एक महत्त्वपूर्ण पहलू है। एक तरह से देखें तो विमानों के इस सौदे के साथ भारत ने वैश्विक बिसात पर सबसे ताकतवर दखल रखने वाले दो देशों से एक साथ अपनी साझेदारी को मजबूत करने की कोशिश की है। इसे उड्डयन कूटनीति कहा जा सकता है। इसका संकेत इससे भी मिलता है कि जहां अमेरिकी राष्ट्रपति ने इस समझौते को ऐतिहासिक करार दिया है, वहीं फ्रांस के राष्ट्रपति ने भी भारत के साथ अपने देश के गहरे रणनीतिक रिश्ते में मील का पत्थर बताया। ऐसे में स्वाभाविक ही इसे अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भारत की बढ़ती हैसियत के तौर पर भी देखा जा रहा है। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि भारत अब दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा विमानन केंद्र बनने को तैयार है। यों भी सरकार नागरिक उड्डयन क्षेत्र को मजबूत करने पर ज्यादा जोर दे रही है और पिछले आठ सालों में देश में हवाई अड्डों की संख्या चौहत्तर से बढ़ कर एक सौ सैंतालीस हो गई है।
इसके अलावा, एक अन्य घटनाक्रम में एअरो इंडिया में लगभग अस्सी हजार करोड़ रुपए के दो सौ छियासठ साझेदारियों की भी घोषणा हुई है। साथ ही रक्षा क्षेत्र में काम करने वाली एक जर्मन कंपनी भारतीय हेलिकाप्टरों के लिए बाधा निवारण प्रणाली बनाने के लिए हिंदुस्तान एअरोनाटिक्स लिमिटेड के साथ महत्त्वपूर्ण तकनीकों की पूरी शृंखला साझा करने के लिए तैयार है। यह छिपा नहीं है कि पिछले कुछ सालों के दौरान महाशक्ति माने जाने वाले देशों के बीच किस तरह नए समीकरण खड़े हो रहे हैं। खासतौर पर रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध के संदर्भ में यह ज्यादा साफ उभरा। लेकिन इस दौर में भारत ने जिस तरह अलग-अलग ध्रुवों के बीच संतुलन कायम करने, विरोधी खेमों के बीच संवाद बनाने और युद्ध जैसी जटिल स्थिति में भी हल के रास्ते तैयार करने में एक कड़ी के रूप में अग्रणी भूमिका निभाई है, वह दुनिया के सभी देशों ने देखा। अमेरिका और रूस के बीच मतभेदों के बीच भी भारत ने अपनी स्वतंत्र हैसियत स्पष्ट रखी और इस तरह एक समांतर शक्ति के ध्रुव के रूप में खड़ा हुआ। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विभिन्न खेमों के बीच खींचतान के बीच अपनी कामयाब उपस्थिति दर्ज करने के बाद अब व्यापार के क्षेत्र में भी इस अहम समझौते के जरिए भारत ने अपना कूटनीतिक कौशल दिखाया है। उम्मीद है कि उड्डयन क्षेत्र में हुए इस ऐतिहासिक समझौते के बाद आने वाले वक्त में भारत की छवि और ज्यादा सशक्त रूप में दर्ज होगी।
Date:16-02-23
कृत्रिम बुद्धिमत्ता की दोधारी तलवारअभिषेक कुमार सिंह
दुनिया भर में कई कंपनियां बढ़ती श्रम लागत के मद्देनजर उत्पादन का काफी कामकाज रोबोट और एआइ यानी कृत्रिम बुद्धिमत्ता से लैस मशीनों-कंप्यूटरों के हवाले कर रही हैं। भारत में भी सूचना तकनीक क्षेत्र की दस फीसदी नौकरियों पर ‘आटोमेशन’ यानी खुद काम करने वाली मशीनों के कारण खत्म होने का खतरा मंडरा रहा है। मानव सभ्यता के इतिहास में जिन कुछ चीजों की ईजाद ने इंसान के रहन-सहन का तरीका बदला, उनमें सबसे पहले हजारों साल पहले आग और पहिये के आविष्कार का नाम लिया जाता है। इसके बाद तस्वीर में बड़ा बदलाव औद्योगिक क्रांति यानी मशीनी युग में आया। आज से करीब पचास साल पहले पैदा हुए इंटरनेट को हाल तक इस रूप में देखा जाता था कि अब शायद इससे बड़ा कोई आविष्कार अगली सदियों तक न हो। पर तकनीक की शायद यही सबसे बड़ी खूबी है कि वह हमारी जरूरतों के मुताबिक बदल जाती है। इंटरनेट के मौजूदा दौर में ये परिवर्तन कुछ ज्यादा ही तेजी से हो रहे हैं। इसकी सबसे ताजा मिसाल ‘चैटजीपीटी’ और उसके फौरन बाद अल्फाबेट (गूगल) द्वारा पेश ‘बार्ड’ नामक कृत्रिम बुद्धि वाले दो मंच हैं, जिन्होंने इधर पूरी दुनिया में हलचल मचा दी है। इन्हें लेकर मची सनसनी का एक छोर जहां इस बात से जुड़ा है कि अब मौलिकता का भला क्या मोल रह जाएगा, क्योंकि इनकी बदौलत नकल होना आसान और उसके पकड़ना मुश्किल हो गया है। दूसरे छोर पर यह चिंता है कि कहीं तकनीक (कृत्रिम बुद्धि) इंसानों पर हावी न हो जाए या नकली बुद्धि से लैस मशीनें हमें अपना गुलाम ही न बना लें।
इन चिंताओं का तात्कालिक संदर्भ- सैनफ्रांसिस्को स्थित आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस रिसर्च कंपनी ओपनएआई द्वारा विकसित चैटजीपीटी नामक एक चैटबाट (एक किस्म का कृत्रिम बुद्धि रोबोट) है, जिसे करीब तीन महीने पहले 30 नवंबर 2022 को आरंभिक स्वरूप (प्रोटोटाइप के रूप) में पेश किया गया। अंग्रेजी के शब्द चैटजीपीटी का पूरा नाम चैट जेनरेटिव प्रिट्रेंड ट्रांसफार्मर है। इसका मकसद ‘सर्च इंजन’ गूगल से आगे बढ़कर पूछे गए प्रश्नों के मौलिक हल प्रदान करना है। इसकी कई खूबियों में से एक यह भी है कि यह सवालों के जवाब हर बार नई शैली में और विस्तार से देता है, जिससे वे मौलिक और ऐसे प्रतीत होते हैं कि मानो उन्हें अलग-अलग लोगों ने दिया हो। असल में भारी मात्रा में इंटरनेट आदि से लिए गए डाटा से प्रशिक्षित किए गए चैटजीपीटी की खूबी सीखने की प्रवृत्ति और मानवीय शैली में विकास करना है। इसे ऐसे प्रशिक्षित किया गया है कि जब कोई सवाल पूछा जाता है, तो जवाब में इंसान कैसी प्रतिक्रियाओं की उम्मीद करते हैं।
यही नहीं, चैटजीपीटी किसी कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआइ) क्षमता से लैस एक आम रोबोट से इस मायने में अलग है कि यह पूछे गए प्रश्नों में इंसान की मंशा को समझकर ऐसा उत्तर देता है जो वास्तविकता के करीब हो। ये जवाब लेख जैसी सामग्री के रूप में हो सकते हैं, वैसे नहीं जैसे गूगल पर जवाब में असंख्य वेबसाइटें सुझाव के रूप में आती हैं। कुछ सवालों के उत्तर देने के बजाय चैटजीपीटी प्रतिप्रश्न पैदा कर सकता है और सवाल के उन हिस्सों को हटा भी सकता है, जो उसे समझ में नहीं आते हैं। कुछ मामलों में चैटजीपीटी गलत या आधे-अधूरे तथ्य प्रदान करता है। इसका कारण यह है कि अभी इसमें मार्च 2022 तक की सूचनाओं के आधार पर डाटा भरा गया है। इसमें नया डाटा डालने की प्रक्रिया एक प्रकार से चैटबाट का प्रशिक्षण है।
हालांकि कृत्रिम बुद्धि के आधार पर खोजे जाने वाले मुख्य शब्दों (की-वर्ड्स), जिज्ञासाओं और सवालों को गूगल आदि सर्च इंजन अपनी-अपनी तरह से काफी समय से हल करते रहे हैं। लेकिन गूगल से मिली जानकारी की एक बड़ी सीमा यह थी कि वे प्रस्तुति के आधार पर मौलिक नहीं कही जा सकती हैं। वे एक जैसी होती हैं, इसलिए अगर चार लोग एक ही सवाल का जवाब गूगल से खोजकर देते हैं, तो वे समान होने के कारण पकड़े जा सकते हैं। साथ ही, अनुवाद के मामले में ‘गूगल ट्रांसलेट’ किसी भाषा के गूढ़ भावार्थ का अनुमान नहीं लगा पाता है। इन समस्याओं को चैटजीपीटी में दूर करने की भरसक कोशिश की गई है।
इसकी तारीफ करते हुए जीमेल के जनक पाल बूशीट कह चुके हैं कि ये गूगल के वजूद के लिए सबसे बड़ा खतरा है। पाल ने कहा था कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता पर आधारित चैटजीपीटी सर्च इंजन के ‘रिजल्ट पेज’ को खत्म कर देगा। चैटजीपीटी से से लेखन, पत्रकारिता, सूचना प्रौद्योगिकी (आइटी) समेत दर्जनों नौकरियों के खत्म हो जाने और स्कूल-कालेजों में निबंध, कविता, लेख, शोधपत्र, किताबें आदि में विद्यार्थियों की मौलिकता पर ग्रहण लगने का दावा किया जा रहा है। यानी विज्ञान की एक उपलब्धि, जिसे असल में क्रांति मानना चाहिए, उसे लेकर दुनिया इस तरह भयभीत हो गई है कि उस पर प्रतिबंध लगाने के उपाय खोजे जाने लगे हैं। अमेरिका में कुछ विश्वविद्यालयों में चैटजीपीटी के इस्तेमाल पर पाबंदी लगा दी गई है। न्यूयार्क और सिएटल स्थित कुछ विश्वविद्यालयों-कालेजों में विद्यार्थी अपने स्मार्टफोन और लैपटाप और सर्वर से जुड़े कंप्यूटरों पर चैटजीपीटी नहीं खोल पा रहे हैं। हालांकि इधर गूगल ने भी चैटजीपीटी की चुनौती को देखते हुए ‘बार्ड’ नामक चैटबाट की शुरुआत कर दी है। लेकिन आरंभिक दिनों में ही जेम्स वेब टेलीस्कोप संबंधी एक सवाल का गलत जवाब देने के कारण गूगल को तथ्यात्मक भूल के लिए माफी मांगनी पड़ी, जिससे उसके (कंपनी अल्फाबेट के) शेयरों की कीमतें एक ही दिन में आठ फीसदी तक गिर गए। यों यह सच है कि खुद गूगल को इन चुनौतियों का अहसास काफी पहले से था। दो साल पहले एक साक्षात्कार में गूगल के प्रमुख सुंदर पिचाई ने दावा किया था कि अगले पच्चीस वर्षों में दो चीजें क्रांति करने वाली हैं। पहली है कृत्रिम बुद्धिमत्ता और दूसरी क्वांटम कंप्यूटिंग।
यहां एक गंभीर प्रश्न एआइ के असर से नौकरियों के खत्म होने और इंसान पर मशीनों के हावी होने का भी है। आज से बीस-पच्चीस साल पहले यह दावा किया जाता था कि कंप्यूटर, इंटरनेट के विस्तार और गूगल सर्च इंजन जैसे आविष्कार मौलिकता को समाप्त करते हुए कई तरह की नौकरियों के लिए काल बन जाएंगे। लेकिन विज्ञान की इस तरक्की को अभिशाप ठहराने की कोशिश करने वालों ने देखा है कि इन वैज्ञानिक आविष्कारों और क्रांतियों के बल पर कामकाज आसान हुआ है और नए रोजगारों का सृजन हुआ है। इसलिए चैटजीपीटी के आविष्कार को लेकर बहुत आशंकित होना उचित नहीं लगता। आज दुनिया भर की मशीनें हमारे आसपास हैं, जो एआइ की बदौलत कई जटिल काम सीखकर उनमें इंसानों पर अपनी श्रेष्ठता साबित कर रही हैं। पर किसी कंप्यूटरीकृत कामकाज में मशीन का आगे निकलना इतना खतरनाक नहीं समझा गया, जिससे कि इंसान मशीन के सामने बौना साबित हुआ हो। असली खतरा नौकरियों का ही है।
इसका एक सच यह है कि दुनिया भर में कई कंपनियां बढ़ती श्रम लागत के मद्देनजर उत्पादन का काफी कामकाज रोबोट और एआइ से लैस मशीनों-कंप्यूटरों के हवाले कर रही हैं। भारत में भी सूचना तकनीक क्षेत्र की दस फीसदी नौकरियों पर ‘आटोमेशन’ यानी खुद काम करने वाली मशीनों के कारण खत्म होने का खतरा मंडरा रहा है। वैज्ञानिक स्टीफन, मशहूर कारोबारी एलन मस्क और माइक्रोसाफ्ट के मालिक बिल गेट्स भी कह चुके हैं कि आने वाले वक्त में कारखानों, घरों और दफ्तरों में कामकाजी इंसानों को मशीनों से चुनौती मिल सकती है। यह अकारण नहीं है कि माइक्रोसाफ्ट जैसी कंपनी और एलन मस्क जैसे कारोबारी ‘ओपनएआइ’ की उन परियोजनाओं में खूब पैसा लगाते रहे हैं, जिनसे अक्लमंद मशीनें तैयार की जाएंगी। संकेत साफ है कि अगर इंसान ने खुद को समझदार मशीन से ज्यादा अक्लमंद साबित नहीं किया, तो उसके हाथ का काम छिनने वाला है।
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हाल ही में केंद्रीय कानून मंत्री ने मुख्य न्यायाधीश से लिखित मांग की है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति में कार्यपालिका को भी स्थान दिया जाना चाहिए। फिलहाल यह प्रक्रिया न्यायाधीशों का कॉलेजियम ही संपन्न करता है।
सरकार की मांग के कुछ बिंदु –
यह आश्चर्य की बात है कि सरकार एक ऐसी न्यायपालिका पर लगाम लगाना चाहती है, जो हाल के कुछ वर्षों में सरकार के प्रति काफी उदार रही है। इसका एकमात्र निष्कर्ष यह है कि वर्तमान शासन, इस देश में अपने न्यायाधीशों की नियुक्ति चाहता है। इस कारण ही सरकार न्यायपालिका द्वारा प्रस्तावित नामों पर कई बार पुनर्विचार के बहाने कार्रवाई में देर करती रहती है। चाहे कुछ भी हो, सरकार का ऐसा प्रयास, लोकतांत्रिक कामकाज के लिए सही नहीं कहा जा सकता है। लोकतांत्रिक व्यवस्था को सुचारू रूप से चलाने के लिए नियंत्रण और संतुलन जरूरी है।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 19 जनवरी, 2023
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Date:15-02-23
More Minnus, DraupadisEvery tribal success story is a reminder how much govts need to do for genuine Adivasi empowerment.TOI Editorials
That Minnu Mani, a 23-year-old from the Kurichiya tribe in Kerala, secured a contract in the Women’s Premier League auction is both heart-warming and a reminder. Minnu’s success is a rare story for India’s tribal communities. Sports has discovered some talent among tribals and politics has embraced a few. But data tells the real story. The recently released Tribal Development Report 2022 by Bharat Rural Livelihoods Foundation provides damning statistics. They are 8. 6% of the population, and they fare considerably worse than others when it comes to access to sanitation, drinking water, education and proper nutrition.
The report also says that tribal communities have been pushed farther away from alluvial plains and fertile river basins over the decades, which has had a direct impact on their livelihood. Of the 257 Scheduled Tribe districts in the country, 230 or 90% are in either forested or hilly or dry areas. And past policies like the Forest Conservation Act, 1980 illogically pitted the imperatives of environment protection against the needs of Adivasi communities.
While that approach has been modified and today Adivasis are seen as important stakeholders in forest conservation, on-ground contestations continue. Last year’s amendments to the Forest Conservation Rules have been protested by tribal communities on the ground that they undermine the rights of tribes and forest dwellers over forest resources as envisioned in the Forest Rights Act, 2009. Adivasi activists say the changes make it easier for businesses to divert forest land and make obtaining clearances by commercial entities easier. If true, these provisions have serious implications for tribal welfare.
It’s also true that there has been increasing political courting of tribal communities in recent years. From expanding ST status to new communities to the Adivasi vote becoming a sought-after electoral commodity to India getting its first tribal President in Droupadi Murmu, tribals have emerged as a serious political bloc. But their genuine empowerment will lie in creating opportunities. We need thousands more Minnu Manis and Droupadi Murmus.
Date:15-02-23
Women’s IPL, Valued, Virtuous CycleET Editorials
Water seeks its own level, goes the old adage. The truth is that for anything of value to get its due, systems and mechanisms must be in place. The case of Monday’s Women’s Premier League (WPL) auction is a classic case of value being made not ‘automatically’ but by effort. This applies not just to the rising talent of the cricketers who have been snapped up for good money to play in a new cricket tournament, but also to those who see WPL take a hold on this spectator sports nation. The very fact that three established (men’s IPL) franchises — Mumbai Indians, Delhi Capitals and Royal Challengers Bangalore (RCB) — and two new ones — Gujarat Giants (established Pro Kabaddi League side) and UP Warriorz — put their money in the ring for WPL 2023 shows how demand can — and should — be built up on the back of supply.
Numbers, especially when connected to money, matter. They provide the most objective version of value yet known. Which is why, even as ₹50 lakh was the highest base price, the very first bid had India’s superb opener Smriti Mandhana have Mumbai Indians and RCB locked in a bidding war, which the latter won after picking up Mandhana for ₹3. 4 crore. Dependable money was spent on dependable players — ₹3. 2 crore on Australia’s Ashleigh Gardner and England’s Natalie Sciver by Gujarat Giants and Mumbai Indians respectively. UP Warriorz and Delhi Capitals got Deepti Sharma and Jemimah Rodrigues for ₹2. 2 crore each.
Like in any value-based enterprise, investments are key — in players, in infrastructure, in marketing to garner more interest, in the actual quality of show. The five WPL franchise owners are looking for returns. The inaugural auction has set up a valuable, virtuous cycle that should see the pool of teams expand in the future.
Date:15-02-23
उद्योगों की जरूरत और तकनीकी शिक्षा में गैपसंपादकीय
नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार देश के आईटीआई केन्द्रों (औद्योगिक प्रशिक्षण संस्थान) में प्लेसमेंट की दर एक प्रतिशत से भी कम है। नीति आयोग का मानना है कि ये युवा उस किस्म का प्रशिक्षण नहीं पा रहे हैं, जिनकी उद्योगों को जरूरत है। दरअसल जिस रफ्तार से तकनीकी बदल रही है, उसके मुकाबले संस्थान के अध्यापक खुद उसमें दक्षता हासिल नहीं कर पा रहे हैं। आजादी के बाद औद्योगिक विकास के लिए देश में तकनीकी शिक्षा त्रि-स्तरीय करने की योजना बनी- डिग्री, डिप्लोमा और सर्टिफिकेट कोर्सेज। लेकिन कालांतर में ट्रेनिंग संस्थाएं तकनीकी की रफ्तार के साथ नहीं चल सकीं। एक आईटीआई प्रशिक्षु पर सरकार करीब 1.32 लाख रुपए खर्च करती है। एक अन्य चौंकाने वाला पहलू और देखें । एक प्रमुख अध्ययन संस्था की ताजा रिपोर्ट के अनुसार देश के सबसे मशहूर बॉम्बे आईआईटी से पढ़े अधिकांश इंजीनियर्स जिस कोर्स में शिक्षा पा रहे हैं, उससे अलग गैर-तकनीकी क्षेत्रों की नौकरियों में रुचि ले रहे हैं। या यूं कहें कि औद्योगिक दुनिया उनके ब्रेन का प्रयोग तो कर रही है लेकिन उस क्षेत्र में नहीं, जिनमें उन्हें चार-पांच साल शिक्षा दी जाती है। आईआईटी में प्रवेश के लिए इन युवाओं को जेईई जैसी बेहद कड़ी प्रतियोगी परीक्षा से गुजरना होता है। एक आईआईटी छात्र की चार साल की पढ़ाई पर सरकार का करीब 30 लाख रुपया खर्च होता है। आज टेक्निकल एजुकेशन में मौलिक परिवर्तन की जरूरत है ताकि ये लाखों युवा उद्योगों में प्रयुक्त तकनीकी के अनुरूप शिक्षा पाएं। बेहतर यह होगा कि उद्योगों की सलाह पर और उनके नियंत्रण में ही प्रशिक्षण की रूपरेखा बने और उद्योग के लोग ही उन्हें प्रशिक्षित करें। टीचर्स को भी अपनी उपादेयता के लिए बदलना होगा।
Date:15-02-23
दुनिया के लिए संकटमोचक बनता भारतश्रीराम चौलिया, ( लेखक जिंदल स्कूल आफ इंटरनेशनल अफेयर्स में प्रोफेसर और डीन हैं )
छह फरवरी को तुर्किये और सीरिया मे आए विनाशकारी भूकंप से हुए विध्वंस से पूरा विश्व मर्माहत है। संयुक्त राष्ट्र ने इसे इक्कीसवीं सदी की सबसे बड़ी आपदाओं मे से एक घोषित किया है। हादसे में जान-माल की क्षति और मानवीय पीड़ा इतनी गंभीर है कि शब्दों में उसका वर्णन संभव नहीं लगता। ऐसे विपत्ति काल में दुनिया के कई देशों ने राहत एवं बचाव अभियान में योगदान शुरू किया है। संकट में तो छोटा सा योगदान भी बहुत बड़ा होता है, परंतु जिस प्रचंड आपदा से तुर्किये और सीरिया दो-चार हुए, उसमें आवश्यकता इतनी अधिक थी कि केवल सक्षम देश ही त्वरित एवं प्रभावी सहायता प्रदान कर पाते। गर्व की बात यही है कि ऐसे देशों की सूची में भारत का नाम प्रमुखता से शामिल है। ‘सच्चा मित्र वही, जो समय पर काम आए’ की कहावत को चरितार्थ करते हुए भारत ने तुर्किये के आपदाग्रस्त क्षेत्रों में शुरुआती तीन दिनों में ही 201 बचाव कर्मी और 170 चिकित्सा कर्मी उतारे। केवल अजरबैजान, इजरायल और फ्रांस ने ही बचाव कार्य में भारत से अधिक कर्मी भेजे, जबकि चिकित्सा दलों के मामले में भारत शीर्ष पर रहा। जहां तक भौगोलिक दूरी की बात है तो भारत, तुर्किये और सीरिया से 4,600 किलोमीटर दूर है, जबकि बाकी बड़े मददगार पश्चिम एशिया के या करीबी यूरोप से थे। इसके बावजूद भारत ने जिस तादाद में राहत सामग्री उपलब्ध कराई, अस्थायी अस्पताल स्थापित किए और मलबे मे फंसे पीड़ितों को जीवित निकाला, इससे एक समानुभूतिक, मजबूत और निपुण देश का परिचय मिला। भारत के ‘आपरेशन दोस्त’ ने बिना किसी पंथ, राष्ट्रीयता या राजनीतिक पूर्वाग्रह से ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ के विचार को साकार करते हुए न केवल प्रभावित जनता, बल्कि सरकारों का भी दिल जीता।
बीते कुछ वर्षों के दौरान भारत ने दूसरे देशों में घटित आपदाओं से निपटने में जो दक्षता दिखाई है, उसे विश्व ने सराहा है। 2022 में ‘आपरेशन गंगा’ के तहत भारत ने रूस-यूक्रेन युद्ध के आरंभिक दिनों में ही वहां फंसे तकरीबन 25,000 भारतीयों सहित 18 अन्य देशों के 147 नागरिकों को सुरक्षित बाहर निकाला। उससे पहले 2015 में यमन युद्ध के दौरान भारत ने ‘आपरेशन राहत’ के अंतर्गत कुल 4,640 भारतीय नागरिकों और 41 देशों के 960 विदेशियों को सुरक्षित जगहों तक पहुंचाया। 2011 में लीबिया युद्ध के आरंभिक दौर में ‘आपरेशन सेफ होमकमिंग’ के जरिये 15,000 भारतीय नागरिकों को चंद हफ्तों में ही बचाकर स्वदेश लाया। पड़ोसी देशों में भी जब-जब कोई आपदा आई है, तब-तब भारत संकटमोचक रूप धारण करके बचाव एवं राहत कार्य में अव्वल रहा है। 2004 में हिंद महासागर की सुनामी के समय भारत ने श्रीलंका में ‘आपरेशन रेनबो’, मालदीव में ‘आपरेशन कास्टर’ और इंडोनेशिया मे ‘आपरेशन गंभीर’ जैसे अभियान चलाकर तत्काल राहत पहुंचाकर अपनी सदाशयता का परिचय दिया। इसी प्रकार 2015 में नेपाल में आए भूकंप के छह-सात घंटों के भीतर ही भारत ने ‘आपरेशन मैत्री’ के माध्यम से भरसक सेवा की और 43,000 भारतीयों की सफल निकासी करवाई। यही कारण है कि हिंद महासागर क्षेत्र में भारत को राहत में सबसे पहले पहल करने वाले देश की ख्याति प्राप्त है, क्योंकि आपदा में समय बहुत महत्वपूर्ण होता। जितना समय गंवाया, क्षति उतनी ही अधिक पहुंचती है।
भारत की ऐसी उपलब्धि और प्रतिष्ठा में हमारे सैन्य बलों के अनुकरणीय तालमेल और आपदा से निपटने की पूर्व तैयारियों एवं अभ्यास का अहम योगदान है। देश में जब भी कोई आपदा आती है तो सेना के सभी अंग अपने धैर्य, निपुणता और उत्कृष्ट सेवा भाव से राहत एवं बचाव का दारोमदार संभालते हैं। इसी अनुभव एवं दक्षता के दम पर अंतरराष्ट्रीय आपदाओं में हमारे सैन्य बल अन्य मददगार देशों के मुकाबले एक कदम आगे होते हैं। दूरस्थ देशों में भारतीय सैन्य बल योजनाबद्ध ढंग से मानवीय सहायता प्रदान करते हैं। हालांकि हमारी सेना के तीनों अंगों के बीच ‘संयुक्त कमान’ का गठन अभी शेष है, लेकिन किसी भी आपदा में ये सभी गजब की एकजुटता और तालमेल से काम करते हैं।
मानवीय सहायता और आपदा राहत के मैदान में भारत इसलिए भी अग्रणी देशों में एक है, क्योंकि हमने आपदाओं में ‘नागरिक-सैन्य समन्वय’ के सिद्धांत को अपनाकर उसे लागू किया है। राष्ट्रीय आपदा मोचन बल यानी एनडीआरएफ में पुलिस और अर्धसैनिक बल अक्सर सेना और स्थानीय प्रशासन एवं नागरिकों के साथ तालमेल बनाकर प्रभावी हस्तक्षेप करते हैं। आपदाओं में लाखों लोगों की जान बचाने का श्रेय हमारी इन्हीं संस्थाओं को जाता है, जिन्होंने समाज को साथ लेकर कार्य संचालन की बढ़िया शैली विकसित की है। एक शक्तिशाली लोकतांत्रिक देश होते हुए भारत ही आपदाओं से निपटने के लिए ऐसा अनोखा संयोजन तैयार कर सकता है। चीन स्वयं को मानवीय संकटों में दुनिया के मददगार के रूप में पेश करता है, लेकिन अपने तानाशाही दृष्टिकोण के कारण उसका प्रभाव भारत के मुकाबले कम है।
अंतरराष्ट्रीय आपदाओं में राहत प्रदान करने के मोर्चे पर भारत के शीर्ष पर रहने का एक कारण साफ्ट पावर को लेकर हमारे राजनीतिक नेतृत्व की समझ भी है। किसी दूरदराज के देश में पीड़ितों को बचाकर, उन्हें आवश्यक वस्तुएं मुहैया कराकर हमें क्या मिलेगा? इस प्रश्न का उत्तर साफ्ट पावर और अंतरराष्ट्रीय जनमत में हमारे देश की छवि के विस्तार में निहित है। प्रधानमंत्री मोदी ने तुर्किये और सीरिया को ‘हरसंभव सहायता’ का वादा यह जानते हुए किया कि ऐसी आपदाओं में ‘अच्छे वैश्विक नागरिक’ बनकर दिखाने का मौका मिलता है। आपदा प्रतिक्रिया के सामरिक लाभ भी हैं। अगर किसी देश ने पूर्व में भारत की अनदेखी की या भारत के विरुद्ध रुख अपनाया हो, तो आपदा में मानवीय दृष्टिकोण से राहत प्रदान कर उसके साथ नए सिरे से रिश्ते बनाने का अवसर मिलता है। एक उदार मानवीय शक्ति के तौर पर भारत आज जिस मुकाम पर है, वह एक भावी महाशक्ति का लक्षण ही है। दुनिया भर में फैले ढेर सारे दोस्तों के आधार पर ही भारत अपने विस्तारशील हितों की रक्षा कर सकता है।
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हाल ही में सरकार ने 13 हिमालयी राज्यों और उनके बफर जोन को ध्यान में रखकर ‘पर्वतमाला इनिशिएटिव’ की शुरूआत की है। भारत के बाकी हिस्सों से अखंड रूप से जुड़े इन सीमावर्ती क्षेत्रों के विकास से, राष्ट्रीय सुरक्षा पर सकारात्मक प्रभाव पड़ने की संभावना है।
अभी तक देश के आर्थिक एवं बुनियादी विकास कार्यों से वंचित इन क्षेत्रों के लोगों के लिए यह जुड़ाव शासन, विकास और राष्ट्रीय सुरक्षा पर केंद्रित होगा। इन क्षेत्रों की आवश्यकताओं के अनुरूप बुनियादी ढांचे के विकास के लिए स्थानीय स्थितियों एवं पारिस्थितिकी की चुनौतियों को समझते हुए आगे बढ़ना होगा।
इन क्षेत्रों के लिए आजीविका को बढ़ाने, विद्रोही तत्वों से निपटने के अलावा पर्यटन और कृषि की बढ़ोत्तरी पर ध्यान देकर चलने की नीति तैयार की जा रही है। इसके अलावा पानी, पनबिजली और राजमार्ग जैसे संसाधनों के अंतरराष्ट्रीय साझाकरण को जोड़ने की जरूरत है।
यह दो-तरफा प्रक्रिया होनी चाहिए, जिसमें प्रशासक केवल सरकारी कार्यक्रमों, योजनाओं और सेवाओं को इन क्षेत्रों में पहुंचाने के साथ-साथ इस क्षेत्र के समुदायों से इनपुट लेकर सरकार तक पहुंचाएं। इस प्रकार से इस पहल को अधिक प्रभावी बनाया जा सकता है।
‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 18 जनवरी, 2023
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Date:14-02-23
The 4 Pillars Holding Up India’s Expanding MiddleNiti Aayog CEO argues the middle class has benefited hugely from Modi govt’s less known initiativesParameswaran Iyer
India has seen a booming middleclass emerge onto the national stage. This was enabled by a sharp decline in poverty levels – now down to about 16% of the population. In terms of absolute numbers, about one-third of the population is estimated to have entered the middle-class.
While financial pundits acknowledge the reduction in direct tax rates proposed in the Union Budget as much-needed relief for the middle-class, the story of the Narendra Modi government’s systematic approach to increase middle-class wellbeing over the last eight years is less known.
These successful efforts can be articulated through the 4S framework: Sampannata, Surakshit Bhavishya, Shreshtha Jeevan and Saralta.
Sampannata: Enrichment through inflation control
In the eight years between 2014 and 2022, annual inflation was 4. 6%, compared to 8. 7% during the preceding eight-year time frame. Despite multiple global crises, the CPI was at 5. 7% in December 2022, which was much lower than many G20 countries.
Greater liquidity for the aspirational middle-class demography has also come in the form of lower EMIs. For example, while student loan rates were priced at 14% in May 2014, they fell to about 8% by December 2022. The result of the overall decline in loan rates was that middle-class families found it easier to purchase more houses, cars and also take more loans for the higher education of their children.
The pioneering one-nation one-tax initiative of GST has led to gross savings of an estimated Rs 18 lakh-crore, which works out to an annual household saving of Rs 12,000.
120 million of 380 million beneficiaries of the PM Mudra Yojana were middle-class individuals whoreceived Rs 7 trillion as collateral-free loans. Sound monetary policies and strengthening of the banking system enabled gross NPAs to reduce from 11. 1% in 2017-18 to 5. 8% in 2022-23.
Surakshit Bhavishya: Securing a healthy future
Affordable healthcare and quality education are especially important. On both counts, GoI has moved the needle towards better outcomes. On the higher education front, India has witnessed:
● 353 new universities in the last nine years.
●Opening of 15 new AIIMS and 261 new medical colleges that have assured 77,386 new medical seats at the undergraduate and postgraduate levels.
●41 Indian universities featured in global rankings in 2023 compared to just nine in 2014.
High out-of-pocket medical expenditure can also push a middle-class household back into poverty. Targeted government initiatives in this regard have led to savings of Rs 20,000 crore to the public – whether through 50-90% cheaper generic medicines available at 9,000 Jan Aushadhi Kendras or 87 crore free screenings done at 1. 5 lakh AyushmanBharat Centres.
Shreshta Jeevan: A better life
By 2022, India built 1. 65 lakh kms of national highways and had the second largest road network in the world, after the US, due to a tenfold increase in capital expenditure on roads and bridges, amounting to Rs 15. 6 trillion.
India now has metro connectivity in 20 cities. We are a year away from having the third largest metro network globally. Despite being a late entrant, India has the highest per capita mobile data consumption rate and among the lowest cost of data per GB in the world. Nearly 80% of our 120 crore mobile phone users and 80 crore internet users are expected to receive 5G connectivity within a year, in what will be the world’s fastest 5G roll-out. This will provide tremendous benefits through online education, telemedicine and effective delivery of government services.
Over Rs 18 trillion has been invested in urban schemes that have seen visible improvements in housing, transportation, tap water connections, and waste management. On an average, power is now available for 22 hours against 12. 5 hours in 2015.
Saralta: Hassle-free existence
India’s cashless digital payment ecosystem is hailed as among the best in the world. UPI accounted for 65% of the 7,245 crore digital transactions in 2021-22. Whether it is 140 million users of the DigiLocker facility for paperless certificate authentication, or 70 million users of presence-less digital life certificates, digitalisation has been facilitated by the government and embraced by the middle-class in equal measure.
India’s rising global profile in a multitude of areas has inculcated a new sense of pride among our middleclass. While India’s delivery of basic services to the poor and vulnerable is widely acknowledged, GoI remains equally committed to boosting prosperity for the middle-class through the 4S framework, providing an alternative development model to the world.
Date:14-02-23
Honour of officeThose required to stay away from partisan politics in current role must not be made GovernorsEditorial
A former judge of the Supreme Court of India and a former Indian Army commander are among the new Governors of States appointed by the Centre on Sunday. The Governors of several States and the Lieutenant-Governor of a Union Territory were also shuffled. In recent years, Governors have sought to play a political role in States such as Jharkhand, Kerala, Tamil Nadu and West Bengal, creating a train of controversies. For good reasons, the roles of the military and the judiciary too are topics of interest, particularly with regard to their relationship with the political executive. The executive government’s eagerness to control judicial appointments, besides the debate on the collegium system of judges appointing judges, is evident. It has selectively delayed and accelerated appointments recommended by the collegium, effectively exercising powers that it does not have in appointing judges. The Bharatiya Janata Party (BJP) has also faced charges of using the armed forces to further its political narratives. Earlier too, retired police and intelligence officers went on to occupy Raj Bhavans, but it was the appointment of a retired Chief Justice of India (CJI) as a Governor in 2014 that created a new precedent. Another retired CJI was nominated to the Rajya Sabha, in 2020, raising eyebrows.
The institution of the Governor is a legacy of the British imperial governance structure. The legitimacy of a nominated Governor in a democracy was the topic of a heated debate in the Constituent Assembly, but it was carried on into the new republic nevertheless. The Governor was to act as a dynamic link between the Centre and the State, but the makers of the Constitution were clear that the posts must remain ornamental, except in very narrowly defined situations in which they were allowed discretion in decision-making. Over the decades, the overreach of Governors has become a serious question in Centre-State relations and democracy in general. The dominance of the BJP at the Centre since 2014 has added fresh tensions with the States. The BJP has a vision of national unity that causes anxiety among regional interest groups. The office of the Governor was to be embellished by the personalities of those who would occupy it. Opening it as a post-retirement possibility for those who are required to stay aloof from partisan politics in their current roles, lowers the dignity of the offices that they leave behind and what they go on to occupy.
Date:14-02-23
Hill or city, urban planning cannot be an afterthoughtFrom Joshimath to Panjim, India’s flawed urban journey points to the need for having a multi- generational process in placeFeroze Varun Gandhi is a three-time Member of Parliament from the Pilibhit Lok Sabha constituency in Uttar Pradesh and the author of the new book, ‘The Indian Metropolis: Deconstructing India’s Urban Spaces’
On December 24, 2009, a tunnel boring machine in Joshimath, Uttarakhand, hit an aquifer about three kilometres from Selang village. This resulted in the loss of nearly 800 litres of water per second (enough to sustain the needs of nearly 30 lakh people per day). Soon after, groundwater sources began drying up even as the water flow reduced but never stopped. Meanwhile, Joshimath has no system to manage wastewater. Instead, the large-scale use of the soak-pit mechanism could exacerbate land sinking. Ongoing infrastructure projects (the Tapovan Vishnugad dam and the Helang-Marwari bypass road) may also worsen the situation.
The problem in hilly urban India
Land subsidence incidents in hilly urban India are becoming increasingly common —an estimated 12.6% of India’s land area is prone to landslides, especially in Sikkim, West Bengal and Uttarakhand. Urban policy is making this worse, according to the National Institute of Disaster Management (and highlighted in the National Landslide Risk Management Strategy, September 2019). Construction in such a landscape is often driven by building bye-laws that ignore local geological and environmental factors. Consequently, land use planning in India’s Himalayan towns and the Western Ghats is often ill-conceived, adding to slope instability. As a result, landslide vulnerability has risen, made worse by tunnelling construction that is weakening rock formations.
Acquiring credible data is the first step toward enhancing urban resilience with regard to land subsidence. The overall landslide risk needs to be mapped at the granular level. The Geological Survey of India has conducted a national mapping exercise (1:50,000 scale, with each centimetre denoting approximately 0.5 km). Urban policymakers need to take this further, with additional detail and localisation (1:1,000 scale). Areas with high landslide risk should not be allowed to expand large infrastructure; there must be a push to reduce human interventions and adhere to carrying capacity. Aizawl, Mizoram, is in ‘Seismic Zone V’, and built on very steep slopes. An earthquake with a magnitude greater than 7 on the Richter scale would easily trigger over 1,000 landslides and cause large-scale damage to buildings. But the city has developed a landslide action plan (with a push to reach 1:500 scale), with updated regulations to guide construction activities in hazardous zones. The city’s landslide policy committee is cross-disciplinary in nature, seeking inputs from civic society and university students, with a push to continually update risk zones.
Further, any site development in hazardous zones needs assessment by a geologist (with respect to soil suitability and slope stability) and an evaluation of its potential impact on buildings that are nearby. It may need corrective measures (retention walls), with steps to prohibit construction in hazardous areas. In Gangtok, Sikkim, the Amrita Vishwa Vidyapeetham has helped set up a real-time landslide monitoring and early warning system, with sensors assessing the impact of rainfall infiltration, water movement and slope instability.
Rising flood risk
Flood risk is the second issue. In August 2019, Palava City (Phase I and II) in Dombivli, Maharashtra experienced heavy flooding, leaving residents stranded. Seasonal rain is now increasing in intensity, and the reason for the flooding soon became evident — the township, spread over 4,500 acres, was built on the flood plains of the Mothali river. When planned townships are approved, with a distinct lack of concern for natural hazards, such incidents are bound to occur. There are more examples. Floods in Panjim, Goa, in July 2021, led to local rivers swelling and homes being flooded, leaving urban settlements along the Mandovi affected. Again, urban planning was the issue; the city, built on marshlands, was once home to mangroves and fertile fields, which helped bolster its flood resilience. In Delhi, an estimated 9,350 households live in the Yamuna floodplains, while the UN Intergovernmental Panel on Climate Change report of March 2022 has highlighted the risk Kolkata faces due to a rise in sea levels. The combination of poor urban planning and climate change will mean that many of India’s cities could face devastating flooding.
Flood-proofing India’s cities will require multiple measures: urban planners will have to step back from filling up water bodies, canals and drains and focus, instead, on enhancing sewerage and stormwater drain networks. Existing sewerage networks need to be reworked and expanded to enable wastewater drainage in low-lying urban geographies. Rivers that overflow need to be desilted regularly along with a push for coastal walls in areas at risk from sea rise. Greater spending on flood-resilient architecture (river embankments, flood shelters in coastal areas and flood warning systems) is necessary. Protecting “blue infra” areas, i.e., places that act as natural sponges for absorbing surface runoff, allowing groundwater to be recharged, is a must. As rainfall patterns and intensity change, urban authorities will need to invest in simulation capacity to determine flooding hotspots and flood risk maps.
Looking ahead
Urban India does not have to embrace such risks. Instead, cities need to incorporate environmental planning and enhance natural open spaces. Urban master plans need to consider the impact of climate change and extreme weather; Bengaluru needs to think of 125 mm per hour peak rainfall in the future, as against the current 75 mm. Urban authorities in India should assess and update disaster risk and preparedness planning. Early warning systems will also be critical. Finally, each city needs to have a disaster management framework in place, with large arterial roads that allow people and goods to move freely. India’s urban journey is not limited to an election cycle. It must plan for a multi-generational process.
Date:14-02-23
जजों को गवर्नर बनाना क्या सही परंपरा है?संपादकीय
ब्रिटेन के वेस्टमिन्स्टर मॉडल में लिखित संविधान नहीं है। यहां गवर्नेस का काम मूल्यों और परम्पराओं के प्रति अटूट प्रतिबद्धता से चलता है। यह प्रतिबद्धता सामूहिक और संस्थागत ही नहीं व्यक्तिगत भी होती है। भारत में हमने यह मॉडल तो लिया, लेकिन उसके नैतिक मानदंडों और मान्यताओं की खुलेआम अनदेखी करनी शुरू की। विधायक तो छोड़िए, पूरी पार्टी की पार्टी पैसे और पद के लिए या दबाव में पाला बदलने लगी। राज्यपाल और विधायिकाओं के पीठासीन अधिकारी पार्टी हित में काम करने लगे। सुप्रीम कोर्ट के कुछ न्यायाधीश रिटायरमेंट के चंद दिनों बाद ही आयोगों में जाने की बाट जोहने लगे। लेकिन ये आयोग कहीं न कहीं आम तौर पर उनके कानूनी कार्यों से ही ताल्लुक रखते थे। पर अब देखने में आ रहा है कि सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीशों को राज्यपाल बनाने का सिलसिला शुरू हो गया है। पिछले कुछ दशकों में राज्यपाल का पद बेहद विवादों में रहा है। केंद्र सरकार द्वारा नियुक्ति होने के कारण आज अधिकांश राज्यपालों की छवि केन्द्र के प्रतिनिधि के रूप में उभरी है और अक्सर उनके फैसले सुप्रीम कोर्ट में उलट दिए जाते हैं। इन सब के बीच इन्हीं जजों को रिटायरमेंट के बाद राज्यपाल बनाना न्याय व्यवस्था की गरिमा को कम करता है । जिस जज को पद से हटाने के लिए संविधान ने एक कठिन प्रक्रिया बनाई हो, जज जब गवर्नर बनता है तो गृह मंत्रालय एक फोन कॉल करके या चिट्ठी लिखकर जज को इस्तीफा देने को मजबूर कर सकता है। प्रजातंत्र में लोक – विश्वास और संस्था की गरिमा बनाए रखने के लिए जरूरी है कि जजों को गवर्नर बनाने से बचा जाए।
Date:14-02-23
दुनिया की खाद्य सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण हैं मोटे अनाजसाधना शंकर, (लेखिका भारतीय राजस्व सेवा अधिकारी)
मेरे पति के महाराष्ट्र स्थित गांव के लगभग हर भोजन में भाकरी शामिल होती है। यह गेहूं के बजाय ज्वार से निर्मित रोटी होती है। वास्तव में मोटे अनाज या मिलेट्स प्राचीन समय से ही हमारे खानपान का हिस्सा रहे हैं। हम सभी ने ज्वार, बाजरा, रागी, कांगिनी, कोदो, जौ, कुट्टू जैसे मोटे अनाजों के बारे में सुन रखा है। मिलेट्स पहले ऐसे प्लांट्स थे, जिन्हें भोजन के लिए डोमेस्टिकेटेड किया गया था। आज से पांच हजार साल पहले सिंधु घाटी सभ्यता के लोग भी मोटे अनाजों की खेती करते थे। खाद्य एवं कृषि संस्थान के अनुसार मिलेट्स छोटे बीज वाली उन घासों का समूह है, जिनकी सालाना पैदावार होती है। इन्हें अनाज की फसल के रूप में उगाया जाता है। मुख्यतया इनकी खेती ऊष्णकटिबंधीय क्षेत्रों के रूखे इलाकों में सीमान्त भूमि पर की जाती है। इन्हें लगभग 130 देशों में उगाया जाता है और यह एशिया और अफ्रीका के लगभग आधा अरब लोगों का प्राथमिक भोजन हैं। ये मोटे अनाज उनकी संस्कृति और परम्पराओं का भी गहरा हिस्सा हैं और जिन क्षेत्रों में उनका सांस्कृतिक महत्व है, वहां खाद्य सुरक्षा मुहैया कराने में उनका मुख्य योगदान है। भारत में मोटे अनाज का उत्पादन करने वाले राज्यों में राजस्थान, कर्नाटक, महाराष्ट्र, यूपी, हरियाणा प्रमुख हैं। वर्तमान में भारत एशिया का लगभग 80 प्रतिशत और दुनिया का 20 प्रतिशत मोटा अनाज उत्पन्न करता है।
दीन-दुखियों का यही प्रिय भोजन अब अचानक महत्वपूर्ण हो गया है। इनमें फाइबर, प्रोटीन, विटामिन जैसे भरपूर पोषक पदार्थ होते हैं। ये ग्लुटन मुक्त होते हैं और उन्हें उन जगहों में भी उत्पन्न किया जा सकता है, जहां कम बारिश होती है या जहां मिट्टी की गुणवत्ता अच्छी नहीं है। छोटे किसानों की आमदनी का वे मुख्य जरिया हैं। मिलेट्स जैव-विविधता के संरक्षक भी हैं और जलवायु-परिवर्तन का उन पर ज्यादा असर नहीं पड़ता, जिसके चलते एग्रीफूड सिस्टम्स में आने वाले बदलावों के मौजूदा दौर में उनकी प्रासंगिकता और बढ़ जाती है। दुनिया की खाद्य सुरक्षा में वे कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं, यह अब जाकर समझा जा रहा है।
वर्ष 2018 को भारत में राष्ट्रीय मिलेट्स वर्ष के रूप में मनाया गया था। तब सरकार ने मिलेट्स को न्यूट्री-सीरियल्स घोषित किया था। मिलेट-उत्पादक स्टार्टअप्स को प्रोत्साहन दिया गया था और इस बात के प्रयास किए गए थे कि मिलेट-उत्पादन के प्रशिक्षण पर ध्यान केंद्रित किया जाए। भारत के प्रस्ताव को स्वीकारते हुए अब संयुक्त राष्ट्र संघ ने भी वर्ष 2023 को इंटरनेशनल ईयर ऑफ मिलेट्स घोषित कर दिया है। यानी यह अनाज अब अंतरराष्ट्रीय मंच पर जा पहुचा है!
इससे मिलेट्स के बीजों की गुणवत्ता सुधरेगी, उनकी उपज में विविधता आएगी और उनके सेवन से होने वाले स्वास्थ्य-लाभों के प्रति जनजागरूकता बढ़ेगी। मोटे अनाज को मुख्यधारा का हिस्सा बनाने के लिए नए विचार और रवैए इसके बाद सामने आएंगे। मिलेट्स जी-20 की बैठकों का अभिन्न अंग बनेंगे और प्रतिनिधिमंडलों को न केवल मिलेट्स के स्वाद से परिचित कराया जाएगा, बल्कि किसानों से उनकी भेंट भी होगी और वे स्टार्ट-अप्स के साथ संवाद कर सकेंगे।
वर्ष 2021 में मिलेट्स का वैश्विक बाजार 470 मिलियन डॉलर का था और अनुमान है कि 2026 तक इसकी सकल सालाना विकास दर में 4.5 प्रतिशत की बढ़ोतरी होगी। आशा की जानी चाहिए कि अब भारत के साथ ही दुनिया में भी मोटे अनाज की खपत बढ़ेगी। इससे न केवल भारत बल्कि दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी नए रोजगारों का सृजन होगा, किसानों की आय बढ़ेगी और खाद्य-पोषण सुरक्षा सुनिश्चित की जा सकेगी। भारत की संसद के कैंटीन में पहले ही मिलेट्स से निर्मित विभिन्न व्यंजन परोसे जाने लगे हैं, जिनमें भाकरी, बाजरा खिचड़ी, ज्वार उपमा आदि शामिल हैं। उम्मीद है कि जल्द ही ये दुनियाभर के चमक-दमक वाले रेस्तरांओं और बेकरियों के मेनु का भी हिस्सा बनेंगे। संसद के कैंटीन में मिलेट्स से निर्मित व्यंजन परोसे जाने लगे हैं, जिनमें भाकरी, बाजरा खिचड़ी, ज्वार उपमा आदि शामिल हैं। उम्मीद है कि जल्द ही ये दुनियाभर के चमक-दमक वाले रेस्तरांओं के मेनु का भी हिस्सा बनेंगे।
Date:14-02-23
चीनी जासूसी गुब्बारों की नई सिरदर्दीहर्ष वी. पंत, (लेखक नई दिल्ली स्थित आब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में रणनीतिक अध्ययन कार्यक्रम के निदेशक हैं)
इन दिनों जासूसी गुब्बारे सुर्खियों में छाए हुए हैं। इनकी कड़ियां चीन से जुड़ी हुई हैं। अमेरिका से लेकर कनाडा में इन गुब्बारों के दिखने और उन्हें गिराए जाने की घटनाएं सामने आ चुकी हैं। इससे एक प्रकार के नए शीत युद्ध की आहट सुनाई पड़ रही है। विशेषकर अमेरिका ने जिस प्रकार मिसाइल-लड़ाकू विमानों द्वारा चीनी जासूसी गुब्बारों को उड़ाने और उनके अवशेष वापस न करने का फैसला किया है, उससे दोनों देशों के रिश्तों में कुछ समय से कायम तल्खी और बढ़ गई है। अमेरिकी एजेंसियां इन अवशेषों की गहराई से जांच-पड़ताल कर रही हैं। स्वाभाविक है कि इसके बाद विश्व की दो बड़ी शक्तियों के बीच संबंधों में सुधार की उम्मीदों को झटका लगेगा। यह पूरा प्रकरण भले ही कौतुक से परिपूर्ण रहा, लेकिन उससे कहीं बढ़कर यह वैश्विक राजनीति के कठिन दौर के उन रुझानों की ओर संकेत करता है जहां की तस्वीर वास्तविकता से इतर दिखती है।
अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन का राष्ट्र के नाम वार्षिक संबोधन इसी पृष्ठभूमि में हुआ। हालांकि उनका संबोधन मुख्य रूप से अगले कार्यकाल की अपनी दावेदारी को पुख्ता करने पर ही केंद्रित रहा। बाइडन ने चीनी जासूसी गुब्बारे का विशेष उल्लेख तो नहीं किया, अलबत्ता चेतावनी भरे लहजे में यह जरूर कहा कि, ‘हमने पिछले सप्ताह स्पष्ट कर दिया कि यदि चीन हमारी संप्रभुता के लिए खतरा उत्पन्न करेगा तो हम अपने देश की सुरक्षा के लिए आवश्यक कार्रवाई अवश्य करेंगे और हमने बिल्कुल वही किया।’ स्पष्ट है कि उनका आशय कुछ दिनों पहले दक्षिण कैरोलिना तट के निकट चीनी गुब्बारे पर हुई सैन्य कार्रवाई से था। विदेश मंत्री एंटनी ब्लिंकन ने भी चीनी गुब्बारे को अमेरिकी संप्रभुता के उल्लंघन का मामला बताते हुए कहा कि चीन का ऐसा गैरजिम्मेदाराना रवैया कतई स्वीकार्य नहीं। ब्लिंकन ने अपना बीजिंग दौरा भी रद कर दिया। अमेरिकी खुफिया नीति-प्रतिष्ठान का यही मानना है कि चीन गुब्बारे के जरिये जासूसी कर रहा था और यह चीनी सेना की आकाशीय निगरानी कार्यक्रम का हिस्सा था। इन जासूसी गुब्बारों ने केवल अमेरिका ही नहीं, बल्कि जापान, ताइवान और फिलीपींस को भी निशाना बनाया।
गुब्बारे पर हंगामे के बाद चीन को स्वीकार करना पड़ा कि यह उसका ही था। उसने अमेरिका से अफसोस जताने के साथ ही इस मुद्दे को सुलझाने के लिए सहयोग की पेशकश भी की। हालांकि, चीन इसी बात पर जोर देता रहा कि यह एक सामान्य एयरशिप था, जिसका उपयोग मौसम संबंधी अनुसंधान के लिए किया जा रहा था, जो खराब मौसम के कारण भटक गया। चीन भले जो दावा करे, लेकिन अमेरिका में चीन विरोधी स्वर और मुखर हो गए हैं। डेमोक्रेटिक और रिपब्लिकन दोनों खेमे उस पर सख्त कार्रवाई की मांग कर रहे हैं। बाइडन प्रशासन के लिए यह मामला और चुनौतीपूर्ण होने जा रहा है, क्योंकि उसने बीजिंग के साथ संवाद की कड़ियां जोड़ने में दिलचस्पी दिखाई थी। नवंबर में जी-20 सम्मेलन के दौरान बाइडन और शी चिनफिंग मिले तो उन्होंने माहौल में तल्खी घटाने और टकराव से बचने की इच्छा जताई थी। शी की आक्रामकता और वाशिंगटन के पलटवार के चलते कई वर्षों से चीन और अमेरिका के रिश्ते रसातल की ओर हैं। इसमें हिंद-प्रशांत क्षेत्र और उससे परे वैश्विक ढांचे को प्रभावित करने की मंशा एक अहम पहलू है। जहां ट्रंप प्रशासन ने चीन को रणनीतिक चुनौती देने वाले प्रतिद्वंद्वी के रूप में चिह्नित कर अमेरिकी तंत्र को सतर्क-सक्रिय किया, वहीं बाइडन प्रशासन ने इस चुनौती से निपटने के लिए राज्य-व्यवस्था के विभिन्न विकल्पों का आश्रय लिया।
विभिन्न क्षेत्रों में चीन और अमेरिका के बीच प्रतिस्पर्धा प्रत्यक्ष है। हाल में पेंटागन ने ओकिनावा में एक विशेष मरीन रेजीमेंट बनाने की घोषणा की है। वहीं जापान ने भी अपनी सामरिक रणनीति को नए तेवर दिए हैं। उसने अगले पांच वर्षों के दौरान 320 अरब डालर की लागत से भारी-भरकम सैन्य ढांचे के निर्माण का एलान किया है। इस क्षेत्र में चीनी विस्तारवाद की काट के लिए अमेरिका लंबे समय से एक सशक्त एवं सैन्य रूप से सक्षम जापान की पैरवी करता आया है। अब जापान अप्रत्याशित गति से इस दिशा में कदम बढ़ा रहा है। फिलीपींस में पांच सैन्य ठिकानों तक बढ़ी अमेरिकी पहुंच से भी इस क्षेत्र में वाशिंगटन के सामरिक हितों को मजबूती मिलेगी। चीन और अमेरिका के बीच तकनीकी मोर्चे पर संघर्ष भी तनातनी बढ़ा रहा है। अमेरिकी रणनीतियों के चलते उच्चक्षमता वाले सेमीकंडक्टर बनाने की चीनी क्षमताओं को झटका लगेगा। गत वर्ष अक्टूबर में वाशिंगटन ने चिप निर्माण में आवश्यक सामग्री के चीन को निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था। आपूर्ति शृंखला में दो मुख्य देशों जापान और नीदरलैंड ने भी हाल में अमेरिका के साथ मिलकर चीन के विरुद्ध एक दमदार गठजोड़ बना लिया है। भारत और अमेरिका के बीच प्रौद्योगिकी सहयोग को भी इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए।
जैसे-जैसे चीन और अमेरिका के बीच प्रतिस्पर्धा बढ़ती जाएगी, वैसे-वैसे ‘बैलूनगेट’ जैसे प्रकरण आम होते जाएंगे। प्रमुख शक्तियों के बीच शक्ति को लेकर लगी होड़ ऐसे ही संकटों के जरिये सामने आती है। शीत युद्ध के दौरान अमेरिका और पूर्ववर्ती सोवियत संघ को मुकाबले के कुछ नियम तय करने में काफी समय लग गया था। वहीं अमेरिका-चीन रिश्तों के समीकरण और भी ज्यादा जटिल हैं। उनका आर्थिक रूप से जुड़ाव कायम है। गत वर्ष दोनों देशों के बीच व्यापार नए शिखर पर पहुंच गया। आर्थिक कड़ी को तोड़ना अभी दूर की कौड़ी दिखता है। चीन का आक्रामक एवं एकतरफा व्यवहार दूसरे देशों के साथ उसकी कार्य करने की क्षमता को गंभीर रूप से चोट पहुंचा रहा है। इससे भारत सहित तमाम देशों के समक्ष समस्या खड़ी हो जाती है कि एक ऐसी उदीयमान शक्ति के साथ कैसे तालमेल बिठाएं जिसे पता ही नहीं कि वह असल में क्या चाहती है। गुब्बारा प्रकरण इस समस्या का नया स्वरूप होने के साथ ही चीन की आक्रामक कार्यशैली का सटीक नमूना भी है।
Date:14-02-23
नदी जल योजनाओं पर टकराते सूबेएस श्रीवास्तव, (वरिष्ठ पत्रकार)
आम बजट में कर्नाटक की अपर भद्रा परियोजना के लिए 5,300 करोड़ रुपये देने संबंधी प्रस्ताव ने इसके पड़ोसी राज्यों- आंध्र प्रदेश व तेलंगाना में असंतोष पैदा कर दिया है। जिस बात ने इन दोनों राज्यों को अधिक परेशान किया है, वह है इसे केंद्रीय परियोजना बताना, जिसका अर्थ है कि इसके लिए पूरी रकम दिल्ली देगी। इस साल कर्नाटक में विधानसभा चुनाव होने वाले हैं, इसलिए इसे चुनावी उपहार माना जा रहा है, पर पड़ोसी राज्य इसलिए नाराज हैं, क्योंकि वे अपनी महत्वाकांक्षी बहु-उद्देश्यीय नदी जल परियोजनाओं- तेलंगाना की कालेश्वरम और आंध्र प्रदेश की पोलावरम के लिए अधिक फंड की मांग कर रहे थे, जिसे पाने में वे नाकाम साबित हुए हैं। दोनों ही परियोजनाओं में लागत बढ़ गई है और अब यह एक लाख करोड़ रुपये या इससे अधिक हो गई है।
पोलावरम परियोजना की बात करें, तो यह एक घोषित केंद्रीय योजना है, लेकिन आंध्र प्रदेश को फंड उतनी तेजी से नहीं मिल रहे हैं, जिसके कारण इस परियोजना की गति धीमी पड़ गई है। जबकि, तेलंगाना के मामले में राज्य को केंद्रीय एजेंसियों ने बड़े पैमाने पर कर्ज जरूर दिया है, जिनको स्वीकृत भी किया जा चुका है, फिर भी फंड जारी नहीं होने की शिकायत है।
तीनों राज्यों में नदी जल परियोजनाओं की राजनीति तरह-तरह से चल रही है। कर्नाटक की बात करें, तो राज्य को परियोजना के लिए केंद्र से 12,500 करोड़ रुपये मिलने की उम्मीद है, जिसका मकसद चित्रदुर्ग, चिक्कमगलुरु, दावणगेेरे और तुमकुरु के सूखाग्रस्त जिलों में 2.25 लाख एकड़ जमीन को सिंचाई सुविधा उपलब्ध कराना है। बसवराज बोम्मई की भाजपा सरकार का इरादा इससे चुनावी लाभ कमाना है। सत्ता विरोधी लहर और भ्रष्टाचार के आरोपों का सामना कर रहे मुख्यमंत्री बोम्मई इसके बहाने कांगे्रस की आक्रामक राजनीति को खारिज करने की कोशिश भी कर रहे हैं। आंध्र में जगनमोहन रेड्डी सरकार केंद्र से फैसले से नाखुश है, लेकिन इस मुद्दे को ज्यादा तूल देने में असमर्थ है, क्योंकि वह केंद्र की भाजपा सरकार को नाराज करने का जोखिम नहीं उठाना चाहती। रेड्डी के मुख्य प्रतिद्वंद्वी और तेलुगुदेशम पार्टी के नेता चंद्रबाबू नायडू भी आवाज उठाने में हिचक रहे हैं, क्योंकि वह भी इस बार भाजपा से हाथ मिलाने को बेताब हैं। पड़ोसी तेलंगाना में मुख्यमंत्री के चंद्रशेखर राव जरूर मुखालफत कर रहे हैं और वह इस मुद्दे को आगे बढ़ा सकते हैं, क्योंकि इस परियोजना को धन की कमी का सामना करना पड़ रहा है।
अपर भद्रा जल परियोजना का उद्देश्य तुंगा नदी से 17.40 हजार मिलियन क्यूबिक फीट (टीएमसीएफटी) पानी पंप से भद्रा जलाशय में पहुंचाना है। आंध्र प्रदेश की चिंता है कि यह परियोजना तुंगभद्रा नदी के प्रवाह को प्रभावित कर सकती है, जो इसके दक्षिण में रायलसीमा क्षेत्र से गुजरती है। राज्य के तीन पूर्ववर्ती जिले अनंतपुर, कुरनूल और कडप्पा तुंगभद्रा से ही पानी लेते हैं।
आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और कर्नाटक पहले से ही कृष्णा नदी के पानी के बंटवारे को लेकर आपस में उलझे हुए हैं। आंध्र प्रदेश और तेलंगाना का कहना है कि न्यायाधिकरण ने उनके बीच पानी का बंटवारा नहीं किया है। उनकी नजर में अपर भद्रा को केंद्रीय परियोजना घोषित करना गलत है, क्योंकि पानी की उपलब्धता के बुनियादी कार्य को अंतिम रूप नहीं दिया जा सका है। आंध्र प्रदेश ने इस बाबत एसएलपी दायर कर रखा है, जो पहले से ही सुप्रीम कोर्ट में लंबित है, जबकि तेलंगाना ने खुद इस मामले में अड़ंगा लगाया है। अपर भद्रा परियोजना पर केंद्र की कृपा बरसने से दोनों राज्यों के सिंचाई विशेषज्ञ भी हैरान हैं, क्योंकि पड़ोसी राज्यों के साथ इसे लेकर विवाद है। राजनेता इसकी वजह आगामी चुनाव मानते हैं, और इसे सियासी आवंटन कह रहे हैं। बेशक कर्नाटक को सिंचाई परियोजना की दरकार है, लेकिन वक्त को लेकर उठ रहे सवाल लाजिमी हैं।
बहरहाल, तेलंगाना और आंध्र के लिए बहुत कुछ दांव पर है। चंद्रशेखर राव ने महत्वाकांक्षी कालेश्वरम परियोजना तैयार की है, जिसे दुनिया की सबसे बड़ी लिफ्ट सिंचाई योजना कहा जाता है। इस परियोजना के तहत गोदावरी नदी में 139 मेगावाट के पंप लगाए गए हैं, जो एक किसान द्वारा सामान्य सिंचाई उद्देश्यों के लिए उपयोग किए जाने वाले 0.5 किलोवाट पंप से 3,000 गुना अधिक शक्तिशाली हैं। भेल की भोपाल फैक्टरी में तैयार यह पंप अपने आप में इंजीनियरिंग का चमत्कार माना जाता है। तेलंगाना को अपने लंबित बिलों का भुगतान करना है और वह पावर फाइनेंस कॉरपोरेशन (पीएफसी) से 37,000 करोड़ रुपये व रूरल इलेक्ट्रिफिकेशन कॉरपोरेशन (आरईसी) से 30,000 करोड़ रुपये कर्ज ले रहा है। पूरे प्रोजेक्ट की लागत शुरुआती 35,000 करोड़ रुपये से बढ़कर 55,000 करोड़ रुपये और अब 1.10 लाख करोड़ रुपये हो गई है। पीएफसी और आरईसी ने अब फंडिंग बंद कर दी है, क्योंकि केंद्र ने एफआरबीएम प्रावधान लागू कर दिया है, जो राज्य द्वारा उधार लिए जाने की सीमा तय करता है।
केसीआर की कुछ और भी चिंताएं हैं। इस परियोजना से तेलंगाना में 13 जिलों की 45 लाख एकड़ भूमि को सिंचित और पूरे राज्य को पीने का पानी उपलब्ध किया जाना है। इससे प्रतिदिन लगभग दो टीएमसीएस पानी पंप किए जाने की उम्मीद है, जिसे दूसरे शब्दों में कहें, तो इससे ओलंपिक आकार के दो लाख स्वीमिंग पुल भरे जाएंगे। आंध्र के लिए पोलावरम महत्वपूर्ण है, क्योंकि इससे विशाखापट्टनम, पूर्वी गोदावरी, पश्चिमी गोदावरी और कृष्णा जिलों में सिंचाई की उम्मीद है। 194 टीएमसी जलाशय क्षमता वाले व 129 फीट ऊंचाई वाले बांध को इससे भरा जाएगा। इससे 960 मेगावाट बिजली भी पैदा होने की संभावना है, जो फिलहाल निर्माणाधीन है।
जाहिर है, मेगा सिंचाई परियोजनाएं न सिर्फ तेलंगाना व आंध्र के लिए सियासी रूप से संवेदनशील हैं, बल्कि इनकी आर्थिकी के लिए भी अहम हैं। जब दो मुख्यमंत्रियों- केसीआर और जगन का इतना कुछ दांव पर है, तो स्वाभाविक ही वे चुनावी राज्य कर्नाटक के प्रति केंद्र के उदार रवैये को लेकर खफा हैं। तेलंगाना विधानसभा में बेशक यह मुद्दा उठा है, लेकिन आंध्र की राजनीति एक अव्यावहारिक स्थिति में फंसी हुई है, क्योंकि जगन और चंद्रबाबू, दोनों भाजपा को लुभाने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि किसान संगठन और सामाजिक कार्यकर्ताओं का रुख विपरीत है।
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भारत में होने वाला जी-20 समूह देशों का सम्मेलन न केवल भारत बल्कि समस्त दक्षिणी देशों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसी तर्ज पर सरकार ने हाल ही में दक्षिणी विकासशील देशों के लिए ‘वॉयस ऑफ द ग्लोबल साउथ समिट’ सम्मेलन का आयोजन किया था।
इस आयोजन से जुड़े मुख्य बिंदु –
ऐसा माना जा रहा है कि इस सम्मेलन से दक्षिण देशों में वैश्विक मुद्दों की सामूहिक समझ से और अधिक प्रगति होगी। इस समूह ने कोई साझा या संयुक्त बयान जारी नहीं किया है। लेकिन भारत में होने वाले आगामी जी-20 शिखर सम्मेलन में भारत के माध्यम से ही वैश्विक दक्षिण की आवाज के रूप में इसे सुना जा सकेगा।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 17 जनवरी 2023
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Date:13-02-23
Moving With TimesSC’s flexible approach to interpreting the Constitution has enhanced its relevance to governanceTOI Editorials
A decision by a five-judge bench of the Supreme Court last week highlighted the universal debate on how a country’s Constitution should be interpreted. Should it be viewed through the prism of originalism, a theory which advocates sticking to an interpretation of the Constitution’s drafters? Or, should it be seen as a living constitution where interpretation adapts to changes in society? SC weighed on the side of a living constitution when considering the right of a religious community to excommunicate followers in a writ petition filed by the Central Board of Dawoodi Bohra community even though it referred the matter to a larger bench.
In making its case, the five-judge bench observed that the idea of freedom is not static. Therefore, judicial interpretation needs to keep pace with changing social mores. SC’s observations on the living constitution approach make sense. India’s jurisprudence shows that SC has used this approach to allow for a gradual change in the way constitutional principles are understood and applied by both the legislature and executive. It’s a pragmatic approach because the first draft of the Constitution could not have conceived of every scenario. The gaps have been interpreted in the light of social and economic changes.
Consider four different judgments across five decades. First, the Kesavananda Bharati case in 1973 led to the establishment of the basic structure doctrine which ensured a parliamentary majority would not lead to constitutional amendments that could undermine its essence. It remains the most important judgment till now. A couple of decades later the Vishaka case led the apex court to frame guidelines to prevent sexual harassment in the workplace. Here, the court was ahead of the legislature in responding to a big social and economic change.
In 2010, another case involving Reliance Industries concluded that government control over natural resources overrode private agreements. This judgment allows the state to continue exercising a tight grip on key areas of economic activity. Finally, with the transition from physical to digital models underway, a nine-judge bench in 2017 delivered a unanimous verdict recognising the right to privacy as fundamental. Many landmark verdicts reflect underlying changes in society. It works better than originalism, a popular approach in the US that has led to indefensible laxity on firearm proliferation. In India, a flexible approach toa interpretation has gradually allowed individual rights to come to the fore.
Date:13-02-23
Lithium, A Welcome Energy LodestoneET Editorials
The substantial lithium resource — 5. 9 million tonnes of it — found in Jammu and Kashmir is good news for India’s clean energy transition. Determining the size of the usable reserve, developing the mine and producing the lithium will take time. As it works on the J&K find, GoI must develop a critical minerals strategic plan that assesses needs, secures supplies, develops technologies for efficient extraction and recovery from secondary sources. It must invest in innovation, R&D of alternative energy storage solutions, substitute materials and designing high resource-efficient products. The requisite policy frameworks, incentives and leveraging public funds for investments must be put in place.
The J&K resource is the second find. In 2021, preliminary surveys on surface and limited sub-surface by the Atomic Minerals Directorate for Exploration and Research identified about 1,600 tonnes of lithium resources in Karnataka. In 2021-22, the Geological Survey of India took up five projects on lithium and associated minerals in Arunachal Pradesh, Andhra Pradesh, Chhattisgarh, J&K and Rajasthan. Critical minerals crucial for clean energy, automation and digitalisation are concentrated in few regions, and their processing in fewer still. Policy and institutional frameworks, and mechanisms for improved surveying are crucial. A robust set of environmental safeguards for mining is needed. Securing supplies for energy security is critical. Besides partnerships and agreements, a system of recovery from secondary sources through recycling is necessary.
Finding lithium should not foreclose other options. India must develop alternative energy storage options. This is crucial for energy security and an equitable clean energy transition.
Date:13-02-23
India-U.S. space cooperation, from handshake to hugOvercoming the structural barriers can lead to a deeper and long-term partnership in the new space agePranav R. Satyanath is a research analyst at the Takshashila Institution.
India and the United States agreeing to advance space collaboration in several areas, under the ‘initiative on critical and emerging technology’ umbrella, including human space exploration and commercial space partnership, comes at a crucial time for both countries. This follows from the eighth meeting of the U.S.-India Civil Space Joint Working Group (CSJWG), that was held on January 30-31, 2023.
In November 2022, the U.S. kicked off its Artemis programme by launching the Orion spacecraft towards the moon and bringing it safely back to earth. India itself is set to embark on its first human spaceflight mission (Gaganyaan) in 2024. The two countries have also taken significant strides in advancing the private space sector. Together, these endeavours will shape and impact U.S. and Indian space policies and programmes over the next decade. In this context, a U.S.-India collaboration seems straightforward. India could secure technologies and expertise by collaborating with an advanced spacefaring nation; the U.S. could strengthen its relationship with India on a matter that seems less controversial than others.
But it is not straightforward: certain structural factors limit the extent to which the U.S. and India can collaborate in the short term. This is why India-U.S. cooperation can advance at a measured pace, to enable sustainable long-term civilian and military space partnerships.
A mismatch in interests, capabilities
The first structural factor that limits long-term India-U.S. space cooperation is the mismatch in the two nations’ interests in outer space. The U.S. has committed to returning to the moon — and this time to stay there for the long term. Although the U.S. and its partners stress the importance of maintaining capabilities in low-earth orbit, their ambitions are firmly set on the moon. In this regard, the Artemis Program, the Artemis Accords, and the Biden administration’s National Cislunar Science & Technology Strategy constitute the foundation for American ambitions beyond earth orbits.
Meanwhile, India’s scientific community focuses on building the nation’s capability in and under earth orbits. The Indian Space Research Organisation (ISRO) currently undertakes fewer than 10 launches each year. The Gaganyaan human spaceflight programme hopes to sustain India’s human presence in space for the long term. This is not to say that India does not aim for the moon, Mars or beyond. But India’s top priority is to substantially increase its satellite and launch capabilities in earth orbits and catch up with other spacefaring nations such as China.
The asymmetry in capabilities is the second structural factor limiting India-U.S. space cooperation. The U.S. has the highest number of registered satellites in space. It also has a range of launch vehicles serving both commercial and national-security needs. Private entity SpaceX, for example, managed to achieve a record 61 launches in 2022, far higher than the number of launches undertaken by any other commercial entity or country. The American private sector has also assumed the challenge of replacing the International Space Station by 2030 with many smaller stations.
The greatest challenge for India here is lack of capacity. The country has just over 60 satellites in orbit and cannot undertake double-digit launches annually. The Indian government also opened the space industry to the private sector only in 2020. Since the U.S. already has an extensive network of partners for space cooperation, it has few technical incentives to cooperate with India.
Compounding these problems are disagreements on how best to govern space activities on the moon and other celestial bodies. Even though countries have a mindset to collaborate, the structural factors overpower diplomatic incentives to pursue long-term cooperation.
Some novel solutions
The standard solution to induce long-term cooperation is to sustain the engagement between academics, the private sector and state-led entities in the two countries. Sustained engagement could also take the form of collaborating on highly specialised projects such as the NASA-ISRO Synthetic Aperture Radar (NISAR) mission.
But these solutions are slow and not entirely suited for the new space age, where diplomacy struggles to keep up with the rate of technological innovation. So, India and the U.S. must find novel solutions to cooperate in the new space age to achieve a meaningful partnership.
One form of cooperation is a partnership between state and private entities; or, as agreed in the most recent meeting, a convention of American and Indian aerospace companies to advance collaboration under the National Aeronautics and Space Administration’s (NASA) Commercial Lunar Payload Services (CLPS) programme. Such an arrangement could be taken further. India could send its astronauts to train at American private companies. This could help India reduce its dependence on Russia while ISRO builds its own astronaut training centre.
Another novel arrangement could be a consortium led by the government-owned NewSpace India Limited which involves private companies in the U.S. This setup could accelerate India’s human spaceflight programme and give the U.S. an opportunity to accommodate Indian interests in earth orbits.
Date:13-02-23
निवेशक का हितसंपादकीय
अडाणी समूह पर ‘हिंडनबर्ग रिसर्च’ का खुलासा सामने आने के बाद स्वाभाविक ही आर्थिक हलकों में एक तरह की अनिश्चितता और उथल-पुथल देखी जा रही है। इसमें अडाणी समूह को हुए तात्कालिक नुकसान से जाहिर है कि उसके कारोबार को लेकर विश्वसनीयता में तेज गिरावट आई है। मगर इस सबके बीच अहम पक्ष यह है कि अडाणी समूह के कारोबार पर भरोसा करके पैसा लगाने वाले आम निवेशकों की पूंजी कितनी सुरक्षित है या फिर उस पर कितना जोखिम है। इसी के मद्देनजर दो जनहित याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सर्वोच्च न्यायालय ने शेयर बाजार में निवेशकों को हुए नुकसान पर चिंता जताई। साथ ही अदालत ने केंद्र सरकार और भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड यानी सेबी से पूछा कि मौजूदा नियामक तंत्र को कैसे मजबूत किया जाए, ताकि भविष्य में निवेशकों के हित को सुरक्षित रखा जा सके। गौरतलब है कि हिंडनबर्ग की रिपोर्ट आने के बाद बाजार में मची उथल-पुथल के बीच अडाणी समूह के शेयरों की कीमतों में लगातार गिरावट आ रही है और कंपनी के मूल्य में भारी कमी आई है।
यह जगजाहिर तथ्य है कि आज बाजार का जो स्वरूप हो चुका है, उसमें पूंजी भारत से निर्बाध रूप से कहीं भी आ-जा रही है। एक तरह से ज्यादातर लोग अब बाजार में हैं और ऐसे में सबसे ज्यादा जोखिम में वह आम निवेशक है, जो भरोसा करके कहीं भी कुछ निवेश करता है। अगर इस समूची गतिविधि में निवेशकों के हित की सुरक्षा के लिए कोई मजबूत तंत्र नहीं होगा, तो यह ढांचा ढह सकता है और इसका सबसे ज्यादा नुकसान आम लोगों को ही होगा। इस लिहाज से देखें तो निवेशकों के पक्ष से सुप्रीम कोर्ट का यह सवाल वाजिब है कि हम कैसे सुनिश्चित करेंगे कि वे सुरक्षित हैं और भविष्य में ऐसा फिर नहीं होगा। यों सेबी ने अदालत को बताया है कि बाजार नियामक और अन्य वैधानिक निकाय आवश्यक कार्रवाई कर रहे हैं, मगर अर्थतंत्र और शेयर बाजार की जटिलताओं को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि इस संबंध में एक सुचिंतित व्यवस्था की जरूरत तुरंत है। दरअसल, ‘हिंडनबर्ग रिसर्च’ की रिपोर्ट में अडाणी समूह पर पूंजी और कंपनी के आंकड़ों से जुड़ी अनियमितताओं के जैसे आरोप लगाए गए, उसे अडाणी समूह ने दुर्भावनापूर्ण बता कर खारिज कर दिया। मगर सिर्फ इतने भर से इसके कई तरह के असर सामने आने तय हैं।
शायद इसी तरह की आशंकाओं के मद्देनजर अदालत की पीठ ने निवेशकों की सुरक्षा के लिए मजबूत नियामक तंत्र को लागू करने के अलावा एक विशेषज्ञ समिति का भी प्रस्ताव रखा है, जिसमें प्रतिभूति क्षेत्र, अंतरराष्ट्रीय बैंकिंग क्षेत्र के विशेषज्ञ और एक पूर्व न्यायाधीश के रूप में मार्गदर्शक व्यक्ति शामिल हो सकते हैं। ‘हिंडनबर्ग रिसर्च’ की रिपोर्ट का असर कितने वक्त रहेगा और किस अन्य रूप में सामने आएगा, कहा नहीं जा सकता। लेकिन अब तक बाजार में जो उतार-चढ़ाव हुआ है, उसकी जटिलताओं पर बहुत ज्यादा ध्यान नहीं देने की वजह से सामान्य निवेशकों को इसका खमियाजा उठाना पड़ सकता है। इसके अलावा, यह भी माना जा रहा है कि संबंधित बैंकों और सेबी को भी इससे नुकसान हो सकता है। हालांकि इसका दूसरा पक्ष यह भी है कि अतीत में ऐसे मामलों के बावजूद शेयर बाजार संभला है। इसी संदर्भ में आम निवेशकों के हित में सुप्रीम कोर्ट ने जो सवाल उठाए हैं, अगर उसका कोई स्पष्ट हल सामने आता है, तो मौजूदा मुश्किलें दूर करने में मदद मिल सकती है।
Date:13-02-23
श्रमबल में महिलाओं की जगहनृपेंद्र अभिषेक नृप
किसी भी देश के विकास का पैमाना इस बात से भी तय होता है कि उसमें महिला श्रमबल की भागीदारी कितनी है। भारत में पिछले कुछ दशकों में महिलाओं ने भले कई क्षेत्रों में उल्लेखनीय योगदान दिया है, लेकिन समाज के साथ-साथ श्रम भागीदारी में आज भी उनकी स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। हमारे यहां महिला को सिर्फ घर संभालने वाले सदस्य के तौर पर देखा जाता है, जबकि पुरुष को कमाऊ सदस्य के तौर पर। यानी प्राचीन समय से चली आ रही लिंगभेद की परंपरा अब भी बरकरार है और लगता नहीं कि यह पूरी तरह खत्म हो सकेगी।
हालांकि बीते दो दशक में वैश्विक स्तर पर महिलाओं की शिक्षा के स्तर में उल्लेखनीय वृद्धि दर्ज हुई है, साथ ही प्रजनन दर में गिरावट देखने को मिल रही है। इन दोनों कारकों के चलते दुनिया भर में वैतनिक श्रमबल में महिलाओं की भागीदारी काफी बढ़ी है। हालांकि भारत के मामले में स्थिति सामान्य और स्पष्ट नहीं है। भारत का सामाजिक ढांचा शुरू से ही अलग रहा है, जिसमें महिलाओं को घर की दहलीज लांघने के लिए भी संघर्ष करना पड़ता है।
फिर भी आवधिक श्रमबल सर्वेक्षण 2018-19 के मुताबिक पंद्रह वर्ष से अधिक आयु वर्ग की महिला श्रमबल भागीदारी दर (एलएफपीआर) ग्रामीण क्षेत्रों में तकरीबन 26.4 प्रतिशत और शहरी क्षेत्रों में 20.4 प्रतिशत है। बीते वर्षों में लैंगिक समानता की दिशा में सरकार द्वारा किए गए प्रयासों को कोरोना महामारी ने काफी प्रभावित किया है, जिसके चलते महिलाओं और लड़कियों के समक्ष मौजूद असमानता की गहरी खाई और चौड़ी हुई है।
विश्व स्तर पर देखें तो लगभग आधी महिला आबादी काम करती है। हाल ही में कई देशों में महिला श्रमबल में वृद्धि के कारण रोजगार में महिला और पुरुषों के बीच का अंतर कम हुआ है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन द्वारा जारी रिपोर्ट ‘विश्व रोजगार और सामाजिक दृष्टिकोण-रुझान 2020’ में यह बात सामने आई है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत के अलावा पाकिस्तान, बांग्लादेश और उत्तरी अफ्रीका के देशों- मोरक्को, मिस्र और ट्यूनीशिया में भी यही स्थिति है।
सामाजिक स्तर पर महिलाओं की खराब स्थिति के चलते ही उनका रोजगार जनसंख्या औसत भी बेहद खराब श्रेणी में है, जो खुले तौर पर लैंगिग असमानता को प्रदर्शित करता है। फिर भी, भारत की बाजार अर्थव्यवस्था में महिलाओं की भागीदारी के रुझान इसके विपरीत दिशा में बढ़ रहे हैं। तीव्र प्रजनन क्षमता के बावजूद, महिलाओं द्वारा शिक्षा अर्जित करने में व्यापक वृद्धि हुई है और पिछले दो दशक में पर्याप्त आर्थिक विकास हुआ है, फिर भी काम करने वाली भारतीय महिलाओं की हिस्सेदारी समय के साथ कम हो गई है।
भारत को रोजगार के क्षेत्र में लैंगिक समानता प्राप्त करने के लिए बड़े पैमाने पर प्रयास करने की जरूरत है। इन प्रयासों में आर्थिक अवसर, कानूनी संरक्षण और भौतिक सुरक्षा जैसे कारक सम्मिलित होंगे। गौरतलब है कि महिलाएं पहले से हमारी अर्थव्यवस्था का हिस्सा हैं और अनौपचारिक क्षेत्र में कम पारिश्रमिक वाली नौकरियां कर रही हैं। ऐसे में उनमें उचित कौशल निर्माण को प्राथमिकता देने की आवश्यकता है।
भारत सरकार कौशल प्रशिक्षण पर जोर देती रही है। महिलाएं शहर के लिए आवश्यक कुछ सेवाएं प्रदान करने की दृष्टि से उपयुक्त हैं। हालांकि महिलाओं को काम के परंपरागत क्षेत्रों तक ही सीमित रखने का कोई कारण नहीं है। वे अगर उचित कौशल से युक्त हों, तो उनमें परंपरगत रुकावटों को दूर करने और नए रोजगार में खुद को बेहतर साबित करने की स्वाभाविक योग्यता होती है।
राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था चूंकि शहरों पर आधारित होती जा रही है, इसलिए महिलाओं के लिए रोजगार के अवसरों का सृजन भी मजबूरन शहरों को केंद्र में रखकर ही करना पड़ेगा। मगर अगर सरकार का उद्देश्य अपने कार्यबल में महिलाओं का काफी बड़ा अनुपात शामिल करना है, तो अपने यहां शहरी सेवाओं में मौजूद खामियों को दूर करना होगा। महिलाओं को ग्रामीण अर्थव्यवस्था से भी जोड़ना होगा।
जिन महिलाओं का संपर्क शहरों तक नहीं हो पाता, उनके घर के पास और उनकी इच्छा की समयावधि में काम को तरजीह देनी चाहिए। इसके लिए पहले से महात्मा गांधी रोजगार गारंटी अधिनियम के तहत उन्हें पहले से तय मजदूरी की दर पर सौ दिनों का रोजगार देने का प्रावधान है। मगर 2018 में एक सर्वेक्षण से पता चला कि ऐसे कामों में महिलाओं की भागीदारी कम हो रही है। ग्रामीण समाज में यह अधिक स्पष्ट तौर पर दिखता है। परिवार का आकार घटने और दबाव में ग्रामीण पुरुषों के होने वाले पलायन की वजह से महिलाओं के बगैर भुगतान वाले काम बढ़ गए हैं। ओईसीडी की रिपोर्ट के मुताबिक भारतीय महिलाएं हर दिन औसतन 352 मिनट घरेलू कामों में लगाती हैं। पुरुष बगैर भुगतान वाले काम में जितना वक्त लगाते हैं, उसके मुकाबले यह 577 फीसद अधिक है। यह आपूर्ति की समस्या है, जिसका समाधान किया जाना चाहिए।
अक्सर देखा गया है कि इसकी मार गरीबों पर अधिक पड़ती है। बगैर भुगतान वाले कार्यों में लगी होने की वजह से महिलाएं रोजगार के लिए जरूरी शिक्षा और कौशल हासिल नहीं कर पाती हैं। इससे वे कार्यबल से लगातार बाहर बनी रहती हैं। ऐसे में बुजुर्गों और बच्चों की देखरेख के लिए आश्रय बनने चाहिए, ताकि श्रमबल में महिलाओं की भागीदारी बढ़ सके। ग्रामीण भारत में इस समस्या के समाधान के लिए यह जरूरी है कि श्रमिकों की मांग से संबंधित समस्याओं का समाधान किया जाए। साथ ही इसके लिए लैंगिक जरूरतों के हिसाब से नीतियां बननी चाहिए, ताकि महिलाओं पर बगैर भुगतान वाले कार्यों का बोझ कम हो। इसका समाधान किए बगैर श्रमबल में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना आसान नहीं होगा।
अक्सर महिलाओं का काम करना हमारे पुरुष प्रधान समाज में उनके पति की असमर्थता के रूप में देखा जाता है। इसके अलावा भारतीय समाज में ऐसी रूढ़िवादी धारणा भी काफी प्रबल है, जो यह मानती है कि एक महिला का स्थान केवल घर और रसोई तक सीमित है और अगर वह सामाजिक रूप से स्वीकृत दायरे से बाहर कदम रखती है, तो इससे हमारे सांस्कृतिक और सामाजिक मूल्यों पर गहरा प्रभाव पड़ेगा।
भारत में महिलाओं के रोजगार के लिए कृषि भी एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्र रहा है, मगर पिछले तीन दशकों में देश में कृषि-रोजगार में भारी गिरावट देखने को मिली है। ऐसे में अक्सर लोग कृषि से हटकर अनौपचारिक और आकस्मिक रोजगार की ओर पलायन कर रहे हैं, जहां काम काफी छिटपुट और प्राय: तीस दिनों से भी कम का होता है। कई अवसरों पर यह देखा जाता है कि जो महिलाएं श्रम बल में शामिल भी हैं, वे अपने रोजगार की प्रकृति के कारण देश के अधिकांश श्रम कानूनों के दायरे से बाहर रहती हैं, इसमें हाल ही में पारित सामाजिक सुरक्षा संहिता भी शामिल है।
अर्थव्यवस्था में महिलाओं की पूर्ण भागीदारी और समावेशन सुनिश्चित करने के लिए उनके समक्ष मौजूद बाधाओं को दूर किए जाने की आवश्यकता है, जिसमें श्रम बाजार तक पहुंच और संपत्ति में अधिकार सुनिश्चित करना और लक्षित ऋण तथा निवेश आदि शामिल हैं। कोरोना महामारी ने पुरुषों से अधिक महिलाओं के रोजगार को प्रभावित किया है। श्रमबल में हिस्सेदारी करने वाली महिलाओं के लिए समान अवसर सुनिश्चित करने हेतु मजबूत और सम्मिलित प्रयास किए जाने की आवश्यकता है, जिसमें महिलाओं के लिए परिवहन, सुरक्षा और छात्रावास की सुविधाएं उपलब्ध कराने के साथ-साथ बच्चों की देखभाल और मातृत्व लाभ जैसे सामाजिक सुरक्षा प्रावधान किया जाना शामिल है।
Date:13-02-23
मिल गया ‘खजाना’संपादकीय
लीथियम ऐसा खनिज पदार्थ है, जिसने आज दुनिया में कई देशों किस्मत बदल दी है। 21वीं सदी में ऊर्जा का यह ऐसा भंडार है जो जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता को खत्म कर दुनिया को ग्लोबल वार्मिंग से बचाने में मदद कर रहा है। लीथियम आयरन बैटरियों के माध्यम से यह पूरी दुनिया के परिवहन क्षेत्र में विद्युत चालित वाहनों की क्रांति का सूत्रपात कर चुका है, और सोलर पैनल, मोबाइल, लैपटॉप और बिजली के अन्य सामानों के क्षेत्र में पूर्ण परिवर्तन ला रहा है। भारत को लीथियम के लिए अभी तक ऑस्ट्रेलिया और अर्जेंटीना पर निर्भर रहना पड़ता था, लेकिन यह निर्भरता अब खत्म हो जाएगी क्योंकि जम्मू-कश्मीर में लीथियम का खजाना हाथ लग गया है। जियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (जीएसआई) ने पुष्टि की है कि रियासी जिले के सलाल-हैमाना इलाके में करीब 59 लाख टन लीथियम का भंडार मौजूद है। देश में रियासी लीथियम खनन की पहली साइट होगी। 62वीं केंद्रीय भूवैज्ञानिक प्रोग्रामिंग बोर्ड की बैठक में लीथियम और सोना समेत 51 खनिज ब्लॉकों पर रिपोर्ट राज्य सरकारों को सौंपी गई। खनन सचिव के मुताबिक देश में पहली बार जम्मू- कश्मीर के रियासी में लीथियम के भंडार की खोज की गई है। अब सोलर पैनल, मोबाइल और ईवी समेत कई अन्य उपकरणों की बैटरी बनाने में इस खनिज की आवश्यकता होती है। जीएसआई की रिपोर्ट सौंपी में 51 खनिज ब्लॉकों की जानकारी दी गई है। इनमें से 5 ब्लॉक सोने से संबंधित हैं। ये ब्लॉक 11 राज्यों जम्मू और कश्मीर, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़, गुजरात, झारखंड, कर्नाटक, मध्य प्रदेश, ओडिशा, राजस्थान, तमिलनाडु और तेलंगाना हैं। इनमें लीथियम और सोने के अलावा पोटाश, मोलिब्डेनम, बेस मेटल आदि शामिल हैं। रिपोर्ट के अनुसार जम्मू कश्मीर में लीथियम के अलावा मैग्नासाइट, सैफायर, चूना पत्थर, जिप्सम, मारबल, ग्रेनाइट, बॉक्साइट, कोयला, लिग्नाइट, स्लेट, क्वार्टजाइट, बोरेक्स, डोलोमाइट, चाइना क्ले और ग्रेफाइट भी मौजूद हैं। इसका अर्थ यह हुआ कि अपनी उपद्रवग्रस्त स्थिति के कारण जिस क्षेत्र की सुरक्षा और विकास पर भारत को अपने संसाधन झोंकने पड़ते थे वह इलाका आने वाले वक्त में अपने ही नहीं अपितु पूरे देश के विकास नई कहानी लिखने में सहायक होगा।
Date:13-02-23
तार्किक और समसामयिक भीनवल किशोर
बिहार में जातिगत सर्वे की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। वैसे समूचे देश में इस कवायद की मांग कुछ राजनीतिक दल कर रहे हैं। बिहार ने इस दिशा में पहल कर दी है, जिसे लेकर पक्ष-विपक्ष में राजनीतिक प्रतिक्रियाओं कारण चरम पर है। बिहार में जातिगत सर्वेक्षण को दो चरणों में पूरा किया जाएगा। पहले चरण में हर एक घर और घर में रहने वाले सदस्यों की उपस्थिति दर्ज होगी; और दूसरे चरण में 26 सवालों के माध्यम से हरेक व्यक्ति के सामाजिक- आर्थिक आंकड़े अंकित किए जाएंगे। इसमें जाति, धर्म, व्यवसाय के साथ निवासियों से जुड़ी अन्य जानकारी भी सूचीबद्ध की जाएंगी। पांच लाख से अधिक कर्मचारियों के सहयोग से यह कार्य मई महीने के अंत तक पूर्ण करने की लक्ष्य निर्धारित किया गया है। ज्ञात हो कि केंद्र सरकार द्वारा मनाही के बाद राज्य सरकार ने अपने खर्च पर जातिगत सर्वे कराने का निर्णय लिया था जिसमें लगभग पांच सौ करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं।
राज्य के सभी दल इस निर्णय में शामिल थे और इसके पक्ष में विधानमंडल दो-दो बार सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर केंद्र को भेज चुका था। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा है कि राज्य की जनसंख्या की सामाजिक-आर्थिक जानकारी शीघ्र ही उपलब्ध होंगी और ये आंकड़े केंद्र सरकार को भी भेजे जाएंगे। उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने इसे ऐतिहासिक कदम बताते हुए इसे लगातार रोकने के लिए भाजपा को गरीब- दलित विरोधी बताया। वहीं नेता प्रतिपक्ष विजय कुमार सिन्हा ने इसे करदाताओं के पैसे की बर्बादी बताया और कहा कि इससे जातियों के बीच तनाव पैदा होंगे। कई मीडिया चैनल इसे मंडल – कमंडल के चश्मे से भी देखने की कोशिश कर रहे हैं, और इसके राजनैतिक इस्तेमाल पर चर्चा करने-कराने में व्यस्त हैं। आम तौर पर जानकारी और आंकड़ों से वही डरता है, जो भ्रम में जीना चाहता है। सांच को आंच क्या? गांव या पंचायत स्तर पर हर कोई अपने पड़ोसी की जाति की जानकारी रखता है । जातिगत जानकारी भर से से टकराव की स्थिति बन जाए, यह बात समझ से परे है। तथ्य है कि जिस गांव में एक ही जाति के लोग हैं, वहां कोई टकराव नहीं होता। जाति की जानकारी होने मात्र से सामाजिक संबंध और भाईचारा बिगड़ जाए, ऐसा कोई समाजशास्त्रीय दावा नहीं करता ।
सनद रहे कि बिना जाति के भारतीय समाज या यूं कहें कि सनातन समाज की बनावट को समझना नामुमकिन है। दरअसल, जातिगत संरचना गैर-बराबरी पर आधारित है, और यही अन्याय का व्याकरण भी है। वर्ण व्यवस्था में संप्रभु वर्ग है, जिसने सदियों से सत्ता, सम्मान और संसाधनों पर वर्चस्व बनाकर रखा था। फलस्वरूप समाज का बहुसंख्यक हिस्सा अमानवीय शोषण का शिकार रहा है। पहली जातीय जनगणना 1931 के अनुसार हिंदू समाज का लगभग तीन-चौथाई हिस्सा शोषित रहा। स्वतंत्रता संग्राम के दौरान भी इन शोषित समूहों ने वर्ण व्यवस्था के खिलाफ आवाज बुलंद की थी। संविधान सभा में भी इस पर खुल कर बहस हुई थी और इसे दूर तथा दुरुस्त करने के उपचार भी इंगित किए गए। यही कारण है कि अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति को आरक्षण के माध्यम से मुख्यधारा में लाने के लिए क्रमशः 15 फीसदी और 7.5 फीसदी आरक्षण देने की व्यवस्था की गई। स्वतंत्रता के बाद से ही इनकी गिनती भी पहली भारतीय जनगणना से ही होती रही है । संविधान निर्माताओं ने समाज के एक अन्य बहुसंख्यक हिस्से को भी सामाजिक और शैक्षणिक तौर पर पिछड़े वर्ग के रूप में चिन्हित किया था जिन्हें मुख्यधारा में लाना सरकार की भावी जिम्मेदारी थी। केंद्र सरकार ने 1953 में काका कालेलकर की अध्यक्षता में प्रथम पिछड़ा आयोग का गठन भी किया जिसकी रिपोर्ट 1955 में संसद के पटल पर रखी गई। लेकिन राष्ट्र-निर्माण के रास्ते में बाधा का हवाला देकर उस रिपोर्ट को लागू नहीं किया गया। दो दशक पश्चात जनता पार्टी की सरकार ने 1978 में बीपी मंडल की अध्यक्षता में दूसरे पिछड़ा आयोग गठित किया। मंडल आयोग ने 1980 मैं ही पिछड़ों को मुख्यधारा में लाने के लिए 40 सूत्री अनुशंसापत्र सरकार को सौंप दिया था। इससे पूर्व बिहार सरकार ने 1970 में मुंगेरी लाल आयोग का गठन किया जिसने 1977 में सरकार को अपनी रिपोर्ट सौंपी थी। इस रिपोर्ट को कर्पूरी ठाकुर ने लागू किया था।
इन तीनों आयोगों ने अपनी-अपनी रिपोर्ट में जातिगत आंकड़ों की आवश्यकता का जिक्र किया। वर्तमान आंकड़े होते तो रिपोर्ट को तर्कसंगत और वैज्ञानिक बनाने में सहायक होते । विकासवादी दृष्टिकोण से विचार किया जाए तो 1931 की जातीय जनगणना की जगह पर सरकार वर्तमान आंकड़ों के आधार पर नीतिगत योजनाएं बनाए तो उसके यकीनन परिणाम बेहतर हो सकते हैं। साथ ही, समाज के समावेशी विकास का पथ भी अधिक प्रशस्त होगा। इसलिए जातिगत जनगणना की मांग या कवायद ज्यादा तार्किक और समसामयिक प्रतीत होती है।
Date:13-02-23
सूर्य का टूटते दिखनासंपादकीय
हमारे ब्रह्माण्ड में बहुत कुछ ऐसा होता रहता है, जो रहस्य से भरा हुआ है। ऐसे खगोलीय परिवर्तन भी नजर आते रहते हैं, जो चिंता में डाल देते हैं। एक ऐसा ही नजारा पिछले दिनों दिखा है। सूर्य की सतह का एक बड़ा हिस्सा कथित तौर पर टूटता दिखा है, जिससे अंतरिक्ष वैज्ञानिक चकित रह गए हैं। पूरी खगोलीय घटना को नेशनल एरोनॉटिक्स ऐंड स्पेस एडमिनिस्ट्रेशन (नासा) ने अपने कैमरे में कैद कर लिया है। नासा के जेम्स वेब टेलिस्कोप का यह ताजातरीन कमाल है, जिससे वैज्ञानिकों की दुनिया चकित भी है और चिंतित भी। एक अंतरिक्ष मौसम भविष्यवक्ता डॉक्टर तमिता स्कोव ने अपने ट्विटर हैंडल पर यह वीडियो साझा किया है। वीडियो में सूर्य का एक बड़ा हिस्सा टूटकर अलग होता दिखा है। सूर्य के उत्तरी ध्रुव में यह घटना नजर आई है। अगर सामान्य शब्दों में समझें, तो सूर्य में अग्नि ज्वार निरंतर उठता रहता है। यह अग्नि ही संसार को प्रकाशित करती है। सूर्य से अग्नि का टूटकर बिखरना नई बात नहीं, लेकिन अगर सूर्य का एक हिस्सा टूटकर अलग हुआ है, तो गहराई से अध्ययन जरूरी है।
वैज्ञानिकों के अध्ययन के लिए अनेक सवाल खड़े हो गए हैं। क्या सूर्य का कोई टुकड़ा पहली भी ऐसे टूटा है? क्या हमने पहली बार सूर्य को ऐसे टूटते देखा है? क्या टूटते सूर्य का आकार घट रहा है या घट जाता है? क्या सूर्य निरंतर अग्नि विस्फोट के चलते अपना आकार बनाए रखता है? ये सामान्य से प्रश्न हैं, लेकिन पृथ्वी से बहुत दूर स्थित सबसे विशेष चमकीले तारे को समझने के लिए वैज्ञानिकों को नए सिरे से जुट जाना चाहिए। इस घटना के बाद अनेक वैज्ञानिकों और भौतिक विज्ञानियों ने विकास और पृथ्वी पर इसके प्रभाव पर चिंता जताई है। गौर करने की बात है कि सूर्य को एक सौर वर्ष पूरा करने में 11 वर्ष लगते हैं। सूर्य के लिए यह समय तीव्रता का है। अलग-अलग वर्ष में सूर्य अलग-अलग प्रभाव दिखाता है। भारतीय शास्त्रों के अनुसार, 12 आदित्य हैं, जो क्रम से या बारी-बारी से प्रभावी रहते हैं और सबका स्वभाव अलग-अलग है। आधुनिक खगोल वैज्ञानिक भी जानते हैं कि सूर्य का व्यवहार हमेशा एक जैसा नहीं रहता है। विशेष रूप से नासा के अत्याधुनिक जेम्स वेब टेलिस्कोप के सक्रिय होने के बाद सूर्य की पड़ताल को नया बल मिला है और सूर्य की बेहतर व स्पष्ट छवियां अध्ययन के लिए वैज्ञानिकों और विद्यार्थियों को उपलब्ध हो रही हैं।
कुछ भारतीय वैज्ञानिक भी इस तरह की टूट को नई बात नहीं मान रहे हैं। यह एक नियमित घटना है, लेकिन इस बार तीव्रता अधिक है। ऐसी संभावनाएं हैं कि टूटा हुआ टुकड़ा फिर से सूर्य के साथ मिल सकता है या मिल गया होगा, क्योंकि सूर्य का गुरुत्वाकर्षण बल काम कर रहा होगा। अत: यह आशंका सही नहीं है कि सूर्य से टूटकर कुछ अलग हो गया है। यह न तो सूर्य के द्रव्यमान को प्रभावित करेगा और न ही पृथ्वी पर इसका कोई विशेष असर होगा। हां, ऐसी घटना से पृथ्वी का दूरसंचार प्रभावित हो सकता है, लेकिन अभी इसके भी स्पष्ट या घोषित प्रमाण सामने नहीं आए हैं। सूर्य गैस से बना है और इसकी सतह पर निरंतर परमाणु प्रतिक्रिया होती रहती है। जब तक ऐसी प्रतिक्रिया सूर्य के ध्रुवों के करीब होती रहेगी, तब तक इस घटना का पृथ्वी पर कोई ठोस प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसलिए घबराने की जरूरत नहीं है, पर सूर्य पर निगाह रखते हुए उसे ज्यादा से ज्यादा जानने की कोशिशें जारी रहनी चाहिए। अभी भी हम सूर्य को बहुत थोड़ा जान पाए हैं।
Date:13-02-23
हिंडनबर्ग रिपोर्ट ने जिन वित्तीय खामियों पर रखी है उंगलीब्रजेश कुमार तिवारी, ( प्रोफेसर, जेएनयू )
अमेरिका की शॉर्ट सेलिंग फर्म हिंडनबर्ग रिसर्च की रिपोर्ट लगातार खबरों में है और रिपोर्ट के विभिन्न पहलुओं का अध्ययन वित्तीय संस्थाओं में जारी है। हिंडनबर्ग ने आरोप लगाए हैं कि अडानी ग्रुप की कंपनियों में स्टॉक मैनिपुलेशन, एकाउंटिंग फ्रॉड और राउंड ट्रिपिंग किया गया है। राउंड ट्रिपिंग का मतलब है, अपनी ही कंपनियों का पैसा एक से निकालकर दूसरे में लगाया जाना। इसी तरह के आरोप पिछले साल एबीजी शिपयार्ड कंपनी व डीएचएलएफ द्वारा किए गए बैंक घोटाले में लगे थे।
निवेश फर्म सीएलएसए की एक रिपोर्ट के अनुसार, शीर्ष पांच अडानी समूह की कंपनियों पर 2.1 लाख करोड़ रुपये का कर्ज है। उनके शेयरों के लगातार गिरने से यह चिंता का विषय बन गया, क्योंकि इन कंपनियों में आम भारतीय की गाढ़ी कमाई का पैसा लगा है। किसी भी देश की अर्थव्यवस्था का सबसे महत्वपूर्ण अंग बैंकिंग सिस्टम होता है। बैंक ही वह जगह है, जहां हर कोई अपनी छोटी-बड़ी बचत करता या रखता है और भविष्य के लिए योजनाएं बनाता है। कोई भले ही हल्के में लेने की कोशिश करे, लेकिन हिंडनबर्ग की रिपोर्ट के बाद तेज गिरावट से भारत का बैंकिंग क्षेत्र सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है। इस निगेटिव रिपोर्ट के चलते स्टेट बैंक ऑफ इंडिया के शेयरों में 5 प्रतिशत, बैंक ऑफ बड़ौदा के शेयरों में 7.5 प्रतिशत, बैंक ऑफ इंडिया के शेयर में 5.51 प्रतिशत और यूनियन बैंक ऑफ इंडिया के शेयरों में 4.5 प्रतिशत की गिरावट आई है।
एसबीआई और अन्य बैंकों ने कहने की कोशिश की है कि उनके द्वारा दिया गया कर्ज अनुमति सीमा के भीतर ही है। भारतीय जीवन बीमा निगम का अडानी ग्रुप की कंपनियों में 70,000 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश है और निगम ने बताया है कि उसने कुल निवेश का एक प्रतिशत ही अडानी की कंपनियों में लगाया है।
जीवन बीमा संस्थाओं और बैंकों का मजबूत होना अर्थव्यवस्था की एक अनिवार्य शर्त है। हर्षद मेहता, सत्यम कंपनी, यस बैंक और लक्ष्मी विलास बैंक की कहानी अधिक पुरानी नहीं है। देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में बैंक व एलआईसी की महत्वपूर्ण भूमिका है। बैंकिंग क्षेत्र में संकट को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं और महामारी से उपजे हालात ने इन सवालों को और गंभीर बना दिया है।
भारतीय रिजर्व बैंक की डिपॉजिट इंश्योरेंस ऐंड क्रेडिट गारंटी कॉरपोरेशन आम लोगों को बैंक में जमा राशि पर बीमा सुरक्षा की गारंटी देता है, यदि कोई बैंक घाटे में भी जाता है या विफल हो जाता है, तो लोगों की पांच लाख रुपये तक की जमा एकदम सुरक्षित रहती है। बैंकों को अपने कामकाज के प्रति ज्यादा सजग होना चाहिए। आमतौर पर यह देखा जाता है कि बैंक आम आदमी के मामले में तो जरूरत से ज्यादा कड़ाई बरतते हैं, लेकिन अमीरों पर जरूरत से ज्यादा मेहरबान हो जाते हैं। अच्छी बैंकिंग में संतुलन बनाकर चलना सबसे अच्छा होता है। बैंकों को समान, तार्किक और विधि-सम्मत व्यवहार करना चाहिए। अमेरिकी फर्म की रिपोर्ट के बाद से अब तक अडानी समूह की संपत्ति 8.76 लाख करोड़ रुपये घट चुकी है, तो क्या बैंकों पर कोई असर नहीं हुआ होगा?
वास्तविकता यह है कि बैंकों व जीवन बीमा में राजनीतिक हस्तक्षेप को खत्म करने की जरूरत है। साथ ही, यदि कंपनियों के खाते में हेराफेरी की गई है, तो इसे सुधारना चाहिए। स्टॉक मैनिपुलेशन और राउंड ट्रिपिंग को रोकना भी जरूरी है। किन्हीं कंपनियों के शेयर ओवर वेल्यूड हैं या शेयरों का जरूरत से ज्यादा मूल्य आंका गया है अथवा अडानी समूह ने कुछ फर्जी ‘कागजी कंपनियां’ भी बना रखी हैं, इन तमाम सवालों का सच सामने आने चाहिए। अगर सच सामने न भी आ सके, तो इन वित्तीय संस्थाओं को अपने स्तर पर सुधार करने चाहिए, ताकि फिर ऐसी स्थिति पैदा न हो।
ध्यान रहे, इन सभी में आम आदमी का पैसा लगा है, वह डूबना नहीं चाहिए। बहरहाल, अघोषित तौर पर रिजर्व बैंक, सेबी, एनएसई और प्रवर्तन निदेशालय अपने-अपने स्तर पर जांच कर रहे हैं और आने वाले दिनों में, विशेष रूप से बैंकिंग क्षेत्र में जरूरी सुधार की उम्मीद है। यह समय बैंकों के लिए कमियों को छिपाने का नहीं, सुधारने का है।
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दूरस्थ मतदान या रिमोट वोटिंग की मांग काफी लंबे समय से की जा रही है। हाल ही में चुनाव आयोग ने इससे संबंधित एक प्रस्ताव भी दिया है। इस प्रस्ताव से अपने मतदान क्षेत्र से दूर रहने वाले अनेक नागरिकों को लंबी यात्राएं किए बिना ही मतदान करने का मौका मिल सकता है। प्रत्येक नागरिक के मतदान के अधिकार को सुनिश्चित करने की दिशा में यह एक अच्छा कदम हो सकता है।
16 विपक्षी पार्टियों ने इस प्रकार के प्रस्ताव पर आपत्ति जताई है।
दूरस्थ मतदान से जुड़ी आशंकाएं –
रिमोट वोटिंग का सबसे बड़ा लाभ प्रवासी श्रमिकों को मिलने की संभावना है। देश में इनकी संख्या लगभग 40 करोड़ है। विपक्षी पार्टियों को आशंका है कि प्रवासी की परिभाषा तय करने में कठिनाई आ सकती है।
चुनाव आयोग का प्रस्ताव है कि मतदान के लिए पंजीकृत राज्य से बाहर रहने वाले व्यक्ति को रिमोट वोटिंग का अधिकार दिया जा सकता है।
विपक्ष की आशंकाएं निरर्थक लगती हैं। यह बहुत से नागरिकों को उनके मताधिकार से वंचित कर सकती हैं। इसमें मुख्य रूप से श्रमिक वर्ग ही आता है।
इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन को लेकर भी राजनैतिक दलों ने शुरू में बहुत सी आशंकाएं जताई थी। चुनाव आयोग ने उनका समाधान कर दिया था। उम्मीद की जा सकती है कि इस मुद्दे पर भी चुनाव आयोग उचित कदम उठाते हुए प्रक्रिया की अखंडता की रक्षा करता रहेगा।
‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 17 जनवरी, 2023
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Date:11-02-23
India’s law and order matrix needs a rebootWith the evolving security scenario resulting in complex internal and external challenges, the nature of the security discourse as well as ground techniques have to be improved.M.K. Narayanan is a former Director, Intelligence Bureau, a former National Security Adviser, and a former Governor of West Bengal.
The annual All India Conference of Directors General/Inspectors General of Police which was held recently, witnessed a departure from the past, when some aspects that were discussed found their way into the public domain. This led to an element of controversy over the management of certain issues, specially on the border, but little else. In its present form, the DGPs/IGPs conference is a relatively new construct (1980), superseding the earlier annual conference of Heads of Intelligence and CIDs of different States. The latter conference used to deal mainly with the nitty-gritty of police work, viz., intelligence, crime and criminal investigation, technology and the forensic aspects, while the conference now additionally deals with a host of other issues including Policy and personnel matters.
In-depth discussion is taking a hit
The proliferation of subjects up for discussion in recent conferences, and the presence of increasing numbers of delegates to cover the various subjects leave little scope for any in-depth discussion. Today’s security threats have an all-embracing character and there is a crying need for in-depth discussions on futuristic themes in policing, such as cyber crime, the dark web, crypto, maritime security, the threat from drones, and also problems stemming from an unchecked social media. These are in addition to subjects such as left-wing extremism, counter-terrorism, drug trafficking and border issues. Lack of adequate time to discuss these matters in detail tend to undermine both the quality of the debates and possible outcomes.
Admittedly, we may not be standing today at the beginning of history, but the evolving security scenario is producing a myriad of internal and external challenges. As the 21st century advances, security problems will grow at an exponential rate. Their dimensions are as yet unclear, but what is already evident is that the emerging challenges would require greater innovativeness and agility as well as a demonstration of newer cognitive skills to meet the challenges posed by swift technological change and the rise of data war fighting. Hence, decision making in these circumstances needs to undergo fundamental changes, entailing more purposive discussion at higher levels.
Law and order management today would be a good starting point in this context. This subject may appear rather mundane in a world dominated by technology; but what it currently demands is a combination of newer skills, in both technology and crowd management, which are not readily available among security agencies. The attention of most security forces in the country has essentially been devoted to ongoing threats such as terrorism, which has resulted in law and order management being put on the back burner. Managing today’s angry, and often unruly, mobs requires a fresh set of skills and inherent abilities, apart from mere technology. A heavy-handed approach tends to create more problems than they solve. Any approach of this kind only leads to a catastrophic divide between law enforcement agencies and the public, at a time when newer practices and skills are the proper answer.
Hence, much more is clearly required than simply reiterating that technology, including artificial intelligence, can provide answers to a host of problems that exist. Understanding the psychology of agitating mobs and, in turn making them realise the dangers of their own predilections before matters get out of hand, is not an innate, but an acquired skill. This needs better attention.
Police and security agencies, must consequently, be provided with the right attributes, and for which they need to be adequately trained. This would call for a top down approach, as there would be considerable competition of resources from within the agencies for other items such as advances in weaponry and technology. It would be required even more, to secure acceptance of utilitarian aspects of any such move.
Pay attention to selection, skills
The selection of personnel to security agencies, especially the police, also will require a total makeover. The 21st century is proving to be vastly different from the 20th century, and the choice of personnel to man security agencies requires more high-level attention than has been devoted to this task. Most of the debate on this subject has been outside, rather than within the police forces, and the higher echelons of the forces have not spent enough time in determining what can and needs to be done. The police forces must mirror the kind of society we live in today, and must be capable of dealing with today’s modern antagonists. The latter often employ a variety of tactics and skills, and use common imagery to keep track of developing situations, including on social media and Twitter. For the police and security forces, this means that more than the mere acquisition of new skills, they must develop a different mind set, including that force cannot be the answer to every situation.
Technological advances worldwide have meant that the human skills of security agencies need to be suitably tailored to a world in which the Internet, social media and other breakthroughs, often provide protestors and agitators an upper hand, and often detrimental to law and order. This has given rise to the importance of ‘Open Source intelligence’ that is often neglected by security agencies. The proper utilisation of Open Source intelligence could well become the critical factor in managing many law and order situations today. A vast gap exists at present between the need, and on how best to utilise information from open sources.
An added problem, apart from the existing cauldron of events, incidents and situations, is the presence of multiple security agencies, including intelligence and investigative agencies, who seldom act with a common purpose. Their techniques and methodologies tend to be different, often leading to contradictions in approach. While the proliferation of agencies was intended to create specialised agencies for special requirements, this has not happened. Far from easing the burden of individual agencies, they often hinder proper analysis and investigation.
‘Small is beautiful’
Hence, what is clear is that there is a very real need to take a hard look at not only improving the nature of the security discourse — in regard to the range and varieties of threats — but also on how to bring about changes in regard to intelligence techniques, investigative methodologies, improving the ground situation, etc. Conventional wisdom would suggest that an apex level meeting of DGPs/IGPs would provide the necessary direction and policy imperatives. The reality is that too broad a sweep, both in terms of the subjects discussed, as well as in the numbers present, tends to affect the quality of the discourse even among dedicated professionals. Meaningful discussions cannot occur when the size of the conference inhibits detailed and frank discussion even in a professional atmosphere. Here, as in many other aspects of life, ‘small is beautiful’.
In short order, it can be said that there is a case for splitting the annual conference of DGPs/IGPs into two separate conferences — a higher level conference of DGPs/IGPs to discuss policy related issues, and a separate conference to be held of intelligence and security specialists (IGs/CID) to discuss the finer points of methodology, techniques and acquisition of new skills for current and future problems. Outcomes would then become more relevant to current and future security needs.
Date:11-02-23
The battle against child marriageAssam cracks down on child marriage, but activists and health workers seek an all-round approach from education of girls to awareness campaigns to stop the practice.Rahul Karmakar
For the first time in more than two decades, a police team from the Ulukunchi outpost came asking questions at Birsingi, a village in Assam’s West Karbi Anglong district. The visit on February 4 made the hill-dwelling Tiwa tribal people analyse gobhiya thaka, a kind of live-in relationship a few of them still practise.
Birsingi is about 110 km east of Guwahati. “The police came with records of teenage pregnancy and delivery from the Umpanai health sub-centre nearby. It made us think seriously about our practice and when a girl child is old enough to choose to live with her partner,” Dilip Timung, a village elder, said. The police inquiry pertained to a non-local teenage girl who had come to stay with a relative during childbirth.
In adjoining Morigaon district’s Kasakhila village, aerially 60 km northwest of Birsingi, 17-year-old Mamoni Biswas (name changed) wished she had listened to her parents to wait till her Class 12 exams to be with her boyfriend Prasenjit Mandal. About nine months ago, she skipped school near her village and walked 3 km to daily-wager Prasenjit’s house. They were later married at a local temple.
On February 3, the police picked up 23-year-old Prasenjit leaving a pregnant Mamoni distraught and her mother-in-law worried about her son’s future. “I still don’t understand why my son has been arrested for marrying the girl he loves,” she said.
At No. 2 Kosutoli in Morigaon district, almost equidistant from Birsingi and Kasakhila, Hafiz Mujibur Rahman has become the most hated person overnight. The local kazi or civil judge following the Muslim personal law, he has been absconding since the Assam Police launched the crackdown against child marriage on February 3.
“My brother, Badrul Hasan, was arrested five days ago because the kazi erred … registered his wife’s age wrongly. And he took ₹7,000 for the nikaah to put us in trouble,” Monjul Hasan, a commercial vehicle driver, said.
The 22-year-old Badrul, also a driver, had eloped with the girl he loved almost a year ago. His family got in touch with the girl’s parents in the neighbouring Samatapathar village, traced the runaway couple and made the girl return home as she was a couple of months shy of turning 18 years old. The two were reunited after she was 15 days past the official age of adulthood. “But the kazi not only got her name wrong, he put a wrong birth date that made her a minor by two days. He has fudged dates of a few others in the village too. If the police don’t get him, we will,” Monjul said.
The police arrested 17 men from No. 2 Kosutoli and Samatapathar. They included the husbands of minor girls and their fathers.
Planned exercise
Announcing the crackdown on February 2, Assam Chief Minister Himanta Biswa Sarma said the police had collected data for three years from 2020 and registered 4,074 cases across the State. He said the drive against child marriages since 2022 was demonstrative, indicating that the offenders could be released on bail soon.
Assam’s Director-General of Police, Gyanendra Pratap Singh, said the exercise was planned after the Chief Minister sought action against large-scale child marriages two months ago. Singh said the shake-up was bound to have some social cost, but the State government has directed the District Magistrates and the Social Welfare Department to take care of girls married off at a young age with some of them already having given birth.
Till February 9, the police had arrested 2,763 persons, 58 of them from within the urban limits of Guwahati. More than 80 of the arrested for abetment were women. The Chief Minister cited the National Family Health Survey-5 report for 2019-21 to justify the drive against child marriage. The report said in India, 23.3% of women aged 20-24 years were married before the age of 18, a drop from 27% in 2015-16. While West Bengal, Bihar and Tripura topped the list with 40% of such cases, Assam clocked 31.8%.
Seeking the cooperation of the people in “controlling this harmful trend”, the Chief Minister said the fight against the “social crime” of child marriage would continue till the 2026 Assembly election. “Teenage pregnancy accounted for 16.8% of more than 6.2 lakh pregnancies in Assam in 2022. We have to continue the drive until the objective is fulfilled,” he said.
In Kamrup district’s Pub Naitor village, about 115 km west of No. 2 Kosutoli, village defence party (VDP) member Taijuddin Sheikh had his second brush with the law when the police arrested his elder brother, Tajmohal Hoque, after not finding the latter’s son, Jubbar, at home. Jubbar was arrested on February 3 under Sections 6 (sexual assault) and 17 (punishment for abetment) of the Protection of Children from Sexual Offences (POCSO) Act, 2012, read with relevant sections of the Prevention of Child Marriage (PCMA) Act, 2006 for marrying a 17-year-old girl four months ago.
“We erred in not checking documents when the girl’s parents said she was a praptabayashka (adult). We should have learnt a lesson when a neighbour dragged me to court in 2021 for marrying off our allegedly minor niece, whose documents convinced the judge that she was not a minor,” Taijuddin, a farmer, said.
Many in Pub Naitor protested when the police arrested Tajmohal and two others in separate cases. The murmurs began dying down when the villagers learned “we were not the only ones at the receiving end”. The situation has been similar further west in Dhubri, a district often equated with alleged “illegal immigration” from adjoining Bangladesh because of a Muslim population of 79.67% (Census 2011). “We arrested 182 people from February 3-9, and there has been no law and order issue after the initial outburst. In fact, the people are now informing us about child marriages in their areas and cases are being registered accordingly,” Dhubri’s Superintendent of Police, Aparna Natarajan, said.
Detained in transit camps
All those arrested in Dhubri and elsewhere in the Brahmaputra Valley have been sent to judicial custody at the Matia transit camp in Goalpara which was set up for housing up to 3,000 people declared foreigners by designated courts. In southern Assam’s Barak Valley, the premises of the National Automotive Testing and R&D Infrastructure Project have been turned into a temporary prison for child marriage offenders.
Since January 2017, when we took a resolution to make awareness against child marriage at all meetings, we have stopped 3,631 child marriages with the help of the local authorities. We have also put kazis behind bars and taken action against one of our leaders accused of indulging in child marriage,” Minnatul Islam, general secretary of the All Assam Minority Students’ Union, said.
‘Execution should have been better’
Rejaul Karim Sarkar, the union’s president, said members of the organisation have endured attacks and abuses for trying to campaign against child marriages and stop them. “This is a much-needed drive but the execution could have been better with a plan in place, ensuring girls under 18 years are not considered a burden for the poor. Many are clueless about laws of any kind,” he said. He also said the move would have been more effective had action been taken against police and other departmental officials in areas where child marriages are reported. “Otherwise, the exercise may boomerang and be prone to politicisation,” he said.
Aminul Islam, general secretary of the minority-based All India United Democratic Front, insisted they have not been politicising or communalising the drive. “We want child marriages to stop, but the action with retrospective effect is affecting lives. One also has to remember rules to implement the PCMA have not been framed in Assam,” he said.
Questions have also been raised over categorising the girls married off into two groups — below 14 years and from 14-18 years for booking the people involved under the POCSO Act and the PCMA respectively. “As we understand, no such categorisation is possible under POCSO, especially after the Supreme Court’s judgment of October 2017 upholding every girl’s right to bodily dignity and ruling that sexual intercourse by a man with his wife, who is below 18 years, is rape,” Rafiqul Islam of the Barpeta-based Campaign Against Child Marriage said. The court read down Exception 2 to Section 375 (rape) of the Indian Penal Code, which allowed the husband of a girl child between 15 and 18 years of age to have non-consensual sex with her.
Legal experts are raising questions about how the court would interpret the implementation, particularly in the case of Muslims who follow the Muslim Personal Law (Shariat) Application Act of 1937 and the Assam Moslem Marriages and Divorces Registration Act of 1935, which do not bar girls under 18 years from getting married.
“There may be no complications for Hindus, Christians and people of other faiths as far as PCMA is concerned. The PCMA is not a settled law and is subject to interpretation by the court in the case of Muslims for whom the personal law is applicable. What if a boy arrested under PCMA goes to court saying as a Muslim, he is an adult under the Shariat law to marry? The court’s view would be interesting since we do not have a uniform civil code,” Fazluzzaman Mazumder, a Gauhati High Court lawyer, said. He suggested high-level discussions involving legal experts for a feasible solution. The Supreme Court is slated to examine whether girls as young as 15 can enter into wedlock if their personal law allows it but is an offence in statutory law. In India, the legal age for marriage is 18 years for women and 21 years for men. A parliamentary standing committee is also deliberating on the Prohibition of Child Marriage (Amendment) Bill, 2021 which sought to amend the PCMA to increase the minimum age of marriage for women from 18 to 21 years.
Stopping child marriage
Rafiqul Islam said child marriage is prevalent among many communities in Assam but is higher among the predominantly Muslim dwellers of the chars (shifting sandbars in the Brahmaputra) and the Adivasi tea plantation workers divided into Hindus and Christians.
“Our sustained efforts to advise people against child marriage for more than a decade may have stopped social ceremonies, but led to formalities indoors, often disguised as family get-togethers. What we wanted for years found a shortcut through the Chief Minister but the hard approach should go alongside softer measures such as ensuring livelihood and the Right to Education from Class 8 to Class 12 so that girls are not forced to drop out of schools,” he said.
Binod Deka, a social worker based in Morigaon district’s Mayong, agreed. “I think people will take us more seriously now,” he said.
Convincing tea plantation workers has been an uphill task, admitted Mansuk Sankharika, publicity secretary of the Baksa district unit of the All-Adivasi Students Association of Assam. “Earlier, the police did not act upon complaints. Things seem to have changed after a 16-year-old pregnant girl was taken to a shelter home and the parents of her absconding husband, living in the Fatehabad Tea Estate, were jailed. Hopefully, the fear factor would help us do our awareness programmes with more authority,” he said.
Child rights activists said the crackdown did not happen in a day although the initial mass outrage could not have been avoided given the scale of the social malaise and the sudden impact on lives. They point to the Arundhati scheme the Assam government had launched in 2020 entailing 1 tola (11.66 grams) of gold to brides belonging to all communities provided they have attained the legal age of 18 years through verification of birth certificate and medical examination, and their marriage is registered. The scheme was for people with an annual income of below ₹5 lakh.
“The drive has without doubt set accountability to the law but child marriage does not happen only because the law does not respond to you. There have been cases of 70-year-old men marrying minors but it is important to note that the reason behind child marriage in most cases is romantic relationships that families often do not accept for fear of earning social shame. There should be conversations around the causes of child marriage and effects of the action against it with communities, which can go a long way in minimising public outcry,” Miguel Das Queah, child rights activist and founder of Universal Team for Social Action and Help, said.
Sunita Changkakati, Chairperson of the Assam State Commission for Protection of Child Rights, blamed most of the recent cases on access to mobile phones for online learning during the COVID-19 lockdown. Child marriage cases increased with boys and girls first meeting on social media platforms.
“A strong message needed to be sent but the scenario is worse than the data the police are armed with because many cases of child marriage go unreported and there is also the issue of teenage abortions. The crackdown would not have been necessary had the stakeholders – the district child protection officer under the Social Welfare Department, police, doctors, health workers, panchayat leaders, village headmen and public representatives – worked in coordination. A system taken for granted has been jolted; we need to sustain it through coordination,” she said.
Date:11-02-23
सबूत देने की बाध्यता से संसद अर्थहीन हो जाएगीसंपादकीय
प्रजातंत्र की सफलता की पहली शर्त है ‘गवर्नेस बाय डिस्कशन’ | जन-विमर्श और उसका सरकारों द्वारा सम्मान स्वस्थ शासन की बुनियाद है। संसद के अस्तित्व के पीछे भी यही मूल कारण है। यहां जनमत से चुने गए सत्तापक्ष और विपक्ष के प्रतिनिधि मुद्दों पर चर्चा करते हैं, जिनमें सरकार की नीतियों व कामकाज भी प्रमुख रूप से शामिल हैं। फिर मीडिया उन्हें लोक-विमर्श के धरातल तक पहुंचाता है और तब विभिन्न पहलुओं पर जनता सरकार के बारे में अपनी राय बनाती है। संसद में कांग्रेस के नेताओं ने अदाणी प्रकरण से संबंधित कई सवाल उठाए और आरोप लगाए । ये आरोप सदनों की कार्यवाही से इस आधार पर निकाल दिए गए कि वे बगैर किसी प्रूफ के थे। संसद कोई कोर्ट नहीं है। यहां की चर्चा कोर्ट की कार्यवाही से अलग होती है। अगर आरोप लगाने वाले से सबूत मांगा जाने लगा तो उस दिन से संसदीय प्रजातंत्र के अस्तित्व पर ही प्रश्न खड़ा हो जाएगा। विपक्ष सरकार की नीतियों पर लगातार सवाल खड़ा करता है और जनता उन पर अपनी राय नाती है। अगर वह राय प्रबल हुई तो सरकारें संशोधन करती हैं। ऐसे आरोपों पर यह सत्तापक्ष के हित में होगा कि सम्यक जांच के लिए सदन में बेबाक चर्चा करे। कार्यवाही से इस तरह चंद चीजें हटा देना अच्छी परिपाटी नहीं है ।
Date:11-02-23
पलायन के पीछेसंपादकीय
यह किसी भी देश के लिए अच्छी बात नहीं मानी जाती कि उसके नागरिक दूसरे देशों की नागरिकता लेने को विवश हों। विदेश मंत्री ने संसद में लिखित जवाब देते हुए बताया कि पिछले बारह सालों में कुल सोलह लाख तिरसठ हजार चार सौ चालीस लोग भारतीय नागरिकता छोड़ कर दूसरे देशों में जा बसे हैं। इन सालों में हर साल एक लाख से अधिक लोगों ने देश छोड़ा। सबसे अधिक पिछले साल- सवा दो लाख से अधिक लोग भारत की नागरिकता छोड़ कर दूसरे देशों में बस गए। इन लोगों ने कारोबार या नौकरी के लिए अपने देश की नागरिकता छोड़ दी। हमारे देश में चूंकि दोहरी नागरिकता का प्रावधान नहीं है, इसलिए जो लोग दूसरे देशों में बस जाते हैं, उनकी नागरिकता स्वत: समाप्त हो जाती है। मगर तथ्य यह भी है कि दूसरे देशों की नागरिकता लेना भी इतना आसान नहीं है कि जो चाहे, वही उन देशों में जाकर बस जाए। भारत छोड़ने वालों से सबसे अधिक लोगों ने अमेरिका की नागरिकता ली है। वहां की नागरिकता हासिल करने के लिए लाखों भारतीय जद्दोजहद कर रहे हैं, नौकरी चली जाने के बाद उन्हें वापस आने के अलावा कोई और रास्ता नहीं बचता। जाहिर है, ऐसे लाखों लोग मजबूरी में भारत के नागरिक बने हुए हैं।
हकीकत यह है कि हमारे देश से बहुत सारे विद्यार्थी पढ़ाई करने के लिए दूसरे देशों का रुख करते हैं। फिर वहीं वे कोई नौकरी करके बस जाते हैं। इसी तरह बहुत सारे लोग कारोबार के सिलसिले में दूसरे देशों की नागरिकता ले लेते हैं। तथ्य तो यह भी है कि बहुत सारे ऐसे कारोबारियों ने दूसरे देशों की नागरिकता ले ली, जिनका भारत में जमा-जमाया कारोबार था। कुछ समय से यह चिंता भी जताई जा रही है कि कारोबारियों के इस तरह पलायन से देश की अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि हमारे देश के कई हिस्सों और तबकों में विदेश जाकर नौकरी या कारोबार करना और फिर वहीं बस जाना प्रतिष्ठा की बात मानी जाती है। यह भी ठीक है कि नौकरी के सिलसिले में विदेश गए लाखों भारतीय यहां भारी मात्रा में विदेशी मुद्रा भेजते हैं, जिससे सरकार का खजाना भरता है। मगर यह प्रश्न अनुत्तरित है कि आखिर लोगों के सामने ऐसी स्थिति ही क्यों आती है कि उन्हें अपने देश की नागरिकता छोड़ कर पराई जमीन पर जा बसना ज्यादा सुरक्षित जान पड़ता है।
दरअसल, शिक्षा और रोजगार के माकूल अवसर उपलब्ध न होने के कारण लाखों विद्यार्थी हर साल देश छोड़ने पर मजबूर होते हैं। आंकड़े गवाह हैं कि भारतीय संस्थानों से जितने विद्यार्थी हर साल तकनीकी शिक्षा प्राप्त कर बाहर निकलते हैं, उनमें से बमुश्किल एक तिहाई को सम्मानजनक नौकरी मिल पाती है। वेतन आदि के मामले में भी यहां नौकरीशुदा लोगों की स्थिति असंतोषजनक ही है। ऐसे में विदेश पढ़ने गए विद्यार्थी यहां वापस लौटना ही नहीं चाहते। यही हाल कारोबारियों का है। सरकार कारोबार के लिए चाहे जितनी अनुकूल स्थितियां बनाने का प्रयास करती हो, मगर हकीकत यही है कि निवेश और आय का अनुपात सदा अनिश्चित बना रहता है। कारोबार के लिए सुरक्षित वातावरण होता, तो वे अपना देश छोड़ कर कभी न जाते। इसलिए इस तरह अपने देश के संसाधनों का उपयोग कर कौशल अर्जित करने के बाद लोगों का दूसरे देशों में जाकर बसना सरकार के लिए इस दिशा में नए सिरे से सोचने की जरूरत रेखांकित करता है।
Date:11-02-23
बढ़ा परदेश का मोहसंपादकीय
दुनिया में भारतीय समुदाय बढ़ता जा रहा है, लेकिन जिस तरह बढ़ रहा है उसे उत्साहजनक कहना तो कतई ठीक नहीं होगा । वस्तुस्थिति यह है कि वर्तमान में भारतीय नागरिकों में देश छोड़ने की होड़ सी लगी है, जो कतई अच्छा समाचार नहीं है। सरकारने बृहस्पतिवार को राज्य सभा में जो जानकारी दी है। उसके अनुसार 2011 से 16 लाख से अधिक लोगों ने भारतीय नागरिकता छोड़ दी है। इनमें से सर्वाधिक 2,25,620 भारतीयों ने तो पिछले साल ही नागरिकता को तिलांजलि दी है। विदेश मंत्री एस जयशंकर ने वर्ष वार भारतीय नागरिकता छोड़ने वाले लोगों का ब्योरा रखा है। जिस गति से लोग नागरिकता छोड़ रहे हैं वह देश के लिए अच्छा संकेत नहीं है। वर्ष 2016 में 1,41,603 लोगों ने नागरिकता छोड़ी जबकि 2017 में 1,33,049 लोगों ने नागरिकता छोड़ी। साल 2018 में यह संख्या 1,34,561 थी, जबकि 2019 में 1,44,017, 2020 में 85,256 और 2021 में 1,63,370 भारतीयों ने अपनी नागरिकता छोड़ दी थी। वर्ष 2022 में यह संख्या 2,25,620 हो चुकी थी। जयशंकर ने उन 135 देशों की सूची भी सामने रखी, जिनकी नागरिकता भारतीयों ने हासिल की है। बेहतर जीवन की तलाश में विदेश जाने वालों को वहां पहुंचकर सुख सुविधाएं ही मिलती हों इसका कोई अध्ययन तो उपलब्ध नहीं है लेकिन ऐसे वक्त में जब भारत निरंतर विकास की ओर उन्मुख है और जब भारत वैश्विक समस्याओं को सुलझाने में निर्णायक भूमिका में आता जा रहा है यह प्रव्रजन ठीक नहीं है। जिस समय दुनिया के देश भारत की ओर उम्मीद भरी नजरों से देख रहे हैं और हमारे लोग स्वदेश छोड़ रहे हैं, यह गंभीर मसला है। जिन देशों में सर्वाधिक भारतीय जाना पसंद करते हैं वे सभी आर्थिक मंदी से जूझ रहे हैं। हाल के महीनों में अमेरिकी कंपनियों द्वारा पेशेवरों की छंटनी एक बड़ा मुद्दा बनी है, जिससे सरकार भी भली भांति अवगत है। इस छंटनी में एक निश्चित प्रतिशत एच-1बी और एल 1 वीजा धारक भारतीय नागरिकों के होने की संभावना है। भारत सरकार अमेरिकी सरकार के समक्ष आईटी पेशेवरों सहित उच्च कुशल श्रमिकों से संबंधित मुद्दों को लगातार उठा रही है। स्थिति को देखते हुए यह कहा जा सकता है कि सरकार को इस दिशा में और गंभीर हो जाना चाहिए।
Date:11-02-23
खनिज धातु लिथियम भंडार का मिलना इतना अहम क्योंशशांक शेखर, ( प्रोफेसर, दिल्ली यूनिवर्सिटी )
जम्मू-कश्मीर में एक बड़े लिथियम भंडार की खोज काफी महत्वपूर्ण है। ऐसा पहली बार हुआ है कि अपने देश में लिथियम की इतनी बड़ी मात्रा एक जगह मिली है। भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण के मुताबिक, जम्मू-कश्मीर के रियासी जिले के सलाल-हैमाना क्षेत्र में लिथियम का जो भंडार मिला है, वह करीब 59 लाख टन हो सकता है। लिथिमय नॉन फेरस, यानी अलौह धातु है, और जब हम हरित ऊर्जा की बात कहते हैं या कार्बन क्रेडिट या फिर जलवायु परिवर्तन की, तो लिथियम ही वह धातु है, जिसका इस्तेमाल इलेक्ट्रिक गाड़ियों, स्मार्टफोन, सोलर पैनल और कंप्यूटर आदि की बैटरी के रूप में होता है। कार्बन-उत्सर्जन कम करने के लिए हमें आने वाले दिनों में 20-30 प्रतिशत निजी और सरकारी गाड़ियों को इलेक्ट्रिक बनाना होगा। ऐसे में, लिथियम का यह भंडार हमारे लिए कितना कारगर हो सकता है, यह कोई छिपा रहस्य नहीं है।
फिलहाल दुनिया में कुछ देश ही लिथियम का उत्पादन अच्छी मात्रा में करते हैं। इन देशों में चिली, अर्जेंटीना, ऑस्ट्रेलिया, चीन जैसे देश शामिल हैं। हम अपनी जरूरत का लिथियम पूरी तरह से आयात करते हैं। न सिर्फ इलेक्ट्रिक कार की, बल्कि लैपटॉप और स्मार्टफोन की बैटरी अब लिथियम से ही बनने लगी है। हालांकि, इसका कुछ हद तक धातु उद्योग या रासायनिक उद्योग में भी इस्तेमाल होता है और दवा उद्योग में भी, लेकिन इनमें काफी कम मात्रा की जरूरत पड़ती है। इसलिए भारतीय भू-वैज्ञानिक सर्वेक्षण की सराहना की जा रही है, क्योंकि उसने अपने खनन कार्य को लेकर नई रणनीति अपनाई और पारंपरिक धातु अथवा खनिज की खोजबीन न करके सामरिक दृष्टि से काफी अहम इस दुर्लभ धातु की खोज का बीड़ा उठाया। हालांकि, अगर यह पूछा जाए कि क्या कल से ही इसके खनन का कार्य शुरू हो सकता है? तो इसका जवाब है, नहीं। फिलहाल यह ‘इंफर्ड रिसोर्सेज’ है, यानी अभी सब कुछ अनुमानित है। सीमित भू-वैज्ञानिक साक्ष्य और नमूने के आधार पर इसकी मात्रा व ग्रेड का अनुमान लगाया गया है। इसकी गुणवत्ता और ग्रेड अभी तक प्रमाणित नहीं की जा सकी है। इसमें अभी कुछ वक्त लगेगा। यही कारण है कि अभी यह कहना भी जल्दबाजी होगी कि इस भंडार के मिलने के बाद लिथियम को लेकर ऑस्ट्रेलिया या अर्जेंटीना जैसे देशों पर हमारी निर्भरता खत्म हो जाएगी। जब तक यह आकलन नहीं हो जाता कि किस तकनीक से हम इसे निकालेंगे या हमारी क्षमता कितनी है, तब तक हम खाली हाथ ही माने जाएंगे। हां, अगर सब कुछ योजनागत हुआ, तो मुमकिन है कि लिथियम को लेकर दूसरे देशों पर हमारी निर्भरता काफी हद तक कम हो जाए।
नवीनतम आंकड़े बताते हैं कि साल 2020-21 में 173 करोड़ रुपये मूल्य के लिथियम और 8,811 करोड़ रुपये मूल्य के लिथियम ऑयन का आयात हमने हांगकांग, चीन, इंडोनेशिया और वियतनाम जैसे देशों से किया था। मुमकिन है, आने वाले दिनों में यह तस्वीर बदलती दिखे।
एक बात और। चिली, अर्जेंटीना जैसे देशों में, जहां लिथियम पर्याप्त मात्रा में उपलब्ध है, वहां जमीन के अंदर खारे पानी से इसे निकाला जाता है। इस पानी में छह से सात फीसदी तक ही लिथियम होता है। मगर अपने यहां यह धातु कुछ पत्थरों में देखी गई है। चूंकि लिथियम बहुत दुर्लभ धातु है, इसलिए कहने की आवश्यकता नहीं कि खनन की बेहतर तकनीक से अपने यहां इसका अच्छा उत्पादन हो सकता है।
विकास का आज जो पैमाना बन गया है, उसमें उस देश का कद स्वाभाविक रूप से बढ़ जाता है, जिसके पास लिथियम जैसे दुर्लभ धातु की बहुतायत हो। इससे सोलर तकनीक में आत्मनिर्भरता आती है, जो भारत के लिए काफी अहम साबित हो सकता है। इसका अर्थ है कि इस भंडार की प्राप्ति से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का कद ऊंचा उठा है। खबर यह भी है कि अपने देश में यह बॉक्साइड में पाया गया है। चूंकि भारत में बॉक्साइड के रिजर्व कई जगहों पर हैं, इसलिए जम्मू-कश्मीर की सफलता अन्य तमाम रिजर्व के लिए संभावना पैदा कर रही है। अगर अन्य जगहों पर भी तलाश की जाए, तो मुमकिन है, लिथियम की बड़ी मात्रा हमारे हाथ लगे। इससे कम से कम लिथियम में ‘आत्मनिर्भर भारत’ की ओर हम जरूर बढ़ सकेंगे।
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11 February 2023
प्रश्न–397 – भारत में चाय उत्पादन के क्षेत्र का विवरण दीजिये। वर्तमान में इस क्षेत्र को किस प्रकार की चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है? (200 शब्द)
Question–397 – Give an account of the regions of tea production in India. What are the challenges the sector is currently facing? (200 words)
नोट : इसका उत्तर आपको हमें नहीं भेजना है, यह आपके स्वयं के अभ्यास के लिए है।
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Date:10-02-23
Sage stancePrice stability is a must for a durable economic recoveryEditorial
The Reserve Bank of India’s decision to raise its benchmark policy rate yet again, albeit by a smaller quarter percentage point, reflects a welcome resolve in staying committed to ensuring durable price stability. Given that the Monetary Policy Committee’s primary mandate is to steer retail inflation towards a 4% target, and that core price gains have stayed stuck above or almost at 6% for 20 months, the rate setting panel voted by a 4-2 majority to continue tightening policy. Governor Shaktikanta Das emphasised the significance of the MPC’s unwavering focus on inflation when he noted that medium-term growth prospects would be best strengthened by ‘keeping inflation expectations anchored and breaking the persistence of core inflation’. That inflation remains the key risk to the growth outlook, notwithstanding the easing in the headline print for retail price gains over November and December, was stressed by the MPC. The panel pointed to the deflation in vegetable prices in end 2022 and cautioned that this trend could likely dissipate as summer approaches and prices harden. Commodity prices are also expected to see upward pressure globally, given the lifting of most COVID-related restrictions, particularly in China. Specifically, the recent uptrend in Brent futures and the intensifying Ukraine conflict forebodes the possibility that oil costs may well upset the RBI’s assumption of an average price of $95 per barrel for India’s crude basket.
The MPC’s decision to raise rates by a marginally smaller 25 basis points (bps) this time following its December decision to temper the tightening to 35 bps after three straight half percentage point increases, shows it is cognisant of the growth-retarding challenges that rising credit costs could pose to the ongoing post-pandemic recovery. Still, the fact that the Indian economy has proved more resilient, underpinned by a rebound in domestic demand especially for contact-intensive services and discretionary spending, has provided a degree of comfort to monetary policymakers. This was manifest in their upgrades to the GDP growth forecasts for the first two quarters of the coming fiscal year. While the RBI raised its growth outlook for Q1 FY24 to 7.8%, a sizeable 70 bps up from its projection in December, it lifted its Q2 projection by 30 bps to 6.2%. Mr. Das’s unequivocal assertion that monetary policy must be “tailored to ensuring a durable disinflation” rightly echoes a recent blogpost by three IMF economists who warned that central banks need to stay resolute as any ‘premature loosening’ of policy risks a sharp resurgence in price gains that could leave countries susceptible to further shocks. Ultimately, price stability is and must remain the bedrock for a durable economic recovery.
Date:10-02-23
विदेशी निवेशकों का भरोसा फिर से पाना चुनौती होगीविराग गुप्ता, ( लेखक और वकील )
संसद में सियासी बयानबाजी, स्टॉक मार्केट में रिकवरी और लचर पीआईएल से अदाणी विवाद से जुड़े विस्फोटक मुद्दे दफन नहीं होंगे। शार्ट सेलिंग करने वाली सटोरिया फर्म हिंडनबर्ग की नीयत, टाइमिंग और बड़ा मुनाफा कमाने का मकसद साफ है। लेकिन पुरानी हकीकत है कि बड़े अपराधों से जुड़े मामलों का खुलासा दुर्जन शक्तियों द्वारा ही होता है। इसलिए इस मामले में रिपोर्ट भेजने वाले की बजाय संगीन आरोप और सवाल ज्यादा अहम हैं। इस विवाद से जुड़े चार पहलुओं को मथने पर शुरू में बेचैन करने वाला विष निकलेगा। लेकिन देशवासियों के हित में यह राष्ट्रमंथन बेहद जरूरी है।
एक फीसदी की गलत थ्योरी
एलआईसी और कई बैंकों के अनुसार अदाणी में उनका निवेश एक फीसदी से भी कम है। फाइनेंशियल टाइम्स की रिपोर्ट को मानें तो अदाणी समूह भारत की जीडीपी में एक फीसदी वजन रखता है। लेकिन इस साल के बजट में कल्याणकारी योजनाओं के लिए आवंटित रकम के आंकड़ों से पूरे मामले को बेहतर तरीके से समझा जा सकता है। 82 करोड़ लोगों को फ्री राशन, शिक्षा, स्वास्थ्य, मनरेगा, जल जीवन मिशन, आंगनबाड़ी, प्रधानमंत्री आवास योजना, महिला एवं बाल विकास, मेट्रो रेल का नेटवर्क, स्वच्छ भारत अभियान और ई-कोर्ट जैसी अहम मदों के लिए बजट में लगभग 6.86 लाख करोड़ आवंटित हुआ है। इसलिए हिंडनबर्ग रिपोर्ट के बाद अदाणी के शेयर्स और पूंजी में 10 लाख करोड़ से ज्यादा की गिरावट को एक फीसदी फार्मूले से खारिज करना गलत है।
देश पर हमला और ग्रोथ स्टोरी
जब अदाणी समूह ने ही रिपोर्ट को देश पर हमला बताया है, तो सरकार बहस से मुंह क्यों मोड़ रही है? एक खबर के अनुसार अदाणी मामले से वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत की रैंक फिसलकर पांचवें से छठे स्थान पर आ गई है। इतिहास के पन्नों से हर्षद मेहता, केतन पारिख, विजय माल्या और नीरव मोदी जैसे कारोबारियों की कुंडली खंगालकर अदाणी के बचाव का नैरेटिव बनाना गलत है। कारोबारियों के साथ पक्ष-विपक्ष सभी के नेताओं की दुरभिसंधि रहती है। अदाणी से जुड़े हिस्सों को संसद की कार्यवाही से भले ही हटा दिया हो लेकिन सोशल मीडिया में चल रहे कयासों पर रोक कैसे लगेगी? हिंडनबर्ग रिपोर्ट में क्रोनी कैपिटिलज्म से जुड़े कई मुद्दों को उठाया गया है। उन पर संजीदगी से मंथन और कॉर्पोरेट गवर्नेंस में सुधार के बाद ही भारत की ग्रोथ स्टोरी पर दुनिया का भरोसा बढ़ेगा।
सुप्रीम कोर्ट की कथित क्लीन चिट
अदाणी समूह ने शुरुआती बचाव में सुप्रीम कोर्ट की क्लीन चिट की दुहाई दी थी। यह बयान कानून की कसौटी पर हास्यास्पद ही माना जाएगा। कुछेक मामलों में सुप्रीम कोर्ट से मिली राहत को अदाणी ग्रुप के कैरेक्टर सर्टिफिकेट के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए। लखनऊ की विशेष अदालत ने भ्रष्टाचार के खिलाफ जंगी फैसला देते हुए 100 रु. की घूस के 30 साल पुराने मामले में 82 साल के बूढ़े व्यक्ति को एक साल की सजा सुनाई है। दूसरी तरफ खरबों डाॅलर से जुड़े मामले में सीनियर वकील साल्वे ने लचर न्यायिक सिस्टम की दुहाई देते हुए हिंडनबर्ग के खिलाफ कार्रवाई से इंकार कर दिया। अब इस मामले में हिंडनबर्ग पर दायर पीआईएल बेतुकी होने के साथ मामले को भटकाने की कोशिश हो सकती है।
रेगुलेटर्स की साख बहाल होना जरूरी
कोरोनाकाल में 82 करोड़ लोग सरकारी राशन पर निर्भर थे, जिससे आर्थिक असमानता बढ़ गई। लॉकडाउन के दो साल के अंधेरे दौर में अदाणी समूह की वैल्यू में कई गुना उछाल हिंडनबर्ग के उठाए गए सवालों को वैधता प्रदान करता है। विपक्षी दल जेपीसी की तो भाजपा सांसद डॉ. स्वामी अदाणी की सम्पत्तियों के राष्ट्रीयकरण की मांग कर रहे हैं। सरकारी चुप्पी के बावजूद पूरे मामले की आंतरिक जांच की घोषणा करके अदाणी ने स्थिति में सुधार करने की कोशिश की है। लेकिन इस रिपोर्ट में धोखाधड़ी, कर चोरी, बेनामी कम्पनियाँं, टैक्स हैवन, हवाला और नेताओं के साथ दुरभिसंधि के आरोप हैं। चाहे जेपीसी हो या जजों की मॉनिटरिंग, प्रभावी जांच के लिए सीबीआई, ईडी, डीआरआई, आरबीआई, इनकम टैक्स और एनआईए जैसी एजेंसियों को ही पूरी भूमिका निभानी होगी। तथ्यपरक जवाब के बगैर अदाणी को दी गई क्लीन चिट से अर्थव्यवस्था पर विदेशी निवेशकों का भरोसा वापस लाना मुश्किल होगा।
Date:10-02-23
संदेह से परे हों न्यायिक नियुक्तियांडा. एके वर्मा, ( लेखक सेंटर फार द स्टडी आफ सोसायटी एंड पालिटिक्स के निदेशक एवं वरिष्ठ स्तंभकार हैं )
न्यायिक नियुक्तियों पर विवाद थमने का नाम नहीं ले रहा है। सर्वोच्च न्यायालय द्वारा कलेजियम व्यवस्था बनाने और संसद द्वारा पारित राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग यानी एनजेएसी के गठन को गैर-संवैधानिक घोषित करने के मुद्दे पर विवाद और विमर्श दोनों जारी हैं। उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ और लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने न्यायपालिका को न्यायिक लक्ष्मण रेखा का उल्लंघन न करने की सलाह दी है तो कानून मंत्री ने न्यायिक प्रक्रिया को पारदर्शी एवं उत्तरदायित्वपूर्ण बनाने के लिए सुप्रीम कोर्ट कलेजियम में केंद्र सरकार और उच्च न्यायालय कलेजियमों में राज्य सरकारों के प्रतिनिधियों को शामिल करने के लिए पत्र भेजा। इससे कार्यपालिका और न्यायपालिका के मध्य विवाद का संकेत गया, लेकिन इसे इन संस्थाओं के बीच संवाद के रूप में भी देखा जाना चाहिए। न्यायमूर्ति एमसी छागला जब मुंबई उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश थे तो उस दौरान वह तत्कालीन मुख्यमंत्री मोरारजी देसाई के साथ न्यायिक नियुक्तियों पर सैद्धांतिक असहमति के बावजूद प्रतिमाह चाय या रात्रि भोज पर संवाद करते थे। आज उस परंपरा को पुनर्जीवित क्यों नहीं किया जा सकता?
स्वतंत्रता तथा योग्यता के आधार पर निष्पक्ष न्यायिक नियुक्तियों को लेकर देश में सर्वसम्मति है। संविधान निर्माताओं की ऐसी कोई मंशा नहीं थी न्यायिक नियुक्तियों में किसी एक संवैधानिक संस्था का एकाधिकार हो। डा. आंबेडकर कल्पना ही नहीं कर सकते थे कि न्यायपालिका ही न्यायाधीशों की नियुक्ति करेगी और जनता को बताएगी भी नहीं कि किस आधार पर उनका चयन हुआ और क्यों कुछ को अस्वीकृत किया गया? कलेजियम प्रणाली से जिस तरह नियुक्तियां हो रही हैं, उससे जनता के मन में शंकाएं उत्पन्न हो रही हैं। संभव है कि वे शंकाएं निर्मूल हों, किंतु पारदर्शिता के अभाव में उन्हें बल मिलता है। कई उदाहरण भी हैं। जैसे त्रिपुरा उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश अकील कुरैशी का प्रतिवेदन न करना और कलकत्ता उच्च न्यायालय में न्यायाधीश सौमित्र सेन की नियुक्ति करना। सेन पर वित्तीय अनियमितताओं के कारण राज्यसभा ने महाभियोग प्रस्ताव पारित किया था। ऐसे निर्णय कलेजियम पर प्रश्नचिह्न खड़े करते हैं।
एनजेएसी संविधान संशोधन के उपरांत अस्तित्व में आया, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उसे असंवैधानिक बताकर खारिज कर दिया। जबकि एनजेएसी में अध्यक्ष का दायित्व स्वयं मुख्य न्यायाधीश को दिया गया था, जिसमें दो वरिष्ठतम न्यायाधीश, कानून मंत्री और दो अन्य ख्यातिप्राप्त जनों का प्रविधान था, जिनका चयन एक समिति करती जिसमें प्रधानमंत्री, नेता-प्रतिपक्ष और स्वयं मुख्य न्यायाधीश होते। एनजेएसी को निरस्त करने के न्यायपालिका के जो भी तर्क हों, लेकिन जनता को आज तक यह समझ नहीं आया कि किस लोकतांत्रिक सिद्धांत के अंतर्गत न्यायाधीश ही न्यायाधीशों की नियुक्तियां करते हैं। विश्व में ऐसा कोई उदाहरण नहीं। अमेरिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा होती है, लेकिन उसके पहले सीनेट की समिति संभावितों के गंभीर साक्षात्कार लेती है। पूरी पड़ताल के आधार पर ही सीनेट नियुक्ति को स्वीकृत या अस्वीकृत करती है। इंग्लैंड में आयोग द्वारा परीक्षा और साक्षात्कार की प्रक्रिया के द्वारा न्यायाधीशों की नियुक्तियों का प्रतिवेदन होता है और प्रधानमंत्री के परामर्श पर महारानी-महाराज नियुक्ति करते हैं। लोकतंत्र में जनता और संविधान सर्वोच्च है, न कि न्यायपालिका। हमारे संविधान निर्माताओं ने यद्यपि न्यायपालिका को संसद के कानूनों पर ‘न्यायिक पुनर्निरीक्षण’ का अधिकार दिया, मगर ‘न्यायिक सर्वोच्चता’ के सिद्धांत को अस्वीकार कर व्यवस्थापिका एवं न्यायपालिका में संतुलन स्थापित किया था। अतः उन्होंने ‘विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया, न कि ‘विधि की सम्यक प्रक्रिया’ के आधार पर न्यायपालिका को ‘न्यायिक-पुनर्निरीक्षण’ का अधिकार दिया। हालांकि, 1973 में ‘केशवानंद भारती मामले ने पूरा परिदृश्य बदल दिया। संविधान के मूल ढांचे के सिद्धांत का प्रतिपादन कर सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायिक-सर्वोच्चता की ओर कदम बढ़ाए। अब सर्वोच्च न्यायालय संसद द्वारा बनाए किसी भी कानून को इस आधार पर निरस्त कर सकता है कि वह संविधान के मूल ढांचे के विरुद्ध है। एनजेएसी के साथ भी उसने यही किया। उच्चतम न्यायालय ने न्यायिक सर्वोच्चता की दिशा में दूसरा कदम 1993 में तब बढ़ाया जब न्यायिक नियुक्तियों में वर्षों की स्थापित प्रक्रिया, जिसमें राष्ट्रपति देश के मुख्य न्यायाधीश और कुछ अन्य न्यायाधीशों से परामर्श कर न्यायाधीशों की नियुक्ति करते थे, को पलट दिया। उस पारंपरिक व्यवस्था में राष्ट्रपति परामर्श को मानने को बाध्य नहीं थे, लेकिन नई व्यवस्था में मुख्य न्यायाधीश के परामर्श को राष्ट्रपति पर बाध्यकारी बना दिया गया। इसी से कलेजियम व्यवस्था का जन्म हुआ।
अक्सर जनता के मन में न्यायिक नियुक्तियों को लेकर संशय होता है, किंतु न्यायपालिका के प्रति आदर भाव के चलते वह कोई प्रश्न नहीं उठाती। ऐसे में न्यायपालिका को विचार करना चाहिए कि कहीं जनता का यह विश्वास टूट न जाए। संसद और कार्यपालिका तो जनता के प्रति उत्तरदायी है, लेकिन न्यायपालिका किसके प्रति उत्तरदायी है? जनता किससे पूछे कि लंबित मुकदमों की संख्या घटाने के लिए न्यायपालिका ने क्या किया? ‘विलंबित न्याय वस्तुतः न्याय से वंचित करना है’– इस सिद्धांत की उपेक्षा क्यों की जा रही है? क्यों नियुक्तियों में पारदर्शिता का अभाव है? प्रश्न यह भी है कि लोकतंत्र में न्यायिक नियुक्तियों में जनता द्वारा निर्वाचित सरकार की भूमिका क्यों न हो? स्मरण रहे कि केवल न्यायपालिका ही ऐसी संस्था है जिसके चयन में जनता की प्रत्यक्ष भूमिका न होने के बावजूद उसकी आस्था बनी हुई है, लेकिन यदि उसके गठन में जनप्रतिनिधियों की भूमिका भी समाप्त हो जाएगी तो जनता न्यायपालिका से पूर्णतः कट जाएगी। यह लोकतंत्र के लिए हितकर नहीं होगा। एक स्वतंत्र, निष्पक्ष, उत्तरदायी, पारदर्शी एवं जनोन्मुखी न्यायपालिका लोकतंत्र में अपरिहार्य है।
Date:10-02-23
महंगाई पर लगामसंपादकीय
महंगाई पर लगाम कसने के मकसद से भारतीय रिजर्व बैंक ने एक बार फिर रेपो दरों में पच्चीस आधार अंक की बढ़ोतरी कर दी है। इस तरह अब रेपो दर साढ़े छह फीसद पर पहुंच गई है। इस बढ़ोतरी का अनुमान पहले से ही लगाया जा रहा था। पिछले दस महीनों में यह छठवीं बढ़ोतरी है। इस दौरान रेपो दर में ढाई सौ अंक की बढ़ोतरी की जा चुकी है। हालांकि कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि अब रिजर्व बैंक बढ़ोतरी को लेकर अपने हाथ रोक लेगा। मगर रिजर्व बैंक के रुख से ऐसा नहीं लग रहा कि वह महंगाई को लेकर आश्वस्त है, इसलिए उसने इस पर कोई स्पष्ट टिप्पणी नहीं की है। रेपो दरों में बढ़ोतरी का मतलब होता है कि इस दर पर सारे बैंक भारतीय रिजर्व बैंक से कर्ज लेते और फिर उससे अपना कारोबार करते हैं। जाहिर है, बैंक अपनी ब्याज दरें इससे कुछ ऊंची ही रखते हैं। इस तरह बैंकों से घर, वाहन, कारोबार आदि के लिए कर्ज लेने वालों पर ब्याज का बोझ बढ़ता है। मगर दूसरी तरफ उन लोगों को लाभ भी मिलता है, जिन्होंने अपने गाढ़े वक्त के लिए बैंकों में निवेश कर रखा या पैसे जमा कर रखे हैं।
रेपो दर में बढ़ोतरी का असर महंगाई पर पड़ता है। उसे रोकने में मदद मिलती है। पिछली बढ़ोतरियों का स्पष्ट प्रभाव भी नजर आ रहा है। फिर अंतरराष्ट्रीय बाजार में ब्याज दरों में बढ़ोतरी को देखते हुए भी भारतीय रिजर्व बैंक को अपनी दरों में बढ़ोतरी करना मजबूरी थी। अमेरिकी फेडरल ने महंगाई के मद्देनजर लगातार अपनी दरें ऊंची की हैं। इसका नतीजा यह भी देखने को मिला कि बहुत सारे विदेशी निवेशकों ने भारत के बाजार से अपना पैसा निकाल कर वहां लगाना शुरू कर दिया। इसके चलते डालर के मुकाबले रुपए की कीमत गिरती गई। रिजर्व बैंक के रेपो दर में बढ़ोतरी से उन निवेशकों को रोकने में मदद मिलेगी। फिर ब्याज दरें ऊंची होने की वजह से बाजार में पूंजी का अनियंत्रित प्रवाह रुकता है। मगर इससे महंगाई पर वास्तव में कितना असर पड़ेगा, दावा करना मुश्किल है। खुद रिजर्व बैंक ने माना है कि चालू वित्त वर्ष की चौथी तिमाही में महंगाई साढ़े पांच फीसद पर सिमट जाएगी, पर अगले वित्त वर्ष में फिर इसके बढ़ने की संभावना है। इसलिए एकमात्र रेपो दरों में बढ़ोतरी, महंगाई रोकने का कारगर उपाय साबित होगा, दावा नहीं किया जा सकता।
दरअसल, भारत में महंगाई बढ़ने की कई वजहें होती हैं। जिस साल मानसून अच्छा नहीं रहता या अनियंत्रित रहता है, उस साल कृषि उपज खराब होती है और खानेपीने की चीजों की कीमतें एकदम से बढ़ जाती हैं। फसलें अच्छी होती हैं, तो कीमतें नीचे आ जाती हैं। चालू वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही में महंगाई घटने के पीछे मुख्य वजह यही मानी गई। फिलहाल औद्योगिक क्षेत्र में अपेक्षित गति नहीं लौट पाई है। निर्यात का रुख नीचे की तरफ है। कई देशों के साथ व्यापार घाटा लगातार बढ़ रहा है। रोजगार के नए अवसर पैदा नहीं हो पा रहे, जिसकी वजह से लोगों की क्रय शक्ति नहीं बढ़ पा रही। तेल की कीमतें अब भी काबू से बाहर हैं। ऐसे में महंगाई की दर अब लोगों की सहन क्षमता से अधिक है। फिर रेपो दरों में बढ़ोतरी का उपाय आजमाने से औद्योगिक और व्यापारिक गतिविधियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है, जिसका सीधा असर देश की विकास दर पर पड़ता है। यानी इस तरह संतुलन बिठाना मुश्किल रहेगा।
Date:10-02-23
गुब्बारे से तनावसंपादकीय
जासूसी गुब्बारे तनाव का विषय बन गए हैं, तो इसके पीछे न केवल कुछ देशों का अविश्वास, बल्कि वह दुश्मनी भी है, जो बढ़ती चली जा रही है। अमेरिका में उड़ता पाया गया चीनी गुब्बारा चर्चा के केंद्र में है और चर्चा तनाव की ओर बढ़ रही है। अब एक अमेरिकी रिपोर्ट आई है, जिसमें बताया गया है कि चीन ने भारत और जापान सहित कई देशों को निशाना बनाते हुए जासूसी गुब्बारों का संचालन किया है। अमेरिकी सेना के लड़ाकू जेट ने देश में संवेदनशील प्रतिष्ठानों पर तैर रहे एक चीनी जासूसी या निगरानी गुब्बारे को मार गिराया था। हालांकि, ऐसा कोई गुब्बारा भारत में चर्चा में नहीं आया है। क्या भारतीय सुरक्षा एजेंसियों को ऐसे गुब्बारों की सूचना है? अमेरिकी रिपोर्ट बताती है कि जासूसी गुब्बारे कई वर्षों से चीन के दक्षिणी तट से दूर हैनान प्रांत से संचालित होते आए हैं। जापान, भारत, वियतनाम, ताइवान और फिलीपींस सहित चीन उन तमाम देशों की जासूसी करता है, जो उसकी नजर में उभरती सामरिक ताकत हैं। क्या अमेरिकी आरोपों में सच्चाई है? क्या अमेरिकी आरोप चीन पर स्वाभाविक ही चिपक नहीं जा रहे हैं?
अमेरिकी अधिकारियों ने कहा है कि इन जासूसी गुब्बारों को आंशिक रूप से पीएलए (पीपुल्स लिबरेशन आर्मी) की वायु सेना द्वारा संचालित किया जा रहा है और इन्हें पांच महाद्वीपों में देखा गया है। चीन दूसरे देशों की संप्रभुता का उल्लंघन कर रहा है। हालांकि, यह भी गौर करने वाली बात है कि ऐसे उल्लंघन किसी न किसी प्रकार से अमेरिका भी दशकों तक करता रहा है। अब ऐसी जासूसी को चीन भी अपना अधिकार मानने लगा हो, तो अचरज नहीं। विशेषज्ञ जानते हैं, चीन ने अमेरिका से ही सर्वाधिक सीखा है और अब भी अमेरिका में ही ऐसी विशेषताएं हैं, जिनसे प्रभावित होकर चीन सुधार के लिए प्रेरित हो सकता है। अगर यह मान लिया जाए कि पिछले सप्ताह अमेरिका में चार से ज्यादा गुब्बारे देखे गए हैं, तो अन्य देशों में कितने देखे गए हैं, यह महत्वपूर्ण सवाल है। चीन का दावा है कि गुब्बारा शोध का हिस्सा था और गलती से भटककर अमेरिका पहुंच गया। वास्तव में, चीन ने दुनिया को अविश्वास के इतने मौके दिए हैं कि उस पर सहज विश्वास करना मुश्किल है।
आज दुनिया जिस मुकाम पर है, वहां बड़ी शक्तियों को ज्यादा समझदारी का परिचय देना चाहिए। युद्ध की मानसिकता से जल्द से जल्द निकल आना चाहिए। अमेरिकी विदेश मंत्री एंटोनी ब्लिंकन की बीजिंग की तय यात्रा स्थगित हो गई। चीन का गुब्बारा फोड़ दिया गया, तो चीन ने भी पूरे बचकानेपन के साथ प्रतिक्रिया दी कि वह भी ऐसा ही करेगा। गुब्बारे कभी युद्ध लड़ने की क्षमता की निशानी हुआ करते थे, लेकिन अब जासूसी का माध्यम बन गए हैं। अंतरराष्ट्रीय कानून तो स्पष्ट है, गुब्बारे अपने देश की थल सीमा पार नहीं कर सकते और जल सीमा में लगभग 22 किलोमीटर दूर ही जा सकते हैं। समस्या संप्रभु हवाई क्षेत्र की ऊपरी सीमा के पार है। सैन्य विमान 13.7 किलोमीटर से ज्यादा की ऊंचाई पर उड़ते हैं, जबकि सुपरसोनिक जेट 18 किलोमीटर की ऊंचाई पर उड़ते हैं, खबर यह है कि चीनी गुब्बारा भी 18 किलोमीटर से ज्यादा की ऊंचाई पर देखा गया है। मतलब, गुब्बारे से जुड़ी विकसित तकनीक इस स्तर पर पहुंच गई है कि अंतरराष्ट्रीय कानूनों को संशोधित करने की जरूरत महसूस होने लगी है। बहरहाल, चीन चाहे, तो अपने अपनी कथित सकारात्मक शोध के बारे में दुनिया को बताकर आश्वस्त कर सकता है।
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भारत के प्रत्येक क्षेत्र में मध्य वर्ग एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाता आ रहा है। फिलहाल वित्त मंत्री का फोकस सार्वजनिक बुनियादी ढांचे में निवेश से मध्यवर्ग पर पड़ने वाले प्रभाव पर है। इससे जुड़े कुछ बिंदु –
एक अध्ययन में लोगों से जब स्वयं ही वर्ग-निर्धारण की बात कही गई, तब देश की लगभग आधी जनता इस वर्ग में आ गई। इस अध्ययन में मध्यवर्ग की अधिकांश जनता को शहरों में बसा हुआ पाया गया है। सरकार के लिए यह चिंता का विषय होना चाहिए, क्योंकि जहाँ एक ओर सरकार को कर की हानि हो रही है, वहीं दूसरी ओर मध्यवर्ग की बढ़ती संख्या वोट बैंक का सहारा बन सकती है। अतः वित्त मंत्री की सोच सही दिशा में जा रही है। देश की उन्नति के लिए मध्यवर्ग की तेज रफ्तार मायने रखती है।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 17 जनवरी, 2023
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Date:09-02-23
Quake Up CallTurkiye,Syria impact magnified by poor construction. India must ensure building codes are followedTOI Editorials
Quake-hit Turkiye and Syria hold a big lesson for India. The tragedy in those two countries would have been less severe had authorities in affected areas not tolerated poor construction and rampant violation of building code. This sounds scarily familiar in this country. Parts of the Indian peninsula lie in a seismically volatile zone – where the Indian and Eurasian tectonic plates meet. Around 59% of India is prone to earthquakes of different magnitudes – 11% in the very high-risk Zone V (Kashmir Valley, western Himachal, eastern Uttarakhand, the Northeast, Rann of Kutch), 18% in high-risk Zone IV (Delhi, parts of Maharashtra, Haryana, UP, Bengal and Bihar), and 30% in Zone III (Kerala, Goa, Lakshadweep, parts of MP, Jharkhand, Chhattisgarh).
It’s not that India doesn’t have norms for earthquake-resistant construction. There is the National Building Code (NBC), 2016, with specific sections on earthquake-resistant design and construction. But there’s no law asking for compliance. In Delhi an estimated 90% of buildings are at risk of collapsing in case of a strong earthquake. In 2019, MCD had drafted a safety audit policy to protect buildings from earthquakes. But this failed to take off because the onus of conducting and paying for the audit was put on the public.
True, there’s a cost in incorporating earthquake-resistant changes in buildings – 3-4% extra of total construction cost for residential buildings and 2-3% extra for offices. Surely, this is a cost worth bearing for saving lives and property. There are two ways forward. First, there needs to be greater public awareness about NBC guidelines to boost voluntary compliance. And second, municipalities should be encouraged to adopt NBC guidelines in their building bye-laws, making them mandatory. Earthquakes can’t be predicted, but measures to minimise loss of lives must be prioritised.
Date:09-02-23
न्यायिक फैसले सबको समझाने की नई पहलसंपादकीय
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) ने पिछले दिनों कहा कि देश की सबसे बड़ी कोर्ट के फैसले सभी क्षेत्रीय भाषाओं में अनूदित करने का बड़ा लाभ होगा। उन्होंने इसके लिए आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस टेक्नीक का प्रयोग करने की बात की। दरअसल हिंदी में फैसलों का अनुवाद करने में इसका प्रयोग इन दिनों काफी जोर-शोर से चल रहा है। प्रधानमंत्री ने कई बार पहले भी इस प्रयास को शुरू कर फैसलों को आम जनता के लिए सुलभ करने की बात कही थी। मद्रास के एआई टेक्नीक के एक विशेषज्ञ प्रोफेसर इस विषय पर काम कर रहे हैं। यह सच है कि आजादी के 70 साल बाद भी न्याय-प्रक्रिया और न्याय की बारीकियों के बारे में 99 फीसदी लोग, जिनका जीवन इन फैसलों से प्रभावित होता है, कुछ भी नहीं जानते। जिला और तहसील के वकील तक इन बड़े फैसलों के बारे में पूरी तरह वाकिफ नहीं होते क्योंकि वे अंग्रेजी में होते हैं। नतीजतन, न्याय दिल्ली में बैठे अभिजात्य वर्ग और कुछ बड़े वकीलों की बौद्धिक जुगाली का विषय बनकर रह जाता है। क्षेत्रीय भाषाओं में इन फैसलों के अनुवाद के बाद गांव का व्यक्ति भी उन्हें न केवल समझ सकेगा बल्कि अपने अधिकारों के प्रति और कानूनी जिम्मेदारियों को लेकर सजग हो सकेगा। राज्य के भ्रष्ट अभिकरण जैसे पुलिस या अन्य नियामक संस्थाओं में बैठे लोग उनको डरा-धमका नहीं सकेंगे।
Date:09-02-23
अभयारण्यसंपादकीय
वन्य जीव संरक्षण के लिए बनाए गए पार्कों, अरण्यों आदि को सैर-सपाटे की जगह बना देने ही का नतीजा है कि लुप्तप्राय जीवों की प्रजातियों को बचाने में कामयाबी नहीं मिल पा रही। इस तथ्य से पर्यावरण मंत्रालय अनजान नहीं है। मगर फिर भी कानूनों में बदलाव करके अभयारण्यों में चिड़ियाघर और सफारी शुरू करने की मंजूरी दे दी गई। पिछले साल जून में पुराने कानून में बदलाव करते हुए पर्यावरण मंत्रालय ने बाघ अभयारण्यों और दूसरे वन्यजीव संरक्षण के लिए बने अरण्यों और पार्कों के फैलाव वाले इलाकों में चिड़ियाघर और सैर-सपाटे के लिए खोलने की मंजूरी दे दी। इस पर सर्वोच्च न्यायालय ने विशेष अधिकार प्राप्त समिति का गठन किया था। उस समिति ने सिफारिश की है कि अभयारण्यों और वन्यजीव संरक्षण पार्कों के फैलाव वाले इलाकों में ऐसी गतिविधियों की मंजूरी तुरंत वापस ली जानी चाहिए। इन फैलाव वाले इलाकों में केवल घायल या बीमार वन्यजीवों के उपचार आदि के लिए गतिविधियां शुरू की जा सकती हैं। खासकर बाघों के संरक्षण को लेकर इसमें अधिक चिंता जताई गई है, क्योंकि उनके संरक्षण को लेकर अब तक किए गए प्रयास विफल ही साबित हुए हैं। मानवीय गतिविधियों का उनके जीवन पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है।
यह छिपा नहीं है कि तमाम अभयारण्यों के भीतर और उनके फैलाव वाले इलाकों में सैर-सपाटे को बढ़ावा देने के मकसद से चोरी-छिपे अनेक प्रकार की व्यावसायिक गतिविधियां चलाई जाती हैं। बहुत सारे अभयारण्यों में मोटेल, विश्राम गृह, रेस्तरां और जलसे आदि के लिए जगहें बना दी गई हैं, जिनमें पूरे साल कुछ न कुछ गतिविधियां चलती रहती हैं। इन अभयारण्यों की तरफ सैलानियों को आकर्षित करने के लिए विज्ञापन तक दिए जाते हैं। कई जगह सफारी शुरू की गई है। यानी गाड़ियों में बिठा कर सैलानियों को उन वनों में विहार कराया जाता है। चिड़ियाघर खोलने की इजाजत देने के पीछे भी मकसद यही है कि इससे सैलानियों को आकर्षित किया जा सकता है। अभयारण्य और वन्यजीव पार्क पर्यटन को बढ़ावा देने का कारगर माध्यम साबित होते हैं। इसलिए सरकारें राजस्व के लोभ में ऐसी जगहों पर पर्यटन संबंधी गतिविधियों को बढ़ावा देती हैं। मगर इन गतिविधियों के चलते वन्यजीवों के स्वाभाविक जीवन पर बहुत बुरा असर पड़ता है। इससे उनकी प्रजनन क्षमता घटती और कई बीमारियां घेर लेती हैं। वन्यजीव अंगों की तस्करी करने वालों की भी इस तरह अभयारण्यों में घुसपैठ आसान हो जाती है। इसलिए वन्यजीवों के लिए काम करने वाली संस्थाएं और विशेषज्ञ लगातार कहते रहे हैं कि अभयारण्यों के आसपास व्यावसायिक गतिविधियां नहीं चलाई जानी चाहिए।
अभयारण्यों में होटल, मोटेल, रेस्तरां, जलसाघर, विश्रामगृह, सफारी आदि खुलने से वहां हर समय वाहनों की आवाजाही लगी रहती है। रात को भी तेज रोशनी होती और जलसों में बजने वाले तेज संगीत आदि से वन्यजीवों का स्वाभाविक जीवन प्रभावित होता है। वे हर समय एक प्रकार के भय में जीते हैं। न तो ठीक से उनका भोजन हो पाता है और न ही पूरी नींद ले पाते हैं। यही वजह है कि बहुत सारे लुप्तप्राय वन्यजीवों की प्रजनन दर घट जाती और वे बीमार रहने लगते हैं। बाघों के मामले में अनेक प्रयासों के बावजूद उनकी संख्या बढ़ाना चुनौती बनी हुई है। अभयारण्यों के भीतर मानवीय गतिविधियां समाप्त करने के इरादे से ही सर्वोच्च न्यायालय ने कुछ साल पहले उनमें बसे गांवों को हटाने का आदेश दिया था। इन तथ्यों से वाकिफ होने के बावजूद अगर पर्यावरण मंत्रालय ने व्यावसायिक गतिविधियों की मंजूरी दी, तो यह हैरानी की बात है।
Date:09-02-23
ईएमआई होगी महंगीसंपादकीय
भारत में मुख्य मुद्रास्फीति (मुख्य रूप से विनिर्माण क्षेत्र की महंगाई) में क्रमिक आधार पर लगातार कमी आने और 6.25 प्रतिशत के ऊंचे स्त तक पहुँच चुकने के मद्देनजर रेपो दर (नीतिगत दर) में और वृद्धि की जरूरत सीमित होने के विचार के बरक्स केंद्रीय बैंक भारतीय रिजर्व बैंक ने बुधवार को रेपो दर 0.25 प्रतिशत बढ़ाकर 6.5 प्रतिशत करने का फैसला किया। महंगाई को लक्ष्य के अनुरूप दायरे में लाने के लिए आरबीआई ने चालू वित्त वर्ष की आखिरी द्विमासिक मौद्रिक नीति समीक्षा में एक बार फिर नीतिगत दर- रेपो रेट में वृद्धि की है। रेपो दर वह ब्याज दर है जिस पर वाणिज्यिक बैंक अपनी फौरी जरूरतों को पूरा करने के लिए केंद्रीय बैंक से कर्ज लेते हैं। इसमें वृद्धि का मतलब है कि बैंकों और वित्तीय संस्थानों से लिया जाने वाला कर्ज महंगा हो जाएगा यानी मौजूदा ऋण की मासिक किस्त (ईएमआई) बढ़ेगी। केंद्रीय बैंक का कहना है कि आने वाले समय में नीतिगत दर में और भी वृद्धि की जा सकती है क्योंकि उसका आकलन है कि मुख्य मुद्रास्फीति ऊंची बनी रह सकती है। गौरतलब है कि एसएंडपी ग्लोबल रेटिंग्स का आकलन था कि ब्याज दरों में बढ़ोतरी की अब जरूरत नहीं है क्योंकि भारत में मुख्य मुद्रास्फीति लंबे समय तक उच्च स्तर पर रहने के बाद 2022 की दूसरी छमाही से लगातार नीचे आ रही है। लेकिन रिजर्व बैंक ने इस आकलन के विपरीत फैसला किया है, तो इसलिए कि वह वैश्विक परिदृश्य की चुनौतियों को लेकर सतर्क है। वह चाहता है कि महंगाई का कारण बनने वाले कारकों पर अंकुश जरूरी है। रिजर्व बैंक को खुदरा मुद्रास्फीति को 4 प्रतिशत (दो प्रतिशत ऊपर या नीचे) के स्तर पर रखने की जिम्मेदारी मिली हुई है। रूस – यूक्रेन युद्ध जैसे बाहरी कारकों से खुदरा मुद्रास्फीति लगातार 11 माह तक संतोषजनक स्तर से ऊपर रही लेकिन नवम्बर, 2022 में यह 6 प्रतिशत से नीचे आ गई। दिसम्बर, 2022 में यह 5.72 प्रतिशत के स्तर पर थी। ऐसे में एसएंडपी ग्लोबल रेटिंग्स को लगा कि रेपो में वृद्धि की जरूरत नहीं है। लेकिन केंद्रीय बैंक का मानना है कि महंगाई में कमी के संकेत के बीच मुख्य खुदरा मुद्रास्फीति ऊंची बनी हुई है, जिसे नीचे लाने के लिए प्रतिबद्ध रहना होगा। भू- राजनीतिक तनाव की वजह से पैदा हुईं अनिश्चितताएं, वैश्विक वित्तीय बाजार में उतार-चढ़ाव, गैर-तेल जिंसों की कीमतों में तेजी और कच्चे तेल की कीमतों में उतार-चढ़ाव निश्चित ही वे कारक हैं, जिनसे सचेत रहना होगा।
Date:09-02-23
अचानक बाल विवाह पर आक्रामकप्रभाकर मणि तिवारी वरिष्ठ पत्रकार
देश की आजादी के 75 वर्ष बीत जाने के बावजूद कई राज्यों में बाल विवाह जैसी सामाजिक बुराई/कुरीति पर अब तक अंकुश नहीं लगाया जा सका है। अब असम सरकार बाल विवाह के खिलाफ इतनी कड़ाई बरतने लगी है कि शिकायत की गूंज पूरे देश तक पहुंच रही है। पहली नजर में, संबंधित राज्य सरकार की इच्छाशक्ति और सामाजिक संगठनों के साथ मिलकर चलाए जाने वाले जागरूकता अभियानों का अभाव और वोट बैंक की राजनीति को ही इसकी प्रमुख वजह माना जा सकता है। सामाजिक नजरिये से असम सरकार के अभियान की सराहना तो हो रही है, मगर उन पर एक खास तबके को निशाना बनाने के आरोप भी लग रहे हैं। हालांकि, सरकार ने इस आरोप से इनकार किया है।
हमारे देश में बाल विवाह की कुरीति बहुत पुरानी है। इस सामाजिक बुराई की जड़ें सामाजिक व्यवस्था में छिपी हैं। पहले बच्चों की तादाद ज्यादा और आर्थिक स्थिति ठीक नहीं होने के कारण यह परंपरा समाज के लगभग सभी तबकों में प्रचलित थी। बीतते समय के साथ इसमें कुछ बदलाव जरूर आया है, लेकिन अब भी कई राज्यों में यह जस की तस कायम है। नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे की रिपोर्ट के मुताबिक, देश के कई राज्यों में शादी की कानूनी उम्र का पालन नहीं किया जा रहा है।
आंकड़ों के लिहाज से देखें, तो पश्चिम बंगाल में 42 फीसदी, बिहार में 40 फीसदी, त्रिपुरा में 39 फीसदी, झारखंड में 35 फीसदी, आंध्र प्रदेश में 33 फीसदी, असम में 32 फीसदी, तेलंगाना में 27 फीसदी, राजस्थान और मध्य प्रदेश में 25-25 फीसदी लड़कियों की शादियां कानूनी उम्र से पहले की जा रही हैं। लड़कों के मामले में भी तस्वीर ज्यादा अलग नहीं है। बिहार में 25, गुजरात, राजस्थान और मध्य प्रदेश में 24-24 फीसदी, झारखंड में 22 फीसदी और पश्चिम बंगाल में 20 फीसदी लड़कों की शादी 21 वर्ष से पहले हो जाती है। आजादी के 75 वर्ष बाद यह तस्वीर भयावह है। भारत में बाल विवाह की राष्ट्रीय औसत दर करीब 23.3 फीसदी है। चिंता की बात यह है कि भारत के आठ राज्यों में बाल विवाह की दर राष्ट्रीय औसत दर से ज्यादा है। इनमें से तीन राज्यों की तस्वीर तो और भी भयावह है। दरअसल, बंगाल, बिहार और त्रिपुरा में लगभग 40 फीसदी और झारखंड में 32.2 फीसदी लड़कियों का विवाह उनके 18 वर्ष की उम्र से पहले ही हो जाता है। इसका नतीजा नवजात शिशुओं और माताओं की उच्च मृत्यु दर के तौर पर सामने आता है।
केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से जारी डेमोग्राफिक सैंपल सर्वे की ताजा रिपोर्ट पर भरोसा करें, तो पश्चिम बंगाल और झारखंड देश के दो ऐसे राज्य हैं, जहां आधी से ज्यादा लड़कियों की शादी 21 वर्ष की उम्र से पहले कर दी जाती है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि राष्ट्रीय स्तर पर 29.5 फीसदी लड़कियों की शादी 21 वर्ष की उम्र से पहले हो जाती है। पश्चिम बंगाल में जहां यह आंकड़ा 54.9 फीसदी है। वहीं, झारखंड के मामले में यह 54.6 फीसदी है। यह सर्वेक्षण वर्ष 2020 में किया गया था और इसकी रिपोर्ट बीते वर्ष के आखिर में सामने आई थी। असम के पड़ोसी पश्चिम बंगाल के लोगों को राजनीतिक और सामाजिक रूप से बेहद जागरूक माना जाता है। कहावत काफी मशहूर है कि बंगाल जो आज सोचता है, वह बाकी देश कल सोचता है, लेकिन ऐसी कहावत वाले बंगाल में भी बाल विवाह धड़ल्ले से होते हैं। हालांकि, ममता बनर्जी सरकार की ओर से इस पर अंकुश लगाने के लिए शुरू की गई कन्याश्री जैसी योजनाओं से खासकर झारखंड से सटे पुरुलिया जिले में इसमें कुछ गिरावट जरूर आई है, लेकिन इसे जड़ से खत्म करना अभी संभव नहीं हो सका है। असम में बाल विवाह करने और कराने वालों के खिलाफ बिना किसी पूर्व चेतावनी सरकार की ओर से शुरू किए गए व्यापक अभियान और इसके तहत ढाई हजार से ज्यादा लोगों को हिरासत में लेने पर विवाद लगातार तेज हो रहा है। बाल विवाह कराने वाले पुजारी से लेकर काजी तक के खिलाफ मामले दर्ज किए जा रहे हैं। पुलिस के मुताबिक, इन मामलों में आठ हजार से ज्यादा लोगों की गिरफ्तारी होनी है, क्या इससे असम में बाल विवाह हमेशा के लिए रुक जाएगा? क्या इससे देश के दूसरे प्रदेश प्रेरणा लेंगे? असम में गिरफ्तारियों के विरोध में खासकर महिलाएं सड़क पर उतर आई हैं। उन्होंने पुलिस थाने और हाईवे का घेराव किया है। इस मुद्दे पर अब सियासत भी तेज हो गई है, पर असम सरकार ने इस अभियान को जारी रखने की बात कही है। इसके लिए विशेष जेल बनाई जा रही है।
विपक्षी नेताओं का आरोप है कि बाल विवाह रोकथाम अधिनियम कोई नया नहीं है, लेकिन बावजूद इसके प्रशासन की नाक तले इतने बड़े पैमाने पर बाल विवाह कैसे होते रहे? कांग्रेस नेता और बरपेटा के सांसद अब्दुल खालेक कहते हैं कि हम बाल विवाह के खिलाफ हैं और इसे हर हाल में रोका ही जाना चाहिए, लेकिन वर्षों पहले शादी करने वाले किसी दंपतियों की गिरफ्तारी गले से नीचे नहीं उतरती। गिरफ्तारी के बाद उनके बच्चों की देखभाल कौन करेगा? असम प्रदेश तृणमूल कांग्रेस अध्यक्ष रिपुन बोरा कहते हैं कि किसी खास तबके को निशाना बनाने के लिए कानून को हथियार नहीं बनाया जाना चाहिए।
एआईएमआईएम प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने सवाल उठाते हुए कहा है कि सरकार लड़कों को जेल भेज देगी, तो लड़कियों का क्या होगा? अनेक नेता पुलिस की कार्रवाई को अल्पसंख्यक विरोधी बता रहे हैं। किसी भी लोकतांत्रिक सरकार के लिए जरूरी है कि वह ऐसे आरोपों से बचे। ऐसा कतई संदेश न जाने दे कि वह समाज के खास वर्ग को निशाना बना रही है।
समाजशा्त्रिरयों का कहना है कि बाल विवाह जैसी गंभीर सामाजिक बुराई के खिलाफ बड़े पैमाने पर जागरूकता अभियान और कार्रवाई, दोनों जरूरी हैं, लेकिन किसी के साथ अन्याय न हो, यह भी सुनिश्चित हो। बाल विवाह विरोधी अभियान देश के तमाम पिछड़े राज्यों में जरूरी हैं, लेकिन तौर-तरीके ऐसे हों कि कोई उंगली न उठाए।
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हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने केरल के संरक्षित वनों के आसपास एक किलोमीटर के बफर जोन के सीमांकन का निर्देश दिया है। पारिस्थितिकीय रूप से संवेदनशील क्षेत्रों के आसपास बफर जोन का निर्माण व रखरखाव आवश्यक माना जाता है। जमीनी-स्तर के डेटा की अनुपलब्धता के कारण यह अक्सर संभव नहीं हो पाता है।
क्लाइमेट चेंज एण्ड लैंड-समरी फॉर पॉलिसी मेकर्स, 2019 की अपनी विशेष रिपोर्ट में इंटरनेशलन पैनल फॉर क्लाइमेट चेंज (आईपीसीसी) ने धारणीय भूमि प्रबंधन हेतु डेटा की उपलब्धता और उस तक पहुंच पर बहुत जोर दिया है। हमारे देश में ऐसे आंकड़े अधिकाशंत अनुमानित है। अगर केवल केरल की ही बात करें, तो 1980 के दशक की शुरूआत में सेंटर फॉर अर्थ साइंस ने इस बात का खुलासा किया था कि वहाँ की वास्तविक वन भूमि और कागजों पर दिए गए आंकड़ों में बडा अंतर है। वन-भूमि का बहुत सा भाग वास्तव में गैरवानिकी कार्यों के लिए उपयोग में लाया जा रहा है। केरल ही नहीं, बल्कि पूरे देश में वन-भूमि का ऐसा ही दुरूपयोग हो रहा है। यही कारण है कि न्यायालय ने सीमांकन का निर्देश दिया है।
प्राकृतिक वन और मानव बस्ती के बीच की सीमा तय करना जरूरी
बफर जोन मैपिंग कैसी हो ?
‘द हिंदू’ में प्रकाशित श्रीकुमार चट्टोपाध्याय के लेख पर आधारित। 9 जनवरी, 2023
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Date:08-02-23
Make In IndiaAs Google comes up with a ChatGPT rival & AI becomes ubiquitous, here’s what GoI must doTOI Editorials
The world of chatbots is hotting up. Google on Monday said that a new artificial intelligence (AI) service named Bard is being tested ahead of a public launch. It’s a conversational service which can provide textual answers to questions raised by users. Bard’s public launch will make it the second generative AI, after ChatGPT, to be freely accessible. Generative AI represents another dimension where the technology has moved beyond pattern recognition to synthesising answers from large data sets.
AI doesn’t have a precise definition. It’s best described as a constellation of technologies. The idea arises from English mathematician Alan Turing’s work in 1950 where he suggested a machine could be programmed to learn from experience in the way children do. The idea has now fructified, and AI is transforming every conceivable area of activity. Acknowledging its importance, the budget announced that three centres of excellence in AI will be set up in top educational institutions, with the private sector contributing to the effort. GoI has taken the right step as AI, the world’s most disruptive technology, is growing everywhere on the back of a collaborative effort between the state and private sector.
GoI’s foremost contribution to making India a key centre in the global AI network will have to be in research. Not all of it can generate commercial returns immediately. However, the long-term payoffs are invaluable. A lot of US government support to domestic AI development is routed through its defence industry. China, the other AI powerhouse, has thrown the weight of the state’s resources behind its attempt to dominate. Large-scale funding and creation of research ecosystems that draw in global Indian talent in AI need to be GoI’s priorities.
AI is already in extensive use at the commercial level. Indian firms have access to domestic talent to leverage these opportunities. It now needs to be complemented by access to data. AI rests on three pillars: data, algorithms and computing power. Indian firms need a sound regulatory framework that allows access to a lot more anonymised data. A GoI expert committee suggested open access to non-personal data. India’s lagging in establishing a legal framework to both safeguard privacy and provide open access to anonymised data for Indian startups. This needs to be addressed soon. AI is the technological frontier that offers India a chance to leapfrog a few stages.
Date:08-02-23
Multilingual Means Better Learning ToolsET Editorials
AMacmillan Education India survey reports that 86% of teachers in northern India want their classrooms to be multilingual. One presumes that to mean engaging in regional languages and English, and Hindi if the former isn’t Hindi. Promoting multilingualism should not turn classrooms into towers of Babel but give teachers the flexibility to improve learning outcomes. It is essential that children learn not just words but comprehend their meanings. There is no point children drawing a house with thatched roofs and a chimney where ‘home’ is signified by flatroofed houses. For this purpose, learning outcomes are most effective when the language at school is the language at home, supplemented with the link languages of English and Hindi.
Diversity of languages provides a readymade opportunity for a polyglot nation. Experts find speaking multiple languages improves cognitive skills. Encouraging students to learn a modern Indian language (including English) other than their own is a good idea from a cognitive perspective. Getting lost in translation is an invitation to fall into rote. First-generation learners and those without adequate home support face another problem. Difficulty in comprehending makes sitting in class challenging and tiresome, resulting in disinterest, avoiding class and even dropping out, reinforcing the cycle of disadvantage. Allowing the use of the local language/dialect in the classroom can break this cycle.
This needs capable teachers to engage and corresponding language tools like quality textbooks and audiovisual content. Teachers must be supported to experiment and to develop the required learning materials. But, before that, educators need to get on the same page on what comprises a multilingual classroom.
Date:08-02-23
कानूनी चाबुक से खत्म नहीं होंगे सामाजिक दोषसंपादकीय
दुनिया भर की न्याय-प्रक्रियाओं ने सिद्ध किया है कि सामाजिक बुराइयों को केवल कानूनी चाबुक से खत्म नहीं कर सकते, क्योंकि इनके पैदा होने के मूल कारण भी अलग-अलग होते हैं। हमने देखा कि एक राज्य ने शराबबंदी लागू की जबकि उस दिशा में सामाजिक चेतना को जगाने के लिए समुचित उपक्रम नहीं हुआ। नतीजतन, जहरीली शराब पीकर मौतें होती हैं। इसी राज्य में लड़कियों की शिक्षा पर सरकार ने एक अरसे से काफी ध्यान दिया, जिससे दस साल बाद प्रजनन दर में गिरावट आनी शुरू हो गई है यानी शिक्षित लड़कियां गर्भ निरोध के आधुनिक तरीके अपनाने लगीं। पूरे देश में आज प्रजनन दर घटकर 2.1% पर आ गई है क्योंकि लड़कियां शिक्षित हो रही हैं और नौकरी के साथ फैसले भी ले रही हैं। पूर्वोत्तर के एक राज्य में एक दिन में 2700 लोगों को बाल- विवाह के आरोप में गिरफ्तार करना समस्या का सही समाधान नहीं है। राज्य के मुख्यमंत्री ने दंडात्मक कार्रवाई का औचित्य बताते हुए 16% बच्चे 15-19 साल की लड़कियों की कोख से पैदा हो रहे हैं। जाहिर है ये बच्चे भविष्य में कमजोर होंगे, मातृमृत्यु दर (इस राज्य में सर्वाधिक है) और बाल मृत्यु दर बढ़ेगी। लेकिन इसके खिलाफ लोगों की चेतना जगानी होगी न कि जेल भेजने से बाल-विवाह रुकेगा। सन् 2000- 2010 के बीच नारी-शिक्षा का अभियान चला और देशव्यापी जागरूकता से बाल विवाह 47 से 30% रह गया। कानून का दंड कुछ हद तक हतोत्साहित कर सकता है लेकिन हजारों साल की सामूहिक सोच खत्म करने के लिए उनकी समझ को बदलना होगा। साथ ही शिक्षा, स्वास्थ्य की सुविधा के अलावा नारी सशक्तीकरण अभियान शुरू करना होगा।
Date:08-02-23
इस बार के आम बजट की पांच जरुरी बातेंचेतन भगत, ( अंग्रेजी के उपन्यासकार )
इस जैसे किसी कॉलम में सरकार की तारीफ करने का मतलब है, अपने पर ‘भक्त’ या ‘चापलूस’ होने का ठप्पा लगवाने का खतरा मोल लेना। ये सच है कि हमें सरकार या उसकी नीतियों में जो कमियां हैं, उनकी आलोचना करनी चाहिए। लेकिन क्या जब सरकार ने कोई प्रशंसा-योग्य कार्य किया हो तब भी उसकी प्रशंसा न की जाए? क्योंकि मौजूदा सरकार के द्वारा अब तक प्रस्तुत किए गए नौ बजटों में से इस वर्ष का आम बजट सबसे अच्छा रहा है। बात राजकोषीय जिम्मेदारी की हो, बुनियादी ढांचे को बढ़ावा देने व खर्चीली सब्सिडियों में कटौती करने की हो या करदाताओं को राहत देने की, बजट ने हर क्षेत्र में अच्छा काम किया है। बजट की पांच बातें ऐसी हैं, जिनके लिए सरकार की सराहना की जाना चाहिए।
पहली बात, 2024 के लोकसभा चुनावों से पहले यह इस सरकार का आखिरी बजट था। इसके बाद अब सरकार पूरी तरह से चुनावी मोड में आ जाएगी। अतीत में चुनाव से पूर्व के अंतिम बजटों के साथ यही समस्या रही है। वोटों की चाह में इनमें दिल खोलकर सौगातें, सबसिडियां, छूट आदि दी जाती थीं। वास्तव में चुनाव-पूर्व बजट का लोकलुभावन होना इतना तयशुदा मान लिया गया था कि विश्लेषकगण इस बार भी वैसी ही अपेक्षा कर रहे थे। एक्सपर्ट लोग इस तरह की बातें कहने के लिए तैयार बैठे थे कि बजट में राजकोषीय जिम्मेदारी का निर्वाह नहीं किया गया है, लेकिन यह समझा जा सकता है, क्योंकि अगले साल चुनाव जो हैं आदि इत्यादि… लेकिन मौजूदा बजट सरकारी खजाने को मजबूती देने वाला है। राजकोषीय घाटे का मतलब होता है सरकार का अपनी आमदनी से ज्यादा खर्च करना, इसलिए यह घाटा जितना कम हो उतना अच्छा। दो साल पहले यह जीडीपी का 6.7 प्रतिशत हो गया था, जिसे इस बार 5.9 प्रतिशत तक लाने का लक्ष्य रखा गया था। ये आंकड़े भले हर भारतीय के जीवन पर प्रभाव डालते हों, लेकिन उनमें रुचि केवल अर्थशास्त्रियों की होती है। अगर सरकार जरूरत से ज्यादा खर्च करती है तो मुद्रास्फीति की स्थिति निर्मित हो जाती है और इकोनॉमी कमजोर होती है। लेकिन शॉर्ट टर्म में ज्यादा खर्च करने का लोभ संवरण करना कठिन होता है। मुफ्त सौगातें देने वाली पार्टी वोटरों को बड़ी प्रिय होती है। लेकिन इस बार के बजट में सरकार ने ऐसा नहीं किया और वित्त-वर्ष 2025-26 तक राजकोषीय घाटे को 4.5 प्रतिशत तक लाने का भी लक्ष्य रख लिया गया है।
दूसरी बात, ऐसा नहीं है कि यह सरकार हमेशा ही हाथ रोककर खर्चा करती है। सरकार के खर्चों का एक बड़ा हिस्सा वेतन भुगतान और राजस्व-व्यय कहलाने वाले ब्याज भुगतान में नियमित रूप से जाता है। इनसे रोजमर्रा का कामकाज चलता है। लेकिन सरकार दीर्घकालिक लक्ष्यों की पूर्ति के लिए भी पैसा खर्च करती है, जिन्हें पूंजीगत-व्यय कहा जाता है। ये वैसे व्यय हैं, जिनसे भविष्य में रिटर्न मिलता है। बुनियादी ढांचे के निर्माण जैसे सड़कें, रेल, पुल, बंदरगाह, हवाई अड्डे आदि इनका बड़ा हिस्सा हैं। सरकार का पूंजीगत व्यय इस साल 7.21 लाख करोड़ से बढ़कर 10 लाख करोड़ हो जाएगा। यह 37 प्रतिशत की बढ़ोतरी है और तीन वर्ष पूर्व के व्यय की तुलना में लगभग दोगुनी है। अकेले रेलवे मंत्रालय का व्यय 1.6 लाख करोड़ से बढ़कर 2.4 लाख करोड़ हो गया है, जो कि एक साल में 48 प्रतिशत का इजाफा है। ये मामूली बदलाव नहीं हैं, बल्कि देश के लिए बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर के निर्माण पर सर्वाधिक जोर देने की नीति का परिणाम हैं। बुनियादी ढांचे की इन तमाम परियोजनाओं से नौकरियों का सृजन होगा, लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण यह है कि इससे आने वाले समय में उत्पादकता और आर्थिक विकास को बढ़ावा मिलेगा। नागरिकों को बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर से जो सुविधा होगी, वह तो है ही।
तीसरी बात, आखिरी बार ऐसा कब हुआ था कि सरकार ने बड़े पैमाने पर सब्सिडियों में कटौती की हो और वह भी चुनाव से ठीक पहले? सरकार ने इस बार के बजट में ठीक यही किया है। फूड, फर्टिलाइजर, पेट्रोलियम आदि में दी जाने वाली सब्सिडियों को 5.6 लाख करोड़ से घटाकर 4 लाख करोड़ कर दिया गया है, जो कि 28 प्रतिशत की गिरावट है। आम बजट के मूल में सरकारी खजाने की स्थिति को बेहतर बनाने की भावना निहित होती है और सरकार ने इस बजट के माध्यम से यही किया है।
चौथी बात, बीते अनेक वर्षों से विनिवेश के लक्ष्यों को अर्जित नहीं किया जा रहा था। बीते वर्ष भी विनिवेश के लक्ष्य का 77 प्रतिशत ही अर्जित किया जा सका। 65 हजार करोड़ के विनिवेश की अपेक्षा थी, पर 50 हजार करोड़ ही हो सका, अलबत्ता वह भी कम महत्वपूर्ण नहीं। बतलाने की जरूरत नहीं कि कोविड-काल में सरकार ने एअर इंडिया को बेचने में सफलता पा ली थी, अकेला वह कदम ही सराहना का हकदार है।
आखिरी बात, बीते अनेक वर्षों से आयकर के स्तरों को बदला नहीं गया था और मुद्रास्फीति को देखते हुए इसमें सुधार अपेक्षित था। आयकर का एक अधिक उपयुक्त स्तर न केवल मध्यवर्ग को राहत देता है, बल्कि कर-नीति के प्रति स्वीकृति भी बढ़ाता है। मिडिल इनकम वालों को कर में छूट देकर सरकार ने अपने लिए बहुत सारे समर्थक जुटा लिए हैं। साथ ही बजट में और भी बहुत सारी बातें थीं, जैसे विभिन्न योजनाएं, छोटे कल्याणकारी कदम, कुछ नीतिगत बदलाव। साथ ही नियमित ड्यूटियां, कर-निर्धारण, कुछ उत्पादों को महंगा तो कुछ को सस्ता करने के निर्णय थे। एक बड़ी और स्थिर अर्थव्यवस्था का बजट ऐसा ही होना चाहिए।
Date:08-02-23
कृषि क्षेत्र को समर्थनसंपादकीय
केंद्रीय बजट में 2023-24 के लिए कृषि के वास्ते जिस पैकेज का प्रस्ताव किया गया है उसका लक्ष्य प्रमुख तौर पर उन कार्यक्रमों और संस्थानों को आगे बढ़ाने का है जो इस क्षेत्र को वृद्धि प्रदान करने वाले संभावित कारकों की भूमिका निभा सकते हैं। लक्ष्य यह है कि कृषि उत्पादन में इजाफा किया जाए और साथ ही किसानों की आय में बढ़ोतरी की जाए ताकि ग्रामीण इलाकों में बढ़ते असंतोष को कम किया जा सके। परंतु इन गतिविधियों के लिए संसाधनों का आवंटन पर्याप्त है या नहीं यह एक खुला प्रश्न है। ऐसा इसलिए कि इस क्षेत्र के लिए कुल बजट में मामूली इजाफा किया गया है और इसमें पीएम-किसान सम्मान निधि योजना के तहत किसानों को चुकाई गई राशि (तीन किस्तों में सालाना 6,000 रुपये) शामिल है। इसके अलावा जहां तकनीक आधारित वृद्धि पर उचित ही जोर दिया गया है लेकिन कृषि शोध एवं विकास में प्रस्तावित निवेश कृषि क्षेत्र के सकल घरेलू उत्पाद (एग्रीजीडीपी) के 0.5 फीसदी से भी कम है। इस क्षेत्र में निवेश का वैश्विक मानक एक से दो फीसदी है। बहरहाल, कृषि से जुड़े हुए क्षेत्रों को प्राथमिकता दी गई है, खासतौर पर पशुपालन और मछलीपालन आदि को तवज्जो दी गई है जो छोटे और सीमांत किसानों के लिए कृषि आय के पूरक का काम करते हैं।
बजट में प्रस्तुत की गई तीन सबसे उल्लेखनीय पहल हैं एग्रीकल्चर एक्सिलरेटर फंड, कृषि से जुड़ी सूचनाओं और सेवाओं के लिए समावेशी डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर का निर्माण और कृषि उत्पादों के लिए विकेंद्रीकृत वेयरहाउसिंग क्षमता का विकास।
अन्य अहम कदमों में शामिल हैं उच्च मूल्य वाली बागवानी उपज के अच्छी गुणवत्ता के बीजों के उत्पादन को प्रोत्साहन देना, लंबे रेशे वाले कपास की खेती को बढ़ावा और प्राथमिक सहकारी समितियों तथा स्वयं सहायता समूह जैसे जमीनी ग्रामीण संस्थानों में सुधार को गति देना। इसके अलावा उसने संस्थागत कृषि ऋण वितरण के लक्ष्य को 20 लाख करोड़ रुपये कर दिया है। इसमें भी डेरी और मछलीपालन पर ध्यान देने की बात शामिल है। जिस एग्रीकल्चर एक्सिलरेटर फंड की योजना बनाई गई है उसका लक्ष्य है उन कृषि स्टार्टअप और कृषि उत्पादक संगठनों (एफपीओ) को बढ़ावा देना जो आधुनिक कृषि तकनीक को बढ़ावा देने में लगे हैं और किसानों की समस्याओं का किफायती हल प्रदान करते हैं।
वहीं दूसरी ओर प्रस्तावित डिजिटल पब्लिक इन्फ्रास्ट्रक्चर यानी अधोसंरचना की परिकल्पना एक ऐसे खुले सार्वजनिक मंच के रूप में की गई है जो फसल की योजना, फसल स्वास्थ्य, कृषि क्षेत्र के कच्चे माल, सहायक सेवाओं, ऋण, बीमा, बाजार की जानकारी तथा अन्य कई चीजों के लिए सेवाएं प्रदान करे। यह पोर्टल फसल उत्पादन के भी विश्वसनीय अनुमान लगाएगा। किसानों के अलावा इस सुविधा तक कृषि क्षेत्र के अन्य अंशधारकों की भी पहुंच होगी। कृषि जिंसों के लिए व्यापक विकेंद्रीकृत भंडारण क्षमता बनाने की योजना भी एक सुविचारित कदम है जो फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान को कम कर सकता है। फिलहाल मोटे अनाजों और दालों में यह छह फीसदी और फलों तथा सब्जियों में 15 फीसदी से अधिक है।
जिंस विशेष के लिए तथा तापमान और आर्द्रता नियंत्रित भंडारगृहों को उत्पादन केंद्रों के करीब तैयार करने से किसानों को अपनी फसल की बेहतर कीमत मिलेगी क्योंकि वे बाजार में उपज को देर से पहुंचाने में भी सक्षम होंगे। वेयरहाउसिंग की रसीदों को पहले ही बैंक ऋण लेने के लिए नकदी के समान मान्य कर दिया गया है। प्राथमिक स्तर के सहकारी ढांचे में सुधार भी जरूरी है और इससे भी कई लाभ हो सकते हैं। फिलहाल बड़ी संख्या में सहकारी समितियां, जिनमें एक से अधिक राज्यों में काम करने वाली समितियां शामिल हैं, उनकी स्थिति ठीक नहीं है। कंप्यूटरीकरण उनके रोजमर्रा के काम को पारदर्शी और प्रभावी बनाएगा। बहरहाल, 2,516 करोड़ रुपये का प्रस्तावित निवेश 63,000 ऐसी सोसाइटियों की जरूरतों के हिसाब से बहुत कम है। अगर सहकार से समृद्धि तक के लक्ष्य को हकीकत में बदलना है तो इस पर दोबारा विचार करना होगा।
Date:08-02-23
शोषण का खेलसंपादकीय
पिछले दिनों महिला खिलाड़ियों के यौन शोषण को लेकर जैसा विरोध प्रदर्शन देखा गया, उससे यही जाहिर हुआ कि खेल के मैदान में महिलाओं के सामने कई तरह की अड़चनें खड़ी हैं। हाल में कुछ महिला खिलाड़ियों या प्रशिक्षकों की ओर से यौन शोषण की शिकायतों से उठा मसला अभी किसी हल तक नहीं पहुंचा है कि अब दिल्ली में एक कबड्डी खिलाड़ी ने अपने प्रशिक्षक पर बलात्कार और भयादोहन का आरोप लगाया है। पुलिस के पास दर्ज मामले के मुताबिक एक महिला खिलाड़ी का कहना है कि उसका प्रशिक्षक न सिर्फ सात साल से बलात्कार कर रहा है, बल्कि उसने धमकी देकर उससे काफी धन भी ऐंठ लिए। गौरतलब है कि पीड़ित महिला एशियाई खेलों में देश के लिए रजत पदक जीतने वाली कबड्डी टीम की खिलाड़ी रही है। आम आपराधिक मानसिकता वाले व्यक्ति की महिलाओं के खिलाफ हरकतें छिपी नहीं हैं, लेकिन खेलों की दुनिया में इस तरह की घटनाएं ज्यादा शर्मनाक हैं। सवाल है कि प्रशिक्षक जैसी महत्त्वपूर्ण जिम्मेदारी को ताक पर रख कर कोई व्यक्ति महिलाओं के खिलाफ अपराधियों जैसी हरकतें कैसे करने लगता है!
महिला खिलाड़ियों के यौन शोषण की घटनाएं पहले भी सामने आती रही हैं। कई बार हालात की जटिलता की वजह से कुछ महिलाएं अपने शोषण के खिलाफ बोल भी नहीं पातीं। यह कोई छिपी बात नहीं है कि महिलाओं का घर की दहलीज से बाहर निकल कर पढ़ना-लिखना और उससे आगे खेलों की दुनिया में अपनी जगह बनाना आज भी किस तरह की चुनौतियों से घिरा हुआ है। होना यह चाहिए था कि अगर कोई लड़की किसी खेल में अपनी काबिलियत साबित करना चाहती है तो उसका हौसला बढ़ा कर न सिर्फ बेहतरीन प्रशिक्षकों के जरिए उसकी प्रतिभा को निखारा जाए, बल्कि देश और समाज के हक में भी उसे एक उदाहरण बनाया जाए। लेकिन अफसोसनाक यह है कि एक पारंपरिक ढांचे के समाज में तमाम अड़चनों से निकल कर किसी खेल में अपने और देश के लिए कुछ करने का सपना पालने वाली लड़की का अपराधी कई बार उसका प्रशिक्षक ही निकल जाता है। जिसके भरोसे कोई लड़की किसी खेल में देश को एक नई ऊंचाई देना चाहती है, वही प्रशिक्षक उसके व्यक्तित्व और सपने को छिन्न-भिन्न कर डालता है।
सही है कि खेलों की दुनिया में सभी लोग ऐसी आपराधिक मानसिकता वाले नहीं होते। ऐसे प्रशिक्षकों की लंबी सूची है, जिनके निर्देशन और सहयोग के बूते बहुत सारी महिला खिलाड़ियों ने दुनिया भर में अपनी काबिलियत साबित की है। मगर इसी बीच कुछ प्रशिक्षकों की आपराधिक हरकतों की वजह से किसी महिला खिलाड़ी के टूट जाने की खबरें भी आती हैं। हाल ही में कुश्ती संघ के अध्यक्ष पर महिला खिलाड़ियों के यौन शोषण के आरोपों के अलावा हरियाणा में खुद खेलमंत्री के एक महिला प्रशिक्षक से अवांछित बर्ताव की जैसी खबरें आईं, वे बताती हैं कि खेलों के शासकीय तंत्र में व्यापक सुधार की जरूरत है।
खासकर अगर कोई व्यक्ति महिला खिलाड़ियों के प्रशिक्षण जैसे जिम्मेदारी से भरे काम में लगाया जाता है तो क्षमताओं के साथ-साथ उसकी मानसिकता, प्रवृत्ति और कुंठाओं आदि की जांच-परख भी होनी चाहिए। महिला खिलाड़ियों के किसी भी तरह के शोषण की आशंका तक की स्थिति को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। वरना बहुस्तरीय बाधाओं को पार कर किसी खेल के मैदान में आईं और इसमें ऊंची उड़ान का सपना देखने वाली लड़कियों का रास्ता मुश्किल बना रहेगा।
Date:08-02-23
जाति–धर्म में न उलझे देशडॉ. सी. पी. राय
जहाँ दुनिया और मानवता के सामने फिलवक्त बड़ी चुनौतिया हैं। दुनिया के सारे देश भविष्य की चुनौतियों का आकलन करने में तथा उससे निपटने में अपनी संपूर्ण मेधा को झोंके हुए है; वहीं भारत में काफी संख्या में राजनीतिक नेतृत्व आज भी जाति और धर्म के विमर्श को ही मुख्य विमर्श बनाने में अपनी पूरी ऊर्जा खपाए हुए है।
नब्बे के दशक से भारत ने धर्म के नाम पर काफी बदनामी और तबाही झेली है और जाति के नाम पर भी उलझन में रहा है। इस वक्त कोविड महामारी के बाद की दुनिया बेरोजगारी‚ तरह–तरह की बीमारी‚ मंदी इत्यादि से जूझ रही है‚ साथ ही आने वाली चुनौतियों को लेकर बेचैन है। इसके अलावा पर्यावरण‚ ग्रीन गैसों के आतंक‚ प्रदूषण तथा गैस उत्सर्जन के कारण तरह–तरह के होते बदलाव को लेकर भी चिंतित है। जहां गर्मी पड़ती थी वहां ठंड रफ्तार पकड़ रही है तथा यूरोपीय देशों में 45–46 के बढ़ते तापमान ने लोगों को परेशान कर रखा है। जल संकट आने वाले समय की बड़ी चुनौती बनता दिख रहा है तो भारत में राजनैतिक नेतृत्व मानो सभी तथ्यों से बेखबर कभी हिंदू बनाम मुसलमान तो कभी मंदिर–मस्जिद में उलझा हुआ दिखता है; कभी रामचरितमानस तो कभी हरिजन या एससी–एसटी बनाम शूद्र में तो कभी पिछड़ों की पहचान में और देश को सैकड़ों साल पहले की बहस में घसीट कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ले रहा है। इसे वैचारिक दिवालियापन ही कहा जाएगा।
भारत इस वक्त 45 साल की सबसे बड़ी बेरोजगारी का शिकार है। पहले नोटबंदी और फिर कोविड महामारी ने अर्थव्यवस्था को बड़ा धक्का पहुंचाया है। बहुत बड़ी तादाद में नौकरियां चली गईं तो न जाने कितने कारोबार बंद हो गए। कोविड के कारण अकारण लोगों की मौतें हों या अर्थव्यवस्था के प्रभाव से आत्महत्याएं; इनके आंकड़े डराते हैं। सरकारी भर्ती या तो रुकी हुई है या फिर पद घट रहे हैं या निजीकरण की रफ्तार का प्रभाव है कि रोजगार के अवसर कम होते जा रहे हैं। ऐसे में लड़ाई और विमर्श तो इस बात पर होनी चाहिए कि रोजगार के अवसर कैसे बढ़े या विकेंद्रित कारोबार कैसे बढ़े‚ स्वरोजगार के अवसर कैसे बढ़ेॽ ऐसी परिस्थिति में जब पूंजी का केंद्रीकरण ही बढ़ रहा हो‚ अंधाधुंध शहरीकरण के कारण कृषि योग्य भूमि कम होती जा रही हो‚गांवों की अव्यवस्था और मूलभूत सुविधाओं के अभाव में शहरों की तरफ पलायन बढ़ रहा है तो बढ़ती आबादी में परिवारों में बंटवारा होने के करण खेत के छोटे–छोटे टुकड़े होते जा रहे हों‚जो किसी भी दृष्टि से लाभदायक नहीं है और परिवार का बोझ उठाने में भी असमर्थ साबित हो रहे हैं। चिकित्सा और शिक्षा महंगी होती जा रही है। देश में आर्थिक विषमता सिर्फ बढ़ ही नहीं रही है बल्कि सुरसा की तरह बढ़ती जा रही है। सौ घरानों के पास देश की 90 फीसद से ज्यादा संपदा हो गई है। पड़ोसी देशों की चुनौतियां भी मुंह बाये खड़ी है। ऐसे में जिन मुद्दों का इंसानों की बेहतरी से कोई संबंध नहीं है और कम–से–कम 90 फीसद से ज्यादा लोगों का तो कोई संबंध नहीं है; उन मुद्दों से देश को भटकाना क्या देश और समाज के साथ गद्दारी नहीं है।
सबसे बड़ा सवाल तो यही पूछा जाना चाहिए कि कोरोना के वक्त धर्म और धार्मिक संगठनों ने आमजन की कितनी मदद की या जातीय संगठन तथा कथित ठेकेदारों ने लाचार लोगों को कितनी मदद कीॽ इसी परिप्रेक्ष्य में एक सवाल पूछ लिया जाए कि इन वर्षों में धर्म का इस्तेमाल सिर्फ राजनीति और वोट के अलावा और किस रूप में हुआ हैॽ क्या इसके ठेकेदार इस बात का दावा करते हुए आंकड़े दे सकते हैं कि इन विवादों के छिड़ने के बाद से आबादी में कितनों में राम‚ लक्ष्मण‚ भरत के गुणों का विकास हुआ या कितनों ने सचमुच में राम जैसी मर्यादा‚ लक्ष्मण का समर्पण‚ भरत का आदर्श अपनाया हैॽ असल में तो यही प्रतीत होता है कि रावण और कैकेयी जैसों की संख्या ही बढ़ रही हैॽ कितनों ने कृष्ण से या महाभारत से शिक्षा ली हैॽ क्या यह आश्चर्यजनक तथ्य नहीं है कि जितनी चर्चा धर्म की बढ़ी और धर्मस्थल कदम–कदम पर बने उतना ही धर्म और ईश्वर का डर खत्म हो गया। तभी तो चारों तरफ पाप बढ़ा हुआ है और धर्म के ठेकेदारों ने सभी पापियों के लिए पाप करने के बाद उसे धोने के रास्ते भी निकाल लिये हैं। क्या यह सच नहीं है कि सीता के वनगमन का दृश्य देखकर आंसू बहाने वाले लोग फिल्म या धारावाहिक खत्म होते ही बीबी को पीटने लगते हैं‚ भारत मिलाप के दृश्य पर सुबकने वाले अपने ही भाई से मुकदमा लड़ रहे होते हैं या उसके खिलाफ षड्यंत्र कर रहे होते हैं‚ द्रौपदी के चीरहरण पर दुखी होने वाले अपने बहुत करीबी से या आसपास चीरहरण से भी ज्यादा घृणित काम कर बैठते हैं। रोज इन समाचारों से अखबार रंगे रहते हैं।
सवाल है कि फिर सभी धार्मिक पुस्तकों और प्रतीकों ने अपने मानने वालों पर क्या प्रभाव डाला हैॽ अगर कुछ नहीं तो उनका उपयोग क्या हैॽ यही सवाल जातियों के ठेकेदारों से भी है कि क्यों नहीं कोई दूसरा महत्मा फुले या बाबा साहेब डॉ. अम्बेडकर पैदा हो पाए आजतकॽ और कैसे जातियों के उत्थान के नाम पर सत्ता पाए लोग अरबपति–खरबपति बन गए। ऊंच बनाम नीच की लड़ाई लड़ते–लड़ते लोग खुद ऊँचे बन जाते हैं। भारत का नौजवान क्या पिछली शताब्दी में ही अटका है या इस प्रतिस्पर्धी युग में उसका मुकाबला करने और उस चुनौती को स्वीकार कर आगे बढ़ने की मानसिकता बना चुका है जिसके परिणामस्वरूप वह जाति और धर्म से उठकर देश और दुनिया में नौकरी हो या व्यापार या अनुसंधान सभी में अपनी प्रतिभा का लोहा मनवा सके।
किसी भी देश और समाज के नेतृत्व की जिम्मेदारी होती है कि वो अपने यहां धार्मिक और सामाजिक कटुता दूर करे‚अंधविश्वास खत्म करे और इतिहास की कटुता से अपने समाज और देश को दूर करने का जरिया बने। नई पीढ़ी को नया प्रगतिशील समाज और देश बनाने को प्रेरित करे न कि पुरानी कटुता अगली पीढ़ी को सौंपे। फिर भी जो लोग ऐसा करते हैं वो वैसे लोग हैं जिनके पास देश‚ समाज और मानवता के लिए कोई सार्थक सपने नहीं है‚ सिद्धांत नहीं है‚ जबकि आम भारतीय तो अपने दैनंदिनी संघर्ष से जूझ कर हल ढूंढ रहा है। इसे जाति और धर्म में उलझा कर अज्ञानी नेतृत्व मुद्दों से मुंह छुपाना चाहता है। देश और समाज को इन लोगों को आईना दिखाना ही होगा तभी ऐसे लोगों से मुक्ति मिलेगी।
Date:08-02-23
घृणा अपराधसंपादकीय
जिस वक्त दिल्ली के जंतर-मंतर पर दिया गया एक धर्मगुरु का आपत्तिजनक भाषण सोशल मीडिया में वायरल हो रहा है, ठीक उसी समय एक अन्य मामले में आई सर्वोच्च न्यायालय की यह टिप्पणी बेहद मानीखेज है कि भारत में घृणा अपराध के लिए कोई जगह नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के दो जजों की पीठ ने उचित ही कहा है कि जब घृणा अपराधों पर कार्रवाई नहीं होती, तब माहौल खतरनाक बन जाता है। पीठ ने यह बात जुलाई 2021 में नोएडा में घटी एक घटना के पीड़ित की याचिका पर सुनवाई करते हुए कही। याचिकाकर्ता ने अदालत में गुहार लगाई थी कि उसके साथ धर्म के नाम पर बदसलूकी की गई और जब वह इसकी शिकायत दर्ज कराने पुलिस के पास गया, तो वहां से उसे बैरंग लौटा दिया गया। क्या विडंबना है, जिस मामले में त्वरित कार्रवाई से पीड़ित में प्रशासन का भरोसा, असामाजिक तत्वों में कानून का भय पैदा किया जा सकता था; पुलिस अपनी तत्परता से सुर्खरू हो सकती थी, उसके लिए एक नागरिक को आला अदालत की शरण लेनी पड़ी! ऐसे में, जंतर-मंतर का भाषण बताता है कि पुलिस-प्रशासन की लापरवाही के क्या नतीजे हो सकते हैं और आला अदालत की चिंता कितनी जायज है?
यह चिंता इसलिए भी बड़ी है कि घृणा अपराध का दायरा धर्म तक सीमित नहीं है। इसके आगे वह जाति, नस्ल, रंग, लिंग, क्षेत्र और भाषा जैसी कई तरह की भूमि तलाशता है और अराजक तत्वों को नए-नए मोर्चे मुहैया कराता है। निस्संदेह, ऐसी घटनाएं सिर्फ भारत में नहीं हो रही हैं, पाकिस्तान-बांग्लादेश से तो हम नियमित रूप से ऐसी खबरें सुनते ही रहते हैं। आखिर कितने दिन हुए, जब ऑस्ट्रेलिया में हिंदू मंदिरों को निशाना बनाया गया या स्वीडन में पवित्र ग्रंथ की प्रतियां जलाई गईं? इंग्लैंड में तो पिछले वर्ष घृणा अपराधों में 26 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज की गई। हमें अपनी चिंता करनी है। हमारा देश जितनी विविधताओं भरा व विशाल आबादी वाला है, उसमें कानून-व्यवस्था संभालने वाली एजेंसियों से अधिक संवेदनशीलता की दरकार है। दुर्योग से इस कसौटी पर वे खरी नहीं उतरतीं।
भारतीय संविधान ने अपने नागरिकों को जो शक्ति दी है, उसका यह अनुपम उदाहरण है कि एक नागरिक अपने मान-सम्मान व धार्मिक आजादी के संरक्षण के लिए देश की सर्वोच्च अदालत तक पहुंच जाता है और अदालत उसके सांविधानिक अधिकारों की रक्षा करते हुए राज्य को उसके दायित्व का स्मरण कराती है। मगर सवाल यह भी है कि आखिर कितने पीड़ित कानूनी जंग लड़ने की हैसियत रखते हैं? जिस तरह से घृणा अपराधों की प्रवृत्ति बढ़ रही है, और लोग आलोचना व अपराध का फर्क भूलते जा रहे हैं, उससे हमारे सामाजिक ताने-बाने को गंभीर चोट पहुंच सकती है। अभिव्यक्ति की आजादी आचरण में जिम्मेदारी की मांग करती है, मगर सोशल मीडिया के इस युग में जवाबदेही की कमी सबसे अधिक दिख रही है। ऐसे में, घृणा अपराधों के प्रति किसी किस्म की कोताही या पक्षधरता अराजक स्थिति की ओर ही ले जाएगी। सर्वोच्च अदालत ने सही कहा है कि राज्य प्रशासन पहले ऐसे कृत्यों को समस्या मानेंगे, तभी तो इसका समाधान ढूंढ़ पाएंगे। तमाम राजनीतिक पार्टियों को भी ऐसे तत्वों को हतोत्साहित करना चाहिए, क्योंकि घृणा अपराध जब राजनीतिक समर्थन व जनाधार जुटा लेते हैं, तो कितने खतरनाक हो जाते हैं, हमारे कई पड़ोसी मुल्कों की हालत यह साफ-साफ बता रही है
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हाल ही में काशी-तमिल संगमम सांस्कृतिक आयोजन किया गया है। यह आयोजन 2047 तक भारत के विकसित राष्ट्र बनने की दिशा में मजबूत सांस्कृतिक और आर्थिक विकास का आधार तैयार करता है। साथ ही ऐसे आयोजन से ‘एक भारत, श्रेष्ठ भारत की परंपरा कायम रहती है।
प्राचीन कड़ियाँ –
काशी दुनिया के सबसे प्राचीन नगरों में से एक है, और तमिलनाडु ऐसा राज्य है, जहाँ विश्व की सबसे प्राचीन भाषा बोली जाती है। ये दोनों ही प्राचीन भारतीय सभ्यता के आधार-स्तंभ हैं। दोनों की कला, संगीत, शिल्प-कौशल, दर्शन, आध्यात्मिकता और साहित्य की समृद्ध प्राचीन परंपराएं हैं। फिर भी स्वतंत्रता के बाद के दशकों तक उत्तर भारत के बहुत कम लोग काशी में रहने वाले संतों के बारे में जानते हैं। न ही लोग ये जानते हैं कि रामेश्वरम मंदिर के लिए गंगा का पवित्र जल ले जाने और तमिल शादियों में काशी यात्रा करने की परंपरा है।
समागम के बहाने व्यापारिक समृद्धि –
सरकार ने संगमम के दौरान एक ‘कपड़ा सम्मेलन’ आयोजित किया था। इसका उद्देश्य इस क्षेत्र में 2030 तक 100 अरब डॉलर निर्यात करना है। इस क्षेत्र में रोजगार की अपार संभावनाएं हैं, जो 2047 तक भारत के विकसित राष्ट्र के स्वप्न को पूरा करने में महत्वपूर्ण हैं। भारत के कपड़ा बाजार के 2047 तक 2 खरब डॉलर तक पहुंच जाने की संभावना है। प्रधानमंत्री ने यहाँ 5 एफ (फार्म, फाइबर, फैब्रिक, फैशन, फॉरेन) का फार्मूला दिया है। इसे किसानों और बुनकरों के जीवन में परिवर्तन और क्षेत्र में बढ़ोत्तरी का आधार बताया जा रहा है।
संगमम ने भारत में एक नए सांस्कृतिक उत्साह को प्रज्जवलित किया है। कपड़ा उद्योग, तमिलनाडु में भी इसी तरह के आयोजन की योजना बना रहा है। उम्मीद की जा सकती है कि इस प्रकार के आयोजन को देश की सभी संस्कृतियों तक विस्तारित किया जाएगा।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित उद्योग एवं वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल के लेख पर आधारित। 11 जनवरी, 2023
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Date:07-02-23
Municipal MessFrom MCD to BMC, paralysis of urban local bodies undermines local governance and democracyTOI Editorials
For the third time in a month the Municipal Corporation of Delhi (MCD) failed to elect its mayor after AAP and BJP councillors again engaged in a row over the election process. This MCD conflict is an extension of the years-long tussle between the two parties over the administration of the national capital. Given Delhi’s unique governance structure with a multiplicity of authorities, ideally the state and central governments should be working in harmony. But in times of hyper-competitive politics, such an understanding has remained elusive.
True, in the absence of a mayor – as well as deputy mayor and standing committee – a special officer is in charge. But major decisions related to policy matters, development works and projects that require big financial investment are delayed. Surprisingly, MCD isn’t the only municipal body in this position. For close to a year, the Brihanmumbai Municipal Corporation (BMC) – the country’s richest civic body – has been managed by an administrator after its term expired and polls were delayed. Further, an astonishing 22 of 28 municipal corporations in Maharashtra have seen their terms expire with fresh polls nowhere in sight.
Such atrophy also undermines local democracy. The Constitution (74th Amendment) Act, 1992 provided for the creation of urban local bodies and empowered state governments to devolve the responsibility of 18 functions including urban planning, regulation of land use, water supply etc. But a 2020 paper by PRS Legislative Research found that most state governments are reluctant to share power and taxes with local bodies. This severely curtails urban governance at a time when 675 million Indians are slated to live in urban centres by 2035. They need smarter cities, which needs empowered instead of stalled local bodies. Mumbai needs municipal elections. Delhi needs a mayor.
Date:07-02-23
What India Needs is A Greendustrial PlanET Editorials
Inaugurating the India Energy Week 2023, the first major event in the G20 calendar, the PM highlighted the immense growth opportunities across India’s energy landscape. Though it addresses individual behaviour and consumption choices, the Lifestyle for Environment (LiFE) initiative is replete with opportunities to leverage sustainable and low-emission options. What India needs, and is missing, is a strategic green industrial plan.
India’s clean energy transition has been largely focused on domestic market formation to make the most of the decline in renewable energy (RE) costs. The aim of cost-effectiveness and minimisation has meant little attention to clean energy R&D. Long-term technology upgrading did not fit the needs. Consequently, investment in R&D and its deployment has been minuscule. The production-linked incentives (PLI) to promote RE equipment manufacturing and the green hydrogen and energy storage missions offer something of a course correction. But they are not enough.
The world’s leading economies have rolled out green industrial plans with protectionist hues — the Inflation Reduction Act in the US, and the Green Industrial Strategy in China. A green subsidies war is brewing and barriers to export of relevant technologies are being erected. This situation will impact clean technology investments and trade, leaving emerging economies like India at a disadvantage. Safeguarding India’s decarbonisation and economic growth requires a green industrial strategy focused on investing in creating local capacities for innovation, R&D and deployment of technologies. It must create partnerships among industry, public and private sectors, and academia, leading to investment across multiple clean-technology value chains.
Date:07-02-23
End-of-life decisionsSC’s tweaks on directive norms are welcome, but legislation will be betterEditorial
When the Supreme Court granted legal status to the concept of ‘advance medical directives’ in 2018 and allowed passive euthanasia, subject to stringent safeguards, it was seen as a vital recognition of both patient autonomy over end-of-life decisions and the right to a dignified death. However, doctors later found that some of the specific directions turned out to be “insurmountable obstacles”. In a recent order, a Constitution Bench modified the directions to make them more workable and simple. The advance directive no more needs to be countersigned by a judicial magistrate. Instead, it could be attested before a notary or a gazetted officer. Instead of the magistrate, it is enough if the notary or officer is satisfied that the document is executed voluntarily, without coercion or inducement, and with full understanding. The original guideline that the executor should name a guardian or a close relative who would be authorised to give consent to refuse or withdraw medical treatment, in the event of the executor becoming incapable of a decision, has been modified to name more than one guardian or relative. Instead of the magistrate being tasked with informing family members about the document, in case they are not present at the time of its being executed, the onus is now on the persons themselves to hand over a copy of the advance directive to the guardians or close relatives named in it, as well as to the family physician. It may also be included in digital health records.
The new guidelines require the hospital itself to constitute a primary medical board to certify whether the instructions on refusal or withdrawal of treatment should be carried out. The hospital should also form a secondary board, including a doctor nominated by the district’s chief medical officer, which will have to endorse the primary board’s certificate. The change here is that the district Collector need not constitute the second medical board, as required in the 2018 judgment. The scrutiny by the boards holds good even in cases in which there is no advance directive, but the patient is not in a position to make any decision. The new guidelines also spell out the experience and specialisations of those to be included in the medical boards. While such guidelines are useful and necessary to implement the concept of a ‘living will’ and advance medical directives, it is time Parliament came out with a comprehensive law. Such a law could also provide for a repository of advance directives so that the need to ascertain afresh its genuine nature does not arise at the time of its implementation.
Date:07-02-23
संघ प्रमुख के बयान पर अमल करे समाजसंपादकीय
आरएसएस प्रमुख ने संत रविदास जयंती पर तीन बेहद गंभीर बातें कहीं हैं। पहली, जाति व्यवस्था पंडितों ने बनाई है; दूसरी, शिवाजी द्वारा औरंगजेब को लिखे पत्र का हवाला देते हुए उन्होंने कहा कि हिन्दू-मुसलमान सब ईश्वर के बनाए हैं लिहाजा उनमें फर्क न करें; और तीसरी, कोई भी समाज 30% से ज्यादा नौकरियां नहीं दे सकता लिहाजा लोगों को स्व-रोजगार की ओर जाना होगा। दुनिया के सबसे बड़े वैचारिक संगठन के मुखिया का यह बयान केवल हिन्दुओं ही नहीं सभी धर्मों के अनुयाइयों के लिए ध्रुवतारा बन सकता है। रामचरितमानस की कुछ चौपाइयों को लेकर पिछले कुछ दिनों से कुछ नेता मानस को जातिवाद का पोषक और ऊंच-नीच को हवा देने वाला बता रहे हैं। इसके कारण जातिवादी दुराव बढ़ रहा है। जब उच्च जाति का कोई व्यक्ति, किसी दलित वर्ग के दूल्हे को घोड़ी पर चढ़ने से रोकता है या एक धर्म के लोग किसी अन्य धर्म के व्यक्ति पर कुछ भी थोपते हैं, तो शायद उन्हें ईश्वरीय व्यवस्था की समझ नहीं होती। इस ओर संघ प्रमुख ने विगत दशहरे पर इंगित किया था। आज यही बात उन आतंकियों को भी सोचनी होगी, जिन्हें लगता है कि वे हत्याएं करके ऊपरवाले का हुक्म मान रहे हैं। समाज में ये दोनों सोच इसे सदियों पीछे धकेल रही हैं। संघ प्रमुख का कहना कि नौकरियों के पीछे भागने की जगह स्व-उद्यम लगाएं, यह एक अच्छी सलाह है। लेकिन लगातार बदलते तकनीकी और पूंजी के प्रभुत्व के दौर में स्व-रोजगार की सीमा मात्र पकौड़े बेचने तक सीमित हो जाती है। इसके उलट सरकारी या संगठित क्षेत्र की नौकरी उन्हें भविष्य की सुरक्षा देती है।
Date:07-02-23
शीर्ष न्यायालय की सर्वोच्चता और उससे जुड़े कुछ सवालजैमिनी भगवती
हाल में मीडिया में कानून मंत्री और उपराष्ट्रपति के ऐसे वक्तव्य सामने आए हैं जिनमें उन्होंने कहा है कि सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की चयन प्रक्रिया की समीक्षा करने की आवश्यकता है। सन 2014 में राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) अधिनियम को संसद से मंजूरी मिल गई थी। उसके अंतर्गत देश के मुख्य न्यायाधीश, सर्वोच्च न्यायालय में उनके बाद के दो वरिष्ठ न्यायाधीश, केंद्रीय कानून मंत्री और दो अन्य प्रतिष्ठित व्यक्ति एनजेएसी के सदस्य बने। सर्वोच्च न्यायालय ने 2015 में एनजेएसी अधिनियम को यह कहते हुए निरस्त कर दिया कि यह संविधान के बुनियादी ढांचे के खिलाफ दिखता है। परिणामस्वरूप कॉलेजियम ने काम करना जारी रखा। इसमें सर्वोच्च न्यायालय के चार वरिष्ठतम न्यायाधीश सर्वोच्च न्यायालय तथा उच्च न्यायालयों के लिए न्यायाधीश चुनते हैं।
तकरीबन आधी सदी पहले अप्रैल 1976 में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों ने बंदी प्रत्यक्षीकरण के कुख्यात मामले में अपनी न्याय की समझ को तत्कालीन केंद्र सरकार के सामने समर्पित कर दिया था। देश के मुख्य न्यायाधीश ने 1975-77 के दौरान सरकार के कहने पर उच्च न्यायालय के उन न्यायाधीशों का स्थानांतरण कर दिया था जो मुश्किल हालात पैदा कर रहे थे। 1970 के दशक के मध्य से ही भारत की सरकारें अक्सर प्रयास करती रही हैं कि उच्च न्यायालयों में अथवा सर्वोच्च न्यायालय में उनकी पसंद के न्यायाधीश चुने जाएं। न्यायमूर्ति एम एन वेंकटचलैया आयोग ने 2002 में अनुशंसा की थी कि राष्ट्रीय न्यायिक आयोग का गठन किया जाना चाहिए जिसमें मुख्य न्यायाधीश, सर्वोच्च न्यायालय के दो वरिष्ठतम न्यायाधीश, केंद्रीय कानून मंत्री और मुख्य न्यायाधीश द्वारा अनुशंसित एक प्रतिष्ठित व्यक्ति शामिल हो। आयोग ने अनुशंसा की थी कि प्रस्तावित एजेंसी सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों का चयन करे।
सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के लिए अपनी संपत्ति का खुलासा करना जरूरी नहीं है जबकि सरकारी अधिकारियों तथा चुनाव लड़ने वालों के लिए ऐसा करना जरूरी है। अक्सर न्यायाधीश सेवानिवृत्ति के तत्काल बाद पंचाट के सदस्य, राज्य सभा के सदस्य और राज्यपाल तक बन जाते हैं। कुछ मामलों में तो सेवारत न्यायाधीशों ने सार्वजनिक तौर पर सत्ता पक्ष के प्रति अपनी निष्ठा जाहिर की और सेवानिवृत्ति के तत्काल बाद उन्हें सरकार द्वारा महत्तवपूर्ण पदों पर बिठा दिया गया। फिर भी आम भारतीयों को उम्मीद है कि कुछ कमियों के बाद भी एक संस्थान के रूप में सर्वोच्च न्यायालय सरकार की अतियों के खिलाफ मजबूती से खड़ा रहेगा।
संविधान के अनुच्छेद 348(1) में कहा गया है कि उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय की कार्यवाही अंग्रेजी में होनी चाहिए। दुर्भाग्यवश सर्वोच्च न्यायालय में ऐसे न्यायाधीश भी आते हैं जिन्हें अंग्रेजी का बहुत सीमित ज्ञान होता है। न्यायमूर्ति डी वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति सुधांशु धूलिया ने 1 अगस्त, 2022 को एक आदेश में कहा था, ‘हिमाचल उच्च न्यायालय का निर्णय पूरी तरह समझ से बाहर है।’ यहां संदर्भ हिमाचल प्रदेश बनाम हिमाचल एल्युमीनियम ऐंड कंडक्टर्स मामले का है।
लिखने के बुनियादी कौशल और समग्र शिक्षा को लेकर एक बचाव आवश्यक है ताकि सर्वोच्च न्यायालय द्वारा नामित किसी संस्था द्वारा कराई जाने वाली प्रतिस्पर्धी परीक्षा संपन्न कराई जा सके। यह एक अलग और विशिष्ट परीक्षा होनी चाहिए जहां से सभी न्यायाधीशों का चयन हो सके। कुछ महीने पहले मैंने सर्वोच्च न्यायालय के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश से पूछा कि क्या ऐसी लिखित परीक्षा और साक्षात्कार के जरिये न्यायाधीशों को चुनना व्यावहारिक और वांछित है तो उन्होंने बिना किसी हिचक के कहा कि ऐसा करना आवश्यक हो चुका है।
इस समय देश की निचली अदालतों में करीब चार करोड़ मामले लंबित हैं। उच्च न्यायालयों के समक्ष 56 लाख और सर्वोच्च न्यायालय में 70,000 मामलों की सुनवाई चल रही है। अक्सर न्यायाधीश ही मामलों के स्थगन और अपील के दशकों तक खिंचने के लिए जिम्मेदार होते हैं। सरकारों को भी जिम्मेदार ठहराया जाना चाहिए क्योंकि कई अदालती मामलों में वे भी शामिल होती हैं। इतने अधिक लंबित मामलों को देखते हुए क्या सर्वोच्च न्यायालय को खुद को भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड, उपासना स्थलों या नोटबंदी जैसे मामलों से जोड़ना चाहिए? ऐसे मामले निचली अदालतों में निपट सकते हैं। शीर्ष न्यायालय को अभी चुनावी बॉन्ड के जरिये राजनीतिक दलों को गुप्त चंदे से संबंधित मामले को भी निपटाना है।
सरकार के पक्ष में काम करने की बात करें तो कुछ और ऐसे क्षेत्र हैं जहां नियंत्रण एवं संतुलन काम नहीं आया है। उदाहरण के लिए राज्यों के राज्यपाल, चुनाव आयुक्त तथा पुलिस आयुक्त, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक तथा केंद्रीय जांच ब्यूरो के निदेशक आदि पदों पर होने वाली नियुक्तियां अक्सर सत्ताधारी दलों के समर्थन के आधार होती रही हैं। यह देश की चुनाव प्रक्रिया और हमारे मतदाता वर्ग की दृष्टि से दुखद है हमें ऐसी सरकारें मिलती हैं जिन पर हम यह विश्वास नहीं कर सकते कि वे अहम पदों पर निष्पक्ष और सक्षम लोगों का चुनाव करेंगी। न्यायाधीशों के चयन की प्रक्रिया में सरकार के नामित लोगों को शामिल करने का प्रस्ताव हमारी न्यायपालिका की निष्पक्षता और शुचिता के लिए सही नहीं होगा।
जाहिर है हमें ऐसे न्यायाधीश चाहिए जो भ्रष्ट न हों। सभी न्यायाधीशों को सेवाकाल में अपनी संपत्ति सार्वजनिक करनी चाहिए और सेवानिवृत्ति के बाद भी 10 वर्षों तक सालाना ऐसा करना चाहिए। सक्षम न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए सर्वोच्च न्यायालय एक सात सदस्यीय समिति बना सकता है जिसमें मुख्य न्यायाधीश, सर्वोच्च न्यायालय के चार वरिष्ठतम न्यायाधीश तथा दो गैर सरकारी प्रतिष्ठित व्यक्ति शामिल हों। उच्च न्यायालय और उच्चतम न्यायालय में नियुक्ति की प्रक्रिया बिंदुवार ढंग से सामने रखी जानी चाहिए और यह सूचना सर्वोच्च न्यायालय की वेबसाइट पर उपलब्ध होनी चाहिए। ऐसी समिति में कोई सरकार द्वारा नामित कोई व्यक्ति नहीं होना चाहिए। सहमति से नियुक्तियों को बढ़ावा देने की प्रक्रिया में इस समिति के किन्हीं दो सदस्यों को वीटो अधिकार होना चाहिए ताकि वे किसी संभावित नियुक्ति को रोक सकें। इसके साथ ही सरकार को यह अधिकार होना चाहिए कि वह चयन समिति द्वारा तय नामों को खारिज कर सके। बहरहाल, सरकार को इसके साथ ही विस्तार से यह भी बताना चाहिए कि वह किसी नाम को क्यों खारिज कर रही है। इस जानकारी को सदन पटल पर रखा जाना चाहिए।
Date:07-02-23
विवाह की उम्र और कानूनबिभा त्रिपाठी
एक तरफ यौन स्वातंत्र्य को निजता का अधिकार माना जाता है, तो दूसरी तरफ उम्र के आधार पर अंतरराष्ट्रीय मानकों से अलग हट कर कानून बनाए जाते हैं। ऐसे में आवश्यक है कि सहमति से संबंध, विवाह की उम्र और पक्षकारों के वैयक्तिक अधिकारों के विवाद पर गहन विमर्श और यथासंभव विवादित मुद्दों के निस्तारण का प्रयास किया जाए। भारतीय दंड संहिता में सहमति की उम्र, बलात्संग के प्रावधान, बच्चों को लैंगिक अपराध से संरक्षण, बाल विवाह निरोधक कानून और वैयक्तिक विधियों की स्थिति प्रमुख हो जाती है।
फिलहाल, लड़कियों के विवाह की उम्र अट्ठारह वर्ष से बढ़ा कर इक्कीस वर्ष करने का विधेयक प्रस्तावित है। किशोर न्याय देखभाल और संरक्षण अधिनियम में बलात्संग जैसे अपराधों में लिप्त सोलह से अठारह वर्ष के बच्चों की मानसिक परिपक्वता का निर्धारण करने और तदनुसार उनके साथ दंड विधान का प्रयोग करने की बात कही गई है। न्यायपालिका द्वारा समय-समय पर ऐसे निर्णय दिए जाते रहे हैं, जो कभी अत्यधिक प्रगतिशील माने जाते हैं, तो कभी रूढ़िवादी मानसिकता के पोषक। एक तरफ विवाह के अधिकार को व्यक्ति का मौलिक अधिकार बताया गया है, तो दूसरी तरफ उम्र के विवादित होने पर कानूनी निपटारे का प्रावधान भी किया गया है। विवाह जैसी संस्था, चाहे इसे हिंदू विधि के तहत संस्कार माना जा रहा हो, चाहे मुसलिम विधि के तहत संविदा, इसकी चूलें हिल रही हैं और वयस्कों के बीच सहजीवन सामान्य जीवन शैली होती जा रही है।
ऐसे में महज उम्र का मापदंड अपराध निर्धारण के लिए संपूर्ण सत्य नहीं माना जा सकता। न्यायालय में जब भी उम्र के निर्धारण का प्रश्न उठा है, इस बात की पुरजोर वकालत की गई है कि किसी भी व्यक्ति को उम्र के आधार पर कानूनों के लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता। मगर विवाद की किसी भी स्थित में अमूमन दो वर्ष का लाभ पक्षकार बच्चे को मिलता है।
ऐसे में जब हम ‘इंडिपेंडेंट थाट बनाम भारत संघ’ के मामले में 2017 में न्यायमूर्ति मदन बी लोकुर द्वारा दिए निर्णय को देखते हैं, जिसमें उन्होंने कहा था कि हमारे सामने आया प्रश्न काफी सार्वजनिक महत्त्व का है कि क्या एक पुरुष और उसकी पत्नी के बीच- पंद्रह से अठारह साल की उम्र की लड़की होने के संबंध में- यौन संबंध बलात्कार है? भारतीय दंड संहिता में इसका उत्तर नकारात्मक है, मगर हमारी राय में अठारह साल से कम उम्र की लड़की के साथ यौन संबंध बलात्कार है, चाहे वह शादीशुदा हो या नहीं। ऐसा लगता है कि तभी से वैवाहिक बलात्संग का प्रश्न अपने उत्तर तलाश रहा है।
दूसरी तरफ बाल विवाह निरोधक कानून अठारह वर्ष से कम उम्र के विवाह को शून्य घोषित करता है, पर ऐसे विवाह से भी अगर कोई संतान उत्पन्न हो जाती है, तो फैक्टम वैलेट के सिद्धांत के तहत ऐसी संतान को जायज मानते हुए उसे समस्त अधिकार प्रदान किए जाते हैं। इस संदर्भ में दिल्ली उच्च न्यायालय के एक फैसले को देखें, जहां एक सत्रह वर्ष की अवयस्क मुसलिम लड़की ने प्रेम में पड़ कर मुसलिम विधि के अनुसार विवाह किया, पर अपने माता-पिता द्वारा प्रताड़ित की जा रही थी। उसने अपनी सुरक्षा की गुहार लगाई, तब न्यायालय ने न सिर्फ उसे सुरक्षा प्रदान करने की अनुशंसा की, बल्कि यह भी कहा कि वह चाहे तो अपने पति के साथ रह सकती है। पर न्यायालय ने यह भी कहा कि इस आधार पर आगे के मामले निर्णीत न किए जाएं।
उधर इस निर्णय के दो ही महीने बाद कर्नाटक उच्च न्यायालय की एक खंडपीठ ने नाबालिग मुसलिम लड़की से शादी करने वाले व्यक्ति की जमानत याचिका पर सुनवाई करते हुए इस तर्क को खारिज कर दिया कि एक नाबालिग मुसलिम लड़की का यौवन या पंद्रह वर्ष की आयु प्राप्त करने पर विवाह, बाल विवाह निषेध अधिनियम का उल्लंघन नहीं करेगा। पीठ ने आगे कहा कि पाक्सो अधिनियम, एक विशेष अधिनियम होने के नाते, पर्सनल ला को दरकिनार करता है।
इस प्रकार के निर्णयों में विभिन्न उच्च न्यायालयों के दृष्टिकोणों में भिन्नता की वजह से अब सर्वोच्च न्यायालय की प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने संसद से अपील की है कि पाक्सो अधिनियम में सहमति की निर्धारित उम्र को अठारह वर्ष से कम करने पर विचार करे। इस अपील के पीछे मंशा यही रही होगी कि ऐसे किशोर वय के बच्चे अगर प्रेम में पड़कर आपसी सहमति से संबंध बनाएं तो उन्हें अपराधी न समझा जाए। मगर सरकार ने इस पर सहमति नहीं जताई है।
स्पष्ट है कि निश्चित ही ये मामले बेहद संवेदनशील हैं। कहीं मानसिक परिपक्वता के अभाव में, तथाकथित उदासीनता के शिकार युवा परिवार और समाज के प्रति विरोध का स्वर मजबूत करते हुए ऐसे संबंध बनाते हैं और फिर उन्हें लगता है कि किशोरावस्था में लिया गया निर्णय गलत साबित हो गया है, तो कहीं माता-पिता स्वयं अपने बच्चों के बाल विवाह के दोषी पाए जाते हैं। कहीं समाज द्वारा पक्षकारों पर इसलिए अत्याचार किया जाता है कि उन्होंने अपने परिवार के विरुद्ध जाकर ऐसे संबंध स्थापित किए हैं। ऐसे में समस्या का निस्तारण किस प्रकार किया जाए यह प्रश्न महत्त्वपूर्ण है।
फिलहाल दो मुद्दे प्रमुखता से उठाए जा रहे हैं। पहला, राष्ट्रीय महिला आयोग और राष्ट्रीय बाल अधिकार आयोग द्वारा लड़कियों के विवाह की उम्र को अठारह वर्ष से बढ़ा कर इक्कीस वर्ष किए जाने की और दूसरे सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश द्वारा सहमति से संबंध की उम्र को अठारह से घटा कर सोलह वर्ष किए जाने की। अब सोचना यह है कि अगर संसद विवाह की उम्र को बढ़ाकर इक्कीस वर्ष भी कर देती है तो इसका प्रभाव उसी पर होगा, जो विवाह जैसी संस्था पर भरोसा करता है। बिना विवाह के आपसी सहमति से साथ रहने वालों की स्थिति तब भी नाजुक ही रहेगी। और अगर उम्र घटा कर सोलह वर्ष कर दी गई, तो अनेक प्रकार की समस्याएं सामने आएंगी। कभी उनके अपने माता-पिता और परिवार द्वारा ही मुकदमा दायर होगा, तो कभी पक्षकारों में से ही किसी द्वारा विवाह के झांसे में संबंध बनाने का मामला आएगा और न्यायालय को सहमति की स्वतंत्रता के प्रश्न पर मगजमारी करनी होगी। सबसे गंभीर समय तब आएगा जब पक्षकारों में से कोई अन्य धर्म का होगा।
इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि कैसे विवाह जैसी संस्था को बचाया जाए और परिवार तथा समाज अपने बच्चों का समाजीकरण स्वस्थ ढंग से करते हुए संवादहीनता की स्थिति को हर हाल में समाप्त कर पाए। हमारे आपराधिक न्याय प्रशासन में अब भी पीड़ित की हित रक्षा का मुद्दा हाशिये पर ही है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जहां अपराधों की संख्या में कमी आ रही है, अपराधियों के सुधार और पुनर्वास पर घोषणापत्र तैयार हो रहे हैं और पीड़ित को पुनर्स्थापित करने के लिए नई-नई नीतियां बनाई जा रही हैं, वहां इस प्रश्न का उत्तर ढूंढ़ना ही होगा कि भारतीय समाज अपनी पितृसत्तात्मक सोच के साथ कब तक चलेगा? इसलिए समय की मांग है कि हम प्रेम, दबाव, शोषण और भयादोहन जैसे शब्दों में अंतर की बारीकी को समझें और हर मामले का निस्तारण उसके विशेष तथ्यों के आधार पर करें।
हर हाल में संसद, समाज और न्यायपालिका को प्रगतिशील बनना होगा। इस क्रम में एक वैध विवाह की उम्र को अठारह से बढ़ाकर इक्कीस कर देना तो उचित प्रतीत होता है, पर सहमति से सबंध की उम्र घटाने की आवश्यकता नहीं है, क्योंकि ऐसा करने पर आने वाले समय में इसे और भी नीचे ले जाने की मांग की जा सकती है।
Date:07-02-23
भारतीय परिवेश में जरूरी हैकमलेश जैन
भारत में हिंदू स्त्रियों की स्थिति 200 वर्ष पहले दयनीय थी। पंडिता रमाबाई ने कहा था भारत तब तक तरक्की नहीं कर सकता और संसार के देशों में कोई स्थान नहीं बना सकता जब तक कि हिंदू घरों में हिंदू स्त्रियां जो मां भी है, की स्थितियां नहीं सुधरती। बच्चियों को बालपन में शादी कर उपेक्षा के अंधकार में ढकेल दिया जाता है।
इसके साथ ही अपने मातृ कर्तव्यों के बारे में अनजान, खासकर सामान्य पोषण संबंधी नियमों से अनजान और ज्यादा निम्नस्तर को प्राप्त होती हैं। यह याद रखना होगा कि वह भी एक लड़की है तथा बच्चे को जन्म देकर मां बनती है। 14-15 की उम्र में उससे यह आशा नहीं की जा सकती कि वह अपने बच्चों का सही ढंग से पालन कर सकेगी। हम देख रहे हैं कि हिंदू रीति-रिवाजों एवं कानून में निरंतर सुधार हुआ है। सती प्रथा, बाल विवाह का विरोध हुआ है। कानून में भी आवश्यक बदलाव कर लड़कियों को जकड़नों, बंधनों से मुक्त किया गया है। आज उनके विवाह की उम्र क्रमश: बढ़ाकर 18-21 वर्ष की गई है, मुफ्त शिक्षा का उपहार दिया गया है। हिंदू विवाह अधिनियम 1955 में बदलाव लाया गया और लड़कियों की उम्र बढ़ाकर 18 वर्ष लड़कों के विवाह उम्र 21 वर्ष की गई और भी बहुत से बदलाव विवाह एवं तलाक के कानूनों में किए गए। इस कारण, आज उनकी स्थिति, शक्ति, आत्मसम्मान में काफी परिवर्तन हुआ है। ठीक इसी तरह मुस्लिम कानून में, स्त्रियों के लिहाज से परिवर्तन आज की मांग है। 1990 के दशक में भी इसकी जरूरत समझी जा रही थी। मैंने खुद ‘एप्वा’ सीपीएमएल की महिला विंग की कार्यकर्ताओं के साथ एक प्रश्नावली, बनाकर पटना का भ्रमण किया था। मैंने बल्ब बनाने वाली महिला से लेकर डॉक्टर तक का इंटरव्यू लिया। सवाल थे- क्या उन्हें पढ़ना, बाहर काम करना पसंद है, क्या वे पति की अकेली पत्नी बनकर रहना चाहती हैं, क्या उन्हें तीन तलाक की प्रक्रिया पसंद है, क्या उन्हें संपत्ति में अधिकार पसंद है, क्या तलाक के बाद मुआवजा या भरण-पोषण का अधिकार चाहिए आदि। करीब-करीब सभी ने यही कहा- हां पसंद है पर मजहब की पाबंदियों के कारण कुछ कह नहीं सकती। आज इन बहनों को भी इन जकड़नों से निकलते की जरूरत है। शादी की उम्र अभी महज 15 वर्ष है। इतनी सी उम्र में शिक्षा मुश्किल से 10 क्लास हो सकती है और नौकरी कर अपने पांवों पर खड़े होने का सवाल ही नहीं उठता। यहां विवाह एक कांट्रेक्ट की तरह है जिसे कभी भी तोड़ा जा सकता है। पर यहां भी पुरुष को अधिक अधिकार दिए गए हैं। मुहम्डन कानून की धारा 251 (2) के अनुसार पागलों और नाबालिगों (लड़का-लड़की) का विवाह उनके अभिभावक द्वारा 15 वर्ष से कम में भी हो सकता है। इसी कानून के अनुसार एक मुस्लिम लड़के का विवाह तोड़ा जा सकता है यदि उसकी सहमति विवाह पर नहीं है। इसके अलावा तलाक के नियम भी पुरुषों के अलग और स्त्रियों के अलग हैं। उन्हें तलाक के बाद मासिक भत्ता देने का रिवाज नहीं है। यह सिर्फ इद्दत भर है यानी तलाक देने से तीन महीनों तक। इसके अलावा स्त्री एक शादी कर सकती है जो कि ठीक है। पर पुरुष एक ही समय में 4 विवाह कर सकता है, और एक ही घर में रख सकता है और यदि वह पांचवां विवाह भी कर लेता है तो यह गैर कानूनी या गैर धार्मिक नहीं है, बस अनियमित है। ऐसी व्यवस्था में हर एक स्त्री को पति पर एकाधिकार नहीं होता जो उसे खुशी प्रदान कर सके। इसके अलावा शिया कानून में दो तरह के विवाह होते हैं- परमानेंट और मुता विवाह यानि अस्थाई। एक शिया मुस्लिम, किसी भी धर्म की स्त्री यथा मुस्लिम, ईसाई, यहूदी या पारसी के साथ अस्थाई विवाह कर सकता है, पर किसी और धर्म वाली के साथ नहीं। पर एक शिया स्त्री किसी गैर मुस्लिम के साथ मुता निकाह नहीं कर सकती। इसमें शारीरिक संबंध एक तय अवधि के लिए बनाया जा सकता है। यह अवधि एक दिन, एक महीना, एक वर्ष या डावर यानी मुआवजा देना जरूरी है। इसमें यौन संबंध की अवधि तथा ‘डावर’ दोनों ही तय होने चाहिए। स्त्री पुरुष में यह भेदभाव स्त्रियों की खुशी उन्नति, शारीरिक सुरक्षा, समाज, देश में उसकी भागीदारी को आहत करती है। इसी प्रकार भारत में हर धर्म, संप्रदाय में यथा ईसाई, पारसी, हिंदू, आदिवासी सभी में स्त्रियों के अधिकार की दृष्टि से एक ही नागरिक संहिता होनी चाहिए। देश की आधी जनसंख्या यदि संविधान में प्रदत्त मौलिक अधिकारों से वंचित रहे तो उसकी शारीरिक, मानसिक, बौद्धिक संपदा, लाभ से राष्ट्र वंचित रहता है। ऐसा देश दुनिया के प्रगतिशील देशों की दौड़-विकास की तुलना में पीछे हो जाता है।
इसका असर राजनीतिक तो है ही सामाजिक भी है। जिस दिन महिलाएं अपनी सशक्त उपस्थिति देश की संसद, विधानसभा, पंचायत, स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय, व्यापार में बराबरी से दर्ज कराएंगी तो देश अत्यंत ही सशक्त संतुलित और अहिंसक होगा। सामाजिक तौर पर शिक्षित, बालिग स्त्रियां आर्थिक रूप से मजबूत, बच्चों के पालन में संतुलित, जागृत होगी। कहा भी जाता है एक शिक्षित मां कई बच्चों की एक मजबूत आधारशिला होती है जिसके बच्चे परिपक्व और समझदार होते हैं। देश राजनैतिक परिवेश और घर समाज की समुचित उन्नति के लिए समान नागरिक संहिता अत्यंत ही आवश्यक है।
Date:07-02-23
कमियों पर वक्त रहते कसे शिकंजाविभूति नारायण राय, ( पूर्व आईपीएस अधिकारी )
हिंडनबर्ग रिसर्च की रिपोर्ट आने के बाद पिछले एक सप्ताह में अडानी समूह की कंपनियों की परिसंपत्तियों में सौ खरब डॉलर से अधिक की कमी आ चुकी है और विश्व का तीसरा सबसे अमीर आदमी शीर्ष बीस की सूची से भी बाहर हो गया है। गनीमत है कि भारतीय बाजार या वित्तीय संस्थाओं में अभी तक कोई बहुत अधिक घबराहट नहीं दिखी है, पर यह सवाल तो उठना स्वाभाविक ही है कि वर्षों से चल रही अस्वाभाविक वित्तीय हरकतों पर नजर रखने वाली हमारी नियामक संस्थाएं आखिर क्या कर रही थीं?
यह पहली बार नहीं है कि देश की नियामक संस्थाएं तब तक गाफिल रहीं, जब तक कि किसी बाहरी संस्था ने कोई बड़ा भंडाफोड़ न कर दिया या घपलेबाज व्यक्ति या कंपनी किसी बैंक का ऋण चुकाने में असफल न हो गई हो। ऐसा भी नहीं है कि घपलों की आग के पीछे धुआं बिल्कुल अदृश्य रहा हो। मगर सिर्फ वे ही इसे लेकर गफलत में रह सकते हैं, जो इसे देखना ही नहीं चाहते, और वे हमारी नियामक संस्थाएं ही हैं।
रिजर्व बैंक, सेबी, ट्राई, डीआरआई, सीबीआई, एनआईए से लगायत विभिन्न राज्यों के विजिलेंस और भ्रष्टाचार निरोधक संगठन कुछ ऐसी ही नियामक संस्थाएं हैं, जिन्हें वित्तीय घपलों से निपटने के लिए बनाया गया है। यदि हम परिप्रेक्ष्य को थोड़ा विस्तृत कर देखें, तो न्यायपालिका के विभिन्न स्तरों और ट्रिब्यूनल भी नियामक की तरह ही काम कर सकते हैं। पर हर्षद मेहता, केतन पारिख, विजय माल्या, नीरव मोदी या हाल के आईसीसीआई बैंक के मामलों में इन संस्थाओं में हरकत क्यों नहीं हुई या ऐसा कैसे हुआ कि सेबी जैसी एक रेगुलेटरी बॉडी में ही वर्षों तक घपला चलता रहा? ये कुछ ऐसे यक्ष प्रश्न हैं, जो अडानी समूह की कंपनियों के शेयर बाजार में औंधे मुंह गिर पड़ने के बाद एक बार फिर उठ खड़े हुए हैं।
यदि हम ध्यान से देखें, तो पाएंगे कि नियामक संस्थाओं के साथ दो तरह की दिक्कतें उनके जन्म से ही जुड़ी होती हैं। किन्हीं राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय दबावों के चलते उनका गठन तो हो जाता है, लेकिन उनके अधिकारों या कर्तव्यों के क्षेत्र में ऐसे छिद्र छोड़ दिए जाते हैं, जिनका लाभ उठाते हुए कोई भी ताकतवर दोषी वर्षों तक अदालतों में दांव-पेच खेलकर अपने को बचाए रख सकता है। एक बार किसी संस्था का गठन हो जाने के बाद उसमें नियुक्त होने वाले अध्यक्ष या सदस्यों के पदों पर कई बार ऐसे लोगों की नियुक्ति हो जाती है, जो सर्वथा अक्षम होते हैं या जिनकी स्वयं की निष्ठा संदिग्ध होती है। ऐसे सदस्यों वाले संगठन भ्रष्टाचार से किस हद तक लड़ सकेंगे, इसकी सिर्फ कल्पना ही की जा सकती है। पिछले दिनों नेशनल स्टॉक एक्सचेंज की मुख्य कार्यपालक अधिकारी चित्रा रामकृष्णन का मसला बिल्कुल बाड़ द्वारा खेत खाने के मुहावरे का ही रूपक था। उनके नेतृत्व में एनएसई, जो खुद एक नियामक संस्था है, अपने उपभोक्ताओं के साथ आपराधिक छल छद्म करता रहा और उस पर नजर रखने वाली सेबी भी अपनी नियामक भूमिका भूलकर आंखें मूदे रही।
लोकसेवकों के भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए बनी संस्थाओं के हाथ-पैर कैसे बांध दिए जाते हैं, इसके सबसे बड़े उदाहरण राज्यों के विजिलेंस संगठन हैं। कुछ राज्यों में एक निश्चित रैंक से ऊंचे अफसरों के खिलाफ कोई जांच बिना सरकार की इजाजत के नहीं हो सकती। यह इजाजत कितनी मुश्किल से मिलती है, इसका अनुमान इसी तथ्य से लगाया जा सकता है कि विभिन्न सरकारों के पास हजारों की संख्या में जांच के प्रस्ताव लंबित हैं। उत्तर प्रदेश विजिलेंस संगठन में काम करते समय मैंने पाया कि किसी लोकसेवक के खिलाफ जांच शुरू होने और अदालत में चार्जशीट दाखिल करने के क्रम में आधा दर्जन से अधिक चरणों की अनुमति के लिए सरकार के पास जाना पड़ता है और किसी भी स्वीकृति को हासिल करने में महीनों से लेकर सालों तक समय लग सकता है। यदि लोकसेवक पहुंच वाला हो, तो यह स्वीकृति कभी नहीं आती। नेकनीयत लोकसेवकों की सुरक्षा के लिए बनाए गए रक्षा कवच भ्रष्ट अधिकारियों की हिफाजत के लिए काम आते हैं। दिलचस्प यह है कि भ्रष्टाचार निरोधक कानूनों के तहत कार्रवाई करने वाली एजेंसियां एक ही मामले में अलग-अलग मापदंडों से कार्रवाई करती हैं। मसलन, एक सामान्य पुलिस थाने को, जिसके पास संसाधन व विशेषज्ञता कम है, अपने से ज्यादा बेहतर सुसज्जित विजिलेंस संगठनों के मुकाबले सरकार के पास इजाजत के लिए कम दौड़ना पड़ता है, क्योंकि उन्हें आईपीसी या सीआरपीसी से सीधे अधिकार मिले हुए हैं, जबकि भ्रष्टाचार से लड़ने के लिए बने कानून और प्रक्रियाएं विजिलेंस से जुड़ी संस्थाओं के सामने कदम-कदम पर रुकावटें खड़ी करती हैं।
पिछले दिनों नोएडा में 32 मंजिला जुड़वां इमारतों को अदालती आदेश के चलते गिरा दिया गया। एक बार गिर जाने के बाद यह तो साबित हो ही गया कि इनका निर्माण भ्रष्टाचारी लोकसेवकों की मिलीभगत से ही संभव हुआ था, फिर भी वर्षों बाद भी उन्हें जेल नहीं भेजा जा सका और उबाऊ प्रक्रियाओं में जांच लंबित रही। राजधानी दिल्ली के ठीक बगल में घटित यह बड़ा मामला इसलिए भी बहुत महत्वपूर्ण है कि इन इमारतों के बगल से गुजरने वाली सड़क से रोज वे लोग गुजरते रहे, जिनकी जिम्मेदारी इनके निर्माण को रोकने की थी और वे अपनी आंखें मूंदे रहे। हमारे तंत्र में उत्तरदायित्व निर्धारित करने की स्वत:स्फूर्त प्रक्रिया का अभाव ही इसका सबसे बड़ा कारण हो सकता है। अडानी समूह की कंपनियों की गिरावट का वित्तीय संस्थाओं पर बुरा असर पड़ा, तो निश्चित रूप से उसका खामियाजा देश के आम निवेशकों को भुगतना पड़ेगा। यह एक स्वाभाविक सवाल हो सकता है कि उनके तरक्की के ग्राफ को अस्वाभाविक रूप से ऊपर बढ़ते देखकर भी नियामक संस्थाएं क्यों नहीं चेतीं?
हाल में ब्रिटिश प्रधानमंत्री द्वारा सीट बेल्ट न बांधने के जुर्म में लंदन मेट्रोपॉलिटन पुलिस ने जुर्माना ठोक दिया था या अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति ट्रंप के घर की तलाशी लेकर एफबीआई ने कई ऐसे गोपनीय दस्तावेज बरामद कर लिए हैं, जिनको उनके घर में नहीं होना चाहिए था। यह सब शायद इसीलिए संभव हो सका कि इन मुल्कों में नियामक संस्थाएं स्वतंत्र हैं। हमें भी अपनी नियामक संस्थाओं को कार्यपालिका के नियंत्रण से मुक्त और उत्तरदायित्व के संस्थागत अंतर्निहित प्रावधानों वाला बनाने के बारे में सोचना होगा।
Date:07-02-23
भारतीयों की थाली में क्या फिर लौट आएंगे मोटे अनाजमनु जोसफ, ( पत्रकार और उपन्यासकार )
भारत का बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बेहतरीन भोजन के रूप में मोटे अनाज की प्रशंसा की। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अनुमोदन में मेज थपथपाई और शेष संसद हर्ष में शामिल हो गई, मानो वे सभी इन प्राचीन मोटे अनाजों के शौकीन हों।
वैसे, भारत इन दिनों कुछ दिलचस्प काम कर रहा है। भारतीयों व बाकी दुनिया को वह स्वास्थ्य सलाह की पेशकश कर रहा है। भारत लोगों से मोटे अनाज खाने को कह रहा है। वैसे इसकी मुख्य प्रेरणा तो इन अनाजों से अधिक धन कमाना प्रतीत होता है, क्योंकि भारत मोटे अनाजों का सबसे बड़ा उत्पादक देश है। भारत सरकार भी इन अनाजों को सेहत के अनुकूल मानती है। भारतीय राष्ट्रवादी सोचते हैं कि जो कुछ भी प्राचीन है, वह हमारे लिए अच्छा है। ऐसे में, मोटे अनाज ‘महान’ घोषित होने की राह पर हैं। हालांकि, इस दलील में अतिशयोक्ति शामिल है। विचार करना चाहिए कि क्या मोटे अनाज को अपनाने में देर नहीं हो गई है? क्या ये अनाज अब मान्यता के लायक हैं? हां, ये चावल और गेहूं की तुलना में अधिक स्वास्थ्यकर हैं, इसलिए इनका ढिंढोरा पीटा जा रहा है।
वैज्ञानिक दृष्टि से मोटे अनाज एक प्रकार की घास के फल होते हैं; उन्हें घास के बीज या बीज वाले फल भी माना जा सकता है। कोई फर्क नहीं पड़ता कि हम क्या खाते हैं, इसका अधिकांश हिस्सा हमारे पेट में ग्लूकोज बन जाता है और हमारे खून में मिल जाता है। ग्लूकोज शुगर या शर्करा का एक सरल रूप है। जितनी जल्दी कोई भोजन शुगर बनता है, उतना ही वह हमें आकर्षित करता है। किसी भी पौधा-आधारित भोजन की व्यावसायिक सफलता शर्करा वितरण पर निर्भर करती है, इसीलिए हमारे समय के सबसे सफल अनाज चावल और गेहूं हैं। अनाजों की दौड़ में चावल और गेहूं इसलिए विजयी हुए, क्योंकि उनकी आधुनिक किस्में स्वादिष्ट हैं; इसके अलावा ज्यादा चबाने-पकाने की असुविधा के बिना बहुत परिष्कृत रूपों में इनका सेवन किया जा सकता है।
आधुनिक दुनिया मीठे की गुलाम है। कोई भी धर्म या परंपरा या यहां तक कि मां का प्यार भी मिठास के बिना नहीं चल सकता। लोग अपनी लत के लिए शुगर लॉबी को दोष देते हैं, मानो ‘उबली गोभी लॉबी’ होती, तो सब उबली गोभी ही खा रहे होते? कुल मिलाकर, भारत में शुगर से बचाव आसान नहीं। आधुनिक चावल व गेहूं की सफलता का नतीजा है कि ये बहुत अच्छे शुगर-वितरण साधन हैं। इन्होंने करोड़ों लोगों के जीवन को अत्यधिक शर्करा से भर दिया है। चावल और गेहूं की तुलना में मोटे अनाज हमारे अंदर बहुत धीरे-धीरे ग्लूकोज में तब्दील होते हैं, इसलिए ये स्वास्थ्य के अनुकूल माने जाते हैं।
स्वस्थ भोजन क्या है? यह गंभीर विवाद का क्षेत्र है। फिलहाल, मेरा जोर इस बात पर है कि शरीर में शर्करा बनने की प्रक्रिया को धीमा कैसे किया जा सकता है? चावल व गेहूं में भी फाइबर होता है, पर मोटे अनाजों में ज्यादा होता है। फाइबर भोजन के ग्लूकोज में रूपांतरण को धीमा कर देता है। शरीर की इस व्यवस्था का सबसे अच्छा विवरण मुझे हरमन पोंटजर की किताब बर्न : द मिसअंडरस्टूड साइंस ऑफ मेटाबोलिज्म में मिला है, जिसके मुताबिक, फाइबर आंतों की दीवारों पर एक जाली जैसा फिल्टर बनाता है, जो शर्करा के अवशोषण को धीमा कर देता है व रक्त-प्रवाह में पोषक तत्वों के लिए ज्यादा जगह बनती है।
फाइबर लोगों को परिपूर्णता का एहसास कराता है, जिससे लोग कम खाते हैं। इसके अलावा, आम तौर पर लोग रेशेदार की तुलना में अन्य अनाज व सब्जियों का स्वाद ज्यादा पसंद करते हैं। इसी से मुझे लगता है, भारत में मोटे अनाज का प्रचार अधिक सफल नहीं होगा। दुनिया ने हमेशा दिखाया है कि लोग स्वास्थ्य के बारे में बात तो खूब करते हैं, लेकिन स्वादिष्ट भोजन को ही तरजीह देते हैं। गरीब जैसे ही कुछ पैसे वाले होते हैं, तो मोटे अनाज को छोड़ देते हैं। सदियों से यही होता आया है। बेशक, मोटे अनाज जीवित रहेंगे, पर उनका अलग आला बाजार होगा। मोटे अनाजों का ज्यादा प्रचार उनके उपयोग को विभिन्न प्रयोगों के जरिए खराब करेगा। ऐसा होने भी लगा है।
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हाल ही में उपराष्ट्रपति जगदीप धनकड ने उच्चतम न्यायालय के उस निर्णय की आलोचना की है, जिसमें न्यायालय ने सरकार के न्यायाधीशों की नियुक्ति के वैकल्पिक तरीके से प्रस्ताव को नकार दिया है। न्यायालय का कहना है कि संसद को संविधान के ‘मूल ढांचे’ में संशोधन का अधिकार नहीं है। उपराष्ट्रपति इससे सहमत नहीं हैं। इस विवाद की सत्यता को जानने के लिए हमें कुछ महत्वपूर्ण मामलों पर एक दृष्टि डाल लेनी चाहिए –
इसका यह अर्थ कदापि नहीं लगाया जाना चाहिए कि 1973 का उच्चतम न्यायालय का ‘मूल संरचना’ सिद्धांत सही नहीं है। यह सत्य है कि न्यायिक कार्यप्रणाली के अन्य पहलुओं में परिवर्तन की आवश्यकता है, जिस पर काम किया जाना चाहिए।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 13 जनवरी, 2023
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Date:06-02-23
Spy In The SkyChina’s espionage balloons or espionage ships are part of an aggressive strategy that can target India too.TOI Editorials
The American shooting down of a Chinese spy balloon off the US coast has unsurprisingly further strained superpower relations. China’s response may be limited to angry words, but it’s unlikely to change its course. This wasn’t the first Chinese surveillance balloon to be detected but was the most sophisticated one. And reports are coming in of a second spy balloon flying over Central and South America. Therefore, there are important lessons here for countries like India that share a land border with China and have serious differences with Beijing.
First, it is quite clear from the balloon incident that Chinese spy tech is getting increasingly sophisticated. Last year’s docking of a Chinese spy ship masquerading as a research vessel at Sri Lanka’s Hambantota port was another example of Beijing’s growing espionage capabilities. This time too Beijing insisted that the balloon flying over sensitive US military sites was a wayward weather-monitoring device. But its angry reaction after a US fighter jet shot down the balloon shows the craft wasn’t just studying wind patterns.
Second, it is also increasingly clear that given China’s autocratic communist regime, distinctions between government and civilian assets are superficial. In fact, under Xi Jinping’s tenure at the helm of the party-state system, such civil-government and civil-military distinctions have further eroded. This puts vast civilian resources at Beijing’s disposal to carry out espionage, data collection and grey-zone tactics. Thus, all cooperation with Chinese civilian agencies and businesses needs to be seen in this light and appropriate safeguard worked out.
China is using an all-of-government and civil-society approach to spy on other countries. Another example of this was the 2020 investigation that revealed a Shenzhen-based technology firm was harvesting data on more than 10,000 influential individuals in India. Given this scenario, India needs to upgrade its hi-tech counterespionage measures. Available information suggests India is quite behind in this game. Balloons, incidentally, have multiple uses outside espionage and weather, and therefore the incentives for becoming at manirbhar in them is large. There is also an urgent need to step up counter-intelligence cooperation with the US and other likeminded democracies to counter China’s plans.
Date:06-02-23
Bajra BoostersPolicies promoting millets will not work unless governments address farmer’s incentives.TOI Editorials
Last week’s budget highlighted millets as a focus area for GoI, with the aim of making India a global hub for it. It’s a smart idea because increasing the production and domestic consumption of millets makes sense from the perspectives of nutrition and environment – and more exports are always welcome. But as a report in this paper showed, in the 2022-23 rabi crop season, millet acreage had declined by 5% in relation to a five-year average even though the overall farm acreage increased by 14% to 72. 1 million hectares. This disconnect is no surprise.
In 2013, GoI launched a crop diversification programme to shift acreage away from paddy in the original Green Revolution regions, Punjab, Haryana and western UP. Later, the Haryana government even offered a cash subsidy of Rs 7,000/acre to shift cultivation to alternate crops. None of these policies worked. If anything, the dominance of rice and wheat in India’s cereal basket is even more pronounced now. For example, between 2010-11 and 2020-21, acreage under coarse cereals declined by about 15% to 24. 12 million hectares. In terms of output, coarse cereals made up 18% of the overall cereal output of 285. 28 million tonnes in 2020-21. Further, in GoI’s gigantic, subsidised food distribution system, coarse cereals are barely present. Therefore, in what’s the world’s largest food security scheme covering about 800 million people, rice and wheat are an overwhelming presence.
These numbers feed back into the economic incentives influencing farmers. The procurement system that supports the food distribution programme caters mainly to rice and wheat. As the procurement guarantees a floor price, an increasing number of farmers have an economic incentive to stick to these two cereals regardless of the long-term consequences. Unless this challenge is addressed, there will be a huge mismatch between the intent to transition towards millets. Therefore, to realise the goal of popularising millets, GoI has to start with providing the right economic incentives to farmers. The procurement system is the best location to begin the shift away from rice and wheat to the more nutrient-dense millets. Farmers, like other economic agents, respond to incentives.
Date:06-02-23
हिंडनबर्ग के निशाने पर अदाणीशिवकांत शर्मा, ( लेखक बीबीसी हिंदी के पूर्व संपादक हैं )
जानी-मानी अमेरिकी सट्टेबाज कंपनी हिंडनबर्ग रिसर्च के नाटकीय हमले ने भारत के सबसे तेज रफ्तार से बढ़ते अदाणी समूह के कदमों को रोक दिया है। हिंडनबर्ग कंपनी की रिपोर्ट के एक हफ्ते के भीतर अदाणी समूह का बाजार मूल्य गिरकर लगभग आधा रह गया है। भारतीय रिजर्व बैंक ने बैंकों से अदाणी समूह को दिए गए कर्जों का हिसाब मांगा है ताकि यह तय किया जा सके कि कर्जे क्या गिरवी रखकर दिए गए हैं। जेफरीज और सोसियते जनराल जैसी ब्रोकरेज कंपनियों की रिपोर्ट के अनुसार अदाणी समूह की कंपनियों को दिया गया कर्ज भारतीय बैंकों द्वारा दिए गए कुल कर्ज के केवल आधे प्रतिशत के ही बराबर है। फिर भी रिजर्व बैंक शायद यह देखना चाहता है कि कर्जे यदि शेयर गिरवी रखकर दिए गए हैं तो क्या वे शेयरों के गिरते दामों को देखते हुए सुरक्षित हैं? इस बीच नेशनल स्टाक एक्सचेंज ने अदाणी एंटरप्राइजेज, अदाणी पोर्ट्स और अंबुजा सीमेंट के शेयरों के सौदों पर पूरी रकम अदायगी का नियम लगा दिया है ताकि सट्टे पर रोक लग सके। बांड बाजार में अदाणी समूह की कई कंपनियों के बांड के दाम 40 प्रतिशत तक गिर गए हैं। इसके बाद क्रेडिट सुइस और सिटीबैंक जैसे कुछ अंतरराष्ट्रीय बैंकों ने इन बांडों को गिरवी रखकर पैसा देना बंद कर दिया है। हालात को देखते हुए समूह को 20 हजार करोड़ के एफपीओ को रद करते हुए निवेशकों को उनका पैसा लौटाना पड़ा है। अदाणी समूह का कहना है कि शेयरों की मांग जारी किए जा रहे शेयरों से ज्यादा थी, लेकिन यह मांग धनी निवेशकों, उद्योगपतियों और संस्थागत निवेशकों की तरफ से आई। आम निवेशकों ने उनके लिए निर्धारित शेयरों में से केवल 11 प्रतिशत खरीदने की ही हिम्मत दिखाई। यहां तक कि अदाणी समूह के कर्मचारी भी उनके लिए रखे शेयरों का केवल 53 प्रतिशत ही लेने को तैयार हुए। अदाणी समूह ने अगले पांच वर्षों में अदाणी न्यू इंडस्ट्रीज, अदाणी एयरपोर्ट और अदाणी रोड ट्रांसपोर्ट जैसे पांच आइपीओ लाने की योजना भी बना रखी थी। हिंडनबर्ग हमले ने इन सब पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
नए उद्यमों के अधिग्रहण, विकास और उन्हें मुनाफा कमाने लायक बनाने के लिए अदाणी को निरंतर नई पूंजी की जरूरत पड़ती रही है, जो बंदरगाहों, सीमेंट कारखानों, खदानों और बिजलीघरों के मुनाफे से पूरी नहीं की जा सकती थी। इसलिए समूह ने बैंकों से कर्ज लेकर, अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बांड बेचकर और बड़े विदेशी निवेशकों को हिस्सेदारी बेचकर पूंजी बटोरी। कारोबार फैलाने के लिए पूंजी बटोरने की प्रक्रिया का परिणाम यह हुआ कि समूह का कर्ज उसकी करीब दो लाख करोड़ की आय से भी ऊपर चला गया, पर मुनाफा केवल 475 करोड़ रुपये ही रहा। इतने कम मुनाफे के बावजूद अदाणी समूह के दाम इतनी तेजी से बढ़ने का एक कारण इन कंपनियों के 72.6 प्रतिशत से अधिक शेयरों का प्रमोटर या मालिकों के हाथों में होना है। केवल 15.39 प्रतिशत शेयर विदेशी निवेशकों और मात्र 6.53 प्रतिशत शेयर आम लोगों के पास हैं। इतने कम शेयर लेनदेन में रहने के कारण उनके दामों में उतार-चढ़ाव का जोखिम ज्यादा रहता है।
एक सूचीबद्ध कंपनी के मालिक 75 प्रतिशत से ज्यादा शेयर अपने पास नहीं रख सकते। हिंडनबर्ग रिसर्च की आलोचना का एक बिंदु यह भी है कि अदाणी समूह अधिकतम सीमा के पास शेयर अपने पास रखकर कंपनी को कुनबाशाही की तरह चलाता है जिसमें अपेक्षित पारदर्शिता नहीं। अदाणी की निजी संपत्ति के तेजी से बढ़ने का सबसे बड़ा कारण कोविड की मंदी के बावजूद उनकी कंपनी के शेयरों में आश्चर्यजनक तेजी आना और कंपनियों के 72.6 प्रतिशत शेयरों का उनके पास होना था। यूरोपीय और अमेरिकी कारोबारी जगत में कुनबाशाही और साठगांठ को अच्छा नहीं माना जाता। जबकि यह भारतीय समाज और राजनीति के स्वभाव में है जिसका कारोबार में झलकना स्वाभाविक है। हिंडनबर्ग की रिपोर्ट के कई सवाल अदाणी समूह के कामकाज में दिखती इसी गड़बड़ी की बात करते हैं। जो भी हो, देश की कारोबारी साख को बनाए रखने के लिए ऐसे सवालों का संतोषजनक उत्तर देना बहुत जरूरी है। उससे भी जरूरी उन सवालों की पारदर्शी तरीके से निष्पक्ष छानबीन कराना है जो हिंडनबर्ग ने विदेश में स्थित फर्जी कंपनियों के माध्यम से शेयर सौदों में और खातों में हेराफेरी को लेकर उठाए हैं। ये आरोप 15 साल पुराने सत्यम कंप्यूटर घोटाले और उससे भी पुराने एनरान घोटाले की याद भी दिलाते हैं। देश की कारोबारी व्यवस्था की साख बनाए रखने के लिए इनकी गहन पड़ताल जरूरी है। इसमें कोई दोराय नहीं कि हिंडनबर्ग कोई भारत-मित्र नहीं है। वह एक सट्टेबाज कंपनी है जो तेज तरक्की की रफ्तार पर सवार कंपनियों की आसमान छूती कीमतों और प्रबंधकीय गडबड़ियों का भय फैलाकर पैसे बनाती है। उसकी रिपोर्ट से भारत के निवेशकों को लगभग दस लाख करोड़ की चपत लग चुकी है। बहुत संभव है कि उसकी आड़ में तीर कोई और चला रहा हो, परंतु उसने सवाल वही उठाए हैं जिन्हें भारत में बहुत पहले उठाया जाना चाहिए था।
अदाणी समूह पर हिंडनबर्ग के हमले ने जो सबसे चिंताजनक बात उजागर की है वह है समाज में कारोबारियों और उद्यमियों के विरुद्ध फैली संदेह, ईर्ष्या और द्रोह की भावना जो देश की उन्नति में सहायक नहीं है। यूरोप और अमेरिका में भी कारोबारी घोटालों का लंबा इतिहास है। फिर भी वहां उद्यम-कारोबार को बड़े सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है, क्योंकि उद्यमी अपने साथ-साथ कई दूसरों को काम देकर उनकी भी उन्नति का जरिया बनते हैं। लोग उद्यमी-कारोबारी को उन्नति करता देख खुद भी वैसी सफलता हासिल करने की सोचते हैं। उन्हें लुटेरा और शोषक मानकर उनसे ईर्ष्या नहीं करते। भारतीय समाज में भी उद्यम-कारोबार का वैसा ही आदर होता था, लेकिन अब नहीं। इसका एक कारण आर्थिक विषमता हो सकती है, परंतु वह तो यूरोप और अमेरिका में भी है। पिछली सदी के छठे और सातवें दशक की फिल्मों का भी उद्यमियों की नकारात्मक छवि बनाने में योगदान रहा है। आजकल राजनीतिक नारेबाजी उसकी भूमिका निभा रही है। वस्तुत:, अपनी उन्नति के लिए हमें उद्यमों-कारोबारों के लिए वैसी भावना बहाल करने की जरूरत है जिसकी पैरवी गांधीजी ने ‘मेरा समाजवाद’ में की थी।
Date:06-02-23
देरी से लिया गया निर्णयसंपादकीय
आखिरकार केंद्र सरकार ने वोडाफोन आइडिया में 33 फीसदी हिस्सेदारी लेने का निर्णय ले ही लिया है। इसके साथ ही वह वित्तीय संकट से जूझ रही इस दूरसंचार कंपनी में 33 फीसदी की हिस्सेदार बन जाएगी। प्रथमदृष्टया यह सकारात्मक घटना लगती है। बहरहाल, सरकार ने इस निर्णय को लेने में जो देरी की उसने दूरसंचार कंपनियों और इस क्षेत्र को बहुत नुकसान पहुंचाया है। ब्याज को शेयर में बदलने के पीछे विचार यही है कि दूरसंचार उद्योग को दो कंपनियों के बीच रह जाने से बचाया जा सके क्योंकि अगर ऐसा हुआ तो उपभोक्ताओं के लिए अच्छे परिणाम नहीं होंगे। परंतु सरकार के निर्णय में देरी के कारण दूरसंचार उद्योग के मन में दो कंपनियों के दबदबे का डर घर कर गया। ऐसा मोटे तौर पर इसलिए हुआ कि बीते कुछ महीनों में इस दूरसंचार कंपनी के ग्राहक काफी बड़ी तादाद में दूसरी कंपनियों के पास चले गए। कंपनी 5जी सेवाओं की दिशा में भी कोई प्रगति नहीं कर सकी है जबकि अन्य कंपनियां तेजी से 5जी में प्रवेश कर रही हैं। इसके अलावा इसके नेटवर्क में निवेश भी नाममात्र का ही रहा है और उसकी नकदी की स्थिति भी खराब हुई है तथा कंपनी अपने वेंडर्स का भुगतान करने में भी अक्षम रही है।
प्रवर्तक भी अपनी बात पर अड़े रहे और उन्होंने नया निवेश करने से इनकार कर दिया। फंड जुटाने की कंपनी की कोशिशें भी निष्फल रहीं क्योंकि सरकार द्वारा हिस्सेदारी नहीं लेने के कारण बाहरी निवेशक भी कंपनी पर भरोसा नहीं कर पा रहे थे। अत्यधिक उलझन की स्थिति तब बन गई जब दूरसंचार विभाग ने यह शर्त रख दी कि वोडाफोन आइडिया के प्रवर्तकों को पहले रकम जुटानी होगी उसके बाद ही 16,133 करोड़ रुपये मूल्य के ब्याज को सरकारी हिस्सेदारी में बदला जाएगा। चूंकि प्रवर्तकों ने फंड डालने से मना कर दिया तो सरकार ने भी हिस्सेदारी लेने का अपना निर्णय स्थगित कर दिया। इसके परिणामस्वरूप बाहरी फंडिंग अत्यधिक चुनौतीपूर्ण हो गई। शुक्रवार को शेयर बाजार की एक अधिसूचना में वोडाफोन आइडिया ने कहा कि केंद्र सरकार ने एक आदेश पारित करके कंपनी से कहा है कि वह स्पेक्ट्रम से संबंधित ब्याज के विशुद्ध वर्तमान मूल्य तथा समायोजित सकल राजस्व को सरकार के लिए हिस्सेदारी में बदले।
कंपनी को निर्देश दिया गया कि वह 10 रुपये प्रति शेयर के मूल्य से शेयर जारी करे। संचार मंत्री अश्विनी वैष्णव ने इसकी पुष्टि करते हुए कहा कि ब्याज को शेयर में बदलने का निर्णय वोडाफोन आइडिया के संयुक्त साझेदारों में से एक बिड़ला द्वारा यह स्वीकार करने के बाद लिया गया कि कंपनी में नई पूंजी डाली जाएगी। परंतु किसी प्रवर्तक द्वारा इस पूंजी की मात्रा या निवेश के समय के बारे में किसी जानकारी के बिना वोडाफोन आइडिया के भविष्य के बारे में अनुमान लगाना मुश्किल है। बाहरी निवेशकों से फंड जुटाना अभी भी चुनौती बनी रहेगी, बशर्ते कि प्रवर्तक नुकसान की भरपाई के लिए तेजी से कदम उठाएं। ब्रिटेन की कंपनी वोडाफोन पीएलसी लागत कटौती में लगी है और वह अपने कारोबार को युक्तिसंगत बनाने का प्रयास कर रही है लेकिन वह भारतीय दूरसंचार कारोबार में निवेश करेगी या नहीं यह देखना होगा। बिड़ला परिवार ने भी अभी निवेश की योजना के बारे में साफ तौर पर कुछ नहीं कहा है। ध्यान रहे 2021 के अंत में सरकार द्वारा शेयर परिवर्तन की पेशकश के बाद हालात बद से बदतर होते जा रहे हैं।
सरकार का ताजा निर्णय केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा दूरसंचार कंपनियों के स्पेक्ट्रम और एजीआर बकाये को सरकारी हिस्सेदारी में बदलने को मंजूरी देने के 16 महीने बाद आया है। हालांकि यह पेशकश सभी कंपनियों को की गई थी लेकिन वोडाफोन आइडिया के बोर्ड ने 2022 के आरंभ में इसका चयन किया। सरकार ने इन तमाम महीनों में कोई कदम नहीं उठाया। शुरुआत में तो इसकी कोई वजह भी नहीं बताई गई और बाद में इस पेशकश को सशर्त बनाते हुए कहा गया कि पहले प्रवर्तक निवेश करें। निवेश के सतर्क माहौल को देखते हुए इस दूरसंचार कंपनी का उबरना कठिन चुनौती है क्योंकि सितंबर 2022 तक इस पर 2.2 लाख करोड़ रुपये का कर्ज था। इस मामले में समय कीमती रहा है और सरकार को समय बचाना चाहिए था।
Date:06-02-23
विवाह की उम्रसंपादकीय
बरसों से जागरूकता अभियानों, विज्ञापनों, लेखों आदि के जरिए बाल विवाह की वजह से जीवन पर पड़ने वाले दुष्प्रभावों के बारे में बताया जा रहा है। सरकारों ने इसके खिलाफ कड़े कानून बना रखे हैं। प्रशासन ऐसी शादियों पर नजर रखने का प्रयास करता है ताकि निर्धारित उम्र से पहले बच्चों का गठबंधन न होने पाए। मगर इन तमाम कोशिशों के बावजूद बहुत कम उम्र में बच्चों की शादी कर देने का चलन बंद नहीं हुआ है। अब ऐसी शादियों के खिलाफ असम सरकार ने व्यापक अभियान शुरू किया है। असम पुलिस का कहना है कि उसने ऐसे आठ हजार लोगों को चिह्नित किया है, जिन्होंने कम उम्र में शादी की या कराई। उनमें विवाह कराने वाले पंडित और मौलवी भी शामिल हैं। वहां की पुलिस ने इस मामले में दो हजार चौवालीस लोगों को गिरफ्तार भी किया है। राज्य सरकार का कहना है कि ऐसे विवाहों को अवैध करार दिया जाएगा। चौदह साल से कम उम्र की लड़की के साथ विवाह करने वालों के खिलाफ पाक्सो अधिनियम के तहत और चौदह से अठारह बरस के बीच की लड़कियों से विवाह करने वालों के खिलाफ बाल विवाह रोकथाम अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज होगा। हालांकि असम सरकार की इस सख्ती से वहां के प्रभावित लोगों में नाराजगी देखी जा रही है, मगर सामाजिक बदलाव के लिए उठाए गए सरकारों के ऐसे कदम को अनुचित नहीं कहा जा सकता।
बेशक देश में साक्षरता दर बढ़ी है, लड़कियों को पढ़ा-लिखा कर सशक्त बनाने पर जोर है, इसका असर भी काफी देखा जा रहा है, मगर हकीकत यह भी है कि बहुत सारे वर्गों, खासकर निम्न वर्ग में विवाह की उम्र आदि को लेकर जागरूकता का अभाव है। कई समुदायों में आज भी यह मान्यता बनी हुई है कि कन्या के रजस्वला होते ही उसका विवाह कर देना चाहिए। कई समाजों में तो लड़के और लड़कियों का बचपन में ही विवाह कर दिया जाता है, फिर उनके योग्य होने के बाद गौना किया जाता यानी उन्हें साथ रहने दिया जाता है। कई समुदायों में लड़कियों की सुरक्षा के लिहाज से भी जल्दी विवाह कर दिया जाता है। वहां माना जाता है कि विवाह के बाद लड़की की अस्मिता पर प्रहार बंद हो जाता है। इन्हीं सब मान्यताओं और धारणाओं के चलते आज भी कम उम्र में विवाह का सिलसिला नहीं रुक पा रहा है। मध्यप्रदेश में तमाम कड़ाई के बावजूद हर साल अखा तीज के दिन बहुत सारे नाबालिगों की शादियां कर दी जाती हैं।
मगर वैज्ञानिक तथ्य यह है कि कम उम्र में लड़कियों का विवाह कर देने और फिर उनके मां बन जाने का सीधा असर उनके स्वास्थ्य पर पड़ता है। वे जीवन भर शारीरिक रूप से कमजोर और बीमारियों से घिरी रहती हैं। वे स्वस्थ बच्चों को जन्म नहीं दे पातीं। कम उम्र में ही उनकी मौत हो जाती है। शिशु और मातृ मृत्यु दर पर काबू पाना इसी वजह से चुनौती बना हुआ है। ऐसे में असम सरकार का बाल विवाह के विरुद्ध अभियान उचित ही है। मगर इस कड़ाई में उसे यह देखने की जरूरत होगी कि जिन परिवारों के एकमात्र कमाऊ सदस्य इस अभियान में गिरफ्तार होंगे, उनके परिवार का भरण-पोषण कैसे चलेगा। राज्य सरकार को विरोध भी इसी वजह से झेलना पड़ रहा है। पर इससे न सिर्फ वहां, बल्कि दूसरे राज्यों के लोगों को भी एक सबक तो मिलेगा कि कम उम्र में विवाह करने या कराने के क्या दुष्परिणाम हो सकते हैं।
Date:06-02-23
मोटे अनाजों की ओरसंपादकीय
जब दुनिया की एक सबसे अमीर हस्ती अपने हाथों से रोटियां बनाएगी, तो जाहिर है, उन रोटियों को पूरी दुनिया देखेगी। यह रोटी के पक्ष में सोने पर सुहागा जैसा है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शनिवार को माइक्रोसॉफ्ट के संस्थापक बिल गेट्स का रोटी बनाते हुए वीडियो साझा किया और लगे हाथ, मोटे अनाजों की पैरोकारी भी कर दी। रोटी का भारत से जुड़ाव इसलिए भी सार्थक बन पड़ा कि बिल गेट्स से रोटियां बनवाने वाले सेलिब्रिटी शेफ ईटन बर्नाथ ने अपनी ताजा बिहार यात्रा का जिक्र कर दिया, जो विभिन्न प्रकार की रोटियों का एक समृद्ध क्षेत्र है। खैर, इसमें कोई दोराय है ही नहीं कि दुनिया में किसी भी प्रकार की ब्रेडरोटी या पावरोटी से रोटी का कोई मुकाबला नहीं है। ब्रेड अव्वल तो मैदा, फिर न जाने कब-कैसे-किससे गूंथा हुआ। न जाने कब का बना हुआ ठंडा, पैकेट में बंद और दूसरी ओर, ताजा गूंथे गए आटे की तत्काल पकी सोंधी रोटी। रोटी को हर तरह से स्वास्थ्य के अनुकूल माना गया है। दुनिया के लगभग सभी सेफ, रसोइये, भोजन विशेषज्ञ, डॉक्टर रोटी का लोहा मानने लगे हैं। ऐसे में, बिल गेट्स का अपने हाथों से रोटी पकाना खास मायने रखता है। जो लोग रोटी से ब्रेड की ओर भाग चुके हैं या भाग रहे हैं, उन्हें इससे जरूर प्रेरणा मिलेगी।
प्रधानमंत्री ने मोटे अनाजों को याद किया है, तब यह ध्यान रखना जरूरी है कि संयुक्त राष्ट्र ने इस वर्ष को मोटे अनाज का वर्ष घोषित कर रखा है। भारत में 2018 को मोटे अनाज का वर्ष कहा गया था और भारत के प्रयासों से ही साल 2021 में तय हुआ था कि दुनिया में 2023 में मोटे अनाज का वर्ष मनाया जाएगा। प्रधानमंत्री ने प्रेरित किया है कि भारत में नवीनतम चलन मोटे अनाज हैं, जो सेहतमंद बनाने के लिए जाने जाते हैं। मोटे अनाज के अनेक व्यंजन हैं, जिन्हें आप बना सकते हैं। यह पश्चिम के आम लोगों के लिए बहुत चकित करने वाली बात है कि गेहूं के कणों, जिन्हें आटा कहा जाता है, उन्हें समेटकर रोटी बनाई जा सकती है। आटा भी केवल गेहूं का नहीं होता, अन्य अनेक मोटे अनाजों का भी होता है। वैसे तो दुनिया में कम से कम 12 प्रकार के मोटे अनाज ज्यादा प्रचलित हैं। उनमें से सबसे पोषक अनाज हैं ज्वार, बाजरा, रागी (मंडुआ), कांगनी/काकुन, चीना, कोदो, सावा/सांवा/झंगोरा, कुटकी), कुट्टू और चौलाई। इन सभी अनाजों को भारत ही नहीं, दुनिया भर में बढ़ावा दिया जा रहा है। गेहूं, चावल जैसे विकसित अनाजों की ओर से लोग मोटे अनाजों की ओर लौटने लगे हैं। जिस अफ्रीका महादेश को पिछड़ा कहा जाता है, वहां मोटे अनाज की खपत सर्वाधिक है।
यह गौर करने की बात है कि साल 1970 तक अपने देश में मोटे अनाजों का सेवन 20 प्रतिशत था, पर अब 6 प्रतिशत रह गया है। विगत पचास वर्षों में पेट की बीमारियों पर ही अगर हम गौर कर लें, तो पता चलेगा कि मोटे अनाजों से किनारा करके हमने क्या गंवाया है। अब हमें वापस मोटे अनाजों की ओर लौटना ही होगा और अपने देश की आटा चक्कियों पर मोटे अनाजों की वापसी हो गई है, बीच में केवल गेहूं का कब्जा दिखने लगा था। साल 2021-2026 के बीच मोटे अनाज के वैश्विक बाजार में 4.5 प्रतिशत की वृद्धि मुमकिन है। भारत में खेतों से लेकर स्टार्ट अप तक अभियान जारी है। मोटे अनाज इंसानी पेट के मुफीद हैं और हमें कम से कम आधा दर्जन घातक बीमारियों से बचा सकते हैं। खैर, जब बिल गेट्स रोटी बनाते देखे गए हैं, तो यकीन मानिए, दुनिया सेहत के प्रति जागरूक होने लगी है।
Date:06-02-23
डिजिटल मीडिया का गहराता असर और घटती जवाबदेहीसंजय द्विवेदी, ( महानिदेशक, भा संचार संस्थान )
पिछले दिनों देश की राजधानी दिल्ली में ‘डिजिटल न्यूज पब्लिशर्स एसोसिएशन’ की ओर से ‘फ्यूचर ऑफ डिजिटल मीडिया’ विषय पर एक सम्मेलन का आयोजन हुआ। उसमें भाग लेने आए ऑस्ट्रेलिया के पूर्व संचार मंत्री और सांसद, पॉल फ्लेचर ने एक समाचारपत्र को दिए गए अपने साक्षात्कार में कहा कि आने वाले दिनों में भारत डिजिटल दुनिया में सबसे आगे होगा। अगले दस सालों में डिजिटल क्षेत्र में सबसे बड़ी संचार क्रांति होने वाली है। बस इस दौरान सबसे ज्यादा ध्यान फेक न्यूज को रोकने के साथ-साथ क्वालिटी कंटेंट या गुणवत्तापूर्ण सामग्री और बिजनेस मॉडल को अपग्रेड करने की जरूरत पर ही होगा।
पिछले एक दशक में देश में डिजिटल मीडिया और डिजिटल सहूलियतों का इस्तेमाल बहुत तेजी से बढ़ा है, लेकिन इस सबके बीच दो चीजों की अनुपस्थिति साफ देखी जा सकती है। एक, विश्वसनीयता और दूसरी, जवाबदेही। ये दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू की तरह हैं। यदि जवाबदेही तय होगी, तो डिजिटल मीडिया की विश्वसनीयता खुद बढ़ जाएगी।
जहां तक जवाबदेही के अभाव का प्रश्न है, तो इसकी कई वजह हैं। पहली वजह है, वर्तमान समय में उपलब्ध बेहद सस्ती और सर्वसुलभ तकनीकी सुविधाएं। तेज इंटरनेट स्पीड जैसी चीजों ने हर किसी के लिए यह बहुत आसान बना दिया है कि वह जब चाहे, नाममात्र के खर्च में अपना खुद का समाचार पोर्टल, यूट्यूब चैनल और पॉडकास्ट शुरू कर सकता है। इसके माध्यम से लोगों को शिक्षा, सूचना, समाचार व मनोरंजन देते समय इस तरह के उपक्रम शुरू करने वाले लोग भूल जाते हैं कि इस सबकी भी कुछ सांविधानिक, सामाजिक, राजनीतिक और मनोवैज्ञानिक सीमाएं भी हो सकती हैं। गैर-जिम्मेदारना रवैये की शुरुआत यहीं से होने लगती है और फिर अपने दायित्व की उपेक्षा एक आदत बन जाती है। दूसरी वजह है, डिजिटल साक्षरता पर ध्यान न दिया जाना। वैसे जवाबदेही से बचने में बड़ी कंपनियां भी पीछे नहीं हैं। फेसबुक और ट्विटर जैसे कई सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल वर्षों से फेक न्यूज और हेट कंटेंट के प्रसार के लिए किया जाता रहा है। इन्हें रोकने के पुख्ता उपाय नहीं किए जा सके हैं। चूंकि, अभी तक हमारे यहां सब कुछ स्व-नियमन के भरोसे चल रहा है, इसलिए जवाबदेही को लेकर ये किसी भी प्रकार की कानूनी कार्रवाई से आसानी से बच जाती हैं। उनका देश की अखंडता और लोकतांत्रिक मूल्यों से कोई लेना-देना नहीं है। उनका एक ही मंत्र है, जितना बड़ा यूजर बेस, उतना ही बड़ा कारोबार। ट्विटर के छह करोड़, फेसबुक के एक अरब, इंस्टाग्राम के डेढ़ अरब, ये सब मिलकर दुनिया की करीब चालीस प्रतिशत आबादी के बराबर हो जाते हैं। इन्हें अपने साथ बनाए रखने के लिए हर प्रकार के समझौते करने को तैयार ये बिग टेक कंपनियां बाकी साठ फीसदी लोगों के बारे में शायद ही सोचती होंगी।
भारत की समस्या यह नहीं है कि वह डिजिटल मीडिया या दूसरी डिजिटल विधाओं-सेवाओं की उपलब्धता और उपयोग के मामले में सबसे बड़ा यूजर बेस वाला देश बनने जा रहा है। समस्या यह है कि इसकी भाषायी, सांस्कृतिक विविधता के बीच, कोई भी चीज या बात, एक जगह के लोगों के लिए सही हो सकती है, तो वही चीज दूसरी जगह समाज पर हानिकारक असर पैदा करने वाली हो सकती है। भौगौलिक सीमाओं से परे रहने वाला और खुद को सभी बंदिशों से ऊपर मानने वाला डिजिटल मीडिया, आवश्यक नियमन के अभाव में स्वतंत्र से ज्यादा उच्छृंखल नजर आता है। लोग बार-बार किसी झूठ को देखने के बाद उस पर विश्वास करने लगते हैं। वर्ष 2016 में ‘स्टेनफोर्ड हिस्ट्री एजुकेशन ग्रुप’ की एक रिसर्च के दौरान यह चौंकाने वाला नतीजा सामने आया कि विभिन्न सोशल मीडिया का इस्तेमाल करने वाले 80 प्रतिशत छात्र विज्ञापन और खबरों के बीच फर्क नहीं कर पाते हैं।
इसे गंभीरता से लेते हुए पिछले साल सरकार ने ‘सूचना तकनीक कानून 2021’ लाकर कुछ दिशा-निर्देश जारी किए थे। यहां स्वीकार करना चाहिए कि सब कुछ डिजिटल मीडिया पर छोड़ देने से समस्या का समाधान नहीं निकाला जा सकता। कुछ नियामक और निवारक व्यवस्था होना आवश्यक है। तभी डिजिटल मीडिया की भी प्रिंट मीडिया जैसी जवाबदेही सुनिश्चित होगी।
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जल-भंडारण और जलमृत (एक्वीफर) रिचार्ज के साथ-साथ वेटलैण्डस, तूफानों और बाढ़ों को रोकने या तीव्रता कम करने में मदद करते हैं। ये प्राकृतिक कार्बन सिंक भी हैं, जो जलवायु परिवर्तन के खतरों से निपटने में मदद करते हैं।
इनकी महत्ता को पहचानते हुए दिल्ली मास्टर प्लान-2041 में वेटलैण्डस के संरक्षण की बात की गई है। यह एक अच्छी शुरूआत कही जा सकती है। हमारी प्रकृति के लिए इनके महत्व के बारे में और अधिक जन-जागरूकता फैलायी जानी चाहिए।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 11 जनवरी, 2023
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Date:04-02-23
The Aam InvestorAdani crisis: retail market participants need reassuranceTOI Editorials
The Nifty 50 stock index ended Friday’s session at 17,845. 05, a gain of 1% over the week. One of its constituents, Adani Enterprise, recorded a 50% fall in its price during the week to close at Rs 1531. The sharp divergence here is an indicator of the underlying optimism in the Indian economy which an index of diverse companies captures.
The optimism about India’s economic future has shown up for a while. Two trends are worth highlighting. In 2022, global economic and geopolitical disruptions led to a net FII outflow of $16. 5 billion in Indian equities. Yet, the bellwether BSE Sensex rose 4. 4% during 2022. The FII outflow was more than offset by the emergence of Indian retail investors in equity as acountervailing force. Take mutual fund SIPs, a proxy for retail investment. Since September 2021, the monthly inflow has exceeded Rs 10,000 crore every month. In 2022-23, the annual inflow is set to more than double what was collected five years ago.
The growing interest of retail Indian investment in Indian equities is a positive development. It helps households capture the gains of economic growth and also helps firms by providing a more diverse pool of investors. While GoI has taken pains to reassure investors on the integrity of market systems, the performance of Adani group shares indicates uncertainty. It’s this fear that regulators need to address in India’s larger economic interest. The diversification of Indian household savings is essential.
Date:04-02-23
Going greenThe Budget can help India transition out of its dependence on fossil fuelsEditorial
Finance Minister Nirmala Sitharaman’s latest Budget is noteworthy for the emphasis she has laid on the government’s commitment to move towards net-zero carbon emission by 2070. As an article presented at the World Economic Forum’s Annual Meeting in Davos last month notes, India holds the key to hitting global climate change targets given its sizeable and growing energy needs. With the country’s population set to overtake China’s some time this year, India’s appetite for energy to propel the economy is set to surge exponentially. The transition to green alternatives from the current reliance on fossil fuels is therefore an urgent imperative and an opportunity to leverage this move to catalyse new industries, generate jobs on a sizeable scale, and add to overall economic output. In a nod to this, Budget 2023-24 devoted a fair amount of space to the green industrial and economic transition needed. With the electric vehicle (EV) revolution poised to take off as every automobile major rolls out new EV models to tap demand, the availability of indigenously produced lithium-ion batteries has become a necessity, especially to lower the cost of EVs. The Budget hearteningly proposes to exempt customs duty on the import of capital goods and machinery required to manufacture lithium-ion cells used in EV batteries. This ought to give a fillip to local companies looking to set up EV battery plants.
Another key proposal relates to the establishment of a viability gap funding mechanism to support the creation of battery energy storage systems with a capacity of 4,000 MWh. Energy storage systems are crucial in power grid stabilisation and essential as India increases its reliance on alternative sources of power generation including solar and wind. With wind turbine farms and solar photovoltaic projects characteristically producers of variable electric supply, battery storage systems become enablers of ensuring the electricity these generators produce at their peak output is stored and then supplied to match the demand arriving at the grid from household or industrial consumers. Ms. Sitharaman also set aside a vital ₹8,300 crore towards a ₹20,700 crore project for building an inter-State transmission system for the evacuation and grid integration of 13 GW of renewable energy from Ladakh. With its vast stretches of barren land and one of the country’s highest levels of sunlight availability, Ladakh is considered an ideal location to site photovoltaic arrays for producing a substantial capacity of solar power. The transmission line will help address what had so far been the hurdle in setting up solar capacity in the region, given its remoteness from India’s main power grid.
Date:04-02-23
देश में आयकर संकलन में बढ़ोतरी कैसे होगी ?संपादकीय
देश में करीब 8.5 करोड़ लोग आयकर रिटर्न भरते हैं, जबकि वास्तविक टैक्स देने वाले केवल 72 लाख लोग ही हैं। इसके उलट एक रिपोर्ट के अनुसार मात्र सन् 2021 में सात करोड़ रुपए से ज्यादा संपत्ति वाले एक साल में 50 हजार लोग बढ़े हैं। वर्ष 2021 के एक साल में दस लाख से एक करोड़ तक की आय वाले 77 लाख लोग हैं। आर्थिक विषमता के इस दौर में उच्च और उच्च-मध्यम वर्ग की कमाई काफी बढ़ी है जबकि नीचे का बड़ा वर्ग इस लाभ से वंचित रहा है। वेतनभोगियों से तो सरकार टैक्स ले लेती है, लेकिन भारी आमदनी वाला एक बड़ा वर्ग आयकर विभाग की नजरों से दूर टैक्स नहीं देता और ऐसी कमाई को बेनामी संपत्ति और अनुत्पादक आडम्बर-निष्ठ उपभोग (कांस्पिकुअस कंजम्प्शन) में लगाता है। इसकी वजह से ईमानदारी से टैक्स भरने वाले हतोत्साहित होते हैं। नोटबंदी के बाद नकदी का चलन ऊपर के वर्ग में काफी हद तक कम हुआ है लेकिन टीयर – 2 और 3 के शहरों व बड़े कस्बों में उपभोक्ता लेन-देन ही नहीं जमीन और संपत्ति की खरीद में अघोषित नकदी का आज भी बोलबाला है। जरूरी है कि टैक्स के दायरे में होकर भी टैक्स न देने वालों की पहचान हो सके तभी अर्थशास्त्रियों के अनुसार आयकर – संकलन दोगुना हो सकता है।
Date:04-02-23
बड़ी चुनौती युवा आबादी को काम पर लगाने की हैमनोज जोशी, ( ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में विशिष्ट फेलो )
इस बात पर लगभग सभी सहमत हैं कि व्यापक अवसरों का नया दौर भारत के सामने उपस्थित हो गया है। इसका इससे कोई सम्बंध नहीं है कि भारत दुनिया का सबसे ज्यादा आबादी वाला देश बन गया है या उसे जी-20 की अध्यक्षता मिल गई है। इसमें आर्थिक, भू-राजनीतिक सहित अनेक फैक्टर्स जुड़े हैं। सरकार का महत्वाकांक्षी एजेंडा भी इसका मुख्य कारण है। आज दुनिया की मैन्युफेक्चरिंग कम्पनियां चीन का विकल्प तलाशने लगी हैं। ‘चाइना प्लस वन’ रणनीति का लाभ भारत और वियतनाम को पहले ही मिलने लगा है। ग्लोबल मैन्युफेक्चरिंग कम्पनियां दूसरे देशों में विकल्पों की तलाश कर रही हैं। यही कारण है कि एप्पल के तीन ताईवानी सप्लायर्स को भारत सरकार के उन इंसेंटिव से लाभ मिला है, जिनके तहत देश में स्मार्टफोन की मैन्युफेक्चरिंग को बूस्ट दिया जाना है।
आज जब अमेरिका, चीन और यूरोप के अधिकतर देश धीमी विकास दर से जूझ रहे हैं, तब वे भारत की ओर आशाभरी नजरों से देख रहे हैं। उन्हें उम्मीद है कि भारत एक ऐसी ताकत के रूप में उभरेगा, जो दुनिया की इकोनॉमी को आगे बढ़ा सकता है। भारत पहले ही दुनिया के उन तीन देशों में शामिल हो चुका है, जो एन्युअल आउटपुट ग्रोथ में 400 अरब डॉलर से ज्यादा की राशि जनरेट कर सकते हैं और अनुमान लगाए जा रहे हैं कि मौजूदा दशक में भारत दुनिया की 20 प्रतिशत आर्थिक वृद्धि को ड्राइव करेगा। भारत के प्रति दुनिया की उम्मीदों का एक बड़ा कारण बुनियादी ढांचे के क्षेत्र में उसके द्वारा की गई तरक्की है। नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से राष्ट्रीय राजमार्गों के नेटवर्क में 50 प्रतिशत से अधिक की बढ़ोतरी हो चुकी है और घरेलू हवाई ट्रैफिक दोगुना हो गया है। डिजिटल पर जोर देने के कारण राजस्व का लीकेज न्यूनतम हो गया है और सुप्रशासन सुचारु कायम हुआ है। आरम्भिक परेशानियों के बाद जीएसटी भी स्थिर हो गया है और सरकार के कर राजस्व-संग्रह में उसके कारण तेजी से बढ़ोतरी हुई है।
कहते हैं कि चीनी भाषा में अपॉर्चूनिटी शब्द का एक अन्य मतलब खतरा भी होता है। यह भारत के लिए भी सही है। रास्ते में चुनौतियां और मुश्किलें कम नहीं हैं। हमें याद रखना चाहिए कि सरकार का मेक इन इंडिया कार्यक्रम वांछित परिणाम देने में सफल नहीं रहा है। लक्ष्य रखा गया था जीडीपी का 25 प्रतिशत हिस्सा मैन्युफेक्चरिंग से प्राप्त करना, लेकिन 2021 तक 14 प्रतिशत के आंकड़े तक ही पहुंचा जा सका है। वैसे भी अकेली मैन्युफेक्चरिंग की हिस्सेदारी बढ़ाने से बात नहीं बनेगी। आईआईएम अहमदाबाद और जॉब सर्च कम्पनी मॉन्स्टर इंडिया की 2017 की एक रिपोर्ट बताती है कि भारत में मैन्युफेक्चरिंग क्षेत्र- जैसे ऑटोमोबाइल, फार्मा, केमिकल्स, मेटल्स, सीमेंट, रबर, इलेक्ट्रिकल मशीनरी आदि से जुड़ी नौकरियों में बहुत कम वेतन मिलता है। चीन में कृषि क्षेत्र से निर्माण क्षेत्र की ओर जैसा ट्रांजिशन हुआ था, वैसा भारत में होना अभी तक शेष है। गांवों में रहने वाले करोड़ों भारतीयों को मैन्युफेक्चरिंग से अभी तक ऊंची आय वाली नौकरियां नहीं मिल सकी हैं।
आज देश के सामने सबसे बड़ी चुनौती युवाओं को रोजगार मुहैया कराना है। सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकोनॉमी के आंकड़े बताते हैं कि भारत की 90 करोड़ की कार्यक्षम आबादी का एक बड़ा हिस्सा तो नौकरियों की तलाश भी नहीं कर रहा है। महिलाओं की स्थिति और बुरी है। पात्र महिलाओं में से केवल 9 प्रतिशत ही काम कर रही हैं या काम की तलाश कर रही हैं। भारत की लेबर सहभागिता दर में गिरावट चिंता का सबब है। अगर भारत को अपनी जनसांख्यिकीय स्थिति का लाभ उठाना है तो उसे लेबर सहभागिता की स्थिति को सुधारने के साथ ही 2030 तक कृषि क्षेत्र के अलावा 9 करोड़ नई नौकरियों का भी सृजन करना होगा। यानी हमारे सामने सबसे बड़ी चुनौती बुनियादी ढांचे या फैक्टरियों की नहीं, बल्कि हमारी युवा आबादी को काम पर लगाने की है। 30 साल से कम आयु वाली 50 प्रतिशत आबादी का तब तक कोई लाभ नहीं मिलेगा, जब तक कि युवा आबादी को पर्याप्त शिक्षा और काम के लिए स्किल्स नहीं मिलेंगी।
Date:04-02-23
अमृतकाल में सहकारिता की अहम भूमिकाअमित शाह, ( लेखक केंद्रीय गृह और सहकारिता मंत्री हैं )
वित्तीय वर्ष 2023-24 के लिए पेश किए गए ‘अमृतकाल’ के प्रथम बजट ने विकसित भारत की आकांक्षाओं और संकल्प को पूरा करने के लिए बुनियादी ढांचे में पूंजीगत व्यय बढ़ाने, करों में कमी लाने और विवेकपूर्ण राजकोषीय प्रबंधन के माध्यम से व्यापक आर्थिक स्थिरता बनाए रखने की दिशा में एक मजबूत आधारशिला रखी है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के सक्षम और दूरदर्शी नेतृत्व में तैयार किया गया यह विकासोन्मुखी बजट न केवल भारत को दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में अपना स्थान बनाए रखने में मदद करेगा, बल्कि वैश्विक निराशा के वातावरण को भी बदलने में सहायक होगा। पहली बार ऐसा हुआ है कि बजट में बढ़ई, सुनार, कुम्हार और अन्य कामगारों की मेहनत के महत्व को समझते हुए उनके हित में प्रधानमंत्री विश्वकर्मा कौशल सम्मान योजना के तहत कई योजनाएं लाई गई हैं। समाज में इन वर्गों के महत्वपूर्ण योगदान को एक लंबे समय से समुचित सम्मान और मान्यता की दरकार थी, जिसे इस बजट में पूरी प्राथमिकता दी गई है।
प्रधानमंत्री मोदी ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था की रीढ़ सहकारिता क्षेत्र को सशक्त करने के लिए एक क्रांतिकारी निर्णय लेते हुए 2021 में सहकारिता मंत्रालय की स्थापना की। मेरा सौभाग्य है कि मुझे इस मंत्रालय का प्रभार दिया गया। इस बजट ने अनेक अनुकूल उपायों की घोषणा करके सहकारी क्षेत्र को एक आवश्यक बूस्टर खुराक प्रदान करने का काम किया है। बजट में एक ऐतिहासिक निर्णय लेते हुए विकेंद्रीकृत भंडारण क्षमता की स्थापना की घोषणा की गई है। यह दुनिया की सबसे बड़ी अनाज भंडारण सुविधा होगी। यह सहकारिता की दिशा और दशा बदलने वाला निर्णय है। नई सहकारी निर्माण समितियों के विकास को बढ़ावा देने के लिए बजट में 31 मार्च, 2024 से पहले कार्यरत समितियों पर 15 प्रतिशत की रियायती आयकर दर की घोषणा की गई है।
चीनी सहकारी मिलों को बहुप्रतीक्षित राहत देने का काम भी इस बजट में हुआ है। निर्धारण वर्ष 2016-17 से पहले गन्ना किसानों को किए गए भुगतान के दावों को अब ‘व्यय’ माना जाएगा। इससे चीनी सहकारी समितियों को लगभग 10,000 करोड़ रुपये की राहत मिलने की उम्मीद है। हालांकि सहकारी समितियां लंबे समय से हमारी अर्थव्यवस्था में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभा रही हैं, लेकिन उनकी उपस्थिति में महत्वपूर्ण क्षेत्रीय और भौगोलिक विविधताओं के कारण इनके लाभ पूरे देश को समानता से नहीं मिल पा रहे है। तेजी से बढ़ रहे सहकारी क्षेत्र को कुशल और प्रशिक्षित जनशक्ति की आपूर्ति के लिए एक ‘राष्ट्रीय सहकारी विश्वविद्यालय’ स्थापित करने का भी काम हो रहा है। हाल में सहकारिता मंत्रालय, इलेक्ट्रानिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय, नाबार्ड और सीएससी ई-गवर्नेंस सर्विसेज इंडिया लिमिटेड के बीच समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर हुआ है। यह समझौता ज्ञापन प्राथमिक कृषि क्रेडिट समितियों को कामन सर्विस सेंटर द्वारा दी जाने वाली सेवाएं प्रदान करने में समर्थ करेगा। जल्द ही प्राथमिक कृषि क्रेडिट समितियों को एफपीओ का दर्जा देने की पहल की जाएगी।
सरकार ने सहकारी क्षेत्र को और मजबूत करने के लिए कई नए कदमों की घोषणा की है। प्रधानमंत्री के दूरदर्शी नेतृत्व में केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा बहु-राज्य सहकारी समिति (एमएससीएस) अधिनियम, 2002 के तहत निर्यात, बीज और आर्गेनिक उत्पादों के लिए राष्ट्रीय स्तर की सहकारी समिति की स्थापना और विकास को मंजूरी देने का ऐतिहासिक निर्णय लिया गया है। सहकारी समितियां छोटे स्तर के उद्यमियों को उत्पादन लागत कम करने के लिए रियायती दरों पर कच्चे माल की खरीद में भी मदद करती हैं। साथ ही, वे उत्पादकों को बिक्री मूल्य में कटौती करने और उच्च बिक्री व लाभ सुनिश्चित करने में उनकी मदद करने के उद्देश्य से बिचौलियों को हटाकर उनके उत्पादों को सीधे उपभोक्ताओं को बेचने के लिए मंच भी प्रदान करती हैं। शहर-गांव के विभाजन को पाटने और आय सृजन के अवसर पैदा करने में सहकारी समितियों की महत्वपूर्ण भूमिका को भी कम करके नहीं आंका जा सकता। वे बड़े उद्योगों को महत्वपूर्ण कच्चे माल और मध्यवर्ती सामान उपलब्ध कराने के कारण अर्थव्यवस्था की चालक भी हैं और भारत के बढ़ते निर्यात बाजारों में अहम योगदानकर्ता भी। सहकारी समितियों की सफलता की तमाम कहानियां हैं। डेरी सहकारी समितियों ने देश में दुग्ध क्रांति की शुरुआत की, जिससे निकला अमूल आज प्रचलित नाम बन गया है। इसी तर्ज पर कुछ महिलाओं द्वारा शुरू किया गया लिज्जत पापड़ हर घर में पहुंच रहा है। इफ्को और कृभको आदि महत्वपूर्ण संस्थाओं ने देश में कृषि क्रांति लाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है। इसके अलावा, राज्य स्तर पर कई सहकारी समितियां, जैसे शहरी सहकारी बैंक, पैक्स, आवास और मत्स्य पालन सहित अन्य अनेक सहकारी समितियां, ग्रामीण क्षेत्रों में लोगों की सामाजिक-आर्थिक स्थिति में सुधार के लिए अथक प्रयास कर रही हैं।
आज देश की आधी से ज्यादा आबादी निर्माता, उपभोक्ता, वित्तीय पोषण या किसी न किसी अन्य रूप में सहकारिता से जुड़ी हुई है, जिसमें सहकारी समितियां पैक्स के माध्यम से देश के 70 प्रतिशत किसानों को कवर करती हैं। देश में 33 राज्य स्तरीय सहकारी बैंक, 363 जिला स्तरीय सहकारी बैंक और 63,000 पैक्स हैं। इसके अलावा, देश के 19 प्रतिशत कृषि वित्त का प्रबंध सहकारी समितियों के माध्यम से किया जाता है। साथ ही 35 प्रतिशत उर्वरक वितरण, 30 प्रतिशत उर्वरक उत्पादन, 40 प्रतिशत चीनी उत्पादन, 13 प्रतिशत गेहूं की खरीद और 20 प्रतिशत धान की खरीद केवल सहकारी समितियों द्वारा की जाती है। लगभग 500 सहकारी समितियों को जेएम पोर्टल में भी पंजीकृत किया गया है, जिससे वे 40 लाख से अधिक विक्रेताओं से खरीदारी कर सकें। जिस तरह मोदी जी ने ‘सहकार से समृद्धि’ के संकल्प के साथ हाल तक उपेक्षित रहीं सहकारी समितियों को देश के आर्थिक परिदृश्य में आगे लाने का काम किया है, उससे वे जल्द ही भारत के विकास इंजन की एक महत्वपूर्ण एवं अग्रणी कड़ी साबित होंगी।
Date:04-02-23
सवाल बनाम चुप्पीसंपादकीय
जब से अडाणी समूह को लेकर हिंडनबर्ग का सर्वेक्षण आया है, विपक्ष के निशाने पर सरकार आ गई है। विपक्षी दलों की मांग है कि इस मामले में सरकार जवाब दे। इस हंगामे के चलते संसद का बजट सत्र बार-बार स्थगित करना पड़ा। कामकाज बाधित रहे। हालांकि अडाणी समूह इस मामले में लगातार सफाई देने और अपनी स्थिति सुधारने में जुटा हुआ है, मगर शेयर बाजार में उसकी कंपनियों के शेयर लगातार नीचे की तरफ रुख किए हुए हैं। दुनिया के तीसरे नंबर के सबसे अमीर उद्यमी के पायदान से खिसक कर अडाणी शीर्ष बीस की सूची से भी नीचे चले गए हैं। ऐसे में भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर तरह-तरह की चिंताएं जताई जाने लगी हैं। सबसे अधिक भ्रम आम निवेशकों में फैला हुआ है, जिन्होंने विभिन्न सरकारी संस्थानों में पैसे निवेश किए हैं। इसलिए कि अडाणी की कंपनियों में सबसे अधिक पैसा सरकारी बैंकों और भारतीय जीवन बीमा निगम जैसे संस्थानों का लगा हुआ है। हिंडनबर्ग का कहना है कि अडाणी समूह ने धोखाधड़ी करके अपनी कंपनियों के लिए सरकारी बैंकों से कर्ज लिया है और उनके शेयरों की कीमतें गलत ढंग से बढ़ा-चढ़ा कर पेश की गई हैं, जबकि वास्तव में उनका मूल्य काफी कम है।
विपक्ष इसलिए सरकार पर हमलावर है कि उसका कहना है कि सरकार की सहमति से ही अडाणी समूह की कंपनियों को कर्ज दिए गए हैं। फिर यह कि जिन बैंकों ने कर्ज दिया, उन्होंने अडाणी समूह की कंपनियों की वास्तविक हैसियत का मूल्यांकन किए बिना आंख मूंद कर इतनी भारी रकम कैसे उनमें लगा दी। जीवन बीमा निगम ने भी किस आधार पर इतने बड़े पैमाने पर उसके शेयर खरीद लिए। फिर सवाल यह भी उठ रहा है कि प्रतिभूति बाजार में हुई गड़बड़ियों पर नजर रखने की जिम्मेदारी सेबी की है, वह कैसे और क्यों अपनी आंखें बंद किए बैठा रहा। अब भी जब अडाणी समूह की कंपनियों के शेयरों में भारी गिरावट देखी जा रही है, वह चुप्पी क्यों साधे हुए है। रिजर्व बैंक ने जरूर उन बैंकों से स्थिति रपट मांगी है, जिन्होंने अडाणी समूह की कंपनियों को कर्ज दिया है। मगर बहुत सारे लोगों को इस कार्रवाई पर भरोसा इसलिए नहीं हो रहा कि सरकार ने भी अभी तक चुप्पी साध रखी है। हालांकि शेयर बाजार में उथल-पुथल का असर कंपनियों की पूंजी और साख पर पड़ता है और इस बाजार के सटोरिए ऐसा खेल करते रहते हैं। मगर अडाणी समूह के शेयरों की गिरती कीमतों का मामला केवल इतना भर नहीं है। इसमें सरकार पर भी अंगुलियां उठ रही हैं कि उसी की सहमति से बैंकों ने नियम-कायदों को ताक पर रख कर कर्ज दिया।
अडाणी समूह की कंपनियों के शेयरों की कीमतें गिरने से उन निवेशकों की धड़कनें बढ़ गई हैं, जिन्होंने इनमें काफी पूंजी लगा रखी है। उन्हें चिंता है कि उनकी पूंजी कभी लौट भी पाएगी या नहीं। हालांकि अडाणी खुद निवेशकों को भरोसा दिला रहे हैं कि उनकी साख कमजोर नहीं हुई है और उनके खिलाफ साजिश रची गई है। मगर भ्रम और आशंकाओं के बादल छंट नहीं रहे। ऐसे में सरकार से चुप्पी तोड़ कर इस मामले में सीधा और व्यावहारिक हस्तक्षेप की अपेक्षा की जाती है। निवेशकों का भरोसा कायम रहना बहुत जरूरी है। फिर, इस मामले में चूंकि सरकार की साख भी दांव पर लगी है, इसलिए उसे निष्पक्षता का परिचय देना ही चाहिए। सरकार जितनी देर चुप्पी साधे रहेगी, विपक्ष को उसे घेरने का मौका मिलता रहेगा।
Date:04-02-23
अडानी की चिंतासंपादकीय
अडानी समूह से जुड़ा संकट थमने का नाम नहीं ले रहा है और समय के साथ चिंता बढ़ती जा रही है। न्यूयॉर्क से लंदन तक निवेशक व वित्तीय संस्थाएं इस समूह में निवेश से अब बचने लगी हैं और सभी को यही इंतजार है कि किसी ठोस जवाब या उपाय के साथ इस आर्थिक संकट का समाधान होगा। चूंकि मामला एक ऐसे उद्यमी से जुड़ा है, जो दुनिया का दूसरा सबसे अमीर व्यक्ति बन गया था, इसलिए दुनिया भर में चिंता स्वाभाविक है। इस संकट से पहले कभी देश की किसी भी कंपनी को ऐसे जूझना नहीं पड़ा था। 24 जनवरी को हिंडनबर्ग रिसर्च रिपोर्ट के सामने आने के बाद से ही अडानी समूह पर स्टॉक में हेरफेर और खाते में गड़बड़ी के आरोप लग रहे हैं, कंपनी को अपने बाजार मूल्य में 108 अरब डॉलर का नुकसान झेलना पड़ा है। इस समूह की लगभग सारी कंपनियों को लगातार नुकसान झेलना पड़ रहा है।
चूंकि हमारे यहां अर्थव्यवस्था भी राजनीति का विषय है, इसलिए विपक्षी राजनीतिक पार्टियां भी बहुत मुखर हैं। ज्यादातर विपक्षी पार्टियों ने यह तय कर लिया है कि संसद में इस मुद्दे पर सरकार को घेरना है। क्या सरकार विपक्ष को विश्वास में ले सकती है? वैसे सरकार का पक्ष यह है कि इससे उसका कोई लेना-देना नहीं है, और यह एक कंपनी का मामला है। हालांकि, भारतीय कॉरपोरेट की जो किरकिरी हो रही है, उसके प्रति सरकारी नियामक संस्थाओं को पूरी सजगता का परिचय देना चाहिए। अगर इस समूह को किसी द्वेष वश निशाना बनाया जा रहा है या अगर कोई भारतीय अमीर पश्चिमी देशों के ईष्यालुओं को चुभ रहा है, तो सरकारी संस्थाओं को भी सजग होकर मुकाबला करना चाहिए। कारोबार की दुनिया में नियम-कायदों का लाभ लेने का सबको हक है, लेकिन अगर कोई अनियमितता हुई है, तो स्वयं सरकारी संस्थाओं को आगे आकर समाधान करना चाहिए। पहले भी पूंजीपतियों के खिलाफ साजिश हुई है, शेयर बाजार में अफवाह फैलाकर किसी की पूंजी कम करने की साजिश लगातार होती ही रहती है। अभी भी हम गौर करें, तो अडानी कोई अकेले नहीं हैं, जिनकी पूंजी कम हो रही है। अनेक कंपनियों के साथ-साथ बैंकों की भी पूंजी घट रही है। भारत की सबसे तेज उभरती कंपनी का अगर भाव घटा है, तो देश के सबसे बड़े बैंक का भी भाव प्रभावित हुआ है। हिंडनबर्ग की रिपोर्ट आने के बाद से भारतीय स्टेट बैंक के शेयर 11 फीसदी टूट चुके हैं। जब बैंक को घाटा होगा, भारतीय जीवन बीमा निगम को नुकसान होगा, तो क्या आम लोग फायदे में रहेंगे?
सरकारी वित्त नियामक संस्थाओं और भारतीय रिजर्व बैंक को पूरी सजगता के साथ बैंकों को बचाने की कोशिश करनी चाहिए। निशाने पर आई कंपनी को भी हर वैध मदद मिलनी चाहिए। उन अधिकारियों को अचानक से पल्ला झाड़कर खडे़ नहीं हो जाना चाहिए, जो 24 जनवरी से पहले एक भारतीय अमीर को दुनिया का सबसे अमीर बनाने में लगे थे। वित्त की दुनिया में चालाकी गलत नहीं होती, लेकिन यह चालाकी तब अपराध सरीखी हो जाती है, जब किसी गरीब का नुकसान साबित हो जाता है। जब निशाने पर आई कंपनी ने आरोपों का खंडन किया है, तब उस पर सीधे अविश्वास करने के बजाय सही परख से काम लेना चाहिए। कोशिश करनी चाहिए कि यह भारतीय कंपनी भंवरजाल से जल्दी से जल्दी निकलकर देश के विकास में सहायक बने। विदेश में अगर पहले कहीं ऐसी स्थिति बनी है और तब कैसे विवाद सुलझा था, इससे भी सीखने में हर्ज नहीं है।
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04 February 2023
प्रश्न–396 – कटघरे में खड़ा सोशल मिडिया‘, इस विषय पर एक सारगर्भित निबंध लिखें। (1000-1200 शब्द)
Question–396 – Write a concise essay on the topic ‘Social media in the palisade’. (1000-1200 words)
नोट : इसका उत्तर आपको हमें नहीं भेजना है, यह आपके स्वयं के अभ्यास के लिए है।
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Date:03-02-23
Move Fast, RegulatorsAdani group crisis calls for incisive response from Sebi, RBI. Financial panic has a habit of spreading.TOI Editorials
The day after Adani Enterprises decided not to go ahead with its fully subscribed follow-on public offer (FPO), its shares closed lower by 27% at Rs 1,565. 30. It’s now around half the floor price of the FPO. In all, seven listed companies of the Adani group have lost more than $100 billion in market value since January 24. In the backdrop of these developments, India’s regulators and politicians swung into action. Parliament had to be adjourned over the issue. Separately, RBI has asked banks about their exposure to Adani firms, Sebi is also active and NSE has put some Adani firms under additional surveillance.
Indian conglomerates now have both business and financial links with overseas markets. One of the lessons of the 2008 global financial crisis is that these links can show up in unexpected ways far from the epicentre of the crisis. Adani group firms have raised debt overseas. Over the last few days, the price of some of the debt securities has fallen sharply. Consequently, as media reports indicate, some of the Adani group debt securities are no longer accepted as collateral for trading. The fallout of such an environment will be felt by the group’s firms as it’s bound to affect both the flow of credit and its cost. There’s also the risk that negative perceptions may impact other Indian firms that have raised debt abroad.
Conglomerates act as a link between different financial jurisdictions. Therefore, it’s unwise to assume that problems with Adani group’s overseas bonds won’t spill over to India. Spillovers across markets were a major aspect of the 2008 crisis – and American regulators were caught napping as money markets froze and then the panic spread across many types of financial markets in almost every geography. Indian regulators need to get on top of the Adani situation before election season politicking leads to unintended consequences. Panic undermines financial stability. The longer this plays out at a political level, the greater the risk of ill-conceived interventions to neutralise the fallout. The situation is as much a test of regulatory ability as it is of the future of the Adani group.
Date:03-02-23
A shot for scienceMore funding for research must be met with easing of bureaucratic procedures.Editorial
The Budget speech in the year preceding a general election is usually one that seeks to appease as wide a swathe of society as possible. It follows that ministries that fund the bulk of research and development (R&D) too would see a healthy jump in allocation. The Ministry of Science & Technology has received an allocation of ₹16,361.42 crore this year, on paper an impressive 15% increase from the previous estimate. However, between 2021-22 and 2022-23, the Ministry had seen a 3.9% decrease. The bulk of the hike has gone to the Department of Science and Technology (DST) — ₹7,931.05 crore, up 32.1% from last year. It was ₹2,683.86 crore for the Department of Biotechnology, or DBT (a nominal hike of 3.9%), and ₹5,746.51 crore (1.9%) for the Department of Scientific and Industrial Research (DSIR). The Deep Ocean mission — which includes among other components developing a deep-submersible vehicle — and the National Research Foundation have got substantially higher hikes than in previous years, a sign that they are the Centre’s immediate focus.
There were multiple references in the Budget speech for investing in dedicated centres for excellence in ‘Artificial intelligence’ research, initiatives to scale up technology to produce laboratory-made diamonds and a centre for research in sickle cell anaemia. While all of these efforts could be spread out across multiple arms of government, none of the budgetary allocations suggests a significant scale up of basic research. As with previous governments, this government too has not succeeded in increasing the percentage of spend on research and development to beyond 1% of GDP. While different countries define R&D spends variously, a rule of thumb suggests that developed and technologically advanced countries spend over 2% of their GDP on R&D, and India, according to a 2022 estimate by the Global Innovation Index, continues to hover around 0.7% despite being among the world’s largest producers of scientific literature. While funds are not the only challenge to research and development in India, the lack of significant raises across departments shows that the absorptive capacity of scientific institutions in the country is limited. A major challenge continues to be research scholars not getting promised funds on time and the wait for the quality equipment required by researchers, continuing to be mired in a maze of bureaucratic whimsy. The bulk of research continues to be funded by government and the participation of the private sector has grown only incrementally. In the next few years, the government must not only increase the size of the funding pie but also ease the procedures to make the most efficient use of it.
Date:03-02-23
Fire and iceLadakh and its people need the urgent attention of the government.Editorial
Picturesque Ladakh has been on edge ever since it was carved out as a Union Territory (UT) from the erstwhile State of Jammu and Kashmir in 2019. After a brief period of jubilation over the status of a separate UT, a long-pending demand from Buddhists of the region, the locals have only grown restive. An agitation demanding the inclusion of the region in the Sixth Schedule under Article 244 of the Constitution (special protection to tribal populations) boiled over last week after Sonam Wangchuk, a Magsaysay winner, went on a fast. Soon after its creation as a UT in August 2019, Ladakh came under a bureaucracy that the local population found to be hostile and irresponsive. The constant tussle between locals, elected representatives of two Hill Councils of Kargil and Leh, and the bureaucracy only widened over the months. Leh’s political and religious bodies formed the Leh Apex Body (LAB) in 2020, headed by former BJP leader and former Member of Parliament Thupstan Chhewang (he is also an elected president of the influential Ladakh Buddhist Association). In Kargil district, political parties, including the National Conference and the Congress, and Shia Muslim-affiliated seminaries joined hands in November 2020 to form the Kargil Democratic Alliance (KDA). Kargil, unlike Leh, is for re-joining with the erstwhile J&K State and restoration of its special status under Article 370.
Despite the differences in their political stands, LAB and the KDA are now together over common goals. They have put forth four major demands before the Centre, which include restoration of full-fledged Statehood, constitutional safeguards under the Sixth Schedule, separate Lok Sabha seats for Leh and Kargil districts and job reservation for locals. They describe the demands as key to protecting Ladakh’s identity, culture and the fragile environment. The Centre appears to be in a bind as the two committees it appointed to reassure the local populations have made little headway in the last two years. In fact the second committee appointed this year under Minister of State for Home Nityanand Rai has only deepened local anger, as it has no mandate to address the issues being raised. Ladakh witnessed a major military incursion from China in 2020, just 10 months after J&K’s special status was scrapped and the erstwhile State divided. That conflict remains unresolved. In the absence of drastic measures to assuage the locals by meeting their genuine demands, the region will only remain embroiled to the advantage of those intent on fomenting trouble.
Date:03-02-23
अच्छी योजनाएं भ्रष्टाचार की शिकार हो जाती हैंसंपादकीय
जन-कल्याण की तमाम केन्द्रीय योजनाएं अमल के स्तर पर राज्यों के अकर्मण्य या भ्रष्ट अधिकारियों की शिकार हो जाती हैं। पूर्व के एक राज्य में ‘एसी’ लगी आलीशान अट्टालिकाओं के मालिकों के नाम पीएम ग्रामीण आवास योजना के लाभार्थियों की सूची में हैं। इनमें से अधिकांश सत्ताधारी दल के कार्यकर्ता हैं या उनके रिश्तेदार कई अन्य घटनाओं में मनरेगा में भी गड़बड़ी की शिकायतें आम हैं। इस योजना में मजदूरों का शत-प्रतिशत भुगतान केंद्र करता है जबकि मटैरियल का 75% राज्य की सरकार ।सीधा मतलब है कि केंद्र की कई कल्याणकारी योजनाएं अपना लक्ष्य इसलिए हासिल नहीं कर पा रही हैं क्योंकि उनका अमल राज्य के अभिकरणों के हाथ में है और उनमें बैठे भ्रष्ट लोग या राजनीतिक उद्देश्य पूर्ति के लिए सत्ताधारी पार्टियां सुपात्र लोगों की जगह अपने लोगों को लाभ दे रही हैं। चूंकि केंद्र सरकार के पास अपनी ऐसी कोई भी एजेंसी नहीं होती जो देश भर के सुदूर गांवों में पात्रता के लिए चुनाव कर सके इसलिए उसे ब्लॉक या पंचायतों के भरोसे यह काम करना होता है। योजनाओं पर अमल भी राज्यों के भरोसे होता है। हाल में पीएम ने नए वर्ष के पहले सप्ताह में एस्पिरेशनल ब्लॉक्स प्रोग्राम लांच किया। इसके तहत ब्लॉकों को बेहद अभाव वाले गांवों में विकास के अनेक कार्यक्रमों को उनकी जरूरत के अनुरूप बनाकर पहुंचाने की जिम्मेदारी दी गई है। अवधारणा अच्छी है बशर्ते इसे निष्ठा से अंजाम दिया जाए।
Date:03-02-23
शहरों की सुधसंपादकीय
आम बजट में शहरी निकायों को आत्मनिर्भर बनाने की पहल यह तो बताती है कि केंद्र सरकार शहरों की दशा सुधारने के लिए प्रतिबद्ध है, लेकिन बात तब बनेगी, जब राज्य सरकारें भी यह समझेंगी कि शहरीकरण पर उन्हें भी ध्यान देने की आवश्यकता है। आम बजट और इसके पहले आर्थिक सर्वे में सरकार ने यह जो आवश्यकता रेखांकित की कि शहरी निकायों को अपनी क्षमता बढ़ानी होगी, उसकी पूर्ति तब तक संभव नहीं, जब तक राज्य सरकारें अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभाने के लिए आगे नहीं आतीं। केंद्र सरकार की तरह राज्य सरकारों को यह समझना होगा कि देश के समुचित और तेज विकास के लिए शहरों को संवारना आवश्यक है। यह काम केवल इसलिए नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि शहरी जीवन का स्तर सुधारने की जरूरत है, बल्कि इसलिए भी किया जाना चाहिए, क्योंकि शहर अर्थव्यवस्था को गति प्रदान करते हैं। अपने देश में कस्बे शहरों में और नगर महानगरों में तो परिवर्तित हो रहे हैं, लेकिन उनमें सुविधाओं का स्तर नहीं सुधर पा रहा है। भले ही शहरीकरण की बातें खूब होती हों, लेकिन हमारे छोटे-बड़े शहर दुर्दशाग्रस्त ही अधिक हैं। जिन सुविधाओं की आस में लोग शहरों में बसना पसंद करते हैं, वे कठिनाई से ही उपलब्ध हो पाती हैं। इसका कारण है शहरों का अनियोजित और अनियंत्रित विकास। बेतरतीब विकास शहरी जीवन को कष्टकर बनाने के साथ ही उनकी छवि भी बिगाड़ता है।
शहरों की दुर्दशा के लिए मुख्यतः स्थानीय निकाय जिम्मेदार हैं। शहरों को संवारना उनकी प्राथमिकता में मुश्किल से ही शामिल होता है। आम तौर पर शहरी निकाय दलगत राजनीति, लालफीताशाही और भ्रष्टाचार का अखाड़ा बनकर रह गए हैं। यह अच्छा है कि आम बजट में शहरों में सुविधाएं बढ़ाने के लिए दस हजार करोड़ रुपये के आवंटन के साथ दूसरी और तीसरी श्रेणी के शहरों के विकास के लिए अर्बन इन्फ्रा डेवलपमेंट फंड की स्थापना की गई है, लेकिन शहरों की जैसी स्थिति है, उसे देखते हुए यह पर्याप्त नहीं। इन स्थितियों में यह आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य है कि शहरी निकाय आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनें। इसके लिए एक तो उन्हें संपत्ति कर सही तरह से एकत्र करना होगा और दूसरे उपलब्ध कराई जाने वाली सुविधाओं का समुचित शुल्क वसूलना होगा। इसमें सफलता तब मिलेगी, जब इनके एवज में अपेक्षित सुविधाएं उपलब्ध कराई जाएंगी। जब शहरी निकाय ऐसा करने में सक्षम होंगे तभी शहरी लोग उनकी ओर से जारी किए जाने वाले म्युनिसिपल बांड की ओर आकर्षित होंगे। यह ठीक है कि केंद्र सरकार यह चाह रही है कि शहरी निकाय अपना खर्च स्वयं जुटाने में सक्षम हों, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि देश में ऐसे शहरी निकायों की संख्या 50 से भी कम है, जिनकी आर्थिक स्थिति ठीक है। स्पष्ट है कि इसे लेकर राज्य सरकारों को भी चिंता करनी होगी।
Date:03-02-23
विपक्ष का दबाव बढ़ासंपादकीय
अडाणी इंटरप्राइजेज ने अपने 20 हजार करोड़ रुपये के अनुवर्ती सार्वजनिक निर्गम (एफपीओ) को मंगलवार को पूर्ण अभिदान मिल जाने के बावजूद बुधवार को इसे वापस लेने की घोषणा करके सबको चौंका दिया। कंपनी ने घोषणा की कि निवेशकों के पैसे जल्द लौटाएगी। इस बीच, इस मसले पर लोक सभा में बृहस्पतिवार को भारी शोर-शराबे के बीच एक बार कार्य स्थगन हुआ और उसके बाद दुबारा भी कामकाज में व्यवधान पड़ने पर सदन की कार्यवाही दिन भर के लिए स्थगित कर दी गई। सदस्य मांग कर रहे थे कि समूह के खिलाफ आई हिंडनबर्ग की रिपोर्ट के आलोक में संसद या सुप्रीम कोर्ट की समिति से जांच कराई जाए। इस बीच, भारतीय रिजर्व बैंक ने बैंकों से समूह को दिए गए ऋण संबंधी रिपोर्ट तलब की है। गौरतलब है कि हिँडनबर्ग की रिपोर्ट के बाद कंपनी के शेयरों में अप्रत्याशित गिरावट शुरू हो गई। इसके बावजूद अडाणी इंटरप्राइजेज के एफपीओ का भारी स्वागत हुआ। चेयरमैन गौतम अडाणी ने निर्गम को मिले रिस्पांस को अपने कारोबार में निवेशकों का विश्वास करार देते हुए निवेशकों का आभार जताया और उसके बाद सूचित किया कि कंपनी के निदेशक मंडल ने असाधारण परिस्थितियों के मद्देनजर फैसला किया है कि एफपीओ पर आगे बढ़ना नैतिक रूप से ठीक नहीं होगा। पिछले हफ्ते अमेरिकी रिसर्च फर्म हिंडनबर्ग ने अपनी रिपोर्ट में अडाणी समूह पर कारोबारी अनियमितताओं के आरोप लगाए थे। उसके बाद से कंपनी के शेयरों ने गिरावट का रुख अख्तियार कर लिया। गिरावट का यह रुख बुधवार को भी जारी रहा। पिछले पांच कारोबारी सत्रों में अडाणी समूह कंपनियों का सामूहिक पूंजीकरण सात लाख करोड़ रुपये घट गया है। इसके अध्यक्ष गौतम अडाणी को रिपोर्ट से जोरदार झटका लगा है। वह एक सप्ताह पहले फोर्ब्स की अरबपतियों की सूची में दुनिया के तीसरे सबसे धनी व्यक्ति थे, लेकिन बुधवार को फिसल कर 15वें स्थान पर पहुंच गए। अडाणी इंटरप्राइजेज के एफपीओ के तहत 4.55 करोड़ शेयरों की पेशकश की गई थी जबकि इस पर 4.62 करोड़ शेयरों के लिए आवेदन मिले। पात्र संस्थागत खरीदारों के खंड के 1.28 करोड़ शेयरों पर पूर्ण अभिदान मिला। बहरहाल, अभी विवाद थमता नजर नहीं आ रहा। सरकार पर विपक्ष का दबाव आने वाले दिनों में बढ़ना तय है।
Date:03-02-23
यात्रा का निहितार्थसंपादकीय
राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल की अमेरिका यात्रा दोनों देशों के बीच रणनीतिक साझेदारी को और अधिक मजबूत बनाने की दिशा में महत्त्वपूर्ण मानी जा सकती है। इस यात्रा के दौरान उन्होंने वहां के शीर्ष अधिकारियों के साथ विभिन्न द्विपक्षीय मुद्दों पर बातचीत की। अमेरिका के रक्षा मंत्रालय के प्रवक्ता इरिक योहान ने बताया कि अमेरिकी उप रक्षा मंत्री डॉ. कैथलीन हिक्स और अजित डोभाल के बीच द्विपक्षीय सैन्य सहयोग को और अधिक मजबूत बनाने को लेकर बातचीत हुई। पिछले साल मई में प्रधानमंत्री मोदी और अमेरिका के राष्ट्रपति जो बाइडेन की मुलाकात जापान में क्वाड शिखर सम्मेलन के दौरान हुई थी। दोनों नेताओं के बीच आपसी रक्षा सहयोग बढ़ाने पर सहमति हुई थी। अमेरिका ही नहीं भारत भी चीन की अवांछित गतिविधियों से परेशान है। हिंद प्रशांत क्षेत्र में चीन की बढ़ती गतिविधियों को अमेरिका सीमित करना चाहता है। जाहिर है डोभाल और डॉ. हिक्स के बीच चीन की गतिविधियों को लेकर साझा रणनीति बनाने पर भी अवश्य ही चर्चा हुई होगी। अमेरिका में चीन को लेकर रणनीतिकारों और सैन्य विशेषज्ञों की दो राय हैं। एक वर्ग का मानना है कि चीन को नियंत्रित करने के लिए दूरगामी रणनीति बनानी चाहिए। इसके लिए सहयोगी देशों का गठबंधन बनाना चाहिए। इसी के मद्देनजर गैर-सैनिक गठबंधन क्वाड और सैन्य गठबंधन ऑकस तैयार किया गया है। डॉ. हिक्स ने डोभाल से हुई इस मुलाकात में भी इस बात का जिक्र करते हुए कहा है कि हमारे लिए गठबंधन और साझेदारी का निर्माण करना सर्वोच्च प्राथमिकता है। लेकिन अमेरिका के सैनिक विशेषज्ञों के दूसरे वर्ग का मानना है कि यदि चीन वास्तव में सबसे बड़ा खतरा है तो उससे बिना देरी किए निपटना होगा। 10-15 साल बाद चीन विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाला देश बन जाएगा और उसकी सैन्य क्षमता में भी काफी बढ़ोतरी हो चुकी होगी। उस समय चीन को परास्त करना कठिन होगा। डॉ. हिक्स के बयानों से संकेत मिल रहा है कि अमेरिका फिलहाल पहले विकल्प को ही आगे बढ़ाते हुए चल रहा है। दक्षिण चीन सागर स्थित विभिन्न देशों के साथ भी चीन के गाढ़े मतभेद हैं। अभी मंगलवार को ही चीन के बीस से ज्यादा लड़ाकू विमानों ने ताइवान स्ट्रेट में दोनों देशों को विभाजित करने वाली सीमा रेखा को पार किया। बहरहाल, डोभाल की इस यात्रा से भारत-अमेरिका के बीच द्विपक्षीय संबंधों को मजबूती मिलेगी।
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जलवायु परिवर्तन के खतरों में वैश्विक स्तर पर भारत का स्थान पांचवां है। यह देश को पारिस्थितिकी रूप से कमजोर देशों की सूची में ले आता है। हाल ही में जोशीमठ के कुछ हिस्सों से निवासियों की आपातकालीन निकासी देश के संवेदनशील हिस्सों के लिए डिजाइन की गई बुनियादी सुविधाओं और निर्माण योजनाओं के पुनर्विचार को प्रेरित करती है।
आर्थिक और मानवीय नुकसान की इस चेतावनी को कुछ बिंदुओं में देखने का प्रयत्न करते हैं .
इसका कारण है कि समय के साथ आउटपुट और एक अतिरिक्त यूनिट के उत्पादन की गिरती कीमत कम होते उत्सर्जन के सापेक्ष हो गई है। इसके चलते भारत में भी अब पारिस्थितिकी अनुकूल विकास कार्यों की उम्मीद की जा सकती है।
इस कदम के लिए सबसे पहले सरकारों को खुद का डेटाबेस बनाना चाहिए। इसके अनुसार ही सरकार के विभिन्न स्तरों पर नीति निर्माण में ग्रीन जीडीपी के प्रसार का प्रयत्न करना चाहिए। इस प्रकार के ठोस प्रयासों से शायद हम जोशीमठ एवं अन्य संवेदनशील क्षेत्रों में आने वाली आपदाओं को नियंत्रित कर पाएंगे।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 10 जनवरी, 2023
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Date:02-02-23
A Budget without a vision for agricultureDespite the adverse factors in agriculture, the government has cut food and fertilizer subsidies and allotted little for animal husbandry, dairy and fisheriesR. Ramakumar is Professor at the Tata Institute of Social Sciences, Mumbai
Globally, there is a twin crisis in agriculture: in food and in fertilizers. On the one hand, there are fears of a fall in the global production and availability of food. The rise in food inflation has been an area of serious concern for the government and the Reserve Bank of India. On the other, global fertilizer prices have risen by about 200% over the past two years. Consequently, the prices of fertilizers and other farm chemicals in India have also shot up.
Domestically, the Union government has the unenviable task of explaining why it failed to double the real incomes of farmers between 2015 and 2022. Official data show that real incomes from cultivation have fallen in absolute terms after 2015. Between 2020-21 and 2022-23, annual growth rates in agriculture and allied sectors have been stagnant between 3% and 3.5%. Agricultural exports have risen, but the impact of this has been insignificant outside a handful of commodities.
Thus, the objectives of the Budget could be formulated as two-fold: one, it must have protected farmers and consumers from the food and fertilizer crises; and two, it must have taken steps to raise net incomes from cultivation.
Disappointing allocations
It was widely expected that food and fertilizer subsidies would be retained or increased. The restructuring of the food distribution guidelines, which effectively ended a part of the free supply of food grains under the Pradhan Mantri Garib Kalyan Anna Yojana, was a disappointment even prior to the Budget. The Budget has reaffirmed that stance and cut food subsidy from ₹2.87 lakh crore in 2022-23 (RE) to ₹1.97 lakh crore in 2023-24 (BE). Fertilizer subsidies have also been cut from ₹2.25 lakh crore to ₹1.75 lakh crore. In effect, these cuts will expose farmers to the vagaries of the global market and render the economics of agriculture more fragile. Landless households in rural areas are also likely to be affected adversely, as the allocation for the Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Scheme has been cut from ₹73,000 crore in 2022-23 (BE) to ₹60,000 crore in 2023-24 (BE).
The cut in fertilizer subsidies will increase the costs of cultivation for farmers, but there is no amelioration to be expected from a compensatory rise in output prices. The rise in minimum support prices between 2020-21 and 2021-22 just covered for the rise in input costs and did not leave any space for higher net incomes.
There has been no solace on the production front too. Yields in agriculture remain low. Rising fertilizer prices have led to lower consumption of fertilizers in farms, leading to imbalanced nutrient application and even poorer prospects of yield rise. The government, on the other hand, has been promoting variants of “natural farming”. The Budget has even allocated ₹459 crore to a new National Mission on Natural Farming. But natural farming has no scientific validation and is likely to reduce crop yields by 25-30%. If yields fall, how can farming stay viable in the face of rising input prices and stagnant output prices?
Capital expenditure
Amidst all the talk of raising capital expenditure, agriculture presents us with a story of utter neglect. Capital investment is required in agriculture not just for irrigation but also to build/improve agricultural markets (mandis). The total capex of the government in 2022-23 was ₹7.5 lakh crore, but allocation under the capital accounts of crop husbandry, animal husbandry, dairy and fisheries was just ₹119 crore. In 2023-24, this is expected to fall to ₹84.3 crore. Under the capital account of irrigation and flood control, the budgeted allocation in 2022-23 was only ₹350 crore, which is slated to fall to ₹325 crore in 2023-24. The Agriculture Infrastructure Fund (AIF) is another much-touted scheme. The budgeted allocation for AIF in 2022-23 was ₹500 crore, of which only ₹150 crore was spent. In 2023-24, the allocation of ₹500 crore has been retained.
The Finance Minister made a series of other announcements on agriculture in her speech, but the allocations for these schemes or scheme components are not listed in the Budget documents. Essentially, all these are fragmented allocations thinly spread across diverse departments with only an indirect or marginal impact on the agricultural sector. Good examples are the Agriculture Accelerator Fund, PM-Pranam, GOBARdhan, Bhartiya Prakritik Kheti Bio-Input Resource Centres, Mishti, and Amrit Dharohar. There was much time spent in the speech on millets too, but without any explicit allocation other than in upgrading a Centre for Excellence in Hyderabad. There was yet another announcement on a targeted investment of ₹6,000 crore under the Pradhan Mantri Matsya Sampada Yojana, but the actual increase in allocation in the Budget papers is only ₹ 121 crore.
The Budget fails to address the most pressing problems in Indian agriculture. The lack of a scientific and grounded vision, which must have ideally driven the quantum and direction of allocations, is telling.
Date:02-02-23
घरेलू इकोनॉमी को मजबूत बनाने पर ज्यादा फोकस रहाडॉ. पूनम गुप्ता, ( डायरेक्टर जनरल, एनसीएईआर )
वित्त वर्ष 2023-24 का आम बजट घरेलू उपभोग पर विकास के मुख्य इंजिन की तरह फोकस करता है। दूसरे क्रम पर सार्वजनिक निवेश को रखा गया है। यहां महत्वपूर्ण बात यह है कि बजट ने इतना ही समर्थन निजी निवेश या निर्यातों को नहीं दिया है। उन्हें आर्थिक विकास या रोजगार निर्माण के लिए उत्प्रेरक नहीं समझा गया है। घरेलू मांग के प्रति सरकार का उत्साही समर्थन वाजिब और न्यायोचित है। क्योंकि आज भारत की कुल जीडीपी का 55 प्रतिशत हिस्सा घरेलू उपभोग का है। बीते एक दशक में इसने 7 प्रतिशत की औसत विकास दर दर्ज की है। बजट में महत्वपूर्ण राजकोषीय समर्थन कृषि, ग्रामीण अर्थव्यवस्था, घरेलू पर्यटन को दिया गया वहीं नेट इनकम टैक्स के बोझ को कम किया गया है। इससे घरेलू मांग में बूम आने की सम्भावना है।
बीते तीन सालों में बजट में जो महत्वपूर्ण बदलाव देखा गया था, वह मौजूदा बजट में भी जारी रहा है। और वह है केंद्र सरकार के पूंजीगत व्यय में भारी बढ़ोतरी | 2019-20 में यह जीडीपी का 1.7 प्रतिशत था, जो इस वर्ष बढ़कर 2.7 प्रतिशत हो गया है। अगले साल के बजट में यह बढ़कर 3.3 प्रतिशत हो जाएगा। जब सरकार पूंजीगत व्यय बढ़ाती है तो विभिन्न संसाधनों के द्वारा वित्तपोषण मिलता है, इससे विकास- वृद्धि में मदद मिल सकती है। दूसरी तरफ अगर यह बढ़ोतरी राजकोषीय घाटे को बढ़ाकर की जाती है तो इससे निजी बचतों के लिए निजी क्षेत्र से प्रतिस्पर्धा निर्मित होती है और परिणामस्वरूप वे इससे दूरी बना सकते हैं।
राजकोषीय एकीकरण की ओर बढ़ते हुए पूंजीगत व्यय में इजाफा करने का प्रस्ताव राजस्व व्यय पर निर्भर करता है। इसके बावजूद अतीत में राजस्व व्यय प्राप्त करना कठिन रहा है। मिसाल के तौर पर, पिछले साल के बजट में राजस्व व्यय को लगभग समतल बनाए रखने का प्रस्ताव रखा गया था, लेकिन अब नए अनुमानों में इनमें 8 प्रतिशत की बढ़ोतरी बताई जा रही है। इससे दो सम्भावनाएं सामने आती हैं। एक, राजकोषीय घाटा बढ़ाते हुए पूंजीगत व्यय में वृद्धि की जाएगी। दो, पूंजीगत व्यय बजट में आवंटित राशि से कम रह जाएंगे और इससे विकास को अपेक्षित प्रोत्साहन नहीं मिल सकेगा। जो भी हो, केंद्र और राज्य दोनों के ही द्वारा सार्वजनिक निवेश भारत की जीडीपी का एक छोटा हिस्सा रहे हैं। बीते दशक में यह औसतन जीडीपी का 7 प्रतिशत ही रहे थे। इसकी तुलना में निजी निवेश इससे तीन गुना अधिक है। निजी निवेश और निर्यात मिलकर जीडीपी का 40 प्रतिशत हिस्सा हैं। लेकिन बजट में विकास के इन दो महत्वपूर्ण उत्प्रेरकों के लिए कोई स्पष्ट नीतिगत निर्देशन या सहायता नहीं प्रदान की गई है।
कुछ उदाहरण देखिए । भारत के अधिक औद्योगीकरण और सेवा क्षेत्र की वैल्यू चेन में प्रगति के लिए कौशल विकास अत्यंत आवश्यक है। इसके अलावा विशेषकर उम्रदराज हो रही विकसित अर्थव्यवस्थाओं को स्किल्स का निर्यात करना भी विकास को बढ़ावा देने वाला हो सकता है। बजट में विभिन्न लक्षित योजनाओं के माध्यम से कौशल- विकास को प्राथमिकता दी गई है। लेकिन अभी यह स्पष्ट नहीं है कि इस उद्यम में निजी क्षेत्र का कैसे लाभ उठाया जाएगा या शोध एवं विकास को बढ़ाने के साथ ही पर्यटन क्षेत्र को कैसे विकसित किया जाएगा। एक और उदाहरण है वर्ष 2021-22 के आम बजट में दिए गए प्रस्तावों पर किसी तरह के फॉलो-अप्स की अनुपस्थिति। बजट विकास के लिए महत्वपूर्ण क्षेत्रों, जिनमें बैंकिंग भी शामिल हैं, में निजी क्षेत्र की सहभागिता बढ़ाने के लिए कोई रोडमैप नहीं मुहैया कराता है।
एक और क्षेत्र जिसकी स्पष्ट उपेक्षा की गई है, वह है प्राइवेट इक्विटी और वेंचर कैपिटलिस्टों के लिए एक इकोसिस्टम को बढ़ावा देना। 2021-22 के बजट में नोट किया गया था कि गत वर्ष वेंचर कैपिटल और प्राइवेट इक्विटी ने 5.5 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का निवेश किया था, जिससे स्टार्ट-अप के इकोसिस्टम को बढ़ावा मिला। इसी तरह प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को देश में आकृष्ट करने के लिए भी ताजा प्रयास नहीं किए गए हैं। जबकि पूर्वी एशिया को मैन्युफेक्चरिंग हब बनाने में विदेशी निवेश का ही हाथ रहा है, क्योंकि विदेशी निवेशक अपने साथ पूंजी, तकनीक और वैश्विक बाजारों तक पहुंच लेकर आते हैं।
Date:02-02-23
वंचितों को प्राथमिकता में रखती सरकारहर्ष वर्धन त्रिपाठी, (वरिष्ठ पत्रकार)
वितमंत्री निर्मला संतारमण का यह पांचवां आम बजट था, लेकिन अमृत काल का पहला । इस लिहाज से इस बजट को अधिक बारीकी से देखने की आवश्यकता है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी बार-बार अमृत काल को भारत के लिहाज से सर्वाधिक अवसरों वाला समय बता रहे हैं। ऐसे में अमृत काल में आया यह पहला बजट क्या बता रहा है ? प्रधानमंत्री मोदी ने इसे एक ऐसा बजट बताया, जो विकसित भारत की पक्की बुनियाद रखने जा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि यह बजट बंचितों-गरीबों को प्राथमिकता दे रहा है कमाल की बात यह भी है कि पारंपरिक संदर्भों में बंचितों- गरीबों का बजट कहने का सीधा सा अर्थ यहाँ होता था कि सरकार ढेर सारी लौक लुभावन योजनाओं को प्रस्तुत कर रही है, लेकिन बजट में नई कर प्रणाली में कर छूट की सीमा पांच लाख से सीधे क सात लाख रुपये वार्षिक करने के अलावा कोई भी दूसरी लोक लुभावन पेजना नहीं दिखती। फिर प्रधानमंत्री मोठे इसे विकसित भारत की पक्की बुनियाद के साथ वंचितों-गरीबों का बजट क्यों कह रहे हैं? इसे समझने के लिए वित्त मंत्री के बजट की शुरुआत को ठीक से सुनना होगा। निर्मला सीतारमण ने बजट शुरू करते प्राथमिकताएँ गिनाई और इसे सप्तर्षि का नाम दिया। ये सात प्राथमिकताएं हैं- समावेरी विकास, अंतिम व्यक्ति तक पहुँच, ईफ्रास्ट्रक्चर एवं इन्वेस्टमेंट, अपनी क्षमता को विकसित करना, हरित विकास को बढ़ाना, युवा शक्ति और वित्तीय क्षेत्र को प्रोत्साहन ये सात 月 प्राथमिकताएं अमृत काल के पच्चीस वर्षों में देश को परिवर्तित करके कैसे दि विकासशील से विकसित करने वाली हैं? इस का बजट है, जिसे वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने प्रस्तुत किया है।
मोदी सरकार के पहले बजट के बाद से अब तक कर सीमा में छूट नहीं दी गई थी। लंबे समय से ढाई लाख रुपये सालाना पर टिकी कर छूट को बढ़ाने का दबाव हर बजट में रहता था। इससे पहले नि सरकार ने नई और पुरानी कर प्रणाली वि में इस तरह से परिवर्तन किया कि लोग के धीरे-धीरे नई कर प्रणाली का हिस्सा बन जाएं, लेकिन मध्यम वर्ग के लिए घर के खरीदने से लेकर दूसरे ढेर सारे जरूरी खर्ची पर किसी तरह की छूट न होने से नई कर प्रणाली को बहुत कम लोगों ने चुना। इस बजट में नई कर प्रणाली में त सीधे सात लाख रुपये वार्षिक कमाई के पर कर छूट देकर निर्मला सीतारमण ने स स्पष्ट कर दिया कि बेहतर होगा, अब लोग इसी को चुनें। सात लाख तक की कमाई वालों का शून्य कर करके मोदी सरकार ने लंबे समय से मध्यम वर्ग की मांग भी मान ली और सात लाख तक की कमाई वाला एक वर्ग तैयार किया, जो राजनीतिक तौर पर भी उपयोगी हो सकता हैं। सरकार ने प्रधानमंत्री आवास योजना मैं बजट आवंटन 66 प्रतिशत बढ़ाकर 79 हजार करोड़ रुपये कर दिया है। दरअसल सरकार अब नहीं चाहती है कि बेतहाशा और बेतरतीब घरों को बनाने का काम बिल्डर करें। बेहद जरूरतमंद लोगों को सरकार प्रधानमंत्री आवास योजना में घर बनाकर देगी और लोगों को उनकी जरूरत के लिहाज से ही घर खरीदने के लिए प्रेरित करेगी। सिर्फ कर छूट के लिए दूसरा घर लेने वालों को हतोत्साहित करना भी सरकार के लक्ष्य के तौर पर दिख रहा है। इससे देश के हर छोटे- बड़े शहर में बिल्डरों के बेतरतीब बनते रियल एस्टेट प्रोजेक्ट पर रोक लगाने की कोशिश भी साफ दिखती है। सरकार ने 80 करोड़ लोगों को राशन देने की योजना पहले ही एक और वर्ष के लिए बढ़ा दी है। बहुत दबाव के बावजूद किसान सम्मान निधि न बढ़ाने का साहसिक निर्णय सरकार ने लिया और किसानों को विकास के रास्ते पर तेजी से आगे बढ़ाने के लिए एग्रीकल्चर एक्सेलरेटर फंड का एलान किया है। सरकार ने पूंजीगत व्यय के लिए आवंटन इस वर्ष के बजट में 33 प्रतिशत बढ़ाकर दस लाख करोड़ का रखा है। रेलवे के लिए किया गया बजट आवंटन भी बुनियादी ढांचे को तेजी से तैयार करने की मंशा दिखा रहा है। रेलवे के लिए दो लाख चालीस हजार करोड़ रुपये का आवंटन मनमोहन सरकार के आखिरी बजट से नौ गुना अधिक है। प्रधानमंत्री विश्वकर्मा कौशल सम्मान योजना एक तीर से दो शिकार जैसा हैं। रोजगार के लिए कुशल श्रमिकों को तैयार करने की मोदी सरकार की बुनियादी बात को ही यह आगे बढ़ाता है। साथ ही विश्वकर्मा नाम से यह योजना शुरू करने से जाती विभाजन की राजनीति करने वाले विपक्षी दलों को भी उत्तर देने के लिए एक हथियार तैयार हो रहा है। विकसित भारत के लिए आवश्यक है कि युवाओं को रोजगार मिले और आधुनिक तकनीक के मामले में भी हमारे युवा अव्वल हों। एकलव्य विद्यालयों में 38 हजार शिक्षकों की भर्ती की बात उसी का उत्तर देने की कोशिश है। देश भर में कौशल विकास के लिए 30 भारत के अंतरराष्ट्रीय कौशल विकास केंद्र तैयार किए जाने की बात बजट में कही गई है। अमृत काल में अगले 25 वर्षों की तैयारी में बुनियादी ढांचे पर कितनी जबरदस्त कार्य योजना है, इसे इसी बात से समझा जा सकता है कि 45 लाख करोड़ रुपये के बजट में 13.30 लाख करोड़ रुपये का निवेश आधुनिक बुनियादी सुविधाएं तैयार करने पर होना है।
महिलाओं को अपने साथ लाने में नरेन्द्र मोदी पहले से बहुत योजनाबद्ध तरीके से आगे बढ़ते रहे हैं। तीन तलाक के खात्मे के बाद मुस्लिम महिलाएं भी मोदी के समर्थन में दिखीं। इसीलिए महिलाओं के स्व सहायता समूह को हर बार की तरह इस बार भी बढ़ावा दिया गया है । सुकन्या समृद्धि लड़कियों के बालिग होने तक थी तो इस बजट में सभी महिलाओं के लिए दो लाख रुपये तक बचत पर महिला सम्मान बचत पत्र के लिए जरिये साढ़े सात प्रतिशत ब्याज का प्रविधान किया गया है। सबसे बड़ी बात कि चुनावी साल के ठीक पहले का पूर्ण बजट होने के बावजूद मोदी सरकार वित्तीय अनुशासन को ध्यान में रखा है। अगले वर्ष वित्तीय घाटा 5.9 प्रतिशत और उसके अगले वर्ष 2025-26 में वित्तीय घाटे को 4.5 प्रतिशत के नीचे लाने का लक्ष्य भी सरकार की तरफ से आना बता रहा है कि यह बजट अमृत काल का पहला बजट भले हो, मोदी सरकार के पहले कार्यकाल के पहले बजट का ही स्वाभाविक विस्तार हैं।
Date:02-02-23
बचत नहीं निवेशसंपादकीय
वित्त मंत्री हर वर्ष केंद्रीय बजट की प्रस्तुति के बाद शुरुआती प्रतिक्रियाओं के प्रबंधन में सिद्धहस्त हो चुके हैं। इससे शेयर बाजारों और टीवी स्टूडियो में भी हल्काफुल्का उत्साह पैदा होता है और जब तक वह ठंडा होता है, लोग बजट के बारीक अध्ययन से निकले संदेशों की अनदेखी करके आगे बढ़ चुके होते हैं। निर्मला सीतारमण भी आय कर कटौती को लेकर उत्साह पैदा करके ऐसा करने में सफल रहीं। अगर विभिन्न कर रियायत योजनाओं को हटाए जाने का आकलन कर लिया जाए तो करदाताओं को उतना लाभ नहीं होगा जितना शुरू में घोषित किया गया था। वित्त मंत्री ने जहां कहा कि उन्हें 35,000 करोड़ रुपये की राजस्व हानि हुई है, वहीं अगले वर्ष के आयकर राजस्व में प्रतिशत वृद्धि का उनका अनुमान उतना ही है जितना कि कॉर्पोरेशन कर राजस्व के लिए यानी 10.5 प्रतिशत। ऐसे में देखा जाए तो व्यावहारिक तौर पर 2023-24 में राजकोष को कोई नुकसान नहीं होगा। बहरहाल, कर व्यवस्था में गंभीर खामी है और दुनिया में कुछ ही ऐसे देश हैं जहां कर रियायत की सीमा इतनी अधिक है।
आंकड़ों पर गौर किया जाए तो यह स्पष्ट हो जाता है कि जिस राजकोषीय सुधार की घोषणा की गई थी उसे एक महीना पहले ही अंजाम दिया गया जब कोविड के समय शुरू की गई नि:शुल्क खाद्यान्न आपूर्ति को बंद किया गया। इसके अलावा उर्वरक सब्सिडी में बचत के कारण ही घाटे में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) की तुलना में 0.5 फीसदी के बराबर कमी प्रस्तावित की जा सकी। संसद में बुधवार को पेश बजट में कोई अतिरिक्त राजकोषीय सुधार नहीं हुआ है। निश्चित तौर पर अब जबकि आर्थिक उत्पादन कोविड के झटके से उबर चुका है और आगे बढ़ रहा है तो यह समझना होगा कि घाटा 2019-20 के कोविड पूर्व के स्तर पर क्यों नहीं आया। तब यह जीडीपी का 4.6 फीसदी था और अगले वर्ष इसके 5.9 फीसदी रहने की बात कही गई है।
दरअसल सरकार बड़ा पूंजी निवेश कर रही है और गैर ब्याज राजस्व व्यय में कमी कर रही है। सार्वजनिक निवेश मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल की पहचान रहा है और पांच वर्षों में पूंजी आवंटन 150 फीसदी बढ़ा है। घाटे की भरपाई खपत से नहीं अधोसंरचना आदि में निवेश से ही होनी चाहिए। यानी घाटे को ऊंचा रखने की एक कीमत है जो बढ़ते ब्याज बिल में नजर आती है। सार्वजनिक ऋण भी बढ़ रहा है। घाटे को कम करने, ब्याज तथा सार्वजनिक ऋण को थामने के लिए पूंजीगत व्यय पर थोड़ा अंकुश लगाना होगा।
मिसाल के तौर पर अरसे बाद रेलवे के पूंजी आवंटन में भारी इजाफा स्वागतयोग्य है लेकिन यह पूंजी निवेश के लिए अधिशेष तैयार नहीं करता और पूरी तरह बजट समर्थन पर निर्भर है। माल भाड़े से आने वाले राजस्व का ज्यादातर हिस्सा कोयला, लोहा, अनाज सीमेंट आदि से आता है जबकि यात्री किराये में ज्यादा हिस्सा दूसरे दर्जे, शयनयान और तृतीय वातानुकूलित श्रेणी से आता है। वंदे भारत जैसी उच्च श्रेणी वाली ट्रेनों की नई श्रेणियों से अभी सार्थक आय होनी है।
सरकार का कहना है कि निजी निवेश के आने तक आर्थिक गति बढ़ाने के लिए उसका पूंजी निवेश आवश्यक है। बजट में राष्ट्रीय शिक्षा मिशन और प्रधानमंत्री आवास योजना का बजट बढ़ाया गया है लेकिन जल जीवन मिशन में सबसे अधिक बढ़ोतरी नजर आ रही है क्योंकि चालू वर्ष में बजट खर्च नहीं हो सकेगा। रक्षा क्षेत्र के आवंटन में मामूली इजाफा हुआ है जबकि प्रधानमंत्री स्वास्थ्य सुरक्षा योजना तथा ग्रामीण रोजगार गारंटी कार्यक्रम में कटौती हुई है। सूचना प्रौद्योगिकी और दूरसंचार में दिखाई गई उदारता पर कोई सवाल नहीं है लेकिन पूरी तस्वीर देखें तो थोड़ा संतुलन बेहतर होता।
सरकार को यह श्रेय दिया जाना चाहिए कि घाटे में फिर कटौती हुई और सार्वजनिक उधारी पर नियंत्रण रहा। इससे संसाधनों पर नियंत्रण बना रहेगा और निजी क्षेत्र के लिए अधिक पूंजी बचेगी। ब्याज दरें भी कम हो सकती हैं। इससे निजी निवेश और खपत बढ़ेगी तथा आर्थिक वृद्धि के मामले में हम औरों से बेहतर रहेंगे। इसके अलावा अगर कर राजस्व अनुमान से बेहतर होता है तो उसका इस्तेमाल घाटा कम करने में किया जा सकता है। उसे चुनाव पूर्व तोहफों में खर्च नहीं किया जाना चाहिए। 2025-26 तक के बाकी दो वर्षों में घाटे में 1.4 फीसदी कमी करने की जरूरत है तभी उस वर्ष 4.5 फीसदी का लक्ष्य हासिल होगा।
Date:02-02-23
समावेशी विकास पर बलसंपादकीय
वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने बुधवार को आम बजट 2023-24 पेश किया । इसे अमृत काल में राह दिखाने वाली प्राथमिकताओं वाला बजट बताया और कहा कि यह ‘सप्तऋषि’ बजट है, जिसमें सात बातों को महत्त्व दिया गया है। प्राथमिकताओं में समावेशी वृद्धि, हरित विकास, युवा शक्ति, वित्तीय क्षेत्र, अंतिम छोर तक पहुंच, बुनियादी ढांचे का विकास और क्षमताओं का पूरा इस्तेमाल शामिल हैं। बजट नागरिकों के लिए अवसरों को सुविधाजनक बनाने, विकास और रोजगार सृजन करने के साथ व्यापक आर्थिक स्थिरता मजबूत करने पर केंद्रित है। कृषि स्टार्टअप के लिए कृषि त्वरित कोष स्थापित किया जाएगा। पशुपालन, डेयरी और मत्स्य पालन पर ध्यान देने के साथ कृषि ऋण लक्ष्य को बढ़ाकर 20 लाख करोड़ रुपये किया जाएगा। आयकर छूट की सीमा बढ़ाकर सात लाख
रुपये की गई है। महिला सम्मान बचत पत्र मार्च, 2025 तक उपलब्ध होगा जिसमें महिला या लड़की के नाम पर दो लाख रुपये तक का निवेश किया जा सकेगा। शहरी बुनियादी ढांचा विकास कोष के लिए हर साल 10,000 करोड़ रुपये खर्च किए जाएंगे। कर्मचारियों एवं पेंशनधारकों के लिए नई कर व्यवस्था में मानक कटौती को बढ़ाकर 52,500 रुपया करने का प्रस्ताव है। बजट प्रस्तावों को देखें तो यह संतुलित बजट है। हालांकि कुछ लोग इसे चुनावी बजट करार दे सकते हैं, लेकिन इसमें अर्थव्यवस्था को स्थिरता प्रदान करने पर तवज्जो है । सभी वर्गों का ध्यान रखा गया है। बजट रोजगार सृजन, आर्थिक विकास और निवेश को प्रोत्साहन देगा। पूंजीगत व्यय बढ़ाया गया है, हरित विकास की बात कही गई, मध्यम वर्ग को राहत दी गई है और आयकर स्लैब में राहत दी गई है। बजट में किसान, महिला, युवा, उद्योग सहित सभी वर्गों को कुछ न कुछ दिया गया है। अब मध्यम वर्ग से सरकार कम पैसे लेगी। इससे उनके पास डिस्पोजेबल इनकम बढ़ेगी और वे ज्यादा खर्च करने को तैयार होंगे जिससे मांग बढ़ेगी और फलस्वरूप अर्थव्यवस्था और ज्यादा मजबूत होगी। पर्यटन क्षेत्र के विकास पर तवज्जो दी गई है। इस कड़ी में पचास और पर्यटन केंद्र विकसित किए जाएंगे। तकनीकी को ज्यादा तवज्जो मिली है। ई-अदालतों के गठन और कमजोर आर्थिक पृष्ठभूमि वाले कैदियों को आर्थिक मदद, जमानत – जुमनि आदि के लिए, से जाहिर हो जाता है कि यह बजट आर्थिक समावेशी होने के साथ ही समाज के हर वर्ग की चिंता और सरोकार पर ध्यान देने वाला है।
Date:02-02-23
संतुलन की कोशिशसंपादकीय
आजाद भारत के अमृत काल का पहला बजट लगभग अपेक्षा के अनुरूप ही रहा है। सबसे अपनी दोस्ती, ना काहू से बैर के भाव के साथ इस बजट में चुनावी वर्ष की छाया भी साफ तौर पर महसूस हो रही है। वैश्विक मंदी और रूस-यूक्रेन युद्ध का अपना असर है, इसके बावजूद वित्त मंत्री ने अपनी सीमाओं के अंदर एक सकारात्मक भविष्योन्मुख बजट पेश किया है। कुछ योजनाओं को पूरा करने के लिए तीन साल से पांच साल तक का समय लिया गया है, मतलब सरकार अपनी घोषणाओं में किसी भी तरह के बड़बोलेपन से बचने में कामयाब रही है। आज के समय में अर्थव्यवस्था जिस मोड़ पर है, वहां किसी भी विशेष वर्ग को निशाने पर नहीं लिया जा सकता। एक ओर, जरूरतमंदों को राहत पहुंचाने के लिए विभिन्न मदों में बजट की बढ़ोतरी हुई है, वहीं बड़ी कंपनियों और निवेशकों की चिंता भी सरकार स्पष्ट रूप से कर रही है। कंपनियों और निवेशकों की तात्कालिक खुशी को इस बात से समझा जा सकता है कि बजट आते ही शेयर बाजार में बढ़त का क्रम दिखा। हालांकि, कुछ समय बाद गिरावट हुई, पर तब भी बाजार ने समग्रता में नुकसान का संकेत नहीं दिया। यह सरकार के लिए एक राहत की बात हो सकती है।
नौकरीपेशा लोगों के लिए आयकर स्लैब में वृद्धि एक खुशखबरी है। आयकर स्लैब को तार्किक बनाने की मांग विगत चार-पांच साल से ज्यादा हो रही थी, लेकिन आयकर वसूलने में सहजता की वजह से सरकार किसी नई रियायत के लिए तैयार नहीं थी। साल 2014 के बाद अब जो परिवर्तन हुआ है, उसके अनुसार, नई आयकर स्कीम को स्वीकार करने वाले लोगों को सात लाख वार्षिक आय पर अब आयकर भुगतान की जरूरत नहीं पड़ेगी। दूसरा परिवर्तन यह है कि यदि आप पुरानी आयकर स्कीम को नहीं चुनेंगे, तो आप पर स्वत: नई आयकर स्कीम लागू हो जाएगी। हालांकि, जिन लोगों की वार्षिक आय 15.5 लाख से ज्यादा है, उन्हें 30 प्रतिशत आयकर चुकाना पड़ेगा। संकेत स्पष्ट है कि पुरानी आयकर स्कीम की विदाई होने वाली है। इसका एक अर्थ यह भी है कि आयकर बचाने के लिए होने वाले निवेश में कमी आएगी। वैसे भी आयकर चुकाने वाले लोग ज्यादा नहीं हैं और जो सक्षम वर्ग है, वह आयकर बचाने में सबसे आगे रहता है। आयकर फॉर्म को सरल बनाने के साथ ही आयकर से जुड़े भ्रष्टाचार को खत्म करने के लिए भी ज्यादा सक्रिय होने की जरूरत है।
प्रधानमंत्री आवास योजना के बजट का 66 प्रतिशत बढ़ना उन गरीबों के लिए सुखद है, जिन्हें अभी तक घर नसीब नहीं हुआ है। एकलव्य विद्यालय के तहत आदिवासियों के विकास की पहल प्रशंसनीय है, तो महिलाओं के लिए विशेष बचत स्कीम व बचत बढ़ाने की अन्य कोशिशें भी सराहनीय हैं। बुनियादी ढांचे के विकास के लिए 10 लाख करोड़ रुपये का बजट, राज्यों को पचास साल के लिए ब्याज मुक्त ऋण देने का प्रस्ताव भी समयानुकल है। किसानों को राहत देने की कोशिश हुई है, तो सहकारिता में फिर प्राण फूंकने का इरादा भी जाहिर है। गांव और शहर के बीच यह बजट संतुलन साधने की कोशिश करता दिख रहा है। अर्थव्यवस्था में सुधार के लिए अभी भी बहुत गुंजाइश है, क्योंकि ज्यादातर पैसा उधार से ही आ रहा है। सर्वाधिक पैसा रक्षा पर खर्च हो रहा है। सरकार ने शिक्षा और स्वास्थ्य का बजट बढ़ाया है, लेकिन अभी और की उम्मीद है।
Date:02-02-23
सबको कुछ न कुछ देता जिम्मेदार बजटएन के सिंह, ( पूर्व सांसद और पूर्व केंद्रीय सचिव)
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने आम चुनावों से पहले का केंद्र सरकार का अंतिम पूर्ण बजट संसद में पेश कर दिया और उस पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी टिप्पणी की है। इस बजट के छह-सात विशेष पहलू हैं और दो शब्दों में कहें, तो यह रिस्पॉन्सिव (तत्पर) और रिस्पॉन्सिबल ( जिम्मेदार) बजट है। रिस्पॉन्सिव या तत्पर इसलिए कि मुझे ऐसे किसी बजट की याद नहीं, जिसने समाज के सभी वर्गों को कुछ न कुछ लाभ दिया हो । अनुमान नहीं था कि बजट 2023-24 ऐसे व्यापक रूप से सभी पक्षों के लिए इतना सकारात्मक होगा। उदाहरण के लिए, कृषि क्षेत्र, जिस पर बल दिया गया है कि कृषि विकास में तकनीक का कैसे प्रयोग बढ़ाया जाए, कृषि उत्पादन में कैसे वृद्धि लाई जाए। महिला, युवा, ग्रामीण शिल्पकार, लघु-मध्यम उद्योग, मध्यम वर्ग इत्यादि पहलुओं पर गौर किया गया है, तभी इसे रिस्पॉन्सिव बजट कह रहा हूं।
आज विकास की इच्छा एक वास्तविकता है। केंद्र सरकार अभी सिर्फ 6.5 प्रतिशत की विकास दर लेकर चल रही है। सरकार 6.8 या 7 प्रतिशत का लक्ष्य लेकर भी चल सकती थी। इससे जीडीपी व टैक्स भी बढ़ता, राजकोषीय घाटे को कम करने में सहूलियत होती, पर सरकार ने ऐसा नहीं किया। जितने भी गैर-बजटीय उधार हैं, सबको पारदर्शिता से पेश किया। सरकार टैक्स अनुमान भी बढ़ा सकती थी, लेकिन उसने ऐसा नहीं किया, ताकि लोगों को ऐसा न लगे कि सरकार अवास्तविक लक्ष्य रखकर चल रही है।
सरकार ने दूरगामी आर्थिक स्थिरता को ध्यान में रखते हुए फैसले लिए हैं। विकास और महंगाई, दोनों के प्रति उसने उत्तरदायी होने का परिचय दिया है। युवा और रोजगार वृद्धि इत्यादि पर ध्यान दिया गया है। सरकार का जोर स्वयं सहायता समूहों पर भी है। इससे आने वाले दिनों में विशेष रूप से महिला रोजगार में ज्यादा वृद्धि होगी। ग्रामीण शिल्पकार एक उपेक्षित वर्ग रहा है, जिसे विश्वकर्मा कहा गया है। पर्यटन की दिशा में भी नई पहल हुई है। मैं वर्षों से कहता रहा हूं कि भारत में पर्यटन में जो असीम क्षमता है, उसके एक प्रतिशत का भी हमने अभी तक उपयोग नहीं किया है। कई ऐसे छोटे देश हैं, जिनकी पूरी अर्थव्यवस्था ही पर्यटन पर चलती है। सरकार ने पचास पर्यटन केंद्र विकसित करने की घोषणा की है। हरित विकास या हरित हाइड्रोजन, हरित ऊर्जा प्रसारण, ऊर्जा भंडारण, कृषि में हरित व्यवहार, हरित ऋण पर जो व्यय की घोषणा हुई है, उससे भारत के विकास को प्रोत्साहन मिलेगा।
स्वास्थ्य क्षेत्र की बात करें, तो मानव संसाधन का अभाव रहा है। वित्त मंत्री ने 157 नर्सिंग कॉलेज खोलने की घोषणा की है, ये सभी कॉलेज अस्पतालों से जुड़े रहेंगे। एलायड सर्विसेज का जो कानून सरकारने पारित किया है, उसका लाभ स्वास्थ्य क्षेत्र, उसमें भी जो ग्रामीण स्वास्थ्य क्षेत्र, प्राथमिक स्वास्थ्य क्षेत्र, पालिका स्वास्थ्य क्षेत्र को मिलेगा । यह बहुत जरूरी है। महामारी अपनी जगह है, पर इन स्वास्थ्य केंद्रों को युद्ध स्तर पर सुधारने की जरूरत है, मैंने भी पंद्रहवें वित्त आयोग के अध्यक्ष के नाते ऐसे प्रस्ताव दिए थे। एलायड सर्विसेज या नर्सों की जो प्रतिभा क्षमता हमारे पास होगी, उसका उपयोग स्वास्थ्य तंत्र को सुधारने पर किया जाएगा। सरकार ने इस ओर कदम बढ़ा दिए हैं। आईसीएमआर लैब और फार्मा ट्रांजिशन भी इस बजट के दो महत्वपूर्ण पक्ष हैं। शिक्षक प्रशिक्षण सुधारने के लिए भी बजट में और बल दिया गया है।
एक और खास पहलू है पूंजीगत व्यय, इससे विकास को चार गुना मदद मिलती है। इसके लिए सकल घरेलू उत्पाद का 3.3 प्रतिशत खर्च करने का लक्ष्य रखा गया है। इसका सीधा लाभ मूलभूत ढांचे की गुणवत्ता पर होगा और कार्य क्षमता, निर्यात व रोजगार में वृद्धि होगी।
ईज ऑफ डुइंग बिजनेस अर्थात व्यवसाय में सुविधा पर भी ध्यान दिया गया है। कहा जाता है, भारत में मुक्त अर्थव्यवस्था तो है, लेकिन व्यवसाय करना आसान नहीं है। जो दस्तावेजी औपचारिकताएं हैं, उनको कम करने और प्रक्रियाओं के गैर- अपराधीकरण पर जोर दिया गया है।
बजट पर कई लोगों के बयान मैंने देख हैं कि तेलंगाना के लिए कुछ नहीं है, कई अन्य राज्यों के लिए कुछ नहीं है। देखिए, यह राज्यों का बजट नहीं है, यह केंद्र का बजट है। अच्छी बात है, सरकार पंद्रहवें वित्त आयोग की सिफारिशों को लागू करती जा रही है। वैसे कोई जरूरी नहीं था कि राज्यों को फिर 1.3 लाख करोड़ रुपये पचास साल तक के लिए बिना ब्याज ऋण स्वरूप दिए जाते। राज्यों के पास बहुत सी ऐसी वित्त क्षमता है, जिसका उपयोग नहीं हुआ है, क्योंकि उन्हें जो पहले उधार का प्रस्ताव दिया गया था, उसका ही उन्होंने पूरी तरह इस्तेमाल नहीं किया है। अब राज्यों को जो अतिरिक्त धन प्राप्त हो सकता है, उसका भरपूर सदुपयोग उन्हें करना चाहिए।
यह एक अद्भुत बजट है, जिसमें कराधान को और सरल करने की कोशिश हुई है। अप्रत्यक्ष कर संग्रह में भारी वृद्धि हुई है। वैसे अभी भी टैक्स स्लैब पर काम करना चाहिए। स्लैब कम करने की जरूरत है। जीएसटी में भी बदलाव की जरूरत है। जहां तक प्रत्यक्ष कर की बात है, तो स्लैब कम कर दिया है, टैक्स दर में भी कमी हुई है। लोगों के पास खर्च के लिए ज्यादा राशि होगी, जिससे अर्थव्यवस्था को ही प्रोत्साहन मिलेगा।
आगामी चुनावों को देखते हुए सरकार के पास यह मौका था कि वह कुछ मुफ्त योजनाओं की घोषणा कर सकती थी, लेकिन सरकार ने रेवड़ी बांटने से बचते हुए एक विकासोन्मुखी जिम्मेदार बजट पेश किया।
संक्षेप में कहूं, तो आम लोगों को इस बजट से तीन चीजें मिली हैं- नौकरी के साधन, पूंजीगत व्यय का इसमें बड़ा योगदान रहेगा। पूंजीगत व्यय से आम आदमी को और बेहतर बुनियादी सुविधाएं मिलेंगी । शिक्षा और स्वास्थ्य क्षेत्र में भी लाभ मिलेगा। दूसरा, महिलाओं, अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति को फायदा होगा। तीसरा, टैक्स में लाभ मिलेगा, इससे आम लोगों की आय भी बढ़ेगी और उनका खर्च भी बढ़ेगा।
वैसे सरकारों का यह विरासती अधिकार है। उन्हें किसी घोषणा के लिए बजट का इंतजार नहीं करना पड़ता है, पर इस बजट के बाद ऐसा लगता नहीं है कि सरकारको अतिरिक्त घोषणा की जरूरत पड़ेगी। संभव है, अगले वर्ष वह लेखानुदान की घोषणा न करते हुए कुछ घोषणाएं करे, पर फिलहाल ऐसा लगता नहीं है।
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देश में भ्रष्टाचार की लड़ाई बहुत समय से चली आ रही है। हाल ही में उच्चतम न्यायालय ने इस लगातार चलने वाली लड़ाई में तेजी लाने के लिए भ्रष्टाचार के मामलों में आवश्यक साक्ष्य की जरूरत में कमी कर दी है। ऐसा नहीं है कि सर्वोच्च न्यायालय ने पहली बार ऐसा कोई निर्णय दिया है। लेकिन न्यायालय के लगातार प्रयासों के बावजूद सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार कम नहीं हो सका है। संविधान पीठ के इस निर्णय से शायद कुछ कमी आ सके। कुछ बिंदु –
भ्रष्टाचार से लड़ाई के दो पहलू हैं : कानून की गंभीरता और उसका अनुप्रयोग। अक्सर ही हमारे कानूनों को और सख्त बनाने के पक्ष में आवाज उठाई जाती है, ताकि गलत काम करने वालों को सजा मिल सके। लेकिन ऐसे कठोर कानून से समस्या का निवारण एक सीमा तक ही संभव हो पाता है। जन शक्ति की ताकत ऐसा हथियार है, जो सार्वजनिक जीवन को साफ-सुथरा बनाने में मदद कर सकता है। दोनों ही पहलू समान रूप से महत्वपूर्ण हैं।
न्यायालय के इस निर्णय से भ्रष्टाचार का चेहरा बदलेगा या नहीं, यह कहा नहीं जा सकता है। लेकिन इसका यह मतलब नहीं है कि हमें लड़ाई छोड़ देनी चाहिए।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित आरण्केण्राघवन के लेख पर आधारित। 10 जनवरी, 2023
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Date:01-02-23
We Can’t Do Without Plastic, Make It SafeET Editorials
Plastic is all around us. It’s part of our daily lives, often inside us without our knowledge. The ubiquitous nature of plastic has meant the world consumes and discards immense quantities of this wonder material. So much so, plastic pollution is now a global concern. Unlike many other substances, such as fossil fuels, we have come to rely on, plastics cannot be completely phased out. What is needed is betterplastics, bettermanagement of plastic waste, and reduction of unnecessary use of plastic. Plastics need not be the enemy. Global exhibitions such as Plastindia 2023 that starts today in Delhi must provide the platform for the industry to transform, innovate and work together to address the global challenge that our runaway reliance on plastics has created.
The plastics industry employs more than 4 million people and comprises more than 20,000 processing units, 80-90% of which are SMEs. In 2020, India’s plastics market was worth $36. 07 billion. Its revenue is expected to grow at 6. 6% CAGR till 2027, to about $56. 42 billion. It is a major export. In FY2020, plastic exports stood at $7. 05 billion. Experts say demand and consumption are expected to grow at about twice the rate of India’s economy.
Despite its growth prospects, the industry faces labour shortages, more so with cutting-edge expertise. Dissemination of hi-tech among SMEs is another concern. As is the roughly 9. 4 million tonnes of plastic waste generated annually in India, of which about 60% is recycled and the rest is left uncollected, littered or dumped in landfills. The plastics industry needs to find a sustainable pathway. That is what the world as well as India need.
Date:01-02-23
पारंपरिक कौशल को मिले प्रोत्साहनसुरेश प्रभु और पार्थो कर, ( सुरेश प्रभु पूर्व रेल एवं वाणिज्य मंत्री और ऋषि हुड विश्वविद्यालय के कुलाधिपति हैं तथा पार्थो कर अर्थशास्त्री एवं कारीगर आजीविका विशेषज्ञ हैं )
वर्ष 1600-1700 के दौरान वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद में भारत की हिस्सेदारी 25 से 30 प्रतिशत के बीच थी। तब भारत एक बड़ी विनिर्माण अर्थव्यवस्था थी, जिसमें कपड़ों, मसालों और नील इत्यादि का उत्पादन शामिल था। ये सब बुनकरों, किसानों और कारीगरों द्वारा उत्पादित किए जाते थे। भारत के शहरों और गांवों में आज भी ऐसे उत्कृष्ट कारीगरों की संख्या बहुत अधिक है, जो पारंपरिक कौशल को पीढ़ी दर पीढ़ी आगे ले जा रहे हैं। आज जब रोजगार का सृजन हमारे लिए एक चुनौती से कम नहीं है, तब यदि हम विनिर्माण करना चाहते हैं तो हमें अपनी जड़ों की ओर लौटना होगा। चूंकि पारंपरिक कौशल से जुड़े उत्पादों का एक बड़ा बाजार है, अतः हमें इनके उत्पादन पर ध्यान देना होगा। यह आने वाले समय में बहुत लाभदायक सिद्ध होगा। वंशानुगत कौशल के दम पर आजीविका के अधिक अवसरों का सृजन किया जा सकता है, जबकि इसमें बहुत कम पूंजीगत व्यय की आवश्यकता होती है। इसके लिए सरकार द्वारा कारीगरों को कार्यशील पूंजी, बाजार से जुड़ाव, आधुनिक उत्पाद डिजाइन के साथ कारीगरों की मदद, ब्रांडिंग और उन्हें बड़ी वैश्विक आपूर्ति शृंखला का हिस्सा बनने में मदद करने की पहल की जानी चाहिए। यदि इस क्षेत्र को बढ़ावा दिया जाए तो लोगों को गांवों में भी रोजगार मिल सकेगा, जिससे शहरों पर दबाव कम करने में मदद मिलेगी। इस क्षेत्र के उत्थान के लिए एक योजनाबद्ध रणनीति की आवश्यकता है। यदि इन उत्पादों को आकर्षक ढंग से पैक किया जाए और इनकी ब्रांडिंग की जाए, तो इसका प्रभाव अद्भुत होगा।
समस्या आधारभूत ढांचे या कौशल की कमी की नहीं, बल्कि डिजाइन, बाजार से जुड़ाव, ब्रांडिंग, उत्पाद विकास और नकदी प्रवाह आदि से संबंधित है। छोटे ग्रामीण उद्यमियों के लिए आनलाइन प्लेटफार्म तक पहुंचना अव्यावहारिक है। उनके लिए 25 प्रतिशत या अधिक रिटर्न का हिसाब देना लगभग मुश्किल है। इस प्रक्रिया में नकदी प्रवाह असंभव हो जाता है। इन कारीगरों को एक स्थिर खरीदार खोजने की आवश्यकता होगी, जो उन्हें डिजाइन तथा वितरण कार्यक्रम उपलब्ध कराएगा ताकि वे उचित नकदी प्रवाह के साथ गुणवत्ता वाले उत्पादों के उत्पादन पर ध्यान केंद्रित कर सकें। प्रारंभिक स्तर पर राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उत्पादों को बढ़ावा देने के लिए सरकारी हस्तक्षेप की जरूरत होगी। ग्राहकों में इन उत्पादों के प्रति जागरूकता बढ़ाई जाए, जिससे उनकी इन उत्पादों के प्रति रुचि जाग्रत हो सके। विश्व स्तर पर यह बहुत प्रभावी होगा, क्योंकि कम संसाधनों के साथ बड़े स्तर पर उत्पादन किया जाना सभी के लिए आश्चर्य का विषय होगा। स्थानीय आपूर्ति शृंखला विशेष रूप से गांवों में छोटे स्थानीय वितरकों तथा रिटेलर्स को बढ़ावा देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
भारत सरकार द्वारा प्रचारित की जा रही डिजिटल बैंकिंग प्रणाली आधारभूत स्तर पर बड़े पैमाने पर वाणिज्यिक लेन-देन की सुविधा प्रदान करेगी। वन प्वाइंट सेलिंग कांटैक्ट इन कारीगरों को व्यावसायिक रूप से अधिक कुशल बनाने एवं आजीविका के नए अवसर उपलब्ध कराके जीवन को बेहतर बनाने में सहायता प्रदान करेगा। इन कारीगरों को बड़ी आपूर्ति शृंखला का हिस्सा बनने के लिए कम से कम पांच वर्ष तक सहायता की आवश्यकता होगी। इन परियोजनाओं के लिए प्रारंभिक धन आंशिक रूप से कौशल विकास तथा मनरेगा बजट से आवंटित किया जा सकता है। कुछ राज्यों ने इस दिशा में कदम उठाए हैं। जैसे उत्तर प्रदेश सरकार ओडीओपी यानी एक जिला-एक उत्पाद नीति को बढ़ावा दे रही है। राज्य को आपूर्ति शृंखला तथा उत्पाद को डिजाइन करने एवं पैकेजिंग करने के लिए हस्तक्षेप की जरूरत है। इससे लाभ भी बढ़ेगा और कारीगर उत्पाद की गुणवत्ता तथा विनिर्माण पर ध्यान दे सकेंगे। नई सहकारी नीति अलग-अलग संगठनों तथा स्वयं सहायता समूहों के गठन और कार्यशैली में सुधार लाएंगी। महिलाएं इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएंगी। वे अपने घरों से ही इसमें भाग ले सकेंगी।
उत्तर प्रदेश में ‘टांडा जामदानी’ जैसे विस्मृत उत्पादों को पुनर्जीवित किया जा सकता है, जिसका पूरे भारत में बड़ा बाजार है। इन उत्पादों में भारत और विश्व के उपभोक्ताओं द्वारा उपभोग की जाने वाली अधिकांश वस्तुओं जैसे खाद्य उत्पाद, शिल्प, वस्त्र और सजावटी सामान इत्यादि को सम्मिलित किया जा सकता है। उत्पादों को बेहतर बनाने के लिए नई तकनीकों का प्रयोग किया जा सकता है। अधिकांश घरों में कांसे के बर्तनों का प्रयोग अब इसलिए नहीं किया जाता, क्योंकि उन्हें साफ करने में अधिक मेहनत और समय लगता है, परंतु आआइआइटी खड़गपुर ने एक नई तकनीक ईजाद की है, जिससे इन बर्तनों को साफ करना बहुत सरल हो गया है। कोविड काल के पश्चात हम सभी अच्छी तरह जान गए हैं कि कांसा हमारे लिए कितना उपयोगी है! बंगाल ने एक कारपोरेशन बनाकर रिटेल, मार्केटिंग चैनल्स तथा उत्पाद डिजाइन के निर्माण से उत्पादों को बढ़ावा देने की पहल की है। यह एक सफल माडल है, जिसका पूरे भारत में अनुकरण किया जा रहा है। यदि केंद्र तथा राज्य सरकारें एक हाइब्रिड संरचना का निर्माण करें और कारीगर आधारित माडल को बढ़ावा दें तो अगले पांच वर्षों में पांच करोड़ रोजगार सृजित किए जा सकते हैं और वंशानुगत कौशल का दोहन किया जा सकता है। इसके साथ ही हमारी उन परंपराओं और संस्कृति को कायम रखा जा सकता, जो विस्मृत होती जा रही हैं।
Date:01-02-23
वैज्ञानिक चेतना के अवरोधकअखिलेश आर्येंदु
भारत में हो रहे वैज्ञानिक शोधों और उनके उपयोग पर नजर दौड़ाएं, तो पाते हैं कि अभी विश्व में हमारी स्थिति एशिया में बहुत नीचे है। 2002 से 2007 तक अनुसंधान विकास में वैश्विक निवेश मात्र दो प्रतिशत के आसपास रहा। 2007 से 2015 तक इसमें मात्र एक प्रतिशत के आसपास वृद्धि हुई। वहीं अमेरिका में इस दौरान यानी 2002 से 2015 तक चालीस प्रतिशत से अधिक वैश्विक निवेश हुआ। इससे समझ सकते हैं कि भारत में विज्ञान के क्षेत्र में गैरसरकारी निवेश कितना कम हुआ। सरकारी निवेश की स्थिति तो और खराब है। आंकड़े बताते हैं कि 2010 तक विज्ञान के क्षेत्र में होने वाले अनुसंधानों के लिए जीडीपी का एक से दो प्रतिशत के बीच खर्च करने का प्रावधान रहा है। इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि केंद्र की सरकारें विज्ञान के प्रति कितना गंभीर हैं।
हां, केंद्र सरकार ने विज्ञान के क्षेत्र में गहन अनुसंधानों, वैज्ञानिकों और नई उपलब्धियों को प्रोत्साहित करने के लिए अनेक पुरस्कारों और सहयोगों को आगे बढ़ाने का काम बड़े पैमाने पर अवश्य किया है। इनमें ‘पोस्ट डाक्टरल रिसर्च’, व्यक्तिगत अनुसंधान सहायता और छात्रवृत्तियां, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दिए जाने वाले अनेक प्रोत्साहनों के अलावा महिलाओं के लिए ‘स्कालरशिप फार रिसर्च एंड बेसिक/अप्लायड साइंस’ जैसे प्रोत्साहन सम्मिलित हैं।
केंद्र सरकार भी मानती है कि वैज्ञानिक अनुसंधानों का लाभ आम आदमी तक ज्यादा से ज्यादा पहुंचाया जाना चाहिए। गौरतलब है कि बढ़ती आबादी और सामाजिक, शैक्षिक समस्याओं का समाधान आम आदमी तक वैज्ञानिक अनुसंधानों का लाभ पहुंचाए बगैर संभव नहीं है। भारत में विज्ञान शोध की प्रबल और प्राचीन परंपरा होने के बावजूद आजादी के बाद से ही विज्ञान के क्षेत्र में किए जाने वाले शोधों को कोई खास तवज्जो नहीं दी गई। 2012 के सर्वेक्षण के आंकड़े बताते हैं कि दस लाख निवासियों पर आज भी भारत में महज 137 शोधार्थी हैं, जबकि एशिया के अन्य देशों में औसतन 746 और ओसिनिया में 4,209 शोधार्थी हैं। इससे पता चलता है कि भारत में शोध कार्य और विज्ञान के प्रति लोगों का कैसा दृष्टिकोण रहा है।
आज भारत विश्व के सबसे तेज गति से जनसंख्या वृद्धि करने वाले देशों में पहले स्थान पर पहुंच चुका है। हम जल्दी ही चीन की जनसंख्या को पीछे छोड़ देंगे। मगर विज्ञान के क्षेत्र में चीन के मुकाबले हमारी स्थिति बहुत चिंताजनक है। चीन में दस लाख जनसंख्या पर शोधार्थियों की संख्या करीब तेरह सौ है। यानी शोध के मामले में चीन हमसे दस गुना आगे है। हम भले प्रगति और विकास का दम भरते न थकते हों, लेकिन हकीकत यह है कि विज्ञान के क्षेत्र में बहुत पीछे हैं। देश में आबादी के अनुपात में शोधार्थियों की संख्या नहीं बढ़ी है। इस मामले में हम छोटे से देश मैक्सिको से भी बहुत पीछे हैं।
2011 के सर्वेक्षण के मुताबिक विज्ञान के क्षेत्र में डाक्टरेट करने वाली साठ फीसद महिलाएं बेरोगार थीं। तबसे लेकर अब तक पिछले छह वर्षों में देश में शिक्षा के क्षेत्र में अनेक बदलाव आए हैं। यूपीए सरकार ने विज्ञान का लाभ आम आदमी तक पहुंचाने के लिए अनेक कदम उठाए थे, जिनमें विश्वविद्यालयों द्वारा कराए जा रहे विज्ञान के क्षेत्र में अनुसंधानों में सुधार करके उनका फायदा आम आदमी तक पहुंचाने के लिए योजनाओं में सुधार करना, विज्ञान के क्षेत्र में बजटीय आबंटन को बढ़ाना, निजी भागीदारी को प्रोत्साहित करना, लैंगिक असमानता को खत्म करना, रामानुज फेलोशिप और रामालिंगस्वामी फेलोशिप के जरिए देश से बाहर गए वैज्ञानिकों को प्रोत्साहित करना, ताकि वे भारत आकर अपना बेहतर योगदान दे सकें। साथ ही व्यक्तिगत अनुंसधान को और अधिक धन आबंटन करना और संभावित अन्य वैज्ञानिक शोधों के लिए छात्रों को प्रोत्साहित करना, अंतरराष्ट्रीय प्रोत्साहन के तहत मिलने वाले अनुदान और फेलोशिप को गांवों की विज्ञान प्रतिभाओं तक पहुंचाने के लिए कदम उठाना और पोस्ट डाक्टरेट रिसर्च के लिए सहायता पहुंचाने जैसे कदम शामिल थे।
दरअसल, भारत की प्रति व्यक्ति आय के औसत में ही बहुत बड़ी खामी है। एक तरफ पंचानबे प्रतिशत लोगों की बहुत कम आय है, वहीं प्रतिदिन हजारों और लाखों कमाने वाले हैं, उनकी आय को मिलाकर औसत निकालने की गलत परंपरा है। इस तरीके से कभी यह पता नहीं चलता कि वाकई भारत में प्रति व्यक्ति वास्तविक आय कितनी है। सरकार को इससे व्यक्ति के सामाजिक और शैक्षिक स्थिति की ठीक जानकारी नहीं हो पाती है। ऐसे में विज्ञान के शोध कार्यों का लाभ और उपयोग गांवों के आम आदमी तक नहीं पहुंच पाया है। जब तक ईमानदारी से गांवों की हालात, वहां की सामाजिक और शैक्षिक स्थिति का ठीक-ठीक आकलन नहीं किया जाता, तब तक वैज्ञानिक अनुसंधानों से निकले परिणामों का फायदा नहीं पहुंचाया जा सकता है।
भारतीय समाज आज भी अंधविश्वसों, पाखंडों और तमाम तरह की बुराइयों में फंसा हुआ है। वैज्ञानिक सिद्धांत, तर्क, विचार और कार्य ही उन्हें इनसे छुटकारा दिला सकते हैं। मगर समस्या यह है कि ज्यादातर वैज्ञानिक सिद्धांत, तर्क, विचार और कार्य आम आदमी तक पहुंच ही नहीं पाते हैं। मसलन, खानेपीने की चीजों को ही लीजिए। तुरंता आहार सेहत के लिए बेहद नुकसानदायक हैं, यह वैज्ञानिक परीक्षणों से साबित हो चुका है। फिर भी विज्ञापनों के मकड़जाल में फंसी जनता इसका इस्तेमाल करती है। इसी तरह देवी-देवताओं की मान्यता की वजह से समाज के अधिकांश लोग आज भी यह मानने के लिए तैयार नहीं हैं कि घटने वाली घटनाओं का कारण देवी-देवताओं का नाराज या खुश होना नहीं होता, बल्कि इसके पीछे वैज्ञानिक कारण होते हैं। गौरतलब है कि अंधविश्वास, पाखंड और बुराइयों की वजह से समाज में ऐसी अनेक समस्याएं पैदा होती रहती हैं, जो विकास के लिए बहुत नुकसानदेह हैं। एक आंकडे के मुताबिक अंधविश्वास, पाखंड, सामाजिक और धार्मिक बुराइयों, गलत प्रथाओं और अंधश्रद्धा के कारण भारत में हर साल पचास करोड़ से अधिक लोग किसी न किसी रूप में प्रभावित होते हैं और लाखों लोग भूत-प्रेत, पिचाश, जादू-टोना और ओझा-तांत्रिकों के मकड़जाल में फंस कर बीमारियों और असमय मौत का शिकार हो जाते हैं।
पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम वह दिन देखना चाहते, जब भारत में विज्ञान का लाभ आम आदमी तक पहुंचे और लोगों के जीवन स्तर में सुधार आए। उन्होंने इस बाबत अपने तर्इं कोशिशें भी खूब कीं, लेकिन हमारे शासन की कार्यशैली ही ऐसी है कि उनके प्रयासों को पंख नहीं लगने दिया गया।
देश में विज्ञान जागरूकता अभियान और विज्ञान जत्था ने पिछले तीस वर्षों में काफी कुछ सामाजिक और शैक्षिक समस्याओं को विज्ञान के नजरिए से दूर करने की कोशिश की है। इसी तरह अंधश्रद्धा निवारण समिति, महाराष्ट्र और वैज्ञानिक विचार अभियान जैसे संगठनों ने भी वैज्ञानिक शोधों के माध्यम से आम आदमी की सामाजिक और शैक्षिक समस्याओं को हल करने का प्रयास किए हैं। फिर भी लोगों में अभी वैसी जागरूकता नहीं आ पाई है, जिससे लोग अवैज्ञानिकता और अतार्किकता के भंवर जाल से निकल पाएं। आवश्कता इस बात की है कि अवैज्ञानिकता के कारणों को समझते हुए समाज के वैज्ञानिक दृष्टिकोण और विचार को आम आदमी तक पहुंचाने के लिए समाज के जागरूक और जिम्मेदार लोगों को आगे आना होगा और उन सामाजिक और शैक्षिक संस्थाओं को भी अपनी भूमिका सार्थक दिशा में निभानी होगी, जिससे लोगों में वैज्ञानिक दृष्टिकोण के प्रति जागरूकता बढ़े और लोग अंधविश्वास, पाखंड और बुराइयों से छूट कर बेहतर जीवन बसर कर सकें।
Date:01-02-23
आर्थिक सर्वे के संकेतसंपादकीय
साल 2023-24 के आम बजट के ठीक पहले आए आर्थिक सर्वेक्षण ने देश की अर्थव्यवस्था की जो तस्वीर पेश की है, वह राहत पहुंचाने वाली है। खासकर तब, जब विकसित देशों में आर्थिक मंदी के पदचाप सुनाई पड़ रहे हैं और इसे लेकर तमाम तरह की आशंकाएं जताई जा रही हैं। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण द्वारा लोकसभा में आर्थिक सर्वेक्षण पेश किए जाने के बाद मुख्य आर्थिक सलाहकार वी अनंत नागेश्वरन ने संवाददाताओं के समक्ष इसके ब्योरे रखते हुए एलान किया कि अर्थव्यवस्था कोरोना महामारी में हुए नुकसान से कमोबेश उबर चुकी है। निस्संदेह, यह एक सुखद घोषणा है और बाजारों व औद्योगिक इलाकों में लौट रही रौनक इसकी तस्दीक भी करती है। ऐसे में, आर्थिक सर्वे में आने वाले दिनों में खपत बढ़ने और घरेलू मांग की स्थिति के मजबूत होने को लेकर जो उम्मीद जताईर् गई है, वह निराधार नहीं दिख रही। सर्वे के मुताबिक, ‘वर्ल्ड कमोडिटी’ में कीमतें उतार पर हैं और इसका असर हमारी थोक मुद्रास्फीति में गिरावट के रूप में दिखा भी है। जाहिर है, आने वाले दिनों में इससे खुदरा महंगाई में भी कमी आने की आशा है। यह घरेलू मांग में वृद्धि के लिहाज से एक सकारात्मक संकेत है।
आर्थिक सर्वे ने कृषि क्षेत्र को लेकर जो तस्वीर पेश की है, वह भी उत्साह बढ़ाने वाला है। कृषि क्षेत्र में निजी निवेश में 9.3 प्रतिशत की बढ़ोतरी देखी गई है। इस क्षेत्र की मजबूती हमारे लिए कितनी जरूरी है, यह बताने की जरूरत नहीं है। महामारी ने शीशे की तरह साफ कर दिया है कि हमारी विशाल आबादी पिछले तीन वर्षों से हिचकोले खाती वैश्विक आर्थिकी के बीच यदि भर पेट भोजन कर सकी, तो इसमें हमारे कृषि क्षेत्र की भूमिका है। इसलिए देश के किसानों और खेतिहर मजदूरों के कल्याण को लेकर किसी किस्म का भ्रम नहीं होना चाहिए। सरकार को आने वाले दिनों में यह सुनिश्चित करना चाहिए कि देश की आर्थिक मजबूती का लाभ किसानों को भी मिले। चूंकि यह चुनावी साल है, इसलिए कयास लगाए जा रहे हैं कि सरकार आगामी बजट में पीएम किसान सम्मान निधि में रकम बढ़ा सकती है। ऐसा करके सरकार वाकई उनको राहत पहुंचाएगी।
हालांकि, रोजगार के मोर्चे पर यह आर्थिक सर्वे जो बातें करता है, उससे कोई बहुत खुशनुमा तस्वीर नहीं उभरती, अलबत्ता गंभीर चुनौतियां झांकती हैं। जनवरी 2023 तक लगभग पौने तीन करोड़ बेरोजगारों का ‘नेशनल करियर सर्विस पोर्टल’ के जरिये अपना पंजीकरण कराना इसकी एक बानगी भर है। इसमें कोई दोराय नहीं कि देश की अर्थव्यवस्था जब पटरी पर लौट आई है, तो वह रोजगार के अवसर भी जरूर पैदा करेगी, मगर दुर्योग से हाल के वर्षों में आर्थिक असंतुलन जिस तेजी से बढ़ा है, उससे रोजगार विहीन आर्थिक तरक्की को लेकर दुनिया भर के अर्थशा्त्रिरयों और हुकूमतों की पेशानी पर बल पड़ने लगे हैं। आर्थिक सर्वे के आंकड़ों को देखते हुए वित्त मंत्री से यह अपेक्षा की जाएगी कि वह अधिकाधिक रोजगार पैदा करने वाले सेक्टरों को अधिक तवज्जो दें। वैसे भी, भारत दुनिया का सबसे बड़ी युवा आबादी वाला देश है, तो उसे इस युवा शक्ति का लाभ जल्द मिलना भी चाहिए। यह अच्छी बात है कि वैश्विक रेटिंग एजेंसी मूडीज ने आगामी वित्त वर्ष में भारतीय अर्थव्यवस्था को लेकर यह कहा है कि यह जी-20 की सबसे तेज विकास दर वाली अर्थव्यवस्था होगी, तो इसका असर आम भारतीय की जेब पर भी दिखना चाहिए।
Date:01-02-23
लौटती मांग और मजबूती की आहटआलोक जोशी, ( वरिष्ठ पत्रकार )
बजट से एक दिन पहले संसद में आर्थिक सर्वेक्षण पेश किया गया। इसमें दावा किया गया है कि अर्थव्यवस्था पर महामारी का असर करीब-करीब खत्म हो चुका है। सर्वेक्षण के मुताबिक, चालू वित्त वर्ष में देश की अर्थव्यवस्था सात फीसदी बढ़ी है। रिजर्व बैंक का अनुमान था कि इस साल यह बढ़त 6.8 प्रतिशत हो सकती है। जाहिर है, यह उम्मीद से बेहतर स्थिति है। हालांकि यह अनुमान ही है, क्योंकि पूरा हिसाब लगना अभी बाकी है। केंद्र सरकार की भी चिंता यही है कि दुनिया के किसी कोने में कहीं कुछ ऐसा न हो जाए कि बनता हुआ खेल फिर बिगड़ जाए।
सर्वेक्षण के मुताबिक, अगले साल जीडीपी की बढ़ोतरी 6.5 प्रतिशत रह सकती है। कहा यह भी गया है कि यह बढ़त कुछ ऊपर-नीचे, यानी 6 से 6.8 प्रतिशत के बीच कहीं भी रह सकती है। दोनों ही सूरत में यह पिछले तीन साल में देश की तरक्की की सबसे धीमी रफ्तार होगी। मगर इस सरकार के पिछले चार साल का हिसाब जोड़ा जाए, तो जीडीपी में औसत बढ़ोतरी सालाना 3.2 प्रतिशत के हिसाब से हुई है। जो देश कुछ साल पहले 10 प्रतिशत से ऊपर की बढ़त का सपना देख रहा था, उसके लिए यह स्थिति बहुत आशाजनक नहीं है। चिंता की बात यह भी है कि साल 2019-20 में, यानी कोरोना से पूर्व भी वृद्धि दर 3.7 प्रतिशत थी, जो दिखाती है कि अर्थव्यवस्था की रफ्तार पर ब्रेक लगना कोरोना से पहले ही शुरू हो गया था।
आर्थिक सर्वे के साथ ही अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष, यानी आईएमएफ का वर्ल्ड इकोनॉमिक आउटलुक भी आया है, जिसमें कहा गया है कि भारत की जीडीपी ग्रोथ 2022 के 6.8 प्रतिशत से गिरकर 6.1 प्रतिशत हो जाएगी। मगर इस गिरावट के बावजूद भारत की तरक्की की रफ्तार दुनिया में सबसे तेज रहने वाली है। वित्त वर्ष 2023-24 के लिए आईएमएफ ने भी भारत की ग्रोथ का अनुमान 6.8 प्रतिशत रखा है। यहां आर्थिक सर्वेक्षण और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष लगभग एक राय रखते हैं। और यह तब है, जब दुनिया की आर्थिक वृद्धि की रफ्तार 3.4 प्रतिशत से गिरकर 2.9 फीसदी रह जाने का डर है।
आर्थिक सर्वेक्षण में कहा गया है कि भारत अब वापस तरक्की की उसी राह पर चलने को तैयार है, जहां वह महामारी से पहले था। इसमें इस बात पर जोर दिया गया है कि इस वर्ष भारत की अर्थव्यवस्था में जो मजबूती आई है, उसकी बड़ी वजह निजी खर्च और निजी क्षेत्र का पूंजी निवेश भी रहा। साल की पहली छमाही में निजी खपत का आंकड़ा 2015 के बाद सबसे ऊंचा रहा है। निजी निवेश बढ़ने से रोजगार बढ़ाने में मदद मिली है, जिसका सुबूत शहरों में बेरोजगारी कम होने और ईपीएफओ में पंजीकृत कामगारों की गिनती बढ़ने में मिलता है। इसके बावजूद सर्वे का कहना है कि निजी क्षेत्र को पूंजीगत निवेश, यानी नए कारखानों या स्थिर संपत्ति में निवेश बढ़ाकर अगली कतार की भूमिका निभानी होगी, ताकि रोजगार बढ़ाने का काम तेज हो सके। जहां तक ऐसी चीजों में सरकार के पैसे लगाने का सवाल है, तो सर्वे का कहना है कि इस वित्त वर्ष के शुरुआती आठ महीनों में सिर्फ केंद्र सरकार का यह खर्च 63.4 प्रतिशत बढ़ा है।
सर्वे का एक महत्वपूर्ण नतीजा यह भी है कि बाजार में मांग लौटती दिख रही है, और घरेलू मांग की मजबूती का ही असर है कि जब तक निर्यात के मोर्चे पर कुछ गिरावट आई, तब तक भारत में इतनी मांग पैदा हो चुकी थी कि अर्थव्यवस्था को उसकी वजह से उतना तगड़ा झटका नहीं लगा। साल 2022-23 की दूसरी छमाही में भारत में निजी खपत का आंकड़ा जीडीपी का 58.4 प्रतिशत था, जो 2013-14 के बाद का सबसे ऊंचा स्तर है। उधर निर्यात भी 2022-23 की दूसरी छमाही में गिरा है, लेकिन उससे पहले करीब डेढ़ साल उसमें जो तेजी आई, वह उद्योग की रफ्तार तेज कर चुकी थी। घरेलू मोर्चे पर मांग लौटने का एक बड़ा उदाहरण हाउसिंग सेक्टर में दिख रहा है। इससे न सिर्फ घरों के बिकने का सिलसिला शुरू होता है, बल्कि बैंकों से कर्ज उठने और नए घरों के बनने से खपत व रोजगार का चक्र चलने का काम भी होता दिखता है।
लंबे इंतजार के बाद महंगाई रिजर्व बैंक की बर्दाश्त की सीमा में है, कंपनियों की बैलेंस शीट मजबूत दिख रही है। मगर सर्वे में चिंता जताई गई है कि अंतरराष्ट्रीय मोर्चे पर संकट खत्म होने के आसार नहीं दिख रहे हैं, इसलिए विदेश व्यापार के मोर्चे पर चिंता बढ़ सकती है। सर्वे के बाद मुख्य आर्थिक सलाहकार अनंत नागेश्वरन ने इस बात के संकेत दिए कि विकास तेज करने के लिए क्या किया जा सकता है? उनकी राय है कि प्रशासिनक सुधारों की रफ्तार तेज की जाए, लाइसेंस राज के बचे-खुचे अवशेष भी मिटाए जाएं। भारत को वैश्विक विनिर्माण पावरहाउस बनाने के लिए जरूरी है कि बिजली की आपूर्ति भरोसेमंद, लगातार और किफायती हो। अक्षय ऊर्जा पर जोर बढ़ाया जाए, और रोजगार बढ़ाने के लिए मध्यम, लघु व सूक्ष्म उद्योगों को बढ़ावा देने का काम जारी रखा जाए।
जाहिर है, आर्थिक सर्वेक्षण के मुताबिक, भारत तरक्की की नई कहानी लिखने को तैयार है, लेकिन इस राह में अड़चनें आ सकती हैं। ये अड़चनें भारत के बाहर से आने का डर ज्यादा है। पिछले तीन साल में ऐसे तीन कांड हो चुके हैं, जिनमें कोरोना, यूक्रेन पर रूस का हमला और उसके बाद पश्चिमी देशों में महंगाई का उफान व उससे निपटने के लिए ब्याज बढ़ाने के फॉर्मूले से पैदा हुआ संकट मुख्य है। सर्वे में चिंता जताई गई है कि डॉलर की कीमतें बढ़ने का सिलसिला चलता रहा, तो भारत का चालू खाते का घाटा भी बढ़ता रहेगा। अगर चीन की अर्थव्यवस्था खुलने की रफ्तार तेज हुई और उसकी वजह से दुनिया के बाजार में कच्चे तेल और दूसरी कमोडिटीज के दाम बढ़ने लगे, तो उसका भी बुरा असर झेलना पड़ सकता है, और दुनिया की दूसरी अर्थव्यवस्थाओं में सुस्ती की वजह से निर्यात भी दबाव में रह सकता है।
कुल मिलाकर, एक बार फिर दुविधा की स्थिति दिख रही है। दुनिया की तरक्की तेज हो, तब भी उसका कुछ बुरा असर आ सकता है, यानी महंगाई का असर डॉलर पर और भारत के आयात बिल पर दिखेगा। तरक्की धीमी हुई, तो भारत से निर्यात पर दबाव दिखेगा। ऐसे में, संकट से निपटने का सुरक्षित तरीका सिर्फ ‘आत्मनिर्भर भारत’ को बढ़ावा देना ही दिखता है।
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भारत का उद्देश्य है कि वह ग्रीन हाइड्रोजन का औद्योगिक और वैश्विक निर्यातक केंद्र बन सके। इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए भारत को सौर सेल, सेमीकंडक्टर और पवन शक्ति के घटकों का निर्यातक बनना होगा। नीतियों के बावजूद भारत ऐसा नहीं कर पाया है क्योंकि यहाँ विनिर्माण का आधार कमजोर है, और वैश्विक पूंजी के सार्थक उपयोग में अक्षमता है। अतः भारत को लघु विनिर्माण और संबद्ध उद्यमों के बुनियादी ढांचे को मजबूत करना होगा।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 6 जनवरी, 2023
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Date:31-01-23
Let’s Make It Not an e-Waste of ResourcesET Editorials
As India continues to grow affluent, the quantum of e-waste — discarded electronic products, including home appliances such as refrigerators and washing machines, and devices such as phones and laptops — will increase. India is the third-largest e-waste generator (3. 2-5 million tonnes) and, like other countries, recycles only 15-17%. As the PM highlighted in his latest Mann ki Baat, tackling this requires a robust life-cycle approach.
e-Waste management is more than managing waste. Reducing the amount of electronics that is discarded requires improved design and greater durability, and the right to repair. It will ensure resource-use efficiency and extend product life. The standardisation of chargers is a step in the right direction. A better collection system is required for discarded electronics. Making producers liable for collection and management of e-waste is an option. Involve local authorities, invest in their capacities and make them accountable. Local authorities must step up awareness on proper e-waste disposal. Incentives will ensure consumers do not push e-waste into the informal kabadi circuit. Then, reuse and recovery. Products that can be refurbished and resold should be. This will require frameworks, robust rules and guidelines.
e-Waste is source of metals and minerals such as gold, silver, rare earth minerals, lithium, cobalt and cadmium. Experts estimate that in 2017, proper extraction could have yielded gold worth $0. 7-1 billion. About 90% of e-waste is recycled in the informal sector, making recovery inefficient and unsafe. Dealing with e-waste must include formalising these workers, training, skilling and equipping them and ensuring safe and healthy work environments. Bottom line: tackling e-waste properly creates economic opportunities in a sustainable manner.
Date:31-01-23
Water woesOpening up the entire Indus Water Treaty could come with its own set of challengesEditorial
The government’s decision to issue notice to Pakistan, calling for negotiations to amend the Indus Waters Treaty, must be considered carefully. New Delhi says this extreme step is due to Pakistan’s intransigence over objections to two Indian hydropower projects in Jammu and Kashmir: the 330MW Kishanganga hydroelectric project (Jhelum) and the 850MW Ratle hydroelectric project (Chenab). India has argued since 2006, when the objections began, that the projects were within the treaty’s fair water use. However, Pakistan has refused to conclude negotiations with India in the bilateral mechanism — the Permanent Indus Commission of experts that meets regularly — and has often sought to escalate it. As a result, the World Bank appointed a neutral expert, but Pakistan pushed for the case to be heard at The Hague. India has objected to this sequencing, as it believes that each step should be fully exhausted before moving on to the next. While India was able to prevail over the World Bank to pause the process in 2016, Pakistan persisted, and since March 2022, the World Bank has agreed to have both a neutral expert and a Court of Arbitration (CoA) hear the arguments. India attended the hearings with the neutral expert last year, but has decided to boycott the CoA at The Hague that began its hearing on Friday. New Delhi says as talks have hit a dead-end, it wants the entire treaty to be opened up for amendments and renegotiations. India’s accusations against Pakistan may be valid, given that Islamabad has failed to provide material evidence of the two projects hampering its water supply. The World Bank’s decision to hold two parallel adjudication processes is also perilous as there could be contradictory rulings. However, opening up the treaty for review has its own problems that India must deliberate on with a cool mind.
To begin with, the Indus Waters Treaty that decided the distribution of the six tributaries of the Indus or Sindhu between the two nations took nearly a decade to negotiate originally before its signing in 1960. Built in were mechanisms for coordination and dispute resolution that have held the treaty in good stead for at least half a century, and it has often been used as a template between upper riparian and lower riparian states worldwide. That it has endured despite conflict and political rhetoric between India and Pakistan is a testament to its text. In addition, if India and Pakistan have not been able to resolve issues over one case in their Indus Commission talks over 16 years, what guarantees are there that they can renegotiate the whole treaty within any reasonable time-frame? At a time when there is no political dialogue, trade and air or rail connectivity between them, reopening negotiations could open a new flank for India-Pakistan confrontation.
Date:31-01-23
मनोविकार के इलाज पर ध्यान देना होगासंपादकीय
ओडिशा के एक मंत्री की पुलिसकर्मी द्वारा हत्या चिंताजनक है। खबरों के मुताबिक हमलावर बायपोलर डिसऑर्डर नाम के मनोविकार से जूझ रहा था। डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट के अनुसार दुनिया में प्रति एक लाख आबादी पर नौ लोग आत्महत्या करते हैं जबकि एशिया में 10.2 लोग। लेकिन भारत में यह आंकड़ा चिंताजनक 12.9 लोगों का है। यहां मरने वाले 15 से 29 वर्ष की आयु के युवाओं में मौत का प्रमुख कारण आत्महत्या है। लांसेट के एक अध्ययन के अनुसार कोरोना के बाद सन् 2020-22 के बीच पूरी दुनिया में डिप्रेशन और एंग्जायटी की घटनाएं क्रमशः 28 और 26% बढ़ीं और ज्यादा संख्या युवाओं की थी, जो भविष्य के प्रति आशंका या आजीविका पर संकट से इस अवस्था तक पहुंचे। मनोचिकित्सक मानते हैं कि सोशल मीडिया से चिपके रहना इसका एक बड़ा कारण है, क्योंकि तब युवा प्रत्यक्ष संबंधों से कट जाता है। समाज में आज भी डिप्रेशन या एंग्जायटी को दाग के रूप में लिया जाता है, लिहाजा मरीज मनोचिकित्सक के पास जाने में संकोच करता है और बीमारी बढ़ती रहती है। समय है जब समाज के प्रबुद्ध लोग आगे आकर अपनी कथा-व्यथा बताकर अन्य लोगों को जागरूक करें। फिल्मी सितारे जैसे दीपिका पादुकोण और करण जौहर ने सफलता के चरम पर रहते हुए डिप्रेशन में होने की अपनी कहानी बताकर एक बड़े वर्ग को जागरूक किया। अन्य तमाम सेलिब्रिटीज भी अपनी आप-बीती बताकर इससे निकलने के लिए सही उपचार लेने की राय देते रहे हैं। भारत में इसको लेकर अभी तक न तो समाज जागरूक हुआ है, ना ही सरकारें इस खतरे को संज्ञान में ले पा रही हैं। इस दिशा में सोचने की जरूरत है।
Date:31-01-23
देश के इकोलॉजिकल स्टोर हिमालय को बचाना जरूरी हैडॉ. अनिल प्रकाश जोशी, ( पद्मश्री से सम्मानित पर्यावरणविद् )
आज दुनिया एक बड़े महत्वपूर्ण मोड़ पर आकर खड़ी है। जहां विकास भी दिखाई देता है और साथ में विनाश भी। दुनिया का ऐसा कोई भी देश नहीं है, जो विकास के पैमाने पर आगे ना बढ़ा हो और साथ में उसने कुछ विनाश ना झेला हो। फिर भी अगर कुछ देश ऐसे बचे हों जिन्होंने शुरुआती दौर से ही अपने को सीमित रखा या उसे अवसर न मिले हों तब भी उसने अन्य देशों के कारण कुछ न कुछ अवश्य झेला होगा। इसको ऐसे देख सकते हैं कि समुद्र तट पर बसे छोटे-मोटे देश, जिनका क्लाइमेट चेंज, ग्लोबल वॉर्मिंग जैसे मुद्दे में कोई योगदान नहीं, लेकिन इन्हीं दो बड़े कारणों से आने वाले समय में पिघलती बर्फ इनके लिए बड़े संकट खड़े कर देगी। ऐसे छोटे-मोटे करीब 43 देश हैं, जो समुद्र तटों पर बसे होने के कारण जलमग्न हो जाएंगे।
वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि सन् 2100 तक 83% ग्लेशियर पिघल सकते हैं। दूसरी तरफ जिस स्तर से वायु प्रदूषण लगातार बढ़ता चला जा रहा है, 2050 तक हम इस दुनिया को गैस चैंबर बनने की तरफ ले जाएंगे। पानी का संकट सबसे ज्यादा होगा, मिट्टी जहरीली हो रही है।
पिछले 10-20 दशकों में हमने जो कुछ भी किया, उससे लाभ तो लिए पर उतना ही अब खोना भी है। या फिर कुछ नए रास्ते तैयार करने की पहल हो, ताकि हम विकास के साथ विनाशी ना बनें। यह सबसे बड़ी चिंता का समय भी है क्योंकि अगर आज यह बहस नहीं हुई तो हम और हमारी वापसी संभव नहीं होगी। एक बात हमें जान लेनी चाहिए कि पृथ्वी में जीवन की समाप्ति कभी नहीं होगी, क्योंकि बदलती परिस्थितियों के चरम में या संसाधनों के अभाव में इंसान भले समाप्त हो जाएं लेकिन प्रकृति कुछ नए तौर-तरीकों के साथ फिर नए जीवन को पनपाएगी। इस ओर हमने लगातार बातचीत जरूर की है, लेकिन हम उन पहुलओं की तरफ कभी आगे नहीं बढ़े जो कि आज की सबसे बड़ी आवश्यकता बन चुके हैं। क्या यह संभव है कि हम आने वाले जीवन को इसी तरह से जी सकेंगे। यह प्रश्न आज दुनिया में उभर रहा है और बाढ़, आपदाएं, हवाओं के बदलते रुख, पानी का स्वभाव सब बदल जाना इसके उदाहरण हैं।
अगर विकास चाहिए तो उसकी शैली और प्रक्रिया क्या हो? उस पर हम अपना विज्ञान, सामाजिकी, आर्थिकी के सभी पहलुओं का समावेश करके पारिस्थितिकी के साथ-साथ उसको कैसे बढ़ाएं, इस पर विचार करें। शायद तभी हम प्रकृति की खींची रेखा को पार नहीं करेंगे। नहीं तो हम सर्वनाश की ओर आगे बढ़ जाएंगे।
यह साफ हो चुका है कि वर्तमान तरीके का विकास का मॉडल ज्यादा दिन नहीं चलने वाला। मतलब अब विकास से पहले विनाश की चिंता कर लेनी होगी। साफ है कि बढ़ती जीडीपी जानलेवा साबित हो सकती है। इसलिए अब बचने के लिए जीईपी (ग्रॉस एनवॉयरमेंट प्रोडक्ट) पर केंद्रित होना होगा। और वो तब ही संभव होगा जब विकास में पारिस्थितिकी को जोड़कर चलें।
Date:31-01-23
कई समस्याओं का समाधान हैं मोटे अनाजनरेंद्र सिंह तोमर, ( लेखक केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री हैं )
खाद्यान्न के क्षेत्र में भारत की आत्मनिर्भरता हमारी आहार संबंधी चुनौतियों से निपटने का पहला पड़ाव थी। इसमें कोई संशय नहीं है कि विगत साढ़े आठ वर्षों में हमने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के कुशल नेतृत्व और मार्गदर्शन में भारत सरकार, किसानों एवं कृषि विज्ञानियों के प्रभावी प्रयासों के बल पर अनाज उत्पादन में अधिशेष यानी सरप्लस की स्थिति हासिल की है। आज हमारे अनाज भंडार भरे पड़े हैं। इस बीच हमने अपनी दूसरी आहार संबंधी चुनौती पर भी विजय प्राप्ति की दिशा में कार्य आरंभ कर दिया है। यह दूसरी आहार चुनौती प्रत्येक भारतवासी की थाली में पर्याप्त पोषण से युक्त आहार पहुंचाने से जुड़ी है। पोषण के पर्याय मोटे अनाज (मिलेट्स) के उत्पादन एवं उपभोग को बढ़ावा देना इसी रणनीति का हिस्सा है कि हम प्रत्येक देशवासी को पर्याप्त पोषक आहार उपलब्ध कराने में सक्षम हो सकें। इसी कड़ी में भारत के नेतृत्व में वर्ष 2023 को अंतरराष्ट्रीय पोषक-अनाज वर्ष के रूप मनाने की तैयारी की गई है। इसके माध्यम से पोषक अनाज को वैश्विक मंच पर लाने की पहल हुई है। मिलेट्स ही हमारे भविष्य का आहार हैं, जो एक साथ कई समस्याओं का हल हैं। यह भी एक स्तुत्य तथ्य है कि प्रधानमंत्री मोदी की पहल पर ही संयुक्त राष्ट्र ने वर्ष 2023 को अंतरराष्ट्रीय पोषक अनाज वर्ष घोषित किया है। इसके माध्यम से भारत का उद्देश्य खाद्य सुरक्षा और पोषण में मिलेट्स के योगदान के बारे में जागरूकता बढ़ाना, मिलेट्स की उत्पादकता और गुणवत्ता में सुधार के लिए सभी हितधारकों को प्रेरित करना तथा अनुसंधान एवं विकास के लिए निवेश को प्रोत्साहित करना है।
अभी हमारे देश में अनाज के रूप में गेहूं एवं चावल का अधिकाधिक सेवन किया जाता है और इसीलिए अब तक उनके उत्पादन पर ही फोकस रहा है। वहीं गेहूं एवं चावल की तुलना में मिलेट्स कहीं अधिक पोषक अनाज हैं। वास्तव में मिलेट्स एक ‘स्वदेशी सुपरफूड’ है, जो प्रोटीन, फाइबर, विटामिन और खनिजों से परिपूर्ण होते हैं। वर्ष 2018 में भारत सरकार द्वारा गेहूं और चावल जैसे प्रचलित खाद्यान्नों की तुलना में मिलेट्स को उनकी पोषण संबंधी श्रेष्ठता के कारण ‘पोषक-अनाज’ के रूप में अधिसूचित किया गया था। पोषक-अनाज को बढ़ावा देने और मांग सृजन के लिए 2018 को ‘राष्ट्रीय पोषक अनाज वर्ष’ घोषित करते हुए मनाया गया था।
आज आवश्यकता इस बात की है कि मिलेट्स को अपनी थाली का अनिवार्य अंग बनाने की मुहिम को एक जनांदोलन का स्वरूप दिया जाए। भारत सरकार ने इस दिशा में सुनियोजित रणनीति बनाते हुए बाजार, उपभोक्ताओं और किसानों को मिलेट्स के प्रति जागरूक और प्रेरित करने के लिए ठोस कदम उठाने प्रारंभ कर दिए हैं। मिलेट्स न केवल हमारी पोषण एवं स्वास्थ्य संबंधी जरूरतों को पूरा करते हैं, अपितु जलवायु परिवर्तन का शमन करने एवं आवश्यक अनुकूलन, शुष्क एवं दुर्गम क्षेत्रों, जहां विकास लक्ष्यों को हासिल कठिन है, वहां के लघु एवं सीमांत किसानों के विकास में योगदान करने में भी मदद कर सकते है। भारत मिलेट्स का विश्व में सबसे बड़ा उत्पादक देश है, जो वैश्विक उत्पादन में 18 प्रतिशत का योगदान देता है। अंतरराष्ट्रीय पोषक अनाज वर्ष मनाने के माध्यम से हमारा उद्देश्य मिलेट्स की घरेलू एवं वैश्विक खपत को बढ़ाना है। इस संबंध में कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय दूसरे केंद्रीय मंत्रालयों, राज्य सरकारों और अन्य हितधारक संगठनों के सहयोग से मिलेट्स के उत्पादन एवं खपत को बढ़ाने के लिए मिशन मोड पर काम कर रहा है।
खाद्य प्रणालियों का भविष्य छोटे एवं सीमांत किसानों की भागीदारी पर बहुत निर्भर करता है। विशेषकर तब जब उत्पादन में विविधीकरण और खाद्य सुरक्षा का प्रश्न हो। भारत में लगभग 86 प्रतिशत छोटे किसानों के पास पांच एकड़ से भी कम भूमि है, जो कुल कृषि योग्य भूमि का लगभग 47 प्रतिशत है। सरकार ने छोटे किसानों को सशक्त बनाने के लिए कई अनुकरणीय पहल की हैं, जिनमें इनपुट समर्थन, एफपीओ हस्तक्षेप, डिजिटलीकरण और कृषि अवसंरचना कोष सहित बहुत कुछ शामिल हैं। ऐसे में फसल प्रणाली में पोषक अनाज को शामिल करना, किसानों को पौष्टिक भोजन में आत्मनिर्भरता, कम इनपुट के साथ रिटर्न में वृद्धि, बेहतर बाजार समर्थन और जलवायु प्रभाव में सुरक्षा प्रदान करने के लिए एक महत्वपूर्ण कदम होगा।
सरकार ने मिलेट्स उत्पादन की क्षमता का दोहन करने और उच्च मूल्य वाले घरेलू एवं अंतरराष्ट्रीय बाजारों में इसके समन्वय के लिए 21 जिलों में ‘एक देश-एक उत्पाद’ और ‘एक जिला-एक उत्पाद’ के रूप में मिलेट्स को नामित किया है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन कार्यक्रम के तहत 14 राज्यों के 212 जिलों में मिलेट्स के लिए एनएफएसएम-पोषक अनाज घटक लागू किया जा रहा है। आज 500 से अधिक स्टार्टअप मिलेट वैल्यू चेन के रूप में काम कर रहे हैं। कर्नाटक, ओडिशा, तमिलनाडु, तेलंगाना, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, गुजरात और असम सहित पूर्वोत्तर के राज्यों ने मिलेट्स को बढ़ावा देने के लिए महती प्रयास किए हैं। कई राज्यों में मिलेट मिशन लांच किया गया है। कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय तथा अन्य संबद्ध मंत्रालयों के साथ ही भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद, आइआइएमआर, इंटरनेशनल क्राप्स रिसर्च इंस्टीट्यूट फार सेमी-एरिड ट्रापिक्स, राज्य कृषि विश्वविद्यालय और अन्य संस्थान देश में खाद्य एवं पोषण सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए इस स्वर्णिम अवसर का उपयोग कर रहे हैं।
समय के साथ यह आवश्यक हो जाता है कि हम अपनी आहार संबंधी आदतों में बदलाव करें। कार्बोहाइड्रेड से ज्यादा ध्यान प्रोटीन, खनिज तत्वों, विटामिंस और फाइबर पर केंद्रित करने की जरूरत है। बदलती जीवनशैली में स्वस्थ शरीर के लिए आहार में मिलेट्स को जोड़ना आवश्यक एवं अपरिहार्य हो गया है। आइए, भारत सरकार के इस मिशन को जन आंदोलन का स्वरूप दें। हर थाली में पोषक अनाज पहुंचाने की दिशा में कदम उठाने के लिए सक्रियता दिखाएं।
Date:31-01-23
सिंधु जल संधि में संशोधन की चुनौतीपंकज चतुर्वेदी, ( लेखक पर्यावरण मामलों के जानकार हैं )
सिंधु जल बंटवारे को लेकर भारत ने पाकिस्तान को चेतावनी दी है। इसका कारण यह है कि पाकिस्तान किशनगंगा और रातले पनबिजली परियोजनाओं पर तकनीकी आपत्तियों की जांच के लिए तटस्थ विशेषज्ञ की नियुक्ति के अपने आग्रह से पीछे हटकर मामले को मध्यस्थता अदालत में ले जाने पर अड़ा है। यह कदम संधि के अनुच्छेद नौ में विवादों के निपटारे के लिए बनाए गए तंत्र का उल्लंघन है। इसीलिए भारत ने सितंबर 1960 में हुई सिंधु जल संधि में संशोधन के लिए पाकिस्तान को नोटिस जारी किया है। वास्तव में भारत ने इस संधि को लागू करने में इस्लामाबाद की हठधर्मिता के बाद यह कदम उठाया है। ध्यान रहे कि अगस्त 2021 में संसद की एक स्थायी समिति ने सिफारिश की थी कि इस संधि पर फिर से बातचीत की जाए, ताकि जलवायु परिवर्तन से जल उपलब्धता पर पड़े असर और अन्य चुनौतियों से जुड़े उन मामलों को निपटाया जा सके, जिन्हें समझौते में शामिल नहीं किया गया है।
पाकिस्तान पोषित आतंकवाद का मुंहतोड़ जवाब देने के लिए पाकिस्तान को जाने वाली नदियों का पानी रोकने पर विचार लंबे समय से चल रहा है, लेकिन पानी रोकने का काम कोई बटन दबाने वाला नहीं है। दुनिया की सबसे बड़ी नदी घाटी प्रणालियों में से एक सिंधु नदी की लंबाई करीब 2,880 किमी है। सिंधु नदी का इलाका करीब 11.2 लाख वर्ग किमी क्षेत्र में फैला हुआ है। यह इलाका पाकिस्तान (47 प्रतिशत), भारत (39 प्रतिशत), चीन (आठ प्रतिशत) और अफगानिस्तान (छह प्रतिशत) में है। अनुमान है कि तकरीबन 30 करोड़ लोग सिंधु नदी के आसपास रहते हैं। सिंधु नदी तंत्र की छह नदियों में कुल 16.8 करोड एकड़ की जल निधि है। इसमें से भारत अपने हिस्से का करीब 90 प्रतिशत पानी इस्तेमाल कर लेता है। शेष पानी रोकने के लिए अभी कम से कम छह साल लगेंगे। तिब्बत में कैलास पर्वत शृंखला से बोखार-चू नामक ग्लेशियर के पास से अवतरित सिंधु नदी भारत में लेह क्षेत्र से गुजरती है। लद्दाख सीमा को पार करते हुए जम्मू-कश्मीर में गिलगित के पास दार्दिस्तान क्षेत्र में इसका प्रवेश पाकिस्तान में होता है। जिन पांच नदियों रावी, चिनाब, झेलम, ब्यास और सतलुज के कारण पंजाब का नाम पड़ा, वे सभी सिंधु की जल-धारा को समृद्ध करती हैं। सतलुज पर ही भाखडा-नंगल बांध है। भले ही भारत और पाकिस्तान के बीच भौगालिक सीमाएं खिंच चुकी हों, लेकिन यहां की नदियां, मौसम और संस्कृति सहित कई बातें चाह कर भी बंट नहीं पाईं।
सिंधु नदी प्रणाली का कुल जल निकासी क्षेत्र 11,165,000 वर्ग किमी से अधिक है। वार्षिक प्रवाह की दृष्टि से यह विश्व की 21वीं सबसे बड़ी नदी है। यह पाकिस्तान के भरण-पोषण का एकमात्र साधन भी है। अंग्रेजों ने पाकिस्तान के पंजाब क्षेत्र की सिंचाई के लिए विस्तृत नहर प्रणाली का निर्माण किया था। विभाजन ने इस बुनियादी ढांचे का एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तान में छोड़ दिया, लेकिन हेडवर्क बांध भारत में बने रहे, जिससे पाकिस्तान के बड़ी जोत वाले जमींदारों में हमेशा डर का भाव रहा है। सिंधु नदी बेसिन के पानी के बंटवारे के लिए कई वर्षों की गहन बातचीत के बाद विश्व बैंक ने भारत और पाकिस्तान के बीच सिंधु जल संधि की मध्यस्थता की। कई विदेशी विशेषज्ञों के दखल के साथ दस साल तक बातचीत चलती रही और सितंबर 1960 में कराची में जल बंटवारे को लेकर द्विपक्षीय समझौता हुआ। भारत-पाकिस्तान के बीच इस समझौते की नजीर सारी दुनिया में दी जाती है कि तीन-तीन युद्ध और लगातार तनावग्रस्त संबंध के बावजूद यह संधि कायम रही। इस संधि के अनुसार सतलज, व्यास और रावी नदियों को पूर्वी, जबकि झेलम, चिनाब और सिंधु को पश्चिमी क्षेत्र की नदी कहा गया। पूर्वी नदियों के पानी का पूरा हक भारत के पास है तो पश्चिमी नदियों का पाकिस्तान के पास। बिजली, सिंचाई जैसे कुछ मामलों में भारत पश्चिमी नदियों के जल का भी इस्तेमाल कर सकता है। भारत रावी पर शाहपुर कंडी में बांध बनाना चाहता था, पर यह परियोजना 1995 से रुकी है। भारत ने अपने हिस्से की पूर्वी नदियों का पानी रोकने के प्रयास किए, मगर सामरिक दृष्टि से ऐसी योजनाएं सिरे नहीं चढ़ पाईं। अब शाहपुर कंडी के अलावा सतलुज-व्यास लिंक योजना और कश्मीर में उझा बांध पर भी काम हो रहा है। इससे भारत अपने हिस्से का सारा पानी इस्तेमाल कर सकेगा।
सिंधु जल संधि में विश्व बैंक सहित कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं शामिल हैं और उन्हें नजरअंदाज कर पानी रोकना कठिन होगा। हां, पाकिस्तान की आतंकी गतिविधियों में सीधी भागीदारी सिद्ध करने के बाद यह संभव होगा, लेकिन यदि हम पानी रोकते हैं तो उसे सहेजने के लिए बड़े जलाशय, बांध चाहिए और नहरें भी। यदि बिना प्रबंध पानी रोकने का प्रयास किया गया तो जम्मू-कश्मीर, पंजाब आदि में जलभराव हो जाएगा। आजादी के इतने साल बाद भी अपने हिस्से की नदियों का पूरा पानी इस्तेमाल करने के लिए बांध आदि न बना पाने का असल कारण प्रतिरक्षा नीतियां हैं। साझा नदी पर कोई भी विशाल जल-संग्रह दुश्मनी के हालात में पाकिस्तान के लिए ‘जल-बम’ के रूप में काम आ सकता है।
भारत से पाकिस्तान जाने वाली नदियों पर चीन के निवेश से कई बिजली परियोजनाएं हैं। यदि उन पर कोई विपरीत असर पड़ा तो चीन ब्रह्मपुत्र के प्रवाह के माध्यम से हमारे समूचे पूर्वोत्तर राज्यों को संकट में डाल सकता है। अरुणाचल और मणिपुर की कई नदियां चीन की हरकतों के कारण एकाएक बाढ़, प्रदूषण और सूखे को झेल रही हैं। स्पष्ट है कि सिंधु जल संधि को संशोधित करना आसान नहीं।
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हमारे देश में अनियोजित शहरीकरण बड़ी समस्या बन रहा है। इससे आम जनजीवन न केवल स्वास्थ्य बल्कि जीवन मूल्यों की दृष्टि से जटिल होता जा रहा है। अनियंत्रित शहरीकरण को रोकने के लिए सरकार अक्सर अतिक्रमण को हटाने का प्रयास करती है। हाल ही में हल्द्वानी शहर में भी ऐसा ही कुछ हुआ है, जिस पर उच्चतम न्यायालय को हस्तक्षेप करते हुए अतिक्रमण हटाने के आदेश पर रोक लगानी पड़ी है।
ऐतिहासिक फैसला क्या है ?
1985 के ओल्गा टेलिस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था कि अतिक्रमण को वैध नहीं माना जा सकता, लेकिन बेदखली के प्रयास में की जाने वाली मनमानी, आजीविका के अधिकार के विरूद्ध है।
कुछ तथ्यात्मक बिंदु –
यहाँ मूल प्रश्न यह है कि शहरों में झुग्गी हैं ही क्यों, जबकि उनके निवासियों को शहरी आर्थिक पदिदृश्य का अभिन्न अंग माना जाता है ?
इसका उत्तर शहरी नियोजन और शासन की विफलता में निहित है। शहरों के लिए जो मास्टर प्लान बनाए जाते हैं, वे स्वीकार किए जाने के तुरंत बाद अप्रासंगिक हो जाते हैं। शहरी अर्थव्यवस्था की बदलती गति के साथ, शहरी नियोजन और प्रशासनिक ढांचे का तालमेल ही नहीं बन पाता है। झुग्गियों का होना, इसी विफलता का परिणाम है।
वर्तमान भारत के शहर विकास-इंजन का काम कर रहे हैं। यहाँ के जनजीवन को सुचारू रूप से चलाने के लिए राज्य एवं नगर प्रशासन को व्यवस्था करनी चाहिए।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 07 जनवरी, 2023
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Date:30-01-23
Build, But SmartlyInfra along LAC is strategically vital. But Joshimath shows why projects must respect mountain ecology.TOI Editorials
India is finally ramping up infrastructure development across LAC. China’s lead on this has had a clear bearing on the mobility of India’s troops in the region. And since Galwan in 2020, there has been an extra urgency to bridge the gap. So, India’s construction of a 135 km road connecting Chushul and Demchok in eastern Ladakh should be one among other projects in that strategically important area and BRO must meet the two-year construction deadline.
That said, given the sensitive ecology of Ladakh, GoI also needs to be extra careful about the construction of this and other projects. Activists from the region have been pointing out that unsustainable construction, industries and tourism can bring catastrophic consequences to the fragile zone. Studies by Kashmir University and other organisations show that glaciers in the Leh-Ladakh region will deplete by two-thirds unless conservation efforts are stepped up. These glaciers are already melting faster than expected due to construction of highways and human activities.
Add to this government’s amendments to the Environment Impact Assessment Rules last year that exempt highway projects of strategic and defence importance that are 100 km from the borders from obtaining environmental clearance. This rightly raises concerns about the damage being done to sensitive ecosystems. The recent land subsidence disaster in Uttarakhand’s Joshimath provides ample proof that we have failed to take care of our mountain ecology. From Northeast to Himachal, India’s mountain ranges are under pressure, and many voices have started asking whether every road, bridge, train line planned really needs to be built.
It is nobody’s argument that defence shouldn’t be prioritised. But strict protocols need to be worked out to ensure even strategic projects in sensitive regions have the least impact on the environment. Ultimately, ecological disasters will also jeopardise strategic objectives. Case in point, the Joshimath crisis forced our troops stationed in the area to move to a different location. Therefore, infrastructure construction along LAC needs to be carefully planned and executed, not just for environment but to ensure the projects’ own longevity.
Date:30-01-23
In NREGA reforms, prioritise the worker and her duesIn reforms to the National Rural Employment Guarantee Act, an administrative and fiscal efficacy-alone focus would be a flawRakshita Swamy and Anindita Adhikari are with the Social Accountability Forum for Action and Research. Ashish Ranjan is with the Jan Jagaran Shakti Sangathan, Bihar. The three writers are associated with the Peoples’ Action for Employment Guarantee and the National Rural Employment Guarantee Act (NREGA) Sangharsh Morcha.
The Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Act (MGNREGA) is no stranger to reform. In fact, the zeal with which reforms are introduced often outpaces the capacity to adapt. Every time the administrative system gets back on its feet after a reform move, it is hit by another. Poorer States struggle more to adapt when compared to those that are better off because of weaker administrative capacity. The most recent concern of the central government is over the programme’s “regressive” spending pattern, where poorer States spend less NREGA funds than better-off ones. As if on cue, a committee to suggest reforms has been constituted instead of listening to the long-standing demands of workers and their collectives. NREGA is underperforming because its most basic design principles have been forgotten or wilfully ignored. We remind the committee of this simple message.
Address violation of entitlements
The first is: address delays in wage payments to restore the faith of workers in the programme. In 2016, the Supreme Court of India directed the government to ensure that wages were paid on time, calling the act of making workers wait for wages for months as equal to “forced labour”. However, there has not been even a single decisive step taken by the Ministry since then. Instead, the process of wage payments created by the central government has become even more convoluted. For instance, seven or more functionaries have to sign off before payment due to a worker can be approved (stage one of the wage payment cycle). This does not even include the series of delays from when the payment is approved till payment is made (stage two of the cycle). In contrast, the processing of loans from private banks is done in fewer steps. The point is the Ministry of Rural Development must simplify the payment process and has to be transparent about pending wage payments in stage one and two so that bottlenecks can be corrected.
The second is: strengthen implementation capacities where expenditure is low instead of curbing expenditure where employment generation is high. States which are spending more are implementing the programme better because they have better capacities (as several studies including the government’s own Economic Survey concluded in 2016). For a universal, demand-based social security programme such as NREGA, reforms cannot be based on ‘targetting’ better. There has to be a focus on exclusion and not inclusion “errors”. Instead of using expenditure and income poverty as the only markers, exclusion must be identified at the household level. There is enough evidence to show that NREGA is fairly well targeted, benefiting the poorest, especially Scheduled Caste (SC) and Scheduled Tribe (ST) families. However, there is scope for improvement. For instance, panchayats, blocks and districts where employment of SCs and ST families is lower than their proportion in the population must be identified. This would indicate pockets where the most marginalised are being nudged out of the programme. Similarly, panchayats where the average wage being paid is lower than the notified wage rate must be identified as well. This would indicate places where the implementing authorities need to be hauled up for failing to ensure work is completed — which in turn deprives workers of their minimum wage. The online Management Information System of NREGA can flag areas where entitlements are violated instead of being used as a tool by bureaucrats to centralise and control things.
The third is: run the programme like a demand-based law, and not a scheme. Intermittent and unpredictable fund releases by the central government are one of the fundamental reasons why State governments are unable to ensure the full potential of NREGA. As of today, ₹18,191 crore in liabilities is due to 24 States. Poor performing States, on account of inadequate funds, typically discourage and often deny demand for work.
The case of Bihar
Based on our experience of organising NREGA workers in several districts of Bihar, we have found that even when we have been able to get receipts for our work demand applications, worksites are not opened on time, and the work provided does not match demand. The Kaam Mango Abhiyan was launched by the Ministry of Rural Development in 2013 — due to declining demand of work under NREGA), the Union Ministry of Rural Development launched this campaign, which literally means “ask for work” — with the help of civil society organisations in six districts in six States; 53,000 workers demanded work in Katihar district alone and dated receipts were provided. Unfortunately, the historic numbers of workers demanding work were let down by the Ministry because funds to honour the demand were not released to States in time. Lessons from such campaigns are part of the institutional memory of government. In a related instance, workers in Barari block of Katihar were on indefinite strike as they have not been provided work and wages for the work they have done. Given the unique financial needs of this programme, the General Financial Rules need to be reimagined so that budgetary allocations remain flexible to the need for funds by States in response to demands for work.
The fourth is: make discussions on any proposed reforms participatory. NREGA emerged from the demands of a vibrant peoples’ movement across India and its cornerstones have been its path-breaking provisions for public accountability. Building on the spirit of public participation, which gave NREGA an institutional architecture that was well before its time, is needed. There has to be a leveraging of consultative processes and forums built into it, such as the State and Central Employment Guarantee Councils. State governments have played a pivotal role in the successes and failures of NREGA, and any proposed reforms must be tabled in State assemblies in addition to Parliament along with bringing civil society organisations, worker unions and representatives of self-help groups into the discussion.
‘Top down’ reforms as a problem
The fifth is: it is time the Government of India makes an earnest attempt to map the impact of each of its “reforms” on access to and the expenditure of NREGA, particularly in poorer States. A slew of “reforms” — the majority have focused on centralisation such as the electronic fund management system, geo-tagging of assets and a national mobile monitoring system (NMMS) — have disrupted implementation. Almost 3,000 women NREGA workers in Muzaffarpur district are protesting against the NMMS application after the app failed to capture their attendance. They have been denied their wages. The committee members must meet the protesting workers when they visit various States. The central government must be held accountable for the denial of entitlements to NREGA workers as a result of top down “reforms” that workers had no say in designing.
The article is also an appeal to this committee to consider some principles in order to guide its discussions and recommendations. Reforms to NREGA must prioritise the access of workers to entitlements with ease and dignity, rather than focus on administrative and fiscal efficacy alone.
Date:30-01-23
शाश्वत है गांधीवाद की राहप्रवीन लखेड़ा, ( लेखक सेंट जेवियर कालेज, जयपुर में सहायक प्रोफेसर हैं )
भारतीय राजनीति में शायद ही कोई ऐसा नेता या राजनीतिक दल होगा, जो गांधीजी या गांधीवाद की दुहाई न देता हो। सभी गांधीजी के नाम को भुनाना तो चाहते हैं, किंतु दुखद है कि उनके दर्शन को अपनाना नहीं चाहते। उनके पदचिह्नों पर चलना नहीं चाहते। गांधीजी या गांधीवाद इनके लिए मात्र अपनी बुराइयों को ढकने का आवरण मात्र रह गया है। प्रश्न यह है कि ऐसा क्या था गांधीजी के व्यक्तित्व में कि आज भी वह राजनीति में प्रासंगिक बने हुए हैं? गांधीजी राजनीति में सत्य, अहिंसा, शुचिता एवं पारदर्शिता के पक्षधर होने के साथ-साथ परिवारवाद और भ्रष्टाचार के विरुद्ध थे। उन्होंने एक लंबी अवधि तक देश तथा देशवासियों को दिशा दी, चंपारण से लेकर भारत छोड़ो तक विभिन्न आंदोलन चलाए, कई सामाजिक सुधार आंदोलन चलाए तथा काफी हद तक उनमें सफल भी हुए। गांधीजी ने देश की निःस्वार्थ सेवा की। अब नेता अपने निजी स्वार्थों के लिए उनके नाम का इस्तेमाल करते हैं। कुछ गिने-चुने नेताओं को छोड़कर लगभग सभी नेताओं पर यह बात सही बैठती है। हालांकि सामान्य जन के लिए गांधीजी एक लोकप्रिय जन-नेता थे और आज भी हैं, क्योंकि उन्होंने कभी भी अपने निजी स्वार्थ के लिए राजनीति नहीं की। राजनीति उनके लिए गरीबों की समस्याओं को जानने और उन्हें सुलझाने का माध्यम थी। यही बात उन्हें मौजूदा नेताओं से अलग करती है।
यह भी सच है कि गांधीजी ने सत्य, अहिंसा, शुचिता एवं पारदर्शिता की जो भी बातें कीं, वे भारतीय समाज के लिए नई नहीं थीं, बल्कि इन सबसे भारतीय समाज पूर्ण रूप से परिचित था। हमारे मनीषियों ने प्राचीन काल से ही धर्म एवं राजनीति के बीच एक संतुलन बनाने की एक सफल कोशिश की थी, किंतु सदियों की गुलामी ने उसके सोच को जकड़ लिया था। 18वीं सदी के उत्तरार्द्ध से पुनः सामाजिक, राजनीतिक जागरूकता आई। गांधीजी ने उसी जागरूकता को आगे बढ़ाया। अंतर सिर्फ इतना था कि उन्होंने इन सब बातों को अपने राजनीतिक जीवन में अपनाया। उनकी कथनी और करनी में अंतर नहीं था। एक अन्य महत्वपूर्ण कारण यह था कि गांधीजी अपने परिवार के किसी सदस्य को राजनीति में नहीं लाए, जबकि वह चाहते तो ऐसा आसानी से कर सकते थे तथा आजादी मिलने के समय उन्होंने सक्रिय राजनीति से लगभग दूरी बना ली थी। इन्हीं कारणों से गांधीजी जनसाधारण में लोकप्रिय हो सके। जबकि मौजूदा नेताओं ने कभी समाजवाद तो कभी बहुजन के नाम पर अरबों-खरबों की संपत्ति लूटी और अपने एवं अपने परिवार वालों के नाम कर दी। अपने कुनबे को ही सत्ता सौंपी, चाहे उनमें योग्यता हो या न हो।
ऐसा नहीं है कि तत्कालीन राजनीति में लोग स्वार्थी नहीं थे, किंतु स्थिति इतनी विद्रूप नहीं थी। सत्ता के लोभी तब भी थे, आज भी हैं और आगे भी रहेंगे। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि 1920 के असहयोग आंदोलन के दौरान जब गांधीजी ने उपाधि-धारकों से अपनी उपाधियां छोड़ने की अपील की तो उस समय लगभग पांच हजार उपाधि-धारकों में से मात्र 24 लोग ही अपनी उपाधियों का त्याग कर सके। सत्ता का मोह या नशा कुछ ऐसा ही होता है कि व्यक्ति चाहकर भी उसे छोड़ नहीं पाता। एक अन्य बात जो गांधीजी को अन्य लोगों की तुलना में कुछ श्रेष्ठ बनाती है वह है अपनी गलतियों को मान लेना। वह अपनी गलतियों को स्वीकार कर लेते थे। आज के नेताओं में तो इतनी भी क्षमता नहीं कि अपनी हार को स्वीकार करें। यहां तो चुनाव दर चुनाव हारने के बाद ईवीएम पर ठीकरा फोड़ा जाता है।
वैसे गांधीजी ऐसे ही युगपुरुष नहीं बने। उन्होंने आम लोगों के दर्द को न सिर्फ महसूस किया, बल्कि उन्हें दूर करने का भरसक प्रयास किया। उन्होंने उनसे अपना तादात्म्य बिठाने की कोशिश की। उच्चवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखने के बाद भी वह आम आदमी के दर्द को समझने का प्रयत्न करते थे। जब उन्होंने देखा कि देश में गरीब लोगों के पास तन ढकने के लिए कपड़े भी नहीं हैं तो स्वयं भी लंगोट एवं अंगवस्त्र पहनना शुरू कर दिया, रेलगाड़ी के तीसरे दर्जे में यात्रा की, संयम से जीवन व्यतीत किया। गांधीजी का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत सर्वोदय का सिद्धांत था, जिसका मतलब था सभी की प्रगति। दूसरे शब्दों में सबसे गरीब व्यक्ति का भी विकास या उन्नति। अब आज के नेता स्वयं विचार करें कि वे इन कसौटियों पर कहां और कितने खरे उतरते हैं?
गांधीजी महात्मा इसीलिए कहलाए, क्योंकि उन्होंने इंसानियत धर्म बखूबी निभाया। सांप्रदायिकता का मुद्दा भारत में हमेशा से प्रबल रहा है। जब हम सांप्रदायिकता की बात करते हैं तो अधिकांशतया हम हिंदू एवं मुस्लिम संघर्ष की बात कर रहे होते हैं। 1946-47 में जब सारा देश दंगों की आग में झुलस रहा था, उस वक्त महात्मा गांधी बिना किसी सुरक्षा और सत्ता के गलियारों से दूर उन इलाकों का दौरा कर रहे थे, जहां दंगाई इंसानियत को तार-तार करने पर तुले थे। इसलिए आज के नेता गांधीजी का नाम लेने से पहले उनकी नीतियों को भी समझने की कोशिश करें। भारत में शायद ही कोई चौराहा या सरकारी विभाग या दफ्तर होगा जहां गांधीजी की मूर्ति या तस्वीर न लगी हो। यह भी सच है कि इन्हीं के नीचे बैठकर लोग गांधीजी के विचारों के विपरीत काम करते हैं। ऐसा लगता है ‘गांधीजी भारत में यत्र-तत्र-सर्वत्र हैं, किंतु गांधीवाद कहीं भी नहीं।’ यदि हमारे नीति-नियंता गांधीजी के अनुसार आचरण करते तो देश में भ्रष्टाचार-कदाचार की समस्या इस कदर गंभीर न होती। आज जरूरत उनके बताए रास्ते पर चलने की है।
Date:30-01-23
समझौते की धारसंपादकीय
आखिरकार भारत ने सिंधु जल समझौते में संशोधन के लिए पाकिस्तान को बातचीत का नोटिस भेज दिया है। इस तरह उसे नब्बे दिन के अंदर इस मसले पर वार्ता के लिए आना होगा। मगर वह आसानी से इस नोटिस को स्वीकार कर लेगा, कहना मुश्किल है। दरअसल, पिछले पांच सालों से भारत कोशिश करता रहा है कि सिंधु जल समझौते में संशोधन हो, मगर पाकिस्तान इसे लगातार टालता रहा है। पाकिस्तान ने सात साल पहले भारत की रातले और किशनगंगा पनबिजली परियोजनाओं पर आपत्ति जताते हुए अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता की अपील की थी। उसके बाद भारत लगातार प्रयास करता रहा है कि इस मसले को परस्पर निपटाया जाए, मगर पाकिस्तान का रुख टालमटोल का रहा है। इसी के चलते उसे यह नोटिस भेजा गया है। सिंधु जल समझौता करीब बासठ साल पहले छह नदियों- व्यास, सतलुज, रावी, सिंधु, झेलम और चेनाब के पानी की हिस्सेदारी को लेकर हुआ था। उसमें विश्व बैंक ने भी हिस्सेदारी की थी। उसके बाद से दोनों देशों के बीच तीन युद्ध हुए, मगर भारत ने कभी पाकिस्तान के हिस्से का पानी नहीं रोका। इस मसले पर कभी कोई बड़ा विवाद नहीं उभरा। हालांकि ये सभी नदियां भारत से होकर गुजरती हैं और उनके पानी के उपयोग का उसे पूरा अधिकार है, फिर भी पाकिस्तान ने उसकी पनबिजली परियोजनाओं पर आपत्ति जाहिर कर दी।
दरअसल, सिंधु जल समझौते में भारत को रावी, सतलुज और व्यास नदियों के पानी के निर्बाध उपयोग का अधिकार है, मगर बाकी तीन नदियों पर परियोजनाएं शुरू करने और पानी रोकने को लेकर कुछ शर्तें लगाई गई हैं। उन्हीं शर्तों के आधार पर पाकिस्तान ने भारतीय पनबिजली परियोजनाओं पर आपत्ति जताई। हालांकि हकीकत यह भी है कि इन नदियों का केवल बीस फीसद पानी भारत इस्तेमाल कर पाता है और अगर वह पानी रोक दे, तो पाकिस्तान में सूखे की स्थिति पैदा हो जाएगी। मगर उसने कभी ऐसा नहीं किया। अब पिछले बासठ सालों में स्थितियां काफी बदली हैं। भारत की जल संबंधी जरूरतें तो बढ़ी ही हैं, कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त होने के बाद वहां नई परियोजनाओं का रास्ता खुला है। सब जानते हैं कि नदियों के पानी का सबसे अधिक इस्तेमाल सिंचाई और औद्योगिक इकाइयों में होता है। ऐसे में आने वाले समय में भारत को उन नदियों के पानी में हिस्सेदारी बढ़ानी पड़ेगी, जिनका बड़ा हिस्सा पाकिस्तान इस्तेमाल करता आ रहा है।
कई बार विशेषज्ञ रेखांकित कर चुके हैं कि कश्मीर से होकर गुजरने वाली नदियों के पानी का भारत को अधिकतम उपयोग करना चाहिए। मगर अभी तक अड़चन यह है कि उन नदियों के पानी का संचय करने का कोई प्रबंध नहीं है। सिंधु जल समझौते में एक शर्त यह भी है कि भारत नदियों का रुख मोड़ नहीं सकता। इस तरह अगर नदी जोड़ परियोजना पर काम शुरू हो, तो मुश्किल पैदा हो सकती है। मजबूरन भारत अपने हिस्से का बहुत सारा पानी पाकिस्तान की तरफ बह जाने देता है। इस लिहाज से भी जल समझौते में संशोधन की आवश्यकता है, ताकि नदी जोड़ परियोजना शुरू कर मैदानी भागों में पानी की उपलब्धता बढ़ाई जा सके। मगर जैसी कि पाकिस्तान की आदत है, वह किसी भी ऐसे समझौते में संशोधन को शायद ही आसानी से तैयार हो, जिससे भारत को लाभ मिलता हो। मगर नब्बे दिनों की नोटिस के बाद अगर उसकी तरफ से कोई सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं आई, तो भारत का पलड़ा भारी होगा और वह अपने ढंग से कुछ फैसला करने की सोच सकता है।
Date:30-01-23
तकनीकी विकास और समृद्धि के सोपानरंजना मिश्रा
आधुनिक युग के तकनीकी सफर में क्वांटम प्रौद्योगिकी सबसे तेजी से विकसित हो रही है। वैसे अभी तक इस तकनीक में अधिक तरक्की नहीं हो सकी है और न ही इसका व्यावहारिक उपयोग संभव हो पाया है, मगर भविष्य में इसको लेकर अनेक संभावनाएं जताई जा रही हैं। क्वांटम प्रौद्योगिकी मुख्यत: क्वांटम मेकेनिक्स के सिद्धांतों पर आधारित होती है। क्वांटम मेकेनिक्स भौतिकी का वह क्षेत्र है, जिसमें परमाणविक या उप परमाणविक कणों के व्यवहार का अध्ययन किया जाता है, जिसे भौतिकी के स्थापित सिद्धांतों के माध्यम से नहीं समझा जा सकता। दरअसल, क्वांटम कणों (इलेक्ट्रान, फोटान आदि) का व्यवहार सामान्यतया आंखों से दिखाई देने वाली वस्तुओं के व्यवहार से काफी भिन्न होता है। क्वांटम प्रौद्योगिकी के अंतर्गत ऐसे कणों के गुणों को नियंत्रित करके या उनमें आवश्यक परिवर्तन लाकर क्वांटम कंप्यूटर और अन्य प्रौद्योगिकियों का निर्माण किया जाएगा, जो वर्तमान कंप्यूटरों और प्रौद्योगिकियों से बेहतर होगी।
आज विश्व के कई बड़े देश इस क्षेत्र में महारत हासिल करने की प्रतिस्पर्धा में लगे हुए हैं, क्योंकि जो देश अपने यहां क्वांटम प्रौद्योगिकी को विकसित कर लेगा, वह दुनिया में अग्रणी होगा और आर्थिक रूप से अधिक समृद्धि हासिल करेगा। क्वांटम भौतिकी से जुड़े लाभों और संभावनाओं को देखते हुए कई संस्थान, कंपनियां और सरकार क्वांटम कंप्यूटिंग में निवेश कर रही हैं। भारत सरकार ने भी वर्ष 2019 में क्वांटम प्रौद्योगिकी को ‘राष्ट्रीय महत्त्व के मिशन’ का दर्जा दिया था और 2021 में इसके अध्ययन को बढ़ावा देने के लिए एक राष्ट्रीय मिशन की शुरुआत की और इसके लिए आठ हजार करोड़ रुपए का आबंटन किया। सेना ने मध्यप्रदेश में क्वांटम रिसर्च सुविधा की शुरुआत की है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग ने पुणे में इससे जुड़ी एक और सुविधा शुरू की है।
क्वांटम तकनीक में क्वांटम मेकेनिक्स के दो सबसे महत्त्वपूर्ण सिद्धांतों का उपयोग किया जाता है- ‘सुपरपोजिशन’ और ‘इंटैगलमेंट’। आज हर क्षेत्र में कंप्यूटर का प्रयोग हो रहा है। तकनीक के विकास के साथ-साथ इनका आकार छोटा होता और क्षमता बढ़ती जा रही है। अभी वैज्ञानिक और इंजीनियरिंग कार्यों के लिए अत्यधिक उच्च गति की गणना करने के लिए सुपर कंप्यूटर का प्रयोग किया जाता है, लेकिन वर्तमान में जो भी कंप्यूटर या सुपर कंप्यूटर हैं, उनमें सूचनाओं को नियोजित करने और बड़ी-बड़ी गणनाएं करने में काफी समय लग जाता है, पर क्वांटम कंप्यूटर द्वारा इन्हें बहुत कम समय में किया जा सकेगा। दरअसल, परमाणु प्राकृतिक रूप से एक सूक्ष्म कैलकुलेटर की भांति कार्य करते हैं, इनसे सूक्ष्म गणना की जा सकती है। इसीलिए वैज्ञानिकों के दिमाग में क्वांटम कंप्यूटर के निर्माण का विचार आया।
क्वांटम कंप्यूटर बड़ी से बड़ी और जटिल से जटिल गणितीय समस्याओं को चंद पलों में हल कर सकता है। यह एक ही समय में एक प्रश्न के सभी संभावित उत्तर खोज कर बता सकता है। यानी यह किसी समस्या के हल की करोड़ों संभावनाएं और तरीकों को मिनटों में खंगाल लेता और सभी संभावित उत्तरों को हमारे सामने लाकर रख देता है। इसकी मदद से बड़े से बड़े अंतरिक्ष समीकरणों को मिनटों में हल किया जा सकता है, जिसे पारंपरिक कंप्यूटरों द्वारा हल करने में हजारों साल लग सकते हैं।
क्वांटम कंप्यूटर अधिक तेजी और अधिक कुशलता के साथ तो काम करेंगे ही, इनसे ऐसे काम भी संभव हो पाएंगे, जिनकी अभी हम कल्पना भी नहीं कर सकते। इनकी मदद से कृत्रिम मेधा को तेजी से विकसित किया जा सकेगा। साथ ही इससे मौसम का सटीक पूर्वानुमान लगाना संभव होगा, विश्व भर की खुफिया एजंसियां बड़ी मात्रा में कूट सामग्री को समझने में इसका उपयोग कर सकेंगी। क्वांटम तकनीक से शेयर बाजार का सटीक अनुमान, बेहतर चिकित्सा सेवा, अधिक उत्कृष्ट उत्पादों का निर्माण, सस्ती और नई दवाएं, सौर पैनलों का बड़े पैमाने पर बेहतर निर्माण संभव हो सकेगा। ब्रह्मांड के रहस्यों को सुलझाने में भी इससे मदद मिलेगी। क्वांटम कंप्यूटिंग में डेटा की ‘क्रिप्टोग्राफी’ अधिक सटीक ढंग से होती है, इसलिए इसमें सेंध लगा पाना लगभग नामुमकिन है। क्वांटम कंप्यूटर की कार्य क्षमता पारंपरिक कंप्यूटरों से अधिक होती है, इसलिए इससे एक ही समय में बहुत तेज गति से कई ‘एप्लीकेशन’ चलाए जा सकते हैं। क्वांटम प्रौद्योगिकी से विज्ञान में नई खोजों को बढ़ावा मिलेगा।
लोगों में यह गलत धारणा है कि क्वांटम कंप्यूटर सामान्य कंप्यूटर प्रणाली को समाप्त कर देगा, लेकिन ऐसा नहीं है। वास्तव में क्वांटम कंप्यूटर सामान्य कंप्यूटरों की जगह लेने के लिए विकसित नहीं किए जा रहे, बल्कि इनका निर्माण विशिष्ट प्रकार की गतिविधियों को उच्चतम सटीकता के साथ संपन्न करने के लिए किया जा रहा है। क्वांटम कंप्यूटर कार्बन उत्सर्जन को भी कम करने में मदद करेंगे, क्योंकि इनको बनाने के लिए प्रयुक्त तकनीकें आज के कंप्यूटर में उपयोग किए जाने वाले ट्रांजिस्टर की तुलना में बहुत कम विद्युत का उपयोग करती हैं। क्वांटम प्रौद्योगिकी का उद्देश्य चिकित्सा, वित्त, ऊर्जा, परिवहन, संचार, आपदा प्रबंधन और जलवायु परिवर्तन आदि क्षेत्रों में व्यापक और नवीन प्रगति लाना है, लेकिन इसके उपयोग के कुछ खतरे भी विद्यमान हैं।
अनेक लाभों के बावजूद, क्वांटम प्रौद्योगिकी से राष्ट्रीय सुरक्षा पर प्रतिकूल असर पड़ सकता है। इसकी वजह से साइबर हमलों की संख्या में बढ़ोतरी हो सकती है और डेटा के सुरक्षित हस्तांतरण के लिए भी यह एक बड़ी चुनौती बन सकती है। क्वांटम कंप्यूटर को बनाना भी एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि इसके लिए ‘सुपरपोजिशन’ जैसी प्रक्रिया पर नियंत्रण करना जरूरी होता है, जो कि बहुत मुश्किल काम है। क्वांटम तकनीक से जुड़ी मशीनरियों को संचालित और सुरक्षित रखना बहुत मुश्किल काम है, जिसके लिए कुशल व्यक्तियों की जरूरत पड़ती है, लेकिन अभी ऐसे व्यक्तियों की कमी है। ‘क्यूबिट’ केवल क्रायोजेनिक तापमान पर स्थिर होते हैं, इसलिए क्वांटम कंप्यूटरों को सामान्य अवस्था में नहीं रखा जा सकता। क्वांटम कंप्यूटर बनाने के लिए प्रयुक्त ‘क्यूबिट तकनीक’ शोर और अन्य बाहरी दखल के प्रति बहुत संवेदनशील होती है, इसलिए क्वांटम कंप्यूटर द्वारा की गई गणना में त्रुटियों की संभावना रहती है। क्यूबिट का जीवनकाल अल्पकालिक होता है, इसलिए वैज्ञानिकों के लिए इन्हें संभालना बड़ी चुनौती है।
क्वांटम कंप्यूटर सूचनाओं की सुरक्षा करने वाले ‘एनक्रिप्शन टूल्स’ में शामिल आरएसए (जो सबसे मजबूत कवच होता है) को भी भेद सकता है। इसलिए इससे दूसरे देशों की गोपनीय सूचनाओं में सेंध लगने का खतरा बढ़ जाता है। क्वांटम तकनीक से जुड़े अनुप्रयोग काफी खर्चीले होते हैं, इसलिए क्वांटम कंप्यूटर को तैयार करने में भारी निवेश की जरूरत पड़ती है। किसी भी तकनीक के विकास में पर्याप्त संसाधनों और कौशलयुक्त जनशक्ति की आवश्यकता पड़ती है, लेकिन क्वांटम प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अभी इसकी कमी है। अभी अमेरिका, चीन और यूरोप की केवल कुछ बड़ी तकनीकी कंपनियां और कुछ शोध संस्थान इस क्षेत्र में विकास करने में सक्षम हैं, क्योंकि इस प्रौद्योगिकी के लिए जिन विशेषज्ञताओं और उच्च कंप्यूटिंग क्षमताओं की आवश्यकता है, वे सभी के लिए उपलब्ध नहीं हैं।
चीन और अमेरिका जैसे देश बेहतर निवेश के साथ क्वांटम तकनीक के क्षेत्र में अग्रणी देशों में शामिल हैं। भारत को भी क्वांटम तकनीक के क्षेत्र में अग्रणी देशों में शामिल होने के लिए अधिक निवेश के साथ प्रौद्योगिकी को बढ़ावा देने की जरूरत है। भारत में क्वांटम कंप्यूटिंग के विकास हेतु आधारभूत ढांचे और वैज्ञानिकों की जरूरत है। इस क्षेत्र में आगे बढ़ने के लिए भारत सरकार को उपयुक्त रणनीति बनानी और उस पर कार्य करना होगा। क्वांटम कंप्यूटिंग के क्षेत्र में निजी कंपनियों और संस्थाओं को भी आगे आना होगा, तभी भारत इस प्रौद्योगिकी को विकसित करने में सफल हो सकेगा।
Date:30-01-23
मित्र के हाथ थामिए और दोस्त का कंधागोपाल कृष्ण गांधी, ( चिंतक एवं पूर्व राजनयिक )
नसीब, तकदीर, किस्मत- इन तीन में कोई फर्क है? मेरे ख्याल में नहीं। तीनों के मायने एक ही हैं। तीनों अरब मूल के अल्फाज हैं। हम सब रोजमर्रा की मामूली बोली में इन तीनों का इस्तेमाल करते हैं। अगर तीनों का मायना एक ही है, तो फिर तीन अलग-अलग लफ्ज हैं क्यों? कौन जाने? कब नसीब कहूंगा मैं, कब तकदीर और कब किस्मत, यह मैं कह नहीं सकता। बोली के अपने राज होते हैं। अपने मर्म, जुमलों के बनने और बुनने में नसीब की अपनी तकदीर होती है और तकदीर की अपनी किस्मत।
ठीक इसी तरह से हैं दोस्त शब्द के पर्याय- बंधु, यार, साथी, संगी, मित्र और सखा। इन सबों का अर्थ एक ही है : अंग्रेजी में जिसको कहेंगे ‘फ्रेंड’। मुंशी प्रेमचंद की मशहूर कहानी शतरंज के खिलाड़ी में मित्र, यार, दोस्त- इन तीनों का उपयोग हुआ है। बिल्कुल सरल, सहज, उपयोग। पहला उदाहरण है, ‘प्रात:काल दोनों मित्र नाश्ता करके बिसात बिछाकर बैठ जाते’। दूसरा, ‘अरे यार जाना ही पड़ेगा हकीम के यहां’। तीसरा, ‘दोनों दोस्तों ने कमर से तलवारें निकाल लीं’।
उदाहरण एक और तीन में प्रेमचंद बोल रहे हैं, हम उनकी आवाज सुन रहे हैं। उनका शब्द चयन देख रहे हैं। इस चयन में एक स्वाभाविक तरीका, तर्क है, क्योंकि उदाहरण एक में वाक्य ‘प्रात:काल’ से आरंभ होता है, उसमें ‘मित्र’ उपयुक्त है। उदाहरण तीन में रोज की बोली हिन्दुस्तानी सुनी जाती है, इसमें ‘दोस्त’ ज्यादा मुनासिब बनता है। उदाहरण दो लेखक की नहीं, कहानी के पात्र मिरजा साहिब की जबान में है, जिसमें ‘यार’ बिल्कुल जमता है। पान में कत्थे की या चिलम में तंबाकू की तरह एक ही मायने के तीन शब्दों का प्रेमचंद ने तीन-तीन संदर्भों में, तीन-तीन प्रसंगों में अलग-अलग उपयोग पर्यायवाची शब्दों में किया है। हरेक पर्याय अपना स्वायत्त और स्वतंत्र स्वरूप दिखाता है। अपने मायने की आजाद रूह पेश करता है।
मित्र, दोस्त और यार हैं पर्याय, लेकिन वे ‘ट्रिप्लेट्स’ नहीं हैं। बंधु भी उनका संगी है। उन चारों के चेहरे एक से हैं, लेकिन उनके मनोभाव भिन्न हैं, मनोधर्म भिन्न, उनके स्वरों की श्रेणी एक है, लेकिन उनके सुर अलहदा। वे एक-दूसरे की जगह नहीं ले सकते। वे आपस में बदले नहीं जा सकते। उनकी अपनी-अपनी पहचान है। अपनी-अपनी छाप है।
मित्र के संबंध में एक ऊंचाई होती है। एक औपचारिकता ही कहिए, इसका मतलब नहीं कि मित्र से घनिष्ठता नहीं हो सकती। अवश्य हो सकती है और होती है, लेकिन उस घनिष्ठता में भी एक ‘वह’ बात होती है, जिसको हम आदर देते हैं, जिसको हम हृदय से ‘मानते’ हैं। उनकी कही को ध्यान से सुनेंगे, उनकी बात को काटेंगे नहीं। उनके आने पर अगर हम उठकर नमस्कार चाहे न भी करें, तब भी उनके आगे टांग फैलाकर बेपरवाही या लापरवाही का परिचय न देंगे। संबोधन में मित्र ‘आप’ के पात्र होते हैं और उस ‘गा’ के, जिसका आजकल कम उपयोग होता है। मेरा मतलब ‘आइएगा’, ‘कहिएगा’, ‘देखिएगा’ से है। आइए और आइएगा में वही अंतर है, जो दूध और खीर में होता है। मैत्री की खीर में रीति-रिवाज की पिसी इलायची मिलेगी। उसमें रस्मों के बादाम और सत्कार के पिश्ते मिलेंगे, और यह भी कह दूं : उसकी शिष्टताओं में सुगंधित केसर की बारीक परत भी पाई जाएंगी। मित्र हमें धन्य करते हैं। गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर और महात्मा गांधी मित्र थे। गुरुदेव ने गांधी को महात्मा और गांधी ने विश्वकवि को गुरुदेव की उपाधि से ही संबोधित किया था और कुछ कहने की आवश्यकता नहीं।
और दोस्त? दोस्त के रिश्ते में एक हल्काई होती है, ढील नहीं, ढीली गांठ की बेपरवाही नहीं, पर एक मुस्कराती अनौपचारिकता। मित्र आते हैं, दोस्त आता है। मित्र बात करते हैं, दोस्त बोलता है। मित्र के साथ हंसी होती है, दोस्त के साथ मजाक। मित्र का हाथ थामा जा सकता है, दोस्त का कंधा। मित्र की आयु कुछ ऊंची होती है। बच्चों के भी दोस्त होते हैं। रुक्मिणी बनर्जी की किताब है, मेरे दोस्त (प्रथम प्रकाशन)। उसका वाक्य सुनिए, ‘मेरे बहुत से दोस्त हैं। मुझे वे सभी अच्छे लगते हैं, पर उनमें से एक सबसे प्यारा है!’ मित्र प्रिय होते हैं, दोस्त प्यारे। दिल की बात दोनों से होती है और उसके दौरान आंसू भी बह सकते हैं, लेकिन अगर मित्र के साथ ऐसा हुआ, तो रुमाल ढूंढ़िएगा। दोस्त के साथ आस्तीन चलेगी।
यार? यार समझिए प्यार का संक्षेपाक्षर है। हिंद को उर्दू का तोहफा है। उस लफ्ज के लिए कुछ भी कहना अनावश्यक है, इसलिए कि उसकी आत्मा को, उसके अंतस को मन्ना डे ने 1993 की फिल्म जंजीर में अमर कर दिया। अमिताभ बच्चन और प्राण, दोनों साथ गाते हैं- यारी है ईमान मेरा, यार मेरी जिंदगी। जिन्होंने यह गीत नहीं सुना, उन्हें जरूर सुनना चाहिए। कभी न भूलेंगे। अगर दोस्त के सामने अपने आंसू को पोछने के लिए अपनी खुद की आस्तीन चलेगी, तो यार के साथ उसका गिरेबां हाजिर होगा।
इन सब पर्यायवाची शब्दों में मेरा प्रिय शब्द है- बंधु। इसमें मित्र, दोस्त, यार सब मिल जाते हैं और मिलकर एक नई बात कहते हैं। उदाहरण के लिए, ‘निराला’ का अनुपम गान, बांधो न नाव इस ठांव बंधु…। बंधु व्यक्ति भी है और भावना भी, इंसान भी है और नियम भी। एकवचन और बहुवचन भी। बंधन से जुड़ा है बंधु, लेकिन उस बंधन से, जिसमें तार-तंतु की खींच नहीं, रस्साकशी का तनाव नहीं। सिर्फ एक जोड़ है, जो स्वर-व्यंजन के युग्म में है। महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’ अपनी दिवंगत पत्नी की याद में बंधु को संबोधित कर रहे हैं। अपने दिल की सबसे गहरी गुफा में बैठकर लिख रहे हैं वह बात, जो कि ‘सब’ के लिए नहीं, सिर्फ अपनी पत्नी के लिए है और अपने बंधु के लिए, जो उस क्रिया में अपनी पत्नी का भी बंधु बन जाता है।
बंधु अंतरात्मा है, अंतरात्मा बंधु। पाठक को यह लगेगा और ठीक ही लगेगा कि क्या इस मित्र-बंधु लोक में महिला का स्थान नहीं? है कैसे नहीं, है, मित्र की आत्मा मैत्री है। सखी, सहेली वह सब है, जो मैंने इन पर्यायवाची शब्दों में दर्शाने की कोशिश की है। महीयसी महादेवी वर्मा और सुभद्राकुमारी चौहान की मैत्री चिर है। उनकी दोस्ती अमर है। आत्मा और जमीर का अगर चित्र बनाती हैं महीयसी, तो वह औरत के रूप में और अंतरात्मा को दीपशिखा के रूप में।
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सरकार ने हाल ही में घोषणा की है कि वह कोविड महामारी के दौरान शुरू की गई मुफ्त-अन्न योजना अर्थात पीएम गरीब कल्याण अन्न योजना को बंद करेगी। इसके बदले वह सार्वजनिक वितरण प्रणाली या पीडीएस योजना को फिर से शुरू करेगी। सरकार के इस निर्णय पर विश्लेषकों की अलग-अलग राय है। कुछ का मानना है कि इससे सरकार के खाद्य सब्सिडी बिल में कमी आएगी। हालांकि बारीकि से देखने पर लगता है कि इस घोषणा से सरकार की राजकोषीय संकीर्णता और कृषि नीति की दिशा पर सवाल खड़े हो सकते हैं। आइए, इन मुद्दों को जानने का प्रयास करते हैं।
महामारी का प्रभाव –
महामारी के दौरान, सरकार का राजकोषीय घाटा बढ़ गया था, क्योंकि राजस्व गिर गया था। खर्च करने की आवश्यकता बढ़ गई थी। अर्थव्यवस्था के महामारी के दौर से उबरने के बाद भी राजकोषीय घाटा बढ़ा हुआ है। केंद्र और राज्यों का कुल घाटा लगभग 10% होने की संभावना है। जी-20 समूह के देशों में यह सबसे ज्यादा है। अकेले केंद्र का घाटा, जीडीपी का 6.4% होने का अनुमान है। इतना ऊंचा राजकोषीय घाटा उचित नहीं है। इसलिए अर्थशास्त्रियों को उम्मीद है कि आगामी बजट में समेकन (कन्सॉलिडेशन) का एक ऐसा पथ प्रस्तुत किया जाएगा, जो मध्यम अवधि में घाटे को कम करेगा।
समस्या की जड़ कहाँ है?
हाल में की गई घोषणा इस तस्वीर में कहाँ फिट बैठती है, इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए कुछ पृष्ठभूमि जरूरी है।
एक नजर में तो सरकार की यह घोषणा राजकोषीय बचत वाली दिखाई पड़ती है, क्योंकि यह गरीबों की मदद के साथ खाद्यान्न सब्सिडी बिल को कम कर देगी। लेकिन क्या सचमुच ऐसा है?
घोषणा से बढता बोझ –
अच्छी राजनीति, खराब अर्थ-प्रबंधन (कुछ प्रश्न) –
कुछ लोगों का तर्क हो सकता है कि यह घोषणा और कार्ययोजना अच्छा उपाय है, क्योंकि सरकार गरीबों की मदद कर रही है। लेकिन नए कार्यक्रम में देश की 80 करोड़ जनसंख्या शामिल होगी। तो क्या, देश की आधे से अधिक जनसंख्या गरीब है? जो जनसंख्या अपने लिए अभी तक अनाज का मूल्य दे सकती थी, उसके लिए सरकार मुफ्त खाद्यान्न योजना क्यों चलाना चाहती है?
आगामी केंद्रीय बजट में मध्यम अवधि में राजकोषीय घाटे को पूरा किया जाना ही महत्वपूर्ण बिंदु था। अब यह मुश्किल लगता है, क्योंकि ब्याज भुगतान, मजदूरी, रक्षा आदि महत्वपूर्ण मदों पर व्यय कम नहीं किया जा सकता है। सरकार की इस घोषणा ने सिद्ध किया है कि यह वोट की राजनीति के लिए अच्छा हो सकता है, परंतु आर्थिक पक्ष के लिए अच्छा नहीं है।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित राजेश्वरी सेनगुप्ता के लेख पर आधारित। 2 जनवरी, 2023
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Date:28-01-23
Founding idealsAdherence to basic principles of the Constitution is what unifies IndiaEditorial
In her first and customary Republic Day address to the nation, President Draupadi Murmu reiterated the founding ideals of the Republic on the eve of the 74th anniversary of the adoption of its Constitution. As the first tribal woman to occupy the highest office in the country, the 15th President of India is emblematic of the Republic’s continuing journey of democracy, pluralism and empowerment of the weaker sections. The values of fraternity and democracy that its founding leaders etched into the genetic makeup of the modern nation were derived from the learnings of an ancient civilisation. Ms. Murmu underscored this quality of the Republic — the amalgamation of the old and the new, the traditional and the modern. A unified and unifying struggle against British imperialism, as the President noted, was “as much about winning Independence as about rediscovering our own ideals”. Ms. Murmu laid emphasis on the “essence of India” — which is profound and predictable at once. “We have succeeded… because so many creeds and so many languages have not divided us, they have only united us.” A commitment to this creed has sustained the modern nation, and the long and ancient civilisation that evolved and reformed over millennia.
It can be argued that the Republic is continuously in formation, as thoughts and ideas emerge. As new ambitions inspire the country, some foundational principles must remain the timeless codes for survival and success. Ms. Murmu’s address reiterated those, while celebrating India’s successes in various fields, particularly the economy. While noting India’s emergence as an influential leader in global affairs, she underscored the principles of Sarvodaya and Atmanirbhar Bharat — uplift of all, and self reliance — which are guiding the government as they have the earlier ones. Oppression and debilitating poverty continue to shackle vast sections, and India must constantly remember this fact, and certainly on occasions when it reflects on its progress. At various points, challenges to the ideals of the Constitution and the national movement arose in the form of political authoritarianism, sectarian extremism, and separatism, but India overcame them — a reason for satisfaction but also a call for constant vigil. Ms. Murmu’s reiteration of the founding principles of the Republic, and her reassurance to fellow citizens come at time when the sanctity of the Constitution is under attack. While debate about the Constitution is also part of the democracy it establishes, adherence to its basic principles is what unifies the people of India. Ms. Murmu made that point.
Date:28-01-23
India’s groundwater governance is in better shapeThe government’s interventions for better and scientific management of the groundwater situation in India reflect the spirit of cooperative federalism in managing a precious resourceSubodh Yadav is Joint Secretary, Department of Water Resources, River Development and Ganga Rejuvenation, Ministry of Jal Shakti, Government of India
Data show that India, with nearly 18% of the world’s population, occupies about 2.4% of the total geographical area and consumes 4% of total water resources. A World Bank report says that India is the largest groundwater user. A rapidly growing economy and population are straining the country’s groundwater resources.
As a vast country, India has distinct and varying hydro-geological settings. Groundwater is the backbone of India’s agriculture and drinking water security in rural and urban areas, meeting nearly 80% of the country’s drinking water and two-thirds of its irrigation needs. Groundwater is pivotal to India’s water security. The fact that the theme of UN World Water Day 2022 was ‘Groundwater, Making the Invisible Visible’ is a reflection of the importance given to the resource across the globe.
The central government is working to achieve the goal of sustainable groundwater management in collaboration with States and Union Territories. In this process, certain important deliverables have been identified that include a reduction in groundwater extraction to below 70%, increasing the network of groundwater observation wells, installing digital water level recorders for real-time monitoring, periodic monitoring of groundwater quality, aquifer mapping and data dissemination, having better regulation of groundwater extraction by industries, and promoting participatory groundwater management and even periodic groundwater resource assessment.
In May 2019, a much-needed step of policy reform was done under the leadership of the Prime Minister with the creation of Jal Shakti Ministry (a merger of the erstwhile Ministries of Water Resources, River Development and Ganga Rejuvenation along with Drinking Water and Sanitation). This was to give impetus to the management of water resources with special focus on demand and supply management. Realising the importance of community participation, the Jal Shakti Abhiyan was launched subsequently to transform Jan Shakti into Jal Shakti through asset creation, rainwater harvesting (‘Catch the Rain’ campaign) and extensive awareness campaign.
A scientific approach
Initiatives have also been taken for the effective management and regulation of groundwater, examples being the Atal Bhujal Yojana (ABY) and the National Project on Aquifer Management (NAQUIM). With the goal of “participatory groundwater management”, ABY looks to inculcate behavioural change made possible by incentivisation. NAQUIM, which is nearing completion, envisages the mapping of sub-surface water bearing geological formations (aquifers) to help gather authentic data and enable informed decision-making. Around 24 lakh square kilometres of the country has been mapped from the available mappable area of nearly 25 lakh sq. km. A heli-borne based survey (state-of-the-art technology), has also been used along with traditional exploratory methods for rapid and accurate aquifer mapping. The remaining area is likely to be mapped by March 2023. Region-wise aquifer management plans are being prepared and shared with States.
There are around 65,025 monitoring stations in India, which include 7,885 automated stations. The numbers are set to go beyond 84,000; in this, the number of automated stations will rise to over 35,000, with a special focus on identified high groundwater extracting industrial and urban clusters and groundwater stressed regions. Besides other quality-related exercises, samples from fixed locations are obtained to check for the presence of heavy and trace metals. Dynamic groundwater assessments will be done annually now and a groundwater estimation committee formed to revise the assessment methodology. A software, ‘India-Groundwater Resource Estimation System (IN-GRES)’, has also been developed.
The completion of groundwater assessment in 2022 in about five months (against the two to three years) shows that a time-bound and scientific approach is being adopted to monitor precious water resources. The findings of the groundwater assessment also indicate a positive inclination in the management of groundwater.
According to the latest assessment, there has been a 3% reduction in the number of ‘overexploited’ groundwater units and a 4% increase in the number of ‘safe’ category units as compared to 2017. There was an improvement in groundwater conditions in 909 units. The assessment also showed a reduction in annual extraction (of about 9.53 billion cubic meters); the data for irrigation, industrial and domestic use, respectively, is 208.49 BCM, 3.64 BCM and 27.05 BCM. Overall extraction saw a declining trend, of about 3.25% since 2017.
Some of this success may be attributed to implementation of comprehensive groundwater guidelines in 2020 for regulation in various sectors and making the processes of issuing a no-objection certificate transparent and time-bound using a web-based application. The government’s interventions in enabling a positive impact on the overall groundwater scenario in India, reflect the spirit of cooperative federalism in managing this precious resource. That around 9.37 BCM of additional groundwater potential was created through artificial water conservation structures is an example of this impact.
Need for source sustainability
As one of the fastest growing economies, India will need adequate groundwater resources to manage anthropogenic pressures. It is important to ensure source sustainability to provide safe drinking water to all rural households by 2024, under the Jal Jeevan Mission.
Communities will have to manage their groundwater resources better with the help of various government agencies and non-governmental organisations. In the context of climate change, as uncertainties will increase with connection with groundwater resources, efforts must be made to find solutions that are essential for sustainable development. The groundwater resource assessment report 2022 shows a brighter future for groundwater situations in the country as the initiatives taken by various governments have begun yielding results. This is a new beginning and steps must be taken to make India a water surplus nation, thus fulfilling the objective of a key United Nations Sustainable Development Goal, of water for all.
Date:28-01-23
एक अच्छे सौदागर की भूमिका निभाना जरूरीसंपादकीय
एक जमाने में भारत आर्थिक मदद या सामरिक साजो-सामान का याचक हुआ करता था। समय के साथ तरक्की हुई। उदार प्रजातान्त्रिक गवर्नेस में विकास की रफ्तार धीमी लेकिन सधी होती है। भारत बदला। आज हम दोस्ती करते हैं तो दूसरा पक्ष खुश होता है कि उसे मजबूत साथी मिला। ऐसा साथी, जो अनाज भी दे सकता है, हथियार भी; निवेश भी कर सकता है और विश्व मंचों पर कूटनीतिक समर्थन भी । मिस्र दुनिया का सबसे बड़ा गेहूं- आयातक है। अरब दुनिया की राजनीतिक स्थिति के मद्देनजर यहां हथियारों की खरीद भी काफी है। घोषित इस्लामिक राष्ट्र होने के बावजूद इस देश की तासीर धार्मिक उदारवाद की रही है हालांकि हाल के दौर में कुछ कट्टरवादी तत्व सिर उठा रहे हैं। पाकिस्तान को छोड़ भारत के मुस्लिम- बहुल देशों, खासकर मिस्र, अमीरात और सऊदी अरब, ईरान के अलावा इजराइल से रिश्ते पारस्परिक भरोसे की बुनियाद पर हैं। लेकिन हमें बहुआयामी संबंधों के विस्तार के साथ यह भी ध्यान देना होगा कि सामान बेचने में अच्छे सौदागर की भूमिका निभाएं। अभी कुछ दिनों पहले भारत से भेजा गया अनाज गुणवत्ता के पैमानों पर रोकना पड़ा। चीन के मुकाबले वैश्विक निर्यातक बनने की पहली शर्त है व्यापार में नैतिक मजबूती, ताकि गुणवत्ता पर सवाल न उठे । वहीं दूसरी शर्त है, अपने उत्पादों की लागत कम करना होगा ।
Date:28-01-23
जातियों की गिनती से निति निकलेगी , राजनीति नहींअभय कुमार दुबे अम्बेडकर विवि, (दिल्ली में प्रोफेसर)
बिहार ने जातियों की गिनती शुरू कर दी है। कई दूसरे प्रदेश भी ऐसा करने के इरादे की घोषणा कर चुके हैं। हो सकता है वहां भी जल्द ही जातियों की गणना प्रारम्भ हो जाए। इस कवायद का यह केवल एक तकनीकी पहलू है कि बिहार द्वारा शुरू की गई इस प्रक्रिया को जनगणना कहा जाए या जातियों का सर्वेक्षण। कानूनन जनगणना का अधिकार केवल केंद्र सरकार के पास है। इसलिए अगर कोई राज्य इस तरह की गणना करवाता है तो उसे औपचारिक रूप से इसे सर्वेक्षण कहना होगा। लेकिन व्यावहारिक दृष्टि से देखा जाए तो इसमें और केंद्र द्वारा करवाई जाने वाली जनगणना में कोई खास अंतर नहीं है।इसमें भी तकरीबन वे सभी सवाल पूछे जाने हैं, जो राष्ट्रीय जनगणना के दौरान पूछे जाते हैं। फर्क केवल इतना होगा कि गिनती करने के बाद यह प्रक्रिया बता देगी कि किस जाति के पास कितनी शिक्षा, नौकरियां, आमदनी आदि है। राष्ट्रीय जनगणना केवल अजा-जजा के बारे में ऐसे आंकड़े बताती है। बिहार की गणना सभी जातियों के बारे में तस्वीर साफ कर देगी। इस लिहाज से देखें तो यह कवायद आबादी के आर्थिक-सामाजिक हालात की जातिवार तस्वीर पेश करेगी।
लेकिन क्या जातिगत गिनती का मकसद यही है? अन्य पिछड़ा वर्ग के नेताओं, पार्टियों और बुद्धिजीवियों का घोषित-अघोषित विचार है कि जैसे ही जातियों की संख्या की प्रामाणिक जानकारी मिलेगी, राजनीति का खेल बदल जाएगा। उन्हें पिछड़ी जातियों की एकता और गोलबंदी का ऐसा प्रबल तर्क मिल जाएगा, जिससे वे सत्ता की होड़ को गहराई से प्रभावित कर सकेंगे। संक्षेप में कहें तो वे एक बार फिर नए सिरे से सत्ता हथिया लेंगे और राजनीतिक क्षितिज पर अंतिम रूप से पिछड़ों का कभी न अस्त होने वाला सूर्योदय हो जाएगा। दरअसल जातियों की गिनती कराने के माध्यम से पैदा होने वाले बहुसंख्या के एहसास का इस्तेमाल करके राजनीति को हमेशा-हमेशा के लिए अपने पक्ष में झुका लेने का यह बहुसंख्यकवादी सपना कोई पहली बार नहीं देखा जा रहा है। यूपी में भाजपा राजनाथ सिंह के नेतृत्व में हुकुम सिंह कमेटी के जरिए एक बार इस तरह की आधी-अधूरी कोशिश कर चुकी है। कर्नाटक में कांग्रेस सिद्धरमैया के नेतृत्व में यह प्रयास कर चुकी है। दोनों ही कोशिशों के इच्छित परिणाम नहीं निकले।
आज की स्थिति यह है कि पिछड़ी जातियों की अलग से गोलबंदी करके स्थायी जातिगत बहुमत बनाने की रणनीतिक योजना में हिंदुत्ववादी राजनीति की सफलता ने पलीता लगा दिया है। हिंदुत्ववादी शक्तियां शुरू से ही हिंदू समाज में कर्मकांडीय रूप से शूद्र कही जाने वाली जातियों को द्विज समझी जाने वाली जातियों के साथ जोड़ने के लक्ष्य के लिए काम करती रही हैं। संघ के दूसरे सरसंघचालक गुरु गोलवलकर की बातों पर गौर करें तो स्पष्ट हो जाता है कि वे बार-बार क्यों शूद्रों को दबे हुए, शोषित और कमतर हैसियत वाले समाज के रूप में देखने का विरोध करते हैं। वस्तुत: अपने आग्रह को धरती पर उतारने के लिए साठ और सत्तर के दशकों में दीनदयाल उपाध्याय ने जनसंघ में अगड़ी जातियों के नेताओं को उच्च पदों से हटाकर पिछड़े नेताओं को बैठाने की नीति अपनाई थी। वे संदेश देना चाहते थे कि हिंदुत्ववादी राजनीति में पिछड़ी जातियों को समान धरातल प्राप्त होगा। इसमें करीब साठ साल लग गए। इसे पिछड़ी जातियों तक पहुंचाने में नब्बे के दशक के बाद पिछड़ों के बीच प्रभुत्वशाली समुदायों के उदय की परिघटना ने भी योगदान किया। जैसे-जैसे कमजोर संख्याबल के कारण आरक्षण व सत्ता के लाभों से वंचित समुदायों की आंखों में ये प्रभुत्वशाली समुदाय खटकने शुरू हुए, वैसे-वैसे हिंदुत्ववादी तर्क उनके गले उतरना शुरू हो गया। परिणाम अगड़ी जातियों के साथ पिछड़ों के एक हिस्से के समीकरण के रूप में निकला। इसने 45 से 50 फीसदी की हिंदुत्ववादी राजनीतिक एकता तैयार की। अगड़ी-पिछड़ी गोलबंदी ने अप्रभुत्वशाली पिछड़ी जातियों और मुसलमान वोटरों की एकता को पराजित कर दिया। पिछड़े समुदायों को ब्राह्मण-बनिया पार्टी कहलाने वाली भाजपा में सत्ता-सुख मिल रहा है। पिछड़ों की संख्या का प्रामाणिक आंकड़ा भी आ जाए तो ब्राह्मणवाद के खिलाफ फिकरेबाजी पहले-सी असरदार होने की सम्भावनाएं नहीं हैं। बिहार की जातिगत गणना से समतामूलक नीति-निर्माण की दिशा में कुछ न कुछ प्रगति ही होगी। लेकिन इससे राजनीति की चलती धारा में कोई परिवर्तनकारी हस्तक्षेप नहीं किया जा सकेगा।
Date:28-01-23
सिंधु जल समझौतासंपादकीय
एक ऐसे समय जब पाकिस्तान भारत से संबंध सुधारने का अनुरोध कर रहा है और शंघाई सहयोग संगठन की बैठक में भाग लेने के लिए पाकिस्तानी विदेश मंत्री को आमंत्रण भेजा गया है, तब यह प्रश्न उठ सकता है कि उसे सिंधु जल संधि में संशोधन के लिए नोटिस क्यों दिया गया? वास्तव में प्रश्न यह होना चाहिए कि यह काम पहले क्यों नहीं किया गया? सिंधु जल समझौता 1960 में हुआ था। दोनों देशों के बीच तनाव, विवादों और यहां तक कि युद्धों के बीच भी यह संधि जारी रही तो भारत की उदारता और अंतरराष्ट्रीय समझौते के प्रति प्रतिबद्धता के कारण। पाकिस्तान ने भारत की इस उदारता को न केवल हल्के में लिया, बल्कि वह इस संधि के प्रविधानों की अनदेखी कर अनावश्यक आपत्तियां भी उठाता रहा। सिंधु जल समझौते में यह स्पष्ट है कि भारत सिंधु क्षेत्र की उन नदियों के पानी का उपयोग परिवहन, बिजली, कृषि आदि के लिए कर सकता है, जिनका पानी पाकिस्तान को जाता है। इसके बाद भी पाकिस्तान ने झेलम और चिनाब नदी पर निर्माणाधीन जलविद्युत परियोजनाओं पर आपत्ति जताने का सिलसिला कायम रखा। माना जाता है कि भारत ने पाकिस्तान के इसी रवैये से आजिज आकर सिंधु जल समझौते को संशोधित करने के लिए उसे नोटिस जारी किया है। इसके तहत उसे 90 दिनों के अंदर बातचीत की प्रक्रिया में शामिल होना होगा। कहना कठिन है कि पाकिस्तान ऐसा करता है या नहीं और यदि वह सहयोग नहीं करता तो भारत क्या निर्णय लेगा? भारत का फैसला कुछ भी हो, इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि सिंधु जल समझौते से पाकिस्तान ही लाभ की स्थिति में है और इसके बाद भी वह भारत के प्रति अपने शत्रुवत व्यवहार का परित्याग करने के लिए तैयार नहीं। इसका प्रमाण किशनगंगा और रातले जलविद्युत परियोजनाओं पर उसकी आपत्तियों से चलता है।
यह सही है कि सिंधु जल समझौता विश्व बैंक की देखरेख में हुआ, लेकिन इसका यह अर्थ नहीं कि भारत तब भी उससे बंधा रहे, जब उसे हानि उठानी पड़ रही हो। भले ही यह कहा जाता हो कि विश्व बैंक की भागीदारी वाले सिंधु जल समझौते को भारत अपनी ओर से रद नहीं कर सकता, लेकिन अंतरराष्ट्रीय नियम-कानून इसकी अनुमति भी देते हैं। उन स्थितियों में और भी, जब पाकिस्तान अपने आतंकी गुटों को भारत के खिलाफ इस्तेमाल करने में जुटा हुआ है। अंतरराष्ट्रीय न्यायालय ने भी कहा है कि यदि मूल स्थितियों में परिवर्तन हो तो किसी भी संधि को रद किया जा सकता है। उचित यह होगा कि भारत एक तो यह सुनिश्चित करे कि सिंधु जल संधि संतुलित रूप में संशोधित हो और दूसरे, पाकिस्तान से दो टूक कहे कि यदि वह आंतकवाद को पालना-पोसना बंद नहीं करता तो उसके लिए इस संधि पर कायम रहना कठिन होगा।
Date:28-01-23
अनधिकार अधिकारसंपादकीय
जांच एजंसियां अपने दायरे को भूल कर अगर अनावश्यक रूप से सक्रिय हो उठें, तो उन पर स्वाभाविक ही सवाल उठते हैं। प्रवर्तन निदेशालय की सक्रियता को लेकर भी काफी समय से सवाल उठ रहे थे कि वह अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर काम कर रहा है। अब दिल्ली उच्च न्यायालय ने उसकी सीमा रेखा बता दी है। अदालत ने कहा है कि प्रवर्तन निदेशालय को केवल धनशोधन संबंधी मामलों में कार्रवाई का अधिकार है। वह अनुमान के आधार पर कोई मामला तय नहीं कर सकता। अगर किसी मामले में अनुमान के आधार पर कार्रवाई की गई है, तो उस पर संबंधित अधिकारियों को कानून के तहत सुनवाई करनी होगी। दिल्ली उच्च न्यायालय ने यह आदेश जिन याचिकाओं की सुनवाई करते हुए दिया है, उनमें धनशोधन को लेकर कोई तथ्य प्रकट नहीं था, यहां तक कि सीबीआइ ने भी ऐसा तथ्य उजागर नहीं किया था। धनशोधन अधिनियम के तहत प्रवर्तन निदेशालय को एक करोड़ या इससे ऊपर के मामलों में ही जांच का अधिकार है, मगर उसने दूसरे विभागों के अधिकार क्षेत्र में अनिधकार प्रवेश कर बहुत सारे मामलों की जांच की है। इसका नतीजा यह है कि उनमें से बहुत कम मामलों में मुकदमा दर्ज हो सका है, बाकी मामलों को बिना किसी फैसले के छोड़ना पड़ा।
दिल्ली उच्च न्यायालय के इस आदेश से बहुत सारे लोग इसलिए संतोष अनुभव कर रहे हैं कि पिछले कुछ सालों में प्रवर्तन निदेशालय ने अनेक ऐसी जगहों पर छापे मारे, जहां उसे जाने की जरूरत नहीं थी। कई जगहों पर उसने आय से अधिक संपत्ति के मामलों में भी दखल दी, सिर्फ इस अनुमान के आधार पर कि वहां धनशोधन से जुड़ा मामला हो सकता है। पीएम मोदी का पुराना ट्वीट शेयर कर अभिनेता ने पूछा- कौन है झूठा?, मिले ऐसे जवाब कौन है देश का अब तक का सबसे बेहतरीन प्रधानमंत्री? जानिए क्या है लोगों की पसंद अगर आज हो जाए लोकसभा चुनाव तो कितनी सीटें जीतेगी भाजपा? एनडीए सरकार के काम से कितना खुश लोग दिल्ली उच्च न्यायालय ने इस मामले में स्पष्ट कर दिया है कि अगर दूसरी जांच एजेंसियों को कोई ऐसा मामला हाथ लगता है, तो वे उसे सौंप सकती हैं, इसी तरह अगर प्रवर्तन निदेशालय को कोई ऐसा तथ्य हाथ लगता है, जो दूसरी एजंसियों के अधिकार क्षेत्र में आता है, तो वह उन्हें सौंप देगा, न कि खुद उन पर कोई फैसला करेगा। इससे पहले सर्वोच्च न्यायालय ने भी प्रवर्तन निदेशालय के जब्ती, गिरफ्तारी जैसे अधिकारों को उचित ठहराते हुए उसके अपने दायरे में रह कर काम करने के अधिकार को रेखांकित किया था, पर उसकी सक्रियता में कमी नहीं आई। इसलिए दावा करना मुश्किल है कि दिल्ली उच्च न्यायालय के आदेश से वह कितना सबक लेगा।
दरअसल, पिछले कुछ सालों में जिस तरह सीबीआइ, प्रवर्तन निदेशालय और आयकर विभाग ने लक्ष्य करके कई लोगों पर छापे डाले, उससे यह कहा जाने लगा था कि ये एजंसियां सरकार के इशारे पर काम कर रही हैं। इस तरह वे अपने दायरे से बाहर जाकर भी काम कर रही हैं। उनका मकसद मामले की जांच करने से अधिक लोगों को परेशान करने का है। हालांकि ये आरोप नए नहीं हैं, सभी सरकारों पर ऐसे आरोप लगते रहे हैं। मगर जब कार्रवाइयों में बदले की भावना अधिक बढ़ जाती है, तो उन्हें लेकर आक्रोश फूटता ही है। इसे लेकर सर्वोच्च न्यायालय में गुहार लगाई गई थी। मगर ऐसी गुहारों पर प्रवर्तन निदेशालय या दूसरी जांच एजेंसियों के कानूनी अधिकार सीमित नहीं किए जा सकते। पर कानून इस तरह उन्हें यह अधिकार भी नहीं देता कि वे अपनी मर्जी से किसी के खिलाफ कार्रवाई कर उसे बदनाम और परेशान करें या किसी तरह का अनावश्यक दबाव बनाएं। प्रवर्तन निदेशालय के लिए दिल्ली उच्च न्यायालय का ताजा आदेश एक सबक है।
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28 January 2023
प्रश्न–395 – जैव विविधता पर सन् 2022 में आयोजित मान्ट्रियल सम्मेलन एक क्रांतिकारी पहल थी। क्या आप इससे सहमत हैं? अपने पक्ष में तथ्य प्रस्तुत करें। (200 शब्द)
Question–395 – The Montreal Conference on Biodiversity held in 2022 was a revolutionary initiative. Do you agree with this? Substantiate your point of view. (200 words)
नोट : इसका उत्तर आपको हमें नहीं भेजना है, यह आपके स्वयं के अभ्यास के लिए है।
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Date:26-01-23
Open SesameBharOS makes it possible to break the stranglehold of Android. It requires supportTOI Editorials
A technology incubation ecosystem in IIT-Madras has developed a mobile phone operating system (OS) with the help of GoI funding. Named BharOS, it represents an important milestone in India’s technological evolution. An OS is a software that runs the phone. BharOS is the second big attempt by GoI-funded scientists to crack open the OS market. Last time, BOSS GNU/Linux was developed by C-DAC for desktops. Developing an OS is an impressive achievement. But commercialising it is perhaps harder because of the business model driving Big Tech.
Google’s Android OS, the dominant software among smartphones, runs more than 3 billion handsets. Most potential competitors such as BharOS are referred to as ‘Android Forks’ as they are modified versions of Android. The source code for Android is free which leads to development of forks. Though forks are a potential threat, they have not displaced Android because of the business model underpinning the rest of the OS ecosystem. An antitrust investigation by the European Commission explained why. In smartphones, application programming interfaces (APIs), which allow different software programmes to communicate, are of critical importance to app developers. Through its proprietary APIs and agreements with handset manufacturers, Google has made it very tough for fork developers to gain commercial viability.
China was a notable exception even though its ecosystem developed on forks. However, when Chinese manufacturers such as Huawei went international, they had no alternative but to be a part of the Google ecosystem. Where does that leave BharOS? There are two things going for it. One, the capture of private data by the Android OS model, which has catalysed demand for alternatives. Two, strategic security needs require a parallel system. BharOS comes as a No Default Apps system which means preloading is not possible. It also has automatic updates, which weave in the latest security patches and bug fixes.
At the moment, BharOS is targeting closed user groups and is working with government and strategic agencies. Its features suit these organisations as they require an OS which protects transmission of sensitive information. Commercialisation, however, may not achieve scale unless the regulators across the world find effective ways of prising open the OS ecosystem. That process has gathered momentum. For the moment, however, BharOS represents a milestone that can gain traction because of a large domestic market.
Date:26-01-23
Make Rural Health Jobs More AlluringET Editorials
Rural Health Statistics 2021-22 presents a dismal picture of India’s state of healthcare. Community healthcare centres (CHC) have a staggering paucity of medical staff — 83% shortage of surgeons, 82% of paediatricians and 79% of general physicians. Operation theatres, X-ray facilities and laboratories remainnon-functional as required facilities and personnel are missing for the most part. This is truly a scandal in a country aiming first-world credentials one day. A functioning healthcare system requires infrastructure and facilities, qualified personnel — doctors, nurses, support staff — and regular medical supplies. On each count, the rural health system fails spectacularly. If India is serious about reaping the demographic dividend, it must invest in building and maintaining a robust healthcare system in the much patronised ‘Bharat’ tracts of India.
The three-tier system — health sub-centres (SC), primary healthcare centres (PHC) and CHCs — is characterised by paucity and absenteeism. Ensuring that each level of healthcare is staffed will require providing incentives, making it a condition of admission, or a requirement to access freeships and scholarships. All SCs and PHCs have a general practitioner, auxiliary nurse/midwife and healthcare worker. But even on paper, these are understaffed.
More funds, though necessary, are not sufficient alone to fix the problem. A functioning system with strong accountabilities is required to ensure appointed medical staff actually do their job. Fixing this extreme rural-urban disparity will require incentives to get doctors, nurses and technical staff to sign up. A programme that gives a 4-5-year employment contract to young medical graduates and newly retired health practitioners could get healthcare staff to serve in rural areas. Getting teaching hospitals in districts to serve the rural centres is another nudge.
Date:26-01-23
न्याय की परिधिसंपादकीय
देश भर में अदालतों पर मुकदमों के बोझ को लेकर लंबे समय से चिंता जताई जाती रही है। अनेक सुझाव भी सामने आते रहे हैं कि न्यायाधीशों की नियुक्त से लेकर मुकदमों को निपटाने के लिए आधुनिक तकनीकी व्यवस्था जैसे उपायों के जरिए इस समस्या की जटिलता को कम किया जा सकता है। हालांकि आए दिन न्यायाधीशों की नियुक्ति के मामले में अलग-अलग कारणों से बहस चलती रहती है। लेकिन सरकार और न्यायपालिका के बीच अब तक कोई ऐसी सहमति नहीं बन सकी है, जिससे इस गंभीर समस्या का हल निकल सके। अब एक बार फिर कानून मंत्री किरेन रिजीजू ने मुकदमों के अंबार को लेकर चिंता जाहिर करते हुए इसके समाधान के लिए ठोस कदम उठाने की बात कही है। उन्होंने कहा कि देश की विभिन्न अदालतों में करीब चार करोड़ नब्बे लाख मामले लंबित हैं और ऐसे में सरकार और न्यायपालिका को साथ मिल कर काम करना होगा, ताकि तेज गति से न्याय हो सके। इस संदर्भ में उन्होंने प्रौद्योगिकी की भी महत्त्वपूर्ण भूमिका पर जोर दिया।
इसमें कोई दो राय नहीं कि कानून मंत्री की फिक्र न्यायिक क्षेत्र में एक जटिल हो चुकी समस्या को संबोधित है और इसके समाधान के लिए अब केवल चिंता जाहिर करने से आगे सार्थक पहल करने की जरूरत है। सवाल है कि दशकों से यह समस्या अब तक क्यों कायम है! आखिर हमारी न्याय व्यवस्था किस पद्धति, तंत्र और सीमा के तहत काम कर रही है कि मामलों के बोझ से उपजी मुश्किल और जटिल होती गई है? यह बेवजह नहीं है कि मुकदमों पर सुनवाई साल-दर-साल खिंचती रहती है और इस तरह न्याय की उम्मीद भी अपना महत्त्व खोती जाती है। इस संदर्भ में एक मशहूर उक्ति है और खुद कानून मंत्री ने भी यह माना है कि लंबित मामलों का मतलब न्याय में देरी है; न्याय में देरी का अर्थ न्याय से इनकार है। सरकार से लेकर न्यायपालिका में सभी स्तरों पर इस हकीकत से परिचित होने के बावजूद ऐसे किसी हल तक पहुंचना जरूरी क्यों नहीं लगता जो न्यायपालिका और न्याय पर भरोसे को मजबूत करे!
न्यायालयों की कमी को दूर करने के साथ-साथ न्यायाधीशों के खाली पड़े पदों पर नियुक्ति और इसकी प्रक्रिया को लेकर एक सर्वमान्य हल तक पहुंचना एक प्राथमिक जरूरत है। लेकिन इस संबंध में अन्य विकल्पों पर विचार करना भी वक्त का तकाजा है। मसलन, क्या आधुनिक तकनीकी या प्रौद्योगिकी के सहारे कोई ऐसा तंत्र बनाया जा सकता है या इसका इस्तेमाल किया जा सकता है, जिससे मुकदमों के बोझ को कम करने में मदद मिले? विधि आयोग की एक रिपोर्ट में इस बात की सिफारिश की गई थी प्रति दस लाख की आबादी पर कम से कम पचास न्यायाधीशों की जरूरत है। हकीकत यह है कि इतनी आबादी पर सिर्फ सत्रह न्यायाधीश हैं। यह बेवजह नहीं है कि इतनी बड़ी आबादी के बीच आए दिन अदालतों में आने वाले मुकदमे में वक्त पर इंसाफ मिलना तो दूर, सुनवाई के लिए भी लोगों को लंबा इंतजार करना पड़ता है। मुकदमों में कमी लाने के लिए लोक अदालतों का सहारा लेना एक विकल्प जरूर है, लेकिन सवाल है कि न्याय की गुणवत्ता के मद्देनजर कोई नियमित व्यवस्था नहीं होती है तो इस माध्यम से कितनी मदद मिल सकती है! फिलहाल मुकदमों की प्रकृति के मुताबिक उन्हें वर्गों में बांट कर एक समयबद्ध कार्यक्रम के तहत उन्हें निपटाने की कोशिश की जा सकती है। लेकिन दीर्घकालिक हल के लिए न केवल लंबित मामलों में कमी लाने, बल्कि अदालतों में रोज आने वाले मुकदमों को निपटाने के लिए एक सुचिंतित और व्यापक तंत्र को मजबूत करने की जरूरत है।
Date:26-01-23
पहाड़ों पर तबाही की सुरंगेंप्रमोद भार्गव
समूचे हिमालय क्षेत्र में बीते एक दशक से पर्यटकों के लिए सुविधाएं जुटाने के लिए जल विद्युत संयंत्रों और रेल परियोजनाओं की बाढ़ आई हुई है। इन योजनाओं के लिए हिमालयी क्षेत्र में रेल चलाने और छोटी नदियों को बड़ी नदियों में मिलाने के लिए सुरंगें बनाई जा रही हैं। बिजली परियोजनाओं में जो संयंत्र लग रहे हैं, उनके लिए हिमालय को खोखला किया जा रहा है। इस आधुनिक औद्योगिक विकास का ही परिणाम है कि आज हिमालय दरकने लगा है, जिन पर हजारों सालों से बसे लोग अपनी ज्ञान-परंपरा के बूते जीवन-यापन और वहां रहने वाले जीव-जगत की भी रक्षा करते चले आ रहे हैं। अथर्ववेद के ‘पृथ्वी-सूक्त’ में अनेक प्रार्थनाएं हैं। यह सूक्त राष्ट्रीय अवधारणा और ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ की भावना को विकसित, पोषित और फलित करने के लिए मनुष्य को नीति और धर्म से बांधने की कोशिश करता है। मगर हमने विकास के बहाने कथित भौतिक सुविधाओं के लिए अपने आधार को ही नष्ट कर दिया। जोशीमठ इसी अनियोजित विकास की परिणति है।
जब हिमालय के पारिस्थितिकी तंत्र ने धरती को हिलाकर नाजुक बना दिया और घरों में दरारें पड़ने के साथ आधारतल घंस रहा है, तब लोगों को जीवन-रक्षा से जुड़ी सच्चाइयों को क्यों छिपाया जा रहा है? स्थानीय लोगों के विरोध के बावजूद हठपूर्वक पर्यावरण के विपरीत जिन विकास योजनाओं को चुना है, उनके चलते अगर लोग अपने गांव और आजीविका के साधनों को खो रहे हैं, तो ऐसी परियोजनाएं किसलिए और किसके लिए? अब रेल और बिजली के विकास से जुड़ी कंपनियां दावा कर रही हैं कि धरती निर्माणाधीन परियोजनाओं से नहीं धंस रही है, लेकिन किन कारणों से धंस रही है, इसका उनके पास कोई उत्तर नहीं है। केंद्रीय ऊर्जा मंत्रालय के नेशनल थर्मल पावर कारपोरेशन, जो इस क्षेत्र में तपोवन विष्णुगढ़ जल विद्युत परियोजनाओं का निर्माण कर रहा है, उसकी बिजली उत्पादक कंपनी ने पत्र लिखकर दावा किया है कि इस क्षेत्र की जमीन धंसने में उसकी परियोजनाओं की कोई भूमिका नहीं है।
उत्तराखंड में गंगा और उसकी सहयोगी नदियों पर एक लाख तीस हजार करोड़ रुपए की जल विद्युत परियोजनाएं निर्माणाधीन हैं। इन संयंत्रों की स्थापना के लिए लाखों पेड़ काटने के बाद पहाड़ों को निर्ममता से छलनी किया जा रहा है। नदियों पर बांध निर्माण के लिए गहरे गड्ढे खोदकर खंभे और दीवारें खड़ी की जाती हैं। कई जगह सुरंगे बनाकर पानी की धार को संयंत्र के पंखों पर डालने के उपाय किए गए हैं। इन गड्ढों और सुरंगों की खुदाई में ड्रिल मशीनों से जो कंपन होता है, वह पहाड़ की परतों को खाली कर देता है और पेड़ों की जड़ों से जो पहाड़ गुंथे होते हैं, उनकी पकड़ भी इस कंपन से ढीली पड़ जाती है। नतीजतन, तेज बारिश के चलते पहाड़ों के ढहने और हिमखंडों के टूटने की घटनाएं पूरे हिमालय क्षेत्र में बढ़ जाती हैं।
हिमालय में अनेक रेल परियोजनाएं भी निर्माणाधीन हैं। सबसे बड़ी रेल परियोजना उत्तराखंड के चार जिलों (टिहरी, पौड़ी, रुद्रप्रयाग और चमोली) को जोड़ेगी, जिससे तीस से ज्यादा गांवों को विकास की कीमत चुकानी पड़ रही है। छह हजार परिवार विस्थापन के दायरे में आ गए हैं। ऋषिकेश से कर्णप्रयाग रेल परियोजना सवा सौ किमी लंबी है। इसके लिए सबसे लंबी सुरंग देवप्रयाग से जनासू तक बनाई जा रही है, जो 14.8 किमी लंबी है। केवल इसी सुरंग का निर्माण बोरिंग मशीन से किया जा रहा है। बाकी पंद्रह सुरंगों में ड्रिल तकनीक से बारूद लगाकर विस्फोट किए जा रहे हैं। इस परियोजना का दूसरा चरण कर्णप्रयाग से जोशीमठ के बजाय अब पीपलकोठी तक होगा। हिमालय की ठोस और कठोर अंदरूनी सतहों में ये विस्फोट दरारें पैदा करके पेड़ों की जड़ें भी हिला रहे हैं। अन्य जिलों के श्रीनगर, मलेथा, गौचर ग्रामों के नीचे से सुरंगें निकाली जा रही हैं। इनमें किए जा रहे धमाकों से घरों में दरारें आ गई हैं। हिमालय की अलकनंदा नदी घाटी ज्यादा संवेदनशील है। रेल परियोजनाएं इसी नदी से सटे पहाड़ों के नीचे और ऊपर निर्माणाधीन हैं।
दरअसल, उत्तराखंड का मानचित्र बीते डेढ़ दशक में तेजी से बदला है। चौबीस हजार करोड़ रुपए की ऋषिकेश-कर्णप्रयाग परियोजना ने जहां विकास और बदलाव की ऊंची छलांग लगाई है, वहीं इन योजनाओं ने खतरों की नई सुरंगें भी खोल दी है। उत्तराखंड के सबसे बड़े पहाड़ी शहर श्रीनगर के नीचे से भी सुरंग निकल रही है। नतीजतन, धमाकों के चलते डेढ़ से ज्यादा घरों में दरारें आ गई हैं। पौड़ी जिले के मलेथा, लक्ष्मोली, स्वोत और देवली में 771 घरों में दरारें आ चुकी हैं। रेल परियोजनाओं के अलावा यहां बारह हजार करोड़ रुपए की लागत से बारहमासी मार्ग निर्माणाधीन हैं। इन मार्गों पर पुलों के निर्माण के लिए भी सुरंगें बनाई जा रही हैं, तो कहीं घाटियों के बीच पुल बनाने के लिए मजबूत आधार स्तंभ बनाए जा रहे हैं। हालांकि ये सड़कें सेना के लिए अत्यंत उपयोगी हैं। सैनिकों का हिमालयी क्षेत्र में इन सड़कों के बन जाने से चीन की सीमा पर पहुंचना आसान हो गया है। लेकिन पर्यटन को बढ़ावा देने के लिहाज से जो निर्माण किए जा रहे हैं, उन पर पुनर्विचार की जरूरत है।
हिमालय में हाल ही में केन-बेतवा नदी जोड़ अभियान की तर्ज पर उत्तराखंड में देश की पहली ऐसी परियोजना पर काम शुरू हो गया है, जिसमें हिमनद (ग्लेशियर) की एक धारा को मोड़कर बरसाती नदी में पहुंचाने का प्रयास हो रहा है। अगर यह परियोजना सफल हो जाती है, तो पहली बार ऐसा होगा कि किसी बरसाती नदी में सीधे हिमालय का बर्फीला पानी बहेगा।
हिमालय की अधिकतम ऊंचाई पर नदी जोड़ने की इस महापरियोजना का सर्वेक्षण शुरू हो गया है। इस परियोजना की विशेषता है कि पहली बार उत्तराखंड के गढ़वाल मंडल की एक नदी को कुमाऊं मंडल की नदी से जोड़कर बड़ी आबादी को पानी उपलब्ध कराया जाएगा। यही नहीं, एक बड़े भू-भाग को सिंचाई के लिए भी पानी मिलेगा। ‘जल जीवन मिशन’ के अंतर्गत इस परियोजना पर काम किया जा रहा है।
मगर इस परियोजना में जिस सुरंग का निर्माण कर पानी नीचे लाया जाएगा, उसके निर्माण में हिमालय के शिखर-पहाड़ों को खोदकर सुरंगों और नालों का निर्माण किया जाएगा, उनके लिए ड्रिल मशीनों से पहाड़ों को छेदा और विस्फोट से पहाड़ों को शिथिल किया जाएगा। यह स्थिति हिमालयी पहाड़ों के पारिस्थितिकी तंत्र के लिए नया बड़ा खतरा साबित हो सकती है। हिमालय के लिए बांधों के निर्माण पहले से ही खतरा बनकर कई मर्तबा बाढ़, भू-स्खलन और केदरनाथ जैसे प्रलय का कारण बन चुके हैं।
उत्तराखंड भूकंप के सबसे खतरनाक जोन-5 में आता है। कम तीव्रता के भूकंप यहां निरंतर आते रहते हैं। मानसून में हिमाचल प्रदेश और उत्तराखंड के पहाड़ी जिलों में भू-स्खलन, बादल फटने और बिजली गिरने की घटनाएं निरंतर सामने आ रही हैं। उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में बीते सात सालों में एक सौ तीस से ज्यादा बार छोटे भूकंप आए हैं। इन पहाड़ों पर जल विद्युत और रेल परियोजनाओं ने बड़ा नुकसान पहुंचाया है। टिहरी पर बंधे बांध को रोकने के लिए तो लंबा अभियान चला था। पर्यावरणविद और भू-वैज्ञानिक हिदायतें देते रहे हैं कि गंगा और उसकी सहायक नदियों की अविरल धारा बाधित हुई, तो गंगा तो अस्तित्व खोएगी ही, हिमालय की अन्य नदियां भी अस्तित्व के संकट से जूझेंगी। इसलिए जोशीमठ का भयावह जो मानचित्र अब दिखाई दे रहा है, वह और विस्तृत होता चला जाएगा।
Date:27-01-23
संबंधों में नये आयामसंपादकीय
भारत की तीन दिवसीय यात्रा पर आए मिस्र के राष्ट्रपति अब्देल फतह अल–सीसी और प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दोनों देशों के पारंपरिक द्विपक्षीय संबंधों को विस्तार देते हुए रणनीतिक साझेदार का दर्जा दिया है। इस दर्जे के बाद रक्षा और सुरक्षा के क्षेत्र में दोनों देशों के रिश्ते और मजबूत होंगे। भू–राजनैतिक दृष्टि से दोनों देशों के पारस्परिक संबंधों में यह एक नया आयाम जुड़ गया है। मोस्ट फेवर्ड़ नेशन के तहत दोनों देशों के बीच 1978 से ही द्विपक्षीय व्यापार समझौता चल रहा है। रणनीतिक साझेदारी के बाद दोनों देशों के बीच और आर्थिक और सुरक्षा संबंध और मजबूत होंगे। भारत और मिस्र के बीच द्विपक्षीय और वैश्विक मुद्दों पर सहयोग का पुराना इतिहास रहा है। भारत की आजादी के तीन दिन बाद ही दोनों देशों के बीच राजकीय संबंधों की शुरुआत हुई। करीब 7 दशक पहले पं. जवाहरलाल नेहरू ने एशिया की एकता को कायम करने के लिए 1955 में इंड़ोनेशिया के बांडंग में एक सम्मेलन आयोजित किया था‚ जिसमें एशिया और अफ्रीका के 24 देश शामिल हुए थे। इस सम्मेलन में मिस्र के तत्कालीन राष्ट्रपति अब्देल जमाल नासिर ने भी भाग लिया था। आगे चलकर पं. नेहरू ने युगोस्लाविया के राष्ट्रपति जोसिफ टीटो और मिस्र के नेता नासिर के साथ मिलकर गुटनिरपेक्ष आंदोलन की नींव रखी थी। पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी‚ पी.वी. नरसिंह राव‚ आई.के. गुजराल और मनमोहन सिंह मिस्र की यात्रा कर चुके हैं। इसी तरह मिस्र के भी कई राष्ट्रपति भारत की यात्रा पर आए हैं। वर्तमान राष्ट्रपति अल–सीसी को भारत सरकार ने इस बार गणतंत्र दिवस समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया था। उनकी इस यात्रा के दौरान दोनों देशों के बीच पांच समझौते हुए। दोनों देश रक्षा क्षेत्र में आपसी सहयोग बढ़ाएंगे। भारत ने स्वनिर्मित रक्षा उत्पादों के निर्यात के लिए मिस्र को एक बड़े बाजार के रूप में चिह्नित किया है‚ काहिरा भी नई दिल्ली से रक्षा उपकरण खरीदना चाहता है। आतंकवाद दोनों देशों की साझी समस्या है। इस चुनौती से निपटने के लिए दोनों देशों के बीच चर्चा हुई। मिस्र वर्तमान समय में खाद्यान्न की कमी से जूझ रहा है। उसे अपेक्षा है कि संकट में भारत उसका साथ देगा। भारत वसुधैव कुटुम्बकम में विश्वास रखता है। और मुश्किल घड़ी में सभी की मदद करता है।
Date:27-01-23
अच्छी पहलसंपादकीय
गणतंत्र दिवस इस वर्ष ऐसी खबर लेकर आया है, जिसे गणतंत्र का वास्तविक परिचायक माना जा सकता है। यह है न्याय के दरवाजे तक क्षेत्रीय भाषाओं की पहुंच | अब सर्वोच्च न्यायालय के फैसले क्षेत्रीय भाषाओं में भी सबको उपलब्ध होंगे। प्रधान न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़ ने गणतंत्र दिवस से एक दिन पूर्व बुधवार को को उच्चतम न्यायालय की एक ऐसी सेवा शुरू करने की घोषणा की जो गणतंत्र दिवस से संविधान की आठवीं अनुसूची में दर्ज भाषाओं में न्यायालय फैसलों तक आम जनता की पहुंच शुरू कर देगी। प्रधान न्यायाधीश ने कहा कि शीर्ष अदालत बृहस्पतिवार को ई- एससीआर परियोजना के एक हिस्से का क्रियान्वयन शुरू करेगी, जिसके तहत अनुसूची में दर्ज कुछ भाषाओं में फैसलों तक निःशुल्क पहुंच उपलब्ध हो सकेगी। ई-एससीआर (परियोजना) में अभी तक करीब 34,000 निर्णय हैं। इसके अलावा क्षेत्रीय भाषाओं में 1,091 फैसले हैं, जिन्हें गणतंत्र दिवस से मुहैया कराया जाएगा। शीर्ष अदालत सभी अनुसूचित भाषाओं में निर्णय प्रदान करने ‘अभियान’ पर है। संविधान की आठवीं अनुसूची में 22 भाषाएं हैं। इनमें असमिया, बंगाली, गुजराती, हिंदी, कन्नड़, कश्मीरी, कोंकणी, मलयालम, मणिपुरी, मराठी, नेपाली, उड़िया, पंजाबी, संस्कृत, सिंधी, तमिल, तेलुगु, उर्दू, बोडो, संथाली, मैथिली और डोगरी शामिल हैं। प्रधान न्यायाधीश चंद्रचूड़ दो जनवरी को इलेक्ट्रॉनिक सुप्रीम कोर्ट रिपोट्र्स (ई-एससीआर) परियोजना शुरू करने की घोषणा की थी, ताकि वकीलों, कानून के छात्रों और आम जनता को इसके लगभग 34,000 निर्णयों तक मुफ्त पहुंच प्रदान की जा सके। शीर्ष अदालत एनआईसी, पुणे की मदद से एक सर्च इंजन विकसित किया है, जिसमें ई- एससीआर के डेटाबेस में एक खोज तकनीक शामिल है। ई-एससीआर में खोज की सुविधा मुफ्त है । यह परियोजना एक अमूल्य संसाधन का निर्माण करेगी क्योंकि वर्ष 1950 में सर्वोच्च न्यायालय की स्थापना से लेकर आज तक के निर्णय ई – एससीआर और डिजिटल रिपॉजिटरी पर उपलब्ध होंगे। आम जनता अदालती कामकाज की भाषा को लेकर मुगलकाल से ही त्रस्त रही है। तब सारा कामकाज उर्दू और फारसी में ही होता था। अंग्रेजों के आने के बाद यह अंग्रेजी हो गई। सर्वोच्च न्यायालय से हो रही यह शुरूआत कालांतर में अदालती कामकाज को भी हिंदी व अन्य भारतीय भाषाओं तक लाने में मदद करेगी, ऐसी उम्मीद है।
Date:27-01-23
नये भारत की दस्तकहर्ष वर्धन श्रृंगला, ( लेखक पूर्व विदेश सचिव हैं )
देशक्कीसवीं सदी के शुरु आती सालों में दुनिया में जो कुछ बड़ी हलचलें हुई हैं‚ नये घटनाक्रम सामने आए हैं‚ उनसे अंतरराष्ट्रीय संबंध और हैसियत का नया वर्ल्ड ऑर्डर तय हो रहा है। इस दौरान वैश्विक मंदी‚ उच्च महंगाई दर और ऊर्जा व खाद्य संकट का खतरा नया विस्तार पा रहा है। वैश्विक हालात ने सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी) के कदमों और क्लाइमेट एक्शन को खासा धीमा कर दिया है। दुनिया आज पहले से कहीं ज्यादा ध्रुवीकृत है। इसलिए इस बात की आश्वस्ति और मूल्यांकन महत्तवपूर्ण है कि भारत को अब समस्या–समाधानकर्ता और एजेंडा तय करने वाले राष्ट्र के तौर पर देखा जा रहा है। दुनिया के सामने भारत की यह छवि नई और तारीखी तौर पर खासी अहम है।
बात करें राष्ट्रों की बड़ी गोलबंदी और नई साझी सहमति की तो इस लिहाज से जी–20 का मंच बहुत बड़ा है। भारत को जी–20 अध्यक्षता संयोगवश ऐसे समय मिली है‚ जब वह दिसम्बर‚ 2022 के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (यूएनएससी) के अध्यक्ष और शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के अध्यक्ष की जिम्मेवारी भी संभाल रहा है। गौरतलब है प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व में पिछले कुछ वर्षों में भारत की वैश्विक स्थिति ने इसे प्रमुख अंतरराष्ट्रीय भागीदारों‚ क्षेत्रीय वार्ताकारों और विकासशील दुनिया के साथ सार्थक जुड़ाव सुरक्षित करने का माहौल प्रदान किया है। भारत जी–7 में नियमित आमंत्रित सदस्य है‚ जिसमें प्रमुख विकसित राष्ट्र शामिल हैं। हम ब्रिक्स (ब्राजील‚ रूस‚ भारत‚ चीन‚ दक्षिण अफ्रीका) के भी सदस्य हैं‚ जिसमें प्रमुख उभरती अर्थव्यवस्थाएं शामिल हैं। भारत अमेरिका‚ जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ क्वाड का भी हिस्सा है।
एससीओ से भी जुड़ा हुआ है‚ जिसमें रूस‚ चीन और मध्य एशियाई देश शामिल हैं। भारत ने क्षेत्रीय साझेदारों को प्रभावी ढंग से एक साथ जोड़ने का काम भी किया है‚ जैसा कि हाल में यूरोपीय संघ‚ अफ्रीकी संघ‚ दक्षिण पूर्व एशियाई देशों के संघ और मध्य एशियाई राज्यों के साथ हुईं शिखरस्तरीय बैठकों में स्पष्ट हुआ है। बात करें जी–20 की तो उत्तर–दक्षिण से लेकर पूर्व–पश्चिम तक विस्तारित विभाजन एवं मजबूत भू–राजनीतिक ध्रुवीकरण को देखते हुए भारत की अध्यक्षता में कठिन चुनौतियों के साथ ही असाधारण अपेक्षाएं भी शामिल हैं। इन चुनौतियों के बावजूद जो इस क्षण को अद्वितीय बनाता है‚ वह है कि दुनिया इन विभाजनों को पाटने की भारत की क्षमता और कौशल के बारे में पहले से कहीं अधिक आश्वस्त है। इसे प्रधानमंत्री मोदी ने ‘आरोग्यकर‚ आशा और सद्भाव की अध्यक्षता’ कहा है। जी–20 के मंच और इसकी सदारत पर दुनिया की निगाहें टिकी हैं। दिसम्बर के पहले हफ्ते में उदयपुर में भारत की अध्यक्षता में आयोजित पहली शेरपा बैठक में भारत की भूमिका धारणा स्पष्ट देखने को मिली। सदस्य देशों के शेरपाओं ने न केवल भारत की समृद्ध संस्कृति‚ बल्कि देश के डिजिटल और तकनीकी कौशल को भी महसूस किया। स्वाभाविक तौर पर यह मंच अंतरराष्ट्रीय समुदाय भू–राजनीतिक और व्यापक आर्थिक स्तरों पर अनिश्चितताओं को दूर करने के लिए विश्वसनीय उपायों की तलाश करेगा। जी–20 विशिष्ट रूप से ऐसा मंच है‚ जो विकसित और उभरती अर्थव्यवस्थाओं की प्राथमिकताओं को सामने रखने में सहायक है।
गौरतलब है कि जी–7 और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद‚ दोनों ही उस विश्व व्यवस्था की याद दिलाते हैं‚ जो दूसरे विश्व युद्ध के तुरंत बाद दिखी थी। दूसरी ओर‚ जी–20 अन्य प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के साथ जी–7 को समान भागीदार के तौर पर एक मंच पर लेकर आया है। यह अन्य प्रमुख देशों के साथ पी–5 को भी साथ लाया है। इसके अलावा‚ जी–20 प्रक्रिया में आमंत्रितों के रूप में अफ्रीकी संघ‚ नेपैड और आसियान जैसे अंतरराष्ट्रीय और क्षेत्रीय संगठनों की नियमित भागीदारी इसे समावेशी और प्रतिनिधि दोनों बनाती है। बड़ी बात यह है कि अतीत में इस समूह ने वैश्विक महत्व के मुद्दों पर बेहतर परिणाम दिए हैं। कोविड–19 से पैदा हुए संकट के बाद विकासशील देशों के लिए ऋण–निलंबन पहल और बहुराष्ट्रीय कंपनियों के लिए समान कर व्यवस्था पर सहमत होने के इसके हालिया निर्णयों को अच्छी तरह से अपनाया गया है। हालांकि‚ इसकी सफलताओं के बीच कुछ मतभेदों की संभावना भी बनती है‚ और रूस–यूक्रेन संघर्ष के दौरान हमने यह देखा है। यहां जो बात अलग से समझने की है‚ वह यह कि दुनिया जिन तनावों और अनिश्चितताओं का सामना कर रही है‚ उनके लिए दूरदर्शी नेतृत्व और राजकीय कौशल जैसे गुणों की आवश्यकता है।
प्रधानमंत्री मोदी के न्यू इंडिया ने हमारे देश को कोविड–19 महामारी से उबारा है‚ और भारत को वैश्विक परिदृश्य पर उज्ज्वल स्थान में बदल दिया है। यह एक लचीला भारत है‚ जिसने बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक बनने के लिए वापसी की है। यह ऐसा भारत भी है‚ जिसने सबसे कठिन समय में वैश्विक भलाई के लिए अपने संसाधनों और क्षमताओं को साझा करने में संकोच नहीं किया। पीएम मोदी के दृष्टि कोण के तहत भारत की विदेश नीति वसुधैव कुटुम्बकम के हमारे प्राचीन दर्शन ‘विश्व एक साझा भविष्य वाला एक परिवार है’‚ को ध्यान में रखते हुए वैश्विक भलाई के लिए काम करने को लेकर प्रेरित है। महामारी से निपटने के लिए मार्च‚ 2020 में सऊदी अरब द्वारा बुलाई गई जी 20 शिखर बैठक में पीएम मोदी ने ‘जन–केंद्रित वैश्वीकरण’ का आह्वान किया था। इस व्यापक दृष्टि को ध्यान में रखते हुए भारत का प्रयास विश्व स्तर पर योगदान करने के लिए अपनी घरेलू ताकत और उपलब्धियों का लाभ उठाने का रहा है।
स्वाभाविक तौर पर नई चुनौतियों और उम्मीदों के बीच ध्रुवीकरण और तकनीकी संतुलन से बंटी दुनिया में भारत सुनिश्चित करने का प्रयास करेगा कि आने वाले वर्षों में विश्व में समृद्ध एवं समावेशी समाज के साथ एक न्यायसंगत प्रणाली हो। भारत सबसे तेजी से बढ़ने वाली अर्थव्यवस्था है‚ जिसके पास मजबूत मैक्रोइकोनॉमिक फंडामेंटल्स‚ मजबूत सार्वजनिक वित्त और मजबूत विनिर्माण और निर्यात वृद्धि है। यह शीर्ष एफडीआई गंतव्य है। नवाचार के स्रोत के रूप में डिजिटल स्पेस में अपनी ताकत का प्रदर्शन करने वाला सबसे बड़ा स्मार्टफोन डेटा कंज्यूमर और वैश्विक फिनटेक को अपनाने वाला देश है।
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उत्तराखंड क्षेत्र में पर्यावरणीय असंतुलन से होने वाले हादसे अंतहीन हो चले हैं। 2013 की उत्तराखंड बाढए हिमस्खलन से हुई चमोली आपदा के बाद अब इस क्षेत्र के जोशीमठ नगर के घरों में दरारें आनी शुरू हो गई हैं। इस क्षेत्र में होने वाले प्राकृतिक विघटन को निम्न बिंदुओं में समझा जा सकता है –
इससे पहले कि बहुत देर हो जाए, इन परियोजनओं की विकास-रणनीति को बदला जाना चाहिए। मणिपुर की सरकार ने इंफाल-जिरिबाम रेल लिंक के निर्माण के दौरान होने वाले भूस्खलन के बाद योजना पर पुनर्विचार करने का निर्णय लिया है। इसी तर्ज पर उत्तराखंड सरकार को भी विचार करना चाहिए।
सख्त पर्यावरण अनुकूल उपाय, आर्थिक विकास और रोजगार के अवसरों की उपलब्धता को धीमा कर सकते हैं। लेकिन एक विशाल पारिस्थितिक आपदा के खतरे को टालकर जान-माल की हानि को बचा सकते हैं। पहाड़ी और तटीय क्षेत्रों के प्रशासकों के लिए यह सोच का महत्वपूर्ण विषय है।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 6 जनवरी 2023
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Date:25-01-23
Joshimath On Sea?Mega projects for Andaman and Nicobar need to be ultra-sensitive about ecology and tribesTOI Editorials
The representation of nearly 100 former civil servants to President Droupadi Murmu against development plans on Great Nicobar Island needs to be given serious thought. Recall that last November the Union environment ministry had given in-principle clearance for the diversion of 130. 75 sq km of forest land on Great Nicobar for a Rs 72,000 crore project that includes a transshipment port, an airport, a power plant and a greenfield township. But this would be likely catastrophic for the island’s sensitive ecology and indigenous hunter-gatherer tribes like the Shompen who are already listed as a ‘particularly vulnerable tribal group’.
The Andaman and Nicobar Islands have been on government’s development radar for some time now. In January 2021, the Island Coastal Regulation Zone of Great Nicobar was reduced. Subsequently, the Union territory administration de-notified 11. 44 sq km of Galathea Bay Sanctuary on the island. This was followed by a special committee meeting to decide the extent of de-notification of the Onge tribal reserve on Little Andaman. While government claims that these moves will bring growth and employment to the islands, little attention is being paid to the fact that the region has some of India’s largest mangroves and that over half the species of butterflies, 40% of birds and 60% of mammals found here are endemic. All of this unique biodiversity could be lost forever.
Plus, even if we leave aside reclusive tribes like the Sentinelese that want nothing to do with the outside world, it is difficult to see the mega projects benefit major indigenous communities like the Nicobarese on account of their current socioeconomic constraints. The projects would essentially cater to outsiders. True, there’s no denying that the islands are strategically important – as characterised by a 2019 Niti Aayog report – given that they lie across important sea lanes. But disregarding the ecological sensitivity of the region could see the making of another Joshimath-like catastrophe on a grander scale. Therefore, any future plans to develop the Andaman and Nicobar Islands need to seriously factor in the environmental impact on the region. Compensatory afforestation in Haryana or MP just won’t cut it.
Date:25-01-23
Ponder This On R-DayHow to make governors constructive constitutional functionaries as originally envisaged by the republicTOI Editorials
Telangana this year will witness an odd Republic Day. A report in TOI said that the K Chandrashekar Rao government has asked governor Tamilisai Soundararajan to hold a separate function. That Telangana will have two separate official R-Day events is thanks to the very public acrimony between the political executive and the governor. It has also resulted in the stalling of at least eight bills, which are yet to receive the governor’s assent. Friction between the state government and the governor over withholding assent to bills cleared by the legislative assembly is also common to Tamil Nadu, Kerala and Chhattisgarh.
Republic Day’s significance stems from the adoption of the Constitution. It replaced the British Raj legislation where the governor functioned as an agent of the colonial power vested with greater authority than the elected council of ministers. The Constitution, however, gave primacy to the legislative assembly and the political executive. That did not prevent misuse of the office till a Supreme Court constitutional bench in 1994 reiterated the primacy of the legislatureand narrowed the ground for dismissal of a government. The grey areas still allow a governor to make controversial calls on appointment of chief ministers. For instance, Maharashtra’s governor BS Koshyari, who recently stated that he wished to step down, swore in a short-lived government in 2019.
The current phase of conflicts between governors and the political executive stems largely from stalling of bills. Article 200 of the Constitution details the options of a governor when a bill is cleared by the assembly. However, it does not unambiguously lay down a deadline. Given that the Constitution is clear that the legislature has primacy, it’s bad form for governors to use this loophole to stall. However, a highly competitive political system awash with animus is likely to frequently deviate from constitutional morality. Two fixes are needed. First, put a deadline on how long a governor can stall a bill. Second, make governors accountable to not just the central executive via the President but also the Rajya Sabha and the state government.
Date:25-01-23
The new and dark interpretations of ‘We the People’The determination shown by the ruling party to dominate States and chip away at a Constitution framed by some of the best minds in India will only lead the country further away from the precious ideals of democracySudarsanam Padam is a political scientist and former SAIL Professor of Public Enterprise at the Administrative Staff College of India, Hyderabad
The raging controversy over the very meaning of ‘We the People’, after the speech made by the Vice-President of India and Chairman, Rajya Sabha, Jagdeep Dhankhar at the 83rd all India conference of presiding officers’ in Jaipur, Rajasthan, on January 11, needs a closer look. With its particular reference to the judiciary, Mr. Dhankhar’s speech was of the view that ‘We the People’ essentially gives primacy to elected members of Parliament and the State legislatures.
The Speaker of Lok Sabha supported Mr. Dhankar’s view that the separation of powers (as enshrined in the Constitution) gives this primacy. Expatiating on this theme, Mr. Dhankhar implied that the separation of powers does not equate the three pillars of democracy: Parliament, judiciary and the executive. In his view (although he did not explicitly say this), as the judiciary and the executive are appointed and not elected directly by the people, they are inferior.
Let us first sort out the meaning of ‘We the People’. The Constitution does not define ‘people’. Its concern is about citizens and not any group or a particular institution. There are people in the judiciary, in the executive and in most other constitutional institutions. There are also those in the military, the police, public enterprise and the vast private enterprise. They are all people no less.
To identify representatives in the legislature to be the sole representatives of the people is a travesty. Apart from being enshrined in the Constitution, the theory of a separation of powers is basic to any democratic society, more than the letter of the Constitution. It is a case of staggering irony that over seven decades after Independence, the Indian nation is being subject to a re-education of what the essence of democracy is, from a person who as Governor, caused innumerable problems for the elected government of West Bengal.
Democracy in the U.S. and the U.K.
Since the issue of primacy of Parliament along with the judiciary and the executive came into the discussion, let us look at two countries with which Indians are familiar. In the United States, the President has the power to appoint judges, although this should be endorsed by Congress. But the President is directly elected by the people and has prerogatives in several issues which do not apply to a parliamentary democracy. The Prime Minister-in-cabinet does not have the powers of the U.S. President. And hence the possibility of a judicial review to check the suitability or otherwise of the candidates nominated.
In the case of the United Kingdom, it is run by time-honoured conventions and laws passed by the House of Commons. It does not have a written Constitution which gives judicial review. But strong conventions are in place in spite of the primacy of Parliament. Conventions in the United Kingdom have an inviolable tradition. Laws can be changed, violated and repealed. Even in Parliament, the Speaker of the House of Commons is elected, but becomes a non-party man, choosing when to retire from office.
In India too, the first two Speakers, G.V. Mavalankar and M. Ananthasayanam Ayyangar and later Neelam Sanjiva Reddy resigned from the ruling party to give the entire Parliament a sense of impartiality in ensuring a proper place for minority parties. The point is that in the United Kingdom, the House of Commons retains the Speaker if he continues to hold office. This, alas, does not happen in India, in spite of the first two Speakers of the Lok Sabha having tried to set a convention. This lack of convention has drastically affected the running of Parliament. The reluctance to honour conventions made our laws and Constitution strive for greater specificity, often leading to quibbling in language and meaning.
Onslaught on institutions
Democracies cannot be run only by the laws passed in representative Assemblies. They need conventions. B.R. Ambedkar realised that Orientals cannot be trusted with conventions. Unless conventions are solidified into constituent laws and bound by strong threads, institutions may even be destroyed, endangering the very purpose of a Constitution protecting the citizen. Indeed, there is a price to be paid converting conventions into law and B.R. Ambedkar knew it. Today’s onslaught on the judiciary is aimed at a powerful constitutional authority which is, by and large, refusing to deviate from its constitutional responsibilities. The fate of the Election Commission of India, independent investigating agencies and the civil service and police are a classic example of a dereliction of constitutional and other legal responsibilities.
The basic structure of the Indian Constitution, as recognised by the Supreme Court of India, is to be protected by it, in spite of any over-reach by the legislature. We can take the case of the executive in relation to government. Mr. Dhankhar, when he was Governor and his ruling party appointed colleagues, over-rode State legislatures with impunity, by not approving Bills or delaying them causing them to lapse into nullity. Where is the power of the people as represented by the legislature?
There is a virtual war in the country now between elected governments in States and the Governors appointed by the Centre, which has brought into focus the question whether we need the institution of Governors in the first place. The Constitution does not intend Governors to be subordinates to the central government or even as detractors of the legitimacy of States. The dangerous portent now is that the Centre consciously feels that it is superior to the States and their Governors are its proxies. This goes against the very dignity of the people of a State as inferior to a higher power outside their State, the constitutional validity of which rightly needs the judiciary as the final judge.
The dangers ahead
In other words, the separation of powers acceptable to the Centre is not applied to the States, where an appointed Governor can defy not only the legislature but also the elected government. Apparently, members of the ruling party members are pushing for greater centralisation not only within constitutional institutions at the Centre but also in States which are ruled by parties other than the national ruling party.
When there is a ruling party determined to dominate States both explicitly and in stealth, there will be strife and conflict endangering the very process of governance. Instead of chipping away at a Constitution framed by the best minds of the Independence movement generation, it will be more honest (sic) to go for a Constituent Assembly and seek a more totalitarian state — far from the ideals of democracy enshrined in the Constitution. If the people of India accept such devastating change, so be it. The determination with which the ruling party is approaching the majority in the country will only usher in divisive conflicts between religions, States and regions. Sadly, India will be just another Russia, China or Turkey.
Date:25-01-23
आत्ममुग्ध हुए बिना काम करे ब्यूरोक्रेसीसंपादकीय
दिल्ली में आईएएस अफसरों की एक संस्था ने बुद्धिजीवियों के एक क्लब में ‘क्या आईएएस ने देश को निराश किया’ विषय पर एक सेमिनार किया। इसमें अन्य विशिष्ट लोगों के अलावा मुख्य रूप से देश के अहम पदों पर रहे कुछ आईएएस अफसर वक्ता थे। भाषणों का सार यह था कि कुछ खास अफसरों के चरित्र को छोड़ दिया जाए तो कुल मिलाकर इस कैडर ने देश के विकास में बड़ा योगदान दिया। यानी इन बड़े अफसरों ने, जिनमें कुछ रिटायरमेंट के बाद भी बड़े पदों पर रहे, इस कैडर को खुद ही सर्टिफिकेट दे दिया । एक अफसर का कहना था कि शिक्षा के क्षेत्र में, खासकर महिला शिक्षा में अपेक्षित सफलता भले ही न मिली हो लेकिन स्वास्थ्य में और दक्षिण भारत में महिलाओं का सेल्फ- हेल्प ग्रुप की योजना के तहत भारी आर्थिक सशक्तीकरण हुआ है। वहीं विकास की धीमी रफ्तार का कारण औपनिवेशिक शोषण – जनित गरीबी से आई दुश्वारियों को बताया गया । इन वक्ताओं को पड़ोस के बांग्लादेश में सेल्फ-हेल्प योजना की सफलता भी देखनी चाहिए। भारत, चीन और इजराइल लगभग एक ही दौर में संप्रभु हुए और स्व- शासन का अपना- अपना मार्ग चुना। इन देशों की आर्थिक उन्नति पर भी गौर करना चाहिए । एक अन्य अधिकारी का तर्क था कि अगर आज भी देश का अधिकांश युवा इस कैडर में आना अपना सपना मानता है तो इसका मतलब है कि कैडर अपना काम ठीक कर रहा है। जबकि यह पूरी हकीकत नहीं है । कहीं न कहीं कारण इन अधिकारियों का रुतबा, ताकत और वेतन-भत्ते हैं। अधिकारियों को जरूरत है कि वे आत्ममुग्ध हुए बिना सच्ची समीक्षा करें। साथ ही बदलती हुई परिस्थितियों के हिसाब से जरूरी बदलाव करें।
Date:25-01-23
दुनिया भर की आबादी की जीवन गुणवत्ता सुधार सकती है एआईराजकुमार जैन, ( स्वतंत्र लेखक )
कृत्रिम बुद्धिमत्ता यानी आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस (एआई) भविष्य को बदलने जा रही है। यूं तो इसे प्रगति का एक लंबा रास्ता तय करना है लेकिन वो अपनी मंजिल पर हमारी सोच से भी पहले पहुंचने वाली है। यह जानना दिलचस्प होने के साथ-साथ आकर्षक भी है कि कैसे ये नवीनतम प्रौद्योगिकियां जीवन जीने का अंदाज बदल रही हैं। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के एक शोध के अनुसार अगले कुछ वर्षों में एआई जीवन का एक अभिन्न अंग बन जाएगी, जो मानव बौद्धिक क्षमता को पार करके बुद्धिमत्ता के उच्चतम शिखर तक पहुंच जाएगी।
वैसे तो आज के एआई में कोई रचनात्मकता नहीं है और करुणा या प्रेम की भी कोई क्षमता नहीं है। यह मानव रचनात्मकता को बढ़ाने का एक उपकरण मात्र है। लेकिन अपनी शारीरिक-मानसिक संरचना की सीमाओं के चलते वो कार्य, जिन्हें करना मनुष्य के लिए संभव नहीं होता, एआई संपन्न मशीनें आसानी से कर देंगी। एआई में दुनिया भर की आबादी के जीवन की गुणवत्ता में सुधार करने की असीमित क्षमता है।
ज्ञान (नॉलेज) इंजीनियरिंग के साथ शुरू हुई विकासवादी चौथी औद्योगिक क्रांति वर्तमान समय के नवीनतम आविष्कार एआई के बलबूते पर ना सिर्फ नए उत्पादों-सेवाओं को बढ़ावा दे रही है बल्कि हमारे व्यक्तिगत जीवन की दक्षता और खुशियों को भी बढ़ाने का काम करेगी। जीवन उपयोगी सभी प्रणालियां भविष्य में और भी सरल होकर आसानी से उपलब्ध होंगी। इसके साथ ही तकनीकी नवाचार दक्षता-उत्पादकता में लाभदायक बदलाव के साथ ही वस्तुओं और सेवाओं के प्रदाय को आसान बनाएंगे।
घरों में स्वत: सफाई करने वाले रोबोट से लेकर वॉइस ऑटोमेशन तक एआई ने तेजी से प्रगति की है। निर्माण के क्षेत्र में एआई संचालित रोबोट काम कर रहे हैं, भविष्य में ये वास्तु कला, ढांचा डिजाइन, निर्माण प्रबंधन आदि कार्य भी स्वत: करने में सक्षम हो जाएँगे। स्वास्थ्य सेवा उद्योग में इनके उपयोग से मानवीय गलतियों को रोका जा सकेगा। एआई संचालित पूर्वानुमान लगाने में सक्षम प्रणाली किसी व्यक्ति के स्वास्थ्य को प्रभावित करने वाले विभिन्न कारकों जैसे जन्म स्थान, खाने की आदतों, प्रदूषण के स्तर आदि को समझ कर किसी आनुवंशिक या पुरानी बीमारी के पुनः विकसित होने की संभावना का पता लगा लेगी और उसके उभरने से पहले ही खत्म करने के लिए निवारक उपचार का सुझाव देगी। शिक्षा क्षेत्र में आभासी (वर्चुअल) शिक्षक मानव शिक्षकों को प्रभावी शिक्षा प्रदान करने में सहायता करेगा। बैंकिंग में एआई का वैश्विक व्यापार मूल्य 2030 के अंत तक 300 बिलियन डालर तक पहुंचने का अनुमान है।
जिस प्रकार विद्युत शक्ति की खोज ने वैश्विक स्तर पर आमूल-चूल परिवर्तनों की नींव रखी थी, उसी तरह एआई भूख, गरीबी और विभिन्न बीमारियों के उन्मूलन की दिशा में सहायक होगी।
Date:25-01-23
दिशा-निर्देश बननी चाहिए बातडॉ. आमना मिर्जा
सोशल मीडिया जगत प्रभावित करने वाले इनफ्लुएंसर जन के लिए नई गाइडलाइंस की एक अहम खबर लेकर आया है। गतिविधि के लिए प्राप्त समर्थन और लाभों के प्रकटीकरण को प्रदर्शित करने और किसी भी उल्लंघन के लिए उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम 2019 के तहत अब जुर्माना लगाया जाएगा। जीवन अब गतिशील है, इस संदर्भ में संचार, मीडिया, प्रभाव और प्रभाव का अध्ययन करना होगा। कदम प्रशंसनीय, लेकिन विभिन्न आयामों से आत्मनिरीक्षण की मांग भी करता है।
व्यापार आज वैश्विक से राष्ट्रीय स्तर तक कल्पना से परे विस्तारित हो गया है। यह कभी भी अलगाव में मौजूद नहीं होता है, उपभोक्ता की पसंद, वैश्विक रुझान, संचार इसमें महत्वपूर्ण हिस्सा है। व्यापार प्रथाएं और नीतियां भी संदर्भ के रूप में आत्मनिरीक्षण की मांग करती हैं, बाजार, सूचना हर बार एक समान नहीं है । व्यापार के तंत्र में वृद्धि के साथ, विपणन और संचार की भूमिका महत्त्वपूर्ण हो गई । संचार अब केवल टेलीविजन या समाचार पत्रों के बारे में नहीं है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ने यहां नई चुनौतियों और अवसरों को जन्म दिया। स्पेक्ट्रम के एक तरफ, संदेश तेज और अधिक सुलभ हो गया जहां कई वीडियो विभिन्न विषयों पर उपलब्ध हैं। व्यापार के दायरे में, विकल्पों की विविधता ने निष्पक्ष व्यापार प्रथाओं और उपभोक्ता हितों की सुरक्षा के लिए महत्त्वपूर्ण चुनौतियां पेश कीं। यह समकालीन समय में वैश्वीकरण की एक अहम आलोचना भी रही है। वैश्विक बाजार उभरे, लेकिन इसने बड़े पैमाने पर उपभोक्तावाद को जन्म दिया। कहानी के उसी पक्ष में, हमें वैश्विक शासन से महत्त्वपूर्ण जानकारी पर ध्यान देना चाहिए। भारत ने भी हाल फिलहाल में कई बार मानव केंद्रित वैश्वीकरण का आह्वान किया है, जिसमें लोगों को मुनाफे से ऊपर रखा गया है। दिशा-निर्देशों पर किसी भी चर्चा के लिए जनसांख्यिकी हमेशा अहम होती है। सोशल मीडिया प्रभावित करने वालों में युवा से लेकर बूढ़े तक शामिल हैं। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि ग्रामीण क्षेत्रों में सोशल मीडिया में कुछ महत्त्वपूर्ण प्रतिभा और प्रभाव देखा जा रहा है बहुत से लोग जो प्रभावशाली हैं, वे पच्चीस वर्ष से कम उम्र के हैं। उन्हें दिशा- निर्देशों की जानकारी के विकेंद्रीकरण के संदर्भ में महत्त्वपूर्ण चुनौती होगी। विज्ञापन की कई कड़ियां होती हैं। उद्योग विभिन्न प्रकार की विज्ञापन तकनीकों को नियोजित करते हैं। भोजन, कपड़े, श्रृंगार, मोबाइल फोन ऐसे क्षेत्र हैं, जहां सोशल मीडिया पर प्रभावशाली लोग महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं। प्रत्येक पोस्ट में टैग, हैशटैग, साझेदारी भी होती है और युवा भी इनसे कमाई कर रहे हैं। इसमें बॉलीवुड की मशहूर हस्तियों के लिए एक संदेश भी है कि विज्ञापन और प्रभाव अब विकेंद्रीकृत हो गए हैं। एजेंसियां इस बारे में भी अनिश्चित हैं कि टेलीविजन पर विज्ञापन किसने देखा कि नहीं, लेकिन सोशल मीडिया के माध्यम से इसे एक व्यक्तिगत स्पर्श के साथ भी प्रस्तुत किया जा सकता है। फोक्स अक्सर ‘ऑर्गेनिक रीच होता है, इसलिए इनफ्लुएंसर्स भी लाभ के प्रकटीकरण पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा क्योंकि यह उनके लिए भी गर्व की बात है। संगठनों के नजरिए से भी विस्तार करना महत्त्वपूर्ण है। सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म अक्सर पेश करते हैं ‘पेड प्रमोशन’ का विकल्प | विज्ञापन संगठन भी संदेश को वास्तविक रूप देना चाहते हैं। कई कलाकार, मशहूर हस्तियां अक्सर विज्ञापन का पहलू बताते हैं, इसलिए इस संबंध में नए दिशा-निर्देशों में कोई समस्या नहीं होगी एक ब्रांड नाम बनाने में समय और समर्पण लगता है, सोशल मीडिया का प्रभाव भी उसी मापदंड का अनुसरण करता है। जानकारी के प्रकटीकरण के लिए स्पष्ट रूप से लिखना कोई समस्या नहीं लगती है क्योंकि कोई भी हस्ती ऐसा कुछ भी नहीं करेगी जो वर्षों से उनकी प्रतिष्ठा को नुकसान पहुंचाए। आज हमारे जीवन में अवधारणाएँ विवादित है, वर्तमान में जो चलन में है वह अगले दिन उबाऊ हो सकता है। सोशल मीडिया का उपयोग बहुत से लोग करते हैं। अच्छे फॉलोअर्स वाले कई लोग अक्सर रिव्यू भी पेश करते हैं। ‘समीक्षा’ और ‘प्रभाव’ के बीच महत्त्वपूर्ण प्रश्न का न्याय करना अक्सर कठिन होता है। कई संगठनों ने उन्हें नुकसान पहुंचाने के लिए ‘परभक्षी समीक्षा’ की भी शिकायत की है, जबकि कुछ अनैतिक भ्रामक विज्ञापनों में संलिप्त हो सकते हैं टैलेंट और इनोवेटिव आइडिया चीजों को सोशल मीडिया पर धमाल भी करती है, अनकही बातों को आगे लाती है।
सरकार को संतुलन सुनिश्चित करना होगा। सिर्फ कुछ लोगों की हरकत की वजह से इतने सारे लोगों की क्रिएटिविटी को सजा देना गलत होगा। साथ ही एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा यह भी उत्पन्न होता है, जहां कानून और दिशा-निर्देशों के बीच अंतर को स्पष्ट किया जाना चाहिए। तकनीकी प्रगति ने हमारे जीवन को फिर से परिभाषित किया है । उपभोक्ताओं की सुरक्षा, अच्छे व्यापार व्यवहार हमेशा प्रशंसनीय है, दिशा-निर्देश हमेशा कई स्तरों पर सशक्तिकरण के लिए होने चाहिए । यही कारण है कि उन्हें कभी भी इस तरह से नहीं रखा जाना चाहिए, जिससे उद्यमशीलता और व्यवसाय में बाधा उत्पन्न हो। इसी संदर्भ में सोशल मीडिया को प्रभावित करने से रोकने के बाबत नये दिशा-निर्देश स्वागतयोग्य हैं।
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शहरी विकास मंत्रालय के अधीन नेशनल कैपिटल रीजन प्लानिंग बोर्ड ने हाल ही में क्षेत्रीय योजना 2041 बनाई है। इस मसौदे में अरावली क्षेत्र को सुरक्षा न दिया जाना चिंताजनक लगता है। मसौदे में अरावली क्षेत्र के प्राकृतिक क्षेत्रों में चिन्हित नहीं किया गया है। इसके चलते यहाँ खनन व अन्य निर्माण गतिविधियों को खुली छूट मिल जाएगी। जबकि एनसीआर के पर्यावरण में अरावली पर्वत श्रेणियों की महत्वपूर्ण भूमिका है।
कुछ बिंदु –
नीति निर्माताओं को समझना चाहिए कि पर्यावरण संरक्षण आर्थिक वृद्धि और विकास के लिए कितना जरूरी है। अतः योजना को पारिस्थितिकीय अनुकूल बनाने के लिए विशेषज्ञों और सभी हितधारकों के साथ जुड़ना चाहिए। प्रकृति आर्थिक मूल्य वाली एक संपत्ति है। इसका संरक्षण किया जाना नितांत आवश्यक है।
‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 5 जनवरी, 2023
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Date:24-01-23
GoI’s Job: Think Of Creating JobsEmployment recovery after Covid is modest. To change this, invest in India’s small towns.Amit Basole, [ The writer is with Azim Premji University. ]
The presentation of the Union Budget by the finance minister is an occasion to reflect on both short-term and longterm economic policy and prospects. India’s economy as well as the global economy have been through a rough few years with Covid pandemic followed by the war in Ukraine.
In India, as per CMIE data, neither employment nor incomes have recovered completely in aggregate terms, from the Covid shock.
● Workforce participation rate for men remains, on average, five percentage points below the pre-Covid level.
● Household incomes are at 90% of their pre-Covid average in real terms, which was a low Rs 6,000 per person per month to begin with.
● In addition, household financial savings are at historic lows.
Worrying growth trend
On the other hand, the ‘K-shaped’ recovery has meant historically high profit rates for the corporate sector. But high profits and low corporate taxes have failed to translate into higher investment rates. The burden of creating demand has fallen on the public sector, taking largely the form of capital expenditure on infrastructural projects. It is not clear yet if this strategy is working as envisioned. Even prior to the onset of the pandemic, the Indian economy was experiencing a severe growth slowdown. The growth rate of gross value added adjusted for inflation fell from 8% in 2016-17 to 6% in 2017-18 and further to 4% by 2019-20, on the eve of the pandemic.
If we leave out the Covid-induced base effect which resulted in large bounce-back growth rates in 2021-22, and assume a real growth rate of 7% for the current financial year, we see that the economy will have grown at a compounded annual growth rate of just under 3% between 2019-20 and 2022-23. These are worrying numbers.
More pertinent to the ordinary person’s concerns, while growth may pick up again, what the recovery willdo to help our long-standing jobs problem is an open question. Creating good quality, productive jobs has proved difficult for many countries, not just India. But, across the developing world, India stands out for its particularly poor performance in linking growth to jobs.
Link between growth and jobs is missing
Cross-country data show that GDP growth is usually positively related to employment growth – in years in which the economy grows faster, more jobs are also created. For India, on the other hand, this relationship is almost non-existent.
That is, over the past 30 years, there is no correlation between GDP growth in a given year and employment growth in that year. Of course, this does not mean that employment has not risen over this period. But it does mean that we cannot bank on raising GDP growth to promote employment growth. We need a separate policy focus on employment itself.
Even the employment that the economy has managed to create in sectors other than agriculture has been largely of the precarious kind, mostly in construction and a few other services. Despite many years of concerted policy efforts via Make in India and more recently the Production-Linked Incentives scheme, the shares of the manufacturing sector in GDP and in employment have remained stuck around 17% and 11% respectively.
The rate of open unemployment among educated youth in India has reached alarming levels, and this does not even take into account women who tend to drop out of the labour force entirely.
Persist with infrastructure spending
So what is the way forward? First, even though the pandemic itself may be receding from our memory, its economic effects linger on. Thus continued support for social safety measures such as MGNREGA remains essential to help vulnerable households cope with employment and income losses.
MGNREGA outlays have been reduced to pre-Covid levels since the last Budget. But, our surveys show that the programme is making a vital difference and demand for work far exceeds its supply, so raising the programme budget is imperative. MGNREGA only operates in rural areas. Hence, it is worth considering an employment guarantee programme for urban areas, as many states like Rajasthan, Tamil Nadu, Odisha and others are experimenting with.
Public infrastructure spending can be part of the solution since it not only creates direct and indirect jobs but also improves ease of doing business, helping the private sector to create jobs. But to really make a difference for micro and small businesses, investment is needed in local infrastructure in thousands of small towns and cities across the country, not in a few mega projects or metro areas.
Given large fiscal deficits, there is pressure on GoI to control expenditures. The solution lies, at least in part, in restructuring the revenue side. The pandemic has been good for larger firms and richer households. Reducing tax exemptions on these is called for, thereby increasing reliance on direct taxes at the expense of indirect taxes, which tend to be regressive. In this context, recall that cutting corporate taxes did not boost private investment.
The Budget is an exercise in balancing interests. The interest of workers in the unorganised sector and MSMEs should not be forgotten in the bargain.
Date:24-01-23
A Swell Police Force For a Forward MarchET Editorials
The call for a police force that is modern, sensitive, and leverages technology and older practices to serve the people better is timely and much-needed. PM Modi’s push for a police force that is responsive, at the 57th All-India Conference of Director Generals/Inspector Generals of Police, must be taken seriously.
Aresponsive police force that is fit for the purpose must leverage technology to address the needs of a diverse population, strengthening older practices such as foot patrol and community engagement, and greater interaction with other law-andorder agencies, particularly in the big cities. This will help reduce the people’s mistrust of police, abate rising petty crimes and address the needs of at-risk youth. The police also need to be well-versed in the use of technology given the prevalence of cybercrimes. Police cannot act in a silo; it must interact and engage with other law-enforcement agencies. At the same, the police must take measures to prevent its politicisation. Being seen as an extension of the ruling party or the local strongman, as has been seen in some states, is not conducive to improved policing. This undermines people’s faith and ability to trust the police. There is a need to increase the sensitivity training of the police personnel on gender, religion and caste. A police force that is not sensitive to the diversity of the population is incapable of serving it.
Given the size of the population, improved policing and law enforcement requires adequate numbers of personnel on the ground. The on-ground police force is less than required in most states, even as tending to VIPs takes precedence. Without adding the requisite numbers to the police force, all efforts for a fit-for-purpose police force will be ineffective.
Date:24-01-23
Promise, pragmatismJacinda Ardern’s politics, rooted in moral values, came up against a reality check.Editorial
Jacinda Ardern’s time in office as New Zealand’s Prime Minister was rattled by several successive challenges. At 37, the Labour leader came to power in 2017, promising a “transformational change”. Nearly six years later when she leaves office, she would be better remembered for her handling of crises such as the coronavirus pandemic, the far-right terror attacks on mosques in Christchurch and volcanic eruptions. Ms. Ardern offered a leadership model rooted in empathy and moral values — the way she handled the Christchurch shootings is a case in point. Her approach towards the pandemic was initially popular, which helped Labour sweep the 2020 legislative elections. New Zealand’s per capita death rate from COVID-19 is among the lowest in the developed world. The way she announced her resignation also won her praise — that there is “not enough in the tank” for her to continue in the top office — which made her stand out in a world where not many leaders relinquish power easily. Chris Hipkins, a former Minister for COVID response in Ms. Ardern’s Cabinet and a troubleshooter for the Prime Minister, will succeed her and lead Labour in the 2023 election.
While her leadership style is widely praised, particularly among liberal sections across the world, there are also questions on whether Ms. Ardern made good on the promises she made to the electorate. New Zealand is one of the most expensive countries to live in. In 2017, Ms. Ardern vowed to tackle the country’s housing crisis by constructing 1,00,000 homes, but only a fraction has been built in the past five years. Housing prices remain extensively high, while high inflation has left a hole in household budgets. Her promises to address child poverty (New Zealand has one of the worst rates of child poverty in the developed world) and tackle inequality (the top 10% control nearly half of the country’s household net worth) have fallen flat. Besides, continued lockdowns and COVID measures even when neighbouring Australia opened up turned a chunk of Ms. Ardern’s early admirers away from her. The slide in her popularity hit Labour’s election prospects which prompted many within the party to question her leadership. According to a December poll, Labour’s support stood at 33%, while 38% backed the centre-right National Party, the main opposition. It was against this background that Ms. Ardern announced her resignation. Mr. Hipkins now has only eight months to steady the ship and reverse the public mood, a tall ask. He should blend Ms. Ardern’s empathetic politics with a strong economic vision that would address New Zealand’s structural economic problems while keeping its social harmony intact.
Date:24-01-23
Democracy and its structural slippagesThe complete equation of democracy with electoral politics draws attention away from any alternative form of governance — there is no space here for diversityHarbans Mukhia taught history at Jawaharlal Nehru University.
The democracy that is functional around the world today — even as it has a long history of evolution — was essentially a 19th century to 20th century western creation. Every civilisation, of course, claims to have had some form of democratic origin. But the institution of universal adult franchise and governance through regular and multi-party elections (the universal norm today) has at the most a 100 years or less of practice behind it. Even in the most “advanced” democracies such as the United States, “universal franchise” of the 1920s did not include African-American citizens. In Britain, women obtained the right to vote in the 1930s, in France in 1944, and in Switzerland as late as 1971, over two decades after their Indian sisters.
Devolution and capitalism
Basic to democracy is the devolution of power, and with it, welfare from the elite echelons to the ground level. Devolution occurs on the premise of the individual and equality. In practice, is there a good record for these principles? If one is to go by the long view of history, the answer is ‘yes, most effectively’. The near-universal abolition of autocratic monarchies and hereditary aristocracies and their replacement by governance through popular mandate (with exceptions) and the spread of economic resources, infrastructure, education, health, etc. to the masses, with all their shortcomings and lacunae, call for acknowledgment even as the demand for these grows every day, constantly, and legitimately.
Yet, there is an unbreakable link between the wide spread of this devolution and capitalism. In capitalism’s basic requirement to seek freedom for resources such as land, labour, and movement from the autocratic restraints of medieval monarchies, the notions of the individual’s rights and equality evolved, culminating in the notion of a free market for every kind of resource mobilisation, including labour. It also implied a great deal of uniformity.
It is important to note that human history has been witness to several experiences of equality, mostly in its religious form: non-theistic Buddhism and monotheistic religions such as Christianity, Islam and Sikhism were proponents of social equality. However, equality here demanded the subjugation of the individual to the community or society.
Clearly, humanity’s urge for equality has erupted over and over again in different parts of the world at different times; it was the same urge that had led to the most recent experiment of Marxian socialism in about a third of the globe and a large chunk of the population. However, it is equally important to note that no egalitarian ideology has ever been able to create an egalitarian society. What it does is to reshuffle existing social hierarchies and create some space for the upward movement of the lower rungs. But the urge for equality has found diverse ways to seek utterance. Its current urge seeks to establish uniformity through the same or similar institutions and practices.
The uniformity takes the form of periodic multi-party “free and fair” elections and guarantees of various kinds of freedoms, especially of the market. The elections are a means of self-correction of government policies and actions.
The conduct of elections
Are elections truly free and fair?
To begin with, elections divide voters into a dubious majority and a minority. The majority-minority division of 50% plus one and 50% minus one is, in principle, hardly a decisive mandate even as this is treated as one empirically. But the practice of elections belies even this notion of “majority”; there is hardly a government anywhere in the world and at any time that governs through a majority of the mandate. Usually, 30% to 40% of the votes cast give a party a comfortable majority to rule legitimately. This is structured into multi-party elections through “the first past the post” principle; but even in a system such as the United States, Donald Trump could defeat Hillary Clinton even as she received some 2.5 million more popular votes than him, in 2016.
In practice again, contrary to theory, even as the voter is all alone in the polling booth voting as an untrammelled individual, her/his vote is still conditioned by numerous demands on it by family, community, religion, culture, and, above all, by the political alternatives offered by political parties. A loss of individuality is implicated here. The individual does not create the choices which are given by parties, very often wrapped in false propaganda and even more false promises. The individual has the “freedom” to choose one or another of these.
The complete equation of democracy with electoral politics draws one’s attention away from any alternative form of governance. There is no space here for diversity.
A reinforcement of identities
This democracy came to India in its most modern form: unconditional adult franchise and multi-party periodic elections. Yet, the operative categories of electoral politics here have mostly been pre-modern: identity politics of caste, sub-caste, community, region, language, etc. Not long ago we were familiar with acronyms such as AJGAR (Ahir, Jat, Gurjar and Rajput castes) and MY (Muslims and Yadavs) and so on, signifying the vote base of different political parties, or what came to be picturesquely called the ‘vote bank’.
Jawaharlal Nehru had hoped that education and the experience of democracy would force a retreat on these operative categories and generate a more “modern” consciousness among the masses. What has emerged is contrary to this. The very success of these mobilisations has reinforced identities instead of weakening them. The Bharatiya Janata Party is determined to create the biggest vote bank which would be ever hard to defeat: the entire Hindu population, comprising 80% of the populace. It can afford to marginalise and thus disenfranchise all others in the residual 20%. Remember the explicit assertion of this strategy by the Uttar Pradesh Chief Minister in the form of his line, “80 versus 20” during the run-up to the Assembly elections?
So, as long as we practise this form of democracy, its fault lines and, above all, its link with capitalism will remain unbroken. Yet, the fact that humanity has throughout history sought one or another form of social equality keeps the possibility of this urge erupting yet again more amenable to achieving a reality that has eluded us so far. What its form and its grade of success will be are hard to guess. What can be said confidently is that history is still unfolding and creating a future for us.
Date:24-01-23
An India chapter for foreign universitiesThe initiative may fail due to contradictions in the draft regulation.Furqan Qamar, [ Former Adviser for Education in the Planning Commission, is a Professor of Management at Jamia Millia Islamia, New Delhi. ]
For a long time, proponents of the internationalisation of higher education have cherished the dream of foreign universities operating in India. For nearly two decades, they have emphasised the need to provide conducive conditions and an enabling framework for such institutions. But the idea failed to come to fruition due to the concerns of the regulatory authorities and governments in India as well as the foreign higher educational institutions.
Concerns
Promoting excellence, preventing malpractices, safeguarding the interests of students and protecting national interests have been some of the major concerns. Many were wary of the cultural threat that this initiative posed. Some of those who were at the forefront of preserving the purity of Indian culture are now a part of the political dispensation. Policy planners and regulators have been particularly concerned about how to come up with a framework that attracts the best of the best and deters the fly-by-night kinds of universities.
On the other hand, the sought-after universities are concerned about the potential adverse effect of setting up offshore campuses with their accreditation, ranking and reputation. Truly reputed higher educational institutions operate on a not-for-profit basis and have no materialistic motives to go offshore. A few countries that have such offshore campuses had to hard-sell the institutions the idea by leasing land at almost no cost, bearing the bulk of infrastructure cost and promising them the academic, administrative and financial autonomy that they enjoy in their home country. India could hardly afford any such incentives. Whatever was offered was riddled with caveats and contradictions.
Past setbacks notwithstanding, the idea of having world-class universities establish and operate their campuses in India has been so compelling that the National Education Policy (NEP) 2020 provided that “selected universities e.g., those from among the top 100 universities in the world will be facilitated to operate in India. A legislative framework facilitating such entry will be put in place, and such universities will be given special dispensation regarding regulatory, governance, and content norms on par with other autonomous institutions of India.” Even though the NEP favoured a “legislative framework”, the idea is being executed through a regulatory route by the University Grants Commission (UGC). There seems to be determination to get the idea going, even if it amounts to some dilution in standards.
While the policy prescribed “facilitation” and “special dispensation” for the top 100 universities of the world, the draft regulation seeks to lower the standards by extending the scope to the top 500 universities, overall or in any discipline. Further, for the “educational institutions”, just being “reputed” in their home country would be a sufficient requirement. The draft regulation doesn’t seem concerned about the subjectivity and scope of discretion in the above articulation as it believes that the standing committee constituted by the UGC would do an unbiased and thorough job in processing the applications and identifying only the best institutions.
Contradictions
The initiative may still fail due to contradictions in the regulation. The draft regulation demands that the quality of education imparted by these institutions in India must be on a par with the quality of courses at their campus in the country of origin. Yet, it insists that they must not “offer any such programme of study which jeopardises the national interest of India or the standards of higher education in India”. It promises academic, administrative and financial autonomy to foreign institutions but takes that away by asserting that they abide by all the conditions that the UGC and the Indian government prescribe from time to time. The provision that the foreign higher education institutions must not do anything “contrary to the sovereignty and integrity of India, the security of the State, friendly relations with foreign States, public order, decency or morality” might deter the best universities that most value their academic autonomy.
Leaving aside the issue of whether the idea would succeed, one wonders why India is so keen on foreign higher education. During a media briefing, it was stated that foreign universities in India would stop the outflow of $28-30 billion in foreign exchange. This does not corroborate the data on outward remittances for studies abroad, as reported by the Reserve Bank of India (RBI). During 2021-22, foreign outflow on account of studies abroad was no more than $5.165 billion. Even if we add to it the outflows of $3.598 billion for education-related travel (though these do not necessarily relate to studies abroad), the total education-related outflows would be $8.973 billion. One could argue that even $5.165 billion is a substantive sum and must be stopped from flowing abroad, but the idea of import substitution in higher education is complicated. Students do not go abroad for degrees alone; they also go for the experience, post-study work visas, income opportunities and better career prospects. Studying in a foreign university in India would offer them none of these. Most critically, as they are able to finance a good part of their education abroad through jobs, assistantships and scholarships, they find it more economical.
Still, India needs to have an enabling framework for the entry and operation of foreign higher educational institutions. It must, however, ensure that the best of the best set up their campuses in the country.
Date:24-01-23
हमें शिक्षा नीति में पश्चिम के अनुकरण की जरूरत नहीं हैराजीव मल्होत्रा, ( लेखक और विचारक )
भारत की नेशनल एजुकेशन पॉलिसी 2020 यानी एनईपी में अमेरिकी सामाजिक सिद्धांतों और नीतियों का अत्यधिक अनुकरण किया गया है। अमेरिकी स्कॉलरशिप और पाठ्यक्रम को आंख मूंदकर भारत में लागू करने से उत्पन्न होने वाली समस्याएं गम्भीर हैं। भारत की अगली पीढ़ी को गुमराह किया जा रहा है। अमेरिकी शिक्षा व्यवस्था के अंतर्गत भी, उसकी उत्कृष्ट अकादमिक संस्थाओं में विकसित सामाजिक विज्ञान के कुछेक हालिया सिद्धांतों के उपयोग को लेकर संकट उत्पन्न हुआ है। परंतु वहां न केवल कॉलेजों में, बल्कि प्राथमिक, माध्यमिक और हाई स्कूल शिक्षा स्तर पर भी इसका विरोध हो रहा है।
इसमें सबसे आगे जेंडर सम्बंधी विचारधारा है, जो शिक्षा के क्षेत्र में लैंगिक अध्ययनों का परिणाम है। अनेक अमेरिकी माता-पिता बहुत छोटे बच्चों के अपने जेंडर के बारे में प्रश्न करने पर आपत्ति व्यक्त करते हैं। कई रूढ़िवादी माता-पिता छोटे बच्चों की इस ‘ग्रूमिंग’ का इस आधार पर विरोध करते हैं कि यह उन्हें यौन सम्बंध बनाने की ओर प्रेरित करेगा और भ्रमित करेगा। अचानक नौजवानों का एक बड़ा प्रतिशत यह महसूस करने लगा है कि लैंगिक रूप से वे ‘गलत’ शरीरों में हैं। गुस्साए माता-पिता बच्चों में लैंगिक हताशायुक्त बेचैनी में तीव्र वृद्धि देख रहे हैं और विशेषज्ञों के पास भी इससे निपटने का रास्ता नहीं है। सोशल मीडिया की भी इसमें बड़ी भूमिका है, विशेषकर परेशान युवा महिलाओं के संबंध में जो स्वयं को सार्वजनिक रूप से ‘ट्रांस’ घोषित करती हैं। पश्चिम में रूढ़िवादी व्यक्ति यह महसूस करते हैं कि यह रुझान अप्राकृतिक है और इसे सामाजिक रूप से निर्मित किया जा रहा है।
इस प्रकार का शैक्षिक शोध सामाजिक न्याय की विचारधारा से जीव-विज्ञान का उल्लंघन करने का प्रयास करता है। यहां यह तर्क दिया जा रहा है कि जेंडर को पुराने ढांचों- जिनका निर्माण उत्पीड़कों द्वारा किया गया- के दवाब में सामाजिक रूप से रचा गया है और पीड़ितों की मुक्ति के लिए उन ढांचों को तोड़ना आवश्यक है।
इसी कारण से जेंडर को ‘अस्थिर’ सामाजिक संरचना कहा जा रहा है। इसके उन्मूलन के लिए, पश्चिम में सोशल इंजीनियरिंग कार्यकर्ता प्यूबर्टी ब्लॉकर्स के लिए अत्यधिक दबाव बना रहे हैं और बच्चों के जननांगों को विकृत करने की शल्यक्रियाओं का समर्थन कर रहे हैं। चिकित्सा विज्ञान पश्चिमी शैक्षणिक समूह के इस नए तथ्य-वर्णन से प्रभावित हो रहा है कि जेंडर जैविक नहीं बल्कि पूर्णतः एक ‘सामाजिक संरचना’ है।
भारत में भी इसकी गूंज सुनाई पड़ रही है। प्रत्येक नवीनतम अमेरिकी सनक की नकल करने का हमारे यहां फैशन जो बन गया है। भारत की नई शिक्षा नीति ने बड़े गर्व से पश्चिमी लिबरल आर्ट्स शिक्षा के लिए द्वार खोल दिए हैं। भारतीय विश्वविद्यालय विद्वानों के बजाय कार्यकर्ताओं से निर्मित जेंडर स्टडीज विभाग के माध्यम से लैंगिक अध्ययनों संबंधी होड़ में शामिल हो गए हैं। अधिकतर धनाढ्य भारतीय माता-पिता- जो लिबरल आर्ट्स की शिक्षा के लिए महंगे ट्यूशन शुल्क का भुगतान करते हैं- अमेरिकी शिक्षा के निहितार्थों को नहीं समझते हैं। जेंडर संबंधी अस्थिरता के प्रवक्ता अपने सक्रियतावाद को भारत-विरोधी राजनीति के साथ मिला रहे हैं।
भारत ने हमेशा विविधता को अपनाया है, जिसमें ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए सम्मान भी शामिल है। भारतीय शिक्षाविदों के लिए बेहतर होगा कि वे पश्चिम का अंधानुकरण करने के बजाय भारतीय प्रतिमानों की जांच-परख करें और उन्हें मानविकी के भारत के अपने प्रारूप में सम्मिलित करें। विविधतापूर्ण जनसंख्या पर लापरवाह तरीके से विदेश के सामाजिक विज्ञानों को लागू किए जाने से ऐसे अप्रत्याशित और अस्थिरतापूर्ण परिणाम आ सकते हैं, जिनके लिए भारत एकदम तैयार नहीं है।
Date:24-01-23
क्लाइमेट चेंज से निपटने में यूरोप से बेहतर कदम उठा रहा भारतआरती खोसला, ( निदेशक, क्लाइमेट ट्रेंड्स )
जलवायु परिवर्तन से निपटने में भारत लगातार अपनी कमर कस रहा है। रिन्युएबल एनर्जी का चरणबद्ध तरीके से विस्तार, हाइड्रोजन नीति, रेलवे का डी-कार्बोनाइजेशन और 2030 तक नेट जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य हासिल करने जैसे कई अच्छे कदम उठाए जा रहे हैं। इन फैसलों के दूरगामी असर होने वाले हैं।
भारत ने नेशनली डिटरमाइंड कंट्रीब्यूशंस के तहत जलवायु नीति के प्रति अपने सरोकार को जाहिर किया है। पेरिस समझौते की पूर्ति के लिए भारत ने वर्ष 2070 तक नेट जीरो अर्थव्यवस्था बनने का लक्ष्य तय किया है। सरकार ने विभिन्न मंत्रालयों के साथ मिलकर प्रदूषण में कमी लाने के लिए एक क्षेत्रवार नजरिया तैयार किया है। वहीं नेशनल एनर्जी पॉलिसी (एनईपी) में भी 2030 तक स्थापित सौर ऊर्जा क्षमता में उल्लेखनीय वृद्धि करने के साथ केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण की कोयला क्षमता में गिरावट की बात कही गई है। केंद्र ने हाल ही में अक्षय ऊर्जा क्षमता को स्टोर करने के लिए एक बिजली ट्रांसमिशन प्रणाली बनाने के लिए 30 अरब डॉलर की योजना का अनावरण किया है। सरकार ने पिछले महीने अपने संप्रभु ग्रीन बांड भी जारी किए हैं। इनका मकसद सार्वजनिक क्षेत्र की ऐसी परियोजनाओं की आर्थिक मदद करना है, जिनका सरोकार जलवायु संरक्षण कार्रवाई से जुड़ा हो। इनके जरिए भारत अपने जलवायु संबंधी अंतरराष्ट्रीय संकल्पों को और मजबूत करना है।
भारत की हाइड्रोजन नीति में भी बदलाव किए गए हैं। हाइड्रोजन उत्पादन को बढ़ाने के लिए ढाई अरब डॉलर की व्यवस्था की गई है। इस बहुप्रतीक्षित नीति में ऊर्जा, उद्योग एवं परिवहन क्षेत्रों में हाइड्रोजन आधारित हरित पारिस्थितिकी का लक्ष्य हासिल करने के लिए स्पष्ट बातें रखी गई हैं। अन्य बातों के साथ-साथ तेल शोधन इकाइयों को वर्ष 2035 तक अपने यहां इस्तेमाल किए जाने वाले ईंधन के एक तिहाई हिस्से को ग्रीन हाइड्रोजन से बदलना होगा। 2035 तक उर्वरक उत्पादन का कार्य 7% ग्रीन हाइड्रोजन से करना होगा और शहरी गैस वितरण ग्रिड में 15% गैस को ग्रीन हाइड्रोजन से बदलना होगा। भारत वर्ष 2026 तक दुनिया में उत्पादित होने वाली कुल 26 गीगावाट इलेक्ट्रोलाइजर क्षमता में से इस वर्ष 8 गीगावट की इलेक्ट्रोलाइजर निर्माण क्षमता का वादा करने की दिशा में भी आगे बढ़ा।
सरकार ने भारतीय रेलवे के वर्ष 2030 तक नेट जीरो उत्सर्जन का लक्ष्य हासिल करने की अपनी घोषणा को दोहराया है। इस लक्ष्य को हासिल करने के लिए रेलवे नेटवर्क के ब्रॉड गेज (बीजी) को 100% विद्युतीकृत करना होगा। रेलवे ने करीब 142 मेगावाट उत्पादन क्षमता के सौर ऊर्जा प्लांट लगाए हैं और अब तक करीब 103 मेगावाट पवन ऊर्जा संयंत्र तैयार किए हैं। रेलवे कार्बन सिंक में वृद्धि करने के लिए अपनी जमीन के वनीकरण की योजना बना रहा है। दुनियाभर से तुलना की जाए, तो भारत ने इस दिशा में अच्छी-खासी प्रगति की है। बस निरंतरता की जरूरत है।
Date:24-01-23
स्मार्ट सिटी की परिकल्पना के क्या हैं मायनेअमित कपूर और विवेक देवरॉय, ( कपूर, इंस्टीट्यूट फॉर कॉम्पिटिटिवनेस, इंडिया के अध्यक्ष और स्टैनफर्ड यूनिवर्सिटी के विजिटिंग स्कॉलर और व्याख्याता हैं। देवरॉय भारत के प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष हैं )
प्रधानमंत्री के महत्त्वाकांक्षी स्मार्ट सिटी अभियान में उन शहरों को बढ़ावा देने का विचार शामिल है जो अपने नागरिकों के जीवन और उनके रहन-सहन को आसान बनाते हुए सहूलियत दे सकें और जहां के मूल बुनियादी ढांचे के विकास के साथ-साथ एक साफ-सुथरे और लंबे समय तक अक्षुण्ण रहने वाला पर्यावरण हो। इसके अलावा स्मार्ट सिटी की परिकल्पना ऐसे शहर के तौर पर भी की गई है जहां डेटा से जुड़े ‘स्मार्ट समाधान’ को अपनाकर संसाधनों तक पहुंच बनाई जा सके।
स्मार्ट सिटी के तहत, शहर के सामाजिक, आर्थिक, भौतिक और संस्थागत स्तंभों पर व्यापक स्तर पर काम किया जाता है जिससे आर्थिक वृद्धि को बढ़ावा देने के साथ ही जीवन की गुणवत्ता बढ़ाने की कोशिश होती है। स्मार्ट सिटी अभियान का लक्ष्य एक ऐसे योग्य मॉडल का उदाहरण पेश करना है जो दीर्घकालिक और समावेशी विकास पर जोर देने के साथ अन्य महत्त्वाकांक्षी शहरों के लिए प्रेरणास्रोत के रूप में काम करता है।
हालांकि, शहरीकरण का यह नया चेहरा एकपक्षीय नहीं है बल्कि यह भारत के अपने लक्ष्य को हासिल करने के नए तरह के डिजिटल और दीर्घकालिक दृष्टिकोण अपनाने के प्रयास का नतीजा है। यह मूलभूत रूप से शासन के विभिन्न पहलुओं से जुड़ा हुआ है, विशेष रूप से इसका ताल्लुक स्थानीय शासन के स्तर पर सुधार से है ताकि शहरी स्थानीय निकायों और उनके प्रशासनिक माध्यमों को नवाचारों से लैस करने के साथ ही उन्हें और अधिक अनुकूल बनाया जा सके। इस प्रकार के सुधार का संबंध केवल इनकी फंडिंग से नहीं बल्कि स्मार्ट सिटी शासन में शहरी स्थानीय निकायों की भूमिका बढ़ाने से भी जुड़ा है।
भारत का स्मार्ट सिटी मिशन केंद्र सरकार की फंडिंग से चलाया जाने वाला कार्यक्रम है जो स्मार्ट सिटी प्रस्ताव के विभिन्न पहलों को लागू करने के लिए राज्य सरकारों और शहरी स्थानीय निकायों के समान योगदान की अनिवार्यता तय करता है। राज्यों से उम्मीद की जाती है कि वे स्मार्ट सिटी प्रस्ताव में शामिल पहलों के लिए विभिन्न स्रोतों से फंडिंग की संभावनाएं तलाशेंगे जिसमें राज्य और शहरी स्थानीय निकायों के संसाधन शामिल हैं जो उपयोगकर्ता शुल्क, लाभार्थी शुल्क, प्रभाव शुल्क, जमीन से मिलने वाली राशि और ऋण आदि से मिलते हैं।
अभियान की निगरानी तीन स्तरों पर की जाती है, राष्ट्रीय स्तर, राज्य और शहर के स्तर पर। राष्ट्रीय स्तर पर विचारों को मंजूरी देने, योजना की प्रगति पर नजर रखने और धन आवंटित करने की जिम्मेदारी एक शीर्ष समिति पर होती है जिसका नेतृत्व आवासीय एवं शहरी मामलों के मंत्रालय के सचिव करते हैं और इसमें संबंधित मंत्रालयों और संगठनों के अधिकारी शामिल होते हैं। राज्य स्तर पर, स्मार्ट सिटी मिशन की समग्र दिशा एक उच्चाधिकार संचालन समिति द्वारा निर्धारित की जाएगी और यह राज्य के मुख्य सचिव की अध्यक्षता में होगी।
इसके अलावा, नगरपालिका स्तर पर, जिलाधिकारी और एक बहुद्देश्यीय योजनाओं (एसपीवी) के मुख्य कार्याधिकारी, सभी स्मार्ट सिटी में स्मार्ट सिटी सलाहकार मंच तैयार करते हैं। इस मंच की जिम्मेदारी फंड जारी करना, स्मार्ट सिटी के विकास की परियोजनाओं की निगरानी और उनका आकलन करना है।
12वें वित्त आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, 3,723 शहरी स्थानीय निकाय हैं, जिनमें से 109 नगर निगम हैं, 1,432 नगरपालिकाएं और 2,182 नगर पंचायत हैं। शहरी स्थानीय निकायों की बड़ी संख्या आवास, स्वच्छता, आजीविका, आईटी, स्वास्थ्य एवं शिक्षा, परिवहन और पर्यावरण सहित सभी महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों में वृद्धि की क्षमता के संकेत देती है। हालांकि, इन शहरी स्थानीय निकायों के कामकाज की जवाबदेही तय करने के साथ ही राजकोषीय अनुशासन बनाए रखना आवश्यक है।
स्मार्ट सिटी अभियान के माध्यम से, भारत को शहरी स्थानीय निकायों की क्षमता में सुधार पर ध्यान देने के साथ ही नए दौर के शासन की ओर प्रगति की जा सकती है।
उदाहरण के तौर पर एसपीवी अनिवार्य रूप से नगरपालिकाओं की तरह काम करते हैं, लेकिन उनकी संरचना इस तरह है कि वे कम से कम 40 प्रतिशत निजी निवेश के साथ एक निजी कंपनी के रूप में पंजीकृत हैं और वे शहरी शासन को स्थायी कार्यकारी नेतृत्व के साथ स्थिरता का अहसास देते हैं। यह उम्मीद की जाती है कि यह स्थानीय सरकारों को अंतर-विभागीय तालमेल की ओर बढ़ने और शहर के निर्वाचित अधिकारियों, जैसे कि मेयर को कार्यकारी अधिकार का हस्तांतरण करे ताकि जवाबदेही के साथ शहरों का प्रबंधन सुनिश्चित किया जा सकता हैं।
शहरी स्थानीय निकाय, कई मायने में स्मार्ट सिटी की वृद्धि के लिए अनिवार्य है। इस अभियान की सफलता, प्रभावी नेतृत्व जैसे कारकों पर निर्भर करती है। सबसे महत्त्वपूर्ण बात यह है कि उनके जमीनी स्तर के संचालन के कारण, शहरी स्थानीय निकाय एक स्पष्ट नजरिया दे सकते हैं और शहर के निवासियों के बीच बेहतर समुदायों का निर्माण करने और प्रभावी एवं बेहतर विकास को बढ़ावा देने की इच्छा बढ़ा सकते हैं। वे स्थानीय पर्यावरण के बारे में उपयोगी जानकारी का एक स्रोत भी हैं और इससे वैसी विशेष मांग सामने आती है जिसका समाधान निकालना अहम होता है ताकि यह आम सहमति की भी आवाज बने। सीमित क्षेत्राधिकार और वित्तीय बाधाओं के रूप में इनमें कुछ महत्त्वपूर्ण बाधाएं हैं। इससे न केवल उनकी काम करने की क्षमता बाधित होती है बल्कि बेहतर काम करने का उनका कौशल भी प्रभावित होता है। ऐसे में, स्मार्ट सिटी मिशन और शहरी स्थानीय निकायों के बीच बेहतर तालमेल की परिकल्पना तभी की जा सकती है जब शहरी स्थानीय निकायों के दायरे को आगे बढ़ाया जाएगा। इन निकायों के कार्य और अधिकार क्षेत्र के दायरे को बढ़ाने के अलावा, यह देश में दीर्घकालिक शहरीकरण को बढ़ावा देने में स्थानीय शासन तंत्र की भूमिका को तवज्जो देने का मामला भी है। दीर्घकालिक और समावेशी शहरीकरण के क्षमता निर्माण के लिए राष्ट्रीय विकास रणनीतियों को शहरी स्थानीय निकायों के साथ जोड़ना अनिवार्य होगा।
इसके माध्यम से, इस अभियान को जवाबदेह बनाते हुए और पारदर्शिता के साथ शहरी शासन व्यवस्था में क्रांतिकारी बदलाव लाने होंगे तभी इसका शहरी विकास पर दीर्घकालिक प्रभाव पड़ेगा।
Date:24-01-23
पुलिस का बलसंपादकीय
नागरिक सुरक्षा के मद्देनजर पुलिस बल को अधिक सक्षम, सतर्क और सुलभ बनाने पर जोर दिया जाता रहा है। बदलती जरूरतों के मुताबिक उसे नए संसाधनों से सुसज्जित भी किया जाता है। इस बात को एक बार फिर प्रधानमंत्री ने भी पुलिस महानिदेशकों और महानिरीक्षकों के सम्मेलन में रेखांकित किया। उन्होंने सुझाव दिया कि राज्य पुलिस बल और केंद्रीय एजंसियों के बीच सहयोग बढ़ाने की दिशा में काम किया जाना चाहिए। प्रौद्योगिकी संसाधन अपनाने के साथ-साथ पैदल गश्त जैसी पारंपरिक प्रणाली को बढ़ावा दिया जाना चाहिए। यह सुझाव ऐसे समय आया है, जब आपराधिक गतिविधियों पर नकेल कसना बड़ी चुनौती मानी जा रही है। हर साल अपराध के आंकड़े कुछ बढ़े हुए दर्ज होते हैं। हालांकि महिलाओं, बच्चों आदि के खिलाफ होने वाले अपराधों से संबंधित दंडात्मक प्रावधान कड़े किए गए हैं, पर उनका अपेक्षित असर नजर नहीं आ रहा। आपराधिक गतिविधियों पर नजर रखने के लिए अत्याधुनिक तकनीक का उपयोग होने लगा है, जिससे अपराध करने वालों की धर-पकड़ में तेजी आई है, मगर अपराध की दर फिर भी नहीं घट रही, तो इसे लेकर चिंता स्वाभाविक है। सूचनाओं के आदान-प्रदान को लेकर राज्यों की पुलिस और केंद्रीय बलों को तकनीकी रूप से परस्पर जोड़ने पर सहमति बहुत पहले बन गई थी, मगर अपराधियों, उपद्रवियों और अलगाववादी ताकतों के अंतरराज्यीय संजाल को तोड़ने में अपेक्षित कामयाबी नहीं मिल पा रही है।
दरअसल, पुलिस आंतरिक सुरक्षा का बुनियादी ढांचा होती है। दूसरी सुरक्षा एजंसियों की अपेक्षा स्थानीय स्तर पर पुलिस की सक्रियता अधिक होती है, उसे हर गतिविधि का सूत्र पता होता है। ऐसे में अपेक्षा की जाती है कि अगर वह केंद्रीय बलों और दूसरे सुरक्षा बलों के साथ सूचनाओं का नियमित आदान-प्रदान करे, तो सीमा पार से या अंतरराज्यीय संजाल के तहत चलने वाली आपराधिक गतिविधियों को रोकने में बहुत आसानी होगी। खासकर माओवादी और पूर्वोत्तर के अलगाववादी संगठनों की सजिशों को अंजाम देने से पहले ही खत्म किया जा सकता है। इस दिशा में काफी कुछ काम भी हुआ है, मगर अब भी पुलिस और दूसरी सुरक्षा एजंसियों के बीच संतोषजनक तालमेल नहीं दिखाई देता। इसकी एक वजह तो यह है कि कानून-व्यवस्था चूंकि राज्य सरकारों के अधिकार क्षेत्र का विषय है, इसलिए वे केंद्रीय सुरक्षा बलों के साथ तालमेल बिठाने से कतराती हैं। इस तरह आतंकवाद, अलगाववाद से प्रभावित इलाकों में नजर रखने और तस्करी, हथियारों की आपूर्ति जैसी गतिविधियों पर अंकुश लगाने में कई तरह की दिक्कतें पेश आती हैं।
मगर सबसे अधिक आलोचना स्थानीय स्तर पर आपराधिक गतिविधियों को रोकने में पुलिस के कामकाज के तरीके को लेकर होती रही है। इसमें सुधार के लिए पुलिस सुधार संबंधी कई सिफारिशें आर्इं, मगर राजनीतिक इच्छाशक्ति के अभाव में उन पर अमल नहीं हो सका। यह भी छिपा तथ्य नहीं है कि सरकारें पुलिस का इस्तेमाल अपने पक्ष में करती हैं। इसलिए भी कई आपराधिक प्रवृत्ति के लोगों के खिलाफ उचित सख्ती नहीं बरती जा पाती। फिर पुलिस का आम लोगों के साथ रिश्ता प्राय: मधुर नहीं देखा जाता, वह आम लोगों से दूरी बना कर और भय पैदा करके ही काम करना अधिक पसंद करती है। इसकी वजह से भी आम लोगों से अपेक्षित सहयोग नहीं मिल पाता और कई सूचनाएं दबी रह जाती हैं। पुलिस तंत्र को वास्तव में मजबूत बनाना है, तो सबसे पहले पुलिस सुधार संबंधी सिफारिशों को लागू करने और फिर संसाधनों और रणनीति के स्तर पर उसमें बदलाव का प्रयास होना चाहिए।
Date:24-01-23
सुशासन में नैतिकता की जगहसुशील कुमार सिंह
एक सक्षम प्रशासक में निष्पक्षता और सत्यनिष्ठा के साथ पारदर्शिता हो तभी सुशासन सुनिश्चित होता है। सिविल सेवकों के लिए आचार संहिता, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और अनेक प्रशासनिक कानूनों के जरिए नैतिकता को सबल बनाने का प्रयास किया गया है, पर इसकी क्या कसौटी हो, इसे भी देखना आवश्यक है। मैक्स वेबर ने अपनी पुस्तक ‘सामाजिक-आर्थिक प्रशासन’ में कहा था कि नौकरशाही प्रभुत्व स्थापित करने से जुड़ी एक व्यवस्था है, जबकि अन्य विचारकों यह राय रही है कि यह सेवा की भावना से युक्त एक संगठन है। इसमें कोई दो राय नहीं कि इस्पाती ढांचे वाली नौकरशाही बीते तीन दशकों से प्लास्टिक फ्रेम वाली सिविल सेवक बन गई है। ऐसा 1991 के उदारीकरण के बाद से देखा जा सकता है। मगर क्या नैतिकता के इस पड़ाव पर आचार नीति के मामले में विधायिका सफल कही जाएगी।
संसद हो या विधानसभा, दागी सांसदों और विधायकों की फेहरिस्त लगातार लंबी होती जा रही है। जाहिर है, आचार संहिता केवल सिविल सेवकों के लिए नहीं, उन तमाम कार्यकारियों के लिए व्यापक रूप में होनी चाहिए, जो राष्ट्र और राज्य में ताकतवर और वैधानिक सत्ता से पोषित हैं। नए वातावरण में कम से कम यह बात आ जानी चाहिए कि नई लोकसेवा के साथ संसद और विधानमंडल का पारिस्थितिकी तंत्र नए नैतिक आचरण से युक्त हो।
स्पेन की सुशासनिक संहिता दुनिया में सबसे अधिक प्रखर रूप में दिखती है। उसमें निष्पक्षता, तटस्थता और आत्मसंयम से लेकर जनसेवा के प्रति समर्पण समेत पंद्रह अच्छे आचरण के सिद्धांत निहित हैं। आचार नीति मानव चरित्र और आचरण से संबंधित है। यह सभी प्रकार के झूठ की निंदा करती है। चुनाव के दिनों में तो आदर्श चुनाव आचार संहिता राजनीतिक दलों और प्रत्याशियों पर लागू हो जाती है। मौजूदा समय में पूर्वोत्तर के तीन राज्यों- मेघालय, त्रिपुरा और नगालैंड में चुनावी बिगुल बज चुका है और नैतिकता के साथ आचरण नीति की आवश्यकता एक बार फिर इन छोटे राज्यों में प्रवेश कर रही है। निर्वाचन आयोग कितना सफल रहेगा और चुनावी होड़ में शामिल राजनेता आचार संहिता में कितने सहयोगी बनेंगे, यह समय बताएगा। द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग ने आचार संहिता पर अपनी दूसरी रिपोर्ट में शासन में नैतिकता से संबंधित कई सिद्धांतों को उकेरा था। पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम ने कहा था कि भ्रष्टाचार जैसी बुराइयां कहां से उत्पन्न होती हैं? ये कभी न खत्म होने वाले लालच से आती हैं। भ्रष्टाचार मुक्त नैतिक समाज के लिए इस लालच के खिलाफ लड़ाई लड़नी होगी और ‘मैं क्या दे सकता हूं’ की भावना से इस स्थिति को बदलना होगा।
देश तभी ऊंचाई को प्राप्त करता है, जब पूरी व्यवस्था आचार नीति का पालन करती हो। जब यह महज कागजी नहीं होती, बल्कि लोगों के स्नायुतंत्र में बस चुकी होती है। जिम्मेदारी और जवाबदेही आचार नीति के अभिन्न अंग हैं और यही सुशासन का पैमाना भी है। आचार नीति एक बहुआयामी मानक है, इसलिए यह दायित्वों के बोझ को आसानी से सह लेती है। अगर दायित्व बड़े हों और आचरण के प्रति गंभीरता न हो, तो जोखिम बड़ा होता है।
विभिन्न देशों ने समय-समय पर अपने मंत्रियों, विधायकों और सिविल सेवकों के लिए नैतिक संहिता निर्धारित किया है। अमेरिका में यह मंत्री संहिता, संयुक्त राष्ट्र सीनेट में आचार संहिता और कनाडा में मंत्रियों के लिए मार्गदर्शन है। भारत सरकार ने एक आचार संहिता निर्धारित की है, जो केंद्र और राज्य सरकार, दोनों के मंत्रियों पर लागू होती है। इनमें कई अन्य बातों के साथ मंत्रियों द्वारा अपनी संपत्ति और देनदारियों का खुलासा करने साथ ही सरकार में शामिल होने से पहले जिस किसी भी व्यवसाय में थे, उससे स्वयं को अलग करने के अलावा स्वयं या परिवार के किसी सदस्य आदि के मामले में कोई योगदान या उपहार स्वीकार न करने की बात कही गई है। मगर जब नैतिकता के पैमाने पर सुशासन को कसा जाता है, तो ये बातें काफी अधूरी दिखती हैं। इसकी बड़ी वजह आचार संहिता के अनुपालन में कमी है। राजनीतिक प्रक्रिया का अपराधीकरण तथा राजनेताओं, लोक सेवकों और व्यावसायिक घरानों के बीच अपवित्र गठजोड़, लोकनीति के निर्धारण और शासन पर घातक असर डालता है।
भारत के लोकतांत्रिक शासन को ज्यादा गंभीर खतरा अपराधियों और बाहुबलियों से है, जो राज्य की विधानसभाओं और देश की लोकसभा में अच्छी-खासी जनसंख्या में घुसने लगे हैं। अब तो ऐसा लगता है कि एक ऐसी राजनीतिक संस्कृति अपनी जड़ें जमा रही है, जिसमें संसद या विधानसभा की सदस्यता को निजी फायदे और आर्थिक लाभ के अवसर के रूप में देखा जा रहा है। इसे व्यापक रूप में देखें तो सुशासन और आचरण नीति दोनों घाटे में दिखते हैं। बावजूद इसके आचार नीति और उसके पारिस्थितिकी तंत्र को प्राप्त करने का भरोसा नहीं छोड़ा जा सकता। विविध भाषाभाषी और संस्कृति से युक्त भारत भावना और संस्कृति से भरा है, मगर विश्वसनीयता और दक्षता के साथ ईमानदारी पर संशय भी उतना ही बरकरार रहता है कि जिन्हें जिम्मेदारी मिली है, क्या वे पूरा न्याय करते हैं। नेता कौन होता है, उसके गुण और जिम्मेदारियां क्या होती हैं, एक समुदाय, समाज या राष्ट्र में समृद्धि, आर्थिक उन्नति स्थायित्व, शांति और सद्भाव आदि कैसे विकसित हों, यह नेतृत्व को समझना होता है। देखा जाए तो नेतृत्व मुख्य रूप से बदलाव का प्रतिनिधित्व होता है और उन्नति उसका उद्देश्य। मात्र लोगों की आकांक्षाओं को ऊपर उठाना, सत्ता हथियाना और नैतिकताविहीन होकर स्वयं का शानदार भविष्य तलाशना न तो नेतृत्व की श्रेणी है और न तो यह आचार नीति का हिस्सा है।
लोक प्रशासन में नैतिकता के पारितंत्र को परिभाषित करने के लिए विभिन्न कानूनों, नियमों और विनियमों के माध्यम से इसे व्यापक रूप दिया गया है। 1930 के दशक में ब्रिटिश सिविल सेवकों के लिए ‘क्या करें और क्या न करें’ निर्देशों का एक संग्रह जारी किया गया था। स्वतंत्रता के बाद भी आचार नीति का निर्माण इसी का हिस्सा था। संविधान में कामकाज की समीक्षा के लिए राष्ट्रीय आयोग द्वारा 2001 में प्रशासन में ईमानदारी को लेकर जारी परामर्शपत्र में कई विधायी और संस्थागत मुद्दों पर प्रकाश डाला गया था। गौरतलब है कि सुशासन, विश्वास और भरोसे पर टिका होता है। शासन में ईमानदारी, सार्वजनिक जीवन में जवाबदेही, पारदर्शिता और सत्यनिष्ठा का सुनिश्चित होना सुशासन की गारंटी है। सुशासन के चलते ही आचार नीति को भी एक आवरण मिलता है।
संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 2003 में भ्रष्टाचार के खिलाफ संकल्प को मंजूरी दी। ब्रिटेन में सार्वजनिक जीवन में मानकों पर समिति बनाई गई, जिसे नोलान समिति के नाम से जाना जाता है। उसमें सात मुख्य बातें- निस्वार्थता, सत्यनिष्ठा, निष्पक्षता, जवाबदेही, खुलापन, ईमानदारी और नेतृत्व- शामिल थीं। देश में संस्थागत और कानूनी ढांचा कमजोर नहीं है, दिक्कत इसके अनुपालन करने वाले आचरण में है। केंद्रीय सतर्कता आयोग, सीबीआइ, नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक, लोकपाल और लोकायुक्त जहां सुशासन स्थापित करने के संस्थान हैं, वहीं भारतीय दंड संहिता, भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और सूचना के अधिकार समेत कई कानून देखे जा सकते हैं। मगर सुशासन के लिए एक ऐसी आचार संहिता की जरूरत है, जो संस्कृति, पर्यावरण तथा स्त्री पुरुष समानता को बढ़ावा देने के अलावा आत्मसंयम और सत्यनिष्ठा के साथ निष्पक्षता पर बल देती हो। यह सच है कि जनता और मीडिया मूकदर्शक नहीं है, न्यायिक सक्रियता भी बढ़ी है। बावजूद इसके, यह सवाल बना हुआ है कि लोकतंत्र के प्रवेश द्वार पर अपराध कैसे रुके और वैधानिक सत्ताधारक आचार नीति में पूरी तरह कैसे बंधे।
Date:24-01-23
सिफारिशें हों लागूसंपादकीय
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पुलिस महानिदेशकों और महानिरीक्षकों के 57 अखिला भारतीय सम्मेलन को संबोधित करते हुए पुलिस बल को अधिक संवेदनशील बनाने के साथ प्रौद्योगिकियों से प्रशिक्षित करने का सुझाव दिया है। भारत में पिछले तीन दशकों से ज्यादा समय से पुलिस तंत्र में व्यापक सुधारों को लेकर वहस चल रही है। हालांकि इन प्रयासों से कुछ सकारात्मक वदलाव अवश्य आए हैं, लेकिन वे पर्याप्त और संतोषजनक नहीं हैं। शायद यही वजह है कि प्रधानमंत्री मोदी ने इस ज्वलंत मुद्दे को रेखांकित करते हुए पुलिस प्रणाली में आवश्यक सुधार करने पर जोर दिया है। आमतौर पर पुलिसकर्मियों के विरुद्ध उनकी शक्तियों का दुरुपयोग करने से लेकर गैरकानूनी गिरफ्तारी, हिरासत में वलात्कार और हत्या करने की शिकायतें हैं। आए दिन समाचार पत्रों में हिरासत में हिंसा, वलात्कार और मौत की घटनाओं से संबंधित खवरें छपती रहती हैं। इससे पता चलता है कि भारतीय पुलिस की कार्यशैली कितनी असभ्य, अशिष्ट और असंवेदनशील है। कानून के राज और विधि के शासन में अगर हिरासत में इस तरह की घटनाएं होती हैं तो यह किसी भी सभ्य समाज के माथे पर कलंक है। यह भी गौर करने वाली वात है कि पुलिसकर्मियों पर भ्रष्टाचार के आरोप भी लगाते रहते हैं। जाहिर है कि पुलिस की कार्यप्रणाली में सुधार के लिए एक ऐसी निरीक्षण प्रणाली का विकास किया जाना चाहिए जिससे पुलिसकर्मियों की जवाबदेही सुनिश्चित की जा सके। पुलिस के सामने अपराधों को जल्द-से-जल्द सुलझाने और अपराधी को पकड़ने की चुनौती होती है। इसके लिए वुनियादी ढांचे का आधुनिकीकरण करने की दिशा में पहल करनी होगी। प्रधानमंत्री ने राज्य पुलिस और केंद्रीय एजेंसियों के वीच तालमेल बढ़ाने का सुझाव दिया है। अगर इस सुझाव का क्रियान्वयन किया जाए तो निश्चित रूप से राज्यों की पुलिस और केंद्रीय पुलिस वलों दोनों की कार्यक्षमता वढ़ेगी। पुलिस विभाग में सुधार लाने के लिए अनेक समितियों का गठन हुआ है । अनेक आयोग वने हैं। लेकिन दुर्भाग्य है कि उनकी सिफारिशों को ठंडे वस्ते में डाल दिया गया है। कहा जा सकता है कि पुलिस सत्ता-प्रतिष्ठान और राजनीतिक ढांचे में यह इच्छाशक्ति नहीं है कि पुलिस तंत्र में चले आ रहे यथास्थितिवाद में बुनियादी वदलाव ला सके। अगर पुलिस तंत्र संवेदनशील और आधुनिक वनाना है तो समितियों और आयोगों की सिफारिशों को लागू करना होगा।
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नोटबंदी या विमुद्रीकरण पर उच्चतम न्यायालय ने अपना अंतिम निर्णय देकर मामले को विराम दे दिया है। 8 नवंबर 2016 को हुई नोटबंदी को संविधान पीठ ने कार्यपालिका का निर्णय क्षेत्र बताया है। साथ ही यह भी स्पष्ट किया है कि ऐसे क्षेत्र विशुद्ध रूप से विशेषज्ञों के क्षेत्र हैं, और न्यायिक समीक्षा से परे हैं। न्यायपालिका के इस निर्णय को नोटबंदी के निर्णय से परे भी एक बेंचमार्क माना जा रहा है। ज्ञातव्य हो कि सर्वोच्च न्यायपालिका में जनहित याचिकाओं की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। इससे उसका बहुत सा समय बर्बाद होता है। बहरहाल संविधान पीठ के एक सदस्य ने नोटबंदी को गैरकानूनी भी बताया है।
कुछ बिंदु –
संविधान पीठ ने नोटबंदी के उद्देश्य की सफलता-असफलता पर कोई विश्लेषण नहीं किया है। अगर विमुद्रीकरण का सामान्य विश्लेषण करें, तो आर्थिक नीतियों के लिए इसे एक बड़ा झटका ही माना जा रहा है। जिस काले धन पर रोक के लिए इसे लाया गया था, उसमें भी कोई सफलता नहीं मिल पाई है। दूसरे, अगर डिजिटल पेमेंट को बढ़ाने का तर्क दिया जाए, तो इसे सफलता का कुछ श्रेय दिया जा सकता है। लेकिन इसको प्रोत्साहित करने के लिए आर्थिक झटके का यह रास्ता उचित नहीं कहा जा सकता है।
इसमें कोई दो राय नहीं कि 2018 और 2019 की आर्थिक मंदी जीएसटी और नोटबंदी का नतीजा थी। लेकिन उच्चतम न्यायालय ने जैसा स्पष्ट कहा कि यह उसकी न्यायिक समीक्षा का विषय नहीं होना चाहिए। उच्चतम न्यायालय का यह रवैया लंबे समय से पेंडिंग मामलों के लिए अच्छा सिद्ध हो सकता है। इसे बनाए रखा जाना चाहिए।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधरित। 3 जनवरी, 2023
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Date:23-01-23
Wrestling NightmaresProbe sexual harassment with strictness and sensitivityTOI Editorials
In its eight-page reply to the Union sports ministry, the Wrestling Federation of India dismissed all allegations of sexual harassment as motivated by a “hidden agenda”. The sweeping, simplistic and swift way in which it did so only confirmed what the wrestlers protesting at Jantar Mantar were spotlighting – that the federation silences every accusation against its domineering chief. At that point, the ministry finally asked Brij Bhushan Sharan Singh to “step aside”. But this is only the start of a fair hearing to Vinesh Phogat, Bajrang Punia, Sakshi Malik and the other much-medalled wrestlers who are speaking in public for those who cannot yet do so themselves.
That these sexual harassment allegations are not yet in writing and that the victims haven’t yet stepped forward is quite understandable given the thick history of harassment complaints against male administrators and coaches that ended up with the complainant paying a bigger price. Both the sports ministry and IOA’s oversight committees for probing the allegations against Singh and WFI must therefore do their work not only with diligence, but also sensitivity. Women who have already suffered unjustly, must not be subjected to brute invasions of privacy. Deliver a timely verdict, initiate police action as warranted, and begin institutional fixes.
Indian sports also need more women in positions of authority, including as coaches. Their presence is critical for budding female athletes, who shall be watching the two probes closely. Sexist nightmares can quickly wither a young woman’s dream of winning golden glory for her country.
Date:23-01-23
It’s Good to Get More NeighbourlyET Editorials
Big Brother India’s continued and proactive support for Sri’s Lanka’s economic recovery, most recently at the International Monetary Fund, provides a glimpse into the role New Delhi envisions in the region. The possibility of using Indian power infrastructure for electricity trade between Nepal and Bangladesh is another facet of India’s neighbourhood engagement. These bonds of support, trade and economic opportunities should bind the countries, with India as a critical player. Acting in unison would be in enlightened self-interest of each country of the South Asia/BIMSTEC region.
New Delhi has been steadfast in its support to Colombo as the fuel, energy and commodities engulfed Sri Lanka and pushed the island nation into political turmoil. Now as Sri Lanka charts a recovery, India was the first country to provide a letter of support at the IMF. New Delhi consistently maintains that economic prosperity of the countries of the region is beneficial for all. As the bigger economy, its investment in these countries and increasing trade is about mutual benefit and not dominance. This approach makes India a reliable partner. The power trade between Nepal and Bangladesh reflects this. Nepal will gain from the sale, and Bangladesh will benefit from the access to electricity. Earlier, India provided debt finance for construction of the 1320 mw Rampal power plant in Bangladesh.
There will be occasions when countries will shop around New Delhi and Beijing for the best deal. There is no denying that China has a bigger economy and greater capacity to invest. However, India’s approach, its commitment to building partnerships and not using investments to take over national assets should, along with the ties of language, culture, history, give it an edge.
Date:23-01-23
Necessary pushbackThe Centre should stop seeing judicial appointments as rewards for loyalistsEditorial
The Supreme Court collegium has done well to push back against the Union government’s attempts to block the appointment of some advocates as High Court judges. The three-member collegium, which makes recommendations for High Court appointments, has reiterated its decision to elevate lawyers Saurabh Kirpal to the Delhi High Court, R. John Sathyan to the Madras High Court and Somasekhar Sundaresan to the Bombay High Court. As it dealt in detail with the objections raised by the Centre in each individual case, the motives behind the government’s ongoing contestation with the judiciary over appointments to constitutional courts stand exposed. Communications between the collegium and the Centre offer a glimpse into the untenable nature of the government’s objections to proposed appointees, making it abundantly clear how badly the current regime wants to control judicial appointments. If the objection based on a candidate’s sexual orientation smacks of a medieval-minded ideological bias, the effort to stall the elevation of a couple of advocates based on their social media activity exposes a mindset that sees appointments to the higher judiciary as a system of spoils meant for political loyalists. As the collegium has pointed out, neither the sexual orientation of Mr. Kirpal nor the airing of political views by the other two advocates will impinge on their suitability or integrity.
The government appears to think that potential candidates for judicial appointments should not have political views of their own, or that a tendency to make their views or opinion known will amount to a possible bias in their functioning as judges. Nothing can disprove this more than the fact that there are other names — to which the government seems to have no objections — that are closely associated with political parties. Indeed, one can say that the history of judicial appointments is replete with instances of government law officers, who invariably enjoy the confidence of the political leadership at the Centre or the States, and lawyers who represent political leaders being offered positions on both the Supreme Court and High Court Benches. The objection based on sexual orientation is particularly appalling, as it is contrary to the constitutional position against discrimination based on sex or sexual preferences. The viewpoint that the collegium system of appointments is flawed as it is opaque and tends to reduce the zone of consideration is valid. However, the manner in which the current regime is seeking to filter out candidates who, it suspects, may not further its political agenda will surely give the impression that allowing any sort of government interference will pose a threat to judicial independence.
Date:23-01-23
A reminder of the flaws in India’s urbanisation policiesA recent report on urban financing for India is another case of a top down approach that is over dependent on technocentric solutions and capital-intensive technologiesTikender Singh Panwar, [Is a former deputy mayor, shimla and an urban specialist]
A report by the World Bank, released in November last year, on financing India’s urban infrastructure needs, focuses on private investments ameliorating urban problems. The push to attract private capital, since the 1990s, followed by the urban reforms under the United Progressive Alliance I regime, the Smart City mission, and now this report, continues to plague India’s policy paradigm in the urban sector.
So, has the reform process really been able to attract private capital to urban infrastructure?
After three decades of reforms, urban finance predominantly comes from the government. Of the finances needed to fund urban capital expenditures, 48%, 24% and 15% are derived from the central, State, and city governments, respectively. Public–private partnership projects contribute 3% and commercial debt 2%.
In the last few years, various reports have estimated a huge demand for funding urban infrastructure; for example, the Isher Judge Ahluwalia report says that by 2030, nearly ₹39.2 lakh crore would be required. Likewise, the 11th Plan puts forth estimates of ₹1,29,337 crore for four basic services, ₹1,32,590 crore for urban transport and ₹1,32,590 crore for housing. A McKinsey report on urbanisation has a figure of $1.2 trillion, or ₹90 lakh crore.
World Bank estimates
The World Bank estimates that nearly $840 billion (₹70 lakh crore) would be needed for investment in urban India to meet the growing demands of the population, and $55 billion would be required annually. The flagship programmes of the government, the Smart City mission, the Atal Mission for Rejuvenation and Urban Transformation (AMRUT), the Pradhan Mantri Awas Yojana (PMAY), etc., are not more than ₹2 lakh crore (that too for a period of five years). So, how will such a gap between demand and supply be matched?
The core idea of the report and the solutions suggested include “improving the fiscal base and creditworthiness of the Indian cities. Cities must institute a buoyant revenue base and be able to recover the cost of providing its services”. In simpler terms, it means increasing property taxes, user fees and service charges to name a few.
This report already points out that nearly 85% of government revenue is from the cities. This means that urban citizens are contributing large revenues even as the World Bank report’s emphasis is on the levying of more burdens in the form of user charges on utilities, etc. But the point is even by enhancing the tax base, will it be sufficient to meet the rising demands of urban infrastructure in the cities?
Finding alternative paths
The basic problem with this report and other reports drawn up in a similar fashion is that they are made using a top to bottom approach, with too much of a focus on technocentric solutions using very high capital-intensive technologies.
For the urban context, plans must be made from below by engaging with the people and identifying their needs.
Empowering the city governments and the people at large is the second point. In the national task force that reviewed the 74th Constitutional Amendment, chaired by K.C. Sivaramakrishnan, many suggestions were made such as empowering the people, transferring subjects to the city governments, suggesting that 10% of the income-tax collected from cities be given back to them and ensuring that this corpus fund was utilised only for infrastructure building. This would ensure that city governments had an advantage in ensuring rapid transformation.
Another important aspect of urban infrastructure is linked to urban governance, which is in a shambles in most parts of the country. Regular elections should be held in cities and there must be empowerment through the transferring of the three Fs: finances, functions, and functionaries.
Cities primarily are run by parastatals and the city governments hardly have any role to play in the smooth functioning of such parastatals.
The World Bank in its report has stated in the report (page 69): “As an example, state-level management of urban water and sewerage functions may be devolved in a time-bound manner. An improved urban legal framework that includes a stable and certain fiscal transfer regime, accords financial powers to ULBs [urban local bodies] along with attendant rules/regulations… will determine the medium- to long-term scale of investment flows for urban infrastructure.”
The Shimla example
However, the exact opposite is happening. The Shimla water story is an example. The Shimla water works was transformed into a single utility in 2016-17, called the Greater Shimla Water Supply and Sewage Circle (GSWSSC) under the Shimla Municipal Corporation. The Bank rendered help in the form of a soft loan, ensuring an adequate supply of water and proper distribution by the utility, but under the Shimla Municipal Corporation. However, in 2017-18, it changed the character of GSWSSC to a company and formed the Shimla Jal Prabandhan Nigam Limited, now run under a board of directors, but outside the ambit of the municipality.
Such machinations shall not serve the purpose and will be perilous to the entire purpose of the urbanisation in India. The World Bank report is another reminder of the tragedy which Indian urbanisation is witnessing — “policy paralysis from the top”.
Date:23-01-23
It’s time for India’s universities to join the worldOpening to the world means making India more visible on the global academic scene and also learning about, and implementing, best practices from abroadPhilip G.Altbach
With India assuming the G20 presidency, it is now time for it to join the world’s academic community as a major player. Indians are well-known globally as top scientists and academics, university leaders, and key leaders in high tech, but little is known about the academic environment from which they have emerged. India’s academic system is now the world’s second largest. And, as articulated in the National Education Policy (NEP) of 2020, the country is actively pursuing reform and improvement.
Opening to the world means making India more visible on the global academic scene and also learning about, and implementing, best practices from abroad. The G20 leadership is an excellent opportunity to do both. Further, one of the priority areas in education during India’s G20 presidency is ‘Strengthening Research and Promoting Innovation through Richer Collaboration’. India is in a particularly advantageous position — the world sees India as an increasingly important economy and geopolitical player. India also plays an important role in higher education — mainly as an exporter of students and talent in many scientific fields — and especially in information technology and related fields. There is a growing interest abroad in linking with Indian universities and research institutes, not only because of untapped talent but also due to disengagement from China by some Western countries.
Unknown, complex system
India is not only the world’s second largest academic system, but also one of the world’s most complex and little understood academic environments. Its higher education sector is fragmented, inflexible with tight subject boundaries, and of uneven quality. The NEP’s focus is on consolidation, with the goal of bringing flexibility and multi-disciplinary education and improving quality. While private sector colleges and universities will continue to fuel growth, high-quality government institutions such as the IITs and AIIMS are also expanding and improving, and will likely achieve good results if they are adequately funded and permitted to have appropriate autonomy.
India has set up the National Institutional Ranking Framework, which has helped fuel competition among institutions. India’s global ranking in scientific publications improved from the seventh position in 2010 to the third in 2020. India ranks third in terms of the number of PhDs awarded in science and engineering. India’s Global Innovation Index ranking has also improved significantly, from 81 in 2014 to 40 in 2022, although it lags significantly behind the U.S. and China.
Indian universities have not scored well in the global rankings. The highest-scoring Indian institution in the 2023 Times Higher Education ranking is the Indian Institute of Science, in the 251-300 range. Another 75 institutions are ranked lower. The best-known institutions globally are the IITs. These do not rank well because they are small, specialised schools and not comprehensive universities, but their quality is much better than their ranking scores. The recent announcement that IIT-Kharagpur will establish a branch campus in Malaysia will help. For India to catch up, both in the rankings and in reality, will take significant investment over a sustained period of time. In comparison, China over decades has invested billions of dollars to improve its top universities — and this shows in the rankings and in measures of scientific output.
Distinctiveness
There are elements of India’s academic environment that are distinctive and worth highlighting to an international audience. These include the emergence of about a dozen top-quality non-profit private universities, mostly funded by philanthropically minded Indians. This elite sector is expanding and is focused on building an international ‘brand’ for Indian higher education. India uses English as the main language of science and higher education, which makes it much easier to interact with the rest of the world. India has more than 100 research laboratories in diverse areas sponsored by the Council of Scientific and Industrial Research and other Central government agencies. Some are outstanding in terms of their research contributions and their relationships with India’s economy.
Exercising leadership
India’s universities and its scientific prowess are an important part of a soft power strategy. The internationalisation initiatives outlined in the NEP is an important start. India’s G20 leadership is also an excellent opportunity to exercise leadership. Two interesting initiatives have been suggested. One is a conference in India of leaders of universities in the G20 countries with the aim of acquainting them with India’s academic opportunities. Another is the creation of a prestigious scholarship programme, similar to the Fulbright programme, that would provide top Indian students and faculty time in leading universities abroad and funding to bring top academic from abroad to India. China’s version of this is the China Scholarship Council.
Indian universities, researchers, and academics also need to involve themselves in the global scientific community through participation in joint projects, international meetings, and the like. All this will take careful planning, sustained resources, support from the Central and State governments and an expanded international consciousness in the Indian academic community.
Date:23-01-23
कलेजियम पर टकरावसंपादकीय
यह सही समय है कि सरकार और सुप्रीम कोर्ट कलेजियम व्यवस्था को लेकर संवाद करें। यदि सुप्रीम कोर्ट यह समझ रहा है कि कलेजियम व्यवस्था को संविधानसम्मत बताने से उसे स्वीकार कर लिया जाएगा तो यह संभव नहीं। इसी तरह इससे भी बात बनने वाली नहीं कि सरकार इस व्यवस्था की विसंगतियों को बयान करती रहे। सुप्रीम कोर्ट कलेजियम ने जिस तरह जजों की नियुक्ति के लिए तय नामों की सिफारिश दोहराते हुए उनकी वरिष्ठता बनाए रखने पर जोर दिया, उसका अर्थ है कि वह सरकार की आपत्तियों पर ध्यान देने को तैयार नहीं। अब सभी की निगाहें इस पर होना स्वाभाविक है कि सरकार क्या प्रतिक्रिया व्यक्त करती है? सुप्रीम कोर्ट कलेजियम की पहल से यदि कुछ स्पष्ट है तो यही कि उसने अपने रुख पर अडिग रहने का फैसला कर लिया है। इससे सरकार और उसके बीच टकराव बढ़ सकता है। आवश्यकता टकराव की नहीं, बल्कि समाधान तलाशने की है। यह समाधान तब मिलेगा, जब सुप्रीम कोर्ट के साथ ही सरकार भी अपने रुख पर विचार करने के लिए तैयार होगी। एक लंबे समय से जहां सरकार कलेजियम व्यवस्था की विसंगतियों को रेखांकित करने में लगी हुई है, वहीं सुप्रीम कोर्ट इस व्यवस्था को संविधानसम्मत ठहराने में लगा हुआ है। इसे इसलिए स्वीकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि एक तो विश्व के किसी प्रतिष्ठित लोकतंत्र में जज ही जज की नियुक्ति नहीं करते और दूसरे संविधान में कलेजियम व्यवस्था का कोई उल्लेख नहीं। सभी इससे परिचित हैं कि सुप्रीम कोर्ट ने लगभग तीन दशक पहले अपने ही एक फैसले के माध्यम से जजों की नियुक्तियों, स्थानांतरण और पदोन्नति का अधिकार अपने हाथ में ले लिया था।
यदि सुप्रीम कोर्ट यह समझ रहा है कि कलेजियम व्यवस्था को संविधानसम्मत बताने से उसे स्वीकार कर लिया जाएगा तो यह संभव नहीं। इसी तरह इससे भी बात बनने वाली नहीं कि सरकार इस व्यवस्था की विसंगतियों को बयान करती रहे। उसे इस व्यवस्था में बदलाव के लिए सक्रिय होना चाहिए। इसके प्रति सुप्रीम कोर्ट को भी लचीला रुख अपनाना चाहिए। यह ठीक नहीं कि सुप्रीम कोर्ट की ओर से केंद्रीय कानून मंत्री के उस पत्र का कोई उत्तर नहीं दिया गया, जिसमें उन्होंने कलेजियम व्यवस्था में सरकार के प्रतिनिधियों की भागीदारी की बात कही थी। आखिर इसमें गलत क्या है? यह सही समय है कि सरकार और सुप्रीम कोर्ट कलेजियम व्यवस्था को लेकर संवाद करें। संवाद के स्थान पर विवाद खड़ा करने से किसी का हित होने वाला नहीं है। इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि न्यायपालिका में सुधार का जो अभाव है, उसके दुष्परिणाम पूरे देश को भोगने पड़ रहे हैं। समझना कठिन है कि यदि सरकार और सुप्रीम कोर्ट न्याय क्षेत्र के अन्य विषयों, जैसे कि न्यायालयों के निर्णयों को क्षेत्रीय भाषा में उपलब्ध कराने पर एकमत हो सकते हैं और एक दूसरे की सराहना भी कर सकते हैं तो अन्य विषयों और विशेष रूप से उच्चतर न्यायपालिका में न्यायाधीशों की नियुक्ति पर मतैक्य क्यों नहीं रख सकते? इस संदर्भ में संसद या संविधान को सर्वोच्च बताने का कोई अर्थ नहीं, क्योंकि यदि कोई सर्वोच्च है तो वह है देश के लोगों की इच्छा।
Date:23-01-23
तारों बिना रातसंपादकीय
जैसे वायु प्रदूषण या ध्वनि प्रदूषण होता है, ठीक वैसे ही प्रकाश प्रदूषण होता है और यह प्रदूषण लगातार बढ़ता चला जा रहा है। इस प्रदूषण का दुष्प्रभाव यह है कि जो चीजें जैसी दिखनी चाहिए, वैसी नहीं दिख रही हैं। दुनिया भर में फैले अनेक सिटिजन साइंटिस्ट ने 12 वर्ष तक अध्ययन के बाद रिपोर्ट पेश की है। रात में होने वाला कृत्रिम प्रकाश प्राकृतिक प्रकाश को दूषित करने लगा है। वैज्ञानिकों ने बताया है कि रात के समय तारों को देखना साल दर साल मुश्किल होता जा रहा है। कृत्रिम प्रकाश जहां ज्यादा है, वहां से तारों को देखना या खोजना बहुत मुश्किल हो गया है। वैज्ञानिकों के अनुमान की मानें, तो हर साल कुछ-कुछ तारे प्रकाश प्रदूषण में छिपते चले जा रहे हैं।
ऐसे में, अध्ययन के नतीजे सैटेलाइट की बढ़ती जरूरत की ओर भी इशारा करते हैं। अब तारों को देखने या ग्रहों-उपग्रहों की पड़ताल में सैटेलाइट ही सहारा हैं। अगर पृथ्वी से तारों को देखकर अध्ययन किया जाएगा, तो वास्तविक स्थिति स्पष्ट नहीं होगी। एक खतरा यह भी है कि अगर पृथ्वी से तारे साफ नहीं दिखेंगे, तो सांस्कृतिक और स्वास्थ्य संबंधी बदलाव भी होंगे। तारों से जुड़ी कहानियां या गीत सामान्य नहीं रह जाएंगे। उस भावी पीढ़ी को समझने में परेशानी होने लगेगी, जो तारों भरा आसमान देखने से वंचित रहेगी। क्यबा एट अल में प्रकाशित ग्लोब एट नाइट प्रोजेक्ट के अध्ययन बहुत महत्वपूर्ण हैं। कम रोशनी और धुंधले तारे भी मानव को सीधे दिखने चाहिए, लेकिन अब मुश्किल होने लगी है। वैज्ञानिकों ने अध्ययन किया है कि आकाश की चमक समय के साथ कैसे बढ़ रही है। पिछले बारह वर्ष (2011 से 2022 तक) के आंकड़ों के विश्लेषण से पता चलता है कि कृत्रिम प्रकाश से प्रभावित आकाश की चमक दुनिया में हर साल 10 प्रतिशत की खतरनाक औसत के साथ बढ़ रही है, यानी आठ साल से कम समय में दोगुनी हो जा रही है। यह वृद्धि रक्षा मौसम विज्ञान उपग्रह कार्यक्रम और सुओमी नेशनल पोलर-ऑर्बिटिंग पार्टनरशिप उपग्रहों द्वारा लिए गए विकिरण मापन के आधार पर कृत्रिम प्रकाश उत्सर्जन (दो प्रतिशत वार्षिक) के अनुमान से बहुत अधिक है। अनेक सैटेलाइट भी सही रोशनी को पकड़ने-समझने में अक्षम हो रहे हैं। अत: भविष्य में ऐसे सैटेलाइट की जरूरत है, जिनको प्रकाश प्रदूषण से किसी तरह की समस्या न आए।
वैसे यह ध्यान रखने की बात है कि अभी जो डाटा प्रकाशित हुआ है, उनमें से ज्यादातर यूरोप और उत्तरी अमेरिका से लिया गया है। व्यापक डाटा और अध्ययन की जरूरत है। अफ्रीका, एशिया और ऑस्टे्रलिया से भी आंकड़े सामने आने चाहिए। लोगों को समझदार बनना पड़ेगा। अभी ज्यादातर शहरों में लोग अत्यधिक रोशनी देखकर बहुत खुश होते हैं, जबकि ऐसी रोशनी प्रकाश प्रदूषण ही है। ज्यादा रोशनी में पत्ते, फूल, फल और तमाम चीजें अलग ही रंग में दिखने लगती हैं। रात में कृत्रिम प्रकाश के खतरों के प्रति जागरूकता बहुत बढ़नी चाहिए और जरूरत के हिसाब से ही रोशनी की व्यवस्था होनी चाहिए। ज्यादातर लोग कृत्रिम प्रकाश को सड़क सुरक्षा और व्यक्तिगत सुरक्षा से भी जोड़ते हैं, जबकि इसका असली समाधान कुछ और है। वैसे दुनिया के खगोलविदों को इस प्रदूषण का आभास जल्दी हो गया था कि रात की रोशनी उनके शोध को प्रभावित कर सकती है और वे अपनी वेधशालाओं को चमकदार शहरों से दूर ले गए। हम कहीं भी हों, समझना होगा कि तारों के बिना रात का कोई अर्थ नहीं।
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केंद्रीय सलाहकाल परिषद् ने उचित मजदूरी की पहचान करने के लिए एक त्रिपक्षीय समिति नियुक्त की थी। इसने मजदूरी को तीन व्यापक श्रेणियों में विभाजित किया। (1) मूल न्यूनतम मजदूरी (2) उचित मजूदरी और (3) निर्वाह या जीवनयापन योग्य मजदूरी। हमारा श्रम मंत्रालय गरीबी उन्मूलन की दिशा में तेजी से काम करते हुए मजदूरी को न्यूनतम से निर्वाह योग्य की ओर ले जाने का प्रयत्न कर रहा है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन के अनुसार 2022 के पूर्वाद्ध में मजदूरी की दर 0.9% गिर गई है। इसको देखते हुए महामारी पश्चात् संभावित क्षतिपूर्ति की संभावना बहुत कम रह गई है। यह गिरावट क्रय-शक्ति में आई कमी को बताती है।
कुछ तथ्य –
सीमाएँ –
इस तरह की मजदूरी के निर्धारण में राष्ट्रीय आय और संबंधित उद्योग की भुगतान-क्षमता को ध्यान में रखा जाना चाहिए। यह अपने में सब्सिडी के कुछ अंश को समाहित करके चलती है। इसलिए यह जनकल्याण योजनाओं को सीमित कर सकती है।
ऐसा लगता है कि व्यापार चक्र में गति लाने के लिए एक गतिशील पारिश्रमिक व्यवस्था को अपनाना हितकर हो सकता है। अगर निर्वाह मजदूरी को ही अपनाया जाना है, तो इसे सामूहिक परामर्श और श्रमिकों के लिए कानूनी सुरक्षा के साथ अमल में लाया जाना चाहिए।
अंततः जीवन निर्वाह की लागत करने वाली मजदूरी से शहरी गरीबी को कम करने में सफलता जरूर मिल सकती है।
‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 30 दिसम्बर, 2022
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Date:21-01-23
Don’t Judge ViewsCriticising govts can’t be a disqualification for judgeship.TOI Editorials
Two of the recommendations that the Supreme Court collegium has reiterated this week had earlier been returned by government on account of the candidates’ social media posts. The point here is whether being “selectively critical … on the important policies, initiatives and directions of the government” precludes one from becoming a judge. In the US, it does. Supreme and federal court justices there are nominated by the president and approved by the Senate by a majority vote. Some state trial court judges actually run on a party ticket, where they appear as Republicans or Democrats. But India has a very different system. Here, the only views whose expression should bar a person from becoming a judge should be those that undermine constitutional values or the fundamental rights enshrined in the Constitution.
In this sense the collegium is absolutely right to hold that the expression of political views, as part of the right to free speech, cannot disentitle candidates from becoming judges in India. But what has happened in the case of these two candidates is part of a larger GOI-collegium fight on judicial appointments. For instance, while the collegium keeps insisting that per the current MoP its reiteration of a name is binding on GOI, the latter has hardened its position against this convention.
The lack of transparency and accountability of the collegium that had caused diverse political parties to cooperate on the NJAC constitutional amendment, hasn’t seen much redress since SC quashed NJAC back in 2015 – even as dissonance with GOI has widened significantly. It is citizens and justice that are the real victims of this impasse. It must end. The Centre and SC must sit together to devise an institutional mechanism for smoother – and timebound –judicial appointments.
Date:21-01-23
FeMoneyismTwo policy ideas for really empowering women.TOI Editorials
How do we make India a better place for women? Government schemes work slowly. What women need is a silver bullet that kills, or at least seriously wounds, the demon of discrimination. First, lower income tax rates for working women. When women pay lower income tax than men it will not only benefit women already in the workforce, it will also be a huge incentive for women who stay out of the workforce. Every male-dominated family that doesn’t want their daughter or their daughter-in-law to work will know that they are missing out on a good thing. Money often changes attitudes faster than morality does. Plus, there will be no long-term revenue loss here as the lower income tax rates for women will be more than offset by an expanding tax base from working women.
The second set of incentives should be for parents who have daughters. Give parents a tax rebate for investments made in the name of daughters. Don’t put conditions on the kind of investment – that will be a dampener. Also, keep the lowest amount eligible for such tax rebate low, say, Rs 10,000, so that low-income households can participate. And put a ceiling on the highest amount, say, Rs 100,000, so that this scheme doesn’t distort investment decisions overall. Further, offer the rebate even when a girl reaches legal adulthood, so that women can also benefit. The attraction of getting a tax rebate will override patriarchal impulses. And over time, such a corpus will give women, even those who don’t work, a measure of financial independence. For older women, the accumulated money represents the chance of personal freedom. To make a difference, you must think different.
Date:21-01-23
Jump On to Recycle Saddle for Net-ZeroET Editorials
India’s goal of a net-zero-emission economy by 2070 requires moving away from a linear to a circular economy. Reports that the budget will focus on the circular economy is encouraging. However, the sectoral approach in the absence of an overarching national policy could make the process less efficient.
Nearly a dozen areas have been identified, building on Budget 2022 that introduced the idea of circular economy in a few sectors. However, a transition to circular economy is not just the sum of sectoral efforts. A circular economy will require laying the foundation of an economy in which products and materials are designed in a manner that they can be reused, remanufactured, recycled or recovered. While the budget will provide fiscal incentives for each sector, the transition will require an overarching policy that will provide a broad roadmap of this transition and milestones. This policy must provide the blueprint regulatory and institutional framework as well as the necessary support required to make the transition. The sectoral policies would flow from this overarching policy and address the specific peculiarities and needs. The budget will encapsulate the fiscal element making the transition possible. Without an economy-wide policy, there is the possibility of sectors working at cross-purposes and the financial and fiscal interventions may not deliver to the optimum.
The government must finalise the national resource efficiency policy that has been ready for the last four years. As India grows rapidly, its material footprint will grow at a rapid pace as more of its people are pulled out of poverty. It is already experiencing the adverse impacts of a materials-intensive growth model: polluted air, water stress and climate change-induced weather events. It must act now before more damage is done.
Date:21-01-23
There is hardly any autonomy at the panchayat levelThe powers of local elected officials remain curtailed by State governments and local bureaucrats in multiple ways, thereby diluting the spirit of the constitutional amendments aimed at local empowerment.Pradeep Chhibber is Professor of Political Science at University of California, Berkeley & Pranav Gupta is a PhD candidate at University of California, Berkeley.
A few weeks ago, Balineni Tirupati, an up-sarpanch in Telangana’s Jayashankar Bhupalpally district, died by suicide due to indebtedness. He had taken out a loan to undertake development works in the village and was unable to bear the burden after the State government’s inordinate delay in releasing bill payments.
A few days before the incident, a few sarpanchs from the incumbent Bharatiya Rashtra Samiti (BRS) — Telangana’s ruling Telangana Rashtra Samiti now renamed as the BRS — resigned from office and voiced their anger at not receiving government funds for nearly a year.
Sarpanchs alleged that the failure of the State government to release funds in time has forced them to utilise either private resources or borrow large amounts to complete panchayat activities and meet various targets.
More than three decades after the 73rd and 74th Amendment Acts, which gave constitutional status to local governments, State governments, through the local bureaucracy, continue to exercise considerable discretionary authority and influence over panchayats. In India, the powers of local elected officials (such as these sarpanchs in Telangana) remain seriously circumscribed by State governments and local bureaucrats in multiple ways, thereby diluting the spirit of the constitutional amendments seeking to empower locally elected officials.
We analysed statutory provisions of Panchayat Acts in various States and spoke to several sarpanchs and local bureaucrats to assess the extent of decentralisation of powers to panchayats. It quickly became very clear to us that sarpanchs need to have administrative or financial autonomy for meaningful decentralisation.
The issue of funding
Gram panchayats remain fiscally dependent on grants (both discretionary and non-discretionary grants) from the State and the Centre for everyday activities. Broadly, panchayats have three main sources of funds — their own sources of revenue (local taxes, revenue from common property resources, etc.), grants in aid from the Centre and State governments, and discretionary or scheme-based funds. Their own sources of revenue (both tax and non-tax) constitute a tiny proportion of overall panchayat funds. For instance, in Telangana, less than a quarter of a panchayat’s revenue comes from its own sources of revenue.
Further, access to discretionary grants for panchayats remains contingent on political and bureaucratic connections.
Even when higher levels of government allocate funds to local governments, sarpanchs need help accessing them. An inordinate delay in transferring approved funds to panchayat accounts stalls local development. In Telangana, this has forced sarpanchs to use private funds for panchayat activities to fulfil mandated targets and avoid public pressure. Delays in the disbursement of funds by the local bureaucracy have led to pressure on sarpanchs leading some to end their life.
There are also severe constraints on how panchayats can use the funds allocated to them. State governments often impose spending limits on various expenditures through panchayat funds. This could include quotidian activities such as purchasing posters of national icons, refreshments for visiting dignitaries, or distributing sweets in a local school at national festivals.
Moreover, in almost all States, there is a system of double authorisation for spending panchayat funds. Apart from sarpanchs, disbursal of payments requires bureaucratic concurrence. The sarpanch and the panchayat secretary, who reports to the Block Development Officer (BDO), must co-sign cheques issued for payments from panchayat funds.
The taxing process of seeking approvals
State governments also bind local governments’ through the local bureaucracy. Approval for public works projects often requires technical approval (from the engineering department) and administrative approval from local officials of the rural development department, such as the block development officer, a tedious process for sarpanchs that requires paying multiple visits to government offices. It is also not unusual to find higher-level politicians and bureaucrats intervening in selecting beneficiaries for government programmes and limiting the power of sarpanchs further. We surveyed sarpanchs in Haryana’s Palwal district and found that they spend a substantial amount of time visiting government offices and meeting local bureaucrats, and waiting to be seen or heard. Sarpanchs reported that they need to be in the “good books” of politicians and local bureaucrats if they wanted access to discretionary resources, timely disbursement of funds, and be able to successfully execute any project or programme in their village.
The ability of sarpanchs to exercise administrative control over local employees is also limited. In many States, the recruitment of local functionaries reporting to the panchayat, such as village watchmen or sweepers, is conducted at the district or block level. Often the sarpanch does not even have the power to dismiss these local-level employees.
The shadow of bureaucrats
Unlike elected officials at other levels, sarpanchs can be dismissed while in office. Gram Panchayat Acts in many States have empowered district-level bureaucrats, mostly district Collectors, to act against sarpanchs for official misconduct. For instance, Section 37 of the Telangana Gram Panchayat Act allows District Collectors to suspend and dismiss incumbent ssarpanchs. On what grounds can Collectors act against sarpanchs? Apart from abuse of power, embezzlement, or misconduct, the conditions include mere refusal to “carry out the orders of the District Collector or Commissioner or Government for the proper working of the concerned Gram Panchayat”.
This is not merely a legal provision. Across the country, there are regular instances of bureaucrats deciding to dismiss sarpanchs from office. In Telangana, more than 100 sarpanchs have been dismissed from office in recent years. In one such case, the official reason was a protest (by boycotting an official programme) against the denial of land for an electric substation.
The situation in Telangana is a reminder for State governments to re-examine the provisions of their respective Gram Panchayat laws and consider greater devolution of funds, functions, and functionaries to local governments. State-level politicians and government officials resist giving sarpanchs power because they feel that sarpanchs will misuse funds allocated to a village. This is a case of the pot calling the kettle black. India has limited decentralisation because if local governments get genuine autonomy to allocate the monies, power will shift from the MLAs and State government-controlled bureaucracy to the sarpanch.
Date:21-01-23
हम पड़ोसियों से बेहतर हैं क्योंकि प्रजातांत्रिक हैंसंपादकीय
पड़ोसी पाकिस्तान हमारे साथ ही संप्रभु राष्ट्र बना, लेकिन इस्लामिक राष्ट्र होने की राह पकड़ी, जबकि हमने अपने प्रजातंत्र के मूल तत्व केवल गवर्नेस में ही नहीं बल्कि जीवन के सभी आयामों में स्वभावतः अंगीकार करना शुरू किए। प्रजातंत्र में विकास की प्रारंभिक गति धीमी होती है लेकिन ऐसा विकास मजबूत होता है। आज पाकिस्तान आतंकवाद का प्रश्रय- स्थल बन अपने ही लोगों से द्वंद्व कर रहा है। देश में कर्ज-जीडीपी अनुपात 90% हो चुका है और विदेशी मुद्रा 4.5 अरब डॉलर यानी दो हफ्ते के आयात के लिए ही बची है। आईएमएफ ने लोन देने से मना कर दिया है। श्रीलंका की स्थिति देख चुके हैं। पड़ोसी नेपाल विकास के नाम जीरो है। स्वयं चीन भले ही फर्जी आंकड़े देकर दुनिया को अपने मजबूत होने का अहसास करा रहा हो लेकिन अब अर्थशास्त्रियों को भी लगने लगा है कि उसके आंकड़ों पर भरोसा करना मुश्किल है। कोरोना के ताजा हमले ने उसकी स्वास्थ्य प्रणाली की पोल खोल दी। चीन का प्रजातंत्र छलावा है और सच में साम्यवाद के नाम पर राज्य शक्तियों ने जनता की आवाज दबाई है। यानी अगर विकास हुआ भी है तो उसकी कीमत शायद अब भारी पड़ने लगी है। संविधान परिवर्तन कर अपने को ही आजीवन सत्ता पर काबिज रखने का शी जिनपिंग का कदम एक भावी विद्रोह का संकेत है। इन उदाहरणों से एक ही सीख है कि हम अपने प्रजातंत्र को और मजबूत करें।
Date:21-01-23
देश में विदेश के विश्वविद्यालयप्रेमपाल शर्मा, ( रेल मंत्रालय में संयुक्त सचिव रहे लेखक शिक्षाविद् हैं )
भारत में विदेशी विश्वविद्यालयों के कैंपस खोलने की अनुमति ने सभी खेमों में खलबली मचा दी है। वाम उदारवादी तो हमेशा की तरह सरकार के हर कदम को जांचे बिना ही टूट पड़ते हैं, लेकिन इस बार स्वदेशी जागरण मंच और आत्मनिर्भर भारत के हिमायती भी परेशान हैं। विदेशी विश्वविद्यालयों को अनुमति देने की चर्चा पिछले 20 वर्षों से होती आ रही है। मनमोहन सिंह सरकार में भी इससे जुड़े विधेयक पेश होते रहे, लेकिन पारित नहीं हो पाए। भाजपा विपक्ष में रहते इसके विरोध में थी, लेकिन अब उसकी ही सरकार अधिक सुविधाओं-रियायतों के साथ विदेशी विश्वविद्यालयों के कैंपस खोलने की अनुमति दे रही है। इसमें सबसे बड़ी रियायत यही है कि ये विश्वविद्यालय मुनाफे को अपने मूल देश भेज सकते हैं। इसके अलावा दाखिला, फीस, पाठ्यक्रम और शिक्षकों की नियुक्ति जैसे सभी क्षेत्रों में भी उन्हें पूरी स्वतंत्रता दी जाएगी।
ऐसे में यह सवाल स्वाभाविक है कि विदेशियों के लिए एकाएक इतनी सारी रियायतें क्यों? मौजूदा सरकार शिक्षा के कई पहलुओं के प्रति गंभीर और सक्रिय रही है। पांच वर्ष पहले दिल्ली विश्वविद्यालय समेत उसके कालेजों को स्वायत्तता देने की चर्चा जोरों पर थी। उसके पीछे भी यही उद्देश्य था कि हमारे विश्वविद्यालयों में पाठ्यक्रम की जकड़न दूर हो और वे वैश्विक ज्ञान को आसान और त्वरित गति से आत्मसात करते हुए ऐसी पीढ़ी तैयार करें जो विकसित देशों को टक्कर दे सके। विश्वविद्यालय का ही एक बहुत बड़ा वर्ग इसके विरोध में खड़ा हो गया। विरोधियों ने तरह-तरह के आरोप लगाए। जैसे कि इससे शिक्षकों की नियुक्ति पर असर पड़ेगा। आरक्षण का लाभ नहीं मिलेगा। फीस बढ़ाई जाएगी। मजबूरन सरकार ने कदम पीछे खींच लिए। हालांकि इसी वर्ग ने उन्हीं दिनों शुरू हुए कुछ निजी विश्वविद्यालयों की फीस और स्वायत्तता पर कभी अंगुली नहीं उठाई। सरकार ने एक और पहल की थी-इंस्टीट्यूट आफ एक्सीलेंस। इसके अंतर्गत ऐसे विश्वविद्यालय बनाए जाने थे, जो दुनिया के 500 सबसे प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थानों में शामिल किए जा सकें। इसमें कुछ आइआइटी और आइआइएम जैसे संस्थान भी चिह्नित किए गए, लेकिन चार वर्ष बीतने के बाद भी इस मोर्चे पर कोई संतोषजनक प्रगति सामने नहीं आई।
विदेशी विश्वविद्यालयों के प्रस्तावित देसी परिसरों को लेकर सबसे बड़ी आपत्ति यह है कि यदि वे शिक्षा से हुए मुनाफे को अपने देश भेजेंगे तो सुप्रीम कोर्ट के उस दृष्टिकोण का क्या होगा, जिसमें शीर्ष अदालत शिक्षा को कोई धंधा नहीं मानती। एक सवाल यह भी है कि क्या इससे देश के संस्थान मजबूत होंगे? प्रश्न फीस का भी है। क्या बिना किसी लगाम के फीस की आजादी गरीबों के हित में होगी? अमीर तो गुणा-भाग कर रहे हैं कि विदेश में भेजने पर यदि एक करोड़ खर्चा होता है तो उनका यहां आधे में ही काम हो जाएगा। पाठ्यक्रम पर भी संदेह जताया जा रहा है। नि:संदेह, हमें ज्ञान की खिड़कियां खुली रखनी चाहिए, लेकिन जिस देश में आंबेडकर और गांधी के कार्टून के विवाद पर संसद ठप रही हो, प्रेमचंद की कहानी के एक शब्द पर लोग सड़कों पर उतर आए हों, वहां विदेशी विश्वविद्यालय के लिए हर तरह की आजादी के लिए कैसे गुंजाइश बनेगी? क्या देश में शिक्षा के अलग-अलग द्वीप बनेंगे? और भारतीय भाषाओं और शिक्षा के भारतीयकरण का क्या? यह भी सर्वविदित है कि प्रिंस्टन, येल, स्टैनफोर्ड और आक्सफोर्ड जैसे विश्वविख्यात विश्वविद्यालय अपने देश के अलावा बाहर शायद ही कोई कैंपस खोलते हों और इसीलिए सैकड़ों वर्षों से वे शीर्ष पर बने हुए हैं। अपनी स्वायत्तता के साथ वे शिक्षा में नई-नई खोजों एवं प्रयोगों को और आगे बढ़ा रहे हैं। हमारे यहां जो विश्वविद्यालय आने की कोशिश कर रहे हैं, वे दूसरे या तीसरे दर्जे से भी नीचे वाले हैं। उन्हें दिख रहा है तो बस दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा शिक्षा बाजार। यूनेस्को की रिपोर्ट बताती है कि भारत विद्यार्थियों का सबसे बड़ा निर्यातक है। हर साल पांच लाख बच्चों का बाहर पढ़ने के लिए जाना क्या आत्मनिर्भर भारत और स्वदेशी भारत के खोखलेपन को नहीं दर्शाता?
वस्तुत: वैश्वीकरण से तो हमें यही सीखने की जरूरत है कि जब विश्वप्रसिद्ध विश्वविद्यालयों की पाठ्यक्रम सामग्री सहजता से उपलब्ध है तो उनसे सीखते हुए हम अपने विश्वविद्यालयों को ही क्यों नहीं बेहतर बना सकते? हम उन्हें थोड़ी स्वायत्तता क्यों नहीं दे सकते? शिक्षा में सुधार के इच्छुक भली मंशा वाले हमारे तमाम उद्यमियों के इसमें योगदान हेतु अनुकूल परिवेश क्यों नहीं बनाते? शिक्षा में लाल कालीन सिर्फ विदेशियों के लिए ही क्यों? यदि सरकार स्वायत्तता और अन्यान्य सुविधाएं विदेशी विश्वविद्यालयों को देना चाहती है तो उससे पहले उसे देसी संस्थानों को भी यही देनी होंगी। अच्छा होता कि देश के श्रेष्ठ शिक्षा संस्थानों को इतना समर्थ बनाया जाए कि वे देश के विभिन्न हिस्सों में अपना विस्तार कर सकें। एक संवेदनशील लोकतांत्रिक सरकार से ऐसी अपेक्षा का हक सभी को है। सोचिए हमारे स्वतंत्रता सेनानियों के आत्मा पर क्या गुजरेगी, जो भारतीय पैसे को विदेश जाता देखकर द्रवित होते थे। इसलिए सरकार की नीयत भले ही कितनी नेक क्यों न हो, उसे इस मुद्दे को समग्रता में समझकर ही कोई कदम उठाना होगा। राज्यों के विश्वविद्यालयों को भी सख्त कानूनों के जरिये और बेहतर बनाना होगा, जिससे छात्रों को केवल शिक्षा के लिए ही महानगरों का रुख न करना पड़े। विकेंद्रीकरण की बात तो आजादी के बाद से ही हो रही है। क्या अमृत काल में उसे फिर से दोहराने की जरूरत नहीं है?
Date:21-01-23
हिमालय क्षेत्र का संकट और हमारी गतिविधियांश्याम सरन, ( लेखक पूर्व विदेश सचिव और सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के सीनियर फेलो हैं )
मैं कई वर्षों से हिमालय में ट्रेकिंग (पहाड़ों पर चढ़ाई) के लिए जाता रहा हूं। मैंने बतौर ट्रेकर अक्सर अपना अनुभव इस समाचार पत्र के पन्नों पर भी साझा किया है। अब जबकि मैं उन अनुभवों को याद करता हूं तो मुझे याद आता है कि दुनिया के सबसे ऊंची इस पर्वत श्रृंखला पर चढ़ाई के दौरान जहां मैं उत्साहित रहता था, वहीं मेरे मन में इस बात को लेकर बहुत चिंता भी रहती थी कि ‘विकास’ के नाम पर इस पूरे क्षेत्र के संसाधनों का जमकर शोषण हो रहा है और इनकी स्थिति लगातार बद से बदतर की जा रही है।
दूरदराज के पहाड़ी इलाकों में रहने वाले लोगों को विकास से वंचित रखना उनके साथ घोर अन्याय होगा लेकिन वास्तविक मुद्दा हमेशा से यह रहा है कि विकास को इस प्रकार अंजाम दिया जाए कि पर्यावरण को क्षति न पहुंचे। इन्हीं चिंताओं के चलते मैंने जलवायु परिवर्तन पर प्रधानमंत्री के विशेष दूत के रूप में 30 जून, 2008 को जारी जलवायु परिवर्तन संबंधी पहली राष्ट्रीय कार्य योजना में नैशनल मिशन फॉर सस्टेनिंग हिमालयन इकोसिस्टम को आठ राष्ट्रीय मिशन में शामिल कराया। मिशन दस्तावेज में इस बात पर जोर दिया गया है कि हिमालय की पारिस्थितिकी देश की पर्यावास सुरक्षा के लिए आवश्यक है। इसमें समृद्ध जैव विविधता, आर्कटिक और अंटार्कटिका के बाद तीसरा हिम ध्रुव होने के नाते जल उपलब्ध कराना और पूरे उपमहाद्वीप के मौसम को प्रभावित करने जैसी बातें शामिल हैं। हाल ही में जोशीमठ में जमीन धंसने की घटना के संदर्भ में यह याद किया जाना चाहिए कि मिशन ने यह प्रस्ताव रखा था कि पहाड़ी इलाकों में पर्यटकों के आवागमन की सीमा तय की जाए और यह सुनिश्चित किया जाए कि वहां उतने ही पर्यटक आएं जितने कि पहाड़ झेल सकें। जोशीमठ की त्रासदी यह दर्शाती है कि हिमालय के अपेक्षाकृत नए पहाड़ों की क्षमता को आंके बिना कदम उठाने का क्या असर हो सकता है।
राष्ट्रीय मिशन को स्पष्ट करने के लिए कई कदम प्रस्तावित थे और उसकी अनुशंसाएं भी वास्तविकता के करीब थीं। उनमें से कुछ इस प्रकार हैं:
पहला, अनियोजित ढंग से नई बसावटों को हतोत्साहित किया जाना चाहिए और पानी तथा पहुंच वाले स्थायी प्रकृति के चुनिंदा अर्द्धशहरी इलाकों में बस्तियों को प्रोत्साहन दिया जाना चाहिए। वहां शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं तथा कचरा प्रबंधन की व्यवस्था होनी चाहिए। पर्यटकों के लिए लक्जरी होटल बनाने के बजाय होमस्टे की व्यवस्था होनी चाहिए। साथ ही स्थानीय सौंदर्य और प्रकृति का सम्मान किया जाना चाहिए। जोशीमठ में इन सबका उल्लंघन हुआ। छोटी आबादी वाली एक बसावट को घनी आबादी वाले इलाके में तब्दील कर दिया गया। हिमालय क्षेत्र में कई इलाकों की यही कहानी है।
दूसरा, हिमालय क्षेत्र में अनेक धार्मिक स्थल हैं। इनमें से प्रत्येक को लेकर एक वैज्ञानिक आकलन किया जाना चाहिए कि वह सालाना कितने श्रद्धालुओं का बोझ सहन कर सकता है। यह अनुशंसा की गई थी कि संरक्षित धार्मिक स्थलों से 10 किलोमीटर की दूरी तक सड़क प्रतिबंधित होनी चाहिए ताकि पर्यावास तथा अध्यात्म के स्तर पर एक बफर जोन बनाया जा सके जहां न्यूनतम मानव हस्तक्षेप हो। इस बफर एरिया में किसी निर्माण की इजाजत नहीं होनी चाहिए। बदरीनाथ और केदारनाथ में ऐसे अतिथिगृह हैं जहां गैस की मदद से कमरों को गर्म किया जाता है और खाना बनता है। यहां पर्यटन और धर्म के बीच की रेखा मिट गई है। अब योजना यह है कि यहां पूरे वर्ष पर्यटन कराया जाए। कल्पना कीजिए कि इससे क्या हो सकता है।
तीसरा, पर्यावरण के अनुकूल सड़क निर्माण की अवधारणा भी पेश की गई थी। पांच किलोमीटर से अधिक लंबाई वाले हर मार्ग के लिए पर्यावरण प्रभाव आकलन को अनिवार्य किया जाना था। इसमें मौजूदा सड़कों का विस्तार और चौड़ीकरण भी शामिल था। यह भी कहा गया था कि बिना विनिर्माण कचरे के निस्तारण के प्रावधान के किसी सड़क निर्माण की योजना स्वीकृत नहीं की जाएगी। परंतु इस नियम की भारी अनदेखी हुई जिससे हिमालय क्षेत्र की प्राकृतिक जलधाराएं प्रभावित हुईं।
चौथा, यह बात मानी जा चुकी थी कि जलविद्युत के विकास से हिमालय क्षेत्र के राज्यों की अर्थव्यवस्था बदल सकती है और वहां रहने वाले समुदाय समृद्ध हो सकते हैं। चूंकि कई ऐसी परियोजनाएं बन चुकी हैं और ढेर सारी अभी भी बनने की प्रक्रिया में हैं तो कई सबक भी सीखे जा सकते हैं।
किसी परियोजना के पर्यावरण प्रभाव आकलन में एक नदी बेसिन में ऐसी अनेक परियोजनाओं के समग्र प्रभाव का आकलन नहीं किया जा सकता है। बड़े पैमाने पर पर्यावरण को क्षति पहुंचने से रोकने के लिए यह आवश्यक है। प्रस्ताव यह भी था कि हिमालय क्षेत्र में जलविद्युत परियोजनाओं को बहती धारा की प्रकृति का होना चाहिए क्योंकि बड़े जलाशय भौगोलिक रूप से अस्थिर इस इलाके को प्रभावित कर सकते हैं। वहां पहले ही कई त्रासदियां घटित हो चुकी हैं। फरवरी 2021 में ऋषिगंगा जलविद्युत परियोजना एक ग्लेशियर झील के फूटने के कारण पूरी तरह समाप्त हो गई थी। वहां जान-माल दोनों का नुकसान हुआ था। मध्य हिमालय में टिहरी बांध भी भूगर्भीय दृष्टि से अस्थिर और सक्रिय इलाके में आता है। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी थी कि अगर बांध फूटता है तो पानी की 200 मीटर ऊंची लहरें नीचे के गांवों और कस्बों को लील लेंगी। जोखिम और लाभ का आकलन करें तो यही बात सामने आती है कि ऐसे संवेदनशील इलाके में इस प्रकार की परियोजनाएं नहीं बननी चाहिए।
हाल के वर्षों में धर्म और रक्षा क्षेत्र की मांगों ने विकास की दलील पर बल दिया है और पर्यावरण संबंधी मानकों को धता बता दिया गया। इस बीच हिमालय में जमकर अधोसंरचना निर्माण हुआ। धार्मिक भावनाओं के सम्मान का यह अर्थ नहीं है कि हिमालय के दूरदराज इलाकों में मौजूद धार्मिक स्थलों तक छह लेने वाले राजमार्ग बनाए जाएं। जहां तक रक्षा की बात है तो यह बात ध्यान में रखना आवश्यक है कि अल्पावधि में पहुंच में सुधार की कीमत लंबी अवधि की आपदाओं के रूप में न चुकानी पड़े।
जानकारी तो यह भी है कि जोशीमठ में जिस तरह जमीन धंसी है, वैसा हिमालय क्षेत्र के कई अन्य कस्बों में भी हो रहा है। जरूरत है कि विशेषज्ञ तत्काल इन इलाकों का विस्तृत सर्वेक्षण करें ताकि पता लग सके कि हमारे सामने कितनी बड़ी चुनौती है और हमें उससे निपटने के लिए क्या करना होगा। हमें हिमालय के उन पवित्र देवताओं को नाराज नहीं करना चाहिए जो ऊंचे पहाड़ों पर रहते हैं और हमें नुकसान से बचाते हैं।
Date:21-01-23
शासन और अनुशासनसंपादकीय
दिल्ली सरकार और उपराज्यपाल के बीच तकरार खत्म होने का नाम नहीं ले रही। एक बार फिर चुनी हुई सरकार और प्रशासक के अधिकारों की व्याख्या शुरू हो गई है। यही विवाद आम आदमी पार्टी सरकार के पहले कार्यकाल में भी उठा था, जब मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल आरोप लगाते रहे कि उपराज्यपाल उन्हें काम नहीं करने दे रहे। उन्हें अपना सचिव तक नियुक्त नहीं करने दे रहे। अधिकारियों को वे सीधे आदेश देते हैं। तब वह मामला अदालत में पहुंचा था और अदालत ने स्पष्ट रूप से कहा था कि चुनी हुई सरकार को अपने ढंग से काम करने का अवसर मिलना चाहिए। उसके बाद कुछ सालों तक विवाद लगभग शांत था। मगर दूसरे कार्यकाल में वर्तमान उपराज्यपाल के आने के बाद फिर से सरकार और उनके बीच तनातनी लगातार बनी हुई है। विचित्र है कि अब यह तनातनी भाषा की मर्यादा भी लांघती नजर आने लगी है। मुख्यमंत्री ने यहां तक कह दिया कि उपराज्यपाल हैं कौन। उन्हें चुनी हुई सरकार के कामकाज में दखलंदाजी का अधिकार दिया किसने। यह बात उन्होंने विधानसभा के विशेष सत्र में कही और बाहर मीडिया के सामने भी। उस पर अब उपराज्यपाल ने मुख्यमंत्री को जवाबी पत्र लिख कर बताया है कि उनकी संवैधानिक हैसियत क्या है।
अभी लगता नहीं कि दोनों के बीच की तकरार खत्म होने वाली है। दरअसल, उपराज्यपाल ने कार्यभार संभालने के साथ ही जिस तरह दिल्ली सरकार की नई आबकारी नीति में हुई अनियमितता का मामला उजागर करते हुए कई अधिकारियों को बर्खास्त कर दिया और उपमुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया के ठिकानों पर छापे डाले गए, उससे दिल्ली सरकार और आम आदमी पार्टी एकदम से आक्रोशित हो उठी। उसने भी उपराज्यपाल के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामले उजागर करने का प्रयास किया। धनशोधन मामले में दिल्ली सरकार के स्वास्थ्य मंत्री सत्येंद्र जैन को जेल भेज दिया गया, वह भी उसकी नाराजगी का बड़ा कारण बना। फिर उपराज्यपाल दिल्ली सरकार के फैसलों पर प्रश्नचिह्न लगाने शुरू कर दिए। उसकी फाइलें या तो बिना मंजूरी के लौटाई जाने लगीं या फिर उन्हें रोका जाने लगा। नगर निगम चुनावों के बाद महापौर चुनाव से पहले उपराज्यपाल ने अलग से सदस्यों को मनोनीत करने के अपने विवेकाधिकार का इस्तेमाल किया, तो आम आदमी पार्टी ने खासा हंगामा खड़ा कर दिया। नतीजतन, वह चुनाव स्थगित करना पड़ा। मुख्यमंत्री का आरोप है कि उपराज्यपाल सीधे अधिकारियों को आदेश देते हैं, उनसे फाइलें मंगा लेते हैं। उनका कहना है कि नियम-कायदे उन्हें ऐसा करने की इजाजत नहीं देते। उपराज्यपाल कोई भी फैसला सरकार की सहमति के बगैर नहीं ले सकते।
चुनी हुई सरकार बनाम केंद्र की तरफ से नियुक्त प्रशासक के अधिकारों की लड़ाई अब ऐसे मोड़ पर पहुंच गई लगती है, जिसमें सिद्धांत और नियम-कायदे कहीं हाशिए पर चले गए हैं। इस लड़ाई में नुकसान दिल्ली के लोगों का हो रहा है। मुख्यमंत्री का आरोप है कि उपराज्यपाल कर्मचारियों के वेतन का भुगतान नहीं होने दे रहे, योजनाओं के लिए धन नहीं दे रहे। इस तरह दिल्ली सरकार का कामकाज बाधित हो रहा है। चूंकि उपराज्यपाल की नियुक्ति केंद्र सरकार ने की है और केंद्र के साथ दिल्ली सरकार की तनातनी पुरानी है, इसलिए मुख्यमंत्री के इन आरोपों को लोग सिरे से खारिज नहीं कर पा रहे कि उपराज्यपाल केंद्र के इशारे पर दिल्ली सरकार के कामकाज में अड़चन पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं। सच्चाई जो हो, पर दोनों की मूंछ की लड़ाई का खमियाजा नागरिकों को भुगतना पड़ रहा है।
Date:21-01-23
प्रकृति के लिए भी न्याय जरूरीवीरेन्द्र कुमार पैन्यूली
आज जब विकास की आपाधापी में पर्यावरणीय नुकसानों से ‘करे कोई भरे कोई’ की स्थिति आ गई है तो पर्यावरणीय न्याय पाने की आवश्यकता महत्ती हो गई है। आज मानव के विकास का दुष्प्रभाव जैव विविधता पर भी पड़ रहा है। यह वैश्विक स्तर पर भी हो रहा है और स्थानीय स्तर पर भी। प्रकृति के प्रति आक्रामक होकर ही पिछले पांच दशकों में वैश्विक आर्थिक प्रगति पांच गुनी बढ़ी है। इस उपलब्धि के लिए पृथ्वी के 70 फीसद से ज्यादा प्राकृतिक संसाधनों का क्षमता से ज्यादा दोहन हुआ है।
धरती पर हर तीन सेकेंड में एक फुटबॉल के मैदान सा वनाच्छादन घट रहा है। विगत सौ सालों मे आधे वेटलैंड और समुद्रों में आधे से ज्यादा मूंगा की चट्टानें खोई जा चुकी हैं। सागरों में प्लास्टिक इतना पहुंच रहा है कि सागरों में 2050 तक मछलियों से ज्यादा प्लास्टिक होने की आशंकाएं होने लगी हैं। आस पास देखें तो सुरंग कोई बना रहा है घर किन्हीं औरों के उजड़ रहे हैं। झील-नहरें लालच में आवासीय विस्तारों के लिए कोई पाट रहा है पर महानगरों और गांवों में बाढ़ से नुकसान कोई झेल रहा है।
पर्यावरणीय न्याय का जिक्र करते हुए 75 वें स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पूर्व राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद के राष्ट्रीय संबोधन में यह भी था कि-‘असमानता से भरी विश्व व्यवस्था में अधिक समानता तथा अन्यायपूर्ण परिस्थितियों में दृढ़तापूर्वक अधिक न्याय दिलाने के लिए न्याय की धारणा बहुत व्यापक हो गई है। इसमें आर्थिक और पर्यावरण से जुड़ा न्याय भी शामिल है। इस कारण आगे की राह बहुत आसान नहीं है।’ जनवरी 2021 में जारी यूएनइपी ग्लोबल क्लाइमेट लिटिगेशन रिपोर्ट 2020 के अनुसार भी आज आम जन जलवायु से संदर्भित स्वस्थ पर्यावरण के अपने अधिकार को लागू करवाने के लिए ज्यादा संख्या में अदालतों में पहुंच रहे हैं। मिस्र के शर्म अल-शेख कॉप – 27 में चले जलवायु सम्मेलन में भी मूल बात पर्यावरणीय न्याय पाने की ही थी। जिन गरीब देशों ने कार्बन उत्सर्जन से धरा को अनुपातिक रूप से लगभग ना के बराबर भार दिया है वो भी जलवायु दंश के दंड भुगत रहे हैं और दूसरी तरफ धींगामुश्ती करने वाला लगभग छुटट ही रहना चाहते हैं। लॉस एंड डैमेज फाइनेंस का भी मुद्दा तभी तो उठा। बढ़ते कार्बन उत्सर्जन, बढ़ते तापक्रम से बवंडरी घातक तूफानों, बाढ़, भूस्खलनों और वनाग्नियों में जो वृद्धि हो रही है उसने पूरी मानव जाति को जोखिम में डाल दिया है। इनसे स्वास्थ्य, खाद्य, आजीविका, आवासीय सुरक्षा तो खतरे में आती ही है। 22 फरवरी 2021 को संयुक्त राष्ट्र संघ की पर्यावरणीय सभा को संबोधित करते हुए महासचिव अंतोनी गुतरेस ने जलवायु उथल-पुथल, जैव विविधता में लगातार कमी और प्रदूषण-महामारी के कारण विश्व के पर्यावरणीय आपातकाल में होने की बात कही थी और इन समस्याओं के प्रकृति आधारित समाधान ढूंढने की अपील की थी, परंतु संयुक्त राष्ट्रसंघ के ही 27 मई 2021 को जारी एक अध्ययन के अनुसार इसमें दुनिया को 2030 तक आज के तिगुने और 2050 तक चौगुना निवेश करना होगा। कुल मिलाकर आज से 2050 के बीच इन तीनों समस्याओं के समाधान में आठ खरब एक अरब अमेरिकी डॉलर की जरूरत होगी। समुद्रतल से 10 से 13 हजार फीट की ऊंचाइयों पर स्थित अल्पाइन चारागाह को बुग्याल कहते हैं। जमीन के भीतर कार्बन, नाइट्रोजन आदि के बहुत बड़ी मात्रा में भंडारण में व प्रदूषणों को रोकने में ये छलनी का भी काम करते हैं। क्षेत्रीय स्तर पर जलवायु बदलाव के दंश को कम करने में इनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। कुछ देशों में प्रकृति एकांशों को अधिकार दिए गए हैं। वहां उन्हें अपने को ठीक करने का अधिकार है।
अमेरिका में भी प्रकृति के कतिपय अधिकारों को मान्यता दी गई है। न्यूजीलैंड, इक्वाडोर और कोलंबिया में भी नदियों को अधिकार देने के उल्लेख हुए हैं। नि:संदेह प्रकृति राहत कापालन करवाने के तौर-तरीकों को विकसित करने में समय लगेगा। हमारे देश में भी पहली बार नैनीताल उच्च न्यायालय ने नदी में अतिक्रमण हटाने की गुहार से संबंधित एक जनहित याचिका की सुनवाई के दौरान 20 मार्च 2017 को गंगा यमुना को जीवित मानव जैसा माने जाने का आदेश दिया था, किंतु लगभग तत्काल ही तत्कालीन उत्तराखंड व केंद्र सरकार की जुगलबंदी में 7 जुलाई 2017 को सर्वोच्च अदालत में इस आदेश के विरुद्ध जाने के बाद कालांतर में यह आदेश रहा ही नहीं। पर्यावरणीय स्थितियों को सुधारने और भौतिक विकास को भी सतत बनाने के लिए 2021 से 2030 तक के संयुक्त राष्ट्र संघ ईको सिस्टम रिस्टोरेशन के दशक मनाया जा रहा है। सतत विकास लक्ष्यों को पाने के लिए 2030 का ही साल आखिरी साल तय किया गया है। वैज्ञानिकों के अनुसार यही वह साल भी है जो हमारे लिए संभवत: आखिरी मौका होगा विकास जनित जलवायु बदलाव का रूख पलटने का।
Date:21-01-23
दिल्ली में द्वंद्वसंपादकीय
दिल्ली में उप-राज्यपाल और मुख्यमंत्री के बीच जिस तरह से खींचतान की स्थिति बनी हुई है, वह कतई प्रशंसनीय नहीं है। यह न राजनीतिक रूप से उचित है, और न शासन-प्रशासन की दृष्टि से। एक भ्रम का माहौल बना हुआ है और उसकी गंभीरता समय के साथ बढ़ती चली जा रही है। दिल्ली और दिल्लीवासियों के नजरिये से समग्र मामले को देखा जाना चाहिए कि आखिर ऐसे भ्रम या सत्ता द्वंद्व से किसे लाभ होगा? दिल्ली देश की राजधानी ही नहीं, अनेक अच्छी राजनीतिक परंपराओं का शहर है और इसीलिए उसके बदलावों से देश में हर कोई लाभान्वित होता आया है। मशहूर शायर मिर्जा गालिब दिल्ली के ही निवासी थे और उन्होंने एक शेर कहा था, हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है/ तुम्हीं कहो कि ये अंदाज-ए-गुफ्तुगू क्या है। दिल्ली के शासकों-प्रशासकों के दिल में इस शेर की व्यंजना धड़कनी चाहिए। दिल्ली देश का दिल ही नहीं, चेहरा और शान है। दिल्ली को दुलार चाहिए, ताकि वही दुलार वह देश को लौटा सके। शासन-प्रशासन को अच्छी तरह पता है, दिल्ली की चुनौतियां खत्म नहीं हुई हैं। ऐसा नहीं होने देना चाहिए कि बढ़ती आबादी के साथ चुनौतियां भी बढ़ती चली जाएं।
उप-राज्यपाल के पास प्रशासनिक ताकत है, तो मुख्यमंत्री के पास जनादेश। जनादेश का मूल्य ज्यादा है और प्रशासनिक ताकत की अपनी सीमाएं हैं। यह लोकतंत्र है और यह देखना ही पड़ेगा कि अपने काम को लेकर आखिर किसे जनता के बीच जाना है? चुने हुए लोगों की कलम ऊपर रहनी ही चाहिए। मगर रुकने का नाम नहीं ले रहे आरोपों-प्रत्यारोपों पर भी नजर फेरिए, किसे अच्छा लगेगा? कोई किसी को हेडमास्टर बोल रहा है, तो कोई किसी पर राजनीतिक मुद्रा अपनाने के आरोप लगा रहा है। शासन-प्रशासन की आपसी खींचतान सड़क पर आ गई है, क्या लोग समझ नहीं रहे होंगे? भ्रामक और अपमानजनक टिप्पणी करने और निम्न स्तर का व्यवहार करने का आरोप किसे शोभा देता है? क्या ऐसे मुठभेड़ से बचा नहीं जा सकता? मुख्यमंत्री को उप-राज्यपाल के भवन तक मार्च निकालना पड़ता है और यह कहना पड़ता है कि ‘आप चाहते, तो पांच मिनट के लिए बाहर आ सकते थे और हमसे मिल सकते थे। …दिल्ली के लोगों को अपमान महसूस हुआ कि दिल्ली के उप-राज्यपाल ने दो करोड़ लोगों के प्रतिनिधियों से मिलने से इनकार कर दिया’।
यह खींचतान मिसाल न बन जाए। मिलकर समाधान निकालना चाहिए। संदेह नहीं कि आम आदमी पार्टी की सरकार अलग ढंग से काम करने की कोशिश कर रही है। कम समय में पार्टी ने दिल्ली और पंजाब में पूर्ण बहुमत से सरकार बनाकर खुद को स्थापित किया है। इस सरकार के लिए दूसरों से अलग, ज्यादा समन्वयकारी दिखना जरूरी है। यह तथ्य है कि दिल्ली पूर्ण राज्य नहीं है और राष्ट्रीय राजधानी होने के नाते इसे पूर्ण राज्य का दर्जा देने के अपने जोखिम हैं। अच्छी बात है, सुप्रीम कोर्ट ने बीते मंगलवार को ही प्रशासनिक नियंत्रण को लेकर दिल्ली सरकार और केंद्र सरकार के बीच विवाद पर सुनवाई फिर शुरू की है। प्रधान न्यायाधीश डी वाई चंद्रचूड़, न्यायमूर्ति एम आर शाह, न्यायमूर्ति कृष्ण मुरारी, न्यायमूर्ति हिमा कोहली और न्यायमूर्ति पी एस नरसिम्हा की पांच-न्यायाधीशों की पीठ सुनवाई कर रही है। हम आने वाले दिनों में यथोचित समाधान की उम्मीद कर सकते हैं। तब तक के लिए शायर बशीर बद्र का शेर ध्यान रहे, दुश्मनी जम कर करो लेकिन ये गुंजाइश रहे/ जब कभी हम दोस्त हो जाएं तो शर्मिंदा न हों।
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21 January 2023
प्रश्न–394 – स्वतंत्रता आंदोलन में जनजातियों की भूमिका का मूल्यांकन कीजिये। (200 शब्द)
Question–394 – Evaluate the role of tribes in the freedom movement. (200 words)
नोट : इसका उत्तर आपको हमें नहीं भेजना है, यह आपके स्वयं के अभ्यास के लिए है।
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Date:20-01-23
Babies & JobsLesson for India from China’s population decline is to get many more of its working age groups into workTOI Editorials
China in 2022 recorded a decline in population by 8. 5 lakh, the first annual decline in six decades. But the last population decline came from famine, this one is a result of both a harsh and short-sighted population control policy and demographic transition from an agrarian society to an industrial one. Global experience, spanning Scandinavia to Singapore, shows that even generous fiscal incentives are unable to reverse a population decline once it’s set in.
UN forecast India will be the most populous nation in the world in 2023. It’s important that India learns the right lessons from an unprecedented global demographic trend. Total fertility rate (TFR) the world over is crashing. The UN forecast the current global population of about 8 billion will rise to 9. 7 billion by 2050. However, 66% of the increase will come because of momentum arising out of past growth. Therefore, the big challenge ahead is to avoid a situation where a country grows old before it gets rich. China already faces this problem and it’s unlikely to catch up with the US in per capita income terms. To illustrate, UN estimates by 2030, China’s population in the 19-60 age bracket at a little over 800 million will be about 10% lower than India.
Demographic transition has two important phases. At the first stage, fertility rates fall. This, in turn, leads to the working age population growing faster than the overall population. It represents a potential demographic dividend when there’s an opportunity for a big spurt in growth and investment. It’s however not preordained. It requires the right mix of policy to make the most of this limited demographic window. Where does India stand?
India’s TFR fell to a mere two in 2019-21 period, which is below the replacement rate. At present, World Bank data shows that India’s working age population is 68% versus a global average of 65%. Even in the age group up to 14 years, India’s share at 26% is a shade above the world average. But the problem is that not enough Indians are working, particularly women. Just 46% of India’s potential labour force is in the job market. Indonesia and Vietnam, in contrast, have 68% and 74% respectively in the job market. GoI must take this trend with utmost seriousness – India’s future depends on reversing it. There’s a real danger of frittering away the demographic dividend.
Date:20-01-23
जातीय गणना के राजनीतिक प्रभावराहुल वर्मा, ( लेखक सेंटर फार पालिसी रिसर्च में फेलो हैं )
बिहार सरकार ने सात जनवरी से राज्य में जातीय गणना शुरू कर दी है। उसके इस फैसले ने पूरे देश में एक नई बहस छेड़ी है। यह पहल कई नए राजनीतिक समीकरणों की ओर भी संकेत कर रही है। इसका कारण है कि पिछले कुछ समय से देश के विभिन्न कोनों से जातीय गणना की मांग जोर पकड़ती रही है। आर्थिक आधार पर आरक्षण वाली व्यवस्था यानी ईडब्ल्यूएस कोटे के अस्तित्व में आने के बाद आरक्षण को लेकर खींची गई सुप्रीम कोर्ट की लक्ष्मण रेखा लांघे जाने के बाद जातिगत आधार पर अधिकारों की मांग खासी तेज हुई है। वास्तव में, मोदी सरकार ने 2019 में ईडब्ल्यूएस कोटे में जो 10 प्रतिशत आरक्षण दिया, उससे कई राज्यों में आरक्षण की सीमा निर्धारित 50 प्रतिशत के दायरे के पार चली गई है। इसके चलते कई वर्षों से जातिगत आधार पर विभिन्न अधिकारों की मांग कर रहे वर्ग नए सिरे से मुखर हुए हैं। वहीं अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी के मसले पर गठित जस्टिस रोहिणी आयोग को लगातार मिलता विस्तार भी कहीं न कहीं यही संकेत करता है कि उसके निष्कर्ष अभी तक किसी परिणति पर नहीं पहुंचे हैं। ऐसे में बिहार सरकार की इस कवायद को कई कड़ियों से जोड़कर देखा जा रहा है। जैसे कि मोदी सरकार द्वारा जनगणना को संभवतः इस कारण टालना कि कहीं उस संदर्भ में जातीय गणना की मांग और तेज न हो जाए।
इस साल कई राज्यों में चुनाव होने हैं और उनकी राजनीति पर इस मुद्दे की छाप दिखाई पड़ेगी। राजनीतिक दलों ने इसकी गंभीरता को समझना भी शुरू कर दिया है। उदाहरण के रूप में कर्नाटक को ही लें, जहां इसी साल विधानसभा चुनाव होने हैं। कर्नाटक सरकार ने गत नवंबर में एक विधेयक पेश किया, जिसके माध्यम से अनुसूचित जातियों (एससी) के आरक्षण की सीमा 15 प्रतिशत से बढ़ाकर 17 प्रतिशत और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए तीन प्रतिशत से बढ़ाकर सात प्रतिशत करने का प्रविधान था। छत्तीसगढ़ में भी एसटी के लिए आरक्षण की सीमा 20 प्रतिशत से बढ़ाकर 32 प्रतिशत और ओबीसी आरक्षण 14 प्रतिशत से बढ़ाकर 27 प्रतिशत करने की तैयारी है। झारखंड तो इस मामले में सबसे आगे निकलता दिख रहा है, जहां एसटी आरक्षण 26 से बढ़ाकर 28 प्रतिशत, ओबीसी आरक्षण 14 से बढ़ाकर 27 प्रतिशत और एससी आरक्षण 10 से बढ़ाकर 12 प्रतिशत करने की योजना है, जो फिलहाल राज्य सरकार, राज्यपाल और अदालती पेच में फंसी हुई है। एससी, एसटी और ओबीसी जैसे वर्गों के लिए आरक्षण की सीमा में फेरबदल के बीच जाट, गुर्जर, मराठा और पाटीदार जैसे तमाम वर्गों को भी उनकी मांगों के अनुरूप समायोजित करने का दबाव बना रहेगा। जाहिर है कि जातीय गणना के बाद कुछ वर्ग अपनी मांग को लेकर दबाव बनाएंगे और उस स्थिति में 50 प्रतिशत की आरक्षण सीमा पर भी नए सिरे से विचार करना होगा।
ऐसा न समझा जाए कि जातीय गणना को लेकर नीतीश कुमार का हृदय सत्ता में साझेदार बदलने के साथ एकाएक परिवर्तित हुआ। जब वह भाजपा के साथ मिलकर सरकार चला रहे थे तो उस समय नेता-प्रतिपक्ष रहे तेजस्वी यादव के साथ वह इस मुद्दे पर एक प्रतिनिधिमंडल लेकर प्रधानमंत्री मोदी से मिले भी थे। हालांकि प्रधानमंत्री मोदी या उनकी सरकार की ओर से इस विषय में कोई आधिकारिक टिप्पणी नहीं आई थी, लेकिन तब नीतीश कुमार ने कहा था कि उन्हें प्रधानमंत्री से जातीय गणना को लेकर सकारात्मक संकेत मिले हैं। जातीय गणना का मुद्दा पूरी तरह बेमानी नहीं है। देश में 1931 के बाद से जातीय गणना नहीं हुई है और यदि अब होती है तो उससे तमाम वास्तविकताओं का पता चलेगा, क्योंकि वस्तुनिष्ठ आंकड़ों की अपनी उपयोगिता होती है। इससे यह भी पता चलेगा कि अभी तक चले आ रहे जातिगत आरक्षण के लाभ कहां तक पहुंचे हैं? प्रायः यह कहा जाता है कि एससी और ओबीसी आरक्षण का लाभ मुख्य रूप से इन वर्गों की कुछ जातियों तक ही सिमटकर रह गया है और तमाम अन्य जातियों को इसका अपेक्षित लाभ नहीं मिल पाया है। जातिगत गणना से सामने आनी वाली वास्तविकता से इन विसंगतियों को दूर करने में मदद मिल सकेगी। इससे कोटे के भीतर उसके पुनर्गठन की मांग भी जोर पकड़ सकती है। इसका एक दूसरा पहलू भी है और वह यह कि चूंकि सार्वजनिक क्षेत्र की नौकरियों से लेकर सरकारी शैक्षणिक संस्थानों में अवसर सीमित होते जा रहे हैं तो जातीय गणना के बाद निजी क्षेत्र की कंपनियों और शिक्षण संस्थानों में आरक्षण की गाहे-बगाहे उठने वाली मांग को भी नई धार मिल सकती है।
अभी यह कह पाना मुश्किल है कि जातीय गणना के राजनीतिक निहितार्थ क्या होंगे और इससे किसे लाभ होगा और कौन नुकसान में रहेगा। अभी तक भाजपा ने इस पर एक तरह से मौन साधकर संतुलित रुख ही अपनाया है। वहीं विपक्षी दलों की दृष्टि से देखें तो उन्होंने जातीय गणना के आधार पर एक नया विमर्श खड़ा करने में सफलता हासिल की है, जिससे भाजपा कुछ रक्षात्मक नजर आ रही है। असल में पिछले कुछ वर्षों के दौरान भाजपा ने एससी और ओबीसी की छोटी-छोटी जातियों को लामबंद किया है और सरकार की तमाम कल्याणकारी योजनाओं से ये जातियां प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से लाभान्वित भी हुई हैं। इसके साथ ही पिछले कुछ वर्षों के दौरान ओबीसी वर्गों में ही कुर्मियों, निषाद और राजभर आदि जातियों की प्रतिनिधि पार्टियां भी उभरी हैं और बड़े राजनीतिक दलों ने उनके हिसाब से समीकरण बिठाने शुरू भी कर दिए हैं। ऐसे में जातीय गणना के राजनीतिक प्रभावों का कोई स्पष्ट आकलन करना जल्दबाजी होगा।
स्मरण रहे कि भारत ने विकसित राष्ट्र बनने का जो स्वप्न देखा है, वह वंचित वर्गों के सशक्तीकरण के बिना साकार नहीं हो सकता है। जाति अभी भी हमारे सामाजिक-आर्थिक ढांचे की एक अहम कड़ी है। समय के साथ जातियों के तानेबाने भी बदले हैं। उन्हें पर्याप्त रूप से समझे बिना हम उस सामाजिक अनुबंध की आधारशिला रखकर उसे पर्याप्त रूप से सशक्त नहीं बना पाएंगे, जो भारत को विकसित बनाने के लिए आवश्यक है।
Date:20-01-23
प्रवासी मतदाता और मशीनसंपादकीय
भारतीय निर्वाचन आयोग द्वारा इस सप्ताह के आरंभ में आयोजित सर्वदलीय बैठक में एक रिमोट (दूर से काम करने वाली) मतदान मशीन का प्रदर्शन किया जाना था जो प्रवासी कामगारों तथा दूरदराज रहने वाले अन्य लोगों के मतदान में काम आ सकती थी। विभिन्न विपक्षी दलों के कड़े प्रतिवाद के बाद प्रदर्शन नहीं किया गया। यह मशीन तब सामने आई जब निर्वाचन आयोग ने कुछ वर्षों तक इस समस्या पर विचार किया कि प्रवासियों के मतदान की समस्या को कैसे दूर किया जा सकता है? गत वर्ष के अंत में आयोग ने संकेत दिया था कि उसने दूर से इलेक्ट्रॉनिक मशीन के माध्यम से मतदान कराने पर काम किया है। इसके लिए एक नमूना मशीन तैयार की गई। निर्वाचन आयोग का कहना है कि ऐसा करने से प्रवासियों के मतदान के लिए अपने गृह जिले जाने की समस्या को हल किया जा सकेगा तथा यह सुनिश्चित हो सकेगा कि वे सुदूर किसी इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन के जरिये मतदान कर सकें। समुचित विचार-विमर्श के बाद प्रवासी मतदान को शामिल करने का निर्णय स्वागतयोग्य है और इसे निश्चित तौर पर लागू किया जाना चाहिए। भारत में कुल मतदाताओं में से बहुत कम लोग वास्तव में मतदान करते हैं क्योंकि बड़ी तादाद में मतदाता देश के भीतर ही काम के सिलसिले में या अन्य कारणों से एक स्थान से दूसरे स्थान पर आते जाते रहते हैं। फिलहाल उनके लिए मतदान की कोई उचित व्यवस्था नहीं है। कुछ सर्वेक्षणों से संकेत मिलता है कि बीते कम से कम एक प्रासंगिक चुनाव में 60 फीसदी मौसमी प्रवासी मतदान करने से चूक गए। चूंकि एक समय में देश के भीतर ही 30 से 45 करोड़ लोग यहां से वहां चले गए हैं इसलिए कह सकते हैं कि केवल इसी वजह से बड़ी तादाद में मतदाता मतदान नहीं कर पाते। अर्थव्यवस्था के विकास के साथ ही यह संभव है कि लोगों का आंतरिक प्रवास और बढ़े क्योंकि लोग काम की तलाश में तथा अन्य वजहों से यहां-वहां जाएंगे और मतदान करने से चूक जाएंगे।
ऐसे में इस बाधा से निजात पाना देश के चुनावों को अधिक समावेशी बनाने के लिए अहम है। यह बात ध्यान में रखनी चाहिए कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लंबे समय से यह हो रहा है। उदाहरण के लिए डाक मतदान अमेरिका तथा अन्य देशों के चुनावों में सहज ही इस्तेमाल होता है। भारत में डाक मतदान केवल वरिष्ठ नागरिकों के लिए तथा उन लोगों के लिए है जो चुनाव ड्यूटी कर रहे हैं या अन्य विशेष पदों पर हैं। बहरहाल, यह कहा जा सकता है कि डाक मतपत्र की व्यवस्था होने के बावजूद नई प्रणाली क्यों तलाश की जा रही है। चुनाव आयोग का सोचना यह हो सकता है कि मौजूदा मतदान मशीनों की गति के साथ तकनीक को आसानी से प्रवासी लोगों तक बढ़ाया जा सकता है।
विपक्ष की शिकायत है कि नई व्यवस्था में जटिलता है। यह बात कुछ हद तक सही है। हर रिमोट वोटिंग मशीन में 72 अलग-अलग निर्वाचन क्षेत्रों के मतदान दर्ज किए जा सकेंगे। चूंकि हर निर्वाचन क्षेत्र में अनेक प्रत्याशी होते हैं और आम चुनाव में बड़ी तादाद में निर्वाचन क्षेत्र होते हैं इसलिए दिक्कत आ सकती है। ऐसे में निर्वाचन आयोग शायद डाक मतदान का इस्तेमाल कर सकता है जो सहज प्रयोग में लाया जा सकता है। इससे रिमोट मतदान में मशीनों के परीक्षण के लिए और समय मिल जाएगा तथा मतदाताओं और राजनीतिक दलों का भरोसा भी मजबूत होगा। मतदान के तरीके को लेकर मतभेद के चलते प्रवासियों को मतदान में शामिल करने में देर नहीं होनी चाहिए। राजनीतिक दलों को भी केवल विरोध के लिए विरोध नहीं करना चाहिए। अतीत में भी अनेक राजनीतिक दलों ने मशीनों से मतदान का किसी ठोस कारण के बगैर विरोध किया है।
Date:20-01-23
भ्रामक ज्ञानसंपादकीय
सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि विकिपीडिया जैसे सूचनात्मक मंचों पर आंख बंद करके भरोसा नहीं कर सकते। उन पर भ्रामक सूचनाएं हो सकती हैं। हालांकि अदालत ने यह बात कानूनी मामलों के मद्देनजर कही और न्यायिक अधिकारियों को ऐसे स्रोतों के उपयोग को लेकर आगाह किया है, पर इसे व्यापक संदर्भ में लेने की जरूरत है। आजकल तथ्यों के लिए विकिपीडिया जैसे मंचों पर अध्येताओं, व्यावसायिक गतिविधियों, शैक्षणिक कार्यक्रमों की निर्भरता लगातार बढ़ती गई है। ऐसे में अगर यह मंच इतना गैर-भरोसेमंद माना जा रहा है, तो यह गंभीर बात है। बहुत सारे विद्यार्थी ऐसे मंचों के सहारे विभिन्न परीक्षाओं की तैयारी करते देखे जाते हैं। मगर इस हकीकत से मुंह नहीं फेरा जा सकता कि विकिपीडिया पर बहुत सारे तथ्य गलत या भ्रामक पाए जाते हैं। इसकी एक वजह स्पष्ट है कि इस मंच ने संपादन की सुविधा खुली छोड़ रखी है। कोई भी वहां जाकर तथ्यों को सुधार सकता है। तथ्यों में उलट-फेर कर सकता है। बहुत पहले इसके कई बड़े उदाहरण देखने को मिल चुके हैं। गांधीजी, जवाहरलाल नेहरू, सरदार पटेल जैसी शख्सियतों के जीवन से जुड़े अनेक भ्रामक तथ्य उन पर परोसे गए हैं। एक सामान्य अध्येता ऐसे तथ्यों को पकड़ नहीं पाता और उसके मन में कई तरह के दुराग्रह पनप सकते हैं।
खासकर कानूनी मामलों में अगर विकिपीडिया जैसे मंचों पर गलत और भ्रामक तथ्य परोसे जाते हैं और उनका उपयोग किसी मामले को सुलझाने के लिए किया जाता है, तो उससे आने वाले समय के लिए गलत नजीर भी बनती है। इसलिए कानून की अधिकृत पुस्तकें ही इस मामले में प्रामाणिक मानी जानी चाहिए। लेकिन आज जिस तरह युवा पीढ़ी पढ़ाई-लिखाई को लेकर इंटरनेट पर निर्भर होती गई है। वह अपनी हर जिज्ञासा को लेकर तुरंत इंटरनेट खंगालना शुरू कर देती है, खासकर विकिपीडिया जैसे ज्ञानकोश पर आंख मूंद कर भरोसा कर लेती है, उसे खतरनाक नतीजे भी भुगतने पड़ सकते हैं। उस पर भरोसा करके अगर उसने किसी सवाल का गलत जवाब दे दिया, जो अधिकृत पुस्तक में छपे तथ्य से मेल नहीं खाता, तो उसे नुकसान हो सकता है। जिन प्रतियोगी परीक्षाओं में ऋणात्मक मूल्यांकन की व्यवस्था है, उनमें भारी नुकसान झेलना पड़ सकता है। इस तरह सर्वोच्च न्यायालय की ताजा टिप्पणी को गंभीरता से लेने की जरूरत है।
यह सही है कि प्रामाणिक पुस्तकों का विकल्प दूसरा कोई माध्यम नहीं हो सकता, पर पिछले कुछ सालों में जिस तरह इंटरनेट एक सशक्त शिक्षा माध्यम के रूप में उभरा है, उसमें ज्ञान की दुनिया का खासा विस्तार हुआ है। पीडीएफ रूप में और किंडल आदि पर पुस्तकें पढ़ने की सुविधा उपलब्ध है। तमाम शैक्षणिक संस्थान अपनी पाठ्य और सहायक पुस्तकें इंटरनेट पर डालते हैं। ई-पाठशाला जैसी व्यवस्थाएं हैं। मगर इसके समांतर इंटरनेट पर बहुत सारे ऐसे मंच सक्रिय हैं, जो बड़े पाठक समुदाय को आकर्षित करने और लाभ कमाने के लोभ में चल रहे हैं। उन पर परोसी जाने वाली बहुत सारी सामग्री अपुष्ट और अप्रामाणिक है। इसे रोकने की जरूरत लंबे समय से रेखांकित की जा रही है। किसी भी माध्यम से गलत तथ्य और भ्रामक जानकारियां उपलब्ध कराना एक प्रकार का अपराध है। मगर इसके लिए कोई कड़ी कार्रवाई न होने की वजह से ऐसे अधकचरे मंच खूब फल-फूल रहे हैं। सर्वोच्च न्यायालय की टिप्पणी के बाद यह बात रेखांकित हुई है कि ऐसे मंचों, सूचना के स्रोतों पर नजर रखने और उन्हें अनुशासित बनाने के लिए एक नियामक तंत्र होना ही चाहिए।
Date:20-01-23
परिसर के प्रसार से बेहतरी की उम्मीदरसाल सिंह
नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति की सिफारिशों के अनुसार, विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने भारत में उच्च शिक्षा के अंतरराष्ट्रीयकरण की दिशा में काम शुरू कर दिया है। अब विदेशी विश्वविद्यालय भारत में अपने परिसर खोल पाएंगे। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने भारत में विदेशी संस्थानों की स्थापना और संचालन के लिए ‘भारत में विदेशी उच्च शिक्षण संस्थानों के परिसर की स्थापना और संचालन-2023’ नामक मसविदा जारी किया है। यह विदेशी विश्वविद्यालयों को प्रवेश प्रक्रिया, शुल्क संरचना, शिक्षकों की नियुक्ति और पारिश्रमिक तय करने और अर्जित आय को स्वदेश भेजने की स्वायत्तता प्रदान करता है। यह भी स्पष्ट है कि ये विश्वविद्यालय पूर्णकालिक कार्यक्रम ही शुरू कर सकेंगे। इस योजना के लिए सिर्फ वही विदेशी संस्थान पात्र हैं, जिन्होंने समग्र या विषयवार वैश्विक रैंकिंग के शीर्ष पांच सौ में अपनी जगह बनाई हो या अपने देश में एक प्रतिष्ठित संस्थान के रूप में मान्य हों।
हालांकि, नियमन में किन मानदंडों को अंतिम रूप से शामिल किया जाएगा, इसकी अधिसूचना सभी हितधारकों की प्रतिक्रिया के बाद इस महीने की समाप्ति तक जारी कर दी जाएगी। यह निर्णय विदेशी संस्थानों को स्थानीय साझेदारों के बिना भी अपने परिसर स्थापित करने हेतु प्रोत्साहित करेगा। इससे भारतीय शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ेगी और छात्रों के भारत छोड़कर विदेश जाने में भी काफी कमी आएगी। भारतीय छात्रों को कम खर्चे पर विदेशी डिग्री मिल पाएगी और भारत अध्ययन और शोध के एक किफायती और आकर्षक केंद्र के रूप में भी स्थापित हो सकेगा।
गौरतलब है कि विदेशी संस्थानों को लाने के ऐसे प्रयास पहले भी हो चुके हैं। पहली बार आर्थिक उदारीकरण के प्रारंभिक चरण में वर्ष 1995 में एक विधेयक लाया गया था। इसी प्रकार 2007 में यूपीए सरकार के समय भी यह विचार चर्चा में आया। मगर ये दोनों प्रयास गठबंधन की विवशताओं और वामदलों के दबाव के कारण सिरे नहीं चढ़ सके।
विदेशी विश्वविद्यालयों के भारत में आने के तमाम कारकों में से सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण भारत की विशाल छात्र संख्या है। भारतीय छात्रों के बीच अंतरराष्ट्रीय शिक्षा की भारी मांग है। केवल 2022 में ही, करीब साढ़े चार लाख भारतीय छात्र उच्च शिक्षा के लिए विदेश गए। इस तरह हर साल हमारे देश का लगभग अठाईस से तीस अरब अमेरिकी डालर बाहर जा रहा है। अनुमान है कि 2024 तक, अठारह लाख छात्र विदेश जाएंगे और लगभग 6.4 खरब रुपए खर्च करेंगे, जो कि भारत के सकल घरेलू उत्पाद का 2.7 प्रतिशत है। अगर यही रुझान जारी रहा, तो इसका सीधा असर भारतीय वित्तीय और मानव पूंजी पर चिंताजनक दबाव के रूप में पड़ेगा। विदेशों में अध्ययन के लिए गए छात्र अक्सर वहीं काम करने का विकल्प भी चुनते हैं, जो कि प्रतिभा पलायन को बढ़ाता है। आंकड़ों के अनुसार, 2022 के पहले तीन महीनों में, एक लाख तैंतीस हजार एक सौ पैंतीस छात्रों ने अकादमिक गतिविधियों के लिए भारत छोड़ा, जबकि 2020 में करीब दो लाख साठ हजार और 2021 में करीब साढ़े चार लाख भारतीयों ने विदेश में शिक्षा ग्रहण की, जो एक वर्ष में ही 41 फीसद की वृद्धि दर्शाता है।
भारतीय छात्रों के अलावा उपमहाद्वीप और अन्य विकासशील देशों के छात्र भी इन संस्थानों में शिक्षा ग्रहण कर सकते हैं, जो कि बहु-संस्कृतिवाद के साथ-साथ अन्य देशों के साथ भारत को मजबूत संबंध स्थापित करने में मदद करेगा। इस प्रकार, भारतीय अर्थव्यवस्था में विदेशी पूंजी प्रवाह बढ़ेगा। छोटे-मोटे व्यवसाइयों और कारीगरों के लिए बहुत सारे रोजगार के अवसर भी पैदा होंगे। उनके संचालन के लिए बहुत-से लोगों की आवश्यकता होगी। साथ ही, विदेशी विश्वविद्यालय प्रतिभाशाली प्राध्यापकों और शोधकर्ताओं को बेहतर वातावरण में काम करने का अवसर प्रदान करते हुए देश में अनुसंधान और विकास को प्रोत्साहित करेंगे।
भारत में एक हजार से अधिक विश्वविद्यालय और बयालीस हजार से अधिक महाविद्यालय हैं। विश्व के सबसे बड़े उच्च शिक्षा तंत्रों में से एक होने के बावजूद, उच्च शिक्षा में भारत का सकल नामांकन अनुपात (जीईआर) सिर्फ 27.1 फीसद है, जो कि विश्व में सबसे कम है। ऐसे कई क्षेत्र हैं, जहां वर्तमान भारतीय उच्च शिक्षा प्रणाली में सुधार की आवश्यकता है। मसलन, हमारा कोई भी विश्वविद्यालय क्यूएस रैंकिंग में शीर्ष सौ में शामिल नहीं है। भारतीय अकादमिक संस्थानों का ध्यान मुख्य रूप से शिक्षण पर होता है। इस कारण अनुसंधान और विकास की अनदेखी कर दी जाती है। कर्मचारियों की कमी, कम संसाधन, छात्रों का बीच में पढ़ाई छोड़ना और संस्थानों का राजनीतिकरण जैसी चुनौतियां भारतीय अकादमिक संस्थाओं को अपना मूल्यवर्द्धन करने से रोकती हैं। इसलिए उच्च गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और सर्वोत्तम कार्य-संस्कृति के माध्यम से शैक्षणिक संप्रभुता, न्यूनतम शासन, दूरदर्शी प्रबंधन, बेहतर संकाय, उद्योगों के साथ संबंध और छात्रों की अकादमिक सक्रियता के जरिए भारत को आगे बढ़ाने हेतु विदेशी संस्थानों का स्वागत किया जाना चाहिए।
करिअर परामर्श और रोजगारपरकता एक ऐसा क्षेत्र है, जिसमें भारतीय संस्थान अपने विदेशी समकक्षों से बहुत पीछे हैं। मसलन, हमारा पाठ्यक्रम उन लोगों से चर्चाओं पर आधारित नहीं होता है, जो अंतत: हमारे छात्रों को रोजगार देते हैं या अपने यहां काम पर रखते हैं। वहीं दूसरी ओर, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ख्याति प्राप्त शैक्षणिक संस्थान भविष्य की संभावनाओं को समझने के लिए लगातार व्यापार, उद्योग और सरकार के साथ जुड़े रहते हैं। नौकरियों की प्रकृति और कर्मचारियों की मांगों में तेजी से बदलाव हो रहा है, जो सीधे-सीधे शिक्षा प्रदाताओं को यह जिम्मेदारी देता है कि वे इस बदलाव का अनुमान लगाएं और छात्रों को इसके अनुरूप तैयार करें। विदेशी विश्वविद्यालयों ने इस कला में महारत हासिल की है। विदेशी संस्थानों के आने की वजह से हमारे देश में बहु-सांस्कृतिक वातावरण में सीखने के पारिस्थितिक तंत्र का निर्माण होगा, जिसका सीधा प्रभाव छात्रों के दृष्टिकोण पर भी पड़ेगा।
भारत में विदेशी विश्वविद्यालयों के परिसर खुलने से उच्च शिक्षा क्षेत्र में प्रतिस्पर्धा पैदा होगी। प्रतिभाशाली प्रोफेसर, शोधकर्ताओं और छात्रों को आकर्षित करने हेतु विदेशी विश्वविद्यालय भारत में मौजूद विश्वविद्यालयों के साथ स्वस्थ होड़ करेंगे। उनके साथ उद्योग परियोजनाओं, प्रतिभाशाली छात्रों और शिक्षकों के लिए प्रभावी ढंग से प्रतिस्पर्धा हेतु भारतीय विश्वविद्यालय अपने स्तर में सुधार को प्रेरित होंगे। इसलिए अपेक्षा की जा रही है कि विदेशी विश्वविद्यालय भारतीय छात्रों की गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक पहुंच बढ़ाने और भारत की आबादी को मानव संसाधन में परिवर्तित करने में भी सहायता प्रदान करेंगे।
यह सब तभी संभव है, जब भारत प्रतिष्ठित वैश्विक संस्थानों को परिसर स्थापित करने हेतु आकर्षित कर सके। जब तक कि उन्हें समान अवसर और सुविधाओं का विश्वास नहीं दिलाया जाएगा, तब तक प्रतिष्ठित विदेशी विश्वविद्यालय आकर्षित नहीं होंगे। अतीत में ऐसी कई पहलें हुई हैं, जिनके वांछित परिणाम प्राप्त नहीं हुए हैं। हालांकि, हाल के दिनों में भारत की आर्थिक स्थिति वैश्विक स्तर पर जबर्दस्त तरीके से सुधरी है। इस आधार पर विदेशी संस्थान भारत को, दो दशक पहले की तुलना में, अपने लिए ज्यादा अनुकूल मान सकते हैं। अकादमिक व्यवस्था, भूस्वामित्व, कराधान और शिक्षकों की भर्ती से संबंधित नियमन आदि उनकी चिंता के सामान्य विषय हैं। इन पर आवश्यक कार्रवाई की जानी चाहिए। इस बात को भी ध्यान में रखना चाहिए कि विदेशी संस्थाएं भारत में अपने परिसरों की स्थापना सहयोग और ज्ञान-साझाकरण के लिए करें, न कि सिर्फ व्यावसायिक हितों के लिए। ये संस्थाएं केवल अभिजात और उच्च वर्ग के लिए ही सीमित न हों, बल्कि वंचित वर्गों के छात्रों का हित-संरक्षण करते हुए उन्हें भी समुचित अवसर प्रदान करें।
Date:20-01-23
खेलों में शोषणसंपादकीय
अनेक भारतीय पहलवानों की जो शिकायत सामने आई है, वह न सिर्फ दुखद, बल्कि चिंताजनक भी है। जंतर-मंतर पर बैठे भारतीय पहलवानों पर देश ही नहीं, दुनिया के अन्य देशों के लोगों की भी नजर गई होगी। क्या भारतीय कुश्ती में यौन शोषण या पहलवानों के साथ दुर्व्यवहार की शिकायत पर तत्काल कार्रवाई नहीं होनी चाहिए थी? खेल मंत्रालय ने जवाब देने के लिए तीन दिन का समय दे दिया, शायद आरोपितों को जवाब देने के लिए कम समय मिलना चाहिए था। विश्व मंचों पर भारत का नाम रोशन करने वाले पहलवानों की ओर से अगर शिकायतें आ रही हैं, तो हमारे खेल प्रबंधकों के कान खड़े हो जाने चाहिए। पदक के मामले में कुश्ती भारत के सफलतम खेलों में शुमार है और उसमें भी हरियाणा की पहलवानों ने जिस तरह यौन शोषण का आरोप लगाया है, उसे हल्के में नहीं लेना चाहिए। ऐसा नहीं है कि खेल अधिकारियों के पास ऐसी शिकायत पहले नहीं पहुंची होगी, पर जब तक विवाद सड़क पर न आ जाए, ज्यादातर अधिकारी मुंह फेरे घूमते रहते हैं, लेकिन अब मुंह छिपाने से काम नहीं चलने वाला।
भारतीय कुश्ती महासंघ के अध्यक्ष बृजभूषण शरण सिंह ने तमाम आरोपों से इनकार किया है, तो आश्चर्य नहीं। उनकी ओर से आने वाले लिखित जवाब के बाद बाकायदे विस्तृत जांच होनी चाहिए। ऐसा न हो कि शिकायतें एक-दो लोगों के कानों तक पहुंचकर रफा-दफा हो जाएं। विनेश फोगाट, साक्षी मलिक, बजरंग पुनिया जैसे पदकवीर अगर साथी पहलवानों के साथ मिलकर न्याय मांग रहे हैं, तो लीपा-पोती तो कतई नहीं होनी चाहिए। यह सही है कि भारतीय कुश्ती महासंघ में ग्यारह साल से एक ही अध्यक्ष हैं और उनके समय भारत ने कुश्ती में अनेक पदक जीते भी हैं, लेकिन अध्यक्ष से जुड़े विवाद भी किसी से छिपे नहीं हैं। अगर इनके खिलाफ साजिश हो रही है, तो इन्हें भी आगे आकर पर्दाफाश करना चाहिए। खेल संघों की राजनीति किसी से छिपी नहीं है, सत्ताधारी दल कोई भी हो, वह खेल संघों पर काबिज हो जाना चाहता है। यह बार-बार दोहराया गया है, यह परिपाटी व्यावहारिक रूप से भी गलत है। खेलों और खिलाड़ियों की संवेदना को समझने वाले व्यक्ति के हाथों में ही खेल संघों की कमान होनी चाहिए। जंतर-मंतर पर दुख बयान करते हुए किसी शोषित ओलंपियन पहलवान की आंखों से आंसू निकल आएं, तो समझ लीजिए, खेल प्रशासन में ममत्व व निष्ठा कितनी कम हो गई है?
यह मुद्दा कतई राजनीति का नहीं है। जंतर-मंतर पर खिलाड़ियों से एकजुटता दर्शाने पहुंची वामपंथी नेता से अगर दोटूक आग्रह किया गया कि मामले को राजनीतिक न बनाइए, तो तारीफ होनी चाहिए। लगे हाथ खिलाड़ियों को यह आग्रह नहीं करना चाहिए कि खांटी नेताओं को खेल महासंघों पर काबिज होने से बचना चाहिए? क्या खूब पदक जीतने वाले देशों में भी ज्यादातर खेल संघों पर राजनेताओं का कब्जा है? खैर, फिलहाल सवाल शोषण संबंधी शिकायत का है और पहलवानों ने आर-पार की लड़ाई ठान रखी है। इस मामले का न्यायपूर्ण पटाक्षेप जितनी जल्दी हो, उतना अच्छा है। कोई भी खेल बुनियादी रूप से श्रेष्ठ आचरण की आशा रखता है। खिलाड़ी अपने परिवार, समाज और देश के लिए राजदूत सरीखे होते हैं। उनके मन में अपनी खेल संस्थाओं-संघों के लिए गौरव का भाव होना चाहिए। शायद अब इस दिशा में सबकी उम्मीद सरकार और शिकायत झेल रहे खेल संघ पहल करने की जरूरत महसूस करेंगे।
Date:20-01-23
युवा देश म नेता बनने के लिए कितनी तैयार हैं नै पीढ़ीविजय विद्रोही, ( वरिष्ठ टीवी पत्रकार )
उदयपुर में कांग्रेस के चिंतन शिविर में संगठन में आधे पद युवाओं को देने पर सहमति बनी थी। अब भारतीय जनता पार्टी ने दिल्ली में हुई राष्ट्रीय कार्यकारिणी में गुजरात मॉडल की तर्ज पर युवाओं को चुनावों में ज्यादा टिकट देना तय किया है। आखिर जिस देश में औसत उम्र 28 साल हो और 65 फीसद आबादी चालीस से कम उम्र की हो, उस देश में राजनीति भी युवा हाथों में क्यों नहीं होनी चाहिए?
आज सभी राजनीतिक दलों को युवा नेताओं और युवा मतदाताओं की जरूरत है। भाजपा की बैठक में तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 18 से 24 साल के युवाओं को अपना सुशासन और पूर्व की सरकारों का कुशासन समझाने के लिए विशेष अभियान चलाने तक की सलाह दी। यह अपने आप में दिखाता है कि युवा मतदाता कितनी अहमियत रखता है। 18 साल के मतदाता को आपने प्रभावित कर लिया, तो वह आगे कई चुनावों तक साथ रह सकता है। माना जाता है, अगर पार्टी को युवा रखना है, तो युवाओं को आगे लाना होगा।
हालांकि, यहां एक पेच है। युवा वर्ग को चुनाव मैदान में उतारा तो जाने लगा है, लेकिन जब पद देने की बारी आती है, तो आलाकमान सियासी मोतियाबिंद का शिकार हो जाता है। पहली बार चुनाव जीतने वालों को सत्ता में कोई बड़ी जिम्मेदारी नहीं सौंपी जाएगी, ऐसा कह दिया जाता है, पर क्या इस नजरिये में बदलाव की जरूरत महसूस की जा रही है? राजनीति का तरीका बदल रहा है। सोशल मीडिया पर भी चुनाव लड़ा जाने लगा है, वहां जाहिर है, युवा वर्ग का हस्तक्षेप ज्यादा है।
भाजपा ने तो अघोषित रूप से 75 साल की उम्र में रिटायर करने की पहल की है, लेकिन कांग्रेस में ऐसा नियम नहीं है। कांग्रेस अध्यक्ष पद की कमान 80 साल के मल्लिकार्जुन खड़गे को सौंपी गई है। पंजाब में अकाली दल की कमान 96 साल के प्रकाश सिंह बादल के पास है। कर्नाटक में जेडीएस की कमान पूर्व प्रधानमंत्री देवेगौड़ा के पास है, जो 90 बसंत देख चुके हैं। हरियाणा में 88 साल के ओम प्रकाश चौटाला इंडियन नेशनल लोकदल की कमान संभाले हुए हैं। इसी तरह एनसीपी के शरद पवार 82 साल, नेशनल कांफ्रेंस के फारूक अब्दुल्ला 85 साल के हैं। नवीन पटनायक 77 साल और लालू यादव 75 पार कर चुके हैं, पर अपने-अपने दल (बीजद और राजद) के मुखिया बने हुए हैं, तो क्या कहा जाए? देश में कुछ बदल नहीं रहा है?
हां, कुछ तो बदल रहा है। सात राज्यों में मुख्यमंत्री पचास साल या उससे कम उम्र के हैं। आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री जगन मोहन रेड्डी और उत्तर प्रदेश के योगी आदित्यनाथ पचास साल के हैं। गोवा के प्रमोद सावंत 49 साल, तो उत्तराखंड के पुष्कर धामी और झारखंड के हेमंत सोरेन 47-47 साल के हैं। मेघालय के संगमा 45 के हैं, तो अरुणाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री पेमा खांडू 43 के हैं। यहां एक उदाहरण अरविंद केजरीवाल का है, जो अलग पार्टी बनाकर 47 की उम्र में मुख्यमंत्री बन गए। दूसरा उदाहरण सचिन पायलट का है, जो 40 की उम्र में राजस्थान में कांग्रेस को सत्ता में लाने के बावजूद मुख्यमंत्री बनने का इंतजार करते रह जाते हैं। ज्योतिरादित्य सिंधिया निराशा में पार्टी छोड़ देते हैं।
सोनिया गांधी ने एक बार युवा नेताओं को नसीहत दी थी कि उन्हें संयम रखना चाहिए। अशोक गहलोत नसीहत देते हैं कि युवा वर्ग को सियासी रगड़ाई के लिए तैयार रहना चाहिए। उधर, युवा नेता गालिब का शेर गुनगुनाने को मजबूर हो जाते हैं- हम ने माना कि तगाफुल न करोगे लेकिन / खाक हो जाएंगे हम तुम को खबर होते तक।
तो क्या किया जाए? अमेरिका में नियम है कि राष्ट्रपति ज्यादा से ज्यादा दो बार बना जा सकता है। युवा नेता शायद यही चाहते हैं, पर बुजुर्ग नेता अक्सर शी जिनपिंग और पुतिन की ओर देखते हैं, जिन्होंने आजीवन सत्ता का ठेका हासिल कर लिया है। कुछ का कहना है कि सोच युवा होनी चाहिए, उम्र में क्या रखा है। कुल मिलाकर, युवा देश के युवा नेताओं को अपने लिए युवा वोट बैंक तैयार करना है, तो अपनी सोच को बदलना होगा, पर फिर वही सवाल, क्या आलाकमान इसकी इजाजत देगा?
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भारत के लिए नेपाल का रणनीतिक महत्व है। दोनों देशों के बीच द्विपक्षीय संबंध भी बहुत मजबूत रहे हैं। मुक्त सीमाओं और नेपाली नागरिकों को भारत में रहने और काम करने की अनुमति देने से व्यापार और आर्थिक संबंध दृढ़ रहे हैं। हाल के कुछ वर्षों में कुछ गलतफहमियों और संदेहों के चलते इन संबंधों में खटास अनुभव की जा रही है। कुछ बिंदु-
हाल ही में चल रही अरूण-थ्री हाइड्रो इलेक्ट्रिक योजना को समय से पूरा करने की चुनौती बनी हुई है। भारत को चाहिए कि वह कालापानी जैसे विवादों को टालने का प्रयत्न करे, और नेपाल में अपने राजनैतिक सामंजस्य को बनाकर चलता रहे।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 3 जनवरी 2023
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Date:19-01-23
Check, do not crossGovernment should work towards systemic reform, and not attack the judiciaryEditorial
There is something rude and unpleasant in the way the Government is going about the task of demanding a big say in the appointment of judges in constitutional courts. The latest salvo is from Union Law Minister Kiren Rijiju, who has written to the Chief Justice of India to request that the executive be given a role in the appointment process, which now is being handled by a Collegium of judges. Reports say that the Minister wants the formation of a search-and-evaluation committee, with Government representatives, to suggest names to the collegiums in the High Courts and the Supreme Court for appointments. He is also understood to have asked for a representative of the Union government in the Supreme Court collegium, and a State government’s representative in the High Court collegiums. The letter comes as the latest in a series of official fulminations against the judiciary. Mr. Rijiju has been at the forefront of this attack, frequently questioning the collegium system by rightly highlighting some of its acknowledged flaws. There is little doubt that the Government’s anger is towards the 2015 judgment of a Constitution Bench striking down the formation of a National Judicial Appointments Commission (NJAC). While few would disagree that the Collegium system needs reform, the Government’s motive in carrying on a campaign against the judiciary in the name of seeking reform in the appointments process is questionable.
The answers to some of the issues raised by the Government are quite simple, and has been repeatedly pointed out by the Court, as well as the political opposition. It can address the need for a more transparent and independent process by making a fresh legislative effort to establish a neutral mechanism that does not impinge on the independence of the judiciary. Until such an exercise to amend the Constitution achieves fruition, it has to abide by the law of the land, that is, the present system of appointments through the Collegium. It is difficult to avoid the impression that the Government’s tactics are bordering on veiled warnings: deliberately delaying action on recommendations; ignoring reiterated names even after multiple reconsiderations; and carrying on a campaign to delegitimise the institution. It is surprising that it seeks to rein in a judiciary that has been quite accommodative of the Government’s concerns on the judicial side in recent years. The only conclusion is that the current regime wants absolute control over who gets to be a judge in this country. A system of checks and balances that prevents any one branch gaining the upper hand is essential for democratic functioning.
Date:19-01-23
बढ़ती गरीब-अमीर खाई मिटाना प्राथमिकता बनेसंपादकीय
ऑक्सफैम की ताजा रिपोर्ट का शीर्षक है ‘सर्वाइवल ऑफ द रिचेस्ट, भारत की कहानी’। रिपोर्ट बताती है आर्थिक नीति में आमूलचूल परिवर्तन नहीं किया गया तो चमकते इंडिया के नीचे एक कराहता भारत बना रहेगा। समाजशास्त्री मानते हैं कि समाज के एक बड़े हिस्से का जीवन जीने की जरूरी शर्तों से लंबे समय तक वंचित रहना खतरनाक हो सकता है। लिहाजा आर्थिक नीतियां ऐसी बनें, जिनसे गरीब को भी आगे बढ़ने का पूरा अवसर मिले। इस रिपोर्ट में बताया गया है कि देश के ऊपरी एक प्रतिशत वर्ग के पास देश की 40% दौलत है जबकि नीचे के 50% के पास मात्र 3% । रिपोर्ट में चौंकाने वाला तथ्य यह है कि देश के गरीब, अमीरों के मुकाबले सरकार को ज्यादा टैक्स देते हैं क्योंकि अमीरों की तुलना में आवश्यक वस्तुओं और सेवाओं पर गरीब ज्यादा खर्च करते हैं। उदाहरण के लिए नीचे का 50% वर्ग खाने के सामान, गैर-खाने के आइटम्स और दोनों को मिलाकर भी टैक्स का 64% देता है। मध्यम वर्ग जो 40% है कुल टैक्स का औसतन 31% देता है, जबकि ऊपर का धनाढ्य केवल 3-4 प्रतिशत देता है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि अगर भारत के दस अमीरों पर केवल दो प्रतिशत टैक्स लगा दिया जाए तो देश के सभी बच्चों के कुपोषण को अगले तीन साल के लिए दूर किया जा सकता है। अमीरों को भी स्वेच्छा से अभावग्रस्त लोगों के लिए आगे आना होगा।
Date:19-01-23
अमीरों पर लगे ज्यादा टैक्सराहुल लाल
भारत में आर्थिक असमानता की खाई और चौड़ी हो गई है। ऑक्सफैम -2023 की रिपोर्ट के अनुसार देश के 1% अमीरों के पास 40% आबादी से ज्यादा संपत्ति है। रिपोर्ट के अनुसार 2020 में अरबपतियों की संख्या 102 थी, वहीं 2022 में यह आंकड़ा 166 पर पहुंच गया । इस तरह दो वर्ष में देश में 64 अरबपति बढ़ गए। रिपोर्ट से स्पष्ट है कि कुछ लोगों की संपत्ति में भारी वृद्धि हुई है, तो करोड़ों लोग और भी गरीब हुए हैं। आय असमानता कल्याणकारी राज्य की सबसे बड़ी विडंबना है ।
भारत में असमानता को कम करने के लिए संविधान के नीति-निर्देशक तत्वों में विशिष्ट प्रावधान किए गए हैं। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 38 (1) एवं अनुच्छेद 39 (1) असमानता को दूर करने के लिए सरकारों को स्पष्ट निर्देश प्रदान करता है। इसके बावजूद भारत में हाल के वर्षों में जिस तरह आर्थिक असमानता में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है, वह चिंताजनक है। सरकार को अपनी कर प्रणाली में सुधार की आवश्यकता है। हाल के समय में कॉरपोरेट टैक्स में कमी की गई, वहीं दूध-दही जैसी आवश्यक खाद्य वस्तुओं के जीएसटी में वृद्धि की गई। कॉरपोरेट टैक्स में कमी करते हुए सरकार ने कहा था कि इससे नये निवेश को आकर्षित करने में मदद मिलेगी।
लेकिन कंपनियों ने कॉरपोरेट टैक्स में छूट का लाभ तो लिया पर निवेश में कमी अभी चिंता का विषय बनी हुई है। 64 फीसदी जीएसटी 50 फीसदी गरीब दे रहे हैं, जबकि अमीर केवल 10% | स्पष्ट है कि अप्रत्यक्ष करों के संदर्भ में सरकार को अत्यंत संवेदनशील होने की जरूरत है। प्रगतिशील कर प्रणाली मूलतः आय आधारित होती है। प्रत्यक्ष कर में तो इसका पालन हो जाता है परंतु अप्रत्यक्ष कर की चपेट में देश का निर्धनतम व्यक्ति भी आ जाता है। इसलिए सरकार से अपेक्षा की जाती है कि वह जीवनोपयोगी वस्तुओं को जीएसटी के दायरे से बाहर रखे।
रिपोर्ट के अनुसार भारतीय अरबपतियों की संपत्ति पर दो फीसदी टैक्स लगाया जाए तो तीन साल तक कुपोषण के शिकार बच्चों के लिए सभी जरूरतों को पूरा किया जा सकता है। भारत के 10 सबसे अमीरों पर एक बार 5% कर लगाया जाए तो 1.37 लाख करोड़ रुपये मिलेंगे। यह स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के बजट से 1.5 गुना अधिक है। स्पष्ट है कि अमीरी-गरीबी के खाई को समाप्त करने के लिए सरकार को कॉरपोरेट टैक्स छूट पर पुनर्विचार करना चाहिए और अतिरिक्त प्रगतिशील संपत्ति कर अरबपत्तियों पर लगाना चाहिए। धन के पुनर्वितरण को अधिक न्याय संगत बनाने के लिए वर्तमान नवउदारवादी मॉडल को ‘नॉर्डिक आर्थिक मॉडल’ से प्रतिस्थापित किया जा सकता है। नॉर्डिक आर्थिक मॉडल में सभी के लिए प्रभावी कल्याण, भ्रष्टाचार मुक्त शासन, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और स्वास्थ्य सेवा का मौलिक अधिकार और अमीरों के लिए उच्च कर दर इत्यादि शामिल हैं। आवश्यक है कि जहां विकास दर तीव्र हो, वहीं रोजगारोन्मुखी भी हो। देश बेरोजगारी और महंगाई की समस्याओं से जूझ रहा है। जब सामान्य लोगों की क्रय क्षमता कम हो तो महंगाई लोगों के जीवन स्तर को कम कर देती है। इससे अमीरी-गरीबी के खाई बढ़ती है। आर्थिक विषमता के खात्मे के लिए वंचितों के राजनीतिक सशक्तीकरण की भी आवश्यकता है। राजनीतिक सक्षमता वाले लोग बेहतर शिक्षा एवं स्वास्थ्य सेवा की मांग करके इन्हें प्राप्त कर सकेंगे। भारत में अधिकांश रोजगार असंगठित क्षेत्र में है, और वह क्षेत्र नोटबंदी, जीएसटी और लॉकडाउन से अब तक उभर नहीं पाया है। इसलिए आर्थिक समानता के लिए इस क्षेत्र पर जोर देना आवश्यक है।
दुनिया भर के आर्थिक विशेषज्ञों में इस बात पर सहमति बढ़ रही है कि आर्थिक विकास समावेशी नहीं है, और उसमें टिकाऊ विकास के तीन जरूरी पहलू आर्थिक, सामाजिक और पर्यावरण शामिल नहीं हैं, तो वह गरीबी कम करने के लिए पर्याप्त नहीं होगा। इन्हीं चुनौतियों को ध्यान में रखते हुए संयुक्त राष्ट्र के टिकाऊ विकास लक्ष्यों (एसडीजी) में 10वें लक्ष्य का उद्देश्य बढ़ती असमानता को कम करना रखा गया है। वर्तमान में आर्थिक असमानता से उबरने का सबसे बेहतर उपाय यही होगा कि वंचित वर्ग को अच्छी शिक्षा, रोजगार उपलब्ध कराते हुए सुदूरवर्ती गांवों को विकास की मुख्यधारा से जोड़ा जाए। इसके लिए कल्याणकारी योजनाओं पर ज्यादा खर्च करने की जरूरत है। अभी भी भारत में स्वास्थ्य पर कुल जीडीपी का केवल 1 से 1.5 फीसदी खर्च होता है जबकि यह कम से कम जीडीपी का 6% होना चाहिए। इसी तरह शिक्षा पर भी भारत में जीडीपी का 3% खर्च किया जाता है, जबकि नई शिक्षा नीति में सरकार ने स्वयं माना है कि शिक्षा क्षेत्र में कम से कम जीडीपी का 5% खर्च होना चाहिए। भारत में क्षमता है कि वह नागरिकों को एक अधिकारयुक्त जीवन देने के साथ समाज में व्याप्त असमानता को दूर कर सकता है।
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भारतीय इतिहास के पुनर्लेखन को लेकर चल रहे वाद-विवाद के बीच नवम्बर, 2021 में महिला एवं बाल विकास, खेल एवं शिक्षा मंत्री ने विद्यालयीन पाठ्यपुस्तकों में इतिहास के अध्यायों में किए जाने वाले परिवर्तनों का डिजाइन संसद में प्रस्तुत किया था। इससे संबद्ध समिति ने इस परिवर्तन के तीन उद्देश्य बताए थे।
1) राष्ट्रीय नायकों के अनैतिहासिक तथ्यों और विकृतियों के संदर्भो को हटाना।
2) भारतीय इतिहास के सभी कालखंडों के समान या आनुपातिक संदर्भ सुनिश्चित करना। तथा
3) इतिहास में महान महिला नायकों की भूमिका पर प्रकाश डालना।
परामर्श के बाद समिति ने अनेक सुझाव दिए हैं। इनमें बच्चों की सीखने की क्षमता के विकास, पाठ्यपुस्तकों की सामग्री, महिलाओं की इतिहास एवं स्वतंत्रता संग्राम में भागीदारी को उजागर करते हुए उनकी पारंपरिक छवि में सुधार करना, एडटेक का भरपूर उपयोग, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और नवाचार में वृद्धि, क्रिटिकल थिंकिंग, दूरसंचार, सृजनात्मकता आदि को बढ़ावा देने पर विचार करना मुख्य हैं।
सुझावों की आलोचना –
समिति के इन सुझावों का इंडियन हिस्ट्री कांग्रेस ने जबरदस्त विरोध किया है। आलोचना में कहा गया है कि पाठ्यपुस्तकों में वर्णित इतिहास को सुधारने के नाम पर जिन सुझावों का प्रस्ताव किया गया है, उनके लिए राष्ट्रीय या अंतरराष्ट्रीय स्तर के किसी इतिहासकार से परामर्श नहीं लिया गया है। बल्कि पूर्वाग्रह से पीड़ित गैर अकादमिक पृष्ठभूमि वाले राजनीतिज्ञों ने ये सुझाव दिए हैं। पब्लिक पॉलिसी रिसर्च सेंटर की रिपोर्ट में भी यही बातें कही गई हैं।
कुछ प्रश्न –
यहाँ ऐतिहासिक सोच और समझ से जुड़े कुछ प्रश्न खड़े होते हैं। क्या इतिहास की पाठ्यपुस्तकों के सही-गलत को परखने के लिए जनता पर भरोसा किया जाना चाहिए? क्या जनता में यह समझ विकसित की जानी चाहिए? अगर हाँ, तो कैसे?
इन प्रश्नों के उत्तर में कहा जा सकता है कि अगर भारतीय प्रभुसत्ता का आधार जनता है, तो जनता में इस प्रकार की ऐतिहासिक समझ विकसित की जानी चाहिए कि वह लोकतंत्र का प्रभावी हिस्सा बन सके। इस प्रकार की ऐतिहासिक समझ का प्रतिशत फिलहाल कम है। हमारे पास ऐसे कई ढांचे हैं, जो ऐतिहासिक चिंतन को विकसित करने में सार्थक सिद्ध हो सकते हैं। जैसे एससीआईएम-सी समराइजिंग, कंटैक्सचुअलाइजिंग, इनफरिंग, मॉनेटरिंग, कोरोबरेटिंग या आरसीएच (असेसमेंट सेंटर फॉर हिस्ट्री) या हिस्टारिकल थिंकिंग स्टैण्डर्स आर्टिक्ंयूलेटेड (गैरी नैशं द्वारा)। इसके अलावा भी कालानुक्रमिक सोच; ऐतिहासिक विश्लेषण और व्याख्याय ऐतिहासिक अनुसंधान, क्षमताएं तथा ऐतिहासिक मुद्दों का विश्लेषण आदि ऐसे कौशल हैं, जिन पर विद्यार्थियों से काम कराया जाना चाहिए।
विद्यार्थी ही भविष्य के नागरिक होंगे, जो देश के इतिहास की सही समझ रखते हुए सही निर्णय लेने में सफल हो सकेंगे। इससे ऐतिहासिक चिंतन की सामान्य प्रवृत्ति विकसित हो सकेगी, जो लोकंतत्र की मजबूती का आधार बनेगी।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित विक्रम विन्सेन्ट के लेख पर आधारित। 27 दिसम्बर, 2022
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Date:18-01-23
Bring the Periphery Closer, ResponsiblyET Editorials
The Parvatmala initiative’s focus on mainstreaming the 13 Himalayan states, particularly the border and buffer areas, is critical and timely. Turning the border areas into growth engines that are integrally connected to the rest of the country will have apositive impact on national security. However, it is essential that mainstreaming should not become a push for homogenisation.
Abandoning the post-1947 hands-off policy that left far-flung and border areas underdeveloped was long overdue. It has had unfavourable impact on India’s strategic security. It has meant that people in these areas have been unable to benefit from the economic and development trends in the rest of the country. The Parvatmala initiative is a corrective. The engagement with the ‘ignored’ periphery will focus on governance, development and national security. But the efforts to connect and engage must avoid a swing in the opposite direction. Localisation in response to specific circumstances and peculiarities will be necessary, and border areas and buffer zones will need infrastructure standardisation for strategic reasons. This is where expertise, and better understanding of local circumstances and the ecology, will be critical. Development and construction of strategic infrastructure must not overlook local peculiarities, be it ecological, social or economic. The identified focus areas — enhancing livelihoods, dealing with insurgency and improved assessments for sectors like tourism and agriculture, international sharing of resources such as water, hydel and highways — need engagement.
The initiative must be a two-way process, with the administrators not just taking government programmes, schemes and services to these areas but also taking inputs from communities in the region to have more effective delivery and integration.
Date:18-01-23
जजों की चुनाव-प्रक्रिया का विवाद कब सुलझेगासंपादकीय
सरकार ने एक बार फिर जजों की नियुक्ति को लेकर वर्तमान कॉलेजियम सिस्टम बदलने का दबाव डालना शुरू किया है। इसके पहले भी संवैधानिक पदों पर बैठे लोगों ने खुलेआम इस सिस्टम को प्रजातंत्र के खिलाफ बताया है। सरकार का प्रश्न है कि जनमत से चुनी गई लोकसभा और उसमें बहुमत पाकर बनी सरकार के मुकाबले क्या चंद जज द्वारा अपने जजों का चुनाव करना सही माना जा सकता है? दरअसल संसद ने 2015 में एक कानून पास किया, जिसमें कॉलेजियम (जो पूर्ण रूप से जजों की सदस्यता वाला होता है) की जगह एक आयोग (एनजेएसी) बनाया था। कानून के प्रावधान ऐसे थे कि सरकार और उसके प्रतिनिधियों की रजामंदी के बिना कोई नियुक्ति नहीं हो सकती थी। सुप्रीम कोर्ट ने इन प्रावधानों को न्यायपालिका की स्वतंत्रता के खिलाफ माना। यहां एक और मौलिक सवाल है। आज देश में जितने भी मामले हैं उनमें से लगभग 46% में सरकार वादी या प्रतिवादी है। क्या ऐसे में अगर जजों की नियुक्ति में उसकी भूमिका रहेगी तो वह ‘इंटरेस्टेड पार्टी’ नहीं मानी जाएगी? क्या जनता ऐसे नियुक्त हुए जजों के फैसले को भी उसी भाव से देखेगी? यह बात आज ज्यादा समीचीन है क्योंकि देश में विचारधारा के स्तर पर जबरदस्त बहस है। व्यक्ति, संस्थाएं, राज्य के अभिकरण और स्वयं सत्ता में बैठा वर्ग एक पक्ष या दूसरे पक्ष की वकालत करता है। इन स्थितियों में जबकि हर संस्था और सरकार के फैसले विचारधारा-विशेष के चश्मे से देखे जा रहे हों, क्या जरूरी नहीं कि कम से कम न्यायपालिका की स्वायत्तता पर देश में एक राय बने? सरकार को भी दूरदृष्टि रखते हुए जजों को चुनने की प्रक्रिया पर स्वस्थ विमर्श करना चाहिए।
Date:18-01-23
छोटी बचतों को बड़ा प्रोत्साहन देना जरूरीसंपादकीय
कोविड के पहले लॉकडाउन के दौरान हजारों लोग शहरों से पैदल अपने गांव-घरों की ओर निकल पड़े थे। रोजगार टूटने के बाद उनके पास पंद्रह दिन तक भी जीने-खाने की बचत नहीं थी । भारत के करीब 50% परिवारों के पास उनकी मासिक आय की 10% भी बचत नहीं है। यह खुलासा मनी – 9 के पर्सनल फाइनेंस सर्वे में हुआ, जो 31 हजार परिवारों के बीच हुआ था। हमारे पास पर्याप्त बचत नहीं हो तो इसका बड़ा असर हमारे साथ सरकार पर भी पड़ता है। हमारी बचत न हो तो सरकारें कंगाल हुई खड़ी हैं। हमारे हजार-पांच सौ जो बैंकों, बीमा आदि में जमा हैं, वही कर्ज बनकर सरकार को मिलता है, तब कई राज्यों में तनख्वाहें बटती हैं। हम टैक्स भी भरते हैं और अपनी बचत भी सौंपते हैं, फिर भी सरकारें दरिद्र हुई जाती हैं! बचतों का टूटना अब जरा खतरनाक हो चला है। महंगाई के समानांतर कमाई नहीं बढ़ती इसलिए बचत तोड़कर राशन खरीदने की नौबत है। बात यहां तक आ गई कि 2022 की पहली छमाही में भारत की शुद्ध वित्तीय बचतें (कर्ज निकालकर) जीडीपी का केवल 4% रह गई हैं। बचतों का यह 30 साल का न्यूनतम स्तर है। यानी भारत के परिवार जितना बचा रहे हैं वह तो सरकारों के कर्ज के लिए भी पर्याप्त नहीं है।
कितना बचाता है भारत: रिजर्व बैंक के आंकड़े बताते हैं 2021 में परिवारों की बचत जीडीपी के अनुपात में 16% पर पहुंच गई। क्योंकि लोग घरों में बंद थे। खपत नहीं थी। 2022 के साल में लॉकडाउन खत्म हुए तो वित्तीय बचत टूटकर 10.8% पर आ गई। यह 2020 से भी कम है, जब कोविड नहीं आया था अर्थात कोविड के बाद कमाई नहीं बढ़ी, जिससे बचतें बढ़ पातीं। लोगों बचत तोड़कर खर्च किया, क्योंकि महंगाई बढ़ गई थी।
अब वित्तीय बचतों की परतें खोलते हैं। बैंक डिपॉजिट तेजी से गिर रहे हैं। वित्तीय बचतों में 2020 में बैंक डिपॉजिट का हिस्सा 36.7% था, जो 2022 में 27.2% रह गया है। बैंक बचतें टूटने से इस कदर परेशान हैं कि कर्मचारियों को डिपॉजिट जुटाने के लक्ष्य दे रहे हैं। बैंक बचतों में भी सहकारी बैंक में जमा बुरी तरह घटा है। 2020 में 58000 करोड़ की बचत थी, 2022 में घटकर 2000 करोड़ रुपए रह गई ! कर्ज की महंगाई के साथ डिपॉजिट पर ब्याज दर बढ़ रही है, लेकिन रोशन हुए चराग तो आंखें नहीं रहीं। अब कमाई ही नहीं बची, जो बैंकों में जमा की जा सके।
कोविड मौतों के कारण बीमा की मांग बढ़ी तो बचतों में बीमा का हिस्सा 2020 में 15.5 से बढ़कर 2022 में 17.8 हो गया। बीमा के साथ प्रॉविडेंट फंड और पेंशन फंड में भी निवेश बढ़ा है। वित्तीय बचतों में छोटी बचत स्कीमों जैसे एनएससी, किसान विकास पत्र, सुकन्या समृद्धि का हिस्सा करीब 2% बढ़ा है। शेयर बाजारों में तेजी के नक्शेकदम पर वित्तीय बचतों में म्युचुअल फंड का हिस्सा 2020 के 2.6% से बढ़कर 2022 में 6.3% हो गया । यानी करीब तीन गुना बढ़त । बचत के हिस्से के तौर पर शेयर यानी इक्विटी में निवेश 0.8% बढ़ा है, मगर उतना नहीं जितनी सफलता एसआईपी क्रांति को मिली। 2020 में कुल बचतें 24 लाख करोड़ रुपए थीं, जो 2022 में केवल 25.60 लाख करोड़ रुपए हो पाई हैं। डिपॉजिट तो 8.27 लाख करोड़ से घटकर 6.53 लाख करोड़ रह गए हैं। अधिकांश आबादी के पास म्युचुअल फंड की समझ नहीं और न ही अतिरिक्त निवेश के लायक बचत म्युचुअल फंड में कुल बचत 2022 में केवल 1.60 लाख करोड़ रही है।
बचत का अंतर्विरोध: बचतों को देनदारियों या कर्ज की रोशनी में ही देखा जाता है। रिजर्व बैंक ताजा आंकड़ा बताता है कि एक तरफ बचतें गिरी हैं तो दूसरी तरफ परिवारों का समग्र कर्ज 2021-22 में छह लाख करोड़ रुपए बढ़कर 83.65 लाख करोड़ रुपए हो गया। कोविड के बाद लोगों को जरूरी खर्च के लिए कर्ज लेना पड़ा है, क्योंकि बचतें भी कम पड़ रही थीं। वित्त वर्ष 2022-23 की पहली छमाही में आम लोगों की शुद्ध बचत (कर्ज निकालकर ) जीडीपी की 4% रह गई है, जो बीते वित्त वर्ष में 7.3% थी । शुद्ध वित्तीय बचत से पता चलता है कि किसी देश के पास उसके सरकारी घाटे को पूरा करने के लिए कितने संसाधन हैं। अर्थव्यवस्था की सुरक्षा के लिए देश की बचत दर सरकारों के घाटे दर से तो ज्यादा होनी ही चाहिए, ताकि हिफाजती बचत (प्रीकॉशनरी सेविंग्स) बनी रहें। 2022-23 में समग्र राजकोषीय घाटा 10% (जीडीपी अनुपात में) के बीच रहने के आकलन हैं। राजकोषीय घाटा सरकार के लिए कुल कर्ज की मांग बताता है।
तो करें क्या : 17वीं सदी में यूरोप में खेती और औद्योगिक क्रांति के बाद भी गरीबी बढ़ती गई थी। तब आया सरकार की प्रोत्साहन बचत का दौर। सेविंग्स बैंक शुरू हुए। जर्मनी और ऑस्ट्रिया स्पार्कसेन इनका शुरुआती संस्करण थे। 19वीं सदी तक यूरोप में कई देशों में सेविंग्स कानून बनाकर बचत पर सरकार की गारंटी और प्रोत्साहन दिए गए। इसी दौरान 1873 में भारत में सरकारी सेविंग्स बैंक एक्ट बना। कोलकाता में पोस्ट ऑफिस सेविंग्स बैंक बनाया गया। बचतों को प्रेरित करने के लिए नेशनल सेविंग्स सेंट्रल ब्यूरो बना था। आजादी के बाद 1948 में नेशनल सेविंग्स ऑर्गेनाइजेशन ने छोटी बचत स्कीम लाकर बचत बढ़ाने के अभियान शुरू किए। उस वक्त तक सरकारों को पता चल गया था कि लोग बचाएंगे तभी देश का काम चलेगा। बीते एक दशक में बचत पर टैक्स प्रोत्साहन बंद कर दिए गए हैं। छोटी बचतों पर ब्याज दर भी कम हुई, नतीजा यह है आज देश की वित्तीय सुरक्षा जोखिम में है।
Date:18-01-23
पश्चिम में भारतवंशियों की सफलता का क्या कारण हैं ?शशि थरूर, ( पूर्व केंद्रीय मंत्री और सांसद )
बीते साल भूरी त्वचा वाले, गोपूजक, भारतवंशी ऋषि सुनक यूके के प्रधानमंत्री बने, जिसका सर्वत्र स्वागत किया गया। इसने सबका ध्यान इस तरफ भी खींचा कि धीरे-धीरे भारतवंशी समुदाय (इंडियन डायस्पोरा) की पश्चिमी दुनिया में अहमियत कितनी बढ़ती जा रही है। इसकी एक झलक निजी क्षेत्र में दिखती है, जहां अग्रणी बहुराष्ट्रीय निगमों के प्रमुख के रूप में भारत में जन्मे, पले-बढ़े व्यक्तियों का चयन किया जा रहा है। पेप्सिको में इंदिरा नूयी, माइक्रोसॉफ्ट में सत्या नडेला, गूगल की पैतृक-कम्पनी अल्फाबेट में सुंदर पिचाई का चयन इसका बेहतरीन उदाहरण है कि दुनिया में दबदबा रखने वाली अमेरिकी कम्पनियों के शीर्ष पर भारतीय प्रतिभाएं आसीन हैं। स्टैंडर्ड एंड पुअर्स 500 इंडेक्स के मुताबिक आज दुनिया की 58 अग्रणी कम्पनियों में भारतीय मूल के सीईओ हैं। यह स्थिति तब है, जब इंदिरा नूयी व वोडाफोन के पूर्व प्रमुख अरुण सरीन रिटायर हो चुके हैं, ट्विटर सीईओ पद से पराग अग्रवाल को हटा दिया गया है और दोयचे बैंक-कैंटर फिट्जराल्ड के प्रमुख रह चुके अंशु जैन का निधन हो गया है।
लेकिन अब बात केवल उद्यमियों, सीईओ, बिजनेस लीडरों तक ही सीमित नहीं रह गई है। भारतवंशियों का दबदबा विदेशी राजनीति के क्षेत्र में भी कायम होने लगा है। भारतीय मूल के अंतोनियो कोस्ता 2015 से ही पुर्तगाल के प्रधानमंत्री हैं। कोस्ता के पास भारत की विदेशी नागरिकता भी है। वहीं लियो वराडकर 2017 से आयरलैंड के प्रधानमंत्री हैं और 2020 में इस पद के लिए पुन: चुने गए हैं। यानी इंग्लैंड और आयरलैंड आज जब पोस्ट-ब्रेग्जिट मसलों पर चर्चा करते हैं तो सुनक और वराडकर के रूप में भारतीय मूल के दो नेता आपस में संवाद कर रहे होते हैं। यह यूरोप के लिए बड़ी ही चटपटी अवस्था है। अमेरिका की उपराष्ट्रपति कमला हैरिस की मां भारतीय हैं। 2024 में निक्की हेली रिपब्लिकन पार्टी की उम्मीदवार बन सकती हैं और उनके अभिभावक भी भारतीय हैं।
क्या कारण है कि भारतीय मूल के लोग पश्चिमी जगत में सफल हो रहे हैं? क्या वजह है कि वे उन कम्पनियों और संस्थाओं का नेतृत्व कर रहे हैं, जो पश्चिम में बनी और विकसित हुई हैं और उनके पास स्थानीय प्रतिभाओं की कोई कमी नहीं है? कुछ लोग इसका श्रेय दो सौ साल के ब्रिटिश राज को देते हैं, जिसके कारण भारतीयों का अंग्रेजी भाषा-संस्कृति से गहरा परिचय हो गया। लेकिन इतने भर से तो कोई सफल नहीं हो जाता। वैसे भी, अगर यही कारण रहता तो फिर गैर-अंग्रेजीभाषी यूरोपियन देशों में भारतवंशियों की सफलता का क्या कारण हो सकता है? कुछ अन्य लोग इसका कारण उस अतिरिक्त ऊर्जा और ललक को बताते हैं, जो ये प्रवासीजन अपने साथ नए देशों में लेकर आते हैं। यह कुछ हद तक सच है और भारतीय दूसरे प्रवासी लोगों की तुलना में निश्चित ही अधिक सफल हुए हैं। मिसाल के तौर पर अमेरिका में किसी भी अन्य नस्ली-समूह की तुलना में भारतीय मूल के लोगों की प्रतिव्यक्ति आय सबसे अधिक है।
भारत से जो पहली पीढ़ी के प्रवासी विदेशों में गए थे, उन्होंने कभी भी सुख-समृद्धि को हलके में नहीं लिया था। उन्होंने पर्याप्त अभाव झेले थे। उनके भीतर सफल और स्थापित होने की वह भूख थी, जो पश्चिमी जगत में अनेक लोगों में नहीं होती। उन्होंने अपनी महत्वाकांक्षाओं के चलते स्पर्धा में दूसरों को पीछे कर दिया। वे भारत में वैसी कठिन परिस्थितियों में पलकर बड़े हुए थे, जो उनके पश्चिमी साथियों के लिए अकल्पनीय थीं। उन्होंने संसाधनों की कमी, सुविधाओं का अभाव, सरकारी-नियंत्रण, नौकरशाही की लेटलतीफी- इस सबको देखा था। भारतीयों को विविधता के साथ जीने की भी आदत है। हमारा इतिहास और बहुलतापूर्ण सामाजिक माहौल भारतीयों को विभिन्न भाषा, धर्म, संस्कृति के लोगों के साथ मिलकर काम करने के लिए तैयार कर देता है। उनके लिए किसी भी बहुराष्ट्रीय निगम में सहकर्मियों के साथ कामकाजी-सम्बंध स्थापित करना सरल हो जाता है। भारत में अपनी परवरिश के दौरान उन्होंने विनम्रता, बड़ों का सम्मान और अपने से ऊंचे ओहदे वाले व्यक्ति का लिहाज करने की मूल्य-चेतना विकसित कर ली होती है। भारतीयों के ये तमाम गुण ही उन्हें औरों से अलग और विशिष्ट बनाते हैं।
Date:18-01-23
एआई टूल्स भी मूल्यों का पालन करते हैं, उन पर निगरानी रखनी होगीउज्ज्वल दीपक, ( लेखक कोलंबिया यूनिवर्सिटी से पढ़े हैं )
2020 में लेखकों और कवियों के एक समूह ने कविता उत्पन्न करने के लिए चैटजीपीटी का प्रयोग किया। उन्होंने क्लासिक कविताओं के डेटासेट पर मॉडल को प्रशिक्षित किया और फिर इसे विभिन्न विषयों और शैलियों का उपयोग करके नई कविताएं गढ़ने के लिए प्रेरित किया। परिणाम काफी प्रभावशाली थे, क्योंकि मॉडल ने ऐसी कविताएं लिखीं, जो न केवल सुसंगत और व्याकरणिक रूप से सही थीं, बल्कि काव्य संरचना, कल्पना और भाषा की गहरी समझ भी प्रदर्शित करती थीं। इस प्रयोग ने प्रदर्शित किया कि चैटजीपीटी में रचनात्मक क्षेत्रों में उपयोग किए जाने की क्षमता है और यह मानव द्वारा उत्पादित सामग्री के बराबर है।
चैटजीपीटी, ओपनएआई द्वारा 2018 में विकसित एक भाषा मॉडल है, जो कृत्रिम बुद्धिमत्ता अनुसंधान प्रयोगशाला है। ये एक प्रोटोटाइप संवाद-आधारित एआई चैटबॉट है, जो प्राकृतिक भाषा को समझने-जवाब देने में सक्षम है। इसकी तीक्ष्ण बुद्धिमता का उदाहरण है कि एक शोध दल ने नए वैज्ञानिक पेपर तैयार करने के लिए एक विशिष्ट क्षेत्र में मौजूदा पेपर्स के डेटासेट पर चैटजीपीटी को फाइन-ट्यून किया, फिर सार और पूर्ण पेपर उत्पन्न करने के लिए मॉडल का प्रयोग किया। विशेषज्ञों ने पाया कि मॉडल द्वारा तैयार कुछ कागजात मानव द्वारा लिखे गए समान गुणवत्ता वाले थे।
जैसे-जैसे ये प्रौद्योगिकियां आगे बढ़ती जा रही हैं, संभावना है कि चैटजीपीटी और अन्य समान मॉडल मानव-समान पाठ को समझने और उत्पन्न करने की उनकी क्षमता में सुधार करना जारी रखेंगे। पर इन तकनीकों का विकास नैतिक और सामाजिक चिंताओं को भी उठाता है, जैसे कि नौकरी का विस्थापन, गलत सूचनाओं का प्रसार और प्रौद्योगिकी का संभावित दुरुपयोग।
जैसे-जैसे एआई का क्षेत्र आगे बढ़ रहा है, यह देखना दिलचस्प होगा कि भविष्य में चैटजीपीटी और अन्य एआई मॉडल का उपयोग मानव रचनात्मकता को बढ़ाने, ज्ञान-सृजन के लिए एक उपकरण के रूप में और विभिन्न क्षेत्रों में मानव शोधकर्ताओं की सहायता के लिए कैसे किया जाएगा। चैटजीपीटी की वास्तविक दुनिया पर प्रभाव डालने की क्षमता- विशेष रूप से उन क्षेत्रों में जहां संसाधन सीमित है- अकल्पनीय है।
पर इस बॉट की क्षमताओं से अधिक चर्चा, इसका गलत सूचनाओं और पूर्वाग्रहों से ग्रसित होना है। होमवर्क असाइनमेंट के लिए चैटजीपीटी या अन्य भाषा मॉडल का उपयोग करने से संभावित रूप से छात्रों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है। इन मॉडलों के उपयोग से छात्र अपने काम को पूरा करने के लिए प्रौद्योगिकी पर बहुत अधिक निर्भर हो सकते हैं और मूल्यवान समस्या-समाधान और महत्वपूर्ण सोच-कौशल खो सकते हैं। मॉडल ने गणित की कुछ समस्याओं का गलत उत्तर दिया है और कुछ धार्मिक प्रश्नों पर भेदभावपूर्वक उत्तर दिए हैं। हालांकि बॉट ने इसके लिए उपयोगकर्ताओं से माफी भी मांगी और अपने उत्तरों को ठीक भी किया पर कई बार इसके अति-विस्तृत उत्तरों ने लोगों को दिग्भ्रमित किया है और वापस गूगल पर जाकर उत्तरों की प्रामाणिकता जांची गई है।
आप ये जानकर रोमांचित हो जाएंगे कि यह लेख भी मैंने चैटजीपीटी का इस्तेमाल कर ही लिखा है। जब चैटजीपीटी से मैंने उसके नकारात्मक पहलुओं के बारे में बताने को कहा तो उसने वह भी तार्किक रूप से बताया। सच में ऐसा लगा कि कोई भीष्म पितामह से उनको ही हराने का उपाय पूछ रहा हो और भीष्म बिना किसी भेदभाव के एक निश्चित जीवन-मूल्यों का पालन करते हुए अपनी हार का रास्ता बता रहे हों। कहने का तात्पर्य यह है कि एआई भी एक निश्चित मूल्यों (कोड) का पालन करते हैं और ऐसी तकनीकों का अच्छा या बुरा होना उनके निर्माताओं द्वारा निर्धारित मूल्यों पर निर्भर करता है। इसलिए ऐसी तकनीकों का नियंत्रण अति आवश्यक है।
Date:18-01-23
एक नई क्रांति के मुहाने पर दुनियाशिवकांत शर्मा, ( लेखक बीबीसी हिंदी सेवा के पूर्व संपादक हैं )
बीते वर्ष प्रिंस्टन यूनिवर्सिटी प्रेस ने एक किताब छापी, ‘यू आर नाट एक्सपेक्टेड टू अंडरस्टैंड दिस’ यानी यह अपेक्षा नहीं कि आप इसे समझ ही लें। दिलचस्प शीर्षक और सामग्री की वजह से चर्चा का विषय बनी यह पुस्तक, जिसकी संपादक टोरी बाश हैं, हमारे वर्तमान और भविष्य पर कृत्रिम बुद्धिमत्ता (आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस-एआइ) और मशीन लर्निंग जैसी तकनीकों के प्रभाव का आकलन करती है। 1975 में जारी किए गए कंप्यूटरों के ओपन सोर्स आपरेटिंग सिस्टम ‘यूनिक्स’ के छठे संस्करण के लेखकों ने उसके कोड में एक दिलचस्प टिप्पणी डाली थी-आप इसे समझ लें, यह आशा नहीं। यह उस कोड की चमत्कारिक क्षमताओं की घोषणा थी, क्योंकि यह आपरेटिंग सिस्टम अलग-अलग कंप्यूटरों पर एक साथ कई एप्लीकेशन चला सकता था। यहीं से नई तकनीक की वह यात्रा शुरू हुई, जो आज एलगोरिद्म के जरिये कृत्रिम बुद्धिमत्ता और मशीन लर्निंग तक आ पहुंची है। एआइ के क्षेत्र में गत वर्ष कई उल्लेखनीय बातें हुई हैं, जिनकी वजह से यह किताब लिखी गई है। जैसे फेसबुक की प्रवर्तक कंपनी मेटा के कुछ कर्मियों ने ऐसा एआइ प्रोग्राम बनाने का दावा किया, जो रणनीति के प्रसिद्ध खेल ‘डिप्लोमेसी’ में अधिकांश लोगों को हरा सकता है। चीन के शेनजेन शहर के अधिकारियों ने दावा किया कि वे 5-जी नेटवर्क से जुड़े मोबाइल के डिजिटल जुड़वा रूपों के जरिये लोगों, उनकी आवाजाही और ऊर्जा खपत की निगरानी कर रहे हैं। इस बीच सबसे अधिक चर्चा चैट-जीपीटी नामक चैट बोट की रही, जो आकलन-विश्लेषण कर सकता है। जटिल विषयों पर लेख लिख सकता है। उलझाऊ समस्याओं के तर्कसंगत हल बता सकता है। चुटकुले और कहावतें समझ सकता है और फंसाने वाले सवाल की गुत्थी सुलझा सकता है। खबरें हैं कि माइक्रोसाफ्ट चैट-जीपीटी बनाने वाली कंपनी ‘ओपन-एआइ’ में 1,000 करोड़ डालर के निवेश की योजना बना रही है।
माइक्रोसाफ्ट एक छोटी उदीयमान कंपनी पर इतना बड़ा दांव इसलिए लगाना चाहती है, क्योंकि उसे गूगल के सर्च इंजन से मुकाबले के लिए विकल्प की तलाश है। चैट-जीपीटी में उसे ऐसा इंजन बनाने की क्षमता नजर आती है। चैट-जीपीटी में जीपीटी का आशय ऐसी तकनीक से है, जिसमें इंटरनेट पर उपलब्ध नाना विषयों की लाखों किताबों की सामग्री पढ़कर स्मृति का विशालकाय डाटाबेस तैयार होता है। फिर उसका प्रयोग समझने और भाषाई व्यवहार करने में कर सकता है। अभी चैट-जीपीटी शैशव अवस्था में है, लेकिन जैसे-जैसे उसमें और जानकारी भरी जाएगी, वैसे-वैसे उसकी क्षमता और समझ बढ़ती जाएगी। ऐसी मशीनें अनुवाद करने, कानूनी और दफ्तरी दस्तावेज लिखने के अलावा रचनात्मक लेखन या संगीत के कच्चे मसौदे बनाने के काम भी कर सकेंगी, जिसके बाद लेखक उन्हें परिमार्जित कर सकेंगे।
गूगल पर हम शब्द या फिकरे डालकर जानकारी खोजते हैं और सर्च इंजन वांछित जानकारी के सही संदर्भ और विषय के बजाय जहां-जहां शब्द और फिकरा मिले उसे पेश कर देता है, लेकिन यदि कल्पना करें कि आप किसी सर्च इंजन से सधे हुए सवाल करें और वह उसके एकदम सटीक उत्तर खोज दे तो कितना अच्छा होगा? माइक्रोसाफ्ट को ‘ओपन-एआइ’ से इसी तरह के सर्च इंजन की दरकार है, जिसके सहारे वह गूगल सर्च इंजन के एकछत्र राज को चुनौती देना चाहता है। यह सब इसलिए संभव हो रहा है, क्योंकि आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस प्रोग्राम अब अपनी डीप लर्निंग की पीढ़ी से फाउंडेशन माडल के पड़ाव पर पहुंच गए हैं। पिछले दस वर्षों से हम गूगल और एपल नक्शों के सहारे घूमने के आदी हो गए हैं। अमेजन की एलेक्सा और एपल की सीरी से भी छोटे-मोटे काम करा लेते हैं, लेकिन फाउंडेशन माडल के बोट एकदम अगली पीढ़ी के होंगे। पायलट से कहीं भूल हो रही होगी तो वे चेतावनी देंगे। आपकी कार चलाएंगे। ड्रोन उड़ाएंगे। डाक्टर को बीमारी का सही निदान बताएंगे। संगीतकार के गुनगुनाते ही धुन और संगीत के नोट बनाकर दे देंगे। यह सब इसलिए संभव लगता है, क्योंकि आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस के कोड अब मशीनों को हमारे मस्तिष्क की तंत्रिकाओं के करोड़ों नेटवर्कों की तर्ज पर प्रशिक्षित कर रहे हैं। मशीनें अपनी भूलों से खुद सीख रही हैं। वैसे अभी भी हवाई और रेल यातायात नियंत्रण, विमान नियंत्रण और चालन, मौसम पूर्वानुमान, मिसाइल, राकेट और उपग्रह प्रक्षेपण जैसे काम मशीनों की आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस ही करती है। नई पीढ़ी की एआइ मशीनों में भूल सुधार की क्षमता भी होगी।
टोरी बाश का मानना है कि लगभग हर काम में प्रयोग आने वाली मशीनों के कोड लिखने वाले लोग हम और आप ही हैं। इसलिए ये उनकी धारणाओं से अछूते नहीं रह सकते। नीति-निर्माताओं के लिए चुनौती यह है कि ये मशीनें आंकड़ों को खंगाल और समझ तो सकती हैं, परंतु इनकी नैतिक और सामाजिक जरूरत का सही फैसला नहीं कर सकतीं। आम लोगों के लिए चुनौती यह है कि एक बार जब सब मशीनों में हर जगह एआइ की कोई न कोई मात्रा लग जाएगी तो उन्हें चलाने और उनकी मरम्मत करने वालों को भी उनकी कुछ जानकारी चाहिए होगी। अन्यथा ये कैसे चलेंगी और ठीक होंगी? संभवतः इसी सोच-विचार के बाद ब्रितानी प्रधानमंत्री ऋषि सुनक ने हाल में कहा कि स्कूलों में बारहवीं कक्षा तक गणित को अनिवार्य किया जाएगा। उनका कहना था कि तेजी हो रहे तकनीकी विकास और बदलाव को देखते हुए गणित की बुनियाद मजबूत किए बिना युवाओं को रोजगार मिलने में दिक्कतें होंगी। आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस और मशीन लर्निंग में हो रहे विकास और रोजगार के प्रत्येक क्षेत्र में गणित की महत्ता को सुनक से बेहतर और कौन समझ सकता है? ऐसे में, भारत के नेताओं और नीति निर्माताओं को भी इस विषय पर जागने की जरूरत है। बुद्धिमान मशीनों की क्रांति औद्योगिक क्रांति के बाद होने वाला सबसे बड़ा परिवर्तन है। लोगों के रोजगार पर इनके संभावित असर को लेकर अभी गहरे मतभेद हैं, लेकिन इस परिदृश्य में हमारे समक्ष दो ही विकल्प हैं- या तो एआइ और उसकी कोडिंग के बारे में जानकारी हासिल करें और मशीनों को अपनी जरूरतों और चुनौतियों के हिसाब से ढालें। या सब कुछ कोड लिखने वालों और मशीनें बनाने वालों पर छोड़ दें।
Date:18-01-23
मतदान से दूरसंपादकीय
दूरस्थ मतदान मशीन यानी आरवीएम शुरू करने के निर्वाचन आयोग के प्रस्ताव को विपक्षी दलों ने शुरुआती चरण में ही अस्वीकार कर दिया। हालांकि जब आयोग ने इसे शुरू करने का प्रस्ताव रखा, तभी इसका विरोध शुरू हो गया था। इसके व्यावहारिक पक्षों को लेकर तरह-तरह के सवाल उठाए और शंकाएं जताई जा रही थीं। निर्वाचन आयोग ने सभी दलों को निमंत्रित किया था कि वे आएं और आरवीएम से संबंधित अपनी शंकाएं और सुझाव साझा करें। निर्वाचन आयोग मशीन के व्यावहारिक पक्षों को समझाना और उनकी सहमति मिलने के बाद इसे प्रायोगिक तौर पर लागू करना चाहता था। मगर विपक्षी दलों ने एक स्वर से इस पर असहमति जता दी। उनका कहना है कि अभी इलेक्ट्रानिक मतदान मशीन यानी ईवीएम को लेकर उठ रही शंकाओं के समाधान ही निर्वाचन आयोग नहीं कर पाया है, ऐसे में वह घरेलू प्रवासियों के लिए उसी तरह की मशीन से नई मतदान व्यवस्था करने की पहल कैसे कर सकता है। कुछ नेताओं ने यह तक पूछा कि आयोग मतदान तो कराना चाहता है, मगर प्रवासी मजदूरों के बीच राजनेता अपना प्रचार करने कैसे जाएंगे। इस तरह आरवीएम के व्यावहारिक पहलुओं पर कई गंभीर सवाल खड़े किए गए। जाहिर है, अब इस प्रणाली पर निर्वाचन आयोग के लिए आगे कदम बढ़ाना संभव नहीं होगा।
दरअसल, पिछले अनेक चुनावों से देखा जा रहा है कि मतदान को लेकर लोगों में उदासीनता बनी हुई है। हर चुनाव में पिछले चुनाव की तुलना में मत प्रतिशत कुछ कम दर्ज होते हैं। हालांकि निर्वाचन आयोग लोगों में मतदान के प्रति जागरूकता पैदा करने का पूरा प्रयास करता है। मगर खासकर शहरी मतदाता में उत्साह नहीं पैदा हो पाता। कई जगहों पर तो पचास फीसद से भी कम मतदान होता है। इस तरह लोकतांत्रिक प्रक्रिया प्रश्नांकित होती है। पचास फीसद से भी कम मतदान के बावजूद प्रतिनिधि तो निर्वाचित होते ही हैं, सरकार बनती ही है। फिर सवाल उठता है कि वह सरकार किन लोगों ने बनाई है। विचित्र स्थिति तब देखी जाती है जब कम मत प्रतिशत वाले दल की संख्या अधिक हो जाती है और वह सत्ता में आ जाता है और अधिक मत प्रतिशत वाला दल बाहर रह जाता है। इस स्थिति को समाप्त करना निस्संदेह निर्वाचन आयोग के लिए बड़ी चुनौती है। मगर यह कैसे संभव हो, इसका उपाय वह निकाल नहीं पाया है। उसे लगता है कि अगर प्रवासी लोगों को अपने मतों का प्रयोग करने की सुविधा मिल जाए तो इससे मत प्रतिशत में बढ़ोतरी हो सकती है।
लंबे समय से रेखांकित किया जाता रहा है कि जो लोग कामकाज, पढ़ाई-लिखाई या दूसरी वजहों से अपना घर-बार छोड़ कर दूरदराज जगहों पर रहने को मजबूर हैं, उन्हें भी अपने मताधिकार का उपयोग करने की व्यवस्था की जानी चाहिए। मगर इसका कोई व्यावहारिक रास्ता अभी तक नहीं निकाला जा सका है। पिछले कुछ सालों में ग्रामीण इलाकों से बहुत तेजी से पलायन बढ़ा है। ऐसे में बड़ी संख्या में ऐसे लोग शहरों में रहने लगे हैं, जिनका मतदाता सूची में नाम अपने गृह प्रदेश में है। निर्वाचन आयोग ने इसी के मद्देनजर दूरस्थ मतदान मशीन की व्यवस्था शुरू करने का प्रस्ताव रखा था। इसके तमाम तकनीकी पहलुओं पर उसने विचार भी कर लिया है। अगर यह लागू हो जाती, तो बेशक इससे न सिर्फ मतदान प्रतिशत बढ़ता, बल्कि अपने मताधिकार के प्रयोग से वंचित लाखों लोगों को सुविधा मिल पाती। इस दृष्टि से इस व्यवस्था पर पुनर्विचार की जरूरत से इनकार नहीं किया जा सकता।
Date:18-01-23
चेताती रिपोर्टसंपादकीय
विश्व आर्थिक मंच (डब्ल्यूईएफ) की वार्षिक बैठक के पहले दिन सोमवार को दावोस में ऑक्सफैम इंटरनेशनल ने पेश वार्षिक असमानता रिपोर्ट–सर्वाइवल ऑफ रिचेस्ट’–में कहा है कि भारत में मात्र एक फीसद लोगों के पास देश की कुल संपत्ति का 40 फीसद हिस्सा है। यह आंकड़ा भी हैरत में डालने वाला है कि नीचे से 50 फीसद आबादी के पास देश की कुल संपत्ति का सिर्फ तीन फीसद है। आंकड़े चौंकाने वाले हैं‚ लेकिन संपत्ति में असमानता का मुद्दा कोई नया नहीं है। कल्याणकारी अर्थव्यवस्था में सरकार की कोशिश रहती है कि आय और संपत्ति के मामले में असमानता कम से कम की जाए। आजादी के बाद से भारत इस बाबत प्रयासरत था और 1991 तक के आकड़ों से इस बात की तस्दीक होती है कि साल दर साल असमानता कम होने की तरफ अग्रसर थी‚ लेकिन 1991 में उदारीकरण लागू होने के बाद से असमानता तेजी से बड़ी। उद्योग–हितैषी नीतियां लागू की गईं और कॉरपोरेट को ज्यादा से ज्यादा सहूलियतें मिलने लगीं। इस क्रम में उद्योग और कंपनी क्षेत्रको प्रतिस्पर्धी बनाने की गरज से ऐसी नीतियां लागू हुईं जिनसे देश में पूंजी का प्रवाह और निवेश बढ़ा। लेकिन उदारीकरण के एकदम बाद के वर्षों में श्रम बल अपेक्षानुरूप कुशल नहीं मिला। उद्योग क्षेत्र में बड़े पैमाने पर छंटनी हुई। निवेश बढ़ाने की गरज से बड़े उद्योगों को सहूलियतों में इजाफे के बीच कॉरपोरेट टैक्स में कटौती जैसी व्यवस्थाएं तो की गईं लेकिन आम जन को लाभान्वित करने की बाबत कोईज्यादा प्रयास नहीं हुए। जीएसटी संग्रह में बढ़ोतरी को एक उपलब्धि के रूप में गिनाया जाता है‚ लेकिन यह टैक्स आम जन पर भारी पड़ रहा है। उसके लिए आटा और पैंसिल–कागज जैसी चीजें भी महंगी हो गई हैं। आम जन संपत्ति और आय में असमानता के दंश से बचाने के लिए यदि करों को ही तर्कसंगत कर दिया जाए तो काफी राहत मिल सकती है। ऑक्सफैम की रिपोर्ट में कहा गया है कि 10 फीसद धनी लोगों पर कर बढ़ाकर देश के बच्चों की पढ़ाई का खर्च निकाला जा सकता है। अरबपतियों पर 2 फीसद कर लगाया जाए तो कुपोषितों के पोषण के लिए धन की व्यवस्था हो सकती है। रिपोर्ट ने महिलाओं को मिल रहे कम वेतन की तरफ भी ध्यान खींचा है‚ जो प्रबुद्ध समाज में अस्वीकार्य है। रिपोर्ट पर सरकार के रुख का अभी पता नहीं चला है‚ लेकिन इसकी मदद से कराधान को तार्किक बनाने की दिशा में जरूर बढ़ा जा सकता है।
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भारत की विदेश नीति में अफ्रीका का महत्वपूर्ण स्थान है। अफ्रीका के 54 देशों में से अधिकांश विकासशील या कम विकसित हैं। दुनिया के जी-20 समूह में इस वर्ष दक्षिणी देशों का प्रतिनिधित्व कर रहे भारत के लिए यह समझना जरूरी है कि अफ्रीका में किस प्रकार के परिवर्तन हो रहे हैं, और अन्य देशों के साथ उसकी किस प्रकार की साझेदारी है। यह अफ्रीकी एजेंडे को आगे बढ़ाने में भारत के योगदान का निर्धारण करेगा।
अफ्रीका-अमेरिका-चीन
अफ्रीका में चीन की भागीदारी काफी लंबे समय से बड़ी मात्रा में रही है। इसकी व्यापार साझेदारी और निवेश, अमेरिका की तुलना में बहुत ज्यादा है। चीन अफ्रीका के बीच में सन् 2000 से ही फोरम ऑन चाइना अफ्रीका कॉपरेशन बना लिया गया था। इस कॉपरेशन में चीन और अफ्रीका के अनेक मंत्री और नेता शामिल हैं, जो तीन वर्षों में एक बार मिलते हैं। चीनी राष्ट्रपति भी इन बैठकों में स्वयं उपस्थित होते हैं या डिजिटली भाग लेते हैं। दोनों देशों के बीच समयवद्ध निर्णय लेने के लिए मंत्रियों का साझा तंत्र है। कुल मिलाकर दोनों के बीच मजबूत साझेदारी है।
दूसरी ओर, अमेरिका ने भी कुछ समय से अफ्रीकी यूनियन के 49 देशों के साथ संबंध मजबूत करने की शुरूआत की है। जी-20 समूह में अफ्रीका यूनियन के देशों को स्थायी सदस्यता देने के लिए अमेरिका ने समर्थन किया है। संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद् में भी अफ्रीका के स्थायी प्रतिनिधित्व को पूर्ण समर्थन दिया है। इसके साथ ही अमेरिकी राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति की अगले साल तक अफ्रीका यात्रा का वादा किया गया है। 2015 के बाद से किसी अमेरिकी राष्ट्रपति या उपराष्ट्रपति की यह पहली अफ्रीका यात्रा होगी। अमेरिका ने अफ्रीका में निवेश भी बढ़ाया है।
भारत के लिए निहितार्थ –
अफ्रीका ने विकास के लिए एजेंडा 2063 तैयार किया है। इसे साकार करने में भारत का सर्वप्रथम सहयोग यह हो सकता है कि वह जी-20 समूह में अफ्रीकी देशों की स्थायी सदस्यता की पुरजोर कोशिश करे। भारत को अमेरिका के साथ मिलकर अफ्रीका में काम करना चाहिए। अंततः, 2024 में होने वाले भारत-अफ्रीका फोरम के शिखर सम्मेलन के लिए उत्साहपूर्वक योजना बनाई जानी चाहिए। यह भारत के हित में होगा।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित राजीव भाटिया के लेख पर आधारित। 28 दिसम्बर, 2022
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Date:17-01-23
Expand The MiddleIndia’s middle classes need better public servixces. Only then will they grow faster & have meaningful impact.TOI Editorials
Nirmala Sitharaman recently said that she is from the middle class and therefore identifies with it. With her fifth budget speech scheduled on February 1, she pointed out that GoI had not levied new taxes on the middle class. Instead, it prioritised urban infrastructure such as metro projects. Given India’s narrow income tax base, middle class aspirations and anxieties often come into focus ahead of the budget.
How large is the constituency? Thinktank PRICE pegs middle class households as ones that earn an income of Rs 5-30 lakh a year. PRICE estimated they make up 30% of all households in 2020-21. That’s roughly in line with what tax data shows. In 2018-19, on an admittedly narrow individual income tax base of about 56 million returns filed, individuals with income in the range of Rs 5-25 lakh numbered around 19 million, or 34%. The data on the tax base is out of sync with consumption patterns, which suggests that the potential size of the middle class is much larger.
It leads to Sitharaman’s second observation about investments in public infrastructure. There’s a mismatch between what different levels of government show as investment and public perceptions about their quality of life. Plenty of anecdotal evidence suggests that an increasing proportion of the middle class rely on private provision of basic services such as transport, healthcare and education. This trend leads back to questions about the tax base as economist Devesh Kapur suggests that when middle classes “exit” and move towards private provision of basic services, it has an adverse effect on the inclination to pay taxes.
In a separate study on the middle class, Kapur and his co-authors tried to gauge the size of the middle class by asking people to self-identify. Almost half of India describes itself as middle class, a phenomenon that’s sharper in urban areas. Poor urban governance architecture not only limits the impact this class can have on politics, it also makes it harder for individuals to cross the Rs 5 lakh income threshold. The middle, which benefitted from liberalisation, needs to grow faster.
Date:17-01-23
Be Wise, Centre & SCBetter than court’s stand & GOI’s proposal is revising the collegium’s memorandum of procedure.TOI Editorials
Union law minister Kiren Rijiju’s letter to CJI DY Chandrachud seeking representation for GoI in the collegium, and consultations with states, signals another front being opened in the Centre-Supreme Court standoff. The collegium system is the outcome of the Third Judges Case of 1998, which envisioned procedures for appointment of SC and high court judges. Subsequently, a Memorandum of Procedure (MoP) was finalised following consultations between the Centre and SC. The only way GoI’s new proposal can be implemented is if SC agrees to revisit the Second and Third Judges Cases. But this is abad idea: It is Parliament that must do the law-making.
Making Parliament into a bystander while the executive proposes and the judiciary decides how to frame the law is bad form. This newspaper has argued for a National Judicial Appointments Commission and believes it deserves another chance. The constitution bench that scrapped NJAC did so without having the benefit of seeing it work. GoI, surprisingly, hasn’t made another attempt to re-enact NJAC. Perhaps, SC can be persuaded this time to watch NJAC at work before inevitable legal challenges to it are taken up. After all, such wait-and-watch has been the SC modus to challenges against demonetisation, electoral bonds, Article 370, CAA, etc.
An alternative course is to revise the MoP as directed by the five-judge NJAC bench in a subsequent order. This order laid special emphasis on making the collegium more transparent through appropriate revisions to the MoP through recording minutes of collegium discussions including dissension, setting up secretariats for each HC and SC for better management of the process, clear eligibility criteria for appointment to HCs and SC, and a mechanism to deal with complaints against judgeship candidates. Since Centre’s primary concern about the present collegium system appears to be the lack of transparency, the MoP revision, which has stalled for over six years over relatively minor disagreements, should be revived. The current standoff is creating unnecessary tensions, and mustn’t affect filling of judges’ vacancies. May wise judgment prevail.
Date:17-01-23
Hills, Stop Copying The PlainsJoshimath shows we need a radically different growth model for Himalayan states.Chandra Bhushan, [ The writer is CEO, International Forum for Environment, Sustainability and Technology (iFOREST) ]
What is unfolding in Joshimath is a tragedy. But this tragedy is not due to climate change; climate change-linked extreme events may have exacerbated the situation, but the sinking of Joshimath is our doing.
The fact is this disaster is not unexpected; it was foretold. Over 50 years, the sinking of Joshimath has been documented by multiple committees of the Supreme Court and the Union and state governments. They warned against haphazard urbanisation, large-scale hydropower development and cutting of hills to widen roads. But time and again, their warnings were ignored.
The result is that the fate of Joshimath is sealed. Even with engineering solutions, a part of this historic city will have to be abandoned, and the rest will struggle to survive. So, how have we reached this stage, and how do we prevent many more Joshimaths in the future?
It is important to understand that Joshimath is a symptom; the disease is the strong push in the Himalayan states to replicate the development model of the plains – big infrastructure projects, wider roads, and high-rise buildings. It is this model that is seriously compromising their environmental security.
Let’s look at the hydroelectric projects (HEPs) in Uttarakhand.
● The state presently has 39 large and small HEPs with an installed capacity of 3,600 MW.
● In addition, there are 25 HEPs worth 2,400 MW capacity under construction.
● So, in a couple of years, Uttarakhand will have 64 HEPs of 6,000 MW capacity.
● But what is existing and under construction is just a fraction of what is being planned.
● There are 180 HEPs of 21,200 MW capacity in the pipeline.
● Many have already obtained environmental clearances from the environment ministry and state agencies.
● Even if we assume that only half of these projects reach fruition, Uttarakhand will have 150 HEPs, and its hydropower capacity will increasefourfold from the present.
● This is plainly unsustainable. Scientists have warned against building hydropower without comprehensive studies, and government committees have recommended scrapping HEPs. Yet, many projects with questionable feasibility continue to be constructed. Take the case of the Tapovan Vishnugad HEP, which is blamed for the aquifer breach at Joshimath.
● Construction of the 520 MW Tapovan project began nearly 17 years ago and was scheduled to be completed in 2013.
● But, almost a decade later, the project is still ‘under construction’.
● Its price tag has more than doubled.
● Moreover, this project has been damaged by floods twice – in 2013 and 2021.
● In 2021 floods caused by an unprecedented avalanche, nearly 200 people died, and many were workers at the project site.
● Tapovan Vishnugad exemplifies the risk of large-scale infrastructure development without proper assessment.
It is well-known that the Himalayas is one of the most unstable mountain ranges and is prone to natural disasters. On top of this, global warming is profoundly impacting the geology and hydrology of the region. Data shows that 90% of earthquakes, most landslides and a large proportion of cloudbursts in India occur there.
With massive infrastructure development and more people living in vulnerable areas, the economic and ecological losses are mounting and will continue to grow unless we make fundamental changes in the development paradigm.
Change the model
The first change is to stop copying the plains. The domain of environmental science tells us that every place has a carrying capacity. Once this capacity is exceeded, ecological destruction ensues.
● Himalayas have a much lower carry
ing capacity than plains and thus can sustain much lower human pressure.
● Therefore, better planning and enforcement are essential to ensure that the carrying capacity is not breached.
● But unfortunately, the institutions which can ensure this, like the town and country planning (TCP) department and the environment department, are weak and ineffective in hill states.
In Uttarakhand, for instance, the TCP department is operating with minimal staff and resources, and the reorganisation of the department has not been done since the bifurcation from Uttar Pradesh. Without solid planning and enforcement, the Himalayan states are doomed.
The second is to practise an alternate model of development, an immediate requirement in the tourism sector. It is projected that 250 million tourists will visit these states by 2025; the number was 100 million before the pandemic. This massive growth will exacerbate water scarcity, worsen air quality and lead to forest and land degradation.
But there is an alternative to this unsustainable tourism – high-value sustainable tourism. We can follow the example of Bhutan, which has capped the number of travellers by imposing a sustainable development fee of $200 per day. A part of this fee goes into environmental protection and enhancing livelihood for local residents. A similar sustainable tourism policy is required for our Himalayas too.
Lastly, in this era of climate change, Himalayan states can create a large number of jobs in the environment sector – biodiversity conservation, high-value organic farming, sustainable forestry, glacier and water body protection etc. And they can be incentivised by the rest of the country to do this.
This is because they are major water sources that sustain the plains, and their glaciers, forests and biodiversity are essential for the country’s ecological security. While some progress has been made on payments for ecosystem services, a lot more needs to be done so that these states can develop and prosper without destroying themselves.
Date:17-01-23
Opposition to Remote Voting to Hit MigrantsET Editorials
The objections by 16 opposition parties to the Election Commission’s (EC) proposal to introduce a remote voting machine (RVM) is unfortunate. The proposal would allow people to vote without having to travel to the state in which they are registered. It is an important measure to ensure that every citizen has the opportunity to cast their vote. Concerns raised by political parties and other stakeholders must be addressed and the integrity of the process assured. Rather than oppose, the opposition parties should engage to ensure a robust system.
The proximate driver for the RVM are migrant workers. The EC’s proposal will make it possible for anyone who lives outside the state in which they are registered to exercise their franchise in another state. Therefore, the arguments by the Opposition that difficulties of establishing a definition for migrant workers would render this system problematic has little basis. In opposing the move, the Opposition led by the Congress is supporting the functional disenfranchisement of a large group of people, particularly poor migrant workers. At a conservative estimate, India has about 400 million migrant workers. For the most part, migrant workers have to make the tough choice between giving up their poorly paid daily wage work and exercising their right to vote.
The EC is taking the right steps to address the concerns raised. It is no different from the efforts it made with the introduction of electronic voting machines (EVM). The EC should also discuss the measures it proposes to ensure the integrity of the process and the votes. The EC’s efforts to ensure that everyone is able to cast their vote is commendable. Hopefully, the Opposition will see the error of its ways and give up its agenda of disenfranchising the poor.
Date:17-01-23
Leading from the frontIndia must amplify the views of the Global South as president of the G20 summit.Editorial
The Government’s summit for developing nations, called the “Voice of the Global South Summit”, as its first big leadership-level G20 event, is an extremely important signal. It is also a departure from New Delhi’s looking towards the “high-table” of global leadership, involving its relationship with the UNSC P5 and G-7 (the most developed economies), to focusing on a more just view of the world and how the developing world is being affected by global inequities. In his opening remarks at the virtual summit, Prime Minister Narendra Modi explained the reasons for the shift: how “challenges of the COVID pandemic, rising prices of fuel, fertilizer and foodgrains, and increasing geopolitical tensions have impacted our development efforts”. External Affairs Minister S. Jaishankar too spoke of India’s need to envision a common future with the Global South and acknowledge India’s “common past” with the Global South, many of whom have suffered colonialism. Over 10 different sessions, India and representatives of 125 countries, of the 134 that make up the G-77, agreed that the key issues include the fragmentation of the international landscape, shortages in grain exports, oil and gas, and fertilizer as a result of the Ukraine war, and terrorism. Of note was Mr. Modi’s push for “human centred” globalisation countering the “first world’s” view of expediting climate change goals at the cost of development, ensuring immigration and work mobility for skilled populations of the global south, and resilient renewable energy access. The summit appears to mark a reset in India’s foreign policy outlook in its year as G20 president: one which has made the Government reclaim the true meaning of non-alignment, in the wake of the Ukraine war where it refused to take sides. Minister of State for External Affairs Meenakshi Lekhi’s visit to Cuba as it took over G77 chairpersonship (a grouping India has shunned) and the invitation to the President of Egypt, a NAM co-founder, as Republic Day chief guest were significant too.
Of note were some of the summit’s exclusions: Pakistan and Afghanistan. Of note too was the inclusion of Myanmar, whose junta regime has not been recognised but with which India has chosen to forge closer ties. It is hoped that the collective South-South understanding of global issues will lead to a more inclusive meeting at the summit level, particularly with reference to South Asian and the subcontinent’s regional problems. It is also of note that the grouping did not release a common or joint statement, and much of the narrative on outcomes is built on what Mr. Modi and Mr. Jaishankar said. For India to be heard as the ‘Voice of the Global South at the G20’, it must reflect on the aspirations of the other nations and amplify them, as a true leader of the developing world at the G20 summit later this year.
Date:17-01-23
इस उभरती सामाजिक परिस्थिति से कैसे निपटेंसंपादकीय
रोज 500 लोग नागरिकता छोड़कर विदेशों में बस रहे हैं। यह संख्या हर साल बढ़ रही है। उनमें से अधिकांश बूढ़े मां-बाप को भाग्य भरोसे छोड़कर अपना ‘भविष्य संवारने’ के लिए यह कदम उठा रहे हैं। यह एक नई खतरनाक व्यक्तिगत – पारिवारिक-सामाजिक परिस्थिति उभर रही है। विदेश में पारिवारिक संबंध इतने प्रगाढ़ नहीं रहे हैं, जितने भारत में। इसका कारण सांस्कृतिक-नैतिक तथा हद तक देश का कृषि-प्रधान (यानी संयुक्त परिवार) होना भी था । इससे अलग पश्चिमी देशों में बच्चे को किशोरावस्था तक पालना एक अभिभावक की मात्र कानूनी जिम्मेदारी होती है । बच्चा भी स्वतंत्र जीवन जी सकता है, क्योंकि इसके लिए सामाजिक सुरक्षा योजनाएं हैं और काम उपलब्ध है। श्रवण कुमार के किस्से वाले भारत में मां-बाप अपना पेट काट कर बच्चों को शिक्षा देते हैं, अपने सुख में कटौती कर कर्ज लेकर उन्हें पढ़ाते हैं। वे बेटे के अलग रहने की कल्पना भी नहीं कर पाते हैं। लेकिन आधुनिक दौर में पाया गया है कि उसी शहर में बेटा शादी करने के बाद अलग मकान/फ्लैट लेता है और शुरू में तो मां-बाप से संपर्क रखता है लेकिन कालांतर में व्यस्तता या बच्चों को पालने के नाम पर इस संबंध को लोकलाजवश मात्र औपचारिकता तक सीमित कर देता है। आर्थिक विपन्नता, बुढ़ापा और बढ़ता भौतिकतावाद शायद भारत में करोड़ों वृद्ध मां-बाप को एक नए भावनात्मक संकट-जनित अवसाद में ले जा रहा है। नए दौर में भारतीय पारंपरिक संस्थाओं जैसे परिवार, अटूट वैवाहिक बंधन और संबंधों की प्रगाढ़ता आज की सबसे बड़ी जरूरत है।
Date:17-01-23
क्या ‘एआई’ इंसान की निजी पहचान पर हावी हो जाएगी ?हरिवंश, ( राज्यसभा के उपसभापति )
इतिहास 2022 को कैसे याद करेगा? वैज्ञानिकों द्वारा न्यूक्लियर फ्यूशन में असाधारण उपलब्धियों के लिए? दिसंबर 5, रात एक बजे कैलिफोर्निया की एक प्रयोगशाला में वैज्ञानिकों को मिली असाधारण सफलता के लिए? या शायद इससे भी बड़ी घटना के लिए। अमेरिका के पूर्व वित्त मंत्री लॉरेंस समर्स क्या मानते हैं? उनका मत है, चैटबाॅट्स (चैट जीपीटी) की उपलब्धि, मानव इतिहास में प्रिंटिंग प्रेस, बिजली, पहिया और आग की खोजों की तरह है। ओपन एआई (आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस) द्वारा विकसित यह चैटबॉट्स खास विषय पर प्रवाहमय, स्पष्ट और प्रासंगिक सामग्री तैयार कर सकता है। उपयोगकर्ता को निजी सूचनाएं दे सकता है। रिपोर्ट लिख सकता है। भारी-भरकम जटिल चीजों का सारांश बना सकता है। कठिन शोधपत्रों-लेखों का सार बताकर वैज्ञानिकों-शोधकर्ताओं की मदद कर सकता है। आगे शोध का विषय सुझा सकता है। यानी अब मशीनें सृजन की भूमिका में हैं। अब तक इंसानी मस्तिष्क का ही रचनात्मकता (सृजन) पर एकाधिपत्य था। हर इंसान अलग तरह का। पर अब जीवन, समाज या व्यवस्था में आर्टिफिशियल इंटेलीजेंस का प्रयोग जितना बढ़ेगा, विशेषज्ञ बताते हैं व्यक्ति की निज पहचान गौण होगी। यानी मनुष्य पर भारी मशीन।
कार्तिक होसनागर (व्हार्टन विश्वविद्यालय) शोधों का निष्कर्ष बताते हैं, आज इंसान मोबाइल या कम्प्यूटर पर ‘एलगोरिदम’ के अनुसार अनेक निर्णय लेता है। अमेजन पर एक तिहाई क्रय इसके तहत हो रहा है। नेटफ्लिक्स पर लोग 80 फीसदी समय ‘एलगोरिदम’ आधारित निर्णयों के तहत बिताते हैं। 90 फीसदी समय यूट्यूब पर इसके अनुसार गुजरता है। डेटिंग एप्स के लिए भी इसका उपयोग हो रहा है। अब एआई, सॉफ्टवेयर कोड विकसित करने की भूमिका में है। ग्राफिक डिजाइन भी। शायद किताबें लिखने में भी सक्षम। इस तरह ‘एलगोरिदम’ आज जटिल (कठिन) या उलझे सृजनात्मक काम श्रेष्ठ तरीके से करने की स्थिति में है।
एआई के विकास का लक्ष्य यह है कि मशीनें, मनुष्य की प्रतिभा, सृजन व रचनात्मकता के बराबर हों। क्या संसार उस मुकाम पर पहुंच गया है? पूरी तरह नहीं। महज 60 वर्षों में मशीनें मनुष्य के समकक्ष आ चुकी हैं। पहले कम्प्यूटर्स सामान्य पहेलियां सुलझाते थे। फिर शतरंज में श्रेष्ठ इंसानी मस्तिष्क को हराया। अब मानव के एकाधिकारवाले क्षेत्र ‘सृजन’ में एआई मौजूद है।
पर एआई के अनेक विशेषज्ञों ने इसकी चुनौतियों-कमियों पर तत्काल गम्भीर सवाल उठाए। इससे मेटा एआई चैटबॉट गैलेक्टिका- जो इस चैटबॉट के विकास के पीछे है- ने इसे वापस ले लिया है। नवम्बर मध्य में यह प्रयोग में आया। तीन दिनों में वापस हुआ। वैज्ञानिक और राजनीतिक दुरुपयोग की आशंका से। यह सवाल भी संसार के सामने है कि मानव मूल्यों, नैतिक आग्रहों से कितना रिश्ता इस मशीनी संसार का होगा? विशेषज्ञ बता रहे हैं कि एआई के लिए बड़ा सख्त कानूनी प्रावधान चाहिए। युवाल हरारी ने कहा है कि नई तकनीक के प्रबंधन के लिए अंतर्राष्ट्रीय सहयोग और नियम जरूरी हैं। एआई और बायोइंजीनियरिंग के लिए, खासतौर से।
विशेषज्ञ बता रहे हैं कि इस तकनीक से डाटा एंट्री, डाटा विश्लेषण, ग्राहक सेवा, उत्पादन और परिवहन क्षेत्रों में रोजगार घटेंगे। लिखने या रिपोर्ट तैयार करने के काम भी एआई निपुणता से करेगा। लिंक्डइन संस्थापक रेड हाफमैन भी मानते हैं कि महज पांच सालों में बाजार-दफ्तरों का स्वरूप बदल जाएगा। अधिकतर काम एआई द्वारा होंगे। उनका मानना है कि गाना लिखने, डॉक्टर का पुर्जा, मीडिया या शोधकर्ताओं के लेख, वकील की कानूनी शीट, कलाकार की तस्वीर बनाने में मशीनें अग्रणी होंगी। इससे नौकरियां खत्म नहीं होंगी पर नौकरियों का बाजार बदल जाएगा। एआई से स्वास्थ्य क्षेत्र में अभूतपूर्व बदलाव के द्वार पर दुनिया है। खासतौर से भारत में इसके इस्तेमाल से गांव-गांव तक बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं का पहुंचना संभव होगा। एआई प्रगति ने संसार को सभ्यता व इतिहास के नए मुकाम पर पहुंचा दिया है।
Date:17-01-23
वैश्विक शक्ति केंद्र के रूप में उभरता भारतश्रीराम चौलिया, ( लेखक जिंदल स्कूल आफ इंटरनेशनल अफेयर्स में प्रोफेसर और डीन हैं )
तेजी से बदल रहे वैश्विक ढांचे में भारत की भूमिका महत्वपूर्ण होती जा रही है। भारत भी इस भूमिका को विस्तार एवं गहराई देने में जुटा है। इसी उद्देश्य की पूर्ति के लिए बीते दिनों नई दिल्ली में ‘वाइस आफ द ग्लोबल साउथ समिट’ का वर्चुअल आयोजन हुआ। भारत के आमंत्रण पर करीब 125 देशों के प्रतिनिधि इसमें शामिल हुए। यह इस बात का भी प्रमाण है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की साख और मान्यता लगातार बढ़ रही है। इस अवसर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के संबोधन से पुन: स्पष्ट हुआ कि भारत वैश्विक स्तर पर उन देशों की आवाज उठाना चाहता है, जिसे अक्सर अनसुना कर दिया जाता है। सम्मेलन में जुटे विकासशील एवं अल्पविकसित देशों के प्रतिनिधियों को प्रधानमंत्री मोदी ने संदेश दिया कि ‘आपकी आवाज ही भारत की आवाज है और आपकी प्राथमिकताएं भारत की प्राथमिकताएं हैं।’ वहीं विदेश सचिव वीएम क्वात्रा ने कहा कि भारत की जी-20 मेजबानी के दौरान यह दावा अवश्य किया जा सकता है कि उसने न केवल बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के साथ मंत्रणा की, बल्कि संपूर्ण विकासशील दुनिया की भावनाओं और विचारों का भी प्रतिनिधित्व किया।
स्पष्ट है कि इन बातों से प्रतिभागी देशों में भारत के प्रति भरोसे का भाव बढ़ा होगा। इसकी पुष्टि अंतरराष्ट्रीय वक्ताओं के बयानों से भी हुई, जिन्होंने स्वीकार किया कि गरीब और वंचित देशों को इसी प्रकार एकजुट होकर मंच पर लाया जाए तो वे समृद्धि के स्वप्न को साकार कर सकेंगे। संयुक्त राष्ट्र महासभा में भी यही सहमति बनी थी कि विकासशील देशों (जी-77) की ‘संयुक्त समझौता वार्ता क्षमता’ में बढ़ोतरी हो और अपने संख्याबल के आधार पर वे अपने हितों की रक्षा कर सकें। ऐसे में यह संतोष की बात ही कही जाएगी कि भारत ने इस समूह के अधिकांश देशों के लिए यह आयोजन किया और इन देशों ने इसे सफल बनाया। सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी ने ऐतिहासिक कड़ियों को जोड़ते हुए कहा कि बीसवीं सदी में ‘हमने एक दूसरे की सहायता की और साम्राज्यवादी उपनिवेशवाद के विरुद्ध संघर्ष किया था’ और आशा व्यक्त की कि ‘हम यह मुहिम दोबारा चलाकर इक्कीसवीं सदी में नई विश्व व्यवस्था का निर्माण कर सकते हैं, जो हमारे नागरिकों का कल्याण सुनिश्चित करेगी।’
वास्तव में, नई विश्व व्यवस्था दशकों से विकासशील देशों की मांग रही है। विकसित देशों द्वारा गरीब राष्ट्रों का आर्थिक शोषण, उनके आंतरिक मामलों में सैन्य हस्तक्षेप और वैश्विक व्यापार एवं निवेश नीतियों में उन्हें लाभ से वंचित रखने की संस्थागत चालों से अमीर और गरीब देशों के बीच की खाई निरंतर चौड़ी होती गई है। भारत ने स्वतंत्रता के बाद से ही गरीब देशों की आवाज उठाई है। हालांकि, वर्तमान परिप्रेक्ष्य मे ‘ग्लोबल साउथ’ यानी वैश्विक दक्षिण की आवश्यकताएं अलग हैं। पूर्व की भांति अब पश्चिमी साम्राज्यवाद और प्रत्यक्ष आधिपत्य नहीं रहा। दूसरी ओर चीन महाशक्ति बनने की राह पर है। विकासशील देशों मे उसका बोलबाला पश्चिम से अधिक है। विकासशील देशों के भीतर भी भिन्नता दिख रही है, क्योंकि ‘गरीब देश’ और ‘उभरती अर्थव्यवस्थाएं’ अलग-अलग दिशा में हैं। चीन अपनी सुविधा से कभी खुद को ‘विकासशील’ देशों में रखता है तो कभी उनके विरुद्ध ही मोर्चा खोल लेता है। चीन की प्रति व्यक्ति आय करीब 13 हजार डालर है, लेकिन वह ग्लोबल साउथ की आड़ लेकर विकासशील देशों के नाम पर अमेरिका और यूरोप से टकराव मोल लेकर अपने हित साधता है। वहीं भारत जैसी उभरती शक्तियां पश्चिमी शक्तियों से गठजोड़ कर चीनी विस्तारवाद को रोकने में लगी हैं। इस परिदृश्य में वैश्विक दक्षिण की जटिलताएं और बढ़ जाती हैं।
चीन के उलट भारत का रवैया विकासशील देशों को हथियार के रूप में इस्तेमाल न कर, उन्हें सशक्त करने का है। इसकी वजह भारत की परंपराओं और मूल्यों के साथ ही वह दृष्टिकोण भी है, जिसमें भारत अपनी प्रगति को विकासशील देशों की नियति के साथ जोड़कर देखता है। आज भारत-अफ्रीका व्यापार करीब 90 अरब डालर तक पहुंच गया है, तो भारत-दक्षिण अमेरिका व्यापार 50 अरब डालर के स्तर तक पहुंच गया है। जहां पश्चिमी शक्तियों और चीन ने पिछड़े देशों से बेहिसाब प्राकृतिक खनिज लूटने और उनकी अंदरूनी राजनीति में आग लगाकर उस पर अपने स्वार्थ की रोटियां सेंकने से परहेज नहीं किया, वहीं भारत का रवैया वहां मानव संसाधन विकास और आमजन के जीवन में सुधार केंद्रित परियोजनाओं पर आधारित रहा है। ‘ग्लोबल साउथ’ में ऐसा एक भी देश नहीं, जिसे भारत ने प्रताड़ित किया हो। वहीं चीनी उत्पीड़न का रवैया जगजाहिर है। दुनिया को अब चीनी कर्ज जाल का फंदा समझ आने लगा है कि इसके माध्यम से ड्रैगन इन देशों को निगलने पर आमादा है। चीन की इसी रणनीति पर परोक्ष रूप से निशाना साधते हुए विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने ‘ऋण का बोझ बढ़ाने वाली परियोजनाओं से मांग-संचालित परियोजनाओं की ओर परिवर्तन’ का प्रस्ताव रखा और ‘विकेंद्रीकृत वैश्वीकरण’ का आह्वान किया। भारत भी अपनी किफायती एवं पर्यावरण अनुकूल तकनीकी विकासशील एवं अल्पविकसित देशों के साथ साझा करने को तत्पर है। इसी सिलसिले में वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने सम्मेलन में शामिल देशों को ‘इंडिया स्टैक’ जैसे अभिनव ‘डिजिटल पब्लिक गुड्स’ की पेशकश की, जो इन देशों के लिए मुफ्त उपलब्ध होंगे और जिनसे वे अपनी स्थानीय सामाजिक एवं आर्थिक योजनाओं को दक्षता से लागू कर सुशासन की ओर कदम बढ़ा सकते हैं।
नि:संदेह, वैश्विक महाशक्तियों द्वारा गरीब देशों के मुंह पर पैसा फेंकने और उन्हें निर्भरता के जाल में फंसाने का खेल यकायक खत्म तो नहीं किया जा सकता, परंतु भारत के ‘मानव-केंद्रित’ सोच और प्रस्ताव ‘ग्लोबल साउथ’ को नई दिशा अवश्य दे सकते है। इस दृष्टिकोण से देखें तो वाइस आफ ग्लोबल साउथ समिट को भारतीय विदेश नीति में एक और मील का पत्थर कहा जा सकता है। इस आयोजन के दौरान गरीब देशों के लिए एक अनोखा भारतीय माडल उभरा है, जो भविष्य में भारत को विश्व के तीसरे शक्ति केंद्र के रूप में स्थापित करने में सहायक होगा।
Date:17-01-23
निजी डाटा के दुरुपयोग पर नियंत्रणडा. सुरजीत सिंह, ( लेखक अर्थशास्त्र के प्रोफेसर हैं )
केंद्र सरकार व्यक्तिगत डाटा संरक्षण विधेयक, 2022 को संसद के आगामी बजट सत्र में पेश करने जा रही है। केंद्रीय इलेक्ट्रानिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय द्वारा तैयार यह विधेयक डिजिटल नागरिकों के अधिकारों, कर्तव्यों और एकत्रित डाटा के वैध उपयोग के दायित्व को समेटे हुए है। आज के दौर में इंटरनेट कनेक्टिविटी देश को डिजिटल रूप से सशक्त बना रही है, जिसका श्रेय 2015 से भारत में शुरू हुए डिजिटल इंडिया कार्यक्रम को जाता है। इस कार्यक्रम ने ग्रामीण भारत सहित पूरे देश में हाई-स्पीड इंटरनेट नेटवर्क को बढ़ावा दिया है। आज इंटरनेट की पहुंच शहरी क्षेत्र में 84 प्रतिशत एवं ग्रामीण क्षेत्र में 74 प्रतिशत तक हो गई है। आप्टिकल फाइबर नेटवर्क के तहत 1.25 लाख से अधिक ग्राम पंचायतों को जोड़ा जा चुका है। कंप्यूटर और इंटरनेट के माध्यम से ई-गवर्नेंस, शिक्षा, स्वास्थ्य, टेलीमेडिसिन और मनोरंजन आदि सभी क्षेत्रों का विस्तार बढ़ता जा रहा है।
आज लोग मोबाइल के अलावा क्रेडिट कार्ड, बैंक अकाउंट, एप का इस्तेमाल या आनलाइन सामान खरीदते समय अपनी अनेक प्रकार की जानकारियां संबंधित कंपनियों को उपलब्ध करवाते हैं। कंपनियां लोगों की निजी जानकारी को गोपनीय न रखकर बड़ी कीमत पर अंतरराष्ट्रीय बाजारों में बेच देती हैं। वर्तमान में सबसे महंगी बिकने वाली वस्तु डाटा ही है। खरीदे गए निजी डाटा का कंपनियों द्वारा व्यावसायिक इस्तेमाल किया जाता है। इस संबंध में भारत में कानून न होने का लाभ इन कंपनियों द्वारा लिया जाता रहा है। डाटा चोरी होने के साथ-साथ साइबर अपराधों का विस्तार भी बढ़ता जा रहा है। एक अनुमान के अनुसार डार्क वेब के पास कम से कम 15 करोड़ लोगों के क्रेडिट कार्ड का डाटा उपलब्ध है। प्रश्न यह है कि भारत जिस तेजी से डिजिटलीकरण के रास्ते पर बढ़ रहा है, उसे देखते हुए प्रश्न है कि लोगों के व्यक्तिगत डाटा की गोपनीयता को कैसे बनाए रखा जाए? बदलती तकनीक के दौर में लोगों की डिजिटल जानकारी के विषय में किस प्रकार जागरूक किया जाए? सुप्रीम कोर्ट भी मानता है कि लोगों के निजी डाटा को सार्वजनिक करना उनके मौलिक अधिकारों का उल्लंघन है। व्यक्तिगत डाटा संरक्षण विधेयक लोगों के हितों की रक्षा के लिए उनके निजी डाटा को सुरक्षा प्रदान करता है। विधेयक में सार्वजनिक और निजी कंपनियों द्वारा एकत्रित व्यक्तिगत डाटा के प्रबंधन, संग्रहण, भंडारण और प्रसंस्करण पर विस्तार से दिशानिर्देश के साथ-साथ जुर्माना और मुआवजा आदि का प्रविधान किया गया है।
इसके कानून बन जाने से कोई भी बाहरी कंपनी कानून एवं सरकार के दायरे से भी बाहर नहीं होगी। कंपनियां लोगों के निजी डाटा को संबंधित व्यक्ति की अनुमति के बिना न तो सार्वजनिक कर पाएंगी और न ही उन्हें अपने लाभ के लिए बेच सकेंगी। हर डिजिटल नागरिक को सारी जानकारी स्पष्ट और आसान भाषा में देना प्रत्येक कंपनी के लिए अनिवार्य होगा। उपभोक्ता को यह अधिकार होगा कि जब कभी उसे लगे कि कंपनियां उसके डाटा का गलत इस्तेमाल कर रही हैं तो वह किसी भी समय अपनी शिकायत दर्ज कर अपनी निजी जानकारी को वापस ले सकता है अथवा उसे उस प्लेटफार्म से हटवा भी सकता है। देश के नागरिकों का संवेदनशील डाटा भारत की कानूनी सीमाओं के अंतर्गत ही रहेगा। संवेदनशील डाटा को छोड़कर यदि कंपनी किसी अन्य डाटा को देश से बाहर लेकर जाना चाहती है तो उसके लिए सरकार की शर्तों एवं जिम्मेदारियों को मानना अनिवार्य होगा। कोई भी कंपनी अनजाने में या जानबूझकर या यह कहकर कि डाटा हैक हो गया है, अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती। बच्चों के संबंध में डाटा एकत्र करने की इजाजत नहीं होगी। यदि कोई व्यक्ति या कंपनी गलत जानकारी देती है तो उसके लिए सजा और जुर्माने का भी प्रविधान किया गया है।
विधेयक के कानून का रूप लेने के बाद देश के समक्ष सबसे बड़ी चुनौती व्यक्तिगत डाटा की सुरक्षा और जिम्मेदार डाटा प्रबंधन प्रथाओं को स्थापित करने की भी होगी, क्योंकि सूचनाओं की गोपनीयता के लिए यह आवश्यक है कि प्रत्येक हितधारक को सूचना के संरक्षण में अपनी भूमिका और जिम्मेदारी के बारे में पता हो। इसके लिए लोगों को डाटा की निजता के प्रति जागरूक करना होगा। असीमित समय तक डाटा को सुरक्षित रखने के लिए अधिक डाटा केंद्रों की आवश्यकता होगी। क्लाउड आइटी के अनुसार अमेरिका में 2701, जर्मनी में 487, ब्रिटेन में 456 और चीन में 443 डाटा केंद्र हैं। तकनीक के मामले में आगे रहने वाले जापान में इनकी संख्या 207 है, जबकि भारत में इनकी संख्या मात्र 138 है। लिहाजा आने वाले वर्षों में डाटा केंद्रों की संख्या को भी बढ़ाना होगा।
व्यक्तिगत डाटा संरक्षण बिल से डाटा के स्तर पर अधिक पारदर्शिता और जवाबदेही बढ़ेगी। इसके साथ ही देश विरोधी गतिविधियों को रोकने में मदद मिलेगी। हालांकि बदलती तकनीक के साथ विधेयक सामंजस्य स्थापित कर सके, इसके लिए इसमें भी समय-समय पर समीक्षा का प्रविधान किया जाना चाहिए। उम्मीद की जा रही है कि सरकार बजट सत्र में डिजिटल इंडिया बिल भी पेश कर सकती है, जो आइटी बिल, 2000 को प्रतिस्थापित करेगा। इससे इंटरनेट मीडिया प्लेटफार्म, ओटीटी प्लेटफार्म और ई-कामर्स वेबसाइट्स आदि को विनियमित किया जाएगा। साइबर अपराध, ब्लाक चेन, ओटीटी कंटेंट, महिला एवं बच्चों से संबंधित अपराधों आदि को रोकने की दिशा में इसे एक बड़ा कदम माना जा रहा है। उम्मीद है कि ये दोनों विधेयक आने वाले समय में भारत को विश्व में एक मजबूत आर्थिक शक्ति बनने में मदद करेंगे।
Date:17-01-23
बढ़ती असमानतासंपादकीय
अगर देश में बढ़ती असमानता के ज्यादा प्रमाणों की आवश्यकता थी तो गैर सरकारी संगठन ऑक्सफैम की ताजा वैश्विक संपत्ति रिपोर्ट इसके पुख्ता प्रमाण प्रस्तुत करती है। दावोस में विश्व आर्थिक मंच के शुरुआती दिन जारी की गई इस रिपोर्ट का शीर्षक है: ‘सरवाइवल ऑफ द रिचेस्ट: द इंडिया स्टोरी’। यह रिपोर्ट दिखाती है कि न केवल पांच फीसदी भारतीयों के पास देश की कुल संपत्ति का 60 फीसदी हिस्सा मौजूद है बल्कि निचले पायदान पर मौजूद 50 फीसदी आबादी संपत्ति में केवल तीन फीसदी की हिस्सेदार है। अध्ययन के नतीजे बताते हैं कि कोविड काल में भी भारत के अमीरों का प्रदर्शन अच्छा रहा और 2020 से 2022 के बीच अरबपतियों की तादाद 102 से बढ़कर 166 हो गई। अध्ययन में अनुमान जताया गया है कि इस अवधि में देश के अरबपतियों की संपत्ति हर मिनट 121 फीसदी यानी करीब 2.5 करोड़ रुपये बढ़ी। ऐसे समय में जब देश मुश्किलों से जूझ रहा था और बेरोजगारी दर ऊंची बनी हुई थी तब यह बढ़ोतरी उल्लेखनीय है।
ऐसे रुझान कारोबारी जगत में भी दिखाई दिए। बिज़नेस स्टैंडर्ड ने हाल ही में कारोबारी प्रबंधन समूह प्राइम इन्फोबेस का एक विश्लेषण प्रस्तुत किया था जो दिखाता है कि भारत के औसत शीर्ष कार्याधिकारी यानी मुख्य परिचालन अधिकारी, प्रबंध निदेशक तथा वरिष्ठ पदाधिकारी अब मझोले दर्जे के कर्मचारी के औसत वेतन भत्तों की तुलना में 241 गुना आय अर्जित करते हैं। इतना ही नहीं यह आंकड़ा महामारी के पहले के वर्ष यानी 2018-19 के 191 गुना की तुलना में भी काफी अधिक है। शीर्ष अधिकारियों का औसत वेतन भी वित्त वर्ष 2019 के 10.3 करोड़ रुपये की तुलना में बढ़कर 12.7 करोड़ रुपये हो गया है। इस असंतुलन को लेकर आश्चर्य नहीं होना चाहिए क्योंकि कॉर्पोरेट भारत अभी भी मोटे तौर पर प्रवर्तकों द्वारा संचालित है और शीर्ष पदों पर अक्सर परिवार के सदस्य तथा रिश्तेदार ही काबिज रहते हैं। हालांकि कुछ अंशधारकों ने प्रवर्तक-सीईओ के वेतन पैकेज को लेकर विरोध किया है लेकिन भारतीय कंपनियों के बोर्ड की स्थिति को देखते हुए यह उम्मीद करना बेमानी है कि उनके मुखिया टिम कुक की तरह अपने वेतन में 40 फीसदी की कटौती करेंगे। 2022 में कंपनी के शेयरों की कीमत में भारी गिरावट के बाद अंशधारकों ने मतदान किया जिसके पश्चात कुक ने इस वर्ष अपने वेतन में 40 फीसदी की कटौती स्वीकार की है। भारतीय कंपनियों के शीर्ष प्रबंधन में खुद को बेहतर वेतन भत्ते देने की संस्कृति एक नैतिक समस्या का प्रतिनिधित्व करती है क्योंकि हमारे देश में अभी भी गरीबों की तादाद बहुत अधिक है। बतौर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने इस मसले को उठाया था और कंपनियों के सीईओ तथा वरिष्ठ पदाधिकारियों से कहा था कि वे इस पर ध्यान दें।
ऑक्सफैम का अध्ययन संपत्ति कर को दोबारा शुरू करने का सुझाव देता है और इस बात को रेखांकित करता है कि ऐसे अवास्तविक लाभ से किस तरह का सामाजिक निवेश किया जा सकता है। अध्ययन बिना नाम लिए देश के सबसे अमीर व्यक्ति की संपत्ति का उल्लेख करता है और बताता है कि कैसे अगर 2017 से 2021 के बीच उनकी संपत्ति के केवल 20 फीसदी हिस्से पर कर लगाकर प्राथमिक शिक्षा को बहुत बड़ी मदद पहुंचाई जा सकती थी जिसके तमाम संभावित लाभ होते। यह उपाय तार्किक प्रतीत होता है लेकिन संपत्ति कर के साथ भारत के अनुभव बहुत अच्छे नहीं रहे हैं। पहली बार यह कर 1957 में लगाया गया था और बड़े पैमाने पर कर वंचना देखने को मिली थी। असमानता कम करने में इससे कोई खास मदद नहीं मिली थी। वर्ष 2016-17 के बजट में तत्कालीन वित्त मंत्री अरुण जेटली ने यह कहते हुए इस कर को समाप्त कर दिया था कि इसे जुटाने की लागत इससे होने वाले हासिल से अधिक होती है। आय और संपत्ति में बढ़ते असंतुलन को दूर करने के उपाय देश की सामाजिक आर्थिक नीति से ही निकाले जा सकते हैं। मिसाल के तौर पर शिक्षा, स्वास्थ्य तथा बुनियादी संरचना में निवेश करना। अमीरों पर भारी भरकम कर लगाने से बात नहीं बनेगी क्योंकि वे उसे न चुकाने की पूरी कोशिश करेंगे।
Date:17-01-23
विदेशी विश्वविद्यालयों के प्रवेश का विरोधटी सी ए श्रीनिवास-राघवन
कुछ लोग विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में प्रवेश की अनुमति देने के विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (यूजीसी) के प्रस्ताव से खासे नाराज हैं। उनका कहना है कि विदेशी विश्वविद्यालयों को बहुत आसान और फायदा पहुंचाने वाली शर्तों पर बुलाया जा रहा है।
इसका विरोध करने वाले लोग एकदम गलत हैं क्योंकि विश्वविद्यालय वही बेच रहे हैं, जिसकी लोगों को ज्यादा दरकार है – शिक्षा। छात्र अपने मां-बाप से पैसे लेकर या बैंक से कर्ज लेकर या दोनों लेकर इसे खरीदते हैं। यहां ऐसा ही चलता है और सफलता के लिए जरूरी है एकाधिकार बनाने की होड़ क्योंकि तभी कुछ आपूर्तिकर्ता कह सकते हैं कि वे दूसरों से बेहतर हैं।
इस तरह की होड़ में कुछ ही विक्रेता होते हैं। यह बाजार अलग दिखकर और ब्रांडिंग कर तैयार किया जाता है। अलग दिखने का एक ही पैमाना है और वह हैं अंक।
ब्रांडिंग मूल विशिष्टता के साथ स्थायी बौद्धिक श्रेष्ठता के साथ भ्रमित करके हासिल किया जाता है। लेकिन यह साबित करने के साक्ष्य कम ही है कि इन जगहों पर प्रवेश की मूल आवश्यकता की वजह से लाखों प्रतिभाशाली लोग तैयार हुए हैं। इस अलग दिखने को ही स्थायी बौद्धिक श्रेष्ठता बताकर ब्रांडिंग की जाती है। लेकिन अलग दिखने यानी ज्यादा अंक लाने वाले लाखों लोग ही आगे जाकर जीनियस या प्रतिभाशाली बने हैं, इसके साक्ष्य नहीं के बराबर हैं।
इसके बाद भी अगर आपने किसी विशेष विश्वविद्यालय से डिग्री हासिल की है तो स्नातक में आपके अंक जो भी हों, आपको स्वत: ही बौद्धिक रूप से उन लोगों से बेहतर मान लिया जाता है, जो वहां से डिग्री नहीं ले सके हैं। यह बिल्कुल वैसा ही है, जैसे यह मान लेना कि केवल महंगा सामान खरीदने वाले लोग उन लोगों से अमीर होते हैं, जो महंगा सामान नहीं खरीदते। अब अगर मैं केवल 500 रुपये की सस्ती सी टी-शर्ट पहनता हूं और सपाट तलवे (फ्लैट फीट) होने की वजह से महंगे सैंडल पहनता हूं तो मुझे अमीर माना जाएगा या नहीं माना जाएगा?
इसलिए जिस तरह आप केवल खरीदारी के आधार पर धारणा नहीं बना सकते उसी तरह प्रवेश का मानदंड भी बौद्धिक श्रेष्ठता का पैमाना नहीं हो सकता। वे बौद्धिक रूप से श्रेष्ठ हो सकते हैं या नहीं हो सकते हैं। शिक्षकों के मामले में भी यही सच है। विश्वविद्यालय या कॉलेज की रैंक अच्छे शिक्षण से तय नहीं होती मगर अच्छी ब्रांडिंग से जरूर तय होती है।
शोध में भी यही होता है। माहौल का असर तो पड़ता है मगर बहुत मामूली होता है। अव्वल दर्जे का शोध किसी कम रैंक वाले विश्वविद्यालय से आ सकता है क्योंकि रैंकिंग तो ब्रांडिंग पर आधारित होती है।
इसलिए विदेशी विश्वविद्यालयों को देश में न्योता देना बिल्कुल सामान आयात करने जैसा ही है और इसका मकसद आपूर्ति बढ़ाना ही है। याद रखिए कि ब्रिटिश हुकूमत के दौरान भी यहां कई विदेशी स्कूल खोले गए थे क्योंकि हमारे पास अंग्रेजी शिक्षा देने के लिए पर्याप्त स्कूल नहीं थे।
ज्यादा कायदे का सवाल यह है कि हमें कोई नाकाम मॉडल अपने यहां क्यों आजमाना चाहिए। ऐसा लगता है कि फ्रैंचाइज पर खोले गए विश्वविद्यालय कारगर नहीं होते क्योंकि स्थानीय लोग उनकी भारी-भरकम फीस का बोझ ही नहीं उठा पाते।
मेरा जवाब सीधा है: जब तक विदेशी विश्वविद्यालय खोलने के लिए भारतीय करदाताओं की रकम इस्तेमाल नहीं की जाती तब तक हम चिंता क्यों करें? यह देखना विदेशी विश्वविद्यालयों का काम है, जैसा दूसरे उद्योग भी करते हैं। अगर भारत में निजी क्षेत्र विश्वविद्यालय खोल सकता है या विदेशी विश्वविद्यालयों के साथ हाथ मिला सकता है तो विदेशी विश्वविद्यालयों को सीधे प्रवेश क्यों नहीं मिल सकता?
यहां मैं कौशिक बसु के एक बयान का जिक्र करूंगा, जो इस सरकार के प्रशंसक नहीं हैं। उन्होंने 2009 में यूजीसी सुधार पर असहमति जताते हुए कहा था, ‘हमें उच्च शिक्षा में निजी क्षेत्र की पूंजी आने देना चाहिए। वे कॉलेज की फीस जितनी ज्यादा रखना चाहें, रखने दी जाए बशर्ते वे इसे पारदर्शी बनाकर रखें।’ लेकिन उन्होंने विदेशी पूंजी शब्द का इस्तेमाल नहीं किया है।
बसु ने आगे कहा, ‘उच्च शिक्षा में हमारी पारंपरिक (हालांकि इसका क्षरण हुआ है) बढ़त, अंग्रेजी भाषा में हमारी ताकत और जीवन यापन की कम लागत को देखते हुए भारत दुनिया भर के, केवल गरीब देशों नहीं बल्कि अमीर और औद्यौगिक देशों के भी छात्रों के लिए एक प्रमुख ठिकाने के तौर पर अपना मुकाम बना सकता है।’
उन्होंने कहा, ‘अगर भारत छात्रों के लिए रहने की अच्छी व्यवस्था के साथ कुछ अच्छे विश्वविद्यालय बना सकता है और दुनिया भर में उनका प्रचार भी कर सकता है तो इस बाजार को वह कड़ी टक्कर दे सकता है। यदि भारत विदेशी छात्रों से प्रति वर्ष 5 लाख रुपये बतौर ट्यूशन फीस लेता है तब दूसरे सभी खर्चों के साथ एक छात्र 8 लाख रुपये में साल भर बढ़िया शिक्षा पा सकता है, जो अमेरिका में होने वाले खर्च का एक तिहाई ही है।’
Date:17-01-23
स्वच्छ ऊर्जा का नया दौरअभिषेक कुमार सिंह
भारत में फिलहाल बिजली का बहुत बड़ा संकट नहीं है, मगर भविष्य की जरूरतों और स्वच्छ ऊर्जा की ओर बढ़ने के संकल्पों के तहत हाल में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन को मंजूरी दी है। गौरतलब है कि इस मिशन के तहत भारत को ऊर्जा-स्वतंत्र बनाने, अर्थव्यवस्था के प्रमुख क्षेत्रों को कार्बन मुक्त करने और वैकल्पिक ईंधन के उत्पादन, उपयोग और निर्यात के एक वैश्विक केंद्र में बदलने की योजना है। उम्मीद है कि इस मिशन के तहत भारत 2030 तक पचास लाख टन हाइड्रोजन उत्पादन क्षमता का लक्ष्य हासिल कर लेगा।
इसमें संदेह नहीं कि विकास की राह पर तेजी से आगे बढ़ने की कोशिश करते भारत जैसे देशों के लिए ऊर्जा में स्वालंबन हासिल करना सबसे बड़ी जरूरत है। हमें कारखाने लगाने, उत्पादन बढ़ाना, लाखों-करोड़ों युवाओं के लिए रोजगार पैदा करना है। इसके लिए स्वच्छ ऊर्जा की दरकार है। आज सच्चाई यह है कि भारत ऊर्जा के मामले में पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं है। जीवाश्म ईंधन (पेट्रोल-डीजल) के रूप में अपनी जरूरतें पूरी करने के लिए ही हमें हर साल करीब बारह लाख करोड़ रुपए आयात में झोंकने पड़ते हैं। इसके बावजूद जनता को वाजिब कीमत पर पेट्रोल-डीजल उपलब्ध कराने में कठिनाई होती है। हाल के कुछ वर्षों में जिस सौर ऊर्जा की बातें जोरशोर से हुई हैं, उसका एक पहलू यह है कि सौर पैनल और संबंधित नई तकनीक के लिए हम विदेशों पर निर्भर हैं।
हालांकि तब भी जनता को राहत दिलाते हुए ऊर्जा स्वावलंबन हासिल किया जा सकता है, बशर्ते कुछ ठोस योजनाओं पर सतर्कता से अमल किया जाए। खासकर यह देखते हुए कि हाइड्रोजन स्वच्छ ईंधन है और एक बार दक्षता हासिल होने के बाद इससे अनंत काल तक असीमित ऊर्जा पाई जा सकती है। मगर इसमें कुछ समस्याएं भी हैं। जैसे एक प्रमुख अड़चन दबाव डाल कर इसके भंडारण की है, क्योंकि यह अत्यंत विस्फोटक होने के कारण दुर्घटना का कारण बन सकती है। उम्मीद है कि राष्ट्रीय हाइड्रोजन मिशन में इससे जुड़ी सभी समस्याओं का समाधान निकाल लिया जाएगा। मसलन, हाइड्रोजन ईंधन को सस्ता करना। कोयले से मिलने वाली बिजली सस्ती है और कोयले की उपलब्धतता का भी फिलहाल कोई संकट नहीं है। मगर ऊर्जा की बढ़ती मांग कोयले के भविष्य को धुंधला कर देती है। ऐसे में बेहतर होगा कि या तो परमाणु बिजली की तरफ बढ़ा जाए या फिर हाइड्रोजन ईंधन समेत स्वच्छ ऊर्जा के अन्य विकल्प आजमाए जाएं।
हाइड्रोजन का विकल्प मिलने पर हमारे देश में जीवाश्म ईंधन, जैसे कच्चा तेल, कोयला आदि के आयात में एक लाख करोड़ रुपए तक की कमी आ सकती है। परोक्ष लाभ यह है कि इससे ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में पांच करोड़ टन की कमी आ सकती है। राष्ट्रीय हाइड्रोजन मिशन का एक अहम उद्देश्य पेट्रोल-डीजल जैसे जीवाश्म ईंधन पर निर्भरता खत्म करते हुए देश को स्वच्छ ऊर्जा के उत्पादन का केंद्र बनाना है। यह सही है कि इस समय हाइड्रोजन हमारी धरती पर उपलब्ध सबसे स्वच्छ ईंधन है। मगर दिक्कत यह है कि पृथ्वी पर मौजूद समस्त हाइड्रोजन किसी दूसरे तत्त्व (जैसे कि पानी और अन्य हाइड्रोकार्बन) के साथ गुंथा हुआ है। ऐसे में इसे विलगाने की प्रक्रिया में प्रदूषण होता है। इसलिए उसे स्वच्छ या ग्रीन हाइड्रोजन नहीं कह सकते। ऐसी समस्याओं का इलाज है राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन।
उल्लेखनीय है कि इलेक्ट्रोलिसिस प्रक्रिया से ईंधन तैयार होने की प्रक्रिया पूरी तरह कार्बन उत्सर्जन से मुक्त होती है। हाइड्रोजन ईंधन तैयार करने के फिलहाल दो तरीके हैं। पहला तरीका इलेक्ट्रोलिसिस यानी पानी में से बिजली को गुजार कर हाइड्रोजन ईंधन प्राप्त करने वाला है। दूसरा तरीका प्राकृतिक गैस से हाइड्रोजन और कार्बन को तोड़ कर ईंधन तैयार करने का है। इलेक्ट्रोलिसिस प्रक्रिया से तैयार होने वाले हाइड्रोजन ईंधन में स्वच्छ ऊर्जा इस्तेमाल होती है। सौर ऊर्जा या पवन ऊर्जा वाले बिजलीघरों से मिली बिजली के इस्तेमाल से पानी को इलेक्ट्रोलाइज कर हाइड्रोजन अलग की जाती है। ऐसे ईंधन को ‘ग्रीन’ हाइड्रोजन या जीएच-2 या फिर ग्रीन फ्यूल कहते हैं। इस तरह की ऊर्जा के बारे में दावा है कि इसका सबसे बड़ा लाभ तेल शोधन, खाद निर्माण, सीमेंट, स्टील और भारी उद्योगों को होगा, क्योंकि वहां हाइड्रोजन ईंधन को सीएनजी और पीएनजी के साथ मिलाकर प्रयोग करने पर ये भारी उद्योग कार्बन मुक्त हो सकेंगे।
अभी दुनिया में ग्रीन हाइड्रोजन की कीमतें कई कारकों पर निर्भर करती हैं। मसलन, इसका स्रोत क्या है, बाजार की स्थितियां क्या हैं और लेनदेन वाली मुद्रा की दरें क्या हैं। फिलहाल दुनिया में ग्रीन हाइड्रोजन तैयार करने की औसत लागत तीन सौ रुपए प्रति किलोग्राम आती है। हालांकि प्राकृतिक गैस से बनाने पर यह औसत 130 रुपए प्रति किलोग्राम तक था, लेकिन रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण यह औसत भी ढाई सौ रुपए तक जा पहुंचा है। ऐसे में ग्रीन हाइड्रोजन मिशन इस स्वच्छ ईंधन की कीमतें कम करने में काफी मदद कर सकता है। भारत ही नहीं, दुनिया में इस वक्त पच्चीस देश ग्रीन हाइड्रोजन पैदा करने की दिशा में तेजी से काम कर रहे हैं।
जहां तक स्वच्छ ईंधन की बात है, ग्रीन हाइड्रोजन के अलावा गन्ने के शीरे से निकाला गया एथेनाल भी एक स्वच्छ ईंधन है। इसे जला कर बनाई जाने वाली बिजली कई मायनों में दूसरे विकल्पों से बेहतर मानी जाती है। भारत में भी एथेनाल से ऊर्जा हासिल करने का चलन शुरू हो चुका है। कुछ राज्यों में प्रायोगिक तौर पर बसें और ट्रेनें तक एथेनाल से चलाई जा रही हैं। साफ बिजली यानी स्वच्छ ऊर्जा का एक प्रारूप हमें सूरज से मिलने वाली ऊर्जा की तरफ ले जाता है। इस सिलसिले में भारत का महत्त्व उसके नेतृत्व में बनाए गए अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन से स्पष्ट होता है। 2015 में पेरिस के जलवायु परिवर्तन सम्मेलन में उल्लेखनीय पहल करते हुए भारत ने सौ देशों का एक सौर गठबंधन (सोलर अलायंस) बनाने की घोषणा की थी। इस गठबंधन के तहत भारत का लक्ष्य 2030 तक साढ़े चार सौ गीगावाट ऊर्जा उत्पादन का लक्ष्य हासिल करना है। इसमें सौ गीगावाट का लक्ष्य हासिल हो चुका है। इसका मतलब है कि देश को शून्य कार्बन उत्सर्जक देश बनाने की राह ज्यादा मुश्किल नहीं है। सौर तकनीकों से 2050 तक इतनी बिजली मिल सकेगी, जिससे लगभग छह अरब टन कार्बन डाईआक्साइड का उत्सर्जन हर साल रोका जा सकेगा। उत्सर्जन की यह मात्रा मौजूदा समय में पूरे विश्व के परिवहन क्षेत्र द्वारा छोड़ी जा रही कार्बन डाईआक्साइड के बराबर है।
प्रदूषण से बचने के लिए परमाणु ऊर्जा एक अच्छा विकल्प है। पहले के मुकाबले अब परमाणु बिजली संयंत्रों को काफी सुरक्षित भी माना जाता है। मगर भारत फिलहाल दो से तीन फीसद परमाणु ऊर्जा ही अपने परमाणु बिजलीघरों में पैदा कर पाता है। फिर, परमाणु बिजलीघर लगाना काफी महंगा है और इसके मुख्य ईंधन यूरेनियम के आयात के लिए आस्ट्रेलिया आदि विकसित देशों पर निर्भरता एक अलग संकट है। पर्यावरणीय कारणों से इन संयंत्रों को तीखा विरोध झेलना पड़ता है। इसके अलावा पेन्सिलवेनिया (अमेरिका) में थ्री माइल द्वीप, चेरनोबिल (रूस) और फुकुशिमा रिएक्टर से रिसाव की घटनाएं, पुराने और जर्जर होते परमाणु संयंत्र, रेडियोएक्टिव कचरे के निष्पादन और यूरेनियम की कमी जैसी समस्याएं परमाणु ऊर्जा के रास्ते में बाधा डाल रही हैं। सौर और पवन ऊर्जा स्वच्छ ईंधन के अच्छे विकल्प हैं, लेकिन सौर पैनलों का रखरखाव काफी झंझट भरा है और पवन ऊर्जा अनिश्चित, व्यापक रूप से फैली हुई तथा मुश्किल से पकड़ में आने वाली ऊर्जा है।
Date:17-01-23
भारतीय वैशिष्ट्य को करेगा स्थापितशिवप्रकाश, ( लेखक भाजपा के राष्ट्रीय सह संगठन मंत्री हैं )
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में भारत देश जी-20 के कार्यक्रमों का आयोजन कर रहा है। जी-20 के माध्यम से होने वाले कार्यक्रम कुछ निश्चित प्रतिनिधियों के कूटनीतिक कार्यक्रम न होकर भारत में समाज की सहभागिता से उत्सव का रूप ले लिया है। प्रधानमंत्री मोदी जी की कार्यशैली की यह विशेषता है कि वह सरकारी योजनाओं को समाज के साथ जोड़कर संपूर्ण समाज का कार्यक्रम बनाते हैं।
उनके द्वारा घोषित लक्ष्य ‘एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य’ (one earth, one family, one future) विश्व को जोड़ने का माध्यम बना है। यह भारतीय संस्कृति की वसुधैव कुटुंबकम की अवधारणा का साकार रूप है। भारत जी-20 के माध्यम से विविधता युक्त भारत का लोकतांत्रिक पद्धति से विकास के मॉडल (Development, Diversity, Democracy) को विश्व के सम्मुख रखना चाहता है। इस वर्ष इंदौर में आयोजित प्रवासी भारतीय दिवस के अवसर पर प्रवासी भारतीयों के मध्य प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि हम सभी को गर्व है कि भारत लोकतंत्र की जननी है। अभी तक हम भारत के लोकतंत्र की प्रशंसा करते हुए कहते थे कि हम दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश हैं। जहां दुनिया के लोकतंत्र संकट आए, हमारे पड़ोसी पाकिस्तान में भी लोकतंत्र सेना के बूटो तले रौंदा गया, वही हम सफल लोकतंत्र सिद्ध हुए। प्रधानमंत्री ने अपने को केवल बड़े लोकतंत्र न कहकर लोकतंत्र की जननी के रूप में संबोधित किया है, क्योंकि भारत में वेद काल से लोकतंत्र की परंपरा रही है। गुलामी के कालखंड में हमारे ‘स्व’ को भुलाने का योजनाबद्ध प्रयास हुआ। हमें पढ़ाया एवं सिखाया गया कि भारत का अपना कुछ नहीं था, हमको सभी कुछ अंग्रेजों ने ही दिया है। गणित, ज्ञान-विज्ञान, कला, साहित्य, विकास अवधारणा आदि सभी अंग्रेजों से ही हमें विरासत में मिली है। इसी क्रम में उन्होंने कहा कि भारत में अपने पास कोई शासन प्रणाली भी नहीं थी। लोकतांत्रिक व्यवस्था भी अंग्रेजों की ही देन है। सुनियोजित मैकाले शिक्षा पद्धति से अध्ययन करने के बाद निकला भारत का भी एक बड़ा वर्ग इसी को सत्य मानने लगा। हमको पढ़ाया गया कि विश्व का प्रथम लोकतंत्र एथेंस गणराज्य है। एथेंस राज्य तानाशाही से मुक्त होकर प्रथम गणराज्य बना, जिसका इतिहास 2000 वर्ष पुराना है। एथेंस गणराज्य से हजारों वर्ष पूर्व भारत में वेद काल से ही लोकतंत्र की भावना का विकास हुआ था। ऋग्वेद में गणतंत्र शब्द का प्रयोग 40 बार एवं अथर्ववेद में 9 बार हुआ है। राजा के द्वारा अपने सहयोगियों से परामर्श कर शासन चलाने के उदाहरण ऋग्वेद में विद्यमान है। राजा एवं उसके सहयोगियों से बनने वाले समूह को ‘समिति’ नाम से संबोधित किया गया। समिति की बैठकों में राजा की उपस्थिति अनिवार्य थी जैसे कि ‘राजा न सत्या: समितिरियान:’ (जो राजा समिति की बैठक में नहीं आता वह सच्चा राजा नहीं है) वेदों में तीन प्रकार की सभाओं का वर्णन है, जिसमें 1. विद्यार्य सभा (शिक्षा संबंधी) 2.धर्मार्य सभा (न्याय संबंधी) 3. राजार्य सभा (शासन-प्रशासन से संबंधित) के माध्यम से शासन संचालन के प्रमाण मिलते हैं। समिति के समान ही सभा भी शासन संचालन का माध्यम थी। इसके अनेक प्रमाण साहित्य मे उपलब्ध हैं। सभा की विशेषता का वर्णन करते हुए कहा है कि वह सभा सभा नहीं जिसमें अच्छे लोग नहीं। ‘न सा सभा यत्थम न सन्ति संतो’। महाभारत के शांति पर्व में जनसदन का उल्लेख है। शांति पर्व में भीष्म पितामह ने युधिष्ठिर को गणराज्य का महत्त्व समझाते हुए कहा ‘जनता के साथ सीधे जुड़ाव का माध्यम गणतंत्र है।’ बौद्ध काल में शाक्य, कोलिओं, लिच्छवि, वज्जी, पिप्पलवन, अलल्पवन सभी प्रजातांत्रिक गणराज्य के उदाहरण है। पतंजलि, कौटिल्य आदि सभी भारतीय विद्वानों के साहित्यों में प्रजातांत्रिक शासन व्यवस्था का वर्णन मिलता है। विदेशी विद्वान मेगस्थनीज, ह्वेनसांग आदि ने भारत की गणतांत्रिक व्यवस्था के संबंध में लिखा है।
भारत में लोकतंत्र की सफलता का रहस्य यह है कि भारत के सामान्य समाज में स्वभावत: लोकतंत्र का भाव भरा है। दुनिया के अनेक देशों में राजा की तानाशाही प्रवृत्ति की प्रतिक्रिया के कारण लोकतांत्रिक व्यवस्था स्थापित हुई। वहीं भारत में सकारात्मक भाव से लोकतंत्र जन्मा है। भारतीय संस्कृति में मानव मन का जितना गहन अध्ययन हुआ है उतना अन्य नहीं दिखता। भारत की समृद्ध परंपरा से उद्भूत अध्यात्म इसका कारण है। ऋग्वेद का मंत्र: संगच्छध्वं संवदध्वं। सं वो मनांसि जानताम्। समानो मंत्र: समिति: समानी। अर्थात: हम एक दिशा में चलें, एक समान बोलें, सभी के मनोभाव को जानें, हमारी समिति समान हो, सभी का मंत्र (लक्ष्य) एक हो। भारत में यह लोकतंत्र का सकारात्मक भाव प्राचीन काल से उत्पन्न हुआ। जो भारतीय जन-मन के संस्कारों में स्थित है। संविधान निर्माताओं ने संविधान निर्माण करते समय सभी को समान मताधिकार देकर इसी भाव को पुष्ट किया था। प्रधानमंत्री भारत को लोकतंत्र की जननी कहकर इसी ऐतिहासिक सत्य को विश्व के सम्मुख उद्घाटित कर रहे हैं। जी 20 इसी प्रकार के भारतीय वैशिष्ट्य को स्थापित करने का माध्यम बनेगी।
Date:17-01-23
एक और सिफारिशसंपादकीय
न्यायाधीशों की नियुक्ति या कॉलेजियम से जुडे़ विवाद का जारी रहना दुखद और अफसोसजनक है। केंद्रीय विधि मंत्रालय ने भारत के प्रधान न्यायाधीश धनंजय वाई चंद्रचूड़ को पत्र लिखकर कॉलेजियम के माध्यम से न्यायिक नियुक्ति की प्रक्रिया में अधिक पारदर्शिता और निष्पक्षता लाने के लिए एक खोज-सह-मूल्यांकन समिति (एसईसी) की जरूरत पर बल दिया है। विधि मंत्रालय की यह दलील है कि न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रक्रिया में सरकार भी एक पक्ष है, अत: सरकार के एक प्रतिनिधि या प्रतिनिधिनियों को न्यायाधीश चयन पैनल में जगह मिलनी चाहिए। संभवत: इसी महीने की शुरुआत में यह पत्र प्रधान न्यायाधीश को भेजा गया है। विधि मंत्रालय ने एसईसी को एक निकाय के रूप में प्रस्तावित किया है, जिसमें सदस्य के रूप में पूर्व न्यायाधीश, शिक्षाविद और अन्य विशेषज्ञ शामिल किए जा सकते हैं और यह कि एसईसी की सदस्यता केंद्र सरकार के परामर्श से प्रधान न्यायाधीश द्वारा तय की जा सकती है।
इस बार विधि मंत्रालय के पत्र में ‘कॉलेजियम’ शब्द का जिक्र नहीं है। मतलब, न्यायाधीश चयन की यह व्यवस्था कॉलेजियम के अतिरिक्त होगी। न्यायपालिका के दिग्गज कॉलेजियम व्यवस्था में सुधार या बदलाव के पक्ष में नहीं हैं, तो यह अतिरिक्त व्यवस्था करने की कोशिश विधि मंत्रालय की ओर से हो रही है। वैसे, यह पहली बार नहीं है, जब सरकार एसईसी का विचार पेश कर रही है। ऐसा सुझाव 2017, 2018 और 2021 में भी दिया जा चुका है। पत्र में प्रधान न्यायाधीश को आश्वस्त करने की कोशिश हुई है, जिस पर निश्चय ही न्याय क्षेत्र में विचार-विमर्श होगा। इसमें कोई दोराय नहीं कि न्यायपालिका संविधान के हिसाब से चल रही है और वह कॉलेजियम की व्यवस्था में किसी भी तरह के बदलाव को आसानी से स्वीकार नहीं करेगी। अगर विधि मंत्रालय समझाने की कोशिश कर रहा है, तो सराहनीय है, लेकिन न्यायपालिका पर अनावश्यक दबाव बनाने से बचना चाहिए। अभी तक कॉलेजियम में प्रधान न्यायाधीश सहित चार अन्य वरिष्ठ न्यायाधीश शामिल होते हैं और कुल मिलाकर, न्यायाधीशों का चयन सराहनीय ही रहा है। देश में लोकतंत्र और संविधान का राज अगर निरंतर कायम है, तो इसमें न्यायपालिका और न्यायाधीशों का योगदान अतुलनीय है।
किसी भी नई परंपरा की शुरुआत करते समय यह देख लेना चाहिए कि कहीं नई व्यवस्था में शक्तियों के दुरुपयोग की गुंजाइश तो नहीं बन रही है? सरकार पर एक राजनीतिक दबाव रहता है, लेकिन यह सरकार के लिए भी मुफीद है कि वह न्यायपालिका को किसी भी तरह से दबाव में न लाए। यदि कोई परिवर्तन जरूरी है, तो उसके पक्ष में अकाट्य तर्क होने चाहिए। सांविधानिक संस्थाओं की मजबूत रीढ़ ही दरअसल देश की रीढ़ होती है। संस्थाओं और उनके कामकाज को राजनीति से जितना बचाया जाएगा, उतना ही अच्छा है। 2014 में एनडीए सरकार ने उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए एक वैकल्पिक प्रणाली की स्थापना करते हुए राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) अधिनियम पारित किया था, जिसमें सरकार के लिए एक बड़ी भूमिका का प्रावधान किया गया था, लेकिन 2015 में सुप्रीम कोर्ट ने पारित कानून को असांविधानिक करार दिया था। उसके बाद से ही सरकार बदलाव के लिए प्रयासरत है। मगर प्रयासों को तीखा बनाने के बजाय संवाद और समन्वय से राह निकालने की जरूरत है।
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कृषि और खाद् सुरक्षा में मोटे अनाज (ज्वार, बाजरा, कोदो आदि) या मिलेट का विशेष महत्व है। संयुक्त राष्ट्र ने भी इसके वैश्विक प्रसार के लिए प्रयास शुरू कर दिए हैं। भारत के लिए इसका महत्व और भी ज्यादा इसलिए है, क्योंकि देश में पोषण का स्तर बहुत कम है। उच्च पोषण स्तर के अलावा मोटे अनाजों को बढ़ते धरती के तापमान में जीवन रक्षक माना जा सकता है। यही कारण है कि भारत ने 2021 की संयुक्त राष्ट्र बैठक में 72 देशों के सहयोग से 2023 को ‘अंतरराष्ट्रीय मिलेट वर्ष’ घोषित करने का प्रस्ताव रखा है। इसके साथ ही मोटें अनाज के लाभों पर एक नजर.
इस कमी की पूर्ति के लिए किसानों या कृषि उपज संगठनों को आपस में मिलकर नए बाजार तैयार करने चाहिए। देश में मोटे अनाजों की मानक किस्मों के उत्पादन के लिए शोध एवं अनुसंधान पर लगातार निवेश करना चाहिए।
मोटे अनाजों की गुणवत्ता और पैदावार को बढ़ाने के लिए आपसी वैश्विक सहयोग भी किया जाना चाहिए। इस मामले में भारत ने जी-20 समूह देशों के समक्ष इंटरनेशनल मिलेट इनिशिएटिव फॉर रिसर्च एण्ड अवेयरनेस के गठन का प्रस्ताव रखा है, जो बहुत लाभकारी सिद्ध हो सकता है। भारत को तेजी से आगे बढ़कर इस दिशा में और भी काम करने चाहिए।
‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 26 दिसम्बर, 2022
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Date:16-01-23
जवाबदेही का तंत्र विकसित करे न्यायपालिकाहृदयनारायण दीक्षित, ( लेखक उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष हैं )
भारतीय राजव्यवस्था में शक्ति के मुख्य स्रोत जन-गण-मन हैं। संविधान की उद्देशिका में इन्हें ‘हम भारत के लोग’ कहा गया है। संविधान सभा में पारित संकल्प के अनुसार प्रभुत्व संपन्न भारत की सभी शक्तियां और प्राधिकार, उसके संघटक भाग और शासन के सभी अंग ‘लोक’ से उत्पन्न हैं। संविधान निर्माताओं ने विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका को शक्ति संपन्न बनाकर उनके उत्तरदायित्व निर्धारित किए हैं। सबकी मर्यादा हैं। अमेरिका में न्यायपालिका को सर्वोच्च बताया जाता है। ब्रिटेन में संसदीय सर्वोच्चता का सिद्धांत है। भारत में संविधान की सर्वोच्चता बताई जाती है। संविधान राजधर्म है। धर्म की शक्ति पालनकर्ता में निहित होती है। यहां जनहित और जनइच्छा की सर्वोच्चता है। विधायिका द्वारा बनाए गए राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग यानी एनजेएसी कानून को न्यायालय द्वारा निरस्त करने से दो स्तंभों में टकराव बढ़ा है। राजस्थान में पीठासीन अधिकारियों के सम्मेलन में उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने एनजेएसी को रद करने पर टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि वह केशवानंद भारती मामले में दिए गए फैसले से सहमत नहीं हैं। इस फैसले में कहा गया था कि संसद संविधान में संशोधन कर सकती है, लेकिन उसके मूल ढांचे में नहीं। धनखड़ ने कहा कि न्यायपालिका को संसद की संप्रुभता में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
दरअसल, संविधान के मूल ढांचे पर बहस जारी है। संविधान सभा में मूल ढांचे पर कोई चर्चा नहीं हुई। एनजेएसी पर राष्ट्रपति ने हस्ताक्षर कर दिए थे। फिर सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान के मूल ढांचे के आधार पर एनजेएसी को निरस्त कर दिया। संविधान में संशोधन की प्रक्रिया है। अनुच्छेद 368 में संशोधन शक्ति की सीमा नहीं है। इसी अनुच्छेद में निरसन शब्द आया है। डीडी बसु ने लिखा है, ‘अनुच्छेद 368 के अधीन संशोधन में संविधान के किसी भी उपबंध का निरसन सम्मिलित है। तथाकथित आधारिक और सारवान उपबंध भी उसमें आते हैं।’ संविधान के कुछ आधारिक लक्षण हैं, किंतु न्यायालय द्वारा घोषित इन आधारिक लक्षणों का संशोधन नहीं किया जा सकता। यदि संविधान संशोधन संविधान की आधारिक संरचना में परिवर्तन करता है तो न्यायालय उसे शक्तिवाह्यता आधार पर शून्य करार देने का पात्र होगा।
उच्चतम न्यायालय ने संविधान के आधारिक लक्षणों की सूची में संख्या निश्चित नहीं की। यानी यह सूची अभी अपूर्ण है। संप्रति संविधान की सर्वोच्चता, विधि का शासन, न्यायिक पुनरावलोकन, परिसंघवाद, पंथनिरपेक्षता, राष्ट्रीय एकता एवं अखंडता, संसदीय प्रणाली, स्वतंत्र एवं निष्पक्ष निर्वाचन, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, उच्चतम न्यायालय की शक्तियां, सामाजिक न्याय, मूल अधिकार और नीति-निदेशक तत्वों के मध्य संतुलन आदि 25 बिंदु आधारिक लक्षणों की सूची में हैं। न्यायपालिका संविधान के निर्वचन और क्रियान्वयन की अभिभावक है। वह न्यायिक पुनरावलोकन के माध्यम से संविधान और विधि की व्याख्याता भी है। व्याख्याकार और निगरानीकर्ता के रूप में न्यायपालिका की महत्वपूर्ण भूमिका है, लेकिन व्याख्याकार सर्वोच्च नहीं हो सकता। स्वतंत्र न्यायपालिका संवैधानिक सीमा के भीतर ही अपना काम करती है, लेकिन यह अवश्य स्मरण रहे कि स्वतंत्रता विधायी मूल्य है और स्वच्छंदता नकारात्मक।
संसद सवा अरब से अधिक लोगों की प्रतिनिधि संस्था है। यह विधि निर्मात्री है। इसके पास संविधान संशोधन के भी अधिकार हैं। संसद और विधानमंडल में बहुमत प्राप्त दल समूह कार्यपालिका बनाते हैं। कार्यपालिका और विधायिका के संबंध स्थायी हैं। कार्यपालिका अपने समूचे कामकाज के बारे में विधायिका के प्रति जवाबदेह है। कार्यपालिका की जवाबदेही भारतीय शासन व्यवस्था को प्रामाणिक बनाती है। विधायिका अपने कामकाज से जनता की सर्वोपरि इच्छा को व्यक्त करती है। कार्यपालिका अपने कामकाज के बारे में न्यायालयों के प्रति भी जवाबदेह है। जवाबदेही प्रत्येक संस्था के कामकाज की गुणवत्ता बढ़ाती है। न्यायपालिका के प्रति लोगों में श्रद्धा है, लेकिन उसकी जवाबदेही का कोई मंच नहीं है। न्यायपालिका को अपने भीतर से ही किसी जवाबदेह संस्था का विकास करना चाहिए। अधिकार प्राप्त व्यक्ति की जिम्मेदारी भी होती है। न्यायपालिका के फैसलों पर टिप्पणियां भी होती हैं। ऐसी टिप्पणी को लेकर न्यायालय की अवमानना की बातें भी चलती हैं। संविधान के आधारिक लक्षणों को लेकर भी टिप्पणियां हुई थीं। संविधान संशोधन और विधि निर्माण विधायिका के विषय हैं, तो न्यायालय के निर्णय विधि बनते हैं। इसलिए न्यायिक निर्णयों में अतिरिक्त सतर्कता की आवश्यकता होती है। यह न भूलें कि संविधान के आधारिक लक्षणों का उदय न्यायिक प्रक्रिया से हुआ है। विधायिका से नहीं।
संविधान जड़ नहीं हो सकता। संविधान निर्माताओं ने तत्कालीन परिस्थितियों को देखते हुए संविधान बनाया था। समय और परिस्थिति के अनुसार सब कुछ बदलता है। संविधान में भी समयानुकूल परिवर्तन-संशोधन होते रहते हैं। अब तक उसमें सौ से अधिक संशोधन हो चुके हैं। पं. जवाहरलाल नेहरू ने उचित ही कहा था कि ‘संविधान इतना कठोर नहीं होना चाहिए कि वह राष्ट्रीय विकास और सामर्थ्य की बदलती हुई परिस्थितियों में अनुकूलित न किया जा सके।’ संविधान निर्माताओं ने परिसंघ प्रणाली को प्रभावित न करने वाले उपबंधों को संशोधित करने के लिए सरल उपबंध किया था। ऐसे उपबंध साधारण बहुमत से पारित होते हैं। संशोधन के लिए सरल तरीका अपनाने का राजनीतिक महत्व था। डा. आंबेडकर ने संविधान सभा में संशोधन के प्रस्ताव को प्रस्तुत करते हुए कहा था, ‘जो संविधान से असंतुष्ट हैं, उन्हें बस दो-तिहाई बहुमत प्राप्त करना होगा। यदि वह संसद में दो-तिहाई बहुमत भी नहीं पा सकते तो यह समझा जाना चाहिए कि संविधान के प्रति असंतोष में जनता उनके साथ नहीं है।’ स्पष्ट है कि हमारी संवैधानिक व्यवस्था ने विधायिका, न्यायपालिका और कार्यपालिका के लिए कुछ मर्यादाएं अधिरोपित की हैं। वर्तमान चुनौतियों को देखते हुए तीनों के मध्य आवश्यक प्रीतिपूर्ण मर्यादा की आवश्यकता है।
Date:16-01-23
पर्यावरण बनाम विकासविनीत नारायण
उत्तराखंड में भगवान श्रीबद्रीविशाल के शरदकालीन पूजा स्थल और आदि शंकराचार्य की तपस्थली ज्योतिर्मठ (जोशीमठ) नगर में विगत महीने से जो बड़ी लंबी-लंबी दरारें आ गई, वे निरंतर गहरी व लंबी होती जा रही हैं। वैज्ञानिकों, विशेषज्ञों और धार्मिंक लोगों के अनुसार, बेतरतीब ढंग से हुए ‘विकास’ और हर वर्ष बढ़ते पर्यटकों के सैलाब को इसका कारण माना जा सकता है।
जोशीमठ नगर बद्रीनाथ धाम से 45 किमी. पहले ही अलकनंदा नदी के किनारे वाले ऊंचे तेज ढलान वाले पहाड़ पर स्थित है। यहां पर फौजी छावनी और नागरिक मिलाकर 50,000 के लगभग निवासी रहते हैं। साल के छह महीने की गर्मिंयों के दौरान यह संख्या पर्यटकों के कारण दुगुनी हो जाती है। बद्रीनाथ धाम में दशर्नार्थी तो आते ही हैं, साथ ही विश्व प्रसिद्ध औली जाने वाले पर्यटक भी आते हैं। औली बद्रीनाथ से करीब 50 किमी. दूर है। जोशीमठ से 4 किमी. पैदल चढ़ कर औली पहुंचा जा सकता है। इसलिए औली जाने वाले ज्यादातर पर्यटक भी रात्रि विश्राम जोशीमठ में ही करते हैं। यहां से बद्रीनाथ धाम जाने के लिए 12 किमी. नीचे की ओर विष्णुगंगा और अलकनंदा के मिलन विष्णु प्रयाग तक उतरना पड़ता है, जहां विष्णु प्रयाग जलविद्युत परियोजना (जेपी ग्रुप) का निर्माण कार्य चल रहा है। यहां बिजली बनाने के लिए बड़ी-बड़ी सुरंग कई वर्षो से बनाई जा रही हैं, जिनमें से अधिकांश बन चुकी हैं। जोशीमठ के नीचे दरकने और दरारें आने की मुख्य वजह ये सुरंगें बताई जा रही हैं क्योंकि बारूद से विस्फोट करके ही इन्हें बनाया जाता है। इस कारण पहाड़ में दरारें आना स्वभाविक है।
यह कार्य चार दशकों से पूरे हिमालय विशेषकर गढ़वाल और कुमाऊं क्षेत्र में हो रहा है। बिजली बनाने के लिए कई सौ परियोजनाएं यहां चल रही हैं। मैदानों को दी जाने वाली बिजली बनाने के लिए कई दशकों से यहां अंधाधुंध व बेतरतीब ढंग से हिमालय में सुरंगों, सड़कों और पुलों का निर्माण जारी है, जिससे यहां की वन संपदा आधी रह गई है। अयोध्या से जुड़े राम भक्त संदीप जी द्वारा साझी की गई जानकारी के अनुसार, उत्तराखंड स्थित बद्री, केदार, यमुनोत्री व गंगोत्री धामों के दशर्न करके इसी जन्म में मोक्ष पाने की सस्ती लालसा के पिपासुओं की भीड़ और नवधनाढ्यों की पहाड़ों में मौज मस्ती भी यहां प्राकृतिक संसाधनों पर भारी पड़ी है। इस कारण समूचा गढ़वाल हिमालय क्षेत्र तेजी से नष्ट हो रहा है जबकि यह देवात्मा हिमालय का सर्वाधिक पवित्र क्षेत्र माना जाता है। इसकी भौगोलिक स्थिति का स्कंध पुराण में भी विस्तृत वर्णन मिलता है।
यहां कदम-कदम, मोड़-मोड़ पर प्राचीन ऋषि मुनियों के आश्रम और पौराणिक देवस्थान स्थित हैं। इन्हीं पर्वतों से गंगा व यमुना जैसी असंख्य पवित्र नदियां निकली हैं। ऐसे परम पवित्र पावन रमणीक हरे-भरे प्रदेश का पर्यावरणविद् के सतत विरोध के बावजूद बिजली बनाने और पर्यटन के लिए वर्तमान बीजेपी सरकार सहित सभी पूर्ववर्ती सरकारों ने खूब दोहन किया है। इस कारण केदारनाथ त्रासदी जैसी घटनाएं घटित हो चुकी हैं, और आगे और भी भयावह विनाश की खबरें आएंगी क्योंकि जब देवताओं की निवास स्थली देवभूमि हिमालय मी पर्यटन के नाम पर अंडा, मांस, मदिरा का व्यापक प्रयोग और न जाने कैसे-कैसे अपराध मनुष्य करेगा तो देवता तो रुष्ट होंगे ही। हर वर्ष गर्मिंयों में उत्तराखंड दशर्न और सैरसपाटे के लिए घुमक्कड़ों की भीड़ इस कदर होती है कि पहाड़ों में गाड़ियों का कई किमी. तक लंबा जाम लग जाता है। पर्यटकों के कारण यहां का पारिस्थितिकी तंत्र चरमरा जाता है। हर शहर और गांव में बढ़ती भीड़ के लिए होटल और गेस्ट हाउसों की बाढ़ आई हुई है। प्रश्न है कि मैदानों की बिजली की मांग तो निरंतर बढ़ती जाएगी तो इसका खमियाजा पहाड़ क्यों भरे? सरकारों को अन्य विकल्प तलाशने होंगे। क्यों न यहां भी बढ़ती भीड़ के लिए कश्मीर घाटी के पवित्र अमरनाथ धाम के दशर्न की ही तरह दशर्नार्थियों को सीमित मात्रा में परमिट देने का सिस्टम विकसित किया जाए?
इस विषय में सबसे खास बात है कि सरकार समूचे हिमालय क्षेत्र के लिए खास दीर्घकालीन योजना बनाई जाए जिसमें देश के जाने-माने पर्यावरणविद्, इंजीनियरों और वैज्ञानिकों के अनुभवों और सलाहों को खास तवज्जो दी जाए। तभी हिमालय का पारिस्थितिकी तंत्र संभलेगा वरना तो केदारनाथ त्रासदी और अभी हाल की जोशीमठ जैसी घटनाएं निरंतर और विकराल रूप में आएंगी ही आएंगी। दिल्ली विश्वविद्यालय से सेवानिवृत्त प्रोफेसर और वर्तमान में भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी के एमिरेट्स साइंटिस्ट प्रो. धीरज मोहन बैनर्जी के अनुसार, ‘कई साल पहले भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ने एक जांच की थी। वह रिपोर्ट भी बोलती है कि यह क्षेत्र कितना अस्थिर है। भले ही सरकार ने वैज्ञानिकों या शिक्षाविद् को गंभीरता से नहीं लिया, कम से कम उसे भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण की रिपोर्ट पर तो ध्यान देना ही चाहिए था। इस क्षेत्र में बेतरतीब ‘विकास’ के नाम पर हो रहे सभी निर्माण कार्यों पर रोक लगनी चाहिए।’
चिंता की बात यह है कि सरकार चाहे यूपीए की हो या एनडीए की वो कभी पर्यावरणवादियों की सलाह को महत्त्व नहीं देती। पर्यावरण के नाम पर मंत्रालय, एनजीटी और अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन सब कागजी खानापूरी करने के लिए हैं। कॉरपोरेट घरानों के प्रभाव में और उनकी हवस को पूरा करने के लिए सारे नियम और कानून ताक पर रख दिए जाते हैं। पहाड़ हों, जंगल हों, नदी हों या समुद्र का तटीय प्रदेश, हर ओर विनाश का यह तांडव जारी है। नरेन्द्र मोदी सरकार द्वारा शुरू किया गया उत्तराखंड के चार धाम को जोड़ने वाली सड़कों का प्रस्तावित चौड़ीकरण भविष्य में इससे भी भयंकर त्रासदी लाएगा। पर क्या कोई सुनेगा? देवताओं के कोप से बचाने वाले खुद देवता ही हैं। वो हमारी साधना से खुश होकर हमें बहुत कुछ देते भी हैं, और कुपित होकर बहुत कुछ ले भी लेते हैं। संदीप जी जैसे भक्तों, प्रोफेसर बनर्जी जैसे वैज्ञानिकों, भौगोलिक विशेषज्ञों और सारे जोशीमठवासियों की पीड़ा हम सबकी पीड़ा है। इसलिए ऐसे संकट में सभी को एकजुट हो कर समस्या का हल निकालना चाहिए।
Date:16-01-23
घरेलू बचत बढ़ना जरूरीडॉ. जयंतीलाल भंडारी
इस समय देश में घरेलू वित्तीय बचत बढ़ाने की जरूरत अनुभव की जा रही है। एक ताजा रिपोर्ट के मुताबिक 2023 की शुरुआत में दिखाई दे रहा है कि महंगाई और खर्च बढ़ने से भारतीय परिवारों की वित्तीय बचत घटकर करीब 30 साल के निचले स्तर पर आ गई है। वित्त वर्ष 2022-23 की पहली छमाही में घरेलू वित्तीय बचत सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के 4 प्रतिशत के बराबर दर्ज की गई है। वित्त वर्ष 2021-22 में 7.3 प्रतिशत के स्तर पर थी जबकि वर्ष 2020-21 में 12 प्रतिशत की ऊंचाई पर। धनराशि के आंकड़ों के मद्देनजर अप्रैल-सितम्बर, 2022 में घरेलू वित्तीय बचत 5.2 लाख करोड़ रुपये रह गई जो एक वर्ष पहले की समान छमाही में 17.2 लाख करोड़ थी।
ऐसे में आगामी तिमाहियों में बचत में तेजी नहीं आती है, तो अर्थव्यवस्था में खपत और निवेश, दोनों प्रभावित होते दिखेंगे। अतएव घरेलू वित्तीय बचत को बढ़ाने के लिए छोटी बचत योजनाओं को ब्याज दर के मद्देनजर आकषर्क बनाया जाना जरूरी है। यद्यपि सरकार ने जनवरी से मार्च, 2023 तिमाही के लिए राष्ट्रीय बचत प्रमाणपत्र (एनएससी), डाकघर सावधि जमा, वरिष्ठ नागरिक बचत योजना सहित छोटी जमा राशि पर ब्याज दरों में बढ़ोतरी की है, किंतु महंगाई और जीवन निर्वहन के बढ़ते खचरे के मद्देनजर छोटी बचत योजनाओं और अधिक आकषर्क बनाना जरूरी है। गौरतलब है कि जनवरी, 2023 से एनएससी पर 7 फीसदी की ब्याज दर मिलेगी। वर्तमान में यह 6.8 फीसदी है। वरिष्ठ नागरिक बचत योजना वर्तमान में 7.6 फीसदी के मुकाबले अब 8 फीसदी ब्याज देगी। 1 से 5 साल की अवधि की डाकघर सावधि जमा योजनाओं पर ब्याज दरों में 1.1 फीसदी तक की वृद्धि होगी। मासिक आय योजना में भी 6.7 फीसदी से बढ़कर 7.1 फीसदी ब्याज मिलेगा। ज्ञातव्य है कि इससे पहले 9 सितम्बर को सरकार ने अक्टूबर से दिसम्बर, 2022 की तीसरी तिमाही में किसान विकास पत्र के ब्याज दर को 6.9 फीसदी से बढ़ाकर 7 फीसदी किया था।
उल्लेखनीय है कि कोविड-19 की आर्थिक चुनौतियों से लेकर महंगाई की चुनौतियों के बीच देश में आम आदमी के सामने बड़ी चिंता छोटी बचत योजनाओं पर ब्याज दर कम रहना थी। रूस-यूक्रेन युद्ध जारी रहने, वैश्विक खाद्यान्न उत्पादन में कमी, अमेरिका के केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व द्वारा 2023 में मौद्रिक नीति को सख्त बनाए जाने से डॉलर की तुलना में रुपये की कीमत घटने की चिंता तथा चीन सहित कई देशों में कोहराम मचा रहे कोरोना वायरस के नये वेरिएंट की वजह से 2023 में महंगाई बढ़ने की आशंका के बीच इस वर्ष की शुरुआत में छोटी बचत योजनाओं पर ब्याज दर में वृद्धि छोटे निवेशकों के लिए राहतकारी है। स्पष्ट है कि अभी वैश्विक चुनौतियों के बीच भारतीय अर्थव्यवस्था गतिशील है, और कारोबार से कर्ज की मांग तेजी से बढ़ रही है और बैंकों में कर्ज के मुकाबले जमा की रफ्तार धीमी है। रिजर्व बैंक के हालिया आंकड़ों से पता चलता है कि बैंकों की ऋण वृद्धि दर जमा वृद्धि दर की तुलना में डेढ़ गुना से भी अधिक है। ऐसे में तमाम बैंकों में बढ़ते ऋणों की जरूरत के मद्देनजर जमा धन राशि बढ़ाने के लिए सावधि जमा पर ब्याज दरों में वृद्धि की होड़ लग गई है। वस्तुत: देश में बचत की प्रवृत्ति के लाभ आमजन के साथ ही समाज व अर्थव्यवस्था के लिए भी हैं। बचत की जरूरत इसलिए भी है क्योंकि हमारे यहां विकसित देशों की तरह सामाजिक सुरक्षा का उपयुक्त ताना-बाना नहीं है। यद्यपि छोटी बचत योजनाओं में ब्याज दर की कमाई का आकषर्ण घटने से 2012-13 के बाद सकल घरेलू बचत दर (ग्रास डोमेस्टिक सेविंग रेट) घटती गई है। लेकिन अभी भी छोटी बचत योजनाएं अपनी विशेषताओं के कारण आमजन के विश्वास और निवेश का माध्यम बनी हुई हैं।
गौरतलब है कि 2008 की वैश्विक मंदी का भारत पर कम असर होने का एक कारण भारतीयों की संतोषप्रद घरेलू बचत की स्थिति को भी माना गया था। कोविड-19 से जंग में भारतीयों की घरेलू बचत विसनीय हथियार के रूप में दिखी। नेशनल सेविंग्स इंस्टीट्यूट (एनएसआई) द्वारा भारत में निवेश की प्रवृत्ति से संबंधित रिपोर्ट में कहा गया है कि लोगों के लिए छोटी बचत योजनाएं लाभप्रद हैं। उम्मीद करें कि घरेलू वित्तीय बचत बढ़ाने की जरूरत के मद्देनजर वित्त मंत्रालय द्वारा तत्परतापूर्वक छोटी बचत की ब्याज दरों में बदलाव के लिए एक और उपयुक्त समीक्षा करके इस बार ब्याज दर बढ़ने से वंचित रहे पीपीएफ और सुकन्या समृद्धि योजना की ब्याज दरों में उपयुक्त वृद्धि की जाएगी। करीब पांच करोड़ कर्मचारियों से संबंधित ईपीएफ पर वर्तमान में दी जा रही और चार दशक की सबसे कम 8.1 फीसदी ब्याज दर में भी वृद्धि की जाएगी। इससे महंगाई की निराशाओं एवं मुश्किलों के बीच छोटी बचत करने वाले करोड़ों लोगों के चेहरों पर मुस्कुराहट बढ़ते हुए दिखाई दे सकेगी। बचत की प्रवृत्ति बढ़ने से छोटी बचत योजनाओं के बढ़े हुए कोष से अर्थव्यवस्था के लिए निवेश भी बढ़ाया जा सकेगा।
Date:16-01-23
कृत्रिम बुद्धि से जुड़े असली सवालहरजिंदर, ( वरिष्ठ पत्रकार )
बात आठ साल पुरानी है। 2015 के जनवरी महीने में दुनिया की एक दर्जन से ज्यादा बड़ी हस्तियों- वैज्ञानिकों, उद्योगपतियों, दार्शनिकों और प्रोफेसरों ने मिलकर एक खुला खत जारी किया। इसमें कहा गया था कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), यानी कृत्रिम बुद्धिमता जिस तरह से विकसित हो रही है, वह दुनिया के लिए ही नहीं, मानवता के लिए भी खतरा साबित हो सकती है। उन्होंने इस पर रोक लगाने की मांग की। इस पत्र पर दस्तखत करने वालों में स्टीफन हॉकिंग जैसे वैज्ञानिक और एलन मस्क जैसे उद्योगपति भी शामिल थे। मगर अभी वह साल पूरा भी नहीं बीता था कि एलन मस्क ने पाला बदला और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को विकसित करने के लिए सैन फ्रांसिस्को में बनी एक कंपनी ओपेनएआई के संस्थापक और प्रमुख निवेशक बन गए। यह बात अलग है कि तीन साल के भीतर ही उन्होंने इस कंपनी के निदेशक पद से कुछ मतभेदों के चलते इस्तीफा दे दिया।
अब इसी ओपेनएआई कंपनी ने चैटजीपीटी नाम की व्यवस्था विकसित की है, जिसे लेकर वे तमाम सवाल फिर सामने आ गए हैं, जो आठ साल पहले उस खुले खत में उठाए गए थे। चैटजीपीटी ऐसा बहुत कुछ कर सकता है, जिसे पहले इंसान ही कर सकते थे। वह इंसान की तरह सोचता है, उसी की भाषा में बोलता है, सवालों के जवाब भी उसी की तरह देता है और समस्याओं के समाधान भी वैसे ही बताता है।
कृत्रिम बुद्धिमता की नैतिकता को लेकर बहुत सारे सवाल शुरू से ही उठाए जाते रहे हैं, वे सारे सवाल तो अपनी जगह हैं ही। इस बीच एक नई चिंता भी उठ खड़ी हुई है, वह है इसकी वजह से पैदा होने वाली बेरोजगारी का सवाल। डर है कि चैटजीपीटी जैसी व्यवस्थाएं अगर और विकसित हुईं, तो पढ़े-लिखे लोगों के वैसे रोजगार कम हो जाएंगे, जिन्हें ‘ह्वाइट कॉलर जॉब’ कहा जाता है। हालांकि, यह कहा जा रहा है कि इससे कई तरह के रोजगार भले ही कम होंगे, लेकिन रोजगार के कई नए अवसर भी पैदा होंगे। ठीक वैसे ही जैसे एक दौर में कंप्यूटर ने किया था। बहुत से लोग जब मान बैठे थे कि इससे रोजगार के अवसर कम होंगे, तो ऐसे अवसर दरअसल बढ़ गए, क्योंकि कंप्यूटर ने उत्पादकता को बढ़ाकर अर्थव्यवस्था को एक विस्तार दे दिया था। तर्क है कि यही काम कृत्रिम बुद्धिमता भी कर सकती है।
मगर कोविड महामारी के बाद की दुनिया में इस तरह के तर्क लोगों को बहुत आश्वस्त नहीं कर पा रहे। खासकर तब, जब महामारी के दौरान बेरोजगार हुए लोगों की एक बहुत बड़ी फौज आज भी अपनी रोजी-रोटी की तलाश में भटक रही है। और, एक बार फिर एआई पर रोक लगाने की मांग उठने लगी है। क्या सचमुच इस पर रोक लग सकती है?
एआई से बहुत पहले जेनेटिक इंजीनियरिंग के मानव पर प्रयोग के खिलाफ बहुत कुछ कहा, सुना और लिखा गया था। वैज्ञानिकों में इसे लेकर एक आम सहमति भी बनती दिखाई दी थी। फिर भी इसे रोका नहीं जा सका। विज्ञान और तकनीक की छोटी-बड़ी लहरों को इस तरह रोकना संभव भी नहीं होता। सभी को लगता है कि अगर उसने तकनीक विकसित नहीं की, तो कोई दूसरा इसका फायदा उठा लेगा। नतीजा यह होता है कि सभी उसे विकसित करने में जुट जाते हैं। एलन मस्क जैसे वे लोग भी, जो शुरू में उसके विरोधी होते हैं। वैसे भी ज्ञान किसी भी तरह का हो, उसके विकास को रोकना खतरनाक भी हो सकता है और प्रतिगामी भी।
समस्या वैसे पूरी तरह से विज्ञान और तकनीक की है भी नहीं। समस्या उस सामाजिक और आर्थिक व्यवस्था की है, जो हमने बना ली है। लंबे दौर तक दुनिया को आश्वासन देने वाला एक आर्थिक सिद्धांत था, जिसे ‘ट्रिकल डाउन थ्योरी’ कहा जाता था। यह सिद्धांत कहता था कि जब विकास तेजी से होगा, सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) बढे़गा, तो उसके फायदे छन-छनकर नीचे सभी लोगों तक पहुंचेंगे ही। सूरज जब बीच आसमान पर चमकेगा, तब उसकी रोशनी हर कोने तक पहुंच जाएगी। मगर पिछली एक सदी के अनुभव ने यह बता दिया है कि दुनिया के बहुत से अंधेरे कोने अभी तक रोशनी की बाट जोह रहे हैं; जबकि इस बीच तरक्की भी खूब हुई है और जीडीपी में वृद्धि भी काफी तेजी से हुई है।
इसे हम अपने देश में ज्यादा अच्छी तरह से देख सकते हैं। उदारीकरण के बाद से अब तक हमने विकास का एक लंबा दौर देख लिया है। इस विकास के लिए एक और शब्दावली का प्रयोग किया जाता है- जॉबलेस ग्रोथ, यानी विकास का ऐसा दौर, जिसमें जीडीपी के आंकड़े तो बहुत तेजी से बुलंद हुए, लेकिन उस अनुपात में रोजगार के अवसर नहीं बढ़े।
सिर्फ इतना ही नहीं हुआ। तकनीक के कारण बढ़ी उत्पादकता और विकास दर से आई समृद्धि चंद लोगों के हाथ ही सिमटी रही है। समृद्धि का यह हिमपात सिर्फ ऊंची चोटियों तक सीमित रहा, नीचे तलहटी तक इसकी सर्द सिहरन और कंपकंपी ही पहुंची। धन का यह केंद्रीकरण उस दौर में कुछ ज्यादा ही बढ़ा है, जिसे हम साइबर युग कहते हैं। इस दौर में गरीबी भले ही कई जगहों पर घटी हो, लेकिन विषमता बढ़ी है।
यही कारण है कि एआई की पदचाप बहुत से लोगों में खौफ पैदा करती है। लोग ऐसे दौर की कल्पना करते हैं, जब ज्यादातर जगहों पर सिर्फ मशीनें काम करेंगी और ज्यादातर लोग सिर्फ बेरोजगार होंगे। बेशक, यह सिर्फ एक खौफनाक यूटोपिया है और शायद ऐसा होगा भी नहीं, लेकिन हमारे पास जो वर्तमान है, और जो भविष्य दिख रहा है, उसमें इसके विरुद्ध खड़ा कोई ठोस आश्वासन भी तो नहीं है। यह आशंका तब और डराती है, जब कुछ अर्थशास्त्री ‘यूनिवर्सल बेसिक इनकम’ की बात करते हैं। इसका अर्थ यह है कि अगर हालात बिगड़ते हैं, तो सभी लोगों को सरकार की तरफ से एक निश्चित रकम या आमदनी दी जा सकती है, ताकि उनका गुजारा चल जाए। क्या अंतिम आदमी तक खुशहाली पहुंचाने के सपने से अब अर्थशास्त्र ने भी नमस्कार कर लिया है? विषमता दूर करने और अंतिम आदमी तक खुशहाली पहुंचाने के नए रोडमैप की जितनी जरूरत हमें आज है, उतनी पहले कभी नहीं थी। क्या इसकी तलाश का काम भी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के हवाले ही करना पड़ेगा?
Date:16-01-23
हमें मार्ग दिखाती गीतास्वामी अवधेशानंद गिरि
मनुष्य के विषय में बहुत से महत्वपूर्ण तथ्य समझने योग्य हैं, लेकिन मनुष्य सोया हुआ है। सारे धर्मग्रंथ और सारी आध्यात्मिक साधनाएं मनुष्य को जगाने के लिए ही हैं। यह जीवन तो एक कर्मभूमि है और उसका उचित-अनुचित फल हमें भोगना ही पड़ता है। इसलिए अपने जीवन को जितना सहज बनाकर प्रभु को अर्पण करेंगे, उतनी ही शांति मिलेगी। तुलसीदास जी ने रामचरितमानस में कहा है- अति कोमल रघुबीर सुभाऊ। प्रभु श्रीराम अति सहज हैं। उन्हें छल नहीं, निर्मल मन भाता है।
इसी तरह, गीता हमें अवसाद से आह्लाद का मार्ग बताती है। जीवन में जो कुछ चल रहा है, उसे यह देखने का सामर्थ्य प्रदान करती है। इस धर्मग्रंथ में तो इतनी शक्ति है कि इसका एक ही श्लोक अगर छह माह तक लगातार पढ़ा जाए, तो सारी अज्ञानता समाप्त हो जाए। इसके मूल रहस्य को समझने की आवश्यकता है। गीता मानव-कल्याण का मार्ग प्रशस्त करती है; हमें तनावों से मुक्त करती है और जीवन में प्रबंधन सिखाती है। इसीलिए हम भारतवासियों के लिए यह एक प्रकार से प्राण-वायु तो है ही, समस्त विश्व के लोगों का जीवन-मार्ग प्रशस्त करती है। भगवान श्रीकृष्ण ने अपने शिष्य अर्जुन को ही नहीं, बल्कि संपूर्ण विश्व के समस्त प्राणियों के लिए इसमें उपदेश दिए हैं।
सही मायने में गीता ईश्वर की वाणीमय मूर्ति है। इसका अध्ययन हमें संवारता है। यह धर्मग्रंथ मनुष्य को हमेशा ही सत्य का मार्ग चुनने की सलाह देता है। श्रीमद्भगवद् गीता में केवल उपदेश नहीं हैं, वरन इसका हरेक श्लोक मनुष्य को सही फैसला लेने के लिए प्रोत्साहित करता है। यह जीवन के सकल भ्रम, भय, अज्ञान व अल्पता का भंजन और अंत:करण की समस्याओं के चिरस्थायी समाधान में समर्थ है।
विडंबना यह है कि लोग इसका सिर्फ वाचन करते हैं, जबकि इसे अपने जीवन में उतारने की आवश्यकता है। जितनी इसकी गहराई में उतरोगे, उतनी ही शांति की अनुभूति होगी और जब मनुष्य शांत होगा, तो प्रकृति का सौंदर्य बढ़ेगा। हरेक जीव आनंदमय होगा। युद्धभूमि में अवतरित गीता हमें अपने अंदर युद्ध करना सिखाती है। हमारे अंदर दो तरह की प्रवृत्तियां पुरातन हैं। एक, दैवी प्रवृत्तियां, जो सद्गुणों से प्रेरित हैं और दूसरी है, आसुरी प्रवृत्तियां, जो दुर्गुणों से प्रेरित हैं। हमें गीता का सहारा लेकर सद्गुणों को अपने हृदय में बढ़ाकर दैवीय प्रवृत्ति को सबल करना है और दुर्गुणों का त्यागकर आसुरी प्रवृत्तियों को दुर्बल करना है।
हमारे अंतर का युद्ध दैवीय प्रवृत्ति और आसुरी प्रवृत्ति के बीच का है। दैवीय प्रवृत्ति से आसुरी प्रवृत्ति को हराना है, क्योंकि दैवीय प्रवृत्ति हमें परम तत्व की तरफ ले जाती है, साथ ही मोक्ष भी दिलाती है।
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भ्रष्टाचार के विरूद्ध मुहिम के तहत हाल ही में दूरसंचार विभाग के 10 वरिष्ठ अधिकारियों को जबरन सेवा निवृत्ति दी गई है। इनमें से कुछ की सत्यनिष्ठा संदेहास्पद थी। यह कार्रवाई भ्रष्टाचार के प्रति असहिष्णुता का सही संदेश देती है। 2014 से केंद्र में आई भाजपा सरकार ने अब तक लगभग 400 प्रशासनिक अधिकारियों को सत्यनिष्ठा और प्रदर्शन में कमी के लिए इस प्रकार का दंड दिया है। लेकिन क्या भ्रष्टाचार की समस्या के लिए यह उचित समाधान हो सकता है? कुछ बिंदुओं में चर्चा-
भारत के कार्यबल में केवल 4% लोकसेवक हैं, जबकि यू.के. में 22.5%, अमेरिका में 13.5% और चीन में 28% हैं। राज्य सरकारों को भी अपनी रोजगार की नीतियों में सुधार करके इनके प्रतिशत को बढ़ाना चाहिए। केंद्र सरकार को अपने 444 और राज्य सरकारों को अपने 1,136 सार्वजनिक उपक्रमों के तेजी से विनिवेश पर काम करना चाहिए। इससे होने वाली आय के हिस्से को प्रशासनिक सुधार के लिए इस्तेमाल किया जाना चाहिए। देश के विकास के लिए एक सक्षम नौकरशाही का होना बहुत महत्वपूर्ण है।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 26 दिसम्बर, 2022
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Date:14-01-23
Stop. Cancel Your Hill HolidayDo Mother Nature this favour. Too much tourism has stripped the beauty from our mountain townsChetan Bhagat
As a writer, people often tell me, ‘You should go to the hills and write. ’ There is this romanticised notion of writing out of cozy cottages in pretty hill stations. It does sound lovely, except for one thing. There are no pretty hill stations in India anymore.
Instead, what you will have are trafficjam-filled hilly roads that lead to a town centre lined with haphazardly parked cars. The sidewalks in the hill town, if indeed there are any, will be covered in empty chips and biscuit packets.
The shops, choc-a-bloc, with ugly tin roofs and grotesque neon signs, will sell everything from chole bhature and children’s toys to fake pashmina shawls and digestive churan. There will be video game arcades and snooker rooms, hawkers vending Maggi noodles and cheap China-made Bluetooth earphones. Hotels will compete in the ugliest look possible. There will be open exposed bulbs and India’s favourite ugly light accessory – tubelights.
Unless you want to write about abject misery or on how to wreck a place that was once beautiful, Indian hill stations are no place to write or do anything creative.
Instagram lies: Forget creativity, Indian hill stations are frankly no place to visit. Sure, there are enterprising Instagram influencers, who manage to make a beautiful frame with their phones, highlighting the snowcapped peak at a distance and hiding the Kurkure and Lays’ packets strewn on the floor.
They put these pictures on Instagram, along with captions that sound nice but mean nothing, such as ‘wanderlust is my spirit animal’ or ‘my soul belongs to the hills. ’ These same pictures pop up in your feed. You get excited, pack your family and drive off to the hills, hoping to ‘nourish your soul’ for a few days. Instead, your soul gets a traffic jam after three hours and a garbage-filled town after six.
Seriously, don’t go. You will do our mountains and Mother Nature a favour if you don’t go to India’s most famous hilltowns. They are not a pleasant experience anyway.
Joshimath’s sinking tells the truer tale: More importantly, the damage to these towns has now reached serious levels. It is no longer just about aesthetics, grotesque shops and dirty streets. These towns are simply dying. They just can’t take the onslaught of the city-dwellers from the plains anymore.
Joshimath, a temple town in Uttarakhand, is literally caving in and people who live there must be evacuated. Unchecked construction, lack of concern for the environment and floods of people from the plains coming in non-stop have led to such degradation. Other towns may follow. For the sake of our beautiful hills, STOP!
We need to stop ruining our hill stations. They are India’s pride, its key to ecological balance. They are considered holy. How can we let such destruction happen?
Learn ecologically sustainable tourism: Sure, I get it that tourism keeps the economies of these towns alive. Hotels, shops, travel agencies, cars – they allbring in money. But at what cost? Should we let people cut all our trees in all our forests then? Or let people hunt tigers? If those things are not allowed, how can we allow entire mountain towns and ranges to be destroyed?
One also understands the need for Indians to take vacations, especially in the hot summer months. Rising per-capita incomes (which are a good thing) have meant more people can travel to these hill stations. However, these hill towns are not meant to take in double, triple, tentimes the number of tourists over the next few years. Many were built during British times. They are not at all designed to accommodate millions of tourists zipping around in their own cars.
So when Indians take breaks and travel and contribute to the economy, the same ten or twenty towns cannot suffice. We must meet this rising need with more nice hill stations. If the British could do it with far inferior technology a century ago, why can’t we do it now? We need at least fifty new hill towns with excellent infrastructure in the coming decades to share the tourist load.
However, each of these new towns must have limits – on construction, unoccupied land spaces, number of visitors and all the other controls required to make the tourism ecologically sustainable. Right now, water and garbage disposal are a major problem in our hill towns. These need to be planned beforehand, rather than create a town left to rot.
Learn from Bhutan: With far less resources, our little friendly neighbour has done an excellent job of preserving the environment. Do Bhutanese people not need jobs or money? Then how are they keeping their greed in check and putting the environment first? Maybe we have a lot to learn from our neighbour.
Bhutan charges foreigners a fee to be in their country. Maybe we can have a hill-town charge, which can be used to keep the town in good condition. Bhutan also does not allow ugly hoardings. There needs to be standardisation in every hill town – think of the uniform signage at Johri Bazaar in Jaipur. Similarly, if we ban plastic bags, we should ban anything sold in plastic packets too. Yes, chips and biscuits, I am talking about you. They aren’t good for health anyway.
The Joshimath developments should serve as a wakeup call for all of us. Wrecking nature for a few rupees isn’t worth it. It’s dumb business anyway. If a town is destroyed, you can never earn from it again. Hill-station tourism needs to be sustainable. And our hill towns need to be beautiful. Maybe that’s when writers will go there to write, after all.
Date:14-01-23
Physical Fitness for Our Spiritual PlacesET Editorials
Apilgrimage is literally a spiritual journey made to a sacral place. Over the past few weeks, the sinking of Joshimath in Uttarakhand, one of the four peeths established by Adi Shankaracharya, has dominated the news, for the wrong reasons. It has highlighted an unfortunate case of devotion leading to destruction. It’s time to rethink the idea of tirth yatras in the age of climate change.
Indiscriminate constructions to accommodate an increasing and unchecked number of pilgrims, all-weather motorways that make it possible to drive up to temple doors and endless helicopter service have made what should be a sober, joyous enterprise fraught with danger, discomfort and damage. If pilgrimages are, indeed, about introspection, faith and devotion, it now happens at warp speed — with consequences. There is a reason why many of these sacred places were established in places difficult to access. By making such journeys as easy as weekend getaways, both nature and humans pay the price. It is not that pilgrimages should be arduous treks. Where possible, efforts must be made to make the journey easier. But this must not come at the cost of spiritual and planetary solace. There is no harm in restricting the flow of human traffic to these sites. In fact, it would make the experience less banal, and make tirth sthaans more aesthetic destinations worthy of the spiritual and temporal oases they are meant to be.
When one enters a Gothic cathedral or an ancient temple, the place should not be inimical towards devotion. Pilgrimages, spiritual as they may be, cannot disregard the world’s physicality. Limits of access to the number of pilgrims, entry of motorised and airborne vehicles, and seasonal closures are options that need to be adopted to protect sacred places, and the planet they exist in.
Date:14-01-23
Bound supremacyParliamentary sovereignty isn’t undone by the basic structure doctrineEditorial
It is fairly well-known that parliamentary legislation is subject to two limitations under the Constitution of India. One is by judicial review, or the power of constitutional courts to review legislation for possible violation of any fundamental right. Another is that no amendment to the Constitution should have the effect of destroying any of its basic features. While the first limitation is set out in Article 13, under which laws inconsistent with or in derogation of fundamental rights are void, the second limitation is based on the ‘basic structure’ doctrine evolved by the Supreme Court. Vice-President Jagdeep Dhankhar’s remarks questioning the basic structure doctrine propounded in the landmark Kesavananda Bharati case (1973) does not reflect the correct position of law. In his view, the basic structure doctrine has usurped parliamentary sovereignty and goes against the democratic imperative that the elected legislature should reign supreme. His particular concern seems justified: that the Supreme Court prevented the National Judicial Appointments Commission, a body to appoint judges to the superior courts in the country, from coming into existence by striking down the relevant amendment to the Constitution and a parliamentary law to give effect to it. But it is difficult not to see his attack on the basic structure doctrine as part of the current dispensation’s tirade against the judiciary and its grievance that it does not have enough say in the appointment of judges.
The idea that the basic structure doctrine undermines parliamentary sovereignty is simply wrong. Parliament is sovereign in its domain, but it is still bound by the limitations imposed by the Constitution. Mr. Dhankhar seems to have a problem with any sort of limitation on Parliament’s jurisdiction to amend the Constitution. Surely, he could not have forgotten that the basic structure doctrine had helped save the Constitution from being undermined through the misuse of parliamentary majority. The main purpose of the doctrine is to ensure that some fundamental features of the Constitution are not legislated out of existence. It has been invoked to strike down amendments only in a few cases, but many others have survived basic structure challenges. Parliamentary majority is transient, but essential features of the Constitution such as the rule of law, parliamentary form of government, separation of powers, the idea of equality, and free and fair elections ought to be perennially protected from legislative excess. It may be open to a new Constituent Assembly to come up with another constitution that changes these fundamental concepts, but a legislature formed under the current Constitution cannot be allowed to change its core identity.
Date:14-01-23
घाटे का व्यापारसंपादकीय
अंततः यह आशंका सही सिद्ध हुई कि चीन के साथ व्यापार घाटा सौ अरब डालर को पार कर सकता है। ताजा आंकड़े बता रहे हैं कि बीते वर्ष भारत-चीन के बीच 135 अरब डालर का जो द्विपक्षीय कारोबार हुआ, उसमें जहां चीन से होने वाला आयात 118 अरब डालर रहा, वहीं भारत की ओर से उसे किया जाने वाला निर्यात 17 अरब डालर तक ही सीमित रहा। यह पहली बार है, जब चीन के साथ भारत का व्यापार घाटा सौ अरब डालर के आंकड़े को पार कर गया। यह इसलिए विशेष चिंता का विषय है, क्योंकि ऐसा मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत अभियान के बाद भी हुआ। इसका सीधा अर्थ है कि इसकी गहन समीक्षा करनी होगी कि ये दोनों अभियान अपेक्षा पर खरे क्यों नहीं उतर पा रहे हैं? इसी के साथ यह भी देखना होगा कि उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजना यानी पीएलआइ स्कीम वांछित परिणाम क्यों नही दे पा रही है? चीन जिस तरह भारतीय हितों को चोट पहुंचाने के साथ सीमा पर आक्रामक रवैया अपनाए हुए है, उसे देखते हुए यह आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य है कि वहां से आने वाली सामग्री पर निर्भरता कम की जाए।
निःसंदेह जहां सरकार को यह देखना होगा कि चीन से व्यापार घाटा बढ़ता क्यों जा रहा है, वहीं उद्योग जगत को भी यह समझना होगा कि इस घाटे के लिए एक बड़ी हद तक वही जिम्मेदार है। हमारे उद्योग जगत को चीनी वस्तुओं पर अपनी निर्भरता कम करने के लिए कमर कसनी होगी। समझना कठिन है कि जिस तरह खिलौना उद्योग में चीन के प्रभुत्व को चुनौती दी गई, उसी तरह अन्य क्षेत्रों में क्यों नहीं दी जा सकती और वह भी ऐसे समय जब विश्व के अनेक देश चीनी उत्पादों पर अपनी निर्भरता कम करना चाहते हैं। अच्छा हो कि भारतीय उद्योगपति इस अवसर का लाभ उठाएं। वे ऐसा करने में तभी सक्षम हो सकते हैं, जब तकनीक का उपयोग करने के साथ अपनी उत्पादकता बढ़ाने और साथ ही अपने उत्पादों की गुणवत्ता सुधारने पर अतिरिक्त ध्यान देंगे। यदि भारत को वास्तव में विकसित देश बनना है तो एक ओर जहां चीनी उत्पादों पर निर्भरता कम करनी होगी, वहीं दूसरी ओर विश्व बाजार में उसके उत्पादों से प्रतिस्पर्द्धा भी करनी होगी। इसका कोई औचित्य नहीं कि भारतीय उद्योगपति वे वस्तुएं भी चीन से मंगाएं, जिन्हें देश में बनाया जा सकता है। यह ध्यान रहे कि एक समय दवाओं में उपयोग होने वाला कच्चा माल यानी एपीआइ भारत में ही तैयार होता था, लेकिन धीरे-धीरे वह चीन में बनने लगा और फिर भारतीय फार्मा उद्योग उसे वहीं से मंगाने लगा। आज स्थिति यह है कि हमारा फार्मा उद्योग चीनी एपीआइ पर निर्भर है। यह समझ आता है कि कच्चा माल चीन से आए, लेकिन इसका कोई अर्थ नहीं कि तैयार माल भी वहीं से आए।
Date:14-01-23
प्रकृति से खिलवाड़ का परिणामविजय क्रांति, ( लेखक वरिष्ठ पत्रकार और सेंटर फार हिमालयन एशिया स्टडीज एंड एंगेजमेंट के चेयरमैन हैं )
उत्तराखंड के चमोली जिले का जोशीमठ दुखद कारणों से खबरों में है। वहां घरों, गलियों और सड़कों में दरारें पड़ने और उसके चलते उपजी दहशत में फंसे लोगों ने पूरे देश का ध्यान खींचा है। अभी तक 600 से ज्यादा घर जमीन बैठ जाने या दरारें पड़ने के कारण असुरक्षित घोषित किए जा चुके हैं और उनमें रह रहे लोगों को सुरक्षित स्थानों पर स्थानांतरित किया जा चुका है। 1976 में भी जोशीमठ में जमीन धंसने का बड़ा हादसा हुआ था। इसी तरह दो साल पहले फरवरी 2021 में यहां की धौलीगंगा नदी में हिमस्खलन के कारण बनी झील के अचानक फूटने से वहां का जलविद्युत संयंत्र बुरी तरह तबाह हो गया था। इस दुर्घटना में 35 कर्मी मारे गए थे और जोशीमठ के आसपास के इलाके को भारी नुकसान हुआ था। वैज्ञानिक तथा औद्योगिक अनुसंधान परिषद के अनुसार 2009 से 2012 के बीच इस इलाके में 128 स्थानों पर भूस्खलन की घटनाएं हुईं।
जोशीमठ का शंकराचार्य से विशेष नाता है। ज्योतिर्मठ होने की अपनी विशेष पवित्रता के कारण ही इस नगर को अपना नाम जोशीमठ मिला। इसके अलावा दो नदियों धौलीगंगा और अलकनंदा तथा दो उपनदियों कर्मनाशा और ढकनाला से घिरा जोशीमठ निकटवर्ती बदरीनाथ, हेमकुंड साहिब और स्कीइंग का अंतरराष्ट्रीय आकर्षण बन चुके औली के लिए मुख्य द्वार जैसा है। इस कारण हर साल लाखों भक्तों, पर्वतारोहियों और शीतकालीन खेल प्रेमियों के लिए जोशीमठ एक मुख्य पड़ाव बन चुका है। इसके अलावा भारत-तिब्बत सीमा पर लगातार बढ़ते हुए चीनी खतरे के कारण भी यह इलाका भारतीय सेना की गतिविधियों का पहले से कहीं अधिक सक्रिय केंद्र बन गया है।
हालांकि, जोशीमठ अकेला ऐसा स्थान नहीं है जहां भूमि के धंसने और भूस्खलन की घटनाएं हो रही हैं। लद्दाख से लेकर अरुणाचल प्रदेश तक के लगभग चार हजार किलोमीटर लंबे हिमालय क्षेत्र में ऐसी घटनाएं होती रहती हैं, लेकिन यह भी सच है कि जोशीमठ जैसे बड़े और महत्वपूर्ण शहर में इतने बड़े पैमाने पर भूमि का टूटकर धंसते जाना बहुत भयावह और चिंता का विषय है। इसलिए हैरानी की बात नहीं कि इतनी गंभीर घटना पर कई तरह की और परस्पर विरोधी टिप्पणियां देखने को मिल रही हैं। गंभीरता का आलम यह रहा कि प्रधानमंत्री कार्यालय भी इस आपदा पर सक्रिय हो गया। जैसा कि ऐसे मौकों पर अक्सर होता है, राज्य सरकार का प्रशासन, राजनीतिक दल और उनके नेता, आंदोलनकारी संगठन और पीड़ित परिवारों के लोग अपनी-अपनी तरह से प्रतिक्रिया देने और मांगें रखने में जुटे हुए हैं। एक वर्ग है जो इस पूरी घटना को विशुद्ध रूप से एक प्राकृतिक आपदा बता रहा है और अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़कर राहत कार्य के लिए यश पाने को लालायित है। कई राजनीतिक पार्टियां और उनके नेता भी इस अवसर को अपनी-अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने के मौके की तरह भुनाने में व्यस्त हैं। ऐसे मौकों पर कुकुरमुत्तों की तरह उग आने वाले संगठनों और विशेषज्ञों की भी जोशीमठ और उत्तराखंड में भरमार हो गई है। इनमें से कुछ तो अपनी विशेषज्ञता का लोहा मनवाने में जुटे हुए हैं और कुछ ऐसे भी हैं, जो अपने एक खास एजेंडे को आगे बढ़ाने के लिए भारतीय सेना की गतिविधियों पर अंकुश लगवाने और सैनिक उपयोग के लिए बनाई जा रही सड़कों के निर्माण को रुकवाने का अभियान छेड़े हुए हैं। एक संगठन इस पूरी आपदा का ठीकरा भारत सरकार के विद्युत उत्पादन उपक्रम एनटीपीसी के सिर फोड़ने पर आमादा है। ऐसी हालत में आवश्यक हो जाता है कि इस आपदा के सभी संभावित पहलुओं पर गंभीरता से विचार किया जाए, ताकि इस समस्या का कोई दूरगामी हल निकाला जा सके।
सबसे पहले समझने वाली बात यह है कि जोशीमठ उस हिमालय का हिस्सा है, जो धरती का सबसे ऊंचा, लेकिन सबसे नया पर्वत है। लगभग चार या पांच करोड़ साल पहले धरती के दो विशाल महाद्वीपों भारत और यूरेशिया के आपसी टकराव से उभरा हिमालय अभी भी विकसित हो रहा है और बहुत धीमी गति से हो रहे खिसकाव की प्रक्रिया अभी भी यहां जारी है। दोनों खंडों के बीसियों मिलन स्थलों पर निरंतर बदलते हुए दबाव के कारण इस क्षेत्र में भूकंप आते हैं और धरती फटती रहती है। जोशीमठ ऐसे ही एक मिलन स्थल पर है। भूगर्भ विज्ञानियों के अनुसार जोशीमठ भूकंप की सबसे अधिक आशंका वाले जोन-5 में पड़ता है, जिस कारण वह भूगर्भीय दुर्घटनाओं का अपेक्षाकृत अधिक शिकार बनता है। तीसरी बात यह है कि जोशीमठ का इतिहास बताता है कि यह 19वीं शताब्दी में एक विशाल भूस्खलन से पैदा हुए मलबे के ढेर पर बसा हुआ है, जिसकी जमीन कमजोर और अस्थिर है। आसपास की नदियों और नालों तथा भूगर्भ में बहती जलधाराओं के कारण यहां की मिट्टी में धंसते रहने की प्रकृति सामान्य से बहुत अधिक है, लेकिन दुर्भाग्य से व्यापारिक दृष्टि से लाभदायक स्थान पर होने के कारण न तो यहां बसने वाले लोगों ने, न होटल-रेस्टोरेंट खोलने वालों ने और न ही यहां के प्रशासकों ने कभी इस बात पर ध्यान दिया कि यहां बसाहट को बहुत सीमित रखा जाए। यहां तक कि स्थानीय भूगर्भीय जलधाराओं की मैपिंग का भी कभी प्रयास नहीं किया गया। कुछ साल पहले जब बदरीनाथ, हेमकुंड साहिब और औली की लोकप्रियता के कारण यहां होने वाले ट्रैफिक जाम से निजात के लिए जोशीमठ बाईपास सड़क की योजना बनी, तब इसी शहर के कुछ संगठनों ने अपना व्यापार घटने के डर से आंदोलन चलाकर ट्रैफिक को अपनी तंग सड़कों से ही चलाते रहने का फैसला करा लिया था। आज यहां के घर, होटल और रेस्टोरेंट के बोझ तले जब यहां की जमीन दरक रही है, तब कई लोग भूमि धंसाव के लिए एनटीपीसी और सेना के सीमा सड़क संगठन पर दोष मढ़ने में जुटे हुए हैं। दुर्भाग्य से शिमला, धर्मशाला और मनाली जैसे कई हिमालयी शहरों के अनियोजित फैलाव की हालत जोशीमठ से बहुत अलग नहीं है। इसलिए जोशीमठ का दुर्भाग्यपूर्ण अध्याय यह सिखाता है कि विकास की अंधी दौड़ में शामिल होने वालों, खासतौर से हिमालयी क्षेत्र के निवासियों, वहां के प्रशासकों और नीति-निर्माताओं को इस बात का ध्यान रखना होगा कि धरती पर उतना ही बोझ लादा जाए, जितना वह झेल सकती है।
Date:14-01-23
एकजुटता ही उपायसंपादकीय
दुनिया अस्थिरता का संकट झेल रही है और यह स्थिति कब तक बनी रहेगी कोई नहीं जानता। इन हालात से बाहर आने का एक ही उपाय है विभिन्न राष्ट्रों की एकजुटता । प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का यह आह्वान कितना सामयिक है कि विकासशील देशों को साथ आकर वैश्विक, राजनीतिक और वित्तीय प्रशासन की व्यवस्था को नये सिरे से तैयार करना चाहिए। इससे असमानता दूर होगी और अवसरों में वृद्धि होगी। वॉयस ऑफ ग्लोबल साउथ शिखर सम्मेलन में प्रधानमंत्री मोदी का जोर खाद्य, ईंधन और उर्वरकों की बढ़ती कीमतों, कोविड- 19 वैश्विक महामारी के आर्थिक प्रभावों के साथ-साथ जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न प्राकृतिक आपदाओं से निपटने में आपसी सहयोग को बढ़ावा देने पर ही केंद्रित रहा। उन्होंने नसीहत दी कि वैश्विक दक्षिण क्षेत्र को ऐसी G20 प्रणालियों एवं परिस्थितियों पर निर्भरता के चक्र से दूर ही रहना चाहिए जो अनुरूप नहीं हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण उत्पन्न आपदाओं से भी पूरी दुनिया त्रस्त रही है। वक्त की मांग है कि सरल, व्यावहारिक और टिकाऊ समाधान ढूंढें जाएं जो समाज और अर्थव्यवस्थाओं में बदलाव ला सकें। मोदी ने सबमें आशावाद की भावना का संचार किया और कहा कि हमारा समय आएगा। वक्त की जरूरत है कि हम सरल, पूरा करने योग्य और टिकाऊ समाधान ढूंढें जो समाज और अर्थव्यवस्थाओं में बदलाव ला सकें। विश्व में नई ऊर्जा का सृजन करने तथा चुनौतियों से निपटने के लिए प्रतिक्रिया, पहचान, सम्मान और सुधार के वैश्विक एजेंडे पर चलने की जरूरत है। सभी देशों की सम्प्रभुता का सम्मान, कानून का शासन और मतभेदों एवं विवादों का शांतिपूर्ण निपटारा करने तथा अधिक प्रासंगिक बने रहने के लिए संयुक्त राष्ट्र सहित अंतरराष्ट्रीय संस्थानों में सुधार की जरूरत है। उनका यह कहना कितना सटीक है कि जिन वैश्विक चुनौतियों के लिए हम कतई जिम्मेदार नहीं हैं उनके कारण ग्लोबल साउथ क्षेत्र का भविष्य सबसे अधिक दांव पर लगा है। 21वीं सदी में वैश्विक वृद्धि दक्षिण के इन देशों से आएगी। मैं समझता हूं कि अगर हम साथ मिलकर काम करते हैं तब हम वैश्विक एजेंडा तय कर सकते हैं। इन देशों की एकजुटता वक्त की फौरी जरूरत है, यूक्रेन संघर्ष के कारण उत्पन्न खाद्य एवं ऊर्जा सुरक्षा सहित विभिन्न वैश्विक चुनौतियों के कारण इन सबको अपनी चिंताएं साझा करनी ही होंगी।
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14 January 2023
प्रश्न–393 – नगरीय निकायों के समक्ष उपस्थित चुनौतियों का उल्लेख करते हुए उनके समाधानों के लिए किये जा रहे एवं किये जाने वाले उपायों की चर्चा कीजिये। (250 शब्द)
Question–393 – Mentioning the challenges before the urban bodies, discuss the measures being taken and to be taken for addressing them. (250 words)
नोट : इसका उत्तर आपको हमें नहीं भेजना है, यह आपके स्वयं के अभ्यास के लिए है।
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Date:13-01-23
It’s Really BasicVP’s right on judiciary’s overreach but SC’s basic structure doctrine must stay, it’s good for robust democracyTOI Editorials
In April 1973, a 13-judge bench of the Supreme Court in a 7:6 majority delivered the institution’s most consequential verdict. Known as the Kesavananda Bharati case, it declared that Parliament’s right to amend the Constitution is not unfettered. An amendment cannot violate the Constitution’s basic structure or fundamental architecture. The aftereffects still reverberate. On January 11, Vice-President Jagdeep Dhankhar in a speech questioned the basic structure doctrine. He said that the power of the Parliament to amend the Constitution and legislate is not subject to any other authority. In short, primacy of Parliament is inviolable.
The basic structure doctrine arose out of the working of the Constitution over two decades. The relevant article, 368, doesn’t clearly spell out the scope of Parliament’s amending power. At first, SC held that Parliament has unfettered power. Subsequent cases saw the emergence of dissenting views (Sajjan Singh vs State of Punjab) and in the Golak Nath case, the majority in an 11-judge bench held that fundamental rights cannot be abridged. Finally, in 1973 came the basic structure doctrine. It was not a bolt from the blue or usurpation of the powers of Parliament. Instead, it reflected the maturation of a democracy.
Take away the basic structure doctrine, the legislature could conceivably knock down the checks and balances that come through the separation of powers between the legislature, executive and judiciary. That would go against the tenor of the constituent assembly debates that had creation of a robust democracy as the main goal. Dhankhar identified SC’s 4:1 verdict in 2015, which invoked the basic structure doctrine to strike down NJAC, as an example of incorrect usage. This paper disagreed with that verdict and shares many of politicians’ critiques of the judiciary. However, that doesn’t make a case against the basic structure doctrine. Instead, it points to a need for the judiciary to tighten it.
The problem is that SC often interprets the basic structure doctrine loosely. This opens the door to the judiciary to stray into domains of the legislature and executive. And that creates enormous problems. But just as an ill-conceived law does not undermine the primacy of the legislature in making them, problematic judicial verdicts do not make a case against the basic structure doctrine. Many aspects of judicial functioning need change. The basic structure doctrine is not one of them.
Date:13-01-23
Remove Raj From Raj BhawansGovernors are necessary. But as recent controversies like those in Tamil Nadu demonstrate, they must be made accountable to not just the Union but the state and Rajya Sabha as wellLalit Panda, [ The writer is Senior Resident Fellow, Vidhi Centre for Legal Policy. This article partly draws on a forthcoming book on governors by Panda, Shankar Narayanan and Kevin James ]
Under the Government of India Act 1935, the British granted limited self-rule to Indian subjects. This was done at the level of the constituent territories of British India, the provinces. For these provinces, limited governments were formed from limited elections and were given limited powers that would not hamper British interests in India. The chief agent enforcing these limitations was the governor appointed by the British for each province.
It is now 2023, but why does this notion of governorship still seem familiar? Are state governors remnants of the British Raj? Are states like colonies under the Union’s thumb? Governors, who are all appointed and removed by the Union, seem to regularly foment federal tensions in opposition-governed states, or else are seen as symbols of Delhi’s yoke.
For example, opposition rallies in Maharashtra last month not only criticised the Shinde-Fadnavis government, but also called for the removal of governor Koshyari for insulting the state. And this month, the Tamil Nadu governor RN Ravi skipped portions of the text that the state government had prepared for his address at the new session of the legislative assembly though this address is meant to be the government’s statement of intent. Much may have changed since 1935, but it is important that we recognise exactly what has stayed the same.
Reform under the British Raj
British governors were permitted to act in a variety of ways that would be inconceivable for state governors under the Indian Constitution. To prevent serious threats to peace, protect the interests of minorities and civil servants, and execute the orders of the governorgeneral, governors of British provinces could overrule elected ministers, make laws and ordinances, appropriate revenues, restrict proceedings in the legislatures, dismiss a minister, or even dismiss the entire government and takeback the reins. They could withhold assent to any legislation at will and stall it. In appointing ministers, the governor could choose representatives from any community he wanted.
The British justified this by saying that the interests of the elected government had to be balanced with the interests of minorities and the need for an impartial civil service. They claimed that Indians were not ready for full democracy yet. So, the British governor would serve as a disinterested umpire who could look after public order, efficient governance and minority rights whenever democracy failed. The unstated premise though was that there was one interest in relation with which the governor remained very much interested: the British Raj itself.
Reform under the Indian Constitution
From the wide powers granted to governors in 1935, the Constituent Assembly shaved off a broad swathe that militated against state-level democracy. What remained in India’s new Constitution was a reduced role more traditional for nominal heads of state, with the powers of appointing ministers, summoning the legislature, assenting to Bills, and calling for President’s rule.
With the passage of time, however, governors increasingly became a medium through which the Union could interfere in state politics. This was done, for example, through the governor’s report calling for President’s rule in a state, though the Supreme Court put its foot down in 1994 and insisted that political questions had to be settled through votes of confidence in the state legislature. But even then, the governorcould influence the outcome of the vote by deciding which party would get the first chance to prove its majority.
What should be clear is that there is an irreducible role for a political umpire to play. No court can decide which party should get the first chance at a floor test because there is no underlying rule to decide that question. It is politics all the way down.
Heads of state have a legitimate role to play in handling political crises and cautioning elected governments while remaining disinterested in the fortunes of any political party. But this is far from the reality of governors today because they too are very much interested. Governors under the Constitution may not have as many toys to play with as British governors, but they still choose to play with them selfishly.
Reform towards responsibility
Heads of state may act with restraint in other jurisdictions, but India’s constitutional climate is driven by a local pressure system. The problem isn’t that state governors exist. Nor can more strict rules make the office responsible and dynamic. If experience has shown that today’s governors are beholden to Delhi, this is because successive Union governments have encouraged such expectations in the way they appoint and remove them.
Since these expectations show no sign of changing organically through a shift in political culture, they must be changed by putting in place new systems. As with other independent institutions, expectations must be set through the process of appointment while incentives are set through the process of removal.
British governors were appointed and removed by one power: the crown. But our Constitution recognises many powers. Through their appointments and removals, governors must be made accountable to the Union, the state and the Rajya Sabha. If they become an umpire all players in the game can count on, governors can remove the last whiff of colonialism that still hangs on them.
Date:13-01-23
Capital stalemateGovernance is the casualty in the conflict between CM and LG in DelhiEditorial
The victory of the Aam Aadmi Party in the recent Municipal Corporation of Delhi (MCD) elections has added a fresh backdrop to the unceasing face-off between the Lieutenant Governor of the National Capital Territory and the elected government. Several Governors, who are all too eager to further the Bharatiya Janata Party’s politics, confront elected Chief Ministers from Opposition parties, but Delhi’s case is unique, given the vast executive power at the command of the Lieutenant Governor. The most recent flashpoint between Chief Minister Arvind Kejriwal and Lieutenant Governor Vinai Kumar Saxena came ahead of the January 6 election of the Mayor and Deputy Mayor of the MCD, when Mr. Saxena appointed 10 aldermen and a BJP councillor to preside over the polls. The AAP alleged that Mr. Saxena had bypassed the tradition of appointing the senior-most councillor as the presiding officer. It has alleged that the aldermen appointed by Mr. Saxena were given voting rights in violation of the MCD Act, a question that remains unclarified. The party has pointed out that the Lieutenant Governor is ignoring the Council of Ministers and issuing orders to the bureaucracy directly on all matters, regardless of the division of power established by the Supreme Court between the two entities.
Technically, the Lieutenant Governor has executive control over only the three reserved subjects of police, public order and land; all other subjects (transferred subjects) lie with the elected government. But by virtue of being in control of the bureaucracy, and exercising the power to transfer, suspend or take any action against any employee of the Delhi government, the Lieutenant Governor’s authority extends beyond those. As its earlier interventions have not settled the dispute between the Lieutenant Governor and the elected government, the Supreme Court is currently examining the question afresh. Meanwhile, the relations between the Chief Minister and the Lieutenant Governor are sliding further. The Lieutenant Governor sought a meeting with the Chief Minister, but then refused to give him time. Till October, the Lieutenant Governor and the Chief Minister used to have weekly meetings. The Supreme Court’s calls for statesmanship and wisdom by actors have not resolved the stalemate, which is seriously impacting governance in the national capital. The heightened political competition between the AAP and the BJP has worsened the situation, but the root of it all is the legal ambiguity that needs to be dispelled.
Date:13-01-23
प्रजातंत्र का मतलब मात्र ‘बहुमत ही सत्य’ नहीं होतासंपादकीय
फ्रेंच राजनीतिक दार्शनिक टॉकविल ने अमेरिकी प्रजातंत्र के अध्ययन के बाद ‘बहुमत का आतंक’ के खतरे से सचेत किया था। कालांतर में इससे बचने के लिए प्रजातंत्र में चार मूल तत्वों को अपरिहार्य माना गया- बहुमत का शासन, अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा, संवैधानिक सरकार और विमर्श से शासन। इनमें से एक तत्व भी निकाल लें तो प्रजातंत्र ढह जाएगा। उपराष्ट्रपति और राज्यसभा के सभापति ने राज्य विधायिकाओं के पीठासीन अधिकारियों के सम्मलेन में एक नया सवाल खड़ा किया कि क्या सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के रहते हम खुद को प्रजातंत्र कह सकते हैं? यहां इस फैसले का हवाला दिया गया था- ‘केशवानंद भारती केस में कोर्ट ने ‘आधारभूत ढांचे’ का सिद्धांत देते हुए कहा था कि संसद को संशोधन का अधिकार तो है बशर्ते उससे संविधान का आधारभूत ढांचा न बिगड़े।’ दरअसल संसद में बने ‘कानून की भी सीमा है। इसी बात को इस फैसले में कोर्ट ने सिद्धांत के रूप में रखा था। जरा सोचिए, अगर संसद सर्वोपरि हो तो बहुमत के बल पर सरकारें जो कानून चाहें, बनवा सकती हैं। अगर संसद सुप्रीम है तो उसी बहुमत के आधार पर तो विधानसभाएं भी हैं। तो फिर गैर-भाजपा शासित राज्यों में राज्यपाल उनके द्वारा (यानी उनकी सरकारों द्वारा) बनाए कानून या फैसलों का दिन-रात विरोध क्यों करते हैं? अगर संसदीय प्रणाली संप्रभु है तो पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु, महाराष्ट्र, छत्तीसगढ़, केरल या दिल्ली में असेंबली द्वारा पारित कानूनों पर या विधायिका में बहुमत वाली सरकारों के फैसलों पर दिन-रात राज्यपाल से द्वंद्व क्यों ? प्रजातंत्र को केवल बहुमत तक सीमित करना इस अवधारणा को ही नकारना होगा।
Date:13-01-23
विदेशी विश्वविद्यालय देश के लिए कितने हानिकारक?अभय कुमार दुबे, ( अम्बेडकर विवि, दिल्ली में प्रोफेसर )
विदेशी विश्वविद्यालयों को भारत में परिसर खोलने देने के फैसले ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि भारतीय शिक्षा इधर कुआ, उधर खाई और बीच में गड्ढा वाली तीन-तरफा बदहाली में फंसी हुई है। एक तरफ स्तर के लिहाज से मामूली उच्च-शिक्षा देने वाले करीब एक हजार विश्वविद्यालयों और 42 हजार कॉलेजों से साल-दर-साल निकल रही बीए-एमए-पीएचडी डिग्रीधारी भीड़ है। बाजार में इसका एक बड़ा हिस्सा साधारण नौकरी पाने के काबिल भी नहीं माना जाता। यानी इसकी ‘एम्प्लॉयबिलिटी’ नगण्य है। दूसरी तरफ निजी क्षेत्र में चल रहे विश्वविद्यालयों की महंगी शिक्षा तक समाज के पांच से दस फीसदी अमीर तबके की ही पहुंच है। अब इसमें विदेशी विश्वविद्यालयों की महंगी शिक्षा भी जुड़ जाएगी। सरकारी क्षेत्र के प्रतिष्ठित समझे जाने वाले डीयू में अगर किसी छात्र को तीन साल के ग्रेजुएट कोर्स की खातिर पचास हजार रुपए तक देना पड़ते हैं तो निजी क्षेत्र के अशोका विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले धनी छात्रों को चार साल के कोर्स के लिए पच्चीस से तीस लाख रुपए का भुगतान करना होता है। कैम्ब्रिज, ऑक्सफर्ड और हार्वर्ड में दाखिले के लिए कितनी फीस देनी होगी, अंदाजा लगा लीजिए।
इस कुए और खाई के बीच के गड्ढों में धंसी हुई हमारी शिक्षा-व्यवस्था पर सरकारी जुमलेबाजी ने विश्व-गुरु बनने का दायित्व डाल रखा है। जाहिर है कि विश्व-बाजार में मलाईदार नौकरियां करने वाले गिने-चुने भारतीयों की नयी पीढ़ियां निजी और विदेशी परिसरों से निकलेंगी। सस्ते श्रम के रूप में उनकी खिदमत करने वाले ‘शिक्षित’ असंख्य भारतीयों की पीढ़ियां ऐसे विश्वविद्यालयों से निकलेंगी, जिन्हें सौ-सवा सौ साल पहले भारतीय शिक्षा के पश्चिमीकरण की प्रक्रिया के दौरान विभिन्न धार्मिक और जातीय समुदायों के नाम पर स्थापित किया गया था।
नई शिक्षा नीति के मुताबिक लिए गए इस फैसले के पक्ष में दी जा रही दलीलें मुख्य रूप से आर्थिक हैं। जैसे 2024 तक 18 लाख भारतीय छात्र विदेशों में शिक्षा प्राप्त करने के लिए जो आठ अरब डॉलर खर्च करने वाले हैं, उनका तीन-चौथाई हिस्सा बचाया जा सकेगा। इससे प्रतिभा पलायन भी रुक सकता है। सर्वाधिक हास्यास्पद तर्क यह है कि सरकारी क्षेत्र के विश्वविद्यालय विदेशियों से प्रतियोगिता करके अपना स्तर सुधार सकेंगे। हमारी विश्वविद्यालय प्रणाली की मामूली जानकारी रखने वाला व्यक्ति भी जानता है कि किसी जमाने में अकादमिक चमक रखने वाली ये संस्थाएं अब केवल प्रशासनिक इकाइयां बनकर रह गई हैं। कहना न होगा कि विश्वविद्यालय जैसी बड़ी संस्था चलाने के लिए एक प्रशासनिक ढांचे की जरूरत होती है, जो एक अकादमिक ढांचे की सेवा करता है। आजकल यह अकादमिक ढांचा उत्साहहीन अध्यापन और डिग्रियां बांटने तक सिमटकर रह गया है।
इस पतित स्थिति का सबसे बड़ा प्रमाण है पीएचडी या शोध-प्रबंध का गिरता स्तर। ऐसे शोध-प्रबंध दुर्लभ होते जा रहे हैं, जिनमें कोई नया निष्कर्ष निकाला गया हो। दरअसल, प्रबंध अंग्रेजी में लिखा गया हो या किसी भारतीय भाषा में- उसका पंजीकरण, उसके लिए सुपरवाइजर की नियुक्ति, उसके लिए होने वाला फील्डवर्क और अंत में उसे लिखे जाने के बाद उसकी जांच की प्रक्रिया में अकादमिक ईमानदारी, प्रतिभा और ज्ञान से चमकते हुए श्रम की भूमिका न के बराबर होती है। ऐसे उदाहरण भी देखने को मिल सकते हैं कि समाज-विज्ञान के क्षेत्र में पीएचडी करने वाले शोधार्थी को गणित या भौतिकी का प्रोफेसर ‘गाइड’ कर रहा हो। अगर कहीं कोई प्रतिभा बची हुई भी है तो वह शिक्षकों की नौकरियों की बंदरबांट होते समय कुम्हला जाती है। प्रवक्ता पद पर एक-एक नौकरी के लिए ऐसी-ऐसी राजनीतिक तिकड़में लगाई जाती हैं कि पढ़ने-लिखने वाले उम्मीदवार तक उनकी पहुंच असम्भव साबित होती है।
इससे बड़ी विडम्बना और क्या हो सकती है कि करीब डेढ़-दो सौ साल तक पश्चिमी विश्वविद्यालयों की नकल करने की हमारी कोशिश अब घोषित रूप से नाकाम हो गई है। जो हमारे आदर्श थे, वे अब हमारा मुंह चिढ़ाते हुए हमारे जेएनयू, बीएचयू, एएमयू या डीयू की बगल में अपना परिसर खोलेंगे। डॉलरों, पाउंडों और यूरो के रूप में मुनाफा कमाकर ये विदेशी विश्वविद्यालय फेमा कानून की शर्तों का पालन करते हुए अपने देश ले जाएंगे। और उनकी बेहतर कार्बन कॉपी बनने का दम भरने वाले खुद को निचले पायदान पर पाएंगे।
Date:13-01-23
अधिकार की सीमासंपादकीय
ऊपरी अदालतों में न्यायाधीशों की नियुक्ति को लेकर सरकार और सर्वोच्च न्यायालय के बीच तनाव खत्म नहीं हो रहा। किसी न किसी बहाने इस पर सरकार की तरफ से टिप्पणी आ ही जाती है। उपराष्ट्रपति ने एक बार फिर दोहराया कि राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग को लेकर बने कानून को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा खारिज किया जाना लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। उन्होंने कहा कि दुनिया में कहीं ऐसा नहीं देखा गया कि संसद द्वारा पारित कानून को किसी दूसरी संस्था ने रद्द कर दिया हो। लोकतंत्र के अस्तित्व के लिए संसद की स्वायत्तता और संप्रभुता सर्वोपरि है। इसके पहले भी उपराष्ट्रपति इस मुद्दे को रेखांकित कर चुके हैं। कुछ दिनों पहले कानून मंत्री ने भी तल्ख लहजे में कहा था कि अगर सर्वोच्च न्यायालय खुद ही अपनी नियुक्तियां करना चाहता है, तो फिर वह अपनी सिफारिशें भी हमारे पास न भेजे। दरअसल, सात साल पहले केंद्र सरकार ने संसद में संविधान संशोधन कर ऊपरी अदालतों में न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग के गठन का प्रावधान किया था। मगर सर्वोच्च न्यायालय ने उसे मानने से इनकार करते हुए खारिज कर दिया था। तभी से सरकार और अदालत के बीच तकरार की स्थिति बनी हुई है।
सरकार का तर्क है कि तमाम संवैधानिक संस्थाओं के सर्वोच्च और महत्त्वपूर्ण पदों पर नियुक्तियां सरकार करती है। उसी तरह सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति भी सरकार की सहमति से होनी चाहिए। पहले ऐसा ही हुआ करता था। उसी के मद्देनजर राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग का प्रावधान किया गया। मगर सर्वोच्च न्यायालय ने इसे संविधान की मूल भावना के अनुरूप न मानते हुए खारिज कर दिया था। सर्वोच्च न्यायालय को आशंका है कि अगर न्यायाधीशों की नियुक्ति में राजनीतिक हस्तक्षेप बढ़ेगा, तो न्याय प्रक्रिया में बाधा पहुंचेगी और उचित न्याय की संभावना क्षीण होगी। कालेजियम प्रणाली इसीलिए बनाई गई थी कि न्यायाधीशों की नियुक्ति में राजनीतिक हस्तक्षेप बढ़ना शुरू हो गया था, जिसे लेकर अंगुलियां उठने लगी थीं। मगर इस प्रणाली को लेकर भी कहा जाता है कि चूंकि जज ही जजों की नियुक्ति करते हैं, इसलिए उसमें भाई-भतीजावाद चल पड़ा है। इससे मुक्ति का रास्ता निकालना चाहिए। मगर वह रास्ता क्या हो, इस पर कोई आमराय बन नहीं पा रही। सरकार अपने ढंग से नियुक्ति चाहती है और अदालत को वह तरीका पसंद नहीं। हालांकि कालेजियम प्रणाली के तहत होने वाली नियुक्तियों में भी सरकार के पास नाम भेजे जाते हैं और वह उनमें से वरिष्ठता आदि को ध्यान में रख कर कुछ नामों पर मंजूरी देती है।
मगर अब सरकार अदालत के सुझाए नामों को मंजूरी देने के बजाय लंबे समय तक चुप्पी साध लेती देखी जाती है। इसे लेकर सर्वोच्च न्यायालय कई बार नाराजगी जता चुका है। जहां तक कानून को रद्द करने की बात है, विशेषज्ञ कहते हैं कि सर्वोच्च न्यायालय को संसद द्वारा बनाए कानूनों की समीक्षा करने और उनके किसी भी रूप में संविधान की मूल भावना के अनुरूप न होने पर उन्हें रद्द करने का अधिकार है। इसलिए संसद की स्वायत्तता और संप्रभुता का तर्क पूरी तरह ठीक नहीं माना जा रहा। सर्वोच्च न्यायालय का कर्तव्य है कि वह संविधान की मूल भावना की रक्षा करे। यह पहली बार नहीं है, जब किसी कानून के औचित्य पर उसने सवाल उठाए। दोनों के अधिकार अपनी जगह हैं, पर उनकी तकरार से आम लोगों में जो संदेश जा रहा है, वह भी ठीक नहीं।
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21वीं शती के पहले दो दशकों के दौरान गूगल, अमेज़ान, मेटा, एप्पल और माइक्रोसॉफ्ट जैसी कंपनियाँ नवोन्मेष और मूल्य सृजन में सबसे आगे रही हैं। डिजिटल विज्ञापन, क्लाउड इंफ्रा, कॉमर्स मैसेजिंग आदि में ये कंपनियां चीनी कंपनियों के साथ दबदबा बनाए हुए थीं। इसके विपरीत, भारत ने डिजिटल पब्लिक इंफ्रास्ट्रक्चर (डीपीआई) को अपनाया। इसने भारत को निजी क्षेत्र के नवाचार और प्रतिस्पर्धा में एक छलांग लगाने का मौका दिया है।
ये सार्वजनिक डिजिटल प्लेटफार्म ओपन सोर्स हैं। इनके पास ओपन एप्लीकेशन प्रोग्रामिंग इंटरफेस हैं। साथ ही इंटरोऑपरेबिलिटी (कंप्यूटर सिस्टम और सॉफ्टवेयर एक्सचेंज के साथ सूचनाओं के उपयोग की व्यवस्था) है। ये कम लागत और समावेशी प्लेटफार्म हैं, जो सहमति आधारित डेटा साझाकरण प्रोटोकॉल के मूल सिद्धांत पर आधारित हैं। भारत के इस प्लेटफार्म में शामिल हैं –
प्राप्त लाभ –
पूरी दुनिया में लगभग 4 अरब लोग ऐसे हैं, जिनकी कोई डिजिटल पहचान नहीं है। लगभग 1.5 अरब लोग बैंकों से जुड़े हुए नहीं हैं, और 133 देशों के पास कोई डिजिटल पेमेंट सिस्टम नहीं है। अब, जबकि भारत जी-20 समूह देशों की अध्यक्षता कर रहा है, उसके पास डिजिटल प्लेटफॉर्म का एक पूरा पैकेज बनाने का अनूठा अवसर है। इन्हें दुनिया को डिजिटल रूप से बदलने के लिए वितरित किया जा सकता है। भारत की सॉफ्ट पावर को बढ़ाने का इससे बेहतर तरीका नहीं हो सकता।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित अमिताभ कांत के लेख पर आधारित। 16 दिसम्बर, 2022
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Date:12-01-23
Reckless spreeAuthorities must heed science and people living near mines, dams.Editorial
The land subsidence in Joshimath has become emblematic of a geological disaster that has in fact manifested across India, in the neighbourhood of several large resource-extraction projects. There have been reports of subsidence from the Jharia, Bhurkunda, Kapasara, Raniganj and Talcher coal mines; from Delhi and Kolkata due to the over-extraction of groundwater; and from Mehsana for hydrocarbons. Last year, land in Chamba, Himachal Pradesh, began to sag shortly after a hydroelectric power project began test runs, calling into question the effects of the Tapovan Vishnugad facility near Joshimath in Uttarakhand. In 2010, some months after a tunnel-boring machine nicked an underground aquifer near Joshimath, leading to substantial water discharge, two researchers wrote in Current Science that the “sudden and large scale dewatering of the strata has the potential” to trigger “ground subsidence in the region”. Determining whether the ongoing incident can be traced directly to the 2009 aquifer puncture is complicated by the lack of long-term scientific investigations of the area. On January 5, the NTPC issued a statement washing its hands of the unfolding crisis after locals began pointing fingers at Tapovan Vishnugad, as well as the Helang-Marwari bypass as part of the Char Dham project. Scientists from the Council of Scientific and Industrial Research-National Geophysical Research Institute set out on January 10 to examine the circumstances of the subsidence. Both the national and the State governments must heed the team’s findings, even if it means ceasing further construction work.
Experts and civil society have called on the government on many occasions to ease its dam-building spree, of late over rivers in the north and the Northeast; to moderate tourism in the regions to be sustainable; and to not blow off unstable hillsides to widen roads. Heavy rains in Aizawl in July triggered subsidence, exposing poor zoning enforcement and oversight of the regional carrying capacity. But in Joshimath, which is particularly prone to landslides, questions about zoning, carrying capacity and tipping points have all been set aside. The subsidence in Joshimath has captured the nation’s attention because it is a destination for both pilgrims and tourists, but it is far from being the site of the first or the deadliest incident. The government must undertake whatever repair and restoration efforts it is undertaking at Joshimath at all the other sites as well. Finally, the national and the State governments must listen to both science and the people already living near mines and dams. There is an argument to allow economically developing countries to emit more before becoming carbon-neutral, but it is not a free pass to plunder natural resources at the cost of climate justice.
Date:12-01-23
संघ प्रमुख के बयान को पूर्णता में देखना चाहिएसंपादकीय
आरएसएस प्रमुख ने एक इंटरव्यू में कहा कि ‘एक हजार साल से विदेशी आक्रांताओं से लड़ता हिन्दू अब जाग गया है। थोड़ी उग्रता स्वाभाविक है। इसका उपयोग हम अंदर की लड़ाई पर विजय पाने में करें… हिन्दू धर्म सबको साथ लेकर चलता है । इस्लाम को दे में कोई खतरा नहीं… आज जो मुसलमान हैं उन्हें कोई नुकसान नहीं। लेकिन उन्हें ‘हम बड़े हैं… एक समय राजा थे’ ये भाव छोड़ना होगा। ऐसा सोचने वाला कोई हिन्दू है तो उसे भी ये भाव छोड़ना पड़ेगा।’ इन वाक्यों को अलग-अलग कर देखने में कुछ लोग उग्रता को स्वाभाविक मान सकते हैं, लेकिन इन वाक्यों को पूर्णता में देखना होगा। संघ प्रमुख ने यह भी कहा है कि इसे अंदर की लड़ाई पर विजय के लिए इस्तेमाल करें। अंदर की लड़ाई यानी जातिवाद, संकीर्ण मानसिकता, दलित-प्रताड़ना और ऊंच-नीच के भेदभाव। उन्होंने मुसलमानों को अपने हर बयान में आश्वस्त किया, लेकिन सलाह दी कि वे अपने में बड़ा होने का भाव न रखें और ये न सोचें कि एक जमाने में वे शासक थे। इन बयानों के अंदर छिपे भाव को गौर से देखें तो ये सांप्रदायिक सौहार्द्र को मजबूत करने का एक बड़ा संदेश हैं। उन्होंने उसी तरह के सुधार हिन्दुओं की सोच में लाने की वकालत की है। आज जिस तरह के विभेद भारतीय समाज में धार्मिक वैमनस्यता पैदा कर रहे हैं, उसमें यह जरूरी है कि संघ प्रमुख का संदेश सही परिप्रेक्ष्य में और पूर्णता के साथ हिन्दू-मुसलमान दोनों के बीच जाए। ये न समझा जाए कि उन्होंने उग्रता को सही ठहराया है। यहां उग्रता विदेशी आक्रांताओं के जुल्म के सन्दर्भ में है जो मूलतः सुधारात्मक है।
Date:12-01-23
सरकारों के साथ राज्यपालों की बढ़ रही है तकरारराजदीप सरदेसाई, ( वरिष्ठ पत्रकार )
एक राष्ट्रीय राजधानी में सर्वाधिक संख्या में राजनीतिक वीवीआईपी होते हैं, लेकिन दिल्ली का बिग बॉस कौन है? क्या दिल्ली की यूनियन टेरिटरी को केंद्रीय गृह मंत्रालय नियंत्रित करता है? और क्या एक निर्वाचित मुख्यमंत्री के बजाय केंद्र के प्रतिनिधि के रूप में वहां विराजित लेफ्टिनेंट गवर्नर या एलजी ही सर्वोच्च सत्ता है? हालिया विवाद दिल्ली के एलजी वीके सक्सेना और मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के बीच मेयर के चुनाव को लेकर उपजी तकरार से जुड़ा है। एलजी के द्वारा दिल्ली म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन में एल्डरमेन की नियुक्ति की गई। उन्होंने राज्य सरकार को दरकिनार करते हुए अपनी पसंद के प्रिसाइडिंग ऑफिसर को भी चुना। इससे भाजपा और ‘आप’ के पार्षदों में तनातनी की स्थिति निर्मित हो गई।
‘आप’ के द्वारा आरोप लगाए गए हैं कि क्या एलजी दोनों पक्षों के बीच न्यूट्रल अम्पायर की भूमिका निभाने के बजाय एक पक्ष के बारहवें खिलाड़ी की भूमिका निभा रहे हैं और निर्वाचित सरकार के अधिकारों में हस्तक्षेप कर रहे हैं? गवर्नमेंट ऑफ नेशनल कैपिटल टेरिटरी ऑफ देल्ही एक्ट 1992 के तहत पुलिस, लोकव्यवस्था और भूमि सम्बंधी मामलों के अलावा शेष में एलजी से अपेक्षित है कि वे मंत्रिपरिषद के सहायक व सलाहकार की भूमिका का निर्वाह करेंगे। यहां एलजी के सहायक व सलाहकार होने की उचित संवैधानिक व्याख्या यही की जा सकती है कि कार्यपालिका की शक्तियां निर्वाचित सरकार में निहित होंगी। लेकिन मार्च 2021 में भाजपा के बहुमत वाली संसद ने तुरत-फुरत में इस एक्ट में संशोधन करवा दिए, जिसके बाद निर्वाचित सरकार की निर्णय-क्षमता और स्वायत्तता घट गई और स्टेट कैबिनेट के लगभग हर निर्णय पर एलजी की सुपरवाइजरी शक्तियों में इजाफा हो गया। ये संशोधन एलजी को एडमिनिस्ट्रेटर का दर्जा देते हैं, जिसका यह मतलब है कि वे सरकार के निर्णयों को बायपास भी कर सकते हैं।
पिछले साल वीके सक्सेना के एलजी बनने के बाद लगभग हर मसले पर उनका केजरीवाल सरकार से सार्वजनिक टकराव रहा है। एलजी ने राजधानी की प्रशासनिक कमान सम्भाल ली है। ब्यूरोक्रेसी का रिपोर्टिंग-स्ट्रक्चर भी अब सीधे एलजी ऑफिस की ओर हो गया लगता है। अधिकारीगण अकसर मुख्यमंत्री और उनकी कैबिनेट को भी दरकिनार कर देते हैं। यह संवैधानिक लोकतंत्र के लिए विडम्बना ही है कि तीन बार के निर्वाचित मुख्यमंत्री को एक गैर-निर्वाचित सरकारी पदासीन का अधीनस्थ बना दिया गया है। अगर केजरीवाल सरकार को इस तरह से अशक्त बना दिया जाएगा तो अपने चुनावी वादों को पूरा नहीं कर पाने की स्थिति में उन्हें कैसे जवाबदेह ठहराया जा सकेगा? बीते आठ सालों से केंद्र सरकार और केजरीवाल के बीच रस्साकशी चलती आ रही है। चुनावों ने बताया है कि केजरीवाल ही दिल्ली के नम्बर एक नेता हैं। ‘आप’ ने स्थानीय मोहल्ला स्तर पर गहरी पैठ बनाई है और भाजपा अनेक प्रयास करने के बावजूद केजरीवाल को डिगा नहीं सकी है। ऐसे में एलजी के जरिए ही ‘आप’ की नेतृत्वशीलता में सेंध लगाना सम्भव है। पूरे देश में यह पैटर्न देखा जा रहा है।
इसी सप्ताह तमिलनाडु के राज्यपाल आरएन रवि ने एक स्पीच देकर राज्य की विधानसभा से बहिर्गमन किया, जो कि अभूतपूर्व घटना थी। वे विधेयकों को लम्बित किए हुए हैं और बहुत समय से राजनीतिक बयान देते आ रहे हैं। उन्होंने तमिलनाडु का नाम तक बदलने की बात कह दी थी। केरल में राज्यपाल आरिफ मोहम्मद खान की मुख्यमंत्री पी. विजयन से तू-तू-मैं-मैं चलती ही रहती है। पंजाब में राज्यपाल ने विधानसभा का विशेष सत्र बुलाने से इनकार कर दिया। महाराष्ट्र में राज्यपाल बीएस कोशियारी पर आरोप लगा था कि उन्होंने शिवसेना के विद्रोही धड़े का समर्थन करते हुए नई सरकार के गठन में फुर्ती दिखाई थी, जबकि सर्वोच्च अदालत में दलबदल याचिकाएं लम्बित थीं। तेलंगाना में मुख्यमंत्री केसीआर और राज्यपाल तमिलसाई सुंदरराजन के बीच तनातनी जारी रहती है। 2009 से 2022 के दरमियान जगदीप धनखड़ पश्चिम बंगाल के राज्यपाल थे और इस दौरान मुख्यमंत्री ममता बनर्जी से उनका निरंतर टकराव होता रहा। बीते साल उन्हें उपराष्ट्रपति बना दिया गया। एक द्रमुक प्रवक्ता ने इस पर कटाक्ष किया था कि इसने एक मिसाल कायम कर दी है, अगर कोई राज्यपाल गैर-भाजपाई राज्य सरकारों को खुलेआम चुनौती देगा तो उसे इसका पुरस्कार अवश्य दिया जाएगा! देश में कुछ राज भवनों में निवासरत गैर-निर्वाचित संवैधानिक पदासीनों के द्वारा जिस तरह के राजनीतिक पक्षपात का प्रदर्शन किया जा रहा है, वह लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं के लिए चिंता का विषय बन गया है।
Date:12-01-23
जनगणना की जिम्मेदारी पूरी करना अब जरूरी हैविराग गुप्ता, ( लेखक और वकील )
बिहार में जातिगत गणना के खिलाफ पीआईएल पर सुप्रीम कोर्ट में अगले हफ्ते सुनवाई होगी। संविधान की सातवीं अनुसूची और 1948 के कानून के अनुसार जनगणना कराने का अधिकार केंद्र सरकार को ही है। लेकिन ओबीसी के बारे में आयोग बनाने के साथ सामाजिक-आर्थिक सर्वे कराने के बारे में राज्य सरकारों को हक हासिल है। बिहार से पहले कर्नाटक में 2014 में जातिगत जनगणना हो चुकी है। समान नागरिक संहिता पर कानून बनाने का केंद्र को हक है। लेकिन इस बारे में कई राज्यों में बनाई गई समितियों को सुप्रीम कोर्ट ने हरी झंडी दिखा दी है। हर 10 साल में कराई जाने वाली जनगणना को 2021 में पूरा करने में केंद्र सरकार विफल रही है। इसलिए बिहार की जातिगत गणना का राज्य के भाजपा नेता भी विरोध नहीं कर पा रहे। केंद्रीय जनगणना को टालने और राज्यों में जातिगत गणना से उपजे विवादों के चार पहलुओं को समझना जरूरी है।
1. संसाधनों की बर्बादी : ओबीसी की 52 फीसदी आबादी को 27 फीसदी आरक्षण का लाभ देने के लिए मंडल आयोग ने अविभाजित भारत की सन् 1931 की जनगणना को आधार माना था। उसके बाद से इस मामले पर तथ्यपरक काम के बजाय वोट बैंक की राजनीति और मुकदमेबाजी हो रही है। पिछली बार 2011 की जनगणना में ओबीसी की गणना के लिए जाति के कॉलम को शामिल करने पर तत्कालीन गृहमंत्री चिदम्बरम ने वीटो लगा दिया था। उसके बाद चलताऊ तरीके से ग्रामीण विकास और आवास मंत्रालयों के माध्यम से सामाजिक-आर्थिक सर्वे किया। आधार और वोटर लिस्ट अपडेट हो रही है। जन्म और मृत्यु के रजिस्ट्रेशन की वजह से जनगणना के अनुमानित आंकड़े भी उपलब्ध हैं। इसलिए बड़ी जरूरत शैक्षणिक, आर्थिक और सामाजिक सर्वेक्षण की है। केंद्र और राज्य की सरकारें सभी तरह के आंकड़ों को साझा और सार्वजनिक करें तो सरकारी कर्मचारियों की सरदर्दी कम हो सकती है।
2. मुकदमेबाजी : अदालतों से अनुच्छेद-15, 16 और 343 की व्याख्या से शैक्षणिक, सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन के नए वर्गीकरण हो रहे हैं। संविधान के 103वें संशोधन से ईडब्ल्यूएस के आरक्षण को सुप्रीम कोर्ट की मान्यता के बाद 99 फीसदी आबादी आरक्षण के दायरे में आने से 50 फीसदी लिमिट पार होना तय है। रोहिणी आयोग की अंतरिम रिपोर्ट के अनुसार ओबीसी की 2633 जातियों में से 983 को आरक्षण का लाभ नहीं मिलने पर उपजातियों की गणना की बात होने लगी है। स्थानीय निकायों में आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट के ट्रिपल टेस्ट फॉर्मूले को लागू करने के लिए राज्यों के पास आंकड़े नहीं हैं। गवर्नेंस से जुड़े मामलों के बजाय वोट बैंक के मामलों में मुकदमेबाजी बढ़ने से न्यायिक सिस्टम चरमरा रहा है।
3. प्रवासी वोटर और पीडीएस : जनसंख्या के आधार पर वित्त आयोग राज्यों के लिए संसाधन आवंटित करता है। खाद्य सुरक्षा कानून के तहत आबादी के अनुसार राज्यों को सस्ता अनाज मिलता है। नई जनगणना नहीं होने से लगभग 12 करोड़ गरीब पीडीएस के लाभ से वंचित हो सकते हैं। आम चुनावों के पहले सरकारी पदों में बम्पर भर्ती में आरक्षण लागू करने के लिए भी नवीनतम डाटा जरूरी है। चुनाव आयोग के रिमोट ईवीएम पर हो रही चर्चा के अनुसार देश में 45 करोड़ लोग प्रवासी हैं। दूसरे राज्यों में बसी इस प्रवासी आबादी को किस राज्य का माना जाए? इस सवाल के जवाब से संसद और राष्ट्रपति चुनावों में राज्यों का दबदबा बदल सकता है।
4. संसद में राज्यों का प्रतिनिधित्व : फिलहाल 2001 की पुरानी जनगणना के अनुसार ही संसद में राज्यों का प्रतिनिधित्व है। 84वें संविधान संशोधन के अनुसार 2021 की जनगणना के अनुसार 2026 में विधानसभा और संसद की सीटों के परिसीमन का प्रावधान है। उस बड़ी संवैधानिक कवायद के बाद ही 2029 के आम चुनाव होने चाहिए। नए साल की शुरुआत में राम मंदिर के निर्माण की तारीख की घोषणा और बिहार में जातिगत जनगणना की शुरुआत से अगले आम चुनावों के लिए धर्म और जाति का एजेंडा सेट-सा लगता है। जाति और धर्म के नाम पर वोटबैंक और अफवाहों की सियासत को खत्म करने के लिए जनगणना के अधिकृत और वैज्ञानिक आंकड़े जरूरी हैं। राष्ट्रीय जनगणना का संवैधानिक उत्तरदायित्व पूरा हो ताे बिहार समेत अन्य राज्यों में जाति-गणना का रिवाज कम होगा। वोटबैंक और अफवाहों की सियासत को खत्म करने के लिए जनगणना के अधिकृत और वैज्ञानिक आंकड़े जरूरी हैं। जनगणना का दायित्व पूरा हो ताे बिहार समेत अन्य राज्यों में जाति-गणना का रिवाज कम होगा।
Date:12-01-23
विकासशील देशों की आवाज बनता भारतविवेक देवराय और आदित्य सिन्हा, ( देवराय प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद के अध्यक्ष और आदित्य सिन्हा प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद में अपर निजी सचिव (अनुसंधान) हैं )
विकसित देशों ने संसाधनों के मामले में विकासशील देशों के साथ पारंपरिक रूप से अन्याय ही किया है। इसने दुनिया के इन दोनों ध्रुवों के बीच असमानता की खाई को चौड़ा किया है। दिसंबर में साउथ सेंटर द्वारा जारी ‘इलिसिट फाइनेंशियल फ्लोज एंड स्टोलन असेट रिकवरी’ अध्ययन में पुन: इसी रुझान की पुष्टि हुई है। ऐसे में विकासशील देशों के हितों की अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पैरवी अपरिहार्य हो गई है। इसी दायित्व की पूर्ति के लिए भारत 12 जनवरी से दो दिवसीय ‘वाइस आफ ग्लोबल साउथ समिट’ का आयोजन करने जा रहा है। इसमें 120 से अधिक देशों के प्रतिनिधि जुटकर एक मंच पर अपना दृष्टिकोण एवं प्राथमिकताओं को साझा करेंगे। इस आयोजन का उद्देश्य विकासशील देशों में सहयोग एवं एकता का भाव बढ़ाना है। भारत हमेशा से विकासशील देशों की आवाज को मुखरता से उठाने के मामले में अग्रणी रहा है। असल में वैश्विक समुदाय में भारत की स्थिति बहुत अनोखी है। विकासशील देशों में गिनती होने के बावजूद भारत विशाल आबादी और तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था वाला देश है। इससे भारत को अंतरराष्ट्रीय संबंधों विशेषकर विकासशील देशों के संदर्भ में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने की गुंजाइश मिल जाती है। संप्रति भारत कम से कम तीन स्तरों पर विकासशील देशों की चिंताओं को लेकर आवाज बुलंद कर रहा है। जैसे कि मौजूदा सरकार के दौर में भारत ने अंतरराष्ट्रीय संगठनों और मंचों पर सक्रियता से सहभागिता आरंभ की है। फिर चाहे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अध्यक्षता हो या जी-20 की कमान, भारत ने समय के साथ एक नेतृत्वकर्ता का अवतार लिया है। वह विश्व व्यापार संगठन और विश्व बैंक सहित तमाम मंचों पर विकासशील देशों के हितों की पुरजोर वकालत कर रहा है।
दूसरा स्तर विकासशील देशों के साथ प्रगाढ़ संबंध बनाने का है। गत वर्षों के दौरान भारत ने तमाम विकासशील देशों विशेषकर अफ्रीकी और दक्षिण अमेरिकी देशों के साथ आर्थिक सहयोग एवं सांस्कृतिक आदान-प्रदान के आधार पर मजबूत रिश्ते गांठे हैं। इससे विकासशील विश्व के हितों के पक्ष में माहौल बनाने का उपयुक्त मंच तैयार हुआ है। तीसरा पहलू दक्षिण-दक्षिण सहयोग की कड़ी के रूप में भारत की महारत से जुड़ा है। ऐसे सहयोग में गुटनिरपेक्ष आंदोलन ने अहम भूमिका निभाई। वर्ष 2009 में दक्षिण-दक्षिण सहयोग पर आयोजित उच्चस्तरीय संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन के नैरोबी दस्तावेज में भी इसकी स्वीकारोक्ति हुई। बेलग्रेड में 1961 में हुए गुटनिरपेक्ष देशों के पहले सम्मेलन में विकासशील देशों के बीच व्यापारिक संबंधों को मजबूत बनाने की स्पष्ट प्रतिबद्धता जताई गई। हालांकि, विकासशील देशों में सहयोग की प्रक्रिया 1968 में तभी जाकर शुरू हो पाई, जब भारत, मिस्र और यूगोस्लाविया ने व्यापार समझौता किया। वर्ष 1972 में गुटनिरपेक्ष आंदोलन ने अपने सदस्य देशों और अन्य विकासशील देशों के बीच आर्थिक सहयोग को स्वीकृति प्रदान की थी। हाल के दौर में विकासशील देशों को कोविड रोधी वैक्सीन उपलब्ध कराना भी दक्षिण-दक्षिण सहयोग के प्रति भारत के निरंतर प्रयासों का प्रमाण है।
दुनिया में चुनिंदा विकासशील देश ही हैं, जो अन्य विकासशील देशों या अल्पविकसित देशों में निवेश करते हैं। इस प्रकार के निवेश में चीन और भारत अग्रणी हैं, जो अन्य देशों में भी विकास कार्यों को विस्तार दे रहे हैं। हालांकि, चीन कर्ज के जाल में फंसाने के लिए कुख्यात हो चला है। चीन की कर्ज जाल में फंसाने वाली रणनीति कई देशों की संप्रभुता पर आघात करने वाली सिद्ध हुई है। चीन अपनी आर्थिक एवं वित्तीय ताकत का इस्तेमाल बुनियादी ढांचे से जुड़ी परियोजनाओं के लिए विकासशील देशों को कर्ज की आड़ में लुभाता है और फिर जब वह देश उसके इस जाल में फंस जाता है तो इसका परिणाम वहां चीन के राजनीतिक प्रभाव एवं रणनीतिक लाभ के रूप में निकलता है। इस चीनी परिपाटी को लेकर चिंता व्यक्त की जाने लगी है कि इससे आर्थिक अस्थिरता और यहां तक कर्जदार देशों के समक्ष दिवालिया होने तक का संकट पनप सकता है। पड़ोस में श्रीलंका और पाकिस्तान ही इस चीनी कर्ज जाल में फंसने के भुक्तभोगी हैं। इसी के चलते श्रीलंका हंबनटोटा बंदरगाह चीन को 99 साल के लिए लीज पर देने को विवश हुआ। पाकिस्तान ने भी चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे यानी सीपैक के लिए बीजिंग से भारी-भरकम कर्ज लिया है और यही आशंका जताई जा रही है कि उसके लिए उसकी भरपाई बेहद कठिन होगी। नतीजतन उसे अपने कई रणनीतिक ठिकाने चीन के हाथों गंवाने पड़ सकते हैं। इसी तरह कोविड काल में आर्थिक झंझावात में फंसा इक्वाडोर भी चीनी कर्ज चुकाने में नाकाम रहा।
दूसरी ओर, भारत अपनी हैसियत और प्रभाव का इस्तेमाल अंतरराष्ट्रीय समुदाय के बीच विकासशील देशों के हितों की पैरवी और उनमें सहयोग बढ़ाने के लिए करता है। ‘वाइस आफ ग्लोबल साउथ समिट’ आयोजन भी इसी कड़ी का हिस्सा है। कोविड महामारी के बाद यह दुनिया के अधिकांश देशों के जुटान का पहला बड़ा अवसर है, जहां वे समकालीन चुनौतियों पर चर्चा के लिए जुटेंगे। यह विकासशील देशों के समक्ष चिंताओं और आशंकाओं को सामने रखने का मंच होगा। प्रधानमंत्री मोदी पहले ही कह चुके हैं कि जी-20 की अध्यक्षता के दौरान भारत की प्राथमिकताएं केवल सदस्य देशों के आधार पर तय नहीं होंगी। उसमें ग्लोबल साउथ यानी विकासशील देशों की आवाज का भी समुचित समावेश होगा।
वस्तुत:, महामारी के बाद वाले दौर में दक्षिण-दक्षिण सहयोग और अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। दुनिया उससे उबरने और नई वास्तविकताओं से ताल मिलाने में लगी है। ऐसे परिदृश्य में दक्षिण-दक्षिण सहयोग की कड़ी गरीबी के दुष्चक्र, अस्थिरता और आर्थिक असमानता को समाप्त करने में सहायक बनने के साथ ही राष्ट्रीय विकास रणनीतियों को सिरे चढ़ाने में मददगार होगी। इस पूरी प्रक्रिया में भारत की भूमिका महत्वपूर्ण होने जा रही है।
Date:12-01-23
त्रासदी की जवाबदेहीसंपादकीय
जोशीमठ में प्राकृतिक त्रासदी को राष्ट्रीय आपदा घोषित करने के लिए हस्तक्षेप की मांग करते हुए एक याचिका सुप्रीम कोर्ट में डाली गई। हालांकि अदालत ने इस पर तत्काल सुनवाई से इनकार करते हुए कहा कि हर जरूरी चीज सीधे न्यायालय के पास नहीं आनी चाहिए। पीठ ने स्पष्ट कहा कि इस पर गौर करने के लिए लोकतांत्रिक रूप से निर्वाचित संस्थाएं हैं। दरअसल, याचिकाकर्ता ने दावा किया कि यह घटना बड़े पैमाने पर औद्योगीकरण के कारण हुई है। उन्होंने उत्तराखंड के लोगों के लिए तत्काल वित्तीय सहायता और मुआवजे की मांग की। सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका और अदालत की टिप्पणी के आईने में देखें तो विधायिका और नौकरशाही बनाम लोकहित के कई मुद्दे उठ खड़े हुए हैं। इसमें दो राय नहीं कि लोकतंत्र की मूल भावना, परंपरा और मर्म को लोकतांत्रिक संस्थाएं ही जिंदा रखती हैं, दीर्घजीवी और लोकतंत्र की जड़ें गहरी बनाती हैं। इस लिहाज से देखें तो उत्तराखंड में जोशीमठ में खड़े हो रहे व्यापक प्राकृतिक आपदा के मद्देनजर वहां के लोगों की मुश्किलों को समझा जा सकता है। लेकिन स्थानीय स्तर पर जिस तरह का संकट पैदा हुआ है, उसमें प्राथमिक स्तर पर वहां की सरकार और संबंधित विभागों की जिम्मेदारी बनती है कि वे इसका तात्कालिक और दीर्घकालिक समाधान निकालें। दूसरी ओर, आम जनता का भी यह हक है कि वह सबसे पहले स्थानीय स्तर पर उन संस्थाओं से अपनी जिम्मेदारी निभाने की मांग करें, जिन्हें लोकतंत्र में इसी काम के लिए बनाया गया है।
दरअसल, जोशीमठ त्रासदी ने लोकतंत्र के इन स्तंभों को लेकर जो सवाल खड़े किए हैं, उन्हें कुछ तथ्यों के आईने में समझने की जरूरत है। वहां भूस्खलन और धंसाव की समस्या को लेकर पिछले सैंतालीस वर्षों में कई अध्ययन कराए गए, लेकिन उनकी रिपोर्ट को ठंडे बस्ते में डाल दिया गया। वैज्ञानिकों ने हर बार आगाह किया, लेकिन इसके बाद भौगोलिक-तकनीकी अध्ययन कराने की ओर से आंखें फेर ली गई़़। उपचारात्मक कार्य नहीं हो पाए और आज स्थिति सबके सामने है। पुराने भूस्खलन क्षेत्र में बसे जोशीमठ में पूर्व में अलकनंदा नदी की बाढ़ से भूकटाव हुआ था। साथ ही घरों में दरारें भी पड़ी थीं। वर्ष 1976 से लेकर 2022 तक की अनेक अध्ययनों की संस्तुतियों में जोशीमठ क्षेत्र का भूगर्भीय सर्वेक्षण, भूमि की पकड़, धारण क्षमता, पानी के रिसाव के कारण समेत कई अध्ययन कराने की जरूरत बताई गई। वैज्ञानिकों के अनुसार जोशीमठ सिस्मिक जोन पांच में आता है और भूकंप व भूस्खलन की दृष्टि से काफी संवेदनशील स्थान है। इन तथ्यों को लेकर राष्ट्रीय ताप विद्युत निगम (एनटीपीसी) की तपोवन विष्णुगढ़ जल विद्युत परियोजना और हेलंग बाईपास का निर्माण कार्य को लेकर सवाल उठते रहे।
अब जबकि जोशीमठ में पानी सिर से ऊपर बहने लगा है और हाल में वैज्ञानिकों के दल ने दोबारा सर्वेक्षण कर अपनी रिपोर्ट शासन को सौंपी है, तब जाकर सरकार की नींद टूटी है। सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका में इस संकट को राष्ट्रीय आपदा घोषित करने की मांग करते हुए कहा गया है कि ‘मानव जीवन और पारिस्थितिकी तंत्र की कीमत पर कोई भी विकास नहीं होना चाहिए। अगर किसी भी स्तर पर ऐसा होता है तो फिर राज्य और केंद्र सरकार को इसे तत्काल रोकने के लिए कदम उठाने चाहिए।’ यह तर्क विधायिका और कार्यपालिका के रुख पर सवाल उठाता है। हालांकि जब विधायिका और कार्यपालिका अपना काम ठीक से न करें तो अदालत का आसरा होता है। लेकिन तथ्य यह भी है कि देश के लोकतांत्रिक ढांचे में एक व्यापक संस्थागत ढांचा बना हुआ है। इस मामले की सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इन्हीं संस्थाओं की प्रासंगिकता की ओर ध्यान दिलाया है।
Date:12-01-23
कृत्रिम बुद्धिमत्ता की अगुवाई में भविष्य के लिए रहिए तैयारविद्या महांबारे, ( प्रोफेसर, अर्थशास्त्र, जीएलआईएम )
कोड करने की क्षमता आज एक श्रेष्ठतम कौशल है, पर कल की मुख्य दक्षताओं या कौशलों के लिए अलग-अलग अभिरुचि व प्रशिक्षण की जरूरत पड़ेगी। मूल कोडिंग और प्रोग्रामिंग की तुलना में कुशलता, समेकित सोच व अभिव्यक्ति कहीं अधिक मूल्यवान व आवश्यक बन जाएगी। समय के साथ मानविकी की मांग बढ़ेगी। अकादमिक विषयों के रूप में मानविकी को हीन या फैशन से बाहर नहीं माना जाएगा। ऐसा भारत और विदेश के शीर्ष कॉलेजों में पहले से ही होने लगा है। महान ज्ञानी मशीनों तक पहुंच रखने वाले लोगों और युवाओं के लिए खुद को विशेषज्ञ या बुद्धिजीवी के रूप में स्थापित करना कठिन होता जाएगा।
ये बातें सामान्य सी लग सकती हैं, पर बदलाव रातोंरात न सही, अपेक्षाकृत तेजी से होगा। चौथी औद्योगिक क्रांति हमारे जीने और काम के तरीके में बुनियादी बदलाव लाएगी, ऐसा होने भी लगा है। नवंबर महीने में चैटजीपीटी की शुरुआत बदलाव की एक झलक है। जीपीटी या जनरेटिव प्रीट्रेंड ट्रांसफॉर्मर, एक अत्याधुनिक भाषा प्रसंस्करण कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) मॉडल है। यह कोडिंग सहित कई सरल और जटिल कार्यों के लिए इंसान जैसे आउटपुट या नतीजे देता है। एआई, रोबोटिक्स और इंटरनेट ऑफ थिंग्स (आईओटी) का इस्तेमाल करने वाली ऐसी तकनीकों का विकास आने वाले समय में हमारे काम करने के तरीकों को बदल देगा। इन तकनीकों को माइक्रोसॉफ्ट जैसे रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाले सॉफ्टवेयर में शामिल कर लिया जाएगा।
तेजतर्रार तकनीकी सुधारों के साथ एआई के अगले संस्करणों के इस्तेमाल की लागत कम हो गई है, जिससे वे लोगों को ज्यादा सुलभ होने लगे हैं। इन तकनीकों का प्रभावी इस्तेमाल करने वालों की उत्पादकता बढ़ेगी। मिसाल के लिए, चैटबॉट से गुणवत्तापूर्ण नतीजे या आउटपुट लेने के लिए अच्छे से संकेत या निर्देश देना महत्वपूर्ण है। यह जानना महत्वपूर्ण हो जाएगा कि क्या पूछना है और कैसे पूछना है। ऐसी कई प्रौद्योगिकियां हैं, जो परस्पर संवाद कर सकती हैं, जबकि हमें यह जानने की जरूरत है कि इसे कैसे व्यवस्थित किया जाए।
मनमाफिक इस्तेमाल के लिए तमाम उपलब्ध तकनीकों को एकीकृत करने के लिए उच्चस्तरीय कोडिंग जानना कारगर होगा। एआई तकनीक पिछले डाटा या आंकड़े के आधार पर काम करती है और इसे लगातार अपडेट किया जाता है। हालांकि, अभी यह नहीं बताया जा सकता कि क्या बड़े बदलाव होने वाले हैं, पर जो लोग इसे महसूस कर सकते हैं, उन्हें आने वाले समय में प्रमुखता मिलेगी। चूंकि यह ज्ञान अनुभव और अभ्यास से आता है, इसलिए खुद को कुशल न बनाने वाले युवा घाटे में रहेंगे। भविष्य में जीपीटी मॉडल इंसानों की तरह लेखन में महारत हासिल कर लेंगे, यह बताना मुश्किल हो जाएगा कि किसी सामग्री को मशीन ने लिखा है या व्यक्ति ने। असली आवाज के साथ जीवंत डिजिटल अवतारों की भी उम्मीद है, लेकिन एआई आमने-सामने के संवाद में इंसान की जगह नहीं ले सकता। सीधे संवाद और सम्मेलनों में निवेश को फिर से महत्व मिलेगा। अर्थशास्त्री टायलर कोवेन ने अपने हालिया ब्लॉग पोस्ट में पहले ही इस ओर इशारा किया है।
जैसे-जैसे प्रत्यक्ष आयोजन फिर प्रमुखता पाएंगे, महिलाओं का एक समूह शायद वंचित हो सकता है। पिछले कुछ वर्षों में जूम जैसी तकनीकों ने महिलाओं को कार्य से संबंधित यात्रा से बचाकर लाभ पहुंचाया है। हालांकि, ऐसी महिलाओं को भी भविष्य में फायदा होगा। वे सॉफ्ट स्कील या सहज कौशल में स्वाभाविक ही बेहतर हैं। जैसे-जैसे कार्य स्वचालित होते जाएंगे, वैसे-वैसे सॉफ्ट स्किल्स की मांग बढ़ती जाएगी।
हां, आने वाले समय में साहित्यिक चोरी का पता लगाना अधिक समय लेने वाली और निरर्थक प्रक्रिया बन जाएगी। पूरे देश में स्कूल और कॉलेज व्यवस्था को लचीला बनाना होगा। उदाहरण के लिए, कंप्यूटर विज्ञान को मनोविज्ञान, व्यावसायिक अध्ययन और गणित के साथ लेना संभव हो जाना चाहिए। अभी ऐसा नहीं है। एक बात तय है कि काम का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। आज के विजेताओं से अलग होंगे कल के विजेता, तो एक नए भविष्य के लिए तैयार हो जाइए।
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इंफोसिस के चेयरमैन एन आर नारायण मूर्ति ने अपनी कंपनी में नियम बनाया था कि उसके संस्थापकों और सह-संस्थापकों के बच्चे कंपनी में सक्रिय भूमिका नहीं लेंगे। ऐसा करने के पीछे उनका मंतव्य यही था कि इसके उत्तराधिकारियों में सभी प्रतिभा के बल पर पद प्राप्त करें। अक्सर यह देखा गया है कि उच्च पदों पर पारिवारिक सदस्यों के आने पर प्रतिबद्धता के स्तर में कमी आती है।
किसी भी संस्थान के उच्च पदों पर नियुक्ति के लिए प्रतिभा का कोई मुकाबला नहीं हो सकता। यहीं आकर चयन के सर्वश्रेष्ठ तरीके में एक स्वतंत्र बोर्ड की भूमिका मायने रखती है। इसके लिए ऐसे उम्मीदवारों का चयन होना चाहिए, जो कंपनी का हित साध सकें। ऐसे हितधारकों को शामिल किया जाना चाहिए, जो कंपनी के भले की सोच सकें। स्वतंत्र बोर्ड ऐसा हो, जो शेयरधारकों के प्रति प्रबंधन की जवाबदेही सुनिश्चित करने का प्रयत्न करे।
अगर स्वतंत्र बोर्ड परिवार के किसी योग्य सदस्य को भी पदासीन करता है, तो सदस्य को चाहिए कि वह अन्य कर्मचारियों का सम्मान प्राप्त करने के लिए अपनी दक्षता सिद्ध करे। भारत की बहुत सी कंपनियों ने पारिवारिक सदस्यों को उच्च पदों पर बैठाकर भी श्रेष्ठता हासिल की है।
व्यवसायों के लिए उत्तराधिकार का विवेकपूर्ण नियोजन जरूरी है। कंपनी की प्रगति इसी पर निर्भर करती है।
‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 17 दिसंबर, 2022
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Date:11-01-23
Get Wet, Get WellWetlands are nature’s shock absorbers. Their degradation in cities is real bad news for urban futureTOI Editorials
Data from Wetlands International shows India has lost nearly two of five wetlands in the last 30 years, while 40% of them can’t support aquatic animals. Most of this degradation is thanks to usual culprits – unplanned infrastructure, pollution, over-exploitation, reclamation. Given that wetlands are vitally important for water storage and aquifer recharge and play the role of storm buffers and flood mitigators, their erosion is bad news on several critical fronts. Wetlands are also natural carbon sinks, making them crucial for combating climate change.
Atotal of 75 Indian wetlands with a surface area of over a million hectares are designated as wetlands of international importance under the Ramsar Convention, which India ratified in 1982. But even the largest among them, the Sundarbans wetland, has lost around 25% of its mangroves due to erosion over the past three decades. One of the main culprits for this is reduction in sediments due to upstream dams. Similarly, encroachment and construction on urban wetlands like the Pallikaranai marsh in Chennai have made cities susceptible to flooding. In fact, Vadodara lost 30% of its wetlands between 2005 and 2018, while Hyderabad has lost 55% of its semi-quatic bodies due to inefficient waste management and unchecked urban development.
True, GOI has notified the Wetlands (Conservation and Management) Rules, 2017 to serve as a regulatory framework for conservation efforts. But most of the assistance provided by the Centre to states for conservation of wetlands is directed towards the notified Ramsar sites, ignoring urban wetlands. Unless greater awareness is created about the benefits of wetland conservation and urban planning actively incorporates preservation of these bodies – Delhi Master Plan 2041 is a good start – the situation will worsen. Wetlands are natural shock absorbers. We need that protection.
Date:11-01-23
Greatly Expanding Indian Middle ClassIn a decade almost half of Indian households will be in the middle income group, ready to transform society in multiple positive waysRajesh Shukla, [ The writer is MD and CEO of PRICE ]
In 2047, India will mark the 100th year of nationhood and it’s only natural that there is much curiosity about the economic wellbeing of the country’s population when we hit that landmark year.
Today, the country boasts more than 4. 3 million ‘crorepati’ households, equivalent to 23 million consumers. Millions are knocking on the doors to join this richie-rich bandwagon and they are spread all over the country.
By 2047, if political and economic reforms have their desired effect, India has the potential to become the fastestgrowing economy in the world, with a sustained conservative annual growth rate of between 6% and 7. 5%. Average annual household disposable income is set to rise to about Rs 20 lakh ($27,000) at 2020-21 prices, while the population is expected to reach more than 1. 66 billion.
Pyramid gives way to a diamond
This growth will not only make the Indian middle class the biggest income group in the country in numerical terms, but it is also set to become the major driver of economic, political and social growth.
Consider this: by the end of this decade, the structure of the country’s demographics will change from an inverted pyramid, signifying a small rich class and a very large low-income class, to a rudimentary diamond, where a significant part of the low-income class moves up to become part of the middle class.
The PRICE (People Research on India’s Consumer Economy) report subdivides the population into four categories. Consider the expected changes between 2020-21 and 2030-31.
● Destitute households (with an annual household income less than Rs 1. 25 lakh or $1,700) will fall steeply from 15% to 6%.
● Aspirers (annual household income between Rs 1. 25 lakh and Rs 5 lakh or $1,700 and $6,700) from 52% to 38%.
● That in itself constitutes a dramatic shift. This shift will transfer thosewho can’t afford most consumer products into potential buyers of entry-level durables and services.
● Corresponding with the fall in the number of destitute and aspiring households is the rise of other categories of households.
● Middle class will increase from the current 30% to 46% of households.
● Rich will see a jump from 4% to 10% of homes.
Growing bulge in the middle
Currently, there are about 432 million middle-class Indians, or one in every three in India belongs to this group. They belong to urban and developedrural households, have achieved economic security, and indulge in discretionary consumption.
With annual household income ranging between Rs 5 lakh ($6,700) and Rs 30 lakh ($40,000) at 2020-21 prices, this middle class is growing at the rate of 7% to 8% annually, and now accounts for close to half of household consumption.
Absolute incomes may well be higher among the rich, but the numerical strength of the Indian middle class suggests that it will become the major driving force of India’s consumption story. The discretionary spending power of this burgeoning section of society could spur investment and generateemployment, thereby boosting economic growth.
Motive force of India’s upward trajectory
A stronger and more secure middle class is crucial for continuing India’s upward trajectory. The middle classes act as employers and employees, consumers and producers, and agents of political change. Representing 62% of salaried and business owners, they generate many of the new jobs that employ the growing workforce, besides paying for nearly half of all taxes.
A focus on propping up the aspiring class that currently comprises 732 million Indians – 52% of the population – can reap rich dividends in the run-up to 2047. The aspirer class is the group that is no longer poor but has not yet achieved middle-class status. Providing access to high-quality public services, good jobs and opportunities will enable the aspirer segment to join the ranks of the middle class. Significantly, their progress will ensure a reduction of economic inequality.
Safety nets and taxes
Among the measures that need to be taken, providing comprehensive social safety nets is at the top of the list. Regular earning opportunities, health protection, and pensions will be crucial factors. Further, strengthening tax policies, compliance by the current middle class and boosting new collections from an expanding middle class will ensure adequate financing for such investment.
As Aristotle once said: “The best political community is formed by citizens of the middle class” and “those states are likely to be well administered in which the middle class is large. ”
This age-old wisdom may become increasingly relevant in India because as the middle class expands it may well become more politically engaged, acting as an agent of change and an important stabilising force. Thus, as India grows and becomes more globalised, the middle class is set to play an important role in shaping Indian society and politics, as well as its economy.
Date:11-01-23
The beginning of India’s cultural renaissanceThe Kashi Tamil Sangamam has ignited a new cultural zeal in India and whetted the country’s appetite for morePiyush Goyal, [ Minister of Commerce and Industry, Consumer Affairs, Food and Public Distribution, and Textiles, Government of India; and Leader of the House in the Rajya Sabha ]
The month-long Kashi Tamil Sangamam, which showcased Tamil culture, heralded a new era where ancient Indian traditions intermingle with one another and are revitalised with the help of modern practices so that they contribute to cultural and economic growth. It gave a rich cultural context to India’s mission to become a developed country by 2047. The event carried forward our tradition of Ek Bharat Shreshtha Bharat.
Ancient links
Kashi, one of the oldest living cities of the world, and Tamil Nadu, where people proudly speak the world’s oldest language, are towering pillars of ancient Indian civilisation. Both have rich, old traditions of arts, music, craftsmanship, philosophy, spirituality and literature. Yet, for decades after independence, few people in north India knew about the Tamil saints who lived in Kashi and intensified its spiritual aura, or the tradition of taking holy Ganga jal (water) to the Rameshwaram temple, or the Kashi Yatra ritual in some Tamil weddings. Likewise, many in Tamil Nadu were not fully familiar with the ancient links between the two cultures.
Prime Minister Narendra Modi took a different approach and launched the Kashi Tamil Sangamam. He rightly said that this cultural intermingling was as holy as the confluence of the Ganga and the Yamuna rivers.
The event saw people from all walks of life from Tamil Nadu visiting Kashi. They experienced the city’s traditions and its iconic landmarks such as the Kashi Vishwanath temple. They approached the temple through the new corridor, which has transformed and beautified the sacred area in line with the vision of Mr. Modi, who represents Varanasi in the Lok Sabha.
The Prime Minister’s initiative to build the landmark Kashi Vishwanath corridor, which connects the Jyotirling with the Ganga, embellishes traditions with a touch of modernity for the benefit of residents and visitors. Similarly, the Sangamam created a unique platform to rediscover and integrate our heritage and ancient knowledge with modern thought, philosophy, technology and craftsmanship. This creates a new body of knowledge and fosters innovations that will help our artisans, weavers, entrepreneurs and traders. For instance, Varanasi is well known for Banarasi silk saris, and Kancheepuram, for its shimmering silk saris. Weavers and entrepreneurs from both regions have a lot to gain from interacting with each other and from their exposure to modern practices of branding, quality control, marketing, product consistency, the use of modern machinery and value addition.
The focus on textiles
The government organised a ‘textiles conclave’ during the Sangamam. Several eminent personalities of different segments of the textile industry from Tamil Nadu and Kashi shared their experiences and exchanged ideas at a session on Amrit Kaal Vision 2047. They were excited and confident about the government’s vision of raising textiles exports to $100 billion by 2030 and creating new opportunities in the sector.
The textiles sector, which has great job-creating potential, is a key part of our mission to become a developed country by 2047. India’s textiles market is expected to grow at a CAGR of 12-13% to nearly $2 trillion by 2047, while exports from the sector are expected to grow at double digits. Mr. Modi’s 5F formula (farm, fibre, fabric, fashion, foreign) will accelerate growth in the sector and transform the lives of farmers and weavers. Kashi and Tamil Nadu have a key role to play to achieve this vision. The government is also encouraging technical textiles, which have phenomenal potential. These products include functional textiles that are used in vehicles, protective clothing, bulletproof vests and construction. Man-made fibre, also an area of focus, has great potential for growth and exports.
The Sangamam was in step with the entire spectrum of this government’s policies. These policies accord top priority to accelerating development with a focus on welfare of the poorest of the poor, love for Indian culture, and promoting local industries and handicrafts.
We are strongly promoting the One District One Product scheme that will take Indian products to the world market. Mr. Modi is a brand ambassador for these products and gifts them to world leaders. Apart from saris, the textiles conclave also dwelled on wooden toys.
Traditional wooden toys of Varanasi are getting more export enquiries and are being showcased in international business exhibitions.
Traditional products will also get a big boost from other government initiatives such as the Open Network for Digital Commerce and the Government e-Marketplace.
Not limited to Tamil Nadu and Kashi
The Sangamam ended on December 16. About 2 lakh people visited the campus of the Banaras Hindu University which hosted cultural shows and a popular exhibition that highlighted Tamil products and cuisine. The Sangamam has ignited a new cultural zeal in India and whetted the country’s appetite for more. The textiles sector is planning a similar event in Tamil Nadu.
More importantly, as Home Minister Amit Shah said, the Sangamam is the beginning of India’s cultural renaissance that is not limited to the bonding of Tamil Nadu and Kashi. It will extend to all cultures of this great country.
Date:11-01-23
चेतावनियों को कब तक नजरअंदाज करेंगेसंपादकीय
उत्तराखंड में हिमालय स्थित जोशीमठ दरकने से हजारों लोगों के जीवन, आजीविका और बड़ी तबाही का खतरा बताता है। कि लालसा मानव की सबसे बड़ी दुश्मन है। संकट का पहला संकेत सन् 1976 के एक 18 सदस्यीय आयोग ने एक रिपोर्ट में दिया और पेड़ों की अंधाधुंध कटाई, भारी निर्माण कार्य, पर्यटन के नाम पर शहर और चौड़े मार्ग बनाकर पर्वत का प्राकृतिक चरित्र बदलने से रोकने की सिफारिश की थी। तब से आज तक दर्जनों रिपोट्र्स में ब्लास्टिंग और ड्रिलिंग विधि से पहाड़ों में सुरंग और पन- बिजली के लिए धारा- परिवर्तन को तत्काल रोकने की सिफारिशें की गईं। निजी उद्यमियों, भ्रष्ट अफसरों नेताओं के गठजोड़ ने इस खनिज संपदा से भरपूर और देश को अपनी पांच नदियों के जरिए पानी देने वाले वरदान- स्वरूप पर्वत को नुकसान पहुंचाया गया। एक समय सरकार ने यहां पन- बिजली की कुल 77 योजनाएं मंजूर की थीं। भला हो सुप्रीम कोर्ट का, जिसने 24 बड़ी परियोजनाओं पर रोक लगा दी । विंध्य या मध्य भारत की सतपुड़ा पर्वत श्रृंखलाओं के मुकाबले काफी नया होने के कारण हिमालय की चट्टानें अभी भी बन रही हैं और इनका बड़ा भाग कच्ची मिट्टी और रेत से बना है। लिहाजा इन पर कोई चोट या भार इनके दरकने का सबब बन जाता है। फिर अपनी ऊंचाई के कारण यह पर्वत सागर से आने वाली हवाओं और बर्फ के मिश्रित दुष्प्रभाव का भी शिकार रहता है। उत्तर दिशा में हमारी रक्षा के लिए निरंतर खड़ा यह प्रहरी दुनिया के तमाम बड़े पहाड़ों में सबसे युवा यानी कच्चा है। केदारनाथ की विभीषिका एक बड़ी चेतावनी थी। इसके अलावा अक्सर हिमपात, सड़क दरकना, बादल फटना और ऐसी ही तमाम आपदाओं से सीख लेना तो दूर, हमने दोहन की रफ्तार बढ़ा दी।
Date:11-01-23
जोशीमठ त्रासदी हमारे लिए खतरे की घंटी हैचेतन भगत, ( अंग्रेजी के उपन्यासकार )
लेखक होने के नाते मुझसे अकसर कहा जाता है कि पहाड़ों पर जाइए और लिखिए। लेखकों के बारे में यह एक रूमानी धारणा बनी हुई है कि वे सुंदर हिल स्टेशनों पर जाकर आरामदेह कॉटेज में रहते हैं और लिखते हैं। यह सुनने में अच्छा लगता है, लेकिन सच यह है कि आज भारत में ऐसे कोई हिल स्टेशन नहीं हैं, जिन्हें सुंदर कहा जाए। इसके बजाय आपको मिलेंगे ट्रैफिक जाम से त्रस्त पहाड़ी रास्ते, अनापशनाप तरीके से पार्क की गई गाड़ियों से घिरा टाउन सेंटर, कुरकुरे, चिप्स और बिस्किट के पैकेट से भरे साइडवॉक। यहां टिन की छतों वाली दुकानों पर हर चीज बिकती है- छोले-भटूरे से लेकर बच्चों के खिलौने और पश्मीना शॉल से लेकर हाजमे के चूरन तक। यहां वीडियो गेम आर्केड्स और स्नूकर रूम्स भी मिलेंगे। रोडसाइड स्टॉल्स पर तरह-तरह की मैगी और चाइना में निर्मित सस्ते ब्लूटुथ ईयरफोन बेचने वाले पाए जाते हैं। होटलों में इस बात की प्रतिस्पर्धा है कि किसका साइनबोर्ड सबसे गंदा है और किसके यहां सबसे बुरी लाइटिंग व्यवस्था है। इनके यहां बल्ब के सॉकेट खुले पड़े रहते हैं और भारत की सबसे चहेती प्रकाश-व्यवस्था यानी ट्यूबलाइट से रोशनी का इंतजाम किया जाता है। अगर आप कोई दु:खदायी कहानी सुनाना चाहते हैं या इस विषय पर किताब लिखना चाहते हैं कि किसी अच्छी-खासी जगह को बरबाद कैसे किया जाए, तो जरूर आप हिल स्टेशनों की सैर पर जा सकते हैं।
भारत के हिल स्टेशन अब सामान्य पर्यटन के उपयुक्त नहीं रह गए हैं। कुछ उद्यमशील इंस्टाग्राम इंफ्लूएंसर्स इन जगहों पर फोन से अच्छी फ्रेम बनाकर तस्वीरें खींच लेते हैं, जिसमें वे दूर बर्फ से लदे पहाड़ों को हाईलाइट करते हैं लेकिन फर्श पर बिखरे कुरकुरे-चिप्स के पैकेट्स को छुपा लेते हैं। वे इन तस्वीरों को इंस्टाग्राम पर उन पंक्तियों के साथ लगाते हैं, जो सुनने में अच्छी लगती हैं, पर जिनका कोई मतलब नहीं होता- जैसे कि ‘माई सोल बिलॉन्ग्स टु द हिल्स’ या ‘वांडरलस्ट इज़ माय स्पिरिट एनिमल।’ ये तस्वीरें आपके फीड में पॉप-अप होती हैं तो आप उत्साहित हो जाते हैं, परिवार सहित वहां छुटि्टयां बिताने चले जाते हैं, इस उम्मीद में कि आपकी आत्मा को पोषण मिलेगा। जबकि आपका सामना ट्रैफिक जाम और कूड़े-करकट से भरे एक कस्बे से होता है। इसलिए मैं तो कहूंगा कि अगर आप पहाड़ों और प्रकृति पर कृपा करना चाहते हैं तो प्रसिद्ध हिल स्टेशनों पर यात्रा करने न जाएं। वहां आपको राहत नहीं मिलने वाली।
इन पहाड़ी कस्बों को हमने जो नुकसान पहुंचाया है, वह अब खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। बात केवल आंखों को खूबसूरत लगने वाली जगहों की बरबादी तक ही सीमित नहीं रह गई है। ये कस्बे अब धीरे-धीरे मरने लगे हैं। उत्तराखंड का जोशीमठ दरक रहा है और वहां बसे लोगों को सुरक्षित दूसरी जगहों पर ले जाकर बसाने की नौबत आ गई है। बेतहाशा निर्माण, पर्यावरण के प्रति चिंता का घोर अभाव और पहाड़ों पर सैर के लिए नॉन-स्टॉप आने वाले लोगों के चलते यह हालत हो गई है। बहुत सम्भव है कि जल्द ही दूसरे कस्बों की भी यही हालत हो जाए। ये पहाड़ी कस्बे हमारा गौरव हैं और पारिस्थितिकी संतुलन के लिए जरूरी हैं, हमें उन्हें नष्ट करने से खुद को रोकना होगा। जिन जगहों को हम पवित्र समझते हैं, उनका ऐसा विनाश कैसे कर सकते हैं?
ये बात सच है कि टूरिज्म इन कस्बों की इकोनॉमी के लिए जरूरी है। होटलें, दुकानें, ट्रैवल एजेंसियां, कारें- इन सबसे पैसा आता है। लेकिन किस कीमत पर? क्या हम जंगलों के सभी पेड़ काटने की इजाजत दे सकते हैं? या बाघों का शिकार करने की? अगर इन चीजों पर रोक है तो पूरे के पूरे कस्बों और पर्वत-शृंखलाओं को नष्ट करने की अनुमति कैसे दी जा सकती है? ठीक है कि भारतीयों को छुटि्टयां बिताने के लिए पर्यटनस्थलों की दरकार है, खासतौर पर गर्मियों के मौसम में। बढ़ती प्रतिव्यक्ति आय के चलते अब ज्यादा से ज्यादा लोग हिल स्टेशनों की यात्रा करने में सक्षम हो गए हैं। लेकिन इन हिल टाउंस की यह क्षमता नहीं है कि इतनी बड़ी संख्या में पर्यटकों को समायोजित कर सकें। इनमें से अधिकतर का निर्माण ब्रिटिश राज में किया गया था, कुछ का तो कुछ ही सौ साल पहले। वे हरगिज इस बात के लिए डिजाइन नहीं किए गए थे कि लाखों पर्यटक कारें लेकर वहां आ धमकें। हमें और हिल स्टेशन विकसित करने चाहिए। अगर ब्रिटिश लोग आज से एक सदी पहले वह सब कर सकते थे तो हम आज बेहतर तकनीक के साथ वैसा क्यों नहीं कर सकते? हमें आने वाले दशकों में पर्यटकों के बढ़ते दबाव के मद्देनजर अगर पचास नहीं तो कम से कम बीस नए हिल टाउंस की दरकार है, जहां बेहतरीन इंफ्रास्ट्रक्चर हो।
हालांकि इन तमाम कस्बों पर मर्यादाएं निर्धारित करना होंगी- सीमित संख्या में निर्माण हो, निश्चित मात्रा में भूमि खाली छोड़ी जाए, पर्यटकों की संख्या तय हो आदि। कूड़ा-प्रबंधन के बारे में पहले ही सोचना होगा। अगर भूटान जैसा देश इतने कम संसाधनों के बावजूद यह कर सकता है तो हम क्यों नहीं? भूटान में विदेशियों से प्रवेश-शुल्क लिया जाता है। शायद हमें भी अब हिल टाउंस में आने वाले पर्यटकों से शुल्क लेने के बारे में सोचना होगा। साथ ही वहां प्लास्टिक बैग्स और पैकेट्स के इस्तेमाल पर भी पूर्णतया रोक लगानी होगी। जोशीमठ में हो रही घटनाएं हम सबके खतरे की घंटी होनी चाहिए। महज चंद रुपए कमाने के लिए प्रकृति का विनाश कर देना तो बड़ा ही महंगा सौदा होगा।
Date:11-01-23
पूरी दुनिया में अपने देश का नाम रोशन कर रहे हैं प्रवासी भारतीयडॉ. वेदप्रताप वैदिक, ( भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष )
इंदौर में संपन्न हुआ 17वां प्रवासी भारतीय सम्मेलन भारत के विश्व-शक्ति बनने का प्रतीक है, क्योंकि यह उन लगभग 5 करोड़ भारतीय मूल के लोगों का प्रतिनिधित्व कर रहा है, जो सारी दुनिया के देशों में बस गए हैं। इस मामले में दुनिया का एक भी देश ऐसा नहीं है, जो भारत का मुकाबला कर सके। भारत के प्रवासियों की संख्या दुनिया में सबसे बड़ी है। मैक्सिको, रूस और चीन के लोग भी बड़ी संख्या में विदेशों में जाकर बस गए हैं लेकिन उनमें और भारतीयों में बड़ा अंतर है। भारत के लोग अपनी सरकारों से तंग होकर विदेश नहीं भागे हैं। वे बेहतर अवसरों की तलाश में वहां गए हैं। वे जहां भी गए हैं, वहां जाकर उन्होंने हर क्षेत्र में अपना सिक्का जमाया है।
इस समय दुनिया के ऐसे दर्जन भर से ज्यादा देश हैं, जिनके राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, न्यायाधीश आदि भारतीय मूल के हैं। अमेरिका की उपराष्ट्रपति कमला हैरिस और ब्रिटेन के प्रधानमंत्री ऋषि सुनक हैं। दुनिया के पांचों महाद्वीपों में एक भी महाद्वीप ऐसा नहीं है, जहां किसी न किसी देश में कोई न कोई भारतीय मूल का व्यक्ति उच्च पदस्थ न हो। इन विदेशियों के बीच भारतीयों को इतना महत्व क्यों मिलता है? क्योंकि वे बुद्धिमान, चतुर और परिश्रमी होते हैं। उदारता और शालीनता उनके रग-रग में बसी होती है।
जिन भारतीयों को डेढ़ सौ-दो सौ साल पहले बंधुआ मजदूर बनाकर अंग्रेज लोग फिजी, मॉरिशस और सूरिनाम जैसे देशों में ले गए थे, उनकी बात जाने दें और आज के करोड़ों प्रवासी भारतीयों पर नजर डालें तो आप पाएंगे कि वे जिस देश में भी रहते हैं, उस देश के सबसे शिक्षित, मालदार और सभ्य लोग माने जाते हैं। अमेरिका के सबसे सम्पन्न वर्गों में भारतीयों का स्थान अग्रगण्य है। भारतीय लोगों में अपराधियों की संख्या भी सबसे कम होती है। वे जिस देश में, जिस हैसियत में भी रहें, भारत की छवि चमकाते रहते हैं। यह ठीक है कि भारत से आज हर साल लगभग दो लाख लोग विदेशों में जा बसते हैं। वे उन देशों की नागरिकता ले लेते हैं। उनमें से कई मोटी नौकरियों की तलाश में रहते हैं। कई उन देशों में पढ़ते-पढ़ते वहीं रह जाते हैं। कुछ ऐसे भी हैं, जो अपने अपराधों की सजा से बच जाएं, इसलिए भारत की नागरिकता छोड़कर विदेशी नागरिकता ले लेते हैं। प्रतिभा-पलायन के कारण भारत का नुकसान जरूर होता है लेकिन हम यह न भूलें कि ये लोग हर साल भारत में अरबों डॉलर भेजते रहते हैं। पिछले वर्ष 100 अरब डॉलर से भी ज्यादा राशि हमारे प्रवासियों ने भारत भिजवाई है। दुनिया के किसी देश को- चीन को भी नहीं- उसके प्रवासी इतनी राशि भिजवा पाते हैं।
इस समय दुनिया के अत्यंत शक्तिशाली और सम्पन्न राष्ट्रों में प्रवासी भारतीयों का डंका बज रहा है। उन देशों की अर्थव्यवस्था और राज्य-व्यवस्था की वे रीढ़ बन चुके हैं। यदि विदेशों में बसे हुए भारतीय आज घोषणा कर दें कि वे भारत वापस लौट रहे हैं तो उनमें से कुछ देशों की अर्थव्यवस्था ही ठप्प हो जाएगी, कइयों की सरकारें गिर जाएंगी और कई देशों के विश्वविद्यालय और शोध-संस्थान उजड़ जाएंगे। यह ठीक है कि उनमें से कई देशों की जनसंख्या के मुकाबले भारतीय प्रवासियों की संख्या मुट्ठीभर ही है। जैसे अमेरिका में 44 लाख, ब्रिटेन में 17.6 लाख, संयुक्त अरब अमीरात में 34 लाख, श्रीलंका में 16 लाख, द. अफ्रीका में 15.6 लाख, सऊदी अरब में 26 लाख, मलेशिया में 29.8 लाख, म्यांमार में 20 लाख, कनाडा में 16.8 लाख, कुवैत में 10.2 लाख भारतीय हैं। ज्यादातर देशों में प्रवासियों की संख्या 3 से 4 प्रतिशत ही है, लेकिन वहां उनका महत्व 30 से 40 प्रतिशत से कम नहीं है। भारतीय लोग अपने मूल देश को वहां से काफी पैसा भिजवाते हैं, लेकिन यह भी तथ्य है कि जिन देशों में वे रहते हैं, उन्हें भी सम्पन्न बनाने में कसर नहीं छोड़ते। भारत के लगभग पांच लाख छात्र- जो विदेशों में हर साल पढ़ने जाते हैं- वे भी उन देशों की आय को बढ़ाते ही हैं। प्रवासी भारतीयों की इस सुप्त शक्ति को जगाने का बीड़ा प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी ने उठाया था, 2003 में! प्रसिद्ध विधिवेत्ता लक्ष्मीमल्ल सिंघवी और राजदूत जगदीश शर्मा के प्रयत्नों से यह प्रवासी संगठन बना है। उसके पहले संघ के वरिष्ठ सदस्य बालेश्वर प्रसाद अग्रवाल की संस्था ‘अंतरराष्ट्रीय सहयोग परिषद’ के जरिए प्रयत्न होता था कि संसार के प्रवासी भारतीयों को अपनी जड़ों से जोड़ा जाए।
अब भारत सरकार ने प्रवासियों की तीन श्रेणियां बना दी हैं। विदेशों में रहने वाले नागरिक (ओसीआई), भारतीय मूल के लोग (पीआईओ) और अप्रवासी भारतीय (एनआरआई)। वह दिन दूर नहीं, जब कई अन्य देशों की तरह भारतीय मूल के लोगों को भी भारत दोहरी नागरिकता दे देगा।
Date:11-01-23
जनतंत्र बनाम अराजकतासंपादकीय
ब्राजील में कुछ समय पहले हुए चुनावों के बाद अब जो हालात पैदा हो रहे हैं, वे इसलिए चिंताजनक हैं कि विवादों और सवालों के हल के लिए बहस और विचार के बजाय हिंसक प्रतिक्रिया को ही हल की तलाश मान लिया जाता है। रविवार को ब्राजील के पूर्व राष्ट्रपति जायर बोल्सोनारो के समर्थक आक्रामक तेवर के साथ उत्पात मचाते हुए संसद भवन, राष्ट्रपति भवन और सुप्रीम कोर्ट में घुस गए और परिसरों पर कब्जा जमाने की कोशिश करने लगे। गनीमत यह रही कि इस हंगामे का दायरा बढ़ने के पहले ही पुलिस ने सख्ती दिखाई और उपद्रवी तत्त्वों के कब्जे से सरकारी इमारतों को खाली कराया। जाहिर है, इसके बाद बोल्सोनारो और उनके समर्थकों पर ऐसे आरोप लग रहे हैं कि लोकतंत्र में उनकी कोई आस्था नहीं है और वे अराजकता के जरिए फिर से सत्ता में वापसी की साजिश में लगे हैं। हालांकि इस मामले ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तूल पकड़ना शुरू किया और बोल्सोनारो पर लोकतंत्र को ध्वस्त करने के आरोप लगने लगे, तब खुद ब्राजील में जनता के एक बड़े हिस्से ने इस हमले के खिलाफ प्रदर्शन और सख्त सजा की मांग करनी शुरू कर दी। फिर बोल्सोनारो ने भी उपद्रव से खुद को अलग करते हुए अराजकता की निंदा की। सवाल है कि आखिर इतनी बड़ी तादाद में लोग जमा होकर मौजूदा चुनी गई सरकार के खिलाफ बगावत पर क्यों उतर गए!
गौरतलब है कि ब्राजील में पिछले महीने राष्ट्रपति पद के लिए हुए चुनावों में लुइज इनासियो लूला डी सिल्वा के मुकाबले बोल्सोनारो मामूली अंतर से हार गए थे। मगर बोल्सोनारो और उनके समर्थकों ने चुनाव परिणामों को स्वीकार करने से इनकार कर दिया था। यह समझना मुश्किल है कि अगर ब्राजील में हुए चुनावों और उसके नतीजों पर कोई राजनीतिक पक्ष सवाल उठा रहा है तो उसके हल के लिए अराजकता का सहारा लेना कितना जायज है। खासतौर पर जिस दौर में दुनिया भर में लोकतंत्र और इसकी जड़ों को मजबूत करने की मांग का दायरा फैल रहा है और एकध्रुवीय राजनीति के पैरोकार भी लोकतंत्र की दुहाई देते नजर आते हैं, वैसे वक्त में विरोध के लिए लोकतांत्रिक तौर-तरीकों की तिलांजलि देने को किस नजरिए से देखा जाएगा? यह बेवजह नहीं है कि ब्राजील में अराजक विरोध प्रदर्शन की तुलना अमेरिका में हुए चुनावों में डोनाल्ड ट्रंप की हार के बाद करीब दो साल पहले उपजी स्थिति से की जा रही है। तब ट्रंप के समर्थकों ने लगभग इसी तर्ज पर कैपिटल हिल यानी अमेरिकी संसद में दाखिल होकर हिंसा की थी। उस घटना की जांच के बाद ट्रंप को जिम्मेदार ठहराया गया था।
अब ब्राजील में हुए ताजा हंगामे के मामले के तूल पकड़ने के बाद बोल्सोनारो भले अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ रहे हैं, लेकिन यह तय है कि इतनी घटना में उनके रुख की वजह से ही उनके समर्थकों के बीच आक्रोश फैला होगा। यों ब्राजील में पहले भी सरकारी इमारतों पर अराजक हमलों की घटनाएं हो चुकी है। विडंबना यह है कि एक ओर बोल्सोनारो पहले तो लोकतांत्रिक तरीके से हुए चुनावों के परिणामों को कठघरे में खड़ा करते हैं और फिर उनके समर्थन में अराजकता फैलती है तब वही लोकतंत्र की दुहाई देते हुए उसकी निंदा करते हैं। ऐसे में आम जनता के सामने एक विभ्रम और ठगे जाने की स्थिति पैदा होती है। अब अगर ब्राजील की मौजूदा सरकार अराजकता फैलाने के आरोपी लोगों के खिलाफ सख्त कार्रवाई करती है तब बोल्सोनारो का रुख क्या होगा? इसलिए कई बार जरूरत इस बात की भी लगती है कि उच्च स्तर पर राजनीतिक टकरावों के बीच आम जनता को अपनी प्रतिक्रिया देते हुए भावनाओं में बहने के बजाय धीरज और विवेक का इस्तेमाल करना चाहिए।
Date:11-01-23
तटीय क्षेत्रों के विकास का अर्थप्रमोद भार्गव
समुद्र तटीय क्षेत्रों में भारत विकास की दृष्टि से पीछे रहा है। उन तटीय क्षेत्रों पर भी हमने ध्यान नहीं दिया, जो देश के लिए नई आर्थिकी और चीन जैसे देश से चुनौती के लिए सामरिक दृष्टि से अहम हो सकते हैं। अंडमान-निकोबार द्वीप समूह उनमें एक है। मगर अब इस उपेक्षित क्षेत्र की तस्वीर बदलने जा रही है। सिंगापुर की तर्ज पर निकोबार के तट का विकास केंद्र सरकार ‘महान निकोबार द्वीप परियोजना’ (जीएनआइ) के अंतर्गत कर रही है। हालांकि परियोजना के अमल से बड़ी मात्रा में पर्यावरण को नुकसान भी होगा। पर पूरी दुनिया में इसी तरह आधुनिक विकास परिणाम तक पहुंचा है।
निकोबार द्वीप समूह दस हजार चौवालीस वर्ग किमी क्षेत्र में फैला है। बंगाल की खाड़ी में पोत परिवहन को नया आयाम देते हुए दस हजार करोड़ रुपए की लागत से एक पोतांतरण बंदरगाह का निर्माण करने की योजना प्रस्तावित है। यह बंदरगाह विकास से जुड़ी गतिविधियों के बड़े केंद्र के रूप में विकसित होगा। विकास के इसी क्रम में चेन्नई से अंडमान और निकोबार द्वीप समूह तक तेज इंटरनेट सुविधा उपलब्ध कराने वाली देश की पहली समुद्री आप्टिकल फाइबर परियोजना का उद्घाटन हो चुका है। इससे इस द्वीप समूह को बेहतर और सस्ती ब्राडबैंड संपर्क सुविधा हासिल होगी। इस बंदरगाह को समुद्री जल मार्ग की प्रमुख गतिविधियों के केंद्र के रूप में विकसित किया जा रहा है। वैसे भी यह क्षेत्र दुनिया के कई पोतांतरण बंदरगाहों की तुलना में काफी प्रतिस्पर्धी दूरी पर स्थित है। बदलती जरूरतों के परिप्रेक्ष्य में पूरी दुनिया यह मानकर चल रही है कि जिस देश में हवाई अड्डों और बंदरगाहों का संजाल और जुड़ाव जितना बेहतर होगा, इक्कीसवीं सदी के व्यापार में वही देश अग्रणी रहेंगे। जब यह बंदरगाह बन जाएगा तो इससे समुद्री व्यापार में भारत की हिस्सेदारी बढ़ेगी और युवाओं के लिए नए रोजगार पैदा होंगे। इस द्वीप पर विकसित किए जा रहे माल-परिवहन के दो रणनीतिक कंटेनर पोतांतरण टर्मिनल के दो भौगोलिक फायदे होंगे। पहला, यह व्यस्त पूर्वी-पश्चिमी अंतरराष्ट्रीय जहाजरानी मार्ग के निकट है। इसलिए शुरू होने के बाद यह पोतांतरण की बेहतर सुविधा देगा। नतीजतन, व्यापारिक गतिविधियां बढ़ेंगी। दूसरे, इस क्षेत्र में आधुनिक ढंग से निर्मित जहाजों से माल उतारने-चढ़ाने की सुविधाएं बंदरगाह पर उपलब्ध होंगी, जिससे बड़े जहाजों की आवाजाही बढ़ेगी।फिलहाल भारत के ज्यादातर बंदरगाहों पर बड़े जहाज प्लेटफार्म तक नहीं पहुंच पाते हैं। उन्हें गहरे जल में ही खड़ा रखना पड़ता है।
अंडमान-निकोबार द्वीप प्रशासन ने कुछ समय पहले ही महान निकोबार द्वीप की दक्षिणी खाड़ी में मुक्त व्यापार भंडारण क्षेत्र विकसित करने के लिए कंटेनर पोतांतरण टर्मिनल के लिए प्रक्रिया आरंभ की है। इससे भारतीय पोत परिवहन को कोलंबो (लंका), सिंगापुर और मलेशिया के क्लांग बंदरगाह में पोतांतरण का नया विकल्प हासिल होगा। दरअसल, इस वक्त भारत हर क्षेत्र में स्वदेशीकरण और आत्मनिर्भरता के दृढ़ संकल्प के साथ आगे बढ़ रहा है। साथ ही वैश्विक स्तर पर विनिर्माण और वस्तुओं की आपूर्ति की कड़ी में अहम भागीदारी कर खुद को एक विश्वसनीय कारोबारी के रूप में स्थापित करने में लगा है। इस दृष्टि से भी नदियों, समुद्री जलमार्गों और बंदरगाहों का आधुनिक ढंग से ढांचागत विकास करना आवश्यक है। तय है, आने वाले पांच-छह साल के भीतर इन जलमार्गों और बंदरगाहों को नवीनतम रूप देने में भारत सफल होगा।
अंडमान-निकोबार का ढांचागत विकास हो जाने पर यहां मछली पालन, एक्वाकल्चर और समुद्री शैवाल की खेती का कारोबार बढ़ेगा। भारत के व्यापारी ही नहीं, दुनिया के कई देश इस परिप्रेक्ष्य में व्यापार की बड़ी संभावनाएं देख रहे हैं। इस दृष्टि से पोर्ट ब्लेयर में एक प्रायोगिक परियोजना शुरू की गई थी, जिसके परिणाम उत्साहजनक रहे हैं। अंडमान-निकोबार के समुद्र तटीय मछुआरों की हालत भी मैदानी क्षेत्रों के गरीब और पराश्रित किसानों जैसी ही है। इन तटवर्ती क्षेत्रों में मछली पकड़ कर आजीविका चलाने वाले मछुआरों की संख्या करीब आठ करोड़ है। गोया, तय है अंडमान-निकोबार क्षेत्र में तटवर्ती मछुआरों को इस क्षेत्र के विकास का सीधा लाभ मिलेगा।
अंडमान-निकोबार द्वीप समूह का निकोबार क्षेत्र आरक्षित जैवमंडल (बायोस्फीयर) क्षेत्र में आता है। इसे 2013 में विशेष जैवमंडल का दर्जा दिया गया था। भारत में कुल अठारह जैवमंडल क्षेत्र हैं, उनमें से एक निकोबार जनजातीय (आदिवासी) आरक्षित वन-भूमि की श्रेणी में है। इस समुद्री क्षेत्र में विशेष प्रजाति के लैदरबैक कछुए, खारे पानी में रहने वाले मगरमच्छ, निकोबारी केकड़े खाने वाले मकाक और प्रवासी पक्षी शामिल हैं, जिनका इस बहुआयामी विकास परियोजना से प्रभावित होना तय है।
हालांकि पर्यावरणविद आशंका जता रहे हैं कि इससे यहां के प्राचीन वर्षा वनों को भारी क्षति होगी। इन्हें हानि होगी, तो कई दुर्लभ प्राणी और वनस्पतियों की प्रजातियां और इस भू-भाग का मानसून भी प्रभावित होगा। यही नहीं, निकोबार द्वीप समूह में गिनती के रह गए जो जनजातीय समूह आदिम अवस्था में रहते हैं, उनका नैसर्गिक जीवन भी प्रभावित होने की शंका जताई जा रही है। इनमें शोंपेन और निकोबारी वनवासी जनजातियां शामिल हैं। इनकी संख्या करीब 1761 है। निकोबार में एक विशेष प्रजाति के न उड़ सकने वाले पक्षी मेगापाड का भी घर है। इनके कुल इक्यावन घोंसले हैं, जिनमें से तीस पूरी तरह नष्ट कर दिए जाएंगे। दरअसल, यह विकास गलाथिया खाड़ी और कैंपबेल खाड़ी राष्ट्रीय उद्यानों की दस किमी परिधि में होना है, जो पर्यावरणीय दृष्टि से अत्यंत संवेदनशील क्षेत्र माना जाता है। हालांकि भारतीय प्राणी सर्वेक्षण और अंडमान-निकोबार प्रशासन के वन एवं पर्यावरण विभाग ने दावा किया है कि परियोजना से वन और प्राणियों को नुकसान नहीं होने दिया जाएगा। मैंग्रोव वृक्षों के संरक्षण और दस हेक्टेयर में फैली मूंगा चट्टानों की 20,668 बस्तियों में से 16,150 बस्तियों की सुरक्षा मूलस्थान से खिसका कर की जा रही है।
अगर कुछ पर्यावरणीय हानि उठानी भी पड़ती है, तो इसे इसलिए स्वीकार किया जाना चाहिए, क्योंकि यह बृहद परियोजना राष्ट्रीय सुरक्षा और नागरिक उद्देश्यों की दृष्टि से अत्यंत महत्त्वपूर्ण मानी जा रही है। इसके तहत सैन्य-नागरिक उपयोग के लिए आवागमन के श्रेष्ठ उपाय किए जा रहे हैं। यहां के अधिकतर विकास कार्य भी नौसेना के नियंत्रण में होने हैं। यहां से बंगाल की खाड़ी, दक्षिण और दक्षिण-पूर्वी एशियाई सागर क्षेत्र में भारत को सामरिक और व्यापारिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण और उपयोगी नियंत्रण की सुविधा हासिल होने की उम्मीद है। दरअसल, इसी दक्षिण सागर में चीन का जबर्दस्त हस्तक्षेप है। चीन का प्रमुख व्यापार और साम्राज्यवादी दबदबा इसी मलक्का जलडमरुमध्य में सबसे ज्यादा है। श्रीलंका तो यहां से निकट है ही, इंडोनेशिया का सुमात्रा द्वीप भी बमुश्किल नब्बे किमी की दूरी पर है। यह स्थल मलक्का जलडमरुमध्य के पश्चिमी प्रवेश द्वार के करीब है। खाड़ी से तेल ले जाने वाले और पश्चिम में वस्तुओं का निर्यात करने वाले चीनी जहाज मलक्का जलडमरुमध्य से ही गुजरते हैं। इसलिए निकोबार द्वीप पर सैन्य सामग्री और युद्धपोतों को रखने तथा बनाने के लिए डाकयार्ड भी यहां बनाए जा सकते हैं। साफ है, जब युद्धपोत यहां खड़े किए जाएंगे, तो मिसाइलें भी स्थापित करने के उपाय किए जाएंगे।
इस परियोजना के माध्यम से यह उपाय भारत की सामरिक रणनीति का हिस्सा है। इसके संपन्न हो जाने के बाद भारत चीन को कड़ा संदेश दे सकेगा। सिंगापुर, हांगकांग और दुबई ने पहले ही दिखा दिया है कि किस तरह द्वीपों और समुद्री तटों को विकसित करके सामरिक और व्यापारिक महत्ता को एक साथ बढ़ाया जा सकता है। भारत निकोबार में यही कर रहा है।
Date:11-01-23
धर्मांतरण पर राजनीति गलतसंपादकीय
सर्वोच्च अदालत ने सोमवार को धर्मांतरण को गंभीर मुद्दा बताते हुए कहा है कि इसे राजनीतिक रंग नहीं दिया जाना चाहिए। अदालत एक याचिका पर सुनवाई कर रही थी। याचिका में मांग की गई है कि छलपूर्ण धर्मांतरण को नियंत्रित करने के लिए केंद्र और राज्यों को कड़े कदम उठाने का निर्देश दिया जाए। मामले में अगली सुनवाई 7 फरवरी को होगी। जस्टिस एम. आर. शाह और जस्टिस सी. टी. रविकुमार की पीठ ने अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी से मामले में अदालत मित्र के रूप में मदद मांगी। उन्होंने वेंकटरमणी से उस मामले में पेश होने को कहा जिसमें याचिकाकर्ता ने ‘भय‚ धमकी‚ उपहार और मौद्रिक लाभ के जरिए धोखाधड़ी’ के माध्यम से कराए जाने वाले धर्मांतरण पर रोक लगाने का आग्रह किया गया है। बल‚ लालच आदि द्वारा धर्मांतरण ऐसे तरीके हैं‚ जिन्हें रोका जाना जरूरी है‚ और अदालत चाहती है कि इसे रोकने के लिए जो भी जरूरी बन पड़े‚ किया जाना चाहिए। दरअसल‚ अदालत मित्र से अदालत की अपेक्षा है कि वे धर्मांतरण के तरीकों से पार पाने के लिए जरूरी सुधारात्मक उपायों की बाबत बताएं। धर्मांतरण को लेकर पहले भी शीर्ष अदालत अपनी चिंता जाहिर कर चुकी है। हाल में एक मामले की सुनवाईके दौरान शीर्ष अदालत ने कहा था कि जबरन धर्मांतरण राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए खतरा पैदा कर सकता है। न केवल इतना‚ बल्कि इससे नागरिकों की धार्मिक स्वतंत्रता भी खतरे में पड़ सकती है। अदालत ने चेताया था कि अगर धोखे‚ प्रलोभन और भय–धमकी के जरिए कराए जाने वाले धर्मांतरण को नहीं रोका गया तो ‘बहुत मुश्किल स्थिति’ पैदा हो जाएगी। उस समय शीर्ष अदालत के समक्षएक दलील यह भी दी गईथी कि धर्म की स्वतंत्रता में दूसरों को धर्मांतरित करने का अधिकार शामिल नहीं है। इस पर अदालत ने केंद्र सरकार से इस ‘बेहद गंभीर’ मुद्दे पर गंभीरता से प्रयास करने को कहा था। गौरतलब है कि यह मसला कोईनया नहीं है। वर्षों से देश के विभिन्न इलाकों खासकर जनजातीय और पिछड़े इलाकों में लोभ–लालच देकर धर्म परिवर्तन कराए जाने के मामले प्रकाश में आते रहे हैं। कई इलाकों का तो धार्मिक रूप से पूरा परिदृश्य ही बदल चुका है। दरअसल‚ धर्मांतरण को लेकर चिंता वाजिब है‚ क्योंकि इससे न केवल समाज बंटता है‚ बल्कि राजनीतिक और सामाजिक रूप से भी विभाजन की वेदना देश और समाज को सतत दग्ध किएरहती है।
Date:11-01-23
जोशीमठ का संदेशसंपादकीय
उत्तराखंड के जोशीमठ से आ रही तस्वीरें और वीडियो हृदय विदारक हैं। अपने पुरखों के घर को त्यागते बाशिंदों का विलाप किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को मर्माहत कर देता है, पर विकल्प ही क्या रह बचा था ? यह अच्छी बात है कि प्रशासन ने राहत एवं बचाव कार्यों में तेजी लाते हुए करीब चार हजार लोगों को जोखिम वाले घरों से सुरक्षित निकाल लिया है और उनके लिए फौरी वैकल्पिक व्यवस्था की गई है। ब्योरों के मुताबिक, जमीन धंसने से अब तक लगभग 600 घरों में दरारें आई हैं और सबसे बुरी हालत वाली इमारतें गिराई जा रही हैं। पूरे जोशीमठ को सुरक्षा के लिहाज से खतरनाक, मध्यवर्ती व पूर्ण सुरक्षित क्षेत्र में बांटकर काम किया जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सीधे हस्तक्षेप से उम्मीद है कि जोशीमठ के आपदाग्रस्त लोगों को बेहतर मदद मिल सकेगी, और स्थानीय प्रशासन को लेकर उनका असंतोष भी कुछ कम होगा।
जोशीमठ की ऐतिहासिकता और सनातन धर्म में उसकी अहमियत किसी से छिपी नहीं है, लेकिन दुर्योग से हमने उसे अक्षुण्ण रखने को पर्याप्त महत्व नहीं दिया। अगर दिया होता, तो इंसानी बसाहट और उसकी जरूरतों के परिणाम पर भी संजीदगी से विचार हुआ होता। आठवीं सदी में आदि शंकराचार्य ने यहां पीठ की स्थापना की थी। सन् 1872 तक यहां की आबादी महज 455 थी, लेकिन अगले 100 वर्षों में ही यह संख्या 12,000 के पार पहुंच गई, तो स्वाभाविक ही उसकी पारिस्थितिकी पर असर पड़ना था। वहां हजारों की तादाद में घर, सराय और होटलों की तामीर कर दी गई। तथ्य यह है कि भू-वैज्ञानिक लगातार आगाह करते रहे हैं कि हिमालय पर्वत अभी बनने की प्रक्रिया में है, इसलिए इसमें भू- स्खलन, बादल फटने जैसी घटनाएं होती रहेंगी, इसके बावजूद उसकी पारिस्थितिकी के प्रति संवेदनशील रवैया नहीं अख्तियार किया गया। सच तो यह है कि बढ़ती मानव गतिविधियों ने जोशीमठ ही नहीं, तमाम पहाड़ी इलाकों के वातावरण को प्रभावित किया है।
निस्संदेह, विशाल आबादी के भरन-पोषण और रख-रखाव के लिए कुदरती संसाधनों का दोहन सरकारों की मजबूरी है, मगर दूरदर्शी नजरिये के बगैर कोई विकास टिकाऊ नहीं हो सकता। एक क्षेत्र की कीमत पर दूसरे को संवारने की नीति स्थायी नहीं हो सकती, उनके बीच संवेदनशील समन्वय बिठाना ही होगा। जोशीमठ के इर्द-गिर्द ही चल रहे जिन प्रोजेक्ट पर आज आनन-फानन में रोक लगाई गई है, क्या उनको मंजूरी देते वक्त या उन पर क्रियान्वयन के दौरान आज जैसे परिणाम की चिंता की गई थी ? तीर्थस्थलों के आस-पास नागरिक सुविधाओं के विस्तार या पर्यटकों के हित में विकास कार्यों से किसी को गुरेज नहीं, लेकिन उस पवित्र स्थल या शहर पर पड़ने वाले दबावों का भी व्यापक आकलन बहुत जरूरी है। देवभूमि उत्तराखंड में सदियों से श्रद्धालु और सैलानी आते रहे हैं, मगर हालिया दशकों में भौतिकतावादी दृष्टि ने आस्था पर सुविधाओं का दबाव इतना बढ़ा दिया है कि आपको हरेक धर्मस्थल पर लकदक होटल और विश्रामगृह मिल जाएंगे। विडंबना देखिए, जोशीमठ में आज कुछ होटलों को तोड़ने की विवशता तब महसूस हुई, जब वह गुफा ध्वस्त हो गई है, जिसमें आदि शंकर ने तपस्या की थी। इसमें कोई दोराय नहीं कि पर्यटन स्थल बड़ी संख्या में लोगों को आजीविका मुहैया कराते हैं, पर पर्यटन उद्योग का भविष्य तभी बचेगा, जब ये स्थल सुरक्षित रहेंगे।
Date:11-01-23
जातिगत जनगणना पर सबकी निगाहसंजय कुमार, ( प्रोफेसर, सीएसडीएस )
जब से बिहार में जातिगत जनगणना शुरू हुई है, तभी से यह सवाल पूछा जा रहा है कि क्या मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की पहल पर शुरू हुई यह जनगणना महज राजनीतिक लाभ कमाने की कवायद है या यह पिछड़े तबकों के सामाजिक-आर्थिक उत्थान में सचमुच मददगार साबित होगी ? सवाल इसके समय को लेकर भी उठ रहा है, क्योंकि लोकसभा चुनाव सिर्फ 16 महीने दूर हैं और कयास लगाए जा रहे हैं कि बिहार की सत्ता में बैठी पार्टियां इससे राजनीतिक लाभ कमाना चाहती हैं। कुछ ऐसे लोग भी हैं, जिनका तर्क है कि बिहार में जातिगत जनगणना क्यों जरूरी है?
फिलहाल, यह बता पाना कठिन है कि बिहार की जातिगत जनगणना राजनीति से प्रेरित कोई सियासी खेल है या पिछड़े वर्गों के सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन को दूर करने की सरकार की नेक कवायद ? यह तो आंकड़ों के सार्वजनिक होने और उन पर होने वाले विचार- विमर्श से पता चल सकेगा। मगर इससे शायद ही किसी को ऐतराज होगा कि मंशा चाहे जैसी भी हो, उसे पूरा करने के लिए आंकड़ों की दरकार होगी ही। आंकड़े न हों, तो न राजनीति हो सकती है औरन ईमानदार शासकीय कोशिश। ऐसे में, जातियों की संख्या पता लगाने और उनकी सामाजिक व आर्थिक स्थिति को जांचने के लिए जातिगत जनगणना का यह प्रयास तारीफ के काबिल है। हालांकि, इसे हम आधिकारिक तौर पर जनगणना नहीं कह सकते, क्योंकि यह काम केंद्र सरकार का है, जो हर दस साल पर इसे करती हैं।
बहस इस बात पर भी है कि जब केंद्र सरकार इस तरह की जनगणना को लेकर उत्साहित नहीं है, तब बिहार इसको लेकर इतना आग्रही क्यों है ? मेरा मानना है कि ओबीसी की संख्या और उनकी सामाजिक- आर्थिक स्थिति का पता लगाने में कोई बुराई नहीं है, क्योंकि इससे बिहार में ओबीसी की संख्या, बिहार की आबादी में उनकी हिस्सेदारी जैसी तमाम अटकलों पर विराम लग जाएगा। ऐसे वक्त में, जब ओबीसी की आबादी को काफी ज्यादा बताया जा रहा हो और 1931 की जनगणना के आंकड़ों पर विवाद हो, तब जनगणना ही एकमात्र ऐसा तरीका है, जिससे विश्वसनीय जानकारी हासिल हो सकती है और बिहार सरकार फिलहाल यही काम कर रही है। इसी तरह, जातिगत जनगणना को राजनीति से प्रेरित बताने का आरोप भी सिरे नहीं चढ़ता, क्योंकि बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार शुरू से जाति आधारित जगनणना के समर्थक रहे हैं। जब एनडीए के भीतर इस मसले पर चर्चा हो रही थी और नीतीश कुमार राजग गठबंधन का हिस्सा थे, तब भी वह इस मुद्दे पर मुखर थे। इसी कारण यह आरोप निराधार लगता है कि लोकसभा चुनाव को देखते हुए राजनीतिक मकसद से उन्होंने यह दांव चला है।
बेशक अभी आंकड़े एकत्र किए जाने बाकी हैं, क्योंकि घरों की सूची का पहला चरण ही अभी शुरू हुआ है और दूसरे चरण में घरों के मुखिया की गिनती की जाएगी और उनकी सामाजिक व आर्थिक स्थिति के बारे में जानकारियां जुटाई जाएंगी, लेकिन इससे इनकार नहीं किया जा सकता है कि इस गणना से कोई राजनीतिक प्रभाव नहीं पड़ेगा। नीतीश कुमार की जद (यू) – राजद-कांग्रेस गठबंधन सरकार ने साफ संकेत दिया है कि बिहार में ओबीसी के सामाजिक-आर्थिक पिछड़ेपन को संजीदगी से दूर करने की उसकी मंशा है। और, इस तरह के किसी भी प्रयास के लिए सरकार को आंकड़े चाहिए, जिसके लिए यह कवायद शुरू की गई है। संभव है, राजद और जद (यू) को इस प्रयास से कुछ चुनावी लाभ मिले, लेकिन ओबीसी के सामाजिक-आर्थिक उत्थान में भी मदद मिल सकती है, क्योंकि नीतीश कुमार यह संकेत देने में सफल रहें हैं कि वह ओबीसी की परवाह करते हैं।
यहां यह ध्यान रखना भी महत्वपूर्ण होगा कि बिहार में सत्तारूढ़ दोनों मुख्य दलों (राजद और जद-यू) के पास ओबीसी मतदाताओं का अच्छा-खासा समर्थन है । उनके लिए चुनाव बहुत कुछ इस बात पर भी निर्भर करता है कि ओबीसी के कितने वोट उनके खाते में जाते हैं। जातिगत जनगणना से इन दोनों पार्टियों ने कम से कम ओबीसी के एक बड़े हिस्से को इसकी जरूरत को लेकर आश्वस्त कर दिया है, और उनमें यह उम्मीद जगाई है (यह छलावा भी साबित हो सकती है) कि है इस जनगणना के बाद उनका जीवन कुछ बेहतर होगा। यही वजह है कि जद (यू) और राजद को इससे सियासी लाभ मिलने की उम्मीद है। हमें यहां यह भी आश्चर्य नहीं करना चाहिए कि समाजवादी पार्टी या बीजू जनता दल जैसी पार्टियां, जो पुराने जनता दल से टूटकर अलग हुई हैं, अपने-अपने राज्यों में इस कवायद को आगे बढ़ा सकती हैं या ओबीसी जनगणना के लिए राज्य सरकारों पर अब दबाव बन सकता है।
हालांकि, जद (यू) और राजद को मिलने वाले इस फायदे को बांटा जा सकता था, यदि भाजपा ने जातिगत जनगणना का विरोध नहीं किया होता। इसने ओबीसी के एक बड़े वर्ग में संदेह पैदा किया है। ओबीसी जातियों के लोगों को इस बात का जवाब नहीं मिल रहा कि भाजपा आखिर क्यों इसका लगातार विरोध कर रही है? क्या केंद्र सरकार के पास इस बाबत कुछ ऐसे तथ्य हैं, जो वह छिपाना चाहती है ?
भाजपा को एहसास होना चाहिए कि उसने देश भर के ओबीसी मतदाताओं, विशेषकर निचली ओबीसी जातियों के बीच अपनी अच्छी पकड़ बनाई है। लोकनीति-सीएसडीएस के आंकड़े बताते हैं कि 2009 के आम चुनाव में महज 22 फीसदी ओबीसी वोट पाने वाली भाजपा ने 2019 के लोकसभा चुनाव 44 प्रतिशत ओबीसी मत हासिल किया। ऐसे में, केंद्र सरकार की तरफ से जातिगत जनगणना शुरू की जाती, तो ओबीसी समुदायों में सकारात्मक संदेश जाता, मगर संभव है कि उसके पास कुछ अन्य मजबूरियां रही हों। मुमकिन है, उसकी यह आशंका हो कि जातिगत जनगणना का नतीजा ‘मंडल पार्ट-2’ के रूप में सामने आ सकता है। उल्लेखनीय है कि ‘मंडल-1’ ने विशेषकर उत्तर भारत के राज्यों में ओबीसी राजनीति को काफी बदल दिया था।
हालांकि, भाजपा नेतृत्व को भरोसा रखना चाहिए कि आज की भाजपा 1990 के दशक से अलग है। केंद्र सरकार द्वारा समर्थित जातिगत जनगणना जैसी कोई भी कवायद शायद ही उसके समर्थन आधार को प्रभावित करती ।
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हमारे देश के मूल निवासियों के साथ स्वतंत्र भारत में बहुत सम्मान जनक व्यवहार नहीं किया गया है। आज एक आदिवासी महिला के राष्ट्रपति बन जाने के बाद आदिवासी उन कानूनों के निशाने पर हैं, जिनसे ब्रिटिश राज के पूर्वाग्रह की बू आती है। एक नजर उन कानूनों पर, जो आदिवासियों को ‘असभ्य जाति’ मानते हैं –
भारत सरकार अधिनियम,1919 के अनुसार ये क्षेत्र ‘आमतौर पर और वास्तव में पिछड़े क्षेत्र’ थे और 1935 के तहत ‘आंशिक और पूर्ण रूप से बहिष्कृत क्षेत्र’ माने गए।
चिंताजनक यह है कि संविधान की पांचवी और छठवीं अनुसूचियों की भाषा जनजातियों के लिए बनाए गए औपनिवेशिक कानूनों का संरक्षण करती हुई लगती है। जनजातियों की ‘सुरक्षा’ और उनकी ‘मदद’ जैसे शब्द, इन जनजातियों को हमेशा अपवाद बनाए रखने की ओर इशारा करते हैं। इसमें समानता और सम्मान वाले भाव का अभाव लगता है।
अगर जनजातियों को वाकई हम समान स्थान देकर मुख्य धारा में लाना चाहते हैं, तो सबसे पहले हमें औपनिवेशिक कानूनों को समाप्त करके, औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्त होना होगा।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित अध्र्य सेनगुप्ता और आदित्य प्रसन्ना भट्टाचार्य के लेख पर आधारित। 16 दिसंबर, 2022
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Date:10-01-23
Greening GDPJoshimath must be a wake-up call. Factor in environmental costs, in projects and in national outputTOI Editorials
The emergency evacuation of residents from parts of Joshimath should serve as a national wake-up call. The town’s land subsidence problem featured in government reports over four decades ago. But that wisdom got bulldozed by infrastructure and construction plans designed for the region. The repeated economic and human loss experienced in the Garhwal Himalaya over the last few years should finally spur India to factor environmental consequences in its calculation of project benefits and in GDP. It will present a more realistic picture of where we stand.
The overarching case for estimating green GDP, which accounts for environmental degradation, is the risk faced by India on account of climate change. India ranked fifth in the Global Climate Risk Index in 2020, which makes the country among the more vulnerable nations. Since then, India has committed to a nationally declared emission target of net zero by 2070. It’s a quantitative measure and the milestones on the path of its realisation need to be measured. Here, our performance is poor. A recent study in the RBI Bulletin pointed out that data on environment indicators are unavailable in any Indian database. Researchers are forced to rely on data generated overseas in an area where India is acutely vulnerable.
The situation is retrievable. Accounting for environmental degradation allows for calibration of policy and a sharper focus on relevant technology. Consider the example given by US economist William Nordhaus. He estimated that between 1973 and 2018, growth rate of net national product after adjusting for environmental costs is actually marginally higher than the unadjusted NNP. The reason is that over time emissions have declined relative to output and costs of producing an additional unit keep going down. That’s the case in India too, which is a cause for hope. The RBI study said that each unit of GDP in 2000 consumed 4. 5 kg of material. By 2017, it had come down to 2. 8 kg per unit of GDP. The trend will continue.
The environmental risk in India varies across regions. Estimating green GDP at both national and state levels will hold a mirror to policy makers on the potential costs and benefits of economic decisions. The first step is to build our own database. It needs to be followed by dissemination of green GDP to inform policy at levels of government.
Date:10-01-23
Mixed Benches, PleaseWomen, SCs, STs, OBCs & minorities are hugely underrepresented in higher judiciary. Correct thisTOI Editorials
A law ministry presentation that showed 79% of high court judges appointed between 2018 and 2022 were upper castes is unsurprising, but also unacceptable. Minorities, SCs and STs comprise 20%, 16% and 8% respectively of the population, but only 2. 6%, 2. 8% and 1. 3%, respectively, of judges appointed post-2018 were from these groups. OBCs too are underrepresented, and women, nearly 50% of the population, made up just 13% of HC judges.
In November, CJI Chandrachud had said that today’s HC judge composition reflects the situation of 30 years ago. By all accounts, there is tremendous diversity in higher education today. All India Survey of Higher Education reveals 53 women per 100 men in LLB courses in 2019-20 from just 44 in 2015-16. Similarly, SCs made up 13% of all LLB enrolment and OBCs 29%, suggesting that the old order has irrevocably changed.
One of the many criticisms of the collegium system has stemmed from its indifference to the changing social composition in public institutions. Higher judiciary mirrors private entities – mainstream media is no exception – in not being representative enough. The collegium’s alleged penchant for nepotism, with many of those passing muster being sons, a few daughters, and kin of ex-judges, is seen as blocking the way for “unpedigreed” others. The nowquashed six-member NJAC was to have one of the two eminent members from SC, ST, OBC, women or minorities. And in another blow against diversity, GoI has not cleared the appointment of India’s first gay judge. Diversity brings collective experiences and point of views for the Bench from traditionally non-elitist groups, improving quality of justice delivery, and representation inspires social confidence. CJI Chandrachud should walk the talk and prod the Supreme Court and HC collegiums into actively looking for diversity in appointments.
Date:10-01-23
Broken-Back Mountains: Joshimath, Darjeeling, Sikkim …Time to cap the numbers of vehicles, tourists in hill towns & ask if we need every fast connectivity optionAnand.Soondas
In 1851, Seattle, chief of the Suquamish tribe around Washington’s Puget Sound, is believed to have delivered what many still consider to be one of the most profound environmental statements made by man. In reply to a proposed treaty under which his tribe was persuaded to sell acres of land to the colonisers, Seattle wrote to the US president that all things are connected: “How can you buy or sell the sky, the warmth of the land? If we do not own the freshness of the air and the sparkle of the water, how can you buy them? Every part of this earth is sacred … Every shining pine needle, every sandy shore, every mist in the dark woods, every clearing and humming insect is holy. ”
Eventually, his land was gone, just as the natural springs – dhara in Nepali – are gone from Darjeeling. As a kid growing up in Kurseong, one of the joys of summer was to scamper up the rocks of steep streams – khola – find a dhara and take a bath. You could drink that water. On the road up to the hills from the plains of Siliguri, dharas dotted the mountain side. They flowed like liquid pearls. They have all but dried up. In their place are shops, concrete houses, hotels – thousands of them – and parking lots. There were few cars in Kurseong in the ’80s. Many would remember the registration number of each other’s gaari, simple four digits. Ours was 5470.
After years, this October when I visited Darjeeling, in time for Dashain, I saw that the place was practically under the wheels of vehicles. It was a horrifying sight. The young driver who ferried us around had an explanation. “People go out, send money home, where do we invest? In taxis and hotels. Easy. People retire, where do they put their savings? Taxis and hotels. ”
Recently, in a TOIreport, one of Uttarakhand’s mostnoted environmentalists, Anil Joshi, said, “We need to learn from the experience of Joshimath. A scientific study of hill towns is needed. What’s the carrying capacity … There is a limit for each town and we need to keep it in mind. ” In Joshimath now, as houses burst out in cracks, residents say that with an aquifer breaching, the mountains are falling on their head and water is lapping at their feet.
Some numbers are terrifying. In 2022, close to 5 crore tourists, 4 crore kanwar yatris and 45 lakh Char Dham pilgrims went to Uttarakhand. That’s about 10 crore. Tiny Joshimath, an ancient town of about 25,000 people, received roughly 5 lakh guests in 2019. A section of people rejoiced when it was reported that a staggering 45 lakh pilgrims trotted up to pray at the Char Dham shrines. Just a few years back, in 2017, it was half at 24 lakh devotees. Does it call for applause or deep introspection? Something has to – will – give. Can you drive tanks on bridges made of bamboo? The hills arenot made to be burdened thus.
There are other dangers. The faithful left a mountain, literally, of garbage at Kedarnath and Badrinath. The solid waste generation at Kedarnath, according to officials, was 10,000 kg daily. A supervisor of the cleanliness drive at Kedarnath had said then, “We’re digging seven-feet deep pits and burying biscuit packets and tobacco wrappers near Gaurikund. ” Much of the filth was thrown directly into rivers like Ganga and Alaknanda. Some flung even dead ponies and horses in the “holy” waters. A swathe, experts say, falls on the Main Central Thrust, a major geological fault. It is built over moraine – paraglacial sediment – and is one of the most fragile segments of the Third Pole, parts of which are the Himalayas. Any construction needs considerable thought.
The hills, just like our cities below, need investments and infrastructure. We cannot deprive the people there of the fruits of modernisation – or money. The key is imagination and balance. And some hard questions. Has the time come to cap vehicles and tourist numbers, and monitor footfalls? Do we need the train to Sikkim and flyovers to Shimla? How fast do we want to travel? Wasn’t taking it slow the whole purpose and beauty of a trip to the mountains? Is the blueprint honest and have we spoken to the real stakeholders, the locals, about real profits and pitfalls?
The Sikkim railway project has led to grumblings and heartburn in the towns and villages where life will be touched – and then changed forever. The SevokeRangpo line, say villagers, will have consequences. They talk about a fall in the water table – the severity of the drinking water crisis in Darjeeling is unimaginably painful – and more landslides. That stretch leading up to Gangtok and beyond is naturally quake prone. For the first time, it will connect Sikkim with India’s railway network. But at what cost?
Tread softly in the hills, our elders back home would say. Bistari. All things are connected.
Date:10-01-23
Joshimath, A Canary In India’s MineshaftDevelopment, not mindless developmentET Editorials
The unfolding disaster in Joshimath, Uttarakhand, must be treated as an unequivocal warning of the perils of pursuing pell-mell development that runs in the face of environmental logic and safety. The ‘sinking’ of Joshimath has been catapulted to the headlines, but this is no sudden calamity. It has been a disaster in the making over decades. Protecting the Himalayan ecosystem — home to river systems critical to life in the subcontinent — and pursuing development accordingly is in our ‘selfish’ self-interest.
Joshimath is the proverbial canary. Environmental considerations, usually considered by all and sundry as more cosmetic than mandatory, must be treated seriously. These are not ‘irritants’ or unnecessary hurdles in the path of jugaad-hurrahing development. No one is making an argument against development, or against building strategic and basic infrastructure and settlements, and creating opportunities for livelihoods. But all these activities must be in consonance with the carrying capacity of the town, area and region concerned. Development must be pitched against mindless development that ignores consequences. Existing environmental and forest clearance processes to ensure ecological integrity of projects must be made more robust. This does not mean more red tape.
There is a need to start writing and treating environmental impact assessments of projects with the seriousness they deserve. Consultations with local stakeholders and experts must be fed into the development of environmental management plans. Most importantly, implementation must be robust and action against illegal activities —such as river-bed sand-mining — must be brought to an end, with a heavy hand, if need be. Drainage in settlementsmust be improved to prevent creation of soak pits, vehicular and helicopter traffic must be limited in these areas, and demand from religious tourists controlled. Joshimath is a prime example of how a development pathway that bulldozes money-making over environmental protection undermines the very development being sought.
Date:10-01-23
A step towards fighting corruptionThe latest Supreme Court judgment may not deter people from corruption, but it is praiseworthyR.K.Raghavan
In a judgment in December 2022 — Neeraj Dutta v. State (Govt. of NCT of Delhi) — the Constitution Bench of the Supreme Court came down heavily on corruption among public servants in the country and lowered the bar for the quantum of evidence required to convict persons charged with corruption. This verdict was hailed by those who desire probity in public administration and demand deterrent penalties for criminal activities. This was not the first time that the Supreme Court was speaking on endemic corruption in our system; on many occasions in the past, the court gave equally strong expression to this scourge that afflicts our public administration. But in spite of its unequivocal stand, the extent of corruption in public life remains undiminished.
The ruling
Through its ruling, the Supreme Court debunks the myth that absolute proof of guilt alone can help convict an offender. The court has now laid down that even if prosecution witnesses turn hostile, a conviction would be in order if all the circumstantial evidence marshalled by the prosecution and produced before the court points unmistakably to the guilt of the accused. This is a great step towards ensuring integrity in public services, especially in the ‘superior’ services such as the Indian Administrative Service and Indian Police Service.
There are two aspects to the fight against corruption: the severity of the law and its application; and the strength of public opinion that would help carry forward the campaign for a clean public life. Both are equally important if we are to rid the country of the weakest link in a burgeoning bureaucracy.
There is often a cry in favour of making our laws more stringent so that the wrongdoer is punished. Even law-makers and the public sometimes don’t understand that deterrence works only up to a point. The demand for the death penalty for a wide range of offences is therefore misdirected. Legislators disregard the fact that the more you enhance penalties for criminal behaviour, the higher will be the quantum of proof required by the courts to be convinced of the guilt of those arraigned before them. It is probably this hard reality that persuaded the Constitutional Bench to lower the bar for the quantum of evidence required to convict persons charged with corruption.
In effect, the Supreme Court has set the standard of ‘preponderance of probability’, a yardstick that is usually not acceptable to sustain conviction in criminal trials. Earlier, the belief was that only conclusive proof, namely, proof that does not leave an iota of doubt in the minds of the courts, was required. This has now been diluted. The court has directed that infirmities such as non-availability of the complainant, either because he is dead or otherwise not traceable, should not stand in the way of accepting the story of the prosecution.
The same liberal application of the law of evidence will now apply to cases where prosecution witnesses turn hostile, either because of inducement or intimidation. It is well known that some powerful people are accused of ‘buying’ prosecution witnesses. Some lawyers have also been part of this, bringing shame to the criminal justice system and to the bar. The apex court is aware of this and believes it can no longer be a mute spectator.
Corruption everywhere
Will this judgment alter the face of corruption? At the cost of being branded a cynic, I believe that corrupt public servants will find other means of covering up their misdeeds. This is because many are willing to offer bribes to public servants, either on their own or on demand. This nexus between offender and victim has become a part of our ethos.
It is undeniable that the misdeeds of public servants are partly attributable to political corruption. The current situation in many States has become so bad that no service to which a citizen is entitled as a fundamental right can be obtained without greasing the palm of someone in the administrative or political hierarchy. Jobs are often sold at a price. Many applicants are prepared to pay without a complaint as there is acute unemployment. No approval for construction of a building or for registration of a property is possible without payment of a bribe. This situation has only worsened in many States. Several public servants involved in this racket cite illegal and rapacious demands from the political hierarchy as the reason for such bribes. Whether this is really the case or not, many corrupt officials in the administration are willing conduits and avail themselves of the opportunity to line their pockets.
The latest Supreme Court judgment may not deter people from corruption. However, that is no reason for us to give up the fight. It is here that we need enlightened opinion leaders who are not scared of taking on powerful elements in politics or in administration.
Date:10-01-23
A mountain reeling under human aggressionC. P. Rajendran
Many raised a red flag against a massive infrastructural project called the Char Dham road project that is being implemented in the Uttarakhand Himalaya. It is indeed turning out to be an unscientific road-construction project with catastrophic consequences for the mountain ecology. The Armed Forces and the authorities, in their enthusiasm to have a “smoother” and “faster” “all-weather” connectivity for pilgrim tourists from the plains, ignored the government’s own recommended “best practice norms” to minimise the impact on the mountain ecosystems and landscapes.
In the next decade, the Government proposes to build 66 tunnels in the Uttarakhand Himalaya and 18 tunnels are already in operation. Building these subsurface structures could result in gross damage to the environment, including the concentration of pollutants from traffic exhaust compounded by a microenvironment with no sunlight and limited dispersion in such long-distance tunnels. The rail traffic may rely on electric locomotion, but constantly generated vibrations during the train movements will keep the mountain slope eternally unstable and thus, make it vulnerable to slide at the slightest trigger.
The construction of highways and railway tracks has now become a prime cause for landslides and its occurrences have doubled over the years. The increased anthropogenic activities such as road construction have made the hill slopes extremely unstable. That is why the recurring landslides have gone up in numbers in the Himalayas.
Irreversible impact on groundwater like descending water levels has been observed in the areas of tunnel construction. Erratic rainfall and ecological degradation associated with land use change for infrastructural development are already impacting mountain aquifer systems. Groundwater use in the Himalayan States differs from that in the plains, as large and contiguous aquifers do not exist in the hills.
Considered as holy, the town of Joshimath in Chamoli district, located at an altitude of 6,150 feet, is sinking rapidly due to human-induced causes. It has been recorded that the Tapovan-Vishnugad hydro project tunnel that passes just below Joshimath, which is sitting on an old glacial deposit, could be a contributing factor to this phenomenon. During the construction of the tunnel, a boring machine had perforated a water-bearing stratum on the left bank of the Alaknanda river near Shelong village, leading to discharge of 60-70 million litres per day, according to a report published in Current Science in 2010. This must have led to gradual depletion of pore-pressure within the sediment leading to aquifer compaction and settling of the ground. The role of pore-pressure in determining slope stability needs to be studied further in this region.
While implementing a free-way project in the Himalayas, a major question that arises is whether the mountain morphology with steep slopes and sharp gradients is easily amenable to human engineering — a caveat raised by many expert committees in the past. The steep gradients of the Uttarakhand Himalayas make it dynamically heterogeneous, in terms of climatic variables, and biodiversity. This has become amply clear from the recent series of disasters, the impact of which was exacerbated by the unsustainable human interferences in natural systems.
The Himalayan terrain demands sustainable tourism, not mass tourism. The daily average footfall last year along the Char Dham route was reported to be around 58,000. Ground reports also say that plastic waste dumped in pits and the cleaning operations resorting to open burning are highly hazardous. The 2013 Kedarnath flood was a wake-up call. The intensity of the disaster was directly proportional to the unregulated rise in tourism that led to a construction boom in unsafe zones such as the river valleys, floodplains and slopes vulnerable to landslides.
The National Disaster Management Authority (NDMA) report on the Chamoli disaster in April 2022 clearly states that “in the long term, it will be necessary to focus on finding alternative sources of energy, as the area appears to be environmentally sensitive”.
A development strategy for the Himalayas should not come at the cost of the environment. It should be primarily based on the region’s natural resources such as forest, water, biodiversity and ecotourism. Rather than building massive dams, focus should be on small projects that would be helpful in providing local energy supply. Most of the farmers have now abandoned their traditional practices and only less than 20% of the agricultural land in the Himalayan districts of Uttarakhand is now being farmed and the rest has become fallow land. An appropriate strategy for human well-being should use traditional knowledge, agricultural practices, construction practices and local cultural aspects.
Going by the past experiences of forming expert committees and having their recommendations ignored, it is not clear what benefit would accrue by creating another one by the government. The Joshimath episode is a warning that the Himalayan environment is at a tipping point and it may not be able to withstand another push generated by intrusive anthropogenic activities in the form of massive construction projects of townships, highways, tunnels, railway tracks and dams — an ecosystem already grappling with the consequences of global warming. And, the devotees must be in the forefront to save the “Abode of the Gods”.
Date:10-01-23
Municipal corporations in India are gasping for fundsThe own revenue of Indian municipal corporations was less than 1% of GDP, smaller than Brazil’s 7% and South Africa’s 6%The Hindu Data Team
The combined budget of all the municipal corporations in India is much smaller than that of the Central and State governments, an RBI analysis of finances of urban local bodies concludes. The study titled “Report on municipal finances” reveals how municipal bodies are in increasing dependence on fund transfers from the State and the Centre, while their revenue earning capacity is limited. Their rev nue raising powers are curtailed, the study shows. Limited funds aside, about 70% of it gets spent on salaries, pensions and administrative expenses with the rest left for capital expenditure. And above all, the municipal corporations don’t
borrow much, leaving them gasping for funds.
Taxes earned by municipal corporations in India are grossly in adequate to meet their expenditure needs. In India, the own tax revenue of municipal corporations, comprising property tax, water tax, toll tax and other local taxes, formed 3134% of the total revenue in the FY18FY20 period. This share was low compared to many other countries and it also declined over time. The share of own revenue (both tax and non tax) in the total revenue of urban local bodies in India has declined, while that of government transfers has increased as shown in chart 1.
Using budgetary data from 201 municipal corporations across India, the RBI report calculated their overall revenue receipts — consisting of own tax revenue, own non tax revenue and transfers. In 2017–18 (actuals), it was estimated to be 0.61% of the GDP and according to budget estimates of 2019–20, it increased slightly to 0.72% of the GDP. This was much smaller than Brazil’s 7% and South Africa’s 6%. Large variations can be observed if the municipal corporations’ own tax revenue is sliced statewise. The own tax revenue of municipal corporations as a share of the State’s GDP in 201718 crossed the 1% mark in Delhi, Gujarat, Chandigarh, Maharashtra and Chhattisgarh, while it was 0.1% or less in Karnataka, Goa, Assam and Sikkim. Chart 2 plots these state-wise variations.
Another major issue with the municipal corporations’ revenue raising capabilities was their dependence on property taxes. In 2017–18, the property taxes formed over 40% of the municipal corporations’ own tax revenue. Despite such dominance, property tax collection in India was much lower compared to OECD countries due to undervaluation, and poor administration, the report argues.
A report published in the Chen nai edition of this paper on Monday further highlights the problems plaguing property tax collection. Of the 13.27 lakh asses seen in Chennai, only 6.94 lakh paid the property tax, while 6.33 lakh were yet to pay. Shortage of tax collectors has further impacted the revenues.
Chart 3 shows property tax collected in ₹ crore in FY18, FY19 and FY20 across major cities. The graph shows that most of the major cities have managed to increase their property taxes in the period, though increasing urbanization rate and rising population density may have played a role. Chart 4 shows the percentage of total expenditure of municipal corporations in India in 201718. Over 70% was spent on revenue expenditure such as salaries/wages/bonus (25%), operational and maintenance charges (16.2%), pensions (7.4%), etc., while less than 30% was capital expenditure .
The corporations are mostly de pendent on transfers with their re venue raising potential being limit ed. Property taxes are not efficiently collected. The generated funds are mostly spent on rev nue expenditure, leaving a much smaller pie for capacity building.
Date:10-01-23
बाजरा केवल नारा बनकर न रह जाएसंपादकीय
भारत की पहल पर ही यूएन ने सन् 2023 को विश्व बाजरा ( मिलेट्स) वर्ष घोषित किया है। प्रधानमंत्री ने राज्यों के मुख्य सचिवों को बाजरे को प्रचलित करने के लिए कहा। सांसदों – पत्रकारों को बाजरे के व्यंजनों की दावत देकर केंद्र ने इसे नारा बनाया है। पोषक तत्वों से भरपूर और हाई फाइबर युक्त यह मोटा अनाज कुपोषण से स्थाई मुक्ति का मार्ग है। ग्लूटेन -युक्त गेहूं और पानी का अति – दोहन करने वाले चावल की खेती अब हानिकारक है। लेकिन क्या लोगों में इसके प्रति अपेक्षित जागरूकता जगाई जा रही है ? क्या किसानों को बाजरे की खेती के लिए जरूरी आर्थिक मदद और उसकी सुनिश्चित खरीद की योजना बनी है ? किसान बाजरे की खेती आखिर क्यों करे, जबकि उसका उत्पादन प्रति हेक्टेयर गेहूं से आधा और चावल का 40% है और दाम भी कम मिलता है। सरकार को बहुआयामी नीति बनानी होगी। इंडियन एग्रीकल्चर रिसर्च इंस्टीट्यूट ने बाजरे की हाइब्रिड किस्म पूसा-1201 विकसित की है, जो रोग, फंगस-निरोधी है, गेहूं से ज्यादा प्रोटीनयुक्त है और जो अनेक खनिज लवण से भरपूर है। यही नहीं सामान्य बाजरे के मुकाबले इसका उत्पादन भी तीन-चौथाई कम समय, कम खर्च पर और दो से तीन गुना होता है। क्या देश के किसान इन सब तथ्यों को जान सके हैं? क्या यह उचित नहीं कि मंत्री इन तथ्यों को जनता को बताने के लिए बाहर निकलें ? भारत में हर पांच में से चार बच्चे कुपोषण के कारण नाटापन, दुबलापन और कम वजन के शिकार होकर आजीवन शारीरिक-मानसिक दुर्बलता से ग्रस्त रहते हैं पर अफसोस कि पिछले 20 वर्षों में बाजरे सहित सभी मोटे अनाजों का उत्पादन घटता गया है। नारे को क्रांति में बदलने की जरूरत है।
Date:10-01-23
जोशीमठ नहीं… धर्म, इतिहास प्रकृति की त्रिवेणी मर रही हैलक्ष्मी प्रसाद पंत, ( नेशनल एडिटर )
जोशीमठ ज्योतिर्मठ का अपभ्रंश या आसान उच्चारण है। इस शब्द को और खोलें तो जोशीमठ उन चार मठों में से एक है जिसकी स्थापना आदि शंकराचार्य ने की थी। लेकिन मेरे लिए जोशीमठ होने के मायने सिर्फ यही नहीं हैं। मेरे गांव से जोशीमठ की दूरी 50 किलोमीटर है। दूरी की सीमाओं से अलग यह शहर मेरे लिए एक एल्बम की तरह है। घर से यहां तक पहुंचने की यात्रा हमेशा रोमांच की तरह रही है। यादें, किस्से, संघर्ष, खुशबू और सबक सबकुछ है जोशीमठ मेरे लिए। पहली बार आसमानी बर्फ को मैंने यहीं छूकर देखा। क्योंकि मेरे गांव में बर्फ काफी लेट और ऊंचाई पर पड़ती थी। जोशीमठ से मेरे रिश्ते का यह एक सच है। चार साल बाद अब जब मैं जोशीमठ गया तो यहां सबकुछ बदला हुआ था। जोशीमठ के भूगोल को बचाने की चीख-पुकार मची हुई थी। दरकते-मरते शहर की चीखती रातें डरा रहीं थीं। जोशीमठ के मायने अब बदल गए हैं। विकास के धमाकों ने शहर को हिला दिया है। जमीन के भीतर से पानी के बुलबुले या यूं कहें कि आंसू बाहर आ रहे हैं। आंसुओं में आक्रोश और बेचैनी दोनों हैं। मानो कह रहे हों कि यह शहर बर्बाद हो रहा है। बचा लीजिए।
जोशीमठ को बचाने की मजबूरी अब तो चारों तरफ है। सरकारों की धूर्त खामोशी टूट गई है। बड़े-सख्त फैसले हा रहे हैं।शहर के मिटते अस्तित्व का ऐतिहासिक साक्षी बनने के लिए अब यहां मीडिया भी तैनात है। कुल मिलाकर यह शहर अब एक बड़े इवेंट में बदल गया है। जिसमें सब अपनी हिस्सेदारी तय करना चाहते हैं। लेकिन जोशीमठ पूछ रहा है कि अब क्यों आए, जब आधा शहर दरक चुका है? जब बचाने के लिए बहुत कुछ बचा ही नहीं। विशेषज्ञ कह रहे हैं कि दरारों को रोकने के लिए विज्ञान और तकनीक भी अब कुछ नहीं कर सकती। जो लोग अब वहां हैं, अब तो उन्हें ही सुरक्षित बाहर निकाल लिया जाए तो गनीमत होगी।
सरकार के कामकाज को लेकर क्रोध और आक्रोश के विस्फोट भी चरम पर हैं। कारण- 1976 में गढ़वाल कमिश्नर महेश चंद्र मिश्रा की देखरेख में बनी कमेटी की रिपोर्ट। मिश्रा कमेटी ने 47 साल पहले साफ कह दिया था कि जोशीमठ कभी भी दरक सकता है। इंतजाम भी बताए थे। ड्रेनेज सिस्टम, ईंट, सीमेंट और बजरी का इस्तेमाल बंद करना, कम ऊंची इमारतें बनाना और सबसे महत्वपूर्ण- पहाड़ों में होते विस्फोटों पर पाबंदी। किंतु शासन-प्रशासन के साजिशाना तालमेल, मौन, छल और धूर्तता ने हाथ बांधे रखे। 47 साल पहले भी जोशीमठ में दरारें आईं थीं और यह कमेटी बनाई ही इसलिए गई थी। यानी जोशीमठ सालों से कांप रहा था, अब पूरी तरह दरक गया है।
जोशीमठ को बचाने की सरकारी फुर्ती 47 सालों से गायब थी। अब एकदम से पूरा लाव-लश्कर दौड़ पड़ा है। लेकिन यह कोई इन्वेस्टमेंट समिट नहीं है, जिसकी रातों-रात तैयारी से पूरा शहर बदलकर चमकाया जा सके। यह प्रकृति है, जिसकी अपनी चाल और ताकत है, जो सरकारों से अलग है। अहम सवाल यह भी है कि बड़ी दाढ़ी वाले पर्यावरण के पद्मश्री भी अब तक कहां थे? उनकी खौफनाक चुप्पी भी काबिल-ए-गौर है। सत्ता और पर्यावरणविदों के बीच का दोस्ताना सच भी यह कहता है कि सब अपनी सुविधा के अनुसार मुद्दे और सुर्खियां चुनते हैं। उनके लिए मिट्टी से ज्यादा मायने माइलेज के हैं, जो उन्हें दिल्ली से देहरादून नहीं आने देता। उनके उद्देश्य और मकसद साफ हैं।
जोशीमठ उदास है क्योंकि यह शहर अलग है। शंकराचार्य ने इसे बसाया जबकि कत्यूरी राजाओं की राजधानी जोशीमठ ही रही। बद्रीनाथ धाम के कपाट जब छह माह बंद रहते हैं तो भगवान नारायण की पूजा यहीं होती है। सामरिक दृष्टि से भी संवेदनशील है जोशीमठ क्योंकि यहां से चीन करीब है। जोशीमठ सिर्फ शहर नहीं है, प्रकृति, इतिहास और धर्मशास्त्र की त्रिवेणी है। सवाल यही नहीं है कि जोशीमठ बचेगा या खत्म हो जाएगा। चिंताएं यह भी है कि विकास के नाम पर सरकारों की कूट-प्रपंची कलंक- कथाएं क्या आगे भी यूं ही जारी रहेंगी? जोशीमठ विकास की उस ताजा खोदी गई कब्र की तरह है, जहां एक खूबसूरत शहर की लाश दफनाने की तैयारी चल रही है। क्या अब भी यह भरोसा मिलेगा कि इसके बाद किसी और जिंदा शहर को जोशीमठ की तरह विकास की कब्र में नहीं दफनाया जाएगा? जोशीमठ उदास है क्योंकि यह शहर अलग है। सवाल यही नहीं है कि जोशीमठ बचेगा या खत्म हो जाएगा। चिंताएं यह भी है कि विकास के नाम पर सरकारों की कूट-प्रपंची कलंक- कथाएं क्या आगे भी यूं ही जारी रहेंगी?
Date:10-01-23
बड़े संकट की चेतावनीसंपादकीय
जोशीमठ उत्तराखंड के कई तीर्थस्थानों तथा औली जैसे स्कीइंग केंद्र का प्रवेश द्वार है। वहां जमीन धंसने की घटना के लिए जोशीमठ तथा आसपास के इलाकों में अवैज्ञानिक ढंग से किए जा रहे विकास कार्य जिम्मेदार हो सकते हैं। परंतु इसकी बुनियाद उन मानवजनित गतिविधियों में निहित है जो पारिस्थितिकी की दृष्टि से तथा भौगोलिक नजरिये से भी संवेदनशील हिमालय क्षेत्र के लिए नुकसानदेह हैं। बल्कि इस घटनाक्रम को एक चेतावनी के रूप में देखा जाना चाहिए कि ऐसी घटनाएं भविष्य में अन्य जगहों पर भी घटित हो सकती हैं। हालांकि पूरा हिमालय क्षेत्र भूस्खलन के खतरे वाला है क्योंकि वह भूकंप की आशंका वाले सक्रिय जोन 5 में स्थित है लेकिन उत्तराखंड में खतरा और भी अधिक है क्योंकि यह पूरा इलाका कमजोर और अस्थिर चट्टानों से बना है।
जोशीमठ खुद उस मलबे पर बसा हुआ है जो सौ साल पहले एक ग्लेशियर के पिघलने के बाद हुए भूस्खलन से एकत्रित हुआ था। यह बात हिमालयन गजेटियर में 1886 में दर्ज की गई थी। उस गजट में भी यह बात दोहराई गई थी कि वह जगह बड़े पैमाने पर इंसानी रिहाइश के अनुकूल नहीं है। गढ़वाल के तत्कालीन आयुक्त एम सी मिश्रा की अध्यक्षता वाली एक समिति ने भी 1976 में प्रस्तुत की गई रिपोर्ट में जोशीमठ की जमीन ढहने की आशंका जताई थी। यहां तक कि हाल के वर्षों में भी विशेषज्ञों ने बार-बार चेतावनी दी कि जोशीमठ का अनियोजित विस्तार, उसकी आबादी में इजाफा और पर्यटकों की तादाद में अनियंत्रित बढ़ोतरी ठीक नहीं है। परंतु इन चेतावनियों पर किसी ने ध्यान नहीं दिया।
एक और बात जिस पर अब तक ध्यान नहीं दिया गया है कि वह यह है उत्तराखंड के चट्टानी इलाकों में पानी का रिसाव बराबर होता है जो उन चट्टानों की पकड़ और मजबूती को कमजोर करता है। जोशीमठ में हाल में जो घटना हुई है वह भी इन्हीं वजहों से हुई है जबकि स्थानीय प्रशासन इन संकेतों की लगातार अनदेखी कर रहा था। हालांकि अब वहां हर प्रकार की विकास संबंधी गतिविधियों को रोक दिया गया है तथा भूगर्भीय अस्थिरता को लेकर अधिक विश्वसनीय जानकारियों की प्रतीक्षा की जा रही है लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि वहां पहले ही अपूरणीय क्षति हो चुकी है। उनका यह भी मानना है कि तपोवन जलविद्युत संयंत्र अथवा हेलंग और मारवाड़ी के बीच चार धाम सड़क का निर्माण जैसी मौजूदा परियोजनाएं इकलौती ऐसी परियोजनाएं नहीं हैं जिन्हें वर्तमान हालात का दोष दिया जा सकता है। वर्षों से इस क्षेत्र में जबरदस्त अधोसंरचना निर्माण का काम चलता रहा है जिसने यहां की पारिस्थितिकी, भूगर्भीय और जल विज्ञान संबंधी संतुलन को बिगाड़ दिया है।
इसके अलावा हिमालय क्षेत्र में अधोसंरचना तथा अन्य विकास योजनाओं की तैयारी करते हुए भी अत्यधिक सावधानी बरतने की जरूरत बढ़ती जा रही है क्योंकि जलवायु परिवर्तन तथा बढ़ती इंसानी गतिविधियों के कारण बर्फ की चादर पतली होती जा रही है और ग्लेशियर भी पिघल रहे हैं। एक हालिया अध्ययन में भी यह कहा गया है कि हिमालय तथा तिब्बत के पठारों में सन 1950 के दशक से ही तापवृद्धि की दर 0.2 डिग्री सेल्सियस प्रति दशक की रही है। इसकी वजह से ग्लेशियरों का पिघलना तेज हुआ है। इससे जल विज्ञान संबंधी संतुलन बिगड़ा है और जलधाराओं का प्रवाह भी प्रभावित हुआ है। हिमालय के उत्तराखंड वाले हिस्से में ही करीब 2,850 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में 900 ग्लेशियर हैं जिनका तेजी से क्षरण हो रहा है। जरूरत इस बात को समझने की है कि अन्य स्थिर पहाड़ी क्षेत्रों के उलट हिमालय के पहाड़ अभी भी नये हैं और उन्हें खास तवज्जो देने की जरूरत है। अगर इस बात की अनदेखी की गई तो हमें जोशीमठ जैसे और हादसों का गवाह बनना पड़ सकता है।
Date:10-01-23
प्रवासी का योगदानसंपादकीय
अपने देश, अपनी धरती से लोगों का स्वाभाविक लगाव होता है, चाहे वे पीढ़ियों पहले कहीं और जाकर बस गए हों। हर देश का भी अपने प्रवासियों से नाता बना रहता है। इसी के चलते भारत में प्रवासी दिवस मनाने की शुरुआत हुई थी, जिसमें हर साल दूसरे देशों में रह रहे भारतीय मूल के लोग कुछ दिनों के लिए यहां आते हैं। यह केवल सैर-सपाटे का अवसर नहीं होता, बल्कि उन्हें अपने देश के लिए कुछ करने का मौका भी होता है। दरअसल, प्रवासी सम्मेलन की शुरुआत ही इस मकसद से की गई थी कि दूसरे देशों में रह रहे भारतीय मूल के लोग यहां आकर निवेश के अवसर तलाश सकें। इंदौर में चल रहे सत्रहवें प्रवासी सम्मेलन को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री ने भी इस तकाजे को एक बार फिर रेखांकित किया। उन्होंने दूसरे देशों में रह रहे भारतीय मूल के लोगों को विदेशी धरती पर भारत का ‘ब्रांड एंबेसडर’ बताया। इस सम्मेलन में सत्तर देशों के साढ़े तीन हजार प्रवासी भारतीय हिस्सा ले रहे हैं। प्रधानमंत्री के संबोधन से पहले विदेशमंत्री ने भी इस सम्मेलन को प्रवासी भारतीयों के लिए अपने संबंधों को नया करने, नई ऊर्जा से भरने और नए पहलुओं को जोड़ने के एक अवसर के रूप में रेखांकित किया।
इस बार के प्रवासी भारतीय सम्मेलन की अहमियत इसलिए भी है कि इस वर्ष जी-20 समूह की अध्यक्षता भारत कर रहा है और यहां निवेश संबंधी अनेक नए अवसर खुले हैं। भारत विश्व की पांचवीं अर्थव्यवस्था बन चुका है। पूरी दुनिया अब भारत की तरफ देख रही है। ऐसे अनेक अवसर आए, जब विश्व के विकसित कहे जाने वाले देशों ने भी भारत को अहमियत दी। कोरोना के समय भारत ने अपने बल पर न केवल इसके टीके बनाए, बल्कि दुनिया के उन्नत कहे जाने वाले देशों की तुलना में अधिक तेजी से और बड़ी संख्या में टीके लगाने में कामयाबी भी हासिल की। अरिहंत जैसा स्वदेशी जलपोत तैयार किया, उपग्रह प्रक्षेपण के मामले में प्रतिस्पर्धी ढंग से आगे बढ़ रहा है। इस तरह भारत से जाकर दूसरे देशों में कारोबार कर रहे लोगों के लिए भारत के प्रति आकर्षण की स्वाभाविक वजहें हैं। इस समय जिस तरह पूरी दुनिया मंदी की आशंका से ग्रस्त है और कारोबारी सुस्ती छाई हुई है, उसमें तमाम देश अपने लिए नया बाजार तलाश रहे हैं। ऐसे में निवेश की दृष्टि से भारत एक बेहतर जगह साबित हो सकता है। इसलिए इस बार के प्रवासी सम्मेलन से स्वाभाविक ही उम्मीद बनती है कि भारतीय मूल के लोगों को यहां कारोबार की नई संभावनाएं तलाशने में मदद मिलेगी।
केंद्र सरकार ने स्टार्टअप और मेक इन इंडिया योजनाओं के तहत लाखों युवाओं को नए आविष्कार और रोजगार के अवसर पैदा किए हैं। इस तरह यहां एक समृद्ध कारोबारी वातावरण बना है। विदेशी कंपनियों के लिए नियम और शर्तें काफी लचीली बना दी है। अब तो विदेशी विश्वविद्यालयों को अपने परिसर भी यहां खोलने की इज्जत दे दी है। ऐसे में प्रवासी भारतीय व्यवसायियों के लिए अनुकूल कारोबारी वातावरण उपलब्ध है। व्यवसाय के लिए सबसे जरूरी चीज होती है, कारोबारी वातावरण और बाजार। ये दोनों चीजें इस समय उपलब्ध हैं। अगर प्रवासी भारतीय भारत में निवेश के लिए आगे बढ़ते हैं, तो न सिर्फ यहां कुछ नए क्षेत्रों में रोजगार के अवसर पैदा होंगे, बल्कि निर्यात को भी गति मिलने की उम्मीद की जा सकती है। निस्संदेह इस बार के प्रवासी सम्मेलन से बेहतर नतीजे आने की आशा है।
Date:10-01-23
उजाड़ने से पहलेसंपादकीय
अगर सरकारी जमीन के किसी टुकड़े पर लोगों ने घर बना लिया, वहां बस्ती बस गई, तो उसे प्रथम दृष्टया अतिक्रमण कहा जा सकता है। कानूनी प्रावधान के मुताबिक सरकार उस जमीन को खाली करा सकती है। यह मसला सतही तौर पर भले अतिक्रमण हटाने का लग सकता है, लेकिन इसके साथ कई ऐसे पहलू जुड़े हुए हैं, जो सरकार को भी कठघरे में खड़ा करती है। हाल ही में उत्तराखंड के हल्द्वानी में रेलवे की जमीन खाली कराए जाने पर ये सवाल उभरे हैं कि करीब सात दशक से बसी बस्ती को सरकार अचानक खाली कराने पहुंच जाती है, तो उसे किस हद तक उचित कहा जा सकता है! वहां इतने लंबे वक्त से लोग अगर कथित तौर पर अवैध रूप से रह रहे हैं तो उसकी जिम्मेदारी से सरकार क्या पूरी तरह मुक्त है? फिर अगर किन्हीं परिस्थितियों में उन्हें वहां से हटाया जा रहा है, तो वहां के लोगों के प्रति सरकार की कोई जवाबदेही है या नहीं? स्वाभाविक ही सुप्रीम कोर्ट ने इस मसले पर उत्तराखंड उच्च न्यायालय के उस आदेश पर फिलहाल रोक लगा दी है, जिसके तहत हल्द्वानी में रेलवे की जमीन को खाली कराया जाना था।
शीर्ष अदालत के मुताबिक सिर्फ सात दिनों की छोटी अवधि के नोटिस में पचास हजार से ज्यादा की आबादी को अचानक ही किसी जगह से नहीं हटाया जा सकता। सवाल है कि अगर वे तमाम लोग वहां दशकों से रह रहे हैं तो क्या संबंधित महकमों ने नियम-कायदे या कानूनी स्थिति के प्रति उन्हें पहले कभी औपचारिक रूप से सूचित किया था? इतना तय है कि इतनी बड़ी आबादी वहां रातोंरात नहीं बस गई होगी। अगर ब्लड शुगर लेवल 300 से ज्यादा है तो सर्दी में तुरंत ब्लड शुगर को कम करेंगे ये 4 आसान टिप्स, देखिए कैसे अगर वहां लोगों ने जमीन खरीद कर अपने घर बनाए, तो भूखंड का सौदा करने वाले वे लोग कौन थे और जब वहां की जमीन की खरीद-फरोख्त चल रही थी, तब नियामक संस्थाएं क्या कर रही थीं? अब अगर सरकार ने अतिक्रमण के तर्क पर एक बड़ी आबादी को वहां से हटाने का फैसला किया भी है तो क्या यह मानवीय प्रश्न नहीं उठता है कि पहले उसे लोगों के वैकल्पिक पुनर्वास की व्यवस्था करनी चाहिए? सुप्रीम कोर्ट ने भी कहा है कि पट्टे और जमीन की नीलामी के दावों के बीच यह तथ्य है कि लोग वहां सालों से रह रहे हैं और ऐसे में उन्हें कुछ पुनर्वास दिया जाना चाहिए।
दरअसल, जब सरकारी जमीन पर अवैध रूप से लोग बस रहे होते हैं तो उसमें भूमाफिया की बड़ी भूमिका हो सकती है, जो किसी भूखंड के वैध होने का आश्वासन देकर लोगों से मोटी रकम वसूलते हैं। इस बीच बस्ती बसती जाती है, सरकार की ओर से बिजली-पानी, स्कूल आदि की व्यवस्था की जाती है। खबरों के मुताबिक हल्द्वानी में विवादित इलाके के निवासियों के नाम सरकारी रिकार्ड में दर्ज हैं और वे सालों से नियमित रूप से गृह कर का भुगतान करते आ रहे हैं। क्षेत्र में कई सरकारी स्कूल, एक अस्पताल आदि ऐसी सुविधाएं हैं, जिन्हें सरकार की ओर से मुहैया कराया गया होगा। ऐसे में अचानक ही यह घोषणा कर दी जाती है कि समूची बस्ती अवैध तरीके से बसी हुई है, तो इसे कैसे देखा जाएगा? यह केवल हल्द्वानी का सवाल नहीं है। देश भर में इस तरह की स्थितियां अक्सर उभरती रही हैं। अब समय आ गया है कि केंद्र के स्तर पर स्थायी पुनर्वास नीति बनाई जाए, ताकि इस तरह की स्थितियों से निपटने में आसानी हो।
Date:10-01-23
प्रगति के राष्ट्रदूतसंपादकीय
रोजगार और व्यवसाय के लिए दुनिया भर में जा बसे भारतीयों की वर्तमान समय में हर देश में कद्र बढ़ती जा रही है । अपनी मेहनत से उन्होंने ऊंचे मुकाम हासिल किए हैं और स्थानीय समाज में नाम कमाया है। अनेक देशों में राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री, मंत्री, न्यायाधीश, व्यवसायी, वैज्ञानिक, चिकित्सक सहित कोई पद ऐसा नहीं है जिस पर भारतीय मूल के लोग आसीन न हों। पहले उनमें अपनी पहचान को लेकर सामान्य भाव होता था. लेकिन भारत की प्रगति के साथ पिछले तीन दशकों से उनकी अहमियत भी बढ़ी है। मोदी सरकार आने के बाद तो उनका रुतबा ही अलग है। इसी बात को भांपते हुए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दुनिया भर में फैले प्रवासी भारतीय समुदाय को भारत के राष्ट्रदूत’ की संज्ञा दी है। जी-20 सम्मेलन की मेजबानी को भारत के लिए एक अवसर मानते हुए उन्होंने प्रवासी भारतीयों से इसे दुनिया को भारत के हैं बारे में जानकारी देने के मौके के तौर पर देखने को कहा है। मोदी ने 17वें प्रवासी भारतीय दिवस सम्मेलन के औपचारिक उद्घाटन समारोह में कहा कि सभी प्रवासी भारतीय विदेशी धरती पर भारत के राष्ट्रदूत हैं। सरकारी व्यवस्था में राजदूत होते हैं, लेकिन भारत की महान विरासत में राष्ट्रदूतों की परंपरा है। प्रवासी भारतीय मेक इन इंडिया, योग, हस्तशिल्प और अब मिलेट्स के भी राष्ट्रदूत हैं । प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत की अभूतपूर्व विकास गति को पूरी दुनिया गौर से देख रही है । आने वाले दिनों में ये गति और बढ़ेगी। दुनिया में भारत के प्रति जिज्ञासा के इस दौर में प्रवासी भारतीयों की जिम्मेदारी और बढ़ गई है। प्रवासी भारतीय भारत के बारे में तथ्यों के साथ जानकारी पूरी दुनिया को दे सकते हैं। जी-20 सम्मेलन के मौके पर दुनिया भर के प्रतिनिधिमंडल इस साल भारत आएंगे। इन प्रतिनिधिमंडलों को प्रवासी भारतीय भारत के बारे में पहले से ही जानकारी दे सकते हैं। युवा प्रवासी भारतीय अपने पूर्वजों के देश के बारे में गहराई से जानकारी प्राप्त कर सकते हैं । वे भारत में आयोजित पर्वों, मेलों और आजादी का अमृत महोत्सव के तहत आयोजित कार्यक्रमों में भाग ले सकते हैं। कुछ भारतीय कई देशों में सदियों से बसे हैं और उनका उस देश के निर्माण में अहम योगदान है। ऐसे लोगों के जीवन, संघर्ष और उनके योगदान का दस्तावेजीकरण किया जा सकता है। यह वक्त दुनिया में भारत की अलग छवि और बढ़ती अहमियत को मजबूती से पुख्ता करने का है और प्रवासी भारतीय इस प्रक्रिया की अहम कड़ी हैं।
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सीओपी-27 की तर्ज पर हाल ही में मांट्रियल, कनाडा में जैव विविधता सम्मेलन आयोजित किया गया। ग्लोबल बायोडायवर्सिटी फ्रेमवर्क के नाम से होने वाले इस सम्मेलन में 196 देशों ने भाग लिया है। सम्मेलन के कुछ मुख्य बिंदु –
भारत एक जैव-विविधता समृद्ध देश है। यह उत्तम अवसर है, जब भारत इससे जुड़ी एक बहुआयामी योजना विकसित करे। इसमें जैव-विविधता के नुकसान को रोकने के विभिन्न पहलुओं को संबोधित करे। कार्यान्वयन और अनुपालन के लिए संस्थागत ढांचों को स्थापित करके उन्हें सुदृढ़ बनाया जाये।
भारत को उन सब्सिडी को खत्म करने पर भी बातचीत करनी चाहिए जो उसे अंतरराष्ट्रीय मंचों पर निशाना बना रही हैं। राजकोषीय व अन्य नीतियों के मानकों को इस प्रकार से विकसित करने की शुरूआत कर देनी चाहिए, जो जैव विविधता के अनुकूल हों।
यह प्रकृति और उससे जुड़े लाभों के महत्व को समझकर आगे बढ़ने का अचूक अवसर है। यहाँ यह याद रहना चाहिए कि जैव विविधता संरक्षण का बोझ आर्थिक विकास पर कभी नहीं पड़ता है। भारत को आगे बढ़कर, जैव विविधता समृद्ध विकासशील देशों के साथ एक ऐसा तंत्र विकसित करना चाहिए, जो सभी का कल्याण कर सके।
विभिन्न समाचार पत्रों पर आधारित। 21 दिसंबर, 2022
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Date:09-01-23
Do It At Home, TooKey takeaway of foreign university draft norms is domestic: Excellence needs autonomyTOI Editorials
The draft UGC regulations for setting up campuses of foreign higher educational institutions are first of all a reminder of the snail’s pace at which this reform has been moving, one government to another. When a bill to this end was introduced in the Rajya Sabha in 1995, liberalisation had just begun feeding Indian students’ appetite for a world-class education. As knowledge of the opportunity gains of such an experience has spread across the country, the longing for it has grown manifold. So second, the question is how the new draft regulations are different from the oft-repeated, failed and fuzzy promises of bringing Yale or Harvard to India.
The only ‘infrastructure’ reference in the regulations is that “institutions should arrange for adequate physical infrastructure. ” This is in sharp contrast to how foreign university campuses in China and the Gulf countries have been facilitated by a lot of funding and public works by the host country.
Perhaps the most notable advance is to allow the foreign institutions “repatriation” per the Fema rules – hitherto the disallowance of for-profit education in India has been a deal-breaking disincentive. Also welcome is the concession of autonomy to these institutions in recruiting faculty and staff from India and abroad – whether it be qualifications, salary structure or other conditions of service. But by simple logic, whatever is a necessary condition of excellence for a foreign institution must also be so for a domestic one. If the regulator has accepted how much educational gains are tied to universities’ financial and academic autonomy, it seems quite self-defeating to deny this autonomy to the thousand universities that are educating Indian youth today but promise it to a select few who may do this tomorrow.
Date:09-01-23
A timely haltSC must lay down rehabilitation norms for eviction from public spacesEditorial
The Supreme Court’s timely intervention has halted the forcible eviction of some 50,000 people from Haldwani in Uttarakhand, where the occupants are accused of squatting on railway property for decades. The Uttarakhand High Court had taken a tough stand against the residents, and passed a slew of directions that would have entailed their eviction within a week, backed by force, including the deployment of paramilitary forces. It is significant that the Bench underscored the human angle to the issue and spoke about the need for rehabilitation before eviction while staying the order. In an earlier round of litigation over the same land, which adjoins the Haldwani Railway Station, court orders had allowed proceedings against individual occupants under the Public Premises (Eviction of Unauthorised Occupants) Act, 1971, to be completed. This time, too, it was on a PIL that the High Court had passed its orders. The High Court’s detailed judgment shows that the residents’ claim is traceable to a 1907 Office Memorandum that says the area be managed under rules pertaining to ‘nazul land’. The court has ruled that it was not a government order but only a communication on how to manage the land, and it does not amount to declaring it as ‘nazul land’, that is, land that has fallen into the hands of the state by escheat. As one of the nazul rules is that there cannot be sale or lease, the court rejected all claims made by occupants based on purported documents for lease, sale, and, in some cases, purchase through auction.
Conflicts between occupants of public land and the state that wants to reclaim the land are a never-ending saga in the country. A shortage of housing, as well as inadequate recognition of the right to shelter, means that large masses of people encroach on vacant land, be it on the bed of water bodies or government property. This often leads to attempts to evict the occupants and spawns litigation. Invariably, there are claims to occupancy rights based on long years of stay at the same location. There are court judgments that stress rehabilitation measures and consultation with the oustees before eviction. Some courts have also recorded the view that mandatory rehabilitation may prove to be an incentive for encroachment. The Haldwani eviction effort has unfortunately taken communal overtones, and there appears to be a clamour for the early eviction of the Muslim residents. India does not have a good record on rehabilitation of those evicted from public spaces, and this case presents an opportunity to the Supreme Court to lay down the law on meaningful rehabilitation as well as effective prevention of encroachments.
Date:09-01-23
A participatory mapping exerciseBuffer zone mapping should be inclusive and involve local inhabitantsSrikumar Chattopadhyay, [ The author is a (Retd) Scientist, Centre for Earth Science Studies, Thiruvananthapuram ]
The demarcation of a 1-km buffer zone around the protected forests in Kerala on the direction of the Supreme Court has raised serious concerns in society. While the creation and maintenance of buffer zone around ecologically sensitive areas are considered essential, the exercise is often beset by a paucity of reliable ground-level data. In its special report on Climate Change and Land- Summary for Policy Makers (2019), the International Panel for Climate Change (IPCC) stressed on improving sustainable land management ‘by increasing the availability and accessibility of data’ and termed it one of the near-term actions to address the issue of climate change and adaptation. However, micro-level land use statistics in Kerala, or for that matter of the entire country, is mostly conjectural with marginal ground input.
According to official statistics, Kerala has 11,525 km2, or 29.7% of its total geographical area under forest cover. The category of dense and degraded forest accounts for 78.7% of the total forest area. The rest of the area is allotted for forest plantations, leased to other department or used to accommodate other non-forest activities. Protected forests cover 26.6% of the total forest area and a 1-km buffer zone is proposed around these protected forest areas. Due to the dominance of tree crops and plantations like rubber, there are technical limitations in isolating natural forest vegetation using satellite images at a finer scale. This is evident from the report of the Forest Survey of India (2021), according to which Kerala has 21,253km2 or 54.7% of the total area under forest. The difference in figures has arisen because of the inclusion of plantations.
The mismatch between the area under forest and the area under actual natural vegetation cover was highlighted in the early 1980s when the Centre for Earth Science Studies brought out a report on deforestation in Kerala. Forest areas are being used for various non-forestry purposes, including the expansion of human settlements, leading to the fragmentation of forest patches. The forest-settlement boundary is pushed deep into the Western Ghats, exposing trails of wildlife movement, and aggravating human-wildlife conflicts. In 2021, there were instances of 8,107 human-wildlife conflicts.
Fixing the boundary between natural forest vegetation and humanised landscape is necessary. It warrants a detailed land use survey on a cadastral scale at the plot level. Participation of local people is imperative. Such an exercise was first attempted in the U.K. where students provided the bulk of the manpower. The entire country was covered through plot level-land use survey from 1928 to 1932 under the leadership of Sir Dudley Stamp of Department of Geography, London School of Economics. This survey vastly improved the land use statistics of U.K. The same exercise was repeated in the 1960s.
Kerala experimented with plot-level land use documentation in 1975. However, being a departmental exercise, the data were not assimilated to the desired level.
In 1991, the Centre for Earth Science Studies, in collaboration with the Kerala State Land Use Board, and the Kerala Shastra Sahitya Parishad introduced participatory panchayat resource mapping in the State. The programme envisaged land use and asset mapping on a cadastral scale by trained local volunteers. Subject experts were involved in mapping land and water resources and assimilating the data through environmental appraisal. All the panchayats in the State were covered.
Specific requirements
In the present context of buffer zone mapping, the requirement is specific. Land use and asset survey are necessary for 115 panchayats bordering the protected forests. It is not possible for the government department to complete the task in a reasonable time frame. Drawing from past experiences, local panchayat and residents can be mobilised to undertake the programme. Students from schools and colleges, along with teachers can be involved. Scientific institutes and departments may be mandated to extend technical support. The entire database will be on a digital platform and be made available to the public. This could perhaps help in a big way in resolving conflicts. Similar exercises will be required to preserve the ecosystem. The ownership of the maps and local action must rest with the local inhabitants.
Date:09-01-23
विमान में अभद्रतासंपादकीय
टाटा समूह के स्वामित्व वाली एयर इंडिया के विमान में महिला यात्री पर पेशाब करने के मामले में टाटा संस के चेयरमैन एन. चंद्रशेखरन ने भी खेद जता दिया, लेकिन यह प्रश्न अभी भी अनुत्तरित है कि आखिर इतनी शर्मनाक घटना को विमान के चालक दल ने इतने हल्के में क्यों लिया? इस प्रश्न का उत्तर एयर इंडिया के मुख्य कार्यकारी अधिकारी के पास भी नहीं, जिन्होंने कुछ दिन पहले इस घटना के लिए माफी मांगी थी। विमान के चालक दल ने सहयात्री महिला के साथ अभद्रता करने वाले यात्री से लिखित माफीनामा लेकर जिस तरह मामले को रफा-दफा कर दिया, वह हैरान करने वाला है। यह समझना भी कठिन है कि घटना के बाद पीड़ित महिला को वैकल्पिक सीट देने की जहमत क्यों नहीं उठाई गई? चूंकि ऐसा करने से इन्कार किया गया इसलिए बुजुर्ग महिला को उसी गंदी सीट पर बैठे रहने के लिए विवश होना पड़ा। इतना ही नहीं दिल्ली पहुंचने पर उन्हें ग्राउंड स्टाफ से किसी तरह का सहयोग नहीं मिला। एक तरह से चालक दल बेहद अप्रिय प्रसंग को न तो हवा में सही ढंग से संभाल सका और न ही जमीन पर। इस कारण बुजुर्ग महिला यात्री के साथ जो कुछ हुआ, वह मानसिक उत्पीड़न ही है। यह तो अच्छा हुआ कि इस मामले को लेकर हंगामा खड़ा हुआ। इस हंगामे के बाद एयर एंडिया ने पुलिस में शिकायत की और अभद्रता के आरोपित को एक महीने के लिए प्रतिबंधित किया। अब आरोपित को गिरफ्तार कर लिया गया है, लेकिन इतना ही पर्याप्त नहीं। उन कारणों की तह तक जाना चाहिए, जिनके चलते एयर इंडिया के चालक दल ने आरोपित को सबक सिखाने वाली कोई कार्रवाई नहीं की।
नवंबर माह में न्यूयार्क से दिल्ली आ रही एयर इंडिया की उड़ान में जो कुछ हुआ, उसे लेकर नागरिक उड्डयन महानिदेशालय का हस्तक्षेप करना आवश्यक था। उसके हस्तक्षेप के बाद ही घटना का गवाह बने विमान के चालक दल को एक माह के लिए ड्यूटी से हटाया गया। एयर इंडिया ने इस घटना को लेकर जिस तरह यह कहा कि अनियंत्रित यात्रियों से निपटने की नीतियों के बारे में चालक दल को जागरूक करने के लिए एक व्यापक शिक्षा कार्यक्रम शुरू किया गया है, उससे यही साबित होता है कि अभी जो भी नीतियां हैं, वे कागजी ही अधिक हैं और उन्हें लेकर स्पष्टता नहीं। यदि ऐसा नहीं होता तो उक्त मामले से इतने भद्दे तरीके से नहीं निपटा गया होता। चूंकि जैसी घटना एयर इंडिया के विमान में घटी, वैसी घटनाएं घटती ही रहती हैं, इसलिए उनसे सख्ती से निपटने के बारे में स्पष्ट नियम बनाने और उनका पालन करना अनिवार्य है। यह इसलिए होना चाहिए, क्योंकि एयर इंडिया का स्टाफ इसलिए शांत होकर बैठ गया था, क्योंकि पीड़ित महिला मामले को आगे नहीं बढ़ाना चाह रही थी।
Date:09-01-23
भूजल का गहराता संकटअतुल कनक
पिछले दिनों संसदीय समिति की एक रिपोर्ट में भूजल के गिरते स्तर पर चिंता जताई गई। ऐसा नहीं है कि इस मसले पर चिंता पहली बार जताई गई हो, लेकिन हर बार किसी जिम्मेदार व्यक्ति, संस्था या समिति द्वारा जताई गई चिंता यह तो साबित करती है कि भूजल बचाने के लिए गंभीर प्रयासों की आवश्यकता है। कहने को दुनिया के दो तिहाई हिस्से में पानी है, फिर भी पानी को लेकर हर तरफ अफरातफरी का माहौल है। हालांकि पृथ्वी की सतह पर मौजूद जल का केवल दो फीसद हिस्सा ही मनुष्य अपनी रोजमर्रा की जरूरतों के लिए काम में ला सकता है। बाकी जल लवणीय है। इसलिए मनुष्य अपनी आवश्यकता के लिए उस पानी की उपलब्धता पर निर्भर है, जो जमीन की सतह के नीचे पाया जाता है।
मीठे पानी के स्रोत के रूप में सबसे ज्यादा इस्तेमाल भूजल का ही होता है। एक अध्ययन के अनुसार दुनिया में दो सौ करोड़ से ज्यादा लोग अपनी रोजमर्रा की जरूरतों और सिंचाई के लिए भूजल पर निर्भर हैं। आंकड़े यह भी बताते हैं कि दुनिया की बीस फीसद से ज्यादा आबादी भूजल से सिंचित फसलों पर निर्भर है। ऐसे में भूजल के संवर्द्धन और संरक्षण की दिशा में विशेष प्रयास होने चाहिए थे। लेकिन दुर्भाग्य से भूजल के अधिकाधिक दोहन की संभावनाओं को तो तलाशा गया, लेकिन उन परंपराओं और साधनों को नजरअंदाज कर दिया गया जो भूजल स्तर को बनाए रख सकते थे।
भूजल संरक्षण में सबसे अधिक योगदान वर्षा का होता है। पुराने जमाने में वर्षा जल संग्रहण के लिए तालाब, कुएं, बावड़ी और कुंड होते थे। इन जल स्रोतों में सहेजा गया वर्षा जल न केवल लोगों की सालभर की जरूरतें पूरी करता था, बल्कि उनमें संचित पानी धरती में रिस कर भूजल का स्तर भी बढ़ाता था। लेकिन आजादी के बाद कथित विकास के नाम पर अधिकांश परंपरागत जल स्रोतों को तोड़ दिया गया। आज हालत यह है कि मिथिला, उत्तराखंड और दक्षिण- पूर्वी राजस्थान जैसे क्षेत्र जहां बहुत-सी क्षेत्रीय नदियां बहती हैं, भूजल की कमी से जूझ रहे हैं। भारत में ही नहीं, सारी दुनिया में यही स्थिति है। एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के सैंतीस प्रमुख जल स्रोतों में से एक दर्जन से अधिक का जलस्तर चिंतनीय स्थिति तक गिर गया है। रिपोर्ट के मुताबिक भूजल के दोहन की गति ऐसी ही रही और जमीन के अंदर के पानी को सहेजने पर ध्यान नहीं दिया गया तो सन 2050 तक दुनिया के आधे से अधिक भूजल स्रोत सूख जाएंगे।
भारत में भूजल का सर्वाधिक दोहन किया जाता है। आंकड़ों के अनुसार भारतीय हर वर्ष दो सौ तीस घन किलोमीटर से अधिक जल जमीन से खींच लेते हैं। सारी दुनिया में उपयोग किए जाने वाले भूजल का यह एक चौथाई हिस्सा है। उत्तर भारत में भूजल 5400 करोड़ घन मीटर सालाना की दर से घट रहा है। भूजल के गिरते स्तर पर नीति आयोग भी चिंता जता चुका है। नीति आयोग की एक रिपोर्ट में चेतावनी दी गई थी कि भूजल में गिरावट का यही क्रम बना रहा तो सन 2030 तक भारत में बड़ा जल संकट खड़ा हो सकता है, क्योंकि दिल्ली, बंगलुरु, चेन्नई, हैदराबाद सहित देश के इक्कीस प्रमुख शहरों में भूजल खत्म होने के कगार पर पहुंच जाएगा। चंडीगढ़, पंजाब, पुदुचेरी, उत्तर प्रदेश, तमिलनाडु, जम्मू-कश्मीर, कर्नाटक, केरल और मेघालय में भी भूजल की स्थिति बहुत अच्छी नहीं पाई गई।
पर्यावरण परिवर्तन से जुड़े विविध प्रसंगों का अध्ययन करने और तदनुसार नीति बनाने के लिए अपनी सिफारिशें देने वाले ‘इंटरगवर्नमेंटल पैनल आन क्लाइमेट चेंज’ ने कुछ समय पहले अपनी रिपोर्ट में आगाह किया था कि सन 2050 तक दुनिया की आबादी दस अरब के करीब हो जाएगी। ऐसे में स्वाभाविक तौर पर अधिक उत्पादन के लिए उद्योगों और कृषि पर दबाव बढ़ेगा और लोग अपनी जरूरतों के लिए अधिक जल का उपयोग भी करेंगे। ऐसे में यदि नीतियों में बदलाव नहीं किया गया और प्राकृतिक संसाधनों के उपयोग की मर्यादा को नहीं समझा गया तो भूजल संकट और गहरा जाएगा। इस रिपोर्ट में दक्षिण-पूर्व एशिया के मेकांग डेल्टा के कुछ हिस्सों की खेती का उदाहरण दिया गया, जहां सिंचाई के लिए अधिक पानी की जरूरत होने पर धान की फसलों की खेती को छोड़ दिया गया था और वैकल्पिक तौर पर नारियल की खेती शुरू कर दी गई थी। इसके उलट भारत में सत्तर के दशक के बाद से ही लोगों को जल उपलब्ध कराने के लिए नलकूप खुदवाए गए और भूजल का असीमित दोहन किया जाने लगा। यह आज भी जारी है। इसी का नतीजा है कि जिन इलाकों में केवल चार-पांच फुट की खुदाई पर ही पानी मिल जाता था, उन इलाकों में भी पानी के लिए पाताल की सीमाओं को खंगालना पड़ रहा है।
भूजल के दोहन की प्रक्रिया से एक और बड़ा संकट खड़ा हो गया है और यह है कार्बन उत्सर्जन का बढ़ना। जबकि दुनिया भर में पर्यावरणविद सरकारों पर शून्य कार्बन उत्सर्जन नीति को बढ़ावा देने के लिए दबाव डाल रहे हैं। भूजल दोहन के लिए जिस पंप का उपयोग किया जाता है, उसके इस्तेमाल के लिए चाहे बिजली का उपयोग हो या जैविक र्इंधन का, वह कार्बन उत्सर्जन का कारक होता है। इसके अलावा अधिकांश भूजल स्रोतों में रेत, बजरी, मिट्टी और कैल्साइट होते हैं। हाइड्रान आयन केल्साइट के साथ क्रिया करके बाईकार्बोनेट और कैल्शियम बनाते हैं। भूजल जब वायुमंडल के संपर्क में आता है तो कार्बन डाईआक्साइड उत्सर्जित होती है और कैल्साइट गाद के रूप में जमा हो जाता है। देश में होने वाले कार्बन डाईआक्साइड के कुल उत्सर्जन में भूजल दोहन प्रक्रिया का भी बड़ा हिस्सा है। दुनिया भर में भूजल दोहन से होने वाले कुल कार्बन उत्सर्जन की मात्रा 3.2 करोड़ टन प्रतिवर्ष से 13.1 करोड़ टन प्रतिवर्ष आंकी गई है।
सत्तर के दशक के अंतिम वर्षों में हरित क्रांति योजना को बढ़ावा देने के लिए नलकूपों की खुदाई का काम शुरू हुआ और फिर बस्तियों में बिना किसी नियंत्रण के नलकूप खोदे जाने लगे। पानी का स्तर पाताल तक पहुंच जाने के बावजूद लोग धरती के अंदर का पानी उलीचते रहे हैं। जबकि जीवन में पानी के महत्त्व के कारण ही उसे बहुत पवित्र माना गया है। लेकिन हमारा दौर पानी के सदुपयोग के प्रति बहुत लापरवाह हो गया है। महाभारत में एक स्थान पर कहा गया है कि अत्यधिक परिचय के बाद व्यक्ति की अवज्ञा होने लगती है (अति परिचयाद् अवज्ञा भवति)। जमीन के अंदर का पानी सरलता से उपलबध होने लगा तो लोग उसका महत्त्व ही भूल गए। इसीलिए आज भूजल दोहन पर नियंत्रण की जरूरत बताई जा रही है। जिन स्थानों पर स्थानीय निकाय नलों द्वारा जल आपूर्ति करते हैं, उन इलाकों में नलकूप प्रतिबंधित होने चाहिए। जहां नलकूप लगाना जरूरी लगे, वहां भी नलकूपों के उपयोग पर नियंत्रण की एक प्रभावशाली प्रणाली होनी चाहिए। सरकारों को वर्षा जल संरक्षण, भूजल संवर्द्धन और भूजल संरक्षण के संबंध में प्रभावशाली नीतियां बनानी चाहिए और उन नीतियों/ नियमों का अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए एक उत्तरदायी तंत्र विकसित करना चाहिए। यदि अब भी हम भूजल संरक्षण के प्रति सजग और संवेदनशील नहीं हुए तो हमें पंचतंत्र की एक कहानी के उसी नायक की तरह पछताना होगा, जिसने ज्यादा से ज्यादा संपत्ति अर्जित करने के लालच में रोज सोने का एक अंडा देने वाली मुर्गी का पेट चीर दिया था। अपने स्वार्थ के चाकू से धरती के गर्भ को चीर कर सभ्यता के विकास का ढोल कब तक पीटेंगे?
Date:09-01-23
मानव निर्मित त्रासदीसंपादकीय
अर्वतीय प्रदेश उत्तराखंड में स्थित जोशीमठ की त्रासदी मानव निर्मित कारणों और सरकार की अदूरदर्शिता–लापरवाही को उजागर करती है‚ जिसके कारण इस हादसे का प्रभाव कई गुना बढ़ गया। जोशीमठ गढ़वाल क्षेत्र के अंतर्गत आता है। यह भारत का सबसे अधिक संवेदनशील क्षेत्र है। हालांकि समूचा उत्तराखंड कच्चे और नये पहाड़ों वाला है। यह क्षेत्र भूकंप‚ भूस्खलन‚ भारी वर्षा‚ बादल फटने जैसी प्राकृतिक आपदाओं से प्रभावित रहता है‚ लेकिन बेतरतीब विकास की दौड़ में प्रकृति के साथ छेड़छाड़ की घटनाओं के कारण अक्सर जोशीमठ की तरह आपदाएं आती रहती हैं। जोशीमठ में भू–धंसाव की घटना कोई नई नहीं है। लोगों को याद होगा जब 1970 में उत्तरखंड की पेड़ों की कटाई के विरुद्ध चिपको आंदोलन की शुरुआत हुई थी। प्रसिद्ध पर्यावरणविद सुंदरलाल बहुगुणा‚ सामाजिक कार्यकर्ता और गांधीवादी पर्यावरणविद चंड़ी प्रसाद भट्ट‚ कामरेड गोविंद सिंह रावत और श्रीमती गौरा देवी के नेतृत्व में चिपको आंदोलन की शुरुआत हुई थी। उसी दौरान चंड़ीप्रसाद भट्ट जोशीमठ में भू–धंसाव के मामले को तब की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के संज्ञान में लाए थे। 1976 में मिश्रा कमेटी की रिपोर्ट आई थी‚ जिसमें इस प्राचीन शहर के धंसने का खुलासा किया गया था‚ लेकिन सरकार की ओर से इसकी रोकथाम करने की कोई पहल नहीं की गई। चार–धाम यात्रा के कारण जोशीमठ का पूरी तरह व्यावसायीकरण हुआ। यहां आज करीब 20–25 हजार की आबादी है‚ लेकिन जल–निकासी के लिए ड्रे़नेज सिस्टम नहीं है। इसके कारण उपयोग में लाया जाने वाला पानी धरती के अंदर जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि बिजली परियोजनाओं और सड़कों के निर्माण के लिए विस्फोटकों का जिस तरह से इस्तेमाल किया जा रहा है‚ उसके कारण भी भू–धंसाव में तेजी आई है। भू–धंसाव के कारण यहां के प्रायः सभी घरों में दरारें पड़ गई हैं। गौर करने वाली बात है कि भूस्खलन जाड़े में हो रहा है। बरसात में क्या होगा इसकी कल्पना से रोंगटे खड़े हो जा रहे हैं। विशेषज्ञों को भी समझ नहीं आ रहा है कि जमीन से कीचड़युक्त पानी का रिसाव क्यों और कहां से हो रहा है। सरकार ने इसका पता लगाने के लिए कमेटियों का गठन किया है। लेकिन महत्वपूर्ण बात यह है कि हमें विकास के मॉडल पर पुनर्विचार करने की जरूरत है। विकास कार्यों पर प्रतिबंध तो नहीं लगाया जा सकता‚ लेकिन प्राकृतिक संसाधनों को क्षति पहुंचाए बिना विकास का मॉडल अपनाया जा सकता है।
Date:09-01-23
जाति गणना का मंतव्यसंपादकीय
बिहार में शनिवार को जाति आधारित जनगणना की शुरुआत कर दी गई। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने वैशाली जिले के गोरौल प्रखंड अंतर्गत हरसेर गांव में मनोज पासवान के घर जाति आधारित गणना की शुरुआत की। इस अवसर पर नीतीश ने कहा कि सभी पार्टियों की सहमति से यह काम शुरू हुआ है। नीतीश ने कहा कि केंद्र सरकार के सामने जाति आधारित गणना की मांग रखी गई थी‚ लेकिन वे लोग तैयार नहीं हुए। इसलिए राज्य सरकार अपने स्तर पर इसे करवा रही है। खास बात यह कि जाति की गणना के साथ ही लोगों की आर्थिक स्थिति का भी अध्ययन करवाया जा रहा है ताकि पता चल सके कि समाज में कितने लोग गरीब हैं‚ और उनके कैसे आगे बढ़ाना है। माना जा रहा है कि बिहार में महागठबंधन सरकार का यह कदम ऐतिहासिक है। बिहार में जाति आधारित जनगणना प्रमुख मुद्दा रही है। सत्तारूढ़ जद (एकी) और उसके महागठबंधन में शामिल सभी घटक लंबे समय से इस बाबत मांग करते रहे हैं। गौरतलब है कि केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार ने 2010 में राष्ट्रीय स्तर पर जाति आधारित गणना कराने पर सहमति जताई थी‚ लेकिन जनगणना के दौरान एकत्रित आंकड़ों को संकलित करके रिपोर्ट का रूप कभी नहीं दिया गया। यकीनन यह बड़ी चूक थी। ऐसी चूक कर्नाटक में भी की गई थी जब 2014 में जाति गणना तो की गई पर रिपोर्ट सार्वजनिक की गई। गणना में 192 नई जातियां चिह्नित की गई और 80 ऐसी थीं जिनमें मात्र 10 लोग थे यानी नई जातियों के लिए उत्थान के लिए जो कुछ भी जरूरी था‚ वह नहीं हो पा रहा था। बिहार में जो शुरुआत हुई है‚ इसके तमाम लाभ गिनाए जा रहे हैं। वार्डवार जाति और कुशल लोगों की संख्या एक जगह उपलब्ध हो सकेगी। तद्नुसार कल्याणकारी नीति बनाई जा सकेगी। आर्थिक–सामाजिक रूप से वंचितों और पिछड़ों के लिए जो विशेष प्रबंध होने चाहिए वे किए जा सकेंगे। इससे सामाजिक ऊंच–नीच तथा आर्थिक खाई को पाटने में मदद मिलेगी। लेकिन कुछ लोग इस समूची कवायद को राजनीति की नजर से भी देख रहे हैं। उन्हें लग रहा है कि मंडल कमीशन के बाद एक बार फिर से राज्य में जातीय भावना फैल सकती है। बेशक‚ राजनीतिक ध्रुवीकरण होगा लेकिन समाज बंट सकता है। बहरहाल‚ इस दृष्टि से लाभ जरूर होगा कि एक विश्वसनीय आकड़ा बैंक हमारे पास होगा।
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हाल ही में भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान या एम्स जैसे महत्वपूर्ण निकाय पर साइबर हमला हुआ है। इस हमले ने देश के महत्वपूर्ण स्वास्थ्य क्षेत्र को अस्त-व्यस्त करके कुछ ही मिनटों में लाखों जिन्दगियों को खतरे में डाल दिया था। यह हमला हमें डिजीटल इंडिया की सुरक्षा का अवलोकन करने को मजबूर करता है। कुछ बिंदु –
भारत तेजी से डिजटलीकरण कर रहा है। इस स्थिति को देखते हुए एक व्यापक साइबर सुरक्षा योजना आवश्यक हो चुकी है। सन् 2018 में संविधान पीठ ने आधार कार्ड से जुड़े नागरिकों के निजी डेटा की सुरक्षा पर विस्तार से बहस की थी, और उच्चतम न्यायालय ने आधार पंजीकरण को अनिवार्य बनाने पर रोक भी लगा दी थी। बावजूद इसके इसे अनिवार्य बना दिया गया।
भारत सरकार को नागरिकों की व्यक्तिगत सुरक्षा के बारे में सोचते हुए कोई ठोस नीति बनानी चाहिए। इस हेतु सरकारी और निजी क्षेत्र एक साथ मिलकर साइबर सुरक्षा बोर्ड की स्थापना कर सकते हैं।
वास्तविकता यही है कि कोई भी सरकार कहीं भी महत्वपूर्ण निजी डेटा की सुरक्षा की पूरी-पूरी गारंटी नहीं दे सकती। अतः ऐसा कोई तंत्र विकसित किया जाना चाहिए कि व्यक्तिगत पहचान से संबंधित डेटा को स्टोर किए जाने की जरूरत ही न हो।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित मिशी चौधरी और फैजल फारूखी के लेख पर आधारित। 14 दिसंबर, 2022
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Date:07-01-23
Haldwani’s LessonAbrupt eviction is no answer to encroachment.TOI Editorials
Rapidly changing fortunes of the 4,000-plus families in Haldwani, Uttarakhand, hold a lesson for governments. After the Uttarakhand high court directed Railways, which claimed the land, and the state to use the paramilitary forces to evict families, the Supreme Court on Thursday stayed the order. The underlying issues have a long history of jurisprudence, with the SC’s landmark 1985 judgment in the Olga Tellis case providing guidelines. In that case, while SC said that encroachment cannot be automatically legalised, the right to livelihood imposes checks against arbitrariness in evictions.
Livelihood lies at the heart of encroachments or slums. Census 2011 said 13. 7 million urban households were in slums, with as many as 41. 3% households in Greater Mumbai in that category. Slum dwellers are intrinsic to the economic life of urban areas. To illustrate, 70. 2% of slum households are owned, a percentage point higher than urban average. It’s a proxy indicator of two aspects. Slum dwellers have livelihoods and aspirations like the middle class. Also, some government bodies formally recognise claims and provide paperwork. Given this context, the core question is why are there slums when their residents are integral to the urban economic landscape?
The answer to that lies in the failure of urban planning and governance, especially the master plans that become irrelevant soon after they are accepted. Urban planners and the attendant governance framework are out of sync with the speed with which urban economies evolve. One of the symptoms of this failure is slums. As India’s jurisprudence has spelt out, occupation doesn’t mean ownership. However, the livelihood factor comes into play here mainly because of state failure in providing pathways to a better life in cities, which are India’s growth engines.
Date:07-01-23
Herstory Of WarPeace has a better chance with women in charge.TOI Editorials
India has sent an all-women platoon of peacekeepers to Abyei, Sudan, the second such deployment after its trailblazing female peacekeeping police unit to Liberia in 2007, which the then Liberian president, Ellen Johnson Sirleaf, lauded as an inspiration and a prompt for recruiting more women in the Liberian police. After the Indian women peacekeeping force left, Liberian women made up 17% of the country’s security sector, up from 6% before their arrival. Scholarship has established that when women make decisions, the risks of war and conflict reduce. But women’s role in conflict resolution and stability is only lately being acknowledged and boosted. And there’s a long way to go.
As of 2020, out of 95,000 UN peacekeepers, women made up only 4. 8% of military contingents and 10. 9% of police units. A Swedish study found that civil society groups including women’s organisations make a peace agreement about 64% less likely to fail. And when women participate in peace processes, the agreement is 35% more likely to last at least 15 years.
Women face the worst brunt of war, in terms of sexual violence and abuse as well as displacement. To see fellow women in authority can encourage women to reclaim public life without fear. The same lesson holds for India at home. Women will be safer if there are many more women in all ranks in various government branches, including police.
Date:07-01-23
Who Tunnels Through A Sinking Town?Despite decades of studies warning of Joshimath’s geological stress, authorities went ahead with power and road projects.Anjal Prakash, [ The writer is Research Director at Bharti Institute of Public Policy at ISB. He contributes to IPCC reports and had led research on glaciated rivers in Hindu-Kush Himalayan region. ]
Residents of Joshimath are protesting because their homes, roads and agricultural fields developed enormous and sudden fractures over the past few days. Water is gushing out of fields while houses are developing cracks. This, prima facie, shows that the town is under tremendous stress, and a portion of it may sink.
Joshimath,or Jyotirmath, is a temple town and a municipality in Uttarakhand’s Chamoli district. The math or monastery is one of the four cardinal institutions founded by Adi Shankaracharya in the four corners of India. The cantonment at Joshimath is one of the closest to the China border; thus, the town has both religious and strategic significance.
Early signs of risk ignored
The entire region, from Chamoli to Joshimath, has been familiar with disasters for the past few decades. The glacial avalanche known as the Chamoli disaster led to flash floods in the Rishiganga and Dhaulganga rivers in February 2021. The two rivers are tributaries of the Ganga. The disaster killed around 200 people, including workers trapped in the Tapovan Vishnugad hydropower plant’s tunnel on the Dhaulganga river. Then, in July 2021, during heavy rainfall, a portion of the mountain sank in Dhandharia near Joshimath.
In a research article documenting 23 disastrous events in 2021 itself in Uttarakhand, Sushil Khanduri of Uttarakhand State Disaster Management Authority showed that heavy downpour, cloudburst, rock fall, debris flow, avalanche, flood/ flash floods occurred in many locations of the state. These disasters took 308 lives, while 61 people went missing and 105 were injured. Around 1,048 farm animals were lost, 5,729 houses were fully damaged, and 18. 5 hectares of agriculture fields were washed away. The research explains that these disasters mostly relate to meteorological regime changes, unusual rainfallpatterns, and indiscriminate human actions in high-risk areas.
In 1964, the government had appointed MC Mishra, then collector of Garhwal, to find out why Joshimath was sinking. His 18-member committee report explained that Joshimath is situated in an old landslide zone and could sink if rampant development is unchecked. It recommended that substantial construction should be prohibited in the vicinity of Joshimath.
The Vishnugad hydel project
Since then, numerous hydroelectric projects including the Vishnugad hydel project have been approved in areas such as Joshimath and Tapovan, despite the region’s geological and environmental sensitivity. The road and tunnel constructions in a fragile mountain ecosystem are creating havoc and leading to the present-day crisis in Joshimath.
Residents and activists working in the Himalayan region question how the Vishnugad project was sanctioned. The survey was done by a private agency that failed to take cognisance of prevailing fragile geological conditions where tunnellingcould disturb the local ecology leading to huge changes in the mountain system.
In May 2010, two researchers from Garhwal University and Disaster Mitigation Management Centre, MPS Bisht and Piyoosh Rautela, wrote a commentary in the journal Current Science highlighting these risks that the town is facing.
● They reported that the government should not have overburdened the town through the tunnel alignment which was part of the hydropower project.
● The tunnelling process punctures the water-bearing strata and causes harm in water gushing out and flooding the area.
● Inability to understand the ecology and geology of the area before implementing large scale infrastructure projects such as hydropower projects and road constructions are acts of negligence by authorities.
And climate change makes it worse
The Himalayan mountains are one of the youngest mountains of the world and therefore they are fragile and unstable. Small changes in the weather and climate pattern affect the mountain system strongly. IPCC reports have been making these observations for the past couple of years, first in the special report on oceans and cryosphere published in 2019 and then in the 6th Assessment Report released in 2022.
● Due to global warming, the region has been experiencing extreme weather events as recorded in 2021-22. The number of extreme rainfall events that have hit Uttarakhand was unprecedented.
● Forest area is also decreasing due to rampant felling and increased infrastructure development.
● Climate change has become a force multiplier, when things were already precarious.
Will Joshimath sink is a question whose answer may lie in the future but whatever happened till now is totally our creation. Due to this, a place which has cultural relevance for millions of Hindus and Buddhist in India may no longer be there, thanks to the mismanagement of environment and natural resources.
However, not everything is lost, and we must save whatever still exists. That will require a transformative change in both our thinking and the patterns of growth that we envisage without paying attention to the immediate environment.
Date:07-01-23
धंसता हुआ शहरसंपादकीय
हल्द्वानी के बाद उत्तराखंड का जोशीमठ शहर अप्रिय कारणों से देश का ध्यान अपनी ओर खींच रहा है। चीन की सीमा से लगे चमोली जिले का जोशीमठ किस तरह गंभीर खतरे का सामना कर रहा है, इसका पता इससे चलता कि भूमि के धंसने और उसके चलते घरों के दरकने के कारण लोगों को अन्यत्र रहने के लिए विवश होना पड़ रहा है। चूंकि घरों में दरारें पड़ने का सिलसिला तेज होता जा रहा है, इसलिए करीब 25 हजार की आबादी वाले जोशीमठ के निवासियों की चिंता और दहशत बढ़ती जा रही है। इसकी भरी-पूरी आशंका है कि आने वाले दिनों में स्थिति और गंभीर होगी तथा इस भयंकर ठंड में अन्य अनेक लोगों को उनके घरों से निकालकर सुरक्षित स्थान पर ले जाना पड़ेगा | अच्छा होता कि शासन-प्रशासन तभी चेतता, जब घरों में दरारें पड़ने का सिलसिला प्रारंभ ही हुआ था। दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हुआ। वह तब चेता जब डरे-सहमे लोग जोशीमठ को बचाने की गुहार लगाते हुए सड़कों पर उतरने के लिए विवश हुए। नाजुक भूगर्भीय क्षेत्र में बसा जोशीमठ जिस आसन्न खतरे का सामना कर रहा है, उसका एक कारण उन चेतावनियों की अनदेखी भी है, जो बहुत पहले दी गई थीं।
इससे संतुष्ट नहीं हुआ जा सकता कि आठ सदस्यीय विशेषज्ञ समिति जोशीमठ शहर का निरीक्षण कर रही हैं, क्योंकि यह काम बहुत पहले किया जाना चाहिए था। इस देरी के दुष्परिणाम भुगतने पड़ सकते हैं। कम से कम अब तो यह सुनिश्चित ही किया जाना चाहिए कि उन कारणों का गहराई से आकलन किया जाए, जिनके चलते जोशीमठ में जमीन धंस रही है। इस पहलू पर विशेष ध्यान दिया जाना चाहिए कि कहीं जमीन धंसने का कारण विकास परियोजनाएं और अनियोजित निर्माण तो नहीं है? यह अच्छा हुआ कि राज्य सरकार ने सभी निर्माण कार्यों पर रोक लगा दी, लेकिन यह ध्यान रहे कि पर्वतीय क्षेत्र भी विकास की मांग करते हैं। समस्या यह है कि पर्वतीय क्षेत्र में विकास कार्यों को आगे बढ़ाने के पहले इलाके की संवेदनशील भूगर्भीय स्थिति का पर्याप्त अध्ययन नहीं किया जाता। यदि पर्वतीय क्षेत्रों में संभावित खतरों की अनदेखी की जाएगी तो वैसे ही खतरे का सामना अन्य अनेक पहाड़ी इलाकों को भी करना पड़ सकता है, जैसा जोशीमठ को करना पड़ रहा है। जो भी हो, फिलहाल प्रभावितों को राहत देने के अतिरिक्त बिजली परियोजनाओं के साथ-साथ चार धाम परियोजना के भी भूगर्भीय प्रभाव का विस्तार से अध्ययन किया जाना समय की मांग है। जोशीमठ में जो कुछ हो रहा है, उससे देश के अन्य पर्वतीय इलाकों को भी सावधान हो जाना चाहिए, क्योंकि जिन कारणों से इस शहर के लिए खतरा पैदा हुआ वे कारण अन्यत्र भी हो सकते हैं। यह भी ध्यान रहे कि अन्य पर्वतीय क्षेत्रों में भी अनियोजित विकास हो रहा है।
Date:07-01-23
भारत जोड़ने का नया प्रयोगडा. एके वर्मा, ( लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं सेंटर फार द स्टडी आफ सोसायटी एंड पालिटिक्स के निर्देशक हैं )
नव वर्ष की पूर्व संध्या से लेकर उसके आगमन तक विश्व में शुभकामनाओं उपहारों का दौर चलता है। मोदी सरकार ने भी देश को नव वर्ष की पूर्व संध्या पर एक उपहार दिया। वह था काशी – तमिल-संगमम् के माध्यम से देश की दो महान संस्कृतियों- आर्य और द्रविड़ को पास लाकर ‘राष्ट्र की एकता और अखंडता’ के संवैधानिक संकल्प को लक्ष्य करना। यह संगमम् काशी हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी और आइआइटी, मद्रास के प्रयास और भारत सरकार के सौजन्य से वाराणसी में पूरे एक महीने चला। प्रधानमंत्री मोदी ने इसका उद्घाटन करते हुए ‘एक भारत श्रेष्ठ- भारत के लक्ष्य को प्राप्त करने में दो महान संस्कृतियों की साझा विरासत और भूमिका को रेखांकित किया।
भारतीय विविधता का बहुआयामी स्वरूप विश्व को चकित करता है। उसके मन में सवाल उठता है कि भारत में एकता क्यों और कैसे हैं? इसका लाभ उठाकर विदेशी आक्रांताओं ने हम पर शासन किया। विदेशी इतिहासकारों ने इसी विविधता को विभाजनकारी तत्व बना कर आर्य और द्रविड़ संस्कृतियों के संघर्ष का कल्पित सिद्धांत प्रतिपादित किया, लेकिन आज तक आर्य-द्रविड़ संघर्ष का तथ्यात्मक प्रमाण नहीं मिल सका। गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने भारत के राष्ट्रगान – “पंजाब, सिंध, गुजरात, मराठा, द्राविड़ उत्कल बंगा…’ में ‘द्रविड’ शब्द को स्थानबाची के रूप में प्रयोग किया, प्रजाति सूचक के रूप में नहीं। केरल में जन्में आदि गुरु शंकराचार्य ने देश के चारों कोनों पर चार धामों और मठों की स्थापना कर देश को एकता के सूत्र में पिरोने का काम किया। कण्व, अगस्त्य, मध्वाचार्य, रामानुजाचार्य, बल्लभाचार्य, शंकराचार्य आदि अनेक ऋषि तथा राजाजी से लेकर सर्वपल्ली डा. राधाकृष्णन और डा. एपेजी अब्दुल कलाम आदि असंख्य विद्वान उत्तर- भारत में परम आदरणीय रहे हैं। काशी तमिल संगमम् ने शंकराचार्य की परंपरा को आगे बढ़ाने का काम किया, जिससे देश की एकता-अखंडता बनी रहे।
काशी तमिल संगमम् न केवल आर्य और तमिल संस्कृतियों वरन उत्तर एवं दक्षिण भारत को जोड़ने का बीजमंत्र है। आज भी तमिलनाडु में विवाह के अवसर पर वर-वधू काशी यात्रा का संकल्प लेते हैं। इसीलिए कहा जाता है कि तमिलों को अपने जीवनकाल में एक बार काशी- यात्रा करना अनिवार्य है। 15वीं शताब्दी में तमिलनाडु के शासक पराक्रम पांड्या ने शिव – काशी में शिव का अद्भुत मंदिर बनवाया, जिसमें काशी से लाए लिंगम की स्थापना की गई। तमिलनाडु में काशी, शिव-काशी, तेन-काशी आदि धार्मिक स्थल काशी – तमिल जुड़ाव के साक्ष्य हैं। वहीं वाराणसी में अनेक क्षेत्रों में एक ‘लघु-तमिलनाडु’ बसता हैं, जिसमें तमिल के महाकवि सुब्रह्मण्य भारती भी वर्षों रह कर अध्ययन कर चुके हैं। इसी के साथ दक्षिण भारत वासियों को यह भी समझना होगा कि वहां के अद्भुत मंदिर यदि सुरक्षित रहे तो उसका एक कारण यह था कि उत्तर भारत के लोगों ने बाह्य आक्रांताओं को यहीं उलझाए रखा।
काशी तमिल संगमम् केवल एक शुरुआत है। ऐसा न हो कि यह क्षणिक उत्सव होकर रह जाए। इसके लिए उत्तर भारत के लोगों को कुछ गंभीर प्रयास करने होंगे, जैसे हमें तमिल, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम आदि में से कोई दक्षिण भारतीय भाषा सीखनी होगी और उसके अद्भुत साहित्य को पढ़ना होगा। जब 1968 में त्रिभाषा फार्मूला बना तो हिंदी भाषी लोगों को हिंदी और अंग्रेजी के अलावा एक आधुनिक भारतीय भाषा (सामान्यतः दक्षिण भारतीय भाषा) का विकल्प दिया गया, लेकिन अधिकतर ने संस्कृत चुना, क्योंकि न तो दक्षिण भारतीय भाषा के शिक्षक उपलब्ध थे, न ही इस पर कोई ध्यान दिया गया। इससे उत्तर-दक्षिण संवाद में व्यवधान पड़ा, जिससे भारतीय शास्त्रार्थ पद्धति, जिसमें संवाद से सहमति और सहमति से समाधान की संस्कृति थीं, समाप्त हो गई। इसीलिए आज के संवाद में हमें शत्रुता और संघर्ष के दर्शन होते हैं।
यह स्वाभाविक हैं कि काशी तमिल संगमम् को राजनीतिक चश्मे से भी देखा गया। बहुतों को लगा कि इससे प्रधानमंत्री मोदी एक और दक्षिणी के राज्यों- तमिलनाडु, केरल, तेलंगाना, आंध्रप्रदेश और कर्नाटक में भाजपा के लिए राजनीतिक जमीन तैयार कर रहे हैं, दूसरी ओर राहुल गांधी की भारत जोड़ो यात्रा के राजनीतिक प्रोजेक्ट की धार कुंद कर रहे हैं। वास्तव में कोई नेता, राजनीतिक दल या सरकार किसी भी रूप में भारत जोड़ने का काम करती है तो उसकी सराहना की जानी चाहिए, भले ही उससे उन्हें राजनीतिक लाभ क्यों न मिले। यदि राहुल अपनी यात्रा से एक बेहतर राजनीतिज्ञ के रूप में उभरते हैं और देश के प्रति उनकी समझ बढ़ती है। तो इसमें बुरा क्या है? यदि इसका लाभ कांग्रेस और देश को मिले तो इसमें क्या हर्ज ? इसी प्रकार काशी तमिल संगमम् से यदि देश की दो महान संस्कृतियों में मिलन और सदभाव हो, उससे देश की एकता एवं अखंडता बढ़े और भाजपा को उसका लाभ मिले तो उसमें क्या समस्या है ? देश के लिए जो भी काम करेगा, उसे तो उसका लाभ मिलेगा ही ।
इस वर्ष नौ राज्यों – मेघालय, त्रिपुरा, नगालैंड, मिजोरम, कर्नाटक, तेलंगाना, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान में होने वाले चुनावों के बाद वर्ष 2024 में लोकसभा चुनाव होंगे। अनेक लोगों को लगता है कि काशी तमिल संगमम् उसकी तैयारी मात्र है। यदि ऐसा हो भी तो इसमें गलत क्या है ? यही काम तो राहुल गांधी कांग्रेस के लिए कर रहे हैं। यह जरूर है कि वह अपनी व्यक्तिगत छवि निखारने के लिए ऐसा कर रहे हैं, लेकिन राजनीतिक स्पर्धा के लिए जिस संगठनात्मक पुनसंरचना, वैचारिक पुनर्स्थापना और नेतृत्व पुनर्निर्माण की आवश्यकता होती है, क्या उसकी कोई समानांतर धारा भी वह चला सके हैं? काशी तमिल संगमम से आर्य संस्कृति को द्रविड़ संस्कृति से और उत्तर भारत को दक्षिण भारत से जोड़ने का जो प्रयास मोदी सरकार ने शुरू ने किया, वह राष्ट्रीय एकता और अखंडता के संवैधानिक संकल्प को प्राप्त करने में मील का पत्थर साबित होगा।
Date:07-01-23
परिसर का प्रसारसंपादकीय
अब विदेशी विश्वविद्यालय भी भारत में अपने परिसर खोल सकेंगे। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने इसका मसविदा पेश कर दिया है। हालांकि यह प्रस्ताव पुराना है, पर अब उसे अमली जामा पहनाया जा सका है। कई विदेशी विश्वविद्यालय बरसों से भारत में अपने परिसर खोलने के इच्छुक थे, मगर कुछ तकनीकी अड़चनों और शिक्षा की गुणवत्ता, पढ़ाने-लिखाने के तौर-तरीके के नियमन, शुल्क आदि को लेकर कई शंकाओं के चलते यह प्रस्ताव टलता आ रहा था। निस्संदेह इस नीति से उच्च शिक्षा में भारतीय विद्यार्थियों के लिए नए अवसर पैदा होंगे। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने फिलहाल विदेशी विश्वविद्यालयों को दस साल के लिए मंजूरी देने का प्रावधान रखा है। उनके प्रदर्शन को देखते हुए नौ साल बाद फिर उनका नवीकरण किया जाएगा। दाखिला प्रक्रिया और शुल्क निर्धारण के मामले में इन विश्वविद्यालयों को स्वतंत्रता होगी। पर इससे यह सुविधा तो होगी कि बहुत सारे भारतीय विद्यार्थियों को अपने देश में रह कर ही विदेशी विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमों को पढ़ने की सुविधा मिल जाएगी। बहुत सारे विद्यार्थी इसलिए बाहरी विश्वविद्यालयों में दाखिला लेने जाते हैं कि यहां के विश्वविद्यालयों में वैसे पाठ्यक्रम नहीं हैं, जो उनमें हैं। अब वे पाठ्यक्रम अपने देश में भी उपलब्ध हो सकेंगे। इससे स्वाभाविक ही अपने यहां के सरकारी और निजी विश्वविद्यालय भी उनकी प्रतिस्पर्धा में ऐसे पाठ्यक्रम शुरू करने का प्रयास करेंगे।
हमारे यहां एक बड़ी समस्या यह भी है कि बढ़ती आबादी के अनुपात में स्कूल-कालेज और विश्वविद्यालय खोलना सरकार की क्षमता से बाहर होता गया है। शिक्षा पर अपेक्षित बजट न होने के चलते सबके लिए गुणवत्तापूर्ण शिक्षा उपलब्ध कराना चुनौती बना हुआ है। ऐसे में निजी संस्थानों को प्रोत्साहित किया जाने लगा। इस तरह निजी स्कूल और कालेजों की बाढ़ तो आ गई, मगर उनमें मिलने वाली शिक्षा की कीमत चुकाना हर किसी के वश की बात नहीं रह गई है। इसलिए भी निजी शिक्षण संस्थान सदा आलोचना का विषय रहे हैं। हालांकि बहुत सारे निजी शिक्षण संस्थानों ने विदेशी विश्वविद्यालयों के अनुरूप पाठ्यक्रम और शैक्षणिक वातावरण देने का प्रयास करते हैं, पर इस पहलू पर भी असंतोष ही देखा जाता है। ऐसे में विदेशी विश्वविद्यालयों के हमारे यहां परिसर खुलेंगे, तो यहां के निजी शिक्षण संस्थानों पर भी उनसे प्रतिस्पर्धा पैदा होगी। फिर उन विश्वविद्यालयों में बहुत सारे प्रतिभावान लोगों को शिक्षण के अवसर भी पैदा होंगे। प्रतिभा पलायन पर कुछ हद तक रोक लगने की गुंजाइश भी बनेगी। जो मुद्रा विदेशी विश्वविद्यालयों में जा रही है, वह अपने देश में रुक सकेगी।
नई शिक्षा नीति में एक वादा यह भी है कि निजी स्कूलों में शुल्क आदि के निर्धारण का व्यावहारिक पैमाना तय किया जाएगा, जिससे स्कूलों की मनमनी फीस वसूली पर लगाम लगाई जा सके। पर निजी और विदेशी उच्च शिक्षण संस्थानों को इस मामले में छूट क्यों है? पहले ही हमारे यहां उच्च निजी संस्थानों में फीस इतनी ऊंची है कि बहुत सारे विद्यार्थी इसलिए यूक्रेन आदि देशों का रुख करते हैं कि वहां यहां से कम खर्च पर गुणवत्तापूर्ण पढ़ाई हो जाती है। अगर इस समस्या पर काबू करने का प्रयास नहीं होगा, तो विदेशी विश्वविद्यालयों के परिसरों को भी विद्यार्थियों के अभाव से जूझना पड़ सकता है। अब शिक्षा का अर्थ केवल विद्यार्थियों को पाठ्यक्रम पूरा करा देना नहीं, उनमें कौशल विकसित करना और फिर विदेशी मुद्रा अर्जित करने का माध्यम भी बन गई है। इस तरह अगर विदेशी विश्वविद्यालयों से प्रतिस्पर्धी वातावरण बनेगा, तो इस दिशा में बेहतर नतीजों की उम्मीद बनती है।
Date:07-01-23
विवाद की परिधिसंपादकीय
पिछले कुछ समय से न्यायाधीशों की नियुक्ति और इससे जुड़े अन्य सवालों को लेकर व्यवस्थागत मसले पर सरकार और न्यायपालिका के बीच जिस तरह की खींचतान देखी जा रही है, वह कोई आदर्श स्थिति नहीं है। हाल में नौबत यहां तक पहुंच गई थी कि न्यायाधीशों की नियुक्ति के मामले में कालिजियम प्रणाली पर सरकार और सुप्रीम कोर्ट के बीच टकराव जैसी स्थिति बनती देखी गई। हालांकि यह ऐसा विषय है, जिस पर सरकार और न्यायपालिका को मिल कर कोई ठोस हल निकालने का प्रयास करना चाहिए था, लेकिन विडंबना यह है कि फिलहाल कुछ सकारात्मक संकेतों के बावजूद इस समस्या के हल के बिंदु स्पष्ट नहीं हो पा रहे हैं, जबकि इससे जुड़े प्रश्नों से उपजी जटिलताएं अब भी बरकरार हैं। इसी मसले पर अब संसद की एक समिति ने भी हैरानी जताई है कि सरकार और उच्चतम न्यायालय करीब सात साल बाद भी कालिजियम प्रक्रिया ज्ञापन पर आपस में कोई सहमति बनाने में विफल रहे हैं। यह प्रक्रिया ज्ञापन शीर्ष अदालत और उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्त, पदोन्नति और तबादले से जुड़ा है।
गौरतलब है कि सरकार और सुप्रीम कोर्ट के बीच इस मुद्दे पर पिछले सात साल से विचार-विमर्श चल रहा है और दोनों पक्षों ने इस पर कई मौकों पर आपस में विचारों का आदान-प्रदान किया है। विचित्र है कि जो मामला समूचे न्यायपालिका के ढांचे को प्रभावित करता है और इसका असर मुकदमों की सुनवाई या न्यायिक गतिविधियों की रफ्तार पर पड़Þता है, उसके समाधान तक पहुंचने को लेकर पर्याप्त सक्रियता नहीं दिख रही। जबकि आए दिन यह सवाल उठता रहता है कि देश की विभिन्न अदालतों पर मुकदमों का कितना बोझ है और न्यायालयों की रिक्तियां भरने के मामले में समय पर जरूरी कदम नहीं उठाए जाते। अदालतों में जजों के खाली पदों के समांतर व्यवस्थागत स्थिति यह है कि सरकार सिर्फ उन्हीं को उच्च न्यायालयों के न्यायाधीश के तौर पर नियुक्त करती है, जिनकी सिफारिश शीर्ष अदालत के कालिजियम की ओर से की जाती है। कुछ समय पहले कानून मंत्री ने संसद में कहा था कि जब तक न्यायाधीशों की नियुक्ति का तरीका नहीं बदलेगा, तब तक नियुक्तियों और खाली पदों पर सवाल उठते रहेंगे। अंदाजा लगाया जा सकता है कि अगर देश भर की अदालतों में जरूरी तादाद में न्यायाधीश नहीं हैं, तो इसके क्या कारण हैं।
ऐसे में संसदीय समिति की ओर से व्यक्त आश्चर्य स्वाभाविक ही है कि जो मसला कई स्तर पर न्यायिक गतिविधियों को प्रभावित करता रहा है और आज उस पर एक तरह से सरकार और शीर्ष अदालत दो पक्ष बन गए दिख रहे हैं, वह इतने लंबे वक्त से विचार के बावजूद किसी ठोस हल तक क्यों नहीं पहुंच पा रहा है। जबकि हकीकत यह है कि खुद संसदीय समिति की रिपोर्ट में न्याय विभाग की ओर से दिए गए विवरणों के हवाले से बताया गया कि 2021 में उच्च न्यायालय के कालिजियम द्वारा दो सौ इक्यावन सिफारिशें की गई थीं। यह एक उदाहरण भर है। यह छिपा नहीं है कि देश के न्यायालयों और खासतौर पर निचली अदालतों में मुकदमों के अंबार और न्याय में देरी की क्या वजहें हैं। फिलहाल ऊपरी अदालतों में न्यायाधीशों की नियुक्ति और खाली पदों की समस्या का हल करने के लिए स्पष्ट पहलकदमी की जरूरत है। यों शुक्रवार को सुप्रीम कोर्ट को आश्वासन देते हुए केंद्र सरकार ने कहा है कि न्यायिक नियुक्तियों पर जो समय सीमा है, उसका पालन किया जाएगा और लंबित पड़े कालिजियम की सिफारिशों को जल्दी ही मंजूरी दे दी जाएगी। संसदीय समिति की चिंता के बाद अब केंद्र सरकार के रुख से उम्मीद की जानी चाहिए कि संबंधित पक्ष मिल कर इस मुद्दे का एक ठोस हल निकालेंगे।
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07 January 2023
प्रश्न–392 – (क) आस्था और भावना में क्या अंतर है? (100 शब्द)
(ख) ‘विश्वास की आवश्यकता‘ पर अपने विचार व्यक्त करें। (100 शब्द)
Question–392 – (a) What is the difference between faith and emotion? (100 words)
(b) Express your views on the ‘necessity of trust’. (100 words)
नोट : इसका उत्तर आपको हमें नहीं भेजना है, यह आपके स्वयं के अभ्यास के लिए है।
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Date:06-01-23
AI, This Won’t FlyAir India’s in-flight response & procedures in two international flight incidents raise disquieting questionsTOI Editorials
The egregiously behaved passenger, Shankar Mishra, aboard the now infamous Air India flight from New York to New Delhi is, as of now, an absconder from law. But it should have never come to a police hunt. As reported first by TOI, Mishra urinated on a fellow passenger, a senior citizen, during the flight and was allowed to get away by the crew. What Mishra did falls squarely within the parameters of unruly behaviour flagged in the aviation regulator DGCA’s rules issued in September 2017. They exist as even one unruly passenger can jeopardise safety on board. The regulator has rightly issued show cause notices to the relevant staffers in the airline, seeking an explanation for their lapse.
There are several disquieting aspects about the performance of the airline crew and AI. Both the crew and ground staff are expected to be trained to manage unruly passengers. Therefore, given Mishra’s in-flight conduct, he should have been dealt with on November 26, the day of the flight, not in early January. That he was allowed to walk away by the flight crew and ground staff of AI after reportedly reaching an “understanding” with the other passenger is irrelevant as far as the crew’s duties are concerned. They should have acted as per DGCA rules. What is worse is that in a December 6 international flight, AI crew also reportedly allowed an unruly passenger and the victim to strike bilateral agreements. In the November incident, the airline’s statement says a police complaint was filed later. There are several questions about the speed with which AI moved. Did the airline follow protocol or did it require escalation of the complaint to the company’s highest levels before action was initiated? That Mishra had the luxury of absconding to evade the arrest shows that AI’s procedural failures compounded its in-flight failures. The airline in a statement said the passenger has been placed on a 30-day no-fly list and the matter has been referred to an internal committee for investigation. That’s as per rules which also say if AI’s internal committee’s investigation overshoots 30 days, the no-fly categorisation will end. Let’s hope AI remembers that.
AI was in the news earlier for micromanaging its crew’s appearances. Most AI flyers would rather have a crew that can manage and report badly behaved passengers, never mind the crew’s hair styles. For Tatas, AI is an acquisition they need to manage very well – given the potential brand impact.
Date:06-01-23
Jolt From JoshimathGovts have finally woken up to a hill town being on the brink of an ecological disaster. But more needs to be doneTOI Editorials
Amid protests in Uttarakhand’s Joshimath over deepening cracks in houses, the district administration has halted road and power plant construction works in the town’s vicinity. There’s little doubt that aggressive construction in recent decades has brought the ancient town to this pass. Multi-storeyed buildings, blasting hills for a thermal power project tunnel and road building to accommodate more traffic have aggravated the condition of a town, already standing on weak foundations. From 1976 to 2022, multiple government committees sounded dire warnings to stop heavy construction activities – but all went unheeded.
The Garhwal division is among India’s most vulnerable regions. The 2013 Uttarakhand floods, and last year’s Chamoli disaster caused by a rock and ice avalanche that killed 200 people in Joshimath’s vicinity and damaged two hydel projects, foretell the devastation that the next Himalayan flood could wreak. But signals from governments, both state and Centre, suggest that big ticket highway and power projects, already underway for a decade or so, will continue. Surely, the frequent cave-ins and landslides marring these projects require changes in the development strategy, before it is too late.
Even the quality of environment impact assessment done to clear projects is sometimes in doubt. Manipur’s government decided to “revisit” the Imphal-Jiribam rail link’s EIA after a landslide during construction killed 60 persons in June last year. While Railways blamed shifting cultivation, others point fingers at extensive tunnelling through a landslide-prone zone. With ambitious timelines to meet, adequate assessment of landslide risks or proper preliminary structural engineering works to stabilise subsequent constructions suffer. Uttarakhand CM PS Dhami’s second term in office gives him the mandate to take tough eco-friendly measures. This may dampen economic growth and job creation, but dangers of a huge ecological disaster are increasing. For administrators in hilly and coastal regions, these are tough but necessary calls to make.
Date:06-01-23
Freedom in authorityThe Supreme Court is right in not adding to curbs on free speech, but leaders must value restraintEditorial
In a recent verdict, the Supreme Court has shown sound restraint while examining the issue of misuse of free speech, especially by political functionaries holding public office. It is to the credit of the Constitution Bench that it did not make any adventurous attempt to expand the scope of the restrictions already spelt out in the Constitution. The context being some rash and intemperate remarks by two ministers, one while serving in the Uttar Pradesh Cabinet and another in Kerala, there was some expectation that the court should carve out an additional restriction on public servants either by making the state vicariously liable for their remarks or by evolving a code of conduct enforceable by law. The four judges who signed off on the main opinion, as well as the fifth judge who wrote a separate one, correctly concluded that the specified grounds for reasonable restrictions in Article 19(2) are “exhaustive” and nothing further can be added by judicial fiat. The majority also declined to expand the notion of ‘collective responsibility’ to fix liability on the state for such remarks. Justice B.V. Nagarathna, writing a separate opinion, differed on this point, saying it is possible to attribute vicarious responsibility to the government if a minister’s view represents that of the government and is related to the affairs of the state. While the issue is largely academic, there have indeed been instances of courts taking note of individual ministers’ public remarks to transfer sensitive investigations to other agencies based on an apprehension of injustice if a police probe remained with the State concerned. Political leaders do need an occasional reminder that they should show utmost restraint, as their public utterances tend to get circulated and also influence their followers.
In the course of the discussion, the court has restated and clarified several principles, including that of constitutional tort, or a civil wrong that is actionable. The main opinion concludes that a mere statement by a minister that goes against an individual’s fundamental rights may not be actionable, but becomes actionable if it results in actual harm or loss. Justice Nagarathna, on the other hand, holds the view that there should be a proper legal framework to define acts and omissions that amount to ‘constitutional tort’. The court’s overall view that fundamental rights are enforceable even against private actors is indeed a welcome one. This largely settles the question of whether these rights are only ‘vertical’, that is, enforceable only against the state, or ‘horizontal’ too, that is enforceable by one person against another.
Date:06-01-23
A green promiseSmall enterprises can be the mainstay of the green economyEditorial
The Union Cabinet has cleared a ₹17,490-crore National Green Hydrogen (NGH) mission that aims to facilitate the production of hydrogen from renewable energy. Hydrogen is an essential industrial fuel that has a range of uses from producing ammonia, making steel and cement, to powering fuel cells that can run buses and cars. However, the cheapest way to manufacture this is to rely on fossil fuel such as coal and natural gas and this produces carbon emissions. The concerns over global warming and the gradual but steady embrace of alternative fuels have stoked the world’s interest in producing hydrogen from renewable energy sources such as solar and wind energy. This, however, is relatively expensive. It costs between $0.9 to $1.5 to produce a kilogramme of hydrogen from coal and anywhere from $3.5 to $5.5 per kg to produce it from renewable energy sources. Just as solar power tariffs in India have now dipped below that of coal power, the government hopes that ‘green hydrogen’, or that produced entirely from renewable energy, will also cost less than the current price to make hydrogen from fossil fuel sources. The NGH mission aims to create an enabling environment for the Indian industry to develop the infrastructure to produce and transport green hydrogen from certain nerve centres to production hubs where they can be used in various industrial applications. The NGH mission has committed to finance — the details are not yet available — the manufacturing of electrolysers, which use electricity to split water into hydrogen and oxygen. By 2030, the goal is to have at least 5 million metric tonnes of annual green hydrogen production, electrolyser capacity of 60-100 gigawatt and a 125-gigawatt renewable energy capacity for green hydrogen and its associated transmission network.
Green hydrogen, because of the entailed expenses, currently accounts for less than 1% of global hydrogen production and India’s aim is to become a global, industrial hub and exporter of such hydrogen. While this is a worthy ambition, India’s track record in becoming a high-technology manufacturing hub raises doubts on whether this is achievable by 2030. Despite policies, India has not managed to be a net exporter of solar cells, semiconductors or wind power components. This is because India’s underlying manufacturing base continues to be weak and unable to efficiently absorb and utilise global capital. For India to realise ambitions, it must strengthen its small manufacturing and allied enterprises infrastructure which, rather than large industries, will be the mainstay of any green economy.
Date:06-01-23
हमारा प्राचीन राजनीतिक-दर्शन किसी से कम नहीं थापवन के. वर्मा, ( लेखक, राजनयिक, पूर्व राज्यसभा सांसद )
हाल ही में दिल्ली में पदस्थ एक वरिष्ठ राजनयिक ने मुझसे कहा एक विदेशी विश्लेषक के लिए भारत में सबसे मुश्किल है यहां की राजनीति समझना। यहां इतने दल हैं, इतने समीकरण हैं, जातिगत फैक्टर आदि हैं, जो उनकी समझ से परे हैं। इसकी तुलना यूरोप से करें, जहां प्राचीनकाल से ही एक सुविचारित राजनीतिक-दर्शन विकसित किया गया था, मूलत: यूनान में। उन्होंने आश्चर्य जताया कि क्या भारत जैसी महान सभ्यता और दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में भी कभी राजनीतिक दर्शन की विकसित परम्पराएं रही होंगी? मैंने तुरंत उन्हें दुरुस्त किया कि यूरोपियन देशों में भी राजनीतिक अस्थिरता रही है, विशेषकर इटली में। लेकिन इससे भी बढ़कर यह कि प्राचीनकाल में भारत में एक बहुत ही परिष्कृत राजनीतिक-दर्शन था, जिसने हमारे संविधान और हमारे लोकतंत्र दोनों पर असर डाला है।
पोलिटिकल थ्योरी की दुनिया की सबसे पुरानी किताबों में से एक कौटिल्य का ‘अर्थशास्त्र’ भारत में लगभग 2500 साल पहले लिखी गई थी। यूरोपियनों ने कौटिल्य को भारत का मैकियावेली कहा है, जबकि मैकियावेली का जन्म कौटिल्य से कोई दो हजार साल बाद हुआ था। उसे यूरोप का कौटिल्य कहा जाना चाहिए! भारत में प्राचीनकाल में राजनीतिशास्त्र पर और भी कई महत्वपूर्ण ग्रंथ थे, जैसे ‘महाभारत’ का ‘शांतिपर्व’, ‘रामायण’ के कुछ अंश, ‘धर्मशास्त्र’, तिरुवल्लुर का ‘तिरुक्कुरल’ और बाद में गुप्तकाल में कमंडक का ‘नीतिसार’ और जैन विद्वान सोमदेव सूरी का ‘नीतिवाक्यमृत’। कौटिल्य ने यह भी लिखा है कि उनकी पुस्तक से पहले भी भारत में राजनीतिक-दर्शन की कम से कम पांच धाराएं प्रचलित थीं, जिनके लिए तेरह लेखकों ने योगदान दिया था।
प्राचीन भारत ‘ऋत’ में विश्वास करता था, जिसका अर्थ है व्यवस्था, नियम, धर्म और कानून का राज। ऋत का विलोम अराजकता है, जिसे जंगलराज की संज्ञा दी जा सकती है। ऐसी अवस्था को ‘मत्स्य न्याय’ कहा जाता था, जिसमें बलवान का बोलबाला होता है और बड़ी मछली छोटी को खा जाती है। राजा का धर्म था ऋत का पालन करवाना और अराजकता को टालना। एक अच्छा राज्य वह होता था, जिसमें ‘सप्तांग’ हों : राजा, मंत्रिपरिषद, राजधानी, क्षेत्र, राजकोष, सेना और विदेशी गठबंधन-सहयोगी। राजकाज के मुख्यतया दो आयाम थे और ऊपर-ऊपर से देखें तो दोनों एक-दूसरे से विपरीत मालूम होते थे, लेकिन उनमें तारतम्य था। पहला राज्य के हितों की रक्षा से सम्बद्ध था। वह राजा को शक्तिशाली बनाता और शत्रुओं को दूर रखता था। इसके लिए राज्यसत्ता का कठोर, निर्मम और नैतिकता से मुक्त होना जरूरी था, वह अपने हित में साम-दाम-दंड-भेद का उपयोग कर सकती थी। दूसरा आयाम इससे ठीक विपरीत था। यह सत्ता को नियंत्रित करने की बात करता था। यह कहता था कि शासक चाहे जितना शक्तिशाली हो, उसे वैधता प्रजा के समर्थन से ही मिलती है। उसके लिए यह जरूरी था कि वह प्रजा की धारणाओं के प्रति संवेदनशील हो और लोगों पर अतिशय कर न लगाए। कालिदास ने एक शासक के राजधर्म को परिभाषित करते हुए कहा है कि उसके लिए लोककल्याण के लिए काम करना अपरिहार्य है। उसे अपने मंत्रियों का चयन भी उनके गुणों के आधार पर करना चाहिए। वहीं मंत्रियों से भी यह अपेक्षा थी कि वे बिना किसी डर-संकोच के अपने विचारों को सामने रखें।
‘अर्थशास्त्र’ दो टूक शब्दों में कहता है कि प्रजा के हितों के विरुद्ध कार्य करना अधर्म है।‘महाभारत’ में तो अत्याचारी शासक के विरुद्ध विद्रोह की भी अनुमति दी गई है। साथ ही कहा गया है कि अगर उत्तराधिकारी योग्य न हो तो उसे सिंहासन पर आरूढ़ नहीं होना चाहिए। ‘अर्थशास्त्र’ में प्रशासनिक संरचनाओं, वित्त व्यवस्था, सेना और विदेश नीति के बारे में भी निर्देश हैं। इनमें से अनेक सिद्धांत आज भी प्रासंगिक हैं। लेकिन मेरे विदेशी मित्र भला इस सबको कैसे जानते? ‘अर्थशास्त्र’ छठी शताब्दी में नष्ट हो गया था और 1905 में मैसूर में ताड़ के पत्तों की एक पांडुलिपि से पुन: प्राप्त हुआ था। इसकी तुलना में यूरोपियन राजनीतिक चिंतकों की किताबें बड़ी संख्या में प्रकाशित हुईं और पूरी दुनिया में पढ़ी गईं। विडम्बना यह है कि आज भी भारत में हमारे राजनीतिक चिंतन की विरासत पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाता, उन पर न के बराबर अकादमिक शोध होते हैं और हमारे राजनेताओं की भी उनमें कोई दिलचस्पी नहीं रह गई है। विडम्बना है कि आज भी भारत में हमारे राजनीतिक चिंतन की विरासत पर ज्यादा ध्यान नहीं दिया जाता, उन पर न के बराबर अकादमिक शोध होते हैं और हमारे राजनेताओं की भी उनमें कोई दिलचस्पी नहीं रह गई है।
Date:06-01-23
हरित ऊर्जासंपादकीय
कार्बन उत्सर्जन पर काबू पाने के मकसद से दुनिया भर में ऊर्जा के वैकल्पिक स्त्रोतो पर बल दिया जा रहा है इस संदर्भ में भारत पहले ही सौर ऊर्जा जैसे वैकल्पिक स्रोतों का इस्तेमाल शुरू कर चुका है।इसी कड़ी में हाइड्रोजन मिशन को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने मंजूरी दे दी है। इसके तहत पचास लाख टन हरित हाइड्रोजन उत्पादन का लक्ष्य रखा गया है। इसका उपयोग ईंधन के रूप में वाहनों और इस्पात तथा तेल शोधन संयंत्रों में किया जाएगा। हाइड्रोजन के उपयोग से कार्बन उत्सर्जन नहीं होता। स्वाभाविक ही इसे बढ़ावा मिलने से कार्बन उत्सर्जन में काफी कमी लाई जा सकेगी। जलवायु परिवर्तन के खतरों को ध्यान में रखते हुए तमाम देशों से अपने यहां कार्बन उत्सर्जन में कटौती करने को कहा जा रहा है। इस बार के जलवायु सम्मेलन में तो कार्बन उत्सर्जन के अनुपात में मुआवजे के प्रावधान पर भी सहमति बनी है। ऐसे में हरित हाइड्रोजन के उपयोग से कार्बन पर काबू पाने में काफी मदद मिलेगी। फिर हाइड्रोजन मिशन में आठ लाख करोड़ रुपए से अधिक निवेश का अनुमान लगाया जा रहा है। 2030 तक सवा लाख मेगावाट नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता वृद्धि का अनुमान है। इस मिशन के तहत छह लाख तक नए रोजगार सृजित होने की संभावना भी है।
भारत में कुल ऊर्जा खपत की करीब अस्सी फीसद बिजली कोयले से पैदा होती है। इससे कार्बन उत्सर्जन सबसे अधिक होता है। इसलिए बिजली की खपत कम करने और इसके वैकल्पिक स्रोतों पर ध्यान देने पर जोर दिया जाता है। इस संबंध में सौर ऊर्जा उत्पादन का विशाल तंत्र विकसित किया जा रहा है। इसके लिए दुनिया के तमाम देशों से करार भी किया गया है। इस तरह नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन में हरित हाइड्रोजन बड़ा सहभागी साबित होगा। इसी तरह तेल शोधन और इस्पात शोधन संयंत्रों से कार्बन उत्सर्जन बहुत होता है। इनमें हरित हाइड्रोजन के इस्तेमाल से इस पर काफी हद तक रोक लगाई जा सकेगी। फिर, जलवायु परिवर्तन के साथ-साथ पूरी दुनिया में यह चिंता पैदा हो गई है कि जैव ईंधन के भंडार पर बहुत लंबे समय तक निर्भर नहीं रहा जा सकता। जिस तरह औद्योगिक इकाइयों में बढ़ोतरी हो रही है, सड़कों पर वाहन बढ़ रहे हैं और हर काम-धंधा बिजली पर निर्भर होता जा रहा है, उसमें जैव ईंधन और बिजली संबंधी आवश्यकताओं की पूर्ति चुनौती बनती जा रही है। इसलिए तेल संबंधी जरूरतों को कम करने के लिए सौर ऊर्जा चालित वाहनों का चलन बढ़ रहा है। जैव ईंधन में एथेनाल आदि मिला कर बाहरी देशों पर ईंधन की निर्भरता घटाने की कोशिश की जा रही है।
हरित हाइड्रोजन का उत्पादन चूंकि पानी में से आक्सीजन और हाइड्रोजन को अलग करके किया जाता है, इसलिए भारत को इसके लिए अधिक संसाधन जुटाने की भी आवश्यकता नहीं है। जिस तरह पूरे साल यहां सूरज की रोशनी मिलती है, जिससे सौर ऊर्जा का उत्पादन आसान है, उसी तरह हरित हाइड्रोजन के लिए भी पर्याप्त जल भंडार है। इस तरह भारत इस मिशन के जरिए न सिर्फ अपनी जरूर की स्वच्छ ऊर्जा पैदा कर सकता, बल्कि दूसरे देशों को भी उपलब्ध करा सकता है। जिस तरह सौर ऊर्जा मिशन के लिए दुनिया के तमाम देशों ने भारत से हाथ मिलाया, उसी तरह हरित हाइड्रोजन उत्पादन में भी निवेश की स्वाभाविक अपेक्षा की जाती है। जाहिर है, इससे 2030 तक कार्बन उत्सर्जन में कटौती के अपने लक्ष्यों तक पहुंचने में भी आसानी होगी।
Date:06-01-23
अभिव्यक्ति पर रोक नहींसंपादकीय
सर्वोच्च अदालत ने पिछले मंगलवार को नागरिकों की संविधान प्रदत्त अभिव्यक्ति की आजादी के मामले में अहम फैसला सुनाया है।न्यायमूर्ति एस.ए. नजीर की अगुवाई वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने बहुमत फैसले में कहा कि अभिव्यक्ति की आजादी पर अब और पाबंदी लगाने की जरूरत नहीं है क्योंकि पहले से ही संविधान के अनुच्छेद 19 (2) के प्रावधानों के तहत पाबंदियां लगी हुई हैं। इस प्रावधान में आठ परिस्थितियों का उल्लेख किया गया है, जब अभिव्यक्ति की आजादी को प्रतिबंधित किया जा सकता है। भारत की संप्रभुता और अखंडता को खतरा, सार्वजनिक व्यवस्था खराब होने का खतरा, अदालत की अवमानना, किसी की मानहानि हो, शिष्टाचार या सदाचार के हित खराब हों या अपराध को बढ़ावा मिलता हो जैसी परिस्थितियों में से किसी एक को भी अगर किसी के शब्द या बात से खतरा होता है तो नागरिकों की बोलने की आजादी को प्रतिबंधित किया जा सकता है। शीर्ष अदालत ने यह भी स्पष्ट कर दिया कि सार्वजनिक पद पर बैठे किसी मंत्री, सांसद या विधायक को अभिव्यक्ति की उतनी ही आजादी है, जितनी कि किसी अन्य नागरिक को है। लिहाजा उनके बोलने पर भी किसी तरह की रोक नहीं लगाई जा सकती है और न ही उनके किसी विचार को सरकार का विचार माना जा सकता है। हालांकि सरकार में सामूहिकता का सिद्धांत लागू है, इसलिए बहुत से लोग यह उम्मीद लगाए हुए थे कि सत्ता प्रतिष्ठान या सार्वजनिक पदों पर बैठे मंत्रियों के घृणा – भाषणों को प्रतिबंधित किया जाएगा। उन्हें इस फैसले से निराशा हुई होगी। दरअसल, यह पूरा मामला 2016 के बुलंदशहर गैंगरेप केस में यूपी के तब के मंत्री आजम खान के बयान से शुरू हुआ था। खान ने इस मामले को राजनीतिक साजिश कहकर विवादास्पद बना दिया था। इस मसले पर संविधान पीठ में शामिल न्यायमूर्ति वी. नागरत्ना का रुख अलग रहा। उन्होंने मंत्रियों के घृणा- भाषणों को खतरनाक माना लेकिन इस बारे में कोई नया कानून बनाने का दिशा- निर्देश नहीं दिया। लोगों को याद होगा कि पिछले वर्ष जून में भाजपा प्रवक्ता नूपुर शर्मा के बयान से कितना विवाद हुआ था। इस पूरे मसले पर शीर्ष अदालत फैसला विवेकपूर्ण है। न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका अ संविधान द्वारा निर्धारित लक्ष्मणरेखा का पालन करें तो लोकतंत्र और मजबूत होगा ।
Date:06-01-23
दुनिया को बचाना हैसंपादकीय
पर्यावरण को सुरक्षित रखने और ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन घटाने के लिए भारत ने गंभीरता से कदम बढ़ा दिए हैं। यह हमारी आने वाली पीढ़ियों के लिए बहुत बेहतर साबित होगा। दुनिया के पर्यावरण को बचाने की भारत की प्रतिबद्धता को ठोस रूप देने के लिए केंद्रीय मंत्रिमंडल ने राष्ट्रीय ग्रीन हाइड्रोजन मिशन को मंजूरी दी है। इसके तहत सरकार की कार्बन उत्सर्जन में भारी कमी लाने की योजना है। ग्रीन हाइड्रोजन को बढ़ावा देने के लिए 174.9 अरब रुपये की अत्यंत महत्वाकांक्षी प्रोत्साहन योजना को मंजूरी दी गई है। मिशन के अंतर्गत भारत को ऊर्जा स्वतंत्र बनाने, अर्थव्यवस्था के प्रमुख क्षेत्रों को कार्बन मुक्त करने, और वैकल्पिक ईंधन और इसके डेरिवेटिव के उत्पादन, उपयोग और निर्यात के लिए एक वैश्विक केंद्र में बदलने का लक्ष्य निर्धारित किया गया है। इस मिशन के लिए 19,744 करोड़ रुपये की प्रोत्साहन योजना को मंजूरी दी गई है। मिशन के तहत भारत के 2030 तक 50 लाख टन हाइड्रोजन उत्पादन क्षमता का लक्ष्य हासिल कर लेने की उम्मीद है। ग्रीन हाइड्रोजन एक तरह की स्वच्छ ऊर्जा है, जिसे नवीकरणीय ऊर्जा की मदद से इलेक्ट्रोलिसिस के जरिए बनाया जाता है। राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन की योजना 13,000 करोड़ रुपये के हरित हाइड्रोजन निर्माण के लिए प्रत्यक्ष प्रोत्साहन देने की है। मिशन का नेतृत्व कैबिनेट सचिव और सचिवों का एक अधिकार प्राप्त समूह करेगा। मिशन के तहत छह लाख से ज्यादा नौकरियों के अवसर पैदा होने के आसार हैं। इस मिशन से कच्चा तेल, कोयला आदि के आयात में एक लाख करोड़ रुपये तक की बचत होने का अनुमान है। इसके अलावा ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन में पांच करोड़ टन तक की कमी आएगी। इस मिशन का मकसद पेट्रोल-डीजल जैसे ईंधन पर देश की निर्भरता खत्म करते हुए देश को स्वच्छ ऊर्जा के उत्पादन का केंद्र बनाना है । देखा जाए तो भारत में प्रति व्यक्ति कार्बन उत्सर्जन दर दुनिया के अनेक देशों से बहुत कम है। इसे देखते हुए भारत ने अपने नेट जीरो उत्सर्जन लक्ष्य हासिल करने की सीमा 2070 तक कर दी है और ऐसा माना जा रहा है। कि वर्ष 2070 तक नेट जीरो कार्बन उत्सर्जन का लक्ष्य हासिल करने में ग्रीन हाइड्रोजन मिशन बड़ी मदद करेगा।
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हमारे देश में विदेशी पर्यटकों के साथ होने वाले तरह-तरह के अपराधों की सुचनाएं मिलती ही रहती हैं। अगर राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरों के आंकड़ों पर नजर डालें, तो भले ही वर्ष दर वर्ष इनका प्रतिशत घटता दिखाई देता है, लेकिन इसके पीछे अनेक कारण हो सकते हैं –
– महामारी के कारण पर्यटकों की संख्या का कम होना या
– अपराध का पंजीकरण न होना।
इसका यह अर्थ कदापि नहीं लगाया जा सकता है कि देश में विदेशियों के प्रति होने वाले अपराधों में कमी आ गई है। ऐसे अपराध वैश्विक स्तर पर देश की छवि को धूमिल करते हैं। आर्थिक नुकसान भी पहुँचाते हैं। कुछ आंकड़े –
इस हेतु पर्यटन मंत्रालय ने पुलिस रिसर्च एण्ड डेवलपमेंट ब्यूरो के साथ मिलकर पर्यटकों के लिए पुलिस के विचार को साकार करने की योजना तैयार की है। कुछ बिंदु –
इसके अलावा भी जरूरी है कि विदेशी पर्यटकों के मन में भारत-भ्रमण को लेकर एक प्रकार की सुरक्षा का भाव भर दिया जाए, जिससे कि वे भारत आने में न हिचकें, और जब देश छोड़कर जाएं तो अच्छी छवि लेकर जाएं। पर्यटकों का भारत आगमन थोड़े समय के लिए होता है। इसलिए यह भी जरूरी है कि इनसे जुड़े अपराधों के लिए फास्ट ट्रैक कोर्ट बनाए जाएँ। इससे भारत की छवि और भी बेहतर हो सकती है।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित एम.पी. नथेनल के लेख पर आधारित। 8 दिसबंर, 2022
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Date:05-01-23
How Free Now?SC did well to warn against further restrictions on free speech. But misuse of IPC provisions needs checking tooTOI Editorials
In a judgment that helps clarify free speech’s many dimensions, a Supreme Court constitution bench has ruled that no more reasonable restrictions can be envisaged other than the eight already listed under Article 19(2). These are sovereignty and integrity of India, security of the state, friendly relations with foreign states, public order, decency or morality, contempt of court, defamation, and incitement to an offence. The implication is that if the state were to bring a law curbing free speech on grounds of public interest that cannot be located within these eight “reasonable restrictions” it can be struck down.
Additionally, the 4-1 ruling also reiterated that rights under Articles 19(1) (free speech) and 21 (right to life and personal liberty) can be enforced against private entities and the state is bound to protect these rights, even when they are infringed by non-state actors. This is an important reminder from SC. Many ordinary citizens find their ways of life, privacy, choices and liberties constrained by dominant groups. It is a cue for officers of the state to proceed against those vigilantes, many of whom are politicians, who muzzle others’ rights.
The majority verdict may have disappointed those hoping that ministers making outrageous, often hurtful, statements would be sanctioned. But SC was clear that individual statements of ministers were inadequate to invoke collective responsibility of cabinet, terming it impractical too when a PM or a CM is politically weak and/or head coalitions. Moreover, violation of constitutional rights and invoking constitutional tort for securing damages happens only when the statement resulted in harm or losses to the complainant.
Despite this conclusion, which is quite logical too, both the majority and the minority verdicts – the latter by Justice BV Nagarathna – uphold free speech emphatically. However, what judicial pronouncements aren’t able to fix is misuse of IPC provisions drawing their constitutionality from Article 19(2)’s reasonable restrictions. Anyone claiming that their sentiment has been hurt – reasons can be religion, caste, or even criticism of a politician or an officeholder – can lodge police complaints. They and cops should heed the majority judgment’s sagacious words: “The emphasis even in the Preamble on ‘fraternity’ is an indication that survival of all fundamental rights and survival of democracy itself depends upon mutual respect, accommodation and willingness to coexist in peace and tranquillity on the part of citizens. ”
Date:05-01-23
We Can’t Talk Green, Walk DegradationRethink the draft Regional Plan 2041ET Editorials
The lack of protection given to the Aravalli Range in the draft Regional Plan 2041 prepared by the National Capital Region (NCR) Planning Board under the urban development ministry is worrisome. The exclusion of the Aravallis from areas demarcated as ‘natural zones’ or areas earmarkedfor conservation will give a free run to construction and mining in the range. This will have adverse implications for the NCR. GoI should reconsider this lax approach.
The 550 km-long Aravalli range is a fragile biodiversityrich ecosystem. It is the NCR’s only water and air recharge zone. The range acts as a natural barrier against the encroachment of the Thar desert, a protection against sandstorms, and sustains the region’s water levels. Their continued degradation also contributes to the NCR’s increased air pollution, water stress from falling water levels, and desertification. Rather than approve a masterplan that gives a free run to construction and mining that will exacerbate air pollution, water stress and the destruction of species, the NCR Planning Board should revisit its plan. It must engage with experts and all stakeholders to develop one that is sustainable. It makes no sense to cut off one’s nose to spite one’s face.
At COP15 to the Convention on Biological Diversity in Montreal, India and 190-odd countries agreed to set targets to halt and reverse biodiversity loss. The draft Regional Plan 2041 certainly goes against this agreement. India must not be seen as promising something and doing something else. Most importantly, to ignore conservationary measures is to hurt ourselves. India’s domestic systems must be rigorous to ensure robust ecosystem protection. Policymakers must recognise that environmental protection is not inimical to economic growth and development. Rather, the degradation of the environment undermines growth and development as it undermines ecosystem services critical to sustaining life, such as ensuring clean air and maintaining water systems. Nature is an asset with economic value. Ergo, it must be protected.
Date:05-01-23
The values of local self-governanceDebates on federalism should include larger discussions on how power should be divided and shared between governments at the Union, State, and local levelMathew Idiculla is a legal consultant and a visiting faculty at Azim Premji University, Bengaluru
In December 1992, Parliament passed the 73rd and 74th constitutional amendments, which instituted panchayats and municipalities, respectively. These amendments mandated that State governments constitute panchayats (at the village, block and district levels) and municipalities (in the form of municipal corporations, municipal councils and nagar panchayats) in every region. They sought to institute a third-tier of governance in the federal framework through the devolution of functions, funds, and functionaries to local governments.
Since local governments seldom derive their authority directly from the Constitution, India’s constitutional reforms for decentralisation are exceptional. But despite these reforms, municipal governments are often seen to be ineffective in addressing even the most basic needs of citizens, such as reliable water supply and walkable footpaths. Urban residents tend to blame “corrupt” local politicians for these civic woes.
However, as we celebrate the 30th anniversary of these reforms, it is important to ask fundamental questions: Why should local governments be empowered? Why are they weak despite constitutional reforms? How can the idea of local self-governance be revived?
The normative basis of local self-governance
Understanding the normative basis of local self-governance is important since this also informs the institutional form local governments take. Local self-governance is linked to the idea of subsidiarity and is typically grounded on two broad arguments. First, it provides for efficient provision of public goods since governments with smaller jurisdictions can provide services as per the preferences of their residents. Second, it promotes deeper democracy since governments that are closer to the people allow citizens to engage with public affairs more easily.
India’s decentralisation agenda is also arguably driven by these values. The 73rd and 74th amendments require States to vest panchayats and municipalities with the authority “to enable them to function as institutions of self-government”, including the powers to prepare and implement plans and schemes for economic development and social justice. They also mandate the regular conduct of local elections, provide for the reservation of seats for Scheduled Castes, Schedules Tribes and women in local councils, and institute participative forums like gram sabhas in panchayats and ward committees in municipal corporations. Hence, the core values that the amendments sought to entrench are that of deepening local democracy and devolving functions for meeting the ends of economic development and social justice. Debates on the role and responsibilities of local governments should be foregrounded by these normative values which have found expression, at least in some regard, in the Constitution.
Despite the constitutional promise of local self-governance, local governments, especially municipalities, operate with limited autonomy and authority. Their frailty may be attributed to the inherent limitations of the 74th amendment and the failure of State governments and courts to implement and interpret the amendment in letter and spirit. Limitations include the discretion given to the States regarding devolution of powers and levying of local taxes. State governments are reluctant to implement the 74th amendment as cities are economic powerhouses and controlling urban land is important for financing State governments and political parties.
The courts have also mostly interpreted the 74th amendment narrowly, allowing State governments to retain their control over cities. In this context, the Patna High Court’s recent order declaring some provisions of the Bihar Municipal (Amendment) Act, 2021 as unconstitutional is path-breaking. The 2021 amendment had transferred the powers of appointment of Grade C and D employees of municipalities from the Empowered Standing Committee of the municipality to the State government-controlled Directorate of Municipal Administration. The court held that these provisions violate the 74th Amendment since the recentralization of power and the weakening of self-governance “are incompatible with the idea, intent and design of the constitutional amendment”.
Local governments and federalism
This judgment is unprecedented since it tested State municipal laws against the letter and spirit of the 74th Amendment and can potentially reset the position of local governments in India’s federal framework. As India is undergoing a centralising shift in its politics, economy, and culture, there’s also been a renewed assertion of federalism. However, this assertion of State rights is hardly articulated as value-based normative claims. If we unpack the intellectual arguments for federalism, many of them are also applicable for local self-governance. Hence, debates on federalism should include larger discussions on how power should be divided and shared between governments at the Union, State, and local level since local governments are, normatively and structurally, an integral part of the federal framework of the Constitution.
Date:05-01-23
शब्दों की परिभाषा बदलने से फैसलों पर भ्रम होता हैसंपादकीय
संविधान के अनुच्छेद 124 में राष्ट्रपति द्वारा सीजेआई से सलाह (कंसल्टेशन) लेकर जजों की नियुक्ति करने का प्रावधान है। सुप्रीम कोर्ट ने सन् 1981 में प्रथम जजेस (नियुक्ति में वरीयता किसकी ? सरकार की या सीजेआई की) केस में कहा था कि सलाह यानी सहमति (कोन्करेंस) नहीं है। लेकिन सन् 1993 में द्वितीय जजेस केस में नौ सदस्यीय संविधान पीठ ने कहा ‘यहां इस शब्द का मतलब सहमति है यानी सरकार को नियुक्ति करने में सीजेआई (कॉलेजियम जिसे इसी फैसले से अस्तित्व मिला) की सहमति अनिवार्य होगी। तब से आज इस कोर्ट ने इस मुद्दे पर सलाह यानी सहमति माना, हालांकि संविधान सभा में इस राय को (सलाह की जगह सहमति शब्द रखा जाए) खारिज कर दिया था। अब एक पांच सदस्यीय पीठ ने नोटबंदी के मामले में आरबीआई एक्ट की धारा 26 (ब) में प्रयुक्त शब्द संस्तुति (रिकमेन्डेशन) की नई परिभाषा दी। इस बेंच के अनुसार संस्तुति यानी सलाहकारी प्रक्रिया (या सलाह) बताया है। प्रश्न है जब जजेस की नियुक्ति की शक्तियों की बात होती है। तो कैसे सलाह बाध्यकारी हो जाती है पर उसी कानून में प्रयुक्त ‘संस्तुति’ सरीखे शब्द को उसी कोर्ट की एक छोटी संविधान पीठ सरकार के लिए बाध्यकारी नहीं मानती और एक नई परिभाषा देती है? इससे भी ज्यादा भ्रम तब पैदा होता है जब उसी बेंच की एक जज, जो बहुमत की राय से इत्तेफाक नहीं रखतीं, ने पूरी नोटबंदी की प्रक्रिया महज एक दिन में पूरा करना गलत माना है। बहुमत फैसला कहता है कि नोटबंदी के निर्णय पर पहुंचने के पहले छह माह आरबीआई से विमर्श चला। शब्दों के मायने और उससे उपजे सत्य इतने विरोधाभासी कैसे हो सकते हैं?
Date:05-01-23
नैनो उर्वरकों के फायदेसंपादकीय
नैनो यूरिया की सफलता के बाद, अब दूसरे सबसे अधिक खपत वाले उर्वरक डीएपी (डाई अमोनियम फॉस्फेट) के नैनो संस्करण को जैव सुरक्षा और विषाक्तता परीक्षणों में मंजूरी मिल गई है और इसके साथ ही अगले खरीफ सत्र में इसे खेतों में इस्तेमाल करने की औपचारिक स्वीकृति का मार्ग भी प्रशस्त हो गया है। ये नवाचारी और स्वदेशी तौर पर विकसित तरल उर्वरक फसलों के जरूरी पोषण के लिए किए जाने वाले आयात और सरकारी सब्सिडी के क्षेत्र में बड़ा बदलाव लाने वाले साबित हो सकते हैं। हकीकत तो यह है कि हमारा देश अगले कुछ वर्षों में उर्वरकों के क्षेत्र में आत्मनिर्भर होने के बारे में भी सोच सकता है क्योंकि तब तक उन उर्वरकों का नैनो संस्करण भी तैयार हो जाएगा जो फिलहाल परीक्षण के दौर से गुजर रहे हैं। इससे उर्वरक सब्सिडी के लिए किया जाने वाला आवंटन पूरी तरह तो समाप्त नहीं होगा लेकिन फिर भी उसमें काफी कमी आएगी। गौरतलब है कि इस वर्ष यह सब्सिडी बढ़कर 2.3 लाख करोड़ रुपये होने का अनुमान है जो अब तक का उच्चतम स्तर है। यह बढ़ोतरी इसलिए कि यूक्रेन-रूस संघर्ष के बाद उर्वरकों की अंतरराष्ट्रीय कीमतों में तेजी से इजाफा हुआ है। यहां तक कि गत वित्त वर्ष के दौरान भी उर्वरक सब्सिडी का बिल करीब 1.6 लाख करोड़ रुपये रहा था। सरकार को अक्सर संसद से पूरक वित्तीय अनुदान लेना पड़ता है ताकि वह बढ़ते उर्वरक सब्सिडी बिल की भरपाई कर सके। अन्यथा उस बकाये को अगले वित्त वर्ष के लिए बढ़ा दिया जाता है। इससे उर्वरक उद्योग में नकदी का भीषण संकट व्याप्त हो जाता है।
महत्त्वपूर्ण बात यह है कि देश में अब तक वाणिज्यिक रूप से इस्तेमाल किए जा रहे हाई-टेक नैनो उर्वरक न केवल सामान्य उर्वरकों की तुलना में काफी सस्ते और प्रभावी हैं बल्कि उनके अलावा भी कई लाभ हैं। उनका पोषण इस्तेमाल अधिक किफायती होता है और वे मिट्टी की उर्वरता में सुधार करके उपज और फसल गुणवत्ता में सुधार कर सकते हैं। उदाहरण के लिए खेतों में परीक्षण के दौरान नैनो यूरिया को 80 फीसदी तक किफायती पाया गया जो पारंपरिक यूरिया की तुलना में दोगुना है। अनुमान है कि इसके इस्तेमाल से उपज में तीन से 16 फीसदी का इजाफा हुआ यानी किसानों को प्रति एकड़ करीब 2,400 रुपये से 5,700 रुपये का फायदा हुआ। नैनो यूरिया की एक बोतल में 500 मिलीलीटर तरल उर्वरक होता है और इसकी कीमत 240 रुपये है। यह कीमत भारी सब्सिडी पर मिलने वाले यूरिया के 45 किलो के बैग की तुलना में काफी कम है जबकि दोनों में समान मात्रा में नाइट्रोजन है। नैनो-डीएपी की कीमत 600 रुपये प्रति बोतल रहेगी जो सामान्य डीएपी के 50 किलो के बैग के बराबर होगी। इस 50 किलो के बैग के लिए किसानों को 1,350 रुपये चुकाने होते हैं वह भी 2,000 रुपये से अधिक की भारी सब्सिडी के बाद। इसके अलावा नैनो उर्वरक तरल स्वरूप में होने के कारण छोटी बोतलों में आ जाते हैं जिन्हें लाना-ले जाना आसान होता है। इससे किसानों को भारी भरकम बोरियों की ढुलाई में लगने वाली लागत से बचाव होता है। ऐसे में ये उर्वरक फसल उत्पादन की लागत कम करने में मदद करेंगे और खेती का मुनाफा बढ़ाएंगे।
नैनो उर्वरकों का एक और लाभ जिसकी ज्यादा चर्चा नहीं होती है वह यह है कि पारंपरिक उर्वरकों की तुलना में ये पर्यावरण को बहुत कम हानि पहुंचाते हैं। पारंपरिक उर्वरक हवा, मिट्टी और पानी तीनों को प्रदूषित करते हैं। चूंकि ये विषाक्त नहीं होते और स्वास्थ्य एवं प्राकृतिक जैव विविधता को नुकसान नहीं पहुंचाते इसलिए ये उर्वरक कृषि क्षेत्र के ग्रीनहाउस उत्सर्जन में भी काफी कमी लाते हैं। पारंपरिक उर्वरकों की तुलना में नैनो उर्वरकों के इन तमाम सकारात्मक पहलुओं को देखते हुए कहा जा सकता है कि इनको बढ़ावा देने की आवश्यकता है। इनके लाभ इतने अधिक हैं कि ये सभी अंशधारकों के लिए लाभदायक साबित होंगे। खासतौर पर किसानों के लिए जिन्हें कच्चे माल में बचत होगी और सरकार को भी उर्वरकों पर कम सब्सिडी का बोझ उठाना होगा।
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भारत में अच्छी गुणवत्ता वाले रोजगार की बहुत कमी है। इसका कारण हमारे पास समय पर उपलब्ध होने वाले विश्वनीय डेटा का अभाव है। अगर इसके विस्तार में जाएं, तो हमें बड़े पैमाने पर दो डेटासेट मिलते हैं।
(1) एक तो सरकार द्वारा प्रदत्त त्रैमासिक शहरी आवधिक श्रमबल सर्वेक्षण और (2) दूसरा सेंटर फॉर मॉनिटरिंग द इंडियन इकॉनमीज़ कंज्यूमर पिरामिड्स हाउसहोल्ड सर्वे है। इनसे मिले आंकड़ों पर आधारित कुछ बिंदु –
सरकार की अग्निपथ सैनिक भर्ती योजना में आए आवेदनों की भरमार से पता चलता है कि भारत का युवा अच्छे रोजगार को पाने के लिए कितना उत्सुक और बेचैन है। अतः सरकार, निजी क्षेत्र और नागरिक समाज को आगे बढ़कर कोई धारणीय तरीका खोजना चाहिए। इस मामले में भारत को अन्य राष्ट्रों से कदमताल करके चलना होगा।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित रघुराम राजन, रोहित लांबा और राहुल चौहान के लेख पर आधारित। 7 दिसंबर, 2022
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Date:04-01-23
High Growth…But Do MoreIndia’s humming economy isn’t yet helping much of its low-income citizens, who need the education deficit bridged and policies that promote job-creation.Raghuram Rajan is a professor at the University of Chicago,Rohit Lamba is an assistant professor at Pennsylvania State University and Rahul Chauhan is a research scholar.
Is this the best of times or the worst of times in India? For many readers of this newspaper, it is the former. By contrast, lower-middleclass households, already on the edge because of the pre-pandemic economic slowdown, have been forced by the pandemic into selling property and borrowing for consumption.
With jobs scarce even as the economy recovers, and children falling behind in schools because of learning losses during the pandemic, the lived experience of the low-income household, their rozmarra ki zindagi , has been worsening steadily over the last few years. You would not know any of this from business commentary or government. But it is there in the data.
Who’s buying, borrowing, selling?
Start with demand. One proxy for wellbeing of the lower-middle-class, especially urban dwellers, is the sale of new two-wheelers. Data from SIAM shows that domestic two-wheeler sales have fallen by 36% since 2018-19 and are now back at 2012-13 levels. In contrast, sales of domestic passenger cars, typically bought by upper-middle-class households, fell only by 9% over the same period. And luxury car maker, Mercedes Benz, reported a 64% increase in sales in the first nine months of 2022 over 2021, and expects to match or surpass its 2018-19 sales record. Clearly, lower the income of the household, the more severely demand has been impacted.
If indeed poorer households are stressed, we should see them borrowing to support consumption. Even lowincome households have gold jewellery they can pawn. RBI’s monthly bulletin indicates that commercial bank loans against gold jewellery increased by a huge 218% between February 2019 and August 2022. Indeed, household borrowing other than for housing, vehicles, securities, or education increased by 80% over this period, suggesting households across the board were borrowingto support consumption.
Those who cannot borrow sell. For farmers, this means land sales. According to the National Family Health Survey, average land holdings were 22% lower in the latest round (2019-21) compared to the 2015-16 round. For households in the lowest wealth quintile, land holdings shrunk by 8. 5% annually since the previous round, even though the land holdings of this quintile were growing between 2% to 5% per annum in the surveys between 2004-05 and 2015-16. The poorest landowners seem to be engaged in substantial distress sales in recent years.
The good and the not so good
Could poorer rural households be selling out and moving to better opportunities in the cities? Probably not, because labour share in agriculture has increased over the last few years, in contrast to the steadily shrinking share before that – India is simply not creating enough jobs in manufacturing and services. Indeed, the demand for “last resort” MGNREGA jobs has increased from 1. 64 crore in 2015 to 3. 07 crore in 2022, completing thegrim picture in rural areas.
To be sure, there have been areas of substantial progress over the last few years.
● Large corporations have cleaned up their balance sheets, as have banks (though it remains to be seen how much of the pandemic-related distress has been recognised).
● As global supply chains look for alternative suppliers outside China, India could benefit.
● And Indian services exports may grow significantly as new technologies to provide servicesat a distance have emerged.
Accept that there’s a problem
Yet to really make this India’s moment, we cannot delude ourselves. Even though we have had quarters of spectacular growth during the pandemic, they followed quarters of dreadful decline. In reality, last quarter’s GDP numbers suggest we have grown about 2. 5% per year since 2019, way below our prepandemic rate of about 5%. Among large economies, we are among the furthest below the level to which we should have grown in the absence of the pandemic.
The fact that a significant part of our economy is still distressed may account for this underperformance. Indeed, corporate titans seem to recognise the drags on our economy, for their tepid investment simply does not live up to their cheery pronouncements.
Where do we go from here? Start by recognising that all is not well. With the global economy slowing this year, we will be even more reliant on domestic demand. Government infrastructure spending is good but not enough. Unfortunately, the still-healthy demand of our rich disproportionately falls on foreign goods while the spending power of the rest is impaired.
The solution is not more tariffs, which will make India a costlier place to do business and ensure global producers think twice about producing in India. Instead, our approach should be two-pronged.
● First, limit the long-term consequences of the damage already done, for instance, by ensuring children in government schools have access to remedial tutoring so that they can make up for learning losses.
● Second, implement bold reforms on the business environment and tariffs so that both foreign and domestic investment pick up to create jobs.
Only with more high-quality jobs will we restore health to the lower-middleclass, without which we cannot achieve our collective dream of prosperity.
Date:04-01-23
Takes GoI & RBI To Policy TangoCentral bank autonomy is a destinationET Editorials
At the heart of the argument for central bank ‘independence’ — an issue relatively lost in the melee after Monday’s Supreme Court 4:1 verdict upholding GoI’s 2016 demonetisation decision — lies the Phillips curve: the relationship between inflation, which central bankers are mandated to control, and employment, a job best left to governments. But a neat division of responsibilities is almost impossible to accomplish primarily because monetary and fiscal policies must work in harmony, which they rarely do. There are also questions over the efficacy of central bank actions over various parts of the business cycle — using cheap credit to revive demand is a bit like pushing on a string, and higher borrowing costs can sometimes be counterproductive when inflation is originating on the supply side. A diffusion of objectives is inescapable and financial markets tend to amplify this policy incongruity, as with their bet on how far central banks are prepared to go in the current battle with inflation. Historical experience points to a policy bias in favour of employment.
The water is muddied further in developing economies where central banks don multiple hats, such as being the government’s debt manager as well as regulator for banks. This adds policy variables to their primary objective of managing inflation. Communicating this objective with the markets as a means to anchoring expectations exposes central bankers to the feedback that renders lawmakers unfit for managing inflation. Sensitivity to market feedback will influence the synchronisation of central bank actions as recession spreads across the world over the course of this year.
Central bank ‘independence’ should ideally make allowances for inflation-unemployment trade-offs specific to an economy’s stage of development and policy transmission capacity. A degree of coordination between governments and central banks regarded as fostering dependence in advanced economies may be necessary in developing economies that have bigger scope for fiscal intervention to build social capital and deliver welfare. Central bank autonomy is a destination. Countries have the flexibility to choose the path.
Date:04-01-23
India Inc, Put R&D Where Your Mouth IsET Editorials
PM Narendra Modi’s strong pitch at the 108th Indian Science Congress for research & development (R&D) on Tuesday underlined the criticality of science and innovation for growth. The stress on taking science from the laboratory to everyday lives is a call for innovation that provides the basis for India’s drive to be self-reliant. The focus on critical and emerging areas such as energy, sustainability, artificial intelligence (AI), quantum technologies, data sciences, development of new vaccines and surveillance for newer diseases will have maximum impact on growth, development and economic opportunities.
Modi’s appeal took off from his 2022 Independence Day address where he had emphasised the need for ideas to be incubated, developed, tested and applied to real-life situations institutionally and not in an ad-hoc manner. An institutional framework alone can help create the structure for mentorship, access to opportunities and help convert research into real-world applications and opportunities. This, in turn, requires funding, institutional support and patience. India’s R&D spending must increase from its low levels of 0. 7% of GDP in 2017-18. This is less than half of the global average of 1. 8%. Government spending accounts for 55-60% of R&D spending. Spending by private entities, businesses and educational institutions must go up.
India’s R&D should focus on leveraging low-cost, accessible technology to meet the developmental needs of its population. It is time to put one’s money where one’s mouth is when it comes to talking about unlocking our demographic dividend.
Date:04-01-23
Overly deferentialWhile upholding demonetisation, SC failed to hold government accountable.Editorial
It is an oft-repeated judicial view that courts must defer to the elected government’s judgment in matters of economic and social policy. Their interventions are usually limited to instances where executive decisions are palpably arbitrary or patently illegal. In this backdrop, it is no surprise that four of the five judges on a Constitution Bench of the Supreme Court deferred to the government’s wisdom in dramatically announcing the move on November 8, 2016 to demonetise all ₹500 and ₹1,000 notes that were then in circulation. The scope of judicial intervention was only to examine the decision-making process, but the majority has given its uncritical endorsement to the process, terming it to be free of flaws. It has upheld the government’s power to demonetise notes without quantitative restrictions and accepted the claim that there was adequate consultation between the Union government, which initiated the proposal, and the Reserve Bank of India (RBI). What might seem distressing about the majority verdict is that it has made light of the enormous suffering of the people that demonetisation entailed. While there are observations that recognise the possibility of hardship and that demonetisation may have ultimately been a failure, these are limited by context to say neither individual suffering nor errors of judgment can be cited to invalidate the action.
The majority has brushed aside substantial arguments based on proportionality, holding that demonetisation survives every test for proportionality: there was a legitimate purpose (unearthing fake currency and hoarded wealth and combating terror funding), there was a nexus between the action and the objectives, and the court did not have the expertise to suggest a less intrusive way of achieving these objectives. However, it does not properly address the question on whether the adverse consequences could have been limited. It is unfortunate that the court had nothing critical to say about the government failing to anticipate the ruinous effect of extinguishing the value of 86% of available currency on the economy and the immense miseries it heaped on the population. Justice B.V. Nagarathna’s dissent, holding the process to be flawed and the RBI’s approach to be without application of mind, is a consolation for those who want the courts to hold those in power to account. In a larger sense, of course, a judicial rap on policy questions matters little. But it might give governments cause for pause before implementing decisions with far-reaching consequences for the people.
Date:04-01-23
शोध पर खर्च बढ़ाना बेहद जरूरी हैसंपादकीय
नारों से लक्ष्य को पूरा करने की शक्ति आती है। शास्त्री जी ने ‘जय जवान, जय किसान’ का नारा तब दिया, जब भारत पर चीनी आक्रमण और तीन साल बाद सन् 1965 में पाकिस्तानी हमले से सैन्य बल को मजबूत करना अपरिहार्य था। उधर देश में अनाज का अभूतपूर्व संकट था। आज दोनों क्षेत्रों में जबरदस्त तरक्की हुई। उसके करीब 33 साल बाद पोखरन परमाणु विस्फोट ने पूरी दुनिया को चौंका दिया। यह सामरिक शक्ति में देश का ‘जायंट लीप’ था। तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने एक हफ्ते बाद ही पोखरन में सैनिकों को संबोधित करते हुए ‘जय जवान, जय किसान’ नारे में ‘जय विज्ञान’ जोड़कर वैज्ञानिक सोच की जरूरत बताई। लगभग 21 साल बाद वर्तमान प्रधानमंत्री ने सन् 2019 में विज्ञान कांफ्रेंस में इस नारे में ‘जय अनुसंधान’ जोड़कर रिसर्च पर बल दिया। उनका कहना था कि बोस, साहा और रमन जैसे भारतीय वैज्ञानिकों ने कम संसाधन रहते हुए भी कड़े संघर्ष से अपने शोध के जरिए देश का नाम रोशन किया। लेकिन इनके शोध की गुणवत्ता के लिए संसाधन मुहैया कराया विदेश की संस्थाओं ने । आज इस नए नारे के बाद भी भारत में शोध पर जीडीपी का मात्र 0.6 प्रतिशत खर्च होता है, जबकि साउथ कोरिया, जापान, जर्मनी, अमरीका और चीन क्रमशः 4.43, 3.21, 3.09, 2.83 और 2.14% खर्च करते हैं। हमारे उच्च शिक्षा संस्थान आज भी दुनिया के 100 संस्थानों में आने की जद्दोजहद में लगे हैं। बड़ी मुश्किल से वर्ष 2022 की क्यूएस वर्ल्ड यूनिवर्सिटी रैंकिंग्स बाई सब्जेक्ट्स में दिल्ली आईआईटी को बेहतर मानते हुए दुनिया की 100 श्रेष्ठ संस्थाओं में स्थान मिला है। शोध पर भारत सरकार का खर्च मात्र 17.6 अरब डॉलर है जबकि अमेरिका और चीन क्रमशः 581 अरब और 298 अरब डॉलर खर्च करते हैं। कम जीडीपी वाले फ्रांस, ब्रिटेन, इटली और ब्राजील भी हमसे कई गुना ज्यादा खर्च करते हैं। लिहाजा अनुसंधान की जीत की पहली शर्त है शोध पर खर्च बढ़ाना ।
Date:04-01-23
दुनिया में सबसे आगे होने के चार तरीके हैंचेतन भगत, ( अंग्रेजी के उपन्यासकार )
आप सबको नए साल की शुभकामनाएं! मुझे पता नहीं कि मुझे इस अवसर पर नए दशक की शुभकामनाएं भी देनी चाहिए या नहीं, क्योंकि इस दशक के शुरुआती तीन साल तो कमोबेश महामारी की भेंट चढ़ गए। नया साल अपनी जांच-परख करने का एक मौका होता है, फिर चाहे हम वैसा खुद के लिए करें या देश के लिए। साल की शुरुआत पर लोग रिजॉल्यूशंस भी लेते हैं, अलबत्ता उनमें से बहुतेरे 18 जनवरी तक इस संकल्प को तोड़ भी देते हैं, जिसे क्विटर्स डे कहा जाता है।
लेकिन हमें समय-समय पर अपने जीवन के प्रयोजन के बारे में सोच लेना चाहिए और नया साल इसका सबसे अच्छा अवसर है। तो बताएं, बीते साल आपका जीवन कैसा रहा? इससे भी जरूरी यह कि आने वाले साल में आप स्वयं को किस जगह पर देखते हैं या देखना चाहते हैं? इसके लिए हमें एक प्रयोजन की दरकार होती है, जिसके बिना जीवन का कोई लक्ष्य नहीं रह जाता। इसी तरह अगर हम पूछें कि अगले साल या अगले दशक में भारत किस मुकाम पर होगा, तो पहले हमें यह जानना चाहिए कि आज दुनिया में भारत का प्रयोजन क्या है? हम इस पर चाहे जितनी बातें कर लें, लेकिन संक्षेप में भारत का प्रयोजन एक ही है : दुनिया के अग्रणी देशों में से एक होना। आज भारत में दुनिया की पंद्रह प्रतिशत से भी ज्यादा आबादी रहती है, वैसे में यह तभी हो सकेगा जब हम एक शांतिपूर्ण समाज का निर्माण करें, जिसमें लोग अस्मिता से रह सकें, उन्हें विकास करने का अवसर मिले और वे अपना जीवन जैसे जीना चाहते हैं, उस तरह से जी सकें। दुनिया में अग्रणी होने के लिए किसी देश को चार चीजों की जरूरत होती है- उच्च आय वाली इकोनॉमी, मजबूत डिफेंस एंड टेक्नोलॉजी, नैतिक उच्चता और सोच के स्तर पर दुनिया का नेतृत्व करने की क्षमता। यह इस तरह से हो सकता है :
उच्च आय वाली इकोनॉमी पैसों से निर्मित होती है। बहुत सारे पैसों से। केवल अमीर देशों को ही मान-सम्मान मिलता है। भारत जितना समृद्ध होगा, उतना ही दुनिया में उसका रसूख बढ़ेगा। तभी दुनियाभर की कम्पनियां हमें गम्भीरता से लेंगी और हमारी ओर आकृष्ट होंगी। जहां तक हमारी सांस्कृतिक विरासत, ऐतिहासिक स्थलों, संगीत, सिनेमा, खानपान का सवाल है तो वह सॉफ्ट पॉवर के दायरे में आता है और उसकी एक सीमा है। दबदबा तो हार्ड पॉवर से ही बनता है। इकोनॉमिक ग्रोथ हमारा नम्बर वन एजेंडा होना चाहिए और हमारे द्वारा हर नीति इसी को ध्यान में रखकर बनाई जानी चाहिए।
दूसरे, अमीर होना ही काफी नहीं है। एक ताकतवर देश के पास मजबूत प्रतिरक्षा तंत्र और तकनीक भी होनी चाहिए। मजबूत प्रतिरक्षा तंत्र केवल सैनिकों की राष्ट्रभक्ति और जोश-जज्बे से ही नहीं बनता, इसके लिए संसाधनों, आधुनिकतम हथियारों और विश्वस्तरीय तकनीक की भी जरूरत है, ताकि दुनिया में कोई भी आपसे लड़ाई मोल लेने से पहले दो बार सोचे। साथ ही एक ताकतवर देश के पास तकनीक-आधारित इंडस्ट्रीज़- जैसे सॉफ्टवेयर, हार्डवेयर और फार्मा- में भी मजबूती होनी चाहिए। इसके लिए साइंटिफिक और इनोवेशन-आधारित मानसिकता की जरूरत है, साथ ही बहुत सारे पैसों की भी। इसीलिए तो हमें अमीर देश होना चाहिए, ताकि इस सब पर खर्च कर सकें।
तीसरी बात, अगर अपने आसपास देखें तो पाएंगे कि जिन देशों का दुनिया पर सबसे ज्यादा दबदबा है, वे लोकतांत्रिक, सेकुलर, खुले दिमाग वाले, स्वतंत्रता-प्रेमी और व्यक्ति का सम्मान करने वाले हैं। वह अमेरिका हो या चाहे यूरोप के दूसरे देश, इसी के चलते वे दुनिया के सामने एक उच्चतम नैतिक आदर्श रखते हैं। भारत में भी यह क्षमता है। हम लोकतांत्रिक हैं और दुनिया के सबसे अधिक बहुलतावादी देशों में से हैं। लेकिन अगर राजनीति के कारण हम बंट गए तो अपना महत्व गंवा देंगे और तब दुनिया का सम्मान अर्जित करना हमारे लिए बहुत मुश्किल हो जाएगा। अगर हमने दूसरों पर एक जैसी संस्कृति, धर्म या भाषा को थोपा तो हम बहुत लम्बी दूरी तक का सफर नहीं तय कर सकेंगे। भारत को अपने लोकतंत्र, विविधता और व्यक्तिगत स्वतंत्रता को कायम रखते हुए ही अमीर देश बनना होगा।
और चौथा, पैसा हो, ताकतवर फौज हो, तकनीक हो, लोकतंत्र हो, इसके बावजूद एक देश को जो चीज अग्रणी बनाती है, वह है आगे की सोच। अपने लोगों का ख्याल रखना अच्छी बात है, लेकिन दुनिया को देने के लिए हमारे पास क्या है? क्या हम दुनिया के सामने मौजूद बड़े सवालों जैसे जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, ऊर्जा संकट, हिंसक टकराव आदि का सामना करने के लिए अपनी ओर से कोई योगदान दे रहे हैं? एक महाशक्ति बनने के लिए हमें इस दिशा में भी काम करना होगा।
ये चारों चीजें मुश्किल जरूर हैं, पर नामुमकिन नहीं। अगर हम सभी भारतीय साथ आएं और इस दिशा में सोचें तो आने वाले कुछ दशकों में इसे हासिल कर सकते हैं। लेकिन अगर हम छोटी-मोटी लड़ाइयों में ही उलझे रहे, गैरप्रासंगिक बातें करते रहे या सोशल मीडिया पर समय जाया करते रहे तो बात नहीं बनने वाली है। अगर भारत निम्न आय वाला देश बना रहता है तो इससे दुनिया को कोई फर्क नहीं पड़ेगा। दुनिया में अपनी मौजूदगी दर्ज कराने के लिए हमें ही अपनी अर्थव्यवस्था, प्रतिरक्षा, तकनीक, सोच और नैतिकता को मजबूत बनाना होगा। मौजूदा दशक में एक देश के रूप में भारत का यही प्रयोजन होना चाहिए!
Date:04-01-23
अभिव्यक्ति की आजादीसंपादकीय
उत्तर प्रदेश के पूर्व मंत्री आजम खान से जुड़े एक मामले की सुनवाई कर रहे सुप्रीम कोर्ट का इस नतीजे पर पहुंचना व्यापक प्रभाव छोड़ने वाला हो सकता है कि यह मानना ठीक नहीं कि किसी मंत्री का वक्तव्य सरकार का कथन है। सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ आजम खान के उस बयान को लेकर सुनवाई कर रही थी, जिसमें दुष्कर्म के एक मामले में उन्होंने कहा था कि यह घटना अखिलेश सरकार को बदनाम करने की साजिश है। सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद उन्हें अपने इस बेतुके बयान के लिए क्षमा याचना करनी पड़ी थी। इस प्रकरण में यह प्रश्न शेष रह गया था कि क्या नेताओं के बोलने पर प्रतिबंध लगाया जा सकता है? यह अच्छा हुआ कि सुप्रीम कोर्ट इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि ऐसा नहीं किया जा सकता। किसी प्रतिबंध की पहल अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर आघात होती, लेकिन शीर्ष न्यायालय का निर्णय इस आम धारणा के विपरीत है कि किसी मंत्री का कथन सरकार का वक्तव्य होता है। अब उसके निर्णय की मनमानी व्याख्या हो सकती है और किसी भी मंत्री के अनपेक्षित, अमर्यादित बयान को उसके निजी बयान की संज्ञा देकर पल्ला झाड़ा जा सकता है। इतना ही नहीं, बड़बोले मंत्री बेलगाम हो सकते हैं, क्योंकि अब उनके पास यह आड़ होगी कि उनका बयान सरकार का कथन नहीं है।
यह ध्यान रहे कि मंत्री अपने बयानों के मामले में मंत्रिमंडल के सामूहिक दायित्व के सिद्धांत से बंधे रहते हैं। यदि वे उससे मुक्त हो जाएंगे तो यह कोई अच्छी स्थिति नहीं होगी। एक प्रश्न यह भी उभरेगा कि यह कैसे तय होगा कि किसी मंत्री का कौन सा कथन निजी माना जाए और कौन सरकार का? अच्छा होता कि इसका समाधान किया जाता। यह इसलिए आवश्यक है, क्योंकि नेताओं के बेतुके बयान एक समस्या बन गए हैं। जिम्मेदार पदों पर बैठे नेता और यहां तक कि मंत्री भी प्रायः ऐसा कुछ बोल जाते हैं, जो संबंधित दल या सरकार की शर्मिंदगी का कारण तो बनता ही है, आम जनता को उद्वेलित और आक्रोशित भी करता है। यद्यपि विचारार्थ मामले की सुनवाई में शामिल न्यायाधीश नागरत्ना ने अधिकांश बिंदुओं पर संविधान पीठ के अन्य सदस्यों से सहमति जताई, लेकिन उन्होंने यह एक सही सुझाव दिया कि राजनीतिक दलों को अपने नेताओं की ओर से दिए जाने वाले भाषणों को नियंत्रित करना चाहिए। यह काम एक आचार संहिता बनाकर आसानी से किया जा सकता है। उचित यह होगा कि सभी दल यह समझें कि अभिव्यक्ति की आजादी का यह अर्थ नहीं कि जिसके जो मन आए, वह बोले। नेताओं को मर्यादा की सीमा में बांधना इसलिए और आवश्यक है, क्योंकि उनके बयान समाज को कहीं अधिक प्रभावित करते हैं। अभिव्यक्ति की आजादी जिस जिम्मेदारी की मांग करती है, उसकी पूर्ति कैसे हो, इस पर राजनीतिक दलों को विचार करना ही चाहिए।
Date:04-01-23
नागरिक समाज और सरकारसंपादकीय
नागरिक समाज और भारत सरकार के बीच पिछले कुछ समय से अच्छे ताल्लुकात नहीं हैं लेकिन हाल के दिनों में यह टकराव बढ़ गया है। गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार नियमन की सख्ती के बाद सन 2017 से 2021 के बीच करीब 6,677 गैर सरकारी संगठनों (एनजीओ) को विदेशी फंडिंग पाने से संबंधित लाइसेंस गंवाना पड़ा। ताजा कदम घरेलू फंडिंग तक पहुंच को सीमित करने से संबंधित है। हाल ही में कम से कम दो संस्थानों को सरकार से पत्र मिले हैं जिनमें आदेश दिया गया है कि वे फंड जुटाने की अपनी गतिविधियां रोक दें। इसके साथ ही राज्यों को भी यह निर्देश दिया गया है कि वे उन क्षेत्रों में एनजीओ की गतिविधियों को सीमित करें जहां की प्राथमिक जिम्मेदारी केंद्र सरकार के पास है। डेक्कन हेरल्ड और आर्टिकल 14 नामक वेबसाइट द्वारा प्रकाशित खबरों के मुताबिक जिन दो संस्थानों को पत्र लिखे गए हैं वे हैं सेव द चिल्ड्रन (यह बाल अधिकारों पर काम करने वाले एक वैश्विक संगठन का भारतीय हिस्सा है) तथा साइटसेवर्स इंडिया। 57 वर्ष पुराना यह संगठन नेत्र स्वास्थ्य सेवाओं पर काम करता है तथा नेत्रहीनों के अधिकारों के लिए काम करता है।
यह बात अहम है कि इन एनजीओ ने न तो कोई नियम तोड़ा है और न ही उन्हें दंडित किया गया है। बस सरकार उनकी गतिविधियों से चिढ़ी हुई है। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय ने राज्यों को एक पत्र लिखा है जो एनजीओ द्वारा फैलाए जा रहे झूठ को लेकर शिकायत करता है और स्थानीय प्रशासन से कहता है कि वे सरकार की पोषण योजनाओं के बारे में जागरूकता बढ़ाएं।
सेव द चिल्ड्रन के मामले में एक विज्ञापन को वापस लेने का आदेश दिया गया है जिसमें एक अत्यधिक कुपोषित आदिवासी बच्चे को दिखाया गया है। सरकार का मानना है कि यह उसके गरीबी उन्मूलन उपायों पर अभियोग के समान है। साइटरसेवर्स के मामले में स्वास्थ्य मंत्रालय ने उससे अनुरोध किया है कि वह देश में अंधत्व नियंत्रण के लिए आम जनता से फंड जुटाने की कोशिशें बंद करे क्योंकि उसकी यह कोशिश सरकार के नैशनल कंट्रोल फॉर ब्लाइंडनेस ऐंड विजुअल इंपेयरमेंट के खिलाफ है जहां सरकार नि:शुल्क सेवाएं देती है।
यह बात सरकार के इस नजरिये को दिखाती है कि वह सामाजिक कार्य करने वाले संगठनों को विरोधी की दृष्टि से देखती है लेकिन इसके साथ ही इन आलोचनाओं की प्रासंगिकता भी समझ से परे और अलाभकारी है। उदाहरण के लिए सरकार के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण समेत एक के बाद एक अनेक आंतरिक सर्वेक्षणों ने यह बताया है कि बच्चों में कुपोषण एक गंभीर मसला है। इस बात को देखते हुए निश्चित तौर पर यह सरकार के हित में है कि वह प्रतिष्ठित संस्थानों के साथ मिलकर बच्चों का पोषण सुधारने की दिशा में काम करे। बांग्लादेश का अनुभव बताता है कि एनजीओ के सहयोग से उसने अपने मानव विकास सूचकांकों में महत्त्वपूर्ण सुधार किया है। इससे सबक लेने की आवश्यकता है। यह विडंबना ही है कि सेव द चिल्ड्रन अतीत में कई योजनाओं में सरकार के साथ मिलकर काम कर चुका है। इसी प्रकार नेत्रहीनता या एक हद तक दृष्टि बाधा भी एक समस्या है, खासकर गरीब लोगों में। ऐसे में नेत्र संबंधी स्वास्थ्य को बढ़ावा देने वाले किसी भी कार्यक्रम को तवज्जो दी जानी चाहिए।
इन एनजीओ पर प्रतिबंधों की विशिष्टता से परे भी दो संबद्ध प्रश्न हैं। पहली बात सरकार एनजीओ जगत को संदेश देने की कोशिश कर रही है जो चिंता की बात है। चूंकि अपनी प्रकृति के अनुरूप ही सरकार स्वास्थ्य, शिक्षा आादि सामाजिक सेवाएं देती है तो ऐसे में इन क्षेत्रों में उपयोगी काम कर रहे एनजीओ के पास क्या विकल्प है? क्या उन सभी को अपना काम इस प्रकार समेट लेना चाहिए ताकि करदाताओं के पैसे से काम करने वाली सरकार की भावना का उल्लंघन न हो? दूसरा, शिक्षा और आदिवासी कल्याण के लिए काम करना कारोबारी सामाजिक जवाबदेही के तहत आने वाली गतिविधियों की सूची में है। ऐसे में कंपनियां उन कार्यक्रमों को लेकर भ्रमित हो सकती हैं जिनमें वे पहले ही निवेश कर चुकी हैं। भारत जैसे देश में सामाजिक सेवा क्षेत्र में संरक्षणवाद लागू करना उचित नीति नहीं जान पड़ती।
Date:04-01-23
संवैधानिक व्यवस्था का कैसे तय हो बचाव?नितिन देसाई
इस समय सर्वोच्च न्यायालय और राज्यों के उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों तथा निर्वाचन आयुक्तों की नियुक्ति को लेकर सार्वजनिक विवाद की स्थिति बनी हुई है। सरकार संविधान के प्रासंगिक प्रावधानों के सहारे है और दलील दे रही है कि नियुक्तियों के निर्णय का अधिकार कार्यपालिका के पास है। जबकि इससे अलग नजरिया रखने वालों को संविधान की मूल भावना की चिंता है।
औपचारिक रूप से देखा जाए तो ये नियुक्तियां राष्ट्रपति द्वारा की जाती हैं जो संविधान के मुताबिक प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाले मंत्रिमंडल की अनुशंसाओं को मानते हुए ऐसा करते हैं। ऐसे में देखें तो संवैधानिक प्रावधानों की भाषा आवश्यक तो है लेकिन वह पर्याप्त नहीं है। हमें संविधान निर्माताओं द्वारा अभिव्यक्त भावनाओं और इरादों को भी ध्यान में रखना होगा। सर्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति की मौजूदा प्रक्रिया सर्वोच्च न्यायालय के 1993 और 1998 के निर्णयों पर आधारित है और यह चयन सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों का एक कॉलेजियम करता है जिसकी अध्यक्षता सर्वोच्च न्यायालय के प्रधान न्यायाधीश के पास होती है। कार्यपालिका उनसे पुनर्विचार करने को कह सकती है लेकिन अगर कॉलेजियम अपनी अनुशंसा पर टिका रहता है तो उसे स्वीकार करना होगा। हालांकि सरकार इन अनुशंसाओं को महीनों तक रोककर नियुक्तियों को लंबित रख सकती है।
सरकार इन नियुक्तियों में अपने घटते प्रभाव से चिंतित है और उसने संसद के सामने एक ऐसा प्रस्ताव मंजूर कराया जिसे एक तरह से संविधान संशोधन कहा जा सकता है। इसके साथ ही राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग की स्थापना को लेकर एक कानून भी बना जिसके पास उच्च न्यायालय की नियुक्तियों का अधिकार होता। आयोग की अध्यक्षता मुख्य न्यायाधीश के पास होगी और इसमें दो वरिष्ठ न्यायाधीश, केंद्रीय कानून मंत्री और दो ‘प्रतिष्ठित’ व्यक्ति शामिल होंगे जिनकी सहमति मिलने पर ही नियुक्तियां की जा सकेंगी। परंतु सर्वोच्च न्यायालय ने इसे असंवैधानिक बताते हुए निरस्त कर दिया। दलील दी गई कि यह न्यायिक स्वायत्तता के साथ समझौता करने जैसा है जबकि वह संविधान की विशेषताओं में से एक है जिसमें संसद संशोधन नहीं कर सकती।
इस विषय पर संविधान सभा की बहस साफ संकेत देती है कि उसकी मंशा न्यायपालिका को कार्यपालिका से स्वतंत्र रखने की है। यही कारण है कि संविधान सभा ने बीच का रास्ता अपनाया जिसके तहत मुख्य न्यायाधीश को मशविरा लेने को कहा गया क्योंकि कहा गया कि बिना किसी नियंत्रण के नियुक्तियों को केवल राष्ट्रपति पर छोड़ देना खतरनाक साबित हो सकता है।
डॉ. बी आर आंबेडकर ने उक्त विचार प्रकट करते हुए कहा था कि यह काम केवल कार्यपालिका की अनुशंसा के भरोसे छोड़ना उचित नहीं होगा। एक संशोधन भी प्रस्तावित था जिसके माध्यम से ‘मशविरा’ शब्द को बदलकर ‘सहमति’ करने की बात शामिल थी। इसे स्वीकार नहीं किया गया। एक अन्य संशोधन जिसे नकार दिया गया वह यह था कि संसद को इस प्रक्रिया में शामिल किया जाए। इसे स्वीकार किया जाता तो न्यायपालिका की स्वतंत्रता, विधायिका के कारण बाधित होती।
हमें पारदर्शी व्यवस्था चाहिए जहां कॉलेजियम की प्रक्रिया जांच के लिए अधिक खुली हो। लेकिन हमें एक नए संस्थान की आवश्यकता नहीं है जो कार्यपालिका को संविधान की इच्छा के परे जाकर अधिकार सौंपे। बुनियादी लक्ष्य यही होना चाहिए कि न्यायपालिका को कार्यपालिका के पूर्वग्रह से बचाया जाए।
संवैधानिक नियुक्तियों को लेकर एक सवाल यह भी किया जा रहा है कि निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति की प्रक्रिया क्या है। संविधान के मुताबिक यह नियुक्ति भी राष्ट्रपति द्वारा मंत्रिमंडल की अनुशंसा पर की जानी चाहिए। यह मामला सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष है और दो निजी सदस्यों के विधेयक इसमें अहम बदलाव के प्रस्ताव के साथ पेश हैं।
संविधान सभा में बुनियादी अधिकारों को लेकर जो समिति बनाई गई उसने यह अनुशंसा की थी कि चुनावों को स्वतंत्र रहने दिया जाए और कार्यपालिका को चुनावों में किसी तरह का हस्तक्षेप न करने दिया जाए। अनुशंसा की गई कि इस विषय में मूल अधिकारों संबंधी हिस्से में प्रावधान किए जाएं। संविधान सभा की चर्चा में इस बात पर सहमति बनी कि इस विषय को संविधान के किसी अन्य हिस्से में रखा जाए जो निर्वाचन आयोग की स्थापना से जुड़ा हो। परंतु संविधान सभा ने मजबूती के साथ यह कहा कि चुनावों की शुद्धता और स्वायत्तता को ध्यान में रखते हुए यह बात महत्त्वपूर्ण है कि चुनाव प्रबंधन करने वाली संस्था तत्कालीन कार्यपालिका के किसी भी तरह के हस्तक्षेप से पूरी तरह मुक्त रहे।
कार्यपालिका के दायरे से बाहर के किसी संगठन जो चुनाव प्रक्रिया के लिए महत्त्वपूर्ण हो, के प्रमुख की नियुक्ति में कार्यपालिका की मजबूत भूमिका की आलोचना उचित ही थी। हमें यह भी याद रखना होगा कि एक मुख्य निर्वाचन आयुक्त ने पद छोड़ने के बाद सरकार में मंत्री का पद स्वीकार किया था। कार्यपालिका की शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र के बाहर के संस्थान पर दबदबा दिखाने की एक घटना तब हुई थी जब मुख्य निर्वाचन आयुक्त के उस प्रस्ताव को खारिज किया गया था जिसमें उन्होंने ऐसे निर्वाचन आयुक्त को हटाने का अनुरोध किया था जिसकी विश्वसनीयता संदिग्ध थी। इतना ही नहीं बाद में उस आयुक्त को मुख्य निर्वाचन आयुक्त भी बना दिया गया था।
नियुक्ति की प्रक्रिया में निर्वाचन आयोग की स्वायत्तता सुनिश्चित होनी चाहिए और उसे मतदाताओं तथा राजनीतिक दलों के प्रति अधिक पारदर्शी तथा स्वीकार्य बनाया जाना चाहिए। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय की प्रतीक्षा करनी चाहिए। दो निजी सदस्यों के विधेयक जो मुख्य न्यायाधीश और सांसदों के साथ चयन समिति के गठन की बात करता है उसका पास होना मुश्किल है। परंतु ध्यान रखना चाहिए कि लालकृष्ण आडवाणी ने 2012 में यह बात आगे बढ़ाई थी कि मुख्य निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली समिति द्वारा की जाए जिसमें मुख्य न्यायाधीश, कानून मंत्री और दोनों सदनों के नेता प्रतिपक्ष शामिल हों।
सच तो यह है कि संविधान को ऐसे समय तैयार किया गया था जब उस वक्त के कार्यपालिक प्रमुख यानी पंडित जवाहरलाल नेहरू की ईमानदारी और लोकतंत्र के प्रति उनकी निष्ठा को लेकर कोई संशय न था। यह बात संविधान सभा में कई बार सामने भी आई। यही कारण है कि कार्यपालिका द्वारा शक्ति के दुरुपयोग से बचाव के अधिक उपाय देखने को नहीं मिले। अब राजनीतिक माहौल बदल गया है। आज के राजनेताओं में संविधान के आशय को लेकर वैसी प्रतिबद्धता नहीं नजर आती और अब हमें एक ऐसी स्पष्ट प्रक्रिया की आवश्यकता है जो उन संस्थानों की स्वतंत्रता और विश्वसनीयता बरकरार रखे जो लोकतंत्र और विधि के शासन के लिए महत्त्वपूर्ण हैं।
Date:04-01-23
चैटजीपीटी : अच्छा, बुरा और इंटेलिजेंटदेवांशु दत्ता
ओपन एआई कंपनी द्वारा निर्मित चैटजीपीटी दुनियाभर में चर्चा का मुद्दा बन चुका है। यह दावा किया जा रहा है कि यह आधुनिक समय के सर्च इंजन को भी पछाड़ सकता है। यह सर्च इंजन से बिल्कुल अलग है। इसमें सिर्फ ऐसा नहीं होता कि कोई भी चीज सर्च करते ही या साधारण भाषाओं में कोई सवाल एंटर करते ही उससे संबंधित अन्य चीजों की केवल सूची ही दिखाई दे।
जबकि, यह सर्च के बाद उचित लिंक के माध्यम से और उसके बाद भी उचित सूचनाओं का मौखिक सारांश भी सुनाता है। हालांकि यह बात भी सही है कि इसके द्वारा गुणवत्ता पर भी असर पड़ेगा। चैटजीपीटी के प्रसिद्ध होने का एक कारण यह भी है कि यह लोगों की आदतों के अनुकूल है। चैटजीपीटी के माध्यम से सूचनाओं का प्रसार ठीक उसी तरह है जैसे कि स्कूल में शिक्षक छात्रों को वही सूचना देते हैं, जिसकी वे जरूरत समझते हैं, पक्षपाती शिक्षक को छोड़कर। दूसरा कारण यह है कि यह सर्च परिणाम के लिए फिल्टर की सुविधा प्रदान करता है, जिसके कारण लोग कई तरह के अनावश्यक लिंक के कारण परेशान नहीं होते।
एआई रिसर्च जिस फीचर के कारण अग्रणी भूमिका निभा रहा है, वह है नैचुरल लैंग्वेज प्रोसेसिंग (एनएलपी)। एक अच्छी एनएलपी का उपयोग अनंत है, और यह रिसर्च के कुछ चुनौती भरे क्षेत्रों में से एक है। यहां तक कि सबसे प्रतिभाशाली और सर्वश्रेष्ठ इंसान भी कुछ न कुछ कमियों के साथ ही बोलता या लिखता है। लोगों के भाषण देने या सामान्य रूप से बोलने या लिखने में जानकारियां बिखरी हुई और बिना किसी संरचना के होती हैं। वह जो बात कहता है उसमें कठिनाई होती है और वे ज्यादातर हास्यास्पद, व्यंग्यात्मक और ताने वाली होती हैं।
लोग जो कहना चाह रहे हैं, उसको समझना और उसमें से भी आवश्यक जानकारियों को फिल्टर करना, और इससे भी बढ़कर, मनुष्य की ही शैली में बोलना और लिखना बहुत ही कठिन है। इसे चैटबॉट के अंदर समेट कर रख देना और भी कठिन है। उदाहरण के लिए, एक रियाल्टार या ऑटोमोबाइल एजेंसी ग्राहकों की जरूरतों को खोजने के लिए चैटबॉट का उपयोग कर सकती है। यह बहुत छोटा है क्योंकि इसके विषय ऐसा कहा जा सकता है जैसे यह चाहे एक या दो बेडरूम, या मैनुअल ट्रांसमिशन या ऑटोमेटिक की बात हो या लोगों की इन सबके अनुसार पसंदीदा बजट सीमा की, ये सारी जानकारियां छोटे से चैटबॉट में रखता है।
एनएलपी को विषयों के व्यापक स्पेक्ट्रम में करना और इसे अच्छी तरह से करना ताकि लोग यह विश्वास कर सकें कि वे मनुष्यों के साथ बातचीत कर रहे हैं, यह एक ट्यूरिंग टेस्ट है। एनएलपी की अवधारणा मूल रूप से मनोचिकित्सा के लिए विकसित की गई थी। लेकिन, इसे अब मानसिक स्वास्थ्य के प्रति संदिग्ध उपयोग माना जाता है।
लेकिन, एनएलपी जैसे-जैसे और विकसित हो रही है, इसके पास एक दूसरी अंतहीन संभावना है। एनएलपी का उपयोग विपरीत परिस्थितियों जैसे- कार को ऑटोमेटिक निर्देश प्रदान करने के लिए वाइस कमांड देने में या प्रतिक्रिया करने में किया जा सकता है और सिर्फ इसी के लिए बहुत सारे स्वतंत्र शोध भी जारी हैं।
दूसरा इसका बेहतर उपयोग लोगों के स्वास्थ्य को लेकर निदान प्रदान करना है। यह नैसर्गिक भाषा में सवाल करके मरीजों से ठीक वैसे ही लक्षणों के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकता है, जैसे कि डॉक्टर सवाल पूछते हैं।
एनएलपी पहले फिल्टर के रूप में अत्यधिक काम करने वाले स्वास्थ्य कर्मचारियों को एक बड़ी सुविधा दे सकता है। अन्य कार्य जैसे-सचिवालय से संबंधित कार्यों या कार्यालय के विभिन्न कार्यों जैसे कॉरपोरेट बैठक में आवश्यक प्रक्रियाओं का रिकॉर्ड रखना, या तकनीकी मैनुअल को समझने योग्य बनाना इससे काफी आसान हो जाएगा।
एनएलपी का उपयोग लाखों सोशल मीडिया या मुख्यधारा के मीडिया के बयानों के माध्यम से लोगों की मनोभावना को जानने में भी किया जाता है। उदाहरण के लिए, मान लीजिए कि कर कानून में बदलाव होता है, या किसी राज्य में प्रतिबंध को हटाने के लिए प्रस्ताव रखा गया है। ऐसे में नीति निर्माता एनएलपी का उपयोग करके लोगों के रुख के बारे में जानकारी इकट्ठा कर सकते हैं और यह जान सकते हैं कि कितने लोगों का क्या मूड है।
दुर्भाग्य की बात यह है कि कम अच्छे काम भी इसके उपयोग से किए जा सकते हैं और यह तब होगा जब एनएलपी अपनी क्षमता में विस्तार कर लेगी और सोशल मीडिया पर लोगों की आपसी बातचीत के बारे में समझकर उनके मतों में तोड़-मरोड़ करने लगेगी। एनएलपी सोशल मीडिया प्रभावित करने के लिए एक अच्छा साधन है। लेकिन, यह एक बेहतरीन फिशिंग और सोशल इंजीनियरिंग टूल भी साबित हो सकता है।
एक और मुद्दा पक्षपात है। सभी एआई को भाषा मॉडल समझाने के लिए डेटा प्रशिक्षण दिया जाना है। प्रशिक्षण के कई तरीके हैं, लेकिन सभी तरीकों में बहुत सारा डेटा शामिल होता है। एनएलपी में, वह डेटा आम तौर पर इंटरनेट और मौखिक सामग्री के लिए अन्य सार्वजनिक रूप से उपलब्ध स्रोतों से लिया जाता है।
इसमें दुर्भाग्य की बात यह है कि वास्तविक दुनिया की तरह ही इंटरनेट पर भी बहुत सारी गलत जानकारियां, अफवाहें और पक्षपातपूर्ण सामग्रियां उपलब्ध है। अगर एनएलपी को प्रशिक्षण में कई तरह की जातियों या रंगों के आधार पर भेदभाव सिखाया जाता है तो उदाहरण के लिए यह इस मत को मानने लगेगा कि एक निश्चित रंग या धर्म के लोग दूसरों से श्रेष्ठ हैं। अगर इसे इस विषय पर प्रशिक्षित किया जाता है कि महिलाएं किसी खास काम में खराब हैं, तो यह भी इस बात पर जोर देगा कि यह सच है। इसी तरह की समस्याएं जलवायु परिवर्तन और टीके के असर जैसे विषयों के साथ उत्पन्न भी होती हैं।
मान लीजिए एनएलपी को फर्जी समाचार देकर या जलवायु परिवर्तन पर गलत तरीके अपनाने के लिए नीति निर्माताओं को प्रभावित करने, या पड़ोसी देशों पर सैन्य हमले शुरू करने के लिए हथियार बनाए जाने के आधार पर प्रशिक्षित किया जाता है, तो स्थिति समस्याजनक हो सकती है। हाल के एक सर्वेक्षण में एआई शोधकर्ताओं के एक तिहाई ने माना कि एआई संभावित रूप से वैश्विक तबाही का कारण बन सकता है। ऐसा होते देखना मुश्किल नहीं है। इस सर्वेक्षण में 327 नमूनों को शामिल किया गया था।
Date:04-01-23
‘सुप्रीम’ फैसलासंपादकीय
नोटबंदी – 500 और 1000 रुपये के नोट को चलन से बाहर करने पर सर्वोच्च अदालत की संवैधानिक पीठ के 4:1 से फैसले से यह बहस अब खत्म हो जानी चाहिए कि नोटबंदी का फैसला गलत था । शीर्ष अदालत ने नोटबंदी के खिलाफ दायर 58 याचिकाओं पर अपना फैसला सुनाया है। याचिकाकर्ताओं ने केंद्र सरकार के इस फैसले से जुड़े अलग-अलग पहलुओं को सर्वोच्च अदालत में चुनौती दी थी। सर्वोच्च अदालत के जस्टिस एस. नजीर की अध्यक्षता वाली पांच जजों की पीठ ने अपने फैसले में नोटबंदी के फैसले को सही ठहराया है। हालांकि जस्टिस नागरत्ना ने चारों जजों के निर्णय सेट अपने फैसले में इसे गैरकानूनी बताया। पीठ ने साफ तौर पर कहा कि नोटबंदी के लिए सरकार ने कानूनी प्रक्रिया का पालन किया, इसलिए फैसला वैध था। अलबत्ता, अदालत की यह टिप्पणी को परखा जाना चाहिए कि ‘नोटबंदी का मकसद कालाधन, टेरर फंडिंग जैसे अपराध को रोकना था, लेकिन अब यह बात मायने नहीं रखती कि वे लक्ष्य हासिल हुए या नहीं क्योंकि हम फैसले का कानूनी पहलू जांच सकते हैं, आर्थिक असर की जांच नहीं कर सकते।’
जबकि नोटबंदी के फैसले से अर्थव्यवस्था को खासा नुकसान हुआ, आमजन को भारी दुश्वारियों का सामना करना पड़ा, छोटे और मंझोले स्तर के उद्योग धंधे बर्बाद हो गए। सोचनीय मसला संसद को नोटबंदी के फैसले से अलग रखने का भी है। संसद लोकतंत्र का आधार है। इसे इतने महत्त्वपूर्ण मामले में अलग नहीं छोड़ा जा सकता है। स्वाभाविक तौर पर यह जरूरी था कि इतने गंभीर मुद्दे पर संसद में चर्चा होती और उसके बाद मंजूरी मिलती। बहरहाल, केंद्र की मोदी सरकार इस ‘सुप्रीम फैसले’ से बड़ी राहत मिली है और वह ज्यादा दमखम और तर्क के साथ विपक्ष के खिलाफ हमलावर रुख अख्तियार करेगी। साथ ही इस बड़ी कानूनी जीत के बाद भाजपा इसे भुनाने में कोई कोर-कसर भी नहीं रखेगी। लंबे वक्त से भाजपा को नोटबंदी के फैसले को कर घेरा जाता था, मगर अब पार्टी ज्यादा प्रभावी तरीके से इसका सियासी फायदा उठाने की कोशिश करेगी । विपक्ष को भी इससे उबरकर नये सिरे से अपनी रणनीति को पैना करना होगा। नोटबंदी के फैसले की समीक्षा आगे भी होती रहेगी, मगर खुले दिल से इस बेहद गंभीर मसले के बारे में सोचने का वक्त चला नहीं गया है। खासकर 500 और 1000 के नोट बंद कर 2000 की करेंसी चालू करना कालाधन पर लगाम कैसे लग सकता है?
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हाल ही में जबरन धर्मांतरण रोकने के नाम पर होने वाली मुकदमेबाजी में न्यायालयों का बहुत सा समय व्यर्थ हो रहा है। पिछले कुछ समय से ऐसी अनेक जनहित याचिकांए दाखिल की जा रही हैं। ऐसे मामले न केवल व्यक्त्गित स्तर पर बल्कि राज्य सरकारों के द्वारा भी न्यायालय में लाए जा रहे हैं।
गुजरात का मामला –
हाल ही में राज्य सरकार अपने धर्मांतरण विरोधी कानून के उस प्रावधान पर लगी रोक को हटाने की मांग कर रही है, जिसके लिए ‘’प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से’’ किए गए किसी भी धर्मांतरण के लिए जिला मजिस्ट्रेट से पूर्व अनुमति की आवश्यकता होती है। यह कानून की धारा 5 है।
उच्चतम न्यायालय का आदेश रहा है कि विवाह और विश्वास एक व्यक्तिगत मामला है। अतः इसके लिए जिला मजिस्ट्रेट से पूर्व अनुमति का प्रावधान गलत है। गुजरात उच्च न्यायालय ने भी यही फैसला दिया था।
समाधान क्या हो ?
धर्म की स्वतंत्रता की रक्षा तभी हो सकती है, जब अंतर-धार्मिक विवाह को लेकर कोई सवाल न उठाए जाएं, और न ही जिला मजिस्ट्रेट से पूर्व अनुमति लेने जैसे कानून लागू किए जाएं। किसी कानून के द्वारा किसी को अपने धार्मिक विश्वास में बदलाव की मंशा को उजागर करने के लिए बाध्य किया जाना गलत है। यह अंतरात्मा की स्वतंत्रता और निजता के अधिकार के विरूद्ध है।
दूसरी ओर, धर्मांतरण की समस्या से इंकार नहीं किया जा सकता है। सर्वोच्च न्यायालय की खंडपीठ ने भी लालच या परोपकार के एजेंडा की आड़ में धर्मांतरण किए जाने को गंभीर समस्या बताया है। लेकिन फिर भी क्या छल से किए जाने वाले धर्मांतरणों के अतिशयोक्तिपूर्ण आरोपों में उच्चतम न्यायालय को उलझाया जाना चाहिए या इसे राज्यों पर छोड़ दिया जाना चाहिए? इस पर विचार करके कोई ऐसा रास्ता निकाला जाना चाहिए कि धार्मिक स्वतंत्रता और साम्प्रदायिक सौहार्द्र बना रह सके।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 6 दिसंबर 2022
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Date:03-01-23
Finally, End NotesSC right in saying policies like demonetisation are executive preserve. But dissenting judge makes good points tooTOI Editorials
Demonetisation has achieved judicial closure. The 4-1 Supreme Court constitution bench verdict termed the November 8, 2016 announcement as an executive decision, where the judiciary does not have the expertise to supplant economic policies, unless manifest arbitrariness requires intervention. The bench majority also refrained from identifying an alternative measure that would have constrained citizens’ rights less, saying these are “areas purely within the domain of experts and beyond the arena of judicial review”.
This is a principle SC needs to consistently uphold, given the number of frivolous PILs it entertains and the intrusion into policy they entail. But the diversity of public opinions on demonetisation was mirrored in SC too. Justice BV Nagarathna in the minority ruled the exercise unlawful but said the status quo ante can’t be restored as the event happened in 2016. She ruled that the Constitution empowers Centre to demonetise currency but the exercise should have been implemented through a law of Parliament. She faulted its implementation by a gazette notification saying that route is available only when RBI is proposing demonetisation under Section 26 (2) RBI Act. Additionally, she faulted RBI for lacking “independent application of mind” while “recommending” what Centre desired.
Neither the majority nor minority verdicts examined whether demonetisation met its stated objectives – because that wasn’t the bench’s job. Demonetisation is hard to support in terms of economic policy logic. The economic impact was negative, even if subsequent research showed that the quantum was less than initially feared. It’s doubtful whether it dealt a body blow to the black economy or to the cash-based transactions that support such activities. Cash in hand of the public now is double that of 2016. Even if only for some weeks, it put a lot of people through immense hardship. One positive consequence was that digital payments got a big boost, and the habit stayed with Indians even after new currency notes became plentiful. But an economic shock is not the best way to encourage digital payments. The considerable economic slowdown in 2018 and 2019 was probably a combination of demonetisation, GST introduction, which unlike demonetisation was a necessary reform, and the NBFC meltdown.
None of that matters for SC, of course. But the successful conclusion of the demonetisation hearings should act as an incentive to set up more constitution benches for other long pending matters.
Date:03-01-23
Mountainous QuestionChina’s growing influence in Nepal means India’s diplomacy and project delivery will need to improveTOI Editorials
A Nepal government dominated by that country’s communist parties isn’t the poll outcome India was hoping for. The best response would be a certain degree of course correction by New Delhi. Nepal holds great strategic significance for India. And bilateral ties are unmatched – an open border, Nepalese citizens having the freedom to stay and work in India, deep trade and economic linkages. Yet, certain misunderstandings and suspicions have crept into the relationship.
First, there is a perception in Nepalese quarters that India only supports certain Nepalese politicians and parties. Add to this the long-held suspicions about India’s connection to the Madhesi movement in Nepal. Together, they open the door for interests that don’t align with the New Delhi-Kathmandu relationship. China’s growing footprint in Nepal needs to be seen in this context. To counter this India needs to reach out and build equally robust ties with all political stakeholders in Nepal, be they on the left, right or centre.
Second, given its geographic position, it is natural for Nepal to seek infrastructure investment from both India and China. The recent inauguration of the international airport in Pokhara, built with Chinese assistance, is a case in point. India’s response should be to compete and prove to Nepal that Indian projects are best suited for the Himalayan nation. However, many such projects in the past were marred by delays due to local environmental objections, cost overruns and selection of poor local contractors. India should help Nepal correct these and deliver on big-ticket infrastructure like the Arun III hydro-electric project by the scheduled deadlines. This, along with close political communication to avoid disputes like the one over territory in the Kalapani region, will address New Delhi’s worries.
Date:03-01-23
खाद्य सुरक्षा महज अनाज एक सिमित न रहे, पोषण भी जरूरीरीतिका खेड़ा, ( दिल्ली आईआईटी में पढ़ाती हैं )
इन तीन विकल्पों का मूल्यांकन कीजिए- बाजार में अनाज 20 रु. प्रति किलो है। पहला विकल्प, 5 किलो अनाज आपको 2 रु. प्रति किलो मिले। दूसरा, 2 रु. प्रति किलो की दर पर 5 किलो अनाज के साथ 5 किलो मुफ्त मिलने लगे। तीसरा, आपको 5 किलो अनाज मुफ्त मिले। पहले में आपको प्रति किलो रु. 18 का लाभ है, यानी कुल 90 रु. की बचत होती है। दूसरे में अनाज की मात्रा दोगुनी है, जिसमें से 5 किलो मुफ्त होने से आपकी बचत 190 रु. है। तीसरे में बचत 18 रु. प्रति किलो से बढ़कर 20 रु. प्रति किलो है। यानी कुल 100 रुपए की बचत होगी। यही है खाद्य सुरक्षा से संबंधित हाल ही में हुई घोषणा का लेखा-जोखा। पहला विकल्प है कोरोना से पहले की राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के 80 करोड़ लोगों की स्थिति, दूसरा विकल्प है कोरोना काल में उनकी स्थिति और तीसरा है जनवरी से लागू नया हाल। जनवरी से दिसम्बर 2023 तक सरकार ने राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून का 5 किलो अनाज मुफ्त कर दिया है। अप्रैल 2020 से पीएम गरीब कल्याण अन्न योजना में दिया जाने वाला मुफ्त अतिरिक्त 5 किलो बंद होगा।
जिस घोषणा को जनहितैषी माना जा रहा है, वास्तव में लोगों को उससे न के बराबर फायदा है। लोगों की नजरों से देखें तो कोरोना से पहले की तुलना में अब से उनको 10 रु. की अधिक बचत होगी, लेकिन कोरोना की तुलना में उन्हें 90 रु. का नुकसान है। सरकार की नजरों से देखें तो लेखाजोखा कुछ अलग है। एक तरफ प्रति किलो 2 से 3 रु. खर्च बढ़ेगा (खाद्य सुरक्षा कानून में राज्यों को अनाज 2 से 3 रु. प्रति किलो बेचा जाता था; अब यह मूल्य नहीं वसूला जाएगा), दूसरी तरफ 5 किलो अनाज की बचत है। नोट करें तो सरकारी खर्च में बड़ी बचत है लगभग डेढ़ लाख करोड़! अनाज आधा करने से हुई बचत पर किसका हक होना चाहिए? खाद्य सुरक्षा कानून 2013 में जन वितरण प्रणाली के साथ-साथ बच्चों की दो योजनाएं हैं और मातृत्व लाभ का प्रावधान भी है। सरकारी बचत के कई योग्य विकल्प हैं।
पहला, जन वितरण प्रणाली का दायरा बढ़ाने की जरूरत है। खाद्य सुरक्षा कानून के अनुसार ग्रामीण क्षेत्रों में 75% और शहरी क्षेत्रों में 50% लोगों को शामिल करना है। लेकिन जब से कानून लागू हुआ है, तब से आज तक जनसंख्या बढ़ी है और उसके अनुसार जन वितरण प्रणाली में शामिल लोगों की संख्या नहीं बढ़ी। एक अनुमान के अनुसार लगभग 10 करोड़ लोग छूट रहे हैं। लेकिन सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में जन वितरण प्रणाली में शामिल लोगों की संख्या बढ़ाने के खिलाफ जवाब तैयार किया है। उनका कहना है 2021 की जनगणना होने तक उनके हाथ बंधे हैं। जनगणना में देरी गरीबों की जिम्मेदारी नहीं है, लेकिन उन्हें सरकारी नाकामी का ज़ुर्माना भरना पड़ रहा है। दूसरा, कई वर्षों से जन वितरण प्रणाली में दाल और तेल सप्लाई करने की मांग रही है, क्योंकि लोगों की खुराक में इनकी कमी है। इसका मुख्य कारण है लोगों की खरीदने की आर्थिक क्षमता नहीं है। कुछ राज्यों (जैसे तमिलनाडु और हिमाचल) में राज्य सरकारें इन्हें अपने बजट से दे रहे हैं। अब केंद्र को इसमें योगदान देना चाहिए। तीसरा, कुछ वर्षों से बच्चों की खाद्य सुरक्षा की योजनाओं (जैसे मध्याह्न भोजन और आंगनवाड़ी) के बजट में कटौती हुई है। अच्छे पोषण के लिए बचपन में पौष्टिक खाना मिलना जरूरी है। लेकिन हमारे देश के बच्चों की डाइट में प्रोटीन-रिच आहार की सख्त कमी है। चौथा, खाद्य सुरक्षा कानून में प्रति बच्चे पर मां को- मातृत्व लाभ के रूप में- 6000 रु. देने का भी प्रावधान है। प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना के तहत इसे घटाकर 5000 कर दिया गया है, वो भी केवल पहले बच्चे तक सीमित है। यह ठीक नहीं है।
हाल की घोषणा से सरकार की जो बचत होगी, उससे इन चारों विकल्पों को आजमाना मुमकिन है। 10 करोड़ लोगों को शामिल करने में लगभग 20,000 करोड़ रु. खर्च होंगे; आंगनवाड़ी बच्चों को प्रोटीन आहार खिलाने में 6500 रु. करोड़ और स्कूल के मध्याह्न भोजन में 6000 रु. करोड़ खर्च होंगे। मातृत्व लाभ को कानून अनुसार लागू करने के लिए 6000 करोड़ रु. की जरूरत है। इस सब के बाद, प्रति माह दाल और तेल के लिए एक लाख करोड़ रु. राशि बच जाती है। आने वाले बजट से स्पष्ट हो जाएगा कि सरकार खाद्य सुरक्षा के प्रति कितनी प्रतिबद्ध है- उसकी कल्पना में खाद्य सुरक्षा की परिभाषा रूखे अनाज तक सीमित है या उसमें पोषण भी शामिल है। आने वाले आम बजट से यह स्पष्ट हो जाएगा कि केंद्र सरकार खाद्य सुरक्षा के प्रति कितनी प्रतिबद्ध है- उसकी कल्पना में खाद्य सुरक्षा की परिभाषा रूखे अनाज तक सीमित है या उसमें पोषण भी शामिल है।
Date:03-01-23
नोटबंदी पर निर्णयसंपादकीय
सुप्रीम कोर्ट की ओर से नोटबंदी के फैसले को वैध करार दिया जाना केंद्र सरकार के लिए एक बड़ी जीत जैसा है। सुप्रीम कोर्ट को मूलतः नोटबंदी के लिए अपनाई गई प्रक्रिया पर विचार करना था। उसने यह पाया कि इस फैसले के पहले केंद्र सरकार ने रिजर्व बैंक से व्यापक विचार-विमर्श किया था और इस कारण यह नहीं कहा जा सकता कि संबंधित प्रक्रिया में कोई खामी थी। हालांकि एक न्यायाधीश ने पांच सदस्यीय पीठ के चार न्यायाधीशों के निर्णय से असहमति जताई, लेकिन उसका कोई विशेष मूल्य नहीं। इसलिए और नहीं, क्योंकि एक तो बहुमत का निर्णय ही मायने रखता है और दूसरे, नोटबंदी जैसे फैसले कानून बनाकर नहीं किए जा सकते। निःसंदेह नोटबंदी का फैसला एक बड़ा और कड़ा फैसला था। यह एक फैसला था, जिसने हर किसी को प्रभावित किया था। सुप्रीम कोर्ट ने यह सही कहा कि किसी फैसले को केवल इसलिए गलत नहीं ठहराया जा सकता, क्योंकि वह सरकार ने लिया है। विडंबना यह है कि कुछ विपक्षी दलों ने सरकार के हर फैसले का विरोध करने को अपना एकसूत्रीय कार्यक्रम बना लिया है। ऐसा ही रवैया अन्य लोगों ने भी अपना लिया है। इसे इससे समझा जा सकता है कि नोटबंदी के फैसले के खिलाफ 50 से अधिक याचिकाएं दायर की गईं।
इसमें संदेह है कि नोटबंदी पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद सरकार के हर फैसले का अंधविरोध करने और सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने वाले हतोत्साहित होंगे, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि सुप्रीम कोर्ट के इस निर्णय का एक सीमित और वह भी अकादमिक महत्व ही है। आखिर जो फैसला छह वर्ष पूर्व लिया गया और जिसके अच्छे-बुरे परिणाम सामने आ चुके हैं, उस पर सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ की ओर से विचार किया जाना कितना सार्थक है? नोटबंदी पर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद विपक्ष का निहत्था होना स्वाभाविक है। इसके बाद भी वह नोटबंदी के असर की अपनी तरह व्याख्या करता रहेगा। इसके साथ ही यह बहस भी चलती रहेगी कि नोटबंदी के जो उद्देश्य थे, वे कितने पूरे हुए-कितने नहीं? इस प्रश्न पर सरकार को भी चिंतन-मनन करना होगा, क्योंकि जिन उद्देश्यों को लेकर पांच सौ और एक हजार रुपये के नोटों को चलन से बाहर करने का फैसला लिया गया, वे सभी सही तरह पूरे नहीं हुए। यह सही है कि टैक्स चोरी पर एक हद तक लगाम लगी और फौरी तौर पर काले धन वालों को झटका लगा, लेकिन यह नहीं कहा जा सकता कि भ्रष्टाचार पर अंकुश लगा। उचित यह होगा कि रिजर्व बैंक के साथ सरकार इस पर विचार करे कि वे सभी उद्देश्य कैसे पूरे हों, जो नोटबंदी को लेकर तय किए गए थे। नोटबंदी से जो अनुभव मिले, उनसे भविष्य के लिए सीख भी ली जानी चाहिए।
Date:03-01-23
नोटबंदी पर बहस की प्रासंगिकतासंपादकीय
सरकार द्वारा नवंबर 2016 में उच्च मूल्य वाले नोट बंद करने के फैसले पर हो रही प्रक्रियागत बहस अब समाप्त हो गई है। सर्वोच्च न्यायालय के एक संवैधानिक पीठ ने सोमवार को 4:1 के बहुमत से प्रक्रिया का समर्थन किया और कहा कि नोटबंदी की पूरी कवयद वैध तथा समानता के परीक्षण को संतुष्ट करने वाली थी। पीठ में न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर, बी आर गवई, वी रामासुब्रमण्यन, एएस बोपन्ना और बीवी नागरत्ना शामिल थे। इस निर्णय को पढ़ते हुए न्यायमूर्ति गवई ने कहा कि केंद्र सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) के बीच इस बारे में छह महीने तक चर्चाओं का दौर चला तथा ऐसे उपाय को लागू करने के लिए समुचित संपर्क था। उन्होंने कहा कि निर्णय लेने की प्रक्रिया को केवल इसलिए गलत नहीं ठहराया जा सकता कि प्रस्ताव केंद्र सरकार की ओर से आया था।
सर्वोच्च न्यायालय के सामने बुनियादी दलील यह थी कि नोटबंदी का प्रस्ताव रिजर्व बैंक के केंद्रीय बोर्ड की ओर से सामने नहीं आया जबकि आरबीआई ऐक्ट की धारा 26(2) के मुताबिक ऐसा ही होना चाहिए। इस दलील को बहुत वैध नहीं माना जा सकता है क्योंकि रिजर्व बैंक और सरकार के बीच इस विषय पर लंबी चर्चा हुई थी। सवाल तो यह है कि क्या इस प्रश्न को इस स्तर तक उठना चाहिए था क्योंकि निर्णय को बदला नहीं जा सकता है। न्यायमूर्ति नागरत्ना ने बहुमत से अलग मत दिया और कहा कि अगर प्रस्ताव केंद्र सरकार की ओर से उत्पन्न हुआ तो वह धारा 26 (2) के अंतर्गत नहीं आता। यह काम विधायी ढंग से किया जा सकता था और अगर गोपनीयता आवश्यक थी तो इसे अध्यादेश के जरिये अंजाम दिया जा सकता था। यहां यह दोहराना आवश्यक है कि उक्त मामला केवल प्रक्रिया से संबंधित था, न कि लक्ष्यों से।
ऐसे में नोटबंदी को लेकर नीतिगत बहस जारी रहनी चाहिए। सरकार ने एक झटके में 85 फीसदी मूल्य की प्रचलित मुद्रा को चलन से बाहर करने को लेकर कई तर्क दिए थे। सबसे बड़ा लक्ष्य था काले धन को सामने लाना। अन्य लक्ष्यों में नकली मुद्रा के इस्तेमाल को समाप्त करना, आतंकवादियों को वित्तीय मदद बंद करना और अर्थव्यवस्था को औपचारिक बनाकर कर आधार को बढ़ाना शामिल था। उम्मीद यह भी थी कि यह निर्णय डिजिटल अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देगा। नतीजों की बात करें तो जहां बहुत बड़ी तादाद में ऐसे बैंक खाते सामने आए जिनमें बहुत बड़ी तादाद में नकदी जमा थी। बंद की गई नकदी में से 99 फीसदी रिजर्व बैंक के पास वापस आ गई। कर संग्रह के संदर्भ में देखें तो यह निर्णय कोई खास प्रभाव नहीं डाल सका। उदाहरण के लिए चालू वर्ष में केंद्र सरकार की सकल कर प्राप्तियों के सकल घरेलू उत्पाद के 10.7 फीसदी रहने का अनुमान है जबकि 2015-16 में यह 10.6 फीसदी थी।
हालांकि भारतीय अर्थव्यवस्था का डिजिटलीकरण जोर पकड़ रहा था लेकिन नोटबंदी ने इसे गति प्रदान की। कोविड-19 महामारी ने इसे और तेज किया। नोटबंदी के बाद से जीडीपी के प्रतिशत के रूप में प्रचलित नकदी भी बढ़ी है। इसके अलावा हाल के वर्षों में कारोबारी क्षेत्र का प्रदर्शन भी बताता है कि आर्थिक गतिविधियां संगठित क्षेत्र की ओर केंद्रित हुई हैं। बहरहाल, ऐसा असंगठित क्षेत्र की कमजोर स्थिति के कारण भी हुआ होगा, खासकर महामारी के बाद। आलोचकों का यह भी कहना है कि नोटबंदी और वस्तु एवं सेवा कर के क्रियान्वयन ने भी असंगठित क्षेत्र को प्रभावित किया। अर्थव्यवस्था में डिजिटलीकरण के इजाफे और उसके औपचारिक होने से समय के साथ उत्पादकता और कर संग्रह में सुधार होगा। हालांकि प्रगति के लिए एकबारगी प्रचलित मुद्रा बंद करने से अधिक तकनीकी तरक्की और उसे अपनाने की आवश्यकता है।
Date:03-01-23
भारतीय रुपये का डिजिटलीकरणजैमिनी भगवती, ( लेखक पूर्व भारतीय राजदूत, वर्ल्ड बैंक ट्रेजरी के विशेषज्ञ और सेंटर फॉर सोशल ऐंड इकनॉमिक प्रोग्रेस के विशिष्ट फेलो हैं )
भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने 1 दिसंबर को एक डिजिटल रुपये (डीआर) की पेशकश की जिसे केंद्रीय बैंक की डिजिटल मुद्रा (सीबीडीसी) के नाम से भी जाना जाता है। आरबीआई ने चार अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों को डिजिटल रुपये का प्रायोगिक परीक्षण करने के लिए अधिकृत किया है। भुगतान के लिए नकदी जमा करने के बजाय भारतीय लोग अन्य व्यक्तियों और संस्थाओं के साथ हिसाब चुकता करने के लिए डीआर का उपयोग करने में सक्षम होंगे।
इसके बाद नकद रकम का भुगतान करने के लिए किसी व्यक्ति, सूक्ष्म, मध्यम और लघु उद्यमों (एमएसएमई) या अन्य को अपने खातों से अपने बैंकों या एटीएम में जाकर नकद रकम निकालने की आवश्यकता नहीं होगी। इसके बजाय वे इस सुविधा को देने के लिए अधिकृत बैंकों के साथ इस सेवा के लिए पंजीकरण कराने के बाद डीआर भेज सकते हैं या हासिल कर सकते हैं। अच्छी बात यह है कि डिजिटल रुपये के उपयोगकर्ताओं को किसी भी बैंक में खाता खोलने की आवश्यकता नहीं है।
ऐसे में एक विवादास्पद सवाल यह उठता है कि कोई भी डिजिटल रुपये में एक बड़ी राशि क्यों रखेगा जबकि यह नकद रकम के ही बराबर है लेकिन बचत खातों की शेष राशि की तरह इस पर कोई ब्याज नहीं मिलेगा? हालांकि दूसरी ओर डीआर का उपयोग करने का एक फायदा यह है कि बैंक खाते के बिना भी इसे हासिल किया जा सकता है। लेकिन बैंकों को इसमें फायदा होगा क्योंकि उन्हें डीआर बैलेंस पर कोई ब्याज नहीं देना होगा। डीआर के इस्तेमाल से आरबीआई की वित्तीय लागत की बचत के साथ-साथ नोटों की छपाई में और समय-समय पर इन्हें हटाने में लगने वाले निरीक्षण समय की बचत होगी।
नवंबर 2016 में की गई नोटबंदी के कुछ उद्देश्यों में से एक बेहिसाब नकदी की जमाखोरी को खत्म करना भी था। उस समय देश में भारतीय रुपये की कुल मात्रा लगभग 15 लाख करोड़ रुपये थी जबकि 2 दिसंबर, 2022 तक, देश में रुपये वाली मुद्रा की कुल नकद राशि 32 लाख करोड़ रुपये थी। दूसरे शब्दों में दिसंबर 2022 में भारतीय अर्थव्यवस्था में नकदी नवंबर 2016 की तुलना में 2.13 गुना थी।
इसी अवधि में भारत में मौजूदा बाजार दर पर आधारित सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) 1.7 गुना बढ़ गया। इसका मतलब यह दर्शाना नहीं है कि नवंबर 2016 और दिसंबर 2022 के बीच जीडीपी में वृद्धि की तुलना में प्रचलन वाले रुपये की मात्रा में अधिक वृद्धि कहीं से भी अनुचित है। इस तुलना का मकसद यह बताना है कि नोटबंदी के कुछ उद्देश्य पूरे नहीं हुए हैं जिनमें से एक अर्थव्यवस्था में नकदी की मात्रा को नियंत्रित करके अवैध मौद्रिक हस्तांतरण कम करना है।
डिजिटल रुपये का उपयोग करने के फायदों की बात करें तो नकद रुपये के वर्तमान उपयोगकर्ता फटे नोटों या नकली नोटों और रकम नहीं मिलने से जुड़ी शिकायत किए बिना ही डीआर में बड़े पैमाने पर भुगतान करने या पाने में सक्षम होंगे। बेशक नकदीरहित लेनदेन पेटीएम और गूगल पे जैसे आसानी से इस्तेमाल होने वाले माध्यमों के जरिये ही संभव हैं। डिजिटल रुपया और पूंजी हस्तांतरण के अन्य साधनों के बीच अंतर यह है कि डिजिटल रुपया के माध्यम को छोड़कर अन्य सभी माध्यमों के लिए पैसा भेजने वाले और भुगतान पाने वाले दोनों का बैंक खाता होना जरूरी है।
जो लोग डिजिटल रुपये का इस्तेमाल करना चाहते हैं उन्हें केवल बैंकों के साथ डिजिटल रुपया बैलेंस रखने की आवश्यकता होगी, जिसे पूंजी का भुगतान करने या प्राप्त करने के लिए इस सुविधा का इस्तेमाल करने के साथ ही डेबिट या क्रेडिट किया जाएगा। बैंकों को इसके लिए भरोसे का माहौल बनाने के लिए डीआर के आदान-प्रदान के लिए एक सुरक्षित प्रणाली तैयार करने की आवश्यकता होगी। हालांकि, यह सुविधा तभी काम करेगी जब उपयोगकर्ताओं के पास आसानी से इंटरनेट की बाधारहित सुविधा मौजूदा हो। हालांकि यह भी बताया जा रहा है कि इंटरनेट कनेक्टिविटी के बिना लेनदेन की अनुमति दी जा सकती है लेकिन इसके परिणामस्वरूप पर्याप्त डीआर क्रेडिट बैलेंस के बिना भी कई डीआर भुगतान हो सकते हैं। डीआर के इस्तेमाल का प्रसार वास्तविक रूप से केवल तभी किए जाने की उम्मीद की जानी चाहिए जब यह पूरे देश में बेहतर बेहतर इंटरनेट कनेक्टिविटी के साथ मौजूद होगा।
इसके बाद, समय के साथ डिजिटल रुपये के इस्तेमाल का प्रसार भारत के भीतर और यहां तक कि नेपाल और बांग्लादेश जैसे पड़ोसी देशों में भी इन देशों के अधिकारियों के साथ तालमेल बिठाने के माध्यम से संभव है। अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों के विस्तार प्रयासों और केंद्र तथा राज्य सरकारों द्वारा किए जा रहे प्रचार-प्रसार के चलते डिजिटल रुपये के इस्तेमाल को बढ़ावा देने और नकली नकदी वाली गतिविधियों में कमी लाने में मदद मिल सकती है।
यह संभावना है कि जो व्यक्ति या अन्य लोग डीआर का उपयोग करना सीख सकते हैं, उनके पास शायद इन निर्दिष्ट बैंकों में बचत खाते भी होंगे और उन्हें यह पता भी होगा कि बैंक खातों के बीच पूंजी कैसे हस्तांतरित की जाती है। ऐसे व्यक्तियों और एमएसएमई को लग सकता है कि डीआर का उपयोग करने का कोई अतिरिक्त लाभ नहीं है और संभावित उपयोगकर्ता लेनदेन की निगरानी को लेकर सावधान हो सकते हैं हालांकि दावा यह किया जाता है कि डीआर के इस्तेमाल के कोई सबूत नहीं रहते हैं।
जांच एजेंसियों के लिए बड़े मूल्य वाले डीआर हस्तांतरण के प्रेषकों-रिसीवरों की निगरानी करने के कई तरीके भी हो सकते हैं। इस संदर्भ में नवंबर 2016 की नोटबंदी के बाद जमा की गई भारी मात्रा की नकदी से यह स्पष्ट हुआ कि कुछ व्यक्ति और छोटे कारोबार गुमनाम रहने और वस्तु तथा सेवा कर या अन्य कर देनदारियों से बचने के लिए नकदी का इस्तेमाल करना पसंद करते हैं।
दुर्भाग्य से भारत में कई लोग आमतौर पर चार्टर्ड अकाउंटेंट की सहायता से कर अधिकारियों की नजर में आने से बचने के लिए कई अनूठे तरीके ढूंढते हैं। नतीजतन, आरबीआई की डीआर पहल नकदी के इस्तेमाल को कम करने के पूरक कदमों के बिना अब भी बिलकुल नया कदम है।
बड़े नकदी हस्तांतरण को हतोत्साहित किया जा सकता है और सभी अधिक मूल्य वाले नोटों को क्रमिक आधार पर वापस लेकर डिजिटल रुपया को बढ़ावा दिया जा सकता है। उदाहरण के तौर पर 100 रुपये से ऊपर के सभी नोटों को तीन साल की अवधि में वापस ले लिया जा सकता है। इसके बाद, 100 रुपये के नोटों के बड़े बंडलों को कहीं ले आना-ले जाना मुश्किल होगा और इसकी वजह से योजनाबद्ध तरीके से कैमरे की निगरानी का इंतजाम किया जा रहा है।
यह संभावना है कि पड़ोसी देशों में सब्सिडी वाले उर्वरकों की तस्करी में कमी जैसे फायदे मिलेंगे जिसका भुगतान संभवतः बड़े मूल्य वाले नकद नोटों में किया जाता है। नोटबंदी के दावे को हासिल करने में डिजिटल रुपया भी कारगर हो सकता है क्योंकि इसके बाधाकारी परिणाम नहीं देखने को मिलेंगे। दरअसल डिजिटल रुपया बड़े मूल्य वाली नकदी के बराबर भुगतान के लिए विकल्प देगा।
एमएसएमई और कोई भी व्यक्ति जो बड़ी तादाद में नकद भुगतान करना चाहते हैं या देना चाहते हैं वे पूरे भरोसे के साथ इस बात का दावा नहीं कर पाएंगे कि जब उनके पास डिजिटल रुपया का विकल्प आसानी से मौजूद है तब उन्हें नकद रुपये का इस्तेमाल क्यों करना चाहिए।
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5 दिसम्बर का दिन ‘विश्व मृदा दिवस’ या वर्ल्ड सॉयल डे’ के रूप में मनाया जाता है। इस वर्ष इसका शीर्षक ‘सॉयल्स रू वेयर फूड बिगिन्स’ था। यह अवसर है, जब हम हमारे भोजन के आधार तत्व यानि मृदा के स्वास्थ्य को समझें और उस पर ध्यान भी दें। मृदा की गुणवत्ता के स्तर को लेकर चुनौतिया लगातार बढ़ती जा रही हैं।
मृदा स्वास्थ्य का हास और उसके परिणाम –
मृदा- ह्रास के नुकसान बहुत ज्यादा हैं। मानव और पारिस्थितिकी पर इसका प्रभाव बहुत गहरा हो सकता है। इसे देखते हुए भारत ने मृदा-संरक्षण पर रणनीति तैयार की है। कुछ बिंदु –
– मिट्टी को रसायन मुक्त बनाना
– जैव विविधता की रक्षा करना
– मृदा में ऑर्गेनिक तत्वों को बढ़ाना
– मिट्टी की नमी को बनाए रखना
– मृदा-क्षरण को रोकना
सरकार ने अपनी रणनीति को सफल बनाने हेतु कुछ विशेष प्रयास किए हैं –
कृषि पारिस्थितिकी और जैविक खेती जैसे प्रयासों के लिए शिक्षाविदों, नीति-निर्माताओं और समाज के बीच एक प्रकार के सामंजस्य की जरूरत है। किसानों को समय पर और साक्ष्य- आधारित सूचना की उपलब्धता ही केंद्रीय मिशन होना चाहिए। एक एक ऐसा मिशन है, जिसमें ज्ञान, सफल तरीकों और वैश्विक स्तर की धारणीय प्रौद्योगिकी की साझेदारी से जीत हासिल की जा सकती है।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित कोण्डा रेड्डी छावा के लेख पर आधारित। 5 दिसंबर, 2022
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Date:02-01-23
Food Subsidy For ThoughtWith India’s deficit highest among G20 nations, the budget must chart a clear consolidation pathRajeswari Sengupta The writer is Associate Professor of Economics, Indira Gandhi Institute for Development Research
The government has recently announced that it will discontinue the free-food scheme that it started during the Covid pandemic and will instead distribute foodgrains for free under the Public Distribution System (PDS). According to some analysts, this is good news because it will reduce the government’s food subsidy bill. However when looked at closely, this announcement could raise questions about the fiscal conservativeness of the government and also about the direction of agricultural policy.
Let’s try to unravel these issues.
Pandemic effect
During the pandemic, the government’s fiscal deficit understandably soared, as revenues fell and the need for spending increased. But even after the economy has recovered from the pandemic, the fiscal deficit remains large. The deficit of the Centre and states put together is likely to be around 10% this year, the highest among G20 countries. The deficit of the Centre alone is budgeted to be 6. 4% of GDP.
Such a high fiscal deficit is not sustainable. Hence, economists expect the Union Budget, to be presented by the finance minister on February 1 to establish a clear glide path of consolidation, which would ensure that the deficit is brought down over the medium term.
Root of the problem
How does the recent announcement fit into this picture? To answer this question, some background is necessary.
● In March 2020, the government launched the PM-GKAY (PM Garib Kalyan Anna Yojana) free food scheme as a Covid-relief measure.
● The scheme provided 5 kg of free foodgrains (wheat or rice) per person, per month to all families holding a ration card, around 80 crore people.
● The scheme was meant to run from April to November 2020 but wasextended multiple times and most recently to December 2022.
● While being well-intentioned and appropriate as an emergency measure, this scheme imposed a serious fiscal burden on successive Union Budgets.
Accordingly, on December 23, the government announced that it will discontinue the PM-GKAY scheme. Instead, it would provide free foodgrains through the existing PDS system for a period of one year, starting from January 1, 2023. This policy action will supposedly generate savings for the government on account of a reduced food subsidy bill.
Hence, at first glance, it seems that the announcement achieves the right objectives – help the poor and reduce subsidy burden. But does it, really?
● The food subsidy will undoubtedly fall next year, compared to this year, but that is not the right comparison.
● This is because PM-GKAY was meant to be a temporary relief provision to help people tide over the pandemic.
● So, the post-health emergency plan needs to be compared to the prepandemic situation.
● Evaluated against that base, the announcement implies that food subsidy will go upsince (a) the selling prices of PDS grains have been reduced to zero; and (b) the quantities provided have been increased.
● In other words, the scheme will increase the fiscal burden when compared with the pre-pandemic base.
Opening a Pandora’s Box
The medium-term implications could be significant. In the past, there was always the possibility that the government could reduce the budget deficit by raising the prices at which foodgrains were distributed through PDS. But now that the government has made grains free, it will be difficult to start charging the households again. In other words, this announcement commits the government to a scheme that arguably makes it more difficult to achieve mediumtermfiscal consolidation targets.
This announcement is likely to have repercussions for overall agriculturalpolicy as well. The government will now be even more constrained than before as far as raising the minimum support price (MSP) is concerned. If it raises the MSP, its budget will get squeezed further because it will procure the grains at a higher price and then distribute them for free. Yet if it does not raise the MSP, farmers’ income from selling to the government will fall in real terms.
In that case, the farmers may decide to sell to the free market rather than the government. But then, the government will face a shortage of foodgrain stock and will not be able to fulfil its commitment. In other words, over and above fiscal issues, this announcement may have opened a Pandora’s Box.
Good politics, bad economics?
Some may argue that this is nonetheless a good measure, since the government is giving more help to poor people. But the new programme is aimed at 80 crore beneficiaries: Is more than half the country’s population poor? Put another way, why is it necessary to provide free foodgrains tomorrow to people who could afford to pay for them yesterday, when the country is becoming more prosperous every day?
● The main task of the approaching Union Budget is to present a credible plan for reducing the fiscal deficit over the medium term.
● This will be difficult, since most of the major items in the Centre’s budget – interest payments, wages, defence and such like – cannot effectively be reduced.
● Until recently, the largest scope for reduction lay in steadily narrowing the food subsidy, the largest component of discretionary current expenditure.
● But with the recent announcement merging the PM-GKAY into the PDS this option may have been foreclosed.
While this may make for good politics, it reflects questionable economics.
Date:02-01-23
Ayes and naysHigher turnout is worth striving for, but not without sufficient safeguardsEditorial
Given the regional variations in demographic trends and economic opportunities, India has a high rate of migration, which doubled in the census decade of 2001-2011. Migrants often see their political and economic rights compromised at their place of origin and residence. The Election Commission of India (ECI) has now proposed a mechanism to facilitate remote voting for domestic migrants. The Remote Electronic Voting Machine (EVM) prototype can be used for up to 72 constituencies simultaneously from a single, remote polling booth. The ECI has invited political parties for a demonstration of the prototype on January 16. A concept note by the Commission takes into account the legal, operational, administrative and technological challenges at hand. Voter participation is comparatively high in India; yet, in 2019, one in three voters did not turn up. Going by the 2017 Economic Survey, there are around 14 crore internal migrants in the country, and they have to cross many hurdles to be able to vote. Anything that advances their rights must be welcomed. But a hurried move will only do more damage to the integrity of the electoral process, which many fear is eroding, and for valid reasons. The ECI’s recent conduct, including in the 2022 Gujarat Assembly elections, has been less than reassuring.
The ECI proposes to have remote voting for migrants as early as this year. While there is no technical basis for allegations of fraud in the current, single-constituency, non-networked EVMs, public trust in them has never been lower than it is today. Public trust is the only strength of any electoral process. With EVMs, the voter has no way to see whether the vote is recorded as it is cast. The ECI’s ambitious plan comes against this backdrop of public scepticism about its own impartiality and, less justifiably, about the reliability of the EVMs. The proposed plan will add more questions to the mix, including some fundamental ones such as about the correlation between citizenship and territoriality. In an era of unprecedented human mobility, the idea of portable voting rights is worth considering, but it will have far-reaching ramifications that should be accounted for. Defining a migrant who is eligible to vote remotely is going to be controversial — for instance, when does a migrant at a place become a resident? Even the ECI had expressed doubts about the practicality of remote voting rights for migrants in the past. Meanwhile, there is also an active demand for voting rights for Non-Resident Indians. Higher turnout is worth striving for, but not without sufficient safeguards.
Date:02-01-23
A broken formulaSome small savings schemes have been unreasonably left out of the rate hikesEditorial
Last Friday, the government increased the returns on some small savings schemes for the first quarter of 2023 by 20 basis points to 110 basis points, or 0.2 to 1.1 percentage points. These will kick in for eight of the 12 small savings schemes where small investors park their household surpluses through banks and post offices. A similar selective hike was effected for the previous quarter too, after a long 27-month pause in small savings rates, but the range was minimal at 10 to 30 basis points and only applied on five schemes. In the latest review, the highest rate hike of 1.1 percentage points has been granted only for one-, two- and three-year time deposits. For other schemes, the increase is more nominal — 40 basis points for senior citizens and monthly income schemes and just 20 basis points for the National Savings Certificate and Kisan Vikas Patra. Returns on the popular long-term savings avenue, the Public Provident Fund (PPF), have been left unchanged at 7.1%, prevailing since April 2020 when they were slashed from 7.9% at the onset of the pandemic. Neither is there relief for those investing in the Sukanya Samriddhi Account Scheme, launched by Prime Minister Narendra Modi in January 2015 to encourage families to invest in the education of girl children and save for their marriage expenses, under the Beti Bachao, Beti Padhao campaign.
For the October to December quarter, the Reserve Bank of India had estimated that the returns on the PPF should have been 7.72% and the Sukanya Samriddhi Scheme at 8.22%. Having adopted a formula-based approach to resetting small savings rates every quarter since 2016, the government must not resort to selective implementation. There has been no perceptible easing of yields on government securities to which these returns are supposed to be linked, in the last quarter of 2022. Perhaps, the decision to offer the highest gains for shorter tenure deposits is driven by the government’s debt management planning, but the status quo on PPF and other schemes is not fair to the risk-averse middle class. Investments in PPF, for instance, are in any case capped at ₹1.5 lakh a year and overall deposits are far lower than bank deposits, if boosting the latter to ensure healthy credit availability for industry was a concern. Inflation in general has been elevated since the 2020 rate cuts and was above the 6% tolerance threshold through most of 2022, accompanied by sharp interest rate hikes. Households have also grappled with income losses and higher health expenses through the past two and a half years, and deserve better.
Date:02-01-23
मोटे अनाजों की वापसी का वर्षडा. जयंतीलाल भंडारी,( लेखक एक्रोपोलिस इंस्टीट्यूट आफ मैनेजमेंट स्टडीज एंड रिसर्च, इंदौर के निदेशक हैं )
नववर्ष में अधिकांश लोग अपने जीवन को व्यवस्थित बनाने और स्वास्थ्य पर ध्यान देने का संकल्प लेते हैं। देखा जाए तो यह दोनों ही पहलू एक दूसरे जुड़े हुए हैं और उसकी एक अहम कड़ी है खानपान। खानपान सुधारने से बेहतर स्वास्थ्य जीवन को संतुलन प्रदान करने में सहायक होता है। खानपान की बदली आदतों ने भी आज के प्रतिस्पर्धी एवं भागदौड़ भरे जीवन की चुनौतियों को बढ़ाया है। एक समय हमारी पारंपरिक थाली मोटे अनाजों से सजी रहती थी, लेकिन समय के साथ आए बदलाव से मोटे अनाज हाशिये पर जाते गए। कुपोषण और जीवनशैली से जुड़ी तमाम समस्याओं के लिए एक कारण मोटे अनाजों की उपेक्षा को भी माना जाता है। अच्छी बात है कि अब इस दिशा में सुधार के संकेत दिख रहे हैं और उस दृष्टि से यह साल अत्यंत महत्वपूर्ण सिद्ध होने जा रहा है, क्योंकि भारत सरकार की पहल पर संयुक्त राष्ट्र ने इस वर्ष को अंतरराष्ट्रीय मोटा अनाज वर्ष घोषित किया है। सरकार ने इस पहल को सफल बनाने के प्रयास भी आरंभ कर दिए हैं। इसी सिलसिले में बीते दिनों संसद भवन में कृषि मंत्रालय की ओर से एक भोज आयोजित किया गया, जिसमें प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे सहित तमाम दिग्गजों ने भाग लिया। उसमें बाजरे से बनी खिचड़ी, रागी डोसा, रागी रोटी, ज्वार की रोटी, हल्दी की सब्जी और बाजरे का चूरमा सहित कई व्यंजन परोसे गए। इस अवसर पर प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि जी-20 से जुड़े तमाम कार्यक्रमों में मोटे अनाजों से बने व्यंजन शामिल किए जाएंगे। इससे दुनिया भर में मोटे अनाजों की महत्ता बढ़ेगी।
मोटे अनाजों को पोषण का पावर हाउस कहा जाता है। ये सूक्ष्म पोषक तत्वों, विटामिनों और खनिजों का भंडार हैं। छोटे बच्चों और प्रजजन आयु वर्ग की महिलाओं के पोषण में विशेष लाभप्रद होते हैं। शाकाहारी खाद्य पदार्थों की बढ़ती मांग के दौर में मोटे अनाज बढ़िया विकल्प हैं। इनकी खेती भी किफायती होती है, जिसमें ज्यादा देखभाल नहीं करनी पड़ती। इनका भंडारण भी आसान है। अतीत में मोटे अनाज हमारी थाली का एक प्रमुख हिस्सा हुआ करते थे। फिर हरित क्रांति और गेहूं-चावल के दौर में मोटे अनाज लगातार उपेक्षित होते गए। स्थिति यह हो गई है कि हमारे खाद्यान्न उत्पादन में करीब 40 प्रतिशत की हिस्सेदारी रखने वाले मोटे अनाजों की हिस्सेदारी अब सिमटकर 10 प्रतिशत से भी कम रह गई है। वैसे, एशिया और अफ्रीका ही मोटे अनाज के प्रमुख उत्पादन और खपत केंद्र हैं। भारत, सूडान और नाइजीरिया इनके प्रमुख उत्पादक हैं। दुनिया में मोटे अनाजों के उत्पादन का करीब 40 प्रतिशत अभी भी भारत में होता है।
मोदी सरकार ने मोटे अनाजों को मुख्यधारा में लाने के लिए तमाम प्रयास किए हैं। विशेषकर अप्रैल 2018 से सरकार मोटे अनाजों का उत्पादन बढ़ाने के लिए मिशन मोड में काम कर रही है। उनके न्यूनतम समर्थन मूल्य में अच्छी-खासी वृद्धि की है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन के तहत मिलेट के लिए पोषक अनाज घटक 14 राज्यों के 212 जिलों में क्रियान्वित किया जा रहा है। भारत के अधिकांश राज्यों में एक या एक से अधिक मोटे अनाज की प्रजातियां उगाई जाती हैं। राज्यों को विशेष रियायतें दी गई हैं। इसमें तीन महीने के भीतर इन अनाजों के वितरण की अनिवार्यता को समाप्त कर इसे छह से 10 महीने कर दिया गया है। केंद्रीय पूल में इन अनाजों की खरीद का लक्ष्य 2021 के 6.5 लाख टन से बढ़ाकर 2022 में 13 लाख टन किया है। चालू खरीफ सत्र में ही 30 नवंबर तक हरियाणा, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, गुजरात और तमिलनाडु में इस निर्धारित लक्ष्य से अधिक की खरीद हो गई। चालू फसल वर्ष के दौरान 2.88 करोड़ टन मोटे अनाज के उत्पादन का लक्ष्य है और यह लक्ष्य प्राप्त होता भी दिख रहा है।
इस समय मोटे अनाज की अहमियत दो प्रमुख कारणों से उभर रही है। एक तो रूस-यूक्रेन युद्ध से अनाज की वैश्विक आपूर्ति प्रभावित हुई, जिससे कुपोषण का खतरा मंडरा रहा है। इस संदर्भ में संयुक्त राष्ट्र की ‘द स्टेट आफ फूड सिक्योरिटी एंड न्यूट्रिशन इन द वर्ल्ड रिपोर्ट, 2022’ के अनुसार वर्ष 2021 से जहां भारत में 22.4 करोड़ लोग भूख एवं कुपोषण की चुनौती से जूझते रहे तो दुनिया में करीब 76.8 करोड़ लोग इस चुनौती का सामना कर रहे हैं। ऐसे में करोड़ों लोगों के लिए पोषक आहार की व्यवस्था करना आवश्यक है, जिसमें मोटे अनाजों को मददगार के रूप में देखा जा रहा है।
इसमें कोई संदेह नहीं कि मोदी सरकार मोटे अनाजों को प्रोत्साहन देने के प्रति गंभीर है, लेकिन इस दिशा में और प्रयास आवश्यक होंगे। जैसे कि सरकार ने पिछले चार-पांच दशकों में अन्य नकदी फसलों को बढ़ावा देने के उपाय किए हैं, उसी तरह के कदम मोटे अनाजों के संदर्भ में भी उठाए जाएं। देश के कृषि अनुसंधान संस्थानों को मोटे अनाजों पर शोध-अनुसंधान को बढ़ावा देना होगा। सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से गेहूं एवं चावल की तुलना में मोटे अनाज की अधिक आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए मोटे अनाजों की सरकारी खरीद बढ़ानी होगी। हम उम्मीद करें कि अंतरराष्ट्रीय मोटा अनाज वर्ष के मद्देनजर जिस तरह मोटे अनाज को बढ़ावा देने की कोशिश बीते दिनों संसद में दिखी, उसके दूरगामी प्रभाव होंगे। भारत 2023 में जी-20 की अध्यक्षता के दौरान अंतरराष्ट्रीय मोटा अनाज वर्ष के उद्देश्यों एवं फायदों के दृष्टिकोण से वैश्विक स्तर पर जागरूकता प्रसार में सफल होगा। इससे मोटे अनाजों का उत्पादन एवं उपभोग तो बढ़ेगा ही, साथ ही फसल चक्र भी संतुलित होगा और कुपोषण के विरुद्ध युद्ध में भी निर्णायक विजय की ओर कदम बढ़ेंगे।
Date:02-01-23
टकराव की सियासतसंपादकीय
गणतांत्रिक व्यवस्था की मर्यादा है कि केंद्र और राज्य परस्पर मिल कर विकास परियोजनाओं को गति देंगे। राज्यों के विकास में कुछ परियोजनाएं राज्य सरकारें चलाती हैं, तो कुछ केंद्र सरकार। जो महकमे केंद्र के अधीन हैं, उनकी परियोजनाओं का संचालन केंद्र करता है, मगर संबंधित राज्य सरकारों से उनमें अपेक्षित सहयोग की दरकार रहती है। पर जब केंद्र और राज्य में दो अलग दलों की सरकारें होती हैं, तो अक्सर दोनों के बीच सियासी टकराव देखा जाता है। अगर उस राज्य में केंद्र सरकार कोई परियोजना लेकर आती है, तो राज्य सरकार का रुख प्राय: असहयोग का या उदासीन ही देखा जाता है। पश्चिम बंगाल के संदर्भ में यह कुछ अधिक ही है। इसका ताजा उदाहरण हावड़ा से न्यू जलपाईगुड़ी के लिए रवाना की गई पहली वंदे भारत रेल को हरी झंडी दिखाने के मौके पर देखने को मिला। उस कार्यक्रम में नाराज मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मंच पर चढ़ने से इनकार कर दिया और वे नीचे सामने की कुर्सी पर बैठी रहीं। हालांकि उन्हें रेलमंत्री और वहां के राज्यपाल ने मनाने का प्रयास किया, पर वे नहीं मानीं। बताया गया कि वे इसलिए नाराज हो गर्इं कि उन्हें देख कर भाजपा कार्यकर्ताओं ने नारे लगाए। ऐसा पहले भी हो चुका है, जब प्रधानमंत्री की मौजूदगी में ममता बनर्जी अपनी नाराजगी जाहिर करते हुए मंच से नीचे उतर गई थीं।
हालांकि यह कोई अनोखी बात नहीं है, हर राजनीतिक दल के कार्यकर्ता अपने नेताओं के समर्थन और विपक्षी नेताओं के खिलाफ नारेबाजी करते ही हैं। ममता बनर्जी को अपने राजनीतिक जीवन में ऐसी स्थितियों से न जाने कितनी बार दो-चार होना पड़ा होगा। इसलिए उनसे उम्मीद की जाती थी कि वे भाजपा कार्यकर्ताओं की नारेबाजी को नजरअंदाज कर देतीं। मगर यह भी सच है कि मर्यादाओं का पालन दोनों तरफ से अपेक्षित होता है। बेशक वह केंद्र सरकार की परियोजना के उद्घाटन का अवसर था, पर उस राज्य की मुख्यमंत्री अगर वहां अतिथि के रूप में आमंत्रित थीं, तो उनका आदर किया ही जाना चाहिए था। फिर वह ऐसा भी मौका था, जब प्रधानमंत्री की मां का निधन हुआ था और सब शोक में थे, तब कार्यकर्ताओं को सियासी खेल से बचने की जरूरत थी। हालांकि उस घटना को तृणमूल कांग्रेस अपनी नेता के अपमान के रूप में प्रचारित कर रही है, मगर वास्तव में बात इतनी भर नहीं है। असल बात राज्य में केंद्र की परियोजना से जनाधार के इधर से उधर होने के भय की अधिक लगती है।
चूंकि ममता बनर्जी केंद्र सरकार पर सदा आक्रामक देखी जाती हैं, उसकी नीतियों और फैसलों पर एतराज जताती रही हैं, इसलिए वे प्राय: केंद्र सरकार के कार्यक्रमों में असहज महसूस करती रही हैं। यह ठीक है कि राजनीतिक समीकरणों के लिए दलगत आधार पर मतभेद प्रकट करना अनुचित नहीं, मगर किसी परियोजना के उद्घाटन के मौके पर ऐसी नाराजगी या अहंकार का प्रदर्शन ठीक नहीं माना जा सकता। जिस रेल का उद्घाटन किया गया, आखिरकार उसका लाभ राज्य के लोगों को ही मिलेगा। उससे वहां नए रोजगार पैदा होंगे। बेशक कोई केंद्र की परियोजना हो, पर लाभ अगर राज्य को मिल रहा है, तो वहां के मुख्यमंत्री को उससे खुश ही होना चाहिए। इस तरह बार-बार नाराजगी जाहिर करना न तो एक मुख्यमंत्री की गरिमा के अनुकूल कहा जा सकता है और न गणतांत्रिक व्यवस्था की मर्यादा के। राज्य की जनता के हितों को सियासी समीकरणों से परे ही रखना चाहिए।
Date:02-01-23
अंतहीन लड़ाईसंपादकीय
म्यां मार में लोकतंत्र की राह और कठिन हो गई है। वहां की सैन्य अदालत ने देश की लोकतंत्र समर्थक नेता 77 वर्षीय आंग सान सू की को कानून के ऐसे पचड़ों में फंसा दिया है कि जीते जी उनका जेल की सलाखों से छुटकारा पाना बेहद मुश्किल हो गया है। उन्हें सैन्य अदालत ने भ्रष्टाचार के पांच नये आरोपों में दोषी ठहरा दिया है, और सात साल की कठोर कैद की सजा सुनाई है। इनमें प्रमुख आरोप अपनी सरकार के एक मंत्री के लिए हेलीकॉप्टर किराए पर लेने के लिए नियमों का पालन नहीं करने का था। सू की पहले से ही 14 अलग-अलग मामलों में 26 साल की कैद की सजा का सामना कर रही हैं। इस तरह उन्हें अब कुल मिलाकर 33 साल जेल की सजा काटनी पड़ेगी। पिछले 18 महीनों में सू की पर अब तक 19 आरोपों में मुकदमा चलाया जा चुका है। हैरत की बात है कि उन पर मुकदमे की कार्रवाई मीडिया से दूर एकांत में बंद कमरे में चलाई जाती है। उन्हें कानूनी सहायता हासिल करने में भी भारी दिक्कतें डाली जाती हैं, या यों कह सकते हैं कि मुकदमे के वक्त उनके वकील मौजूद नहीं होते। उनके वकीलों पर मीडिया से बात करने पर प्रतिबंध हैं। दुनिया भर के मानवाधिकार संगठन उन पर चल रहे मुकदमों का विरोध कर रहे हैं। सू की पर जो आरोप लगे हैं उनमें कोविड नियमों का उल्लंघन, वॉकी टॉकी का अवैध आयात, गोपनीयता कानून तोड़ना, पद का दुरुपयोग करके सरकारी भूमि को औने-पौने दामों में किराए पर हासिल करने, धमार्थ कार्य के नाम पर जुटाए गए धन से अपना घर बनाने के आरोप शामिल हैं। चुनाव में धोखाधड़ी और देशद्रोह के अत्यंत गंभीर आरोप तो उन पर पहले ही से चल रहे हैं। वर्ष 2021 में हुए तख्तापलट के बाद से सू की जेल में हैं। तब से सैन्य शासन लगातार उनकी सजा बढ़ाता चला आ रहा है। उनके समर्थकों और राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि उन पर लगातार लगाए जा रहे आरोपों का अभिप्रायः सैन्य शासन के सत्ता पर कब्जे को वैध बनाने की कोशिश है। म्यांमार की जनता का दुर्भाग्य है कि सैन्य शासन उनके लोकतंत्र समर्थक आंदोलन का बर्बरता से दमन कर रहा है, और संयुक्त राष्ट्र सहित पूरा विश्व समुदाय उनकी और से आंखें मूंदे हुए है। नोबेल पुरस्कार विजेता 77 वर्षीय सू की को 33 साल जेल की सजा से लड़ाई अंतहीन हो गई है।
Date:02-01-23
स्वदेश धन भेजने में आगे निकलते भारतवंशीफ्रैंक एफ इस्लाम,( अमेरिकी उद्यमी व समाजसेवी )
भारतवंशी बड़ी मात्रा में धनराशि भारत भेज रहे हैं। विश्व बैंक की रिपोर्ट से पता चलता है कि इस मद में हर साल भारत आने वाली राशि 100 अरब डॉलर के शिखर को छूने के लिए अग्रसर है। पहली बार यह देश इस मील के पत्थर को पार करेगा। भारतवंशियों का दुनिया में सबसे बड़ा डायस्पोरा है, जिसकी संख्या करीब 3.20 करोड़ है । ‘माइग्रेशन ऐंड डेवलपमेंट ब्रीफ’ का 37वां संस्करण पिछले वर्षों के दौरान प्रवासन और पैसा भेजने में बढ़त के साथ-साथ नीति और नियामक बदलावों को दर्ज करता है। यहां भारत के लिए दो खास चमकदार पहलू हैं। पहला उज्ज्वल पहलू अमेरिका का भारत में पैसा भेजने में शीर्ष स्रोत के रूप में उभरना है। 2020-21 में अमेरिका ने भारत को उसके कुल धन प्रेषण का 23 प्रतिशत दिया। अमेरिका से भारत में प्रेषण 23 अरब डॉलर तक पहुंच जाएगा।
अमेरिका से धन भेजने के मामले में शीर्ष पर रहने वाले भारतीय डायस्पोरा को आश्चर्य से नहीं देखना चाहिए। 25 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था के साथ अमेरिका दुनिया का सबसे अमीर देश है । यह सबसे बड़े भारतीय डायस्पोरा का भी घर है, वैश्विक भारतीय डायस्पोरा का हर छठा सदस्य अमेरिका में रहता है। यह दुनिया के सबसे समृद्ध डायस्पोरा में से एक है। हालांकि, ऐतिहासिक रूप से खाड़ी सहयोग परिषद (जीसीसी) के छह देशों में मौजूद भारतीय डायस्पोरा स्वदेश धन भेजने के मामले में आगे रहा है।
दशकों से भारतीय राजनेताओं व नौकरशाही हलकों जुबान में चर्चा होती थी कि अमेरिका के अनिवासी भारतीय बहुत अमीर होने के बावजूद धन भेजकर पर्याप्त मदद नहीं करते हैं। एक विश्लेषण से पता चलता है कि प्रेषण में पहले स्थान पर आने में अमेरिका की अक्षमता भारतीय डायस्पोरा द्वारा धन रोके रखने की वजह से नहीं है, बल्कि इसके दो कारण हैं। पहला, एक दशक पहले तक संयुक्त अरब अमीरात और सऊदी अरब में प्रवासी भारतीयों की संख्या अमेरिका की तुलना में अधिक थी । दूसरा, अरब क्षेत्र में गुजर कर रहे भारतीयों के पास ज्यादा विकल्प नहीं हैं। एक बार जब वह सेवानिवृत्त हो जाते हैं, तो उनके द्वारा उन देशों में अर्जित और संचित लगभग पूरी धनराशि भारत चली आती है। दूसरी ओर, भारतवंशी अमेरिकी नागरिक बन सकते हैं। आवास और सेवानिवृत्ति संबंधी योजनाओं में निवेश कर सकते हैं। हाल के वर्षों में दो चीजें बदली हैं। सबसे पहले अमेरिका में भारतीय डायस्पोरा के आकार में नाटकीय वृद्धि हुई है, इनकी आबादी अब 50 लाख पर पहुंचने वाली है। दूसरी चीज, प्रौद्योगिकी, संचार व परिवहन में खूब वृद्धि हुई है, जिसने अमेरिका और भारत की दूरियों को कम कर दिया है। हाल के वर्षों में परिवार के सदस्यों को पैसा भेजने के अलावा बहुत सारे भारतीय अमेरिकियों ने भारत में भूमि व उद्यमों में भी निवेश किया है। यहां पैसा भेजना बेहद आसान हो गया है।
इन सब कारणों के चलते अमेरिका से भारत में नकदी प्रवाह में काफी वृद्धि हुई है। 2021 में कुल अंतरराष्ट्रीय रेमिटेंस या प्रेषण में विकसित देशों की हिस्सेदारी 36 फीसदी से ज्यादा थी। विश्व बैंक की रिपोर्ट का दूसरा चमकदार पहलू यह है कि भारत को भेजी जाने वाली राशि उन विपरीत हालात से प्रभावित नहीं हुई है, जिनका वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दुष्प्रभाव पड़ा है। भारत दक्षिण एशिया का एकमात्र देश है, जिसने प्रेषण में दहाई अंकों की वृद्धि दर्ज की है, पिछले वर्ष की तुलना में 12 प्रतिशत वृद्धि । इसकी तुलना में वैश्विक स्तर पर प्रेषण की अपेक्षित वृद्धि 4.9 प्रतिशत ही रही है। दुनिया में प्रेषण के रूप में भेजा गया हर आठवां डॉलर भारत को जाता है। भारत के बाद प्रेषण का दूसरा सबसे बड़ा लाभार्थी मेक्सिको (60 अरब डॉलर) है। इसके बाद चीन (51 अरब डॉलर) व फिलीपींस (38 अरब डॉलर) का स्थान है।
कुल नतीजा सामने है, 23 दिसंबर को भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 563.5 अरब डॉलर था, दुनिया में पांचवां सबसे अधिक। सिर्फ चीन, जापान, स्विट्जरलैंड और रूस के पास इससे बड़ा विदेशी मुद्रा भंडार है। जाहिर है, जो भारतवंशी आज अपनी मातृभूमि के प्रति प्रेम और वफादारी दिखा रहे हैं, वे कल भारत को विश्व गुरु बनाने में मददगार होंगे।
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अमेजॉन कंपनी केवल भारत ही नहीं, बल्कि विश्व स्तर की बहुत बड़ी कंपनी है, जो सैकड़ों रोजगार उपलब्ध कराती है। फिलहाल यह कंपनी बड़ी छंटनी कर रही है। इसका प्रभाव भारत के भोजन डिलीवरी, किराना, ऑनलाइन ट्यूशन आदि क्षेत्रों के रोजगार पर पड़ने वाला है। ये सभी क्षेत्र स्थानीय व्यवसायों से प्रतिस्पर्धा में उलझे हुए है। इसके चलते अमेजॉन के कॉर्पोरेट पुनर्गठन में बदलाव के कारण इन क्षेत्रों में छंटनी की जा रही है।
भारत पर इसका प्रभाव
इस सबसे ऊपर भारत में ई-कॉमर्स अभी भी सबसे तेजी से बढ़ रहा है। 2022-23 के प्रत्यक्ष विदेशी निवेश में कमी की आशंका के बावजूद हार्डवेयर और सॉफ्टवेयर में इसकी हिस्सेदारी बढ़ती जा रही है। भारत के व्यापार का वातावरण सकारात्मक रूप से आगे बढ़ रहा है। टाटा और रिलायंस जैसी देशी कंपनियां, ई-कामर्स में अमेजॉन और फ्लिपकार्ट को कड़ी टक्कर दे रही हैं। वैश्विक प्रौद्योगिकी कंपनियों को बढ़ती जांच का सामना करना पड़ रहा है। फोन पे और गूगल पे को ऑनलाइन भुगतान में अपनी बाजार-हिस्सेदारी को कम करने की समय सीमा दे दी गई है। व्हाट्सएप की तरह अन्य पर दूरसंचार विभाग का अनुपालन बोझ बढ़ाया जा रहा है। इस वातावरण में अमेजॉन के कार्पोरेट बदलाव को समझा जा सकता है। हो सकता है कि वह भारतीय बाजार में दांव लगाने की नई लाभदायक गुजांइश तलाशने का प्रयत्न कर रहा हो।
बात यह है कि कोविड का दौर थमते ही शुरू हुई नई कंपनियों और स्टार्टअप से रोजगार की उम्मीदें बंधी हुई हैं। विडंबना यह है कि हमारे देश में सरकार पचहत्तर हजार से ज्यादा स्टार्टअप होने का दावा कर रही है। लेकिन उनमें नौकरियों का अकाल पड़ना शुरू हो गया है। इस स्थिति से बाहर निकलने के लिए घरेलू कंपपियों को तेजी से विस्तार करना होगा। इससे ही संकट का कुछ समाधान हो सकता है।
‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 3 दिसंबर 2022
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Date:31-12-22
Regaining Lost VotesRemote voting for migrants is a great ideaTOI EditorialsThe Election Commission’s decision to test the possibility of remote voting for migrant workers will deepen democracy. Sections of government personnel vote through postal ballots. Since Covid, this facility is available to elderly over 80. But extending voting rights to migrant workers involves far greater numbers and will be through a customised EVM machine that can reportedly cater to 72 constituencies.
The 2016-17 Economic Survey tracked annual interstate travel to estimate 6 crore migrant workers between 2001 and 2011. Census 2011 enumerated 45. 6 crore migrants, nearly 40% of India’s population. These are huge numbers, suggesting why a large chunk of India isn’t exercising voting rights. The 2020 Bihar and 2022 UP polls clearly point to disenfranchisement of migrant workers. Male electors outnumbered female electors by 40 lakh in Bihar but just 3 lakh more men voted than women, equating to male turnout of 55% and female 60%. Similarly, male electors outnumbered females by 1. 1 crore in UP, but just 45 lakh more men voted than women (male turnout was 50%, female 62%).
With land, kinship, and sentimental ties to their native state, asking migrants to transfer their vote to the location of work is a sub-par option. The ability to cast votes is key to getting one’s voice heard in the political process. Lack of opportunities triggers most migrations. The exodus of over 1 crore migrant workers during the Covid lockdown hardly became an electoral issue anywhere. With migrants getting to vote, candidates and big netas will have to court this demographic and address their concerns. EC must convince political parties to support this game-changing initiative.
Date:31-12-22
In the new evolving world, India needs a new visionThe foundation for this new vision is a harmonious and inclusive society that embraces India’s unique plurality; incrementalism using existing tools, structures and processes may not sufficeShashi Tharoor is a Congress Member of Parliament and former United Nations Under Secretary General. Praveen Chakravarty is a senior office bearer of the Congress party and a political economist
The year 2022 can perhaps be best summarised by a quote by Vladimir Lenin: ‘There are decades where nothing happens; and there are weeks where decades happen.’
The year began with the ostensible vanquishing of the COVID-19 pandemic, thanks to the remarkable collective vaccination efforts of science, business and governments across the world. This significant accomplishment promised to restore normalcy in daily lives and rekindle the doused human spirit.
Alas, that was not meant to be. Just two months into the new year, the fallibility of the human mind reared its head in the form of the Russia-Ukraine conflict, throwing the world into disarray again. A global war, soon after a pandemic was both rare and unfathomable. Retaliatory economic sanctions and weaponisation of trade dependencies have triggered woes of inflation, recession and gas shortage in winter, making lives miserable for millions.
‘Foe trade’ and an aggressive China
The era of innovative consumer technologies from America and Europe, mass produced in Taiwan, Korea and Japan, and consumed in China, Brazil and India, seems to be nearing its end. America is now championing trade restrictions against its enemies, promoting trading blocs among its allies and incentivising domestic production through large financial assistance. Trusted free trade among nations has turned into distrustful ‘foe trade’, leading to formation of ‘friend trade’ groups and the glorification of ‘economic nationalism’.
India’s explosive exports growth over the last four decades has helped create millions of jobs, bring in valuable foreign reserves, and spurred domestic production and consumption. India stands to gain from the established trade order and can ill afford to get squeezed in the emerging bipolar world of western and Russia-China trading blocs.
In the midst of such profound global changes comes the sudden, and incomprehensible military aggression by China against India. China’s advances into Indian territory are both undeniable and unacceptable. The timing and rationale of China’s military threat are intriguing and, purportedly, has a larger motive than just territorial interests across India’s borders. China has managed to engineer a realignment of the world order through strategic use of debt diplomacy, economic power and a ‘common enemy’ doctrine. The Chinese threat is neither just a border dispute with India nor an isolated bilateral conflict. It marks a fundamental reshaping of global forces.
China’s economic might as the factory of the world is what gives it the confidence and the power to indulge in such aggression. Knee-jerk reactions such as trade restrictions and economic sanctions against China by western powers are blunt measures that will backfire. The counter to a Sino-centric world order is an economically powerful India.
Social harmony is a necessary condition
Factories employing millions of people producing billions of dollars of goods and services for the world in a thriving India is the strongest response to China. But social harmony is a necessary condition for India’s rise as an economic power. Factories cannot afford to differentiate amongst people of multiple identities working together, sowing distrust and hatred on the basis of workers’ religion, identity, caste or class. Ability is all that matters.
If we accept that India’s economic power holds the key to its internal security, then it follows that India’s social harmony is the foundation of its edifice. It is in this context that the ongoing Bharat Jodo Yatra led by Rahul Gandhi is significant. Sadly, India’s communal harmony is under threat, but of our own doing. There is a lurking danger of one stray communal incident erupting into large-scale violence and unrest. A communally divided India on tenterhooks is a gift to our enemies. Tormented sections of our society can be easy targets for a preying attacker. The yatra is a momentous effort to heal communal wounds and strengthen the nation’s social fabric to help surmount the geopolitical and economic challenges facing the nation and the world.
Cliched as it may sound, 2022 may go down in history as the year when the global equilibrium that lasted many decades and reaped tremendous benefits was disrupted. Seemingly rational pursuits of peace and prosperity are not the sole or even primary motivator for all nations and leaders. We must contest this ‘no more shared rational pursuits’ premise for the emerging new world order.
It is time to re-imagine India’s overall strategy and re-evaluate our normative policy framework in this backdrop of an irrational world. We need a holistic military, diplomatic, social and economic strategy and not be afraid to challenge conventional wisdom.
There is an imminent need to modernise and augment our defence capabilities with state-of-the-art weaponry and not be held hostage to antiquated military purchase norms and processes.
A belligerent and hostile China will reaffirm who India’s active friends are and who merely observes from the sidelines. The established foreign policy doctrine of non-alignment may now conflict with India’s growing need for trade and market access in the new economic world order, and may need to be re-envisioned. India needs a bolder geo-economic strategy to gain preferential access to unique technologies and capital from other nations in return for domestic market access.
India’s politics will need to craft a new social contract with citizens, as the traditional tools of welfare and governance turn creaky and the gap between the haves and have-nots widens further. India’s economic road map will have to factor in environmental concerns, move away from the monopolies model of private enterprise, carve a new inclusive, labour market focused economic development path of production, and not chase financialisation-driven GDP growth that has lost relevance for the common person.
Look at decentralisation
India’s political governance model calls for greater decentralisation and federalism reforms to cater to widening divergence among States. Centralisation played a critical role in holding together and building the republic in the first half a century after Independence. The time has now come to let go and move away from a ‘one nation one policy’ mindset. Stronger institutions are a necessary condition for greater decentralisation. Reforming public institutions with more powers, autonomy, resources and accountability is essential.
In a nutshell, the nation needs a new vision in the new world. But the foundation for this new vision is a harmonious and inclusive society that embraces India’s unique plurality.
Incrementalism using existing tools, structures and processes may not suffice. It requires the collective efforts of all leaders across the political spectrum to come together and craft a new vision, for which the onus rests with the Prime Minister. We sincerely hope for the sake of our beloved country and its beautiful people that a new awakening awaits.
Date:31-12-22
A strong case exists for marriage equalityWith the judiciary presenting strong equality-based reasoning in ‘Navtej Singh’, the exclusion of marriage rights appears difficult for the state to justifyShivani Vij is an advocate practising in Delhi
A recent statement by a Member of Parliament that same-sex marriages are against the (so-called) cultural ethos of India has once again stirred up the debate on marriage equality. This is amidst a petition for marriage rights of same-sex couples (under the Special Marriage Act, 1954) pending before the Supreme Court of India. The most obvious hurdle in adjudication seems to be the legitimacy of the institution — i.e., whether courts should intervene in marriage rights or leave it to the wisdom of Parliament. However, another factor that may guide the Court urging it to intervene here is that it previously decriminalised consensual same-sex conduct on the basis of the ‘right to equality’ and not merely the ‘right to privacy’. The question then is: how difficult is the present challenge to (no) marriage rights?
An aspect to the LGBTQ community’s legal battle has been whether the law criminalising sexual conduct has been violative of the right to privacy or the right to equality. In the former, one’s sexual orientation and choice of a sexual partner were held intrinsic to privacy and personal liberty. In the latter, equal treatment of same-sex couples with those of heterosexual couples was considered paramount. As argued by lawyer Jonathan Berger, this makes a difference because while a privacy analysis calls for a complete ‘hands-off’ approach from the state where it should not interfere, an equality analysis requires the state to take positive steps to ensure equal treatment in all spheres of life. Thus, once equal treatment with heterosexual persons is established, it ought to become simpler to seek sequential rights of equalising age of consent, prohibiting employment discrimination, rights in marriage, adoption etc.
Comparative law
The European Court of Human Rights, in Dudgeon vs UK (1981), struck down the offence of buggery in Northern Ireland as violative of Article 8 of the European Convention on Human Rights because it disproportionately restricted personal and family life. This restriction cast on the most intimate part of personal life could not be justified by any pressing social need. The court thus adopted a privacy approach and did not go into the question of equal treatment under Article 14. It could be argued that this made it difficult for a same sex couple, in Oliari vs Italy, to seek marriage rights in Italy. Here, the court reasoned that states could not be obligated to grant marriage equality, provided there was some form of legal recognition of their rights. Moreover, that many European countries had not yet granted marriage rights and only recognised civil partnerships shaped the court’s decision.
On the contrary, a conscious decision by LGBTQ lawyers and activists in South Africa to litigate rights based on ‘equality’ made sure they won successive battles, beginning with constitutional protection of ‘sexual orientation’ and judicial recognition of marriage, adoption, etc. Dealing with decriminalisation in National Coalition for LGBTQ (1998), Justice Ackermann compared the privacy and equality approaches and opined how the latter was enabling and granted greater protection to homosexual persons. Thus, in Fourie (2005), the Constitutional Court rejected the state’s argument that the Constitution only protected the right to establish family in private life without state interference and not to marry. Exclusion to marry was considered antithetical to equality and dignity and permitting it would have meant that marriage of a homosexual couple was inferior or of lesser worth. This was constitutionally impermissible.
The U.S. dealt with this quite differently since it decriminalised same-sex relations (Lawrence vs Texas 2003) and granted marriage equality (Obergefell 2015), both under the due process clause of the Fourteenth Amendment of its Constitution, which prohibits the state from taking away personal liberties without substantive and procedural fairness. The focus was thus on personal liberty.
A decriminalisation
Though belated, India adopted the South African approach in Navtej Singh (2018). The top court read down Section 377 IPC and decriminalised consensual sexual conduct on the basis that it created an unreasonable classification for same-sex persons under Article 14, besides being violative of bodily autonomy under Article 21. As per the majority, unequal treatment to homosexual persons meant that they were treated as a separate class of citizens. Any classification that perpetuated stereotypes was violative of Article 15. Further, sexual orientation implicated both negative and positive obligations on the state. Besides non-interference, it called for a recognition of rights to ensure true fulfilment of same-sex relationships. Previously, even in NALSA (2014), the Court acknowledged the importance of sequential rights arising from ‘gender identity’ (employment, health care, education, equal civil and citizenship rights).
Evidently, the Court focused on an all-encompassing meaning of equality in all spheres of life, essential for dignified living to overcome prejudice. With this strong equality-based reasoning, which is a notch higher than mere protection of privacy, the exclusion of marriage rights (under challenge) appears difficult for the state to justify. The foundation of equal treatment thus ought to pave the way for marriage equality in India and not be left to the vagaries of the legislature. This would be significant in the Indian context where marriage holds a special cultural and religious value, a denial of which may reinforce the stigma faced by same-sex couples. The Court may be the only hope in claiming sequential rights where no active steps have been taken by the Government since the Court’s decision in 2018.
Date:31-12-22
भारत-नेपाल संबंधों को लेकर सवालडा. एनके सोमानी, ( लेखक राजनीतिशास्त्र के सहायक प्राध्यापक हैं )
नेपाल में एकाएक बदले राजनीतिक समीकरणों में कम्युनिस्ट पार्टी नेपाल-माओवादी सेंटर (सीपीएन-एमसी) के मुखिया पुष्प कमल दहल उर्फ प्रचंड देश के नए प्रधानमंत्री बन गए। इस पूरे घटनाक्रम में उस वक्त नाटकीय मोड़ आया जब गठबंधन सरकार में शामिल प्रचंड पाला बदलकर ओली के खेमे में चले गए। प्रचंड तीसरी बार नेपाल के पीएम बने हैं। पूर्व में वह पहली बार 2008 से 2009 और दूसरी बार 2016 से 2017 तक प्रधानमंत्री रहे हैं। यह नेपाल में राजनीतिक अस्थिरता के परिदृश्य को भी दर्शाता है।
नेपाल की 275 सदस्यीय प्रतिनिधि सभा के लिए नवंबर में चुनाव हुए थे। चुनाव में किसी भी दल को बहुमत न मिलने के कारण पिछले कुछ दिनों से सरकार निर्माण के लिए राजनीतिक दलों के बीच बैठकों और वार्ताओं का दौर चल रहा था। जनादेश में शेर बहादुर देउबा की नेपाली कांग्रेस 80 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी। ओली की पार्टी को 78 और प्रचंड की पार्टी को महज 30 सीटें मिलीं। इसके बावजूद वह नेपाली कांग्रेस के साथ गठबंधन में पहले ढाई साल के लिए पीएम बनना चाहते थे। दूसरी ओर नेपाली कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी के रूप में सरकार का नेतृत्व करने पर अड़ी हुई थी। राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी द्वारा प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के लिए निर्धारित समय सीमा रविवार को शाम पांच बजे समाप्त हो रही थी। देउबा के साथ बातचीत विफल होने के बाद प्रचंड प्रधानमंत्री पद के समर्थन के लिए कम्युनिस्ट पार्टी आफ नेपाल-यूनाइटेड मार्क्सवादी लेनिनवादी (सीपीएन-यूएमएल) के अध्यक्ष केपी शर्मा ओली के आवास पर पहुंचे। वहीं सत्ता में साझेदारी के समीकरणों पर अंतिम सहमति बनी।
सहमति की शर्त के अनुसार सीपीएन-यूएमएल समेत छह पार्टियों के समर्थन से प्रचंड पहले ढाई साल के लिए नेपाल की कमान संभालेंगे और अगले ढाई साल के लिए सीपीएन-यूएमएल के नेता केपी शर्मा ओली नेपाल के पीएम होंगे। प्रचंड के ओली के गठबंधन में शामिल होने के बाद नेपाल की तीनों प्रमुख कम्युनिस्ट पार्टी के नेता प्रचंड, ओली और माधव कुमार नेपाल एक खेमे में आ गए हैं। प्रचंड और ओली, दोनों भारत विरोधी माने जाते हैं। ऐसे में सवाल यह है कि आने वाले दिनों में भारत-नेपाल संबंध किस दिशा में आगे बढ़ेंगे। यह सवाल इसलिए भी वाजिब लग रहा है, क्योंकि चुनाव प्रचार अभियान के दौरान ओली यह कह चुके हैं कि अगर वह सता में आते हैं तो भारत के क्षेत्र कालापानी, लिपुलेख और लिंपियाधुरा को वापस लेकर रहेंगे। यह क्षेत्र सदियों से भारत का हिस्सा है। अब प्रचंड के साथ ओली भी सत्ता में है, तो निश्चित ही चुनावी वादा पूरा करने के लिए वह भारत के साथ तनाव को हवा देंगे। दूसरा, ओली की चीन परस्ती पहले से जगजाहिर है। हालांकि, नेपाली कांगेस के साथ काम करते हुए प्रचंड के भारत विरोधी रुख में कुछ बदलाव जरूर आया और चुनाव से पहले वह भारत भी आए थे। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि वह चीन की रणनीतिक चाल को समझने भी लगे हैं। फिर भी, उनके अतीत और अस्थिर रवैये को देखते हुए यह सवाल परेशान करता है कि गठबंधन के प्रमुख सहयोगी के दबाव में अगर प्रचंड का चीन प्रेम जाग उठा तो भारत नेपाल को लेकर उत्पन्न होने वाली रणनीतिक चुनौतियों से कैसे निपटेगा।
नवंबर 2019 में नेपाल में ओली की सरकार थी। उस वक्त कालापानी इलाके पर नेपाल ने दो-टूक कह दिया था कि भारत को इस क्षेत्र से हट जाना चाहिए और नेपाल भारत को एक इंच जमीन भी नहीं देगा। उस वक्त भी यह सवाल उठा था कि ओली की इस आक्रामक भाषा के पीछे कहीं चीनी मंसूबे तो नहीं हैं। वहीं, 2014 में नरेन्द्र मोदी की नेपाल यात्रा के दौरान तत्कालीन नेपाली प्रधानमंत्री सुशील कोइराला ने कालापानी का मुद्दा उठाया था और कालापानी पर नेपाल का अधिकार बताते हुए इसे हल करने की अपील की थी। दरअसल, 1996 में कालापानी इलाके के संयुक्त विकास के लिए महाकाली संधि के तुंरत बाद बाद नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टियों ने कालापानी पर दावा करना शुरू कर दिया। उधर, चीन लंबे समय से इस इलाके पर कब्जा करने की कोशिश करता रहा है। चीन की शह पर ही नेपाल में यदा-कदा कालापानी को लेकर प्रदर्शन होते रहे हैं। यह वही जगह है, जहां भारत 1962 के युद्ध में चीन के साथ मजबूती से डटा हुआ था। भारत को डर है कि अगर कालापानी नेपाल के अधिकार क्षेत्र में चला गया तो चीन वहां अपने पांव जमा लेगा। भारत की घेराबंदी में जुटे चीन की भी यही साजिश दिखती है।
चीन की महत्वाकांक्षी परियोजना ‘वन बेल्ट-वन रोड’ में सहयोगी होने और व्यापारिक हितों के कारण कुछ समय से नेपाल का झुकाव भारत से अधिक चीन की ओर हुआ है। नवंबर 2019 में प्रधानमंत्री मोदी ने काठमांडू में हुए बिम्सटेक सदस्य देशों के समक्ष सैन्य अभ्यास का प्रस्ताव रखा तो ऐन वक्त पर चीन के दबाव मे नेपाल ने इस सैन्य अभ्यास में शामिल होने से कन्नी काट ली, लेकिन बाद में उसने चीन के साथ सैन्य अभ्यास में भाग लिया। जबकि पारंपरिक रूप से भारत और नेपाल समान संस्कृति और साझा मूल्यों वाले पड़ोसी हैं। इसके बावजूद दोनों देशों के संबंध एक व्यूह में फंसकर रह गए हैं तो इसकी एक बड़ी वजह कहीं न कहीं नेपाल का चीन प्रेम ही है। नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के सभी धड़े भारत विरोधी और चीन समर्थक रहे हैं। इसलिए ओली के समर्थन से बन रही नेपाल की नई सरकार के साथ भारत के रिश्तों को लेकर संदेह के बादल गहराना स्वाभाविक है। संदेह के इन बादलों के छंटने में समय लग सकता है।
Date:31-12-22
वर्षांत की हकीकतसंपादकीय
सरकार ने कोविड संबंधी कार्यक्रम के तहत नि:शुल्क खाद्यान्न वितरण योजना को बंद कर दिया और उसे सार्वजनिक वितरण प्रणाली यानी पीडीएस के माध्यम से वितरित करने की घोषणा की है। अब तक पीडीएस के तहत चावल तीन रुपये किलोग्राम, गेहूं दो रुपये किलोग्राम और मोटा अनाज एक रुपये किलोग्राम की दर पर बेचा जाता रहा है। इन पर औसतन 90 प्रतिशत तक की सब्सिडी दी जाती है। यानी यह लगभग मुफ्त बिकता है। इस आवरण के परे देखने पर पता चलता है कि नि:शुल्क या 90 फीसदी सब्सिडी के साथ वितरित किए जाने वाले अनाज की कुल मात्रा में कमोबेश 50 फीसदी की कमी आ रही है। केंद्र सरकार के वित्त की बात करें तो इसके आवंटन में काफी कमी आएगी। नि:शुल्क अनाज की पेशकश करने वाले राज्यों की भी काफी बचत होगी क्योंकि पूरा बिल केंद्र चुका रहा है।
राजकोषीय अनुशासन की बात करें तो जो हो चुका उसका कुछ नहीं किया जा सकता है। केंद्र सरकार की खाद्य, उर्वरक और पेट्रोलियम सब्सिडी को एक साथ रखकर देखा जाए तो वह जीडीपी का 2.5 फीसदी है। यह स्तर एक दशक पहले भी था। यह आंशिक तौर पर इसलिए है कि पेट्रोलियम सब्सिडी (जो कुल सब्सिडी बिल का एक तिहाई था) बिल काफी कम हुआ है। ताजा निर्णय के बाद अगले वर्ष खाद्य सब्सिडी बिल भी जीडीपी की तुलना में कम होगा। उर्वरक सब्सिडी में कमी आएगी या नहीं यह बात काफी हद तक यूक्रेन में चल रहे युद्ध पर निर्भर करेगी। अनुमान तो यही है कि सब्सिडी बिल में काफी कमी आएगी।
सरकार के निर्णय की बात करें तो दिक्कत राजकोषीय गणित में नहीं बल्कि इस बात में है कि यह दो हकीकतों से किस प्रकार निपटता है। एक का संबंध खेती की आर्थिकी से है और दूसरे का रिश्ता देश की अधिसंख्य कामगार आबादी के आय के स्तर से है। कृषि की बात करें तो अधिकांश किसानों को उर्वरक पर भारी सब्सिडी, नि:शुल्क पानी और बिजली आदि मिलते हैं। भारत कृषि के मामले में दुनिया में सबसे कम मेहनताना देने वाले देशों में शामिल है। इसका भी फायदा मिलता है। कुछ सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण फसलों के लिए किसानों को खरीदार और मूल्य की गारंटी भी मिलती है। ऐसे में खेती से जुड़ा स्वाभाविक जोखिम अपने आप समाप्त हो जाता है। इसका नतीजा यह है कि महंगे और किफायती कच्चे माल के इस्तेमाल में किफायत बरतने को खास प्रोत्साहन नहीं मिलता। कई फसलों की बात करें तो उनकी उत्पादकता अंतरराष्ट्रीय स्तर से काफी कम है। थोक सब्सिडी के कारण एक ऐसा क्षेत्र व्यवहार्य नहीं बन पा रहा है जो बहुत कम वेतन स्तर पर देश के आधे रोजगार मुहैया कराता है।
आय के स्तर की बात करें तो असंगठित क्षेत्र के जो 27.7 करोड़ श्रमिक सरकार के ई-श्रम पोर्टल पर पंजीकृत हैं, उनमें से 94 प्रतिशत की मासिक आय 10,000 रुपये से कम है। बमुश्किल 1.5 फीसदी की मासिक आय 15,000 रुपये प्रति माह से अधिक है। देश की कुल श्रम शक्ति में असंगठित क्षेत्र के श्रमिकों की हिस्सेदारी करीब 80 प्रतिशत है। इनमें से दो-तिहाई कृषि कार्य में संलग्न हैं। वहीं सर्वे बताते हैं कि आय का स्तर गैर कृषि आय के स्तर के एक चौथाई के बराबर है। हकीकत में देखें तो मुद्रास्फीति समायोजित कृषि वेतन भत्ते बीते पांच वर्षों में काफी कम हुए हैं। मेहनताने का स्तर एक स्वघोषित आंकड़ा होता है जो बीते चार दशकों में प्रति व्यक्ति आय में हुए पांच गुना इजाफे से टकरा सकता है। अतिरिक्त आय में से पूरी की पूरी उच्चतम स्तर के समूह के पास तो नहीं गई होगी। गरीबी के घटते स्तर से यह बात साबित भी होती है। खपत की आदतों और टिकाऊ उपभोक्ता वस्तुओं की खरीद को लेकर भी विरोधाभासी आंकड़े हैं जो बढ़ती मध्यवर्गीय श्रेणी की ओर इशारा करते हैं। अगर हालात उतने बुरे हैं जितना बताया जा रहा है तो भी क्या मुफ्त अनाज ही समस्या का हल है? अधिकांश कामगारों को पीडीएस दर पर परिवार के लिए एक माह का राशन खरीदने में एक दिन से अधिक का मेहनताना नहीं लगता है। अनाज को नि:शुल्क करने से कोई खास बदलाव नहीं आता। निश्चित रूप से इससे एक लोकलुभावन चक्र अवश्य शुरू हो सकता है क्योंकि राजनीतिक दल पहले ही नि:शुल्क बिजली समेत तमाम मुफ्त चीजें दे रहे हैं।
अगर हम विकल्पों की बात करें तो हमारी खोज व्यापक आर्थिक नीति की दिशा में जाएगी। कृषि क्षेत्र के वेतन भत्तों की बात करें तो उनकी कमजोरी के कारण गैर कृषि आय के साथ उसके अंतर में कमी नहीं आएगी जब तक कि विनिर्माण और सेवा क्षेत्र में और रोजगार तैयार करके लोगों को कृषि से इतर रोजगार नहीं मुहैया कराया जाता। तब तक गरीबों को लिए आय समर्थन आवश्यक है। तीसरी बात, रोजगार गारंटी योजना जैसा स्व चयन वाला कार्यक्रम अपने बारे में काफी कुछ बताता है। सार्वजनिक स्वास्थ्य, स्कूली शिक्षा और रोजगारपरक प्रशिक्षण में अधिक निवेश पर भी यही बात लागू होती है। सब्सिडी और नि:शुल्क तोहफे अक्सर जरूरी कामों पर से ध्यान हटा देते हैं।
Date:31-12-22
सुविधा का मतदानसंपादकीय
मताधिकार की सफलता इसी बात में है कि हर नागरिक इसका उपयोग कर सके। मगर पढ़ाई-लिखाई, नौकरी, रोजगार, दिहाड़ी मजदूरी आदि के चलते बहुत सारे लोग अपना मूल स्थान छोड़ कर विभिन्न राज्यों में रहने को विवश हैं, इसलिए वे चुनावों में अपने मताधिकार का उपयोग नहीं कर पाते। निर्वाचन आयोग के मुताबिक पिछले आम चुनाव में करीब तीस करोड़ लोग अपने मताधिकार का इस्तेमाल नहीं कर पाए। ऐसा हर चुनाव में होता है। इसलिए लंबे समय से मांग उठती रही थी कि ऐसे लोगों के लिए मतदान का कोई व्यावहारिक उपाय निकाला जाना चाहिए। उसी के मद्देनजर निर्वाचन आयोग ने घरेलू प्रवासियों के लिए ‘रिमोट वोटिंग मशीन’ यानी आरवीएम शुरू करने का प्रस्ताव पेश किया है। इस पर विचार-विमर्श के लिए अगले महीने सभी राजनीतिक दलों को आमंत्रित किया गया है। आयोग का कहना है कि इस मशीन को त्रुटिहीन बनाया और इंटरनेट से नहीं जोड़ा जाएगा। हालांकि इस प्रक्रिया को लागू करने की राह में कई कानूनी और तकनीकी रोड़े हैं, जिन्हें दूर करना जरूरी होगा। मगर आयोग फिलहाल इसे प्रायोगिक तौर पर लागू करना चाहता है और फिर इस दिशा में आगे बढ़ा जा सकेगा। कई चुनाव विशेषज्ञ इसे एक क्रांतिकारी पहल मान रहे हैं।
सैद्धांतिक तौर पर यह पहल निस्संदेह सराहनीय है। मगर जिस तरह अभी तक ईवीएम को लेकर भ्रम बने हुए हैं और हर चुनाव के बाद कुछ आवाजें मतदान में हुई गड़बड़ी को लेकर उठती रहती हैं, उसमें स्वाभाविक ही आरवीएम भी संदेह से परे नहीं होगी। जब मतदाता पहचानपत्र को आधार कार्ड से जोड़ने का प्रस्ताव आया, तब भी इसी शंका के चलते सवाल उठे थे कि कोई भी बाहरी व्यक्ति मतदान में गड़बड़ी कर सकता है। इसलिए आरवीएम को पूरी तरह भरोसेमंद बनाना होगा। विपक्षी कांग्रेस ने इसे लेकर शुरू में ही विरोध जाहिर किया है कि इससे मतदान के प्रति लोगों का भरोसा कमजोर होगा। जाहिर है, दूसरे दलों की तरफ से भी ऐसे एतराज उठने की संभावना है। मगर यह प्रस्ताव अगर किन्हीं वजहों से व्यावहारिक रूप नहीं ले पाता, तो ऐसे करोड़ों लोगों का मताधिकार प्रश्नांकित होता रहेगा। अब हर चुनाव में गिरता मतदान प्रतिशत निर्वाचन आयोग के लिए चुनौती बना हुआ है। तमाम अपीलों और जागरूकता अभियानों के बावजूद हर चुनाव में कई निर्वाचन क्षेत्रों में पचास प्रतिशत से भी कम मतदान हो पाता है। इस तरह जन प्रतिनिधित्व का मकसद ही अधूरा हो जाता है। इसे दूर करना निर्वाचन आयोग का नैतिक और संवैधानिक दायित्व है।
चुनावों में गिरते मत प्रतिशत के पीछे अपने मूल स्थान से दूर शहरों या कस्बों में जा बसे लोगों को अपने मताधिकार का उपयोग न कर पाना भी बड़ा कारण है। अगर ऐसे लोगों को मतदान में शरीक कर लिया जाता है, तो निस्संदेह मत प्रतिशत बढ़ेगा। मगर दिक्कत यह है कि ऐसे लोगों की पहचान सुनिश्चित करना और वे जहां रह रहे हैं, वहां मतदान केंद्र स्थापित कर पाना कैसे संभव होगा। मसलन, अगर बिहार में चुनाव है और वहां के लाखों मतदाता दिल्ली, गुजरात, मुंबई, पुणे, श्रीनगर आदि जगहों पर बिखरे हुए हैं, तो उन्हें कैसे मतदान की सुविधा उपलब्ध कराई जाए और फिर उनकी गणना आदि कैसे की जाए, यह एक जटिल काम हो सकता है। सबसे प्रमुख सवाल कि मतदाता कैसे स्वतंत्र रूप से अपने मताधिकार का उपयोग करे। मगर जैसा कि निर्वाचन आयोग का दावा है, उससे लगता है कि उसने इन तमाम पक्षों पर गंभीरता से विचार कर लिया है।
Date:31-12-22
कहीं से भी होगी वोटिंगसंपादकीय
निर्वाचन आयोग लगता है अधिकाधिक मतदान के लक्ष्य को लेकर अत्यंत गंभार है‚लेकिन इस अत्यंत आदर्शपूर्ण स्थिति को हासिल करने के लिए जो उपाय किए जा रहे हैं उन पर सबका विश्वास हासिल करने की राह थोड़़ी मुश्किल लगती है। इस क्रम में आयोग की पहली परीक्षा 16 जनवरी को होगी जब तमाम दल ‘रिमोट वोटिंग मशीन’ (आरवीएम) का प्रदर्शन देखकर अपनी राय व्यक्त करेंगे। इस मशीन का शुरुआती मॉड़ल निर्वाचन आयोग ने घरेलू प्रवासी मतदाताओं के मतदान को सुगम बनाने के लिए तैयार कराया है। यह पहल अगर कामयाब रहती है तो निर्वाचन आयोग के अनुसार प्रवासी मतदाता जहां हैं‚वहीं से मतदान कर सकेंगे। हालांकि आयोग के अधिकारी दूरदराज के मतदान केंद्रों पर ड़ाले गए मतों की गिनती और दूसरे राज्यों में निर्वाचन अधिकारी तक उन्हें भेजे जाने को एक ‘तकनीकी चुनौती’ मान रहे हैं। आरवीएम मौजूदा इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन पर ही आधारित है‚जिसे ‘मजबूत‚त्रुटिरहित और दक्ष तंत्र’के रूप में विकसित किया जाएगा और इसे इंटरनेट से नहीं जोड़ जाएगा। आयोग ने ‘रिमोट वोटिंग’ को लागू करने में आने वाली कानूनी‚प्रशासनिक प्रक्रियात्मक‚तकनीकी तथा प्रौद्योगिकी संबंधी चुनौतियों पर राजनीतिक दलों के विचार मांगे हैं। आयोग के अनुसार एक ‘रिमोट’ मतदान केंद्र से 72 निर्वाचन क्षेत्रों में ‘रिमोट वोटिंग’ की सुविधा दी जा सकेगी। इस पहल को विपक्ष के राजनीतिक दलों का समर्थन मिलना दूर की कौड़़ी लगता है। कांग्रेस ने अपनी तल्ख प्रतिक्रिया में दावा किया है कि इस पहल से चुनाव प्रणाली में विश्वास कमतर होगा। अभी वर्तमान चुनाव प्रणाली में ही पूरी पारदर्शिता के साथ विश्वास बहाल करने की जरूरत है। जर्मनी में 2009 में इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन से मतदान की व्यवस्था खत्म कर दी गई थी क्योंकि मतदाता को यह विश्वास नहीं हो रहा था कि उसका मत सही तरीके से रिकॉर्ड़ हो रहा है। कांग्रेस का कहना है यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारत में ईवीएम को लेकर कई विवाद होने के बाद ईवीएम के ‘दुरुपयोग संबधी ड़र’ को व्यवस्थित ढंग से दूर नहीं किया गया। कांग्रेस नेता जयराम रमेश की इस आशंका से सहमत हुआ जा सकता है कि यदि विभिन्न क्षेत्रों की ईवीएम दूसरे स्थानों पर होंगी तो संदेहात्मक चलन को बल मिल सकता है। इससे चुनाव प्रणाली में विश्वास गंभीर रूप से कमजोर होगा।
Date:31-12-22
एक युग का अवसानसंपादकीय
साठ साल से ज्यादा वक्त तक खेल प्रेमियों के दिलों पर राज करने वाले फुटबॉल के भगवान पेले का जाना वाकई गुजरते वर्ष की सबसे दुखदायी खबर है। 82 वर्ष की उम्र में पेट के कैंसर से पेले आखिरकार अपनी लड़ाई हार गए। विश्व के महानतम फुटबॉल खिलाड़ी के तौर पर उनकी शख्सियत निःसंदेह अपने समकालीन खिलाड़ी या बाद के खिलाड़ियों से बड़ी है। पहले फुटबॉल में तीन एस (S) स्पीड (गति), स्किल (कौशल) और स्टेमिना (शारीरिक क्षमता) की अहम भूमिका थी, मगर पेले ने इस सूत्र में एक और स्ट्रेंथ (ताकत) को जोड़ा। खेल के मैदान में उनकी चपलता और हुनर की दाद तो विपक्षी खिलाड़ी भी देते हैं। यह वाकई विस्मित करने वाला वाकया है कि बेहद गरीबी में पले-बढ़े पेले का खेल जब शबाब पर था, उनके खेल का कोई सानी नहीं था, और उनपर रुपयों की बौछार करने के लिए विश्व की तमाम अमीर और नामी क्लब कुछ भी रकम खर्चने के लिए तैयार थे तब ब्राजील की सरकार ने उन्हें राष्ट्रीय संपत्ति घोषित कर दिया। यह था पेले का रुतबा और लोकप्रियता । यह भी कम आश्चर्य की बात नहीं कि जिस नाम – पेले-से वह विख्यात हुए, उसका अर्थ न तो उन्हें और न उनके दोस्तों को मालूम था। मैदान में उनकी चपलता, गेंद पर उनका कमाल का नियंत्रण और खिलाड़ियों को चकमा देने की उनकी क्षमता देखते ही बनती थी। हालांकि बहुत कम लोगों को पता होगा कि उनका सबसे पसंदीदा गोल कैमरे में रिकॉर्ड ही नहीं हो सका । ‘बाइसाइकिल किक’ उनका पसंदीदा शॉट था और बाद के खिलाड़ियों ने उसे बखूबी अपनाया । जिस तरह हॉकी के महानतम खिलाड़ी ध्यानचंद की स्टिक की विपक्षी टीम जांच-परख करती थी कि कहीं स्टिक में गोंद तो नहीं चिपकाया गया है, ठीक उसी तरह पेले के शरीर की भी जांच की गई। न्यूयार्क टाइम्स अखबार के मुताबिक सामान्य व्यक्ति का दिल प्रति मिनट 90-95 बार धड़कता है मगर पेले के हृदय की धड़कन प्रति मिनट 56-58 मिनट थी। उनके पैर, एड़ी और मांसपेशियों की बारीकी से जांच की गई और पाया गया कि उनमें जन्मजात कुछ विशेषताएं थीं, जो उन्हें जीनियस बनाती हैं। उनका जाना यकीनन फुटबॉल प्रेमियों के लिए तकलीफ की बात तो है, मगर कुछ हद तक फुटबॉल का भी निधन है।
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31 December 2022
प्रश्न–391 – नजर नहीं, नजरिया महत्वपूर्ण होता है।
इस विषय पर एक सारगर्भित निबंध लिखें। (1000-1200 शब्द)
Question–391 – It is not the sight, but the perspective that matters.
Write a succinct essay on this topic. (1000-1200 words)
नोट : इसका उत्तर आपको हमें नहीं भेजना है, यह आपके स्वयं के अभ्यास के लिए है।
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Date:30-12-22
Ring FencingRansomware attacks are rising fast. India needs to be ready. And the data bill must factor this in.TOI Editorials
The last two months of 2022 brought India’s cyber vulnerabilities into sharp relief. In November, securities depository CDSL said it had detected malware in some machines and disconnected itself from the capital market. Later, AIIMS, New Delhi, found its services compromised. GoI told Parliament that five servers were affected due to improper network segmentation. These two incidents are examples of a larger challenge confronting India. CERT-In’s India Ransomware Report for the first half of 2022 said that there’s been a 51% year-on-year increase in ransomware incidents. A majority of attacks are on datacentres.
Data has a unique quality, it’s non-rivalrous. Simply put, it can be used simultaneously by different people and not necessarily with consent of the data owner. It’s this quality that makes even temporary data loss deeply problematic. As India moves apace to a digital operating system for social and economic activities, loss of data or even temporary access to it have emerged as a public security challenge. This problem is global in nature. For example, last year Ireland was forced to shut down its public healthcare service for a while following a ransomware attack.
Coping with this challenge starts with everyone following basic steps to safeguard their data. The most serious problems come from organised cyberattacks on large data repositories and critical public infrastructure. The extent and scale of attacks on critical information infrastructure are in the realm of speculation as GoI told Parliament that revealing details is not in the interest of national security. Of no less importance is ring fencing data repositories from cyber-attacks. On the legislative side, there are two aspects that India’s forthcoming personal data protection bill needs to emphasise.
Data breaches are inevitable. The extent of loss, however, can be limited if two principles are followed. Purpose limitation in collecting data by all regulated entities needs to be strictly enforced. Sweeping in more data than required on flimsy pretexts increases risks manifold. Highly sensitive data such as biometrics are collected by different government organisations who may not all have high standards of cybersecurity. Collection of biometrics needs to be limited. The other essential principle is narrowing down the discretion enjoyed by a regulator in choosing when to let potential victims know about data breaches. Given data’s nonrivalrous quality, offering a regulator too much leeway protects a regulated entity at the expense of potential victims.
Date:30-12-22
Cops And LoversHeartbreak, breakups happen to adults. Tragedies may also happen. But these aren’t police matters.TOI Editorials
Love or something like it rarely endures forever. Relationships frequently sour or end. And when they do, the heartbreak or the “blame” on the two sides rarely weighs equally on the measuring scale. Today the Tunisha Sharma suicide case is seeing a high-decibel post-mortem of her relationship with Sheezan Khan. It is understandable that her family is trying to cope with loss and grief in myriad ways, including looking for its cause in whether her lover was “unfaithful” to Tunisha or “broke up” with her. The minute, repetitive, painful computation of who did how much injury is a routine aftermath of human relationships gone wrong.
But what’s police got to do with it?
It should not be a matter of criminal investigation whether or not lovers are faithful to each other. Like some of the news TV programmes some policemen might find salacious sport in going down these personal corridors. But as the Supreme Court said in its 2018 judgment decriminalising adultery, the fundamental right of an individual to self-determination includes sexual self-determination, into which “real private realm” police should not intrude.
In the Tunisha case, this impulse is aided by ‘abetment to suicide’ continuing to be on the statute books as a non-bailable offence. The police, having blundered into such cases by filing an FIR with little thought, then grab every bit of information as justification, and most often an adult is put through the wringer, aided by lower courts happily granting extended custody without asking questions. The many instances in which all this blundering soon enough reveals itself as just a gratuitous abuse of privacy, should act as a disincentive to police. That it doesn’t says a lot about how police views its role vis-a-vis citizens.
Date:30-12-22
Make the Move From Minimum to Living……with legal safeguards for workersET Editorials
The labour ministry is reportedly examining moving from minimum wages to living wages as a means to speed up poverty eradication. A floor for wages indexed to inflation that is not purely benchmarked to survival or productivity is an elegant construct that addresses concerns over setting the right rate and revising it in time. The International Labour Organisation (ILO) estimates global monthly wages declined 0. 9% in real terms in the first half of 2022, thereby threatening the post-pandemic recovery. This loss in purchasing power follows loss of livelihood during pandemic restrictions and contributes to rising income inequality. ILO reckons accelerated inflation has eroded purchasing power of minimum wages in several countries despite nominal adjustments.
Seeking inputs from ILO on a possible switch to living wages during its G20 presidency strengthens India’s commitment to UN’s Sustainable Development Goals. Real wages in advanced G20 economies contracted 2. 2% between January and June 2022, while those in the emerging economies of the grouping that contributes four-fifths of global output grew by 0. 8%. Inflation exerts an undue effect on the cost of living for low-wage earners who spend a larger part of their income on essentials that are typically price inelastic.
Living wages also subsume some subsidies, thereby restricting their widespread application because of the effects on targeted welfare delivery. This limits their use as an anti-poverty tool. There is also a criticism it shares with minimum wages of depressing employment and encouraging entry-level labour substitution. Finally, a dynamic wage floor would tend to reinforce business cycles, adding complexity to countercyclical economic policy. If living wages are adopted, these need to be reinforced by collective bargaining and legal safeguards for workers. Yet, wages covering the cost of living offer an established method of reducing urban poverty through municipal intervention. India’s labour policy stands to benefit from the global experience with living wages.
Date:30-12-22
रिमोट ईवीएमसंपादकीय
चुनाव आयोग ने घरेलू प्रवासी मतदाताओं के लिए रिमोट इलेक्ट्रानिक वोटिंग मशीन विकसित कर एक अच्छी पहल की है। ऐसी किसी पहल की आवश्यकता इसलिए थी, क्योंकि एक बड़ी संख्या में लोग काम-धंधे के सिलसिले में अपने घरों से बाहर रहने लगे हैं। समय के साथ ऐसे लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है। ऐसे करोड़ों लोग अपने मताधिकार का उपयोग नहीं कर पाते, क्योंकि सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा करके अपने गांव-घर वोट डालने जाना कभी भी सुविधाजनक नहीं होता। एक अनुमान के अनुसार लगभग 30 करोड़ मतदाता वोट करने से वंचित रह जाते हैं। अब ऐसे मतदाताओं के लिए रिमोट ईवीएम किसी वरदान से कम नहीं होगी। समय के साथ इस ईवीएम का लाभ बीमार और बुजुर्ग भी उठा सकते हैं और मतदान के दिनों में यात्रा करने वाले भी। इससे मतदान में उन सब लोगों की हिस्सेदारी बढ़ेगी, जो वोट डालने की इच्छा रखते हुए भी ऐसा नहीं कर पाते। बहुत संभव है कि इससे कम मतदान की समस्या का भी समाधान हो। निःसंदेह रिमोट ईवीएम को लेकर आम लोगों की प्रतिक्रिया उत्साहजनक होनी चाहिए। देखना यह है कि इस ईवीएम पर राजनीतिक दल अपनी कैसी और क्या प्रतिक्रिया व्यक्त करते हैं? उचित यह होगा कि वे नीर-क्षीर ढंग से अपनी प्रतिक्रिया दें और नकारात्मक के बजाय सकारात्मक रवैया अपनाएं। यह अपेक्षा इसलिए, क्योंकि कुछ राजनीतिक दल ईवीएम को लेकर सवाल उठाने के आदी रहे हैं। यह अच्छा है कि उनकी यह आदत हाल के हिमाचल और गुजरात विधानसभा चुनावों के दौरान देखने को नहीं मिली।
रिमोट ईवीएम का अस्तित्व में आना चुनाव सुधार की दिशा में एक मील का पत्थर है। चुनाव आयोग से यह अपेक्षित है कि वह रिमोट ईवीएम के बाद अन्य लंबित चुनाव सुधारों की दिशा में तेजी से आगे बढ़े। ये सुधार न केवल मतदान में अधिकाधिक लोगों की भागीदारी बढ़ाने वाले होने चाहिए, बल्कि अनुचित साधनों का इस्तेमाल रोकने और साथ ही राजनीति के अपराधीकरण पर अंकुश लगाने वाले भी। इसकी अनदेखी नहीं की जानी चाहिए कि तमाम उपायों के बाद भी चुनावों में अनुचित साधनों का इस्तेमाल बढ़ता जा रहा है। लोगों को प्रलोभन देकर और अब तो सीधे-सीधे रुपये बांटकर लोगों के वोट हासिल करने की कोशिश होने लगी है। आपराधिक छवि वालों को चुनाव लड़ने से रोकना भी चुनाव आयोग की प्राथमिकता में होना चाहिए। हालांकि चुनाव आयोग एक लंबे समय से इसके लिए कोशिश कर रहा है, लेकिन वह इसलिए सफल नहीं हो पा रहा है, क्योंकि राजनीतिक दल उसके सुझावों को अपनाने के लिए तैयार नहीं। राजनीतिक दलों के आगे चुनाव आयोग की इसलिए नहीं चल पा रही है, क्योंकि उसके पास पर्याप्त अधिकार नहीं। उचित यह होगा कि इस मामले में सुप्रीम कोर्ट चुनाव आयोग की सहायता करे और उसे जरूरी अधिकारों से लैस करने की आवश्यकता को समझे।
Date:30-12-22
राजकोष पर भारी पड़ेगी मुफ्त खाद्यान्न योजनाए के भट्टाचार्य
केंद्र सरकार ने गत सप्ताह यह निर्णय लिया कि वह राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम (एनएफएसए) के तहत मुफ्त खाद्यान्न आपूर्ति जारी रखेगी। उसके इस निर्णय पर उचित ही सवाल उठ रहे हैं। सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत 81 करोड़ लोगों को आपूर्ति किए जाने वाले अनाज का केंद्रीय निर्गम मूल्य बढ़ाकर खाद्य सब्सिडी बिल कम करने के बजाय सरकार ने उसे नि:शुल्क कर दिया है। इस प्रकार राजकोषीय विवेक के सिद्धांत का पालन नहीं किया गया। इससे भी बुरी बात यह है कि यह कदम कई राज्य सरकारों को इस बात के लिए प्रेरित कर सकता है कि वे राजकोषीय दृष्टि से गैरजवाबदेह हो जाएं और ऐसी ही अन्य योजनाएं शुरू कर दें।
इस बारे में कोई गलती नहीं करें। वर्ष 2023 में नौ राज्यों के विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में यह निर्णय पूरी तरह चुनावी हितों को ध्यान में रखते हुए लिया गया है। ऐसा प्रतीत होता है कि लोकतंत्र का त्योहार सभी राजनीतिक दलों द्वारा राजनीतिक विवेक की कीमत पर ही मनाया जाएगा। ऐसे में इस तथ्य से कोई राहत नहीं मिलती है कि प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत 81 करोड़ लाभार्थियों को पांच किलोग्राम अनाज नि:शुल्क देने की योजना को बंद किया गया है। एनएफएसए अब दिसंबर 2023 तक के लिए नि:शुल्क अनाज योजना रह गया है और मई 2024 में आम चुनाव होने हैं, ऐसे में लगता यही है कि इसे कम से कम कुछ महीनों के लिए अवश्य बढ़ाया जाएगा।
पिछले दिनों जो किया गया उसका दीर्घकालिक परिणाम राजकोषीय सुदृढ़ीकरण के लिए दिक्कतदेह साबित हो सकता है और ऐसा केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर संभव है। परंतु इसका परिणाम केंद्रीय वित्त मंत्रालय के लिए दो अल्पकालिक फायदों के रूप में भी सामने आएगा। 2022-23 के 3.3 लाख करोड़ रुपये के अनुमानित खाद्य सब्सिडी बिल के बरअक्स देखें तो 2023-24 में यह कम होकर 2.15 लाख करोड़ रुपये का रह जाएगा। अगर मान लिया जाए कि अगले वर्ष अर्थव्यवस्था 11 फीसदी की दर से विकसित होगी तो इससे वित्त मंत्रालय को सकल घरेलू उत्पाद की तुलना में 0.4 फीसदी के बराबर बचत होगी। उर्वरक सब्सिडी से होने वाली बचत को मिला दें जो जीडीपी के 0.3 फीसदी के बराबर होगी तो वित्त मंत्रालय के पास 2023-24 में जीडीपी के 0.7 फीसदी के बराबर की बचत होगी। इससे पूंजीगत व्यय में कुछ राहत मिलेगी।
सरकार ने खाद्य सब्सिडी के मामले में अपनी देनदारी की अनिश्चितता को जिस तरह कम किया है वह भी एक लाभ है। प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना के जाने के बाद अब सरकार को शेष चुनौती का सामना एनएफएसए के जरिये अनाज का वितरण करके करना होगा। 2024 के आम चुनाव की राजनीतिक बाध्यताओं को देखते हुए लगता नहीं है कि 2024 के मध्य के पहले एनएफएसए को मूल्य व्यवस्था के अधीन लाया जाएगा। परंतु बीते कुछ वर्षों के उलट वित्त मंत्रालय अब इस बात को लेकर स्पष्ट होगा कि अगले कुछ वर्षों में खाद्य सब्सिडी को लेकर उस पर कितना बोझ होगा।
अप्रैल 2020 में लॉन्चिंग के बाद से ही प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना केंद्रीय वित्त मंत्रालय के लिए खतरे की घंटी थी। यकीनन मंत्रालय गरीबों को नि:शुल्क अन्न उपलब्ध कराने के विचार के खिलाफ नहीं था क्योंकि यह तबका कोविड से बहुत बुरी तरह प्रभावित हुआ था। मंत्रालय की चिंता केवल यह थी कि जिस तरह इसकी घोषणा की गई उससे व्यय नियोजन प्रभावित हुआ।
मार्च 2020 में लॉकडाउन की घोषणा के तत्काल बाद सरकार ने इस योजना की शुरुआत की थी। आरंभ में इसे अप्रैल से जून 2020 के लिए शुरू किया गया था। लेकिन बाद में इसे जुलाई से नवंबर 2020 तक पांच माह के लिए और बढ़ा दिया गया। 2021 के आरंभ में कोविड की दूसरी लहर के आगमन के बाद सरकार ने इस योजना को दोबारा पेश किया। आरंभ में इसे मई-जून 2021 के लिए प्रस्तुत किया गया था लेकिन बाद में दो किस्तों में इसे सितंबर 2022 तथा आगे दिसंबर 2022 तक के लिए बढ़ा दिया गया।
बार-बार किए जाने वाले अवधि विस्तार तथा पांच महीनों के अंतराल के बाद इसे दोबारा पेश करने से वित्त मंत्रालय की व्यय योजना को झटका लगा। 2020-21 में बजट ने खाद्य सब्सिडी के लिए केवल 1.16 लाख करोड़ रुपये की व्यवस्था की थी। इस बात को समझा जा सकता था क्योंकि फरवरी 2020 में बजट पेश किए जाते समय महामारी का असर पूरी तरह सामने नहीं आया था।
आश्चर्य नहीं कि 2020-21 में खाद्य सब्सिडी का वास्तविक बिल 5.41 लाख करोड़ रुपये तक बढ़ गया। ऐसा केवल प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना की वजह से नहीं हुआ बल्कि भारतीय खाद्य निगम के पिछले बकाये के निपटान की भी इसमें भूमिका रही। वर्ष 2021-22 का बजट फरवरी 2021 में पेश किया गया। यहां एक बार फिर खाद्य सब्सिडी की कम राशि मिली। चूंकि फरवरी 2021 में उक्त योजना नहीं चल रही थी इसलिए वित्त मंत्रालय ने 2021-22 में खाद्य सब्सिडी के 2.43 लाख करोड़ रुपये रहने का अनुमान जताया। हालांकि इस मद में उसका वास्तविक व्यय 2021-22 में 2.9 लाख करोड़ रुपये के साथ कहीं अधिक था।
इसी प्रकार फरवरी 2022 में पेश किए गए बजट में वित्त मंत्रालय का अनुमान था कि उक्त योजना मार्च 2022 तक समाप्त हो जाएगी। इसीलिए उसने पूरे वर्ष के लिए 2.1 लाख करोड़ रुपये के खाद्य सब्सिडी बोझ का अनुमान लगाया था। परंतु बजट पेश होने के बाद योजना को दो बार आगे बढ़ाया गया। अब अनुमान है कि 2022-23 में वास्तविक खाद्य सब्सिडी बिल 3.3 लाख करोड़ रुपये रहेगा। गत सप्ताह प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना को एनएफएसए में समाहित करके सार्वजनिक वितरण प्रणाली के तहत नि:शुल्क अन्न आपूर्ति को एक वर्ष यानी दिसंबर 2023 तक बढ़ाने का जो निर्णय लिया गया उसका अर्थ यह है कि वित्त मंत्रालय अब 2023-24 में खाद्य सब्सिडी को लेकर अपनी देनदारी ज्यादा स्पष्ट तरीके से तय कर सकता है। पिछले तीन बजटों के दौरान सरकार को यह सुविधा हासिल नहीं थी।
ऐसे में आशा की जानी चाहिए कि आगामी बजट में सरकार के खाद्य सब्सिडी विधेयक को लेकर ऐसे आंकड़े सामने आएंगे जो हकीकत के करीब हों। आशा की जानी चाहिए कि एनएफएसए की तकदीर और इसके तहत आवंटित होने वाले अनाज की कीमत को लेकर भी सही समय पर निर्णय लिया जाएगा ताकि कोई नई अनिश्चितता सामने न आए। लेकिन इस बात में कम ही संदेह है कि नि:शुल्क खाद्यान्न योजना दीर्घावधि में केंद्र और राज्यों दोनों के लिए जोखिम समेटे है। यह जोखिम 2023-24 में वित्त मंत्रालय को होने वाले सीमित लाभ की तुलना में काफी अधिक है।
Date:30-12-22
पुनर्विचार की जरूरतप्रो. लल्लन प्रसाद
नागरिकों की खाद्य सुरक्षा सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है। 2020 में जब कोरोना महामारी का प्रकोप शुरू हुआ तो लॉकडाउन के कारण आर्थिक गतिविधियां नहीं के बराबर रह गईं। करोड़ों लोग बेरोजगार हो गए, शहरों में काम करने वाले मजदूर अपने गांवों में वापस जाने लगे। भारत ही नहीं पूरे विश्व में गरीबों के लिए बहुत बड़ी आफत आ गई। यूनाइटेड नेशन ने भी इसका संज्ञान लिया और खाद्य सुरक्षा के लिए सरकारों को समय पर कदम उठाने का आह्वान किया।
भारत सरकार ने प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना प्रारंभ की, जिसके अंतर्गत गरीबी रेखा के नीचे (बीपीएल) के लिए नाममात्र के भुगतान पर प्रति परिवार 35 किलो राशन और गरीब वर्ग के अन्य लोगों के लिए प्रति व्यक्ति प्रतिमाह 5 किलो राशन देने की व्यवस्था की गई। मोटा अनाज 1 प्रति किलो, गेहं 2 और चावल 3 प्रति किलो देने की यह योजना 31 दिसम्बर 2022 तक चली। योजना मे बीपीएल के अंतर्गत आने वाले परिवारों को जीवनयापन के लिए पात्रता के अनुसार अलग-अलग राशन कार्ड दिये गए। इस पर 3 लाख करोड़ से अधिक का खर्च आया, इसका लाभ 80 करोड़ से अधिक लोगों को मिला । विश्व की यह सबसे बड़ी खाद्य सुरक्षा योजना मानी गई । सरकार ने वर्ष 2023 के लिए राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के अंतर्गत नई मुफ्त खाद्य योजना की घोषणा की है. इसके अंतर्गत गरीबों को राशन पूर्ण रूप से मुफ्त दिया जाएगा, कोई चार्ज नहीं लिया जाएगा।
नये वर्ष के लिए सरकार का गरीब जनता के लिए यह एक उत्तम उपहार माना जा रहा है। योजना पर 2 लाख करोड़ के खर्च का अनुमान है, इससे 81.35 करोड़ लोग लाभान्वित होंगे। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम जुलाई 2013 में पारित हुआ था। इसके अंतर्गत देश की गरीबी रेखा के नीचे की 67 फीसद आबादी (75 फीसद ग्रामीण और 50 फीसद शहरी) को अत्यधिक सब्सिडाइज्ड राशन के प्रावधान थे, कवरेज 2011 की जनगणना के आधार पर दी गई थी। खाद्यान्न केंद्र सरकार द्वारा देने और उनका वितरण राज्य सरकारों की परिधि में रखा गया। योजना देश के सभी 36 राज्यों/केंद्रशासित इलाकों मे लागू की गई। पूरी योजना के लिए केंद्र सरकार ने 3.91 लाख करोड़ का प्रावधान किया। यूनाइटेड नेशंस ने अपने 21वीं शताब्दी के विकास योजना के एजेंडे में भुखमरी से बचाव और खाद्य सुरक्षा को प्राथमिकता दी, 2021 में फूड सिस्टम समिट हुई, वर्ल्ड फूड प्रोग्राम लांच किया गया। भारत में चल रही खाद्य सुरक्षा योजना विश्व के अधिकांश देशों की अपेक्षा अधिक कारगर रही, कोरोना महामारी के चलते खाद्य संकट में भारत ने अन्य देशों की भी मदद की। गरीब की थाली खाली न जाए इस उद्देश्य की पर्ति के लिए जो भी कदम उठाए जाएं वे सराहनीय हैं। किंतु ऐसी योजनाओं का दुरुपयोग रोका जाना चाहिए, जिसके लिए सरकार को बजट में भारी प्रावधान करना पड़ता है।
मुफ्त खाद्य योजना गरीबी रेखा के नीचे के लोगों के लिए बनाई गई है, उनका बीपीएल के अंदर राशन कार्ड बना हुआ है। योजना भारत के नागरिकों के लिए बनाई गई है किंतु बांग्लादेश और म्यामांर से आये करोड़ों अनिधकृत लोग इसका लाभ उठा रहे हैं, जो सर्वविदित है. इससे इनकार नहीं किया सकता । नेताओं और अफसरों की मिलीभगत से ऐसा हुआ हुआ है। राशन कार्ड धारकों मे जो लोग गरीबी रेखा के ऊपर आ चुके हैं वे भी योजना का लाभ ले रहे हैं। राशन कार्ड 2011 की जनगणना के आधार पर बने हैं। जो लोग गरीबी रेखा के ऊपर आ चुके हैं उनमें कितने ऐसे हैं जिनका लेखा-जोखा नहीं है। ऐसा माना जाता है कि बहुत से लोग मुफ्त गल्ला लेकर कालाबाजारी करते हैं, दुकानदारों को कम दाम पर राशन बेच देते हैं। देश में मध्यमवर्ग की आमदनी के लोगों की आबादी लगभग 50 फीसद है, इनमें आधे से अधिक लोग ऐसे हैं जो सरकारी परिभाषा के अंतर्गत बीपीएल में नहीं आते किंतु वास्तव में गरीब हैं, मुश्किल से अपना परिवार पालते हैं। उन्हें महंगे दाम पर गल्ला बाजार से खरीदना पड़ता है. बच्चों की पढ़ाई लिखाई, मकान का भाड़ा, शादी ब्याह, सरकारी टैक्सों और अन्य खर्चे के लिए कठिन परिश्रम करना पड़ता है।
इस वर्ग के लोगों को भी मुफ्त नहीं तो सब्सिडाइज रेट पर गल्ला मिलना चाहिए । राजनीति में इनका उतना प्रभाव नहीं है जितना गरीबी रेखा के नीचे के लोगों का और अच्छी आमदनी के मध्य वर्ग और अमीरों का है, शायद इसीलिए ये उपेक्षित हैं, इनकी आवश्यकताओं पर सरकार का ध्यान कम जाता जाता है। सभी वर्गों के साथ न्याय होना चाहिए। मुफ्त अनाज योजना और अन्य मुफ्त योजनाओं के लाभ चुनाव में भुनाने की प्रवृत्ति को भी रोकने की आवश्यकता है क्योंकि ये सरकारी खजाने से संसद या राज्य विधान सभाओं द्वारा बनाए गए अधिनियम के अंतर्गत दी जाती हैं। वैसे भी मुफ्त में दी जाने वाली चीजों की कदर नहीं होती, उनका दुरुपयोग आसानी से होता है।
सामाजिक दृष्टि से भी यह विवादास्पद है । देश के एक पूर्व प्रधानमंत्री मोरारजी देसाई ने उस लोकोक्ति को असराहनीय माना, जो कहती है ‘अजगर करे न चाकरी पंछी करे न काम, दास मलूका कह गए सबके दाता राम।’ यह भगवत गीता के कर्म के सिद्धांत की भी अवहेलना है, लोगों को परिश्रम से बचने का राह दिखाती है। बिल्कुल मुफ्त अनाज की योजना उन लोगों तक ही सीमित रखी जानी चाहिए जो वास्तव में गरीब हैं और इसके हकदार हैं। बीपीएल को पुनः परिभाषित करने और मुफ्त अनाज देने के आधार पर नये सिरे से विचार की आवश्यकता है। सरकारी खजाने का सही उपयोग ही विकास को गति देता है और समाज को ऊपर उठाता है।
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विश्व बैंक की माइग्रेशन एण्ड डेवलपमेंट की संक्षिप्त रिपोर्ट बताती है कि वैश्विक विपरीत परिस्थितियों के बावजूद भारत के प्रवासी कामगार विदेशों से 100 अरब डॉलर तक भेजने की क्षमता में हैं। यह अर्थव्यवस्था के लिए शुभ संकेत है।
इससे संबंधित कुछ बिंदु –
वैश्विक अर्थव्यवस्था अस्थिर है। बढ़ती मंदी के साथ चालू खाते का घाटा बढ़ने की आशंका बनी हुई है। आई टी कंपनियों में बढ़ते खिंचाव से भारत के सॉफ्टवेयर क्षेत्र पर भी प्रभाव पड़ने की पूरी संभावना है। अतः बढ़ते व्यापार घाटे को सॉफ्टवेयर निर्यात या इन्वार्ड रेमीटेन्स से नहीं पाटा जा सकेगा। इसलिए भारत को रेमीटेन्स में बढ़ोत्तरी के लिए विकसित देशों के साथ वर्कर वीजा पर तेजी से काम करना चाहिए।
‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 2 दिसम्बर, 2022
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Date:29-12-22
संवैधानिक संकट में फंसतीं राज्य सरकारेंसंपादकीय
तमाम राज्यों की सरकारें या राजनीतिक दल किसी एक वर्ग को आरक्षण देने की घोषणा करते हैं लेकिन उसके लिए अपेक्षित शर्तें पूरी नहीं करते। लिहाजा कोर्ट्स उनके कानून को निरस्त कर देते हैं और तब यह चुनावी मुद्दा बन जाता है। उत्तर प्रदेश में हाई कोर्ट ने सरकार की उस अधिसूचना को गलत करार दिया जिसके तहत ओबीसी के लिए स्थानीय निकायों में सीटें आरक्षित की गई। कोर्ट का कहना था कि 10 साल पहले सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ द्वारा आदेशित ट्रिपल टेस्ट की शर्तों की- जिस पर पिछले वर्ष दोबारा उस कोर्ट ने मोहर लगाई- अनदेखी करके सीटें आरक्षित की गईं, जो गलत था। आखिर ट्रिपल टेस्ट की शर्तें बगैर माने ये सरकारें क्यों आरक्षण करती हैं? क्या इनकी मंशा आरक्षण देने से ज्यादा उस वर्ग के वोट लेना होता है? अब राज्य सरकार के सामने इस फैसले के बाद एक संवैधानिक संकट है। फैसला आने के तत्काल बाद मुख्यमंत्री ने ट्वीट किया कि ट्रिपल टेस्ट का अनुपालन होगा और यह भी कि पिछड़ों के हित के लिए सरकार कृतसंकल्प है। यहां प्रश्न यह है कि ट्रिपल टेस्ट को मानते हुए इन पांच वर्षों में आयोग का गठन नहीं करना चाहिए था? पुलिस रिफॉर्म्स के मामले में भी सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के आदेश को 16 वर्ष बाद भी देश के लगभग सभी राज्यों ने कमोबेश नहीं माना। यह रवैया सरकारों के किस मनोभाव को इंगित करता है?
Date:29-12-22
फंसे हुए कर्जों से निपटने की चुनौतीब्रजेश कुमार तिवारी, ( लेखक जेएनयू में एसोसिएट प्रोफेसर हैं )
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने बीते दिनों संसद में बैंकों की दशा से जुड़े एक अहम पहलू पर अपनी बात रखी। उन्होंने बताया कि भारतीय रिजर्व बैंक के दिशानिर्देशों और बोर्ड के अनुमोदन के बाद पिछले छह वित्त वर्षों के दौरान सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (पीएसबी) और अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों (एससीबी) ने कुल मिलाकर 11,17,883 करोड़ रुपये की राशि बट्टे खाते में डाली यानी उसे राइट आफ किया। केवल 2021-22 में ही वाणिज्यिक बैंकों ने 1,74,966 करोड़ के कर्ज बट्टे खाते में डाले, जिसमें से 33,534 करोड़ की ही वसूली हो पाई। वसूली में नाकाम रहने पर अकेले भारतीय स्टेट बैंक ने ही पिछले चार वित्त वर्षों में 1.65 लाख करोड़ का कर्ज बट्टे खाते में डाला। वस्तुत:, चार साल पुराने ऐसे कर्ज, जिसकी प्रोविजनिंग कर बैंक उसे बैलेंस शीट से हटा देते हैं, वही राइट आफ कहलाता है। हालांकि ये प्रोविजनिंग बैंक अपने स्रोतों से करते हैं और वह स्रोत जनता के पैसे से ही बनता है, क्योंकि बैंकों के पास अपना पैसा तो होता नहीं।
पिछले चार वर्षों में कर्ज चुकाने में जानबूझकर चूक करने वालों (विलफुल डिफाल्टर) की संख्या खासी बढ़ी है। सरकारी बैंकों में विलफुल डिफाल्टर की संख्या 2017 में 8,045 थी, जो 2022 में बढ़कर 12,439 हो गई। वहीं निजी बैंकों में यह संख्या 2017 में 1,616 से बढ़कर 30 जून, 2022 को 2,447 हो गई। भारतीय बैंकों के समक्ष सबसे बड़ी समस्या बैड लोन यानी फंसे हुए कर्जों-एनपीए की है। पिछले कुछ वर्षों में बैंकों का जो एनपीए घटता हुआ दिखा है तो इसके पीछे ये बट्टे खाते ही हैं। बैंकों द्वारा पांच वर्षों में जितने कर्ज की वसूली हुई, उसके दोगुने से अधिक बट्टे खाते में डाल दिए। बैंक अपनी बैलेंस शीट को साफ-सुथरा रखने और टैक्स लाभ आदि लेने के मकसद से एनपीए को बट्टे खाते में डालते हैं। बैंको का दावा है कि लोन को राइट आफ किए जाने के बाद भी कर्ज वापसी का दबाव डाला जाता है। हालांकि, आंकड़ों के अनुसार 15-20 प्रतिशत से ज्यादा के कर्ज की वसूली नहीं हो पाती। उच्च एनपीए से बैंकों का नेट इंटरेस्ट मार्जिन भी घटने लगता है। उनकी परिचालन लागत भी लगातार बढ़ती जाती है।
सिर्फ 312 बड़े डिफाल्टरों पर कुल बैड लोन का 76 प्रतिशत से अधिक बकाया इस तस्वीर को स्पष्ट करता है। जहां सरकार करदाताओं के पैसों से बैंकों को पूंजी उपलब्ध करा रही है, तो वहीं बैंक भारी-भरकम कर्ज न लौटाने वालों के कर्जों को ठंडे बस्ते में डाल रहे हैं। इन बैड लोन में लगभग 75 प्रतिशत हिस्सेदारी कारोबारी ऋणों की है। जबकि खुदरा ऋणों की हिस्सेदारी केवल चार प्रतिशत है, जिनमें कार लोन, होम लोन और पर्सनल लोन शामिल हैं।
बात साफ है कि बैंकों को एनपीए से बचाना है तो कारपोरेट ऋण देने में बहुत सतर्कता दिखानी होगी। असल में एनपीए बैंकिंग प्रणाली के लिए कैंसर के समान है। इसे कुछ हद तक नियंत्रित तो किया जा सकता है, लेकिन पूरी तरह से खत्म करना असंभव है, क्योंकि अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए कारपोरेट जगत को विशेष सुविधाएं दी जाती हैं। इसके पीछे कारपोरेट जगत से यही अपेक्षा होती है कि वे आर्थिक समृद्धि की बुनियाद रखकर उसे शिखर पर पहुंचाएं। ऐसे में कारपोरेट जगत को इसका बेजा लाभ उठाने से बचते हुए कर्ज चुकाने के प्रति गंभीरता और तत्परता का भी परिचय देना चाहिए। दूसरी ओर यही बैंक वाले किसी आम आदमी के कर्ज की किस्त तीन महीने तो क्या एक महीने जमा न होने पर कर्जदार को परेशान करने लगते हैं, लेकिन बड़ी-बड़ी संस्थाओं से वसूली पर ध्यान नहीं दिया जाता और उनमें से कुछ तो घोटाले करके विदेश तक भाग जाते हैं।
आइएमएफ की एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में कुल कर्जों का 30 प्रतिशत हिस्सा जोखिम में है। बैड बैंक या नेशनल एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी लिमिटेड के गठन को बैंकिंग उद्योग के संकट की कुंजी के तौर पर प्रस्तुत किया जाना भी उचित नहीं, क्योंकि कर्ज फंसने पर ही ये उपाय मददगार हो सकते हैं, लेकिन उन्हें फंसने से नहीं बचा सकते। ऐसे में बेहतर यही हो कि कर्ज की पेशकश करते समय बैंक अतिरिक्त सतर्कता बरतें। बैंकों को ऋण मंजूर करने से पहले बड़ी परियोजनाओं के कड़े मूल्यांकन के लिए एक आंतरिक रेटिंग एजेंसी बनानी चाहिए। परियोजनाओं के बारे में पूर्व चेतावनी संकेतों की निगरानी के लिए प्रभावी प्रबंधन सूचना प्रणाली (एमआइएस) को लागू करना भी आवश्यक हो गया है। लेनदार के क्रेडिट इन्फार्मेशन ब्यूरो इंडिया लिमिटेड (सिबिल) स्कोर का मूल्यांकन बैंक के साथ ही आरबीआइ के अधिकारियों को भी करना चाहिए। बैंकों के एनपीए को कम करने के लिए चार्टर्ड अकांउटेंट्स का नियमन एवं नियंत्रण भी अत्यंत आवश्यक है। साथ ही, बैंकों को उन भारतीय कंपनियों को कर्ज देते समय सतर्क रहना चाहिए, जिन्होंने विदेश से भारी कर्ज ले रखा है। बैंकों के आंतरिक और बाहरी आडिट सिस्टम को सख्त करना अपरिहार्य हो गया है। भारत में बैंककर्मी बनने के लिए विशिष्ट कौशल की अनिवार्यता नहीं है। इसलिए बैंकिंग क्षेत्र को एक कौशल विशिष्ट क्षेत्र के रूप में वर्गीकृत करने की आवश्यकता है। विशेष रूप से इसका उधार देने वाला खंड। कनिष्ठ अधिकारियों को अक्सर गड़बड़ी का जिम्मेदार माना जाता है, लेकिन बड़े निर्णय तो क्रेडिट स्वीकृति समिति द्वारा किए जाते हैं। उसमें वरिष्ठ स्तर के अधिकारी शामिल होते हैं। इसलिए, वरिष्ठ अधिकारियों को जवाबदेह बनाना महत्वपूर्ण है। बड़े लेनदार के पासपोर्ट विदेश मंत्रालय में जमा कराने के साथ ही ऋण विभाग के कर्मचारियों की नियमित अदला-बदली भी फंसे हुए कर्जों के दुष्चक्र को तोड़ने में उपयोगी हो सकती है।
Date:29-12-22
जैव विविधता पर मंडराता खतरासुधीर कुमार
हाल में चीन की अध्यक्षता और कनाडा की मेजबानी में मांट्रियल शहर में आयोजित पंद्रहवां संयुक्त राष्ट्र जैव विविधता सम्मेलन ‘कुनमिंग-मांट्रियल वैश्विक जैव विविधता रूपरेखा’ नामक ऐतिहासिक समझौते के साथ समाप्त हो गया। इसके तहत 2030 तक विश्व में तीस फीसद भूमि, तटीय इलाकों और जल क्षेत्रों का संरक्षण सुनिश्चित करने और जैव विविधता संरक्षण के लिए तेईस लक्ष्य निर्धारित किए गए। इस सम्मेलन में भी पिछले दिनों मिस्र में आयोजित काप-27 की तरह ही सतत विकास लक्ष्यों को पूरा करने और वैश्विक तापमान को डेढ़ डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने के लिए पारिस्थितिकी तंत्र को बचाने पर बल दिया गया। इस समझौते में इस दशक के अंत तक समृद्ध जैव विविधता वाले क्षेत्रों के नुकसान को शून्य के करीब ले जाने, जैव विविधता के करीब रह रहे स्थानीय समुदायों के अधिकारों का सम्मान और संरक्षण, मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने, पौधों और जीवों के अवैध व्यापार पर रोक लगाने, प्रदूषण को न्यूनतम करने, वैश्विक खाद्य अपशिष्ट को आधा करने और ऐसी आर्थिक सहायता को चरणबद्ध तरीके से समाप्त करने जैसे मुद्दे शामिल हैं जो प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से जैव विविधता के विनाश का कारण बन रहे हैं।
जैव विविधता के संरक्षण पर वैश्विक समुदाय को सचेत होना इसलिए जरूरी है, क्योंकि पर्यावरण क्षरण और जैव विविधता के ह्रास के कारण जलवायविक दशाएं कठोर होती जा रही हैं। दुनियाभर में जिस तेजी से जैव विविधता और पर्यावरण मूल्यों की हानि हो रही है, वह गंभीर चिंता का विषय है। संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम के मुताबिक दुनिया की अनुमानित अस्सी लाख वनस्पतियों और जीवों की प्रजातियों में से दस लाख विलुप्त होने के कगार पर हैं। यह चिंता का विषय इसलिए भी है क्योंकि प्राणवायु, भोजन, स्वास्थ्य, आजीविका और समृद्धि के विभिन्न साधनों के लिए हम किसी न किसी रूप से जैव विविधता पर आश्रित हैं। प्रकृति मानवता की पोषक है, लेकिन पारिस्थितिकी तंत्र में गिरावट वैश्विक आबादी के चालीस फीसद तबके के कल्याण को प्रभावित कर रही है।
धरती पर पारिस्थितिकी तंत्र को संतुलित रखने और जीवन की निरंतरता को बनाए रखने में जैव विविधता की भूमिका काफी महत्त्वपूर्ण है। जैव-विविधता से तात्पर्य धरती पर मौजूद जीवों और वनस्पतियों की विभिन्न प्रजातियों से है। जैव-विविधता के बिना धरती पर जीवन की कल्पना नहीं की जा सकती। जीवों की विविधता ही धरती पर जीवन के लिए अनुकूल परिवेश का निर्माण करती हैं। इसकी संपन्नता जहां मानव जीवन को सुदीर्घ और सेहतमंद बनाती है, वहीं विलुप्त होती जैव विविधता धरती को विनाश की ओर ले जाती है। हालांकि बढ़ती जनसंख्या, मृदा का घटना, जंगलों की कटाई, बिगड़ता पर्यावरण, जलवायु परिवर्तन और बढ़ती औद्योगिक गतिविधियों से जैव-विविधता का तेजी से क्षरण हो रहा है। लिहाजा जैव विविधता पर मंडराता खतरा मानव अस्तित्व के लिए भी जोखिम बढ़ा रहा है। ऐसे में जैव विविधता के नुकसान का मानव स्वास्थ्य और जीवन पर बुरा असर पड़ रहा है। इससे मानव का सामाजिक, आर्थिक, शारीरिक, मानसिक और भावनात्मक विकास प्रभावित हो रहा है। ऐसे में जरूरी है कि जैव विविधता के रूप में मानव जीवन के आधार को संरक्षित करने पर विशेष बल दिया जाए।
गौरतलब है कि दुनिया की सत्तर फीसद जैव विविधता केवल सत्रह देशों में पाई जाती है। इनमें भारत भी शामिल है। भारत का क्षेत्रफल दुनिया के कुल क्षेत्रफल का महज 2.4 फीसद है, लेकिन यहां वन्यजीवों की लगभग इक्यानबे हजार और वनस्पतियों की पैंतालीस हजार प्रजातियां पाई जाती हैं। जैव-विविधता का यह विशाल स्वरूप पारिस्थितिक-तंत्र को संतुलित रखने और मानव जीवन को अनुकूल बनाने में काफी मददगार साबित हुआ है। विभिन्न प्रकार के पौधों और जीवों की विस्तृत शृंखला स्वस्थ पारिस्थितिकी प्रणाली के निर्माण में सहायक है। मसलन, पेड़-पौधे प्राणवायु का संचार करते हैं और वायुमंडल से कार्बन डाइआक्साइड जैसी ग्रीनहाउस गैसों का अवशोषण कर धरती को अतिरिक्त ताप के खतरे से बचाते हैं। वहीं प्रवाल भित्तियां और मैंग्रोव वन चक्रवात और सुनामी से सुरक्षा प्रदान करते हैं। एक तरफ राइजोबियम, एजोटोबैक्टर जैसे जीवाणु और केंचुए जैसे अकशेरुकी जीव मृदा को उर्वर बनाने में सहायक हैं, तो दूसरी ओर गिद्ध सहित हजारों जीव मृत जीवों के अवशेषों का भक्षण कर वातावरण को प्रदूषित होने से बचाते हैं। इस तरह सब के सहयोग से एक स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण होता है। लेकिन अनुचित मानवीय गतिविधियों के दखल से पौधों और जीवों की कई प्रजातियां विलुप्त हो चुकी हैं और कइयों का अस्तित्व खतरे में है। मानव समाज के लिए यह एक बड़ी चेतावनी है। अगर समय रहते इन प्रजातियों के संरक्षण के लिए त्वरित और ठोस प्रयास नहीं किए गए, तो इन्हें भी किस्से-कहानियों का हिस्सा बनने में अधिक समय नहीं लगेगा! ऐसी अवस्था में मनुष्य भी अपना अस्तित्व खो देगा।
संयुक्त राष्ट्र ने 2011-2020 अवधि को ‘जैव विविधता दशक’ घोषित किया था। इसका उद्देश्य जैव विविधता के लिए उत्पन्न खतरों के बारे में जागरूकता बढ़ाना था। जैव विविधता के संरक्षण के लिए सबसे बड़ी आवश्यकता उन मानवीय गतिविधियों पर लगाम लगाने की है जो जैव विविधता के लिए घातक सिद्ध हो रही हैं। जैव विविधता के संरक्षण के लिए मुख्य रूप से दो रणनीतियां अपनाई जाती हैं। पहली, स्व-स्थानिक (इन-सीटू) संरक्षण विधि, जिसमें राष्ट्रीय उद्यान, वन्यजीव अभ्यारण्य और संरक्षित जैव वन शामिल हैं। दूसरी, बाह्य-स्थानिक (एक्स-सीटू) संरक्षण विधि है, जिसमें वनस्पति उद्यान, चिड़ियाघर, बीज बैंक, जीन बैंक आदि शामिल होते हैं। जैव विविधता संरक्षण की इन दोनों विधियों में बुनियादी फर्क यह है कि स्व-स्थानिक संरक्षण में लुप्तप्राय: प्रजातियों को बनाए रखने और उसकी पुनर्प्राप्ति के लिए उनके प्राकृतिक आवासों को संरक्षित किया जाता है, जबकि बाह्य-स्थानिक संरक्षण विधि में संकटग्रस्त प्रजातियों का संरक्षण प्राकृतिक आवासों की तर्ज पर विकसित मानव निर्मित आवासों में किया जाता है। हालांकि जैव विविधता के संरक्षण की ये दोनों ही विधियां लुप्तप्राय: जानवरों और पौधों की प्रजातियों की रक्षा, रखरखाव और पुनर्प्राप्ति में सहायक हैं। स्व-स्थानिक संरक्षण विधि के तहत देश में अब तक सैकड़ों राष्ट्रीय उद्यान, वन्यजीव अभ्यारण्य और संरक्षित वन विकसित किए गए हैं। जबकि दूसरी ओर बाह्य-स्थानिक संरक्षण के अंतर्गत देश में बड़ी संख्या में चिड़ियाघर, मछलीघर और वनस्पति उद्यानों की स्थापना हुई है। इनसे जीव-जंतुओं और पेड़-पौधों की अनगिनत प्रजातियों को संरक्षित करने में मदद मिली है।
जैव विविधता अधिनियम (2002) को लागू करने के लिए 2003 में केंद्र सरकार ने पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के अंतर्गत एक स्वायत्त और वैधानिक निकाय के रूप में ‘राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण’ की स्थापना की थी। इसी अधिनियम के तहत राज्यों में जैव विविधता प्राधिकरण और जैव-विविधता प्रबंधन समिति का गठन भी किया गया था। राष्ट्रीय जैव विविधता प्राधिकरण का काम जैव-विविधता के संरक्षण, इसके घटकों के सतत उपयोग और जैविक संसाधनों व ज्ञान के उपयोग से उत्पन्न होने वाले लाभों के उचित और समान बंटवारे से संबंधित किसी भी मामले पर केंद्र सरकार को सलाह देना, राज्य जैव विविधता बोर्डों को तकनीकी सहायता और मार्गदर्शन प्रदान करना और अनुसंधान को बढ़ावा देना है। असम, बिहार, पश्चिम बंगाल, कर्नाटक सहित कुल अठारह राज्यों और दो केंद्र शासित प्रदेशों- अंडमान और निकोबार द्वीप समूह और दादर एवं नगर हवेली-दमन एवं दीव में वनस्पतियों और जीवों की प्रजातियों पर विलुप्त होने का खतरा सबसे ज्यादा मंडरा रहा है। बहरहाल, मानवीय गतिविधियों पर लगाम लगाने के साथ जैव विविधता के संरक्षण हेतु समाज में भी जागरूकता पैदा करनी होगी, तभी हम जलवायु परिवर्तन के खतरे का सामना कर पाएंगे।
Date:29-12-22
नेपाल की नई सरकार और भारतडॉ एन. के. सोमानी
कम्युनिस्ट पार्टी नेपाल–माओवादी सेंटर (सीपीएन–एमसी) के मुखिया पुष्प कमल दहल उर्फ प्रचंड नेपाल के नये प्रधानमंत्री होंगे। रविवार को तेजी से बदले सियासी घटनाक्रम में उस वक्त नाटकीय मोड़ आ गया जब गठबंधन सरकार में शामिल प्रंचड पाला बदल कर ओली के खेमे में चले गए थे। दोनों नेताओं के बीच सरकार निर्माण के साथ–साथ पधानमंत्री पद के लिए प्रचंड के नाम की सहमति बनी। प्रचंड तीसरी बार नेपाल के पीएम बन रहे हैं। पहली बार 2008-09 और दूसरी बार 2016 तक नेपाल के पीएम रह चुके हैं।
नेपाल की 275 सदस्यीय प्रतिनिधि सभा के लिए नवम्बर में चुनाव हुए थे। चुनाव नतीजों में किसी भी दल को बहुमत नहीं मिला। मौजूदा प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा की नेपाली कांग्रेस को सबसे अधिक 80 सीटें मिलीं। ओली की पार्टी को 78 सीट और प्रचंड की पार्टी को महज 30 सीटें मिली हैं। इसके बावजूद वे नेपाली कांग्रेस के साथ गठबंधन में पहले ढाई साल के लिए पीएम बनना चाहते थे। दूसरी ओर‚ नेपाली कांगेस सबसे बड़ी पार्टी के रूप में सरकार का नेतृत्व करने पर अड़ी हुई थी। उधर‚ राष्ट्रपति बिद्या देवी भंडारी द्वारा प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के लिए निर्धारित समय सीमा रविवार को शाम पांच बजे समाप्त हो रही थी। देउबा के साथ बातचीत विफल होने के बाद प्रचंड प्रधानमंत्री पद के समर्थन के लिए कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ नेपाल–यूनाइटेड मार्क्सवादी लेनिनवादी (सीपीएन–यूएमएल) के अध्यक्ष केपी शर्मा ओली के निजी आवाज पर पहुंचे जहां दोनों नेताओं के बीच सरकार निर्माण के फार्मूले पर सहमति हुई। सहमति की शर्त के मुताबिक सीपीएन–यूएमएल समेत छह पार्टियों के समर्थन से प्रचंड पहले ढ़ाई साल के लिए नेपाल की कमान संभालेंगे और अगले ढ़ाई साल के लिए सीपीएन–यूएमएल के नेता केपी शर्मा ओली नेपाल के पीएम होंगे। प्रचंड के ओली के गठबंधन में शामिल होने के बाद नेपाल की तीनों प्रमुख कम्युनिस्ट पार्टियों के नेता प्रचंड‚ ओली और माधव कुमार नेपाल एक खेमे में आ गए हैं। प्रचंड और ओली‚ दोनों भारत विरोधी माने जाते हैं। ऐसे में सवाल है कि आने वाले दिनों में भारत–नेपाल संबंध किस दिशा में आगे बढ़ेंगे। यह सवाल इसलिए वाजिब लग रहा है क्योंकि अपने प्रचार अभियान के दौरान ओली कह चुके हैं कि अगर वे सत्ता में आते हैं‚ तो भारत के क्षेत्र कालापानी‚ लिपुलेख और लिम्पियाधुरा को वापस लेकर आएंगे। ये क्षेत्र सदियों से भारत के पास हैं। अब प्रचंड के साथ ओली सत्ता में हैं‚ तो निश्चित ही चुनावी वादा पूरा करने के लिए भारत के साथ तनाव को हवा देंगे। दूसरा‚ ओली की चीन परस्ती पहले से ही जग जाहिर है। हालांकि‚ नेपाली कांग्रेस के साथ काम करते हुए प्रचंड के भारत विरोध रुख में बदलाव आया है। फिर भी सवाल तो परेशान करता ही है कि अगर प्रचंड का चीन प्रेम जाग उठा तो भारत‚ नेपाल के रास्ते आने वाली रणनीतिक चुनौतियों से कैसे निबट सकेगा।
नवम्बर‚ 2019 में जब नेपाल में ओली की सरकार थी‚ उस वक्त कालापानी इलाके पर नेपाल ने दो टूक कह दिया था कि भारत को इस क्षेत्र से अपनी सेना हटा लेनी चाहिए। उस वक्त भी सवाल उठा था कि ओली की आक्रामक भाषा के पीछे कहीं चीनी मनसूबे तो काम नहीं कर रहे। हालांकि‚ 2014 में नरेन्द्र मोदी की नेपाल यात्रा के दौरान तत्कालीन नेपाली प्रधानमंत्री कोइराला ने कालापानी का मुद्दा उठाया था और कालापानी पर नेपाल का अधिकार बताते हुए इसे हल करने की अपील की थी। 1996 में कालापानी इलाके के संयुक्त विकास के लिए महाकाली संधि के तुंरत बाद नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टियों ने कालापानी पर दावा करना शुरू कर दिया। उधर‚ चीन लंबे समय से इस इलाके पर कब्जा करने की कोशिश करता रहा है। चीन की शह पर ही नेपाल में जब–तब कालापानी को लेकर प्रदर्शन होते रहे हैं। यह वही जगह है जहां भारत 1962 के युद्ध में चीन के समक्ष मजबूती से ड़टा हुआ था। भारत को डर है कि अगर कालापानी नेपाल के अधिकार क्षेत्र में चला गया तो चीन वहां अपने पांव जमा लेगा। भारत की घेराबंदी में जुटे चीन की भी यही मंशा है।
चीन की महत्वाकांक्षी परियोजना वन बेल्ट वन रोड में सहयोगी होने और व्यापारिक हितों के कारण नेपाल का झुकाव भारत से कहीं अधिक चीन की ओर है। नवम्बर‚ 2019 में पीएम मोदी ने काठमांडू में हुए बिम्सटेक देशों के सामने सैन्य अभ्यास का प्रस्ताव रखा तो ऐन वक्त पर चीन के दबाव में नेपाल ने सैन्य अभ्यास में शामिल होने से इंकार कर दिया जबकि बाद में उसने चीन के साथ सैन्य अभ्यास में भाग लिया था। भारत और नेपाल के बीच भारतीय सेना की गोरखा बटालियन में गोरखा सैनिकों की भर्ती के मुद्दे पर भी तनातनी की स्थिति बनी हुई है। नेपाल नाराज है कि भारत सरकार ने सेना में भर्ती की अग्निपथ योजना को लेकर उससे चर्चा तक नहीं की। नेपाली विदेश मंत्री नारायण खड़के नेपाल में भारतीय राजदूत नवीन श्रीवास्तव से मिलकर इस योजना के तहत नेपाली युवकों की भर्ती की योजना को स्थगित करने की मांग कर चुके हैं।
नेपाल का आरोप है कि अग्निपथ योजना नवम्बर‚ 1947 में भारत–ब्रिटेन एवं नेपाल के बीच हुए त्रिपक्षीय समझौते का उल्लंघन है। हालांकि‚ भारत ने नेपाल को आश्वस्त किया है कि अग्निपथ योजना के सारे फायदे‚ जो भारतीय युवाओं को मिलेंगे‚ नेपाल के गोरखाओं को भी हासिल होंगे। थल सेना प्रमुख जनरल मनोज पांडे की नेपाल की पांच दिवसीय यात्रा के दौरान इस मुद्दे को सुलझाने की कोशिश की गई थी लेकिन ऐसा नहीं हो सका। अब भारत ने भी दो टूक कह दिया है कि अगर नेपाली गोरखा अग्निवीर बनने के लिए नहीं आते हैं‚ तो उनकी खाली जगह को भारत में रह रहे गोरखाओं से भरा जाएगा। अभी 30 हजार से अधिक गोरखा भारतीय सेना में हैं। नेपाल में अग्निपथ योजना के तहत 1300 सैनिकों की भर्ती की जानी है।
हालांकि‚ भारत और नेपाल‚ दोनों समान संस्कृति और मूल्यों वाले पड़ोसी हैं। इसके बावजूद दोनों देशों के संबंध निर्धारित दायरे से बाहर नहीं निकल पाए हैं‚ तो इसकी बड़ी वजह कहीं न कहीं नेपाल का चीन प्रेम ही है। ओली के समर्थन से बन रही नेपाल की नई सरकार भारत के साथ रिश्तों को किस तरह आगे बढ़ाती है‚ यह अगले कुछ दिनों में स्पष्ट हो जाएगा।
Date:29-12-22
ध्यान खींच रहे मोटे अनाजमुद्दारवि शंकर
वर्तमान समय में देश–दुनिया में मोटे अनाजों को लगातार बढ़ावा दिया जा रहा है। सरकारी विज्ञापनों से लेकर संसद के मेन्यू तक हर जगह इनका जिक्र किया जा रहा है। लोगों से अपने आहार में मोटे अनाजों को शामिल करने की अपील की जा रही है। मोटे अनाजों को बढ़ावा देने के लिए संयुक्त राष्ट्र ने 2023 को मिलेट अर्थात मोटा अनाज वर्ष घोषित किया है। बताते चलें कि इसका प्रस्ताव भारत ने ही रखा था और 72 देशों ने इस प्रस्ताव का समर्थन किया था। मोटे अनाजों के बारे में कहा जाता है कि इनकी फसलें प्रतिकूल मौसम को झेल सकती हैं। इन्हें ज्यादा पानी की जरूरत नहीं होती है। भारत के बारे में मशहूर है कि यहां हजारों साल से ये अनाज हमारे भोजन का अनिवार्य हिस्सा रहे हैं। हमारी पीढ़ी‚ जो पांच–छह दशक पहले बड़ी हो रही थी‚ में से बहुतों ने बचपन में गेहूं‚ ज्वार‚ बाजरा‚ जौ‚ मक्का आदि की चूल्हे पर सिंकी स्वादिष्ट रोटियां खूब खाई हैं। बाजरे की खिचड़ी‚ रोटी और घी मिलाकर बनाए लड्डू‚ समा के चावल भी भोजन का हिस्सा रहे हैं। तब तो गेहूं की रोटी में भी चने का आटा मिलाकर खाया जाता था‚ जिसे मिस्सा आटा कहते थे। अकेले गेहूं की रोटी खाना स्वास्थ्य के लिए हानिकारक माना जाता था। सर्दियों में शायद ही कोई दिन होता था‚ जब मक्का या बाजरा की रोटी न बने‚ लेकिन गेहूं‚ चावल की पैदावार में क्रांति और इन्हें खाने वालों की आर्थिक हैसियत को ऊंची बताने के कारण मोटे अनाज हमारी थालियों से लगभग गायब हो गए। अरसे बाद जब ये सुपरफूड के रूप में विदेशों से लौटे और स्वास्थ्य के प्रति जागरूक रहने वाले धनाढ्य वर्ग की थाली की शोभा बढ़ाने लगे‚ तो फिर इनके प्रति दिलचस्पी बढ़ी। यह अच्छा ही हुआ। फिलहाल सरकार भी इनके उत्पादन के लिए किसानों को प्रोत्साहित कर रही है। खान–पान में इन अनाजों को शामिल करने की बात लगातार की जा रही है। मालूम हो‚ लम्बे समय से मोटे अनाजों की खेती को मुख्य धारा में लाने के लिए कोशिश की जा रही है।
सवाल अहम यह है कि भारत सहित दुनिया के देश मोटे अनाज की खेती पर जोर क्यों दे रही हैॽ जवाब स्पष्ट है‚ तेजी से हो रहा जलवायु परिवर्तन और बढ़ती जनसंख्या चिंता की बात है‚ ऐसे में फसलों के उत्पादन में कमी आएगी और खाद्य पदार्थों की मांग में बढ़ोतरी जिसके कारण सभी के लिए खाद्य पदार्थों की आपूÌत करना बड़ी चुनौती हो सकती है। जलवायु परिवर्तन के कारण भविष्य में सूखा और अकाल पड़ने जैसी घटनाएं सामान्य हो जाएंगी। मोटे अनाजों की खेती करके अकाल और सूखे की स्थिति से आसानी से निपटा जा सकता है। भारत दुनिया के उन सबसे बड़े देशों में शामिल है जहां सबसे ज्यादा मोटे अनाज की पैदावार होती है। भारत दुनिया के कई देशों को मोटे अनाज का निर्यात करता है। इनमें संयुक्त अरब अमीरात‚ नेपाल‚ सऊदी अरब‚ लीबिया‚ ओमान‚ मिस्र‚ ट्यूनीशिया‚ यमन‚ ब्रिटेन तथा अमेरिका शामिल हैं। मोटे अनाजों में भारत सबसे ज्यादा बाजरा‚ रागी‚ कनेरी‚ ज्वार और कुट्टू को एक्सपोर्ट करता है। वैश्विक उत्पादन में लगभग 41 प्रतिशत की अनुमानित हिस्सेदारी के साथ भारत दुनिया में बाजरा के अग्रणी उत्पादकों में शुमार है। इसके बावजूद मोटे अनाजों से बने उत्पाद– बेबीफूड‚ बेकरी‚ ब्रेकफास्ट‚ रेडी टू ईट फूड‚ रेडी टू कुक‚ रेडी टू सर्व‚ वेवरीज और पशु आहार बेचकर चीन दुनिया में मोटी कमाई कर रहा है। यह तब है जब वह दुनिया का मात्र 9 फीसदी ही मोटा अनाज पैदा करता है। खैर‚ केंद्र सरकार ने बाजरा सहित संभावित उत्पादों के निर्यात को बढ़ावा देने तथा पोषक अनाजों की आपूर्ति „श्रृंखला की बाधाओं को दूर करने के लिए पोषक अनाज निर्यात संवर्धन फोरम का गठन किया है। मोटे अनाज की कैटेगरी में ज्वार‚ बाजरा‚ रागी (मडुआ)‚ जौ‚ कोदो‚ सामा‚ बाजरा‚ सांवा‚ कुटकी‚ कांगनी और चीना जैसे अनाज आते हैं। इन अनाजों के सेवन से मोटापा‚ दिल की बीमारियां‚ टाइप–2 डायबिटीज और कैंसर का खतरा घटाता है। इनमें कई गुना अधिक पोषक तत्व पाए जाते हैं। यही वजह है कि मोटे अनाज को सुपर फूड भी कहा जाता है। मोटे अनाज में सिर्फ फाइबर ही नहीं‚ बल्कि विटामिन–बी‚ फोलेट‚ जिंक‚ आयरन‚ मैग्नीशियम‚ आयरन और कई तरह के एंटीऑक्सीडेंट्स पाए जाते हैं।
मोटे अनाज जहां सेहत के लिए रामबाण हैं तो दूसरी तरफ खेती करने वाले किसानों के लिए भी फायदेमंद हैं। मोटे अनाजों की खेती करके जलवायु परिवर्तन‚ ऊर्जा संकट‚ भू–जल ह्रास‚ स्वास्थ्य और खाद्यान्न संकट जैसी समस्याओं को काबू में किया जा सकता है। हम उम्मीद कर सकते हैं कि भारत 2023 में जी–20 की अध्यक्षता करते हुए अंतरराष्ट्रीय मोटा अनाज वर्ष 2023 के उद्देश्यों और लक्ष्यों के मद्देनजर देश और दुनिया में मोटे अनाजों के लिए जागरूकता पैदा करने में सफल होगा और इससे मोटे अनाज का वैश्विक उत्पादन बढ़ेगा‚ मोटे अनाज का वैश्विक उपभोग बढ़ेगा। साथ ही‚ कुशल प्रसंस्करण एवं फसल चक्र का बेहतर उपयोग सुनिश्चित होगा। भारत द्वारा वर्ष 2023 में मोटा अनाज वर्ष के तहत मोटे अनाजों के प्रति जागरूकता की प्रभावी रणनीति से एक बार फिर मोटे अनाज को देश के हर व्यक्ति की थाली में अधिक जगह मिलने लगेगी।
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चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति संबंधी याचिका पर उच्चतम न्यायालय की संविधान पीठ की सुनवाई को लेकर चर्चा जोरों पर बनी हुई है। हमने भी अपने एक लेख में इससे संबंधित कुछ तथ्य साझा किए थे। इस लेख में आयुक्तों की नियुक्ति की प्रक्रिया को लेकर दी गई विशेषज्ञों की टिप्पणीयों के बारे में जानते हैं। कुछ बिंदु –
उदाहरण के लिए, आयुक्तों को 65 वर्ष तक ही पद पर बने रहने का अधिकार है। सरकार ने इस बिंदु का लाभ उठाते हुए इतने वरिष्ठ लोगों की नियुक्ति की परंपरा बना ली है कि वे एक या दो वर्ष में ही सेवामुक्त हो जाते हैं। सरकार आखिर ऐसा क्यों करती है ?
नियमों के अनुसार प्रशासनिक सेवा के किसी व्यक्ति को ही आयुक्त पद पर नियुक्त करने की बाध्यता नहीं है। चूंकि जिलों में लंबे समय तक काम करते हुए इन अधिकारियों को चुनाव करवाने का अनुभव ज्यादा होता है, इसलिए इनको प्राथमिकता दी जाती है। इन अधिकारियों की नियुक्ति 58.59 वर्ष में न करने की परंपरा इसलिए पड़ी कि सरकार इन्हें छः वर्षों तक चुनाव आयुक्त बने रहकर अपनी मनमानी करने की शक्ति नहीं देना चाहती है। इस परंपरा के चलते वरिष्ठ अधिकारियों को ही आयुक्त बनने का मौका मिलने लगा है। लेकिन संविधान में कहीं ऐसा कोई उल्लेख नहीं है।
न्यायपालिका तो संविधान की रक्षक है, और उसने इस मामले को गंभीरता से लेकर सही कदम उठाया है। दूसरी ओर, स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव, हमारे संविधान का मूल आधार है। अतः इसे सुलझाया जाना बहुत जरूरी है। उम्मीद की जा सकती है कि देश के प्रबुद्धजन और संवैधानिक मामलों के विशेषज्ञ इस मामले में कोई सही हल निकाल सकेंगे।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित चर्चा पर आधारित। 2 दिसंबर, 2022
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Date:28-12-22
Focus on Africa, the heart of the Global SouthFor India to be remembered as the voice of the Global South through the G20 presidency, it needs to understand the mood and changes in AfricaRajiv Bhatia
India, through the G20 presidency, intends to be remembered as the voice of the Global South at the heart of which is Africa. Most of the 54 countries of this continent are developing or least developed countries. To truly represent the South, it is essential to grasp the mood and changes in Africa, especially in its external partnerships. This will determine the contribution India can make to advance the African agenda. In this context, the outcome of the U.S.-Africa Leaders’ Summit needs a critical examination.
Washington summit
The second U.S.-Africa summit was held in Washington from December 13 to 15. The leaders of 49 countries and the chair of the African Union (AU) participated from Africa. U.S. President Joe Biden, who is yet to visit the continent, played gracious host, discussing the political, security, and economic cooperation with his guests. The leaders also deliberated on the ways to mitigate the impact of COVID-19 and future pandemics, respond to the climate crisis, promote food security and deepen diasporic ties. Mr. Biden declared that African voices, leadership and innovation are “all critical to addressing the most pressing global challenges” and realising the vision of a free, open, prosperous and secure world. The U.S. is “all in on Africa and all in with Africa,” he stressed.
Several important decisions were taken. First, the U.S. announced its support for the AU to join the G20 as a permanent member. Second, the U.S. said it “fully supports” reforming the UN Security Council (UNSC) to include permanent representation for Africa. The first assurance is implementable immediately, provided the U.S. and India overcome likely resistance from the ASEAN and European Union. But the second is vague since UNSC reform is still far into the future. Third, a promise for the president and the vice president to visit Africa next year was made. This will be a refreshing change as no U.S. president has been seen in Africa since 2015.
Summits with Africa are often judged by the quantum of funds external partners are willing to offer for economic development. The U.S. announced new investments and initiatives, including $21 billion to the International Monetary Fund to provide access to necessary financing for low-and middle-income countries, and $10 million for a pilot programme to boost the security capacity of its African partners. The administration indicated that it planned to invest $55 billion in Africa over the next three years, working closely with the Congress.
China’s shadows
Nevertheless, the U.S.’s attempts to raise its profile in Africa remain episodic and faulting. China, on the other hand, has emerged as the largest trading partner and the fourth largest investor in the African continent, ahead of the U.S., through its steady diplomacy and extensive economic engagement. In 2021, while U.S.-Africa trade stood at $44.9 billion, China-Africa trade exchanges stood at $254 billion. The U.S. investment stock in Sub-Saharan Africa was $30.31 billion last year, compared with China’s total investment in Africa of $43.4 billion in 2020.
Here, the U.S. and other nations can take a cue from the Forum on China-Africa Cooperation (FOCAC), established in October 2000. The FOCAC is composed of ministers and leaders of Africa and China who meet once in three years, alternately in Beijing and an African capital. The Chinese president participates in deliberations in person or digitally. China has a full-fledged inter-ministerial mechanism to ensure the timely implementation of FOCAC decisions. The last meeting, held in Dakar in 2021, expressed support for the Chinese agenda: One-China Principle, the Global Development Initiative, the Belt and Road Initiative, and the vision of “a community with a shared future.” It also applauded the decision by the 2018 FOCAC summit in Beijing to build “a China-Africa community” that strives for “win-win cooperation.” For years, the Chinese foreign minister begins his annual series of foreign visits by travelling to Africa. Whatever flaws there may be in China’s economic diplomacy in Africa — and there are many, its consistent attention to Africa contains a useful lesson.
Just before the Washington summit, Don Graves, the U.S. Deputy Commerce Secretary, noted that the U.S. had fallen behind as China surged ahead. His claim that the U.S. remains the “partner of choice” should be weighed against constant feedback received from African leaders that they do not want to choose. They want the U.S., China, and all other partners to work with them because Africa’s needs are huge.
Implications for India
India’s equity in Africa is older and richer than that of China and the U.S., but that should not be a source of complacency. India has striven hard, in the past two decades, to strengthen its political and economic partnership with Africa at the continental, regional and bilateral levels. The Modi government created a special momentum in arranging high-level exchanges and forging cooperation initiatives during the 2015-19 period.
Since then, COVID-19, the economic downturn, the war in Ukraine and border conflict with China may have contributed to a slowdown. This should be arrested quickly. The G20 presidency is India’s opportunity to ensure that the AU becomes a permanent member of this grouping and to reflect firmly Africa’s Agenda 2063 for development. India and the U.S. should work closer together in Africa. Finally, the fourth India-Africa Forum Summit should be held in early 2024, lest the third summit held in 2015 becomes a distant memory.
Date:28-12-22
भूमंडलीकरण का एक नया दौरहर्ष वी. पंत, ( लेखक आब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में रणनीतिक अध्ययन कार्यक्रम के निदेशक हैं )
यह कहना गलत नहीं होगा कि 2022 बेहद उथल-पुथल भरा रहा। साल खत्म होने को आया, लेकिन रूस द्वारा यूक्रेन के शहरों, उसके ऊर्जा केंद्रों और बुनियादी ढांचे को मिसाइलों एवं ड्रोन से निशाना बनाने का सिलसिला समाप्त नहीं हुआ। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन इन हमलों को इस आधार पर उचित ठहरा रहे हैं कि यह अक्टूबर में रूस को क्रीमिया से जोड़ने वाले पुल को उड़ाने की वाजिब जवाबी प्रतिक्रिया है। मास्को जहां यूक्रेन के लोगों का हौसला पस्त करना चाहता है, वहीं यूक्रेन और दृढ़ता से प्रतिकार के लिए तैयार प्रतीत होता है, जो गतिरोध का शिकार हुई ऊर्जा आपूर्ति के बीच हाड़ कंपा देने वाली सर्दी में भी झुकने को राजी नहीं। ईरान द्वारा रूस को लंबी दूरी तक मार करने वाली बैलिस्टिक मिसाइलों की आपूर्ति से जुड़ी चिंताओं के बीच अब अमेरिका यूक्रेन को पैट्रियट एयर डिफेंस मिसाइलें उपलब्ध करा रहा है। यूरोप में संवाद बढ़ाने के पक्ष में कुछ आवाजें जरूर उठ रही हैं, लेकिन ऐसी संभावना के साकार होने के आसार कम ही दिखते हैं।
विश्व का दूसरा सबसे शक्तिशाली देश चीन इस समय कई दबावों से जूझ रहा है। महज कुछ ही दिनों के भीतर चीनी कम्युनिस्ट पार्टी ने अपनी शून्य कोविड नीति से पलटी मार ली, क्योंकि शी चिनफिंग के सख्त नियमों से उकताकर लोग आक्रोशित होने लगे थे। कई शहरों में विरोध-प्रदर्शन कर रहे लोग शी के इस्तीफे की मांग करने लगे थे। इसके बाद चीन ने कोविड संबंधी सख्त पाबंदियां हटा दीं। एकाएक इन पाबंदियों को हटाने से वहां स्वास्थ्य ढांचा चरमराने लगा है, क्योंकि सुविधाओं की तुलना में संक्रमण के मामले कहीं ज्यादा तेजी से बढ़ रहे हैं। हालांकि, घरेलू स्तर पर ऐसी मुश्किलों के बावजूद शी बाहरी मोर्चे पर आक्रामकता दिखाने से बाज नहीं आ रहे। बीते दिनों अरुणाचल के तवांग में चीनी दुस्साहस वास्तविक नियंत्रण रेखा यानी एलएसी पर एकतरफा परिवर्तन की उसकी मंशा को ही दर्शाता है। चूंकि भारतीय सैन्य बलों ने मात्रात्मक एवं गुणात्मक स्तर पर सुदृढ़ सेना को करारा जवाब दिया तो इससे भी चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की भारत को सबक सिखाने की खीझ और बढ़ेगी।
यह सब एक ऐसे समय में हो रहा है, जब अमेरिका और चीन के बीच तेज होते भूराजनीतिक एवं भूआर्थिक टकराव ने नई दिल्ली की स्थिति को चीन की दादागीरी की दृष्टि से और नाजुक बना दिया है। तल्ख होती अमेरिकी-चीन प्रतिद्वंद्विता से आगामी वर्षों में यह प्रतिस्पर्धी दबाव और बढ़ेगा, क्योंकि अमेरिका जहां हिंद-प्रशांत क्षेत्र में अपनी साझेदारी को सशक्त बनाएगा, वहीं चीन के साथ तकनीकी आदान-प्रदान को संकुचित करेगा। बाइडन प्रशासन ने हाल में ऐसी कुछ सिलसिलेवार घोषणाएं की हैं, जिनसे चीन को होने वाला अमेरिकी उच्च प्रौद्योगिकी निर्यात बंद होगा। इससे आधुनिक कंप्यूटिंग चिप्स, सुपर कंप्टूयर्स और उन्नत सेमीकंडक्टर्स बनाने की चीनी क्षमताएं प्रभावित होंगी।
संप्रति भूराजनीति फिर से निर्णायक भूमिका में आ गई है, क्योंकि आर्थिक निर्णयों के मामले में विश्वास आवश्यक पहलू बन गया है। वाशिंगटन द्वारा चीन को महत्वपूर्ण तकनीकों से वंचित करने की नीति और चीन पर अति निर्भरता को दूर करने के लिए आपूर्ति शृंखला को नए सिरे से गढ़ने के लिए समान विचार वाले देशों के साथ नई साझेदारियों की आवश्यकता में यही आभास होता है। अमेरिका ने स्पष्ट रूप से कहा है कि 21वीं सदी की वैश्विक अर्थव्यवस्था के निर्माण में चीन के साथ उसकी जो प्रतिस्पर्धा है, उससे अकेले पार नहीं पाया जा सकता।
अब भूमंडलीकरण का एक नया दौर शुरू हो गया है, जिसमें महत्वपूर्ण उद्योगों से जुड़ी आपूर्ति शृंखला के ढांचे में बदलाव के पीछे विदेश नीति और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं का ध्यान रखा जा रहा है। अबाध आर्थिक भूमंडलीकरण की जिस ताकत को कभी सभी वैश्विक समस्याओं का समाधान माना जाता है, उसका असर अब कमजोर पड़ गया है। यदि उभरती तकनीकें ही भूराजनीति के अगले चरण का निर्धारण करेंगी तो समझिए कि उनकी आपूर्ति का ध्रुवीकरण एक नई वास्तविकता है। देखना यही होगा कि इस मोर्चे पर संबंधित पक्षों में ताल कैसे बैठती है।
इसमें कोई संदेह नहीं कि यह दौर बड़ी शक्तियों के बीच टकराव का है, जिसमें बहुपक्षीय ढांचा दरक रहा है और भूराजनीतिक समीकरण बदल रहे हैं। इसके चलते आर्थिक एवं तकनीकी सहयोग में राजनीतिक विश्वास की बड़ी भूमिका होगी, भले ही देशों को इसकी कुछ कीमत ही क्यों न चुकानी पड़े। यदि अमेरिका ने इस आर्थिक ढांचे के नए सिरे से आकार देना आरंभ किया है तो इसे अंतिम स्वरूप यूरोप से मिलेगा। चीन का उदय अमेरिका के लिए जिन निहितार्थों वाला है, वही स्थिति यूरोप के लिए यूक्रेन में रूसी हमले की है। अंतत: यूरोप की आंखें वैश्विक हलचलों की चुनौती को लेकर खुली हैं। फिर चाहे वह यूरेशिया का मामला हो या फिर हिंद-प्रशांत का। वैश्विक राजनीति और आर्थिकी का ध्यान हिंद-प्रशांत की ओर बढ़ा है। पश्चिम को भी आभास हुआ है कि रूस एक तात्कालिक दिक्कत है, लेकिन बड़ी समस्या चीन है और आने वाले समय में मास्को-बीजिंग धुरी के मजबूत होने से यह समस्या और विकराल ही होनी है। यही कारण है कि पश्चिम महत्वपूर्ण उत्पादों के लिए चीन पर अपनी आर्थिक निर्भरता घटाने के लिए तमाम विकल्प अपनाएगा। इसके लिए चीन को महत्वपूर्ण तकनीकों से दूर रखना और समान विचारों वाले साझेदारों के साथ नजदीकी बढ़ाने जैसे तरीके भी अपनाए जाएंगे।
उभरते भूराजनीतिक ढांचे में भारत की मुख्य भूमिका होगी। जी-20 की अध्यक्षता के साथ वह अगले वर्ष वैश्विक एजेंडे को आकार देने में सक्षम होगा। हालांकि इससे इतर बात करें तो यही वह पड़ाव है जब भारतीय नीति निर्माताओं को अपने नीतिगत विकल्पों के दूरगामी निहितार्थों को देखते हुए बड़ी सावधानी से उनका चयन करना होगा। अपने लाभ के लिए शक्ति के संतुलन का उपयोग वैश्विक पदानुक्रम में किसी राष्ट्र के उदय में अहम होता है। यह वैश्विक ढांचे में एक निर्णायक मोड़ का दौर है। नई दिल्ली को इसे गंभीरता से लेते हुए सक्रियता के साथ अपनी तत्परता दिखानी चाहिए।
Date:28-12-22
एक भारतीय जेईटीपी की बुनियादअजय शाह
विकसित अर्थव्यवस्था वाले देशों ने वातावरण को प्रदूषित किया और यह उचित ही है कि वे गरीब देशों को संसाधन मुहैया कराएं जहां कार्बन आधारित वृद्धि अब व्यावहारिक नहीं है। दो जलवायु वित्त चैनल हैं जो निवेश क्षमता और निवेश की समस्याओं को हल करने का प्रयास कर रहे हैं। द ग्लोबल एन्वॉयरनमेंटल, सोशल ऐंड गवर्नेंस या ईएसजी अवधारणा जो पहले आई, इसने स्वच्छ ऊर्जा के लिए बड़े पैमाने पर सस्ती वित्तीय मदद मुहैया कराई। परंतु इसके लिए निवेश की क्षमता आवश्यक थी। यह परिपक्व बाजार में ऊर्जा क्षेत्र के लिए जरूरी बुनियाद है। जस्ट एनर्जी ट्रांजिशन पार्टनरशिप या जेईटीपी जलवायु वित्त व्यवस्था का दूसरा चैनल है। भारत की बात करें तो जेईटीपी को एक बार में एक राज्य के लिए काम करना चाहिए और उस राज्य को निवेश लायक बनाने के लिए बिजली के क्षेत्र में सुधारों को आंशिक रूप से फंड करना चाहिए।
जलवायु न्याय का विचार कहता है कि चूंकि विकसित अर्थव्यवस्थाओं ने वातावरण को प्रदूषित किया है इसलिए गरीब देश वैसी ही प्रक्रियाएं अपनाकर समृद्धि हासिल नहीं कर सके। इन दावों के बारे में कुछ कहा जाना आवश्यक है जबकि इसके साथ ही कई सीमाओं को भी चिह्नित करना होगा। ऐसे में गरीब देश कहते हैं कि विकसित बाजारों को उनकी ऊर्जा बदलाव की कोशिशों के लिए संसाधन सहायता करनी चाहिए। जेईटीपी के दो बड़े कार्यक्रम दक्षिण अफ्रीका और इंडोनेशिया में चल रहे हैं और यही जलवायु वित्त व्यवस्था का दूसरा नया चैनल है। हम भारतीयों को इस परिदृश्य को समझना होगा और साथ ही विभिन्न कारकों के प्रोत्साहन और दिखावे को लेकर सतर्क रहना होगा। हम पाते हैं कि भारत में ऊर्जा बदलाव को लेकर सबसे अहम संगठित करने वाला सिद्धांत है निवेश और निवेश योग्यता के बीच भेद।
निवेश की बात करें तो वह निजी कंपनियों का कारोबार है जो उत्पादन, भंडारण, वितरण और पारेषण का काम करती हैं और जो बाजार आधारित विद्युत क्षेत्र का हिस्सा है। इस क्षेत्र में ऐसी कंपनियां होनी चाहिए जो ऐसे निर्णय लें जो मूल्य और संभावित लाभ से निर्धारित होते हों। इन कंपनियों पर सही मायने में खतरा होगा और बदलती कीमतों के मुताबिक उनको लगातार अपना व्यवहार बदलना होगा। कीमतों पर सभी स्तरों पर उतार-चढ़ाव आएगा और मांग तथा आपूर्ति में भी। मांग और आपूर्ति के साथ ही कीमतों में सभी स्तरों पर उतार चढ़ाव आएगा। यानी मांग और आपूर्ति दोनों पक्ष ऊर्जा बदलाव से संबंध रखते हैं।
जबकि निवेश के लिए जलवायु वित्त व्यवस्था की समस्या मोटे तौर पर हल हो चुकी है: ईएसजी निवेश के रूप में लगभग असीमित विदेशी पूंजी रूपी संसाधन इस क्षेत्र में उपलब्ध हैं। इसमें विकसित बाजारों के पेंशनधारक और बीमा ग्राहक शामिल हैं जिन्हें भारत में ऊर्जा बदलाव को फंडिंग के बदले अपने निवेश पर बाजार दर से कुछ कम प्रतिफल हासिल होता है।
वैश्विक ईएसजी निवेश ने मुंबई में निवेश वित्त की जमीनी हकीकतों को बदला है। ईएसजी भारतीय ऊर्जा बदलाव की सहायता करने में सक्षम है तथा यह वर्तमान और भविष्य के भारतीय वित्तीय नियमन की सीमाओं, पूंजी नियंत्रण, कर नीति और विधि के शासन के अनुरूप है। अब मुंबई में जीवाश्म ईंधन कारोबार के लिए वित्तीय सौदे हासिल करना मुश्किल है जबकि स्वच्छ ऊर्जा कारोबार के लिए आसान। भारत में जलवायु वित्त की बात करें तो एक ओर वैश्विक वित्तीय तंत्र से मजबूत परियोजनाओं के लिए असीमित पूंजी उपलब्ध है तो वहीं दूसरी ओर भारतीय बिजली क्षेत्र में अलग तरह की सीमाएं हैं। हमारी बुनियादी समस्या यह है कि हमारा बिजली क्षेत्र सरकारी नियंत्रण में काम करता है।
लेखकों ने रणनीतियों को लेकर काफी कुछ लिखा है। नीतिगत शोध, डिजाइन, क्षमता निर्माण आदि के क्षेत्र में काफी काम करने की आवश्यकता है कि ताकि जरूरी बिजली सुधारों को अंजाम दिया जा सके। एकबारगी बड़ी धनराशि का व्यय आवश्यक है ताकि नीतिगत दिक्कतों से निजात पाकर निवेश की अर्हता हसिल की जा सके और असीमित निवेश हासिल हो। इस एकबारगी व्यय के तीन स्रोत हैं: (अ) समान्य बजट संसाधन (ब) बिजली क्षेत्र में सरकारी परिसंपत्तियों के निजीकरण से होने वाली प्राप्तियां और (स) अमीर देशों से मिलने वाली सहायता। जेईटीपी इस सहायता में कारगर है।
जेईटीपी के दक्षिण अफ्रीका और इंडोनेशिया के दस्तावेज दानदाताओं, आधिकारिक राशि और निजी धनराशि का मिश्रण हैं। ऐसे में निवेश और निवेश अर्हता का भी मिश्रण तैयार होता है। भारत में हमें भी निवेश की समस्या को परे करके देखना चाहिए। भारतीय वित्तीय कंपनियां वैश्विक ईएसजी धड़ों में भी अच्छी तरह शामिल हैं और वैश्विक निजी पूंजी को भारतीय निजी बिजली संबंधी निवेश में लाने में मदद कर सकती हैं। भारतीय जेईटीपी का ध्यान निवेश की अहर्ता पर होना चाहिए। दक्षिण अफ्रीका अनुभव बताता है कि 8.5 अरब डॉलर के एक जेईटीपी ने 98 अरब डॉलर के कुल निवेश के लिए प्रेरक का काम किया है।
हमें चार सिद्धांतों पर जोर देना चाहिए:
Date:28-12-22
युवाओं पर हैं दारोमदारअनमोल सोवित
दुनिया में युवाओं की आबादी कुल आबादी की लगभग 16 फीसद है। यानी विश्व में 8 अरब की आबादी में लगभग 125 करोड़ युवा हैं। युवाओं की इतनी बड़ी संख्या को देखते हुए उनके प्रतिनिधित्व की जरूरत महसूस की गई। इसी को ध्यान में रखते हुए जी 20 देशों के समूह ने 20 यानी युवाओं के एक अलग समूह की स्थापना की है। जी 20 देशों के युवाओं के इस समूह की भूमिका अति महत्त्वपूर्ण है। इनका योगदान न केवल अंतरराष्ट्रीय स्तर पर युवाओं को जोड़ने के क्षेत्र में है बल्कि इन युवाओं के रिसर्च और रिपोर्ट के आधार पर वैश्विक स्तर पर नीतियों का निर्धारण और क्रियान्वयन भी जी 20 के देशों के द्वारा किया जाता रहा है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने राष्ट्रीय युवा दिवस 2022 के अवसर पर राष्ट्रीय युवा महोत्सव को संबोधित करते हुए कहा था ‘आज दुनिया भारत को एक आशा की दृष्टि से, एक विश्वास की दृष्टि से देखती है क्योंकि भारत का जन भी युवा है, और भारत का मन भी युवा है। भारत अपने सामर्थ्य से भी युवा है, भारत अपने सपनों से भी युवा है। उन्होंने आगे कहा कि भारत अपने चिंतन और अपनी चेतना से भी युवा है। भारत के युवाओं के पास बड़ी युवा आबादी के साथ- साथ लोकतांत्रिक मूल्य भी हैं। इसका लाभ अतुलनीय है।
युवाओं के राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महत्त्व को रेखांकित करने और आपसी जुड़ाव के महत्त्व को समझने की दिशा में 20 आज की तिथि में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। 20 न केवल युवाओं को जी 20 के सरकार के प्रमुखों के समक्ष अपने विचारों और दृष्टिकोण को प्रस्तुत करने का अवसर देता है बल्कि यह युवाओं को कठिन बहुपक्षीय परामर्श में भी शामिल होने का मौका देता है । जी 20 शिखर सम्मेलनों के दौरान युवाओं को पर्याप्त अवसर देकर उनकी प्रतिभा और रणनीतिक एवं नेतृत्व कौशल को उभारने का प्रयास किया जाता है। जी 20 देशों युवाओं के कार्य कौशल एवं उनके भीतर की प्रतिभा को उभारने एवं अंतरराष्ट्रीय स्तर पर उनके दृष्टिकोण और वैचारिकता को प्रस्तुत करने के उद्देश्य से ही यूथ 20 का गठन किया है। इस युवा जुड़ाव समूह में प्रत्येक जी 20 देशों के युवाओं को समान प्रतिनिधित्व मिलता है। जिसके तहत हर देश से 5 युवाओं को प्रतिनिधिमंडल में शामिल किया जाता है। विभिन्न देशों के युवा अंतरराष्ट्रीय शिखर सम्मेलन में विभिन्न मुद्दों पर विचार विमर्श कर एक समावेशी निर्णय पर पहुंचते हैं। तत्पश्चात अपने निर्णयों को एक रिपोर्ट के माध्यम से जी 20 के देशों के नेताओं के समक्ष प्रस्तुत करते है। यूथ 20 के माध्यम से वैश्विक स्तर पर युवाओं को अपने राष्ट्र एवं पूरी दुनिया के भविष्य के प्रतिनिधित्व का अवसर मिलता है। यूथ 20 के माध्यम से युवाओं से यह उम्मीद की जाती है कि वे अपने अनुभव और बुद्धिमता के द्वारा वैश्विक स्तर पर दायित्व की भावना को बढ़ावा देंगे। उनसे यह आशा होती है कि वे भविष्य के प्रति एक सकारात्मक जिम्मेदारी ग्रहण करेंगे ताकि उनके एक सुंदर और समावेशी भविष्य के निर्माण की दिशा में मजबूत कदम बढ़ाया जा सके। यूथ 20 के युवाओं को वैश्विक स्तर के सभी युवाओं की आवाज मानकर उनके द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट से बेहतर दुनिया की संकल्पना की जाती है। इंडोनेशिया में आयोजित जी 20 देशों के शिखर सम्मेलन में यूथ 20 के प्रतिनिधियों के द्वारा कई वैश्विक मुद्दों पर लंबा विचार विमर्श किया गया। युवाओं के इस समूह ने पर्यावरण, स्थिरता, शांति, सुरक्षा, समावेशन और इक्विटी के संबंध में युवाओं को दिशा दी है। युवाओं के इस अहम समूह ने वैश्विक नेताओं से सतत और रहने योग्य धरती, युवाओं के लिए पर्याप्त रोजगार, तकनीकी विकास एवं विविधता और समावेशिता पर नीतियां बनाने का आह्वान किया है। इंडोनेशिया की अध्यक्षता में संपन्न हुए जी 20 देशों के इस शिखर सम्मेलन के बाद अगले एक साल के लिए जी 20 देशों की अध्यक्षता भारत को सौंप दी गई। भारत वर्तमान में संसार का सबसे युवा देश है। इसलिए युआवों के लिए भारत की जिम्मेदारी बढ़ जाती है। भारत इक्कसवीं सदी में दुनिया की महाशक्ति बनने जा रहा है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी जी के नेतृत्व में भारत का चतुर्दिक विकास हो रहा है।
हर क्षेत्र में भारत की हो रही इस तरक्की के आधार देश के युवा हैं। ऐसे में जी 20 की अध्यक्षता मिलने के बाद यूथ 20 के युवाओं के प्रतिनिधित्व की जिम्मेदारी भी भारत के पास है और भारत को मिले इस अवसर का निश्चित रूप से देश के युवाओं के विकास को दिशा देगा। यूथ 20 मंच के माध्यम से भारत के युवाओं के आकांक्षाओं को प्राथमिकता देना, उनके सशक्तिकरण की जरूरत पर बल देना आवश्यक है। भारत को वैश्विक स्तर पर एक नई पहचान देने वाले, विश्व को नई राह दिखाने वाले स्वामी विवेकानंद जी ने युवाओं का आह्वान करते हुए कहा था ‘उठो, जागो और तब तक नहीं रुको, जब तक कि लक्ष्य न प्राप्त हो जाए ।’ स्वामी विवेकानंद जी के ये विचार आज भी युवाओं के लिए प्रेरक हैं। जी 20 के मंच के माध्यम से देश के युवाओं के पास एक अवसर आया है कि अपनी क्षमता, ज्ञान और बेहतर विश्व बनाने के संकल्प के साथ एक बार पुनः विश्व का मार्गदर्शन करें।
Date:28-12-22
राज्य सीमा विवादसंपादकीय
महाराष्ट्र और कर्नाटक के बीच सीमा विवाद लगातार बढ़ता जा रहा है, इससे न केवल राजनीतिक खींचतान, बल्कि स्थानीय लोगों में चिंता भी बढ़ रही है। कर्नाटक विधानसभा ने गुरुवार को एक प्रस्ताव पारित किया है, जिसमें सीमा विवाद पर समझौता नहीं करने का संकल्प लिया गया है। अब इसके जवाब में महाराष्ट्र विधानसभा ने भी एक प्रस्ताव पारित किया है, ताकि विवादित क्षेत्रों को जल्दी से जल्दी महाराष्ट्र में शामिल किया जा सके। महाराष्ट्र की राजनीति में भावनाएं ज्वार पर हैं। राज्य विधानसभा में सोमवार को कर्नाटक-महाराष्ट्र सीमा विवाद के प्रस्ताव को लेकर अनिश्चितता के बादल मंडरा रहे थे, क्योंकि सत्तारूढ़ बालासाहेबंची शिवसेना (बीएसएस) और भारतीय जनता पार्टी इस मामले में एकमत नहीं थे। बीएसएस ने शुक्रवार को ही कह दिया था कि वह विधानसभा में प्रस्ताव लाएगी। खैर, महाराष्ट्र में अब भाजपा के लिए यह मजबूरी है कि वह बीएसएस के साथ गठबंधन में रहे। समस्या यह भी है कि शिवसेना में विभाजन के बाद पहली बार उद्धव ठाकरे ने बीएसएस का किसी मुद्दे पर समर्थन किया है। उद्धव के इस समर्थन का राजनीतिक महत्व समझा जा सकता है। यह प्रस्ताव भविष्य में भाजपा और बीएसएस की दूरी बढ़ा सकता है।
इस पूरे विवाद में भाजपा के लिए मुसीबत बढ़ना तय लगता है। महाराष्ट्र को खुश करने की कोशिश में कर्नाटक विधानसभा चुनाव में मुश्किल हो जाएगी, जहां भाजपा सत्ता में है और अगर कर्नाटक को खुश किया, तो महाराष्ट्र में न केवल लोग नाराज होंगे, सरकार गिरने की भी नौबत आ जाएगी। शिवसेना के दोनों गुटों का कर्नाटक में वजूद नहीं है, लेकिन भाजपा के लिए कर्नाटक का बहुत महत्व है। भाजपा कर्नाटक में भी दबाव में थी, इसलिए उसने गुरुवार को प्रस्ताव पारित कर दिया। अब जवाब में महाराष्ट्र में जो प्रस्ताव पारित हुआ है, उसमें भी भाजपा भागीदार है। यह एक ऐसा विवाद हो गया है, जिसे सुलझाने के लिए पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व को आगे आना होगा। विवादित भूमि किसी के भी पक्ष में जाए, नुकसान भाजपा को होना तय है। अक्सर दावा किया जाता है कि डबल इंजन की सरकार ज्यादा अच्छी होती है। कर्नाटक और महाराष्ट्र, दोनों जगह भाजपा सरकार में है, तो इससे फायदे की उम्मीद दोनों राज्यों में लोगों को जरूर होगी। यह दूसरी पार्टियों के लिए सियासी अनुकूलता का समय है, जबकि भाजपा के लिए प्रतिकूलता का। नुकसान से बचने के लिए भाजपा को कर्नाटक में भी सचेत रहना होगा और महाराष्ट्र में भी।
ध्यान रहे, कर्नाटक राज्य महाराष्ट्र की सीमा में स्थित 40 गांवों पर दावा कर रहा है, तो महाराष्ट्र को कर्नाटक से 865 मराठीभाषी गांव चाहिए। यह विवाद सुप्रीम कोर्ट में भी जा चुका है। सुप्रीम कोर्ट ने इसे केंद्रशासित प्रदेश बनाने का सुझाव दिया था, लेकिन इस पर आगे का काम नहीं हुआ, क्योंकि इसके लिए दोनों राज्य सहमत नहीं हुए। ऐसे मामले अदालतों में नहीं, सियासी मैदान में संवाद से सुलझें, तभी स्थायी समाधान निकल सकता है। देश में ऐसे अनेक इलाके हैं, जहां इसी तरह की चर्चा होती रहती है, लेकिन विवाद नहीं खड़े किए जाते हैं। महाराष्ट्र और कर्नाटक के बीच भी यह विवाद खड़ा नहीं होना चाहिए, लेकिन कर्नाटक में मुख्यमंत्री बसवराज बोम्मई और महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे, दोनों ही इस मुद्दे पर आक्रामक लग रहे हैं। मामला और बिगड़े, उससे पहले केंद्रीय सियासी नेतृत्व और न्यायपालिका को सक्रिय हो जाना चाहिए।
Date:28-12-22
अब बेटियों को चाहिए तेज बदलावअनीता जैन भटनागर, ( पूर्व आईएएस )
वर्ष 2022 समापन पर है। बीतते वर्ष में कुछ मुख्य मुद्दों की प्रगति के आकलन का यह उपयुक्त समय है। साल 2022 में महिलाओं के लिए संयुक्त राष्ट्र का विषय था, ‘एक स्थायी कल के लिए आज लैंगिक समानता’। इस व्यापक सोच के पीछे जलवायु परिवर्तन के अनुकूलन और प्रतिक्रिया में महिलाओं के प्रमुख योगदान की महत्ता है। मतलब पृथ्वी का सुरक्षित भविष्य महिलाओं के बिना संभव नहीं है। यह बात बिल्कुल सही है, क्योंकि विश्व की 49.5 प्रतिशत और भारत की 48.3 प्रतिशत आबादी महिलाओं की है। भारत में 66.3 प्रतिशत महिलाएं 15 से 64 वर्ष के बीच की हैं, यह उनका सर्वाधिक उपयोगी वर्ग है।
इस साल यह जानकर महिलाओं को बहुत प्रसन्नता हुई कि बीसीसीआई द्वारा निर्णय लिया गया है, महिला क्रिकेटरों को पुरुष खिलाड़ियों के अनुरूप बराबर मैच फीस मिलेगी। समाचारपत्रों में इस सूचना के साथ उसी पन्ने पर यह भी खबर छपी थी कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने एक राज्य सरकार को नोटिस दिया है, क्योंकि इस राज्य में कुछ जाति पंचायतों ने विवाद सुलझाने के नाम पर लड़कियों को बेचने और बलात्कार तक की मंजूरी दी है। यह पढ़कर ही रोंगटे खड़े हो गए थे कि हम किस युग में रह रहे हैं?
महिलाओं की वास्तविक स्थिति काफी जटिल है। उनके साथ होने वाली घरेलू हिंसा के आंकडे़ दुखद कहानी बयान करते हैं। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार, 53.44 प्रतिशत विवाहित महिलाएं विभिन्न प्रकार की घरेलू हिंसा की शिकार हुई हैं। हमारी पुरुष प्रधान सामाजिक व्यवस्था में अच्छी महिला वह है, जो पति की हर आज्ञा का पालन करे। पुरुष ही नहीं, कई महिलाएं भी आज्ञा की पालना न होने पर घरेलू हिंसा को सही मानती हैं। सर्वेक्षण के आंकड़े इस बात की भी पुष्टि करते हैं कि जहां पति-पत्नी का शैक्षिक स्तर अच्छा है, वहां घरेलू हिंसा की घटनाओं में कमी है। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार, प्रत्येक घंटे एक महिला की दहेज हिंसा के कारण मृत्यु होती है और दो का बलात्कार होता है। एक अन्य तथ्य यह भी है कि ज्यादातर बलात्कार दर्ज नहीं हो पाते हैं।
इस वर्ष निर्भया के वीभत्स हत्याकांड के 10 वर्ष पूरे हुए। इस घटना के फलस्वरूप केंद्र सरकार ने कई नियमों में सकारात्मक बदलाव किए थे। यह सवाल फिर उठा कि वास्तविक स्थिति में अब तक कितना सुधार आया है? प्रोत्साहन स्वयंसेवी संस्था ने यह पाया कि पोस्को ऐक्ट के तहत 2014 से दायर 70 प्रतिशत मामले अभी भी निर्णय के लिए लंबित हैं। संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या रिपोर्ट के अनुसार, यह अनुमानित है कि भारत में बेटे को वरीयता देने की सोच के चलते 460 लाख बालिकाओं का जन्म ही नहीं हुआ। भारत में महिला-पुरुष लिंग अनुपात नौ राज्यों में प्रत्येक हजार पुरुष पर 900 महिलाओं से भी कम है।
इन तथ्यों-आंकड़ों का तात्पर्य यह कदापि नहीं है कि महिलाओं के सशक्तिकरण के लिए वर्ष 2022 में कदम नहीं उठाए गए हैं। अनुसूचित जनजाति की द्रौपदी मुर्मू भारत की राष्ट्रपति बनीं, जो अविस्मरणीय उपलब्धि है। पी टी उषा भारतीय ओलंपिक एसोसिएशन की प्रथम महिला अध्यक्ष बनीं। सीएसआईआर की महानिदेशक पहली बार महिला डॉक्टर एन कलाइसेल्वी नियुक्त हुईं। भारतीय नौसेना में ऐतिहासिक निर्णय हुआ कि अब महिलाएं उनकी विभिन्न सेवाओं में शामिल की जा सकती हैं। ्त्रिरयां मरीन कमांडो भी बन सकती हैं। महिलाओं की सेना में कुछ सामान्य पदों पर भर्ती की शुरुआत 1992 में ही हुई थी, परंतु 30 वर्ष की इस कठिन यात्रा में नौसेना द्वारा अब लिए गए निर्णय का दूरगामी प्रभाव पड़ेगा। साल 2022 ने एक प्रकार से इस मनोवैज्ञानिक भ्रांति को दूर किया है कि महिलाएं निम्न स्तर की सेनानी हैं।
आज जन-धन योजना के तहत 56 प्रतिशत खाते महिलाओं के हैं, जिनमें से 67 प्रतिशत खाते ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों में हैं। मुंबई में महिलाएं टैक्सी चला रही हैं और सामान की डिलीवरी भी कर रही हैं। बदलाव और उपलब्धियों की सूची लंबी है। अभी दिसंबर माह में भारतीय महिला हॉकी टीम ने एफएआई अंतरराष्ट्रीय ट्रॉफी जीती, परंतु इस उपलब्धि को समाचारों और जन-सामान्य में वांछित प्रमुखता नहीं मिली। ऐसा क्यों? सरकार द्वारा महिलाओं के सामाजिक व आर्थिक उत्थान के लिए अनगिनत योजनाएं चलाई जा रही हैं, पर प्रगति आवश्यकता के अनुरूप नहीं है।
मुख्य समस्या जेंडर आधारित सोच है। महिलाओं के काम को महत्व देने की जरूरत है, पर कई जगह उनके कार्यों को गंभीरता से नहीं लिया जाता। इस सोच को बदलना पहली जरूरत है। इससे महिलाओं के विरुद्ध विभिन्न प्रकार के अपराधों में कमी आएगी और उनके सशक्तिकरण के नए आयाम स्थापित होंगे। कानून से पर्याप्त मदद महिलाओं को मिल रही है और मिलेगी, लेकिन सोच बदलकर बाल्य-काल से ही नई पीढ़ी की सोच को बदला जा सकता है। परिवार से ही बराबरी की शुरुआत होनी चाहिए। लड़कियों को पर्याप्त शिक्षा मिले और घरेलू कार्य में केवल लड़कियों को ही न उलझाया जाए। बेटियों को सम्मान मिले। घर के अंदर उनके साथ किसी प्रकार की हिंसा न हो। लड़कियों को पर्याप्त हक और आर्थिक आजादी मिले, तो इससे निश्चय ही प्रदेश-देश का माहौल बदलेगा। जरूरी है कि महिलाएं विभिन्न क्षेत्रों में दिखें, आगे बढ़कर अपने हिसाब से खुद को मजबूत करें। समाज में महिलाओं की सहमति को महत्वपूर्ण माना जाए, लड़कियों को खेलों में बढ़ावा दिया जाए, सार्वजनिक स्थलों को सुरक्षित बनाया जाए, थानों में और अधिक महिला डेस्क बनाई जाए आदि। आने वाले वर्ष में शिक्षक, पुलिस, प्रशासन, निर्वाचित प्रतिनिधि और न्यायपालिका को महिलाओं के अधिकारों व गरिमामय जीवन के प्रति अधिक संवेदनशील बनाने के प्रयास किए जाएं।
सोशल मीडिया की मदद से लैंगिक असमानता को समाप्त कर तेज गति से बदलाव लाया जाए। सरकार की योजनाओं के साथ समाज, परिवार और व्यक्तिगत सोच हाथ मिलाकर चले, तो पारंपरिक लैंगिक भेदभाव जल्दी ध्वस्त होगा। किसी ने सही कहा है, मैं अकेले दुनिया में बदलाव नहीं ला सकता, परंतु तालाब में एक पत्थर फेंककर लहर जरूर पैदा कर सकता हूं, जिसका प्रभाव दूर तक जाएगा। महात्मा गांधी के अनुसार, आप स्वयं वह बदलाव बनें, जो आप इस दुनिया में देखना चाहते हैं। आइए, नववर्ष में प्रवेश करते हुए अपने परिवार में, अपनी बहन-बेटी-बहू समेत विभिन्न रक्त संबंधों से, अपने कार्य क्षेत्र में, अपने सामाजिक क्षेत्र में बदलाव की लहर शुरू करें।
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भारत में सरकारी कामकाज एवं अन्य क्षेत्रों की सीमित लेकिन पारदर्शी जानकारी उपलब्ध कराने में केन्द्रीय सूचना आयोग महत्वपूर्ण भूमिका निभाता रहा है। किसी सूचना का खुलासा करने या न करने का निर्णय लेना ही इस आयोग का मुख्य काम है। कुछ समय से ऐसा प्रतीत होता है कि आयोग अपने इस काम को करने में मुश्किल का सामना कर रहा है।
कुछ बिंदुओं में इसे समझा जाना चाहिए –
अति तब हुई, जब आयोग ने इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन और फोन टैपिंग जैसे सामान्य मामलों में भी सूचना देने के निर्णय को तीन महीने से भी अधिक समय तक टाले रखा है। जरूरत है कि आयोग की इस प्रकार की गैर-जवाबदेही का पुरजोर विरोध किया जाए।
भारत की पारदर्शिता की रक्षा के लिए स्थापित संस्था स्वयं खतरे में आ गई है। इस व्यवस्था को बनाए रखने के लिए निष्ठापूर्ण आयुक्तों की नियुक्ति के साथ-साथ उनकी स्वतंत्रता बनाए रखने की दिशा में कदम उठाया जाना चाहिए।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित सौरव दास के लेख पर आधारित। 24 नवंबर 2022
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Date:27-12-22
नवीनता का सुखडॉ विजय अग्रवाल, ( आध्यत्मिक विषयों के अध्येता )
गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने बहुत ही महत्वपूर्ण बात कही है। वे अर्जुन को समझाते हुए कहते हैं कि जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर नये वस्त्र धारण करता है, उसी प्रकार आत्मा पुराने तथा जीर्ण-शीर्ण शरीर को त्यागकर नवीन देह धारण करता है। यदि आत्मा जैसा अविनाशी तत्व नवीनता की आवश्यकता से परे नहीं है, तो फिर इस विनाशी भौतिक शरीर के लिए नयेपन की अनिवार्यता का सहज ही अनुमान लगाया जा सकता है। श्रीकृष्ण के इस कथन से सुख की प्राप्ति का यह एक सरल-सा सूत्र तो हमारे हाथ आता ही है कि ‘नवीनतम अपने आप में ही सुखद होता है।’ चूंकि जड़ता से, स्थिरता से ऊब की दुर्गंध उठने लगती हैं, इसलिए जरूरी है कि चेतन हुआ जाए, गतिशील हुआ जाए। इससे कुछ तो बदलेगा और यह बदलाव सुख देगा।
हमारे पास इस नवीनता को धारण करने के दो मुख्य उपाय होते हैं। पहला है- दैनिक जीवन में निरंतर वस्तुओं एवं घटनाओं में नवीनता का एहसास करना। क्या आपने गीत गाता चल फिल्म का यह गीत सुना है- ‘मैं वही, दर्पण बही, न जाने ये क्या हो गया कि सब कुछ लागे नया-नया…’ । कभी न कभी आपको भी ऐसी प्रतीति अवश्य हुई होगी। यदि आप प्रतिदिन, एक पल के लिए ही सही, इस एहसास को ला सकें, तो यह आपके पूरे दिन को सुख की अनुभूति से भर देगा ।
वस्तुतः सुख भौतिक वस्तुओं पर आश्रित नहीं होता है। यह भौतिक वस्तुओं के प्रति हमारी प्रतीति पर आधारित हैं। आप जो नये वर्ष का उत्सव मनाएंगे, उसमें दिनांक के अतिरिक्त और क्या नवीन है ? ऐसा तो प्रतिदिन ही होता है, फिर चाहे वह दिन, सप्ताह और मास के रूप में ही क्यों न हो। यह एक जनवरी के प्रति मात्र आपकी प्रतीति ही हैं, जो इसे ‘नव’ बना रही है। यदि ‘नव वर्ष’ हो सकता है, तो ‘नव दिवस’ क्यों नहीं?
अब दूसरा उपाय | इसके लिए मैं आपके सामने दो स्थितियां प्रस्तुत कर रहा हूं। इनसे जुड़े प्रश्नों के उत्तर ढूंढने की थोड़ी माथापच्ची करें। स्थिति नंबर एक कुएं में पानी भरा हुआ है। मैं उससे पानी निकालकर अपने घर लाया। अगले दिन जब मैं उसी पानी का इस्तेमाल सुबह पूजा के लिए कर रहा था, तब मेरी दादी ने कहा- ‘नहीं, पूजा के लिए कुएं से ताजा पानी लाओ। यह बासी हो गया है।’ जबकि कुएं का पानी तो न जाने कितने दिनों का बासी पानी है। ऐसा क्यों? स्थिति नंबर दो- आपके पैर का नंबर 11 है, लेकिन किसी ने आपको नौ नंबर का महंगा जूता उपहार में दे दिया। पहनने पर वह काटता है। अब आप इस जूते का क्या करेंगे? पहले प्रश्न का उत्तर है कि कुएं का पानी इसलिए हमेशा ताजा बना रहता है, क्योंकि वह अपने मूल स्रोत से जुड़ा रहता है। हमारी संस्कृति चेतना का मूल स्त्रोत हैं। चूंकि लोक मानस इससे जुड़ा रहता हैं, इसलिए वह हमेशा नये के सुख में रहता है। दूसरे प्रश्न का उत्तर हैं- ‘संकीर्णता’। यदि संकीर्ण जूता पैर को काट सकता हैं, तो संकीर्ण सोच के बारे में आपके क्या विचार हैं? हमारा दर्शन ‘आ नो भद्रा कृतवी यंतु विश्वतः’ का दर्शन रहा है। अच्छे विचार चारों और से आने दो। यदि कमरे में हवा और रौशनी आती रहेगी, तो ताजगी बनी रहेगी।
यह बात हमारी चेतना के साथ भी है । आइए, कुछ इसी तरह के प्रयासों के साथ नये वर्ष 2023 की शुरुआत करते हैं।
Date:27-12-22
वैश्विक नेतृत्व के लिए तैयार भारतजीएन वाजपेयी, ( लेखक सेबी और एलआइसी के पूर्व चैयरमैन हैं )
जी-20 इन दिनों चर्चा में है। दिसंबर में ही भारत ने इस वैश्विक समूह की कमान संभाली है। अध्यक्षता संभालने के अवसर पर प्रधानमंत्री मोदी ने ‘एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य’ के मंत्र का आह्वान किया। उन्होंने इसके पीछे की संकल्पना का भी उल्लेख किया, ‘कोई विकसित दुनिया और कोई तीसरी दुनिया नहीं’ और ‘एक विश्व’ कहने का यही आशय है कि समूची मानवता ‘एक परिवार’ के रूप में साझा समृद्धि करे और अशक्त पक्ष को ‘एक भविष्य’ के लिए सहारा देकर सशक्त बनाया जाए। ये सभी बातें तो प्रशंसनीय हैं, लेकिन वास्तविक राजनीतिक प्रकृति को देखते हुए सवाल उनके फलदायी होने को लेकर जुड़ा है। भूराजनीतिक हलचल, दक्षिणपंथी राजनीति, उद्दंड तानाशाही और आर्थिक राष्ट्रवाद जैसी दुर्दांत चुनौतियां इस राह में कुछ बड़े अवरोध के रूप में दिखती हैं। साथ ही, रूस-यूक्रेन युद्ध, कोविड महामारी का काला साया, जलवायु आपदाएं और भूमंडलीकरण से प्रत्येक स्तर पर विचलन से उपजी बेलगाम महंगाई, ब्याज दरों में तेजी का सिलसिला और निरंतर बढ़ती आर्थिक दुश्वारियां स्थिति को और बिगाड़ने वाली हैं। संप्रति विश्व समुदाय के लिए गंभीर चुनौतियां हैं। विकसित अर्थव्यवस्थाओं में राजनीतिक विमर्श भी आर्थिक वृद्धि के प्रति उदासीनता को दर्शाने वाला है।
यहां कुछ तथ्यों की पड़ताल उपयोगी होगी। पिछली सदी के नौवें दशक के मध्य से 2007 के बीच की अवधि को ‘व्यापक समभाव’ का दौर माना जाता है, जब दुनिया की अर्थव्यवस्थाएं वृद्धि की ओर उन्मुख हो रही थीं, जिसमें करोड़ों लोगों को भयावह गरीबी और अभावग्रस्तता के दुष्चक्र से बाहर निकाला गया। व्यापक भूराजनीतिक शांति, संयमित राजनीतिक नेतृत्व, कम मुद्रास्फीति, निचली ब्याज दरें, भूमंडलीकरण की गहरी होती पैठ और पूंजी के मुक्त प्रवाह जैसे पहलुओं ने इसमें प्रभावी भूमिका निभाई। डेविड रिकार्डो का तुलनात्मक लाभ सिद्धांत साकार होता दिखने के साथ ही आर्थिक वृद्धि पर भी सार्वभौमिक ध्यान केंद्रित था। दुर्भाग्यवश, ये पहलू अब कमजोर पड़ रहे हैं और दुनिया भर में आर्थिक मुश्किलें एवं असमानता बढ़ती दिख रही है।
विकसित देशों में कामकाजी आबादी, विस्थापन और महिलाओं की व्यापक भागीदारी के साथ ही तकनीकी उन्नयन ने कुल कारक उत्पादकता यानी टीएफपी की वृद्धि में अहम योगदान दिया। टीएफपी कामकाजी आबादी के ज्ञान में आए परिवर्तन और तकनीकी प्रगति के प्रभाव का आकलन करता है। इसके माध्यम से किसी आर्थिक प्रणाली में दीर्घकालिक उत्पादन पर इन परिवर्तनों के प्रभावों के आकलन का प्रयास होता है। फिलहाल जननांकीय स्थिति प्रतिकूल हो रही है, विस्थापन को रोका जा रहा है और महिलाओं की भागीदारी चरम पर पहुंच गई है। कोविड ने काम को लेकर हिचक बढ़ाई है। तकनीकी सुधार अपनी एक सीमा में ही योगदान कर पा रहे हैं। स्मरण रहे कि विकासशील देशों को आउटसोर्सिंग, पूंजी के पर्याप्त प्रवाह और तकनीकी विकास की साझेदारी से लाभ पहुंचा। वहीं, समग्र वैश्विक अर्थव्यवस्था भूराजनीतिक शांति, नरम मुद्रास्फीति, निम्न ब्याज दरों और सस्ते श्रम, ऊर्जा, धातुओं और खनिजों की आपूर्ति से लाभान्वित हुई।
जब आर्थिक वृद्धि और लोगों की बेहतरी पर खतरा मंडरा रहा हो तो पारंपरिक संवादों और परिचर्चाओं की सार्थकता संदिग्ध होने लगती है। एक ऐसे दौर में जब दुनिया कुछ इसी प्रकार की परिस्थितियों से दो-चार हो, तब विकसित विश्व और तीसरी दुनिया के देशों को ‘एक पृथ्वी, एक परिवार, एक भविष्य’ के सूत्र में पिरोने वाला भारत का विचार और प्रासंगिक हो गया है। ऐसे में सभी बैठकों के मूल में यही बात होनी चाहिए कि हम सभी एक ही नाव पर तैर रहे हैं और नैया पार लगने पर सभी को सहयोग का बराबर लाभ मिलेगा। स्पष्ट है कि आर्थिक राष्ट्रवाद से आर्थिकी के स्तंभों को आघात नहीं पहुंचना चाहिए। इसके बजाय उसे आर्थिकी से जुड़े जोखिमों को दूर कर उसे सशक्त बनाने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए। ऐसे में समय की आवश्यकता है कि सामाजिक असंतोष और आर्थिक गतिरोध को रोकते हुए लोगों, पूंजी और वस्तुओं एवं सेवाओं की मुक्त आवाजाही के साथ ही तकनीकी साझेदारी का सिलसिला कायम रहना चाहिए।
दुनिया के किसी भी हिस्से में छिड़ा कोई संघर्ष पूरी दुनिया को प्रभावित करने में सक्षम हैं। रूस-यूक्रेन टकराव इसका ज्वलंत उदाहरण है। ऐसे में प्रधानमंत्री मोदी का यह उद्गार कि ‘यह युद्ध का युग नहीं’ को लेकर वैश्विक सहमति बने, जो न केवल इस युद्ध पर तत्काल विराम लगाए, बल्कि भविष्य के किसी भी टकराव को रोकने से लिए ढांचे को और सशक्त बनाए। इस समय दक्षिणपंथी राजनीति, आर्थिक राष्ट्रवाद, भूराजनीतिक टकराव, हठधर्मी नेतृत्व और संवाद एवं सहयोग के प्रति अनिच्छा जैसे पहलू असमानता और अभाव जैसी स्थितियों को एक बड़ी हद तक प्रभावित कर रहे हैं। आर्थिक वृद्धि के कुछ उत्तोलक भी असमानता एवं अभाव की स्थिति निर्मित करने में योगदान करते हैं। ऐसे में स्थिति को सुधारने के लिए आवश्यक कदम निश्चित रूप से उठाए जाने चाहिए।
पर्यावरण की बिगड़ती स्थिति पृथ्वी और यहां जीवन एवं आजीविका की निरंतरता के समक्ष बड़ी चुनौती है। पर्यावरण की स्थिति में गिरावट किसी भौगोलिक क्षेत्र की आर्थिकी एवं आर्थिक समृद्धि पर निर्भर करती है। जहां पर्यावरणीय विध्वंस को रोकने की जिम्मेदारी और जवाबदेही तो सार्वभौमिक है, किंतु उसकी कीमत हैसियत के हिसाब से साझा की जानी चाहिए। इस दृष्टि से सीओपी-27 के शर्म अल-शेख सम्मेलन में जलवायु क्षरण की क्षतिपूर्ति निधि की प्रतिबद्धता को मूर्त रूप देना भी महत्वपूर्ण होगा।
अब भारत के बौद्धिक वर्ग को भी जी-20 के नेतृत्व के लिए विचारों, नीतियों और कार्यक्रमों की रूपरेखा खींचकर इन आवश्यक मुद्दों पर सहमति निर्माण में महती योगदान देना चाहिए। मौजूदा मानव जाति स्वास्थ्य, संपदा और जीवन की गुणवत्ता के अप्रत्याशित चक्र में जी रही है। यह उसका दायित्व है कि वह आने वाली पीढ़ियों को बेहतर जीवन गुणवत्ता की विरासत-सौगात सौंपे।
Date:27-12-22
जजों की नियुक्ति के लिए सशक्त प्रणाली जरूरीवरुण गांधी, ( युवा नेता और सांसद )
फरवरी 1970 में, केरल में एडनीर मठ के प्रमुख स्वामी केशवानंद भारती ने संविधान के अनुच्छेद 26 के तहत सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर की थी। इसमें केरल सरकार द्वारा मठ की सम्पत्ति के प्रबंधन पर प्रतिबंध के प्रयासों को चुनौती दी गई थी। तीन साल बाद इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 7-6 बहुमत से संविधान के मूल संरचनात्मक सिद्धांत को रेखांकित किया। इसमें खास तौर पर संविधान के प्रमुख सिद्धांतों और इसकी मूल संरचना में संशोधन की संसद की हैसियत पर प्रतिबंधों को नए सिरे से रेखांकित किया गया। दिलचस्प है कि जब आपातकाल घोषित किया गया तो सुप्रीम कोर्ट भी नए न्यायाधीशों के साथ ढेर हो गया था। ए.एन.राय को राष्ट्रपति द्वारा मुख्य न्यायाधीश नियुक्त किया गया। इस नियुक्ति में तीन न्यायाधीशों की वरिष्ठता खारिज की गई थी। गौरतलब है कि राय ने केशवानंद मामले में फैसले पर दस्तखत नहीं किए थे। उनके नेतृत्व में 13 न्यायाधीशों की पीठ के साथ ऐतिहासिक फैसले पर दोबारा गौर किया गया। मामले की सुनवाई दो दिनों तक चली। यह बात भी सामने आई कि वास्तव में कोई समीक्षा याचिका दायर नहीं की गई थी। महज एक मौखिक अनुरोध पर यह समीक्षा सुनवाई हुई। जाहिर है एक अनुचित प्रक्रिया अपनाई गई, जिसमें मुख्य न्यायाधीश ने एकतरफा बेंच को भंग कर दिया। केंद्र के पास एक प्रतिबद्ध न्यायपालिका होने के बावजूद संविधान की बुनियादी संरचना का सिद्धांत बमुश्किल बच पाया। इस ऐतिहासिक फैसले ने देश में निरंकुशता और लोकतंत्र के बीच संतुलन साधने में मदद की।
हाल में संविधान के अनुच्छेद 124(2) और 217(1) की व्याख्या को लेकर केंद्र और न्यायपालिका के बीच टकराव सामने आया है। अनुच्छेद 124(2) इस बात पर प्रकाश डालता है कि सर्वोच्च न्यायालय के प्रत्येक न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा सर्वोच्च न्यायालय के ऐसे न्यायाधीशों (विशेष रूप से मुख्य न्यायाधीश) और राज्यों के उच्च न्यायालयों के परामर्श के बाद की जाएगी। इसी तरह उच्च न्यायालयों के लिए अनुच्छेद 217(1) इस बात पर प्रकाश डालता है कि उच्च न्यायालय के प्रत्येक न्यायाधीश को भारत के मुख्य न्यायाधीश, राज्य के राज्यपाल और उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश के परामर्श के बाद राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त किया जाएगा। अनेक मामलों में न्यायिक व्याख्या ने न्यायिक स्वतंत्रता के सिद्धांत को और साफ किया तथा न्यायाधीशों की सिफारिश के लिए एक कॉलेजियम प्रणाली पर जोर दिया। वर्तमान में केंद्र कॉलेजियम प्रणाली द्वारा की गई सिफारिशों को स्वीकार या अस्वीकार कर सकता है, जबकि यदि कोई सिफारिश दोहराई जाती है तो सरकार उसे मानने को बाध्य थी। हाल में यह आम सहमति गतिरोध में बदल गई। केंद्र ने कॉलेजियम द्वारा दोहराई सिफारिशों को रोक दिया। 22 नवम्बर को सुप्रीम कोर्ट ने दूसरे न्यायाधीशों के मामले में तय समयसीमा का पालन नहीं करने के लिए सरकार की खिंचाई की। कानून व कार्मिक संबंधी स्थायी संसदीय समिति ने भी न्याय विभाग से असहमति उजागर की है कि रिक्तियों को भरने का समय नहीं बताया जा सकता है।
स्वतंत्र न्यायपालिका और केंद्र के बीच इस ऐतिहासिक टकराव का एकमुश्त असर भारत की न्यायिक प्रणाली में गिरावट है। अगस्त 2022 में उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की 1,108 में से तकरीबन 381 रिक्तियां थीं। निचली अदालतों में 24,631 में से तकरीबन 5,342 सीटें खाली थीं, जो इसकी क्षमता का 20 फीसद हैं। अदालतों में अगस्त 2022 तक लगभग चार करोड़ मामले लंबित हैं। न्यायिक सुधार लम्बे समय से लम्बित हैं। चुनिंदा देशों में राजनीतिक संस्थानों द्वारा न्यायाधीशों की नियुक्ति होती है। इटली में संवैधानिक न्यायालय में नियुक्तियां राष्ट्रपति, विधायिका और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा की जाती हैं। वहां प्रत्येक इकाई को पांच न्यायाधीशों को नामित करने की अनुमति है। अमेरिका में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को राष्ट्रपति द्वारा नामित किया जाता है और फिर बहुमत से सीनेट द्वारा अनुमोदित किया जाता है। जर्मन संवैधानिक न्यायालय को संसद द्वारा नियुक्त किया जाता है। यह एक पक्षपातपूर्ण न्यायपालिका को जन्म दे सकता है।
इसके अलावा न्यायिक चुनावों का उपयोग न्यायपालिका की जवाबदेही बढ़ाने के लिए भी किया गया है। मसलन, अमेरिका में स्टेट सुप्रीम कोर्ट में न्यायिक नियुक्तियों के लिए राज्य चुनावों का उपयोग कर रहे हैं। हालांकि यह न्यायाधीशों को लोकलुभावन फैसले देने के लिए प्रोत्साहित कर सकता है और न्याय व्यवस्था को विशेष रुचि समूह अपने प्रभाव में ले सकते हैं। इसका मतलब गतिरोध भी हो सकता है।
खासतौर पर गठबंधन सरकार वाले किसी लोकतंत्र के लिए यह उचित नहीं है। अन्य देशों ने न्यायिक परिषदों के साथ प्रयोग किया है। इराक में न्यायाधीश एक न्यायिक संस्थान के स्नातक हैं। वहां आवेदकों को परीक्षा से गुजरना पड़ता है। अमेरिका में राज्यपाल योग्यता आयोग द्वारा प्रदान की गई सिफारिशों के आधार पर राज्य न्यायाधीशों की नियुक्ति करते हैं। हाल ही में केंद्र ने न्यायिक नियुक्तियों को न्यायिक आयोग के माध्यम से संचालित करने पर जोर दिया है। गौरतलब है कि 16 अक्टूबर 2015 को सुप्रीम कोर्ट ने एनजेएसी अधिनियम (2014) को 4:1 के बहुमत से रद्द कर दिया। यह रेखांकित किया गया कि यह कॉलेजियम प्रणाली में अधिक पारदर्शिता के लिए खुला है। इस बात पर बहस की पूरी गुंजाइश है कि क्या न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए एक सशक्त सचिवालय की आवश्यकता है। एक खास झुकाव वाली न्यायपालिका से हमें बचना चाहिए।
Date:27-12-22
प्रकृति को बचाने के लिए हमें अपनी प्रवृति सुधारना होगीडॉ. अनिल प्रकाश जोशी, ( पद्मश्री से सम्मानित पर्यावरणविद् )
संयुक्त राष्ट्र की बायोडायवर्सिटी कांफ्रेस पिछले हफ्ते मॉन्ट्रियल, कनाडा में संपन्न हुई। इसमें कई तथाकथित महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए। ये कहा गया कि हमें कम समय में ज्यादा काम करना है, क्योंकि परिस्थितियां विपरीत हैं और यह माना जा रहा है कि 2030 तक दुनिया के क से कम 30% तटीय इलाके और समुद्री क्षेत्रों के संरक्षण की कोशिश होनी चाहिए। क्योंकि आज हम मात्र 17% भूमि और 8 प्रतिशत समुद्री क्षेत्रों का संरक्षण की कोशिश में जुटे हैं। वैसे हम पहले भी कई तरह के लक्ष्यों का वादा कर चुके है।
सत्य यह है कि इस तरह की गोष्ठियों से व्यावहारिक कुछ नहीं निकलता। इस बार भी जैवविविधता को लेकर काफी चर्चाएं हुई हैं और मान कर चला गया है कि सभी स्रोतों से 200 अरब डालर जुटाएं और विकासशील देशों को सालाना 30 अरब डॉलर देने की बात को दोहराया गया है। इसमें इकोसिस्टम के सभी हिस्सों को प्राथमिकता दी जाए और ये भी कहा गया है कि खेती-बाड़ी में जो छूट लंबे समय से दी गई है, उसे कम किया जाए।
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि 80 के दशक में युनाइटेड नेशन ने ‘मैन एंड बायोस्फियर’ नाम की योजना चलाई थी, जिसके बाद दुनिया भर में कई बायोस्फियर पार्क नेशनल पार्क सेंचुरीज बने। इन्हें हर तरह के वन्य जीव और पेड़ पौधों के बचाने व संरक्षित करने की कोशिश माना गया था। लेकिन, आज भी उनके हालात अच्छे नहीं कहे जा सकते।
पृथ्वी का तापक्रम लगातार बढ़ रहा है और साथ ही हवा, पानी, मिट्टी की गुणवत्ता भी गिरती जा रही है। इसका अगर कोई समाधान छुपा है तो वो इसी समझ पर होगा कि कम से कम प्रकृति, पर्यावरण और पारिस्थितिकी के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जो भी समझौते हों वो एक बात है, लेकिन ज्यादा बड़ा समाधान आंतरिक उपायों से ही हो पाएगा। यह भी स्वीकार लेना चाहिए कि नई दिल्ली की हवा न्यूयॉर्क में बैठकर ठीक नहीं की जा सकती है। इसके लिए आंतरिक प्रयत्न ज्यादा महत्वपूर्ण और बेहतर परिणाम दे पाएंगे। हवा, मिट्टी, जंगल पानी के हालात से तो हम परिचित ही हैं। और जहां तक जैवविविधता का सवाल है तो 10 लाख प्रजातियां पहले ही खतरे में जा चुकी हैं और 1 लाख करीबन खत्म ही हो चुकी हैं तो ऐसे में फिर जैवविविधता को लेकर चिंतन और बातचीत में हम किस परिणाम पर पहुंचेंगे, क्योंकि पैसे या डॉलर से या एक बड़े इस तरह के अंतरराष्ट्रीय प्रयत्नों से हम न जैवविविधता को बचा पाएंगे और ना ही जीवन के अमूल्य संसाधनों को।
इसका अगर कहीं कोई समाधान छुपा है, तो वो अपने देश में बाकी बचे जंगलों, तालाबों, नदियों के संरक्षण से ही संभव है। यह भी जानना आवश्यक है कि जितना ज्यादा पानी होगा, जितना ज्यादा वन होंगे, बेहतर मिट्टी होगी। ये स्वयं भी जलवायु परिवर्तन में और तापक्रम स्थिर करने में बहुत बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। यह सवाल इसलिए बार- बार है कि हम इस तरह की अंतरराष्ट्रीय गोष्ठियों से क्या पा रहे हैं? और पिछले लगातार दशकों से होने वाली गोष्ठियां किस बेहतर परिणाम की तरफ हमें ले जा चुकी हैं? क्योंकि प्रकृति और पारिस्थितिकी दुनिया भर में अगर लगातार गिरती चली जा रही हो तो सवाल इस तरह के अंतरराष्ट्रीय गोष्ठियों के प्रति खड़ा होना ही चाहिए। प्रकृति को बचाना है तो अपनी प्रवृति को पहले सुधारना होगा। हमें अपनी आवश्यकताओं पर अंकुश लगाना चाहिए, विलासिताओं को त्याग कर ही शायद हम प्रकृति संरक्षक के बड़े वाहक बन सकते हैं।
Date:27-12-22
पूरी तरह अंतरसंबद्ध है हमारी पारिस्थितिकीश्याम सरन, ( लेखक पूर्व विदेश सचिव और सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के सीनियर फेलो हैं )
संयुक्त राष्ट्र जैव विविधता सम्मेलन के पक्षकारों का 15वां सम्मेलन (कॉप15) मॉन्ट्रियल में गत 19 दिसंबर को संपन्न हुआ। इस आयोजन में वैश्विक जैव विविधता प्रारूप को अपनाया गया जो यह लक्ष्य तय करता है कि 2030 तक कम से कम 30 प्रतिशत क्षेत्रीय, आंतरिक जल और वैश्विक समुद्रों का प्रबंधन संरक्षित क्षेत्र के रूप में किया जाएगा। अभी यह स्पष्ट नहीं है कि इन लक्ष्यों को राष्ट्रीय लक्ष्यों में कैसे बदला जाएगा या फिर राष्ट्रीय सीमाओं और दायरे के बाहर आने वाले समुद्रों का प्रबंधन कैसे होगा? रासायनिक पोषकों और कीटनाशकों के इस्तेमाल को लेकर एक अहम लक्ष्य है जो भारत जैसे देशों के लिए सीधे तौर पर प्रासंगिक है।
रासायनिक उर्वरकों के इस्तेमाल से होने वाले उत्सर्जन को 2030 तक आधा करने तथा जहरीले कीटनाशकों के इस्तेमाल को एक तिहाई करने का लक्ष्य है। भारतीय पर्यावरण मंत्री पहले ही इस प्रावधान को लेकर आपत्ति जता चुके हैं। एक और लक्ष्य है जो काफी अधिक महत्त्वाकांक्षी साबित हो सकता है और वह है 2030 तक प्लास्टिक कचरे को पूरी तरह समाप्त करने का लक्ष्य। इसके लिए धनराशि जुटाना हमेशा की तरह एक समस्या है। खासतौर पर ऐसे समय में जबकि वैश्विक अर्थव्यवस्था गहरी मुश्किलों से दो-चार है।
इस बात का भी जिक्र किया गया है कि सभी संभव स्रोतों से वित्तीय संसाधन जुटाए जाएंगे ताकि सालाना कम से कम 200 अरब डॉलर की राशि जुटाई जा सके। इसमें नए, अतिरिक्त और प्रभावी वित्तीय संसाधन शामिल होंगे और विकासशील देशों को मिलने वाली अंतरराष्ट्रीय वित्तीय सहायता से सालाना 10 अरब डॉलर का इजाफा किया जा सकता है। मैं इसकी व्याख्या विकासशील देशों को सालाना 10 अरब डॉलर की राशि की आश्वस्ति के रूप में कर रहा हूं जो काफी कम धनराशि होगी।
एक उल्लेख यह भी है कि सालाना 500 अरब डॉलर की अतिरिक्त राशि उन सब्सिडी को खत्म करके भी जुटाई जाएगी जो जैव विविधता के लिए नुकसानदेह हैं लेकिन यह सभी देशों पर लागू होगी। यह स्पष्ट है कि इस प्रारूप में तय लक्ष्यों को हासिल करने के लिए जरूरी संसाधन सभी पक्षों को जुटाने होंगे और वह भी बिना साझा लेकिन बंटी हुई जिम्मेदारी तथा संबंधित क्षमताओं का सिद्धांत लागू किए हुए। इस प्रारूप का स्वागत किया जाना चाहिए क्योंकि कम से कम इसके माध्यम से सभी पक्षों ने एक इरादा जताया है लेकिन ऐसा लगता नहीं कि इसके लिए जरूरी पैमाने पर संसाधन जुटाए जा सकेंगे।
बैठक के एजेंडे में एक अहम मुद्दा जेनेटिक संसाधनों और जेनेटिक संसाधनों की डिजिटल सीक्वेंस सूचना तथा जेनेटिक संसाधनों के वाणिज्यिक लाभ से जुड़े पारंपरिक ज्ञान से संबंधित है। उदाहरण के लिए औषधीय उत्पादों के विकास में इनका इस्तेमाल।
प्रारूप के लक्ष्यों में से एक है यह सुनिश्चित करना कि ऐसी उपयोगिता से हासिल होने वाले लाभ साझा और समतापूर्ण ढंग से बांटे जाएं और इस दौरान स्वदेशी लोग और समुदाय भी इसमें शामिल हों। एक सहमति इस बात पर बनी कि ऐसी व्यवस्था बने जिसके माध्यम से जेनेटिक संसाधनों और उनके उपयोगकर्ताओं से संबंधित डिजिटल सीक्वेंसिंग सूचना (जीएसआई) के जरिये हासिल होने वाले लाभों को समतापूर्ण ढंग से साझा भी किया जा सकेगा। इसके लिए एक बहुपक्षीय फंड की स्थापना की जाएगी। इस पहल को तुर्की में 2024 में आयोजित अगली कॉप में अंतिम रूप दिया जाएगा।
यह बात विकासशील देशों के लिए महत्त्वपूर्ण हो सकती है जिनके यहां जैव विविधता बहुत संपन्न है और उनकी कीमती और दुर्लभ औषधीय जड़ी-बूटियों का विकसित देश लंबे समय से अपने वाणिज्यिक लाभ के लिए इस्तेमाल कर रहे हैं। बदले में उन देशों को कुछ नहीं मिलता। हालांकि औद्योगिक बौद्धिक संपदा को पेटेंट आदि के माध्यम से सुरक्षित करने पर जोर दिया गया लेकिन विकासशील देशों से थोक में जेनेटिक संसाधन लिए गए। उनमें से कई तो इस बात से भी अनभिज्ञ थे कि वे क्या गंवा रहे हैं। जीएसआई के लिए एक बहुपक्षीय सुविधा केंद्र बनने से ऐसे संसाधनों की रक्षा करने में मदद मिलेगी और फायदों के समतापूर्ण बंटवारे के साथ उनका वाणिज्यिक उद्देश्यों के लिए इस्तेमाल किया जा सकेगा।
प्रारूप में जलवायु परिवर्तन और पारिस्थितिकी के बीच के जरूरी संबंध को स्पष्ट किया जाना था। अब यह स्पष्ट है कि जलवायु परिवर्तन एक बड़े और गंभीर पारिस्थितिकी संकट का केवल एक घटक है।
जलवायु परिवर्तन और पारिस्थितिकी में आ रही गिरावट के बीच मजबूत संबंध है। समुद्र कार्बन अवशोषण का सबसे बड़ा जरिया हैं। परंतु प्लास्टिक तथा अन्य हानिकारक कचरे को समुद्र में डालने से समुद्र की कार्बन अवशोषण की क्षमता काफी हद तक प्रभावित हो रही है। धरती के वन भी कार्बन अवशोषण में अहम भूमिका निभाते हैं। वनों के नष्ट होने से उनकी यह क्षमता भी कमजोर पड़ रही है। समुद्र में मौजूद प्लास्टिक समुद्री जीवों के लिए एक बड़ा खतरा बन रहा है। मछलियां सूक्ष्म प्लास्टिक कणों को खा रही हैं जो उनके माध्यम से इंसानी शरीर में भी पहुंच रहा है। समुद्रों की तापवृद्धि का असर भी समुद्र की पारिस्थितिकी पर पड़ रहा है।
प्रारूप के मुताबिक विभिन्न जीव चौंकाने वाली गति से खत्म हो रहे हैं और यही वजह है कि उसने यह लक्ष्य तय किया है कि इंसानों के कारण जीव प्रजातियों के नष्ट होने पर नियंत्रण किया जाए। सन 2050 तक इसकी दर में 10 गुना कमी करने का लक्ष्य है। ऐसे लक्ष्यों का हासिल होना इस बात पर निर्भर करता है कि अन्य मोर्चों पर किस प्रकार के कदम उठाए जाते हैं। उदाहरण के लिए वनों में ऐसे जीवों के प्राकृतिक आवासों को नष्ट होने से रोकना ऐसा ही एक कदम है। अत्यधिक मछली मारना तथा समुद्री सतह से छेड़छाड़ को रोकना होगा ताकि समुद्री प्रजातियों को नष्ट होने से रोका जा सके।
एक पर्यावरणविद की मानें तो जैव विविधता को अगर दार्शनिक नजरिये से देखा जाए तो इसका संबंध उस ज्ञान से है जो लाखों वर्षों के दौरान जीवों की उत्पत्ति से सीखा गया है। इसका संबंध इस बात से भी है कि पृथ्वी के निरंतर बदलते माहौल और पर्यावरण में कैसे बचा रहा जा सके। इस नजरिये से देखें तो इस समय मनुष्य जैव विविधता को बहुत तेजी से नष्ट कर रहा है। हमारी वैश्विक चर्चाओं में भी इस विषय पर अधिक बात नहीं होती है। अब समय आ गया है कि धरती की पारिस्थितिकी की परस्पर संबद्ध व्यवस्था पर नजर डाली जाए। इसके लिए एक व्यापक दृष्टिकोण अपनाना होगा। हमें एक ऐसे वैश्विक सम्मेलन पर नजर डालनी होगी जहां इस नजरिये को लेकर बातचीत हो सके।
Date:27-12-22
विरासत का हिसाबसंपादकीय
देश का अभिलेखागार उसकी विरासत और विकास तथा इतिहास में आए उतार चढ़ावों का जीवंत दस्तावेज होता है। यह उसके समृद्ध इतिहास और आर्थिक विकास को भी परिलक्षित करता है। अभिलेखागार के दस्तावेज एक झलक में ही किसी खास वक्त का पन्ना हमारे सामने खोल देते हैं। यह कितने अफसोस की बात है कि भारत का राष्ट्रीय अभिलेखागार (एनएआई) 1962‚ 1965 और 1971 के युद्धों और हरित क्रांति के रिकार्ड़ से वंचित है। एनएआई के महानिदेशक के वक्तव्य से यह जानकारी उजागर हुई है। उनका कहना है कि कई केंद्रीय मंत्रालयों और विभागों ने अपने रिकॉर्ड़ उसके साथ साझा ही नहीं किए जिस कारण यह निराशाजनक स्थिति पैदा हुई है। भारत सरकार और उसके संगठनों के रिकॉर्ड़ रखने की जिम्मेदारी एनएआई के ही पास है और यही उनका संरक्षण करता है। इसे वर्गीकृत दस्तावेज प्राप्त नहीं होते। रिकॉर्ड़ प्रबंधन किसी सरकार के बेहतर शासन का एक आवश्यक पहल होता है। इसके महत्व को जानते हुए भी अनेक मंत्रालयों का रुख लापरवाही भरा रहा हैऔर उन्होंने आजादी के बाद से एनएआई के साथ अपने रिकॉर्ड़ साझा ही नहीं किए हैं। देश में 151 मंत्रालय और विभाग हैं‚ जबकि एनएआई के पास 36 मंत्रालयों और विभागों समेत केवल 64 एजेंसियों का रिकॉर्ड़ है। एनआईए महानिदेशक की मानें तो स्थिति इतनी विकट है कि लगता है जैसे आजादी के बाद के अपने इतिहास के एक बड़े हिस्से को हम लगभग खो चुके हैं। रक्षा मंत्रालय ने आजादी के बाद से इस साल की शुरुआत तक 476 फाइलें भेजी थीं। 1960 तक की 20,000 फाइल को इस वर्ष स्थानांतरित किया गया है। राष्ट्रीय अभिलेखागार में रखने के लिए फाइलों की रिकॉर्डिंग और छंटाई का काम हर तिमाही में किया जाना चाहिए। अभिलेखों का मूल्यांकन और एनएआई को स्थानांतरण के लिए उनकी समीक्षा करना तथा उनकी पहचान करना शासन का एक बहुत महत्वपूर्ण पहलू है। इस तथ्य से कोई इनकार नहीं कर सकता कि जिन देशों का इतिहास उपलब्धियों से भरा होता है उनके अभिलेखागार बहुत समृद्ध होते हैं। इसलिए यह वक्त की जरूरत होने के साथ ही साथ भविष्य के लिए भी जरूरी है कि राष्ट्रीय अभिलेखागार के लिए दस्तावेजों की छंटाई और वर्गीकरण का कार्य तत्परता और पूरी ईमानदारी और पारदर्शिता से नियमित और लघु अंतराल पर हो। अगर ऐसा होगा तभी हमारी गौरवशाली अतीत को संरक्षित किया जा सकता है।
Date:27-12-22
नजर रखे भारतसंपादकीय
हिमालयी राष्ट्र नेपाल में रविवार को हुए दिलचस्प घटनाक्रम में सीपीएन–एमसी के नेता पुष्प कमल दहल ‘प्रचंड़’ एक बार फिर प्रधानमंत्री की कुर्सी पर सत्तासीन हुए। राष्ट्रपति विद्या भंड़ारी के प्रचंड़ को नया प्रधानमंत्री नियुक्त किए जाने के साथ ही आम चुनाव के बाद सरकार बनाने को लेकर जारी अनिश्चितता नाटकीयता के साथ समाप्त हो गई। 68 साल के प्रचंड़ तीसरी बार नेपाल का नेतृत्व संभालेंगे। नेपाल के सियासी गलियारे में अब तक यही माना जाता रहा था कि नेपाली कांग्रेस के अध्यक्ष और पूर्व प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा ही दोबारा प्रधानमंत्री बनेंगे‚ मगर प्रचंड़ ने अचानक से दांव चलते हुए पासा पलट दिया। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने नवनिर्वाचित प्रधानमंत्री प्रचंड़ को बधाई दी। बहरहाल‚ भारत पड़ोसी देश के ताजा सियासी घटनाक्रम पर नजर बनाए हुए है। प्रचंड़ चीन के करीबी माने जाते हैं और पूर्व में भी उन्होंने भारत की नेपाल को लेकर बनाई गई नीतियों का पुरजोर विरोध भी किया था। के.पी. शर्मा ओली जिनके साथ प्रचंड़ सत्ता के शीर्ष पद पर पहुंचे हैं‚ उनकी विचारधारा भी चीन समर्थक मानी जाती है। लिहाजा‚ भारत को ताजा राजनीतिक घटनाक्रम और वहां सत्तारूढ़ हुए प्रधानमंत्री और उसके गठबंधन दल पर खासी सतर्कता बरतने की जरूरत है। यह तथ्य जगजाहिर है कि नेपाल के साथ हाल के वर्षों में भारत के संबंध थोड़े कड़वाहट भरे रहे हैं। नेपाल के साथ रिश्ते अब पहले की तरह नहीं रहे हैं। चीन की चालाकियों से नावाकिफ नेपाल के हुक्मरानों ने भारत के खिलाफ पिछले कुछ वर्षों में जमकर बयानबाजी की है। खासतौर पर लिंपियाधुरा‚ लिपुलेख और कालापानी को लेकर दोनों देशों के बीच विवाद का साया और ज्यादा गहराया है। वहीं‚ नेपाल का नया नक्शा जारी करने के ऐलान के बाद पूर्व प्रधानमंत्री ओली ने भारत पर ‘सिंहमेव जयते’ का तंज कसा। दरअसल‚ वर्ष 2015 में नेपाल के संविधान में बदलाव करने के बाद से भारत और नेपाल के बीच रिश्ते और ज्यादा तल्ख हो गए। मधेसियों के साथ विवाद और हिंसक संघर्ष के बाद से दोनों देशों के बीच संबंधों में पुराना भरोसा नहीं लौट पाया है। एक बार फिर प्रचंड़ के प्रधानमंत्री बनने के बाद इस छोटे मगर बेहद संवेदनशील देश की गतिविधियों पर भारत को करीब से निगाह रखनी होगी क्योंकि प्रचंड़ और ओली का अतीत भारत विरोधी और चीन के करीबी की रही है।
Date:27-12-22
Archive-Nirbhar IndiaMinistries must share records with National Archives, which must also get more proactiveTOI Editorials
Insofar as record-keeping is central to modern nation-building, revelations about the poor state of the National Archives of India are quite concerning. NAI is the central repository of government’s non-classified records but it is riddled with big gaps, including in seminal national events such as the 1962, 1965 and 1971 wars and the Green Revolution. Repeated requests to different ministries to transfer non-current files to NAI have fallen on deaf ears. Historian T Raychaudhuri had underlined six decades ago that NAI’s public records can facilitate smooth working of the country’s administration in the same way as memory oils man’s day-to-day life. But an institutional culture of secrecy has put paid to this potential.
India is a far cry from the US where records are automatically declassified after 25 years. NAI is not even seeking timely declassification. Its problem is that the defence ministry has not shared any files since 1960, while multiple other departments including agriculture, rural development, and food and consumer affairs have not shared anything ever. The NAI director general has correctly said that what is at stake is nothing less than “losing a large part of our history since Independence”.
The British Library is a much smarter resource to study colonial India, but we should at least have atmanirbharta in the postcolonial period. This is not of concern for historians alone. NAI provided invaluable information for the building of the Central Vista. Its cartographic treasures can be similarly useful in foreign policy. A look at older government orders can help improve the newer ones. The beginning has to be a clear directive to all ministries to share files with NAI. State-level archives have to be likewise strengthened. However, archive administrators must also step up strongly. The invitation to reading rooms and online curated tours on the UK’s National Archives home page itself is indicative of its energetic citizen outreach. In India both the moth-balled and bhadralok stereotypes of libraries need to be corrected. Because only a public that feels invested in record-keeping puts pressure on government to improve it.
Date:27-12-22
How to improve historical thinkingIt is essential that citizens are equipped with tools of historical thinking in order to be able to effectively participate in a democracyVikram Vincent
Acommon claim by activists is that the ‘other side’ of the political spectrum is distorting history. At the 400th birth anniversary celebration of Ahom Army General Lachit Borphukan, Union Home Minister Amit Shah said, “I often hear that our history has been distorted… Maybe it’s true. But who has stopped us now from presenting a glorious history to the world?”
Reforms in textbooks
Along the lines of what Mr. Shah said, the Parliamentary Standing Committee on Education, Women, Children, Youth and Sports, headed by Vinay P. Sahasrabuddhe, presented the ‘Reforms in Content and Design of School Textbooks’ to both Houses of Parliament on November 30, 2021. The circular by the Committee stated three objectives: removing references to unhistorical facts and distortions about our national heroes from textbooks; ensuring equal or proportionate references to all periods of Indian history; and highlighting the role of great historic women heroes. Post consultations, the Committee brought out 25 suggestions that related to improvement of engagement of children for learning, content of the textbooks, representation of women in history during the Indian freedom struggle along with changing the way women are traditionally represented in textbooks, use of EdTech in content delivery, promotion of scientific temper, innovation, communication, collaboration, creativity, and critical thinking. The report also focused on the need for textbooks to promote national integration, unity and constitutional values. While acknowledging the importance of the suggestions, it is equally important to observe the class and caste composition of the Committee and the fact that it did not have a single woman member.
On July 14, 2021, the Indian History Congress (IHC) released a scathing criticism of the circular. It said: “The critique of the existing textbooks implicit in the ‘Reforms’ being contemplated is not emerging from any expert body of nationally and internationally recognised historians but from a political position favoured by non-academic votaries of prejudice. The implicit critique is in fact the same as that argued in a Report brought out recently by the Public Policy Research Centre. This is reminiscent of the effort made in 2001-2002 to make deletions from existing NCERT textbooks and… replace them with books written by those with chauvinistic and communal bias. That effort too was preceded by a publication The Enemies of Indianisation: The Children of Marx, Macaulay and Madrasa edited by Dina Nath Batra, General Secretary of the RSS-run Vidya Bharati.” The IHC release contested the three objectives of the circular by providing around 11 pages of tabular data detailing the distribution of content in existing history textbooks. The IHC continued, “School textbooks written for the NCERT by some of the tallest scholars in the country… were actually removed, and in their place books with a clear sectarian, majoritarian bias were introduced in 2002… The textbooks of the NCERT, with the brief exception of the books brought out in 2002, have always been authored by eminent scholars in the field of Indian history…. The books brought out in 2002 were severely critiqued in a publication of the IHC… Under widespread public criticism the books had to be withdrawn.”
In December 2019, at the IHC conference at Kannur University, there was an alleged altercation between Kerala Governor Arif Mohammed Khan and historian Irfan Habib. The 81st session of the Indian History Congress will take place at Madras Christian College, Chennai (December 27-29, 2022). This will be closely watched.
Is it possible to accurately recreate the past? Are the data sufficient to make causal claims? Is it possible to uphold the values of the past in its entirety or is there a possibility to reinterpret the past based on the lens we wear? Is there a scientific process involved in the study of history or is it simply static content meant for memorisation? These and other questions were answered by Professor Gary Nash and his colleagues in History on Trial: Culture Wars and the Teaching of the Past, relating to the preparation of the National History Standards in the U.S. Perhaps there are lessons to be learned from those experiences.
Tools of historical thinking
Should citizens be able to evaluate the quality of history in their textbooks? How will they do this? Is it even necessary? If the source of India’s sovereignty are the people of India, it is essential that citizens are equipped with tools of historical thinking in order to be able to effectively participate in a democracy. An analysis of the history textbooks across education boards shows that the engagement in historical thinking is abysmally low. There are various frameworks that have been proven to develop strong historical thinking such as the SCIM-C (Summarising, Contextualising, Inferring, Monitoring, and Corroborating) or ARCH (Assessment Center for History) or the Historical Thinking Standards articulated by Gary Nash et al. In the third, students engaged in activities draw upon skills in five types of historical thinking: chronological thinking; historical comprehension; historical analysis and interpretation; historical research capabilities; historical issues — analysis and decision-making.
How much work will it take to improve the history curriculum of various State boards? Perhaps, the Delhi government was wise when the Delhi Board of School Education signed an agreement with the International Baccalaureate to adopt the latter’s global curriculum framework in government schools. Even the poorest aspire for the best possible education.
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किसी भी देश की स्वच्छ और निष्पक्ष चुनाव की प्रक्रिया, उसके लोकतंत्र का आधार होती है। हाल ही में देश के निर्वाचन आयुक्त की नियुक्ति को लेकर उच्चतम न्यायालय ने अहम् टिप्पणी की है। एक याचिका की सुनवाई करते हुए न्यायालय ने कहा है कि संविधान ने मुख्य निर्वाचन आयुक्त और दो अन्य निर्वाचन आयुक्तों पर बहुत महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सौंपी हैं। अतः इनकी निष्पक्ष नियुक्ति के लिए मुख्य न्यायाधीश को भी शामिल किया जाना चाहिए। आखिर न्यायालय ऐसा क्यों चाहता है –
(1) चुनाव आयुक्त का कार्यकाल सामान्यतः छः वर्ष का होता है।
(2) सन् 1991 के कानून में प्रावधान है कि अगर आयुक्त छह साल पूरे होने के पहले 65 साल का हो जाता है, तो उसका कार्यकाल खत्म हो जाएगा। लिहाजा सरकार ऐसे व्यक्ति को नियुक्त करती है, जो कार्यकाल पूरा होने से पहले ही 65 का हो जाए, ताकि वह नया चुनाव आयुक्त नियुक्त कर सके। इससे आयुक्त दबाव में रहते हैं।
(3) आखिर क्यों सरकारें नैतिक रूप से मजबूत और निष्पक्ष आयुक्त नहीं चुन पाती? संविधान पीठ की चिंता का विषय यही है कि ऐसा चुनाव आयुक्त कैसे नियुक्त किया जा सके, जिसे सरकार भयभीत न कर सकें। पीठ में मौजूद न्यायमूर्ति जोसेफ ने यहां तक कहा कि हमें ऐसे मुख्य चुनाव आयुक्त की जरूरत है, जो प्रधानमंत्री के खिलाफ शिकायत मिलने पर भी कार्रवाई कर सके।
इस संदर्भ में नब्बे के दशक में रहे चुनाव आयुक्त टी.एन. शेषन को उनके दृढ़ व्यक्तित्व और ठोस निर्णयों के लिए याद भी किया गया।
चुनाव आयुक्तों को चुनने संबंधी सवाल पर संविधान की चुप्पी का सभी राजनीतिक दलों ने सत्ता में रहते हुए लाभ उठाया है। सरकार को चाहिए कि इसे निष्पक्ष बनाने के लिए एक कानून लाने पर विचार करे, क्योंकि चुनाव आयोग ही नहीं, सभी संविधानिक पदों पर किसी भी नियुक्ति के लिए तटस्थ और योग्य चयन समिति समय की मांग है।
समाचार पत्रों पर आधारित। 24 नवबंर 2022
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Date:26-12-22
Administering ChangeGoI periodically gets rid of dodgy bureaucrats. That’s good. But systemic reforms are needed.TOI Editorials
The forced retirement of 10 senior department of telecom officials, some with doubtful integrity, is high-visibility action, signalling the right message of intolerance to corruption. Since 2014, GoI has retired around 400 officers for lack of integrity or non-performance. Most were Group A and Group B officers. Telecom and Railways minister Ashwini Vaishnaw had approved similar disciplinary action on 40 Railways officers earlier. But with nearly 90,000 Group A and 2.9 lakh Group B employees in position in central services according to the Seventh Pay Commission, such episodic disciplinary action will not solve a systemic problem.
Too many mid-career and senior officers have integrity and/or performance deficits and GoI must find ways to identify and offload them following due process alongside recruiting meritorious replacements. Everyone enters the system young and there are equal opportunities to progress ahead. But the assured promotion system irrespective of performance, too many departments performing no significant functions, and the corrupt nexuses that form over a long career being close to netas and moneyed interests, all combine to ruin many officers. This is where the National Programme for Civil Services Capacity Building, approved in April 2021, aiming to reshape post-recruitment training mechanisms and GoI’s HR policies, is important.
Mid-career appraisals to weed out inept officers will have to proceed concurrently with greater public service recruitment. Lateral hiring hasn’t taken off with recruits struggling for acceptance and direction. Only 4% of India’s workforce comprise public servants. Compare this to 22. 5% in the UK, 13. 5% in the US and 28% in China. State governments must also reform public employment policies. After all, combined employment of states is much more than GoI and state bureaucracy’s interface with the ordinary citizen is much larger. Centre and states, with their 444 central PSUs and 1,136 state PSUs, should also pursue disinvestment more vigorously, and use part of the proceeds to reform administration. An efficient bureaucracy is key to India’s economic acceleration.
Date:26-12-22
Bajra Dal, A Push In The Right DirectionET Editorials
India’s push for millets and the UN’s recognition of its importance have implications beyond agriculture and food security. Higher nutrition value apart, millets are food crops most suitable for a warming planet. As a major producer, India must use the year-long attention to create new markets, mainstream production, and create pathways for farmers to increase their earnings.
In 2021, India with the support of 72 countries piloted the proposal in the UN to declare 2023 as the International Year of Millets. This recognition will raise the profile of bajra, drawing on its high nutritional value and low-environmental footprints. Millets require much less water and fertilisers. They are drought-resistant and can grow in temperatures as high as 46°C. Their nutritional value, and that they are grown in 130 countries including India, the US, China, Argentina, Nigeria and Sudan, gives it an edge over other grains especially with supply disruptions due to Covid and the war in Ukraine. As a major producer, with 41% of global production, India should be able to leverage the increased interest among foreign buyers. Despite steady growth in production, in 2021-22, production was at 15. 92 million metric tonnes, a 27% increase over the previous year, only 1% of harvested millets were exported.
GoI and agriculture agencies need to work with farmers or farm producer organisations to tap this emerging market. India must focus its efforts on introducing standards, increased R&D for improving strains of millets and use. This will help increase export potential. Millets also provide an avenue for collaborative action. India’s proposal for G20 to set up the International Millet Initiative for Research and Awareness is a good move.
Date:26-12-22
A welcome moveThe Centre’s taking up the burden for free food grain distribution in 2023 will provide relief to States.Editorial
The Government has decided not to extend the Pradhan Mantri Garib Kalyan Anna Yojana, (PMGKY), a scheme that ran between April 2020 to December 2022 (except for a short period in between), and provided additional allocation of food grains, i.e., rice or wheat from the central pool at five kilograms a month free of cost to beneficiaries under the National Food Security Act (NFSA). PMGKY absorbed the shock of the pandemic for the extreme poor and also brought in political dividends for the ruling Bharatiya Janata Party in many States that had elections this year, including Uttar Pradesh in particular. While discontinuing the scheme, the Government has said that it will bear the expenses of food grains under the NFSA for 2023 and ensure free ration under the Act for the estimated 81.35 crore beneficiaries for that year. In other words, ration card holders can now avail 5 kg of wheat or rice per month for free rather than at a subsidised rate, while Antyodaya Anna Yojana cardholders will receive 35 kg of free food grains. As the estimated number of 81.35 crore beneficiaries is still based on Census 2011 numbers and Public Distribution System entitlements have been limited to ration card holders and quotas framed by the Union Government, some States have gone on to expand benefits to others through the NFSA and other schemes. By taking on the burden of the expenditure for this distribution, the Union government, which has estimated an additional amount of ₹2 lakh crore for the scheme, has provided limited but welcome relief in monetary terms for States.
While the expenditure numbers on food distribution and subsidy provisions seem fiscally expensive, the schemes have provided distress relief to the most needy, helped the Government control its food buffer stocks better, and also reduced wastage of procured food grains at a time when procurement figures for rice and wheat by the Food Corporation of India remain high. The PDS and the PMGKY have not only enabled basic food security but have also acted as income transfers for the poor by allowing them to buy other commodities that they could not have afforded if not for the benefits. There is, of course, the question of whether targeted distribution, including the identification of priority households and the “poorest of the poor”, has really helped the benefits reaching the deserving with concerns about diversion of foodgrains. But as rights activists have argued, the more robust solution could be a universalisation of the PDS, which has already worked well in a few States such as Tamil Nadu, as the scheme would be availed by anyone in need instead of a flawed targeting system.
Date:26-12-22
भूखे को भोजनसंपादकीय
हर कल्याणकारी राज्य की जिम्मेदारी होती है कि उसका कोई भी नागरिक भूखा न सोए। अव्वल तो हर नागरिक के पास कोई न कोई ऐसा काम होना चाहिए, जिससे वह खुद अपना और अपने परिवार का भरण-पोषण कर सके। मगर यह आदर्श स्थिति शायद किसी भी देश में नहीं है। इसलिए जो लोग खुद अपने भोजन का प्रबंध कर पाने में अक्षम हैं, उन्हें भोजन उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी सरकारों पर आ जाती है। इसी दायित्व का निर्वाह करने के मकसद से भारत में राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून लागू किया गया था। अब सरकार की सांविधानिक बाध्यता है कि वह किसी को भूखे पेट न सोने दे। इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए खाद्य सुरक्षा योजना के तहत हर गरीब व्यक्ति को हर महीने पांच किलो अनाज उपलब्ध कराया जाता रहा है। अत्यंत गरीब परिवारों को अंत्योदय योजना के तहत प्रति परिवार पैंतीस किलो अनाज उपलब्ध कराया जाता है। खाद्यान्न सुरक्षा योजना के तहत चावल, गेहूं और मोटे अनाज के लिए क्रमश: तीन, दो और एक रुपए प्रति किलो पर भुगतान करना होता है, जबकि अंत्योदय योजना में अनाज मुफ्त दिया जाता है। कोरोना काल में केंद्र ने प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना के तहत इन दोनों योजनाओं के अतिरिक्त पांच किलो अनाज मुफ्त उपलब्ध कराना शुरू किया था, जो सात चरणों में बढ़ते हुए इस महीने खत्म हो रही है।
अब केंद्र सरकार ने प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना को आगे न बढ़ा कर राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा योजना और अंत्योदय योजना के तहत मिलने वाले अनाज के वितरण की अवधि एक साल और बढ़ा दी है। इस अनाज के लिए भुगतान नहीं करना पड़ेगा। यानी मुफ्त राशन उपलब्ध होगा। सरकार का कहना है कि करीब इक्यासी करोड़ तीस लाख लोगों को इस योजना का लाभ मिलेगा और इस पर करीब दो लाख करोड़ रुपए का खर्च आएगा, जिसे सरकार वहन करेगी। निस्संदेह इससे गरीबों को बड़ी राहत मिलेगी। दरअसल, कोरोना के बाद बंदी के चलते बहुत सारे लोग बेरोजगार हो गए और बहुतों का काम-धंधा बंद हो गया। ऐसे में बहुत तेजी से गरीबों की संख्या में वृद्धि हुई। उनके सामने दो वक्त के भोजन का संकट पैदा हो गया। उन्हें भोजन पहुंचाना सरकार का सांविधानिक कर्तव्य है। मगर यह सवाल फिर भी बना हुआ है कि इस तरह इतनी बड़ी आबादी को सरकार कब तक मुफ्त राशन उपलब्ध कराती रह सकती है। जिस देश की आधे से अधिक आबादी मुफ्त के राशन पर निर्भर हो और दो तिहाई आबादी को पोषणयुक्त भोजन उपलब्ध कराने की चुनौती हो, उसे लेकर सवाल उठने स्वाभाविक हैं।
पिछले कई सालों से लगातार भारत विश्व भुखमरी सूचकांक में पायदान-दर-पायदान नीचे खिसक रहा है। अगले साल आबादी के पैमाने पर हम दुनिया का सबसे बड़ा देश बनने जा रहे हैं। इस तरह भोजन और पोषण संबंधी चुनौतियां उत्तरोत्तर बढ़ती जा रही हैं। उत्पादन के मामले में भी पिछड़ रहे हैं। इसलिए खाद्य सुरक्षा को लेकर चिंता स्वाभाविक है। विशेषज्ञ लगातार सुझाव देते रहे हैं कि इस समस्या से पार पाने का यही तरीका है कि हर हाथ को काम मिले। मगर इस पहलू पर सफलता कठिन बनी हुई है। गरीबी और भुखमरी हर चुनाव में मुद्दा बनती है, राजनीतिक दल इनके जरिए गरीबों का भावनात्मक दोहन करने का भी प्रयास करते हैं, मगर हकीकत यही है कि हर साल ये समस्याएं बढ़ रही हैं। इनके समाधान के लिए दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है।
Date:26-12-22
हर जगह दी है दस्तकआनन्द माधव
नवम्बर 23, 2022 की सुबह ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस (एम्स), दिल्ली में अफरातफरी मच गई जब पता चला कि इमरजेंसी लैब के कंप्यूटर सेंटर से मरीजों की रिपोर्ट नहीं मिल रहीं। फिर बिलिंग सेंटर, अन्य विभागों से भी रिपोर्ट आने लगीं कि कोई फाइल नहीं खुल रही। टीम ने बैकअप सिस्टम को रिस्टोर करने का प्रयास किया तो मालूम हुआ इसे हैक किया जा चुका है। दिल्ली एम्स पर इस हमले में लगभग 4 करोड़ मरीजों का डाटा चोरी होने का अनुमान है । हैकर्स ने एम्स से 200 करोड़ रुपये की फिरौती की मांग की। इसे क्रिप्टो करंसी में भुगतान करने को कहा गया। हालांकि पुलिस ने फिरौती की मांग से इनकार किया।
हम डिजिटल युग में रह रहे हैं। इंटरनेट से जीना आसान हो गया है। मोबाइल की एक क्लिक पर पूरी दुनिया हाजिर है। आज कोई भी व्यक्ति या देश साइबरस्पेस से खुद को अलग नहीं कर सकता, लेकिन हम असुरक्षित भी होते जा रहे हैं। कोई भी हमारे व्यक्तिगत जीवन में ताकझांक कर सकता है। बिना कुछ किए बैंक खाते में डाका डाल सकता है। हैकिंग, ट्रोलिंग, बुल्लिंग, हेट स्पीच, पोर्न की लत आम बात हो गई है। बैंक फ्रॉड से लेकर मैलवेयर से लेकर रोमांस स्कैम तक, साइबर क्राइम हर जगह है। साइबर अपराध मात्र आर्थिक अपराध तक ही सीमित नहीं है, यह राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा भी बन गया है। साइबर अपराधी युवाओं का ब्रेन वॉश कर उनको अपने ही देश के विरुद्ध अपराध करने को भड़काता है। हेट स्पीच के माध्यम से समाज में विभेद पैदा करता है। एनसीआरबी 2020 के रिपोर्ट के अनुसार गत वर्ष 50 हजार से भी अधिक साइबर क्राइम के केस भारत में रजिस्टर्ड हुए। साइबर अपराध मात्र भारत की समस्या नहीं है, लगभग हर देश की समस्या है। फेडरल ब्यूरो ऑफ इन्वेस्टिगेशनम की 2021 की इंटरनेट क्राइम रिपोर्ट के अनुसार साइबर क्राइम के कारण 7 बिलियन का नुकसान हुआ, जो 2019 में रिपोर्ट किए गए नुकसान से लगभग दोगुना है।
ब्रिटिश जालसाजों ने टैक्स धोखाधड़ी करने के लिए ग्राहकों कि संवेदनशील जानकारी को ऑनलाइन टारगेट किया है। ब्राजील के मैलवेयर डवलपर्स ने देश में उनके नाम जारी किए गए इलेक्ट्रॉनिक चालानों में हेर-फेर किया है। आर्थिक रूप से प्रेरित खतरे वाले कर्ताओं ने ऑस्ट्रेलियाई सेवानिवृत्ति खातों को टारगेट किया। साइबर अपराध राष्ट्रीय सुरक्षा को विभिन्न तरीकों से प्रभावित करता है, जिसमें संगठित अपराध और शत्रुतापूर्ण राष्ट्र राज्यों को अवैध लाभ प्राप्त करने और लूटने के लिए उपजाऊ जमीन उपलब्ध कराना, घरों, उद्योगों और सरकारी की आर्थिक स्थिरता को खतरा पैदा, आपूर्ति श्रृंखलाओं को बाधित कर महत्त्वपूर्ण क्षेत्रों को पंगु बना देना । कोस्टारिका के सार्वजनिक और निजी क्षेत्र के खिलाफ राष्ट्रव्यापी कोंटी रैंसमवेयर हमले और देश की बाद की आपातकालीन घोषणा, एक और स्पष्ट उदाहरण है। भारत में अब तक कोई डाटा प्रोटेक्शन एक्ट नहीं है। भारत सरकार ने सूचना प्रौद्योगिकी संशोधन अधिनियम, 2008 के अंतर्गत सीईआरटी इन को राष्ट्रीय एजेंसी के रूप में कार्य करने के लिए नामित किया है, जिसकी स्थापना 2004 में हुई है। 2018 में डाटा प्रोटेक्शन एक्ट का प्रारूप तैयार किया गया और 2020 में इसे सदन में पेश किया गया। लेकिन इसे फिर वापस ले लिया गया था। अब पुनः ‘डिजिटल पर्सनल डेटा प्रोटेक्शन बिल, 2022’ को आम जनता के सुझाव के लिए इलेक्ट्रॉनिकी और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय की वेबसाइट पर डाला गया है। वित्तीय अपराध या फ्रॉड को रोकने के लिए या रक्षा एवं गृह विभाग के महत्त्वपूर्ण डाटा को सुरक्षित रखने के लिए हमें बहुपरत सुरक्षा (आतंरिक एवं बाह्य) की जरूरत है, लेकिन इसमें कोई अतिश्योक्ति नहीं है कि साइबर सुरक्षा के मामले में भारत विश्व में निचले पायदान के देशों के साथ खड़ा है। इसके कई कारण हैं। सबसे पहले तो साइबरस्पेस की महत्ता समझने के बाद भी इस मद में बहुत ही कम बजट करना । दूसरा, साइबर अपराध के बारे में न तो लोगों की समुचित समझ है, और न ही इसके लिए व्यापक प्रचार-प्रसार ही किया जा रहा है।
हमारे सरकारी प्रतिष्ठान कमजोर है क्योंकि -क) हम अपने डिजिटल इकोसिस्टम एवं सरकारी प्रतिष्ठान अपने डिजिटल डाटाबेस को सुरक्षित करने के लिए न्यूनतम राशि खर्च करते हैं, ख ) ऐप/नेटवर्क और ऑपरेटिंग सिस्टम का उपयोग करने के लिए पायरेसी / गैर- लाइसेंस / मुक्त उपयोग पर निर्भर हैं, ग) हमारी सरकार ने प्रदाताओं / ऑपरेटरों और उपयोगकर्ताओं के लिए लक्ष्मण रेखा की रूपरेखा नहीं बनाई है, घ) हम अपने डाटा से समझौता किए जाने के बारे में कम से कम चिंतित हैं। साइबर अपराध से लड़ने के लिए उचित बजट एवं सरकार की मजबूत इच्छाशक्ति की जरूरत है, साथ ही मजबूत डिजिटल पर्सनल डाटा प्रोटेक्शन एक्ट भी जरूरी है, तभी हम साइबर अपराधी से लड़ने के लिए तैयार हो पाएंगे एवं राष्ट्र पर साइबर हमले रोकने में सक्षम होंगे।
Date:26-12-22
मोटे अनाजों की पैदावार से समृद्ध होंगे छोटे किसानअनिल बलूनी, ( सांसद और मीडिया प्रभारी, भाजपा )
जब से केंद्र में भारतीय जनता पार्टी की सरकार आई है और नरेंद्र मोदी देश के प्रधानमंत्री बने हैं, तब से सरकार का हर कदम गांव, गरीब और किसान के कल्याण के प्रति समर्पित रहा है। किसान शुरू से ही प्रधानमंत्री की प्राथमिकता में सबसे ऊपर रहे हैं। उन्होंने किसानों के कल्याण और उनकी आमदनी को दोगुना करने के उद्देश्य से कई परिवर्तनकारी योजनाएं शुरू की। इसी दिशा में छोटे और गरीब किसानों के सशक्तिकरण की दिशा में एक और कदम उठाते हुए उन्होंने अब मिलेट्स, यानी मोटे अनाज को बढ़ावा देने का बीड़ा उठाया है। मिलेट्स को महत्व दिलाने के लिए 2018 को उन्होंने ‘मोटा अनाज वर्ष’ घोषित किया था। साथ ही, मोटे अनाज को देश के पोषण मिशन अभियान में भी शामिल किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अथक प्रयासों के बल पर ही संयुक्त राष्ट्र साल 2023 को ‘अंतरराष्ट्रीय मिलेट्स वर्ष’ के रूप में मना रहा है। मिलेट्स को हर थाली में पहुंचाने के अभियान से सबसे अधिक फायदा देश के छोटे व गरीब किसानों को होगा। यह उनकी तकदीर बदलने और आय बढ़ाने में व्यापक रूप से लाभकारी सिद्ध होगा।
मोटे अनाज सदियों से हमारे नियमित भोजन का हिस्सा रहे हैं। हालांकि, 20वीं सदी में चावल और गेहूं की लोकप्रियता ने इनकी लोकप्रियता को कम कर दिया था, लेकिन अब ये अनाज तेजी से लोगों की पसंद बन रहे हैं। स्वयं प्रधानमंत्री के भोजन में मिलेट्स नियमित रूप से शामिल रहते हैं। 2023 को मिलेट्स वर्ष की पहचान देने की पहल के तहत 20 दिसंबर को सरकार ने सांसदों के लिए एक लंच का आयोजन भी किया था, जिसमें मोटे अनाज से बने भोजन मीनू का हिस्सा थे। अंतरराष्ट्रीय मिलेट्स वर्ष में यह तय किया गया है कि भारत की अध्यक्षता में देश में होने वाली जी-20 की बैठकों में मिलेट्स के व्यंजन भी परोसे जाएंगे। प्रधानमंत्री अपने ‘मन की बात’ कार्यक्रम में मोटे अनाजों के प्रति लोगों में जागरूकता बढ़ाने के लिए जन-आंदोलन चलाने की बार-बार बात करते हैं। भारत में जब कोई विदेशी मेहमान अथवा राष्ट्राध्यक्ष आते हैं, तो प्रधानमंत्री की कोशिश रहती है कि उन्हें परोसे जाने वाले व्यंजनों में मिलेट्स से बने व्यंजन भी शामिल हों। यह प्रयोग काफी सफल रहा है।
मिलेट्स खाद्य सुरक्षा की दृष्टि से भी काफी महत्वपूर्ण हैं। पूरी दुनिया में जलवायु परिवर्तन के कारण सूखे की समस्या लगातार बढ़ रही है। भूजल का स्तर भी तेजी से नीचे गिरता जा रहा है। ऐसे में, यह समय की मांग है कि ऐसे फसलों को बढ़ावा मिले, जो पोषक तत्वों से भरपूर हों और जिन्हें उगाने में पानी की खपत भी कम हो। साथ ही, मिट्टी की उर्वरा शक्ति भी बनी रहे। मोटे अनाज गेहूं और चावल पर देश की निर्भरता कम करने में भी सहायक होंगे। ये प्रधानमंत्री के प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के अभियान में भी मददगार सिद्ध होंगे, क्योंकि इन फसलों में कीड़े कम लगते हैं, जिससे किसानों पर कीटनाशकों का दबाव कम होता है। इस तरह से किसानों की उत्पादन-लागत भी कम होगी।
मिलेट्स सुपर फूड्स होते हैं, क्योंकि इनमें मिनरल्स, फाइबर्स और पोषक तत्व अपेक्षाकृत काफी अधिक मात्रा में होते हैं। ऐसे में, देश में आठ करोड़ मधुमेह के मरीजों और लगभग 35 लाख कुपोषित बच्चों के लिए ये अनाज काफी फायदेमंद साबित होंगे। अगर आप सुबह की शुरुआत मिलेट्स से करते हैं, तो कई बीमारियों से बच सकते हैं। इसके सेवन से मोटापा, पाचन की समस्या, कोलेस्ट्रॉल और मधुमेह संबंधी दिक्कतें कम होती हैं। यही वजह है कि इन अनाजों को थाली में जगह देना अनिवार्य हो गया है। भारत ने 2021-22 में इससे पिछले वर्ष की तुलना में बाजरा उत्पादन में 27 प्रतिशत की वृद्धि दर्ज कराई है। वैश्विक उत्पादन में लगभग 41 प्रतिशत की अनुमानित हिस्सेदारी के साथ भारत दुनिया में बाजरा के अग्रणी उत्पादकों में से एक है। सरकार के प्रयासों से मोटे अनाजों के उपयोगी प्रसंस्करण और फसल चक्र के बेहतर इस्तेमाल के साथ इसे खाद्य सामग्री का अहम अंग बनाने में मदद मिलेगी। आजादी के अमृत काल में हमें मोटे अनाज को अधिक से अधिक अपनाने का प्रयास करना चाहिए, ताकि आत्मनिर्भर भारत, स्वस्थ भारत, स्वस्थ मिट्टी और खुशहाल किसान का सपना साकार हो सके।
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हाल के वर्षों में संवैधानिक प्रावधानों और संवैधानिक नैतिकता का गंभीर क्षरण हुआ है। चुनाव आयोग और महालेखा नियंत्रक परीक्षण जैसे संवैधानिक निकायों के साथ-साथ भाजपा शासित राज्यों के राज्यपालों ने संविधान और उसकी सीमाओं का मजाक बना दिया है। कुछ बिंदु –
– संविधान के अनुच्छेद 153 में राज्य के लिए राज्यपाल का प्रावधान किया गया है। वहीं अनुच्छेद 154 राज्यपाल की कार्यकारी क्षमताओं का उल्लेख करता है। इसके अनुसार ‘राज्य की कार्यपालिका शक्ति राज्यपाल में निहित होगी, और वह इसे सीधे या अपने अधीनस्थ अधिकारियों के माध्यम से प्रयोग करेगा।’
– अनुच्छेद 154(2) ए राज्यपाल को “किसी अन्य प्राधिकरण पर मौजूदा कानून द्वारा प्रदत्त” किसी भी कार्य का प्रयोग करने से प्रतिबंधित करना है।
– अनुच्छेद 163 बताया गया है कि ‘राज्यपाल की सहायता और सलाह के लिए मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में मंत्रिपरिषद् होगी ——।’
राज्यपाल की विवादास्पद स्थिति से जुड़े मुख्य मामले –
– 1974 का शमशेर सिंह बनाम पंजाब सरकार
इस मामले में स्पष्ट रूप से कहा गया कि ‘राज्यपाल को दिए गए विवेक का अर्थ है कि संवैधानिक या औपचारिक प्रमुख के रूप में राज्य की शक्ति उसके पास निहित है’, परंतु अनुच्छेद 356 के प्रयोग होने पर ही केवल राज्यपाल अपनी शक्तियों का उपयोग मंत्रिपरिषद् की सलाह के विरूद्ध कर सकता है। अन्यथा अन्य मामलों में जहाँ भी वह अपनी विवेकाधीन शक्तियों का इस्तेमाल करे, उसे मंत्रिपरिषद् के सामंजस्य में करना होगा।
संविधान सभा की बहस –
राज्यपाल की शक्तियों को लेकर हुई संविधान सभा की बहस में डॉ०अम्बेडकर ने कहा था कि ‘यह सदन जानता है कि राज्यपाल के पास ऐसा कोई कार्य नहीं है, जिसे उसे अपने विवेक से या व्यक्तिगत निर्णय से करने की आवश्यकता हो।’
आज की स्थिति –
निश्चित रूप से राज्यपाल के पास दिन-प्रतिदिन के मामलों सहित प्रशासन में हस्तक्षेप करने की कोई शक्ति नहीं है। न ही विधानसभा द्वारा पारित विधेयकों को स्वीकृति देने से इंकार करने की शक्ति है। लेकिन आज विपक्ष शासित राज्यों में राज्यपालों का व्यवहार संविधान-विरोधी दिखाई दे रहा है। दूसरी ओर, भाजपा शासित राज्यों के राज्यपाल उनके कार्यों से च्युत किए जाने पर भी कोई आवाज नहीं उठा रहे हैं। देश की सीबीआई, प्रवर्तन निदेशालय एवं अन्य जांच एजेंसियों की भी लगभग यही स्थिति है।
राज्यपालों पर चाहे सत्ता पक्ष का दबाव हो, लेकिन उनके गरिमामयी पद को देखते हुए उनसे हमेशा यह अपेक्षा की जाती है कि वे संविधान के दायरे में रहकर देश के कल्याण हेतु काम करें।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित दुष्यंत दवे के लेख पर आधारित। 19 नवबंर 2022
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Date:24-12-22
छुट्टियां नहीं सुप्रीम कोर्ट के कामों का महत्व देखेंसंपादकीय
सुप्रीम कोर्ट देश की सबसे बड़ी अदालत है। इसके फैसले अगर हड़बड़ी या हर पहलू को बगैर समझे दिए गए तो लोगों का न्याय से विश्वास उठ जाएगा। एक केन्द्रीय मंत्री की सलाह कि जनता चाहती है सुप्रीम – हाई कोर्ट के जजेस लम्बी छुट्टियों पर जाने की परंपरा बंद करें ताकि ज्यादा केसेस का निपटारा हो सके, शायद ठीक मांग नहीं है। कम ही लोग जानते हैं कि फैसले के पहले जजों को घर पर देर रात तक घंटों तैयारी करनी होती है। कभी सैकडों / हजारों पेज वाले फैसलों में ओबिटर डिक्टा (फैसले का वह भाग जिसमें फैसले तक पहुंचने का कारण होता है ) देखें। संवैधानिक पहलू के अलावा सामाजिक, आर्थिक, नैतिक और आध्यात्मिक यानी लगभग हर आयाम पर गौर करने के बाद ये फैसले दिए जाते हैं। इनमें जजेस की समझ का समुन्नत स्तर देखने को मिलता है। यही कारण है कि भारत की सुप्रीम कोर्ट के तमाम फैसले अमेरिकन, ब्रिटिश और यहां तक कि पाकिस्तानी कोर्ट्स में भी ‘कोट’ होते हैं। दूसरा इन फैसलों तक पहुंचने में कोर्ट्स को ज्यादा मेहनत करनी पड़ती है क्योंकि भारत में तथ्यों तक पहुंचने के लिए अपराध अनुसंधान तो छोड़िए, भू-राजस्व रिकॉर्ड में भी टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल नहीं होता। कोर्स में सरकार आधे से ज्यादा केसेस में वादी या प्रतिवादी है, लिहाजा सरकार को भी सोचना होगा कि उसके अभिकरण कहीं शक्ति का बेजा प्रयोग तो नहीं कर रहे हैं।
Date:24-12-22
हमें चाहिए अपना समावेशी इतिहासडा. एके वर्मा, ( लेखक सेंटर फार द स्टडी आफ सोसायटी एंड पालिटिक्स के निदेशक एवं राजनीतिक विश्लेषक हैं )
भारतीय संविधान का प्रथम अनुच्छेद कहता है ‘इंडिया, दैट इज भारत’ अर्थात ‘इंडिया, जो भारत है।’ तो भारत है क्या? उस भारत का संपूर्ण इतिहास क्या है? क्या हमें भारत और भारत के इतिहास के बारे में बताया गया है? जब भी इतिहास के पुनर्लेखन की बात होती है तो संशय पैदा होता है कि कहीं इतिहास की पुस्तकों से छेड़छाड़ तो नहीं की जाएगी? कुछ विद्वानों को लगता है कि इससे मध्यकालीन इतिहास या मुस्लिम इतिहास को हिंदुत्व के चश्मे से लिखा जाएगा। चाहे मुस्लिम आक्रांता रहे हों या अंग्रेज, दोनों ने अपने-अपने दृष्टिकोण से इतिहास लिखवाया, जिसमें उन्होंने स्वयं को भारतीय समाज और संस्कृति से श्रेष्ठ दिखाया। स्वतंत्रता के बाद सरकार ने ध्यान नहीं दिया कि आक्रांताओं की ओर से गढ़े गए तथ्यों, विदेशी-कलम और दृष्टिकोण से लिखा इतिहास बच्चों को क्यों पढ़ाया जा रहा है? जैसे-जैसे नए तथ्य और शोध सामने आए, इतिहास के पुनर्लेखन की मांग जोर पकड़ती गई। इंग्लैंड में डेविड ह्यूम ने 18वीं शताब्दी में गंभीर शोध कर ‘हिस्ट्री आफ इंग्लैंड’ लिखी, जो आज वहां कोई नहीं पढ़ता, क्योंकि नए तथ्यों के आलोक में वह पुस्तक अप्रासंगिक हो गई।
भारत में ऐसा क्यों नहीं हो सकता? क्यों अपने तथ्यों, अपने दृष्टिकोण और अपनी कलम से हम अपना इतिहास नहीं लिख सकते? न्यायपालिका को पारदर्शिता के साथ आत्मदर्शन की राह तलाशनी होगी कोलेजियम पर पुनर्विचार का समय, कोई भी स्वयं के मामले में नहीं हो सकता न्यायाधीश यह भी पढ़ें सच्चा एवं संपूर्ण इतिहास जानना न केवल हमारा मौलिक अधिकार है, वरन हमारी अस्मिता को सम्मान, शक्ति एवं गौरव प्रदान करने का सशक्त माध्यम भी है। इससे हमें अपनी गलतियों, भूलों और सामाजिक-राजनीतिक-सांस्कृतिक विसंगतियों को जानने और सुधारने का अवसर भी मिलेगा। आज समावेशी-राजनीति और समावेशी-विकास की व्यापक चर्चा होती है, पर कोई समावेशी इतिहास की बात नहीं करता। हाल में प्रकाशित ‘ब्रेवहार्ट्स आफ भारत’ में विक्रम संपत ने इसका उल्लेख किया है। प्रथम, हमारे इतिहास को ऐसे लिखा गया है, जैसे हम पिछड़े, असभ्य और कमजोर समाज रहे हों, लेकिन भारतीय समाज के विकसित स्वरूप और सभ्यता के प्रतिमान बिंदुओं का कोई उल्लेख नहीं। द्वितीय, भारतीय इतिहास मूलतः दिल्ली-केंद्रित है। उसमें दक्षिण भारत के सशक्त चालुक्य, सप्तवाहन, चोल-साम्राज्य, विजयनगर, त्रावणकोर, असम के अहोम, मणिपुर, नगालैंड और अन्य सीमांत प्रदेशों जैसे ओडिशा, बंगाल के गणपति साम्राज्य, मुर्शिदाबाद और बंगाल के नवाबों आदि की कोई चर्चा नहीं। राजपूतों और मराठों के शौर्य, पराक्रम और योगदान को जो स्थान मिलना चाहिए, वह भी नहीं मिला। तृतीय, इतिहास में महिला शासकों जैसे रानी दुर्गावती, गढ़वाल की रानी कर्णावती, मदुरै की रानी मंगम्मल, मराठा रानी ताराबाई, अहिल्याबाई होल्कर और भोपाल की बेगमों के शौर्य-पराक्रम की घोर उपेक्षा की गई है। इतिहास के पुनर्लेखन में इन उपेक्षित आयामों को जोड़ा जाना चाहिए।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने हाल में असम के अहोम साम्राज्य के परमवीर सेनानायक लचित बारफुकन की 400वीं जन्म-शताब्दी पर कहा कि उन्होंने सरायघाट युद्ध में मुगलों को हराया और औरंगजेब का असम में प्रवेश रोका। प्रधानमंत्री का संकेत भारतीय इतिहास को समावेशी बनाने की ओर था। असंख्य रणबांकुरे और वीरांगनाओं को आज कोई नहीं जानता, जैसे कि कश्मीर के ललितादित्य, मेवाड़ के महाराणा कुंभा, गुजरात की रानी नेकीदेवी, अहमदनगर की चांदबीबी, त्रावनकोर के मार्तंड वर्मा और अवध की बेगम हजरतमहल आदि।
भारतीय इतिहासकारों की एक पीढ़ी ने देश के इतिहास के साथ अन्याय किया है। उन्होंने भारतीय इतिहास को बौद्धिक-विमर्श से निकाल कर कभी लोक-क्षेत्र में लाने की चेष्टा नहीं की। परिणामस्वरूप किसी की दिलचस्पी अपने पुरातन इतिहास और उसके वीरों-वीरांगनाओं में नहीं हुई। भारतीय इतिहास को शुष्क विषय के रूप में हमें पढ़ाया गया। भारत में मुगल आक्रांताओं के बाद के इतिहास का ‘फोकस’ केवल मुगलों पर रहा। अंग्रेजों के आगमन पर वह ब्रिटेन केंद्रित हो गया। भारत बहुत बड़ा देश था, जो असंख्य छोटी-छोटी देसी रियासतों से मिलकर एक राष्ट्र के रूप में रहा है। इन छोटे राज्यों और रियासतों में अनेक का गौरवशाली इतिहास था, लेकिन क्या उनकी कहीं चर्चा होती है? राजनीतिक विमर्श के केंद्र में दक्षिण के राज्यों, पूर्वोत्तर या अन्य छोटे भारतीय राज्यों का कोई अस्तित्व नहीं। स्वतंत्रता के 75 वर्षों बाद भी भारत में राजनीतिक-विमर्श समावेशी नहीं हो सका। क्यों? यही स्थिति इतिहास की है। अब कुछ इतिहासकारों ने इसका बीड़ा उठाया है कि वे भारतीय इतिहास को दिल्ली पर केंद्रित न रखकर उसे समावेशी बनाएंगे। उनके इस प्रयास को हिंदुत्व से जोड़ने का भरपूर प्रयास किया जाएगा, परंतु हमें स्मरण रहे कि विजय अंत में सत्य की ही होगी। भारतीयों को प्रत्येक कालखंड के सच्चे और संपूर्ण इतिहास को जानने का अधिकार है। देश के विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों की जिम्मेदारी है कि वे अपने-अपने क्षेत्राधिकार के ‘स्थानीय-इतिहास’ को छात्रों के लिए अनिवार्य करें, जिससे नई पीढ़ी को अपनी विरासत को जानने और उससे जुड़ने का अवसर मिले। जैसे उत्तर प्रदेश के बहराइच क्षेत्र में राजा सुहेलदेव पासी ने सोमनाथ मंदिर को 17 बार लूटने वाले महमूद गजनवी के सेनापति और हिंदुओं का कत्लेआम करने वाले मसूद गाजी को भयानक युद्ध में मार गिराया था, मगर क्या राजा सुहेलदेव के बारे में बहुत कुछ उल्लेख है? आज जब इतिहास के पुनर्लेखन की बात होती है तो हमें स्पष्ट होना चाहिए कि इसका अर्थ उसे समावेशी बनाने से है। इतिहास के उस अंश को उजागर करने से है, जिस पर पर्दा पड़ा हुआ है, न कि उपलब्ध इतिहास से कोई छेड़छाड़ करने से। जब तक हम भारत के इतिहास को समावेशी नहीं बनाएंगे, उसमें दलितों, पिछड़ों, जनजातियों और सर्व-समाज के वीरों-वीरांगनाओं के योगदान की याद नहीं दिलाएंगे, तब तक हम अपने समाज, राजनीति और विकास को सच्चे अर्थों में समावेशी नहीं बना सकेंगे।
Date:24-12-22
कोलेजियम पर पुनर्विचार का समयडा. अभय सिंह यादव, ( लेखक भारतीय प्रशासनिक सेवा के पूर्व अधिकारी एवं हरियाणा विधानसभा के सदस्य हैं )
हमारे देश की न्यायपालिका विश्व के श्रेष्ठतम न्यायतंत्रों की श्रेणी में उपस्थिति दर्ज करवाती रही है। स्वतंत्रता के उपरांत इसने समय की चुनौतियों से गुजरते हुए अपनी प्रतिष्ठा एवं गरिमा को सुरक्षित रखा है। संविधान ने इसे प्रजातंत्र के प्रहरी की भूमिका में संविधान की रक्षा का दायित्व सौंपा है। सरकार के शेष दोनों अंगों कार्यपालिका एवं विधायिका के कार्य की समीक्षा का दायित्व भी न्यायपालिका के पास है। पूरी व्यवस्था को सुव्यवस्थित एवं सुचारु बनाने के लिए तीनों ही अंगों को परिसीमित करने वाली लक्ष्मण रेखा भी संविधान में निहित है, ताकि सरकार के सभी अंग अपनी-अपनी सीमा में रहते हुए सामंजस्य एवं संतुलन के साथ अपने कार्यक्षेत्र में आगे बढ़ते रहें।
उच्च पदों पर न्यायिक नियुक्तियों की वर्तमान कोलेजियम प्रणाली पर हाल में छिड़ी बहस ने आम जनमानस का ध्यान न्यायपालिका पर केंद्रित किया है। इसलिए और भी अधिक, क्योंकि कोलेजियम को लेकर विभिन्न नेताओं की ओर से संसद के भीतर और बाहर लगातार वक्तव्य दिए जा रहे हैं। निःसंदेह यह एक गंभीर विषय है। मूल रूप से संविधान में न्यायिक नियुक्तियों की एक सुस्पष्ट व्यवस्था उपलब्ध थी, परंतु कुछ परिस्थितिजन्य घटनाओं ने एक ऐसी स्थिति पर पहुंचा दिया, जहां न्यायपालिका ने अपनी न्यायिक समीक्षा की शक्तियों का प्रयोग करते हुए उच्च न्यायिक नियुक्तियों का अधिकार काफी हद तक अपने पास सीमित कर लिया, जिसे कोलेजियम प्रणाली के रूप में जाना जाता है। अब इस कोलेजियम प्रणाली की कुछ सीमाएं रेखांकित होने लगी हैं। यही कारण है कि इस विषय में प्रबुद्ध वर्ग में चिंतन एवं विवेचन का सिलसिला शुरू हुआ है।
केंद्र में भाजपा की पूर्ण बहुमत की सरकार बनने के बाद इस प्रणाली का एक पारदर्शी एवं प्रभावी विकल्प संसद के समक्ष लाया गया और न्यायिक नियुक्ति की इस व्यवस्था को देश की सर्वोच्च विधायिका ने सर्वसम्मति से स्वीकार कर लिया, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने संविधान संशोधन विधेयक के जरिये बनाए गए राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग के अमल में आने से पहले ही अपने न्यायिक समीक्षा के अधिकार का प्रयोग करते हुए उसे निरस्त कर दिया। आम जनमानस के मानस पटल पर इस घटनाक्रम ने अनेक प्रश्न छोड़ दिए। सामान्यतः कोई भी व्यक्ति अपने स्वयं के मामले में न्यायाधीश नहीं हो सकता। इसके लिए हमेशा तीसरे पक्ष से निर्णय की अपेक्षा की जाती है। लगभग पूरी न्यायिक व्यवस्था की एक स्थापित मान्यता है कि यदि किसी मामले से किसी न्यायाधीश का कोई संबंध रहा है तो ऐसे मामलों की सुनवाई से वे स्वयं को अलग कर लेते हैं, किंतु इस मामले में न्यायपालिका ने स्वयं से सीधा संबंध रखने वाले मामले का खुद ही निर्णय कर दिया। यहां यह बात भी स्वाभाविक रूप से आती है कि सर्वोच्च न्यायालय से ऊपर देश में कोई न्यायिक व्यवस्था उपलब्ध ही नहीं है तो इसका निर्णय उसे ही करना था। इसके बाद भी इस विषय पर लीक से हटकर विचार किया जा सकता था, जिसमें इसे मात्र न्यायिक निर्णय मानने की मनोस्थिति से बाहर निकलकर विचार हो सकता था।
संविधान द्वारा देश की न्यायपालिका को न्यायिक समीक्षा का अधिकार देने के बाद भी संविधान की मूल भावना का एक सत्य यह भी है कि प्रजातंत्र का अंतिम सत्य एवं शक्ति प्रजा ही है। देश की संसद इस प्रजा का सीधा प्रतिनिधित्व करने वाली सर्वोच्च सभा है। यही कारण है कि स्वयं संविधान ने इसमें संशोधन का अधिकार केवल संसद को ही दिया है। जब संसद ने विशेष तौर से सर्वसम्मति से एक कानून बना दिया और वह भी जो सीधे तौर पर न्यायिक नियुक्तियों से संबंधित था, तो यह न्यायिक समीक्षा का सामान्य मामला नहीं था, जिसे लागू करने से पहले ही निरस्त करने की जल्दबाजी से बचा जा सकता था। यदि इसे लागू होने के उपरांत समय की कसौटी पर खरा उतरने का अवसर दिया जाता तो यह स्थापित न्यायिक व्यवस्था एवं गरिमा के हित में होता। इसके क्रियान्वयन उपरांत गुण-दोष के आधार पर यदि यह समीक्षा होती तो जनमानस में इसकी स्वीकार्यता कहीं अधिक होती। इस संबंध में एक महत्वपूर्ण पहलू यह भी है कि न्यायपालिका की स्वतंत्रता की मुख्य आधार शक्ति जन आस्था होती है। यह आस्था न्यायपालिका के निष्पक्ष एवं पारदर्शी न्याय दर्शन का प्रतिबिंब होती है, जिसके अविरल प्रवाह को बनाए रखना स्वयं न्यायपालिका का मूल दायित्व है। जनमानस में तनिक भी संदेह न्यायिक गरिमा के लिए घातक हो सकता है।
अतः न्यायिक नियुक्तियों के विकल्प में न्यायपालिका से अधिक सावधानी बरतने की अपेक्षा है। बेहतर तो यही होगा कि न्यायिक नियुक्तियों के मामले में न्यायपालिका को स्व-संपूर्णता और मुग्धता के भाव से बाहर निकलना होगा। यह कटु सत्य है कि मानव प्रकृति के स्वाभाविक दोषों से कोई भी व्यक्ति या संस्था पूर्ण रूप से मुक्त नहीं रह सकती। ये दोष मानव स्वभाव के अभिन्न अंग हैं, जिनसे पूर्ण मुक्ति हिमालय की कंदराओं में तपने वाले साधु भी संभवतः प्राप्त नहीं कर सके। अत: किसी भी संस्था को इनसे दूर रखने के लिए व्यवस्थागत छलनी की आवश्यकता है, जिसके मूल में पारदर्शिता हो। अतः न्यायपालिका को पारदर्शिता के साथ आंतरिक समीक्षा के माध्यम से आत्मदर्शन का रास्ता तलाश करना होगा।
Date:24-12-22
जिंदगी में जहर घोलता प्लास्टिकअखिलेश आर्येंदु
चौंकाने और हैरत में डालने वाली बात है- प्लास्टिक की बरसात। मगर आने वाले वक्त में पानी की जगह प्लास्टिक की बरसात होने की बात कह कर वैज्ञानिकों ने हमें अभी से इसके प्रति सावधान कर दिया है। समुद्र की पारिस्थितिकी का हिस्सा बनने वाला यह खास तरह का प्लास्टिक आसमान से बरसने लगा है। वैज्ञानिकों के मुताबिक माइक्रोप्लास्टिक, जिसका आकार पांच मिलीमीटर होता है, जो खिलौनों, गाड़ियों, कपड़ों, कार के पुराने टायर, पेंट आदि में पाया जाता है, हमारे पास से होते हुए समुद्र में पहुंच रहा है। फिर पारिस्थितिकी तंत्र का हिस्सा बनकर धरती पर लौट आता है। ये प्लास्टिक के कण नंगी आंखों से नहीं दिखाई देते। यही वजह है कि आम आदमी को इसके बारे में कोई जानकारी नहीं है। मगर इससे भी ज्यादा हैरत की बात यह है कि हम सबके घरों में माइक्रोप्लास्टिक बहुत बड़ी तादाद में पाए जाते हैं, पर हम इससे अनजान बने रहते हैं। इसकी वजह से हम कई समस्याओं से ग्रस्त हो जाते हैं। अमेरिका की एक विज्ञान पत्रिका के मुताबिक सबसे साफ माने जानी वाली जगह- दक्षिण नेशनल पार्क- की हवा में प्लास्टिक के महीन कणों की बरसात लगातार होती रहती है। गौरतलब है कि इस इलाके में वाहनों और कारखानों की मौजूदगी न होने के बावजूद यहां माइक्रोप्लास्टिक कणों की बरसात लंबे समय तक होती रहती है, जिससे सैकड़ों टन प्लास्टिक धरती पर बिछ चुकी है। यूनिवर्सिटी आफ आकलैंड (न्यूजीलैंड) के वैज्ञानिकों के मुताबिक इलेक्ट्रिक और इलेक्ट्रानिक सामान से पाली कार्बोनेट निकलता है, जो एक तरह का प्लास्टिक ही है। इससे भी हमारी सेहत पर बुरा असर पड़ता है।
वैज्ञानिकों ने 2021 में माइक्रोप्लास्टिक के असर पर शोध के दौरान पाया कि हम रोज लगभग सात हजार माइक्रोप्लास्टिक के टुकड़े अपनी सांस के जरिए लेते हैं। अध्ययन के मुताबिक माइक्रोप्लास्टिक का हम पर वैसा ही असर होता है, जैसा तंबाकू या सिगरेट का होता है। वैज्ञानिकों का मानना है कि माइक्रोप्लास्टिक हमारी प्रजनन क्षमता पर भी असर डाल रहा है। गौरतलब है कि माइक्रोप्लास्टिक खासकर एकल उपयोगी प्लास्टिक में पाया जाता है, इसलिए ऐसे प्लास्टिक के इस्तेमाल पर तुरंत रोक लगनी चाहिए। एकल उपयोगी प्लास्टिक से महज हवा प्रदूषित नहीं हो रही, यह पानी-मिट्टी को भी प्रदूषित कर रहा है।
प्लास्टिक उत्पादों में सबसे अधिक उपयोग प्लास्टिक के थैलों (पचास माइक्रोन से कम) का होता है। फिर इसमें पैकिंग फिल्म, फोम वाले कप-प्याले, कटोरे, प्लेट, लेमिनेट किए गए कटोरे और प्लेटें, छोटे प्लास्टिक कप और कंटेनर (डेढ़ सौ मिलीग्राम और पांच ग्राम से कम), प्लास्टिक स्टिक और इयर बड, गुब्बारे, झंडे और कैंडी, सिगरेट के बड, फैलाया हुआ पौलिस्ट्रिन, पेय पदार्थों के लिए छोटे प्लास्टिक पैकेट (दो सौ मिली से कम) और सड़क किनारे लगाए जाने वाले बैनर (सौ माइक्रोन से कम) जैसे प्लास्टिक उत्पाद भी शामिल हैं।
वैज्ञानिकों के अनुसार साधारण प्लास्टिक को सड़ने में लगभग पांच सौ वर्ष लग जाते हैं। सहज उपलब्ध होने के कारण इसका इस्तेमाल बिना सोचे-समझे किया जाता है। दुनिया में इसका महज पांच में से एक हिस्से का पुनर्चक्रण हो पाता है। इस तरह इसका अस्सी प्रतिशत हिस्सा समुद्र में जा रहा है। इसमें माइक्रोप्लास्टिक का हिस्सा सबसे ज्यादा होता है। इससे स्तनधारी जीव असमय मौत का शिकार बनने लगे हैं। एक अनुमान के मुताबिक हर वर्ष करीब एक लाख समुद्री जीव-जंतु मर जाते हैं, जिसमें सील, ह्वेल, समुद्री कछुए, पक्षी सहित अनेक समुद्री जीव-जंतु शामिल हैं।
माइक्रोप्लास्टिक की वजह से कई जीव-जंतु विलुप्त हो गए। उनमें कई नई बीमारियां देखने को मिल रही हैं। समुद्र, नदियों और झीलों का जल प्रदूषित हो गया। इससे ग्रामीण और कस्बाई लोग कई प्रकार की बीमारियों से ग्रस्त हो गए हैं। एक सर्वेक्षण के मुताबिक सत्तर के दशक के बाद प्लास्टिक का उपयोग शहरी, ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों में बढ़ता गया, जो बीमारियों का कारण बन गया है।
‘इस्तेमाल करो और फेंको’ संस्कृति के कारण प्लास्टिक आज देश ही नहीं, पूरे विश्व में अनेक बीमारियों का कारण बन गया है। लंबे समय तक प्लास्टिक अपघटित नहीं हो पाता, जिसके चलते यह हवा, पानी और मिट्टी को प्रदूषित करता है। उपयोग में आने वाले प्लास्टिक को जलाने से कई तरह की जहरीली गैसें पैदा होती हैं, जिनमें नाइट्रिक आक्साइड, कार्बन डाइआक्साइड और कार्बन मोनोआक्साइड प्रमुख हैं। इन गैसों से फेफड़ों और आंख की बीमारियां, कैंसर, मोटापा, मधुमेह, थायराइड, पेट दर्द, सिर दर्द, कब्ज जैसी अनेक समस्याएं पैदा हो सकती हैं। नए शोध के अनुसार प्लास्टिक से बने बर्तन में गर्म पेय और खाद्य पदार्थों के उपयोग से इसमें मौजूद नुकसानदेह रसायन डाइआक्सिन, लेड (सीसा), कैडमियम आदि खाद्य पदार्थों में घुल कर हमारे शरीर में पहुंच जाते हैं, जिससे पेट, सिर, फेफड़े और आंख से संबंधित समस्याएं पैदा हो जाती हैं। महिलाओं में प्लास्टिक के अधिक उपयोग से बांझपन हो सकता है। यह वनस्पतियों, औषधियों और पेड़ों के विकास पर भी असर डालता है। इसका कारण सिंथेटिक पालीमर नामक पदार्थ है, जो पर्यावरण के लिए बेहद हानिकारक माना जाता है। नदियों, झीलों और समुद्र के किनारे उगी वनस्पतियों और पेड़ों पर यह असर अधिक देखा गया है।
नदियों और समुद्र तटों पर अरबों टन प्लास्टिक कचरा मौजूद है। इस कचरे का पुनर्चक्रण करने का काम भी दुनिया की कुछ कंपनियां कर रही हैं। एक कंपनी ने प्लास्टिक की खाली बोतलों से परिधान बना कर प्रदूषण-मुक्ति की दिशा में एक सफल प्रयोग किया है। इस कंपनी ने जो टीशर्ट तैयार की है, उसको बनाने में सात बोतलें उपयोग में ली जाती हैं। केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) के अनुसार 2017-18 में भारत में प्लास्टिक कचरे का छह करोड़ साठ लाख अठहत्तर हजार सात सौ पचासी टन अंबार लग गया था। एकल उपयोगी प्लास्टिक से फैलने वाले प्रदूषण से निपटने के लिए एक टिकाऊ विकल्प तैयार किया जाए। दूसरे, प्लास्टिक का ऐसा रूप तैयार किया जाए, जो प्रदूषण न फैलाए, बल्कि प्रदूषण से मुक्ति दिलाने में भूमिका निभाए। अभी यह विकल्प केवल कल्पना है, लेकिन इस दिशा में कई कंपनियां और देश आगे बढ़ रहे हैं। जूते बनाने वाली एक कंपनी ने 2018 में प्लास्टिक कचरे से पचास लाख जोड़ी जूते तैयार किए। इसमें जो प्लास्टिक उपयोग किया गया, वह पोस्ट-कम्यूमर रिसाइक्ल्डि (PCR) प्लास्टिक था, जो महासागरीय तटों और तटीय क्षेत्रों से इकट्ठा किया गया। वैज्ञानिकों के अनुसार वैश्विक ताप का कारण प्लास्टिक प्रदूषण भी हो सकता है।
केंद्र सरकार ने पर्यावरण दिवस पर घोषणा किया था कि एकल उपयोगी प्लास्टिक को चरणबद्ध तरीके से 2022 तक चलन से बाहर किया जाएगा, लेकिन तमाम प्रतिबंधों की घोषणा के बावजूद यह संभव नहीं हो पाया। राष्ट्रीय और संगठनात्मक स्तर पर 2025 तक प्लास्टिक से होने वाले प्रदूषण को कम करने का लक्ष्य रखा गया है। केंद्र सरकार और राज्य सरकारों ने एकल उपयोगी प्लास्टिक को राज्य स्तरीय नियम बना कर प्रतिबंधित करने का कार्य किया, वहीं कई बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने भी 2025 तक पैकेजिंग में सौ फीसद पुनर्चक्रित उत्पाद का प्रयोग करने की घोषणा की। उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, केरल, पंजाब, दिल्ली, हिमाचल प्रदेश और हरयिाणा सहित देश के अनेक राज्यों में प्लास्टिक कचरे पर प्रतिबंध लगाया जा चुका है, लेकिन व्यावहारिक जिंदगी में एकल उपयोगी प्लास्टिक का चलन ज्यों का त्यों है। अगर एकल उपयोगी प्लास्टिक को चलन से बाहर नहीं किया गया, तो माइक्रोप्लास्टिक बरसात से जो मानव सभ्यता का नुकसान होगा, वह हमारी कल्पना से बाहर हो सकता है।
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24 December 2022
प्रश्न–390 – संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष ने 15 नवम्बर 2022 को विश्व की जनसंख्या के 8 अरब होने के अवसर पर कहा था, “आठ अरब आशाएं, आठ अरब स्वप्न और आठ अरब संभावनायें।”
इस कथन की व्याख्या कीजिये। (200 शब्द)
Question–390 – On 15 November 2022, when the world’s population became 8 billion, the United Nations Population Fund said “8 billion hopes. 8 billion dreams. 8 billion possibilities.”
Explain this statement. (200 words)
नोट : इसका उत्तर आपको हमें नहीं भेजना है, यह आपके स्वयं के अभ्यास के लिए है।
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Date:23-12-22
कठिन लक्ष्यसंपादकीय
संयुक्त राष्ट्र जैव विविधता सम्मेलन के पक्षकारों के 15वें सम्मेलन (कॉप 15) का आयोजन पिछले दिनों कनाडा के मॉन्ट्रियल में किया गया। इस आयोजन में जो सहमति बनी वह कागजों पर तो काफी प्रभावशाली नजर आती है लेकिन उसका क्रियान्वयन काफी कठिन साबित हो सकता है। हालांकि इसकी फाइनैंसिंग के लिए एक व्यापक व्यवस्था बनाने की बात कही गई लेकिन उसके बावजूद यह काम मुश्किल हो सकता है। यह ऐतिहासिक समझौता पेरिस जलवायु संधि के तर्ज पर किया गया और इसमें ऐसे लक्ष्य तय किए गए जो 2030 तक जमीनी, आंतरिक जलीय और तटीय तथा समुद्री पारिस्थितिकी को हुए 30 फीसदी नुकसान की भरपाई कर उसे बहाल करने की बात कहते हैं और साथ ही अहम जैव विविधता को होने वाले भावी नुकसान को रोकने का लक्ष्य तय करते हैं। यह लक्ष्य आसान नहीं है, खासकर यह देखते हुए कि फिलहाल केवल 17 फीसदी जमीनी और 10 फीसदी से भी कम समुद्री क्षेत्रों का बचाव किया जा रहा है। दुनिया के महत्त्वपूर्ण जैव संसाधन पूरी तरह बचाव से रहित हैं।
नए वैश्विक जैव विविधता प्रारूप (जीबीएफ) में यह परिकल्पना की गई है कि 2030 तक सभी सार्वजनिक एवं निजी स्रोतों से न्यूनतम 200 अरब डॉलर की राशि प्रति वर्ष जुटाई जाएगी और इसकी सहायता से पृथ्वी की पारिस्थितिकी को जरूरी सुविधाएं मुहैया कराई जाएंगी। यह भी अति महत्त्वाकांक्षी लक्ष्य नजर आता है क्योंकि विकसित देश 2009 में जलवायु परिवर्तन पर नियंत्रण के लिए उत्सर्जन कम करने के क्रम में सालाना 100 अरब डॉलर का फंड जुटाने पर सहमत हुए थे लेकिन इस मामले में कोई सकारात्मक अनुभव नहीं रहा है। समग्र रूप से देखा जाए तो जीबीएफ में 23 लक्ष्य तय किए गए हैं जिनमें से अनेक मात्रात्मक हैं जिससे उनकी प्रगति को आंकना आसान है। जैव विविधता को नुकसान पहुंचाने वाले उद्योगों की सब्सिडी में सालाना 500 अरब डॉलर तक की कमी करना और कीटनाशकों तथा हानिकारक रसायनों के इस्तेमाल को आधा करना शामिल है। इसके अलावा इसमें वैश्विक स्तर पर होने वाली खाद्य पदार्थों की बरबादी में 50 फीसदी की कमी और जरूरत से अधिक खपत तथा कचरा उत्पादन में अहम कटौती की बात कही गई है। यह इस बात की भी मांग करता है कि बड़े कारोबारी और निजी निवेशक नियमित रूप से अपने उन कदमों का खुलासा करें जो प्रकृति को प्रभावित करते हैं और उसका संरक्षण करते हैं।
इसमें दो राय नहीं है कि इन कदमों की जरूरत है और इससे भी अधिक ये ऐसे कठिन काम हैं जिनके बारे में कहना आसान है लेकिन करना कठिन। उनका असली महत्त्व तभी आंका जा सकता है जब उन्हें पृथ्वी की जैव विविधता की मौजूदा कमजोर दशा के परिदृश्य में देखा जाए। वर्ल्ड वाइड फंड फॉर नेचर द्वारा जारी 2022 की लिविंग प्लैनेट रिपोर्ट में हमारी जैव विविधता की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। इसके मुताबिक करीब 34,000 पौधे और 5,200 पशुओं की प्रजातियां नष्ट होने के कगार पर हैं। इसमें पक्षियों की तमाम किस्में शामिल हैं। बुरी बात यह है कि वन्य जीवों की आबादी 1970 से अब तक 69 फीसदी घटी है। इसके लिए उनके प्राकृतिक आवास नष्ट होना, खतरनाक गतिविधियां, प्रदूषण और जलवायु परिवर्तन आदि प्रमुख वजह हैं।
भारत इस तथ्य से राहत तलाश सकता है कि लक्ष्यों को वैश्विक स्तर पर लागू करने का उसका सुझाव मान लिया गया। विभिन्न देशों को यह स्वतंत्रता दी गई है कि वे इन्हें अपने हालात, प्राथमिकता और क्षमता के अनुसार अपनाएं। यह बात भी ध्यान देने लायक है कि भारत कुछ अन्य विकासशील देशों तथा अपेक्षाकृत अमीर देश जापान के साथ मिलकर मत्स्यपालन तथा कृषि सब्सिडी को बाहर रखने में कामयाब रहा। इससे भी अहम बात यह है कि वनों में रहने वाले लोगों के जेनेटिक संसाधनों के इस्तेमाल से होने वाले मौद्रिक और गैर मौद्रिक लाभ की साझेदारी तथा जेनेटिक संसाधनों से संबद्ध पारंपरिक ज्ञान के संरक्षण को जीबीएफ का हिस्सा बनाया गया है। बहरहाल, नए जैवविविधता समझौते के हानि-लाभ से परे इस दिशा में प्रगति के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति अहम है। वरना पृथ्वी का प्राकृतिक संतुलन बिगड़ेगा और हम गहन संकट में फंस जाएंगे।
Date:23-12-22
फंसा कर्ज और ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहितादेवाशिष बसु, ( लेखक मनीलाइफ डॉट इन के संपादक हैं )
केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पिछले सप्ताह राज्य सभा को बताया कि अधिसूचित वाणिज्यिक बैंकों ने बीते पांच वर्ष में 10 लाख करोड़ रुपये मूल्य का फंसा हुआ कर्ज बट्टे खाते में डाला और इसमें से केवल 13 फीसदी की वसूली हो सकी। वर्ष 2016 में ऋणशोधन अक्षमता एवं दिवालिया संहिता (आईबीसी) के चलन में आने के बाद से सितंबर माह तक आईबीसी के माध्यम से फंसे हुए कर्ज की वसूली 30.8 फीसदी रही। जिन लोगों ने फंसे हुए कर्ज के स्रोत और उनकी वसूली में आईबीसी की भूमिका पर केंद्रित मेरे पिछले आलेख पढ़े होंगे उन्हें इस बात से कोई आश्चर्य नहीं होगा।
फंसे हुए कर्ज और आईबीसी रिकवरी प्रक्रिया के ये दोनों मुद्दे भले ही अलग अलग नजर आते हैं लेकिन ये दोनों आपस में संबंध रखते हैं। ऐसा इसलिए कि इनमें से पहला दूसरे का परिणाम है। इस तस्वीर पर एक बार फिर से नजर डालते हैं। फंसे हुए कर्ज का ज्यादातर हिस्सा सरकारी बैंकों की देन है। कई ऋण ऐसे होते हैं कि उनका फंसे ऋण में परिवर्तित होना तय रहता है। मंजूरी के चरण से ही भ्रष्टाचार अपनी पैठ बना लेता है। एक बार जब मामला आईबीसी के पास पहुंचता है तो वसूली के लिए कोई संपत्ति बचती ही नहीं। मैंने सरकारी बैंकों में सुधार के हवाले से 2014 से ही इस बात को बार-बार दोहराया है। मैंने आईबीसी की वास्तविक क्षमताओं के बारे में भी बात की है। अब आंकड़ों ने भी इस नजरिये की पुष्टि कर दी है।
भ्रष्टाचार और फंसा हुआ कर्ज: चकित करने वाली बात यह है कि फंसे हुए कर्ज के प्रबंधन में लगे, उस पर टिप्पणी करने वाले और इस भारी-भरकम संकट से निपटने में लगे लोगों ने कभी यह स्वीकार नहीं किया कि फंसे कर्ज की इकलौती बड़ी वजह उनके ठीक सामने मौजूद है और वह है ऋण मंजूरी की प्रक्रिया में भ्रष्टाचार। लेकिन बैंक अधिकारियों को जिम्मेदार ठहराने का कभी कोई प्रयास नहीं किया गया। इसके विपरीत भारतीय रिजर्व बैंक, वित्त मंत्रालय और बैंक अधिकारियों सभी ने फंसे हुए कर्ज के लिए दो बाहरी कारकों को वजह बताया : कारोबारों की नाकामी और कमजोर दिवालिया कानून। जबकि हमेशा बैंकर ही इस तथ्य को सुनिश्चित करने के लिए जिम्मेदार रहे हैं कि तथाकथित दिवालिया प्रवर्तक जनता के पैसे से अमीर हुए।
रिजर्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन ने 2016 के मध्य में सरकारी बैंकों के बारे में बात करते हुए फंसे हुए कर्ज के लिए बैंकरों के भेड़ चाल वाले सोच को वजह बताया था। उन्होंने कहा कि 2006 से 2008 के दौरान बैंकर कर्ज देने के लिए अपनी चेक बुक लेकर कारोबारियों के पीछे भाग रहे थे। एक छोटी सी घटना के सहारे, डॉ राजन ने समझाया, ‘इस फंसे हुए कर्ज में से ढेर सारा’ यानी सरकारी बैंकों का लाखों करोड़ रुपये का कर्ज बैंकरों और कारोबारियों के बीच सांठगांठ की देन था। सरकारी बैंकों के कर्मचारी ऐसे सरकारी अधिकारी हैं जिन्हें कर्ज देने के लिए कोई प्रोत्साहन नहीं मिलता। व्यावहारिक रूप से देखा जाए तो वे संदिग्ध प्रस्ताव को ठुकराने के लिए सबसे बेहतर स्थिति में होते हैं।
आखिर वे कौन से प्रलोभन होंगे जिनकी बदौलत ये अधिकारी प्रवर्तकों के पीछे अपनी चेकबुक लिए घूम रहे थे? इस सवाल का जवाब एकदम जाहिर है। उनके पास अपनी तरह के प्रोत्साहन थे। जब 2010 की मंदी के बाद सरकारी बैंक कर्ज नहीं दे रहे थे तब डॉक्टर राजन ने उनका सार्वजनिक रूप से बचाव किया था और कहा था कि बैंकर सतर्कता जांच से बेहद डरे हुए हैं इसलिए निर्णय नहीं ले पा रहे हैं। उस वक्त भी मैंने कहा था कि राजन ने इस तथ्य की अनदेखी कर दी कि ऐसा बहुत कम हुआ है जब किसी बैंकर को रेहन संबंधी गलती के लिए दोषी ठहराया गया हो। जबकि सरकारी बैंकों में यहां आम है। खास तौर पर इसलिए कि सरकारी बैंक हमेशा परिसंपत्तियों पर कर्ज देते हैं ना की नकदी प्रवाह पर।
कमजोर वसूली और दिवालिया कानून: आज भले ही ज्यादातर लोग भूल चुके हैं लेकिन कुछ वर्ष पहले तक खराब वसूली के लिए बैंकरों का एक सीधा साधा बहाना था दिवालिया कानून। भारतीय स्टेट बैंक की पूर्व चेयरमैन अरुंधती भट्टाचार्य ने एक बार कहा था, ‘हमें नियामकीय व्यवस्था में बदलाव और डिफॉल्टरों के लिए कठोर नियमों की आवश्यकता है। साथ ही हमें एक व्यवस्थित दिवालिया कानून की भी जरूरत है ताकि फंसे हुए कर्ज से सही तरीके से निपटा जा सके।’ तथ्य तो यह है कि बीते तीन दशकों में नीति निर्माताओं ने फंसे हुए कर्ज से निपटने के लिए आधा दर्जन उपाय किए। इनमें से प्रत्येक उपाय पिछले की तुलना में कठोर था। साथ ही दिवालिया कानून कब लागू होता है जब कर्ज फंसे हुए कर्ज में तब्दील हो जाता है, ना कि पहले। अगर कर्ज को जानबूझकर इस तरह तैयार किया जाए कि खराब बैंकरों के प्रोत्साहन के चलते उसे फंसे हुए कर्ज में तब्दील होना ही हो तो भला दिवालिया कानून क्या करेंगे?
निश्चित रूप से आईबीसी ने केवल यह दिखाया है कि सरकारी बैंकों में भ्रष्ट बैंकिंग व्यवहार कितना व्यापक और गहरा था। ऋण के बारे में जरा भी जानकारी रखने वाला कोई भी व्यक्ति जानता है कि अगर आपको वास्तव में ऋण चाहिए तो बैंकर इसके लिए तमाम कठिन शर्तें बताएंगे। आपको अनावश्यक बीमा योजनाएं तक खरीदने के लिए विवश किया जाएगा। बिना व्यक्तिगत गारंटी के आपको ऋण नहीं मिल सकता और कुछ मामलों में तो तीसरे पक्ष की गारंटी भी चाहिए। इसके बावजूद आलोक इंडस्ट्रीज, भूषण स्टील, भूषण पावर, मोनेट इस्पात, वीडियोकॉन, एस्सार समूह, शिवा इंडस्ट्रीज और ऐसे ही असंख्य मामलों में बैंकों को लगभग पूरा कर्ज बट्टे खाते में डालना पड़ा। किसी बैंकर से पूछा नहीं गया कि उसने गारंटी के लिए क्या किया? साफ जाहिर होता है कि फंसा हुआ कर्ज गलत वाणिज्यिक निर्णयों का नतीजा नहीं है जैसा कि डॉक्टर राजन और अन्य लोगों ने बैंकों के बचाव में कहा था। उन्हें तैयार है इस तरह किया गया था कि वे नाकाम हों और सरकारी बैंकों का धन लुटे। यही कारण है कि बैंक फंसे कर्ज में से केवल 13 प्रतिशत की वसूली कर पाए जबकि आईबीसी स्तर पर यह केवल 30 फीसदी रहा।
क्या इन परिस्थितियों में बदलाव आएगा? इस सरकार के कार्यकाल में एक अपवाद को छोड़ दिया जाए तो राजनीति से प्रेरित ऋण की घटनाएं लगभग नहीं नजर आतीं। इसलिए संभव है कि सरकारी बैंकों का फंसा हुआ ऋण काफी कम नजर आए। जब तक सरकारी बैंकों का निजीकरण नहीं होगा नए सिरे से फंसे कर्ज का खतरा बरकरार रहेगा, खासकर किसी अन्य राजनीतिक सत्ता के अधीन। दूसरी ओर, जैसा कि संदेह था आईबीसी की प्रक्रिया जल्दी ही जटिलताओं की शिकार हो गई, अंतहीन संशोधन, परिपत्र, तदर्थ बदलाव तथा अतीत से प्रभावी निर्णय इसका उदाहरण हैं। जैसा कि मैं कई बार कह चुका हूं, दिवालिया प्रक्रिया को बाजार को स्वच्छ करने वाली प्रणाली से संचालित करने की आवश्यकता है। लेकिन इसके लिए सोच विचार की पूरी प्रक्रिया को बदलना आवश्यक है जो आसान नहीं है।
Date:23-12-22
क्रिप्टो पर शकसंपादकीय
भारतीय रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास ने फिर चेताया है कि अगला आर्थिक संकट क्रिप्टोकरेंसी की वजह से पैदा होगा। हालांकि, यह आशंका नई नहीं है। शक्तिकांत दास हमेशा से ही क्रिप्टोकरेंसी के मुखर विरोधी रहे हैं। अनेक मौकों पर उन्होंने इशारा किया है कि भारत की वित्तीय स्थिरता के लिए डिजिटल मुद्रा संकट पैदा कर सकती है। यही कारण है कि भारत में केंद्रीय बैंक ने क्रिप्टो क्षेत्र के अनुकूल माहौल नहीं बनाया है। क्रिप्टो के प्रति सख्त रुख की वजह से इसका विस्तार भारत में ज्यादा तेजी के साथ नहीं हो सका है। दुनिया के अनेक देशों में क्रिप्टो पर लोगों का विश्वास नहीं जमा है और उस पर निवेश करने वालों की संख्या भी कम है। इसमें खास बात यह है कि जब केंद्रीय बैंक ने एक आधिकारिक डिजिटल मुद्रा की ओर कदम बढ़ाया है, तब भी शक्तिकांत दास के विचार में बदलाव नहीं आया है। ‘बीएफएसआई इनसाइट समिट 2022’ में बोलते हुए उन्होंने कहा है कि क्रिप्टोकरेंसी का कोई अंतर्निहित मूल्य नहीं है और यह भारत की वित्तीय स्थिरता के लिए भारी जोखिम पैदा करता है।
वाकई, किसी भी वस्तु या मुद्रा का मूल्य तय करने का काम बाजार करता है और एक हाथ से दूसरे हाथ में जाते हुए मूल्य का स्पष्ट होना जरूरी है। यह अभी सवाल है कि क्रिप्टो का मूल्य क्या है और वह कैसे तय होगा? लोग धन खर्च करके क्रिप्टो खरीदते हैं और क्रिप्टो की कीमत पिछले वर्ष में बहुत बढ़ी है, लेकिन क्या यह बढ़त जारी रहेगी? क्या विश्व स्तर पर गैर-मान्यता प्राप्त इस मुद्रा का संभावित मूल्य बना रहेगा? यह मुद्रा डूबी, तो कौन देश या कौन सा केंद्रीय बैंक इसकी जिम्मेदारी लेगा? अगर क्रिप्टो एक उत्पाद है, तो उसे बनाने वाली कंपनी क्या इसे किसी दिन वापस ले सकती है या क्या वह कंपनी बंद हो सकती है? कंपनी बंद हुई, तब क्या होगा? आरबीआई गवर्नर इसे 100 प्रतिशत सट्टा गतिविधि मानते हैं, तो कोई आश्चर्य नहीं। उन्होंने क्रिप्टोकरेंसी के एक दिग्गज खिलाड़ी एफटीएक्स का हवाला दिया है। ध्यान रहे, हाल ही में क्रिप्टोकरेंसी का एक एक्सचेंज एफटीएक्स तबाह हुआ है। एक झटके से निवेशकों के चालीस अरब डॉलर का सफाया हो गया है। एफटीएक्स के 30 वर्षीय मालिक सेमुअल बैंकमैन फ्राइड पर अरबों डॉलर की चोरी का आरोप लगा है। अमेरिका इसे अपने इतिहास की सबसे बड़ी वित्तीय धोखाधड़ी में से एक मान रहा है। सेमुअल को गिरफ्तार कर लिया गया है और बहामास से अमेरिका लाया जाना है। इस प्रकरण का उदाहरण देते हुए शक्तिकांत दास ने कहा है कि एफटीएक्स प्रकरण के बाद मुझे नहीं लगता कि हमें कुछ और कहने की जरूरत है।
यह सवाल अभी भी बरकरार है कि क्रिप्टोकरेंसी से क्या सार्वजनिक फायदा होता है? तो क्या इन मुद्राओं को प्रतिबंधित कर देना चाहिए? इन मुद्राओं से खतरा है, तो रिजर्व बैंक भी क्यों ऐसी ही मुद्रा के विस्तार की ओर बढ़ रहा है? वस्तुस्थिति यह है कि सरकार ने क्रिप्टो को मान्यता तो नहीं दी है, लेकिन इस पर वह 30 प्रतिशत विशेष कर और जीएसटी अलग से वसूलती है। अगर ज्यादा जोखिम है, तो क्रिप्टो को अनियमित ढंग से भी क्यों चलने दिया जाए? इसके अलावा भारत में जिस ई-रुपये की शुरुआत हुई है, उसे वैध व तार्किक ढंग से चलाना होगा। क्रिप्टो से यह डिजिटल मुद्रा अलग और फायदेमंद रहे, किसी निवेशक को नुकसान न हो, पूरे विश्वास के साथ इससे लेन-देन हो, तो हमारा रिजर्व बैंक एक मिसाल पेश कर पाएगा।
Date:23-12-22
पहले तीस फीसदी दुनिया ही बचा लेंदेविंदर शर्मा, ( कृषि विशेषज्ञ )
संयुक्त राष्ट्र जैव विविधता सम्मलेन (कॉप-15) का समापन जिस समझौते के साथ हुआ है, वह मील का पत्थर साबित हो सकता है। इस ‘फ्रेमवर्क’ के तहत कुल 23 लक्ष्य तय किए गए हैं, जो अल्पावधि के लिए हैं। जैसे, साल 2030 तक दुनिया की कम से कम 30 फीसदी जमीन, तटीय इलाकों और समुद्री क्षेत्रों का संरक्षण करना; फिलहाल 17 फीसदी भूमि और आठ प्रतिशत समुद्री क्षेत्रों का संरक्षण हो रहा है, 30 प्रतिशत पारिस्थितिकी तंत्र को पुनर्जीवित करना, जैव विविधता के लिहाज से अहम स्थानों पर नुकसान को शून्य करना आदि। ये तमाम उद्देश्य सुरक्षित भविष्य की मशाल हैं।
इसकी हमें सख्त जरूरत थी। दुनिया अभी जिस दौर से गुजर रही है, उसे ‘छठा सामूहिक विनाश’ कहा जा रहा है। इसका मतलब है कि आने वाले दिनों में जीव-जंतुओं की 10 लाख प्रजातियां लुप्त होने वाली हैं। इससे पहले सामूहिक विनाश तब हुआ था, जब धरती से डायनासोर का अंत हुआ था। जाहिर है, जब हमारे आसपास जैव विविधता की इतनी बड़ी दुनिया खत्म होगी, तो मानव अस्तित्व पर स्वाभाविक खतरा पैदा होगा। कॉप-15 के फ्रेमवर्क में लक्ष्य ही नहीं तय किए गए हैं, बल्कि पहली बार उनकी निगरानी की व्यवस्था भी की गई है। साथ ही, जैव विविधता से संबंधित फंडिंग के लिए सार्वजनिक व निजी स्रोतों से हर साल 200 अरब डॉलर जुटाने और विकासशील देशों को सालाना 30 अरब डॉलर देने की बात भी कही गई है। मिट्टी और समंदर ही नहीं, इको-सिस्टम को बचाने की अनिवार्यता भी इसमें हैं। चूंकि यह समझौता लक्ष्य-केंद्रित है, इसलिए इसकी तुलना 2015 के पेरिस समझौते से भी हो रही है, जिसमें पूर्व-औद्योगिक युग से दुनिया का तापमान 1.5 डिग्री सेल्सियस तक लाने का लक्ष्य तय किया गया है। जिस तरह से जलवायु परिवर्तन से बचाव को लेकर पहली बार एक ठोस लक्ष्य पेरिस में तय किया गया था, उसी तरह की संजीदगी इस बार कनाडा में कॉप-15 की बैठक में जैव विविधता को लेकर दिखी है।
अच्छी बात यह भी है कि जैव विविधता सम्मेलन में हर साल दुनिया भर की सरकारों द्वारा दी जा रही 1.8 ट्रिलियन (18 खरब) डॉलर की सब्सिडी को सालाना 500 अरब डॉलर की दर से कम करने पर भी सहमति बनी है। इसका खाद्य और कृषि पर सीधा असर होगा। यह पर्यावरण-अनुकूल खेती की राह प्रशस्त कर सकती है। यानी ऐसी खेती संभव हो सकेगी, जिससे मिट्टी की पोषकता तो अक्षुण्ण रहेगी ही, इंसानी सेहत भी बनी रहेगी। इसके लिए समझौते में 2030 तक कीटनाशकों के इस्तेमाल को 50 फीसदी घटाने की अनिवार्यता रखी गई है। इस पर कुछ देश सहमत नहीं हैं। सवाल यह है कि कुछ सरकारें आखिर क्यों कीटनाशकों या खाद कंपनियों की लॉबी की गिरफ्त में दिखती हैं? अगर वे इनको दरकिनार नहीं करेंगी, तो सुरक्षित खाद्य तंत्र की ओर हम उतनी तेजी से नहीं बढ़ सकेंगे, जितनी अपेक्षा की जा रही है।
अपने यहां भी हमने देखा है कि जब-जब कीटनाशकों पर सवाल उठा है, सरकारें उसके बचाव में उतर आती हैं। केरल में ही काजू के बागानों में एंडोसल्फान कीटनाशक का धड़ल्ले से इस्तेमाल होता था, और जब ग्रामीणों ने बीमारियों की वजह से इसका विरोध किया, तो केंद्र सरकार इसका बचाव करने लगी थी। यहां तक कि स्टॉकहोम कन्वेंशन में जब इस पर प्रतिबंध लगाया गया, तब भी हमारी सरकार नहीं चाहती थी कि इसका उपयोग बंद हो। हालांकि, बाद में इसका इस्तेमाल बंद किया गया। अब अच्छी बात यह है कि हमारे प्रधानमंत्री प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने की वकालत करते हैं, लिहाजा उम्मीद कर सकते हैं कि सब्सिडी न देकर जो रकम बचाई जाएगी (क्योंकि कृषि में मिलने वाली सब्सिडी का बड़ा हिस्सा कीटनाशक कंपनियों के पास जाता है), उसका इस्तेमाल टिकाऊ खेती के लिए होगा।
जैव विविधता के लिहाज से भारत का दुनिया में तीसरा सबसे बड़ा स्थान है। यहां काफी ज्यादा वैविध्य है। मगर सच यह भी है कि बीते कुछ वर्षों में विकास के नाम पर पर्यावरण की बलि ली गई है। छत्तीसगढ़ में ही कोयला खनन के नाम पर हजारों पेड़ काटने की बात चल रही है। अंडमान में विकास के नाम पर आठ लाख पेड़ काटे जाएंगे, जिसकी पूर्ति गुरुग्राम (हरियाणा) में वृक्षारोपण करके की जाएगी। क्या यह सही नीति है? हमें अपनी पारिस्थितिकी की कीमत पर ऐसे कथित विकास-कार्यों से बचना चाहिए। हमें यह तय करना ही होगा कि ऐसे कार्यों से हम पर्यावरण को जितना नुकसान पहुंचा रहे हैं, उसकी कीमत क्या है? कहीं यह तो नहीं कि खनन से जितना फायदा हमें मिलेगा, उससे कहीं कीमती पारिस्थितिकी को हम नष्ट कर रहे हैं? इसीलिए इको-सिस्टम के मूल्य-निर्धारण की व्यवस्था होनी चाहिए। हरित क्रांति के बाद ही, जिस तरह से एकल कृषि को बढ़ावा मिला है, उसने हमारी जैव विविधता को काफी चोट पहुंचाई है। आज कपास की होने वाली 95 फीसदी खेती बीटी कॉटन की हो रही है, जिस कारण कपास की अन्य प्रजातियां किसानों के लिए अनुपलब्ध हो गई हैं। जीएम फसल से आगे भी एकल कृषि को ही बढ़ावा मिलेगा। साफ है, हमें समग्रता में अपनी नीतियां बनानी होंगी। विकास नीतियों में प्रकृति व पर्यावरण को सबसे ऊपर रखना होगा।
यहीं पर कॉप-15 बैठक में लक्ष्यों की निगरानी की बात महत्वपूर्ण बन जाती है। इसमें वैश्विक व्यवस्था के तहत न सिर्फ वादा करना होगा, बल्कि उसे पूरा करने की दिशा में काम भी करना होगा। इसमें स्थानीय प्रशासन भी जवाबदेह बन गए हैं, यानी ‘ग्लोबल’ से ‘लोकल’ तक एक कड़ी बन गई है। यह धारणा अब बदलनी होगी कि हमें पेड़ नहीं, विकास चाहिए। विकास का मतलब प्रकृति को खत्म करना नहीं, बल्कि पारिस्थितिकी से संतुलन बनाते हुए तरक्की करना होना चाहिए। पर्यावरण पर गौर किए बिना किसी देश की अर्थव्यवस्था आगे नहीं बढ़ सकती। हमें जब यह पता है कि दुनिया भर में ग्रीनहाउस गैसों का 34 फीसदी हिस्सा कृषि से उत्सर्जित हो रहा है, तो हमें सुरक्षित खेती की तरफ बढ़ना ही होगा। जैव विविधता बचेगी, तभी जलवायु परिवर्तन की चुनौतियों का भी हम समाधान कर सकेंगे।
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महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम, संक्षेप में जिसे ‘मनरेगा’ कहा जाता है, 15 वर्षों से चल रहा है। इसमें पंजीकृत 15.51 करोड़ श्रमिको के साथ यह सामाजिक सुरक्षा गारंटी की एक प्रभावी योजना रही है। यदि वर्तमान परिप्रेक्ष्य में इसका आकलन करें, तो यह गरीबी उन्मूलन में विफल रही है, और अपेक्षाकृत समृद्ध राज्यों में संपत्ति इकट्ठा करने का एक माध्यम बन गई है। ग्रामीण विकास मंत्रालय ने इस कार्यक्रम की समीक्षा करते हुए इसकी क्षमता बढ़ाने पर बल दिया है। इससे संबद्ध समिति की कार्ययोजना से जुड़े बिंदु –
– मनरेगा नौकरियों, व्यय के रूझान आदि का राज्यवार अंतर को समझना।
– इस योजना से जुड़े प्रशासनिक मामलों पर ध्यान देना।
– समीक्षा में योजना कार्यक्रम के इच्छित लक्ष्य को अधिक स्पष्ट करना।
यूं तो इसे ‘गरीबी उन्मूलन’ कार्यक्रम के रूप में अस्थायी रूप से डिजाइन किया गया है, जिससे कोई भी परिवार गरीबी की बेहाली में न जा पाए। इसका उद्देश्य निर्धन परिवारों को स्थायी रूप से गरीबी से मुक्त करना नहीं है।
महामारी के दौरान मनरेगा अपने लक्ष्य में कुछ हद तक सफल रहा है। जिन्हें काम मिल सका, उनके आर्थिक नुकसान की कुछ भरपाई हो सकी। परंतु लगभग 39% ऐसे भी रहे, जिन्हें काम मिल ही नहीं सका।
समीक्षा समिति को चाहिए कि योजना में आई हुई दरारों को भरकर इस योजना की दक्षता को बढ़ाएं। इससे पहले इसके विस्तार का प्रयत्न न करें। साथ ही इसमें ‘कार्य’ की परिभाषा को स्पष्ट करें। इस योजना के माध्यम से जिन राज्यों में संपत्ति बढ़ाई जा सकी है, वहाँ इसे रोजगार का स्थायी साधन बना दिया जाना चाहिए। इस प्रकार से मनरेगा को अगर और अधिक प्रभावी बनाया जा सके, तो यह प्रशंसनीय होगा।
‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 30 नवंबर, 2022
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Date:22-12-22
Benchmarks for ECs’ appointmentsMonopolisation of the positions of ECs and Chief Election Commissioner (CEC) by the administrative services is too obvious these daysJagdeep S. Chhokar is the Co-founder of election Watchdog Association for DEmocratic Reforms (ADR),which is a petitioner in the case in the supreme court
The way India’s constitutional and political structures have evolved over the years seems to have made elections almost a mechanistic and ritualistic exercise. The reason behind this is the setting up and functioning of the Election Commission of India (ECI). This has come into public discourse because of the hearings in the Supreme Court on the appointment of Election Commissioners (ECs).
While many issues related with the ECI have been discussed in court hearings and outside, a deeper look at the ECI may be useful, given its role in the preservation of democracy in the country.
Working of the Constitution
Article 324 of the Constitution is the fountainhead that creates the ECI. This brings to mind the larger issue of the working of the Constitution. For this, it is worth recalling what two stalwarts of Constitution-making (the President of the Constituent Assembly (CA) and the Chairman of the Drafting Committee for the Constitution) said in their final speeches in the CA when the Constitution was finally adopted.
While commending the adoption of the Constitution to the CA on November 25, 1949, Dr. B.R. Ambedkar said, “However good a Constitution may be, it is sure to turn out bad because those who are called to work it, happen to be a bad lot. However bad a Constitution may be, it may turn out to be good if those who are called to work it, happen to be a good lot. The working of a Constitution does not depend wholly upon the nature of the Constitution.”
The next day, on November 26, 1949, almost echoing Dr. Ambedkar’s words, Dr. Rajendra Prasad said, “Whatever the Constitution may or may not provide, the welfare of the country will depend upon the way in which the country is administered. That will depend upon the men who administer it… If the people who are elected are capable and men of character and integrity, they would be able to make the best even of a defective Constitution. If they are lacking in these, the Constitution cannot help the country. After all, a Constitution, like a machine, is a lifeless thing. It acquires life because of the men who control it and operate it, and India needs today nothing more than a set of honest men who will have the interest of the country before them.”
If we take the above-mentioned views of the two luminaries as a guide for choosing who should be assigned the task of ensuring that the roots of democracy are kept appropriately watered and nourished, the answer is Election Commissioners (ECs).
All the arguments and proposals mentioned during the court hearings will, obviously, be an improvement over the existing system of appointment of ECs but if we want ECs to match the qualities stated by Dr. Ambedkar and Dr. Prasad, then we need to go beyond how Article 324 of the Constitution and the Election Commission (Conditions of Service of Election Commissioners and Transaction of Business) Act, 1991, have been operationalised so far.
Elevation of EC to CEC
One major weakness in the system(s) of appointments of the ECs proposed so far is that they all perpetuate the bureaucratisation of the ECI, which is not even hinted at in the Constitution anywhere. Two visible manifestations of this are the so-called elevation of ECs to Chief Election Commissioner (CEC), and the tenures of ECs and CEC. The elevation is a clear violation of the principle of primus inter pares. Monopolisation of the positions of ECs and CEC by the administrative services is too obvious to need highlighting.
So, how do we find persons who will come close to the expectation of Dr. Ambedkar and Dr. Prasad? For this, we need to go outside the existing frameworks. Marginal improvements are not going to be enough. Bold actions are called for.
For this, the following process is proposed. An existing committee of Parliament or a new committee formed for this purpose should propose the qualifications and requirements for persons to be appointed as ECs/CEC. The proposals of the committee should be put to Parliament and should be considered approved only if they are approved by two-thirds majority of the members of Parliament present and voting. Once the qualifications and requirements have been approved by Parliament, the same committee should be entrusted with the task of searching for and selecting individuals proposed to be appointed as ECs/CEC.
The committee should invite nominations and applications of individuals appropriate for or interested in being appointed as ECs/CEC.
The committee should send its recommendations to Parliament for consideration. Recommendations of the committee should be considered approved by Parliament only if approved by two-thirds majority of the members of Parliament present and voting. Once Parliament approves the recommendations, they should be sent to the President for approving the appointments. Once appointed, such persons should stay in their positions for six years or the age of 75 years, whichever is earlier. Persons above the age of 69 years should not be appointed.
Obviously, the above will be seen to be a very cumbersome process, particularly given that Parliament is more or less dysfunctional today. Nonetheless, if the democracy in its real sense is to be preserved in the country, the importance of the ECI has to be recognised and accepted.
Date:22-12-22
कामकाजी आबादी बढ़ने का हमें लाभ नहीं मिलेगानीरज कौशल, ( कोलंबिया यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर )
भारत के डेमोग्राफिक डिविडेंड (जनसांख्यिकीय लाभ) के बारे में बहुत बातें की जाती हैं, लेकिन क्या वह वास्तविक है? एक तुलनात्मक परीक्षण करते हैं। बीते दशक में भारत की आबादी 16 करोड़ बढ़ी है। इसकी तुलना में चीन की आबादी इससे आधी ही यानी 8 करोड़ बढ़ी है। कई विश्लेषकों का मत है कि जनसंख्या-वृद्धि से भारत को लाभ हुआ है, क्योंकि बीते दशक में जन्मे लाखों लोग जल्द ही कार्यक्षम आबादी का हिस्सा बन जाएंगे और फिर रिटायर होने तक अपने आर्थिक योगदानों से देश की इकोनॉमी को लाभ पहुंचाते रहेंगे। इन मायनों में देखें तो भारत को चीन की तुलना में दोगुना जनसांख्यिकीय लाभ मिलना चाहिए, ठीक?
हम्म्म… नहीं तो। कारण, चीन की तुलना में भारत का प्रति व्यक्ति लाभांश बहुत कम है। इसकी दो वजहें हैं : एक, चीनियों की तुलना में एक औसत भारतीय कम काम करता है। चीन के 68 प्रतिशत की तुलना में भारत का श्रमशक्ति योगदान 45 प्रतिशत ही है। इसका यह मतलब है कि बीते एक दशक में जन्मे 16 करोड़ भारतीयों में से 7.2 करोड़ ही कार्यशक्ति का हिस्सा बनेंगे, वहीं चीन में पिछले एक दशक में जन्मे 8 करोड़ लोगों में से 5.4 करोड़ कामगारों का हिस्सा बनेंगे। यानी जहां भारत में चीन की तुलना में 8 करोड़ अधिक लोग जन्मे हैं, वहीं उसकी कार्यशक्ति में चीन की तुलना में केवल 1.8 करोड़ ही अधिक लोगों का इजाफा होगा।
दूसरा कारण है, कामगारों की कार्यकुशलता। इसका पैमाना है शिक्षा। इस क्षेत्र में चीन हमसे कहीं बेहतर स्थिति में है। 15 प्रतिशत चीनियों के पास कॉलेज डिग्री है, जबकि भारत में यह 11 प्रतिशत के ही पास है। यकीनन, ये तमाम आंकड़े भर ही हैं। लेकिन पॉइंट यह है कि अगर हमने अपनी कार्यशक्ति सहभागिता दर नहीं बढ़ाई और कामगारों की स्किल्स को नहीं सुधारा तो चाहे जितना डेमोग्राफिक डिविडेंड हो, उससे हमें ज्यादा लाभ नहीं मिलने वाला है। अर्थशास्त्री प्रणब सेन के शब्दों में भारत के कार्यशक्ति सहभागिता के आंकड़े हताश कर देने वाले हैं। वे न केवल कम हैं, बल्कि और गिर रहे हैं।
इसका एक बड़ा कारण है भारतीय महिलाओं की श्रमशक्ति में कम सहभागिता। आलोचकों का मत है कि भारत जैसे समाज में, जहां महिलाएं घर के कामकाज में केंद्रीय भूमिका निभाती हैं और घर की देखभाल में उनका योगदान सबसे अहम होता है, वहां इस नॉन-मार्केट काम को भी एक रोजगार की श्रेणी में रखा जाना चाहिए और इसकी वैल्यू को देश की जीडीपी में जोड़ना चाहिए। इस तर्क को काटना कठिन होगा। मिसाल के तौर पर, अगर कोई स्त्री वही काम किसी और के घर में करती तो उसे इसका वेतन दिया जाता और यह राष्ट्रीय जीडीपी में जोड़ा जाता। यह तर्क केवल रोजमर्रा के कामकाज तक ही सीमित नहीं है। अगर आप खुद ही अपने टैक्स रिटर्न पर काम कर रहे हैं तो यह जीडीपी में नहीं जुड़ेगा, लेकिन अगर कोई अकाउंटेंट आपके लिए यह काम करता है तो यह जीडीपी में गिना जाएगा। लेकिन अधिकतर मामलों में इस तरह की गतिविधियों का मूल्यांकन करना दूभर होता है। क्योंकि अगर आप या आपकी मेड बहुत अच्छा खाना नहीं बना पाते या साफ-सफाई अच्छे-से नहीं करते तो दोनों के कामों को समान मानना एक अच्छा विश्लेषण नहीं कहलाएगा।
बात केवल मूल्यांकन की ही नहीं, पसंद और प्रेरणा की भी है। जिन समाजों में पेड-वर्क में महिलाओं की सहभागिता एक आम चलन है, वहां उनके पास अपनी क्षमताओं के अनुरूप काम चुनने की आजादी भी होती है। साथ ही, वे जो काम करना चाहती हैं, उसके लिए स्किल्स का विकास भी कर सकती हैं। घर के कामकाज कोई प्रोफेशन नहीं है, इसलिए उसमें प्रोफेशनल ग्रोथ नहीं होती। साथ ही किसी बुजुर्ग सदस्य या दिव्यांग बच्चे की देखभाल करने जैसे चुनौतीपूर्ण कार्यों की भी वहां परख नहीं होती है, जबकि अगर यही काम किसी कार्यस्थल पर किया जाए तो न केवल इसमें पेशेवर विकास होगा, बल्कि वेतन भी ऊंचा मिलेगा। घर के काम में कोई पेंशन नहीं मिलती, सामाजिक सुरक्षा नहीं होती, न ही जॉब मोबिलिटी होती है। घर के कामकाज में दक्षता हासिल करने से भी आय नहीं बढ़ती है। तो हम फिर से अपने मूलभूत प्रश्न पर लौटें कि क्या भारत का डेमाग्राफिक डिविडेंड वास्तविक है? है तो, लेकिन कृपया उसे अधिक न आंकें। अगर हमने अपनी कार्यशक्ति सहभागिता दर नहीं बढ़ाई और कामगारों की स्किल्स को नहीं सुधारा तो चाहे जितना डेमोग्राफिक डिविडेंड हो, उससे हमें ज्यादा फायदा नहीं मिलने वाला है।
Date:22-12-22
खुदकुशी की कड़ियांसंपादकीय
जब किसी वजह से हर तरफ कोई व्यापक त्रासदी हावी दिखने लगती है तब उसकी सबसे ज्यादा मार समाज के कमजोर तबकों पर पड़ती है। करीब तीन साल पहले जब कोरोना ने दस्तक दी थी, तब शुरुआती दौर में यह लगा था कि संकट जल्द ही टल जाएगा। लेकिन महामारी से बचाव के उपायों के तहत लगाई गई पूर्णबंदी जितने वक्त तक लंबी खिंच गई और बाद में भी हालात पूरी तरह सामान्य नहीं हुए, उसका कितना असर देश और समाज पर हुआ, वह छिपा नहीं है। इस बीच ऐसी खबरें सुर्खियों में नहीं आ सकीं, जिसमें हाशिए के लोगों को कई तरह की त्रासदी से जूझना पड़ा और उसका असर आज भी उनके परिवारों पर कायम है। मसलन, सिर्फ पिछले साल यानी 2021 में देश में रोजाना औसतन एक सौ पंद्रह दिहाड़ी मजदूरों और तिरसठ गृहिणियों ने आत्महत्या की। मंगलवार को सरकार ने लोकसभा में बताया कि राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के मुताबिक, पिछले साल देश भर में कुल एक लाख चौंसठ हजार तैंतीस लोगों ने खुदकुशी की। साथ ही तेईस हजार एक सौ उनासी गृहणियों और पंद्रह हजार आठ सौ सत्तर पेशवर लोगों के अलावा कई अन्य वर्गों के सैकड़ों लोगों ने अलग-अलग कारणों से अपनी जान दे दी।
जाहिर है, महामारी की मार ने केवल सेहत के मोर्चे पर लोगों के सामने जानलेवा हालात नहीं पैदा किए, बल्कि उससे बचाव के लिए जो तरीके अपनाए गए, उसके असर ने करोड़ों लोगों की जिंदगी को मुश्किल में डाल दिया। पूर्णबंदी की वजह से जब हर तरफ सब कुछ ठप पड़ गया था, तब महज जिंदा रह पाने के लिए रोजाना की मजदूरी पर निर्भर लोगों की लाचारी ने उन्हें अमानवीय परिस्थितियों में झोंकने के साथ-साथ ऐसे हालात भी पैदा किए, जिसमें बहुत सारे लोगों को पेट भरने तक के लिए खर्च और अनाज जुटाना भारी पड़ने लगा। सब कुछ बंद होने की वजह से हर तरफ काम-धंधे खत्म थे और दिहाड़ी करके गुजारा करने वालों को कोई रोजगार नहीं मिल रहा था। यानी जो लोग कोरोना विषाणु से संक्रमित होकर भी या फिर उसकी जद में आने से बच गए, उनके सामने जीवन चलाने और बचाने तक की चुनौती मुंह बाए खड़ी थी, क्योंकि रोजगार का कोई जरिया आसान नहीं रह गया था। यहां तक कि कर्ज या उधार लेकर काम चलाने के हालात भी मुश्किल हो गए। ऐसी त्रासदी में कमजोर पड़ कर बहुत सारे लोग टूट गए और कोई विकल्प न पाकर कइयों ने खुदकुशी का रास्ता अख्तियार कर लिया।
यह स्थिति केवल मजदूर तबकों तक सीमित नहीं थी, बल्कि हर तरफ छाई नकारात्मक घटनाओं के असर ने व्यवसाय जगत से लेकर अन्य क्षेत्रों को भी बुरी तरह प्रभावित किया। इसमें संदेह नहीं कि विकट परिस्थितियों में सरकार ने मुफ्त अनाज से लेकर कई स्तर पर सहायता मुहैया कराने का दावा किया। लेकिन जरूरत के मुकाबले मदद की सीमा एक व्यापक त्रासदी में फंसे बहुत सारे लोगों की जान बचा पाने में कारगर साबित नहीं हुई। अभाव और उससे जुड़ी कड़ियों ने आम लोगों के सामने जिस तरह के मानसिक संघर्ष के हालात पैदा किए, उसके दबाव और उसकी पीड़ा को झेल पाना सबके लिए संभव नहीं हुआ। जाहिर है, अब सरकार अगर लोगों की जिंदगी बचाने के नाम पर कोई बड़ा कदम उठाती है तो उसे ध्यान रखना चाहिए कि कहीं उनसे जुड़ी कड़ियों से ही लोगों के सामने जान देने की लाचारगी न पैदा हो। उन वजहों और नीतियों पर भी गौर करने की जरूरत है जिसके असर से पिछले सात सालों में दिहाड़ी मजदूरों की खुदकुशी की संख्या में करीब तीन गुना की बढ़ोतरी हो गई है।
Date:22-12-22
रूखे-सूखे से पोषणसंपादकीय
संसद में मंगलवार को कृषि मंत्रालय ने ‘विशेष मिलेट्स लंच’ का आयोजन किया। इसमें उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़, प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी, लोक सभा अध्यक्ष ओम बिरला समेत सभी दलों के सांसदों ने मोटे अनाज से तैयार लजीज व्यंजनों का स्वाद लिया। बाजरा से बनी खिचड़ी, रागी डोसा, रागी रोटी, ज्वार की रोटी, हल्दी की सब्जी, बाजरा खीर, बाजरा केक और चूरमा आदि व्यंजनों में शामिल थे। संयुक्त राष्ट्र संघ ने 2023 को अंतरराष्ट्रीय बाजरा (मिलेट्स) वर्ष घोषित किया है। इसी के स्वागत में संसद में कृषि मंत्रालय ने विशेष मिलेट्स लंच की मेजबानी की। गौरतलब है कि भारत ने स्वस्थ विश्व की परिकल्पना के तहत संयुक्त राष्ट्र से मोटा अनाज वर्ष घोषित करने की अपील की थी। भारत का यह प्रस्ताव स्वीकार कर लिया गया। दुनिया में पोषक अनाज का चलन बढ़ा तो पक्की बात है कि न सिर्फ लोगों के स्वास्थ्य पर अनुकूल असर पड़ेगा, बल्कि इसका लाभ भारत के उन लाखों किसानों को मिलेगा जो कम सिंचित क्षेत्रों में खेती करते हैं। बारिश ज्यादा न होने के कारण जलाभाव वाले क्षेत्रों में किसान मोटे अनाज की पैदावार ही ले पाते हैं। लोगों के खानपान में मोटे अनाज का शुमार नहीं होने कारण इन खाद्यान्नों की मांग ज्यादा नहीं रहती । ज्यादातर अनाज का इस्तेमाल पशु आहार में किया जाता है, और किसान को उसकी उपज का लाभकारी दाम मिलना तक मुश्किल हो जाता है। अच्छी बात है कि अब मोटे अनाजों को खानपान में शामिल करने के लिए इतने बड़े स्तर पर प्रयास हो रहे हैं। जरूरी है कि इस बाबत जनांदोलन चलाया जाए जिसका जिक्र प्रधानमंत्री मोदी ने भी किया है। उन्होंने कहा है कि जी -20 की विभिन्न बैठकों में आने वाले अतिथियों भोज में कम से कम एक व्यंजन मोटे अनाज का होना चाहिए। आंगनवाड़ी, स्कूलों के साथ अन्य सरकारी बैठकों के मैन्यू में मोटे अनाज से तैयार व्यंजन शामिल करने की बात भी कही है। भारत में मोटे अनाज को प्रचलन में लाने के लिए प्रयास कोई हाल-फिलहाल में शुरू नहीं हुए हैं। भारत सरकार ने अप्रैल, 2018 में बाजरा को पोषक अनाज के रूप में अधिसूचित किया था। इसके तहत पोषण मिशन अभियान में बाजरा को भी शामिल कर लिया गया। मोटे अनाज में बाजरा प्रमुख फसल है। बहरहाल, मोटे अनाज को जिस तरह प्रचलन में लाने की कोशिश की जा रही है, उसके दूरगामी लाभ मिलना निश्चित है।
Date:22-12-22
जैव विविधता पर मंडराता खतराअनिरुद्ध गौड़
“जलवायु परिवर्तन और मानवीय गतिविधियों के कारण पूरे विश्व में विविधता खतरे में है। कनाडा के मॉन्ट्रियल शहर में 7 से 19 दिसम्बर तक आयोजित हुई कॉप 15 बायोडायवर्सिटी कॉन्फ्रेंस में संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटीनियो गुटेरेश सहित तमाम प्रतिनिधि देशों ने असंतुलित वैश्विक जैव विविधता पर चिंता व्यक्त की। करीब 196 देशों के प्रतिनिधियों को संयुक्त राष्ट्र ने कॉन्फ्रेंस ऑफ दी पार्टीज टू दी कन्वेंशन ऑन बायोलॉजिकल डायवर्सिटी टू (कॉप) घोषित किया है। 1994 से 1996 तक कॉप की सालाना बैठक होती रहीं। 2000 में आयोजन के नियम में संशोधन हुआ और यह बैठक प्रत्येक दो वर्ष में होने लगी।
कॉप-15 चीन के कुनिमंग और कनाडा के मॉन्ट्रियल में दो फेज में संपन्न हुई। इसमें 188 देशों के प्रतिनिधियों, अमेरिका सहित द वेटिकन ने जापान के आईची शहर में हुई कॉप की 11वीं बैठक (आईची-11) के लक्ष्यों की समीक्षा करते हुए कॉप-15 में वैश्विक जैव विविधता के संरक्षण के 23 लक्ष्य और 4 उद्देश्य को निर्धारित किया है। ऐतिहासिक समझौते पर सहमति बनना पृथ्वी की प्रकृति के लिए मील का पत्थर साबित होगा बशर्ते सभी देश कॉप-15 में निर्धारित लक्ष्यों और उद्देश्यों के करीब पहुंचते हैं। वैश्विक जैव विविधता के मुद्दे पर पीछे मुड़कर देखें तो संयुक्त राष्ट्र के वैश्विक मंच पर 1992 में रियो डी जेनेरियो में संपन्न अर्थ सम्मिट में वैश्विक जैव विविधता संरक्षण पर पहली बार चिंता जताई गई। फिर दिसम्बर, 1993 में कन्वेंशन ऑन बायोलॉजिकल डायवर्सिटी (सीबीडी) की अंतरराष्ट्रीय संधि पर विश्व के प्रतिनिधि देशों ने हस्ताक्षर कर इसे लागू किया । विश्व स्तर पर जारी आकलन रिपोर्ट में पशु और पौधों की लाखों प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर हैं, जिसके पीछे इंसानी महत्त्वाकांक्षा है। हालांकि कॉप-15 में 2030 तक प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और सुरक्षा से जुड़े उपायों में 30 प्रतिशत भूमि, तटीय इलाकों और अंतर्देशीय जलक्षेत्र के संरक्षण लक्षित हैं।
महत्त्वपूर्ण है कि वैश्विक जैव विविधता पर मंडराते खतरे से निपटने के लिए 2010 में आईची-11 में लगभग 200 देशों ने 2020 तक अपने स्तरीय क्षेत्र में कम से कम 17 प्रतिशत जमीनी और 10 प्रतिशत समुद्री हिस्से को संरक्षित करने का संकल्प लिया था। लेकिन 2020 तक इस लक्ष्य तक विश्व के काफी देश नहीं पहुंच सके हैं। 15 इसलिए कॉप-15 में कुनिमंग- मॉन्ट्रियाल ग्लोबल बायोडायवर्सिटी फ्रेमवर्क (जीबीएफ) 2030 के लक्ष्य अर्थात 30 फीसदी भूमि, समुद्र, तटीय इलाकों और अंतर्देशीय जलक्षेत्रको संरक्षण करना कॉप देशों के लिए बड़ी चुनौती है। आइची – 11 लक्ष्यों की समीक्षा करने पर पाया गया है कि भारत सहित दुनिया के काफी देश इस लक्ष्य तक पहुंचने में काफी दूर रहे हैं। भारत में 6 प्रतिशत संरक्षित क्षेत्र ही घोषित है और 2010 से पिछले दस वर्षों में भारत मात्र 0.1 प्रतिशत संरक्षित क्षेत्र ही बढ़ा पाया है। एशिया के अधिकतर देशों की कमोबेश ऐसी ही स्थिति है। भारत के आंकड़ों पर गौर करें तो देश के 1,73,306.83 वर्ग किमी. संरक्षित क्षेत्र में 990 संरक्षित क्षेत्रों का नेटवर्क है। इसमें 106 राष्ट्रीय उद्यान, 565 वन्य जीव अभ्यारण, 100 संरक्षण रिजर्व और 219 सामुदायिक रिजर्व शामिल हैं। हालांकि पिछले 10 वर्षों में 40 प्रतिशत एशियाई देश ने संरक्षित क्षेत्रों में 17 फीसदी हिस्से के लक्ष्य को हासिल किया है। इनमें भूटान, नेपाल, जापान, कतर, दक्षिण कोरिया जैसे देशों ने संरक्षित क्षेत्र बढ़ाने में महती कामयाबी पाई है।
जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र की सेवाओं का आकलन करने वाली अंतर सरकारी विज्ञान नीति मंच (आईपीबीईएस) की गत 6 मई, 2019 को जारी रिपोर्ट के मुताबिक जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र की विभिन्न सेवाएं खतरे में हैं। वैश्विक आकलन के मुताबिक 10 लाख पशुओं और वनस्पतियों की प्रजातियां विलुप्ति के कगार पर हैं। इनमें से हजारों एक दशक के भीतर ही विलुप्त हो जाएंगी। आईपीबीईएस अध्यक्ष रॉबर्ट वॉटसन की चिंता है कि तेजी से नष्ट हो रहे पारिस्थितिकी तंत्र पर सभी पूरी तरह से निर्भर है। हम पशु, खाद्य सुरक्षा और हमारी अर्थव्यवस्था की बुनियाद को नष्ट करते जा रहे हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में केवल 15 प्रतिशत पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली से ही विलुप्ति का यह खतरा 60 प्रतिशत तक कम हो सकता है | गौरव की बात है कि संयुक्त राष्ट्र ने भारत की पवित्र गंगा नदी को फिर से जीवंत करने की पहल पर काम करने के लिए नमामि गंगे की सराहना करते हुए उसे प्राकृतिक जगत को पुनर्जीवित करने पर केंद्रित 10 अग्रणी प्रयासों में स्थान दिया है।
आईपीबीईएस की रिपोर्ट ने दुनिया को चिंतित तो कर दिया है लेकिन वैश्विक दृढ़ प्रतिज्ञा हमें इस संकट से उबार सकती है। ग्रह और मानवता को बचाने के लिए तत्काल एक साथ आना होगा। विकसित देशों के विकासशील और गरीब देशों को आर्थिक और तकनीकी सहयोग देकर वैश्विक बायोडायवर्सिटी असंतुलन के संकट से उबरने में आगे आकर बड़े सहयोग की आवश्यकता है। तभी 2030 तक 30 प्रतिशत भूमि और समुद्र के संरक्षण के लक्ष्य को पाने में आसानी होगी।
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कारण –
रणनीति –
भारत में आत्महत्याओं की बढ़ती संख्या से स्थिति विकट हो चुकी है, और लक्षित कार्यक्रमों के साथ इससे निपटने की उम्मीद की जा सकती है।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 23 नवंबर 2022
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Date:21-12-22
Unity In BiodiversityDoing little about extinction of other species is a suicide pact by 8 billion humans. But here’s some good newsTOI Editorials
A landmark Global Biodiversity Framework (GBF) was hammered out in Montreal on December 19 under the umbrella of the UN Convention on Biological Diversity. It’s important for a couple of reasons. Biodiversity now will be accorded seriousness in the effort to limit environmental damage. And there are some realistic measures among the four goals and 23 targets for achievement by 2030. The most important goal is that the level of biodiversity protection which today is limited to 17% and 10% of the world’s terrestrial and marine areas respectively will now be enhanced to 30%.
The term biodiversity represents the collection of all living things on earth. Scientists have identified about 1. 6 million different species, only a part of what is believed to exist. This biodiversity is the result of at least 4 billion years of evolution that has left all forms of life intricately wound together. For example, many insects serve as pollinators that are essential to agriculture. The three primary direct causes for biodiversity loss are land use change (30%), overexploitation (20%) and climate change and pollution (14%).
Formulating biodiversity protection as a step against economic development is inaccurate. Consider India’s experience with rice, the most important food crop by output. Between 1950-51 and 2016-17, India’s rice production increased over fivefold to about 110 million tonnes a year. Yet, during the same period the area under rice cultivation rose just 1. 4 times to 43. 19 million hectares. This was achieved without India being an exceptional performer in productivity and agricultural practices. It shows the extent to which technological advancement has offset fears that may have been valid 50 years ago. In this context, one of GBF’s suggestions merits mention. It calls for reform of subsidies that undermine biodiversity. Realising this goal is in India’s self-interest and something GoI and many states seek.
Technological progress makes the possibility of enhancing biodiversity protection without sacrificing economic output achievable. This takes us to the challenging issue of financing biodiversity protection. GBF’s target is to raise annual international financial flows to poorer countries to at least $25 billion by 2025 and $30 billion by 2030. The poor track record of meeting financing targets in combating climate change is bound to lead to scepticism. Despite this drawback, there’s a lot in the GBF that is achievable and also in sync with India’s vision. That’s reason for optimism.
Date:21-12-22
Biodiversity Smart Is Planetary WiseET Editorials
The Kunming-Montreal Global Biodiversity Framework adopted by 196 countries in Montreal, Canada, this week is a major moment for biodiversity protection. It is biodiversity’s ‘Paris moment’, with countries agreeing to ambitious targets to halt and restore biodiversity loss by 2030. It is the first step to stop the war on nature and put the world on a pathway to live with it symbiotically. Delineating this necessarily ambitious action is what makes the agreement at COP15 in Montreal historic.
The real work begins now. India, a biodiversity-rich country, must develop a multifaceted plan that addresses different aspects of halting biodiversity loss, including international targets. It must set up and strengthen institutional structures and systems to assist and monitor implementation, and ensure compliance. Serious domestic conversations are necessary on elements such as phasing out of harmful subsidies that India pushed back on at the international negotiations. It must begin to develop and use parameters that ensure fiscal and other policies do not undermine biodiversity. Creating regulatory frameworks that embed sustainable production and consumption are essential. Valuing nature and its services, not just in a qualitative way but also by assigning economic value, is critical. Biodiversity protection does not impose a cost on economic development, but unsustainable economic growth actually does impede long-term growth.
As a first mover in global greening, India must engage with other developing countries, particularly those rich in biodiversity, to develop a system for them to benefit from their own biodiversity resources, efficiencies of resource use, etc. Being smart about biodiversity protection is being planetary wise.
Date:21-12-22
Fluid boundariesInter-State disputes resolution lies in be a political culture respectful of diversityEditorial
The dispute between Karnataka and Maharashtra over areas that both States claim to be theirs has become nasty and noisy in recent weeks, even leading to violence. Karnataka Chief Minister Basavaraj Bommai and Maharashtra Deputy Chief Minister Devendra Fadnavis — both from the BJP — have crossed swords publicly. Campaigners for the merger of Karnataka’s Marathi-speaking areas with Maharashtra upped the ante this week by organising a conference in Belgaum. Maharashtra politicians wanted to attend it but were stopped by the police, leading to a flare-up, possibly as intended by the invitees and the organisers. Karnataka’s practice, since 2006, of holding the winter session of the Assembly in Belgaum, is itself an assertion of its authority over the place. Recently, Mr. Bommai reiterated Karnataka’s claim over 48 villages of Sangli in Maharashtra, drawing a sharp rebuttal. With exchanges getting increasingly provocative, Union Home Minister Amit Shah has told the Chief Ministers to dial down the rhetoric and wait for the Supreme Court to adjudicate the matter. The Court is seized of the matter, but it can only do so much as the underlying factors that originated along with the 1956 linguistic reorganisation of Indian States are not easily amenable to technical and legal solutions.
Carving out political units that neatly correspond with various linguistic groups is impossible in India. As a result, almost all States have linguistic minorities that are accorded special rights. The Maharashtra-Karnataka row fundamentally arises out of a lack of appreciation of that reality. In 1957, Maharashtra claimed 814 villages and the three urban settlements of Belagavi, Karwar and Nippani in Karnataka; Karnataka not only rebuffed Maharashtra’s claims but also began to claim areas in Kolhapur, Sholapur and Sangli districts in Maharashtra. Elsewhere, Maharashtra and Telangana are caught in a dispute across their border, in Chandrapur and Asifabad districts, respectively. Reports of populations wanting to have their places shift from one State to another have emerged in recent weeks. In the Northeast, some boundary disputes between States have cost lives. It is wise to defer to the Court’s decision on any dispute, but harmony can be achieved only through embracing and promoting a political culture that is respectful of diversity that cannot be neatly demarcated. Fluid political and cultural boundaries criss-cross the landscape of India. If new fires are lit through divisive politics, the judiciary can do very little. That will be a double engine failure.
Date:21-12-22
Upholding the autonomy of the Election CommissionIn sorting out the method by which the Election Commission of India is constituted, the guiding principle must be functional and effective independence from the executiveGautam Bhatia is a Delhi-based lawyer
Over the course of November and December, a Constitution Bench of the Supreme Court of India heard a crucial case about the method by which the Election Commission of India (ECI) is constituted, and Election Commissioners appointed. At the time of writing, the Court has reserved its judgment, which is expected early in the new year. The issues before the Court are straightforward, but with far-reaching ramifications for Indian democracy: is complete executive control over appointments to the ECI constitutional? And if not, what manner of appointment is sufficient to preserve the independence of the ECI, and the fairness of elections?
According to the classical understanding of modern democracy, there are three “wings” of state: the legislature, the executive, and the judiciary. The task of the Constitution is to allocate powers between these three wings, and to ensure that there is an adequate degree of checks and balances between them. Traditionally, bodies that are involved with administrative and implementational issues — elections being among them — are believed to fall within the executive domain.
The erosion of a ‘classical understanding’
However, in contemporary times, that understanding is no longer dominant. It is now commonly accepted that healthy constitutional democracies need what are known as “fourth branch institutions” (or, alternatively, “integrity institutions”). The reason why a “fourth branch” — in addition to the legislature, the executive, and the judiciary — needs to exist is the following: many of the basic rights and guarantees that we enjoy cannot be effective without an infrastructure of implementation.
Let us take, for example, the right to information, a staple feature of most modern constitutional democracies. Without an infrastructure of implementation, the right to information will remain only a paper guarantee. We need, for example, an information commission, adequately staffed and funded, which will oversee the on-ground enforcement of the right to information, compel recalcitrant public institutions to release public information, adjudicate disputes, and so on. These tasks involve elements of the judicial function as well as the administrative function, and, therefore, cannot only be performed by the judiciary, but need bodies — such as commissions — to perform them on a daily basis.
Now, it logically follows from the above that “fourth branch institutions” need to be functionally independent from the political executive. This is because they are the vehicles for implementing rights against the executive. Once again, think of the right to information: primarily, citizens will attempt to invoke this right to extract public documents from government departments, in the interests of transparency. Governments, therefore, have a direct interest in such cases, and as history has shown, governments are rarely willing to be transparent of their own accord. To be effective, therefore, an Information Commission needs to be thoroughly independent of the government, against which it will be obligated to enforce the constitutional right to information. This is not an abstract point: as we have seen in recent times, extensive government control over the Central Information Commission — including control over appointments — has led to it becoming a largely toothless and ineffective body, and the eventual frustration of the right to information.
Examples from overseas
Modern constitutions all over the world have recognised this.
Thus, for example, the South African and Kenyan Constitutions have dedicated constitutional provisions for “fourth branch institutions” such as Human Rights Commissions, Election Commissions, and so on, calling these “integrity institutions”, and requiring them to be “independent.” The appointments process for such bodies normally involves multiple stakeholders from different wings of the state.
The Indian Constitution also provides for such similar fourth branch institutions. While the ECI is, obviously, an example, others include the Comptroller and Auditor General, and the Public Service Commission(s), and the National Commission for Scheduled Castes. The problem, however, is this: while the Constitution goes to some degree to protect the independence of fourth branch institutions while officials are in office (such as, for example, a high threshold on the removal of an Electoral Commissioner), the power of appointment lies exclusively with the executive (formally, the President of India acting on the aid and advice of the Council of Ministers). To put the point simply, the government decides who gets to be in charge of running fourth branch institutions.
This is undoubtedly a problem. The link between the power of appointment to a body, and its control, is both intuitive and has been empirically established in multiple contexts. As the South African constitutional court correctly noted in one of its landmark judgments, true and functional independence is effectively impossible if the power to appoint rests entirely within a single individual, office, or entity. This, then, is the foundation of the ongoing dispute before the Supreme Court.
Indeed, Indian constitutional history as well points to the problem. The collegium system for the appointment of judges — which has recently seen controversy again — arose as a response to executive abuse and attempts to control the judiciary, stemming from the constitutional text, which again gave to the President (i.e., the executive) the power to appoint judges. In the landmark Vineet Narain case, the Supreme Court likewise held that for the rule of law to prevail, the appointment of the CBI Director would have to be ratified by a three-member body that included the Prime Minister, the Leader of Opposition, and the Chief Justice of India. Thus, Indian constitutional history is no stranger to the perils of executive power over appointments to independent bodies, and the fashioning of remedies against that.
The appointments process
What, then, should the Court do in the case before it? It is important to note that almost no constitutional democracy in the world allows the political executive sole power to staff a body as important to sustaining democracy as an Election Commission. Appointment processes involve the government, the Opposition, independent experts, and judicial experts, in a manner that no one centre of power has dominance, or a veto. The problem, however, is that an appointments process is difficult to create simply by judicial decree: it is something that needs political consensus, public deliberation, and, perhaps, a carefully crafted legislation.
The Court, therefore, has its task cut out. It is obvious that the existing system where the executive has absolute power over appointments is unsatisfactory, has been historically problematic, and damages the rule of law. But the Court must be careful to avoid band aid or stop-gap solutions. One possible alternative is for the Court to hand down a suspended declaration of invalidity, i.e., a remedy where the Court puts into place certain interim guidelines, but leaves a more permanent, structural solution up to the legislature. It is for the Court to decide how best that might be achieved, but the guiding principles, at all times, must be functional and effective independence from the executive, from the moment of appointment to the retirement, and then beyond.
Date:21-12-22
इस सब्सिडी से किसान, सरकार दोनों का अहितसंपादकीय
वर्षों से किसान नाइट्रोजन का अधिक प्रयोग कर खेत की उर्वरा शक्ति घटा रहे हैं। किसानों को सलाह दी जा रही है कि वे अधिक मात्रा में पानी सोखने वाले चावल-गेहूं जैसे अनाज की जगह दलहन, तिलहन व अन्य अनाज या नकदी फसलों का उत्पादन करें। सरकारी कृषि विभाग इन दोनों बातों को समझाने में असफल रहा। इस वर्ष गेहूं की बोवाई का रकबा बढ़ गया है। यह चिंता की बात है। गेहूं का रकबा नहीं, उत्पादकता बढ़ाने और कृषि चक्र में बहुफसलीय वैविध्य लाकर खेती को समुन्नत करने की जरूरत है। पर दिक्कत यूरिया डीएपी जैसी खादों पर सरकार का भारी सब्सिडी देना है। कृषि वैज्ञानिक मानते हैं कि अच्छे उत्पादन के लिए नाइट्रोजन, फॉस्फेट, पोटाश का संतुलित प्रयोग होना चाहिए, लेकिन चूंकि सरकार को उपरोक्त दोनों तत्वों का दाम बढ़ने से राजनीतिक नुकसान का डर रहता है लिहाजा केवल यूरिया (जिसमें 46.4% नाइट्रोजन, डीएपी जिसमें 18% नाइट्रोजन, 46% फॉस्फोरस) पर ही सब्सिडी बढ़ाई गई। नतीजतन खेती में इस वर्ष पोटाश का प्रयोग 45% घट गया और मिश्रित एनपीके खाद भी किसानों ने खारिज कर दिया क्योंकि ये खाद अंतरराष्ट्रीय दाम बढ़ने से और सब्सिडी न मिलने से किसानों की पहुंच से बाहर हो गई। यानी राजनीतिक हानि से बचने के लिए सरकार ने रिकॉर्ड सवा दो लाख करोड़ रुपए की ‘वास्तविक’ सब्सिडी दी। जमीन में नाइट्रोजन की अत्यधिक मात्रा होने से जमीन की उर्वरा शक्ति और घटेगी। यानी सरकार को आर्थिक चूना और किसान का दीर्घकालिक नुकसान। समय आ गया है सब्सिडी की सही नीति बनाकर किसानों को बहुफसलीय खेती और संतुलित खाद के लाभ बताए जाएं।
Date:21-12-22
पारिस्थितिकी संरक्षणसंपादकीय
दुनिया भर में जलवायु परिवर्तन और बढ़ती पर्यावरणीय चिंताओं के बीच धरती और खासकर मानव जीवन को बचाने के लिए लगातार विमर्श चल रहे हैं। इसमें सबसे जरूरी पहलू है कि अगर पर्याप्त भूमि और जल को संरक्षित कर लिया जाए तो बड़े संकटों का सामना करना आसान हो जाएगा। इस लिहाज से सोमवार को एक बेहद अहम पहलकदमी तब सामने आई, जब कनाडा के मांट्रियल में संयुक्त राष्ट्र जैव विविधता सम्मेलन (काप-15) में शामिल देशों के बीच एक ऐतिहासिक समझौता हुआ। इसके तहत बनी सहमति इस दशक के अंत तक विश्व भर में तीस फीसद भूमि, तटीय इलाकों और अंतर्देशीय जलक्षेत्र के संरक्षण का लक्ष्य पूरा कर लेगी। साथ ही खाद्यान्न की बर्बादी में भी पचास फीसद कमी लाने का लक्ष्य रखा गया है। जाहिर है, दुनिया की बढ़ती आबादी और जरूरतों के बीच विकास के विभिन्न प्रारूपों की वजह से धरती पर असंतुलन न हो, इसके लिए पहले से ही जरूरी संसाधनों का संरक्षण अगर नहीं किया गया, तो इसका खमियाजा सबसे ज्यादा मनुष्य को ही उठाना पड़ेगा।
कहा जा सकता है कि इस मसले पर बनी सहमति भविष्य के संकट से बचने की दिशा में एक जरूरी कवायद है। मगर यह देखने की बात होगी कि इस पर वास्तव में अमल किस स्तर तक हो पाता है। दरअसल, काप-15 की अध्यक्षता कर रहे चीन की ओर से एक मसविदा जारी किया गया, जिसमें 2030 तक जैव विविधता के लिए अहम माने जाने वाली कम से कम तीस फीसद भूमि और इसके साथ-साथ जल के संरक्षण का भी आह्वान किया गया था। फिलहाल सत्रह फीसद भूमि और दस फीसद समुद्री क्षेत्र संरक्षित दायरे में माने जाते हैं। मसविदे में पृथ्वी पर विभिन्न लुप्तप्राय प्रजातियों के संरक्षण, जलवायु परिवर्तन के गंभीर और घातक असर के साथ प्रदूषण को कम करने के लिए की जाने वाली कोशिशों में और तेजी लाने की बात भी कही गई है। स्वाभाविक ही विकासशील देशों के सामने इस दिशा में ठोस पहल करने के लिए सबसे बड़ी चुनौती धन की होगी। मगर इस सम्मेलन में सहमति बनी है कि दुनिया में भूमि और जल संरक्षण सहित जैव विविधता को बचाने के लिए विकासशील देशों को धन मुहैया कराने के जरूरी उपाय किए जाएंगे।
निश्चित रूप से इसमें जैव विविधता को बचाने के लिए एक तरह से समावेशी दृष्टिकोण की जगह बनाई गई है। धरती पर सभ्यता के बदलते दौर और उसमें तमामों जीवों और प्रकृति के उपादानों का सह-अस्तित्व खुद मनुष्य के जीवन के लिए कितना अनिवार्य रहा है, यह एक जगजाहिर तथ्य है। लेकिन मनुष्य जीवन के बदलते स्वरूप, प्राकृतिक उतार-चढ़ाव और इसके समांतर विकास के नाम पर चलने वाली गतिविधियों की वजह से बहुत सारे जीव-जंतु या तो विलुप्त हो गए या फिर अपने अस्तित्व के संकट से जूझ रहे हैं। सभी जीव एक-दूसरे पर निर्भर और पारिस्थितिकी चक्र में परस्पर गुंथे हुए हैं। ऐसे में अगर भविष्य में धरती पर जैव विविधता को बचाने की दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए तो एक के अभाव में दूसरे का बचना मुमकिन नहीं होगा। इसमें स्वाभाविक ही भूमि और जल का संरक्षण प्राथमिक होगा। इसके अलावा, भोजन की बर्बादी को रोकना भी इसी के समांतर महत्त्व का मुद्दा है। मौजूदा समय में जिस तरह पानी के अभाव से लेकर प्रदूषण तक की समस्या पैदा हो गई है, उसमें संयुक्त राष्ट्र जैव विविधता सम्मेलन (काप-15) में बनी सहमति निस्संदेह बहुत महत्त्वपूर्ण है।
Date:21-12-22
ऐतिहासिक समझौतासंपादकीय
विविधता को बचाने की मुहिम में शामिल भारत की मांग पर वैश्विक तौर पर अब गौर किया गया है। संयुक्त राष्ट्र जैव विविधता सम्मेलन (कॉप15) में जैव विविधता की रक्षा के लिए ऐतिहासिक समझौते पर मुहर लग गई। कनाडा के मांट्रियल शहर में सोमवार तड़के सदस्य देशों के बीच जैव विविधता की रक्षा के लिए विकासशील और गरीब देशों को हर साल 30 अरब डॉलर की वित्तीय मदद पर सहमति बनी। समझौते की सबसे खास बात यह है कि समझौता आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है‚ जो संरक्षण के चलते विस्थापन के उनके डर को कम करेगा। आदिवासियों की स्थिति भारत से लेकर दूसरे देशों में कितनी दयनीय हो चुकी है‚ यह जगजाहिर है। उनकी जमीनें छीन ली गईं‚ उन्हें उनके मूल आवास से बेदखल कर दिया गया‚ उनके रहन–सहन और आचार–व्यवहार को बर्बाद कर दिया गया। यह सब कुछ हाल के वर्षों में ज्यादा हुआ है‚ और औद्योगीकरण के नाम पर उन्हें उजाड़ने की साजिश को बिना किसी शोर–शराबे के अंजाम दिया गया। समझौते का सबसे अहम हिस्सा 2030 तक जैव विविधता के लिए महत्वपूर्ण मानी जाने वाली 30 प्रतिशत भूमि और महासागरों की रक्षा करने के लिए प्रतिबद्धता है। वर्तमान में 17 फीसद स्थलीय और 10 प्रतिशत समुद्री क्षेत्र संरक्षित हैं। समझौते के तहत गरीब देशों के लिए सालाना वित्तीय मदद को 2025 तक बढ़ाकर कम से कम 20 अरब डॉलर किया जाएगा। वर्ष 2030 तक यह रकम बढ़कर 30 अरब डॉलर प्रति वर्ष हो जाएगी। भारत काफी पहले से इस मसले पर अपनी आवाज विभिन्न मंचों पर उठाता रहा है। भारत का मानना है कि जैव विविधता का संरक्षण जिम्मेदारियों और क्षमताओं पर आधारित होना चाहिए क्योंकि जलवायु परिवर्तन जैव विविधता को भी प्रभावित करता है। जैव विविधता के संरक्षण के लक्ष्यों को लागू करने का ज्यादा बोझ विकासशील देशों पर पड़ता है। स्वाभाविक रूप से भारत की मांग कहीं से भी गलत नहीं है। जैव–विविधता के बिना पृथ्वी पर मानव जीवन असंभव है। जिस तरह से खेती पर संकट गहराया है‚ और खाद्यान्न संकट का ड़र बना हुआ है‚ उसे जैव विविधता के जरिये ही खत्म किया जा सकता है। पर्यावरण प्रदूषण को दूर करने में भी इसकी महती भूमिका है। लिहाजा‚ हर किसी को इस बारे में संजीदगी से सोचना होगा।
Date:21-12-22
कानून को ज्यादा सख्त बनाना होगाभगवती प्र. डोभाल
केंद्रीय पर्यावरण मंत्री भूपेंद्र यादव ने संसद के शीतकालीन सत्र के पहले ही दिन वन्य जीवन संरक्षण संशोधन विधेयक राज्य सभा के पटल पर रखा। इससे पूर्व यह विधेयक मानसून सत्र में 3 अगस्त को लोक सभा में पारित कर दिया गया था। इस बिल का उद्देश्य वन्य जीवों और वनस्पतियों की लुप्तप्रायः प्रजातियों को अंतरराष्ट्रीय व्यापार सम्मेलन के बेहतर कार्यान्वयन के लिए एक प्रयास है।
विधेयक एक ऐसे प्रावधान के कारण से विवादास्पद था‚ जिसमें हाथियों का व्यापार करना संभव बना दिया गया था। इस कारण सदन में भारी विरोध के कारण उस प्रावधान को हटा दिया गया। विधेयक पेश करते हुए यादव ने कहा कि जंगली जीवों और वनस्पतियों की लुप्तप्रायः होने वाली प्रजातियों में अंतरराष्ट्रीय व्यापार पर सम्मेलन सीआईटीईएस के तहत भारत के दायित्वों को पूरा करने के लिए संशोधन पेश किया गया है‚ क्योंकि भारत सीआईटीईएस का सदस्य है। जिस गति से वन्य जीवों और वनस्पतियों की प्रजातियों का नुकसान हो रहा है‚ यह समझौता उसी के पालन के लिए संशोधित किया गया था। भारत में वन्य जीवों के अवैध व्यापार के लिए अलग नियमों का प्रावधान किया गया है–जैसा सीमा शुल्क अधिनियम‚ एक्जिम नीति‚ विदेश व्यापार महानिदेशालय और वन्य जीवन संरक्षण अधिनियम के तहत नियंत्रित किया जाता है। सीआईटीईएस ने वन्य जीवों के अवैध व्यापार के लिए अलग नियम का प्रावधान बनाया। यूपीए ने सीआईटीईएस के तहत अपने आश्वासनों को पूरा नहीं किया। लेकिन हम अभी इसे पूरा करने का प्रयास कर रहे हैं। लोक सभा ने इसे पारित कर दिया है। यादव ने कहा कि अधिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए सीआईटीईएस के परिशिष्ट–2 से परिशिष्ट–1 में लाल मुकुट वाले कछुवे और लीथ के सॉफ्ट शेल कछुवे को स्थानांतरित करने के भारत के प्रस्ताव को पनामा में सीआईटीईएस की 19वीं बैठक में पार्टियों के सम्मेलन सीवोपी द्वारा अपनाया गया है। उन्होंने कहा कि सीआईटीईएस ने छोटे कारीगरों को राहत देते हुए 10 किग्रा. तक की शीशम की लकड़ी में व्यापार पर कैप को मुक्त करने की अनुमति दी है। लोक सभा में पारित विधेयक में वन्य जीवों के लिए राज्य बोर्डों की स्थायी समितियों के गठन से संबंधित प्रावधान बनाया गया है। विशेषज्ञों ने कहा है कि इस प्रावधान से राज्य स्तर पर बुनियादी ढांचा‚ परियोजनाओं के लिए वन्य जीवन मंजूरी की प्रक्रिया को आसान बनाने की संभावना है‚ क्योंकि पैनल में ज्यादातर आधिकारिक सदस्य शामिल होंगे। अप्रैल में कांग्रेस नेता जयराम रमेश की अध्यक्षता वाली संसद की स्थायी समिति ने केंद्र से बंदी हाथियों के परिवहन के प्रावधानों का स्पष्टीकरण देने के लिए कहा गया था और इसकी कुछ सिफारिशों को केंद्र ने स्वीकार कर लिया था। तत्कालीन संप्रग सरकार ने 2005 में इस संबंध में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर आश्वासन दिया था‚ लेकिन उसे पूरा नहीं किया। यह सरकार इस आश्वासन को पूरा करने के साथ ही 1972 के कानून में संशोधन करना भी चाहती है। इस पर कांग्रेस के विवेक के. तन्खा ने कहा कि वन्य जीवों पर कानून बनाने का अधिकार पहले राज्यों के पास था। 1970 के दशक में संविधान संशोधन के बाद इस विषय को समवर्ती सूची में डाल दिया गया था। बिल का सेक्शन 43 इजाजत देता है कि हाथियों को एक जगह से दूसरी जगह धार्मिक और ‘अन्य किसी भी कार्यों’ के लिए ले जा जाया जा सकता है‚ जो कुछ स्पष्ट नहीं करता। बिल में यह बात स्पष्ट हो कि तीसरी पार्टी की शिकायत पर लुप्त हो रही प्रजातियों को गैर–कानूनी ढंग से बंदी बनाए जाने पर रोक लगे। इसी बात पर विपक्षी दलों ने सदन में बिल का विरोध किया और जोर दिया कि सरकार संघीय ढांचे की व्यवस्था को तोड़ने का प्रयास कर रही ह।
देखा जाए तो देश के 20 फीसद भाग में वन हैं‚ वनों की सुरक्षा जरूरी है। इसके लिए स्थानीय लोगों की भूमिका बहुत आवश्यक है। उनके जंगल में घुसने के अधिकार को नहीं रोका जाना चाहिए। वनों और वन्य जीवों की सुरक्षा में आदिवासियों का विशेष योगदान रहा है। उन्होंने ही वन संपदा को सुरक्षित रखने का प्रयास किया है। उनको वनों से बेदखल कर बाहरी व्यक्ति और व्यावसायिक हाथों के सुपुर्द करना पर्यावरण के लिए गंभीर खतरा है। वनों के कटान का सिलसिला ब्रिटिश काल से ही उनके द्वारा बनाए कानूनों से शुरू हो गया था। इसी कारण वनों की अंधाधुंध कटाई से आज बहुत सारे वन समाप्त हो चुके हैं‚ और उस क्षेत्र में पैदा होने वाली वनस्पतियों और जीव–जंतुओं का इस धरती से पलायन हो गया है। उनका सरंक्षण ऐसे कानून और बिल नहीं कर सकते। इसलिए सोच–समझ कर ऐसी व्यवस्था बनाने की जरूरत है‚ जो सही मायनों में प्रकृति का संरक्षण करने में कारगर हो सके। आज सरकार जो कानून बनाने जा रही है‚ वह पर्याप्त नहीं हैं। मनुष्य के लिए प्राण वायु से लेकर इको सिस्टम की सख्त जरूरत है। सभी तरह के जीव–जंतुओं का अस्तित्व बनाए रखने का प्रयास जरूरी है‚ ताकि धरती हरी–भरी और उसका संतुलित अनुपात कायम रह सके। ऐसा न होने से मौसम का बदलाव हर किसी को इस धरती से उखाड़ फेंक सकता है।
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तीन वर्ष पहले अगर आप किसी से कहते कि एक प्राइवेट कंपनी इसरो से रॉकेट लॉन्च करती है, तो यह अविश्वसनीय होता। परंतु यह हमारे वर्तमान का सच है। स्काईरूट एयरोस्पेस एक ऐसा स्टार्टअप है, जिसने हाल ही में सतीश धवन स्पेस सेंटर से विक्रम-एस रॉकेट का टेस्ट प्रक्षेपण किया है। इसी कड़ी में आगे अग्निकुल कॉसमॉस कंपनी भी अपना रॉकेट प्रक्षेपित करना चाहती है। भारत के लिए यह मील का पत्थर साबित होने वाला क्षण है।
भारत की बढ़ती प्रक्षेपण क्षमता पर कुछ बिंदु –
रैपिड लॉन्च क्षमताओं का लाभ –
एक दशक पहले रॉकेट के विनिर्माण की उच्च लागत के कारण तेज और सामरिक अंतरिक्ष प्रक्षेपण क्षमताओं को हासिल करना बेहद मुश्किल माना जाता था। अब यह संभव हो चुका है। इसका श्रेय 3डी प्रिंटिंग, कार्बन फाइबर बॉडी के विनिर्माण और मिनिएचर उपग्रह को जाता है।
रैपिड लॉन्च का सबसे अधिक लाभ सेना में है। दुश्मन के घातक हमलों के दौरान अगर दूरसंचार जैसी सेवाओं को नष्ट किया जाता हैए तो क्षतिग्रस्त या नष्ट उपग्रहों की भरपाई के लिए रैपिड लॉन्च सेवा बहुत उपयोगी हो सकती है।
चुनौतियां कम नही हैं –
अतः भारत में निजी लॉन्च प्रदाताओं की सफलता तरल ईंधन वाले रॉकेटों के विनिर्माण में है। नवाचार पर आधारित ऐसी तकनीकों का विकास होना चाहिए, जो मांग के अनुसार विनिर्माण कर सकें।
दीर्घावधि योजना –
द इंडियन नेशनल स्पेस प्रमोशन एण्ड ऑर्थोराइजेशन सेंटर (आईएन-एसपीएसीई) की 2020 में स्थापना की गई थी। यह एक स्वतंत्र निकाय है, जो देश में सभी अंतरिक्ष गतिविधियों का नियमन करता है। इसका मुख्य काम अंतरिक्ष प्रक्षेपण में निजी क्षेत्र को अधिकृत करना है।
रक्षा अंतरिक्ष एजेंसी को इस सेंटर के साथ मिलकर काम करना होगा, जिससे रक्षा क्षेत्र पेलोड के लिए अलग ट्रैक बनाया जा सके।
भारत का अंतरिक्ष क्षेत्र पिछले तीन वर्षों में एक लंबा सफर तय कर चुका है। लेकिन भारत को एक संपन्न अंतरिक्ष शक्ति बनाने के लिए निजी क्षेत्र की भागीदारी और क्षमता का इस्तेमाल जरूरी है। इस दिशा में भारत की वर्तमान नीति सार्थक कही जा सकती है।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित प्रणव आर सत्यनाथ के लेख पर आधारित। 19 नवंबर, 2022
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Date:20-12-22
A planet in crisisTangible outcomes from biological diversity convention are a long time awayEditorial
A month after the 27th Conference of the Parties to the UN Framework Convention on Climate Change (COP27) in Egypt, diplomatic retinue went into a contentious huddle again to save the planet — in Montreal, Canada, this time, and as the Convention on Biological Diversity (CBD). While both these conferences can trace their origins to the Rio summit of 1992, the CBD does not get anywhere near the media attention COP commands. There are no world leaders and heads of state making grandiloquent commitments because the CBD largely continues to be framed as an ‘environmentalist’ concern, much like what COP used to be, until the forces of capitalism managed to reimagine the idea of a planet being inexorably slow-cooked in greenhouse gases to one that may yet be saved by renewable energy sources — and at the very least — make some entrepreneurs rich.
Unlike cyclones and melting glaciers that have become visual aids to bring home the climate crisis wrought by invisible gases, biodiversity loss continues to be largely invisible despite its victims being extremely visible. Based on current trends, the UN reckons, an estimated 34,000 plant and 5,200 animal species, including one in eight of the world’s bird species, face extinction. About 30% of breeds of main farm animal species are currently at high risk of extinction. Forests are home to much of the known terrestrial biodiversity, but about 45% of the earth’s original forests are gone, cleared mostly during the past century. Yet, because much of this extinction is not finely accounted for as the rise in per capita carbon emissions or temperature swings, it fails to evoke the urgency it deserves. In this light, India’s stance, i.e., of not wanting hard targets on proposals such as reducing the use of pesticides, given that their effects on impacting biodiversity are documented, and conserving 30% of land and sea, seems anachronistic particularly when it sees itself as a champion of conservation and living in harmony with nature. While India, adopting a negotiating tack from climate conferences, has argued that different nations have differing levels of responsibility towards biodiversity conservation (which requires richer nations to be more generous funders of global conservation efforts), it is well known that such demands are a dead end unless countries agree to definite targets. What cannot be measured, as the adage goes, cannot be understood or addressed. Elizabeth Maruma Mrema, Executive Secretary of the CBD, has described the negotiations as one that should result in a “Paris moment for nature”; while this was not quite what happened, countries have agreed on preparing concrete road maps by 2024 and the richer ones, committing $30 billion an annum by 2030. But seeing tangible outcomes is a long time away.
Date:20-12-22
A role for India in a world wide webThe evolution of a role for India, where it moves to exercising a vision of responsibility on the world stage, would be worth watchingShashi Tharoor is a third-term Lok Sabha MP (Congress) from Thiruvananthapuram, a former Under Secretary General of the United Nations, a former Minister of State for External Affairs and former Chairman of the Parliamentary Standing Committee on External Affairs. Among his 24 books are ‘Pax Indica: India and the World in the 21st Century and ‘The New World Disorder’ (co-authored with Samir Saran)
A recent statement by External Affairs Minister S. Jaishankar that India can play a “stabilising” and “bridging” role, at a time when the world no longer offers an “optimistic picture”, is intriguing. He stated that India can contribute towards the “de-risking of the global economy” and in political terms, “in some way, help depolarise the world”.
He said, “I think those are really expectations that a lot of other countries, especially countries of the global south have of us. Obviously, we will try and do what we can, and we remain in touch with all the bottom countries of the world.” He added, “Countries wanted to talk to us, because there is a belief that we are in touch with key players [and] we can influence them, we can shape the thinking, we can contribute, we are prepared, sometimes to say things which many others cannot see, or have reached out to countries and leaders in a way may not be possible for everybody to do so.”
Mr. Jaishankar’s is an ambitious formulation expressed, wisely, in cautious terms. In 2012, when I wrote my book, Pax Indica: India and the World in the 21st Century, many immediately misconstrued the title phrase to mean world domination, as in the familiar “Pax Romana” or “Pax Britannica”. What I meant, however, was the critical role I believed India has to play in what has become a cooperative networked system in our multi-polar world. The idea of “Pax Indica”, to me, is not about India as a future “world leader” or even as “the next superpower”, a status assorted commentators claimed that it was heading irresistibly towards. Instead “Pax Indica”, in my conception, was about India’s role in shaping the emerging global “network” which would define international relations and world politics in the 21st century. I believe that the era of any country claiming or seeking to be a “world leader” is definitely over — and I hope Beijing is listening.
An archaic notion
In any case, the very idea of “world leadership” is a curiously archaic notion; the very phrase is redolent of Kipling ballads and James Bondian adventures. What makes a country a world leader? Is it population, in which case India is on course to top the charts, overtaking China as the world’s most populous country next year? Is it military strength (there, India has the world’s fourth-strongest army) or nuclear capacity (India’s status having been made clear in 1998, and then formally recognised in the India-U.S. nuclear deal some years later)? Is it economic development? There, India has made extraordinary strides in recent years; it is already the world’s third largest economy in PPP (purchasing-power parity) terms and continues to climb, though too many of our people continue to live destitute, amidst despair and disrepair. Or could it be a combination of all these, allied to something altogether more difficult to define — “soft power”? As Joseph Nye has argued in regard to the U.S., does not the power of attraction mean much more today than the force of arms or economic muscle in wielding influence in the world?
Much of the conventional analyses of any country’s stature in the world relies on the all-too-familiar economic and hard-power assumptions. But as India demonstrates daily, we are famously a land of paradoxes, and among those paradoxes is that so many speak about India as a great power of the 21st century when we are not yet able to feed, educate and employ all our people. So it is not economic growth, military strength or population numbers that I would underscore when I think of our nation’s potential role in the world of the 21st century. Rather, it is a transformation of the terms of global exchange and the way countries adapt to the new international, interlinked landscape that will shape their future role and direction. Far from evolving into a “world leader”, India, for instance, should become an active participant in a world that is no longer defined by parameters such as “superpowers” or “great powers” exercising “world leadership”.
Foreign policy has much more to it
The old binaries of the Cold War era are no longer relevant. At the same time, the distinction between domestic and international is less and less meaningful in today’s world. Foreign policy is no longer just foreign: when we think of foreign policy, we must also think of its domestic implications. The ultimate purpose of any country’s foreign policy is to promote the security and well-being of its own citizens. We want a world that gives us the conditions of peace and security that will permit us to grow and flourish, safe from foreign depredations but open to external opportunities.
We are living in a world in which one defining paradigm for foreign policy is impossible. We cannot simply be non-aligned between two superpowers when one of them sits on our borders and nibbles at our territory. But nor can we afford to sacrifice our strategic autonomy in a quest for self-protection. We need to define a new role for ourselves that depends on our understanding of the way the world is.
My metaphor for today’s globalised world is that of the World Wide Web. In this increasingly networked world, we are going to have to work through multiple networks, which will sometimes overlap with each other with common memberships, and sometimes be distinct. But they all serve our interests in different ways and for different purposes. Our External Affairs Minister meets annually with his Russian and Chinese counterparts in the trilateral RIC; he adds Brazil and South Africa in BRICS; subtracts both Russia and China in IBSA, for South-South co-operation; and retains China but excludes Russia in BASIC, for environmental negotiations. (And this is not merely because India’s name begins with that most useful element in any acronym, a vowel!)
Another set of paradoxes
This kind of world-wide-web style networking reflects other paradoxes of our world. India belongs both to the non-aligned movement, which reflects its experience of colonialism, and the community of democracies, which reflects its 75 years of experience as a democracy alongside many of the countries it rails against in the non-aligned movement. India is a leading light of the global “trade union” of developing countries, the G-77 (Group of 77), which has some 120 countries, and also of the global macro-economic “management”, the G-20 (Group of 20 developed and developing countries whose presidency India has just assumed). India plays an influential role both in the United Nations, a universal organisation that has 193 member states, and in the South Asian Association for Regional Cooperation (SAARC) that has only its seven neighbours. We have the great ability to be in all these great institutional networks, pursuing different objectives with different partners, and in each finding a valid purpose that suits us. This is why I have long suggested that India has moved beyond non-alignment to what I called multi-alignment, though I must admit the phrase did not catch on when I first used it in 2009. (Now Mr. Jaishankar happily cites it, and was gracious enough to credit me for it when he first used it at the Raisina Dialogue.)
Today, India, and indeed most countries, can take our sovereignty for granted; we know no one would dare threaten it. Our strategic autonomy is a fact of life and no longer something that has to be fought for. We are now in a position to graduate from a focus limited to our own sovereign autonomy to exercising a vision of responsibility on the world stage, from a post-colonial concern with self-protection to a new role participating in the making of global rules and even playing a role in imposing them. This seems to be what Mr. Jaishankar was suggesting in his recent remarks, and the evolution of this role is well worth watching.
Date:20-12-22
निचली अदालतें अपनी जिम्मेदारियों से न बचेंसंपादकीय
एक व्यक्ति को ट्रायल कोर्ट ने बिजली की चोरी के एक अभियोग में दो वर्ष की सजा दी। उस पर बिजली चोरी के ऐसे नौ मुकदमों में उसे ऐसी ही सजा मिली। लेकिन कोर्ट ने यह स्पष्ट नहीं किया कि सभी नौ मुकदमों में सजा साथ-साथ चलेगी या एक पूरी होने के बाद अगली । नतीजतन वह व्यक्ति बिजली चोरी जैसे छोटे से अपराध में 18 वर्षों की सजा काटने लगा। हाई कोर्ट ने उसकी अपील खारिज करते हुए कहा कि निचली कोर्ट ने स्पष्ट कुछ भी नहीं लिखा है लिहाजा सीआरपीसी की धारा 427 के तहत सभी सजाएं क्रमशः चलेंगी। तीन साल से जेल में बंद यह कैदी सुप्रीम कोर्ट पहुंचा तब जाकर उसे राहत मिली और उसे छोड़ा गया। सीजेआई ने एक लेक्चर में इस मामले का जिक्र करते हुए बताया कि देखने में यह केस छोटा है लेकिन सवाल न्याय में जन-विश्वास का है। उनका मानना था कि अपराध की गंभीरता आईपीसी – सीआरपीसी की दफाओं या सजा के काल से नहीं बल्कि नागरिक के प्रति न्यायपालिका की संवैधानिक और नैतिक जवाबदेही से तय होती है। यहां सवाल यह उठता है कि क्या यह जिम्मेदारी सुप्रीम कोर्ट की ही है ? क्या हाई कोर्ट्स को भी ऐसी जिम्मेदारी पर खरा नहीं उतरना चाहिए? निचली कोर्ट्स पीड़ित जनता या आरोपियों से सबसे ज्यादा रू-ब-रू होती हैं। देश में जो पांच करोड़ लंबित मामले हैं उनमें करीब 4.40 करोड़ इन्हीं कोर्स में हैं और इन मामलों में दो-तिहाई छोटे-बड़े अपराध के हैं। न्याय पर जनता का भरोसा रहे, यह केवल सुप्रीम कोर्ट की ही नहीं हाई कोर्स और हजारों निचली कोर्ट्स की भी जिम्मेदारी है।
Date:20-12-22
जलवायु नुकसान की भरपाईवेंकटेश दत्ता
जलवायु परिवर्तन से जुड़ी हानि और क्षति के संबंध में विकासशील देशों की आवाज इस साल मिस्र में अधिक प्रमुखता से उठाई गई। पिछले वर्ष वार्ता के अंतिम दिनों में धनी देशों ने इस तरह के प्रस्तावों को खारिज कर दिया था। चीन, यूरोपीय संघ और कुछ अन्य विकसित देश पहली बार जलवायु हानि और क्षति कोष के समर्थन में सामने आए। इस तरह अमेरिका ने अपनी लंबे समय से चली आ रही विरोध-नीति को पलट दिया। हानि और क्षति पर सीओपी-27 समझौता महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है, लेकिन बैठक में कई अन्य जरूरी मुद्दों पर बात नहीं हुई। इस बैठक में कमजोर और विकासशील देशों की चिंताओं को दूर करने की कोशिश तो की गई, मगर स्वच्छ ऊर्जा की ओर आवश्यक सहयोग या धन जुटाने के लिए कोई प्रारूप प्रदान नहीं किया गया।
नया नुकसान और क्षति कोष पेरिस समझौते (2015) के तहत, जिम्मेदारी के न्यायसंगत बंटवारे की दिशा में पहला सैद्धांतिक कदम है। भविष्य में यह कैसे विकसित होगा, कहना मुश्किल है। इतना तो तय है कि जलवायु नुकसान और क्षति का मुद्दा विवादास्पद रहने वाला है, जाहिर है, आने वाले समय में कुछ देश इस संकल्प से पीछे हट जाएंगे।
पेरिस समझौते की प्रतिबद्धताओं में 2030 तक ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन को तैंतीस से पैंतीस फीसद तक कम करना शामिल था। विवाद इस बात को लेकर था कि जलवायु परिवर्तन से जुड़े ‘नुकसान और क्षति’ के लिए सबसे अधिक जिम्मेदार, यानी वातावरण में ग्रीन हाउस गैसों का उत्सर्जन करने वाले देश कौन हैं, और इन्हें विकासशील देशों को कैसे भुगतान करना चाहिए, जिससे क्षतिपूर्ति की जा सके। यह तो सबको पता है कि इस वक्त संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन और अन्य बड़े धनी देश जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार गैसों का सबसे ज्यादा उत्सर्जन करते हैं।
सीओपी-27 में चीन की घोषित स्थिति यह है कि वह नुकसान और क्षति कोष का समर्थन तो करता है, लेकिन एक विकासशील देश के रूप में वह कोष में किसी भी योगदान के लिए तैयार नहीं है। सीओपी-27 में जलवायु परिवर्तन से जुड़ी बहुत सारी बहसें और घटनाक्रम हमारे सामूहिक और सतत विकास के मायने तय करेंगे, लेकिन जो बाइडेन और शी जिनपिंग का एक साथ मिलना और नुकसान और क्षति कोष की स्थापना इस बैठक की एक महत्त्वपूर्ण उपलब्धि है।
दुनिया की कुल आबादी का सत्रह फीसद होने के बावजूद, भारत वैश्विक उत्सर्जन का लगभग सात फीसद उत्सर्जन करता है। 2019 के आंकड़ों के अनुसार चीन ग्रीन हाउस गैसों का सत्ताईस फीसद उत्सर्जन करता है, उसके बाद अमेरिका ग्यारह फीसद और फिर भारत 6.6 फीसद करता है। भारत हर साल लगभग तीन गीगाटन कार्बन डाइआक्साइड का उत्सर्जन करता है, इसमें प्रति व्यक्ति योगदान लगभग ढाई टन के बराबर है। यह दुनिया के प्रति व्यक्ति औसत का आधा है। यूएनईपी का अनुमान है कि 2030 तक यह तीन और चार टन के बीच होगा। भारत में कार्बन उत्सर्जन चीन की तुलना में बहुत कम है, लेकिन बहुत तेजी से बढ़ रहा है।
जलवायु परिवर्तन से सर्वाधिक प्रभावित देशों की सूची में भारत चौथे स्थान पर है। 1901 और 2018 के बीच भारत में औसत तापमान करीब 0.7 सेंटीग्रेड तक बढ़ गया है। देखने में यह बहुत कम लगता है, लेकिन प्रकृति के लिए यह बहुत ज्यादा है। ऐसा बदलाव प्रकृति की मुश्किल बढ़ा सकता है। कुछ अनुमानों के अनुसार, वर्तमान सदी के अंत तक भारत में सूखे की गंभीरता में उल्लेखनीय वृद्धि होगी। 2022 में उत्तर भारत में जो गर्मी की लहर आई थी, उसकी तीव्रता जलवायु परिवर्तन के कारण तीस गुना अधिक थी।
सितंबर-2021 तक भारत अपनी बिजली का 39.8 फीसद अक्षय ऊर्जा स्रोतों से और 60.2 फीसद बिजली जीवाश्म ईंधन से उत्पन्न करता रहा है, जिसमें से इक्यावन फीसद कोयले से उत्पन्न होता है। भारत में कोयले के खनन के साथ-साथ, कोयले से चलने वाले बिजली संयंत्रों में जलाने के लिए कोयले का आयात भी होता है। नए संयंत्रों के बनने की संभावना नहीं है, पुराने संयंत्रों को बंद किया जा सकता है और बाकी बचे संयंत्रों में अधिक से अधिक कोयला जलाया जा सकता है। ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कटौती से भारत में वायु प्रदूषण तो कम होगा ही, कटौती लागत से चार से पांच गुना ज्यादा स्वास्थ्य लाभ होगा, जो दुनिया में सबसे अधिक सस्ता होगा।
पिछले साल के सीओपी में कोयले को धीरे-धीरे कम करने का संकल्प लिया गया था और इस साल भारत ने सभी देशों को चुनौती दी है कि वे सभी जीवाश्म ईंधन को चरणबद्ध तरीके से कम करने के लिए प्रतिबद्ध हों। हालांकि, सीओपी का अंतिम बयान केवल एक विविध ऊर्जा-मिश्रण की मांग करता है। समझौते में ऐसा कुछ भी नहीं था, जिससे उत्सर्जन में कटौती पर अधिक कार्रवाई की जा सके या जलवायु परिवर्तन से लड़ने के लिए अधिक वित्तीय या तकनीकी संसाधन जुटाए जा सकें। उत्सर्जन में कटौती पर कुछ मजबूत प्रावधानों को लागू करने के प्रयासों को सभी पक्षों की सहमति नहीं मिली। सभी जीवाश्म ईंधनों को चरणबद्ध रूप से बंद करने का प्रस्ताव, मूल रूप से भारत द्वारा आगे रखा गया था। इसे बड़ी संख्या में देशों का समर्थन भी हासिल हुआ, पर इसे अंतिम समझौते में शामिल नहीं किया गया।
जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुकसान को कम करने के लिए वित्तीय प्रवाह बढ़ाने पर प्रतिबद्धता की कमी सबसे बड़ी चुनौती रही है। शुद्ध-शून्य या नेट जीरो उत्सर्जन लक्ष्य तक पहुंचने के लिए 2030 तक नवीकरणीय ऊर्जा क्षेत्र में निवेश के रूप में हर साल लगभग चार खरब डालर की आवश्यकता होगी। निम्न-कार्बन विकास पथ में वैश्विक परिवर्तन के लिए हर साल कम से कम चार से छह खरब डालर की आवश्यकता पड़ेगी। विकासशील देशों को ही जलवायु कार्य योजनाओं को पूरा करने के लिए 2030 से पहले लगभग 5.6 खरब डालर की आवश्यकता है। विकसित देशों ने अभी तक प्रति वर्ष सौ अरब डालर की अपेक्षाकृत छोटी राशि देने का अपना वादा भी पूरा नहीं किया है।
यह समझौता अक्षय ऊर्जा और हरित परियोजनाओं में अधिक से अधिक निवेश जुटाने के लिए अंतरराष्ट्रीय वित्तीय बाजार को बदलने की बात करता है। यह सुनिश्चित करता कि जलवायु कोष सभी के लिए, विशेष रूप से छोटे और कमजोर देशों को आसानी से सुलभ हो। हालांकि अभी इस पर और भी काम करने की जरूरत है।
जलवायु आपदाओं से प्रभावित विकासशील देश अब भी अपने पुनर्निर्माण के लिए अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संसाधनों का उपयोग करने में सक्षम नहीं हैं। इस कोष के संचालन से जुड़े महत्त्वपूर्ण कई मुद्दे बेहद विवादास्पद हैं। इनमें कोष में भुगतान कौन करेगा, कौन इसका लाभ उठा पाएगा और इसे कैसे प्रबंधित किया जाएगा, जैसे प्रश्न शामिल हैं। इन सभी मुद्दों पर गौर करने के लिए एक समिति का गठन किया गया है, जिसमें धन के स्रोतों की पहचान और विस्तार की संभावना भी शामिल है। कोष का निर्माण वास्तव में महत्त्वपूर्ण है, लेकिन यह केवल पहला कदम है, अभी बहुत सारे काम किए जाने बाकी हैं। फिर भी यह एक बड़ी सफलता है।
इस कोष के निर्माण ने विकसित देशों के बड़े प्रदूषकों को एक चेतावनी दी है कि वे अब अपने जलवायु विनाश से बच नहीं सकते। कई देश विनाशकारी तूफान, लू, बाढ़ और बढ़ते समुद्र स्तर का सामना कर रहे हैं। विकसित देशों को मिल कर काम करना और यह सुनिश्चित करना चाहिए कि नया कोष पूरी तरह से चालू हो सके और जलवायु परिवर्तन से जूझते सबसे कमजोर देशों और समुदायों को जवाब दे सके।
Date:20-12-22
मोरल पुलिसिंग मंजूर नहींसंपादकीय
सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि पुलिस अधिकारियों को ‘नैतिक पहरेदारी” करने की जरूरत नहीं है। अदालत ने सीआईएसएफ (केंद्रीय औद्यागिक सुरक्षा बल) के एक कांस्टेबल को सेवा से हटाने संबंधी अनुशासनात्मक प्राधिकार के आदेश को सही ठहराते हुए यह मत व्यक्त किया। जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस जेके माहेश्वरी की पीठ ने 16 दिसम्बर, 2014 के गुजरात उच्च न्यायालय के उस फैसले को रद्द कर दिया जिसमें सीआईएसएफ कांस्टेबल संतोष कुमार पाण्डेय की याचिका को स्वीकार करते हुए बर्खास्त किए जाने की तारीख से 50 प्रतिशत पिछले वेतन के साथ सेवा में बहाल करने का निर्देश दिया गया था । पाण्डेय आईपीसीएल टाउनशिप, बड़ोदरा, गुजरात ग्रीनबेल्ट क्षेत्र में तैनात था, जहां कदाचार के आरोप में 28 अक्टूबर, 2001 को उसके खिलाफ आरोप पत्र दायर किया गया था। उस पर आरोप था 26 और 27 अक्टूबर की दरमियानी रात करीब एक बजे ग्रीनबेल्ट में अपनी ड्यूटी के दौरान उसने बाइक सवार एक व्यक्ति और उसकी मंगेतर को रोक कर पूछताछ की और मौके का फायदा उठाते हुए व्यक्ति से कहा कि वह उसकी मंगेतर के साथ कुछ समय बिताना चाहता है । उस व्यक्ति ने पाण्डेय के आचरण पर आपत्ति की तो आरोपी ने उससे कुछ और सामान देने को कहा। इस पर उस व्यक्ति ने अपने हाथ की घड़ी उतार कर उसे थमा दी ताकि उस सूनी अंधेरी रात में वह और उसकी मंगेतर वहां से खैरियत से बचकर निकल सकें। अगले रोज पीड़ित ने इस घटना की शिकायत अधिकारियों से की तो सीआईएसएफ ने मामले की जांच कराई और पाण्डेय को सेवा से बर्खास्त कर दिया। शीर्ष अदालत ने इस मामले में सीआईएसएफ की कार्रवाई को स्वीकार करते हुए कहा कि वह गुजरात उच्च न्यायालय के विवादित फैसले को खारिज करती है । यह तल्ख टिप्पणी भी की अनुचित लाभ लेने की कोई भी कोशिश अस्वीकार्य है। दरअसल, जिस प्रकार की स्वेच्छारिता कानून का अनुपालन कराने वाली एजेंसी के एक प्रतिनिधि ने दिखाई वो हैरान करने वाली थी। इस घटना का पता चलते ही एक पल को लगता है कि यह स्थिति और प्रवृत्ति यदि पुलिस और अन्य कानून प्रवर्तक एजेंसियों के कर्मियों में पनपी तो यकीनन बेहद दुखद स्थिति का हमें सामना करना होगा। अदालत का फैसला आश्वस्त करने वाला है।
Date:20-12-22
सीमित दायरे में अभिव्यक्ति को बचाए रखने का विचारमनु जोसेफ, ( पत्रकार और उपन्यासकार )
यह स्वीकार करने का समय आ गया है कि भारतीयों ने अपनी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता खो दी है और हो सकता है, कई दशक तक यह फिर हासिल न हो पाएगी। आज एक छोटा समूह या यहां तक कि एक व्यक्ति जो आहत है, या वस्तुतः आहत नहीं भी है, पर तफरी लेना चाहता है, तो अदालत जा सकता है। वह बड़े से बड़े प्रकाशकों, लेखकों, पत्रकारों, निर्माताओं, अभिनेताओं की गिरफ्तारी की मांग कर सकता है।
क्या भारत आज नाराज लोगों की जन्नत बन गया है? एक आहत व्यक्ति की शिकायत के कारण प्रकाशकों को किताबों की दुकानों से हजारों प्रतियां वापस लेने के लिए मजबूर होना पड़ सकता है। फिल्म निर्माता और स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म के अधिकारी भी परेशानी के डर से खुद को सेंसर करने लगे हैं। किसको किस बात पर आपत्ति हो जाए, कोई नहीं जानता। लाखों लोगों को समृद्ध करने वाली मनोरंजन कला और बौद्धिक कार्यों को एक आदमी भी बंधक बना सकता है। मेरे पास समस्या का समाधान है।
गौर कीजिए, एक ऐसी जगह है घर, जहां हमें अपनी बात कहने की पूरी आजादी है। जब तक हम सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आते, तब तक हम काफी हद तक स्वतंत्र हैं। हमें जो करने की जरूरत है, वह है घर से परे निजी जगह या उसके विचार का विस्तार। हमें भारत में लोगों को एक किताब, एक फिल्म, एक सभागार, एक ऑनलाइन चैनल या एक सोशल मंच को निजी जगह मानने के लिए तैयार करना होगा। जो लोग अपने निजी दायरे में बात रखना चाहते हैं, वे दर्शकों या पाठकों को अपने दायरे में बुला लें, ताकि सरकार या राज्य के चिंतित होने की नौबत न आए। मुझे क्यों लगता है कि भारत में अभिव्यक्ति की आजादी को सार्वजनिक सामग्री के खांचे से हटाकर और निजी मानकर ही सुरक्षित रखा जा सकता है।
ऐसे में, अदालत जाना फिजूल है। भारतीय कानून ने हमेशा किसी बोलने वाले के अधिकार से ज्यादा तवज्जो आहत होने वाले के अधिकार को दी है। यहां तक कि आंबेडकर और गांधी ने भी कहा था कि वह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को पूर्ण नहीं मानते हैं। बेशक, इन दिग्गजों का असर हमारे उन कानूनों पर है, जो हमारी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को नियंत्रित करते हैं। हर कोई अपने मन बात कहना चाहता है और कलात्मक प्रस्तुति करना चाहता है, लेकिन ताकतवर लोग या नाराज लोग भला इसकी अनुमति क्यों दें? यह सोचना भोलापन या गलतफहमी भी है कि ताकतवर लोग नैतिकता या आधुनिकता की भावना से खुले इजहार को मंजूर करेंगे।
भारत में निकट भविष्य में ऐसे नेता होने की संभावना नहीं है, जिसकी प्राथमिकता भारतीयों को पतली चमड़ी ( या आसानी से बुरा मानने वालों) के अत्याचार से मुक्ति दिलाना होगा। आज हमें एक ऐसा व्यावहारिक आंदोलन शुरू करने की जरूरत है, जो संपूर्ण स्वतंत्र अभिव्यक्ति की मांग नहीं करता हो, पर जो विशिष्ट व निजी दायरे में अभिव्यक्ति की आजादी सुनिश्चित कर सके। यहां निजी स्थान या ऐसे दायरे होंगे, जहां एक कार्य या वस्तु, जो निजी होने की इच्छा रखती हो, वह पहले ही ऐसी घोषणा कर देगी। उदाहरण के लिए, एक व्यक्ति जो चाहता है कि उसका व्याख्यान निजी माना जाए, वह अधिकतम एक हजार लोगों से कुछ भी कह सकता है। भाषण की शुरुआत में एक घोषणा होगी कि यह निजी है और जो लोग आहत हो सकते हैं, वे जा सकते हैं। ऐसी पुस्तकें, जो स्वयं को निजी जगह कहती हैं, पुस्तकालयों में नहीं होंगी । निजी माने जाने की इच्छा रखने वाली फिल्में यह घोषणा करेंगी कि वे उन लोगों के लिए अनुपयुक्त हो सकती हैं, जिनके नारंगी या हरे रंग के स्विमसूट से आहत होने की आशंका है।
हमें नहीं भूलना चाहिए कि पहले से ही एक कारगर निजी स्थान का उदाहरण है, किताबें, जहां आप ऐसी बातें कह सकते हैं, जो एक फिल्म में नहीं कह सकते। सरकार का तर्क यह है कि किताबें बहुत कम लोगों तक पहुंचती हैं, इसलिए वे भारत के स्वतंत्र स्थान के मिथक को बढ़ावा देने के साथ-साथ डराने वाली भी नहीं हैं। निजी स्थान के इस विचार का कुल निचोड़ यही है कि एक दायरे में लोग संस्कृति विभाग को किसी जोखिम में डाले बिना कला का पूरा आनंद ले सकेंगे।
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न्यायपालिका में उच्च स्तरीय नियुक्तियों के लिए कॉलेजियम प्रणाली की स्थापना की गई थी। लेकिन हाल ही में कानून मंत्री रिजीजू ने उच्च एवं उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रणाली को हमारे संविधान के लिए ‘विदेशी’ कहकर उसकी महत्ता पर प्रश्नचिन्ह लगा दिया है।
कॉलेजियम प्रणाली की निंदा काफी समय से यह कहकर की जा रही है कि यह अपारदर्शी है। इसमें भाई-भतीजावाद का बोलबाला है। अपने परिचित वकीलों के नाम न्यायाधीश के लिए आगे बढ़ाने का आरोप पहले भी लगाया जाता रहा है। इस फेर में न्यायिक जगत की प्रतिभाएं पीछे छूटती जाती हैं।
इस संबंध में एनजेएसी (नेशनल ज्यूडिशियल अपांइटमेन्ट कमीशन एक्ट) को रद्द करने वाले फैसले में भी कॉलेजियम प्रणाली की खामियों को स्वीकार किया गया था। लेकिन अंततः इसमें सुधार करके इसे ही चलाने का फैसला लिया गया। सुधार की कवायद भी जल्द ही छोड़ दी गई।
वर्तमान में सरकार ने कॉलेजियम द्वारा प्रस्तावित न्यायाधीशों के नाम पर चुप्पी साध ली है। अगर सरकार वाकई कुछ परिर्वतन करना चाहती है, तो नियुक्तियों को रोककर रखना कोई समाधान नहीं है। इस हेतु एक वैकल्पिक तंत्र को सामने लाना होगा; कोई ऐसा तंत्र, जिसमें पहले के कानून जैसी दुर्बलताएं न हो। एनजेएसी ने न्यायिक सदस्यों की संख्या को कम करके कार्यकारी नामांकित व्यक्तियों की संख्या को बढ़ा दिया था। इस प्रकार का तंत्र लाना चाहिए, जो न्यायिक नियुक्तियों में निष्पक्षता को प्रधानता पर रख सके।
इस मामले को लेकर उच्चतम न्यायालय में अपील भी की गई है, जो संविधान संशोधन और एनजेएसी कानून को रद्द करने के फैसले पर पुनर्विचार करने की प्रार्थना करती है। उम्मीद की जा सकती है सरकार इसके समाधान के लिए त्वरित कदम उठाएगी।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 19 नवंबर, 2022
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Date:19-12-22
India’s crushing court backlogs, out-of-the box reformThere are instruments, resources and methods that work to address the issue of daunting delays in the justice delivery system.Sriram Panchu is a senior advocate and mediator.
Two important voices have weighed in recently on delays in the justice delivery system. The Chief Justice of India D.Y. Chandrachud stated that increasing the number of judges will not demolish the perennial problem of pendency, and that it is difficult enough now to find good High Court judge material. Sushil Kumar Modi, Chairman of Parliament’s Standing Committee on Personnel, Public Grievances, Law and Justice has called for out-of-the-box thinking to solve the problem. Joining the dots, it seems clear that reforms inspired by convention will be pretty much like rearranging the deck chairs on the sinking Titanic. So, do we have other instruments, resources and methods? Here are three which are doable, do not cost much, and yield solutions.
Losing resources from the High Court, Supreme Court
We have difficulty in finding good talent to be appointed as judges of the High Court, but year after year we see the spectacle of large numbers of experienced and fine judges retiring from the High Courts because they have reached the age of 62. Many have several good years of work left in them which goes waste, much like the richest sediment on river banks getting washed out to sea. All that needs to be done is to continue them with pay and perquisites, and we would have kept the best for their last run of service.
Extend the out-of-box thinking and bring back retired Supreme Court judges to hear admission of Special Leave Petitions. These are appeals filed in hundreds every week against all kinds of orders of lower courts and tribunals across the length and the breadth of the country. They are the biggest clog to justice in the Supreme Court (SC) because they take away half the time of the country’s senior most judges in just reading these mountainous files to decide which minute fraction to hear and dismiss the rest. It is stretching an analogy, but imagine the board of governors of the central bank sitting to examine doubtful currency notes. Many SC judges are in fine fettle at 65 when they retire, and this is better work for them than arbitrations where they become subject to scrutiny by District Judges. And working hours and schedules can be flexibly designed for retired judges to operate. This will enable the current judges to take up important cases in adequate Bench strength and composition. Extend this a little more and have a scheme by which experienced High Court senior advocates sit as judges once a week to hear matters from another State High Court. Many would sign up for the novel and contributing experience, and many would do an excellent job.
Strengthen online justice and mediation
But, the question arises, do we then not need more brick and mortar structures, office infrastructure and an army of staff? No, we do not, and that leads us to the second suggestion. Cultivate online justice. The courts responded splendidly to the COVID-19 shutdown by harnessing online facilities, and, pretty soon, judges and lawyers were quite well-versed in this new medium and welcomed its ease and flexibility. The environment too must have been relieved to be saved of carbon footprint.
Unfortunately, we have gone back to the old days of only physical hearings in crowded courtrooms, jettisoning even the benefits of hybrid methods. However, enabling these ad hoc judges to work online from home with minimum support staff is an excellent harness of human and technology resources; it will enable a vast number of cases to be disposed of. And disposed of well, not just disposed off which is what will happen if we appoint inept new judges. The last not only produces injustice galore but needs two good ones to sit in corrective appeal.
Lastly, employ mediation. As a method of dispute resolution, it is far superior to litigation in cases where it can be applied. Those cover a wide range, from personal and matrimonial to civil and commercial and property disputes. India has had a marvellous introductory run with this process; in less than 20 years it has firmly established itself in the court annexed mediation schemes with thousands of trained and enthusiastic lawyers and other mediators handling lakhs of cases. If well planned and executed, mark my words, we have the capacity to lift half the load of such cases off court dockets and onto mediation tables. And, even now, most mediation centres have a success rate of over 50%, several much more. When you realise that it costs much less, takes a fraction of the time litigation does, brings about settlements which all sides can agree to, eliminates appeals, is easy to enforce if necessary, and respects and restores relationships then you know why Singapore’s Chief Justice Sundresh Menon says, “What’s not to like about mediation?” It is a no-brainer to use mediation as a central peg of reform. What is necessary, however, is to devise and implement sensible policies and strategies to encourage resort to it; and principal amongst these is to make it a professionally attractive career option for mediators who are willing to make a living by being peacemakers. An Indian Mediation Service can be created on the lines of the judicial service. And both incentives and disincentives must be devised for existing and prospective litigants to try this consensual method in good faith. That is all that is necessary; guide the horse to the pond, and more often than not, he will drink from it and savour the nectar of settlement and amity.
Reform can succeed
When we look at the crushing backlogs of Indian courts even the bravest feel daunted, and every Chief Justice probably feels like the Greek mythological figure of Sisyphus vainly, and in eternity, rolling the boulder up the hill only for it to roll back. Conventional reform prescribes more of the same — more judges, more courts, more staff, more infrastructure. But we know that we do not have the resources of either money or men and women. And, surely, we are tired of constant bewailing of the obvious and ever present problems. These suggestions offer a strikingly different approach, one which garners and puts to best use excellent available resources, technological and personal, and can make a telling impact. And they will show that innovation and reform can succeed, a message that is much needed. When necessity and possibility converge, sparks get ignited. To recall Sri Aurobindo in his great writing The Hour of God, the moment has arrived; but will we lose it because the lamp has not been kept trimmed for the welcome and the ears are sealed to the call?
Date:19-12-22
Good governance beyond motherhood and apple pieThe cliches and platitudes are now a thing of the past, with the country having made a lot of progress, but more needs to be done in what is an endless quest.Srivatsa Krishna is an IAS officer.
“So, they [the government] go on in strange paradox, decided only to be undecided, resolved to be irresolute, adamant for drift, solid for fluidity, all-powerful for impotency,” said Sir Winston Churchill on governance.
Churchill’s definition of (bad) governance is applicable even 100 years after he spoke so sagaciously. One of the big achievements of Prime Minister Narendra Modi is that while administrative reforms are, usually, all about motherhood and apple pie proclamations such as “wash your hand before you eat”, he has turned at least some of it into action. Usually, good governance has meant cliches and platitudes such as “corruption is bad for good governance”, “we should cut red-tape in the country”, and “we should use more e-governance in India”, but that is now a thing of the past.
First, the Modi government (thanks to the stellar work of economist Bibek Debroy) has repealed an estimated 2,000 Acts, statuettes and subordinate legislation which include dozens of Appropriation acts, the Excise Act 1863, Foreign Recruiting Act 1874, Elephants Preservation Act 1879, and Bengal Districts Act, 1836 to name just a few. There is a long way to go, especially for State governments, where such obsolete laws are often tools for rent seeking.
Karnataka is one of India’s fastest growing States, with a GSDP of ₹20.50 lakh crore, 38.34 lakh enterprises, 9.2 lakh provident fund payers, and 70.84 lakh workers. It has 1.1 crore students in schools and 21.8 lakh students pursuing higher education. The State is also the highest exporter of IT services. However, Karnataka ranked 17th in the 2019 Business Reforms Action Plan (BRAP) national rankings, and this presents a significant opportunity for driving institutional reforms with respect to compliance. Avantis RegTech has studied industries and compliance across Indian States and concludes that Karnataka features in the top five States in India in terms of compliance burden. This report highlights 26,134 criminal clauses across India and almost 40% of compliances can send an entrepreneur to jail. Karnataka’s employers confront a total of 1,175 State-specific jail clauses and ranks among the top five in the country. A micro, small and medium enterprise operating in Karnataka currently deals with an average of 778 compliances annually across labour, finance, and taxation, secretarial, environment, health and safety, industry-specific and commercial categories. Imagine the scope for similar good governance across sectors and across 30 States.
Second, for 30 years from 1998, any pecuniary benefit to any private parties, without public interest, regardless of whether there was an intent to cause such gains or not, was construed as criminal misconduct by a public servant. Therefore, even honest officers had to face this cruel law. Thus, if one were to buy laptops from vendor x for a department, and vendor z offered it a few thousands cheaper, one could be hauled up, even without mens rea. This government finally scrapped this provision of the Prevention of Corruption Act, thereby enabling good governance, by allowing officers to act without fear.
Enterprise DigiLocker, compliance portal
Third, another possible small step towards good governance is the DigiLocker (an integral part of the India stack) now has more than five billion documents and 100 million users. Likewise, the Union and State governments can set up enterprise DigiLockers to store all documents that any small or large business is expected to possess (Pan card, GSTN number, Aadhaar card, bank account details, etc.). Multiple departments which seek the same information over and again (often charging a price for it) can just download these at the click of a button. It is simple to set up and will enable another kind of good governance. Karnataka has implemented KUTUMBA (family beneficiary database), FRUITS (Farmer Registration and Unified beneficiary Information System), SVAMITVA (drone-based property and land mapping, or Survey of Villages Abadi and Mapping with Improvised Technology in Village Areas) and GraamaOne (single point assistance centre for citizen centric activities at panchayat level), all leading to more good governance.
Fourth, today no State government or the Government of India has any common portal, through which businesses even get to know fully the extent of the compliance burden which is spread across multiple departments and agencies. The simplest thing to do would be to create a common portal where all the compliances for a particular industry are listed as well as an update of periodic changes to government orders or any court judgment. This will ensure that an entrepreneur or a businessman does not have to search for information across 40 to 50 different websites. The Reserve Bank of India has the concept of a “master circular” which should be adopted by governments too.
Fifth, the use of technology is critical in engendering good governance. Some examples abound in Government already, and many more are possible. There are startups such as Avantari and Rephrase.ai which use artificial intelligence and machine learning (AI/ML) to create “mass personalization” in advertising and communication. Imagine the Prime Minister or a Chief Minister addressing every citizen of his constituency by name and having a personalised message about the various welfare schemes. Or a Chief Minister inviting the Top Fortune 500 CEOs by name and with a specific incentive about their industry, to invest in his State. All this is happening with AI-augmented videos.
The issue of who pays
Lastly, everyone aspires for a better standard of living and life — this is as universal as the sun rising in the East. I can bet there is no one in India who does not want the quality of health care that is there in Scandinavia or the United States. However, India’s tax to GDP ratio hovers around 11%-12% as against 45% in the U.S. One is not aware of a single Budget meeting where any industry association or leader would say tax us more in national interest and use the funds to improve primary health care in the country. Everyone says, leave me alone, but tax my neighbour. So, where should the Indian government find resources for providing U.S.-like health care with India-like taxes? Good governance is also the responsibility of enlightened citizens who should give some thought to complex trade-offs like these and not just only demand good governance but also contribute to it.
In sum, India has made a lot of progress on good governance beyond motherhood, but it is an endless journey; not a one-off destination to be reached. As India enters its good governance week (December 19-25, 2022), we can be satisfied that we will soon prove Churchill wrong.
Date:19-12-22
बढ़ती जरूरतों के बीच ऊर्जा का विकल्पसुशील कुमार सिंह
भारत भौगोलिक रूप से उष्ण कटिबंधीय देशों में शुमार है, जहां साल में तीन सौ दिन धूप खिली रहती है। जाहिर है, इससे सौर ऊर्जा के मामले में भारत मजबूत देश बन सकता है। हालांकि अभी इस दिशा में उतने पुख्ता इंतजाम नहीं किए गए हैं, जितने होने चाहिए। मगर पारंपरिक माध्यमों से बिजली पैदा करना लगातार महंगा होता जा रहा है, इसलिए सौर ऊर्जा एक बेहतर विकल्प बन कर उभर रही है। गौरतलब है कि 2035 तक देश में सौर ऊर्जा की मांग सात गुना बढ़ने की संभावना है। भारत की आबादी कुछ ही समय में चीन से अधिक हो जाएगी। ऐसे में दुनिया के सबसे बड़े आबादी वाले देश को बिजली की जो जरूरत होगी उसमें सौर ऊर्जा कहीं अधिक प्रभावशाली रहेगी। तथ्य यह भी है कि पर्यावरण के लिहाज से भी सौर ऊर्जा कहीं बेहतर विकल्प है।
भारत की ऊर्जा मांग का एक बड़ा हिस्सा तापीय ऊर्जा द्वारा संभव होता है, जिसकी निर्भरता जीवाष्म र्इंधन पर है। वैसे विश्व भर में केवल ऊर्जा उत्पादन से प्रति वर्ष लगभग बीस अरब टन कार्बन डाईआक्साइड और अन्य दूषित तत्त्व निकलते हैं, जो जलवायु परिवर्तन के लिए जिम्मेदार हैं। जाहिर है कि सौर ऊर्जा कार्बन उत्सर्जन में कटौती में भी मदद करती है। सौर ऊर्जा, ऊर्जा का एक ऐसा स्वच्छ रूप है, जो पारंपरिक ऊर्जा स्रोतों का बेहतरीन विकल्प है।
विकासशील अर्थव्यवस्था वाला भारत ऊर्जा के कई विकल्प आजमाता रहा है। औद्योगीकरण, शहरीकरण समेत कृषि और रोजमर्रा की बिजली से जुड़ी आवश्यकताओं से भी भारत को नई-नई चुनौतियां मिलती रही हैं। उच्च जनसंख्या घनत्व के चलते जहां एक ओर सौर संयंत्र स्थापित करने के लिए भूमि की उपलब्धता कम है, वहीं परंपरागत ऊर्जा से जरूरत भर की आपूर्ति होना भी संभव नहीं है। फिर सौर ऊर्जा केवल एक सुखद पहलू नहीं है, इससे उत्पन्न कचरा भविष्य की चुनौती हो सकता है। फिलहाल भारत ई-कचरा, प्लास्टिक कचरा समेत कई कचरों के निपटान को लेकर मुश्किलों में फंसा है। अनुमान है कि 2050 तक भारत में सौर कचरा 18 लाख टन के आसपास होने की संभावना है। इन सबके अलावा भारत को अपने घरेलू लक्ष्यों को प्राथमिकता देने और विश्व व्यापार संगठन की प्रतिबद्धताओं के बीच भी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है।
फिलहाल सौर ऊर्जा के इस्तेमाल को बढ़ावा देने के लिए केंद्र और राज्य सरकारें विभिन्न योजनाएं भी चला रही हैं। बहुत कम दाम पर सोलर पैनल उपलब्ध कराए जा रहे हैं। सौर संयंत्र लगाने पर सबसिडी का भी प्रावधान है। पर इस बात को भी समझना होगा कि भारत में हर पांचवां व्यक्ति गरीबी रेखा के नीचे है। झुग्गी-झोपड़ियों से लेकर कच्चे मकानों की तादाद भी यहां बहुतायत में है। 2011 की जनगणना के अनुसार देश में साढ़े छह करोड़ लोग झुग्गी-झोपड़ियों में रहते हैं और करोड़ों बेघर हैं। ऐसे में सोलर पैनल लगाना अपने तरह की एक चुनौती है। भारत सरकार ने 2022 तक दो करोड़ पक्के मकान देने का वादा किया था। अगर ये मकान उपलब्ध हो जाएं तो शायद वे सोलर पैनल लगाने के काम भी आएंगे।
सरकार ने 2022 के अंत तक नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता का जो लक्ष्य 175 गीगावाट निर्धारित किया है। इसमें पवन ऊर्जा साठ गीगावाट, बायोमास दस गीगावाट और जल विद्युत परियोजना महज पांच गीगावाट शामिल है, जबकि इसमें सौ गीगावाट अकेले सौर ऊर्जा का है। हालांकि जिस दर से बिजली की आवश्यकता बढ़ रही है, उसमें समय के साथ कई गुना बढ़ोतरी करते रहना होगा। मगर यह तभी संभव है, जब सोलर पैनल सस्ते और टिकाऊ हों। इसके साथ ही अधिक से अधिक लोगों की छतों तक ये पहुंच सकें और सोलर पार्क भी बढ़ाए जाएं। चीन की कंपनियों के साथ भारत की वस्तुओं की हमेशा स्पर्धा रही है। भारतीय घरेलू निर्माता तकनीकी और आर्थिक रूप से उतने मजबूत नहीं हैं, इसलिए दूसरे देशों के बाजार पर निर्भरता भी घटानी होगी। सौर ऊर्जा क्षेत्र में रोजगार के नए अवसर की अनेक संभावनाएं मौजूद हैं। आंकड़े बताते हैं कि एक गीगावाट सौर ऊर्जा उत्पादन से प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप से लगभग चार हजार लोगों को रोजगार मिल सकता है। इसके अलावा इसके संचालन और रखरखाव में भी रोजगार के अवसर ढूंढ़े जा सकते हैं।
जहां 2035 तक वैश्विक सौर क्षमता में भारत की कुल हिस्सेदारी आठ फीसद होने की संभावना है, वहीं तीन सौ तिरसठ गीगावाट की क्षमता के साथ वैश्विक अगुआ के रूप में उभरने की संभावना भी है। अंतरराष्ट्रीय सौर ऊर्जा गठबंधन, जिसका शुभारंभ भारत और फ्रांस द्वारा 30 नवंबर, 2015 को पेरिस में किया गया था। उसकी पहल भारत ने की थी। उस वक्त पेरिस जलवायु सम्मेलन चल रहा था। इस संगठन में एक सौ बाईस देश हैं, जिनकी स्थिति कर्क और मकर रेखा के मध्य है। सूर्य साल भर इन्हीं दो रेखाओं के बीच सीधे चमकता है, जिससे धूप और प्रकाश की मात्रा सर्वाधिक देखी जा सकती है। हालांकि विषुवत रेखा पर यही धूप और ताप अनुपात में सर्वाधिक रहता है।
भारत में राजस्थान के थार मरुस्थल में देश की सर्वोत्तम सौर ऊर्जा परियोजना प्रारंभ की गई है। सौर ऊर्जा मिशन के लक्ष्य पर नजर डालें तो 2022 तक बीस हजार मेगावाट क्षमता वाले सौर ग्रिड की स्थापना के अलावा दो हजार मेगावाट वाली गैर ग्रिड के सुचारु संचालन की नीतिगत योजना दिखती है। इसी मिशन में 2022 तक दो करोड़ सौर बत्तियों को भी शामिल किया गया है। ई-चार्जिंग स्टेशनों की स्थापना शुरू कर दी गई है। यह सौर ऊर्जा से चलने वाले वाहनों के लिए एक बेहतरीन कदम है। गौरतलब है कि भारत में वाहन उद्योग ने भी सौर ऊर्जा को तेजी से अपनाना शुरू कर दिया है और ऐसे वाहन बनाए जा रहे हैं, जिन्हें पेट्रोल, डीजल के बजाय सौर ऊर्जा से चलाया जा सके। किसी भी योजना को अंजाम देने के लिए कौशल विकास एक अनिवार्य पक्ष है। किसी भी देश का कुशल मानव संसाधन विकासात्मक और सुधारात्मक योजना के लिए प्राणवायु की भांति होता है। भारत में जहां इसकी घोर कमी है, वहीं लागत को लेकर भी चुनौती रही है।
सौर ऊर्जा की औसत लागत प्रति किलोवाट एक लाख रुपए से अधिक है, जो सभी के बूते में नहीं है। भारत में ढाई लाख पंचायतें और साढ़े छह लाख गांव हैं, जहां खंभा और तार कमोबेश पहुंचे तो हैं, मगर उनमें बिजली कम ही दौड़ती है। ग्रामीण उद्यमिता और वहां के मझोले, छोटे और लघु उद्योग बिजली की कमी से जूझते हैं, जिसके चलते कई कुशलताएं धरी की धरी रह जाती हैं और शहरों की ओर पलायन उनकी मजबूरी बन जाती है। गांवों में डेयरी उद्योग से लेकर कई ऐसे दस्तकारी से जुड़े कारोबार हैं, जिनमें सौर ऊर्जा बेशकीमती योगदान कर सकता है और गांव आत्मनिर्भर बन सकते हैं।
वैसे देखा जाए तो भारत ने सौर ऊर्जा के क्षेत्र में कुछ हद तक कमाल भी किया है। चालू वित्तवर्ष की पहली छमाही में सौर ऊर्जा उत्पादन के चलते 1.94 करोड़ टन कोयले की बचत और 4.2 अरब डालर के अतिरिक्त खर्च से मुक्ति मिली है। सौर ऊर्जा क्षमता से संपन्न शीर्ष दस अर्थव्यवस्थाओं में पांच एशिया महाद्वीप के देश हैं, जिनमें भारत, चीन, जापान, दक्षिण कोरिया और वियतनाम शामिल हैं। फिलहाल सौर ऊर्जा भविष्य की केवल आवश्यकता नहीं, अनिवार्यता होगी। मगर यह पूरी तरह सक्षम और सशक्त तभी हो पाएगी, जब सभी तक इसकी पहुंच बन सकेगी।
Date:19-12-22
अति महत्त्वाकांक्षा की परिणतिडॉ. सुरजीत सिंह गांधी
हाल में राजस्थान के कोटा शहर में तीन छात्रों द्वारा की गई आत्महत्या समाज के समक्ष अनेक यक्ष प्रश्न खड़े करती है, जिनके उत्तर आज तलाशने ही होगे। अपने जीवन लीला समाप्त करने वाले तीनों छात्र कोटा में इंजीनियरिंग और मेडिकल की तैयारी करने के लिए आए थे। लगभग 3800 करोड़ रुपये का कोचिंग व्यवसाय संचालित करने वाला यह शहर भविष्य के सुनहरे सपनों को बेचता है। प्रतियोगिता की दौड़ में मानसिक दबाव को न झेल पाने वाले छात्र आत्महत्या के मार्ग को चुनने के लिए मजबूर हो जाते हैं।
नेशनल क्राइम ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार देश में औसतन दस हजार बच्चे प्रति वर्ष आत्महत्या करते हैं। बच्चों द्वारा की जाने वाली आत्महत्या के आंकड़ों से स्पष्ट है कि इसको रोकने के प्रयास कागजों पर ही हो रहे हैं। अभिभावकों, अध्यापकों, कोचिंग संस्थाओं, समाज आदि को मिलकर सोचना होगा कि बच्चों की आत्महत्याओं को कैसे रोका जाए। प्रत्येक अभिभावक अपने बच्चों को डॉक्टर, इंजीनियर, आईएएस बनाने के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगाने के लिए तैयार है। बच्चों के कोमल कंधों पर अभिभावक अपनी महत्त्वाकांक्षाओं और कुंठाओं का इतना अधिक बोझ डाल देते हैं कि बच्चे अपने सपनों को ही छोड़ देते हैं। कोचिंग संस्थाएं भी मानसिक दबाव पैदा करने में कसर नहीं छोड़तीं। मेडिकल, इंजीनियरिंग, आईआईटी, एमबीए, आईएएस आदि कोचिंग संस्थान अपने आप को इस प्रकार ग्लैमराइज करते हैं कि जीवन में हासिल करने लायक बस यही एक उद्देश्य है। सफल छात्रों को इस प्रकार से हीरो बना कर पेश किया जाता है कि तैयारी करने वाला छात्र आसानी से इनके जाल में फंसता जाता है। कोचिंग संस्थानों के एक-एक बैच में 500 से 600 छात्र होते हैं। बच्चों की योग्यता के आधार पर उनको अलग-अलग बैठाया जाता है। आगे निकलने की होड़ में छात्र स्वयं को अकेला महसूस करने लगते हैं, डिप्रेशन का शिकार हो जाते हैं । जब स्वयं को असहाय पाते हैं, तो आत्महत्या जैसे कदम उठाने को मजबूर हो जाता है।
2019 में आत्महत्या करने वाले 1557 छात्र 18 वर्ष से कम उम्र के थे। इनमें से 30 प्रतिशत से अधिक छात्रों ने परीक्षा में असफल रहने पर आत्महत्या की थी । मेडिकल और इंजीनियरिंग की सीमित सीटों के कारण प्रतियोगिता में सफल होने का दबाव निरंतर बढ़ता जा रहा है। 2022 में जेईई मेंस में करीब 10 लाख लोगों ने परीक्षा दी थी, जिनमें से केवल 40,172 उत्तीर्ण हुए अर्थात उत्तीर्ण होने की दर मात्र 4 प्रतिशत है। आईआईटी की 16,000 सीटों के सापेक्ष उत्तीर्ण होने की दर मात्र 1.6 प्रतिशत थी। नीट में 17 लाख से अधिक छात्र परीक्षा में बैठे थे जिसमें यह दर 5 प्रतिशत रही। आईएएस की लगभग 1000 सीटों के लिए लगभग 6 से 7 लाख लोग परीक्षा देते हैं । सरकारी नौकरी के प्रति आकर्षण के कारण युवा अपने जीवन के उत्पादक वर्ष इन कोचिंग संस्थानों में ही बिता देते हैं। हमें समझना होगा कि जीवन प्रतियोगिता नहीं है, और न ही हम मशीनों का निर्माण कर रहे हैं। समाज में लोगों की सामूहिक जिम्मेदारी है कि बच्चों को मेहनती, समझदार और अच्छे इंसान बनने के लिए प्रेरित करे जिससे कि वे जीवन में सफल हो सकें। जीवन के संघर्षों में अंक तालिकाएं काम नहीं आतीं, बल्कि बच्चे को व्यावहारिक ज्ञान ही दिशा दिखाता है। इस परिवर्तन की शुरुआत अभिभावकों को करनी होगी। समझना होगा कि प्रतियोगिता में सफलता ही जीवन का मापदंड नहीं है। प्रत्येक बच्चे की प्रकृति अलग होती है, स्वभाव और मानसिक स्तर अलग होता है । प्रत्येक स्कूल और कोचिंग संस्थान के लिए काउंसलर और मनोवैज्ञानिक की नियुक्ति को अनिवार्य किया जाना चाहिए | तनाव एवं दबाव प्रबंधन से संबंधित कक्षाओं के संचालन को बढ़ावा देने हेतु इसे सीबीएसई के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाना चाहिए। 13 से 19 वर्ष तक के बच्चों को, जब वे भावनात्मक परिवर्तन के दौर से गुजर रहे होते हैं, के मानसिक स्तर पर विषेश ध्यान दिए जाने की आवश्यकता है। इस उम्र में मां-बाप, अध्यापक, कोचिंग संस्थान, समाज आदि की असंवेदनशीलता बच्चों में गुस्सा, चिड़चिड़ापन और विद्रोह भर देती है जिससे बच्चा अपने केंद्र बिंदु से ही दूर हो जाता है। शिक्षा व्यवस्था भी इस प्रकार की होनी चाहिए कि छात्र जिज्ञासु बनें न कि मानसिक दबाव महसूस करें।
जरूरी है कि बच्चों को कोई स्किल सीखने के लिए प्रेरित किया जाए जिससे वे आत्मनिर्भर बन सकें । यद्यपि नई शिक्षा नीति में इन विषयों को समाहित किया गया है परंतु समय ही बताएगा कि यह नीति कसौटी पर कितनी खरी उतरती है। कोटा में आत्महत्याओं से हमें सबक अवश्य सीखना होगा कि आखिर, हम कैसे भविष्य का निर्माण करना चाहते हैं। युवा ही देश की विरासत को बढ़ाने और विकास को आकार देने में सक्षम हैं। केंद्र एवं राज्य सरकारों को मिलकर इस दिशा में ठोस प्रयास करने होंगे ।
Date:19-12-22
विचारों से मुंह मोड़कर बढ़ती राजनीतिहरजिंदर, ( वरिष्ठ पत्रकार )
जैसे यह राजनीतिक अस्तित्व की सबसे जरूरी शर्त हो। अब जब आम आदमी पार्टी ने गुजरात विधानसभा चुनाव में 12.9 फीसदी वोटों के साथ राष्ट्रीय दल बनने की अहर्ता हासिल कर ली है, उसकी विचारधारा के बारे में सवाल पूछे जाने लगे हैं। राजनीति के कई विद्वान, विश्लेषक और टिप्पणीकार इस बात से हैरत में हैं कि एक ऐसी पार्टी ने अपनी आधी अधूरी सफलताओं से राष्ट्रीय होने का दर्जा कैसे हासिल कर लिया, जिसकी कोई विचारधारा कहीं भी स्पष्ट नहीं नजर आती।
वैसे विचारधारा की यह पहेली आम आदमी पार्टी के जन्म के साथ ही उससे जुड़ी रही है। दिल्ली में हुए एक आंदोलन से जन्मे बच्चे का गोत्र पता नहीं, इसलिए उसकी राजनीति बहुतेरे पंडित लंबे समय से तय ही नहीं कर पा रहे! मुफ्त बिजली, पानी, शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं जैसी नीतियों से जब कुछ लोग इस पार्टी को वामपंथी साबित करने के लिए निकलते हैं, तो उन्हें दिखाई देता है कि पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल चुनावी लाभ के लिए हनुमान चालीसा का सार्वजनिक पाठ कर रहे हैं। बहुत से लोग तो उसे भाजपा की बी-टीम ही मानते हैं, जबकि कुछ के लिए वह महज कांग्रेस द्वारा रिक्त किए जाने वाले स्थानों की पूर्ति कर रही है। वैसे एक दौर में कुछ लोगों ने उसे कांग्रेस का दत्तक पुत्र भी कहा था।
कुछ लोग मानते हैं कि यह पार्टी विचारधारा का दौर खत्म हो जाने के बाद जन्मी है। यह एक ऐसे दौर की उपज है, जब राजनीति में विचारधाराएं अप्रासंगिक हो चुकी हैं। एक के बाद एक आने वाली ज्यादातर सरकारें तकरीबन एक ही तरह से काम करती दिखाई देती हैं। फिर जिस तरह से और जिस तेजी से भारत की राजनीति में दलबदल होता है, उसे लेकर अक्सर कहा जाता है कि इस राजनीति में अगर कोई सबसे बड़ा वाद है, तो वह अवसरवाद ही है। जिसे हम लंबे समय तक समाजवादी समझते रहे, एक दिन अचानक पता चलता है कि वह हिंदुत्ववादी हो गया। कई बार इसका उलटा भी दिखाई देता है।
मार्च 2020 में कांग्रेस के युवा नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया ने जब पार्टी छोड़कर भाजपा का दामन थामा, तो राहुल गांधी ने उनके बारे में टिप्पणी की थी कि उन्होंने अपनी विचारधारा को छोड़ दिया है। तब कुछ लोगों ने चौंक कर पूछा था कि आखिर कांग्रेस की वह विचारधारा है क्या, जिसे ज्योतिरादित्य सिंधिया ने बीच रास्ते छोड़ दिया? कांग्रेस देश की अकेली ऐसी पार्टी है, जिसकी विचारधारा हमेशा सवालों के घेरे में रही है। मगर यह कभी नहीं कहा गया कि कांग्रेस की कोई विचारधारा ही नहीं है। कांग्रेस के जितने विचार रहे हैं, उससे ज्यादा उसकी व्याख्याएं रही हैं। कुछ विद्वानों का विचार है कि कांग्रेस एक बड़े तंबू वाला दल है, जिसे आधुनिक राजनीतिशास्त्र की भाषा में ‘बिग टैंट पार्टी’ कहा जाता है। ऐसे दलों की विशेषता होती है कि उनकी छत्र-छाया में तरह-तरह की विचारधाराएं पलती और बढ़ती रहती हैं। कांग्रेस में वामपंथ से लेकर दक्षिणपंथ तक का पूरा स्पैक्ट्रम मौजूद रहा है। इसीलिए वह समय-समय पर अलग रंग में नजर आती है। आपको कौन-सा रंग नजर आ रहा है, यह इस पर भी निर्भर करता है कि आप उसे कहां खड़े होकर देख रहे हैं।
हम जिस समय यह बात कर रहे हैं, उस समय देश में जिस पार्टी का शासन है, वह साफ तौर पर खुद को हिंदुत्व विचारधारा की पार्टी मानती है। हालांकि, यह स्पष्ट नहीं है कि कितना यह विचारधारा का मामला है और कितना चुनावी रणनीति का? कितना यह देश को बदलने का मामला है और कितना यह अपने लिए देश में एक स्थायी वोटर वर्ग तैयार करने का? मगर एक बात तय है कि पार्टी अपनी विचारधारा को उस तरह बख्तरबंद ढंग से अपने साथ लेकर नहीं चल रही, जैसे कि वामपंथी पार्टियां अपनी विचारधारा को लेकर चलती रही हैं। आपका कोई भी इतिहास रहा हो, आप किसी भी विचारधारा को मानने वाले रहे हों, आप किसी भी पार्टी के हों, अगर भाजपा को आपमें कुछ लाभ नजर आता है, तो आपका वहां स्वागत है। चुनाव में आपको पार्टी का टिकट भी मिल सकता है और मंत्री-मुख्यमंत्री का पद भी। देश के वामपंथी दलों में यह सुविधा किसी के लिए भी उपलब्ध नहीं है।
भाजपा को यहीं छोड़कर फिर लौटते हैं आम आदमी पार्टी की ओर। उसकी विचारधारा की बात करते हुए कुछ लोगों ने अमेरिकी समाजशास्त्री डेनियल बेल का भी हवाला दिया है। पिछली सदी के छठे दशक में डेनियल बेल ने एक किताब लिखी थी – द एंड ऑफ आइडियोलॉजी यानी विचारधारा का अंत। हालांकि, डेनियल बेल ने जो बात कही थी, उसका संदर्भ दूसरा था। आम आदमी पार्टी की जेब में कोई विचारधारा न होने को इससे जोड़कर नहीं देखा जा सकता। डेनियल बेल खुद अपने बारे में कहते थे- अर्थशास्त्र के मामले में मैं समाजवादी हूं, राजनीति के मामले में उदारपंथी और संस्कृति के मामले में मैं कट्टरवादी हूं। विचार और विचारधारा खत्म हो गई, यह बात उन्होंने सीधे तौर पर कभी नहीं कही।
पिछले छह सात दशक में पूरी दुनिया में यह धारणा बनी है कि बख्तरबंद विचारधाराओं का युग अब खत्म हो गया। लेकिन इसका अर्थ नहीं है कि किसी विश्व दृष्टि की जरूरत भी अब नहीं है। मूल्यों, अधिकारों और संसाधनों के इस्तेमाल को लेकर अलग-अलग नजरिये ही नहीं होंगे, तो लोकतंत्र का अर्थ भी क्या है। इसलिए जब किसी पार्टी से उसकी विचारधारा पूछी जाती है, तो आशय यही होता है कि इन चीजों के बारे में वह क्या सोचती है? दलितों को लेकर, पिछड़ों को लेकर, अल्पसंख्यकों आदि के सशक्तीकरण पर उसकी क्या राय है? गरीबी और बेरोजगारी उन्मूलन के लिए वह किस रास्ते को चुनना चाहती है?
मगर ये सवाल हम उस समय पूछ रहे हैं, जब हमने राजनीति में विचारधाराओं को बेमतलब बना दिया है। तरह-तरह की राजनीति की शुरुआत भले ही जिस बड़े और महान लक्ष्य के साथ हुई हो, वह अब महज वोट बैंक पर सिमट गई है। वोट न तो विचारों पर मांगे जाते हैं और न ही मिलते हैं। ऐसे में, आम आदमी पार्टी से उसकी विचारधारा पूछना उसके साथ ज्यादती ही होगी। विचारों का सवाल तब आएगा, जब हम भारतीय राजनीति में विचारों की ठीक से प्राण-प्रतिष्ठा कर लेंगे। अगर बिना विचारधारा के वोट मिल सकते हैं, तो ऐसी पार्टियां बनेंगी ही, जिनकी कोई विचारधारा न हो। उन्हें आप कैसे रोक सकते हैं?
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भारतीय शहर आर्थिक रूप से कमजोर हैं। हाल ही में नगर निकायों की वित्तीय स्थिति पर आरबीआई की अभी तक की एकमात्र रिपोर्ट आई है। इससे जुड़े कुछ तथ्यात्मक बिंदु-
शहरी नियोजन और कुशल प्रशासन के लिए शहरों में ऐसे बुनियादी ढांचे के निर्माण की योजना बननी चाहिए, जो लचीली हो और स्थिरता दे सके। इस हेतु निकायों को निर्णय और निवेश लेने के लिए सशक्त होना होगा।
‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 19 नवबंर, 2022
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Date:17-12-22
Big B, Bigger MessageGovts can’t join ‘outrage brigade’ targeting filmsTOI Editorials
A political war of words has very, very predictably broken out over Amitabh Bachchan’s comments at a Kolkata film festival inauguration. The veteran actor drew attention to how moral policing and checks on freedom of expression hamstring India’s entertainment industry today. A look back at how hurt-sentiment brigades have targeted most big releases this year establishes the factuality of Bachchan’s statements. As this is neither a new phenomenon nor unique to any particular ideological dispensation, all political posturing against it is hypocritical to the point of absurdity. It is beyond this posturing that the stakes are real and high.
After a two-year slump and thanks in large part to southern surprises, 2022 will have a cheery box office report. Like every other entertainment industry, India’s opportunities are more global than before and so is the competition obviously. The public sphere that now includes a raucous social media is also more Babelic than ever. This means that outrage against some title, some song, some dialogue … will only rise and rise. This is freedom of expression. This is fine. Governments have an altogether different role – helping India’s economic and soft power grow alongside the industry.
In 2018, the Supreme Court had hauled up four states for crippling the exhibition of Padmaavatafter it had already been certified by the censor board. This is what MP home minister Narottam Mishra, demanding changes in the upcoming Pathaan, must be reminded today. Even as the film is accused of disrespecting “Hindu sentiments” for featuring a saffron-coloured bikini, on the other side the MP Ulema Board is calling for its ban for hurting “Muslim sentiments”. Governments have to safeguard the industry from being ground up between sundry opinions. Protect ease of doing business – and audiences’ freedom to choose.
Date:17-12-22
Medical MannaPublic health must offer incentives to recruit doctorsTOI Editorials
The increase in undergraduate medical seats from 53,000 in 2014 to 96,000 in 2022 and postgraduate seats from 31,000 seats to 63,000 raises hopes that India’s problem of too few doctors in rural areas and backward states can be fixed. India’s 9 active doctors per 10,000 population trail China (22), US (26) and UK (30) but at our current pace of adding nearly 1 lakh doctors a year, these deficits will be wiped out in 10-20 years. More importantly, with thousands of new doctors, the public health system must grow massively to absorb them into its ranks.
Between 2011 and 2021, government medical seats have increased faster, from 18,000 to 48,000 seats, while private seats went from 22,000 to 44,000. Graduates from government colleges have bonds mandating rural service for 1-2 years. But offering government jobs at attractive salaries can keep them invested and correct the skew of graduating doctors preferring cities.
Migration of medical graduates from south to north could help. All southern states have over 10 UG seats per 10,000 population because they invested early in medical education. Corresponding numbers in UP and Bengal are 4, Bihar and Jharkhand 2. But UP, along with Tamil Nadu, has the most medical seats and Bihar is among the states recording highest increase in private medical seats. GoI is prioritising new medical colleges in underserved areas. These are positive trends. However, while quantity gets addressed thus, ensuring quality medical education could prove tougher.
Date:17-12-22
3 Criteria to Succeed: Talent, Talent, TalentSuccession planning key to businessesET Editorials
NR Narayana Murthy deserves credit for his admission that he was ‘completely wrong’ in not allowing Infosys’ founders’ children to take up active roles in the company he co-founded. He said that the move, had it been allowed, would have eased the succession process. It turns the spotlight on the leadership and succession planning challenges faced by Indian promoters. The predominant view that professional managers are somehow more successful than family members in running a business is misplaced. Likewise, the notion that letting family members take up top jobs may degrade the level of commitment and the sense of ownership among employees and lead to higher attrition rates is baseless. Of course, no undeserving candidate should be inducted in an organisation simply because of family ties. Talent should not be barred just because of genes, but checks must be in place that weed out any nepotism.
Competency holds the key for hiring the best talent that offers itself to fill top positions. This is where sound methods of selection by an independent board count. Candidates who would best address the interests of the company and the shareholders, rather than just the promoters’, should make the cut. An independent board must also have the willingness to rock the boat in pursuit of management accountability to shareholders.
It is equally important for a selected family member to earn the respect of employees and let them know that she or he has the requisite skills to keep running and growing the business. Many of India’s biggest companies have grown through competencies enhanced within the family tree. Succession planning is key to businesses, and shareholders do see value in accepting their promoters’ influence across generations.
Date:17-12-22
शराबखोरी के खिलाफ प्रबुद्ध वर्ग चेतना जगाएसंपादकीय
शराबखोरी को कई बार कानून बनाकर रोकने की कोशिश होती है। शराब गैर-कानूनी रूप से बिके, अवैध रूप से बनाई जाए, नकली / जहरीली शराब से लोगों की मौत हो तो सरकार को इस बात के लिए दोषी माना जाएगा। लेकिन क्या सिर्फ सरकार को दोषी मानना सही है? एक तर्क है कि जहां अमीरों को ज्यादा पैसे खर्च कर अच्छी शराब उपलब्ध हो जाती है, वहीं ये गरीब घटिया और जहरीली शराब पीने और मरने को मजबूर होते है। ऐसा तर्क देने वाले यह नहीं सोचते कि शराबखोरी की कीमत अमीर के लिए वही नहीं होती जो एक गरीब के लिए। गरीब का परिवार उजड़ता है, बच्चे पैसे के अभाव में स्कूल नहीं जाते, घर का वातावरण दूषित होता है और शांति गायब हो जाती है। लिहाजा अगर कानून इजाजत नहीं देता तो इसलिए कि उस घर के मुखिया को छोड़ पत्नी और बच्चे भी नहीं चाहते कि उनका पति या पिता मजदूरी कर 200 रुपए कमाए और उसमें से 100 रुपया शराब पर और बाकि लड़ाई-झगड़ा कर थाना पुलिस और मुकदमे में खर्च करे। समय है जब समाज का प्रबुद्ध वर्ग और राजनीतिक दल का जो तबका शराब की तस्करी और नकली / जहरीली शराब बनाने पर प्रभावी रोक न लगाने पर सरकार को कटघरे में खड़ा कर रहा है वह समाज में भी नई शराबखोरी के खिलाफ नई चेतना लाने की कोशिश करे।
Date:17-12-22
सभी के लिए एक नागरिक संहिता में बुराई क्या है?मकरंद परांजपे, ( जेएनयू में प्राध्यापक )
जैसे ही राजस्थान के भाजपा सांसद किरोड़ी लाल मीणा ने राज्यसभा में समान नागरिक संहिता यानी यूसीसी को प्रस्तुत किया, अल्पसंख्यकवादी सेकुलर-लॉबी सक्रिय हो गई। उनका मकसद स्पष्ट था। वे इस विधेयक और उसके प्रस्तोता दोनों को अमान्य करना चाहते थे। राष्ट्रीय दैनिकों और पोर्टलों में इस आशय के शीर्षक दिखाई देने लगे कि ‘यूसीसी पर राज्यसभा में अराजकता!’ या ‘भाजपा के राज्यसभा सांसद के कारण विपक्षी बेंचों पर कोलाहल हुआ!’ विधेयक में व्यवधान डालने की कोशिशों के बावजूद उसे सफलतापूर्वक प्रस्तुत किया गया और 63 सदस्यों ने उसके पक्ष और 23 ने विपक्ष में वोट डाले। कोई भी सजग नागरिक पूछ सकता है कि आखिर इस पर कोलाहल क्यों हुआ? गौर करने वाली बात यह है कि अलग-अलग पर्सनल लॉ ब्रिटिश राज की विरासत हैं। यह उनकी बांटो और राज करो की प्रशासनिक नीति के अनुरूप था। मजे की बात है कि आज गोवा ही इकलौता ऐसा राज्य है, जहां यूसीसी है, जबकि वह पुर्तगाली उपनिवेश था।
स्वतंत्र भारत में यूसीसी लाने की कोशिश की गई थी और इसे प्रधानमंत्री नेहरू और कानून मंत्री आम्बेडकर का समर्थन प्राप्त था। लेकिन इसके बजाय हिंदू कोड बिल लाया गया। संविधान ने सिखों, बौद्धों और जैनों को भी हिंदू की श्रेणी में रखा था। मुस्लिम, ईसाई और पारसी इससे बाहर रखे गए। इसका खामियाजा इन समुदायों की स्त्रियों ने ही सबसे ज्यादा भुगता, जैसा कि बाद में शाहबानो मामले में देखा गया। तीन तलाक का उन्मूलन इसी कड़ी में देरी से किया गया भूलसुधार था। इस साल कई राज्यों में यूसीसी पर फिर से बहस गर्म है। इनमें उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड, गुजरात और केरल शामिल हैं। यूसीसी का सबसे कड़ा विरोध ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहाद-उल मुस्लिमीन या एआईएमआईएम द्वारा किया जा रहा है, जो इसे असंवैधानिक और अल्पसंख्यक-विरोधी बता रहे हैं। तथाकथित सेकुलर आलोचक भी इससे सहमत हैं। जैसी कि उम्मीद की जाती है, विदेशी मीडिया ने भी इस पर अपना रुख जाहिर कर दिया है और इसे देश पर हिंदुत्व थोपने की एक और कोशिश बताया है।
जहां तक विधेयक को प्रस्तुत करने का सवाल है तो हमें याद रखना चाहिए कि यह एक निजी सदस्य बिल था, जिसे किसी राजनीतिक दल का अधिकृत समर्थन नहीं था। वैसे भी प्राइवेट मेम्बर्स बिल आसानी से कानून नहीं बनता है। वह अमूमन लम्बित विधेयकों के ठंडे बस्ते में चला जाता है। विधेयक का विरोध करने वाले पूछ रहे हैं कि किरोड़ी लाल मीणा कौन हैं। उन्हें बताया जाना चाहिए कि 70 वर्षीय वयोवृद्ध राजनेता न केवल एमबीबीएस हैं, बल्कि अपने राज्य और समुदाय में वे बहुत सम्मानित भी हैं। उन्होंने दूसरी बार यह विधेयक रखने का प्रयास किया है। मार्च 2020 में भी वे एक बार इसकी कोशिश कर चुके थे।
राज्यसभा में विधेयक का विरोध करते हुए द्रमुक के तिरुचि शिवा ने कहा कि यह सेकुलरिज्म के विरुद्ध है। क्या उन्हें नहीं पता कि यूसीसी एक नीति निर्देशक सिद्धांत के रूप में हमारे संविधान का अनुच्छेद 44 है। उसमें कहा गया है कि राज्यसत्ता पूरे भारतीय परिक्षेत्र में नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता को सुनिश्चित करेगी। यानी संविधान के अनुसार यूसीसी को प्रस्तुत और लागू करना भारतीय गणराज्य का दायित्व है। तो क्या हमारा संविधान ही सेकुलरिज्म के विरुद्ध है? विधेयक को रोकने के लिए यह भी कहा गया कि इससे देश बंटेगा और उसकी संस्कृति-बहुलता को ठेस पहुंचेगी। तो क्या देश की एकता तभी कायम रहेगी, जब अल्पसंख्यकों के लिए पृथक से नियम होंगे? और क्या भारतीय विविधता का यह अर्थ है कि कानून की नजर में अलग-अलग समुदायों के साथ अलग-अलग व्यवहार किया जाए?
आखिर विवाह, तलाक, उत्तराधिकार आदि से जुड़े मामलों में सभी धर्मों-समुदायों के लोगों के लिए एक समान कानून में क्या बुराई है? इसका यह मतलब नहीं है कि परम्परागत रीतियां समाप्त हो जाएंगी। इससे इतना ही होगा कि अगर किसी नागरिक को लगता है कि उसके साथ जुल्म हो रहा है तो वह अपने लिए न्याय की तलाश कर सकता है। नगालैंड, मेघालय, मिजोरम जैसे विशिष्ट क्षेत्रों के स्थानीय नियम-कायदों की तो संविधान खुद ही रक्षा करता है। यह बात अब धीरे धीरे स्पष्ट हो रही है कि यूसीसी का समय आ चुका है।
Date:17-12-22
जायज है मतांतरण पर चिंताहरेंद्र प्रताप, ( लेखक बिहार विधान परिषद के पूर्व सदस्य हैं )
देश में अनुसूचित जाति और जनजातियों के लिए आरक्षण की व्यवस्था है, लेकिन इस्लाम या ईसाई पंथ में मतांतरित होने पर उनके लिए आरक्षण को लेकर बहस जारी है। इस पर केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में दो-टूक जवाब दिया है कि मुस्लिम और ईसाई पंथ में मतांतरित दलितों को आरक्षण का लाभ नहीं दिया जाना चाहिए। सरकार ने ‘संविधान, अनुसूचित जातियां आदेश, 1950’ का हवाला देकर कहा है कि उस आदेश में इस्लाम और ईसाई पंथ के लोगों को इस कारण उससे बाहर रखा, क्योंकि ये दोनों पंथ यह दावा करते हैं कि उनके यहां छुआछूत वाली व्यवस्था नहीं हैं, इसीलिए जनगणना के कालम में इसका उल्लेख नहीं किया जाता, जबकि हिंदू, सिख और बौद्ध धर्म के अलावा अन्य पंथ मानने वाले अनुसूचित जाति के लोगो को इसमें शामिल ही नहीं माना जाता। यानी अनुसूचित जाति के लोग जैसे ही इस्लाम या ईसाई पंथ स्वीकार करते हैं, वैसे ही वे अनुसूचित जाति नहीं रह जाते।
मतांतरण के बाद आरक्षण का यह पहलू इसलिए भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि अल्पसंख्यकों के संरक्षण के लिए पहले से ही कई प्रविधान हैं और दूसरा पंथ अपनाने के बाद आरक्षण के लाभ की स्थिति में दोहरे फायदे की बात आती है। यह कई लोगों के लिए मतांतरित होने में उत्प्रेरक की भूमिका निभाता है। आंकड़े भी इसकी पुष्टि करते हैं। बिहार का उदाहरण लें तो विगत दो दशकों में सेक्युलर और समाजवादियों की सरकार में भी बिहार ईसाइयों की वृद्धि के मामले में अरुणाचल-370.41 प्रतिशत, सिक्किम-351.29 प्रतिशत के बाद तीसरे स्थान पर है। बिहार में ईसाइयों की संख्या में करीब 351 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। बिहार के मधुबनी जिले में 8055, औरंगाबाद में 3420, दरभंगा में 2406 तथा शेखपुरा में 2135 प्रतिशत ईसाई जनसंख्या वृद्धि दर्ज की गई। जबकि इन जिलों में अनुसूचित जनजाति की जनसंख्या नगण्य है। अतः ईसाई पंथ में मतांतरित होने वाले अनुसूचित जनजाति के नहीं, बल्कि अनुसूचित जाति या अन्य जाति के लोग हैं। बिहार की राजधानी पटना से सटे नौबतपुर में फादर जय प्रकाश मसीह ने स्वीकार किया कि शौचालय, कंबल और मच्छरदानी का लाभ देकर वे लोगों को ईसाई बना रहे हैं। इसका दूसरा पहलू पंजाब, हरियाणा, चंडीगढ़, दिल्ली और पुडुचेरी में देख सकते हैं, जहां आदिवासी हैं ही नहीं। वर्ष 1971 से 2011 के बीच राष्ट्रीय स्तर पर ईसाई जनसंख्या वृद्धि दर 95.59 प्रतिशत थी। अगर इन पांच में से चार राज्यों को देखें तो पंजाब में 114.68, चंडीगढ़ में 248.24, हरियाणा में 413.70 तथा दिल्ली में 234.15 प्रतिशत ईसाई जनसंख्या वृद्धि दर रही।
संप्रति कुछ अपवादों को छोड़ दिया जाए तो अमूमन हिंदू समाज का कोई वर्ग मुसलमान नहीं बनता, परंतु जहां तक ईसाई पंथ का सवाल है तो देश में अनुसूचित जनजाति और अन्य वर्ग के लोग ईसाई पंथ में मतांतरित हो रहे हैं। इस लक्षित मतांतरण से कुछ वर्गों की चिंता स्वाभाविक दिखती है। मतांतरण के साथ ही कुछ समुदायों विशेषकर मुस्लिमों की बढ़ती जनसंख्या को लेकर भी कुछ वर्ग चिंता जताते रहते हैं। मुस्लिम जनसंख्या में वृद्धि मुख्य रूप से बांग्लादेश से हो रही घुसपैठ, मुसलमानों में बहुविवाह प्रथा तथा अधिक संतानें पैदा करने से हो रही है। इस चिंता के पीछे अतीत के घाव भी जिम्मेदार है। अंग्रेजों यानी ईसाइयों ने भारत पर अत्याचार किए। भारतीय अर्थव्यवस्था को बर्बाद किया। इस्लामिक मुगल शासकों ने भारत के सनातन पूजा स्थलों को ध्वस्त किया तथा बलात मतांतरण कराया। इस्लाम ने तो 1947 में भारत का विभाजन तक करा दिया। स्वतंत्र भारत में इन दो पंथों के विरुद्ध हिंदुओं-सिखों में स्वत: स्फूर्त आक्रोश था। अतः संविधान निर्माताओं ने संविधान में अनुच्छेद-25 का समावेश करते हुए ‘अंतःकरण की और धर्म के अबाध रूप से मानने, आचरण और प्रचार करने की स्वतंत्रता’ तथा अनुच्छेद-26 में ‘धार्मिक कार्यों के प्रबंध की स्वतंत्रता’ का प्रविधान किया। हालांकि, संविधान निर्माताओं का यह डर गलत साबित हुआ। हिंदुओं और सिखों ने मुसलमानों और ईसाइयों का मतांतरण नहीं कराया। अलबत्ता मुसलमान और ईसाई जिस प्रकार पहले मतांतरण करवाते थे, वैसे ही आज भी करवा रहे है। ईसाइयों की ‘चंगाई सभाओं’ का आयोजन खुलेआम छल-कपट है। यह किसी से छिपा नहीं कि छल-कपट-प्रलोभन और तलवार के बल पर इन्होंने पूरे विश्व में अपने पंथ का विस्तार किया। वास्तव में, इन समुदायों ने राज्य संरक्षण की आड़ में अपने पंथ का विस्तार करने की नीति ही अपनाई। इसी कड़ी में वे अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों पर डोरे डाल रहे हैं। चूंकि अनुसूचित जाति की जनगणना में मुसलमान और ईसाई का कोई कालम ही नहीं होता, तो वे अपना बचाव करते हैं कि हम उनका मतांतरण नहीं करवाते हैं। जबकि शिक्षा, स्वास्थ्य और रोजगार आदि का लालच देकर तेजी से मतांतरण का खेल जारी है।
मतांतरण राष्ट्रांतरण होता है। यह 1947 में प्रमाणित हो चुका है और बीते दिनों सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी में प्रतिध्वनित भी हुआ। भारत का वह हिस्सा पहले ही विलग हो चुका है, जहां मुस्लिम बहुतायत में थे। यही आशंका ईसाई बहुल इलाकों को लेकर भी गहरा रही है। संविधान बनाते समय मुसलमानों तथा ईसाइयों पर दबाव डालकर उनका पंथ परिवर्तन कराने की आशंका न केवल निर्मूल साबित हुई, बल्कि इस मामले में तो उलटी गंगा बह रही है। समय की मांग है कि संवैधानिक व्यवस्था से स्पष्ट किया जाए कि सभी को अपना पंथ मानने की स्वतंत्रता तो रहेगी, परंतु किसी भी व्यक्ति को अब इस्लाम और ईसाई पंथ में मतांतरित होने पर उसकी नागरिकता समाप्त कर दी जाएगी।
Date:17-12-22
आनुवंशिक फसलों से पैदा होते खतरेविनोद के. शाह
अब सर्वोच्च न्यायालय को जीएम यानी आनुवंशिक सरसों में फूल आने से पहले नष्ट करने संबंधी याचिका पर निर्णय करना है। देश में जीएम सरसों डीएमएच-11 की व्यावसायिक खेती पर रोक लगाने का मामला विचाराधीन है। याचिकाकर्ता ने इसके फूलों और बीज से पर्यावरण को खतरा बताया है। देश में आनुवंशिक फसलों की व्यावसायिक खेती की अनुमति को लेकर पिछले दो दशक से विभिन्न मंचों पर बहस जारी है। देश के अधिकांश पर्यावरणविद और कृषि विशेषज्ञ आनुवंशिक परिवर्तित खेती में फायदा कम, नुकसान अधिक मानते आए हैं। मगर सरकार ने जेनेटिक इंजीनिंयरिंग मूल्यांकन समिति जीईएसी से व्यावसायिक खेती के लिए जीएम सरसों को मंजूरी मिलते ही इसके उत्पादन की मौन स्वीकृति दे दी थी। इसे विकसित करने वाले संस्थान ने प्रयोग के लिए बीज भी उपलब्ध करा दिया था। विवाद होने के बाद भी यह खयाल नहीं रखा गया कि उत्पादन संबंधी प्रयोग खुले में करने के बजाय ग्रीन हाउस में किया जाए।
पिछले बीस वर्षों से जीएम सरसों के पर्यावरण पर पड़ने वाले कुप्रभाव को लेकर विरोध हो रहा है। सन 2002 में भारत में इसके बीज को भारतीय किस्म वरुणा को पूर्वी यूरोप की किस्म अर्ली हीरा-2 से आनुवंशिक संरचना में परिवर्तन कर तैयार किया गया था। सन 2017 में भारत की जेनेटिक इंजीनियरिंग अनुमोदन समिति ने देश में इस जीएम सरसों की व्यावसायिक खेती करने की इजाजत दी थी। मगर सुप्रीम कोर्ट में इससे पर्यावरणीय खतरों की आशंका को लेकर पर्यावरणविदों द्वारा दायर याचिका के बाद मामला अदालत में लंबित है। देश के कृषि अनुसंधान केंद्रों और सरकार ने भी तब से लेकर अब तक इसे लेकर न तो बहुत अधिक प्रयोग कराए और न ही इसके संबंध में देश के किसानों और जानकारों से राय लेने कि कोशिश की गई है। बल्कि एक बार फिर इसके पक्ष में यह कह कर व्यावसायिक अनुमति दे दी गई कि इस किस्म की खेती से देश में तिलहन के उत्पादन में पहले के मुकाबले तीस फीसद की बढ़ोतरी हो जाएगी। दलील यह भी है कि कनाडा, यूरोप और चीन में सरसों की बयासी फीसद खेती आनुवंशिक बीजों से ही होती है, जहां उत्पादन बहुत अधिक है। जबकि पर्यावरणविदों का मानना है कि संशोधित आनुवंशिक बीजों ने उपयोगकर्ता देशों की परंपरागत सरसों की फसल पर अतिक्रमण कर लिया है।
भारत में 2020-21 में खाद्य तेल की खपत में सरसों तेल की हिस्सेदारी 14.1 फीसद थी। 2021 में सरकार ने अकेले पाम और सूरजमुखी तेल के आयात पर उन्नीस अरब डालर की राशि खर्च की। भारत दुनिया का सबसे बड़ा खाद्य तेल का आयातक है। रूस-यूक्रेन युद्ध की वजह से भारत की चिंता बढ़ी है। यही कारण है कि केंद्र सरकार पर्दे के पीछे रह कर इस विवादित मुद्दे पर बहुत अधिक परिणामों को जाने बगैर इसकी व्यावसायिक खेती बढ़ाने में जल्दबाजी कर रही है। देश के पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश के लगभग पचहत्तर लाख हेक्टेयर कृषि क्षेत्र में सरसों की खेती हो रही है। साथ ही इस फसल के फूलों के माध्यम से देश के कुल शहद उत्पादन का साठ फीसद तैयार हो रहा है। जलवायु परिवर्तन की वजह से विगत दो वर्षों में उत्तर भारत में समय पूर्व तेज गर्मी से गेहूं और दलहन का औसत उत्पादन घट रहा है। इसके चलते इस क्षेत्र का किसान कम समय में तैयार होने वाली सरसों की फसल में रुचि लेने लगा है।
भारत में प्रचलित बीजों के माध्यम से सरसों का उत्पादन प्रति हेक्टेयर एक हजार से बारह सौ किलो माना गया है। जबकि वैश्विक उत्पादन, जो कि आनुवंशिक बीजों से होता है, प्रति हेक्टेयर दो हजार से बाईस सौ किलोग्राम माना जाता है। देश का किसान पर्याप्त सिंचाई उपलब्धता और नई बीज किस्मों से अब प्रति हेक्टेयर अठारह सौ किलो तक उत्पादन लेने लगा है। जीएम सरसों की संरचना को शाकनाशियों के प्रति अत्यधिक सहनशील बनाया गया है, क्योंकि माना जाता है कि खर-पतवार के कारण सरसों फसल के उत्पादन में गिरावट आती है। इस फसल से खर-पतवार को नष्ट करने के लिए ग्लूफोसिनेट अमोनिया समूह का उपयोग अत्यधिक मात्रा में किया जाता है, जो कि जीव, जीवन और पर्यावरण के लिए खतरनाक है। इसके इस्तेमाल से खेतों में काम करने वाले मजदूरों और जानवरों को स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां पैदा होती हैं। सरकार को इस पर भी विचार कर लेना चहिए।
मृदा जलसंरक्षण एवं अनुसंधान संस्थान देहरादून की पूर्व प्रकाशित एक अध्ययन रिपोर्ट में बताया गया है कि अत्यधिक कीटनाशकों, उर्वरकों और खरपतनाशी के प्रयोग से प्रतिवर्ष देश के बड़े हिस्से की उपजाऊ मिट्टी नष्ट होकर बंजर भूमि में तब्दील हो रही है। जहरीले रसायनों के कुप्रभाव से देश की औसतन प्रति हेक्टेयर 16.4 टन मिट्टी जैविकता खो देती है। भारत सरकार एक तरफ शून्य बजट जैविक खेती की बात करती है, मृदा स्वास्थ्य योजना की बात करती है, तो दूसरी तरफ जीएम सरसों को पिछले दरवाजे से खेती की अनुमति देती है, जिसमें खरपतनाशियों का अंधाधुंध इस्तेमाल होने की भरपूर संभावना है। बीटी कपास के परिणाम देश के सामने हैं। सरकारी आकड़ों पर गौर करें तो बीटी कपास की खेती से देश में कपास उत्पादन दस गुना बढ़ा है। मगर इसके विपरीत फसलों में इस्तेमाल होने वाले कीटनाशकों, उर्वरकों और खरपतनाशकों के अत्यधिक प्रयोग से किसानों की उत्पादन लागत कई गुना बढ़ गई है। देश में पहले के मुकाबले बीटी कपास में चालीस फीसद अधिक कीटनाशकों का प्रयोग हो रहा है। बीटी कपास के बीज के लिए किसान पूर्णतया बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर आश्रित हैं। बीटी कपास फसल पर देशी और प्राकृतिक कीटनाशक निष्प्रभावी हैं। इसलिए इनके लिए किसानों को बहुराष्ट्रीय कंपनियों के रसायनों पर पूरी तरह आश्रित रहना ही एकमात्र विकल्प है। बीटी कपास की फसलों में काम करने वाले देश के मजदूरों में त्वचा संबंधी रोग तेजी से उभर कर सामने आए हैं।
आनुवंशिक बीजों से पैदा होने वाली फसलों में पौध उत्पादन की क्षमता मात्र चालीस फीसद तक होती है। इस स्थिति में किसान अपने बीज उत्पादन में अक्षम साबित होता है। उसे बीज के लिए पूरी तरह बाजार और बहुराष्ट्रीय कंपनियों पर निर्भर रहना पड़ता है, जिससे खेती में उत्पादन लागत कई गुना बढ़ रही है। पर्यावरणविदों की यह चिंता अकारण नहीं है कि खरपतनाशी के अत्यधिक उपयोग का असर मधुमक्खियों की प्रजनन क्षमता पर पड़ेगा, अन्य फसल मित्र कीट-पंतगे, जो अन्य फसलों के फूलों में परागण की मदद करते हैं, खरपतनाशी का इस्तेमाल इनके जीवन पर खतरा साबित होगा, जिससे अन्य फसलों की उत्पादन क्षमता भी प्रभावित होगी।
वर्ष 2002 में भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद ने जीएम सरसों के बीज संबंधी अर्जी यह कह कर खारिज कर दी थी कि मैदानी परिक्षणों में फसल बेहतर उत्पादन नहीं देती है। विकसित जीएम सरसों डीएमएच-11 के उत्पादन आंकड़ों के मुकाबले भारतीय फसल बीज वरुणा के उत्पादन आंकड़े बेहतर रहे हैं। अब डीएमएच-11 का अनुसंधान बीस साल पुराना हो चुका है, जबकि विकासशील देश डीएमएच-4 का उपयोग कर रहे हैं। भारत में उपयोग की जाने वाली जीएम सरसों डीएमएच-11 वैश्विक स्तर पर पुरानी पड़ चुकी है। जबकि पूर्णता स्वदेशी कृषि अनुसंधान केंद्र में विकसित पूसा डबल जीरो 31 का उत्पादन बाईस सौ किलो प्रति हेक्टेयर आ रहा है। ऐसे में सरकार को देश में जीएम सरसों की अनुमति के बजाय भारतीय विश्वविद्यालयों और अनुसंधान केंद्रों में विकसित पूर्णतया स्वदेशी किस्मों को बढ़ावा देना चहिए।
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17 December 2022
प्रश्न–389 – मध्यम वर्ग समग्र विकास का केन्द्रक होता है।
भारत के संदर्भ में इस कथन को स्पष्ट कीजिए। (200 शब्द)
Question–389 – The middle class is the nucleus of the holistic development.
Explain this statement with reference to India. (200 words)
नोट : इसका उत्तर आपको हमें नहीं भेजना है, यह आपके स्वयं के अभ्यास के लिए है।
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Date:16-12-22
How We Treat Our First CitizensTribals are still targeted by laws that reek of British Raj prejudice.Arghya Sengupta and Aditya Prasanna Bhattacharya are Research Director and Research Fellow respectively at Vidhi Centre for Legal Policy.
Jaipal Singh Munda was a remarkable man. A skilled orator, an Oxford graduate, Olympian and gold medallist in hockey, Munda was a passionate advocate for tribal rights in the Indian Constituent Assembly. The atmosphere in the Assembly was hostile to tribals.
Ambedkar, adopting the borrowed language of eugenics, had earlier said of tribals: “Thirteen million people living in the midst of civilisation are still in a savage state, and are leading the life of hereditary criminals!” He was opposed to any reservation for tribal persons in legislatures because he felt that “they had not developed any political sense to make best use of their political opportunities. ”
Nehru disagreed but patronised them through safeguards: “Every care should be taken in protecting the tribal areas, those unfortunate brethren of ours who are backward through no fault of theirs. ”
But Munda did not ask for the charity of the Constituent Assembly: “What my people require, Sir, is not adequate safeguards as Pandit Jawahar Lal Nehru has put it … We do not ask for any special protection. We want to be treated like every other Indian. ”
Seven decades on, has this wish been fulfilled? Today, a tribal lady, of which there were none in the Constituent Assembly, is the President of India. Despite all laws finally being enacted with her assent, the legal system continues to treat the tribal person as belonging to an “uncivilised race”. This happens in three ways.
● First, there are many pre-Independence laws that exhibit a deep-seated prejudice towards tribals and continue to remain in force.
● The Sonthal Parganas Act, 1855 is a classic example. Enacted as a response to the Santhal uprising against the East India Company, the Act excludescertain districts in the erstwhile Bengal Presidency from the application of the ‘general Regulations and Acts of Government’.
● The Act is based on a simple premise – Santhals are too ‘uncivilised’ a people to be governed by the legal system. This is not an inference – it is stated explicitly in the preamble of the Act.
● The leaders of the Santhal uprising were Sidhu and Kanhu Murmu, heroes who have rarely featured in any Indian history book. Ironically, the Sonthal Parganas Act, 1855 remains prominent in another book – the Indian statute book.
● Second, the cocktail of protectionism and prejudice continues with postIndependence laws. Introduced in 1952, the Habitual Offenders’ Model Bill replaced the Criminal Tribes Act, 1871 and served as the basis for state-level Habitual Offenders’ Acts.
● The 1871 Act described certain tribes as ‘addicted to the systematic commission of … offences’ and enabled the government to notify them as ‘criminal tribes’. Using this power, nearly 200 tribes were branded hereditary criminals.
With the repeal of this Act, the ‘criminal tribes’ came to be ‘de-notified’. As one would expect, the Habitual Offenders’ Acts, unlike their colonial counterpart, do not explicitly single out these tribes. However, in practice, not much has changed. In almost every state where Habitual Offenders’ Acts are in force, individuals belonging to the de-notified tribes have been disproportionately targeted. The substantive provisions are worryingly similar to those in the 1871 Act.
Take the Bombay Habitual Offenders’ Act, 1959 which is in force in Maharashtra. It empowers a district magistrate toprepare a register of habitual offenders and compel them to provide ‘such information as may be necessary’ to prepare the register. In effect, with tribal persons being targeted, this has meant that all kinds of data on tribes continues to be extracted from them with no regard for their privacy.
This includes photographs, fingerprints, footprints, palm impressions and iris scans. Just like its colonial counterpart, the Bombay Act bars courts from questioning the validity of any direction or order issued under the Act. Tribal persons continue to remain exhibits for the state machinery and not citizens.
● Third, the old colonial idea of primitivism continues under the guise of protecting cultural autonomy. The Fifth and Sixth Schedules of the Constitution lay out a set of special provisions for tribal areas. Among other things, governors are empowered to prevent or modify the application of both central and state laws to these scheduled areas.
● These areas were previously ‘typically and really backward tracts’ under the Government of India Act, 1919 and ‘partially and wholly excluded areas’ under the Government of India Act, 1935.
● The Fifth and Sixth Schedules of the Constitution perpetuate the language, and more worryingly, the patronising logic of these colonial statutes – that there is a need to ‘protect’ the tribal population and ‘help’ them. If that means keep them in a state of permanent exception away from the regular legal system intended for all citizens, so be it.
This is not to say that it is not the duty of the government to address the social and educational backwardness affecting members of the tribal population. But the starting point cannot be one of protection or assimilation, but rather respect and equality.
Sardar Patel, echoed Jaipal Singh Munda and grasped this instinctively in the Constituent Assembly, “All the laws that have given them protection are there. But have they protected them?”
If the aim is to disrupt colonial continuities and decolonise our laws, the first step is to decolonise our minds.
Date:16-12-22
The Indian Innovation That Can Change The WorldThe model that created UPI, Bharat Bill Pay & Aadhaar-bank linkages can benefit every country.Amitabh Kant, [ The writer is India’s G20 Sherpa. ]
During the first two decades of the 21st century, Google, Amazon, Meta, Apple and Microsoft have been at the forefront of a massive explosion in innovation and value creation. They, along with Chinese firms Alibaba and Tencent dominate the global sphere in digital advertising, commerce, messaging, cloud infrastructure, social media and mobile operating systems amongst others.
India took a unique path
In contrast, India has adopted an unprecedented and a powerful new approach in policy governance through the adoption of digital public infrastructure (DPI). This has enabled India to digitally leapfrog with the public sector playing a key role in defining the regulatory guardrails, and the private sector innovating and competing in the marketplace.
These public digital platforms are open source, have open APIs (application programming interfaces), open standards for interoperability and leverage public data for open innovation models. These low cost and inclusive platforms are based on core principles of consent-based data sharing protocols and reduce the digital divide. They also create a level playing field through regulatory framework.
Tech innovations normally emerge from the developed world. DPI is an area where an emerging market has created a unique model. These platforms include:
● JAM trinity which links Aadhaar, mobiles and bank accounts
● DigiLocker for digital storage and documents
● Bharat Bill Pay, a one stop solution for multiple payments
● UPI, Aadhaar Enabled Payment Systems (AePs) and Immediate Payment Service (IMPS)
● CoWin for vaccinationThese platforms create a powerful integrated stack of building blocks that provide impetus to private sector innovations.
Intertwined building blocks
India has been able to solve the challenge of digital inclusion by taking a platform approach by mainstreaming digitisation and tech across all schemes of government. A recent study by the Bank for International Settlements (BIS) has highlighted that on account of the digital public infrastructure, India has delivered in 10 years what would have taken 50 years to achieve.
All these platforms have been developed by building an alternate model on principles of openness, equity, inclusivity, fairness, transparency and trust. In future, this new approach will create a new economic divide between countries who are leapfrogging ahead on digital public infrastructure approach versus the rest.
For example, inherent to the UPI architecture is interoperability. Its value is resonated in over 300 banks offering linkages to bank accounts through UPI which is accessed by consumers via 50-plus third-party apps.
As a result of the JAM trinity, every household now has access to formal banking services along with aplatform for availing low value credit, insurance and pension schemes. A testimony of this is the resounding success of Pradhan Mantri Jan Dhan Yojana (PMJDY).
In 2015 when the scheme started only 15% of the accounts were operated by women. During the last eight years 460 million accounts were opened. The number of accounts operated by women has jumped from 15% to 56%, and 67% of the account holders are from rural and semi-urban areas. The average deposit per account has gone up by 71%. This transformation has been possible only due to the digital public infrastructure built by India.
The platform approach has led to top class payment products being developed on top of UPI. Numerous apps like PhonePe, GPay and AmazonPay are facilitating payments with the click of a button.
E-commerce, the next frontier
India is now democratising e-commerce through interoperability. The Open Network for Digital Commerce (ONDC) has gone live by providing access and equity to small and medium-sized merchants, increasing choice and quality for customers, and ensuring competitiveness and efficiency across the value chain.
ONDC is significant given that the coverage of retailers using digital commerce has remained at 15,000 out of 120 million retailers, while the estimated size of online shoppers is projected to be about 220 million by 2025. ONDC will revolutionise how people transact and empower MSMEs and with greater negotiation options.
A vast segment of the global population, almost 4 billion, does not have a digital identity. Almost 1. 5 billion people still remain unbanked and 133 countries do not have digital payment systems. As India takes over the Presidency of G20 it has a unique opportunity to create a complete package of these digital platforms and deliver them as an end-to-end e-governance service to digitally transform the world. All this as a “Cloud in a Box”. No better way to enhance India’s soft power.
Date:16-12-22
Reflections on the fading principle of non-interventionIn the tense interplay now between the executive and the judiciary on the appointment of judges, it is worthwhile recalling what ought to hold the key.Vivek Katju is a retired diplomat.
The President of India, Draupadi Murmu, and the Vice-President of India, Jagdeep Dhankhar, have weighed in on the surpassing significance of the separation of powers in the Indian Constitution. However, both did so in different ways, in substance and style.
Wise counsel
In her valedictory address on November 26 to the Constitution Day celebrations organised by the Supreme Court of India, Ms. Murmu said, “The Constitution outlines a map for good governance. The most crucial feature in this is the doctrine of separation of functions and powers of the three Organs of the State…. It has been the hallmark of our Republic that the three organs have respected the boundaries set in place by the Constitution… It is understandable that in the zeal to serve the best interests of the citizens, one or the other may be tempted to overstep. Yet, we can say with satisfaction and pride that the three have always attempted to keep the boundaries in mind while doing their best to function in the service of the people.”
These measured words do not point a finger at any particular organ of state. Ms. Murmu cautions them all against excessive “zeal” which may lead to transgressing the “boundaries” set for them by the Constitution. Indeed, it can be said without fear of contradiction that seldom has a leader sounded a caution so delicately and yet so effectively. Her wise counsel should be a guide to the political class and the judges.
Mr. Dhankhar, in his capacity as Chairman of the Rajya Sabha, addressed the House (“258th session of the Rajya Sabha”) for the first time on December 7. Devoting a portion of his address to the doctrine of separation of powers in the Constitution, he said, “Democracy blossoms … when its three facets… scrupulously adhere to their respective domains. The sublimity of the Doctrine of Separation of Powers, is realised when Legislature, Judiciary and Executive optimally function in tandem and togetherness, meticulously ensuring scrupulous adherence to respective jurisdictional domain. Any incursion by one, howsoever subtle, in the domain of [the] other has the potential to upset the governance apple cart.”
And a radical departure
As the Vice-President proceeded further, he departed radically from the President’s views. He said, “We are indeed faced with this grim reality of frequent incursions.”. President Murmu had only pointed to “temptations”. Far from making the charge of “frequent incursions”, she had categorically said that it was the “hallmark” of the Indian Republic that the three organs had respected their constitutionally prescribed boundaries.
In the context of the “grim reality of frequent incursions”, Mr. Dhankhar basically focused on the Supreme Court’s decision to strike down the 99th Constitutional Amendment setting up the National Judicial Appointment Commission (NJAC). He said, “This historic parliamentary mandate was undone by the Supreme Court on October 16, 2015 by a majority of 4:1 finding the same as not being in consonance with the judicially evolved doctrine of ‘Basic Structure’ of the Constitution.” Stating this to be an unparalleled development in “democratic history”, he added, “We need to bear in mind that in democratic governance, ‘Basic’ of any ‘Basic Structure’ is the prevalence of the primacy of the mandate of the people reflected in the Parliament. Parliament is the exclusive and ultimate determinative of the architecture of the Constitution”. He regretted that Parliament had not focussed on this matter for the past seven years. It is difficult to recall another instance of any Vice-President having expressed his views on a judicial decision and in such a manner. But then these are new times and new precedents are being set.
The office of the Republic’s President is above politics. The Vice-President has to be fundamentally above politics too; he/she can only enter that arena when he/she has to exercise a ‘casting vote’ in case of an ‘equality of votes’ in a matter under the consideration of the Rajya Sabha. In the past, Vice-President’s have, in their addresses outside the House, given voice to their views on public policies. Mr. Dhankhar’s choice of words on the Supreme Court’s decision on the NJAC also tends to give an impression that he not merely made a comment on a specific case but raised questions of the long-settled matter of the ambit of Parliament’s powers to amend the Constitution.
The Minister of Law and Justice, Kiren Rijiju, has clarified in Parliament that the Government does not propose to re-introduce the NJAC with amendments. He was critical of the present collegium system for appointment of judges earlier. The Supreme Court is seized of the matter relating to delays by the Government in acting on the recommendation of the collegium in some cases. As the matter is subjudice, it would be improper to comment on the issues. It would not be improper though to recall what Mohammad Hidayatullah, a former Chief Justice of India — he is also one of Vice-President Dhankhar’s predecessor’s — has recorded in his autobiography, My Own Boswell. He wrote that the Chief Minister of Madhya Pradesh, Dr. Kailas Nath Katju, told Justice Hidayatullah when he was Chief Justice of the State that he would never intervene with judges’ appointments but caution him if he heard something adverse about any of his recommendations. This goes back to 1957, decades before the collegium system, but the principle followed by Dr. Katju holds the key even today to the interplay between the executive and the judiciary on the appointment of judges.
Date:16-12-22
‘पॉक्सो’ पर सीजेआई के कथन पर ध्यान देना जरूरीसंपादकीय
यूनिसेफ और एक निजी संस्था के संयुक्त अध्ययन में पाया गया कि कोर्ट में ‘पॉक्सो’ के जितने मामले गए, उनमें चार में से एक में लड़के- लड़की रोमांटिक सम्बन्ध में थे और उनमें से करीब आधे मामलों में दोनों की उम्र 16-18 वर्ष की थी। वर्ष 2016-20 के बीच तीन राज्यों के पॉक्सो केसेज पर कोर्ट के फैसलों में पाया गया कि ऐसे रोमांटिक संबंधों में करीब 89% मामलों में लड़की ने कबूल किया कि लड़के से रिश्ता रोमांटिक था। हाल ही में सीजेआई ने केन्द्रीय व राज्य विधायिकाओं से कहा कि तरुणाई की गलतियों को पॉक्सो की श्रेणी में रखकर समाज गलती तो नहीं कर रहा है। अर्थात इस गलती को रोकने के प्रयास में कहीं तरुणाई का अपराधीकरण तो नहीं हो रहा। अध्ययन बताता है कि अपराध न्याय सिस्टम की ताकत का इस्तेमाल अभिभावक किशोरियों को ऐसे संबंधों से अलग होने को मजबूर करने के लिए करते हैं। यह कानून सहमति-युक्त सेक्सुअल संबंधों को अलग नहीं मानता, यानी वह भी उसी अपराध की श्रेणी में आता है जिसमें ऐसे बच्चों के खिलाफ अन्य सेक्सुअल अपराध, लेकिन कोर्ट्स ने हमेशा इस पर उदार रवैया अपनाते हुए अभियुक्त किशोरों को बरी कर दिया है। सीजेआई का कहना था कि 18 से कम उम्र हो तो सेक्सुअल संबंधों को एक ही श्रेणी में रखने के इस कानून की वजह से जज के लिए एक अजीब द्वंद्व की स्थिति बन जाती है।
Date:16-12-22
फुटबॉल के मैदान पर अब टूटने लगी हैं राष्ट्रीय सरहदेंराजदीप सरदेसाई, ( वरिष्ठ पत्रकार )
कई सनसनीखेज उतार-चढ़ावों से भरे विश्व कप फुटबॉल टूर्नामेंट का कोई निर्विवाद निष्कर्ष निकालें तो वो यही होगा कि इस सबसे कड़ी मशक्कत वाले खेल में अब सभी को समान अवसर मिलने लगे हैं। मोरक्को का नाटकीय उदय इसका उदाहरण है। वह विश्व कप सेमीफाइनल तक पहुंचने वाली पहली अफ्रीकी टीम थी। इसने यह बताया कि वैश्वीकरण के पैटर्न अब बदल रहे हैं, जिससे एक नई विश्व – व्यवस्था उभरकर सामने आ रही है। ऐसे तो 2002 में भी दक्षिण कोरिया ने सबको चौंकाते हुए सेमीफाइनल तक का सफर तय कर लिया था, जबकि तुर्की तीसरे स्थान पर रहा था। अतीत में कैमरन, सेनेगल, अल्जीरिया जैसी अफ्रीकी टीमों ने चौंकाने वाले उलटफेर किए हैं। 1966 में उत्तरी कोरिया ने इटली को परास्त कर दिया था। लेकिन तब इनकी जीत को तुक्का माना गया था, ये किसी नए दौर की सूचक नहीं थीं। इस बार के विश्व कप में मोरक्को की सफलता इनसे भिन्न है। क्योंकि जिस प्रणाली के चलते मोरक्को ने सफलता पाई, वह खेलों के बदलते स्वरूप का संकेत देती है।
मोरक्को की सफलता का सबसे आश्चर्यजनक पहलू यह था कि उसके 26 सदस्यीय स्क्वाड में से 14 सदस्य मोरक्को के नहीं थे। उनमें से अधिकतर यूरोप व अन्य क्षेत्रों के प्रवासी समुदायों से सम्बंध रखते हैं। टूर्नामेंट शुरू होने से पहले केवल हकीम जियेच और अशरफ हकीमी को ही दुनियाभर में पहचाना जाता था, जो चेल्सी और पीएसजी जैसे बड़े क्लबों के लिए खेलते हैं। लेकिन अब यूनुस बोनो, सोफियान अबराबात, सोफियने बूफाल भी जाने-पहचाने चेहरे बन चुके हैं। फुटबॉल में मोरक्कन प्रवासियों की यह सफलता ही बताती है कि खेल उन सीमाओं को लांघने में सफल रहते हैं, जिन्हें राजनीति बांध नहीं पाती। आज अकेले यूरोप में अनुमानित रूप से पचास लाख मोरक्कन प्रवासी हैं। वे यूरोप महाद्वीप में फैले ढाई करोड़ अरब प्रवासियों में शुमार हैं। उनकी सशक्त उपस्थिति के कारण यूरोप के दक्षिणपंथी नेता सशंकित हो उठे हैं। अब मुस्लिमों और मुख्यधारा के यूरोपियन समुदायों के बीच वैरभाव पनप रहा है। अरब प्रवासियों को राष्ट्रीय पहचान, अंदरूनी सुरक्षा और सामाजिक समरसता के लिए खतरा बताया जा रहा है।
लेकिन गनीमत है कि फुटबॉल के खूबसूरत खेल के पास इस तरह की कुरूप बातों के लिए कोई जगह नहीं है। खेल प्रतिस्पर्धाएं अपनी प्रतिभा दिखाने का अवसर होती हैं, जिनमें सभी को बराबरी के मौके मिलते हैं। कतर में हो रहे विश्व कप में 125 खिलाड़ी ऐसे थे, जो किसी अन्य देश में जन्मे थे और किसी और के लिए खेल रहे थे। हाल में जिन यूरोपियन देशों ने अच्छा प्रदर्शन किया है, वे भी वो हैं जिन्होंने बहुलता को स्वीकारा है। स्विट्जरलैंड के कप्तान ग्रैनिट शाका और टीम के सितारा मिडफील्डर जेरदान शकीरी दोनों ही अल्बानियाई मूल के हैं। स्विस स्क्वाड के अनेक सदस्य विदेशों में जन्मे थे, यह इस बात का संकेत है कि कैसे खुली प्रवासी नीतियों ने समुदायों को बदला है। 2018 में विश्व विजेता फ्रांस के अधिकतर खिलाड़ी प्रवासियों की संतान थे। 2022 की फ्रांसीसी स्क्वाड भी अपवाद नहीं है । सुपर सितारा खिलाड़ी कीलियन एमबाप्पे के पिता कैमरन मूल के हैं, जबकि उनकी मां अल्जीरियाई हैं। उन्हें सबसे पहले फ्रांसीसी क्लब एएस बोंदी ने खोज निकाला था। अनेक फ्रांसीसी खिलाड़ी आज इस क्लब सिस्टम की देन हैं, जो बहुनस्लीय खेल संस्कृति को प्रोत्साहित करता है। यहां तक कि आज इंग्लैंड की टीम भी एक नए बहुसांस्कृतिक ब्रिटेन का प्रतिनिधित्व करती है, जबकि 1966 की विश्व विजेता इंग्लैंड टीम में सभी खिलाड़ी गोरे थे। आज वहां बुकायो साका, रहीम स्टर्लिंग, जूड बेलिंघम और मार्कस रैफर्ड जैसे अश्वेत खिलाड़ी खेल रहे हैं। दक्षिणी अमेरिकी टीमों ब्राजील और अर्जेंटीना को छोड़ दें- जहां आज भी अधिकांश खिलाड़ी स्थानीय होते हैं – तो दुनिया के बाकी देशों में फुटबॉल के मैदान पर राष्ट्रीय सरहदें अब टूट रही हैं।
ऐसे में सवाल उठता है कि अगर फुटबॉल को संस्कृति- बहुलता और प्रवासियों के समावेश से लाभ मिल सकता है तो शेष समाज क्यों पीछे रहे? जबकि सच्चाई यह है कि अंतर्राज्यीय और वैश्विक प्रवास ने पूरी दुनिया के देशों की समृद्धि में इजाफा ही किया है। फुटबॉल माइग्रेंट्स की सफलता में भारत और पूरी दुनिया के लिए सबक हैं कि अगर आप रचनात्मक रूप से प्रतिभाओं की आवाजाही को बढ़ावा देंगे तो इससे आपको ही लाभ होगा, किसी और को नहीं ।
Date:16-12-22
सीमा विवाद के जरिए हम पर दबाव बना रहा है चीनमनोज जोशी, ( ‘अंडरस्टैंडिंग द इंडिया चाइना बॉर्डर’ के लेखक )
अब जब भारत और चीन पूर्वी लदाख के कुछ इलाकों में 2020 से कायम चीनी गतिरोध को समाप्त करने के लिए निरंतर चर्चा कर रहे हैं, अरुणाचल प्रदेश में हालात और संगीन होते लग रहे हैं। बीते सप्ताह तवांग के उत्तर-पूर्व में स्थित यांकी एरिया में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच हुई मुठभेड़ ने नई दिल्ली में खतरे की घंटी बजा दी है। बड़ा प्रश्न यह है कि आखिर दोनों देश किन परिस्थितियों में अपने सीमा विवाद को सुलझाएंगे ? भारतीय गणराज्य और पीपुल्स रिपब्लिक ऑफ चाइना को अस्तित्व में आए 70 से ज्यादा साल हो चुके हैं। चीन की सीमारेखा बहुत लम्बी है और अनेक स्थानों पर वह विवादित है। 14 में से 12 विवादों को चीन सुलझा चुका है, केवल भारत और भूटान से ही उसके सीमा विवाद अभी तक शेष हैं।
भारत से चीन का सीमा विवाद गम्भीर है। 1962 में यह एक युद्ध को जन्म दे चुका है। आज दोनों देशों ने वास्तविक नियंत्रण रेखा पर भारी सैन्यबल तैनात कर रखा है। सीमा विवाद सुलझाने के लिए कई बार वार्ताएं हो चुकी हैं। 1950 के दशक में दोनों देशों के प्रधानमंत्री चर्चा में शरीक हुए थे। प्रधानमंत्री नेहरू इस बात को लेकर सुनिश्चित थे कि भारत की सीमारेखा अच्छी तरह से निर्धारित है और अब उस पर चर्चा करने की कोई जरूरत नहीं। चीन ने प्रस्ताव रखा था कि अगर भारत लदाख में अक्साई चिन पर अपना दावा छोड़ दे तो चीन भी अरुणाचल प्रदेश पर भारत के दावे को स्वीकार कर लेगा। 1970 और 1980 के दशक के अंत में चीनियों ने फिर यह पेशकश सामने रखी, लेकिन भारत ने ठुकरा दिया। उसके बाद चीनियों ने अपना स्टैंड बदल लिया। अब वे कहते हैं कि मुख्य समस्या अरुणाचल में है। चीन चाहता है कि भारत समूचा तवांग इलाका चीन को सौंप दे।
जब नौकरशाहों के स्तर पर संवाद प्रक्रिया विफल हो गई तो 2003 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने अपनी बीजिंग यात्रा के दौरान कहा कि दोनों देशों को ऐतिहासिक दावों के बजाय राजनीतिक आधार पर इस समस्या को सुलझाना चाहिए। दोनों देशों ने दो वरिष्ठ अधिकारियों को इस विवाद के निपटारे के लिए स्पेशल रिप्रजेंटेटिव्ज़ नियुक्त किया। भारतीय स्पेशल रिप्रजेंटेटिव ब्रजेश मिश्रा थे, जो वाजपेयी के प्रधान सचिव और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार भी थे। 2004 में वाजपेयी सरकार चुनाव हार गई, इसके बावजूद दोनों देश 2005 में एक समझौते पर पहुंचे। इसे एग्रीड गाइडलाइंस एंड पोलिटिकल पैरामीटर्स ऑफ अ बॉर्डर सेटलमेंट कहा गया। अभी तक यह इकलौता ऐसा करारनामा है, जिस पर भारत और चीन ने अपने सीमा विवाद के परिप्रेक्ष्य में दस्तखत किए हैं। अगर आप इस करारनामे को पढ़ें तो ऐसा प्रतीत होगा कि दोनों देश एक्सचेंज ऑफ क्लेम्स के लिए तैयार हो रहे थे, यानी भारत अकसाई चिन को छोड़ देगा और चीन अरुणाचल को भारत का हिस्सा मान लेगा। लेकिन ऐसा हुआ नहीं। एक साल बाद चीनी अधिकारी कहने लगे कि करारनामे में तवांग को शामिल नहीं किया गया था। अब भारत की ओर से इस मामले में स्पेशल रिप्रजेंटेटिव अजीत डोभाल हैं, जबकि चीन की ओर से उसके विदेश मंत्री वांग यी-हावे हैं। 2012 में इस विवाद के निपटारे के लिए फ्रैमवर्क लगभग पूरा कर लिया गया था, लेकिन अभी तक उस राजनीतिक सौदेबाजी के लिए कोई तैयारी नहीं दिखाई गई है, जो इस सीमा विवाद का वैसा हल खोज सके, जिससे दोनों पक्ष संतुष्ट हों। इसके लिए बड़े राजनीतिक साहस की दरकार है और दिल्ली और बीजिंग दोनों को ही वैसी हिम्मत दिखाना होगी।
स्पेशल रिप्रजेंटेटिव्ज़ की आपसी बातचीत का आखिरी दौर दिसम्बर 2019 में हुआ था। तब से अब तक पहले 2020 में लदाख और अब तवांग की घटनाओं के बाद भारत-चीन के सम्बंध खराब ही हुए हैं। 2012 में स्थापित वर्किंग मैकेनिज्म फॉर कंसल्टेशन एंड को-ऑर्डिनेशन ही सीमा विवाद के निपटारे के लिए प्रमुख प्रणाली है। इसमें दोनों देशों के शीर्ष अधिकारीगण सम्मिलित हैं और उनकी आखिरी बैठक जून 2021 में हुई थी। पिछले सप्ताह यांगत्से में हुई घटनाएं बताती हैं कि चीनी अब पूर्वी सेक्टर में भी गहमागहमी बढ़ाने की फिराक में हैं। ऐसे में निकट भविष्य में सीमा विवाद का अंत होता नहीं लग रहा है। वास्तव में यह चीन के हित में है कि वह किसी भी सेटलमेंट को टालता रहे। क्योंकि इसकी मदद से वह दक्षिण एशिया में भारत पर दबदबा कायम रख सकता है।
Date:16-12-22
गंगा की सेहतसंपादकीय
गंगा को प्रदूषण मुक्त करने की कोशिश लंबे समय से चल रही है। इसके लिए करीब पैंतीस साल पहले गंगा कार्ययोजना शुरू की गई थी। तबसे इस पर सैकड़ों करोड़ रुपए बहा दिए गए, मगर नतीजे के रूप में यही सामने आया कि गंगा निरंतर और गंदी होती गई। फिर नमामि गंगे परियोजना शुरू की गई। इसके लिए एक अलग मंत्रालय भी बनाया गया। नए ढंग से योजना बनी और न सिर्फ गंगा के पानी को साफ करने, बल्कि इसके किनारों को भी संपन्न प्राकृतिक क्षेत्र के रूप में विकसित करने की कोशिश शुरू हुई। अच्छी बात है कि इस प्रयास के कुछ बेहतर नतीजे नजर आने लगे हैं। यहां तक कि संयुक्त राष्ट्र ने इसे दुनिया की दस महत्त्वपूर्ण पहलों में शुमार किया है। इस समय कनाडा में संयुक्त राष्ट्र का पंद्रहवां जैव विविधता सम्मेलन चल रहा है। उसमें संयुक्त राष्ट्र ने माना है कि नमामि गंगे परियोजना प्राकृतिक दुनिया को बहाल करने में काफी मददगार साबित हो सकती है। इसलिए कि यह क्षेत्र म्यामां, फ्रांस और सोमालिया से भी बड़ा है। संयुक्त राष्ट्र ने इस परियोजना को परामर्श और वित्तीय पोषण उपलब्ध कराने की घोषणा की है। स्वाभाविक ही इस घोषणा से इस परियोजना को गति मिलेगी और जल्दी बेहतर नतीजों की उम्मीद की जा सकती है।
केंद्र सरकार ने नमामि गंगे परियोजना के तहत गंगा में गिरने वाले गंदे जल को रोकने के साथ-साथ इसके दोनों किनारों पर वन क्षेत्र विकसित करने का अभियान चला रखा है। इस क्षेत्र में वन्यजीवों के रहने लायक वातावरण बनाया जा रहा है। इस तरह गंगा के दोनों पाटों के इलाकों में खेती और वहां रहने वाले लोगों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव को रोका जा सकेगा। एक विशाल हरित पट्टी तैयार होने से पर्यावरण प्रदूषण और स्वाभाविक जलवायु परिवर्तन के कारकों को कम करने में मदद मिलेगी। पिछले कुछ सालों के अनेक अध्ययनों में ये तथ्य उजागर हुए थे कि गंगा में प्रदूषण बढ़ने की वजह से न सिर्फ पेयजल उपलब्ध कराने और उसके जल-जीवों की सेहत की दृष्टि से समस्या गहरी हुई है, बल्कि इसके दोनों किनारों पर बसे गांवों के लोगों के स्वास्थ्य पर भी बुरा प्रभाव देखा जा रहा है। खेतों में जहरीले रसायन घुल चुके हैं, जो वहां उगने वाले अनाज के माध्यम से दूसरे लोगों की सेहत पर भी बुरा असर डाल रहे हैं। इस दृष्टि से गंगा को पूरी तरह प्रदूषण मुक्त करने का अभियान चलाया गया है। अभी तक दो सौ तीस विभिन्न संगठनों की मदद से गंगा के करीब तीस हजार हेक्टेयर क्षेत्र का वनीकरण किया जा चुका है।
गंगा भारत की आस्था की नदी है। यह देश के बहुत बड़े हिस्से को सिंचित करती और अनेक शहरों और औद्योगिक इकाइयों की जल संबंधी जरूरतों को पूरा करती है। मगर जिस नदी के दर्शन मात्र से मुक्ति की बात की जाती रही है, उसमें निर्बाध औद्योगिक कचरा और शहरी मल मिलते जाने की वजह से कई जगहों पर उसका पानी आचमन तो दूर, छूने लायक भी नहीं रह गया था। राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी और प्रशासनिक लापरवाहियों के चलते इसमें और इसकी सहायक नदियों में बहाए जा रहे जहर को रोकने की कड़ाई से पहल कभी नहीं की गई। अब संयुक्त राष्ट्र ने नमामि गंगे परियोजना की सराहना करते हुए इसे गति प्रदान करने की पहल की है, तो स्वाभाविक ही उससे बेहतर नतीजे की उम्मीद बनी है।
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कोविड महामारी के बाद अब पूरे विश्व में पर्यटन एक बार फिर से जोर पकड़ने लगा है। इसे ‘रिवेंज ट्रैवल’ का भी नाम दिया जा रहा है। ऐसा माना जा रहा है कि लोग कोविड के दौरान बंदिशों में रहने के बाद अब उस काल की भी पूर्ति कर रहे हैं। लोग बड़े-बड़े समूहों में खर्चीली यात्राएं कर रहे हैं या करने को उत्सुक हैं। इसे देखते हुए यात्रा उद्योग की क्षमता बढ़ाई जा रही है। परिवहन लागत भी बढ़ गई है। साथ ही सुविधाओं को अपग्रेड किया जा रहा है।
दुर्भाग्यवश, वैश्विक स्तर पर व्यापार की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। इसके कारण बिजनेस यात्राएं नहीं के बराबर हो रही हैं। अर्थव्यवस्थाओं की गिरती हुई स्थिति को देखते हुए पर्यटन पर खर्च करने की क्षमता के भी जल्दी ही चुक जाने की आशंका है।
भारत के घरेलू पर्यटन में बजट यात्रियों की ही अधिकता है। यह एक अच्छा अवसर है जब भारत को एक गंतव्य के रूप में प्रचारित करके अंतरराष्ट्रीय यात्रियों को आकर्षित किया जा सकता है। भारत को पर्यटक-आकर्षण बनाने के लिए कुछ बिंदु –
देश के राज्यों को चाहिए कि अपनी सांस्कृतिक सीमाओं को एक किनारे रखकर रेल रोड और वायु के बुनियादी ढांचे को ऐसा मजबूत बना दें कि पर्यटकों के लिए मुख्य दर्शनीय स्थल सुगम्य हो जाएं। भारत में पर्यटन की अपार संभावनाएं हैं, और इसे भुनाने का यह सही अवसर है।
‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 19 नवंबर, 2022
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Date:15-12-22
2024 Is Not 2004Opposition unity is tough to achieve, even tougher is for opposition to counter Modi in a national voteTOI Editorials
Bihar’s chief minister Nitish Kumar scotched speculation that he was positioning himself as an opposition PM candidate in 2024 Lok Sabha elections. Instead, he claimed that he is trying to unite political parties opposed to BJP. It’s a role that the late HS Surjeet, former general secretary of CPM, effectively executed between 1996 and 2004 when United Front and UPA coalitions were formed after the Lok Sabha elections threw up a split verdict.
There’s no doubting Nitish’s political savvy. He’s been Bihar CM time and again with different coalition partners, and while leading a political party that was never the dominant one in the state. However, savvy may not be enough. Even if, a big if, a united opposition bloc is forged before the 2024 general election, unlike 1996 and 2004, it will be a tall order to form a government. There are good reasons to argue that comparisons with earlier coalitions are irrelevant. The advent of Modi to national leadership has been accompanied by a transformation of LS contests as ones akin to a presidential contest. It’s no exaggeration to say the choice in LS 2024 will be mainly about the PM’s post rather than the political party or individual candidate.
Consider the outcomes of three assembly elections between 2018 and 2020 with LS 2019 polls. In Karnataka’s 2018 assembly polls, BJP emerged as the largest party with a 36. 2% vote share, which was more than a percentage point lower than Congress. In the 2019 general election, BJP swept Karnataka with 51. 4% vote share. In the same election, BJP’s vote share in Haryana was 58%. A few months later, in the 2019 Haryana assembly election, BJP’s vote share was just 36. 5% and it couldn’t secure a simple majority on its own.
This has happened twice in Delhi. BJP swept the 2019 LS election with 57% vote share. Eight months later, AAP swept the assembly elections with 54% vote share. In contemporary politics, a high incidence of voters in key battleground states now shift political support between assembly and LS elections. It will be the fundamental difference between the 2024 general election and the ones in the 1990s and the noughties. Nitish, therefore, may find greater odds stacked against him as kingmaker than those times when he was in Bihar and Modi was in Gujarat.
Date:15-12-22
Unnecessary MysteryJudges recusing from cases without specifying reasons hurts the entire judiciary. SC must frame rulesTOI Editorials
Every few months a Supreme Court or high court judge recusing from a case makes news. Recusals are common in HCs; for instance, rarely a month passes without a judge recusing in Bombay HC. This week SC’s Justice Bela M Trivedi recused from hearing Bilkis Bano’s challenge against the premature release of 11 murder-gangrape convicts. Ordinarily judges recuse over conflict of interest. Sometimes, litigants point this out to a judge, who may not be themselves aware of such a conflict. Judges then decide whether to recuse or not. There are also instances where despite a judge revealing what can be construed as “interest” both parties didn’t fear bias.
While some judges mention in open court why they are recusing, often judges don’t give reasons. The NJAC judgment, in which Justice Khehar’s continuance on the five-judge bench was challenged, saw different shades of judicial opinion. Justice Kurian Joseph argued for the desirability of specifying reasons for recusal, as it would meet constitutional norms of transparency. Justice Lokur demurred as a judicial order would make it legally contestable at a higher forum but noted that “procedural and substantive rules” were needed, given growing frequency of recusal pleas. Justices Chelameswar and Goel argued that “real danger” or “reasonable apprehension” of bias must be proven, where a judge’s interest isn’t financial.
Stating reasons for recusal forestalls all sorts of conjectures about the judge. It would curb attempts at forum shopping, which also involves attempts to force a judge to recuse without specifying reasons. When this happens, rumours fly thick and fast in legal circles over political pressures, etc. But if rules mandating judges to specify reasons for recusal were framed, every judge would have to comply and the system would greatly benefit from the resultant transparency.
Date:15-12-22
Keep China in Our Magnified SightET Editorials
Last week’s clash between Chinese and Indian army personnel in Tawang, Arunachal Pradesh, confirmed by defence minister Rajnath Singh in Parliament on Tuesday, underscores the constant threat posed by China to not just India’s borders but also to the rules-based international order. Indian armed forces successfully repulsed the aggressors underlining preparedness. But there is no room for complacency. Cyberattacks targeting key Indian infrastructure have also increased, thus demanding defence.
Beijing often uses belligerence towards its neighbours to tackle tricky domestic situations. The latest confrontation comes at a time of rising Covid cases and capacity issues of hospitals following the relaxation of its zeroCovid policy. India must rally its partners and allies, and strengthen its relationships in the region and beyond. It requires New Delhi to take a clear stand against countries that disregard and violate rulesbased international order and show little respect for rights of sovereign nations. India’s G20 presidency can only buttress such an effort.
India poses a threat to China’s ambitions for global dominance under an imperial Xi regime. China’s growing economy and its role as the world’s factory gave it a modicum of protection. But there are chinks in its armour. Late Japanese PM Shinzo Abe’s efforts put the spotlight on the danger China poses in the IndoPacific, resulting in the formation of the Quad. The pandemic demonstrated the dangers of concentrating supply chains in one country. In this context, India’s growing global space and role at the helm of several plurilateral and intergovernmental platforms are anathema to Beijing. India can’t wish away its neighbour, but it can ensure that engagement is on its terms.
Date:15-12-22
Warning signIndia cannot wish away the situation on the Chinese border by staying silentEditorial
Another attempted transgression by the Chinese military, this time in the Tawang sector in the eastern section of the India-China boundary, has served a reminder of the precarious state of affairs along the Line of Actual Control (LAC). A crisis which began in April 2020, with PLA transgressions in Ladakh, in the western sector of the boundary, has now appeared to have widened to Arunachal Pradesh. Defence Minister Rajnath Singh said in Parliament that the Indian Army had forced the PLA to return to its posts. The Minister’s comments, on December 13, came four days after the incident, details of which were first reported by The Hindu on December 12. An Army statement confirmed the clash. The Opposition, which has criticised the Narendra Modi government’s continuing reticence on the China border issue, staged a walkout after being denied a discussion.
As troubles now flare in Arunachal, the situation in Ladakh still remains unresolved. India is yet to resume patrolling in any of the five disengagement areas where temporary buffer zones have been established, while the Chinese military remains on India’s side of the LAC in two other friction points, in Depsang and Demchok. What is clear is that the Chinese military has decided, for reasons still unexplained, to unilaterally change how both sides manage what were previously mutually recognised disputed areas. Managing what has become a live border after three decades of relative peace, and crafting a modus vivendi with China in this new situation, has now emerged as a pressing challenge for New Delhi. This is both a military and a political challenge. Addressing it will require, as a first step, transparency, and taking the Opposition and public along on an issue far too important to be led by apparent considerations over optics. Those considerations also appear to be one factor behind the continuing freeze in high-level political contact with China, with Prime Minister Modi and President Xi Jinping avoiding a formal meeting at two recent multilateral summits. That the leaders have not spoken for more than three years, barring an exchange of pleasantries at the G-20 summit, is an untenable situation as risks continue to rise along the borders. A resumption of dialogue will, at the very least, allow India to convey its concerns at the highest level. The public also remains largely in the dark on the events that have transpired along the borders, as well as the developments that led to the loss of life of 20 Indian soldiers, in 2020. If the Government’s apparent hope was to maintain a silence until the crisis resolves in due course, the latest clash has served a warning sign that it is nowhere near ending.
Date:15-12-22
An energy conundrumSolar power is important for India, but it will not serve every energy needEditorial
At the core of India’s energy transformation is its bet on solar power. Based on a commitment to address the global climate crisis, India has promised to source nearly half its energy from non-fossil fuel sources by 2030 and, in the shorter term, source at least 60% of its renewable energy from solar power. However, a disclosure in Parliament by the Minister for Power, New and Renewable Energy suggests that India faces significant headwind in this quest. A key central policy to source solar power is facilitating the establishment of large solar parks; small solar power projects usually translate to higher per-unit production costs. And so, in 2014, the Centre announced the ‘Solar Parks and Ultra-Mega Solar Power Projects’ policy to facilitate the creation of large parks. The initial plan was to set up 25 parks capable of generating at least 20,000 MW by 2019. In 2017, the Government scaled this to 61 parks with a target of 40,000 MW. It emerges, however, as of 2022, that only a fourth of the capacity has been achieved, that is, projects worth 10,000 MW have been commissioned. Four projects have been cancelled, by the Centre’s own admission, due to tardy progress. The roadblocks, in the Centre’s estimate, have been challenges in acquiring land with a clear title, setting up infrastructure necessary to transmit power produced at these parks to the grid and, in an unusual disclosure, “environmental issues” in Rajasthan and Gujarat, where projects have been halted because their transmission lines encroach upon the habitat of the critically endangered Great Indian Bustard.
Notwithstanding its claims on international podia that it is on track to meeting renewable energy targets, it is no secret that India is lagging behind. By the end of 2022, India had committed to having in place 1,75,000 MW of renewable energy capacity, with 1,00,000 MW from solar power. However, only around 61,000 MW of such capacity has actually been installed. For a few years now, there has been considerable hype around solar power achieving grid parity in India — meaning power companies are able to sell it at a price lower or as much as conventional sources — but this does not account for the subsidies or concessions front-loaded by the Government. While India should continue to expand its economy on the back of renewable energy, the Government must take a hard look at whether renewable power, solar, wind or nuclear, meets standards of economic viability and environmental sustainability. Solar power may be a valuable tool in India’s energy transformation story, but it cannot be the panacea for every need.
Date:15-12-22
Building climate resilience collectivelyActive involvement by government, non-governmental, community-based organisations, and academic institutions will help build a sustainability profile and arrive at specific interventionsMansi Sachdev is Senior Urban Planner, UN-Habitat India. Pushkal Shivam is Urban Planner, Un-Habitat India
India unveiled its long-term climate action plan at the 27th Conference of the Parties to the United Nations Framework Convention on Climate Change (COP27), held in Sharm el-Sheikh, Egypt, in November. While the document titled ‘Long-Term Low-Carbon Development Strategy (LT-LCDS)’ has multi-sectoral measures to reach a net-zero emissions status, climate-resilient urbanisation forms a cornerstone of the Government of India’s strategy under the Paris Agreement.
This three-pronged and long-term plan for urban areas focuses on adaptation and resource efficiency in urban planning, climate-responsive and climate-resilient buildings, and municipal service delivery.
Have a data-driven approach
There are several flagship missions championed by the Ministry of Housing and Urban Affairs as well, which target specific objectives towards creating a smart, sustainable and resilient urban India. To facilitate implementation of the LT-LCDS and other missions, and enable their integration, a data-driven approach may be useful. Demonstrating urban planning strategies aimed at climate resilience through specific actions and interventions (backed by sound data) and linking them to various finance streams accessible to the urban local bodies is important.
Cities need effective and efficient planning instruments that translate master plans into transformative business-ready investment projects.
For instance, the Urban Sustainability Assessment Framework (USAF), a decision support tool of UN-Habitat for municipal commissioners and urban practitioners, supports the sustainable and resilient urban planning and management of Indian cities. It enables cities to regularly capture inter-sectoral data and corresponding analysis on urban metrices, thereby helping in monitoring the performance of a city in static and dynamic contexts. Cities can enhance vertical integration by pulling together the missions’ objectives at the central level, State policies and projects, and local implementation through city-specific strategic actions linked to capital investment planning.
The urban transport sector is among the key contributors to greenhouse gas (GHG) emissions.
The cases of Bhopal and Jaipur
In the case of Bhopal (Madhya Pradesh), for example, they make up for 19% of the city’s GHG emissions. Bhopal favours non-motorised transport (NMT) with a 43% NMT modal share but provides access to public bike docking stops to only 24% of its population; only half of its streets have footpaths. By designing ‘shared streets’ for personal vehicles, public transport, NMT and pedestrians, and linking them with future economic activity zones and underserved areas, the city has immense potential to reduce its carbon footprint. These streets can also be conduits for native plant species and groundwater recharge by integrating water-sensitive urban design features with a potential of reducing GHG emissions of up to 15 tCO2/annum per kilometre. In Bhopal, the Smart Cities Mission has made significant investments in NMT, though the use of this infrastructure has been sub-optimal. There are opportunities for improvement and increased usage of the NMT network though better land-use integration. Spatial analyses can inform decision-making towards co-location of investments and projects from various missions for cumulative community impact and enhanced urban value.
Nature-based solutions provide a range of solutions for climate change adaptation over hard grey infrastructure. As seen in Jaipur (Rajasthan), with only 1.42 sq.m per capita of open space against a benchmark of 12 sq.m per person, the desert capital also experiences various hazards that include heat waves, droughts and urban flooding. Residential areas with at least 10% of land area under open space and parks were found to be at least 1.25°C cooler than neighbourhoods with less green pockets. In industrial pockets, the urban heat island impact was greater with temperatures higher by 1.1°C. There are several macro and micro options available to Jaipur such as planting shade trees, urban forests, installing cool roofs, planning cool islands and investing in city scale blue green infrastructure to improve the micro-climate and environmental conditions.
Jaipur has also witnessed a significant decline in porous surfaces (by 50%) in the last three decades and a corresponding sharp increase in surface stormwater run-off (156%) which the city struggles to accommodate leading to regular urban flooding. Simple yet effective solutions that can increase Jaipur’s resilience include community recharge pits in neighbourhood parks, and increasing permeable spaces along mobility corridors to decrease the run-off by a sizeable fraction. Such interventions find consonance with the Atal Mission for Rejuvenation and Urban Transformation (AMRUT) mandates and allows for cities to integrate them with their capital investment plans.
The suggested planning approach merits a comprehensive stakeholder participation towards building climate resilience. Active involvement from various tiers of government, non-governmental, community-based organisations, and academic institutions is desirable at each step — from building a sustainability profile to arriving at very specific interventions. Movements on the city performance indicators communicate the impact of these interventions to the decision-makers and the community at large. In addition, cumulative benefits and efficient use of public resources from various central and State missions, and on-ground convergence are possible by identifying neighbourhoods/wards to co-locate investments for holistic and integrated city-level transformations. This evidence-based approach aims at making cities sustainable, resilient and inclusive with no one and no place left behind.
All this is in the spirit of the Sharm el-Sheikh Implementation Plan which affirms that “sustainable and just solutions to the climate crisis must be founded on meaningful and effective social dialogue and participation of all stakeholders”. Therefore, India’s long-term strategy must accommodate the most vulnerable of its people in its low-emissions pathways to achieve sustainable economic growth and poverty eradication.
Date:15-12-22
कर्ज वापस करने में गरीब अमीरों से आगे हैंसंपादकीय
भारत की जेलें बताती हैं कि गरीब ज्यादा कानून तोड़ते हैं यानी अपराधी होते हैं। जबकि एक नया चौंकाने वाला आंकड़ा बताता है कि कर्ज लेकर उसे वापस करने में गरीब, अमीरों से दूना आगे हैं। पिछले सात वर्षों में मुद्रा लोन में सरकार ने गरीबों को छोटी-छोटी दुकानों और व्यवसाय के लिए जो 13.64 लाख करोड़ रुपए का लोन दिया था, उसमें से 96.3% इन गरीबों ने वापस कर दिया। यह लोन मोबाइल रिपेयर, गुमटी लगाने वालों की आजीविका चलाने के लिए मुद्रा स्कीम के तहत सन् 2015 से देना शुरू हुआ था। उधर संसद में मंत्री ने बताया कि इसी काल में बैंकों का एनपीए 6% से ज्यादा होकर 5.40 लाख करोड़ हो गया। बैंकों से ऋण बड़े उद्योगपतियों, कारोबारियों और उद्यमियों को दिया जाता है और जब वे नहीं दे पाते तो बैंक अंततः उसे नॉन परफॉर्मिंग एसेट मान लेता है। मुद्रा लोन स्कीम जब शुरू हुई तो यह माना जाता था कि गरीब से यह पैसा वापस लेना मुश्किल होगा। लेकिन शायद नैतिकता आज भी गरीबों का आभूषण बनी हुई है। इससे यह समझ में आता है कि क्यों भारत की जेलों में बंद कैदियों / विचाराधीन कैदियों में 96% गरीब और अनपढ़ हैं? वे इसलिए वहां है कि सिस्टम इन्हें छोटे-छोटे अपराध में पकड़ने में ज्यादा दिलचस्पी रखता है जबकि अमीर का बड़ा अपराध सिस्टम की नजर से ओझल रहता है या कर दिया जाता है।
Date:15-12-22
निजी बिलों के शोर्टकट से सतत विकास नहीं होगाविराग गुप्ता, ( लेखक और वकील )
चीनी घुसपैठ पर गतिरोध के साथ सांसदों द्वारा पेश निजी बिलों की वजह से संसद का सत्र चर्चा में ज्यादा है। प्रधानमंत्री ने सही कहा है कि शॉर्टकट राजनीति के बजाय देश को सतत विकास की जरूरत है। लेकिन संसद में पेश हो रहे 50 से ज्यादा निजी सदस्यों के बिल दूसरी तस्वीर बयां कर रहे हैं। विपक्षी सांसदों द्वारा पेश निजी बिलों पर बहस संसदीय सिस्टम के लिए शुभ है, लेकिन सत्ता पक्ष को तो सदन में बहुमत हासिल होने के कारण कानून बनाने का हक है। इसीलिए मंत्रियों को निजी हैसियत से बिल पेश करने पर प्रतिबंध है। पक्ष-विपक्ष के सांसदों द्वारा पेश हो रहे प्राइवेट बिलों का आकलन करने पर कानून निर्माण के पांच पहलू सामने आते हैं। जी-20 लीडरशिप व विदेशी निवेश को सफल करने के लिए संसदीय व्यवस्था की सफलता जरूरी है। निजी सदस्यों के बिलों पर बहस के दौरान कानून निर्माण में संसदीय तंत्र की विफलता पर गौर करना चाहिए। पहला- वक्फ बोर्ड अधिनियम जैसे पुराने कानूनों को खत्म करना। दूसरा- पूर्ववर्ती आयोगों की सिफारिशों के अनुसार राज्यपाल, चुनाव आयुक्त जैसे संवैधानिक पदों की नियुक्ति-व्यवस्था में सुधार के लिए कानून में संशोधन। तीसरा- मॉब लिंचिंग यानी भीड़ के उन्माद जैसे बढ़ते अपराधों को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइंस के अनुसार कानूनों में बदलाव। चौथा- इंटरनेट बंदी जैसे आधुनिक मामलों पर नई कानूनी व्यवस्था बनाना। पांचवा- ईवीएम और जनसंख्या नियंत्रण जैसे मुद्दों पर सियासत और कानून बनाने के बेतुके प्रयास।
संविधान के अनुच्छेद 50 के प्रावधानों को दरकिनार करके जजों की नियुक्ति में अधिकार हासिल करने के लिए सरकार बेचैन है। लेकिन कानून निर्माण पर संसद की विफलता से लेकर ज्युडिशियल एक्टिविज्म के साथ बेवजह की मुकदमेबाजी बढ़ने पर कोई हलचल नहीं है। निजी बिलों की बढ़ती संख्या के बीच विधि निर्माण में संसदीय तंत्र की विफलता के इन चार बिंदुओं पर भी चर्चा होना चाहिए-
1. सरकार द्वारा पेश बिल ही संसद में अमूनन कानून बनते हैं। इसीलिए 1970 के बाद से बहस के बावजूद कोई निजी बिल कानून नहीं बन पाया। कानून बनाने का काम संस्थागत विशेषज्ञता का है। इसमें विधि आयोग, कानून मंत्रालय, संसदीय समितियों का रोल अहम है।
वर्तमान विधि आयोग में चेयरमैन की नियुक्ति ढाई साल विलम्ब से होने की वजह से कोई रिपोर्ट नहीं आई। पुराने 21 आयोगों की 277 रिपोर्टों में 92 पर ही अमल हुआ है। आयोग की सैकड़ों रिपोर्टों पर एक्शन नहीं होने से ही संसद में निजी बिल और सुप्रीम कोर्ट में पीआईएल की संख्या बढ़ रही है।
2. महिला आयोग ने याचिका दायर करके मुस्लिम लड़कियों की 18 साल से कम उम्र में शादी पर सवाल उठाया है। इस पर सुप्रीम कोर्ट में लम्बी-चौड़ी बहस होगी। लेकिन ऐसे मामलों पर कानून बनाने की जिम्मेदारी तो सरकार और संसद की है। सरकारी-तंत्र शादी की उम्र 21 साल करना चाहता है।
दूसरी तरफ वोट देने की कम उम्र के मद्देनजर चुनाव लड़ने की उम्र को 25 साल से कम करने की बात हो रही है। शराब, सेक्स, वोट और शादी के लिए न्यूनतम उम्र के कानून में एकरूपता लाने की जरूरत है। ऐसे मामलों को धार्मिक ध्रुवीकरण का मोड़ देना लोकतंत्र की सेहत के लिए खतरनाक है।
3. पिछले 8 सालों से समान नागरिक संहिता पर कानून बनाने के बजाय सिर्फ बातें होने से भी कट्टरपंथी ताकतें मजबूत हो रही हैं। केंद्र सरकार ने अदालत में हलफनामा देकर इस पर संसद से कानून बनाने की बात की है। तो फिर राज्यों के स्तर पर कानून बनाने का स्वांग कितना ठीक है? जल्द न्याय, लम्बित मुकदमों के खात्मे, चुनावी सुधार, मध्यस्थता कानून, मृत्युदंड से जुड़े मामलों पर भाषण हो रहे हैं, लेकिन इन विषयों पर सन् 1958 के बाद पेश विधि आयोग की अनेक रिपोर्ट के अनुसार कानून बनवाने में संसद, सरकार और विपक्ष की दिलचस्पी नहीं होना दुर्भाग्यपूर्ण है।
4. उद्योग और बहुराष्ट्रीय कंपनियों से जुड़े मामलों में झटपट कानून बन जाते हैं, लेकिन समाज, देश और सुशासन से जुड़े मामलों में दशकों तक गाड़ी अटकी रहती है। इसके दो कारण हो सकते हैं। जटिल विषयों पर कानून बनाने में सरकारी तंत्र सक्षम नहीं। या ऐसे मामलों में कानून के हाथीदांत से सिर्फ वोट हासिल करने की मंशा हो। कानून से जुड़े मामलों पर सियासत होने से न्यायिक अतिक्रमण बढ़ने के साथ संविधान का रसूख कमजोर होता है। जी-20 लीडरशिप व विदेशी निवेश को सफल करने के लिए संसदीय व्यवस्था को सफल बनाना जरूरी है। निजी सदस्यों के बिलों पर बहस के दौरान कानून निर्माण में संसदीय तंत्र की विफलता पर सांसदों को गौर करने की जरूरत है।
Date:15-12-22
गंभीर होती चीन की चुनौतीविजय क्रांति, ( लेखक सेंटर फार हिमालयन एशिया स्टडीज एंड एंगेजमेंट के चेयरमैन एवं वरिष्ठ स्तंभकार हैं )
दो साल पहले लद्दाख के गलवन कांड की याद को ताजा करते हुए इस महीने की नौ तारीख को अरुणाचल प्रदेश के तवांग सेक्टर की यांग्त्से सीमा चौकी पर भारत और चीन के सैनिकों के बीच गंभीर टकराव हुआ। भारत के नियंत्रण वाले तवांग क्षेत्र में प्रवेश करने का प्रयास करने वाले लगभग तीन सौ चीनी सैनिकों के एक दल और भारतीय सैनिकों के बीच हाल में जो यह हाथापाई हुई, उसे 2020 के गलवन कांड के बाद भारतीय और चीनी सेना के बीच टकराव की सबसे गंभीर घटना माना जा रहा है। चीनी सैनिकों को वापस धकेलने के बाद भारतीय सेना ने अपने एक संक्षिप्त बयान में बताया है कि इस मुठभेड़ में भारत के पांच जवान घायल हुए और स्थिति नियंत्रण में है।
भले ही इस बार सैन्य झड़प की हिंसा काफी हद तक सीमित रही, लेकिन भारत-चीन संबंधों को रसातल में पहुंचाने वाले गलवन कांड के बाद चीन की ओर से फिर इस तरह की कार्रवाई यही संकेत दे रही है कि चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग के इरादे नेक नहीं हैं। ऐसी आशंका इसलिए बलवती हो रही है, क्योंकि कोविड को लेकर घोर विफलता के कारण चीनी राष्ट्रपति और उनकी कम्युनिस्ट सरकार चीन में उठ रही जनाक्रोश की लहर से सहमे हुए हैं। ऐसे में, यही लगता है कि चीनी राष्ट्रपति, पार्टी प्रमुख और प्रधान सेनापति के सभी पदों पर विराजमान शी की सेना अपनी जनता का ध्यान बंटाने के लिए ही इस तरह की हरकतें कर रही है। ऐसा मानने वालों की कमी नहीं है कि इस जनाक्रोश को ठंडा करने के लिए शी कभी भी भारत या ताइवान के साथ युद्ध के हालत पैदा कर सकते हैं। ऐसे में यह सवाल अहम हो जाता है कि शी दोनों देशों में से किसके साथ टक्कर लेना ज्यादा फायदेमंद मानते हैं? चीनी मामलों के कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि ताइवान पर हमला करके चीन एक ऐसे अंतरराष्ट्रीय टकराव में उलझ सकता है, जिसमें ताइवान पर पूरी तरह कब्जे का शी का सपना पूरा नहीं हो पाएगा। भारत के बारे में भी चीन को समझ आ गया है कि 1962 के बजाय आज का भारत करारा जवाबी हमला कर सकता है, जो चीन को बहुत महंगा पड़ेगा। इसके बाद विश्व विजय का उसका सपना ध्वस्त हो सकता है। जो भी हो, रावण और दुर्योधन सरीखी मानसिकता वाले तानाशाह शी चिनफिंग बदहवासी के आलम में किसी भी हद तक जा सकते हैं और तवांग प्रकरण इसकी ताजा मिसाल है, जिसने भारत को सचेत रहने का संकेत दे दिया है।
यह पहला अवसर नहीं जब अरुणाचल के यांग्त्से क्षेत्र में चीनी सैनिकों ने नियंत्रण रेखा को बदलने का प्रयास किया हो, लेकिन इस बार भारतीय क्षेत्र में घुसने का प्रयास करने वाले चीनी सैन्य दस्ते की संख्या तीन सौ से अधिक थी, जबकि अमूमन 20-25 चीनी सैनिकों की टुकड़ियां ही इस क्षेत्र में गश्त लगाने आती रही हैं। भारत और चीन की सेनाओं के बीच आपसी सहमति है कि गश्त करते समय दोनों पक्षों का कोई भी सैनिक अपने पास बंदूक, पिस्तौल या इस तरह का कोई घातक हथियार नहीं रखेगा। इस कारण ऐसी स्थिति में होने वाला टकराव एक दूसरे पर चिल्लाने, नारेबाजी और धक्कामुक्की तक ही सीमित रहता है। शायद यही कारण है कि तवांग में टकराव भी धक्कामुक्की और हाथापाई से आगे नहीं बढ़ा। वहीं, जून 2020 में गलवन में चीनी सैनिकों ने निहत्थे रहने के नियम का पालन करने के बजाय पहले से तैयार कीलों की वेल्डिंग वाली लोहे की राड और बाड़ की तारों से लैस डंडों जैसे घातक हथियारों से भारतीय सैनिकों पर एकाएक हमला बोल दिया था। उस हमले में भारतीय कमांडर सहित 20 सैनिक बलिदान हो गए थे, लेकिन समय पर भारतीय सेना की नई कुमुक के पहुंच जाने से बाजी पलट गई। चीन सरकार ने गलवन में अपने हताहत सैनिकों पर पर साल भर चुप्पी साधे रखी और बाद में केवल चार सैनिकों के मरने की बात स्वीकारी। हालांकि, अमेरिका समेत कुछ देशों के चीन में सक्रिय खुफिया तंत्रों ने बाद में दावा किया कि इस मुठभेड़ में चीन के 42 सैनिक मारे गए थे। सैटेलाइट तस्वीरों से भी इस दावे की पुष्टि हुई।
तवांग में झड़प ने सिद्ध किया कि इस क्षेत्र में भारतीय सेना की तैयारी बहुत मजबूत है और हमारे सैनिक इस तरह की स्थिति से निपटने को पूरी तरह तैयार हैं। इससे पहले ऐसे समाचार आते रहे हैं कि चीन ने भारत के साथ लगने वाली अपनी करीब साढ़े तीन हजार किमी लंबी सीमा के साथ-साथ न केवल साल भर चालू रहने वाला सड़कों का तंत्र विकसित किया हुआ है, बल्कि राष्ट्रपति शी की व्यक्तिगत पहल पर इस सीमा के कई क्षेत्रों में 600 से अधिक ऐसे नए गांव बसा लिए हैं, जिनमें पक्के घरों से लेकर सड़क, बिजली, स्कूल और ब्राडबैंड इंटरनेट सुविधाएं भी उपलब्ध हैं। इसके पीछे चीन की मंशा न केवल इस क्षेत्र में अपनी सैन्य शक्ति को मजबूत करना है, बल्कि इस इलाके पर अपना दावा मजबूत करने के लिए वहां स्थायी रूप से नागरिकों को बसाना भी है। सीमा पर गांवों को बसाने में राष्ट्रपति शी की व्यक्तिगत रुचि को इससे समझा जा सकता है कि पिछले साल अगस्त में अचानक तिब्बत यात्रा के दौरान उन्होंने अरुणाचल से लगने वाली सीमा की भी यात्रा की थी और इस तरह के एक गांव में भी गए थे, लेकिन सीमा पर उनकी इस यात्रा का असली उद्देश्य अपनी सैन्य तैयारियों का जायजा लेना था।
तवांग क्षेत्र में चीन की नई आक्रामक हरकत इस मायने में भी बहुत गंभीर है कि भारत सरकार चीन के साथ-साथ विश्व को स्पष्ट कर चुकी है कि चीन जब तक भारतीय सीमा पर तनाव कम नहीं करता और अपनी सेनाओं को पहले वाले स्थानों तक वापस नहीं ले जाता, तब तक उसके साथ दूसरे मामलों में सहयोग की कोई बात नहीं की जाएगी। चीन इससे परेशान है कि भारत अपनी इस नीति पर कायम है। तवांग में उसकी हरकत उसकी खिसियाहट भरी प्रतिक्रिया भी हो सकती है। इसमें नई दिल्ली के लिए निहित संदेश भी स्पष्ट है कि भारत को चीन के साथ युद्ध के लिए भी तैयार रहना चाहिए।
Date:15-12-22
नगर निकायों के प्रति बेरुखी का निदान जरूरीए के भट्टाचार्य
बिज़नेस स्टैंडर्ड के एक विश्लेषण में बताया गया है कि नगर निकायों में अपेक्षाकृत कम मतदान दर्ज करने के मामले में दिल्ली अकेला नहीं है। केवल राष्ट्रीय राजधानी में ही नहीं बल्कि देश के कई अन्य शहरों के नगर निकाय चुनावों में भी मतदाताओं ने अपेक्षाकृत कम रुचि दिखाई। जबकि विधानसभा अथवा लोकसभा के चुनावों में मतदाताओं का प्रतिशत अधिक रहा है। नगर निकाय चुनावों में मतदाताओं की कम अभिरुचि को किसी भी लोकतंत्र में चिंता का विषय माना ही जाना चाहिए।
इस माह के आरंभ में जिस बात ने इस चिंता पर जोर दिया वह था यह खुलासा कि गत 4 दिसंबर को हुए दिल्ली नगर निगम के चुनावों में 250 पार्षदों के निर्वाचन के लिए कुल पात्र मतदाताओं में से केवल आधों ने मतदान किया । यह तादाद 2020 के दिल्ली विधानसभा चुनावों तथा उससे एक वर्ष पहले के आम चुनावों की तुलना में 10 फीसदी कम थी। वर्ष 2017 के नगर निगम चुनावों में करीब 53 फीसदी लोगों ने मतदान किया था जबकि 2015 के दिल्ली विधानसभा चुनावों में 67 फीसदी लोगों ने वोट डाला था ।
मुंबई, बेंगलूरु और चेन्नई के नगर निगम चुनावों में भी मतदान का रुझान कमोबेश ऐसा ही रहा और वहां क्रमशः 45 से 48 फीसदी के बीच मतदान हुआ। केवल कोलकाता अपवाद था जहां पिछले नगर निगम चुनावों में 67 फीसदी मतदान हुआ जो कि पश्चिम बंगाल के पिछले विधानसभा चुनाव में हुए मतदान से भी अधिक था।
नगर निकाय चुनावों में इतने कम मतदान की क्या वजह हो सकती है ? क्या यह इस बात का संकेत है कि मतदाता उदासीन हैं। या फिर यह राजनीतिक दलों की अनिच्छा का परिणाम है? या फिर ऐसा इसलिए है कि देश में शासन का ढांचा इस प्रकार का है कि न तो राजनीतिक दल और न ही मतदाताओं में निकाय चुनावों में हिस्सेदारी को लेकर कोई रुचि बची है। कोलकाता का रुझान बाकी जगहों से अलग लग रहा है। कोलकाता शहर पहले से ही राजनीतिक रूप से अधिक सचेत रहा है। इतिहास बताता है कि कोलकाता कई राजनीतिक दलों के लोकप्रिय आंदोलनों का अगुआ रहा है और वहां की जनता ने बहुत बड़े पैमाने पर उनमें हिस्सेदारी की है। ऐसे में कोलकाता के निकाय चुनावों में अच्छा मतप्रतिशत चकित नहीं करता ।
दिल्ली, मुंबई, बेंगलूरु और चेन्नई जैसे शहरों की कहानी अलग है। इस विश्लेषण में शामिल दो दक्षिणी शहरों में अनियमित चुनाव भी हुए हैं। हालांकि 1993 में हुए संविधान संशोधन के मुताबिक नगर निकाय समेत सभी स्थानीय निकायों के चुनाव हर पाँच वर्ष में होने चाहिए लेकिन बेंगलूरु और चेन्नई ने इसका पालन नहीं किया। निकाय चुनावों में मतदाताओं की रुचि कम होने की यह भी एक वजह हो सकती है। परंतु नगर निकाय चुनावों में मतदाताओं और राजनीतिक दलों की फीकी प्रतिक्रिया की एक और वजह हो सकती है। इसका संबंध देश के शासन ढांचे से है जिसमें नगर निकायों जैसे स्थानीय शासन को बहुत कम अधिकार प्राप्त हैं। यही कारण है कि इस तीसरे स्तर के शासन के पास संसाधन जुटाने के पर्याप्त अधिकार नहीं हैं। इससे भी बुरी बात यह है कि इनमें से अधिकांश निकाय अपने मौजूदा अधिकारों का इस्तेमाल करने के भी बहुत अधिक इच्छुक नहीं दिखते ताकि नए संसाधन जुटाकर योजनाओं का वित्त पोषण कर सकें।
इसके दो परिणाम नजर आते हैं। पहला, नगर निकायों के प्रदर्शन पर गहरा असर होता है। अक्सर उनके पास उन तमाम एजेंसियों और संगठनों के कर्मचारियों का वेतन तक देने के लिए पैसे नहीं होते हैं जिनकी मदद से वे प्राथमिक शिक्षा, स्वास्थ्य और सफाई जैसी बुनियादी सेवाएं संचालित करते हैं।
दूसरा परिणाम तो और भी बुरा है। ये निकाय राज्य सरकारों द्वारा किए जाने वाले वित्तीय आवंटन पर अधिक निर्भर रहने । लगते हैं। यदि आवंटन न हो तो ये निकाय अपनी बुनियादी सेवाएं भी नहीं दे पाते। अगर निकाय पर राज्य के सत्ताधारी दल से अलग दल का शासन हो तो वित्तीय परिणाम और भी गंभीर होते हैं।
आश्चर्य नहीं कि ऐसे हालात के कारण शासन की अलग तरह की राजनीति पैदा हुई है। वित्त आयोग अब संसाधनों को सीधे केंद्र से इन नगर निकायों को हस्तां तरित कर रहे हैं। जाहिर है यह बात राज्यों को पसंद नहीं आ रही है। यहां तक कि केंद्र सरकार भी राज्यों को जो आवंटन कर रही है वह इस शर्त पर कि वह उसे नगर निगमों या अन्य स्थानीय शासन के लिए इस्तेमाल करे।
निश्चित तौर पर राजनीतिक दल नगर निगमों के चुनाव इसी बल पर लड़ रहे हैं कि उनमें राज्य या केंद्र सरकार से और अधिक राजस्व जुटाने की क्षमता है या नहीं। उदाहरण के लिए हाल ही में संपन्न हुए दिल्ली नगर निगम के चुनावों में आम आदमी पार्टी की दलील थी कि उसे अगर उसे मत दिया जाता है तो राज्य सरकार को निगम के कामकाज के संचालन में मदद मिलेगी। भारतीय जनता पार्टी ने भी कहा कि उसे केंद्र की मोदी सरकार से मदद मिल रही है।
यह दुर्भाग्य की बात है कि नगर निकायों को लेकर होने वाली बहस में अब तक एक महत्त्वपूर्ण बात पर ध्यान नहीं दिया गया है और वह यह कि उनके द्वारा बेहतर शासन की व्यवस्था होनी चाहिए। इस बात पर कोई चर्चा नहीं होती है कि इन निगमों को अपना कर राजस्व दायरा बढ़ाने के लिए कैसे प्रेरित किया जा सकता है और मौजूदा राजस्व संग्रह को अधिक किफायती और प्रभावी कैसे बनाया जा सकता है। एक संबद्ध मसला प्रबंधन ढांचे का भी है जिसका नगर निकाय अनिवार्य तौर पर पालन करते हैं।
नगर निकायों को चलाने के लिए जो पद अहम माने जाते हैं उन पर अक्सर भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी पदस्थ रहते हैं। शासन के विभिन्न स्तरों पर प्रशासनिक निरंतरता मुहैया कराने में भले ही यह लाभदायक साबित हुआ लेकिन अगर इन निकायों को अपने मुख्य कार्याधिकारियों को निजी क्षेत्र से चुने जाने की अधिक आजादी दी जाए तो उन्हें राजस्व जुटाने के नए स्रोतों पर विचार करने का अधिक अवसर मिलेगा। यदि ऐसा हुआ तो इन निकार्यों को वित्तीय दृष्टि से अधिक स्वायत्त बनाया जा सकेगा। एक बार जब नगर निकाय अपने दम पर अधिक संसाधन जुटाना शुरू कर देंगे और लोगों को अधिक किफायती सेवाएं देने लगेंगे तो मतदाताओं की मौजूदा बेरुखी भी दूर हो जानी चाहिए। इससे देश में अपेक्षाकृत कमजोर अवस्था वाली तीसरी श्रेणी के शासन को भी कुछ मजबूती हासिल होगी।
Date:15-12-22
चीन की बेचैनी और तवांगप्रो सतीश कुमार
तवांग के मुद्दे को दो तरह से देखा जा सकता है। पहला चीन के अंदरूनी हालात बहुत ठीक नहीं हैं। राष्ट्रपति शी जिनपिंग की राजनीतिक किश्ती भंवर में फंसी हुई दिख रही है। उनकी मंशा आनन फानन में अपनी राजनीतिक हैसियत को माओ त्से तुंग जो चीन में साम्यवादी व्यवस्था के सस्थापक थे के बराबर लाकर खड़ा करने की है। जबकि सच्चाई यह है कि चीन का आथक ढांचा 2013 के बाद से निरंतर लुढ़कता हुआ दिख रहा है। कूटनीतिक चुनौती ताइवान और जापान की तरफ से ज्यादा सख्त है। कोरोना के आघात से चोटिल चीन की साम्यवादी व्यवस्था लोगों के क्रोध का कोप भी झेल रही है। ऐसे मौके पर पडोसी देशों से संघर्ष की बातें लोगों को भ्रमित करती हैं। चीन की इस दलील को नकारा नहीं जा सकता कि गलवान संघर्ष के बाद चीन ने तवांग को निशाना बनाया। दूसरा चीन हर समय देखना चाहता है कि भारत की सैन्य और राजनीतिक व्यवस्था कितनी सजग और मजबूत है। दोकलाम गलवान पुनः तवांग उसी सिद्धांत की पुष्टि करता है। चीन युद्ध नहीं करना चाहता है लेकिन यह जरूर जानना चाहता है कि भारत किस हद तक तैयार है ?
भारत–चीन की सेना के बीच अरु णाचल प्रदेश के तवांग में हुई झड़प का मुद्दा देश की संसद तक पहुंच गया है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह व गृह मंत्री अमित शाह ने तवांग संघर्ष पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है। इस बीच चीनी विदेश मंत्रालय ने तवांग संघर्ष पर बयान दिया। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता वांग वेनिबन ने कहा कि भारत के साथ सीमा पर स्थिति ‘स्थिर’ है। चीनी विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता वांग वेनिबन ने कहा कि भारत–चीन सीमा पर हालात कुछ दिनों के बाद फिर से सामान्य हैं। उन्होंने कहा कि सीमा पर दोनों पक्षों के सैनिकों के बीच झड़प हुई थी। भारत के तवांग सेक्टर में शुक्रवार को आमने–सामने हुई झड़प में दोनों पक्षों के जवानों को चोटें भी आई हैं। हालांकि‚ वांग ने अरुणाचल प्रदेश के तवांग सेक्टर के यांग्त्से क्षेत्र में भारतीय और चीनी सैनिकों के बीच 9 दिसंबर को हुए संघर्ष के बारे में जानकारी देने से इनकार कर दिया। भारतीय वायु सेना की पूर्वोत्तर में मजबूत उपस्थिति है‚ और असम के तेजपुर और छाबुआ सहित कई स्थानों पर सुखोई–30 लड़ाकू विमान तैनात हैं। राफेल लड़ाकू विमानों को पश्चिम बंगाल के हाशिमारा में तैनात किया गया है। चीनी सेना की निगाहें एलएसी पर रही हैं‚लेकिन अरुणाचल प्रदेश के तवांग जिले को लेकर उसका मंसूबा बार–बार सामने आता रहा है। 1962 के युद्ध के समय चीन ने भारत के पूर्वोत्तर हिस्से में अपने सैनिकों के बड़े़ जत्थे से तवांग के रास्ते असम तक घुसपैठ करवाई थी। कुछ समय के लिए तवांग चीन के कब्जे में रहा था। अक्टूबर, 2021 में चीन के दो सौ सैनिकों का एक दल तवांग स्थित भारत–चीन–भूटान सीमा के पास भारतीय गांव में घुस आया था जिसे बाद में भारतीय सैनिकों ने खदेड़ा था। इस बार भी चीनी सेना के मंसूबे कुछ ऐसे ही थे लेकिन भारतीय सैनिकों के सामने एक बार फिर चीनी सेना को मुंह की खानी पड़ी।
अमेरिका का वर्तमान चीन विरोध शीत युद्ध के माहौल से अलग है। 1950 से 1972 तक विरोध वैचारिक था साम्यवाद और पूंजीवाद के बीच वर्चस्व की लड़ाई थी लेकिन 2016 से 2020 के बीच का द्वंद्व अस्तित्व की जद्दोजहद है। अमेरिका किसी भी कीमत पर चीन को दुनिया का मठाधीश बनते नहीं देख सकती उसके लिए वह किसी हद तक जाने के लिए तैयार है। अमेरिका की इस सोच को अगर कोई भी देश सार्थक मदद देने की स्थिति में है तो वह भारत है। भारत की भी अपनी जरूरतें हैं चीन को कमजोर करने में। कोरोना ने ऐसी भू–राजनीतिक स्थिति पैदा कर दी है जिसमें चीन की रफ्तार न केवल रोकी जा सकती है बल्कि तोड़ा भी जा सकता है और उसके लिए तिब्बत से बेहतरीन और कोई विषय नहीं हो सकता। दशकों से चली आ रही आतंक और अलगाववाद की समस्या थम जाएगी पड़ोसी देशो में भी भारत की धाक बढ़ जाएगी। कूटनीति में समय–परिस्थिति की अहम भूमिका होती है अगर तीर सही समय पर कमान से नहीं निकला तो खुद के लिए भी घातक बन सकता है।
चीन की साख निरंतर विवाद के घेरे में है। 2013 के बाद से चीन की आथक रफ्तार धीमी हुई है। पिछले कुछ महीनों में कुछ देशों ने चीन के विरु द्ध मुहीम भी शुरू कर दी है। जर्मनी ने चीन की 2 सॉफ्टवेयर कंपनी प्रतिबंधित कर दी हैं। जबूती जो अीका का छोटा सा देश है‚चीन के कर्ज के भार से दम तोड़ रहा है और उसने चीनी कर्ज नहीं लौटाने का फैसला किया है। जापान और ताइवान चीन के साथ मुठभेड़ की स्थिति में दिख रहे हैं। पश्चिमी दुनिया चीन के विरोध में गोलबंद हो गई है। लेकिन चीन को मालूम है कि असली मुकाबला तो भारत के साथ होना है। इसलिए भी कि 21 शताब्दी को एशियाई शताब्दी के रूप में जाना जा रहा है। भारत कूटनीति धारदार हुई है। रूस–यूक्रेन युद्ध में अगर किसी देश की बात को सबसे ज्यादा अहमियत दी गई है‚तो ये भारत के प्रधानमंत्री के शब्द थे। भारत अमेरिका का साथ नहीं देते हुए भी अमेरिकी समीकरण का सबसे मुख्य हिस्सा बना हुआ है। रूस की युद्ध नीति के विरोध के बावजूद भारत–रूस संबंध मजबूत बनते गए। यह सब कुछ चीन की आंखों में किरकिरी के सामान था। चीन अपने एकमुश्त आथक जाल के जरिए सामरिक समीकरण की बिसात बिछाने में फेल प्रतीत हो रहा है।
इसलिए आनन फानन में चीन ने गलवान के साथ तवांग को भी विवाद के घेरे में खड़ा कर दिया है। चीन की हठधमता सम्भवतः जारी रहेगी क्योंकि उसे लगता है कि भारत के साथ युद्ध जैसी स्थिति पैदा करके वह अपने खिलाफ बन रहे समीकरण को तोड़ देगा या इसे बनने नहीं देगा। लेकिन उसके दुश्मन एक नहीं बल्कि हर मुहाने पर खड़े हैं। दक्षिण चीन सागर पर चीन के पडोसी देश वर्षों से डंक के साथ तैयार हैं। उन्हें केवल समर्थन की जरूरत है। ताइवान ने विगुल पहले ही बजा दिया है। कोरोना महामारी के बाद से यूरोप पूरी तरह से चीन के विरोध में है। चीन भारत के साथ संघर्ष की स्थिति पैदा करके अपनी मुसीबत को बड़ा कर रहा है जबकि उसकी अंदरूनी स्थिति प्रतिकूल है। ऐसे हालात में भारत के साथ दुश्मनी उसे महंगी पड़ेगी। चुनौती भारत के लिए भी है‚ लेकिन भारत दुनिया की नजरों में और सामरिक ढंग से मजबूत हालत में है।
Date:15-12-22
विश्व समुदाय का चीन पर बढ़ता संदेहअरविन्द गुप्ता, ( डायरेक्टर, विवेकानंद इंटरनेशनल फाउंडेशन )
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने मंगलवार को संसद में एक बयान दिया, जिसमें उन्होंने तवांग (अरुणाचल प्रदेश) के यांगत्से क्षेत्र में चीन के सैनिकों द्वारा वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के अतिक्रमण करने की एक विफल कोशिश की जानकारी दी। उन्होंने यह भी बताया कि चीनी पक्ष को इस तरह की हरकतों से बाज आने और सीमा पर शांति बनाए रखने को कहा गया है। उन्होंने देश को आश्वस्त किया कि भारतीय सेनाएं इस तरह के किसी भी प्रयास को विफल करती रहेंगी।
चीन का यह अतिक्रमण साल 2020 की गलवान घटना के बाद अत्यंत गंभीर मामला है। 2020 में नियंत्रण रेखा के पश्चिमी क्षेत्र में अतिक्रमण का प्रयास किया गया था, और इस बार लगभग वैसी ही घटना पूर्वी सेक्टर में हुई है। इसका अर्थ है कि दोनों पक्षों के वरिष्ठ सैन्य कमांडरों की 16 बैठकों के बाद भी चीन को यह कतई परवाह नहीं है कि उसकी ऐसी गतिविधियों से द्विपक्षीय संबंधों पर कितना बुरा असर पड़ सकता है और पड़ रहा है।
भारत के प्रति चीन के व्यवहार को समझने के लिए हमें व्यापक दृष्टिकोण की जरूरत है। चीन एक उभरती वैश्विक ताकत है। उसकी टक्कर अमेरिका और उसके सहयोगी देशों से है। वह अमेरिका का प्रभाव विश्व भर में, विशेष रूप से हिंद-प्रशांत क्षेत्र (इंडो-पैसिफिक) में कम करना चाहता है। वह भारत को अमेरिका के साथ देखता है, और इस बात से बेहद परेशान है। वह भारत के विकास और उद्भव को एक चुनौती के रूप में देखता है। उसका यही प्रयास है कि कैसे भारत के बढ़ते प्रभाव को रोका जाए। वास्तविक नियंत्रण रेखा का बार-बार उल्लंघन और अतिक्रमण करके वह नई दिल्ली को एक बड़े दबाव में रखना चाहता है।
चीन के आक्रामक रवैये की कई झलकियां हाल में देखने को मिली हैं। कुछ महीने पहले अमेरिकी संसद की स्पीकर नैन्सी पेलोसी की ताइवान यात्रा के बाद चीन इतना अधिक भड़क गया था कि उसने ताइवान जलडमरूमध्य में अपनी सैन्य गतिविधियां इतनी अधिक बढ़ा दीं कि ताइवान व अमेरिका के साथ युद्ध का खतरा पैदा हो गया था। दक्षिण चीन सागर में उसने नाइन डैश लाइन के भीतर के सभी द्वीपों पर कथित तौर पर अवैध कब्जा कर लिया है। पूर्वी चीन सागर में सेनकाकू द्वीप समूहों को लेकर जापान के साथ उसकी खटपट लगातार चलती रहती है। चीन क्वॉड को, जिसमें भारत, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया शामिल हैं, अपने लिए एक बड़ा खतरा मानता है।
अक्तूबर में हुई चीन की कम्युनिस्ट पार्टी की 20वीं कांग्रेस के बाद राष्ट्रपति शी जिनपिंग माओ के बाद चीन के सबसे सशक्त नेताओं के रूप में उभरे हैं। लिहाजा यह मानकर हमें चलना चाहिए कि चीन के तेवर भविष्य में और कड़े होंगे, और द्विपक्षीय संबंधों में तनाव व जटिलताएं बढ़ेंगी। अच्छी बात यह है कि विश्व जनमत चीन के व्यवहार को संदेहास्पद मानता है। अमेरिका की ताजा नेशनल सिक्योरिटी स्ट्रैटिजी में बीजिंग को वाशिंगटन की प्रभुता के लिए एक बड़ी चुनौती माना गया है। हिंद-प्रशांत में चीन के आक्रामक रुख के कारण ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और ब्रिटेन ने परमाणु पनडुब्बियों को बनाने के लिए ऑकस समझौता किया है, जिसे चीन अपने लिए एक गंभीर चुनौती के रूप में देखता है। अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया और जापान भी त्रिपक्षीय ढांचे में एक-दूसरे के साथ सहयोग करते हैं। इस मंच का उद्देश्य भी चीन से निपटना ही है।
तो क्या मान लिया जाए कि चीन का अरुणाचल प्रदेश में ताजा अतिक्रमण-प्रयास विश्व जनमत को सचेत और सावधान करेगा? क्या ये देश भारत के पक्ष में खुलकर सामने आएंगे और चीन की आलोचना करेंगे? ऐसे निष्कर्ष निकालना फिलहाल ठीक नहीं है। अधिकतर देशों के, और जिसमें भारत भी शामिल है, चीन के साथ व्यापक व्यापारिक संबंध हैं। सैकड़ों विदेशी कंपनियां अब भी चीन में निवेश और कारोबार कर रही हैं। चीन ने मध्य एशिया, अफ्रीका, पश्चिमी एशिया, लातीन अमेरिका के दर्जनों देशों से अपने संबंध बढ़ाए हैं। बेशक अधिकतर देश चीन के आक्रामक रूप को पसंद नहीं करते, लेकिन वे खुलकर उसकी निंदा नहीं करेंगे। यहां तक कि रूस भी, जो हमारा घनिष्ठ मित्र है, आज इस स्थिति में नहीं है कि वह चीन के खिलाफ भारत के साथ खड़ा दिखे।
ऐसी स्थिति में भारत के सामने क्या विकल्प हैं? राजनयिक स्तर पर हमें विश्व को सचेत करना होगा कि चीन के बार-बार अतिक्रमण-प्रयासों को उसकी व्यापक मंशा के रूप में देखा जाए। चीन जो कुछ हमारे खिलाफ कर रहा है, कुछ-कुछ वैसा ही वह जापान, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और अन्य देशों के विरुद्ध भी कर रहा है। हमें क्वाड देशों से आग्रह करना चाहिए कि वे चीन की हालिया अतिक्रमण-साजिश के बारे में अपनी सख्त प्रतिक्रिया दें। साथ ही, अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया की चीन के संदर्भ में जो चिंताएं हैं, उसके बारे में हमें भी अपनी प्रतिक्रिया देनी चाहिए।
भारत अगले एक साल के लिए जी-20 का अध्यक्ष है। चीन भी इस समूह का सदस्य है। भारत चाहेगा कि सितंबर, 2023 में होने वाला जी-20 शिखर सम्मेलन सफलतापूर्वक संपन्न हो, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं होना चाहिए कि भारत किसी प्रकार से अपनी संप्रभुता और अखंडता पर कोई आंच आने दे सकता है। चीन इस गलतफहमी में न रहे कि वह जी-20 शिखर सम्मेलन के चलते भारत की मजबूरी का फायदा उठा सकता है। ऐसा संदेश भारत की तरफ से जाना चाहिए।
कुल मिलाकर, भारत को अपने ही बल पर चीन से निपटना होगा। यह स्वाभाविक है कि दूसरे देश अपने-अपने हितों पर अधिक जोर देंगे। हमें अपनी सैन्य शक्ति को बढ़ाना पड़ेगा, ताकि चीन किसी मुगालते में न रहे। भारत की सैन्य क्षमताओं में और सुधार किया जाना चाहिए। अब हम इस गलतफहमी में नहीं रह सकते कि चीन वास्तविक नियंत्रण रेखा पर शांति और स्थिरता में कोई दिलचस्पी रखता है।हमें सीमा क्षेत्रों में सड़कों, पुलों, सुरंगों, इमारतों और अन्य बुनियादी ढांचों का तीव्र विकास करना होगा। इसी प्रकार, अपनी सैन्य शक्ति को सीमा क्षेत्रों में इस प्रकार तैनात करना होगा कि चीन के साथ किसी अप्रिय स्थिति से बचना सुनिश्चित हो सके। अगर भारत सशक्त होगा, तो इसका संदेश पूरे विश्व को जाएगा।
Date:15-12-22
आर्थिक तरक्की को चूना लगा रहे हैं कर्ज के बटटे खातेब्रजेश कुमार तिवारी, ( प्रोफेसर, जेएनयू )
मंगलवार को वित्त राज्य मंत्री भागवत कराड ने राज्यसभा में बताया कि वित्त वर्ष 2021-22 में वाणिज्यिक बैंकों ने कुल 1,74,966 करोड़ रुपये का ऋण ‘राइट ऑफ’ कर दिया है। ‘राइट ऑफ’ किए गए या बट्टे खाते में डाले गए ऋण में से 33,534 करोड़ रुपये की ही वसूली हो पाई है। साथ ही, पिछले पांच वित्त वर्ष में 10 लाख करोड़ रुपये से ज्यादा के ऋण को बट्टे खाते में डाला गया है। वसूली में नाकाम रहने पर अकेले भारतीय स्टेट बैंक ने ही पिछले चार वित्त वर्ष के दौरान 1.65 लाख करोड़ रुपये का कर्ज बट्टे खाते में डाला है। पिछले चार साल में ऋण अदायगी के मामलों में जान-बूझकर चूक करने वालों (विलफुल डिफॉल्टर) की कुल संख्या 10,306 हो गई है। भारतीय बैंकों के समक्ष मौजूद सबसे बड़ी समस्या बैड लोन (एनपीए) की ही है, जो निजी और सरकारी बैंकों को समान रूप से प्रभावित कर रही है।
हालांकि, मार्च 2022 तक सकल गैर-निष्पादित संपत्ति (जीएनपीए) के रूप में कुछ राहत की बात बैंकों के लिए रही और यह छह साल के निचले स्तर 5.9 प्रतिशत पर आ गई है। फिर भी, हमारा एनपीए अनुपात अब भी ब्रिटेन (1.2 फीसदी), मलेशिया (1.6 फीसदी), चीन (1.8 फीसदी), इंडोनेशिया (2.6 फीसदी), फ्रांस फीसदी(2.7) जैसे देशों से ज्यादा है।
वैसे, कुछ वर्षों में बैंकों का एनपीए घटा है, पर इसके पीछे की स्याह हकीकत बट्टे खाते हैं। बैंकों ने पांच साल में जितने कर्ज की वसूली की, उसके दोगुने से अधिक बट्टे खाते में डाल दिए। रिजर्व बैंक के निर्देशों के मुताबिक, ऐसे फंसे हुए कर्ज, जिसके लिए चार साल पूरे होने पर बैंक अपने खाते में पूरी रकम का प्रावधान कर देते हैं, उसे बैंक की बैलेंस शीट से हटा दिया जाता है। हालांकि, ये प्रावधान बैंक अपने स्रोतों और जनता के पैसे से ही बनाता है। इसे ही ‘राइट ऑफ’ का नाम दिया जाता है। बैंक अपनी बैलेंस शीट को साफ-सुथरा रखने, टैक्स लाभ लेने के मकसद से एनपीए को बट्टे खाते में डालते हैं। बैंकों का दावा है, राइट ऑफ किए जाने के बाद भी कर्ज वसूली के लिए दबाव डाला जाता है। आंकड़ों पर नजर डालें, तो पता चलता है कि 15-20 फीसदी से ज्यादा ऋण की वसूली नहीं हो पाती है।
मंत्री ने यह भी बताया कि विलफुल डिफॉल्टर की सूची में मेहुल चोकसी की गीतांजलि जेम्स लिमिटेड सबसे ऊपर है। भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा साझा की गई जानकारी से पता चलता है कि सिर्फ 312 बड़े डिफॉल्टरों पर कुल बैड लोन का 76 प्रतिशत से अधिक का बकाया है। जहां एक तरफ, सरकार करदाताओं के पैसों से बैंकों को पूंजी उपलब्ध करा रही है, वहीं दूसरी तरफ, बैंक भारी मात्रा में ऋण न लौटाने वालों के कर्ज को ठंडे बस्ते में डाल रहे हैं। बैंकों और जांच एजेंसियों की नीति, नीयत और निगरानी पर भी सवाल उठ रहे हैं।
छोटे कर्जदार एक भी किस्त भरने में चूक जाता है, तो बैंक प्रबंधन उसके खिलाफ कार्रवाई में देर नहीं लगाते हैं। ऐसे मामलों में कई बार नौबत कुर्की और नीलामी तक पहुंच जाती है, लेकिन कॉरपोरेट ऋण वसूलने के मामले में बैंकों के हाथ बंध जाते हैं और ऋण लेने वाले आसानी से विदेश भाग जाते हैं। उन्हें वापस लाना मुश्किल होता है। बात साफ है, बैंकों को एनपीए से बचाना है, तो कॉरपोरेट ऋण देने में बेहद सतर्कता दिखानी होगी। आजादी के 75 वर्षों में बैंकिंग की भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण रही है और यह कई पड़ावों से होते हुए आगे बढ़ रही है। आज भारतीय बैंकों के पास जोखिम ऋण की राशि श्रीलंका के सकल घरेलू उत्पाद का लगभग दोगुना है।
केवल नेशनल एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी लिमिटेड या बैड बैंक की स्थापना असली समाधान नहीं है, क्योंकि ऋण खराब होने पर ही ये उपाय मदद कर सकते हैं, ऋण खराब होने से नहीं रोकते। भारत में किसी बैंक में बैंकर बनने के लिए आपके पास विशिष्ट कौशल की आवश्यकता नहीं है। बैंकिंग क्षेत्र को कौशल विशिष्ट क्षेत्र के रूप में वर्गीकृत करने की जरूरत है, विशेष रूप से इसके उधार देने वाले विभाग को सुधारना पड़ेगा। उधार मांगने वालों की जांच होनी चाहिए, जोखिमों का समग्र आकलन होना चाहिए। बड़े लेनदार के पासपोर्ट विदेश मंत्रालय में जमा होने चाहिए। ऋण चोरों के सामाजिक बहिष्कार के भी कायदे बनने चाहिए।
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भारत के अधिकांश शहर सामान्य अव्यवस्था और पूर्ण अफरा-तफरी के बीच झूल रहे हैं। इसका कारण अक्सर प्रभावी शासन की कमी को माना जाता है। भारतीय शहरों का डिजाइन और इसके बाद की बेतरतीब वृद्धि अपने आप में त्रुटिपूर्ण शासन का निर्माण करती है। इसके साथ ही –
शहर, गांवों का विस्तार नहीं होते हैं। वे सीमित क्षेत्र में कांक्रीट के ऐसे ढांचे से बने होते हैं, जहाँ अक्सर आबादी का घनत्व काफी अधिक होता है। ऐसे ढांचों के निर्माण के लिए दूरदृष्टि, नवाचार और कुशल प्रशासन की आवश्यकता होती है। यदि पूरे विश्व के शहरों पर नजर डालें, तो आसानी से देखा जा सकता है कि ये गांवों या राज्यों से अलग बने होते हैं।
उदाहरण के लिए न्यूयार्क के ब्रुकलिन ब्रिज को लें, तो देखा जा सकता है कि शताब्दी पूर्व बना यह पुल सड़क मार्ग, सायकिल ट्रैक, पैदलयात्री और रेलमार्ग सभी के लिए पर्याप्त स्थान रखता है। इसी प्रकार से नगर योजना के लिए भी तीन स्तरीय समाधान हो सकता है –
1) प्रशासन – सर्वप्रथम नौकरशाही की जिम्मेदारी होती है कि वह नागरिक प्रशासन के वृहद् पहलू को देखते हुए निर्णय ले। शहर के लिए भूमि आवंटन, आवश्यक सुविधाएं, बजट, केंद्रीय सुविधाओं और सेवाओं की व्यवस्था, शहरी परिवहन, आबादी के घनत्व पर नियंत्रण तथा कचरा प्रबंधन आदि की जिम्मेदारी ले।
2) इंजीनियरिंग – शहरों के बुनियादी ढांचों के लिए समयानुकूल सोच रखना निर्माण के दिशानिर्देश और उपनियमों का पालन, ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों का प्रयोग करना, परिवहन के नए प्रयोग और नगरीय आवासों के नए पर्यावरण अनुकूल डिजाइन तैयार करना इस क्षेत्र की जिम्मेदारी है।
3) रखरखाव – शहरी प्रशासन को चुस्त-दुरूस्त रखने के लिए निरंतर काम करने से ही शहरों का हाल ठीक रह सकता है।
विश्व के अधिकांश नगर एक ही प्रधान ‘मेयर’ के अधीन चलते हैं। मानव विकास के इच्छुक देश आज भी नगर प्रशासन को अच्छी तरह चला रहे हैं। तो फिर भारत ऐसा क्यों नहीं कर सकता ?
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित गौतम भाटिया के लेख पर आधारित। 18 नवंबर, 2022
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Date:14-12-22
What AIIMS Server “Hijack” Tells Us About Cyber SecurityEvery database is vulnerable, and our defences aren’t as robust as we thinkMishi Choudhary is a New York-based tech lawyer and Faisal Farooqui is a tech entrepreneur.
For days, hundreds of dedicated healthcare professionals at Delhi’s prestigious AIIMS had to work with pen and paper to register a sea of patients waiting in long queues after a ransomware attack. What should have been a seamless task of admitting patients in the hospital or rendering check-ups and diagnostic services in the outpatient department had to be done as it was in the 1970s and 80s.
This is because on November 23 the core or main servers of AIIMS were hijacked (or held hostage) by an unknown, faceless enemy who could have been operating as a single individual or a group or organisation. The servers were partially restored on December 6 and online appointments were restored earlier this week.
How safe is Digital India?
We have used the word hijack and not hacked only to draw attention to the sophistication of the level of this type of attack.
● ‘Hijack’ because the attacker/s have demanded an astronomical amount of Rs 200 crore to unlock these servers which are required for the smooth functioning of almost everything at AIIMS.
● Such an attack in the IT industry is known as a ransomware attack and is becoming more frequent than you and I can imagine.
● Worryingly, the national infrastructure remains exposed to a public network, ‘the internet’, which becomes the conduit for such ransomware attacks.
India is moving at breakneck speed to roll outDigital India in every aspect of our lives but without a comprehensive cyber security plan.
The too-big-to-fail Aadhaar database
Consider the Aadhaar database. When various petitioners argued before a five-judge constitution bench in 2018 that Aadhaar data is not safe, the then Attorney General of India responded that the data remains secure in a building that has 13-feet-high and five-feet-thick walls.
Of course, the Attorney General knew that walls and buildings do not protect data on servers that are powered by silicon chips and connected to fibre-optic networks. Anything, anything and we repeat anything that’s on a connected digital medium is extremely vulnerable to outside attack. One such attack happened on AIIMS.
Despite a clear prohibition issued by the Supreme Court against making Aadhaar registration mandatory, GoI and enthusiastic parties in both state governments and industry proceeded to adopt Aadhaar-basedtechnology and impose requirements for Aadhaar registration for even the most mundane services from educational scholarships to booking railway tickets to marrying voter ID databases to Aadhaar.
By making Aadhaar registration de facto mandatory, GoI has to now think about the security of personal information of citizens.
India’s enemies could target Aadhaar
Shouldn’t we dread the consequences of what will happen if our Aadhaar infrastructure or servers are held to ransomware or cyberattack in any form? Proponents of Aadhaar will argue that it’s stored safely behind sophisticated firewalls and layers of software and hardware-based protection and in worst-case scenarios, backup systems will kick in immediately.
Well of course, the system will be up and running again, but what about the identity and demographics, photos, biometric fingerprint, and eye scan of 135 crore citizens and residents that may end up in the hands of hostile groups or people or nations? There would be no victory even if our data was recovered afterwards, because the damage would already be done.
We recommend that a Cyber Security Board should be established with government and private sector participants that have the authority to convene following a significant cyber incident to analyse what happened and make concrete recommendations to improve cybersecurity.
You and I are simple ordinary citizens. We know that no government anywhere at present can promise a perfect security for its most critical personnel data. The only way to protect our nation’s and its citizen’s data health and identity data is perhaps by not having them stored anywhere. Period.
Date:14-12-22
मौसम का सीधा असर अब आम जिंदगियों परसंपादकीय
विश्व बैंक की एक ताजा रिपोर्ट के अनुसार आगामी कुछ वर्षों में भारत में गर्मी मनुष्य की बर्दाश्त करने की सीमा पार कर जाएगी, जिससे मौतें होंगी, बेरोजगारी बढ़ेगी और आर्थिक-खाद्य संकट भयानक रूप लेगा। रिपोर्ट में बताया गया कि दुनिया में इसका सबसे ज्यादा दंश भारत झेलेगा, जहां उच्च तापमान, लम्बे समय तक गर्मी और मानव जीवन के लिए बर्दाश्त से ज्यादा गर्म हवाएं होंगी। रिपोर्ट के अनुसार आज भारत में 75% कामगार (38 करोड़ लोग ) भीषण गर्मी में काम करते हैं जैसे खेती, निर्माण कार्य व मजदूरी रिपोर्ट ने इस वर्ष के अप्रैल में तापमान के 46 डिग्री सेल्सियस होने और मार्च से ही जबरदस्त गर्मी होने का जिक्र करते हुए बताया कि आने वाले समय में यह बढ़ेगा। दुनिया में करीब 80 करोड़ लोग बेरोजगार होंगे, जिनमें 34 करोड़ केवल भारत के होंगे। गरम हवाएं या लू सन् 2036 तक 25 गुना बढ़ जाएंगी। सन् 2030 में उच्च तापमान की वजह से आर्थिक गतिविधियां कम होंगी और भारत अपनी जीडीपी का 4.5% खोने लगेगा। चूंकि भारत में कोल्ड चेन की व्यवस्था केवल 4% ताजा उत्पादों के लिए है, लिहाजा हर साल करीब एक लाख करोड़ रुपए का खाद्य पदार्थ बर्बाद होता है। तापमान बढ़ने से दो-तिहाई वर्ग ऐसा होगा, जो इस गर्मी को नहीं झेल पाएगा। इससे मौत, बीमारियां और अनेक तरह का जीवन-संकट बना रहेगा। इसमें दो राय नहीं कि विगत मार्च माह में भयंकर गर्मी के कारण ही गेहूं की पैदावार घट गई। आने वाले दिनों में न केवल तापमान बढ़ने बल्कि लम्बे समय तक बने रहने वाले ग्रीष्म काल से भी कृषि -चक्र प्रभावित होने का खतरा है। यानी मानव- जीवन, उत्पादन, अर्थ-व्यवस्था सभी पर आसन्न संकट ।
Date:14-12-22
स्वागतयोग्य परिवर्तनसंपादकीय
जीन संवर्द्धित (जीएम) सरसों की हाइब्रिड किस्म डीएमएच-11 को मंजूरी देने को लेकर संसद में जो वक्तव्य दिए गए और सर्वोच्च न्यायालय में जो साक्ष्य दिया गया वह जीएम फसलों को लेकर सरकार की नीति में सकारात्मक बदलाव का संकेत देता है। इन फसलों की वाणिज्यिक खेती को लेकर अनिश्चित रुख रखने के बजाय अब सरकार इनके पक्ष में नजर आ रही है। जेनेटिक इंजीनियरिंग अप्रैजल कमेटी (जीईएसी) द्वारा जीएम सरसों को मंजूरी का बचाव करके सरकार ने न केवल यह स्वीकार किया है कि यह खाने-खिलाने की दृष्टि से सुरक्षित है बल्कि उसने एक कदम आगे बढ़कर यह भी कहा कि जीएम तकनीक खाद्य सुरक्षा और निर्यात में कमी की दृष्टि से अहम है। यह कृषि वैज्ञानिकों के उस विचार का समर्थन है जिसमें उनका मानना है कि जेनेटिक इंजीनियरिंग तकनीक की मदद से ही कृषि उत्पादों की बढ़ती मांग पूरी की जा सकती है और उत्पादन लागत कम करके किसानों की आय बढ़ाई जा सकती है। कीटनाशकों, बीमारियों और जलवायु परिवर्तन के कारण उत्पन्न चुनौतियों से निपटने में भी ऐसी फसलें मददगार होंगी।
दिलचस्प बात है कि डीएमएच-11 वही जीएम सरसों है जिसे जीईएसी ने 2017 में मंजूरी दी थी लेकिन पर्यावरण मंत्रालय ने इसके इस्तेमाल पर रोक लगा दी थी। अब वही मंत्रालय कह रहा है कि विषाक्तता, एलर्जी और पर्यावरण सुरक्षा को लेकर किए गए गहन अध्ययनों में पाया गया है कि जीएम हाइब्रिड हर लिहाज से सुरक्षित हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने जब सरकार से यह पूछा कि डीएमएच-11 को पर्यावरण संबंधी मंजूरी देने की वजह क्या रही तो सरकार ने जो जवाब दिया वह भी नीतिगत बदलाव की ओर संकेत देता है। सरकार ने जो हलफनामा पेश किया है उसमें जोर दिया गया है कि कृषि सुधार मसलन जीएम फसलों की खेती की मदद से ही घरेलू खाद्य तेलों की उपलब्धता बढ़ाई जा सकती है ताकि उनका आयात कम किया जा सके और उनकी कीमतों को नियंत्रित रखकर मुद्रास्फीति का प्रबंधन किया जा सके। दिल्ली विश्वविद्यालय के जैव प्रौद्योगिकी केंद्र द्वारा विकसित डीएमएच-11 के बारे में जानकारी है कि यह किस्म सरसों की लोकप्रिय किस्म वरुणा की तुलना में 28 फीसदी अधिक उपज देती है। दुनिया भर में जीएम हाइब्रिड के आने के बाद उत्पादन में काफी वृद्धि देखने को मिली है। भारत अपनी जरूरत के खाद्य तेल का करीब 60 फीसदी आयात करता है और माना जा रहा है कि जीएम बीजों के आने के बाद इसमें काफी कमी आएगी।
अहम बात यह है कि जीएम सरसों इकलौती खाद्य फसल नहीं है जिसे बीते एक दशक से अधिक समय से मंजूरी का इंतजार था। जीन संवर्द्धित बीटी-बैगन की तकदीर और भी बुरी है। भारी खपत वाली यह जीएम सब्जी कभी खेतों तक नहीं पहुंची जबकि जीईएसी ने इसे 2009 में ही इसे मंजूरी दे दी थी। ऐसा इसलिए हुआ कि जीएम फसलों का विरोध करने वाली लॉबी तथा सत्ताधारी भारतीय जनता पार्टी के वैचारिक संगठन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से संबद्ध स्वदेशी जागरण मंच ने इसका जमकर विरोध किया। हकीकत में यही वजह थी कि तत्कालीन सरकार ने सभी जीएम फसलों के खेतों में परीक्षण को 10 वर्ष के लिए स्थगित कर दिया था। भारतीय बीटी बैगन अब बांग्लादेश और फिलिपींस में जमकर उगाया जा रहा है।
ऐसे प्रतिगामी कदमों की देश ने भारी कीमत चुकाई है। कुछ प्रमुख बहुराष्ट्रीय कंपनियां जो देश में कपास क्रांति लाने वाले बीटी-कॉटन समेत जीन संवर्द्धित फसलों के विकास से जुड़ी रही हैं उन्होंने भारत से अपना कारोबार समेट लिया और अन्य देशों में चली गईं। इसके अलावा भारत ने विकास के अलग-अलग चरणों से गुजर रही कई जीएम किस्मों और हाइब्रिड फसलों की मंजूरी भी रोक दी। ऐसे में किसान भी इनकी खेती से होने वाले वाणिज्यिक लाभ से वंचित हो गए। माना जा सकता है कि नीतियों में इस बदलाव से बेहतर जीन वाली खाद्य और वाणिज्यिक फसलों का इस्तेमाल शुरू हो सकेगा तथा एक और तकनीक समृद्ध हरित क्रांति देखने को मिलेगी।
Date:14-12-22
लोकतंत्र पर मंडराता अदालती खतराआर जगन्नाथन आर जगन्नाथन, ( लेखक स्वराज्य पत्रिका के संपादकीय निदेशक हैं )
न्यायधीशों की नियुक्ति को लेकर इन दिनों कार्यपालिका और न्यायपालिका के बीच जारी जुबानी जंग बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। हालांकि, यदि इसके लिए किसी को जिम्मेदार ठहराना हो तो इसका दोष न्यायपालिका के हिस्से में ही अधिक आएगा। दरअसल, न्यायपालिका ने स्वयं को ऐसी शक्तियां प्रदान की हैं, जिनका संविधान में भी कोई उल्लेख नहीं था और यही पहलू टकराव के मूल में है।
कुछ दिन पहले की बात है जब न्यायमूर्ति संजय किशन कौल की अध्यक्षता वाला पीठ सरकार पर कुपित था। उसके आक्रोश का कारण यह था कि सरकार नई नियुक्तियों को लेकर कॉलेजियम की सिफारिशों पर कुंडली मारे बैठी है। न्यायमूर्ति कौल ने कहा कि सरकार शायद इस बात से नाराज हो कि 2015 में शीर्ष अदालत ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) से जुड़ी उसकी पहल को खारिज कर दिया था, लेकिन उसे अदालत का फैसला मानना तो पड़ेगा। उन्होंने कहा, ‘यही देश का कानून है, जिसका सभी को पालन करना होगा।’
एक ऐतिहासिक विषयांतर दर्शाता है कि यह कथन कितना आत्म-विवर्धक है। फ्रांसीसी क्रांति द्वारा राजशाही को चुनौती देने से पहले 18वीं सदी में फ्रांस में दो उल्लेखनीय सम्राट हुए। एक लुई चतुर्थ और दूसरे लुई षष्ठम। उसमें लुई चतुर्थ का एक फ्रांसीसी कथन बहुत चर्चित है, जिसका सार यही था कि उसने स्वयं को ही राज्य का पर्याय करार दे दिया था। उसके कहने का यही अर्थ था कि ‘मैं ही राष्ट्र (या राज्य) हूं।’ वहीं लुई षष्ठम का अक्सर अपनी संसद के साथ विवाद हुआ करता था। उसने अप्रैल 1788 में संसद द्वारा पारित कानून को खारिज करते हुए यह कहा था, ‘जब मैं अपनी संसद से मिलता हूं तो इसका मकसद वहां रखे जाने वाले कानूनों पर होने वाली चर्चा को सुनना होता है, जिन कानूनों पर मैं अपने समक्ष प्रस्तुत किए गए तथ्यों के साथ निर्णय करता हूं। गत 19 नवंबर को भी मैंने यही किया। मैंने चर्चा सुनी। जब तक मैं आपके विचार-विमर्श में उपस्थित नहीं होता, तब तक उन्हें सारांशित करने की कोई आवश्यकता नहीं…वहीं, जब मैं उपस्थित होता हूं तो मैं बैठक के लिए अपने भाव का स्वयं फैसला करता हूं। यदि संसद का बहुमत मेरी इच्छा के विरुद्ध जाने में सक्षम होता, तो राजशाही मजिस्ट्रेटों के कुलीन वर्ग से कुछ अधिक नहीं रह जाती। यह राष्ट्र के अधिकारों और हितों के लिए उतना ही खतरनाक है, जितना संप्रभु के लिए।’अब यदि उच्चतम न्यायालय को लुई षष्ठम के स्थान पर रख दिया जाए तो अपनी शक्तियों के प्रति न्यायपालिका के दृष्टिकोण को कुछ इस प्रकार समझाया जा सकता है, ‘हमने सुना है कि एनजेएसी के माध्यम से न्यायिक नियुक्तियों को लेकर संसद का क्या कहना है, लेकिन यहां न केवल हम उसकी व्याख्या करते हैं, बल्कि यह भी तय करते हैं कि कानून वास्तव में कैसा होना चाहिए।’ उच्चतम न्यायालय के पीठ के कहने का यही अर्थ है कि संसद द्वारा संविधान संशोधन हो सकता है और वह भी भले ही सर्वानुमति के साथ, लेकिन यह निर्णय हम ही करेंगे कि वह स्वीकार्य है या नहीं। और अंत में जो हम निर्णय करते हैं, वही देश का कानून है, न कि वह जिसे निर्वाचित एवं जवाबदेह विधि निर्माता प्रवर्तित करते हैं। इस पर कतई ध्यान न दें कि संविधान इस प्रकार की न्यायिक नियुक्तियों पर कुछ नहीं कहता।
संवैधानिक न्यायालयों में नियुक्ति को लेकर अनुच्छेद 124 (2) में उल्लिखित व्यवस्था के अनुसार, ‘सर्वोच्च न्यायालय के प्रत्येक न्यायाधीश की नियुक्ति राष्ट्रपति द्वारा अपने हस्ताक्षर और मुहर के अंतर्गत सर्वोच्च न्यायालय और राज्यों के उच्च न्यायालयों के ऐसे न्यायाधीशों से परामर्श के बाद की जाएगी, जिन्हें राष्ट्रपति इस प्रयोजन-उद्देश्य के लिए आवश्यक समझ सकते हैं और वह 65 वर्ष की आयु तक अपने पद को धारण कर सकेगा, बशर्ते मुख्य न्यायाधीश के अलावा किसी अन्य न्यायाधीश की नियुक्ति के मामले में, भारत के मुख्य न्यायाधीश से सदैव परामर्श किया जाएगा।’ फिर उच्चतम न्यायालय ने न्यायाधीशों के चयन और नियुक्ति के मामले में स्व-निर्मित कॉलेजियम व्यवस्था के बारे में कैसे पढ़ लिया, जिसमें सरकार के पास केवल समीक्षा का अधिकार है और अंतिम निर्णय कॉलेजियम का ही होता है। यह तो अनुच्छेद 124 (2) में उल्लिखित व्यवस्था के सर्वथा विपरीत है, जो इस संबंध में राष्ट्रपति (या कैबिनेट) को प्रमुख प्रस्तावक के रूप में रखता है।
स्पष्ट है कि उच्चतम न्यायालय ने संविधान के अनुच्छेद 142 (1) के एक विशेष प्रावधान, जो उसे कानून बनाने की शक्ति प्रदान करता है, का उपयोग कर स्वयं को न्यायाधीशों के मुख्य नियोक्ता की भूमिका में गढ़ा है।
अनुच्छेद 142 (1) के अनुसार, ‘उच्चतम न्यायालय अपने अधिकार क्षेत्रों के प्रयोग में ऐसी डिक्री पारित कर सकता है या ऐसा आदेश दे सकता है, जो किसी भी लंबित मामले या मामले में पूर्ण न्याय करने के लिए आवश्यक हो, और इस तरह से पारित कोई भी डिक्री या आदेश पूरे भारत के क्षेत्र में इस तरह से लागू किया जा सकता है, जैसा कि संसद द्वारा बनाए गए किसी भी कानून द्वारा उसके तहत निर्धारित किया जा सकता है।
यह उपबंध उच्चतम न्यायालय को न केवल कानून की व्याख्या करने, बल्कि अपने कानून बनाने की गुंजाइश भी प्रदान करता है, भले ही संविधान उनके विषय में जो कहे। इस प्रकार यदि संसद कोई संविधान संशोधन करती है तो शीर्ष अदालत उसे खारिज कर सकती है। एक तरह से उच्चतम न्यायालय जो कहे, वही संविधान है।
हाल के वर्षों में विधि-निर्माण के मोर्चे पर अदालत ने अपनी पैठ बहुत गहरी की है। जीन संवर्धित सरसों पर सरकारी फैसले की वैधता से लेकर वैक्सीन नीति, दिल्ली में प्रवेश करने वाली एसयूवी गाड़ियों पर अतिरिक्त कर से लेकर राफेल विमान की सही कीमत का निर्धारण करना और हाईवे पर बार आदि जैसे तमाम मामलों पर उच्चतम न्यायालय सक्रिय रहा है। हाल में उसने पूछा है कि क्या चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति तीन सदस्य पैनल द्वारा नहीं की जानी चाहिए, जिस पैनल में मुख्य न्यायाधीश भी शामिल हों। स्मरण रहे कि चुनाव आयोग भी एक संवैधानिक संस्था है और कतिपय खामियों के बावजूद उसने हमारे चुनावों को निष्पक्ष एवं पारदर्शी बनाए रखा है। यदि यह सिलसिला इसी प्रकार कायम रहा तो भविष्य में तब किसी को हैरानी नहीं होनी चाहिए यदि उच्चतम न्यायालय राज्यों में राज्यपालों की नियुक्ति प्रक्रिया में भी स्वयं को यह कहकर शामिल कर ले कि उसकी मंशा ऐसे संस्थानों के राजनीतिकरण को रोकने की है। वह जिस धड़ल्ले से लगभग हर तरह की कथित ‘जनहित याचिकाओं’ की सुनवाई को लेकर तत्पर है, उससे यही लगता है कि वह किसी भी ऐसे मामले में दखल दे सकता है, जो अभी विधायिका या कार्यपालिका के दायरे में आता है।
भारत में कार्यपालिका और नेताओं को दोष देने की एक परिपाटी है कि उन्होंने अपने हाथ में हद से ज्यादा शक्ति ले रखी है, लेकिन भारत में यह मानने के पर्याप्त कारण हैं कि उच्चतर न्यायपालिका निरंतर निरंकुश एवं गैर-जवाबदेह होती जा रही है। अनुच्छेद 142 की समाप्ति के साथ ही अनुच्छेद 124 को संशोधन करने के पक्ष में दमदार दलीलें हैं, ताकि न्यायाधीशों की नियुक्ति में कार्यपालिका और संसद की तार्किक भूमिका मुखरित हो सके। इस मामले में सरकार को सभी राजनीतिक धड़ों से संपर्क साधकर संसदीय सर्वानुमति बनानी चाहिए।
न्यायपालिका द्वारा विधि-निर्माण एवं शासन वाली व्यवस्था लोकतंत्र न होकर किटार्की कहलाती है। वस्तुतः, लोकतंत्र को अक्षुण्ण रखने वाली नियंत्रण एवं संतुलन की नाजुक व्यवस्था को न्यायपालिका ने किनारे कर दिया है। न्यायपालिका को लुई षष्ठम सरीखे अपने ढर्रे को निश्चित ही तिलांजलि दे देनी चाहिए।
Date:14-12-22
असरकारी आवाज उठेभारत डोगरा
विश्व में ‘डूमस्डे क्लाक’ अपनी तरह की प्रतीकात्मक घड़ी है जिसकी सुइयों की स्थिति के माध्यम से दर्शाने का प्रयास किया जाता है कि विश्व किसी बड़े संकट की संभावना के कितने नजदीक है। इस घड़ी का संचालन ‘बुलेटिन ऑफ एटोमिक साइंटिस्ट्स’ नामक वैज्ञानिक संस्थान द्वारा किया जाता है। इसके परामर्शदाताओं में 15 नोबल पुरस्कार विजेता भी हैं। ये सब मिलकर प्रति वर्ष तय करते हैं कि इस वर्ष घड़ी की सुइयों को कहां रखा जाए। इस घड़ी में रात के 12 बजे को धरती पर बहुत बड़े संकट का पर्याय माना गया है। घडी की सुइयाँ रात के 12 बजे के जितने नजदीक रखी जाएंगी, उतनी ही किसी बड़े संकट से धरती (और उसके लोग व जीव) के संकट की स्थिति मानी जाएगी। 2020-21 में इन सुइयों को (रात के) 12 बजने में 100 सेकेंड पर रखा गया। संकट के प्रतीक 12 बजे के समय से इन सुइयों की इतनी नजदीकी कभी नहीं रही। दूसरे शब्दों में, यह घड़ी दर्शा रही है कि इस समय धरती किसी बहुत बड़े संकट के सबसे अधिक नजदीक है। इस समय यह चर्चा है कि निकट भविष्य में डूमस्डे से दूरी को और कम किया जाएगा क्योंकि 2022 में पर्यावरण व युद्ध के खतरे बढ़ गए हैं। ‘डूमस्डे घड़ी’ के वार्षिक प्रतिवेदन में इस स्थिति के तीन कारण बताए गए हैं।
पहली वजह यह है कि जलवायु बदलाव के लिए जिम्मेदार जिन ग्रीन हाऊस गैसों के उत्सर्जन में 2013-17 के दौरान ठहराव आ गया था उनमें 2018 में फिर वृद्धि दर्ज की गई। जलवायु बदलाव नियंत्रित करने की संभावनाएं समग्र से धूमिल हुई हैं। दूसरी वजह यह है कि परमाणु हथियार नियंत्रित करने के समझौते कमजोर हुए हैं। आईएनएफ समझौते का नवीनीकरण नहीं हो सका। तीसरी वजह यह है कि सूचना तकनीक का बहुत दुरुपयोग हो रहा है। जिसका सुरक्षा पर भी प्रतिकूल असर पड़ रहा है। इन तीन कारणों के मिले जुले असर से आज विश्व बहुत बड़े संकट की संभावना के अत्यधिक नजदीक आ गया है, और इस संकट को कम करने के लिए जरूरी कदम तुरंत उठाना जरूरी है। क्या ‘डूमडे घड़ी’ के इस अति महत्त्वपूर्ण संदेश को विश्व नेतृत्व समय रहते समझेगा? हाल के वर्षों में यह निरंतर स्पष्ट होता रहा है कि अब तो धरती की जीवनदायिनी क्षमता ही खतरे में है। जिन कारणों से हजारों वर्षों तक धरती पर बहुत विविधतापूर्ण जीवन पनप सका, आधार ही बुरी तरह संकटग्रस्त हो चुके हैं। धरती की जीवनदायिनी क्षमता के संकटग्रस्त होने अनेक कारण हैं – जलवायु बदलाव व अनेक अन्य गंभीर पर्यावरणीय समस्याएं, परमाणु हथियार व अन्य महाविनाशक हथियार आदि । इस बारे में तो निश्चित जानकारी मिल रही है कि धरती पर जीवन संकट में है, पर इसे दूर करने के लिए समय पर असरदार कदम कैसे उठाए जाएंगे इस बारे में अभी बहुत अनिश्चित स्थिति है। जो प्रयास हो रहे हैं, वे बहुत अपर्याप्त हैं। उससे कहीं अधिक बड़े प्रयास और बड़े बदलाव चाहिए।
यह प्रयास अमन-शांति, पर्यावरण और जीवन के सभी रूमों की रक्षा, लोकतंत्र, समता और न्याय की परिधि में होने जरूरी हैं। इस सभी मुद्दों पर विश्व के विभिन्न देशों में विभिन्न जन- आंदोलन और जन-अभियान पहले से चल रहे हैं। इनके विभिन्न आयाम हैं। उदाहरण के लिए यदि केवल अमन-शांति के आंदोलनों और हिंसा – विरोधी आंदोलनों और अभियानों की बात करें तो किसी भी देश में इनके विभिन्न आयाम हो सकते हैं। बारुदी सुरंगों या अन्य विशिष्ट छोटे हथियारों के विरुद्ध एक अभियान हो सकता है, तो परमाणु हथियारों जैसे महाविनाशक हथियारों के विरुद्ध एक अलग अभियान। पड़ोसी देशों से संबंध सुधारने के कई अभियान हो सकते हैं। महिला हिंसा, बाल-हिंसा और घरेलू हिंसा के विरुद्ध कई आंदोलन हो सकते हैं। शिक्षा संस्थानों व कार्यस्थलों पर होने वाली हिंसा के विरुद्ध अभियान हो सकते हैं। एक बड़ी चुनौती यह है कि अमन-शांति के इन सभी जन- अभियानों और आंदोलनों में आपसी एकता बना कर उन्हें बड़ी ताकत बनाया जाए जिसका असर अधिक व्यापक व मजबूत हो। ये सभी शाखाएं एक-दूसरे की पूरक हों, इनकी अमन-शांति के मुद्दों पर व्यापक व समग्र सोच हो, वे अहिंसा की सोच में गहराई तक पहुंच सकें।
जब अमन-शांति की ये सभी धाराएं परमाणु हथियारों को समाप्त करने के बारे में आम सहमति बनाएं तो इस मांग को बहुत बल मिलेगा। दूसरे शब्दों में, अपनी विशिष्ट मांगों के साथ यह सभी अभियान उन मांगों को भी अपनाएँ जो धरती पर जीवन को बुरी तरह संकटग्रस्त कर रही समस्याओं के समाधान से जुड़ी हैं। इस तरह किसी भी देश में बहुत व्यापक स्तर पर धरती की रक्षा की मांग उठ सकती है। फिर सभी देशों से मांग उठेगी तो अपने आप विश्व स्तर पर यह मांग बहुत असरदार रूप से उठ पाएगी। विभिन्न देशों के अमन-शांति के आंदोलनों में आपसी समन्वय हो, एकता हो तो साथ-साथ जोर लगाकर परमाणु हथियारों को समाप्त करने की मांग को वे और भी असरदार ढंग से उठा सकेंगे। यही स्थिति पर्यावरण की रक्षा के आंदोलन की भी है। किसी भी देश में इस आंदोलन के कई अध्याय हो सकते हैं जैसे नदियों के प्रदूषण को कम करना, वायु प्रदूषण को कम करना, प्लास्टिक के प्रदूषण को कम करना आदि। यदि इन विभिन्न अभियानों और आंदोलनों का आपसी समन्वय हो तो इनकी आवाज मजबूत बनेगी। इस ओर भी विशेष ध्यान देना होगा कि जो मुद्दे धरती के जीवन को बुरी तरह संकटग्रस्त करने वाले हैं (जैसे जलवायु बदलाव का मुद्दा ) उन मुद्दों को पर्यावरण रक्षा के आंदोलन अपने विशिष्ट मुद्दों के साथ-साथ जोर देकर उठाएं।
इस तरह एक ओर पर्यावरण रक्षा के सभी पक्ष एक-दूसरे की सहायता से मजबूत होंगे तथा दूसरी ओर जलवायु बदलाव जैसे धरती को संकटग्रस्त करने वाले मुद्दों को कहीं अधिक व्यापक समर्थन मिलेगा। यदि लगभग सभी देशों में ऐसे प्रयास एक साथ हों तो जलवायु बदलाव जैसे संकट के संतोषजनक समाधान की मांग विश्व स्तर पर बहुत असरदार ढंग से उभर सकेगी। तिस पर यदि इन सभी देशों के पर्यावरण आंदोलनों में साझी कार्यवाही के लिए जरूरी सहयोग हो जाए तो वे एक साथ असरदार ढंग से विश्व स्तर पर आवाज बुलंद कर सकेंगे।
Date:14-12-22
वक्त की जरूरतशशांक द्विवेदी
पिछले 10 महीनों से यूक्रेन- रूस युद्ध चल रहा है। इस दरम्यान दुनिया भर में क्रूड आयल के दामों में तेजी की वजह से ईंधन की कीमतें बढ़ी रहीं । युद्ध की वजह से यूरोप बिजली, प्राकृतिक गैस और ऊर्जा संकट से जूझ रहा है और कुछ समय से पूरी दुनिया महंगाई व ऊर्जा संकट का सामना कर रही है। भारत अपनी जरूरत का 90 फीसदी क्रूड आयल आयात करता है। ऐसे में हम अपनी ईंधन और ऊर्जा जरूरतों के लिए दूसरे देशों पर निर्भर हैं। किसी भी देश आधारभूत विकास के लिए ऊर्जा का सतत और निर्बाध प्रवाह बहुत जरूरी है। किसी देश में प्रति व्यक्ति औसत ऊर्जा खपत वहां के जीवन स्तर की सूचक होती है। इस दृष्टि से दुनिया के देशों में भारत का स्थान काफी नीचे है ।
देश की बढ़ती आबादी के उपयोग के लिए तथा विकास को गति देने के लिए ऊर्जा की हमारी मांग भी बढ़ रही है । द्रुत गति से विकास के लिए औद्योगीकरण, परिवहन और कृषि के विकास पर ध्यान देना होगा। इसके लिए ऊर्जा की आवश्यकता है। दुर्भाग्यवश खनिज तेल, पेट्रोलियम, गैस, उत्तम गुणवत्ता के कोयले के हमारे प्राकृतिक संसाधन बहुत सीमित हैं। हमें बहुत सा पेट्रोलियम आयात करना पड़ता है । विद्युत की हमारी मांग उपलब्धता से बहुत ज्यादा है । आवश्यकता के अनुरूप विद्युत का उत्पादन नहीं हो पा रहा है। रेटिंग एजेंसी इक्रा ने यह अनुमान जताते हुए कहा है कि वित्त वर्ष 2021-22 में अखिल भारतीय स्तर पर बिजली की मांग 1,380 अरब यूनिट थी। भारत करीब 200 गीगावॉट यानी करीब 70% बिजली का उत्पादन कोयले से चलने वाले प्लांट्स से करता है, लेकिन ज्यादातर प्लांट्स बिजली की बढ़ती मांग और कोयले की कमी की वजह से बिजली की अपेक्षित सप्लाई कर पा रहे है। देश के कोयले से चलने वाले बिजली प्लांट्स के पास पिछले 9 सालों में सबसे कम कोयले का भंडार बचा है। इस संकट की प्रमुख वजह है कोयले का आयात घटना | दुनिया के दूसरे सबसे बड़े कोयला आयातक भारत ने पिछले वर्षों से लगातार अपना आयात घटाने की कोशिश की। लेकिन इस दौरान घरेलू कोयला सप्लायर्स ने उतनी ही तेजी से उत्पादन नहीं बढ़ाया। इससे सप्लाई गैप पैदा हुआ।
अब इस गैप को सरकार चाहकर भी नहीं भर सकती क्योंकि रूस – यूक्रेन युद्ध की वजह से अंतरराष्ट्रीय बाजार में कोयले की कीमत 400 डॉलर यानी 30 हजार रुपये प्रति टन के रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गई है। भारत करीब 20 करोड़ टन कोयला इंडोनेशिया, चीन और ऑस्ट्रेलिया से आयात करता है लेकिन अक्टूबर, 2021 के बाद इन देशों से आयात घटना शुरू हो गया और अब भी इन देशों से आयात प्रभावित है। नतीजतन, बिजली कंपनियां कोयले के लिए पूरी तरह कोल इंडिया पर निर्भर हो गईं। भविष्य उज्जवल बनाए रखने के लिए वर्तमान परिस्थितियों में सभी तरह की ऊर्जाओं तथा ईंधन की बचत अत्यंत आवश्यक है क्योंकि आज बचत करेंगे तो ही भविष्य सुविधाजनक रह पाएगा। हमारे विद्युत उत्पादन केंद्रों की उत्पादन क्षमता इतनी नहीं है कि बढ़ती हुई मांग की पूर्ति कर सकें। यह बात विद्युत के संबंध में ही नहीं, बल्कि पेट्रोलियम पदार्थों के संबंध में भी लागू होती है। हमें इन मुद्दों पर ध्यान देना होगा। ऊर्जा बचत के उपायों को शीघ्रतापूर्वक और सख्ती से अमल में लाए जाने की जरूरत है। प्रत्येक नागरिक को इसमें जुट जाना चाहिए। बचत चाहे छोटे स्तर पर ही क्यों न हो, कारगर जरूर होगी क्योंकि बूंद- बूंद से ही सागर भरता है। संभल कर ऊर्जा के साधनों का इस्तेमाल करेंगे तो ही इनके भंडार भविष्य तक रह पाएंगे। कोशिश जमीन स्तर से की जाए तो आकाश छूने में समय नहीं लगेगा बशर्ते प्रत्येक नागरिक जागरूक हो । ऊर्जा की बचत करे तथा औरों को भी इसका महत्त्व बताए ।
भोजन, प्रकाश, यातायात, आवास, स्वास्थ्य की मूलभूत आवश्यकताओं के साथ मनोरंजन, दूरसंचार, सुख संसाधन, पर्यटन जैसी आवश्यकताओं में भी ऊर्जा के विभिन्न रूपों ने हमारी जीवन शैली में अनिवार्य स्थान बना लिया है। इस सब में भी बिजली ऊर्जा वह प्रकार है, जो सबसे सुगमता से हर कहीं सदैव हमारी सुविधा के लिए सुलभ है। इधर आपने बटन दबाया और फट से बिजली सेवा में हाजिर हुई । यही कारण है कि अन्य ऊर्जा विकल्पों को बिजली में बदल कर ही उपभोग किया जाता है। ऊर्जा बचत में सबका सहयोग अत्यंत आवश्यक है। यदि ऊर्जा का उपयोग सोच-समझ कर नहीं किया गया तो इसका भंडार जल्द समाप्त हो सकता है। प्रकृति पर जितना अधिकार हमारा है, उतना ही हमारी भावी पीढ़ियों का भी है, जब हम अपने पूर्वजों के लगाए वृक्षों के फल खाते हैं, उनकी संजोई धरोहर का उपभोग करते हैं, तो हमारा दायित्व है कि हम भी भविष्य के लिए नैसर्गिक संसाधनों को सुरक्षित छोड़ कर जाएं, कम से कम अपने निहित स्वार्थों के चलते उनका दुरुपयोग तो न करें अन्यथा भावी पीढ़ी और प्रकृति माफ नहीं करेगी। कोरोना महामारी के बाद वैश्विक परिदृश्य बदल गया है । हमें हर क्षेत्र में आत्मनिर्भर होना होगा। ऊर्जा क्षेत्र में आयात कम करके इसके संरक्षण पर ध्यान देना होगा ।
Date:14-12-22
चीन का दुस्साहससंपादकीय
यह सतर्क हो जाने का समय है। लाल सेना ने अरुणाचल प्रदेश के तवांग क्षेत्र में एक बार फिर जो दुस्साहस दिखाया है, वह बताता है कि दो साल पहले गलवान घाटी में दोनों देशों की सेनाओं के बीच जिस तरह की झड़प हुई थी, उससे चीन ने कुछ सीखा नहीं है। साथ ही, उसने अपने इरादों को बदला भी नहीं है। पिछले शुक्रवार को वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) पर जिस तरह से चीन के 300 से ज्यादा सैनिकों ने घुसपैठ की कोशिश कर हमारे एक पोस्ट पर कब्जा करने का प्रयास किया और फिर दोनों सेनाओं के बीच जिस तरह से हाथापाई हुई, वह कोई सामान्य घटना नहीं है। तवांग एक ऐसा इलाका है, जहां दोनों देशों की सेनाएं नियमित रूप से निगरानी करती हैं। निगरानी दस्तों का कई बार आमना-सामना भी हो जाता है, लेकिन कुछ भी अप्रिय नहीं होता है। ये निगरानी दस्ते छोटे होते हैं और आमतौर पर वे अपनी हद में ही रहते हैं, लेकिन एकाएक 300 सैनिक अगर निकल पड़ते हैं, तो इसमें कुछ भी नियमित जैसा नहीं है। इसका एक ही अर्थ है कि किसी खास मकसद या रणनीति से उन्होंने यह कदम बढ़ाया है। कम-से-कम यह लाल सेना की स्थानीय टुकड़ियों के स्तर पर किया गया फैसला तो नहीं ही होगा।
हालांकि, यह सब अप्रत्याशित भी नहीं है। पिछले कुछ साल में चीन ने जिस तरह से सीमा क्षेत्र में भारी बुनियादी ढांचा कायम किया है और गांव तक बसा दिए हैं, उसने भारत के सैन्य विशेषज्ञों के कान तो काफी पहले ही खड़े कर दिए थे। दुनिया भर के विशेषज्ञ अक्सर चीन की ‘सलामी स्लाइसिंग’ नीति का जिक्र करते हैं। दक्षिण चीन सागर के इलाके में चीन जिस तरह से काबिज होने की कोशिश कर रहा है, उसकी व्याख्या इसी नीति से की जाती है। चीन पहले अपनी पूरी आक्रामकता के साथ एक बहुत छोटा-सा कदम बढ़ाता है और फिर कुछ समय के लिए रुककर शांत हो जाता है। इस तरह से वह धीरे-धीरे आगे बढ़ता जाता है। अंदेशा है कि चीन इसी नीति को भारत के साथ लगने वाली वास्तविक नियंत्रण रेखा पर भी आजमा रहा है। गलवान और डोकाला में भी यही दिखाई दिया था। मुमकिन है कि मौसम को ध्यान में रखकर यह समय चुना गया हो। तवांग का यांगत्से क्षेत्र आने वाले कुछ ही समय में बर्फ की चपेट में होगा। बर्फबारी के इस मौसम में सीमा की गश्त भी आसान नहीं होती है। हो सकता है कि चीन उस स्थिति का फायदा उठाने के लिए थोड़ा पहले ही आगे बढ़ जाना चाहता हो।
जो भी हो, भारतीय सेना ने चीन के इन इरादों को सिरे नहीं चढ़ने दिया। अच्छी बात यह भी है कि भारत ने पहले से ही उस इलाके में जवाबी बुनियादी ढांचा खड़ा करना शुरू कर दिया है। वहां सड़कें बनने लगी हैं, ताकि किसी भी हालात के लिए सेना के आवागमन को आसान बनाया जा सके, लेकिन फिलहाल हालात को शांत करने के लिए भारतीय सेना की कोशिश रंग लाती दिखी है। दोनों सेनाओं के स्थानीय अधिकारियों की फ्लैग मीटिंग के बाद तवांग का यांगत्से क्षेत्र शांत है। जिस तरह से भारतीय सेना ने प्रत्युत्तर दिया, उसके बाद चीन के पास इसके अलावा कोई विकल्प भी नहीं था। लेकिन खतरा टला नहीं है और ऐसी साजिश फिर हो सकती है। पहले डोकाला और फिर गलवान जैसे उदाहरण यह बताते हैं कि चीन हर बार अपना दुस्साहस दिखाने के लिए कोई नया भूगोल चुन लेता है। हमारे लिए हर जगह, हर दम सतर्क रहना इसीलिए जरूरी है।
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जी-20 शिखर सम्मेलन ऐसा महत्वपूर्ण मंच है, जहाँ बड़े-बड़े भू-राजनीतिक दांव लगाने वाले देशों के नेता मिलते हैं, और चर्चा करते हैं। हाल ही में बाली में हुई इसकी बैठक और भी महत्वपूर्ण है, क्योंकि यहाँ जारी घोषणापत्र के अनुसार भारत को फिलहाल इस समूह की अध्यक्षता करनी है।
कुछ विशेष बिंदु –
भारत का मानना है कि अन्य देशों ने रूस पर जो प्रतिबंध लगाए हैं, वे अनुपयोगी हैं। साथ ही भारत का ध्यान कोविड पश्चात जन्मे खाद्य व ऊर्जा सुरक्षा संकट जैसी प्राथमिकताओं की ओर है। वास्तविकता यही है कि यह युद्ध का युग नहीं है, और इस विसंगति का अंत किया जाना चाहिए।
‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 17 नवंबर, 2022
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Date:13-12-22
Go Back To 16Response of the criminal justice system to Pocso is reason to revisit the age of consent.TOI Editorials
The Protection of Children from Sexual Offences Act (Pocso) is a widely supported law. But Pocso raised the age of consent from 16 to 18 and has caused considerable disquiet in the justice system. The increase in threshold appears to be out of sync with ground reality. Consider the following. Recently, Tamil Nadu’s director general of police issued a circular to the force asking them to avoid haste in making arrests under Pocso as many cases involve relationships based on consent. Independently, some constitutional courts such as Allahabad high court expressed concern about abuse of the law when it comes to relationships between teenagers. Last week, CJI Chandrachud pointed out that the presumption of the law is that there’s no consent in the legal sense among those below 18, which poses difficult challenges. He suggested lawmakers address concerns about criminalisation of adolescents who engage in consensual sex.
Research suggests that the increase in the threshold of consent to 18 has led to abuse of the legislation. The most recent study covered three states, West Bengal, Maharashtra and Assam. It found that 25% of Pocso listings were romantic cases. Of them, 47% involved girls between the ages of 16 and 18 where acquittals were the norm. The high incidence of cases involving adolescents between 16 and 18 is consistent with NCRB data. Anecdotal evidence suggests disquiet with this aspect of the law also pushes up pendency. Parliamentarians should revisit the decision to raise the threshold of consent to 18. A decade’s experience provides the rationale for it. If MPs are reluctant to take this up, this is a fit case for a PIL.
Date:13-12-22
Ready for the worstGovernments and agencies have shown better preparedness for cyclones.Editorial
That Cyclone Mandous, which had its landfall near Mamallapuram, near Chennai, in the early hours of Saturday, did not cause much damage has come as a huge relief to the people of Tamil Nadu and Andhra Pradesh. At one stage, it was expected to develop into a “severe cyclonic storm”, but did not gain much strength. Called a “textbook cyclone”, the storm, as predicted by the India Meteorological Department, crossed the coast with all the attendant features, to the satisfaction of professional meteorologists. Though Cyclone Mandous was similar to Cyclone Vardah which made landfall in Chennai in mid-December 2016, this event dumped heavy rainfall that was far more than what occurred under Vardah. This time, not only parts of north Tamil Nadu but also areas in neighbouring Andhra Pradesh experienced heavy rainfall. For instance, Vembakkam in Tiruvannamalai district of Tamil Nadu and Srikalahasti in Tirupati district of Andhra Pradesh bore the brunt, recording rainfall of 25 cm and 23 cm, respectively, during the 24-hour-period that ended at 8.30 a.m. on Saturday. But more noteworthy was the way the official machinery in Tamil Nadu steered the disaster management system. Despite the cyclone crossing the coast at almost midnight and causing a number of trees and structures to fall, the response of the administration was swift and the common man’s life hardly disrupted. Five lives were lost, a count much lower than during disasters of a similar magnitude.
After drawing flak in November 2021, and, subsequently, when Chennai and its vicinity experienced inundation following spells of heavy rain, the Tamil Nadu government has been paying greater attention this time to improving the storm-water drain network and such other works. Though one of the reasons cited for many areas being spared of flooding was that the core parts of the city did not receive as much rain as the interior parts of north Tamil Nadu, the State government’s coordination with the Meteorological Department and its preparedness in tackling the post-landfall situation made a difference to the situation this time. Otherwise, as in the past, citizens would have suffered even in light rain. Technology too, both in terms of forecast and information dissemination, has been playing a key role. The authorities, i.e., the State government and the Meteorological department, should continuously work to improve their ways of functioning, making use of technology, and helping people to be ready to face a natural disaster of this nature or even of greater strength. Ideally, the official machinery should set a goal of ensuring no loss to life. Such a task would not be impossible, given the availability of resources, both hardware and software, and empirical data on cyclones and severe cyclones crossing the coast of Tamil Nadu.
Date:13-12-22
जी-20 अध्यक्षता का कांटों भरा ताजहर्ष वी. पंत, ( लेखक आब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में रणनीतिक अध्ययन कार्यक्रम के निदेशक हैं )
इस महीने के आरंभ में भारत ने विधिवत जी-20 की अध्यक्षता संभाल ली है। भारत के लिए यह गर्व की अनुभूति कराने वाला है कि उसे एक महत्वपूर्ण वैश्विक संगठन की अध्यक्षता मिली है। यूं तो जी-20 की अध्यक्षता बारी-बारी से सदस्य देशों को मिलती है, लेकिन जिस दौर में भारत को यह कमान मिली है, उसकी बड़ी अहमियत है। पूरी दुनिया कोविड महामारी से उबरी भी नहीं थी कि रूस और यूक्रेन के बीच छिड़े युद्ध ने तमाम समीकरण बिगाड़ दिए। इससे बिगड़ी आपूर्ति शृंखला ने कई देशों को दिवालिया बनाने के कगार पर पहुंचा दिया। विकसित देशों में भी महंगाई ने रिकार्ड तोड़ दिया। पूरी दुनिया में आर्थिक सुस्ती का माहौल बन गया। एक ओर पश्चिमी देशों और रूस के बीच संघर्ष विराम के कोई आसार नहीं दिख रहे तो दूसरी ओर चीन और अमेरिका के बीच तनाव घटने का नाम नहीं ले रहा। ऐसी तनातनी का सबसे बड़ा खामियाजा गरीब और विकासशील देशों को भुगतना पड़ रहा है। संप्रति समग्र वैश्विक परिदृश्य चुनौतियों से दो-चार है। चूंकि जी-20 विश्व की शीर्ष अर्थव्यवस्थाओं का संगठन है तो इसका दारोमदार उस पर ही है कि वह इन मौजूदा संकटों का समाधान निकालने की दिशा में सक्रिय हो, मगर इससे जुड़े कुछ अंशभागियों के बीच टकराव से यह आसान नहीं लगता। इसलिए समझा जा सकता है कि जी-20 अध्यक्ष का ताज भारत के लिए कितना कांटों भरा साबित होने वाला है। अपनी अध्यक्षता को सफल बनाने के लिए भारत को कड़ी मशक्कत करनी होगी। हालिया रुझान यही दर्शाता भी है कि भारत ने इस दिशा में सक्रिय होकर संतुलन साधने की कवायद शुरू कर दी है।
इसका पहला संकेत तो तब देखने को मिला जब ऐसी खबरें आईं कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी इस साल रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के साथ शिखर वार्ता के लिए रूस नहीं जाएंगे। दोनों देशों के बीच दिसंबर में वार्षिक शिखर वार्ता होती है, जिसमें राष्ट्राध्यक्ष बारी-बारी से एक दूसरे के देश जाते हैं। इस बार मोदी के रूस जाने की बारी थी, जिसके आसार अब नहीं दिखते। विदेश मंत्रालय ने इसके पीछे कोई आधिकारिक वजह तो नहीं बताई है, लेकिन कूटनीतिक हलकों में व्यापक रूप से यही माना जा रहा है कि रूस को लेकर वैश्विक आक्रोश के चलते भारत यह कदम उठाने जा रहा है। खासतौर से रूस ने जिस प्रकार बार-बार परमाणु हेकड़ी दिखाई है, उससे उसके प्रति धारणा खराब हुई है। ऐसी स्थिति में भारत नहीं चाहता कि रूसी राष्ट्रपति के साथ उसकी गलबहियों से वैश्विक स्तर पर किसी तरह का नकारात्मक संदेश जाए। हाल में इंडोनेशिया में हुए जी-20 सम्मेलन में भी रूस के प्रति वैश्विक भावनाएं मुखरता से अभिव्यक्त हुई थीं। इसलिए भारत नहीं चाहेगा कि उसकी अध्यक्षता के दौरान व्यापक संबंधों पर द्विपक्षीय पहलू से कोई ग्रहण लगे। इसके लिए भारतीय विदेश नीति की सराहना भी करनी होगी कि वह रूस को नाराज किए बिना ही अपने हितों को साधने में सफल हो रही है।
यह वह दौर है जब तमाम जिम्मेदार वैश्विक संगठन अपनी जिम्मेदारियों से मुकरते दिख रहे हैं। उनका पराभव हो रहा है। नेतृत्व निर्वात की स्थिति है। विशेष रूप से ग्लोबल साउथ यानी विकासशील देशों की सुनवाई के लिए कोई तैयार नहीं। यह भारत के लिए स्वाभाविक नेतृत्वकर्ता के रूप में स्थापित होने का सुनहरा अवसर है। भारत इस मौके को भुनाने के लिए तत्पर भी दिखता है। इसके संकेत जी-20 की अध्यक्षता संभालने के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के शब्दों से भी मिले, जिसमें उन्होंने कहा कि ‘हमारी जी-20 प्राथमिकताओं को न केवल हमारे जी-20 भागीदारों, बल्कि ग्लोबल साउथ वाले हिस्से में हमारे साथ चलने वाले देशों, जिनकी बातें अक्सर अनसुनी कर दी जाती हैं, के परामर्श से निर्धारित किया जाएगा।’ वास्तव में, इस समय शक्तिशाली देशों के बीच चल रहे संघर्ष से जो खाद्य और ईंधन संकट उत्पन्न हुआ है, उसकी सबसे ज्यादा मार इन्हीं देशों पर पड़ रही है। यही कारण है कि भारत ने इन समस्याओं से निपटने के लिए माहौल बनाना शुरू कर दिया है। भारत बार-बार तनाव घटाने को लेकर सचेत कर रहा है। इसके पीछे यही मंशा है कि वैश्विक स्तर पर शांति एवं स्थायित्व कायम हो। मौजूदा अस्थिरता दूर हो सके। पर्यावरण संरक्षण के लिए भी प्रधानमंत्री भारतीय संस्कृति में समाहित सूत्रों को साझा कर रहे हैं। भारत की ओर से विकसित देशों को आईना दिखाते हुए व्यापक वैश्विक सुधारों के लिए दबाव भी बनाया जा रहा है। इन सुधारों से सबसे अधिक लाभान्वित विकासशील देश ही होंगे।
स्पष्ट है कि इस चुनौतीपूर्ण परिवेश में भारत अपने प्रयासों से स्वयं को वैश्विक नेतृत्वकर्ता के रूप में स्थापित करने की दिशा में सक्रिय होकर यही संदेश देना चाहता है कि वह अंतरराष्ट्रीय शांति एवं स्थायित्व को सुनिश्चित करने में सेतु की भूमिका निभाने के लिए तैयार है। यह जी-20 की अध्यक्षता को सफलता दिलाने के लिए आवश्यक भी है। पूरा विश्व इस समय भारत को बड़ी उम्मीद से देख भी रहा है। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुअल मैक्रों से लेकर जर्मन विदेश मंत्री एनालेना बेयरबाक तक तमाम नेता कह चुके हैं कि भारत जी-20 की अध्यक्षता को एक नया आयाम देगा। ऐसे में भारत के लिए आवश्यक हो चला है कि इस समय वह अपनी विदेश नीति में द्विपक्षीय भाव से अधिक बहुपक्षीय भावनाओं को वरीयता दे। तभी वह विभिन्न अंशभागियों के बीच किसी सहमति का निर्माण कर अपनी अध्यक्षता को सफलता दिला सकेगा। बदलते वैश्विक ढांचे में इससे भारत का कद और बढ़ेगा। मूल रूप से आर्थिक हितों से जुड़ा संगठन होने के नाते जी-20 में भरपूर संभावनाएं हैं कि उसके माध्यम से भू-राजनीतिक तनाव और टकरावों को दूर किया जा सके। यह इसलिए आवश्यक हो गया है, क्योंकि फिलहाल संयुक्त राष्ट्र जैसी संस्थाएं अपने इस मूल दायित्व की पूर्ति में विफल दिख रही हैं। यही उम्मीद है कि भारत विश्व के समक्ष कायम मुश्किलों को एक अवसर के रूप में ढालकर अपने नेतृत्व से वैश्विक छाप छोड़ने में सफल होगा, जैसा कि उसने कोविड महामारी में भी किया था।
Date:13-12-22
कॉप27 सम्मेलन में हाथ लगी नाकामीसुनीता नारायण
यह कहना विशुद्ध हताशा का परिचायक है कि दुनिया ने मिस्र के तटवर्ती शहर शर्म अल-शेख में संपन्न क्लाइमेट चेंज कॉन्फ्रेंस ऑफ पार्टीज (कॉप27) में ‘कुछ’ हासिल हुआ है। तथ्य तो यह है कि कॉप27 को उत्सर्जन कम करने संबंधी तीन दशक लंबी वार्ताओं के इतिहास में सबसे खराब घटना के रूप में दर्ज किया जाना चाहिए। इन उत्सर्जनों ने बड़े पैमाने पर क्षति पहुंचाई है। यह बैठक एक बड़े मजमे की तरह थी, काफी हद तक रेगिस्तान में मरीचिका की भांति। इससे अत्यधिक सक्रियता की भावना बनी जबकि वास्तव में वहां हुआ क्या? इस खतरनाक खतरे से निपटने की दिशा में अब तक जो थोड़ी बहुत प्रगति हुई थी वह भी गंवा दी गई।
मैं भी इस सम्मेलन में शामिल करीब 45,000 लोगों में से एक थी। जिस बात ने मुझे चकित किया वह यह कि इसे कुछ इस तरह तैयार किया गया था कि यह वार्ता से जुड़ा तमाम दबाव कम हो जाए। इसके आयोजकों यानी संयुक्त राष्ट्र के जलवायु परिवर्तन सचिवालय और हमारे मेजबान यानी मिस्र की सरकार ने विभिन्न देशों और एजेंसियों के सैकड़ों पविलियन तैयार किए थे। इनमें से प्रत्येक में एक छोटा सा सम्मेलन कक्षा था जहां रोज पांच से छह आयोजन होते थे। इनमें से प्रत्येक आयोजन में 30-35 लोग हिस्सेदारी करते थे। पूरा दिन इतना कुछ होता रहता था कि कॉप27 का मूल मुद्दा यानी उत्सर्जन में कमी और जलवायु परिवर्तन को नियंत्रित करने संबंधी बातचीत हाशिये पर चली गई।
इसलिए जब मैं कहती हूं कि कॉप27 का अंतिम निर्णय दरअसल अनिर्णय जैसा ही था तो चकित होने की आवश्यकता नहीं है। तमाम महत्त्वपूर्ण बातों को 20 नवंबर की सुबह तक कोष्ठक में रखा गया (जब विभिन्न पक्ष असहमत होते हैं तो संयुक्त राष्ट्र यही भाषा इस्तेमाल करता है) जब तक कि उनके बीच सहमति नहीं बन गई। यह सहमति बहुत हल्की भाषा में थी। हममें साहस नहीं है कि हम ऐसा कह सकें। लॉस ऐंड डैमेज फंड (वैश्विक तापवृद्धि के कारण हुए नुकसान के लिए कमजोर देशों को मुआवजा देने के वास्ते स्थापित) के मुद्दे को कॉप27 की बड़ी कामयाबी माना जा रहा है। शर्म अल-शेख क्रियान्वयन योजना ‘विकासशील देशों को होने वाले लॉस और डैमेज से जुड़ी वित्तीय लागत को लेकर गहरी चिंता प्रकट करती है।’
यह जलवायु परिवर्तन के विपरीत प्रभावों से संबद्ध है। इसके आगे योजना में कहा गया है कि यह लॉस ऐंड डैमेज को हल करने के लिए संस्थागत व्यवस्था कर रही है और यह भी कि इससे उन विकासशील देशों को तकनीकी सहायता को प्रेरणा मिलेगी जो जलवायु परिवर्तन को लेकर सबसे अधिक जोखिम में हैं। इकलौता निर्णय यह है कि 2023 तक सचिवालय के लिए मेजबान देश तलाश कर लिया जाएगा। इस तरह देखें तो फंड बनाने को लेकर कोई सहमति नहीं बनी, इस बात पर भी सहमति नहीं बनी कि इसके लिए भुगतान कौन करेगा लेकिन एक नई श्रेणी अवश्य तैयार हुई कि यह सब अब उन देशों की ओर लक्षित होगा जो सबसे अधिक जोखिम में हैं। वे कौन से देश हैं? राजनीति यहीं शुरू होती है।
क्या भारत जैसे बड़े विकासशील देशों को नुकसान के लिए अन्य विकासशील देशों को भुगतान करना चाहिए? कॉप27 में यह सवाल बार-बार उठा और जाहिर है इसका विरोध भी हुआ। उसके बाद क्या भारत जैसे देश जोखिम वाले देशों की श्रेणी में आते हैं क्योंकि यहां पहाड़ और तट रेखा दोनों हैं? वार्ता के अगले दौर में इसका विरोध होगा और बात किसी नतीजे पर नहीं पहुंचेगी जबकि इस बीच प्राकृतिक आपदाएं बढ़ती जा रही हैं और आम जन तथा अर्थव्यवस्थाओं को होने वाला नुकसान भी बढ़ रहा है।
यही कारण है कि दुनिया जलवायु को लेकर एक नियम आधारित व्यवस्था की ओर लौटने की आवश्यकता है। हमें पता है कि मौसमी आपदाओं की बढ़ती संख्या और आवृत्ति का संबंध जलवायु परिवर्तन से है और यह जलवायु परिवर्तन की घटना वातावरण में ग्रीनहाउस गैसों के उत्सर्जन से संबंधित है। ऐसे में विधि का सीधा सा स्थापित सिद्धांत यह कहता है कि जो देश प्रदूषण के लिए जिम्मेदार है उसे भुगतान करना चाहिए। यही कारण है कि नुकसान और क्षति से संबंधित चर्चाएं देनदारी और क्षतिपूर्ति पर आधारित हैं। इस नियम आधारित परिदृश्य में यह बात स्थापित होगी कि भारत जैसे देश को भी फंड में योगदान करना होगा लेकिन केवल तभी जब वह ग्रीन हाउस गैसों के उत्सर्जन की एक तयशुदा सीमा पार कर जाएगा। यह नियम आधारित व्यवस्था बड़े प्रदूषकों के लिए उपयुक्त नहीं है इसलिए इसे 2015 में पेरिस समझौते से अलग कर दिया गया था। अब प्रदूषकों के बीच भेद करने की कोई व्यवस्था है इसलिए चीन जैसे देशों को सहज ही अवसर मिल गया है कि वे इसका फायदा उठाएं। चीन का प्रतिव्यक्ति उत्सर्जन 2030 में अमेरिका के बराबर हो जाएगा।
उसे प्रदूषकों की श्रेणी में होना चाहिए था। परंतु अभी भी वह 77 विकासशील देशों के पीछे छिपा हुआ है। साफ कहें तो इन 77 विकासशील देशों को भी ताकतवर चीन की शरण लेने में राहत मिलती है। यह खेल हमारी कीमत पर जारी है।
परंतु मैंने कॉप27 को प्रतिगामी क्यों कहा? ऐसा इसलिए कि पहली बार समझौते में सफेद और हरे जीवाश्म ईंधन में फर्क करने का निर्णय किया गया। अंतिम समय में स्वच्छ ऊर्जा वाले मिश्रण में में कम उत्सर्जन वाली ऊर्जा को शामिल कर दिया गया। यानी यह बताने की कोशिश की प्राकृतिक गैस अपेक्षाकृत स्वच्छ है क्योंकि यह कोयले की तुलना में आधा कार्बन डाईऑक्साइड उत्सर्जित करती है। यूरोपीय संघ ने प्राकृतिक गैस को स्वच्छ बताते हुए यही कहा था। हमें पता है कि दुनिया के उस हिस्से में जहां अकार्बनीकरण की अधिक आवश्यकता है वह पूरे विश्व में और अधिक प्राकृतिक गैस के लिए खुदाई कर रहा है। इन देशों में सम्मेलन का मेजबान देश मिस्र भी शामिल है।
यह सब सही नहीं है। दुनिया तेजी से औद्योगिक युग के पहले के स्तर से 1.5 डिग्री सेल्सियस अधिक तापवृद्धि की ओर बढ़ रहा है। 1.1 डिग्री सेल्सियस वृद्धि के साथ ही हमें इतने बड़े पैमाने पर बरबादी और इंसानी दिक्कतें देखने को मिल रही हैं। हम इसका हिस्सा नहीं बन सकते। हम कम से कम ऊंची आवाज में यह तो कह सकते हैं कि हम बुरी तरह नाकाम हुए हैं।
Date:13-12-22
असंतुलित भागीदारीसंपादकीय
मुख्यधारा की राजनीति में महिलाओं की कम उपस्थिति को लेकर राजनीतिक दल लंबे समय से चर्चा करते रहे हैं, लेकिन इसके सुचिंतित हल को लेकर शायद ही कभी ईमानदारी दिखाई देती है। इस बार हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव नतीजों के बाद यह मुद्दा सुर्खियों में है कि वहां अड़सठ सदस्यीय विधानसभा में सिर्फ एक महिला विधायक होगी। हालांकि इस बार के चुनाव में वहां अलग-अलग दलों की ओर से कुल चौबीस महिला प्रत्याशी थीं। जहां तक महिला मतदाताओं की संख्या का सवाल है, तो वहां उनका अनुपात उनचास फीसद है। चुनावों के नतीजों के बाद आए आंकड़ों के मुताबिक इस बार के विधानसभा चुनावों में महिलाओं का मतदान पुरुषों के मुकाबले ज्यादा (76.8 फीसद) रहा। हालांकि 2017 में हुए विधानसभा चुनावों में भी कुल सीटों की दृष्टि से कोई बहुत अच्छी तस्वीर नहीं थी और उसमें सिर्फ चार महिलाओं ने कामयाबी हासिल की थी। मगर महिला प्रतिनिधित्व के लिहाज से देखें तो इस बार के चुनावों में स्थिति और दयनीय हुई है। दूसरी ओर, गुजरात में भी पिछले विधानसभा चुनाव में तेरह के मुकाबले इस बार सिर्फ दो महिला प्रतिनिधियों की बढ़ोतरी हुई। जबकि वहां विधानसभा की कुल क्षमता एक सौ बयासी विधायकों की है और इस बार कुल एक सौ उनतालीस महिलाएं चुनाव के मैदान में थीं।
जाहिर है, जिस दौर में हर क्षेत्र में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए आवाज उठ रही है, सरकारों की ओर से कई तरह के विशेष उपाय अपनाए जा रहे हैं, वैसे समय में राजनीति में महिलाओं की इस स्तर तक कम नुमाइंदगी निश्चित रूप से सबके लिए चिंता की बात होनी चाहिए। लेकिन यह केवल हिमाचल प्रदेश या गुजरात जैसे राज्यों की बात नहीं है। पिछले हफ्ते लोकसभा में सरकार की ओर से पेश आंकड़ों के मुताबिक, आंध्र प्रदेश, असम, गोवा, गुजरात, हिमाचल प्रदेश, केरल, कर्नाटक, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, मणिपुर, ओड़िशा, सिक्किम, तमिलनाडु और तेलंगाना में दस फीसद से भी कम महिला विधायक हैं। देश की संसद में थोड़ा सुधार हुआ है, लेकिन आज भी लोकसभा और राज्यसभा में महिला सांसदों की हिस्सेदारी करीब चौदह फीसद है। यानी आमतौर पर आधी आबादी के नाम से जानी वाली महिलाओं की भागीदारी मुख्यधारा राजनीति में आज भी संतोषजनक स्तर तक नहीं पहुंच सकी है। जबकि सच्चाई यह है कि राष्ट्रीय राजनीति में प्रतिनिधित्व की कसौटी पर अगर कोई सामाजिक तबका पीछे रह गया है तो बाकी सभी क्षेत्रों में उसकी उपस्थिति पर इसका सीधा असर पड़ता है।
सवाल है कि जो राजनीतिक दल आए दिन महिलाओं के अधिकारों की बात करते रहते हैं, वे अपने ही ढांचे में भागीदारी के लिए कितना साहस कर पाते हैं। अमूमन सभी पार्टियां चुनाव के वक्त महिलाओं को टिकट देने के मामले में अपने वादों और दावों जितना ही उत्साह नहीं दिखा पातीं। इस तरह की कोई पहलकदमी तो दूर, संसद और विधानसभाओं में महिलाओं के लिए तैंतीस फीसद आरक्षण सुनिश्चित करने का मुद्दा पिछले करीब ढाई दशक से अधर में लटका है। कभी-कभार इसे लेकर सुगबुगाहट दिखाई पड़ती है, मगर महिला आरक्षण को कानून बनाने की दिशा में राजनीतिक दलों की ओर से कभी ठोस पहल नहीं की जाती। आखिर क्या वजह है कि जब संसद में बिना बहस के भी कई विधेयक पारित हो जाते हैं, तब भी संसद और विधानसभाओं में महिलाओं का प्रतिनिधित्व कानूनी तौर पर सुनिश्चित कराने को लेकर राजनीतिक पार्टियां गंभीर नहीं दिखती हैं? यह एक तथ्य है कि जिन राज्यों में स्थानीय स्तर के चुनावों में महिलाओं के लिए आरक्षित सीटों का निर्धारण किया गया, वहां एक हद तक उनकी नुमाइंदगी में बढ़ोतरी देखी गई।
Date:13-12-22
चुनौतियों के बरक्स एक अवसरपरमजीत सिंह वोहरा
भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने सदा अवसरों की तुलना में चुनौतियां अधिक रही हैं। आजादी के बाद के पहले चार दशक तक अर्थव्यवस्था सरकारी नियंत्रण में थी और उसका मुख्य जोर कृषि क्षेत्र को विकसित करने और आधारभूत संरचना के विकास पर केंद्रित था। उस दौरान भी पड़ोसी देशों से युद्ध, अकाल के कारण खाद्यान्न की कमी आदि चुनौतियों का सामना करना पड़ा। फिर भी आर्थिक नीतियों में सदा पूर्वानुमान को प्राथमिकता देते हुए सर्वांगीण विकास को महत्त्व दिया गया। 1990 के आर्थिक सुधारों के बाद आर्थिक विकास में तेजी आई, जिसके चलते आर्थिक विकास के स्तर पर आज भारत विश्व के शीर्ष मुल्कों में पांचवें पायदान खड़ा है। आज भारतीय अर्थव्यवस्था तकरीबन साढ़े तीन खरब अमेरिकी डालर के बराबर है। हालांकि इन सबके बावजूद भारत के लिए आर्थिक चुनौतियां अब भी बनी हुई हैं, जिनमें विशाल जनसंख्या के लिए रोजगार, महंगाई, गरीबी और अमीरी के बीच लगातार बढ़ती खाई, शिक्षा में गुणवत्ता का स्तर, ग्रामीण व्यक्ति के आर्थिक स्तर में प्रगति, असंगठित क्षेत्रों में संलग्न व्यक्तियों को आर्थिक सुरक्षा, छोटे उद्योगों में लागत तथा गुणवत्ता के स्तर पर अच्छी जानकारियों का अभाव आदि मुख्य हैं।
इन सबके बीच भारत को जी-20 देशों का नेतृत्व करना है। निश्चित रूप से यह एक ऐसा अवसर है, जिसे भारत आगामी एक वर्ष तक अपने आर्थिक दीर्घकालीन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए अच्छे ढंग से नियोजित कर सकता है। अगर इसका क्रियान्वयन सकारात्मक रहा तो भारतीय अर्थव्यवस्था को पांच खरब अमेरिकी डालर तक पहुंचने में ज्यादा समय नहीं लगेगा और भारत विश्व के तीन शीर्ष आर्थिक महाशक्तियों में शुमार हो जाएगा।
गौरतलब है कि जी-20 की स्थापना एशिया महाद्वीप में 1997-98 के दौरान शुरू हुए आर्थिक संकट से निपटने के लिए हुई थी। उस दौरान जब थाईलैंड ने अपनी मुद्रा को अमेरिकी डालर की तुलना में नियंत्रित करने की कोशिश की, तो उसके दुष्प्रभाव फिलीपींस, मलेशिया, दक्षिण कोरिया आदि देशों पर पड़े थे। तब एशिया महाद्वीप के आर्थिक संकट का बड़ी अर्थव्यवस्थाओं पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव को रोकने के लिए विश्व के सबसे बड़े आर्थिक संगठन जी-8 को विस्तार देकर जी-20 बनाया गया था। आज के वर्तमान परिदृश्य में जी-20 के अंतर्गत सम्मिलित सभी देशों की अर्थव्यवस्था का वर्तमान स्तर पचहत्तर खरब अमेरिकी डालर है, जो लगभग वैश्विक जीडीपी का पचासी प्रतिशत है। इसके अलावा संपूर्ण विश्व के अंतरराष्ट्रीय व्यापार में जी-20 में सम्मिलित देशों का योगदान पचहत्तर प्रतिशत है। यह इस बात को स्पष्ट करता है कि जी-20 में सम्मिलित सभी मुल्क आज के दौर की सभी वैश्विक आर्थिक नीतियों के ढांचे को निर्धारित करने के पीछे मुख्य भूमिका निभाते हैं। जी-20 में शामिल मुल्कों में अमेरिका, चीन, जर्मनी, भारत और जापान की विश्व की आधी से अधिक आबादी निवास करती है। विश्व के बड़े आर्थिक संस्थान, जिनमें विश्व बैंक, आइएमएफ, संयुक्त राष्ट्र, डब्ल्यूटीओ आदि जी-20 के मुख्य भाग हैं, इसलिए यह एक बड़ी उपलब्धि है कि भारत ने जी-20 जैसे आर्थिक संगठन की कमान संभाली है।
इन दिनों वैश्विक स्तर पर आर्थिक अनिश्चितता है। इसके पीछे कोरोना महामारी के आर्थिक दुष्प्रभाव कारण हैं, तो वहीं पिछले ग्यारह महीनों से रूस और यूक्रेन के बीच चल रहा युद्ध भी एक मुख्य समस्या है। इसी वर्ष श्रीलंका का आर्थिक संकट भी पूरे विश्व ने देखा। फिर इस बात की भी सुगबुगाहट है कि अमेरिकी आर्थिक नीतियों के चलते वैश्विक स्तर पर आर्थिक मंदी आने को है। अमेरिकी फेड द्वारा जानबूझ कर लगातार की जा रही ब्याज दरों में बढ़ोतरी से तुलनात्मक रूप से अमेरिकी डालर वैश्विक स्तर पर मजबूत हो रहा है, जिसके चलते दूसरे देशों की मुद्रा पर नकारात्मक असर पड़ रहा है। सभी मुल्कों में आयात महंगा होता जा रहा है, जिससे घरेलू स्तर पर महंगाई बढ़ रही है। जिन विकासशील मुल्कों ने कई वैश्विक आर्थिक संस्थानों से कर्ज लिए हुए हैं, डालर की मजबूती उन्हें और अधिक ब्याज का भुगतान करने के लिए विवश कर रही है। रूस और यूक्रेन युद्ध के चलते वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल के मूल्य बढ़ गए हैं। उर्वरकों की आपूर्ति में कमी देखी जा रही है, जो कृषि क्षेत्र को प्रभावित कर रही है। इन सब आर्थिक चुनौतियों से निपटने के लिए पूरा विश्व जी-20 से एक सकारात्मक सोच और नई नीतियों की अपेक्षा कर रहा है।
पिछले दिनों जब जी-20 का नेतृत्व मिला तो इस बात पर मंथन शुरू हो गया कि इसके माध्यम से भारत अपनी अर्थव्यवस्था को क्या-क्या अवसर उपलब्ध करा सकता है? भारतीय अर्थव्यवस्था के सामने मुख्य चुनौतियों में कृषि क्षेत्र को उन्नत करना, बेरोजगारी का निवारण, आधारभूत संरचनाओं को वैश्विक स्तर का बनाना और निर्माण के क्षेत्र में भारत के उद्योग-धंधों को अधिक से अधिक वैश्विक अवसर उपलब्ध कराना मुख्य है। यह भी स्पष्ट है कि आज भारत वैश्विक स्तर पर अपनी क्रय क्षमता के कारण एक बड़ी पहचान रखता है, पर अब भारत को आत्मनिर्भर बनने की भी अत्यंत आवश्यकता है। जी-20 समूह के अंतर्गत विश्व के चार अन्य राष्ट्र, जो भारत से बड़ी आर्थिक महाशक्तियां हैं, उनमें भारत की चीन पर आर्थिक निर्भरता तुलनात्मक रूप से काफी अधिक है। चीन के साथ भारत का आयात पचासी प्रतिशत के आसपास है, तो वहीं निर्यात तकरीबन दस से पंद्रह प्रतिशत के बीच है। चालू वित्त वर्ष में भारत का चीन से आयात तकरीबन नवासी अरब डालर का है, तो वहीं निर्यात सिर्फ चौदह अरब डालर है।
यह एक ऐसी चुनौती है, जिसका हल भारत को जल्दी तलाशना होगा और आगामी एक वर्ष में उसके माध्यम से विश्व की अन्य बड़ी महाशक्तियों को भारत के प्रति आकर्षित करना होगा अन्यथा अर्थव्यवस्था के वर्तमान आर्थिक स्तर को तेजी से बढ़ाना मुश्किल होता जाएगा। इसे इस तरह से भी लिया जा सकता है कि अगर भारत को विश्व की बड़ी आर्थिक महाशक्ति बनना है, तो उसे सबसे पहले चीन के साथ आर्थिक लड़ाई में आत्मनिर्भरता की तरफ मुड़ना पड़ेगा और इसके लिए जी-20 समूह के दूसरे बड़े राष्ट्रों को आकर्षित करना एक विकल्प के रूप में उपयोग किया जा सकता है।
भारतीय अर्थव्यवस्था में पिछले काफी समय से आधारभूत संरचना के विकास पर तेजी से काम हुआ है, जिसमें राष्ट्रीय राजमार्गों का निर्माण सबसे शीर्ष पर है। इसके अलावा आर्थिक नीतियों की मुख्य प्राथमिकताओं में रेलवे का विकास और टेलीकाम क्षेत्र में क्रांतिकारी परिवर्तन, ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता तथा समुद्री क्षेत्र का आधुनिकीकरण है। इंटरनेट प्रौद्योगिकी में भी महानगरों में 5जी की शुरुआत हो चुकी है, जिससे निश्चित रूप से आने वाले समय में व्यावसायिक गतिविधियों में बहुत तेजी देखने को मिलेगी। हालांकि इन सबके बीच लगातार बढ़ रही आर्थिक विषमता भारत के सामने एक ऐसी आर्थिक चुनौती है, जो गरीबी उन्मूलन के लिए बहुत बड़ा संकट है। इन सब चुनौतियों के निवारण हेतु जी-20 का नेतृत्व करते हुए भारत को अपने लिए कुछ आर्थिक उद्देश्य निश्चित करने चाहिए। उनमें विभिन्न वैश्विक आर्थिक संस्थानों से बुनियादी ढांचे के लिए आर्थिक सहायता प्राप्त करना और आयात लागत को तुलनात्मक रूप से कम करने के लिए आर्थिक महाशक्तियों के साथ अंतरराष्ट्रीय व्यापार को बढ़ाना मुख्य उद्देश्य हों। अगर यह संभव हो पाता है, तो भारत अपना विदेशी मुद्रा भंडार सदा सुरक्षित रखने में सक्षम हो पाएगा। विश्व की नामी-गिरामी कंपनियों को ‘मेक इन इंडिया’ के तहत एशिया महाद्वीप में चीन के बजाय भारतीय प्राथमिकता दिलाना भी मुख्य उद्देश्य होना चाहिए।
Date:13-12-22
बदलनी तो चाहिए तस्वीरमनोज चतुर्वेदी
भारतीय खेलों में पिछले कुछ सालों से एक अच्छा ट्रेंड ‘देखने को मिल रहा है। यह ट्रेंड है खेल संगठनों का बॉस खिलाड़ियों का बनना । इस सिलसिले को आगे बढ़ाते हुए अपने समय की बेहतरीन धाविका पीटी ऊषा देश के सर्वोच्च खेल संगठन भारतीय ओलंपिक एसोसिएशन के अध्यक्ष पद पर पहुंची हैं। पीटी ऊषा को निर्विरोध अध्यक्ष चुना गया है। पाय्योली एक्सप्रेस के नाम से मशहूर रहीं पीटी ऊषा ने 1980 के दशक में एशियाई खेलों सहित तमाम अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में पदकों का अंबार जुटाया। पर उनका 1984 के लास एंजिल्स ओलंपिक की 400 मीटर बाधा दौड़ में सेकंड के सौवें हिस्से से पिछड़कर कांस्य पदक से हाथ धोने को हमेशा याद किया जाता है।
पीटी ऊषा से पहले सिर्फ एक और खिलाड़ी महाराजा यदुविंद्र सिंह आईओए अध्यक्ष बने थे। उन्होंने 1934 में इकलौता क्रिकेट टेस्ट खेला था और वह 1938 में अध्यक्ष बने थे। भारतीय खेलों की कमान खिलाड़ियों को देने की मांग जमाने से की जाती रही है। पर पिछले कुछ सालों से इस तरफ ध्यान दिया जाना खेलों के स्वास्थ के लिए अच्छा संकेत है। हम सभी जानते हैं कि दुनिया के सबसे अमीर खेल संगठन माने जाने वाले बीसीसीआई की कमान कुछ सालों पहले देश के सफलतम टेस्ट कप्तानों में शुमार रखने वाले सौरव गांगुली के हाथों में थी। अब उनकी जगह यह जिम्मेदारी एक अन्य क्रिकेटर रोजर बिन्नी के हाथों में सौंपी गई है। इसी तरह भारतीय एथलेटिक्स फेडरेशन के अध्यक्ष आदिल सुमारिवाला, हॉकी इंडिया की कमान पूर्व भारतीय कप्तान दिलीप टिर्की के हाथों में दी गई। इसी तरह भारतीय फुटबाल फेडरेशन के अध्यक्ष भारतीय टीम के पूर्व गोलकीपर कल्याण चौबे बने हैं। इन संगठनों की कमान खिलाड़ियों के हाथों में आने के परिणाम अभी आने बाकी हैं। हम सभी जानते हैं कि आईओए पिछले काफी समय राजनीति का शिकार था । अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति ने तो इस माह तक चुनाव नहीं कराने पर उसे निलंबित करने तक की चेतावनी दे दी थी। पर दो धड़ों के टकराव की वजह से चुनाव टलते आ रहे थे। आखिरकार सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद ही चुनाव संपन्न हो सके हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने अवकाश प्राप्त न्यायाधीश नागेश्वर राव की देखरेख में चुनाव कराए हैं। इन चुनावों के बाद लगता है कि स्वच्छ हवा का झोका खेल गतिविधियों को पटरी पर ला सकेगा। देश की सर्वोच्च खेल संस्था आईओए के अध्यक्ष पद पर पीटी ऊषा के पहुंचने में इसके नये बने संविधान ने अहम भूमिका बनाई है। असल में इससे पहले राष्ट्रीय खेल फेडरेशनों और राज्य एसोसिएशनों के प्रतिनिधि ही अध्यक्ष और अन्य पदाधिकारियों को चुना करते थे। इसलिए पदाधिकारियों खासतौर से अध्यक्ष पद पर राजनेता या नौकरशाह ही पहुंच पाते थे, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय की देखरेख में बने नये संविधान में इलेक्ट्रल कॉलेज में 33 राष्ट्रीय खेल फेडरेशनों के एक-एक पुरुष और महिला प्रतिनिधि, आठ पुरुष और महिला खिलाड़ी और दो एथलेटिक कमीशन के दो खिलाड़ी और अंतरराष्ट्रीय ओलंपिक समिति की सदस्य नीता अंबानी सदस्य हैं। कुल 77 सदस्यों में 39 महिलाएं और 38 पुरुष इलेक्ट्रल कॉलेज में शामिल हैं। पीटी ऊषा का आईओए में साथ निभाने के लिए निशानेबाज गगन नारंग, पहलवान योगेश्वर दत्त, तीरंदाज डोला बनर्जी, टेनिस खिलाड़ी डोला बनर्जी आदि कई खिलाड़ी हैं। नये संविधान के मुताबिक अब सचिव पद खत्म कर दिया या है। उसकी जगह अब सीईओ की नियुक्ति होगी । आईओए के चुने गए पदाधिकारियों की इक यह खूबी है कि पिछले काफी समय से दो धड़ों में बंटे रहे इस संगठन इन घड़ों से जुड़े एक- आदि को छोड़कर कोई नहीं है। नए पदाधिकार्यों में कोषाध्यक्ष सहदेव यादव को जरूर ललित भनोट धड़े से जरूर माना जा रहा है। पर बाकी पदाधिकारी धड़ों से नहीं होने के कारण इस संगठन के अब सुचारू रूप से संचालन की उम्मीद की जा सकती है। पीटी ऊषा ने अध्यक्ष चुने जाने पर कहा भी है कि हमारी कोशिश होगी कि खिलाड़ियों को अपनी समस्याओं के समाधान के लिए भटकना नहीं पड़े। आईओए के दरवाजे हमेशा उनके लिए खुले रहेंगे।
पीटी ऊषा की अगुआई वाले आईओए में तमाम खिलाड़ी होने से यह तो फायदा होगा कि खिलाड़ियों की समस्याओं के समझने वाले होने से उनके हित वाली नीतियां बन सकेंगी। पर यह तब ही संभव हो सकेगा, जब ऊषा अपनी खिलाड़ी वाली छवि के हिसाब से ही काम करें। असल में केंद्र में शासित भाजपा सरकार ने इस साल पीटी ऊषा को राज्य सभा के लिए मनोनीत कराया था। आईओए चुनाव में भी उन्हें भाजपा समर्थित उम्मीदवार माना जा रहा था। इसलिए उन्होंने राजनैतिक दल के हिसाब से काम किया तो बहुत संभव है कि वह बहुत सफल नहीं हो पाएं। फिर भी यह तो माना ही जा सकता है कि पीटी ऊषा खुद उम्दा खिलाड़ी रहीं हैं, इसलिए खिलाड़ियों की समस्याओं का समाधान जरूर करेंगी। यही नहीं अन्य खिलाड़ियों के सहयोग से आईओए यदि देश में ऐसा खेल माहौल बनाने में कामयाब हो जाता है, जिसमें हमारे खिलाड़ी ओलंपिक जैसे खेलों में डेढ़-दो दर्जन पदक ला सकें। वह अपने कार्यकाल में ऐसा कर सकीं तो उन्हें प्रशासक के रूप में खिलाड़ी की तरह ही दशकों तो याद रखा जाएगा।
Date:13-12-22
राष्ट्रपति के दिल से निकला जो सवालविभूति नारायण राय, ( पूर्व आईपीएस अधिकारी )
अभी ये कौन लोग हैं, जो जेलों मे हैं? एक बड़े और भव्य हॉल में यह प्रश्न गूंजा और सन्नाटा खिंच गया। प्रश्न पूछने वाला भारत का प्रथम नागरिक था और जिनकी तरफ सवाल उछाला गया था, वे न्यायपालिका के शीर्ष पर बैठे वे लोग थे, जिनके कंधों पर नागरिकों की व्यक्तिगत स्वतंत्रता की हिफाजत की जिम्मेदारी है। आमतौर पर ऐसे औपचारिक उद्बोधन, जो किसी धीर-गंभीर विमर्श के उद्घाटन के अवसर पर दिए जाते हैं, मुख्य वक्ता के सामने लिखित रख दिए जाते हैं और वह एक रोबोट की तरह पढ़ देता है। विडंबना यह है कि अमूमन यह लिखित भाषण उसी संस्था द्वारा तैयार किया जाता है, जिसका कार्यक्रम होता है, और इसलिए कोई आश्चर्य नहीं कि उसी की कारगुजारियों की प्रशस्तियों से भरा होता है। सुप्रीम कोर्ट के जिस कार्यक्रम का उद्घाटन करने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू गई थीं, उसमें भी उनके सामने बोलने के लिए निश्चित रूप से आयोजकों, कानून मंत्रालय या उनके अपने सचिवालय द्वारा कागजों का एक पुलिंदा जरूर रखा गया होगा, पर उन्होंने उसकी उपेक्षा कर एक ऐसा सवाल पूछा, जो सीधे उनके दिल से निकला था और किसी के पास उसका उत्तर नहीं था।
राष्ट्रपति के एक सवाल से कई सवाल गुंथे हुए थे। उन्होंने यह तो पूछा ही कि वे कौन लोग हैं, जो भारतीय जेलों में बंद हैं, जिन्हें न तो अपने मौलिक अधिकारों का पता है, न संविधान की प्रस्तावना का और न ही मौलिक कर्तव्यों का। कहने का मतलब यह कि जेलों मे बंद हाशिये के ये लोग अन्य मानवीय उपलब्धियों के अलावा शिक्षा से भी वंचित हैं। इसके साथ उन्होंने विकास के हालिया मॉडल पर भी सवाल उठाया कि एक तरफ तो कहते हैं, हम विकास की ओर जा रहे हैं, और दूसरी तरफ कहते हैं कि हमारी जेलें भीड़ से बजबजा रही हैं, इसलिए हमें और ज्यादा जेलें चाहिए। इस एक प्रश्न में ही दूसरा प्रश्न निहित था कि यदि हम विकास के जरिये स्वस्थ, साक्षर और संतुष्ट समाज बनाने का दावा कर रहे हैं, तो फिर क्यों हमें अपनी जनसंख्या के बड़े हिस्से को जेलों में बंद रखने की जरूरत पड़ रही है?
राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू की चिंता किसी शून्य से नहीं उपजी थी। वर्षों पहले जब वह ओडिशा विधानसभा की सदस्य चुनी गईं, तब उन्हें गृह विभाग से संबंधित स्थाई समिति का अध्यक्ष नियुक्त कर दिया गया। इस हैसियत से उन्हें ओडिशा के अलग-अलग जिलों की जेलों में जाने का मौका मिला। वहां उन्होंने देखा कि आदिवासियों की एक बड़ी जमात जेलों में बंद है। ज्यादातर मुकदमों में सुनवाई भी वर्षों से लंबित है, कुछ की जमानतें हो गई हैं, पर कई के पास जमानतदार नहीं हैं। ऐसे बहुत से कारण हैं, जिनके चलते असंख्य आदिवासी जेलों में सड़ रहे हैं। राष्ट्रपति खुद आदिवासी समुदाय से आती हैं, वह जानती हैं कि अपने शैक्षणिक, आर्थिक और सांस्कृतिक परिवेश के चलते इन आदिवासियों से यह उम्मीद करना ज्यादती होगी कि वे भारतीय संविधान में निहित अपने मौलिक अधिकारों को जानते होंगे। वे तो अपनी नियति को दोष देते हुए जेलों में अपना समय काटते रहते हैं। आंकड़ों की बात करें, तो देश में अनुसूचित जनजातियों की जनसंख्या 8.6 प्रतिशत है और जेलों में बंद कैदियों में उनका प्रतिशत 10.7 है ।
आदिवासियों के संबंध में व्यक्त चिंता देश में हाशिये पर मौजूद सभी वर्गों पर लागू होती है। इनमें अनुसूचित जातियों और अल्पसंख्यक वर्गों के लोग भी शामिल हैं। देश के सबसे बड़े अल्पसंख्यक समुदाय मुसलमानों की स्थिति इससे बेहतर नहीं है। जातियों व धर्मों से भी परे। और, इन सबमें मौजूद एक तबका ऐसा है, जिसकी सबसे अधिक उपस्थिति जेलों में है, और वह है आर्थिक रूप से असहायों का। जेलों में सबसे अधिक बंद वे हैं, जो भ्रष्ट न्यायिक प्रणाली का पेट नहीं भर सकते। एक अध्ययन के अनुसार, भारत की जेलों में 76 प्रतिशत विचाराधीन कैदी हैं, जिनमें से अधिकांश इसी तबके से आते हैं। वर्षों तक उनके मुकदमों की कोई सुनवाई नहीं होती और वे खचाखच भरी जेलों में सड़ते रहते हैं। कई तो अधिकतम दंड की अवधि से अधिक समय सुनवाई की प्रतीक्षा में बिता देते हैं। ऐसे मामले भी कम नहीं हैं, जिनमें कोई अभागा गरीब इसलिए जेल से बाहर नहीं निकल पा रहा कि उसकी जमानत भरने के लिए कोई संपत्तिवान तैयार नहीं है।
न्यायिक अधिकारियों के सम्मेलन में पूछे गए प्रश्नों के बहाने हमें भारतीय जेलों से जुड़े बुनियादी सुधार के मुद्दों पर भी विचार करना चाहिए। मुझे याद है कि वर्षों पूर्व हिंदी के एक लेखक सुधीर शर्मा ने अपने जीवन के दस वर्ष गोवा जेल में कैदी के रूप में बिताए थे। जेल से लिखा था कि यदि आपके पास पैसा और बाहुबल हो, तो वहां सब कुछ उपलब्ध हो सकता है, घर का खाना, शराब, दूसरे नशे, यौन सुख, सब कुछ। पैसा न हो, तो जेल आपके लिए किसी नरक से कम नहीं है। राष्ट्रपति के उद्बोधन के बहाने उन कारणों पर बात होनी चाहिए, जिनके चलते जेल सुधार के केंद्र न होकर अपराधों के अड्डे या नए अपराधी बनाने के कारखाने बन गए हैं। उत्तर प्रदेश के अपने अनुभव से मैं कह सकता हूं कि अपहरण, फिरौती या हत्या के बहुत से मामलों के तार जेलों से जुड़े होते हैं। किसी भोले, निश्छल या निर्मल हृदय किशोर को कुछ दिनों के लिए जेल भेज दें, तो ज्यादा संभावना है कि वह एक कठोर दिल दुर्दांत अपराधी बनकर बाहर निकले ।
इसी सम्मेलन में एक और बुनियादी प्रश्न पूछा गया और यह विकास के वर्तमान मॉडल से संबंधित था। यह भी एक गंभीर सवाल है कि यह कैसा विकास हो रहा है, जिसमें ज्यादा लोगों को जेलों में रखने के लिए नई जेलें तामीर करने की जरूरत पड़ रही है। इसका संबंध सिर्फ आदिवासियों से नहीं है। देश में जिस तरह की असमानता बढ़ी है, उससे निश्चित रूप से अपराध भी बढ़े होंगे। मगर इसका हल क्या अधिक जेलें हैं या राज्य को असमानता दूर करने के लिए ऐसे कदम नहीं उठाने चाहिए, जिनसे यह कम हो और गरीब गुरबा बिना अपराध की दुनिया में कदम रखे सम्मानजनक जीवन जी सके? हमारे देश की राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू ने जो एक सवाल पूछा था, उससे ये सारे सवाल निकलते ही हैं।
Date:13-12-22
पी टी उषा के नेतृत्व में भारतीय ओलंपिक संघ से बढ़ी उम्मीदेंज्वाला गुट्टा, ( प्रसिद्ध बैडमिंटन खिलाड़ी )
पी टी उषा का भारतीय ओलंपिक संघ (आईओए) का अध्यक्ष बनना काफी समय से लंबित था। वह एक किंवदंती हैं, प्रतिमान हैं और मैं उनकी बहुत बड़ी प्रशंसक हूं। मैं रोमांचित हूं कि जिन्हें मैं अपना आदर्श मानती रही हूं, भारतीय ओलंपिक संघ की पहली महिला अध्यक्ष बनने जा रही हैं। वाकई, एक खिलाड़ी-अध्यक्ष चाहे, तो बहुत बदलाव ला सकता है, क्योंकि खिलाड़ियों से उसे खास सहानुभूति होगी। मैं ऐसा इसलिए कह रही हूं, क्योंकि मुझे अच्छा प्रशासन नसीब नहीं हुआ और किसी न किसी वजह से मुझे निशाना बनाया गया था। एक नियमित खिलाड़ी होने के बावजूद मुझे वैसा समर्थन नहीं मिल पाया, जिसकी मुझे हमेशा जरूरत रही।
जब एक खिलाड़ी का भारतीय ओलंपिक संघ में शीर्ष पर होना महत्वपूर्ण है, तब यह बात भी ध्यान देने योग्य है कि खिलाड़ियों और प्रशासकों का मिला-जुला संगठन ही प्रभावी ढंग से काम कर सकता है। यह एक खिलाड़ी की विशेषज्ञता पर भी निर्भर है कि वह प्रशासक की राजनीतिक और विश्लेषणात्मक सोच के साथ मिलकर पूरे संघ का नेतृत्व करता है।
उषा एक महिला अध्यक्ष के रूप में बदलाव ला सकती हैं, बशर्ते उन्हें ऐसा करने का मौका दिया जाए। सच कहा जाए, तो ऐसे पद बड़ी जिम्मेदारी के साथ आते हैं और अक्सर इनमें जितना दिखता है, उससे कहीं अधिक होता है। यह मैं आज एक अकादमी चलाते हुए सीख रही हूं। यह सुनिश्चित करते हुए कि आपके किसी फैसले से कोई परेशान न हो, हर किसी को खुश करने की जरूरत को साधते हुए सावधान रहना होगा। यह एक कठिन डगर है। उषा के लिए यह आसान नहीं होने वाला है, लेकिन मुझे उम्मीद है कि वह ठोस बदलाव लाने में सक्षम होंगी।
मुझे उम्मीद है कि नया आईओए एथलीट आयोग के संबंध में दबावों के आगे नहीं झुकेगा, जैसा मैंने एथलीट निकायों को करते देखा है। मुझे याद है, मैं खिलाड़ियों के एक जीवंत संघ का हिस्सा बनना चाहती थी, पर मैंने सीखा कि संघ बहुत दमघोंटू भी हो सकता है। इसलिए मेरा मानना है, अगर उषा आईओए में ठोस बदलाव करती हैं, एथलीट आयोग को निर्णय लेने में अधिक आजादी देती हैं और यह सुनिश्चित करती हैं कि खिलाड़ी संघ में सुरक्षित और आत्मविश्वास महसूस करें, तो यह देश में खेलों के लिए बड़ी जीत होगी।
इच्छुक और अनुभवी खिलाड़ियों से भरे संगठन में सबकी आवाज सुनी जानी चाहिए। खिलाड़ियों का समर्थन करने के लिए एक दृढ़ संगठन की जरूरत पड़ेगी। अगर हम सब साथ आएं, तो बदलाव ला सकते हैं। खिलाड़ियों को मुखर होना होगा। वैसे इतिहास मेरे लिए कठिन शिक्षक रहा है, यह मुझे थोड़ा शंकालु बना रहा है।
पी टी उषा को भारतीय ओलंपिक संघ में खिलाड़ियों के लिए अधिक आजादी की पैरोकारी करनी चाहिए। यह सुनिश्चित करना होगा कि संघ सभी खिलाड़ियों के कल्याण को प्राथमिकता दे। यह कल्याण खेल से परे भी है और इसमें हर तरह की समस्याएं शामिल हैं, जो खिलाड़ी अक्सर झेलते हैं। मानसिक स्वास्थ्य के मुद्दों से लेकर उत्पीड़न तक और यहां तक कि यौन उत्पीड़न जैसी परेशानियों से भी खिलाड़ियों को गुजरना पड़ता है। खुद एक खिलाड़ी के रूप में मैं जानती हूं कि हमारी खेल व्यवस्था में उत्पीड़न और शोषण के कई मामले हैं। कई खिलाड़ी इस बारे में बात करने में भी असमर्थ हैं या डरे हुए हैं। खिलाड़ियों और संगठन के बीच सहज संवाद की सुविधा ऐसी होनी चाहिए कि खिलाड़ी अपना पूरा ध्यान अपने खेल में उत्कृष्टता प्राप्त करने पर लगा सकें।
जो खिलाड़ी देश का प्रतिनिधित्व करना चाहते हैं और जीतकर पदक व ट्रॉफियां घर लाना चाहते हैं, उन्हें सुरक्षित महसूस कराने की जरूरत है। खिलाड़ियों को यह बताना जरूरी है कि संगठन से संवाद के द्वार उनके लिए हमेशा खुले हैं। ऐसा माहौल चाहिए, जहां संघ अपने खिलाड़ियों की देखभाल करता हो, समस्या बड़ी हो या छोटी, संघ उनसे निपटने में मदद करता हो, जहां खिलाड़ियों के साथ सम्मान और गरिमापूर्ण व्यवहार किया जाता हो। किसी को मीडिया या अदालतों का सहारा न लेना पड़े। खेलों में शोषण का समय अब समाप्त होना चाहिए। जब उषा ने आईओए का कार्यभार संभाला है, मुझे उम्मीद है, ये आकांक्षाएं पूरी होंगी।
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रिड्यूस, रिसायकिल और रियूज, ये तीन ऐसे मंत्र हैं, जिन्हें कचरे के निपटान के लिए व्यक्तिगत के साथ-साथ सामुदायिक ध्येय बना लिया जाना चाहिए। यदि इन्हें हम एक बड़े फ्रेम में देखें, तो लाइफस्टाइल फॉर एन्वायरनमेंट या एलआईएफई तक पहुँच कर हम विश्व के लिए उदाहरण बन सकते हैं।
‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित अक्षय राउत के लेख पर आधारित। 14 नवबंर, 2022
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Date:12-12-22
Back on trackP.T. Usha can create a road map for India’s bid for the Olympics in the 2030sEditorial
Decades ago, when P.T. Usha travelled by the Madras-Mangalore Mail, her employers, the Railways, permitted an unscheduled stop at her hometown Payyoli in North Kerala. Such was the respect she garnered for her medal-winning exploits at the Asian level while the collective heart-break she bequeathed in narrowly missing a bronze in the 400m hurdles at the 1984 Los Angeles Olympics is remembered even today. After she retired from track-and-field, she evolved as a coach, groomed fresh talent and kept an eye on the grassroots. Her latest appointment as president of the Indian Olympic Association (IOA) comes with a surfeit of goodwill. Additionally, it busts the patriarchy inherent in many sports hierarchies across India. She becomes the first woman president of the IOA, a post she was elected to unopposed. In a sense the IOA’s hand was forced as factionalism drew censure from the International Olympic Committee and there were whispers of a ban. A change of guard from the earlier well-entrenched lobby with political links was inevitable and Usha was seen as the ideal candidate. Already a nominated Rajya Sabha member, Usha’s latest sporting elevation was seen as an organic progress. Having handled many batons while running her famous relays, Usha will find the latest one perhaps the toughest to manoeuvre.
As the umbrella organisation for sports bodies in India, the IOA has to deal with sister associations lost in dissidence. Stadiums become white elephants, leased out for housing loan expos or music concerts. Age-fudging and doping are grim realities as young athletes, seeking jobs, chase medals at the zonal, age-group and national levels. Medals often secure a career opening in public sector units, banks and a few corporates and Usha is aware of this. She and her team of administrators that includes sportspersons and other officials, need to crack the whip. For all the political jostling that happens during the elections, men and women representing opposite ideologies shake hands and become entrenched in sports administration, seeking brownie points and fame. The Government’s leaning on the soft power of sports, the Sports Authority of India’s initiatives and corporate-backed academies have changed the landscape. India is beginning to aspire for golds beyond the Asian realm and Neeraj Chopra and Abhinav Bindra’s exploits in the Olympics are a pointer that the skill-sets are there and if support is provided, medals with better lustre can be secured. With India hoping to bid for the Olympics in the 2030s, Usha and her team are expected to create a road map for that too. The Payyoli Express has a tough challenge ahead.
Date:12-12-22
कोलेजियम पर रारसंपादकीय
कानून एवं कार्मिक मंत्रालय से जुड़ी संसदीय समिति ने उच्च न्यायालयों में न्यायाधीशों की नियुक्ति में देरी पर चिंता जताते हुए यह जो कहा कि कोलेजियम पर जारी गतिरोध को दूर करने के लिए न्यायपालिका के साथ कार्यपालिका को सक्रिय होना चाहिए, उस पर दोनों को ही ध्यान देने की आवश्यकता है। इस समिति ने इस संदर्भ में यह सही सुझाव दिया कि कार्यपालिका और न्यायपालिका को इस मामले में लीक से हटकर सोचने की जरूरत है। यह तभी संभव है, जब दोनों पक्षों में इस विषय पर संवाद की प्रक्रिया प्रारंभ होगी। विडंबना यह है कि संवाद के बजाय वाद-विवाद हो रहा है। एक ओर जहां सरकार कोलेजियम व्यवस्था पर सवाल उठा रही है, वहीं सुप्रीम कोर्ट उसे न केवल उपयुक्त बताने में लगा हुआ है, बल्कि यह भी चाह रहा है कि उसे लेकर किसी तरह के प्रश्न न किए जाएं। यह स्वीकार्य नहीं हो सकता और सुप्रीम कोर्ट के यह कहने के बाद भी नहीं हो सकता कि कोलेजियम अब एक कानून है और सभी को उसका सम्मान करना होगा। भले ही कोलेजियम का निर्माण सुप्रीम कोर्ट ने किया हो, लेकिन इसका यह मतलब नहीं कि वह एक नीर-क्षीर व्यवस्था है और उसमें कहीं कोई विसंगति नहीं। वास्तव में कोलेजियम व्यवस्था में न केवल विसंगतियां हैं, बल्कि वह लोकतांत्रिक मूल्यों के अनुकूल भी नहीं। इसी कारण उसे लेकर सवाल उठते रहते हैं।
सरकार की ओर से कोलेजियम व्यवस्था को विसंगतिपूर्ण ठहराने और सुप्रीम कोर्ट की ओर से उसे सही करार देने से बात बनने वाली नहीं है। उचित यह होगा कि दोनों पक्ष इस पर विचार करें कि न्यायाधीशों की नियुक्ति की ऐसी कोई व्यवस्था कैसे बने, जो न तो पूरी तौर पर कार्यपालिका से संचालित हो और न ही सुप्रीम कोर्ट से। यह व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए, जिससे उच्चतर न्यायपालिका के लिए यथासंभव योग्य एवं निष्पक्ष तरीके से कार्य करने वाले न्यायाधीशों की नियुक्ति संभव हो सके। न्यायिक नियुक्ति आयोग का गठन करके ऐसी ही व्यवस्था बनाने की कोशिश संविधान संशोधन विधेयक के जरिये की गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने इस विधेयक को असंवैधानिक करार दिया। इसे लेकर आज भी सवाल उठते हैं और इसका कारण यह है कि सुप्रीम कोर्ट ने न्यायिक नियुक्ति आयोग की खामियों को दूर करने की कोई पहल करने के बजाय उसे सिरे से खारिज कर दिया। इससे न्यायाधीशों की नियुक्ति का अधिकार उसके पास ही बना रहा। उचित यह होगा कि सुप्रीम कोर्ट यह समझे कि कोलेजियम व्यवस्था में बदलाव की आवश्यकता है। यह व्यवस्था पारदर्शिता की भी मांग करती है। क्या यह विचित्र नहीं कि जिस सुप्रीम कोर्ट को चुनाव आयुक्त की नियुक्ति और नोटबंदी के फैसले की फाइल चाहिए, वह कोलेजियम के तहत न्यायाधीशों की नियुक्ति का कोई विवरण देने को तैयार नहीं?
Date:12-12-22
एम्स साइबर हमले से मिला सबकडा. शशांक द्विवेदी, (लेखक विज्ञान के जानकार हैं )
पिछले दिनों दिल्ली स्थित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) के सर्वर पर बड़ा साइबर हमला हुआ। हमला इतना गंभीर था कि उसका सर्वर लगातार नौ दिन तक डाउन रहा। इस दौरान एम्स का कामकाज बड़े पैमाने पर ठप रहा। अधिकांश काम को मैनुअल तरीके से निपटाए गए। इस बीच यह भी खबर आई कि हैकिंग करने वालों ने लाखों मरीजों के चुराए हुए डाटा को वापस करने और सर्वर को बहाल करने के लिए क्रिप्टोकरेंसी के माध्यम से 200 करोड़ रुपये की फिरौती भी मांगी। फिलहाल इस हमले की जांच चल रही है, लेकिन इससे यह साफ हो गया है कि देश का कोई भी संस्थान साइबर हमलों से सुरक्षित नहीं है। दरअसल एम्स के बाद इंडियन काउंसिल आफ मेडिकल रिसर्च (आइसीएमआर) की वेबसाइट पर भी बड़ा साइबर हमला हुआ। हैकर्स ने एक दिन में ही करीब छह हजार बार हमले के प्रयास किए। दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल के सर्वर पर भी नवंबर के मध्य में एक बड़ा साइबर हमला हुआ था। वह हमला हांगकांग से किया गया था। हालांकि आइसीएमआर के सर्वर की सुरक्षा में कोई खामी नहीं थी, जिससे हैकर्स जानकारी चुराने में विफल रहे। फिलहाल आइसीएमआर की वेबसाइट सुरक्षित है। इस तरह के साइबर हमलों की जांच-पड़ताल करने वाली दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल की शाखा इंटेलीजेंस फ्यूजन स्ट्रैटेजिक आपरेशन के अनुसार हांगकांग की दो ई-मेल आइडी से एम्स के सर्वर पर हमला किया गया। दोनों ई-मेल का आइपी एड्रेस पता कर लिया गया है। आरंभिक जांच के अनुसार इसमें चीन की भूमिका भी सामने आ रही है। इसके पहले भी देश में कई बड़े साइबर हमलों में चीन की भूमिका सामने आई है।
जाहिर है भारत सहित दुनियाभर में इस तरह के साइबर हमलों का खतरा मंडरा रहा है। पिछले तीन साल में चीन से भारत पर कई साइबर हमले किए हैं। पिछले वर्ष एक बड़े साइबर हमले में एयर इंडिया के 45 लाख यात्रियों का डाटा लीक हुआ था। याद कीजिए जब अक्तूबर 2020 में पावर ग्रिड पर साइबर हमले के चलते मुंबई में किस तरह ब्लैकआउट हो गया था और हाल में नेशनल स्टाक एक्सचेंज यानी एनएसई का कामकाज भी कई घंटे प्रभावित रहा। विशेषज्ञों के अनुसार चीन के हैकर्स के पास भारत के खिलाफ साइबर हमला करने की बड़ी क्षमता है। जब भी उन्हें मौका मिलता है वे देश की व्यवस्था में बड़ी गड़बड़ी पैदा कर देते हैं। साइबर जगत के विशेषज्ञों के अनुसार यह डाटा-युद्ध का जमाना है। हम जब डाटा को टुकड़ों में देखते हैं तो नहीं समझ पाते हैं कि आखिर इसे चुराकर कोई क्या हासिल कर सकता है? लेकिन इन्हीं छोटी-छोटी जानकारियों को एकसाथ जुटाकर और उनका किसी खास मकसद से हथियार के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। यानी कि देश के आंतरिक मुद्दों, राष्ट्रीय नीति, सुरक्षा, राजनीति, अर्थव्यवस्था सबमें सेंधमारी के प्रयास किए जा सकते हैं।
एक तरफ जहां देश के संवेदनशील संस्थानों पर साइबर हमले के मामले बढ़ रहे हैं, तो दूसरी तरफ महत्वपूर्ण संस्थान साइबर हमलों से बचने के लिए पर्याप्त कदम तक नहीं उठा रहे हैं। एम्स के मामले में भी बड़ी लापरवाही सामने आई है। मसलन संस्थान में सर्वर के रखरखाव के लिए पिछले करीब साढ़े चार साल से कोई एजेंसी नियुक्त नहीं थी। सर्वर की सुरक्षा के लिए दक्ष कर्मचारियों का भी अभाव था। सर्वर और हार्डवेयर के रखरखाव की जिम्मेदारी पहले एक निजी एजेंसी के पास थी, जिसके अनुबंध का नवीनीकरण 2018 से नहीं हुआ था। उसके बाद से किसी एजेंसी के पास सर्वर के रखरखाव की अधिकृत जिम्मेदारी नहीं थी। इस वजह से सर्वर का ठीक से रखरखाव सुनिश्चित नहीं हो रहा था। साफ है एम्स के सर्वर की सुरक्षा भगवान भरोसे ही थी। ऐसे में साइबर हमले की घटना के बाद एम्स की व्यवस्था पर बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। यह स्थिति तब है जब चिकित्सा व्यवस्था को पूरी तरह डिजिटल करने और डाक्टरों द्वारा मरीजों को लिखी जाने वाली दवा की पर्ची भी आनलाइन जारी करने की दिशा में कदम उठाए जा रहे हैं। एम्स जैसी ही स्थिति देश के अधिकांश संस्थानों की है, जिन्होंने साइबर हमलों से निपटने के लिए कोई पुख्ता इंतजाम नहीं किया है।
कोरोना काल से ही भारत में साइबर हमलों का खतरा बढ़ गया है। कोरोना काल तो हैकर्स के लिए बहुत अनुकूल रहा। साल 2020-2021 में भारतीय संस्थानों और यूजर्स पर सबसे ज्यादा साइबर हमले किए गए। साइबर सुरक्षा कंपनी सोनिकवाल की रिपोर्ट के अनुसार भारत में इस दौरान लाखों की संख्या में साइबर हमले हुए। महामारी के दौरान सबसे ज्यादा साइबर हमले वर्क फ्राम होम करने वाले यूजर्स पर किए गए। हालांकि इन हमलों से बचने के लिए कई संस्थानों ने पावरफुल क्लाउड-बेस्ड टूल और क्लाउड स्टोरेज तकनीक का इस्तेमाल किया।
वास्तव में साइबर जगत की सुरक्षा इस दौर की बड़ी जरूरत बन गई है। सवाल है कि साइबर हमलों से निपटने के लिए हमारा देश कितना तैयार है? क्योंकि हम सबकी इंटरनेट पर बहुत अधिक निर्भरता बढ़ने की वजह से आज के इस आधुनिक समय में साइबर सुरक्षा सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण मुद्दा हो चला है। साइबर विशेषज्ञों के अनुसार भारत में जितने बड़े सर्वर मौजूद हैं, उनमें अधिकांश हैकिंग प्रूफ नहीं हैं। हमारे यहां सरकार भी तभी जागती है, जब कोई बड़ा साइबर हमला हो। हैकर्स के नए तरीकों का हल ढूंढ़ने में महीनों लग जाते हैं। अब भारत को इस तरह के साइबर हमलों के लिए पहले से सतर्क होना होगा। केंद्र सरकार को डिजिटल इंडिया की तर्ज पर साइबर सुरक्षा के लिए विशेष रणनीति और असाधारण प्रयास करने होंगे, क्योकि जब सब कुछ इंटरनेट के भरोसे हो रहा है तो उसकी सुरक्षा सुनिश्चित करना भी सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।
Date:12-12-22
समानता का समीकरणसंपादकीय
समान नागरिक संहिता लागू करने को लेकर एक बार फिर चर्चा शुरू हो गई है। संसद में इससे संबंधित एक निजी विधेयक पेश किया गया, जिसका विपक्षी दलों ने विरोध किया, मगर मत विभाजन के जरिए उस पर चर्चा की मंजूरी मिल गई। हालांकि निजी विधेयकों पर कानून बनने के उदाहरण बहुत कम हैं, मगर इसे लेकर उम्मीद जताई जा रही है कि यह कानून की शक्ल ले सकता है। इसलिए कि समान नागरिक संहिता लागू करना खुद सरकार की वचनबद्धताओं में एक है। इसे लेकर पहले भी पहल हो चुकी है, मगर कुछ तकनीकी अड़चनों के चलते सहमति नहीं बन सकी। फिर, अभी जो निजी विधेयक पेश किया गया उसे सत्तापक्ष के ही एक सांसद ने सदन के पटल पर रखा। उत्तराखंड, मध्यप्रदेश, गुजरात, कर्नाटक जैसे कुछ भाजपा शासित राज्य पहले ही इसे लागू करने की प्रक्रिया शुरू कर चुके हैं। हिमाचल प्रदेश विधानसभा चुनाव में भी भाजपा ने समान नागरिक संहिता लागू करने का वादा किया था। यानी देश में इसे कानूनी रूप देने की जमीन पहले से तैयार है, उसमें इस विधेयक पर सदन में चर्चा का माहौल भी बन गया। इसलिए इसके सिरे चढ़ने की संभावना अधिक नजर आती है।
दरअसल, समान नागरिक संहिता का मुद्दा भाजपा ने उठाया जरूर था, मगर इसकी जरूरत सर्वोच्च न्यायालय ने शाहबानो मामले की सुनवाई के वक्त ही रेखांकित कर दी थी। शाहबानो ने तलाक के बाद अपने बच्चों के भरण-पोषण को लेकर अदालत का दरवाजा खटखटाया था। तब अदालत ने सरकार से समान आचार संहिता बनाने को कहा था। मगर इसमें तकनीकी अड़चन यह आ रही थी कि ऐसा कानून लागू करने से अल्पसंख्यक समुदाय की धार्मिक आस्था पर चोट पहुंच सकती है, जो कि असंवैधानिक कहा जा सकता है। असल में, मुसलिम समुदाय में शादी एक करार होती है, जिसे कोई भी एक पक्ष अपनी मर्जी से तोड़ने को स्वतंत्र है। बहुविवाह का चलन भी वहां स्वीकृत है। इस तरह विवाहिता पत्नी और उससे पैदा हुए बच्चों के भरण-पोषण, संपत्ति आदि का हक बाधित होता है। इसलिए खुद मुसलिम समाज की बहुत सारी महिलाएं समान आचार संहिता लागू करने की मांग करती रही हैं। फिर इसके पक्ष में तर्क यह भी दिया जाता है कि जब संविधान में धर्म और जाति से परे समान अधिकार की बात कही गई है, तो विवाह आदि के मामले में धार्मिक आस्था को क्यों महत्त्व दिया जाना चाहिए। तरक्की पसंद मुसलमान भी इस कानून के पक्ष में रहे हैं, मगर उनका कहना है कि इसे लागू करने से पहले तमाम संवेदनशील पहलुओं पर बारीकी से विचार कर लिया जाना चाहिए।
जब केंद्र सरकार ने तीन तलाक को खत्म करने का फैसला किया, तब बड़ी तादाद में मुसलिम महिलाओं ने अपनी खुशी का खुला इजहार किया था। इस तरह समान नागरिक संहिता को लेकर भी इस समुदाय की तरफ से किसी व्यापक विरोध की आशंका नजर नहीं आती। दरअसल, यह मामला धर्म से अधिक महिलाओं के हक से जुड़ा हुआ है। बहुत सारे देशों ने विवाह के बाद पति द्वारा पत्नी और बच्चों को बेसहारा छोड़ दिए जाने की प्रथा पर कानूनी रोक लगा रखी है। सब जानते हैं कि तलाक के बाद मुसलिम महिलाओं का गुजारा मेहर की रकम से होना मुश्किल होता है। उन्हें पति की संपत्ति पर बराबर का हक मिलेगा, तो न केवल वे खुद को सशक्त महसूस कर पाएंगी, बल्कि मनमानी तलाक पर भी लगाम लगेगी। मगर इसे कानूनी रूप देने से पहले इसके सभी पहलुओं पर गंभीरता से विचार-विमर्श होना चाहिए।
Date:12-12-22
विविधता की चिंतासंपादकीय
जलवायु परिवर्तन और प्रदूषण ने दुनिया को खतरे में डाल रखा है, लेकिन सुधार के प्रयास भी नाकाफी हैं। आज दुनिया में एक चौथाई जैव-विविधता विलुप्त होने के कगार पर है। ऐसे में, जैव-संरक्षण के लिए मॉ्ट्रिरयल, कनाडा में 190 से अधिक देशों के प्रतिनिधि और मंत्री विशेष सम्मेलन कर रहे हैं। कॉप15 नामक संयुक्त राष्ट्र जैव विविधता शिखर सम्मेलन में 7 से 19 दिसंबर तक पृथ्वी पर सुधार के लिए विस्तृत चर्चा होगी। संरक्षण के लिए एक समझौते पर मुहर लगने की भी उम्मीद है। एक समझौता या संधि साल 2020 में भी हुई थी, क्या उसमें हम सफल हुए हैं। विश्व स्तर पर समीक्षा हो रही है, लेकिन सबसे जरूरी है, देशों को जैव विविधता संरक्षण के लिए बाध्य करना। प्रेरित करने का आह्वान अब मखौल-सा लगने लगा है। जैव विविधता हमारे हाथों से फिसलती चली जा रही है। क्या हम खेतों को नाइट्रोजन आधारित उर्वरकों से बचाने के लिए कुछ कर पाए हैं? खेत आधार हैं, खेत बिगड़े, तो पूरा खाद्यान्न क्षेत्र ही खतरे में पड़ जाएगा।
सेविंग नेचर के प्रमुख स्टुअर्ट पिम कहते हैं, हम प्रजातियों को भौतिक विकास के माध्यम से लगभग 1,000 गुना तेजी से विलुप्त होने के लिए दुष्प्रेरित कर रहे हैं। कॉप15 धूमधाम से शुरू हो गया है, लेकिन शोधकर्ताओं और नीति विशेषज्ञों को चिंता है कि ज्यादातर देश अभी भी बहुत से जरूरी मुद्दों पर असहमत हैं। ऐसे में, क्या एक प्रभावी जैव संरक्षण समझौता हो पाएगा? संकट की गंभीरता अभी भी देशों को समझ नहीं आ रही है। एक वैश्विक मूल्यांकन से पता चलता है कि 40 प्रतिशत से अधिक उभयचर विलुप्त होने का खतरा झेलरहे हैं। उदाहरण के लिए, मेंढक जैसे मूलभूत जीव भी खतरे में हैं। इंडोनेशिया में बोगोर कृषि विश्वविद्यालय की पशु चिकित्सक मिर्जा कुसरिनी के नेतृत्व में एक टीम ने अध्ययन करके बताया है कि जलवायु परिवर्तन छोटे मेंढकों के जीवन को कठिन बना रहा है। खराब कवक या तत्व पानी में बढ़ने लगे हैं, उभयचरों का जीवन संकट में पड़ गया है। मेंढकों की अनेक प्रजातियां पहले ही नष्ट हो चुकी हैं। ग्लोबल वार्मिंग, जिससे समुद्र का तापमान बढ़ रहा है, दुनिया भर में प्रवाल भित्तियों को नुकसान पहुंचाने के लिए भी जिम्मेदार है। गौर कीजिए, नौ वर्ष की अवधि में, 2018 तक, दुनिया के 14 प्रतिशत प्रवाल समाप्त हो चुके हैं।
खतरा बड़ा है, लेकिन अभी भी विनाशकारी ताकतें सक्रिय हैं। बेहिसाब पैमाने पर मछली व अन्य जल-जीव पकड़ने का काम हो रहा है। वन्यजीव व्यापार व तस्करी रोकने की दिशा में भी देशों के बीच एकजुटता नहीं आई है। अनियंत्रित विकास की वजह से मोटे तौर पर भोजन उत्पादन के लिए लगभग 75 प्रतिशत भूमि और 66 प्रतिशत महासागर क्षेत्र में काफी बदलाव हुए हैं। दुनिया से कौन-सा जीव किस वजह से विलुप्त हो रहा है, अभी इसका ही पूरा अनुमान नहीं है। जब तक हम होश में आएंगे, तब तक न जाने कितनी जैव विविधता से हाथ धो बैठेंगे। वैज्ञानिक बार-बार बोल रहे हैं कि जैव विविधता का कुछ और हिस्सा भी अगर हम खो देंगे, तो दुनिया में जीवन चक्र प्रभावित हो जाएगा, सहज जीवन पहले की तरह लौटकर नहीं आएगा। देखिए, दुनिया में जब उभयचर या मेंढक घट रहे हैं, तब अमेरिका जैसे विकसित देशों में भी मच्छरों और संक्रामक बीमारियों की आशंका तेजी से बढ़ रही है। कॉप15 को समस्याओं की सूची के साथ नहीं, समाधान व समझौते के साथ सामने आना होगा।
Date:12-12-22
जी-20 के सहारे नवाचार का केंद्र बनने की भारतीय पहलचिंतन वैष्णव, ( अध्यक्ष, स्टार्टअप-20 )
प्रत्येक देश की उभरती जरूरतों और स्थापित मूल्यों के अनुरूप स्टार्टअप आज नवाचारों से प्रेरित आर्थिक सुधार, पुनर्संरचना और विकास के इंजन बन गए हैं। कुल 90 ट्रिलियन डॉलर की वैश्विक अर्थव्यवस्था में वैश्विक स्टार्टअप अर्थव्यवस्था की हिस्सेदारी लगभग तीन ट्रिलियन डॉलर है, और यह हिस्सेदारी तेजी से बढ़ रही है। बदलते वैश्विक परिदृश्य की जरूरतों के मुताबिक नवाचार के संचालन में स्टार्टअप की भूमिका महामारी के दौरान साफ-साफ दिखी थी। न सिर्फ जान बचाने में, बल्कि आर्थिक जीवंतता को वापस पटरी पर लाने में उसने बखूबी योगदान दिया। सतत विकास लक्ष्यों को पाने के लिए अर्थव्यवस्थाओं की मदद करने, सीमा-पार सहयोग बढ़ाने और नवाचार को बढ़ावा देने के लिए स्टार्टअप निरंतर सहयोग कर रहे हैं। वे रोजगार सृजन, तकनीकी प्रगति, दीर्घकालिक विकास और संकट प्रबंधन के मामले में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।
वर्ष 2023 में जी-20 की भारत की अध्यक्षता के दौरान शुरू किए जाने वाले स्टार्टअप-20 एंगेजमेंट ग्रुप का मकसद स्टार्टअप का समर्थन करना और स्टार्टअप, कॉरपोरेट जगत, निवेशकों, नवाचार एजेंसियों व इससे जुड़े इको-सिस्टम के अन्य प्रमुख साझेदारों के बीच तालमेल को संभव बनाना है। भारत का स्टार्टअप इको-सिस्टम आज दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा इको-सिस्टम है, जिसमें 107 यूनिकॉर्न, 83,000 से अधिक मान्यता प्राप्त स्टार्टअप और उनको सहयोग देने वाला तंत्र शामिल है, जो निरंतर विस्तार कर रहा है। स्टार्टअप-20 एंगेजमेंट ग्रुप के माध्यम से भारत जी-20 देशों के बीच रणनीतिक सहयोग के जरिये रचनात्मक स्टार्टअप की सहायता करने के लिए एक समावेशी ढांचा विकसित करने में मदद करेगा। जी-20 देशों में से प्रत्येक देश अपने यहां स्टार्टअप इको-सिस्टम बना रहे हैं, इसलिए यह समूह स्टार्टअप के वित्त-पोषण के मॉडल को संभव बनाने और विशेष रूप से वैश्विक महत्व के क्षेत्रों के लिए संगतपूर्ण और सह-निर्माण सुनिश्चित करने के लिए मिलकर काम करेगा।
इस एंगेजमेंट ग्रुप के स्थापना-वर्ष के लिए भारत ने तीन साझा स्तंभों की पहचान की है। पहला है, नींव और गठबंधन। जी-20 की अर्थव्यवस्थाओं में स्टार्टअप और उनके काम को लेकर कई परिभाषाएं मौजूद हैं। इस स्तंभ के माध्यम से, स्टार्टअप-20 की नींव को मजबूत करने के लिए स्टार्टअप के लिए एक हैंडबुक तैयार किया जाएगा और इसके लिए आम सहमति के आधार पर परिभाषाओं व शब्दावलियों का मूल्यांकन किया जाएगा। इसके अलावा, जी-20 की अर्थव्यवस्थाओं में स्टार्टअप इको-सिस्टम के हितधारकों के बीच वैश्विक गठजोड़ बनाने के लिए रूपरेखा तैयार की जाएगी और तमाम देशों के बीच आपसी सहयोग बढ़ाया जाएगा।
दूसरा स्तंभ है वित्त। यह स्टार्टअप के वित्त-पोषण को आसान बनाने और सहयोगी वातावरण बनाने के लिए नीतियों व फ्रेमवर्क पर ध्यान देगा। तीसरा स्तंभ है, समावेशिता और स्थिरता। यह सभी देशों के साझा हित के क्षेत्रों में महत्वपूर्ण सतत विकास लक्ष्यों से संबंधित कमियों की भरपाई करने वाले या महिला उद्यमी, दिव्यांग जैसा उन समूहों का प्रतिनिधित्व करने वाले स्टार्टअप को गति देने के लिए उपयुक्त तंत्र बनाने में मददगार होगा, जिनके समावेशन पर विशेष ध्यान देने की सख्त जरूरत है।
स्टार्टअप-20, जी-20 के देशों में स्टार्टअप इको-सिस्टम के विकास के अपने दायित्व को पूरा करने के लिए विभिन्न कार्यक्रमों व सत्रों की मेजबानी भी करेगा। इस बाबत भारत के विभिन्न हिस्सों में कई कार्यक्रम प्रस्तावित हैं। इसके अलावा, भारत के स्टार्टअप इको-सिस्टम को दुनिया के सामने पेश करने की भी कल्पना की गई है। उम्मीद है, इस तरह के जुड़ाव से भारत ‘ग्लोबल इनोवेशन हब’ की हैसियत पा सकेगा।
जी-20 की अध्यक्षता के माध्यम से भारत ने ‘एक धरती, एक परिवार, एक भविष्य’ की भावना को दुनिया के सामने रखा है। इसी भावना के अनुरूप स्टार्टअप-20 एंगेजमेंट ग्रुप काम करेगा, और यह स्टार्टअप की सहायता करने, उन्हें समावेशी व विभिन्न भागीदारी के माध्यम से सामूहिक भविष्य का हिस्सा बनाने संबंधी वैश्विक राय बनाने में कारगर साबित होगा।
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हाल ही में वित्तमंत्री सीतारमण ने स्टार्ट अप्स् से आहवान किया है कि वे सस्ते और पैमाने पर खरे, ऐसे तकनीक आधारित समाधानों के साथ आगे आएं, जो आने वाले ‘टैकेड’ यानि तकनीक आधारित दशक को ऊँचाई पर ले जा सकें।
कुछ बिंदु –
इन सभी पहलुओं में उभरती प्रौद्योगिकियों को अपनाने और उन्हें लागू करने की कंपनियों की क्षमता बहुत मायने रखती है। अनेक क्षेत्रों में स्टार्टस अप और बड़ी कंपनियों के साथ सार्वजनिक मंच सामने आ रहे हैं। इन सबसे भारत के तकनीक रूप से श्रेष्ठ होने की संभावना बढ़ जाती हैं।
‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 14 नवंबर, 2022
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Date:10-12-22
The G-20 can be the UN Security Council alternativeT.P. Sreenivasan is a former Indian Ambassador and Governor for India of the International Atomic Energy Agency. He is also Mentor and Adjunct Professor of Eminence, Somaiya Vidyavihar University, Mumbai, and the Director General of the Kerala International Centre
As India begins its presidency of the G-20 (Group of Twenty), there is a certain reluctance on its part to take the bull by the horns and try to end the Russian invasion of Ukraine. India has gone out of its way to say that Ukraine will not be the centrepiece of the G-20 this year. This position is because of the fear of failure, especially because of the position India has taken not to condemn Russia; it is not because the Russian invasion is not the most urgent issue for the world to resolve. But after the G-20 summit in Bali, Indonesia, in November, there is greater understanding of the Indian position — as articulated by U.S. President Joe Biden himself. Considering that the Bali declaration was virtually drafted by India, New Delhi has been recognised as a potential honest broker who may be able to end the devastating war.
The right place and the right time for India
The alphabetical rotation of the G-20 presidency has brought India to the right place at the right time, especially when the world is looking for an alternative to the United Nations Security Council (UNSC), which has been paralysed by the veto. Most recently, during the COVID-19 pandemic and the Russian invasion of Ukraine, the UNSC’s credibility hit rock bottom. Any reform of the UNSC, particularly the expansion of its permanent membership, will be strongly resisted by the permanent members and a large majority of the General Assembly because it does not benefit anyone except those who aspire to be permanent members.
Every candidate has a strong opponent waiting to pounce the moment there is any serious proposal to make the candidate country a permanent member. Among the proposals made in the last three decades, there is none that can command the votes of the five permanent members as well as two-thirds of the members of the General Assembly. Although the G-20, which consists of 19 countries and the European Union (EU), was set up by the G-7 countries in 1999, and upgraded to the level of Heads of State/Government in 2008 to address “major issues related to the global economy, such as international financial stability, climate change mitigation and sustainable development”, its composition is such that it looks like it is an expanded Security Council. It is representative of all the significant countries of the 21st century and is balanced between developed and developing countries. The present permanent members and declared aspirants have been included while Africa and Latin America have also been represented. The EU represents a very important segment of the global power structure. A consensus decision of G-20 should be universally acceptable.
The platform of the Bali Declaration
A gradual transformation of the G-20 from an economic body to a political body can be initiated on the basis of the Bali Declaration, which constitutes the consensus in the group on the Russia-Ukraine war. If the G-20 emerges as peacemaker in Europe, it will attain legitimacy as a group to promote international peace and security; it can gradually become an alternative to the UNSC.
The most important difference will be that no one can prevent its meetings by use of the veto. Care should be taken not to isolate anyone and promote a solution, which is acceptable. Russia will have to reason out its behaviour rather than threaten the use of the veto to intimidate the international community. The grave danger of a permanent member waging a war and vetoing every resolution against it is a reality that the UN should address.
The first step for India to take is to highlight the Bali Declaration and to present a road map during the preparatory process for the G-20 and persuade the sherpas to take it on its agenda. The response cannot be negative except by Russia as it has to negotiate as an equal with the other members of the G-20. If Russia is looking for an escape route, even Russia will accept India’s role as an honest broker in the process. This will enhance India’s capacity to deal with the crisis in a formal way within the G-20. It will accomplish India’s ultimate goal of securing the reform of the UNSC. Once the basic work is done, the UNSC can formalise the decision and implement it for international peace and security.
Not a new role
Being an honest broker in international peace and security is a role that is not new to India. Although it has taken strong positions on decolonisation and rights of the developing countries to play a role as a leader of the non-aligned world, it kept the conversation going among the protagonists and promoted a balanced outcome. India was the author of several landmark resolutions of the UNSC on the question of Palestine and administered the healing touch whenever confrontation developed in multilateral fora. India was a part of efforts made to prevent the expulsion of Egypt from the Non-Aligned Movement at the Havana summit when the Arabs turned against Egypt.
Flexibility in negotiations even while being principled in its national position gave India a role in many situations. As the President of the G-20, the fund of goodwill that India has earned in the UN will be an asset at this critical moment.
The legitimisation of the G-20 as a global arbiter in international affairs will create a multilateral instrument where all members are equal. Though it may take a very long time for it to replace the UNSC, a beginning will have been made in making the UN an effective instrument in stopping wars and building cooperation. Such an opportunity comes, but rarely in history. It will be worth the effort even if it only plants the seeds for the beginning of a new UNSC.
Date:10-12-22
सरकारें अफसरों के तय कार्यकाल के खिलाफसंपादकीय
करीब 15 साल पहले प्रकाश सिंह बनाम भारत सरकार केस में सुप्रीम कोर्ट ने पुलिस सुधार पर एक अहम फैसले में सरकारों को डीजीपी और एसपी का दो वर्ष का कार्यकाल निश्चित करने और उनकी नियुक्ति के लिए एक स्वतंत्र पैनल बनाने का आदेश दिया था। लेकिन आज तक एक भी राज्य ने इस फैसले पर पूरी तरह अमल नहीं किया। अधिकांश राज्यों ने इस पर कोई भी प्रतिबद्धता जाहिर नहीं की और अगर की भी तो अमल में नहीं लाए। कम महत्व वाली जगह पर पोस्टिंग अधिकारियों को सजा की तरह लगती है, जिसके डर से वे गुलाम भाव में आकर राजनीतिकों के हर गलत-सही आदेश को मानने लगते हैं। सुप्रीम कोर्ट में इन दिनों एक मुख्य चुनाव आयुक्त (सीईसी) की ताजा नियुक्ति का मामला जेरे बहस है। जहां एक ओर सरकारें वर्षों तक पुलिस सुधार से जुड़े कोर्ट के आदेश पर कोई अमल नहीं करतीं, वहीं सीईसी की नियुक्ति की फाइल का 24 घंटों में हर स्तर से क्लीयर होकर नियुक्ति हो जाना एक अजीब विरोधाभास है, जिसे कोर्ट ने इंगित किया। यानी अगर सरकारें चाहें तो बिजली की गति से भी काम कर सकती हैं और न चाहें तो वर्षों तक देश की सबसे बड़ी कोर्ट के स्पष्ट आदेश को भी दरकिनार कर सकती हैं। शायद स्वस्थ गवर्नेस का सबसे बड़ा अवरोध है- राजनेताओं का कानून की ताकत का अपना प्रभाव बढ़ाने में अनधिकृत इस्तेमाल करना। याद होगा कि एक वरिष्ठ अधिकारी दम्पती अपने कुत्ते को घुमाने के लिए देश का प्रमुख स्टेडियम शाम को बंद करवा देते थे, जिससे खिलाड़ी तक प्रैक्टिस करने से वंचित रहने लगे।
Date:10-12-22
जजों की नियुक्ति के विवाद में कौन सही कौन गलत?पवन के. वर्मा, ( लेखक, राजनयिक, पूर्व राज्यसभा सांसद )
क्या न्यायिक स्वायत्तता पर अंकुश लगाने के प्रयास किए जा रहे हैं या क्या न्यायिक प्रक्रिया को सच में ही सुधारों की जरूरत है? 8 नवम्बर को संसद में अपने पहले अभिभाषण में उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने इस विषय पर अपनी बातें रखीं और इस बात पर नाराजी जताई कि सर्वोच्च अदालत ने राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम (एनजेएसी एक्ट) को ओवररूल कर दिया है। 2014 में सरकार 99वें संविधान संशोधन के माध्यम से एनजेएसी एक्ट लाई थी। इसे संसद में भरपूर समर्थन मिला। इकलौते राम जेठमलानी ही ऐसे थे, जिन्होंने राज्यसभा में इसका विरोध किया था। यह एक्ट मौजूदा कॉलेजियम सिस्टम को बदलकर जजों की नियुक्ति का अधिकार एक अन्य पेनल को देना चाहता था, जिसमें मुख्य न्यायाधीश समेत सर्वोच्च न्यायालय के दो वरिष्ठतम जज, केंद्रीय कानून मंत्री व सिविल सोसायटी से दो प्रतिष्ठित सदस्य हों। लेकिन 2015 में सर्वोच्च अदालत ने यह कहते हुए इस एक्ट को समाप्त कर दिया कि न्यायपालिका सरकार की कृतज्ञता के चक्रव्यूह में नहीं फंस सकती।
कॉलेजियम में मुख्य न्यायाधीश समेत सर्वोच्च अदालत के चार वरिष्ठतम जज होते थे। केंद्रीय कानून मंत्री किरन रिजिजू सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि कॉलेजियम प्रणाली अस्पष्ट और गैरजवाबदेह है। उन्होंने कहा पूरी दुनिया में कहीं भी जज ही जजों की नियुक्ति नहीं करते, सिवाय भारत के। यह प्रक्रिया संविधान के अनुरूप नहीं है। वहीं पूर्व मुख्य न्यायाधीश एन.वी. रमन्ना कहते हैं, जजों की नियुक्ति एक लम्बी, परामर्श-आधारित प्रक्रिया के माध्यम से की जाती है और इसमें अनेक सहभागियों से संवाद किया जाता है। इससे ज्यादा लोकतांत्रिक प्रक्रिया कोई दूसरी नहीं। सर्वोच्च अदालत के एक मौजूदा जज ने कानून मंत्री का प्रतिकार करते हुए कहा, जब कोई व्यक्ति इतने ऊंचे पद पर हो तो उसे ऐसी बातें नहीं कहनी चाहिए।
इस मामले की जड़ में यह है कि तमाम सरकारें- वो चाहे जिस पार्टी की हों- यह चाहती हैं कि न्यायपालिका उनके एजेंडा का समर्थन करने वाली हों। हो भी क्यों ना, अदालतों के सम्मुख प्रस्तुत 80% से ज्यादा मामलों में सरकार ही एक पक्ष होती है। वैसे में वे जजों की नियुक्ति में दखल देना चाहती हैं। अतीत में यह बेरोकटोक किया जाता था। 1973 में इंदिरा गांधी ने तीन जजों को दरकिनार करते हुए जस्टिस ए.एन. राय को मुख्य न्यायाधीश बना दिया था। इस प्रवृत्ति पर रोक लगाने के लिए 1993 में कॉलेजियम सिस्टम लाया गया। इसके बाद सरकार जजों की नियुक्तियों-तबादलों के लिए कॉलेजियम की सिफारिशों पर निर्भर हो गई। सरकार चाहे जितने नामांकितों को विचारार्थ भेज सकती थी, लेकिन निर्णय कॉलेजियम का ही मान्य था।
लेकिन सरकारों के पास एक और उपाय था। वे सर्वोच्च अदालत की सिफारिशों को तो रद्द नहीं कर सकती थीं, लेकिन उन्हें स्वीकार करने में भरपूर समय जरूर ले सकती थीं या सूचीबद्ध नामों में से अपनी पसंद के नामों को ही चुन सकती थीं। नवम्बर 2022 तक हाईकोर्ट में नियुक्तियों सम्बंधी कॉलेजियम की 68 सिफारिशें सरकार के सामने लम्बित थीं। इनमें से 11 ऐसी थीं, जिनके लिए उसने जोर दिया था और सरकार के लिए उन्हें मानना बाध्यकारी था। यह संवैधानिक संकट पैदा करने वाली स्थिति है। सर्वोच्च अदालत के जज संजय के. कौल ने चेताया है कि सरकार सीमा पार कर रही है। उन्होंने न्यायिक कार्रवाई की भी बात कही है। उनका कहना है कि बीते डेढ़ वर्षों से दर्जनों नाम लम्बित पड़े हैं। इनमें से एक वकील की मृत्यु हो चुकी है, एक अन्य ने अपनी सहमति वापस ले ली है।
भारत में 4.7 करोड़ मामले लम्बित हैं। 60 हजार सर्वोच्च अदालत में रुके हैं। हाईकोर्ट के जजों की 1108 स्वीकृत पोस्ट में से 380 खाली हैं। पटना हाईकोर्ट में 49% सीटें रिक्त हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट में 160 मंजूर पदों के समक्ष केवल 66 जज हैं। दिल्ली, कोलकाता, पंजाब, हरियाणा के हाईकोर्ट में 40% तक सीटें खाली हैं। समस्या का समाधान खोजना जरूरी है। सरकार का यह कहना सही है कि दुनिया के किसी और देश में जज ही जजों की नियुक्ति नहीं करते। वहीं न्यायपालिका भी अपनी स्वायत्तता की उचित ही रक्षा कर रही है। कॉलेजियम प्रणाली में पारदर्शिता का अभाव है तो कॉलेजियम की सिफारिशों पर सरकार की प्रतिक्रिया के बारे में भी यही बात कही जा सकती है। नागरिक स्वतंत्र न्यायपालिका चाहते हैं, लेकिन वे यह भी चाहते हैं कि न्यायिक तंत्र सुचारु रूप से काम करे। तमाम सरकारें- वो चाहे जिस पार्टी की हों- चाहती हैं कि न्यायपालिका उनके एजेंडा का समर्थन करने वाली हों। हो भी क्यों ना, अदालतों के सम्मुख प्रस्तुत 80% से ज्यादा मामलों में सरकार ही एक पक्ष होती है।
Date:10-12-22
समान संहिता का विधेयकसंपादकीय
राज्यसभा में भाजपा सदस्य की ओर से निजी स्तर पर समान नागरिक संहिता विधेयक प्रस्तुत करने का जैसा विरोध हुआ, उसका औचित्य समझना कठिन है। यह विरोध यही बताता है कि विपक्षी दल समान नागरिक संहिता पर बहस करने के लिए भी तैयार नहीं। आखिर जिस समान नागरिक संहिता का उल्लेख संविधान के नीति निर्देशक तत्वों में है, उस पर संसद में बहस क्यों नहीं हो सकती और वह भी तब, जब निजी विधेयक पेश करने की एक परंपरा है? यह हास्यास्पद है कि कई विपक्षी सांसदों ने समान नागरिक संहिता विधेयक पेश करने की पहल को संविधान विरोधी बता दिया। इसे अंधविरोध और कुतर्क के अतिरिक्त और कुछ नहीं कहा जा सकता। यह ठीक है कि निजी विधेयक मुश्किल से ही कानून का रूप लेते हैं और हाल के इतिहास में तो किसी भी ऐसे विधेयक को संसद की मंजूरी नहीं मिली है, लेकिन किसी भी सांसद को निजी स्तर पर विधेयक पेश करने का अधिकार है। जब ऐसे विधेयकों पर संसद में चर्चा होती है तो देश का ध्यान संबंधित विषय की ओर आकर्षित होता है और उस पर विचार-विमर्श की प्रक्रिया तेज होती है। यदि भाजपा सांसद किरोड़ीमल मीणा के निजी विधेयक के जरिये यह काम होता है तो इससे किसी को परेशानी क्यों होनी चाहिए?
निजी स्तर पर पेश किए गए समान नागरिक संहिता विधेयक पर राज्यसभा में व्यापक बहस इसलिए होनी चाहिए, क्योंकि कई राज्य सरकारें इस संहिता के निर्माण की दिशा में सक्रिय हैं। जहां उत्तराखंड ने इसे लेकर एक समिति गठित कर दी है और उसने अपना काम शुरू कर दिया है, वहीं गुजरात सरकार ने भी चुनाव में जाने के पहले ऐसा करने का वादा किया था। इसके अलावा मध्य प्रदेश सरकार ने भी समान नागरिक संहिता के निर्माण की आवश्यकता जताई है। इन स्थितियों में आवश्यक केवल यह नहीं कि संसद में समान नागरिक संहिता को लेकर विस्तार से बहस हो, बल्कि यह भी है कि केंद्र सरकार इस संहिता का कोई मसौदा सामने लाए, जिससे आम जनता के बीच भी विचार-विमर्श की प्रक्रिया आगे बढ़े। जब ऐसा होगा तो समान नागरिक संहिता को लेकर दुष्प्रचार की जो राजनीति हो रही है, उसकी काट करने में मदद मिलेगी। यह दुष्प्रचार वोट बैंक की राजनीति के तहत और साथ ही अल्पसंख्यक समुदायों, खास तौर पर मुस्लिम समुदाय को भ्रमित करने के शरारतपूर्ण इरादे से हो रहा है। इसका पता विपक्षी सांसदों के इस तरह के थोथे बयानों से चलता है कि समान नागरिक संहिता के निर्माण की दिशा में आगे बढ़ने से विविधता की संस्कृति को क्षति पहुंचेगी। यह निरा झूठ है, क्योंकि यह संहिता तो विविधता में एकता के भाव को बल देगी। इसके साथ ही इससे राष्ट्रीय एकता को भी बल मिलेगा।
Date:10-12-22
खुश खबर को तैयार होता रक्षा उद्योग!संपादकीय
देश के रक्षा कारोबार के बारे में अधिकांश लोग सोचते हैं कि सरकार जहां दशकों से हथियार विकास और निर्माण में आत्मनिर्भरता हासिल करने का प्रयास कर रही है (ज्यादातर सरकारी कंपनियों के जरिये) वहीं हकीकत यह है कि भारत दुनिया में रक्षा क्षेत्र का दूसरा सबसे बड़ा आयातक है। यह नतीजा प्रयासों की कमी की वजह से नहीं बल्कि सही तरीके से प्रयास न करने की वजह से है।
कम ही लोग जानते हैं कि अगर अंतरिक्ष और नाभिकीय ऊर्जा को रक्षा में शामिल कर लिया जाए तो रक्षा शोध एवं विकास बजट के मामले में भारत तीसरा या चौथा सबसे बड़ा देश है लेकिन अमेरिका और चीन की तुलना में हम बहुत कम धनराशि खर्च करते हैं लेकिन फिर भी यह ब्रिटेन, जर्मनी और फ्रांस के रक्षा शोध एवं विकास बजट से काफी अधिक है। जबकि ये सभी देश रक्षा उपकरण और हथियार निर्माण में भारत से काफी आगे हैं। बल्कि विमानन और इलेक्ट्रॉनिक्स के क्षेत्र में शीर्ष सरकारी रक्षा कंपनियों का शोध एवं विकास व्यय अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इस क्षेत्र में होने वाले औसत व्यय से काफी अधिक है।
विरोधाभास यहीं समाप्त नहीं होता। एक ओर यह स्पष्ट है कि स्वदेशी स्तर पर विकसित हथियार सामने आ रहे हैं। तेजस और ब्रह्मोस के साथ-साथ कई रेंज की मिसाइलें और पोत क्षमता इसका उदाहरण हैं। दूसरी ओर जहां इस विषय से संबद्ध अधिकारी घरेलू रक्षा उपकरणों की बिक्री में तेज इजाफे, निजी क्षेत्र के लिए अधिक हिस्सेदारी और आयातित हार्डवेयर पर कम निर्भरता की बात कर रहे हैं वहीं उपलब्ध आंकड़ों से संकेत मिलता है कि डॉलर के संदर्भ में रक्षा उत्पादन लगभग ठहरा हुआ है। यही बात रक्षा निर्यात पर भी लागू होती है।
तो क्या यह एक अच्छी खबर है या नहीं? शायद दोनों बातें सही हैं। परंतु इस क्षेत्र से जुड़े लोगों की एक हालिया चर्चा से यह बात एकदम स्पष्ट है कि बदलाव की हवा जरूर बह रही है। सरकार ने इस क्षेत्र को निजी विनिर्माताओं के लिए खोल दिया है और वित्त मंत्री ने अपने पिछले बजट भाषण में कहा था कि सरकारी फंडिंग वाले रक्षा शोध एवं विकास का चौथाई व्यय निजी उद्योगों द्वारा गैर सरकारी संस्थानों में व्यय किया जाएगा। अब तक तो ऐसा इरादा ही जताया गया है लेकिन सी-295 परिवहन विमान का निर्माण टाटा-एयरबस के संयुक्त उपक्रम द्वारा किया जाएगा। वहीं हावित्जर का निर्माण लार्सन ऐंड टुब्रो तथा भारत फोर्ज द्वारा किया जाएगा। ऐसे बड़े उपक्रम अब इस क्षेत्र के उन 10,000 छोटे और मझोले उपक्रमों के साथ हैं जो यहां पहले से हैं।
शोध एवं विकास के मोर्चे पर भी सरकार ने चार वर्ष पहले रक्षा नवाचार संस्थान की स्थापना की थी। इसकी कार्यकारी शाखा यानी इनोवेशन फॉर डिफेंस एक्सिलेंस यानी आईडेक्स ने ड्रोन, रोबोटिक्स, कृत्रिम मेधा और उन्नत सामग्री के क्षेत्र में शोध के लिए 100 से अधिक परियोजनाओं को फंड दिया। इसके अलावा कुछ स्टार्टअप द्वारा निर्मित छवि पहचानने वाली, पहने जा सकने वाली तकनीक आदि विकसित की गई हैं। इस क्षेत्र में काम करने वालों का मानना है कि अंतत: अब चीजें बदल रही हैं।
इसका अर्थ यह नहीं है कि समस्या है ही नहीं। रक्षा खरीद प्रणाली अभी भी कई के लिए बड़ी बाधा है। सैन्य बल घरेलू शोध एवं विकास आधारित उत्पादों को स्वीकार करने में बहुत समय लगाते हैं। सबसे सस्ती बोली को अपनाने की मानक परंपरा वेंडरों को बहुत प्रोत्साहित नहीं करती है। आइडेक्स फंडिंग ने ड्रोन तकनीक के विकास में काफी मदद की है लेकिन अभी तक वास्तविक ऑर्डरों के फलीभूत होने के बहुत कम मामले सामने आए हैं। ड्रोन और ड्रोन कलपुर्जों के निर्माण के लिए उत्पादन संबद्ध योजना की घोषणा की गई है जिससे शायद इस क्षेत्र को थोड़ी मदद मिले।
निर्यात में भी इजाफा हो सकता है। उदाहरण के लिए टेस्ला के बारे में जानकारी है कि उसने बैटरियों को जल्दी चार्ज करने के लिए स्थानीय सामग्रियों से विकसित तकनीक में रुचि दिखाई है। दो कंपनियों को पिनाका रॉकेट फायरिंग सिस्टम के लिए निर्यात ऑर्डर मिले हैं। इस वर्ष के आरंभ में मलेशिया ने एचएएल के साथ तेजस लड़ाकू विमान के लिए समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं, बहरहाल दुर्भाग्य की बात है कि यह अनुबंध चीन को मिल सकता है।
शायद अभी अलहदा सौदों और घरेलू शोध एवं विकास के आधार पर बड़े आंकड़े हासिल करने की बात सोचना जल्दबाजी होगी। परंतु जिन कदमों से मदद मिली है उनमें एक यह है कि सरकार अब सरकारी फंड से होने वाले शोध से तैयार बौद्धिक संपदा पर स्वामित्व का दावा नहीं करती। ऐसे में कंपनियां भी उत्पादन के चरण में पूंजी जुटाने के लिए बेहतर स्थिति में हैं। अच्छी तकदीर के साथ रक्षा शोध एवं रक्षा उत्पादन क्षेत्र वास्तव में खुश खबर साबित हो सकता है।
Date:10-12-22
दागी नुमाइंदेसंपादकीय
दिल्ली नगर निगम चुनाव के बाद एक बार फिर यह साफ हुआ है कि राजनीति में अपराधीकरण खत्म करने को लेकर कोई भी राजनीति पार्टी गंभीर नहीं है। सार्वजनिक रूप से वे और उनके नेता चाहे कितने भी दावे करें कि वे राजनीति को स्वच्छ बनाने के लिए काम करेंगे, लेकिन मौका मिलते ही वे भी इस बात का खयाल रखना जरूरी नहीं समझते कि अपराध के आरोपी या आपराधिक पृष्ठभूमि वाले किसी व्यक्ति को उम्मीदवार बनाने से कौन-सी परंपरा मजबूत होगी। गौरतलब है कि दिल्ली नगर निगम चुनावों में जीते पार्षदों के संदर्भ में ‘एसोसिएशन फार डेमोक्रेटिक रिफार्म्स’ यानी एडीआर और ‘दिल्ली इलेक्शन वाच’ की ओर से जारी एक रिपोर्ट में यह बताया गया है कि दो सौ अड़तालीस विजेताओं में से बयालीस यानी सत्रह फीसद निर्वाचित पार्षद ऐसे हैं, जिन पर आपराधिक मामले दर्ज हैं। इसके अलावा, उन्नीस पार्षद गंभीर आपराधिक मामलों के आरोपी हैं। विडंबना है कि यह प्रवृत्ति कम होने के बजाय हर अगले चुनाव में और बढ़ती ही दिख रही है।
सवाल है कि आए दिन राजनीतिक परिदृश्य को एक स्वच्छ और नई छवि देने से लेकर ईमानदारी का दावा करने वाली पार्टियों और उनके नेताओं के लिए चुनावों के आते ही यह सवाल महत्त्वहीन क्यों हो जाता है! देश के कुछ अन्य राज्यों में जब स्थानीय स्तर पर राजनीति में अपराधियों के दखल को लेकर चिंता जताई जाती है तो उम्मीद बंधती है कि कम से कम राजधानी दिल्ली में नई शुरुआत होगी। लेकिन पिछले कई सालों से होने वाले चुनावों में यह देखा गया है कि यहां भी वही प्रवृत्ति हावी होती जा रही है। दिल्ली में फरवरी, 2020 में हुए विधानसभा चुनाव के नतीजों के बाद भी एडीआर ने अपने विश्लेषण में चुने गए कम से कम आधे विधायकों पर गंभीर आपराधिक मामले दर्ज पाए थे। इसमें मुख्य रूप से आम आदमी पार्टी के विधायक थे। अब दिल्ली नगर निगम के चुनावों में भी किसी पार्टी ने उम्मीदवार बनाने के लिए स्वच्छ छवि के व्यक्ति को तरजीह देने की जरूरत नहीं समझी। नतीजतन, जनकल्याण के नारे और वादे के साथ जो उम्मीदवार जीत कर पार्षद बने हैं, वे खुद गंभीर अपराधों के आरोपों से जूझ रहे हैं।
दरअसल, जब भी राजनीति के अपराधीकरण का मुद्दा बहस का केंद्र बनता है तो अमूमन सभी दलों की ओर से बढ़-चढ़ कर इसके खिलाफ अभियान चलाने और इसे खत्म करने के दावे किए जाते हैं। लेकिन जब चुनाव आता है तो वही राजनीतिक पार्टियां आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों या फिर अपराध के आरोपियों को उम्मीदवार बनाने में कोई हिचक नहीं महसूस करती हैं। अफसोसनाक यह है कि इसमें वैसी पार्टियां भी शामिल हैं, जिनका राजनीति में उदय ही भ्रष्टाचार जैसे मुद्दे के खिलाफ अभियान चलाने से हुआ। लोगों को यह उम्मीद थी कि वे राजनीति को अपराधीकरण से मुक्त एक नया चेहरा देंगी। लेकिन ऐसा लगता है कि लगभग सभी पार्टियों ने यह मान लिया है कि राजनीति में आपराधिक पृष्ठभूमि के लोगों के बिना काम नहीं चल सकता। वरना क्या वजह है कि ईमानदार और प्रतिबद्ध आम लोगों से लेकर कार्यकर्ताओं तक की एक शृंखला होने के बावजूद किसी पार्टी के शीर्ष नेतृत्व को जनता का प्रतिनिधि चुने जाने के लिए स्वच्छ छवि को एक अनिवार्य शर्त बनाना जरूरी नहीं लगता?
Date:10-12-22
कुपोषण की चुनौती और मोटा अनाजजयंतीलाल भंडारी
सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार से यह सुनिश्चित करने को कहा है कि देश में कोई भी व्यक्ति भूखा न सोए और सरकार ने कोरोना महामारी के दौरान लोगों तक जिस तरह मुफ्त अनाज पहुंचाया, वह व्यवस्था जारी रहनी चाहिए। ऐसे में निश्चित रूप से मोटे अनाज का उत्पादन और वितरण बढ़ा कर देश में भूख और कुपोषण की चुनौती का सामना और यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि देश का कोई भी व्यक्ति भूखा नहीं सोएगा। इस समय जब देश में भूख और कुपोषण की चुनौतियां उभर रही हैं, तो अंतरराष्ट्रीय मोटा अनाज वर्ष (इंटरनेशनल मिलेट्स ईयर) 2023 के व्यापक प्रचार-प्रसार से मोटे अनाज के अधिक उत्पादन और वितरण से इस चुनौती से पार पाने की संभावनाएं भी दिखाई दे रही हैं। संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रकाशित ‘द स्टेट आफ फूड सिक्योरिटी ऐंड न्यूट्रिशन इन द वर्ल्ड रिपोर्ट-2022’ के अनुसार 2021 में भारत की 22.4 करोड़ आबादी कुपोषण और भूख का सामना कर रही थी, तो दुनिया में कुपोषण की चुनौती का सामना करने वाले लोगों की कुल संख्या 76.8 करोड़ थी। विभिन्न वैश्विक रिपोर्टों के मुताबिक, इस कुपोषित आबादी की थालियों में मोटे अनाज बढ़ा कर कुपोषण कम करने की डगर पर आगे बढ़ा जा सकता है।
गौरतलब है कि मोटे अनाजों को पोषण का शक्ति केंद्र कहा जाता है। पोषक अनाजों की श्रेणी में ज्वार, बाजरा, मक्का, रागी, चीना, कोदो, सावां, कुटकी, कुट्टू और चौलाई प्रमुख हैं। मोटे अनाज किसान हितैषी फसलें हैं। इनके उत्पादन में पानी की कम खपत और कम कार्बन उत्सर्जन होता है। ये सूखे वाली स्थिति में भी उगाई जा सकती हैं। मोटा अनाज सूक्ष्म पोषक तत्त्वों, विटामिन और खनिजों का भंडार है। छोटे बच्चों और गर्भवती महिलाओं के पोषण में विशेष लाभप्रद हैं। शाकाहारी खाद्य पदार्थों की बढ़ती मांग के दौर में मोटा अनाज वैकल्पिक खाद्य प्रणाली प्रदान करता है। इनकी खेती सस्ती और कम जोखिम वाली होती है। मोटे अनाजों का भंडारण आसान है और ये लंबे समय तक संग्रह योग्य बने रहते हैं।
देश में कुछ दशक पहले तक सभी लोगों की थाली का एक प्रमुख भाग मोटे अनाज हुआ करते थे। फिर हरित क्रांति और गेहूं-चावल पर हुए व्यापक शोध के बाद गेहूं-चावल का हर तरफ अधिकतम उपयोग होने लगा। मोटे अनाजों पर ध्यान कम हो गया। हालांकि तकनीक और अन्य सुविधाओं के दम पर पांच दशक पहले की तुलना में प्रति हेक्टेयर मोटे अनाजों की उत्पादकता बढ़ गई है, लेकिन इनका रकबा तेजी से घटा और इनकी पैदावार कम हो गई है। इनका उपभोग लगातार कम होता गया है। स्थिति यह है कि कभी हमारे खाद्यान्न उत्पादन में करीब चालीस प्रतिशत हिस्सेदारी रखने वाले मोटे अनाज की हिस्सेदारी इस समय दस प्रतिशत से भी कम हो गई है।
ऐसे में देश में करोड़ों लोगों के लिए पोषण युक्त आहार की व्यवस्था सुनिश्चित करना जरूरी है। गौरतलब है कि राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा कानून के तहत देश की लगभग दो तिहाई आबादी सबसिडी वाले खाद्यान्न प्राप्त करने की हकदार है। सभी पात्र परिवारों को तीन रुपए किलो चावल, दो रुपए किलो गेहूं और एक रुपए किलो की दर से मोटे अनाज का वितरण आवश्यक है। इसके अलावा प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के लिए भी अनाज का एक बड़ा भाग उपभोग में आ रहा है। चूंकि गेहूं और चावल की तुलना में मोटे अनाज में पोषक तत्त्व अधिक हैं और ये किसान हितैषी फसलें हैं, इसलिए इनका अधिक उत्पादन और वितरण किया जाना कुपोषण को दूर करने में काफी मददगार साबित होगा।
भारत के अधिकांश राज्य एक या अधिक मिलेट (मोटा अनाज) उगाते हैं। खासकर अप्रैल 2018 से सरकार देश में मोटे अनाज का उत्पादन बढ़ाने के लिए ‘मिशन मोड’ में काम कर रही है। मोटे अनाज के न्यूनतम समर्थन मूल्य में राहतकारी वृद्धि की गई है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा मिशन के तहत मोटे अनाज घटक चौदह राज्यों के दो सौ बारह जिलों में क्रियान्वित किया जा रहा। इन्हें उगाने के लिए किसानों को अनेक सहायता दी जाती है। देश में मिलेट मूल्यवर्धित शृंखला में पांच सौ से अधिक स्टार्टअप काम कर रहे हैं। मोटे अनाज के वैश्विक उत्पादन में भारत का हिस्सा करीब चालीस फीसद है। इनके उत्पादन और निर्यात में पूरी दुनिया में भारत पहले स्थान पर है। देश में मोटा अनाज उत्पादन के शीर्ष राज्य राजस्थान, महाराष्ट्र, कर्नाटक, गुजरात और मध्यप्रदेश में इनके उत्पादन के विशेष प्रयास किए जा रहे हैं।
निश्चित रूप से अंतरराष्ट्रीय मोटा अनाज वर्ष 2023 के तहत सरकार की यह रणनीति होनी चाहिए कि जिस तरह पिछले चार-पांच दशक में अन्य नकदी फसलों को बढ़ावा देने के कदम उठाए गए हैं, वैसे ही कदम मोटे अनाजों के संदर्भ में भी उठाए जाएं। जब किसानों को भरोसा होगा कि उन्हें मोटे अनाजों की उपज का सही दाम मिल सकता है, तो निस्संदेह वे मोटे अनाज की खेती के लिए भी प्रोत्साहित होंगे हैं।
अब सरकारी खरीद में मोटे अनाज की हिस्सेदारी और न्यूनतम समर्थन मूल्य भी बढ़ाना होगा। देश के कृषि अनुसंधान संस्थानों द्वारा मोटे अनाजों पर लगातार शोध बढ़ाना और अधिक उपज के लिए बायो फर्टिलाइज तकनीक का अधिक उपयोग करना होगा। मोटे अनाजों को लोकप्रिय बनाने के लिए इनसे नूडल्स, कुरकुरे आदि बनाने की दिशा में भी अधिक काम करना होगा, जिससे मोटे अनाजों के बाजार का विस्तार होगा। किसान इनकी खेती के लिए अधिक प्रोत्साहित होंगे। खासकर देश और दुनिया में कुपोषण की चुनौती को दूर करने के साथ-साथ खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने और खाद्यान्न की कीमतों के नियंत्रण में मोटे अनाज की महत्त्वपूर्ण भूमिका बनानी होगी। सार्वजनिक वितरण प्रणाली के माध्यम से आम आदमी तक गेहूं और चावल की तुलना में मोटे अनाज की अधिक आपूर्ति सुनिश्चित करने के लिए मोटे अनाजों की सरकारी खरीद बढ़ानी और इनके निर्यात को बढ़ाने की नई रणनीति बनानी होगी।
निस्संदेह बढ़ते वैश्विक कुपोषण और भूख संकट के दौर में भारत में भूख और कुपोषण की चुनौती को कम करने में मोटे अनाजों की अधिक आपूर्ति के साथ कई और बातों को भी ध्यान में रखा जाना होगा। देश में गरीबों के सशक्तिकरण की कल्याणकारी योजनाओं के अधिक विस्तार, कृषि क्षेत्र में सुधार तथा खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने के नए कदम जरूरी होंगे। अब केंद्र सरकार द्वारा गरीबों, किसानों और कमजोर वर्ग के करोड़ों लोगों के बैंक खातों में डीबीटी के माध्यम से अधिक नकद धन हस्तांतरित किया जाना लाभप्रद होगा। सरकारी योजनाओं के और अधिक लाभ डीबीटी से लाभार्थियों तक पहुंचने से गरीबों का सशक्तिकरण होगा और कुपोषण की चुनौती कम होगी। सरकार द्वारा सामुदायिक रसोई की व्यवस्था को मजबूत बना कर उन जरूरतमंदों के लिए भोजन की कारगर व्यवस्था सुनिश्चित करनी होगी, जिन्हें सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) का लाभ नहीं मिल पा रहा है। साथ ही देश में बहुआयामी गरीबी, भूख और कुपोषण खत्म करने के लिए पोषण अभियान-2 को पूरी तरह कारगर और सफल बनाना होगा।
उम्मीद है कि भारत जी-20 की अध्यक्षता करते हुए अंतरराष्ट्रीय मोटा अनाज वर्ष 2023 के उद्देश्यों और लक्ष्यों के मद्देनजर देश और दुनिया में मोटे अनाजों के लिए जागरूकता पैदा करने में सफल होगा और इससे मोटे अनाज का वैश्विक उत्पादन और वैश्विक उपभोग बढ़ेगा। इससे एक बार फिर मोटे अनाज को देश और दुनिया के अधिकांश लोगों की थाली में अधिक जगह मिलने लगेगी तथा देश और दुनिया के करोड़ों लोगों को भूख और कुपोषण की चुनौतियों से बाहर लाने में सफलता मिल सकेगी।
Date:10-12-22
कॉलेजियम पर बढ़ी रारसंपादकीय
न्यायाधीशों की नियुक्ति का मामला न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच खींचतान का विषय बना रहता है। न्यायाधीशों की नियुक्ति की सर्वोत्तम प्रक्रिया क्या हो इस पर एकराय होना आसान नहीं लगता। सरकार इस बारे में न्यायिक नियुक्ति आयोग के जरिए आगे बढ़ना चाहती है क्योंकि वह न्यायाधीशों द्वारा ही न्यायाधीशों की नियुक्ति की प्रणाली को उचित नहीं मानती । इस मामले में अपने रुख को और दृढ़ करते हुए उच्चतम न्यायालय का कहना न्यायाधीशों की नियुक्ति की कॉलेजियम प्रणाली देश का कानून है और इस पर किसी प्रकार की टीका टिप्पणी भी उचित नहीं है। शीर्ष अदालत से घोषित कोई भी कानून सभी हितधारकों के लिए बाध्यकारी है और कॉलेजियम प्रणाली का भी पूरा पालन किया जाना चाहिए। कॉलेजियम द्वारा भेजे गये नामों को मंजूर करने में केंद्र द्वारा की जा रही कथित देरी से जुड़े मामले की इस दिनों सुनवाई चल रही है जिस दौरान उच्चतम न्यायालय की यह सख्त टिप्पणी सामने आई है। सुनवाई कर रही पीठ ने कहा कि कॉलेजियम पर सरकार के लोगों की ओर से की जाने वाली टिप्पणियों को उचित नहीं माना जा सकता । अटॉर्नी जनरल सरकार से टिप्पणी करने वालों को रोकने को कहें। केंद्रीय विधि मंत्री किरेन रिजिजू ने हाल ही में कहा था कि कॉलेजियम प्रणाली संविधान प्रति सर्वथा अपरिचित शब्दावली है। पीठ ने कहा कि वह अटॉर्नी जनरल से अपेक्षा रखती है कि सरकार को सही राय देंगे, कॉलेजियम ने जिन 19 नामों की सिफारिश की थी, उन्हें सरकार ने हाल में वापस भेज दिया था। जब तक कॉलेजियम प्रणाली कायम है, हमें इसे लागू करना होगा। आप दूसरा कानून लाना चाहते हैं, कोई आपको दूसरा कानून लाने से नहीं रोक रहा । पीठ का कहना था हम केवल इतना कह सकते हैं कि संविधान की योजना अदालत से कानून की स्थिति पर अंतिम मध्यस्थ होने के अपेक्षा रखती है। कई नाम महीनों और सालों से लंबित हैं इनमें कुछ ऐसे हैं जिन्हें कॉलेजियम ने दोहराया है। शीर्ष अदालत का कॉलेजियम जब नामों को मंजूरी देता है तो वरिष्ठता समेत कई चीजों को दिमाग में रखता है। लगता है सरकार इस तथ्य से नाखुश है कि राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग (एनजेएसी) अधिनियम को मंजूरी नहीं मिली, लेकिन यह देश के कानून के शासन को नहीं मानने की वजह नहीं हो सकती है।
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10 December 2022
प्रश्न–388 – उच्चतम न्यायालय ने हाल ही में देश में निष्पक्ष, तटस्थ एवं साहसी चुनाव आयुक्तों की आवश्यकता की बात कही है। वर्तमान स्थितियों को ध्यान में रखते हुए बतायें कि आपकी दृष्टि में इसके लिए क्या-क्या उपाय किये जाने चाहिए। (200 शब्द)
Question–388 – The Supreme Court has recently spoken about the need for fair, neutral and courageous Election Commissioners in the country. Keeping in mind the present conditions, suggest some measures that should be taken in this regard. (200 words)
नोट : इसका उत्तर आपको हमें नहीं भेजना है, यह आपके स्वयं के अभ्यास के लिए है।
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Date:09-12-22
जिला अदालतों की स्थिति सुधारने की जरूरत हैसंपादकीय
हाल के दिनों में मुख्य न्यायाधीश (सीजेआई) ने तीन खास मुद्दों पर चिंता व्यक्त की- जिला जजों को अधीनस्थ जज मानना, इन कोर्ट्स द्वारा भय के कारण जमानत न देना और जिला न्यायालयों में सुविधाओं का अभाव। उन्होंने कहा कि कई जिला अदालतों में महिला न्यायाधीश तक के लिए वॉशरूम न होने से वे सुबह 8.30 बजे से शाम 6 बजे तक बगैर इस सुविधा के काम करती हैं। सीजेआई का मानना था कि टॉयलेट जैसी सुविधा का अभाव फंड्स की कमी के कारण नहीं बल्कि उपेक्षापूर्ण दृष्टिकोण के कारण है। अगर गांव-गलियों में सरकार टॉयलेट बनवा रही है तो कोर्ट्स में टॉयलेट न होना प्रशासनिक उदासीनता ही कही जा सकती है। लेकिन शायद सीजेआई भूल रहे हैं कि निचली कोर्ट्स में जमानत एक व्यापार के रूप में वटवृक्ष बन चुका है। वकीलों की एक बड़ी संख्या केस लड़ने की जगह जमानत में लगी रहती है और उनके और निचली कोर्ट्स के बड़े भाग का गठजोड़ न्याय प्रशासन को दीमक की तरह खा रहा है। लिहाजा न्यायप्रिय जज भी जमानत देने और आलोचना से बचना चाहते हैं। अगर इस स्थिति को सुधारना है तो निच कोर्ट्स में भ्रष्टाचार- जिससे सबसे ज्यादा प्रभावित गरीब और अनपढ़ वर्ग होता है- खत्म करना होगा और इसके लिए हाई कोर्ट्स के प्रशासनिक जजों को अपने-अपने क्षेत्र के जिला कोर्ट्स पर सख्ती करनी होगी।
Date:09-12-22
वैकल्पिक राजनीति की संभावनासंपादकीय
भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) ने गुजरात में 27 वर्षों से लगातार सत्ता में होने के बावजूद गुरुवार को घोषित हुए विधानसभा चुनाव के नतीजों में जबरदस्त जीत हासिल की। पार्टी ने विधानसभा में अपनी सीट की तादाद 2017 के 99 से बढ़ाकर इस वर्ष 156 तक पहुंचा दी। जाहिर है मौजूदा राजनीतिक चर्चाओं में सबसे अधिक तवज्जो इसी बात को दी जाएगी। बहरहाल, यदि हम व्यापक तस्वीर पर नजर डालें तो एक अलग परिदृश्य उभरता दिखाई देता है। वह यह कि हाल में जो तीन बड़े चुनाव हुए उनमें से दो में सत्ताधारी दल यानी भाजपा को हार का सामना करना पड़ा है। आम आदमी पार्टी (आप) ने दिल्ली नगर निगम चुनावों में भाजपा का 15 वर्षों का दबदबा तोड़ दिया। ऐसा तब हुआ जब भाजपा के कई बड़े नेताओं ने इन चुनावों में प्रचार किया। दिल्ली में आप को 250 वार्डों में से 134 में जीत मिली। भाजपा को 104 वार्ड में जीत हासिल हुई। हिमाचल प्रदेश में कांग्रेस ने 40 सीट पर जीत हासिल की। यह एक ऐसा राज्य है जहां सत्ताधारी दल की प्राय: वापसी नहीं होती है। सत्ताधारी दल के कमजोर शासन और राज्य इकाई में आपसी फूट ने भी उसकी संभावनाओं को कमजोर किया है। लेकिन यह बात ध्यान देने लायक है कि भाजपा और कांग्रेस दोनों की मत हिस्सेदारी लगभग बराबर है। यकीनन कांग्रेस ने हिमाचल में जूझने का माद्दा दिखाया, हालांकि उसकी जीत का आंशिक श्रेय इस बात को भी दिया जा सकता है कि पार्टी ने राज्य में पुरानी पेंशन योजना वापस लाने का वादा किया। हिमाचल में यह एक अहम मसला है।
कुल मिलाकर तीनों प्रमुख दलों भाजपा, कांग्रेस और आप के पास खुश होने की वजह है। भाजपा ने गुजरात का अपना गढ़ बरकरार रखा है। हिमाचल के नतीजे बताते हैं कि गुजरात में खराब प्रदर्शन के बावजूद कांग्रेस को चुका हुआ मानना ठीक नहीं। हालांकि गुजरात में भाजपा की जीत पर कोई संदेह नहीं था, खासकर इसलिए भी कि प्रधानमंत्री स्वयं चुनाव प्रचार अभियान में थे लेकिन जीत के इतने बड़े अंतर का अनुमान शायद ही किसी ने लगाया हो। यह संभव है कि प्रदेश में कांग्रेस और आप की मौजूदगी भाजपा के लिए लाभदायक साबित हुई हो क्योंकि विपक्ष के मत भाजपा और कांग्रेस के बीच बंट गए। भाजपा भी दिल्ली नगर निगम के चुनाव नतीजों से पूरी तरह निराश नहीं हुई होगी क्योंकि उसने अपना मत प्रतिशत बरकरार रखा है और वह अब भी मजबूत बनी हुई है।
परंतु इस सप्ताह की बड़ी खबर है आप का राष्ट्रीय मंच पर पदार्पण। गुजरात चुनावों में अपने अच्छे प्रदर्शन की बदौलत आप अब राष्ट्रीय पार्टी बन गई है। राष्ट्रीय पार्टी बनने के लिए किसी दल को कुछ अन्य शर्तों के अलावा कम से कम चार राज्यों में अच्छी उपस्थिति दर्शानी होती है तथा वहां के विधानसभा चुनाव में कम से कम दो सीट और छह फीसदी मत हासिल करने होते हैं। पार्टी दिल्ली और पंजाब में सत्ता में है और गोवा विधानसभा में उसे दो सीट पर जीत मिली थी। गुजरात विधानसभा में पार्टी को पांच सीट पर जीत मिली है और उसे 12.9 फीसदी से अधिक मत हासिल हुए हैं। आप ने स्थापना के महज 10 वर्ष के भीतर यह मुकाम हासिल किया है। 2024 के लोकसभा चुनाव शायद आप के अहम विपक्षी दल बनने की दृष्टि से कुछ ज्यादा करीब हैं लेकिन उसका अब तक का प्रदर्शन बताता है कि देश में वैकल्पिक राजनीति की जगह बची हुई है।
Date:09-12-22
नियुक्ति का न्यायसंपादकीय
ऊपरी अदालतों में न्यायाधीशों की नियुक्ति को लेकर सर्वोच्च न्यायालय और सरकार के बीच तनातनी खत्म होने का नाम नहीं ले रही। कुछ दिनों पहले केंद्रीय कानून मंत्री ने न्यायाधीशों की नियुक्ति करने वाली कालेजियम प्रणाली को प्रश्नांकित करते हुए कहा था कि संविधान में कहीं भी यह शब्द नहीं मिलता। अब उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने इस मुद्दे को संसदीय लोकतंत्र के लिए चिंताजनक स्थिति माना है। उनका कहना है कि संसद द्वारा पारित राष्ट्रीय न्यायिक आयोग कानून को सर्वोच्च न्यायालय द्वारा खारिज कर दिया जाना संप्रभुता के खिलाफ है। अब उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने यह बात राज्यसभा में कही। जाहिर है, सरकार ने कालेजियम प्रणाली को समाप्त करने को लेकर एक बार फिर कमर कस ली है। हालांकि पिछले कार्यकाल से ही वर्तमान केंद्र सरकार इस प्रणाली के खिलाफ रही है। उसका तर्क है कि कालेजियम प्रणाली के तहत ऊपरी अदालतों में न्यायाधीशों की नियुक्ति में पक्षपात होता और भाई-भतीजावाद चलता है। सरकार चाहती है कि जिस तरह तमाम विभागों और संस्थानों में सर्वोच्च पदों पर नियुक्तियां वह खुद करती है, उसी तरह न्यायाधीशों की नियुक्ति भी उसी की मर्जी से हो। मगर सर्वोच्च न्यायालय इसे राजनीतिक दखलअंदाजी के रूप में देखता है।
वर्षों तक ऊपरी अदालतों में न्यायाधीशों की नियुक्ति केंद्र के फैसले से होती रही, मगर देखा गया कि उसमें सरकार अपने करीबी लोगों को तरजीह देती है, इसलिए कालेजियम प्रणाली लागू की गई। तब तर्क दिया गया कि चूंकि न्यायाधीश निचली अदालतों के न्यायाधीशों और वकालत कर रहे लोगों की प्रतिभा और क्षमता को बहुत नजदीक से जानते हैं, इसलिए उनमें से जज के रूप में चुनाव करने में उन्हें अधिक आसानी होगी। उसमें भी अंतिम निर्णय सरकार को ही लेना होता है, मगर वह एक तरह से चुने गए नामों पर अपनी स्वीकृति देने का होता है। हालांकि कुछ वर्षों बाद कालेजियम प्रणाली पर भी सवाल उठने शुरू हो गए कि वह अपने करीबी लोगों को ही उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय में भेजती है। इस आधार पर सरकार ने कालेजियम प्रणाली को समाप्त कर राष्ट्रीय न्यायिक आयोग गठित करने संबंधी विधेयक संसद में पेश किया, जिसे सभी दलों ने आम सहमति से पारित कर दिया था। मगर सर्वोच्च न्यायालय ने उसे संविधान की मंशा के खिलाफ मानते हुए रद्द कर दिया। तभी से यह तनातनी बनी हुई है और रह-रह कर सार्वजनिक रूप से उभर आती है।
निस्संदेह ऊपरी अदालतों में न्यायाधीशों की नियुक्ति का मामला न्याय-व्यवस्था की साख से जुड़ा है। उच्च और उच्चतम न्यायालय के प्रति देश के लोग इंसाफ के लिए बड़े भरोसे के साथ देखते हैं। हालांकि अधिकांश मामलों में ऊपरी अदालतों ने अपनी साख कायम रखी है और संविधान के प्रति उसकी निष्ठा प्रकट होती है। मगर कुछेक मामलों में अगर उदाहरण दिए जाते हैं कि जज का बेटा ही सर्वोच्च न्यायालय का जज बनता है, तो इस तरह के आरोप से मुक्त होने की जवाबदेही भी खुद सर्वोच्च न्यायालय पर आ जाती है। मगर इस बात से भी इनकार नहीं किया जा सकता कि न्यायालयों में राजनीतिक दखलअंदाजी से नियुक्तियां होंगी, तो उनके निष्पक्ष होने को लेकर सवाल उठते रहेंगे। किसी भी न्याय-व्यवस्था को इस तरह संदेह और सवालों के घेरे में डाले रखना उचित नहीं माना जा सकता। मगर जिस तरह सरकार और न्यायालय के बीच तनातनी चल रही है, वह भी ठीक नहीं। इसमें जल्दी ही बीच का कोई सर्वमान्य रास्ता निकलना चाहिए।
Date:09-12-22
एआई की है अहम भूमिकागिरीश चंद्र मुर्मू, ( लेखक भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक हैं )
जी 20 विश्व की प्रमुख विकसित और उभरती अर्थव्यवस्थाओं को जोड़ने वाला बहुपक्षीय रणनीतिक मंच है। भविष्य में विश्व के आर्थिक विकास और समृद्धि को सुरक्षित रखने में जी20 की महत्वपूर्ण भूमिका है। एक साथ मिलकर जी 20 के सदस्य दुनिया की जीडीपी का 80 प्रतिशत से अधिक‚ अंतरराष्ट्रीय व्यापार का 75 प्रतिशत और दुनिया की आबादी के 67 प्रतिशत का प्रतिनिधित्व करते हैं।
जी20 सदस्य देशों के सर्वोच्च लेखा परीक्षण संस्थानों का एक समूह एसएआई20 (सुप्रीम ऑडिट इंस्टीट्यूशन) कार्य समूह शासन से जुड़ी संस्थाओं को मौजूदा समय में सामने आ रही समस्याओं का बेहतर‚ तेज और विश्वसनीय तरीके से हल निकालने में समर्थ बनाने के साथ ही नागरिकों को उच्च कोटि का जीवन प्रदान करने के लिए सरकारों को सक्षम बनाने की दिशा में काम करता है। 1 दिसम्बर‚ 2022 को भारत द्वारा जी20 की अध्यक्षता ग्रहण करने के साथ भारत का सीएजी यानी एसएआई इंडिया एसएआई 20 की अध्यक्षता करेगा। जी20 में भारत की अध्यक्षता के मार्गदर्शक सिद्धांत यानी वसुधैव कुटुम्बकम‚ जिसमें पूरे विश्व को ‘एक पृथ्वी‚ एक परिवार‚ एक भविष्य’ के रूप में देखा जाता है‚ के तहत भारत के नियंत्रक एवं महा लेखापरीक्षक प्राथमिकता वाले दो क्षेत्रों–ब्लू इकोनॉमी और जिम्मेदार आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस–पर जी20 एसएआई के सहयोग का प्रस्ताव रख रहे हैं।
ब्लू इकोनॉमी ऐसी आर्थिक प्रणाली है‚ जिसमें समुद्री और ताजे पानी के पर्यावरण के संरक्षण‚ उनके सतत उपयोग को बढ़ावा देने‚ खाद्य और ऊर्जा का उत्पादन करने‚ आजीविका में मदद करने और आर्थिक उन्नति में सहायक के रूप में कार्य करने के उद्देश्य से नीति और परिचालन–संबंधी आयामों की विस्तृत श्रेणी शामिल हैं। कॉप26 में भारत द्वारा प्रस्तुत लाइफ यानी लाइफस्टाइल ऑफ इन्वायरमेंट की अवधारणा को ब्लू इकोनॉमी आगे ले जाती है। प्राथमिकता वाले क्षेत्र के रूप में‚ यह यूएन 2030 एजेंडा‚ विशेष रूप से (लेकिन अनन्य रूप में नहीं)‚ लक्ष्य 14 अर्थात जलीय जीवन की उपलब्धिओं पर एसएआई का ध्यान केंद्रित करने में मदद करता है। इसका उद्देश्य लेखा परीक्षण नीतियों और कार्यक्रमों पर इस तरह से सहयोग करना है‚ जो ब्लू इकोनॉमी पर प्रभावशाली तरीके और प्रगतिशाली रूप में असर डाले और समुदायों‚ क्षेत्रों के साथ–साथ राष्ट्रों तक फैले मजबूत अंतर्संबंधों में और वृद्धि करे। इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए कि मत्स्य पालन व्यवसाय से जुड़ा अधिकांश वर्ग आर्थिक रूप से कमजोर है‚ एसएआई को समाज में अधिक समावेशिता और लोगों के प्रति उनकी तत्काल प्रासंगिकता के हित में अधिक प्रभावी ढंग से अपने निरीक्षण का प्रयोग करने के लिए मजबूर करता है। भारत के नियंत्रक एवं महा लेखापरीक्षक सर्वसम्मत और व्यापक रूप से लागू मानकों या दिशा–निर्देशों को तैयार करने का प्रयास करेंगे जो सभी एसएआई को उनके संबंधित अधिदेशों के भीतर नीतियों और कार्यक्रमों के विकास और प्रभावी कार्यान्वयन का मूल्यांकन और मार्गदर्शन करने में सक्षम बनाएंगे जो निरंतरता और आर्थिक प्रगति के साथ संतुलन बनाता है।
दूसरी प्राथमिकता वाला क्षेत्र यानी जिम्मेदार आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की नागरिकों के जीवन पर असर डालने वाली उस भूमिका के अनुसार है‚ जिसमें छोटे कदम के बड़े असर देखने को मिल रहे हैं। ब्लू इकोनॉमी की तरह‚ उत्तरदायी एआई से संबंधित समस्याएं सामयिक‚ बहुआयामी और अन्योन्याश्रित हैं। चिंताएं वैधता‚ नैतिकता के साथ–साथ मानव बनाम गैर–मानवीय एजेंसी को लेकर दार्शनिक विकल्पों के मुद्दों पर फैली हुई हैं। सरकारों‚ व्यवसायों और नागरिक समाज संगठनों में जिम्मेदार आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के उपयोग पर जागरूकता पैदा करने को लेकर व्यापक मान्यता और मजबूत सिफारिश की गई है। जून‚ 2019 में व्यापार और डिजिटल अर्थव्यवस्था पर जी20 मंत्रीस्तरीय वक्तव्य के दौरान और नवम्बर‚ 2021 में यूनेस्को द्वारा आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की नैतिकता पर सिफारिशों के अनुसार यह स्पष्ट करने की दिशा में शुरुआत की गई है कि सभी हितधारकों के बीच विश्वास पर ही डिजिटल समाज का निर्माण किया जाना चाहिए जबकि एआई के एप्लीकेशन हमारे जीवन के अधिक से अधिक क्षेत्रों में शामिल हो रहे हैं‚ यह एआई के जिम्मेदारी भरे उपयोग को सुनिश्चित करने में सरकारों के साथ–साथ एसएआई‚ दोनों की समझ‚ विनियमन और लेखा परीक्षा से जुड़ी जटिल चुनौतियों को सामने रख रहा है।
एसएआई के लिए महत्वपूर्ण है कि वे एआई सिस्टम के इस्तेमाल से जुड़े मूल प्रश्नों को हल करने के लिए कारगर क्षमताओं को विकसित करें ताकि प्रभावी निरीक्षण के प्रतिनिधि के रूप में खुद को अनिवार्य रूप से स्थापित किया जा सके। भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक का प्रयास उठाए जाने वाले कदमों की प्रकृति और उनकी सीमा पर व्यापक सहमति बनाना होगा जो सभी एसएआएई अपने संबंधित शासनादेशों के भीतर रहते हुए उत्तरदायी एआई के मूल्यों को बढ़ावा देने के लिए उठा सकते हैं।
हम संयुक्त रूप से लेखा परीक्षण में मदद के लिए रचनाएं विकसित करने का प्रयास करेंगे और उन तरीकों का भी पता लगाएंगे जिनमें जी20 एसएआई आपसी क्षमता निर्माण और अनुभवों को साझा कर एक दूसरे की मदद कर सकते हैं। एक सामान्य सिद्धांत‚ जो हमारी दिशा का मार्गदर्शन करेगा‚ एआई सिस्टम के विकास और उपयोग को इस तरह से विनियमित करने की आवश्यकता होगा जो इसके जीवन को बदलने वाले फायदों को पूरी तरह से हासिल करने में सक्षम बनाता है जबकि उसी समय में जान बूझकर होने वाले दुरु पयोग या यहां तक गलतियों पर नजर रखता है। अत्यधिक प्रासंगिकता वाले प्राथमिकता के क्षेत्रों को आगे बढ़ाते हुए एसएआई20 के अध्यक्ष के रूप में भारत के नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक एक प्रभावशाली और बेजोड़ जी20 अध्यक्षता के लिए जी20 एसएआई के मजबूत‚ सफल और व्यापक रूप से भागीदारी वाले सहयोग का इरादा रखते हैं।
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कोप 26 या कांफ्रेंस ऑफ पार्टीज या यूनाइटेड नेशन्स क्लाइमेट चेंज कांफ्रेंस में ईधन के रूप में कोयले के इस्तेमाल को कम करने को लेकर संकल्प लिए गए थे। परंतु यूक्रेन युद्ध से परंपरागत ऊर्जा स्रोतों की आपूर्ति में आई बड़ी रुकावट ने कोयले के उपयोग को बढ़ा दिया है। स्थितियों के मद्देनजर भारत ने कोप-27 में प्रस्ताव रखा है कि केवल कोयले में कटौती करने की जगह, सभी जीवाश्म ईंधनों पर चरणबद्ध तरीके से कटौती की जाए। भारत के इस प्रस्ताव के दो कारण हैं –
1) प्राकृतिक गैस और तेल भी ग्रीन हाउस गैस उत्सर्जन के लिए उतने ही दोषी हैं।
2) भारत को कोयले पर अत्यधिक निर्भरता के लिए अक्सर लक्ष्य किया जाता है। यह अन्यायपूर्ण है।
भारत के प्रस्ताव कितने खरे –
इस वर्ष वैश्विक कार्बन उत्सर्जन के रिकार्ड स्तर पर पहुंचने की आशंका है। इन स्थितियों में भले ही कोयले पर हमारी निर्भरता खत्म न हो, लेकिन 2040 तक इसे क्रमशः कम से कमतर स्थिति पर लाया जा सकता है। इससे बाहर निकलने में स्वच्छ प्रौद्योगिकियों के इस्तेमाल पर भारत की नजर होनी चाहिए।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 14 नवंबर, 2022
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Date:08-12-22
BIMSTEC as key to a new South Asian regionalReviving SAARC in the current scenario is too idealistic. so the next best scenario is to look at other regional instruments such as BIMSTECPrabhash Ranjan, [ Professor and Vice Dean, Jindal Global Law School, O.P. Jindal Global University. The views expressed are personal ]
December 8 is commemorated as SAARC Charter Day. It was on this day, 37 years ago, that the South Asian Association for Regional Cooperation (SAARC), an intergovernmental organisation, was established by Bangladesh, Bhutan, India, the Maldives, Nepal, Pakistan and Sri Lanka to promote economic growth in South Asia. Afghanistan acceded to SAARC later. However, SAARC has failed abjectly in accomplishing most of its objectives. South Asia continues to be an extremely poor and least integrated region in the world. The intraregional trade and investment in South Asia are very low when compared to other regions such as the Association of South East Asian Nations (ASEAN) and Sub-Saharan Africa.
Pakistan has adopted an obstructionist attitude within SAARC by repeatedly blocking several vital initiatives such as the motor vehicles agreement, aimed at bolstering regional connectivity. Deepening hostility between India and Pakistan has made matters worse. Since 2014, no SAARC summit has taken place leaving the organisation rudderless, and practically dead.
Significance of regionalism
But why bother about SAARC? Because South Asia, that is India’s neighbourhood, is important for India’s national interests. This is best captured in the current government’s ‘neighbourhood first’ policy. SAARC is the only intergovernmental organisation with a pan-South Asia reach. India can judiciously employ it to serve its interests in the entire region. But India, in the last few years, has been looking at SAARC through the lens of Pakistan. Consequently, the deterioration in India-Pakistan relations has coincided with the incapacitation of SAARC, much to the delight of Pakistan. A weakened SAARC also means heightened instability in other promising regional institutions such as the South Asian University (SAU), which is critical to buttressing India’s soft power in the region.
A new narrative is that in South Asia, India can successfully use the instrument of bilateralism over regionalism to pursue its interests. While bilateralism is undoubtedly important, it can at best complement, not substitute, regional or multilateral efforts. Regionalism has brought immense success in other parts such as East Asia and Africa. Looking at ASEAN’s spectacular success in regional integration, international lawyers Julien Chaisse and Pasha L. Hsieh have developed the concept of a new regional economic order — a process through which developing countries search for a trade-development model, based on incrementalism and flexibility; this is different from the neoliberal model laid down by the Washington Consensus. Regionalism can deliver prosperity in the South Asian region too, especially because multilateralism is weakening.
The BIMSTEC promise
Since South Asia cannot repudiate regionalism, reviving SAARC by infusing political energy into it and updating its dated Charter will be an ideal way forward. However, in the current scenario, this is too idealistic. So, the next best scenario is to look at other regional instruments such as the Bay of Bengal Initiative for Multi-Sectoral, Technical and Economic Cooperation (BIMSTEC), an intergovernmental organisation established in 1997. BIMSTEC comprises five South Asian nations (Bangladesh, Bhutan, Nepal, India and Sri Lanka) and two ASEAN countries (Myanmar and Thailand). Importantly, Pakistan is not a BIMSTEC member. In recent years, India seems to have moved its diplomatic energy away from SAARC to BIMSTEC. This resulted in BIMSTEC, after 25 years, finally adopting its Charter earlier this year. The BIMSTEC Charter is significantly better than the SAARC Charter. For instance, unlike the SAARC Charter, Article 6 of the BIMSTEC Charter talks about the ‘Admission of new members’ to the group. This paves the way for the admission of countries such as the Maldives.
Notwithstanding the improvements, the BIMSTEC Charter, to boost economic integration, does not contain the flexible participation scheme of the kind present in the ASEAN Charter. This flexible scheme, also known as the ‘ASEAN Minus X’ formula, allows two or more ASEAN members to initiate negotiations for economic commitments. Thus, no country enjoys veto power to thwart economic integration between willing countries. Given the experience of SAARC, where Pakistan routinely vetoes several regional integration initiatives, it is surprising that BIMSTEC does not contain such a flexible participation scheme. A flexible ‘BIMSTEC Minus X’ formula might have allowed India and Bangladesh or India and Thailand to conduct their ongoing bilateral free trade agreement (FTA) negotiations under the broader BIMSTEC umbrella. This would have eventually strengthened BIMSTEC by enabling the gradual and incremental expansion of these binding commitments to other members. India should press for this amendment in the BIMSTEC Charter.
Some steps to take
BIMSTEC should not end up as another SAARC. For this, its member countries should raise the stakes. A high-quality FTA offering deep economic integration — something that Prime Minister Narendra Modi also advocated at the last BIMSTEC ministerial meeting — would be an ideal step. Likewise, India should explore legal ways to move successful SAARC institutions such as SAU to BIMSTEC. These steps will give stronger roots to BIMSTEC and enable erecting a new South Asian regional order based on incrementalism and flexibility, ushering in prosperity and peace in the region.
Date:08-12-22
Need for an effective tourist policeWith optimistic predictions of about 13.34 million foreign tourists arriving by 2024, there is a pressing need to upgrade security systems specially to provide a flawless security blanket cover to foreign touristsM.P. Nathanael, [ Inspector General of Police (Retd.), CRPF ]
Crimes against tourists and other foreign nationals appear to be on the rise in India. Consider several recent cases, and the lessons they suggest. A few days ago, a Kerala session court sentenced two men to life imprisonment for the rape and murder of a Latvian tourist in 2018. A 12-year-old Russian girl was raped in a hotel in Goa on April 6 this year. The rapist was an employee of the hotel in which the girl was staying with her mother.
An Iraqi couple staying at a hotel in Gurugram for the treatment of the husband in the Medanta hospital was accosted by two miscreants posing as policemen on October 23. They accused the couple of carrying drugs and on the pretext of checking their wallets, fled with $15,000 the couple had saved for the treatment.
On September 2, a British woman lawyer lodged a complaint of sexual misconduct against a cab driver who was ferrying her from the airport to her hotel in South Delhi. The incident traumatised her to the extent that she left for the U.K. within two days of her arrival.
These are just a few incidents of foreigners falling victim to crimes in our country. Women are more prone to sexual attacks by criminals on the prowl in tourist destinations. For every crime committed against foreigners, there would be several others that go unreported for multifarious reasons, with one of them being the fear instilled in them by the threats of these criminals. In the South Delhi incident, the British national was reluctant to lodge a formal complaint out of fear.
Crimes against foreigners
According to data of the National Crime Records Bureau (NCRB), Delhi recorded 27 cases of crime against foreigners last year, a drastic decline from 62 cases reported in 2020 and 123 in 2019. Rajasthan has shown a sharp reduction in registration of crimes from 16 in 2019 to just 4 in 2020 and two cases last year, which could be attributed to the sharp decline in tourist arrivals due to COVID-19.
As many as 29 foreigners were murdered in the last three years. While 14 foreigners fell victim to rape last year, 16 were raped in 2020 and 12 in 2019. As many as 15 cases of assault to outraging modesty of foreign women were registered last year across the country, apart from 14 complaints of cheating. While 142 cases of theft were lodged by foreigners in 2019, it declined to 52 in 2020 and further dipped to 23 in 2021.
Crime against foreigners not only dents our image globally but could also adversely affect the inflow of foreign tourists, which is a vital source of income for our country. Tourism happens to be one of the biggest foreign exchange earners for India and constant effort needs to be made to raise earnings. While India’s earnings through tourism was $30.06 billion in 2019, it declined to $6.958 billion in 2020 due to COVID-19 and the resultant restrictions in foreign tourists entering the country. A marginal increase of $8.797 billion was recorded last year.
With optimistic predictions of about 13.34 million foreign tourists arriving by 2024, there is a pressing need to upgrade our security systems specially to provide a flawless security blanket cover to foreign tourists. Safety assumes utmost importance to draw tourists in hordes. .
In order to provide a safe environment for tourists, the Ministry of Tourism, in collaboration with the Bureau of Police Research and Development (BPRD), organised a conference in New Delhi on October 19, 2022. It was organised with a view to “sensitise the specific requirements of the tourists for effective implementation of Uniform Tourist Police Scheme at pan-India level”.
Though the concept of ‘tourist police’ has been in vogue for the past few years, it has not been given the kind of attention it deserves. The States that have tourist police are Uttar Pradesh, Madhya Pradesh, Delhi, Goa, Rajasthan and Kerala.
In view of the forthcoming G20 Summit, the Delhi police is gearing up its tourist police wing, which was hitherto in a neglected state and so are other States which will see a huge influx of foreigners.
The tourist police scheme
The BPRD has brought out a booklet on the tourist police scheme detailing the mode of setting up of tourist police stations and control rooms, outposts, uniforms, recruitment, qualifications, training and logistics requirements for tourist police stations. As many as 25 popular tourist spots have been identified in the country where the tourist police necessarily need to be deployed to help foreigners. As an incentive, 30% deputation allowance has been recommended for the police personnel who joins the tourist police on deputation.
While the setting up of tourist police stations is a commendable step to provide safety to foreigners, much needs to be done to instil a sense of security in them even before they leave their countries for India. With theft being the most common crime committed against foreigners, all criminals in and around tourist spots need to be identified and kept under constant surveillance.
Since foreigners come for short durations, the cases cannot be allowed to linger on in courts for long. Fast track courts should be set up immediately to try cases of crime against foreigners and the culprits punished speedily. It may be recalled that a rape convict, Bitihotra Mohanty, was tried for raping a German national in Alwar (Rajasthan) on March 21, 2006 and he was sentenced to seven years imprisonment on April 12, that is, within 22 days.
Such speedy disposal of cases of crime against foreigners can be replicated if we have the will.
Date:08-12-22
जलवायु परिवर्तन का संबंध खानपान की आदतों से भी हैमिन्हाज मर्चेंट, ( लेखक, प्रकाशक और सम्पादक )
मिस्र के शर्म-अल-शेख में हाल में हुई सीओपी-27 समिट के दौरान जलवायु परिवर्तन से सम्बंधित हर विषय पर ब्योरेवार बात की गई, केवल एक ही विषय को छोड़ दिया गया। जबकि वह सबसे जरूरी था- पर्यावरण पर हो रहे दुष्प्रभावों के लिए सबसे ज्यादा जिम्मेदार मांस उद्योग। यूनाइटेड नेशंस फूड एंड एग्रीकल्चर ऑर्गेनाइजेशन या एफएओ के मुताबिक दुनिया के कार्बन उत्सर्जन में अकेले मांस उद्योग का योगदान 15 प्रतिशत है। बीबीसी बताती है कि बीफ से सर्वाधिक ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन होता है। यूनिवर्सिटी ऑफ एबेर्डीन की मार्गरेट गिल का कहना है कि पोल्ट्री के बजाय कैटल से अधिक मीथेन गैस उत्पन्न होती है। लेकिन अगर मांस, पोल्ट्री और मछली उद्योग की समूची खाद्य शृंखला पर नजर डाली जाए तो आप पाएंगे कि पर्यावरण का नाश करने वाले समस्त कार्बन और मीथेन उत्सर्जन में इनका कुल योगदान लगभग 30 प्रतिशत है।
यूरोप और अमेरिका के लोगों को अब यह बात समझ आने लगी है कि पशु-आधारित भोजन पर्यावरण के लिए कितना नुकसानदेह होता है। जबकि इन दोनों ने ऐतिहासिक रूप से सबसे ज्यादा प्रदूषण फैलाया है। ब्रिटेन में आज लगभग 70 लाख लोग शाकाहारी बन गए हैं। यह उसकी कुल आबादी का दस प्रतिशत है। इनमें भी छह लाख लोग तो वीगन हैं, यानी उन्होंने दूध या उससे निर्मित उत्पादों का सेवन भी बंद कर दिया है। अमेरिका में भी पांच प्रतिशत आबादी शाकाहारी हो चुकी है। चीन में यह संख्या चार प्रतिशत से कम है। एफएओ की रिपोर्ट कहती है, भारत में आज भी दुनिया में सबसे कम मांस का सेवन किया जाता है।
प्लांट-बेस्ड भोजन स्वास्थ्य के लिए तो अच्छा होता ही है, मांस-आधारित खाद्य-शृंखला को कम करने से हम कार्बन उत्सर्जन में भी कमी ला सकते हैं। फोर्ब्स में डेविड वेटर की एक रिपोर्ट के मुताबिक, मांस के लिए किसी पशु की हत्या करने में जो अनैतिकता छिपी है, उसके बारे में सदियों से बहस की जा रही है। लेकिन हाल के सालों में इसमें जलवायु-परिवर्तन का परिप्रेक्ष्य भी जुड़ गया है, जिसके बाद मांसाहारी और दुविधा में पड़ गए हैं। जलवायु-वैज्ञानिकों ने चेताया है कि कैटल और डेयरी फार्मिंग पर्यावरण के लिए घोर नुकसानदेह है और इसमें उत्पादन की हर प्रक्रिया में ग्रीनहाउस गैसों का भारी मात्रा में उत्सर्जन होता है।
पिछले महीने कार्बन बीफ नामक यूके की एक क्लाइमेट चेंज वेबसाइट ने एक डाटा जारी किया, जिसमें बताया गया कि मांस और दूध उद्योग हर साल 7.1 गीगाटन ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन करता है। यह मानव-जनित उत्सर्जनों का 14.5 प्रतिशत है। इसमें भी बीफ का योगदान सबसे बढ़कर है। एक किलो बीफ के उत्पादन के लिए 60 किलो ग्रीनहाउस गैसों का उत्सर्जन होता है, यानी भेड़ के मांस से दोगुना अधिक। मवेशियों से उत्पन्न होने वाली मीथेन गैस कार्बन डाय ऑक्साइड की तुलना में 34 गुना अधिक प्रभावी होती है। साथ ही मांस उद्योग के द्वारा जंगलों की कटाई आदि भी की जाती है, ताकि मवेशियों के लिए चारे का बंदोबस्त कर सकें। बीफ उत्पादन से मुनाफा कमाने के लिए चीन जैसे देश में हजारों वर्गकिमी के वर्षावन नष्ट कर दिए गए हैं, जो जैव-विविधता से भरे थे और पारिस्थितिकी तंत्र के लिए केंद्रीय महत्व के थे। एक नई रिपोर्ट के मुताबिक दक्षिण अमेरिका के 40 प्रतिशत वर्षावन भी अब डी-फोरेस्टेशन के खतरे की जद में हैं।
प्लांट-आधारित भोजन की ओर पूरी दुनिया का रुख तो अभी सुदूर भविष्य की बात है, लेकिन जलवायु-परिवर्तन के जो विनाशाकारी परिणाम होने जा रहे हैं, उन्होंने अनेक बहसों को जन्म दे दिया है। दुनिया नेट-जीरो का लक्ष्य अर्जित करने के लिए क्लीन-एनर्जी की ओर बढ़ रही है, लेकिन जीवनशैली सम्बंधित परिवर्तन लाना बहुत मुश्किल है। भोजन की आदतें आसानी से छूटती नहीं। वैसे में यही रास्ता सूझता है कि लोगों को प्लांट-आधारित मांस का विकल्प दिया जाए। यह न केवल एक बड़ी आबादी का भरण-पोषण कर सकता है, बल्कि खाद्य प्रणाली, पर्यावरण और स्वास्थ्य के लिए भी अच्छा है। भारत में पहले ही यह ट्रेंड गति पकड़ने लगा है। क्रिकेटर विराट कोहली और अभिनेत्री अनुष्का शर्मा प्लांट-आधारित मांस को प्रचारित कर चुके हैं। ब्लू ट्राइब, वकाव, अर्बन प्लैटर, इमेजिन मीट्स जैसे अनेक ब्रांड्स भी मीट-सब्स्टिट्यूट पेश कर रहे हैं।
Date:08-12-22
सुप्रीम कोर्ट की लक्ष्मण रेखासंपादकीय
राज्यसभा के सभापति के रूप में अपने पहले संबोधन में जगदीप धनखड़ ने जिस तरह न्यायपालिका और विशेष रूप से सुप्रीम कोर्ट को उसकी लक्ष्मण रेखा की याद दिलाते हुए उसकी ओर से खारिज किए गए राष्ट्रीय न्यायिक आयोग का उल्लेख किया, उससे स्पष्ट है कि यह विषय केवल चर्चा तक सीमित रहने वाला नहीं है। यह रहना भी नहीं चाहिए, क्योंकि सुप्रीम कोर्ट की ओर से सर्वसम्मति से पारित किसी संशोधन विधेयक को खारिज किया जाना कोई साधारण बात नहीं। इसलिए और भी नहीं, क्योंकि इस विधेयक के माध्यम से जिस राष्ट्रीय न्यायिक आयोग का गठन किया गया था, वह उस कोलेजियम व्यवस्था का स्थान लेने वाला था, जिसका संविधान में कोई उल्लेख नहीं। कोलेजियम व्यवस्था के जरिये सुप्रीम कोर्ट ने न्यायाधीशों की नियुक्ति का अधिकार अपने हाथों में इस तरह ले लिया कि इन नियुक्तियों में सरकार की भूमिका पोस्ट मास्टर सरीखी रह गई। यह आश्चर्य की बात है कि नए सभापति जगदीप धनखड़ के पहले संसद में किसी ने यह रेखांकित करना आवश्यक क्यों नहीं समझा कि सुप्रीम कोर्ट ने राष्ट्रीय न्यायिक आयोग का गठन करने वाले संविधान संशोधन विधेयक को खारिज कर संसद की संप्रभुता की अनदेखी करने के साथ जनादेश का असम्मान किया? इस विधेयक को खारिज करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यह संविधान के मूल ढांचे के अनुरूप नहीं। समझना कठिन है कि किसी ने यह प्रश्न क्यों नहीं उठाया कि क्या न्यायाधीशों की ओर से अपने सहयोगियों की नियुक्ति करना संविधान की मूल भावना के अनुकूल है? क्या यह कुछ वैसा ही नहीं, जैसे कार्यपालिका के शीर्ष पदाधिकारी अपने उत्तराधिकारियों का चयन स्वयं करने लगें?
यह ठीक है कि समय-समय पर कोलेजियम व्यवस्था पर सवाल उठते रहे और हाल में कानून मंत्री किरण रिजिजू ने कई अवसरों पर यह कहा कि यह व्यवस्था संविधानसम्मत नहीं, लेकिन क्या इतना ही पर्याप्त है? यह अच्छा हुआ कि जगदीप धनखड़ ने कोलेजियम व्यवस्था को लेकर पहले संसद के बाहर अपनी असहमति प्रकट की और अब संसद में। देखना है कि अब सुप्रीम कोर्ट कोलेजियम व्यवस्था में सुधार के लिए सक्रिय होता है या नहीं? यदि वह सक्रिय नहीं होता तो संसद को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि यथास्थिति बदले और न्यायाधीशों की नियुक्तियों की ऐसी कोई व्यवस्था बने, जिसमें समस्त शक्ति सुप्रीम कोर्ट के पास निहित न रहे। यह इसलिए होना चाहिए, क्योंकि विश्व के किसी भी प्रमुख लोकतांत्रिक देश में न्यायाधीश ही न्यायाधीशों की नियुक्तियां नहीं करते। भारत में वे न केवल ऐसा करते हैं, बल्कि उसकी पूरी प्रक्रिया गोपनीय भी रखते हैं। सुप्रीम कोर्ट के वर्तमान और पूर्व न्यायाधीश कुछ भी दावा करें, यह नहीं कहा जा सकता कि कोलेजियम व्यवस्था के आकार लेने के बाद सुयोग्य न्यायाधीशों का ही चयन किया जा रहा है।
Date:08-12-22
विश्व को दिशा देने का अवसरश्रीराम चौलिया, ( लेखक जिंदल स्कूल आफ इंटरनेशनल अफेयर्स में प्रोफेसर एवं डीन हैं )
भारत ने इसी एक दिसंबर को जी-20 देशों के समूह की अध्यक्षता संभाल ली। इस जिम्मेदारी को लेकर मोदी सरकार कितनी गंभीर है, इसका पता पिछले दिनों इसे लेकर बुलाई गई सर्वदलीय बैठक से भी चलता है और उन तैयारियों से भी जो देश के विभिन्न स्थानों पर हो रही हैं। जी-20 जैसे विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के संस्थान का नेतृत्व करना देश के लिए प्रतिष्ठा का विषय है। यह एक ऐतिहासिक दायित्व भी है। जिन बहुआयामी आर्थिक और भूराजनीतिक संकटों से विश्व गुजर रहा है, उनके समाधान का भार जी-20 के कंधों पर है। मूलतः यह संस्थान बदलती विश्व व्यवस्था के संदर्भ में संकटों से लड़ने के लिए बनाया गया एक अनूठा मंच है। इसकी सफलता पर ही धरती के सभी निवासियों का कल्याण निर्भर है। जी-20 के सदस्य देशों की कुल आबादी विश्व की लगभग दो तिहाई जनसंख्या जितनी है, पर चूंकि विश्व के सभी देश और लोग एक सूत्र और जुड़ी हुई व्यवस्था में बंधे हुए हैं, लिहाजा यह मानकर चलना उचित होगा कि दुनिया की समस्त आठ अरब आबादी का जिम्मा न केवल उनकी सरकारों, बल्कि जी-20 पर भी है। जी-20 संगठन विश्व सरकार तो नहीं है, लेकिन वैश्विक शासन और सामूहिक कार्य का एकमात्र विश्वसनीय माध्यम जरूर है। कई मामलों में संयुक्त राष्ट्र की शिथिलता और असफलता के मद्देनजर जी-20 आज अधिक प्रासंगिक बन गया है। भारत समेत ब्राजील, इंडोनेशिया, दक्षिण अफ्रीका, दक्षिण कोरिया, तुर्किये, सऊदी अरब और अर्जेंटीना जैसी उभरती शक्तियों को जो स्थान और सम्मान संयुक्त राष्ट्र में नहीं मिल पाया है, वह जी-20 ने प्रदान किया है। बड़े विकासशील देशों को वैश्विक शासन में भागीदार बनने का अवसर जी-20 के माध्यम से ही मिला है। सदस्यता और कार्यप्रणाली में लचीलेपन के वजह से ही यह संगठन अंतरराष्ट्रीय आशाओं का केंद्रबिंदु बना हुआ है।
जी-20 की शक्ति इस गुण में है कि यह सदस्य देशों पर बाध्यकारी कानून को लागू करने वाला औपचारिक अंतरसरकारी संगठन नहीं है। जी-20 देशों का साझा बयान संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव से काफी भिन्न होता है। इसके निर्णयों में सख्त अंतरराष्ट्रीय कानून और अनुपालन के निहितार्थ नहीं होते। यही कारण है कि हाल में इंडोनेशिया के बाली में संपन्न जी-20 शिखर बैठक के अंत में तमाम भूराजनीतिक मतभेदों और तनावों के बावजूद कम से कम एक संयुक्त घोषणा पत्र आया, जिस पर सभी सदस्यों ने हस्ताक्षर किए।
सर्वसम्मति और बंधनमुक्त विचार-विमर्श पर आधारित जी-20 संगठन अंतरराष्ट्रीय समुदाय को मार्गदर्शन प्रदान करता है, लेकिन इसके निर्णयों को लागू करने के लिए ठोस तंत्र का अभाव है। एक प्रकार से यही तथ्य जी-20 की ताकत भी है और कमजोरी भी। बाली शिखर बैठक में भारतीय कूटनीति ने जी-20 की इस प्रकृति का दक्षता से उपयोग किया और विरोधी गुटों को एक मंच पर लाने में सफलता अर्जित की। अमेरिकी सरकार ने बाली संयुक्त घोषणा पत्र का श्रेय भारत की “महत्वपूर्ण भूमिका” और विरोधी खेमों में बंटे विश्व नेताओं के साथ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के “अहम रिश्तों” को दिया। मौजूदा समय में वैश्विक कूटनीति डांवाडोल है। ऐसी स्थिति में भारत सभी देशों से बीच एक सेतु का काम तो कर ही रहा है, साथ ही वैश्विक समस्याओं के निवारक का अवतार धारण करके जी-20 की लाज और दुनिया की अपेक्षाओं का संरक्षण भी कर रहा है। जी-20 को दिशा देने का अवसर हासिल करने वाले भारत ने इस संगठन में अब तक जिस सामर्थ्य और सामूहिक भावना का प्रदर्शन किया है, उससे कई गुना अधिक उसे अगले एक वर्ष के दौरान दिखानी होगी।
मोदी युग में भारतीय विदेश नीति की विशेषता यह है कि भारत विश्व से यह नहीं कहता फिरता कि हमें क्या चाहिए? इसके विपरीत भारत यह दिखा रहा है कि विश्व की आवश्यकतों की पूर्ति में वह कितना योगदान देने को तैयार है? भारत ने विश्व में ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ के मंत्र से अपने कर्मों द्वारा जो साख स्थापित की है, वह उसकी जी-20 की अध्यक्षता को बल देगी। भारत के हौसले बुलंद तो हैं, पर इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि अंतरराष्ट्रीय पटल पर आगामी एक साल कठिनाइयों भरा रहेगा और यही समय भारत की जी-20 की मेजबानी का भी वर्ष है। रूस-यूक्रेन युद्ध, एशिया में चीन के आक्रामक तेवर, बढ़ती महंगाई, आर्थिक मंदी और विकासशील देशों में सामाजिक एवं राजनीतिक उथलपुथल जैसे संकटों ने जी-20 को ‘एक हो जाओ या नष्ट हो जाओ’ की दुविधा के सामने लाकर खड़ा कर किया है। ऐसे में जी-20 द्वारा केवल संयुक्त घोषणापत्र जारी करना एकमात्र उपाय नहीं है। प्रधानमंत्री मोदी ने “महत्वाकांक्षी, निर्णायक और कार्रवाई-उन्मुख” जी-20 की अध्यक्षता का वादा किया है। इसे कारगर करने के लिए भारत को जी-20 के अंदर अपने विशेष सामरिक साझीदारों के साथ मिलकर कूटनीतिक मध्यस्थता और समझौते करवाने की पहल करनी होगी।
भारत ‘लोकतंत्र की जननी’ कहलाता है। व्यापक परामर्श तथा आम सहमति बनाना हमारे राजनीतिक चरित्र में निहित है। एक तरफ कश्मीर से लेकर अंडमान द्वीप तक जी-20 के कार्यक्रमों का आयोजन देश को विश्व कल्याण के कर्तव्य पथ पर जागरूक बनाए रखेगा तो दूसरी तरफ जी-20 के सदस्य देशों और गैर-सदस्यों के साथ सैकड़ों बैठकों का संचालन वैश्विक शासन के डगमगाते कदमों को स्थिर करेगा। स्पष्ट है कि भारत के सर्वस्पर्शी और सर्वसमावेशी व्यक्तित्व की एक बड़ी परीक्षा जी-20 की मेजबानी करते समय होगी। मोदी सरकार ने भारत को विश्व की ‘अग्रणी शक्ति’ के रूप में बदलने का संकल्प लिया है। इस स्वप्न को साकार करने की यात्रा में जी-20 अध्यक्षता मील का पत्थर है। अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था में महाशक्ति का दर्जा सिर्फ आर्थिक विकास में तेज वृद्धि या सैन्य बल में इजाफा करने मात्र से नहीं प्राप्त होता। साफ्ट पावर और वैश्विक संस्थानों के माध्यम से प्रभाव फैलाना भी उतना ही जरूरी होता है। इस लिहाज से जी-20 की मेजबानी भारत के लिए बड़ा अवसर लेकर आई है। संकीर्ण सोच से ऊपर उठकर इसमें अंशदान करना भारत के पुनर्जागरण का संकेत होगा।
Date:08-12-22
सुशासन को शक्ति देने वाला ई-रुपयासुशील कुमार सिंह, ( लेखक लोक नीति विश्लेषक हैं )
नवंबर 2016 में नोटबंदी के बाद से ही भारत सरकार द्वारा डिजिटल अर्थव्यवस्था को बढ़ावा दिया जा रहा है। इसी क्रम में डिजिटल इंडिया जैसे अभियान भी तेजी से आगे बढ़े। अब यह सिलसिला डिजिटल रुपये तक आ पहुंचा है। बीते एक दिसंबर को देश के चार शहरों मुंबई, दिल्ली, बेंगलुरू और भुवनेश्वर में डिजिटल रुपये के इस्तेमाल का पायलट प्रोजेक्ट शुरू किया गया। हालांकि अभी सीमित ग्राहकों और कुछ दुकानदारों तक ही यह सुविधा उपलब्ध है, मगर भविष्य में इसका प्रयोग देश भर में देखा जा सकेगा। यहां डिजिटल रुपये को ई-रुपये की संज्ञा दी जा सकती है।
ई-रुपये के चलते लोगों की नकदी पर निर्भरता कम होगी। इस तरह के लेनदेन में कोई हार्ड करेंसी की जरूरत नहीं पड़ती, बल्कि वालेट टू वालेट इसका लेनदेन होता है। ई-रुपया जिस वालेट में रखा जाएगा, उसे आरबीआइ मुहैया कराएगा और बैंक केवल बिचौलियों का काम करेंगे। भारतीय स्टेट बैंक, आईसीआईसीआई, आईडीएफसी-फर्स्ट और यस बैंक से खुदरा डिजिटल रुपये लिए जा सकते हैं। अगली कड़ी में अहमदाबाद, गुवाहाटी, लखनऊ, पटना, शिमला आदि शहरों में ई-रुपये का चलन संभव होगा। ई-रुपये के लेनदेन में बैंकों को इसकी जानकारी नहीं होगी। यह सीधे एक वालेट से दूसरे में जाएगा। नकदी के मुकाबले इस पर कोई ब्याज नहीं मिलेगा, लेकिन इसे नकदी के रूप में परिवर्तित किया जा सकता है। आरबीआइ ने कहा है कि ई-रुपया परंपरागत नकद मुद्रा की ही तरह धारक को भरोसा, सुरक्षा और अंतिम समाधान की खूबियों से भी युक्त होगा।
डिजिटलीकरण की चुनौतियां जैसे-जैसे घटेंगी, अर्थव्यवस्था वैसे-वैसे सघन होगी। भारत डिजिटल सेवा क्षेत्र में बढ़ रहे प्रत्यक्ष विदेशी निवेश के लिए एक आदर्श गंतव्य है। विगत कुछ वर्षों में निजी तथा सरकारी सेवाओं को डिजिटल रूप प्रदान किया गया है। भारत में ई-गवर्नेंस के चलते सुविधाओं को बढ़ना और चुनौतियों का कमजोर होना देखा जा सकता है। किसानों के खाते में किसान सम्मान निधि का हस्तांतरण डिजिटल गवर्नेंस का एक पारदर्शी उदाहरण है। ई-लर्निंग, ई-बैंकिंग, ई-सुविधा, ई-अस्पताल, ई-याचिका, ई-अदालत आदि ई-गवर्नेंस को संयुक्त रूप से ताकत दे रहे हैं। अब इसी कड़ी में ई-रुपये का प्रकटीकरण सुशासन के साथ अर्थव्यवस्था को मजबूती देने वाला है। देश के प्रमुख शहरों के बैंकों की ओर से लगभग पौने दो करोड़ डिजिटल मुद्रा की मांग की गई थी। ई-रुपया डिजिटल टोकन आधारित व्यवस्था है, जिसे केंद्रीय बैंक जारी करता है। इसका मूल्य बैंक में लेनदेन वाले नोट के समान ही है और इसे कैश की तरह दो हजार, पांच सौ, दो सौ और सौ, पचास रुपये और बाकी मूल्यवर्ग में जारी किया जाएगा। ई-रुपये के चलते मनी लांड्रिंग जैसे मामलों पर भी शिकंजा कसना आसान होगा। मनी लांड्रिंग को लेकर आए दिन समाचार आते रहते हैं। मनी लांड्रिंग भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने के साथ सुशासन के लिए चुनौती बना हुआ है। ई-रुपया एक ऐसे समय आया है, जब क्रिप्टो करेंसी चर्चा का विषय है। सरकारी संस्थाएं इसे लेकर कई चिंताओं से युक्त रही हैं। उम्मीद है कि अब ये चिंताएं कम होंगी।
कंफेडरेशन आफ आल इंडिया ट्रेडर्स की ओर से डिजिटल मुद्रा शुरू करने के रिजर्व बैंक के निर्णय का स्वागत किया गया है, लेकिन ई-रुपये को अपनाने के लिए व्यापारिक समुदाय के बीच एक राष्ट्रव्यापी आंदोलन शुरू करना होगा। इसमें कोई दुविधा नहीं कि ई-रुपये का प्रभाव जैसे-जैसे बढ़ेगा, नकदी के प्रबंधन में भी कमी आएगी। इससे लेनदेन में भी नकदी को कम किया जा सकेगा। जाहिर है लोगों को जेब में नकद लेकर चलने की जरूरत नहीं रहेगी। ई-रुपया बिना इंटरनेट कनेक्टिविटी भी काम करेगा। इसके चलन से डिजिटल अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी, जिसके लिए सरकार वर्षों से प्रयासरत है।
चूंकि हर सिक्के के दो पहलू होते हैं इसलिए ई-रुपये के चलन से होने वाले लाभ के साथ संभावित नुकसान की भी चर्चा होनी चाहिए। इस तरह के लेनदेन से पूरी तरह निजता संभव होगी, यह कहना मुश्किल है, क्योंकि यह सरकार की निगरानी में संचालित होगा। ई-रुपया पर कोई ब्याज नहीं मिलेगा। रिजर्व बैंक ने साफ किया है कि यदि डिजिटल रुपये पर ब्याज दिया गया तो बाजार में अस्थिरता आ सकती है। चूंकि आम तौर पर बचत खाते में जमा राशि पर निर्धारित ब्याज दर सुनिश्चित होता है, ऐसे में यदि ई-रुपये पर ब्याज दिया जाता है तो बचत खाते से पैसे निकालकर डिजिटल करेंसी में बदलने का सिलसिला चल पड़ेगा।
ई-रुपये का पायलट प्रोजेक्ट करीब एक महीना चलेगा। उसके बाद ही इसके विस्तार से जुड़ी चुनौतियां और कमियों का ठीक से अंदाजा मिलेगा। ई-रुपया पारंपरिक मुद्रा का एक डिजिटल संस्करण है। ई-गर्वनेंस का शाब्दिक अर्थ आनलाइन सेवा से है। लोकतांत्रिक देशों में सरकारें लोक सशक्तिकरण की प्राप्ति हेतु एड़ी-चोटी का जोर लगाती रही हैं। भारत में 1970 में इलेक्ट्रानिक विभाग और 1977 में नेशनल इन्फार्मेटिक सेंटर के साथ इस दिशा में कदम बढ़ाया गया था। पिछली सदी के अंतिम दशक में कंप्यूटरीकरण ने इलेक्ट्रानिक व्यवस्था को मजबूती की ओर धकेला और 1991 में उदारीकरण के बाद भारत सुशासन की राह पर चल पड़ा। शनैः शनैः लोक सेवा और जन सशक्तिकरण का स्वभाव बदलता गया और सुशासन की लकीर लंबी होती गई। साल 2005 में सूचना के अधिकार और 2006 में राष्ट्रीय ई-गवर्नेंस योजना ने इसे और पुख्ता कर दिया। मोदी सरकार के शासनकाल में डिजिटलीकरण को एक नया आसमान देने का प्रयास हुआ। नतीजन ई-शासन एक नई ऊंचाई पर पहुंचा। साफ है कि ई-रुपये के चलन ने सुशासन की दिशा में कदम बढ़ाने का काम किया है।
Date:08-12-22
रुकना ही चाहिए मतांतरणसंपादकीय
मतांतरण को लेकर सर्वोच्च न्यायालय ने एक बार फिर पुनः चेतावनीपूर्ण मत व्यक्त किया है। न्यायमूर्ति एमआर शाह और न्यायमूर्ति सीटी रवि कुमार की पीठ ने लालच‚धोखा और दबाव में जबरन मतांतरण को गंभीर मुद्दा मानते हुए चिंता प्रकट की है। शीर्ष अदालत ने कहा है कि जबरन मतांतरण संविधान के विरुद्ध है। अगर कोई गरीब और जरूरतमंद व्यक्ति की मदद करना चाहता है तो जरूर करे‚लेकिन इसका मकसद मतांतरण नहीं होना चाहिए। शीर्ष अदालत ने यह भी कहा कि भारत में रहने वालों को यहां की संस्कृति के अनुरूप चलना होगा। इसमें कोई संदेह नहीं है कि इस समय मतांतरण विभिन्न सामाजिक समूहों के बीच वैमनस्य और शत्रुतापूर्ण वातावरण का निर्माण कर रहा है‚जिससे भारत की सद्भावी संस्कृति को खतरा पहुंच रहा है और इसके कारण देश की राष्ट्रीय भावना और सुरक्षा भी प्रभावित हो रही है। यह वस्तुतः चिंताजनक स्थिति है‚लेकिन यहां सवाल दूसरा भी है। मतांतरण हिंदू धर्म से हो रहे हैं और ईसाई तथा मुस्लिम धर्मों में हो रहे हैं। भले ही लोभ‚लालच‚डराने और धमकाने से मतांतरण की बात सामने आ रही हो‚लेकिन विचार इस पर भी किया जाना चाहिए कि हिंदू धर्म के लोग ही क्यों लालच और दबाव में आ जाते हैं और धर्म परिवर्तन कर लेते हैं। निश्चित तौर पर ऐसा हिंदू धर्म की आंतरिक खामी के कारण भी हो रहा है। अगर गरीब या निचली जाति के लोगों को‚जो मतांतरण का शिकार हो रहे हैं‚हिंदू धर्म के भीतर से ही सुरक्षा और सम्मान का वातावरण मिलता तो मतांतरण कराने वालों को सफलता नहीं मिलती। इसलिए जरूरी है कि मतांतरण की समस्या का कानूनी रूप से तो समाधान खोजा ही जाए लेकिन इसके साथ–साथ हिंदू समाज के भीतर भी इस गंभीर मुद्दे को लेकर समाधानकारी सक्रियता की आवश्यकता है। हिंदू संस्कृति को‚जो भारत की केंद्रीय संस्कृति है‚अधिक समावेशी‚समन्वयकारी और भेद–भाव‚ऊंच–नीच‚जाति–कुजाति जैसी मतांतरणपोषी सामाजिक कुरीतियों से पूरी तरह मुक्ति पा लेनी चाहिए।
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भारत की स्वतंत्रता के लगभग 75 वर्षों के इतिहास में उच्चतम न्यायालय ने भारत के संविधान में समान व्यवहार की गारंटी को मुहर लगाते हुए ढेर सारे फैसले सुनाए हैं। लेकिन हाल ही में जनहित अभियान बनाम भारत संघ के मामले में न्याय करते हुए समानता के मूल सिद्धांत को उलट दिया गया है।
मामला क्या है?
2019 में संविधान में 103वां संशोधन किया गया था। इसमें संविधान के अनुच्छेद 15 और 16 में बदलाव करते हुए राज्यों को यह अधिकार दिया गया कि वे सरकारी नौकरियों और शिक्षण संस्थानों में आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग को 10% आरक्षण दे सकते हैं।
साथ ही यह भी निर्देश दिए गए कि आरक्षण के इस वर्ग में पहले से ही आरक्षण प्राप्त नागरिकों के अलावा अन्य लोग आएंगे। इसका अर्थ यही है कि इस श्रेणी में अनुसूचित जाति, जनजाति तथा अन्य पिछड़ा वर्ग के लोग नहीं आते हैं।
जनहित अभियान के अनुसार
1973 से सर्वोच्च न्यायालय की 13 न्यायधीशों की खंडपीठ ने केशवानंद भारती बनाम केरल राज्य मामले में स्पष्ट कर दिया था कि संविधान में संशोधन करने की संसद की शक्ति पूर्ण नहीं है।
यदि संशोधन प्रक्रिया के बाद का संविधान अपनी मूल पहचान खो देता है, तो संशोधित कानून को अवैध माना जाएगा। अन्य शब्दों में कहें, तो संसद को संविधान के मूल ढांचे को नुकसान पहुंचाने का अधिकार नहीं दिया जा सकता है।
याचिकाकताओं के तर्क –
जनहित अभियान में याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया है कि 103वें संशोधन में संविधान के बुनियादी ढांचे के उल्लंघन को तीन आधार पर देखा जाना चाहिए-
1) व्यक्तिगत आर्थिक आधार पर आरक्षण का प्रावधान आरक्षण के मूल तर्क के विरूद्ध जाता है।
2) यह संशोधन भेदभावपूर्ण है, क्योंकि यह अनुच्छेद 15 और 16 के मौजूदा प्रावधानों के तहत आरक्षण के हकदार अनुसूचित जाति जनजाति और ओबीसी को इस सुविधा से बाहर करता है।
3) यह संशोधन आरक्षण की 50% सीमा का उल्लंघन करता है।
विवादास्पद बिंदु – भारत में हमेशा आरक्षण को वास्तविक समानता प्राप्त करने और क्षतिपूर्ति के उपाय के रूप में देखा गया है। यही कारण है कि इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ (1992) मामले में न्यायालय की खंडपीठ ने कहा था कि समाज में पिछड़ा वर्ग की श्रेणी की पहचान के लिए आर्थिक आधार अकेले मानदंड नहीं बनाया जा सकता है।
फिर भी बहस के दौरान यह तर्क दिया जा सकता है कि यद्यपि संविधान समानता की मांग करता है, परंतु यह संसद को इसके किसी एक सटीक संस्करण की संकल्पना में नहीं बांधता है। इसलिए आर्थिक स्थिति पर आधारित आरक्षण का सरकार का कदम मौलिक समानता को ही बढ़ावा देता है। इसी आधार पर पीठ के बहुमत ने इसे उचित वर्गीकरण, माना है।
निर्णय में क्या अनदेखा किया गया ?
अनुसूचित जाति-जनजाति और पिछड़े वर्ग को दिया गया आरक्षण, कोई अतिरिक्त सुविधा या एहसान नहीं है, बल्कि यह समानता की गारंटी के लिए प्रावधान है। 1975 के केरल राज्य बनाम एन .एम थॉमस मामले मे यह तथ्य स्वयंसिद्ध हो गया है। इसलिए जब तक हम केशवानंद भारती मामले को एक सैद्धांतिक अप्रासंगिकता नहीं मान लेते, तब तक 103वें संशोधन को संविधान के मूल ढांचे के अभिशाप के रूप में देखा जाना चाहिए।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित सुरिथ पार्थसारथी के लेख पर आधारित। 12 नवंबर, 2022
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Date:07-12-22
Maha-Nataka, Why?Political grandstanding like that over Maharashtra, Karnataka border forgets many Indians are multilingualTOI Editorials
A potential flashpoint in the long-running boundary dispute between Maharashtra and Karnataka was averted yesterday when the scheduled visit of two ministers in the Maharashtra government to Belagavi was called off. Unfortunately, this will not end the disruption endured by people in the area. Prohibitory orders have been imposed, public transport disrupted, and the atmosphere remains charged. The immediate trigger for this round of flare-ups is the conduct of senior functionaries in both governments and organisations with a stake in the issue.
The dispute goes back to reorganisation of states on linguistic lines in the 1950s. Multilingual regions were demarcated and Maharashtra’s governments have been unsatisfied with the allocation of Belagavi to Karnataka. A joint effort by governments in the two states in the 1960s to find a solution did not fructify. The dispute currently is in the Supreme Court. In other words, no amount of grandstanding by politicians on both sides is going to result in redrawing borders. However, that hasn’t prevented them from periodically raking it up with the consequences borne by people in the region. As is the case with border areas, many inhabitants speak both languages even as politicians are ostensibly fighting the cause of speakers of one language.
India does need a more active national interstate council to manage tensions that arise out of disagreements over maps. However, an inactive council cannot condone the conduct of senior politicians as heated rhetoric causes collateral damage. India’s painstaking transition to dismantling interstate fiscal barriers through the roll-out of GST is undermined when physical movement of goods and people gets disrupted by escalating tension. The political class that set aside differences to arrive at a grand bargain and created a common market in India should not undo their achievement. One of India’s strengths is the extent of multilingualism even when internal borders have been determined largely on linguistic basis. Politicians need to learn from common Indians.
Date:07-12-22
The Great Jobs HuntToo few Indians are seeking work and mostly among those working quality of employment isn’t greatRaghuram Rajan, Rohit Lamba and Rahul Chauhan, [Rajan is a professor at the University of Chicago, and Lamba is an assistant professor at Pennsylvania State University and Chauhan is a research scholar]
India needs faster GDP growth, of course. But the quality of economic growth matters as much as its quantity. Specifically, growth must translate into good quality jobs. Unfortunately, on that count, we are not doing well.
Timely, reliable jobs data are important, and we have relatively few such sources in India. The objective of collecting such data is for the government to make more informed policy decisions, not show it in a bad light. At any rate, let’s start by triangulating the jobs data we have.
The big picture
The two large-scale datasets – the government’s quarterly urban Periodic Labour Force Survey (PLFS) and Centre for Monitoring the Indian Economy’s Consumer Pyramids Household Survey – peg India’s unemployment rate at 7. 2% and 8% as of September and November 2022 respectively. This means, around 3. 5-3. 9 crore Indians of working age population, who are willing and able to search for jobs, aren’t able to get one.
The unemployment rate only counts those who are unemployed and looking for jobs. If you are unemployed but not looking for jobs – for example, a 24-yearold preparing for exams for publicsector jobs or a 35-year-old who has given up looking – you are not counted.
Moreover, this metric is silent on the quality of jobs, and their productivity. For instance, five people manning a small retail store or tilling a small field, when only two would be sufficient, is disguised unemployment, but it does not show up in these numbers.
Too few look for jobs
Digging deeper, the labour force participation rate in India – the fraction employed or looking for a job – is currently around 46%. So, for every 100 Indians of working age, a staggering 54 are not participating in the labour force.
To put things in a comparativeperspective, the labour force participation rate in 2021:
● In Brazil was 58%,
● In Indonesia 68%,
● In all OECD countries 60%.
Missing women
The gender breakup is more worrisome still. At 19%, the female labour force participation rate in India is even lower than Saudi Arabia. Prominent thinker Chandra Bhan Prasad has pointed out that it may be a matter of pride for some with rising incomes that females in the family are not required to undertake unsafe manual jobs.
Yet it is equally an indictment of a system that cannot offer women attractive jobs outside the home that they can get to, and do, safely. According to the ILO, the gender discrepancy is enormous even for the well-educated – in 2019, only 30% of Indian females with tertiary education participated in the labour force as compared to 81% for males.
Whatever the reason, a large portion of productive female labour does not work outside the home. Beyond the direct loss in productivity, we are losing out on the new ideas and valuable changes that more diversity in the workplace would bring.
Youth unemployment has also been increasing steadily – it stood at 22% in 2019 (and was 28% in 2021) as compared to 18% in 2010. Remember, those still studying or taking exams are not included in these numbers. According to CMIE data, we do see a jump in males participating in the labour force after the age of 25. Something – possibly preparation for exams for public sector jobs that only a lucky few will get – is keeping a sizablechunk of youth from joining the labour force even after getting a college degree.
Returning to farms
What about the quality of jobs? The PLFS indicates 46. 5% of the labour force works in the agriculture sector today as compared to 42. 5% in 2019. This increase is not just a pandemic effect. Between 2018-19 and 2019-20, agricultural employment increased by 3. 4 crore while industry and services employment only grew by 93 lakh. Regular salaried employees too have dropped from 24% in 2018-19 to 21% in 2020-21.
The most plausible interpretation of these facts is that the quality and number of non-agricultural jobs on offer has regressed. If so, we may be the only developing country that is pushing people back to agriculture, an alarming indictment of our efforts at job creation.
Rajeev Chandrasekhar, minister for IT and skill development, wrote in these pages that 8 lakh jobs will be created over the next five years by the government’s flagship Production Linked Incentives scheme. Given that such subsidies are being directed into capital-intensive industries, this is arguably an optimistic number. Furthermore, the estimated cost in government subsidies will be Rs 2 lakh crore, amounting to Rs 25 lakh per job created. By any account, this is an enormous subsidy per job.
Given that 50 million job seekers will come on the labour market over this period, and crores are already looking for jobs, the multiplier effect of each PLI job has to be implausibly large to meet the need. PLI, alone, cannot be the solution.
The spontaneous outburst of our youth in response to the army’s Agnipath Scheme reinforces the data suggesting we are failing on job creation. Government, private sector, and civil society must come together to find a sustainable way to create more and better jobs. India should not be a negative outlier among nations in this matter.
Date:07-12-22
मानव मस्तिष्क के इस प्रयोग के क्या मायने हैंसंपादकीय
एलन मस्क ने अमरीकी रेगुलेटर संस्था एफडीए से अपनी एक अन्य कंपनी के नए शोध के लिए मानव पर क्लिनिकल ट्रायल की अनुमति मांगी है। हाल के दौर में दुनिया की कई कंपनियों और संस्थाओं ने पशुओं के दिमाग के न्यूरॉन्स और कंप्यूटर सिग्नल के बीच संदेशों के आदान-प्रदान की दिशा में बड़ी सफलता पाई है। इसे ब्रेन- कंप्यूटर इंटरफेस (बीसीआई) कहा जाता है। अगर मानव मस्तिष्क पर यह प्रयोग सफल हो गया तो चिकित्सा की दुनिया में एक बड़ा चमत्कार होगा। इससे जन्मांध लोगों को आंखों की रोशनी मिलेगी, मिर्गी पर काबू हो सकेगा, ब्रेन इंजरी, पार्किंसन और अल्जाइमर और लकवाग्रस्त लोगों को भी ठीक किया जा सकेगा। एक कंपनी ने पिछले वर्ष एक डेमोंस्ट्रेशन में दिखाया कि बंदर भी पोंग (टेबल टेनिस की तरह का एक खेल खेल रहा है क्योंकि उसका दिमाग कंप्यूटर से जोड़ दिया गया है । मस्क ने कहा कि इनमें से एक प्रयोग में वह खुद अपने ब्रेन में इस यंत्र को स्थापित करना चाहेंगे। बीसीआई को ब्रेन मशीन इंटरफेस (बीएमआई) भी कहते हैं, जिसकी ईजाद सन् 1973 में कैलिफोर्निया के एक प्रोफेसर ने की थी और तब से मानव मस्तिष्क और कंप्यूटर के बीच एक रिश्ता बनाने की कोशिश चल रही है। यहां तक तो ठीक है, लेकिन खतरा यह है कि इसका दुरुपयोग मानव मस्तिष्क को नियंत्रित करने में या उसे गलत संदेश देकर अपराध में न होने लगे। ईश्वर ने मानव को एक विवेक और पिछले अनुभवों के आधार पर चीजों को संश्लिष्ट करने की खूबी दी है। अगर किसी भी विधि से मानव का ईश्वर-प्रदत्त योग्यता पर नियंत्रण हो जाएगा तो नैतिक मूल्यों और सामाजिक संबंधों में भारी बदलाव होगा।
Date:07-12-22
पारदर्शी नहीं न्यायाधीशों की नियुक्ति प्रक्रियाडा. हरबंश दीक्षित, ( लेखक तीर्थंकर महावीर विश्वविद्यालय के विधि संकाय में प्रोफेसर एवं डीन हैं )
कानून मंत्री किरन रिजिजू और सर्वोच्च न्यायालय के बीच सार्वजनिक मतभेदों के कारण देश में कुछ अरुचिकर परिस्थितियां बनती जा रही हैं। मूल विषय कोलेजियम से जुड़ा हुआ है। काफी समय से कोलेजियम सिस्टम की कार्य पद्धति और उसकी उपादेयता पर बहस होती रही है। पिछले दिनों इस बहस में उपराष्ट्रपति जगदीप धनखड़ ने भी दखल दिया। इस बहस के मूल में यह है कि हमारे सर्वशक्तिमान न्यायाधीशों की नियुक्ति और स्थानांतरण का एकाधिकार कुछ न्यायाधीशों को केवल इसलिए हो, क्योंकि वे न्यायपालिका परिवार का हिस्सा होने के कारण उनके बारे में बेहतर समझ रखते हैं या उसमें आम आदमी के नुमाइंदों की भी भागीदारी इसलिए हो, क्योंकि न्यायाधीश केवल न्यायपालिका के ही नहीं, अपितु पूरे समाज के हित-रक्षक होते हैं?
वर्ष 1993 से पहले देश में इस तरह का कोई विवाद नहीं था। संविधान में यह अधिकार राष्ट्रपति को दिया गया है। अनुच्छेद 124 और 217 में राष्ट्रपति से यह जरूर अपेक्षा की गई कि वह न्यायाधीशों की नियुक्ति करते समय देश के मुख्य न्यायाधीश, अन्य न्यायाधीशों तथा उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों की नियुक्ति के समय वहां के राज्यपाल से भी मशविरा करें। दूसरे लोकतांत्रिक देशों में भी न्यायाधीशों की नियुक्ति का अधिकार कार्यपालिका के पास ही है। 1993 में सुप्रीम कोर्ट एडवोकेट्स आन रिकार्ड बनाम भारत संघ के मुकदमे में सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार न्यायाधीशों की नियुक्ति और स्थानांतरण के मामले में न्यायपालिका की राय को सर्वोच्चता देने की बात कही। तब नौ न्यायाधीशों की पीठ ने मत व्यक्त किया कि न्यायाधीश चूंकि न्यायिक परिवार का हिस्सा होता है इसलिए उसके बारे में जितनी समझ न्यायाधीशों को होती है, उतनी दूसरों को नहीं हो सकती। अतः उसकी नियुक्ति और स्थानांतरण से जुड़े विषयों पर न्यायपालिका को ही निर्णय लेना चाहिए। इसे अंजाम देने के लिए न्यायाधीशों के एक कोलेजियम की परिकल्पना की गई, जिसमें भारत के मुख्य न्यायाधीश और कुछ अन्य वरिष्ठ न्यायधीश हों। संविधान पीठ के कुछ न्यायाधीशों ने अपने निर्णय में न्यायिक स्वायत्तता और निष्पक्षता के लिए इस कदम को जरूरी बताते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश अपने वरिष्ठ साथियों के कोलेजियम की मदद से इसे अंजाम देंगे।
कोलेजियम सिस्टम की शुरुआत के साथ ही इस पर विवाद शुरू हो गया। धीरे-धीरे यह साफ होने लगा कि कोलेजियम के नाम पर मनमाने फैसले लिए जा रहे हैं। अन्य न्यायाधीशों की राय को तरजीह नहीं देने की बातें भी सामने आने लगीं, किंतु सब कुछ इतना गोपनीय था कि इस पर स्वस्थ बहस नहीं हो सकी। यह विवाद उस समय सतह पर आ गया जब वर्ष 1998 में तत्कालीन मुख्य न्यायाधीश मदन मोहन पुंछी ने न्यायाधीशों की नियुक्ति के लिए अपनी सिफारिशें राष्ट्रपति को भेज दीं और सरकार ने उन्हें रोककर कोलेजियम एवं मुख्य न्यायाधीश के संबंध में सुप्रीम कोर्ट से राय मांगी। तब नौ सदस्यीय संविधान पीठ की ओर से न्यायमूर्ति एसपी भरूचा ने कोलेजियम व्यवस्था को विस्तार से परिभाषित किया। उन्होंने कहा कि इसमें मुख्य न्यायाधीश के अलावा चार वरिष्ठ न्यायाधीश होंगे, निर्णय यथासंभव सर्वानुमति से लिया जाए और यदि किसी नाम पर कोलेजियम के दो सदस्य असहमत हों तो उसका नाम नहीं भेजा जाए। सैद्धांतिक रूप से यह व्यवस्था अब तक कायम है, किंतु इसे अब नजरअंदाज करने के प्रकरण भी सामने आने लगे हैं। मौजूदा कोलेजियम सिस्टम का सबसे बड़ा दोष यह है कि वह गोपनीयता के अंधेरे में काम करता है। ऐसे देश में जहां पर पारदर्शिता की संस्कृति विकसित करने में न्यायपालिका की सबसे बड़ी भूमिका रही हो, उसका न्यायाधीशों की नियुक्ति जैसे महत्वपूर्ण मामले में सब कुछ गोपनीय रखने के प्रति आग्रही होना समझ से परे है।
हमारे देश में न्यायाधीशों को बहुत महत्वपूर्ण जिम्मेदारी दी गई है। वे नागरिक अधिकारों के प्रहरी हैं। देश भर से चुन कर आए सांसदों द्वारा पारित कानून पर न्यायाधीश रोक लगा सकता है। देश के करोड़ों लोग अपनी परेशानी के क्षणों में अदालतों पर भरोसा करते हैं। बाढ़, सूखा और महामारी जैसी प्राकृतिक आपदाओं में भी आम आदमी को अदालतों ने राहत पहुंचाई है। ऐसे में न्यायाधीश अब केवल न्यायपालिका के परिवार के सदस्य मात्र नहीं हैं। वे करोड़ों लोगों के भरोसे का केंद्र भी हैं। इसलिए उनकी नियुक्ति को न्यायपालिका का आंतरिक मामला नहीं माना जा सकता। अपने लोगों को अनुशासित रखने के मामले में हमारी न्यायपालिका के नाम कोई गौरवगाथा नहीं जुड़ पाई है। दूसरों की गलतियों के लिए कठोरतम सजा देने वाले न्यायाधीशों के खिलाफ प्राथमिकी भी दर्ज करना आसान नहीं है। प्रोविडेंट फंड घोटाले के अभियुक्तों के खिलाफ प्राथमिकी इसीलिए दर्ज नहीं हो सकी। जस्टिस सौमित्र सेन के खिलाफ आपराधिक दुर्विनियोग के साबित आरोपों के बावजूद उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो सकी। जस्टिस निर्मल यादव के ऊपर तो चार्जशीट तक दाखिल हो गई, किंतु कुछ नहीं बिगड़ा। इसी तरह कर्नाटक उच्च न्यायालय के पूर्व मुख्य न्यायाधीश पीडी दिनाकरन भी उन लोगों में से हैं, जिनके खिलाफ भ्रष्टाचार के पुष्ट आरोपों के बावजूद उनके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो सकी।
चूंकि न्यायाधीश भी हमारे समाज का हिस्सा हैं, इसलिए अब समय आ गया है कि उनकी नियुक्ति और स्थानांतरण जैसे महत्वपूर्ण मामलों को न्यायिक परिवार के सीमित दायरे से बाहर निकालकर उसमें अन्य को भागीदार बनाया जाए। इसके लिए कोलेजियम व्यवस्था की निर्णय प्रक्रिया में आमूल परिवर्तन की आवश्यकता है। न्यायाधीशों की नियुक्ति से पहले उनकी पृष्ठभूमि के व्यापक छानबीन की जरूरत है। इसमें अमेरिका के अनुभवों से हम सीख सकते हैं। वहां सीनेट की न्यायिक समिति देश के आम और खास लोगों से उस व्यक्ति के बारे में जानकारी मांगती है, जिसे न्यायाधीश के रूप में नामित किया जाता है। इससे लोगों को अपना पक्ष रखने का मौका मिलता है। तय समय सीमा के अंदर उस पर विचार करके निर्णय होता है और इस तरह से असंदिग्ध सत्यनिष्ठा वाले व्यक्ति को न्यायाधीश के रूप में नियुक्त होने का मौका मिलता है। कोलेजियम सिस्टम भी जरूरत के मुताबिक संशोधन करके इस व्यवस्था को अपना सकता है।
Date:07-12-22
तकनीकी विकास क्या इंसानों के लिए बनेगा बड़ा खतरानिरंकार सिंह, ( पूर्व सहायक संपादक, हिंदी विश्वकोश )
दुनिया भर के वैज्ञानिक महसूस करने लगे हैं कि तकनीकी विकास से मानव जाति के लिए बड़ा खतरा पैदा हो गया है। इसके कारण ही आज सांस लेने के लिए न तो शुद्ध हवा है और न पीने के लिए स्वच्छ जल। कई तरह के रसायन और कीटनाशकों के कारण खाद्यान्न पहले से ही प्रदूषित हो चुके हैं, इसलिए वे टिकाऊ विकास पर जोर दे रहे हैं, लेकिन असली खतरा तो अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) से पैदा हो गया है।
अमेरिका और चीन जैसे देश एआई से संचालित रोबोट का उपयोग जंग में सैनिकों की जगह करने की तैयारी कर रहे हैं। एआई के खतरे के बारे में पता तब चला, जब सॉफ्टवेयर इंजीनियर एक प्रयोग कर रहे थे। दरअसल, 2017 में फेसबुक के सॉफ्टवेयर इंजीनियरों ने एक प्रयोग किया था। इस प्रयोग के दौरान एक इंजीनियर ने कहा, चलो इंसानों से नहीं, मशीनों की आपस में बात कराते हैं। फिर उन्होंने उनका नाम बॉब और एलिस रखा । जब ये दोनों आपस में बात कर रहे थे, तब इंजीनियरों को पता नहीं चला कि ये दोनों क्या बात कर रहे हैं। फिर इंजीनियरों को शोध के बाद पता चला कि इन्होंने अपने आप में एक गुप्त भाषा विकसित कर ली है। यह देख इंजीनियरों ने तुरंत इस कार्यक्रम को बंद कर दिया। क्या आप सोच सकते हैं कि बॉब और एलिस इंसानों से बचकर गुप्त भाषा विकसित करके एक-दूसरे से बात कर रहे थे। यह बेहद खतरनाक प्रयोग था । यह बताता है कि आगे जाकर एआई कितना खतरनाक होगा?
पांच साल पहले ही प्रोफेसर हॉकिंग ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के बारे में कहा था, ‘जिन्न बोतल से बाहर आ चुका है। वह इस बात से डरे हुए थे कि एआई एक ऐसी प्रजाति को सामने ले आएगा, जो इंसानों को बहुत पीछे छोड़ देगी। इसके बाद इंसान और रोबोट आमने- सामने खड़े हो सकते हैं। जाहिर है, ऐसा अगर हुआ, तो इंसान रोबोट के सामने कमतर ही साबित होगा। यह बात स्टीफन हॉकिंग ने नॉर्वे साइंस ऐंड आर्ट्स फेस्टिवल में कही थी।
इसमें कतई संदेह नहीं कि पिछले 70 साल के दौरान दुनिया में नए-नए तकनीकी आविष्कारों और खोजों ने हमारा जीवन बदल दिया है। फिर, डिजिटल क्रांति ने आर्थिक वृद्धि का नया इतिहास लिखा, जिसका आज पूरा समाज लाभ उठा रहा है। 1990 के दशक के बीच से लेकर 2000 के दशक के बीच तक ऐसा हुआ था और इसमें बहुत कुछ श्रेय असल में काम करने की जगहों में पर्सनल कंप्यूटर को दिया जाता है। तबसे हम इसका उपयोग कर रहे हैं, पर हमें आर्थिक समृद्धि का वह स्तर हासिल नहीं हुआ, जो डिजिटल टेक्नोलॉजी की वजह से ज्यादा बराबरी से बंटा हुआ हो सकता था । इसलिए हमें और ज्यादा व्यापक तकनीक की जरूरत है। इसकी एक झलक माइक्रोसॉफ्ट के सीईओ सत्य नडेला ने अपनी किताब हिट रिफ्रेश में पेश की है। इसमें यह बताया गया है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मिक्स्ड रियलिटी और क्वांटम कंप्यूटिंग से किस तरह आपकी जिंदगी बदलने वाली है।
आप असल दुनिया और वर्चुअल या आभासी दुनिया में फर्क तक नहीं कर पाएंगे। यह मिश्रित यथार्थ दुनिया होगी। मिश्रित यथार्थ टेक्नोलॉजी के साथ कंप्यूटिंग का सबसे शानदार तजुर्बा माइक्रोसॉफ्ट रच रहा है। ऐसा अनुभव, जिसमें आपकी देखने की जगह कंप्यूटिंग की सतह बन जाती है। और डिजिटल दुनिया व आपकी भौतिक दुनिया आपस में मिलकर एक हो जाती है।
स्टीफन हॉकिंग भविष्यवाणी कर गए हैं कि जेनेटिक एडिटिंग की तकनीक सुपरह्यूमन (महामानव) की एक नई जाति को जन्म देगी। लोग अपने जीन में एडिटिंग करके किसी खास गुण को पा सकेंगे, किसी बुराई को छोड़ सकेंगे या किसी आनुवंशिक बीमारी को खत्म कर सकेंगे। एक समय आएगा, जब इंसान खुद को तकनीक की मदद से डिजाइन कर रहा होगा।
सुंदर पिचई ने कहा है कि एआई को लेकर सावधानी बरतना बेहद जरूरी है। नए नियम बनाने चाहिए। हम नई तकनीक पर लगातार काम करते रह सकते हैं, लेकिन बाजार को उसके किसी भी तरह के इस्तेमाल की खुली छूट नहीं होनी चाहिए। मगर क्या किसी नई तकनीक को बाजार से बचाया जा सकता है ?
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अगले वर्ष तक भारत का सबसे अधिक जनसंख्या वाला देश बनने का अनुमान है। इस मायने में यह चीन को पीछे छोड़ देगा। पिछले छह दशकों में दुनिया की जनसंख्या दोगुने से अधिक हो गई है। यह एक ऐसा चरण है, जब अधिकांश विकासशील देशों में जनसंख्या के विस्तार पर अंकुश लगाना एक प्राथमिकता बन गई है। परिणामतः प्रजनन दर में गिरावट और वृद्ध होती जनसंख्या, इस सदी की प्रमुख जनसांख्यिकीय प्रवृत्ति होगी। भारत में भी 2020 के नमूना पंजीकरण सर्वेक्षण में प्रजनन में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। यह 2 पर आ गई।
अन्य चुनौतियां क्या हैं ?
गिरती प्रजनन दर के साथ भविष्य में हमें बुजुर्ग जनसंख्या की देखभाल की चुनौतियों से लड़ना होगा। लेकिन दुर्भाग्यवश अपने एशियाई समकक्षों की तुलना में हम युवा आबादी का आर्थिक लाभ नहीं उठा पा रहे हैं, क्योंकि हमारी नीतियां सही नहीं है।
अतः जब तक भारत के कामकाजी क्षेत्र में महिलाओं का योगदान नहीं बढ़ता, मानव पूंजी की गुणवत्ता में सुधार नहीं होता है, तब तक हम विकास के पथ पर तेजी से आगे नहीं बढ़ सकेंगे।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 16 नवंबर, 2022
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Date:06-12-22
Apart From ApathyUrban voting is low in part because politicians don’t have too many deliverables for middle classesTOI Editorials
The EC didn’t mince words. “Urban (voter) apathy continues unabated from Shimla to Surat,” it said on Saturday. In Shimla, the turnout was more than 10 percentage points lower than Himachal’s state average of 75. 6%. The trend held in the first phase of Gujarat polls where the urban turnout was lower than the surrounding rural areas. The urban turnout in the first phase in Gujarat was also lower than the same in 2017. In Delhi’s local polls, better-off classes largely stayed away.
The trend is not new. In the first three decades of elections, the relative participation of urban voters was greater. The gap between urban and rural turnout has widened since the 1980s. “Urban apathy” isn’t irrelevant – urban India contributes to 60% of GDP and a very high proportion of taxes. As this paper has argued, improvement in urban governance has been hindered by the political executive holding back on the transfer of power to urban bodies envisaged three decades ago in the Constitution’s 74th amendment.
There are certain unique factors about India’s urban governance that are relevant to voter turnout. Political scientists have used surveys and election data to study the plausible reasons for the lower turnout in urban areas. The common thread running through some of the studies is that rural turnout is positively influenced by a more pronounced emphasis on group mobilisation and a greater need for the intervention of politicians to compensate for state failure. The second aspect is relevant even within urban centres. For example, in Delhi’s 2020 assembly election the turnout in New Delhi, the seat of the government, was 52. 15%, almost 20 percentage points lower than some constituencies with large slum clusters. Poorer urban Indians still need politicians to improve some services. Better-off classes, who can insulate themselves somewhat from civic non-governance, don’t have a lot of incentive.
That the urban-rural vote divide is not decreasing even in national polls – where supposedly ‘big’ issues familiar to middle classes are debated – tells us that it’s not apathy or not just apathy that keeps better off city Indians from voting. There’s nothing wrong in electoral politics focussing on the rural areas, and more so on lower-income rural poor. But the disconnect between city middleclassesand elections is still something politicians should think about.
Date:06-12-22
Faith and freedomFreedom of religion is protected when state keeps away from matters of faithEditorial
Protracted litigation in the name of combating forcible religious conversion is taking up valuable time of courts. The Supreme Court is hearing a purported Public Interest Litigation (PIL) seeking action to curb deceitful religious conversion in the country. Not wanting to be left behind, the Gujarat government is seeking the removal of a stay on a provision in its anti-conversion law that requires prior permission from the District Magistrate for any conversion done “directly or indirectly”. The Gujarat High Court had correctly stayed Section 5 of the Gujarat Freedom of Religion Act, 2003 (amended in 2021 to include ‘conversion by marriage’), while also staying the operation of other provisions that sought to cover inter-faith marriages as instances of illegal conversion. The High Court had noted that the prior permission requirement would force someone to disclose one’s religious belief or any change of faith, contrary to Supreme Court rulings that say marriage and faith involve an individual’s choice. In a strange claim, Gujarat argues that the stay on Section 5 is affecting even genuine inter-faith marriages that involve no fraud or coercion, as those who usually solemnise such marriages are unable to do so. This is based on a claim that the prior permission requirement obviates the need to question the genuine nature of the conversion, if any, consequent upon an inter-religious marriage.
No one would buy the claim that the provision enables voluntary conversion. Freedom of religion is protected only when no questions are raised and no suspicion entertained based on the mere fact that an inter-faith marriage has taken place. Common sense would suggest that forcing someone to disclose an intent to change one’s faith violates freedom of conscience and the right to privacy. Also, when a separate appeal against the High Court’s interim orders staying the provisions is pending before the Supreme Court, there was no need for the State government’s petition seeking to revive the prior permission requirement as part of the ongoing hearing on the PIL against religious conversions. On the larger issue, the observations of a Supreme Court Bench headed by Justice M.R. Shah to the effect that religious conversion through “allurement” or charity work is a serious problem indicate an eagerness to goad the Government into coming up with anti-conversion measures on a national scale. It is questionable whether courts should entertain exaggerated allegations of rampant fraudulent conversions across the country, instead of leaving it to States to identify the extent of the problem, if any, and adopt steps to protect religious freedom and communal harmony.
Date:06-12-22
आंकड़े सही न हों तो नीतियों पर असर होगासंपादकीय
डिजिटल दौर में भी अगर आंकड़े सही न हों तो न तो नीतियां सही बन सकेंगी, न ही आर्थिक विकास को गति मिलेगी। सबसे ज्यादा जरूरत देश में कृषि क्षेत्र में सही स्थिति पता करने की है। चालू वर्ष की दूसरी तिमाही (जुलाई-सितम्बर) के ताजा आंकड़े इस कमी की ओर इंगित करते हैं। इसके अनुसार विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) की विकास दर पिछले वर्ष के इसी काल के मुकाबले 4.3% घटी है जबकि कृषि की 4.6% बढ़ी है। यहां प्रश्न है
मेनेजर इंडेक्स के अनुसार पिछले 17 महीनों में कच्चे माल की खरीद में लगातार वृद्धि हुई है। ऐसे में विनिर्माण में वृद्धि कैसे कम हो सकती है? अब इसके उलट कृषि में विकास दर को लें। स्वयं कृषि मंत्रालय का पहला एडवांस एस्टीमेट आंकड़ा बताता है कि इस तिमाही में खरीफ, खासकर धान व तिलहन का उत्पादन पिछले साल के इसी काल के मुकाबले कम होगा। अन्य विश्वसनीय सर्वे भी यही कहते हैं कि इस साल बारिश एक समान और सही समय पर न होने से कम रकबे में फसलें बोई गईं। कृषि सेक्टर की दूसरी प्रमुख गैर-फसलीय गतिविधि है- पशुपालन व डेयरी । चारा, खली, दाने के दाम में भारी वृद्धि से दूध पर असर पड़ा, जिसकी वजह से अमूल – मदर डेयरी ने दाम बढ़ाए। फिर लम्पी वायरस के कारण यह सेक्टर आहत रहा। फिर कृषि क्षेत्र में विकास का आंकड़ा कैसे बढ़ सकता है? जरा सोचिए, डीएएचडी के अनुसार भारत में हर घर में औसत करीब दो लीटर दूध की रोजाना की उपलब्धता है। क्या कुपोषण और प्रोटीन की कमी वाले इस देश में हर घर इतने दूध की बात पर भरोसा किया जा सकता है? आज भी देश में खाद्य खपत के 11 साल पुराने आंकड़ों पर ही नीतियां बन रही हैं।
Date:06-12-22
स्पेस में निजी क्षेत्र और स्टार्ट-अप के बढ़ते दखल के मायनेसाधना शंकर, ( लेखिका भारतीय राजस्व सेवा अधिकारी )
पिछले महीने विक्रम-एस का सफलतापूर्वक प्रक्षेपण अंतरिक्ष-विज्ञान के क्षेत्र में भारत की एक बड़ी कामयाबी थी। छह मीटर लम्बा, नीले-सफेद रंग वाला यह रॉकेट पहला ऐसा अंतरिक्षयान है, जिसे पूरी तरह से निजी क्षेत्र के द्वारा डिजाइन किया और बनाया गया है। इसे श्रीहरिकोटा स्थित इसरो की साइट से लॉन्च किया गया था। विक्रम-एस का यह नामकरण विक्रम साराभाई के नाम पर किया गया है।
स्कायरूट नामक जिस स्टार्ट-अप ने विक्रम-एस को लॉन्च किया था, वह हैदराबाद स्थित है। उसने रॉकेट के थ्रस्टर्स बनाने के लिए थ्री-डी प्रिंटिंग तकनीक का उपयोग किया और उसकी मोटर-केसिंग बनाने के लिए कार्बन फाइबर प्रयुक्त किया। ये उपाय अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी की श्रेणी में आते हैं। रॉकेट में कलाम-80 इंजिन का दमखम था। लॉन्च के बाद चंद ही मिनटों में रॉकेट पृथ्वी से 89.5 किलोमीटर दूर चला गया था।
इसरो सार्वजनिक क्षेत्र की संस्था है। उसने हमारे देश को अंतरिक्षयात्रा करने वालों की कतार में ला खड़ा किया और स्पेस टेक्नोलॉजी में हमें आत्मनिर्भर बनाया। कम लागत में स्पेस रिसर्च कैसे की जाती है, इसकी एक मिसाल इसरो ने कायम की है। लेकिन स्पेस-इकोनॉमी से 10 अरब डॉलर का ही राजस्व मिल रहा था, जो कि दुनिया के 440 अरब डॉलर के राजस्व का महज दो प्रतिशत है। अभी तक स्पेस सेक्टर में निजी क्षेत्र की सहभागिता केवल इसरो के सप्लायर के रूप में ही थी। 2020 में भारत सरकार ने स्पेस सेक्टर को निजी क्षेत्र के लिए खोल दिया और प्रारम्भ मिशन के तहत निजी कम्पनियों को रॉकेट और सैटेलाइट्स बनाने की अनुमति दे दी गई। प्राइवेट कम्पनियां केवल रॉकेट और सैटेलाइट्स ही नहीं बना सकती थीं, बल्कि उन्हें लॉन्च भी कर सकती थीं। नई नीति के तहत इसरो भी अब निजी कम्पनियों को अपनी फेसिलिटीज के उपयोग की अनुमति देगा। निजी क्षेत्र के लॉन्च और अन्य स्पेस-गतिविधियों की निगरानी करने और उनसे समन्वय के लिए इंडियन नेशनल स्पेस प्रमोशन एंड अथॉराइजेशन सेंटर यानी इन-स्पेस की स्थापना की गई है।
विक्रम-एस के लॉन्च ने देश में स्पेस-गतिविधियों के एक नए दौर की शुरुआत कर दी है। इस क्षेत्र में प्रवेश के इच्छुकों की संख्या बढ़ रही है। 68 फर्में पे-लोड्स बनाना चाहती हैं, 30 रॉकेट और उनके घटक बनाना चाहती हैं, वहीं 57 या तो जमीनी स्टेशन बनाने को तैयार हैं या स्पेस से प्राप्त डाटा का उपयोग विभिन्न गतिविधियों में करना चाहती हैं। स्पेस के क्षेत्र में स्टार्ट-अप सेक्टर जोशो-खरोश से अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहा है। 2020 के बाद से अब तक 101 स्टार्ट-अप रजिस्ट्रेशन करा चुके हैं। विदेशों से भी दिलचस्पी दिखाई जा रही है और दुनिया की कुछ बड़ी कम्पनियां सॉफ्टवेयर और डाटा एनालिसिस के क्षेत्र में भारत की महारत का लाभ उठाना चाहती हैं। इसमें उनका फायदा यह है कि भारतीय उद्यम की लागत कम है। वैश्विक प्रतिस्पर्धा के लिए भारतीय उद्यमियों को अपनी लागत को कम रखना पड़ेगा और साथ ही रीयूजेबल रॉकेट बनाने पड़ेंगे। स्पेस के क्षेत्र में आज जो रोमांचक गतिविधियां हो रही हैं, वे हमारे देश के युवाओं के लिए नया अध्याय साबित हो सकती हैं।
विक्रम-एस के बाद से इसरो आठ और नैनो सैटेलाइट्स को लॉन्च कर चुका है और ये सभी भारत और दुनिया में निजी क्षेत्रों के द्वारा बनाए गए हैं। आंकड़ों के अनुसार आज पृथ्वी की कक्षा में 4550 मनुष्य-निर्मित सैटेलाइट्स हैं। आगामी दस वर्षों में कम से कम 50 हजार और सैटेलाइट्स लॉन्च किए जा सकते हैं। इसका यह मतलब है कि पृथ्वी की कक्षा एक खचाखच भरा हाईवे साबित होने जा रहा है। स्ट्रैटोस्फीयर में अंतरिक्षयानों के कारण कार्बन फुटप्रिंट को लेकर भी चिंताएं जताई गई हैं। परम्परागत रूप से स्पेस सम्प्रभु राष्ट्रों का डोमेन रहा है, लेकिन स्पेस-एक्सप्लोरेशन और टूरिज्म में दूसरे प्लेयर्स की आमद के बाद नियमों पर पुनर्विचार की जरूरत हो सकती है। अभी तक स्पेस सेक्टर में निजी क्षेत्र की सहभागिता केवल इसरो के सप्लायर के रूप में ही थी। 2020 में भारत सरकार ने स्पेस सेक्टर को निजी क्षेत्र के लिए खोल दिया। यह युवाओं के लिए एक नया अवसर है।
Date:06-12-22
बेहतरी का संकल्पसंपादकीय
समूह बीस देशों के संगठन यानी जी-20 की अध्यक्षता मिलने के बाद भारत में इसकी पहली बैठक शुरू हो चुकी है। इसमें चालीस देशों के शेरपा हिस्सा ले रहे हैं। पूरे साल देश के पचपन स्थानों पर ऐसी कुल दो सौ बैठकें होनी तय हैं। पहली बैठक में साल भर होने वाली बैठकों और फिर शिखर सम्मेलन के मुद्दे स्पष्ट हो चुके हैं। सभी सदस्य देशों ने आजीविका के संकट से उबरने के लिए समावेशी व्यवस्था की ओर आगे बढ़ने का संकल्प लिया है। इन बैठकों में मुख्य रूप से वैश्विक विकास, महिला विकास, व्यापार, भ्रष्टाचार, आर्थिक-वित्तीय, रोजगार, संस्कृति, चिकित्सा, शिक्षा आदि विषयों को शामिल किया गया है। इन्हीं विषयों पर लिए गए निर्णयों के आधार पर शिखर सम्मेलन के दौरान सम्मिलित रूप से अंतिम फैसले पर पहुंचा जा सकेगा। पहली बैठक में स्वीकार किया गया कि कोरोना महामारी के बाद दुनिया गंभीर संकट के दौर से गुजर रही है। इस दौरान वैश्विक ऋण में वृद्धि हुई है, विकास दर कमजोर हुई, मुद्रास्फीति बढ़ी और रोजगार में कमी आई है। इन स्थितियों से पार पाने के लिए नए संकल्प के साथ आगे बढ़ने की जरूरत है। इस कठिन दौर में इस संकल्प से स्वाभाविक ही बेहतरी की उम्मीद जगी है।
जी-20 की सदारत भारत को मिलना इसलिए भी महत्त्वपूर्ण है कि आर्थिक विकास को लेकर तमाम देश इसकी तरफ नजरें उठाए देख रहे हैं। दुनिया के कई बड़े उभरते बाजार जी-20 संगठन में हैं और यह समूह दुनिया की दो तिहाई आबादी का प्रतिनिधित्व करता है। दुनिया की पचासी फीसद जीडीपी, अठहत्तर फीसद वैश्विक व्यापार और नब्बे फीसद पेटेंट जी-20 देशों के पास है। निस्संदेह इतने क्षमतावान देश अगर मिल कर काम करें तो आर्थिक संकट से उबरना कठिन काम नहीं माना जा सकता। मगर रूस-यूक्रेन युद्ध और चीन की एकाधिकारवादी नीतियों के चलते व्यापार-वाणिज्य संबंधी प्रयासों में बाधा उत्पन्न हुई है। सबसे चिंता की बात है कि विश्व की आपूर्ति शृंखला बाधित हुई है। चूंकि रूस से भारत की गहरी मित्रता है और वह भारत की सलाह पर अमल भी करता रहा है, इसलिए तमाम देशों को उम्मीद है कि भारत अगर गंभीरता से प्रयास करे, तो यूक्रेन के साथ उसकी तनातनी पर विराम लगाना आसान होगा। भारत खुद भी ऐसा प्रयास करता रहा है। जी-20 की अध्यक्षता मिलने के बाद भारत की यह जिम्मेदारी और बढ़ गई है कि वह आर्थिक विकास की राह में आने वाली मुश्किलों को दूर करने का प्रयास करे।
पहली बैठक में भारत के शेरपा ने फिर से दोहराया कि आपदा को अवसर में बदलने की दिशा में सोचने से इस संकट से जल्दी उबरा जा सकता है। जी-20 देशों के साथ परस्पर व्यापार-वाणिज्य के रिश्ते मजबूत होंगे, तो स्वाभाविक ही भारत की आर्थिक विकास दर पर भी उसका सकारात्मक असर पड़ेगा। अभी भारत खुद भी महंगाई, बेरोजगारी, स्वास्थ्य सुविधाओं, शिक्षा, लोगों को गरीबी रेखा से बाहर निकालने जैसी चुनौतियों का सामना कर रहा है। इस दिशा में बेहतर नतीजे तभी आ सकते हैं, जब प्रत्यक्ष विदेशी निवेश और निर्यात को बढ़ावा मिले। जी-20 देशों के साथ तालमेल करके इस दिशा में बेहतर नतीजे हासिल करना बड़ी चुनौती नहीं कही जा सकती। जी-20 के सदस्य देशों में खपत और उत्पादन की सबसे अधिक क्षमता भारत के पास है, इसलिए इस जिम्मेदारी को वह सदस्य देशों के साथ मिल कर निस्संदेह एक बेहतर अवसर के रूप में बदल सकता है।
Date:06-12-22
गन्ना किसानों की पीड़ा और नीति आयोग की अनुशंसाएंके सी त्यागी, ( पूर्व सांसद )
नीति आयोग द्वारा गन्ना एवं चीनी उद्योग पर गठित कार्यबल की अनुशंसाएं किसानों की मुसीबतें बढ़ा रही हैं। उत्तर प्रदेश समेत कई राज्य सरकारों द्वारा गन्ना मूल्य के लिए एसएपी (राज्य सरकार द्वारा घोषित मूल्य) की घोषणा न करना इसका ताजा उदाहरण है। साल 2022- 2.3 के लिए गन्ने के दाम में 15 रुपये प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी की गई है। यह फैसला प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाली आर्थिक मामलों की कैबिनेट कमेटी द्वारा किया जाता है। कमेटी ने स्वीकार किया है कि गन्ने की उत्पादन लागत 162 रुपये प्रति क्विंटल रही। दरअसल, कृषि लागत मूल्य के आधार पर ही बढ़ोतरी की सिफारिश की जाती है, लेकिन लखनऊ गन्ना रिसर्च इंस्टीट्यूट आकलन में एक क्विंटल गन्ने की लागत 280 रुपये आंकी गई है, जबकि शाहजहांपुर गन्ना शोध संस्थान के मुताबिक, यह लागत 301 रुपये है। फिर किस आधार पर चीनी मिल मालिक और नीति आयोग के अफसर गन्ना किसानों की समृद्धि की दास्तान तैयार कर रहे हैं ? गौर करने वाली बात यह भी है कि लागत मूल्य आयोग में अभी आधे पद रिक्त हैं और एक लंबे अंतराल के बाद अध्यक्ष की नियुक्ति हो पाई है।
“सुगर केन कंट्रोल ऑर्डर 1966 में संशोधन के बाद गन्ने का मूल्य तय करने का जिम्मा ‘फेयर ऐंड रिमुनरेटिव प्राइस’ यानी एफआरपी को सौंपा गया। पहले यह एमएसपी द्वारा तय किया जाता था। पुराने फॉर्मूले के तहत गन्ने की कीमत तय करते समय छह बातों का ध्यान रखना पड़ता था । गन्ने उगाने का लागत मूल्य, गन्ने की जगह किसान दूसरी चीज बोता, तो उस पर कितना मूल्य आता, राशन की दुकान पर उपभोक्ता को किस कीमत पर चीनी मिल रही है, उपभोक्ता खुले बाजार में किस दाम पर चीनी खरीद रहे हैं, गन्ने से चीनी की रिकवरी कितनी है और गन्ने के सह-उत्पादों जैसे शीरा, खोई व मैली से होने वाली आय । तब पेट्रोल में मिलाने के लिए इस्तेमाल होने वाले एथेनॉल प्रचलन में नहीं था। पिछले कई वर्षों से सरकारी प्रोत्साहन से पेट्रोल में एथेनॉल की • मात्रा लगभग 20 प्रतिशत होने का अनुमान है, इसीलिए वर्तमान चालू वित्त वर्ष में एथेनॉल की कीमत में भी बढ़ोतरी की गई है। इसे 63.45 रुपये प्रति लीटर से बढ़ाकर 65 रुपये प्रति लीटर किया गया है।
ताजा विवाद गठित कार्यबल की सिफारिशों को लेकर है, जिसके कारण उत्तर प्रदेश सरकार समेत अनेक राज्य सरकारों ने एसएपी देने से इनकार कर दिया है। नीति आयोग का मानना है कि चीनी उद्योग में आए ठहराव के लिए गन्ने की कीमतों में हो रही लगातार बढ़ोतरी बड़ी वजह है, जिससे यह संकट के दौर से गुजर रहा है। देश में चीनी खपत की अतिरिक्त मांग न होने के बावजूद किसान गन्ने की खेती का रकबा बढ़ाते जा रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय व घरेलू बाजार के हालात को देखते हुए गन्ने के दाम में बढ़ोतरी नहीं की जानी चाहिए। जो राज्य एसएपी बढ़ाकर अतिरिक्त दाम देने को तैयार हैं, उन्हें कार्यबल ने ऐसा न करने के सुझाव दिए हैं।
कृषि वैज्ञानिकों के अनुसंधानों और किसानों की दिन-रात की मेहनत का नतीजा है कि भारत विश्व का सबसे बड़ा चीनी उत्पादक व उपभोक्ता है और दूसरे नंबर का निर्यातक है। भारत के करीब पांच करोड़ किसान और 50 लाख कुशल- अकुशल मजदूर इस उद्योग से अपनी जीविका चलाते हैं। यह उद्योग सालाना लगभग एक लाख करोड़ रुपये की कमाई करता है।
गन्ना पेराई के सीजन को शुरू हुए लगभग डेढ़ महीने से अधिक समय हो चुका है, लेकिन भुगतान को लेकर मिल मालिकों का रवैया यथावत है। कहने को तो गन्ने की फसल ‘नगद फसल’ कहलाती है, लेकिन वास्तविकता यह है कि किसानों को जितना समय एवं मेहनत फसल उपजाने पर खर्च करना पड़ता है, उतना ही वक्त उसे अपनी उपज का मूल्य पाने के लिए खर्च करना पड़ता है, हालांकि भार्गव फॉर्मूले के अनुसार, मिल में पहुंचाए जाने के 14 दिन के अंदर मिल मालिकों को किसानों को भुगतान करना जरूरी है, अन्यथा उसके बाद लंबित भुगतान पर 15 प्रतिशत सालाना की दर से ब्याज देने का प्रावधान है, लेकिन मिल मालिकों और अफसरों की मिली भगत से इस आदेश को कभी व्यवहार में उतारा नहीं जाता।
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हाल ही में कोप-27 में भारत की दीर्घकालिक निम्न-उत्सर्जन विकास रणनीति जारी की गई है। इसी परिप्रेक्ष्य में यह भारत की अर्थव्यवस्था में बदलाव की रणनीति की भी एक झलक दिखाता है। भारत जैसे निम्न-मध्यम आय वाले देशों के लिए कार्बन, उच्च-उत्सर्जन विकल्पों से हटना मुश्किल कदम हो सकता है। इसी मद्देनजर यह रणनीति तैयार की गई है। कुछ बिंदु-
भारत जलवायु परिवर्तन के प्रति सबसे संवेदनशील देशों में से एक है। अतः कार्बन के उत्सर्जन को कम करना इसके हित में है। इस मामले में हमें वित्तीय सहयोग की जरूरत होगी। 2019-20 में हमारा ग्रीन फाइनेंस 44 अरब डॉलर था, जबकि हमें 170 अरब डॉलर सालाना चाहिए थे। इस बजट में 80% स्रोत हमारे अपने थे। अपने वित्त प्रवाह को बढ़ाने के लिए भारत को प्रयास करना होगा। तभी हम उत्सर्जन में कटौती के अपने लक्ष्य को पूरा कर सकते हैं।
‘द इकानॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 15 नवबंर, 2022
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Date:05-12-22
Poor soil management will erode food securitySoil degradation can have irreparable consequences on human and ecosystem health, which cannot be ignoredKonda Reddy Chavva, [ Officer-in-Charge, Food and Agriculture Organization of the United Nations (FAO) Representation in India ]
Healthy soils are essential for our survival. They support healthy plant growth to enhance both our nutrition and water percolation to maintain groundwater levels. Soils help to regulate the planet’s climate by storing carbon and are the second largest carbon sink after the oceans. They help maintain a landscape that is more resilient to the impacts of droughts and floods. As soil is the basis of food systems, it is no surprise that soil health is critical for healthy food production.
World Soil Day (WSD) 2022, annually observed on December 5, aligns with this. WSD 2022, with its guiding theme, ‘Soils: Where food begins’, is a means to raise awareness on the importance of maintaining healthy soils, ecosystems and human well-being by addressing the growing challenges in soil management, encouraging societies to improve soil health, and advocating the sustainable management of soil.
Degradation and its consequences
Today, nutrient loss and pollution significantly threaten soils, and thereby undermine nutrition and food security globally. The main drivers contributing to soil degradation are industrial activities, mining, waste treatment, agriculture, fossil fuel extraction and processing and transport emissions. The reasons behind soil nutrient loss range from soil erosion, runoff, leaching and the burning of crop residues. Soil degradation in some form or another affects around 29% of India’s total land area. This in turn threatens agricultural productivity, in-situ biodiversity conservation, water quality and the socio-economic well-being of land dependent communities.
Nearly 3.7 million hectares suffer from nutrient loss in soil (depletion of soil organic matter, or SOM). Further, excessive use of fertilizers and pesticides, and irrigation with contaminated wastewater are also polluting soils. Impacts of soil degradation are far reaching and can have irreparable consequences on human and ecosystem health.
India’s conservation strategy
The Government of India is implementing a five-pronged strategy for soil conservation. This includes making soil chemical-free, saving soil biodiversity, enhancing SOM, maintaining soil moisture, mitigating soil degradation and preventing soil erosion. Earlier, farmers lacked information relating to soil type, soil deficiency and soil moisture content. To address these issues, the Government of India launched the Soil Health Card (SHC) scheme in 2015. The SHC is used to assess the current status of soil health, and when used over time, to determine changes in soil health. The SHC displays soil health indicators and associated descriptive terms, which guide farmers to make necessary soil amendments.
Other pertinent initiatives include the Pradhan Mantri Krishi Sinchayee Yojana, to prevent soil erosion, regeneration of natural vegetation, rainwater harvesting and recharging of the groundwater table.
In addition, the National Mission for Sustainable Agriculture (NMSA) has schemes promoting traditional indigenous practices such as organic farming and natural farming, thereby reducing dependency on chemicals and other agri-inputs, and decreasing the monetary burden on smallholder farmers.
The Food and Agriculture Organization of the United Nations (FAO) undertakes multiple activities to support the Government of India’s efforts in soil conservation towards fostering sustainable agrifood systems. The FAO is collaborating with the National Rainfed Area Authority and the Ministry of Agriculture and Farmers’ Welfare (MoA&FW) to develop forecasting tools using data analytics that will aid vulnerable farmers in making informed decisions on crop choices, particularly in rainfed areas.
Working with target States
The FAO, in association with the Ministry of Rural Development, supports the Deen Dayal Antyodaya Yojana-National Rural Livelihoods Mission’s (DAY-NRLM) Community Resource Persons to increase their capacities towards supporting on-farm livelihoods for the adoption of sustainable and resilient practices, organic certification and agri-nutri-gardens. The FAO works in eight target States, namely, Madhya Pradesh, Mizoram, Odisha, Rajasthan, Uttarakhand, Chhattisgarh, Haryana and Punjab, for boosting crop diversification and landscape-level planning. In Andhra Pradesh, the FAO is partnering with the State government and the Indian Council of Agricultural Research (ICAR) to support farmers in sustainable transitions to agro-ecological approaches and organic farming.
There is a need to strengthen communication channels between academia, policymakers and society for the identification, management and restoration of degraded soils, as well as in the adoption of anticipatory measures. These will facilitate the dissemination of timely and evidence-based information to all relevant stakeholders. Greater cooperation and partnerships are central to ensure the availability of knowledge, sharing of successful practices, and universal access to clean and sustainable technologies, leaving no one behind. As consumers and citizens, we can contribute by planting trees to protect topsoil, developing and maintaining home/kitchen gardens, and consuming foods that are mainly locally sourced and seasonal.
Date:05-12-22
राष्ट्रीय चुनौती बना छल-बल से मतांतरणहृदयनारायण दीक्षित, ( लेखक उत्तर प्रदेश विधानसभा के पूर्व अध्यक्ष हैं )
अवैध मतांतरण राष्ट्रीय चुनौती है। ईसाई-इस्लामी समूह लंबे समय से अवैध मतांतरण में संलग्न हैं। वे सारी दुनिया को अपने पंथ-मजहब में मतांतरित करने के लिए तमाम अवैध साधनों का इस्तेमाल कर रहे हैं। अपनी आस्था, विवेक और अनुभूति में जीना प्रत्येक मनुष्य का अधिकार है, लेकिन यहां अवैध मतांतरण के लिए छल, बल, भय और प्रलोभन सहित अनेक नाजायज तरीके अपनाए जा रहे हैं। यह मानवता के विरुद्ध असाधारण अपराध है। और राष्ट्रीय अस्मिता के विरुद्ध युद्ध भी है। मतांतरण से व्यक्ति अपना मूल धर्म ही नहीं छोड़ता, बल्कि उसकी देव आस्थाएं भी बदल जाती हैं। पूर्वज बदल जाते हैं। वह अपनी संस्कृति के प्रति स्वाभिमानी नहीं रह जाता। वह नए पंथ-मजहब के प्रभाव में अपने पूर्वजों पर भी गर्व नहीं करता। उसकी भू-सांस्कृतिक निष्ठा बदल जाती है। भू-सांस्कृतिक निष्ठा ही भारतीय राष्ट्र का मूल तत्व है। इसलिए मतांतरण राष्ट्रांतरण भी है। इस्लाम और ईसाइयत की आस्था सारी दुनिया को इस्लामी-ईसाई बनाना है। ईसाई मिशनरियां अस्पताल, स्कूल जैसी सेवाएं देकर गरीबों-बीमारों को ठगती हैं। वे हिंदू देवी-देवताओं का अपमान सिखाती हैं। गांधी जी ने हरिजन (18-07-1936) में लिखा था, ”आप पुरस्कार के रूप में चाहते हैं कि आपके मरीज ईसाई बन जाएं।” उन्होंने 1937 में फिर लिखा, ”मिशनरी सामाजिक कार्य को निष्काम भाव से नहीं करते।” स्कूल, अस्पताल बहाना हैं। मकसद मतांतरण है। इसी तरह तमाम इस्लामी संगठन भी अवैध मतांतरण में संलग्न हैं। दोनों की क्रूर कारगुजारियों का लंबा इतिहास है।
औद्योगिक समूह वस्तुओं के अपने ब्रांड का प्रचार करते हैं। अपने ब्रांड को उपयोगी बताते हैं, लेकिन धर्म, पंथ, मजहब उपभोक्ता सामग्री नहीं होते। इसी तरह पंथिक समूह राजनीतिक दल भी नहीं होते। राजनीतिक समूह अपने दल को लोक कल्याणकारी बताते हैं और दूसरे दलों को भ्रष्ट। यही काम पंथ, मजहब के प्रचारक करते हैं। वे अपने पंथ को सही और दूसरे पंथ को गलत बताते हैं। मतांतरण में जुटी शक्तियां भारतीय संविधान के अनुच्छेद 25 की आड़ में कथित पंथ प्रचार करती हैं। संविधान के उक्त प्रविधान में कहा गया है, ‘‘सभी व्यक्तियों को अंतःकरण की स्वतंत्रता और धर्म के अबाध रूप से मानने, आचरण करने और प्रचार करने का सामान हक होगा।” इसे धर्म की स्वतंत्रता और प्रचार का अधिकार कहा गया है। यहां अंतर्विरोध हैं। ‘अंतःकरण की स्वतंत्रता’ में धर्म प्रचार बाधक है। मतांतरण के मकसद खतरनाक हैं। संविधान सभा में अनुच्छेद 25 पर काफी बहस हुई थी। संविधान के मूल पाठ में धर्म की जगह रिलीजन शब्द प्रयोग हुआ है। रिलीजन और धर्म में मौलिक अंतर है। धर्म भारत के लोगों की जीवनशैली है। सभा में तजम्मुल हुसैन ने कहा था, ‘‘मैं आपसे मेरे अपने तरीके से मुक्ति पाने का आग्रह क्यों करूं? आप भी मुझसे ऐसा क्यों कहें?” सही बात है। जीवन का लक्ष्य या मुक्ति के उपाय और साधन एक पंथिक समूह द्वारा दूसरे पंथिक समूह पर नहीं थोपे जा सकते। ऐसे प्रयास सभ्य समाज पर कलंक हैं। प्रो. केटी शाह ने कहा कि ”यह अनुचित प्रभाव डालना हुआ। ऐसे बहुत उदाहरण है जहां अनुचित धर्म परिवर्तन कराए गए हैं।” लोकनाथ मिश्र ने पंथ प्रचार के अधिकार को गुलामी का दस्तावेज बताया था। उन्होंने भारत विभाजन को मतांतरण का परिणाम बताया।
वास्तव में मतांतरण से जनसंख्या के चरित्र में बदलाव आते हैं। के संथानम ने ईसाई मिशनरियों द्वारा कराए जा रहे मतांतरण पर कहा था कि ”राज्य को अनुचित प्रभाव डाल कर मतांतरण करने वालों पर कार्रवाई का पूरा अधिकार है।” संविधान सभा का बहुमत पंथ-धर्म प्रचार के वैधानिक अधिकार के विरुद्ध था। इसे देखकर केएम मुंशी ने कहा, ‘‘ईसाई समुदाय ने इस शब्द के रखने पर बहुत जोर दिया है। परिणाम कुछ भी हों, हमने जो समझौते किए हैं, हमें उन्हें मानना चाहिए।” संविधान सभा में मुंशी ने जिन समझौतों का उल्लेख किया था, आखिरकार उन समझौतों के पक्षकार कौन लोग थे? क्या तत्कालीन सरकार एक पक्षकार थी? तो दूसरा पक्ष कौन था? क्या दूसरा पक्ष संप्रभु राष्ट्र राज्य से ज्यादा प्रभावी था? अब समय आ गया है कि इस रहस्य से पर्दा उठना चाहिए। अनुच्छेद 25 पर भी नए सिरे से विचार की आवश्यकता है। इससे राष्ट्रीय क्षति हुई है। पंथ प्रचार के अधिकार से हुए लाभ-हानि पर भी विचार करने का यही सही अवसर है। पंथ प्रचार के नाम पर पंथिक, मजहबी अलगाववाद बढ़ाने की इजाजत किसी को नहीं दी जा सकती।
मध्य प्रदेश में ईसाई मतांतरणों की बाढ़ से पीड़ित तत्कालीन मुख्यमंत्री रवि शंकर शुक्ल ने न्यायमूर्ति भवानी शंकर की अध्यक्षता में एक जांच समिति बनाई थी। उस समिति ने मतांतरण के उद्देश्य से भारत आए विदेशी तत्वों को बाहर करने की सिफारिश की थी। न्यायमूर्ति एमवी रेगे जांच समिति (1982) ने भी ईसाई मतांतरणों को दंगों का कारण बताया था। वेणु गोपाल आयोग ने तो मतांतरण रोकने के लिए कानून बनाने की सिफारिश की थी। मतांतरण का प्रश्न पहली लोकसभा में ही उठा था। देश के 12 राज्यों ने मतांतरण रोकने पर कानून बनाए हैं। वे राज्य उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, झारखंड, हिमाचल प्रदेश, गुजरात, अरुणाचल प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, ओडिशा, कर्नाटक, हरियाणा एवं तमिलनाडु हैं। हाल में सर्वोच्च न्यायपीठ में इन कानूनों के विरुद्ध याचिका भी दाखिल हुई है। याचिका में मतांतरण विरोधी कानूनों को समाप्त करने की मांग की गई है। कानून विधि सम्मत हैं। संविधान (अनुच्छेद 25-2) का पुनर्पाठ आवश्यक है कि ‘‘इस अनुच्छेद की कोई बात विद्यमान विधि के प्रवर्तन पर कोई प्रभाव नहीं डालेगी और धार्मिक आचरण से संबद्ध किसी आर्थिक, वित्तीय, राजनीतिक या अन्य क्रियाकलापों का विनियमन या निर्बंधन करने वाली विधि बनाने से राज्य को नहीं रोकेगी।” राज्य विधानसभाओं ने अपनी विधायी क्षमता के आधार पर ही मतांतरण विरोधी कानून बनाए हैं। ये कानून भय, लोभ, छल से होने वाले अवैध मतांतरण रोकने के लिए ही बनाए गए हैं। वर्तमान परिस्थितियों के अनुरूप इन्हें प्रभावी रूप से लागू किए जाने की आवश्यकता है। देश भय, लोभ, छल, बल आधारित मतांतरण की क्षति बर्दाश्त नहीं कर सकता। समय की मांग है कि मतांतरण का अपराध बंद होना चाहिए।
Date:05-12-22
अपराध है नियुक्तियों में अनावश्यक देरीजगमोहन सिंह राजपूत, ( लेखक शिक्षा, सामाजिक सद्भाव एवं पंथिक समरसता के क्षेत्र में कार्यरत हैं )
केंद्र सरकार ने एक चुनाव आयुक्त की नियुक्ति की। समाचार छपा। लोगों ने मान लिया कि एक सामान्य घटना है, लेकिन व्यवस्था के छिद्रान्वेषण में निपुण किसी नागरिक ने इसमें असमान्यता ढूंढ़ ली और सर्वोच्च न्यायालय में वाद दायर किया कि इतनी तेजी क्यों? न्यायालयों में निर्णय की मंथर गति सर्वविदित है, लेकिन चुनाव आयोग नियुक्ति प्रकरण में सर्वोच्च न्यायालय ने शिकायतकर्ता की अर्जी को ध्यान से सुना और तय किया कि वह इस संबंध में हर संशय को दूर करेगा। अपने आप में संभवत: यह एकमात्र घटना होगी जब भारत का सर्वोच्च न्यायालय किसी फाइल की तेज गति के कारण सतर्क हो गया हो और इसका कारण जानना चाहे। यह सर्वस्वीकार्य है कि भारत का सर्वोच्च न्यायालय हर नागरिक से सर्वोच्च सम्मान का अधिकारी है और इस लोकतांत्रिक देश में यह सम्मान उसे मिलता है। उसे तो ऐसी किसी भी घटना का स्वतः संज्ञान लेने का अधिकार है जिसमें उसे लगे कि किसी के भी साथ अन्याय हो रहा है। इसमें संविधान के साथ हो रहा अन्याय भी शामिल है। कितना अच्छा होता कि सर्वोच्च न्यायालय पिछले कुछ महीनों से संविधान के साथ हो रहे एक घोर अन्याय का स्वतः संज्ञान लेता। क्या किसी को ऐसा कोई उदाहरण ज्ञात है कि चुनी हुई सरकार का मंत्री आपराधिक आरोप में न्यायालय द्वारा जेल भेजा जाए, लेकिन वह मंत्री पद पर बना रहे? पूर्व में महाराष्ट्र और वर्तमान में दिल्ली के मंत्रियों के साथ ऐसा हुआ है। मंत्री पद पर हुई नियुक्ति क्या अन्य हर प्रकार की नियुक्ति से अलग है? दिल्ली के मंत्री को लेकर जो स्थिति बनी है, क्या वह एक जीवंत संविधान के प्रति घोर लांछन की स्थिति निर्मित नहीं करती है? देश का वह प्रखर बौद्धिक तथा सेवानिवृत्त नौकरशाहों का वह वर्ग भी ऐसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर चुप्पी साध लेता है, जो सामान्यत: प्रधानमंत्री को सामूहिक पत्र लिखने और देश की नकारात्मक छवि निर्मित करनेवाले लेख विदेशी अखबारों में लिखने के लिए सदा तैयार रहता है।
भारत के मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्त के पद अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। देश का ध्यान उनकी तरफ जाता है। जब एक नियुक्ति को लेकर सर्वोच्च न्यायालय का ध्यान खींचा गया है, तब यह उचित ही होगा कि उन हजारों-लाखों युवाओं की ओर भी ध्यान दिया जाए, जो अपनी शिक्षा प्राप्त कर वर्षों तक नियुक्ति की प्रतीक्षा करते रहते हैं और इन प्रतीक्षा-वर्षों में हर प्रकार के संताप सहन करते हैं। पिछली सदी के छठे और सातवें दशक तक सरकारी संस्थान तथा केंद्रीय और राज्यों के लोक सेवा आयोग अपनी निष्पक्षता के लिए जाने जाते थे। पिछले दो-तीन दशकों से उनकी इस साख में लगातार गिरावट आई है। हर परीक्षार्थी भयभीत रहता है कि इस बार भी प्रश्नपत्र लीक न हो जाए। विज्ञापन के तीन-चार वर्षों तक नियुक्ति प्रक्रिया का संपन्न न हो पाना अब किसी को आश्चर्यचकित नहीं करता है। कितना अच्छा होता यदि सर्वोच्च न्यायालय इसका स्वत: संज्ञान लेकर इन कुप्रवृत्तियों को रोकने के उपाय देश को बताता और उसे लागू कराता। चूंकि अब न्यायपालिका विधायिका में हुई नियुक्तियों में तेजी पर चिंतित हो रही है तो उसे स्कूलों और विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्तियों में हो रही घनघोर देरी के लिए भी स्वतः संज्ञान लेकर आदेश पारित करना चाहिए। विश्वविद्यालयों में प्राध्यापकों के दशकों तक पद रिक्त रहने से देश की बौद्धिक संपदा को हो रही अकूत हानि से माननीय न्यायालय अपरिचित तो नहीं होगा। दूसरी ओर केरल में हर मंत्री को बीस से अधिक सहायक सरकारी खर्चे पर नियुक्त करने का अधिकार है, जो दो वर्ष बाद पेंशन के लिए अधिकृत हो जाते हैं। क्या यह स्वतः संज्ञान लेने लायक प्रकरण नहीं है?
आज विश्व ज्ञान समाज में प्रवेश कर चुका है। प्रत्येक देश जानता है कि उसका विकास और प्रगति सीधे तौर पर उसकी अपनी बौद्धिक संपदा पर निर्भर है। भारत अपने उच्च शिक्षा प्राप्त और शोध में प्रशिक्षित लाखों युवाओं के साथ इतना बड़ा अन्याय कैसे कर सकता है? 24-25 वर्ष के युवा के अपने सपने होते हैं। परिवार की उससे कितनी ही अपेक्षाएं होती हैं। उसके सामने परिवार द्वारा उसे शिक्षित करने में उठाए गए कष्टों का बोझ भी होता है। अब ऐसे युवा की मनोदशा की कल्पना करना कठिन नहीं होना चाहिए। उसकी तुलना में उस युवा को लीजिए जिसने अपनी शोध उपाधि प्राप्त करने के तुरंत बाद नियमित नियुक्ति पा ली हो, करियर की अनिश्चितता से मुक्त हो गया हो, अपनी प्रोन्नति के बारे में सोचना प्रारंभ कर दिया हो और उसके लिए अपने योगदान की गुणवत्ता बढ़ाने में निष्ठापूर्वक लग गया हो। उसके लिए अगले आठ साल में एसोसिएट प्रोफेसर तथा तीन साल बाद प्रोफेसर बनाने का प्रविधान है। यह इसीलिए किया गया है कि संस्थाओं में सशक्त कार्य संस्कृति बने, शोध और नवाचार के लिए एक कर्मठ और निष्ठावान युवावर्ग देश के हर उच्च शिक्षा संस्थान में कार्यरत हो। क्या हम नियमों, उपनियमों और कार्य संस्कृति के समक्ष इतना निरीह हो गए हैं कि दो-दो दशकों तक विशिष्ठ ज्ञान केंद्रों को भी ऐसे तदर्थ नियुक्त युवाओं के हाथ में छोड़ दें, जो चौबीसों घंटे अपने कल की चिंता में तनाव ग्रस्त बने रहने को बाध्य हों? एक व्यक्ति की नियुक्ति कितने ही लोगों पर प्रभाव डालती है। उसमें अनावश्यक देरी अक्षम्य अपराध माना जाना चाहिए। एक अध्यापक की नियुक्ति पीढ़ियों पर प्रभाव डालती है। सतर्क व्यवस्था तो वही होगी जो पद रिक्त होने के पहले ही नियुक्ति की प्रक्रिया पूरी कर ले। पद चाहे भारत के मुख्य न्यायाधीश का हो, चुनाव आयुक्त का हो या सरकारी स्कूल के अध्यापक का।
Date:05-12-22
बढ़ती आबादी, गहराता खाद्य संकटरवि शंकर
दुनिया की आबादी आठ अरब को पार कर चुकी है। मात्र तेईस साल की अवधि में दुनिया की आबादी दो अरब बढ़ गई। आने वाले दशकों में क्षेत्रीय असमानताओं के साथ जनसंख्या बढ़ती रहेगी। संयुक्त राष्ट्र के मुताबिक 2030 तक यह आबादी साढ़े आठ अरब, 2050 तक 9.7 अरब और 2100 तक 10.4 अरब तक पहुंच सकती है। आबादी के मामले में भारत अगले साल तक चीन को पीछे छोड़ देगा। वह पहले नंबर का सबसे बड़ी आबादी वाला देश हो जाएगा। भारत की जनसंख्या अभी 1.04 फीसद की सालाना दर से बढ़ रही है। अहम सवाल यह है कि जिस रफ्तार से जनसंख्या बढ़ रही है, इतनी बड़ी जनसंख्या का आने वाले समय में पेट कैसे भरा जाएगा। क्योंकि जलवायु परिवर्तन न सिर्फ आजीविका, जल आपूर्ति और मानव स्वास्थ्य के लिए खतरा, बल्कि खाद्य सुरक्षा के लिए भी चुनौती खड़ी कर रहा है। दुनिया के अधिकांश देश आज जिन चुनौतियों का सामना कर रहे हैं, उनमें खाद्य सुरक्षा सबसे बड़ी चुनौती है।
आज जिस तरह विश्व की आबादी बढ़ रही है, उसी हिसाब से प्राकृतिक संसाधनों पर भी स्पष्ट रूप से दबाव पड़ रहा है। आज पूरी दुनिया के लिए बढ़ती आबादी और सिकुड़ते संसाधन एक अभिशाप हैं, क्योंकि जनसंख्या के अनुपात में संसाधन सीमित हैं। यही वजह है कि करीब आठ अरब की आबादी का बोझ ढोती यह पृथ्वी जनसंख्या से पैदा हुई अनेक समस्याओं के निदान की बाट जोह रही है। पूरी दुनिया की आबादी में अकेले एशिया की इकसठ फीसद हिस्सेदारी है। यही भारत को दुनिया की महाशक्ति बनने में सबसे बड़ी बाधा है। फिलहाल भारत की जनसंख्या विश्व जनसंख्या का अठारह फीसद है। भूभाग के लिहाज के हमारे पास 2.5 फीसद जमीन और चार फीसद जल संसाधन है। ऐसे में तेजी से बढ़ती जनसंख्या देश की सामाजिक-आर्थिक समस्याओं की जननी बन कर देश के सामने खतरे की घंटी बन सकती है। आज जनसंख्या वृद्धि देश की हर समस्या का मूल कारण बनती जा रही है। गरीबी, भुखमरी, बेरोजगारी, अशिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएं, अपराध, स्वच्छ जल की कमी आदि के पीछे भी जनसंख्या वृद्धि एक बड़ा कारण है। इतना ही नहीं, देश में जमीन के कुल साठ फीसद हिस्से पर खेती होने के बावजूद करीब बीस करोड़ लोग भुखमरी का शिकार हैं। साफ है, जनसंख्या विस्फोट से संसाधनों की अपर्याप्तता के कारण उत्पन्न हुई समस्याओं का असर सब पर पड़ रहा है। चाहे वह किसी भी धर्म या जाति का हो।
अभी भारत की आबादी 1.39 अरब है। बढ़ती जनससंख्या के चलते कृषि योग्य भूमि पर भी अतिक्रमण हो रहा है। खेती योग्य जमीन घट रही है, खाने वाले लोग बढ़ रहे हैं। ऐसे में सभी के लिए कृषि से भोजन उपलब्ध कराना एक नई चुनौती होगी। यह विडंबना ही है कि आजादी के बाद देश खाद्यान्न के मामले में पूरी तरह आत्मनिर्भर नहीं हो पाया है, बल्कि आज कृषि भूमि के अन्य उपयोगों में तेजी से परिवर्तन हो रहा है, किसान कृषि से दूर हो रहे हैं, जिससे भारत में खाद्य सुरक्षा के लिए खतरा बढ़ सकता है। कृषि भूमि का ह्रास भारत के सामाजिक-आर्थिक ताने-बाने को भी प्रभावित कर रहा है। हालांकि, इस दौरान सरकार द्वारा बंजर भूमि को कृषि योग्य भूमि में बदलने में कुछ सफलता मिली है, बावजूद इसके, यह भी एक तथ्य है कि हमारे देश में खेती योग्य भूमि साल-दर-साल घट रही है।
‘वेस्टलैंड एटलस 2019’ के मुताबिक, पंजाब जैसे कृषिप्रधान राज्य में चौदह हजार हेक्टेयर और पश्चिम बंगाल में बासठ हजार हेक्टेयर खेती योग्य भूमि घट गई है। वहीं, सबसे अधिक आबादी वाले राज्य उत्तर प्रदेश में यह आंकड़ा सबसे अधिक खतरनाक लग सकता है, जहां हर साल विकास कार्यों पर अड़तालीस हजार हेक्टेयर कृषि भूमि घटती जा रही है। गौरतलब है कि 1992 में ग्रामीण परिवारों के पास 11.7 करोड़ हेक्टेयर भूमि थी, जो 2013 तक घट कर केवल 9.2 करोड़ हेक्टेयर रह गई। जाहिर है कि महज दो दशक में 2.2 करोड़ हेक्टेयर भूमि ग्रामीण परिवारों के हाथ से निकल गई। अगर यही सिलसिला जारी रहा तो कहा जा रहा है कि अगले साल तक भारत में खेती का रकबा आठ करोड़ हेक्टेयर ही रह जाएगा।
यह ठीक है कि जनसंख्या नियंत्रण के नाम पर कई योजनाएं बनीं, मगर वे सफल नहीं हो सकीं। जनसंख्या के लिए एक राष्ट्रीय नीति बहुत जरूरी है। बेतहाशा बढ़ती जनसंख्या देश के विकास को प्रभावित कर रही है। बड़ी जनसंख्या तक योजनाओं के लाभों का समान रूप से वितरण संभव नहीं हो पाता, जिसकी वजह से हम गरीबी और बेरोजगारी जैसी समस्याओं से दशकों बाद भी उबर नहीं सके हैं। जाहिर है कि अगर आबादी बढ़ती है, तो गरीबों की संख्या में वृद्धि होना स्वाभाविक। वैशविक भुखमरी सूचकांक 2022 की रिपोर्ट के मुताबिक, भारत में 16.3 फीसद आबादी कुपोषित है। पांच साल से कम उम्र के 35.5 प्रतिशत बच्चे अविकसित हैं। भारत में 3.3 प्रतिशत बच्चों की पांच साल की उम्र से पहले ही मौत हो जाती है। खाद्य एवं कृषि संगठन (एफएओ) की ‘द स्टेट आफ फूड सिक्युरिटी एंड न्यूट्रिशन इन द वर्ल्ड’ रिपोर्ट के अनुसार दुनिया भर में अस्सी करोड़ से ज्यादा लोग भुखमरी से जूझ रहे हैं। दूसरे शब्दों में कहें तो दुनिया का हर दसवां शख्स भूखा है। इतना ही नहीं, अब भी दुनिया में स्वस्थ आहार 310 करोड़ लोगों की पहुंच से बाहर है। साफ है कि दुनिया भर में तमाम कार्यक्रमों और संयुक्त राष्ट्र की कोशिशों के बावजूद खाद्य असमानता और कुपोषण को अभी तक खत्म नहीं किया जा सका है। खाद्य और कृषि संगठन के मुताबिक, इसका एक बड़ा कारण देशों के बीच संघर्ष, जलवायु परिवर्तन और आर्थिक मंदी है। कोरोना महामारी ने इस अंतर को और बढ़ाया है।
बढ़ती आबादी की वजह से ही दुनिया भर में तेल, प्राकृतिक गैस, कोयला आदि ऊर्जा संसाधनों पर दबाव बढ़ गया है, जो भविष्य के लिए बड़े खतरे का संकेत है। भले हम विकास का दम भरते रहें, पर सच यह है कि दुनिया भर में भुखमरी का गंभीर संकट मंडरा रहा है। अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन का कहना है कि खाद्य समस्या का मुख्य कारण सिर्फ खाद्य पदार्थों का अभाव नहीं, बल्कि लोगों की क्रयशक्ति में कमी है। वहीं दूसरी तरफ, एक आकलन के अनुसार पूरी दुनिया में तीस फीसद अनाज बर्बाद हो जाता है। किसान भी आबादी के अनुपात में अनाज का उत्पादन नहीं कर पा रहा है। महंगाई बढ़ने का यह एक बड़ा कारण है। ऐसे में दुनिया की बड़ी आबादी को भुखमरी से बाहर निकालने के लिए सामूहिक प्रयास की जरूरत है।
जनसंख्या नियंत्रण और खाद्य उत्पादन में वृद्धि को लेकर विचार करने की आवश्यकता केवल भारत नहीं, संपूर्ण विश्व को है। इन दोनों समस्याओं के समाधान के लिए विश्व स्तर पर अभिनव प्रयास जारी हैं। भारत विश्व के उन देशों में है जहां खाद्यान्न की प्रति व्यक्ति उपज बेहद कम है। यहां अमीर वर्ग मध्यवर्ती किसान और व्यापारी ही पर्याप्त और उपयुक्त भोजन प्राप्त कर पाते हैं। शेष ग्रामीण, मजदूरों, लघु कृषकों, आदिवासियों मध्यवर्गीय लोगों के समक्ष अन्न की समस्या बढ़ती जा रही है। जमीन की उर्वरता बढ़ाने के लिए पशुपालन और अनाज के स्थान पर साग-सब्जी का उत्पादन तथा सेवन ऐसा उपाय है, जिसके सहारे समाधान बहुत हद तक संभव है। सरकार द्वारा परिवार नियोजन और खाद्यान्न उत्पादन के लिए कार्यक्रम क्रियान्वित किया जाना चाहिए।
Date:05-12-22
छोटे शहरों की चिंता ज्यादा जरूरी हैडॉ. भीम सिंह भवेश
पर्यावरण प्रदूषण आज गंभीर वैश्विक समस्या का रूप अख्तियार कर चुका है। खासकर छोटे शहरों में प्रदूषण की चाल–ढाल अब डराने लगी है। ‘कोढ़ में खाज’ यह कि इन द्वितीयक और तृतीयक शहरों के गैस चेंबर बनने को लेकर किसी को रत्ती भर भी चिंता नहीं हो रही है। कहीं से कोई आवाज नहीं उठ रही है‚जबकि आंकड़े चीख–चीखकर भयावहता का प्रदर्शन कर रहे हैं। इसकी वजह से प्रति वर्ष 90 लाख लोग असमय काल कवलित हो रहे हैं। इनमें भारत से करीब 24 लाख होते हैं। यदि इस तरफ सचेत नहीं हुए तो दिन दूर नहीं जब भौतिक उपलब्धियों की होड़ में हम एक बीमार देश की संरचना करना शुरू कर देंगे।
प्रत्येक वर्ष सर्दियों में पर्यावरण और स्वास्थ्य के हालात को देखते हुए‚ सिंधु–गंगा के मैदानी इलाकों (इंडो–गैंगेटिक प्लेन) का मानिचत्र लाल रंग से रंग जाता है‚जिसका कारण सर्दी के मौसम में वायु प्रदूषण खतरनाक स्तर पर पहुंचना है। आमतौर पर दिल्ली सबसे ज्यादा खबरों में रहती है और इस समस्या का केंद्र भी यही होती है‚लेकिन यह कहानी अकेले दिल्ली की नहीं है। यह उत्तर भारत के विस्तृत भू–भाग में रहने वाले लोगों को जहरीली हवा के दुष्प्रभावों से होने वाले खतरों के बारे में है। सिंधु–गंगा के मैदानी इलाकों में सिरसा‚जींद‚करनाल‚भटिंडा‚मेरठ‚लखनऊ‚वाराणसी‚पटना‚ गया और पश्चिम बंगाल के शहर हैं (देखें‚खतरे का बढ़ता दायरा‚)। इन शहरों में पीएम 2.5 के वार्षिक औसत स्तर और 24 घंटे के अधिकतम औसत का त्वरित मूल्यांकन दर्शाता है कि दिल्ली की तुलना में पीएम 2.5 के काफी कम वार्षिक औसत स्तर वाले शहरी इलाकों में रोजाना ज्यादा धुंध होने की संभावना है। यह धुंध की घटनाओं को रोकने और वायु प्रदूषण को कम करने की जरूरत को दर्शाता है। वायु प्रदूषण की खतरनाक और भ्रामक प्रकृति भारत के अन्य क्षेत्रों में भी दिखाई देती है। कुछ ऐसा ही हाल बिहार के कई जिलों का है जहां वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) देश के सर्वाधिक खतरनाक शहरों के समतुल्य पहुंच गया है। 26 नवम्बर‚2022 को बिहार एक्यूआई रिपोर्ट के मुताबिक तीन जिलों दरभंगा (421)‚ सिवान (401) और पूर्णिया (381) का ‘खतरनाक’ जबकि बेतिया‚भागलपुर‚बिहार शरीफ‚बक्सर‚छपरा‚कटिहार‚मोतिहारी‚मुजफ्फरपुर‚सहरसा एवं समस्तीपुर का ‘बहुत खराब’ रहा। विदित हो कि एक्यूआई रिमार्क 0 से 50 ‘अच्छा’‚ 51 से 100 ‘ठीक है’‚ 101 से 2000 ‘अच्छा नहीं’‚ 201 से 300 ‘खराब’‚ 301 से 400 ‘बहुत खराब’ और 401 से 500 तक का वायु गुणवत्ता सूचकांक ‘खतरनाक’ श्रेणी का रिमार्क है। वैज्ञानिकों का मानना है कि अगले 50 वर्षों तक प्रदूषण की यही गति बनी रही तो पृथ्वी का विनाश हो सकता है। विकास पदार्थों की बढ़ती मात्रा‚ जनसंख्या वृद्धि‚ वृक्षों की कटाई‚ कृषि एवं औद्योगिक पदार्थों के निपटान के विकल्पों की कमी‚ शहरीकरण‚ खनन और बदलती जीवन शैली प्रदूषण को खाद–पानी दे रहे हैं। तेजी से बढ़ते रेफ्रिजिरेटर और एयर कंडीशनर के उपयोग के कारण फ्रियोन और क्लोरो फ्लोरो कार्बन (सीएफसी) गैस भी अपना कुप्रभाव तेजी से बढ़ा रही हैं। प्रदूषण की समस्या से आज समूचा विश्व चिंतित है। इस पर नियंत्रण के प्रयासों की चर्चा जोर–शोर से हो रही है‚ परंतु तेजी से बढ़ते प्रदूषण को नियंत्रित करने के निमित्त सरकारी और सामाजिक प्रयास नाकाफी सिद्ध हुए हैं। लिहाजा अब सरकारों को भूमि‚ जल‚ वन‚ वायु इत्यादि के अनियंत्रित दोहन पर रोक लगानी चाहिए ताकि पर्यावरण बच सके। उद्योगों द्वारा फैलाए जाने वाले प्रदूषण‚ जनसंख्या वृद्धि‚ गंदी बस्तियों के विस्तार आदि को रोकना होगा। वृक्षारोपण के लिए लोगों में जागरूकता पैदा करनी होगी। फैक्टरियों से निकलने वाले धुएं को रोकने के लिए चिमनियों में ऐसे यंत्र लगाए जाने चाहिए जिससे घातक गैसें तथा धुएं को वहीं कार्बन के रूप में रोक लिया जाए। खतरनाक रसायनों को नदियों में डालने की बजाय ऐसे तरीके से नष्ट किया जाए जिससे नदियों का पानी प्रदूषित न होने पाए। वाहनों से निकलने वाली गैसों पर नियंत्रण रखने के लिए उनमें फिल्टर का उपयोग अनिवार्य कर दिया जाए। आण्विक विस्फोटों पर भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अंकुश लगा दिया जाना चाहिए।
सौर ऊर्जा जनसाधारण के लिए सुलभ कराई जाए जिससे प्रदूषण कम किया जा सके। मानव व पशु संख्या पर प्रभावी नियंत्रण लगाया जाना चाहिए। मूलभूत आर्थिक क्रियाकलाप की विविधता के लिए प्राकृतिक सजीव संसाधनों के प्रबंध को उच्च प्राथमिकता देनी होगी‚ लेकिन भूमि व जल प्रबंधन पर ध्यान दिए बगैर इसकी व्यवस्था करना नुकसानदेह होगा। व्यावसायिक इकाइयां प्रदूषण रोकने के लिए निर्देशित वर्जनाओं का पालन करें। भले ही ये कदम खर्चीले या दंडात्मक ही क्यों न हों। क्योंकि जीवन से अधिक व्यवसाय महत्वपुर्ण नहीं है। जीवन बचेगा तो व्यवसाय होगा। प्रदूषण रोकने के लिए हर स्तर पर जागरूकता एवं इस क्षेत्र में बेहतर कार्य करने वाले व्यक्तियों और संस्थाओं को प्रोत्साहित भी किया जाए।
Date:05-12-22
कैसे मिलेगा डाटा क्रांति का पूरा फायदाहरजिंदर, ( वरिष्ठ पत्रकार )
तीन साल पहले हार्वर्ड विश्वविद्यालय की प्रोफेसर शुशाना जुबॉफ ने एक किताब लिखी- द एज ऑफ सर्विलांस कैपिटलिज्म। इस किताब में उन्होंने सूचना युग के पूंजीवाद की एक नई व्याख्या दी थी। इसके पहले की व्याख्याएं बहुत सारी हैं, लेकिन शुशाना ने अपनी बात जिस व्याख्या से शुरू की, वह थी कार्ल मार्क्स की व्याख्या। मार्क्स मानते थे कि पूंजीवाद मानव श्रम का शोषण कर उसे संपत्ति में बदल देता है। शुशाना ने इसी को आधार बनाते हुए आधुनिक पूंजीवाद को अलग तरह से परिभाषित किया। इस किताब में वह कहती हैं कि संचार युग का पूंजीवाद लोगों के डाटा और उनकी निजता का शोषण करके उसे संपत्ति में बदलता है।
यह वह परिभाषा है, जिससे हम गूगल और फेसबुक जैसी कंपनियों को बहुत आसानी से समझ सकते हैं। इन कंपनियों ने न तो कोई बहुत बड़ी फैक्टरियां लगाईं और न ही भारी संख्या में मजदूर या अन्य कर्मचारी रखे। न कच्चा माल खरीदा गया, न उत्पादन हुआ और न ही बाजार में बेचने के लिए कोई उत्पाद तैयार हुआ। मगर बहुत ही कम समय में उन्होंने इतनी संपत्ति अर्जित कर ली कि आज उनकी गिनती दुनिया की बड़ी कंपनियों में होती है। हमारे कंप्यूटरों और मोबाइल फोन से हर क्षण निकलने वाला डाटा उनके लिए इतनी बड़ी सोने की खान साबित हुआ कि सचमुच में सोने का खनन करने वाली कंपनियों की चमक भी उनके सामने फीकी पड़ गई।
हालांकि, इस किताब से भी दो दशक पहले दुनिया को यह बात समझ में आने लगी थी कि डाटा ही भविष्य की पूंजी है और भविष्य की कारोबारी इमारतें इसी नींव पर खड़ी की जाएंगी। वे खड़ी भी हुईं। वह भी मजबूती से। गूगल उसी दौर की उपज है, फेसबुक हालांकि कुछ बाद में आया। उसके बाद से तो पूरी दुनिया में डाटा आधारित सफल कारोबारों और कारोबारियों की कतार ही बंध गई। इसके साथ ही डाटा की मिल्कियत और निजता के अधिकार को लेकर कई तरह के विमर्श भी तकरीबन हर जगह चल रहे हैं।
मगर दो दशक के बाद भी भारत में अभी तक हम यह तय नहीं कर सकें कि हमें अपने डाटा का क्या करना है? देश के तमाम नीति नियामक पिछले पांच साल से इसी कवायद में व्यस्त हैं कि किसी तरह निजी डाटा संरक्षण विधेयक को अंतिम रूप दिया जाए, लेकिन इसमें कामयाबी नहीं हासिल हो रही। इसका जो पहला मसौदा बना, उसमें राष्ट्रवाद का तर्क देते हुए यह व्यवस्था की गई थी कि सभी को देश के लोगों का डाटा देश के सर्वरों में ही रखना होगा और उसे बाहर जाने की इजाजत नहीं दी जा सकती। मगर बाद में समझ आया कि इंटरनेट के जरिये पूरी दुनिया जिस तरह से आपस में जुड़ चुकी है, उसमें व्यावहारिक रूप से यह बहुत संभव नहीं है। अब इस विधेयक का जो नया मसौदा पेश किया गया है, उसमें से इस अनिवार्यता को विदा कर दिया गया है। मगर नए मसौदे में बहुत सारे पेच ऐसे हैं, जिनसे न तो उद्योग जगत खुश है और न ही नागरिक अधिकार संगठन। एक की उम्मीदों पर यह अभी खरा नहीं उतर रहा और दूसरे को लग रहा है कि लोगों की निजता को बचाने की संवेदनशीलता इसमें नदारद है। अभी चंद रोज पहले ही जारी हुए इस मसौदे की खामियों पर इतना कुछ कहा और लिखा जा चुका है कि उसे जोड़कर कई पोथे तैयार हो सकते हैं।
यह सब तब हो रहा है, जब भारत को दुनिया में डाटा की सबसे उपजाऊ भूमि कहा जा रहा है। चीन के बाद भारत दुनिया का दूसरा ऐसा देश है, जहां मोबाइल फोन की संख्या एक अरब को पार कर चुकी है। इसमें एक बड़ी संख्या स्मार्टफोन की है। स्मार्टफोन एप डाउनलोड के मामले में भी भारत दुनिया में दूसरे नंबर पर है। गूगल, फेसबुक, यू-ट्यूब, इंस्टाग्राम, लिंक्डइन, ट्रू-कॉलर जैसे एप के लिए भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा बाजार है। भारत के दुनिया की तीसरी बड़ी अर्थव्यवस्था बनने को लेकर अभी बहुत सारी किंतु-परंतु हैं, लेकिन सोशल मीडिया की सदस्यता के मामले में यह बहुत पहले दूसरे नंबर पर पहुँच चुका है।
जाहिर है, जिन देशों में इस समय सबसे ज्यादा डाटा तैयार हो रहा है, उनमें भारत बहुत आगे पहुँच चुका है। मगर सच यह है कि यह डाटा अभी तक सिर्फ कच्चा माल है, जो भारत से बाहर की कंपनियों के हवाले हो रहा है। डाटा अगर नए दौर की पूंजी है, तो यह पूंजी हमारे पास पर्याप्त मात्रा में मौजूद है, लेकिन इससे जो पूंजीवाद मजबूत हो रहा है, उसकी इमारत फिलहाल भारत के बाहर बुलंद है।
ठीक यहीं पर डाटा संरक्षण का कानून हमारे लिए महत्वपूर्ण हो जाता है। पांच साल पहले जब इसके लिए बीएन श्रीकृष्णा की अध्यक्षता में एक विशेषज्ञ समिति का गठन हुआ था, तो कई उम्मीदें बांधी गई थीं। उद्योग जगत को उम्मीद थी कि इससे देसी डाटा पूंजीवाद जड़ें पकड़ेगा, जबकि नागरिकों को उम्मीद थी कि उनकी संवेदनशील जानकारियों का दोहन नहीं होगा। यह भी उम्मीद की जा रही थी कि जैसे यूरोपीय संघ ने निजता के अधिकार को मौलिक अधिकार बना दिया है, कुछ वैसे ही प्रावधान यहां भी किए जाएंगे। मगर विधेयक के पहले मसौदे में ऐसा कुछ नहीं दिखा। जब इसे लोकसभा में रखा गया, तो यह वहां से संयुक्त संसदीय समिति के पास पहंुच गया। समिति ने इसमें 81 संशोधन सुझाए और 12 अन्य सिफारिशें की। नतीजा यह हुआ कि सरकार ने विधेयक को ही वापस ले लिया। अब जो नया मसौदा तैयार हुआ है, वह भी किसी को संतुष्ट करता नहीं दिख रहा। जो काम कई साल पहले हो जाना चाहिए था, वह अब भी आम सहमति लायक मसौदे का इंतजार कर रहा है।
विश्व उद्योग जगत की एक के बाद एक कई क्रांतियों में हम पिछड़े हैं। पहली और दूसरी औद्योगिक क्रांति के समय भारत गुलाम था, इसलिए पिछड़ जाने पर कोई आश्चर्य नहीं। मगर इसके बाद हम उस तीसरी औद्योगिक क्रांति में भी पीछे रह गए, जब दुनिया ने सेमीकंडक्टर से कंप्यूटर तक का सफर तय किया। इसके बाद हुई संचार क्रांति में हमने एक छोटी भूमिका जरूर निभाई, लेकिन चीन या कोरिया की तरह हम अगली पांत में कभी नहीं पहुँच पाए। ऐसे में, थोड़ा सा और चूके, तो हम डाटा क्रांति का पूरा फायदा उठाने में भी नाकाम रहेंगे।
Date:05-12-22
घटती आर्थिक असमानता से बावजूद सता रही गरीबीहिमांशु, ( एसोसिएट प्रोफेसर, जेएनयू )
अभी यह बहस गरम है कि पिछले एक दशक में गरीबी की क्या स्थिति रही? यह एक स्वाभाविक जिज्ञासा है, विशेषकर यह देखते हुए कि इस दशक में नीतिगत और प्राकृतिक, दोनों घटनाएं घटित हुईं। साल 2014 और 2015 सूखे की भेंट चढ़ गए, फिर नोटबंदी हुई, उसके बाद जीएसटी लागू किया गया और अंत में कोरोना-संक्रमण; अर्थव्यवस्था पर इन सबका स्पष्ट प्रभाव पड़ा और औसत विकास दर पिछले तीन दशकों में सबसे कम हो गई। इसमें आखिर क्या नफा और कितना नुकसान हुआ? जहां तक गरीबी उन्मूलन का सवाल है, तो इस मोर्चे पर पिछले दशक में हमें कामयाबी नहीं मिली, पर आर्थिक विषमता घटाने में हम जरूर सफल हुए हैं।
राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय द्वारा जारी उपभोग व्यय का आंकड़ा असमानता मापने का आधार रहा है। मगर 2011-12 के बाद उपभोग सर्वेक्षण न होने के कारण इस बाबत ठीक-ठीक बता पाना मुश्किल है। 2017-18 का पिछला सर्वेक्षण सरकार ने बिना कोई ठोस वजह बताए खारिज कर दिया था। मगर इसकी लीक हुई सूचनाएं बता रही थीं कि 2011-12 और 2017-18 के दरम्यान देश में गरीबी बढ़ी है। आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण (पीएलएफएस) के आंकड़ों ने 2017-18 के बाद उपभोग व्यय व श्रमिक आय में गिरावट की बात कही थी। खपत सर्वेक्षण के आंकड़ों से भी पता चला था कि नाममात्र ही सही, लेकिन असमानता कम हुई है। असमानता को मापने का एक मापक गिनी भी है। गांवों में 2011-12 की 28.7 की तुलना में 2017-18 में गिनी गुणांक 25.8 था, जबकि शहरों में इसी अवधि के दौरान यह गुणांक 36.7 से घटकर 32.9 हो गया। पूंजीगत असमानता को आंकने वाले अखिल भारतीय ऋण और निवेश सर्वेक्षण (एआईडीआईएस) ने भी इसकी पुष्टि की है। उसने भले ही खपत व पीएलएफएस सर्वेक्षणों की तरह तेज गिरावट नहीं दिखाई, लेकिन यह बताया कि 2019 में संपत्ति में असमानता नहीं बढ़ी है या 2012 के स्तर पर स्थिर है। हां, कुछ निजी सर्वे बता रहे हैं कि असमानता बढ़ी है, लेकिन इनमें वृद्धि बहुत मामूली जान पड़ती है।
इससे यही समझ आता है कि इस अवधि में असमानता घटी है, जबकि गरीबी बढ़ने के पर्याप्त सुबूत हैं। हालांकि, ऐसा क्यों हुआ, इस पहेली की कोई स्पष्ट व्याख्या नहीं है। ऐसा नहीं है कि अमीरों की आमदनी छिटककर गरीबों के हिस्से में जाने या गरीबों की आमदनी अपेक्षाकृत तेजी से बढ़ने के कारण आर्थिक असमानता घटी है, बल्कि इसकी वजह मध्यवर्ग और संपन्न तबके की आय में आई गिरावट है। अर्थव्यवस्था में आई सुस्ती भी इसी की तस्दीक करती है, जिसने न केवल गरीबों को प्रभावित किया है, बल्कि अमीरों की आय के तमाम पहलुओं पर भी गहरा असर डाला है। पीएलएफएस के आंकड़े साफ बता रहे हैं कि नियमित श्रमिकों की कमाई दिहाड़ी मजदूरों की तुलना में तेजी से कम हुई है।
संभावना इस बात की भी है कि आर्थिक मुश्किलों से टकराने के मामले में गरीब कहीं अधिक बेहतर स्थिति में थे, क्योंकि पिछले दो दशकों में भारत में सामाजिक सुरक्षा का आधार व्यापक हुआ है। दरअसल, राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के लागू होने और महामारी के दौरान दिए जाने वाले मुफ्त राशन के बाद जन-वितरण प्रणाली का भी विस्तार हुआ है। यहां तक कि ग्रामीण रोजगार गारंटी जैसी योजनाओं ने भी गरीबों को मुश्किल वक्त से पार पाने में मदद की है। कहा जा सकता है कि कल्याणकारी उपायों से बेशक गरीबों को बुनियादी सुरक्षा मिली,पर मध्यवर्ग की आय कम होने से घटी विषमता आर्थिक विकास की स्थिरता पर सवाल उठाती है।
ऐसे तथ्य भी हैं, जो बताते हैं कि गैर-जरूरी खर्च में कमी के कारण अर्थव्यवस्था में मांग की स्थिति कमजोर हुई है। यह न सिर्फ आर्थिक सुस्ती की एक वजह बनी, बल्कि इसने विकास के फिर से तेज होने की राह भी कमजोर की। यदि स्थिति यही रही, तो व्यापक आर्थिक सुधार की दिशा में हमें मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है। गरीबों के लिए सामाजिक सुरक्षा का जाल जरूर मजबूत होना चाहिए, पर भारत में आर्थिक सुधार की कोई भी कवायद विशाल मध्यमवर्ग की क्रय-शक्ति को बेहतर बनाए बिना अधूरी साबित होगी।
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हाल ही में मद्रास उच्च न्यायालय में एक याचिका दायर की गई है, जिसमें शिक्षा को राज्य सूची से हटाकर समवर्ती सूची में स्थानांतरित किए जाने को चुनौती दी गई है। संविधान के 42वें संशोधन (जिसे ‘मिनी कांस्टीट्यूशन’ के नाम से भी जाना जाता है) अधिनियम के द्वारा शिक्षा को राज्य सूची से हटाया गया था। तब से लेकर आज तक शिक्षा के क्षेत्र में अनेक महत्वपूर्ण बदलाव किए जा चुके हैं।
कुछ अन्य कारण –
विवादास्पद बिंदु यह है कि कोई भी इकाई पूर्ण नियंत्रण का दावा नहीं कर सकती है। यह एक विविधरंगी पारिस्थितिकी तंत्र है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा तक पहुंच अभी भी एक बड़ा मुद्दा है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति में शिक्षा पर संयुक्त सरकारी व्यय के 6% के लक्ष्य के विरूद्ध 2021-22 के जीडीपी में 3% का ही बजट था। राज्यों को चाहिए कि वे इस हेतु केंद्र सरकार पर दबाव बनाएं।
दूसरी ओर शिक्षा को राज्य सूची में शामिल करने से शिक्षा पर खर्च बढ़ाने की केंद्र की जरूरत कम हो सकती है। लेकिन साथ ही राज्य सरकारें भी अपने आप से पूछें कि राज्य के विश्वविद्यालयों और स्कूलों को कम छात्र क्यों मिल रहे है, जबकि केंद्रीय शिक्षण संस्थानों में लंबी लाइन है। गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना ही सरकारों का परम लक्ष्य होना चाहिए।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 10 नवबंर, 2022
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Today's Daily Audio Topic-"चुनाव आयुक्त की नियुक्ति (1)"
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25-11-2022 (Important News Clippings)
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Today's Life Management Audio Topic-"रुचियों को पूरा करना"
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Today's Daily Audio Topic-"राज्यपालों के दौरे"
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24-11-2022 (Important News Clippings)
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Today's Life Management Audio Topic-"रुचियां और क्षमता"
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भारत में बढ़ते मध्य-वर्ग से जुड़े कुछ तथ्य
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Today's Daily Audio Topic-"भारत-ऑस्ट्रेलिया मुक्त व्यापार समझौता"
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23-11-2022 (Important News Clippings)
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Today's Life Management Audio Topic-"क्षमता के बीज"
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ईरान के निरंकुश प्रशासन के विरोध का संदेश
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Today's Daily Audio Topic-"वर्तमान वैश्विक परिदृश्य"
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22-11-2022 (Important News Clippings)
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Today's Life Management Audio Topic-"अनुमान भी विज्ञान है"
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टू-फिंगर टेस्ट पर प्रतिबंध लगाना ही पर्याप्त नहीं है
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21-11-2022 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"COP 27 सम्पन्न"
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Today's Life Management Audio Topic-"स्वयं को जानना जरूरी"
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कुरुक्षेत्र : विज्ञान और तकनीक से बदलती गाँवों की तस्वीर
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19-11-2022 (Important News Clippings)
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Kurukshetra : Technology and Innovation in Rural Economy
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Yojana Magazine : Indian Coastal Community and Climate Change
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उत्तर लिखने के अभ्यास के लिए प्रश्न - 385
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18-11-2022 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"नगरीय निकायों की वित्तीय स्थिति"
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Today's Life Management Audio Topic-"सब कुछ संभव नहीं है"
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महिला क्रिकेटरों को मिली वेतन समानता
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17-11-2022 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"जी-20 की अध्यक्षता"
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Today's Life Management Audio Topic-"असंतोष का भाव"
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भारतीय कृषि को जीएम फसलों की नियामकीय अनुमति की जरूरत
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16-11-2022 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"भारतीयता की तलाश"
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Today's Life Management Audio Topic-"भगवान"
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वैल्थ फ्रॉम वेस्ट (धान के ठूंठ से लाभ)
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Today's Daily Audio Topic-"कुछ महत्वपूर्ण खबरें"
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15-11-2022 (Important News Clippings)
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Today's Life Management Audio Topic-"सोच में ईमानदारी"
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धारा 66 ए का उपयोग बंद होना चाहिए
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Today's Daily Audio Topic-"वैकल्पिक विषय"
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Today's Life Management Audio Topic-"स्वयं से वायदा"
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14-11-2022 (Important News Clippings)
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मानव-विकास के क्षेत्र में नई खोज
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कुरुक्षेत्र : कृषि उद्यमिता से देश होगा आत्मनिर्भर
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Kurukshetra : Conservation of Natural Resources
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12-11-2022 (Important News Clippings)
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योजना : तटीय सुरक्षा के बहुमुखी आयाम
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Yojana Magazine : Coastal Erosion
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उत्तर लिखने के अभ्यास के लिए प्रश्न - 384
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11-11-2022 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"प्लेट विवर्तनिकी सिद्धान्त"
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Today's Life Management Audio Topic-"स्वयं के प्रति ईमानदारी"
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धार्मिक विवादों का क्या समाधान हो ?
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10-11-2022 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"भारतीय भाषाओं में उच्च शिक्षा"
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Today's Life Management Audio Topic-"व्यक्तिगत ईमानदारी"
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राजनैतिक दलों में आंतरिक लोकतंत्र का अभाव
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09-11-2022 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"EWS का आरक्षण"
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Today's Life Management Audio Topic-"भरपाई करें"
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02-11-2022 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"भ्रष्टाचार"
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Today's Life Management Audio Topic-"स्थान का अर्थ"
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बैंकों के प्रशासन की देखभाल
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01-11-2022 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"डिजिटल रूपी"
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Today's Life Management Audio Topic-"समय पर एक शोध"
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न्यायपालिकाओं में लंबित मामलों से संबंधित कुछ तथ्य
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31-10-2022 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"मिशन लाइफ"
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Today's Life Management Audio Topic-"समय का व्यापक अर्थ"
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सेमीकंडक्टर विनिर्माण के लिए भारत की तैयारी
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Kurukshetra : Organic Farming
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29-10-2022 (Important News Clippings)
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Yojana Magazine : Green Telecom
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उत्तर लिखने के अभ्यास के लिए प्रश्न - 382
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28-10-2022 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"आंतरिक सुरक्षा"
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Today's Life Management Audio Topic-"समय और सफलता"
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रुपये की गिरती कीमत और आरबीआई की भूमिका
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27-10-2022 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"कुछ खबरें"
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‘बैड लोन’ से बाहर निकलने का बेहतर तरीका
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26-10-2022 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"ऋषि सुनक का प्रधानमंत्री बनना"
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शंघाई कॉर्पोरेशन ऑर्गेनाइजेशन की बैठक की चुनौतियां
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कुरुक्षेत्र : नई तकनीक से कृषि उद्यमिता को मिली संजीवनी
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22-10-2022 (Important News Clippings)
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Kurukshetra : Agripreneurship and Farm Prosperity
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Yojana Magazine : Safeguarding Oceans
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उत्तर लिखने के अभ्यास के लिए प्रश्न - 381
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21-10-2022 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"आंदोलन पर पूछे गये प्रश्न"
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Today's Life Management Audio Topic-"सच की चुनौती"
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ईडब्ल्यूएस की पात्रता को ठीक से परिभाषित करना होगा
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20-10-2022 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"आंदोलन के प्रमुख पड़ाव"
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Today's Life Management Audio Topic-"अपने सच की खोज"
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आरक्षण नहीं, सुधार की मांग होनी चाहिए
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19-10-2022 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"सन् 1935 के बाद"
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Today's Life Management Audio Topic-"सच का दावा"
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18-10-2022 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"सन् 1919 के बाद"
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Today's Life Management Audio Topic-"समस्या की समझ"
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17-10-2022 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"सन् 1909 से आगे की राह"
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Today's Life Management Audio Topic-"स्वयं को जानने का महत्व"
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धार्मिक विवादों में न्यायालयों की महत्वपूर्ण भूमिका
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Kurukshetra : Aatm Nirbharta through Agripreneurship
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15-10-2022 (Important News Clippings)
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योजना : प्रकृति और विकास के बीच संतुलन
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Yojana Magazine : Water Governance
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06-10-2022 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"मुख्य परीक्षा के प्रश्न"
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Today's Life Management Audio Topic-"समाज में विरोधाभास"
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05-10-2022 (Important News Clippings)
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04-10-2022 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"यात्रा से व्यक्तित्व विकास"
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Today's Life Management Audio Topic-"विरोधाभासों से मुक्ति"
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एक राष्ट्र-एक राशन कार्ड की सफलता
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03-10-2022 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"कुछ महत्वपूर्ण खबरें"
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Today's Life Management Audio Topic-"अंतर विरोधों के दर्शन"
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श्रम सुधारों की वास्तविकता
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01-10-2022 (Important News Clippings)
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कुरुक्षेत्र : आदिवासी संस्कृति में समानता एक जीवनशैली
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Kurukshetra : Livelihood Opportunities for Tribals
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योजना : निवेश को प्रोत्साहन
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उत्तर लिखने के अभ्यास के लिए प्रश्न - 378
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30-09-2022 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"गर्भपात का अधिकार"
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Today's Life Management Audio Topic-"सम्पूर्णता और तर्क"
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29-09-2022 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"खबरों की तैयारी"
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Today's Life Management Audio Topic-"चेतना की सम्पूर्णता"
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परिवारों के परिवर्तनीय स्वरूप को मान्यता
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28-09-2022 (Important News Clippings)
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भारत में पेटेंट से संबंधित कुछ तथ्य
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Today's Daily Audio Topic-"उजाड़-स्थान पर्यटन"
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Today's Life Management Audio Topic-"दिमागी सोच की कारस्तानी"
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27-09-2022 (Important News Clippings)
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05-09-2022 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"भारतीय अर्थव्यवस्था"
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न्यायिक प्रणाली की प्राथमिकता क्या हो
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03-09-2022 (Important News Clippings)
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कुरुक्षेत्र : ग्रामीण उद्यमिता में प्रचुर संभावनाएं
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उत्तर लिखने के अभ्यास के लिए प्रश्न - 374
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02-09-2022 (Important News Clippings)
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01-09-2022 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"करेन्ट अफेयर्स के नोट्स"
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31-08-2022 (Important News Clippings)
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30-08-2022 (Important News Clippings)
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29-08-2022 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"कुछ खबरें"
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Today's Daily Audio Topic-"व्यावसायिक नैतिकता"
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25-08-2022 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"स्वास्थ्य सेवा के छः संकल्प"
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Today's Life Management Audio Topic-"छोड़ने की बुद्धिमानी"
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हमारी जेलों से जुड़े कुछ तथ्य
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24-08-2022 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"उत्तर का बीज-तत्व"
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Today's Life Management Audio Topic-"धीरे-धीरे आजादी"
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23-08-2022 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"उत्तर के लिए प्रश्न को समझें"
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Today's Life Management Audio Topic-"तूफानी सोमवार और शांति"
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ग्रीन हाइड्रोजन का हब बन सकता है भारत
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22-08-2022 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"दो महत्वपूर्ण खबरें"
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Today's Life Management Audio Topic-"मानसिक गुलामी से मुक्ति"
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कुरुक्षेत्र : खाद्य प्रसंस्करण एवं मूल्य संवर्धन
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20-08-2022 (Important News Clippings)
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Kurukshetra : Roadmap for Rural Industrialisation
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योजना : स्वाधीनता आन्दोलन और राष्ट्रवाद
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Yojana Magazine : Freedom Movement in Central India
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उत्तर लिखने के अभ्यास के लिए प्रश्न - 372
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19-08-2022 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"सामाजिक विषमता"
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Today's Life Management Audio Topic-"सत्य को स्वीकारें"
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दलबदल विरोधी कानून का पुनरावलोकन हो
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18-08-2022 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"कुछ महत्वपूर्ण खबरें"
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Today's Life Management Audio Topic-"चेतना की आजादी"
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अपनी गरिमा को संभाले एनजीटी
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17-08-2022 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"मुख्य परीक्षा के प्रश्न"
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Today's Life Management Audio Topic-"तोड़ो कारा तोड़ो"
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उच्च शिक्षा संस्थानों का कायाकल्प स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार समान रूप से किया जाए
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Today's Daily Audio Topic-"प्रधानमंत्री प्रदत्त पाँच संकल्प"
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Today's Life Management Audio Topic-"राष्ट्र हमारा आधार है"
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16-08-2022 (Important News Clippings)
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Kurukshetra : Livelihood Promotion for Women under DAY-NRLM
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Yojana Magazine : Role of Hindi Literature
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13-08-2022 (Important News Clippings)
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उत्तर लिखने के अभ्यास के लिए प्रश्न - 371
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Today's Daily Audio Topic-"उत्तर-लेखन का बीज-तत्व"
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12-08-2022 (Important News Clippings)
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Today's Life Management Audio Topic-"अपनी विलक्षणता को ढूँढे"
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भारत को प्रत्यक्ष पोषण पर अधिक काम करने की जरूरत है
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11-08-2022 (Important News Clippings)
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ब्रिक्स को लेकर भारत की दुविधा
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10-08-2022 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"भारत-रूस संबंध"
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Today's Life Management Audio Topic-"नये मूल्यों को स्वीकारें"
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विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी क्षेत्र में विकास कैसे हो ?
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09-08-2022 (Important News Clippings)
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‘Current Content’ will not be published today (09-08-2022)
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Today's Daily Audio Topic-"विषय का चरित्र जानें"
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08-08-2022 (Important News Clippings)
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Today's Life Management Audio Topic-"मेरी कोई नहीं सुनता"
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कानून और वास्तविकता में अंतर ( गर्भपात कानून )
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कुरुक्षेत्र : कृषि में जल प्रबंधन
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Kurukshetra : Water Management in Agriculture
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06-08-2022 (Important News Clippings)
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योजना : जनजातीय बहुल इलाकों के खिलाड़ियों का दबदबा
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Yojana Magazine : Gandhian Influence
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उत्तर लिखने के अभ्यास के लिए प्रश्न - 370
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05-08-2022 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"विचार करने की आदत"
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Today's Life Management Audio Topic-"लालच से बचें"
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राजकोषीय घाटे में घिरी सरकार
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Today's Daily Audio Topic-"राष्ट्रीय डोपिंग रोधी विधेयक"
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04-08-2022 (Important News Clippings)
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Today's Life Management Audio Topic-"गलती की हो तो बतायें जरूर"
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ब्रिटेन की राजनीतिक स्थितियों से मिलता एक सबक
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Today's Daily Audio Topic-"भारत-मालदीव संबंध"
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03-08-2022 (Important News Clippings)
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Today's Life Management Audio Topic-"शब्द ब्रह्म"
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लोगों की गुणवत्ता का अपना महत्व है
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02-08-2022 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"भारतीय अंटार्कटिक विधेयक"
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Today's Life Management Audio Topic-"शब्द साँस लेते हैं"
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पहाड़ों पर पर्यटकों की संख्या पर नियंत्रण हो
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Today's Daily Audio Topic-"प्रवर्तन निदेशालय के अधिकार सुरक्षित"
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Today's Life Management Audio Topic-"आपकी संवेदनायें महत्वपूर्ण हैं"
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01-08-2022 (Important News Clippings)
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भारत को रेयर अर्थ एलीमेंट्स का पॉवरहाउस बनना चाहिए
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30-07-2022 (Important News Clippings)
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उत्तर लिखने के अभ्यास के लिए प्रश्न - 369
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29-07-2022 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"ऑनलाइन क्लासेस"
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Today's Life Management Audio Topic-"वर्षा और संगीत की जुगलबंदी"
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सेमीकंडक्टर : नए विश्व का हीरो
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28-07-2022 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"कौन सी कोचिंग"
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Today's Life Management Audio Topic-"बच्चों को भिगोयें"
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जी7 देशों का पीजीआईआई भारत के हित में है
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27-07-2022 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"पढ़ने का तरीका"
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Today's Life Management Audio Topic-"वर्षा से सीख"
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एआई के नैतिक उपयोग से जुड़े वैश्विक मानक
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Today's Daily Audio Topic-"सिलेबस के चैलेंजेज"
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Today's Life Management Audio Topic-"वर्षा में ये जरूरी काम"
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26-07-2022 (Important News Clippings)
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रोजगार के लिए औपचारिक क्षेत्र का विस्तार जरूरी
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Today's Daily Audio Topic-"कोचिंग के बारे में निर्णय"
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25-07-2022 (Important News Clippings)
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Today's Life Management Audio Topic-"वर्षा को महसूस करें"
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आसियान देशों से कैसे संबंध रखे भारत
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कुरुक्षेत्र : जल संसाधनों का समुचित प्रबंधन
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23-07-2022 (Important News Clippings)
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Kurukshetra : Water Management for Sustainable Rural Livelihood
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योजना : अनुसूचित जनजातियों की कल्याण-नीति
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Yojana Magazine : Healthcare Challenges
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उत्तर लिखने के अभ्यास के लिए प्रश्न - 368
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Today's Daily Audio Topic-"अनुमान की क्षमता"
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22-07-2022 (Important News Clippings)
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Today's Life Management Audio Topic-"आस्था पर एक लोककथा"
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एक असंवैधानिक कानून को पुनर्जीवित करने का प्रयास
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Today's Daily Audio Topic-"समझ से सही तक पहुँच"
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21-07-2022 (Important News Clippings)
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Today's Life Management Audio Topic-"आत्मबल की एक घटना"
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विश्व व्यापार संगठन में भारत का एक बार फिर से सक्रिय होना
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20-07-2022 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"ऐसे अनुमान लगायें"
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Today's Life Management Audio Topic-"आस्था बस आस्था है"
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19-07-2022 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"ज्ञान और अनुमान"
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Today's Life Management Audio Topic-"तर्क और विश्वास"
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Today's Daily Audio Topic-"काटसा से छूट"
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Today's Life Management Audio Topic-"तर्क की सीमा"
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18-07-2022 (Important News Clippings)
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राष्ट्रभाषा को लेकर विवाद क्यों ?
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कुरुक्षेत्र : जल शक्ति अभियान : कैच द रेन
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29-06-2022 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"जी 7"
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Today's Life Management Audio Topic-''ध्यान के सहज रूप''
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शहरों के लिए रोजगार गारंटी योजना की जरूरत
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28-06-2022 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"मस्तिष्क को उपजाऊ बनायें"
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27-06-2022 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"सतर्कता से सुनें"
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Today's Daily Audio Topic-"प्री के पेपर के प्रश्न"
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Today's Life Management Audio Topic-''जैसा भी हो, शुरू करो''
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15-06-2022 (Important News Clippings)
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जीएसटी परिषद पर उच्चतम न्यायालय का निर्णय
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14-06-2022 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"सिलेबस पर संदेह मत करो"
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Today's Life Management Audio Topic-''स्थितियों को बदलों''
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कुरुक्षेत्र : उद्यमिता के बढ़ते अवसर
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Yojana Magazine : Jan Suraksha
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11-06-2022 (Important News Clippings)
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उत्तर लिखने के अभ्यास के लिए प्रश्न - 362
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10-06-2022 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"डेली ऑडियो से पूछे गये प्रश्न"
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Today's Life Management Audio Topic-''सौन्दर्य कथा का निहितार्थ''
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‘अनेकता में एकता’ में दिया है समृद्धि का सूत्र
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09-06-2022 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"कुछ खबरें"
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Today's Life Management Audio Topic-''सौन्दर्य के आयाम''
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विरोध में उठी छोटी-छोटी आवाजों से प्रेस की स्वतंत्रता बरकरार है
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Today's Daily Audio Topic-"खाद्यान्न व्यापार पर भारत का प्रस्ताव"
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08-06-2022 (Important News Clippings)
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Today's Life Management Audio Topic-''सौन्दर्य क्या है ?''
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बैडमिंटन में देश की सफलता का राज
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Today's Daily Audio Topic-"2023 की तैयारी की शुरुआत"
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07-06-2022 (Important News Clippings)
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Today's Life Management Audio Topic-''लघुकथा सौन्दर्य''
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विश्व स्वास्थ्य संगठन में सुधार की जरूरत क्यों है ?
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Today's Daily Audio Topic-"प्री 2023"
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06-06-2022 (Important News Clippings)
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Today's Life Management Audio Topic-''एक कथन की समझ''
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जमानत के प्रावधान पर उचित कार्रवाई हो
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कुरुक्षेत्र : ग्रामीण सड़कों का बदलता चेहरा
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Kurukshetra : Transforming Rural Connectivity
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योजना : प्रोत्साहन ,प्रतिरक्षा और सुरक्षा का तिहरा कवच
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04-06-2022 (Important News Clippings)
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उत्तर लिखने के अभ्यास के लिए प्रश्न - 361
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03-06-2022 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"परीक्षा के दिन"
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Today's Life Management Audio Topic-''आइये , इसे समझते हैं''
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राज्य पुलिस बलों का आमना-सामना खतरनाक है
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Today's Daily Audio Topic-"प्री 2022 का स्कोर-लक्ष्य"
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02-06-2022 (Important News Clippings)
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Today's Life Management Audio Topic-''महत्वपूर्ण बात है-समझना''
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बढ़ती मुद्रास्फीति का घरेलू वित्तीय बचत पर प्रभाव
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01-06-2022 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"कुछ खबरें"
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Today's Life Management Audio Topic-''यात्रा बड़ी, कदम छोटे''
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सबका साथ, सबका विकास का प्रभाव
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31-05-2022 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"सिविल सर्विस की टॉपर"
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Today's Life Management Audio Topic-''जीवन का सरल फलसफा''
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क्या रुपए में गिरावट चिंता का विषय है ?
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Today's Daily Audio Topic-"कुछ महत्वपूर्ण खबरें"
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30-05-2022 (Important News Clippings)
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Today's Life Management Audio Topic-''कल्पना से वापसी''
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यूरोप के साथ संबंधों की मजबूती
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Kurukshetra : Rural Youth-Shaping New India
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कुरुक्षेत्र : स्वास्थ्य सेवाओं का बढ़ता दायरा
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Yojana Magazine : Safeguarding Children
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28-05-2022 (Important News Clippings)
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14-05-2022 (Important News Clippings)
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Yojana Magazine : Sustainable Economic Growth
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उत्तर लिखने के अभ्यास के लिए प्रश्न - 358
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Today's Daily Audio Topic-"कुछ महत्वपूर्ण खबरें"
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13-05-2022 (Important News Clippings)
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Today's Life Management Audio Topic-''जीवन पर अधिकार तुम्हारा नहीं''
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भारत के लिए निर्णायक सुअवसर है
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12-05-2022 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"दिल्ली नगर निगम ( संशोधन ) अधिनियम, 2022"
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Today's Life Management Audio Topic-''सोच-समझकर करें विश्वास''
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उच्च न्यायालय के आदेशों की गुणवत्ता खराब क्यों हो रही है
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Today's Daily Audio Topic-"कैसे बनेगा भारत आर्थिक महाशक्ति"
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11-05-2022 (Important News Clippings)
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Today's Life Management Audio Topic-''विश्वास को तर्क से समझें''
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आपराधिक प्रक्रिया (पहचान) अधिनियम की सार्थकता पर चर्चा
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Today's Daily Audio Topic-"डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर"
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10-05-2022 (Important News Clippings)
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Today's Life Management Audio Topic-''विश्वास का टूटना''
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पहचान की राजनीति से बचे सरकार
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Today's Daily Audio Topic-"बेरोजगारी और स्किल इंडिया"
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09-05-2022 (Important News Clippings)
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Today's Life Management Audio Topic-''छवि के केंद्र में विश्वास''
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स्वास्थ्य सेवा में एक आधुनिक पारंपरिक विकल्प
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Yojana Magazine : Holistic Healthcare
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07-05-2022 (Important News Clippings)
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कुरुक्षेत्र : सामूहिक नारी शक्ति के प्रतीक स्वयंसहायता समूह
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योजना : वित्तीय प्रौद्योगिकी क्रांति
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उत्तर लिखने के अभ्यास के लिए प्रश्न - 357
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06-05-2022 (Important News Clippings)
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Today's Daily Audio Topic-"रेपो रेट एवं सीआरआर"
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Date:04-05-22
Green Partners India must integrate with EU’s renewables supply chain, with access to its technology TOI Editorials
Prime Minister Narendra Modi’s visit to Germany, the first leg of his three-nation European tour, set the stage for an essential aspect of India’s development pathway. One of the three strands of the bilateral talks was on climate and energy. Following talks, foreign secretary Vinay Kwatra identified the joint declaration of intent on green and sustainable development partnership as perhaps the most important one. It will play out initially through two channels. Both countries will create a Green Hydrogen Task Force and Germany will support India’s green growth plans with an additional development assistance of €10 billion by 2030.
These developments need to be located in a larger context. The urgency of mitigating climate change is stark. IPCC’s report in 2021 said that the global surface temperature was 1. 09 degrees higher in 2011-20 than the 1850-1900 baseline. Its consequences are already evident. India has contributed only 4% of cumulative greenhouse gas emissions between 1850 and 2017. However, with a coastline of about 7,516 km and 17% of the world’s population, it is already at the frontline of the fallout of climate change. Therefore, it’s in our interest to enhance the use of non-fossil fuel sources for incremental economic growth.
Modi last year outlined a net-zero commitment by 2070 as India’s overarching aim. It is to be realised through two interrelated steps by 2030. India is to reduce its projected carbon emissions by 1 billion tonnes and 50% of its energy needs are to be sourced through renewables. This is where India’s goals tie in with the EU’s vision. Having set a net-zero target by 2050, the EU is in the midst of a transition to sourcing most of its energy needs from renewables. Denmark, for example, has already sourced about 32% of its energy consumption in 2020 from renewables.
Renewables represent a menu of energy options. In the EU, wind and water provide most of the renewable electricity. This is being complemented by solar. Advances in R&D are opening up more options which also allows countries to de-risk their sourcing of renewable energy. It is in this context that PM Modi’s three-nation tour holds significant long-term potential. Despite the current scramble for securing fossil fuel supplies following Russia’s invasion of Ukraine, the long-term trends won’t change. India needs more than development assistance. It also has to be a part of the EU’s renewables supply chain with access to technology. This trip will lay the foundation.
Date:04-05-22
Inflation Is Also Contagious Why an RBI-led rise in borrowing costs is both imminent and imperative Abheek Barua, [ The writer is Chief Economist, HDFC Bank ]
Consumer price inflation in India almost touched 7% in March. It is likely to climb up further as the full effect of the global shortages in crude oil, metals and farm products (like oilseeds and wheat) on the back of the Ukraine war kicks in.
Forecasters are predicting inflation rates of 7% or more for at least seven more months with a peak of around 8% in June. Wholesale price inflation that measures factory and farm gate prices looks even more grim, printing at 14. 55% for March.
Why fret over a 7-8% inflation rate when the economy has seen much higher inflation rates in the past? In 2013, for instance, consumer inflation crossed 12%. For one thing, the period of high inflation in the early 2010s brought considerable agony to both households and businesses. The objective of current inflationmanagement policy is to ensure that we do not revisit this period in history.
In fact, the experience of the early 2010s forced a complete rethink on the ways to keep prices in check. A key outcome was the government’s decision to mandate RBI to keep CPI inflation in a range of 2-6% and ideally target the midpoint or 4%. Current inflation has busted the upper limit of this range. Does this call for urgent action by RBI?
In normal circumstances, central banks have a ready formula for taming inflation. This assumes that price increases reflect excess demand for goods and services riding on high economic growth and low unemployment. The logical response is to tamp demand down through higher interest rates.
How does this work? A household planning to take a car loan might think twice and often jettison the plan of buying a car if EMIs were to rise with interest rate increases. If a lot of households think this way, the aggregate demand for cars will decline and car producers will find it difficult to hike prices. Replace cars with all goods and services in the economy and you should get a rough sense of how interest rates impact aggregate inflation.
A related strategy is to reduce the amount of money in the economy. Inflation, as elementary economics texts point out, is a situation of too much money chasing too few goods. If RBI, the sole creator of money in the economy, reduces the pace of money supply, fewer rupees chase the same basket of goods. This helps to control inflation and increase the purchasing power of the rupee.
Things become tricky when instead of demand, sudden and sharp supply shortages push prices up – think of factories producing less because of Covid lockdowns or Russian oil going off the market. These shortages cause both economic stagnation and inflation, leading to the dreaded syndrome called stagflation. Hiking rates in such a situation could backfire, hurting growth further without denting inflation.
When inflation is primarily supplydriven, central banks prefer to wait awhile for shortages to abate. Thus, despite some upward pressure on inflation during the pandemic period (inflation crossed the 6% mark in May and June 2021), RBI (and other central banks) held back from hiking interest rates.
However, it now seems ready to change its stance and start hiking. Is it doing the right thing? The answer is perhaps ‘yes’. Even if inflation is primarily driven by supply bottlenecks, there are a few warning signs that a central bank must heed and be seen to be doing something in response. For them, the sharpest instrument in their toolbox is the interest rate.
● Past experience shows that persistently high headline inflation (even if confined to a couple of categories like food and fuel) pushes up inflation expectations of households and firms. Elevated inflation expectations are known to feed inflation and keep it alive. That is certainly the case in India.
● The second factor in deciding monetary action is the likely persistence of supply shortages. The impact of the Ukraine war is unlikely to die down in a hurry and the consequent elevation in food and fuel prices among others will keep inflation high.
Besides China’s zero-Covid policy has meant that the mother factory of the world is operating at much less than full capacity. This could result in shortages, often unexpected, in a vast range of items.
● Finally, high and persistent inflation has an annoying habit of spreading to other items in the consumer basket. Thus, not only do consumers pay more at the petrol pump or for a bag of atta, they face (quickly enough) inflation in a whole bunch of other goods and services as well.
Economists like to strip out food and fuel, the volatile components of the consumer basket, and look at core inflation. The core basket covers all other goods and services and gauges how broad-based inflation is. Core inflation has in India remained high for an extended period and going by most forecasts, will remain so.
Central banks across most of the world seem to differ in their intensity of response. The US Federal Reserve has taken its gloves off and is expected to hike rates by at least two whole percentage points this year. RBI is likely to follow a milder approach, careful not to derail the economic recovery. However, one can be certain that a rise in borrowing costs is both imminent and imperative.
Date:04-05-22
Make Our Courts More Accessible ET Editorials
India’s judicial system is characterised by a high pendency rate. In September 2021, there were 70,000 cases pending in the Supreme Court, 5. 6 million in the high courts, and 40 million in the lower courts. The courts are understaffed and proceedings incomprehensible to most justice-seekers. Filling judicial vacancies, preventing the executive from transferring decision-making to courts and ensuring legislatures enact laws diligently can only make things better.
Vacancies plague the judicial system, leading to delays. 37% of high court posts have been vacant as of November 2021, and nearly a quarter of subordinate court posts are yet to be filled. These are the courts where the bulk of judicial activity is conducted. Staffing judicial posts through an open system is critical to speedy delivery of justice.
Language is, indeed, a barrier. Article 348 of the Constitution mandates the use of English in the Supreme Court and high courts. It is also the language of district courts. The governor can, with the president’s consent, allow the use of non-English Indian languages. But orders and judicial outcomes are still recorded only in English. This barrier — along with the archaic Latinate jargon strewn in documents — makes it very difficult for the vast majority to follow their cases, leaving them vulnerable to touts and other mala fide characters. The prime minister’s recent suggestion to use local languages can resolve this issue. But it could create problems for lawyers to access case law from different jurisdictions. The courts should make the proceedings, observations and orders available in local non-English languages as well as in English. An understaffed judiciary incomprehensible to most does not an effective system make.
Date:04-05-22
The court’s burden A national body may be better placed to plan upgradation of judicial infrastructure Editorial
It is unfortunate that the proposal by the Chief Justice of India (CJI) for a national judicial infrastructure corporation with corresponding bodies at the State level, did not find favour with many Chief Ministers at the recent joint conference of Chief Justices and Chief Ministers. A special purpose vehicle, vested with statutory powers to plan and implement infrastructure projects for the judiciary, would have been immensely helpful in augmenting facilities for the judiciary, given the inadequacies in court complexes across the country. However, it is a matter of relief that there was agreement on the idea of State-level bodies for the same purpose, with representation to the Chief Ministers so that they are fully involved in the implementation. The CJI, N.V. Ramana, who had mooted the proposal some months ago, sought to dispel the impression that a national body would usurp the powers of the executive, and underscored that it could have adequate representation of the Union/States. He had flagged the gulf between the available infrastructure and the justice needs of the people. If his proposal had been accepted, the available funding as a centrally sponsored scheme, with the Centre and States sharing the burden on a 60:40 ratio, could have been gone to the national authority, which would allocate the funds through high courts based on need. It is likely that Chief Ministers did not favour the idea as they wanted a greater say in the matter.
Given the experience of allocated funds for judicial infrastructure going unspent in many States, it remains to be seen how far the proposed State-level bodies would be successful in identifying needs and speeding up implementation. It will naturally require greater coordination between States and the respective High Courts. Union Law Minister Kiren Rijiju has promised assistance from the Centre to the States for creating the required infrastructure, especially for the lower judiciary. While it is a welcome sign that the focus is on infrastructure, unmitigated pendency, chronic shortage of judges and the burgeoning docket size remain major challenges. CJI Ramana flagged some aspects of the Government’s contribution to the burden of the judiciary — the failure or unwillingness to implement court orders, leaving crucial questions to be decided by the courts and the absence of forethought and broad-based consultation before passing legislation. While this may be unpalatable to the executive, it is quite true that litigation spawned by government action or inaction constitutes a huge part of the courts’ case burden. The conversation between the judiciary and the executive at the level of Chief Justices and Chief Ministers may help bring about an atmosphere of cooperation so that judicial appointments, infrastructure upgradation and downsizing pendency are seen as common concerns.
Date:04-05-22
Bill assent, a delay and the Governor’s options With its provision for definite choices, the Constitution makes it obligatory for the Governor to act without a wait P.D.T. Achary is former Secretary General, Lok Sabha
The State of Tamil Nadu has been witnessing a confrontation between the elected government and the State Governor on the question of giving assent to the National Eligibility cum Entrance Test (NEET) Bill (linked to an all India pre-medical entrance test) passed by the State Assembly. Giving assent to a Bill passed by the legislature is a normal constitutional act performed by the Governor. But of late, even such normal acts have become a source of confrontation between State governments and the Governors. The conduct of Governors in certain States follows a definite pattern which causes a great deal of disquiet to elected governments as well as to those who have faith in the constitutional order.
On the advice of Ministers
The position of a Governor in the constitutional setup in India needs to be clearly understood in order to grasp the significance of the actions as well as responses of Governors in the politico-administrative contexts emerging from time to time in States. The Governor is an appointee of the President, which means the Union government. Although Article 154(1) of the Constitution vests in the Governor the executive power of the State, he is required to exercise that power in accordance with the Constitution. In other words, the Governor can act only on the aid and advice of the Council of Ministers. Though there is not much deviation from the language used in the Government of India Act of 1935 in the context of the powers of the British-era Governors, it is a settled constitutional position that the Governor is only a constitutional head and the executive power of the State is exercised by the Council of Ministers. In Shamsher Singh vs State of Punjab (1974), the Supreme Court had clearly affirmed this position in the following words: “We declare the law of this branch of our Constitution to be that the President and Governor, custodians of all executives and other powers under various Articles, shall, by virtue of these provisions, exercise their formal constitutional powers only upon and in accordance with the advice of their Ministers save in a few well known exceptional situations”.
Dr. Ambedkar explained the position of the Governor in the Constituent Assembly as follows: “The Governor under the Constitution has no functions which he can discharge by himself: no functions at all.” The Sarkaria Commission restates this position in its report, “it is a well-recognized principle that so long as the council of ministers enjoys [the] confidence of the Assembly its advice in these matters, unless patently unconstitutional, must be deemed as binding on the governor”. In 2016, a five-judge constitution Bench of the Supreme Court (the Nabam Rebia case) reaffirmed the above position on the governors’ powers in our constitutional setup.
The pathways available
It may be stated here that this analysis of the Governor’s powers is meant to enable readers to have a perspective on the issue of the Governor of Tamil Nadu not deciding on the request for assent to the NEET Bill passed by the Assembly even after the passage of more than two months. What exactly are the options before the Governor in the matter of giving assent to a Bill passed by the Assembly?
Article 200 of the Constitution provides for four alternative courses of action for a Governor when a Bill after being passed by the legislature is presented to him for his assent. Assent of the Governor or the President is necessary for a Bill to become law. The Governor can give his assent straightaway or withhold his assent. He may also reserve it for the consideration of the President, in which case the assent is given or withheld by the President. The fourth option is to return the Bill to the legislature with the request that it may reconsider the Bill or any particular provision of the Bill. The Governor can also suggest any new amendment to the Bill. When such a message is received from the Governor, the legislature is required to reconsider his recommendations quickly. However, if the legislature again passes the Bill without accepting any of the amendments suggested by the Governor he is constitutionally bound to give assent to the Bill.
The Governor of Tamil Nadu returned the NEET Bill to the Assembly for reconsideration of the Bill. Accordingly, the Assembly held a special session in the first week of February and passed it again and presented it to the Governor for his assent. He has not assented to the Bill so far.
A wrong view
In the meantime, some sources in the Raj Bhavan have reportedly said that the Constitution has not fixed any time line within which to act. This, then, is the crux of the issue. The point that is made by these sources is that since the Constitution has not fixed any time frame, the Governor can postpone a decision indefinitely. Needless to say, it is a very wrong view.
While it is true that Article 200 does not lay down any time frame for the Governor to take action under this Article, it is imperative on the part of the Governor to exercise one of the options contained therein. A constitutional authority cannot circumvent a provision of the Constitution by taking advantage of an omission. The option mentioned in Article 200 is meant to be exercised by the Governor without delay. The context of Article 200 needs to be understood to be able to take the correct decision. After a Bill is passed by the legislature, it is sent to the Governor immediately. Although Article 200 does not say by what time the Governor should take the next step, it clearly and unambiguously states the options for him to exercise. It is obvious that if the Governor does not exercise any of those options he will not be acting in conformity with the Constitution because non-action is not an option contained in Article 200.
But sitting on the Bill after the Assembly has passed it again and sent it to him is impermissible under the Constitution. Article 200 (proviso) clearly says that when the Assembly reconsiders the Bill on the recommendations of the Governor and presents it to him, he shall not withhold assent. The Constitution makers could never have intended that the Governor could sit on a Bill passed by the legislature for as long as he wants and take advantage of the absence of any specific time frame.
In fact, the words used in Article 200 “… it shall be presented to the governor and the governor shall declare….” indicates that the Constitution requires the Governor to act without delay upon the presentation of the Bill. The reason is obvious. The legislature passes a Bill because there is an urgency about it. But if the Governor does not act, the will of the legislature is frustrated. It is not the constitutional policy to frustrate the legislative will as expressed through the Bill. Therefore, in view of the mandatory provision in the proviso to Article 200, it is clear that the Constitution does not permit the Governor to sit on a Bill after the Assembly re-submits it to him after reconsideration.
An undemocratic option
Giving assent to a Bill passed by the legislature is a part of the legislative process and not of the executive power. But the Constitution has by providing for definite options made it obligatory for the Governor to exercise any of those options without delay. Withholding of assent, though an option, is not normally exercised by Governors because it will be an extremely unpopular step. Besides, withholding assent to a Bill by the Governor, an appointee of the President, neutralises the entire legislative exercise by an elected legislature enjoying the support of the people. In the opinion of this writer, this option is undemocratic and essentially against federalism. In the United Kingdom it is unconstitutional for the monarch to refuse to assent to a Bill passed by Parliament. Similarly, in Australia, refusal of assent to a Bill by the crown is considered repugnant to the federal system.
In our constitutional system, the Governor or the President is not personally responsible for their acts. It is the elected government that is responsible. Under Article 361, the President or a Governor is not answerable to any court for anything done in the exercise and performance of their powers and duties. But when a Governor does not take any decision on a Bill which is put up for his assent, he is not acting in exercise and performance of the duties cast upon him.
Date:04-05-22
Joblessness on the rise in India India is in the throes of a widening joblessness crisis and misinformation does not help Santosh Mehrotra is Research Fellow, IZA Institute of Labour Economics, Germany.
After many years of refusing to recognise there is a jobs crisis in India, the government of India, faced with relentless data to the contrary, has now resorted to misinformation. Scholars associated with the government have contributed to this effort. Two pieces – “Here’s why it’s V not K”, March 3, 2022 in The Times of India and “A hazy picture on employment in India”, February 1, 2022 in The Hindu are cases in point and are examined here. Regrettably, both pieces show an inadequacy in understanding the jobs situation.
As compared to the 8% per annum GDP growth in the period 2004-14, and 7.5 million new non-farm jobs created each year over 2005 to 2012 (NSO’s employment-unemployment survey), the number of new non-farm jobs generated between 2013-2019 was only 2.9 million, when at least 5 million were joining the labour force annually (NSO’s Periodic Labour Force Survey (PLFS)). The NSO itself states clearly that the two surveys provide comparable data; the claim that those two surveys are not comparable is not correct.
Unpaid family labour
A claim is made that between 2017-18 and 2019-20, the worker participation rate (WPR) and labour force participation rate (LFPR) is rising, showing improvement in the labour market. The next question is: how come these rates are rising, exactly when the economy is slowing down sharply from 2017 to 2020? The reality is that this rise in WPR and LFPR is misleading. It was caused mostly by increasing unpaid family labour within self-employed households, mostly by women.
The claim that manufacturing employment increased between 2017-18 and 2019-20 by 1.8 million is technically correct (based on PLFS). What this ignores is that between 2011-12 and 2017-18, manufacturing employment fell in absolute terms by 3 million, so a recovery is hardly any consolation. Manufacturing as a share of GDP fell from 17% in 2016 to 15%, then 13% in 2020, despite ‘Make in India’.
Meanwhile, another argument offered is that GDP in FY22 “could not have returned to pre-COVID FY20 level without workers returning to work and MSMEs recovering too”. Clearly, this fails to recognise that organised economic activity could recover without a corresponding increase in unorganised activities, thus cancelling each other out, and still leave the jobless without work, or even less work.Second, a fall in urban unemployment after July 2020 to January-March 2021 has now been reversed, with urban unemployment rate rising in April-June 2021 back to mid-2020 level, and labour force participation falling again. This is a K-shaped recovery.
In any case, the authors provide no evidence that MSMEs, that provide most of the non-farm employment, have recovered to pre-COVID levels. Meanwhile, here is the evidence. The Consortium of Indian Association (CIA) conducted a survey of over 81,000 micro businesses across Indian in June 2021, two months after the second wave was over. Of them 59% reduced their staff compared to pre-COVID levels; 88% respondents had not availed of any government stimulus packages; 28% reported they were unable to get payment dues from their customers from private or government; 64% reported banks were not giving loans..
Farm employment
In any case, the recovery of urban employment till March 2021 clearly ignores that urban employment barely captures a third of total employment. Besides, agriculture output may have performed well during COVID, and free rations may have alleviated acute distress. This completely ignores that between 2019 and 2020, the absolute number of workers in agriculture increased from 200 million to 232 million, depressing rural wages — a reversal of the absolute fall in farm employment of 37 million between 2005-2012, when non-farm jobs were growing 7.5 million annually, real wages were rising, and number of poor falling. Rising farm employment is a reversal of the structural change underway until 2014.
Finally, another dubious argument is offered to supplement the claim that organised formal employment is rising, because new registration in employment provident fund rose in the last two years. One limitation of EPFO-based payroll data is the absence of data on unique existing contributors. Employees join, leave and then rejoin leading to large and continuous revisions in EPFO enrolment.
There has been a massive increase in joblessness of at least 10 million due to COVID-19, on top of the 30 million already unemployed in 2019. This happened while the CMIE is reporting the employment rate has fallen from nearly 43% in 2016 to 37% in just four years. If this is not a V-shaped recovery, what is? Poverty had already increased during pre-COVID times, and increased further post-COVID by all estimates.
Date:04-05-22
कोर्ट में स्थानीय भाषा का प्रयोग बेहतर होगा संपादकीय
प्रधानमंत्री ने न्यायालयों में क्षेत्रीय भाषा में अदालती काम करने की सलाह दी है ताकि आम-जन में न्याय के प्रति भरोसा बढ़े। इससे हटकर पीएम ने एक और बात कही जिसके दूरगामी जनोपयोगी परिणाम होंगे। उन्होंने कहा कि कानून की भाषा आम जनता की समझ में नहीं आती क्योंकि उसमें तमाम कानूनी/तकनीकी शब्दों का प्रयोग होता है। जाहिर है जो कानून समझ में नहीं आता हो उसके पालन की अपेक्षा अशिक्षित लोगों से करना गलत है। पीएम ने बताया कि केंद्र सरकार इस बात का प्रयास कर रही है कि कानून बनाते समय ही मूल कानून के साथ सहज भाषा में भी उसकी व्याख्या दी जाए। इस प्रयास से कानून केवल वकीलों और जजों की दुनिया से निकल कर सामान्य नागरिक तक पहुंचेगा। क्षेत्रीय भाषा में कोर्ट्स के काम की अवधारणा को भी अमल में लाना मुश्किल नहीं है। अभी तक देश के हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में केवल अंग्रेजी में काम होता है। जरा सोचें, केरल-मूल का युवा सिविल सेवा अधिकारी बंगाल कैडर में चुने जाने के बाद एक साल की ट्रेनिंग के बाद छोटे जिले में मुख्य विकास अधिकारी रहता है और उससे स्थानीय भाषा में संवाद की अपेक्षा की जाती है। वह यह नहीं कहता कि उसे मलयाली या अंग्रेजी में प्रार्थना-पत्र दिया जाए। लिहाजा यह तर्क देना कि हाई-कोर्ट जजों को अन्य राज्यों में ट्रांसफर पर जाना होता है, कतई तार्किक नहीं है। अगर गूढ़ कानूनी शब्दों का प्रयोग कर अंग्रेजी में ही फैसले आएंगे तो कई बार अनपढ़, गरीब या ग्रामीण को तो छोड़िए स्थानीय कोर्ट्स को भी सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट्स के फैसले समझने में गलती होती है। विकल्प के रूप में शुरू में कोर्ट्स क्षेत्रीय भाषा की जगह हिंदी शब्दों को विकल्प के रूप में चुन सकते हैं।
Date:04-05-22
नए दौर में पुराने कानून कब तक चलेंगे? विराग गुप्ता, ( लेखक और वकील )
लंबे अर्से बाद प्रधानमंत्री, कानून मंत्री, सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के सभी चीफ जस्टिस के साथ राज्यों के मुख्यमंत्री एक मंच पर एकत्र हुए। प्रधानमंत्री ने आमजन के मनोभावों को व्यक्त करते हुए कहा कि लोगों को जल्द न्याय मिले तभी स्वराज आएगा। सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस ने इस मर्ज के तीन पहलुओं पर विस्तार से चर्चा की। पहला, अंग्रेजों के जमाने से चल रही जटिल कानूनी व्यवस्था से आज के समय में इंस्टैंट जस्टिस संभव नहीं है। दूसरा, अदालतों में जजों की कमी के साथ जरूरी इन्फ्रास्ट्रक्चर नहीं है। तीसरा, सरकारें जिम्मेदारियों का पालन नहीं करतीं, जिससे अदालतों को नीतिगत मामलों में हस्तक्षेप करना पड़ता है। संसद, सरकार या सुप्रीम कोर्ट- कोई भी लक्ष्मण रेखा लांघे, यह संवैधानिक दृष्टि से ठीक नहीं। लेकिन पहले लक्ष्मण रेखा को समझना जरूरी है। एक लाइन में कहें तो लक्ष्मण रेखा का निर्धारण संसद द्वारा बनाए कानून और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों से होता है।
पुरानी कानूनी व्यवस्था की वजह से आमजन 4.5 करोड़ से ज्यादा मुकदमों के साथ जेलों में बंदी हैं। 2014 में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा था कि वे रोजाना एक कानून को रद्द करेंगे। शुरुआती 5 साल के कार्यकाल में सरकार ने पंद्रह सौ कानूनों को रद्द किया, इस लिहाज से कमोबेश उन्होंने अपने वचन को पूरा किया। लेकिन जमीनी हकीकत भयावह है। ऑब्ज़र्वर रिसर्च फाउंडेशन की नवीनतम रिपोर्ट के अनुसार देश में 69233 रेगुलटरी कानूनों में 26134 का पालन नहीं होने पर जेल जाने का खतरा होता है। इससे भ्रष्टाचार के साथ लोगों का दमन भी बढ़ता है। रिजर्व बैंक की एक रिपोर्ट के अनुसार कोरोना के पिछले तीन सालों में भारत में लगभग 50 लाख करोड़ मूल्य के उत्पादन का घाटा हुआ। पुराने कानून जिन पर लागू होते हैं, उनमें से 80 करोड़ से ज्यादा कोरोना काल में सरकारी राशन पर निर्भर रहे।
अब एक नजर नई डिजिटल अर्थव्यवस्था पर भी डालना जरूरी है। 2014 में देश में लगभग 400 स्टार्टअप थे, जिनकी संख्या अब 68 हजार हो गई है। डिजिटल पेमेंट में 40 फीसदी हिस्सेदारी की वजह से भारत विश्व में सिरमौर है। ऑनलाइन गेम मार्केट ने देश के 40 करोड़ से ज्यादा लोगों को गिरफ्त में ले लिया है। ई-कॉमर्स, क्रिप्टो और फिनटेक जैसे अनेक सेक्टर के लिए कानून, नियम या गाइडलाइंस की कोई लक्ष्मण रेखा नहीं है। इसको ऐसे समझें कि पुरानी सड़क जो धीरे-धीरे बेकार होने के बाद प्रचलन में नहीं है, उस पर सफर कर रहे लाचार लोगों पर सभी तरह के कानूनों की मार और टैक्स की वसूली होती है। दूसरी तरफ सरकारी अनुदान से बने राजमार्ग पर डिजिटल का काफिला स्वच्छंद विचरण कर रहा है। कानून को अपडेट रखने यानी विधायी मोर्चे पर विफलता को इन 12 बिंदुओं से समझा जा सकता है-
1. समान नागरिक संहिता पर संसद से ही कानून बन सकता है। संविधान के अनुच्छेद 44 में दी गई इस जिम्मेदारी को पूरा करने में पिछले 72 सालों में केंद्र सरकार विफल रही। इसकी वजह से उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्य संविधान-उल्लंघन कर रहे हैं।
2. सुप्रीम कोर्ट ने आईटी एक्ट की धारा 66-ए को रद्द कर दिया, पर सरकार ने नया कानून नहीं बनाया। फलस्वरूप सोशल मीडिया पोस्ट पर राज्यों की पुलिस आईपीसी के तहत मामले दर्ज करके मनमानी कर रही है।
3. 150 साल पहले अंग्रेजों ने राजद्रोह का जो कानून बनाया था। उसके दुरुपयोग पर चिंता जताने के बावजूद संसद से 124-ए को निरस्त करने की प्रक्रिया नहीं हुई।
4. डेटा सुरक्षा और प्राइवेसी पर सुप्रीम कोर्ट के नौ जजों के पांच साल पुराने फैसले के बावजूद केंद्र सरकार ने डाटा सुरक्षा कानून नहीं बनाया।
5. लिव-इन रिलेशनशिप, समलैंगिक विवाह आदि के बारे में केंद्रीय स्तर पर कानून नहीं होने से लक्ष्मणरेखा पार करने का नैतिक आधार मिल गया है।
6. चेक बाउंस जैसे सिविल अपराध के मामलों को आपराधिक दायरे में लाने से 33 लाख से ज्यादा मुकदमे कारोबारियों और अदालतों के गले की फांस बन गए। डिजिटल पेमेंट का सिस्टम शुरू हो गया, पर पुराने मामलों को खत्म करने के लिए कानून में बदलाव नहीं हुए।
7. श्रम कानूनों पर बहस के बाद बड़े मसौदे बने। लेकिन डिजिटल अर्थव्यवस्था में काम कर रहे लाखों गिग वर्कर्स के हितों के लिए कोई नियम-कानून नहीं बना।
8. विपक्ष शासित पांच राज्यों में सहमति नहीं मिलने से बैंकिंग फ्रॉड के 21 हजार करोड़ से ज्यादा के मामलों की सही जांच नहीं हो पा रही। हाईकोर्ट ने सीबीआई की वैधता पर सवाल खड़े किए, पर विशेष कानून नहीं बना।
9. ऑटो और टैक्सी वालों के लिए पुराने नियम बने हैं। एप आधारित कंपनियां डाटा चोरी के साथ ग्राहकों की जेब पर डकैती डाल रही हैं। उनके लिए कानून नहीं बना।
10. सोशल मीडिया और साइबर के लाखों अपराध मामले दर्ज नहीं होने की वजह से एनसीआरबी के आंकड़ों में नहीं दिखते। सीईआरटी के अनुसार साइबर अपराध के मामलों में 6 घंटे के भीतर रिपोर्टिंग जरूरी है। इसके बावजूद आईटी एक्ट में समयानुकूल बदलाव नहीं हुए।
11. सुप्रीम कोर्ट चीफ जस्टिस के अनुसार आधे से ज्यादा मुकदमों में सरकार पक्षकार है। देश में राष्ट्रीय मुकदमा नीति बनी थी, जिसे अपडेट और लागू नहीं करने से मुकदमों का बोझ दिन दूना रात चौगुना बढ़ रहा है।
12. सुप्रीम कोर्ट ने 7 साल पहले जो फैसला दिया था, उसके अनुसार सरकार को एमओपी में बदलाव करना था। इसमें टालमटोल से जजों की नियुक्ति प्रक्रिया में विलंब के साथ न्याय की गाड़ी पटरी से उतर रही है।
Date:04-05-22
चुनावों में मुफ्त उपहार के वादे देश के लिए खतरनाक डॉ. वीरेंद्र मिश्र, ( वरिष्ठ आईपीएस अधिकारी )
देश चुनावी मोड में है। पार्टियां खुद को औरों से बेहतर साबित करना चाहती हैं। परम्परागत वोटरों को अपने पक्ष में करने के लिए हरसम्भव तरीके आजमाए जा रहे हैं। चूंकि चुनावों में बहुत कुछ दांव पर होता है, इसलिए उनमें बहुत तनावपूर्ण संघर्ष होता है। विचारधाराओं का टकराव होता है। लेकिन हमें याद रखना चाहिए कि किसी भी पार्टी को चुनाव जीतने के लिए वे उपाय नहीं आजमाने चाहिए, जो देश की सेहत के लिए नुकसानदेह साबित हों। क्योंकि नेशन फर्स्ट ही हमारा स्लोगन है। दुर्भाग्य से चुनाव जीतने पर मुफ्त उपहार देने के वादे एक ऐसी ही प्रवृत्ति है, जो देश के लिए अच्छी नहीं कही जा सकती।
एक जनहित याचिका पर सुनवाई करने के दौरान सर्वोच्च अदालत ने इस विषय में चिंता जताई थी और कहा था कि चुनावों में मुफ्त उपहार देने के वादे गम्भीर समस्या है। वरिष्ठ अधिकारियों ने इस बारे में प्रधानमंत्री को अवगत कराया, क्योंकि प्रधानमंत्री की छवि ऐसे नेता की है, जो निर्णय लेने में संकोच नहीं करते। उन्होंने उन्हें सचेत किया कि मतदाताओं को लुभाने के लिए राज्य सरकारों द्वारा किए जाने वाले वादे अंतत: वित्तीय संकट की ही स्थिति निर्मित करेंगे। इस मामले में चुनाव आयोग ने असमर्थता जाहिर की है। अब गेंद राजनीतिक दलों के पाले में है, लेकिन वे नकार के मोड में हैं। वे जानते हैं कि यह प्रवृत्ति हानिकारक है, इससे संसाधनों की क्षति होती है और सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचता है, फिर भी वे इसे समाप्त नहीं करना चाहते। वोटरों को भी इसके दूरगामी नतीजे नहीं पता, जो उनके लिए ही बुरे साबित होंगे।
ये मुफ्त उपहार- जो फ्रीबी कहलाते हैं- सामाजिक-आर्थिक राहत राशि के रूप में दिए जाते हैं, जबकि यह भ्रामक है। आर्थिक राहत तभी सम्भव है, जब समाज के सबसे निचले तबके के व्यक्तियों को भी सामाजिक-आर्थिक विकास प्रक्रिया में उत्पादक के तौर पर सहभागी बनाए जाए। नागरिकों में गैर-उत्पादकता को प्रोत्साहित करने से तो नुकसान ही होंगे। लेकिन फ्रीबी बांटने की लोकलुभावन नीति के पीछे चैरिटी का वह रूप है, जो कार्यक्षम लोगों को निष्क्रिय बनने को प्रेरित करता है और इस तरह से देश पर बोझ बढ़ाता ही है। यह अव्यावहारिक नीति ऊपर से चाहे जितनी भावनात्मक मालूम होती हो, लेकिन अंत में उन्हीं लोगों के लिए नुकसानदेह साबित होती है, जिनके लिए उसे लागू किया गया था। महामारी ने हमें बहुत सारी चीजें सिखाई हैं, और उनमें से एक यह है कि जब रोजगारों पर संकट पैदा होता है तो सबसे पहली चोट गरीबों पर ही पड़ती है। अर्थव्यवस्था में गिरावट आती है तो स्वास्थ्य-सेवाएं प्रभावित हुए बिना नहीं रह पातीं।
जरा श्रीलंका और वेनेजुएला जैसे देशों का उदाहरण देख लें। वास्तव में श्रीलंका आज एक केस स्टडी बन चुका है। वहां भी चुनावों के दौरान गैर-व्यावहारिक लोकलुभावन घोषणाएं की गई थीं। उन्हीं को पूरा करने के फेर में आज श्रीलंका की यह हालत हो गई है। जनता से टैक्स में छूट के वादे किए गए, जो पूरे नहीं किए जा सकते थे। भारी सब्सिडी देने, कर्ज और बिल माफ करने के सपने दिखाए गए। यह सब समानता के नाम पर किया गया। जबकि इस तरह की चीजें उलटे सामाजिक न्याय के आदर्श को नुकसान पहुंचाती हैं। वेनेजुएला जैसा देश, जिसके पास अकूत तेल-सम्पदा है, वेलफेयर प्रोग्राम के नाम पर की गई शाहखर्ची से दिवालिया होने के कगार पर आ गया है। ये सच है कि महिलाओं और बच्चों के सशक्तीकरण, स्वास्थ्य सुरक्षा, रोजगार-वृद्धि, वरिष्ठजनों के कल्याण आदि के लिए चलाए जाने वाले कार्यक्रम सराहनीय हैं, लेकिन उनमें भी हितग्राही को रचनात्मक रूप से सहभागी बनाते हुए उसके सशक्तीकरण पर जोर दिया जाना चाहिए, अन्यथा राज्यसत्ता के संसाधन अनुत्पादक व्ययों में खर्च हो जाएंगे। एक सच्चे नेता को यह अहसास होना चाहिए कि अदूरदर्शितापूर्ण कदमों से राष्ट्र-निर्माण सम्भव नहीं है।
Date:04-05-22
ई-खुदरा में क्रांति ! संपादकीय
ओपन नेटवर्क फॉर डिजिटल कॉमर्स (ओएनडीसी) के रूप में जो महत्त्वाकांक्षी पहल देश के पांच शहरों में प्रायोगिक तौर पर की गई है वह देश में ई-कॉमर्स को पूरी तरह बदल सकती है। एकीकृत भुगतान इंटरफेस (यूपीआई) की तरह ओएनडीसी एक ओपन डिजिटल नेटवर्क विकसित कर रहा है जिसे कुछ इस प्रकार तैयार किया गया है कि सभी प्रकार के ई-खुदरा ऐप और प्लेटफॉर्म उसी तरह एक दूसरे के साथ संवाद कर सकेंगे जैसे कि यूपीआई हर भुगतान ऐप को अबाध ढंग से पैसे का लेनदेन करने देता है। ओएनडीसी डिजिटल पारिस्थितिकी तंत्र और उसके डेटा प्रवाह पर कई असर डाल सकता है। यह खरीदारों और विक्रेताओं के लिए पहुंच को बराबर कर सकता है, इस व्यवस्था में डेटा प्रबंधन और डेटा संरक्षण को लेकर भी चिंता है। इसके अलावा जब ओएनडीसी बड़े पैमाने पर काम करेगा तो ई-बाजार संचालित कर रहे कई विदेशी समूहों पर अभी लगे प्रतिबंधों को हटाने की भी तार्किक वजह उत्पन्न होगी।
फिलहाल भारत के ई-खुदरा क्षेत्र में एमेजॉन और फ्लिपकार्ट की हिस्सेदारी 60 प्रतिशत से अधिक है। परंतु एमेजॉन की ऐप का इस्तेमाल कर रहा ग्राहक उन उत्पादों और सेवाओं को नहीं देख सकता जो फ्लिपकार्ट की ऐप पर सूचीबद्ध हैं। इसी तरह जोमैटो ऐप स्विगी पर सूचीबद्ध रेस्तरां नहीं दिखाएगा। ओएनडीसी ऐसे सभी प्लेटफॉर्म को जोड़ेगा जिससे विकल्प बढ़ेंगे और ऑनलाइन खरीदारी करने वालों को ज्यादा विकल्प मिलेंगे। इससे 1.2 करोड़ छोटे किराना कारोबारियों और 4.2 करोड़ छोटे और मझोले कारोबारों को अपने उत्पाद प्रदर्शित करने में मदद मिलेगी और उनके लॉजिस्टिक्स की समस्या भी हल होगी। ओएनडीसी के घोषित उद्देश्य हैं नए विक्रेताओं के लिए प्रतिस्पर्धा में सुधार करना और मौजूदा ई-मार्केट का नेतृत्व करने वालों के दबदबे को नियंत्रित करना। इस विषय में जुलाई 2021 में एक सलाहकार परिषद स्थापित की गई और ओएनडीसी को यूपीआई का संचालन करने वाले भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम की तरह एक गैर लाभकारी कंपनी के रूप में पंजीकृत किया गया है। ओएनडीसी ने एक रणनीति पत्र प्रकाशित किया है जो उन चुनौतियों और समस्याओं के बारे में बताता है जिन्हें वह हल करने का प्रयास करेगा। यहां उसकी बनावट के बारे में कुछ विस्तृत जानकारी सामने आती है। बहरहाल इस पर्चे में डेटा की निजता और सुरक्षा के उपायों की जानकारी नहीं दी गई है।
यदि ओएनडीसी वैसे ही काम करता है जैसा बताया गया है तो वह बहुत बड़े पैमाने पर संवेदनशील निजी और वाणिज्यिक डेटा का प्रबंधन करेगा। ऐसे में डेटा सुरक्षा बहुत अहम है। इस विषय में मोटी-मोटी जानकारी दी गई है जिसे विस्तार की जरूरत है, खासकर यह देखते हुए कि डेटा संरक्षण कानून अभी लंबित है। दस्तावेज में कहा गया है कि लेनदेन संबंधी डेटा केवल खरीदार और विक्रेता की ऐप में रहेंगे और वे ओएनडीसी पर नहीं नजर आएंगे। ओएनडीसी किसी आंकड़े को न तो जमा करेगा और न ही देखेगा। डेटा नीतियां सहमति आधारित तथा सीमित उद्देश्य वाली होंगी। ओएनडीसी यह सुनिश्चित करेगा कि लेनदेन के डेटा तथा व्यक्तिगत पहचान संबंधी सूचना एवं विक्रेताओं की अहम जानकारी को सुरक्षित रखा जाए। नेटवर्क की विश्वसनीयता के लिए यह देखना अहम होगा कि ओएनडीसी इस स्तर की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित करेगा।
क्या अपनी ऐप बनाने, स्मार्ट लॉजिस्टिक्स प्रबंधन तथा कम लागत वाली वेयरहाउसिंग सुविधाओं पर अरबों डॉलर की राशि व्यय करने वाले बाजार के शीर्ष कारोबारी ओएनडीसी से जुडऩा चाहेंगे जबकि वह स्वैच्छिक होगा? यदि ओएनडीसी बड़े पैमाने पर काम करने में सफल होता है तो विदेशी खुदरा कंपनियों पर प्रतिबंध कम करने की बात उठेगी। ये प्रतिबंध अभी उन्हें बहु ब्रांड स्टोर बनने से रोकते हैं। यदि सब ठीक रहा तो ओएनडीसी बहुत क्रांतिकारी साबित होगा। यह न केवल छोटे कारोबारियों को बड़ा बाजार मुहैया कराएगा बल्कि बड़े पैमाने पर कारोबार लॉजिस्टिक्स को किफायती बनाएगा। लॉजिस्टिक्स की लागत में भारी कमी से अर्थव्यवस्था अधिक सक्षम बनेगी।
Date:04-05-22
रिश्तों की कूटनीति संपादकीय
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का जर्मनी, डेनमार्क और फ्रांस जैसे यूरोपीय देशों का दौरा तेजी से बदल रही वैश्विक राजनीति में भारत की बढ़ती अहमियत को रेखांकित करता है। यह यात्रा महत्त्वपूर्ण इसलिए भी है कि रूस-यूक्रेन युद्ध की वजह से दुनिया में खेमेबाजी बढ़ी है और भारत किसी भी गुट में शामिल नहीं है। भारत शुरू से ही तटस्थ रुख अपनाता आया है और आज भी इस पर कायम है। जर्मनी के चांसलर ओलाफ शाल्ज के साथ भी प्रधानमंत्री मोदी ने यही कहा कि किसी भी सूरत में युद्ध रुकना चाहिए और भारत पहले ही दिन से ही इसकी वकालत और प्रयास करता रहा है। डेनमार्क में भी प्रधानमंत्री ने रूस-यूक्रेन युद्ध को तत्काल रोकने पर जोर दिया। इससे भारत ने दुनिया को एक बार फिर दो-टूक संदेश दिया है कि वह किसी गुट का सदस्य बनने के बजाय युद्ध रोकने और शांतिके प्रयासों में ही भरोसा रखता है। गौरतलब है कि फ्रांस, जर्मनी और डेनमार्क सहित यूरोपीय संघ के सदस्य देश यूक्रेन के साथ और रूस के खिलाफ खड़े हैं। यूरोपीय संघ भारत से भी यह अपेक्षा कर रहा है कि इस मुद्दे पर वह रूस के खिलाफ खड़ा हो और यूक्रेन पर हमले का विरोध करे।
देखा जाए तो मामला रूस-यूक्रेन युद्ध तक ही सीमित नहीं है। यूरोपीय देश भारत को एक बड़े भागीदार के रूप में भी देखते रहे हैं। चाहे जलवायु संकट से निपटने का मुद्दा हो या हरित ऊर्जा, अंतरिक्ष सहयोग जैसे दूसरे क्षेत्र हों, सभी में भारत की गिनती अहम और निर्णायक भूमिका अदा करने वाले देश के रूप में हो रही है। विकसित देश भी इस हकीकत को स्वीकार कर रहे हैं कि भारत को नजरअंदाज करके वैश्विक संकटों से निपटना संभव नहीं है। वरना जर्मनी के चांसलर शाल्ज भारत को समूह सात (जी-7) शिखर सम्मेलन के लिए न्योता क्यों देते? यह बात इसलिए भी अहमियत रखती है कि यूक्रेन के मुद्दे पर तटस्थ रुख रखने के बाद भी बड़े देश भारत को अलग-थलग करने की नहीं सोच सकते। हालांकि भारत पर इसके लिए दबाव कम नहीं पड़े हैं। यह बात तो फ्रांस, जर्मनी जैसे देश समझते ही हैं कि युद्ध एक न एक दिन खत्म होगा ही, लेकिन भारत के साथ भागीदारी और कारोबारी संबंध हमेशा चलने वाले हैं। इसमें तो कोई संशय नहीं कि युद्ध ने यूरोपीय देशों को भी बुरी तरह प्रभावित किया है। ऐसे में उनके लिए भारत जैसा देश एक बड़े मददगार के रूप में साथ खड़ा है। गौरतलब है कि हाल में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जानसन और यूरोपीय संघ की प्रमुख उर्सूला लेयन ने भी भारत का दौरा इसी उद्देश्य से किया था कि भारत के साथ रिश्तों को और मजबूती दी जा सके।
इस यात्रा का एक और बड़ा हासिल यह भी है कि जर्मनी हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत का सहयोगी बनने को राजी हो गया है। इससे पहले ब्रिटेन भी इसकी रजामंदी दे चुका है। यूरोपीय संघ की प्रमुख उर्सूला लेयन ने भी इस मुद्दे पर भारत के साथ सहमति जता दी है। यानी हिंद-प्रशांत क्षेत्र में रणनीतिक दबदबा बनाने की दिशा में यूरोप के मुल्क भी भारत के साथ आ रहे हैं। अमेरिका के नेतृत्व में बना क्वाड समूह, जिसका भारत भी सदस्य है, पहले से इस क्षेत्र की सुरक्षा को लेकर सतर्क है। सबकी चिंता हिंद-प्रशांत क्षेत्र के जलमार्ग को चीन के दबदबे से बचाने की है। प्रधानमंत्री के यूरोप दौरे से यह और साफ हो गया है कि भारत भले किसी गुट में न हो, लेकिन उसकी कूटनीति की धमक जरूर बनने लगी है।
Date:04-05-22
जरूरी है जल संरक्षण अतुल कनक
गर्मी के मौसम के साथ ही देश के अलग-अलग हिस्सों से जल संकट की खबरें सामने आने लगती हैं। इस बार भी ऐसा ही हो रहा है। राजस्थान के कोटा शहर का उदाहरण ही लें। यह शहर चंबल नदी के किनारे बसा है। लेकिन इस शहर की अनेक बस्तियों में पानी की किल्लत हो गई है। स्थिति यह है कि कई बस्तियों में तो नलों से बूंद-बूंद टपकने वाले पानी के सहारे अपनी जरूरत पूरी करने के लिए लोगों को रात-रात भर जागना पड़ता है। पिछले दिनों आई एक रिपोर्ट के अनुसार राजस्थान के हाड़ौती अंचल में भूजल पाताल तक पहुंच गया है। पश्चिमी राजस्थान में मरुस्थल है और वहां पानी का संकट नई बात नहीं है। लेकिन हाड़ौती अंचल राजस्थान के जिस दक्षिण-पूर्वी हिस्से में है, उसे सरसब्ज इलाके के तौर पर जाना जाता है। चंबल, कालीसिंध, पार्वती, परवन, आहू, ताकली, उजाड़ जैसी नदियों के अलावा इस अंचल में एक दर्जन छोटी या सहायक नदियां बहती हैं। बरसात के दिनों में जब इन नदियों में उफान आता है, तब इनमें होने वाली पानी की आवक का पता चलता है। इसके बावजूद यदि इलाके में भूजल का स्तर पाताल में पहुंच गया है और लोगों को पानी की पर्याप्त आपूर्ति नहीं हो पा रही है, तो इसका अर्थ केवल यही है कि हम पानी के प्रबंधन में कहीं पिछड़ गए हैं। हाड़ौती तो एकमात्र उदाहरण भर है, देश के ज्यादातर हिस्सों में जलसंकट की कमोबेश यही कहानी है।
महाभारत में एक जगह कहा गया है-‘अति परिचयाद् अवज्ञा भवति।’ सहजता से उपलब्ध हो जाने वाली वस्तुओं के वास्तविक मूल्य का अनुमान हम आसानी से नहीं लगा सकते, भले ही वे जीवन के लिए कितनी ही उपयोगी क्यों न हों। पानी के साथ भी ऐसा ही हुआ है। पृथ्वी की सतह का दो तिहाई हिस्सा पानी से भरा है। इसलिए कई लोगों को लगता है कि जब चारों तरफ इतना पानी है, तो फिर चिंता की क्या बात? शायद कुछ लोगों का यही सोच है। लेकिन ऐसे लोग इस तथ्य को भूल जाते हैं कि पृथ्वी की सतह पर मौजूद कुल पानी में से दो प्रतिशत से भी कम मनुष्य के उपयोग लायक है। आज भी पीने के पानी के लिए दुनिया का बड़ा हिस्सा बरसात या नदियों के प्रवाह पर ही निर्भर है। विज्ञान ने हमें भले ही उन्नति के नए सोपान सौंपे हैं, लेकिन आज तक दुनिया की किसी प्रयोगशाला में मनुष्य की जरूरतों को पूरा करने लायक पानी नहीं बनाया जा सका है। इजराइल जैसे देशों ने समुद्री पानी को पीने के योग्य बनाने का दावा किया है, लेकिन उनकी तकनीक या तो इतनी महंगी है या इतनी अप्रचलित है कि दुनिया में यह चलन लोकप्रिय नहीं हो पाया।
ऐसे में जरूरी यह था कि हम उन संसाधनों को बचाएं जो हमें साल भर तक पीने का पानी मुहैया कराते हैं। नदियों के अलावा झीलों, तालाबों, कुओं, बावड़ियों, टांकों, जोहड़ों जैसे जल संसाधनों को इस श्रेणी में रखा जा सकता है। हमारे पूर्वज जानते थे कि पानी जीवन की सबसे बड़ी जरूरत है और इसके संरक्षण के जरा-सी भी लापरवाही पीढ़ियों के अस्तित्व को संकट की ओर धकेल सकती है। इसीलिए प्राचीन भारतीय मान्यताओं में किसी जल स्रोत के निर्माण को बहुत पुण्यदायक माना गया। राजाओं, सेठों और सामर्थ्यवान लोगों ने अपने जीवन के किसी महत्त्वपूर्ण अवसर की स्मृति को अक्षुण्ण रखने के लिए भव्य जल संसाधनों का निर्माण करवाया। भारत की सबसे भव्य बावड़ियों में एक ‘रानी जी की वाव’ गुजरात के अन्हिलवाड़ा पाटन में स्थित है। राजा भीमदेव प्रथम की स्मृति में इस बावड़ी का निर्माण उनकी रानी उदयामति ने करवाया था। यह बावड़ी अब विश्व विरासत में शामिल है। मध्यप्रदेश की राजधानी में स्थित भोपाल के प्रसिद्ध बड़े तालाब का निर्माण परमार राजा भोज ने ग्यारहवीं सदी में एक चर्म रोग से छुटकारा पाने के उपक्रम में करवाया था। युद्ध के दौरान अपनी प्रजा और सेना को शत्रु से बचाए रखने के लिए प्राचीन शासक किलों और दुर्गों में विशेष जलाशय बनवाते थे। चित्तौड़ के विश्व प्रसिद्ध गढ़ में चौरासी जलाशय थे। राजस्थान की जयसमंद और राजसमंद जैसी विशाल झीलें अपने अपने दौर में अकाल के दौरान लोगों को रोजगार देने की योजना के तहत बनवाई गई थीं। इन झीलों में जमा पानी ने बाद में लंबे समय तक इलाके को अकाल से लड़ने का हौसला दिया। मरुस्थलीय इलाकों में रहने वाले लोगों से बेहतर पानी की कीमत कौन समझ सकता है? पश्चिमी राजस्थान में न केवल पाताल की छाती तोड़ कर पानी निकाल लाने वाले कुँओं का निर्माण करवाया गया, बल्कि इन कुओं की शुचिता की रक्षा के लिए विशेष प्रबंध भी किए गए।
जैसलमेर में एक तालाब है- गढ़सीसर तालाब। बरसात शुरू होने के पहले सारा शहर इस तालाब की सफाई के लिए जमा होता था। स्वयं राजा श्रमदान हेतु लोगों के साथ उपस्थित होते थे। इस तालाब के जल को गंदा करना अपराध माना जाता था। आज भी देश के कुछ गांवों में ऐसे जलाशय हैं जिनके जल को गंदा करना सहज क्षम्य नहीं होता। प्राचीन भारतीय मान्यताएं भी जलाशयों को गंदा करना शुभ नहीं मानतीं। लेकिन समय ने हमारी प्राथमिकताओं को बदल दिया। जब शहरों की आबादी बढ़ी तो पुराने तालाबों को पाट कर बाजार और बस्तियां बसा दी गईं । हमारे यहां कई उत्सवों पर कुएं की पूजा करना एक महत्त्वपूर्ण अनुष्ठान माना जाता था। इस परंपरा का मूल यह था कि हम कुएं की कल्याणकारी भूमिका को स्वीकारें, जो अपने अंतस में हमारी जरूरतों का पानी सहेजे रहता है। लेकिन नलों के माध्यम से पानी घरों तक पहुंचा, तो लोगों ने कुओं को उपेक्षित छोड़ दिया। यही कारण है कि आज देश के अधिकांश प्राचीन कुएं और बावड़ी गंदगी से अटे पड़े हैं।
पुराने तालाब, कुएं, बावड़ी, जोहड़, टांके या झील अपने अंतस में बरसात के पानी को तो सहेजते ही थे, उनमें संचित जल शनै: शनै: धरती के अंदर जाकर भूगर्भीय जल के स्तर को बचाए रखने में भी मदद करता था। लेकिन दुर्भाग्य से विकास की आधुनिक अवधारणा ने इस सच को अनदेखा कर दिया। विकास की आधुनिक अवधारणा ने इन तालाबों की जमीनों को पाट दिया। कहीं बस्तियां बस गईं , कहीं बाजार बना दिए गए, तो कहीं रेलवे स्टेशन और न जाने क्या-क्या। भूजल को समृद्ध करने के साधन तो खत्म हुए ही, 1970 के दशक के अंत में जनता को पानी मुहैया कराने के लिए जगह-जगह नलकूप भी खोद दिए गए, जिनसे मनमाने तरीके से जमीन के अंदर का पानी बाहर उलीचा जाने लगा। परिणाम यह हुआ कि भूजल का स्तर पताल में जा पहुंचा।
देश के कुछ हिस्सों से ऐसी खबरें सामने आई हैं, जिनमें बताया गया है कि एक छोटा-सा घड़ा पानी भरने के लिए भी स्त्रियों और बच्चों को अपनी जान जोखिम में डाल कर गहरे कुएं में उतरने को मजबूर होना पड़ता है और इस कुएं तक पहुंचने के लिए भी उन्हें अपने घर से बहुत दूर चिलचिलाती धूप में जाना पड़ता है। पानी को लेकर होने वाले संघर्ष ऐसे ही कारणों से उग्र और हिंसक होते हैं। ऐसे में आवश्यक है कि हम पानी के सदुपयोग के और वर्षा जल को संग्रहित करने के महत्व को समझें। दुनिया भर में पानी को बचाने की चेतना जगाने के लिए संवेदनशील लोग सक्रिय हैं क्योंकि पानी के अभाव में मनुष्य की तरक्की के सारे दावे अर्थहीन हो जाएंगे। शायद इसीलिए रहीम ने कहा था-‘रहीमन पानी राखिये, बिन पानी सब सून/ पानी गये न ऊबरे, मोती-मानुष- चून।’
Date:04-05-22
भारत की सर्वप्रिय भाषा बने हिंदी गोपालकृष्ण गांधी, ( पूर्व राज्यपाल )
मुझे हिंदी से प्रेम है। यह बचपन से रहा है, जब मेरी मां ने मुझसे हिंदी में बात करनी शुरू की। सिर्फ हिंदी में। उनकी भाषा हिंदी नहीं थी। तमिज्ह थी। हां, तमिज्ह, तमिल या तामिल या तामील या फिर टामिल नहीं, तमिज्ह। चेन्नई जिस प्रांत की मुख्य नगरी है, यानी तमिज्ह नाड़ की, उस प्रांत की भाषा तमिज्ह है। भारत के हिंदीभाषी प्रांतों में उस भाषा का नाम ‘तमिल’ से प्रचलित हो गया है। तमिज्ह को तमिल कहने में कोई भयंकर गलती नहीं, लेकिन उसका सही उच्चारण है, तमिज्ह। यह ‘ज्ह’ कुछ मुश्किल है कहना, लेकिन उसको समझना और सही उच्चारण में कहना श्रेयस्कर है। उतना ही, जैसे हिंदी को हिंदी कहना, न कि हिंड्डी या हिन्ढी।
तो, मेरी मां (जिनका नाम लक्ष्मी था) तमिज्हभाषी थीं। लेकिन बहुत आनंद और लगन से उन्होंने हिंदी को बोलना, लिखना व प्यार करना सीखा और उस भाषा पर अद्भुत अधिकार पाया। उनके पिता थे चक्रवर्ती राजगोपालाचार्य, जिन्होंने रामायण का मूल तमिज्ह में सुंदर रूपांतर किया है। बेटी लक्ष्मी ने फिर उस रूपांतर का हिंदी में अनुवाद किया- दशरथ-नंदन श्रीराम के शीर्षक से। उसी लक्ष्मी ने (जिनका नाम शायद सरस्वती होना चाहिए था) मुझको और मेरी बहन व मेरे भाइयों को हिंदी सिखाई। भाषा के साथ संस्कार भी। उदाहरण के लिए, उन्होंने एक दिन कहा- ‘गोपू, ‘आ’, ‘आओ’ और ‘आइए’ में फर्क है न? बड़ों को तुम ‘आ’ नहीं कहोगे, न ही ‘आओ’। तुम कहोगे, ‘आइए’। ‘आइए’ से भी आगे एक शब्द है, आइएगा। अगर तुम ‘आइए’ कहो, तो कुछ गलती न होगी, लेकिन ‘आइएगा’ कहो, तो शिष्टाचार से भी आगे एक भावना का परिचय दोगे, संस्कार का।
स्कूल (बाराखंबा रोड, नई दिल्ली) में भी सौभाग्यवश मुझे हिंदी के जो अध्यापक मिले, वे उसी कोटि के मिले- पुण्यश्लोक वेदव्यास जी और विष्णुदत्त जी। इन्होंने मुझे हिंदी के और भी निकट किया। गजब के अध्यापक थे वे। पाठ्यक्रम को पूरा करना सामान्य बात होती है, जो हर शिक्षक करता है, लेकिन पाठ के प्रति प्यार की भावना अंकुरित करना कुछ और बात होती है। यह उन्होंने किया।
ऐसी मां के, जिनकी मातृभाषा हिंदी नहीं, तमिज्ह थी, और जिन्होंने मुझे तमिज्ह सीखाने से पहले हिंदी सिखाई, ज्ञानदान की स्मृति में आज यह कहता हूं कि हिंदी संस्कारी भाषा है। हिंदी जिनकी मातृभाषा नहीं, उनके मन, हृदय में हम हिंदीभाषी हिंदी के प्रति लगाव देखना चाहेंगे या नाराजगी? क्या हम नहीं चाहेंगे कि हिंदी भाषा के लिए, साहित्य के लिए, साहित्यकारों के लिए उनमें आदर, स्नेह और आकर्षण बने?
‘हिंदी ही एकमात्र राष्ट्रभाषा है भारत की!’ यह कहना भारत जैसे बहुभाषी राष्ट्र में अनुचित ही नहीं, अनुपयुक्त भी है। जो लोग संविधान से परिचित हैं, वे जानते हैं कि संविधान की आठवीं अनुसूची में शामिल भाषाओं में हिंदी समेत हमारी राज्य भाषाएं भी हैं। ‘जो हिंदी नहीं बोलेगा, वह नागरिकता खो लेगा’ के आक्रामक कथन में हिंदी की शीलता नहीं, अवधी का सुर नहीं, ब्रजभाषा का माधुर्य नहीं। उसमें बिहारी के दोहों का हास्य नहीं, रसखान की शब्द-क्रीड़ा नहीं, महादेवी का महाहृदय नहीं, निराला का चिंतन नहीं, प्रेमचंद का व्यवहार नहीं, जैनेंद्र का गांभीर्य नहीं। उसमें जवाहरलाल नेहरू का गुलाबी मन नहीं, लाल बहादुर शास्त्री का स्नेही हाथ नहीं, अटल जी की दरियादिली नहीं।
हिंदी में जन-बल है, उसको दंगल-बल की रेत में न ढालें। भारत में दक्षिण नाम की भी एक जगह है। यह हम हिंदीभाषी न भूलें। कवि प्रदीप कतई न भूले थे। तभी तो उन्होंने चिर-स्मरणीया लता मंगेशकर के गाने को कोई गोरखा कोई मदरासी वाले अमर्त्य शब्द दिए थे। भारत के तन को भारत के मन से हम अलग न करें। हमारे कविवर रवींद्रनाथ टैगोर ने गाया है- जन गण मन। उस मन को हम हर वक्त याद रखें।
और उस दक्षिण में हिंदी अनिष्ट नहीं है। बिल्कुल नहीं। ‘हिंदी-नीति’ की दक्षिण में एक छवि है- हिंदी का आरोपण हो रहा है। हिंदी-जगत यह कह सकता है कि आरोपण करने का उद्देश्य किसी का नहीं है। अगर नहीं है, तो फिर यह छवि क्यों? कैसे? उस छवि को कौन और कैसे दूर करे? जवाहरलाल नेहरू का और फिर लाल बहादुर शास्त्री का आश्वासन तमिज्ह जगत को विश्वसनीय लगा। आरोपण का भय जाता रहा। हिंदी गौण रूप से दक्षिण में सहज, सरल और खुले रूप से बोली-सुनी जाने लगी। कोई जोर नहीं, कोई जबर्दस्ती नहीं, कोई प्रतियोगिता नहीं। यह स्थिति बदलनी नहीं चाहिए, बल्कि उसको और बल मिलना चाहिए।
कई हिंदीभाषी हैं, जो कहते हैं कि हिंदी ही राष्ट्रभाषा है। कम हिंदीभाषी हैं, जो कहते हैं, भारत भाषाओं का सागर है; दक्षिण हिंदी सीखे, उत्तर दक्षिण भाषाएं सीखे। तमिज्ह महाकाव्य तिरुक्कुरल हिंदी में उपलब्ध है। कितने हिंदीभाषी हैं, जिन्होंने उसको पढ़ने और उसके ज्ञान से लाभ उठाने का प्रयत्न किया? क्या यह जानने का प्रयत्न किया है कि बसव के कन्नड़ महावाक्य हिंदी में मिलेंगे या नहीं? क्या श्री नारायण गुरु के मलयाली कथन और त्यागराज के तेलुगू कीर्तन हिंदी में अनुदित हैं? हिंदी-नीति हिंदी के विस्तार के लिए ही नहीं, हिंदी जगत की आतंरिक सीमाओं के विस्तार, उसकी संकीर्णताओं को दूर करने के लिए कटिबद्ध होनी चाहिए। और यह देखने के लिए कि उस सुशील भाषा के प्रेमियों में अन्य भारतीय भाषाओं के प्रति-उपनिवेशवाद की मानसिकता कभी न आ सके।
भाषाओं से नहीं, भाषाओं में निहित संदेशों से देश जुड़ता है। हम हिंदी में या किसी भी भारतीय भाषा में ऐसे संदेश पाएंगे, जो भारत के संयुक्त परिवार में समन्वय लाते हैं, और ऐसे भी, जो उस परिवार में अलगाव लाते हैं। भारत के हिंदीभाषी निश्चय ही बहुमत में हैं। हिंदी भारत की सर्वोच्च ‘लिंक’ भाषा बने, यह हिंदी जगत में एक स्वाभाविक भावना है। हिंदी भारत की सर्वप्रिय भाषा बने, यह हिंदी जगत का एक स्वधर्मी उद्देश्य होना चाहिए। राष्ट्र प्रेम में हिंदी का योगदान निश्चित रूप से बड़ा है। अगर हिंदी-प्रेम में राष्ट्र का योगदान लाना है, तो हिंदी को खुद से नहीं, अन्य भाषाओं और अन्य भाषियों से प्रेम करना सीखना होगा।
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हाल ही में असम, मणिपुर और नगालैण्ड के बड़े हिस्से से सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम या अफस्पा को वापस ले लिया गया है। कुछ वर्ष पहले तक यह अकल्पनीय था। 32 वर्ष पहले, इसे लागू करने से लेकर, अब तक विभिन्न सरकारों के कार्यकाल में 62 बार इसके विस्तार का अनुरोध किया जाता रहा है।
अफस्पा को हटाने के दो प्रमुख कारण –
भारत के पूर्वोत्तर राज्यों में कानून और व्यवस्था की स्थिति में उल्लेखनीय सुधार हुए हैं। इस दौरान कई उग्रवादी संगठनों ने हथियार डाल दिए हैं।
केंद्र की वर्तमान राजनीतिक व्यवस्था ऐसी है, जिसमें जमीनी स्तर पर सुधार करने के लिए ठोस कदम उठाने का उत्साह है।
कुछ अन्य कारण –
सहयोगात्मक निर्णयों और सफलताओं के परिणामस्वरूप चरणबद्ध तरीके से अफस्पा की वापसी के लिए भूमिका तैयार करना।
राज्य सरकारों और केंद्रीय गृह मंत्रालय के बीच चर्चा के बाद नगालैण्ड के संदर्भ में गठित समिति की सिफारिशों के आधार पर यह निर्णय लिया जा सका है।
गृह मंत्री द्वारा प्रदर्शित दृढ़ता और निर्णायकता के परिणामस्वरूप ऐतिहासिक बोडो शांति समझौता और कार्बी आंगलोंग शांति समझौता हो सका।
त्रिपुरा में हुए इन दो समझौतों ने 6900 से अधिक विद्रोही कैडरों और 4800 हथियारों के समर्पण को संभव बनाया।
मिजोरम के जातीय संघर्षो ने समुदाय के 37000 लोगों को पड़ोसी राज्य त्रिपुरा में पलायन को मजबूर कर दिया था। जनवरी 2020 में उन्हें एक समझौते के द्वारा किसी भी राज्य में रहने का विकल्प दिया गया।
वर्तमान की इस नई रणनीति में सुरक्षा संबंधी चुनौतियों को हल करने के लिए एक समग्र समाधान की कल्पना है। इसके लिए सभी संभावित बलों और संसाधनों को एकत्रित और मुस्तैद भी रखा जाएगा।
एक संयुक्त पूर्वोत्तर में स्थायी शांति सुनिश्चित करने के लिए गृह मंत्रालय ने सीमा सुरक्षा बल के क्षेत्राधिकार को बढ़ाया है। मानव तस्करी, नशीले पदार्थों और पशु तस्करी आदि से निपटने के लिए विभिन्न केंद्रीय कानूनों को सशक्त बनाने के लिए कदम उठाये गए हैं । उम्मीद की जा सकती है कि इन कदमों के फलस्वरूप पूर्वोत्तर सीमाओं को सुरक्षित किया जा सकेगा।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित हेमंत बिस्वा सरमा के लेख पर आधारित। 13 अप्रैल, 2022
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Date:03-05-22
न्यायालयों के आदेश की अवहेलना गंभीर मुद्दा है संपादकीय
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (सीजेआई) ने प्रधानमंत्री की उपस्थिति में कार्यपालिका और विधायिकाओं पर अपनी पूरी क्षमता से काम न करने का आरोप लगाते हुए कहा कि कार्यपालिका न्यायिक आदेशों की अवहेलना करती है। अदालत की अवमानना के बढ़ते मामले इसका प्रमाण है। यह टिप्पणी कार्यपालिका को बेहद गंभीरता से लेनी होगी, न कि इसे ‘हम बनाम वो’ के भाव से देखना होगा। यह सच है कि अगर कार्यपालिका कानून-सम्मत तरीके से बगैर राजनीतिक दबाव में आए काम करे तो आम जन को भी विश्वास होगा और वे न्यायालयों का दरवाजा नहीं खटखटाएंगे। सीजेआई का मानना है कि न्यायिक निर्देशों के बावजूद सरकारों का जानबूझकर निष्क्रियता दिखाना लोकतंत्र के स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं है। याद होगा कि विगत सप्ताह सुप्रीम कोर्ट के स्थगन आदेश के बावजूद राजधानी दिल्ली की जहांगीरपुरी में कुछ समय तक सरकार बुलडोजर चलवाती रही। यह सच है कि पिछले 70 वर्षों में लगातार राज्य यानी सरकारें कोर्ट्स में सबसे बड़ी मुकदमेबाज हैं। लेकिन अगर ये कानून-सम्मत तरीके से शासन करें तो न्यायालयों को बीच में आना ही न पड़े। हाल के दौर में ईडी, आयकर या अनेक सरकारी एजेंसियों द्वारा राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ मुकदमों के तमाम मामले सुप्रीम कोर्ट के सामने बहस में हैं। लोकसभा में केंद्र सरकार के गृह राज्यमंत्री का बयान है कि सख्त यूएपीए के मामलों में सजा की दर मात्र 2.1% है। जाहिर है 98% मामलों में पुलिस ने गिरफ्तार तो कर लिया लेकिन अपेक्षित साक्ष्य नहीं ला सकी। इस प्रक्रिया में कोर्ट का समय भी गया और जनता का विश्वास घटा। लोकतंत्र के इन स्तंभों के बीच बढ़ती इस खाई को पाटने की जरूरत है।
Date:03-05-22
भारत में प्रेस की ‘आजादी’ का अब यह तीसरा दौर अभय कुमार दुबे, ( अम्बेडकर विवि, दिल्ली में प्रोफेसर )
एक अंतर्राष्ट्रीय संस्था ‘रिपोर्टर्स विदआउट बॉर्डर’ की प्रेस फ्रीडम इंडेक्स संबंधी रपट ने भारत पर आरोप लगाया है कि पिछले कुछ वर्षों से देश में पत्रकारिता की आजादी के स्तर में गिरावट हो रही है। जबकि असलियत यह है कि भारत में प्रेस की आजादी का नजारा इस तरह के इंडेक्सों और उनके खंडन-मंडन की कवायद से कहीं पेचीदा है।
हमारे यहां प्रेस की आजादी मुख्य तौर पर तीन चरणों से गुजरकर मौजूदा मुकाम पर पहुंची है। कंधे पर झोला डाले रिपोर्टिंग करने वाले भारतीय पत्रकार की छवि पिछले साठ-सत्तर साल में लम्बा सफर तय कर चुकी है। इसमें पहला परिवर्तनकारी मुकाम तब आया, जब अंग्रेजी के एक शीर्ष दैनिक के सम्पादक ने दावा किया था कि भारत के प्रधानमंत्री के बाद देश की सबसे ताकतवर हस्ती उसी को समझा जाना चाहिए। वहीं एक अन्य ताकतवर ‘खोजी पत्रकारिता’ के रुझान को लोकप्रिय करने में लगे थे।
झोले वाले रिपोर्टर के लिए यह स्वर्णयुग था। चाहे दिल्ली जैसा महानगर हो, या कोई प्रादेशिक राजधानी अथवा छोटा कस्बाई शहर, इस पत्रकार को लगता था कि उसका रुतबा बुलंद है। वह पुलिस से लेकर नेता तक और इलाके के सबसे अमीर व्यक्ति से लेकर सबसे बड़े सट्टेबाज तक समान गति और आत्मविश्वास के साथ अपनी जरूरत के मुताबिक आवाजाही करने में सक्षम था। दिल्ली वाला रिपोर्टर अधिक संसाधन और बेहतर कौशल से लैस होता था। लेकिन छोटे शहर का अखबारनवीस भी खुद को संवाददाताओं, सम्पादकों और लेखक-पत्रकारों की उसी बिरादरी का सदस्य पाता था, जिसे लोकतंत्र का चौथा खम्भा मानने में किसी को हिचक नहीं थी। पिछली सदी में 80 और 90 के दशक तक इस पत्रकार के दिमाग में स्वयं को प्रेस की आजादी का वाहक मानने में कोई संदेह नहीं था। पत्रकार की हस्ती प्रेस की आजादी के मर्म में थी।
कहना न होगा कि यह जमाना सूचना-क्रांति और सोशल मीडिया से पहले का था। उस समय छपी हुई खबर प्रमुख होती थी। खबरिया चैनल और यूट्यूब चैनलों की कल्पना भी नहीं थी। पत्रकार का वक्ता होने से कई संबंध नहीं था। उसे लेखक ही होना पड़ता था। लेखक होने की प्रक्रिया में वह भाषा को साधता था, और यह प्रयास अपने आप पत्रकार को एक तरह का संयम और आत्मानुशासन प्रदान कर देता था। मीडिया का आकार उस समय छोटा था। इस दुनिया की पूंजी-सघनता भी आज जैसी नहीं थी। लेकिन, यह चरण बहुत दिन नहीं चल पाया। जैसे-जैसे पूंजी की मात्रा बढ़ी, नई प्रौद्योगिकी ने पत्रकार के लेखक होने की अनिवार्यता को मंद किया- वैसे-वैसे रिपोर्टर के महत्व का क्षय होता चला गया। आज अतीत का रिपोर्टर कमोबेश लुप्त हो चुका है। मीडिया की पूंजी-सघन और प्रौद्योगिकी-निर्भर दुनिया में लेखक-पत्रकार की खास हैसियत नहीं रह गई है। वह मौजूद तो है, लेकिन नए मीडिया की फ्रंट-डेस्क पर न होकर पृष्ठभूमि में चला गया है। उसका लिखा हुआ टेक्स्ट एंकर द्वारा इस्तेमाल किया जा रहा है। प्रिंट मीडिया में अभी भी अच्छे लेखकों का बोलबाला है, लेकिन वहां भी सम्पादक की संस्था अपदस्थ कर दी गई है, और प्रकाशक व प्रबंधक की संस्था ने उसका स्थान ले लिया है।
तीसरा चरण प्रेस की आजादी और सरकार के सबंधों को बदलने वाला साबित हुआ। सार्वजनिक जीवन और भारतीय राज्य की नीतियों ने बाजारवादी और दक्षिणपंथी रुझान ग्रहण करना शुरू किया। इस नई प्रवृत्ति ने पत्रकारों और मीडिया प्रतिष्ठान के संचालकों के मानस को कब्जे में लेने में कम से चालीस साल लगाए। देश में प्रेस इस समय तकनीकी रूप से आजाद है, लेकिन उसने बहुसंख्यकवादी राष्ट्रवाद के मुक्त स्वर का प्रतिकार करने के अधिकार से स्वयं को वंचित कर लिया है। यदाकदा उभरकर चमक उठने वाले अपवादों को छोड़कर भारतीय प्रेस की आजादी का प्रचलित नियम यही बन गया है।
Date:03-05-22
भारत और यूरोप संपादकीय
यूक्रेन पर रूस के हमलों के बीच भारतीय प्रधानमंत्री की यूरोपीय देशों की यात्रा इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि इस हमले से यही देश सबसे अधिक प्रभावित हैं। इसकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि ये देश यह चाहते हैं कि भारत रूस की उसी तरह निंदा करे, जिस तरह उनकी ओर से की जा रही है। उनकी इस चाहत के बाद भी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का यूरोप के तीन महत्वपूर्ण देशों-जर्मनी, डेनमार्क और फ्रांस की यात्रा पर जाना यह बताता है कि इन देशों के साथ भारत की समझबूझ बढ़ रही है। इसका पता इससे चलता है कि जहां बर्लिन में जर्मन चांसलर ने रूसी राष्ट्रपति से युद्ध रोकने को कहा, वहीं भारतीय प्रधानमंत्री ने भी यह कहने में संकोच नहीं किया कि इस युद्ध में किसी की भी जीत नहीं होगी। उनका यह कथन रूस को भी संदेश है। भारत इसके पहले भी कई बार यह कह चुका है कि न तो यूक्रेन की संप्रभुता का उल्लंघन होना चाहिए और न ही संयुक्त राष्ट्र चार्टर की अनदेखी। नि:संदेह रूस के रवैये को सही नहीं ठहराया जा सकता, लेकिन अमेरिका और यूरोप को भी इस पर विचार करना चाहिए कि यूक्रेन को नाटो का हिस्सा बनाने की पहल ने रूस को उकसाने का काम किया।
चूंकि डेनमार्क में भारत-नार्डिक सम्मेलन में भारतीय प्रधानमंत्री की मुलाकात आइसलैंड, फिनलैंड, स्वीडन और नार्वे के शासनाध्यक्षों से भी होगी, इसलिए यह उम्मीद की जाती है कि इससे न केवल भारत व यूरोपीय देशों के बीच संबंध और प्रगाढ़ होंगे, बल्कि यूरोपीय समुदाय के साथ मुक्त व्यापार समझौते की संभावना भी प्रबल होगी। भारतीय प्रधानमंत्री की यूरोप यात्र यह भी बताती है कि यूरोपीय देश इस नतीजे पर पहुंच रहे कि अपने पड़ोस में चीन के आक्रामक और अतिक्रमणकारी रवैये के चलते भारत चाहकर भी यूक्रेन संकट के मामले में उनकी जैसी भाव-भंगिमा नहीं अपना सकता। यह अच्छा हुआ कि इन देशों को अपनी इस अपेक्षा की निर्थकता का भी आभास हो गया कि भारत को अपनी ऊर्जा जरूरतों की पूर्ति रूस से नहीं करनी चाहिए। ऐसा इसीलिए हुआ, क्योंकि भारत ने इस तथ्य को रेखांकित करने में देर नहीं की कि यूरोपीय देशों के मुकाबले भारत कहीं कम ऊर्जा सामग्री रूस से आयात कर रहा है। क्या यह विचित्र नहीं कि यूरोपीय देश भारत को जो उपदेश दे रहे, उस पर खुद ही अमल नहीं कर पा रहे? यदि उनकी कुछ विवशता है, तो ऐसी ही स्थिति भारत की भी है। यह अच्छा हुआ कि भारत ने यूरोपीय देशों के दोहरे मापदंड को बयान करने के साथ उन्हें यह भी याद दिलाया कि चीन के अतिक्रमणकारी रवैये को लेकर किस तरह उनके मुंह से उसके खिलाफ एक शब्द भी नहीं निकला था।
Date:03-05-22
बेरोजगारी का जिन्न सरोज कुमार
महामारी से पहले भी बेरोजगारी चिंता का गंभीर विषय बनी हुई थी। लेकिन महामारी के दौरान बेरोजगारी का ठीकरा फोड़ने के लिए हमें एक मुकम्मल सिर मिल गया था। आज जब आर्थिक गतिविधियां पटरी पर लौट आई हैं तब बेरोजगारी के सवाल पर रोजगार के प्रबंधक सिर खुजा रहे हैं। मार्च 2022 के रोजगार के आंकड़े अर्थव्यवस्था की डरावनी तस्वीर पेश कर रहे हैं। एक तरफ नौकरियां घट रही हैं, दूसरी तरफ बेरोजगारी की दर भी और तीसरी तरफ दर-दर भटकने के बाद निराश हाल बेरोजगार घरों को लौट रहे हैं। अर्थव्यवस्था बंजर भूमि बन गई है, जहां रोजगार का अंकुर असंभव हो गया है।
मार्च 2022 में बेरोजगारी की दर नीचे आई तो आर्थिक पंडितों ने अर्थ निकाला कि अर्थव्यवस्था सुधार पर है। रोजगार के आंकड़े आते ही इस अर्थ में छिपा अनर्थ सामने आ गया। सेंटर फार मानिटरिंग इंडियन इकोनामी (सीएमआइई) के आंकड़े बताते हैं कि मार्च 2022 में बेरोजगारी दर घट कर 7.60 फीसद पर आ गई, जो फरवरी 2022 में 8.10 फीसद थी। बेरोजगारी दर घटने से नौकरियां बढ़नी चाहिए थीं, लेकिन यहां तो चौदह लाख नौकरियां घट गईं। फिर बेरोजगारी दर घटने का क्या अर्थ? बेरोजगारी दर का सीधा अर्थ श्रम बाजार में श्रमिकों की भागीदारी से जुड़ता है। श्रम बाजार में उपलब्ध रोजगाररत और बेरोजगार श्रमिकों के औसत के आधार पर बेरोजगारी दर बनती है। यदि श्रम बाजार में श्रमिक काम मांगने नहीं जाएंगे तो बेरोजगारी दर स्वत: नीचे आ जाएगी। मार्च महीने में बेरोजगारी दर के नीचे आने की वजह यही रही।
मार्च, 2022 में श्रमिक भागीदारी दर (एलपीआर) घट कर 39.5 फीसद रह गई, जो फरवरी में 39.9 फीसद थी। यानी श्रमिक भागीदारी दर जितनी घटी, लगभग उतनी ही बेरोजगारी दर नीचे आई है। आश्चर्य की बात यह कि मार्च की श्रमिक भागीदारी दर महामारी की दूसरी लहर के दौरान की दर से भी नीचे रही, जब कई प्रतिबंधों के कारण आर्थिक गतिविधियां बुरी तरह बाधित थीं। उस दौरान (अप्रैल-जून, 2021) औसत श्रमिक भागीदारी दर चालीस फीसद थी और न्यूनतम श्रमिक भागीदारी दर भी जून में 39.6 फीसद थी। पिछले पांच सालों में 2017 से 2022 के बीच श्रमिक भागीदारी दर लगभग छह फीसद घट गई। देश में लगभग 90 करोड़ लोग नौकरी योग्य हैं। जबकि मार्च 2022 में श्रम बाजार में श्रमिकों की संख्या अड़तीस लाख घट कर बयालीस करोड़ अस्सी लाख रह गई। यानी अकेले मार्च में अड़तीस लाख लोग नौकरी की उम्मीद छोड़ घर बैठ गए। जुलाई 2021 से आठ महीने की अवधि में श्रम बाजार में श्रम बल की यह न्यूनतम संख्या है। मार्च का महीना आर्थिक गतिविधि के लिहाज से साल का सबसे व्यस्त महीना माना जाता है, ऐसे में श्रम बाजार में श्रमिक भागीदारी दर के साथ नौकरियों का घटना अर्थव्यवस्था में बड़े संकट की आहट है। जून 2018 के बाद तीन वर्षों की अवधि में श्रम बाजार में श्रमिकों की संख्या में इस तरह की गिरावट पहली घटना है।
रोजगार बाजार में जो नौकरियां बची हैं, अब जरा उन पर गौर किया जाए। मार्च, 2022 में चौदह लाख की गिरावट के बाद कुल नौकरियों की संख्या 39.6 करोड़ रह गई, जो जून, 2021 के बाद का सबसे निचला स्तर है। अगर कृषि क्षेत्र न होता तो नौकरियों का यह निचला स्तर रसातल में चला जाता। कृषि क्षेत्र की अधिकांश नौकरियां हालांकि छद्म श्रेणी में रखी जाती हैं, जिसे सरल भाषा में ‘बैठे की बेगार’ कहते हैं। माना जाता है कि जब दूसरे क्षेत्रों में नौकरियां नहीं मिलतीं, तब श्रमिक कृषि क्षेत्र में लौट जाते हैं। इसी कृषि क्षेत्र में मार्च 2022 में एक करोड़ तिरपन लाख नौकरियां बढ़ गईं, जिसके कारण दूसरे क्षेत्रों में एक करोड़ सड़सठ लाख नौकरियों के खत्म होने की काफी हद तक भरपाई हो गई। कृषि क्षेत्र ने रोजगार के आकड़े को रसातल में जाने से भले बचा लिया, लेकिन यहां कार्यरत श्रमिकों की हालत क्या है, किसी से छिपी नहीं है। खेती से किसान की रोज की कमाई मात्र सत्ताईस रुपए है।
पिछले पांच सालों में दो करोड़ से ज्यादा नौकरियां जा चुकी हैं। मार्च 2022 में जिन क्षेत्रों में नौकरियां गईं, उनमें वे क्षेत्र शामिल हैं जो सर्वाधिक नौकरियां पैदा करने के लिए जाने जाते हैं, जैसे- उद्योग, विनिर्माण, निर्माण, खनन और खुदरा क्षेत्र। मार्च, 2022 में औद्योगिक नौकरियां छिहत्तर लाख घट गईं। विनिर्माण क्षेत्र में इकतालीस लाख नौकरियां खत्म हो गईं, जिसमें ज्यादातर नौकरियां सीमेंट और धातु जैसे संगठित क्षेत्र की हैं। निर्माण क्षेत्र में उनतीस लाख और खनन क्षेत्र में ग्यारह लाख नौकरियां चली गईं। विनिर्माण क्षेत्र की सेहत बताने वाला इंडिया मैन्युफैक्चरिंग परचेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (पीएमआइ) मार्च में घट कर 54.0 पर आ गया, जो फरवरी में 54.9 था। यह आंकड़ा फैक्टरी संबंधित गतिविधि में सितंबर 2021 से अब तक की सबसे धीमी वृद्धि को प्रदर्शित करता है। महामारी की भेंट चढ़े वित्त वर्ष 2020-21 के बाद जुलाई, 2021 को छोड़ दिया जाए, तो 2021-22 के पूरे वित्त वर्ष के दौरान विनिर्माण क्षेत्र में सुधार का रुख था। मार्च में भी यह सिलसिला जारी रहने की उम्मीद थी। पर परिस्थिति दगा दे गई। आर्थिक गतिविधियां बहाल होने के बाद निर्माण क्षेत्र में भी तेजी की उम्मीद थी। लेकिन छह करोड़ चालीस लाख नौकरियों तक पहुंच कर यह क्षेत्र भी ठिठक गया। वर्ष 2018 में यहां छह करोड़ अस्सी लाख से सात करोड़ बीस लाख लोग रोजगाररत थे। मार्च 2022 में तो निर्माण क्षेत्र में छह करोड़ बीस लाख से भी कम नौकरियां रह गईं। खुदरा क्षेत्र के लिए भी यह वक्त मायूसी भरा रहा, जहां नौकरियां घट कर छह करोड़ छप्पन लाख रह गईं। फरवरी 2022 में यहां सात करोड़ लोगों को रोजगार मिला हुआ था।
गैर कृषि क्षेत्र में नौकरियों का जाना इन क्षेत्रों में सुस्ती का संकेत है। लेकिन यह सुस्ती चुस्ती में कैसे बदले? बड़ा सवाल यही है। अर्थव्यवस्था की चुस्ती आमजन की जेब से जुड़ी है। लोगों की जेब में पैसे होंगे तो वे खर्च करेंगे, तभी बाजार में मांग बढ़ेगी। मांग बढ़ेगी तभी नौकरियां पैदा होंगी। मुनाफा अगर बाजार का मूल सिद्धांत है, तो घाटा सह कर बाजार नौकरियां नहीं पैदा करेगा। मुनाफे का सिद्धांत महंगाई बढ़ा रहा है। यह एक खतरनाक रुझान है। देश ने वित्त वर्ष 2021-22 में चार सौ अरब डालर से अधिक मूल्य के निर्यात का इतिहास रचा। निर्यात के इस आंकड़े के अनुसार बाजार में मांग और रोजगार का टोटा नहीं होना चाहिए था। लेकिन अर्थव्यवस्था के तमाम संकेतकों से लगता है निर्यात में यह उछाल परिस्थितिजन्य प्रकृति की है, बाधित आपूर्ति श्रृंखला के बहाल होने का तात्कालिक परिणाम। यदि निर्यात की यह रफ्तार आगे बनी रहती है तो रोजगार बढ़ने की उम्मीद की जा सकती है। लेकिन अस्थिर वैश्विक आर्थिक हालात इसकी संभावना को कमतर करते हैं।
कृषि क्षेत्र और सार्वजनिक क्षेत्र संकट की हर घड़ी में लाभ-हानि की परवाह किए बगैर रक्षक की भूमिका में रहे हैं। इन दोनों क्षेत्रों को मजबूत करना समय की मांग है। 2019-20 में जहां कृषि क्षेत्र की वृद्धि दर साढ़े पांच फीसद थी, वहीं गैर कृषि क्षेत्र साढ़ तीन फीसद वृद्धि दर के साथ घिसट रहा था। वित्त वर्ष 2020-21 में जब अर्थव्यवस्था 6.3 फीसद गोता लगा गई, तब भी कृषि क्षेत्र 3.3 फीसद की दर से आगे बढ़ रहा था। 2021-22 में भी अर्थव्यवस्था सिर्फ गड्ढे से बाहर ही निकली है, जबकि कृषि क्षेत्र 3.3 फीसद की दर के साथ लगातार विकास के पथ पर है। ऐसे में कम से कम कृषि क्षेत्र को एक स्वतंत्र नियंत्रणकारी स्वरूप प्रदान किया जाना चाहिए, ताकि बाजार के नियंत्रण से परे रोजगार का एक मजबूत आधार खड़ा हो सके।
Date:03-05-22
साइबर शक्ति बढ़ाने की जरूरत प्रभात सिन्हा
रूस और यूक्रेन के बीच वर्तमान में चल रहे युद्ध में पहली बार परंपरागत युद्ध के अलावा साइबर युद्ध भी चल रहा है। वास्तव में रूस ने सैन्य हमले से पहले यूक्रेन के सरकारी और बड़े कॉर्पोरेट वेबसाइटों के खिलाफ निम्न श्रेणी के साइबर हमले शुरू कर दिए थे। साइबर सुरक्षा संस्था, चेक प्वाइंट रिसर्च के रिपोर्ट के अनुसार, 24 फरवरी से शुरू सैन्य आक्रमण के शुरुआती तीन दिनों में, यूक्रेन के सरकारी, सैन्य संस्थाओं के वेबसाइट और अन्य डिजिटल संशाधनों पर साइबर हमले फरवरी के शुरुआती दिनों के अपेक्षा 196 प्रतिशत तक बढ़ गए थे।
लगातार हो रहे साइबर हमले से परेशान होकर यूक्रेन सरकार ने भी स्वयंसेवी साइबर विशेषज्ञों के लिए ‘आई टी आर्मी ऑफ यूक्रेन’ नाम से एक टेलीग्राम ग्रुप बनाया, जिसमें अब 3 लाख से ज्यादा सदस्य जुड़कर साइबर मोर्चे पर रूस को कड़ी टक्कर दे रहे हैं। प्रत्यक्ष रूप से, साइबर युद्ध भी तेजी से युद्ध के एक व्यापक माध्यम के तौर पर विकसित हो रहा है। हार्वर्ड के कैनेडी स्कूल में बेलफर सेंटर फॉर साइंस एंड इंटरनेशनल अफेयर्स की टीम के अनुसार, साइबर शक्ति समृद्ध देशों में संयुक्त राष्ट्र अमेरिका अव्वल है, जबकि चीन, यूनाइटेड किंगडम, और रूस क्रमश: दूसरे तीसरे और चौथे स्थान पर हैं। विशेषज्ञों के अनुसार अमेरिका की सहायता के कारण ही यूक्रेन, रूस के साइबर आक्रमणों का ना सिर्फ डटकर मुकाबला कर पा रहा है, बल्कि यूक्रेन समर्थक साइबर विशेषज्ञ डीडीओएस हमलों से लेकर डिजिटल संपत्तियों को बाधित करने जैसे कई प्रयास भी कर रहे हैं। डिस्ट्रीब्यूटेड डिनायल ऑफ सर्विस आक्रमण, सर्वरों, नेटवकरे और अन्य संसाधनों पर जरूरत से ज्यादा इंटरनेट बोझ बढ़ाकर उन्हें निष्क्रिय बना देता है। परिणाम सिस्टम वैध अनुरोधों को संचालित करने में असमर्थ हो जाता है। रूस पूर्व में भी यूक्रेन पर साइबर आक्रमण कर चुका है, जैसे 2015 में क्रीमिया के रूसी विलय के बाद पावर ग्रिड पर होने वाले साइबर आक्रमण से कुल 2 लाख लोगों को घंटो बिजली के अभाव में बिताना पड़ा था। 2017 का नोटपेत्या साइबर हमला और भी गंभीर था। नोटपेत्या एक मालवेयर है जो उपयोगकर्ताओं को लॉकआउट करने के लिए डिवाइस में मौजूद डेटा को कूटलेखित करता है। मालवेयर किसी कंप्यूटर सिस्टम को बाधित करने, क्षति पहुंचाने या अनिधकृत उपयोग करने के लिए विकसित किया जाता है। नोटपेत्या साइबर हमले से यूक्रेन हवाई अड्डों, रेलवे और बैंकिंग व्यवस्था का परिचालन बुरी तरह प्रभावित हो गया था। यही नहीं, नोटपेत्या ने बहुराष्ट्रीय कंपनियों के सिस्टम को भी तहस-नहस करने में कामयाबी हासिल की थी, जिससे अरबों डॉलर का नुकसान हुआ था। साइबर हमलों को दो भाग में विभाजित किया जा सकता है। पहला; प्रत्यक्ष रूप से और व्यापक अराजकता फैलाने के लिए किसी व्यक्ति, संस्था अथवा देश के ऊपर, दूसरा परोक्ष रूप से आवश्यक सेवाओं को बाधित करने के उद्देश्य से। कई परोक्ष साइबर आक्रमण का तो पता भी नहीं चल पाता, या फिर काफी देर से पता चलता है। साइबर हमले काफी घातक भी हो सकते हैं। एक गंभीर साइबर आक्रमण प्राकृतिक आपदा जैसा विनाशकारी हो सकता है, जिससे आवश्यक बुनियादी ढांचा क्षतिग्रस्त हो सकता है और आम जनजीवन को भारी असुविधा हो सकती है। प्रसिद्ध शोध संस्था फिच रेटिंग के अनुसार 2013 के बाद के साइबर हमलों में लगभग एक चौथाई का लक्ष्य सरकारी संपत्तियों को नुकसान पहुंचाना रहा है, जबकि 15 प्रतिशत के करीब हमले महत्त्वपूर्ण सुविधाओं को बाधित करने के लिए होते हैं। उदाहरण के तौर पर, अप्रैल 2007 में, एस्टोनिया के ऊपर साइबर हमला हुआ था, जिसके दौरान लगभग 58 महत्त्वपूर्ण एस्टोनियाई वेबसाइटें ऑफलाइन हो गई, जिनमें सरकार, बैंक और मीडिया आउटलेट्स की वेबसाइटें शामिल थीं। उसी प्रकार 2017 में हुए रैंसमवेयर में 150 से अधिक देशों में लगभग 200,000 कंप्यूटर प्रभावित हुए थे। रैंसमवेयर एक प्रकार का दुर्भावनापूर्ण सॉफ्टवेयर होता है, जो किसी कंप्यूटर सिस्टम का उपयोग तब तक अवरुद्ध करता है जब तक कि मांगी गई राशि का भुगतान नहीं किया जाए। इस प्रकोप का कई व्यवसायों पर व्यापक प्रभाव पड़ा और कुल नुकसान की वैश्विक लागत लगभग 7.8 बिलियन डॉलर से ज्यादा पहुंच गई थी। सैन्य, आर्थिक, राजनीतिक और अंतरराष्ट्रीय संबंधों में लाभ हासिल करने के लिए सभी बड़े और विकसित देश अत्याधुनिक डिजिटल तकनीकों के माध्यम से साइबर शक्ति एकत्रित करने की होड़ में शामिल हैं।
बेहतर साइबर शक्ति होने पर जासूसी, तोड़फोड़, दुष्प्रचार से दुश्मन को बिना सैन्य कार्रवाई के भी पंगु बनाया जा सकता है, साथ ही अपने ऊपर होने वाले साइबर हमले से बेहतर बचाव भी किया जा सकता है। दुश्मन के सैन्य बुनियादी ढांचे को डिजिटल रूप से अक्षम करने की क्षमता साइबर शक्ति संपन्न देशों के प्रयासों को गतिशीलता प्रदान करती है। प्रतिद्वंद्वी खेमे के मनोबल को कमजोर करने के लिए दुष्प्रचार फैलाने की पुरानी युद्ध रणनीति को भी तकनीक से बढ़िया प्रोत्साहन मिलता है। वर्तमान अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों को देखते हुए भारत सरकार को भी साइबर शक्ति बढ़ाने के लिए जरूरी कदम उठाने होंगे।
Date:03-05-22
पुलिस का दुरुपयोग दोधारी तलवार विभूति नारायण राय, ( पूर्व आईपीएस अधिकारी )
गुजरात के विधायक जिग्नेश मेवानी को पिछले दिनों जमानत देते समय बारपेटा के न्यायाधीश ने लोकतंत्र और पुलिस को लेकर जिस तरह की टिप्पणियां की हैं, वे हम सबकी आंखें खोलने के लिए पर्याप्त हैं। जिग्नेश को सबसे पहले असम के एक जिले की पुलिस ने उनके द्वारा किए गए कुछ ट्वीट्स के आधार पर गिरफ्तार किया, और जब उन्हें उसमें जमानत मिल गई, तो उन्हें हिरासत में रहते हुए ही एक महिला पुलिसकर्मी से दुर्व्यवहार के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया। सत्र न्यायाधीश ने इस पूरे मामले को फर्जी करार देते हुए असम पुलिस की कार्यप्रणाली पर कठोर टिप्पणियां की हैं। उन्होंने पुलिस की अराजकता पर नियंत्रण करने का अनुरोध किया है। न्यायाधीश की यह टिप्पणी सबसे महत्वपूर्ण है कि मुश्किल से हासिल लोकतंत्र को पुलिस-राज में तब्दील नहीं होने दिया जा सकता। पिछले कुछ वर्षों में असम में पुलिस अभिरक्षा से ‘भागने’ का प्रयास करते हुए मारे जाने वाले कैदियों की संख्या में जैसी असाधारण वृद्धि हुई है, उसे देखते हुए यह टिप्पणी बहुत महत्वपूर्ण है।
असम पुलिस का यह आचरण पुलिस में दिन-ब-दिन बढ़ते राजनीतिक हस्तक्षेप और शीर्ष पुलिस नेतृत्व द्वारा मौका मिलते ही पूरी तरह समर्पण करने की प्रवृत्ति का द्योतक है। यदि एक ऐसे विधायक को, जिसकी धाक पूरे देश में है, फर्जी मामले में फंसाया जा सकता है, तो फिर आम नागरिक के साथ क्या हो सकता है, इसकी मात्र कल्पना ही की जा सकती है। पुलिस का अपने विरोधियों के खिलाफ इस्तेमाल की कामना किसी एक राजनीतिक दल की बपौती नहीं है। हाल ही में पंजाब पुलिस ने भी पिलखुआ में कवि कुमार विश्वास के घर पर इसी तरह एक आभासी टिप्पणी पर दबिश दी थी। याद रहे कि असम और पंजाब में भिन्न दलों की सरकारें हैं, पर अपने विरोधियों से पुलिस के जरिये निपटने की भूख दोनों में एक जैसी ही है।
पुलिस का राजनीतिक इस्तेमाल व्यक्तिगत आजादी की सांविधानिक गारंटी को किस तरह बाधित करता है, यह असम जैसी घटनाओं से बखूबी समझा जा सकता है, पर इससे भी ज्यादा चिंताजनक सांप्रदायिक उन्माद की वे घटनाएं हैं, जो पिछले कुछ दिनों में देश के विभिन्न भागों में घटी हैं और जिनसे निपटने में असफलता के पीछे एक जैसा ही राजनीतिक हस्तक्षेप दिखता है। यह हस्तक्षेप अलग-अलग दलों की सरकारों द्वारा समय-समय पर किया जाता रहा है।
देश की आजादी के 75वें वर्ष में, जिसे हम अमृत महोत्सव के रूप में मना रहे हैं, किसे उम्मीद थी कि देश के अलग-अलग हिस्सों में नफरत के फफोले फूट पड़ेंगे और पीब के फव्वारे हमारे शरीर को उस आभा से वंचित कर देंगे, जिसके दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र के रूप में हम पात्र थे। यह अनायास नहीं हुआ कि इस वर्ष रामनवमी के अवसर पर देश का एक तिहाई भाग किसी न किसी तरह की हिंसा का शिकार हुआ। इसके लिए हम पिछले काफी दिनों से तैयारी कर रहे थे। इस बीच उत्तर प्रदेश समेत कई राज्यों में चुनाव हुए हैं, जिनमें खुलकर हिंदू-मुस्लिम कार्ड खेला गया। इन्हीं के दौरान जब परस्पर घृणा अपने उरूज पर थी, देश के कई हिस्सों में संत सम्मेलन आयोजित किए गए। इन सम्मेलनों में जैसे वक्तव्य दिए गए या हथियारों का जिस तरह से प्रदर्शन किया गया, उसमें बहुत कुछ ऐसा था, जिनकी किसी संत सम्मेलन में अपेक्षा नहीं की जा सकती थी। कई धर्म संसदों और माहौल में काफी जहर घुल जाने के बाद सर्वोच्च न्यायालय ने रुड़की में प्रस्तावित धर्म संसद पर रोक लगा दी। जितनी आसानी से स्थानीय प्रशासन ने आयोजकों और भाग लेने वालों को अनुशासित कर दिया, उससे स्पष्ट हो गया कि केवल राज्य की इच्छा शक्ति का अभाव था, जिनके चलते पिछले धर्म संसदों में उत्तेजक भाषण हो सके। न्यायपालिका से भी जैसी सक्रियता की अपेक्षा की जा सकती है, वैसी नहीं दिखाई दी। हरिद्वार के पहले धर्म संसद के दौरान किए गए भाषणों को लेकर कई व्यक्ति और संगठन सर्वोच्च न्यायालय गए, पर किसी प्रभावी कार्यवाही के अभाव में रुड़की के प्रस्तावित कार्यक्रम के पहले कई और कार्यक्रम हुए और उनमें एक से एक बढ़कर भड़काऊ भाषण होते रहे।
जिस तरह के दंगे-फसाद पिछले दिनों हमारे यहां हुए हैं, उनसे पूरी दुनिया में हमारी छवि पर असर पड़ा है। यदि हम विश्व की एक बड़ी अर्थव्यवस्था बनना चाहते हैं, तो हमें अपना घर सुधारना होगा। कोई राष्ट्र आर्थिक महाशक्ति नहीं बन सकता, यदि वहां प्राकृतिक न्याय के सर्वमान्य सिद्धांतों का पालन नहीं होता। दुनिया में सभ्य राष्ट्र वे ही कहलाते हैं, जिनमें कानून का शासन होता है और यह कानून कायदों का पालन करने वाली पुलिस के जरिये ही संभव है। पुलिस द्वारा खुद ही न्यायाधीश की भी भूमिका हथियाने की चाहत से फर्जी एनकाउंटर का जन्म होता है। त्वरित न्याय की यह पद्धति हमारे समाज को बर्बर और असभ्य ही बनाएगी।
हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि पुलिस राज्य का सबसे दृश्यमान अंग होती है। सांप्रदायिक हिंसा के दौरान जब कफ्र्यू लगा हो, तब तो अक्सर सन्नाटा भरी निर्जन सड़कों पर सिर्फ पुलिस भारतीय राज्य का प्रतिनिधित्व करती है। यदि वह समाज के किसी तबके का विश्वास जीतने में असफल होती है, तो इसका सीधा अर्थ यह निकलता है कि एक बड़े वर्ग का राज्य में विश्वास खत्म हो गया है। भारत एक बहुभाषी और बहुधार्मिक समाज है और इस विविधता की रक्षा में ही इसका कल्याण है। धार्मिक, जातीय या भाषिक तनाव के दौरान पुलिस के निष्पक्ष और पेशेवर आचरण से ही भारतीय राज्य की निष्पक्षता की परख होती है। दुर्भाग्य से हालिया दंगों में पुलिसकर्मी अपने राजनीतिक आकाओं को खुश करने का प्रयास करते से दिखते हैं।
पुलिस का अपने संकीर्ण हित में इस्तेमाल करने को व्यग्र राजनीतिज्ञों को समझना होगा कि इसका दुरुपयोग एक दोधारी तलवार की तरह है। पुलिस को गैरकानूनी आचरण के लिए प्रेरित करने वाले भूल जाते हैं कि जिस दिन वे सत्ता में नहीं होंगे, यही पुलिस उनके खिलाफ भी गैरकानूनी आचरण से नहीं झिझकेगी। दिलचस्प यह है कि जिन नेताओं ने विपक्ष में रहते हुए पुलिस की बर्बरता झेली है, वे भी सत्ता हासिल करते ही उसका दुरुपयोग करने के लिए आतुर हो जाते हैं।
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Date:02-05-22
CJI Makes A Case Reducing govt litigation, smarter law-making and clearer govt policies can help court pendency TOI Editorials
With the Prime Minister and state chief ministers in attendance, Chief Justice of India NV Ramana laid down what was nothing less than a manifesto on good government practices to mitigate the judiciary’s pendency crisis. CJI Ramana was able to demonstrate that government as the largest litigant has to clean up its act. He proceeded bottom-up from panchayat and civic bodies to tehsildars and other revenue officials, from policing at thanas to service laws that trigger disputes over postings and transfers, to signal how non-performance and lack of adherence to constitutional due process kicks off copious litigation.
The CJI then proceeded to the upper tier of governance. His list of lapses was long: hasty enactment of laws by legislatures, often done without discussion, frivolous litigation by various government departments, deliberate inaction by governments on implementing judicial pronouncements, transferring the burden of decision-making to courts, slow process of judicial appointments, and lag in upgradation of judicial infrastructure. Top politicians of the country who govern at the Centre and in states and who return from the conference with judges to their offices have a constitutional responsibility to set right this drift.
Judges can only interpret the law; for everything else pertaining to governance, the Constitution empowers the political executive and the bureaucracy, which is the permanent executive, to make laws, frame procedures and loosen purse-strings. The CJI’s remark that land disputes account for 66% of pendency offers governments a focus area to the extent that clearer policies can solve some of these disputes. Governments must also address the fear of prosecution that haunts officers and decisionmaking at all levels. That’s one of the reasons administrators find it safer to go to court than settle a dispute quickly.
Badly conceived laws that criminalise liquor and marijuana consumption, dissent, teenage sexuality, interfaith marriages or increased compliance burdens on businesses and the countless politically motivated cases across India are a poor advertisement for governance and constitutionalism. These cases breed corruption, which hits the poor the hardest, besides spawning a hard to dislodge neta-babu-cop nexus. If government departments can ensure justice to citizens by following due process, courts wouldn’t be overburdened and wouldn’t fail in their watchdog duties. It’s not a chicken and egg problem.
Date:02-05-22
Desi Commerce GoI’s ecommerce network for small players is a good idea. Customer interface will be critical TOI Editorials
GoI’s quest to build an open digital ecommerce network for small businesses holds great promise. The proposed model can potentially be a game-changer for small retailers and new tech startups facing big ecommerce giants and their market dominance and commissions. It can also address sellers’ limitations of being tied down to one platform, and supposedly opaque algorithms used by them to prioritise some sellers. Physical retail still accounts for well over 90% of retail sales, but mom-and-pop stores enjoying a large chunk of consumer goods sales (75-80%) are feeling the heat of ecommerce players aggressively targeting new segments like groceries, promising 10-minute deliveries.
After its technological successes of the Aadhaar system and digital payments solution UPI, GoI can justly claim a good track record. Another promising digital venture is the National Digital Health Mission that aims to digitise health records of all citizens. And it’s good that the presence of ecommerce biggies Amazon and Walmart-owned Flipkart hasn’t daunted GoI. There’s economic logic in safeguarding livelihoods in the unorganised retail sector and boosting MSMEs, as long as this isn’t done by introducing any distortion or discrimination. Roping in the likes of Nandan Nilekani, who played key roles in conceptualising Aadhaar and UPI, for the Open Network for Digital Commerce (ONDC), has also added to the project’s heft.
But unlike in digital payments and the pioneering UPI, ecommerce has dominant players with user-friendly websites and apps, excellent customer service and fast delivery networks. ONDC-based offerings have to be just as good to attract sellers and customers. ONDC, with its premise of greater cross-platform visibility and discoverability of sellers, shouldn’t be thrust on anybody. If interoperable networks and applications built on ONDC ease tasks like cataloguing, inventory management, order fulfilment and delivery logistics, both buyers and sellers would be automatically attracted. ONDC can also help tomorrow’s ecommerce/tech startups save redundant investments in the ecommerce network and focus on customer acquisition. Next month’s pilot ONDC project will be keenly watched.
Date:02-05-22
Making the NE AFSPA-Mukt ET Editorials
Narendra Modi’s announcement last Thursday in Assam regarding ongoing efforts to completely remove the Armed Forces (Special Powers) Act (Afspa) from the Northeast is reassuring. This builds on the earlier announcement to reduce the number of disturbed areas brought under the Act in Nagaland, Assam and Manipur from April 1. The PM’s announcement should now be followed up with a roadmap and timeline. This will build on the credibility that the Centre has garnered on its willingness to minimise the use of this law.
The improvement in the law and order situation — reports suggest a 75% decrease in violence in the region — is good news for the development and economic growth of the Northeast. This is
also indicative of improved governance. Afspa, granting special almost unbridled powers to Indian Armed Forces to maintain public order in ‘disturbed areas’. The law was first imposed in the form of the Armed Forces (Assam and Manipur) Special Powers Act in 1958 in the Naga Hills region (then a part of Assam), and later expanded across the Northeast. Over the years, Afspa has remained in force in parts of the Northeast, resulting in abrogation of various aspects of democratic and open societies. Efforts at ensuring peace in the region proved to be unsuccessful, the continued imposition of Afspa adding to the vicious cycle of distrust.
The efforts by the state governments in the region and the central government — as well as participation of the local people — has helped to seriously reduce the earlier endemic violence, the provocation for the imposition of the law in the first place. It’s fitting that the region where Afspa first raised its unhelpful head is the very place where GoI is working to make Afspa-mukt. One hopes other district under Afspa across the country also follow suit.
Date:02-05-22
Ending AFSPA AFSPA should go entirely because of the impunity it offers armed forces Editorial
It augurs well for the future that Prime Minister Narendra Modi has given the first authentic indication that the operation of the Armed Forces (Special Powers) Act (AFSPA) may come to an end in the whole of the north-eastern region, if ongoing efforts to normalise the situation bear fruit. Mr. Modi’s remark that a good deal of work is being done in that direction, not only in Assam but also Nagaland and Manipur, may be rooted in his keenness to demonstrate the level of progress achieved in the region under his regime; but it will bring immense relief to the citizens, nevertheless. Areas notified as ‘disturbed areas’ under AFSPA have been progressively reduced in the last few years, mainly due to the improvement in the security situation. About a month ago, the Union Home Ministry reduced such notified areas considerably in Assam, Nagaland and Manipur. There was a substantial reduction in Assam, where AFSPA was removed entirely in 23 districts and partially in one. In Nagaland, after the removal of the law from 15 police stations in seven districts, it remains in areas under 57 police stations, spread across 13 districts. Areas under 82 police stations are still notified under the Act in Manipur, even though 15 police station areas were excluded from the notification from April 1. Mr. Modi, who spoke at a ‘peace, unity and development rally’ in Diphu in Assam last week, cited “better administration” and the “return of peace” as the reasons for the removal of AFSPA in these areas in a region that has seen insurgencies for decades.
AFSPA was revoked in Tripura in 2015 and in Meghalaya in 2018. It is not unforeseeable that other States will also be excluded from its purview at some point of time. It is convenient to link the exclusion of an area from AFSPA’s purview with reduction in violence by armed groups, improvement in the security situation and an increase in development activity, but what is important is the recognition that the law created an atmosphere of impunity and led to the commission of excesses and atrocities. It was hardly four months ago that 15 civilians were killed in Mon district in Nagaland in a botched military operation. Therefore, alongside the gradual reduction in the areas under the Act, there should be serious efforts to procure justice for victims of past excesses too. On the political side, it is indeed true that much headway has been made in moving towards a political solution to some of the multifarious disputes in the region, in the form of peace accords, ceasefire and creation of sub-regional administrative arrangements. The removal of AFSPA from the entire region will be an inevitable step in the process. But irrespective of the security situation, AFSPA should not have allowed such impunity to the armed forces.
Date:02-05-22
Invigorating the Ayush industry Its integration into mainstream systems will give wider acceptance to traditional systems of the country Dr. Rajiv Kumar is former Vice-Chairman, NITI Aayog. Vaidya Rajeshwari Singh is Research Officer, and Ravindra Pratap Singh is personel secretary to Vice Chairman, NITI Aayog
The global market for herbal medicine was valued at $657.5 billion in 2020. It is expected to grow to $746.9 billion in 2022. In China, the traditional medicine industry had total revenue of $37.41 billion in 2018, according to an IBISWorld report. In fact, the Healthy China 2030 plan forecasts that the value of traditional Chinese medicine (TCM) market may reach $737.9 billion within China and globally by 2030.
The growth of the TCM industry in China is attributed to the immense attention the sector has received in the country. In 1982, the Constitution of China gave full recognition to TCM. Since 2009, there has been continuous support for TCM in health policies. China has focused upon developing quality infrastructure for TCM to co-exist with modern medicine under the same roof.
The NAM scheme
In India, the National Ayush Mission (NAM) was launched in 2014 by the Department of Ayush, Ministry of Health and Family Welfare, to promote Ayush systems and address the needs of the sector in a comprehensive way. Providing cost-effective services, strengthening educational systems, quality control of drugs and sustainable availability of raw materials are the main objectives of NAM. The industry is projected to reach $23.3 billion in 2022, according to a Research and Information System for Developing Countries (RIS), 2021, report. The Indian herbal medicine market is worth $18.1 billion.
The Indian Ayush sector has grown by 17% between 2014 and 2020. Related segments such as plant derivatives grew by 21%, plant extracts by 14.7%, and herbal plants by 14.3% during the same period.
Under the ‘Medicinal Plants’ component of the NAM scheme (2015–16 to 2020–21), the cultivation of prioritised medicinal plants in identified clusters/zones is being supported. Cultivation of plants on farmer’s land, establishment of nurseries with backward linkages, post-harvest management with forward linkages, and primary processing, marketing, etc., are all covered under the scheme. For the cultivation of plants, subsidies at 30%, 50% and 75% of the cultivation cost for 140 medicinal plants are being provided. So far, approximately 56,396 hectares are under the cultivation of medicinal plants, as per the Ministry of Ayush.
Further, last year Union Ayush Minister Sarbananda Sonowal announced that medicinal plants will be cultivated on 75,000 hectares of land. The Ministry of Finance has also announced a ₹4000-crore package under the Aatmanirbhar Bharat Abhiyaan for the promotion of herbal cultivation.
There is no doubt about the potential of the sector and the above measures will surely help. However, the Ayush sector requires a multi-dimensional thrust, ranging from initiatives at the institutional level, massive awareness and promotion of cultivation of medicinal plants by farmers, to trade-related interventions and quality focus measures.
SMPBs to be strengthened
The National Medicinal Plant Board (NMPB) implements the medicinal plant component of Ayush through state bodies—State Medicinal Plant Boards (SMPBs). The organisational structure of SMPBs needs to be strengthened. They should have experts for conservation, cultivation, R&D, herbal garden and nurseries, IEC and marketing and trade of medicinal plants. On the trade front, developing comprehensive databases on Ayush trade, products and raw materials is needed. To date, most ISM (Indian System of Medicine) products, herbal products and medicinal plants products are not identified under specific HS (Harmonised system) codes. Expansion of HS national lines to accommodate various features of traditional medicine and medicinal plant products based on existing requirements is required to provide more comprehensive trade data on Ayurvedic products.
Prime Minister Narendra Modi laid the foundation of the WHO-Global Centre for Traditional Medicine in Jamnagar on April 19, 2022. This will be the first and only global outpost centre for traditional medicine across the world.
NITI Aayog has already constituted a committee and four working groups on integrative medicine, with more than 50 experts across the country, to provide deeper insights and recommendations in the areas of education, research, clinical practice and public health and administration. Considerable progress has been made by the committee for the finalisation of the report. Integration of Ayush systems into mainstream systems will certainly give wider acceptance for traditional systems of the country.
The Ayush industry in India can provide cost-effective healthcare to people across States. It has all the ingredients of success, to co-exist with the modern health systems, as a choice-based system of traditional medicine.
Date:02-05-22
समान नागरिक संहिता संपादकीय
समान नागरिक संहिता को लेकर जारी बहस के बीच ऐसे स्वर फिर से खूब उभर रहे हैं, जो इस या उस बहाने ऐसी किसी संहिता के निर्माण को अनावश्यक बता रहे हैं। यह कोई नई बात नहीं। दशकों से यही होता चला आ रहा है। जब भी समान नागरिक संहिता को लेकर कोई पहल होती है अथवा उसके निर्माण की आवश्यकता जताई जाती है, तब कुछ दल, खास सोच वाले बुद्धिजीवी और इंडियन मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड जैसे संगठन कुतर्को और काल्पनिक भय के साथ उसके विरोध में खड़े हो जाते हैं। इन दिनों भी ऐसा ही हो रहा है। कोई यह कह रहा है कि समान नागरिक संहिता का निर्माण लोगों के धार्मिक मामलों में अनावश्यक हस्तक्षेप होगा तो कोई ऐसे बयान दे रहा है कि यह महंगाई, बेरोजगारी आदि से लोगों का ध्यान बंटाने की कोशिश है। क्या इससे बेतुकी बात और कोई हो सकती है? क्या समान नागरिक संहिता का निर्माण न करने से महंगाई और बेरोजगारी की समस्या का समाधान हो जाएगा? प्रश्न यह भी है कि महिलाओं को उनके अधिकार दिलाना और उन्हें अन्याय एवं शोषण से बचाना किसी के धार्मिक मामलों में हस्तक्षेप कैसे कहा जा सकता है? क्या किसी पंथनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक देश में धार्मिक मामलों के नाम पर मनमानी होने दी जा सकती है?
समान नागरिक संहिता को लेकर बेलगाम बयानबाजी होने का एक बड़ा कारण यह है कि उसके विरोधियों और यहां तक कि समर्थकों को भी यह नहीं पता कि वह कैसी होगी और उससे क्या बदलेगा? यही कारण है कि मनमाने बयान दिए जा रहे हैं। यह सिलसिला तब तक नहीं थमने वाला, जब तक समान नागरिक संहिता का कोई मसौदा सामने नहीं लाया जाता। उचित यह होगा कि इस संहिता का कोई मसौदा तैयार कर उसे जनता के समक्ष विचारार्थ प्रस्तुत किया जाए, ताकि उस पर व्यापक बहस हो सके। गोवा में यह संहिता लागू है। उसके जरिये उसका एक नया मसौदा आसानी से तैयार किया जा सकता है। समान नागरिक संहिता को लेकर गंभीरता प्रदर्शित कर रहे सत्तारूढ़ लोगों के लिए यह आवश्यक है कि सबसे पहले वे उसका मसौदा सामने लाएं। यह जानना दयनीय है कि 21वें विधि आयोग को समान नागरिक संहिता से जुड़े प्रविधानों का विस्तृत अध्ययन करने का काम सौंपा गया था, लेकिन यह काम किए गए बगैर उसका कार्यकाल खत्म हो गया। इसके बाद कहा गया कि 22वें विधि आयोग को यह जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है, लेकिन कोई नहीं जानता ऐसा कब होगा?
Date:02-05-22
मुश्किलें बढ़ाती महंगाई जयंतीलाल भंडारी
पिछले हफ्ते दिल्ली में आयोजित रायसीना संवाद में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने कहा कि रूस-यूक्रेन युद्ध और आपूर्ति शृंखला में बाधा की वजह से दुनियाभर में खाद्यान्न की कमी होने लगी है और महंगाई तेजी से बढ़ती जा रही है। सरकार से लेकर अर्थशास्त्री तक इस हालात को लेकर चिंतित नजर आ रहे हैं। भारत में भी आम आदमी कीमतों में बढ़ोतरी से जूझ रहा है, लेकिन खाद्यान्न अनुकूलता के कारण अभी यहां वैसे हालात पैदा नहीं हुए हैं, जैसे दुनिया के और मुल्कों में देखने को मिल रहे हैं। इस समय भारत अपने खाद्यान्न भंडारों के कारण दुनिया को खाद्य संकट से उबारने में मदद भी कर पाने की स्थिति में है।
गौरतलब है कि अमेरिका, ब्रिटेन, तुर्की, पाकिस्तान सहित अधिकांश देशों में जहां महंगाई भारत की तुलना में काफी अधिक है, वहीं जर्मनी, इटली, स्पेन सहित कई यूरोपीय देशों में खाद्य तेलों और आटे का स्टाक खत्म होने की खबरें भी आ रही हैं। महामारी संकट तथा महंगाई और बढ़ने की आशंका को देखते हुए लोग घरों में सामान जमा कर रहे हैं। इस कारण कई यूरोपीय देशों को तो सीमित मात्रा में सामान बेचने का नियम लागू करने को बाध्य होना पड़ा है, ताकि जमाखोरी न बढ़े। इतना ही नहीं कई यूरोपीय देशों में उद्योग-कारोबार में गिरावट के कारण कर्मचारियों की छंटनी का सिलसिला भी जारी है। वैसे भी बेरोजगारी दुनिया की बड़ी और गंभीर समस्या बन गई है।
उल्लेखनीय है कि भारत में खाद्यान्न अनुकूलता के बावजूद महंगाई बढ़ने के चार परिदृश्य सामने हैं। एक, थोक और खुदरा महंगाई दर बढ़ रही है। दो, पेट्रोल और डीजल की कीमतों में वृद्धि रोजमर्रा के खर्च को प्रभावित कर रही है। तीन, चीन सहित कई देशों से आयातित वस्तुएं महंगी हो गई हैं और इंडोनेशिया ने पाम आइल का निर्यात रोकने का फैसला किया है। चार, ब्याज दरों में वृद्धि से कर्ज महंगा होने से महंगाई बढ़ रही है। गौरतलब है कि 18 अप्रैल को आए आंकड़ों के अनुसार मार्च में थोक महंगाई दर बढ़ कर 14.55 फीसद पर पहुंच गई। यह बीते चार माह में सबसे ज्यादा रही। यह लगातार बारहवां महीना रहा, जब थोक महंगाई दर दस फीसद से ऊपर रही। इसी तरह खुदरा महंगाई भी इस साल मार्च में 6.95 फीसद पर पहुंच गई, जो पिछले सत्रह महीनों में सबसे ज्यादा रही। यह लगातार तीसरा महीना है जब खुदरा महंगाई भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) के दो से छह फीसद से दायरे से बाहर बनी हुई है।
यह बात भी महत्त्वपूर्ण है कि रूस-यूक्रेन के बीच युद्ध की वजह से कच्चे तेल के बढ़ते दाम और वस्तुओं की आपूर्ति बाधित होने से वैश्विक जिंस बाजार में भी भारी तेजी बनी हुई है। शंघाई सहित चीन के कई औद्योगिक शहरों में कोरोना फिर से फैलने की वजह से पूर्णबंदी जैसे कदम उठाए जा रहे हैं। इस कारण उत्पादन में कमी होने से चीन से आयातित कच्चा माल काफी महंगा हो गया है। इसका असर भारत के उद्योगों पर पड़ रहा है। रूस-यूक्रेन युद्ध की वजह से सूरजमुखी के तेल का आयात पहले से प्रभावित है। इंडोनेशिया ने पिछले हफ्ते से पाम आयल का निर्यात बंद कर दिया है। भारत में खाद्य तेल की खपत दो सौ पच्चीस लाख टन सालाना की है और इसमें अस्सी लाख टन पाम आयल भी शामिल है। भारत में पाम आयल का इस्तेमाल खाने से लेकर साबुन, बिस्कुट, टूथपेस्ट, शैंपू जैसी रोजमर्रा के इस्तेमाल वाली वस्तुओं के उत्पादन में किया जाता है। ऐसे में पाम आयल के गहराते संकट की वजह से खाद्य तेलों के अलावा दूसरी वस्तुएं भी महंगी हो रही हैं। इससे अप्रैल की खुदरा महंगाई दर पर असर पड़ेगा।
सरकार के साथ रिजर्व बैंक भी बढ़ती महंगाई के दुष्प्रभावों से अनजान नहीं है। इस समय रिजर्व बैंक की प्राथमिकता महंगाई को काबू करना है। इसी को ध्यान में रखते हुए रिजर्व बैंक के कहने पर देश के विभिन्न व्यावसायिक बैंकों ने कर्ज दर (एमसीएलआर) में इजाफा किया है। इससे कर्ज महंगे हो गए हैं। कर्जदारों, कारोबारियों और उद्योगपतियों को कर्ज पर ज्यादा किस्त और ब्याज चुकाना होगा। कर्ज दर बढ़ने से महंगाई के दौर में लोगों की मुश्किलें और बढ़ेंगी। एमसीएलआर बैंकों की ऐसी मानक ब्याज दर होती है, जिस पर बैंक ग्राहकों को कर्ज देते हैं। हालांकि कर्ज का महंगा होना महंगाई नियंत्रण की दिशा में एक प्रभावी कदम है, लेकिन इससे आर्थिक गतिविधियों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका रहती है। वस्तुत: महंगी दर पर कर्ज लेने से आम आदमी, उद्यमी व कारोबारी पीछे हटेंगे। इससे बाजार में विभिन्न उत्पादों की मांग और आपूर्ति में कमी आएगी। स्थिति यह भी है कि इस साल मार्च से बढ़ी महंगाई के बाद जहां आम आदमी के जीवन पर महंगाई का असर पड़ा है, वहीं कर्ज के भुगतान पर भी इसका प्रभाव दिखने लगा है। कर्ज नहीं चुका पाने वालों की संख्या बढ़ रही है। जबकि पिछले साल नवंबर में आर्थिक गतिविधियों में तेजी को देखते हुए कर्जदारों की भुगतान क्षमता सुधार दिखा था। लेकिन मार्च में खाद्य वस्तुओं और तेल की बढ़ती कीमतों से आर्थिक हालात फिर से बिगड़ने लगे।
इस समय दूसरे देशों की तुलना में भारत में महंगाई का असर कम है। भारत में महंगाई को तेजी से बढ़ने से रोकने में कुछ अनुकूलताएं स्पष्ट दिखाई दे रही हैं। देश में अच्छी कृषि पैदावार खाद्य पदार्थों की कीमतों के नियंत्रण में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभा रही है। इसके अलावा देश में न केवल सार्वजनिक वितरण प्रणाली (पीडीएस) के लिए आवश्यकता से अधिक चावल और गेहूं का सुरक्षित केंद्रीय भंडार भरपूर है, बल्कि देश गेहूं और चावल का निर्यात भी कर रहा है। यह बात भी महत्त्वपूर्ण है कि देश में महंगाई को काबू करने में सार्वजनिक वितरण प्रणाली की उपयोगिता दिखाई दे रही है। राष्ट्रीय खाद्य सुरक्षा अधिनियम के तहत सार्वजनिक राशन प्रणाली के तहत करीब अस्सी करोड़ लाभार्थियों में से जनवरी 2022 तक सतहत्तर करोड़ से अधिक लाभार्थी डिजिटल रूप से सभी राशन दुकानों से जुड़ गए। सरकार ने तिलहन और खाद्य तेलों पर भंडारण सील की अवधि छह महीने बढ़ा कर 31 दिसंबर 2022 तक कर दी है। भंडारण सीमा के तहत खुदरा विक्रेता तीन टन तक और थोक व्यापारी पचास टन तक खाद्य तेल का भंडारण कर सकता है। इस कदम से जमाखोरी पर नियंत्रण रहेगा। रिजर्व बैंक भी कह चुका है कि वह अब विकास दर में वृद्धि के बजाय महंगाई नियंत्रण को अधिक प्राथमिकता देगा और अपने नरम रुख को धीरे-धीरे वापस लेगा। जिस तरह पिछले वर्ष 2021 में पेट्रोल और डीजल की कीमतें सौ रुपए प्रति लीटर से अधिक होने पर केंद्र सरकार ने पेट्रोल व डीजल पर सीमा व उत्पाद शुल्क में और कई राज्यों ने वैट में कमी की थी, वैसे ही कदम अब फिर जरूरी दिखाई दे रहे हैं।
उम्मीद की जानी चाहिए कि सरकार ऐसे विभिन्न रणनीतिक प्रयासों से देश के आम आदमी और अर्थव्यवस्था को महंगाई के खतरों से बचाने के लिए तेजी से आगे बढ़ेगी। भारतीय मौसम विभाग ने इस वर्ष सामान्य मानसून रहने का जो पूर्वानुमान किया है, वह सटीक रहेगा और सामान्य मानसून से भी महंगाई नियंत्रित होगी।
Date:02-05-22
न्याय प्रणाली और नागरिक संपादकीय
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कहा है कि अदालतों में स्थानीय भाषाओं का इस्तेमाल ज्यादा से ज्यादा किया जाए तो न्याय प्रणाली में आम नागरिकों का विश्वास बढ़ेगा और वे इससे जुड़ाव महसूस करेंगे। छह वर्ष के अंतराल पर शनिवार को हुए मुख्यमंत्रियों और उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीशों के संयुक्त सम्मेलन को संबोधित करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने बताया कि एक समूह दो प्रारूपों पर विचार कर रहा है-एक विशिष्ट कानूनी भाषा में तो दूसरा साधारण भाषा में जिसे आम लोग समझ सकते हैं। ऐसा विभिन्न देशों में प्रचलित है, और दोनों प्रारूप कानूनी रूप से स्वीकार्य हैं। इससे पूर्व प्रधान न्यायाधीश एनवी रमण ने कहा कि अदालतों में स्थानीय भाषाओं का इस्तेमाल करने के लिए एक कानूनी व्यवस्था की दरकार है। प्रधान न्यायाधीश की टिप्पणी का जिक्र करते हुए प्रधानमंत्री ने कहा कि भारत आज जब स्वतंत्रता की 75वीं वषर्गांठ मना रहा है, तो ऐसी न्यायिक प्रणाली के निर्माण पर ध्यान केंद्रित किया जाना चाहिए जहां न्याय आसानी से उपलब्ध हो, त्वरित मिले और सर्वसुलभ हो। दरअसल, यह सम्मेलन न्यायिक क्षेत्र के समक्ष चुनौतियों और उनके समाधान में आने वाली अड़चनों पर गौर करने का अवसर था। इसी के मद्देनजर प्रधान न्यायाधीश जस्टिस रमण ने ध्यान दिलाया कि कार्यपालिका और विधायिका की विभिन्न शाखाओं के अपनी पूरी क्षमता के साथ काम नहीं करने के कारण अदालतों में लंबित मामलों का अंबार लग गया है। सरकारों को ‘सबसे बड़ा वादी’ करार देते हुए उन्होंने कहा कि पचास प्रतिशत लंबित मामलों के लिए सरकारें जिम्मेदार हैं। कार्यपालिका की विभिन्न शाखाओं की निष्क्रियता नागरिकों को अदालतों का दरवाजा खटखटाने पर विवश करती है। अदालतों के फैसले सरकारें वर्षो तक लागू नहीं कर पातीं तो अदालतों में अवमानना याचिकाओं की बाढ़ आ जाती है। जनसंख्या के बरक्स न्यायाधीश कम होने से याचिकाओं के निपटारे में विलंब होता है, और कानून क्षेत्र की प्रसिद्ध उक्ति-जस्टिस डिलेड इज जस्टिस डिनाइड-चरितार्थ होने लगती है। ऐसे में जरूरी है कि राज्य के तीनों अंग-कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका-अच्छे से अपने दायित्व का निर्वहन करें। प्रधान न्यायाधीश ने भी इस तरफ ध्यान दिलाया है कि ये तीनों क्षेत्र अपनी ‘लक्ष्मण रेखा’ के प्रति सचेत रहें तो नागरिकों को त्वरित न्याय सुनिश्चित होगा। अवमानना तथा जनहित याचिकाओं की संख्या कम होगी और अदालतों पर बोझ कम हो सकेगा।
Date:02-05-22
ख्वाब ही रहेगा या.. जकिया सोमन
आमतौर पे हमारे देश में सिर्फ चुनाव के समय स्त्री मतदाता की बात होती है। आज जब कहीं भी चुनाव नहीं हो रहे हैं, तब भी भारतीय स्त्री की समानता एवं उसके साथ जुड़े प्रश्नों की बात करना जरूरी है। साक्षरता, शिक्षा और तेजी से बदलता समाज मौजूदा सदी की एक महत्त्वपूर्ण विशेषता है, लेकिन फिर भी देश की महिला आम तौर पर पुरु ष से बहुत पीछे है। पिछले तीन दशकों में टेक्नोलॉजी और वैश्विकीकरण के चलते मानव जीवन शैली में बदलाव की प्रक्रियाएं प्रत्यक्ष रूप से तेज हुई हैं। फिर भी समाज में महिलाओं एवं लड़कियों का स्थान दोयम दर्जे का ही बना हुआ है।
आजादी के सत्तर साल बाद भी महिला की तरक्की के लिए सरकार, नागर समाज, समाज एवं परिवार में इच्छा-शक्ति और ताल-मेल की जरूरत है। महिला का वोट लेने के लिए राजनैतिक पार्टयिां कई हथकंडे अपनाती रही हैं। लेकिन क्या महिला की भूमिका सिर्फ वोट तक सीमित होनी चाहिए? बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ; लड़की हूं, लड़ सकती हूं, अच्छे नारे हैं। अब इन नारे से आगे जाकर महिला के वास्तविक जीवन में सुधार होना जरूरी है। कई राज्यों में महिलाएं बड़ी तादाद में वोट डालने निकलती हैं। कहीं-कहीं तो महिलाओं का मतदान प्रतिशत पुरुषों से ज्यादा भी हो जाता है। यही वजह है कि पार्टयिां प्रचार के समय महिला महिला जपती हैं, लेकिन महिला को मानवीय अधिकार एवं मान-सम्मान दिलाने के लिए आवश्यक कदम उठाने से कतराती हैं। सरकारें एवं राजनैतिक पार्टयिां पितृसत्तात्मक सामाजिक व्यवस्था से टकराना तो दूर, उन्हें बरकरार रखने वाले कई कथन-कृत्य करती नजर आती हैं।
महिला के लिए शिक्षा, रोजगार, सुरक्षा, मानवीय गरिमा एवं सामाजिक न्याय सबसे बड़ी चुनौतियां हैं। हालांकि देश का संविधान महिला नागरिक को समान हक देता है, लेकिन पुरुष प्रधानता के चलते महिला पीछे रह जाती है। फिर राजनैतिक पार्टयिां भी पुरु ष प्रधानता पर आधारित व्यवस्था से काम करती हैं। उन्हें सिर्फ महिला के वोट से मतलब है न कि असल बदलाव से। संसद में महिला आरक्षण कानून का प्रस्ताव 30 से अधिक वर्षो से धूल खा रहा है। साफ है कि राजनीतिक पार्टियों के नेता-मुखिया महिला के समर्थन में बातें ही करते हैं, लेकिन कोई ठोस कदम नहीं उठाना चाहते। ज्यादातर राजनेता खुद पुरु षवादी मानसिकता से पीड़ित हैं। वे नहीं चाहते कि कोई महिला राजनीति में प्रवेश करे या तरक्की करे। लगता है कि महिला आरक्षण कानून का प्रस्ताव आने वाले कई वर्षो तक यूं ही पड़ा रहेगा। भाजपा, कांग्रेस, वामपंथी दलों समेत तमाम अन्य राजनैतिक दल इस देरी के लिए जिम्मेदार हैं। एक तरफ शिक्षा के निजीकरण के चलते किसी भी गरीब और विशेष रूप से ग्रामीण और पिछड़े परिवार के लिए बेटियों की शिक्षा और दूभर हो चली है। दूसरी तरफ, कोविड-19 महामारी के चलते करीब दो वर्षो तक स्कूल-कॉलेज और शिक्षण-प्रशिक्षण संस्थान बंद रहे। ऑनलाइन मॉड में शिक्षा के चलते गरीब परिवारों के बच्चों और खासकर बच्चियों को शिक्षा से वंचित रहना पड़ा है। कोविड महामारी के कारण कई महिलाओं को रोजगार से हाथ धोना पड़ा है।
सेंटर फॉर मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी (सीएमआईई) के एक अध्ययन के मुताबिक करीब 25% महिला कामगारों का रोजगार हमेशा के लिए छीन गया है यानी ये महिलाएं रोजगार के दायरे से बाहर हो गई हैं, और अब पूरी तरह से अपने परिवार पर और भी निर्भर हो गई हैं। उधर, राष्ट्रीय महिला आयोग की एक रिपोर्ट दशर्ती है कि महामारी के चलते घरेलू हिंसा का चलन और भी बढ़ गया है जबकि भारत में पिछले कई वर्षो से घरेलू हिंसा निषेध कानून लागू है। साथ ही, मानसिक उत्पीड़न एवं मानसिक स्वास्थ्य से जुड़ी समस्याएं भी सामने आ रही हैं। वैसे तो कोविड महामारी की मार पूरे देश ने झेली है लेकिन महिलाओं और लड़कियों ने इसकी और भी ज्यादा कीमत चुकाई है। सरकारें इस समस्या को पहचानें और इसका हल निकालें, यह उम्मीद करना भी शायद मजाक ही होगा। वैसे तो देश की सभी महिलाएं कामकाजी महिलाएं हैं। कोई स्त्री घर के अंदर काम करती है, तो कोई घर के अंदर और बाहर, दोनों जगहों पर काम करती है। लेकिन हमारा समाज महिला के काम को काम ही नहीं मानता। ऐसी स्थिति में काम के दाम मिलें, यह उम्मीद रखने की तो सोचना भी मुश्किल है। जाहिर है कि इन हालात में महामारी की मार तो स्त्री को झेलनी ही थी!
आज महिलाओं के खिलाफ लैंगिक हिंसा भी आम हो चली है। गांवों, शहरों और कस्बों से बलात्कार एवं जातीय हिंसा की खबरें रोज सुनने को मिलती रहती हैं। कई बार तो सत्ता में बैठे लोगों के द्वारा भी हिंसा किए जाने की खबर हमें चौंकाती है। इन घटनाओं और खबरों पर राजनीतिक पुरुषों की प्रतिक्रियाएं भी अचंभित करने वाली होती हैं। स्त्री को सुरक्षा और न्याय दिलाने की बजाय वे महिला को ही हिंसा का दोषी ठहराते हैं, या कहते हैं कि बलात्कार की कोई घटना हुई ही नहीं है। दोषियों को सजा दिलवाना तो दूर रहा, वे दोषियों को बचाने की पूरी कोशिश में लग जाते हैं। फिर घटना के साथ जाति एवं मजहब भी जोड़ दिया जाता है। कुल मिलाके देश की बेटियों को असुरक्षा और हिंसा की घटना के साथ ही जीवन व्यतीत करने का अनुभव होता है। हालात से लड़ने की जिम्मेदारी लड़की और उसके परिवार की होकर रह जाती है, जो इस समस्या से अपने दम जूझने को विवश दिखलाई पड़ते हैं।
भारत का संविधान स्त्री नागरिकों को समान अधिकार देता है। इसके बावजूद समाज में स्त्रियों से खुले आम अन्याय होता है। जब बेटी आगे बढ़ेगी तो ही परिवार आगे बढ़ेगा और समाज एवं देश आगे बढ़ेगा। आज भी कुछ विशेष हालात में जन्मी स्त्रियों को छोड़कर अन्य सभी स्त्रियां शिक्षा एवं प्रगति के अवसर से वंचित रह जाती हैं। संविधान में व्यवस्था के बावजूद आज तक हमारा समाज और हमारे देश की राजनीति मूलभूत रूप से पुरुष प्रधान है। अधिकतर स्त्रियों को अपनी मानवीय गरिमा एवं क्षमता पूर्ण रूप से हासिल करना 21वीं सदी में भी मुश्किल है। देश की बेटियों को समान हक और न्याय तभी मिल पाएगा जब सरकार, राज्य व्यवस्था, समाज और विशेष रूप से पुरु ष समाज इसकी ओर प्रतिबद्ध हो। इनकी गैर-मौजूदगी में स्त्री समानता एक ख्वाब ही रहेगा।
Date:02-05-22
जब किराये की कोख से आने लगे धनाढ्य लोगों के बच्चे क्षमा शर्मा, ( वरिष्ठ पत्रकार )
कहा तो यह जाता है कि जो महिलाएं गर्भधारण नहीं कर सकतीं या जिनकी उम्र ज्यादा है, वे सरोगेसी की मदद से मां बनने की कोशिश करती हैं। जैसे कि हाल ही में मशहूर अभिनेत्री प्रियंका चोपड़ा या प्रीति जिंटा मां बनी हैं।
मगर यह हमेशा का सच नहीं है। कई माता-पिता जिनके बच्चे कुछ बड़े हो गए हैं, वे भी इस तकनीक की मदद से बच्चे पैदा करा रहे हैं, जैसे आमिर खान या शाहरुख खान। कई धनाढ्य या हस्तियां जो अविवाहित हैं, उन्होंने भी इस तकनीक की मदद से बच्चे का सुख प्राप्त किया है, जैसे कि निर्माता एकता कपूर, उनके भाई अभिनेता तुषार कपूर और करण जौहर। यह परंपरा धनाढ्य वर्ग में जोर पकड़ती जा रही है। क्या हम उस ओर बढ़ रहे हैं, जहां सक्षम महिलाएं शायद गर्भधारण और प्रसव पीड़ा से गुजरना ही न चाहें?
तकनीक ने बदलाव का रास्ता आसान कर दिया है। एक समय में विदेशी भी भारत में इस तकनीक से बच्चा प्राप्त करने के लिए बड़ी संख्या में आते रहे हैं। क्योंकि विदेश के मुकाबले भारत में यह तकनीक बहुत सस्ती है। एक अनुमान है कि इसमें तेरह-चौदह लाख रुपये तक का खर्च आता है, लेकिन कई बार ऐसा होता है कि तमाम मानवाधिकारों तक को भुला दिया जाता है। भारत में एक ऑस्ट्रेलियाई दम्पत्ति को जुड़वां बच्चे हुए थे, एक लड़का और एक लड़की। मगर वे लड़के को यहां यह कहकर छोड़ गए कि उन्हें लड़का नहीं चाहिए, क्योंकि उनका एक लड़का पहले से है। कितना दुखद है कि एक बच्चा जन्मते ही माता-पिता के होते हुए भी इस दुनिया में अकेला रह गया। बच्चा चुनने या छोड़ देने का यह अधिकार किसी को ताकत या धन के आधार पर देना कहां तक उचित है?
ऐसी ही बहुत सी घटनाएं रही होंगी, जिस कारण से भारत सरकार ने विदेशियों को यहां से सरोगेसी के जरिए बच्चा प्राप्त करने पर रोक लगा दी। इस तकनीक से कुछ महिलाएं तो लगभग हर साल बच्चे पैदा कर रही थीं। उनके स्वास्थ्य पर किसी का कोई ध्यान नहीं था। धन केलोभ महिलाएं भी अपने स्वास्थ्य से समझौता करने लगी थीं। अधिक बच्चों का जन्म महिलाओं के स्वास्थ्य पर बुरा असर डालता है। पहले ही भारत में जचगी के दौरान एनीमिक होने या खून की कमी के कारण बड़ी संख्या में महिलाओं की मौत हो जाती है।
स्त्रीवादियों द्वारा यह आरोप भी लगाया जाता है कि एक स्त्री की कोख को व्यवसाय अपने हितों के लिए इस्तेमाल कर रहा है। स्त्री के मां बनने के अधिकार को पैसे से खरीदा जा रहा है। वे इसे पैसे वालों का गरीब स्त्री के शरीर पर आक्रमण भी बताते हैं। वे औरत के शरीर को बच्चा पैदा करने वाली मशीन बनाने का विरोध भी करते हैं, जो सही भी है।
अपने यहां माना जाता है कि कोख से पवित्र कुछ नहीं है। बच्चे पर पहला अधिकार उस मां का होता है, जिसने उसे जन्म दिया। मगर यहां तो जो मां जन्म देती है, जन्मते ही बच्चे को उससे अलग कर दिया जाता है। जो स्वयं जन्म नहीं देती, जो प्रसव पीड़ा नहीं झेलती, वह पूरे अधिकार से मां बनकर बच्चे को ले जाती है। जन्म देने वाली मां की पहचान हमेशा केलिए खो जाती है। ऐसी कोख से जन्म लेने वाला बच्चा जब बड़ा होगा, तो क्या वह जन्म देने वाली मां को खोजेगा, क्या वह ममता का सही व स्वाभाविक मोल समझेगा? माना जाता है कि चूंकि बच्चे को जन्म देने के लिए मां को पैसे दिए गए हैं, इसलिए उसका उस पर कोई अधिकार नहीं है। जबकि गर्भावस्था के दौरान मां और बच्चे के बीच भावनात्मक सम्बंध जुड़ जाता है। यदि यह सम्बंध न हो, तो यह बच्चे के स्वास्थ्य और मानसिक विकास के लिए बुरा है। बच्चे और मां के बीच जो नाभि-नाल सम्बंध होता है, उसे बिल्कुल भुला दिया जाता है। आज स्टेम सेल विज्ञान इसी नाल से तमाम ऐसी बीमारियों का इलाज खोज रहा है, जिन्हें आज तक लाइलाज माना जाता है।
बच्चे के विकास के लिए भावनात्मक सम्बंध कितने जरूरी हैं, आखिर इस पर ध्यान क्यों नहीं दिया जाता? हाल ही में हुई रिसर्च ने बताया था कि बच्चे अपनी मां को खुशबू से पहचानते हैं। जब तक वे भाषा नहीं सीखते, तब तक इसी खुशबू से काम चलाते हैं। आपने देखा ही होगा कि किसी दूसरे की गोद में अगर बच्चा रो रहा है, तो वह अपनी मां की गोद में आते ही चुप हो जाता है। यह खुशबू जन्म देने वाली मां की ही होती है। सरोगेसी से जन्मे बच्चे आखिर इस गंध को कहां से पाते होंगे? इस लेखिका ने कई वीडियो में भी ऐसा देखा है कि बच्चे जन्म के बाद जब अपनी मां के पास लाए गए, तो वे उन्हें सूंघने लगे। पैसे देकर किसी बच्चे को जन्मते ही खरीदना एक तरह से बच्चे के अधिकार का हनन तो है ही, उसे एक उत्पाद बना देना भी है। जैसे एक साबुन, शैम्पू या बिस्कुट, कपड़ा, आप बाजार से खरीदते हैं, उसी प्रकार पैसे देकर बच्चे भी खरीद सकते हैं।
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हाल ही में संसद ने दिल्ली नगर निगम (संशोधन) अधिनियम, 2022 पारित किया है। देखने में तो ऐसा लगता है कि केंद्र सरकार ने तीन भागों में बंटे हुए दिल्ली नगर निगमों को एकीकृत करने का प्रयास किया है। परंतु वास्तव में केंद्र ने राज्य के नगर निगम अधिकारों पर नियंत्रण बनाने के लिए यह कदम उठाया है। केंद्र सरकार के इन परिवर्तनों की शुरूआत से संघवाद का घोर नुकसान होने की आशंका है।
कुछ बिंदु –
केंद्र सरकार का कहना है कि संशोधन को संविधान के अनुच्छेद 239एए के अनुसार पारित किया गया है। 239 एए (3)(बी) प्रावधान के अनुसार संसद को दिल्ली राज्य के लिए ‘किसी भी’ मामले पर कानून बनाने का अधिकार है।
संशोधित कानून के अनुसार वार्डों की संख्या, प्रत्येक वार्ड की सीमा, सीटों का आरक्षण, निगम की सीटों की संख्या, पार्षदों की संख्या जैसे कई महत्वपूर्ण मामले अब केंद्र के अधीन होंगे।
संघीय ढांचे में सेंध –
इस संशोधन कानून में केंद्र सरकार ने जानबूझकर संविधान के भाग-9ए को नजरअंदाज किया है। इस भाग में स्पष्ट कहा गया है कि राज्य के विधानमंडल को नगरपालिकाओं से संबंधित कानून बनाने का अधिकार होगा। केंद्र का यह तर्क कि संविधान के भाग 9ए के ऊपर, अनुच्छेद 239 एए को लागू किया जा सकता है, सही नहीं है। भाग 9ए को संविधान में 74वें संशोधन के माध्मय से शामिल किया गया था।
दिल्ली नगर निगम को तीन भागों में बांटने के लिए विभिन्न स्तर पर विचार-विमर्श किए गए थे। अनेक समितियां बनाई गई थीं। अंततः 2011 में इसे अमल में लाया गया। केंद्र सरकार ने इसे फिर से एक करने से पहले किसी प्रकार का अध्ययन या विचार-विमर्श नहीं किया है।
ज्ञातव्य हो कि अनुच्छेद 239 एए अपने अधिनिमयन के बाद से ही विवादों में रहा है। उच्चतम न्यायालय ने 2018 के स्टेट ऑफ एनसीटी ऑफ दिल्ली बनाम भारत सरकार मामले में इसका दायरा निर्धारित किया था।
न्यायालय ने स्पष्ट रूप से कहा था कि – “संविधान ने एक संघीय संतुलन को स्थापित किया है, जिसमें राज्य सरकारों को एक निश्चित डिग्री की स्वतंत्रता का आश्वासन दिया गया है।’’ इस मामले में दिल्ली नगर निगम अधिनियम, 1957 भी है, जिसमें संशोधन से राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली राज्य, केंद्र सरकार के नगर निगम संशोधन कानून को चुनौती दे सकता है।
बहरहाल, नगरपालिका जैसे मामलों में केंद्र का हस्तक्षेप, संघवाद और विकेंद्रीकरण के भारतीय मॉडल के खिलाफ एक प्रहार है।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित मुकुंद पी. उन्नी के लेख पर आधारित। 21 अप्रैल, 2022
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Date:30-04-22
A step that would trigger language phonocide Imposing Hindi would be catastrophic; instead, India would be better off having a multi-linguistic accommodative policy Faisal C.K. is Under Secretary (Law) to the Government of Kerala.
The Union Home Minister, Amit Shah, recently urged the use of Hindi as the lingua franca, rather than English, in inter-State communication. He suggested (reportedly at the Parliamentary Official Language Committee) that when citizens of States who speak other languages communicate with each other, it should be in the “language of India”. It is quite natural that a leader of a political stream that raised the slogan, ‘Hindi, Hindu, Hindustan’ would air such a quixotic idea. It was V.D. Savarkar, the Hindutva icon, who first advocated the idea of Hindi to be declared the national language and articulated the slogan, ‘Hindi, Hindu, Hindustan’. R.V. Dhulekar, a member of the Constituent Assembly, bluntly stated in the Assembly, “You may belong – to another nation but I belong to Indian nation, the Hindi Nation, the Hindu Nation, the Hindustani Nation.”
India has a harmonious symphony of linguistic pluralism; it is not a disarranged cacophony. Ganesh N. Devy, in ‘Indigenous languages’, a UNESCO lecture in October 2008, and also in a media article, “Tribal languages in a death trap” in August 2011, has mentioned how Sir George Grierson’s Linguistic Survey of India (1903-1923) had identified 179 languages and 544 dialects in India. The 1961 Census reports mentioned a total of 1,652 ‘mother tongues’, out of which 184 ‘mother tongues’ had more than 10,000 speakers, and of which 400 ‘mother tongues’ had not been mentioned in Grierson’s survey, while 527 were listed as ‘unclassified’. In 1971, the linguistic data offered in the Census was distributed in two categories — the officially listed languages of the Eighth Schedule of the Constitution, and the other languages with a minimum of 10,000 speakers each. All other languages spoken by less than 10,000 speakers were lumped together in a single entry ‘Others’. That practice continued to be followed in subsequent enumerations. This practice made many languages invisible, says Prof. Devy.
Exposing a myth
The so-called ‘National Grandiosity’ of Hindi is a dubious fallacy unsupported by facts. Prof. Devy had exposed the myth of Hindi as a pan-Indian language. In an article in The Hindu on June 7, 2019, “Language, the opening move”, he wrote: “The 2011 Census data on languages, published last year, was heavily doctored. It presents Hindi as the ‘mother tongue’ of over 52 crore people by subsuming more than 5 crore claimants of Bhojpuri and more than 9 crore speakers of nearly 61 other languages — claimed as ‘other’ by their speech communities — from Rajasthan, Himachal Pradesh, Uttarakhand, Haryana, Bihar, Jharkhand, Chhattisgarh and Madhya Pradesh. ‘The Hindi’ is probably spoken by not more than 30% of the population, but it is not the mother tongue for the remaining 70%.”
Hindi is not a lingua franca for Indians; nor is it a dominant language. It is only a primus inter pares among numerous Indian languages.
In the neighbourhood
The imposition of one language in neglect of the others in a multilingual state is disastrous. Pakistan and Sri Lanka are textbook examples of how stubbornness over language ruined nations. After Partition and Pakistan was formed, Pakistan became a multi-ethnic and multi-linguistic state. In 1948, the Government of Pakistan ordained the Islamisation of East Pakistan, with Urdu as the sole national language. “There can only be one state language if the component parts of this state are to march forward in unison, and in my opinion, that can only be Urdu,” asserted Jinnah. This arrogance of the West Pakistan elite ignited the violent Bengali language movement or Bhasha Andolan in East Pakistan, advocating the recognition of the Bengali language as an official language of the then Dominion of Pakistan in order to allow its use in government transactions, in education, in media, in currency and to maintain its writing in the Bengali script. The Language Movement catalysed Bengali nationalism and the eventual separation of East Pakistan from Pakistan.
The Sinhala Only Act (the Official Language Act) of 1956 was a high point in Sri Lanka’s history. It triggered intense enmity and distrust between the Sinhalis and the Tamils. The Act replaced English with Sinhala as the sole official language of the nation with the exclusion of Tamil. Sinhalese was the language of Sinhalese people who formed 70% of the population. Tamil was spoken by Indian and Sri Lankan Tamils (and most Muslims) who together constituted around 29% of the country’s population. The Act was discriminatory and alienated the Tamil community from the mainstream. The Act also symbolised the Sinhalese majority’s zeal to assert Sri Lanka’s identity as a Sinhala nation state; for Tamils, it epitomised minority oppression and a justification for the demand for a separate Tamil nation. This friction sparked the decades-long civil war and ruined the nation.
A place for diversity
In contrast, the nations that accommodated linguistic diversity prospered. Singapore has a multi-ethnic population (Chinese, Malay and Indian). In its formative years, there was immense pressure to declare Chinese as the official language of Singapore. But Lee Kuan Yew, the architect of modern Singapore, quelled the demand and opted for English. English language proficiency made the city state a global business hub. In an article in The Straits Times (2004) he had said, “When we became independent in 1965, the Chinese Chamber of Commerce committee came to see me in my office, then at City Hall. They urged me to have Chinese as our national and official language. I looked them in the eye and said, ‘You must be mad, and I don’t want to hear any more of that from you. If you do, you are entering the political arena. I have to fight you. Because, Singapore will come apart.’ Supposing I had been otherwise inclined, which my colleagues would not have allowed, and had said, ‘Yes, okay.’ What would have happened to Singapore? Where would the Malays be, and the Indians, what future would they have? The English-educated Chinese would also be against us. The country would fall apart. Let us assume that we were all Chinese, no Malays, no Indians. Could we make a living with Chinese as our language of government and our national language? Who is going to trade with us? What do we do? How do we get access to knowledge? There was no choice.”
In South Africa, the national anthem of this Rainbow Nation, since 1997, is a five-language lyrical composition, making it the most unique anthem in the world in this regard. The languages are Xhosa, Zulu, Sesotho, Afrikaans and English. South Africa is an emerging leader of the African continent and its accommodative linguistic policy helped them a lot.
India should emulate the multi-linguistic accommodative policy of Singapore and South Africa; not the disastrous linguistic chauvinism of Pakistan or Sri Lanka. Imposing Hindi, which is the first language of the residents of only 12 of the 35 States and Union Territories (in the 2011 Language Census of India, and where Andhra Pradesh and Telangana figure together in the 2011 data) as a lingua franca would initiate the phonocide of other Indian languages. And it would prove to be catastrophic.
Date:30-04-22
क्यों बदलता जा रहा है देश का सामाजिक ताना-बाना? शशि थरूर, ( पूर्व केंद्रीय मंत्री और सांसद )
जब मुझसे पूछा जाता है कि क्या आज भारत में सामाजिक खाई बढ़ती जा रही है, तो मैं तुरंत उन त्रासदियों के बारे में नहीं सोच पाता, जो इस तरह के प्रश्न को जन्म देती हैं- साम्प्रदायिक दंगे, मॉब लिन्चिंग, हिजाब, हलाल, अजान के लाउडस्पीकरों पर विवाद आदि- जिनका मकसद मुस्लिम समुदाय को हाशिए पर धकेलना है। इसके बजाय मैं उन दो वाकियों के बारे में सोचने लगता हूं, जिनकी तरफ हाल ही में मेरा ध्यान खिंचा। इन्होंने उस बढ़ती हुई खाई को मेरे सामने कहीं अधिक स्पष्टता से चित्रित किया है।
पहला एपिसोड : हाल ही में जयपुर में मेरी मुलाकात लेबनान की एक महिला से हुई, जो बीते पंद्रह वर्षों से हस्तशिल्प और ज्वेलरी की डील्स के लिए भारत आ रही थीं। उनके बालों का रंग भूरा था और उन्हें देखते ही मालूम होता था कि वे विदेशी हैं। अतीत में हमेशा उनका स्वागत किया जाता रहा था। जब वे नूर के रूप में अपना परिचय देती थीं तो उनसे कहा जाता था कि कितना प्यारा नाम है, हमारे यहां भी ऐसा ही नाम हुआ करता है, हमें नूर शब्द का मतलब भी पता है- रोशनी। लेकिन वे कहती हैं कि आज चीजें बदल गई हैं। आज जब वे अपना नाम बताती हैं तो उनसे पूछा जाता है- ओह, तो क्या आप मुस्लिम हैं? यह प्रश्न जिस लहजे में पूछा जाता है, वह पूरी कहानी खुद ही बयां कर देता है। अब वे सोच रही हैं कि शायद वे पहले की तरह नियमित रूप से भारत नहीं आएंगी।
दूसरा एपिसोड : एक पूर्व भारतीय राजदूत- जिन्होंने पाकिस्तान मामलों और इस्लामिक आतंकवाद के विशेषज्ञ के रूप में अपनी प्रतिष्ठा बनाई थी- ने मुझे अपने एक दोस्त के बारे में बताया। वे काबुल के एक प्रतिष्ठित सर्जन हैं। अपने देश में तालिबान के बढ़ते प्रभाव से वे चिंतित थे और मेरे पूर्व राजदूत मित्र की सलाह पर उन्होंने पत्नी और बच्चों को भारत भेजने का निर्णय लिया (याद रहे उन्होंने उन्हें पाकिस्तान नहीं भेजा)। उन्होंने गुड़गांव में एक फ्लैट किराए पर लिया और बच्चों का नामांकन एक अच्छे स्कूल में कराया। लेकिन एक साल बाद ही उन्हें महसूस हो गया कि अब यह पहले जैसा भारत नहीं रह गया है। उन्हें सबसे गहरा आघात तब पहुंचा, जब उनके अपार्टमेंट में रहने वाले उनके बच्चों के दोस्तों ने कहा कि हमारे पैरेंट्स ने हमें आपके बच्चों के साथ खेलने से मना किया है, क्योंकि आप मुसलमान हैं। यह वाकया सुनाए जाने पर मेरे पूर्व राजदूत मित्र शर्मिंदा हो गए। उन्होंने उन्हें सलाह दी कि बेहतर होगा वे अपने बच्चों को दुबई या लंदन ले जाएं।
मैं जानता हूं कि महज दो वाकियों के आधार पर आप किसी परिघटना का विश्लेषण नहीं कर सकते। लेकिन एक-दूसरे से पृथक हाल ही की ये घटनाएं इस सच को उजागर करती हैं कि समाज में साम्प्रदायिक विभेद बहुत बढ़ गया है। आज सार्वजनिक मंचों से ऐसी बातें कही जा रही हैं, जिन्हें अतीत में परदे के पीछे भी कहा जाना उचित नहीं समझा जाता था। हेट-स्पीच इतनी आम हो चुकी हैं कि अब उन पर कोई चकित नहीं होता। एक समय था जब देश की केंद्र और राज्य की सरकारें कौमी एकता के प्रदर्शन के लिए कोशिशें करती थीं, लेकिन अब ऐसा कुछ नहीं होता। हिंसा की घटनाएं होने पर उन्हें भड़काने वालों पर कार्रवाई नहीं की जाती। अधिकारीगण इन घटनाओं की निंदा तक नहीं करते हैं।
मैं एक ऐसे भारत में बड़ा हुआ था, जहां गंगा-जमुनी तहजीब का उत्सव मनाया जाता था। लेकिन आज राष्ट्रवाद का मतलब बहुसंख्यकवाद होकर रह गया है। वहीं राष्ट्रीय एकता से आशय यह लगाया जाने लगा है कि वर्चस्वशाली समुदाय के नैरेटिव को सभी स्वीकार कर लें। पहले ‘अमर अकबर एंथनी’ जैसी फिल्मों को मनोरंजन-कर से मुक्त किया जाता था, जिसमें यह दर्शाया जाता था कि अपने माता-पिता से बिछड़े तीन बच्चों को हिंदू, मुस्लिम और ईसाई परिवारों के द्वारा पाल-पोसकर बड़ा किया गया है। पहले दुनिया में इस बात के लिए हमारी इज्जत की जाती थी कि भारत के मुसलमान गर्व से हिंदुस्तान को अपना मुल्क बताते हैं और हमारी सफलताओं में उनका भी योगदान है। हम भी विदेशियों को नाज से बताते थे कि भारत में 18 करोड़ मुसलमान हैं, लेकिन तालिबान और अलकायदा से सहानुभूति रखने वाले उंगलियों पर गिने जा सकते हैं। लेकिन आज खाई ना केवल गहरा गई है, उसने हमारे समाज को भी बदला है। हम आशा ही कर सकते हैं कि आने वाला दौर हमें एकता की ओर ले जाएगा, विखंडन की ओर नहीं।
Date:30-04-22
हिंदी को कोसने की बुरी आदत क्षमा शर्मा, ( लेखिका साहित्यकार हैं )
एक बार फिर हिंदी के साथ-साथ हिंदी वालों की पिटाई चालू है। आखिर हिंदी या हिंदी वालों ने दक्षिण या फिर अन्य क्षेत्र की किस भाषा का कब अपमान किया और किसे अपने मुकाबले दोयम दर्जे का कहा, लेकिन जब देखो तब, कभी चुनाव के मौके पर, कभी किसी मामूली सी बात पर हिंदी को कोसने, दुरदुराने और भला-बुरा कहने का नफरत भरा सैलाब आ जाता है। जब ऐसा होता है तब जो हिंदी के चलते अपनी रोजी-रोटी कमा सके, लेखक बन सके, बुद्धिजीवी, कलाकार कहलाए, वे लंबा मौन धारण कर लेते हैं। कोई बताएगा कि कब किस हिंदी भाषी राज्य में भाषा को लेकर दंगे हुए, जबकि दक्षिण में जिस तरह जब चाहे तब हिंदी भाषियों को खदेड़ा जाता है, लेकिन उनके अनुसार हिंदी वाले पिछड़े हुए हैं। उनकी कोई संस्कृति नहीं है। वे हिंदी साम्राज्यवाद दक्षिण पर लादना चाहते हैं। वे हिंदी भाषी जो 55 करोड़ हैं, उनकी दुर्गति ऐसी है कि कोई भी उन्हें आंखें दिखाकर चलता बनता है। हिंदी वाले चारों तरफ से लांछित होते हैं और इस डर से कि कोई उन्हें पिछड़ा न कह दे, चुप लगा जाते हैं।
यह केशवचंद्र सेन या महात्मा गांधी का जमाना नहीं, जो अहिंदी भाषी होते हुए भी हिंदी के महत्व को स्वीकार करते थे। यह तो वह जमाना है कि बंगाल में एक डाक्टर ने बांग्ला न जानने के कारण एक महिला से कहा कि वह बिहार में जाकर ही अपना इलाज कराए। क्या अब डाक्टर, इंजीनियर तभी कोई काम करेंगे, जब उनका क्लाइंट उनकी ही भाषा बोलेगा? एक बार मशहूर लेखिका आशापूर्णा ने कहा था कि जब उनकी पुस्तकों का अनुवाद हिंदी में हुआ, तभी उन्हें असली पहचान मिली। यही कहानी अन्य भाषा के दूसरे लेखकों की भी है।
दरअसल डर हिंदी से नहीं, उसके संख्या बल से है। उसकी तेजी से बढ़ती लोकप्रियता और उसके बड़े बाजार से है। यह कितना दिलचस्प है कि हिंदी वाले की जेब में दक्षिण के लोगों का हाथ तो घुसा होना चाहिए, हिंदी क्षेत्र के बाजार का लाभ भी उन्हें मिलना चाहिए, लेकिन न हिंदी चाहिए, न हिंदी वाले। अक्सर यह कहा जाने लगता है कि यदि हिंदी की बात तक की तो देश टूट जाएगा। भई वाह, आपकी भाषाओं की बात होती रहे, तब किसी हिंदी वाले को यह खतरा नहीं महसूस होता कि देश टूटने वाला है, लेकिन जैसे ही हिंदी की बात होती है, तो देश टूटने की धमकियां सी दी जाने लगती हैं। लगता है इस देश की अखंडता को बचाने की सारी जिम्मेदारी बस हिंदी वालों और हिंदी क्षेत्र की है। यदि आपको अपनी भाषा पर गर्व है तो यह गर्व किसी हिंदी वाले को क्यों नहीं होना चाहिए?
कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री सिद्धरमैया फिर से हिंदी विरोध में आ डटे हैं। पिछली बार जब कर्नाटक की एक मेट्रो ट्रेन में कन्नड़ और अंग्रेजी के साथ हिंदी में भी स्टेशनों के नाम लिखे जा रहे थे तो उन्होंने इसका जमकर विरोध किया था। वह कांग्रेसी हैं, लेकिन कांग्रेस कभी उनकी बातों का विरोध नहीं करती। क्या इसी तरह से यह दल उत्तर भारत में अपनी खोई जगह फिर से बना सकता है? एक बार जब मैसूर में उत्तर भारतीय यात्रियों की सुविधा के लिए रास्तों के नाम हिंदी में लिखने की कोशिश की गई थी, तब भी उसका विरोध हुआ था। वास्तव मे हिंदी तो उस गरीब की जोरू है, जिसे किसी न किसी बहाने हर बार पिटना है।
आखिर अजय देवगन ने क्या गलत कहा कि जब हिंदी से इतनी नफरत है तो अपनी फिल्में हिंदी में डब क्यों करते हो? भाषा के नाम पर घृणा भी फैलाएंगे और चाहेंगे कि न केवल पूरे भारत में छा जाएं, बल्कि ग्लोबल भी हो जाएं। आप कौन होते हैं, हमें पीटने वाले। आप भूल जाते हैं कि बड़ी संख्या में दक्षिण भारतीय लोग हिंदी भाषी क्षेत्रों में काम करने आते हैं। यदि आपकी बातों पर हिंदी के लोग आपकी ही तरह नाराज होने लगें तो? जब अजय देवगन के पक्ष में खड़े होने वाले नहीं दिख रहे, तब जाने-माने अभिनेता नवाजुद्दीन सिद्दीकी की तारीफ करनी होगी कि उन्होंने एक बातचीत के दौरान खुलकर हिंदी का पक्ष लिया। जब उनसे पूछा गया कि अगर बालीवुड में तीन चीजें बदलनी हों, तो वे क्या बदलना चाहेंगे। इस पर नवाज ने कहा कि पहले तो मैं बालीवुड का नाम बदलकर ‘हिंदी फिल्म इंडस्ट्री’ रखूंगा। दूसरा यह कि जो स्क्रिप्ट रोमन में आती है, उसे याद करना मुश्किल होता है, इसलिए मैं देवनागरी में स्क्रिप्ट की मांग करूंगा। तीसरी बात यह कि जब फिल्म हिंदी में बन रही हो तब निर्देशक और उनके सहयोगियों का अंग्रेजी में बात करने का क्या तुक? उनके अनुसार इसके चलते एक्टर को आधी चीजें समझ में आती हैं, आधी नहीं। इससे परफार्मेस पर असर पड़ता है। दक्षिण भारतीय फिल्मों की यह अच्छी बात है कि निर्देशक और पटकथा लेखक से लेकर मेकअप करने वाला तक अपनी भाषा में बात करता है। वहां जो माहौल बनता है, उससे कुछ न कुछ नया निकलता है। सचमुच नवाज की बातों में दम है। उन्होंने एक नए विमर्श को दिशा दी है।
हिंदी की दुर्दशा के लिए हम लोग भी कोई कम जिम्मेदार नहीं है। ज्यादातर हिंदी फिल्मों के सितारे अंग्रेजी का सहारा लेते हैं। इसी तरह जब कोई हिंदी भाषी किसी उच्च पद पर पहुंच जाता है तो उसे हिंदी बोलने में शर्म महसूस होने लगती है। वह बड़े गर्व से कहता है कि ‘यू नो माई हिंदी इज नाट दैट गुड।’ अंग्रेजी के चरण चाटना इसी को कहते हैं। हिंदी का अंग्रेजी या किसी अन्य भाषा से कोई विरोध नहीं, लेकिन विरोध न होने का यह मतलब भी नहीं कि आप अपनी श्रेष्ठता के नाम पर हिंदी और हिंदी भाषियों को हर बार नीचा दिखाएं। बहुत सह लिया अपमान, अब क्यों सहें?
Date:30-04-22
आत्मनिर्भरता की परिभाषा संपादकीय
दुनिया में कोई अर्थव्यवस्था ऐसी नहीं है जो ‘पूरी तरह अपने बलबूते पर हो’ और आत्मनिर्भर भारत वास्तव में आत्मनिर्भर नहीं है। नेहरू के दौर में जब आत्मनिर्भरता पर जोर दिया जा रहा था तब उसके चरम दौर में भारत मशीनरी से लेकर पूंजी और तकनीक से लेकर हथियार और यहां तक कि कलम भी आयात कर रहा था। जब स्वदेशीकरण के प्रयास रुके तो आयात पर निर्भरता बढ़ी। आज भी रक्षा और अंतरिक्ष जगत की अधिकांश ‘आत्मनिर्भर’ परियोजनाओं में ढेर सारी आयातित सामग्री इस्तेमाल की जाती है। तेजस लड़ाकू विमान में जनरल इलेक्ट्रिक का इंजन लगा है जबकि भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन की वेबसाइट कहती है कि उसके उपग्रहों में 50-55 फीसदी आयातित सामग्री लगती है। देश के नाभिकीय ऊर्जा संयंत्र आयातित यूरेनियम पर निर्भर हैं। तेल की बात करें तो हम अपनी जरूरत का 85 फीसदी आयात करते हैं।
यदि आत्मनिर्भरता को नीतिगत रूप से विवेक संपन्न ढंग से इस्तेमाल करना है तो पहले इसे सही ढंग से परिभाषित करना होगा जबकि हमारी सरकार के मंत्री अक्सर ऐसा नहीं करते। क्या इसका अर्थ यह है कि सामरिक आयात पर निर्भरता कम की जाए या रूस जैसे प्रतिबंधों का खतरा कम किया जाए? इसका उत्तर अलग-अलग हो सकता है। एक ओर हरित क्रांति ने देश को अमेरिका के राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन के दबाव से निजात दिलाई जो सन 1960 के दशक में अकाल से जूझ रहे भारत को गेहूं की आपूर्ति करते हुए ऐसा कर रहे थे। तो दूसरी ओर इलेक्ट्रॉनिक चिप्स से लेकर सौर ऊर्जा पैनलों तक आत्मनिर्भरता से जुड़ी परियोजनाओं का अर्थ है अंतरराष्ट्रीय आपूर्ति शृंखलाओं से मजबूत संबंध और घरेलू उत्पादन इकाइयों के लिए खतरा क्योंकि वे आयात पर निर्भर हैं। उदाहरण के लिए पाकिस्तान जेएफ-17 लड़ाकू विमान चीन के साथ साझेदारी में बनाता है। क्या ऐसा करने से पाकिस्तान चीन पर कम या ज्यादा निर्भर हो जाता है? क्या रक्षा उत्पादन में आत्मनिर्भरता को तब भी प्राथमिकता दी जानी चाहिए जब इसका मतलब आपूर्ति में देरी हो?
एक पुरानी कहावत है कैसे एक कील की कमी से एक साम्राज्य गंवा दिया गया। कील को घोड़े की नाल में ठोका जा सकता था और राजा घोड़े पर बैठकर युद्ध में जा सकता था…। कील खोजना आसान है जबकि छोटी इलेक्ट्रॉनिक चिप्स की कमी ने भारी भरकम ऑटोमोटिव सेक्टर को परेशानी में डाल दिया है। कल को कोबाल्ट या लिथियम की कमी से बैटरी उत्पादन प्रभावित हो सकता है। हम खुद को पूरी मूल्य शृंखला के उतार-चढ़ाव से नहीं बचा सकते। व्यापारिक साझेदारों पर निर्भरता आधुनिक अर्थव्यवस्था में आम है। एक दलील यह है कि अपने देश में आपूर्तिकर्ता तलाशकर चीन जैसे शत्रु देश पर निर्भरता घटाई जा सकती है। लेकिन अधिकांश उत्पादों में चीन इकलौता आपूर्तिकर्ता नहीं है, हां वह प्रतिस्पर्धी कीमत वाला अवश्य है। वाणिज्यिक व्यापार में भारत उन देशों के साथ अधिशेष की स्थिति में है जो तेल उत्पादन नहीं करते। परिभाषा को व्यापक करके वस्तु एवं सेवा व्यापार को शामिल करें तो देश का चालू खाता घाटा सुरक्षित दायरे में है, विशुद्ध पूंजी की आवक घाटे की भरपाई की जरूरत से अधिक है, भारत ऊर्जा की कमी वाला देश है और हम चीन पर निर्भर हैं। हमारी समस्या वृहद व्यापार की नहीं है।
उस लिहाज से देखें तो विनिर्माण को व्यवहार्य बनाने में जरूर दिक्कत है और घरेलू क्षमताएं विकसित करने की आवश्यकता है। उत्पादन संबद्ध प्रोत्साहन (पीएलआई) के पीछे यही तर्क है। यदि पांच वर्ष तक सालाना 50,000 करोड़ रुपये खर्च करके देश में विनिर्माण क्षमताएं तैयार की जा सकें तो यह बहुत छोटी कीमत होगी। खतरा यह है कि स्थानीय मूल्यवर्धन शायद इतना बड़ा न हो कि सब्सिडी को उचित ठहराया जा सके, निर्यात प्रतिस्थापन लॉबी सरकार से विस्तारित अवधि तक सब्सिडी हासिल कर लेगी और संरक्षणवादी शुल्क से व्यापार उदारीकरण की स्थिति उलट जाएगी: इनमें से कुछ खतरे दिखने भी लगे हैं। वृहद आर्थिक जोखिम यह है कि ऐसी स्थिति में प्रतिस्पर्धा प्रभावित होगी और तेल एवं रसायन आदि का इस्तेमाल करने वाले महंगी आपूर्ति करने वालों पर निर्भर हो जाएंगे। यह आत्मनिर्भरता के विपरीत बात होगी। पिछली बार कुछ ऐसा ही हुआ था और यह दोबारा हो सकता है। पीएलआई की दूसरी आलोचना यह है कि ये पूंजी के इस्तेमाल वाले क्षेत्रों पर केंद्रित है, उनमें से कुछ को निरंतर तकनीकी और उपकरण संबंधी उन्नयन की जरूरत होती है। क्या यह व्यावहारिक है? इस बीच अपेक्षाकृत श्रम आधारित क्षेत्र जो बड़े पैमाने पर संगठित रोजगार पैदा कर सकते हैं, वे अब भी पिछड़े हुए हैं। भारत के सामने व्यापार घाटे और रोजगार की कमी के दो संकटों में दूसरा संकट ज्यादा गंभीर है। पीएलआई के जरिये आत्मनिर्भरता हासिल करने की कोशिश में व्यवहार्यता तथा इस सवाल को भुलाया नहीं जाना चाहिए।
Date:30-04-22
‘गति शक्ति’ में दम, क्या समस्याएं कर पाएगी कम इंद्रजित गुप्ता, ( लेखक फाउंडिंग यूल के सह-संस्थापक हैं )
‘गति शक्ति’ योजना क्रांतिकारी बदलाव लाने वाली कुछ परियोजनाओं में एक मानी जा रही है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले वर्ष अक्टूबर में इस योजना की शुरुआत की थी। भारत में बड़े आकार की ढांचागत परियोजनाओं का नियोजन एवं क्रियान्वयन सदैव चुनौतीपूर्ण रहा है। परियोजनाओं में विलंब होने से समय एवं धन दोनों की हानि होती है। ‘गति शक्ति’ परियोजना का समर्थन करने वाले लोगों का कहना है कि इस पहल से ढांचागत क्षेत्र में कई समस्याओं का समाधान हो जाएगा।
सरल शब्दों में कहें तो ‘गति शक्ति’ परियोजना भौगोलिक क्षेत्र का आकलन करने के लिए विभिन्न मंत्रालय एवं एजेंसियों से प्राप्त आंकड़ों के आधार पर भू-अंतरिक्ष तकनीक का इस्तेमाल करती है। उपलब्ध तथ्यों का सूक्ष्मता से अध्ययन कर यह नियोजन एवं क्रियान्वयन इकाइयों को एक ठोस सलाह एवं प्रस्ताव देती है। ‘गति शक्ति’ परियोजना विभिन्न मंत्रालयों के बीच समन्वय बढ़ाने के साथ बाधाएं दूर करती हैं। हाल में प्रकाशित एक खबर में दावा किया गया है कि इस परियोजना की शुरुआत के पहले छह महीनों में 131 महत्त्वपूर्ण परियोजनाओं में ढांचागत कमियों का पता चला है और उन्हें दूर करने के लिए विभिन्न मंत्रालयों का ध्यान आकृष्ट किया गया है।
हालांकि ऐसे लोग भी हैं जिन्हें नहीं लगता कि ‘गति शक्ति’ अभियान एक क्रांतिकारी बदलाव लाने की क्षमता रखता है। ऐसे लोगों का कहना है कि सूचना आधारित यह परियोजना ढांचागत विकास की राह में पेश आने वाली चुनौतियां दूर करने में कुछ हद तक ही योगदान दे सकती है। उन्हें इस बात का डर सता रहा है कि अधिकारी सूचनाओं के आदान-प्रदान में सक्रियता नहीं दिखाएंगे और पारदर्शिता लाने और नई पहल करने के प्रयास में बाधा पहुंचाएंगे। गति शक्ति पोर्टल में उद्योग जगत, खासकर परिवहन एवं ढांचागत खंड, के लोगों ने काफी दिलचस्पी दिखाई है। पिछले महीने प्रधानमंत्री ने निजी क्षेत्र के प्रतिनिधियों से गति शक्ति मिशन के तहत उपलब्ध कराई जा रही सूचनाओं का लाभ उठाने का आह्वान किया। मगर यह स्पष्ट नहीं है कि निजी क्षेत्र गति शक्ति परियोजना से उत्साहित होकर ढांचागत परिायेजनाओं में निवेश करने के लिए प्रेरित होगा या नहीं। वर्तमान में यह कहा नहीं जा सकता कि निजी-सार्वजनिक भागीदारी (पीपीपी) प्रारूप के तहत सरकार की तरफ से किया गया भारी निवेश रंग लाएगा या नहीं। प्रश्न यह है कि क्या गति शक्ति अपने वायदे पर खरा उतर पाएगी? या इसका भी हाल कुछ उन परियोजनाओं की तरह होगा जिनका उद्देश्य तो नेक था मगर अपेक्षित परिणाम नहीं मिल पाए?
इन प्रश्नों का उत्तर जानने के लिए हमें फिलहाल प्रतीक्षा करना होगी। हालांकि इस परियेाजना के संभावित लाभ तो दिख रहे हैं। नए मार्गों और इनमें आने वाले वन क्षेत्र और परिवहन के अन्य साधनों को एक दूसरे से जोड़ने की जरूरत पर विचार करने में छह महीने की वजह कुछ ही ह ते लगेंगे। गति शक्ति परियोजना की मदद से वस्तुओं का परिवहन तेजी से हो सकता है जिससे वास्तविक अर्थव्यवस्था में अधिक क्षमता सृजित होगी और उत्पादकता बढ़ेगी। देश में मुंबई के जेएनपीटी पोर्ट से उत्तर प्रदेश में दादरी तक विशेष मालवहन गलियारा इसका एक विचारणीय उदाहरण है। उस समय सभी बड़ी रेल परियोजनाओं के लिए रेलवे के पास एक ‘ई-दृष्टि’ पोर्टल हुआ करता था। गति शक्ति परियोजना ई-दृष्टि का ही नया रूप है। मगर क्रियान्वयन की दिक्कत पहले की तरह ही बरकरार है। रेलवे अधिकृत सूचीबद्ध कंपनी कॉनकॉर इस मालवहन गलियारे के दोनों तरफ परिसंपत्तियों का निर्माण कर रही है। मगर क्षेत्रीय आर्थिक केंद्र कांडला तक कोई उपयुक्त परिवहन संपर्क नहीं होने की वजह से इनमें ज्यादातर परिसंपत्तियों का इस्तेमाल नहीं हो पाया है। इससे कॉनकॉर को अपने निवेश पर कोई लाभ नहीं मिल रहा है। गति शक्ति पोर्टल समर्पित मालवहन गलियारा परियोजना को सबसे कम दूरी वाले मार्ग के बजाय कुछ वैकल्पिक मार्ग मुहैया करा सकता है जिससे पूर्वी हिस्से में वन या खनन क्षेत्र इसके आड़े नहीं आएगा। असल बात यह है कि नियोजन प्रक्रिया में कई मंत्रालय एवं एजेंसियां लगे होते हैं और इनमें प्रत्येक के काम करने का एक अपना तरीका होता है। उदाहरण के लिए कोई नया बंदरगाह तैयार करते वक्त रेल एवं सड़क संपर्क पर पर्याप्त विचार किए बन जाता है। गति शक्ति में इन खामियों को दूर करने का प्रयास किया गया है। इस अभियान में विभिन्न मंत्रालयों को एक मंच पर लाकर खामियों की पहचान की जाती है और इसके बाद प्रत्येक मंत्रालय के लिए कार्य को अंजाम देने एवं परिणाम सुनिश्चित करने का उत्तरदायित्व तय किया जाता है।
कागज पर यह सभी चीजें तत्काल जरूरी लग सकती हैं मगर ये सरकार के मौजूदा कामकाज के तरीकों और सूचनाओं के आधार पर निर्णय लेने की क्षमता के लिए बड़ी चुनौती खड़ी करती हैं। वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) परियोजना के साथ भी यही समस्या थी। जीएसटी व्यवस्था के प्रभावी होने के बाद भी एक लंबे समय तक सरकार इस प्रणाली से मिलने आंकड़ों का बुद्धिमता से इस्तेमाल करने में अक्षम थी। इस समय कम से कम 18 मंत्रालय-इस्पात, रेलवे, बंदरगाह, अक्षय ऊर्जा आदि-हैं जो ढांचागत क्षेत्र से जुड़े हैं। उम्मीद तो यही की जा रही है कि गति शक्ति अभियान से विभिन्न मंत्रालयों के बीच आपसी समन्वय बढ़ेगा और अति महत्त्वपूर्ण ढांचागत परियोजनाओं को तो जरूर लाभ मिलेगा। पूरी प्रक्रिया की समीक्षा के लिए कैबिनेट सचिव स्वयं अहम मंत्रालयों के अधिकार प्राप्त सचिव समूहों की बैठक की अध्यक्षता करते हैं। प्रधानमंत्री कार्यालय (पीएमओ) भी पैनी नजर बनाए रखता है।
मगर देखने वाली बात यह होगी कि क्या मंत्रालय सभी महत्त्वपूर्ण परियोजनाओं, खासकर जो निर्धारित समय से पीछे चल रही हैं, से संबंधित सूचनाएं गति शक्ति मंच पर साझा करने के लिए पहल करते हैं या नहीं। वित्त मंत्रालय ने जोर दिया है कि सभी बड़ी परियोजनाएं गति शक्ति मंच से होकर गुजरेंगी और उसके बाद उन्हें धन मुहैया कराया जाएगा। समन्वय समिति द्वारा समस्याओं की पहचान किए जाने के बाद इस पर कदम उठाने का विशेष अधिकार वित्त मंत्रालय को होगा। गति शक्ति की सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि यह एक उपयुक्त डिजिटल परियोजना निगरानी प्रणाली साबित होगी या एक और अधूरी सरकारी योजना बन कर रह जाएगी।
Date:30-04-22
सुरक्षा और चुनौतियां संपादकीय
हाल के वर्षों में बढ़ती वैश्विक चुनौतियों के बीच देश की सुरक्षा का मुद्दा एक महत्त्वपूर्ण और गंभीर चिंता के रूप में उभरा है। भारत के लिए यह ज्यादा चिंताजनक इसलिए भी है कि दशकों से दोनों पड़ोसी देश चीन और पाकिस्तान सुरक्षा के लिए खतरा बने हुए हैं। दोनों ही देशों के साथ भारत को युद्ध का सामना भी करना पड़ा है। यह भी कि पिछले तीन-चार दशकों से पाकिस्तान भारत के खिलाफ सीमापार से आतंकी गतिविधियां चला रहा है। दूसरी तरफ सीमा विवादों को लेकर चीन ने भारत के खिलाफ जिस तरह का आक्रामक रुख अपनाया हुआ है, उसे देखते हुए दोनों देशों के बीच रिश्ते सामान्य हो पाना आसान नहीं है। गौरतलब है कि दो साल पहले गलवान घाटी में चीन ने भारतीय जवानों पर हमला कर दिया था, जिसमें चौबीस भारतीय सैनिक शहीद हो गए थे। इसके बाद चीन ने वहां घुसपैठ कर ली और नया विवाद खड़ा कर दिया। देखा जाए तो इस तरह के विवाद अक्सर ऐसी नौबत पैदा करते रहे हैं जब युद्ध जैसे तनावपूर्ण हालात बन जाते हैं। ऐसे में कई बार दुश्मन को सबक सिखाने के लिए सैन्य कार्रवाई भी अपरिहार्य हो जाती है। जाहिर है, इस तरह की सुरक्षा के लिए देश के पास चाक-चौबंद सैन्य तंत्र से लेकर अत्याधुनिक हथियार और कुशल रणनीति का होना भी जरूरी है।
हाल में भारत के वायु सेना प्रमुख वीआर चौधरी ने दिल्ली में एक सम्मेलन में त्वरित युद्धों के लिए तैयार रहने की जो जरूरत बताई है, वह देश की सुरक्षा चिंताओं को रेखांकित करती है। दरअसल भारत की भौगोलिक स्थिति भी कुछ ऐसी है कि बिना लंबे-चौड़े और अत्याधुनिक सैन्य तंत्र के देश की रक्षा कर पाना आसान नहीं है। भारत तीन तरफ समुद्रों से घिरा है और छह हजार किलोमीटर से ज्यादा लंबी तटीय सीमा है। इसके अलावा हिमालयी क्षेत्र में चार हजार किलोमीटर लंबी सीमा चीन के साथ है। चीन लद्दाख से लेकर पूर्वोत्तर राज्यों खासतौर से अरुणाचल प्रदेश और सिक्किम के लिए बड़ा खतरा बना हुआ है। पूर्वोत्तर का संकट इसलिए भी ज्यादा बड़ा है कि यहां के राज्यों की सीमाएं म्यांमा से मिलती है। यह इलाका नशीले पदार्थों से लेकर हथियारों तक की तस्करी के रूप में जाना जाता है। पूर्वोत्तर में उग्रवाद भी देश के लिए कम बड़ा संकट नहीं रहा है। पिछले कुछ सालों में एक खतरा यह भी बढ़ा है कि पाकिस्तान नेपाल और म्यांमा के रास्ते भी आतंकियों को भारत में घुसाता रहा है। भारत के खिलाफ चीन और पाकिस्तान की ऐसी हरकतें युद्ध के खतरों को बढ़ाने वाली ही प्रतीत होती हैं। इसलिए आपात हालात में युद्ध जैसी तैयारियां वक्त की जरूरत बन कर सामने आ सकती हैं।
हालांकि पूर्वी लद्दाख में और पाकिस्तान सीमा पर मिलने वाली चुनौतियों से भारत ने कई सबक लिए हैं। दोनों देशों से खतरे को देखते हुए भारत भी अपनी सुरक्षा मजबूत करने अब पीछे नहीं है। जहां तक बात है सेना को अत्याधुनिक हथियार और साजो-सामान मुहैया करवाने की, तो देश में ही हथियारों के निर्माण पर जोर दिया जा रहा है। हालांकि कई उन्नत हथियारों, रक्षा प्रणालियों और उपकरणों के मामलों में अभी भी हम रूस और अमेरिका जैसे देशों पर निर्भर हैं। लेकिन अब रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में भी कदम बढ़ रहे हैं। पनडुब्बी और पोत अब भारत में ही बन रहे हैं। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि अगर रक्षा क्षेत्र में भारत आत्मनिर्भर हो गया, तो देश की सैन्य ताकत में भी इजाफा होगा और पड़ोसी राष्ट्र भी आसानी से आंख नहीं उठा पाएंगे।
Date:30-04-22
कैसे मजबूत बने पंचायती व्यवस्था सुशील कुमार सिंह
सुशासन शांति और खुशहाली का परिचायक होता है। पंचायत एक ऐसी संस्था है जो सुशासन को आगे बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती है। पंचायती राज व्यवस्था के रूप में लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण का संस्थानीकरण स्थानीय स्वशासन की दिशा में न केवल एक महत्त्वपूर्ण और ऐतिहासिक कदम है, बल्कि लघु गणतंत्र की दिशा में भी व्यापक दृष्टिकोण है। इतना ही नहीं, यह महात्मा गांधी के ग्राम स्वराज की इच्छा का परिणाम भी है। गांव के विकास के बिना भारत की प्रगति संभव नहीं है, यह कथन कहीं अधिक पुराना है, मगर इसके नएपन से आज भी छुटकारा नहीं मिला है। जहां से शासन में सबकी भागीदारी सुनिश्चित होती हो और समस्याओं को समझने तथा हल करने का जमीनी प्रयास संभव हो, वही पंचायत है।
पंचायत शब्द भारत के लिए नया नहीं है। यह प्राचीन काल से ही अस्तित्व में रहा है। जब समावेशी ढांचा तैयार किया जाता है और उसके उद्देश्य तय किए जाते हैं और इन उद्देश्यों की पूर्ति के लिए संस्था का खाका बनता है, तब पंचायत के मार्ग से ही गुजरना पड़ता है। पंचायत केवल एक शब्द भर नहीं है, बल्कि गांव की वह जीवनधारा है जहां से सर्वोदय की भावना और पंक्ति में खड़े अंतिम व्यक्ति को समान होने का एहसास होता है। पंचायत लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण का परिचायक है। सामुदायिक विकास कार्यक्रम इसकी नींव है, जिसकी शुरुआत दो अक्तूबर, 1952 को हुई थी। पंचायत जैसी संस्था की बनावट कई प्रयोगों और अनुप्रयोगों का भी नतीजा है। सामुदायिक विकास कार्यक्रम का विफल होना, तत्पश्चात बलवंत राय मेहता समिति का गठन और 1957 में उसी की रिपोर्ट पर इसका मूर्त रूप लेना देखा जा सकता है। गौरतलब है कि जिस पंचायत को राजनीति से परे और नीति उन्मुख सजग प्रहरी की भूमिका में समस्याएं दूर करने का एक स्वरूप माना जाता है, आज वही कई समस्याओं में जकड़ी हुई है।
नीति निर्देशक तत्व के अनुच्छेद 40 के अंतर्गत पंचायत के गठन की जिम्मेदारी राज्यों को दी गई थी। लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण की दृष्टि से इसका अनुपालन सुनिश्चित करना न केवल इनका दायित्व था, बल्कि गांवों के देश भारत को सामाजिक-आर्थिक दृष्टि से अत्यंत शक्तिशाली भी बनाना था। इस मामले में पंचायतें कितनी सफल हैं, यह पड़ताल का विषय है। मगर लाख टके का सवाल यह है कि जिस पंचायत ने सबसे नीचे के लोकतंत्र को मजबूती दे रखी है, वही समस्याओं से मुक्त नहीं है। चाहे वित्तीय संकट हो या उचित नियोजन की कमी या फिर अशिक्षा, रूढ़िवादिता तथा पुरुष वर्चस्व के साथ जात-पांत और ऊंच-नीच ही क्यों न हो। हालांकि पिछले तीन दशकों में ये समस्याएं कम भी हुई हैं और पंचायती व्यवस्था ने यह सिद्ध भी किया है कि उसका कोई विकल्प नहीं है।
पंचायत और सुशासन का गहरा रिश्ता है। पंचायत जहां लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण का परिचायक है और स्वायत्तता इसकी धरोहर है, वहीं सुशासन कहीं अधिक संवेदनशील लोक कल्याण और पारदर्शिता व खुलेपन से युक्त है। पंचायत की व्याख्या में क्षेत्र विशेष में शासन करने का पूर्ण और विशिष्ट अधिकार निहित है। इसी अधिकार से उन दायित्वों की पूर्ति भी होती है जो ग्रामीण प्रशासन के तहत स्वशासन का बहाव भरता है। जबकि सुशासन एक ऐसी अवधारणा है जो बार-बार शासन को यह सचेत करती है कि समावेशी और सतत विकास के साथ बारंबार सुविधा प्रदायक की भूमिका में बने रहना है। 1997 का ‘सिटिजन चार्टर’ सुशासन की ही देन थी और 2005 का सूचना का अधिकार इसी का एक और अध्याय था। इतना ही नहीं, 2006 की ई-शासन योजना से भी पंचायतों को ताकत मिली है। सुशासन की अवधारणा 1992 में सबसे पहले ब्रिटेन में आई थी। हालांकि 1991 के उदारीकरण के बाद इसकी पहल भारत में भी देखी जा सकती है। सुशासन के इसी वर्ष में पंचायती राज व्यवस्था को संवैधानिक स्वरूप दिया जा रहा था। संविधान के 73वें संशोधन में जब इसे संवैधानिक स्वरूप दिया गया, तब दो अक्तूबर 1959 से राजस्थान के नागौर से यात्रा कर रही यह पंचायत रूपी संस्था एक नए आभामंडल से युक्त हो गई। 1992 में हुए इस संशोधन को 24 अप्रैल 1993 को लागू किया गया। गौरतलब है कि संविधान के इसी संशोधन में गांधी के ग्रामीण स्वशासन को पूरा किया गया। पंचायतों में एक तिहाई महिलाओं का आरक्षण इसी संशोधन के साथ सुनिश्चित कर दिया गया था, जो मौजूदा समय में पचास फीसद तक है।
देखा जाए तो तीन दशक पुरानी संवैधानिक पंचायती राज व्यवस्था में व्यापक बदलाव तो आया है। राजनीतिक माहौल में सहभागी महिला प्रतिनिधियों के प्रति पुरुषों की सोच बदली है। बावजूद इसके विभिन्न आर्थिक-सामाजिक रुकावटों के कारण आंतरिक क्षमता और शक्ति को लेकर महिलाओं में भरोसा पूरी तरह बन गया हो, ऐसा कम ही दिखाई देता है। लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण की यही सजावट है कि पंचायतें सामाजिक प्रतिष्ठा और महिला भागीदारी से सबसे ज्यादा भरी हुई हैं, मगर राजनीतिक माहौल में अपराधीकरण, बाहुबल, जात-पांत और ऊंच-नीच आदि दुर्गुणों से पंचायतें भी मुक्त नहीं हैं।
समानता पर आधारित सामाजिक संरचना का गठन सुशासन की एक कड़ी है। इसलिए पंचायतों का उद्देश्य एक शोषण मुक्त समाज का निर्माण होना चाहिए, जहां सुशासन का प्रभाव हो, जिसमें पंचायत में पारदर्शिता और खुलेपन को बढ़ावा मिल सके, ताकि 11वीं अनुसूची में दर्ज 29 विषयों को जनहित में सुनिश्चित कर ग्रामीण प्रशासन को सशक्त किया जा सके। गौरतलब है कि 2011 की जनगणना के अनुसार देश में हर चौथा व्यक्ति अभी भी अशिक्षित है और पंचायत व सुशासन पर इसका प्रभाव देखा जा सकता है। अधिकतर महिला प्रतिनिधि अनपढ़ हैं। इससे उनको पंचायत के लेखापत्र नियम पढ़ने व लिखने में कई दिक्कत आती हैं। डिजिटल इंडिया का संदर्भ भी 2015 से देखा जा सकता है। आनलाइन क्रियाकलाप और डिजिटलीकरण ने भी पंचायत से जुड़े ऐसे प्रतिनिधियों के लिए चुनौती पैदा की है। हालांकि देश की लाखों पंचायतों को अभी डिजिटल तकनीक से जोड़ना बाकी है, साथ ही बिजली आदि की आपूर्ति का कमजोर होना भी इसमें एक बाधा है।
डिजिटल क्रांति ने सुशासन पर गहरी छाप छोड़ी है। जहां एक तरफ डिजिटल लेन-देन में तेजी आई है, कागजों के आदान-प्रदान में बढ़ोत्तरी हुई है, भूमि दस्तावेजों का डिजिटलीकरण हो रहा है, फसल बीमा कार्ड, मृदा स्वास्थ कार्ड और किसान क्रेडिट कार्ड सहित प्रधानमंत्री फसल बीमा जैसी योजनाओं में दावों के निपटारे के लिए रिमोट सेंसिंग, कृत्रिम मेधा आदि का प्रयोग होने लगा है, वहीं ग्राम पंचायतों में खुले स्वास्थ सेवा केंद्रों में ग्रामीण महिलाओं की भागीदारी को प्रोत्साहन भी दिया जा रहा है, ताकि वे ग्राम स्तरीय उद्यमी बने। सूचना और प्रौद्योगिकी का इस्तेमाल करते हुए शासन की प्रक्रियाओं का पूर्ण रूपांतरण ही ई-गवर्नेंस कहलाता है, जिसका लक्ष्य आम नागरिकों को सभी सरकारी सेवाओं तक पहुंच प्रदान करते हुए साक्षरता, पारदर्शिता और विश्वसनीयता को सुनिश्चित करना है।
पंचायती राज व्यवस्था आम लोगों की ताकत है। बीते तीन दशकों में पंचायतें बदली हैं। इन सबमें एक प्रमुख बात यह रही है कि महिलाओं की स्थानीय स्तर पर भागीदारी बढ़ी है। केंद्रीय और प्रादेशिक स्तर पर निर्वाचित सरकारों की मौजूदगी किसी लोकतंत्र के लिए काफी नहीं है। सुशासन की दृष्टि से भी देखें तो लोक सशक्तिकरण इसकी पूर्णता है और लोक विकेंद्रीकरण की दृष्टि से देखें तो पंचायत में ये सभी खूबियां हैं। लोकतंत्र के लिए यह भी जरूरी है कि स्थानीय स्तर पर स्थानीय मसलों और समस्याओं के निराकरण के लिए एक निर्वाचित सरकार हो, जिसे स्थानीय मुद्दों पर स्वायत्तता प्राप्त हो।
Date:30-04-22
हिंदी को कभी भी राष्ट्रीय भाषा नहीं बनाया गया एस. श्रीनिवासन, ( वरिष्ठ पत्रकार )
अभिनेता किच्चा सुदीप की एक छोटी-सी वीडियो क्लिप ने इस सप्ताह सोशल मीडिया पर आग लगा दी। इसकी वजह से भाषा जैसे संवेदनशील मुद्दे पर तीखी बहस शुरू हो गई है। एक तरफ, जहां यह शीतयुद्ध पुराने राग को अलापने जैसा रहा है, तो दूसरी तरफ, यह उन तथ्यों को सामने लाने में भी कामयाब रहा, जिसे आम लोग अमूमन बिसरा चुके हैं। यह पूरा विवाद किच्चा के साथ शुरू हुआ, जिन्होंने शायद दक्षिण भारतीय फिल्मों, विशेषकर केजीएफ-2 की अभूतपूर्व सफलता से उत्साहित होकर यह कह दिया कि ‘हिंदी अब राष्ट्रीय भाषा नहीं रही’। देखा जाए, तो तथ्य भी यही है कि हिंदी कभी राष्ट्रीय भाषा नहीं थी। यह अंग्रेजी की तरह केंद्र सरकार की आधिकारिक भाषा है। मगर किच्चा ने चूंकि कोई लिखित स्क्रिप्ट नहीं पढ़ी, इसलिए उनके शब्द अपने अर्थ से भटक गए। शायद वह कहना चाहते थे कि हिंदी फिल्म जगत के दिन लद गए हैं और अन्य भारतीय भाषाओं में बनी फिल्मों ने इसके दबदबे को खत्म कर दिया है।
बहरहाल, मुंबई से अभिनेता-निर्माता अजय देवगन ने इस पर तीखी प्रतिक्रिया जाहिर की। उन्होंने ट्वीट किया, ‘हिंदी हमारी मातृभाषा और राष्ट्रभाषा थी, है और हमेशा रहेगी।’ मगर ऐसा कहते हुए वह यह भूल गए कि भारतीय संविधान 22 भाषाओं को मान्यता देता है और हिंदी उन्हीं में से एक है। हालांकि, हिंदी को विशेषाधिकार हासिल है, क्योंकि यह केंद्र और कई राज्य सरकारों के कामकाज की आधिकारिक भाषा है। अन्य भारतीय भाषाएं भी आधिकारिक भाषाएं हैं, लेकिन वे अपने-अपने राज्यों या क्षेत्रों तक सीमित हैं।
अजय देवगन को मातृभाषा, आधिकारिक भाषा और राष्ट्रभाषा के बीच अंतर करना चाहिए। जहां तक मातृभाषा की बात है, तो यह सबकी अलग-अलग होती है। हिंदी पट्टी में ही हिंदी व्यापक रूप से बोली जाती है, लेकिन बृज, अवधी, भोजपुरी जैसी अलग-अलग भाषाएं भी इसी क्षेत्र में हैं। इसके अलावा, भारत में हजारों तरह की बोलियां भी हैं, जिनकी हम यहां चर्चा नहीं कर रहे। रही बात आधिकारिक भाषा की, तो भारत की कोई आधिकारिक भाषा नहीं है, और न यह कोई असामान्य बात है। कई देशों के पास आधिकारिक भाषा नहीं है। अमेरिका भी उन्हीं में एक है।
सोशल मीडिया पर जहां इन दोनों सितारों ने एक-दूसरे के खिलाफ तलवारें खींच लीं, तो राजनेताओं ने भी इसमें कदमताल मिलाना शुरू कर दिया। उमर अब्दुल्ला ने जहां सभी को कश्मीर की याद दिलाई कि भारत विविधताओं का देश है, तो वहीं कर्नाटक के राजनेता, जिनकी नजर अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव पर है, किच्चा के समर्थन में आगे आ गए और उनके बयान की सराहना करने लगे। कुछ समाचार चैनल तो गलत तर्कों के आधार पर हिंदी और अंग्रेजी के बीच तुलना करने लगे। एक एंकर का सुझाव था, ‘चूंकि 44 करोड़ भारतीय हिंदी बोलते हैं और महज 10 करोड़ अंग्रेजी में सहज हैं, तो हिंदी को राष्ट्रभाषा क्यों नहीं बना देना चाहिए?’ वह दरअसल यह भूल रहे थे कि अंग्रेजी को हिंदी की तरह ही संपर्क भाषा माना गया है, क्योंकि सभी भारतीय भाषाएं हिदी की तरह हैसियत की मांग करती रही हैं। दूसरे शब्दों में कहें, तो सभी भारतीय भाषाएं केंद्र सरकार की कामकाजी भाषा के रूप में अपनी मान्यता की इच्छुक हैं। अब चूंकि अनुवाद कार्य करने वाले आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सॉफ्टवेयर के आ जाने से कई भाषाओं में एक साथ संवाद करना संभव हो गया है, इसलिए यदि सरकार अपनी इच्छाशक्ति दिखाती है, तो सभी भाषाओं को समान दर्जा देकर भाषा का विवाद सुलझाया जा सकता है।
यह घटनाक्रम सोशल मीडिया की सीमाओं और उसके काले पक्ष को भी जाहिर करता है। इसके कई उपयोगकर्ता दुष्प्रचार के शिकार हो जाते हैं। सच तो यह है कि भाषा एक भावनात्मक और संवेदनशील मसला है, जिसकी व्याख्या करने का काम सिने कलाकारों को छोड़ देना चाहिए। हमें याद रखना चाहिए कि भाषायी और पहचान संबंधी विवाद ही पड़ोसी देश श्रीलंका में गृहयुद्ध के कारण बने थे। बेशक, बाहुबली, पुष्पा, केजीएफ-1, केजीएफ-2 जैसी दक्षिण की फिल्मों में नयापन है, लेकिन हमें इनका आनंद लेना चाहिए, न कि इन फिल्मों की सफलता से हिंदी सीने जगत को चोट पहुंचानी चाहिए। हमारे देश के सिनेमा दर्शक ऐसी बेजा तुलनात्मक बहसों में नहीं उलझना चाहते।
Date:30-04-22
हमारे बाजार की सबसे सशक्त भाषा है हिंदी उदय प्रकाश, ( प्रसिद्ध साहित्यकार )
भारत में हिंदी भाषा को लेकर विवाद नया नहीं है। जाने-माने अभिनेता अजय देवगन और कन्नड सिनेमा के बड़े स्टार किच्चा सुदीप के बीच भाषा को लेकर जो विवाद उठता दिखा, वह भी कदापि नहीं चौंकाता। इस विवाद पर बॉलीवुड का अपना नजरिया है, उधर, दक्षिण से कुछ और अलग आवाजें आ रही हैं। दूसरी भाषाओं के कलाकार व नेता भी विवाद में अपना योगदान दे रहे हैं।
हालांकि, इसमें कोई शक नहीं कि हिंदी को फैलाने और लोकप्रिय बनाने में बॉलीवुड की भूमिका रही है, लेकिन बॉलीवुड में हिंदी की स्थितियों व सीमाओं को भी समझना होगा। हिंदी ने जो स्नेह-दुलार फैलाया है, उसे समझना चाहिए, उसकी उदारता और मिलकर चलने की क्षमता को भी एक नजर जरूर देखना चाहिए।
राज कपूर की एक फिल्म है, जिस देश में गंगा बहती है, उसमें शैलेंद्र का लिखा एक गीत है, ये पूरब है, पूरब वाले/ हर जान की कीमत जानते हैं/ मिल-जुल के रहो और प्यार करो/ एक चीज यही जो रहती है/ हम उस देश के वासी हैं, जिस देश में गंगा बहती है।
आप पाएंगे कि उत्तर भारत या भारत विशेष रूप से गंगा केंद्रित रहा है और हम यही कहते आए हैं कि हम उस देश के वासी हैं, जिस देश में गंगा बहती है। वैसे तो इस देश में कृष्णा, कावेरी, सतलुज, झेलम, पेरियार भी हैं, और जन-जन में प्रिय राम तो सरयू किनारे ही पैदा हुए और उसी में समा गए, लेकिन एक भी गीत बॉलीवुड का आप बताइए, जो सरयू पर बना हो? बॉलीवुड में राम केसाथ भी गंगा नदी को ही याद किया जाता है। तो जो यह बॉलीवुड है, जहां भाषा को लेकर बहुत गंभीर दृष्टिकोण नहीं अपनाना चाहिए।
मैं ट्विटर व अन्य जगह हिंदी पर छिड़ी ताजा बहस देख रहा था। हम राष्ट्रभाषा, संपर्क भाषा, राजकाज की भाषा और मातृभाषा में कोई अंतर ही नहीं कर पा रहे हैं, सबको एक साथ गड्डमड्ड कर दे रहे हैं। तमिलभाषियों पर आप हिंदी जितनी भी लादें, वे तो नहीं कहेंगे कि हिंदी मातृभाषा है। यह समझना होगा कि वास्तव में हमलोग बहुभाषी हैं। मिसाल के लिए, मेरी मां भोजपुर की हैं, पिता बघेली, गांव छत्तीसगढ़ी, तो मैं किस भाषा को कहूं कि ये मेरी मातृभाषा है? यहां हमें उदार होना चाहिए। हां, यह गर्व लायक सच है कि हिंदी बहुत अच्छी भाषा है, दुनिया में तीसरे नंबर की भाषा है, कई देशों में बोली जाती है।
हम लोग खूब विविधता वाले गणराज्य हैं और काफी लंबी प्रक्रिया से गुजरकर एक राष्ट्र या एक राष्ट्रभाषा बनती है। संयुक्त राज्य अमेरिका तो अभी भी राज्यों का ही समूह है, वह आज भी उस तरह से राष्ट्र नहीं है, जैसी हमारे यहां धारणा बनाई जा रही है। वैसे भी, संविधान में कहीं नहीं है कि हिंदी राष्ट्रभाषा है। सभी राजभाषाएं हैं। अंग्रेजी भी है। अंग्रेजी का भी विरोध होता रहा है। हम गौर करें, तो कहीं भी एक लोकप्रिय धारणा बनाई जाती है और लोग उसी को मानने लग जाते हैं। लोक मान्यता कुछ और होती है और वास्तविकता कुछ और। यह विरोधाभास कभी कम नहीं होगा। देश में एक समय था, जब रेलवे स्टेशन और अन्य जगहों पर अंग्रेजी में लिखे नामों को रंग से पोत दिया जाता था और उनकी जगह हिंदी में लिखा जाता था। हिंदी के पक्ष में आंदोलन या राजनीति वगैरह भी कुछ हुई। हिंदी राजनीति की भाषा बन ही सकती है, लेकिन वैसी नहीं बन सकती, जैसी चीन में मंदारिन है या जापान में जापानी भाषा।
बहुत पहले देश में त्रिभाषा फॉर्मूला दिया गया था। पढ़ाई में हिंदी, अंग्रेजी और एक क्षेत्रीय भाषा रहे, लेकिन यह हुआ नहीं, हम अंग्रेजी या अन्य भाषाओं के बीच उलझे रह गए। दुख होता है, जल्दबाजी में हिंदी के पक्ष में जो लोग बोल रहे हैं, उन्हें संपर्क भाषा, राजभाषा, मातृभाषा का अंतर नहीं पता है। दक्षिण की ओर से उठने वाला हिंदी विरोध भी उचित नहीं है, लेकिन जब-जब आप हिंदी के पक्ष में आवाज बुलंद करेंगे, तब-तब दक्षिण में विरोध होगा। हिंदी के पक्ष में सिर्फ ज्यादा आबादी से कुछ नहीं होता है।
अभी फिल्मों में देखिए, अजय देवगन की किसी भी फिल्म ने वैसी कमाई नहीं की है, जैसी दक्षिण की फिल्मों केजीएफ, आरआरआर इत्यादि ने की है। यह अच्छी बात है, दक्षिण की फिल्में हिंदी में भी आ रही हैं, तो हम स्वीकार करते हैं और करना भी चाहिए। आज हिंदी बाजार की सशक्त भाषा है, यह उत्तर से दक्षिण तक हर कोई जानता है। वास्तव में, हिंदी का विरोध कहीं नहीं है, लेकिन हम जानते हैं, इसे कभी-कभी जान-बूझकर उभारा जाता है।
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30 April 2022
प्रश्न–356 – वर्तमान में मुद्रा-स्फीति एक वैश्विक रूप ले चुकी है। इसके कारण क्या हैं ? भारत के संदर्भ में इसके प्रभावों का उल्लेख कीजिये। (250 शब्द)
Question–356 – At present, inflation has taken a global shape. What are the causes? Mention its impacts in the context of India. (250 words)
नोट : इसका उत्तर आपको हमें नहीं भेजना है, यह आपके स्वयं के अभ्यास के लिए है।
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Date:29-04-22
देश में चलाए जा रहे दंगा-उद्योग के जिम्मेदार कौन ? मिन्हाज मर्चेंट, ( लेखक, प्रकाशक और सम्पादक )
अगर हम भारत में होने वाले दंगों को पेशेवर-उद्यम की तरह देखें तो पाएंगे कि वह तीन स्तरों पर विभाजित है। इसके शीर्ष पर उकसाने वाले हैं। इनमें वे सेकुलर पार्टियां शामिल हैं, जिन्हें मुस्लिम वोटबैंक से अपने अधिकतर वोट मिलते हैं। दूसरे स्तर पर इन्हें सम्भव बनाने वाले हैं, जिनमें वामपंथी पत्रकार और नक्सली-इस्लामिस्ट रूझानों वाले एक्टिविस्ट्स हैं। वे उकसाने वालों के साम्प्रदायिक संदेशों को आगे लेकर जाते हैं। तीसरे स्तर पर हिस्ट्रीशीटर्स हैं, जिनमें रैडिकलाइज्ड नौजवान और आपराधिक गतिविधियों में संलग्न रहने वाले शामिल हैं। इनकी एक ही योग्यता है और वह है हिंसा करना। ये तीनों लेयर्स एक-दूसरे के साथ मिलकर बड़े सुगम तरीके से काम करती हैं। एक से दूसरे फिर तीसरे तक मैसेज जाते हैं। इनकी प्लानिंग बड़ी कमाल की होती है। टाइमिंग का ध्यान रखा जाता है और साम्प्रदायिक उपद्रव के दिन को बड़े ऐहतियात से चुना जाता है। अमूमन यह तब होता है, जब विदेश से कोई हाई-प्रोफाइल मेहमान भारत आने वाला होता है, जिसके साथ अंतरराष्ट्रीय मीडिया भी होता है।
फरवरी 2020 में जब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प अपने परिवार और विदेशी पत्रकारों के भारी हुजूम के साथ दिल्ली पहुंचे तो देश की राजधानी दंगों से जल उठी थी। ट्रम्प के जाते ही दंगे खत्म हो गए। काम पूरा हो गया था। भारत की धर्मनिरपेक्ष छवि पर दुनिया के सामने सफलतापूर्वक दाग लगा दिया गया था। हाल ही में जहांगीरपुरी, खरगोन और हुबली में हुए साम्प्रदायिक दंगों के पीछे भी यही पैटर्न दिखाई देता है। पहले तो उकसाने वाले उचित समय चुनते हैं। फिर वे किन्हीं साम्प्रदायिक मामलों को तूल देते हैं। इस बार ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन की यात्रा सोने पर सुहागा साबित हुई। उकसाने वालों को पता था कि जॉनसन के साथ घोर मोदी-विरोधी ब्रिटिश मीडिया आने वाला है। जैसे ही टाइमिंग सेट हुई, दूसरी कड़ी एक्शन में आई। सोशल मीडिया पर भाजपा-विरोधी एक्टिविस्टों और पत्रकारों द्वारा मैसेज भेजे जाने लगे। टूलकिट का इस्तेमाल किया गया। 2021 में गणतंत्र-दिवस के दंगों की योजना बनाने में इन टूलकिट की भूमिका को एक्सपोज किया जा चुका था। इस बार दिए जाने वाले संदेश ज्यादा गूढ़ थे, लेकिन मनसूबे पहले जैसे ही थे। फिर हिस्ट्रीशीटर्स हरकत में आ गए। 16 अप्रैल के दिन हमले शुरू हुए। पहली बार अनेक दंगाइयों पर नेशनल सिक्योरिटी एक्ट के तहत मामले दर्ज किए गए।
आगामी 3 मई को ईदुल-फितर और अक्षय तृतीया के पर्व एक साथ आ रहे हैं। लेकिन इसके बावजूद आप मान लीजिए कि वह दिन शांतिपूर्ण तरीके से निकल जाएगा। क्योंकि मूल लक्ष्य पहले ही अर्जित किया जा चुका है और वह है एकता और शक्ति का प्रदर्शन। मनोवैज्ञानिक रूप से बात करें तो अजान के लिए लाउडस्पीकर, सड़कों पर नमाज पढ़ना, हिजाब पहनना आदि मुस्लिम पहचान को मजबूत बनाने के लिए हैं। भारतीय मुस्लिमों के पुरखों ने 1947 में पाकिस्तान जाने से इनकार कर दिया था। वे भारत में निष्ठावान और देशभक्त नागरिक की तरह रहना चाहते थे। पाकिस्तान के बजाय भारत को चुनने के ऐवज में कांग्रेस ने उन्हें पुरस्कृत भी किया। जहां पाकिस्तान इस्लामिक तानाशाही बनता गया, वहीं भारत धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र के रूप में उभरा। मुस्लिमों को पर्सनल लॉ का पालन करने की अनुमति दी गई थी, जबकि स्वयं हिंदू पर्सनल लॉ 1955 में जाकर बनाया गया था। जल्द ही मुस्लिम एक महत्वपूर्ण वोटबैंक बन गए और कांग्रेस द्वारा उन्हें मोस्ट फेवर्ड कम्युनिटी का दर्जा दे दिया गया। 1977 में कांग्रेस-राज के अंत के बाद देश का सामाजिक ताना-बाना बदल गया था। 1980 के दशक में शाहबानो प्रकरण और अयोध्या में शिलान्यास के बाद जो साम्प्रदायिक राजनीति उभरी, वह विगत 35 वर्षों में बढ़ती चली गई है। 1980 और 1990 के दशक में भाजपा का उदय इसी का परिणाम था।
आम हिंदू वर्षों से अंकुश में था, किंतु उसने अब धार्मिक पहचान के पुनरुत्थान को अनुभव किया है। मुस्लिमों को लगने लगा कि उनके साथ भेदभाव किया जा रहा है। मोदी के उदय ने रही-सही कसर पूरी कर दी। भारत का दंगा-उद्योग सक्रिय हो गया। अनुभव तो यही बताते हैं कि भारत में साम्प्रदायिक दंगे एक पक्ष द्वारा छेड़े जाते हैं। 1969 में गुजरात में हिंदू साधुओं और मंदिर पर हमला किया गया था, 2002 में गोधरा में 59 कारसेवकों को जिंदा जला दिया गया। इस दंगा-उद्योग का इतिहास बहुत लम्बा और हिंसक है, इसे अब बंद करने का समय आ गया है।
Date:29-04-22
भारत की आवाज सुनने को उत्सुक दुनिया हर्ष वी पंत, ( लेखक सामरिक मामलों के विशेषज्ञ हैं )
इस समय पूरी दुनिया उथल-पुथल भरे दौर से गुजर रही है। कई ताकतें अपना प्रभाव बढ़ाने के लिए बेसब्र हुई जा रही हैं। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। यहां उसकी आक्रामकता ने कई देशों को परेशान किया हुआ है। इस क्षेत्र के लिए भले ही अस्थिरता एवं तनाव कोई नई बात न हो, लेकिन यूरोप जैसे अपेक्षाकृत स्थायित्व भरे क्षेत्र में भी इस समय युद्ध की आग भड़की हुई है। यहां यूक्रेन पर रूसी हमले ने दुनिया को एक तरह से दोफाड़ कर दिया है। इस बदलते वैश्विक घटनाक्रम में अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं अपनी भूमिका के साथ न्याय नहीं कर पाई हैं। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद जो विधि आधारित वैश्विक ढांचा बना था, उसे रूसी हमले से उपजी स्थिति ने खंड-खंड कर दिया। कोविड महामारी के समय अंतराष्ट्रीय संस्थाओं की जिस नाकामी के दर्शन हुए थे, उनकी अक्षमता को इस युद्ध ने पूरी तरह उजागर करके रख दिया। यही कारण है कि दुनिया दो खेमों में बंटती दिखी। जब ये संस्थाएं किसी सहमति या संवाद की स्थिति बनाने में असफल रहीं, तब भारत दुनिया की कूटनीति का नया केंद्र बनता हुआ दिखा। इसका अनुमान आप इसी तथ्य से लगा सकते हैं कि यूक्रेन को लेकर जब अमेरिका और रूस एक दूसरे को आंखें दिखा रहे थे, उसी दौरान एक हफ्ते के भीतर अमेरिकी उप-राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार और रूसी विदेश मंत्री नई दिल्ली का दौरा कर चुके थे।
बीते करीब एक डेढ़-महीने में दुनिया के तमाम नेता और राजनयिक भारत का दौरा कर चुके हैं। जाहिर है कि यह उभरते हुए वैश्विक ढांचे में भारत की बढ़ती भूमिका का ही प्रमाण है। इसी पृष्ठभूमि में रायसीना डायलाग के सातवें संस्करण का सफल आयोजन हुआ। इसमें दुनिया के करीब सौ से अधिक देशों के प्रतिनिधियों ने विश्व के समक्ष ज्वलंत मुद्दों पर मंथन किया। बीते कुछ वर्षों के दौरान रायसीना डायलाग वैश्विक भू-राजनीति एवं भू-आर्थिकी पर विमर्श के एक प्रमुख मंच के रूप में उभरा है। विश्व इस समय जिन परिस्थितियों से जूझ रहा है, उसमें ऐसे मंच की उपयोगिता कहीं ज्यादा बढ़ गई है। एक ऐसे समय में जब दुनिया में वाद-विवाद बढ़ रहे हों, वहां संवाद और भी आवश्यक हो गया है। इस दृष्टिकोण से रायसीना डायलाग ने अपनी भूमिका के साथ पूरा न्याय किया। यहां रूस और यूक्रेन के मुद्दे पर इतनी सारगर्भित एवं अर्थपूर्ण चर्चा हुई, जैसी दुनिया में अभी तक किसी देश या मंच पर देखने को नहीं मिली। इस मुद्दे से जुड़े तमाम अंशभागी यहां उपस्थिति रहे, जिन्होंने रायसीना डायलाग के मंच से अपना-अपना पक्ष दुनिया के सामने रखा।
पिछले कुछ समय से यह देखने में आ रहा है कि दुनिया की कई शक्तियां भारत को अपने-अपने पाले में खींच रही हैं। ऐसी स्थिति में भारत इन शक्तियों के साथ अपने समीकरण साधने में सफल रहा है। अच्छी बात यह रही है कि भारत न तो पूरी तरह से किसी एक पाले में गया और न ही उसने तटस्थता जैसा कोई भाव अपनाया। वास्तव में भारत ने यही दर्शाया कि उसका दृष्टिकोण तटस्थ न होकर अपने हितों की पूर्ति करने में सक्षम देश का है। इस दौरान विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने मुखर होकर अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भारत का पक्ष रखा। रायसीना डायलाग के मंच पर उन्होंने उसी निरंतरता को कायम रखा। विषय विशेषज्ञता एवं साफगोई के लिए विख्यात जयशंकर ने इस मंच से भी दुनिया को स्पष्ट संकेत दिए कि भारत का नजरिया क्या है। यूरोपीय प्रतिनिधियों द्वारा यूक्रेन के मामले में भारत के लिए रचे गए प्रश्नों के व्यूह को विदेश मंत्री ने अपने अचूक तर्कों से ध्वस्त कर दिया। उन्होंने कहा कि भारत ने बार-बार दोहराया है कि यूक्रेन पर हमला उचित नहीं और किसी भी विवाद का संवाद से ही समाधान तलाशा जाना चाहिए। उन्होंने विधि आधारित वैश्विक व्यवस्था की दुहाई देने वाले पश्चिमी देशों के इस मामले में दोहरे मापदंड भी गिनाए। उन्होंने कहा कि जो लोग अब रूस पर वैश्विक ढांचे का मखौल उड़ाने का आरोप लगा रहे हैं, वे तब मौन थे, जब अमेरिका ने एकाएक अफगानिस्तान से निकलने का फैसला किया और वहां तालिबान का कब्जा हो गया। उन्होंने यहां तक कहा कि जब चीन भारत की सीमा पर अपना दुस्साहस दिखा रहा था तो पश्चिम ने बिन मांगी सलाह के तौर पर भारत को सुझाया कि चीन से तनाव टालने के लिए वह उससे अपना व्यापार बढ़ाए। जयशंकर ने कहा कि रूस को लेकर भारत ने पश्चिमी देशों को ऐसी कोई सलाह नहीं दी। उन्होंने बहुत संतुलित ढंग से समझाया कि अंतरराष्ट्रीय मामलों में संतुलित रवैया बहुत आवश्यक है। इसमें सभी की अपनी-अपनी प्राथमिकताएं होती हैं। समस्या मुद्दों को अपने-अपने नजरिये से देखने के कारण उत्पन्न होती है।
इसमें कोई संदेह नहीं कि सशक्त होते भारत का नई आकार लेती विश्व व्यवस्था में कद भी उसी अनुपात में बढ़ रहा है। बीते दिनों भारत आए ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जानसन ने भी कहा था कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र दुनिया में आर्थिक वृद्धि की नई धुरी के रूप में उभरने वाला है, जिसमें भारत की भूमिका महत्वपूर्ण होगी। चीन में विकास के चरम अवस्था पर पहुंचने और कोविड से लड़खड़ाने के बाद भारत ही दुनिया की सबसे तेजी से वृद्धि करने वाली अर्थव्यवस्था के रूप में सामने आ रहा है। इसने भारत की जिम्मेदारी को भी बढ़ा दिया है, जिसका वह निर्वहन करने से भी नहीं हिचक रहा। चाहे कोविड महामारी से बचाव के लिए वैक्सीन की पहुंच के मामले में गरीब देशों के समर्थन में आवाज बुलंद करना हो या फिर यूक्रेन में युद्ध छिड़ने से गेहूं की वैश्विक किल्लत में अपनी ओर से आपूर्ति करने की पहल, भारत के इन कदमों को पूरी दुनिया से सराहना मिली है। कई देशों को भारत ने कोविड रोधी टीका उपलब्ध कराया। मुश्किल में फंसे अफगानिस्तान को अनाज और दवाएं मुहैया कराईं। यहां तक कि चीनी कर्ज के चंगुल में फंसे आर्थिक संकट के शिकार श्रीलंका की मदद से भी पीछे नहीं रहा। ये सभी उदाहरण भारत को एक जिम्मेदार शक्ति के रूप में स्थापित करते हैं। भविष्य में भारत के इस उभार की कहानी को आगे बढ़ाने में विमर्श को अपने अनुरूप गढ़ने की आवश्यकता भी उतनी ही महत्वपूर्ण होगी। इसमें रायसीना डायलाग जैसे मंच का महत्व और अधिक बढ़ेगा। जब दुनिया के अधिकांश देश एवं अंतरराष्ट्रीय संस्थान अंतर्मुखी होते जा रहे हैं, तब दुनिया भारत की आवाज सुनना चाहती है और उसे सुनाने की एक अहम कड़ी के रूप में रायसीना डायलाग का दायरा आने वाले समय में और व्यापक होता दिखेगा।
Date:29-04-22
समाप्त हो राजद्रोह कानून संपादकीय
सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को नोटिस दिया है कि वह तीन दिन के भीतर भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 124ए के तहत आने वाले राजद्रोह कानून की वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं का उत्तर दे। इससे यह आशा जगी है कि अंतत: यह कानून समाप्त कर दिया जाएगा। इस कानून का केंद्र और राज्यों की सरकारों ने जमकर दुरुपयोग किया है और यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के गत वर्ष जून में जी-7 देशों के आयोजन में दिए गए भाषण के विपरीत है जिसमें उन्होंने कहा था कि ‘भारत लोकतंत्र, विचारों की स्वतंत्रता और आजादी को लेकर प्रतिबद्ध देश है’। इसके बाद मोदी ने मुक्त समाज संबंधी एक वक्तव्य पर हस्ताक्षर किए थे जिसमें कहा गया है कि उस पर हस्ताक्षर करने वाले ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों तरह से अभिव्यक्ति की आजादी के पक्ष में रहेंगे। यह सार्वजनिक रुख उस बात के विपरीत है जिसके तहत सरकार की आलोचना करने वालों को गिरफ्तार कर लिया जाता है। इसमें पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता, कलाकार और छात्र सभी शामिल हैं। इतना ही नहीं सरकार ने अनगिनत अवसरों पर इंटरनेट भी बंद कराया है। धारा 124ए को समाप्त करके सर्वोच्च न्यायालय सरकार की मदद ही करेगी क्योंकि इससे उसकी अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धताओं तथा घरेलू व्यवहार के बीच की विसंगति दूर होगी।
इस कानून को समाप्त करने के लिए विधिक हलकों में भी मांग तेजी से बढ़ी है। उदाहरण के लिए गत वर्ष फरवरी में दिल्ली की एक अदालत ने कहा था कि राजद्रोह के कानून का इस्तेमाल उपद्रवियों को शांत करने के बहाने से आशंकाओं को दूर करने के लिए नहीं किया जा सकता। बाद में प्रधान न्यायाधीश एन वी रमण ने सरकार के विधिक प्रतिनिधि से पूछा था कि एक औपनिवेशिक कानून जिसका इस्तेमाल लोगों को दंडित करने के लिए किया जाता था, उसे आजादी के 75 वर्ष बाद भी क्यों इस्तेमाल किया जा रहा है। सर्वोच्च न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया है कि इस मामले की अंतिम सुनवायी 5 मई को होगी। इससे यही संकेत मिलता है कि न्यायमूर्ति रमण इस विवादित मुद्दे को समाप्त करना चाहते हैं। देश की सबसे बड़ी अदालत का रुख अभिव्यक्ति की आजादी के हिमायतियों के लिए आशा जगाने वाला है। परंतु एक तथ्य यह भी है कि सरकार ने याचिकाएं दायर होने के नौ महीने बाद भी अपना जवाब दाखिल नहीं किया है। ऐसे में संभव है कि सरकार के विचार अदालत से मेल न खा रहे हों। गत वर्ष दिसंबर में कानून मंत्री किरण रिजिजू ने भी इस बात की पुष्टि की थी कि गृह मंत्रालय की ओर से धारा 124ए को समाप्त करने का कोई प्रस्ताव नहीं है।
इस कानून को समाप्त करने की तात्कालिक आवश्यकता इसलिए उपजी है कि राजनेताओं और सुरक्षा एजेंसियों ने धारा 124ए को लेकर केदारनाथ बनाम बिहार राज्य के मामले में सर्वोच्च न्यायालय के 60 वर्ष पुराने ऐतिहासिक निर्णय की मनमानी व्याख्या की है। उस फैसले में न्यायालय ने धारा 124ए की वैधता को कायम रखते हुए कहा था कि उसका इस्तेमाल केवल तभी किया जाना चाहिए जब मकसद सरकार या देश के प्रति हिंसा भड़काना हो। परंतु इस फैसले के और अधिक स्पष्ट न होने के कारण सरकार इसकी व्यापक व्याख्या करके उसे इस्तेमाल करती है। भारत जैसे लोकतांत्रिक देश में ऐसा करना आसन है क्योंकि यहां जनता की नाराजगी किसी भी समय सामने आ सकती है और वक्तव्यों के बगावती असर को मनचाहे ढंग से आंका जा सकता है। आम भारतीयों की आजादी को दो अन्य खतरे हैं विधिविरुद्ध क्रियाकलाप (निवारण) अधिनियम (यूएपीए) तथा राष्ट्रीय सुरक्षा कानून। इनका भी सरकार के विरोधियों को चुप कराने के लिए इस्तेमाल किया जा रहा है। इन दोनों की तत्काल समीक्षा की आवश्यकता है। ऐसे में धारा 124ए को समाप्त करने से अच्छी नजीर पेश होगी और भारत मुक्त समाज की प्रतिबद्धताओं के अनुरूप बनेगा।
Date:29-04-22
रायसीना डायलॉग संपादकीय
पश्चिमी देशों को आईना दिखाते हुए विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने जो कहा वह भारत के बढ़ते कद और हौसले का परिचायक है। जयशंकर ने साफ कहा, ‘हमें पता है, हम कौन हैं हम दूसरे देशों को खुश करने के लिए उनकी छाया नहीं बन सकते।’ रायसीना डायलॉग नामक कार्यक्रम में तीनों दिन पश्चिमी देश जहां भारत पर अपने पाले में खड़ा होने का दबाव बनाते रहे वहीं भारत ने दृढ़ता से अपनी बात रखी। तीन दिवसीय कार्यक्रम का आयोजन विदेश मंत्रालय और ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन ने किया था। अंतिम दिन के एक सत्र में जयशंकर ने कहा कि भारत को अंतरराष्ट्रीय समुदाय को खुश करने का प्रयास करने की बजाय दुनिया से लेन देन करने के लिए अपनी पहचान पर विश्वास को आधार बनाना चाहिए। उन्होंने कहा,‘हम कौन हैं, इस बारे में हमें आत्मविश्वास-पूर्ण होना चाहिए। हमें दुनिया से अपनी असली पहचान के दम पर ही लेन देन करना चाहिए। दूसरे हमें परिभाषित करें यह बीते जमाने की बात हो चुकी है। हमें किसी भी तरह दूसरों की स्वीकृति की जरूरत नहीं है। रूस-यूक्रेन संकट पर उन्होंने कहा कि इस समय लड़ाई को रोकने और बातचीत शुरू करने पर ध्यान केंद्रित करने की जरूरत है। यूक्रेन युद्ध की शुरु आत से ही पश्चिमी देश भारत के किसी भी पक्ष का साथ न देने को लेकर असहज रहे हैं। अर्से से जाहिर भारत-रूस संबंधों को लेकर भारत की आलोचना की जाती रही, यहां तक कि अमेरिका ने भी दबाव बनाने का खुला प्रयास किया। जबकि भारत हमेशा युद्ध और हिंसा को खत्म करने और वार्ता की अपील करता रहा। रूस की आलोचना में भारत ने पश्चिम का साथ नहीं दिया लेकिन जब यूक्रेन के बूचा शहर में मासूम नागरिकों के नरसंहार की खबरें सामने आई तो भारत ने इसकी कड़ी निंदा की। रायसीना डायलॉग के यूरोपीय आयोग की प्रमुख उर्सुला फोन डेय लायन ने रूस पर लगाए गए यूरोपीय प्रतिबंधों के पक्ष में भारत का भी समर्थन मांगा। लेकिन भारत अपनी स्थिति पर कायम रहा। भारत ने पश्चिमी देशों को ही आड़े हाथों लिया। चीन की आक्रामकता को नजरअंदाज करने और अफगानिस्तान में तालिबान की वापसी जैसी एशिया की सबसे बड़ी चुनौतिया की परवाह न करने पर जयशंकर ने उन्हें ही खरी खोटी सुना दी।
Date:29-04-22
सहकारी संघवाद की परीक्षा संपादकीय
एक असाधारण कदम उठाते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने कोविड संक्रमण के ताजा उभार पर मुख्यमंत्रियों के साथ अपनी ऑनलाइन बैठक में एक असामान्य विषयांतर किया। उन्होंने पेट्रोलियम उत्पादों की ऊंची कीमतों की ओर इशारा करते हुए विशेष रूप से विपक्षी राज्य सरकारों से आग्रह किया कि पेट्रोल-डीजल पर वैट घटाएं और अपनी जनता को राहत दें। विपक्ष-शासित राज्यों को ही संबोधित इस मांग का तात्कालिक संदर्भ यह है कि पिछले नवंबर में केंद्र ने तेल के उत्पाद शुल्क में 5 रु0 प्रति लीटर की कमी की थी। उस समय केंद्र की ओर राज्यों से वैट कम करने की मांग भी की गयी थी और कई भाजपा शासित राज्यों ने उसमें कमी भी की थी, जिससे तेल का दाम आम तौर पर सैकड़ा पार करते-करते रह गया था। लेकिन विधानसभा चुनाव के नतीजे आने के बाद फिर से तेजी से बढ़ने शुरू हो गए। और अब तेल के दाम को सैकड़ा पार किए गए भी कई हफ्ते हो चुके हैं। इस बीच महंगाई की दर तीस साल के रिकार्ड स्तर पर पहुंच गयी है और इसके लिए सबसे बढ़कर, तेल के दाम में बढ़ोतरी को ही जिम्मेदार माना जा रहा है। इन हालात में कोविडोत्तर आर्थिक बहाली के लिए भी खतरा बढ़ गया है। प्रधानमंत्री का तेल के बढ़े हुए दाम पर चिंता जताना स्वाभाविक भी था और जरूरी भी। लेकिन हालांकि प्रधानमंत्री ने सहकारी संघवाद की दुहाई भी दी थी, लेकिन जैसा कि उनको अनुमान भी था, उनकी अपील ने विवाद ही ज्यादा पैदा किया है। दुर्भाग्य से इसके लिए सिर्फ राज्यों और खास तौर पर विपक्ष शासित राज्यों को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। इसकी वजह राज्यों के हाथों में संसाधनों का बहुत घट जाना ही नहीं है। इसकी सबसे बड़ी वजह है, तेल की कीमतों के असह्य रूप से ऊपर चढ़ जाने में, बाहरी कारणों को छोड़ दें तो, केंद्र द्वारा वसूले जाने वाले करों का हिस्सा बहुत ज्यादा होना। 2014 के बाद से पेट्रोल पर केंद्रीय कर की दर में 3.5 गुना और डीजल पर 9 गुना बढ़ोतरी हुई है। वास्तव में केंद्र सरकार के राजस्व में पेट्रोलियम करों का हिस्सा 5.4 फीसद से बढ़कर 12.2 फीसद रह गया है। इसलिए केंद्र सरकार पहले खुद तेल क्षेत्र को संसाधन जुटाने के लिए दुधारू गाय की तरह इस्तेमाल करना बंद करे, उसके बाद ही राज्यों से वैट घटाने की उसकी मांग में कोई नैतिक बल सकता है, उसके बिना नहीं। केंद्र की नीतियों से तय दाम के साथ राज्यों का वैट तो खुद ही घट जाएगा।
Date:29-04-22
विकास की राह में रोड़ा न बनें नियम मकरंद आर परांजपे, ( प्रोफेसर, जेएनयू )
जो लोग यह मानते हैं कि भारत का विकास आज से पहले ऐसे संभव नहीं था, वे अक्सर देश के विशाल नियामक और अनुपालन (नियम-पालन) तंत्र को लेकर निराश भी दिखते हैं। कभी-कभी वे नाराज और क्रोधित भी हो जाते हैं। ऐसा इसलिए, क्योंकि यह व्यवस्था भारत के तेज विकास की कहानी में अड़चन और रुकावट पैदा करती है। माना यही जाता है कि कई बेईमानों, ठगों और प्रत्यक्ष धोखेबाजों केचलते खूब रुकावटेंपैदा होती हैंऔर हमारा विशाल तंत्र भारत में कारोबार को किसी दु:स्वप्न सरीखा बना देता है।
ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन (ओआरएफ) द्वारा हाल ही में जारी की गई ‘जेल्ड फॉर डूइंग बिजनेस’ रिपोर्ट में चौंकाने वाली 69,233 तरह की अद्वितीय मंजूरियां और औपचारिकताएं सूचीबद्ध की गई हैं। ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के वाइस प्रेसिडेंट गौतम चिकरमने और अवंतिस रेगटेक के सह-संस्थापक व सीईओ ऋषि अग्रवाल द्वारा तैयार यह रिपोर्ट बताती है कि 26,134 मंजूरियों या औपचारिकताओं की पालना अगर न हो, तो बतौर दंड कारावास तक की सजा हो सकती है। सबसे अधिक नियम-पालन पर जोर देने वाले राज्यों में से जिन पांच सूबों में सर्वाधिक कारावास संबंधी प्रावधान हैं, वे हैं- गुजरात (1,469), पंजाब (1,273), महाराष्ट्र (1,210), कर्नाटक (1,175) और तमिलनाडु(1,043)। मगर निराशाजनक है कि सख्त अनुपालन व्यवस्था के बावजूद, जिसमें तमाम नियम मौजूद हैं व कठोर धाराएं भी लगाई जाती हैं, लेकिन असली अपराधी कानून के लंबे हाथों से बार-बार बचते दिखाई पड़ते हैं।
भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत के विकास की इन बाधाओं से पूरी तरह परिचित हैं। 21 अप्रैल को आयोजित 15वें सिविल सेवा दिवस के कार्यक्रम का इस्तेमाल उन्होंने न सिर्फ लोक प्रशासन में उत्कृष्ट काम करने वाले नौकरशाहों को पुरस्कृत करने के लिए किया, बल्कि यह संदेश भी घर-घर पहुंचा दिया कि हमारी नौकरशाही अपने जटिल प्रशासनिक व्यवस्था के कारण भारत के विकास में एक बड़ी चुनौती पेश कर रही है। भारतीय जनता पार्टी द्वारा साल 2013 में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में नाम की घोषणा होने के बाद अपने शुरुआती अनुभवों को याद करते हुए नरेंद्र मोदी ने कहा, जब मेरी पार्टी ने पहली बार 2013 में प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार के रूप में मेरे नाम की घोषणा की थी, तब मुझे दिल्ली में कारोबारी समुदाय ने बुलाया था। मैंने उनके बीच एक भाषण दिया। तब 2014 के आम चुनाव होने में चार से छह महीने की देरी थी। जब उन्होंने मुझसे पूछा कि प्रधानमंत्री बनने के बाद मैं क्या करूंगा, तब मैंने कहा, मैं हर दिन एक कानून खत्म करूंगा, कोई नया कानून मैं नहीं बनाऊंगा। यह सुनकर वे चौंक गए थे। और, अपने पहले पांच वर्षों में मैंने 1,500 कानून खत्म भी किए।
बिना किसी लाग-लपेट के प्रधानमंत्री ने कहा, यह आप जानते ही हैं कि इस तरह के सैकड़ों कानून अपने देश में रहे हैं, जिनको मैं भारत के नागरिकों के लिए बोझ समझता हूं। आप मुझे बताइए, आखिर हमें ऐसे कानूनों को क्यों ढोना चाहिए? आज भी मेरी यही राय है कि इस तरह के कई कानून, जो बेकाम हो चुके हैं, उनके खिलाफ हम कुछ पहल क्यों नहीं करते? उनको खत्म क्यों नहीं कर देते? देश को इस गैर-जरूरी जाल से बाहर निकालना ही होगा।
कैबिनेट सचिव राजीव गौबा की मंच पर मौजूदगी के बावजूद प्रधानमंत्री मोदी ने भारतीय नागरिकों से नियम-पालन की अंतहीन मांग करने वाली इस व्यवस्था पर बोलना जारी रखा। उन्होंने कहा, इसी तरह, हम नागरिकों से सभी प्रकार के नियम अनुपालन की मांग करते रहते हैं। मैंने कैबिनेट सचिव से कहा कि जब तक हम बाकी दुनिया के लिए (अपने सॉफ्टवेयर और प्रौद्योगिकी आउटसोर्सिंग के माध्यम से) काम करने की कोशिश कर रहे हैं, आपको इसकी जिम्मेदारी लेनी चाहिए कि देश इन नियमों के पालन से मुक्त होगा; नागरिकों को हमें आजाद करना ही चाहिए। आजादी के इस 75वें वर्ष में आप नागरिकों को इस जाल में क्यों फंसा रहे हैं? और, एक कार्यालय में छह लोग काम करने बैठे होंगे, हर टेबल वाले को काम की पूरी जानकारी होगी, फिर भी वे अलग से पूछेंगे, टेबल की साइड से वे कुछ नहीं करेंगे।
यहां मैं फिर से ‘जेल्ड फॉर डूइंग बिजनेस’ रिपोर्ट पर लौटता हूं। इसकी सामग्री को पिछले सात वर्षों में टीम लीज और रेग टेक ने शिद्दत से जमा किया है। इसके मोनोग्राफ में श्रम, वित्त व कराधान, पर्यावरण, स्वास्थ्य व सचिव के कार्य को लेकर सुरक्षा, वाणिज्यिक, उद्योग-केंद्रित और सामान्य क्षेत्र जैसे सात व्यापक श्रेणियों में रिपोर्ट के नतीजे बांटे गए हैं। नियामक न सिर्फ अतिरिक्त लाभ कमाने वाले, बल्कि गैर-लाभकारी संस्थानों की राह में भी बाधाएं उत्पन्न करता है। यही वजह है कि भारत में न केवल कोई कारोबार करना या नया संस्थान शुरू करना कठिन है, बल्कि उसे बंद करना तो कहीं ज्यादा दुरूह काम हो जाता है। जैसा कि टीम लीज के अध्यक्ष मनीष सभरवाल भी कहते हैं, भारत में नियोक्ता संबंधी अनुपालनों का अत्यधिक अपराधीकरण भ्रष्टाचार को जन्म देता है, औपचारिक रोजगार को कुंद करता है और न्याय में जहर घोलता है।
यह रिपोर्ट तमाम तरह की सिफारिशों से भरी हुई है, जिनमें व्यावसायिक नियमों और विनियमों को युक्तिसंगत बनाना, आपराधिक दंड को नियंत्रित करना और व्यापक नीतिगत सुधार शामिल हैं। देश के अनुपालन तंत्र या आम लोगों को सेवा देने वाली व्यवस्थाओं के पुनर्गठन से न केवल भारत में सामान्य कारोबारी माहौल बेहतर बन सकेगा, बल्कि इससे विभिन्न तरीके से पैसे कमाने वाले, नवाचार में विश्वास रखने वाले, उद्यमी और बड़े-बड़े उद्योगपतियों की गरिमा भी सुरक्षित रहेगी।
सिविल सेवकों के लिए प्रधानमंत्री का यह आह्वान केंद्र सरकार के साथ-साथ, देश के विभिन्न राज्यों, उनके विभिन्न मंत्रालयों व विभागों और पूरे देश के लिए एक व्यापक सुधार प्रक्रिया को शुरू करने का बेहतर मौका दे रहा है। यह निश्चय ही भारत को समृद्धि और खुशहाली की नई ऊंचाइयों पर ले जाएगा।
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हाल ही में मध्यप्रदेश के खरगौन जिले में हुए दंगों में कानून का जो रूप सामने आया है, उसने कानून की एक नई व्याख्या को जन्म दिया है। वहाँ हुए पूरे घटनाक्रम से ऐसा लग रहा है कि शासकों द्वारा जो भी किया जाता है, वही कानून है। इसके लिए न तो कानून की आवश्यकता होती है, और न ही प्रक्रिया की।
रामनवमी के जुलूस के एक दिन बाद दंगाइयों की संपत्ति के कुछ हिस्सों को इसलिए ध्वस्त किया गया, क्योंकि उन्होंने कथित तौर पर इस जुलूस पर पत्थरबाजी की थी। यह कदम मुसलमानों के विरूद्ध सरकार समर्थित अभियान कहा जा सकता है, जिसमें कुछ लोगों के कथित कृत्यों के लिए सामूहिक दंड दिया गया।
इस पूरे घटनाक्रम को ‘अतिक्रमण ध्वस्त’ करने का नाम देकर मोड़ देने का प्रयत्न किया जा रहा है। मुख्यमंत्री ने चेतावनी दी है कि दंगाइयों को बख्शा नहीं जाएगा, और उनके स्वामित्व वाली संपत्ति से नुकसान की भरपाई की जाएगी। इस चेतावनी का आधार 2009 का सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय है, जो हिंसा होने पर कार्यक्रम के आयोजकों को दोषी मानने और उनसे मुआवजे की वसूली की अनुमति देता है।
घटनाक्रम के पीछे छिपे तथ्य –
ऐसा लगता है कि हिंदुत्ववादी संगठन, मुस्लिमों की प्रथाओं और व्यवसायों के बहिष्कार के आहवान का लक्ष्य लेकर चल रहे हैं।
हिंसा को रंग देने में उछाल आने के साथ ही ऐसा लगने लगा है कि इन घटनाओं के पीछे बड़ा एजेंडा है। इसका उद्देश्य किसी प्रकार के प्रतिशोध को भड़काना है, ताकि उन्हें अपराधी के रूप में चित्रित किया जा सके, और उन्हें कानून के बाहर और दायरे में कड़ी सजा दी जा सके।
ऐसी घटनाओं में सरकारी तंत्र के मौन समर्थन से देश को सांप्रदायिक तनाव के वातावरण में नहीं जाने देना चाहिए। उम्मीद की जा सकती है कि दो समुदायों के बीच होने वाली छोटी-मोटी झड़पों को सरकार की विवेकपूर्ण कार्रवाई से सुलझाया जा सकेगा।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 14 अप्रैल, 2022
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Date:28-04-22
Scrap Sedition There’s no point trying to mend this broken law. It’s an anti-constitutional provision that must go TOI Editorials
The Supreme Court’s resumption of its hearing into petitions seeking the scrapping of the sedition provision in IPC comes at a time when this colonial era law is becoming a major threat to political and personal freedoms. Section 124A IPC punishes words or actions that attempt to incite hatred, contempt and disaffection towards governments with three years to life imprisonment. “Hatred”, “contempt” and “disaffection” are such broad phrases that even legitimate criticism or dissent can earn a sedition charge. Not surprisingly, hundreds of dissenters over the years have paid a heavy price after being falsely accused of “deshdroh”.
For British imperialists, it was the ideal legal instrument to jail freedom fighters like Bal Gangadhar Tilak and Mahatma Gandhi for long periods because other than their political writings and utterances against the Crown, no other serious crime could be attributed to them. Today’s governments are guilty of the same tactic of
prosecuting thoughts and words when there’s precious little to target their political rivals. At this juncture, SC should discard any notions that setting guardrails will force police and governments to behave.
The 1962 Kedar Nath Singh judgment had attempted to narrow sedition to offences betraying an “intention” and “tendency” to cause public disorder or endanger state security. Six decades hence, we know with absolute certainty that it has had no tempering influence on police or governments. SC and high courts have repeatedly had to emphasise that criticism of governments isn’t sedition but the message just doesn’t percolate. That’s because for thana cops directed by authorities to fix political opponents, the sedition provision’s continuing existence in IPC makes it the most handy tool to inflict harassment.
Not only is sedition cognisable and non-bailable, it doesn’t require an actual crime to have been committed, and lends itself easily to criminalising any political expression, even those protected by India’s free speech laws. Not surprisingly, sedition has been invoked against writers, cartoonists, politicians, and even ordinary citizens like the thousands of villagers who agitated against the Koodankulam nuclear plant in Tamil Nadu. The growing trend of private complaints of sedition where any motivated individual can lodge a sedition complaint and make life hell for people not even remotely connected to the complainant must also be noted by SC. Britain, which gifted India sedition, extirpated it from the country’s statute in 2009. SC should do the honours for India and scrap the sedition provision.
Date:28-04-22
Nations-Building, A New Joint Venture ET Editorials
The Trilateral Development Corporation (TDC) Fund launchedby India is an important step towards providing alternatives to countries to power their economic development without going into debt. GoI’s effort to bring private enterprise into the fold, offering state support and backing, and partnering with other countries keen to invest will allow India to participate actively not just in the Indo-Pacific but also in other parts of the developing world.
Like-minded democracies have been talking and working to provide an alternative to the Chinese growth model that has often led countries to situations where they found themselves in debt or having to give up key assets. The pandemic and the
war in Ukraine have exacerbated this situation. Sri Lanka is a grim reminder. This effort is important to ensure that the Indo-Pacific remains open and free. Having an operational mechanism with multiple partners provides a level of dexterity that will give countries seeking investment a real alternative to the Chinese option. India’s venture brings added value, providing access to relevant human resources, particularly in technology, and using scale to drive down costs. India, trying to bridge considerable development gaps itself, brings to the table its ability to guide economic and infra projects in a manner that is best suited to developing economies. Besides, the strong India-origin and expatriate communities in many parts of the Indo-Pacific and Africa give the venture a high level of acceptability.
This effort is about India taking a leadership role in the global arena, leveraging its advantages to unleash not just its economy, but to also ensure growth and stability in the region in partnership with developed and developing countries.
Date:28-04-22
Preventing harm Proactive intervention is needed to stop spread of hate and inflammatory speeches Editorial
The value of proactive judicial intervention cannot be understated. After the Supreme Court called for “corrective measures” against the peddling of communal hate from supposedly religious platforms, the authorities in Uttarakhand have prevented the holding of a ‘dharam sansad’ in Roorkee by imposing prohibitory orders against such gatherings. At a time when communally motivated gatherings are becoming conspicuous in their frequency and vociferous in their fulminations against minorities, one would have expected the police to be more sensitive to the situation and prevent hate speeches. Counsel for Himachal Pradesh has said preventive steps were taken when one such gathering took place a few days ago, and that the participants were warned against any incitement, but those who have approached the Court against the trend of hate speeches at such meets, accuse the local authorities of inaction. It was one such religious conclave in Haridwar in December that witnessed extraordinarily inflammatory speeches being made against Muslims, some of them having a shockingly genocidal tenor. After dithering, the Uttarakhand police had then arrested Yati Narsinghanand, a controversial priest and Hindutva leader, who was among those who had allegedly called for armed violence against minorities. Even after obtaining bail, under a condition that he would not make any provocative speeches, he had participated in a similar event in Delhi. Instances of controversial religious figures making unacceptable comments at different places and occasions have emerged as a disturbing pattern, one that the Court may have to arrest by stern action.
One way of looking at this phenomenon is to dismiss it as not being representative of the silent majority and as the activity of a few fringe elements. However, it cannot be gainsaid that the provocateurs are seeking to foster a collective fear among the majority that their interests are not being protected by an allegedly minority-friendly Constitution, and feeding off the same fear to spread their message of hate. The possible damage to the social fabric is incalculable, as the language of hatred may seep into the public consciousness as an acceptable thought process. The result may be an atmosphere in which communal harmony and public tranquillity will be at perennial risk. It is in this backdrop that modern democracies make a clear distinction between freedom of expression and speech that tends to incite hatred against a public group or section of society. The Supreme Court has recognised the potential for a wider societal impact beyond the distress caused to individual members of the targeted group. In cases relating to lynching and ‘khap panchayats’, the Court laid down guidelines on preventive, remedial and punitive measures. While these are to be followed without exceptions, there is also a need for considering new criminal and penal provisions to combat hate speech.
Date:28-04-22
अधिकारियों की नियुक्ति पर टकराव न बने संपादकीय
कुछ दिनों पहले केंद्र-राज्य के बीच एक नया विवाद परवान चढ़ा। इसके पीछे केन्द्रीय गृह-मंत्रालय का एक प्रस्ताव था, जिसके मुताबिक राज्य कैडर के आईपीएस अधिकारियों को आईजी और ऊपर के स्तर पर तब तक केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति पर नहीं लिया जाएगा जब तक वे एसपी और डीआईजी स्तर पर केंद्र में अपनी सेवाएं नहीं देते। राज्यों को लगा कि उनके अधिकारियों की लगाम कसने का केंद्र का यह नया औजार है। इस बीच गृह मंत्रालय बीएसएफ के लिए नियमों में परिवर्तन कर आईपीएस अधिकारियों की कमांडेंट (एसपी) स्तर पर नियुक्ति का रास्ता खोलने की सोच रहा है। अभी तक सात में से पांच केन्द्रीय सशस्त्र पुलिस बलों में (सीआईएसएफ-एसएसबी को छोड़कर) इन पदों पर फोर्स के कैडर की नियुक्ति होती रही है। उधर इन सेवाओं के अधिकारी बेहद चिंतित हैं क्योंकि बीएसएफ के बाद अन्य बलों में भी यह शुरू होगा जिससे उनके प्रमोशन के मौके और भी कम हो जाएंगे। पहले से इन सेवाओं के अधिकारी प्रमोशन बमुश्किल पाते थे। यह सच है कि केन्द्रीय बलों में कमांडेंट स्तर पर आधे पद खाली पड़े हैं और राज्य सरकारें अपने आईपीएस को प्रतिनियुक्ति पर भेजने में कतराती हैं। उधर आईपीएस, आईजी या ऊपर के स्तर पर ही केन्द्रीय प्रतिनियुक्ति में दिलचस्पी दिखाते हैं। लेकिन क्या आईपीएस को हर मर्ज की दवा मानना एक गलत अवधारणा नहीं है? पिछले 70 वर्षों में जिलों के स्तर पर भी तो यही आइईएस-आईपीएस अधिकारी रहे लेकिन गवर्नेंस भ्रष्टाचार का पर्याय बन गया। फिर केन्द्रीय बलों के कार्य की प्रकृति लोक प्रशासन की शर्तों से अलग है जिसका अनुभव आईपीएस अधिकारियों को नहीं होता जबकि बलों का अपना कैडर विशेष कौशल रखता है।
Date:28-04-22
ट्विटर की समस्याएं अब बढ़ेंगी या घटेंगी? आनंद गिरिधरदास, ( अमेरिकी पत्रकार व द न्यूयॉर्क टाइम्स के पूर्व स्तम्भकार )
प्लूटोक्रेसी यानी अमीरों के प्रभाव से चलने वाले तंत्र में इससे बेहतर मिलाप और कौन-सा हो सकता था : गम्भीर समस्याओं से घिरा ट्विटर और उन्हीं समस्याओं के मूर्त रूप एलन मस्क। जरा सोचिए कि तब क्या होता है जब किसी समस्या का जीता-जागता स्वरूप स्वयं ही यह निश्चय करने के अधिकार खरीद लेता है कि वह समस्या क्या है और उसे कैसे सुलझाया जा सकता है?
आखिर ट्विटर की समस्या क्या है- भ्रामक सूचनाएं ही ना। कोविड वैक्सीन, क्लाइमेट चेंज और इस जैसी ही जाने कितनी चीजों के बारे में फर्जी खबरें। स्वयं मस्क ने संदिग्ध दावे करने से कभी परहेज नहीं किया, फिर चाहे वह गुमराह करने वाली वित्तीय सूचनाएं हों या थाईलैंड में फंसे स्कूली बच्चों को बचाने वाले ब्रिटिश डाइवर के लिए अभद्र शब्द का इस्तेमाल। ट्विटर के साथ नस्लवाद की समस्या है। समय-समय पर वह अश्वेत यूजर्स के साथ होने वाले दुर्व्यवहार की शिकायतों का समाधान करने में विफल रहा है। मस्क की कार-निर्माता कम्पनी टेस्ला के साथ भी यही समस्या है। टेस्ला के अनेक कर्मचारियों ने मीडिया से इस बारे में शिकायत की है और उस पर नस्ली भेदभाव का मुकदमा भी दर्ज किया गया है। ट्विटर के साथ बुलीइंग और प्रताड़ना की समस्या है और यह पाया गया है कि वह मनुष्य के सबसे अच्छे स्वरूप के बजाय सबसे बुरे रूप को उभारने में अधिक मदद करता है। मस्क भी इन समस्याओं से अछूते नहीं हैं। आप यह सोच सकते हैं कि जिस व्यक्ति की सम्पत्ति 250 अरब डॉलर से ज्यादा है और जो पृथ्वी और अंतरिक्ष की समस्याएं सुलझाने में व्यस्त है, वह समय-समय पर दूसरों को नीचा दिखाने और उन पर रौब गालिब करने से बाज नहीं आएगा। ऐसे में इसे राम मिलाई जोड़ी ही कहा जा सकता है कि मस्क अब ट्विटर के कर्ता-धर्ता बन गए हैं।
अगर आपने गौर किया हो कि हमारे प्लूटोक्रेटिक समाज में चीजें कैसे काम करती हैं तो यह घटनाक्रम आपको चकित नहीं करेगा। आपको अमूमन ऐसे दृश्य दिखलाई दे जाएंगे, जिनमें आगजनी करने वाले स्वयं को दमकलकर्मी के रूप में प्रस्तुत कर रहे हों। 2020 में अमेरिका में हुए चुनावों से पहले अपने प्लेटफॉर्म से हेट-स्पीच और गुमराह करने वाली सूचनाओं के प्रसार में मेटा यानी फेसबुक के मार्क जकरबर्ग उतने ही जिम्मेदार थे, जितने कि कोई और। बाद में उन्हीं जकरबर्ग ने अपनी पत्नी प्रिसिल चान के साथ 300 मिलियन डॉलर की राशि उन ताकतों से चुनावी-प्रक्रिया की रक्षा करने के लिए दान दी, जिन्हें उन्हीं ने मंच प्रदान किया था। गूगल ने ऑनलाइन एडवर्टाइजिंग में अपनी मार्केट पॉवर का इस्तेमाल करते हुए स्थानीय समाचारों के संकलन के कार्य को छिन्न-भिन्न करने के बाद सपोर्ट लोकल न्यूज कैम्पेन को 15 मिलियन डॉलर देने का वादा किया।
जब आप फ्री स्पीच और बहस की संस्कृति के परिप्रेक्ष्य से सोचते हैं तो मस्क की ट्विटर से हुई डील सिर चकराने वाली लगने लगती है। मस्क स्वयं को फ्री स्पीच के संरक्षक के रूप में प्रस्तुत करते हैं और इस बात के लिए ट्विटर की आलोचना करते आ रहे हैं कि वह सेंसरशिप और दमन की सीमा तक विमर्श को मॉडरेट करता आ रहा है। जबकि वे स्वयं एक ऐसे व्यक्ति का टेस्ला-ऑर्डर रद्द कर चुके हैं, जिसने एक ब्लॉग पर उनकी कम्पनी की आलोचना करने की जुर्रत की थी। उन्होंने उसे ट्रोल भी किया था और यह संदेश देने का प्रयास किया था कि अगर कोई भी उनके हितों की आलोचना करेगा तो उसे इसी तरह से भीड़ के न्याय के हवाले कर दिया जाएगा।
वास्तव में फ्री स्पीच के प्रति मस्क का नजरिया दोषपूर्ण है। उनके मत में ताकतवर और रसूखदार लोगों को बेरोकटोक बोलने की आजादी- जिसे निगेटिव फ्रीडम ऑफ स्पीच कहा गया है- ही सही मायनों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है। इसलिए वे नाजियों, स्त्रीविरोधियों, दबंगों, यहां तक कि पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का भी ट्विटर अकाउंट बहाल करके यह साबित कर सकते हैं कि यही उनकी ट्विटर की परियोजना थी। लेकिन अभिव्यक्ति की सकारात्मक स्वतंत्रता भी होती है। इसके तहत संवाद का वैसा परिवेश निर्मित किया जाता है, जिसमें सभी स्वतंत्र महसूस कर सकें और जो वो सोचते हैं, उसे कहने की उन्हें आजादी मिले। सरकारें एक बड़ी केंद्रीकृत संस्था होती हैं, लेकिन आमजन की आजादी को बाधित करने वाला खतरा केवल उन्हीं से नहीं आता। सेंसरशिप से ज्यादा उपयुक्त मंच नहीं होने के कारण लोग अपनी बात नहीं रख पाते थे। सोशल मीडिया ने इसे बदलने की कोशिश की है। लेकिन जब वह महिलाओं और अश्वेतों के प्रति घृणा और दुर्व्यवहार का अड्डा बन गया तो इंटरनेट की सच्चाई उभरकर सामने आने लगी, यह कि आप यहां पर जो चाहे कह जरूर सकते हैं, लेकिन अगर आपने ऐसा करने की हिमाकत की तो आपकी जिंदगी दर्दनाक बना दी जाएगी।
ट्विटर ने अपने प्लेटफॉर्म को सुधारने के लिए कदम उठाए। उसने समस्या को स्वीकारा। उसने अभिव्यक्ति की सकारात्मक आजादी को पहचाना। उसने ऐसा माहौल बनाने की कोशिश की, जिसमें ध्वंसात्मक विचार नहीं प्रसारित किए जाएं। लगता है इसी से मस्क को समस्या है। प्लूटोक्रेट लोगों ने इकोनॉमी पर तो पहले ही अधिकार जमा लिया था। अब वे आमजन के द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले टूल्स पर भी हावी हो रहे हैं। जो समाज सोशियोपैथ लोगों के हाथों में अपने सामाजिक-संवाद की कुंजी सौंप देता है, वह स्वयं को स्वतंत्रता नहीं उपद्रवों की ओर ले जाता है।
Date:28-04-22
देश की संपर्क-भाषा अंग्रेजी नहीं, हिंदी ही होनी चाहिए डॉ. वेदप्रताप वैदिक, ( भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष )
संसदीय राजभाषा समिति की बैठक में गृहमंत्री अमित शाह ने यह कह दिया कि भारत की संपर्क-भाषा अंग्रेजी नहीं, हिंदी होनी चाहिए। फिर क्या था? बर्र का छत्ता बिखर पड़ा। तमिलनाडु, केरल और विपक्ष के कई अहिंदीभाषी नेता अमित शाह पर बरस पड़े। अमित शाह ने अहिंदीभाषियों पर न तो हिंदी थोपने की बात कही, न ही अन्य भारतीय भाषाओं पर किसी प्रकार का लांछन लगाया था। लेकिन उन्होंने वह बात कह दी, जिसे कहने का साहस भारत के बड़े-बड़े नेता नहीं कर सकते। सब यही रट लगाते हैं कि ‘हिंदी लाओ, हिंदी लाओ’। महर्षि दयानंद, महात्मा गांधी और डाॅ. राममनोहर लोहिया- ये ऐसे तीन महापुरुष हुए हैं, जो कहते थे कि ‘अंग्रेजी हटाओ’। हटाओ का अर्थ मिटाओ बिल्कुल नहीं है। जो लोग अंग्रेजी को मिटाने की बात करते हैं, उन्हें विदेशी भाषाओं के महत्व का कुछ पता ही नहीं है। हमें अंग्रेजी के साथ-साथ पांच-सात ऐसी विदेशी भाषाओं में निपुणता होनी चाहिए, जिनसे हमारा अंतरराष्ट्रीय व्यापार, अंतरराष्ट्रीय कूटनीति और अंतरराष्ट्रीय विषयों का अनुसंधान बढ़ता ही चला जाए। जो भी स्वेच्छा से विदेशी भाषाएं पढ़ना चाहें, जरूर पढ़ें।
लेकिन यह तभी हो सकता है जबकि हम भारतीय लोग अंग्रेजी की गुलामी से मुक्त हो जाएं। सिर्फ एक विदेशी भाषा (अंग्रेजी) की गुलामी के परिणाम किसी भी राष्ट्र की एकता, समृद्धि और शक्ति के लिए बहुत घातक होते हैं। भारत के कानून अंग्रेजी में बनते हैं, अदालतों के फैसले अंग्रेजी में होते हैं, बच्चों की पढ़ाई में अंग्रेजी अनिवार्य है, उच्च शोध अंग्रेजी में होता है, सरकार की नीतियां नौकरशाह अंग्रेजी में बनाते हैं, अंग्रेजी जाने बिना आप सरकार में या बाहर कोई ऊंची या सामान्य नौकरी भी नहीं पा सकते। जो मेरे विदेशी मित्र भारत आते हैं तो वे भारत के घर-द्वार, बाजार और सरकार में अंग्रेजी का दबदबा देखकर दंग रह जाते हैं।
अंग्रेजी की इस गुलामी के कई कारण हैं। दुनिया के लगभग 50 देशों में अंग्रेजों का राज रहा है। ब्रिटिश राष्ट्रकुल के इन देशों में आज भी उनका भद्रलोक अंग्रेजी के जरिए दबदबा बनाए हुए हैं। यदि इन देशों में उनकी अपनी भाषाओं का इस्तेमाल सर्वत्र शुरू हो जाए तो यह भद्रलोक प्रभाहीन हो जाएगा। इस मुट्ठीभर भद्रलोक के लिए अंग्रेजी जादुई शिकंजा है, जो देश के गरीब, ग्रामीण, पिछड़े, वंचित, दलित लोगों को उच्च शिक्षा, सेवा, पद, आय और जीवन से वंचित करके रख देता है। अंग्रेजों के जमाने से जमे इस शिकंजे को तोड़ने का काम किसी सरकार ने नहीं किया है।
जो लोग भारत में अंग्रेजी के दबदबे को चलते रहने देना चाहते हैं, उनका एक तर्क यह भी है कि अंग्रेजी विश्वभाषा है। अंग्रेजी को हटाकर क्या हम भारत को सारी दुनिया से काट देना चाहते हैं? नहीं, बिल्कुल नहीं। यदि अंग्रेजी एक मात्र विश्वभाषा है, तो संयुक्त राष्ट्र में आधिकारिक भाषाओं की संख्या 6 क्यों है? सच्चाई तो यह है कि अंग्रेजी दुनिया के सिर्फ साढ़े चार देशों की भाषा है। अमेरिका, ब्रिटेन, आस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड और तीन-चौथाई कनाडा! अमेरिका, ब्रिटेन और कनाडा में भी आपको ऐसे लाखों लोग मिल जाएंगे, जिनकी भाषा अंग्रेजी नहीं। दुनिया में सबसे अधिक बोली और समझे जाने वाली यदि कोई भाषा है तो वह हिंदी है। चीनी सिर्फ चीन में बोली जाती है जबकि हिंदी दक्षिण एशिया के आठ देशों के अलावा दुनिया के लगभग आधा दर्जन देशों में बोली जाती है। हिंदी के मुकाबले अंग्रेजी का व्याकरण और शब्दकोश भी बहुत कमजोर है। हिंदी संस्कृत की पुत्री है। संस्कृत की एक धातु से हजारों शब्द गढ़े जा सकते हैं। तीन हजार से ज्यादा तो धातुएं ही हैं। इसके अलावा दर्जनों भाषाओं और सैकड़ों बोलियों के शब्दों से मिलकर हिंदी का कोष अंग्रेजी से कई गुना बड़ा है। लेकिन हिंदी को अहिंदीभाषियों पर थोपना भी गलत है। यदि अमित शाह यह भी कह देते कि सभी हिंदीभाषी अन्य भारतीय भाषाएं भी सीखें और उनके प्रति आदर-भाव रखें तो विरोधियों की हवा खिसक जाती।
Date:28-04-22
न्याय एवं सुरक्षा के नए युग का आरंभ डा. तुलसी भारद्वाज, ( लेखिका सीएसआइआरओ, आस्ट्रेलिया से एंडेवर पोस्ट-डाक फेलो हैं )
आपराधिक प्रक्रिया (पहचान) अधिनियम, 2022 ने देश में लागू सौ वर्ष से भी अधिक पुराने बंदी शिनाख्त अधिनियम, 1920 का स्थान ले लिया है। इसका मुख्य उद्देश्य विकसित देशों की तर्ज पर देश की पुलिस को आधुनिकतम तकनीक से लैस करते हुए आपराधिक मामलों में वैज्ञानिक सुबूतों का दायरा बढ़ाते हुए न्यायिक जांच को दक्ष बनाना है, ताकि भारत में दोष सिद्धि की दर में वृद्धि की जा सके। अब पुलिस अपराधियों के निजी, भौतिक एवं जैविक डाटा को सुबूतों के तौर पर एकत्र कर सकती है। जैविक डाटा में अपराधियों के बायोमीट्रिक रिकार्ड जैसे रेटिना एवं आंखों की पुतली के स्कैन, रक्त के नमूने आदि शामिल हैं, वहीं भौतिक डाटा के रूप में लोगों के मानवीय व्यवहार से संबंधित नमूने जैसे हस्ताक्षर और लेखनी आदि का रिकार्ड भी एकत्र किया जा सकता है, जिससे समय आने पर इस रिकार्ड के माध्यम से अपराधी तक आसानी से पहुंचा जा सके। इस अधिनियम में सुबूतों के साथ-साथ अभियुक्तों का दायरा भी बढ़ाया गया है।
जहां पहले कठोर कारावास वाले अपराधियों का ही रिकार्ड लिया जा सकता था, वहीं अब किसी भी अपराध के लिए गिरफ्तार किए गए व्यक्ति का रिकार्ड लेने का प्रविधान किया गया है। प्रमाण एकत्र न करने देने या प्रतिरोध की स्थिति को सरकारी कर्मचारी को ड्यूटी से रोकने की दशा मानते हुए भारतीय दंड संहिता की धारा 1860 के तहत एक अपराध माना जाएगा। हालांकि राजनीतिक अपराधियों पर यह प्रभावी नहीं होगा, परंतु आपराधिक मामले में पकड़े जाने पर उन्हें भी सामान्य नागरिक की तरह ही माना जाएगा। ब्रेन-मैपिंग और पालीग्राफ टेस्ट को इस कानून के दायरे से बाहर रखा गया है। थाने के प्रभारी, हेड कांस्टेबल, जेल के हेड वार्डन को भी डाटा एकत्र करने का अधिकार होगा।
पुलिस के साथ-साथ मेट्रोपालिटन मजिस्ट्रेट भी इन अधिकारों से लैस रहेंगे, ताकि न्यायिक प्रक्रिया के दौरान किसी भी संदिग्ध व्यक्ति पर इस अधिकार का प्रयोग किया जा सके। यद्यपि दोषमुक्त होने की स्थिति में उसके रिकार्ड को हटा दिया जाएगा। ध्यान रहे अभी तक आपराधिक सुबूतों में केवल हाथ-पैर की अंगुलियों के निशान ही एकत्र किए जा सकते थे, जिसके कारण अपराधियों को सजा दिलाने के मामले में भारत काफी पीछे है। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) अपराधियों से सुबूत के तौर पर एकत्र किए गए डाटा का संग्रहण करेगा और समय आने पर उसे सुरक्षा एजेंसियों के साथ सुबूतों के मिलान करने की दृष्टि से साझा करेगा। यह संग्रहित रिकार्ड विशेष सुरक्षा के अंतर्गत 75 वर्ष तक सुरक्षित रखे जाएंगे, जिसमें थर्ड पार्टी का हस्तक्षेप नहीं होगा। इस प्रकार पूर्व संग्रहित आपराधिक रिकार्ड की मदद से अपराधी तक पहुंचने की संभावनाएं काफी बढ़ जाएंगी। इससे अपराधियों पर थर्ड डिग्री के प्रयोग की आवश्यकता के अवसर भी कम होते चले जाएंगे। फलस्वरूप पुलिस पर अमूमन लगने वाले मानवाधिकारों हनन के आरोपों में भी कमी आएगी।
ब्रिटेन, कनाडा, अमेरिका, दक्षिण अफ्रीका और आस्ट्रेलिया आदि देशों में पहले से ही इस प्रकार के आपराधिक पहचान कानून प्रभावी हैं, जिसके कारण वहां दोष सिद्धि की दर बहुत ऊंची है। आस्ट्रेलिया की बात करें तो हत्या के मामले में केवल तीन प्रतिशत अपराधी ही कानून के शिकंजे से बच पाते हैं, जबकि एनसीआरबी के 2020 के आंकड़ों के अनुसार भारत में इस जघन्य अपराध में बच निकलने वालों का प्रतिशत 66 के आसपास है। स्पष्ट है कि यह चिंताजनक स्थिति है। अपने देश में अन्य आपराधिक मामलों में दोष सिद्धि दर के आंकड़े और भी गंभीर हैं। जैसे कि दुष्कर्म के मामलों में यह केवल 39 प्रतिशत, हत्या के प्रयास में 24 प्रतिशत, चोरी के मामलों में केवल 38 प्रतिशत है, जो कहीं न कहीं सूचना एवं तकनीक के इस युग में न्याय व्यवस्था पर प्रश्न चिन्ह लगाने के साथ-साथ समाज में आपराधिक प्रवृत्ति को बढ़ावा देने वाला है।
भारत जैसे विशाल एवं जटिल सामाजिक संरचना वाले देश में अपराध नियंत्रण की चुनौती को स्वीकार करते हुए 2014 में प्रधानमंत्री मोदी ने स्मार्ट पुलिसिंग की अवधारणा दी थी। इसके तहत न्यायिक एवं प्रशासनिक तंत्र से संबंधित सुधार के अलावा कई सुधारवादी बिल अभी पाइपलाइन में हैं। जैसे अपराधियों से निपटने के लिए नेक्स्ट जेन पुलिसिंग बिल, भारतीय दंड संहिता एवं आपराधिक प्रक्रिया संहिता संशोधन एवं सुधार बिल, आदर्श कारागार नियमावली आदि। इसके साथ-साथ केंद्रीय फोरेंसिक लैब विश्वविद्यालय की स्थापना भी अहम है। इसमें दो राय नहीं कि इनकी मदद से अपराधियों की गर्दन तक पहुंचना आसान हो जाएगा और पुलिस एवं न्यायिक तंत्र का बोझ भी काफी हद तक कम हो सकेगा।
आपराधिक प्रक्रिया (पहचान) अधिनियम से निजता और मौलिक अधिकारों के हनन और साथ ही डाटा के दुरुपयोग होने की आशंकाएं भी जताई जा रही हैं। ऐसी आशंका निराधार है। देखा जाए तो मानव अधिकारों का डंका पीटने वाले देश पहले से ही इस प्रकार के कानून को अपनाकर न्याय एवं प्रशासन के क्षेत्र में नए कीर्तिमान स्थापित कर चुके हैं। आज जबकि भारत का कोई भी क्षेत्र आधुनिकतम तकनीक से वंचित नहीं रह गया है तो क्या यह विडंबना नहीं है कि मानव अधिकारों और निजता के हनन के नाम पर स्वयं पुलिस के हाथ बांध दिए जाएं। कुल मिलाकर इस नए अधिनियम के प्रभावी होने पर आपराधिक मामलों में सतत गिरावट दर्ज होने की उम्मीद है, लेकिन यह इसके प्रभावी क्रियान्वयन पर निर्भर करेगी। इसके अभाव में अन्याय के शिकार व्यक्ति को न्याय दिलाना वर्तमान परिवेश जैसा ही कठिन बना रह जाएगा।
Date:28-04-22
भारतीय प्रशासनिक सेवा नहीं भारतीय अधिकार सेवा कहें टीसीए श्रीनिवास-राघवन
राज्य सभा की एक स्थायी समिति चाहती है कि सरकार ज्यादा आईएएस अधिकारियों की भर्ती करे। यह सिफारिश इसकी 112वीं रिपोर्ट के पैराग्राफ 3.6 में की गई है। इस पैराग्राफ में जो कहा गया है, उसे मैं पूरी तरह उद्धृत कर रहा हूं। ‘3.6 समिति ने पाया है कि देश में 1,500 से अधिक आईएएस अधिकारियों की भारी-भरकम कमी है। आईएएस अधिकारियों के स्वीकृत पदों और वास्तविक संख्या के बीच अंतर उत्तर प्रदेश कैडर में 104, बिहार कैडर में 94 और एजीएमयूटी कैडर में 87 तक है। समिति का मानना है कि शायद अफसरों की कमी के कारण राज्यों को गैर-कैडर अधिकारियों को कैडर पदों पर नियुक्त करने, उन्हें इन पदों पर स्वीकृत समयसीमा से ज्यादा अवधि तक बनाए रखने और सेवारत अधिकारियों को बहुत से प्रभार देने जैसे अनेक तरीकों का सहारा लेना पड़ रहा है। समिति का मानना है कि ऐसे उपायों से प्रशासन की कार्यकुशलता कमजोर होगी। इसलिए समिति डीओपीटी (कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग) से सिफारिश करती है कि भारतीय प्रशासन की बदलती जरूरतों को मद्देनजर रखते हुए आईएएस अधिकारियों की सालाना भर्ती में अहम बढ़ोतरी की जाए।’
इस पैराग्राफ का कारण यह है कि गैर-आईएएस अधिकारियों को कैडर पदों पर नियुक्त किया जा रहा है, जो 1954 के आईएएस कैडर नियमों का उल्लंघन है। ये नियम प्रशासनिक हैं जो जाति आधारित आरक्षण के समान हैं। यही वजह है कि आईएएस को सबसे अच्छी नौकरी मिलती है, जबकि इसके ज्यादातर सदस्य शायद नियोजन के योग्य ही नहीं हैं। फिर भी व्यवस्था ने खुद को कायम रखा है क्योंकि सभी सुधारों में से प्रशासनिक सुधार सबसे ज्यादा कठिन हैं। यही वजह है कि बहुत से आईएएस अधिकारी खुद की सेवा के बजाय हर चीज में सुधार लाना चाहते हैं।
जो राजनेता सुधार की कोशिश करते हैं, वे अगला चुनाव हार जाते हैं। ऐसा पिछले 30 साल में तीन बार हो चुका है। यह सभी राजनीतिक दलों को चेतावनी के लिए पर्याप्त है। ऐसा पहली बार उस समय हुआ, जब हिमाचल प्रदेश में शांता कुमार ने राज्य सरकार के कर्मचारियों पर नकेल कसने की कोशिश की तो वह राज्य में चुनाव हार गए। दूसरी बार तब, जब जयललिता ने तमिलनाडु में यही चीज करने की कोशिश की। उन्होंने करीब एक लाख हड़ताली सरकारी कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया था। तीसरी बार उस समय जब चंद्रबाबू ने उन पर सख्ती की। वह केवल इतना चाहते थे कि वे सुबह 9.30 बजे कार्यालय पहुंचें और शाम 5.30 बजे निकलें। वह अगले चुनाव में सत्ता से बाहर हो गए।
इस वजह से राजनेताओं ने फैसला किया है कि सबसे अच्छा यह है कि सरकारी कर्मचारियों को उनके हाल पर ही छोड़ दिया जाए और इसे कोई भी सेवा आईएएस से बेहतर नहीं जानती है। वे इसका पूरा फायदा उठाते हैं।
जो भी हो, लेकिन वह कौनसी चीज है जिसका स्थायी समिति ने इशारा किया है? मैंने कुछ दोस्तों से पूछा और उन्होंने कहा कि ये वे पद थे, जो आईएएस के लिए कानून के द्वारा नहीं बल्कि परंपरा के द्वारा आरक्षित थे। इस तरह नाम से कोई पद केवल आईएएस के लिए आरक्षित घोषित किया जाता है। उदाहरण के लिए जिलाधिकारी, आयुक्त, हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ दान आदि।
कुछ पदों का नाम दिया जाता है, लेकिन एक निश्चित स्तर पर बहुत से पद ‘संवर्गित’ या आरक्षित घोषित किए जाते हैं। इससे सरकार किसी कर्मचारी को उस विभाग में नियुक्त कर सकती है, जिसे वह अधिकारी के लिए उपयुक्त समझती है। इसमें वेतन ‘उचित’ स्तर पर होता है। इस हक को ही अगले स्तर पर ले जाया गया है।
लेकिन इस तरह के अधिकार की सीमा आरक्षण तक ही नहीं है। अब इसका दायरा उससे भी काफी ज्यादा है। इसलिए ऐसी चीज है, जिसे ‘गैर-कार्यात्मक बढ़ोतरी’ (एनएफयू) कहा जाता है। जब आप यह पढ़ेंगे कि यह क्या है तो आपका खून खौल उठेगा। इससे पता चलता है कि आईएएस व्यवस्था को कैसे अपने हिसाब से तोड़ता-मरोड़ता है। राजनेता इसे जानते हैं, लेकिन ‘मेरे बाप का क्या जाता है’ के भारतीय सिद्धांत के दूसरे तरीके से देखते हैं। आखिर में यह करदाताओं का पैसा होता है। एनएफयू छठे वेतन आयोग की सिफारिशों के बाद जनवरी 2006 में अस्तित्व में आया। यह अधिकारियों को पदोन्नति नहींं मिलने से होने वाले वित्तीय घाटे की भरपाई के लिए लेकर आया गया। इस तरह एनएफयू के तहत आपको ज्यादा पैसा मिलता है, भले ही आप अगले उच्चपद पर चुने जाने के लिए काबिल नहीं हो। इसलिए अकुशल को भी वही मिलता है जो सबसे अच्छे अधिकारियों को मिलता है क्योंकि अब ग्रुप-ए के सभी सिविल अधिकारियों को काफी उच्च ग्रेड का वेतन एवं पेंशन मिलती है।
अन्य किसी देश में ऐसा नहीं है। 1952 बैच के एक अधिकारी ने मुझे 2007 में बताया था कि ‘गधा भी घोड़ा बन जाएगा।’ यह उसके ठीक विपरीत था, जो मुझे 1964 बैच के व्यक्ति ने 2004 में बताया था। उन्होंने कहा, ‘हमारी सरकार दौड़ के घोड़े लेती है और उन्हें खच्चर बना देती है।’
असल में यह वह चीज है, जो आईएएस में बदलाव हुआ है। इसी वजह से इसे फिर से डिजाइन किए जाने की जरूरत है। अखिल भारतीय सेवा के तर्क के पीछे छिपना पर्याप्त नहीं है। अगर इस अवधारणा की जरूरत पड़ती है तो भी इस पर दोबारा विचार किए जाने की जरूरत है। आईएएस को पहले आईसीएस कहा जाता था, जिसे ब्रिटिश ने दमन के लिए बनाया गया था और इसके लिए भुगतान भी ‘निवासी’ करते थे। यह ठीक पहले जैसी ही बनी हुई है क्योंकि इसके कुछ सदस्यों के दुखड़ा रोने के बावजूद कौन इस विलासिता की जिंदगी को छोड़ना चाहेगा जो उन्होंने 24 साल की आयु में केवल एक परीक्षा पास करने के बाद हासिल की थी?
अगर नरेंद्र मोदी आईएएस और अखिल भारतीय सेवा की अवधारणा को फिर से डिजाइन कर सकते हैं तो यह उनकी वास्तविक विरासत होगी।
Date:28-04-22
भारत की अपनी बात संपादकीय
भारतीय विदेश मंत्री एस जयशंकर की दृढ़ता सबका ध्यान खींचने लगी है। भारत इन दिनों जिस भाषा या भाव में बात कर रहा है, उसे वास्तव में ऐसा ही करना चाहिए। एक स्थिर लोकतंत्र, विशाल आबादी और खुले बाजार वाले भारत को जो लाभ मिलने चाहिए, वे अभी तक नहीं मिले हैं। विदेश मंत्री की दृढ़ता न केवल लाभ दिला सकती है, बल्कि भारत की रक्षा पंक्ति को भी मजबूत कर सकती है। दरअसल, भारत की विदेश नीति वही है, जो पहले थी, लेकिन अब परिस्थितियां बदल गई हैं और पश्चिम के देश कमजोर जमीन पर खड़े हैं। कुछ देशों का पक्षपात भारत ही नहीं, पूरी दुनिया झेलती आ रही थी, लेकिन अब ऐसे पक्षपाती देशों की नीतियां औंधे मुंह ढहने लगी हैं। ऐसे पक्षपाती देशों की नसीहत पहले हम सुन लेते थे, लेकिन अब कोई जरूरत नहीं है कि उनके कुतर्कों को सुना जाए या ऐसी नसीहतों को सुना जाए, जिस पर स्वयं पश्चिम के देश नहीं चल रहे हैं। विदेश मंत्री ने उचित ही कहा है कि भारत अपनी शर्तों पर दुनिया से रिश्ते निभाएगा और इसमें उसे किसी की सलाह की जरूरत नहीं है।
रायसीना डायलॉग में उन्होंने बहुत गहरी बात कही है कि वे कौन हैं समझकर दुनिया को खुश रखने की जगह, हमें इस आधार पर दुनिया से रिश्ते बनाने चाहिए कि हम कौन हैं! दुनिया हमारे बारे में बताए और हम दुनिया से मंजूरी लें, वह दौर खत्म हो चुका है। लगे हाथ उन्होंने यह भी कह दिया कि अगले 25 वर्षों में भारत वैश्वीकरण का केंद्र होगा। यह संकल्प वाजिब है, लेकिन इसे साकार करने के लिए बुनियादी रूप से हमें मजबूत होना पडे़गा। अर्थव्यवस्था की ज्यादा चिंता करना जरूरी है। जब हमारे यहां पर्याप्त निवेश होगा, भरपूर रोजगार होगा, तो अपने आप हमारे सकल घरेलू उत्पाद में बढ़ोतरी होगी। वैसे ऐसे सपने अनेक नेताओं ने पहले भी भारतवासियों को दिखाए हैं, लेकिन वास्तव में भारत अपने यहां आतंकवाद, अशिक्षा और गरीबी जैसी समस्या का मुकम्मल समाधान नहीं कर पा रहा है। दुनिया में भारत को एक सशक्त देश के रूप में देखा जाए, इसके लिए आत्मनिर्भरता भी बहुत जरूरी है। आत्मनिर्भरता ही हमें वैश्वीकरण के केंद्र में लाएगी। अत: विदेश मंत्री की सोच की दिशा बिल्कुल सही है, वह व्यापकता में सोच रहे हैं कि किस चीज में हम विफल रहे हैं? अपनी विफलताओं का वाजिब अध्ययन ही हमें विकास की ओर तेजी से ले जाएगा।
इन दिनों यूरोपीय देश आए दिन भारत को सलाह दे रहे हैं कि वह रूस के साथ और व्यापार न करे। नए भारत के विदेश मंत्री अब बार-बार यह इशारा कर रहे हैं कि भारत को किसी से सलाह लेने की जरूरत नहीं है। उन्होंने चीन का नाम लिए बगैर बिल्कुल सही सवाल उठाया है कि यूरोप उस वक्त असंवेदनशील क्यों हो गया था, जब एक देश एशिया को धमका रहा था? वास्तव में, यह यूरोप के लिए जागने का समय है कि वह एशिया की ओर देखे। एशिया में भी अस्थिर सीमाएं और आतंकवाद जैसी समस्याएं खतरा बनी हुई हैं। पश्चिमी देश एशियाई देशों को केवल सलाह देकर काम चलाते आए हैं। जो देश सैन्य ताकत पर भरोसा करते हैं, वे भी भारत या एशिया के देशों को परस्पर वार्ता से विवाद सुलझाने की नसीहत देते हैं, जबकि परोक्ष रूप से विवादों की ओर से आंख मूंदकर सबके लिए समस्याएं बढ़ाते हैं। अब बदले हुए हालात में पश्चिमी देशों को भारत की जायज चिंताओं पर गौर करना ही होगा और इसकी शुरुआत शायद हो चुकी है।
Date:28-04-22
समान नागरिक संहिता की असमान राह आनंद कुमार, ( समाजशास्त्री )
भारत में राष्ट्र निर्माण और राष्ट्रीय एकता के लिए समान नागरिक संहिता की जरूरत बताई जाती है। मगर किसी भी समाज के रीति-रिवाजों को बदलने के लिए सत्ता-प्रतिष्ठान की अपनी साख मजबूत होनी चाहिए, क्योंकि विवाह की व्यवस्था समाज की जिम्मेदारी रही है और इसमें सत्ता-प्रतिष्ठान का दखल संदेह पैदा करता है। भारत भी अपवाद नहीं है। भारतीय संविधान में अनुच्छेद 25 से 28 तक जो धार्मिक स्वतंत्रता का आश्वासन मिला हुआ है, वह अनुच्छेद 45 में निर्देशित समान नागारिक कानून व्यवस्था के निर्माण की जिम्मेदारी से टकराता है। यहां हमें यह भी याद रखना चाहिए कि 1954 में जब हिंदू सामाजिक कानूनों में सुधार के लिए जवाहरलाल नेहरू के समर्थन से कानून मंत्री बाबा साहब आंबेडकर ने प्रस्ताव रखा, तो कट्टरपंथी हिंदुओं जैसा असंतोष खुद कांग्रेस में फैल गया। फिर, 1956 में इस प्रयास को चार टुकड़ों में बांटकर पेश किया गया और हिंदू विवाह व संपत्ति में हिस्सेदारी आदि सवालों का कुछ समाधान निकल सका। देखा जाए, तो इस तरह के बदलावों के लिए विदेशी शासन ज्यादा सक्षम रहे हैं। इसीलिए, 1856 में विधवा विवाह की अनुमति मिल सकी और 1928 में हिंदू स्त्रियों को पति की संपत्ति में हिस्सेदारी संबंधी कानून बन सके। ब्रिटिश शासन के दौरान ही 1937 में शरिया कानून लागू किया गया।
हमें यह भी मालूम होना चाहिए कि भारत का गोवा ऐसा प्रदेश है, जहां समान नागरिक संहिता पुर्तगाली राज के समय से ही लागू है। गोवा भारत के अन्य राज्यों की तरह बहुधर्मी है, लेकिन वहां के हिंदुओं, मुसलमानों, ईसाइयों, सिखों आदि में समान नागरिक संहिता को लेकर कोई विवाद नहीं है। तो क्या पूरे भारत को गोवा के रास्ते पर चलकर समान नागरिक संहिता लागू कर देनी चाहिए? इसके बरक्स यह याद दिलाया जाता है कि भारत में 1954 से ही विशेष विवाह कानून (स्पेशल मैरिज ऐक्ट) उपलब्ध है, जिसके तहत बिना धार्मिक परंपराओं और बंधनों के दो वयस्क स्त्री-पुरुष विवाह कर सकते हैं। और ऐसे विवाहों को सरकार की मान्यता भी हासिल है।
असल में, मुसलमानों के विवाह कानूनों को लेकर हमारे देश में 1937 से ही विवाद रहे हैं। पुरुष प्रधान व्यवस्था को इसका दोषी माना गया है। पति द्वारा तत्काल तलाक देने की व्यवस्था के कारण पत्नी पूरी जिंदगी आतंक और अनिश्चय में जीने को विवश होती है। तलाक नहीं देने पर भी पति एक पत्नी के रहते हुए और शादियों का धर्मसम्मत अधिकार रखता है। तलाकशुदा स्त्री को गुजारा भत्ता देना एक मानवीय जिम्मेदारी कही जा सकती है, लेकिन शरिया कानून में इसे स्पष्ट शब्दों में मना किया गया है।
इस पुरुष प्रधान विवाह व्यवस्था पर विशेष ध्यान आजादी के बाद सन 1985 में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा शाह बानो नाम की 72 वर्षीय महिला की फरियाद पर दिए गए फैसले के बाद गया। शाह बानो को उनके वकील पति ने विवाह के पांच दशक बाद बिना गुजारा भत्ता के संबंध तोड़ने का फरमान सुना दिया था। शाह बानो को अदालत से राहत तो मिली, लेकिन तब की प्रगतिशील आवाजें हकलाने लगीं, क्योंकि कट्टरपंथी तबके इस फैसले को इस्लाम के वजूद पर खतरा बताने लगे थे। तत्कालीन राजीव गांधी सरकार में इतना आत्मबल नहीं था कि वह सर्वोच्च न्यायालय के साथ खड़ी रह सके। तब से समान नागरिक संहिता का मुद्दा मुस्लिम विवाह व्यवस्था में स्त्री हितों की रक्षा का पर्याय बन गया है।
समाज के वयस्क सदस्यों के बीच यौन संबंध और परिवार-व्यवस्था के लिए विवाह नामक संस्था की बड़ी भूमिका है। इसीलिए यह व्यवस्था देश, काल और पात्रों के अनुसार विविधातपूर्ण है। भारतीय समाज अलग-अलग जातियों, धर्मों, क्षेत्रों और वर्गों में बंटा हुआ है, और इन विविधताओं से जुड़ी विशिष्टताएं विवाह की संस्था और इससे जुड़े रस्म-ओ-रिवाज में स्पष्ट दिखती हैं। विवाह की संस्था पुरुष प्रधानता और स्त्री प्रधानता के बीच बनती-बदलती आई है। अंग्रेजी राज के दौरान इसका एक ढांचे में बने रहने से यही संदेश गया था कि यह आदिवासियों और विभिन्न जातियों के विवाह नियमों की उपेक्षा करके ब्राह्मण उन्मुख व्यवस्था की स्थापना है। अभी भी हिंदू विवाह व्यवस्था में क्षेत्र और जाति के अनुसार विविधताएं बनी हुई हैं। यह भी याद रखना चाहिए कि जब बाल विवाह व सती प्रथा जैसी भयानक परंपराओं को खत्म करने का प्रयास किया गया, तब सहमति से ज्यादा विरोध के स्वर गूंजे थे। लोकमान्य तिलक जैसे नायकों की नजर में भी विदेशी राज को भारतीय समाज में सुधार का कोई अधिकार नहीं था। इस इतिहास को याद रखते हुए ही हमें मुस्लिम समाज में मौजूद विवाह नामक व्यवस्था के बारे में सोचना चाहिए।
दिक्कत यह है कि मौजूदा भाजपा सरकार की धर्म संबंधी छवि जगजाहिर है। इसके कारण समान नागरिक संहिता को शायद ही समाज की जरूरत से जोड़कर देखा जाता है। ऐसे में, यह सोचना होगा कि क्या अपनी खराब साख के बावजूद सरकार को मुसलमानों को निशाने पर रखते हुए समान नागरिक संहिता के लिए संसद को एक मंच बनाना चाहिए? धर्म की रक्षा के नाम पर ज्यादातर लोग प्राय: भावनाओं में बह जाते हैं। इसलिए एक तरफ, गांवों और कस्बों के नुक्कड़ पर ‘इस्लाम खतरे में है’ के नारे के साथ लोगों के जुटने, तो दूसरी तरफ ‘एक देश, एक कानून’ का विरोध करने वालों को पाकिस्तान भेजने की सलाह देने वाले हुड़दंगियों के भड़कने की आशंका होगी। वैसे यह तो साफ हो चुका है कि शिक्षा और वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विस्तार से मुस्लिम स्त्री-पुरुष भी देर-सवेर विवाह संबंधी कानूनों की अनिवार्यता स्वीकार लेंगे। इसीलिए इस सवाल पर सत्ता की तरफ से शक्ति प्रदर्शन करना राष्ट्र-निर्माण के लिए सही रास्ता नहीं होगा।
समान नागरिक संहिता के दबाव को आदिवासी भारत भी स्वीकार नहीं करेगा। 10 करोड़ से ज्यादा आदिवासी भारतीय स्त्री-पुरुष हिंदू, मुस्लिम, ईसाई आदि विवाह कानूनों से परे स्थानीय विधि और रीति-रिवाजों के साथ परिवार व्यवस्था स्वीकारते हैं। विवाह संबंधी इनके विवादों को स्थानीय आदिवासी जमात सुलझाती है। लिहाजा, समान नागरिक संहिता को लागू करने के आवेश में केंद्र सरकार अनायास आदिवासियों के साथ भी एक मोर्चा खोल लेगी।
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रूस-यूक्रेन युद्ध को चलते एक लंबा समय हो चला है। इस पूरे प्रकरण में महाशक्तियों के कुछ गुट बने रहे, और कुछ देशों ने तटस्थता की नीति अपनाए रखी है। इनमें से भारत भी एक है। लेकिन ऐसा क्या कारण है कि अन्य तटस्थ देशों की तुलना में भारत के रवैये और उसकी भूमिका को लेकर लगातार सवाल उठाए जा रहे हैं, और उस पर दबाव भी डाले जा रहे हैं।
भारत पर किस प्रकार के दबाव हैं –
अभी तक भारत ने संयुक्त राष्ट्र में रूस के आक्रमण के लिए महत्वपूर्ण सभी प्रस्तावों से परहेज किया है। अब उसे रूस के विपक्ष में वोट देने को कहा जा रहा है।
रूस से कम कीमत पर तेल खरीदने के भारत के निर्णय को लेकर दबाव है।
भारत, रूबल में रूस को भुगतान न करे, अन्यथा उस पर अन्य देशों द्वारा लगाए गए प्रतिबंधों का असर कम हो जाएगा।
ये दबाव क्यों बनाए जा रहें हैं ?
राजनीतिक दृष्टि से कहें, तो पश्चिमी देशों ने इस हमले को ‘स्वतंत्र दुनिया’ पर एक हमला बताया है। भारत जैसा लोकतंत्र अगर इस दृष्टिकोण पर अगर चुप बैठता है, तो यह उक्त दृष्टिकोण को कमजोर करने वाला कदम होगा।
आर्थिक दृष्टिकोण से रूस पर पश्चिमी देशों ने बड़े पैमाने पर प्रतिबंध लगाए थे। एशिया में केवल जापान, द. कोरिया और सिंगापुर ने इनका समर्थन किया है। चीन ने इसका विरोध करके रूस से व्यापार जारी रखने की बात कही है। अगर भारत भी रूस से व्यापार जारी रखता है, तो प्रतिबंधों का प्रभाव कम रहेगा।
रणनीतिक रूप से शीत युद्ध की समाप्ति के बाद से यह सबसे बड़ा वैश्विक संकट है। पिछले 30 वर्षों में भारत ने अमेरिका और अन्य पश्चिमी देशों के साथ अपनी रणनीतिक साझेदारी में सुधार किया है। साथ ही रूस से भी संबंध अच्छे रखे हैं। हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भी अमेरिका भारत को चीन के विरोध में एक सहयोगी राष्ट्र मानता है। वह चीन के विरूद्ध भारत को सहयोग भी देने को तैयार है। ऐसे में, सभी पश्चिमी देशों को उम्मीद है कि भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता छोड़कर पश्चिमी देशों का साथ दे।
भारत का दृष्टिकोण –
तेजी से बदलते वैश्विक परिदृश्य में तीन महाशक्तियां हैं, जिनमें से अमेरिका और रूस भारत के सहयोगी है, जबकि चीन प्रतिस्पर्धी है। सवाल यह है कि यूरोपीय देशों में चल रहे विवाद में, भारत किसी एक के साथ खड़ा होकर अपने प्रतिस्पर्धी को सशक्त होने का मौका क्यों दे। अतः भारत के लिए तटस्थता ही सर्वश्रेष्ठ विकल्प रह जाता है।
दूसरे, हर एक देश राष्ट्रीय हितों को देखते हुए अपनी विदेश नीति तय करता है, न कि नैतिक प्रतिबद्धता को देखते हुए। जहाँ अमेरिकी हित रूस की कमजोरी में है, वहीं भारत का हित रूस की मजबूती में है। भारत को न केवल रक्षा और ऊर्जा क्षेत्र में रूस का सहयोग चाहिए, बल्कि भू-राजनीतिक दृष्टिकोण से भी चाहिए। रूस, ईरान और अन्य मध्य एशियाई देशों के साथ सहयोग व सामंजस्य बनाए रखना भारत के लिए बहुत जरूरी है।
जी-20 को लेकर भारत पर दबाव –
सन् 1999 के आर्थिक संकट के बाद अंतरराष्ट्रीय वित्तीय स्थिरता की खातिर जी-20 का गठन किया गया है। इसकी आगामी बैठक भारत में इसी वर्ष होने वाली है। पश्चिमी देश चाहते हैं कि रूस को इस समूह से बाहर निकाल दिया जाए, परंतु चीन ने इसका विरोध किया है।
निष्कर्ष –
बहरहाल, भारत किसी शक्ति का पिट्ठू नहीं है। वह किसी गठबंधन का भी सदस्य नहीं है। किसी भी अन्य देश की तरह, भारत भी व्यावहारिक यथार्थवाद और अपने मूल राष्ट्रीय हितों के आधार पर नीतियां बनाने का अधिकार रखता है। भारत का सोचना यही है कि रणनीतिक स्वायत्तता में स्थिर एक तटस्थ स्थिति, जो दोनों पक्षों के साथ चैनलों को खुला रख सके, उसके हितों की पूर्ति करती है।
समाचार पत्रों पर आधारित।
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Date:27-04-22
Cities Will Drive Growth, But Only If We Build Right Follow master plans, develop transit networks, grow vertically, conserve water, recruit urban managers Amitabh Kant, [ The writer is CEO, Niti Aayog ]
Urbanisation will be the single biggest agent of growth in the next few decades in India. In fact, India is already the second-largest urban system in the world with 11% of the total global urban population living in Indian cities. This is more than the urban population of the US, Germany, Japan and UK. The UN estimates that around 416 million people will be added as urban dwellers in India between 2018 and 2050, and the country will be more than 50% urban by 2050. Hitherto, India has been a reluctant urbaniser. However, this year’s Budget takes cognisance of urbanisation and has propounded not one but multiple actions to steer a paradigm shift.
Blueprint for sustainable urbanisation
● First, master plans are critical for managing urbanisation. The urban system of India consists of 7,933 settlements, comprising statutory towns and census towns. Our statutory towns are governed through 4,041 municipal corporations or municipalities. We have 3,892 census towns which are classified as urban in the census as they meet the criteria of minimum population of 5,000, at least 75% of the ‘male’ main workers engaged in nonagricultural activities, and a density of population of at least 400 persons per sq km. However, they continue to be governed as villages and do not have urban local bodies. Plus, it’s estimated that in addition to the 3,892 census towns identified by Census 2011, another 2,231 census towns have come up by 2021. These census towns account for almost 72 million ‘urban’ population and remain under the ambit of ‘uncatered’ or ‘ignored’ urbanisation.
Almost half of our statutory towns are expanding in an unplanned, unscientific manner without any master plan to guide their growth. None of the census towns has a master plan. This is leading to haphazard growth with piecemeal interventions leading to urban sprawl. The first and foremost challenge is to prepare scientific master plans for all statutory towns and govern census towns as urban local bodies and prepare their master plans to guide their spatial growth.
● Second, Indian cities must grow and evolve on the back of Transit Oriented Development. Planned development along the mode of a rapid transit network has multifold benefits. It reduces the number of cars, it increases walkability and bikeability, it brings people and offices closer to each other through compact and vertical development. All of this leads to agglomeration and enhanced productivity. Therefore, urban planning in Indian cities must support bus rapid transit, light rapid transit, mass rapid transit and nonmotorised transit systems like cycling and walking.
Densify and enhance FSI
● Third, there is a need to densify our cities, build them vertically and reap agglomeration benefits of enhanced economic productivity and lower transaction costs. The maximum Floor Space Index (FSI) in Singapore is 25, Tokyo 20, New York 15, whereas in Mumbai it is 1. 33, Pune 1. 25, Ahmedabad 2 and Delhi 3. 5. Restricting the FSI to such low levels creates distortions in the land market, pushes development to the peri-urban areas, reduces availability of serviced land within cities, particularly for low-income groups, increases commuting distances and their environmental costs. People from rural areas will continue to move to cities in search of livelihoods. Keeping FSI artificially low to control the densities is a failed strategy.
Water and more
● Fourth, water will be a key determinant in our ability to sustainably manage our cities and enhance the quality of life of our citizens. Indian cities dominate both current and future lists of cities from across the world with highest overall water risk. Indian cities need to collect, treat and reuse used water on a vast scale, and need to be fully sewered to collect all used water. We need to construct separate drainage and sewerage systems to facilitate used water reusage. There is also a necessity for rational and pragmatic policy for pricing water. There is a willingness to pay for regular supply of water but political unwillingness to charge for water. This has long-term implications in making water boards financially bankrupt. The pricing mechanism should be based on “pay as you use” with direct benefit transfer of a subsidy for those who cannot afford to pay.
● Lastly, there is a need to re-engineer and strengthen urban governance structures. States need to build up a cadre of professional urban managers and create an ecosystem of light-touch regulations, reform building bye-laws and use technologies like geospatial systems to leapfrog. Moreover, states need to provide greater financial autonomy and administrative freedom to cities.
Successful cities are fundamental to a successful nation. The challenge for Indian states is to use urbanisation as an instrument of growth, job creation and elimination of poverty.
Date:27-04-22
India and Europe, A Continental Shift ET Editorials
The announcement by Narendra Modi and European Commission president Ursula von der Leyen to establish the EU-India Trade and Technology Council (TTC) brings a new dimension to the India-EU relationship. Though India has strong bilateral ties with several EU member states, they have not translated into a strong partnership with the European Union (EU) as a whole. That should change with this agreement.
Trade, technology and security are the TTC’s pillars to be built on existing sectoral programmes. For the EU, the India TTC is the second, the first was with the US. The EU’s relationship with the US is very different from that with India. Russia’s invasion of Ukraine and its ‘friendship without bounds’ with China have necessitated the EU to pivot again, stepping up engagement with India. Brussels’ relationship with Beijing is complex, much like New Delhi’s relationship with Moscow. Yet both parties understand the importance of deepening ties with likeminded parties in the changing geopolitical context. Tackling climate change and transiting to a net-zero economy will be the TTC’s strong drivers. India can be an important technology partner for development, innovation, and upscaling to drive down costs, and developing technologies in key areas of the low carbon economy like batteries, hydrogen, and energy security. Trade must be more than bilateral, though. The council should serve as a partnership to expand trade based on resilient supply chains.
The ties of history have served more to detract than aid the EUIndia partnership. However, the two have more in common than is traditionally acknowledged. The EU and India bring complementary advantages to the partnership while structural and attitudinal similarities provide learning opportunities.
Date:27-04-22
‘Mission Antyodaya’ should not fall by the wayside With the right momentum, the project can help transform rural India — in terms of development and social justice M.A. Oommen is Honorary Fellow, Centre for Development Studies, Thiruvananthapuram and Distinguished Fellow, Gulati Institute of Finance and Taxation, Thiruvananthapuram
The Indian Constitution mandates local governments to prepare and implement plans for ‘economic development and social justice’ (Articles 243G and 243W). Several complementary institutions and measures such as the gram sabha to facilitate people’s participation, the District Planning committee (DPC) to prepare bottom up and spatial development plans, the State Finance Commission (SFC) to ensure vertical and horizontal equity, one-third reservation for women (in most States, now 50%), population-based representation to Scheduled Caste/Scheduled Tribe communities, and so on were introduced to promote this goal. Even so, India’s decentralisation reforms (with no parallel in federal history) have failed to take the decentralisation process forward in delivering social justice and progress in rural India.
This article argues that given the right momentum, the ‘Mission Antyodaya’ project of the Government of India launched in 2017-18 (and cast in a convergence framework avowedly to eradicate poverty in its multiple dimensions among rural households) bears great promise to revive the objectives of these great democratic reforms. The Ministry of Panchayati Raj and the Ministry of Rural Development act as the nodal agents to take the mission forward.
The Bharatiya Janata Party government which came to power in 2014 had several reasons to reimagine rural development. The traditional poverty line linked to the calorie-income measure, religiously pursued by the former Planning Commission with great academic support proved inane and failed to serve as a purposive policy tool.
Moreover, the revealing statistics brought into the public domain by the SocioEconomic and Caste Census (SECC) 2011 were ‘demanding’ remedial intervention. That 90% of rural households have no salaried jobs, 53.7 million households are landless, 6.89 million female-headed households have no adult member to support, 49% suffer from multiple deprivations, 51.4% derive sustenance from manual casual labour, 23.73 million are with no room or only one room to live, and so on cannot be easily dismissed by any democratic government. Paradoxically, this happened in a country that spends more than ₹3 trillion every year for the rural poor from the Central and State Budgets and bank-credit linked self-help programmes. Indeed, the ‘Mission Antyodaya’ project was a needed intervention.
Key goal
The main objective of ‘Mission Antyodaya’ is to ensure optimum use of resources through the convergence of various schemes that address multiple deprivations of poverty, making gram panchayat the hub of a development plan. This planning process (whose intellectual heritage is traced to the people’s plan of Kerala) is supported by an annual survey that helps to assess the various development gaps at the gram panchayat level, by collecting data regarding the 29 subjects assigned to panchayats by the Eleventh Schedule of the Constitution.
These subjects are broken down into 112 parameters for data collection using detailed questionnaires. Also, data regarding health and nutrition, social security, good governance, water management and so on are also collected. The idea of the Ministry of Panchayati Raj to identify the gaps in basic needs at the local level, and integrating resources of various schemes, self-help groups, voluntary organisations and so on to finance them needs coordination and capacity-building of a high order. If pursued in a genuine manner, this can foster economic development and inter-jurisdictional equity. Although two major reports, one on infrastructure and service gaps and the other on a composite index, have been in the public domain, they do not seem to have attracted public discussion.
Gaps in gram panchayats
The ‘Mission Antyodaya’ survey in 2019-20 for the first time collected data that shed light on the infrastructural gaps from 2.67 lakh gram panchayats, comprising 6.48 lakh villages with 1.03 billion population. The data set updated annually enables development planning sectorally and spatially, from the village level to the State and the country as a whole. For an insight into the gap report, we may use the State-wise break-up of the score-values. The maximum score values assigned will add up to 100 and are presented in class intervals of 10. While no State in India falls in the top score bracket of 90 to 100, 1,484 gram panchayats fall in the bottom bracket. Even in the score range of 80 to 90, 10 States and all Union Territories do not appear. The total number of gram panchayats for all the 18 States that have reported adds up only to 260, constituting only 0.10% of the total 2,67,466 gram panchayats in the country. If we consider a score range of 70-80 as a respectable attainment level, Kerala tops but accounts for only 34.69% of gram panchayats of the State, the corresponding all-India average is as low as 1.09%. Even for Gujarat which comes next to Kerala, gram panchayats in this bracket are only 11.28%.
Social justice still distant
The composite index data, a sort of surrogate for human development, are also not encouraging. Although only 15 gram panchayats in the country fall in the bottom range below 10 scores, more than a fifth of gram panchayats in India are below the 40 range. All the gram panchayats in Kerala are above this and stand out in contrast to the rest of the States. While in the country as a whole only 7.37% have a composite index in the 70-100 bracket, Gujarat (which tops the list) has 20.5% in the range, followed by Kerala (19.77%) and Karnataka (17.68%). The gap report and the composite index show in unmistakable terms that building ‘economic development and social justice’ remains a distant goal even after 30 years of the decentralisation reforms and nearly 75 years into Independence.
Nearly four years have passed since the former Finance Minister, Arun Jaitley, announced the Mission Project in his Budget speech of 2017-18 with the specific target “to make 50,000 gram panchayats poverty free by 2019, the 150th birth anniversary of Gandhiji”. Nothing happened but the goal posts have been moved to 2022, to coincide with the 75th anniversary of Independence, on August 15. Removing goal posts is a poor game.
Rectify these lapses
The scope to reduce the growing rural-urban disparities is tremendous. Given the ‘saturation approach’ (100% targets on select items) of the Ministry of Panchayati Raj, the possibilities of realising universal primary health care, literacy, drinking water supply and the like are also immense. But there is no serious effort to converge resources (the Mahatma Gandhi National Rural Employment Guarantee Act, the National Rural Livelihood Mission, National Social Assistance Programme, Pradhan Mantri Awas Yojana, etc.) and save administrative expenses.
Another lapse is the failure to deploy the data to India’s fiscal federalism, particularly to improve the transfer system and horizontal equity in the delivery of public goods in India at the sub-State level. Evidently the Fifteenth Finance Commission has missed it. The constitutional goal of planning and implementing economic development and social justice can be achieved only through strong policy interventions. The policy history of India has been witness to the phenomenon of announcing big projects and failing to take them to their logical consequence. ‘Mission Antyodaya’ is a striking case in recent times.
Date:27-04-22
A splintered ‘nerve centre’ Services of urban local bodies have to be integrated with the ICCC for improving amenities for people Pushkal Shivam is the former deputy CEO of a Smart City SPV in Maharashtra
Networked infrastructure in cities of the global South seems to be a chimera that everyone wants to ride. It is mostly the people, however, who occupy networks that make infrastructure work for our cities. Take, for example, the water supply distribution lines in most Indian cities. In its current form, no sensor may ever replace the “linemen” who work the valves spread across the city, often with a simple rod, to regulate the supply of water. And yet, a different logic of governing infrastructure is in the making.
The Union Minister for Housing and Urban Affairs Hardeep Singh Puri recently announced that Integrated Command and Control Centres (ICCCs) have been established in 80 cities selected as part of the Smart Cities Mission, a Centrally Sponsored Scheme. The ICCC projects being executed may be seen as part of the “pan city” component of the mission which envisages “application of selected Smart Solutions to the existing [emphasis added] city-wide infrastructure”.
Five pillars of ICCC
The overbearing images of a hall with giant video walls notwithstanding, an ICCC has five basic pillars: first is bandwidth; second, the sensors and edge devices which record and generate real-time data; third, various analytics which are software that draw on data captured by end devices to generate “intelligence”; fourth is data storage; fifth, the ICCC software which may be described as, in MoHUA’s words, “a system of systems” — the anchor for all other application specific components and has been described as the “brain and nervous system” of the city.
Central to the promise of ICCC is the idea of “predictive modelling” which uses data to generate inputs on not just how the city is but also how it can be. It could tell which direction the city is growing in; it could predict future real estate hot spots; it could identify and predict all accident-prone spots in the city, and it could predict the bus routes prone to crowding. This is in sharp contrast to how things actually work on the ground: our frames of response are retrospective and we are constantly retrofitting our cities as the primary mode of transformation.
The ICCC may be seen in sync with the functions of an urban local body (ULB) under the 74th Constitutional Amendment, towards improving services for people. Several contradictions may arise in this context.
First, the project is being executed under the aegis of the Special Purpose Vehicles (SPVs) constituted under the Companies Act, 2013, in the selected cities. Projects of the SPV that overlap with core ULB areas have been a source of tension between the two, one that the cities are still learning to resolve. Unless the core staff of ULB working across departments such as health, town planning, water supply, etc., adopt the ICCC systems, it risks being a splintered “nerve centre”.
One solution is to build a team in the SPV that can act as a bridge, inspire more users, and develop capacities; however, as “contract employees” they may be subject to the mercurial aspects of administration. Second, there is the risk of permanent underutilisation of the system. With poor integration with ULB services, and not just software integration but also in terms of workflows and SOPs, the functional capability may continue to be titled towards video surveillance. Even with the latter, configuration of video surveillance analytics and its application has been less than perfect and the police department operators often use the systems manually to screen the footage in the wake of an incident which defeats the purpose of ICCC.
Third, the sizeable investments required create contradictions in some cities which are otherwise struggling for funds to upgrade their basic infrastructure and services. One of the key questions to gauge the success of ICCC in future, maybe to ask, if cities are choosing to build and sustain these systems out of their own revenue or untied devolution funds. If not, ICCCs may struggle to outlive the exhaustion of mission grants. And finally, despite the efforts to keep procurement vendor-agnostic, some segments of ICCC are still dominated by select industry players who may dictate terms to the city or engage in arm-twisting for payments.
‘War rooms’
The ICCCs in some cities served as a “war room” during the COVID-19 pandemic, and its application is cited as a success. Despite its usefulness, the success of such “war rooms” lay in the fact that the municipal, district and the police administration were bound together by the compulsions of the pandemic, which may not be normally forthcoming. Unless the services of the ULB and the people taking them to the residents of a city are “integrated” into ICCCs, they may turn out to be as the images show: a hall with giant video walls, a rather expensive one.
Date:27-04-22
संस्थाओं पर घटता विश्वास बड़ी चुनौती संपादकीय
अपने कार्यकाल के एक साल बाद भारत के मुख्य-न्यायाधीश (सीजेआई) ने एक बार फिर कहा है कि कार्यपालिका और विधायिका की ज्यादतियों पर रोक लगाना न्यायपालिका का संवैधानिक दायित्व है। सीजेआई ने कहा कि संविधान ने कोर्ट्स को कानून-सम्मत व्यवस्था सुनिश्चित करने की बड़ी जिम्मेदारी भी प्रदान की है। उन्होंने यह भी कहा कि आज देश के सामने सबसे बड़ी समस्या है संस्थाओं पर घटता जन-विश्वास, जिसमें न्यायपालिका भी शामिल है। उनके अनुसार हर समाज में आपसी मतभेद होते हैं लेकिन उन्हें निपटाने के लिए अन्तर्निहित विवाद-समाधान मैकेनिज्म विकसित किया जाता है। अदालतें इस काम को अंजाम देने में केवल मशीनी रूप से कानून या प्रक्रियाओं की व्याख्या मात्र नहीं करतीं बल्कि उसका एक मानवीय पक्ष भी देखती हैं। असली न्याय उस दिन खत्म हो जाएगा जिस दिन समाज स्वयं त्वरित न्याय का सहारा लेने लगेगा। बकौल सीजेआई, न्यायपालिका में जबरदस्त सुधार की जरूरत है और इसका भारतीयकरण करना होगा। मामलों के निपटारे में असाधारण विलंब भारतीय न्याय व्यवस्था पर एक कलंक-सा बनता जा रहा है। लेकिन देश के सर्वोच्च जज ने आंकड़े देते हुए संकेत दिया कि अवरोध का कारण सरकार द्वारा नियुक्ति में ढिलाई है। उनके अनुसार इस एक साल उनके नेतृत्व वाले कॉलेजियम ने हाईकोर्ट्स के जजों की नियुक्ति के लिए 180 नामों की अनुशंसा की लेकिन 54 मामलों में आज भी नियुक्ति पत्र जारी नहीं हुआ है, जबकि देश के तमाम हाईकोर्ट्स में कुल 1104 जजों के पद के मुकाबले 388 पद आज भी खाली हैं।
Date:27-04-22
समाज का दोष सरकारों के सिर पर राजीव सचान, ( लेखक दैनिक जागरण में एसोसिएट एडिटर हैं )
यह देखना दुखद है कि दलितों के साथ र्दुव्यवहार की वैसी घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रहीं, जैसी थम जानी चाहिए। बतौर उदाहरण बीते दिनों राजस्थान के जालौर जिले में एक दलित दंपती को मंदिर में पूजा करने से रोक दिया गया। चूंकि इस घटना का वीडियो वायरल हो गया तो पुलिस हरकत में आई और पुजारी को गिरफ्तार कर लिया गया। इस घटना को अपवाद के तौर पर नहीं देखा जा सकता, क्योंकि ऐसी घटनाएं देश के विभिन्न हिस्सों में रह-रहकर होती ही रहती हैं। वे कभी सुर्खियां बनती हैं और कभी नहीं। कभी दलित दूल्हे को घोड़ी पर नहीं चढ़ने दिया जाता तो कभी उसकी बारात नहीं निकलने दी जाती। बीते सप्ताह ही यूपी के बुलंदशहर जिले के एक गांव में दलित दूल्हे की घुड़चढ़ी के वक्त पुलिस को उपस्थित रहना पड़ा और वह भी तब, जब दूल्हा खुद सीआरपीएफ में सिपाही है। उसने आशंका जताई थी कि उसे घुड़चढ़ी से रोका जा सकता है। इस आशंका का कारण अतीत में हुई ऐसी ही एक घटना है, जिसमें एक व्यक्ति की जान चली गई थी। संयोग से पुलिस ने गंभीरता और तत्परता दिखाई और सब कुछ शांति से निपट गया। सदैव ऐसा नहीं होता, क्योंकि कभी-कभार पुलिस शिकायत को गंभीरता से नहीं लेती या फिर उसके पास मामला पहुंचने के पहले ही अनहोनी हो जाती है। पुलिस के पास मामला जाए और वह कुछ न करे तो उसकी निंदा समझ में आती है, लेकिन आम तौर पर दलितों के साथ बुरे व्यवहार की जिन घटनाओं से पुलिस प्रशासन का कोई लेना-देना नहीं होता और यह भी शिकायत नहीं होती कि उसने समय पर सही कार्रवाई नहीं की, उनमें भी उसे और संबंधित राज्य की सरकार को खरी-खोटी सुनाई जाती है। ऐसा करते हुए यह भी देखा जाता है कि राज्य विशेष में किस दल की सरकार है। इसे वे भी देखते हैं, जो स्वयं को दलित हितों के लिए सदैव समर्पित और सक्रिय दिखाते हैं।
नि:संदेह राज्य सरकारों एवं उनके पुलिस प्रशासन को इसके लिए और सजग रहना चाहिए कि दलित या किसी भी कमजोर, वंचित तबके के व्यक्ति के साथ किसी भी तरह का भेदभाव न हो, लेकिन इतनी ही जिम्मेदारी समाज की भी तो है। क्या जालौर अथवा बुलंदशहर में जो कुछ हुआ, उसे रोकने के लिए सबसे पहले संबंधित गांव के असरदार लोगों को आगे नहीं आना चाहिए था? आखिर कहां थे ब्लाक, पंचायत सदस्य और प्रधान जी? इसी तरह क्या उन लोगों को सक्रिय नहीं होना चाहिए था, जो हिंदू समाज की एका की बात करते हैं और इस पर जोर देते हैं कि दलित, आदिवासी आदि हिंदू समाज का अविभाज्य अंग हैं? सवाल यह भी है कि धर्मगुरु गांव-गांव जाकर इसके लिए कोई अलख क्यों नहीं जगाते कि दलितों, आदिवासियों के साथ वैसा व्यवहार नहीं होना चाहिए, जैसा होता है और जो सभ्य समाज को शर्मिदा करने के साथ हिंदू समाज को कमजोर करने का काम करता है?
समाज सुधार का काम केवल शासन-प्रशासन पर नहीं छोड़ा जा सकता। यह काम समाज और विशेष रूप से सामाजिक एवं धार्मिक नेताओं को भी करना होगा। इसलिए और भी, क्योंकि आजादी के बाद राजनीतिक दलों के एजेंडे से समाज सुधार बाहर हो गया है। आखिर हमारे घोषित-अघोषित शंकराचार्य और अन्य धर्मगुरु करते क्या हैं? क्या वे भी सरकारों के भरोसे हैं? क्या उन्हें नहीं पता कि दलितों की अनदेखी-उपेक्षा को रह-रहकर बयान करने वाली घटनाएं हिंदू समाज की एकता को क्षति पहुंचाने के साथ उन तत्वों को बल भी प्रदान करती हैं, जो यह शरारतपूर्ण अभियान छेड़े हुए हैं कि दलित-आदिवासी तो हिंदू हैं ही नहीं। यह एक खतरनाक अभियान है। यह एक हद तक सफल होता दिखता है और इसी कारण मीडिया के साथ अन्य मंचों पर दलितों का उल्लेख इस तरह होने लगा है, जैसे वे हिंदू समाज का हिस्सा ही न हों। इस अभियान के अलावा एक अन्य अभियान दलित-मुस्लिम एका के नाम पर चल रहा है। यह भी वैसा ही खोखला-फर्जी अभियान है, जैसा मुहम्मद अली जिन्ना ने बंगाल के नेता जोगेंद्र नाथ मंडल के साथ मिलकर चलाया था। जिन्ना के छल का शिकार जोगेंद्र नाथ मंडल तो हुए ही, जो शर्मिदा होकर कलकत्ता लौटे और गुमनामी में मर गए, बांग्लादेश के करोड़ों दलित हिंदू आज भी हो रहे हैं।
दलितों के साथ र्दुव्यवहार की उन घटनाओं पर भी शासन-प्रशासन को कठघरे में खड़ा करना राजनीतिक उद्देश्यों अथवा अन्य किसी एजेंडे को पूरा करने में तो मददगार हो सकता है, जिनमें उनकी कोई भागीदारी अथवा गलती नहीं होती, लेकिन ऐसा करने से समाज को चेताने और उसे उसकी जिम्मेदारी का अहसास कराने का उद्देश्य कहीं पीछे छूट जाता है। जहां शासन-प्रशासन की गलती हो, वहां उसे कठघरे में खड़ा ही किया जाए, लेकिन जहां गलती समाज की हो, वहां उसे भी इसका आभास कराया जाना आवश्यक है। वास्तव में यह काम केवल दलितों, आदिवासियों के साथ होने वाली घटनाओं पर ही नहीं, महिलाओं से छेड़छाड़ और दुष्कर्म के मामलों में भी होना चाहिए। इस तरह की घटनाएं पुलिस की सजगता के अभाव में कम, लोगों की उस मानसिकता के कारण अधिक होती हैं, जिसके तहत वे लड़कियों-महिलाओं को नीची निगाह से देखते हैं। इस अपेक्षा में कोई हर्ज नहीं कि सरकारों को समाज सुधार के लिए और सक्रिय होना चाहिए, लेकिन समाज की गलती केवल शासन-प्रशासन के सिर मढ़ने से बात बनने वाली नहीं है।
Date:27-04-22
डेटा आधारित हो नीति संपादकीय
भारतीय अर्थव्यवस्था की गति कोविड-19 महामारी द्वारा उथलपुथल मचाने के पहले ही धीमी होने लगी थी। हालांकि अब अर्थव्यवस्था महामारी के कारण बनी विपरीत परिस्थितियों से उबर रही है लेकिन बीते दो वर्षों में रोजगार और आय पर बहुत बुरा असर पड़ा है। तथ्य यह भी है कि महामारी के दौरान भी अन्य बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में भारत का राजकोषीय हस्तक्षेप सीमित था। इस वजह से भी महामारी के बाद बनी परिस्थितियों में हमारी खपत ज्यादा प्रभावित हुई। नि:शुल्क खाद्यान्न वितरण जरूर एक बड़ा हस्तक्षेप था जिसने बड़ी तादाद में परिवारों की मदद की। परिवारों की खपत की वास्तविक हालत का पता तब चलेगा जब नए उपभोक्ता व्यय सर्वेक्षण के परिणाम सामने आएंगे। इसके जुलाई से शुरू होने की खबर है।
सरकार ने प्रक्रिया को शुरू करके अच्छा किया है क्योंकि भारतीय अर्थव्यवस्था के कामकाज को समझने के लिए यह सर्वे अत्यंत महत्त्वपूर्ण है। हाल ही में प्रकाशित दो प्रपत्रों में भारत में गरीबी के स्तर का आकलन किया गया। इनमें से एक विश्व बैंक द्वारा तथा दूसरा अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष द्वारा प्रकाशित किया गया है। यद्यपि दोनों की कड़ाई से तुलना नहीं की जा सकती लेकिन उनका निष्कर्ष यही है कि हाल के वर्षों में देश में गरीबी में उल्लेखनीय कमी आई है। अर्थशास्त्रियों ने खपत के ताजा आधिकारिक आंकड़ों के अभाव में गरीबी का स्तर अलग-अलग तरीके अपनाकर मापा। सरकार ने 2017-18 में किए गए उपभोक्ता व्यय सर्वेक्षण को नकारने का निर्णय लिया क्योंकि आंकड़ों की गुणवत्ता को लेकर कुछ समस्या थी। महामारी शुरू होने के कारण नया सर्वेक्षण नहीं हो सका। परंतु अब जबकि महामारी नियंत्रण में है, सरकार ने यह तय किया है कि इस अहम सर्वेक्षण को दोबारा शुरू किया जाए। चूंकि यह सर्वेक्षण बहुत महत्त्वपूर्ण है तथा पिछला सर्वेक्षण गुणवत्ता के कारण खारिज किया जा चुका है इसलिए सांख्यिकी विभाग को यही सलाह होगी कि वह सभी अंशधारकों को यह बताए कि क्या बदलाव किए जा रहे हैं। प्रविधि का व्यापक मूल्यांकन और अपनाये गए बदलावों का आकलन प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाएगा तथा नतीजे भी ज्यादा विश्वसनीय होंगे। विभाग को इस प्रक्रिया में मिलने वाले सुझावों से भी मदद मिल सकती है।
सर्वेक्षण के नतीजे न केवल खपत का स्तर जांचने में अहम होंगे बल्कि सकल घरेलू उत्पाद के आधार तथा उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में संशोधन के लिए भी वे महत्त्वपूर्ण होंगे। यह संभव है कि इन नतीजों के बाद अन्य वृहद संकेतकों तक पहुंचने के तरीकों में बदलाव की जरूरत पड़े। उदाहरण के लिए यह कहा जाता रहा है कि एक विकसित होती अर्थव्यवस्था के साथ भारतीय परिवारों की खपत के तौर तरीके बीते 10 वर्षों में काफी बदल गए हैं। यह भी संभव है कि खपत में खानेपीने की वस्तुओं का भार कम हुआ हो तथा सेवा पर व्यय बढ़ा हो। चूंकि शीर्ष उपभोक्ता मूल्य सूचकांक आधारित मुद्रास्फीति की दर मौद्रिक नीति से संबद्ध है इसलिए यह महत्त्वपूर्ण है कि सूचकांक सही तस्वीर पेश करे। यदि सूचकांक लंबे समय तक पुराना बना रहता है या वास्तविक तस्वीर नहीं पेश करता है तो मौद्रिक नीति में अनुचित बदलाव उत्पादन को प्रभावित कर सकते हैं तथा दीर्घावधि का असंतुलन कायम कर सकते हैं।
व्यापक स्तर पर देखें तो यह दोहराना उपयुक्त होगा कि डेटा का समय पर संग्रह और विश्लेषण करना तेजी से बदलते आर्थिक माहौल में कोई बड़ी मांग नहीं है। संभवत: यह नीतिगत हस्तक्षेप को दिशा दिखाने वाला सबसे शक्तिशाली उपाय है। अब जबकि सरकार सर्वे को दोबारा शुरू कर रही है उसे डेटा संग्रह की कमियां दूर करने का प्रयास भी करना चाहिए। उदाहरण के लिए जैसा कि पहले भी कहा जा चुका है, भारत को एक नये उत्पादक मूल्य सूचकांक की आवश्यकता है। उत्पादन, खपत तथा कीमतों में बदलाव सटीक का आकलन करना जरूरी है। ऐसा करने से ही वृहद आर्थिक स्थिरता सुनिश्चित हो सकेगी।
Date:27-04-22
भारत का बुनियादी विकास और यूरोपीय संघ का महत्त्व मिहिर शर्मा
यूरोपियन आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लियेन इस सप्ताह भारत यात्रा पर आई थीं। अभी चंद रोज पहले ही ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन भारत आए थे जहां उनका बहुत अच्छा स्वागत हुआ। वह गुजरात भी गए और एक बुलडोजर के साथ फोटोशूट भी कराया जो शायद गलत निर्णय था।
ब्रेक्सिट के बाद ब्रिटेन भारत के भविष्य के आर्थिक दायरे के लिए उतना महत्त्वपूर्ण नहीं रह गया जितना कि यूरोपीय संघ है। बल्कि यूरोपीय संघ भारत के आर्थिक हितों के लिए अमेरिका से भी अधिक महत्त्वपूर्ण हो सकता है।
ब्रिटेन की भारत के साथ कारोबारी समझौता करने की उत्सुकता जॉनसन की इस बात में महसूस की जा सकती है जिसमें उन्होंने कहा कि वे अक्टूबर तक इसे अंजाम देना चाहते हैं। जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहीं अधिक संयत अंदाज में कहा कि ‘यह तय किया गया है कि इस वर्ष के अंत तक मुक्त व्यापार समझौते को पूरा करने के सभी संभव प्रयास किए जाएंगे।’ इससे यह भी स्पष्ट होता है कि ब्रिटिश जनता द्वारा यूरोपीय संघ से अलग होने के छह वर्ष बाद भी ‘वैश्विक ब्रिटेन’ की दिशा में खास प्रगति नहीं हुई है। ऐसे में जॉनसन जैसे नेताओं को अपने समर्थकों को दिखाने के लिए कुछ तो चाहिए।
भारतीय वार्ताकारों को भी दुनिया को दिखाना है कि भारत व्यापारिक मोर्चे पर एकदम अनिच्छुक नहीं है। ब्रिटेन इस समय ठोस काम के बजाय सुर्खियों में ज्यादा रुचि रख रहा है और भारत अत्यंत सीमित व्यापारिक समझौते के पक्ष में है। यूरोपीय संघ के साथ वार्ता एकदम अलग बात है। संघ की भारी भरकम अफसरशाही तथा आंतरिक जटिलताओं के कारण समझौते पर पहुंचना मुश्किल है। परंतु ऐसे समझौते अधिक व्यापक और विश्वसनीय भी होंगे। जॉनसन के उलट वॉन डेर लियेन को फोटो शूट की जरूरत नहीं। ऐसा भी नहीं है कि ब्रिटेन की तरह ब्रसेल्स शराब और फलों पर चुनिंदा रियायतों से संतुष्ट हो जाएगा।
यूरोपीय संघ और भारत के बीच विभिन्न नियामकीय और आर्थिक मोर्चों पर दूरी है। डिजिटल नियमन से लेकर बौद्धिक संपदा और पादपस्वच्छता जरूरत तक तमाम दिक्कत हैं लेकिन इन्हें दूर किया जा सकता है। यूरोपीय संघ और अमेरिका के बीच भी ऐसी दिक्कतें हैं। उन्हें आशा है कि गत वर्ष शुरू व्यापार और तकनीकी परिषद की मदद से वे इस समस्या को हल कर सकेंगे। अमेरिका का कहना है कि यह परिषद उसके और यूरोपीय संघ के बीच वैश्विक व्यापार और तकनीकी मसलों को हल करने में सहायक होगी। जानकारी के मुताबिक भारत के सामने भी ऐसा ही प्रस्ताव रखा गया है। भारतीय नीति निर्माताओं को अवसर का लाभ लेना चाहिए। अब तक भारत तथा यूरोपीय संघ के लिए नियामकीय स्तर पर तालमेल एक बड़ी बाधा रही है। भारत-यूरोपीय संघ व्यापार एवं तकनीकी वार्ता इस कमी को दूर कर सकती है।
ऐसा करने से भारत की व्यापार वार्ता विभिन्न लॉबी और हित समूहों की ऐतिहासिक पकड़ से भी दूर की जा सकती है। यह विचित्र और दुखी करने वाली बात है कि भारत की बेहतर संपर्कों वाली कानूनी सेवा फर्में व्यापक व्यापार समझौतों को इसलिए नष्ट कर देती हैं ताकि अपनी बेहतर भुगतान वाली फर्मों को विदेशी प्रतिस्पर्धा से बचा सकें। उच्च कौशल वाले श्रमिकों का प्रवासन भी किसी भारतीय सरकार की प्राथमिकता नहीं होनी चाहिए क्योंकि ऐसे लोग भारतीय श्रम शक्ति का बहुत छोटा हिस्सा हैं। प्राथमिक चिंता श्रम आधारित क्षेत्रों में अनुकूल निवेश परिस्थितियों की होनी चाहिए।
निवेश के कारण ही यूरोपीय संघ के साथ सुसंगतता इतनी महत्त्वपूर्ण है। भारतीय नीति निर्माताओं के लिए यह आवश्यक है कि वे स्वीकार करें कि भारत में सरकारी फंड की बदौलत समुचित बुनियादी ढांचा विकसित नहीं किया जा सकता है। अर्थव्यवस्था को पर्यावरण के अनुकूल, वैश्विक रूप से एकीकृत तथा प्रतिस्पर्धी बनाने के लिए फंड बहुत जरूरी है। चीन से आने वाले फंड की अपनी दिक्कतें हैं। जापान पहले ही भारत को लेकर प्रतिबद्ध है। वैश्विक संस्थागत वित्त की मदद से ही फंडिंग की कमी दूर की जा सकती है।
यूरोपीय संघ तथा उसके कई सदस्य देश संस्थागत वित्त पर बहुत जोर देते हैं। इसका श्रेय कुछ हद तक यूरोपियन बचत को भी दिया जा सकता है जो बाह्य प्रतिफल की प्रत्याशा में है।
याद रखिए भारत को बहुत बड़े पैमाने पर बुनियादी विकास के लिए धनराशि चाहिए। अगले कुछ वर्षों में सरकार की आकांक्षी नैशनल इन्फ्रास्ट्रक्चर पाइपलाइन की लागत करीब 1.5 से दो लाख करोड़ डॉलर होगी। अनुमान है कि इस जरूरत को पूरा करने के लिए देश के सालाना अधोसंरचना व्यय को तीन गुना करना होगा। दुनिया में सबसे अधिक संस्थागत पूंजी यूरोप में है। यदि भारत को अपनी निवेश की कमी दूर करनी है तो दोनों अर्थव्यवस्थाओं में तालमेल बहुत आवश्यक है।
जॉनसन और वॉन डेर लियेन की यात्राओं को यूक्रेन संकट के बीच भारत को लुभाने की कोशिश के रूप में देखना आकर्षक है लेकिन यह स्पष्ट होना चाहिए कि यह संकट किसी पक्ष के लिए प्राथमिक वजह नहीं है। जॉनसन ब्रेक्सिट के बाद सही सुर्खियों की आवश्यकता है। भारत को वृद्धि को गति देने की जरूरत है जबकि यूरोपीय संघ की बात करें तो वहां छोटे-छोटे ब्योरों को भी पूरे विस्तार से लिखने की प्रवृत्ति है। वह जलवायु संबंधी कदम तथा हिंद-प्रशांत संचार के लिए भारत को साझेदार बनाना चाहता है। खुशकिस्मती से भारत भी यही चाहता है।
यूरोपीय संघ पहले से नियामकीय महाशक्ति था। डेटा की निजता पर सबसे पहले उसने कदम उठाया और बड़ी तकनीकी कंपनियों से राजस्व जुटाने पर भी। अगले दशक के दौरान हरित वित्त को चैनल करने तथा नए तकनीकी मोर्चों के नियमन में भी वह पर्याप्त प्रभावी रहेगा। एक के बाद एक संकटों ने यूरोप के एकीकरण को गहन किया है। भारत के लिए इस दशक में यूरोपीय संघ अहम है।
Date:27-04-22
भाईचारे के हक में संपादकीय
सर्वोच्च न्यायालय ने कल दो अलग-अलग मामलों में यह बिल्कुल साफ कर दिया कि देश के सांप्रदायिक भाईचारे से खिलवाड़ करने की छूट किसी को नहीं दी जाएगी और इसके लिए शीर्ष अधिकारी अपनी जिम्मेदारियों से बच नहीं सकते। आला अदालत ने जहां रामनवमी के दिन विभिन्न राज्यों में हुई सांप्रदायिक हिंसा की वारदातों की न्यायिक जांच की मांग करने वाली याचिका को ‘अगंभीर’ मानते हुए खारिज कर दिया, तो वहीं एक अन्य मामले में रुड़की धर्म-संसद के संदर्भ में ‘हेट स्पीच’ को लेकर उत्तराखंड सरकार को आगाह करते हुए मुख्य सचिव की जवाबदेही तय करने की हिदायत भी दे डाली। यही नहीं, हिमाचल प्रदेश के ऊना जिले में हुई धर्म-संसद में वैधानिक दिशा-निर्देशों के कथित उल्लंघन को लेकर उसने राज्य सरकार से जवाब-तलब भी किया है। आरोप है कि ऊना जिले के मुबारकपुर गांव में हाल में आयोजित धर्म-संसद में उन्हीं लोगों ने फिर से सांप्रदायिक विष-वमन किया, जो हरिद्वार धर्म-संसद में आपत्तिजनक बयानबाजी के लिए गिरफ्तार हुए थे और फिलहाल जमानत पर हैं।
रामनवमी से अब तक देश में सांप्रदायिक हिंसा की कई घटनाएं हो चुकी हैं और इन वारदातों का दायरा लगभग एक दर्जन राज्यों में फैल चुका है। ऐसे में, सुप्रीम कोर्ट की ताजा टिप्पणियां काफी महत्वपूर्ण हैं। यदि शीर्ष अधिकारियों की जिम्मेदारी तय होने लगे, तो प्रशासनिक लापरवाही की गुंजाइश ही नहीं रह बचेगी। यह जानते हुए कि सांप्रदायिक हिंसा से न सिर्फ पूरा सामाजिक ताना-बाना प्रभावित होता है, जान-माल की क्षति होती है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की छवि धूमिल होती है, हमारा प्रशासनिक अमला प्राय: बेहतर नजीर नहीं पेश कर पाता। समाज के अगुवा लोग भी अब बहुत सक्रिय नहीं दिखते। आखिर शहरों की शांति समितियां कहां होती हैं? सद्भाव बनाए रखने का दायित्व सरकार के साथ-साथ समाज का भी है। आखिर जो लोग नुकसान हो जाने के बाद तिरंगा यात्रा निकालते हैं, वे उस वक्त कहां होते हैं, जब उनकी रहनुमाई की सबसे अधिक जरूरत होती है? कानून-व्यवस्था राज्य का विषय है और देश गवाह है कि प्रशासनिक इच्छाशक्ति की बदौलत कई राज्य सरकारों ने किसी भी संप्रदाय के असामाजिक तत्वों को सिर नहीं उठाने दिया।
यह बताने की जरूरत नहीं होनी चाहिए कि सामाजिक उथल-पुथल देश की आर्थिक तरक्की को प्रभावित करती है। इससे निवेशक बिदकते हैं और राज्य की जो ऊर्जा तरक्की में लगनी चाहिए, वह सामाजिक सौहार्द की बहाली में खर्च करनी पड़़ती है। उत्तर भारतीय राज्यों के पिछड़ेपन का एक बड़ा कारण सांप्रदायिक तनाव रहा है। इसलिए सरकारों को ऐसे मामलों को गंभीरता से लेना चाहिए। यह देखना सुखद है कि उत्तर प्रदेश सरकार के सख्त और संतुलित रुख के कारण मंदिरों और मस्जिदों ने अपने तईं कदम उठाने शुरू कर दिए हैं। किसी भी धर्म में धर्मगुरुओं व पंथ-प्रधानों का काम गुमराह लोगों को सही रास्ता दिखाना होता है, इसकी एक सुदीर्घ परंपरा भारत में रही है, मगर धर्म की आड़ में राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं की खेती अब इसे नुकसान पहुंचाने लगी है। व्यक्तिगत, सामुदायिक व राष्ट्रीय उत्कर्ष में सहायक धार्मिक आयोजनों से भला किसी को क्यों गुरेज होगा, पर उन्हें सामाजिक भाईचारे और देश के विकास में बाधक बनने से रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट से पहले तो समाज को ही खड़ा होना चाहिए।
Date:27-04-22
अदालतों के भारतीयकरण की जरूरत और फायदे हरबंश दीक्षित, ( विधि विशेषज्ञ )
भारत के प्रधान न्यायाधीश एनवी रमणा ने एक बार फिर अदालती व्यवस्थाओं में सुधार पर चर्चा शुरू की है। उन्होंने कहा है कि यह ऐसे पवित्र मंत्रों की तरह न हो, जिसे समझा ही न जा सके। उन्होंने चिंता व्यक्त की है कि अदालती भाषा और प्रक्रिया आम आदमी के लिए इतनी दुरूह है कि वह उसे जानने के लिए दूसरों पर निर्भर रहता है। इतना ही नहीं, इसका अंतहीन सिलसिला चलता रहता है और मुकदमे के समाप्त होते ही उसमें से ही दूसरे की शुरुआत हो जाती है। प्रधान न्यायाधीश ने कहा है कि हमारी 5,000 साल पुरानी पारदर्शी और उन्नत अदालती व्यवस्था होने के बावजूद अपने निर्णयों में विदेशी सिद्धांतों की मदद लेते हैं, जो आम आदमी की समझ में नहीं आता है।
वैदिक काल में अदालतों को सभा कहा जाता था। वे स्थानीय स्तर पर एक गांव या आसपास के कुछ गांवों के विवादों का निपटारा अपने स्तर पर कर देती थीं। न्यायिक व्यवस्था पर लोगों का भरोसा इस कदर था कि बहुत कम मुकदमे ऐसे होते थे, जिन्हें राजधानी में ले जाना पड़ता, जहां दो तरह की अदालतें होती थीं। राजा की अदालत सबसे बड़ी होती थी, किंतु उसके नीचे भी एक न्यायालय होता था, जिसमें एक न्यायाधीश तथा आम नागरिकों के बीच से लिए गए कुछ लोग होते थे, जिन्हें आज की भाषा में ‘ज्यूरी’ कहा जा सकता है। ज्यूरी विवेचक की भूमिका निभाते थे, जिन्हें कानून की कसौटी पर परखने के बाद न्यायाधीश निर्णय देते थे। राजा की अदालत में बहुत कम मामले पहुंचते थे, क्योंकि अधिकतर लोग निचली अदालत के निर्णय से संतुष्ट हो जाते थे।
वैदिक न्यायालयों की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि वहां आम नागरिक की भाषा इस्तेमाल होती थी। नियम-कानून भी ऐसे होते थे, जिन्हें आम आदमी समझ सकता था। उसे समझने के लिए किसी विशेषज्ञ की जरूरत नहीं थी। पूरी प्रक्रिया मुकदमे के पक्षकारों के ईद-गिर्द घूमती थी। इस समय सब कुछ ठीक उल्टा है। कानून की भाषा और अदालती प्रक्रिया ऐसी है कि उसमें वादी कहीं दूर बेचारा-सा खड़ा दिखाई देता है। न्यायाधीश, अधिवक्ता और जटिल कानून न्यायिक व्यवस्था के केंद्र में आ गए हैं। कानून को स्थानीय भाषा में उपलब्ध कराने के लिए राष्ट्रीय स्तर पर सुझाव भी आए, किंतु उसका क्रियान्वयन नहीं हो सका। मालिमथ समिति ने 2003 में दी गई अपनी रिपोर्ट में इस पर व्यापक अनुशंसा की थी। उसमें कहा गया था कि हर कानून में अनुसूची जोड़कर उसे स्थानीय भाषा में भी लिखकर शामिल किया जाए। उनका मत था कि इससे आम आदमी में कानून की समझ विकसित होगी और उसका भरोसा बढे़गा।
आज की स्थिति यह है कि सरकार और अदालतों की तमाम कोशिशों के बावजूद लंबित मुकदमों की संख्या बढ़ती जा रही है। इस समय 4.5 करोड़ से ज्यादा मामले लंबित चल रहे हैं। स्थिति इतनी भयावह है कि यदि एक भी नया मुकदमा दायर नहीं किया जाए, तब भी मौजूदा व्यवस्था में उन्हें निपटाने में 100 वर्ष लग जाएंगे। इसके लिए अपने यहां एक अच्छी पहल की गई थी। सन 2009 में संसद ने ग्राम न्यायालय अधिनियम के माध्यम से स्थानीय स्तर पर अदालतों की स्थापना के लिए कानून बनाया था, लेकिन अपेक्षित परिणाम नहीं आए। इसके तहत देश में कुल आठ हजार न्यायालयों का गठन होना था, किंतु अब तक केवल 395 न्यायालयों की अधिसूचना जारी हो पाई है और उनमें से भी अधिकतर या तो निष्क्रिय हैं या आधे-अधूरे ढंग से काम कर रही हैं। यदि उन पर पर्याप्त ध्यान दिया जाए, तो नए मुकदमों की संख्या अपने आप कम हो जाएगी। हमारे वैदिक काल की अदालतों की एक विशेषता यह भी थी कि न्यायाधीशों की सत्यनिष्ठा असंदिग्ध हुआ करती थी। उनका पूरा जीवन समाज के सामने एक खुली किताब की तरह होता था।
वैदिक अदालतें न्याय करते समय तकनीकी या कानून के आधार पर ही नहीं, अपितु संदर्भ के अनुसार मध्यस्थता और समझौते का व्यापक प्रयोग करती थीं। ग्रामीण न्यायालयों के न्यायाधीशों को तो ‘पंच’ के ही पदनाम से आज भी संबोधित किया जाता है। मध्यस्थता की सबसे बड़ी खासियत यह होती है कि इसमें मुकदमे के दोनों पक्षों में से कोई हारता नहीं, अपितु दोनों ही पक्ष अपने आप को विजेता मानते हैं। दोनों संतुष्ट हो जाते हैं और अपील की जरूरत नहीं पड़ती। इसलिए ऊपर की अदालतों पर मुकदमों का बोझ नहीं बढ़ता है। हमारे पास इस समय सैद्धांतिक तौर मध्यस्थता, सुलह तथा पंचनिर्णय के विकल्प मौजूद हैं, किंतु उसका समुचित उपयोग नहीं हो पा रहा है। मुहिम चलाकर इसका प्रचार-प्रसार करने तथा अदालतों द्वारा उन्हें प्रोत्साहित करने की जरूरत है।
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भारत एक विविधतापूर्ण देश है। यहाँ अनेक समूहों के अपने विचार, परंपराएं, भाषा, खानपान, वेशभूषा, मान्यताएं आदि हैं। इस वातावरण में किसी एक समूह के विचारों को दूसरे पर थोपने का जोखिम नहीं उठाया जा सकता है।
18वीं शताब्दी में हुई औद्योगिक क्रांति मानवता को परिवर्तित करने वाली एक महत्वपूर्ण घटना थी। इसने न केवल हर समाज की आर्थिक व्यवस्था को पूरी तरह से बदल दिया, बल्कि साथ ही साथ उनके शासित होने के तरीके में भी अनेक बदलाव किए।
तब से, समुदाय-केंद्रित परंपराओं और आर्थिक व्यवस्थाओं के बीच की खाई को पाटने के लिए निरंतर प्रयास किए जा रहे हैं।
चूँकि भारत जैसे विविधता वाले देश में भी आर्थिक आधुनिकीकरण की खोज की जानी थी, इसलिए शासन का लक्ष्य हमेशा ही अपनी आर्थिक और सामाजिक दृष्टि को आगे बढ़ाने के तरीके को खोजने की ओर रहा।
भारत के सतरंगी समाज को साधने का साधन संविधान को बनाया गया, और वह आज भी है। इसके संचालन के लिए ऐसी सरकार की आवश्यकता है, जो पक्षपातपूर्ण न हो। यहाँ का न तो समाज अखंड है, न ही उपसमूह एक समान हैं। समूहों के बीच मतभेदों ने यदा-कदा हिंसा के दौर को भी जन्म दिया है।
आधुनिक प्रशासन के पूरे तंत्र का मार्गदर्शन करने वाला सिद्धांत, विभिन्न परंपराओं को सह-अस्तित्व की अनुमति देने के बारे में है। यह किसी समूह की दूसरों के अधिकारों पर अतिक्रमण करने की प्रवृत्ति की जांच करता है। यह अजनबियों को जीविका की खोज में स्थान साझा करने के लिए तैयार करता है। इसका लाभ संघर्ष पर विराम होता है।
हाल के कुछ वर्षों में शासन या सरकार, एक समान दृष्किोण बनाए रखने में असफल रही है। कानूनी आधार के बिना भी, एक समूह दूसरों पर अपने मूल्य लागू करने का प्रयास करने लगे हैं। ऐसी प्रवृत्ति हिंसा को जन्म दे रही है। यह हिंसा सार्वजनकि स्थानों से लेकर विश्वविद्यालय परिसर तक फैली हुई है। इस संदर्भ में यह नहीं भूलना चाहिए कि ऐसे संघर्षों में कोई विजेता नहीं होता है। समुदायों को आर्थिक प्रगति में बाधा डालने वाली घटनाओं से हार ही तो मिलनी है।
विडंबना यह है कि सब कुछ देखते-समझते हुए भी सरकार एक समूह को दूसरे के अधिकारों पर अगर अतिक्रमण करने दे रही है, तो इस ढलान पर फिसलन ही दिखाई देती है।
भारत के राज्यों को चाहिए कि शासन की अनदेखी के परिणामों के प्रति सचेत रहें। हमारे शासन की संरचना में अंतर्निहित भावना से जुड़े बिना कोई शांतिपूर्ण समाधान नहीं है। सरकार का वर्तमान रवैया आर्थिक संभावनाओं को दबा देगा। सह-अस्तित्व का वातावरण ही आर्थिक और सामाजिक प्रगति का एकमात्र मार्ग है।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 12 अप्रैल, 2022
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Date:26-04-22
Plotting Progress Political risks of land acquisition are borne by states. They need better incentives TOI Editorials
The national monetisation pipeline has identified 25 airports run by the Airports Authority of India (AAI) for action over the next three years. Four of them are located in Tamil Nadu – all international airports. GoI’s airport monetisation plan needs to be studied with the TN government’s major industries policy note, 2022-23, to see how the approach can be tweaked to realign incentives between the two levels of government to encourage industrial development. It’s essential because the current airport infrastructure policy doesn’t reconcile political risks to potential rewards of monetisation.
TN’s policy note is an extension of what the previous DMK government suggested during the UPA-1 era. The note says that land forms the major portion of overall project cost. Henceforth, if the state transfers land free to GoI, which subsequently monetises the infrastructure, the state should be entitled to a share of the gains. It’s a sensible suggestion and one GoI should consider. Revenue from infrastructure flows to governments through two streams. One, through taxes, which are split between GoI and states on the basis of the Finance Commission’s recommendations and GST Council’s decisions. Two, through subsequent monetisation of an asset.
It’s the second stream that needs fine-tuning. Often, land is obtained by invoking a legislation to forcibly take over privately-owned property to serve a public purpose. This can sometimes extract a political cost that’s borne entirely by the state government. This risk can be mitigated by giving states a share of the upside arising out of monetisation. A mismatch between risk and reward across the two levels of government has acted as a drag on India’s industrialisation. The UP government’s example is pertinent here. It holds the equity of Noida International Airport incorporated in 2018. After overseeing the land acquisition process, it contracted Zurich Airport to build the airport and then operate it for 40 years. The upside of a potential monetisation will accrue to UP. True, Jewar is a greenfield project and AAI’s are existing airports. But the principle holds.
Separately, there’s a need to re-evaluate mechanisms of awarding compensation when land is acquired. The legislative process is complex and tilts towards the state. Sometimes this results in paltry compensation. On paper, there are redressal mechanisms. However, it’s almost impossible for an individual to get redress. Tweaks in laws allowing acquisition can help mitigate resistance to acquisition. The doctrine of eminent domain needs to be balanced with fairness.
Date:26-04-22
Retire Judges Later Constitutional court judges are being pensioned off too early. Their services are badly needed TOI Editorials
With seven Supreme Court judges retiring this year and over a third of sanctioned high court judges posts lying vacant, Parliament should urgently consider increasing the retirement ages of SC and HC judges from 65 and 62 respectively. Scarce judicial resources are constantly expended in finding suitable candidates for these top constitutional positions. And with replacements rarely happening concurrently, the pendency burden grows faster. On August 31 last year, nine SC judges were appointed after two years of no appointments. It’s another matter that a nearly full-strength SC failed to prioritise consequential constitution bench matters.
The vacancy problem is more pronounced in HCs where 45% of pending 59 lakh cases are awaiting disposal for over five years. While the overall vacancy position is 35% in HCs, in big HCs like Allahabad, Calcutta and Patna nearly 50% sanctioned posts lie vacant. The bizarrely different retirement ages for SC-HC judges may be a colonial legacy, but the UK has progressively increased retirement age for judicial office holders to 75. The benefits of India following suit go beyond pendency.
It’s no one’s case that judges turn unfit after 62 or 65. Many secure positions as judicial members of tribunals and commissions. But the hankering for post-retirement jobs weakens judicial independence vis-à-vis central and state executives. If judges serve till 70 there’s minimal incentive to seek post-retirement sinecures. Alternatively, a higher retirement age can also attract the best minds to the vocation. Only a few like Justice Rohinton Nariman and Justice UU Lalit have left behind lucrative practices to join SC. HC collegiums also face great difficulty attracting noted lawyers because of the low retirement age of 62 and delayed appointments. Even Article 224A’s option of allowing reappointment of retired HC judges hasn’t been exercised. A fully staffed judiciary will help crores of citizens awaiting justice in civil and criminal matters.
Date:26-04-22
सरकार का अंपायर के रोल में रहना बेहतर शेखर गुप्ता, ( एडिटर-इन-चीफ, ‘द प्रिन्ट’ )
राजधानी के जहांगीरपुरी क्षेत्र में दंगों के बाद बुलडोजर और ध्वस्तीकरण अभियान फिर सुर्खियों में है, जहां उत्तरी दिल्ली नगर निगम ने खासकर मुस्लिमों के स्वामित्व वाली संपत्तियों को निशाना बनाया। बचाव में तर्क ये दिया कि केवल अतिक्रमण और अनधिकृत निर्माण ध्वस्त किए जा रहे हैं। भाजपा के पूर्व केंद्रीय मंत्री और राजधानी में डिमॉलिशन मैन- जो 1992 से 1995 के बीच दिल्ली विकास प्राधिकरण के आयुक्त (भूमि) पद पर सेवारत थे- के तौर पर ख्यात रहे के.जे. अल्फोंस ने बातचीत में कहा था कि ध्वस्तीकरण अभियान तभी प्रभावी होते हैं, जब पहले कुलीन वर्ग के अवैध कब्जों को निशाना बनाया जाए। वे बताते हैं कि अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने एकाध ही अलग-थलग बसी झुग्गी-बस्ती ध्वस्त की थी।
इसने मुझे 1999 के अपने उस लेख की याद दिला दी, जो मैंने उस समय लिखा था जब न्यायपालिका अतिक्रमणों पर संज्ञान ले रही थी। यह फिर प्रासंगिक हो गया है क्योंकि सामाजिक-आर्थिक ढांचे में निचले पायदान पर रहने वालों को निशाना बनाया जा रहा है और अमीर और ताकतवर लोगों को हमेशा की तरह खुली छूट मिली हुई है। लेकिन इस स्तंभकार जैसा कोई मुक्त-बाजार का हिमायती शिकायत क्यों कर रहा है? क्योंकि हमें सरकार की जरूरत है। दरअसल, लाइसेंस-कोटा राज की तुलना में एक मुक्त बाजार, नियंत्रण मुक्त और उपभोक्ताओं को राजा मानने वाली समृद्ध अर्थव्यवस्था में तो सुशासन की आवश्यकता अधिक होती है। क्या कभी सोचा है कि हमारे मध्यम और उच्च-मध्यम वर्ग, कुछ अतिरिक्त आय और इसलिए थोड़ी बचत कर पाने वाले लोग आर्थिक सुधारों को लेकर नाक-भौं क्यों सिकोड़ते हैं? एक हालिया सर्वेक्षण ने यह क्यों दिखाया कि हमारे 70 फीसदी युवा संरक्षणवाद के पक्ष में हैं? हर्षद मेहता उनकी नजर में क्या है? बहुत अधिक रेग्युलेशन का नतीजा या बहुत कम का? या फिर 1993-94 में बाजार में शुरुआती उछाल के दौरान रातोंरात उभरी सैकड़ों निजी कंपनियों की घटना का, जिसने आईपीओ के जरिए पेंशनभोगियों और वेतनभोगियों से 10,000 करोड़ रुपए से अधिक जुटाए, और फिर गायब हो गया? यदि डिरेग्युलेशन का नतीजा इस तरह के झांसे के तौर पर ही सामने आता है तो क्या पुराने माई-बाप सरकार वाले दिन ज्यादा बेहतर नहीं थे, जब उद्योग भवन के बाबू लाइसेंस पर कुंडली मारे बैठे रहते थे और शेयर से जुड़े पूंजीगत मुद्दों का नियंत्रण उनके हाथ में होता था? लेकिन नॉन-गवर्नेंस को डिरेग्युलेशन मान लेना खतरनाक है। कोई भी मुक्त बाजार अच्छी सरकार और मजबूत कानूनों के बिना सफल नहीं हो सकता।
एक मुक्त बाजार को सरकार-संचालित अर्थव्यवस्था से भी अधिक कानूनों की आवश्यकता होती है। कानून अच्छे और निष्पक्ष होने चाहिए, लागू करने के लिहाज से डिरेग्युलेटरी होने चाहिए, और फिर इन पर अमल और निगरानी सरकार की जिम्मेदारी होनी चाहिए। यदि बाजार अपने आप में जवाबदेही की गारंटी होता तो सबसे सफल मुक्त अर्थव्यवस्थाओं में इस तरह के मजबूत नियामक तंत्र नहीं होते। बाजार, कानून और सरकारें मिलकर जवाबदेही सुनिश्चित करती हैं। हमारे मंत्री, वित्त सचिव, सीबीआई प्रमुख और यहां तक कि सेबी के मुखिया भी इस बात की शिकायत करते हैं कि हमारे पैसे लेकर गायब हुई कंपनियों के प्रमोटरों का पता लगाना और उन्हें दंडित करना मुश्किल है। सीधा सवाल यह है कि देश के शीर्ष बैंकों और वित्तीय संस्थानों की तरफ से चलाई जा रही मूल्यांकन एजेंसियों के प्रभारी अधिकारियों को क्यों नहीं पकड़ा जाता, जिनके प्रमाणपत्र प्रमोटर बड़े गर्व से लहराते घूमते थे? हम तो इसलिए ठगे गए न, क्योंकि हमने सोचा था कि इनका मूल्यांकन सम्मानित संस्थानों ने किया है।
दूरसंचार क्षेत्र में जारी तमाशा यह समझने के लिए एक अच्छा उदाहरण है कि कैसे हमने डिरेग्युलेशन को नो-रेग्युलेशन समझने की भूल कर दी है। सेवाएं बेहतर हुई हैं, अभूतपूर्व रूप से सस्ती भी हैं और इस सबका श्रेय निजीकरण को दिया जाना भी सही लगता है। लेकिन इस सबके बीच ट्राई की भूमिका के बारे में सोचें, जिससे निजी ऑपरेटर्स के साथ-साथ पुराने खिलाड़ी एमटीएनएल और डीओटी भी चिढ़ते हैं। वे टैरिफ घटाते रहते हैं और कोई गलती दिखने पर अंपायर की तरह सीटी भी बजाते हैं। अंपायरों को तो कोई भी पसंद नहीं करता लेकिन आप उनके बिना खेल भी नहीं खेल सकते। हमें सरकार की जरूरत है या नहीं, यह बहस पुराने भारतीय ताने-बाने में ही उलझी है, जहां हम किसी चीज से इतने प्रभावित हो जाते हैं कि आगे-पीछे सब भुला देते हैं। हम चुनाव अभियानों, मतदान, धांधली और परिणामों में इस कदर उलझ जाते हैं कि भूल जाते हैं यह सब किसलिए है।
मुझे कई साल पहले डॉ. मनमोहन सिंह के साथ हुई बातचीत याद है, जब वे वित्त मंत्री थे। वे अर्थव्यवस्था और राष्ट्र की स्थिति पर चिंतित थे। उन्होंने कहा, ‘हमारा तब तक कोई भविष्य नहीं है, जब तक हम अपने लोगों को उन सेवाओं के लिए उचित शुल्क के भुगतान के लिए राजी नहीं कर लेते जो सरकार उन्हें प्रदान करती है- जैसे बिजली, पानी, सड़क, शिक्षा आदि।’ लेकिन ऐसी सरकारें हमें इसके लिए कैसे राजी कर सकती हैं, जो दूसरों को मुफ्त बिजली की लूट, बिना टिकट यात्रा, नियमों-कायदों की धज्जियां उड़ाने और अवैध निर्माण करने की अनुमति देती हैं, वहीं अधिकारी हाउस टैक्स के लिए हमें परेशान करते रहते हैं और पूरी तरह से कानूनी कॉलोनियों में हमारी कथित तौर पर बड़ी बालकनी ध्वस्त करने में जरा भी देर नहीं लगाते हैं?
Date:26-04-22
नागरिक से ज्यादा उपभोक्ता बनने की कोशिशों से हानि नंदितेश निलय, ( लेखक और वक्ता )
रूस -यूक्रेन युद्ध में अभी तक दोनों तरफ से हजारों सैनिक मारे जा चुके हैं और अगर हम यूएन की रिपोर्ट को मानें तो 3 मिलियन से ज्यादा लोग घर छोड़कर इधर-उधर शरण ले रहे हैं। तो क्या महामारी के वक्त भी हिंसा ही मनुष्य की बुद्धि का साधन और साध्य है? और यह भी हिंसा से कम नहीं है कि विश्व स्तर पर शांति का न कोई दूत है और न वो जनमानस। युद्ध 24 फरवरी को शुरू हुआ और बस चल ही रहा है। ऐसा नहीं लगता कि पूरे विश्व को फिर से महात्मा गांधी के अहिंसा के सिद्धांत को अपनाने की जरूरत है?
8 फरवरी 1922 को, एक हिंसक भीड़ ने चौरी-चौरा में इमारत में आग लगा दी, जहां 22 पुलिस अधिकारी थे। उस समय गृह सचिव ने कहा, यह राज के खिलाफ विद्रोह है। लेकिन महात्मा गांधी के लिए, यह हिंसा ही थी। यहां तक कि उन्होंने हिंसा के लिए आत्म-दंड के रूप में पांच दिनों का उपवास भी किया। वे अहिंसा के साधनों के साथ प्रयोग कर रहे थे, और उनके लिए साधन उतने ही आवश्यक थे जितने कि साध्य। उनके लिए किसी भी प्रकार की हिंसा का तरीका अस्वीकार्य था। महात्मा गांधी के अनुसार, अहिंसा हमारी प्रजाति का कानून है क्योंकि हिंसा जानवर का कानून है। ताकत शारीरिक क्षमता से नहीं आती है। यह एक अदम्य इच्छाशक्ति से आती है।
गांधी विश्व-व्यवस्था में विश्वास करते थे, जहां साध्य की खोज में साधनों का समान महत्व होगा। मानव-विकास को प्राप्त करने के लिए उन्होंने कभी भी साधनों से समझौता नहीं किया। जब हम पिछले सत्तर वर्षों के भारत को देखते हैं तो कोई भी इनकार नहीं कर सकता है कि सर्वोत्तम इरादों के बावजूद कई बार हमने नागरिक से ज्यादा उपभोक्ता बनने की कोशिश की है। उपभोक्तावाद की ऊंची आकांक्षाओं ने नागरिकता के मूल्यों को ढक दिया है। इसने हमें तनावग्रस्त और क्रोधित बना दिया है। आजकल छोटी-छोटी दलीलें भी हिंसक हो जाती हैं। हम क्या विकसित देश के नागरिक भी बात-बात पर हिंसक हो रहे हैं। चाहे वो स्कूल के बच्चे हों या हॉलीवुड के कलाकार। क्रोध तो मानो पहला परिचय हो गया है। लोग एक पल के लिए भी नहीं सोचते कि गांधी ने अहिंसा के माध्यम से दुनिया को माना और प्रबुद्ध किया।
गांधी ऐसे नेता थे जिन्होंने अलगाव और उदासीनता का दर्द महसूस किया। गांधी को याद करना शब्दों से नहीं कर्मों में हो सकता है। नोबेल पुरस्कार विजेता गुन्नार मायर्डल ने विशेष रूप से कहा था कि भारत इतनी सारी परेशानियों के बीच में है और अधिकांश मुद्दों को संबोधित किया जा सकता है यदि हम गांधी के मार्ग को नहीं भूले होते। इसलिए संस्थाओं को वांछित लक्ष्य प्राप्त करने के लिए अपने साधनों का चयन करते समय सावधान रहने की आवश्यकता है। उन साधनों को मानव जाति की एकता, प्रेम, सम्मान, सच्चाई और सेवा की भावना की अपनी दृष्टि प्रस्तुत करनी चाहिए। वे एक सामाजिक व्यवस्था में विश्वास करते थे, जो अहिंसक और न्यायपूर्ण है।
आज युद्ध में फंसे विश्व के लिए गांधी की अहमियत और बढ़ गई है, उस अहिंसा और सद्भाव की। भगत सिंह ने अपने पिता किशन सिंह के साथ आखिरी बातचीत में एक जोरदार अपील की थी कि आपको अपने जनरल (गांधी) का समर्थन करना चाहिए। तभी आप देश के लिए आजादी हासिल कर पाएंगे। रोमां रोलां ने भी उल्लेख किया है कि बड़ी संख्या में सभा में गांधी को उनकी मृदु आवाज के कारण नहीं सुना जा सकता था, लेकिन फिर भी, लोग उनकी बात सुनते थे और वह केवल उनके हावभाव से। लेकिन शायद विश्व भी उनको सुने उन बमों के धमाकों से पहले। और सत्य की प्रयोगशाला में इस महामारी के वैक्सीन को ढूंढे ना कि कोई और हिंसा के साधन। वे ही देश फिर से भारत की ओर देखेंगे और उन गांधीवादी मूल्यों को याद करेंगे जहां साध्य ही साधन और साधन ही साध्य हो जाता है।
Date:26-04-22
समान नागरिक अधिकारों की प्रतीक्षा प्रो. हरबंश दीक्षित, ( लेखक विधि मामलों के विशेषज्ञ एवं उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग, प्रयागराज के सदस्य हैं )
सभी वर्गो के लिए एक जैसे सिविल कानून यानी समान नागरिक संहिता एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है, क्योंकि उत्तराखंड सरकार के बाद उत्तर प्रदेश सरकार ने भी इस संहिता के निर्माण की बात कही है। गृह मंत्री अमित शाह ने भी कहा है कि अब समान नागरिक संहिता की बारी है। यद्यपि हमारे संविधान निर्माताओं ने अनुच्छेद 44 के माध्यम से पहले ही अपनी भावना व्यक्त कर दी थी, किंतु पिछले 72 वषों से कोई ठोस कदम नही उठाया जा सका। यह अनुच्छेद 44 सबसे अधिक दुष्प्रचारित हिस्सों में से एक है। इस उपबंध के साथ बहुत अन्याय हुआ है। इसमें देश के सभी नागरिकों के लिए एक जैसा कानून बनाने की बात कही गई और सरकार से अपेक्षा की गई कि वह पंथ, जाति, क्षेत्र, भाषा जैसे बंटवारा करने वाले आधारों की परवाह किए बगैर सभी के लिए एक जैसा कानून बनाए, जो मानवीय गरिमा का सम्मान करता हो और सभ्य समाज के मानकों पर खरा उतरता हो। दुर्भाग्यवश इस पवित्र भावना को आगे बढ़ाने के बजाय हमारे अधिकतर नेताओं ने अपनी फितरत के मुताबिक एक हौआ खड़ा कर दिया और इस विषय पर तार्किक बहस करने के बजाय उसे सांप्रदायिक रूप देकर अछूत बना दिया। इस मामले में हम लोकशाही की महान पंरपराओं से भी मुंह चुराते दिखे। कुछ लोग इस विषय पर स्वस्थ बहस करने के बजाय इसके प्रस्तावकों को तब तक लानत भेजते रहते हैं, जब तक वह थक हार कर बैठ न जाए।
हमारे देश में अधिकतर मामलों में एक जैसा कानून लागू होता है। जमीन का क्रय-विक्रय, किरायेदारी और अन्य दीवानी मामलों में पहले से ही एक जैसा कानून है, लेकिन विवाह, उत्तराधिकार, वसीयत, दतक ग्रहण जैसे मामलों में आजादी के पहले से ही अलग-अलग संप्रदायों के लिए अलग कानून रहे हैं। संविधान निर्माताओं ने महसूस किया कि विवाह और भरण-पोषण से जुड़े मामलों का संबंध किसी उपासना पद्धति से नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा से है। यदि संतानहीन व्यक्ति किसी बच्चे को गोद लेकर अपनी वंश परंपरा आगे बढ़ाना चाहता है या उससे उसे सुरक्षा बोध का अहसास होता है, तो इससे किसी उपासना पद्धति की अवमानना कैसे हो सकती है? यदि किसी कानून से किसी महिला को सामाजिक सुरक्षा मिलती है या पति से अलग होने के बाद उसके लिए गुजारा भत्ते की व्यवस्था कर दी जाती है तो इसमें मत-मजहब क्यों आड़े आना चाहिए? यदि वैवाहिक संबंधों में समानता सुनिश्चित की जाती है तो इस पर किसी को आपत्ति कैसे हो सकती है?
आजादी के बाद समानता के सिद्धांतों को ध्यान में रखते हुए पारंपरिक हिंदू विधि में व्यापक परिवर्तन किए गए। पहले हिंदू समाज के पुरुष एक से अधिक शादियां कर सकते थे। हिंदू विवाह अधिनियम द्वारा इस पर प्रतिबंध लगाया गया। पति-पत्नी को विवाह विच्छेद करके सम्मानपूर्वक एक-दूसरे से अलग रहने का अधिकार दिया गया। महिलाओं को भरण-पोषण का अधिकार दिया गया। पिता की संपत्ति में बेटियों को भी अधिकार देने की परंपरा शुरू हुई। गोद लेने के मामलों में भी पति के एकाधिकार को तोड़ते हुए महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने की कोशिश की गई। इनमें कुछ सुधार दूसरे संप्रदायों में पहले से ही थे। मसलन ईसाई समाज में पुरुष एक ही शादी कर सकता था। हिंदू कोड बिल के माध्यम से पारंपरिक विधि की जगह मानवाधिकारों और समानता के सिद्धांतों को तरजीह दी गई, लेकिन वोट बैंक के कारण दूसरे समुदायों में ऐसा नहीं हो सका। आधुनिक सोच का लाभ समाज के केवल एक वर्ग तक ही सीमित न रहे, अपितु वह सभी समुदायों को भी हासिल हो, इसके लिए अदालतें समान नागरिक संहिता के निर्माण के लिए लगातार कोशिश करती रही हैं। शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि यह खेद का विषय है कि संविधान के अनुच्छेद 44 में तय की गई राज्य की जिम्मेदारी अब निर्जीव शब्द समूहों का संग्रह मात्र बन कर रह गई है। सुप्रीम कोर्ट ने तलाकशुदा शाहबानो को गुजर-बसर के लिए महज कुछ धनराशि तय की थी, लेकिन इसे मुसलमानों के धार्मिक मामलों में दखलंदाजी के रूप में प्रचारित किया गया। कुछ लोगों ने इस फैसले को पूरी कौम की अस्मिता पर खतरा करार कर दिया। राजीव गांधी की प्रचंड बहुमत वाली सरकार भी इस वाग्जाल की आंधी का सामना नहीं कर सकी। उसे झुकना पड़ा और कानून बनाकर मुस्लिम महिलाओं को गुजारे भत्ते के अधिकार से वंचित करना पड़ा। यह मुस्लिम महिलाओं की अनदेखी ही नहीं, उनके साथ किया जाने वाला घोर अन्याय भी था। इससे संविधान की पराजय हुई और मानवता एवं समानता के सिद्धांतों की हेठी हुई। इससे यह भी संदेश गया कि अब समान नागरिक संहिता के लिए पहल मत करना। बाद के घटनाक्रम बताते हैं कि तार्किक विचारधारा के लोग अपनी बात कहते रहे और सुप्रीम कोर्ट निर्देश जारी करता रहा, लेकिन हुआ कुछ नहीं।
शाहबानो प्रकरण के बाद सरला मुदगल और लिली थामस जैसे कई मामलों में सर्वोच्च न्यायालय ने समान नागरिक संहिता न होने के दोषों को उजागर करते हुए उस पर अमल का निर्देश दिया। खुद मुस्लिम समाज के विद्वानों मुहम्मद करीम छागला, प्रो. ताहिर महमूद, एमयू बेग आदि ने समान नागरिक संहिता की कमी की ओर बार-बार इशारा किया, लेकिन हमारे राजनीतिक नेतृत्व पर उसका कोई असर नहीं पड़ा। संसद में इस पर ढंग से बहस भी नहीं हो सकी। कम से कम अब तो समाज के व्यापक हित को देखते हुए सभी पंथनिरपेक्ष हितचिंतकों को आगे बढ़कर समान नागरिक संहिता की दिशा में पहल करनी चाहिए और यह पहल भी ऐसी होनी चाहिए जो किसी निर्णय पर पहुंचे ताकि हम एक प्रगतिशील समाज के रूप में एकजुट हो सकें। इससे हम संवैधानिक आदर्शो की स्थापना में भी अपनी भूमिका का निर्वहन कर सकेंगे।
Date:26-04-22
नीतिगत मदद संपादकीय
गत सप्ताह राजीव कुमार के इस्तीफा देने के बाद अर्थशास्त्री सुमन बेरी को नीति आयोग का नया उपाध्यक्ष नियुक्त किया गया। किसी संस्थान में ऐसे बदलाव हमेशा इस बात का अच्छा अवसर होते हैं कि वह अपनी स्थिति की समीक्षा करे तथा स्वयं को अधिक प्रासंगिक बनाने के लिए जरूरी बदलाव लाए। यह बात निजी उपक्रमों और सरकारी विभागों दोनों के लिए सही है। नीति आयोग के मामले में यह बात खासतौर पर प्रासंगिक है क्योंकि यह अभी भी अपेक्षाकृत नया संस्थान है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले के प्राचीर से स्वतंत्रता दिवस पर अपने पहले भाषण में यह घोषणा की थी कि योजना आयोग को नीति आयोग से प्रतिस्थापित किया जाएगा। इसकी स्थापना ने योजना निर्माण के एक युग का अंत किया और भारत पंचवर्षीय योजनाओं से आगे निकला।
विशेषज्ञों के बीच इस बात को लेकर आशंका थी कि यह नया संस्थान जो कि एक सरकारी थिंक टैंक है, क्या हासिल करेगा। सात वर्षों के बाद यह कहना सही होगा कि कई पहलों के साथ इसने सरकारी पारिस्थितिकी में अपनी जगह बना ली है। बहरहाल तेजी से बदलते आर्थिक माहौल में उससे और अधिक काम करने की अपेक्षा है। इसके बुनियादी लक्ष्य, जैसा कि नीति आयोग स्वयं कहता है, ‘राज्यों की सक्रिय सहभागिता के साथ राष्ट्रीय विकास की प्राथमिकताओं, क्षेत्रों और नीतियों को लेकर साझा दृष्टि विकसित करना।’ उससे यह भी अपेक्षा है कि वह इस दृष्टिकोण के साथ सहकारी संघवाद को बढ़ावा देगा कि मजबूत राज्य एक मजबूत राष्ट्र बनाएंगे। उसने इस क्षेत्र में काम किया है और कई नीतिगत दस्तावेज तथा रैंकिंग तैयार की हैं जो प्रतिस्पर्धी संघवाद को बढ़ावा देने में मदद करती है। राज्य यह देख सकते हैं कि वे कहां पिछड़ रहे हैं और अन्य राज्यों की बेहतर बातों को अमल में ला सकते हैं। केंद्र सरकार ने उसकी कई अनुशंसाओं को अपनाया है। उदाहरण के लिए नीति आयोग ने राष्ट्रीय मुद्रीकरण पाइपलाइन तैयार करने में भी अहम भूमिका निभाई। नए नेतृत्व के अधीन आगे बढ़ते हुए नीति आयोग के लिए बेहतर होगा कि वह कुछ व्यापक क्षेत्रों पर नजर डाले और कुछ ऐसा करे जो उसके अब तक के कामों से अलग हो। भारत ने योजना निर्माण को त्याग दिया है लेकिन उसे मध्यम अवधि के नीतिगत खाके की आवश्यकता है। कोविड के कारण लगे झटके के बाद यह बात ज्यादा महत्त्वपूर्ण हो गई है। महामारी ने देश की उत्पादक क्षमता को जो क्षति पहुंचाई है उसका अहसास होना बहुत जरूरी है। वृद्धि अनुमान से संकेत मिलता है कि आधार प्रभाव के समाप्त होने के साथ भारत महामारी के पहले वाले वृद्धि स्तर पर लौट जाएगा जो हर मानक से कम है। ऐसे में यह जानना अहम है कि मध्यम अवधि में सतत उच्चवृद्धि कैसे हासिल होगी। मध्यम अवधि का नीतिगत विश्लेषण तथा खाका इसमें मददगार होगा। उदाहरण के लिए नीति आयोग 2017 में प्रकाशित तीन वर्षीय योजना एजेंडे को दोबारा शुरू कर सकती है। बल्कि वह वार्षिक तौर पर ऐसे दस्तावेज पर काम कर सकती है और वर्ष भर में हुई प्रगति का आकलन कर सकती है। इससे न केवल नीतियों को लेकर व्यापक दिशा मिलेगी बल्कि बेहतर क्रियान्वयन भी संभव होगा। इतना ही नहीं सहकारी संघवाद की दिशा में भी काफी कुछ करने की आवश्यकता है। इसे ऐसा मंच बनना चाहिए जहां राज्यों के विकास संबंधी सभी मुद्दों पर चर्चा की जाए और उन्हें हल किया जाए। केंद्र में नीति आयोग के साथ राज्यों का निरंतर संवाद जलवायु परिवर्तन के एजेंडे को प्रभावी ढंग से लागू करने में मदद करेगा। उसे अंतरराष्ट्रीय अर्थशास्त्र को समझने में मदद करनी चाहिए। वैश्विक आर्थिक माहौल तेजी से बदल रहा है और भारत को समुचित प्रतिक्रिया के लिए बेहतर समझ की जरूरत है। भारत अब भले सीमित व्यापार समझौते कर रहा है लेकिन कुल मिलाकर वह वैश्विक स्तर से पीछे है। व्यापक स्तर पर नीति आयोग को उचित नीतिगत हस्तक्षेप में सरकार की मदद करने के लिए और अधिक क्षमता विकसित करनी होगी।
Date:26-04-22
अभी और कोशिश की जरूरत अवधेश कुमार
अप्रैल 24 को पंचायत दिवस आया गया जैसा हो गया। अगर नरेन्द्र मोदी सरकारी इस दिवस पर पंचायतों के लिए पुरस्कारों की घोषणा न करें तो किसी को याद भी नहीं होगा कि पंचायत दिवस कब आता है। जब पी वी नरसिंह राव सरकार ने 24 फरवरी, 1992 को संविधान के 73वें संशोधन के द्वारा पंचायती राज कानून पारित किया तथा इसके एक वर्ष बाद लागू हुआ तो इसे स्थानीय स्वशासन प्रणाली की दृष्टि से लोकतांत्रिक अहिंसक क्रांति नाम दिया गया।
वास्तव में आजाद भारत की सबसे बड़ी विडंबना थी कि महात्मा गांधी को स्वतंत्रता आंदोलन का अपना नेता घोषित करने के बावजूद आजादी के बाद शासन में आई सरकार ने ग्राम स्वराज के उनके सपने को संविधान के तहत अनिवार्य रूप से संपूर्ण राष्ट्र में साकार करने का कदम नहीं उठाया। पंडित जवाहरलाल नेहरू के शासनकाल में ही 1957 में बलवंत राय मेहता समिति ने जिस त्रिस्तरीय पंचायत प्रणाली की अनुशंसा की उसके अनुसार गांव में ग्राम पंचायत, प्रखंड स्तर पर पंचायत समिति और जिला स्तर पर जिला परिषद को तभी संविधान का अनिवार्य भाग बना दिया जाना चाहिए था। उसने विकेंद्रित लोकतंत्र शब्द भी प्रयोग किया। हालांकि सभी सरकारों ने भारत में ग्राम पंचायतों को सशक्त करने की वकालत की, अलग-अलग राज्यों में थोड़े-बहुत अंतर के साथ पंचायती ढांचा कायम हुए पर इसे व्यापक और समग्र संवैधानिक ढांचागत स्वरूप 1992 के संशोधन द्वारा ही प्राप्त हुआ।
ध्यान रखिए, स्वतंत्रता के बाद संविधान की सातवीं अनुसूची में केंद्र और राज्यों के बीच शक्तियों का विभाजन संघ, समवर्ती और राज्य सूची के आधार पर ही किया गया, जिनमें पंचायतों को अधिकार नहीं मिल सका। 1992 का संशोधन ही था, जिसके तहत पंचायतों को कुल 29 विषयों पर काम करने का संवैधानिक अधिकार मिला। इस व्यवस्था ने 29 वर्ष पूरा कर 30वें वर्ष में प्रवेश किया है और संविधान संशोधन की दृष्टि से देखें तो 30 वर्ष पूरा हो चुका है। किसी भी व्यवस्था के मूल्यांकन के लिए इतना समय प्राप्त होता है। प्रश्न है कि क्या हम पंचायत प्रणाली की वर्तमान स्थिति को संतोषजनक मान सकते हैं? आज दुनिया के विकसित देश औपचारिक रूप से यह मानने को विवश हैं कि भारत जैसे विशाल और विविधता वाले देश में पंचायती राज्य के माध्यम से सत्ता को नीचे तक पहुंचाने का काम अद्भुत है। सच यह है कि विश्व में सबसे ज्यादा शोध यदि किसी एक प्रणाली पर हुआ है तो वह है, भारत की पंचायती राज व्यवस्था। हमें अपने देश में भले यह सामान्य काम लगे, लेकिन विश्व के लिए यह अद्भुत है। इस आधार पर स्वाभाविक निष्कर्ष यही निकलेगा कि अगर विश्व में इस व्यवस्था ने धाक जमाई है तो निश्चित रूप से सफल है। जाति और लिंग के आधार पर सत्ता में भागीदारी की दृष्टि से विचार करें तो इसने समानता के सिद्धांत को साकार किया है। 1992 के संशोधन में महिलाओं के लिए 33 फीसद आरक्षण था जिसे बाद में 50 फीसद कर दिया गया। यानी इस समय करीब 2.6 लाख ग्राम पंचायतों में आरक्षण के अनुसार सत्ता की आधी बागडोर महिलाओं के हाथों में है। दूसरे, दलितों, आदिवासियों तथा पिछड़ी जातियों के प्रतिनिधियों की संख्या 80 फीसद से ज्यादा मानी जा रही है।
विधानसभाओं एवं लोक सभा में अनुसूचित जाति-जनजाति एवं अति पिछड़ी जातियों के सांसदों और विधायकों के निर्वाचित होने से जमीनी स्तर पर सामाजिक असमानता में अपेक्षित अंतर नहीं आया, लेकिन पंचायतों में इनके निर्वाचन से व्यापक अंतर आया है। एक समय स्वयं को उपेक्षित माने जाने वाला वर्ग अब गांवों और मोहल्ले में फैसले करते हैं तथा ऊंची जाति की मानसिकता में जीने वाले ने लगभग इसे स्वीकार कर समन्वय स्थापित किया है। आप किसी जाति के हों, काम के लिए ग्राम प्रधान, मुखिया, सरपंच या वार्ड सदस्य के घर जाना होता है। वह चाहे किसी जाति का हो उसके दरवाजे पर बैठना है। इन सब से ऊंच-नीच की मानसिकता बदल रही है। इस तरह कहा जा सकता है कि पंचायती राज में सामाजिक समानता को मनोवैज्ञानिक स्तर पर स्थापित करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाया है। हां, महिलाओं के मामले में अभी यह लक्ष्य प्राप्त होना शेष है। ज्यादातर जगह निर्वाचित महिला प्रतिनिधियों के पति व्यवहार में ज्यादा सक्रिय हैं और मुख्य भूमिका उनकी होती है। किंतु अनेक जगह महिलाएं स्वयं भी सक्रिय हैं। पुरुषों और स्त्रियों के बीच राजनीतिक मामलों में बहस व विमर्श की वर्षो से कायम दूरियां घटी हैं।
चुनाव के समय आप गांव में महिलाओं के बीच भी राजनीतिक बहस होते देख सकते हैं। पढ़े-लिखे युवाओं में भी निर्वाचित होकर काम करने की ललक बढ़ी है। चुनाव आधारित लोकतांत्रिक प्रणाली की दृष्टि से देखें तो यह लोकतंत्र के मूल सिद्धांत सतत जागरूकता का साकार होना है। किंतु यह सब एक पक्ष है। इसके दूसरे पक्ष चिंताजनक और कई मायनों में डरावने हैं। सत्ता यदि शक्ति, संपत्ति और प्रभाव स्थापना का कारक बन जाए तो वह हर प्रकार की मानवीय विकृति का शिकार होता है। हालांकि लोक सभा और विधानसभाओं के अनुरूप शक्ति का विकेंद्रीकरण तुलनात्मक रूप से पंचायती राज में काफी कम है। बावजूद पंचायती राज के तीनों स्तरों के अधिकार और कार्य विस्तार के साथ जितने काम आए और उसके अनुरूप संसाधनों में बढ़ोतरी हुई उसी अनुरूप इनके पदों पर निर्वाचित होने की लालसा भी बढ़ी। वर्तमान वोटिंग प्रणाली अनेक प्रकार के भ्रष्ट आचरण की जननी है।
आज पंचायतों की चुनाव प्रणाली हर सारे भ्रष्ट व्यवहारों की गिरफ्त में आ चुका है। प्रशासन के लिए पंचायतों का चुनाव कराना विधानसभाओं और लोक सभा चुनाव से ज्यादा चुनौतीपूर्ण है। पंचायत प्रमुख एवं जिला परिषद अध्यक्ष आदि के चुनाव में निर्वाचित प्रतिनिधियों की बोली लगती है। समय की मांग पूरी राजनीतिक व्यवस्था की गहरी समीक्षा और उसके अनुरूप व्यापक संशोधन और परिवर्तन का है। गांधीजी ने भारत की प्राचीन प्रणाली के अनुरूप मतदान की अति सामान्य व्यवस्था दी थी, लेकिन उनके विचार के केंद्र में परस्पर एक दूसरे का हित चाहने वाला नैतिक और जिम्मेदार व्यक्ति है। तो व्यवस्था में बदलाव की कल्पना के साथ समाज में ऐसे व्यक्तियों का बहुतायत कैसे हो इस पर काम करने की आवश्यकता है।
Date:26-04-22
राष्ट्रीय भाषा नीति बने अजीत दुबे
उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू जी मातृभाषा के प्रयोग के प्रति सदैव मुखर रहे हैं। उन्होंने कहा कि ‘मैं इस बात पर हमेशा जोर देता रहा हूं कि हर किसी को प्राथमिक शिक्षा उसकी मातृभाषा में मिलनी चाहिए। ये समय की जरूरत है। अंग्रेजी भी रहेगी, हिंदी भी रहेगी, आप सीखिए मगर फोकस हमेशा मातृ भाषाओं पर होना चाहिए।’
सर्वविदित है कि मातृ भाषा में ज्ञान प्राप्त करना सुगम होता है यूनेस्को ने इस संबंध में एक रिपोर्ट भी प्रकाशित की है, जिसमें कहा गया है कि मातृ भाषा में शिक्षा प्राप्त करना प्रत्येक बच्चे का मूलभूत अधिकार है। भारत एक बहुभाषी समाज है भाषायी विविधता हमारे देश की खूबसूरती है। वर्तमान केंद्र सरकार 34 सालों के बाद नई शिक्षा नीति 2020 में लेकर आई है जो एक सराहनीय कदम है। नई शिक्षा नीति में स्थानीय भाषाओं और मातृ भाषाओं के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण अपनाया गया है, लेकिन नई शिक्षा नीति में मातृ भाषा और स्थानीय भाषाओं में शिक्षा उपलब्ध कराने की जो बात कही गई है उसका आधार क्या होगा? शिक्षा नीति में कोई स्पष्ट मानक तय नहीं किया गया है। क्या प्राथमिक शिक्षा आठवीं अनुसूची में शामिल भाषाओं में होगा या अन्य स्थानीय भाषाओं में जो आठवीं अनुसूची में शामिल नहीं है उनमें भी होगा, ये अनुत्तरित सवाल हैं। हाल ही में गृहमंत्री अमित शाह जी ने स्पष्ट कहा कि हिंदी को अंग्रेजी की जगह राष्ट्र की सम्पर्क भाषा बना देना चाहिए, यह एक साहसिक बयान है। अमित शाह जी ने अपने बयान में बताया कि पूर्वोत्तर भारत की बोडो, जेमी, किरबुक सहित आठ स्थानीय भाषाओं द्वारा देवनागरी लिपि अपनाना कोई मामूली घटना नहीं है। वैसे भारतीय भाषाओं के देवनागरी लिपि अपनाने का विचार नया नहीं है। आचार्य विनोबा भावे ने भी कहा था कि भारतीय भाषाएं अगर देवनागरी लिपि अपना लें तो भारत की एकता अखंडता के लिए मजबूत प्रयास होगा। खासतौर पर दक्षिण की भाषाओं को इसका बड़ा लाभ होगा। वहां की चार भाषाएं अत्यंत निकट हैं, तेलूगु, मलयालम, कन्नड़ में बहुत सारे शब्द संस्कृत के हैं और इन भाषाओं में बहुत सारे शब्द समान हैं,अगर ये सभी नागरी लिपि स्वीकार कर लेते हैं तो दक्षिण के लोग चारों भाषाएं बहुत जल्द और आसानी से सीख सकते हैं। महात्मा गांधी जी चाहते थे कि देश की सम्पर्क भाषा हिंदी बने। यह देश का दुर्भाग्य है जहां इतनी सारी भाषाएं हैं वहां एक विदेशी भाषा अंग्रेजी सम्पर्क भाषा बनी हुई है। अमित शाह जी के हिंदी के संबंध में दिए गए बयान के बाद दक्षिण भारत से कुछ नेताओं द्वारा हिंदी विरोध के स्वर मुखर फिर हुए जो वर्षो से दक्षिण भारत में हिंदी विरोधी आंदोलन को हवा देते रहें हैं। हवा देने वालों में वामपंथी विचारधारा, सहित भारत की एकता अखंडता की विरोधी शक्तियों का महत्त्वपूर्ण एजेंडा है हिंदी विरोध। आखिर ऐसा क्यों हो रहा है ये सवाल अभी भी अनुत्तरित है। देश में 22 भाषाओं को आठवीं अनुसूची में मान्यता मिली हुई है मगर रिजर्व बैंक के नोट पर सिर्फ 15भाषाओं का प्रयोग होता है किसी ने विरोध नहीं किया। सेंट्रल यूनिर्वसटिी के अंदर स्नातक कोर्स के दाखिले के लिए 13 भाषाओं में परीक्षा दे सकते हैं, जिस बात पर कोई विवाद या विरोध नहीं है। साहित्य अकादमी में 24 भाषाएं मान्यता प्राप्त है। अन्य भाषाओं को साहित्य अकादमी से मिलने वाले पुरस्कारों, लाभों से वंचित होना पड़ता है, ये भी विसंगति है। 2005 में कुछ दक्षिण भारतीय भाषाओं को जो 1500 साल से ज्यादा पुरानी थी, शास्त्रीय भाषा की मान्यता मिली किसी ने कोई विरोध नहीं किया क्योंकि एक मानक तय किया गया, जिसके आधार पर इन शास्त्रीय भाषाओं को उनका लाभ मिल रहा है, कोई विरोध नहीं है। परंतु आज तक आठवीं अनुसूची का कोई पैरामीटर नहीं बन पाया कि आखिर आठवीं अनुसूची में भाषाओं को शामिल करने का क्या मानक हो, 14-15 लाख की संख्या में बोलने वाली भाषाएं आठवीं अनुसूची में शामिल हैं, मगर 20 करोड़ की संख्या में बोली जाने वाली भोजपुरी जैसी कई भाषाएं आठवीं अनुसूची से अभी भी दूर हैं।
वर्तमान केंद्र सरकार का रवैया स्थानीय भाषाओं के प्रति कुछ सकारात्मक जरूर रहा है। यूपी में भोजपुरी, अवधी, बुंदेली और ब्रज भाषाओं की अकादमी बनने की आहट है। 34 वर्षो बाद केंद्र सरकार ने नई शिक्षा नीति लाकर अपनी रचनात्मकता को व्यक्त किया है। नई शिक्षा नीति में मातृभाषाओं और स्थानीय भाषाओं में प्राथमिक शिक्षा देने की बात हो रही है ये अच्छी बात है, मगर आजादी के अमृत महोत्सव के बाद भी भारत राष्ट्र की अपनी कोई स्पष्ट भाषा नीति नहीं है, जिसके कारण कुछ नकारात्मक तत्व समय-समय पर हिंदी बनाम दक्षिण भारतीय भाषा, हिंदी बनाम भोजपुरी, हिंदी बनाम मराठी, हिंदी बनाम अंग्रेजी और हिंदी बनाम बंगाली विवाद को हवा देते रहते हैं। भाषायी नीतियों की अस्पष्टता के कारण बहुत सारी भाषाओं को उनके उचित हक से वंचित रहना पड़ता है जो यदा-कदा विवादों का कारण बनते हैं। जरूरत है कि जल्द-से-जल्द केंद्र सरकार भाषायी विवादों को दूर करने और विसंगतियों को खत्म कर आने वाली पीढ़ियों के भाषायी सौहार्द का निर्माण करने के लिए राष्ट्रीय भाषा नीति लेकर आए, तभी देश में अनुत्तरित भाषायी सवालों का हल निकल पाएगा और राष्ट्र के विकास की गति को तेज किया जा सकता है।
Date:26-04-22
युद्ध के समय तेजी से भारत के करीब आता पश्चिम हर्ष वी पंत, ( प्रोफेसर, किंग्स कॉलेज लंदन )
जैसे-जैसे यूक्रेन के साथ रूस का युद्ध बढ़ता जा रहा है, पश्चिम के साथ भारत के जुड़ाव में भी तेजी आ रही है। दिलचस्प है कि कई लोगों को आशंका थी कि यूके्रन-रूस युद्ध के समय में भारत पर पश्चिमी रुख के मुताबिक चलने के लिए दबाव डाला जाएगा, लेकिन अब रूस के साथ भारत के अच्छे रिश्ते की वजहों को समझा जा रहा है। नई दिल्ली पहुंचने वाले यूरोपीय नेताओं का तांता लगा हुआ है। यूरोप और भारत के बीच संबंध लगातार बढ़ रहे हैं, दोनों पक्षों के नेतृत्व ने कई मुद्दों पर अपना ध्यान केंद्रित किया है।
यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयन भी गत दिनों भारत में थीं, जहां उन्होंने स्पष्ट रूप से जलवायु परिवर्तन, जैव-विविधता के नुकसान, ऊर्जा और डिजिटल प्रसार, परस्पर संपर्क, सुरक्षा, रक्षा और हिंद-प्रशांत में सहयोग पर ध्यान केंद्रित करने का फैसला किया है। यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष के रूप में उनकी यह पहली भारत यात्रा थी, जिसके दौरान उन्होंने भारत में एक कार्यक्रम को मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित भी किया।
ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन भी पिछले सप्ताह भारत में थे और उनका दृष्टिकोण है कि भारत और ब्रिटेन के बीच पूरकता पर जोर देना है और रूस के मामले में परस्पर मतभेदों को कम करना है। जॉनसन ने भारत-रूस संबंधों के बारे में कहा कि यह एक ऐतिहासिक संबंध है, जिसे हर कोई समझता है और सम्मान करता है। इससे शायद कई ऐसे लोगों को आश्चर्य हुआ होगा, जिन्होंने उम्मीद की थी कि इस यात्रा के दौरान रूस पर एक विवादास्पद बहस सामने आएगी। पश्चिम में अनेक लोगों को भारत से शिकायत रही है कि वह यूक्रेन के मामले में पश्चिमी देशों के साथ नहीं है और अपनी अलग स्थिति बनाकर चलना चाहता है। वैसे भारत अपनी स्थिति को लेकर कतई रक्षात्मक नहीं है।
नई दिल्ली रूस के सवाल पर पूरी साफगोई से अपनी बात रख रही है। भारत में अनेक पश्चिमी नेताओं की मेजबानी के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी भारत-यूरोप साझेदारी को बढ़ावा देने के लिए मई की शुरुआत में तीन यूरोपीय देशों, जर्मनी, डेनमार्क और फ्रांस का दौरा करेंगे। विदेश मंत्री, एस जयशंकर और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह 2+2 वार्ता के लिए पहले ही अमेरिका जा चुके हैं, भारत-अमेरिका द्विपक्षीय एजेंडे को आगे बढ़ा रहे हैं। भारत इतिहास में या आज गलत जगह खड़ा है, ऐसी धारणा से अमेरिका पीछे हट रहा है।
भारत किसी तरह की अनावश्यक बहस में नहीं उलझ रहा है, पूरी सफाई के साथ अपने राष्ट्रीय हितों की रक्षा करते हुए चल रहा है। यदि पश्चिम को भारत को अपनी रणनीति में शामिल करना है, तो उसे भारत की दीर्घकालिक चुनौतियों का समाधान प्रदान करने में भागीदार बनना होगा, चाहे वह रक्षा हो या ऊर्जा। यही संदेश भारत अपने पश्चिमी समकक्षों को लगातार दे रहा है। भारतीय विदेश मंत्री तांत्रिक जवाबों के साथ पेश आ रहे हैं। भारत में एक नया विश्वास पाया गया है कि नई दिल्ली के विकल्प केवल अपनी सामरिक अनिवार्यताओं से संचालित होंगे।
पिछले कुछ वर्षों में भारतीय विदेश नीति के सामने सबसे महत्वपूर्ण मकसदों में से एक है, पश्चिम के साथ दीर्घकालिक स्थायी संबंध बनाना। इस लक्ष्य का पीछा करने में नई दिल्ली ने कुछ गंभीर कूटनीतिक पूंजी खर्च की है और नतीजे साफ हैं। बेशक, पश्चिम को भी भारत की बदलती उम्मीदों और हिंद-प्रशांत में उभरती भू-राजनीतिक वास्तविकताओं के साथ आना पड़ा है। लंबे समय से यूरोपीय संघ ऐसे किसी प्रयास से बच रहा था, लेकिन जैसे-जैसे चीन की ओर से दबाव बढ़ा और रूस ने यूरोप की सुरक्षा के लिए चुनौती पैदा कर दी, यूरोप को बदलाव के लिए तैयार होना पड़ा। खासकर पश्चिम यूरोपीय देश नई विदेश नीति विकसित करने को मजबूर हो रहे हैं। अब यूरोप समान विचारधारा के देशों के साथ भागीदारी बढ़ाना चाहता है।
इस नए समीकरण में भारत-यूरोपीय संघ की साझेदारी निश्चित रूप से यूरोपीय संघ के लिए महत्वपूर्ण है, यह देखते हुए कि यह भारत का तीसरा सबसे बड़ा व्यापार भागीदार और एक खास रणनीतिक महत्व वाला देश बना हुआ है।
आज जब भारत की बात आती है, तो यूनाइटेड किंगडम और यूरोपीय संघ के बीच एक स्वस्थ प्रतिस्पद्र्धा भी दिखाई पड़ती है। दोनों भारत के साथ लंबे समय से लंबित मुक्त व्यापार समझौते पर तेजी से आगे बढ़ने की कोशिश कर रहे हैं। इसलिए यह आश्चर्य की बात नहीं होनी चाहिए कि रूस-यूक्रेन युद्ध से संकट, पश्चिम के साथ भारत के बढ़ते जुड़ाव को मजबूत करेगा और यह भारतीय कूटनीति की असली कामयाबी है।
The post 26-04-2022 (Important News Clippings) appeared first on AFEIAS.
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The post 26-04-22 (Daily Audio Lecture) appeared first on AFEIAS.
Date:31-03-22
Northeast Hope Assam-Meghalaya accord should pave the way for resolving other border disputes in the region TOI Editorials
Assam and Meghalaya have signed a pact that resolves their interstate boundary dispute for six out of the 12 areas of differences. Recall that Assam has such boundary disputes with most of its neighbouring states that were carved out of undivided Assam. And these disputes have often boiled over into serious clashes. This was exemplified by deadly skirmishes between Assam and Mizoram police forces in July last year that left six Assamese policemen dead.
Keeping these disputes festering has neither been in national nor regional interest. But solving them has been tricky given that diverse ethnic populations of the region steadfastly hold on to their traditional cultural boundaries as opposed to constitutionally defined boundaries. The former date back to colonial times, whereas the states of Nagaland, Meghalaya, Mizoram and Arunachal Pradesh were carved out of Assam only in the 1960s and 70s. In fact, people residing along the Assam-Meghalaya border have long held two voter IDs corresponding to the two states.
Last year Assam and Meghalaya formed three committees each to look into their border dispute and asked locals to choose one of either state. With that process completed, the Survey of India will now demarcate the boundary as per the agreement. While this could become a template for resolving other border disputes in the Northeast, it’s true that the Assam-Meghalaya case was a little different – state governments made claims but locals lived side by side. But in the Assam-Mizoram and Assam-Nagaland disputes, there are allegations of encroachment into reserved forest areas of Assam, making resolution difficult. At the heart of the problem is the huge pressure on land combined with cultural sub-nationalism. Nonetheless, all states in the region must make concerted efforts to resolve interstate border disputes. This will not only help develop Northeast and actualise India’s Act East policy, but also prevent an adversarial China from fishing in troubled waters.
Date:31-03-22
Upping the Stakes In BIMSTEC ET Editorials
The renewed emphasis on regional cooperation at the 5th Bay of Bengal Initiative for Multi-Sectoral Technical and Economic Cooperation (Bimstec) meet is timely. This is not only because of the recent developments in Europe and questions it has raised about the stability of the world order, but also in the context of the turmoil underway in this year’s chair Sri Lanka as well as the political chaos in neighbouring Pakistan. India’s leadership is critical.
The importance of regional cooperation and support is something that Sri Lanka is well aware of. India has stepped in to help the country tide over its current economic hardships. As the leading economy of the region, India has taken the lead. New Delhi will be providing $1 million in aid to augment the Bimstec secretariat.
The grouping has been a work in progress since 1997. The adoption of a charter on Wednesday, giving the group a formally stated purpose, principles and architecture is a major step in ensuring a strong network that will work to improve the resilience and economies of the region. The signing of three legal instruments — mutual legal assistance in criminal matters, mutual cooperation between diplomatic academies, and establishment of Bimstec technology transfer facility in Colombo — give concrete basis to the direction the member states intend to travel. The idea is to enhance trade, investment, tourism, technology and energy in the Bay of Bengal region. Improving resilience to combat poverty, climate change, natural disasters and pandemics is another important plank. A robust Bimstec is also critical to ensuring a free and open Indo-Pacific region — to providing an alternative to efforts being made by a belligerent China in the immediate neighbourhood and beyond.
Date:31-03-22
Identity and privacy Prisoners’ identification Bill, which raises privacy and data safety concerns, requires deep scrutiny Editorial
The Union government’s latest proposal to enable the collection of biometric and biological data from prisoners, besides the usual physical measurements, photographs and finger-prints, raises serious questions about its legal validity. Such questions are inevitable in an era in which people look at official efforts to gather personal data with suspicion. The practice of recording the photographs and fingerprints of prisoners is more than a century old in the country, backed by a colonial law dating back to 1920. The Union government now proposes to expand the idea of taking “measurements” to cover “finger-impressions, palm-print impressions, foot-print impressions, … physical, biological samples and their analysis”, besides “behavioural attributes including signatures [and] handwriting”. The Criminal Procedure (Identification) Bill, 2022, which embodies this goal, has been introduced in the Lok Sabha. Some Members have argued that the Bill went against the Supreme Court’s landmark judgment declaring privacy as a fundamental right in K.S. Puttaswamy. Some contended that the Bill enabled coercive drawing of samples and possibly involved a violation of Article 20(3), which protects the right against self-incrimination. There are other concerns too, such as the means by which the data collected will be preserved, shared, disseminated, and destroyed. The Bill allows the records to be preserved for 75 years, and to be destroyed earlier if the person is discharged or acquitted.
The concern over privacy and the safety of the data is undoubtedly significant. Such practices that involve the collection, storage and destruction of vital details of a personal nature ought to be introduced only after a strong data protection law, with stringent punishment for breaches, is in place. The 1920 law enabled the taking of measurements from convicts sentenced to a prison term of one year and above, and anyone arrested on a charge that attracts such a prison term; and thirdly, one who has furnished a bond for good behaviour and peace. However, the present Bill includes all convicts, and anyone arrested under any law in force or detained under any preventive detention law. There is a provision by which an arrested person, not accused of an offence against a woman or a child, or one that attracts a prison term of seven years or more, may disallow the taking of samples. Not all detainees may know that they can indeed decline to let biological samples to be taken. And it may be easy for the police to ignore such refusal and later claim that they did get the detainee’s consent. The Bill is controversial, as the tendency to arrest activists, protesters and even innocent people and invoke grave charges is on the rise. It would be in the fitness of things if it is referred to a Standing Committee for deeper scrutiny before it is enacted into law.
Date:31-03-22
Explaining Sri Lanka’s economic crisis The country’s current situation is due to misguided policies and flawed external advice R. Ramakumar is Professor, Tata Institute of Social Sciences, Mumbai
The Sri Lankan economy has been facing a crisis owing to a serious balance of payments (BoP) problem. Its foreign exchange reserves are depleting rapidly. It is becoming increasingly difficult to import essential consumption goods. The country is unable to repay past debts. This article is an effort to locate the proximate causes of the current crisis and document the roles of different groups and organisations in its making.
One can, of course, trace the roots of the crisis to colonialism and Sri Lanka’s post-war developmental pathway but let us stick to the last decade for our purposes. Even in the 21st century, Sri Lanka’s economic fortunes continued to be tied to the export of primary commodities such as tea and rubber, and garments. It mobilised foreign exchange reserves through primary commodity exports, tourism and remittances, and used it to import essential consumption items including food.
When Sri Lanka emerged from a 26-year long war in 2009, it was expected that economic growth would revive. Possibly because of pent-up demand, Sri Lanka’s post-war GDP growth was reasonably high at 8-9% per annum between 2009 and 2012. However, the economy was on a downward spiral after 2013 as global commodity prices fell, exports slowed down and imports rose. The average GDP growth rate almost halved after 2013. A counter-cyclical fiscal policy was ruled out, as the hands of the then Mahinda Rajapaksa government were tied by a $2.6 billion loan obtained from the International Monetary Fund (IMF) in 2009. During the period of the war, budget deficits were high. Further, the capital flight that accompanied the global financial crisis of 2008 drained Sri Lanka’s foreign exchange reserves. The IMF loan in 2009 was obtained in this context, with the conditionality that budget deficits would be reduced to 5% of the GDP by 2011.
With no pick-up in growth or exports, and the continuing drain of foreign exchange reserves, the new United National Party (UNP)-led coalition government approached the IMF in 2016 for another US$1.5 billion loan for a three-year period between 2016 and 2019. The IMF’s conditionality was that the fiscal deficit must be reduced to 3.5% by 2020. Other conditionalities included a reform of the tax policy and tax administration; control of expenditures; commercialisation of public enterprises; flexibility in exchange rates; improvement of competitiveness; and a free environment for foreign investment.
The IMF package led to a deterioration of Sri Lanka’s economic health. GDP growth rates shrank from 5% in 2015 to 2.9% in 2019. Investment rate fell from 31.2% in 2015 to 26.8% in 2019. Savings rate fell from 28.8% in 2015 to 24.6% in 2019. Government revenues shrank from 14.1% of the GDP in 2016 to 12.6% of the GDP in 2019. Gross government debt rose from 78.5% of the GDP in 2015 to 86.8% of the GDP in 2019.
New shocks to economy
In 2019, there were two further shocks to the economy. First, the Easter bomb blasts of April 2019 in churches in Colombo led to the death of 253 people. Consequently, the number of tourists fell sharply leading to a decline in foreign exchange reserves. The blasts dealt a severe blow to the prospects of economic recovery.
Secondly, the UNP-led government was replaced in November 2019 by a new government led by the Sri Lanka Podujana Peramuna (SLPP), headed by Gotabaya Rajapaksa. The SLPP had promised lower tax rates and wide-ranging sops for farmers during their campaign. On the surface, these promises appeared divergent from the IMF package. However, in the absence of a concrete policy alternative to the IMF’s neoliberal package, these promises were hollow.
Gotabaya Rajapaksa was quick to implement the ill-advised plan to slash taxes. In December 2019, the value added tax (VAT) rates were reduced from 15% to 8%. The annual threshold for VAT registration was raised from LKR 12 million to LKR 300 million. The annual income threshold for waiver of personal income tax was raised from LKR 500,000 to LKR 3,000,000. The nation building tax, the PAYE tax and the economic service charges were abolished.
Estimates show that there was a 33.5% decline in the number of registered taxpayers between 2019 and 2020, and close to 2% of the GDP was lost in taxes thus foregone. GST/VAT revenues were halved between 2019 and 2020.
The COVID-19 pandemic in 2020 made the bad situation worse. Exports of tea, rubber, spices and garments suffered. Tourism arrivals and revenues fell further. The pandemic also necessitated a rise in government expenditures: the fiscal deficit exceeded 10% in 2020 and 2021, and the ratio of public debt to GDP rose from 94% in 2019 to 119% in 2021.
Sri Lanka annually spent about $260 million (or about 0.3% of its GDP) on fertiliser subsidies. Most of the fertilisers are imported. To prevent the drain of foreign exchange reserves, the Gotabaya government came up with a novel, but thoroughly bizarre, solution in 2021. All fertiliser imports were completely banned from May 2021, and it was declared that Sri Lanka would overnight become a 100% organic farming nation. This policy, which was withdrawn in November 2021 after protests by farmers, literally pushed Sri Lanka to the brink of a disaster. Agricultural scientists were unanimous in warning the Gotabaya government of the potential losses from the organic farming policy. They wrote to the government that yields may drop by 25% in paddy, 35% in tea and 30% in coconut if chemical fertilisers were banned.
Fertiliser ban fiasco
The scientists were proven right. In February 2022, the IMF assessed that there was a “worse-than-anticipated impact of the chemical fertiliser ban on agricultural production”, which was likely to drag down the prospects of economic recovery. As agricultural production fell, more imports of food became necessary. But increasing imports was difficult in the face of foreign exchange shortages. Thus, inflation rose to 17.5% in February 2022. Also, a fall in the productivity of tea and rubber led to lower export incomes. And thus, the organic farming policy, which aimed to soften the pressure on reserves, ended up straining them even further.
The current Sri Lankan economic crisis, then, is the product of the historical imbalances in the economic structure, the IMF’s loan-related conditionalities, misguided policies of authoritarian rulers and the official embrace of pseudo-science. The future looks bleak too. The government might approach the IMF once again for a new loan with fresh conditionalities. With the global outlook appearing dim, a renewed push to such a deflationary policy would not just limit the prospects of economic revival, but also exacerbate the sufferings of the Sri Lankan people.
Date:31-03-22
Race to the bottom for gig workers The food delivery sector is heading towards ‘quick delivery’ of food but is risking the safety of the delivery partners Mohan Mani is a Visiting Fellow with the Centre for Labour Studies at the National Law School of India University (NLSIU). Sachin Tiwari is an independent researcher and is associated with the Platform study at the Centre for Labour Studies. (NLSIU)
The recent announcement by Zomato CEO Deepinder Goyal of its plans to deliver food to customers in 10 minutes has raised a small twitter storm, forcing the CEO to put out a clarification. This raises several questions on the nature of delivery platforms, and the impact on delivery workers.
Platform industry is all about grabbing market share. This is done by introducing innovations to increase “efficiency”, which in the case of food delivery implies cost reduction and speed; both directly impact the platform worker, or “delivery partner” as he is euphemistically termed. It is the earnings of workers that represent the only variable cost element; cost reduction finally pinches his earnings. It forces him to “run twice as fast just to stay in the same place” to quote Alice in Wonderland.
Mr. Goyal in his clarification claimed, “We do not put any pressure on the delivery partner to deliver food faster.”
Well, in the platform world where the customer is the king (or queen), it is the delivery partner who will face the wrath of the customer for late delivery. There are enough anecdotal experiences from platform workers of the wrath turning ugly with customers even refusing to pay leaving the partner at the mercy of the platform, which often is insensitive to the grievances of the workers.
The Member of Parliament from Tamil Nadu, Karti Chidambaram was probably the most articulate among the Twitter responses. In a follow-up letter, he raised, among other queries, average earnings of the gig workers employed in food delivery, and average daily hours worked. The Centre for Labour Studies at the National Law School of India University (NLSIU) addresses these very questions in a recently completed study on food delivery platform work in the city of Bengaluru.
Major problems
First, on earnings of the platform worker – the numbers generally put out by platforms are the potential gross earnings a worker might earn.
In a system where all costs are borne by the worker, including fuel, asset cost including cost of maintenance and depreciation, all taxes and levies, the real earnings are substantially lower. At a time when fuel prices have been skyrocketing, some attention has been given to the impact of fuel on earnings in this sector.
However, the other cost elements are generally not discussed in popular reports. Between the two big daddies of the food delivery sector, Zomato and Swiggy, they claim creating employment for around five lakh “delivery partners”. They claim that these “partners” can earn a decent daily wage, with freedom to log on and off at will.
However, our study estimated that the net earnings for the worker was only around 40% of the total gross earnings from delivery pay-outs and incentives, with 30% eaten up by fuel costs and another 30% on various capital costs and levies.
What this meant was that the worker could make the platform worthwhile, with some money in the pocket after meeting all fixed cost obligations only if he stayed on the platform for really long hours. There was no question of the freedom to log on and off at will.
This leads to the second question of work intensity. Our study showed that over a window of a week, the worker averaged up to 13 hours per day, covering over 190 kilometres each day. Mr. Goyal, in his responses, explained the 8-principles around which Zomato was building its instant delivery platform — the seventh principle was delivery partner safety.
Well, at 13 hours and 190 kilometres travel on a two-wheeler through busy city traffic, it is surely impossible to ensure delivery partner safety.
Human value
Mr. Goyal was candid to state that innovation was the only way to survive and thrive in the food industry. His company has surely thrived, with current market prices giving the company market capitalisation of close to ₹1 lakh crore! The question is whether his “delivery partner” has been a partner in this prosperity? The contribution of the platform to technology and lifestyle improvement cannot be denied, particularly during the course of the pandemic. However, there is also the human involvement, providing the last link to make the platform an efficient delivery machine.
Surely this link is equally important to the ultimate success of the industry. Maybe the MP from Tamil Nadu can also get some answers to his queries through this study’s findings.
Date:31-03-22
Benign corruption and bigger enemies Contractors’ allegations of ‘commission’ system has failed to generate a debate on corruption S Bageshree
It was back on July 6, 2021, that the Karnataka State Contractors Association wrote to Prime Minister Narendra Modi, accusing the government machinery of extracting kickback of up to 40% for award of government contracts and clearance of bills. They pointed fingers at various layers of the hierarchy, from people’s representatives to bureaucrats. Though B.S. Yediyurappa was in office then, the association made the letter public in November, after Basavaraj Bommai took over, alleging that little had changed.
Though the Chief Minister had announced two committees headed by retired judges to scrutinise the tender estimates and conditions, there has been little talk on it since. Now, three months later, the association has threatened to launch an agitation by the end of April, stating that its grievance has gone unaddressed despite escalating it all the way to the top. But the State Government refused to reply to a question raised on the issue in the just-concluded Budget session, arguing that the allegation has no shred evidence.
A failed attempt
One of the grounds for change of guard in Karnataka, on July 28, 2021, was the repeated allegations of corruption against Mr Yediyurappa and members of his family. The situation had reached such a pass that Rural Development and Panchayat Raj Minister K.S. Eshwarappa had lodged a complaint with the Governor on “interference” in his Department by the CMO. Transfer of power to Mr. Bommai was meant to cleanse the system. Coincidence or otherwise, Mr. Yediyurappa stepped down within weeks of the contractors’ letter reaching PMO. But the renewed threat of agitation by the contractors is an indication of the cleansing process not going very far.
Corruption seems to be a “non-issue” in public discourse as Karnataka gets set for elections next year. In what appears to be a conscious change of course, particularly post-Uttar Pradesh results, BJP in Karnataka is stepping on the communal polarisation pedal hard. Even the eye-popping numbers being cited by the contractors — uncleared bills running to several thousand crore — are overshadowed by various communally divisive issues being pushed to the foreground. They range from banning hijab-clad girls from entering classrooms to attempts at introducing Bhagavad Gita in school curriculum. Public cynicism about corruption being a “norm” across parties and in all dispensations has made this effort easier. The mutually beneficial contractor-political class nexus being as old as the hills and the association only protesting the kickbacks going as high as 40% too is not a point missed by anyone.
Though Opposition Congress has every now and then reminded Mr. Modi that his calling the Siddaramaiah-led Government “10 percent sarkar” has now boomeranged and taunted him on the famous “Na khaunga, na khane doonga” slogan, it has not gained the expected traction. While part of the reason could be that the criticism comes from people who themselves can hardly boast of a clean image, more importantly, Congress is most often left reacting to the discourse set by the BJP. Janata Dal(Secular) has steered clear of the issue. Party leader and former Chief Minister H.D. Kumaraswamy has advised contractors that everything would be set right if they simply stop paying commission.
The “40 percent commission” episode in Karnataka is an indicator of the extent to which corruption is normalised and how easily people’s attention can be diverted from it by pointing to a “bigger enemy”, even when they are aware that the final victims of such a system are themselves.
Date:31-03-22
क्या अब गन्ना-किसानों के दिन फिरेंगे? संपादकीय
यह सच है कि देश की हजारों चीनी मिलें गहरे संकट में पिछले कुछ वर्षों से हैं क्योंकि अति-उत्पादन के कारण चीनी के दाम देश में ही नहीं विश्व-बाजार में भी गिरते जा रहे हैं। स्वास्थ्य सम्बन्धी चेतना के तहत वैसे भी लोग कम मीठा खाने लगे हैं और कई देश गन्ना की जगह अन्य कृषि उत्पादों से सस्ती चीनी बनाने लगे हैं। देश के करोड़ों गन्ना-किसानों के लिए बड़ी समस्या मुंह बाए खड़ी है। घाटे के कारण चीनी मिलें भुगतान नहीं कर पा रही हैं और अंततः बंद हो रही हैं। ऐसे में केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री की घोषणा सामने आई है कि आने वाले दिनों में हवाई जहाज में भी ईंधन के रूप में इथेनोल इस्तेमाल करने का प्रयोग जोर-शोर से चल रहा है। दरअसल इथेनोल चीनी (मोलेसेस) से बनाया जाता है यानी कृषि उत्पाद का बायो-फ्युएल में परिवर्तन। दुनिया में वैकल्पिक ईंधन पर शोध किया जा रहा है, क्योंकि तेल के भंडार अक्षय नहीं हैं, साथ ही तेल प्रदूषण का बड़ा कारण भी है। भारत में चीनी मिलों ने पिछले दो वर्षों में बड़े पैमाने पर इथेनोल बनाना शुरू किया है और अगले दो वर्षों में इथेनोल के हजारों विक्रय-केंद्र दिखाई देंगे। मंत्रालय की योजना है कि दोपहिया वाहनों और कारों को पूरी तरह इथेनोल-आधारित कर दिया जाएगा और इसके लिए दुनिया की कई बड़ी वाहन निर्माता कम्पनियां उत्सुकता दिखा रही हैं। भारत में पेट्रोल-डीजल का 84 प्रतिशत आयात किया जाता है। देश में ही विकल्प मिल जाएगा तो विदेशी पूंजी बचेगी। परिवहन वाले इथेनोल की कीमत भारत में फिलहाल 46 रु. प्रति लीटर है जबकि पेट्रोल कई जगह सैकड़ा पार कर चुका है। पेट्रोल में इथेनोल का मिश्रण 5 से बढ़ाकर 20% करने का ऐलान पीएम के उद्बोधन में भी देखा गया।
Date:31-03-22
समझौते से होगी प्रगति संपादकीय
पूर्वोत्तर के राज्यों असम और मेघालय के बीच हुए सीमा समझौते ने क्षेत्र में स्थायी शांति की उम्मीद जगा दी है। दोनों राज्यों में हुआ समझौता अन्य राज्यों के लिए मॉडल बनकर विवादों को सुलझाने की नई राह दिखा सकता है। बीते पांच दशकों से दोनों राज्यों के बीच जारी सीमा विवाद सुलझाने के लिए मंगलवार को नई दिल्ली में दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने एक ऐतिहासिक समझौते पर हस्ताक्षर किए। 1972 में असम से अलग करके मेघालय राज्य का गठन किए जाने के साथ ही दोनों राज्यों में विवाद चल रहा था और कई बार हिंसक झड़प का रूप ले चुका था। 2010 में ऐसी ही एक घटना में लैंगपीह में पुलिस गोलीबारी में चार लोग मारे गए थे। दोनों राज्यों में बारह स्थानों पर विवाद था। इस समझौते के जरिए छह स्थानों का विवाद सुलझा लिया गया है। इस समझौते से नगालैंड, अरुणाचल प्रदेश और मिजोरम के साथ असम के सीमा विवाद को भी सुलझाने का मार्ग प्रशस्त हो सकता है। असम-मेघालय सीमा विवाद सुलझाने की लंबे समय तक कोशिशें चलीं लेकिन कोई हल नहीं निकला था। 1985 में वाईवी चंद्रचूड़ समिति का गठन किया गया था। लेकिन उसकी रिपोर्ट बाहर ही नहीं आई। इस समझौते से कुल सीमा का 70 फीसदी विवाद सुलझ गया है। उम्मीद है कि अगले छह-सात महीनों में बाकी 30 प्रतिशत इलाके का विवाद भी सुलझ जाएगा। इस समझौते की राह में प्रधानमंत्री और गृह मंत्री की यह अपील बहुत उत्प्रेरक बनी कि जब भारत-बांग्लादेश आपसी सीमा विवाद सुलझा सकते हैं, तो देश के दो राज्य क्यों नहीं। दोनों राज्यों के मुख्यमंत्रियों ने सीमा विवाद सुलझाने के लिए 29 जनवरी को गुवाहाटी में एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए थे। इसके मुताबिक असम 18.51 वर्ग किमी. जमीन अपने पास रखेगा और बाकी 18.28 वर्ग किमी. मेघालय को देगा। उम्मीद है कि यह समझौता पूर्वोत्तर राज्यों के दशकों पुराने सीमा विवाद को सुलझाने के लिए एक मॉडल के रूप में काम करेगा। असम के बंटवारे में ही सीमा विवाद की जड़ें छिपी हैं। बीते पांच-छह दशकों के दौरान इस मुद्दे को सुलझाने की कोई ठोस पहल नहीं हुई। अब इस समझौते से पूर्वोत्तर में असम के अन्य राज्यों से चल रहे विवादों के सुलझने की उम्मीद बनी है। राज्यों में चल रहे आपसी सीमा विवादों का खमियाजा मासूम लोग तो भुगतते ही हैं, प्रगति भी प्रभावित होती है। अब ये राज्य शांति और खुशहाली के साथ प्रगति के पथ पर एक साथ आगे बढ़ेंगे।
Date:31-03-22
देउबा की भारत यात्रा संपादकीय
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के निमंत्रण पर नेपाल के प्रधानमंत्री शेर बहादुर देउबा अपनी पत्नी आरजू देउबा के साथ एक अप्रैल को तीन दिवसीय भारत यात्रा पर आ रहे हैं। उनकी इस यात्रा से दोनों देशों के द्विपक्षीय संबंधों में नये आयाम जुड़ेंगे। हिमालयी राष्ट्र नेपाल और भारत के बीच सदियों पुराने धार्मिंक, सांस्कृतिक, व्यापारिक और राजनीतिक रिश्ते विशेष संबंधों पर आधारित हैं। हालांकि नेपाल में जब कम्युनिस्ट पार्टी सत्ता में आती है तब दोनों देशों के रिश्तों में गतिरोध भी पैदा होता है। कम्युनिस्ट नेता भारत विरोधी भावनाएं भड़काने का काम बढ़-चढ़कर करते हैं। कम्युनिस्ट नेता केपी शर्मा ओली के कार्यकाल में दोनों देशों के रिश्तों में दरारें आई थीं। लेकिन अब यह अतीत की बात हो गई है। नेपाली कांग्रेस के नेता शेर बहादुर देउबा के प्रधानमंत्री बनने के साथ ही रिश्ते सामान्य हो गए हैं। जुलाई, 2021 में देउबा ने प्रधानमंत्री का पद संभाला था। उनकी यह यात्रा चीन के विदेश मंत्री वांग यी की नेपाल यात्रा के बाद हो रही है। इसलिए देउबा की भारत यात्रा को कूटनीतिक क्षेत्र में बहुत महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है। वास्तव में कम्युनिस्ट प्रधानमंत्री ओली के कार्यकाल में नेपाल का झुकाव चीन की ओर हो गया था। नेपाल की भू-राजनीतिक स्थिति ऐसी है कि यहां चीन के साथ अमेरिका की भी विशेष दिलचस्पी रहती है। हाल ही में अमेरिका ने मिलेनियम चैलेंज कॉरपोरेशन कॉम्पेक्ट के तहत नेपाल को 500 मिलियन अमेरिकी डॉलर की विकास सहायता दी है। माना जा रहा है कि नेपाल में चीन की सक्रियता को कम करने के लिए अमेरिका ने यह मदद की है। नेपाल भारत के लिए भी विशिष्ट महत्त्व रखता है, दोनों देशों की उपासना और पूजा पद्धति समान हैं और रोटी-बेटी के रिश्ते हैं। भारत के स्वतंत्रता संग्राम से प्रभावित होकर नेपाली कांग्रेस के नेताओं ने नेपाल को राणाशाही की निरंकुश सत्ता से मुक्ति दिलाई थी। इसलिए नेपाली कांग्रेस के नेता भारत के प्रति विशेष सम्मान का भाव रखते हैं। उम्मीद है कि देउबा की भारत यात्रा से दोनों देशों के बीच व्यापार, संपर्क, निवेश, बिजली और स्वास्थ्य के क्षेत्र में विशेष तौर पर प्रगति होगी। माना जा रहा है कि प्रधानमंत्री मोदी और देउबा के बीच होने जा रही मुलाकात में चीन और अमेरिका के साथ संबंधों को लेकर आपसी चर्चा हो सकती है।
Date:31-03-22
सामाजिक न्याय की दरकार डॉ. फैयाज अहमद फैज
एक महत्त्वपूर्ण राजनैतिक घटनाक्रम में उत्तर प्रदेश की नवनियुक्त भाजपा सरकार ने अपनी परंपरा से हटते हुए मुस्लिम समाज में सामाजिक न्याय के प्रश्न को दृष्टिगोचर रखते हुए देशज पसमांदा समाज से आने वाले अपने कैडर दानिश आजाद को मंत्रालय में जगह दी है। ज्ञात रहे कि अब तक भाजपा में शिया सैय्यद ही ऐसे उच्च पदों पर आसीन होते रहे हैं। भारत के राजनैतिक इतिहास में यह दूसरी घटना है जहां एक राष्ट्रीय स्तर की पार्टी ने मुस्लिम समाज में सामाजिक न्याय को ध्यान में रखते हुए जातीय संरचना में पिछड़े कहे जाने वाले समाज को भागीदारी दी है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान मुस्लिम विमर्श की वकालत करती मुस्लिम लीग के विरोध में उस समय के आसिम बिहारी के नेतृत्व में मुस्लिम समाज में सामाजिक न्याय के लिए संघषर्रत जमीयतुल मोमिनीन (मोमिन कॉन्फ्रेंस) ने संगठन और पसमांदा समाज की साधनविहीनता (उस समय वयस्क मतदान का अधिकार नहीं था और पढ़े-लिखे एवं पैसे वाले लोगों को ही मतदान का हक था जिससे पिछड़ा समाज लगभग वंचित था) के बावजूद मुस्लिम लीग को 1946 के चुनाव में अनेक सीटों पर मात दी थी जिसका संज्ञान लेते हुए सरदार पटेल ने स्वतंत्रता के बाद बिहार में बनने वाली सरकार में कांग्रेस की अशराफ लीडरशिप के विरोध के बावजूद मोमिन कॉन्फ्रेंस के दो साथियों नूर मुहम्मद और अब्दुल कय्यूम अंसारी को कांग्रेस की शपथ पर हस्ताक्षर कराए बिना मंत्रिमंडल में शामिल करवाया था।
ऐसा नहीं है कि भाजपा ने चुनाव जीतने के बाद ही इस ओर ध्यान दिया है। चुनाव से बहुत पहले ही उसने अल्पसंख्यक आयोग, मदरसा बोर्ड और उर्दू अकादमी के अध्यक्ष पदों पर पसमांदा समाज से आने वालों की नियुक्ति कर अपनी मंशा स्पष्ट कर दी थी। यह बात ध्यान देने की है कि अब तक इन अल्पसंख्यक संस्थानों के अध्यक्ष पद पर पारंपरिक रूप से लगभग सभी पार्टयिों द्वारा मुस्लिम समाज के उच्च शासकवर्गीय अशराफ मुसलमानों को ही नियुक्त किया जाता रहा है। हुनर हाट के आयोजन के माध्यम से भी मुस्लिम समाज की वंचित पिछड़ी जातियों को जोड़ने का प्रयास किया गया। मुस्लिम पिछड़ी जातियों में अधिकतर कामगर जातियां आती हैं, जो हुनर हाट जैसे कार्यक्रम से सीधे संबंधित हैं। आगामी लोक सभा चुनाव को ध्यान में रखते हुए यूपी मंत्रीमंडल में पसमांदा को शामिल कर इस दिशा में एक और कदम बढ़ाया गया है। ज्ञात रहे कि पसमांदा मुसलमान कुल मुस्लिम संख्या का 90% हैं। इनमें से कुछ प्रतिशत को भी पार्टी प्रभावित कर ले गई तो मुस्लिमों की बड़ी संख्या का वोट उसके पक्ष में हो सकता है।
पसमांदा आंदोलन के साथी चुनाव के दौरान लगातार मांग कर रहे थे कि पूर्वाचल की बुनकर बेल्ट से बुनकर को टिकट दिया जाए लेकिन प्रमुख विपक्षी पार्टी ने बुनकरों का वोट तो भरपूर लिया किंतु टिकट देना गवारा नहीं किया। दानिश आजाद पूर्वाचल के बुनकर समाज से आते हैं, जहां बुनकरों की बड़ी संख्या आबाद है। दानिश आजाद के मंत्रीमंडल में शामिल होने के साथ ही मुस्लिम समाज के सामाजिक न्याय का प्रश्न एक बार फिर चर्चा में आ गया है। सोशल मीडिया में खुलेआम अशराफ वर्ग के नौजवानों और बुजुगरे, जिनमें खुद को सेक्युलर, लिबरल, कट्टर धार्मिंक और राष्ट्रवादी कहने वाले लगभग सभी प्रकार के लोग हैं, द्वारा जातिसूचक अपमानजनक शब्द ‘जुलाहा’ का प्रयोग कर पूरे पसमांदा समाज के मान-सम्मान को तार-तार करने का प्रयास किया जा रहा है। इसे आप चंद लोगों के मानसिक दिवालियापन का नाम दे सकते हैं, लेकिन समाजवादी पार्टी के प्रवक्ता शहजाद अब्बास द्वारा एक चैनल डिबेट में यह कहना कि शिया को भागीदारी न देकर पसमांदा के नाम पर ऐसे चेहरे को मंत्री बनाना जिसे कोई नहीं जानता, मुसलमानों का अपमान है। इससे अर्थ निकलता है कि सैय्यद मंत्री बने तो मुसलमानों का सम्मान और देशज पसमांदा बने तो मुसलमानों का अपमान है। एक यूटय़ूब चैनल पर वरिष्ठ पत्रकार सैय्यद कासिम ने बुनकर समाज को मुसलमानों में आर्थिक और शैक्षिक रूप से सबसे मजबूत बिरादरी बताया। उन्हें कमजोर तबका मानने से इंकार किया जबकि यह पूर्णत: सत्य से परे है। मंडल कमीशन, रंगनाथ मिश्र कमीशन और सच्चर कमेटी की रिपोटरे के आधार पर मुस्लिम बुनकर समाज हर रूप से पिछड़ा है, और इसी कारण केंद्र और राज्य की आरक्षण लिस्ट में अन्य पिछड़े वर्ग में आता है जबकि हिंदू समाज का बुनकर वर्ग अनुसूचित जाति में आता है।
उर्दू मीडिया भी दानिश आजाद से आरएसएस की विचाराधारा से संबंधित असहज सवाल पूछ रहा है। शायद ही कभी उर्दू मीडिया ने भाजपा के किसी अशराफ लीडर से ऐसे सवाल किए हों। क्या आपने कभी देखा है कि किसी हिंदू पिछड़े दलित को राजनैतिक भागीदारी मिलने पर सवर्ण समाज की तरफ से सोशल मीडिया पर इस प्रकार से गाली-गलौज की जाती हो या किसी राजनैतिक पार्टी के प्रवक्ता द्वारा एक वंचित को राजनैतिक भागीदारी मिलने पर हिंदू समाज का अपमान बताया जाता हो? जबकि यही लोग इससे पहले शिया-सैय्यद लोगों के मंत्री बनाए जाने पर लगभग खामोश रहा करते थे।
कुशीनगर के रामकोला में भाजपा कार्यकर्ता बाबर की हत्या के पीछे यही मानसिकता उत्प्रेरक की भूमिका में प्रतीत होती है। इसका एक ऐतिहासिक पक्ष भी है, 1946 के इलेक्शन में कानपुर में एक पसमांदा कार्यकर्ता अब्दुल्लाह की मुस्लिम लीग के खिलाफ प्रचार करने के कारण हत्या करवा दी गई थी। होना तो यह चाहिए था कि मुस्लिम समाज का नेतृत्व करने वाले अशराफ वर्ग को अपने द्वारा संचालित संस्थाएं जैसे मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, इमारते शरिया आदि में मुस्लिम समाज के वंचित तबकों को भी भागीदारी देकर सामाजिक न्याय की स्थापना करनी चाहिए न कि लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार में पसमांदा की भागीदारी पर इस तरह का क्षोभ प्रकट करे। इस पूरे प्रकरण से यह बात पूरी तरह साफ हो जाती है कि मुस्लिम समाज में जातिवाद की जड़ें कितनी गहरी हैं, और समाज में सामाजिक न्याय की तत्काल कितनी गंभीर रूप से आवश्यकता है।
Date:31-03-22
पूर्वोत्तर में नई उम्मीद संपादकीय
केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह की मध्यस्थता के कारण असम और मेघालय के बीच करीब पांच दशक पुराने सीमा विवाद को खत्म करने को लेकर बनी सहमति एक बड़ी कामयाबी है। यकीनन, इससे भारतीय संघ-राज्य की परिकल्पना और मजबूत हुई है। संघीय ढांचे में दो राज्यों या दो प्रशासनिक इकाइयों के बीच भौगोलिक सीमाओं या संसाधनों के बंटवारे को लेकर मतभेद एक सामान्य बात है। ऐसे किसी विवाद में आदर्श स्थिति तो यही है कि संबंधित सूबों के मुख्यमंत्री या प्रशासक भारतीय संविधान की भावना का आदर करते हुए आपसी समझ-बूझ से इसे दूर कर लें, क्योंकि सभी प्रदेशों में बसने वाले लोग अंतत: अखंड भारत के ही नागरिक हैं और किसी के हितों की अनदेखी उचित नहीं है। पर अमूमन ऐसा होता नहीं है, मुद्दे उलझते जाते हैं और फिर वे केंद्र के पास या अदालत की शरण में पहुंच जाते हैं। कई बार तो ये हिंसक मोड़ भी ले लेते हैं, जैसा कि असम और मेघालय के मामले में पिछली जुलाई में हुआ था। तब दोनों सूबों के सुरक्षाबलों की झड़प में असम पुलिस के कई जवानों की जान चली गई थी और केंद्र को हस्तक्षेप करना पड़ा था।
सन् 1972 में असम से ही काटकर मेघालय का गठन हुआ था और तभी से करीब 500 वर्गमील इलाके पर अधिकार को लेकर दोनों राज्यों में अनबन रही है। ऐसे में, प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के सक्रिय हस्तक्षेप के बाद अब दोनों पड़ोसी राज्यों ने विवाद के 12 में से छह बड़े बिंदुओं पर समझौता कर लिया है। उम्मीद है, बकाया मुद्दे भी जल्द सुलझा लिए जाएंगे। वैसे भी, दोनों प्रदेशों में एनडीए की सरकारें हैं, और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शुरू से खास तौर पर पूर्वोत्तर के आर्थिक विकास की पैरोकारी करते रहे हैं। उनकी सरकार बखूबी जानती है कि जब तक इन प्रदेशों में स्थायी शांति नहीं होगी, तब तक उनका विकास अवरुद्ध रहेगा। इसीलिए पूर्वोत्तर के प्रदेशों में कई स्तरों पर शांति-वार्ताएं की जाती रही हैं, और इनके नतीजे भी मिले हैं। खुद केंद्रीय गृह मंत्री ने कहा है, पिछले तीन वर्षों के दौरान इन प्रदेशों में 6,900 सशस्त्र विद्रोहियों ने आत्म-समर्पण किया है।
यह दुखद है कि देश के दो सबसे खूबसूरत भौगोलिक इलाके, जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर ज्यादातर अशांति की चपेट में रहे और न तो विदेशी-घरेलू पर्यटकों की मेजबानी के जरिये ये अपना आर्थिक हित साध सके, और न ही देश की औद्योगिक तरक्की का लाभ उठा सके। इन प्रदेशों में न रेलवे का विस्तार हुआ और न ही सड़कों का पर्याप्त विकास हो सका। निस्संदेह, इन प्रदेशों के राजनीतिक नेतृत्व की यह सामूहिक विफलता है, क्योंकि उन्होंने अपने सियासी नफे-नुकसान के कारण क्षेत्रीय आकांक्षाओं की लगातार अनदेखी की। ऐसे में, असम और मेघालय के बीच हुआ ताजा समझौता नई आशा जगाता है कि पूर्वोत्तर में अमन बहाली के काम को अब और गति मिल सकेगी। चूंकि असम के मुख्यमंत्री पिछले कई वर्षों से पूर्वोत्तर में भारतीय जनता पार्टी के बड़े रणनीतिकारों में शामिल रहे हैं, ऐसे में स्थानीय हितधारकों से उनका संपर्क-संवाद स्वाभाविक है। केंद्र सरकार इसका लाभ उठाते हुए यदि वहां व्यापक क्षेत्रीय समझ विकसित कर सकी, तो पूर्वोत्तर के साथ-साथ पूरे भारत को इसका फायदा होगा। देश के कई पड़ोसी प्रदेशों में अलग-अलग राजनीतिक पार्टियों की सरकारें हैं, जिनके बीच दशकों से तरह-तरह के विवाद हैं। उनके लिए भी यह समझौता एक प्रेरक उदाहरण हो सकता है।
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हाल ही में कर्नाटक राज्य के कई शिक्षण संस्थानों में हिजाब पहनने को लेकर विवाद हुआ है। इस संदर्भ में उच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में शैक्षणिक संस्थानों में हिजाब को प्रतिबंधित रखने का निर्णय दिया है, जो कई स्तरों पर गलत है।
कुछ बिंदु –
न्यायालय इस बात की जांच करने में विफल रहा कि निर्धारित यूनिफार्म के अलावा, हिजाब पहनना, स्कूल या कॉलेज में प्रवेश से इंकार करने का आधार बन सकता है।
छात्रों ने हिजाब पहनने को इस्लाम की अनिवार्य प्रथा बताया था, जिस पर न्यायालय ने कुरान की आयतों की जांच की और इसे खारिज कर दिया।
छात्रों ने संविधान के अनुच्छेद 25 के तहत धार्मिक स्वतंत्रता के हिस्से के रूप में संवैधानिक सुरक्षा से जोड़कर अपना पक्ष रखा था।
इस पर न्यायालय ने दलीलों में विस्तार के अभाव का हवाला दिया।
दलील दी गई थी कि एक बहुलवादी समाज में छात्रों के बीच समानता की भावना को कम किए बिना कक्षा को सामाजिक विविधता को प्रतिबिंबित करने की अनुमति मिलनी चाहिए। न्यायालय ने इसे खारिज कर दिया।
न्यायालय ने कहा है कि छात्र-छात्राओं को यूनिफॉर्म उल्लंघन या मनमाने कपड़े पहनकर स्कूल आने का अधिकार नहीं है।
न्यायालय का निर्णय, संवैधानिक सिद्धांतों को कमजोर करने वाला लगता है। न्यायालय ने अनुच्छेद 25 के संरक्षण का दावा जिस तरह से किया, उसे समानता, गरिमा और गोपनीयता जैसे संवैधानिक मूल्यों के लिए किया जाता, तो बेहतर होता। धर्म की स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है, क्योंकि स्वतंत्रता महत्वपूर्ण है, इसलिए नहीं कि धर्म महत्वपूर्ण हैं।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 17 मार्च, 2022
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Date:30-03-22
Who’ll Police Cops? Overhaul of India’s crime-fighting laws was overdue, but the new bill suffers from over-reach & ambiguous drafting TOI Editorials
The Criminal Procedure (Identification) Bill authorising the collection, storage and analysis of biological samples, biometrics and physical measurements of convicts, arrested persons and those in preventive detention is let down by bad drafting. The Identification of Prisoners Act, 1920, which the Bill seeks to replace restricts itself to finger/foot prints of arrested persons and their storage only for convicted persons, needed an upgrade. Agencies like FBI have moved on to advanced biometrics. And such data certainly has crime-fighting uses.
But this positive intent is defeated by the Bill’s provisions. Take the carte blanche to police officers in sample collection. While those arrested for offences carrying less than seven years imprisonment or not facing sexual crimes against women or children can refuse to give samples, actual policing in India rarely gives such leeway to ordinary citizens to withhold their consent. With computing power no longer a finite phenomenon, data collection eased by handheld devices, and all state governments competing to build multidimensional databases, there may be no holding back the thana cop. A better legislative design would have inverted the process to mandate police officers to secure amagistrate’s order to collect samples.
Lumping those in preventive detention, who are essentially held on apprehension of breach of public order even before committing any act of criminality, with convicts and those arrested for major offences, has rightly irked opposition parliamentarians. Centre mustn’t see this as the usual pushback against anything it proposes; India has a long history of state governments using police departments to hound opponents. The Bill has simply not provided enough checks and balances to prevent abuse of its provisions by police to harass or implicate innocent persons. Also, it neither dwells on unauthorised access to stored data through hacking, nor on misuse of data by the police.
Even dubious techniques like narco-analysis, which the Supreme Court ruled inadmissible as evidence, or prone-to-abuse facial recognition can become commonplace. The Bill’s definition of “measurements” surpasses biometrics and biological data to offer a wide berth for “any other examination referred to in Section 53 and 53A of Criminal Procedure Code”. These two CrPC sections are, in turn, loosely worded to allow for “such other tests which a registered medical practitioner thinks necessary”.
Finally, while the Bill’s bet on big data to increase conviction rate is understandable, there’s no government action on bolstering fundamentals like more forensic facilities. In 2019, only 27% of India’s cops reported always having access to forensic technology at thanas. And courts across India bemoan delays caused by too few forensic science labs.
Date:30-03-22
Bridging the bay in quest of a stronger BIMSTEC The grouping has potential as a natural platform for development cooperation in a rapidly changing Indo-Pacific region Rajeev Ranjan Chaturvedy is Associate Professor and Coordinator of the Centre for Bay of Bengal Studies at Nalanda University, Bihar
Sri Lanka is gearing up to host the Fifth Bay of Bengal Initiative for Multi-Sectoral Technical and Economic Cooperation (BIMSTEC) Summit, now in its silver jubilee year (the summit is being held in virtual/hybrid mode on March 30, and Sri Lanka is the current BIMSTEC chair). This special occasion makes it imperative for BIMSTEC leaders to reinforce their commitments and efforts in building the momentum of collaborations in the Bay of Bengal region for the security and development of all.
This summit is expected to build the required momentum of collaborations among the member states — Bangladesh, Bhutan, India, Myanmar, Nepal, Sri Lanka and Thailand — as there has been commendable teamwork among them and a finalisation of several agreements to enhance regional strategic and economic integration. The unique ecology of BIMSTEC is witnessing enriched political support and commitment from India.
Undoubtedly, BIMSTEC has special significance for India in a changing mental map of the region. India has made the Bay of Bengal integral to India’s ‘Neighbourhood First’ and ‘Act East’ policies which can accelerate the process of regional integration. BIMSTEC matters for India and the region.
An area of importance
Finalising the BIMSTEC Charter; BIMSTEC Master Plan for Transport Connectivity; BIMSTEC Convention on Mutual Legal Assistance in Criminal Matters; BIMSTEC Technology Transfer Facility (TTF); cooperation between diplomatic academies/training institutions; and a template of Memorandum of Association for the future establishment of BIMSTEC centres/entities present signs of optimism as well as the comeback of the Bay of Bengal as a new economic and strategic space.
Further, the economic and strategic significance of the Bay of Bengal is growing rapidly with a re-emergence of the idea of the ‘Indo-Pacific’ region. This notion assumes that the growing economic, geopolitical and security connections between the Western Pacific and the Indian Ocean regions are creating a shared strategic space. The Bay of Bengal is evolving as the centre of the Indo-Pacific region again. The renewed focus has given a new lease of life to the developmental efforts in the region, in particular BIMSTEC.
As the BIMSTEC process turns 25 years, it is all set to make visible progress through advancing concrete cooperation among the member states. They have invested some fresh energy in the last couple of years to make BIMSTEC a valuable institution for regional integration and collaboration.
A bridge between Asias
BIMSTEC has huge potential as a natural platform for development cooperation in a rapidly changing geopolitical calculus and can leverage its unique position as a pivot in the Indo-Pacific region. There has been tangible progress in BIMSTEC cooperation in several areas that include security, counter-terrorism, intelligence sharing, cybersecurity and coastal security, and transport connectivity and tourism, among others.
The growing value of BIMSTEC and its attempt to generate synergy through collective efforts by member states can be understood, for three key reasons. First, there is a greater appreciation of BIMSTEC’s potential due to geographical contiguity, abundant natural and human resources, and rich historical linkages and a cultural heritage for promoting deeper cooperation in the region. Indeed, with a changed narrative and approach, the Bay of Bengal has the potential to become the epicentre of the Indo-Pacific idea — a place where the strategic interests of the major powers of East and South Asia intersect. Political support and strong commitment from all member countries are crucial in making BIMSTEC a dynamic and effective regional organisation.
Need for connectivity
Second, BIMSTEC serves as a bridge between two major high-growth centres of Asia — South and Southeast Asia. Connectivity is essential to develop a peaceful, prosperous and sustainable Bay of Bengal region. Therefore, BIMSTEC needs to address two dimensions of connectivity – one, upgrading and dovetailing national connectivity into a regional road map; and two, development of both hard and soft infrastructures.
The BIMSTEC Master Plan for Transport Connectivity will provide the necessary boost to connectivity. There is growing involvement of educational institutions, industries and business chambers through various forums and conclaves which are helping to enhance cooperation in the areas of education, trade and investments, information technology and communication among others. Resisting the temptation to make lofty promises, the BIMSTEC leaders have focused on priority areas through a concrete action plan on time.
India’s role
Third, the BIMSTEC Secretariat coordinates, monitors and facilitates the implementation of BIMSTEC activities and programmes. The leaders must agree to strengthen the institutional capacity of the BIMSTEC Secretariat. Approval of a charter for BIMSTEC during the summit will further augment its visibility and stature in international fora. Likewise, India has implemented its promise to set up a Centre for Bay of Bengal Studies (CBS) at Nalanda University, Bihar for research on art, culture and other subjects related to the Bay of Bengal. The quest for economic growth and the development of the BIMSTEC region can be achieved with single-minded focus and cooperation among the member counties. In this endeavour, India has a key role in accelerating regional cooperation under the BIMSTEC framework and in making it vibrant, stronger and result-oriented.
Date:30-03-22
किसानों की घटती आय पर चिंता संपादकीय
कृषि, पशुपालन और खाद्य-प्रसंस्करण से सम्बंधित स्थायी संसदीय समिति ने लोकसभा में प्रस्तुत रिपोर्ट में पिछले तीन वर्षों से लगातार कृषि एवं किसान कल्याण विभाग द्वारा कुल 67,929 करोड़ रु. का फंड इस्तेमाल न किए जाने पर नाराजगी व्यक्त की है। रिपोर्ट के अनुसार झारखण्ड, ओडिशा, मध्यप्रदेश और नागालैंड में किसानों की आय 2015-16 से 2018-19 के बीच 5 से 25 प्रतिशत तक घटी है। जबकि राष्ट्रीय स्तर पर किसानों की आय इस काल में 8059 रु. से बढ़ कर 10218 रु. हो गई है। समिति इस बात से नाखुश है कि किसानों के कल्याण के लिए जिम्मदार विभाग राशि वापस करता रहा यानी किसानों की आय दूनी करने की योजना विभाग ने भुला दी। रिपोर्ट ने फसल बीमा योजना पर तमाम राज्यों की बेरुखी के प्रति भी नाराजगी प्रकट की है। ये राज्य इस स्कीम में अपना हिस्सा तक देने में असफल रहे हैं, जिससे बीमा कंपनियां किसानों के क्लेम का भुगतान नहीं देतीं। 2016 में शुरू हुई फसल बीमा योजना प्रधानमंत्री की फ्लैगशिप योजना थी और माना जाता था कि इससे किसानों का भाग्य बदलेगा। लेकिन आज तक यह योजना केवल 25 प्रतिशत किसानों को ही कवर कर पाई है। वे भी वे हैं, जिन्होंने बैंकों से ऋण ले रखा है। प्रधानमंत्री ने 2016 में बरेली की एक आम सभा में किसानों की आय 2022 तक दूनी करने की घोषणा की थी और इसके लिए दलवई समिति ने एक रिपोर्ट भी दी थी। लेकिन एनएसओ के सर्वे के अनुसार 2019 तक किसानों की आय में नॉमिनल (न कि वास्तविक) आधार पर मात्र 25 प्रतिशत का इजाफा हुआ था। मुद्रास्फीति को संज्ञान में लें तो वास्तविक आय राष्ट्रीय स्तर पर भी घटी है।
Date:30-03-22
पश्चिमी ताकतों के पक्षपात की सजा भारत क्यों भुगते संकेत उपाध्याय, ( वरिष्ठ पत्रकार )
यूक्रेन और रूस के युद्ध का एक परिणाम यह भी हुआ है कि कच्चे तेल की कीमतें दुनियाभर में लगातार बढ़ रही हैं। इसके चलते भारत ने कुछ ऐसा किया, जो हमारी विदेश नीति से परे है। रूस से तेल का आयात। इस कदम के चलते अमेरिका में तमाम सवाल उठाए जा रहे हैं। क्या भारत रूसी तेल खरीदकर रूस को और बुलंद बनाने की कोशिश कर रहा है? एक ऐसे वक्त, जिसमें रूस के खिलाफ पूरा विश्व बोल रहा है, क्या हम उसमें भी बिजनेस देख रहे हैं? क्या हम रूस की यूक्रेन पर चढ़ाई का सपोर्ट कर रहे हैं?
सबसे पहली बात तो भारत की विदेश नीति के बारे में। सरकार रूस से तेल खरीदकर बड़ा कूटनीतिक संदेश दे रही है। पर इसमें कोई अनोखी या नई चीज नहीं है। भारत की विदेश नीति समय-समय पर रूस और अमेरिका के बीच झुकाव भले रखती रही हो, लेकिन हमने हमेशा गुटनिरपेक्ष नीति का पालन किया है। अपने हित को सबसे ऊपर रखा है। जहां तक बात है जंग में बिजनेस करने की तो व्यावसायिक सम्बंध ही अंतरराष्ट्रीय कूटनीति का आधार होते हैं। अगर भारत का मकसद पूरा हो रहा है तो ऐसे में भारत को शर्मिंदा महसूस करना या कराना दोनों ही काम नहीं आएगा। यह एक ऐसी नीति है, जिसकी बात अब इमरान खान भी कर रहे हैं। एक भाषण में वो बोल पड़े कि भारत क्वाड का भी मेम्बर है और रूस से भी तेल लेता है।
फिर पश्चिमी देश भारत को लेक्चर क्यों दे रहे हैं? यह अमेरिका द्वारा क्यों बोला जा रहा है कि भारत तय करे कि वो इतिहास के पन्नों में अपने आपको कहां पाना चाहता है। इसका भी जवाब बिजनेस ही है। भारत रूसी तेल खरीद रहा है और पश्चिमी देशों में एक्सपर्ट्स का मानना है कि भारत पर प्रतिबंध लगेगा। सबसे पहली बात : रूसी तेल पर कोई प्रतिबंध नहीं है। अमेरिका का चहेता और नाटो का हिस्सा यूरोप रूस से तेल खरीद रहा है। नाटो देश रूसी ऊर्जा में निवेश करते हैं और खरीदते हैं। तो क्या जंग में सही तरफ होने की जिम्मेदारी सिर्फ भारत की ही है क्या? क्या मोरल हाई ग्राउंड और रूसी तेल, दोनों पश्चिमी देशों की बपौती हैं?
दरअसल, कोल्डवॉर के जमाने की राजनीति एक बार फिर सामने आ रही है। एक तरफ अमेरिका द्वारा बनाया गया एंटी रशिया कैम्प, जिसमें नाटो के सारे सदस्य और अनेक लोकतांत्रिक देश शामिल हैं। दूसरी तरफ रशिया कैम्प है, जिसमें बेलारूस, आर्मेनिया, सीरिया, नॉर्थ कोरिया, क्यूबा और मध्य-एशियाई गणराज्य हैं। ये वो देश हैं, जहां लोकतंत्र हमेशा सवालों में घिरा रहा है और अमेरिका से इनका छत्तीस का आंकड़ा है। लेकिन ऐसे भी कई मुल्क हैं, जो किसी की तरफ नहीं।
भारत और अमेरिका ट्रेडिंग पार्टनर हैं, वहीं रूस भारत का बड़ा डिफेंस पार्टनर है। जब तक बिजनेस हावी था, अमेरिका भारत के इस अनूठे रिश्ते को समझता था। लेकिन इस जंग के बाद भारत पर अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ाया जा रहा है। भारत ने संयुक्त राष्ट्र में रूस के खिलाफ प्रस्ताव पर तीन बार भाग नहीं लिया है। इसी वजह से अमेरिका की प्रतिक्रिया तीखी होती जा रही है। लेकिन भारत की कूटनीति हर तरफ से भारतीयों को लाभ देती है। जब छात्र यूक्रेन में फंसे थे, तो सब जगह कम्युनिकेशन लाइन खुली होने का फायदा भारत को मिला। भारत रूस पर अपनी डिफेंस जरूरतों के लिए निर्भर है। यूएन में रूस भी हमेशा हमारे पक्ष में खड़ा हुआ है। जब चीन ने गलवान घाटी में उपद्रव मचाया, तब ये पश्चिमी देश दूसरी तरफ देख रहे थे। यहां भी रूस ही भारत के काम आया, एक्सपर्ट बताते हैं कि मॉस्को की पहल पर भारत और चीन में समझौता हुआ। जबकि अमेरिका का हाल-फिलहाल का ट्रैक रिकॉर्ड देखिए, अफगानिस्तान को बीच मंझधार में छोड़ा और अब यूक्रेन को। ऐसे में भारत अपने हित को देख रहा है तो इसमें गलत क्या है?
Date:30-03-22
वर्क फ्रॉम होम से हुए घालमेल का असर बाद में देखने मिलेगा अमन आकाश, ( पीएचडी रिसर्चर )
फेडरल रिजर्व बैंक ऑफ डल्लास के एक शोध के अनुसार जहां फरवरी 2020 में वर्क फ्रॉम होम करने वालों की संख्या महज 8.2 फीसदी थी, वहीं मई 2020 में 35.2 प्रतिशत लोगों ने इसे अपना लिया था। कोरोना से पहले युवा पीढ़ी के लिए वर्क फ्रॉम होम एक फैंटेसी जैसा था। कितना अच्छा होता घर बैठकर काम करने को मिलता, न ट्रैफिक की चिक-चिक, ना कलीग्स की किच-किच जैसी बातें हंसी-मजाक के तौर पर कर ली जाती थीं। यह फैंटेसी अचानक से सच हो गई। पर अभी दो साल भी ठीक से नहीं बीते हैं कि वर्क फ्रॉम होम के नकारात्मक पक्ष सामने आने लगे हैं। लोगों के मानसिक-शारीरिक स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव देखने को मिल रहा है। विश्व-भारती विश्वविद्यालय, पश्चिम बंगाल की एक शोध रिपोर्ट के अनुसार वर्क फ्रॉम होम करने वाले 29 प्रतिशत लोगों ने बताया है कि उनमें स्थाई तौर पर डिप्रेशन, मूड स्विंग, एंग्जायटी जैसी समस्याएं पाई गई हैं। परिवार में रहकर भी वो परिवार के लोगों से कट रहे हैं। सबसे ज्यादा दिक्कतों का सामना छोटे घरों में रहने वाले लोगों को करना पड़ रहा है। उन्हें काम करने के लिए सुरक्षित पर्सनल स्पेस नहीं मिल पा रहा। कहीं नेटवर्क की समस्या है तो कहीं काम में बच्चों का शोरगुल व्यवधान डाल रहा है। वर्क फ्रॉम होम ने चिड़चिड़ापन बढ़ाया है और इसकी परिणति के रूप में घरेलू हिंसा में भी बढ़ोतरी हो रही है। बच्चों के साथ अनुचित व्यवहार हो रहा है। सालभर में ही वर्क फ्रॉम ऑफिस को मिस किया जाने लगा है। कलीग्स गेट टुगेदर की याद आने लगी है।
वर्क फ्रॉम होम को बढ़ावा देने के पीछे ऑफिस के कई तर्क हो सकते हैं। ऑफिस का रेंट बच रहा, बिजली बिल से छुटकारा मिल रहा, इक्विपमेंट्स की देखरेख का झंझट नहीं होता। नोएडा के आईटी सेक्टर में काम करने वाले रवि का कहना है कि उनके ऑफिस में महज कॉफी का खर्च महीने का 60,000 है। हमें वर्क फ्रॉम होम थमाकर ऑफिस ने ऐसे कई खर्च बचा लिए हैं। नोएडा में रहते थे तो पांच दिन लगातार काम के बाद वीकेंड पर अपनी लाइफ होती थी। पिछले डेढ़ साल से घर पर काम करते हुए वीकेंड लाइफ खत्म हो गई है, काम का समय बढ़ गया है, दो बार आंखें चेक करवा चुका हूं। देशभर में ऐसे कई लोग होंगे, जो इस तरह की समस्याओं से जूझ रहे होंगे।
मानव सभ्यता के विकास के साथ मनुष्य ने गुफाओं से निकलकर समुदाय में रहना सीखा। नगर बसे, रहने की जगह अलग थी, काम करने की अलग निर्धारित हुई। वास्तव में दोनों जगहों से भिन्न-भिन्न तरह की ऊर्जा का संचार होता है। जहाँ ऑफिस का वातावरण प्रतिस्पर्धी होता है, वहीं घर की दीवारों से शांति की गंगा बहती है। ना घर को ऑफिस बनाया जा सकता है और ना कभी ऑफिस घर-सा सुकून दे सकता है। वर्क फ्रॉम होम ने यह विचित्र घालमेल किया है और इसके दुष्प्रभाव लम्बे समय के बाद देखने को मिलेंगे। घर-घर से मोटापा, डायबिटीज, मानसिक समस्याओं के मरीज़ निकलेंगे। मनुष्य का स्वभाव एकाकी होता जाएगा और हम समुदाय से वापस गुफा में पहुंच चुके होंगे। मनुष्य के सामाजिक प्राणी बने रहने देने के लिए आवश्यक है कि वर्क फ्रॉम होम पर पुनर्विचार किया जाए। ऑफिस के क्यूबिकल्स कॉफी ब्रेक के बहाने ठहाकों से फिर गुलजार हों।
Date:30-03-22
महंगाई की चुनौती संपादकीय
कोरोना महामारी से उबर रही वैश्विक अर्थव्यवस्था को जिस तरह यूक्रेन संकट का सामना करना पड़ा, उसके नतीजे में महंगाई बढ़नी ही थी, क्योंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के मूल्यों में लगातार वृद्धि हो रही है। इस वृद्धि से दुनिया के अन्य देशों की तरह भारत भी जूझ रहा है। चूंकि भारत अपनी खपत का 80 प्रतिशत से अधिक कच्चा तेल आयात करता है, इसलिए उस पर कहीं अधिक प्रभाव पड़ा है। फिलहाल यह कहना कठिन है कि पेट्रोलियम पदार्थो के मूल्यों में वृद्धि का सिलसिला कब थमेगा, लेकिन यदि वह थमा नहीं तो महंगाई की चुनौती और अधिक गंभीर होना तय है। इसकी भी अनदेखी नहीं की जा सकती कि महंगाई यूक्रेन संकट के पहले से ही सिर उठा रही थी, क्योंकि कोरोना पर लगाम लगने के कारण खपत में वृद्धि हो रही थी और उसके चलते अनेक वस्तुओं के दाम बढ़ रहे थे। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण का यह कहना सही है कि भले ही यूक्रेन युद्ध दुनिया के एक कोने में लड़ा जा रहा हो, लेकिन सभी देशों पर उसका असर कुछ वैसे ही पड़ रहा है, जैसे कि कोरोना महामारी का पड़ा, लेकिन समस्याओं का उल्लेख करने मात्र से वे हल होने वाली नहीं हैं। सरकार को ऐसे कदम उठाने की आवश्यकता है, जिससे यूक्रेन संकट से उपजी परिस्थितियों के प्रभाव को कम किया जा सके। यह ठीक है कि सरकार के पास सीमित विकल्प हैं, लेकिन उसे जो कुछ संभव हो, वह तो करना ही होगा। रिजर्व बैंक को भी यह देखना होगा कि वह अपने स्तर पर क्या कर सकता है? सरकार इसकी अनदेखी नहीं कर सकती कि खाने-पीने की सामग्री के साथ अन्य अनेक वस्तुओं के दाम भी बढ़ रहे हैं और इससे आम लोगों का बजट बिगड़ रहा है। विपक्षी दलों को उन उपायों को भी रेखांकित करना चाहिए जो महंगाई का मुकाबला करने में सहायक बन सकें। इतना ही नहीं उन्हें अपनी राज्य सरकारों के रुख-रवैये पर भी ध्यान देना चाहिए जो लोकलुभावन नीतियों पर कुछ ज्यादा ही जोर दे रही हैं।
Date:30-03-22
सामाजिक सुधार और धार्मिक ग्रंथ राजीव सचान, ( लेखक दैनिक जागरण में एसोसिएट एडिटर हैं )
हिजाब मामले में कर्नाटक उच्च न्यायालय के फैसले के खिलाफ सर्वोच्च न्यायालय में दायर की जाने वाली याचिकाओं की संख्या बढ़ती जा रही है। ताजा याचिका इंडियन मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड की ओर से दाखिल की गई है। यह कोई सरकारी संस्था नहीं, बल्कि एनजीओ जैसा एक स्वयंभू संगठन है। मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड के वकील की मानें तो कर्नाटक उच्च न्यायालय का फैसला इस्लामिक ग्रंथों और विशेष रूप से पवित्र कुरान की गलत समझ पर आधारित है। यह वही बोर्ड है, जिसने 1985 में शाहबानो मामले में दिए गए सुप्रीम कोर्ट के फैसले को राजीव गांधी सरकार पर दबाव बनाकर संसद से पलटवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। तब इस बोर्ड के लोगों का कहना था कि मुस्लिम समाज को शरीयत के हिसाब से ही चलने का अधिकार मिलना चाहिए। उस समय पवित्र कुरान का भी हवाला दिया गया था। तीन तलाक मामले में इस बोर्ड के लोगों ने यह तो माना था कि यह प्रथा खराब है, फिर भी वे उसी जारी रखने के पक्ष में थे। इससे यह सहज ही समझा जा सकता है कि जब कभी निकाह हलाला मामले की सुनवाई होगी तो उसे भी जायज बताने की ही कोशिश होगी। यह गनीमत रही कि सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक को प्रतिबंधित कर दिया।
जैसे सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक मामले में यह पाया कि यह प्रथा इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा नहीं, उसी तरह कर्नाटक उच्च न्यायालय भी इस नतीजे पर पंहुचा कि हिजाब इस्लाम का बुनियादी हिस्सा नहीं। प्रश्न यह है कि यदि तीन तलाक इस्लाम के अनिवार्य हिस्से के रूप में दर्ज होता तो क्या उसे जारी रखने की मंजूरी दे दी जाती? यही प्रश्न हिजाब मामले में भी कर्नाटक उच्च न्यायालय के फैसले के संदर्भ में भी उठता है। यदि कहीं किसी इस्लामी ग्रंथ अथवा पवित्र कुरान में यह लिखा होता कि हिजाब-बुर्का आदि इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा है तो क्या उसे स्कूली कक्षाओं में पहनने की मंजूरी दे दी जाती? इन सवालों पर विचार इसलिए होना चाहिए, क्योंकि यदि सैकड़ों-हजारों वर्ष पुराने किसी धर्मग्रंथ में किसी ऐसी प्रथा का उल्लेख हो, जो आज के इस युग में समानता, पंथनिरपेक्षता, लोक व्यवस्था, संवैधानिक नैतिकता, महिला स्वतंत्रता आदि के लिहाज से उपयुक्त न हो तो क्या उसे जारी रखने की मंजूरी दे दी जाएगी? यदि सामाजिक सुधार के फैसले इस आधार पर लिए जाएंगे कि संबंधित समाज के किसी धर्मग्रंथ में किसी प्रथा के बारे में क्या लिखा है तो यह गंभीर समस्याएं खड़ी करने का काम करेगा। अगर सामाजिक प्रथाओं और रीति-रिवाजों के मामले में धर्मग्रंथों में क्या लिखा है, इस पर ध्यान दिया जाता तो वे अनेक सुधार संभव नहीं होते, जो हिंदू समाज में हुए।
यह सही है कि हिंदू समाज में व्यापक सामाजिक सुधार आजादी के बाद हिंदू कोड बिल के माध्यम से हुए, लेकिन यह भी एक तथ्य है कि इस समाज में सुधारों का सिलसिला अंग्रेजों के शासनकाल में ही कायम हो गया था। यदि अंग्रेजी सत्ता सती प्रथा और बाल विवाह के चलन को खत्म करने के साथ लड़कियों और लड़कों की विवाह योग्य आयु बढ़ाने, विधवा विवाह को मान्यता देने, हिंदू महिलाओं को संपत्ति का अधिकार देने वाले नियम-कानून बना सकी तो इसीलिए, क्योंकि इसके लिए स्वयं हिंदू समाज के नेता पैरवी कर रहे थे, जैसे कि राजा राममोहन राय, केशव चंद्र सेन, ईश्वरचंद्र विद्यासागर, बाल गंगाधर तिलक, हरविलास शारदा आदि। वास्तव में ऐसे समाज सुधारकों की एक लंबी सूची है। ऐसा नहीं है कि इन समाज सुधारकों को हिंदू समाज के लोगों के विरोध का सामना न करना पड़ा हो। विरोध के बाद भी वे अडिग रहे। विरोध का सामना प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू और कानून मंत्री बाबा साहब आंबेडकर को भी तब करना पड़ा, जब वे हिंदू कोड बिल पारित कराने की कोशिश कर रहे थे। इसी विरोध के कारण इस बिल को चार हिस्सों में पारित कराया गया।
हालांकि मुस्लिम समाज के लोगों ने भी समय-समय पर अपने समाज में सुधार की आवाज उठाई, लेकिन सरकारों ने या तो ऐसे लोगों की अनदेखी करना पसंद किया या फिर उनके बजाय मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड जैसे संगठनों और नेताओं को महत्व दिया। इसी कारण शाहबानो वाले फैसले को संसद में मुस्लिम महिला तलाक अधिकार संरक्षण विधेयक लाकर निष्प्रभावी किया गया। फिलहाल तो ऐसा कोई अंदेशा नहीं है, लेकिन इस पर तो देश की निगाहें हैं ही कि हिजाब मामले में सुप्रीम कोर्ट क्या फैसला देता है? यदि सुप्रीम कोर्ट कर्नाटक उच्च न्यायालय के निर्णय से सहमत नहीं होता तो मुस्लिम समाज फिर वहीं खड़ा नजर आएगा, जहां वह 1986 में तब खड़ा हो गया था, जब शाहबानो वाले फैसले को पलटा गया था। शाहबानो मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटने के लिए जो मुस्लिम महिला तलाक अधिकार संरक्षण विधेयक लाया गया था, वह भले ही यह आभास कराता हो कि यह मुस्लिम महिलाओं के हित में है, लेकिन वास्तव में वह उनके अधिकारों का दमन करने वाला था।
यदि स्कूली कक्षाओं में हिजाब धारण करने को अनुमति मिली तो सार्वजनिक जीवन में हिजाब के साथ बुर्के का चलन तो बढ़ेगा ही, उन मुस्लिम संगठनों का हौसला भी बढ़ेगा, जो अपने समाज को शरीयत के हिसाब से चलाने की जिद करते हैं। वास्तव में इसी जिद के कारण मुस्लिम समाज में न तो आजादी के पहले कोई ठोस सामाजिक सुधार हो सके और न ही आजादी के बाद। जो सुधार हुए, वे भी सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के चलते, जैसे कि तीन तलाक प्रथा की समाप्ति। यह समझने की जरूरत है कि किसी भी समाज में सुधार तभी हो पाते हैं जब उस समाज के लोग आवाज उठाते हैं। यह देखना सुखद है कि आज मुस्लिम समाज में ऐसे अनेक लोग दिख रहे हैं और वे मुखर भी हैं।
Date:30-03-22
कचरा निपटान की मुश्किलें अखिलेश आर्येंदु
भारत सहित दुनिया के तमाम देशों में कचरे और मलबे से पैदा होने वाली समस्याएं मानव सभ्यता के लिए संकट बनती जा रही हैं। भारत के बड़े और मझोले शहरों से निकलने वाला मलबा और मिलावटी कचरा एक गंभीर समस्या का रूप धारण कर चुका है। देश में हर साल निर्माण और ध्वस्तीकरण से जुड़े काम में पंद्रह करोड़ टन से अधिक कचरा पैदा होता है। अकेले राजधानी दिल्ली में ही रोजाना सात हजार टन के करीब मलबा व मिलावटी कचरा निकलता है, जिसमें से महज चार हजार एक सौ पचास टन का ही रोजाना निस्तारण हो पाता है। गौरतलब है कि तीन हजार टन मलबा व कचरा बिना पुनर्चक्रण के बचा रहता है जो वायु, जल, मृदा आदि को खराब कर रहा है। इसके अलावा जो मलबा निर्माण और ध्वस्तीकरण से निकलता है, वह यमुना का गला घोंट रहा है। इसके अलावा मलबे व कचरे के निस्तारण की उचित व्यवस्था न होने की वजह से लोग मलबे को चोरी-छिपे नालियों या गड्डों में डाल देते हैं। इससे नाले भर जाते हैं और आए दिन जलभराव की समस्या से लोगों को दो-चार होना पड़ता है। यह हालत देश की राजधानी की है, जो पिछले कई सालों से वायु, जल, ध्वनि और मृदा प्रदूषण से जूझ रही है।
राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्डों और प्रदूषण नियंत्रण समितियों की गई 2018-19 की रिपोर्ट के मुताबिक भारत में रोजाना एक लाख बावन हजार छिहत्तर टन ठोस कचरा पैदा होता है। वहीं 2020-21 के आंकड़े बताते हैं कि भारत में हर साल दो सौ सतहत्तर अरब किलो कचरा निकलता है, यानी प्रति व्यक्ति दो सौ पांच किलो कचरा। इनमें से सत्तर प्रतिशत कचरा ही इकट्ठा किया जाता है, बाकी जमीन या पानी में इधर-उधर फैला रहता है। आंकड़ों के अनुसार एक लाख उनचास हजार सात सौ अड़तालीस टन कूड़ा इकट्ठा किया जाता है। लेकिन इसमें से रोजाना केवल पचपन हजार सात सौ साठ टन यानी पैंतीस फीसद कूड़े का उचित निस्तारण किया जाता है। पचास हजार टन यानी तैंतीस प्रतिशत भराव वाली जगहों यानी लैंडफिल में फेंक दिया जाता है और बाकी छियालीस हजार एक सौ छप्पन टन रोजाना पैदा होने वाले कूड़े या मलबे के एक तिहाई का कोई हिसाब नहीं।
बढ़ती आबादी और घटते प्राकृतिक संसाधनों के बीच कचरे के निस्तारण की समस्या लगातार बढ़ती जा रही है। आज हालत यह हो गई है कि दिल्ली के गाजीपुर और मुंबई के मुलुंड डंपिंग ग्राउंड इलाके में कचरे के पहाड़ खड़े हैं। गौरतलब है भारत में निकलने वाला कचरा दो तरह का है, औद्योगिक मलबा और नगर निगमों से निकलने वाला कचरा। औद्योगिक कचरे के निपटान की जिम्मेदारी उद्योगों पर है, जबकि नगर निगमों के कचरे के निपटान की जिम्मेदारी स्थानीय प्रशासन की होती है। आमतौर पर नगर निगम कचरा तो इकट्ठा करते हैं, लेकिन उसे आबादी के आसपास ही किसी इलाके में फेंकते रहते हैं। इससे वहां रहने वाले नागरिकों की सेहत पर बुरा असर पड़ता है। नेशनल इन्वायरमेंटल सेंटर के सर्वे के मुताबिक देश के बड़े शहरों में मिलाजुला कचरा सबसे ज्यादा खतरनाक है। इस कचरे में कागज, प्लास्टिक, धातुएं, शीशा, घरों से निकलने वाले विषैले कचरे, मांस, अंडे जैसे खाद्य आदि शामिल होते हैं, जो सबसे अधिक समस्या पैदा करते हैं। दरअसल, भारतीयों में कचरा प्रबंधन की आदत नहीं है। इस कारण सूखा और गीला दोनों तरह का कचरा एक ही डिब्बे में डाल दिया जाता है, जो कई दिनों तक सड़ता रहता है।
विश्व स्तर पर ई-कचरा और प्लास्टिक का कचरा मानव सभ्यता के दुश्मन बन गए हैं। इसलिए ई-कचरे और प्लास्टिक के कचरे के पुनर्चक्रण का पुख्ता इंतजाम होना चाहिए। वैज्ञानिकों के मुताबिक साधारण प्लास्टिक को सड़ने में लगभग पांच सौ वर्ष लग जाते हैं। सहज-सरल उपलब्ध होने के कारण इसका इस्तेमाल इसके जहरीलेपन को नजरअंदाज करके किया जाता है। दुनिया में इसके महज पांच में से एक हिस्से का ही पुनर्चक्रण हो पाता है। इस तरह इसका अस्सी प्रतिशत हिस्सा समुद्र में जा रहा है। इसका असर यह हो रहा है कि स्तनधारी जीव प्लास्टिक का सबसे अधिक इस्तेमाल जाने-अनजाने करके असमय मौत का शिकार हो रहे हैं।
आज समुद्र, नदियों और झीलों का जल कई तरह के प्रदूषणों से ग्रस्त हो गया है। इन्हें खराब करने में शहरों से निकलने वाले कचरे की ही भूमिका ज्यादा है। कस्बों और गांवों के कुओं व नहरों का जल भी प्लास्टिक के कारण प्रदूषित हो रहा है। एक सर्वेक्षण के मुताबिक सत्तर के दशक के बाद प्लास्टिक का उपयोग शहरी, ग्रामीण और कस्बाई क्षेत्रों में तेजी से बढ़ता गया है, जो कई तरह की बीमारियों का कारण भी बन गया है।
दरअसल, प्लास्टिक दुनिया में सबसे अधिक भयावह तस्वीर हमारे सामने पेश कर रहा है। एक अनुमान के मुताबिक विश्व में प्रति मिनट दस लाख प्लास्टिक बोतलें और हर वर्ष पांच खरब प्लास्टिक थैलियां खरीदी जाती हैं। ये ऐसे उत्पाद हैं जो महज एक बार इस्तेमाल होने के बाद कचरा बन जाते हैं। प्लास्टिक का सबसे ज्यादा इस्तेमाल पैकजिंग के लिए होता है। पैकजिंग उद्योग दुनिया का सबसे बड़ा उद्योग बन गया है। इस उद्योग के लिए हर साल आठ करोड़ टन प्लास्टिक तैयार होता है। हम सोच सकते हैं कि कितनी बड़ी तादाद में प्लास्टिक कचरा समुद्र और जमीन में दबाया जा रहा है। महानगरों में सत्तर फीसद हिस्सा प्लास्टिक कचरे का ही है।
जो प्लास्टिक एक शताब्दी पहले मानव का मित्र बना हुआ था, वही आज मानव सभ्यता का दुश्मन बन गया है। प्लास्टिक से अनेक समस्याएं, संकट, बीमारियां और विकृतियां देखने को मिल रही हैं। औद्योगिक और घरेलू क्षेत्रों में प्लास्टिक का उपयोग इतना अधिक बढ़ गया है कि इसके बिना कोई का कार्य संभव नहीं दिखाई पड़ता। ‘इस्तेमाल करो और फेंको’ की संस्कृति के कारण प्लास्टिक आज देश में ही नहीं, दुनियाभर में संकट और अनेक बीमारियों का कारण बन गया है। उपयोग में आने वाले प्लास्टिक को जलाने से कई तरह की जहरीली गैसें पैदा होती हैं, जिनमें नाइट्रिक आक्साइड, कार्बन डाइआक्साइड व कार्बन मोनोआक्साइड प्रमुख हैं। इन गैसों से फेफड़ों और आंख की बीमारियां, कैंसर, मोटापा, मधुमेह, थायरायड, पेट दर्द, सिर दर्द जैसी अनेक समस्याएं पैदा हो सकती हैं। नए शोध के अनुसार प्लास्टिक से बने बर्तन में गर्म पेयों और खाद्यों के उपयोग से इसमें मौजूद नुकसानदेह केमिकल डाइआक्सीन, लेड (सीसा) कैडमियम आदि खाद्य पदार्थों में घुल कर हमारे शरीर में पहुंच जाते हैं, जिससे गंभीर शारीरिक समस्याएं पैदा हो जाती हैं।
कचरे के प्रबंधन के लिए केंद्र और राज्य सरकारें हालांकि कदम उठा रही हैं, लेकिन इस दिशा में अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। शहरों में जितनी समस्या मिलावटी कचरे से पैदा हुई है, उतनी ही समस्या ई-कचरे और मलबे से भी बढ़ रही है। इसलिए इस समस्या को संपूर्णता में देखने और जल्द समाधान करने की जरूरत है। इसके लिए सरकारों और गैरसरकारी संगठनों के साथ आम आदमी को भी आगे आना होगा। कूड़े का निस्तारण कैसे करें, इसके लिए लोगों में जागरूकता पैदा करनी जरूरी है। वरना जिस तेजी से मलबे, कचरे और मिलावटी कचरे से समस्याएं बढ़ रही हैं, वे आने वाले वक्त के लिए और बड़े संकट का रूप ले सकती हैं।
Date:30-03-22
अपराधियों का रिकार्ड संपादकीय
अपराधियों की पहचान के तरीकों में काफी बदलाव आने वाला है। अब इसमें तकनीक का इस्तेमाल सिर्फ विकसित देशों की ही विशेषता नहीं रहेगी बल्कि भारतीय पुलिस को भी इसमें महारत हासिल होगी। हालांकि तकनीक के इस्तेमाल पर आपत्तियां भी हैं। इन आपत्तियों को विपक्ष ने लोक सभा में संबंधित विधेयक रखे जाते समय पुरजोर तरीके से जाहिर भी किया। लोकसभा में सोमवार को केंद्र सरकार ने दंड प्रक्रिया पहचान विधेयक 2022 पेश किया, विधेयक पारित होने के बाद किसी मामले में गिरफ्तार और दोषसिद्ध अपराधियों का रिकॉर्ड रखने के लिए तकनीक का इस्तेमाल संभव हो सकेगा। विधेयक पेश करते वक्त सरकार ने कहा कि मौजूदा अधिनियम 102 साल पुराना है। उसमें सिर्फ उंगलियों के निशान और पांव के निशान लेने की अनुमति थी। नई प्रौद्योगिकी आने के बाद इसमें संशोधन की जरूरत महसूस की जा रही थी। संशोधन से जांच एजेंसियों को जरूरी सूचनाएं हासिल होंगी और दोषसिद्धि भी बढ़ेगी। विपक्ष के भारी विरोध के चलते विधेयक पेश करने के लिए मतविभाजन कराना पड़ा। 58 के मुकाबले 120 मतों से विधेयक पेश हुआ। विपक्ष का आरोप था कि विधेयक अनुच्छेद 20 और 21 का उल्लंघन है। यह निजता के अधिकार का भी उल्लंघन करता है। विधेयक पारित हो गया तो पुलिस के पास आरोपित या सजायाफ्ता लोगों के शारीरिक और जैविक नमूने लेने का अधिकार आ जाएगा। पुलिस आंखों की पुतलियों की पहचान, हथेली-पैरों की छाप, फोटो और लिखावट के नमूने भी ले सकेगी। सरकार का कहना है कि ज्यादा रिकॉर्ड होने से अपराधियों को पकड़ने और उन्हें सजा दिलाने के काम में तेजी आएगी। यह रिकार्ड 75 वर्षो तक रखा जा सकेगा। विधेयक पारित होने के बाद अपराधियों की पहचान अधिनियम 1920 खत्म हो जाएगा और नया कानून उसकी जगह ले लेगा। माना जा सकता है कि विकसित देशों में प्रयोग की जा रही नई तकनीक विसनीय एवं भरोसेमंद परिणाम दे रही है और इसे सम्पूर्ण विश्व में मान्यता प्राप्त है, लेकिन सरकार को राजनीतिक दलों और आंदोलनकारियों की इस आशंका को भी दूर करना होगा कि थाना प्रभारियों और हेड कांस्टेबलों के जरिए कानून का दुरूपयोग नहीं होगा और कोई मामला दर्ज होते ही पुतलियों की छाप और डीएनए की जांच कर उन्हें हमेशा के लिए आशंकित नहीं रखा जाएगा।
Date:30-03-22
गैर-जरूरी विवाद संपादकीय
अभी बहुत दिन नहीं हुए, जब कर्नाटक के उडुपी जिले में आयोजित सालाना कौप मरीगुड़ी उत्सव में गैर-हिंदू वेंडरों को मंदिर परिसर के आसपास कारोबार न करने देने की मांग उठी थी, जो अब मांड्या, शिवमोगा, चिकमंगलुरु, तुमकुरु और हासन जिलों तक फैल गई है, इसी बीच केरल से भी खबर आई है कि कन्नूर जिले के कुछ मंदिरों के प्रबंधन ने ख्यात पूराक्कली-मराथुकली कलाकार विनोद पणिकर की मंदिर समारोहों में कला-प्रस्तुति पर कथित तौर से रोक लगा दी है। पणिकर का आरोप है कि उनके बेटे ने मुस्लिम लड़की से शादी की है, इसलिए उन पर यह रोक लगाई गई है, जबकि वह करीब चार दशकों से इन मंदिरों में अपनी कला प्रस्तुतियां देते आ रहे हैं। सुखद यह है कि कल ही कर्नाटक के दो भाजपा विधायकों, एच विश्वनाथ और अनिल बेनके ने मंदिरों के आस-पास गैर-हिंदुओं के कारोबार पर प्रतिबंध को ‘गैर-सांविधानिक’ कृत्य बताया और यह अपील की कि लोगों के ऊपर ही छोड़ देना मुनासिब होगा कि वे किस दुकान से क्या खरीदें।
सदियों का हिन्दुस्तानी लोक-व्यवहार और आजाद भारत का संविधान साक्षी है कि ‘सर्वधर्म समभाव’ की इसकी खूबसूरती ने पूरी दुनिया को भारत का मुरीद बनाया है और अब कुछ असामाजिक तत्व निहित स्वार्थ के कारण इसे आघात पहुंचाना चाहते हैं। भारत के तीर्थस्थल हमेशा से इसकी समावेशी संस्कृति के बड़े प्रतीक रहे हैं। और इसकी सबसे ताजा मिसाल बिहार में पूर्वी चंपारण के इश्तियाक अहमद खान ने पेश की है, जिनके परिवार ने लगभग ढाई करोड़ रुपये की जमीन रामायण मंदिर के निर्माण के लिए दान कर दी। इस देश में ऐसे कई उदाहरण हैं, जब सभी धर्मों के लोगों ने मिल-जुलकर एक-दूसरे के उपासना स्थलों का जीर्णोद्धार किया है। ऐसे में, केरल-कर्नाटक सरीखी बाड़ेबंदी भारतीयता की मूल भावना के भी विपरीत है।
दरअसल, हमारे सामाजिक जीवन में विद्वेष की राजनीति की घुसपैठ लगातार बढ़ती जा रही है और इसी के कारण इस तरह की विसंगतियां देखने को मिल रही हैं। अब तक उत्तर भारतीय प्रदेशों में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण या जातिवादी गोलबंदी के कारण अनेक प्रकार की समस्याएं पैदा होती रही हैं और उनके पिछड़ेपन की एक बड़ी वजह भी है, लेकिन चिंता की बात यह है कि इस तरह की प्रवृत्तियां अब केरल-कर्नाटक में तेजी से बढ़ने लगी हैं, जो तरक्कीपसंद सूबे समझे जाते हैं। इसमें कोई दोराय नहीं कि दक्षिण के राज्यों में उत्तर के मुकाबले सामाजिक समावेशीकरण कहीं बेहतर हुआ है और उन्हें इसका फायदा भी खूब मिला है। यह एक स्थापित तथ्य है कि कोई भी कलहप्रिय समाज कभी तरक्की नहीं कर सकता। इसलिए राज्य सरकारों का यह बुनियादी दायित्व है कि वे सामाजिक ताने-बाने को बिगाड़ने की किसी भी कोशिश से सख्ती से निपटें। भारत के सामने गरीबी, बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य के मोर्चे पर पहले ही गंभीर चुनौतियां हैं। महामारी ने उन्हें और विकराल बना दिया है। ऐसे में, इस तरह के निरर्थक विवाद शासन की सिरदर्दी ही बढ़ाएंगे और उसकी कार्य-संस्कृति को नकारात्मक रूप से प्रभावित करेंगे। इस तरह के विवाद देश के राजनीतिक-सामाजिक संगठनों के लिए भी किसी परीक्षासे कम नहीं हैं। उनके नेतृत्व की समझदारी इन्हीं नाजुक मौकों पर देखी-परखी जाती है। कर्नाटक और केरल में सामाजिक समरसता न बिगड़े, इसे सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी राज्य सरकारों के साथ-साथ इन सबके कंधों पर भी है।
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हाल ही में कर्नाटक विधानसभा का एक विधेयक चर्चा में है। यह विधेयक धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार से संबंधित है, और इसे धर्मांतरण विरोधी भी माना जा रहा है। इस विधेयक पर चर्चा पूरी होने से पहले ही कर्नाटक की भाजपा सरकार ने मंदिरों को सरकारी आधिपत्य से मुक्त करने हेतु कानून प्रस्तावित करने की घोषणा कर दी है।
मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने की मांग क्यों ?
कर्नाटक में हिंदू मंदिरों को सरकारी नियंत्रण में रखने के लिए हिंदू धार्मिक संस्थान और धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम, 1997 है, जिसे मुजराई अधिनियम भी कहा जाता है।
राज्य में एक गलत सूचना फैली कि हिंदू समूहों द्वारा एकत्र किए गए धन को गैर-हिंदू धार्मिक संस्थानों के लिए डायवर्ट किया जा रहा है। इसके बाद मंदिरों को नियंत्रण मुक्त करने की मांग बढ़ी।
क्या लाभ, क्या हानि, क्या आशंकाएं –
भाजपा के इस कदम से उसे राजनीतिक लाभ मिलना निश्चित है।
देश के अन्य भागों में भी मंदिरों को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करने की मांग जोर पकड़ने लगी है।
प्रस्तावित कानून ऐसे समय में आया है, जब राज्य भर के कई शक्तिशाली धार्मिक मठों ने प्राचीन मंदिरों को अपने कब्जे में लेने में रूचि दिखाई है। दरअसल, ये मंदिर आमदनी का अच्छा स्रोत हैं।
इस मांग से मंदिरों में सामाजिक बहिष्कार और एक विशेष जाति द्वारा मंदिर प्रबंधन को हथियाने की आशंका बढ़ गई है।
इस कदम से केवल अमीर मंदिरों को लाभ होने की संभावना है। 34,000 से कम आय वाले मंदिर सरकार के नियंत्रण में बने रह सकते हैं।
हिंदू मंदिरों के पुजारियों ने इस प्रस्ताव का विरोध किया है, क्योंकि इससे उन्हें अपने पद असुरक्षित होने की आशंका है।
भाजपा का तर्क है कि नियंत्रण मुक्त मंदिरों को ट्रस्ट के अधीन रखने से, प्रशासनिक और वित्तीय जवाबदेही और पारदर्शिता बढ़ेगी। दूसरी ओर, हाल के वर्षों में राज्य के तीन प्रसिद्ध मंदिरों पर वित्तीय अनियमितता का आरोप लगने के बाद उन्हें मुजराई विभाग में ले लिया गया था। अभी कानून का स्वरूप बहुत स्पष्ट नहीं है। आने वाले समय में उम्मीद की जा सकती है कि सरकार अपने राजनीतिक हितों की रक्षा के अलावा देश की सामाजिक और धार्मिक शुचिता को बनाए रखने के लिए मार्ग ढूंढ निकालेगी।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित शरद एस श्रीवत्स के लेख पर आधारित। 16 मार्च, 2022
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Date:29-03-22
Fixing The Service Recruiting more IAS officers is necessary, as is a real merit system and trimming of government TOI Editorials
Data presented by a parliamentary standing committee show that vacancies in the IAS, earlier only thought to be at the central government level, are affecting state governments too. GoI had mooted an amendment to service rules to ensure more officers are available for central deputation by making states’ consent immaterial, triggering stiff pushback from opposition-governed states. GoI was unhappy that though the number of IAS officers had increased from a decade ago, officers on the central deputation reserve had reduced by 27%. Now the parliamentary committee has revealed that over 1,500 sanctioned IAS officer posts (22%) at the state level lie vacant with some states reporting greater gaps than others.
This is despite quick fixes like conferring IAS on state civil service officers or temporarily appointing other central or state cadre officers to posts reserved for IAS. The last review of IAS cadre strengths in 2012 had fixed the annual intake at 180 officers. The parliamentary committee has remarked that a panel constituted to revise this number for 2022 onwards can “significantly” increase the intake to fill sanctioned posts. But alongside quantity, bureaucracy is also battling a crisis of quality.
Recent GoI initiatives like Mission Karmayogi and Capacity Building Commission must lead to a performance management system that can reward the best and brightest and deter young officers from sliding into mediocrity. Underperformers must be retired prematurely so that they don’t drag down governance. Currently, talented officers, sandwiched between mediocrity and officer scarcity, are heavily overworked. This is not a sustainable path. Unlike pyramidal hierarchies in typical organisations, central cadres like IAS and IPS have “cylindrical” structures because of assured promotions. For instance, Punjab police has around 30 DGP/ADGPlevel officers. This top-heaviness isn’t contributing to governance: look at Punjab’s entrenched drug and liquor mafia. Meanwhile, GoI’s efforts at lateral entry have struggled because unlike many IAS officers who rise to the midand senior-levels with deep-rooted knowledge of the terrain and strong support networks, lateral entrants face the outsider tag despite industry or research or grassroots experience they may possess.
But where quantity or quality won’t fix the “bureaucracy deficit” that the parliamentary committee observed is the role of bad politics. There’s no political incentive to review the number of officers parked in non-essential departments, commissions, corporations and schemes that symbolise big government. This would be a starting point to cut governance flab at not just the personnel level. Maybe GoI can show the way to states.
Date:29-03-22
Not Another Push to Minority Appeasement ET Editorials
The Supreme Court’s taking up a petition on Monday seeking ‘identification’ of minorities at the state level and granting minority status to Hindus where their numbers are not in the majority is most befuddling. For the judiciary to entertain matters that are the business of the executive — according to Section 2(c) of the National Commission for Minorities Act, 1992, ‘minority’ means a community ‘notified as such by the Central Government’ — this smacks of overreach. The petition, seeking minority status for Hindus in Lakshadweep (2. 5%), Mizoram (2. 75%), Nagaland (8. 75%), Meghalaya (11. 53%), J&K (28. 44%), Arunachal Pradesh (29%), Manipur (31. 39%), and Punjab (38. 40%), hopes to use ‘minority appeasement’ through welfare schemes in its narrowest form.
The Centre has been pushed to file an affidavit in response to the apex court and has, unsurprisingly, said that state governments could also be free to ‘consider’ a religious or linguistic community — including Hindus, Jews and Bahais, in addition to Muslims, Sikhs, Christians, Buddhists, Parsis and Jains — as a ‘minority community’ within individual states. If operationalised, this will open a whole new can of worms in a country already familiar with the hazards of competitive minority-majority politics.
‘Sab ka saath, sab ka vikas’ is a motto GoI has treated more than just as a slogan. Making states tinker with this genuinely secular strategy is going against the grain. The benefits of a demographic-agnostic approach also brings with it political returns, as was evident in the latest round of state elections, especially in Uttar Pradesh where old votebanks are dissolving. To consider an additional layer of minority status is to move retrogressively, in the exact opposite direction where ‘communal’ — in the sense of purely community-based — politics is sought to be subsumed by social security and opportunities for all. Minorityism and its reactionary force of majoritarianism should be made to wither away in 2022 India, and not be amplified, that too by judicial prodding.
Date:29-03-22
A subregional grouping that must get back on course BIMSTEC is in need of a framework to tackle the specific challenges confronting the Bay of Bengal region Venu Rajamony is Professor of Diplomatic Practice, O.P. Jindal Global University, Senior Adviser, Centre for Humanitarian Dialogue and the former Ambassador of India to the Netherlands
As world attention remains focused on the war in Ukraine, leaders of the Bay of Bengal Initiative for Multi-Sectoral Technical and Economic Cooperation (BIMSTEC) will attend a summit meeting of the regional organisation. The meet, which is to be held in virtual mode, will be hosted by Sri Lanka, the current BIMSTEC chair.
Founded in 1997, the seven-member BIMSTEC, which includes the littoral states of India, Bangladesh, Sri Lanka, Myanmar (Thailand is a member too) and the land-locked states of Nepal and Bhutan, has identified 14 pillars for special focus. These are trade and investment, transport and communication, energy, tourism, technology, fisheries, agriculture, public health, poverty alleviation, counter terrorism and transnational crime, environment and disaster management, people-to-people contact, cultural cooperation and climate change. While each sector is important, the segmented approach has resulted in omnibus end summit communiqués full of aspirations rather than action. The upcoming summit is an opportunity for BIMSTEC leaders to go beyond generalised statements and take concrete steps to address critical challenges confronting the region.
A Bay of Bengal Maritime Dialogue (BOBMD) organised recently by the Centre for Humanitarian Dialogue and the Pathfinder Foundation brought together government officials, maritime experts, and representatives of prominent think tanks from Sri Lanka, India, Bangladesh, Myanmar, Thailand and Indonesia. Participants called for stepped up efforts in areas such as environmental protection; scientific research; curtailing illegal, unreported, and unregulated (IUU) fishing, as well as the development of standard operating procedures that could govern interaction between fishing vessels of one country with maritime law enforcement agencies of another.
Rich marine ecosystem
Presentations made at the BOBMD highlighted the fact that the Bay of Bengal is home to a large network of beautiful yet fragile estuaries, mangrove forests of around 15,792 square kilometres, coral reefs of around 8,471 sq.km, sea grass meadows and mass nesting sites of sea turtles. The annual loss of mangrove areas is estimated at 0.4% to 1.7% and coral reefs at 0.7%. It is predicted that the sea level will increase 0.5 metres in the next 50 years. Moreover, there have been 13 cyclonic storms in the last five years. The Bay is an important source of natural resources for a coastal population of approximately 185 million people. The fishermen population alone is estimated to be around 3.7 million, with an annual fish catch of around six million tonnes, constituting 7% of the world’s catch and valued at around U.S.$4 billion. Around 4,15,000 fishing boats operate in the Bay and it is estimated that 33% of fish stocks are fished unsustainably (Source: presentation in February 2022 by E. Vivekanandan, senior consultant, ICAR-Central Marine Fisheries Research Institute). According to the Food and Agriculture Organization of the United Nations (FAO), the Bay of Bengal is one of IUU fishing hotspots in the Asia-Pacific.
The pressing challenges that confront the Bay of Bengal include the emergence of a dead zone with zero oxygen where no fish survive; leaching of plastic from rivers as well as the Indian Ocean; destruction of natural protection against floods such as mangroves; sea erosion; growing population pressure and industrial growth in the coastal areas and consequently, huge quantities of untreated waste flow. Security threats such as terrorism, piracy and tensions between countries caused by the arrests of fishermen who cross maritime boundaries are additional problems. It also needs to be kept in mind that the problem of fishermen crossing into the territorial waters of neighbouring countries affect India and Sri Lanka and Bangladesh and Myanmar (also Pakistan on the west coast).
Need for regional interaction
The blue economy potential of the Bay of Bengal is huge. There are many opportunities to develop maritime trade, shipping, aquaculture and tourism. However, tapping these opportunities requires coordinated and concerted action by governments, scientists and other experts. The BIMSTEC Summit must create a new regional mechanism for coordinated activities on maritime issues of a transboundary nature. This mechanism must initiate urgent measures to strengthen fisheries management, promote sustainable fishing methods, establish protected areas and develop frameworks to prevent and manage pollution, especially industrial and agricultural waste as well as oil spills. There is also a need for greater scientific research on the impact of climate change in general and on fisheries in particular. At present, there is limited cooperation between countries of the region in marine research. Most BIMSTEC countries have premier institutions and excellent scientists but their interaction with the West is far more than within the region. The use of modern technology and improved fishing practices can go a long way in restoring the health of the Bay.
This should be a priority area
Marine environmental protection must become a priority area for cooperation in the Bay of Bengal. Enforcement must be strengthened and information shared on best practices. Regional protocols need to be developed and guidelines and standards on pollution control established. Decision-making must be based on science and reliable data, information and tools.
There is a need for home-grown solutions based on capabilities of local institutions and for mutual learning through regional success stories. There is a need to create regional frameworks for data collection. Participatory approaches must be evolved for near-real-time stock assessment and the creation of an regional open fisheries data alliance. The Bay of Bengal Programme (BOBP), an inter-governmental organisation based in Chennai, is doing good work to promote sustainable fishing.
A Bay Of Bengal Large Marine Ecosystem (BOBLME) project is also being launched by the FAO with funding from the Global Environmental Facility (GEF) and others. The BIMSTEC summit must express full support for both BOBP and BOBLME. The summit must mandate officials to come up with measures to curtail unsustainable as well as IUU fishing. These could include setting up an international vessel tracking system and making it mandatory for vessels to be equipped with automatic identification system (AIS) trackers; establishing a regional fishing vessel registry system and publishing vessel licence lists to help identify illegal vessels; increasing monitoring, control and surveillance in IUU fishing hotspots; establishing regional guidelines on how to deter and prevent IUU practices; improving the implementation of joint regional patrols, and regional fishing moratoriums and outreach programmes targeted at fisherfolk. Laws and policies in littoral states must be harmonised and the humanitarian treatment of fishermen ensured during any encounter with maritime law enforcement agencies.
The challenges that confront the Bay of Bengal region brook no more delay. BIMSTEC must arise, awake and act before it is too late. The summit must set in process regular meetings of officials, supported by scientists and experts, to tackle illegal and unsustainable fishing as well as prevent the further environmental degradation of the Bay of Bengal.
Date:29-03-22
A contributor, not consumer Atmanirbharta is neither protectionist nor isolationist; it refers to a self-reliant India dealing with the world on its own terms Jayanthi Natarajan is a former Union Minister and a political activist and lawyer
Prime Minister Narendra Modi’s call in May 2020 for an Atmanirbhar Bharat (self-reliant India) highlighted the reality that in a post-COVID-19 world, India cannot exist in isolation. It is clear that the world is small and connected. In just the last one month, the ripple effects of the war in Ukraine on our economy and democracy make it imperative for us to continuously engage with the world around us. As Rabindranath Tagore said, it is not possible to remain behind “narrow domestic walls”. The pandemic has shown us that whether it is the stressed economy or human rights, rural development or climate change, defence or foreign policy, we need to re-imagine the way forward for India and its relationship with the world.
The way forward
Atmanirbhar Bharat is Mr. Modi’s framework for India’s way forward. A recent book, Atmanirbhar Bharat: A Vibrant and Strong India, edited by noted ideologue S. Gurumurthy and Arvind Gupta, is a thoughtful and comprehensive conceptualisation of a wide spectrum of policy issues which are the building blocks for an Atmanirbhar Bharat. Atmanirbharta is neither protectionist nor isolationist; it refers to a self-reliant India dealing with the world on its own terms.
Mahatma Gandhi’s call for Swadeshi galvanised our nation. Atmanirbhar Bharat is Swadeshi tailored to India in 2022. The ideational foundation of this concept is not just relevant to today’s India; it also addresses existential challenges in the country and challenges in its engagement with a tension-filled world order. Within the country it is even more important that the conflicting aspirations and expectations of States are managed and harmonised to present a united, confident and self-reliant India. For example, the aspirations of the Dravidian model of development and other regional-specific aspirations should synchronise with the holistic concept of Atmanirbhar Bharat. If India does not evolve a harmonious national model, only chaos will result. The emphasis on unity rather than diversity in our polity becomes vital. In the absence of cooperation, fundamental issues such as the sharing of Cauvery waters and coal for energy will remain unresolved. Former Tamil Nadu Chief Ministers C.N. Annadurai and M. Karunanidhi ensured that their politics were regionally distinct while staying uncompromisingly nationalistic. Significantly, in the 1967 Tamil Nadu Assembly elections, Dravidian icon Periyar actually supported and endorsed the Congress party and not the DMK, while C. Rajagopalachari supported the DMK. To learn from history and introspect on how these stalwarts responded dynamically to emerging situations is vital for political leaders today.
As Francis Fukuyama said, national identity is pivotal to the fortune of modern states, especially when states are built around liberal democratic political values and the shared experiences of diverse communities. In fact, national identity makes liberal democracy possible and is critical to maintaining a successful modern political order.
A human-centric model
Mr. Gurumurthy writes how, like Swadeshi, but also different from it, atmanirbharta is a model for a rising India. It is based on civilisational pride, experience and a self-belief that will help India be a contributor to the world rather than only a consumer. He forcefully argues that no one-size-fits-all Western model can work for a country as diverse as India, as evidenced by the catastrophic financial crisis of 2008. Social capital, family and communities are now at the centre of a development model, which was earlier not human-centric. This is an unassailable premise on which to base a growth model based on equity and humanity.
Defence, human rights, climate change, agriculture, the rural-urban divide, economy, governance and federalism are all addressed in the five pillars of Atmanirbhar Bharat expounded by Mr. Modi. The time has come to seriously absorb the ideas explained in this important book and discuss with an open and non-partisan mind the concept of Atmanirbhar Bharat. There will always be differences. Indeed, in those differences lies the vibrancy of our democracy.
The world today is reeling under an economic crisis. The war in Europe has grave consequences for the entire world. Leaders should realise that this is not a time for narrow political gains, but a time to come together for the sake of the nation. Atmanirbhar Bharat is a human-centric way forward based on our own civilisational ethos and values. It envisages a self-reliant India working for Vasudaiva Kutumbakam. This is a time when the legitimate aspirations of the diverse peoples of our country need to be reconciled, and differences overcome.
Date:29-03-22
नाटो की प्रासंगिकता का संकट ब्रह्मदीप अलूने
यूरोप और अमेरिकी महाद्वीप को संतुलित और नियंत्रित रखने की उत्तर अटलांटिक संधि संगठन (नाटो) की नीति पस्त पड़ चुकी है। चीन की आर्थिक रणनीति और रूस की सामरिक आक्रामकता के सामने नाटो बौना साबित होने लगा है। लातिन अमेरिका और कैरेबियाई देशों में चीन का सहायता कूटनीति का अभियान जोरों पर है।
दरअसल, लातिन अमेरिका और कैरेबियाई देश चीन की बेल्ट रोड योजना का अहम हिस्सा बन चुके हैं। वेनेजुएला और क्यूबा अमेरिका विरोध के चलते चीन के समर्थन में खड़े हैं। अल सल्वाडोर और होंडुरास जैसे देशों में भी चीन का दबदबा बढ़ता जा रहा है। पश्चिम यूरोप में भी चीन तेजी से पैर जमा रहा है। चीन का नया सिल्क मार्ग पांच महाद्वीपों में फैला बुनियादी परियोजनाओं का एक महत्त्वाकांक्षी नेटवर्क है, जिसके सहारे वह अमेरिकी महाद्वीप और नाटो के सहयोगी देशों के साथ आर्थिक साझेदारी बढ़ाने में लगा है। मध्य-पूर्व के जिन यूरोपीय देशों के साथ चीन व्यापक रणनीति के तहत काम कर रहा है, उनमें अल्बानिया, बोस्निया-हर्जेगोविना, बुल्गारिया, क्रोएशिया, चेक गणराज्य, एस्तोनिया, ग्रीस, हंगरी, लात्विया, उत्तरी मेसेडोनिया, मोंटेनेग्रो, पोलैंड, रोमानिया, सर्बिया, स्लोवाकिया और स्लोवेनिया शामिल हैं। इसमें कई देश नाटो सैन्य संगठन का हिस्सा हैं, जिसकी स्थापना ही साम्यवाद को रोकने के लिए हुई थी। यूरोप को चारों ओर से घेर लेने की नीति के तहत चीन बाल्कन देशों के साथ सहयोग को लेकर लगातार आगे बढ़ रहा है। वह यूरोप के कई बंदरगाहों में भी दिलचस्पी दिखा रहा है। ग्रीस, तुर्की सहित दक्षिण यूरोप के कई देशों के बंदरगाहों में उसकी बड़ी हिस्सेदारी है। पश्चिमी बाल्कन देशों में चीनी निवेश काफी बढ़ गया है और इन देशों पर चीन का कर्ज बढ़ता जा रहा है। चीन के इस बढ़ते प्रभाव से अमेरिका और यूरोप की नींद उड़ना लाजिमी है।
चीन के आर्थिक और सांस्कृतिक सहयोग का असर कूटनीतिक रूप से भी दिखने लगा है। अमेरिका वीगर मुसलमानों के अधिकारों को लेकर मुखर है, वहीं बाल्कन देश चीन की आलोचना के किसी भी प्रस्ताव में कोई दिलचस्पी नहीं दिखाते। बाल्कन प्रायद्वीप दक्षिण-पूर्वी यूरोप का एक बड़ा क्षेत्र है और यहां चीन की कूटनीतिक बढ़त रणनीतिक बढ़त नहीं बन जाए, इसे लेकर अमेरिका और नाटो आशंकित हैं। बाल्कन दक्षिणी यूरोप का सबसे पूर्वी प्रायद्वीप है और यह तीन ओर से समुद्र से घिरा है। इसके पूर्व में काला सागर, ईजियन सागर, दक्षिण में भूमध्यसागर, पश्चिम में इयोनियन सागर और एड्रियाटिक सागर हैं। चीन का इस क्षेत्र में बढ़ा रुतबा अमेरिका और नाटो पर रणनीतिक बढ़त लेता हुआ दिखाई देता है।
यूक्रेन को लेकर रूस की आक्रामकता और इस पर वैश्विक दबाव का काम न करना भी दुनिया के सबसे बड़े सैन्य संगठन नाटो की प्रासंगिकता पर सवाल खड़े कर रहा है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में हस्तक्षेप को एक तानाशाही दखलंदाजी माना जाता है, जो एक राष्ट्र दूसरे राष्ट्र के मामलों को पलटने के लिए करता है। पूर्वी यूरोप के एस्तोनिया, लातविया, लिथुआनिया, पोलैंड और रोमानिया में अमेरिका के नेतृत्व में नाटो के सैनिक तैनात हैं। इसके साथ ही नाटो ने बाल्टिक देशों और पूर्वी यूरोप में हवाई निगरानी भी बढ़ाई है, जिससे आकाश से भी रूस पर नजर रखी जा सके। यूक्रेन पर हमले के बाद यह साफ हो गया कि रूस पर दबाव बनाने की नाटो और अमेरिका की यह योजना कारगर नहीं हो सकी। यह स्थिति नाटो और अमेरिका को परेशान करने वाली है।
साल 2008 में नाटो के बुखारेस्ट सम्मेलन में यूक्रेन और जार्जिया को सदस्य बनाने का समर्थन किया गया था और इस बात पर सहमति जताई जताई थी कि ये देश नाटो के सदस्य बन जाएंगे। लेकिन रूस ने अमेरिका के पूर्व की ओर नाटो क्षेत्र के विस्तार के विकल्प को खारिज कर दिया। नाटो की असल चुनौती यही से बढ़ गई। दुनिया के सबसे बड़े सैन्य संगठन नाटो का प्रमुख लक्ष्य साम्यवादी सोवियत संघ के कूटनीतिक, राजनीतिक और सामरिक प्रभाव को सीमित करना था, जिसमें उसने सफलता भी पाई। लेकिन पिछले दो दशकों में रूस में पुतिन के प्रभाव और चीन की सहायता कूटनीति से वैश्विक परिदृश्य पूरी बदल गया है। 2008 में जार्जिया और यूक्रेन को अपने गठबंधन में शामिल करने के नाटो के इरादे की घोषणा के बाद रूस ने जार्जिया पर आक्रमण किया और उसके कई क्षेत्रों पर कब्जा कर लिया। इसके बाद 2014 में क्रीमिया पर कब्जा कर लिया। इस समय भी यूक्रेन रूस के हमलों से तबाह हो चुका है।
हर किसी के लिए दरवाजे खुले रखने की नाटो की नीति कमजोर पड़ चुकी है। वह यूक्रेन के मामले में चाह कर भी कुछ नहीं कर पाया। यूक्रेन नाटो में शामिल होने को लेकर एक तय समयसीमा और संभावना स्पष्ट करने की मांग करता रहा है। पर नाटो रूस के दबाव के आगे बेबस हो गया। अब तो यूक्रेन के राष्ट्रपति जेलेंस्की भी यह साफ कह चुके हैं कि नाटो रूस से डर गया।
यूक्रेन को लेकर अमेरिकी और नाटो की नीति का असर दुनिया के कई क्षेत्रों में रणनीतिक रूप से पड़ सकता है। नाटो और अमेरिका के विरोध को नजरअंदाज कर रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने पूर्वी यूक्रेन के पृथकतावादी विद्रोही इलाके दोनेत्स्क और लुहांस्क को स्वतंत्र राज्य की मान्यता दे दी। रूस आधिकारिक से रूप यहां दाखिल हो गया और आश्चर्य नहीं कि इसके रूस में विलय की जल्द घोषणा कर दी जाए। ऐसा भी नहीं है कि पुतिन यूक्रेन तक ही सीमित रहेंगे। हो सकता है पुतिन आगे चल कर पोलैंड, बुल्गारिया और हंगरी में भी यूक्रेन जैसी ही सैन्य कार्रवाई कर बैठें। एशिया के कई देश यूक्रेन संकट में रूस का विरोध करने से बचे हैं। यह स्थिति अमेरिका और नाटो को असहज करने वाली है। अफगानिस्तान में तालिबान का सत्ता में लौटना और नाटो सेनाओं द्वारा उसे अस्थिर छोड़ जाने से इस सैन्य संगठन की प्रतिष्ठा धूमिल हुई है।
शक्ति संतुलन को लेकर कोई भी स्पष्ट विचार नहीं हो सकता, क्योंकि प्रत्येक राष्ट्र केवल ऐसे संतुलन में विश्वास रखता है जो उसके पक्ष में हो और यहीं से दूसरे पक्ष में असंतुलन स्थापित हो जाता है। अभी तक नाटो और अमेरिका सैन्य संतुलन कायम करने के लिए दुनिया के किसी भी हिस्से में सैन्य कार्रवाइयों को अंजाम देते रहे हैं। लेकिन यूक्रेन पर हमले के बाद रूस की परमाणु युद्ध की धमकी के आगे नाटो बेबस नजर आया है। यूक्रेन में नाटो की रणनीतिक प्रतिकार से बचने की नीति से वैश्विक शक्ति संतुलन को लेकर असमंजस बढ़ गया है।
चीन और रूस को रोकने के लिए नाटो और अमेरिका के सामने आर्थिक और सामरिक मोर्चों पर कई चुनौतियां हैं। यूरोप और अमेरिका महाद्वीप में चीन का आर्थिक प्रभाव कैसे कम किया जाए, इसे लेकर कोई प्रभावी योजना नाटो के पास फिलहाल नहीं है। वहीं रूस के परमाणु हमलों से बचने का यूरोप के पास कोई सुरक्षा कवच भी फिलहाल नहीं है। यह पहले से कहीं ज्यादा आक्रामक, नई साम्यवादी, आर्थिक और सामरिक चुनौती है जिसका सामना करने का सामर्थ्य अमेरिका और नाटो के पास फिलहाल नजर नहीं आती।
Date:29-03-22
दक्षिणी शहरों की स्वच्छता से सीखें एस. श्रीनिवासन, ( वरिष्ठ तमिल पत्रकार )
इस बात से शायद ही किसी को आश्चर्य हुआ होगा कि साल 2021 के लिए जारी विश्व वायु गुणवत्ता रिपोर्ट में भारत के सबसे कम प्रदूषित 35 शहरों में से 30 शहर दक्षिण के चार राज्यों- कर्नाटक, तमिलनाडु, केरल और आंध्र प्रदेश के हैं। हालांकि, जब उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और हरियाणा (सभी उत्तरी राज्य) की नजर से इस रिपोर्ट को देखते हैं, तो यह एक कटु सत्य लगता है। देश की राजधानी दिल्ली ने तो प्रदूषण में सभी को पीछे छोड़ दिया है। रिपोर्ट के मुताबिक, जहां कोच्चि, चेन्नई, अमरावती और बेंगलुरु जैसे दक्षिणी शहरों में वायु प्रदूषण का स्तर 40 से 70 के बीच है, वहीं लखनऊ, पटना, जयपुर और रोहतक में यह 100 से 170 के बीच है। दिल्ली का औसत स्तर तो 230 है।
दक्षिण के राज्यों को भौगोलिक रूप से भी एक बड़ा लाभ हासिल है। दरअसल, उनकी सीमाएं कम से कम एक तरफ से समुद्र से लगती हैं। ऐसे में, उप-महाद्वीप के आसपास के महासागरों से आने वाली हवाएं एक झटके में प्रदूषक तत्वों को उड़ा ले जाती हैं। इनकी तुलना में जमीनी सीमाओं वाले उत्तरी राज्यों को यह सुविधा हासिल नहीं है। धूल भरी हवा इन क्षेत्रों में फंसी रहती है और उसी में घूमती रहती है, जिससे अधिक से अधिक प्रदूषण फैलता है। गरमियों के महीनों में तो ऐसा लगता है कि पूरा उत्तर भारत ही धूल का कटोरा बन गया है। इन महीनों में जहां धूल भरी आंधी दृश्यता कम कर देती हैं,तो वहीं सर्दियों में ठंडी हवा नमी व प्रदूषक तत्वों के साथ मिलकर ऐसा घना कोहरा बनाती है कि दृश्यता करीब-करीब शून्य हो जाती है।
उत्तर भारत में थार मरूस्थल से आने वाली हवाएं उत्तर प्रदेश के शहरों को अपनी गिरफ्त में ले लेती हैं। इसके अलावा, फैक्टरियों और गाड़ियों से होने वाले उत्सर्जन भी समस्या बढ़ाते हैं। फिर, उत्तर भारत के कई शहरों में बड़े पैमाने पर निर्माण संबंधी गतिविधियां भी लगातार चलती रहती हैं, जिसके कारण यहां की आबोहवा और बिगड़ती जा रही है। पर सिर्फ प्राकृतिक लाभ की वजह से दक्षिणी राज्य कम प्रदूषित नहीं हैं। पिछले अनेक वर्षों में यहां कई ऐसे उपाय किए गए हैं, जिनसे इस मामले में तरक्की हुई है।
इनमें सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि दक्षिण के राज्य देश के उत्तरी राज्यों की तुलना में बेहतर सामाजिक संकेतकों को जी रहे हैं। नीति आयोग के मुताबिक, बड़े राज्यों में किए गए विश्व बैंक के अध्ययन बताते हैं कि केरल, तमिलनाडु और तेलंगाना समग्र प्रदर्शन के मामले में अन्य सभी राज्यों पर बीस साबित हुए हैं। इस अध्ययन में स्वास्थ्य सेवाओं, शासन और सूचना आदि को भी शामिल किया गया था।
दक्षिण की तुलना में उत्तर भारत में कहीं अधिक युवा है, क्योंकि दक्षिणी राज्य की आबादी तेजी से बुजुर्ग हो रही है। उत्तर भारत को अपने इस जनसांख्यिकीय लाभांश को निश्चय रूप से राष्ट्र के समग्र और तेज विकास के लिए उपयोगी बनाने की जरूरत है। मगर उच्च जनसंख्या वृद्धि उत्तरी राज्यों पर दबाव बढ़ा रही है। मसलन, अगले 15 वर्षों में बिहार की आबादी महाराष्ट्र से अधिक हो सकती है। राजस्थान भी तमिलनाडु से अधिक आबादी वाला राज्य है। जाहिर है, उत्तर में जहां जनसंख्या विस्फोट की स्थिति है, वहीं दक्षिण में जनसंख्या वृद्धि दर गिर रही है।
इसका निस्संदेह वायु प्रदूषण के स्तर पर प्रभाव पड़ता है। ‘ग्लोबल बर्डन ऑफ डिजीज’ की हालिया रिपोर्ट बताती है कि साल 2013 में दुनिया भर में 55 लाख अकाल मौत का कारण वायु प्रदूषण था। यह अब सभी जानते हैं कि वायु प्रदूषण का मानव स्वास्थ्य पर गंभीर प्रभाव पड़ता है, खासतौर से श्वसन तंत्र और हृदय पर। इसके अलावा, यह फसल की पैदावार और जैव विविधता व पारिस्थितिकी तंत्र को भी काफी गहरे तौर पर प्रभावित करता है।
वायु प्रदूषण का एक अन्य कारण बढ़ता शहरीकरण है। तमिलनाडु और केरल भारत के सबसे अधिक शहरीकृत सूबों में एक हैं। राज्य की जनसंख्या लगभग ग्रामीण और शहरी के बीच बंटी हुई है। यहां तक कि ग्रामीण क्षेत्रों में भी पर्याप्त स्वास्थ्य सुविधाएं और नागरिक प्रशासन देखे जा सकते हैं। कमोबेश यही कहानी केरल और कर्नाटक की है। इसके उलट, उत्तर प्रदेश का 22 फीसदी हिस्सा शहरी है। देखा जाए, तो ग्रामीण आबादी में बसावट के लिहाज से उत्तर प्रदेश देश में सबसे ऊपर है।
सर्दियों के मौसम में उत्तर भारत में वायु प्रदूषण की स्थिति और खराब हो जाती है। इस समय दक्षिणी राज्यों में जहां प्रदूषण का औसत स्तर अच्छे से मध्यम के बीच होता है, वहीं उत्तर में यह कभी सामान्य नहीं हो पाता। यहां तक कि सबसे अच्छी स्थिति में भी दिल्ली जैसे शहरों में वायु प्रदूषण का सूचकांक स्वीकार्य स्तर से तीन गुना अधिक रहता है। दिवाली के समय तो पटाखों के कारण पीएम 2.5 का स्तर 1,000 के पार चला जाता है। जबकि तमिलनाडु जैसे राज्यों में यह कोई भी अनुभव कर सकता है कि किस तरह से लोग पर्व-त्योहारों में अपने गांव की ओर जाते हैं, और अपनी जड़ों की ओर लौटने के कारण प्रकृति एवं वहां की आबोहवा की सुरक्षा के मामले में तत्पर होते हैं।
दिल्ली में वायु प्रदूषण तो पंजाब-हरियाणा में किसानों द्वारा फसल कटाई के बाद पराली जलाने के कारण भी होता है। वायुमंडल में फंसा धुआं पूर्व की ओर राजधानी व अन्य शहरों की तरफ बढ़ता है। इससे वहां धुंध और कोहरे की काली चादर पसर जाती है। यहां इस बाबत कई ऐसे अध्ययन हुए हैं, जो बताते हैं कि वायु प्रदूषण के कारण जीवन प्रत्याशा कम हो जाती है।
साफ है, अस्वीकार्य स्तर पर वायु प्रदूषण के कारण साफ आबोहवा को लेकर आम लोगों के बीच जागरूकता बढ़ाने की दरकार है। औद्योगिक इकाइयों को घनी बस्तियों से ज्यादा से ज्यादा दूर करना चाहिए, निर्माण गतिविधियों के दौरान प्रदूषण के स्तर को कम करने के लिए जरूरी कदम उठाए जाने चाहिए और शहरी इलाकों में हरियाली बढ़ाई जानी चाहिए। इन सबके अलावा, हरित परिवहन को बढ़ावा दिए जाने की भी जरूरत है। अगर दक्षिण के कुछ सबक हैं, तो उत्तर उन पर अमल कर सकता है।
Date:29-03-22
जवाबदेही कानून से आखिर कितनी बढ़ेगी पारदर्शिता विजय विद्रोही ,वरिष्ठ पत्रकार
राजस्थान की अशोक गहलोत सरकार जवाबदेही कानून बनाने जा रही है। ‘राजस्थान भागीदारी, जवाबदेही और सामाजिक अंकेक्षण कानून’ नाम से इसका मसौदा भी तैयार कर लिया गया है। ऐसा कानून बनाने और लागू करने वाला राजस्थान देश का पहला राज्य होगा। फिर देश के अन्य राज्यों पर भी दबाव बढ़ जाएगा। गौर कीजिए, राजस्थान ही देश का वह पहला राज्य है, जिसने सूचना का अधिकार कानून लागू किया था। भैरों सिंह शेखावत के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने तब यह काम किया था।
बहरहाल, यह जवाबदेही कानून क्या है? यह ‘गारंटीड डिलीवरी ऑफ पब्लिक सर्विस ऐक्ट’ से अलग कैसे है? दरअसल, प्रस्तावित विधेयक यह कहता है कि अगर किसी को राशन नहीं मिल रहा, तो वह व्यक्ति इसकी शिकायत दर्ज करा सकेगा, जिसकी सुनवाई में एसडीएम और राशन विभाग से जुडे़ तमाम अधिकारी मौजूद रहेंगे। यह सुनवाई पंचायत स्तर पर होगी, ताकि उसमें गांव के अन्य लोग भी शामिल हो सकें। इस सुनवाई में जन-प्रतिनिधियों को भी बुलाया जाएगा, और 15 दिनों में शिकायत का जवाब देना होगा। अगर शिकायतकर्ता जवाब से संतुष्ट नहीं, तो वह जिला कमेटी को शिकायत कर सकेगा, जहां एक महीने में समस्या का निवारण अनिवार्य होगा। और यदि शिकायत सही पाई गई, तो संबंधित अधिकारी को जवाबदेह बनाते हुए उसके खिलाफ लापरवाही बरतने संबंधी विभागीय कार्रवाई की जाएगी। साथ ही, शिकायतकर्ता को 25 हजार रुपये तक का हर्जाना दिए जाने की भी व्यवस्था होगी।
इस कानून की सबसे खास बात यह है कि शिकायतकर्ता को यह पता होगा कि किस सरकारी विभाग का कौन सा अफसर उसका काम करने के लिए जिम्मेदार है, और काम न होने की सूरत में उस अधिकारी की जवाबदेही बनती है। अभी तक यही होता रहा है कि काम समय पर न होने पर पूरा विभाग एक-दूसरे को बचाने में लग जाता था और किसी एक की जवाबदेही तय नहीं हो पाती थी, न कोई दंडित हो पाता था। अब कुसूरवार बच नहीं पाएंगे। सरकारें आमतौर पर सूचना के अधिकार से डरती हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि इससे उनकी योजनाओं का सच सामने आ जाएगा, उनकी गड़बड़ियां सामने आ जाएंगी, तो बदनामी होगी। राजस्थान में तो पंचायत स्तर पर सोशल ऑडिट की बात कही गई थी। लेकिन तब पंचों-सरपंचों ने इसका विरोध किया था। लेकिन सूचना के अधिकार की लड़ाई लड़ने वाली अरुणा राय पिछले पांच वर्षों से जवाबदेही कानून के लिए संघर्ष कर रही हैं। राज्य में जवाबदेही कानून लाने के लिए सरकार पर दबाव डालने के मकसद से एक जवाबदेही यात्रा भी निकाली गई थी। यात्रा के दौरान इस आंदोलन के समर्थन में 25 हजार लोगों ने ‘मिस्ड कॉल’ की, 26 हजार पर्चे बांटे गए।
इस यात्रा के दौरान लोगों ने अपनी शिकायतों को सामने रखा। 17 दिन की उस यात्रा में 2,400 शिकायतें आम जनता ने सामने रखी। जन-संगठनों की तरफ से दावा किया गया कि बैंक संबंधी गलतियों और वार्षिक सत्यापन न होने के कारण करीब सवा लाख लोगों की पेंशन अटकी पड़ी है। जन-संगठनों ने यात्रा ही नहीं निकाली, बल्कि जिलाधिकारियों को ज्ञापन देकर पेंशन के लिए तरस रहे लोगों को राहत पहुंचाने की भी कोशिश की। जिस तरह से आम गरीब आदमी इस यात्रा का हिस्सा बना, उससे साफ पता चलता है कि सूचना के अधिकार से लेकर ‘गारंटीड डिलीवरी ऑफ पब्लिक सर्विस ऐक्ट’ लागू होने के बावजूद लोगों को न सही सूचना मिल पा रही है और न उनके काम समय पर हो पा रहे हैं। लोगों को दलालों की मदद लेनी पड़ रही है। यह हाल अगर राजस्थान का है, जहां ये दोनों कानून लागू हैं, तो जाहिर है कि पूरे देश में हालात और बुरे होंगे।
पर सवाल यह है कि जवाबदेही कानून लागू होने से क्या जनता का वास्तव में भला हो सकेगा? राजस्थान में सूचना का अधिकार लागू है, लोकायुक्त की व्यवस्था है, ‘गारंटीड डिलीवरी ऑफ पब्लिक सर्विस ऐक्ट’ है। इस कानून के तहत भी जन्म-मरण प्रमाणपत्र, जाति प्रमाणपत्र बनाने से लेकर जमीन-जायदाद के कागजात तय समय में दिए जाने के कड़े प्रावधान हैं। पर देखा गया है कि सूचना आयुक्तों के पद खाली रहते हैं, लोकायुक्त के यहां जांच का काम लंबा खिंचता है, फिर लोकायुक्त की सिफारिशों को सरकार लंबे समय तक टाले रखती है। दिक्कत यह है कि समय पर काम न होने के बावजूद लोग शिकायत नहीं दर्ज कराते। उन्हें लगता है कि शिकायत की, तो काम बिल्कुल न हो सकेगा। वे दलालों के जरिये काम निकलवा लेते हैं। ऐसे में, बड़ा सवाल यह है कि जवाबदेही कानून बन भी गया, तो क्या वास्तव में पारदर्शिता आ पाएगी? क्या सरकारी अधिकारी और कर्मचारी डरेंगे?
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मातृत्व मृत्यु दर को कम करते जाने के लिए माता के स्वास्थ को अच्छा रखना, एक बहु-क्षेत्रीय प्रयास है, जिसमें शिक्षा और पोषण से लेकर गर्भ निरोधकों और संस्थागत प्रसव तक के इनपुट से बेहतर परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 15 मार्च, 2022
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Date:28-03-22
Atmashakti Over Atmanirbharta Learn right lessons from Russia sanctions. Attempting self-reliance in technology is self-defeating Pranay Kotasthane, [ The writer is the Chairperson of the High Tech Geopolitics Programme at the Takshashila Institution ]
Confirmation bias is the tendency to search for information that confirms one’s preconceptions. This bias is visible in the Indian debates on technology following the West’s stringent export controls restricting the Russian state’s access to cutting-edge technology.
Some tech companies have gone far beyond the remit of these controls, suspending their operations or restricting access to Russian citizens. For those who seek tech self-sufficiency, this war appears to bolster their case for everything from data localisation to domestic social media platforms and home-made drones.
The common refrain seems to be: “See, this happens when you have technology interdependence with the West. Imagine if the West were to use the same instruments against India in the future. Shouldn’t we decouple before they do this to us?”
No doubt, this narrative is a popular one. It finds resonance amongst many policymakers and Indian citizens. But before this line of thinking converts the goal of atmanirbharta into a full-on quest for import substitution, here are four counterpoints to consider.
●First, the biggest lesson to draw from the Russia-Ukraine war is not that we need to become self-sufficient, but that invading another country comes at a humungous human cost to one’s own citizens. Nuclear-armed invaders might well avoid a conventional response by other nuclear-armed powers, but they will face responses in other domains – economic, technological and sub-conventional.
Perhaps, the reason behind this fear is historical. Many Indians cite the economic sanctions against India after the Pokhran tests. They fear that the information ageversion of those sanctions could be similar to the sanctions imposed on Russia.
However, that conclusion ignores the history of the last 20 years. The West, too, would prefer a powerful India to counter China. And for this reason, the same postPokhran sanctions were replaced by a civil nuclear agreement between the US and India within seven years. It would be a strategic mistake to cite another state’s past unreliability for justifying decoupling today when there’s substantial convergence of interests.
There’s also a category error in this comparison. Government-to-government sanctions against nuclear tests are different from the combined might of multi-State, multi-market and multisectoral sanctions that Russia’s invasion has invited. Since India has no designs to invade another country, we need not spend sleepless nights.
●Second, the pursuit of tech selfsufficiency is itself a near-impossible goal. Whatever the level of domestic alternatives we build, there will still be some levers left in the hands of other countries to throttle India’s progress. Take the case of semiconductors. The government’s policy push to attract semiconductor manufacturing firms to set up shop in India is a much-needed step. But this step – even if it works as desired – will not eliminate the need to import chips from outside India.
Moreover, semiconductor manufacturing is just one stage in the semiconductor ecosystem. It comprises other stages such as a cutting-edge research base that needs a highly skilled workforce, testing and packaging capability made competitive by low labour costs, and finally, Original Equipment Manufacturers (OEMs) that build consumer products with chips.
No one country can do all these steps by itself. Instead of national champions making complete products independently, companies only specialise in specific stages of this global supply chain. Dependencies for intermediate goods and specialised equipment in other countries are thus inescapable. Plurilateral collaboration is, therefore, a necessity, not a choice.
This logic of interdependence also applies to other high-tech sectors such as artificial intelligence and advanced computing. The research in these areas relies on extensive cross-border movements of intermediate products, talent and intellectual property.
●Third, the proper lesson from the West’s weaponisation of its tech economy is not atmanirbhar but atmashakti (self-strength). India’s deep connections with the West foster technology transfer (through a flow of ideas and people) in critical and emerging technologies. Building tech atmashakti requires deepening the links, not plugging out from the West.
The trajectory that China followed has a few lessons for us. Over 40 years, the sustained movement of ideas, capital, goods and services between China and the West helped China build its strengths. Collaborating with the West on future industries is in India’s self-interest.
●Fourth, self-reliance can quickly morph into self-harm through protectionism in technology manufacturing. For instance, the Union government banned the import of drones in February. The stated intent was to encourage participation in the government-sponsored ProductionLinked Incentive (PLI) scheme for drones, through which the government aspires to make India a global drone hub by 2030.
But banning the import of a good and becoming a global hub of the same good are antagonistic. There’s no incentive for acompany shielded by protectionism to compete with the best in the world.
Further, a recent report by the India Cellular and Electronics Association found that high import tariffs negate the benefits accrued via PLI schemes for mobile manufacturing. Using a PLI scheme merely to generate domestic champions is aredistribution of money from taxpayers to manufacturers. India benefits from PLI schemes only when the economic pie grows through exports. And doing that requires trade-friendly policies.
Instead of protectionism, India needs to dominate in areas where the West is relatively disadvantaged. The IT industry is one such example. Economist Ajay Shah estimates that IT is the most significant contributor by wages and economic value amongst all large non-financial firms in India. This industry benefits immensely from the connections with the West.
Finally, past attempts at building atmashakti failed, not for the lack of intent, but because India couldn’t provide stable and non-discriminatory tax, business and trade environments. There are no shortcuts.
Date:28-03-22
Taking The BIMSTEC Route To Prosperity The grouping’s moment has arrived as Saarc fades on the sub-regional front Rajiv Bhatia. [ The writer is Distinguished Fellow, Gateway House and a former ambassador ]
The unique regional grouping linking five countries of South Asia (India, Bangladesh, Nepal, Bhutan and Sri Lanka) and two countries of Southeast Asia (Thailand and Myanmar) holds its long-awaited fifth summit in Colombo on March 30. On it rides a hefty burden of expectations to advance regional cooperation. Meticulous preparations behind the scenes have created an atmosphere of hope for its success.
Building ambition
BIMSTEC (Bay of Bengal Multi-Sectoral Technical and Economic Cooperation) completes 25 years of the journey that began in Bangkok in June 1997. Until 2014, it was a low-profile, unassuming sub-regional grouping that had much to be modest about. But as hopes of Saarc cooperation faded, India took a bold initiative that helped the smaller grouping to develop ambition. The leaders of BIMSTEC were invited to a historic retreat for deep reflection; they also interacted with the Brics leaders. This was in Goa in October 2016. Two years later, BIMSTEC felt adequately confident to project itself as a dynamic regional grouping, ready to work for “a peaceful, prosperous and sustainable Bay of Bengal Region”. It should. It represents 1. 7 billion people and a combined GDP of $3. 8 trillion, which can accelerate economic development through greater integration.
All foreign ministers, except of Myanmar, will be present in Colombo. But all heads of state or government will attend the summit virtually from their capitals – a creative formula that allows the participation of Min Aung Hlaing, Myanmar’s PM, without triggering a diplomatic controversy. This calibrated compromise was necessary even though it deprives leaders of an opportunity for personal interactions.
A full agenda
BIMSTEC now stands at the cusp of rejuvenation as Colombo hands over the chairman’s responsibility to Thailand, which played a seminal role in creating a bridge between Saarc and Asean. Since the former continues to be in limbo, BIMSTEC is the only available platform for South Asian cooperation with the region. It should draw suitable lessons from the successful Asean model. For India specifically, BIMSTEC is of mounting relevance to its Neighbourhood First policy, national priority to ensure stability and development in the Northeast, and Indo-Pacific strategy.
What is likely to be achieved? BIMSTEC leaders will adopt the charter (or constitution) that defines its goals, institutions and long-term vision. They may also approve a major rationalisation of sectors of cooperation, pruning them down from 14 to seven areas, each assigned to a member state as ‘the lead’. They will support the strengthening of the secretariat, with at least one country – India – offering additional funding to shoulder its added responsibilities.
A 10-year master plan for transport connectivity supported by the Asian Development Bank will be adopted. Three new agreements will be signed, focussedon mutual legal assistance in criminal matters, cooperationbetween diplomatic academies and the establishment of a technology transfer facility in Colombo.
Time to take big strides
Most interesting will be to observe how the leaders address the more challenging issues. One, connectivity, as the overarching theme, is founded on the triple-axis of coastal shipping linkages, a seamless road transport network governed by a motor vehicles agreement, and asmooth energy grid interconnection based on demand and supply. Some agreements are not in place yet, while others await implementation. Two, the creation of a BIMSTEC development fund, which has shown little progress so far. Three, cooperation for disaster management and security cooperation for countering international terrorism, crime and cyber security have developed well, but they need to be balanced with progress on the economic front, given some members’ worry about the group’s ‘over-securitisation’.
Four, the plan to conclude a comprehensive free trade agreement, which began with a framework agreement signed in 2004, poses the biggest challenge. Existing impediments to the trade agreement need to be removed by mustering necessary political will. Five, the leaders may develop a consensus on the broad parameters that should shape BIMSTEC’s ties with its external partners. This is of increasing importance, given China’s marked intrusion into the geo-economic space of BIMSTEC.
Finally, BIMSTEC aspires to be inclusive, an association of business and industry leaders as well as other stakeholders from the ‘Third Space’ comprising youth, women groups and media. A rejuvenated BIMSTEC will contribute to turning the Indo-Pacific into a free, open and inclusive region.
Date:28-03-22
Don’t Scare Digital Currencies Away Waiting for RBI’s regulatory position ET Editorials
GoI has reaffirmed its intent in amendments to the Finance Bill to use tax as a deterrent to speculation in virtual digital assets. The amendments disallow losses on the sale of one crypto asset to be set off against gains on another. No deduction is permitted for any expenditure other than the cost of acquisition for computation of income from sale of cryptos and non-fungible tokens (NFTs). Every transfer of crypto assets will be taxed at the proposed 30% rate, irrespective of whether they are a capital asset or not. Only the proposed 1% rate of tax deducted at source will apply to transactions in digital assets. Penalties have been imposed for taxpayers who have claimed a deduction of surcharge and cess from their taxable income, but have not on their own accord paid the tax and interest on the deduction they have claimed.
The inability to set off losses will skew the risk-reward profile of digital assets, and crypto exchanges fear it could push trading activity beyond Indian jurisdiction to decentralised exchanges and foreign platforms accessed through virtual private networks. The industry feels not allowing tax deduction on the costs of mining cryptos will eventually force blockchain companies and the talent they hire to operate outside the country. To the extent that the proposed tax regime drives users from exchanges compliant with know-your-customer (KYC) rules towards underground peer-to-peer platforms, deterrence would be diluted.
Nirmala Sitharaman, in her statement while moving the amendments, has clarified the tax on private digital assets does not indicate GoI’s stance on their legitimacy. The regulatory position could become clearer once the Reserve Bank of India (RBI) is ready with its digital currency. Fiat digital currencies, which make transactions and monetary transmission more efficient, are inevitable as the use of cash plateaus in several countries. Speculation, and a reflex to curb it, must not draw attention away from the inherent superiority of digital currencies. This is the future of money.
Date:28-03-22
Poverty rose but income inequality fell There are signs that this pandemic has not followed the usual script — of the poor bearing the brunt of the pain Anup Malani is the Lee and Brena Freeman Professor at the University of Chicago. Arpit Gupta is an Assistant Professor at the NYU Stern School of Business, U.S. Bartek Woda is a research specialist at the University of Chicago
COVID-19 has upended Indian society. Over two-thirds of the country has been infected by COVID-19 and perhaps five million or so people have died, directly or indirectly, from the pandemic. The economy too has taken a beating. Even though there has been a V-shaped recovery, output remains about 10% lower than 2019.
In macroeconomic crises, including the oil shock of 1990-91 or the global liquidity crisis of 2007-08, many expect the poor to bear the brunt of the pain. They are the most vulnerable, without contractual protections and adequate safety nets. But there are signs that this pandemic has not followed that script.
Poverty certainly rose during the COVID-19 pandemic. We examined monthly data from nearly 2,00,000 households with a total of one million members from the Consumer Pyramids Household Survey through 2021.
We found that extreme poverty, defined by the World Bank as the percentage of the population with an income below $1.90, rose from 7.6% in November 2019 to 11.7% in July 2021.
Income inequality
However, income inequality actually fell. In 2019, the average monthly income of households in the top 25% and bottom 25% of the income distribution was approximately ₹45,000 and ₹8,000, respectively, in urban areas, and ₹22,500 and ₹7,500, respectively, in rural areas. While the average monthly income of the top quartile in urban areas fell almost 30%, to ₹32,500 by July 2021, the monthly income of the bottom quartile in July 2021 remained at pre-pandemic levels. In rural areas, the top quartile income fell by perhaps 20%, while the bottom quartile income grew slightly during the same period. The result is that inequality, measured as the percentage change in the income of the top quartile minus the income in the bottom quartile, fell by 15-20 percentage points. This is a robust finding: richer households saw larger drops in income all along the income scale, in rural and urban areas, within each State, and even within caste groups.
This remarkable finding is not unprecedented. Historians observed the same dynamic during the plague in 14th century Europe. Given how much the world economy has changed since then, however, the explanations for India’s experience will differ.
Three sources of income
To learn why inequality fell during the pandemic, we examined three sources of household income: government transfers, business profits, and labour income. Government transfers are cash or in-kind payments. Profits may be from any business, be it a food cart, a farm, or a manufacturing plant. Labour income is wages earned from hourly work or employment contracts.
Government payments to the poor cannot explain the decline in inequality. To be sure, income support was not insubstantial. Households received roughly ₹400 per month in urban areas and nearly ₹500 per month in rural areas during the lockdown and the Delta wave. They received roughly half that much during the rest of the pandemic. However, even when government transfers were netted out from income, income inequality fell by over 20% points by July 2021.
Business profits play a bigger role than transfers. The rich saw a larger decline in business income and depended more on that income than the poor. While just 7% of a bottom quartile household’s income is from a business, nearly 15% of a top quartile’s household’s income is from a business. Unlike labour income, business income is volatile because it is susceptible to changes in demand, and thus to aggregate income. We find that business income of the top quartile is four times more sensitive to the aggregate performance of the economy than the business income of the bottom quartile. Given the large negative effect of COVID-19 on the economy, this suggests that some of the disproportionate losses of the rich operate through business income.
Labour income, however, plays a critical role (Table). Labour income is just over 65% and 80% of the income of the top 25% and bottom 25% of households. These are larger shares than those of government transfers or business profits. To explain the decline in labour income, we looked at supply-side and then demand-side explanations.
Looking at supply, one might suspect the rich chose to work less than the poor, perhaps out of fear of contracting COVID-19. That was also our conjecture, but it proved wrong. When the economy contracted, people lost jobs and income. They tried to compensate by finding alternate work, sometimes even in other occupations. While this seems a natural response for the bottom 25%, it was even more true for the top 25%. While the minimum amount that the poor were willing to accept to take a job fell roughly 40%, the minimum amount fell more than 45% for the rich.
Demand for labour
The better explanation for the disproportionate loss of labour income among the top quartile households is that demand for their labour fell more. The rich tend to work in the service sector, and demand for services fell more than demand for other sectors. While 30% of workers in bottom quartile households work in the service sector, 45% of workers from the top quartile households do. During the pandemic, consumer spending on services fell by 30%-40%, far more than the decline in spending on manufacturing or agriculture.
The situation was reversed in manufacturing. That sector employs a larger share of bottom quartile workers than top quartile ones: 35% versus 15%. But manufacturing declined less than 20% during the pandemic. The progressive contraction of demand for services swamped the regressive contraction of demand for manufacturing.
To be clear, our analysis does not suggest that the pandemic was good for the Indian economy. The loss of life and rise in poverty make it one of the larger disasters the country has borne. The reduction in inequality would be a silver lining if it were accomplished by lowering poverty rather than reducing the income of the rich.
Nevertheless, by understanding the decline in inequality during the pandemic we can assess prospects for inequality after it ends. Once demand for services rises, along with aggregate income, both demand for the labour of the rich and the business income of that group will likely return. There is a risk that inequality will return to pre-pandemic levels.
Date:28-03-22
देसी उत्पादों की मांग संपादकीय
प्रधानमंत्री ने मन की बात कार्यक्रम में विश्व में भारतीय वस्तुओं की बढ़ती मांग का जो उल्लेख किया, वह एक वास्तविकता है और इसकी पुष्टि हाल में चार सौ अरब डालर के निर्यात का लक्ष्य हासिल करने से होती है। नि:संदेह यह भारत की बढ़ती क्षमता का परिचायक है, लेकिन अभी उसे और बढ़ाने की आवश्यकता है। इस आवश्यकता की पूर्ति हेतु लोकल के लिए वोकल अभियान के तहत स्थानीय उत्पादों को प्रोत्साहित करने की बात एक लंबे समय से की जा रही है। देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए ऐसा किया ही जाना चाहिए, लेकिन घरेलू बाजार के साथ विश्व बाजार में देसी उत्पादों की मांग अपेक्षा के अनुरूप तब बढ़ेगी, जब उनकी गुणवत्ता बढ़ेगी और वे उत्पादकता के मामले में अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा में खरे उतरेंगे। यह ध्यान रखा जाना चाहिए कि इस दिशा में अभी बहुत काम करना शेष है। वास्तव में उन कारणों की तह तक जाने की जरूरत है, जिनके चलते अनेक ऐसे चीनी उत्पादों की भारत में खपत हो रही है, जिन्हें आसानी से देश में बनाने-खपाने के साथ उनका निर्यात भी किया जा सकता है।
यह समय की मांग है कि हम भारत के लोग देसी उत्पादों की खरीद को प्राथमिकता दें लेकिन इसके साथ ही यह भी तो देखा जाए कि हमारे उद्यमी अपने उत्पादों की गुणवत्ता का स्तर बढ़ाने में कैसे समर्थ हों? यह सामर्थ्य तभी बढ़ सकती है, जब देसी उत्पादों की गुणवत्ता विश्वस्तरीय बनाने के लिए सरकार के स्तर पर कोई प्रभावी अभियान छिड़े और उसके तहत शोध एवं अनुसंधान को प्राथमिकता दी जाए। इस क्रम में सरकार को रोजगार के अवसर पैदा करने वाले छोटे और मझोले उद्योगों की विशेष रूप से मदद करनी होगी। ऐसा करके ही एक जिला-एक उत्पाद और मेक इन इंडिया जैसी योजनाओं को सफल बनाया जा सकता है। इस तरह की योजनाओं को सफल बनाने के लिए जितना केंद्र सरकार को सक्रिय होना होगा, उतना ही राज्य सरकारों को भी। यह सही समय है कि राज्यों के स्तर पर ऐसे शोध एवं अनुसंधान केंद्र स्थापित हों, जिनका एकमात्र उद्देश्य स्थानीय उत्पादों की गुणवत्ता बढ़ाना और उद्यमियों की समस्याओं का समाधान करना हो। हमारे उद्यमियों को भी यह समझना होगा कि अपने उत्पादों की गुणवत्ता बढ़ाए बिना वे विश्व बाजार में स्थान नहीं बना सकते। एक ऐसे समय जब दुनिया के तमाम देश चीनी उत्पादों पर अपनी निर्भरता कम करना चाहते हैं, तब यह स्थिति भारत के लिए एक अवसर है। इस अवसर को भुनाने के लिए कुछ कदम अवश्य उठाए गए हैं, लेकिन अभी अपेक्षित परिणाम सामने नहीं आए हैं और इसी कारण भारत स्वयं को निर्यात आधारित अर्थव्यवस्था में परिवर्तित नहीं कर पा रहा है।
Date:28-03-22
विनिवेश में सहायक संपादकीय
भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने एक नया मशविरा पत्र (सरकारी कंपनियों में विनिवेश के मामलों में प्रस्तावित मूल्य निर्धारण की समीक्षा) पेश किया है जो सरकारी उपक्रमों के मूल्य की खुली पेशकश में बदलाव का प्रस्ताव रखता है। इस बदलाव से रणनीतिक निवेशकों के लिए सरकारी उपक्रमों का अधिग्रहण अधिक आकर्षक हो सकता है लेकिन इससे अल्पांश हिस्सेदारों के संभावित प्रतिफल में कमी भी आ सकती है। सरकारी कंपनियों में विनिवेश की प्रक्रिया पर विचार करें तो इस प्रस्ताव के पीछे की दलील समझ में आती है। सेबी सब्सटेंशियल एक्विीजिशन ऑफ शेयर्स ऐंड टेकओवर्स रेग्युलेशन, 2011 के नियमों के मुताबिक अधिग्रहण करने वाले को उस स्थिति में 26 फीसदी अतिरिक्त हिस्सेदारी की खुली पेशकश करनी होगी जब वह 25 फीसदी स्वामित्व की सीमा पार कर चुका हो।
खुली पेशकश के लिए मूल्य का फॉर्मूला कई मानकों पर आधारित है। एक सूचीबद्ध कंपनी के लिए इसका निम्र मानक के तहत सर्वाधिक कीमत होना आवश्यक है: अधिग्रहण के लिए तय प्रति शेयर मूल्य, सार्वजनिक घोषणा से पहले के 52 सप्ताह में अधिग्रहण करने वाले द्वारा (यदि) चुकाया गया औसत वॉल्यूम मूल्य, अधिग्रहण करने वाले द्वारा सार्वजनिक घोषणा के पूर्व के 26 सप्ताह में चुकाया जा सकने लायक उच्चतम मूल्य, सार्वजनिक घोषणा के पहले के 50 कारोबारी दिवस में स्टॉक एक्सचेंज पर वॉल्यूम आधारित औसत बाजार मूल्य। यदि लक्षित अधिग्रहण में एक अन्य सूचीबद्ध कंपनी का अप्रत्यक्ष नियंत्रण हासिल करने की स्थिति में भी ऐसा ही मूल्य फॉर्मूला लागू होता है। यह मूल्य मौजूदा अहम अंशधारक को दिए जाने वाले मूल्य से कम नहीं होना चाहिए। 26 सप्ताह/52 सप्ताह का मानक उन स्थितियों से निपटने के लिए है जहां अधिग्रहण करने वाले ने बाजार खरीद के जरिये हिस्सेदारी मजबूत की हो।
नियामक सरकारी उपक्रमों के लिए 60 दिन का मानक समाप्त करना चाहती है। यहां बात यह है कि निजी अधिग्रहण के उलट सामरिक बिक्री या विनिवेश के पहले एक विस्तारित अवधि तक सार्वजनिक सूचनाएं जारी की जाती हैं। एक निजी कंपनी के अधिग्रहण में सार्वजनिक सूचना तब आती है जब कोई बाध्यकारी समझौता हो। इसलिए पूर्व की अवधि में शेयर कीमतों पर खास असर नहीं होता। किसी सरकारी कंपनी के विनिवेश में विनिवेश का इरादा अक्सर बजट के दौरान सार्वजनिक रूप से जताया जाता है या फिर इसे दूसरे आधिकारिक मंचों से सामने लाया जाता है। अधिग्रहण करने वाले को बोली लगाने वालों में से चुना जाता है। इस प्रक्रिया में कई महीने लगते हैं। ऐसे में सार्वजनिक सूचनाओं के सामने आने से प्राय: सौदे की घोषणा के पहले ही बाजार मूल्य में काफी इजाफा हो जाता है। इस संदर्भ में नियामक ने सही कहा कि संभावित खरीद को बदलती हुई पेशकश मूल्य के लिए तैयार रहना चाहिए क्योंकि विनिवेश की घोषणा और आगे विभिन्न चरणों में बाजार मूल्य बढ़ने की संभावना रहती है।
यदि 60 दिन का मानक हटा दिया जाता है तो अल्पांश हिस्सेदारों के लिए खुली पेशकश मूल्य सरकार को की गई पेशकश के अनुरूप ही रहेगा या थोड़ा अधिक रह सकता है। यदि संबंधित सरकारी कंपनी में परस्पर अंशधारिता है जिससे अन्य सूचीबद्ध कंपनियों में अप्रत्यक्ष नियंत्रण की स्थिति बन सकती है तो 60 दिन वाला मानक भी आकलन में उसी तरह अलग किया जा सकेगा। खुली पेशकश मूल्य फॉर्मूला में ऐसे बदलाव ऐसे रणनीतिक सौदों को अधिक बेहतर बना सकते हैं और ये अधिग्रहण करने वाले के लिए ज्यादा आकर्षक हो जाएंगे। इससे शेयर कीमतों में अस्थिरता कम होगी और सरकार को आसानी से उचित मूल्यांकन पर पहुंचने में मदद मिलेगी। सरकार को विनिवेश कार्यक्रम को आक्रामक ढंग से अंजाम देना होगा ताकि आर्थिक सुधार की मदद की जा सके।
Date:28-03-22
आत्मनिर्भरता का लक्ष्य और चुनौतियां जयंतीलाल भंडारी
कोरोना महामारी और रूस-यूक्रेन युद्ध जैसी चुनौतियों के बीच वैश्विक व्यवस्था में भारत की अहमियत बढ़ती जा रही है। लेकिन इन मौजूदा चुनौतियों के बीच अब आत्मनिर्भरता के रास्ते पर बढ़ कर ही देश ऊंचाइयां हासिल कर सकता है। अब भारत के लिए आत्मनिर्भरता केवल आकर्षक नारा ही नहीं होना चाहिए, बल्कि इसे वास्तविक रूप में साकार होता दिखना भी चाहिए। देश के समक्ष इस समय जो बड़ी चुनौतियां हैं, उनमें एक अर्थव्यवस्था पर बाहरी दबावों का जोखिम कम करना भी है। इसके लिए रक्षा क्षेत्र के साथ-साथ विनिर्माण, प्रौद्योगिकी विकास और कृषि उत्पादन सहित विविध क्षेत्रों में देश को आत्मनिर्भर बनाना होगा।
निश्चित रूप से रूस-यूक्रेन संकट के मद्देनजर भारत के लिए यह सबक भी है कि चीन और पाकिस्तान से लगातार मिल रही रक्षा चुनौतियों के बीच भारत को दुनिया में सामरिक रूप से शक्तिशाली देश के तौर पर अपनी पहचान बनाना होगी। गौरतलब है कि हिंद-प्रशांत सुरक्षा पर दस मार्च को अमेरिकी कांग्रेस में सांसदों ने कहा था कि वास्तविक नियंत्रण रेखा पर भारत और चीन के बीच तनाव चार दशकों में सबसे खराब स्तर पर पहुंच गया है। सामरिक रूप से महत्त्वपूर्ण हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की आक्रामकता बढ़ती जा रही है। ऐसे में भारत को अपनी रक्षा तैयारियां मजबूत करना जरूरी है। इसके अलावा 13 मार्च को केंद्र सरकार की सुरक्षा मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (सीसीएस) की बैठक में रूस-यूक्रेन युद्ध के मद्देनजर अत्याधुनिक सुरक्षा तकनीक के इस्तेमाल और रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में भारत को आत्मनिर्भर बनाने के काम को प्राथमिकता देने के निर्देश दिए गए थे।
रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के लिहाज से भारत के सामने स्थितियां चुनौतीपूर्ण भले हों, पर संसाधनों की कमी नहीं हैं। इस क्षेत्र में भारत और भारतीयों की क्षमता का दुनियाभर में लोहा माना जाता है। रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता के लिए हमें कितना आगे जाना होगा, इसका अनुमान स्टाकहोम इंटरनेशनल पीस रिसर्च इंस्टीट्यूट की ताजा रिपोर्ट से लगाया जा सकता है। रिपोर्ट के मुताबिक हथियार खरीद के मामले में भारत और सऊदी अरब दुनिया में शीर्ष पर हैं। भारत कुल वैश्विक हथियारों का ग्यारह फीसद हथियार खरीदता है। हालांकि हमारे आयुध कारखाने विशालकाय हैं, लेकिन रक्षा उत्पादन में हिस्सेदारी महज दस फीसदी पर ही टिकी है। स्थिति यह है कि अभी तो भारत सैनिकों की वर्दियों के लिए भी दूसरे देशों पर निर्भर है। लेकिन यह भी महत्त्वपूर्ण है कि भारत से रक्षा निर्यात भी लगातार बढ़ रहे हैं। हथियार निर्यात के मामले में भारत दुनिया में चौबीसवें स्थान पर है। वर्ष 2019-20 में भारत का रक्षा निर्यात नौ हजार करोड़ रुपए था। इसे 2024-25 तक बढ़ा कर पैंतीस हजार हजार करोड़ रुपए करने का लक्ष्य रखा गया है।
एक संतोषजनक बात यह भी है कि भारत का रक्षा बजट लगातार बढ़ रहा है। वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने इस बार आम बजट में रक्षा क्षेत्र के लिए सवा पांच लाख करोड़ रुपए का आवंटन किया। यह बजट पिछले वर्ष के मुकाबले सैंतालीस हजार करोड़ रुपए अधिक है। चूंकि भारत के रक्षा तकनीकी विशेषज्ञों ने कई तरह के कौशल हासिल कर लिए हैं, इसलिए भारत लड़ाकू विमानों सहित रक्षा क्षेत्र की जरूरतों को पूरा करने के लिए आत्मनिर्भर बनने की दिशा में तेजी से बढ़ सकता है।
विनिर्माण क्षेत्र में भी आत्मनिर्भरता हासिल करना बड़ी चुनौती है। हालांकि वर्ष 2021-22 में भारत का निर्यात चार सौ अरब डालर के ऐतिहासिक स्तर पर पहुंच गया, लेकिन भारत का आयात भी इस वर्ष पांच सौ नवासी अरब डालर के स्तर पर है। यानी एक सौ नवासी अरब डालर का व्यापार घाटा है। यदि हम उत्पाद निर्यात के नए आंकड़ों का विश्लेषण करें, तो पाते हैं कि निर्यातकों ने आपूर्ति से जुड़ी चुनौतियों के बावजूद वित्त वर्ष 2021-22 में औसतन तेंतीस अरब डालर से अधिक के उत्पाद हर महीने निर्यात किए। खासतौर पर पेट्रोलियम उत्पादों, इलेक्ट्रानिक और इंजीनियरिंग उत्पाद, चमड़ा, काफी, प्लास्टिक, परिधान, मांस, दूध से बने उत्पाद, समुद्री उत्पाद और तंबाकू आदि की निर्यात बढ़ाने में अहम भूमिका रही है। इंजीनियरिंग सामान, परिधान आदि का निर्यात बढ़ने से यह धारणा भी बदल रही है कि भारत प्राथमिक जिंसों का ही बड़ा निर्यातक है। अब भारत अधिक से अधिक मूल्यवर्धित और उच्च गुणवत्ता वाले सामान भी निर्यात कर रहा है।
देश का व्यापार घाटा कम करने के लिए 2022-23 के बजट में कई प्रावधान किए गए। गौरतलब है कि वित्तमंत्री ने बजट में विशेष आर्थिक क्षेत्र यानी सेज के वर्तमान स्वरूप को बदलने की बात कही थी। सेज में उपलब्ध संसाधनों का पूरा उपयोग करते हुए घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों बाजारों के लिए विनिर्माण तेज किया जा सकेगा। जहां उत्पादन से जुड़ी विशेष प्रोत्साहन (पीएलआइ) योजना की सफलता से चीन से आयात किए जाने वाले कच्चे माल के विकल्प तैयार हो सकेंगे, वहीं औद्योगिक उत्पादों का निर्यात भी बढ़ सकेगा। देश में अभी भी दवा, मोबाइल, चिकित्सा उपकरण, वाहन और बिजली उद्योग काफी हद तक चीन से आयातित कच्चे माल पर ही निर्भर हैं। सरकार ने आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत नवंबर 2020 से तेरह औद्योगिक क्षेत्रों के लिए पीएलआइ योजना को करीब दो लाख करोड़ रुपए के प्रोत्साहनों के साथ आगे बढ़ाया है। वर्ष 2022-23 के बजट में भी पीएलआइ योजना के लिए प्रोत्साहन सुनिश्चित किए हैं। निसंदेह देश में विशेष आर्थिक क्षेत्रों की नई भूमिका, मेक इन इंडिया अभियान की सफलता और पीएलआइ योजना का सशक्त तरीके से क्रियान्वयन जरूरी है।
रिकार्ड खाद्यान्न पैदावार और उसका निर्यात निश्चित रूप से देश की नई आर्थिक शक्ति बन सकता है। लेकिन दलहन और तिलहन क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की चुनौती सामने है। अभी देश में कुल जरूरत का करीब साठ फीसद खाद्य तेल आयात किया जाता है। ऐसे में कृषि क्षेत्र को आगे बढ़ाने के अधिक प्रयास करने होंगे। तभी देश के पास खाद्यान्न का सुरक्षित भंडार होगा और दुनिया के कई देशों को कृषि निर्यात बढ़ाए जा सकेंगे। देश में कृषि क्षेत्र के तहत दलहन और तिलहन उत्पादन के साथ-साथ खाद्य तेल के उत्पादन में आत्मनिर्भरता को उच्च प्राथमिकता दी जानी होगी।
अब बात आती है ऊर्जा क्षेत्र की। ऊर्जा क्षेत्र में भी देश को आत्मनिर्भरता के लिए तेजी से काम करना होगा। एक ओर देश में जहां कच्चे तेल का उत्पादन बढ़ाना होगा, वहीं कच्चे तेल के विकल्प भी तलाशने होंगे। देश को रोजाना करीब पचास लाख बैरल पेट्रोलियम पदार्थों की जरूरत होती है। चूंकि भारत कच्चे तेल की अपनी जरूरत का करीब पिच्यासी फीसद आयात करता है। इस आयात का करीब साठ फीसद हिस्सा खाड़ी देशों इराक, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात आदि से आता है। कच्चे तेल के वैश्विक दाम में तेजी के बीच तेल कंपनियों की एथनाल मिश्रण कार्यक्रम में दिलचस्पी और बढ़ानी होगी। मालूम हो कि देश के पास करीब तीन सौ अरब बैरल का विशाल तेल भंडार है, लेकिन हम उसका पर्याप्त दोहन नहीं कर पा रहे हैं। वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की वर्तमान कीमतों की तुलना में चार-पांच गुना कम लागत पर ही कच्चे तेल का दोहन किया जा सकता है। इसके अलावा देश में बिजली चलित वाहनों के उपयोग को भी बढ़ावा देना होगा। इस दिशा में नवाचारी उद्योग बड़ी भूमिका निभा सकते हैं। ऐसे में मौजूदा चुनौतियों और संकटों के बीच आत्मनिर्भरत बनने का लक्ष्य एक अवसर के रूप में देखा जाना चाहिए।
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महिलाओं की शक्ति के सदुपयोग की संभावना कहाँ है ?
नीतियां और उपाय –
लैंगिक समानता के साथ महिलाओं की श्रम भागीदारी बढ़ाकर, सामाजिक कल्याण और आर्थिक विकास के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सकता है।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित के. राजेश्वर राव एवं साक्षी खुराना के लेख पर आधारित। 8 मार्च, 2022
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Date:26-03-22
Has IAS Failed The Nation? Yes, and it’s not all politicians’ fault. The service rewards mediocrity & risk aversion Duvvuri Subbarao, [ A former RBI governor, was also an IAS officer ]
Has the IAS failed the nation? I wish the answer were a resounding ‘no’. Much to my regret though, that’s not the case. The public perception of the IAS today is of an elitist, self-serving, status quo perpetuating set of bureaucrats who are out of touch with reality, who wallow in their privileges and social status and have lost the courage of conviction to stand up for what’s right.
It wasn’t always like this. In the mid-1970s when I was a fresh entrant into the service, if the government was being attacked by the opposition on a scam or a scandal, all that the CM had to do was to stand up in the Assembly and announce that he would appoint an IAS officer to inquire into the matter. That was enough to shut out the debate. Today if a CM said that, she is likely to be booed.
It’s difficult to put a precise date on when the decline started. When the IAS was instituted soon after Independence as a successor to the colonial era ICS, it was seen as the home grown answer to the enormous task of nation building in a country embarking on an unprecedented experiment of anchoring democracy in a poor, illiterate society.
Whether it was agricultural development, land reforms, building irrigation projects, promoting industry, improving health and education delivery, implementing social justice or enforcing the rule of law, the IAS was seen as the delivery arm. IAS officers led this effort from the front, built an impressive development administration network from ground zero and earned for the service a formidable reputation for competence, commitment and integrity.
That reputation began unravelling in subsequent decades. The IAS lost its ethos and its way. Ineptitude, indifference and corruption had crept in. Arguably, this negative stereotype view is shaped by a minority of officers who have gone astray, but the worry is that that minority is no longer small.
A CM once told me that of the IAS officers at his disposal, about 25% were callous, corrupt or incompetent, the middle 50% had happily turned into sinecures and that he had to depend on the remaining 25% to get all his work done. The Prime Minister echoed a similar view when he openly expressed in the Parliament last year his disenchantment with the ‘babu culture’ in the bureaucracy.
What explains this malaise in the IAS? The standard scapegoats are the recruitment examination, the induction training and subsequent in-service training, limited opportunities for selfimprovement and indifferent or even callous career management. For sure, these are all areas in need of improvement but to believe that these are the biggest problems ailing the IAS is to miss the wood for the trees.
The biggest problem with the IAS is a deeply flawed system of incentives and penalties. The service still attracts some of the best talent in the country, and young recruits come in with sharp minds and full of enthusiasm to ‘change the world’. But soon, they become cogs in the wheels of complacency and acquiescence, turn lazy and cynical, and worse, lose their moral compass.
IAS officers would like the world to believe that this happens because of poli- ticians standing in the way of their delivering results. You can’t miss noticing that most IAS memoirs are, at heart, tales of: “I was going to do great things but politicians came in the way and stopped me. ”
I don’t want to trivialise the challenge of political interference; in a democracy, it comes with the territory. But to blame politicians for the intellectual and moral decline of the IAS is self-serving. Politicians will of course dangle carrots but why should officers go for them? What happens though is that some individual officers with weak moral fabric succumb to the temptation and others follow suit, either attracted by the rewards or simply to save their careers.
The truth is that no political system, no matter how venal, can corrupt a bureaucracy if it stands united and inflexibly committed to collective high standards of ethics and professional integrity. Sadly, that’s not been the IAS story.
It strikes me that Prime Minister Boris Johnson of the UK is currently being investigated for alleged ‘party-gate’ transgressions by the British equivalents of our cabinet secretary and the Delhi police. And not one member of the UK parliament, not even an opposition MP, has cast any doubt on the integrity of the probes. Such a thing happening in our system is unimaginable, and that’s a reflection not of the low esteem in which our politicians are held but of the low esteem in which our bureaucracy is held.
So, what is the problem with incentives and penalties? For a start, when everyone gets promoted by efflux of time, to use a bureaucratic phrase, there is no pressure on officers to perform and deliver results. In a system where the smart, enthusiastic and capable are not assured of rising to the top, and the corrupt, lazy and incompetent don’t get weeded out, there is no motivation for officers to upgrade their knowledge and skills. A system that promotes mediocrity and risk aversion rather than innovation and change sinks to a low common denominator as indeed the IAS has.
The IAS has to be reformed into a meritocracy. There will be resistance of course but it is doable. How to go about that has to await another opinion piece.
I am deeply conscious that there are hundreds of young IAS officers out there in the field performing near miracles under testing circumstances. Sadly, my generation of civil servants and subsequent cohorts have bequeathed a flawed legacy to these unsung heroes. To them passes the challenge and opportunity of recovering the soul of the IAS.
Date:26-03-22
To Make Our Cities Truly Eye-Catching India Inc, chip in to spread murals, street art ET Editorials
By and large, most parts of most Indian cities and towns are conglomerations of concrete structures, unsightly public spaces and disagreeable stretches that make the outdoors, even without problems like pollution and the general lack of civic sense, a place that requires to be negotiated with rather than enjoyed. Both behavioural science and common sense tell us that people are far less likely to, say, litter, dirty or even vandalise public spaces that are visually pleasant. What can turn the tide is something simple and, yet, that can overtly leave a mark: street art.
Organisations like St+Art are already literally changing India’s urban landscape via striking murals. In 2014, an area as visually ungainly as New Delhi’s ITO crossing, changed its look — and the way it is looked at — when a 152 ft black-and-white mural of the Mahatma adorned the façade of the Delhi Police Headquarters in a collaboration between an art and government body. Walls of public buildings and even residential homes along Delhi’s Lodhi Road and elsewhere followed. Bright, imaginative — some quite stunning — street art has crept up in other cities across India, including Mumbai, Coimbatore, Patna, Chennai, Kozhikode and Kolkata. The initial curiosity value segues into a genuine confirmation of how pleasing our urban public spaces can be courtesy large-scale, building-sized works of art.
Companies such Asian Paints are already collaborating with organisations, spreading colour and wonderful shapein our otherwise largely drab urban spaces. Corporates should join in and ‘sponsor walls’ for murals and street art projects across the country, perhaps as part of their CSR, or even as straightforward ‘brand-buildings’ exercises. India, as the cliché goes, is a land of colour. By replacing the all-too-prevalent grime and slapdash of cementconcrete with outdoor, everyday art depicting nature, wildlife and fantastical images — and not restricting eyegrabbing subjects to just ‘great Indians’ — we can make our cities not just liveable but also celebratable.
Date:26-03-22
चीन को खरी-खरी संपादकीय
यह आवश्यक ही नहीं, अनिवार्य था कि चीनी विदेश मंत्री वांग यो की अनपेक्षित नई दिल्ली यात्रा के समय भारत उन्हें खरी-खरी सुनाने में संकोच नहीं करता। यह अच्छा हुआ कि ऐसा ही हुआ और विदेश मंत्री जयशंकर ने उनसे दो टूक कहा कि चीन के साथ भारत के संबंध तब तक सामान्य नहीं हो सकते, जब तक वह सीमा पर अपने अतिक्रमणकारी रवैये का परित्याग नहीं करता। भले ही चीनी विदेश से बात करेंगे, लेकिन जब तक अपेक्षित परिणाम सामने नहीं आ जाते, तब तक भारत को अपने रुख पर न केवल अडिग रहना चाहिए, बल्कि उसे बार-बार रेखांकित भी करना चाहिए। यह इसलिए आवश्यक है, क्योंकि चीन सीमा संबंधी विवादों को लंबा खींचने और फिर कुछ ले-देकर समझौता करने की अपनी कुटिल नीति के लिए जाना जाता है। वास्तव में इसी कारण दोनों देशों के सैन्य अधिकारियों के बीच 15 दौर की बातचीत के बाद भी मामूली प्रगति हुई है। भारत को यह लगातार स्पष्ट करते रहना होगा कि वह बेहद धीमी गति वाली इस प्रगति से बिल्कुल भी संतुष्ट नहीं और चीन को उन समझौतों का पालन करना ही होगा, जो सीमा विवाद के संदर्भ में हुए हैं और जिनका उसने उल्लंघन किया। चूंकि चीन के इरादों पर भरोसा नहीं किया जा सकता, इसलिए यह भी समय की मांग है कि भारत उसकी हरकतों पर नजर रखे।
भारत इसकी अनदेखी नहीं कर सकता कि चीनी विदेश मंत्री ने नई दिल्ली आने से पहले पाकिस्तान में कश्मीर का मसला उठाया । यह ठीक है कि उन्हें यह विस्तार से बता दिया गया कि कश्मीर पर उनका बयान भारत को क्यों आपत्तिजनक लगा, लेकिन यह पहली बार नहीं, जब चीन ने कश्मीर मसले पर बेजा टिप्पणी की हो । वह यह काम पहले भा कर चुका है। इसी तरह वह अरुणाचल प्रदेश को लेकर भी अनावश्यक और भारत को उकसाने वाली टिप्पणियां करता रहता है। इसका सटीक जवाब यही हो सकता है कि भारत ‘एक चीन नीति’ । पर अपनी प्रतिबद्धता जताने पर नए सिरे से विचार करे। यदि चीन भारत की एकता, अखंडता और संप्रभुता को लेकर संवेदनशील नहीं तो फिर भारतीय नेतृत्व को भी यह संकेत देने में और देर क्यों करनी चाहिए कि वह ताइवान और तिब्बत जेसे मसलों पर चुप नहीं रह सकता? वास्तव में चीन पर दबाव बनाने और उसे बढ़ाने की जरूरत है। इस क्रम में यह भी अवश्य देखा जाना चाहिए कि चीन पर आर्थिक निर्भरता कम करने के लिए जो कदम उठाए गए थे, उनके वांछित परिणाम क्यों नहीं मिले? यह ठीक नहीं कि तमाम प्रयासों के बाद भी व्यापार के मामले में पलड़ा चीन के पक्ष में ही झुका हुआ है।
Date:26-03-22
जहरीली हवा संपादकीय
यह हर साल का सिलसिला बन गया है कि जब भी दुनिया के शहरों में प्रदूषण का स्तर नापा जाता है, तो भारत के शहर प्राय: उसमें अव्वल पाए जाते हैं। स्विस संगठन आइक्यूएअर की ताजा रिपोर्ट में दिल्ली को लगातार चौथे साल दुनिया का सबसे प्रदूषित शहर बताया गया है। भारत का एक भी ऐसा शहर नहीं है, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा निर्धारित वायु गुणवत्ता के मानक पर खरा उतरता हो। वायु गुणवत्ता मानक के अनुसार हवा में पीएम 2.5 कणों की मौजूदगी पांच माइक्रोग्राम प्रति घनमीटर से अधिक नहीं होनी चाहिए। मगर भारत के शहरों में यह पचास से अधिक ही दर्ज होती है। दिल्ली में यह छियानबे माइक्रोग्राम से अधिक है। पिछले साल दिल्ली में वायु प्रदूषण में साढ़े चौदह फीसद से अधिक की बढ़ोतरी दर्ज हुई। यह स्थिति तब है, जब इस शहर को प्रदूषणमुक्त बनाने के अभियान लगातार चलते रहते हैं। शहर में बाहर से आने वाले भारी वाहनों पर रोक है, दिल्ली सरकार ने स्माग टावर खड़े कर प्रदूषण अवशोषित करने का उपाय भी किया है। प्रदूषण फैलाने वाले वाहनों पर भारी जुर्माना किया जाता है। पंद्रह साल पुराने वाहनों को सड़क पर चलने की इजाजत नहीं है।
दिल्ली और दूसरे महानगरों में बढ़ते वायु प्रदूषण की वजहें सबको पता हैं। हालांकि धुआं उगलने वाले कारखानों को शहरों के रिहाइशी इलाकों से दूर बसाया गया है। जो उद्योग-धंधे पहले से शहरों के भीतर चलते आ रहे थे, उन्हें किफायती दर पर भूखंड आबंटित कर शहरों से दूर बसाया गया। मगर हकीकत यह है कि आज भी दिल्ली सहित तमाम शहरों में बड़े पैमाने पर लघु उद्योग शहरों के भीतर चलाए जाते हैं, जो न सिर्फ वायु प्रदूषण फैलाते, बल्कि नदी जल में भी जहर घोलते रहते हैं। उनमें से बहुत सारे उद्योगों का पंजीकरण नहीं है, प्रशासन की मिली-भगत से शहरों के भीतर बने हुए हैं। शहरों के भीतर आ गए गांवों में ऐसे उद्योग बड़े पैमाने पर मौजूद हैं। उन पर कैसे काबू पाया जाए, यह तो प्रशासन ही बता सकता है। इसी तरह वाहनों में प्रदूषण नियंत्रक यंत्र लगाना अनिवार्य किया गया। मगर उसका कोई उल्लेखनीय नतीजा सामने नहीं आ पा रहा।
हवा में पीएम 2.5 कणों की सघनता बढ़ने का सबसे बड़ा कारण वाहनों से निकलने वाला धुआं माना जाता है। इसलिए कई बार यह भी सुझाव आए कि वाहनों की बिक्री पर नियंत्रण किया जाए और सार्वजनिक परिवहन की क्षमता बढ़ाई जाए। इस दिशा में मेट्रो रेलों के परिचालन और नगर बस सेवाओं की संख्या में बढ़ोतरी करके काबू पाने का प्रयास किया गया। दिल्ली में बाहर से आने वाले ट्रकों के प्रवेश पर अंकुश लगाया गया, शहर में चलने वाली सभी बसों को सीएनजी चालित किया गया। पर वायु प्रदूषण अगर चौदह-पंद्रह फीसद की दर से बढ़ा दर्ज हो रहा है, तो यह सरकारों के लिए गंभीर चिंता का विषय होना चाहिए। इसे तदर्थ उपायों के जरिए नहीं रोका जा सकता। अब तक सरकारें स्थिति गंभीर होने पर कई तात्कालिक उपाय आजमा चुकी हैं, जैसे दिल्ली सरकार ने सम-विषम योजना आजमाई। मगर ऐसे उपाय इसके स्थायी हल नहीं साबित हो सकते। सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को और चुस्त-दुरुस्त करने की जरूरत से इनकार नहीं किया ज सकता। दिल्ली सहित तमाम महानगरों में लोगों की शिकायत रहती है कि सरकारें इस दिशा में व्यावहारिक कदम नहीं उठातीं। अब पानी सिर से ऊपर बढ़ने लगा है, इसलिए इस समस्या का समन्वित रूप से समाधान तलाशा जाना जरूरी है।
Date:26-03-22
साक्षरता और सुशासन सुशील कुमार सिंह
भारत में साक्षरता शक्ति का एक महत्त्वपूर्ण उपकरण है। जो महिलाएं शिक्षित हैं, वे साक्षर बच्चों की एक पीढ़ी पैदा कर सकती हैं और यही पीढ़ी देश में कुशल कार्यबल बन सकती है। स्पष्ट है कि साक्षरता में कौशल और प्रतिभा का संदर्भ निहित है। जब बाजार में अवसरों की मांग बढ़ेगी और जीवन स्तर में सुधार होगा, तो प्रति व्यक्ति आय भी ऊंची होगी और देश की आर्थिकी छलांग लगाएगी।
गरिमामय और उद्देश्यपूर्ण जीवन जीने के लिए व्यक्ति को साक्षर होना बहुत जरूरी है। साक्षरता मुक्त सोच को जन्म देती है। आर्थिक विकास के साथ-साथ व्यक्तिगत और सामुदायिक कल्याण के लिए भी यह महत्त्वपूर्ण है। इसके अतिरिक्त आत्मसम्मान और सशक्तिकरण भी इसमें निहित है। अब सवाल यह है कि जब साक्षरता इतने गुणात्मक पक्षों से युक्त है, तो फिर अभी भी हर चौथा व्यक्ति अशिक्षित क्यों है? क्या इसके पीछे व्यक्ति स्वयं जिम्मेदार है या फिर सरकार की नीतियां और मशीनरी जवाबदेह है? कारण कुछ भी हो, मगर इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि साक्षरता का अभाव सुशासन की राह में बड़ा रोड़ा है।
सुशासन एक जन केंद्रित संवेदनशील और लोक कल्याणकारी भावनाओं से युक्त ऐसी व्यवस्था है जिसके दोनों छोर पर केवल व्यक्ति ही होता है। यह एक ऐसी अवधारणा है जहां से सामाजिक-आर्थिक उत्थान अंतिम व्यक्ति तक पहुंचाया जाता है। बदले दौर में सरकार की नीतियां और जन अपेक्षाएं भी बदली हैं। बावजूद इसके पूरा फायदा तभी उठाया जा सकता है, जब देश निरक्षरता से मुक्त होगा। गौरतलब है कि स्वतंत्रता के बाद 1951 में 18.33 फीसद लोग साक्षर थे, जो 1981 में बढ़ कर इकतालीस फीसद हो गए थे। लेकिन जनसंख्या के अनुपात में यह क्रमश: तीस करोड़ से बढ़ कर चवालीस करोड़ हो गए थे। ऐसे में राष्ट्रीय साक्षरता मिशन की कल्पना अस्तित्व में आई। पांच मई 1988 को शुरू हुए इस मिशन का उद्देश्य था कि लोग अनपढ़ न रहें। कम से कम साक्षर तो जरूर हो जाएं। इस मिशन ने असर तो दिखाया, लेकिन शत-प्रतिशत साक्षरता हासिल कर पाने में यह नाकाम रहा। इसी के ठीक तीन बरस बाद 25 जुलाई 1991 को आर्थिक उदारीकरण का पदार्पण हुआ और 1992 में नई करवट के साथ भारत में सुशासन का बिगुल बजा। साक्षरता और सुशासन की यात्रा को तीन दशक से अधिक वक्त हो गया। जाहिर है, दोनों एक-दूसरे के पूरक तो हैं, मगर अभी देश में इन दोनों का पूरी तरह स्थापित होना बाकी है।
भारत में साक्षरता सामाजिक-आर्थिक प्रगति की कुंजी है। साक्षरता और सुशासन का गहरा रिश्ता है। दुनिया के किसी भी देश में बिना शिक्षित समाज के सुशासन के लक्ष्य को हासिल करना संभव नहीं है। साक्षरता से जागरूकता को बढ़ाया जा सकता है और जागरूकता से स्वावलंबन और आत्मनिर्भरता को बढ़त मिल सकती है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर निरक्षरता मिटाने के मकसद से 1966 में यूनेस्को ने अंतरराष्ट्रीय साक्षरता दिवस की शुरुआत की थी। इसका कार्यक्रम का उद्देश्य था कि 1990 तक किसी भी देश में कोई भी व्यक्ति निरक्षर न रहे।
मगर ताजा स्थिति यह है कि भारत में 2011 की जनगणना के अनुसार साक्षरता चौहत्तर फीसद ही है। जबकि राष्ट्रीय सांख्यिकी आयोग के 2017-18 के सर्वेक्षण के मुताबिक देश में साक्षरता 77.7 प्रतिशत थी। इतना ही नहीं, साक्षरता दर में व्यापक लैंगिक असमानता भी विद्यमान है। साक्षरता का शाब्दिक अर्थ है- व्यक्ति का पढ़ने और लिखने में सक्षम होना। आसान शब्दों में कहें तो जिस व्यक्ति को अक्षरों का ज्ञान हो और वह पढ़ने-लिखने में सक्षम हो, सरकार की नीतियों, बैंकिंग व्यवस्था, खेत-खलिहानों से जुड़ी जानकारियां, कारोबार से जुड़े उतार-चढ़ावों जैसी चीजों को समझ सके। साक्षरता के जरिए लोकतंत्र की मजबूती से लेकर आत्मनिर्भर भारत की यात्रा भी सहज हो सकती है।
भारत के केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय ने हाल में वयस्क शिक्षा को बढ़ावा देने और निरक्षरता खत्म करने के लिए ‘पढ़ना-लिखना अभियान’ की शुरुआत की है। इस अभियान का उद्देश्य 2030 तक देश में साक्षरता दर सौ फीसद तक ले जाने का है। जाहिर है, यह अभियान ‘साक्षर भारत-आत्मनिर्भर भारत’ के ध्येय को भी पूरा करने में मदद कर सकती है। गौरतलब है कि संपूर्ण साक्षरता के लक्ष्य को ध्यान में रख कर ही साल 2009 में ‘साक्षर भारत कार्यक्रम’ शुरू किया गया था। इसमें यह निहित था कि राष्ट्रीय स्तर पर यह दर अस्सी फीसद तक पहुंचाना है। हालांकि साल 2011 की जनगणना के अनुसार देश की साक्षरता दर चौहत्तर फीसद ही थी। कोविड-19 के चलते साल 2021 में होने वाली जनगणना संभव नहीं हो पाई। ऐसे में साक्षरता की मौजूदा स्थिति क्या है, इसका कोई स्पष्ट आंकड़ा नहीं है। मगर जिस तरह 2030 तक शत-प्रतिशत साक्षरता का लक्ष्य रखा गया है, उसे देखते हुए कह सकते हैं कि 2031 की जनगणना में आंकड़े देश में अशिक्षा से मुक्ति की ओर होंगे।
सुशासन की परिपाटी भले ही बीसवीं सदी के अंतिम दशक में परिलक्षित हुई हो, मगर साक्षरता को लेकर चिंता जमाने से रही है। साक्षरता और जागरूकता की उपस्थिति सदियों पुरानी है। यदि बार-बार अच्छा शासन ही सुशासन है, तो इस तर्ज पर अशिक्षा से मुक्ति और बार-बार साक्षरता पर जोर देना सुशासन की मजबूती भी है। असल में कौशल विकास के मामले में भारत में बड़े नीतिगत फैसले या तो हुए नहीं, और यदि हुए भी तो साक्षरता और जागरूकता में कमी के चलते उसे काफी हद तक जमीन पर उतारना कठिन बना रहा। ‘स्किल इंडिया’ कार्यक्रम सुशासन को एक अनुकूल जगह दे सकता है, बशर्ते इसके लिए जागरूकता का दायरा बढ़ाया जाए। गौरतलब है कि स्किल इंडिया कार्यक्रम के अंतर्गत 2022 तक कम से कम तीस करोड़ लोगों को कौशल प्रदान करना है। पर इसकी राह में दो बड़े अवरोध हैं। पहला यह कि देश में मात्र पच्चीस हजार ही कौशल विकास केंद्र हैं जो नाकाफी हैं। और दूसरा अवरोध साक्षरता को लेकर है जिसके अभाव में कौशल कार्यक्रम के उद्देश्य को पूरा करना अपने में एक समस्या है। यही कारण है कि लोक कल्याण और जनहित के लिए योजनाएं तो कई आती रही हैं, मगर इसकी पूरी पहुंच साक्षरता और जागरूकता की कमी के चलते संभव नहीं हुईं।
बहरहाल भारत के समक्ष राष्ट्रीय साक्षरता दर को सौ फीसद तक ले जाने के अतिरिक्त स्त्री-पुरुष साक्षरता की खाई को पाटना भी एक चुनौती रही है। संयुक्त राष्ट्र ने 2030 तक पूरी दुनिया से सभी क्षेत्रों में लैंगिक भेदभाव को समाप्त करने का संकल्प लिया है। देखा जाए तो भारत में पिछले तीन दशकों में स्त्री-पुरुष साक्षरता दर का अंतर दस प्रतिशत तक तो घटा है। मगर पिछली जनगणना को देखें तो यह अंतर एक खाई के रूप में परिलक्षित होता है। जहां पुरुषों की साक्षरता दर बयासी फीसद से अधिक है, वहीं महिलाओं में यह दर पैंसठ फीसद ही है।
दरअसल शिक्षा के क्षेत्र में लैंगिक विषमता बढ़ने के कई कारण हैं। शिक्षा के प्रति समाज२ का एक हिस्सा आज भी जागरूक नहीं है। सुशासन के निहित परिप्रेक्ष्य से यह विचारधारा स्थान लेती है कि साक्षरता कई समस्याओं का हल भी है। 1991 के उदारीकरण के बाद देश में जिस तरह तकनीकी बदलाव आए हैं, उसमें साक्षरता के कई आयाम भी प्रस्फुटित हुए हैं। मसलन, अक्षर साक्षरता के अलावा तकनीकी साक्षरता, कानूनी साक्षरता, डिजिटल साक्षरता आदि अधिकारों को जानने के प्रति जागरूकता सहित कई ऐसे परिप्रेक्ष्य हैं जो जनता के लिए जरूरी हैं। इसलिए संपूर्ण साक्षरता के बिना सुशासन स्वयं में अधूरा है।
Date:26-03-22
हम नई विश्व व्यवस्था की ओर फ्रेंक एफ इस्लाम, ( अमेरिकी उद्यमी )
यूक्रेन पर अकारण हमले के लगभग एक महीने बाद साफ है कि युद्ध उस तरह से नहीं चल रहा है, जैसी कल्पना व्लादिमीर पुतिन ने की थी। हालांकि, अभी रूसी आक्रमण को दलदल कहना जल्दबाजी होगी, लेकिन यह साफ है कि यूक्रेन के सैनिकों व नागरिकों ने जिस तरह से उग्र प्रतिरोध किया है, उसके चलते रूस अपने सैन्य और सियासी मकसद से अभी तक दूर है। युद्ध से पहले वाशिंगटन में विदेश नीति के हलकों में दो प्रमुख धारणाएं थीं- पहली धारणा यह थी कि रूसी सेनाएं कुछ ही दिनों, शायद 48 घंटों से भी कम समय में यूक्रेन की सेना को पछाड़ देंगी और मॉस्को के अनुकूल शासन की स्थापना हो जाएगी। दूसरी धारणा यह थी कि रूसी दुस्साहस चीन के मौन समर्थन से एक नई दो-ध्रुवीय विश्व व्यवस्था की शुरुआत करेगा, जिसमें एक तरफ, संयुक्त राज्य अमेरिका व उसके सहयोगी होंगे और दूसरी तरफ, रूस व चीन होंगे।
मॉस्को द्वारा आक्रमण के महीने भर बाद रूस की पहली धारणा अमान्य हो गई है। यूक्रेन द्वारा दिए गए आक्रामक जवाब के चलते रूसी हमलावर कई मोर्चों पर ठिठक गए हैं। यूक्रेन की राजधानी कीव को गिराने में रूस अब तक असमर्थ रहा है और रूसी पक्ष का नुकसान लगातार बढ़ता जा रहा है। अमेरिकी अधिकारियों का अनुमान है कि अब तक के युद्ध में 7,000 या इससे अधिक रूसी सैनिक मारे गए हैं। इसके अतिरिक्त, पश्चिमी पर्यवेक्षकों के अनुसार, रूस को टैंक, लड़ाकू जेट और मिसाइलों के मामले में भी खासा नुकसान हुआ है। भयंकर बमबारी व मिसाइल हमलों के बावजूद यूक्रेनी राष्ट्रपति वोलोदिमीर जेलेंस्की का पश्चिम-समर्थक प्रशासन न सिर्फ कायम है, बल्कि इसे यूरोप और दुनिया भर के देशों में भारी समर्थन मिल रहा है। वास्तव में, एक पूर्व कॉमेडियन व व्यवसायी जेलेंस्की पश्चिमी दुनिया के अधिकांश हिस्सों में एक नायक बन गए हैं। हाल के एक जनमत सर्वेक्षण में 64 प्रतिशत अमेरिकियों ने कहा कि वे जेलेंस्की के रुख से इत्तेफाक रखते हैं। इस वजह से अमेरिका में प्रशासन, रक्षा और रणनीतिकारों को यह विश्वास हो चला है कि पुतिन ने युद्ध की तैयारी करते समय यूक्रेनी प्रतिरोध और पश्चिम के संकल्प को कम आंका था। जाहिर है, पुतिन ने न सिर्फ यूक्रेनी संकल्प, बल्कि अमेरिका व उसके सहयोगियों की दृढ़ता का भी गलत आकलन किया था।
आज तक के नतीजों को देखते हुए उचित ही यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि विश्व व्यवस्था में बदलाव उस तरह से सामने नहीं आया है, जैसा रूस या चीन की मर्जी थी। लगता है, पिछले कई दशकों में महाशक्ति के दर्जे के लिए रूस का दावा मुख्य रूप से उसकी कल्पित सैन्य शक्ति पर टिका था।
कोई संदेह नहीं कि युद्ध जितना लंबा चलेगा, पुतिन और दुनिया की दूसरी सबसे शक्तिशाली ताकत मानी जाने वाली रूसी सेना के लिए उतना ही नुकसानदेह होगा। रूस की प्रतिष्ठा काफी हद तक क्षतिग्रस्त हुई है और इसीलिए पुतिन व उनके लोग परमाणु हथियारों की चर्चा ज्यादा करने लगे हैं।
युद्ध की शुरुआत में पारंपरिक धारणा यही थी कि पुतिन द्वारा छेडे़ गए युद्ध का बड़ा लाभार्थी चीन होगा। जिस तरह से युद्ध हो रहा है, उसे देखते हुए शायद चीन अभी भी एक लाभार्थी होगा, लेकिन उस तरह से नहीं, जैसा पहले सोचा गया था। चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने निस्संदेह यूक्रेन में पुतिन की गलतियों से सबक सीख लिया है। अमेरिका के साथ अपने व्यापारिक संबंधों की वजह से ही बीजिंग दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सका है। अब वह निश्चित रूप से ताइवान या यहां तक कि भारत के उत्तर व पूर्वोत्तर में हस्तक्षेप करते समय पहले से अधिक सतर्क रहेगा। गौर कीजिए, अब एक नई विश्व व्यवस्था उभर रही है। राष्ट्रपति जो बाइडन ने इसे आकार देने के लिए अपने देश को प्रतिबद्ध किया है। 21 मार्च को बिजनेस राउंड टेबल के भाषण में उन्होंने कहा, ‘चीजें बदल रही हैं, व एक नई विश्व व्यवस्था बनने जा रही है और हमें इसका नेतृत्व करना है।… हमें यह करने के लिए बाकी आजाद दुनिया को एकजुट करना होगा।’ नाटो, जो डोनाल्ड ट्रंप के वर्षों में पीछे हट गया था, व्लादिमीर पुतिन की बदौलत एकजुट इकाई के रूप में लौट आया है। नाटो का हर सदस्य देश मौके पर आगे आया है, इनमें स्लोवाकिया जैसे राष्ट्र भी शामिल हैं, जो शीत युद्ध के समय सोवियत खेमे में शुमार थे।
राष्ट्रपति जो बाइडन बुधवार को नाटो, जी 7 और यूरोपीय संघ के आपातकालीन शिखर सम्मेलन के लिए ब्रुसेल्स पहुंचे। वह नाटो और यूरोप के साथ मिलकर रूस पर नए-नए प्रतिबंध लगाने में जुटे हैं। बाइडन की कोशिश है कि तेल व गैस के लिए मास्को पर यूरोपीय सहयोगियों की निर्भरता कम हो जाए। जैसा कि ऊपर जिक्र किया गया है, यूक्रेन पर रूस के आक्रमण के चलते खुद रूस के लिए कई अनपेक्षित और बहुत दुखद परिणाम हुए हैं। रूसी ऑपरेशन की संभावित नाकामी का एक अन्य अनपेक्षित परिणाम यह भी है कि तथाकथित ताकतवर या निरंकुश लोगों का विजयी मार्च दुनिया में धीमा पड़ सकता है।
अमेरिकी राजनीतिक विज्ञानी फ्रांसिस फुकुयामा लिखते हैं, रूसी आक्रमण ने पहले ही दुनिया भर के ऐसे लोगों को भारी नुकसान पहुंचाया है, जो हमले से पहले पुतिन के प्रति किसी न किसी रूप में सहानुभूति रखते थे। लेकिन युद्ध की राजनीति ने खुले तौर पर उनके सत्तावादी झुकाव को जाहिर कर दिया है। प्रसिद्ध पुस्तक द एंड ऑफ हिस्ट्री ऐंड द लास्ट मैन के लेखक फुकुयामा लिखते हैं, ‘पुतिन की हार से दुनिया में उदार लोकतंत्र की वापसी हो सकती है, जो कई वर्षों से पीछे हटता जा रहा है।’ वह कहते हैं, ‘रूस की पराजय आजादी के नए जन्म को संभव बना देगी, और हमें वैश्विक लोकतंत्र की दुर्गंध भरी गिरावट से बाहर निकाल देगी। बहादुर यूक्रेनी समुदाय का आभार!’
युद्ध ने संयुक्त राज्य अमेरिका के राजनेताओं और लोगों को एक तरह से एकजुट कर दिया है, यह स्थिति 9/11 के बाद से नहीं देखी गई थी। युद्ध ने दुनिया भर में लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति समर्थन जगाया है। यह वैसी नई विश्व व्यवस्था नहीं है, जैसी पुतिन ने इस युद्ध को शुरू करते समय चाही थी, बल्कि यह वह नई व्यवस्था है, जिसकी दुनिया को जरूरत है।
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26 March 2022
प्रश्न–351 – क्या संविधान में निहित मूल कर्तव्यों को वैधानिक संरक्षण दिया जाना चाहिए ? अपने विचार सतर्क प्रस्तुत कीजिए। (200 शब्द)
Question–351 – Should the Fundamental Duties enshrined in the Constitution be given statutory protection? Present your views logically. (200 words)
नोट : इसका उत्तर आपको हमें नहीं भेजना है, यह आपके स्वयं के अभ्यास के लिए है।
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Date:25-03-22
Keep Pushing on The Pull for Exports Global economy, policy tweaks doing the trick ET Editorials
Surging energy prices and a super-cycle in commodities have pushed India’s merchandise exports in 2021-22 above $400 billion, as the export basket was widened to farm produce, and engineering products found new markets. India benefited from a global economy recovering from the pandemic as well as disruptions that saw consuming nations seek out alternatives to Chinese supply chains. Both themes are still playing out, and the gains to India’s merchandise trade could accrue for a while. This should, however, not take away from years of policy tweaks that have gone about setting right the country’s approach to free trade agreements and expanding the export basket as well as opening up new markets. Fast-track bilateral deals are yielding vastly improved outcomes in trade promotion, and the results are likely to surprise on the upside.
Efforts to climb the value chain in industrial and agriculture trade are beginning to show up in trade statistics. Performancelinked incentives (PLI) in manufacturing are delivering for sales at home and abroad. There is an untapped market beyond Europe and North America for labour-intensive engineering exports that is benefiting from a granular mapping of demand. Trade promotion for farm produce has likewise gone down to the district level. But Indian industry, by and large, remains a commodities play, and export diversification will take time. For now, cargoes of refined petroleum products and industrial raw materials are exporting inflation to the West and providing a cushion to Indian consumers.
This watershed moment in the country’s trade history should encourage policymakers to look more vigorously beyond domestic demand. The size of the Indian market has, for long, dented its competitive advantage, in contrast to most of Asia’s miracle economies that adopted an export-led model for development. The approach that allowed services to pick up the slack for merchandise exports did justice to neither. Merchandise trade needs a sustained push for India to secure its place in the world trading order.
Date:25-03-22
Workers’ Safety Must Be Non-Negotiable ET Editorials
Norms guaranteeing the occupational safety and health of workers must be strictly enforced. The loss of 11 lives in a warehouse fire in Secunderabad, Telangana, was an avoidable tragedy. The victims were migrant workers, far from home and family. Their callous exploitation by their employer(s) must not go unpunished. Such fires in warehouses and small industrial units are, unfortunately, not rare across an India that wishes to join the global big boys in manufacturing. To be global, it must ensure global practices. Compliance to safety norms and provisions is critical, for which local administrations, business associations and workers’ welfare organisations need to step up.
Minimising such accidents will require the concerted effort
of the various agencies and authorities that sign off on such business operations. Enforcement of regulation relating to the structure, location, proper access for first responders (fire trucks, ambulances), fire-extinguishing equipment and emergency exits must become de facto from de jure. Most workers in such units are staffed by migrant workers, making it easy to cut corners. Implementation of labour codes must be fast-tracked, as these give greater protection to migrant workers in the informal sector in terms of social security protection and requires employers to contribute towards the safety net. Worker safety and the security of businesses should be aligned and complementary, not at odds with each other, as it remains in far too many cases.
Ending the fragmentation of the permits systems will help ensure that only those that meet the norms are operational. Those responsible for the lapses that led to Wednesday’s deaths must be held accountable. Else, a dangerous trend of apathy will continue.
Date:25-03-22
Let’s BIMSTEC Together Harsh V Pant & Sohini Bose, [ Pant is professor of international relations, King’s College London, UK, and Bose is junior fellow, Observer Research Foundation (ORF), Kolkata ]
It’s been 25 years since the formation of the Bay of Bengal Initiative for MultiSectoral Technical and Economic Cooperation (Bimstec) in 1997. But it is only recently that the grouping has begun to gain traction. The summit in Sri Lanka on March 30 is of particular importance since Bimstec is scheduled to adopt a charter for the first time that will lend clear purpose to the organisation and rationalise sectors of cooperation for better functionality.
Devoted exclusively to the Bay of Bengal region, Bimstec has been in limelight of late with the rise in the Bay of Bengal’s strategic significance. It boasts of a membership encompassing all of the bay’s littorals — India, Bangladesh, Sri Lanka, Nepal, Bhutan, Myanmar and Thailand — and is, therefore, ideally suited to be the platform for re-engagement to build a more collaborative future.
After the marginalisation of the South Asian Association for Regional Cooperation (Saarc) since 2016 owing to tensions between India and Pakistan, a search for alternative regional collaborations led India to Bimstec. This grouping was poised to connect the Greater Himalayan region with the Bay of Bengal, as well as act as a bridge between South and Southeast Asia. It, thus, echoed India’s ambition of strengthening ties with its neighbours and create a mariti-me identity for itself.
As agreed at the virtually held 2021 Bimstec ministerial meet, the organisation decided to regroup its 14 diverse priority sectors into seven broad concerns, each under the lead of one member state: trade, investment and development (Bangladesh), environment and climate change (Bhutan), security (India), agriculture and food security (Myanmar), people-people contact (Nepal), science, technology and innovation (Sri Lanka), and connectivity (Thailand).
India’s responsibility is in sync with its focus on ‘Security and Growth for All in the Region’ (SAGAR), an extension of its Act East and Neighbourhood First policies. In 2019, building upon SAGAR, it announced its Indo-Pacific Oceans Initiative (IPOI), to support the building of a rules-based regional architecture resting on seven pillars. Among these, three pillars — maritime security, maritime resources and disaster risk reduction — resonate particularly well with its role in Bimstec. The sector of cooperation on security embodies three sub-sectors: counterterrorism and transnational crime (CTTC), energy and disaster management.
CTTC had already been under India’s lead, as had been the priority sector environment and disaster management. With energy, originally under Myanmar’s lead and joining the security bandwagon, India’s focus on nontraditional security concerns in the Bay of Bengal has become more holistic.
India visualises itself as a ‘net security provider’ of the region, a term coined by Manmohan Singh in 2013 at a time when the country was aspiring to take a leading strategic role in the Indian Ocean while expanding into the Pacific. The Bay of Bengal encounters a range of security concerns, from the natural to the man-made. Transnational concerns such as terrorism, sea piracy, undocumented migration, human trafficking and illegal, unreported and unregulated (IUU) fishing are just tip of the iceberg. Their sheer multiplicity makes it impossible for any country to singlehandedly address these concerns.
Within the security priority sector under India’s umbrella, a ‘shepherd country’ has been assigned for each sub-group that includes anti-money laundering and combating the financing of terrorism (Thailand), and human trafficking and illegal migration (Bangladesh).
But Bimstec continues to suffer from some serious challenges that include institutional fragility, the weakness of its secretariat, the paucity of consolidated funding and the absence of clear guidelines. Hopefully, the upcoming charter will resolve many of these, and the organisation will be able to realise its true potential, especially in an environment that is evolving faster than the ability of the regional states to manage it. After all, Bimstec can only be as successful as its member states’ commitment to it.
Date:25-03-22
सही योजनाएं लोगों का भाग्य बदलती हैं संपादकीय
डब्ल्यूएचओ के अनुसार घरेलू प्रदूषण की मृत्यु दर बढ़ाने में बड़ी भूमिका रही है। गांव में औरतें चूल्हे के धुएं को जीवनभर फेफड़े में लेती हैं। सन् 2020 में लांसेट में छपे अध्ययन के अनुसार करीब 70 लाख लोग वायु प्रदूषण से अकाल मृत्यु के शिकार होते हैं। इसी अध्ययन ने बताया था कि भारत में सन् 2019 में 6.10 लाख लोगों की असमय मौत घरेलू प्रदूषण से हुई। इस अध्ययन में उन्हें लिया गया जिनके पास एलपीजी जैसे स्वच्छ ईंधन के साधन नहीं थे। लेकिन प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना पर हुए एक स्वतंत्र अध्ययन में पाया गया कि जितने नए घरों में इस स्कीम के तहत गैस पहुंची और जिन्होंने अन्य वैकल्पिक बायोमास (धुएं वाले ईंधन) का प्रयोग नहीं किया, उससे करीब 1.50 लाख लोग अकाल मृत्यु से बचाए जा सके। इसमें दो राय नहीं कि प्रधानमंत्री की कुछ सफलतम योजनाओं में उज्ज्वला योजना रही हालांकि आरोप लगे कि पहले मुफ्त सिलेंडर के बाद गरीब दूसरा सिलेंडर नहीं खरीद सके और वापस लकड़ी-कोयला पर लौट आए। इस योजना का फायदा वायु प्रदूषण 13% कम होने के रूप में भी हुआ। पता चला है कि 2019 तक केवल 65% घरों में शुद्ध रूप से स्वच्छ ईंधन का प्रयोग होता था। जबकि अगले दो वर्षों में यह संख्या 80% तक पहुंच गई है। सरकार को चाहिए कि गरीबों को सिलेंडर की आपूर्ति बनी रहे।
Date:25-03-22
दो दशक में हम वैश्वीकरण से धुर राष्ट्रवाद तक पहुंच गए शशि थरूर, ( पूर्व केंद्रीय मंत्री और सांसद )
दुनिया में धुर-राष्ट्रवाद का उदय हमारे समय की एक चौंकाने वाली घटना है। जब यह सदी शुरू हुई थी, तब लगता था जैसे वैश्वीकरण को कोई नहीं रोक सकेगा। राष्ट्रीय सीमाओं में प्रवेश पर पाबंदियां घटने लगी थीं। राज्यसत्ताएं अपनी ताकतों को अपने से बड़ी संस्थाओं के हवाले करने लगी थीं, जैसे कि यूरोपियन यूनियन, विश्व व्यापार संगठन और अंतरराष्ट्रीय क्रिमिनल कोर्ट। तब कम ही ने पूर्वानुमान लगाया होगा कि नई सदी का दूसरा दशक आते-आते चीजें इतनी बदल जाएंगी और दुनिया वैश्वीकरण के विरुद्ध हो जाएगी। इस बदली हुई परिघटना का ही कुरूप परिणाम है हाइपर-नेशनलिज़्म का उदय।
आज दुनिया में संरक्षणवाद बढ़ता जा रहा है। यूरोप, अमेरिका में तो इसने प्रवासियों व अल्पसंख्यकों के विरुद्ध नस्ली हिंसा का रूप ले लिया है। इस तरह की नकारात्मकता को हमेशा अपने लिए एक सकारात्मक संदेश की जरूरत होती है, जो अमेरिका में मेक अमेरिका ग्रेट अगेन और तुर्की में साम्राज्यवादी तुर्की-गौरव को वापस स्थापित करने सम्बंधी नारों में व्यक्त हुए हैं। बहुसंख्यकवादी नैरेटिव हर देश में बहुलतावादी राजनीति को क्षीण कर रहा है। वैश्वीकरण के मूल में एक ऐसी दुनिया थी, जो अपनी भिन्नताओं को भुलाकर स्वतंत्रताओं को बढ़ावा देगी। लेकिन आज का प्रतिक्रियावादी राष्ट्रवाद विभेद को रेखांकित करता है व राज्यसत्ता के प्रति निष्ठावान होने की मांग करता है।
जहां तक राष्ट्रीय प्रतीकों और सेनाओं के बलिदान का सम्मान करने की बात है, मुझे इससे कोई समस्या नहीं। लेकिन जब प्रतीकों का इस्तेमाल मौजूदा शासनतंत्र के नैरेटिव को बल देने के लिए किया जाने लगता है, तब मुझे इस पर ऐतराज होने लगता है। इस बिंदु पर आकर राष्ट्रीय प्रतीकों के प्रति सम्मान की भावना को राज्यसत्ता और सत्तारूढ़ पार्टी के प्रति आज्ञाकारिता से जोड़कर दिखाया जाने लगता है। आज यूरोप में जिस तरह से दक्षिणपंथी लोकप्रियतावादी का उभार देखा जा रहा है, वह भी इसी वृत्ति को उजागर करता है। तंत्र-विरोधी लोकप्रिय पार्टियों, जैसे कि फ्रांस में नेशनल फ्रंट, यूनान में सीरिजा और इटली में फाइव-स्टार मूवमेंट का तेजी से आगे बढ़ना इसी का उदाहरण है। यूरोप में एक पॉवर वैक्यूम के बीच ही आज ऐसे उग्र राष्ट्रवादी विचारों का उदय हो रहा है।
फ्रांस में अगले महीने चुनाव होने जा रहे हैं और एमान्युअल मैक्रों के विकल्प के रूप में दो नाम प्रस्तुत किए जा रहे हैं, दोनों ही धुर राष्ट्रवादी- नेशनल फ्रंट की मरीन ली-पेन और प्रवासियों के खिलाफ भड़काऊ भाषण देने वाले एरिक जेम्मॉउर। ऑस्ट्रिया में फार-राइट ग्रुप्स और जर्मनी में एएफडी ने हाल ही में जैसा प्रदर्शन किया है, वह भी बदलती हुई दुनिया के ट्रेंड को बतलाता है। ये परेशान कर देने वाले और खतरनाक बदलाव हैं। राष्ट्र के विचार का मूल यह था कि उसके सभी नागरिक एक समुदाय के रूप में मिलकर रहेंगे, जिसमें हर व्यक्ति को संवैधानिक संरक्षण दिया जाएगा, वह निजी प्रसन्नता और राष्ट्रीय दायित्व के अपने विचार को अपना सकेगा और शासकों के दबावों से मुक्त होगा। लेकिन राष्ट्रवाद के अधिकृत रूप से बदले गए प्रारूप का हवाला देकर आज इन मूल्यों को दरकिनार किया जा रहा है।
1920 और 1930 के दशक में इटली और जर्मनी ने जिस तरह से फासिज्म और नाजीवाद को अपनाया था, उसकी पुनरावृत्ति होती दिखलाई दे रही है। आज कम्युनिकेशन के साधन आधुनिक हो चुके हैं और मीडिया मुक्त है, वैसे में फासिज्म के डर को अतिशयोक्तिपूर्ण कहा जा सकता है, लेकिन जब आप देखते हैं कि सोशल मीडिया पर जहरीली और असंसदीय भाषा किस हद तक जा चुकी है तो निश्चिंत होने का विकल्प शेष नहीं रह जाता। 1991 में मुक्त-बाजार प्रणाली को अंगीकार करने के बाद से भारत ने बहुत कुछ पाया है। हमने केवल विदेशी-निवेश और मुक्त-व्यापार से ही प्रतिबंध नहीं हटाए, दुनिया के लिए भी दरवाजे खोले थे। मौजूदा अंतरराष्ट्रीय रीतियों के प्रति हममें स्वीकार का भाव आया था। हमने राष्ट्रवाद के विचार को एक व्यापक उदारवादी और कॉस्मोपोलिटन अंतरराष्ट्रीयवाद में सम्मिलित कर दिया था। लेकिन अब वह सब बदल रहा है। हिंदुत्व के विचार को खुलकर सत्ता के द्वारा बढ़ावा दिया जा रहा है और अल्पसंख्यकों को हाशिए पर धकेला जा रहा है। परम्परागत पोशाकें पहनने वाली युवा लड़कियों को पढ़ने से रोका जा रहा है। देश अब उदारवादी नहीं रह गया है। प्रामाणिकता के नाम पर हम अपनी सौम्यता को गंवाते जा रहे हैं।
Date:25-03-22
हिजाब के मसले को राष्ट्रीय विवाद बनाने की साजिश विराग गुप्ता, ( लेखक और वकील )
हिजाब मामले में फैसला देने वाले हाईकोर्ट जजों को धमकी मिलने के बाद सरकार ने उन्हें वाय कैटेगरी की विशेष सुरक्षा दी थी। धमकी देने वाले दो लोगों की गिरफ्तारी भी हुई है। लेकिन हिजाब की आड़ में सोशल मीडिया में अफवाह फैला रही बहुत सारी फेक न्यूज़-वीडियोज के प्रसार को रोकना अदालत और सरकार दोनों के लिए टेढ़ी खीर है। एक पुराने फैसले के आधार पर फेक न्यूज़ वायरल हो रही है, जिसमें बम्बई हाईकोर्ट के जज द्वारा हिजाब के हक में फैसले को सराहा जा रहा है। दूसरे फेक वीडियो में हिजाब की कथित पीआईएल पर डांट लगाते चीफ जस्टिस वकील पर प्रतिबंध लगाने का आदेश दे रहे हैं।
चुनावों के पहले इस मसले को राष्ट्रीय विवाद बनाने के पीछे मजहबी ताकतों के अलावा, सियासतदानों और सोशल मीडिया का बड़ा योगदान था। तीन जजों की बेंच ने अपने फैसले में लिखा है कि जिस तरीके से इस मामले ने देश-विदेश में तूल पकड़ा, उससे लगता है कि शांति और भाईचारे को नुकसान पहुंचाने के खेल के पीछे बड़ी ताकतें शामिल हो सकती हैं। हाईकोर्ट के फैसले के आखिरी पन्नों में एक पीआईएल के हवाले से चार कट्टरपंथी संगठनों का नाम भी दिया हुआ है।
हाईकोर्ट ने यह फैसला कुछेक लड़कियों से जुड़ी सात रिट पिटीशन में सुनवाई के बाद दिया। लेकिन इस बारे में दायर पीआईएल यानी जनहित याचिकाओं पर सुनवाई से जजों ने इंकार कर दिया था। इसकी वजह से सुप्रीम कोर्ट के सामने फाइल की गई अपील सार्वजनिक हित के बजाय व्यक्तिगत अधिकारों के बारे में सीमित है। लेकिन सोशल मीडिया में गर्मी बढ़ने के साथ अनेक लोग सीधे सुप्रीम कोर्ट में पीआईएल दायर कर रहे हैं। यूथ कांग्रेस के अध्यक्ष बीवी श्रीनिवास ने सुप्रीम कोर्ट में पीआईएल फाइल कर दिया और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लाॅ बोर्ड भी पीआईएल की तैयारी में है। नियम के अनुसार हाईकोर्ट के आदेश के खिलाफ सम्बंधित पक्षकार ही सुप्रीम कोर्ट में विशेष अवकाश याचिका (एसएलपी) दायर कर सकते हैं। अपील के पुराने मामलों के साथ यदि पीआईएल के नए मामलों को जोड़ा गया तो मामले का दायरा बढ़ जाएगा, जिसके लिए सुप्रीम कोर्ट की विशेष अनुमति जरूरी है। हिजाब मामले में समानता (अनुच्छेद 14), अभिव्यक्ति की आजादी (अनुच्छेद 19) और प्राइवेसी (अनुच्छेद 21) के साथ धार्मिक आस्था और अधिकारों (अनुच्छेद 25-26) के संवैधानिक बिंदुओं पर मामले को आगे बढ़ाया जा रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने इस्माइल फारूकी मामले में 1994 में कहा था कि मस्जिद इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा नहीं है। तीन तलाक, गुजारा भत्ता देने का कानून और वायुसेना में गैर सिखों को दाढ़ी बढ़ाने के अधिकार के बारे में अनेक फैसलों से अदालतों ने धर्म के ऊपर समानता और संविधान को वरीयता दी। इसलिए पुराने फैसलों के आधार पर सुप्रीम कोर्ट में इस मामले का जल्द फैसला हो सकता है। सबरीमाला में महिलाओं के प्रवेश के मामले में कई राउंड की सुनवाई के बाद अब 9 जजों की बेंच को फैसला करना है। लेकिन तीन साल पुराने फैसले के बावजूद अभी तक बेंच का गठन नहीं हुआ। हिजाब मामले में भी नई पीआईएल याचिकाओं पर यदि लंबी-चौड़ी बहस यानी बौद्धिक विलास की इजाजत दी गई तो इससे फैसले में विलम्ब के साथ ध्रुवीकरण बढ़ सकता है।
सोशल मीडिया में फैल रहे फेक समाचारों और कानूनी बारीकियों के चक्कर में गए बिना फैसले की दो अहम बातों को समझना जरूरी है। पहला यह फैसला कर्नाटक के सिर्फ उन्ही स्कूलों के भीतर लागू होगा, जहां पर ड्रेस कोड का नियम बनाया गया है। दूसरा मुस्लिम बच्चों के साथ हिंदू छात्र भी भगवा शाल जैसे धार्मिक प्रतीक धारण नहीं कर सकते। डॉ. आंबेडकर ने सभी धर्मों की महिलाओं के लिए परदे से मुक्ति की बात कही थी। शिक्षा बच्चों का मौलिक अधिकार है और शिक्षित करना समाज और सरकार की संवैधानिक जिम्मेदारी। इसलिए तालीम के ऊपर लड़कियों को हिजाब चुनने के लिए प्रेरित करना प्रतिगामी है। अनेक विद्वानों और याचिकाकर्ताओं के अनुसार हिजाब इस्लाम का अनिवार्य हिस्सा है। इस तर्क को सही मानें तो बाजार, ऑफिस, मेट्रो, अस्पताल, स्कूल और काॅलेजों में हिजाब के बगैर दिख रही करोड़ों लड़कियां और महिलाएं क्या इस्लाम के दायरे से बाहर मानी जाएंगी? सत्तारूढ़ दल के नेताओं को भी हिजाब मामले पर संयत और समावेशी रुख अपनाकर समान नागरिक संहिता के प्रति आम सहमति पैदा करनी चाहिए, जिससे 21वीं सदी में मध्यकालीन मुद्दों पर विवादों से बचा जा सके।
Date:25-03-22
निर्यात को नीतिगत समर्थन संपादकीय
निर्यात में मौजूदा तेजी ने देश को चालू वित्त वर्ष के लिए 400 अरब डॉलर का लक्ष्य तय करने में सक्षम बनाया है। मौजूदा दर के हिसाब से वित्त वर्ष का अंत 410 अरब डॉलर मूल्य के वस्तु निर्यात के साथ हो सकता है। बीते कई वर्षों से निर्यात के ठहरे हुए स्तर के हिसाब से यह अहम उपलब्धि होगी। चालू वर्ष में निर्यात में इजाफा इसलिए हुआ कि इंजीनियरिंग वस्तुओं, पेट्रोलियम उत्पादों और रासायनिक पदार्थों के निर्यात ने अहम भूमिका निभाई। भारत के पास निर्यात वृद्धि और उसके स्तर दोनों को लेकर उत्साहित होने की वजह है लेकिन यह देखना होगा कि यह रुझान कब तक बना रहता है। इस बीच वैश्विक जिंस कीमतों में इजाफे ने देश के आयात को रिकॉर्ड 589 अरब डॉलर के स्तर तक पहुंचा दिया है। यानी हमारा व्यापार घाटा 189 अरब डॉलर रह गया है।
भारत के निर्यात में वृद्धि के कई कारण हैं। वैश्विक बाजारों में जिंसों की ऊंची कीमतों ने मूल्य में इजाफा किया है। उदाहरण के लिए पेट्रोलियम उत्पादों ने कुल निर्यात में 15 फीसदी का योगदान किया और चालू वित्त वर्ष में इसमें काफी बढ़ोतरी हुई है। इसके अलावा विश्व अर्थव्यवस्था के महामारी से उत्पन्न उथलपुथल से उबरने का भी निर्यात को सहारा मिला है। दुनिया भर की कंपनियां बड़ी तादाद में अपनी इन्वेंटरी में नए सिरे से भंडारण कर रही हैं। वस्तु निर्यात का वैश्विक वृद्धि से मजबूत संबंध है और जैसा कि क्रिसिल के अर्थशास्त्रियों ने दर्शाया भी है इंजीनियरिंग वस्तुओं, रसायनों, पेट्रोलियम उत्पादों और रत्न एवं आभूषण आदि जिनकी देश के निर्यात में उच्च हिस्सेदारी है, वे वैश्विक वृद्धि को लेकर भी अधिक लचीले हैं। ऐसे में देश के निर्यात का प्रदर्शन काफी हद तक वैश्विक वृद्धि की दर पर निर्भर करेगा।
बहरहाल, अनुमान यह है कि वैश्विक अर्थव्यवस्था में धीमापन आएगा। इसकी कई वजह हो सकती हैं। मौजूदा भू-राजनीतिक अनिश्चितता ने जिंस कीमतों में इजाफा किया है और वह वृद्धि को प्रभावित करेगी। इसके अलावा बड़े केंद्रीय बैंक, खासकर अमेरिकी फेडरल रिजर्व ने ब्याज दरों में इजाफा करना शुरू कर दिया है। अमेरिकी बॉन्ड बाजार की हालिया बिकवाली से यही संकेत निकलता है कि आने वाले महीनों में वित्तीय हालात तंग हो सकते हैं। इसका असर वैश्विक वृद्धि पर भी पड़ेगा। इसके अलावा चीन तथा अन्य देशों में कोविड के मामलों में आ रही तेजी भी आपूर्ति शृंखला को प्रभावित करेगी। इसके परिणामस्वरूप उत्पादन में कमी आएगी और मुद्रास्फीति बढ़ेगी। ऐसे में भू-राजनीतिक अनिश्चितता और धीमी वैश्विक वृद्धि आने वाली तिमाहियों में भारतीय निर्यात के लिए अहम जोखिम साबित होगी। व्यापक नीति के स्तर पर देखें तो माहौल में ज्यादा परिवर्तन नहीं आया है और वह मध्यम अवधि में सतत उच्च निर्यात बरकरार रखने के लिए अनुकूल नहीं है। भारत पिछले कई वर्षों से शुल्कों में इजाफा कर रहा है। इसका असर मध्यम से दीर्घ अवधि में देखने को मिलेगा। उच्च शुल्क वैश्विक मूल्य शृंखला में भागीदारी पर असर डालता है जबकि निर्यात में निरंतर उच्च वृद्धि के लिए वह आवश्यक है।
भारत ने क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी (आरसेप) में भी शामिल नहीं होने का निर्णय लिया जबकि उसे विश्व का सबसे जीवंत कारोबारी समूह कहा जा रहा है। भारत कई देशों के साथ द्विपक्षीय व्यापारिक सौदों पर बातचीत कर रहा है जिसमें समय लग सकता है और वह आरसेप में शामिल न होने की भरपाई भी नहीं करेगा। बदलते वैश्विक माहौल में भारत को इस निर्णय पर दोबारा सोचना चाहिए। निकटवर्ती नीतिगत प्र्रबंधन के संदर्भ में भारत को रुपये का प्रबंधन करना होगा ताकि निर्यात को मदद मिल सके। चालू खाते का बढ़ा हुआ घाटा और आने वाली तिमाहियों में पूंजी का बहिर्गमन रुपये पर दबाव डालेगा। रिजर्व बैंक के लिए यह अहम होगा कि वह रुपये का सहज अवमूल्यन होने दे। मुद्रास्फीति को थामने के लिए रुपये का बचाव करने की कोशिश निर्यात पर असर डालेगी और दीर्घावधि का वृहद आर्थिक असंतुलन पैदा करेगी।
Date:25-03-22
विश्व अर्थव्यवस्था की तीन प्रमुख समस्याएं अजय शाह
विश्व अर्थव्यवस्था के सामने अब तीन बड़े और अहम सवाल हैं। अमेरिका में वृहद आर्थिक स्थिरता को मुद्रास्फीति का संकट चुनौती दे रहा है और वहां मौद्रिक नीति संंबंधी रणनीति को लेकर भी चिंता है। चीन में एक बड़ी गैर बाजार अर्थव्यवस्था खड़ी की गई थी लेकिन वह आंतरिक विरोधाभासों से दो-चार हो रही है। वहां अलग तरह की निराशा का माहौल है। रूस की अर्थव्यवस्था हालांकि छोटी है लेकिन यूक्रेन युद्ध और आर्थिक गतिविधियों में अचानक गिरावट से विश्व अर्थव्यवस्था प्रभावित हो सकती है। हमें इस बात की भी चिंता करनी चाहिए कि आने वाले वर्ष में भी इनका प्रभाव देखने को मिल सकता है।
वैश्विक वृहद आर्थिक का सबसे महत्त्वपूर्ण तत्त्व है अमेरिका। अमेरिकी वृहद आर्थिक नीति ने महामारी का मुकाबला करने में अहम भूमिका निभाई और भारत भी अमेरिका तथा अन्य विकसित देशों की विस्तारवादी वृहद आर्थिकी का एक अहम लाभार्थी रहा है। परंतु हालिया लड़ाई के दौरान बने हिंसा के माहौल में अमेरिकी वृहद नीति ने अच्छा काम किया। अमेरिकी केंद्रीय बैंक ने करीब दो फीसदी का मुद्रास्फीति लक्ष्य रखा है। लेकिन अमेरिकी मुद्रास्फीति उस दर को पार कर चुकी है। ऐसा चक्र निर्मित होने के भी संकेत हैं जहां वेतन वृद्धि के कारण कीमतों में भी वृद्धि हो जाए। बीते चार दशकों में जहां सभी विकसित बाजारों ने मुद्रास्फीति को लक्षित करना शुरू कर दिया तो ऐसी कठिनाइयां प्राय: दूर हो गईं।
अमेरिकी केंद्रीय बैंक फेडरल रिजर्व के मौजूदा रुख में दो बातें शामिल हैं। आशा की जा रही है कि नीतिगत दरों में एक वर्ष में 150 आधार अंकों की बढ़ोतरी की जाएगी। दावा किया जा रहा है कि इतनी वृद्धि मुद्रास्फीति को नियंत्रण में लाने के लिए पर्याप्त होगी। इस स्थिति में दिक्कत यह है कि अल्प दरों में 150 आधार अंकों का इजाफा किए जाने के बाद भी यह वास्तविक संदर्भ में नकारात्मक बनी रहेगी। फेडरल रिजर्व का मानना है कि एक केंद्रीय बैंक अर्थव्यवस्था में इकलौता योगदान यही कर सकता है कि वह दो फीसदी की अनुमान वाली मुद्रास्फीति दर दे सकेे ताकि वृहद आर्थिक स्थिरता के हालात बन सकें जिसके तहत आम परिवार तथा कंपनियां बेहतर योजनाएं बना सकें। यदि मौद्रिक नीति को सामान्य बनाने का यह सफर मुद्रास्फीति पर कोई असर नहीं डालता है तो 2022 के आखिर में और उसके बाद उसमें धीमापन रह सकता है।
अमेरिकी मौद्रिक नीति ने संपूर्ण विश्व को प्रभावित किया है। जब अमेरिका तथा अन्य विकसित देशों में ब्याज दरें कम होती हैं तो वित्तीय पूंजी विश्व अर्थव्यवस्था के उन हिस्सों में जाती हैं जहां जोखिम ज्यादा है। मिसाल के तौर पर भारत में तकनीकी कंपनियां और अचल संपत्ति की कंपनियां। जब विकसित बाजारों की ब्याज दरें बढ़ती हैं तो वैश्विक आवंटक उनकी ओर वापस लौटते हैं और पूंजी भी जोखिम वाले बाजारों से वापस आती है। ऐसे में उन केंद्रीय बैंकों को मुश्किल होती है जो विनिमय दर नीति अपनाने का प्रयास करते हैं।
विश्व अर्थव्यवस्था के लिए दूसरी समस्या चीन है। चीन एक बड़ी अर्थव्यवस्था है लेकिन उसके पास अच्छे संस्थान नहीं हैं और कई मायनों में संसाधनों का आवंटन अधिकारियों द्वारा किया जाता है, न कि मूल्य व्यवस्था द्वारा। इससे अस्थिरता आती है। कई वर्षों से अधिकारियों ने वृद्धि को गति देने के लिए उन नीतियों को अपनाया उधारी और अचल संपत्ति की उच्च कीमतों पर बल देती हैं। चीन में एवरग्रांड तथा अचल संपत्ति की कई अन्य कंपनियों की विफलता के बाद अर्थव्यवस्था मुश्किल का सामना कर रही है।
सन 1970 के दशक के अंत से ही वैश्विक कंपनियों को लगने लगा था कि वे चीन में निवेश कर सकती हैं, उन्हें यकीन हो चला था कि वह एक उदार लोकतंत्र में परिपक्व बाजार अर्थव्यवस्था के रूप में उभरेगा। शी चिनफिंग के प्रभार संभालने के बाद चीन का रुख अंतर्मुखी हो गया और वह राष्ट्रवाद तथा अधिनायकवाद की ओर बढ़ गया। अच्छे संस्थानों के विकास की प्रक्रिया में स्थिरता आ गई।
इसके परिणामस्वरूप वैश्विक परिसंपत्ति आवंटक तथा गैर वित्तीय कंपनियों ने चीन को लेकर अपनी प्राथमिकता कम करनी शुरू कर दी। अमेरिकी आयात में चीन की हिस्सेदारी भी कम होने लगी क्योंकि बहुराष्ट्रीय कंपनियों ने अपना उत्पादन चीन से दूर करना शुरू कर दिया।
विश्व अर्थव्यवस्था के लिए तीसरी समस्या रूस है। रूस की अर्थव्यवस्था छोटी है, बल्कि भारत से भी छोटी है और अचानक युद्ध तथा आर्थिक प्रतिबंधों ने उसे बड़ा आर्थिक झटका दिया है।
अधिकांश लोगों का ध्यान यूक्रेन युद्ध पर केंद्रित है जो कि वास्तव में काफी अहम है। परंतु रूसी अर्थव्यवस्था को जो क्षति पहुंच रही है उससे विश्व अर्थव्यवस्था पर भी कई अनचाहे प्रभाव पड़ सकते हैं। उदाहरण के लिए श्रीलंका, मिस्र और तुर्की जैसे देशों पर काफी बुरा असर पड़ा है। रूस में कारोबार वाली वित्तीय कंपनियों पर भी असर पड़ सकता है। चीन की तरह रूस में भी वैश्विक कंपनियों ने एकबारगी सोचा होगा कि वे उदार लोकतंत्र और बाजार अर्थव्यवस्था पर भरोसा कर सकती हैं। अब सभी बाहरी कारोबारियों को रूस में भारी घाटा हो रहा है। इस प्रकार चीन और रूस के रूप में क्रमश: एक बड़ी और एक छोटी अर्थव्यवस्था में बाहरी प्रतिभागियों को निराशा का सामना करना पड़ा।
वैश्वीकरण में मूल समस्या घरेलू पूर्वग्रह की है। यह पूर्वग्रह विकसित बाजारों के परिसंपत्ति आवंटकों तथा बोर्ड सदस्यों के मस्तिष्क में रहता है कि वे विकसित बाजारों में बने रहें। चीन और रूस में भारी घाटा इस पूर्वग्रह को बल देगा। यह बात विश्व अर्थव्यवस्था पर विपरीत प्रभाव डालेगी।
ये तीनों समस्याएं विश्व अर्थव्यवस्था को एक साथ प्रभावित कर रही हैं: अमेरिकी मुद्रास्फीति और मौद्रिक नीति की चिंता, चीन में वृहद स्थिरता की चिंता और रूस के रूप में एक छोटी अर्थव्यवस्था में अचानक गिरावट। ये समस्याएं अगर अलग-अलग आई होतीं तो इनसे निपटना आसान होता। परंतु ये तीनों एक साथ आई हैं और प्राय: अंत:संबंधित हैं।
यह संभव है कि इन दिक्कतों की प्रतिक्रिया स्वरूप विश्व अर्थव्यवस्था के विभिन्न हिस्सों में समस्याएं उत्पन्न हों। इसका तरीका हमें चौंका सकता है क्योंकि हमें अर्थव्यवस्था की इतनी समझ नहीं है कि हालात के घटित होने के सटीक तरीके का अनुमान लगा सकें।
भारतीय कंपनियों या नीतिगत निर्णय लेने वालों में से अधिकांश का ध्यान अल्पावधि पर होता है। अब वक्त आ गया है कि अधिक रणनीतिक रुख अपनाया जाए और वैश्विक मामलों की समझ बढ़ाई जाए तथा प्रभाव के अप्रत्याशित चैनलों पर नजर रखी जाए।
Date:25-03-22
कारोबारी छलांग संपादकीय
अर्थव्यवस्था की मजबूती के लिए घरेलू उत्पाद का बाहरी बाजार में पैठ बनाना बहुत जरूरी है। इस दृष्टि से भारत पिछड़ा रहा है। इसके आयात और निर्यात में काफी अंतर रहा है। इसलिए लगातार मांग उठती रही है कि व्यापारिक घाटा पाटने के लिए निर्यात को बढ़ावा देना चाहिए। यह पहली बार है, जब सरकार के घोषित लक्ष्य को प्राप्त करते हुए चालू वित्त वर्ष में निर्यात चार सौ अरब डालर के पार पहुंच गया है। यह ऐसे समय में संभव हो सका है, जब दुनिया भर में कोविड महामारी के चलते आर्थिक गतिविधियां शिथिल पड़ी हुई थीं और फिर रूस-यूक्रेन युद्ध की वजह से बाहर के बाजार पर संकट मंडराना शुरू हो गया। निस्संदेह इस उपलब्धि से सरकार का मनोबल बढ़ा और अर्थव्यवस्था को जल्दी पटरी पर लाने के संकल्प को मजबूती मिली है। प्रधानमंत्री ने इसे बड़ी उपलब्धि मानते हुए कहा है कि यह आत्मनिर्भर भारत की यात्रा में मील का पत्थर साबित होगा। स्वाभाविक ही निर्यात बढ़ने से एमएसएमइ यानी सूक्ष्म, छोटे और मझोले उद्योगों को प्रोत्साहन मिलेगा। एमएसएमइ में बेहतरी का अर्थ है, रोजगार के नए अवसर पैदा होना, क्योंकि इस क्षेत्र में सबसे अधिक रोजगार के अवसर हैं। कोरोना महामारी की वजह से हुई पूर्णबंदी ने इस क्षेत्र की बहुत बुरी गत बना दी थी। अब निर्यात बढ़ने से इस क्षेत्र को बल मिलेगा।
दुनिया के बाजारों में अभी तक चीन, अमेरिका आदि कुछ देशों का वर्चस्व है। उसे तोड़ना भारत के लिए कठिन बना हुआ था। मगर कोरोना काल में जब दुनिया के बड़े कल-कारखाने बंद हुए तो भारत जैसे देशों को उन बाजारों में पैर पसारने की जगह मिल गई। भारत के जिन क्षेत्रों में निर्यात की दर बढ़ी है, वे पेट्रोलियम उत्पाद, रसायन, रत्न, आभूषण और इंजीनियरिंग हैं। इन क्षेत्रों में रोजगार के अवसर काफी हैं। रत्न के कारोबार में भारत पहले से अग्रणी देशों में शुमार है। इसमें कुटीर उद्योग के रूप में काम करने वाले भी बहुत सारे लोग जुड़े होते हैं। कोविड की वजह से अर्थव्यवस्था में आई मंदी के दौर में सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती रोजगार के नए अवसर पैदा करने की है। बंदी के दौरान लाखों लोगों के रोजगार छिन गए, एमएसएमइ के बहुत सारे कल-कारखानों में ताले पड़ गए। उनके पास नए सिरे से कारोबार करने की पूंजी तक नहीं बची, कर्ज का बोझ ऊपर से था। हालांकि आसान शर्तों पर सरकार ने कर्ज की व्यवस्था की थी, पर उद्यमियों की हिम्मत जवाब दे गई थी। इसकी बड़ी वजह थी कि उनके उत्पाद के लिए बाजार नजर नहीं आ रहा था।
आयात के मुकाबले निर्यात के बढ़ने की एक बड़ी वजह यह भी है कि सरकार ने घरेलू उत्पाद को बढ़ावा देना शुरू किया है। कई वस्तुओं पर आयात शुल्क बढ़ा दिया है, जिसके चलते बाहर की वस्तुओं की अपेक्षा कीमत और गुणवत्ता में देशी उत्पाद प्रतिस्पर्धा में खड़े हो सके हैं। फिर बाहर के बाजारों में नई जगहें तलाशने में कामयाबी मिली है, यह ज्यादा संतोष की बात है। अभी तक गुणवत्ता और कीमत के स्तर पर भारतीय उत्पाद विदेशी वस्तुओं के सामने प्रतिस्पर्धा में खड़े नहीं हो पा रहे थे। अब उनकी पहुंच बढ़ रही है तो यह इस बात का संकेत है कि बाहर के बाजारों में भारतीय उत्पाद की गुणवत्ता पर वहां के लोगों का भरोसा बढ़ा है। कारोबार में यह उछाल बना रहा, तो बहुत जल्दी इसके सकारात्मक नतीजे नजर आने लगेंगे।
Date:25-03-22
आत्मनिर्भर होता भारत संपादकीय
भारत ने 400 अरब डॉलर का निर्यात लक्ष्य हासिल करके उल्लेखनीय उपलब्धि हासिल की है। यह पहला मौका है जब भारत ने 400 अरब डॉलर का उत्पाद निर्यात किया है। इससे भी महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इस लक्ष्य को निर्धारित समय से नौ दिन पहले हासिल किया गया है। चालू वित्त वर्ष में भारत का निर्यात 37 प्रतिशत बढ़कर 400 अरब डॉलर हो चुका है। वित्त वर्ष 2020-21 में यह 292 अरब डॉलर था। निर्यात के मामले में भारत का पिछला सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन वर्ष 2018-2019 में 330.07 अरब डॉलर का रहा था। वाकई में कोरोना काल की आर्थिक उथल पुथल के दौरान यह भारत के आत्मनिर्भर होने की ओर बढ़ने में बड़ा कदम है। भारत ने 2021-2022 में औसतन 33 अरब डॉलर के उत्पाद हर महीने निर्यात किए। निर्यात वृद्धि में पेट्रोलियम उत्पादों, इलेक्ट्रॉनिक उत्पाद, इंजीनियरिंग उत्पाद, चमड़ा, कॉफी, प्लास्टिक, रेडीमेड परिधान, मांस एवं दुग्ध उत्पाद, समुद्री उत्पाद और तंबाकू उत्पादों की अहम भूमिका रही है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने 400 अरब डॉलर का उत्पाद निर्यात लक्ष्य हासिल करने में भारत को मिली कामयाबी की तारीफ की है और कहा है कि देश को ‘आत्मनिर्भर भारत’ बनाने में यह एक अहम पड़ाव है। इस सफलता की बधाई किसानों, कारीगरों, एमएसएमई, विनिर्माताओं, निर्यातकों को दी जानी चाहिए, जिन्होंने विपरीत परिस्थितियों में भी इस लक्ष्य को हासिल करने में जबरदस्त योगदान किया है। केंद्र सरकार के प्रोत्साहनों का भी इस उपलब्धि में बड़ा योगदान है। सरकार राज्यों एवं जिलों के साथ करीबी संपर्क में है और निर्यातकों से जुड़े मुद्दों के त्वरित समाधान के लिए भी उनसे जुड़ी हुई है। निर्यात संवर्धन परिषदों, उद्योग संगठनों और अन्य हितधारकों के साथ सक्रिय संपर्क ने देश को यह लक्ष्य हासिल करने में बड़ी मदद की है। भारतीय निर्यात संगठनों के महासंघ (फिओ) ने इसे देश के लिए एक बड़ी उपलब्धि बताया है। निर्यातकों ने तमाम चुनौतियों के बावजूद एक साल में ही निर्यात में 110 अरब डॉलर की वृद्धि की है। इस सिलसिले को कायम रखना और उसे आगे बढ़ाना अधिक महत्त्वपूर्ण है। उम्मीद करें कि विभिन्न देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौतों और उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजनाओं से यह सिलसिला और बढ़ेगा।
Date:25-03-22
समझदारी जरूरी संपादकीय
हिजाब मामले में देश की सर्वोच्च अदालत का रुख प्रथम दृष्टया प्रशंसनीय और सांकेतिक है। प्रधान न्यायाधीश एनवी रमना के रुख से समाज में समझदारी का अनुपात बढ़ना चाहिए। अदालत का इशारा है कि मामले को ज्यादा सनसनीखेज न बनाया जाए। इस मामले को सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष लाने वाले अधिवक्ता ने परीक्षाओं का हवाला देते हुए जल्दी सुनवाई की मांग की थी, पर अदालत को जल्दी नहीं है। अदालत ने कहा है कि परीक्षाओं का इस मुद्दे से कोई लेना-देना नहीं है। परीक्षा देने संबंधी जो प्रावधान हैं, उनमें हिजाब जैसी कोई बात नहीं है। कर्नाटक में कई लड़कियों ने हिजाब पहनने की जिद के कारण परीक्षा में बैठने से इनकार कर दिया था। कर्नाटक सरकार पहले ही स्पष्ट कर चुकी है कि दोबारा परीक्षा नहीं ली जाएगी, जबकि कुछ लड़कियों की मांग है कि परीक्षा फिर से ली जाए, वरना साल बर्बाद हो जाएगा। यहां प्रश्न प्राथमिकता का है, हिजाब या परीक्षा? ऐसे कारणों से अगर परीक्षा दोबारा होने लगे, तो एक नई परिपाटी शुरू हो जाएगी, जिसे गलत मानने वाले भी अच्छी-खासी संख्या में होंगे। फिर भी उन लड़कियों के बारे में शिक्षा के कर्णधारों को स्थानीय स्तर पर कोई फैसला लेना चाहिए, ताकि उनका साल बर्बाद न हो।
वैसे तो कर्नाटक उच्च न्यायालय ने पहले ही अपना फैसला सुना दिया है कि हिजाब अनिवार्य नहीं है। यह कोई ऐसा हक नहीं है, जो मजहब से हासिल होता हो। आम जनजीवन में हिजाब पर कोई रोक नहीं है, कोई भी पहन सकता है, लेकिन जब बात स्कूल और कॉलेज की आती है, तो अनुशासन और एकरूपता को अहमियत देना अपरिहार्य है। जाहिर है, इस फैसले से असंतुष्ट लोगों ने सर्वोच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया है और सर्वोच्च न्यायालय ने बिल्कुल वाजिब इशारा किया है कि यह मामला उतने महत्व का नहीं है, जितना उसे बनाया जा रहा है। कर्नाटक उच्च न्यायालय ने न्यायिक और धार्मिक आधारों के अध्ययन के बाद अपने फैसले में हिजाब सहित शैक्षणिक संस्थानों के अंदर सभी तरह के धार्मिक कपड़ों पर प्रतिबंध को सही माना था। अब सर्वोच्च न्यायालय को विचार करना है, क्या हिजाब जरूरी धार्मिक प्रथा है।
वास्तव में, ऐसे मामलों को हम जरूरत से ज्यादा तरजीह देने लगे हैं। कई बार सनसनीखेज और हिंसक भी बना दे रहे हैं। अगर हम इसी मामले को लें, तो उच्च न्यायालय के जिन न्यायाधीशों ने यह फैसला सुनाया था, उन्हें मौत की धमकी दे दी गई। शिकायत मिलने के बाद न्यायमूर्तियों को वाई श्रेणी की सुरक्षा प्रदान की गई है। किसी भी चीज को धर्म के नजरिए से देखने में बुराई नहीं है, पर जब सांप्रदायिकता के नजरिए से देखा जाता है, तब समस्या होती है। हिजाब के पक्ष और विपक्ष, दोनों तरफ सांप्रदायिकता की घुसपैठ है। अदालत इस घुसपैठ से परे जाकर संविधान की रोशनी में ही विचार करेगी। आज समाज जिस ओर बढ़ रहा है, उसमें सांप्रदायिकता की चाशनी में पगे ऐसे मामले खूब सामने आएंगे। अव्वल तो लोगों को ही सावधान रहना होगा। स्कूलों, कॉलेजों में प्राथमिकता पढ़ाई ही रहे। सामान्य शिक्षा किसी धार्मिक कर्मकांड का क्षेत्र नहीं है। स्कूलों-कॉलेजों के बाहर धार्मिक व्यवहार की भी पूरी आजादी है, जिसकी रक्षा संविधान करता है और हमेशा करेगा। अब स्कूलों में भी धर्म के नाम पर किसी परिधान को अगर स्वीकार किया जाना है, तो इसके लिए भी सद्भाव जरूरी है, ताकि हम अप्रिय स्थितियों से बचते हुए राह निकाल सकें।
Date:25-03-22
कभी पूछिए अपने शहर से उसका हाल अनुमिता रॉय चौधरी, ( कार्यकारी निदेशक, सीएसई )
आईक्यूएयर की नई रिपोर्ट बताती है कि भारत का कोई भी शहर वर्ष 2021 में विश्व स्वास्थ्य संगठन यानी डब्ल्यूएचओ के वायु गुणवत्ता मानक पर खरा नहीं उतर सका। रिपोर्ट के मुताबिक, दिल्ली की हवा दुनिया की तमाम राजधानियों में सबसे जहरीली है और विश्व के शीर्ष 100 प्रदूषित शहरों में से 63 भारत के हैं। जाहिर है, दुनिया भर के नगरों का अध्ययन करके तैयार की गई यह रिपोर्ट काफी खास है। अब हम न सिर्फ वायु प्रदूषण की प्रवृत्तियों का अध्ययन कर रहे हैं, बल्कि उन नीतियों की भी पड़ताल में जुट गए हैं, जो वायु प्रदूषण के खिलाफ सरकारें अपनाती रही हैं।
मगर इस तस्वीर का एक अन्य पहलू भी है। यह रिपोर्ट बताती है कि वर्ष 2020 की तुलना में 2021 में प्रदूषण में काफी बढ़ोतरी हुई है। दिल्ली की आबोहवा 15 फीसदी अधिक दूषित हो गई है। लेकिन सच यह भी है कि 2020 में कोरोना महामारी के कारण हम एक लंबे लॉकडाउन के गवाह बने थे। आर्थिक गतिविधियों पर रोक लगने और सड़कों पर गाड़ियों का बोझ न होने के कारण पूरे देश में प्रदूषण के स्तर में तेज गिरावट आई थी। इसीलिए, जब अर्थव्यवस्था खोलने की कवायद शुरू हुई, तब तमाम विश्लेषकों ने प्रदूषण में इजाफा होने के कयास लगाए थे। आईक्यूएयर की रिपोर्ट इसकी तस्दीक कर रही है। हालांकि, 2016 से 2020 तक का जब हम ट्रेंड देखते हैं, तो पता चलता है कि दिल्ली में प्रदूषण के स्तर में कमी आई है। इसका अर्थ यह है कि प्रदूषण की दीर्घकालिक प्रवृत्ति में गिरावट दिख रही है। इसलिए इस नई रिपोर्ट के बहाने यह चिंतन भी होना चाहिए कि आर्थिक गतिविधियों के सुचारू रूप से काम करने के कारण 2021 में प्रदूषण का जो स्तर हम देख रहे हैं, उसे किस तरह से नियंत्रित किया जाए?
साफ है, हमें ऐसी योजनाएं बनानी होंगी, जो धरातल पर सफल साबित हों। विभिन्न क्षेत्रों में ऐसे प्रयास हो भी रहे हैं, लेकिन अब भी कई ऐसे छिद्र हैं, जिनको भरना अति-आवश्यक है। सबसे पहले तो गाड़ियों से होने वाले प्रदूषण को नियंत्रित करने पर काम होना चाहिए। इसके लिए न सिर्फ सार्वजनिक परिवहन को बड़े पैमाने पर बढ़ाना होगा, बल्कि सड़कों पर निजी गाड़ियों को कम करने की रणनीति भी अपनानी होगी। अच्छी बात है कि इलेक्ट्रिक गाड़ियों को लेकर सरकारें संजीदा हुई हैं। दिल्ली सरकार ने तो यह लक्ष्य बनाया है कि 2024 में जितनी गाड़ियां सड़कों पर होंगी, उनमें से 25 फीसदी इलेक्ट्रिक होनी चाहिए। हमें इस लक्ष्य को पाना ही होगा। इलेक्ट्रिक गाड़ियों पर मिलने वाली सब्सिडी इसमें कारगर भूमिका निभा सकती है।
इसी तरह, औद्योगिक इकाइयों में इस्तेमाल हो रहे ईंधन को भी हमें बदलना होगा। दिल्ली में कोयला जैसे जीवाश्म ईंधन का इस्तेमाल बंद कर दिया गया है। ऐसे में, प्राकृतिक गैस का विस्तार आवश्यक है। उद्योग जगत जितनी तेजी से स्वच्छ ईंधन की तरफ आकर्षित होगा, पर्यावरण में कार्बन का उत्सर्जन उतनी तेजी से कम होगा। हमें कचरा प्रबंधन पर भी प्रमुखता से काम करना होगा। कचरा का बेहतर निस्तारण तो होना ही चाहिए, कोशिश यह भी होनी चाहिए कि उनका फिर से इस्तेमाल हो सके। हालांकि, महज राष्ट्रीय राजधानी में काम करने से बात नहीं बनेगी। हमें पूरे एनसीआर में उसी सख्ती से योजनाओं को अमलीजामा पहनाना होगा, जितनी कठोरता की जरूरत दिल्ली में है। यह समझना होगा कि प्रदूषण की कोई प्रशासनिक सीमा नहीं होती। दिल्ली के आसपास के इलाकों में यदि प्रदूषण बढ़ता जाएगा, तो राष्ट्रीय राजधानी की हवा भी साफ नहीं रह सकेगी। एनसीआर के तमाम साझेदार विभागों को मिलकर इस दिशा में काम करना होगा।
वायु प्रदूषण कई पहलुओं पर निर्भर करता है। हर देश की अलग-अलग भौगोलिक और मौसमी परिस्थितियां होती हैं। इनका प्रदूषण पर खासा असर पड़ता है। यही वजह है कि भारत में गंगा के मैदानी इलाकों और उत्तर भारतीय शहरों में तुलनात्मक रूप से प्रदूषण का स्तर अधिक रहता है, जबकि दक्षिण भारत या देश के पूर्वोत्तर में प्रदूषण उतना परेशान नहीं करता। इसलिए, स्वच्छ वायु के लिए कोई रणनीति बनाते वक्त हमें स्थानीय स्तर पर भौगोलिक व मौसमी परिस्थितियों का विशेष ध्यान रखना चाहिए। सुखद है कि सरकार ने नीतिगत मोर्चे पर काम शुरू कर दिया है। साल 2019 में देश भर में राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम की शुरुआत की गई थी, जिसका मकसद साल 2024 तक 20-30 फीसदी तक प्रदूषण कम करना है। इसके लिए 132 शहरों को चिह्नित किया गया है। इसके अलावा, दिल्ली-एनसीआर में भी अलग से कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। यानी, योजना-निर्माण के स्तर पर देश भर में काम हो रहा है, इसलिए इनके क्रियान्वयन को लेकर हमें प्रयास करना होगा। यह देखना होगा कि हमने इसमें कितने संसाधन लगाए हैं, या हमारी संस्थागत क्षमताओं में कितना इजाफा हो रहा है? पिछली कई योजनाओं का हश्र देखने का बाद यही समझ में आता है कि जब तक ऐसे कार्यक्रमों को राजनीतिक स्तर पर सहयोग नहीं मिलता, तब तक वे सार्थक नहीं हो पाते हैं।
हमारे नियामक बताते हैं कि देश में कहीं प्रदूषण बढ़ रहा है, तो कहीं घट रहा है, तो कहीं मिश्रित रुझान भी दिखने में आ रहे हैं। इसलिए हमें समस्या पर नहीं, बल्कि समाधान पर अधिक सोचना चाहिए। सार्वजनिक मंचों पर योजनाओं की चर्चा होने से उनको जन-समर्थन मिलता है। जनता और सरकार की समझ बढ़ाए बिना हम प्रदूषण के खिलाफ लड़ ही नहीं सकते। इसका अर्थ यह भी है कि देश भर में निस्संदेह प्रदूषण बढ़ रहा है, लेकिन इसको नियंत्रित करने के लिए जिस तरह की योजनाओं की जरूरत है, उनके निर्माण और क्रियान्वयन के लिए हमें आम लोगों को जोड़ना होगा।
हम समस्या पर बेशक जन-जागरूकता बढ़ाएं, लेकिन उसके समाधान को लेकर कहीं ज्यादा जागरूकता फैलाने की दरकार है। और, इसके लिए सार्वजनिक परिवहन को बढ़ावा देने, उद्योग जगत को वाजिब दरों पर स्वच्छ ईंधन उपलब्ध कराने, निजी गाड़ियों के इस्तेमाल को हतोत्साहित करने और कचरे का विशेष प्रबंधन करने की जरूरत है। तभी हम जहरीली आबोहवा से मुक्ति पा सकेंगे।
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महामारी के बाद से सेमीकंडक्टर निर्माण की वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला प्रभावित हुई है। चिप निर्माण को आकर्षित करने के लिए कई देश अब आकर्षक पैकेज पेश करके अपने हितों की रक्षा में लगे हैं। इसलिए, भारत ने भी देश में इसके निर्माण हेतु 10 अरब डॉलर के पैकेज को मंजूरी दे ही है।
सेमीकंडक्टर निर्माण सुविधा या फैब में भारत की मजबूती –
हमारे पास अमेरिका के बाद चिप डिजाइनरों की सबसे बड़ी संख्या है। ये सभी अत्याधुनिक प्रणालियों और प्रौद्योगिकियों पर काम कर रहे हैं। उदाहरण के लिए, कर्नाटक में विभिन्न वैश्विक कंपनियों के 85 से अधिक फैबलेस चिप डिजाइन हाउस हैं।
इलेक्ट्रॉनिक डिजाइन ऑटोमेशन टूल्स में हमारे पेशेवरों की विशेषज्ञता विनिर्माण की ओर बढ़ने के लिए ठोस आधार प्रदान करती है।
फैब निर्माण हेतु पारिस्थितिकी तंत्र कैसे बनाया जाए –
सबसे पहले, देश के भीतर उत्पन्न सेमीकंडक्टर की मांग को समझना महत्वपूर्ण है। यह 2030 तक 80-90 अरब डॉलर होने की उम्मीद है।
ऑटोमोटिव जैसे सेमींकंडक्टर के निर्माताओं को चाहिए कि वे पहले ही उपभोक्ताओं से एक समझौता कर लें, जिससे निर्मित चिप्स की खपत हो सके।
कच्चे माल की आपूर्ति करने वाली कंपनियों को आपूर्ति शुरू करने का अवसर देना होगा। ऐसी कंपनियां अपने आप ही मांग बढ़ाने का काम करती हैं।
फैब क्लस्टरिंग से सेमींकडक्टर आपूर्ति श्रृंखला और संबंधित व्यवसाय को एक मंच दिया जा सकता है।
ऐसा पारिस्थितिकी तंत्र एक अच्छे स्थान और उत्तम बुनियादी ढांचे की मांग करता है। इसके लिए अल्ट्रा प्योर पानी और बिजली की पर्याप्त सुविधा होनी चाहिए।
श्रम विवादों के लिए अनुकूल वातावरण बनाने की आवश्यकता है।
एफडीआई को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।
शोध व अनुसंधान को बढ़ावा देना होगा, क्योंकि नए युग की प्रौद्योगिकियों को डिजाइन, सामग्री और प्रक्रिया स्तरों पर नवाचार की आवश्यकता होती है।
आकर्षक सरकारी अनुदान और कर प्रोत्साहन के साथ भारतीय इंजीनियरों को स्टार्टअप के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए।
भारत के प्रमुख विज्ञान संस्थानों को भी इस क्षेत्र में आक्रामक तरीके से काम करने के लिए कहा जाना चाहिए।
इन सबके साथ भारत यह सुनिश्चित कर सकता है कि वह आत्मनिर्भर बन जाए।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित गुंजन कृष्ण के लेख पर आधारित। 14 फरवरी, 2022
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Date:24-03-22
Mind, Body & Growth How to ensure India’s government schools, healthcare deliver quality service for the majority Raghuram Rajan is a professor at the University of Chicago & Rohit Lamba is an assistant professor at Pennsylvania State University
Whatever path India chooses for its economic growth, capabilities of our people will matter. And while our best hospitals and schools compare with the best in the world, our healthcare and education systems grossly underserve the ordinary citizen.
Even before accounting for the devastating effect of the pandemic on our children’s learning, ASER reported in 2019 that only about half the students in Standard III could read at Standard I levels. The rate of malnutrition amongst India’s children stays stubbornly over 30%, which is higher than in Ghana or Kenya. Why has a vibrant electoral democracy not been able to deliver on education, health and other public goods?
Part of the answer is that no one can be held responsible for a local primary health centre (PHC) that is frequently out of medicines, or for a local government school where the teacher is perpetually absent. The power to affect these matters, for instance to penalise the absentee teacher, typically lies in the state capital, which aggrieved locals or their panchayat representatives have little ability to reach. So local elections are rarely about improving delivery of public goods, since local governments neither have the power, the funds, nor the staff to change matters.
At the same time, the quality of the local school is too small a matter for the state politician to campaign on – not that she will have much ability or incentive to alter local matters when she becomes a minister in the state capital. Instead, she campaigns on populist giveaways such as loan waivers or free rations that have broad appeal across the state. And to address economic worries, she focuses on job reservations based on caste, region, or other subgroup identities, instead of pushing for better capabilities for the youth to get private jobs.
We don’t lack for detailed reports on needed reforms. The supply side of service delivery in health and education is improving but at too slow a pace. The hope lies in upending the system by mobilising the demand side – instead of pushing services top down, these have to be pulled from bottom up. Instead of centralising administration, we need to decentralise, while empowering beneficiaries. In short, we have to harness the power of our democracy rather than succumb to its most populist aspects.
If some power to reward or punish providers is handed to local government, even if short of full powers to hire or fire, locals have some measure of redress. Even better would be to set up school boards and health boards, staffed primarily by user households, which should be the primary input to the local government’s decisions. The Delhi government is virtually a mayoralty, and the improvements it has made in its schools and PHCs suggest the potential for changes elsewhere if local government is empowered and funded.
Of course, the poor may be reluctant to protest poor service, especially if the provider has a higher social status, or is locally influential. Such fears tend to diminish as the poor come to realise their own power of citizenry. But it is also one more reason to do away with arbitrary laws that any administration – local, state, or national – has to harass critics.
The quality of state delivery also stays mediocre because the middle-class no longer uses it. Consequently, a vocal force that would protest bad service goes missing – contrast the quality of Kendriya Vidyalayas that admit the children of middle-class government servants with the typical government school. To entice the middle class back to more typical government schools, their quality has to improve, a chicken and egg problem.
Private providers can offer people more choice. Unfortunately, our historical suspicion of the private sector impedes progress. Instead of regulating them lightly and effectively, the state veers between seeing them as unwanted greedy competition or a necessary evil. Instead of a vibrant private alternative, therefore, poorer households often get the products of collusion between the corrupt elements of the state and the greediest parts of the private sector. The consequence is continued distrust.
Some regulations are warranted, but not ones that force private providers to be clones of the government ones. Transparency can lead to more informed choice. Parents should know their local school’s test performance and its teachers’ qualifications. There is however no need to insist that every teacher have a B. Ed. Indeed, the regulatory side of the state should be independent from the side providing the service, so that regulations improve private provision rather than impede competition to state providers.
Similarly, it should be possible for a patient to check in a public database that their doctor has the degrees she claims, or to check a hospital’s record of treatments, prices charged, and success rates. The trusted informal village ‘doctor’ could get formal training in basic treatments and get a verifiable certificate.
The eventual aim should be to allow state and private providers to compete on alevel playing field. If the poor household chooses private alternatives, the government should aid them through school vouchers and health insurance. Policy is already nudging in that direction with programmes such as Ayushman Bharat.
Finally, unless we fix the basic architecture of the system, more resources may make little dent. Yet, as we go about fixing design, our spending priorities are also worth rethinking.
Consider sums being handed for Production-Linked Incentives – it will cost $10 billion or more in subsidies to convince a big industrialist to build one semi-modern chip factory, a highly capital-intensive (not labour-intensive) enterprise. That sum could fund 50 top-notch universities churning out 50,000 fantastic scientists and engineers a year or 1,000 schools with state-ofthe-art laboratories, libraries and gyms.
Surely, spending on healthy minds in healthy bodies will take us much further than subsidising mindless matter?
Date:24-03-22
Make It an Aptitude, Not Dipstick, Test ET Editorials
The University Grants Commission’s announcement of a Common University Entrance Test (CUET) is a good move. College admissions based on high cut-off marks in an inflationary marking system had, indeed, become ridiculous. Quality college education resembles a cabal. With the CUET, though, school board scores no longer necessarily count. In theory, it opens admissions to all. In practice, it could replace one closed system with another.
A common entrance test means a level-playing field. But swapping a diluted assessment metric with a multiple question format that allows cumulative school learning to become vestigial, is a jump-through-the-hoop challenge, not an aptitude test. What is needed is a practical, multi-metric admissions
system that gives genuine shape to the goals of the National Education Policy 2020. The new Delhi University entrance criteria requiring 40% in board exams to qualify for the common exam is a workable model. The CUET is a three-part test — language skills, domain-specific knowledge, general knowledge, analytical and quantitative skills — based on the National Council of Educational Research and Training (NCERT) syllabus. Take out board exam marks wholesale and students will be monomaniacal about CUET rankings rather than holistic learning in the final years of school. Ironically, this is exactly the trajectory experts wish engineering and medical hopefuls to move away from. With CUET, expect a windfall for coaching schools.
College admissions must give due weightage to (an improved) board exam metric that gives credit to a candidate’s prowess to learn, as well as a common entrance exam that takes a dipstick test. The board exam metric is broke and needs fixing. A quiz contest alone is not the fix.
Date:24-03-22
कॉमन एंट्रेंस टेस्ट से आएगी समानता संपादकीय
देश के सभी 45 केंद्रीय विश्वविद्यालयों में स्नातक स्तर (यूजी) में प्रवेश के लिए यूजीसी ने एक कॉमन एंट्रेंस टेस्ट का खाका तैयार किया है। यह देखने में आया कि कई राज्यों के शिक्षा बोर्ड इंटरमीडिएट स्तर पर अंक देने में दरयादिली दिखाते हैं, जिससे दूसरे राज्यों के बच्चों का दाखिला प्रभावित होता है। कट-ऑफ का दबाव इतना बढ़ता गया है कि पिछले वर्ष डीयू के आठ कॉलेजों में 11 कोर्सेज में कट-ऑफ शत-प्रतिशत रखा गया। योजना के तहत 3 घंटा 30 मिनट की केवल एक परीक्षा होगी, जिसके तीन खंड होंगे। हालांकि कुछ शिक्षाविद कह रहे हैं कि इससे स्कूल और माध्यमिक स्तर की परीक्षाओं का महत्व खत्म हो जाएगा लेकिन वे भूल रहे हैं कि नई शिक्षा नीति 5+3+3+4 के तहत स्कूल और माध्यमिक स्तर पर भी प्रोफेशनल कोर्सेज लाए जा रहे हैं, ताकि उन्हें रोजगार के लिए उपयोगी बनाया जा सके। हाई स्कूल और इंटर तक के कोर्स में पत्रकारिता और वोकेशनल कोर्स लाने से उद्देश्यहीन उच्च शिक्षा की डिग्री लेने वालों का दबाव कम होगा। देखना होगा कि 45 केंद्रीय यूनिवर्सिटीज में से दो- एएमयू और जामिया मिलिया- क्या प्रतिक्रिया देते हैं। इस वर्ष से ही यह परीक्षा 13 भाषाओं में ली जाएगी और यह सम्बंधित विश्वविद्यालयों पर निर्भर करेगा कि वे किसी स्थानीय भाषा को भी इसमें शामिल करें या नहीं। विश्वविद्यालय चाहें तो इसमें भी काउंसिलिंग की व्यवस्था शुरू करें, जैसा कि नीट और जेईई को लेकर होता है। उधर राज्यों की यूनिवर्सिटीज को भी छूट होगी कि वे चाहें तो यूजीसी के एग्जाम के मार्क्स के आधार पर दाखिला शुरू करें। आज भी भारत में उच्च शिक्षा सरकारी यूनिवर्सिटीज में बेहद सस्ती है लेकिन कई कोर्सेज में शिक्षा रोजगारपरक नहीं बन पाई है।
Date:24-03-22
महत्वपूर्ण फैसला संपादकीय
सभी मत-मजहब वालों के लिए तलाक, गुजारा भत्ता, उत्तराधिकार, विवाह की आयु, बच्चों को गोद लेने और विरासत संबंधी नियम एकसमान बनाने की मांग वाली याचिका पर सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि यदि इन सभी मामलों में एक जैसे नियम बन जाते हैं तो समान नागरिक संहिता का उद्देश्य पूरा हो जाएगा। होना तो यह चाहिए था कि अभी तक इस उद्देश्य को हासिल कर लिया जाता, क्योंकि संविधान के नीति निर्देशक तत्वों में साफ तौर पर कहा गया है कि राज्य समान नागरिक संहिता लागू करने की दिशा में आगे बढ़ेगा। यदि ऐसा नहीं हो सका तो कुछ दलों के नकारात्मक रवैये, अल्पसंख्यकों के तुष्टीकरण की राजनीति और इस दुष्प्रचार के कारण कि इससे विभिन्न समुदायों के रीति-रिवाजों में अनावश्यक हस्तक्षेप होगा। दुर्भाग्य से यह दुष्प्रचार अभी भी जारी है। यह इसके बाद भी जारी है कि सर्वोच्च न्यायालय के साथ-साथ विभिन्न उच्च न्यायालय समय-समय पर समान नागरिक संहिता की आवश्यकता रेखांकित कर चुके हैं। तथ्य यह भी है कि गोवा में समान नागरिक संहिता पहले से ही लागू है और वहां सभी समुदायों के लोग रहते हैं।
आखिर जो व्यवस्था गोवा में बिना किसी बाधा के लागू है, वह शेष देश में क्यों नहीं लागू हो सकती? प्रश्न यह भी है कि जब अन्य कई लोकतांत्रिक देशों में समान नागरिक संहिता लागू है तो भारत में उसका विरोध क्यों होता है? यह प्रश्न अनुत्तरित है तो इसीलिए कि अभी तक किसी सरकार ने समान नागरिक संहिता का मसौदा तक तैयार करने की जहमत नहीं उठाई। कम से कम अब तो यह काम होना ही चाहिए, ताकि उस पर व्यापक विचार-विमर्श हो सके। यह हास्यास्पद है कि एक ओर संविधान की दुहाई देकर यह कहा जाता है कि कानून की नजर में सब बराबर हैं और दूसरी ओर भिन्न-भिन्न समुदायों के लिए विवाह विच्छेद, गुजारा भत्ता, उत्तराधिकार आदि से संबंधित नियम अलग-अलग बने हुए हैं। समान नागरिक संहिता के अभाव के चलते ही विभिन्न समुदायों के लोगों में आपसी एकता का वह भाव देखने को नहीं मिलता, जो आवश्यक ही नहीं अनिवार्य है। यह समझने की जरूरत है कि समान नागरिक संहिता का निर्माण देश की जनता को जोड़ने के साथ उनमें यह भाव जगाने का भी काम करेगा कि वे सब एक ही कानून से बंधे हुए हैं। पता नहीं सुप्रीम कोर्ट सभी समुदायों के लिए तलाक गुजारा भत्ता विवाह की आयु गोद लेने और विरासत संबंधी नियम एक जैसे बनाने की मांग करने वाली याचिका पर किस नतीजे पर पहुंचेगा लेकिन उसे ऐसा कुछ तो करना ही चाहिए जिससे देश समान नागरिक संहिता की दिशा में आगे बढ़ सके।
Date:24-03-22
कठिन दौर में कारगर विदेश नीति हर्ष वी पंत, ( लेखक नई दिल्ली स्थित आब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन में रणनीतिक अध्ययन कार्यक्रम के निदेशक हैं )
पिछले कुछ अर्से से दुनिया बड़े उथल-पुथल भरे दौर से गुजर रही है। रूस-यूक्रेन युद्ध ने इस हलचल को और बढ़ा दिया है। इससे कई पुरानी साझेदारियां दांव पर लग गई हैं तो तमाम नए रिश्ते उभरते नजर आ रहे हैं। वैश्विक ढांचे की जटिलता इतनी बढ़ गई है कि दो मित्र देश एक पड़ाव पर साथ दिखते हैं तो अगले पड़ाव पर उनके हितों में टकराव होने लगता है। ऐसे में सभी देशों को अपनी विदेश नीति में बड़ा बदलाव करना पड़ रहा है। भारत के लिए बदलाव की यह चुनौती इस कारण और विकराल हो गई कि रूस के साथ जहां हमारे ऐतिहासिक प्रगाढ़ रिश्ते हैं, वहीं विगत कुछ दशकों के दौरान अमेरिका सहित पश्चिमी देशों के साथ हमारे संबंध नई ऊंचाई पर पहुंचे हैं। यूरोप में करीब महीने भर से जारी जंग ने इन दोनों ही गुटों में दरार और तकरार कहीं ज्यादा बढ़ा दी है। इसके चलते दुनिया के तमाम देशों को किसी न किसी पाले में खड़ा होना पड़ रहा है। ऐसे धर्मसंकट की स्थिति में भारत किसी पाले में खुलकर खड़े हुए बगैर अपने हितों को पोषित करने में सफल रहा। भारतीय हितों के संरक्षण में संतुलन साधने की हमारी विदेश नीति के पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देशों का कायल होना उसकी कामयाबी को ही बयान करता है। बीते दिनों पाकिस्तानी प्रधानमंत्री इमरान खान ने सार्वजनिक सभा में भारतीय विदेश नीति की भूरि-भूरि प्रशंसा की थी। पाकिस्तान जैसे देश से ऐसी तारीफ दुर्लभ है।
यह कहना गलत नहीं होगा कि भारतीय विदेश नीति की इस सफलता में भारत के बढ़ते कद की अहम भूमिका रही। भारत गिनती के उन देशों में रहा, जिसके प्रधानमंत्री की रूस और यूक्रेन दोनों के राष्ट्रपतियों से कई बार बात हुई। इस दौरान प्रधानमंत्री मोदी ने दोनों ही देशों से संवाद के माध्यम से समाधान निकालने की बात कही। इतना ही नहीं जहां भारत रूस पर प्रतिबंध लगाकर उसे अलग-थलग करने के प्रयासों का समर्थन नहीं कर रहा, वहीं उसे रूस को यह हिदायत देने में भी गुरेज नहीं कि वह अंतरराष्ट्रीय कानूनों का पालन करे। मंगलवार को ही ब्रिटिश प्रधानमंत्री बोरिस जानसन से वार्ता में प्रधानमंत्री मोदी ने कहा कि रूस को संयुक्त राष्ट्र घोषणापत्र का पालन करना चाहिए। भारत के इसी संतुलित रुख का नतीजा है कि रूस के खिलाफ स्पष्ट रुख न अपनाने को लेकर हो रही आलोचनाओं के बावजूद उसे पश्चिमी देशों के कोप का भाजन नहीं बनना पड़ा। अंतरराष्ट्रीय समुदाय नई और बदलती वैश्विक व्यवस्था में भारत की महत्वपूर्ण भूमिका देखता है। कई देशों को तो यह आभास भी हो रहा है कि रूस-यूक्रेन संघर्ष को समाप्त कराने में भारत रचनात्मक भूमिका निभा सकता है।
जिन्हें लगता था कि रूस का स्पष्ट विरोध न करने का भारत को खामियाजा भुगतना पड़ेगा, उनकी ऐसी धारणाएं भी समय के साथ ध्वस्त हो गईं। ये आशंकाएं भी निर्मूल साबित हो गईं कि यूरोप में युद्ध छिडऩे से हिंद-प्रशांत क्षेत्र के अहम साझेदारों की सक्रियता शिथिल पड़ जाएगी और उसमें भी भारत को किनारे लगा दिया जाएगा। हाल में क्वाड की एक बैठक हुई और उसमें यूक्रेन पर आए प्रस्ताव को लेकर भारत की कोई कटु आलोचना नहीं हुई। अमेरिकी राष्ट्रपति के वक्तव्य से भी यही आभास हुआ कि वह इस मामले में भारत की भावनाओं को समझते हैं। क्वाड के दो सदस्य देशों जापान और आस्ट्रेलिया के प्रधानमंत्रियों ने बीते दिनों मोदी से सीधा संवाद किया। जापान के प्रधानमंत्री फुमिओ किशिदा हाल में जब भारत आए तो उस दौरान कई रणनीतिक साझेदारियों पर सहमति बनने के साथ ही जापान ने अगले पांच वर्षों के दौरान भारत में 3.2 लाख करोड़ रुपये के भारी-भरकम निवेश की प्रतिबद्धता जताई। वहीं आस्ट्रेलियाई प्रधानमंत्री स्काट मारिसन की मोदी से हुई वर्चुअल बातचीत में कई द्विपक्षीय मसलों पर साझेदारी बढ़ाने के अलावा भारत में 1,500 करोड़ रुपये का निवेश करने का एलान भी किया। यह भारत में आस्ट्रेलिया का अभी तक सबसे बड़ा निवेश प्रस्ताव है। इस दौरान जापान और आस्ट्रेलिया दोनों के राष्ट्रप्रमुखों ने यूक्रेन के मसले पर भारतीय रुख की व्यावहारिकता को समझने के संकेत भी दिए।
बात केवल पारंपरिक साझेदारों तक ही सीमित नहीं है। मौजूदा स्थितियों में चीन का रुख भी भारत के प्रति बदला हुआ नजर आ रहा है। इसके पीछे कहीं न कहीं रूस का कोण दिखता है, क्योंकि आज जिस प्रकार रूस अलग-थलग पड़ता जा रहा है, उसमें पुतिन यहीं चाहेंगे कि चीन और भारत जैसे दो बड़े देश उनके साथ खड़े दिखें। ऐसे में भारत एवं चीन बीच कोई भी टकराव रूस के लिए समीकरण और खराब करेगा। यही कारण है कि बीते दिनों ऐसी खबरें आईं कि चीनी विदेश मंत्री भारत दौरे पर आना चाहते हैं। चीन को यूक्रेन युद्ध से उपजी आर्थिक दुश्वारियों का आभास हो रही है तो संभव है कि वह भी नहीं चाहता हो कि यह लड़ाई लंबी खिंचे।
जापान और आस्ट्रेलिया के साथ मेल-मुलाकात के बाद भारत जल्द ही इजरायली प्रधानमंत्री नाफ्ताली बैनेट की मेजबानी करने जा रहा है। वर्तमान परिस्थितियों में यह एक महत्वपूर्ण दौरा होगा, क्योंकि रूस को लेकर भारत और इजरायल का रुख-रवैया कमोबेश एक जैसा है। जिस प्रकार भारत रूस और यूक्रेन से शांतिपूर्वक समाधान निकालने की अपील कर चुका है, उसी प्रकार बैनेट भी दोनों देशों में मध्यस्थता का प्रयास कर चुके हैं। इस कवायद के लिए युद्ध के दौरान ही बैनेट ने रूस की गुप्त यात्रा की, जो सार्वजनिक हो गई। ऐसे में कोई संदेह नहीं कि मोदी-बैनेट वार्ता में रूस का मुद्दा ही केंद्र में होगा। इसके माध्यम से दोनों देश कोई ऐसा स्वीकार्य हल निकालने की दिशा में आगे बढ़ सकते हैं, जिसे अधिक से अधिक देशों का समर्थन मिल सके। हाल के कुछ वर्षों के दौरान भारत और इजरायल के पश्चिम एशियाई देशों के साथ संबंधों में नाटकीय सुधार हुआ है। खाड़ी के देशों के साथ भारत और इजरायल की रणनीतिक भागीदारी भी आकार ले चुकी है। ऐसे में दोनों नेता सहयोगियों को जोड़कर व्यापक लाभ की किसी योजना पर आगे बढ़ सकते हैं।
फिलहाल जो परिस्थितियां आकार ले रही हैं उनका यही सार निकलता दिख रहा है कि निवेश के आकर्षक ठिकाने के रूप में उभरता भारत नई वैश्विक व्यवस्था में अपनी अहम जगह बनाता जा रहा है। भारत की यह हैसियत उसकी अंतरराष्ट्रीय साख बढ़ाने में सहायक सिद्ध हो रही है।
Date:24-03-22
समाज भी बदल रहा है राजनीति को बद्री नारायण, ( लेखक जीबी पंत सामाजिक विज्ञान संस्थान, प्रयागराज के निदेशक हैं )
राजनीति समाज को बदलती है तो समाज भी राजनीति को बदलता है। इसीलिए समाज एवं राजनीति के रूप में परिवर्तन होता रहता है। पुरानी अवधारणाएं टूटती हैं और नए बनती हैं। जनतांत्रिक राजनीति ने भारतीय समाज में आकांक्षाओं की अनंत लहरें पैदा की हैं। जिन सामाजिक समूहों में पहले सपने देखने और उन्हें व्यक्त करने की क्षमता नहीं विकसित हो पाई थी, उनमें अब ऐसा होने लगा है। ऐसे ही समूहों को विकासपरक राजनीति की भाषा में आकांक्षी यानी एस्पिरेंट समूह कहा जाता है। इसीलिए नीति, नियोजन एवं प्रशासन की भाषा में यह शब्द बार-बार प्रयुक्त होने लगा है।
हाशिये पर बसे समुदायों में अपनी आकांक्षा की अभिव्यक्ति उनमें बढ़ती आत्मशक्ति का प्रतीक है। इसी के बल पर ये समूह जनतंत्र में अपनी हिस्सेदारी के लिए सत्ता पर दबाव बनाते हैं। वैसे तो यह प्रक्रिया कल्याणकारी एवं विकासपरक राजनीति के ही कारण विभिन्न समाजों में विकसित हुई है, किंतु अब वह अपनी शक्ति के प्रभाव से जनतंत्र के ऊपरी तल पर अवस्थित जनतांत्रिक ढांचों को प्रभावित करने लगी है। समय के साथ जनतांत्रिक आत्मशक्ति निचले तलों पर अवस्थित सामाजिक समूहों में लगातार विकसित होती जा रही है। आकांक्षी समूहों की राजनीतिक चेतना ने अस्मिता की राजनीति के ढांचे को हिला दिया है। इसने जाति एवं अनेक सामाजिक अस्मिताओं को थोड़ी देर के लिए ही सही, पीछे धकेल दिया है। हालांकि जाति अभी भी जनतांत्रिक गोलबंदी की राजनीति के प्रभावी अस्त्र के रूप में कारगर है, किंतु जाति आधारित आकांक्षाओं ने एक वर्ग जैसा स्वरूप भी गढ़ना शुरू किया है।
इसने जनतांत्रिक राजनीति एवं सामाजिक गतिशीलता के स्तर पर दो काम किए हैं-पहला, जातियों से परे विकास की चाह से संचालित होने वालों का एक बड़ा समूह तैयार किया है। दूसरा, जातीय अस्मिता की राजनीति करने वालों को एक बड़ा झटका दिया है। हाशिये के समूहों में यह चेतना भी फैली है कि जो दल उनकी विकासपरक आकांक्षाओं एवं दैनिक जीवन की समस्याओं के निदान में सहायक होगा, वही उनका अपना होगा। इस नए जनतांत्रिक परिवर्तन ने भारतीय शासन, प्रशासन एवं राजनीति को भी प्रभावित किया है।
वैसे तो हर दल एक लाभार्थी समूह विकसित करता है, किंतु भाजपा की डबल इंजन सरकारों ने केंद्र एवं राज्यों की विकास एवं कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से दलितों एवं हाशिये पर बसे सामाजिक समूहों को जोड़कर लाभार्थियों का एक बड़ा समूह तैयार किया है। भाजपा ने अपने राजनीतिक कार्यक्रमों से इन समूहों को एक ऐसे समुदाय में तब्दील कर दिया है, जिनमें आकांक्षी चेतना विकासमान रहती है। हाल में प्रधानमंत्री मोदी ने इन्हें विकास योद्धा का नाम दिया। भाजपा ने एक ऐसी राजनीतिक स्थिति पैदा कर दी है, जिसके कारण दलित, गरीब एवं उपेक्षित तबकों का एक बड़ा वोट बसपा जैसे दलित सशक्तीकरण की राजनीति करने वाले दल से छिटक कर उसकी तरफ जा रहा है। इसे मैं एक नई अस्मिता के उभार के रूप में देखता रहा हूं। यह अस्थायी होती है और बनती-बिगड़ती भी रहती है, पर यह प्रभावी होती है। इसे स्थायी बनाए रखना राजनीतिक दलों पर निर्भर करता है।
उत्तर प्रदेश में भाजपा के चुनाव प्रभारी धर्मेद्र प्रधान ने चुनाव प्रचार की शुरुआत में ही गरीब कल्याण को एक बड़े वृत्तांत के रूप में प्रस्तुत किया था। इसी तरह प्रधानमंत्री मोदी ने जब अपना चुनाव प्रचार प्रारंभ किया तो उनका जोर गरीब कल्याण एवं विकास योद्धाओं पर रहा। गरीब कल्याण के कार्यक्रमों को मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने भी एक महत्वपूर्ण विमर्श के रूप में रखा। इस प्रकार दलित एवं हाशिये के समूहों का राजनीतिक पक्ष तय करने में जातीय अस्मितापरक विमर्श से ज्यादा बड़ी भूमिका विकास की चाहत की रही।
प्रधानमंत्री मोदी ने समय-समय पर हाशिये के समाजों से अपना सीधा संवाद स्थापित किया। इसी कारण उनके प्रति विश्वास की पूंजी उनके इतने समय तक शासन में रहने के बाद भी घटी नहीं बल्कि बढ़ी ही है। हाशिये के समूहों के बड़े भाग को भाजपा की ओर मोड़ा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने भी अपने सेवाकार्यो के माध्यम से हाशिये के समूहों के एक भाग में हिंदुत्व की चेतना को प्रखर किया है। इस चेतना ने पिछड़े वर्गो एवं दलित जातियों में जातीय अस्मिता की चेतना के आक्रामक उभार को काफी कुछ संतुलित एवं अनुकूलित करने का काम किया है। संघ एवं उससे प्रभावित अनेक संगठन हाशिये के समाजों में कई दशकों से सेवा कार्य करते आ रहे हैं। संघ परिवार शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार सृजन के अनेक कार्यक्रम हाशिये के समाजों के बीच संचालित करता है। विद्या भारती संचालित स्कूल दलितों एवं हाशिये के समाजों में शिक्षा प्रसार के माध्यम से पहुंच रहे हैं। इसी प्रकार वनवासी कल्याण आश्रम शिक्षा, स्वास्थ्य और आर्थिक स्वावलंबन के कार्यो के जरिये जनजातीय समूहों के बीच हिंदुत्व की चेतना जगा रहा है।
हमारे महानगरीय बुद्धिजीवी अपने चश्मे से हाशिये के समूहों को देखने के क्रम में प्राय: यह तथ्य भूल जाते हैं कि उनकी जरूरतें भिन्न होती हैं। ऐसे बुद्धिजीवी उनके भीतर अपने जैसे एक ‘क्रांतिकारी’ की खोज में लगे रहते हैं। वे यह नहीं भांप पाते कि कैसे धीरे-धीरे उनकी जीवन स्थितियां उनकी मनोदशा में परिवर्तन ला रही हैं। वे यह भी नहीं देख पाते कि पारंपरिक अस्मिताओं के साथ उनके संबंध कैसे बन-बिगड़ रहे हैं? ऐसे में वे उनकी राजनीतिक चाहत में आए परिवर्तन को या तो देख नहीं पाते या फिर देखते भी हैं तो समझ नहीं पाते और समझते भी हैं तो उन्हें स्वीकार नहीं कर पाते।
Date:24-03-22
कुतर्कों के बवंडर आचार्य पवन त्रिपाठी
हाल ही में प्रदर्शित एक फिल्म ‘द कश्मीर फाइल्स’ पर इन दिनों जोरदार बहस चल रही है। एक तरफ इसे देखने वाले ज्यादातर आम नागरिक इस बात को लेकर क्षुब्ध हैं कि देश से जुड़ा इतना भयावह सच आज तक उनसे छुपाकर क्यों रखा गया, तो दूसरी ओर सेक्युलर जमात इस सच के सामने आ जाने से परेशान है। वह तरह-तरह के तर्क गढ़कर यह साबित करने की कोशिश कर रही है, मानो कुछ हुआ ही न हो। या जो हुआ भी, वह बहुत मामूली और सामान्य सी घटना रही हो।
इस घटना के घटित होने के पीछे कांग्रेस और नेशनल कॉन्फ्रेंस जैसे दलों की कोई भूमिका ही न रही हो। यही नहीं, हर समस्या की तरह वे इस समस्या का भी ठीकरा भाजपा पर ही यह सवाल उठाकर फोड़ना चाहते हैं कि 19 जनवरी, 1990 अर्थात कश्मीर घाटी से कश्मीरी पंडितों के बड़े पैमाने पर पलायन के समय केंद्र में किसकी सरकार थी? चूंकि उस समय केंद्र में भारतीय जनता पार्टी के बाहरी समर्थन से विनाथ प्रताप सिंह की सरकार थी, इसलिए इसका दोषी भी भाजपा को बताया जा रहा है। लेकिन यह तर्क देते समय इस सच्चाई को नकारा जा रहा है कि भाजपा के बाहरी समर्थन वाली वीपी सिंह की सरकार तो चंद दिनों पहले ही बनी थी जबकि कश्मीर समस्या की शुरुआत तो उससे कई दशक पहले फारुख अब्दुल्ला के पिता शेख अब्दुल्ला करके गए थे।
शेख अब्दुल्ला के नेतृत्व वाली नेशनल कॉन्फ्रेंस ने तो आजादी से पहले 10 मई, 1946 को ही तत्कालीन डोगरा राजा हरि सिंह एवं कश्मीर की हिंदू जनता के विरुद्ध ‘कश्मीर छोड़ो’ का नारा बुलंद कर कश्मीर में उत्पात मचाना शुरू कर दिया था। आजादी के तुरंत बाद कश्मीर पर हुआ पाकिस्तानी कबायलियों का हमला तो शेख अब्दुल्ला के इसी प्रयास का विस्तार मात्र था। अफसोस तो इस बात का है कि जब शेख को उनके इस उत्पात के कारण महाराजा हरि सिंह ने गिरफ्तार करवा दिया, तो उनका मुकदमा लड़ने जो व्यक्ति दिल्ली से कश्मीर पहुंचा, वही भारत के आजाद होने के बाद देश का पहला प्रधानमंत्री बना यानी पंडित जवाहरलाल नेहरू। शेख अब्दुल्ला का 10 मई, 1946 को बोया बीज था, जो कांग्रेस की अनदेखी या मदद के सहारे करीब साढ़े चार दशक बाद 19 जनवरी, 1990 को कश्मीरी पंडितों के पलायन के साथ विस्फोटक रूप से सामने आया। सब लिखा-पढ़ा इतिहास है। इन घटनाओं के दस्तावेज यानी फाइलें मौजूद हैं।
अभी तक इन दस्तावेज को दबा कर रखा गया था क्योंकि किसी की हिम्मत ही नहीं पड़ती थी ऐसे विषय को छूने की। विषय कश्मीर का हो या गुजरात का। अब तक दर्जनों फिल्में बन चुकी हैं, और किताबें भी लिखी जा चुकी हैं। लेकिन किसी फिल्मकार ने कश्मीरी पंडितों या गुजरात के उन हिंदुओं की व्यथा पर नजर डालने की कोशिश ही नहीं की, जिन्हें ट्रेन के डिब्बे में जलाकर मार दिया गया था। अब एक फिल्मकार ने जब ‘द कश्मीर फाइल्स’ के जरिए कश्मीरी पंडितों का दर्द दिखाने की कोशिश की है, तो उन्हें धमकियां मिल रही हैं। सरकार को उन्हें ‘वाई’ श्रेणी की सुरक्षा देनी पड़ रही है। कश्मीर की सच्चाई सामने लाने वालों या उसे भारत का हिस्सा बताने वालों को नुकसान पहुंचाने की शुरु आत तो आजादी के तुरंत बाद ही हो गई थी।
क्या यह याद दिलाने की जरूरत है कि ‘एक देश में दो निशान, दो प्रधान और दो संविधान नहीं चलेंगे’ का नारा देने वाले जनसंघ के संस्थापक डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी की किन परिस्थितियों में मौत हुई थी? वह बिना परमिट के ही कश्मीर जाने की जिद पर अड़े हुए थे। वहां गए भी। लेकिन जिंदा लौटकर नहीं आ सके। तभी से ‘जहां हुए बलिदान मुखर्जी, वह कश्मीर हमारा है’ का नारा लेकर जनसंघ और भाजपा चलते आ रहे हैं। इसी संकल्प के साथ वर्तमान प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी 1993 में भाजपा के तत्कालीन अध्यक्ष मुरलीमनोहर जोशी के साथ श्रीनगर के लालचौक पर तिरंगा फहराने गए थे। यह वही संकल्प था, जिसे पूरा करने के लिए गृह मंत्री अमित शाह को अनेक चुनौतियों के बावजूद संसद में अनुच्छेद 370 की समाप्ति की घोषणा करने में तीन मिनट भी नहीं लगे।
भाजपा को उम्मीद है कि वह अपने इसी संकल्प के सहारे एक दिन पाक अधिकृत कश्मीर को भी भारत का अभिन्न अंग बनते देख सकेगी। भाजपा के इस दृढ़ संकल्प के बावजूद 1990 के पलायन के लिए कटघरे में खड़ा किया जा रहा है वीपी सिंह को बाहर से समर्थन दे रही भाजपा को। जिस सरकार के गृह मंत्री ही कश्मीर के रहने वाले मुफ्ती मोहम्मद सईद थे, जिनकी बेटी अपहरणकर्ताओं के चंगुल से मुस्कुराते हुए बाहर आते देखी गई थी। शक तो यह पैदा होता है कि केंद्र में वीपी सिंह की कमजोर सरकार बनने के बाद उसे अस्थिर करने के लिए ही कश्मीरी पंडितों के पलायन का खेल रचा गया क्योंकि कांग्रेस जानती थी कि कश्मीर के मुद्दे पर संवेदनशील भाजपा ऐसी घटनाएं देख अपना समर्थन वापस ले लेगी और भाजपा सरकार गिर जाएगी। लेकिन ऐसा हो नहीं सका। केंद्र की गैर-कांग्रेस सरकार को अस्थिर करने की कांग्रेसी साजिश चंद्रशेखर के प्रधानमंत्रित्वकाल में भी देखी जा चुकी है, जब चंद्रशेखर को खुद बाहर से समर्थन दे रही कांग्रेस ने जासूसी का एक बेतुका मुद्दा उठाकर अपना समर्थन वापस ले लिया था, और चंद्रशेखर सरकार गिर भी गई थी।
मसला कश्मीर का हो, या पूर्वोत्तर के राज्यों अथवा बंगाल का, कांग्रेस ने इन सीमावर्ती राज्यों में ऐसी-ऐसी गलतियां की हैं कि जिनका खमियाजा देश को कई पीढ़ियों तक भुगतना पड़ेगा। लेकिन देर से ही सही, इन गलतियों को सामने लाने और समझने की शुरुआत अब हो चुकी है। कश्मीर जैसी न जाने कितनी फाइलें अब खुलेंगी। उनका विश्लेषण होगा। ‘द कश्मीर फाइल्स’ पर आ रही आम जनता की प्रतिक्रिया देखकर यह भी लगने लगा है कि देश की जनता अतीत में हुई गलतियों को जानने की इच्छुक भी है ताकि इन गलतियों से सबक लेकर आगे बढ़ा जा सके।
Date:24-03-22
उच्च शिक्षा के लिए केवल प्रवेश परीक्षा हरिवंश चतुर्वेदी, ( डायरेक्टर, बिमटेक )
जीसी चेयरमैन एम जगदीश कुमार द्वारा 45 केंद्रीय विश्वविद्यालयों की स्नातक कक्षाओं में दाखिले के लिए घोषित किए गए सेंट्रल यूनिवर्सिटी एंट्रेन्स टेस्ट (सीयूईटी) के साथ ही अब अगले सत्र से नई व्यवस्था लागू हो गई है। फिलहाल यह व्यवस्था 45 केंद्रीय विश्वविद्यालयों के लिए ही अनिवार्य की गई है, किंतु निजी, डीम्ड व राज्यों के सरकारी विश्वविद्यालयों को भी इसमें शामिल होने का विकल्प रहेगा।
केंद्रीय विश्वविद्यालयों में दाखिले के लिए यूपीए-2 के कार्यकाल में ही सीयूईटी ऐक्ट वर्ष 2010 में पारित किया गया था, किंतु अब तक यह एक वैकल्पिक व्यवस्था थी। पिछले वर्ष 14 केंद्रीय विश्वविद्यालयों ने सीयूईटी को अपनाया था, जिनमें अपेक्षाकृत नामी-गिरामी विश्वविद्यालय शामिल नहीं थे। यूजीसी के नए फैसले के अनुसार, अब सभी केंद्रीय विश्वविद्यालयों में सत्र 2022-23 के लिए स्नातक कक्षाओं में दाखिले 12वीं की परीक्षाओं के प्राप्तांकों के आधार पर न होकर सीयूईटी के स्कोर के आधार पर होंगे।
केंद्रीय विश्वविद्यालयों में स्नातक स्तर पर दाखिले की पिछले कई दशकों से चली आ रही कट ऑफ वाली व्यवस्था अब खत्म हो जाएगी। अप्रैल, 2022 के पहले हफ्ते में सीयूईटी के लिए आवेदन पत्र भरे जा सकेंगे और जुलाई, 2022 में अनेक बडे़ शहरों में नेशनल टेस्टिग एजेंसी (एनटीए) द्वारा ऑनलाइन माध्यम से यह प्रवेश परीक्षा आयोजित की जाएगी। पिछले साल दिल्ली विश्वविद्यालय के सात मशहूर कॉलेजों की दस स्नातक कक्षाओं के प्रवेश में कट ऑफ 100 प्रतिशत तक पहुंच गया था। इससे पूरे देश में कट ऑफ की समूची व्यवस्था पर सवाल खड़े हो गए थे।
देश में 12वीं की परीक्षाएं सीबीएसई और आईसीटीई सहित 50 से अधिक राज्य माध्यमिक बोर्डों द्वारा संचालित की जाती हैं, जिनके मूल्यांकन पैमानों में एकरूपता नहीं है। यह ठीक है कि नई व्यवस्था में कट ऑफ प्रणाली की विद्रूपताएं रोकी जा सकेंगी, किंतु फिर भी 45 केंद्रीय विश्वविद्यालयों के यूजी दाखिलों में इस नीतिगत बदलाव से देश के करोड़ों परिवारों का अपने बच्चों को अच्छी शिक्षा दिलवाने का सपना अभी पूरा नहीं हो पाएगा।
यूजी स्तर पर अच्छे विश्वविद्यालयों में दाखिलों के लिए देश में मारामारी जैसा माहौल क्यों चला आ रहा है? क्या यूजीसी द्वारा लागू की गई सीयूईटी की नई व्यवस्था इस व्यापक समस्या का हल कर पाएगी? हमारे देश में जो आर्थिक व सामाजिक विविधताएं और विषमताएं पाई जाती हैं, उनको देखते हुए क्या दाखिले की नई व्यवस्था यूजी दाखिले में सबको समान अवसर दे पाएगी? क्या ऑनलाइन तरीके से संचालित एमसीक्यू प्रश्नों वाली परीक्षा समाज के सभी वर्गों को समान सहूलियत या कठिनाई प्रदान करेगी? क्या नीट और जेईई की तरह इस नई व्यवस्था से कोचिंग इंडस्ट्री और अधिक ताकतवर नहीं हो जाएगी? ज्ञातव्य है कि सीयूईटी की घोषणा से पहले ही निजी कंपनियों के कोचिंग पैकेज की बिक्री शुरू है।
हमारे देश में अगर गुणवत्ता, ब्रांड व रोजगारपरकता के आधार पर विश्वविद्यालयों के चुनाव किए जाएं, तो देश के कुल 1,000 से अधिक विश्वविद्यालयों में बमुश्किल 200 ऐसे होंगे, जहां हर परिवार अपने बच्चे को पढ़ाना चाहेगा। इनमें 45 केंद्रीय विश्वविद्यालय, 50 राज्य सरकारों के विश्वविद्यालय और शेष निजी विश्वविद्यालय शामिल हैं। नैक के गुणवत्ता पैमानों पर भी 20 से 25 प्रतिशत विश्वविद्यालय ही खरे उतरेंगे। दिल्ली विश्वविद्यालय, जेएनयू, जामिया, बीएचयू, एएमयू जैसे केंद्रीय विश्वविद्यालयों के दाखिलों के लिए मारामारी इसलिए होती है, क्योंकि वहां शिक्षा का स्तर श्रेष्ठ है, फीस कम है और इन जगहों पर यूजी की पढ़ाई करने से युवाओं को करियर बनाने में आसानी रहती है।
केंद्रीय विश्वविद्यालय, केंद्र सरकार द्वारा पोषित होने के कारण फीस बहुत कम रखते हैं, किंतु निजी नामचीन संस्थानों में कोर्स की फीस 15 लाख रुपये से 35 लाख रुपये तक पहुंच जाती है। स्पष्ट है, हर मध्यवर्गीय और गरीब परिवारों के लिए इसे वहन कर पाना कठिन होता है। 45 केंद्रीय विश्वविद्यालयों में विद्यार्थियों की कुल संख्या 2019-20 में 7.2 लाख थी, जो देश के कुल विद्यार्थियों का सिर्फ 2.4 प्रतिशत थी। इन 7.2 लाख विद्यार्थियों में यूजी स्तर पर मात्र 5.40 लाख विद्यार्थी पंजीकृत थे। जाहिर है, सीयूईटी यद्यपि एक स्वागतयोग्य कदम है, लेकिन यह गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा के अभाव का कोई प्रभावी निराकरण नहीं कर पाएगा। ज्ञातव्य है कि सीईयूटी की ऑनलाइन परीक्षा का संचालन एनटीए जुलाई, 2022 में करेगी। अच्छी बात है कि परीक्षार्थियों के पास 13 भाषाओं में से किसी भी भाषा में ऑनलाइन टेस्ट देने का विकल्प रहेगा। यूजीसी चेयरमैन एम जगदीश कुमार के अनुसार, सीईयूटी तीन घंटे की ऑनलाइन परीक्षा होगी, जिसमें हर सवाल के साथ दिए गए वैकल्पिक उत्तरों में से एक सही उत्तर पर परीक्षार्थियों को टिक करना होगा। देश की संकटग्रस्त उच्च शिक्षा प्रणाली को ढर्रे पर लाने के लिए सीयूईटी एक सराहनीय कदम है। इससे यूजी प्रवेश में बोर्ड परीक्षाओं के असंतुलित परीक्षा फलों पर निर्भरता खत्म होगी।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति में कहा गया था कि ऐसी परीक्षा तभी कारगर होगी, जब वह विद्यार्थियों को ज्ञान आत्मसात करना और जीवन में उसे उपयोग करना सीखा सके। ऐसी परीक्षा को ट्यूशन लेने या कोचिंग इंस्टीट्यूट में पढ़ने की कुप्रथा को भी खत्म करना होगा। क्या हम नेशनल टेस्टिंग एजेंसी यह यह उम्मीद करें कि वह इन बातों को ध्यान में रखेगी? क्या हम 12 वर्षों के स्कूली अनुभव को प्रवेश परीक्षा में पूरी तरह से नकार सकते हैं? किसी भी परीक्षार्थी की प्रतिभा को सिर्फ एमसीक्यू, रीजनिंग एबिलिटी टेस्ट या ऑनलाइन परीक्षा से ही नहीं जाना जा सकता है।
उच्च शिक्षा में व्यापक सुधारों की जरूरत है, जिनकी तरफ डॉक्टर कस्तूरीरंगन कमेटी ने इशारा किया था। सीयूईटी इस दिशा में एक प्रभावी कदम तभी होगा, जब हम इसे बड़े, दूरगामी और ढांचागत सुधारों की पहली कड़ी के रूप में देखें। भारत में उच्च शिक्षा के व्यापक विस्तार और उसमें भारी विनियोग की जरूरत है, जिसमें कोई भी देरी घातक होगी।
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अप्रैल-जून, 2021 की तिमाही में बेरोजगारी दर बढ़कर 12.6% हो गई।
सरकार के आवधिक रोजगार सर्वेक्षण के पांचवे दौर में पाया गया कि श्रम बल की भागीदारी अप्रैल-जून 2021 में क्रमिक रूप से घटकर 46.8% हो गई।
कोरोना की मार से आबादी का बड़ा हिस्सा आय के नुकसान को झेल रहा है।
इसका प्रभाव मांग में कमी के रूप में दिखाई दे रहा है।
इस समय निवेश आधारित विकास पर भरोसा किया जा सकता है। लेकिन सरकार बेहतर कल्याण योजनाओं के वितरण पर भरोसा कर रही है। यह विभिन्न योजनाओं के माध्यम से स्थानीय विनिर्माण को बढ़ाने की कोशिश कर रही है।
इसमें निजीकरण का प्रयास भी शामिल है, जो अधिशेष श्रम को खपाने की क्षमता नहीं रखता है।
अर्थव्यवस्था में इन संरचनात्मक परिवर्तनों को महामारी ने और बढ़ा दिया है। कल्याणकारी योजनाएं नौकरियों और रोजगार सृजन का विकल्प नहीं बन सकती हैं। कल्याण में वृद्धि, श्रम बल की भागीदारी में गिरावट के साथ तालमेल नहीं रख सकती। बेरोजगारी के साथ होने वाला विकास धारणीय नहीं हो सकता।
‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 17 मार्च, 2022
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Date:17-03-22
Buy Russian Oil Europe is buying Russian energy. India should too, and think deeper on strategic trade autonomy TOI Editorials
Reports that India is close to clinching a deal with Russia for buying 3. 5 million barrels of its crude at deep discounts appear to have divided opinions in the West. But crucially, the US has indicated that should India go ahead with the purchase, it may not violate American sanctions already in place against Russia. After all, despite the war in Ukraine, European nations are continuing to buy energy from Russia.
The European dependence on Russian energy is also why the US did not go for a complete ban on Russian oil exports and chose instead to just bar Russian energy imports into the US. In fact, the EU recently discussed new sanctions against Russian oil majors Rosneft, Transneft and Gazprom Neft but clarified that it will continue to buy oil from them. Hence, nobody has moral grounds to question India in case it goes ahead with the Russian oil deal. Besides, 3. 5 million barrels don’t constitute a big volume for India given its daily consumption of 4. 5 million barrels. In any case, Russian oil only accounts for 2% of total Indian imports. Therefore, the transaction is more symbolic in nature and will serve as a test case for New Delhi-Moscow trade in the new environment.
Of particular interest is the payment mechanism for the transaction with a rupee-rouble arrangement reportedly under consideration. Since most of the Russian banking system is under sanction, payment would also have to be routed through Indian banks that don’t have any business in Western nations. Actually, sanctions on Russia have once again provided impetus to calls for reviewing the dollar as a reserve currency and the primary currency of global trade. According to reports, Saudi Arabia is already in active talks with China to price some of its oil sales to the latter in yuan. True, Riyadh’s motives here are driven by its irritation with Washington over progress in talks to revive the Iran nuclear deal. Riyadh recently rebuffed Washington’s attempts to persuade it to produce more oil in the wake of the American ban on Russian imports.
Thus, the current state of geopolitical play should compel India to look at internationalising the rupee to firewall future strategic trade from Western sanctions. Both Trump – with Iran sanctions – and Biden administrations have now forced India to rejig its trading patterns. And while Russia has not made things easy with its unjustifiable Ukraine invasion, India shouldn’t be compromising its strategic autonomy in trade. The latter isn’t a matter of how India should view the Ukraine war. It is a geoeconomic strategy commensurate with India’s position in the global order today.
Date:17-03-22
Have Faith, Be Liberal SC must note what HC didn’t on hijab: Secular doesn’t mean no religion in public sphere Arghya Sengupta is Research Director, Vidhi Centre for Legal Policy. Raag Yadava teaches at NLSIU, Bangalore.
The Constitution of India is a secular document. It does not declare a state religion, provides everyone the freedom to profess, practise and propagate their religion and prevents the state from discriminating on religious grounds. Yet, the pages of the original Constitution now encased in Parliament which contains these secular precepts are adorned with beautiful artwork featuring Ram, Lakshman, Sita, Krishn, Mahavir, Gautam Buddha, Guru Gobind Singh, Akbar amongst a host of Indian cultural, religious and historical icons. It is at once a celebration of India’s history, its religiosity, its achievements over time.
Nandalal Bose of Shantiniketan found no contradiction in embellishing a secular document with artwork that included religious figures. Rabindranath, the founder of Visva Bharati where Nandalal honed his craft, himself had compared India to a pot of holy water “purified by the touch of a myriad religions and races”.
Religion has never been a purely private matter in India. Religious imagery is commonplace, religious rituals commonly performed publicly, for many, religious beliefs are the cornerstone of the nation itself. So, when it came to the Constitution, it was natural that religious figures were not unnaturally excluded from its illustrations.
The text of the Constitution too echoed this understanding of religion. Article 25 of the Constitution allows everyone the freedom to not only profess and practise but also propagate their religion. Propagation necessarily is a public activity.
In fact, the word was specifically included so that several religious faiths including the Arya Samajis could preach their religious beliefs openly. This right to propagate was never considered a threat to the nation but rather as TT Krishnamachari said in the Constituent Assembly, “(a matter of) giving the right to every religionist, if he felt that it is a thing that he had to do … (as his) duty towards his God and his community”.
The Karnataka high court in upholding the order of the Karnataka government to prevent the wearing of the hijab in classrooms has entirely misunderstood the nature of Indian secularism. The legal question is neither about whether wearing the hijab is an essential religious practice in Islam, nor about whether governments can prescribe uniforms for students.
The question is on what grounds can governments restrict persons from exercising their free choice to wear the clothes they want, whatever be their reasons for wanting to wear them. The Constitution is clear – these grounds have to be limited to public order, morality, health or any other fundamental right in the Constitution. When it comes to the hijab, which is a purely self-regarding activity, no case can be made out that the requirement of a uniform flows from any of these grounds. The court’s order is unsurprisingly muted on this issue.
Instead, the justificatory heavy lifting is done by the court’s implicit insistence that secularism and privatisation of religious expression are one and the same thing. This is a cardinal error. Secularism means that the state should not impose any religious authority on our lives. But to say that political power must not align with any particular religious belief is not to say that the public sphere itself cannot be deeply religious.
If the Indian public sphere is to retain its Indianness, it must protect this sphere from the artifice of a coerced sameness. What it means to be Indian is to feel secure and comfortable in our own skin, not only in our own homes, but also when we step out, without having educators and judges dictate how we express ourselves.
The young hijab-clad women are not imposing themselves on anyone, but being imposed upon in the name of an unfortunate and foreign understanding of secularism designed to create sterile and lifeless public spaces shorn of vitality, individuality and life itself. Today it’s the hijab, tomorrow it may be the burqa, but a day will come if the Constitution is read in this misguided fashion that it will be the mangal sutra, the angavastram or the vibhuti that is prohibited from the public sphere.
The court forgets that India’s civilisational strength has been its unique jugalbandi of religious expression and liberalism. Our country has birthed and housed a dizzying diversity of religious faiths, mingling with each other largely in an environment of security and trust. This, and not a “keep it at home” brand of secularism, is what we need. Like Abkar, and Chandragupta before him, we must celebrate our religious diversity, not make it invisible.
It is especially schools and colleges as intimate spaces where different communities live and learn together that should foster diversity. Our differences do not lead to “social separateness” as HC fears. On the contrary, a public sphere anaesthetised of all religions, which tells students that a core part of their identity is not welcome in the college, does precisely that.
It is this attitude, which the judgment unwittingly endorses, that sows distrust and hardens religious differences. If India is to realise a semblance of fraternity in the next generation, its youth must experience what difference looks and feels like in close quarters, sitting on the bench next to them in class.
When the Supreme Court hears this case, we hope they remember that a secure and confident nation with a secular Constitution does not need to be afraid of religion, but embrace it. India is and can be religiously secular.
Date:17-03-22
Jobless Growth Is Unsustainable Welfare is no substitute for job creation ET Editorials
The second wave of the coronavirus pandemic had a less intense effect on joblessness than the first. Yet, the urban unemployment rate climbed to 12. 6% in April-June 2021 on account of localised lockdowns from 9. 3% in the prior three months. The number for the same quarter a year before was a staggering 20. 8%, as a nationwide lockdown led to mass layoffs and a reverse migration of the urban workforce. The 11th round of the government’s periodic employment survey finds the labour force participation rate declined sequentially to 46. 8% in April-June 2021 from 47. 5% in the previous quarter, and it was not much of an improvement over the 45. 9% during the first three months of the Covid outbreak in 2020.
The narrative of a resurgent Indian economy falters over these numbers. A big chunk of the population pays an inordinately high price through loss of income as a fragile recovery sets in. These vulnerabilities are showing up in high-frequency indicators as a decline in demand, particularly for items of mass consumption. A public investment-led growth push must work its way to ailing consumption at the bottom of the pyramid through jobs. This segment of the workforce has been through two years of income insecurity. They now face the prospects of inflation with no immediately significant improvements in their employment prospects.
The government is relying on improved welfare delivery to address this vulnerability, as it tries to ramp up local manufacturing through various schemes. It is also on a declared course of privatisation that reduces the capacity to absorb surplus labour. These structural changes in the economy have been exacerbated by the pandemic as the onus of job creation moves from the visible hand of the state to the invisible one of the market. Welfare, even with vastly improved targeting, cannot be a substitute for jobs and job creation, and increasing welfare does not sit well with declining labour force participation. Growth has to — to use an unfashionable term — trickle down. Jobless growth is unsustainable.
Date:17-03-22
Swadhin By Another NAM With the West having weaponised globalisation, India must insure its economy by aatmanirbharta Sanjay Baru, [ The writer is co-editor, A New Cold War: Henry Kissinger and the Rise of China ]
If there is one policy idea that Narendra Modi will be remembered for in years to come, it will be his reinterpretation of the old idea of self-reliance in the emerging global context as aatmanirbharta. In the wake of Russia’s invasion of Ukraine, the US has responded with widespread economic sanctions that may not just cripple the Russian economy, but may well also inflict collateral damage on the global economy as a whole.
Modi’s Aatmanirbhar Bharat Abhiyaan (ABA) was initially a response to Chinese aggression along the Line of Actual Control (LoAC) and a growing feeling in India that the economy’s dependence on imports from China, contributing to a huge trade deficit, should be reduced. This concern became acute when India found itself in dire need of Covid-related equipment and medicines in the middle of a pandemic and a border clash.
Even as India sought to reduce its economic dependence on China, trade policy actions by Donald Trump drew attention to the continued western pressure on India and other developing economies to widen the trade policy agenda to suit US interests. On top of these developments came the realisation that India was still dependent on Russia for critical defence equipment. The emerging relationship between Russia and China, on the one hand, and Russia and the US, on the other, made New Delhi prioritise ‘Make in India’ in defence manufacturing.
From pharmaceuticals to electronics hardware, telecom to internet-based services, semiconductors to missiles, India found itself dependent on other countries for vital technologies. It was in this context that the scope of ABA widened. Indeed, every time India has been subject to external economic pressures, constraints or sanctions, the country’s political leadership, from Jawaharlal Nehru to Modi, has had no option but to emphasise the importance of self-reliance.
Nucleared & NAMed
Making a statement to Parliament after the nuclear tests of May 1998, when all the three members of what is now the Quad — the US, Japan and Australia — imposed economic sanctions against India, Atal Bihari Vajpayee said, ‘In 1947, when India emerged as a free country to take its rightful place in the comity of nations, the nuclear age had already dawned. Our leaders then took the crucial decision to opt for selfreliance, and freedom of thought and action. We rejected the Cold War paradigm and chose the more difficult path of non-alignment. ’
India opted to stay out of the Regional Comprehensive Economic Partnership (RCEP) agreement as part of the strategy of aatmanirbharta in response to the dependence on China. I was then a critic of GoI’s decision, imagining that it had exaggerated the nature of the problem. Compared to the kind of dependence on China that India has tried to reduce, or the defence-related dependence on Russia, the dependence on the US-led global economic system is vastly more. India will now have to deal with both the direct and indirect consequences of what can best be described as the weaponisation of globalisation by the world’s biggest economy.
Observer Research Foundation (ORF) President Samir Saran recently drew attention to the kind of challenges India faces, as a consequence of the weaponisation of globalisation by the Big Powers, ‘Innocuous supply chain components for electronics, minor supplements for medicines, components for vaccine packaging, energy and gas grids, SWIFT [Society for Worldwide Interbank Financial Telecommunication] system and currency, and minerals and sundry materials have all been used for political coercion, waging war, or undermining other’s interests. ’
It was such fear of external dependence and arm-twisting by the Big Powers that shaped the thinking of nationalist leaders in the early post-Independence years. It took almost half-acentury for India’s political leadership to acquire the courage to open up the economy in the hope that mutual economic interdependence would benefit the country. In the euphoria of rising growth due to the economy’s global reintegration, Nandan Nilekani and Thomas Friedman even declared that ‘the world is flat’. Joe Biden has reminded us that the world is certainly not.
Aatmanirbhar Deterrence
The US and the EU have demonstrated their capacity to bring the global economy to its knees. Russia may have challenged the West by invading a neighbouring country. But the West has challenged the global economy by weaponising global trade flows, financial flows, energy flows, information and culture flows. In responding to an attack by Russia, the US has issued a missive to the world, including the EU, Japan, China and India.
The pressure is now on India to choose sides. There are costs attached both to choosing a side and to not choosing sides. Whatever decision the political leadership takes with respect to foreign policy, it has no option but to speed up ABA, not just in defence manufacturing but across the board. The medium-term consequences for economic policy at home could be far-reaching as India seeks to insure its economy against the fallout of the ongoing East-West conflict.
Date:17-03-22
Essentially flawed Karnataka HC ruling on hijab fails to recognise the need for reasonable accommodation Editorial
The Karnataka High Court verdict upholding the ban on the wearing of head scarves by students in educational institutions is wrong on many levels. The manner in which it framed the questions arising from the controversy over Muslim girl students wearing the hijab undermines constitutional principles. The court failed to examine whether the wearing of the hijab, in addition to the prescribed uniform, but without any variation in colour, was a ground to refuse entry into a school or college. The Bench examined verses from the Koran to disagree with the students’ claim that wearing the hijab was an essential practice in Islam and that, therefore, it was entitled to constitutional protection as part of religious freedom under Article 25. But is that the real issue? The court rejected the argument in favour of ‘reasonable accommodation’, by which a pluralist society may allow the classroom to reflect social diversity without undermining the sense of equality among students. Apparel norms may be needed in “qualified public spaces” such as schools. But there is no reason to not accommodate the choice of an additional piece of clothing that does not interfere with the prescribed uniform.
In rejecting the argument based on ‘freedom of conscience’, the court cited the absence of elaboration in the pleadings. The judgment’s emphasis on the uniform as an inviolable symbol of equality and homogeneity seems to have overwhelmed any contention in favour of any sort of accommodation. Another question to raise is whether it was at all necessary to invoke the ‘essential practice’ test in this case. If something is egregiously religious, it is more likely to be kept out of the campus, if uniformity and eliminating any ‘sense of separateness’ are the hallowed goals. The matter could have been disposed of without entering the theological domain. The ‘essential religious practice’ test itself is a pointless exercise, as the Supreme Court has established a nearly unattainable standard to determine it. Something is an essential practice only if its absence or removal has the effect of destroying the religion itself. Save for a few fundamentals, no religious practice will actually survive such scrutiny. It would be far better if a claim for Article 25 protection is tested against constitutional values such as equality, dignity and privacy, subject, of course, to health and public order. In any case, the ‘essentiality’ test should be jettisoned forever if only because it theoretically allows some defining theological concepts to override all else. What is abhorrent to constitutional principles will remain so irrespective of what is considered essential to a religion. Freedom of religion is important because freedoms are important, and not because religions are important.
Date:17-03-22
Treating values of individual freedom as trifles The hijab judgment has struck a blow against each of these principles — liberty, equality, and fraternity Suhrith Parthasarathy is an advocate practising in the Madras High Court
Our social contract is built on an edifice that grants pre-eminence to individual choice. The Constitution’s Preamble recognises this when it places an onus on the state to secure to all citizens, among other things, liberty, equality and fraternity. The last of those values is fortified by a further commitment. The state, the Preamble says, will guarantee “fraternity assuring the dignity of the individual and the unity and integrity of the Nation”.
The chief architect of the Constitution, B.R. Ambedkar, saw the standards contained in these words as forming a triumvirate of values. Liberty, equality, and fraternity, he said, were principles of life, “a union of trinity”. Divorce one from the other and the very purpose of democracy will be defeated. The Constituent Assembly believed that it was only a deep commitment to these principles that can help usher in a social revolution in the country. The structures of India’s democracy — the various minutiae of administration that the Constitution spells out — were each built on the idea that securing individual happiness required the state to foreground these standards.
Enforcing popular morality
In that picture, independent courts, the framers thought, would stand as a guardrail against any effort to undermine social democracy. But far from acting as “sentinels on the qui vive” — as a former Chief Justice of India once described the Supreme Court of India’s role — the judiciary has time and again enforced the popular morality of the day, treating values of individual freedom as dispensable trifles. Tuesday’s judgment by the Karnataka High Court, in Resham vs State of Karnataka, is the newest addition to this litany. It upholds a ban imposed on the use of hijabs by students in classrooms across the State (Karnataka), and, in doing so, strikes a blow against each of the principles contained in B.R. Ambedkar’s union of trinity.
Court’s use of precedent
The judgment is premised on three broad conclusions. First, the court holds that the wearing of a hijab is not essential to the practice of Islam, and, therefore, the petitioners’ right to freedom of religion is not impinged; second, it finds that there is no substantive right to free expression and privacy that can be claimed within the confines of a classroom; and, third, according to it, since the Government’s order does not by itself ban the use of a hijab and since it is otherwise neutral, there is no discrimination aimed at Muslim women students.
These conclusions suffer from one flaw or another. In rejecting the plea that the wearing of a hijab is a legitimate exercise of religious freedom, the court refers to a plethora of precedent that points to only “essential religious practices” enjoying constitutional protection. According to the court, the petitioners failed to produce any evidence to show that the use of a hijab was essential to Islam. Yet, despite this, it proceeds to perform a theological study — which one would think it is ill-equipped to do, especially without conducting a full-fledged trial — and concludes that Islam does not make the wearing of a hijab mandatory.
This is an extraordinary finding for a secular court to make. No doubt, similar leaps of judgment have been made by the judiciary in the past — for example, in 2004, the Supreme Court concluded that the performance of the Tandava dance was not indispensable to the Ananda Margis faith, even though the followers of that religion believed it to be so. But if the Karnataka High Court’s inference is partly based on flawed doctrine, it must take the blame for posing to itself the question of whether at all a hijab was essential to religion.
Free choice and state action
Unlike many of the cases in which the doctrine of essential practice is invoked, this was not a case where individual freedom was at odds with group rights. On the contrary, this was a case where exercise of free choice was curtailed by state action. The petitioners had contended that they wore the hijab as a matter of conscience. Article 25 of the Constitution guarantees to all persons not only an equal right to profess, practise and propagate religion but also a “freedom of conscience.” Counsel pointed to the Supreme Court’s judgment in Bijoe Emmanuel (1986), where the rights of Jehovah’s Witnesses who refused to partake in the singing of the national anthem was protected. There, the Court ruled that so long as students conscientiously believed that they must not participate in the recital, their rights could be abridged only in the interests of public order, morality or health.
In Resham, the Karnataka High Court draws a facile distinction from Bijoe Emmanuel. The judgment holds that there is no evidence in this case that the petitioners conscientiously believed in the necessity of the hijab — this is anomalous given that once a pleading is made on affidavit, the onus ought to have been on the state to establish that the petitioners were not, in fact, wearing the hijab out of a sense of conscience.
The court then proceeds to make an even more astonishing assertion: all cases where a right of conscience is pleaded, according to it, are ipso facto cases of religious freedom, and, therefore, ought to be subject to the test of essentiality. This conclusion ignores the fact that Bijoe Emmanuel was explicitly decided based on conscience and that conscience need have no direct relation to religious faith. It is possible, for example, that the hijab might not be essential to Islam, and yet that Muslim women choose to wear it as an exercise of their own individual beliefs.
On the classroom space
That the court was simply unprepared to grapple with this difference is even more evident in its rejection of claims based on free expression. The petitioners argued that in choosing to wear the hijab, they were merely exercising a form of identity relatable to their rights to freedom of speech and privacy. The court counters this by holding that classrooms are “qualified public spaces”, where individual rights cannot be asserted to “the detriment” of “general discipline and decorum”. In spaces such as these — and the court draws a remarkable analogy with prisons — substantive rights, the judgment holds, metamorphose into derivative rights. It is unclear what the ruling means by all this, except that these apparently derivative rights are incapable of being invoked in protected environments.
In all of this, the court ignores the classic test for determining when and how the right to free expression can be legitimately limited: that is, the test of proportionality. There is, according to the judgment, no need to dwell on legal doctrine, because “the petitions we are treating do not involve the right to freedom of speech & expression or right to privacy, to such an extent as to warrant the employment of these tests for evaluation of argued restrictions, in the form of school dress code”. In this manner, the court also brushes aside requests for “reasonable accommodation”.
Many accommodations
Kendriya Vidyalayas, for example, as the petitioners claimed, allow for hijabs within the contours of the prescribed uniforms. But the judgment holds that to make such an accommodation would defeat the very purpose of uniforms. This finding fails to recognise that even within the existing dress code, many accommodations are, in fact, made. For instance, religious and cultural marks on the forehead and accessories on other parts of the body are not disallowed. If the purpose of the uniform is to allow for no differences, surely every exhibition of faith in the classroom must be stamped out. Therefore, we can only see the failure to provide for a reasonable accommodation for the hijab as deliberate discrimination wrought on Muslim women.
The judgment makes repeated references to constitutional secularism. But secularism, properly understood, demands precisely what the petitioners here were pleading for: the rights to agency, choice, and equal treatment, and, more than anything else, a guarantee of fraternity undergirded, as the Preamble says, with dignity to every individual.
Date:17-03-22
एआई में बुद्धि तो बहुत है किंतु हम जैसी चेतना नहीं राजीव मल्होत्रा, ( लेखक और विचारक )
एआई यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को एक चेतन जीव की भांति दर्शाने वाली विज्ञान की काल्पनिक कथाओं ने एआई से सम्बंधित लोकप्रिय भ्रांतियों को हवा दी है। उसने आने वाली एआई क्रांति को महत्वहीन बनाकर हानिकारक काम किया है। ऊटपटांग आख्यानों ने मशीनों की चेतना से जुड़ी सजीव अटकलों और बहस को जन्म दिया है। लोग प्रायः बुद्धिमत्ता और चैतन्यता के बीच में भ्रमित हो जाते हैं। वहीं बुद्धिमत्ता कई रूपों में विद्यमान है और वह चेतन या अचेतन दोनों ही रूपों में हो सकती है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और आर्टिफिशियल कॉन्शियसनेस (कृत्रिम चेतना) अत्यंत भिन्न हैं। एक बुद्धिमत्तापूर्ण प्रणाली अचेतन भी हो सकती है। वहीं चेतन प्रणाली भी बिना बुद्धि के हो सकती है।
जब एक ट्रक चालक की नौकरी किसी बिना चालक वाले वाहन को मिल जाएगी, तब इस बात का कोई महत्व नहीं रहेगा कि उस वाहन में चेतना है या नहीं। महत्व तो मात्र इस तथ्य का है कि मशीनें मनुष्यों की नौकरियां छीन सकती हैं, क्योंकि मशीनें उस काम को मनुष्यों से बेहतर और कम खर्च में ही पूर्ण कर सकती हैं। हम जानते हैं कि घोड़ों में चेतना होती है जबकि वाहनों में नहीं होती है किंतु इस अंतर ने वाहनों को उनसे अच्छा कार्य करने से नहीं रोका। बिना चालक की कार और ट्रक के आने से वर्तमान मोटरगाड़ियां और इनके उद्योग भी अप्रचलित हो जाएंगे। इसी तरह कम्प्यूटर एक्स-रे का विश्लेषण कर सकते हैं। अन्य चिकित्सकीय निदान भी निपुणता से करने में सक्षम हैं। ऐसे में इसका स्वास्थ्य सेवा से कोई लेना-देना नहीं कि मशीनें सचेत हैं या नहीं।
वे व्यक्ति जो किसी संवाद के समय भागीदार होते हैं, उन्हें व्याकरण में पुरुष कहा जाता है। उत्तम पुरुष वाले वाक्यों में व्यक्ति अपने बारे में कुछ चर्चा करता है और अहम् भाव को प्रकट करता है। इस ‘मैं’ को अनुभव करने की क्षमता को चेतना कहते हैं। मध्यम पुरुष वाले वाक्य वे होते हैं जो किसी श्रोता या हमारी बात सुनने वाले को सम्बोधित करते हैं। वे पारस्परिक होते हैं और सामने उपस्थित व्यक्तिओं को सम्बोधित करते हैं। अन्य पुरुष वाले वाक्य वे होते हैं जो किसी ऐसे वस्तु या व्यक्ति की ओर संकेत करते हैं, जो दो लोगों की आपसी चर्चा का विषय है। ये ‘वह’ या ‘वे’ जैसे सर्वनामों का उपयोग करते हैं। जिसकी चर्चा हो रही है, वह विषय कोई व्यक्ति, अचेतन वस्तु या कोई निराकार विचार भी हो सकता है।
एक ऐसी सत्ता जिसमें मध्यम पुरुष और अन्य पुरुष को जानने की क्षमता तो है, परंतु जिसे उत्तम पुरुष यानी स्वयं का बोध नहीं है, उसे फिलोसोफिकल ज़ोम्बी या पी-ज़ोम्बी कहा जाता है। एक व्यक्ति के रूप में हम जानते हैं कि हम पी-ज़ोम्बी नहीं हैं, लेकिन हमारे पास यह सुनिश्चित करने का कोई मार्ग नहीं है कि कोई अन्य व्यक्ति पी-ज़ोम्बी है या नहीं। मनुष्यों के पास किसी अन्य व्यक्ति के आंतरिक अस्तित्व में झांकने का कोई रास्ता नहीं है। हम यह निश्चित रूप से तय नहीं कर सकते कि कोई अन्य व्यक्ति वास्तव में चेतन है या फिर केवल चेतन होने का दिखावा करने वाला रोबोट है। पी-ज़ोम्बीज और सामान्य मनुष्यों में फर्क कर पाना संभव नहीं है। यदि किसी पी-ज़ोम्बी पर प्रहार किया जाए तो उसे किसी भी प्रकार के दुःख का अनुभव नहीं होगा, किन्तु वह बाह्य रूप से ऐसा स्वांग करेगा जैसे कि उसको पीड़ा हुई है। शुद्ध व्यावहारिक दृष्टि से देखें तो किसी व्यक्ति या वस्तु की उत्तम पुरुष की दृष्टि से कार्य कर पाने की क्षमता या अक्षमता अन्य लोगों के लिए कोई महत्व नहीं रखती। मानव बुद्धि आंशिक रूप से सचेत और जड़ मानी जा सकती है। शरीर में सदैव चलने वाली बहुत-सी शारीरिक क्रियाओं का भान नहीं होता है, यद्यपि ये क्रियाएं अत्यधिक जटिल और बुद्धिमत्तापूर्ण हैं। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि ये प्रक्रियाएं स्वयं भी आत्म-जागरूक नहीं हैं। इसी तरह, हम अपने मस्तिष्क के भी बड़े हिस्से से अनजान हैं, जहां बुद्धिमत्ता से जुड़ी प्रक्रियाएं बिना आत्म-चेतना के हर समय चलती रहती हैं। हमारा शरीर भी मशीन-लर्निंग के ही समान अपने अनुभवों और उन पर आधारित आंकलनों से सीखता है।
Date:17-03-22
जातिवाद और परिवारवाद की बीमारी प्रदीप सिंह, ( लेखक राजनीतिक विश्लेषक एवं वरिष्ठ स्तंभकार हैं )
नेहरू युग की पंरपरा पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने फिर सीधा हमला बोला। उन्होंने कहा कि वंशवाद और परिवारवाद जातिवाद को बढ़ावा देता है और जनतंत्र को कमजोर करता है। यह हमला उन्होंने अपनी पार्टी पर भी बोला। साफ है कि वह पार्टी को नए विमर्श के लिए तैयार कर रहे हैं और साथ ही लोकसभा चुनाव में इसे बड़ा मुद्दा बनाने के लिए धार भी दे रहे हैं। भाजपा संसदीय दल की बैठक में उन्होंने कहा कि सांसदों के बेटे-बेटियों को टिकट न देने का फैसला मेरा था। उसका दोषी मैं हूं। अगर यह पाप है तो यह पाप मैंने किया है।
यह देश की राजनाति में नए युग का सूत्रपात है। अन्य किसी पार्टी के नेता में इतनी राजनीतिक इच्छाशक्ति नहीं दिखती कि वह ऐसा निर्णय ले सके और उसे लागू करा सके। मोदी इसका अपवाद हैं, क्योंकि वह पर उपदेश कुशल बहुतेरे वाले नहीं हैं। वह पहले आचरण करते हैं, फिर नियम बनाते हैं।
भारत में इस समय जनतातंत्रिक वंशवाद हावी है। राष्ट्रीय राजनीतिक दलों में भाजपा और क्षेत्रीय दलों में जनता दल यूनाइटेड एवं आम आदमी पार्टी इसका अपवाद हैं, पर शायद जल्द ही जदयू अकेला रह जाए। भारत में वंशवाद का बीज देश के पहले प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू ने बोया। यह बीज अब वटवृक्ष बन गया है। सभी क्षेत्रीय दलों ने इसे आदर्श व्यवस्था मानकर अपना लिया है। तर्क एक ही है कि जब नेहरू जैसा जनतंत्र का इतना बड़ा समर्थक इसे सही मानता था तो यह भला जनतंत्र के विरोध में कैसे हो सकता है? क्षेत्रीय दलों में यह बीमारी तीसरे चरण में आई। पहले समाजवाद और दूसरी विचारधाराओं के आधार पर दल बने। फिर जब विचारधारा अनुपयोगी लगने लगी और सत्ता की राह में बाधक नजर आने लगी तो जाति के आधार पर पार्टियों का गठन हुआ। इसके बाद वे वंशवाद के हाईवे पर चल पड़ीं।
विडंबना यह है कि एक समय गैर कांग्रेसवाद की राजनीति का मुख्य आधार कांग्रेस का वंशवाद और भ्रष्टाचार विरोधी अभियान था, लेकिन उससे लडऩे वाले दल धीरे-धीरे उसी के जैसे बन गए। शायद उन्होंने यह मान लिया कि यह तो बड़ी अच्छी व्यवस्था है। कबीर का दोहा है- बूड़ा वंश कबीर का उपजा पूत कमाल। अर्थ यह कि उनका पुत्र उनके रास्ते से अलग चलने लगा। उनकी संत परंपरा को आगे बढ़ाने में उसकी रुचि नहीं थी। लगता है कि नेता पुत्रों ने कबीर के इस दोहे से सबक लिया और तय किया कि वे अपने पिता के रास्ते पर ही चलेंगे। इसलिए किसी नेता का वंश नहीं डूबा। पुत्र हो पुत्री या परिवार का कोई अन्य सदस्य, जन्म के साथ ही उसका पद तय होने लगा। कुछ पद शादी से भी तय हुए। पुराने जमाने में राज परिवारों में शंका रही होगी, पर जनतात्रिक वंशवाद में किसी नेता को कोई शंका नहीं है। वे होश में आते ही मान लेंते हैं कि वे राज करने के लिए ही इस भारत भूमि पर अवतरित हुए हैं। देश के प्रथम राजनीतिक परिवार होने का मुगालता पालने वालों को ही देखिए। सोनिया गांधी ने उम्मीद का दामन छोड़ा नहीं है। उन्हें अब भी विश्वास है कि जल्दी ही वह दिन आएगा, जब देश में उनके बच्चों का राज होगा। इसके इतर मानने का उनके पास कोई कारण नहीं है, बल्कि यह कहना ज्यादा सही होगा कि उनके पास और कोई विकल्प नहीं है। उन्हें पूरा यकीन है कि इस देश पर राज करने का इस परिवार का जन्म सिद्ध अधिकार है।
मौजूदा लोकसभा में 162 सदस्य ऐसे हैं, जो किसी न किसी परिवार से हैं। यह बीमारी समय के साथ कम होने की बजाय बढ़ती जा रही है। इस समस्या का एक कारण अपने समाज की व्यवस्था भी है, जिसमें यह स्वीकृत धारणा है कि पिता के व्यवसाय में बच्चे जाएं तो इसमें कोई असामान्य बात नहीं। नेताओं की संतानों के चुनाव जीतने में इस सोच का भी योगदान होता है, पर किसी को तो इस सोच को बदलने का बीड़ा उठाना था। जो इस व्यवस्था से फल फूल रहे हैं, उनसे तो ऐसी उम्मीद की नहीं जा सकती। भाजपा कोई नई-नई बनी पार्टी नहीं है। हालांकि वह वंशवाद की बामारी से बची हुई है। इसीलिए इसे सही मायने में कार्यकर्ताओं की पार्टी कहना गलत नहीं होगा। देश में यह एकमात्र पार्टी है, जिसका साधारण कार्यकर्ता एक दिन पार्टी अध्यक्ष, मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री बन सकता है और बना है, पर परिवारवाद का वायरस तो भाजपा में भी आ ही गया है। प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी वैसे तो इस मुद्दे पर पहले से बोलते रहे हैं, पर पिछले कुछ दिनों में उन्होंने इसे जैसे मुख्य मुद्दा बनाने का फैसला कर लिया है। बजट सत्र में संसद के दोनों सदनों के संयुक्त अधिवेशन में राष्ट्रपति के अभिभाषण पर धन्यवाद प्रस्ताव पर चर्चा का जवाब देते हुए उन्होंने परिवारवादियों को खूब लताड़ा। उसके बाद पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव के समय एक समाचार एजेंसी को दिए इंटरव्यू और कई चुनावी सभाओं में भी उन्होंने इस मुद्दे को उठाया। मोदी के भाषणों और सरकार की नीतियों एवं कार्यक्रमों को गौर से देखें तो वह पिछले कई सालों से देश को जातिवाद की राजनीति से निकालने की कोशिश कर रहे हैं। इसके साथ ही जातियों को वर्ग में बदलने का प्रयास कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव में यह कोशिश सफल होती दिख रही है। चुनौती है इसे बनाए रखने की, क्योंकि इस संबंध में सतत प्रयास न हुए तो पुरानी स्थिति बहाल होने में ज्यादा समय नहीं लगेगा। परिवारवाद और जातिवाद दोनों को एक दूसरे से ताकत मिलती है। इसलिए इन पर अलग-अलग हमला करने से बात नहीं बनेगी। दोनों पर एक साथ हमला करना पड़ेगा। शायद इसीलिए प्रधानमंत्री दोनों पर एक साथ हमलावर हैं। इसकी शुरुआत वह अपनी ही पार्टी से कर रहे हैं। उनके प्रधानमंत्री बनने के बाद से भाजपा के मुख्यमंत्रियों के चयन पर ध्यान दें तो साफ नजर आएगा कि उस राज्य की प्रमुख जाति से मुख्यमंत्री बनाने की पुरानी सोच को उन्होंने बदल दिया है।
जाति और परिवारवाद ने बड़ी संख्या में अच्छे लोगों को राजनीति से विमुख किया है। परिवारवाद की यह बीमारी अब छोटे दलों तक भी आ गई है। अपने समाज के लोगों को सत्ता में भागीदारी दिलाने के नाम पर बनी पार्टियां भी परिवारवाद के रास्ते पर चल पड़ी हैं।
Date:17-03-22
दागी जनप्रतिनिधि संपादकीय
राजनीति के अपराधीकरण को लेकर देश में सभी पार्टियां चिंता जाहिर करने में सबसे आगे रहती हैं। लेकिन जब इस समस्या को दूर करने में अपनी भागीदारी का मौका आता है, तब अमूमन सभी दल इस जिम्मेदारी से अपना पल्ला झाड़ लेते हैं। यह बेवजह नहीं है कि इस समस्या को लेकर चिंता तो लंबे समय से जताई जाती रही है, मगर कोई सुधार होने के बजाय इसमें बढ़ोतरी ही होती जा रही है। उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनाव के नतीजों का ताजा आंकड़ा यह बताने के लिए काफी है कि राजनीति को अपराधियों से दूर रखने का वादा करने वाली लगभग सभी पार्टियों ने इस मसले पर सिर्फ हवा-हवाई बातें ही कीं। ज्यादातर मुख्य पार्टियों ने आपराधिक छवि या पृष्ठभूमि के लोगों को टिकट दिया और उनके जीत कर विधानसभा में पहुंचने के रास्ते तैयार किए। इसमें हाल के चुनाव में स्पष्ट बहुमत हासिल करने वाली भारतीय जनता पार्टी से लेकर नतीजों में दूसरे स्थान पर रहने वाली समाजवादी पार्टी तक शामिल हैं। सवाल है कि चुनाव प्रचार में जनता के सामने राजनीति में अपराधियों को ठिकाने लगाने के वादे करते हुए क्या पार्टियां महज ऐसा बोलने का बस दिखावा करती हैं?
चुनाव सुधारों को लेकर काम करने वाले संगठन एसोसिएशन फार डेमोक्रेटिक रिफार्म यानी एडीआर ने अपने ताजा अध्ययन में बताया है कि उत्तर प्रदेश में चुनाव के बाद जितने प्रतिनिधि जीत कर विधानसभा में पहुंचे उनमें से आधे से ज्यादा यानी इक्यावन फीसद आपराधिक पृष्ठभूमि वाले हैं। कुल चार सौ दो विधायकों में से दो सौ पांच पर किसी न किसी अपराध में शामिल होने के मुकदमे दर्ज हैं। यह वर्ष 2017 में इसी वर्ग के तहत दर्ज संख्या के मुकाबले पंद्रह फीसद ज्यादा है। आंकड़ों के मुताबिक, इस बार एक सौ अट्ठावन विधायकों पर दर्ज मुकदमों की प्रकृति गंभीर अपराधों की है। इनमें कई के खिलाफ हत्या और बलात्कार तक के मुकदमे दर्ज हैं। अफसोस की बात यह है कि सबसे ज्यादा सीटें हासिल करने वाली पार्टियों के बीच एक तरह से होड़ देखी गई कि किसकी टिकट पर कितने आपराधिक छवि वाले उम्मीदवार जीतते हैं! सपा के तैंतालीस फीसद, तो भाजपा के पैंतीस फीसद विधायकों पर गंभीर अपराधों के आरोप हैं। बाकी कई दलों के विधायकों की स्थिति भी कमोबेश यही है।
इसके अलावा, सभी राजनीतिक दलों के जनता के प्रति जवाबदेह होने के दावे और सरोकार की असलियत का अंदाजा इससे भी लगता है कि चुने गए इक्यानबे फीसद विधायक करोड़पति हैं। पिछली बार अस्सी फीसद विधायक इस वर्ग के थे। जाहिर है, आम और वंचित तबकों की जनता की जगह राजनीति की मुख्यधारा में लगातार कम होती जा रही है। इससे बड़ी विडंबना और क्या हो सकती है कि समूचे देश की राजनीति में जिस समस्या को बेहद गंभीर मान कर सभी दल इसके हल की बातें करते रहते हैं, वह हर अगले चुनाव के दौरान और बाद और ज्यादा जटिल बन कर उभर जाती है। विचित्र यह है कि सत्ताधारी से लेकर विपक्ष तक सभी पार्टियां एक दूसरे पर ऐसे आरोप लगाते नहीं थकतीं कि वे राजनीति में अपराधियों को बढ़ावा या संरक्षण दे रही हैं। इस बार के चुनावों के पहले राजनीति के अपराधीकरण पर काबू पाने के मकसद से सुप्रीम कोर्ट ने सभी दलों को आपराधिक छवि वाले लोगों को टिकट देने की वजह बताने को कहा था। इसके अलावा, प्रत्याशियों को भी इसे सार्वजनिक करना था। मगर ऐसा लगता है कि न राजनीतिक दलों पर इसका कोई असर पड़ा, न अपने अपराधों के रिकार्ड के साथ राजनीति में अपनी जगह बनाने वाले लोगों पर।
Date:17-03-22
महंगाई से गहराते संकट सरोज कुमार
महामारी की रफ्तार भले मंद पड़ गई हो, लेकिन महंगाई की लगातार बढ़ रही है। भू-राजनीतिक परिस्थितियां इसमें खाद का काम कर रही हैं। कमाई के अभाव में महंगाई की ऊर्ध्व दिशा आम आदमी को किस दशा में पहुंचाएगी, कह पाना कठिन है। अर्थव्यवस्था के प्रबंधन में महंगाई और कमाई को केंद्र में नहीं रखा गया तो देश की दशा भी दयनीय होगी। महंगाई दर के ताजा आंकड़े फिलहाल कुछ ऐसा ही संकेत दे रहे हैं।
महंगाई दर इस वक्त आठ महीने के उच्चस्तर पर है। लगातार दूसरे महीने भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) की लक्षित अधिकतम सीमा के पार। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआइ) पर आधारित खुदरा महंगाई दर फरवरी में बढ़ कर छह दशमलव सात फीसद हो गई। जनवरी में यह छह दशमलव एक फीसद थी। इसी तरह थोक मूल्य सूचकांक (डब्ल्यूपीआइ) पर आधारित थोक महंगाई दर फरवरी में बढ़ कर तेरह दशमलव एक एक फीसद हो गई, जो जनवरी में बारह दशमलव नौ छह फीसद थी। चिंता की बात यह कि थोक महंगाई दर लगातार ग्यारह महीने से दो अंकों में बनी हुई है। नवंबर 2021 में यह चौदह दशमलव नौ फीसद के ऐतिहासिक उच्चस्तर पर पहुंच गई थी। दिसंबर में थोड़ा नीचे आई, फिर भी तेरह दशमलव पांच छह फीसद पर। फरवरी 2021 में थोक महंगाई दर चार दशमलव आठ तीन फीसद थी।
थोक महंगाई दर बढ़ने से विनिर्माण लागत बढ़ती है और अंत में उसकी कीमत आम उपभोक्ताओं को चुकानी पड़ती है। खुदरा महंगाई दर में मौजूदा वृद्धि इसी का परिणाम है। थोक महंगाई दर में वृद्धि का मूल कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे माल की कीमतों में वृद्धि है। महामारी के कारण लंबे समय तक ठप आर्थिक गतिविधियों के शुरू होने से कच्चे माल की मांग तेजी से बढ़ी है। जबकि आपूर्ति महामारी से पहले की स्थिति में नहीं पहुंच पाई है। इसके पीछे निर्यातक देशों का कुछ लालच, तो कुछ बाहरी परिस्थितियां जिम्मेदार हैं। अब इसमें रूस-यूक्रेन युद्ध की नई परिस्थिति जुड़ गई है। युद्ध के कारण आपूर्ति श्रृंखला बुरी तरह बाधित हुई है। परिणामस्वरूप पूरी दुनिया ऊंची कीमतों की तपिश से झुलसने लगी है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत सौ डालर प्रति बैरल को पार कर गई है। इसके और ऊपर जाने की आशंका है। भारत अपनी जरूरत का अस्सी फीसद से अधिक कच्चा तेल आयात करता है। एक अनुमान के मुताबिक, कच्चे तेल की कीमत दस फीसद बढ़ने से महंगाई दर शून्य दशमलव तीन फीसद से शून्य दशमलव चार फीसद तक बढ़ जाती है और जीडीपी विकास दर को लगभग शून्य दशमलव बीस फीसद का नुकसान होता है। यूक्रेन संकट के बाद से कच्चे तेल की कीमत में पच्चीस फीसद से अधिक की वृद्धि हो चुकी है। अमेरिकी केंद्रीय बैंक- फेडरल रिजर्व ने चालीस साल के सर्वोच्च स्तर पर पहुंची महंगाई से निपटने के लिए ब्याज दर में पच्चीस आधार अंकों की वृद्धि की योजना बनाई है। इस वृद्धि के बाद कच्चा तेल और महंगा हो जाएगा। भारत का आयात बिल बढ़ जाएगा। आम आदमी के साथ ही अर्थव्यवस्था के लिए यह मुश्किल भरी परिस्थिति होगी।
खुदरा महंगाई दर का ताजा आंकड़ा एक विचित्र चित्र प्रस्तुत करता है, जो खासतौर से देश की ग्रामीण आबादी के लिए चिंताजनक है। फरवरी में ग्रामीण महंगाई दर छह दशमलव तीन आठ फीसद, और शहरी महंगाई दर पांच दशमलव सात पांच फीसद रही है। जबकि फरवरी 2021 में तस्वीर बिल्कुल उलट थी- ग्रामीण महंगाई दर चार दशमलव एक नौ फीसद और शहरी महंगाई दर पांच दशमलव नौ छह फीसद। शहरों की तुलना में गांवों में महंगाई दर का ऊंचा होना नए नकारात्मक आर्थिक रुझान का संकेत है, वह भी खाद्य पदार्थों की महंगाई के कारण। गांवों में खाद्य महंगाई दर पांच दशमलव आठ सात फीसद रही है, तो शहरों में पांच दशमलव सात छह फीसद। महंगाई की यह दर तब है, जब मांग महामारी से पहले के स्तर पर नहीं पहुंच पाई है। यह महंगाई मांग के कारण नहीं है। आरबीआइ ने फरवरी 2022 में अपनी मौद्रिक नीति समीक्षा में कहा था कि घरेलू मांग का आधार निजी उपभोग अभी भी महामारी से पूर्व के स्तर पर नहीं पहुंच पाया है। केंद्रीय बैंक ने अपनी नीतिगत दर यानी रेपो रेट चार फीसद पर यथावत रखी थी। बाजार में मांग बढ़ाने के मकसद से आरबीआइ ने पिछले बीस महीनों से नीतिगत दर में कोई वृद्धि नहीं की है। लेकिन कर्ज बांटने पर केंद्रित आरबीआइ का यह कदम, महामारी के बीच बने अस्थिर वित्तीय वातावरण के कारण बहुत कारगर साबित नहीं हो पाया है। अलबत्ता इसका उलटा असर दिखा है। बैंकों ने जमा पर ब्याज दर घटाई तो बुजुर्गों, विधवाओं, पेंशनधारकों, सामाजिक संस्थाओं से जुड़े लोगों का जीवन कठिन हो गया। ब्याज से होने वाली आय घटी तो बजट बिगड़ गया, और खर्च में कटौती करनी पड़ी। इससे जहां एक तरफ बाजार में मांग घटी, वहीं दूसरी तरफ संबंधित लोगों की सामाजिक सुरक्षा को भी चोट पहुंची है।
आरबीआइ का अनुमान था कि वित्त वर्ष 2021-22 की चौथी तिमाही में यानी जनवरी से मार्च की अवधि के दौरान खुदरा महंगाई दर पांच दशमलव सात फीसद रहेगी। लेकिन जनवरी, फरवरी के आंकड़े और मार्च के रुझान इस अनुमान को असंभव बना रहे हैं। फिर भी महंगाई पर नियंत्रण के जो उपाय आरबीआइ के पास हैं, उसे आजमाने को लेकर उसके हाथ बंधे हुए हैं। मांग बढ़ाने के जिस मकसद से बैंक ने नीतिगत दर को चार फीसद के निम्न स्तर पर अब तक बनाए रखा है, वह अभी पूरा नहीं हुआ है। अर्थव्यवस्था महामारी से पूर्व की स्थिति में नहीं आ पाई है। महंगाई जब बाजार में मांग बढ़ने के कारण बढ़ती है, तब आरबीआइ ब्याज दर बढ़ा कर मांग घटाने की कोशिश करता है। कमाई न होने से यहां तो मांग पहले से घटी हुई है। कमाई का आधार, रोजगार बाजार में हाहाकार मचा हुआ है। सेंटर फार मानिटरिंग इंडियन इकॉनॉमी (सीएमआइई) के आंकड़े बता रहे हैं कि फरवरी में बेरोजगारी दर आठ दशमलव एक शून्य फीसद पर पहुंच गई, जो जनवरी में छह दशमलव पांच सात फीसद थी। मार्च में भी अभी यह लगभग साढ़े सात फीसद पर बनी हुई है। यानी जो रोजगार से कमाई कर सकते हैं, उनके पास रोजगार नहीं है, और जो ब्याज की कमाई पर आश्रित हैं, उनका यह आधार खिसक गया है। लेकिन महंगाई बढ़ रही है। महंगाई बढ़ने से मांग के और नीचे जाने की आशंका है। इससे रोजगार घटेंगे। अर्थव्यवस्था डांवाडोल होगी।
महंगाई पर नियंत्रण का दूसरा रास्ता आपूर्ति को बढ़ाना और करों को घटाना है। लेकिन सरकारी खजाना पहले से खाली है और कर्ज का बोझ जीडीपी के नब्बे फीसद से ऊपर पहुंच चुका है। विनिवेश के जरिए राजस्व जुटाने का रास्ता भी बहुत फलदायी नहीं दिख रहा है। ऐसे में सरकार के पास अधिक गुंजाइश नहीं बच रही। न कर घटा कर राहत देने की, और न महंगाई के बढ़ते दबाव को पहले से दबी-कुचली जनता के ऊपर डालने की ही। एक तरफ कुंआ है, तो दूसरी तरफ खाई। महंगाई की आर्थिक मार तो पीड़ादायक है ही, सामाजिक मार अधिक दर्दनाक है। आर्थिक संकट से त्रस्त लोग खुदकुशी जैसा कदम उठाने को मजबूर हो जाते हैं। समाज पतन की ओर बढ़ता है, तो मानवीय अपराध को बढ़ावा मिलता है। कुल मिलाकर आगे की राह कठिन है। और इस कठिन राह को पार पाने जिस कौशल की जरूरत है, उसका नाम है -बाजार से मुक्ति। यही है महंगाई का मुक्ति मार्ग, जिसकी वकालत महात्मा गांधी ने की थी।
Date:17-03-22
जरूरी नहीं हिजाब संपादकीय
कर्नाटक उच्च न्यायालय ने मंगलवार को व्यवस्था दी कि हिजाब पहनना इस्लाम धर्म में आवश्यक धार्मिक प्रथा का हिस्सा नहीं है। और इसके साथ ही अदालत ने कक्षाओं में हिजाब पहनने को अनुमति देने संबंधी मुस्लिम छात्राओं की याचिकाएं खारिज कर दीं। इस प्रकार अदालत ने राज्य में शैक्षणिक संस्थानों में हिजाब पर राज्य सरकार द्वारा लगाए गए प्रतिबंध को बरकरार रखा। राज्य सरकार ने पांच फरवरी, 2022 को अपने एक आदेश में यह प्रतिबंध लगाया था। मुख्य न्यायाधीश ऋतु राज अवस्थी, जस्टिस कृष्ण एस दीक्षित और जस्टिस जेएम खाजी की पीठ ने कहा कि स्कूल की वर्दी का नियम एक उचित पाबंदी है, और संवैधानिक रूप से स्वीकृत है, जिस पर छात्राएं आपत्ति नहीं उठ सकतीं। यह आदेश पारित करते हुए कर्नाटक उच्च न्यायालय ने यह शंका भी जताई कि हिजाब विवाद के पीछे ‘अदृश्य हाथ’ है, जिसका उद्देश्य सामाजिक शांति और सौहार्द बिगाड़ना है। तीन सदस्यीय पीठ ने कह, ‘जिस तरीके से हिजाब विवाद सामने आया उससे इस बहस को बल मिलता है कि कुछ ‘अदृश्य हाथ’ सामाजिक शांति और सौहार्द बिगाड़ने में लगे हैं। इसे अधिक विस्तार में कहने की जरूरत नहीं है।’ कैम्पस फ्रंट ऑफ इंडिया (सीएफआई) ने अदालत के फैसले को संविधान प्रदत्त मौलिक अधिकारों का हनन करार दिया है। उसके मुताबिक, यह चिंताजनक संकेत है कि न्यायपालिका धार्मिक ग्रंथों में हस्तक्षेप कर रही है, वे संविधान विरोधी फैसले को कभी स्वीकार नहीं करेंगे और संविधान तथा व्यक्तिगत आजादी की रक्षा के सभी प्रयास जारी रखेंगे। यह विवाद कर्नाटक से उठा था। शैक्षणिक संस्थान में हिजाब पहन कर न आने के खिलाफ छात्राओं ने आंदोलन छेड़ दिया था। यह असंतोष बाद में अन्य स्थानों पर भी फैल गया था। लेकिन यह थमा तो इसलिए कि कुछ पक्षों ने अदालत का दरवाजा खटखटा कर इस बाबत व्यवस्था मांगी। सभी को अदालत के फैसले का बेसब्री से इंतजार था। अब अदालत ने व्यवस्था दे दी है, तो कर्नाटक की सरकार का दायित्व है कि हिजाब या किसी अन्य धार्मिक चिन्ह के प्रति आग्रही तत्व माहौल न बिगाड़ने पाएं। अभिभावकों का भी फर्ज है कि अपने बच्चों को सामाजिक सौहार्द नहीं बिगड़ने देने को कहें। वास्तव में किसी स्कूल या संस्थान में यूनिफॉर्म होती हो इसलिए है ताकि इसके सदस्यों के बीच असमानता का भाव न पनपने पाए। यूनिफार्म की समावेशी भावना को कमतर करने का प्रयास दुर्भाग्यपूर्ण होगा।
Date:17-03-22
जड़ नहीं है भारतीय समाज नवल किशोर कुमार, ( लेखक फॉरवर्ड प्रेस‚ नई दिल्ली के हिंदी संपादक हैं )
यह पहली बार नहीं हो रहा है कि जीतने वाला पक्ष जीत के कारण गिना रहा है‚ और हारने वाला पक्ष आत्ममंथन। भारतीय लोकतंत्र में यह हर बार होता है। मसलन‚ हाल में संपन्न हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों के बाद चार राज्यों में विजेता भाजपा के नेता और उनके समर्थक जीत के कारणों को बता रहे हैं। कोई इसे प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की दूरदर्शिता की उपमा दे रहा है‚ तो कोई योगी आदित्यनाथ सरकार द्वारा कोरोना महामारी की तीसरी लहर के दौरान मुफ्त राशन योजना की कामयाबी।
लेकिन यह समझा जाना चाहिए कि भारतीय समाज विकासशील समाज है। यह विकसित समाज नहीं है कि कोई एक ठोस निष्कर्ष निकाला जाए। भारतीय समाज के वर्तमान को स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व और स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद के हिसाब देखें तो कई बातें पारदर्शी शीशे की तरह साफ हो जाती हैं। स्वतंत्रता प्राप्ति के पूर्व देश की सियासत जिन वर्गों के हाथ में थी‚ वह श्रमजीवी वर्ग नहीं था। यह वह वर्ग था‚ जिसके पास खाने–पीने का संकट नहीं था। स्वतंत्रता प्राप्ति का परिणाम यह हुआ कि सत्ता ब्रिटिश हुक्मरान से इसी वर्ग को स्वतः हस्तांतरित हो गई। फिर देश में एक संविधान बनाया गया जिसकी प्रस्तावना में ‘हम भारत के लोग’ को परिभाषित किया गया। फिर शुरू हुआ चुनावों का दौर। उस दौर को देखें तो पाते हैं कि चुनावों में कांग्रेस अपराजेय रही। कांग्रेस का शीर्ष नेतृत्व ऊंची जातियों के पास रहा लेकिन हर चीज की मियाद होती है। भारतीय जनमानस चुनाव और चुनावी राजनीति के अलावा सत्ता का हिसाब–किताब समझने लगा तो अनेक परिवर्तन हुए।
डॉ. राममनोहर लोहिया ने 1960 के दशक में नारा दिया था‚ ‘संसोपा ने बांधी गांठ‚ पिछड़ा पावे सौ में साठ।’ दरअसल‚ यह महज नारा नहीं था बल्कि भारतीय लोकतंत्र की जड़ें मजबूत होने का परिचायक होने के साथ–साथ इस बात का उद्घोष था कि भारतीय समाज का वंचित तबका अपनी हिस्सेदारी लेने के लिए चुप नहीं बैठेगा। यही हुआ भी। कांग्रेसी वर्चस्व को चुनौतियां मिलने लगीं। 1970 का दशक आते–आते अनेक राज्यों में कांग्रेस को संघर्ष करना पड़ा। बिहार में ही कर्पूरी ठाकुर‚ बीपी मंडल‚ जगदेव प्रसाद सरीखे अनेक नेताओं ने मोर्चा संभाल लिया था। वहीं‚ उत्तर प्रदेश में चौधरी चरण सिंह जैसे कद्दावर नेता चुनावी नतीजों को प्रभावित करने लगे थे। फिर आया 1974 का दौर जब कांग्रेसी वर्चस्व को जबरदस्त चुनौती अखिल भारतीय स्तर पर मिली और अपना अस्तित्व बचाने के लिए तत्कालीन कांग्रेसी नेतृत्व को देश में आपातकाल लागू करना पड़ा।
लेकिन तब तक भारत में लोकतंत्र की जड़ें बहुत गहरी हो चुकी थीं और पाकिस्तान जैसा तानाशाही शासन यहां नामुमकिन था। परिणामतः 1977 में आपातकाल खत्म किया गया और देश में चुनाव हुए। इसका परिणाम आज भी भारतीय लोकतंत्र के इतिहास का सबसे धवल पन्ना है। इसकी वजह यह है कि सत्ता में समाज के वंचित तबके की हिस्सेदारी बड़े पैमाने पर दर्ज की गई। इसी हिस्सेदारी का परिणाम और जन दबाव का असर था कि मोरारजी देसाई सरकार को बीपी मंडल के नेतृत्व में पिछड़े वर्गों के लिए एक आयोग का गठन करना पड़ा। करीब एक दशक बाद जब मंडल आयोग की सिफारिशें लागू हुई तो भारतीय समाज का दूसरा पक्ष सामने आया। यह कोई हैरत की बात नहीं है कि 1900 में डॉ. बीआर अंबेडकर को मरणोपरांत ‘भारत रत्न’ का सम्मान दिया गया। जैसे–जैसे सत्ता की राजनीति में दलित और पिछड़े वर्ग के लोगों की भूमिका बढ़ती रही‚ वैसे–वैसे ऊंची जातियों के लोगों ने संघर्ष का माद्दा दिखाया। वे दलित और पिछड़े वर्ग की बढ़ती एकजुटता को पहले शिथिल और बाद में खत्म कर देना चाहते थे। ऐसा करने से ही उनके वर्चस्व की वापसी हो सकती थी। यही किया भी गया। लेकिन इस बार बाजी भाजपा ने मारी। उसने राम मंदिर का मसला उठाया और अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व में देश में सरकार बनी।
वर्ष 2004 का चुनाव भी समाजशास्त्रीय अध्ययन के हिसाब से नजीर है। देश की जनता ने हिंदुत्व को खारिज किया और कांग्रेस पहले 2004 और फिर 2009 में केंद्र में सरकार बनाने में सफल रही। भाजपा की बात करें तो समय रहते उसने समझ लिया था कि अब ‘सॉफ्ट हिंदुत्व’ और ऊंचीजातियों को नेतृत्व देने से बात नहीं बनेगी। परिणामतः 2012 से ही नरेन्द्र मोदी‚ जो ‘कट्टर हिंदुत्व’ के प्रतीक पुरुष थे और ऊंची जाति से नहीं आते थे‚ को भाजपा ने नेता माना। इसका असर तो होना ही था। वर्ष 2014 और 2019 में भाजपा को अपेक्षा से अधिक सफलता मिली। इस क्रम में इस बार उत्तर प्रदेश में हुए चुनाव का परिणाम देखें तो भारतीय समाज के अंदर चल रहे संघर्ष को देखा जा सकता है। कट्टर हिंदुत्व की छवि को मुलायम करने की कोशिश इस बार भाजपा की ओर से की गई। राम के साथ–साथ भाजपा नेतृत्व को भुखमरी से जुझते लोगों को मुफ्त में राशन तक बांटना पड़ा। समाजवादी पार्टी (सपा) गठबंधन को पूर्वांचल के आजमगढ़ और गाजीपुर सहित कुछ इलाकों में मिली कामयाबी ने यह साबित कर दिया है कि भारतीय समाज जड़ नहीं है।
एक प्रमाण यह भी कि इस बार उत्तर प्रदेश के विधानसभा में ऊंची जातियों और पिछड़े वर्गों के विधायकों की संख्या क्रमशः 131 और 151 है। इसमें इस बार कुल 151 पिछड़ा वर्ग के विधायक विजयी हुए हैं। पिछड़े वर्ग के विधायकों में 90 भाजपा गठबंधन‚ 60 सपा और कांग्रेस के एक विधायक शामिल हैं। अब यदि कुल विधायकों की संख्या के आधार पर देखें तो सपा गठबंधन में 50 फीसदी से अधिक पिछड़ा वर्ग के विधायक हैं जबकि भाजपा गठबंधन में इस वर्ग की हिस्सेदारी केवल 33 फीसदी है।
दरअसल‚ भारतीय समाज में गैर बराबरी का सवाल हमेशा से महत्वपूर्ण रहा है। जातिगत जनगणना‚ आरक्षण‚ भूमि सुधार आदि मुद्दे वे मुद्दे हैं‚ जो भारतीय समाज के उपेक्षित तबके के लिए महत्वपूर्ण हैं। इस आधार पर कहा जा सकता है कि यह भी एक दौर है‚ और आने वाले समय में भी एक और आएगा। वैसे भी भारतीय दर्शनशास्त्र की मान्यता यही है कि कुछ भी स्थायी नहीं होता।
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हाल ही में इलेक्ट्रानिक्स सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय ने नए साइबर सुरक्षा नियमों को लाने का संकेत दिया है। इस विनियमन का मुख्य ध्येय, संगठनों पर होने वाले किसी भी साइबर अपराध की रिपोर्ट करने की जिम्मेदारी डालना होगा।
क्या कहता है कानून ?
डेटा संरक्षण विधेयक 2021 के खंड 25 के अनुसार डेटा न्यासियों (फिडयूश्टीज) को किसी भी व्यक्तिगत और गैर-व्यक्तिगत डेटा उल्लंघन की रिपोर्ट करनी चाहिए। उल्लंघन की रिपोर्ट 72 घंटे के अंदर की जानी चाहिए।
यूरोपीय संघ के डेटा मानक को अभी तक गोल्डन स्टैण्डर्ड का माना जाता है। इसमें भी एक निश्चित समय के भीतर डेटा उल्लंघन की घटना की रिपोर्ट करने के लिए एक खंड है।
रिपोर्ट क्यों नहीं की जाती ?
किसी भी संगठन या कंपनी पर डेटा के उल्लंघन की घटना का नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। एक अध्ययन से पता चलता है कि ऐसी घटनाओं से लगभग तीन महीने के अंदर ही कंपनी के शेयर 3.5% औसतन गिर जाते हैं। एक वर्ष की अवधि में तो यह प्रभाव दोगुना हो जाता है। इन घटनाओं के चलते ऐसी कंपनियों का बाजार में खराब प्रदर्शन देखा जाता है।
संभावित समाधान –
सरकार को चाहिए कि सभी सरकारी विभागों व अन्य संगठनों में समय-समय पर साइबर सुरक्षा प्रभाव आकलन के संचालन के लिए तीसरे पक्ष के साइबर सुरक्षा ऑडिटर्स को सूचीबद्ध करे।
निजी फर्मों के लिए समय-समय पर सुरक्षा ऑडिट रिपोर्ट का प्रकाशन अनिवार्य हो। प्रवर्तन के लिए सरप्राइज सुरक्षा ऑडिट करने की व्यवस्था की जाए।
आईटी सुरक्षा उत्पादों और सुरक्षा प्रोफाइल का मूल्यांकन और प्रमाणित करने के लिए देशभर में सामान्य मानदंड परीक्षण प्रयोगशालाओं और प्रमाणन निकायों का दायरा साइबर सुरक्षा ऑडिट और आकलन तक बढ़ाया जाए।
आईबीएम की तरह, अन्य बड़ी कंपनियों को भी एक बड़ा साइबर सुरक्षा कमांड सेंटर स्थापित करने के लिए प्रोत्साहित किया जा सकता है।
इस तरह के उपायों से भारत उन देशों के समूह के करीब पहुंच जाएगा, जिनके पास समान स्तर की साइबर सुरक्षा और यूरोपियन यूनियन के समान डेटा सुरक्षा है। इससे डेटा का निर्बाध प्रवाह हो सकेगा।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित वी. श्रीधर के लेख पर आधरित। 1 मार्च, 2022
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Date:16-03-22
Court Is Correct The hijab judgment rightly argues sensible institutional rules don’t violate fundamental rights TOI Editorials
Ruling that hijab isn’t an essential religious practice in Islam, and in a judgment that recalls those on Sabarimala and triple talaq, the Karnataka high court was broadly right in declaring that educational institutions’ enforcing a uniform isn’t violative of fundamental rights. The distinction, as in Sabarimala and triple talaq, was between what is essential to the religion and what may be essentially religious. Circumscribing the latter in some contexts is rightly seen as not automatically constituting a violation of practising one’s faith. Crucially, the judges didn’t agree with arguments by petitioners that the state government order of February 5 violated their individual rights and collective rights of the community.
One of the issues was whether religious freedom as guaranteed by Article 25 of the Constitution was violated by hijab bans by various institutions. Here, the court correctly rested its argument on the primacy of institutional norms and goals over a practice that’s not
deemed essential for ensuring religious freedom. As the court observed, a critical purpose of school uniforms is to “promote harmony”, “transcending religious or sectional diversities”. Also, and in perhaps a necessary reminder of what schools are really about, the judges noted that instilling a scientific temperament in students must take a central role. In words that should find resonance with all right-thinking Indians, the court said young minds can’t develop “so long as any propositions such as wearing of hijab or bhagwa are regarded as religiously sacrosanct and therefore, not open to question”.
Another important point, given the constant attacks on various institutions by different groups, was the judges’ description of schools as “qualified public spaces”, where certain sensible rules, if applied to everyone equally, can’t be deemed as discriminatory to anyone. Therefore, these rules can’t be seen as diluting rights under Article 14 (equality before law), Article 15 (no discrimination) and Article 19 (1) (freedom of expression). The key principle here is that a school uniform is a universal requirement, and therefore not sectarian.
The Supreme Court is certain to be swamped by appeals. In the interim, there’s no room for triumphalism or vigilantism by any group. At stake is the education of thousands of girls. All states including Karnataka should act strongly against attempts by all groups to take the issue to the level of street violence.
On a broader point, let’s remember that issues of far greater import confront India’s young. To list a few: the quality of education, employability of students, employment opportunities and low women’s workforce participation. That none of these questions enthuse all those debating religious issues says something about this country.
Date:16-03-22
Hijab: Wrong Question, Wrong Call Court should have asked whether expressions of individual religious conviction in institutions are allowable, given that other such practices already prevail Mihira Sood, [ The writer teaches at National Law University, Delhi, and is the Director of the Centre for Child Rights & Juvenile Justice ]
In deciding whether or not female students are allowed to wear the hijab, the Karnataka high court asked itself two questions – whether hijab is an essential religious practice in Islam, and whether the imposition of auniform is a justifiable restriction on individual rights. Because it asked itself the wrong questions, it arrived at the wrong decision.
The test of essential religious practices is itself flawed, because it has the effect of ossifying the way a religion is observed, and insulating it from any kind of evolution or modernisation. When this question is sought to be answered by the courts, that danger is magnified, because of the law’s power in regulating conduct and the reliance on a precedent once set.
While it is superficially correct to rule that hijab is not an essential religious practice, it is misleading, because the truth is that no such essence should be (or should ever have been) prescribed, especially by law.
Women should neither be forced to remove the hijab, nor should they be forced to wear it. When a practice is held as essential, it becomes a mandate. If it is held to be non-essential, it risks violating individual freedoms as in the present case.
There are also instances where the application of the test has been used to usher in reform, but it is a flawed platform to do so. Individual fundamental liberties provide a far more sound and stable foundation for reform than secular courts ruling on religious doctrine, which they are anyway ill-equipped to do. That the essential practices test should be discarded is therefore, not an argument that any side should oppose.
On the issue of uniform, again, the court created an issue out of something that needn’t have been one. There is no reason why a hijab cannot be accommodated within existing school uniforms, as it is in fact done in many schools. One must remember here, the basic differences between a hijab (headscarf), and face or body coverings like a niqab or a burqa. It is like comparing a dupatta draped on the head with a ghoonghat.
Institutions can and do have legitimate concerns regarding uniforms. Security, for example, where being able to properly identify a student may be important. Administrative concerns, such as ensuring earpieces etc can’t be concealed in clothes during exams, are also valid and have been dealt with in the past without such a ban.
The point is that, with certain rules in place, a headscarf can certainly be accommodated within those concerns, just as it has been in the past, just as it continues to be done in some places, and just as it is done with turbans and dupattas, and indeed masks, across the country.
What then, should the court have asked itself ? It should have asked itself what secularism means in this country, and how best it can uphold secularism equally, when students of other religions do wear symbols that are not part of the uniform, but can coexist with it, such as bindis, kadas, tilaks, turbans. The judgment addresses none of these, except saffron stoles which everyone knows were being worn purely for political provocation, though banning these has provided the court the fig leaf of equality. It should have asked itself whether we can or should allow expressions of individual religious conviction in educational institutions, and what practices already prevail.
It should have treated the matter as one of individual belief and not collective faith, because that is the direction our jurisprudence on religious issues has to move in if we are to have any hope of development, modernity, or rule of law.
Above all, it should have asked itself whether creating barriers to girls’ education is really worth any views that it has on religious practices or dress codes. The female labour force participation in India is already less than 20%, and the sex ratio at birth, crimes against women and various other indicators of gender equality are all abysmally low. In this context, forcing girls to choose between religion and education is exceptionally appalling.
If the court is genuinely concerned about gender equality, which it claims to be, then these are the issues that ought to have weighed with it, instead of lengthy pontification on Quranic interpretation or the true meaning of individual conscience.
For many, wearing the hijab is the only way they are allowed to step out of the house or access an education at all, while for others, the prospect of gaining access only by accepting their second-class treatment qua their peers in respect of their religion is an unacceptable choice.
It is by now no longer just a question of religion, but one of dignity, of rejecting the humiliation that has been deliberately and predictably meted out to students and teachers alike in the past few weeks, and in failing to address this appropriately, the court has missed a crucial opportunity.
Date:16-03-22
Why Hijabs Shouldn’t Make Us Nervous ET Editorials
The Karnataka High Court upholding the state government’s proscription of wearing the hijab to educational institutions dealt with one question that petitioners had challenged: whether the hijab — the scarf worn by women around their head — was an essential part of Islamic practice or not. The court was right to decide it isn’t, since neither does Islam make any injunction on the matter nor are practising Muslims who choose not to wear a hijab ‘less Muslim’.
But the ban brings up another question pertaining to at least one of the colleges in Balagadi village in Chikkamagaluru district with a uniform rule (most colleges in Karnataka do not have a code) that had imposed the ban on any religious accessory being worn with uniforms: how much uniformity can one insist upon in a unifor m? Here, the matter of hijabs, saffron scarves or turbans are hardly the disruptive objects they are seen to be in some non-Indian cultures. France, with its constitutional insistence of laïcité — that keeps allreligious symbols, the crucifix included, outside the public terrain — has a very different notion of secularism than India, where it is about equal freedom and status to all religious practices. Also, the nervousness attached to a hijabwearer is absent in India where it is part and parcel of its culture, regressive or otherwise. It is this aspect of ‘importing anxiety’ that makes the ban on hijab, or the saffron scarf, out of joint.
What matters in each society is its ownchanging parameters that decide what is ‘modest’ and ‘immodest’. A hijab in India keepsthat perception of propriety in place, doesn’t disrupt it like it may in societies less familiar with our cultural markers. With its verdict, though, the court may have helped deny many youngsters from conservative families from pursuing higher education.
Date:16-03-22
The debate over ‘freeing’ temples The demand in Karnataka to free Hindu temples from government control is gathering steam
Sharath S. Srivatsa
Even before the debate on the controversial Karnataka Protection of Right to Freedom of Religion Bill, 2021 (known as the anti-conversion bill) and its passage in the Upper House of the Legislature could be completed, the BJP government in Karnataka announced that it will bring in a law to free temples from government control, during the State Budget. This may lead to another round of political slugfest. It is seen as one more RSS-backed initiative being implemented by the BJP government.
The demand for freeing Hindu temples in Karnataka from the purview of The Hindu Religious Institutions and Charitable Endowments Act, 1997 (Muzrai Act) has grown especially loud after a misinformation campaign, allegedly by Hindutva groups, that the funds collected in temples are being “diverted” to non-Hindu religious institutions. This has continued despite clarification by the Department that the ‘tasdik’ amount for maintenance of non-Hindu religious places, to compensate the religious institutions that had lost their Inam lands when land reforms were implemented in the State, come from the government and not from temple collections. The ‘diversion’ of fund collected in temples, if any, has been from rich temples for the development of ‘C’ category temples. The Department provides ₹60,000 annually as tasdik for holding daily rituals in temples that have meagre incomes from devotees. It has 34,559 temples under its control of which 190 temples (earning more than ₹25 lakh annually) and 163 temples (earning between ₹5 lakh and ₹25 lakh annually) have been categorised as ‘A’ and ‘B’. As many 34,206 temples that have an annual income of less than ₹5 lakh have been categorised as ‘C’ and these receive tasdik.
Politically, the move is expected to help the ruling BJP. The narrative of freeing temples from government control has gathered steam in other parts of the country too. The Congress, which has been at loggerheads with the government on the anti-conversion bill and the anti-cow slaughter bill, will be on the back foot in putting up a strong opposition to the narrative on temple collection while fighting the BJP in the polls next year.
The proposed law comes at a time when many powerful religious mutts across the State have evinced interest in taking over ancient temples, some of which have reportedly high incomes with a steady flow of devotees. This has raised fears about social exclusion in temple management and activities and the takeover of temple management by caste groups. It has also raised concern that only rich temples will benefit from the move while more than 34,000 temples with meagre incomes could end up remaining with the government. Interestingly, the Karnataka Federation of Archakas and Agamikas of Hindu Temples has opposed the proposal as they are insecure about their positions in case the government moves ahead with the law.
Though BJP insiders pushing for the law argue that the freed up temples will be managed by trustees who will bring in transparency and greater accountability, there are also fears to the contrary. At least three very popular temples run by private trusts in Bengaluru, for instance, have been taken over by the Muzrai Department in recent years after a section of trustees alleged financial and administrative mismanagement.
As of now, it is not clear whether the trust will be handed over the responsibility of the temple buildings land, and the temple jewellery. The combined property of all Muzrai temples is said to be about ₹1 lakh crore although an audit is still to be done. The details are of the proposed law are unclear but what is clear is that the Bommai government is keen to implement the proposal.
Date:16-03-22
निर्णय की प्रतीक्षा कर रहे हैं सार्वजनिक महत्व के मामले अर्घ्य सेनगुप्ता संस्थापक-रिसर्च डायरेक्टर, विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी। दीपिका किन्हाल लीड-ज्यूडिशियल रिफॉर्म, विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी
आज यह भावना बलवती है कि सर्वोच्च अदालत के द्वारा महत्वपूर्ण मुकदमों के निराकरण में देरी हो रही है। विमुद्रीकरण को दी गई चुनौती, आर्थिक रूप से पिछड़े वर्गों के लिए सीटों के आरक्षण हेतु संविधान-संशोधन, अनुच्छेद 370 का निरस्तीकरण, ये सभी मामले निर्णय की प्रतीक्षा कर रहे हैं। ये कोई अपवाद नहीं हैं। विधि सेंटर फॉर लीगल पॉलिसी द्वारा हाल ही में किया गया एक अध्ययन बताता है कि आज ऐसी संवैधानिक खण्डपीठों- जिनमें पांच या इससे अधिक न्यायाधीश हैं- के समक्ष 587 मामले लम्बित पड़े हैं।
संविधान-निर्माताओं ने सर्वोच्च अदालत की स्थापना इसलिए की थी, ताकि संवैधानिक महत्व के मसलों का निराकरण किया जा सके। इसके बावजूद इस प्रकार के मामले लम्बे समय से लम्बित हैं। इनमें से कुछ तो ऐसे हैं, जो अब यथास्थिति बन चुके हैं, उनके बारे में कुछ नहीं किया जा सकता। मिसाल के तौर पर, क्या 1000 के पुराने नोट को कानूनी रूप से फिर से चलन में लाया जा सकता है? ऐतिहासिक रूप से सर्वोच्च अदालत की संवैधानिक खण्डपीठों ने भारत के लोकतांत्रिक मूल्यों को सहेजने का काम किया है। फिर चाहे केशवानंद भारती के मामले में यह निर्णय हो कि लोकतंत्र, धर्मनिरपेक्षता और कानून का राज भारतीय संविधान का मूलभूत ढांचा हैं जिन्हें बदला नहीं जा सकता, या मेनका गांधी के मामले में सरकारों द्वारा नागरिकों के एक जगह से दूसरी जगह जाने के अधिकार को मनमाने तरीके से बाधित करने पर निर्णय हो, या हाल में शायरा बानो केस में सुनाया गया यह फैसला, जिसमें मुस्लिम पुरुषों के लिए इंस्टैंट तीन तलाक को गैरकानूनी बनाया गया हो, या फिर केएस पुट्टास्वामी के मामले में यह निर्णय कि निजता का अधिकार बुनियादी है- संवैधानिक खण्डपीठों ने हमेशा ऐसे निर्णय सुनाए, जिन्होंने सर्वोच्च अदालत को दुनिया में प्रतिष्ठा दिलाई और नागरिकों का भरोसा जीता है।
संवैधानिक खण्डपीठों के जो मामले आज लम्बित हैं, वो भी उपरोक्त वर्णित मामलों से अधिक नहीं तो उतने ही महत्वपूर्ण अवश्य हैं। मिसाल के तौर पर, आंध्रप्रदेश में मुस्लिमों को पिछड़े वर्ग के दर्जे की संवैधानिकता का मामला और मुम्बई में महाराष्ट्र सरकार का किराया-भाड़ा नियंत्रण सम्पदा प्राप्त करने का अधिकार- ये इन दोनों राज्यों में संवेदनशील राजनीतिक महत्व के मामले हैं। सीएए की वैधता, असम में एनआरसी की आजमाइश, शबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश का अधिकार, वॉट्सएप्प की गोपनीयता नीति में परिवर्तन ऐसे मामले हैं, जो बहुत महत्वपूर्ण हैं। इनका राजनीतिक महत्व ही नहीं, ये आमजन-जीवन को भी प्रभावित करते हैं।
इसके बावजूद आज एक भी खण्डपीठ सक्रिय नहीं है। पांच, सात और नौ न्यायाधीशों की खण्डपीठों के समक्ष 35 मुख्य और 552 संबंधित मामले लम्बित हैं। इनमें सबसे पुराना केस तो वर्ष 1999 में सात जजों की संवैधानिक खण्डपीठ को भेजा गया था। तब से लेकर अभी तक किसी मुख्य न्यायाधीश ने यह जरूरी नहीं समझा कि इस मामले की सुनवाई के लिए बेंच गठित की जाए। 2010 से 2020 तक के आंकड़ों के आधार पर सर्वोच्च अदालत ने हर साल औसतन 63 हजार मामलों का निराकरण किया है। इसलिए सवाल अक्षमता का नहीं, प्राथमिकताओं का है।
बीते अनेक सालों में अदालत का फोकस बदला है। अदालत सामान्यतया तलाक, मोटरयान दुर्घटना और बंटवारे संबंधी मामलों की अपीलों पर सुनवाई करती है, जिनका संबंधित पक्षों के लिए भले महत्व हो, सार्वजनिक हित के मामले वे अमूमन नहीं होते। इस कारण संवैधानिक अदालत के अपने दायित्व का निर्वहन वह नहीं कर पाती। यह बदलाव वांछनीय नहीं है। ऐसे में अदालत को एक स्थायी संवैधानिक खण्डपीठ का गठन करना चाहिए, जो वर्षभर संवैधानिक महत्व के मामलों की तत्समय सुनवाई करे। जब तक यह नहीं होगा, संविधान निष्प्रभावी सिद्ध होता रहेगा और अदालत की नैतिक वैधता क्षीण होती रहेगी।
Date:16-03-22
परिवारवाद की राजनीति संपादकीय
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने एक बार फिर परिवारवाद की राजनीति पर प्रहार करते हुए साफ-साफ कहा कि हालिया विधानसभा चुनावों में पार्टी के जिन सांसदों के बेटों को टिकट नहीं दिए गए, वे उनके ही कहने पर नहीं दिए गए। स्पष्ट है कि उन्होंने भाजपा के उन नेताओं को सख्त संदेश दिया, जो अपने बेटे-बेटियों को राजनीति में लाना चाह रहे हैं। उनके इस कथन से यह भी तय है कि वह परिवारवाद की राजनीति को पोषित कर रहे राजनीतिक दलों को आगे भी घेरते रहेंगे। कायदे से ऐसे दलों को सतर्क हो जाना चाहिए, लेकिन इसके आसार कम ही हैं, क्योंकि एक समय जो दल कांग्रेस की परिवारवाद की राजनीति को कोसा करते थे, वे आज उसी की राह पर चल रहे हैं। वे यह देखने को तैयार नहीं कि परिवारवाद की राजनीति ने कांग्रेस को किस तरह पतन की राह पर धकेल दिया है। यदि पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में बुरी तरह पराजित होने के बाद भी गांधी परिवार विक्टिम कार्ड का सहारा लेकर कांग्रेस को अपने कब्जे में बनाए रखना चाहता है, तो पार्टी के साथ-साथ देश को भी अपनी निजी जागीर समझने की अपनी सामंती मानसिकता के कारण ही। इस मानसिकता का प्रमाण यह है कि चुनाव वाले राज्यों के कांग्रेस अध्यक्षों से तो इस्तीफा देने को कह दिया गया, लेकिन गांधी परिवार अपनी जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं-और वह भी तब, जब सारे फैसले उसकी ओर से ही लिए गए।
यह विडंबना ही है कि पांच राज्यों में शर्मनाक हार के कारणों की समीक्षा की मांग करने वाले कांग्रेस नेता यह कहने का साहस नहीं जुटा पा रहे कि इस हार के लिए गांधी परिवार जिम्मेदार है और वह अपनी जवाबदेही से बच नहीं सकता। यह देखना दयनीय है कि पार्टी संचालन के तौर-तरीकों से असहमत जी-23 समूह के नेताओं में से कपिल सिब्बल को छोड़कर अन्य किसी ने सोनिया गांधी के नेतृत्व में आस्था जताना बेहतर समझा। आखिर इस समूह के नेता एक स्वर से यह क्यों नहीं कह सके कि गांधी परिवार किसी अन्य को पार्टी की कमान सौंपे? यदि जी-23 समूह के नेता और साथ ही अन्य कांग्रेसजन पार्टी को बचाने के लिए सचमुच गंभीर हैं तो उन्हें न केवल साहस दिखाना होगा, बल्कि गांधी परिवार को आईना भी दिखाना होगा। कहीं वे इसलिए तो साहस नहीं जुटा पा रहे हैं, क्योंकि उनका कहीं कोई जनाधार नहीं? यदि वे सोनिया, राहुल और प्रियंका गांधी की चाटुकारिता कर रहे नेताओं की ओर से गढ़ी गई इस घिसीपिटी धारणा के बंधक बने रहे कि गांधी परिवार के बिना कांग्रेस आगे नहीं बढ़ सकती तो फिर इस पार्टी का कोई भविष्य नहीं।
Date:16-03-22
छीन-भिन्न होती विश्व व्यवस्था दिव्य कुमार सोती, ( लेखक काउंसिल आफ स्ट्रेटजिक अफेयर्स से संबद्ध सामरिक विश्लेषक हैं )
यह समय द्वितीय विश्व युद्ध और शीत युद्ध की समाप्ति के बाद अस्तित्व में आई अंतरराष्ट्रीय व्यवस्थाओं के अवसान की ओर जाने और पश्चिम द्वारा उसे रोकने के प्रयासों का काल है। रूस-यूक्रेन युद्ध के परिप्रेक्ष्य में विभिन्न अंतरराष्ट्रीय गुटबंदियों और समीकरणों की समीक्षा से पता चलता है कि किस प्रकार विभिन्न अंतरराष्ट्रीय गठबंधनों के घटक देश इन गठबंधनों से अलग नीति अपना रहे हैं। अमेरिका के करीबी समझे जाने वाले इजरायल ने रूस के विरुद्ध किसी कड़ी टिप्पणी से परहेज किया। इजरायली प्रधानमंत्री ने युद्ध के बीच ही रूस की यात्रा कर राष्ट्रपति पुतिन से मुलाकात की और मध्यस्थता का प्रयास किया। ब्रिक्स देशों में से ब्राजील को छोड़कर भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका ने संयुक्त राष्ट्र आमसभा में रूस के विरुद्ध पश्चिमी देशों द्वारा लाए गए प्रस्ताव के समर्थन में मतदान न कर अनुपस्थित रहना चुना। वहीं हिंद-प्रशांत क्षेत्र में चीन की बढ़ती दादागीरी पर लगाम लगाने के लिए अस्तित्व में आए क्वाड में से भारत रूस के विरुद्ध नहीं गया। उसके दो अन्य घटक जापान और आस्ट्रेलिया रूस पर प्रतिबंध लगा रहे हैं। दरअसल जापान का सेनकाकू द्वीपसमूह को लेकर चीन से तो कुरील द्वीप समूह को लेकर रूस से विवाद बना हुआ है।
अंतरराष्ट्रीय संबंधों की जटिलता का एक और उदाहरण यह है कि संयुक्त राष्ट्र में रूस को लेकर भारत, पाकिस्तान और चीन की नीति एकसमान रही। तुर्की वैसे तो नाटो में है, परंतु रूस-यूक्रेन युद्ध में दोनों पक्षों में संतुलन बनाने का प्रयास करता दिखाई दे रहा है। तुर्की नाटो का सदस्य होते हुए भी रूस से एस-400 मिसाइल प्रतिरोधी प्रणाली खरीद चुका है। अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए भी वह रूस पर निर्भर है। हालांकि रूसी सेना और तुर्की समर्थित सशस्त्र गुटों में सीरिया के अलावा लीबिया में कई झड़पें हो चुकी हैं। अभी भी तुर्की यूक्रेनी सेना को ड्रोन मुहैया करा रहा है। ऐसे विरोधाभास केवल तुर्की तक ही सीमित नहीं हैं। कभी अमेरिकी सेनाओं को अड्डे देने वाले सऊदी अरब में भी यही हालात हैं। यूक्रेन संकट के दौरान सऊदी शाह ने अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडन से फोन पर बात करने तक से मना कर दिया। ध्यान रहे कि सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात इजरायल से अपने संबंध सुधार रहे हैं। यही इस्लामिक जगत की राजनीति में उनका प्रतिद्वंद्वी तुर्की भी कर रहा है। ऐसे समय पाकिस्तान को समझ नहीं आ रहा है कि वह क्या करे। वह एक अर्सें से तुर्की को अपना खास दोस्त मान रहा है।
अंतरराष्ट्रीय संबंधों में तेजी से हो रहा यह बदलाव यही बताता है कि विश्व में बने पुराने गठजोड़ अपने सदस्य देशों के सभी हितों की सुरक्षा करने में असमर्थ हैं, जिसके चलते तमाम देश विभिन्न मुद्दों को लेकर अपने हितों के अनुरूप अलग-अलग नीतियां अपना रहे हैं।
यूक्रेन संकट के बीच गैर-सरकारी हथियारबंद संगठनों को परोक्ष युद्ध में इस्तेमाल करने की प्रवृत्ति इसका एक उदाहरण है। नाटो देश यूक्रेन में रूसी सेना के विरुद्ध ब्लैकवाटर जैसे युद्ध ठेकेदारों और अजोव बटालियन जैसे नवनाजी संगठनों का समर्थन कर रहे हैं। जवाब में रूस ने वेगनर ग्र्रुप जैसी अर्धसैनिक कंपनी को मैदान में उतारा है। ये सब मध्यकाल में यूरोपीय शासकों द्वारा एक-दूसरे के विरुद्ध समुद्री डाकुओं के उपयोग की याद दिलाता है। ऐसे में खतरा यह है कि कहीं रूस को काबू करने के चक्कर में पश्चिमी देशों का नवनाजी गुटों का समर्थन यूरोप में फिर से नाजीवाद को न खड़ा कर दे। यूरोप के छोटे देशों और जर्मनी के पुन:शस्त्रीकरण के साथ मजबूत होता नव-नाजीवाद यूरोपीय स्थिरता के लिए गंभीर खतरा साबित होने वाला है। यह प्रश्न उठ खड़ा हुआ है कि विश्व भर से रूस के विरुद्ध लडऩे के लिए यूक्रेन में इकट्ठे किए जा रहे निजी लड़ाके इस युद्ध के बाद कहां जाएंगे? कहीं ये गुट भी तो वैश्विक सुरक्षा के लिए वैसा ही खतरा तो नहीं बनेंगे जैसा अफगानिस्तान में सोवियत संघ के विरुद्ध लड़े इस्लामिक चरमपंथी बने थे? इन निजी हथियारबंद गुटों के प्रयोग ने नाटो और रूस जैसी बड़ी शक्तियों द्वारा एक दूसरे के विरुद्ध ‘डार्क आपरेशंस’ का खतरा बढ़ा दिया है, जिससे अस्थिरता और अधिक बढ़ सकती है।
भूमंडलीकरण पर आधारित बताई जाने वाली वर्तमान वैश्विक व्यवस्था के लिए एक चुनौती और भी उभर रही है। यह पश्चिम की बहुराष्ट्रीय कंपनियों से जुड़ी है। यूक्रेन संकट दिखाता है कि ये तथाकथित बहुराष्ट्रीय कंपनियां वास्तव में बहुराष्ट्रीय न होकर अपने मूल देश की विदेश नीति का हथियार ही हैं। जैसे ही अमेरिका और रूस में तनाव बढ़ा और अमेरिका ने रूस पर प्रतिबंध लगाए तो अमेरिकी मूल की इन कंपनियों ने अपने देश की विदेश नीति के अनुरूप काम करना शुरू कर दिया। विश्व की सबसे बड़ी क्रेडिट और डेबिट कार्ड सेवा प्रदाता मास्टरकार्ड और वीजा ने रूस में अपने कार्ड बंद कर दिए। गूगल पे और एपल पे ने भी सेवाएं बंद कर दीं। इससे वहां मेट्रो स्टेशनों और शापिंग माल्स में लंबी कतारें लग गईं। यूट्यूब ने रूसी मीडिया के चैनलों को हटा दिया। गूगल ने अपने प्ले स्टोर की कई सेवाएं रूस में बंद कर दीं। यह सब नाटो देशों की रूस के विरुद्ध आर्थिक युद्ध की घोषणा के बाद रूस के जनजीवन को ठप करने के लिए किया गया। अमेरिका में तो यहां तक मांग उठी कि इलेक्ट्रिक कार निर्माता कंपनी टेस्ला रूस में बेची गई अपनी कारों को निष्क्रिय कर दे।
पिछले कुछ समय में विश्व भर में यह प्रचार किया गया है कि क्रिप्टोकरेंसी सरकारी नियंत्रण से मुक्त हैं, पर अमेरिकी प्रतिबंध लगते ही कोएनबेस ने 25,000 रूसी खातों को ब्लाक कर दिया। ये सब दिखाता है कि इन तथाकथित बहुराष्ट्रीय कंपनियों और उनके शिगूफों पर अधिक निर्भरता और विश्वास कैसे भारत की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए भी किसी दिन बड़ा खतरा बन सकती है? ऐसी परिस्थितियों में आत्मनिर्भरता ही सुरक्षा और संप्रभुता की गारंटी है। पुरानी विश्व व्यवस्था वैश्विक उथल-पुथल में बदल रही है, जो लंबे समय तक खिंचने के साथ और तेज भी हो सकती है। इस स्थिति में हमें पश्चिम प्रायोजित इस विमर्श से निकलना होगा कि उसके वर्चस्व वाली वैश्विक व्यवस्था से इतर हर व्यवस्था तो अव्यवस्था होती है, क्योंकि कहीं न कहीं वर्तमान अस्थिरता की जनक भी पाश्चात्य व्यवस्था ही है।
Date:16-03-22
‘सुप्रीम’ नाराजगी संपादकीय
वैश्विक महामारी कोरोना के दौरान मौतों को लेकर सरकारी तंत्र की लापरवाही से तो हर आम और खास परेशान था, मगर मुआवजे को लेकर जिस तरह का भ्रष्ट आचरण देखा गया, वह वाकई तकलीफदेह है। सर्वोच्च अदालत का कोरोना मुआवजे के फर्जी दावों पर नाराजगी जताना निश्चित तौर पर तंत्र की विफलता को पलिक्षित करता है। शीर्ष अदालत का यह कहना कि ‘नैतिकता का इतना पतन होगा, सोचा न था’, लालच और भ्रष्ट तंत्र की पोल खोलता है। अदालत ने वैसे तो अभी इस मामले में कोई आदेश पारित नहीं किया है, मगर इतना जरूर कहा कि नियंत्रक एवं महालेखा परीक्षक (कैग) से इस मसले की जांच कराई जा सकती है। दरअसल, पूरा खेल डॉक्टरों और मुआवजा पाने वालों के लालच का है। अदालत ने बिना लाग-लपेट के कहा भी कि डॉक्टरों की ओर से फर्जी प्रमाण पत्र जारी करना चिंताजनक है। डॉक्टर को लोग भगवान की तरह मानते हैं, अगर वे लोग इस तरह से सिस्टम के साथ खिलवाड़ करेंगे तो निश्चित तौर पर शासन का पूरा ढांचा ढह जाएगा। कोरोना की दूसरी और तीसरी लहर में डॉक्टरों की दो तरह की तस्वीर सामने आई थीं। एक तरफ जहां डॉक्टरों ने अपनी जान की परवाह किए बिना मरीजों की सेवा में कोई कसर नहीं छोड़ी थी, वहीं कुछ डॉक्टरों और अस्पतालों का अमानवीय और संवेदनहीन चेहरा भी देश के सामने नमूदार हुआ था। अलबत्ता, डॉक्टर बिरादरी से यही उम्मीद हमेशा की जाती है कि वह न तो किसी से पक्षपात करती है न संवेदना के स्तर पर उनमें कोई कमी झलकती है। इस लिहाज से शीर्ष अदालत की डॉक्टरों को लेकर की गई बेहद सख्त टिप्पणी को संजीदगी से समझने की दरकार है। फिलहाल अदालत कोई आदेश जारी करे, इससे पहले खुद उन अस्पतालों को आगे आना चाहिए जहां के डॉक्टरों ने इस तरह का नाजायज काम किया है। अस्पतालों और डॉक्टरों को अपनी विसनीयता बनाए रखने के लिए यह काम अति शीघ्र करना चाहिए। अगर समाज से उनका भरोसा कमजोर होगा तो चीजें और ज्यादा जटिल होती चली जाएगी। मुआवजे को लेकर कई राज्य सरकारें सवालों के घेरे में है, जिन्होंने आधिकारिक तौर पर मारे गए लोगों की संख्या से कहीं ज्यादा मुआवजा बांटा। यह वाकई भ्रष्टाचार का जीता-जागता नमूना है।
Date:16-03-22
पहनावे की आजादी संपादकीय
संविधान की रोशनी में जिस न्यायिक फैसले पर सबकी निगाह लगी थी, वह आ गया। कर्नाटक उच्च न्यायालय ने मजहब के हिसाब से हिजाब पहनने को अनिवार्य नहीं माना है। न्यायालय के अनुसार, यह एक सांस्कृतिक प्रथा है और सामाजिक सुरक्षा के उपायों के तहत वस्त्र के रूप में हिजाब का इस्तेमाल होता है। यह फैसला न केवल संविधान, बल्कि धर्म-पुस्तक की मदद लेते हुए भी दिया गया है। मतलब इस फैसले का न्यायिक और धार्मिक, दोनों आधार है। हिजाब के बहाने न्यायालय ने महिलाओं की स्थिति पर भी प्रकाश डाला है। न्यायालय ने कहा है कि मानव जाति का इतिहास महिलाओं के साथ दुर्व्यवहार और उत्पीड़न की मिसालों से भरा पड़ा है। जिस इलाके में और जिस वक्त इस मजहब का अवतरण हुआ था, वह भी कोई अपवाद नहीं था। न्यायालय ने यह भी याद दिला दिया कि इस मजहब की शुरुआत से पहले के युग को जाहिल, बर्बर और अज्ञान के समय के रूप में जाना जाता है। इसमें कोई दोराय नहीं कि परदा प्रथा हर मजहब में पाई जाती है, लेकिन शायद ही कोई आधिकारिक मजहबी पुस्तक होगी, जो परदे या हिजाब की पैरोकारी करती होगी।
मजहब कोई भी हो, लाज-लिहाज की ही चिंता करता है। किसी भी मजहब ने कभी यह नहीं कहा कि किसी को क्या पहनना चाहिए। यही वजह है कि मुस्लिम देशों में भी अलग-अलग लिबास पाए जाते हैं। हर देश में हिजाब या परदा समान रूप से अनिवार्य नहीं है। असली परदा तो व्यवहार का होता है, दिल और आंखों का होता है। किसी भी समाज में उसमें जब कमी आती है, तब पहनावे को थोपने की कवायद होती है। अंकुश बुरे लोगों या गलती करने वालों पर होना चाहिए। जो लड़कियां न्याय की गुहार लिए उच्च न्यायालय गई थीं या जो हिजाब को धार्मिक रूप से अनिवार्य बता रही थीं, उन्हें इस फैसले का आदर करना चाहिए। जो लोग अब भी स्कूल-कॉलेजों में हिजाब के पक्षधर हैं, उन्हें पूरी सजगता और नई तैयारी के साथ उच्चतम न्यायालय में गुहार लगानी चाहिए। कर्नाटक उच्च न्यायालय के तार्किक फैसले को ऊपरी अदालत में नए तथ्यों या तर्कों के साथ ही चुनौती दी जा सकती है।
यह फैसला बेहद संवेदनशील है, लेकिन हमें ध्यान रखना चाहिए कि संविधान और लोकतंत्र का प्रभाव अब ऐसा है कि कोई भी किसी को ज्यादा समय तक दबाकर नहीं रख सकता। किसी पिछड़े समुदाय को दबाकर रखने की साजिश हो या किसी समाज में महिलाओं पर अलग से पाबंदियां लगाने की कोशिश, इन सामाजिक कमियों के अंत की शुरुआत बहुत पहले हो चुकी है। शिक्षा और जागरूकता के दौर में सुरक्षा का आश्वासन किसी पहनावे से नहीं मिलना चाहिए, बल्कि कुल व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि सबके लिए सुरक्षा का घेरा रहे। यहां हम यह जरूर गुहार लगा सकते हैं कि देश में जो महिलाएं पीड़ित हैं, उन्हें न्यायालय में जल्द से जल्द न्याय मिले। न्याय के प्रति आश्वस्त महिला ही समाज से मुंह नहीं चुराएगी, और वह जब सामने आएगी, तो दूसरी तमाम महिलाओं को प्रेरित करेगी। वैसे भी, भारत में हिजाब पर कोई रोक नहीं है, और न लगने वाली है। उदार भारतीय जीवन शैली में समय के अनुरूप पहनावे बदलते रहे हैं और आगे भी बदलते रहेंगे। लेकिन जहां तक स्कूलो और कॉलेजों में पहनावे की बात है, तो यहां एकरूपता जरूरी है, ताकि अनुशासन बना रहे और परस्पर भेद के बीज बचपन में ही अंकुरित न होने लगें।
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पिछले दो वर्षों में, जीनोम सीक्वेसिंग, निदान टीके, या एंटीवायरल में जैव प्रौद्योगिकी की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। इस क्षेत्र ने 16% से अधिक की अभूतपूर्व चक्रवृद्धि वार्षिक वृद्धि दर देखी है। 2022 के अंत तक इसके 90 अरब डॉलर तक पहुंचने की उम्मीद है।
इस क्षेत्र की महत्ता से जुड़े कुछ बिंदु –
कोविड महामारी से निपटने में भारत का आधार, विज्ञान और प्रौद्योगिकी रहा है। भारतीय वैज्ञानिकों ने ऐसे उपकरण विकसित कर लिए हैं कि अब भारत, वैश्विक जरूरतों की पूर्ति कर सकता है।
आज भारत के पास अन्य बीमारियों के भी तीव्र, संवेदनशील और विशिष्ट निदान विकसित करने के लिए नई अत्याधुनिक तकनीकों का उपयोग करने की आवश्यक क्षमता है।
भारत में एक ऐसे मजबूत पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण कर लिया गया है, जो नैदानिक नमूनों, सत्यापन पैनल, निर्माण क्षमता और बाजार तक पहुंच प्रदान करता है।
घरेलू कच्चे माल के विकास और आपूर्ति के लिए अच्छी कनेक्टिविटी तैयार कर ली गई है, जिससे बड़े पैमाने पर विनिर्माण हो सके।
इस तंत्र का उपयोग अब आगे के विकासात्मक अनुसंधान के लिए किया जा सकता है।
कोविड महामारी के कई दौर के बाद भी हमें अन्य बीमारियों से लड़ने को तैयार रहना होगा। वायरस के बदलते स्वरूप के साथ उत्पन्न होने वाली मानव स्वास्थ की चुनौतियों का समाधान करने हेतु एक सफल वैज्ञानिक पारिस्थितिकी तंत्र को विकसित करने के लिए क्षमता, अत्याधुनिक प्रौद्योगिकी और सहयोग आवश्यक है।
राष्ट्रीय बायोफार्मा मिशन ने सभी बायोफार्मा उत्पादों के लिए, उत्पाद विकास मूल्य श्रृंखला में साझा बुनियादी ढांचे के एक अत्याधुनिक नेटवर्क का निर्माण किया है। इस ढांचे में नवाचार का अद्वितीय तंत्र भी शामिल है। उम्मीद की जा सकती है कि अन्य स्वास्थ संबंधी प्राथमिकताओं के लिए विज्ञान-आधारित समाधानों की पहल की जा सकेगी।
‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित रेणु स्वरूप के लेख पर आधारित। 26 फरवरी, 2022
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Date:15-03-22
May All Mothers Live Improvements in maternal mortality still have a long way to go. Assessing Covid impact is crucial TOI Editorials
Improving maternal health is a multi-sectoral endeavour – encompassing better access to inputs ranging from education and nutrition to contraceptives and institutional delivery. So the welcome decrease in India’s maternal mortality ratio from 122 to 103 (maternal deaths per lakh live births) between 2015-17 and 2017-19, shown by SRS data, is actually the fruit of multiple interventions. Likewise, further improvements will also need sustained effort along all relevant vectors. India’s SDG target is to bring its MMR below 70 by 2030, which it can well meet in advance. Beyond this it should take inspiration from countries that have already brought their MMR down to single digits – like Belarus, Poland and the UK.
Large disparities in states’ performances need to be understood and addressed. Kerala’s MMR improved from 42 to 30, suggesting it kept pushing up standards from an already high level. UP continues to have among the highest MMRs in the country at 167, but it has delivered a dramatic 49 points improvement from 216. By contrast, Bengal’s performance worsened from 94 to 109. Stateor region-wise solutions will vary. One may need to focus on increasing marriage age and another, on increasing antenatal care visits. The Centre too needs to assess different schemes objectively and increase investment or undertake reform where needed. An issue that needs disentangling is why the distribution of iron and folic acid supplements has not reduced severe anaemia, as envisioned.
The most immediate nationwide need is to take stock of how the pandemic has hurt reproductive care services, to ensure that hard-won gains are not seriously reversed. Institutional deliveries, a core factor in improving MMR, took a hit. As did women’s access to Asha workers and their health counselling. The list goes on. The important question is whether all such services are now back on track, as Covid deaths drop back to the level of the pandemic’s initial weeks. India has seen health interventions improve health outcomes. But it can do much better.
Date:15-03-22
A new deal Any delay in the Iran deal will deepen the security crisis in West Asia and inflate global oil and gas prices Editorial
The Vienna talks aimed at reviving the Joint Comprehensive Plan of Action (JCPOA), also known as the Iran nuclear deal, have hit a wall after Russia sought sanctions exemptions for its future trade and defence ties with Iran. European negotiators say “a good deal” is on the table. But Russia, which has been slapped with a barrage of sanctions by the United States and its allies over the Ukraine invasion, seeks written guarantees that those curbs would not “in any way harm” its ties with Iran. The nuclear deal, reached in 2015, started unravelling in 2018 as the Trump administration unilaterally pulled the U.S. out of the agreement despite international certification that Iran was fully compliant with its terms. After the U.S.’s withdrawal, Iran started enriching uranium to a higher purity and installing advanced centrifuges at its nuclear plants. Now, nuclear experts believe Iran is just months away from having enough high purity uranium to make a nuclear bomb, though the Iranian leadership has repeatedly claimed that it has no plan to make one. Western officials say the growing nuclear capability of Iran demands urgent steps to conclude the deal and curb its nuclear programme. Removing sanctions on Iran and letting Iran’s oil enter the global market could also ease oil and gas prices, which shot up after the Russian attack on Ukraine.
The West’s push to conclude the deal gives Russia added leverage in the negotiations, at a time when relations between Moscow and western capitals are at their lowest point since the end of the Cold War. The U.S. and Europe are reportedly looking for alternatives to revive the deal without Russia. But it would not be easy. Russia, an original signatory of the JCPOA, is a member of the joint commission that supervises Iran’s compliance. Under the agreement, Russia is also required to take control of Iran’s excess enriched uranium and work with Tehran to turn its Fordow nuclear plant into a research facility. In theory, the deal can be revived if other signatories take up Russia’s responsibilities. But it is not clear whether Iran and China would be ready to go ahead without Russia. While the Iranians have publicly said they would not allow any “external factors” to impact their national interests, Tehran is unlikely to ignore the sensitivity of Russia, an ally, and reach an agreement with the U.S., whose exit scuttled the original deal. This leaves the future of the nuclear deal in Russian hands. Russia’s invasion of Ukraine and the West’s response to it have already sent commodity prices soaring and shaken the global economy, which is yet to come out of the COVID-19 shock. A further delay or a total collapse of the Iran deal would not only deepen the security crisis in West Asia but also add pressure on global oil and gas prices. The signatories should not hold the Iran deal to ransom. They should continue to push for a collective agreement that could curb Iran’s nuclear programme and take the country into the global economic mainstream.
Date:15-03-22
Fragmenting world order, untied nations The impact of the Ukraine war on global interconnectedness is a cause for worry in the post-World War order Suhasini Haidar
Nearly three weeks into the Russian war on Ukraine, the cost to India is still to be counted. While some are focusing on how India’s refusal to criticise Russia’s actions, and the string of abstentions at the United Nations, would affect its relations with the West and its Quad partners (the United States, Australia and Japan), others are watching the economic costs that the unprecedented sanctions of the U.S. and the European Union will have on Indian trade, energy and defence purchases. However, the outcome that should worry New Delhi and other like-minded countries the most, apart from the devastating consequences for the Ukrainian nation, is the impact the Ukraine crisis is having on the global world order, which is fragmenting in every respect of global interconnectedness — in terms of international cooperation, security, military use, economic order, and even cultural ties.
The UN and Security Council
To begin with, the global order has broken down and events in Ukraine have exposed the United Nations and the Security Council for their complete ineffectiveness. Russia’s actions in Ukraine may, in terms of refusing to seek an international mandate, seem no different from the war by the United States in Iraq in 2003, Israel’s bombing of Lebanon in 2006 and the Saudi-coalition’s attacks of Yemen in 2015.
But Ukraine is in fact a bigger blow to the post-World War order than any other. The direct missile strikes and bombing of Ukrainian cities every day, exacting both military and civilian casualties, and the creation of millions of refugees, run counter to every line of the UN Charter preamble, i.e. “to save succeeding generations from the scourge of war…”, “to practice tolerance and live together in peace with one another as good neighbours”, as well as Articles 1 and 2 of the ‘Purposes and Principles’ of the United Nations (Chapter 1).
The fact that Russian President Vladimir Putin broadcast his decision to “launch military operations” on Ukraine at the same time the Russian envoy to the United Nations was presiding over a UN Security Council discussion on the Ukraine crisis, speaks volumes for the respect the P-5 member felt for the proceedings. A vote of the international commons, or the UN General Assembly (UNGA), that decried Moscow’s actions, was brushed off in a way that was even easier than when the U.S. did when it lost the UNGA vote in 2017 over its decision to move the U.S. Embassy to Jerusalem.
Meanwhile, in their responses, other P-5 members such as the United States, the United Kingdom and France did not seek to strengthen the global order either, imposing sanctions unilaterally rather than attempting to bring them to the UN. Clearly, Russia would have vetoed any punitive measures, but that should not have stopped the attempt. Nor are the surge in weapons transfers to Ukraine a vote of confidence in the UN’s power to effect a truce.
Whither nuclear safeguards
The next point is Russian recklessness with regard to nuclear safety in a country that has suffered the worst impacts of poor safety and planning following the 1986 Chernobyl disaster (when Ukraine was part of the Soviet Union), which is a challenge to the global nuclear order. Russian military’s moves to target areas near Chernobyl and shell buildings near the Zaporizhzhia nuclear power plant ( also Europe’s largest), show an alarming nonchalance towards safeguards in place over several decades, after the U.S.’s detonation of atomic bombs over Hiroshima and Nagasaki in 1945 led to the establishment of the International Atomic Energy Agency (IAEA) in 1956. The world must also consider the cost to the nuclear non-proliferation regime’s credibility: Ukraine and Libya that willingly gave up nuclear programmes have been invaded, while regimes such as Iran and North Korea can defy the global order because they have held on to their nuclear deterrents.
There are also the covenants agreed upon during the global war on terrorism, which have been degraded, with the use of non-state actors in the Ukraine crisis. For years, pro-Russia armed militia operated in the Donbas regions, challenging the writ of the government in Kyiv. With the arrival of Russian troops, the Ukrainian President, Volodymyr Zelensky, has invited all foreign fighters who are volunteering to support his forces to the country. This seeks to mirror the “International Brigades” in the Spanish Civil War of the 1930s, comprising foreign volunteers from about 50 countries against forces of Spanish military ruler Francisco Franco.
However, the role of foreign fighters has taken on a more sinister meaning after 2001 and al Qaeda, when western recruits joined the Islamic State to fight Syrian President Assad’s forces. British Foreign Secretary Liz Truss’s recent statement that she would “absolutely support” British veterans and volunteers joining the Ukraine war against Russia has since been reversed by the British Foreign Office, and it is hoped that other countries around the world, including India, make firm efforts towards preventing such “non-state actors” from joining a foreign war.
Economic actions
Economic sanctions by the U.S., the U.K. and the European Union (EU) also point to a fragmentation of the global financial order. While analysts have pointed out that the sanctions announced so far do not include some of Russia’s biggest banks such as Sberbank and Gazprombank and energy agencies (in order to avoid the disruption of oil and gas from Russia), the intent to cut Russia out of all monetary and financial systems remains. From the eviction of Russia from SWIFT payments, to the cancellation of Mastercard, Visa, American Express and Paypal, to the sanctioning of specific Russian businesses and oligarchs and pressure on Western businesses (McDonalds, Coca-Cola, Pepsi, etc.) operating in Russia to shut down, the arbitrary and unilateral nature of western sanctions rub against the international financial order set up under the World Trade Organization (that replaced the General Agreement on Tariffs and Trade, or GATT).
The obvious fallout of this “economic cancel culture” will, without doubt, be a reaction — a pushback from Russia and an exploration of alternative trading arrangements with countries such as China, India and much of the Eastern Hemisphere which continue to trade with Moscow. For the S-400 missile defence deal, for example, New Delhi used a rupee-rouble mechanism and banks that were immunised from the U.S.’s CAATSA sanctions (or Countering America’s Adversaries Through Sanctions Act) for advance payments. Russian banks will now use the Chinese “UnionPay” for online transactions. Gradually, the world may see a “non-dollar” system emerge which would run banking, fintech and credit systems separately from the “dollar world”.
Isolation by culture
Finally, there is the western objective, to “isolate” Russia, socially and culturally, that rails against the global liberal order. While several governments including the U.S., the U.K. and Germany have persistently said that their quarrel is not with Russian citizens but with their leadership, it is clear that most of their actions will hurt the average Russian citizen. The EU’s ban of all Russian-owned, Russian-controlled or Russian-registered planes from EU airspace, and Aeroflot’s cancellation of international routes, will ensure that travel to and from Russia is severely curtailed. Some of this isolation of its citizens will work to the favour of an increasingly authoritarian Kremlin. Mr. Putin’s response to the banning of Russian channels in Europe and its allies has been to use the western media ban as a pretext to ban opposition-friendly Russian channels as well. The “isolation” extends to art and music: in the past two weeks the Munich Philharmonic fired its chief conductor and New York’s Metropolitan Opera let a Russian soprano, Anna Netrebko, go because they would not criticise the war. The Bolshoi Ballet’s performances in London and Madrid were similarly cancelled.
The perils of this comprehensive boycott of Russia are not without historical precedent. Speaking to his Parliament this week, Mr. Zelensky invoked British Prime Minister Winston Churchill’s “Fight to the End” speech, delivered at the House of Commons in June 1940, to speak about Ukraine’s commitment to fight Russia. European onlookers would do well to also remember Churchill’s other famous speech, “The Sinews of Peace”, delivered in the United States in 1946, when he first referred to the “Iron curtain coming down” between Soviet Russia and Western Europe. “The safety of the world requires a new unity in Europe, from which no nation should be permanently outcast,” Churchill had warned, although his words went in vain and the world suffered the consequences of the Cold War for the next four decades.
New Delhi needs to ponder
The events over the past two weeks, set in motion by Russia’s declaration of war on Ukraine, have no doubt reversed many of the ideas of 1945 and 1990, fragmenting the international order established with the UN, ushering in an era of deglobalisation and bringing down another Iron Curtain. India’s abstentionist responses and its desire not to be critical of any of the actions taken by the big powers might keep Indians safe in the short term. But in the long term, it is only those nations that move proactively to uphold, strengthen and reinvent the global order that will make the world a safer place, even as this war that promises few winners rages on.
Date:15-03-22
शहर ही नहीं, गांवों के बारे में भी सोचे आज का विज्ञान डॉ. अनिल प्रकाश जोशी, ( पद्मश्री से सम्मानित पर्यावरणविद् )
जब से सभ्यता ने जन्म लिया, तमाम तरह की हलचलें विज्ञान से जुड़ी रही हैं। यह भी स्वीकार लेना पड़ेगा कि शुरुआती दौर में जब सभ्यता का जन्म हो रहा था, तब विज्ञान आवश्यकताओं से ज्यादा जुड़ा था- चाहे घर-बार की बातें हों या खेती-बाड़ी। लेकिन आज विज्ञान की एक अलग पहल भी है और वो ज्यादा विलासिता पर केंद्रित है। आज चारों तरफ जो भी सुविधाएं विकास का माध्यम बनी हुई हैं और जिनके आधार पर हम देश को विकासशील श्रेणी में रखते हैं, उसका सबसे बड़ा कारण विज्ञान एवं तकनीकी ही है। लेकिन एक अंतर अवश्य है कि तब विज्ञान आवश्यकता और संरक्षण से जुड़ा हुआ था और आज विज्ञान विलासिता और शोषण से जुड़ा है। जिज्ञासा के विज्ञान आर्थिकी व पारिस्थितिकी को सीधे प्रभावित नहीं करते।
आज देश में विभिन्न संस्थान हैं, जो विभिन्न तरह के विज्ञान व तकनीक विकसित करने में बड़ी भूमिका निभाते हैं। आज हम विज्ञान और तकनीकी के क्षेत्र में जो भी मानव संसाधन तैयार करते हैं, वे देश-दुनिया में कहीं बड़ी भागीदारी करके बड़ा योगदान भी करते हैं। आज विज्ञान के दो रूप बड़े स्पष्ट हैं। एक इसका मूल स्वभाव जो सिद्धांतों को प्रतिपादित करता है वो फंडामेंटल साइंस के रूप में जाना जाता है। इसकी दुनिया में हमेशा से आवश्यकता इसलिए रहेगी क्योंकि इसी के आधार पर दुनिया के विभिन्न कार्यों के प्रति समझ बन पाती है। लेकिन दूसरी तरफ ऐसे भी संस्थान हैं जिनका लक्ष्य और उद्देश्य मानव विकास के लिए विज्ञान को विकसित करने की बड़ी भूमिका में है। लेकिन एक बड़ा सवाल इन सबके बावजूद यह भी है कि ढेर सारे संस्थानों व विश्वविद्यालयों के बाद भी आज देश के साढ़े छह लाख गांव विज्ञान-तकनीकी सामर्थ्य से अछूते हैं। यह सवाल वहीं का वहीं खड़ा है और स्वतंत्रता के 75 साल बाद भी इनके सामर्थ्य को बढ़ाने में सफलता नहीं मिली है। जबकि दूसरी तरफ विकसित सुविधाएं, गैजेट्स, कारें व अन्य जो भी जीवन की बेहतर कल्पनाएं हम कर सकते हैं, ये आज शहरों में ही झलकती हैं। यह भी कहा जाए कि विज्ञान आज कहीं ना कहीं पक्षपाती रहा है तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी। क्योंकि आज की विज्ञान-तकनीक ने विलासिताओं पर ही बड़ा काम किया है और ये शहरों के ही पल्ले पड़ी हैं।
साथ ही आज विज्ञान-तकनीक की प्रासंगिकता भी एक बड़ा मुद्दा है। आज वैज्ञानिक अपनी प्रगति को आंकने के लिए शोधपत्रों को बड़ा माध्यम मानते हैं और उनका एक बड़ा वर्ग नई खोजों की महत्वाकांक्षाओं के चलते ऐसे शोधों पर ज्यादा केंद्रित है, जिन्हें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्थान मिले। इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि इसका अपना महत्व है। पर वहीं दूसरी तरफ आज भी कई तकनीक संस्थानों में ज्यादातर शोध पत्रों पर ही जोर है। आज भी ग्राम केंद्रित विज्ञान में हम तकनीकी का ज्यादा दम नहीं भर सकते। और अगर ऐसा कुछ किया भी होगा तो उन्हें गांव तक पहुंचाने के बड़े रास्ते तैयार नहीं हो पाए। बात साफ है कि आज जब साढ़े छह लाख गांवों की कई आवश्यकताएं व प्राथमिकताएं विज्ञान-लाभ से वंचित हैं तो ऐसे में देश के विज्ञान को ग्राम-केंद्रित होना होगा। और यह भी स्पष्ट समझ लेना चाहिए कि खाली होते गांवों का अगर कहीं कोई समाधान संभव है तो वह इसी पर निर्भर है कि गांव के प्रति विज्ञान जो खेती-बाड़ी, मूल्यवृद्धि, मिट्टी-पानी से जुड़ा है, इन पर हुए शोध कार्यों को गांव तक पहुंचाने की एक बड़ी मुहिम की आवश्यकता है।
विज्ञान को मात्र भोगवादी बनाने के लिए ही उपयोग में न लाएं। उसकी एक अन्य भूमिका प्राकृतिक संसाधनों के हित को भी साधने में है। यही आज के विज्ञान की सबसे बड़ी चुनौती भी बननी चाहिए। तभी शायद हम गांव और शहर दोनों को मिलाकर बेहतर विकास की कल्पना कर सकते हैं।
Date:15-03-22
एक लंबा विवाद और वैश्वीकरण को झटका टीटी राममोहन
यूक्रेन मामले के बाद दुनिया बदल गई है। हम पर जो बदलाव होने जा रहा है, उसके पूरे आयामों को समझना अभी जल्दबाजी होगी। लेकिन दो चीजें काफी साफ हैं। यूक्रेन पर रूस के सैन्य अभियान से अंतरराष्ट्रीय संबंधों की व्यवस्था में आने वाला बदलाव दीर्घकालिक होने के आसार हैं। दूसरा, वैश्वीकरण का रुझान यूक्रेन संकट से पहले ही पलटने लगा था, लेकिन अब इसे तगड़ा झटका लगा है।
इन बदलावों को समझने के लिए हमें सबसे पहले यूक्रेन पर पश्चिम के बयानों को अलग रखना होगा। पश्चिम मीडिया चाहता था कि हम यह मानें कि यूक्रेन संकट इसलिए पैदा हुआ है कि राष्ट्रपति ब्लादीमिर पुतिन दोबारा सोवियत साम्राज्य खड़ा करना चाहते हैं। रूस की सेना का सैन्य अभियान बहुत बड़ी गलती है और यह पुतिन पर भारी पड़ेगा। पुतिन ने रूस की आक्रामकता से निपटने के पश्चिम के संकल्प को कम आंका है। पश्चिम के प्रतिबंधों से रूस घुटनों पर आ जाएगा। भारतीय मीडिया का एक बड़ा हिस्सा और भारतीय बुद्धिजीवी भी इसे सही मान रहे हैं।
एक अन्य वैकल्पिक मत है, जिस पर गंभीरता से लिए जाने की जरूरत है ताकि नीति निर्माता आगामी मुश्किल महीनों के लिए सही योजना बना सकें। पुतिन नाटो में यूक्रेन के शामिल होने को अपने वजूद के खतरे और यूक्रेन में दखल को निकट भविष्य में परमाणु युद्ध रोकने लिए आवश्यकता के रूप में देखते हैं। इसके खातिर रूस के लिए कोई भी कीमत बहुत अधिक बड़ी नहीं है।
पुतिन एकमात्र ऐसे व्यक्ति हैं, जिन्होंने नाटो के पूर्व में विस्तार को लेकर पश्चिम को चेताया है। जॉर्ज केनन, हेनरी किसिंजर और स्टीफन कोहेन जैसे बड़े अमेरिकी विचारकों ने चेताया था कि अगर विस्तार जारी रहा तो रूस के साथ टकराव तय है। अब पुतिन यूक्रेन में रूसी अभियान को रूस की सीमाओं से नाटो की मौजूदगी को पीछे धकेलने की शुरुआत के रूप में देख सकते हैं। पश्चिम अपने स्तर पर पुतिन को अपने दुस्साहस के लिए दंडित करने के लिए संकल्पित है। इसके नतीजतन रूस और पश्चिम के बीच विवाद जल्द खत्म नहीं होगा। यहां तक कि कुछ यूक्रेन के नतीजे को लेकर ही संदेह रखते हैं। यूक्रेन में युद्ध उस तरह से खत्म नहीं होने के आसार हैं, जिस तरह पश्चिम चाहता है। पश्चिमी विश्लेषक रूस के त्वरित जीत हासिल नहीं करने में नाकाम रहने पर खुश हो रहे हैं। उनका मानना है कि रूस का अभियान एक पेचीदा स्थिति में खत्म होगा। यह एक खयाली पुलाव है। बहुत से स्वतंत्र विश्लेषकों ने संकेत दिया है कि रूसी सेना इसलिए धीरे बढ़ रही है क्योंकि वह बड़े पैमाने पर नागरिकों की मौत से बचने के आदेशों का पालन कर रही है। रूसी सेना यह भी मानती है कि उसके मकसद सीधे टकराव के बजाय यूक्रेन की सेना की घेराबंदी कर और आपूर्ति को रोककर भी पूरे हो सकते हैं।
ऐसा लगता है कि यह दांव काम भी कर रहा है। यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदीमिर जेलेंस्की ने 9 मार्च को कहा कि वह नाटो की सदस्यता लेने का इरादा त्यागने और रूस की कुछ मांगों पर विचार करने को भी तैयार हैं। यह इस बात का साफ संकेत है कि यूक्रेन को नहीं लगता कि वह लंबे समय तक डटे रह सकता है। पुतिन ने सैन्य अभियान शुरू करने से पहले 24 फरवरी को अपने भाषण में सैन्य अभियान में दखल देने के खिलाफ पश्चिम को कड़े शब्दों में चेताया था। उन्होंने कहा, ‘जो कोई बाहर से दखल देने के बारे में विचार करेगा, उसे अपने इतिहास के किसी भी परिणाम से ज्यादा भयंकर नतीजे भुगतने होंगे।’ ऐसा लगता है कि इस चेतावनी का आवश्यक असर पड़ा है। नाटो देशों ने यूक्रेन में अपनी सेनाओं को भेजने से इनकार किया है। नाटो द्वारा यूक्रेन पर लगाए गए ‘नो फ्लाई’ जोन की बात को तेजी से खत्म कर दिया गया। पोलैंड ने रूस में बने लड़ाकू विमानों को यूक्रेन भेजने के लिए अमेरिका को सौंपने का प्रस्ताव रखा, लेकिन अमेरिका ने इसे खारिज कर दिया। नाटो रूस के खिलाफ सैन्य युद्ध के बजाय आर्थिक युद्ध को वरीयता देता है।
पश्चिम ने ऐसे प्रतिबंध लगाए हैं जिन्हें किसी देश पर लगाए गए सबसे कड़े प्रतिबंध माना जा रहा है। अमेरिका ने रूस से तेल एवं गैस का आयात बंद कर दिया है। ब्रिटेन भी तेल आयात में कटौती कर रहा है। रूस को पहले कभी स्विफ्ट मेसेजिंग प्रणाली से अलग नहीं किया गया। रूस के चुनिंदा बैंकों को भुगतान प्रणाली से वंचित कर दिया गया है। रूस ने अभी तक अपने प्रतिबंधों से पलटवार नहीं किया है। लेकिन इसने रूस की कंपनियों के अन्य देशों पर विदेशी मुद्रा में भुगतान के बकाये को ‘होस्टाइल’ घोषित कर दिया है। इससे पश्चिम को चोट पहुंचाने की ताकत का संकेत मिलता है। अब ये भुगतान केवल रूबल में किए जा सकते हैं, जो निर्धारित रूसी बैंकों के पास जमा हैं।
इसके नतीजतन पश्चिमी बैंकों और कंपनियों को भारी नुकसान होने के आसार हैं। यूक्रेन संकट पैदा होने के बाद रूबल में भारी कमजोरी आई है। लेकिन यह साफ नहीं है कि कितनी विदेशी कंपनियां रूसी बैंकों के पास जमा रूबल में भुगतान कर सकती हैं और डॉलर में रूस के बॉन्डों के भुगतान को लेकर भी संदेह है। रूस के आपूर्ति में कटौती किए बिना ही तेल एवं गैस की कीमतें बढ़ी हैं। पश्चिम और असल में शेष दुनिया को ऊंची महंगाई और कम वृद्धि का दंश झेलना पड़ेगा। बढ़ते संरक्षणवाद और राष्ट्रीय सुरक्षा की चिंताओं ने यूक्रेन संकट से पहले ही वैश्विक व्यापार एवं निवेश प्रवाह की रफ्तार सुस्त कर दी थी। कोरोना महामारी ने दुनिया भर में फैली आपूर्ति शृंखलाओं पर अत्यधिक निर्भर देशों को लेकर संदेह पैदा किए हैं। यूक्रेन संकट से वैश्वीकरण को एक अन्य झटका लगेगा।
समस्या केवल पश्चिम और रूस के बीच व्यापार एवं निवेश संबंधों की नहीं है। यह पश्चिम और चीन तथा भारत जैसे अन्य देशों के बीच संबधों से जुड़ी है, जो रूस के साथ संपर्क बनाए रखने का रास्ता चुन सकते हैं। अगर ये प्रतिबंध रूस के साथ लेनदेन करने वाले देशों पर भी लगाए गए तो उठापटक बहुत अधिक होने के आसार हैं।
रूस को अपने केंद्रीय बैंक की पश्चिम में रखे विदेशी मुद्रा भंडारों को इस्तेमाल करने में कड़े प्रतिबंधों से जूझना पड़ रहा है। बहुत से टिप्पणीकारों ने कहा है कि इस घटनाक्रम से भारत समेत अन्य देश पश्चिम में केंद्रीय बैंकों के पास सरप्लस विदेशी मुद्रा को रखने के बारे में गंभीरता से विचार करेंगे। इससे यह बड़ा सबक मिलेगा कि बाहरी दुनिया के साथ ज्यादा जुड़ाव से अर्थव्यवस्था पर बाहरी दबाव का जोखिम बढ़ता है और इससे देश को संप्रभुता पर समझौता करना पड़ सकता है।
इस पृष्ठभूमि में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘आत्मनिर्भर भारत’ के नारे का आकर्षण बढ़ने के आसार हैं। इस नारे की विभिन्न लोगों ने विभिन्न तरह से व्याख्या की है। हालांकि इसका बुनियादी पहलू रक्षा समेत चिह्नित क्षेत्रों में आत्मनिर्भरता को बढ़ावा देना है।
सरकार का कदम यह है कि हम प्रतिस्पर्धा को खत्म नहीं करना चाहते हैं, हम दुनिया के लिए उत्पादन करेंगे लेकिन शुल्क एवं सब्सिडी के जरिये घरेलू उद्योग को मदद देंगे। इसे संभव बनाने के लिए यूक्रेन मामले के बाद की दुनिया में आत्मनिर्भरता का मतलब केवल दिग्गज राष्ट्रीय कंपनियां खड़ी करना नहीं है बल्कि यह बाहरी दबावों का जोखिम घटाकर राष्ट्रीय सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
Date:15-03-22
भारत की निर्यात चुनौतियां जयंतीलाल भंडारी
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने हाल में रूस-यूक्रेन युद्ध के कारण भारत के विदेशी व्यापार पर पड़ने वाले असर को लेकर चिंता व्यक्त की। इस जंग की वजह से देश से होने वाले निर्यात पर भारी असर पड़ने की आशंका पैदा हो गई है। चिंता की बात ज्यादा इसलिए भी है कि जंग जितनी लंबी चलेगी, यह विदेश व्यापार पर उतनी ही ज्यादा मार पड़ेगी। हालांकि रुपए में गिरावट से निर्यातकों को लाभ होता है, लेकिन भारत के अन्य प्रतिस्पर्धी देशों की मुद्राओं की कीमतों में गिरावट, महंगे होते कच्चे माल और यूरोप के बाजार से निर्यात मांग में भारी कमी होने के कारण निर्यात चुनौतियां बढ़ गई हैं। वाणिज्य मंत्रालय की ओर से दो मार्च को जारी आंकड़ों के अनुसार चालू वित्त वर्ष 2021-22 में अप्रैल से फरवरी, 2022 तक भारत का निर्यात तीन सौ चौहत्तर अरब डालर पर पहुंच गया और निर्यात पहली बार निर्धारित लक्ष्य के अनुरूप चार सौ अरब डालर की रिकार्ड ऊंचाई को छू गया। लेकिन अब यूक्रेन संकट के कारण वित्त वर्ष 2022-23 में भारत के सामने निर्यात संबंधी मुश्किलें दिखाई देने लगी हैं। न केवल रूस और यूक्रेन को किए जाने वाले निर्यात में कमी आने की आशंका है, बल्कि अन्य पूर्वी यूरोपीय देशों में स्वेज नहर और काला सागर से माल की आवाजाही में बाधा और रूस पर पश्चिमी देशों के आर्थिक प्रतिबंधों के कारण भी भारत का निर्यात प्रभावित होगा। इस समय यूक्रेन संकट से उत्पन्न निर्यात संबंधी चुनौतियों से निपटते हुए निर्यात बढ़ाने की रणनीति में चार प्रभावी कदम जरूरी हैं। एक, देश में विशेष आर्थिक क्षेत्रों (सेज) की भूमिका को प्रभावी बनाना, दूसरा- मेक इन इंडिया अभियान को और कामयाब बनाना, तीन- उत्पादन आधारित प्रोत्साहन (पीएलआइ) योजना का उपयुक्त तरीके से क्रियान्वयन और चौथा- संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के साथ हुए मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) की तरह दूसरे देशों के साथ भी एफटीए को मूर्तरूप देना।
गौरतलब है कि एक फरवरी को वर्ष 2022-23 का बजट पेश करते हुए वित्त मंत्री ने कहा था कि सरकार विशेष आर्थिक जोन यानी सेज के मौजूदा स्वरूप को बदलेगी। सेज में उपलब्ध संसाधनों का पूरा उपयोग करते हुए घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दोनों बाजारों के लिए विनिर्माण किया जाएगा। सेज संबंधी नए नियम इसी वर्ष 30 सितंबर तक लागू किए जाएंगे। सेज का नया नाम डवलपमेंट आफ इंटरप्राइजेज एंड सर्विस हब (डीईएसएच या देश) होगा।
ऐसे में अब सेज की नई अवधारणा के तहत सरकार सेज से अंतरराष्ट्रीय और घरेलू बाजार के लिए विनिर्माण करने वाले उत्पादकों को विशेष सुविधाएं मुहैया करवाएगी। सेज में खाली जमीन और निर्माण क्षेत्र का इस्तेमाल घरेलू व निर्यात मैन्युफैक्चरिंग के लिए हो सकेगा। सेज में पूर्णकालिक पोर्टल के माध्यम से कस्टम मंजूरी की सुविधा होगी और उत्पाद निर्माण शुरू करने के लिए जरूरी सभी प्रकार की मंजूरियां भी वहीं दी जाएंगी। राज्यों को भी इस प्रक्रिया में शामिल किया जाएगा। ढांचागत सुविधाओं खासतौर से आपूर्ति की सुविधा बढ़ने से उत्पादन लागत घटेगी और भारतीय वस्तुएं अंतरराष्ट्रीय बाजार में आसानी से मुकाबला कर पाएंगी। रेल, सड़क, बंदरगाह जैसी सुविधाओं के बड़े नेटवर्क से भारतीय लागत वैश्विक स्तर की हो जाएगी और भारत को निर्यात आधारित अर्थव्यवस्था बनाने में मदद मिलेगी।
यहां यह भी उल्लेखनीय है कि सेज की नई अवधारणा से इसे और बेहतर रूप देने के बाद देश को दुनिया का प्रमुख विनिर्माण केंद्र बनाना आसान हो जाएगा। मालूम हो कि आगामी वित्त वर्ष 2022-23 के बजट में प्रस्तावित सेज के नए नियमों के साथ-साथ बड़े निर्यात प्रोत्साहन भी लाभप्रद होंगे। बजट घोषणा से देश के निर्यात में एक बड़ी हिस्सेदारी रखने वाले रत्न और आभूषण के निर्यात में भी बढ़ोतरी होगी। कपड़ा और परिधान, चमड़ा, हस्तशिल्प और इलेक्ट्रानिक्स जैसे क्षेत्रों के निर्यात में भी इजाफा होगा। गति शक्ति कार्यक्रम से आपूर्ति की लागत में कमी आएगी। बजट में एक सौ कार्गो टर्मिनल बनाने की घोषणा की गई है, जिससे माल की आवाजाही और आसान हो सकेगी और लागत में घटेगी। बजट में तैयार हीरों और रत्नों के आयात शुल्क तथा फैशन वाले आभूषण के आयात पर शुल्क में कमी की गई है। इससे चीन से आने वाली सस्ते आभूषण पर रोक लगेगी और भारत में इसके निर्माण को प्रोत्साहन मिलेगा। कपड़ा और चमड़ा उत्पादों के निर्यात प्रोत्साहन के लिए जिपर, बटन जैसे उत्पादों, विशेष प्रकार के चमड़े और पैकेजिंग बाक्स के आयात को शुल्क-मुक्त कर दिया गया है। इससे इनके निर्यात को बढ़ावा मिलेगा।
जहां उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजना (पीएलआइ) की सफलता से चीन से आयात किए जाने वाले कच्चे माल के विकल्प तैयार हो सकेंगे, वहीं औद्योगिक उत्पादों का निर्यात भी बढ़ सकेगा। देश में अभी भी दवा उद्योग, मोबाइल उद्योग, चिकित्सा उपकरण उद्योग, वाहन उद्योग और बिजली उपकरणों जैसे कई उद्योग बहुत कुछ चीन से आयातित माल पर आधारित हैं। सरकार ने आत्मनिर्भर भारत अभियान के तहत नवंबर 2020 से चौदह औद्योगिक क्षेत्रों के लिए पीएलआइ योजना को करीब दो लाख करोड़ रुपए के प्रोत्साहनों के साथ आगे बढ़ाया है। इस योजना के तहत दिए गए विभिन्न प्रोत्साहनों से देश के उत्पादक चीन से आयातित कुछ कच्चे माल को स्थानीय उत्पादों के आधार पर तैयार करेंगे।
निर्यात बढ़ाने में विभिन्न देशों के साथ मुक्त व्यापार समझौते की भूमिका अहम हो सकती है। गौरतलब है कि इस साल 18 फरवरी को भारत और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) ने एफटीए पर हस्ताक्षर किए। इस समझौते को समग्र आर्थिक साझेदारी समझौता (सीपा) नाम दिया गया है। इस व्यापार समझौते से भारत और यूएई के बीच कारोबार पांच साल में दोगुना बढ़ा कर सौ अरब डालर किए जाने का लक्ष्य रखा गया है, जो अभी करीब साठ अरब डालर है। इस समय यूएई भारत का तीसरा सबसे बड़ा व्यापारिक साझेदार है और अमेरिका के बाद दूसरा बड़ा निर्यात केंद्र है। इस समझौते के तहत दोनों देश इस साल मई से विभिन्न क्षेत्रों की निर्धारित वस्तुओं को शुल्क मुक्त और रियायती शुल्क पर पहुंच की अनुमति देंगे। भारत यूएई को कपड़ा, आभूषण, दवाइयां, चिकित्सा उपकरण, चमड़े के उत्पाद, जूते, हस्तशिल्प व खेलकूद के सामान, कीमती रत्न, खनिज, खाद्य वस्तुएं जैसे मोटे अनाज, चीनी, फल और सब्जियां, चाय, मांस और समुद्री खाद्य, इंजीनियरिंग और मशीनरी, रसायन जैसे उत्पाद निर्धारित रियायतों पर भेजे जा सकेंगे। वहीं यूएई भारत को पेट्रो रसायन उत्पाद, धातु जैसे सेक्टरों के साथ सेवा से जुड़े कई क्षेत्रों में रियायतें देगा। यह बात भी महत्त्वपूर्ण है कि इस एफटीए से यूएई के बाजार में अब किसी भी भारतीय दवा उत्पाद को आवेदन करने के नब्बे दिनों में शून्य शुल्क पर बिक्री की इजाजत मिल जाएगी। सेवा क्षेत्र और डिजिटल व्यापार को लेकर भी दोनों देशों में विशेष समझौता हुआ है। अब यूएई के बाद विभिन्न देशों के साथ की जा रही एफटीए वार्ताओं में भारत के वार्ताकारों को डेटा संरक्षण नियम, ई-कामर्स, बौद्धिक संपदा और पर्यावरण जैसे नई पीढ़ी के कारोबार मसलों को ध्यान में रखा जाना होगा। साथ ही, किसानों और दुग्ध उत्पादों से संबंधित मुद्दों को भी ध्यान में रखना होगा।
उम्मीद की जानी चाहिए कि यूक्रेन संकट से बने हालात के बीच निर्यात बढ़ाने के लिए जहां सेज की भूमिका महत्त्वपूर्ण होगी, वहीं बदली हुई वैश्विक व्यापार व कारोबार की पृष्ठभूमि में यूएई के साथ किया गया एफटीए वैश्विक व्यापार को बढ़ाने की दिशा में मील का पत्थर साबित होगा। यूएई के बाद अब आस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, कनाडा, दक्षिण अफ्रीका, अमेरिका, इजरायल, भारत खाड़ी देश परिषद और यूरोपीय संघ के साथ भी एफटीए को शीघ्रतापूर्वक अंतिम रूप दिया जा सकेगा।
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उच्चतम न्यायालय बड़ी संख्या में लंबित मामलों के बोझ तले दबा हुआ है। ऊपर से ऐसी जनहित याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा है, जो मौलिक कर्तव्यों को कानूनी रूप से लागू करने का प्रयास करती हैं। इस मामले में न्यायालय ने केंद्र और राज्य सरकारों को नोटिस भी जारी किया है।
मामले से संबंधित कुछ बिंदु –
कानून बनाना संसद और कार्यपालिका का कार्यक्षेत्र है।
मौलिक कर्तव्यों को संविधान में 1976 के आपातकाल के दौरान भाग चार(ए) में शामिल किया गया। 11वां मौलिक कर्तव्य सन् 2002 में जोड़ा गया था।
जहाँ संवैधानिक नीति निर्देशक सिद्धांतों को सरकारी नीतियों को प्रभावित करने वाला समझा जाता है, वहीं मौलिक कर्तव्य नागरिकों को अपने सार्वजनिक जीवन में कुछ ‘आदर्श आचरण’ प्रदर्शित करने के लिए सामान्य निर्देश देते हैं। उन्हें कानूनी रूप से लागू करने के लिए एक ढांचा तैयार करना होगा। इस तरह के कानूनों का भारी दुरूपयोग और राजनीतिकरण होने की आशंका रहती है।
इसके अलावा राष्ट्रीय सम्मान के अपमान की रोकथाम अधिनियम, आईपीसी 124 ए, न्यायालयों की अवमानना अधिनियम, पर्यावरण संरक्षण अधिनियम, प्रचीन स्मारक और पुरातत्व अवशेष अधिनियम तथा शिक्षा का अधिकार अधिनियम जैसे कई कानून हैं, जो पहले से ही मौलिक कर्तव्यों को ध्यान में रखते हुए बनाए गए हैं। जरूरत पड़ने पर संसद ने इनमें से प्रत्येक अधिनियम को अधिनियमित भी किया है। न्यायालयों का काम इन कानूनों की व्याख्या करना है।
संवैधानिक प्रावधानों से संबंधित कानूनों का गठन और उन्हें पारित करना, संसद का कार्यक्षेत्र है। न्यायपालिका को व्यवस्थापिका और कार्यपालिका के अधिकार क्षेत्र में आने वाले मामलों में स्वयं को उलझाने से बचना चाहिए।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 23 फरवरी, 2022
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Date:14-03-22
Policing And Politics Unless states give up political interference and invest in modernisation, cops won’t change TOI Editorials
Prime Minister Narendra Modi’s strong pitch for police reforms during his Gujarat tour is workable only if state governments join his call for change. Policing is a state subject, limiting the Centre’s ability to force reforms. In a telling remark, Modi said: “Even now, the perception about police is that one should stay away from them. ” The incentive for reform is missing because state governments often rely on police to do extracurricular jobs, including setting the course of politically sensitive cases.
Political control is primarily achieved through dictating postings and transfers, which put extraneous pressures on officers. The Supreme Court’s 2006 guidelines for police reform in the Prakash Singh judgment are gathering cobwebs. There’s been no credible attempt to implement them. But there are now political costs in failing popular expectations on law and order. RJD in Bihar and SP in UP remain scarred by perceptions of greater lawlessness during their stints in office. Yogi Adityanath’s free hand to police to act against lawbreakers without being hampered by local party bigwigs, despite some allegations, worked electorally in his favour.
Besides not meeting bare minimum yardsticks like functional autonomy for cops, netas are also depriving policing of qualitative improvements. Sexual offences, which need better forensics and sensitive handling of witnesses, have abysmally low conviction rates. Women suffer as a result. Rising cybercrimes demand that police must simultaneously upgrade both tech and physical interface to ease reporting of these crimes. The Status of Policing in India Report 2019 reveals that 44% cops work over 12 hours a day; one in two don’t get a weekly off day. Meanwhile, around 5.3 lakh sanctioned posts (20%) lie vacant nationally. Such tough working conditions aren’t amenable to fostering a humane or well-trained police force. Unless politics changes, policing may not get the kind of reforms the PM spoke of.
Date:14-03-22
A Licence to Treat India’s Health Sector ET Editorials
GoI’s decision to stay on course with administering an examination — the National Exit Test (NExT) — for obtaining a licence to practise medicine is welcome. Tens of thousands go to Russia, China, Ukraine (90% of the 20,000-odd Indian students in this war-wracked country were studying medicine), Kyrgyzstan, the Philippines, etc, every year to pursue a degree in medicine. Within India, a sizeable number receive their medical education in private and public institutions. Ensuring that all medical graduates meet a minimum threshold of competence before being allowed to practise is essential to ensure a robust healthcare system.
The idea of a licence to practise for all medical graduates, irrespective of where they received their training, is a robust and fair way to ensure threshold quality. Requiring even domestically trained medical students to take the exam creates a level playing field. The first examination will be held in 2023. The decision to have a trial run in 2022 makes eminent sense, as it will help iron out any hitches that could arise ahead of the rollout in 2023. This system will also help identify institutions that are below par and be an invaluable tool for the medical education commission to suggest measures and put out advisories for students. It could well spark a race to improve quality of education.
Healthcare, as the pandemic made doubly clear, has been a neglected sector. India had to mend and build its fragile system on the run. Personnel is the most critical part of this system. Ensuring this system is staffed with enough hands possessing at least a basic level of competence and training is the first step towards sprucing up India’s health infrastructure. The licence system could ensure that in a fair, competent fashion.
Date:14-03-22
The mandates, voter messages, political takeaways A welfare-plus-development combination has struck a chord with voters, who now back the ‘change-makers’ Vinay Sahasrabuddhe is Member, Rajya Sabha, and a former National Vice-President of the Bharatiya Janata Party (BJP).
Mandates always have a message and it depends upon how the recipients read the same. This is true with the recent round of Assembly elections. In India, electoral verdicts have always underscored the fact that continuity and change always go together, and this round of elections is no exception. Voters have continued with the change-makers and sought to change those who wanted to continue with the status quo.
Voters speak
There are four lucid aspects from the clear and loud message from the voters. First, the Uttar Pradesh results in particular have shown that voters have graduated and risen above caste and community considerations and voted resoundingly in favour of a welfare-plus-development combination. From the V.P. Singh era onwards, the political discourse has been dominated by political engineering effected through smart social coalitions or social engineering. Now, democratic polity has been taken to a different level and the effective management of aspirations has replaced social engineering. People prefer a party that delivers on the ground than parties that ask for votes in the name of caste and community. Also remarkable is the fact that the decimation of the Bahujan Samaj Party in the State is indicative of the fact that Scheduled Castes have refused to be bracketed with a single community-based party.
No thumbs up for dynasties
The second important message is that the days of dynastic demigods are over. Voters have rejected dynasties one after the other, from the Badals to the Yadavs to the Banerjees, and, above all, the Gandhis. The Prime Minister, Narendra Modi, had all along on the campaign trail cautioned voters about Parivarvadi parties, and they seem to have paid heed to his appeal. In an aspirational democracy, people have realised that supporting the leaders of dynastic parties is like endorsing birth-based discrimination, something that our Constitution-makers had rejected lock, stock and barrel. Parties where the leadership is reserved for families have no glorious future any more, and the sooner dynasts listen to this message, the better it is for their survival. Let us hope that parties such as the Dravida Munnetra Kazhagam (DMK), the Shiv Sena, the Rashtriya Janata Dal (RJD), the All India Trinamool Congress (TMC) and the Nationalist Congress Party (NCP) pay heed to this message seriously. Make no mistake, the Aam Aadmi Party (AAP) is not, per se, a dynastic party although it is being run on the same lines almost single-handedly. Nonetheless, the victory in Punjab is also a clear rejection of a traditional alternative that has been a dynastic party.
Focus on performance
The third message is about the politics of performance. Parties that ensure that their government delivers in governance, ably convert anti-incumbency into pro-incumbency. The Bharatiya Janata Party (BJP) has proved this several times in Gujarat, in 2019 in Maharashtra, in 2020 in Bihar, in 2021 in Assam, and now in Uttar Pradesh, Uttarakhand, Manipur and Goa. The BJP’s victory in all these rounds of elections was not simply thanks to a weak Opposition. In fact, the Opposition in U.P., Goa, Uttarakhand, or earlier in Gujarat or Maharashtra cannot be described to be weak at all. And yet, if people have unequivocally shown their preference for the BJP in these elections, it is a clear indication of pro-incumbency. Curiously, anti-incumbency had become the rule, a kind of status quo; now, this rule clearly stands changed. The fact that the BJP has increased its vote share in most States also underscores what the Prime Minister has described as ‘an endorsement of the BJP’s pro-poor, pro-active governance’.
The leader does matter
Lastly, the verdicts in 2022 also underscore that national leadership always matters no matter how small or big a State is. There have been many times in the past where political pundits have said that verdicts in national elections mirror aggregation of State politics. Today, the verdicts in 2022 remind us that State verdicts too reflect national aspirations. These elections happened under the shadow of COVID-19. Also, when voting rounds had actually begun, the shadow of the Ukraine crisis was looming large as thousands of Indian students were stranded there. Whether it was the novel coronavirus pandemic or Ukraine, the way the Government faced these challenges seems to have gone down well with the people across the country. This also is indicative of the fact that people all over India believe that the nation needs Prime Minister Narendra Modi’s leadership for many more years. The State verdicts reflect this feeling.
These election results are also important for democracy. As mentioned in the latest Pew Research Center survey report on satisfaction with democracy, ‘the global pandemic has, if anything, intensified perceived political and social divisions. Across the 17 advanced economies we surveyed in 2021, a median of 61% say that their country is more divided than before the outbreak’. And in India, in the first major elections held after three waves of COVID-19, people from diverse regions and far-off States seem to be speaking in one voice. Clearly, the Prime Minister has emerged as a unifier par excellence, across States, castes and communities. Having mastered the art of implementation, he has established that liberal democracy can go hand in hand with efficient state craft, making democracy deliver. All said and done, the 2022 verdicts are as much about credit going to the Prime Minister as they are about the BJP’s periodically galvanised organisation and its ideology-driven cadres.
Date:14-03-22
महिलाओं के सशक्तीकरण की राह अत्यंत पेचीदा कनिका दत्ता
नरेंद्र मोदी के दूसरे कार्यकाल का आधा वक्त पूरा होने के साथ ही इस साल एक और महिला दिवस के बीत जाने पर एक अनोखा विरोधाभास उभरता नजर आया जिस पर कम ही चर्चा हुई है। इस अवधि के दौरान स्त्री-पुरुष असमानता शायद ही कम हुई है बल्कि यह पहले के स्तर की ओर गई है। फिर भी, सक्रिय नीति के संदर्भ में देखा जाए तो पहले की योजनाओं को नए नामों से पेश करने की कवायद से परे भी इस सरकार ने पूर्ववर्ती सरकारों की तुलना में महिलाओं के कल्याण के लिए काफी कुछ किया है।
सरकार की इन योजनाओं की विस्तृत सूची के मदद के बिना भी इन हस्तक्षेपों को याद रखा जा सकता है जो क्रियान्वयन के स्तर पर दोषपूर्ण जरूर थे लेकिन इनकी शुरुआत प्रगतिशील इरादे के साथ शुरू की गई थीं। उदाहरण के तौर पर मोदी की पहली सरकार में महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने महिलाओं के लिए लंबे मातृत्व अवकाश और कार्यस्थलों में बच्चों की देखभाल से जुड़ी सुविधाएं देने के प्रावधान को अनिवार्य बनाया।
गर्भवती महिलाओं और स्तनपान कराने वाली मांओं को फायदा देने के लिए शुरुआत में कुछ कार्यक्रमों की शुरुआत की गई और सब्सिडी वाली रसोई गैस वितरण योजना भी शुरू की गई। हालांकि क्रियान्वयन के स्तर पर इनका प्रदर्शन बेहद औसत रहा लेकिन एक अहम बात यह हुई कि महिलाओं को अब नीतिगत पहल के केंद्र में रखा जाने लगा। यह महिलाओं के बीच मोदी की स्थायी लोकप्रियता को भी दर्शाता है। मुस्लिम महिलाओं के तीन तलाक पर प्रतिबंध लगाने की योजना को उनकी सरकार के अधिक दूरदर्शी और प्रगतिशील सामाजिक कानूनों में गिना जा सकता था, अगर इसे फौजदारी के बजाय, दीवानी अपराध की श्रेणी में डाला गया होता।
अगर महिला श्रम बल भागीदारी दर (एफएलएफपीआर) के तेजी से घटने, मोदी सरकार के कार्यकाल के दौरान बढ़ती महिला बेरोजगारी से लेकर विश्व आर्थिक मंच के ताजा ग्लोबल जेंडर गैप में 28 पायदान तक की गिरावट पर गौर करें तो लगता है कि भारत को अब भी स्त्री अधिकारों के लिहाज से कवर करने की आवश्यकता है।
भारत शिक्षा हासिल करने के मामले में 114 वें स्थान पर है और स्वास्थ्य तथा जीवित रहने के मामले में इसका स्थान 155 वें पायदान पर है। आर्थिक भागीदारी और मौके हासिल करने की पहुंच के मामले में भारत सबसे खराब प्रदर्शन करने वालों देशों में से एक है। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो देश में अगर बच्चियां जन्म ले भी लेती हैं तब भी उनकी गिनती पूरी तरह स्वस्थ या पर्याप्त रूप से शिक्षित भारतीय महिला के तौर पर नहीं होती है। जो उन बाधाओं को दूर भी कर लेती हैं, उनके लिए नौकरी मिलने की संभावना कम होती है। 21वीं सदी के तीसरे दशक की शुरुआत में इसे शायद ही भारतीय समाज की उत्साहजनक तस्वीर के तौर पर देखा जाएगा जो भारत दुनिया की एक प्रमुख शक्ति बनने की ख्वाहिश रखता है।
जाहिर है सत्तारूढ़ व्यवस्था इस स्थिति के लिए पूरी तरह से जिम्मेदार नहीं है। हाल ही में घर और अर्थव्यवस्था में स्त्री-पुरुष से जुड़े आयामों के अध्ययन से जुड़े प्यू सर्वेक्षण ने निराशाजनक, पिछड़े और प्रतिगामी दृष्टिकोण को ही उजागर किया जिसकी वजह से भारतीय महिलाएं समाज में वंचित रह जाती हैं और सशक्त नहीं हो पातीं। सर्वेक्षण ने पुष्टि की है कि 21 वीं सदी के तीसरे दशक में भी भारतीय समाज को लगता है कि रोजगार के मौके के मामले में पुरुषों को प्राथमिकता होनी चाहिए क्योंकि उन्हें ही घर चलाने वाले मुख्य व्यक्ति के रूप में देखा जाता है।
इस तरह की सोच ही वह पहली बाधा है जिसे एक कामकाजी महिला को दूर करने की कोशिश करनी पड़ती है। कामकाजी महिलाओं पर घर के काम और बच्चों की देखभाल का असमान बोझ और कार्यस्थल में भेदभाव या उत्पीडऩ का सामना करना पड़ता है। वैवाहिक बलात्कार को अपराध की श्रेणी में शामिल न करने को लेकर होने वाला प्रतिरोध भी काफी परेशान करने वाला है और इससे बेहद बारीकी से हिंसक पितृसत्तात्मक समाज की चिंताएं ही जाहिर होती हैं। सोच से जुड़ी विकट बाधाओं को देखते हुए, इस बात पर तर्क संभव है कि सरकार या कोई भी सरकार महिलाओं की स्थिति को बेहतर करने के लिए क्या इतना ही कर सकती है।
वर्ष 2011-12 में 33.1 प्रतिशत का एफएलएफपीआर घटकर 20 प्रतिशत रह गया है जो दुनिया में सबसे कम है। निश्चित रूप से यह अंतर भारतीय अर्थव्यवस्था के प्रदर्शन से जुड़ा है। एक विस्तारित अर्थव्यवस्था स्वत: तरीके से नौकरी के बाजार को बढ़ाती है और आखिरकार श्रम बाजारों में ऐसी स्थितियां बनाती है जिसकी वजह से कारोबार जगत स्त्री-पुरुष से जुड़े पूर्वग्रहों को दूर करने और महिलाओं की भर्ती करने के लिए मजबूर होते हैं। उदाहरण के तौर पर आईटी में नौकरी पाने वाली महिलाओं की तादाद अधिक है जो भारत का तेजी से बढ़ता क्षेत्र है और मिसाल के तौर पर अकाउंटेंसी में कार्यरत महिलाओं की बड़ी संख्या इसी बिंदु को रेखांकित करती है।
इस स्थिति में, स्त्री-पुरुष केंद्रितसरकारी नीतियां इस प्रक्रिया के पूरक के तौर पर काम करती हैं। लेकिन भारतीय अर्थव्यवस्था का दायरा वर्ष 2017 के बाद से लगातार कम हो रहा है जिससे बेरोजगारी दर नई ऊंचाई पर पहुंच गई है। अगर रूस-यूक्रेन युद्ध लंबा खिंचता है और वायरस की चौथी लहर आती है तब कोविड-19 महामारी से पहले के दौर के घाटे को पूरा करने में वर्षों लगेंगे और यह सामान्य रूप से भारतीयों और विशेष रूप से महिलाओं के लिए बुरी खबर है।
विडंबना यह है कि महिला सशक्तीकरण की राह में मोदी सरकार की दो प्रमुख आर्थिक पहलों, नोटबंदी और वस्तु एवं सेवा कर को पहले लागू करना बड़ी बाधा साबित हुई। दोनों ने अर्थव्यवस्था की रफ्तार को धीमा करने में प्रमुख भूमिका निभाई और महिलाओं के लिए अर्थव्यवस्था में भागीदारी करने की संभावनाओं को कम कर दिया।
Date:14-03-22
नशे का बाजार संपादकीय
नशीले पदार्थों के उत्पादन और उपभोग पर रोक लगाने के लिए दुनिया के हर देश में कड़े कानून हैं। नशीले पदार्थों की खरीद-बिक्री पर नजर रखने के लिए मादक पदार्थ नियंत्रण ब्यूरो हैं। मगर हकीकत यह है कि ऐसे पदार्थों पर रोक लगाना तो दूर, दिनों-दिन इनकी खपत और कारोबार बढ़ते जा रहे हैं। चिंता की बात है कि अब नशीले पदार्थों की खरीद-बिक्री के लिए इंटरनेट का धड़ल्ले से उपयोग हो रहा है। विएना स्थित अंतरराष्ट्रीय स्वापक नियंत्रण ब्यूरो यानी आइएनसीबी ने अपनी पिछले साल की वार्षिक रिपोर्ट में बताया है कि भारत और दक्षिण एशिया में गैरकानूनी वस्तुओं की बिक्री करने वाली इंटरनेट संचालित दुकानों यानी ‘डार्कनेट’ के जरिए भारी पैमाने पर नशीले पदार्थों की तस्करी हो रही है। इसमें सोशल मीडिया का भी उपयोग किया जा रहा है। ये दुकानें ऐसे पदार्थों का महिमामंडन करने के लिए सामग्री भी प्रसारित करती हैं। रिपोर्ट में कहा गया है कि दवा की शक्ल में भी इन पदार्थों की बिक्री की जाती है। आइएनसीबी ने ऐसी कुछ दुकानों को चिह्नित कर उनकी सूची भी जारी की है। यह एक डरावना तथ्य है। मगर हैरानी की बात है कि ऐसी दुकानों पर प्रतिबंध लगाने के लिए अभी तक कोई व्यावहारिक कदम क्यों नहीं उठाया जा सका है।
हमारे देश में नशीले पदार्थों ने इस कदर अपनी पैठ बना ली है कि बहुत सारे युवा इनकी लत का शिकार होकर अपनी सेहत चौपट कर रहे या असमय काल के गाल में समा रहे हैं। पंजाब में नशीले पदार्थों के दुष्प्रभाव की भयावह तस्वीरें किसी से छिपी नहीं हैं। अब अमीर और संभ्रांत वर्ग के जलसों में ऐसे नशीले पदार्थों का सेवन फैशन-सा बनता जा रहा है। बल्कि कई जगह तो विशेष रूप से ऐेसे पदार्थों के सेवन के लिए ही चोरी-छिपे दावतें दी जाती हैं। नारकोटिक्स ब्यूरो कहीं-कहीं कुछ लोगों की धर-पकड़ कर कभी-कभार नशे के कारोबार पर अपनी सख्ती जाहिर करता है, पर हकीकत यही है कि इस कारोबार के मुख्य स्रोत तक उसकी पहुंच नहीं बन पाती। इसी का नतीजा है कि नशे के कारोबारी अब इस कदर बेखौफ नजर आते हैं कि दूसरे देशों से सैकड़ों किलो की मात्रा में नशीले पदार्थों की खेप मंगा लेते हैं। गुजरात के एक बंदरहगाह और दूसरी कई जगहों पर भारी मात्रा में पकड़े गए नशीले पदार्थ इसके प्रमाण हैं। पुलिस और नारकोटिक्स विभाग पर शक की सुई इसलिए बार-बार जाकर अटक जाती रही है कि कई मामलों में खुद इन्हीं महकमों के लोग शामिल पाए गए हैं। कुछ साल पहले पंजाब के एक डीएसपी श्रेणी के अधिकारी को नशीले पदार्थों को दवा की टिकिया के रूप में बेचने का दोषी पाया गया था।
नशे का कारोबार इसलिए चिंता का विषय है कि यह न सिर्फ युवाओं का जीवन बर्बाद कर रहा है, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था पर भी बुरा असर डाल रहा है। मगर सरकारें अभी तक इस कारोबार पर नकेल कसने में विफल ही साबित हुई हैं। इसके लिए दृढ़ राजनीतिक इच्छाशक्ति की जरूरत है। मगर पंजाब में जिस तरह एक राजनेता को इस कारोबार में संलिप्त पाए जाने पर गिरफ्तार किया गया, उससे यह संकेत मिलता है कि इस कारोबार की जड़ें राजनीति से भी खाद-पानी ले रही हैं। यह समझ से परे है कि जब आपत्तिजनक सामग्री परोसने वाली साइटें बंद की जा सकती हैं, तो नशे का कारोबार करने वाली वेबसाइटों को बंद करनें में भला क्या अड़चन हो सकती है।
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भारत का पड़ोसी देश श्रीलंका आर्थिक संकट से जूझ रहा है। इसका विदेशी मुद्रा भंडार इतना कम चल रहा है कि वह आवश्यक ईंधन की खरीद करने में असमर्थ है।
भारत की भूमिका –
भारत के लिए यह प्रदर्शित करने का समय है कि उसकी ‘पड़ोसी पहले’ की नीति बहुत महत्वपूर्ण है। भारत ने 500 करोड़ डॉलर की आर्थिक सहायता प्रदान भी की है। लेकिन इस सप्ताह कच्चे तेल की कीमतें 100 डॉलर के स्तर को पार करने से श्रीलंका के संकट के और गहराने की संभावना है।
तेल को लेकर उपजा संकट रूस की कार्रवाइयों के प्रभाव से संबंधित है। इसलिए भारत को यह सुनिश्चित करने के लिए उपाय करने होंगे कि आर्थिक चुनौतियों के परिणामस्वरूप क्षेत्र में अस्थिरता न हो। हालांकि भारत ने श्रीलंका को अतिरिक्त सहायता प्रदान की है, लेकिन और अधिक किए जाने की जरूरत है। इस हेतु भारत सरकार श्रीलंका की अर्थव्यवस्था और रोजगार की स्थिति में सुधार के लिए अधिक निवेश पर विचार कर रही है।
अपनी आर्थिक चुनौतियों के बाद भी भारत इस क्षेत्र की प्रमुख अर्थव्यवस्था है। अतः हिंद-प्रशांत क्षेत्र में कोविड बाद की अर्थव्यवस्था के पुननिर्माण में भारत को आगे आना चाहिए।
बिम्सटेक (द बे ऑफ बेगाल इनिशिएटिव फॉर मल्टीसेक्टोरल टेक्निकल एण्ड इकॉनॉमिक कॉपरेशन) देशों के बीच आर्थिक साझेदारी और सहयोग को बढ़ावा देने के साथ, भारत के लिए अपनी स्थिति मजबूत करने का यह उपयुक्त दौर है।
अतः श्रीलंका के साथ भारत का जुड़वा क्षेत्रीय साझेदारी को मजबूत करने में निहित होना चाहिए, जो क्षेत्र की आर्थिक और विकासात्मक प्रगति में हिस्सेदारी रखने वाले प्रत्येक देश, राष्ट्रों की संप्रभुता का सम्मान करने और खुले समाज को बढ़ावा देने पर आधारित हो।
‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 26 फरवरी, 2022
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Date:12-03-22
Corporates vs States, a New Twist MC Govardhana Rangan
As Russian tanks rolled into Ukraine, many economic missiles began to shower on the rest of the world in the form of soaring commodity prices and disrupted supply chains. Since the invasion, crude oil prices are up around 30%, aluminium 13%, and the benchmark Dutch Natural Gas contracts have doubled. Nickel, of which Russia is a key supplier, doubled in a few hours after Russian troops moved inside Ukraine, forcing the London Metal Exchange to suspend trading.
Unlike in the past, when sanctions were left to states, this time there seems to be corporate action too, with businesses pulling out of Russia. Businesses are supposed to be ideologically and politically neutral. That has been the driving force all along with US MNCs, for instance, happily doing business in Venezuela, China, Saudi Arabia. … Consumers, too, boycott company products because of perceived wrongdoings. But companies boycotting consumers of a country? So, what has made the likes of Apple, Mastercard, McDonald’s, Netflix and Zara put the moral high ground ahead of earnings per share when it comes to Vladimir Putin’s Russia?
While such a boycott helps those companies to enhance their moral branding, it could send different signals to the political classes across nations — that they either play by the global rules (read: rules the companies’ countries agree upon), or adopt policies that would limit the damage these corporations can cause.
To be sure, the international sanctions haven’t cut off Russia from the rest of the world, yet. The Germans, Italians and the Dutch are still transacting with the Russians. Nor have they cut Russia totally from the global financial system. Compared to this, the sanctions from individual corporations appear to be total.
Do these actions reflect the confidence of companies and their commitment to causes more than their own states? Or do they believe they are more powerful than the states whose markets they boycott, considering some companies’ revenues are more than the GDP of some countries?
To many members of the political class, corporate sanctions can be alarming. This, coming on the back of the debate about the rising clout of technology companies and the need to control them, is certain to raise red flags. If Donald Trump could have his Facebook and Twitter accounts suspended by companies for encouraging rioters at Capitol Hill in the US, what could be in store for other politicians in other countries seen to do the wrong thing?
The world has prospered immensely due to open trade since World War 2. Along with the current spate of protectionism, the world may be in for even more disruption if political leaders see the actions of MNCs threatening their nations. China has already built enough homegrown tech companies, duplicating Google, Apple and WhatsApp by hook or by crook.
Economic nationalism is on the rise, whether it be Brexit, Make America Great Again or Aatmanirbhar Bharat. The eagerness to reduce dependence on other countries is accelerating amid rising distrust. Europeans are regretting their dependence on Russia for oil and gas, while some countries have already banned Huawei from their territories.
There is talk of Xi Jinping’s China possibly doing a ‘Ukraine’ on Taiwan. If that does happen, would the corporate world resort to a similar boycott against China where the stakes are far higher than with Russia?
Date:12-03-22
The BJP’S rock solid social coalition Governance issues notwithstanding, the BJP’s caste arithmetic could not be breached Mirza Asmer Beg is Professor in the Department of Political Science at Aligarh Muslim University; Shashikant Pandey is Professor in the Department of Political Science at Babasaheb Bhimrao Ambedkar University, Lucknow; Shreyas Sardesai is a Research Associate at Lokniti-CSDS
The wide social coalition that the BJP crafted and honed in U.P. during national and State elections over the last seven years remained intact this Assembly election. An analysis of the caste-wise vote preference data from the Lokniti-CSDS post-poll survey points to a story of continuity as far as the BJP’s base is concerned. The party has also achieved some major gains from unexpected quarters. The SP also improved its performance among communities except the upper castes, but this was clearly not enough to defeat the BJP.
The BJP’s social base
The BJP managed to not only consolidate its traditionally staunch upper caste base even further, netting over four-fifths support from the Brahmins, Thakurs and Vaishyas, but also held on rather successfully to its relatively recently cultivated support base of non-Yadav Other Backward Classes (OBCs). This critical segment that constitutes two-fifths of U.P.’s electorate was widely expected to move away from the BJP in significant measure due to the SP’s alliance with smaller caste-based parties such as the Suheldev Bharatiya Samaj Party, Janwadi Socialist Party, Mahan Dal, and Apna Dal (Kamerawadi) that cater to some of the non-dominant OBC segments such as Rajbhars, Noniyas, Chauhans, Kushwahas and Mauryas. The defection of BJP’s senior backward caste leaders like Swami Prasad Maurya, Dara Singh Chauhan and Dharam Singh Saini to the SP was also expected to dent the BJP’s base in their respective constituencies. However, the post-poll data suggest that the BJP actually ending up gaining more support from these constituencies, except the Rajbhars. Among the Maurya-Khushwaha-Koeri communities for instance, the party increased its vote share from 56% to 64%. Major gains for the BJP also came from Gaderias and Kumhars. The only non-Yadav OBC community where the BJP appears to have lost some support is that of the Mallahs. Lokniti’s survey finds that the BJP lost support to the tune of 11 percentage points among the Mallahs. Nonetheless, the BJP was still way ahead of the SP among the non-Yadav OBCs, securing over three-fifths of their votes.
The BJP made some very significant gains among the Dalits: Jatavs and non-Jatavs. It won over two-fifths of the support of non-Jatav Dalits as opposed to one-thirds last time. It made some of its most impressive inroads among Jatav Dalits, the community that has stood by the Bahujan Samaj Party (BSP) through thick and thin in the past, securing 21% or nearly a fifth of their votes, more than double of 2017. The BSP’s vote share among Jatavs came down drastically from 87% to just 65%. Among non-Jatavs, which had already started moving away from the party since the last few elections, the BSP’s vote share reduced considerably too. This indicates that the BSP is facing an existential threat. Interestingly, this time around, it was the SP that gained far more from this BSP decline among non-Jatav Dalits than the BJP. But it wasn’t sufficient.
A major roadblock for the SP’s failure to make sufficient inroads among Dalits and lower OBCs was the strong perception among them about the dominance of Yadavs under Akhilesh Yadav’s rule as compared to the alleged Thakurvaad under Yogi Adityanath’s rule. In the post-poll survey, even though most voters were found to carry the opinion that Mr. Adityanath’s rule had benefited only upper castes (overall 43% thought so), this sentiment was nonetheless much weaker than the sentiment recorded in the 2017 survey about Mr. Yadav’s rule having benefited only Yadavs (54% had said so).
A further disappointment perhaps for the SP alliance was the Rashtriya Lok Dal (RLD) not being able to sufficiently consolidate its core Jat voters in favour of the alliance, even though the party did perform well in some of its traditional strongholds. Despite the active participation of western U.P.’s Jat community in the farmers’ movement and the pre-election noise about Jats beginning to move back to the RLD, a majority of Jats, our data indicates, voted for the BJP. The Jat-Muslim-Yadav alliance that had been anticipated in western U.P. before the elections did not materialise pan region. It was limited to a few seats in the upper parts of the region. In fact, for the fourth straight election in U.P., only Muslims and Yadavs (30% of the electorate) consolidated behind the SP, offering it four-fifths of their support. It seems that Yadav and Muslim voters’ heavy consolidation in favour of the SP led to counter-mobilisation of Hindu voters (other than Yadavs) in favour of BJP. The Congress’s complete inability to wean way upper caste support from the BJP didn’t help matters either, for the SP.
To conclude, it can be said, that several governance issues notwithstanding, the BJP’s caste arithmetic could not be breached.
Date:12-03-22
विपक्षी दलों का रवैया संपादकीय
चुनाव वाले पांच राज्यों में से चार में भाजपा की सफलता के बाद विपक्षी खेमे में हलचल स्वाभाविक है। जहां पंजाब में शानदार जीत हासिल करने के बाद आम आदमी पार्टी राष्ट्रीय विकल्प बनने की तैयारी में है, वहीं कांग्रेस समेत अन्य दल फिर से विपक्षी एकता की संभावनाएं टटोल रहे हैं। ममता बनर्जी ने कांग्रेस की खत्म होती विश्वसनीयता का जिक्र करते हुए विपक्षी एकता की नए सिरे से पहल की है। नि:संदेह कांग्रेस की पांचों राज्यों में पराजय हुई है, लेकिन गोवा में चुनाव लड़ने गई तृणमूल कांग्रेस का भी तो खाता नहीं खुला। ममता की मानें तो उत्तर प्रदेश में सपा को ईवीएम में लूट करके हराया गया है। साफ है कि वह यह यह भूल गईं कि बंगाल में चुनावों के दौरान और फिर नतीजों के बाद कैसी भीषण हिंसा हुई थी? उन्हें यह भी याद नहीं रहा कि 2018 में बंगाल के पंचायत चुनावों के दौरान मतपेटियां किस तरह तालाबों में मिली थीं? पांच प्रांतों के चुनाव नतीजों से ममता का नाराज होना समझ आता है, लेकिन यह भी साफ है कि उनके नेतृत्व में विपक्षी एका के आसार नहीं। इसी तरह तेलंगाना के मुख्यमंत्री चंद्रशेखर राव की पहल भी परवान चढ़ती नहीं दिखती, क्योंकि वह भी ममता की तरह कांग्रेस को किनारे कर विपक्ष को एकजुट करना चाहते हैं।
ममता और चंद्रशेखर राव के रुख से कांग्रेस को चिंतित होना चाहिए, क्योंकि वह खुद एक क्षेत्रीय दल में तब्दील होती जा रही है। चिंता की बात यह भी है कि उसकी मानसिकता भी क्षेत्रीय दलों सरीखी होती जा रही है। वह राष्ट्रीय मुद्दों पर बात अवश्य करती है, लेकिन उसी संकीर्णता के साथ जैसे क्षेत्रीय दल करते हैं। पांच राज्यों में हार के बाद राहुल गांधी ने भले ही यह कहा हो कि वह सबक सीखेंगे और देशहित में काम करते रहेंगे, लेकिन इस तरह की बातें तो वह न जाने कब से करते आ रहे हैं। इसीलिए यह सवाल उठ रहा है कि आखिर वह कब सीखेंगे? वास्तव में इस सवाल से पूरा गांधी परिवार दो-चार है, क्योंकि वह ऐसे व्यवहार कर रहा है, जैसे देश पर शासन करना उसका जन्मसिद्ध अधिकार है और एक के बाद एक चुनावों में जनता कांग्रेस को नकार कर गलती कर रही है। जैसे अन्य विपक्षी दलों का सारा जोर भाजपा और विशेष रूप से प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को सत्ता से बाहर करने पर है, वैसे ही कांग्रेस का भी। समझना कठिन है की विपक्षी दल इस सवाल का जवाब क्यों नहीं देते कि वे भाजपा को हटाकर खुद क्या करेंगे? इसमें दोराय नहीं कि देश में एक नहीं कई समस्याएं हैं लेकिन आखिर विपक्षी नेता उन्हें गिनाने के साथ यह क्यों नहीं बताते कि वे उनका समाधान कैसे करेंगे?
Date:12-03-22
अर्थव्यवस्था को झटके से बचाना टी. एन. नाइनन
भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए संकट अब ‘सामान्य’ हो चुके हैं। सन 1962 से 1974 तक के 12 वर्षों में भारत को तीन युद्ध लड़ने पड़े और चार बार सूखे का सामना करना पड़ा जिससे बिहार जैसी जगहों पर अकाल जैसे हालात बने और इसी अवधि में देश को तेल के पहले झटके का सामना भी करना पड़ा जब कच्चे तेल की कीमतें चार गुना हो गईं। देश में मुद्रास्फीति लगातार दो अंकों में रही और उसका उच्चतम स्तर 26 फीसदी हो गया। सन 1966 में रुपये का 36 प्रतिशत अवमूल्यन करना पड़ा। नीतिगत मोर्चे पर भी कुछ गलत कदम उठाए गए, मसलन सरकार द्वारा अनाज के थोक कारोबार का अल्पकालिक रूप से अधिग्रहण करना। कांग्रेस विभाजन जैसी राजनीतिक उथलपुथल भी हुई और श्रमिक हड़ताल, नक्सलवाद के जन्म जैसे विरोध आंदोलन भी उत्पन्न हुए। इसी अवधि में जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व वाला आंदोलन भी हुआ जिसके बाद सन 1975 में देश में आपातकाल लगा।
तब से अगली आधी सदी तक ऐसी स्थितियां नहीं बनीं, हालांकि उसके बाद भी देश को तेल के झटके लगे (उनमें से एक के साथ तो सूखा भी पड़ा और सन 1979-80 में हमारी जीडीपी 5 फीसदी घट गई), खालिस्तान और कश्मीर की चुनौती ने हमारी राष्ट्रीयता को चुनौती दी, सन 1991 में विदेशी मुद्रा का संकट उत्पन्न हुआ, एशियाई तथा उसके बाद वैश्विक वित्तीय संकट पैदा हुआ। ये संकट समय-समय पर पैदा हुए और इनकी आवृत्ति आगे चलकर बढ़ी। हाल के वर्षों में हमारा सामना ऋणग्रस्त कंपनियों और लगभग दिवालिया हो रहे बैंकों के कारण ‘बैलेंस शीट के दोहरे संकट’ से हुआ। इसके बाद 2016 में नोटबंदी और कोविड महामारी की तीन लहरों, 2020 के लॉकडाउन और फिर दोबारा तेल का झटका।
सवाल यह है कि अर्थव्यवस्था को ऐसे झटकों से कैसे बचाया जाए? खाद्यान्न संकट समाप्त हो चुका है, उसकी जगह अब अधिशेष की समस्या है। विदेशी मुद्रा भंडार की स्थिति भी बहुत अच्छी है। मुद्रास्फीति का स्तर भी सहज है और मुद्रा भी अधिक स्थिर है। तेल की कीमतों से लगने वाले झटके को आंशिक तौर पर तो तेल का भंडार तैयार करके कम कर लिया गया है, हालांकि एक बार तेल कीमतों में गिरावट आने के बाद उसकी क्षमता दोगुनी करनी होगी। ऊर्जा के लिए आयात पर निर्भरता की समस्या भी है, चूंकि उसका कोई हल नहीं है इसलिए निकट भविष्य में हमारा देश तेल, गैस और कोयले का सबसे बड़ा आयातक बना रहेगा। कंपनियों की बात करें तो कॉर्पोरेट बैलेंस शीट पहले की तुलना में अधिक मजबूत हैं। डेट-इक्विटी अनुपात में सुधार हुआ है और मुनाफा भी बढ़ा है। विदेशी कर्ज को भी हतोत्साहित किया जा रहा है। बैंकों का पूंजीकरण बेहतर हुआ है और ऐसी कंपनियों की तादाद घटी है जहां पूंजी फंस जाती थी। हालांकि संरक्षणवाद भी बढ़ा है लेकिन अर्थव्यवस्था अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्धा के लिए काफी हद तक खुली है और बाहरी उतारचढ़ाव से प्रभावित होती दिखती है। जरूरत यह है कि कंपनियां आपूर्ति क्षेत्र के झटके से बचाव के लिए भंडारण करें तथा कार्यक्रमों को लेकर समय पर आकलन करें। रक्षा जैसे सामरिक क्षेत्र में स्वदेशीकरण पर जोर दिए जाने की आवश्यकता है। इस बीच कुछ बाजारों में अब ज्यादा गहराई है, ज्यादा कारोबारी हैं और इसलिए स्थिरता भी अधिक है। पारदर्शिता और नियमन भी बेहतर हुआ है, हालांकि उसमें और सुधार की गुंजाइश है। यदि आईएलऐंडएफएस जैसे मामले सामने आए तो इसलिए कि निदेशक मंडल, अंकेक्षण फर्म तथा क्रेडिट रेटिंग एजेंसियों ने अपना काम ठीक से नहीं किया।
व्यक्तिगत स्तर पर देखें तो अब भारत सुरक्षा ढांचे के कुछ तत्त्व अवश्य दर्शाता है: दो तिहाई आबादी के लिए खाद्य सुरक्षा कार्यक्रम, ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना जिसे और बेहतर फंडिंग की आवश्यकता है, आबादी के निचले आधे हिस्से के लिए नि:शुल्क स्वास्थ्य बीमा योजना तथा बुजुर्गों के लिए पेंशन जैसी श्रेणियों में नकद भुगतान। वंचित परिवारों को संकट में डालने वाली समयपूर्व मौतों को कम करने के लिए और कदम उठाए जा सकते हैं लेकिन सार्वजनिक स्वास्थ्य बजट कम बना हुआ है। हालांकि शौचालय नल जल योजना से स्वच्छता बढ़नी चाहिए और घरेलू गैस के कनेक्शन बढ़ने से महिलाओं के स्वास्थ्य में सुधार आना चाहिए। सड़क दुर्घटनाओं में कमी लाने के लिए सड़क इंजीनियरिंग में सुधार की आवश्यकता है। बुनियादी आय गारंटी के अभाव में ऐसे कदम आय की सुरक्षा बढ़ाएंगे। रोजगार के रूप में सबसे बेहतर सुरक्षा मुहैया करायी जा सकती है। कोई भी रोजगार नहीं बल्कि उच्च शिक्षित लोगों को बेहतर गुणवत्ता वाले रोजगार दिलाने होंगे ताकि उनमें से अधिक से अधिक लोगों को बेहतर वेतन भत्ता मिले। इसके लिए व्यापक वृहद आर्थिक बदलाव की आवश्यकता होगी जिसमें समय लगेगा। चूंकि निकट भविष्य में रोजगार सुधरते नहीं दिख रहे इसलिए सामाजिक सुरक्षा पहल के रूप में अब बेरोजगारी भत्ते पर विचार होना चाहिए।
Date:12-03-22
दोहरी चुनौती संपादकीय
अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने आने वाले दिनों में भारत की अर्थव्यवस्था प्रभावित होने का जो संकेत दिया है, उसे एक चेतावनी के रूप में देखने की जरूरत है। इस वैश्विक वित्तीय संस्थान की प्रमुख क्रिस्टलीना जार्जीवा ने साफ कहा है कि रूस-यूक्रेन की जंग के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल के दाम जिस तेजी से बढ़ रहे हैं, वह चिंता की बात है और भारत की अर्थव्यवस्था पर इसका असर पड़े बिना नहीं रहेगा। महंगे होते कच्चे तेल पर वैसे तो सरकार भी नजर रखे हुए है। पिछले दिनों कुछेक मौकों पर वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण भी इस पर चिंता जाहिर कर चुकी हैं। उन्होंने कहा भी कि कच्चे तेल के बढ़ते दाम अर्थव्यवस्था के लिए चुनौती बनते जा रहे हैं। वित्त मंत्री की इस चिंता से अनुमान लगाया जा सकता है कि हमें आने वाले दिनों में किस तरह के संकट का सामना करना पड़ सकता है और इसके लिए तैयार रहने की जरूरत है। गौरतलब है कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल एक सौ चालीस डालर प्रति बैरल के करीब आ चुका है। इस क्षेत्र से जुड़ी वैश्विक कंपनियां इसके डेढ़ सौ डालर प्रति बैरल तक जाने की बात पहले ही कह चुकी हैं।
गौरतलब है कि भारत की अर्थव्यवस्था काफी समय से गंभीर चुनौतियों का सामना कर रही है। कोरोना महामारी के दो सालों में तो विकास दर शून्य से नीचे चली गई थी। हालांकि अर्थव्यवस्था का संकट 2017 से ही दिख रहा था और आर्थिक वृद्धि दर लगातार नीचे आ रही थी। पर महामारी के दौरान जिस तरह के हालात बन गए थे, उन्हें देखते हुए विकास दर सामान्य होने में अभी भी लंबा वक्त लग सकता है। अर्थशास्त्रियों की राय भी इससे अलग नहीं है। साल 2020 में तो आर्थिक गतिविधियां एक तरह से ठप ही रही थीं। हालांकि अब जब स्थितियां पटरी पर आना शुरू ही हुईं थीं कि रूस-यूक्रेन संकट खड़ा हो गया। वैसे जीडीपी वृद्धि के अनुमानों को लेकर वैश्विक वित्तीय संस्थान और रेटिंग एजंसियां अभी भी बहुत ज्यादा उत्साहित लग नहीं रही हैं। दो महीने पहले तक जो अनुमान लगाए जा रहे थे, अब उन्हें लेकर संशय दिखने लगे हैं। इसका बड़ा कारण रूस-यूक्रेन की जंग से कच्चे तेल में तेजी का रुख बनना है। कोई नहीं जानता कि जंग कब थमेगी और कच्चा तेल कब नीचे आना शुरू होगा!
हमारा संकट यह है कि कच्चे तेल के मामले में हम दूसरे देशों पर निर्भर हैं। भारत अपनी जरूरत का पचासी फीसद तेल दूसरे देशों से खरीदता है। इनमें रूस भी है। हालांकि आर्थिक प्रतिबंधों के बाद रूस ने भारत को काफी सस्ता तेल देने की पेशकश की है। लेकिन सिर्फ इसी से काम नहीं चलने वाला। हम जिन दूसरे देशों से तेल खरीदते हैं, वे तो सस्ता देने से रहे। जाहिर है, वैश्विक बाजार की तेजी का तेल आयात पर असर पड़ेगा। इससे विदेशी मुद्रा भंडार पर भी प्रभावित होगा। वैसे भी चुनावों के मद्देनजर तेल कंपनियों ने पिछले साढ़े तीन महीने से पेट्रोल और डीजल के दाम नहीं बढ़ाए हैं। पर अब तो चुनाव नतीजे आ चुके हैं और तेल कंपनियां कभी भी दाम बढ़ा सकती हैं। पेट्रोल-डीजल महंगा होते ही महंगाई और बढ़ेगी। चिंता की बात यह है कि महंगाई दर पहले ही काफी ऊंची बनी हुई है। ऐसे में सरकार के सामने दोहरी चुनौती है। महंगा तेल भी खरीदना है और महंगाई का भी सामना करना है।
Date:12-03-22
किसानों के मोर्चे की हार संपादकीय
पजाब में कई किसान संगठनों का राजनीतिक दल (संयुक्त समाज मोर्चा एसएसएम) विधानसभा चुनाव में राजनीतिक प्रभाव नहीं छोड़ पाया। आम आदमी पार्ट (आप) ने राज्य मे प्रचंड जीत हसिल की है, और किसान नेता बलवीर सिंह राजेवाल की अगुवाई वाला संगठन राज्य में एक भी सीट नहीं जीत पाया। कोई एक साल तक तीन कृषि कानूनों के खिलाफ दिल्ली की सीमाओं पर चले किसान आंदोलन की सफलता, इस रूप में कि केंद्र सरकार ने इन कानूनों को वापस ले लिया था, से अभिभूत किसान संगठनों ने पंजाब विधानसभा लड़ने का मन बनाया था। हालांकि विभिन्न किसान संगठनों, जिन्होंने कृषि कानूनों के विरोध में जोरदार आंदोलन चलाया था, ने इस बाबत मंशा को ज्यादा तवज्जो नहीं दी। उनका मानना था कि इससे किसान हितों संबंधी आंदोलन मुद्दे से भटक सकता है। लेकिन कुछ नेताओं का तर्क था कि चुनावी राजनीति में शिरकत से हो ‘राजनीतिक बदलाव’ आ सकेगा। राजनीति में ऐसी भागीदारी से जनांदोलन के संघर्ष को धार दी जा सकती है। इसलिए बीते दिसम्बर महीने में हरियाणा भारतीय किसान यूनियन (चढूनी) के नेता गुरनाम सिंह चढूनी की संयुक्त संघर्ष समिति के साथ गठबंधन करके चुनव लड़ा गया। राजेवाल स्वयं पटियाला जिले की समराला सीट से चुनाव मैदान में उतरे लेकिन उन्हें हार का सामना करना पड़ा। ऐसा पहली बार नहीं हुआ जब किसी जनांदोलन से जुड़े नेता-कार्यकर्ताओं ने चुनाव लड़ने की महत्त्वाकांक्षा दिखाई हो। मजदूरों, छात्र और महिलाओं के मुद्दों पर संघर्ष करने वाले लोग चुनाव में किस्मत जब तब आजमाते रहे हैं। यहां तक कि आरटीआई कार्यकर्त भी मौका मिले तो चुनाव लड़ने से नहीं चुकते। लेकिन राजनीतिक डगर जनांदोलन से निकले लोगों को कम ही रास आई है, और उन्हें राननीत में हाथ आजमाने से तौबा कर ली। कुछ मुद्दों पर अपने आसपास जुटें लोगो के हुजूम को देखकर कुछ लोग अति उत्साह में राजनीति में आने का फैसला करते हैं, लेकिन नाकामी मिलने पर हाथ जला बैठने जैसा महसूस करते हैं। पंजाब में कुछ किसान नेताओं ने दावा किया कि जनता की मांग और दबाव में वे चुनाव लड़ रहे हैं, लेकिन ज्यादातर समय वे संघर्ष करते ही दिखे यानी राजनीति में जद्दोजहद आंदोलनों के संघर्ष से बिल्कुल जुदा है।
Date:12-03-22
खाद्य उत्पादन पर मंड़राता संकट रविशंकर
जलवायु परिवर्तन कई देशों की खाद्य सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बन सकता है। फिर भी इस तरफ ध्यान नहीं दिया जा रहा है। हाल ही में जारी इंटरगवर्नमेंटल पैनल फॉर क्लाइमेट चेंज यानी आईपीसीसी की छठी रिपोर्ट में बताया गया है कि जलवायु परिवर्तन यानी ग्लोबल वार्मिंग कई देशों की खाद्य सुरक्षा के लिए गंभीर खतरा बनकर उभर रही है। रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि इस सदी के अंत तक धरती का तापमान एक से चार डिग्री सेल्सियस तक बढ़ सकता है। अगर वह सही होता है‚ तो इस वजह से भारत में चावल का उत्पादन 10 से 30 फीसदी तक कम हो सकता है। मक्का जैसे मोटे अनाजों की पैदावार 25 से 70 फीसदी तक कम हो सकती है।
सोचिए‚ भारत जैसे विशाल आबादी वाले देश को भोजन का बंदोबस्त तब कितना मुश्किल हो जाएगाॽ बहरहाल‚ विभिन्न रिपोर्टों एवं आंकड़ों के विश्लेषण से यह तथ्य उभरकर सामने आया है कि विश्व में बढ़ते तापमान व जलवायु परिवर्तन के कारण उत्पादन में कमी दर्ज की जा रही है‚ फसल चक्र अनियमित और असंतुलित होता जा रहा है‚ जिससे संपूर्ण विश्व के लिए खाद्य सुरक्षा अहम चुनौती बन रही है। इतना ही नहीं‚ बढ़ते कार्बन उत्सर्जन से इस शताब्दी में विश्व में झगड़े‚ भुखमरी‚ बाढ़ और जनसंख्या के पलायन में भी बढ़ोतरी होने की बात कही जा रही है। इसलिए भविष्य में दुनिया के सभी देशों को ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन कम करने के लिए सभी विकल्पों पर विचार करना होगा।
विकास की तीव्र आंधी में हमें नहीं भूलना चाहिए कि संपूर्ण विश्व की अधिकांश जनसंख्या की आजीविका का मुख्य आधार कृषि ही है। साफ है‚ यदि इसी तरह से हम प्राकृतिक के साथ खिलवाड़ करते रहे तो कृषि पर दिन–प्रतिदिन दबाव बढ़ता जाएगा जिससे अधिकांश जनसंख्या के लिए रोजी–रोटी की व्यवस्था करना मुश्किल हो जाएगा। 2030 तक भूख को खत्म करने का हमारा लक्ष्य भी अधूरा रह जाएगा।
जलवायु परिवर्तन न सिर्फ आजीविका‚ पानी की आपूर्ति और मानव स्वास्थ्य के लिए खतरा पैदा कर रहा है‚ बल्कि खाद्य सुरक्षा के लिए भी चुनौती खड़ी कर रहा है। ऐसे में सवाल पैदा होता है कि क्या भारत जलवायु परिवर्तन के खतरों के बीच आने वाले समय में इतनी बड़ी जनसंख्या का पेट भरने के लिए तैयार हैॽ भारत आज जिन चुनौतियों का सामना कर रहा है‚ उनमें से खाद्य सुरक्षा की चुनौती सबसे प्रमुख है। हम सबको मालूम है कि 2050 तक विश्व की आबादी लगभग 9.5 अरब हो जाएगी। इसका स्पष्ट मतलब है कि हमें दो अरब अतिरिक्त लोगों के लिए 70 प्रतिशत ज्यादा खाना पैदा करना होगा। इसलिए खाद्य एवं कृषि प्रणाली को जलवायु परिवर्तन के अनुकूल बनाना होगा और ज्यादा लचीला‚ उपजाऊ और टिकाऊ बनाने की जरूरत होगी। इसके लिए प्राकृतिक संसाधनों का उचित इस्तेमाल करना होगा और खेती के बाद होने वाले नुकसान में कमी के साथ ही फसल की कटाई‚ भंडारण‚ पैकेजिंग और ढुलाई व विपणन की प्रक्रियाओं के साथ ही जरूरी बुनियादी ढांचा सुविधाओं में सुधार करना होगा।
खैर‚ दो दशक से ज्यादा हो चुके हैं‚ लेकिन आज भी दुनिया उन्हीं सवालों से जूझ रही है‚ जो उस वक्त हमारे सामने थे। बल्कि स्थितियां और गंभीर ही हुई हैं‚ जिनने हमारे सामने बहुत–सी चुनौतियां खड़ी कर दी हैं। इससे आर्थिक विकास के मॉड़ल लड़खड़ाने लगे हैं। भूख खाद्य असुरक्षा और गरीबी ने न केवल गरीब देश पर असर डाला है‚ बल्कि पूर्व के धनी देशों को भी परेशानी में डाल दिया है। हमारे जलवायु‚ ईंधन और विविधता से जुड़े संकटों ने भी आर्थिक विकास पर असर दिखाया है। सचमुच आज हमारे सामने विकास बनाम पर्यावरण का मुद्दा है‚ और दोनों में से किसी को भी त्यागना संभव नहीं है। इसलिए समन्वित दृष्टिकोण के साथ वैश्विक हितों को साझा किया जाना चाहिए। यह ऐसी समस्या भी है जिसमें बिना जनसमूह की भागीदारी के सफलता नहीं हासिल की जा सकती है। इसलिए इसे रोकने के लिए हर पहलू से गंभीर प्रयास करने होंगे। देशों को एक–दूसरे पर आरोप लगाने की बजाय साथ मिल कर प्रयास करने होंगे। इसमें कोई संदेह नहीं है कि विकसित देशों की इसमें बड़ी भूमिका है‚ और उन्हें इसे रोकने के लिए जरूरी फंडिंग करनी चाहिए। आईपीसीसी की रिपोर्ट में बहुत साफ शब्दों में कहा गया है कि जलवायु परिवर्तन से होने वाले नुकसान के बारे में पहले जो अनुमान लगाए गए थे‚ उनके मुकाबले नुकसान कहीं ज्यादा बड़ा होगा। इसलिए उसे रोकने का प्रयास भी बहुत बड़ा होना चाहिए।
Date:12-03-22
बुनियादी जरूरतें संपादकीय
भारतीय जनता पार्टी ने उत्तर प्रदेश में न केवल अपने बुनियादी आधार को मजबूत किया है, वह जनता की नजर में सबसे प्रासंगिक पार्टी भी साबित हुई है। लोग उसे सत्ता में रखते हुए काम लेते रहना चाहते हैं। पार्टी ही नहीं, विश्लेषकों को भी लग रहा था कि युवाओं या बेरोजगार मतदाताओं का मोहभंग हुआ है, लेकिन यह मोहभंग इतना भी नहीं था कि सत्ता परिवर्तन हो जाए। इसका मतलब, रोजगार के मोर्चे पर उत्तर प्रदेश की सरकार ने जो प्रयास किए हैं, उसके मद्देनजर युवाओं को आगे के लिए उम्मीदें हैं। साल 2021 के अंत तक रोजगार करने वालों की आबादी 32.79 प्रतिशत हो गई। इसमें एक बड़ा कारण महामारी और लॉकडाउन है। निश्चित रूप से रोजगार के मोर्चे पर राज्य सरकार ने अपनी ओर से प्रयास किए हैं, इसलिए लोगों का उस पर विश्वास कायम रहा है। पर जीत की खुशी में यह भ्रम किसी को नहीं होना चाहिए कि अब बेरोजगारी मुद्दा नहीं है। ऐसे युवाओं की विशाल आबादी है, जो मुश्किल समय में मिले रोजगार का महत्व जानती है।
ठीक इसी तरह का मुद्दा है कृषि विकास और सुधार। किसान आंदोलन का असर नहीं के बराबर रहा है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि सरकार किसानों से किए गए वादों को भुलाकर भविष्य में कोई नुकसान झेले। कृषि क्षेत्र अभी भी हमारी अर्थव्यवस्था का एक बेहद महत्वपूर्ण आधार है। किसानों को उपज की उचित कीमत देने और आवारा पशुओं की समस्या सरकार के संज्ञान में रहनी चाहिए। सरकार के सामने तीसरी चुनौती शिक्षा के मोर्चे पर है, उत्तर प्रदेश में अच्छे शिक्षण संस्थानों की जरूरत है, ताकि किसी भी छात्र को प्रदेश के बाहर पढ़ने न जाना पडे़। आबादी को कुशल बनाने की जरूरत है, ताकि उसे रोजगार या उद्यम में सुविधा हो। बीस प्रतिशत से ज्यादा आबादी अभी भी निरक्षर है, तो आजादी के अमृत वर्ष में उत्तर प्रदेश को भी जल्द से जल्द पूर्ण साक्षर बनाने का संकल्प लेना चाहिए। बजट बढ़ाकर प्राथमिक स्तर से उच्च शिक्षा तक शैक्षणिक ढांचे को ऐसा चाक-चौबंद करना चाहिए कि प्रदेश विकसित राज्यों की श्रेणी में आ खड़ा हो। अच्छी चिकित्सा-व्यवस्था भी सरकार की प्राथमिकता होनी चाहिए। महामारी के समय युद्ध स्तर पर अचानक कुछ सुधार हुए हैं, मगर उत्तर प्रदेश समग्रता में चिकित्सा सेवा में पीछे है। नीति आयोग के अनुसार, चिकित्सा सेवा के मामले में बड़े राज्यों के बीच उत्तर प्रदेश निचले पायदानों पर है। प्रदेश को देश के श्रेष्ठ 10 चिकित्सा सुविधा वाले प्रदेशों में लाना प्राथमिकता होनी चाहिए।
प्रदेश सरकार की चौथी प्राथमिकता औद्योगिक विकास होना चाहिए। तमिलनाडु अपेक्षाकृत छोटा राज्य है, लेकिन वहां से लगभग एक तिहाई उद्योग ही उत्तर प्रदेश में लगे हैं। उत्तर प्रदेश देश का सबसे बड़ा बाजार भले हो, लेकिन उद्योग लगाने या चलाने के मामले में तमिलनाडु बहुत आगे है। उत्तर प्रदेश में छोटे-बडे़ हर प्रकार के उद्यम या निवेश की जरूरत है। इसके लिए सबसे बढ़कर है जन-भागीदारी। लोग अपनी आवाज खुलकर बुलंद कर रहे हैं। यह मुखरता स्थानीय स्तर पर बुनियादी सुविधाएं मांगने में भी इस्तेमाल होनी चाहिए। तमिलनाडु के लोग आगे बढ़कर सरकारी स्कूलों के लिए शिक्षक मांगते हैं, प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों पर डॉक्टरों की नियमित मौजूदगी मांगते हैं, ध्यान रहे, यह काम दिल्ली की स्थानीय सरकार अपने स्तर पर ही करने की कोशिश कर रही है। बेशक, लोग जाति-धर्म से ऊपर उठकर सजग होंगे, तो सरकारें भी तेजी से काम कर सकेंगी।
Date:12-03-22
महिलाएं अब करने लगी हैं फैसला यामिनी अय्यर, ( प्रेसिडेंट, सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च )
हमें मोदी पसंद हैं- ये शब्द थे रावत समुदाय की उस महिला के, जो मोहनलालगंज में अपने पति के साथ बैठकर सरकारी योजनाओं से मिलने वाले फायदे हमें गिना रही थी। उसे सरकारी इमदाद के रूप में राशन और गैस मिल रहे थे, साथ ही, नए बने ‘ई-श्रम कार्ड’ से 1,000 रुपये बहुत जल्द मिलने का वादा किया गया था। दूसरी ओर, उसके पति की राय भी बिल्कुल स्पष्ट थी। बेरोजगारी और बढ़ती महंगाई की वजह से उसका वोट समाजवादी पार्टी को जाने वाला था। एग्जिट पोल पर यदि विश्वास करें, तो पति-पत्नी की सोच में यह अंतर कोई अपवाद नहीं था।
पूर्वी उत्तर प्रदेश के तमाम हिस्सों में हिंदू महिला मतदाताओं के साथ बातचीत में हमने कुछ ऐसा ही महसूस किया। न सिर्फ घर के महिला व पुरुष सदस्यों की प्राथमिकताओं में हमें अंतर दिखा, बल्कि मोदी के साथ भावनात्मक जुड़ाव व कल्याणकारी योजनाओं का लाभ मिलने संबंधी वादे पर उनको भरोसा करते हुए भी हमने देखा। यह विश्वास दिल से किए गए वर्षों की मेहनत से कमाए गए हैं। दरअसल, महिला मतदाताओं के बीच विश्वास जमाने और उनसे संपर्क बनाने की एक कोशिश 2017 की उज्ज्वला योजना थी, जिसके तहत उनमें गैस सिलेंडर मुफ्त में बांटे गए थे। 2022 में यह काम मुफ्त राशन ने किया। कई महिला वोटरों ने बताया कि उन्हें अक्सर पार्टी कार्यकर्ताओं के फोन आते हैं, जो राशन ले आने की बात याद दिलाते हैं।
हालांकि, यह ताकीद महज राशन की नहीं होती थी। मोहनलालगंज में ही एक युवा गृहिणी ने (जिसने इस बार बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के बजाय संभवत: भाजपा को वोट दिया होगा) बताया, ‘उनके फोटो हर जगह दिखते हैं’। यानी, लगातार स्मरण करने की इस कवायद ने लाभकारी योजनाओं को लेकर ऐसा माहौल बनाया, जिसमें प्रधानमंत्री की कल्याणकारी छवि और भाजपा के पार्टी काडर की ताकत, दोनों का संगम सुगमता से हो गया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी आम लोगों का भरण-पोषण करने वाले नेता के रूप में उभरे। यह महिलाओं की राजनीतिक लामबंदी का एक प्रभावी औजार साबित हुआ।
महिलाओं की ऐसी राय निश्चय ही हमें उन कारकों को समझने में मदद करती है, जिसने उत्तर प्रदेश में भाजपा की जीत सुनिश्चित की। मगर प्रधानमंत्री को लेकर बने नैरेटिव और कई महिला मतदाताओं द्वारा जाहिर की गई यह आत्मीयता भारतीय चुनाव में आए एक महत्वपूर्ण बदलाव के भी संकेत हैं, जिस पर गंभीर चर्चा किए जाने की दरकार है।
एक अहम वोट बैंक के रूप में महिला मतदाताओं का उभरना जाति पर आधारित पहचान के ढांचे को चोट पहुंचाता है। यह वही पहचान है, जिससे राजनीति की हमारी समझ प्रभावित होती रही है, विशेष रूप से उत्तर भारत में। पूर्वी उत्तर प्रदेश का नैरेटिव मुद्दे के बजाय व्यक्ति (मोदी) के ईद-गिर्द निर्मित एक नई राजनीति के उदय की ओर इशारा करता है, जिसमें नेतृत्व को उभारने के लिए पार्टी द्वारा असीमित संसाधनों का इस्तेमाल किया जाता है। राजनीतिक विज्ञानी नीलांजन सरकार इसे ‘विश्वास की राजनीति’ कहते हैं।
महिला मतदाता विश्वास की इसी राजनीति की नींव बनकर उभर रही हैं। खासतौर से उनके लिए चलाई जाने वाली योजनाओं में उनको लाभार्थी बनाना इसमें मददगार साबित हो रहा है। हमारी बातचीत में जन-धन खाता खोलने वाली ज्यादातर महिला मतदाताओं ने उन दिनों को याद किया, जब कोविड-19 के कारण पहली बार लगाए गए लॉकडाउन के दौरान उनके बैंक खाते में पैसे आए थे। इसी तरह, उज्ज्वला भी एक लोकप्रिय योजना है और महिला मतदाताओं को मोदी से जोड़ती है, फिर चाहे कई लाभार्थियों के पास गैस सिलेंडर को फिर से भरने का साधन बेशक न हो। यही वह शुरुआती रणनीति है, जिसने प्रत्यक्ष तौर पर महिला मतदाताओं को भाजपा के पक्ष में संगठित किया।
भले ही महिलाओं ने बार-बार यह बताया कि राशन से मिलने वाले फायदे बेरोजगारी या महंगाई की भरपाई नहीं कर सकते, फिर भी यह भाजपा को वोट देने की एक बड़ी वजह जान पड़ती है। हालांकि, व्यक्तिगत राजनीति और कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से महिला मतदाताओं को लुभाने की यह रणनीति सिर्फ भाजपा की नहीं है। लोकनीति के मुताबिक, पिछले साल के पश्चिम बंगाल चुनाव में भाजपा पर तृणमूल कांगे्रस की जीत में ममता बनर्जी को पसंद करने वाले पुरुष मतदाताओं की तुलना में महिला वोटरों की संख्या बहुत अधिक थी। बिहार में भी नीतीश कुमार कुछ इसी तरह की रणनीति से सफल रहे हैं।
महिलाओं व पुरुषों के बीच की ये स्पष्ट राजनीतिक प्राथमिकताएं हमारे चुनावी परिदृश्य में नए कारक के रूप में उभर रही हैं। भाजपा ने इनको प्रभावी ढंग से लामबंद किया है। यह जाति की राजनीति से बिल्कुल अलग है। साफ है, मौजूदा ढांचे में महिलाएं व्यक्तिगत राजनीति से जुड़कर एक लाभार्थी के रूप में मत डाल रही हैं। लोकतंत्र पर इसके दीर्घकालिक प्रभाव की गहन पड़ताल आवश्यक है।
और अंत में चर्चा कांग्रेस की। महिला मतदाताओं के बढ़ते प्रभाव को देखते हुए ही संभवत: कांग्रेस आलाकमान ने ‘लड़की हूं, लड़ सकती हूं’ अभियान की कल्पना की होगी। मगर कांग्रेस उस बुनियाद को समझने और पहचानने में विफल रही, जो महिला मतदाताओं को भाजपा, और विशेष तौर पर नरेंद्र मोदी से जोड़ती है। यदि वह महिला मतदाताओं को कहीं अधिक गंभीरता से लेना चाहती है, तो उसे महिला मतदाताओं और उनकी प्राथमिकताओं को गहराई से समझने की कुव्वत खुद में पैदा करनी होगी। एक महत्वपूर्ण वोट बैंक के रूप में महिला मतदाताओं की उपस्थिति ने भारत की चुनावी राजनीति की दिशा मोड़ दी है। बेशक भारतीय राजनीति को परखने के लिए मंडल-कमंडल का विश्लेषण किया जाता है, लेकिन अब महिला मतदाताओं के लिए ये मुद्दे शायद ही मायने रखते हैं। नेताओं की भावनात्मक अपील उनको कहीं ज्यादा राजनीतिक पार्टियों से जोड़ती है। लिहाजा, अब समय आ गया है कि हम इन पर संजीदगी से ध्यान दें।
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12 March 2022
प्रश्न–349 – (अ) भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में सिनेमा की भूमिका का मूल्यांकन कीजिये। (100 शब्द)
(ब) लता मंगेशकर का भारतीय संगीत में योगदान पर एक संक्षिप्त नोट लिखें। (100 शब्द)
Question–349 – (a) Evaluate the role of cinema in the Indian freedom movement. (100 words)
(b) Write a short note on Lata Mangeshkar’s contribution to Indian music. (100 words)
नोट : इसका उत्तर आपको हमें नहीं भेजना है, यह आपके स्वयं के अभ्यास के लिए है।
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भारत में तेजी से बढ़ते यूनिकॉर्न के चलते वह वैश्विक स्तर पर अमेरिका और चीन के बाद तीसरे नंबर पर आ गया है। हरून ग्लोबल यूनिकॉर्न इंडैक्स 2021 की इस सूची में मिलने वाली बढ़त के बाद भारत को यह देखना जरूरी है कि इससे अर्थव्यवस्था के साथ-साथ रोजगार की स्थिति में क्या अंतर पड़ सकता है।
यूनिकॉर्न के आर्थिक मूल्यांकन में पूंजी लागत, मांग और पूर्ति जैसे कई मैक्रोइकॉनॉमिक तत्व जुड़े हुए हैं। फिर भी भारत में इनकी स्थिति कुछ आधारों पर निर्भर करती है।
यदि देखे तो रोजगार के स्तर पर देखें, तो स्टार्टअप से इस क्षेत्र में अवसर बढ़े हैं। उदाहरण के लिए फ्रेशवर्क की शुरूआत कुछ दर्जन कर्मचारियों के साथ हुई थी, परंतु थोड़े ही समय में इनकी संख्या 3,000 पहुँच गई।
स्टार्टअप के कर्मचारी धीरे-धीरे अपनी खुद की कंपनी खोलते हैं या किसी नवोन्मेष में निवेश करते हैं। नवोन्मेष और विकास के लिए तकनीक और कर्मचारी, दोनों की ही जरूरत होती है।
स्टार्टअप, रोजगार के अवसरों में और अधिक वृद्धि कर सकते हैं, लेकिन इनका लक्ष्य यह नहीं होता है।
भारत में प्रतिभा और नवोन्मेष की संभावनाओं को देखते हुए उम्मीद की जा सकती है कि यहाँ वेन्चर कैपिटल या उद्यम पूंजी को लेकर वैश्विक पूंजीपतियों की फंडिंग की गति बढ़ेगी, और इससे अर्थव्यवस्था की भी रफ्तार बढ़ेगी।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित एक संवाद पर आधारित। 25 फरवरी, 2022
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Date:10-03-22
Sumy Success With Operation Ganga winding down, India must now take a clear position on Ukraine crisis TOI Editorials
In an extremely delicate operation, the last big group of about 700 Indian students was finally evacuated from the northeastern Ukrainian city of Sumy. Establishing a humanitarian corridor for the extraction had proved to be quite challenging. In fact, earlier attempts failed due to Russian shelling. But hectic diplomacy on India’s part finally resulted in a breakthrough with the Ukrainians and Russians agreeing to provide safe passage to the Sumy students. They are now expected to cross over to Poland from where they will board Operation Ganga flights back to India.
The successful Ukraine evacuation adds to India’s long list of such rescue missions from war-torn countries. The most notable ones include the 1990 Kuwait airlift where around 1,70,000 Indians were brought back home after Iraqi forces invaded Kuwait, kicking off the first Gulf War. Similarly, when conflict between Israel and Hezbollah broke out in 2006, India launched Operation Sukoon to evacuate not just Indians but also nationals of neighbouring countries like Sri Lanka and Nepal with the help of the Indian navy. Then during Operation Rahat in 2015, India evacuated nearly 4,000 citizens along with foreign nationals of 26 countries from war-torn Yemen.
That said, now that the Ukraine rescue operation is winding down, the focus will shift back to India’s position on the war. Hitherto, the need to evacuate around 20,000 Indian citizens in Ukraine was seen as one of the factors influencing New Delhi’s neutral position on the war. But with most Indians out, pressure will grow on New Delhi to take a clear stand.
This is already evident in France’s stated desire to see India play a more “forceful” role in the next phase of UNSC meetings, while the US has long made clear that India can’t have different standards for the Indo-Pacific and what’s happening in Ukraine. There’s no denying that Russia’s aggression on Ukraine was militarily unprovoked and violated the sovereignty of an independent state. With China too violating India’s territorial sovereignty, the only way New Delhi can counter Beijing is through the support of the US and its allies. Plus, Russia is now primed to be in the China camp. India can’t afford to abstain from critiquing Russia any longer.
Date:10-03-22
Global Warning is Real Europe-Centric After 30 Years Bruce Riedel, [ The writer is a former CIA analyst and ex-member, US National Security Council ]
The decision by Joe Biden to ban Russian oil and gas imports to the US reflects the fact that the Ukraine crisis is fundamentally changing US foreign policy. It is the defining event of a generation, perhaps the most important single event since the Cuban missile crisis in 1962 that precipitated the largest global arms race since World War 2. The US is going to revert to being Europe-centric.
Biden has been working with unusually excellent intelligence on Russian intentions since last December when the CIA first predicted that Russia would invade Ukraine. CIA Director William Burns had then gone to Moscow to tell the Russians to desist. It was then that the Biden administration began developing a tough sanctions package, which is now being rolled out in coordination with the US’ allies.
The Europeans are, in many ways, leading the effort. Germany’s decision to quickly rebuild its military after 30 years of running it down has been a game changer. The Nato alliance that Donald Trump denigrated has been rejuvenated. Finland and Sweden may join it — Biden just hosted the Finnish president at the White House last week. Biden is right to resist creating a no-fly zone. That would mean war with Russia. The Pentagon is rightly against it.
But the US military will reverse 30 years of drawing down forces in Europe for West Asia and Afghanistan. Expect significant increases in US and other Nato forces in Poland, Romania and the Baltic states (and, possibly, Finland). The notion of a US pivot to Asia is overtaken by the crisis in Europe. Russia is a far more dangerous opponent than al-Qaeda or Saddam Hussein could ever be and against which the US has fought two wars during this century. Confrontation with Russia is the immediate priority. China is the more distant problem.
Biden enjoys broad bipartisan support for standing up to Vladimir Putin, a sharp break from the polarisation of recent years in US national security policy. If Biden was at all reluctant to ban Russian oil, the Congress was eager for him to act.
Russia’s economy revolves around oil. If markets in Europe are shut down, it will be devastating to the Russian economy. Biden is already pressing Saudi Arabia and the other Gulf states to increase oil production. The Europeans will do the same. US sanctions on Iran and Venezuela may be eased. If the Iran nuclear deal is revived, Iranian oil and gas exports will rise significantly. Algeria, with large gas holdings, is a likely beneficiary of the new market conditions. It is closer to the European markets than the Gulf states.
The US transition to a Europe-focused foreign policy is reinforced daily by the images of destruction in Ukraine and the plight of Ukrai- nian refugees fleeing to the West. The powerful impact of these pictures is already changing US politics. Trump is badly discredited by his years of close association with Putin. The American public should blame Putin for high oil prices.
If the Russians occupy all or most of Ukraine, expect the US to support a resistance insurgency in Ukraine much as it had supported the mujahideen in Afghanistan in the 1980s. In 1979, Jimmy Carter rapidly mobilised a strategic alliance to fight the Russians. Within two weeks after the Soviet invasion on December 24, 1979, the US president had persuaded Zia-ul-Haq to support the mujahideen with refuge, bases and training in Pakistan.
The US and Saudi Arabia would go on to jointly fund the Afghan insurgency, Pakistan’s Inter-Services Intelligence (ISI) would be the patrons of the mujahideen, while the CIA and the Saudi intelligence service would be the financiers and quartermasters of the war spending abo- ut $5 billion together. No CIA officer ever was deployed in Afghanistan. Britain’s MI6 did send officers into Afghanistan to deliver select weapons and training. The ISI did all the rest. It was Zia’s war. The ISI trained and occasionally led the mujahideen in battle, even striking into Soviet Central Asia.
The Afghan people paid a horrible cost for the war. As I wrote in What We Won: America’s Secret War in Afghanistan, at least 1 million Afghans died, 5 million became refugees in Pakistan and Iran, and millions more were displaced in their own country. But they won. The Soviet Union collapsed. Ukraine was born.
The geopolitical implications of the Ukrainian crisis are just beginning to play out. Oil will be a central issue. A dividing line is once more separating democracies from dictatorship.
Date:10-03-22
Tradition and formality Leaders’ wrangling should not lead to politicising of constitutional norms Editorial
Two contrasting issues concerning the legislature in two States appear to sum up the potential for political controversy when elected governments and Governors do not see eye to eye. In the West Bengal Assembly, Chief Minister Mamata Banerjee and legislators of her party had to virtually plead with Governor Jagdeep Dhankhar to start reading his customary address amidst a prolonged uproar by the Opposition BJP MLAs. Mr. Dhankhar appeared ready to give in to the protesters, but was ultimately persuaded into reading the first and last lines. In Telangana, on the other hand, the K. Chandrasekhar Rao government seems to have decided not to have Governor Tamilisai Soundararajan address the legislature before it presented this year’s Budget. Instead, it is treating the current meeting of the legislature as a continuation of the last session. That the session, which last met some months ago, was not prorogued, has given scope for the government to contend that it is just a further meeting, and it is not necessary for the Governor to open it with an address. The ceremonial address is usually delivered in the first session of every year. Dr. Soundararajan has issued a rare statement to argue that the government’s position was technical, and it would not be proper to commence the Budget session without her address. The episode appears to arise from points of conflict between the government secretariat and Raj Bhavan, as the ruling TRS seems aggrieved that the Governor deviated from the text of her address last year and on some other issues too.
The Governor’s address is a constitutional formality, albeit a significant one, as it is essentially a statement of policy of the regime of the day. That the formal occasion is mired in political wrangling is a sign of institutional decay and unwarranted politicisation of constitutional norms. That Ms. Banerjee saw the incidents in the Assembly, which almost resulted in the abandonment of the Governor’s address, as “an attempt to create a constitutional crisis” shows that leaders still attach constitutional significance to the tradition. It will be desirable if the same recognition is seen in Telangana too. After all, if not now, the next session will have to open with the Governor’s address. It is true that there are sound arguments that question the need and the relevance of the office of Governor, or support the view that some incumbents are politically partisan. There may even be a case for doing away with the formality, or even arguing that the policy statement is better read out by the elected Chief Minister. However, as long as the current system is in vogue, there is a case for abiding by the norms. Politics notwithstanding, it is only in such formality that civility in public discourse is expressed.
Date:10-03-22
Water management needs a hydro-social approach Freshwater resources are under stress, the principal driver being human activities in their various forms Srikumar Chattopadhyay is ICSSR National Fellow, Gulati Institute of Finance and Taxation, and former Scientist, National Centre for Earth Science Studies, Thiruvananthapuram
The Global Water System Project, which was launched in 2003 as a joint initiative of the Earth System Science Partnership (ESSP) and Global Environmental Change (GEC) programme, epitomises global concern about the human-induced transformation of fresh water and its impact on the earth system and society. The fact is that freshwater resources are under stress, the principal driver being human activities in their various forms.
Fresh water, water valuation
In its fourth assessment report in 2007, the Intergovernmental Panel on Climate Change (IPCC) highlighted the link between societal vulnerability and modifications of water systems. It is globally estimated that the gap between demand for and supply of fresh water may reach up to 40% by 2030 if present practices continue.
The formation of the 2030 Water Resource Group in 2008, at the instance of the World Economic Forum, and the World Bank’s promotion of the group’s activity since 2018, is in recognition of this problem and to help achieve the Sustainable Development Goal (SDG) on water availability and sanitation for all by 2030 (SDG 6). Formally, it is: “to ensure safe drinking water and sanitation for all, focusing on the sustainable management of water resources, wastewater and ecosystems….” The latest UN World Water Development Report, 2021, titled ‘Valuing Water’, has laid stress on the proper valuation of water by considering five interrelated perspectives: water sources; water infrastructure; water services; water as an input to production and socio-economic development, and sociocultural values of water.
Designing a comprehensive mix of divergent views about water (along with ecological and environmental issues) held by stakeholder groups is necessary. In this context, a hydro-social cycle approach provides an appropriate framework. It repositions the natural hydrological cycle in a human-nature interactive structure and considers water and society as part of a historical and relational-dialectical process.
Inter-basin transfer projects
The anthropogenic factors directly influencing a freshwater system are the engineering of river channels, irrigation and other consumptive use of water, widespread land use/land cover change, change in an aquatic habitat, and point and non-point source pollution affecting water quality. The intra- and inter-basin transfer (IBT) of water is a major hydrological intervention to rectify the imbalance in water availability due to naturally prevailing unequal distribution of water resources within a given territory.
There are several IBT initiatives across the world. One recent document indicates that there are 110 water transfer mega projects that have either been executed (34 projects) or being planned/under construction (76 projects) across the world. The National River Linking Project of India is one of those under construction. These projects, if executed, will create artificial water courses that are more than twice the length of the earth’s equator and will transfer 1,910 km3 of water annually. They will reengineer the hydrological system with considerable local, regional and global ramifications. Based on a multi-country case study analysis, the World Wildlife Fund/World Wide Fund for Nature (2009) has suggested a cautious approach and the necessity to adhere to sustainability principles set out by the World Commission on Dams while taking up IBT projects.
Some of the key assumptions
Recently, inter-basin transfer of water drew attention in India due to a provision made in Budget 2022 for the Ken Betwa river link project which is a part of the National River Linking project (mooted in 1970 and revived in 1999). This decision raises larger questions about hydrological assumptions and the use and the management of freshwater resources in the country. We shall ponder over some of them.
First, the basic premise of IBT is to export water from the surplus basin to a deficit basin. However, there is contestation on the concept of the surplus and deficit basin itself as the exercise is substantially hydrological. Water demand within the donor basin by factoring present and future land use, especially cropping patterns, population growth, urbanisation, industrialisation, socio-economic development and environmental flow are hardly worked out. Besides this, rainfall in many surplus basins has been reported as declining. The status of the surplus basin may alter if these issues are considered.
Second, there is concern about the present capacity utilisation of water resources created in the country. By 2016, India created an irrigation potential for 112 million hectares, but the gross irrigated area was 93 million hectares. There is a 19% gap, which is more in the case of canal irrigation. In 1950-51, canal irrigation used to contribute 40% of net irrigated area, but by 2014-15, the net irrigated area under canal irrigation came down to less than 24%. Ground water irrigation now covers 62.8% of net irrigated area. The average water use efficiency of irrigation projects in India is only 38% against 50%-60% in the case of developed countries.
Agriculture, grey water use
Even at the crop level we consume more water than the global average. Rice and wheat, the two principal crops accounting for more than 75% of agricultural production use 2,850 m 3/tonnes and 1,654 m 3/tonnes of water, respectively, against the global average of 2,291m 3/tonnes and 1,334m 3/ tonnes in the same order. The agriculture sector uses a little over 90% of total water use in India. And in industrial plants, consumption is 2 times to 3.5 times higher per unit of production of similar plants in other countries. Similarly, the domestic sector experiences a 30% to 40% loss of water due to leakage.
Third, grey water is hardly used in our country. It is estimated that 55% to 75% of domestic water use turns into grey water depending on its nature of use, people’s habits, climatic conditions, etc. At present, average water consumption in the domestic sector in urban areas is 135 litres to 196 litres a head a day. Given the size of India’s urban population (469 million estimated for 2021), the amount of grey water production can be well imagined. If grey water production in the rural areas is considered it will be a huge amount. The discharge of untreated grey water and industrial effluents into freshwater bodies is cause for concern. The situation will be further complicated if groundwater is affected.
Apart from the inefficient use of water in all sectors, there is also a reduction in natural storage capacity and deterioration in catchment efficiency. The issues are source sustainability, renovation and maintenance of traditional water harvesting structures, grey water management infrastructure, groundwater recharge, increasing water use efficiency, and reuse of water.
Planning ahead
Looking into these issues may not be adequate to address all the problems. Nevertheless, these measures will help to reduce demand supply gap in many places, and the remaining areas of scarcity can be catered to using small-scale projects. The axiom that today’s water system is co-evolving and the challenges are mainly management and governance has been globally well accepted. Water projects are politically charged and manifest an interplay of social relations, social power, and technology.
It is important to include less predictable variables, revise binary ways of thinking of ‘either or’, and involve non-state actors in decision-making processes. A hybrid water management system is necessary, where (along with professionals and policy makers) the individual, a community and society have definite roles in the value chain. The challenge is not to be techno-centric but anthropogenic.
Date:10-03-22
A new vision for old age care A formal approach to homes for the elderly is an important policy and planning issue for India Tejah Balantrapu is Associate Director, Science, Health Data, and Story-telling , L.V. Prasad Eye Institute; Srinivas Marmamula is Associate Director, Public Health Research and Training, L.V. Prasad Eye Institute ]
As India becomes increasingly urbanised and families break up into smaller units, homes for the elderly have sprung up. The care of elderly people is managed by a set of professionals or voluntary organisations interested in geriatric services. The number of such care homes is rising rapidly in urban and semi-urban India. These homes are either paid for, or offer free or subsidised service. Typically, such homes are run by NGOs, religious or voluntary organisations with support from the government, or by local philanthropists. They provide accommodation, timely care, and a sense of security for their residents. However, the quality of service varies as these homes lack regulatory oversight. Many homes lack clearly established standard operating procedures, and their referral paths to health care are informal. There is an urgent need to understand the quality of life at such institutions, including the impact of these homes on the mental health of their residents.
A rapidly growing section
A formal approach to homes for the elderly is an important policy and planning issue for India. The UN World Population Ageing Report notes that India’s ageing population (those aged 60 and above) is projected to increase to nearly 20% by 2050 from about 8% now. By 2050, the percentage of elderly people will increase by 326%, with those aged 80 years and above set to increase by 700%, making them the fastest-growing age group in India. With this future in mind, it is essential that our policy framework and social responses are geared to meet this reality.
A recent set of research papers from Hyderabad focusing on the quality of health in homes for the elderly has some interesting insights. The papers highlight the fact that good intentions and a sense of charity are often inadequate when it comes to addressing the basic health needs of their elderly residents. These papers are outcomes of the Hyderabad Ocular Morbidity in Elderly Study (HOMES) by the L.V. Prasad Eye Institute that was primarily meant to understand the vision needs of elderly residents of such homes. About 30% of the residents who were part of the study (over 1,500 participants from 40 homes) had a vision impairment of some sort, but nearly 90% of this vision impairment could be addressed by simple, relatively low-cost health interventions: issuing better eye glasses or cataract surgery.
The study also found some ‘unseen’ effects of vision impairment: many were prone to depression. In fact, those with both vision and hearing impairment had a rate of depression that was five times higher than those without. Our homes, buildings and social environment are not built keeping the elderly (or people with disabilities) in mind. As people age, and their motor skills weaken, they are at a greater risk of falling down and hurting themselves. Having an impairment increases this risk. Instead of planning for accessible and elderly-friendly structures that allow them to operate safely, we reduce their mobility. People with functional skills are asked to stay away from daily tasks like cooking, sewing, cleaning, or washing up. This reduces their sociability, their sense of independence and well-being — all leading up to mental health issues and depression.
The state of homes for the elderly today offers us some low-hanging fruit we can address easily: build formal pathways for basic health screening between such homes and public health facilities. This can include screenings for blood sugar, blood pressure, periodic vision and hearing screening, and a simple questionnaire to assess mental health. Such interventions are inexpensive (think of all the motorcycle-operated screenings outside public grounds for morning-walkers) and could go a long way in identifying health issues and offering support. The next step would be to build formal pathways to address any health issues that such screenings identify. Many hospitals (public, NGO-run, and private care) can help.
Public policy support
Crucial though will be the need for robust public policy to support homes for the elderly. Health institutions will also need to offer a comprehensive set of packages that are tailored for the elderly — not piecemeal solutions for diabetes, cardiology or cancer, for example. What happens once care is provided? Homes for the elderly must be guided, again by policy, to make their facilities, buildings and social environment elderly- and disabled-friendly. Design, architecture and civic facilities must be thought from the ground up — and these innovations must be available for all residents, not just those living in expensive ones. There are lessons here for society as a whole, but, as they say, let’s take one step at a time.
Date:10-03-22
जिसकी लाठी उसकी भैंस आज भी एक सच्चाई चेतन भगत, ( अंग्रेजी के उपन्यासकार )
यूक्रेन पर रूस के हमले से दुनिया चौंक गई थी। अनेक विशेषज्ञ भी इसका पूर्वानुमान नहीं लगा सके थे। खटपट तो लम्बे समय से चल रही थी, लेकिन किसी को उम्मीद नहीं थी कि रूस यूक्रेन पर पूरे दमखम से धावा बोल देगा। साल 2022 में यह अकल्पनीय ही है कि कोई सम्प्रभु देश किसी दूसरे पर हमला कर सकता है। दुनिया स्तब्ध है। न्यूज चैनलों पर नॉन-स्टॉप कवरेज चल रहा है। सोशल मीडिया पर वीडियोज, मीम्स और लेख भरे पड़े हैं। पश्चिमी देशों ने एकजुट होकर रूस की निंदा की है। कठोर प्रतिबंध लगाए गए हैं। इसके बावजूद यूक्रेन अपने से कहीं ताकतवर शत्रु से अकेला ही लड़ रहा है। युद्ध समाप्त करने की मांगें, यूक्रेनवासियों का समर्थन, रूस की निंदा- ये सब अपनी जगह दुरुस्त हैं, लेकिन इस युद्ध ने जीवन और दुनिया के बारे में कुछ कड़वी सच्चाइयों को भी उजागर किया है।
अगर आप बहुत जल्द किसी बात से चोट खा जाते हैं और भड़क उठते हैं तो इससे आगे ना पढ़ें। अगर आप सच्चाई का सामना नहीं करना चाहते और ‘जो है’ उसके बजाय ‘जो होना चाहिए’ की आदर्शवादी बातें करते हैं, तो कृपया पढ़ना बंद कर दें! क्योंकि जो मैं कहने जा रहा हूं, वो आपको परेशान कर देगा। ठीक है, आपको चेतावनी दे दी गई है। तो ये रहे रूस-यूक्रेन से सीखने वाले पांच सबक, जो आपके जीवन पर भी लागू होते हैं।
ताकत और क्षमता मायने रखती हैं : रूस के व्यवहार पर आपका नैतिक रुख चाहे जो हो, तथ्य यही है कि रूस ने यह हमला इसलिए किया क्योंकि वह मजबूत है। यूक्रेन पिट रहा है, क्योंकि वो उसके जितना ताकतवर नहीं है। ये सच है कि यूक्रेन के साथ आज सबकी हमदर्दी है। लेकिन हमें जीवन में- या एक देश के रूप में- ताकत की खोज करनी चाहिए, हमदर्दी की नहीं। काबिलियत को तलाशें, रहम को नहीं।
किसी पर भी भरोसा न करें : यूक्रेन के पास न्यूक्लियर हथियार थे। पश्चिम ने न्यूक्लियर हथियारों को समाप्त करने पर जोर दिया और निरस्त्रीकरण जैसे शब्दों को कूल और महान बना दिया। यूक्रेन ने अपने न्यूक्लियर हथियारों को त्याग दिया। उससे वादा किया गया था कि जरूरत पड़ने पर मदद की जाएगी, लेकिन आज कोई मदद नहीं कर रहा है। भारत से भी न्यूक्लियर हथियारों को छोड़ने को कहा गया था। हमें युद्ध चाहने वाला, ताकत दिखाने वाला, अमन-चैन का दुश्मन आदि कहा गया। लेकिन आपने देखा यूक्रेन में क्या हुआ? अगर उसके पास न्यूक्लियर हथियार होते तो क्या ऐसा हो पाता? यूक्रेन ने भरोसा किया और कीमत चुकाई। जीवन में भी- या एक देश के रूप में- किसी पर भरोसा न करें। और अपनी सुरक्षा को किसी और के हाथों में ना सौंपें।
जो जितना निर्मम, उतना ही ताकतवर : अमेरिका के पास सबसे ताकतवर हथियार और शायद सबसे बेहतरीन डिफेंस फोर्स है, लेकिन आज दुनिया रूस से डर रही है। चाहे लाखों मर जाएं रूस को परवाह नहीं, अमेरिका को है। आज अमेरिका न्यूक्लियर हथियारों का इस्तेमाल करने के बारे में सोच भी नहीं सकता, इसके बावजूद उसे रूस की बात सुननी पड़ रही है। आज जहां अनेक देशों के पास दुनिया का अंत करने में सक्षम हथियार हैं, वहां सबसे निर्मम और क्रूर नेता ही सबसे ताकतवर साबित होता है। यही कारण है कि नॉर्थ कोरिया जैसा छोटा-सा देश भी आज इतना दबदबा रखता है।
दुनिया सॉफ्ट और कमजोर हो गई है : सोशल मीडिया पर भावुकता और वोकनेस का बोलबाला रहता है। यहां न्याय, समानता, करुणा की मांगें की जाती रहती हैं। ब्रांड्स भी इन बातों को भुनाकर पैसा कमाने का मौका नहीं चूकते। राजनेता इसे प्रोत्साहित करते हैं, क्योंकि उनकी नजर वोटों पर है। आज यह माना जाने लगा है कि आप जितना विरोध-प्रदर्शन करेंगे और खुद को व्यक्त करेंगे, चीजें उतनी ही बेहतर होंगी। इसके पीछे यह खुशफहमी है कि दुनिया और लोग न्याय चाहते हैं। जबकि दुनिया कभी न्यायपूर्ण नहीं थी, ना होगी। ताकतवर हमेशा कमजोर को हराएगा। इसलिए विक्टिम कार्ड खेलकर खुद को कमजोर दिखलाने के बजाय ताकतवर बनने की कोशिश कीजिए। मनुष्यता का इतिहास संघर्षों से भरा रहा है। पहले लोग तीर-तलवार चलाते थे, आज रील्स बनाते हैं और पोस्ट लिखते हैं। अंतर देख लीजिए।
युद्ध एक कंटेंट है और आप अकेले हैं : जमीनी हकीकत चाहे जितनी भयावह हो, तथ्य यही है कि युद्ध में ड्रामा के लिए सभी जरूरी तत्व होते हैं। यह अल्टीमेट रियल्टी शो बन सकता है और बन चुका है। इसमें सोशल मीडिया इंफ्लूएंसर्स से लेकर सामाजिक-न्याय के योद्धाओं और वर्चुअल सिग्नलर्स तक सभी यूक्रेन के लिए प्यार जता रहे हैं। यह सब अमूमन लाइक्स, कमेंट्स और इंगेजमेंट्स के लिए किया जाता है। हममें से बहुतेरे यथास्थिति को बदलने के लिए कुछ नहीं कर सकते, इसके बावजूद हम इस भयानक-कंटेंट से चिपके हुए हैं। जीवन में भी यही होता है। जब आप दु:खी होते हैं तो दुनिया के बड़े हिस्से के लिए केवल एक गॉसिप का साधन होते हैं।
बीते अनेक दशकों ने हमें इस भ्रम में डाल दिया था कि दुनिया शांतिपूर्ण व न्यायप्रिय जगह है। यह झूठ है। हर मनुष्य और हर देश को अपने पैरों पर खड़ा होना चाहिए। अगर वो खुद ताकतवर नहीं होगा तो किसी ताकतवर का गुलाम बन जाएगा। भावनाओं और आदर्शवाद से फर्क नहीं पड़ता, क्षमताओं और ताकत से पड़ता है। उम्मीद करें युद्ध जल्द ही खत्म हो जाएगा। लेकिन साथ ही युद्ध ने जो सबक सिखाए हैं, उन्हें हमेशा याद भी रखें।
Date:10-03-22
अमेरिका की अनुचित अपेक्षा ब्रह्मा चेलानी, ( लेखक सामरिक मामलों के विश्लेषक हैं )
यूक्रेन पर रूसी हमला ‘जिसकी लाठी, उसकी भैंस’ का ताजा उदाहरण है। यह बताता है कि वैश्विक ढांचे को एक व्यवस्था के अनुरूप चलने के दावे भोथरे हैं। इस सदी के इतिहास और विशेषकर 2001 से ही संप्रभु देशों पर सैन्य हमलों को ही देखिए। अंतरराष्ट्रीय कानून कमजोरों के खिलाफ मजबूत, किंतु ताकतवर के विरुद्ध असहाय दिखते हैं। चाहे रूसी आक्रमण हो या फिर पश्चिम द्वारा रूस पर प्रतिबंधों की आड़ में छेड़ा गया आर्थिक युद्ध, दोनों ही गलत हैं और नियमों पर आधारित अंतरराष्ट्रीय ढांचे का मखौल उड़ाते हैं। रूस की आक्रामकता यदि यूक्रेन की क्षेत्रीय संप्रभुता का उल्लंघन करती है तो पश्चिम का आर्थिक युद्ध रूस की आर्थिक संप्रभुता पर आघात करने वाला है। इस संघर्ष में वैश्विक ढांचे को बदलने की क्षमता है। इससे विश्व अर्थव्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय राजनीति, दोनों में ध्रुवीकरण बढ़ सकता है। एक नए शीत युद्ध की आहट सुनाई पड़ रही है। इसमें अमेरिका वापस ‘या तो आप हमारे साथ हैं या फिर हमारे खिलाफ’ वाला रवैया अपनाता दिख रहा है। इस स्थिति में तटस्थ या संतुलित रुख अपनाने वाले देशों पर दबाव बढ़ जाता है। इससे अमेरिका के साथ उन देशों के रिश्ते भले ही टूटें नहीं, लेकिन जटिल जरूर बन जाते हैं, जो वाशिंगटन के आर-पार वाले नजरिये से इतर तटस्थ रुख रखते हों। रूस के खिलाफ भारत को अपने पाले में खींचने के बाइडन प्रशासन के प्रयास कुछ ऐसे ही हैं। सुरक्षा परिषद में रूस के खिलाफ आए प्रस्ताव पर भारत की अनुपस्थिति को लेकर टीम बाइडन भारत पर हमलावर हो गई। वह भी तब जबकि भारत ने रूस द्वारा कूटनीतिक मार्ग का परित्याग करने की आलोचना और हिंसा समाप्त करने का निरंतर आह्वान किया।
एक अमेरिकी न्यूज वेबसाइट के अनुसार अमेरिकी विदेश विभाग ने एक केबल में कहा है कि यूक्रेन को लेकर भारत और संयुक्त अरब अमीरात (यूएई) के तटस्थ रुख ने उन्हें ‘रूस के पाले’ में पहुंचा दिया है। दरअसल अमेरिकी कूटनीति का यही इतिहास रहा है कि उसमें संदेश या चेतावनी जारी करने के लिए मीडिया ‘लीक्स’ का सहारा लिया जाता है। जैसे 1998 में चीन के साथ भारत के संबंधों को बिगाड़नेमें व्हाइट हाउस से प्रधानमंत्री वाजपेयी की अमेरिकी राष्ट्रपति बिल क्लिंटन को परमाणु परीक्षणों के संदर्भ में लिखी चिट्ठी लीक की गई। उक्त वेबसाइट के जरिये इशारों में यह भी कहा गया कि यदि नई दिल्ली वाशिंगटन के रुख से सहमति नहीं जताती तो भारत में लोकतंत्र की स्थिति और अल्पसंख्यकों की कथित अनदेखी पर सार्वजनिक विमर्श शुरू हो सकता है। यूएई पर तो अमेरिकी दबाव ने असर भी दिखाया। जो यूएई 25 फरवरी को सुरक्षा परिषद की बैठक में तटस्थ रहा, उसने 2 मार्च को हुई आमसभा की बैठक में रूस के खिलाफ निंदा प्रस्ताव के पक्ष में मतदान किया। हालांकि भारत का रवैया पहले जैसा ही रहा। यहां एक विरोधाभास दिखता है। चीन ने करीब 23 महीनों तक भारत की सीमा पर अपना दुस्साहस दिखाया, लेकिन किसी भी पश्चिमी देश के राष्ट्रप्रमुख ने चीन की निंदा नहीं की। यहां तक कि उन्होंने चीन से अपनी फौज पीछे हटाने को भी नहीं कहा, जिसने हिमालयी क्षेत्र में करीब दो लाख सैनिकों का जमावड़ा कर लिया था, जो द्विपक्षीय समझौते का घोर उल्लंघन था। इसके बावजूद पश्चिमी देश यह चाहते हैं कि यूक्रेन पर रूसी हमले के मामले में भारत उनके पक्ष में खड़ा रहे, जबकि भारत न तो नाटो का सदस्य है और न ही यूरोपीय संघ का।
जब ट्रंप अमेरिकी राष्ट्रपति थे, तब उनके शीर्ष अमले ने भारत के पक्ष में आवाज उठाई। उनके विदेश मंत्री रहे माइक पोंपियो से लेकर राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार राबर्ट ओ ब्रायन नियमित रूप से भारत के खिलाफ चीनी आक्रामकता पर बीजिंग को आड़े हाथों लेते रहे। उन्होंने इसे ‘बेहद आक्रामक कदम’, ‘अस्वीकार्य व्यवहार’ और ‘स्पष्ट रूप से उकसाने’ वाली कवायद बताया। इसके उलट चीन से पुन: रिश्तों को सुधारने की प्राथमिकता देने वाला बाइडन प्रशासन चीनी आक्रामकता के मामले में भारत के सार्वजनिक समर्थन से बचता रहा। इतना ही नहीं बाइडन ने चीनी आक्रामकता को हिंद-प्रशांत रणनीति का हिस्सा न मानकर भारत के साथ नियंत्रण रेखा से जुड़ा मसला बताया। चीन तो छोडि़ए, पाकिस्तान के मामले में भी टीम बाइडन ने भारत को ठोस समर्थन नहीं दिया। ‘एक प्रमुख गैर-नाटो सहयोगी’ के रूप में वह पाकिस्तान पर निरंतर दांव लगा रहा है। वह भी तब जब पाकिस्तान के पिट्ठुओं यानी तालिबान के हाथों उसे अफगानिस्तान में अपमानजनक हार मिली। पाकिस्तान पर किसी प्रकार के प्रतिबंध लगाने में बाइडन की नाकामी के चलते ही वह अभी तक आतंकी देशों की अमेरिकी सूची से बाहर है। इसके बावजूद टीम बाइडन यही चाहती है कि यूक्रेन मसले पर भारत उनका पुरजोर समर्थन करे।
यह सही है कि अमेरिका भारत का एक महत्वपूर्ण रणनीतिक साझेदार बनता जा रहा है, लेकिन दशकों से संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत का कवच बनता आया रूस भी हमारा उतना ही महत्वपूर्ण मित्र है। ऐसी स्थिति में क्या भारत पश्चिम के साथ मिलकर उस देश के खिलाफ मतदान करता, जो ब्रह्मोस मिसाइल से लेकर परमाणु पनडुब्बी जैसी तकनीक और रक्षा साजोसामान की आपूर्ति का अहम स्रोत बना हुआ है? चीन के खिलाफ भारत को सामरिक रूप से मजबूत बनाने के लिए रूस एस-400 एयर एवं एंटी-मिसाइल सिस्टम को अग्रिम रूप से देने की तैयारी कर रहा है।
अमेरिका भारत की रणनीतिक स्वायत्तता को महत्व देता है। भारत को भी यही करना चाहिए। मास्को के साथ रिश्तों के बिगड़ने का अर्थ होगा भारत की अमेरिका पर निर्भरता बढ़ना, जिस पर भरोसा करना बड़ा संदिग्ध है। अमेरिका पहले से ही भारत के बड़े हथियार सौदे हासिल कर रहा है, फिर भी वह यही चाहता है कि वही भारत को सभी हथियारों की आपूर्ति करे। रूस से भारत की रक्षा आपूर्ति के लिए उसने 2017 में काट्सा नाम से एक घरेलू कानून भी बनाया। अब इस नए शीत युद्ध की आहट से अमेरिका के ऐसे प्रयास और तेज ही होंगे। फिलहाल भारत सबसे ज्यादा सालाना सैन्य अभ्यास अमेरिका के साथ कर रहा है। भारत को हथियारों की बिक्री के मामले में भी अमेरिका ने रूस को पछाड़ दिया है। नई दिल्ली भी वाशिंगटन से अपने रिश्तों को और गहराई देने के प्रति उत्सुक है। ऐसी स्थिति में भारत के साथ ‘इधर या उधर’ वाला व्यवहार उचित नहीं कहा जाएगा। रूस और अमेरिका में से किसी एक विकल्प को चुनने का दबाव केवल भारत और अमेरिका के रिश्तों में बढ़ती मिठास को कम करने का ही काम करेगा।
Date:10-03-22
रुपये का प्रबंधन संपादकीय
रूस पर और अधिक आर्थिक दबाव डालने के उद्देश्य से अमेरिका ने मंगलवार को उससे होने वाले ऊर्जा आयात पर प्रतिबंध लगा दिया। अमेरिका उससे बहुत सीमित मात्रा में ईंधन आयात करता है लेकिन यह एक बड़ा संकेत है तथा और अधिक साझेदार इस दिशा में आगे बढ़ सकते हैं। ऊर्जा क्षेत्र की बड़ी पश्चिमी कंपनियां रूस से दूरी बना रही हैं जिससे आपूर्ति प्रभावित हो सकती है और निकट भविष्य में ईंधन कीमतें बढ़ी हुई रह सकती हैं। भले ही आने वाले दिनों में यूक्रेन-रूस विवाद का कोई कूटनीतिक हल निकल आए लेकिन कीमतों में तेजी जारी रह सकती है। चूंकि भारत बड़े पैमाने पर कच्चे तेल तथा कई अन्य जिंसों का आयात करता है, ऐसे में जिंसों की बढ़ी हुई कीमतों के साथ जुड़ी वृहद आर्थिक जटिलता कुछ समय तक जारी रह सकती है। इस वर्ष के आरंभ से अब तक तेल कीमतों में 70 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है। बढ़ी हुई जिंस कीमतें देश को जिन रूपों में प्रभावित करेंगी उनमें एक रुपये का बाह्य मूल्य भी है। हालांकि रुपया इस सप्ताह अपने अब तक के निम्र स्तर पर पहुंचने के बाद कुछ हद तक सुधरा है लेकिन दबाव जारी रह सकता है और रुपया अंतत: निचले स्तर पर ही स्थिर होगा।
रुपये के निकट भविष्य में कमजोर बने रहने की तमाम वजह हैं। उच्च जिंस कीमतों के कारण अमेरिकी डॉलर की मांग बढ़ेगी और उसकी कीमत में तेजी आएगी। चूंकि उच्च तेल कीमतों का देश में वृहद आर्थिक निष्कर्षों पर अहम प्रभाव है इसलिए विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक भी भारतीय बाजार से बाहर हो रहे हैं। इसके कारण डॉलर की मांग और बढ़ रही है। उदाहरण के लिए विदेशी निवेशकों ने इस महीने में अब तक 26,000 करोड़ रुपये मूल्य के भारतीय शेयर बेचे हैं। ऐसे में चालू खाता और पूंजी खाता दोनों ओर से दबाव है। ज्यादा व्यापक ढंग से देखें तो वैश्विक बाजार में जोखिम से बचने का अर्थ है फंड की अमेरिका वापसी जिसके चलते सरकारी बॉन्ड प्रतिफल में गिरावट आई और डॉलर में तेजी। इसके अतिरिक्त फेडरल रिजर्व भी जल्दी ही ब्याज दरों में इजाफा शुरू कर सकता है। फेड भू-राजनीतिक तनावों के संदर्भ में वृद्धि पर होने वाले असर को लेकर भी सतर्क होगा। ऐसे में दरें बढ़ेंगी और आने वाले महीनों में वित्तीय परिस्थितियां तंग होंगी। बल्कि जोखिम से बचने की कवायद यूक्रेन संकट के बहुत पहले शुरू हो गई थी जब बाजार ने फेड की ओर से दरों में अनुमान से अधिक इजाफे की संभावना पर समायोजन शुरू कर दिया था।
इस वैश्विक परिदृश्य में यह स्पष्ट है कि रुपये पर दबाव रहेगा। कुछ लोगों का कहना है कि भारतीय रिजर्व बैंक अगर इसका बचाव न करे तो बेहतर होगा। मुद्रा भंडार का इस्तेमाल बेवजह अस्थिरता को थामने के लिए किया जाना चाहिए, न कि मुद्रा के स्तर का बचाव करने के लिए। मुद्रा का व्यवस्थित समायोजन चालू खाते को स्थिर करने में मदद करेगा। चालू खाते के घाटे का स्थिर और प्रबंधन लायक स्तर मुद्रा को अधिक स्थिर बनाता है। कमजोर रुपया मुद्रास्फीति का दबाव बढ़ाएगा। इसका अर्थ यह नहीं है कि रिजर्व बैंक को रुपये का अवमूल्यन नहीं होने देना चाहिए। उच्च मुद्रास्फीति क्रय शक्ति कम करती है और यह मुद्रा के बाह्य मूल्य में भी झलकेगी। इस समायोजन को बाधित करने से बड़ा असंतुलन उत्पन्न हो सकता है। ऐसे में रिजर्व बैंक को मुद्रास्फीति संबंधी पूर्वानुमान का नये सिरे से आकलन करना चाहिए और उसके अनुरूप काम करना चाहिए। अगले वित्त वर्ष के उसके पहले के पूर्वानुमान शायद बरकरार न रह सकें और अब उसे नीतिगत सामान्यीकरण की प्रक्रिया तेज करनी होगी। मुद्रास्फीति की अनदेखी करने से जोखिम बढ़ सकते हैं। इनमें बाहरी जोखिम भी शामिल हैं।
Date:10-03-22
सरकारी कंपनियों में हिस्सेदारी का बोझ ए के भट्टाचार्य
मोदी सरकार ने अपने दूसरे कार्यकाल में केंद्रीय सरकारी उपक्रमों के साथ किस तरह का व्यवहार किया? क्या इन उपक्रमों के साथ उसकी संबद्धता पहले कार्यकाल या पिछली सरकारों के कार्यकाल की तुलना में अलग रही? इस संबद्धता को आंकने का एक तरीका है कि यह देखा जाए कि केंद्र सरकार ने सरकारी उपक्रमों के इक्विटी आधार में किस प्रकार योगदान किया है या उनमें अपनी हिस्सेदारी किस तरह बेची। अतीत के साथ तुलना काफी जानकारीपरक हो सकती है।
उदाहरण के लिए मनमोहन सिंह सरकार ने 2009-10 और 2013-14 के बीच सरकारी उपक्रमों में करीब 2.34 लाख करोड़ रुपये की इक्विटी डाली। यह मनमोहन सरकार के पहले कार्यकाल यानी 2004-05 से 2008-09 के दौरान डाली गई 80,000 करोड़ रुपये की राशि से करीब तीन गुनी थी। सरकारी उपक्रमों के विनिवेश का किस्सा भी अलग नहीं था। यह याद रहे कि वह सरकार निजीकरण को लेकर शंकालु थी और सरकारी उपक्रमों में विनिवेश को लेकर वह आत्मविश्वास से भरी नहीं थी। इसके बावजूद मनमोहन सिंह सरकार की विनिवेश प्राप्तियां 2004-09 के 46,000 करोड़ रुपये से बढ़कर 2009-14 में 1.2 लाख करोड़ रुपये हो गईं।
इसके उलट मोदी सरकार के पहले कार्यकाल यानी 2014-19 में विनिवेश पर ज्यादा ध्यान दिया गया, हालांकि निजीकरण को लेकर सतर्कता बरती गई और उस मोर्चे पर सकारात्मक नतीजे हासिल नहीं हुए। एयर इंडिया के निजीकरण की शुरुआत हुई लेकिन इरादा त्यागना पड़ा और आईडीबीआई बैंक के निजीकरण का प्रस्ताव रखा गया लेकिन लक्ष्य हासिल नहीं हुआ। मोदी सरकार के पास निजीकरण के नाम पर कुछ नहीं था लेकिन पहले कार्यकाल में उसने विनिवेश से 3.2 लाख करोड़ रुपये हासिल किए।
पहले कार्यकाल में मोदी सरकार ने विनिवेश पर जोर दिया लेकिन सरकारी उपक्रमों में इक्विटी में और इजाफा हुआ। मनमोहन सिंह के 2009-14 के कार्यकाल में जहां यह राशि 2.34 लाख करोड़ रुपये थी, वहीं 2014-19 के बीच यह राशि बढ़कर 6.26 लाख करोड़ रुपये हो गयी। यह चौंकाता है। आखिर सैद्धांतिक तौर पर निजीकरण में भरोसा करने वाली सरकार, शासकीय उपक्रमों में इक्विटी डालने में इतनी राशि क्यों इस्तेमाल करेगी? परंतु ऐसा लगता है कि यह एक रणनीति के तहत किया गया। शायद माना जा रहा था कि सरकार को पूंजी डालकर बैंकों की गड़बड़ी ठीक करनी होगी तथा चुनिंदा सरकारी उपक्रमों द्वारा नियंत्रित अहम बुनियादी क्षेत्रों में निवेश करना था।
जाहिर है अधिकांश इजाफा बैंकिंग, रेलवे तथा राजमार्ग निर्माण जैसे क्षेत्रों में हुआ। मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में एयर इंडिया में 17,000 करोड़ रुपये की पूंजी डाली गई जो मनमोहन सिंह के दूसरे कार्यकाल की 15,000 करोड़ रुपये की राशि से बहुत अलग नहीं था। परंतु सरकारी बैंकों के मामले में ऐसा नहीं था। उन्हें मनमोहन सिंह की सरकार में जहां 45,000 करोड़ रुपये की राशि दी गई थी वहीं 2014-19 के बीच इन बैंकों में 2.52 लाख करोड़ रुपये की राशि डाली गई। ऐसा इसलिए कि सरकारी बैंकों की परिसंपत्ति गुणवत्ता में गिरावट आई थी और उन्हें पूंजी की आवश्यकता थी।
इसी प्रकार भारतीय रेल और भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण (एनएचएआई) में डाली गई इक्विटी भी 2009-14 के क्रमश: एक लाख करोड़ रुपये तथा 46,000 करोड़ रुपये से बढ़कर दो लाख करोड़ रुपये तथा 1.14 लाख करोड़ रुपये हो गई। यह इस बात का स्पष्ट संकेत था कि मोदी सरकार उस समय अधोसंरचना में निवेश को लेकर प्रतिबद्ध थी जब निजी क्षेत्र के निवेश में धीमापन आ रहा था तथा वृद्धि बनाए रखने के लिए उच्च सरकारी निवेश की आवश्यकता थी।
मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल के दौरान भी यह सिलसिला जारी रहा। सन 2019-20 से 2022-23 में चार वर्षों के दौरान तथा अगले वर्ष के बजट अनुमान के अनुसार सरकारी उपक्रमों में डाली जाने वाली राशि बढ़कर 9.5 लाख करोड़ रुपये हो सकती है। मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल के चार वर्षों में ही पहले कार्यकाल की तुलना में इसमें 52 फीसदी का इजाफा हो चुका है।
सबसे अधिक वृद्धि एनएचएआई में हुई जो करीब 2.77 लाख करोड़ रुपये है जबकि भारतीय रेल में 2.48 लाख करोड़ रुपये का इजाफा हुआ। सरकारी बैंकों के पुनर्पूंजीकरण में एक लाख करोड़ रुपये की कमी आएगी तथा घटते फंसे हुए कर्ज के साथ उनकी स्थिति में सुधार हो रहा है। एयर इंडिया के लिए कोई प्रावधान नहीं है। एयर इंडिया ऐसेट होल्डिंग लिमिटेड के लिए करीब 62,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया ताकि वह निजीकरण के बाद विमानन कंपनी के कर्ज को बट्टे खाते में डालने की औपचारिकताएं पूरी कर सके। परंतु यह एकबारगी आवंटन है और इस मद में कोई अन्य प्रावधान नहीं होगा।
मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल में विनिवेश की गति में आए धीमेपन को अनदेखा नहीं किया जा सकता है। इसे कोविड महामारी के कारण बाजार में आई अस्थिरता की वजह भी माना जा सकता है। यूक्रेन-रूस सैन्य संघर्ष के बीच यह अस्थिरता जारी रह सकती है और मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल की बाकी बची अवधि में भी यह विनिवेश पर विपरीत प्रभाव डालेगी।
बीते दो दशक में विभिन्न सरकारों द्वारा सरकारी उपक्रमों में निवेश पर नजर डालें तो यही नतीजा निकलता है कि कुल सरकारी व्यय में उनकी हिस्सेदारी मोदी सरकार के कार्यकाल में तेजी से बढ़ी है। मनमोहन सिंह सरकार के दो कार्यकालों के 2.5 प्रतिशत और 3.6 प्रतिशत के मुकाबले मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में सरकारी उपक्रमों पर व्यय 6.3 फीसदी और दूसरे कार्यकाल के चार वर्षों में 6.8 फीसदी बढ़ा है।
इसकी कई वजह प्रतीत होती हैं। पहली बात, सरकारी उपक्रमों की वित्तीय सेहत समय के साथ और खराब हुई है तथा उन्हें बार-बार नकदी की आवश्यकता पड़ी। दूसरा, देश के परिवहन क्षेत्र के लिए बढ़ते निवेश की जरूरत पूरी करनी थी जिस पर सरकारी उपक्रमों का नियंत्रण है। इसका अर्थ यह भी है कि बीते कई वर्षों से चल रहे निजीकरण के बावजूद परिवहन अधोसंरचना अभी भी सरकारी क्षेत्र से संचालित है और निवेश में कमी दूर करने के लिए सरकार को हस्तक्षेप करना पड़ा। बैंकिंग क्षेत्र की वित्तीय सेहत अब ऐसी नहीं है कि वे सरकारी संसाधनों का इस्तेमाल करें। सरकारी उपक्रमों में डाली जाने वाली इक्विटी पूंजी में अधोसंरचना क्षेत्र भी बड़ा हिस्सेदार है। यह भी दर्शाता है कि मोदी सरकार निजी क्षेत्र को अधोसंरचना निर्माण के लिए आकर्षित करने में विफल रही है। यदि सरकारी उपक्रमों में ज्यादा इक्विटी की मांग का प्रबंधन नहीं किया गया तो यह भी एक बड़ा वित्तीय बोझ बन सकता है।
Date:10-03-22
देश में सूक्ष्म वित्त से जुड़े भ्रम एवं वास्तविकता तमाल बंद्योपाध्याय, ( लेखक बिज़नेस स्टैंडर्ड के सलाहकार संपादक, लेखक और जन स्मॉल फाइनैंस बैंक में वरिष्ठ सलाहकार हैं। )
इन दिनों भारत में सूक्ष्म वित्त कंपनियों में निवेश करने वाले कुछ परंपरागत निवेशक हतोत्साहित दिख रहे हैं। उनका कहना है कि सूक्ष्म ऋण की मदद से लोगों के जीवन में बदलाव आने की बातें बढ़ा-चढ़ा कर की जाती हैं जबकि जमीनी हकीकत कुछ और है। निवेशक शुरुआती कुछ वर्षों में तो लाभ कमाते हैं मगर बाद के वर्षों में विभिन्न कारण से अपनी रकम गंवा बैठते हैं। इन कारणों में राज्य चुनावों के दौरान ऋ ण माफी में राजनीतिक हस्तक्षेप, प्राकृतिक आपदा और अब कोविड-19 महामारी शामिल हैं।
वे यह जानने के लिए भी उत्सुक हैं कि सूक्ष्म या अत्यधिक छोटे ऋण ने किस तरह गरीबी उन्मूलन में मदद की है। अनौपचारिक वित्तीय स्रोतों पर गरीब लोगों की निर्भरता कम हुई है मगर सूक्ष्म वित्त कंपनियां आंशिक रूप से ही उनकी जरूरतें पूरी करती हैं। लोगों को स्वास्थ्य, आपातकालीन जरूरतें और शिक्षा के लिए अनौपचारिक स्रोतों से ऋण लेना पड़ता है। सूक्ष्म वित्त संस्थान (एमएफआई) खासकर एनबीएफसी-एमएफआई एवं बैंक केवल सृजनात्मक या आय अर्जित करने वाले साधनों के लिए ऋण देते हैं। बांग्लादेश में एमएफआई बेहतर काम कर रहे हैं और लोगों को गरीबी से निकालने में मदद कर रहे हैं। इंडोनेशिया में तो एमएफ आई निवेश पर आकर्षक प्रतिफल भी दे रहे हैं। पिछले वर्ष अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के अल्फ्रेड शिपके ने कहा था कि दुनिया में 1.90 डॉलर प्रति दिन आय पर जीवन-यापन करने वालों की संख्या बढ़कर 10 करोड़ हो गई है और इसका लगभग आधा हिस्सा भारत में है। विश्व बैंक के अनुसार भारत में गरीबी दर कम होगी मगर तब भी यह 10 प्रतिशत के इर्द-गिर्द रहेगी। सूक्ष्म वित्त उद्योग पर नजर रखने वाले संगठन माइक्रोफाइनैंस इंस्टीट्यूशंस नेटवर्क (एमएफआईएन) का दावा है कि पिछले एक दशक के दौरान वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देने में सूक्ष्म वित्त ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई है। इस संगठन के अनुसार यह उद्योग लोगों को उनके घर तक ऋण एवं बीमा सुविधाएं मुहैया करा रहा है और सूक्ष्म-उद्यम विकास के जरिये लोगों को रोजगार भी दे रहा है।
मार्च 2012 और दिसंबर 2021 के बीच सूक्ष्म वित्त उद्योग का सकल ऋण खाता 17,264 करोड़ रुपये से बढ़कर 2.51 लाख करोड़ रुपये हो गया। कर्जधारकों की संख्या भी बढ़कर 20 करोड़ से 57 करोड़ हो गई है। एमएफआईएन का कहना है कि इस उद्योग में काम करने वाले लोगों की संख्या भी पिछले एक दशक में 69,000 से बढ़कर 4,00,000 हो गई है। एमएफआईएन ने एक रिपोर्ट का हवाला देते हुए कहा है कि 2018-19 के दौरान सूक्ष्म वित्त ने प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष रूप से करीब 1.28 करोड़ रोजगार सृजित किए। करीब 12 करोड़ लोगों को बीमा सुविधा (ऋण एवं जीवन दोनों के लिए) मिली। सूक्ष्म वित्त उद्योग से ऋण लेने वाली 98 प्रतिशत ग्राहक महिलाएं हैं।
जितने ऋण आवंटित हो रहे हैं उनमें 90 प्रतिशत सीधे बैंक खातों में डाले जा रहे हैं और ऋण भुगतान भी तेजी से डिजिटल माध्यम से हो रहा है। नकदी रहित ऋण आवंटन से लोगों में बचत करने की आदत भी विकसित हो रही है। इस उद्योग पर नजर रखने वाले एक अन्य संगठन सा-धन का कहना है कि मार्च 2010 से सूक्ष्म वित्त संस्थानों के शाखाओं की संख्या लगभग दोगुनी-11,459 से 20,065- हो गई है। हां, इन संस्थानों की संख्या में कमी आई है और यह 264 से कम होकर 208 रह गई है। इन आंकड़ों की पृष्ठभूमि में एक प्रश्न उठता है कि सूक्ष्म वित्त संस्थानों की वर्तमान स्थिति को नकारात्मक या सकारात्मक नजरिये से देखा जाना चाहिए? भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआई) ने सूक्ष्म वित्त संस्थानों के संबंध में अपनी नीति तैयार कर ली है। जून 2021 में केंद्रीय बैंक ने सूक्ष्म वित्त नियमन पर एक परामर्श पत्र जारी किया किया था जिसमें बड़े बदलावों का जिक्र किया गया था। इस दस्तावेज में वह शर्त समाप्त करने की योजना है जिसके तहत दो से अधिक एनबीएफसी-एमएफआई किसी एक कर्जधारक को ऋण नहीं दे सकते हैं और ऋण की रकम परिवार के कर्ज-आय के अनुपात पर आधारित होगी। आरबीआई सभी बकाया ऋणों पर ब्याज और मूलधन का भुगतान कर्जधारक के परिवार की आय का 50 प्रतिशत तक सीमित रखना चाहता है।
मगर आरबीआई ने यह नहीं कहा है कि सूक्ष्म कर्जधारक कहलाने के लिए किसी परिवार की अधिकतम आय कितनी होगी। वर्तमान में ऋण की सीमा 1.25 लाख रुपये (पहले चक्र में यह 75,000 रुपये से अधिक नहीं हो सकती है) है। इसे बढ़ाए जाने की जरूरत है।
कई सूक्ष्म कर्जधारकों को अधिक रकम की जरूरत है और अगर हम उन्हें महाजनों के चंगुल में जाने से बचाना चाहते हैं तो उन्हें और रकम दी जानी चाहिए।
आरबीआई का प्रस्ताव वह प्रावधान भी हटाने के पक्ष में है जिनमें ऋण का 50 प्रतिशत हिस्सा आय सृजन के लिए इस्तेमाल होना चाहिए। आय सृजन करने वाले और उपभोग ऋण के बीच अंतर समाप्त किया जा रहा है। कर्जदाता शिक्षा, स्वास्थ्य खर्चों, पारिवारिक परिसंपत्ति, उपभोग एवं यहां तक कि महाजनों से ऊंची ब्याज दर पर लिए गए ऋण के भुगतान के लिए ऋ ण का इस्तेमाल कर सकते हैं। आरबीआई ऋण दरों पर तय सीमा भी समाप्त करना चाहता है। यह बाजार पर छोड़ दिया जाएगा। ये सभी स्वागतयोग्य कदम हैं क्योंकि इनसे सूक्ष्म वित्त उद्योग में दोहराव बढ़ जाएगा और इस उद्योग को नई जगहों में विस्तार करने में मदद मिलेगी। आरबीआई को यह मौजूदा नियम भी बदलना चाहिए कि एनबीएफसी-एमएफआई अपने 85 प्रतिशत ऋण बिना किसी गारंटी के देंगे। कुछ ऋण के एवज में कर्जधारकों से क्यों गारंटी नहीं लेनी चाहिए? बैंक समाज में पिछड़े वर्ग को प्राथमिकता के आधार पर ऋण देते हैं मगर वे सभी असुरक्षित नहीं होते हैं। ऋण की अवधि दो वर्ष तय की गई है। अगर हम गरीबी दर में कमी लाना चाहते हैं तो बड़े ऋण के मामले में भी यह अवधि बढ़ाई जानी चाहिए।
Date:10-03-22
लैंगिक असमानता और नीतियां अरविंद कुमार मिश्रा
दुर्भाग्य से पिछले कई दशकों से महिला आरक्षण विधेयक देश के राजनीतिक परिदृश्य में विमर्श का मुद्दा नहीं बन पा रहा है। जाहिर है, लैंगिक समानता की इस ठोस कवायद के लिए न सिर्फ सभी राजनीतिक दलों को, बल्कि जनता को भी जागरूक होना पड़ेगा।
विकास को समावेशी आवरण देने में महिलाओं की भूमिका सबसे अहम होती है। सामाजिक और आर्थिक सशक्तिकरण प्रत्यक्ष रूप से लैंगिक समानता से अंतर-संबंधित है। हमारे यहां महिलाओं को वैदिक काल से शक्ति का स्रोत माना गया है। महिलाओं ने सामाजिक, आर्थिक और सैन्य क्षेत्र से लेकर विज्ञान तक में अपनी काबिलियत साबित की है। मानव संसाधन किसी भी राष्ट्र के सशक्तिकरण का प्रतीक होता है। इसी को ध्यान में रखते हुए भावी नीतियों के निर्माण और योजनाओं को गति देने में महिलाओं की भूमिका को अहमियत दी जा रही है। इसका एक मकसद अर्थव्यवस्था को टिकाऊ स्वरूप देना भी है। यह अर्थ तंत्र में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने से ही संभव होगा।
कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी बढ़ने का सीधा संबंध अर्थव्यवस्था की उत्पादकता से है। सामाजिक न्याय का कोई भी प्रयास महिलाओं की आत्मनिर्भरता से ही सुदृढ़ होता है। विश्व आर्थिक मंच द्वारा जारी लैंगिक भेद सूचकांक (जीजीआई-2020) में भारत एक सौ बारहवें पायदान पर है, जबकि 2018 में यह स्थान एक सौ आठवां था। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन (एनएसएसओ) के अनुसार देश में महिला श्रमबल की भागीदारी दर (एफएलएफपीआर) 23.3 फीसद है। श्रम क्षेत्र में महिला कार्यबल की भागीदारी कम होने के प्रभावों को लेकर विश्व बैंक की एक रिपोर्ट हमें आगाह करती है। विश्व बैंक के अनुसार भारत के श्रमक्षेत्र में 2019 में महिलाओं का अनुपात 20.3 फीसद था। यह पड़ोसी देश बांग्लादेश के 30.5 और श्रीलंका के 33.7 फीसद से काफी कम है। आर्थिक मंदी हो या फिर कोरोना जैसी आपदा, इनका सबसे अधिक असर महिलाओं पर ही पड़ा। गौरतलब है कि मार्च-अप्रैल 2020 में लगभग डेढ़ करोड़ महिलाओं को अपना रोजगार गंवाना पड़ा था, जो कुल महिला कार्यबल का सैंतीस फीसद था। ऐसे में हमें महिला सशक्तिकरण के प्रयासों को नए सिरे से प्रभावी बनाना होगा। तभी हम लैंगिक असमानता खत्म कर हम महिलाओं को आगे ला सकते हैं।
इसमें कोई संदेह नहीं होना चाहिए कि आधी आबादी की सामाजिक, आर्थिक व राजनीतिक भागीदारी बढ़ाने का कोई भी जतन शिक्षा के जरिए ही पूरा होगा। इसके लिए होने वाले बजटीय आवंटन के समय लैंगिक संवेदनशीलता को वरीयता देनी होगी। इससे राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के उद्देश्यों को भी हासिल किया जा सकेगा। हमारे यहां स्कूलों में पुन: नामांकन, उपस्थिति आदि के तथ्यों में पारदर्शिता का नितांत अभाव बड़ी चुनौती है। महिला एवं बाल विकास मंत्रालय के अनुसार 2018-19 में उच्च माध्यमिक स्तर पर पढ़ाई छोड़ने वाली छात्राओं की दर 17.3 फीसद रही। प्राथमिक स्तर पर यह 4.74 फीसद रही। कर्नाटक, असम, बिहार, अरुणाचल प्रदेश और त्रिपुरा में लड़कियों के बीच में ही पढ़ाई छोड़ने की दर सबसे अधिक है। कोरोना महामारी ने छात्राओं और स्कूलों के बीच की दूरी को और बढ़ा दिया।
श्रम बाजार की जरूरतों के अनुसार महिलाओं को शिक्षा और व्यावहारिक प्रशिक्षण दिया जाए। कौशल विकास के नाम पर अब भी हम सिलाई, कढ़ाई और बुनाई से बाहर नहीं निकल पा रहे हैं। महिलाओं का एक बड़ा अनुपात असंगठित क्षेत्र में कार्यरत है। कुल कामकाजी महिलाओं में से लगभग तिरसठ फीसद खेती-बाड़ी के काम में लगी हैं। संगठित क्षेत्र में रोजगार के अवसरों में महिलाओं की चुनौतियों का परिदृश्य अलग है। 2011 के जनसंख्या के आंकड़ों के अनुसार जब करियर बनाने का समय आता है, उस समय अधिकांश लड़कियों की शादी हो जाती है। विश्व बैंक के आकलन के अनुसार भारत में महिलाओं की नौकरियां छोड़ने की दर बहुत अधिक है। यह पाया गया है कि एक बार किसी महिला ने नौकरी छोड़ी, तो पारिवारिक जिम्मेदारियों व अन्य कारणों से पुन: श्रमबल का हिस्सा बनना कठिन होता है।
शिक्षा के प्राथमिक स्तर से लेकर रोजगार केंद्रित नीतियों में उद्योग जगत की जरूरत को ध्यान में रखना जरूरी है। इसका एक समाधान तकनीक, इंजीनियरिंग और गणित (वैज्ञानिकी) विषयों के अध्ययन के लिए महिलाओं के प्रोत्साहन के रूप में भी देखा जाता है। देश में उच्च शिक्षा अर्जित करने वाली महिलाओं का अनुपात बढ़ रहा है। लेकिन विज्ञान व नवाचार से जुड़े विषयों में आधी आबादी का प्रतिनिधित्व काफी कम है। स्कूली स्तर पर हैकथान कार्यक्रमों को बढ़ावा देकर शोध व समस्या समाधान के प्रति छात्राओं में नवोन्मेषी दृष्टिकोण विकसित करना होगा। आज रोजगार के अधिकांश अवसर सूचना व प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में हैं। इस क्षेत्र में उद्यमशिलता के बिना महिलाओं की भागीदारी नहीं बढ़ाई जा सकती है। उच्च शिक्षा पर अखिल भारतीय सर्वेक्षण (एआइएसएचई) 2019-20 के अनुसार भारत का सकल नामांकन अनुपात (जीईआर) 27.1 फीसद हो गया। 2018-19 में यह 26.3 फीसद था। इस दशक के अंत तक पांच खरब डालर की अर्थव्यवस्था बनाने के लिए हमें जीईआर को पचास फीसद के स्तर पर ले जाना होगा।
महिलाओं को स्वास्थ्य सुविधाओं व पोषण की उपलब्धता उनके सशक्तिकरण का एक अनिवार्य कारक माना जाता है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की एक रिपोर्ट के अनुसार दक्षिण एशियाई देशों में भारतीय महिलाओं की स्वस्थ जीवन प्रत्याशा सबसे कम है। दरअसल महिला सशक्तिकरण के उपायों को एकांगी रूप में नहीं आगे बढ़ाया जा सकता है। डब्ल्यूएचओ की रिपोर्ट के अनुसार भारत में स्वास्थ्य पर होने वाला खर्च कुल बजट का 3.4 फीसद है, जबकि भूटान 7.7, नेपाल 4.6 फीसद बजट स्वास्थ्य पर खर्च कर रहे हैं। इसका सीधा संबंध गरीबी के रूप में सामने आता है।
लैंगिक समानता के लक्ष्यों को अर्जित करने के लिए नीति निर्धारण प्रक्रिया में महिलाओं की मौजूदगी बढ़ानी होगी। महिलाओं को लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में तैंतीस फीसद आरक्षण की मांग पर राजनीतिक दलों की उदासीनता किसी से छिपी नहीं है। विश्व लैंगिक भेद रिपोर्ट-2021 के अनुसार राजनीतिक सशक्तिकरण सूचकांक में भारत का प्रदर्शन लगातार कमजोर हो रहा है। संसद में महिला प्रतिनिधित्व को लेकर इंटर पार्लियामेंट्री यूनियन (आइपीयू) द्वारा जारी एक आंकड़े के अनुसार एक सौ तिरानवे देशों में भारत एक सौ अड़तालीसवें स्थान पर आता है। सत्रहवीं लोकसभा में अठहत्तर महिला सांसद निर्वाचित हुर्इं। 2014 के लोकसभा चुनाव में बासठ महिलाओं ने जीत दर्ज की थी। महिलाओं का प्रतिनिधित्व लोकसभा में बढ़ रहा है, लेकिन अनुपात अब भी बहुत कम है। 1951 में हुए पहले लोकसभा में पांच फीसद महिला उम्मीदवारों ने जीत दर्ज की थी, जबकि साल 2019 की सत्रहवीं लोकसभा में यह बढ़ कर चौदह फीसद हो गया। दुर्भाग्य से पिछले कई दशकों से महिला आरक्षण विधेयक देश के राजनीतिक परिदृश्य में विमर्श का मुद्दा नहीं बन पा रहा है। जाहिर है, लैंगिक समानता की इस ठोस कवायद के लिए न सिर्फ सभी राजनीतिक दलों को बल्कि जनता को भी जागरूक होना पड़ेगा। जबकि देश में लगभग बीस राज्यों ने महिलाओं को पंचायती राज व्यवस्था में पचास फीसद का आरक्षण दिया है। ग्रामीण स्तर पर सरकारी योजनाओं के क्रियान्वयन में इसके असर को देखा जा सकता है।
राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वे-5 में पहली बार देश में महिलाओं की संख्या पुरुषों से अधिक होने का निष्कर्ष प्रोत्साहित करने वाला है। इसका श्रेय महिला सशक्तिकरण के लिए वित्तीय समावेश और लैंगिक पूर्वाग्रह तथा असमानताओं से निपटने के उपायों को जाता है। बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ जैसे सामाजिक अभियानों से छात्राओं के पढ़ाई छोड़ने की दर में कमी आई है। लैंगिक समानता के प्रयासों के क्रम में लड़कियों के विवाह की उम्र को 18 से 21 किया जाना एक महत्वपूर्ण फैसला है। नीतियों में लैंगिक संवेदनशीलता का एक प्रभावी उपक्रम जेंडर बजटिंग भी है। इसके अतंर्गत महिला सशक्तिकरण कार्यक्रमों को बजटीय आवंटन, महिला संवेदी कार्यक्रमों को प्रोत्साहन व नीतिगत प्रतिबद्धता प्रमुख है। देश में लैंगिक समानता की सबसे बड़ी बाधा महिलाओं की सोच पर एकाधिकार की पुरुषवादी प्रवृतियां भी हैं। सरकार व प्रशासनिक नीतियों को महिलाओं के लिए संवेदनशील तभी बनाया जा सकता है, जब समाज की साझा सोच आधी आबादी को लेकर संवेदनशील होगी।
Date:10-03-22
लोकपाल क्या करे ! संपादकीय
क्या देश में भ्रष्टाचार खत्म हो गया है, या केंद्र या राज्यों के सरकारी कर्मचारी (लोकसेवक) बेहद ईमानदार हो गए हैं? इस बारे में किसी भ्रम में न रहें। कुछेक अपवादों को छोड़कर स्थिति बिल्कुल नहीं बदली है। लेकिन लंबे संघर्ष के बाद गठित लोकपाल नाम की संस्था के कामकाज के रिकार्ड पर नजर डालें तो बेहद निराशाजनक परिदृश्य उभरता है। करीब तीन साल पहले गठित लोकपाल अब तक भ्रष्टाचार के आरोपी किसी लोकसेवक पर मुकदमे की मंजूरी नहीं दे पाया है। सूचना का अधिकार (आरटीआई) से मिली सूचना के तहत यह जानकारी हासिल की गई है। इस बारे में आरटीआई के तहत पूछे गए सवाल के जवाब में बताया गया है कि भ्रष्टाचार की तमाम शिकायतों की जांच और अभियोजन के निर्धारण से संबंधित दो निदेशकों की नियुक्तियां ही अभी तक नहीं हो सकी हैं। आरटीआई के जवाब में बताया गया है कि जांच निदेशक और अभियोजन निदेशक की नियुक्तियों के लिए पैनल उपलब्ध कराने के लिए सरकार से अनुरोध किया गया है। लंबे संघर्ष और आंदोलन के बाद गठित लोकपाल लोकसेवकों के खिलाफ भ्रष्टाचार की शिकायतों की जांच करने वाला सर्वोच्च निकाय है। 27 मार्च, 2019 को अध्यक्ष की नियुक्ति के साथ ही इसका विधिवत कामकाज शुरू हो गया था। भ्रष्टाचार के आरोपी कितने लोकसेवकों के खिलाफ अभियोग के प्रस्ताव या मंजूरी दी गई है, इस बारे में पूछे जाने पर लोकपाल ने कहा है कि उसने अभी तक ऐसी एक भी मंजूरी नहीं दी है। राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने 23 मार्च, 2019 को लोकपाल के अध्यक्ष के तौर पर न्यायमूर्ति पिनाकी चंद्र घोष को पद की शपथ दिलाई थी। लोकपाल के आठ सदस्यों में चार न्यायिक और शेष चार गैरन्यायिक सदस्य हैं, जिन्हें न्यायमूर्ति घोष ने उसी साल 27 मार्च को शपथ दिलाई थी। फिलहाल, जानकारी दी गई है कि वर्तमान में लोकपाल में दो न्यायिक सदस्यों के पद खाली हैं। लोकपाल ने जानकारी दी है कि उसे अप्रैल, 2021 से 31 जनवरी, 2022 तक 4,244 भ्रष्टाचार की शिकायतें प्राप्त हुई हैं, जो 2020-21 की तुलना में 80 फीसदी अधिक हैं। वित्तीय वर्ष 2019-20 में इसे 1427 शिकायतें मिली थीं। भ्रष्टाचार को लेकर हमारे मानक कमजोर हो गए हैं, पीएम केयर सहित तमाम संस्थाओं को आरटीआई के दायरे से बाहर रखा जाना इसी प्रवृत्ति की तरफ इशारा करता है।
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पिछले दिनों राष्ट्रीय हाइड्रोजन मिशन के शुभारंभ की घोषणा की गई है। यह नीति, निम्न कार्बन नेट जीरो इकॉनॉमी के लिए भारत सरकार की प्रतिबद्धता की दिशा में महत्वपूर्ण है।
कुछ अन्य बिंदु –
इस नीति से घरेलू उद्योगों एवं निर्यात के लिए ग्रीन हाइड्रोजन के क्षेत्र में बढ़त प्राप्त की जा सकती है।
यह नीति ग्रीन हाइड्रोजन पर एक पूर्ण स्पेक्ट्रम नीति विकसित करने का आधार प्रदान करती है। इससे मूल्य श्रृंखला में अधिक स्पष्टता आएगी। यह ग्रीन हाइड्रोजन के उस खंड को आगे बढ़ाने पर केंद्रित है, जिसे वैश्विक स्तर पर नेट-जीरो लक्ष्य को पूरा करने के लिए महत्वपूर्ण माना गया है।
यह नीति ग्रीन हाइड्रोजन से मिलने वाले आर्थिक लाभ के द्वार खोल सकेगी। नीति, ग्रीन हाइड्रोजन के उत्पादन को इस प्रकार से सक्षम बना सकेगी कि उपयोगकर्ता उद्योगों को तेजी से आगे बढ़ने की अनुमति मिल सके।
नीति में ग्रीन हाइड्रोजन को पाइपलाइन के द्वारा अणुओं के रूप में संचारित करने के बजाय, ग्रीन हाइड्रोजन बनाने की प्रक्रिया के लिए महत्वपूर्ण अक्षय ऊर्जा (रिन्यूएबल एनर्जी) इकाइयों को उपभोग करने वाली इकाइयों के नजदीक रखा जाएगा। इसमें 25 वर्षों के लिए संचरण शुल्क और अक्षय ऊर्जा के लिए बैंकिंग में छूट मिल सकेगी।
चुनौतियां भी हैं –
जीवाश्म ईंधन और उच्च कार्बन हाइड्रोजन विकल्पों के बदले ग्रीन हाइड्रोजन को अपनाए जाने के लिए इसकी लागत को कम करना होगा।
दूसरे, इस नीति में अभी तक उपभोक्ताओं की मांग जानने पर कोई चर्चा नहीं की गई है। इससे ग्रीन हाइड्रोजन की अप्रयुक्त खेप को लेकर समस्या हो सकती है। साथ ही नई तकनीक के विकास और सुरक्षा जैसे अन्य प्रमुख मामलों पर ध्यान दिए जाने की जरूरत है।
अगर सरकार अपने इस मिशन की सफलता चाहती है, तो नीति में मूल्य श्रृंखला पर काम करने की ओर पूरा ध्यान लगाना चाहिए। उम्मीद की जा सकती है कि सरकार इस ओर कदम बढ़ाएगी।
यह लेख ‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित है। 19 फरवरी, 2022
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Date:09-03-22
Oil It Steadily Sharp increase in pump price will lead to a demand shock. Fiscal policy must prevent this TOI Editorials
On February 24, the Indian basket of crude breached a psychologically important price barrier of $100 a barrel. A mere ten days later, the price of the Indian basket crossed $126 per barrel just as polling for the five state assemblies ended. This co-occurrence begs the question if pump prices of petrol and diesel, which since November have remained sticky despite the price trend in crude, will now see sharp increases to offset the higher costs being borne by oil refiners. This should be avoided. GoI should ensure that the increase in pump prices is gradual.
India’s economic context today is marked by a potential inflationary spiral along with a weak aggregate demand. This context rules out any meaningful role for monetary policy as nudging up interest rates now will harm economic recovery. It, therefore, makes fiscal policy the best tool to manage the current economic situation. Because a sharp oil price increase at this stage will lead to a demand shock and undo some of last year’s economic recovery, GoI should absorb some of the uncovered costs of oil refiners for now. This will help avoid a demand shock while protecting the companies.
Going forward, retail fuel prices will have to reflect higher input costs. To balance this, GoI must cut central fuel taxes. There’s definitely room for this as benefits from the moderation in global crude price between 2015 and 2021 were not passed on to Indian consumers. For instance, central duties on a litre of petrol in 2014 were about Rs 9.50. Currently, they’re about Rs 27.90 per litre. Reduction in fuel tax revenue will be offset by a likely increase in tax collections – as an increase in inflation will help GoI overshoot its target of 9.6% growth in tax revenue in 2022-23.
Some of the key assumptions underpinning the Union Budget have become untenable on account of subsequent geopolitical turmoil, which is catalysing inflation in other industrial inputs too. Consequently, crowding in private investment in the wake of an increase in public spending may take longer than expected. It leaves GoI and states with the responsibility of using fiscal policy to anchor economic recovery. Public investment will remain the key in holding up investment demand. Given that economic uncertainty coupled with higher inflation will act as a drag on private consumption, governments must ensure revenue spending is not contractionary in inflation-adjusted terms. Don’t choke the consumption demand.
Date:09-03-22
Defence Independence India has to reduce Russian imports, but dependency on the West no solution either TOI Editorials
While speaking to the UK Parliament’s foreign affairs committee, British foreign secretary Liz Truss said that India’s stance on the Russian invasion of Ukraine is the result of New Delhi’s dependence on Moscow, and that the way forward is closer India-UK ties. She is correct insofar as more than 50% of India’s military assets are of Russian origin. These need constant maintenance, upgrades and spares – even as the new Western sanctions on Russia, such as excluding several Russian banks from the SWIFT international payment system, mean a considerable strain on India’s traditional defence ties with Moscow. But exchanging dependency on Russia for dependency on the West is no solution for India.
Over the last decade India has made concerted attempts to diversify its defence imports. For example, the Indian air force today heavily relies on the American C-17 and C-130J Super Hercules in its heavy-lift transport fleet. The helicopter fleet too has inducted the American Chinook and Apache. But cost competitiveness, proven battlefield performance and familiarity with consecutive generations of servicemen still make Russian platforms preferable. Then there is the issue of technology transfer. Although no country is willing to share cutting-edge military tech, Russia has been slightly more open to helping India develop strategic platforms such as cruise missiles and nuclear submarines.
Even with this Russian help, India today is in no position to build assets like a fifth-generation fighter from scratch. In the near term, India has to maintain a diversified defence portfolio, because switching out all Russian defence equipment for Western imports is not feasible. But in the medium- to long-term, especially given the sanctions on Russia and Moscow’s growing strategic convergence with Beijing, India has to develop its own indigenous military-industrial complex, capable of serving various needs including cutting-edge platforms. That’s the only way to have a truly independent defence and strategic policy.
Date:09-03-22
Independence for Our Regulators! Vijay L Kelkar is former chairman, Finance Commission, and Pradeep S Mehta is secretary general, Consumer Unity & Trust Society (CUTS) International. Inputs by Rajshree Agarwal
India will soon be taking over the presidency of the G20 in 2023. This means it has to show, among other things, its best in economic governance systems, which are comparable to advanced countries’ systems. So, as GoI is gearing up to select a new head of the Insurance Regulatory and Development Authority (Irda), it may be useful to look at an International Monetary Fund (IMF) working paper (bit. ly/3pIW6hG) highlighting how the independence of regulatory agencies matters for good governance and financial sector stability, for the same reasons as the independence of central bank matters for monetary stability.
Together, these independent agencies have the potential to reinforce each other in achieving the overall objective of financial stability and growth. GoI needs to demonstrate credible commitment to regulation, which is dynamic in nature due to a fast-changing environment. India’s regulators need to be independent and it needs to revisit its selection process for that purpose.
In India, the tendency seems to be to appoint retired civil servants as regulators showing their preference to their accommodative possibilities compared to the needed high level of competency. The current level of compensation is not a hindrance to attract professionals, as the legal profession shows that talented lawyers are willing to join the judiciary, at a loss of income, to serve the higher purpose of public service and better governance.
Central bank governors in G20 countries, too, are fairly independent and appointed from a pool of experts. Britain’s central bank once appointed a Canadian governor, Mark Carney, as it believed that it can govern better by getting talent from anywhere in the anglophone world. In the same vein, Britain appointed Parthasarathi Shome as the head of its tax administration system.
The mechanisms followed in other countries should be understood to be used as possible models for an efficient and effective procedure of selection of regulators in India. In Britain, select committees of both Houses of Parliament conduct pre-appointment hearings. This type of parliamentary scrutiny enables the select committees to take evidence from candidates for key public appointments before they are appointed. Hearings are in public, and a report is published setting out the committee’s views on the candidate’s suitability for the post.
In the US, these senate appointments are believed to be the only mechanisms for democratic governance to organise, respond to, and participate in the technical affairs of financial regulation. After a candidate is nominated, the senate engages in providing its advice and consent on the appointment. There is high quality of engagement across the partisan divide in debating finer points on the candidature, the position requirements and the overall consequences of the country’s management of the publicprivate partnerships and the regulators’ potential role in it.
In Spain, the government makes a recommendation to Parliament. After scrutiny, the latter decides upon the appointment of the regulator. The process began as a pilot initiative even at the provincial level. Renewal of term is allowed for only once, and for that too, reasons have to be furnished.
There is a multifaceted appointment process in New Zealand, where advice, recommendation and consent is granted by another body. This is to undermine influence of any single political party in the selection process. This has the potential to muster greater assistance to the central bank, shield it, to an extent, from changes in the executive or legislature and help anchor the central bank in the community. The New Zealand Reserve Bank’s board, for instance, proposes the governor, who is then appointed by the finance minister.
For India, a sector-specific selection procedure must be adopted, against which applications should be accepted. Thereafter, a permanent selection body like the Union Public Service Commission (UPSC) or the Banks Board Bureau must be established with eminent personalities, and not just civil servants, to conduct efficient interviews and scrutiny in the pre-appointment stage. Private sector employees and young candidates must be encouraged to take up such positions. This would also need amendments in laws. After this process, the selection body should refer the candidate to the parliamentary standing committee on the subject under which the appointment has to be made. Ensuring the effectiveness of parliamentary scrutiny will hold regulators to account.
Date:09-03-22
Debunking an urban myth about Taj Mahal There are no historical records to prove that Shah Jahan ordered the hands of workers to be chopped off M. Saleem Beg, who retired as Jammu and Kashmir Director of General Tourism, and was a member of the National Monuments Authority, heads the Jammu and Kashmir chapter of the Indian National Trust for Art and Cultural Heritage
A monument of national importance, the Taj Mahal is a UNESCO World Heritage Site. UNESCO describes it as a “masterpiece of architectural style in conception, treatment and execution”. This 17th century wonder is again at the centre of multiple narratives driven by ideologicy. In the process, history is being pushed into the shadows.
The latest attempt at building an ideologically-driven narrative came against the backdrop of Prime Minister Narendra Modi inaugurating the Kashi Vishwanath Dham in December 2021. In an appreciable gesture, Mr. Modi showered flower petals on sanitation workers who work at the Kashi Vishwanath Temple, to thank them for keeping the temple clean. But this heartwarming gesture soon became another reason to criticise the Mughals. Several news channels started comparing Mr. Modi with Mughal emperor Shah Jahan. The point hammered home was that unlike the Prime Minister who had showered flower petals on sanitation workers, Shah Jahan had chopped off the hands of those who had built the Taj Mahal. In their misplaced exuberance, some politicians from the ruling establishment picked up the thread. In no time, social media was flooded with posts suggesting that the hands of workers who had built the Taj Mahal were chopped off.
The fact remains that this is a well-known urban myth. There is no historical evidence to prove that Shah Jahan did this. This urban myth goes back to the 1960s or at least resurfaced around that time. As this controversy has been raked up again, let us revisit written records to salvage the truth.
Builders of the Taj
The Taj Mahal was conceived as a memorial by Shah Jahan for his wife Mumtaz Mahal. UNESCO states that several historical and Quranic inscriptions in the Arabic script have helped us understand how the Taj Mahal was built. Masons, stone-cutters, inlayers, carvers, painters, calligraphers, dome builders and other artisans were requisitioned from the whole empire and also from Central Asia and Iran to construct the monument. UNESCO says: “The Taj Mahal is considered to be the greatest architectural achievement in the whole range of Indo-Islamic architecture… The uniqueness of Taj Mahal lies in some truly remarkable innovations carried out by the horticulture planners and architects of Shah Jahan.”
While we cannot discount the skills and craftsmanship of the artisans and workers, it was indeed the expertise and creative capabilities of the architects and planners, including those from Central Asia and Iran, which gave us this marvel. The supervision of the process, starting from the ideation stage to the conception and execution stage, was entrusted to the Mughal nobles.
Account books and Mughal records say, for example, that Ata Muhammad, a stonemason, was paid ₹500 a month. Shakir Muhammad from Bukhara received ₹400, while Muhammad Sajjad, a mason from Multan, and Chiranjilal, a façade worker from Lahore, were paid ₹590 and ₹800 a month, respectively. The normal wages of such workers were about ₹15 rupees a month, as reflected in period records for trained workers. Therefore, it can be safely assumed that the people quoted in the account books were team leaders who were responsible for certain work. They were perhaps tasked with engaging local and other workers. These huge sums were redistributed among several people.
Also, apart from these masters, architects, calligraphers and organisers feature in historical records. Some of them were, or became part of, the Mughal nobility. The uniqueness of the monument has been attributed to the calligraphy. We know from historic records that this distinguishing feature in the monument was devised and supervised by a noble, Amanat Khan, who was originally a calligrapher from Shiraz in Iran and migrated to the Mughal court with his elder brother Afzal Khan in 1608 CE. He began working in the Imperial Library of emperor Shah Jahan, while Afzal Khan soon rose to become Prime Minister of the empire. Amanat Khan was appointed to design the calligraphy on the mausoleum in Agra, which came to be known as the Taj Mahal. Impressed with his work, Shah Jahan conferred on him the title of ‘Amanat Khan’ (like an heirloom) and a ‘mansab’, a land title that ranked with the nobility. Amanat Khan worked on the Taj Mahal for six years. The calligraphy inside the domed hall of the grand mausoleum was completed in 1638. However, just when he completed the most important project of his life, a personal tragedy struck him. Afzal Khan died in Lahore. W. E. Begley, an eminent scholar of Indian and Islamic Art, wrote that the old calligrapher spent his entire income in constructing a memorial for his brother. It is said that Amanat Khan did not return to Iran on the request of his closest friend Ustad Ahmad, who was the chief architect of the Taj Mahal.
Respected architects
Ustad Ahmad was a respected architect who was equated with the nobility of the time. Shah Jahan’s court historians emphasise his personal involvement in the construction. More than any other Mughal emperor, he showed great interest in building new magnificent buildings. He held daily meetings with his architects and supervisors.
The court chronicler, Abdul Hamid Lahori, wrote that Shah Jahan would make “appropriate alterations” to whatever the skilful architects had designed after considerable thought and “would ask the architects competent questions”. In writings by Lahori’s son, Lutfullah Muhandis, two architects are mentioned by name: Ustad Ahmad Lahori and Mir Abd-ul Karim. Ustad Ahmad Lahori had laid the foundations of the Red Fort in Delhi. Mir Abd-ul Karim had been the favourite architect of the previous emperor, Jahangir. Several designers and architects, 37 in all, are mentioned by name in Mughal history. It is probable that they all worked together to shape the Taj Mahal. They include Ismail Afandi (aka Ismail Khan), who had worked for the Ottomans in Turkey as a designer and builder of domes; Qazim Khan, a goldsmith from Lahore, who cast the gold finial that crowns the dome; Chiranji Lal, a lapidary from Delhi, who was chosen as the chief mosaicist; Amanat Khan, the master calligrapher whose signature is inscribed on the Taj gateway; Mohammed Hanif, a master mason from Delhi; and Mukrimat Khan and Mir Abdul Karim from Shiraz, chief supervisors and administrators.
While the efforts and hard work of artisans and workers played a key role in the construction of the monument, we know that projects of this nature and scale are created by the planners and architects. They were all felicitated and rewarded by Shah Jahan for giving shape to his passion and vision. The records conclusively show that the rumours about the chopping of hands were just that: hearsay. For leaders to repeat this myth every now and then only betrays their ignorance and lack of understanding of history.
Date:09-03-22
युद्ध के कारण भारत में अब महंगाई अपरिहार्य संपादकीय
यूक्रेन से युद्ध के मद्देनज़र रूस से व्यापार बंद करने के बाद पिछले तीन माह में कच्चे तेल की कीमत विश्व बाजार में 70 डॉलर से आज 140 डॉलर प्रति बैरल जा पहुंची है। भारत अपनी जरूरत का 84 प्रतिशत तेल आयात करता है। लिहाजा पांच राज्यों के अंतिम चरण के चुनाव के तत्काल बाद देश में पेट्रोल-डीजल की कीमत में असाधारण वृद्धि अपरिहार्य है। सरकार की योजना है कि अचानक बड़ी वृद्धि न करते हुए चरणबद्ध तरीके से दो माह में कीमतें बढ़ाई जाएं ताकि जनता में घबराहट न पैदा हो। बहरहाल, तेल की कीमत 10 प्रतिशत बढ़ने से थोक महंगाई 0.9 प्रतिशत और खुदरा महंगाई 0.5 प्रतिशत बढ़ती है, यानी बेरोजगारी पर महंगाई की मार। वास्तव में इसे रोकना सरकार के हाथ में नहीं है जब तक वह पेट्रोलियम पर टैक्स को कम न करे। लेकिन टैक्स कम करने का मतलब राजस्व में कमी, जो विकास और राहत कार्यों को प्रभावित करेगी। कच्चे तेल के आयात में पहले से ज्यादा खर्च करने का मतलब चालू खाते में घाटा। महंगाई बढ़ी तो लोग खर्च में कोताही करेंगे, जिससे सामान कम बिकेगा और एमएसएमई इकाइयां फिर बंद होने के कगार पर होंगी। यानी बेरोजगारी का नया दौर। अभी अर्थव्यवस्था पटरी पर आना शुरू हुई ही थी कि युद्ध से आसन्न महंगाई का खौफ सताने लगा है। इसी बीच भारत को रूस से मिलने वाले चार और एस-400 (एक पहले ही मिल चुका है) की आपूर्ति में देरी होगी। स्विफ्ट और अन्य आर्थिक प्रतिबंधों के कारण रूस के उत्पादन पर भी असर होगा। भारत द्वारा रूसी मिग-29 की खरीद रद्द किए जाने का अमरीकी सीनेट ने स्वागत किया है। भारत की सामरिक क्षमता प्रभावित हुई तो इससे चीन भी खुश ही होगा।
Date:09-03-22
भारत अगर चाहे तो हल हो सकता है यूक्रेन-संकट डॉ. वेदप्रताप वैदिक, ( भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष )
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रूस व यूक्रेन के राष्ट्रपतियों से बात करते हुए उन्हें संवाद के लिए प्रेरित किया। यह अच्छी पहल है। अब वे पांच राज्यों के चुनावी झंझट से मुक्त हो चुके हैं। वे चाहें तो अमेरिकी राष्ट्रपति जो बाइडेन से भी सीधी बात कर सकते हैं। यूक्रेनी संकट की असली जड़ अमेरिका में ही है। यदि अमेरिका यूक्रेनी राष्ट्रपति जेलेंस्की को नाटो में शामिल होने के लिए नहीं उकसाता तो यूक्रेन पर रूसी हमले की नौबत ही क्यों आती?
क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेस्कोव ने हाल में अपने बयान में कहा है कि यूक्रेन के खिलाफ रूस अपनी सैन्य-कार्रवाई एक क्षण में ही बंद करने के लिए तैयार है, बशर्ते वह मास्को की मांगों पर ध्यान दे। मांग यह है कि यूक्रेन नाटो के सैन्य गुट में शामिल न होने की घोषणा करे, क्रीमिया को रूसी क्षेत्र घोषित करे और दोनेत्स्क और लुहांस्क को स्वतंत्र राष्ट्रों की मान्यता दे। पेस्कोव ने यह भी स्पष्ट किया कि रूस नहीं चाहता कि वह यूक्रेन को अपना प्रांत बना ले या कीव पर कब्जा कर ले। पिछले डेढ़ हफ्ते में रूस ने यूक्रेन के खिलाफ जो कुछ भी किया, उसे वह युद्ध नहीं, सिर्फ सैन्य कार्रवाई कह रहा है। इसीलिए मारे जाने वाले लोगों की संख्या सैकड़ों में है, हजारों-लाखों में नहीं। लगभग 20 लाख यूक्रेनी भागकर पड़ोसी देशों में चले गए हैं और वे तथा भारतीय छात्र भी सुरक्षित बाहर निकल सकें, इस दृष्टि से रूस ने चार ‘सुरक्षित गलियारों’ की घोषणा की थी लेकिन यूक्रेन ने इसे शुद्ध पाखंड बताया है।
यूक्रेन को पता चल गया है कि अमेरिका और नाटो राष्ट्रों ने उसे पानी पर चढ़ाकर मुंह फेर लिया है। अब भी यूक्रेन के नेता और लोग बड़ी हिम्मत से रूसी हमले का मुकाबला कर रहे हैं लेकिन उन्हें पता है कि यदि यह हमला लंबा खिंच गया तो मुश्किल होगी। ऐसी हालत में यह सही होगा कि जेलेंस्की यूक्रेन की तटस्थता की घोषणा तो कर ही दें। दोनेत्स्क और लुहांस्क को स्वतंत्र राष्ट्रों की तरह मान्य करने के बजाय वे वैसा ही करें, जैसा कि क्रीमिया में किया था। क्रीमिया पर से रूसी कब्जा हटाने की कोशिश यूक्रेन ने नहीं की और उस कब्जे को मान्यता भी नहीं दी। अभी तक बेलारूस में दोनों देशों के अफसर बात करते रहे हैं लेकिन अब खबर है कि तुर्की में रूसी-यूक्रेनी विदेश मंत्री मिलेंगे। तुर्की नाटो का सदस्य है लेकिन रूस-यूक्रेन से उसके घनिष्ठ संबंध हैं। इन देशों की सीमाएं काले समुद्र की वजह से तुर्की से भी जुड़ती हैं। तुर्की ने हमले को अनुचित बताया है लेकिन उसने रूस के विरुद्ध घोषित प्रतिबंधों का भी विरोध किया है। भारत चाहे तो इस शांति-संवाद में तुर्की से आगे निकल सकता है। वह दिल्ली में अमेरिकी, रूसी और यूक्रेनी विदेश मंत्रियों में संवाद करवा सकता है।
यूक्रेन-विवाद पर जब भी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर मतदान हुआ, भारत सदा तटस्थ रहा। उसने न तो रूस का पक्ष लिया और न ही यूक्रेन या अमेरिका का! भारत के लगभग 20 हजार छात्रों और नागरिकों को यूक्रेन से बाहर निकाल लाने के भारी काम में यूक्रेन और रूस दोनों ने हमारी मदद की। भारत सरकार ने इस मामले में देर से ही सही, लेकिन बड़ी मुस्तैदी से सराहनीय काम करके दिखाया। यदि भारत इस युद्ध को तुरंत रुकवा सके तो रूस और यूक्रेन को ही नहीं, सारे विश्व को वह कई आर्थिक संकटों से बचा ले सकता है। यदि यूरोपीय देशों को होने वाली रूसी तेल और गैस की आपूर्ति बंद हो जाए तो उनके होश फाख्ता हो जाएंगे। इसीलिए इन देशों ने अभी तक रूसी तेल और गैस पर प्रतिबंध नहीं लगाया है। पिछले 12-13 दिनों में कच्चा तेल 44 प्रतिशत महंगा हो गया है। सोना, चांदी और डॉलर की कीमतें बढ़ती चली जा रही हैं। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भी नए समीकरणों का विकास हो रहा है। तीन दशक पुराने शीत युद्ध की नरम शुरुआत तो हो ही चुकी है। अब एक तरफ अमेरिकी खेमा होगा और दूसरी तरफ चीनी-रूसी खेमा। इस दूसरे खेमे का नेतृत्व अब रूस नहीं, चीन करेगा। इसीलिए चीन हर कदम फूंक-फूंककर रख रहा है।
Date:09-03-22
महामारी से जेंडर गेप खत्म करने की समयसीमा बढ़ी साधना शंकर, ( लेखिका, भारतीय राजस्व सेवा अधिकारी )
अक्टूबर 2021 के बाद से अब तक चार देशों में महिला राष्ट्रपति या प्रधानमंत्री बन चुकी हैं- बारबाडोस, ट्यूनिशिया, स्वीडन और होंडुरास। कुछ समय पूर्व इंडियन स्टैटिस्टिकल इंस्टिट्यूट ऑफ कोलकाता की नीना गुप्ता ने वर्ष 2021 का प्रतिष्ठित डीएसटी-आईसीटीपी-आईएमयू रामानुजन पुरस्कार जीता। विकासशील देशों के युवा गणितज्ञों को दिया जाने वाला यह पुरस्कार जीतने वाली वो पहली भारतीय महिला हैं। महिलाओं ने खेल, व्यवसाय और सौंदर्य के क्षेत्र में भी सफलता के प्रतिमान रचे हैं। कल अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस मनाया गया, जिसमें उत्सव मनाने के लिए बहुत कुछ था। लेकिन इस साल की थीम ‘ब्रेक द बायस’ (पक्षपात को समाप्त करना) ही हमें यह बताने के लिए बहुत है कि अभी बहुत लम्बी यात्रा बाकी है।
महामारी के बाद अब निजी और सार्वजनिक स्तर पर स्वास्थ्य पर फोकस बढ़ गया है, जिससे स्वास्थ्य-सम्बंधी रिसर्च में परम्परागत लैंगिक-भेद भी उभरकर सामने आ रहा है। ऐतिहासिक रूप से महिलाएं क्लिनिकल ट्रायल्स का हिस्सा नहीं रही हैं, अलबत्ता अब यह स्थिति बदल रही है। पहले इसके लिए तर्क दिए जाते थे कि हम प्रजनन आयु-समूह की महिलाओं को उन दवाइयों से बचाना चाहते हैं, जो भविष्य की उनकी संतानों को प्रभावित कर सकती हैं। फिर यह कहा जाने लगा कि स्त्रियों के हॉर्मोन्स रिसर्च को प्रभावित कर सकते हैं। रिपोर्टों के अनुसार दुनिया में स्वास्थ्य-सम्बंधी रिसर्च के लिए सबसे ज्यादा फंड देने वालों में से एक यूएस नेशनल इंस्टिट्यूट ऑफ हेल्थ अपने संसाधनों का अधिकतम हिस्सा ऐसी बीमारियों पर खर्च करता है, जो मुख्यतया पुरुषों को प्रभावित करती हैं। इस भेदभाव के कारण महिलाओं को ऐसी स्वास्थ्य-सुविधाएं प्राप्त होती हैं, जो उनके शरीर की सम्पूर्ण समझ पर आधारित नहीं होतीं। उन्हें चिकित्सकीय पक्षपात का भी सामना करना पड़ता है, उनके मामलों को विशेषज्ञों को कम रेफर किया जाता है। यही स्थिति मानसिक-रोगों में भी है। तनाव पर पुरुषों और महिलाओं की प्रतिक्रिया एक जैसी नहीं होती। पुरुषों को तनाव होने पर रक्तचाप जैसी शारीरिक प्रतिक्रियाओं का सामना करना पड़ता है, वहीं महिलाओं की प्रतिक्रियाएं अधिक मनोवैज्ञानिक होती हैं। उनके रोग भी पुरुषों की तुलना में भिन्न होते हैं। मेडिकल रिसर्च के क्षेत्र में लिंगभेद का प्राथमिकता से समाधान करना चाहिए। दुनिया की आधी आबादी होने के नाते यह महिलाओं का अधिकार है कि वे अपनी जैविक संरचना के आधार पर स्वास्थ्य-सेवाएं पा सकें।
महामारी के बाद कार्यस्थलों पर भी महिलाओं के लिए चुनौतियां उभरी हैं। चाहे वर्क फ्रॉम होम हो या हाइब्रिड शैली- महिलाओं की जरूरतों को ध्यान में रखकर नियम बनाए जाने चाहिए। कोविड-19 के कारण नौकरियां गंवाने वालों में महिलाओं की संख्या बड़ी है। उन्हें फिर से काम पर लौटाने के लिए कामकाज के ढांचे में लचीलापन लाने की जरूरत है, ताकि वे मौजूदा दौर में पिछड़ न जाएं। दुनियाभर के शहर और अर्बन-स्पेस पुरुषों के द्वारा नियोजित और निर्मित हैं। उनमें महिलाओं की जरूरतों के प्रति सजगता नहीं होती। सार्वजनिक सुविधाघरों और सड़कों पर पर्याप्त रोशनी जैसी बुनियादी सुविधाओं तक का अभाव पाया जाता है। रहवासी और व्यावसायिक एरिया को मिलाते हुए उन्हें महिलाओं के लिए सुरक्षित बनाना या सुरक्षित ट्रांसपोर्ट सुविधा मुहैया कराना भी लैंगिक-दृष्टि से सम्पन्न बुनियादी ढांचे का हिस्सा होना चाहिए। इंटरनेट सेवा प्रदाताओं की जिम्मेदारियों पर बात करना भी जरूरी है। महिलाओं के साथ साइबर-स्टाकिंग और इंटरनेट-दुर्व्यवहार की घटनाएं बढ़ी हैं। इन्हें रोकने के लिए प्रभावी नियामक फ्रेमवर्क बनाने की आवश्यकता है। ऑनलाइन हिंसा भी ऑफलाइन हिंसा की तरह महिलाओं को बलप्रयोग से चुप करा देना चाहती है। अगर ‘ब्रेक द बायस’ में एक और सदी लगने जा रही है तो हर महिला दिवस पर हमें आकलन करना चाहिए कि हम बदलावों की दिशा में कितना आगे बढ़े।
Date:09-03-22
आपरेशन गंगा संपादकीय
यह राहत की एक बड़ी खबर है कि यूक्रेन के घमासान वाले शहर सूमी में फंसे करीब सात सौ भारतीय छात्रों को सुरक्षित निकालने में सफलता मिली। यह सफलता इसलिए उल्लेखनीय है, क्योंकि कभी रूस तो कभी यूक्रेन युद्धविराम के लिए बनी सहमति का उल्लंघन कर रहे थे। इससे सूमी में फंसे भारतीय छात्रों की मुसीबत बढ़ रही थी। उन्हें संकट से बचाने के लिए प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को न केवल यूक्रेन और रूस के राष्ट्रपति से बात करनी में भारतीय प्रतिनिधि को इन दोनों देशों के रवैये पर आपत्ति पड़ी। रूस पर यूक्रेन के हमले के बाद वहां फंसे भारतीयों को सुरक्षित बचाकर लाना एक बड़ा चुनौता थी, क्योंकि शुरुआती दिनो मे काई देश युद्धविराम के लिए, तैयार नहीं था और यदि कभी वे तैयार भी होते तो उसके प्रति गंभीरता नहीं दिखा रहे थे। ऐसे हालात में 47 हजार से अधिक भारतीयों को सुरक्षित निकालकर लाना एक बड़ा काम है। इस ‘काम को किस तरह सर्वोच्च प्राथमिकता दी गई, इसे इससे समझा जा सकता है कि इसके लिए न केवल चार केंद्रीय मंत्रियों को यूक्रेन के पड़ोसी देशों में भेजा गया, बल्कि भारतीय वायुसेना की भी सेवाएं ली गईं।
भारत ने एक बार फिर यह साबित किया कि वह युद्ध अथवा अन्य किसी आपदा में फंसे अपने नागरिकों को निकालने में कोई कसर नहीं रखता। आपरेशन गंगा के तहत यूक्रेन में भी उसने यही किया और वह भी तब, जब कई देशों ने अपने लोगों को वहां से निकालने के मामले में हाथ खड़े कर दिए थे। भारत ने कुछ वर्ष पहले ऐसा ही काम बमन में आपरेशन राहत के तहत किया था। तब तो उसने बांग्लादेश, नेपाल, श्रीलंका के अलावा अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, कनाडा समेत से निकाला था। ऐसे अभियान केवल भारत की बढ़ती क्षमता को रेखांकित करते हैं, बल्कि दुनिया को यह संदेशी देते हैं कि बह एक बड़ी और जिम्मेदार शक्ति बन रहा है। चूँकि जिन भी भारतीयों ने यूक्रेन स्थित भारतीय दूतावास से ‘किया था, उन सभी को निकाल लिया गया है, इसलिए, उम्मीद वहां हमारा कोई नागरिक नहीं फंसा होगा। यदि किसी कारण कोई भारतीय वहां रह भी गया होगा तो आशा की जाती है कि उसे भी निकाल लिया जाएगा। यदि यूक्रेन से फंसे भारतीयों को निकालने में सफलता मिली तो भारत की कूटनीतिक सक्रियता के कारण | निःसंदेह भारत की भूमिका यहीं समाप्त नहीं हो जाती। उसे इसके लिए प्रयत्न जारी रखने चाहिए कि यूक्रेन में युद्धविराम हो और दोनों पक्ष बातचीत के जरिये समस्या का समाधान करने के लिए आगे आएं।
Date:09-03-22
वित्तीय आत्मनिर्भरता का प्रेरक उदाहरण राजीव मंत्री, ( स्तंभकार नवम कैपिटल के प्रबंध निदेशक एवं ‘ए न्यू आइडिया आफ इंडिया’ पुस्तक के सह-लेखक हैं )
बीते दिनों मास्को सहित रूस के कई शहरों में मेट्रो स्टेशनों से लेकर एटीएम जैसे सार्वजनिक स्थलों पर लोगों की लंबी-लंबी कतारों की फोटो इंटरनेट मीडिया पर वायरल हो रही थीं। इसका एक बढ़ा कारण यह था कि एपल, गूगल, वीजा, मास्टरकार्ड, अमेरिकन एक्सप्रेस और पेपाल जैसी कंपनियों ने रूस में अपना परिचालन बंद कर दिया था। युक्रेन पर रूसी हमले के विरोध में लगाए गए पश्चिमी प्रतिबंधों के कारण इन कंपनियों ने यह कदम उठाया था। लोग मेट्रो जैसी सेवाओं के लिए आनलाइन भुगतान के अध्यस्त हो गए थे, लेकिन एकाएक लगे इन प्रतिबंधों ने उन्हें नकदी का सहारा लेने पर मजबूर कर दिया। इसी कारण मेट्रो स्टेशनों पर लंबी कतार लग गईं। तमाम अन्ब वस्तुओं एवं सेवाओं के भुगतान के लिए बढ़ी नकदी की जरूरत से एटीएम के बाहर भी लौग कतारबद्ध दिखे। इसमें कोई संदेह नहीं कि भुगतान नेटवर्क से जुड़ी पश्चिमी कंपनियों ने अपनी इन सेवाओं को एक हथियार के रूप में इस्तेमाल कर रूस में वित्तीय लेनदेन पर आघात किया है। इस परिदृश्य ने एक नई बहस छेड़ दी है कि पश्चिमी संस्थाओं पर पूर्ण निर्भरता अपनी वित्तीय संप्रभुता के लिए कितनी घातक है ?
यदि भारत के समक्ष इस प्रकार की स्थितियां उत्पन्न हुईं, तब क्या होगा? शुक्र है कि भारत के संदर्भ में इसका जवाब वैसा नहीं होगा, जैसा रूस के मामले में देखने को मिला। इसका श्रेय भारत सरकार की दूरदर्शी नीतियों को जाता है, जिसने समय से रुपे कार्ड और यूपीआइ जैसी भुगतान प्रणालियों को न केवल अपनाया, बल्कि उन्हें जरूरी प्रोत्साहन भी प्रदान किया। भारतीय राष्ट्रीय भुगतान निगम यानी एनपीसीआइ की यह दौहरी पेशकश ऐसे किसी भी संकट में भारत के लिए वरदान सिद्ध होगी।
वास्तव में पेमेंट इन्फ्रास्ट्रक्चर यानी वित्तीय भुगतान से जुड़ा ढांचा किसी भी अर्थव्यवस्था की रीढ़ होती है। कतिपव कारणों से भारत पारंपरिक रूप से नकदी प्रधान अर्थव्यवस्था रहा। इसमें नकदी के विकल्प रूप में अपनाई जाने बाली प्रणाली के उपयोग में लगने वाली एक निश्चित लागत सबसे बड़ी बाधा रही | जैसे वीजा या मास्टरकार्ड से होने वाले कार्ड भुगतान पर कुछ प्रतिशत राशि इन कंपनियों की न्नोली में जाती है। यह पहलू भुगतान प्रणाली के डिजिटलीकरण की राह में एक बड़ी बाधा बना रहा। मोदी सरकार ने इस अवशेध को चिन्हित कर रुपे के तौर पर एक शुल्क मुक्त पहल की। इसका असर भी दिखा। भारतीय रिजर्व बैंक के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2020 तक देसी डेबिट कार्ड बाजार में रुपे कार्ड की हिस्सेदारी 60 प्रतिशत तक पहुंच गई, जबकि 2017 में यह 15 प्रतिशत ही थी। इस बढ़ोतरी में एक निर्णावक पहलू प्रधानमंत्री जन धन योजना का भी रहा, जिसके अंतर्गत खाताधारकों को रुपे कार्ड ही जारी किए जाते हैं। हालांकि क्रेडिट कार्ड के मोर्चे पर रुप का वैसा दबदबा नहीं, लेकिन जानकारों का कि स्मव के साथ इसमें तय है ‘डूड समय पहले बैंकिंग नियामक नियमन संबंधी अहंताओं को लेकर मास्टरकार्ड द्वारा नए कार्ड जारी करने पर प्रतिबंध लगा दिया था। उस दौरान रुपे क्रेडिट कार्ड के बाजार में खासा विस्तार देखने को मिला था। यही कारण है कि वीजा और मास्टरकार्ड जैसी कंपनियां अमेरिकी सत्ता प्रतिष्ठान में रपे के खिलाफ लाबिंग करने में लगी हैं कि प्रधानमंत्री मोदी ‘वित्तीय राष्ट्रवाद’ की आड़ में उनके हितों को नुकसान पहुंचा रहे हैं। उनकी यह खोज्न स्वाभाविक है, क्योंकि वित्तीय लेनदेन पर उन्हें जो दौ-तीन प्रतिशत कमीशन मिलता रहा, उ्स पर उन्हें खतरा मंडराता दिख रहा है। स्पष्ट है कि भारतीय वित्तीय प्रणाली में रुपे की निरंतर पैठ बढ़ने से न केवल वित्तीय आत्मनिर्भरता का लक्ष्य प्राप्त हो रहा है, बल्कि इससे हर साल हजारों करोड़ रुपये की बचत भी हो रही है।
यूनिफाइड पेमेंट इंटरफेस यानी यूपीआइ आत्मनिर्भर भुगतान प्रणाली से जुड़ी भारत की सफलता की गाथा का दूसरा अध्याय है। आज जब बैंकिंग सुविधा हमारे फोन में सिमट गई है तो यूपीआइ वित्तीय लेनदेन को सुगम बनाने के महत्वपूर्ण आधार के रूप में उभरा है। आंकड़े इसकी सफलता स्वयं कहते हैं। वर्ष 2014 तक जीडीपी में खुदरा डिजिटल भुगतान को नाममात्र की हिस्सेदारी थी, जो 202 में बढ़कर का प्रतिशत तक पहुंच गईं। यूपीआइ ने वित्तीय लेनदेन को सुरक्षित एवं आसान बनाने के साथ ही नकदी पर निर्भरता घटाने में भी नाटकीय भूमिका निभाई है। वर्ष 2014 में खुदरा लेनदेन में एटीएम निकासी हिस्सेदारी 88 प्रतिशत थी, वह दिसंबर 2021 में घटकर 22 प्रतिशत रह गई। यानी यहां भी दोहरा फायदा है। वृषीआइ से जहां बैंक-एटीएम वाले नकदी लाजिस्टिक्स पर आने वाला खर्च घटा है, वहाँ वित्तीय लेनदेन सुरक्षित होने और समूचे तंत्र में पारदर्शिता बढ़ाने वाला भी सिद्ध हुआ है। इसीलिए दुनिया के कई देश बुपरीआइ के प्रति आकर्षित दिख रहे हैं।
यूक्रेन पर हमले के बाद रूस को जिस प्रकार के वित्तीय प्रतिबंधों को सामना करना पड़ रहा है, उसे देखते हुए भारतीव नीति- नियंताओं की सबब की दाद देनी होगी कि उन्होंने वित्तीय मोर्च पर आत्मनिर्भरता की आवश्यकता को समय रहते भांपफर उस दिशा मैं कदम बढ़ा दिए थे। अमेरिका और अन्य पश्चिमी वित्तीय दिग्गज कंपनियों के ऐसे रबैये के कारण अब दुनिया के कई देशों मैं उनके प्रति आशंकाओं का जन्म लेना स्वाभाविक है। ऐसे में यह भारत के लिए उचित अवसर है कि वह रुपे और युपीआइ के वैश्विक विस्तार के प्रयासों को और गति दे। मोदी सरकार पहले ही इन कोशिशों में लगी है। संयुक्त अरब अमीरणत जैसे देश ने रुपे कार्ड को व्यापक स्वीकार्यता दी है। दक्षिण-पूर्वी एशिया और खाड़ी के कई देशों में उसे अपनाने की तैयारी हो रही हैं। हीं तमाम देश भारत की प्रेरणा से अपनी स्वतंत्र वित्तीय प्रणालियां विकसित करने के इच्छुक हो सकते हैं। अपने अनुभव एवं दक्षता से भारत इन देशों की मदद के लिए आगे आ सकता हैं। एक ऐसे दौर में जब वित्तीय लेनदेन का तानाबाना पूरी तरह बदल गया है और भविष्य की लड़ाइयों में तकनीक की भूमिका अहम होती जाएगी, उस स्थिति में भारत की रुप और युपीआइ जैसी पहल उसे वित्तीव आत्मनिर्भरता का कवच प्रदान करने के साथ ही विश्व को नई राह भी दिखाएंगी।
Date:09-03-22
आयातित ऊर्जा की बढ़ती कीमत का जोखिम नीलकंठ मिश्रा, ( लेखक एपैक स्ट्रैटजी के सह-प्रमुख एवं क्रेडिट सुइस के इंडिया स्ट्रैटजिस्ट हैं )
हमने नवंबर में आशा जताई थी कि ईंधन कीमतों में तेजी अस्थायी रहेगी और भारत की कोविड के पश्चात की सुधार प्रक्रिया इससे प्रभावित नहीं होगी। परंतु ईंधन कीमतें तेजी से बढ़ीं क्योंकि रूस पर प्रतिबंध लगने से आपूर्ति बाधित हुई। भारत अपनी जरूरत के कुल ईंधन का 36 प्रतिशत आयात करता है। सकल घरेलू उत्पाद में देश के ईंधन आयात की हिस्सेदारी अन्य बड़ी अर्थव्यवस्थाओं की तुलना में सर्वाधिक है। एक दशक पहले यह अनुपात 8 फीसदी के उच्चतम स्तर पर पहुंचा था लेकिन उसके बाद यह घटा और कोविड के पहले केवल चार फीसदी तथा महामारी के दौरान तीन फीसदी से भी कम रह गया।
यदि मौजूदा कीमतें बरकरार रहती हैं तो यह अनुपात पुन: बढ़कर सात प्रतिशत हो सकता है। देश में 12 महीने का शुद्ध तेल आयात फिलहाल 1.25 अरब बैरल है जो कोविड के कारण मांग घटने के पहले 1.4 अरब बैरल था। यदि आगामी वित्त वर्ष में आर्थिक उत्पादन कोविड के पहले वाले वर्ष से 10 फीसदी अधिक रहता है तो शुद्ध तेल आयात 1.5 अरब बैरल पहुंच सकता है। तेल कीमतें भी दिसंबर 2021 के स्तर से 40 डॉलर प्रति बैरल तक बढ़ चुकी हैं। यानी इस मोर्चे पर भी करीब 60 अरब डॉलर का अतिरिक्त बोझ पडऩा तय है।
हालांकि यह तो प्रभाव का केवल एक हिस्सा है। गैस, कोयला, खाद्य तेल तथा उर्वरक जैसे घनीभूत ऊर्जा के अन्य स्वरूपों की कीमत भी बढ़ी है। ऐसा इसलिए भी है कि रूस और यूक्रेन इन जिंसों के विशुद्ध आपूर्तिकर्ता भी हैं। मौजूदा मूल्य पर भारत का इन जिंसों का आयात 40 अरब डॉलर तक बढ़ सकता है। यानी कुल ईंधन आयात का बोझ 100 अरब डॉलर तक बढ़ सकता है जो जीडीपी के तीन फीसदी के बराबर है।
ईंधन से जुड़ी ज्यादातर चर्चा मुद्रास्फीति तथा नकदी पर प्रभाव पर आधारित रहती है जबकि उत्पादन पर भी इसका बुरा असर होता है। ऐसा तीन तरह से होता है।
पहली बात, ऊर्जा की ऊंची लागत एक बार उपभोक्ताओं पर डाले जाने के बाद स्थानीय उत्पादन वाली वस्तुओं और सेवाओं की खपत को प्रतिस्थापित करेगी जिससे जीडीपी प्रभावित होगी। घरेलू आपूर्तिकर्ता के साथ वस्तुओं के मूल्य में वृद्धि के उलट यहां लाभार्थी देश के बाहर है। सरकार ईंधन करों में कटौती, आयात शुल्क पर दरें कम करके तथा उर्वरक सब्सिडी बढ़ाकर राहत दे सकती है लेकिन वह पूरे प्रभाव के एक चौथाई से अधिक मदद शायद ही दे पाए।
दूसरा, सरकार के हस्तक्षेप के बावजूद ईंधन की लागत में करीब 30 फीसदी इजाफा इस्तेमाल पर असर डालेगा: पेट्रोल, डीजल, घरेलू गैस तथा प्लास्टिक उत्पादों की कीमत बढ़ने का अर्थ होगा इस्तेमाल में कमी। दुनिया भर में आर्थिक गतिविधियां इनके इस्तेमाल से संबद्ध हैं। मसलन तेज आवागमन, विनिर्माण, उच्च गुणवत्ता वाले पदार्थ आदि के निर्माण में इनकी भूमिका है। ईंधन के इस्तेमाल में कमी का अर्थ है जीडीपी में कमी।
तीसरा, ईंधन की ऊंची कीमतें तथा भूराजनीतिक अनिश्चितता के कारण वैश्विक मांग प्रभावित हो सकती है। कच्चे तेल का वैश्विक बाजार उस समय 2.6 लाख करोड़ डॉलर का था जब कच्चे तेल की कीमत 70 डॉलर प्रति बैरल थी। 120 डॉलर प्रति बैरल के हिसाब से बाजार का आकार बढ़कर 4.4 लाख करोड़ डॉलर हो जाएगा और तेल उपभोक्ता उत्पादकों को 1.8 लाख करोड़ रुपये की अतिरिक्त राशि चुकाएंगे। तेल कीमतों में अचानक इजाफा और भविष्य की अनिश्चितता को देखते हुए लगता नहीं कि उत्पादक इस अप्रत्याशित लाभ को नए निवेश पर खर्च करेंगे। तेल कीमतों का झटका वैश्विक मांग पर असर होगा। अमेरिका जैसी अर्थव्यवस्था जो तेल के मामले में आत्मनिर्भर है वहां भी उपभोक्ताओं पर असर होगा जबकि उत्पादक बचत करेंगे। वैश्विक विनिर्माण निर्यात में भारत की कम हिस्सेदारी को देखते हुए हिस्सेदारी में इजाफा वृद्धि को सकारात्मक रखेगा लेकिन हालात वाकई मुश्किल हैं।
हमारा मानना है कि ईंधन कीमतें काफी ऊंचे स्तर पर जाने वाली हैं। आपूर्ति अल्पावधि में प्रतिक्रिया नहीं दे सकती और नए ऊर्जा माध्यमों से प्रतिस्थापन कठिन होगा। एक दो माह तक मांग भी प्रभावित रहेगी क्योंकि उपभोक्ताओं को ऊंची कीमत को अपनाने में वक्त लगेगा। इससे मांग में लाजिमी तौर पर कमी आएगी। बहरहाल, आपूर्ति की बाधा को लेकर अनिश्चितता लंबी खिंचने से समायोजन भी मुश्किल होगा। कंपनियां इस बढ़ोतरी का बोझ ग्राहकों में डालने से हिचकिचा सकती हैं क्योंकि इससे वे दूर हो सकते हैं। आपूर्तिकर्ता इस बात को लेकर आशंकित रह सकते हैं कि नई क्षमताओं में कैसे निवेश किया जाए। कीमतों में इतनी बढ़ोतरी नवीकरणीय ऊर्जा को गति दे सकती है लेकिन इस प्रक्रिया में कई वर्ष लगेंगे।
नीति निर्माताओं के लिए भी यह बड़ी चिंता है कि वर्तमान अनिश्चितता कितने लंबे समय तक चलेगी। ये बदलाव भारत के भुगतान संतुलन को तार्किक अधिशेष से बड़े घाटे की ओर धकेलने वाले हैं। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों का बाहर जाना इस संकट को रेखांकित करने वाला है लेकिन चालू खाते का घाटा इतना बड़ा है कि अगर ईंधन कीमतें एक वर्ष तक ऊंची बनी रहीं तो केंद्रीय बैंक डॉलर के मुकाबले रुपया और कमजोर होने दे सकता है। दूसरी ओर अगर यह इजाफा अल्पकालिक साबित होता है और कुछ सप्ताह में हालात बदल जाते हैं तो यह विदेशी मुद्रा भंडार का इस्तेमाल करके विनिमय दर को स्थिर रख सकता है।
सरकार की बात करें तो उर्वरक कीमतों पर शायद तत्काल कोई सक्रिय निर्णय लेने की आवश्यकता नहीं हो लेकिन ईंधन करों में कटौती या सब्सिडी बढ़ाने के मामले में अहम अनिश्चितता यही है कि कीमतें कब तक ऊंची रहेंगी। यदि कीमतें एक वर्ष या उससे अधिक समय तक ऊंची बनी रहीं तो सरकार पेट्रोल या डीजल कीमतों को बढऩे और अर्थव्यवस्था को धीमे पडऩे दे सकती है तथ इस बीच कम आयात निर्भरता वाले ईंधन की दिशा में तेजी से कदम बढ़ा सकती है। दूसरी ओर अगर बढ़ोतरी कुछ सप्ताह में समाप्त हो गई तो सरकार ईंधन कीमतों की अस्थिरता को सीमित रखना चाहेगी ताकि उत्पादकता पर बुरा असर न पड़े। इसके लिए कुछ राजकोषीय संसाधनों का इस्तेमाल किया जा सकता है।
चाहे जो भी हो वृद्धि में तीन फीसदी गिरावट का जोखिम, मुद्रास्फीति में तेज इजाफा और अपेक्षाकृत कमजोर रुपया, नीति निर्माताओं की इस बात में सहायता कर सकता है कि वे मध्यम अवधि में ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भरता हासिल करने की दिशा में बढ़ें।
Date:09-03-22
मनमाना दोहन संपादकीय
राष्ट्रीय हरित अधिकरण यानी एनजीटी ने उत्तर प्रदेश में चल रही शीतल पेय बनाने वाली दो कंपनियों पर भूजल के अवैध दोहन को लेकर पच्चीस करोड़ रुपए का जुर्माना लगाया है। इन दोनों कंपनियों ने भूजल उपयोग के लिए अनापत्ति प्रमाण पत्र नहीं लिया था और अवैध तरीके से भूजल का दोहन कर रही थीं। इस मामले में एनजीटी ने केंद्रीय भूजल प्राधिकरण की भी आलोचना की है कि उसने इतने बड़े पैमाने पर भूजल के अवैध दोहन को नजरअंदाज किया। इस मामले से एक बार फिर भूजल के अवैध दोहन को लेकर चिंता गहरी हुई है। शीतल पेय बनाने वाली कंपनियों के खिलाफ देश भर में इसीलिए स्थानीय लोगों का विरोध प्रदर्शन चलता रहा है कि वे भारी पैमाने पर भूजल का दोहन करती हैं, जिससे किसानों को सिंचाई वगैरह में मुश्किलों का सामना करना पड़ता है। गौरतलब है कि शीतल पेय बनाने वाली कंपनियां जितनी मात्रा में अपनी बोतलें तैयार करती हैं उससे करीब चार गुना अधिक पानी बर्बाद चला जाता है। वे जमीन के काफी गहरे तक जाकर पानी निकाल लेती हैं, जिससे आसपास के इलाकों में पेयजल और सिंचाई आदि के लिए पानी की किल्लत खड़ी हो जाती है। सात-आठ साल पहले देश के विभिन्न हिस्सों में पेप्सी और कोला बनाने वाली कंपनियों के कारखानों के विरुद्ध बड़े आंदोलन हुए थे, जिनके चलते इन कंपनियों को अपने कई कारखाने हटाने पड़े थे। मगर केंद्रीय भूजल प्राधिकरण और पर्यावरण पर निगरानी रखने वाले महकमों की उदासीनता के चलते ऐसे कारखाने फिर से अपने पांव पसारने लगे।
शीतल पेय बनाने वाली कंपनियों के खिलाफ अनेक कारणों से आंदोलन चलते रहे हैं। एक तो इनमें इस्तेमाल होने वाली सामग्री का खासकर बच्चों के स्वास्थ्य पर पड़ने वाले प्रतिकूल प्रभाव को लेकर। दूसरे, भूजल के मनमाने दोहन पर आपत्ति जताई जाती रही है। फिर इन कारखानों से निकलने वाला गंदा पानी आसपास के इलाकों में फैल कर उपजाऊ भूमि की उर्वरा शक्ति नष्ट कर देता है। मगर इन कंपनियों का रसूख ऐसा है कि इनके खिलाफ सरकारें आज तक कोई कठोर फैसला नहीं कर पाईं। एनजीटी के ताजा फैसले के बाद शीतल पेय बनाने वाली कंपनियां और भूजल तथा पर्यावरण आदि पर नजर रखने वाली संस्थाएं कितना सबक सीख पाएंगी, कहना मुश्किल है। उन कंपनियों का केवल एक मकसद होता है- मुनाफा कमाना, इसके लिए चाहे लोगों की सेहत और उनके वातावरण पर कितना भी प्रतिकूल असर क्यों न पड़ता हो।
भूजल के अतार्किक दोहन का मामला केवल शीतल पेय बनाने वाली कंपनियों तक सीमित नहीं है। बोतलबंद पानी का चलन भी पिछले कुछ सालों में तेजी से बढ़ा है और इसका देश में अरबों रुपए का कारोबार फैल चुका है। इस क्षेत्र में न सिर्फ अनेक नामी कंपनियां सक्रिय हैं, बल्कि चोरी-छिपे कारोबार करने वाले कारखाने भी छोटी-छोटी जगहों पर चल रहे हैं। शुद्ध पेयजल की कमी के चलते इस कारोबार ने जोर पकड़ा है। बोतलबंद पानी बनाने वाली कंपनियां भी ज्यादातर भूजल को ही शुद्ध करती हैं। कुछ साल पहले दिल्ली में छापेमारी के दौरान ऐसे अनेक अवैध कारखानों को पकड़ा गया था, जो या तो मनमाने ढंग से भूजल का दोहन कर रहे थे या जल बोर्ड के पानी का चोरी कर रहे थे। छिपी बात नहीं है कि इस तरह की मनमानियां इसलिए चलती रहती हैं कि इन पर नजर रखने वाले महकमे लोभ में आंखें बंद किए रहते हैं। उनकी आंखें कब खुलेंगी, कहना मुश्किल है।
Date:09-03-22
अप्रासंगिक होती संधियां प्रमोद भार्गव
युद्ध से बचने और शांति के प्रयासों में स्थायित्व लाने की दृष्टि से जिन संधियों को विश्वव्यापी रूप में अमल में लाया गया था, रूस-यूक्रेन युद्ध में उनकी भूमिका निष्क्रिय साबित हो रही है। परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) पर अमेरिका, यूरोपीय संघ और रूस के दबाव में यूक्रेन ने भी हस्ताक्षर किए थे, आज वही संधि उसके सामने काल बन कर खड़ी है। रूस ने तो यूक्रेन पर हमला बोलने के साथ परमाणु हथियार चलाने की तैयारी भी शुरू कर दी है। जबकि अमेरिका और यूरोपीय संघ असमंजस की स्थिति में हैं। नाटो देश भी बगलें झांक रहे हैं। बावजूद इच्छाबल के बूते यूक्रेनी नागरिक रूसी सेना से लोहा ले रहे हैं। रूसी सेना ने राजधानी कीव सहित कई शहरों पर भारी हमले करते हुए इन पर नियंत्रण की कोशिश में है। ऐसे में यदि कुछ और दिन यही हालात बने रहे तो आशंका है कि राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन परमाणु हथियारों का सीमित इस्तेमाल कर सकते हैं। ऐसा इसलिए मुमकिन है क्योंकि एनपीटी पर हस्ताक्षर कर देने के कारण यूक्रेन परमाणु हथियार बनाने की दिशा में आगे नहीं बढ़ पाया। उसे अब अपनी भूल का अहसास हो रहा है।
यूक्रेन 1994 में बुडापेस्ट समझौते के तहत परमाणु हथियार नहीं बनाने के लिए वचनबद्ध हो गया था। अमेरिका और यूरोपीय देशों ने उस समय रूस के साथ मिल कर यूक्रेन को परमाणु हथियारों से वंचित रखने की नीति अपना ली थी। उसके बाद यूक्रेन ने अपने पास मौजूद परमाणु हथियारों को 1996 में नष्ट कर दिया था। यूक्रेन ने यह पहल 20 जून 1996 को जिनेवा सम्मेलन में अस्तित्व में आई ‘व्यापक परमाणु परीक्षण प्रतिबंध संधि (सीटीबीटी)’ के तहत की थी। जबकि भारत ने परमाणु परीक्षण से जुड़ी इस संधि पर हस्ताक्षर करने से मना कर दिया था। भारत की ओट लेकर पाकिस्तान ने भी यही रुख अपनाया था। भेदभाव पूर्ण इस संधि के दोष अब साफ नजर आ रहे हैं।
भारत का पहला परमाणु परीक्षण तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 1974 में राजस्थान के पोखरण में कराया था, ताकि दुनिया को पता चल जाए कि भारत परमाणु शक्ति संपन्न देश बन जाने की दिशा में आगे बढ़ चुका है। दूसरा परीक्षण 1998 में प्रधानमंत्री अटलबिहारी वाजपेयी ने कराया था। हलांकि इस परीक्षण के बाद भारत ने इस सिद्धांत को अपनाया था कि वह पहले परमाणु हथियार का इस्तेमाल नहीं करेगा। अगस्त, 1999 में भारत सरकार ने इस सिद्धांत का एक प्रस्ताव भी जारी किया था। इसमें कहा गया था कि ‘परमाणु हथियार केवल निरोध के लिए हैं और भारत केवल प्रतिशोध की नीति अपनाएगा।’ अर्थात भारत कभी स्वयं आगे बढ़ कर पहले परमाणु हमला नहीं करेगा। परंतु यदि किसी देश ने उस पर परमाणु हमला किया तो वह प्रतिकार की भावना से परमाणु हमला करके प्रतिक्रिया देगा।
विश्व फलक पर उभरी तमाम विडंबनाओं और विरोधाभासों के चलते परमाणु निरस्त्रीकरण के प्रयास में जुटी संस्था ‘इंटरनेशनल कैंपेन टू एबोलिश न्यूक्लियर वेपंस’ (आईसीएएन) को 2017 में नोबेल शांति पुरस्कार दिया था। नार्वे स्थित यह अंतरराष्ट्रीय संस्था परमाणु हथियारों के खात्मे के लिए अंतरराष्ट्रीय अभियान चला रही है। इस संस्था को नोबेल शांति पुरस्कार देना इसलिए प्रासंगिक माना गया था, क्योंकि परमाणु शक्ति संपन्न देशों ने एक-दूसरे को धमकाते हुए दुनिया को परमाणु युद्ध की आशंका से तनावग्रस्त व भयभीत किया हुआ था। एक तरफ उत्तर कोरिया अमेरिका, जापान और दक्षिण कोरिया को नेस्तनाबूत करने की धमकी दे रहा है, तो वहीं जबावी कार्रवाई में अमेरिका समूचे उत्तर कोरिया का वजूद ही मिटा देने की हुंकार भरता रहा है। दूसरी तरफ चीन ने समुद्री निगरानी के बहाने परमाणु पनडुब्बियों को समुद्र में उतारने का फैसला ले लिया था।
आइसीएएन संगठन अंतरराष्ट्रीय संधि के माध्यम से दुनिया को परमाणु हथियार मुक्त बनाने के प्रयासों में जुटा है। संगठन के प्रयासों पर सहमति जताते हुए एक सौ बाईस देशों ने परमाणु हथियारों को प्रतिबंधित करने की संधि भी कर ली है। सन 1945 में जब संयुक्त राष्ट्र संघ की स्थापना हुई थी, तब उसका मुख्य उद्देश्य विश्व में परमाणु निरस्त्रीकरण ही था। लेकिन इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि इस वैश्विक संस्था के अस्तित्व में आने के बाद से ही परमाणु हथियार रखने वाले देशों की संख्या तो बढ़ ही रही है, परमाणु और हाइड्रोजन बमों की संख्या भी बढ़ रही है। जो देश परमाणु संपन्न हैं, वे अब तक परमाणु व अप्रसार संधि (एनपीटी) पर दस्तखत करने को तैयार भी नहीं हुए हैं। इन देशों में अमेरिका, रूस, चीन, ब्रिटेन, फ्रांस, भारत, पाकिस्तान, इजराइल और उत्तर कोरिया शामिल हैं। यदि आर्म्स कंट्रोल एसोशिएशन, वाशिंगटन की रिपोर्ट को मानें तो इस समय रूस के पास सात हजार, अमेरिका के पास छह हजार आठ सौ फ्रांस के पास तीन सौ, चीन के पास दो सौ साठ, ब्रिटेन के पास दो सौ पंद्रह, पाकिस्तान के पास एक सौ चालीस, भारत के पास एक सौ दस, इजराइल के पास अस्सी और उत्तर कोरिया के पास दस परमाणु हथियार मौजूद हैं। यदि ये देश इन हथियारों को चिंगारी दिखा दें तो पूरी धरती तहस-नहस हो जाएगी।
आइसीएएन का गठन 2007 में हुआ था। इस समय इसकी एक सौ एक देशों में शाखाएं फैली हुई हैं। इसी के प्रयास से एक सौ बाईस देशों ने संयुक्त राष्ट्र की परमाणु अप्रसार संधि पर हस्ताक्षर किए हैं। इस लिहाज से इस संस्था का परमाणु युद्ध संबंधी खतरा टालने में अहम भूमिका सामने आई है। हालांकि परमाणु संपन्न देशों द्वारा संधि पर दस्तखत नहीं करने के कारण यह संकट यथावत बना हुआ है और लगता है रूस कहीं यूक्रेन पर परमाणु हमला न कर दे। दरअसल दूसरे विश्व युद्ध के दौरान अमेरिका ने जापान के शहर हिरोशिमा पर छह अगस्त और नागासाकी पर नौ अगस्त 1945 को परमाणु बम गिराए थे। इन बमों से हुए विस्फोट से फूटने वाली रेडियोधर्मी विकिरण के कारण दो लाख लोग तो मरे ही, हजारों लोग अनेक वर्षों तक लाइलाज बीमारियों की गिरफ्त में रहे। आज भी इस इलाके में विकलांग बच्चे पैदा होते हैं। अमेरिका ने जब 1945 में पहला परीक्षण किया था, तब आणविक हथियार निर्माण की पहली अवस्था में थे। किंतु तब से लेकर अब तक घातक से घातक परमाणु हथियार निर्माण की दिशा में बहुत प्रगति हो चुकी है। लिहाजा अब इन हथियारों का इस्तेमाल होता है तो बर्बादी की विभीषिका हिरोशिमा और नागासाकी से कहीं ज्यादा भयावह होगी। इसलिए कहा जा रहा है कि आज दुनिया के पास इतनी बड़ी मात्रा में परमाणु हथियार हैं कि समूची धरती को एक बार नहीं, अनेक बार नष्ट किया जा सकता है।
भारत तो ने संयुक्त राष्ट्र में आणविक अस्त्रों के समूल नाश का प्रस्ताव रख भी चुका है। लेकिन परमाणु महाशक्तियों ने इस प्रस्ताव में कोई रुचि नहीं दिखाई, क्योंकि परमाणु प्रभुत्व में ही उनकी वीटो-शक्ति अंतनिर्हित है। अब तो परमाणु शक्ति संपन्न देश कई देशों से असैन्य परमाणु समझौते करके यूरेनियम का व्यापार कर रहे हैं। परमाणु ऊर्जा और स्वास्थ्य सेवा की ओट में ही कई देश परमाणु-शक्ति से संपन्न देश बने हैं और हथियारों का जखीरा इकट्ठा करते चले जा रहे हैं। हालांकि भारत अभी भी परमाणु अस्त्र विहीन दुनिया का समर्थन कर रहा है। किंतु वह इस परिप्रेक्ष्य में पक्षपात के विरुद्ध हैं। यही कारण है कि भारत ने अब तक परमाणु अप्रसार संधि पर दस्तखत नहीं किए हैं। अब लग रहा है ऐसा करके भारत ने ठीक ही किया है।
Date:09-03-22
डिजिटलाइजेशन से सहकारिता का विकास दीनानाथ ठाकुर, ( लेखक सहकार भारती के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं )
विगत दो दशक सर्वाधिक बदलाव के दौर रहे हैं। एक ओर वैश्विकरण एवं तकनीकी बदलाव ने विकास के प्रवाह को गति प्रदान की है तो दूसरी ओर जो लोग इस बदलाव के साथ चलने में सक्षम नहीं हैं, उनके लिए जीवन कई मायनों में कठिन हो गया है। डिजिटलाइजेशन ने सिनेमा से लेकर शिक्षा तक, रोजगार से लेकर व्यापार तक, नीति निर्माण से लेकर रक्षा साधनों तक और राजनीति से लेकर समाज के निचले हिस्से तक सभी को प्रभावित किया है। विकास और व्यापार के प्रत्येक प्रारूप में स्थायित्व का भविष्य डिजिटलाइजेशन के प्रति उसकी अनुकूलता पर निर्भर करेगा।
हम सभी जानते हैं कि भारत दुनिया का सबसे युवा और दूसरी बड़ी आबादी का देश है। नीति आयोग के अनुसार तीव्र शहरीकरण की प्रकिया के बावजूद 130 करोड़ भारतवासियों में अभी भी लगभग 65 प्रतिशत लोग भारत के गांवों में रहते हैं। कोरोना महामारी में लॉकडाउन के कारण बड़े पैमाने पर शहरी मजदूर अपने गांवों की ओर लौटे जिससे एक बार फिर यह विचार करना आवश्यक हो गया है कि क्या शहर केंद्रित विकास से इतर कुछ किया जा सकता है? तो इसका उत्तर है, हां। कृषि उत्पादन प्रबंधन, खाद्य सुरक्षा एवं खाद्य आपूर्ति श्रृंखला प्रबंधन तथा ऊर्जा सुरक्षा से संबंधित क्षेत्रों में सहकारिता आधारित मॉडल ही सर्वाधिक अनुकूल, व्यावहारिक एवं व्यवहार्य मॉडल है। सहकारिता या सामूहिकता ही वो मॉडल है, जो ग्रामीण भारत का न केवल समग्र विकास कर सकता है बल्कि शहरों पर जनसंख्या के अनावश्यक दबाव को कम करने के साथ शहरी आवश्यकताओं की पूर्ति भी करने में सक्षम है। सहकारिता के वर्तमान स्वरूप और स्थितियों में कुछ क्षेत्रों में यह संभव भी हुआ है। अब दुनिया चौथी औद्योगिक क्रांति के दौर से गुजर रही है और बड़ी संख्या में मानव श्रम का स्थान मशीनें ले रही हैं और हाट बाजार भी अब डिजिटल स्क्रीन पर लगने लगे हैं। इस मशीनीकरण और ऑटोमेशन से भारत जैसे बड़ी आबादी के देश को कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है। हाल ही में वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम द्वारा प्रकाशित फ्यूचर ऑफ जॉब्स, 2020 रिपोर्ट में कहा गया : ‘43 प्रतिशत व्यवसायों के सर्वेक्षण से संकेत मिलता है कि वे तकनीक एकीकरण के चलते अपने कार्यबल में कमी करने की तैयारी में हैं, 41 प्रतिशत की विशिष्ट कार्यों के लिए अपने यहां ठेकेदारों का उपयोग बढ़ाने की योजना है और सिर्फ 34 प्रतिशत की तकनीक एकीकरण के चलते अपने कार्यबलों की संख्या में विस्तार की योजना है।’ जैसा कि उक्त रिपोर्ट का अनुमान है, कार्यों के इंसान से मशीनों की ओर हस्तांतरित होने के परिणामस्वरूप 2025 तक 8.5 करोड़ लोगों को रोजगार बनाए रखने के लिए अपने कौशल का उन्नयन करने की आवश्यकता होगी। दूसरी तरफ, 9.7 करोड़ नई नौकरियां सिर्फ सही कौशल वाले लोगों और मशीनों के लिए ही उपयुक्त होंगी। इस प्रकार, नई व्यवस्था में आर्थिक संकट की तुलना में नौकरियों से ज्यादा लोगों का विस्थापन देखने को मिलेगा। सहकारिता, ऐसे लोगों के कौशल उन्नयन के साथ उनके पुनर्सयोजन का माध्यम बन सकती है, लेकिन इसके लिए सहकारिता को स्वयं को ई-कॉमर्स सहित सभी तरह के बदलाव के अनुकूल करना होगा। प्रश्न यह है कि ऐसी कौन सी व्यवस्था या तरीका अपनाया जाए, जिससे इस बड़े बदलाव के दौर में भारतीय सहकारिता के साथ कृषि, ग्रामीण भारत को इस तकनीकी बदलाव के अनुपूरक बनाया जा सके ताकि सहकारिता ग्रामीण भारत के समग्र विकास का आधार बन सके। इसके लिए सहकारी समितियों और संगठनो को नये कानून और नियमों के साथ डिजिटलाइजेशन की राह पकड़नी होगी। हम सभी जानते हैं कि देश भर में सहकारी समितियों की एक बड़ी संख्या है, जिनका अभी तक डिजिटलाइजेशन नहीं हुआ है। अगर हमें भारत के विकास में इनकी बड़ी भूमिका सुनिश्चित करनी है तो बदलाव करना ही होगा। साथ ही अगर सहकारी समितियों को एकीकृत करके शहर की आवश्यकताओं की पूर्ति की ओर केंद्रित कर दिया जाए तो कई समस्याओं का समाधान हो जाएगा। विश्व पटल पर डिजिटल दुनिया के बढ़ते फैलाव को देखते हुए अब डिजिटल दुनिया से जुड़ने का समय आ गया है। पैसा सिर्फ सक्षम कारक है, ज्ञान प्राथमिकता होनी चाहिए और ज्ञान, बाजार, प्रौद्योगिकी और आपूर्ति श्रृंखला प्रबंधन में डिजिटल तकनीक के उपयोग के अंतर को दूर करने के लिए काम किया जाना चाहिए।
इस प्रक्रिया में शैक्षणिक पाठ्यक्रमों के साथ डिजिटल ज्ञान के विस्तार के लिए एक वृहद जागरूकता अभियान चलाए जाने की जरूरत है। सहकारिता क्षेत्र को डिजिटली सक्षम बनाने में निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी काफी अहम है। इसके लिए केवल सरकार पर निर्भर नहीं रहा जा सकता। निजी क्षेत्र डिजिटल क्षेत्र में नवाचार के लिए शोध में पर्याप्त खर्च करते हैं। ई-कॉमर्स के क्षेत्र में काम कर रही कंपनियां अपने प्लेटफार्म पर छोटे उद्यमियों को डिजिटली सक्षम बनाने में खासा योगदान कर सकती हैं। सहकारिता एवं निजी क्षेत्र के बीच गठजोड़ से दोनों क्षेत्रों में कारोबार की लागत कम होगी एवं व्यापार का विकास होगा। देश में अब सहकारिता क्षेत्र को इस नवाचार से एकाकार करके स्वयं को बदलाव के लिए तैयार करना चाहिए।
Date:09-03-22
पाला बदल की चिंता संपादकीय
राज्य हो या केंद्र, चुनाव में जब स्पष्ट बहुमत का अभाव हो जाता है, तो गठबंधन या दलबदल की जरूरत पड़ने लगती है। अत: जिन राज्यों में ऐसी आशंका है, वहां सभी दल अपने-अपने ढंग से बचाव में जुट गए हैं। गोवा के बारे में सूचना है कि कांग्रेस अपने प्रत्याशियों को लेकर सचेत हो गई है। उसे दलबदल का भय सताने लगा है। खबर यहां तक है कि गोवा कांग्रेस ने दलबदल के भय से अपने प्रत्याशियों को रिजॉर्ट में भेज दिया है। अपने विधायकों को दलबदल या खरीद-फरोख्त से बचाने के लिए यह तरीका नया नहीं है। बड़ी-छोटी अनेक पार्टियों में समय-समय पर ऐसी अप्रिय स्थितियां पैदा हुई हैं। गोवा में कांग्रेस का ताजा भय आधारहीन नहीं है। 2017 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने गोवा की 40 में से 17 सीटों पर जीत हासिल की थी, पर 13 सीटें जीतने के बावजूद छोटी पार्टियों और निर्दलीयों की मदद से भाजपा सरकार बनाने में कामयाब हुई थी। भाजपा की राजनीतिक तैयारी या चेष्टा का कोई तोड़ कांग्रेस के पास नहीं था। कांग्रेस उस दलबदल से इतनी कमजोर हो गई थी कि बाद में उसके 15 विधायक भाजपा में शामिल हो गए थे।
किसी भी पार्टी को बुरा ही लगेगा, यदि उसके नेता ज्यादा विधायक के बावजूद सरकार न बना पाएं या किसी छोटी पार्टी के पास भले ही चंद विधायक हों, लेकिन अगर वे सत्ता के लिए पार्टी छोड़ जाएं, तो उन्हें रोकने के लिए कोई नियम-कायदा तय नहीं है। क्या इसके लिए कानून बनाने की जरूरत नहीं है? क्या राजनीति में वांछित-वाजिब नैतिकता की बहाली हो सकती है? यह दुखद ही है, जब पार्टियां जीतने के बाद पाला या गठबंधन बदल लेती हैं, तब तय संख्या में अपने नेताओं को दलबदल विरोधी कानून से बचते हुए पार्टी से बाहर जाने से कैसे रोका जा सकता है? साफ है, दलबदल विरोधी कानून तो अभी भी है, लेकिन उसकी खामियों या अपर्याप्तता को राजनेता ठीक से समझ गए हैं। कांग्रेस ही नहीं, कोई भी पार्टी यह नहीं चाहेगी कि ज्यादा सीटें जीतने के बावजूद वह सरकार न बना पाए, लेकिन कायदा यह भी है कि किसी पार्टी को अगर ज्यादा सीटें मिलें, तो वह गठबंधन करते हुए सरकार बनाने के पूरे प्रयास करे।
गठबंधन के दौर में समस्या यह हो गई है कि मतदाता जिन नेताओं को विपक्ष में बैठने के लिए मत देते हैं, वे भी सत्ता पक्ष में शामिल होने को लालायित रहते हैं। छोटी-छोटी पार्टियों को भी सत्ता में हिस्सेदारी मिल जा रही है और खूब सीटें जीतने वाली पार्टी भी विपक्ष में सुशोभित हो रही है। दरअसल, बहुदलीय व्यवस्था के साथ यह समस्या हमेशा रहेगी। चूंकि सत्ता पाना राजनीति का एकमात्र लक्ष्य होता जा रहा है, इसलिए भी पाला बदल का खतरा बढ़ता जा रहा है। हर चुनावी राज्य में विशेष रूप से छोटे दलों में ज्यादा बेचैनी होगी। कुछ दल ऐसे होंगे, जो किसी भी पक्ष या गठबंधन के साथ चले जाएंगे। गोवा में जो कोशिशें चल रही हैं, उनके अनुसार, केवल कांग्रेस ही नहीं, भाजपा भी फिर सरकार बनाने के लिए जोड़-गठबंधन के लिए जुट गई है। यदि गठबंधन से ही सरकार बननी है, तो किसी पार्टी के ज्यादा सीटें जीतने या बहुमत से पीछे रह जाने का कोई अर्थ नहीं है। नेताओं और राजनीतिक दलों को सचेत रहना चाहिए कि जरूरत पड़ ही जाए, तो सभ्यता-शालीनता के साथ गठबंधन बने और लोगों को अच्छी सरकारें मिलें। जब लोगों को अच्छी सेवाभावी सरकार मिल जाती है, तो राजनेताओं और राजनीति के दोष कम दिखने लगते हैं।
Date:09-03-22
मुश्किलों के बावजूद हमारी आर्थिक मजबूती सतीश सिंह, ( बैंकिंग व आर्थिक विशेषज्ञ )
अर्थव्यवस्था में मुश्किलें तो हैं, लेकिन रौनक भी लौटी है। ताजा हालात की बात करें, तो विदेशी निवेशकों (एफपीआई) ने मार्च के तीन कारोबारी सत्रों में भारतीय शेयर बाजार से 17,537 करोड़ रुपये की निकासी की है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमत 7 मार्च, 2022 को 139 डॉलर प्रति बैरल हो गई है। रुपये की कीमत में लगातार गिरावट दर्ज की जा रही है। एक डॉलर के मुकाबले रुपये की कीमत कम होकर 77 रुपये रह गई है, जिससे महंगाई और चालू खाते के घाटे में बढ़ोतरी की संभावना बढ़ गई है। हालांकि, 4 फरवरी, 2022 को भारत में 631.953 अरब यूएस डॉलर के विदेशी मुद्रा का भंडार था, इसलिए फिलहाल भारत को कच्चे तेल के आयात में मुश्किलें नहीं आएंगी। सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में चालू वित्त वर्ष की तीसरी तिमाही में 5.4 प्रतिशत की दर से वृद्धि कम नहीं है।
आईएचएस मार्केट के अनुसार, भारत का मैन्युफैक्चरिंग पर्चेजिंग मैनेजर्स इंडेक्स (पीएमआई) फरवरी महीने में सुधरकर 54.9 के स्तर पर पर आ गया है, जबकि जनवरी में यह गिरकर 54 के स्तर पर आ गया था, जो विगत चार महीनों में सबसे निचला स्तर था। यहां यह ध्यान रहे, पीएमआई यदि 50 अंक से ज्यादा होता है, तो माना जाता है कि कारोबार में वृद्धि हो रही है, वहीं इससे कम होने पर माना जाता है कि देश में विकास की गति बाधित है। इन आंकड़ों से यह भी पता चलता है कि नए कारोबारों और मांग व बिक्री में बेहतरी आई है। उल्लेखनीय है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी विगत तीन महीनों के दौरान मांग में तेजी देखी गई है। इस अवधि में उपभोक्ता वस्तु विनिर्माताओं की राह भी आसान हुई है। वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) संग्रह फरवरी में 1.33 लाख करोड़ रुपये रहा, जो पिछले वर्ष की फरवरी की तुलना में 18 प्रतिशत अधिक है और फरवरी, 2020 की तुलना में 26 प्रतिशत अधिक है। यह पांचवां महीना है, जब जीएसटी संग्रह 1.3 लाख करोड़ रुपये से ऊपर रहा है। जीएसटी संग्रह में आई तेजी को देखते हुए अनुमान लगाया जा रहा है कि वित्त वर्ष 2023 में औसत जीएसटी संग्रह हर महीने में 1.25 लाख करोड़ रुपये से ऊपर रह सकता है। राजकोषीय घाटा भी कम हुआ है। चालू वित्त वर्ष के अप्रैल से जनवरी महीने के दौरान केंद्र का राजकोषीय घाटा 9.38 लाख करोड़ रुपये रहा, जो संशोधित अनुमान का 58.9 प्रतिशत है, जबकि पिछले साल की समान अवधि में राजकोषीय घाटा 66.8 प्रतिशत रहा था। राजकोषीय घाटा में कमी आने का कारण केंद्रीय कर संग्रह में तेजी आना है। सरकार को भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) के शेयर बिक्री से भी बहुत ज्यादा उम्मीदें हैं। अगर बाजार में इस आईपीओ को अच्छी प्रतिक्रिया मिलती है, तो घाटे में और कमी आ सकती है। कर संग्रह के मोर्चे पर लगातार सुधार हुआ है। सरकार को विनिवेश और निजीकरण के विकल्पों पर भी ध्यान देना चाहिए। वित्त वर्ष 2022 में राजस्व व्यय 23.68 लाख करोड़ रुपये या संशोधित अनुमान का 74.7 प्रतिशत रहा, जो पिछले साल की समान अवधि में 71.6 प्रतिशत था। मतलब सरकारी व्यय में वृद्धि हो रही है, लेकिन मौजूदा परिदृश्य में सरकार को व्यय में और भी तेजी लानी चाहिए। सरकार को कृषि क्षेत्र के विकास हेतु और सकारात्मक कदम उठाने चाहिए।
आशा जगाते कुछ अन्य आंकड़े भी हैं, ग्लोबल लोकेशन टेक्नोलॉजी फर्म टॉमटॉम इंटरनेशनल के आंकड़ों के अनुसार, नई दिल्ली और मुंबई में यातायात में वृद्धि हुई है। बिजली उत्पादन और खपत में भी हाल में वृद्धि दर्ज की गई है। साथ में, भारतीय रेलवे द्वारा ढुलाई किए जाने वाले माल की मात्रा में भी वृद्धि हुई है। ये आंकड़े देश में आर्थिक हालत के सामान्य होने की ओर इशारा कर रहे हैं।
भारतीय अर्थव्यवस्था के विकास की राह में अभी भी बाधाएं बनी हुई हैं। पहले अर्थव्यवस्था कोरोना महामारी से जूझ रही थी और अब रूस व यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध का कुप्रभाव अर्थव्यवस्था के कुछ महत्वपूर्ण मानकों पर पड़ रहा है। बावजूद इसके विकास के अन्य मानकों जैसे, सरकारी व्यय में बढ़ोतरी, राजस्व संग्रह व जीएसटी संग्रह में वृद्धि, आर्थिक गतिविधियों में आई तेजी आदि से साफ पता चलता है कि अर्थव्यवस्था मजबूती की दिशा में अग्रसर है।
Date:09-03-22
मजदूरों का बढ़ा बल दारूबन्दी से गरीब जनता और मजदूरों का कितना भला हुआ है, इसका प्रमाण बम्बई की मिल-हड़ताल से मिलता है। हड़ताल को आरम्भ हुए चार दिन हो गए हैं मगर कोई उत्पात, दंगा और उपद्रव नहीं हुआ है। मजदूरों के इस संयम का कारण बम्बई में एक अगस्त से जारी दारूबन्दी है। मजदूर अनुभव करते हैं कि दारूबन्दी के कारण उनका बल बढ़ गया है और उनकी साख बढ़ गई है। इसके कारण वे अब १९२८ की अपेक्षा अधिक समय तक हड़ताल चला सकते हैं। शराब की चमकती बोतल पहले उन्हें ललचाती थी और उनके हड़ताल के निश्चय को कमजोर कर देती थी। मगर दारूबन्दी के कारण उनका बड़ा शत्रु दूर हो गया है।
गोरों की भरती : भारत पिछले पचास साल से सेना के भारतीयकरण के लिए जोर दे रहा है। मगर सरकार की नीति में अभी तक कोई विशेष अन्तर नहीं आया है। गोरे अफसरों की नियुक्ति पहले के समान जारी है। पिछले पांचसाल में कितने गोरे अफसर रखे गए हैं, इसकी एक तालिका राज्य परिषद में दी गई थी। इसके अनुसार, १९३५ में १००, १९३६ में १७२, १९३७ में १३६, १९३८ में १२४ और १९३९ में १२५ गोरे अफसर भरती किए गए। इनकी जगह भारतीय अफसरों की नियुक्ति में कम से कम ३० साल और लग जाएंगे।
खर्च पर नियन्त्रण : बजट पर हुई बहस के सिलसिले में सरकार को सलाह दी गई थी कि युद्ध-व्यय का नियन्त्रण करने के लिए असेम्बलियों के सदस्यों की एक कमेटी बनाई जाये। स्थिर आर्थिक कमेटी (स्टैण्डिंग फाइनान्स कमेटी ) पिछले दो साल से काम नहीं कर रही है। इसलिए यह बहुत जरूरी है कि लड़ाई चलाने के लिए हो रहे खर्च के नियन्त्रण के लिए एक कमेटी बनाई जाये। मगर अर्थ सदस्य सर रेजमैन ने इस प्रस्ताव को मानने से इन्कार कर दिया। आपका कहना है कि रोजमर्रा के खर्च का नियन्त्रण करने वाली कमेटी युद्ध को सफलता पूर्वक चलाने में सहायक न होकर बाधक होगी, क्योंकि संकट काल के लिए आवश्यक खर्च भी उसके कारण रुका रहेगा। इस तर्क में कुछ सच्चाई है, इससे इन्कार नहीं किया जा सकता। मगर इस बात से भी इन्कार नहीं किया जा सकताकि युद्ध के नाम पर अन्धाधुंध खर्च न किया जाये और खर्च ठीक रीति से हो रहा है, यह जनता को विश्वास दिलाना आवश्यक है। यह असेम्बली के सदस्यों की बनी नियन्त्रण कमेटी के बनने से ही सम्भव है। मगर अर्थ सदस्य इससे सहमत नहीं हैं। आपने अनुमान कमेटी नियुक्त करने की सलाह दी है। मगर जब तक कमेटी को किसी खर्च को नामंजूर करने, रोकने का अधिकार न होगा, इस प्रकार की कमेटी बनाने का लाभ न होगा।
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Date:12-02-22
India, Heal Thyself Medical oath isn’t the point, medical education is TOI Editorials
The undergraduate board of the National Medical Commission (NMC) has reportedly decided to replace the Hippocratic Oath in medical colleges with the Charak Shapath from the new academic session. The Hippocratic Oath is a worldwide rite of passage for medical students in modern medicine, notwithstanding intense debates in certain circles about its relevance today. Those in favour of Charak Shapath argue that India has its own rich heritage in medicine and thereforeborrowing an oath with roots in ancient Greece doesn’t make sense.
But both the Hippocratic Oath and Charak Shapath – the latter derived from Maharshi Charaka’s Charaka Samhita – essentially enjoin medical practitioners to put patients first, respect their privacy, and practise with the best of judgment. Thus, it hardly makes any difference which oath is administered. Besides, it’s not as if switching oaths will magically transform medical education in India. NMC came into being in 2020 when it replaced the utterly discredited Medical Council of India and the interim Board of Governors. NMC’s stated aims include improving access to quality medical education and ensuring availability of adequate medical professionals.
However, the shortage of medical professionals in the country remains chronic. As per a report of the 15th Finance Commission made public last year, every allopathic doctor in India caters to 1,511 people as opposed to the WHO norm of 1:1,000. The shortage of trained nurses is worse with the ratio standing at 1:670 against the WHO norm of 1:300. NMC’s efforts should be directed at improving these numbers. Moreover, even if the bigger aim here is indigenisation or mainstreaming alternative/indigenous medical systems or AYUSH, the focus ought to be on rigorous scientific standardisation of these streams, which is hitherto missing. NMC’s mandate will be better served by boosting actual medical infrastructure in the country, especially in light of Covid. The type of oath administered to medical students is irrelevant – the type of medical education is the point.
Date:12-02-22
कानून के दुरुपयोग से टूटते परिवार सुनीता मिश्रा
देश में महिलाओं को शारीरिक-मानसिक शोषण, प्रताड़ना और घरेलू हिंसा से बचाने के लिए कई कानूनी कवच दिए गए हैं। ये कानून उनके हितों के रक्षा के लिए बनाए गए हैं, ताकि उन्हें उनका हक और इंसाफ मिल सके, लेकिन इन कानूनों का धड़ल्ले से दुरुपयोग किया जा रहा है। इसे लेकर सुप्रीम कोर्ट भी समय-समय पर तल्ख टिणणी कर चुका है। हाल में सुप्रीम कोर्ट ने इस पर चिंता जाहिर करते हुए कहा, दहेज प्रताड़ना से बचाव के लिए बनाई गई आइपीसी की धागा 498-ए का इस्तेमाल एक हथियार की तरह हो रहा है। यह हथियार पति और उसके रिश्तेदारों पर गुस्सा निकालने के लिए चलाया जा रहा है। शिकायतकर्ता महिला यह भी नहीं सोचती कि बेबजह मुकदमे में फंसे लोगों पर उसका क्या असर होगा।’ इस तीखी टिप्पणी के साथ कोर्ट ने महिला के ससुरालियों पर दहेज प्रताड़ना के केस को खारिज कर दिया। इसके बावजूद उसके पति पर मुकदमा चलता रहेगा।
भारतीय दंड संहिता की धारा 498-ए महिला के पति और उसके रिए्तेदारों द्वारा संपत्ति अथवा कीमती वस्तुओं के लिए अवैधानिक मांग के मामले से संबंधित है, जिसमें अधिकतम तीन साल की कैद और जुर्माने का प्रविधान है। अब वही धारा अपनी भड़ास निकालने का जरिया बन गई है। इससे तमाम परिवार खंडित हो रहे हैं। कुछ पुरुषों को झूठे आरोपों के आधार पर फंसाया गया। भले ही बाद में ऐसे पुरुषों को राहत मिल जाती है, लेकिन तब तक वे बदनामी के साथ-साथ अन्य कई तरह की परेशानियों से दो-चार हो चुके होते हैं।
राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरों की रिपोर्ट के अनुसार 2012 में धारा 498-ए के मामलों में ।,97,762 लोगों को गिरफ्तार किया गया था, जिनमेँ 15 प्रतिशत आरोपित ही दोषी पाए गए थे। गिरफ्तार किए गए लोगों में से कई बेकसूर ऐसे भी होते हैं, जो समाज में अपनी बदनामी होने के बाद आत्महत्या तक कर लेते हैं। यही नहीं इस मामले में आम तौर पर पति के साथ उसके मां-बाप, भाई, भाभी और दूर के रिश्तेदार भी आरोपित बना दिए जाते हैं।
इस सच्चाई से इन्कार नहीं कि आज भी तमाम महिलाएं दहेज को लेकर यातनाएं सहती हैं। यहां तक कि उनकी हत्या भी कर दी जाती है। इससे संरक्षण प्रदान करने के लिए ही कानून में सख्त प्रविधान किए गए, लेकिन अब कानून के बढ़ते दुरुपयोग ने महिलाओं के प्रति संदेह की दृष्टि को बढ़ा दिया है, जिसके कारण अक्सर उन्हें समय पर न्याय नहीं मिल पाता है। झुठे आरोप लगाने वाली महिलाओं को नहीं भूलना चाहिए कि पुरुष भी इसी समाज का हिस्सा हैं। शादी और रिश्तों का महत्व उन्हें समझना होगा। छोटे-मोटे ज्ञगड़े तो हर परिवार में होते हैं, मगर अपने निजी-पारिवारिक ज्ञगड़ों को दहेज प्रताड़ना के विवाद में परिवर्तित करने से उन्हें बचना होगा।
Date:12-02-22
सफेदपोश बनाम मेहनती काम संपादकीय
सन 2000-2001 में यानी सदी में बदलाव के वक्त देश से होने वाले वस्तु और सेवा निर्यात में विनिर्मित वस्तुओं का निर्यात प्रमुख हिस्सेदार था। सेवा निर्यात का आकार विनिर्मित वस्तुओं के निर्यात का आधा था। एक दशक बाद यानी 2010-11 में भी विनिर्मित वस्तुओं का निर्यात देश के कुल निर्यात में सबसे बड़ा हिस्सेदार था लेकिन इसकी हिस्सेदारी कम हुई थी। गत वित्त वर्ष यानी 2020-21 तक सेवा निर्यात (206 अरब डॉलर) काफी हद तक वस्तु निर्यात (208 अरब डॉलर) के करीब पहुंच गया और आयात का कुल आकार 498 अरब डॉलर हो गया। दो दशक की अवधि में सेवा निर्यात ने विनिर्मित वस्तुओं के निर्यात के आधे से लगभग बराबरी तक का सफर तय कर लिया। यदि कुल निर्यात के बजाय वृद्धि पर नजर डाली जाए तो रुझान अधिक स्पष्ट है। 2020-21 तक के एक दशक में सेवा निर्यात में 81 अरब डॉलर की वृद्धि हुई जबकि विनिर्मित वस्तुओं के निर्यात में इसके आधे से भी कम यानी करीब 37 अरब डॉलर की वृद्धि दर्ज की गई। देश में सेवा और वस्तु निर्यात का अनुपात अब अमेरिका तथा अन्य औद्योगीकृत देशों के निर्यात के समान हो गया है। भारत जैसे विविध विकासशील देश के लिए यह अनुपात विशिष्ट है। यह रुझान चालू वर्ष में उलटता नजर आता है। इस वर्ष वस्तु निर्यात, सेवा निर्यात की तुलना में तेज गति से बढ़ा। ऐसा शायद इसलिए हुआ कि पेट्रोलियम वस्तुओं के निर्यात की कीमतें ऊंची रहीं। यह आशा नहीं करनी चाहिए कि रुझान में यह पलटाव स्थायी होगा। देश की प्राथमिक प्रतिस्पर्धी बढ़त अभी भी उसकी श्रम शक्ति की लागत है। यह बात शिक्षित श्रम शक्ति से स्पष्ट है और सॉफ्टवेयर सेवा निर्यात में देश की प्रतिस्पर्धा से जाहिर होती है। चिप निर्माण के बजाय चिप डिजाइन करने में हमारी महारत तथा बेहतर मार्जिन होने के कारण ज्ञान आधारित उत्पादों मसलन औषधियों तथा विशिष्ट रसायनों के निर्यात में हमारी सफलता भी यही दर्शाती है। श्रम की लागत में हमारी प्रतिस्पर्धी बढ़त कृषि निर्यात की बढ़ती महत्ता को भी रेखांकित करती है। यह इसलिए हुआ कि खेती के काम में मेहनताना भी कम है। एक तथ्य यह भी है कि बीते एक दशक में कृषि निर्यात में 68 फीसदी का इजाफा हुआ जबकि विनिर्मित वस्तु निर्यात में केवल 22 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई। प्रश्न यह है कि श्रमिकों की अधिक जरूरत वाले, बड़े पैमाने पर लेकिन कम मार्जिन वाले उत्पादों के क्षेत्र मसलन तैयार वस्त्र और जूतों (पूर्वी एशिया की शुरुआती सफलता में इनकी अहम भूमिका रही) के मामले में श्रम शक्ति लागत की हमारी बढ़त क्यों नहीं सामने आती। जैसा कि हर कोई जानता है इसका उत्तर है नीतिगत विफलता। शुरुआती दौर में इन वस्तुओं को छोटे उद्योगों के लिए संरक्षित रखा गया इसलिए बड़े पैमाने पर काम नहीं हो सका। इसके बाद कड़े श्रम कानूनों ने कार्यस्थल पर लचीले कार्य व्यवहार की राह रोकी, इन क्षेत्रों को वे प्रोत्साहन नहीं मिल सके जो पूंजी आधारित उद्योगों को मिले। इनमें से कुछ मसले हल किए गए जबकि बाकी बरकरार रहे। क्या निर्यात बाजारों के लिए श्रम आधारित विनिर्माण पर जोर देने के लिहाज से बहुत देर हो चुकी है? नहीं उच्च श्रम लागत के बावजूद चीन वस्त्र निर्यात करके हमसे अधिक आय जुटाता है। परंतु एक अहम कारण से यह काम कठिन अवश्य हो गया है और वह है रुपये की विनिमय दर। यदि भारत केवल वस्तुओं का व्यापार करता तो 150 अरब डॉलर (जीडीपी का 5 फीसदी) के भारी भरकम घाटे ने रुपये के मूल्य को कम किया होता। उससे हमारी विनिर्मित वस्तुएं निर्यात बाजार में सस्ती हुई होतीं और घरेलू उत्पादन आयात के मुकाबले सस्ता होता। मुद्रा में यह गिरावट नहीं हुई क्योंकि वस्तु व्यापार के घाटे की प्राय: सेवा अधिशेष से भरपायी हो जाती है। स्पष्ट कहा जाये तो सफेदपोश काम मेहनत के काम पर भारी पड़ा है। समस्या को पहचानते हुए भारत ने क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक साझेदारी में शामिल होने की वार्ता के दौरान सेवा व्यापार खोलने के बदले वाणिज्यिक व्यापार में रियायत चाही। परंतु चीन तथा अन्य देशों के प्रभाव में ऐसा नहीं हो सका। तब भारत इससे बाहर हो गया लेकिन उससे समस्या का अंत तो नहीं हुआ। बल्कि बाहरी पूंजी को लेकर खुलापन बढ़ाकर हमने अपनी मुश्किलें और अधिक बढ़ा ली हैं। बाहरी पूंजी रुपये को मजबूती देती है। विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों को तवज्जो दी गई क्योंकि वे घरेलू रोजगार तैयार करते हैं। इसके परिणामस्वरूप डॉलर का अधिशेष हुआ और रिजर्व बैंक को गैर जरूरी रूप से डॉलर खरीदने पर मजबूर होना पड़ा। इससे देश का विदेशी मुद्रा भंडार बढ़ा। ऐसे कदम एक सीमा तक ही उठाये जा सकते हैं इसलिए कम मार्जिन वाले विनिर्माण निर्यात को व्यावहारिक रखने के लिहाज से रुपये के महंगा बने रहने की संभावना है। खासतौर पर भारत के पंगु परिचालन माहौल में। हालिया बजट में राहत की बात यह है कि सरकार ने बॉन्ड बाजार को अंतरराष्ट्रीय पूंजी के लिए ज्यादा नहीं खोला। यदि ऐसा किया जाता तो समस्या और गहन हो जाती।
Date:12-02-22
नदी जोड़ परियोजना के संकट अतुल कनक
इस बार के केंद्रीय बजट में केन-बेतवा जोड़ परियोजना के लिए एक हजार चार सौ करोड़ रुपए देने की घोषणा की है। देश में नदियों को जोड़ कर विविध हिस्सों में जल संकट की समस्या का समाधान करने की दृष्टि से तैयार की गई नीति के तहत केन-बेतवा परियोजना सबसे महत्त्वपूर्ण है। इस परियोजना के लिए पिछले साल मार्च में केंद्रीय जल शक्ति मंत्रालय का उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश की सरकारों से एक करार हुआ था। इस परियोजना पर करीब चवालीस हजार करोड़ रुपए खर्च होंगे।
गौरतलब है कि केन और बेतवा दोनों ही यमुना की सहायक नदियां हैं। केन नदी मध्यप्रदेश की कैमूर की पहाड़ियों से निकल कर चार सौ सत्ताईस किलोमीटर की यात्रा तय करने के बाद उत्तर प्रदेश में बांदा के पास यमुना नदी में मिल जाती है, जबकि बेतवा नदी मध्यप्रदेश के रायसेन से निकल कर पांच सौ छिहत्तर किलोमीटर का प्रवाह क्षेत्र तय करके उत्तर प्रदेश के हमीरपुर में यमुना नदी में मिल जाती है। इस परियोजना के तहत दोनों नदियों को परस्पर जोड़ने के लिए दो सौ इक्कीस किलोमीटर लंबी लाइन नहर बनेगी, जिससे अधिक जल राशि वाली केन नदी का पानी बेतवा नदी में स्थानांतरित किया जा सकेगा। बेतवा नदी का अपना एक सांस्कृतिक और ऐतिहासिक महत्त्व भी है, क्योंकि सांची और विदिशा जैसे सांस्कृतिक नगर इसके किनारे बसे हुए हैं। उधर, केन नदी अनेक रोचक प्रसंगों से जुड़ी है। महाभारत में केन नामक कन्या का उल्लेख है। केन नदी का इसलिए भी विशिष्ट है कि इसमें अपनी तरह का अनूठा शजर नामक पत्थर पाया जाता है जो ईरान में ऊंचे दामों पर बिकता है। जानकारों का कहना है कि सारी दुनिया में यह पत्थर केवल इसी नदी में पाया जाता है। उम्मीद है कि केन और बेतवा नदी को जोड़े जाने के बाद उस बुंदेलखंड क्षेत्र में पानी की समस्या का समाधान हो सकेगा, जो प्राय: हर गर्मी में अकाल का सामना करता है।
नदियों को परस्पर जोड़ने की परिकल्पना आजादी से भी पहले सन 1858 में सर आर्थर थामस काटन नाम एक ब्रिटिश सिंचाई इंजीनियर ने की थी। सन 1971-72 में तत्कालीन सिंचाई मंत्री केएल राव ने गंगा और कावेरी को जोड़ने का सुझाव दिया था। लेकिन इस कार्य की व्यावहारिक दिक्कतों और उपयोगिता पर लगे प्रश्नचिह्न ने इस बात को आगे नहीं बढ़ने दिया। नब्बे के दशक में नदियों को आपस में जोड़ने की परिकल्पना को मूर्त रूप देने की संभावनाओं और देश-समाज पर पड़ने वाले उसके असर के अध्ययन के लिए एक आयोग का गठन भी हुआ था। 13 अक्तूबर 2002 को भारत सरकार ने अमृत क्रांति के रूप में नदी संपर्क योजना का प्रारूप पारित किया जिसमें तीन दर्जन से अधिक नदियों को जोड़ने का प्रस्ताव था। इस योजना में नदियों के बीच बांध और जल भंडारण के लिए जलाशय बनाने जैसे प्रस्ताव भी शामिल थे। फिर एक जनहित याचिकार पर देश की सबसे बड़ी अदालत ने केंद्र सरकार को निर्देश दिया कि वह नदियों को जोड़ने की योजना को तैयार कर सन 2015 तक उसका क्रियान्वयन सुनिश्चित करे।
लेकिन नदियों को जोड़ने की दिशा में अब तक कोई खास प्रगति नहीं हो पाई है। इसके कई कारण हैं। विभिन्न राज्यों के बीच नदियों के जल बंटवारे को लेकर होने वाले विवादों ने भी इस अनिर्णय की स्थिति को बनाए रखने में कम भूमिका नहीं निभाई है। जल संसाधन, नदी विकास और गंगा संरक्षण मंत्रालय की पहल पर ‘अंतर प्रवाह क्षेत्र जल अंतरण’ विषय पर एक रिपोर्ट तैयार हुई थी। इसके अनुसार तीस नहरें, तीन हजार जलाशयों और चौंतीस हजार मेगावाट क्षमता वाली जल विद्युत परियोजनाऐं तैयार होनी थीं। सन 2002 में इस संपूर्ण परियोजना की लागत बारह करोड़ तीस लाख डालर आंकी गई थी। यह लागत इतने वर्षों बाद निश्चित रूप से कई गुना बढ़ गई है। भारत जैसे विकासशील अर्थव्यवस्था के लिए किसी एक परियोजना पर इतना व्यय वहन कर पाना आसान नहीं है।
सन 2022-23 का बजट पेश करते हुए केंद्रीय वित्त मंत्री ने केन-बेतवा परियोजना के लिए एक हजार चार सौ करोड़ रुपए देने के साथ ही पांच नदियों को परस्पर जोड़ने का प्रस्ताव भी रखा। इनमें तीन प्रस्तावित योजनाएं दक्षिण भारतीय नदियों से संबंधित हैं। बजट प्रस्ताव में यह भी कहा गया है कि इन परियोजनाओं के लिए उन राज्यों की सहमति आवश्यक होगी, जिन राज्यों में कोई नदी विशेष प्रवाहित होती है। लेकिन दक्षिण भारत में अभी से इसके विरोध के स्वर उठने शुरू हो चुके हैं। तेलंगाना के मुख्यमंत्री ने केंद्र की घोषणा के औचित्य पर सवाल उठाते हुए कहा है कि नदियों से जुड़े राज्यों के बीच पंचाटों के फैसले के जरिए पानी का बंटवारा होता है। ऐसे में नदियों को जोड़ने का प्रस्ताव नए विवाद खड़े करेगा। आंध्रप्रदेश और कर्नाटक से भी प्रस्ताव के विरोध के स्वर उठने शुरू हो गए हैं।
उधर, पर्यावरणवादियों का कहना है कि नदियों को परस्पर जोड़ने से उनके पारिस्थितिकी तंत्र पर विपरीत असर पड़ेगा, क्योंकि हर नदी का अपना विशिष्ट पारिस्थितिकी तंत्र होता है और नदियों को जोड़ने से किसी नदी विशेष के जल में रहने वाले जीवों के सामने अस्तित्व का संकट भी पैदा हो सकता है। नदियों को जोड़ने की नीति का विरोध कर रहे लोगों का कहना है कि सरकार को नदियों को आपस में जोड़ने से ज्यादा ध्यान लोगों को नदियों से जोड़ने पर देना चाहिए, ताकि लोग नदियों से जुड़ाव महसूस कर सकें। इससे नदियों की उपेक्षा का सिलसिला समाप्त होगा और उन्हें बचाने में मदद मिलेगी। इसके अलावा धरती की सतह पर गिरे वर्षा जल जो नदियों के माध्यम से समुद्र में पहुंच जाता है, के संरक्षण के लिए भी नए जलाशयों का निर्माण किया जाना चाहिए। देश के एक बड़े हिस्से में जल संकट का एक कारण यह है कि भूजल का स्तर बहुत नीचे चला गया है। जब तक उन इलाकों में भूजल स्तर को बढ़ाने के प्रयास नहीं होंगे, जल उपलब्धता की दिशा में पनपे संकट का सटीक समाधान नहीं किया जा सकेगा।
यह महत्त्वपूर्ण है कि देश में सतह पर मौजूद करीब सात करोड़ क्यूबिक मीटर जल में से केवल पैंसठ प्रतिशत जल का ही उपयोग हो पाता है, शेष जल समुद्र में चला जाता है। समुद्र में जाने वाले जल का मानव हित में उपयोग आवश्यक है। नदियों को यदि आपस में जोड़ा जाता है, तो उसके कुछ फायदे हो सकते हैं। निर्धारित तरीके से पानी का स्थानांतरण संभव हो सकता है और सूखे व बाढ़ से राहत मिलेगी, सिंचाई योग्य जमीन में पंद्रह प्रतिशत तक वृद्धि हो सकती है, जल परिवहन को प्रोत्साहन मिलेगा और नए पर्यटन केंद्र भी विकसित हो सकते हैं। लेकिन नदियों को जोड़ने के बाद जल व्यवस्थापन के लिए बनाए गए बांधों से भूमि दलदली होगी और उससे खाद्यान्न उत्पादन में भी कमी होगी। शायद इसीलिये एक पर्यावरणविद का कहना है कि ‘नदियों को जोड़ने से होने वाले आर्थिक लाभों का मूल्यांकन करते हुए उसे प्राकृतिक संसाधनों की पूंजी के नुकसान के मुकाबले तोलना चाहिए और उसके बाद ही नदियों को जोड़ने की नई परियोजनाओं पर काम शुरू करना चाहिए।’ नदियों को जोड़ना उपयोगी कदम हो सकता है, लेकिन उसके पहले विशेषज्ञों और नीति नियंताओं को इस बात का ध्यान रखना होगा कि नदियों के पारिस्थितिकी तंत्र को किसी तरह का नुकसान नहीं पहुंचे, वरना विकास की राह में नए अवरोध भी खड़े होते देर नहीं लगेगी।
Date:12-02-22
क्रिप्टो पर सख्त रुख संपादकीय
यूरोप के देश नीदरलैंड़ (हालैंड़) में 17 वीं सदी में पैदा हुए बर्बादी के हालात का हवाला देते हुए भारतीय रिजर्व बैंक ने लोगों को क्रिप्टोकरेंसी (आभासी मुद्रा) के फेर में न फंसने की सख्त हिदायत दी है। रिजर्व बैंक के गवर्नर शक्तिकांत दास की नजर में क्रिप्टोकरेंसी की कीमत ट्यूलिप से भी कम है। दुनिया में डिजिटल करंसी को लेकर जारी जोरदार आकर्षण पर केंद्रीय बैंक के मुखिया की राय है कि क्रिप्टोकरेंसी वित्तीय स्थिरता के लिए बहुत बड़ा खतरा है। वित्तीय नीति को लेकर हुई बैठक के बाद उपकी यह राय सामने आई। केंद्र सरकार इसी महीने पारित बजट में डिजिटल करंसी को कर के दायरे में ले आई है‚ जिसे निवेशकों ने क्रिप्टोकरेंसी को मान्यता देने की दिशा में उठाया गया कदम माना। दास ने इस धारणा को झटका देते हुए क्रिप्टोकरेंसी को एक ट्यूलिप से भी सस्ता बताया। दास का इशारा नीदरलैंड़ के ट्यूलिपमेनिया की तरफ था जहां 17वीं सदी में लोग ट्यूलिप के फूलों को लेकर बेहद दीवाने हो गए थे। तब निवेशकों ने बड़ी मात्रा में ट्यूलिप खरीदने शुरू कर दिए और उनकी कीमतें चढ़ने लगीं। एक फूल की कीमत एक आम आदमी की सालभर की कमाई से भी ज्यादा हो गई थी। एक फूल खरीदना एक घर लेने से भी ज्यादा महंगा हो गया। एकाएक जब यह ज्वार उतरा तो निवेशक बर्बाद हो गए। क्रिप्टोकरेंसी पर भारत का रुख अभी तक स्पष्ट नहीं है। पिछले साल क्रिप्टोकरेंसी पर प्रतिबंध लगाने का प्रस्ताव पेश हुआ था‚ लेकिन लागू नहीं किया गया। इसी महीने पेश बजट में वित्त मंत्री ने ऐलान किया कि भारत अगले साल अपनी डिजिटल करेंसी पेश करेगा। इससे डिजिटल इकोनॉमी को बढ़ावा मिलेगा। क्रिप्टोकरेंसी पर भारत सरकार की नजर शुरुआत से ही टेढ़ी रही है। साल 2018 में तो केंद्रीय बैंक ने क्रिप्टोकरेंसी पर प्रतिबंध ही लगा दिया था‚ जिसे बाद में सर्वोच्च अदालत ने हटा दिया था और तब से भारत में क्रिप्टोकरेंसी का बाजार तेजी से बढ़ा है। आज भारत में क्रिप्टोकरेंसी में निवेश करने वालों की संख्या लाखों में है। माना जाता है कि भारत में चार खरब रुपये की कीमत की क्रिप्टोकरेंसी बाजार में मौजूद है। सरकार और रिजर्व बैंक को इस बारे में दुविधा को जल्द दूर करना चाहिए कि ताकि भारतीय निवेशकों को दुनिया के साथ चलने का मौका मिले और वे निवेश के किसी लाभ से वंचित न रह जाएं।
Date:12-02-22
इस इस्पाती ढांचे को नुकसान न पहुंचे देवेंद्र सिंह असवाल, ( पूर्व अपर सचिव, लोकसभा )
भारत सरकार द्वारा आईएएस कैडर नियमों में प्रस्तावित परिवर्तन पर विवाद खड़ा हो गया है। पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने तो बाकायदा जन-आंदोलन शुरू करने की चेतावनी भी दे डाली है। पश्चिम बंगाल के अलावा छत्तीसगढ़, राजस्थान, झारखंड, तमिलनाडु और केरल के मुख्यमंत्रियों ने भी प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर प्रस्तावित बदलावों का कड़ा विरोध किया है। 40 से अधिक पूर्व नौकरशाहों और कई सांसदों ने भी इसके बारे में प्रधानमंत्री को पत्र लिखा है। बदलावों के विरोधी इसे भारत के संघीय ढांचे पर प्रहार मानते हैं।
प्रस्तावित बदलावों के बाद इसकी प्रबल आशंका है कि आईएएस अधिकारियों की नियुक्ति में केंद्र सरकार को एकाधिकार हासिल हो जाएगा। इसके बाद ऐसे ही संशोधन अन्य अखिल भारतीय सेवाओं में भी हो सकते हैं। आईएएस संवर्ग नियम, 1954 के मौजूदा नियम 6(1) में संशोधन से राज्य व केंद्र सरकार के बीच असहमति की स्थिति में केंद्र सरकार का निर्णय ही अंतिम होगा और प्रतिनियुक्ति आदेश में निर्धारित समय-सीमा के भीतर अधिकारी का स्थानांतरण प्रभावी होगा।
राज्य सरकारों का तर्क है कि एक अखिल भारतीय सेवा अधिकारी को केंद्र सरकार राज्य सरकार और संबंधित अधिकारी की सहमति के बिना राज्य से बाहर केंद्र में या कहीं भी स्थानांतरित कर सकती है। यही नहीं, उस अधिकारी को विवश होकर नया कार्यभार निर्धारित अवधि में ग्रहण करना होगा। नियमों में ऐसा संशोधन ‘भय की मनोवृत्ति’ पैदा करेगा, मनमाने निर्णय को बढ़ावा देगा और अधिकारियों व सभी राज्य सरकारों को केंद्र सरकार की दया का पात्र बना देगा। ऐसी स्थिति में उत्पीड़न और प्रतिशोध की राजनीति की काफी संभावना है। कई सेवानिवृत्त सिविल सेवकों ने इस कदम के प्रतिकूल परिणामों के बारे में सार्वजनिक रूप से आगाह किया है और ऐसा न करने की अपील की है।
केंद्र सरकार के कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग ने यह स्पष्ट किया है कि राज्य सरकारें निश्चित अनुपात के अनुसार केंद्रीय प्रतिनियुक्ति के लिए अधिकारियों को नहीं भेज रही हैं। यह भी कहा गया है कि अधिकारियों को केवल राज्यों के परामर्श से केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर तैनात किया जाएगा, लेकिन ‘केंद्र में प्रतिनियुक्ति पर आने वाले अधिकारियों की संख्या आपसी परामर्श से तय हो जाने के बाद केंद्र को उन अधिकारियों की केंद्र में पदस्थापना का अधिकार होना चहिए।’
लेकिन अक्सर ‘वाणी और व्यवहार’ में विरोधाभास देखा जाता है। ऐसे कई उदाहरण हैं, जब केंद्र द्वारा राज्य सरकारों से परामर्श किए बिना स्थानांतरण के आदेश जारी किए गए। जून, 2001 में तमिलनाडु पुलिस ने पूर्व मुख्यमंत्री एम करुणानिधि के घर पर छापा मारा और उन्हें उनके पार्टी नेताओं मुरासोली मारन और टीआर बालू के साथ गिरफ्तार किया था, जो तत्कालीन एनडीए सरकार में मंत्री भी थे। इससे नाराज होकर केंद्र सरकार ने राज्य सरकार को छापेमारी से जुडे़ तीन आईपीएस अधिकारियों को केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर भेजने को कहा। तब मुख्यमंत्री जयललिता ने न केवल इनकार किया, बल्कि राज्यों के अधिकारों की रक्षा के लिए समर्थन जुटाने की खातिर अन्य मुख्यमंत्रियों को भी पत्र लिखा। एक अन्य मामले में 1987 बैच के आईएएस अधिकारी और पश्चिम बंगाल के मुख्य सचिव अलपन बंद्योपाध्याय का कार्यकाल केंद्र सरकार की सहमति से तीन महीने की अवधि के लिए बढ़ा दिया गया था, पर जिस दिन वह सामान्य रूप से सेवानिवृत्त होते, उसी दिन उन्हें अचानक दिल्ली में पदस्थापना का आदेश केंद्र ने जारी कर दिया। राज्य सरकार से कोई परामर्श नहीं किया गया और न ही अधिकारी की सहमति ली गई। यह भी नहीं बताया गया कि उनकी सेवानिवृत्ति के बाद तीन महीने की अवधि के लिए दिल्ली में उनकी इतनी तत्काल आवश्यकता क्यों थी?
एक अन्य मामला दिसंबर, 2020 का है। केंद्र ने कहा कि उन तीन आईपीएस अधिकारियों को केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर भेजा जाए, जो उस समय सुरक्षा-व्यवस्था के प्रभारी थे, जब भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा के काफिले पर 10 दिसंबर, 2021 को कथित तौर पर तृणमूल समर्थकों द्वारा कोलकाता के बाहर हमला किया गया था। लेकिन राज्य सरकार ने आईपीएस अधिकारियों की कमी का हवाला देते हुए इनकार कर दिया।
केंद्र की दलील है कि प्रतिनियुक्त सिविल सेवकों की कमी ने केंद्र को राज्यों की सहमति के बिना अधिकारियों को स्थानांतरित करने की शक्ति देने के लिए नियमों में संशोधन करने को मजबूर किया है। विनियमों के अनुसार, राज्यों को केंद्रीय जरूरतों को पूरा करने के लिए प्रत्येक संवर्ग में 40 प्रतिशत वरिष्ठ पदों को निर्धारित करना चाहिए, लेकिन राज्यों में सीडीआर की कमी 61 से 95 प्रतिशत के बीच है। संयुक्त सचिवों, निदेशकों और उपसचिवों की विशेष रूप से कमी है। केंद्र सरकार के पास आईपीएस अधिकारियों की कमी है। करीब एक साल पूर्व गृह सचिव ने राज्यों के मुख्य सचिवों को पत्र लिखकर केंद्रीय पुलिस के रिक्त पदों को भरने के लिए आईपीएस अधिकारी उपलब्ध कराने को कहा था। अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों का चयन संघ लोकसेवा आयोग द्वारा किया जाता है और विभिन्न राज्यों को आवंटित किया जाता है। संघ व राज्य, दोनों की ‘साझा संपत्ति’ होने के नाते उनसे दोनों की सेवा करने की अपेक्षा की जाती है।
राज्यों की दलील यह भी है कि मनमाने तरीके से केंद्रीय प्रतिनियुक्ति उनके विकास कार्यों को बाधित करेगी और अधिकारियों के मनोबल को आघात लगेगा। तथ्य यह भी है कि आमतौर पर आईएएस व आईपीएस अधिकारी संयुक्त सचिव के स्तर से नीचे प्रतिनियुक्ति पर जाना पसंद नहीं करते, क्योंकि उन्हें वहां वे सुविधाएं नहीं मिलतीं, जो डीएम या एसपी के रूप में मिलती हैं।
इसमें कोई दोराय नहीं कि अखिल भारतीय सेवा के अधिकारियों को केंद्रीय प्रतिनियुक्ति पर लाने की जरूरत है। उनका पूरा सेवाकाल एक ही राज्य कैडर में सीमित नहीं रह सकता। लेकिन केंद्रीय प्रतिनियुक्ति में हितधारकों से उचित परामर्श भी लागू होना चाहिए। सरदार पटेल ने वर्ष 1948 में कहा था, एक ‘अखिल भारतीय सेवा… को दलगत राजनीति से दूर रहना चाहिए और हमें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि राजनीतिक नियंत्रण कम से कम हो, यदि इसे पूरी तरह से समाप्त नहीं किया जा सकता है।’ उन्होंने सिविल सेवकों को ‘भारत का स्टील फ्रेम’ कहा था। चुनावी राजनीति की बढ़ती प्रवृत्ति को देखते हुए यह और जरूरी हो गया है कि अखिल भारतीय सेवाओं के ‘स्टील फ्रेम’ को संरक्षित किया जाए।
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12 February 2022
प्रश्न–345 – अभाव का आनंद अद्भुत होता है, यदि हम अनुभव कर सकें तो।
इस विषय पर एक सारगर्भित निबंध लिखे। (1000-1200 शब्द)
Question–345 – The joy of scarcity is wonderful, if we can experience it.
Write a concise essay on this topic. (1000-1200 words)
नोट : इसका उत्तर आपको हमें नहीं भेजना है, यह आपके स्वयं के अभ्यास के लिए है।
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Date:11-02-22
Appeal For Change SC’s suggestion on reducing jail time for those appealing convictions is worth serious thought TOI Editorials
In another attempt at solving the justice system’s crushing case pendency, the Supreme Court will examine whether those appealing their convictions and who have already served long incarcerations should be given other options. This follows the UP government’s data that a staggering 1. 83 lakh appeals against trial court convictions are pending before the Allahabad high court. In its best year, Allahabad HC disposed of 5,231 appeals, implying that waiting periods for hearing an appeal could be as long as 35 years.
The right to appeal is intrinsic to the legal process but such a long wait makes an utter mockery of justice. Convicts have a chance of getting acquitted by higher courts in appeals that raise doubts over the quality of evidence presented to trial courts. But for that the appeals have to be heard. Hence SC’s suggestion of plea bargaining. This is used regularly in the US, where its advantages and dangers are welldocumented. Plea-bargaining in India can let those in jail for years out, reduce burdens on courts and jails. But for those convinced of their innocence, especially the disadvantaged among accused who didn’t get a fair hearing, it’s an awfully tough choice. Cases of the latter variety are numerous in India. On the other side is the jaw-dropping wait for innocence – Bombay HC declared four persons innocent in two different murder convictions, after 22 and 24 years. It is examples like these that make options like plea bargaining worth considering.
But an even easier option is speedy judicial appointments – 411 of 1,098 sanctioned judicial posts at HCs lie vacant. Allahabad HC, swamped by appeals, has 67 vacancies. HC judges retire at 62 while SC judges continue till 65. There’s no rational explanation for this discrepancy. Further, the retirement date of every judge is known in advance, raising questions why replacement lists aren’t ready beforehand. Article 224A also provides for retired judges to be reappointed to HCs. The governance logjam here is poor advertisement for both judiciary and executive. Mutual recriminations by both sides on judicial appointments have gone on far too long. They need to devise a solution together.
Date:11-02-22
‘Green Bonds Will Fund Reduction Of Carbon Intensity’ Union environment minister argues Budget creates a foundation for sustainable growth Bhupender Yadav
Finance minister Nirmala Sitharaman’s Budget speech declared that energy transition and climate action will be one of the pillars of the development and growth agenda of Amrit Kaal, the 25-year period from the 75th anniversary to the centenary of independent India. The foundation of this goal is the mantra of LIFE, Lifestyle for the Environment, announced by Prime Minister Narendra Modi at COP26 at Glasgow, calling for “mindful and deliberate utilisation as opposed to mindless and destructive consumption”.
How do we get there?
Cognisant of the limited flow of the means of implementation, technology as well as finance, from the developed world GoI has prioritised allocation of significant domestic financial resources for developing indigenous capacities for energy transition and climate action. In keeping with this view, and recognising the critical role of solar power, the Budget has sharply increased the production-linked incentive for domestic integrated solar manufacturing facilities from last year’s allocation of Rs 4,500 crore to Rs 19,500 crore. This increase is in line with the proposed goal of achieving 280 GW of solar power by 2030. As a forward-looking initiative, energy storage systems, including grid-scale battery systems are to be given infrastructure status.
How will transport and agriculture transition?
The Budget has also reiterated India’s vision for responsible use of fossil fuels in the energy transition by giving a determined push to two notable directions of innovation. The first is the introduction of co-firing
with biomass pellets in all thermal power plants, taking forward the current initiatives that are already under way in the area. The use of biomass pellets in thermal power plants will not only reduce coal dependence but also provide additional earnings for farmers and help reduce incidents of stubble burning. The second is the continued attention to optimal utilisation of coal, through four pilot plants for coal gasification and the conversion of coal into chemicals for industry that will establish technical and financial viability. At the same time, India will continue to push further its efforts in energy efficiency, extending it to large commercial buildings.
In transport, encouragement of efforts to blend fuel as an important step to deal with the issue of air pollution has been undertaken, with unblended fuel attracting an additional differential excise duty of Rs 2/litre from October 1, 2022.
To promote sustainable transport, GoI’s electricvehicle policy ‘Scheme for Faster Adoption and Manufacturing of (Hybrid and) Electric Vehicle in India’ has seen a big boost from Rs 800 crore last year to Rs 2,908. 28 crore in the current Budget. E-mobility is all set to get a major impetus, with the announcement of a battery-swapping policy, with the provision of land for establishing charging stations at scale.
The Budget provides for increased allocation to the flagship schemes of the ministry of environment, forest and climate change, with a total allocation of Rs 3,030 crore. This includes an increased allocation for the ‘National Mission for a Green India’ and the Green India Mission – National Afforestation Programme. The Budget has a larger outlay for initiatives such as capacity building, forest training and Eco Task Force.
Agriculture is another area where our vision of climate-resilience and sustainability is being developed. The Budget is focussed on promoting chemical-free natural farming starting with farmland close to the river Ganga.
How do green bonds close the circle?
To drive the wide range of the proposed initiatives across the range of environment, sustainability and climate action, the Budget announced that GoI would issue sovereign green bonds. The move would be part of the government’s overall market borrowings in 2022-23, for mobilising resources for green infrastructure. The proceeds would flow to public sector projects which help in reducing the carbon intensity of the economy. As the developed countries have not been forthcoming in meeting their climate finance commitments, India needs to find its own ways to boost infrastructure that will help reduce carbon intensity and emissions. The green bonds are astep in that direction.
Date:11-02-22
Local job laws that raise constitutional questions State laws that limit the rights of out-of-State citizens go against the idea of India being one nation M.R. Madhavan, [ President of PRS Legislative Research, New Delhi ]
The Supreme Court of India will soon hear a petition to remove the stay on the Haryana State Employment of Local Candidates Act, or the Haryana Act, that reserves 75% of jobs in the private sector in the State for local residents. The Act applies to jobs that pay up to ₹30,000 per month, and employers have to register all such employees on a designated portal. The Government may also exempt certain industries by notification, and has so far exempted new start-ups and new Information Technology Enabled Services (ITES) companies, as well as short-term employment, farm labour, domestic work, and promotions and transfers within the State. The Act was enacted in February 2021, and brought into effect in January 2022. Last week, the Punjab and Haryana High Court admitted a petition challenging the constitutionality of the Act, and stayed the implementation until it heard the case. The petition in the Supreme Court is by the Haryana government to remove the stay.
At the core of the issue
Other States such as Andhra Pradesh and Jharkhand have passed similar Bills. The Andhra Pradesh legislation has been challenged in the Andhra Pradesh High Court. These Acts raise several constitutional questions. The Supreme Court will first have to decide whether it will wait for the High Courts to decide the respective cases (and then hear any appeal), or whether it will draw the cases to itself as similar substantial constitutional issues are pending across High Courts.
There are at least three important constitutional questions that arise from this Act. First, Article 19(1)(g) of the Constitution guarantees freedom to carry out any occupation, trade or business. There may be reasonable restrictions “in the interests of the general public”, and in particular related to specifying any professional or technical qualifications, or to reserve a sector for government monopoly. This Act, by requiring private businesses to reserve 75% of lower end jobs for locals, encroaches upon their right to carry out any occupation.
In 2002, in the T.M.A. Pai Foundation case, the Supreme Court stated that private educational institutions have autonomy in their administration and management. In 2005, in the P.A. Inamdar case, it said that reservation cannot be mandated on educational institutions that do not receive financial aid from the state, as that would affect the freedom of occupation. In 2005, the Constitution was amended to allow reservation in private educational institutions for socially and educationally backward classes and Scheduled Castes and Scheduled Tribes. Note that this amendment applies to admissions in private educational institutions and not to jobs in the private sector.
Second, the provision of reservation by virtue of domicile or residence may be unconstitutional. Article 16 of the Constitution specifically provides for equality of opportunity for all citizens in public employment. It prohibits discrimination on several grounds including place of birth and residence. However, it permits Parliament to make law that requires residence within a State for appointment to a public office. Note two points here. This enabling provision is for public employment and not for private sector jobs. And the law needs to be made by Parliament, and not by a State legislature.
Point of a ‘special case’
There have been several cases related to public employment. For example, the Supreme Court, in 2002, ruled that preference given to applicants from a particular region of Rajasthan for appointment as government teachers was unconstitutional. It said that reservations can be made for backward classes of citizens but this cannot be solely on account of residence or domicile. In 1995, Rules in Andhra Pradesh that gave preference to candidates who had studied in the Telugu medium were struck down on grounds that it discriminated against more meritorious candidates.
The third question is whether 75% reservation is permitted. In the Indra Sawhney case in 1992, the Supreme Court capped reservations in public services at 50%. It however said that there may be extraordinary situations which may need a relaxation in this rule. It gave examples of far-flung and remote areas, where the population may need to be treated in a different way. It also specified that “in doing so, extreme caution is to be exercised and a special case made out”. That is, the onus is on the State to make a special case of exceptional circumstances, for the 50% upper limit on reservations to be relaxed.
This question has arisen in several cases later. Telangana (2017), Rajasthan (2019) and Maharashtra (2018) have passed Acts which breach the 50% limit. The Maharashra Act, which provided reservations for Marathas was struck down by the Supreme Court in May 2021 on grounds of breaching the 50% limit. It stated that the 50% limit is “to fulfil the objective of equality”, and that to breach the limit “is to have a society which is not founded on equality but on caste rule”.
Affects equality
The Haryana Act does not further “caste rule” as it is for all residents of the State irrespective of caste but it breaches the notion of equality of all citizens of India. Again, note that all these cases relate to either public employment or to admissions to educational institutions, while the Haryana Act is about private sector employment. However, one may contend that any reservation requirement imposed on the private sector should not be higher than the limits on the public sector.
Over the last three years, three States have enacted laws that limit employment for citizens from outside the State. These laws raise questions on the conception of India as a nation. The Constitution conceptualises India as one nation with all citizens having equal rights to live, travel and work anywhere in the country. These State laws go against this vision by restricting the right of out-of-State citizens to find employment in the State. This restriction may also indirectly affect the right to reside across India as finding employment becomes difficult. If more States follow similar policies, it would be difficult for citizens to migrate from their State to other States to find work.
Another fallout
There would be adverse economic implications of such policies. Other than potentially increasing costs for companies, there may also be an increase in income inequality across States as citizens of poorer States with fewer job opportunities are trapped within their States. There may also be serious consequences to the idea of India as a nation. Can people across States imagine themselves as citizens of one nation if they cannot freely find work and settle down across the nation? The courts, while looking at the narrow questions of whether these laws violate fundamental rights, should also examine whether they breach the basic structure of the Constitution that views India as one nation which is a union of States, and not as a conglomeration of independent States.
Date:11-02-22
An MSP scheme to transform Indian agriculture A decentralised plan would aid price stabilisation, offer income support, and also cope with the indebtedness of farmers Amit Bhaduri & Kaustav Banerjee, [ Amit has taught economics across various universities; Kaustav teaches at Dr. B.R. Ambedkar University Delhi ]
The ongoing struggle of farmers is not for political power. It is a struggle to transform Indian agriculture and the livelihoods of the farming majority which are in ruins in most parts of the country. The compulsion of our time is to give a new direction to a peaceful peoples’ movement to generate momentum in small peasant agriculture, which in turn could give real content to our democracy. Setting aside false promises of doubling the farmers’ income by the Government or pretending that market-friendly reforms will do the trick, we propose a different way of designing a minimum support price (MSP).
A background
The massive solidarity (despite deeply divisive social faultlines) seen in the recent farmers’ movement has already shaken the Himalayan arrogance of the Government. Maintaining that solidarity is essential, which means MSP must look especially into the requirements of farmers and the landless. MSP could serve, in principle, three purposes — price stabilisation in the food grains market, income support to farmers, and also as a mechanism for coping with the indebtedness of farmers.
The price stabilisation policy for food grains in India evolved over time, first with the Essential Commodities Act in 1955 to counter price rise due to speculative private trading and then MSP in the 1960s. A buffer stock policy with the public storage of food grains for market intervention was developed over time to involve different kinds of mechanisms such as: setting cost-based minimum procurement price; paying the difference between procurement price and market price; storing the procured surplus for sale through the Public Distribution System (PDS) at issue price, and market intervention to stabilise price when deemed necessary. These induced farmers to shift to a high-yielding varieties cropping pattern during the Green Revolution, while ensuring food security for citizens. This task required interlinking procurement, storage and distribution with more centralised investment and control of each of these tasks.
Partial coverage
The procurement and PDS from the Green Revolution period provided assured price incentives for rice, wheat and sugar (the flagships of the Green Revolution), but left out some 20 crops now under discussion for MSP including millets, coarse cereals, pulses and oilseeds. As a result, this partial MSP coverage skewed the cropping pattern against several coarse grains and millets particularly in rain-fed areas. The area under cultivation of rice and wheat from the time of the Green Revolution till recently increased from 30 million hectares to 44 million hectares and nine million hectares to 31 million hectares, respectively, while that of coarse cereals plunged from 37 million hectares to 25 million hectares. Although part of the diet of many people across the country, these left-out crops (grown mostly in rain-fed conditions) were not made available in ration shops. Almost 68% of Indian agriculture is rain fed and the crops grown in these regions are usually more drought resistant, nutritious and staple in the diet of the poorer subsistence farmers. This has been a particularly vulnerable point of our food security system; greater coverage of all 23 crops under MSP is a way of improving both food security and income support to the poorest farmers in rain-fed regions.
Economic cost
The centralised mechanism for ensuring distribution of the procured stock of rice and wheat at MSP entails bringing the procured grains to centralised Food Corporation warehouses. Here they are milled, made ready for consumption and sent back to each district/province, and from there to villages/slums/wards for distribution through fair price (ration) shops at an issue price fixed by the government which is below the market price to make it affordable for poor households.
The total economic cost involving subsidy for selling below market price along with procurement costs, distribution costs of freight, handling, storage, interest and administrative charges along with costs borne due to transit and storage losses would be around ₹3 lakh-crore. Sugarcane comes under a separate category because all this is organised through private sugar mills and is often plagued by delays.
If price is charged in a range according to harvest conditions, the total economic cost will vary within a price “band”.
As a band
MSP has to be conceived as a list of some 23 crops with a more flexible arrangement. Each crop within a band of maximum and a minimum price depending on harvest conditions (i.e. higher price in a bad and lower price in a good harvest year in general) will have its price set in the band. The price of some selected coarse grains can be fixed at the upper end of its band to encourage their production in rain fed areas. In this way, the objectives of income support to farmers, price stabilisation and food security and inducing more climate-friendly cropping patterns can be combined to an extent. Wide coverage of MSP through income support to farmers would generate massive positive economic externalities through raising industrial demand especially for the unorganised sector. This will help in extending solidarity among farmers and non-farmers while creating a chain reaction of demand expansion through multipliers for the whole economy.
For estimating the additional cost of a wider MSP; of the total grains produced some 45%-50% is for farmers’ self-consumption and the rest is marketed surplus. This marketed surplus sets the upper bound of total procurement cost from which must be deducted the net revenue recovered through the PDS (if all these crops are sold through ration shops). Our preliminary estimate puts it in the range of ₹5 lakh-crore, far less than the ₹17 lakh-crore estimated by the government. It is of the same order of magnitude as DA to public sector employees (less than 5% of the population, and the total tax break and income foregone announced in the Budget for a handful of industrial houses (₹3 lakh-crore), not to speak of a wilful default of bank loans by a handful of borrowers (well over ₹10 lakh-crore). This expenditure will benefit more than half the population directly and another 20%-25% of the population indirectly in the unorganised sector — over 70% of India’s citizens.
A real breakthrough in the recurring problem of agricultural debt can be made by the linking of selling of grains under MSP to provision of bank credit particularly for small farmers. The farmer can get a certificate selling grains at MSP which would be credit points proportional to the amount sold; this will entitle them to a bank loan as their right, and calibrate the fluctuations between good and bad harvest years by storing the certificates for later use. This mechanism would go a long way not only in addressing the indebtedness in the farming community but also has the virtue of great administrative simplicity in disbursing bank loans.
It needs emphasising that how effectively such an MSP scheme could be implemented would depend largely on decentralising the implementing agencies under the constitutionally mandated supervision of panchayats. The near miracle we have witnessed in organising and unifying the farmers’ movement across caste, class and gender through the panchayat and maha-panchayat system in Punjab, Haryana and West Uttar Pradesh raises hope that they will turn their attention to decentralising the MSP implementation mechanism. The movement enabled massive and effective mobilisation through these decentralised bodies. Therefore, they are capable of doing it again.
Date:11-02-22
Is the institution of Governor subverting federal structure? Regular discussions are the best way to resolve differences between Governors and Chief Ministers Governor R.N. Ravi returning the National Eligibility-cum-Entrance Test (NEET) Bill passed by the Tamil Nadu Assembly and the running battle between West Bengal Governor Jagdeep Dhankhar and Chief Minister Mamata Banerjee underline again the problematic role that governors play in Indian politics. In a conversation moderated by Amit Baruah, Gopalkrishna Gandhi and Shadan Farasat discuss this issue. Edited excerpts:
What do you make of this battle between the West Bengal Governor and Chief Minister? Can a State run if two constitutional functionaries are at loggerheads?
Gopalkrishna Gandhi: The situation in West Bengal is a somewhat extreme example of a situation which has existed in many States over a period of time — of inherent tension between the Governor, who is appointed by the President, and the State government, headed by a popularly elected Chief Minister. In Bengal, the Governor and the Chief Minister could have shown their perspectives both to each other and to the people of the State in a manner in which the two offices would not have been diminished.
It is not surprising in a democracy, which has room for a non-elected head of state and an elected head of government, to have very different perspectives on legislative, administrative and political matters. It is perfectly possible for these different perspectives to be played out in a way that does not hurt one another or the institutions of the state. Much depends, therefore, on the personalities involved. I don’t want to go into the personalities of the two leaders that we are talking about. And I say leader consciously, even for the Governor, because the Governor is head of state and he leads in many ways the political narrative, the constitutional narrative, and the narrative of governance in the State, because he or she heads the State, and cannot but head the State without reading the State.
I want to talk about a concept which governs the non-elected and elected functionaries of the State in India. The President of India is indirectly elected. He’s seen more as a person who has assumed the office through a constitutional mechanism which is elective in a very technical sense but is essentially beyond elections. The President has the opportunity, the facility and the duty to look upon anything that comes before him with only the Constitution in mind. And so the President can afford to take a view which is not popular either with the government or with public or media opinion. If the President goes along the grain of public opinion, and is faithful to the letter and spirit of the Constitution, there is no way in which the President’s view can be ignored. So also the Governor. Conversations between the Governor and the Chief Minister are extremely important and must precede, accompany and follow serious decisions, negotiations, important analyses and decisions. The law is clear that the elected government has the final say on any matter.
What is your sense of the role of the Governor, especially with the Tamil Nadu Governor returning a Bill that seeks to exempt State students from the NEET exam?
Shadan Farasat: The role of the Governor, constitutionally speaking, is quite well defined. Article 163 is clear that the Governor is bound by the aid and advice of the Council of Ministers. Although a government is run in the name of the President or the Governor, the real power that it exercises is with the elected wing. The role of the Governor or the President, as it may be, with some differences, is effectively just nominal. Having said that, Governor has the ability to engage with the government at a private level and the power of persuasion as a constitutional head. What we are seeing in West Bengal is quite extraordinary. The Governor on social media openly expresses disagreement day in and day out with the policies of the government. The Governor, as a nominal head of the state, cannot have a view different from the elected government, or at least express it publicly.
Insofar as Tamil Nadu is concerned, the Governor may have a view that exemption from NEET is not necessary. The legislature of Tamil Nadu has passed a legislation. There are some constitutional issues involved if there is some conflict with either a central law or which raises the issues of repugnancy where presidential assent may be required. If there is an issue of repugnancy, the Governor has to flag it and place it before the President.
The Bill was passed again by the Tamil Nadu Assembly. What happens now?
Shadan Farasat: If there is the issue of repugnancy, he will have to send it to the President. The power to undo repugnancy is only with the President acting on the aid and advice of the Union Cabinet and Council of Ministers. That the Bill was passed again shows that whatever reservations the Governor may have had have now been reconsidered by the legislature. And the legislature still holds its view in terms of passing that legislation. And to that extent, it’s that much weightier.
Mr. Gandhi, you were Governor of West Bengal from 2004 to 2009. Your comments on the Nandigram issue didn’t go down very well with the State government of the day. Tell us a little bit about your experience.
Gopalkrishna Gandhi: It is very important for there to be a dialogue between the Chief Minister and the Governor. Now, it’s important for us to know that while the Constitution is clear about the role of the Governor (he can only act on the advice of the government), the Governor is also accountable to the people of the State. He can’t be having a conversation with the people of the State over the head of the government, or behind the back of the government. But there can be occasions when the Governor and the public are on what has been called by President K.R. Narayanan ‘along the grain of a commonly held view’ and if that has been reiterated by the Governor to the Chief Minister and to the government and has not been taken on board and then something explodes like it did in Nandigram — I don’t think anybody would be surprised if the Governor were to express his anguish to the people. And the only way that can be done is through channels of the media. I made one statement to the media on the night of the shooting and killing of 14 persons. Let me just say one more thing. Chief Minister [Buddhadeb] Bhattacharya was extraordinarily civil about this. He told me what he felt about that whole episode.
Do we need to relook the role of the Governor?
Gopalkrishna Gandhi: It was famously said by Ambedkar and President Narayanan later that the fault is not with the Constitution but between those who run it. We cannot talk about the role of the Governor needing a relook without saying the role of the President needs a relook. If the country cannot do without a President, I don’t see how a State can do without a Governor. I also feel that the office of the Governor should be seen by its best examples. Even today, there are States with different political parties in which the Governor has been appointed by the present ruling dispensation in the Centre. They are working with some degree of cordiality, perhaps with some difficult moments, but nonetheless with cordiality, and that says a lot about the office of the Governor and the incumbent Chief Ministers.
There have been many occasions when the Centre has sounded out a Chief Minister before appointing a Governor. Can that convention be restored?
Gopalkrishna Gandhi: I would say the convention of the Union government, the President, the Home Minister and the Prime Minister sounding out the Chief Minister about an incumbent is a healthy convention. If it is observed in the breach, then the beginning of the Governor’s incumbency is, to that extent, rocked. It is also possible that the Chief Minister, not having been sounded, can find in the Governor a perfectly genial, senior colleague to work with. So, yes, sounding out is a desirable convention, but much more important is the selection of the person. And there, apart from the very first few years under Jawaharlal Nehru when persons of integrity, though not without political affiliation (many of them were Congresspersons), shed their political bias as soon as they entered Raj Bhavan, that has not been the case in subsequent years, certainly not during Indira Gandhi’s prime ministership, and also not the case with the party that defeated her. Mrs. Gandhi invoked Article 356 39 times, but the next government also invoked it something like nine times in that brief period. So, much depends on the person.
The Governors who signed the recommendation for President’s Rule did not do any service to either the Constitution or to their own conscience. The few who may have demurred are the Governors who have done a service. Here, I must mention the example of B.K. Nehru in Jammu and Kashmir whose views ran counter to those of Mrs. Gandhi. He was a shining example of a Governor who could be independent even in the context of Article 356 and other policy directives from the Centre regarding the State.
How can the delicate balance, envisaged between the Centre and States in the Constitution, be maintained?
Shadan Farasat: I think there is always a balance to be drawn. The Constitution, as originally envisaged, had a pro-Central government tilt because we were coming from a national movement and there were concerns about how well the federation would hold up. But, in practice, we have federated quite well. The best way to resolve differences is through discussion. Of course, if there is party positioning alone, which is guiding the Governor who has been appointed by a certain political party, then it’s unlikely to be resolved through discussion. In that case, it is essential that courts function effectively. Unfortunately, our courts, even in important constitutional matters, including concerning some of the issues of a federal setup, have kept the issues pending. One of the examples is the J&K issue. One part is Article 370 itself. The other is the conversion of a full-fledged State to two Union Territories without taking the views of the State Assembly. Now, that second issue will equally apply to any other State in India. It is effectively very essential for understanding federalism. So, when things don’t work out through engagement and statesmanship, it is the courts which have to give an answer quickly.
Mr. Gandhi, what is your sense of this balance between the Centre and States?
Gopalkrishna Gandhi: The balance between the Centre and the States has been envisioned by the framers of the Constitution. It is an extraordinary balance. In making that balance work, the President has an extraordinary role. In the appointment of Governors, again, the President has a huge role, because in that balance, the glue is provided by the Governors. Presidents have spoken candidly about names that have come to them from the Prime Minister of the day about Governors’ appointees and the President said, sorry, I don’t think this is a very good name and the Prime Minister accepted that. So, in the choice of the Governors, the President has a huge role and if those Governors are appointed with care, then the balance is, to that extent, more secure.
Date:11-02-22
कोविड से मुकाबले के लिए अब एक वैश्विक संधि की जरूरत शशि थरूर, ( पूर्व केंद्रीय मंत्री और सांसद )
ओमिक्रॉन के प्रसार पर सभी ने तरह-तरह से प्रतिक्रियाएं दी हैं। क्या यह अधिक संक्रामक किंतु कम घातक है? या क्या यह इन मायनों में महामारी के अंत का आरम्भ है कि अब वायरस ऐसे रूप में म्युटेट होने लगा है, जो सामान्य फ्लू से अधिक नुकसानदेह नहीं होता? ठीक तरह से कोई नहीं जानता- कम से कम अभी तक तो नहीं। लेकिन ओमिक्रॉन की आमद ने वैक्सीन-विषमता और महामारी पर वैश्विक-प्रतिक्रिया को लेकर जताई जा रही चिंताओं को बढ़ा जरूर दिया है। डब्ल्यूएचओ द्वारा नए वैरिएंट की घोषणा किए जाने के तुरंत बाद दुनिया के नेतागण इस बारे में बात करने लगे थे कि अगर इस तरह से महामारी के नित-नए दौर मानव-जीवन का हिस्सा बन जाएंगे तो क्या किया जाएगा? कुछ ने पूछा कि क्या अब समय नहीं आ गया है कि हम इनका मुकाबला करने के लिए एक नया अंतरराष्ट्रीय करारनामा बनाएं, जिसे आप महामारी-संधि कह सकते हैं? नवम्बर में डब्ल्यूएचओ की वर्ल्ड हेल्थ असेम्बली में एक विशेष सत्र के दौरान इस पर चर्चा की जा चुकी है, जिसमें दुनिया के 32 स्वास्थ्य मंत्रियों ने वैसी किसी संधि के विचार का समर्थन किया था।
ओमिक्रॉन का सबसे पहले दक्षिण अफ्रीका में पाया जाना ही इसकी पुष्टि करता है कि क्यों वैसी संधि अब जरूरी हो गई है। दक्षिण अफ्रीका ऐसा देश है, जहां बड़े पैमाने पर वैक्सीनेशन नहीं हुआ था। वहां तेजी से फैलने वाले वैरिएंट का पाया जाना उस बात को सच ही साबित करता था, जिसे हम महामारी की शुरुआत से सुनते आ रहे थे कि- ‘जब तक सभी सुरक्षित नहीं हैं, तब तक कोई सुरक्षित नहीं है।’ हमें एक ऐसा वैश्विक तंत्र रचने वाले अंतरराष्ट्रीय वैधानिक अभिकरण की आवश्यकता है, जिसकी मदद से हम महामारी के खतरों को पहले ही पहचान सकें और वैक्सीन व अन्य जरूरी दवाइयों का समय रहते, समुचित मात्रा में उत्पादन कर सकें। तुलनात्मक रूप से गरीब देश तो यही चाहते हैं।
लेकिन इस पर अमीर व ताकतवर देशों की अभी तक जैसी प्रतिक्रिया रही है, उससे तो सकारात्मक संकेत नहीं मिलते। आज सभी सरकारें सबसे पहले अपने लोगों का खयाल रखने को प्राथमिकता देना चाहती हैं। एक साल पहले मैंने कहा था कि कोविड महामारी वैश्वीकरण के अंत की शुरुआत कर सकती है। ओमिक्रॉन के प्रसार के बाद भी यही साबित हुआ है कि दुनिया के देशों में किसी भी प्रकार की वैश्विक-भावना का अभाव है। ओमिक्रॉन के बारे में पता चलते ही सरकारों ने पहला काम यह किया कि उन्होंने प्रतिबंध लगाना शुरू कर दिए और नए वैरिएंट के प्रसार वाले क्षेत्रों से अपने देश में यात्रियों की आमद पर रोक लगा दी। इससे प्रश्न उठता है कि क्या दुनिया फिर से उस मनोदशा में चली जाएगी, जहां सभी सरकारें केवल अपने बारे में सोचती हैं? हम पहले ही देख चुके हैं कि कैसे महामारी के दौर में कुछ देशों ने वैक्सीन की जमाखोरी की, वैक्सीन बनाने वाली तकनीक को दूसरों से साझा नहीं किया और दूसरों को वैक्सीन सप्लाई करने के अनुबंधों और प्रतिबद्धताओं से मुकर गए। अमीर मुल्कों ने केवल अपने लोगों को वरीयता दी और गरीब देशों की पुकार अनसुनी कर दी। महामारी पर रोक लगाने के लिए वैश्विक-सहभागिता की मांग पर डब्ल्यूएचओ तक ने अधिक ध्यान नहीं दिया।
विश्व व्यापार संगठन के ट्रिप्स काउंसिल की एक बैठक भी रद्द कर दी गई, जिसमें कोविड-वैक्सीन के बौद्धिक सम्पदा अधिकारों को कुछ समय के लिए त्याग देने पर विचार किया जाना था। यदि वह निर्णय ले लिया जाता, तो कोरोनावायरस के लिए सबसे प्रभावी वैक्सीनों और दवाइयों के सस्ते और सामान्य संस्करण उपलब्ध हो सकते थे। लेकिन अमीर देशों- विशेषकर यूरोपीय मुल्कों ने- इस प्रस्ताव का विरोध किया। जब दुनिया के देश वैक्सीन के बौद्धिक सम्पदा अधिकारों को ही कुछ समय के लिए समाप्त नहीं कर सके तो उनसे महामारी संधि के लिए क्या उम्मीद लगाई जा सकती है? कोविड की मार से हताश दुनिया के सामने आज अपनी प्राथमिकताएं स्पष्ट हैं, लेकिन सरकारों का रवैया निराशाजनक रहा है। अगर हम वैसी कोई वैश्विक संधि नहीं कर पाए तो महामारी के आगामी दौर में दुनिया फिर से वही पुरानी गलतियां दोहराती नजर आ सकती है।
Date:11-02-22
केंद्र -राज्य सहयोग संपादकीय
यह स्वागतयोग्य है कि एक राष्ट्र-एक राशन कार्ड योजना से देश के 35 राज्य व केंद्र शासित प्रदेश जुड़ गए। अब केवल असम का इस योजना में शामिल होना शेष है। आशा है कि स्थानीय और विदेशी लोगों की नागरिकता का निर्धारण होने के साथ ही वह भी जनकल्याण की इस उपयोगी योजना से जुड़ जाएगा और उसी के साथ यह पहल पूरी तौर पर साकार हो जाएगी। यह योजना कितनी उपयोगी है, इसे इससे समझा जा सकता है कि सार्वजनिक वितरण प्रणाली का डिजिटलीकरण होने से करीब 19 करोड़ अपात्र लोगों को चिन्हित करने में मदद मिली। इसके चलते वे हजारों करोड़ रुपये बचे, जो भ्रष्ट तत्वों और बिचौलियों की जेब में जाते थे। इस योजना से सबसे अधिक लाभ उन मजदूरों को मिल रहा, जो अपने राज्य से बाहर किसी अन्य राज्य में रोजगार के लिए जाते रहते हैं। अब वे कहीं पर भी राशन हासिल कर सकते हैं। अच्छा होता कि गरीबों को राहत और सुविधा देने के साथ भ्रष्टाचार पर प्रभावी लगाम लगाने वाली इस योजना में सभी प्रदेश शामिल होने की तत्परता दिखाते, लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं हुआ। जहां कुछ प्रांतों ने ढिलाई का परिचय दिया, वहीं दिल्ली, बंगाल और छत्तीसगढ़ ने कोरोना संकट काल में शुरू की गई इस योजना को अपनाने से ही इन्कार कर दिया। यदि सुप्रीम कोर्ट सख्ती नहीं दिखाता तो शायद वे अब भी आनाकानी करते रहते। इस आनाकानी ने केवल राजनीतिक संकीर्णता को ही रेखांकित नहीं किया, बल्कि यह भी प्रकट किया कि गरीबों के हितैषी होने-दिखने का दावा करने वाले कुछ राजनीतिक दल किस तरह उनके हितों की पूर्ति में बाधक बनते हैं।
एक राष्ट्र-एक राशन कार्ड योजना ने केवल मजदूरों, कामगारों और गरीब तबके के अन्य लोगों की भौगोलिक बाधा को ही दूर नहीं किया, बल्कि यह भी दर्शाया कि यदि केंद्र और राज्य मिलकर काम करें तो लोक कल्याण के साथ देश के विकास की दिशा में बेहतर ढंग से कार्य कर सकते हैं। यह विचित्र है कि संघीय ढांचे को सशक्त करने की जरूरत जताने वाले दल ही अक्सर उसके खिलाफ काम करते दिखते हैं। जीएसटी लागू होने के बाद जब संघवाद के प्रति और अधिक सहयोग भाव दिखाया जाना चाहिए था, तब कुछ दल अपना अलग राग अलाप रहे हैं। क्या यह किसी से छिपा है कि कुछ राज्य आयुष्मान योजना और नीट के मामले में किस तरह असहयोग भरे रवैये का परिचय दे रहे हैं? आमतौर पर ऐसा रवैया क्षेत्रीय दल दिखाते थे लेकिन अब कांग्रेस भी उन्हीं की राह पर चलती दिख रही है। बीते दिनों राहुल गांधी ने संसद में तमिलनाडु को लेकर जो कुछ कहा उसकी अनदेखी नहीं की जा सकती। उनका बयान क्षेत्रवाद को उकसाने और राष्ट्रभाव की उपेक्षा करने वाला ही था।
Date:11-02-22
मुसीबत बने दागी उम्मीदवार यशपाल सिंह, ( लेखक उत्तर प्रदेश के पूर्व पुलिस महानिदेशक हैं )
राजनीतिक दल जिन दागियों को जिताऊ उम्मीदवार बताकर चुनाव मैदान में उतार देते हैं, उनके बचाव में वे न्याय शास्त्र के इस सिद्धांत की आड़ लेते हैं कि आरोपित जब तक न्यायालय से दोषी न करार दिया जाए, तब तक वह निर्दोष ही माना जाए। यह दलील उन मामलों में भी दी जाती है जिनमें उम्मीदवार के संगीन अपराध में लिप्त होने का आरोप होता है। इसी दलील के कारण पांच राज्यों के चुनावों में दागी छवि वाले कई प्रत्याशी चुनाव मैदान में हैं। एसोसिएशन फार डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स के अनुसार उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव के पहले चरण में उतरे 25 प्रतिशत उम्मीदवारों के खिलाफ आपराधिक मामले हैं। इसका अनुमान सहज ही लगाया जा सकता है कि पांच राज्यों में कुल कितने दागी उम्मीदवार चुनाव मैदान में होंगे। विडंबना यह है कि राजनीतिक असर रखने और आपराधिक इतिहास वाले नेताओं को मुश्किल से सजा हो पाती है। वे अपने केस को किसी न किसी कानूनी दांवपेच से तब तक उलझाए रखते हैं, जब तक गवाह टूट न जाए। वे गवाहों को तोड़ने या अपने केस को कमजोर करने के लिए साम, दाम, दंड, भेद सभी का खुलकर प्रयोग करते हैं।
कुछ माह पहले वाराणसी की जिस युवती और उसके सहयोगी ने सुप्रीम कोर्ट के सामने आत्मदाह किया था, उसके मामले में आरोपित सांसद के खिलाफ 21 अपराधिक मामले थे। सांसद के एक शातिर गुर्गे ने उनका जीना दूभर कर दिया था। सांसद के प्रभाव का अनुमान इससे लगाया जा सकता है कि संबंधित क्षेत्र के डिप्टी एसपी भी उसके प्रभाव में आ गए और उन्होंने कोर्ट में उसी के पक्ष में बयान दे दिया था। यह अलग बात है कि जांच के बाद वह गिरफ्तार हुए और योगी सरकार ने उन्हें बर्खास्त कर दिया। यह मामला इसका उदाहरण है कि राजनीति के अपराधीकरण के लिए पुलिस-अपराधी गठजोड़ भी जिम्मेदार है। भारत सरकार के पूर्व गृह सचिव एनएन वोहरा ने इस खतरे को लेकर कई दशक पहले ही आगाह कर दिया था, परंतु उनकी रपट पर सही तरह संज्ञान नहीं लिया गया। राजनीति के अपराधीकरण को रोकने के लिए जैसे कदम उठाए जाने चाहिए, उनका अभी भी इंतजार हो रहा है।
जब कोई दागी नेता जनप्रतिनिधि बन जाता है तो उसकी पकड़ सत्ता के गलियारे तक हो जाती है। अभी कुछ दिनों पहले उत्तर प्रदेश के एक विधायक को पांच साल की सजा सुनाई गई, लेकिन यह सजा सुनाने में 28 साल लग गए। उन्होंने बीएससी की परीक्षा में फेल होने के बाद भी फर्जी मार्कशीट बनाकर आगे की कक्षा में दाखिला प्राप्त कर लिया था। नेताजी ने अपने प्रभाव का इस्तेमाल कर पुलिस को 13 साल तक आरोपपत्र दायर करने से रोके रखा। इसके बाद कोर्ट में मुकदमा 14 साल खिंचवाया। दरअसल कोर्ट से इस मामले के मूल दस्तावेज ही गायब हो गए थे। ऐसे उदाहरणों की कमी नहीं, जो यह बताते हैं कि राजनीतिक असर वाले नेता किस तरह अपने खिलाफ चल रहे मामलों की सुनवाई को लंबा खींचने में सफल रहते हैं।
शासन की संवैधानिक व्यवस्था के तीन अंग हैं-विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका। प्रजातंत्र में तीनों का अलग-अलग कार्य क्षेत्र है। जनप्रतिनिधि सांसद-विधायक के रूप में जब सदनों में होते हैं तो विधायी कार्य करते हैं, फिर वही मंत्री बनकर कार्यपालिका के नियंत्रक हो जाते हैं। अखिल भारतीय सेवा के वरिष्ठतम अधिकारी उनके तहत कार्य करते हैं और उन्हीं के आदेशों को सामान्यत: मानते हैं। अगर न मानें तो उन्हें हाशिये पर डाल दिया जाता है। अब ‘स्टील फ्रेम’ कही जाने वाली उस नौकरशाही का जमाना नहीं रहा, जब मंत्री और अफसरों में मर्यादित सहमति होती थी। कार्यपालिका की स्थिति इन्हीं दागी सांसदों-विधायकों ने दयनीय कर रखी है। दागी नेता जनप्रतिनिधि बनते ही अपराध छोड़ सफेदपोश अपराध के संरक्षक बनकर अवैध कमाई में लग जाते हैं। वे दूसरों के नाम से ठेके, पट्टे, लाइसेंस लेते हैं या अवैध खनन आदि को संरक्षण देते हैं। इसके लिए वे उच्च अधिकारियों पर दबाव बनाते हैं और स्थानीय अधिकारियों को निष्क्रिय कर देते हैं। आम तौर पर हर प्रकार की अवैध गतिविधियों के संरक्षकों में दागी जनप्रतिनिधियों का नाम आता है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने कुछ वर्ष पहले लालकिले से घोषणा की थी कि राजनीति से अपराधियों का धीरे-धीरे सफाया करेंगे। इसके लिए एमपी-एमएलए कोर्ट भी बनाई गईं, ताकि वे दागी नेताओं के मामले शीघ्र निपटाएं। ये कोर्ट अपना काम कर तो रही हैं, परंतु कोई प्रभाव नहीं परिलक्षित हो रहा है, क्योंकि उच्च न्यायालयों में ऐसी कोई विशेष बेंच नहीं, जिसके द्वारा ऐसे मामलों की अपीलों को शीघ्रता से निपटाया जा सके। तमाम दागी नेताओं के मामलों का निस्तारण निचली अदालतों से हो चुका है, लेकिन वे उच्च न्यायालय में वर्षों से लंबित हैं। हाल में सुप्रीम कोर्ट में दायर एक याचिका में कहा गया है कि सांसदों और विधायकों के खिलाफ कुल 4,984 मामले लंबित हैं। दिसंबर 2018 में ऐसे कुल लंबित मामलों की संख्या 4,110 थी, जो अक्टूबर 2020 में बढ़कर 4,859 हो गई। इस याचिका में सुप्रीम कोर्ट से गुहार लगाई गई है कि ऐसे मामलों के जल्द निपटारे की कोई ठोस व्यवस्था बनाई जाए।
पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि सरकार चुनाव आयोग के इस प्रस्ताव पर विचार करे कि संगीन धाराओं में आरोपित व्यक्ति चुनाव तभी लड़ सके, जब उसके पास अपने प्रदेश के हाई कोर्ट की एनओसी हो। इस पर विचार होना चाहिए। राजनीति को अपराधीकरण से बचाने से न केवल जनप्रतिनिधियों को सामान्य जन का वास्तविक सम्मान मिलेगा, बल्कि लोकतंत्र को बल भी मिलेगा। जनप्रतिनिधि पर जनता का विश्वास ही प्रजातंत्र की आत्मा है। आज जब देश अपनी स्वतंत्रता का अमृत महोत्सव मना है तो 25 साल पहले संसद में सर्वसम्मति से पारित इस प्रस्ताव पर फिर से विचार किया जाए कि राजनीति के अपराधीकरण पर रोक लगना आवश्यक है। यह समझा जाना चाहिए कि दागी प्रत्याशियों का अपराधिक इतिहास अखबारों में छपवाने के कदम असफल साबित हो रहे हैं। जाति, मजहब और क्षेत्र से प्रभावित जनता इस इतिहास का कोई संज्ञान नहीं लेती। अब समय आ गया है कि सर्वोच्च न्यायालय सीधा हस्तक्षेप कर प्रजातंत्र को मजबूत करे। लोकतंत्र में जनता का भरोसा बनाए रखने के लिए यह आवश्यक है।
Date:11-02-22
आर्थिक तंगी और आत्महत्या संपादकीय
बेरोजगारी और आर्थिक तंगी किसी एक व्यक्ति ही नहीं बल्कि उसके पूरे परिवार को अनेक सामाजिक दबावों और बेहद कष्टपूर्ण परिस्थितियों में जीवन जीने पर मजबूर कर देती है। बहुत से लोग इस दबाव को सह नहीं पाते और टूट जाते हैं। पिछले तीन सालों में 25000 लोग विपरीत परिस्थितियों का सामना नहीं कर पाए और जीवन समाप्त कर बैठे। यह तथ्य सरकार की ओर से संसद में दिए जवाब में सामने आया है। एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार 2020 में बेरोजगारी के कारण 3,548 लोगों ने आत्महत्या की। सरकार ने संसद को बताया कि 2018 से 2020 के बीच 16,000 से अधिक लोगों ने दिवालिया होने या कर्ज में डूबे होने के कारण आत्महत्या कर ली, जबकि इसी अवधि में बेरोजगारी के कारण 9,140 लोगों ने अपनी जान ले ली। गृह राज्य मंत्री ने बताया कि 2020 में 3548 लोगों ने, जबकि 2019 में 2851 लोगों ने बेरोजगारी के चलते खुदकुशी की। एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार 2020 में कर्नाटक में सबसे अधिक720 बेरोजगारों ने आत्महत्याएं कीं। इसके बाद महाराष्ट्र में 625, तमिलनाडु में 336, असम में 234, और उत्तर प्रदेश में 227 बेरोजगारों ने जान दे दी। साल 2020 में दिवालियापन या कर्ज नहीं चुका पाने के कारण आत्महत्याओं में महाराष्ट्र पहले स्थान पर रहा। महाराष्ट्र में 2020 में 1,341 आत्महत्याएं हुई। इसके बाद कर्नाटक में 1,025, तेलंगाना में 947, आंध्र प्रदेश में 782 और तमिलनाडु में 524 लोगों ने जान दी। भारत में कोरोना महामारी के बाद से ही बेरोजगारी चरम पर है। छोटे कारोबारी बहुत ज्यादा परेशान हैं। दिसम्बर में 5.2 करोड़ से ज्यादा लोग बेरोजगार थे। इनमें वे लोग शामिल नहीं हैं, जिन्होंने निराश होकर नौकरियां खोजना ही छोड़ दिया है। सरकार इस जिम्मेदारी से बच नहीं सकती। जिन मुद्दों पर उसे जनता ने अपार बहुमत दिंया है; उनमें रोजगार का वादा प्रमुख था। विपक्ष का आरोप है कि सरकार ने बजट में रोजगार पैदा करने का कोई खाका तैयार नहीं किया है। इसके जवाब में सरकार यही रटा-रटाया तर्क देती है कि रोजगार सृजन के लिए अनेक कार्यक्रम चल रहे हैं। किसी भी देश के लिए जनता के यह हालात ठीक नहीं हैं। सरकार को जल्द-से-जल्द गंभीर प्रयास करने होंगे।
Date:11-02-22
यूक्रेन की गुत्थी और भारत का रुख हर्ष वी पंत, ( प्रोफेसर, किंग्स कॉलेज लंदन )
यूक्रेन को लेकर रूस और पश्चिम के बीच खींचतान जारी है। यह शीत युद्ध के दौर के भू-राजनीतिक तनाव की याद दिला रहा है। हालांकि, बड़ी ताकतें जहां यूक्रेन के भविष्य को लेकर उलझी हुई हैं, वहीं यूक्रेनवासियों की आवाज बिल्कुल किनारे कर दी गई है। फिलहाल यूक्रेन जंग का एक ऐसा मैदान बन गया है, जो आने वाले दिनों में यूरोप के सुरक्षात्मक ढांचे को आकार दे सकता है। इसीलिए, पश्चिम और रूस के बीच तनाव महज यूक्रेन के भविष्य को लेकर नहीं है, बल्कि इससे निहितार्थ कहीं अधिक गहरे हैं, क्योंकि इससे शीत युद्ध के बाद की पूरी भू-राजनीतिक संरचना ढहती दिख रही है।
वाशिंगटन ने दावा किया है कि यूक्रेन पर हमला करने के लिए जरूरी सैन्य-संसाधन का 70 फीसदी साजो-सामान रूस ने सीमा पर तैनात कर दिया है। उसने यह भी चेतावनी दी है कि रूसी हमले की सूरत में 50 हजार से अधिक नागरिक और 25 हजार के करीब यूक्रेनी सैनिक मारे जा सकते हैं। रूस ने इस दावे को ‘उन्माद और खौफ फैलाने वाला’ बताया और इसे पूरी तरह से खारिज कर दिया है। यूक्रेन भी सीमा पर रूसी सैन्य ढांचे के निर्माण को तवज्जो नहीं दे रहा। राष्ट्रपति वलोडिमिर जेलेंस्की ने अपने देशवासियों से कहा है, ‘वे तबाही की आशंकाओं पर विश्वास न करें। यूक्रेन किसी भी तरह के घटनाक्रम के लिए तैयार है। आज यूक्रेन के पास एक मजबूत सेना और अभूतपूर्व अंतरराष्ट्रीय समर्थन है। यूक्रेनवासी भी अपने देश पर पूरा विश्वास करते हैं। दुश्मन को हमसे डरना चाहिए, न कि हमें उससे।’
हालांकि, फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों और जर्मन चांसलर ओलाफ शोल्ज की मदद से परदे के पीछे से कूटनीतिक प्रयास भी जारी हैं। मैक्रों जहां मॉस्को और कीव का दौरा कर चुके हैं, वहीं शोल्ज अगले हफ्ते दोनों देशों की यात्रा करेंगे। यूरोप में यही मान्यता है कि यूक्रेन-रूस जंग से बचा जा सकता है। मैक्रों ने यूरोपीय देशों की सुरक्षा और रूस को संतुष्ट करने के लिए ‘नए संतुलन’ का आह्वान किया है। ऐसा करते हुए उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि रूस का अपनी सुरक्षा के लिए चिंतित होना लाजिमी है। फ्रांस पिछले कुछ समय से रूस के साथ यूरोप के संबंधों को नए सिरे से गढ़ने की वकालत कर रहा है और यूरोपीय संघ से कह रहा है कि वह वाशिंगटन के चश्मे से मॉस्को को न देखे। मगर नाटो की मुख्यत: अमेरिका पर निर्भरता और आगामी रुख को लेकर यूरोपीय संघ के अंदरूनी मतभेदों के कारण ब्रसेल्स (यूरोपीय संघ का मुख्यालय) सिर्फ कूटनीतिक तरीकों से ही जमीनी हालात को प्रभावित कर सकता है।
दूसरी ओर, चीन के साथ रूस के रिश्ते लगातार मजबूत हो रहे हैं, और दोनों देश पश्चिम से मुकाबला करने के लिए अपनी साझेदारी को आगे बढ़ा रहे हैं। रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन शीतकालीन ओलंपिक में भाग लेने के लिए बीजिंग भी पहुंचे, और पिछले दो वर्षों में पहली बार किसी ताकतवर देश के राष्ट्राध्यक्ष के साथ चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग की निजी मुलाकात हुई। अपनी यात्रा के दौरान, दोनों नेताओं ने एक साझा बयान भी जारी किया, जिसमें उनके द्विपक्षीय संबंधों का विस्तार से वर्णन था। बयान में कहा गया, ‘(रूस और चीन) की आपसी दोस्ती की कोई सीमा नहीं है। सहयोग का ऐसा कोई क्षेत्र नहीं, जो ‘वर्जित’ हो।’
साझा बयान में नाटो को घेरा गया कि वह शीत युद्ध की सोच को आगे बढ़ा रहा है, और ‘ऑक्स’ (ऑस्ट्रेलिया, ब्रिटेन और अमेरिका का समूह) पर भी चिंता जताई गई। इसके अलावा, माॉस्को ने बीजिंग की ‘एक चीन नीति’ का भी समर्थन किया, क्योंकि उसने ‘ताइवान की आजादी के किसी भी रूप का विरोध’ किया। आर्थिक रिश्ते को बढ़ाने के साथ-साथ रूस और चीन ने गैस सौदे की भी जानकारी बयान में दी, जिसके तहत चीन को अब गैजप्रोम हर साल 38 अरब क्यूबिक मीटर के बजाय 48 अरब क्यूबिक मीटर गैस देगी। हालांकि, इसमें यूक्रेन का कोई जिक्र नहीं था, लेकिन दोनों देशों का इरादा स्पष्ट था- रूस और चीन बाहरी ताकतों के उन प्रयासों के खिलाफ हैं, जिसके जरिये वे साझा निकटवर्ती इलाकों की सुरक्षा और स्थिरता को कमजोर करने की जुगत में हैं। इतना ही नहीं, संप्रभु राष्ट्रों में बाहरी ताकतों की किसी भी तरह की दखलंदाजी के भी वे खिलाफ हैं, सत्ता विरोधी आंदोलनों का वे विरोध करते हैं और कई क्षेत्रों में वे आपसी सहयोग बढ़ाएंगे।
बहरहाल, यूक्रेन में 2014 के क्रीमिया संकट के दौरान देखा गया था कि बीजिंग ने मॉस्को को आर्थिक और कूटनीतिक सहयोग की पेशकश की थी, क्योंकि रूस को अलग-थलग करने के लिए पश्चिम एकजुट हो गया था। रूस के लिए न केवल पश्चिमी दबाव का समाधान निकालने के लिए, बल्कि अपनी वैश्विक ताकत को बरकरार रखने के लिए भी चीन का समर्थन महत्वपूर्ण है। पश्चिम जितना अधिक रूस को अलग-थलग करेगा, मॉस्को और बीजिंग की नजदीकी उतनी बढ़ती चली जाएगी। वैश्विक वर्चस्व की इस राजनीति के बेशक अपने-अपने तर्क हैं, लेकिन भारत जैसे देशों के सामने बहुत बड़ी चुनौती खड़ी हो गई है। नई दिल्ली ने अब तक अपने रुख में संतुलन बनाए रखने की ही कोशिश की है, लेकिन अगर तनाव बढ़ता है, तब यह संतुलन कितना टिक सकेगा, इसका अभी ठीक-ठीक जवाब नहीं दिया जा सकता।
पिछले दिनों संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में यूक्रेन पर चर्चा करने के लिए हुए प्रक्रियागत वोट से भारत ने दूरी बरती थी। तर्क दिया गया था कि ‘भारत की रुचि ऐसा समाधान खोजने में है, जो तनाव को तत्काल कम कर सके। यह समाधान सभी देशों के सुरक्षा हितों को ध्यान में रखकर तैयार किया जाए और दीर्घकालिक शांति व स्थिरता सुनिश्चित करे।’ भले ही, नई दिल्ली इस तनाव को कम करने की दिशा में जमीनी स्तर पर बहुत कुछ नहीं कर सकती, लेकिन इस संकट का अंतिम परिणाम निश्चित तौर पर भारतीय हितों को प्रभावित करेगा, इसलिए उसका सावधानी से मूल्यांकन अनिवार्य है। बीजिंग अब भी नई दिल्ली के लिए सबसे बड़ी रणनीतिक चुनौती है, और रूस व पश्चिम के तनाव के साथ-साथ रूस व चीन की बढ़ती नजदीकी आने वाले समय में भारतीय हितों को चोट पहुंचा सकती है। इसलिए, भारत इस मसले की अनदेखी ज्यादा दिनों तक नहीं कर सकता।
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हाल ही में केंद्र सरकार ने प्रतिनियुक्ति से संबंधित आईएएस (संवर्ग) नियम 1954 के नियम 6(1) में चार संशोधनों का प्रस्ताव दिया है।
मौजूदा नियम –
नियम में कहा गया है कि एक संवर्ग या कैडर अधिकारी को संबंधित राज्य सरकार की सहमति से केंद्र सरकार या किसी अन्य राज्य या सार्वजनिक क्षेत्र की किसी इकाई में प्रतिनियुक्त किया जा सकता है। इसमें यह भी कहा गया है कि किसी भी असहमति की स्थिति में, केंद्र सरकार द्वारा मामला तय किया जाएगा।
प्रस्तावित संशोधन –
चार प्रस्तावित संशोधनों में से दो विचलित करने वाले नियम हैं।
राज्य सरकारों को आशंका है कि इस प्रावधान का राजनीतिक लाभ के लिए दुरूपयोग किया जा सकता है।
दीर्घकालीन क्षति –
इन परिवर्तनों का आईएएस अधिकारियों की स्वतंत्रता, सुरक्षा और मनोबल पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
राज्यों का मानता है कि प्रस्तावित संशोधन, आईएएस अधिकारियों की तैनाती के उनके अधिकार का उल्लंघन है। ऐसे में नीतियों के क्रियान्वयन की राज्यों की क्षमता प्रभावित होगी।
इन स्थितियो में राज्य अधिक-से-अधिक पदों पर राज्य सिविल सेवा अधिकारियों की नियुक्ति को प्राथमिकता दे सकते हैं।
इन सबके कारण आईएएस अपनी गरिमा भी खो सकता है। उम्मीदवार इसे अपने कैरियर के रूप में लेने से कतराएंगे।
सहकारी संघवाद के विरूद्ध –
एस आर बोम्मई बनाम भारत संघ (1994) मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा था किए “राज्यों का स्वतंत्र संवैधानिक अस्तित्व है, और लोगों के राजनीतिक, सामाजिक, शैक्षिक और सांस्कृतिक जीवन में संघ के रूप में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका है। वे न तो केंद्र के उपग्रह हैं, और न ही एजेंट।”
एक संघीय व्यवस्था में केंद्र और राज्यों के बीच विवाद होना अपरिहार्य है। लेकिन ऐसे सभी मतभेदों को सहकारी संघवाद की भावना से व्यापक राष्ट्रीय हित में सुलझाया जाना चाहिए।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित के. अशोकवर्धन शेट्टी और वी. मानी के लेख पर आधारित। 21 जनवरी, 2022
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Date:10-02-22
Is Wearing Hijab Mandated By Religion? A scholar of Islam argues that the Quran does not stipulate this form of dress Zeenat Shaukat Ali, [ The writer is Director-General, Wisdom Foundation ]
Heated debate surrounding the wearing of hijab in educational institutions in Karnataka has spread across the ideological spectrum and several dimensions – from preserving culture to making a political statement, from the roles of religion and national identity to gender equality. I have also been pondering several questions regarding the protests that have now spread to several colleges in the state, with many girls protesting in hijabs and many boys protesting in saffron shawls.
Are we seeing India’s continuing slide into minority suppression in the name of uniformity? Or does a battle need to be at all fought on the hijab issue where young, impressionable women are hostages to the dictation of clerics on the one side and pawns to facilitate male patriarchy on the other? Especially when an integral part of their growth, their educational instruction, is at stake.
Again, on the one hand, in a liberal democracy, constitutionally, can moral policing and vigilantism enforce the choice of a woman’s attire? But on the other hand, is the male religious identity by way of the Sikh turban, Muslim skull cap, Hindu tilak, or the Christian crucifix, to be brought under similar scrutiny? If there is no ban on male-oriented cultural/religious forms of dress in India’s educational institutions or government offices, why are women the only ones bearing the brunt?
Was the veil invented by Islam?
Significantly, veiling did not originate with the advent of Islam. Elite women in ancient Mesopotamia and in the Byzantine, Greek and Persian empires wore the veil as a sign of respectability and high status. In ancient Mesopotamia, Assyria had explicit sumptuary laws detailing which women must veil and which women must not. Hence, long before the advent of Islam, veiling and seclusion appear to have existed in the Hellenistic-Byzantine area and among the Sassanians of Persia.
The words burqa, abaya, niqaab etc are unfamiliar to the Quran. Also, in the Quran, the word hijab is not equivalent to ‘clothing’. The word hijab, or a derivative, appears seven times in the Quran and it has been translated by lexicographers as barrier, partition, screen, curtain. So the word has several metaphorical dimensions, none of which concern women’s clothing. It has been equated with ‘headscarf’ speciously.
How does the Quran enjoin “modesty” upon women?
Indubitably the Quran advocates decency and modesty in clothing for both genders: “Say to the believing men that they should lower their gaze and guard their modesty that will make for greater purity for them”; “And say to believing women that they should lower their gaze and guard their modesty. ”
While modesty and decency of dress was the standard, there was no prescribed dress form mandated by the religion. Al-Fakhr al-Razi stated that what should be covered is left to the prevailing custom, while al-Zamakshari left it to the custom and
nature. Classical as well as modern scholars submit that verses relating to dress are not absolute fard al ayn (individual obligation) or fard al kifayah (collective obligation) since there is no textual stipulation (nass) which makes it obligatory (wajib).
Prophet Muhammad recommended modesty and decency in appearance and dress. But to suppose that his recommendations enjoined a cloistered uniform for women in the present, is wholly opposed to the spirit of his reforms.
Have Muslim-majority countries banned hijab?
Unfortunately Muslim scholarship has been appallingly negligent in setting the record straight in matters relating to hijab and gender. Still, the garment has acquired different legal and cultural status in countries across the world. Kosovo (since 2009), Azerbaijan (since 2010), Tunisia (since 1981, partially lifted in 2011) and Turkey (gradually lifted) are among the Muslim-majority countries which have banned the hijab in public schools and universities or government buildings, while Syria and Egypt banned face veils in universities from July 2010 and 2015 respectively.
On the other hand, hijab/burqa is mandatory by law in Iran, Afghanistan and the Indonesian province of Aceh.
In Indonesia, Malaysia, Morocco, Bruni, the Maldives and Somalia hijab is not mandatory. Instead women use the customary dress they call the jibab.
Several countries have given hijab a cultural status. Some have attempted banning the wearing of hijab in public facilities like educational institutes, government buildings, military and some other public gatherings for security reasons.
In India, earlier court rulings have thrown up conflicting answers, and with the present Karnataka case the legal rules concerning the dress code for educational institutions are once again before the court. Bearing in mind India’s democratic norms, we now await the judgment of the Karnataka high court.
Date:10-02-22
ठीक नहीं हैं वोटरों को प्रलोभन देने वाले वादे संपादकीय
लोक प्रतिनिधित्व कानून की धारा 123 के तहत चुनाव के दौरान प्रत्याशी या उसके प्रतिनिधि द्वारा वोटरों को प्रलोभन देना गैर-कानूनी है लेकिन अगर यही काम उसकी राजनीतिक पार्टी करे तो वह जायज है। अमरीका में राजनीतिक दल भी ऐसे वादे तभी कर सकता है जब उनसे समुदाय या संस्था के लिए कोई सम्पदा निर्मित होती हो जैसे कॉलेज में गरीब बच्चों के लिए लैपटॉप। भारत में इस गलत परम्परा के कारण 2014 में चुनाव आयोग ने 1200 करोड़ रुपए जब्त किए, जबकि अगले चुनाव में यह राशि बढ़कर 1500 करोड़ हो गई। चुनाव आयोग ने दो दिन पहले पंजाब में उपहार देने की 38 प्रतिशत शिकायतें सही पाई थीं। लेकिन कानूनी तौर पर चुनावी घोषणा के नाम पर यूपी में दो बड़ी पार्टियों- भाजपा और सपा- ने अपने घोषणा पत्रों में वोटरों के लिए आसमान से तारे तोड़ लाने जैसे वादे किए हैं, बगैर यह बताए कि आसमान तक पहुंचने के लिए सीढ़ी कहां है। देश के इस सबसे बड़े सूबे में इस साल बढ़ने की जगह राजस्व कम होने जा रहा है जबकि सत्ताधारी दल ने कॉलेज जाने वाले 30 लाख छात्रों को दुपहिया वाहन, लैपटॉप और किसानों को फ्री बिजली से लेकर दर्जनों वादे किए हैं। इन पर सरकार का अतिरिक्त खर्च करीब 1.50 लाख करोड़ रुपए होगा, जबकि राज्य का पुनरीक्षित बजट घटकर 5 लाख करोड़ होने का अनुमान है। उधर समाजवादी पार्टी ने भी बगैर यह बताए कि पैसे कहां से आएंगे, लगभग इसी किस्म के वादे किए हैं। खतरा यह है कि ये वादे सरकारों और राजनीतिक वर्ग पर भरोसा तोड़ने वाले हैं। किसानों को लुभाने के लिए भी अनेक वादे किए गए हैं, लेकिन किसी ने भी उनकी मुख्य मांग- उपज पर एमएसपी की गारंटी- का वादा नहीं किया।
Date:10-02-22
हिजाब के लिए जिद संपादकीय
यह देखना दयनीय है कि जब ईरान में महिलाएं बुर्के के खिलाफ संघर्ष कर रही हैं और अफगानिस्तान में तालिबान बुर्का न पहनने वाली स्त्रियों पर कोड़े बरसा रहे हैं, तब कर्नाटक में कुछ छात्राएं हिजाब पहनकर पढ़ाई करने पर आमादा हैं। राज्य के उडुपी जिले के एक सरकारी कालेज में इस विवाद ने तब तूल पकड़ा, जब इसी दिसंबर की शुरुआत में छह छात्राएं हिजाब पहनकर कक्षा में पहुंच गईं। इसके पहले वे कालेज परिसर में तो हिजाब पहनती थीं, लेकिन कक्षाओं में नहीं। आखिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि वे अध्ययन कक्ष में हिजाब पहनकर जाने लगीं? इस सवाल की तह तक जाने की जरूरत इसलिए है, क्योंकि एक तो यह विवाद देश के दूसरे हिस्सों को भी अपनी चपेट में लेता दिख रहा और दूसरे, इसके पीछे संदिग्ध पृष्ठभूमि वाले कैंपस फ्रंट आफ इंडिया का हाथ दिख रहा है। यह पापुलर फ्रंट आफ इंडिया की छात्र शाखा है। माना जाता है कि यह प्रतिबंधित किए जा चुके कुख्यात संगठन सिमी का नया अवतार है। नि:संदेह हर किसी को अपनी पसंद के परिधान पहनने की आजादी है, लेकिन इसकी अपनी कुछ सीमाएं हैं। स्कूल-कालेज में विद्यार्थी मनचाहे कपड़े पहनकर नहीं जा सकते। इसी मनमानी को रोकने के लिए शिक्षा संस्थान ड्रेस कोड लागू करते हैं। इसका एक बड़ा कारण छात्र-छात्रओं में समानता का बोध कराना होता है।
दुर्भाग्यपूर्ण केवल यह नहीं कि जब दुनिया भर में लड़कियों-महिलाओं को पर्दे में रखने वाले परिधानों का करीब-करीब परित्याग किया जा चुका है और इसी क्रम में अपने देश में घूंघट का चलन खत्म होने को है, तब कर्नाटक में मुस्लिम छात्राएं हिजाब पहनने की जिद कर रही हैं। यह न केवल कूप-मंडूकता और एक किस्म की धर्माधता है, बल्कि स्त्री स्वतंत्रता में बाधक उन कुरीतियों से खुद को जकड़े रखने की सनक भी, जिनका मकसद ही महिलाओं को दोयम दर्जे का साबित करना है। यह हैरानी की बात है कि कांग्रेस समेत कई दल स्कूलों में छात्रओं के हिजाब पहनने की मांग का समर्थन कर रहे हैं। इस क्रम में प्रियंका गांधी यहां तक कह गईं कि यह महिला का अधिकार है कि वह चाहे हिजाब पहने, चाहे बिकिनी, चाहे घूंघट.। क्या वह स्कूलों में भी बिकिनी, घूंघट की वकालत कर रही हैं? इस पाखंड और शरारत पर भी गौर करें कि कई कथित प्रगतिशील मुस्लिम महिलाएं, जो खुद हिजाब नहीं पहनतीं, वे उसके पक्ष में अभियान छेड़े हुए हैं।
Date:10-02-22
राष्ट्रभाव के खिलाफ खड़ी होती कांग्रेस विकास सारस्वत, ( लेखक इंडिक अकादमी के सदस्य एवं वरिष्ठ स्तंभकार हैं )
लंबे समय तक हिंदू और हिंदुत्व के बीच अनावश्यक, अनर्गल भेद खड़ा करने के बाद कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने अब भारतीयता के अभिप्राय पर आपत्तिजनक बयान दिया। उन्होंने संसद में यह कहकर चौंका दिया कि भारत राष्ट्र नहीं, बल्कि राज्यों का समूह है। जिस प्रकार हिंदुत्व को हिंदू धर्म से अलग दिखाने का प्रयास दुर्भावना से प्रेरित था, उसी प्रकार भारत की संवैधानिक अवधारणा का अनर्थ राहुल के दुराग्रह का प्रदर्शन था। प्रधानमंत्री मोदी ने उनके बयान की गंभीरता को समझते हुए राष्ट्रपति के अभिभाषण पर अपने संबोधन का काफी समय इसका जवाब देने के लिए दिया। अपने बयान द्वारा राहुल ने यह जताने का प्रयास किया कि राज्यों की दया और स्वेच्छा से भारत का अस्तित्व मात्र एक देश के रूप में है और भारत राष्ट्र तो कतई नहीं है। भारत की यह व्याख्या सांस्कृतिक और संवैधानिक रूप से तो गलत है ही, यह कांग्रेस के उन मूल्यों का उपहास भी है, जिनकी प्रेरणा से पार्टी ने भारत को समग्र राष्ट्र मानकर स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ी थी।
बंकिमचंद्र के राष्ट्रवादी घोष ‘वंदे मातरम’ को अपना क्रांति मंत्र बनाने वाली पार्टी, जिसका औपचारिक नाम ही भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस है, यदि ऐसे नेता का नेतृत्व पाती है, जो भारत की राष्ट्रीय अवधारणा को नकार दे तो इससे पता चलता है कि पार्टी न सिर्फ अपना मूल चरित्र खो बैठी है, बल्कि उन मूल्यों के विरोध में खड़ी हो गई है, जिन्हें लेकर उसका सृजन हुआ था। यहां राष्ट्र और देश के बीच का भेद समझने के लिए यह जानना आवश्यक है कि राहुल और उन्हीं की तरह के अन्य लोग जब भारत को राष्ट्र मानने से इन्कार करते हैं तो उनकी मंशा क्या होती है? जहां देश मात्र भौगोलिक सीमाओं से चिन्हित और संवैधानिक अधिकार से चलने वाली राजनीतिक इकाई है, वहीं राष्ट्र वह चेतना है जो साझा इतिहास, समान संस्कृति एवं सभ्यता के गौरव को आधार बनाकर उस राजनीतिक इकाई का सहज और स्वाभाविक एकीकरण करती है। यदि देश शरीर है तो राष्ट्र उसकी आत्मा है। राष्ट्रीय चेतना के अभाव में देशों की सीमाएं चलायमन और अस्तित्व संदिग्ध रहता है। वहीं राष्ट्रभाव, राष्ट्र-राज्य यानी नेशन स्टेट को उसकी विशिष्टता, स्थायित्व, दीर्घता, सांस्कृतिक शोभा, सामाजिक समरसता और राजनीतिक एकता प्रदान करने का ठोस आधार देता है।
संविधान के जिस अनुच्छेद एक का उल्लेख कर राहुल ने भारत को राष्ट्र नहीं, बल्कि महज राज्यों का संघ बताया, वह संविधान की मूल भावना के सर्वथा विपरीत निकाला गया अर्थ है। अनुच्छेद एक में ‘इंडिया दैट इज भारत’ में भारत स्पष्ट रूप से एक पुरातन, सांस्कृतिक राष्ट्र इंगित है। जहां तक बात ‘यूनियन आफ स्टेट्स’ यानी राज्यों का संघ होने की है तो यह शब्दावली राष्ट्र के विरोध में नहीं, बल्कि उसके शासकीय ढांचे को उद्धृत करने के लिए की गई है। राहुल यदि यूनियन आफ स्टेट्स का अर्थ ढीले-ढाले, स्वायत्त राज्यों के संघ से समझते हैं तो संविधान निर्माता यूनियन की जगह फेडरेशन शब्द का उपयोग करते। यूनियन बनाम फेडरेशन की चर्चा संविधान सभा में हुई थी और डा. भीमराव आंबेडकर ने दो कारणों से भारत को फेडरेशन मानने से इन्कार किया था। पहला तो यह कि भारतीय राष्ट्र स्वाधीन राज्यों के बीच हुए किसी समझौते का परिणाम नहीं और दूसरा इसलिए कि भारतीय कल्पना में राज्यों को देश से अलग होने की छूट नहीं। आंबेडकर ने स्पष्ट किया था कि फेडरेशन की जगह यूनियन शब्द के प्रयोग का कारण भारत की मजबूत संघीय कल्पना ही है।
एक मजबूत संघीय ढांचे के तहत राष्ट्रभाव को संवैधानिक रूप देने के लिए आंबेडकर ने संविधान सभा के कई सदस्यों की नाराजगी भी झेली। मौलाना हसरत मोहानी ने उन पर आरोप लगाया कि वह भारत को बिस्मार्क, कैसर विल्हेम और हिटलर के जर्मनी की तर्ज पर एकीकृत शासन व्यवस्था के अधीन लाना चाहते हैं। इस्लामी राष्ट्र पाकिस्तान के निर्माण और गांधीजी के राष्ट्र विभाजन के प्रबल विरोध के बाद भारतीय राष्ट्रभाव को इस प्रकार लांछित करना बेहूदगी थी, परंतु किसी ने यह आशा नहीं की थी कि नेहरू-गांधी खानदान में भी कभी कोई केंद्रीकृत संघीय ढांचे का विरोध करेगा। हसरत मोहानी की तरह आज राहुल भी भारत को एक ऐसे ढीले- ढाले रूप में देखना चाहते हैं, जिसमें विघटन बड़ी बात न होकर सामान्य सी बात हो। अपने भाषण में तमिलनाडु का जिक्र राहुल की इसी विघटनकारी मंशा को जाहिर करता है। राहुल का प्रधानमंत्री से यह कहना कि आप तमिल लोगों पर राज नहीं कर सकते, उस अलगाववार्दी चगारी को हवा देने का प्रयास है, जो लंबे समय तक वहां कभी तेज तो कभी धीमे-धीमे सुलगती रही है। इस तमिल अलगाववाद ने कभी खुलकर अलग देश ‘द्रविडनाडु’ की मांग की तो कभी आर्य विरोध के नाम पर प्रच्छन्न रूप से क्षेत्रीय कट्टरता को बढ़ावा दिया। राहुल द्वारा तमिल अलगाव को हवा देने का यह पहला प्रयास नहीं। पहले भी वह केंद्र द्वारा तमिल संस्कृति को कुचलने का मनगढ़ंत आरोप लगा चुके हैं। कांग्रेस सीएए विरोध के बहाने मुसलमानों और किसान आंदोलन की आड़ में सिख भावनाओं को भड़का चुकी है। कांग्रेस पुलवामा हमले, सर्जिकल स्ट्राइक, एयर स्ट्राइक और चीन से गतिरोध पर दुश्मन देशों के सुर में सुर मिलाती देखी गई है। राहुल द्वारा भारत की राष्ट्र चेतना से इन्कार इसी क्रम में अलगाव को वैधता देने का प्रयास है।
अपने बयान और कृत्यों से राहुल आज उन वामपंथी अतिवादियों के खेमे में आ गए हैं, जो भारत को एक राष्ट्र न मानकर बलात जोड़े गए छोटे-छोटे कई राष्ट्रों का समूह मानते हैं। धुर वामपंथी कन्हैया कुमार को पार्टी में स्थान देना राहुल की विघटनकारी संवेदनाओं को प्रकट करता है। हिंदुत्व से राहुल की चिढ़ भी इसी कारण दिखती है, क्योंकि हिंदुत्व भारतीय राष्ट्रबोध का मूलभूत आधार है। यह दिनोंदिन साफ होता जा रहा है कि सत्ता से दूर कुंठाग्रस्त राहुल की राजनीति भारतीय अक्षुण्णता के लिए खतरा बनती जा रही है। इस नाते प्रधानमंत्री का कांग्रेस को टुकड़े-टुकड़े गैंग का लीडर बताना राजनीतिक आरोप से बढ़कर राष्ट्र को इस घातक राजनीति के प्रति सचेत करने का प्रयास है।
Date:10-02-22
जड़ होती नौकरशाही प्रेमपाल शर्मा
दुनिया में शायद ही कोई ऐसा देश होगा जो भारत जैसी नौकरशाही के विरोधाभास में जीता हो। एक तरफ नौकरशाही को हर तरफ से धिक्कार, प्रताड़ना और अपमान से गुजरना पड़ता है, तो दूसरी तरफ हर नौजवान उसमें शामिल होने का सपना भी देखता है। इसमें सरकारी स्कूल, विश्वविद्यालय से लेकर कोर्ट-कचहरी तक हर सरकारी संस्था शामिल है। कुछ दिन पहले पटना और इलाहाबाद में रेलवे भर्ती परीक्षा को लेकर नौजवान गुस्से में सड़क पर उतरे और सरकारी संपत्ति को भारी नुकसान पहुंचाया। वैसे उनकी बात कुछ हद तक सही भी है कि रेलवे की नौकरियों में भर्ती में देरी क्यों हो रही है? साथ ही, इन नौजवानों ने भर्ती की परीक्षा प्रणाली पर भी उंगली उठाई।
इन नौजवानों का दर्द जायज है। पिछले दो साल की कोरोना त्रासदी की मार सबसे ज्यादा गरीबों और बेरोजगारों पर पड़ी है। हिंदी क्षेत्र में तो और भी ज्यादा, क्योंकि यहां लोग छोटे-मोटे काम भी शुरू नहीं कर पा रहे हैं और न ही भविष्य में इसकी कोई उम्मीद दिखाई दे रही है। लेकिन कुछ दरारें इस विरोध में भी साफ नजर आती हैं। उन्होंने नौकरशाही को अकर्मण्य, उदासीन, भ्रष्ट न जाने क्या-क्या कहा है। जब कोई ऐसा आरोप लगता है तो नौकरशाही कोई शीर्ष पर बैठे एक व्यक्ति का नाम नहीं, बल्कि पूरा संस्थान होता है जिसमें कई स्तर के कर्मचारी-अधिकारी होते हैं। अगर देखा जाए तो यह आरोप हर स्तर पर लागू है। बड़े अफसरों की जिम्मेदारी निश्चित रूप से ज्यादा है। लेकिन रेलवे भर्ती बोर्ड की परीक्षा के तहत जिन पदों पर भर्ती की जाएगी, वे भी अपनी कामचोरी, लापरवाही, अकर्मण्यता के लिए उतनी ही बदनाम हैं। कौन नहीं जानता कि रेल प्रशासन में सबसे ज्यादा बिना टिकट यात्री, जहरखुरानी की घटनाएं, चोरी, लेटलतीफी, घाटे की रेल उत्तर भारत की है और विशेषकर उन इलाकों में जहां उपद्रव हुए हैं। आखिर यह कौनसा समाज है जो ऐसे नागरिक बना रहा है जो जब तंत्र से बाहर होते हैं तो उसे बर्बाद और तोड़ने के लिए तत्पर रहते हैं और अंदर पहुंच जाएं तो उसे हर हालत में बचाने के लिए। रेल प्रशासन की तरफ से भर्ती में देर भी हो रही है और कुछ चूके भी हुई हैं। इस विरोध-प्रदर्शन से रेल प्रशासन की नींद टूटी और भी सुधार के लिए सिद्धांत रूप से वह तैयार हो गया है। कमेटी बन गई है और उम्मीद है कि ऐसे कदम उठाए जाएंगे जिससे भविष्य में भी ऐसी नौबत नहीं आए। लेकिन ऐसी घटनाओं की रोशनी में पूरे तंत्र पर पर निगाह डालने की भी जरूरत है। पैंतीस हजार पदों के लिए होने वाली यह भर्ती असम, तमिलनाडु, गुजरात, कश्मीर से लेकर उत्तर प्रदेश, बिहार सहित पूरे देश के नौजवानों के लिए थी। क्या कारण है कि उपद्रव सिर्फ इलाहाबाद और पटना में ही हुए? जो आंकड़े सामने आ रहे हैं, उसमें सबसे ज्यादा संख्या उत्तर प्रदेश और बिहार के बेरोजगारों की ही है।
कोरोना काल से पूरा देश प्रभावित हुआ। लेकिन दक्षिण के राज्य अपनी बेहतर शिक्षा व्यवस्था, हुनर, कार्य संस्कृति के बूते तेजी से पटरी पर आ रहे हैं, जबकि उत्तर प्रदेश, बिहार जैसे उत्तरी राज्यों में नौजवानों की टकटकी सिर्फ सरकारी नौकरियों की तरफ ही लगी हुई है। इलाहाबाद, लखनऊ, पटना, भागलपुर जैसे शहरों में एक-एक कमरे में दस-दस बच्चों का रहना, बहुत कम साधनों में प्रशिक्षण और विशेषकर अंग्रेजी सुधारने के लिए जान झोंकते क्या इन नौजवानों के लिए इतनी सरकारी नौकरियां बची हैं? क्या शिक्षा व्यवस्था पचास फीसद से ज्यादा निजी हाथों में नहीं पहुंच गई? क्या ऐसे ही कदम रेलवे में लगातार नहीं बढ़ रह रहे? पिछले पांच साल में ही नहीं, बल्कि बीस वर्षों से रेलवे के बहुत सारे कार्यकलाप सार्वजनिक-निजी भागीदारी (पीपीपी) माडल और दूसरे कई नामों से निजी हाथों की तरफ बढ़ रहे हैं, चाहे विश्राम गृहों का रखरखाव हो या स्टेशन का विकास या उत्पादन इकाइयों के बहुत सारे काम। पिछले दिनों तो लगभग सौ रेलवे मार्गों को भी निजी गाड़ियों को सौंपने की तैयारी हो चुकी है। इसके बावजूद उत्तर प्रदेश बिहार जैसे हिंदी राज्यों के स्कूल, विश्वविद्यालय या समाज में यह ज्ञान कब आएगा कि आप फर्जी सामान्य ज्ञान और अंग्रेजी की स्पेलिंग रटने के आधार पर सरकारी नौकरी की उम्मीद छोड़ना कब बंद करेंगे? खेती, उद्योग या दूसरे हुनर या श्रम आधारित काम करना क्यों नहीं सीखते?
गंभीर प्रश्न नौकरशाही में सुधार का भी है। किसी भी हालत में उसका अपराध कम नहीं है। भारतीय नौकरशाही दुनिया की सबसे भ्रष्ट और आरामतलब नौकरशाही मानी जाती है। और इसके लिए जिम्मेदार राजसत्ता भी कम नहीं है। हालांकि मौजूदा सरकार ने इस समस्या पर ध्यान दिया है और सुधार के लिए पारदर्शिता वाले कुछ अच्छे कदम लागू किए हैं, पर वे सब तकनीक के इस्तेमाल वाले ज्यादा हैं। याद कीजिए एक समय था जब रेल टिकट के लिए लंबी-लंबी कतारें होती थीं। बिजली के दफ्तर से लेकर टेलीफोन और पासपोर्ट कार्यालय तक में काम आसानी से नहीं हो पाते थे। पर इक्कीसवीं सदी की डिजिटल तकनीक की दुनिया ने नौकरशाही को सुधारने या उसके पर कतरने के लिए ज्यादा बेहतर काम किया है, बजाय हमारी सत्ता ने। सत्ताधीशों ने शायद ही कभी लालफीताशाही, भ्रष्टाचार, भाई-भतीजावाद के खिलाफ आवाज उठाई, बल्कि प्रकारांतर से उसे और प्रश्रय ही दिए जाते रहने की प्रवृत्ति बनी रही।
निश्चित रूप इक्कीसवीं सदी के भारत में बड़ा परिवर्तन नौकरशाही में सुधार से ही संभव होगा। इसे वक्त के साथ बदलना बेहद जरूरी है। पचास के दशक की कार्य संस्कृति से न तो भारतीय रेल चलाई जा सकती है, न कोई दूसरा संस्थान। यूरोप अमेरिका से लेकर सभी विकसित राष्ट्रों की नौकरशाही ने निजी क्षेत्र से सबक लेते हुए अपने को सुधारा है। हमारी नौकरशाही पर पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने भी बार-बार बहुत सख्ती से चोट की है। याद कीजिए भारत के मुख्य न्यायाधीश एनवी रमण ने वायु प्रदूषण को लेकर पिछले साल नवंबर में कहा था कि ‘नौकरशाही में एक तरह की जड़ता विकसित हो गई है। वे फैसले नहीं लेना चाहते। कार कैसे रोकें? वाहन कैसे जब्त किया जाए? क्या यह सब कोर्ट करेगा।’ ऐसी ही टिप्पणी उन्होंने उत्तर प्रदेश के एक कर्मचारी की बकाया राशि न देने के मामले में की थी। उन्होंने मुख्य सचिव के लिए कहा था कि ‘आप अपने ही कर्मचारी को उसके जायज बकाया धन से वंचित कर रहे हैं. आप को सख्त सजा दी जानी चाहिए।’ सुप्रीम कोर्ट तो यहां तक कह चुका है कि ‘इस देश को तो अब भगवान भी नहीं बचा सकता।’
सर्वोच्च अदालत की ऐसी गंभीर टिप्पणियों के आलोक में हमें सोचने की जरूरत है कि नौकरशाही इतनी जड़ क्यों होती जा रही है? रेलवे भर्ती की हालिया घटना का ही उदाहरण लें तो ये उम्मीदवार बड़े अफसरों से मिलने पटना गए थे, लेकिन उन्होंने कोई संतोषजनक उत्तर नहीं दिया। क्यों? क्या पारदर्शिता की कमी है? सही वक्त पर सही निर्णय में देरी क्यों? क्या साहस की कमी है? क्या तंत्र उनको धीरे-धीरे ऐसा अपाहिज और निष्क्रिय बना रहा है? लाख दावों के उलट पिछले दिनों इन सभी में बहुत तेजी से गिरावट आई है और इसका असर पूरे देश के लिए विनाशकारी होगा। राजनेताओं को भी यह समझने की जरूरत है कि यदि आपने नौकरशाही को अकर्मण्य और चापलूस बनाया तो दीर्घकाल में उसके अंजाम ऐसे ही होंगे, जो हाल में पटना स्टेशन पर देखने को मिले।
Date:10-02-22
‘पसंद के चुनाव’ की तात्पर्यता! गुरु प्रकाश
हाल में मैंने सोशल मीडिया पर डॉ. शशि थरूर द्वारा लिखित कर्नाटक गवर्नमेंट कॉलेज में लड़कियों के हिजाब पहन कर कॉलेज में प्रवेश पर लगी पाबंदी से संबंधित पोस्ट देखा जिसमें वे ऑक्सफोर्ड इंग्लिश की विशिष्टता लिए अपनी अनूठी शैली में हिजाब की तुलना हिंदुओं के माथे पर तिलक, सिख की पगड़ी और ईसाई द्वारा पहना किए क्रूस से करने को प्रवृत्त हुए हैं। उनका विचार था कि हिजाब पहनने वाली महिलाओं को कॉलेजों में प्रवेश करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए तो किसी दूसरे धार्मिंक चिह्नों को भी अनुमति नहीं होनी चाहिए। कहा कि हमें महिलाओं को तय करने देना चाहिए कि उन्हें हिजाब पहनना है या नहीं, और, सामान्य तौर पर मैं आगे स्क्रॉल करना जारी रखता और उनके धर्मनिरपेक्ष रुख की सराहना करता लेकिन इन दिनों मैं सतीश चंद्र लिखित इतिहास पाठ्यों के कारण मुझमें रोपित अपने स्वयं के ज्ञानात्मक पक्षपातों पर गंभीरता से जूझ रहा हूं।
एनसीईआरटी की किताबों, जो मुझे एक बच्चे के रूप में दी गई थीं, ने मुझमें धर्मनिरपेक्षता की एक विकृत अवधारणा आसवित की, जहां अच्छा और परिष्कृत व्यक्ति होने के नाता विशेष अचेतन तुष्टिकरण से जुड़ा था, बल्कि सभी प्रकार की मुस्लिम प्रथाओं के लिए औचित्य खोजना और इस मामले में अपरिहार्य का बचाव करना ध्येय था। हिजाब! जैसा कि हमें बताया गया था, शालीनता का परिधान होता है, या कहें कि संस्कृति विशिष्ट पोशाक है, जिसे कुछ महिलाएं अपनी पसंद से चुनती हैं, जिसकी तुलना पैंट-सूट छोड़ साड़ी पहनने के चुनाव से की जा सकती है। लेकिन क्या हिजाब वाकई इतनी सीधी-सादी हानिरहित पोशाक है? या हमारी छद्म धर्मनिरपेक्षता हमें दूध को दूध और पानी को पानी कहने से रोकती है? हिजाब लैंगिक भेदभावपूर्ण प्रथाओं की परिणति है जो धार्मिंक विश्वास से सिंचित होकर नैतिक स्वीकृति और सामाजिक आज्ञाकारिता प्राप्त करता है।
हिजाब शारीरिक रूप से महिलाओं को दुनिया के साथ स्वतंत्र रूप से बातचीत करने से नहीं रोकता है। लेकिन सच्चाई यह है कि हिजाब पहनने वाली महिला अपने को अलग महसूस करने हेतु धर्म द्वारा सामाजिक रूप से प्राणुकूलित होती हैं। डॉक्टर या वैज्ञानिक या व्यवसायी महिला बनना आसान नहीं है। हिजाब पहने हुए तो यह निर्विवाद रूप से और भी कठिन है। महिलाओं के लिए यह जितना कठिन होगा, शिक्षा या रोजगार के क्षेत्र में आपको उतनी ही कम महिलाएं मिलेंगी। हिजाब धर्म तंत्रानुसार बाध्यातित और मोर्चाबंद पुरुष-आधिपत्य का प्रतीक है, जिससे कुछ सरकारी कॉलेज लड़ने की कोशिश कर रहे थे। उनके प्रगतिशील इरादों को छद्म धर्मनिरपेक्षवादियों के शोर-शराबे ने दबा दिया है। जो महिलाएं हिजाब पहनकर कॉलेजों में जाने की गुहार लगा रही हैं, क्या वे वास्तव में अपनी पसंद की स्वतंत्रता का प्रयोग करने में सक्षम हैं, जैसा चितण्रथरूर ने करने की कोशिश की है। क्या वे अपने समाज के बुजुगरे को बता पातीं कि कॉलेज में हिजाब नहीं पहनना चाहतीं और तब यह एक गैर-मुद्दा होता। सच्चाई यह है कि उनके समाज के ‘बुजुगरे’ ने उन लड़कियों के कॉलेज जाने की चाहत पर, हिजाब पहनने की अपरक्राम्य अनिवार्यता निर्धारित की हुई है। महिलाएं कॉलेज के अधिकारियों से गुहार लगा रही हैं क्योंकि उनके पास उनके अपने ही सामाजिक-धार्मिंक परिवेश के खिलाफ ‘अपनी पसंद का चुनाव’ करने का कोई विकल्प नहीं है।
अपने इन तकरे के साक्ष्य के रूप में मैं उन्हीं महिलाओं में से एक के तथ्यात्मक वक्तव्य का उल्लेख कर रहा हूं, जिसमें वह कह रही है, ‘मैं अपने खुले बाल अपने भाई तक को नहीं दिखाती हूं तो गैर-मदरे को कैसे दिखाऊं।’ क्या यह वक्तव्य नहीं दर्शाता कि उक्त महिला अपने ‘बुजुगरे’ द्वारा अपने ऊपर थोपी गई दीर्घकालिक धार्मिंक बाध्यता को अपना प्रारब्ध स्वीकार चुकी है? क्या ऐसी मानसिकता लिए कोई महिला ‘अपनी पसंद के चुनाव’ की स्वतंत्रता के प्रयोग में सक्षम हो सकती है? तो! इसलिए! श्रीमान थरूर, कृपया हिजाब की ‘पसंद के चुनाव’ की तात्पर्यता के तर्क न दें! ऐसे किसी मसौदे का अस्तित्व ही नहीं है। धर्म शून्य में मौजूद नहीं होता। यह उस व्यवहार से गहराई से जुड़ा होता है, जिसे व्यक्ति प्रथा में लाता है, और यह उस समाज को गुण और चरित्र प्रदान करता है। राज्य को धर्म के दोषनिवृत्ति में दृढ़ रहना चाहिए और तुष्टीकरण की राजनीति के बहकावे में नहीं आना चाहिए। हमें एक ऐसे समाज को लक्षित रखना चाहिए जहां जेंडर-भेदभाव न्यूनतम हो और इस दृष्टिकोण से हिजाब को सिर्फ लैंगिक सौंदर्यशास्त्र में अंतर तक सीमित नहीं किया जा सकता। थरूर जैसे लोग, जो इस परिधान के अहितकारी स्वरूप को पहचानने से इनकार करते हैं, राष्ट्र और उस समाज के लिए बहुत बड़ा नुकसान करते हैं, जिसे हम बनाने की कोशिश कर रहे हैं, और इस हेतु मैं सिर्फ निवेदन कर सकता हूं। ज्ञानपूर्ण स्त्री और पुरु ष, चौंधियाने वाली अंग्रेजी में तर्क से नारी शक्ति की उन्नति हेतु की जा रहीं ऐतिहासिक कोशिशों को दिग्भ्रमित करने की कोशिशों को पहचानने, समझने और उन पर काबू पाने में सक्षम हैं।
Date:10-02-22
हिजाब पर हंगामा संपादकीय
बेवजह के विवादों का दावानल बन जाना इन दिनों नई बात नहीं है। ऐसा ही एक विवाद बुधवार को कर्नाटक उच्च न्यायालय के सामने था। राज्य के स्कूलों में मुस्लिम लड़कियों के हिजाब पहनने पर लगी पाबंदी का मुद्दा पिछले कुछ दिनों से देश की बहुत सारी ऊर्जा सोख रहा है। आंदोलन हो रहे हैं, नफरत फैल या फैलाई जा रही है, समाज में तनाव बढ़ रहा है और इसकी आग अब देश भर में फैलती हुई दिख रही है। देश के दूसरे हिस्सों से भी विरोध प्रदर्शन की खबरें आ रही हैं। इस बीच महिलाओं के अधिकार से लेकर समाज सुधार जैसे कई तर्क इससे जोड़ दिए गए हैं। इसलिए जब यह मामला उच्च न्यायालय के सामने आया, तो अदालत ने उन जटिलताओं को भी समझा, जो इससे जोड़ दी गई हैं और इसकी संवेदनशीलता को भी ध्यान में रखा। न्यायालय को यह एहसास था कि इस मामले में उसके फैसले के परिणाम बहुत दूरगामी हो सकते हैं। इसलिए मामले की सुनवाई कर रहे न्यायाधीश ने कहा कि इस मुद्दे की सुनवाई अदालत की बड़ी पीठ द्वारा की जानी चाहिए। राज्य के उडुपी जिले की लड़कियों ने अदालत में यह याचिका दायर की थी कि इस मामले में उन्हें अंतरिम राहत दी जाए, लेकिन न्यायाधीश ने अंतरिम राहत का फैसला भी बड़ी पीठ के ऊपर ही छोड़ दिया।
पिछले कुछ दिनों में यह विवाद इतना बड़ा हो गया है कि कर्नाटक सरकार को पूरे प्रदेश के स्कूल-कॉलेजों में छुट्टी घोषित करनी पड़ी है। हालांकि, इस बात की कोई गारंटी नहीं कि जब स्कूल-कॉलेज दोबारा खुलेंगे, तब तनाव फिर से न दिखाई दे। पूरे मामले को जिस तरह से सांप्रदायिक रंग दिया गया है और जिस तरह से इस बहाने एक धर्म के लोगों को दूसरे धर्म के खिलाफ खड़ा करने की कोशिश की जा रही है, उसमें बात सतही फैसलों से बनने वाली भी नहीं है। अब मामला यह नहीं है कि बात कहां से शुरू हुई थी, अब समस्या इसे लेकर शुरू हुई राजनीति है, जो समाज की पुरानी जटिलताओं के बारे में फैसला सड़कों पर कर लेना चाहती है।
हिजाब या परदे को लेकर हमारे देश में कई समाज सुधारकों ने बहुत से गंभीर प्रयास किए हैं, इसके लिए लंबी लड़ाइयां भी लड़ी गई हैं। इनमें बहुत सारी लड़ाइयों में सफलताएं भी मिली हैं, बहुसंख्यकों में भी और अल्पसंख्यकों में भी। सच तो यह है कि ऐसे ही प्रयासों के कारण लड़कियां और महिलाएं घर की दहलीज से बाहर निकली हैं और अब वे पढ़ाई ही नहीं कर रहीं, बल्कि जीवन के तकरीबन सभी क्षेत्रों में सक्रिय दिखाई देती हैं। यह भी कहा जाता है कि वे घर से निकली हैं, इसीलिए परदा भी खत्म हुआ और उसके तर्क भी। यह ठीक है कि परदा अभी भी कई रूपों में मौजूद है, अधिकतर परंपराओं के कारण है और कुछ जगहों पर कट्टरता के कारण भी। जैसे-जैसे लड़कियां घरों से निकलेंगी, ये आग्रह भी खत्म होंगे ही। वैसे भी, परदा प्रथा को खत्म करने का मामला समाज सुधार का मामला है, राजनीति का नहीं। अगर किसी को जबरदस्ती परदा थोपने की इजाजत नहीं दी जा सकती, तो किसी को जबरन परदा हटाने की इजाजत भी नहीं दी जा सकती। अच्छा होगा, हम लड़कियों को खूब पढ़ाएं और अपने परदे का फैसला उनके विवेक पर ही छोड़ दें। लेकिन अभी तो जो हो रहा है, वह उनमें से कुछ के पढ़ने के रास्ते ही बंद कर सकता है।
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आजकल सांसदों और विधायकों का निलंबन, अतिवादी सत्ता की राजनीति का एक उपकरण बन गया है। हाल ही में राज्यसभा से किया गया 12 सदस्यों का निलंबन, तथा महाराष्ट्र और छत्तीसगढ़ विधानसभाओं से किया गया विधायकों का निलंबन, लोकतंत्र के लिए खतरे का प्रतिनिधित्व करता है। इस पर उच्चतम न्यायालय ने चेतावनी दी है।
कुछ मुख्य बातें –
उच्चतम न्यायालय ने सुझाव दिया है कि निलंबन लंबे समय तक नहीं होना चाहिए।
निलंबन का उद्देश्य सदन के कार्यों का सुचारू रूप से संचालन करना है। इसलिए उसे मौजूदा सत्र से आगे बढ़ाना ‘तर्कहीन’ है।
इस प्रावधान का दुरूपयोग करने वाली कम बहुमत वाली सरकारों के बारे में यह चिंता का विषय है।
सदन के पीठासीन अधिकारी की जिम्मेदारी है कि वह सरकार के विधायी कार्यों को सदन की भागीदारी के साथ संचालित कराए। इस हेतु उन्हें पक्षपातपूर्ण आचरण से बचना चाहिए। लेकिन समकालीन राजनीति की अतिवादी प्रवृत्ति को देखते हुए यह कठिन होता जा रहा है। असहमति के प्रति असहिष्णुता आज की राजनीति की सबसे बड़ी अस्वस्थता है।
सरकारों के लिए असुविधाजनक मुद्दों पर बहस को टालने के ट्रेजरी बेंचों (सदन में आगे की सीटें, जो वरिष्ठ नेताओं के लिए होती हैं) के प्रयास और दूसरी ओर बहस के लिए विपक्ष का बार-बार दबाव ही संसदीय प्रोटोकॉल को तोड़ने का कारण बन जाता है। असंयमित आचरण से जब विधायिका अपनी लोकतांत्रिक मर्यादा को भूल जाती है, तो ऐसी स्थिति उत्पन्न होती है।
उम्मीद की जा सकती है कि सभी राजनीतिक दल, दलगत राजनीति से ऊपर उठकर इस स्थिति को सुधारने पर विचार करते हुए किसी समाधान पर जल्द ही पहुंचेंगे।
‘द टाइम्स ऑफ इंडिया’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 20 जनवरी, 2022
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Date:09-02-22
Facebook To Metaworse Metaverse may not be Zuckerberg’s salvation if privacy violation is built into its business model Apar Gupta, [ The writer is Executive Director, Internet Freedom Foundation ]
Over the past week Meta Platforms, which owns and operates Facebook, Instagram and WhatsApp, has taken a big market hit. Its shares $240 billion off its market capitalisation. As of Monday, this trend continued with another dip of 4. 7%, a cumulative stock price fall of 30% since its earnings report for the fourth quarter of 2021.
Is Meta’s share fall a part of the overall bearish market sentiment on because the Alphabet-Google stock is down only 1. 8% and the Amazon stock, after a drop, is now witnessing a rally. Therefore, markets are sending a bigger message to Meta.
Market analysts have set out two primary reasons for Meta’s challenges. The first is that Facebook has lost roughly half a million users, marking a decline in its global user base for the first time. While this may seem like a blip in the overall number of 1. 93 billion active daily users, if this continues as a trend, it will lead to a negative network effect.
The doctrine of network effects says that the value of a communications network is proportional to the square of the number of its connected users. Just as this plays out when most people join social media, a shrinking user base will usually have a compound impact that will spur greater attrition – simply, each person leaving Facebook, prompts another.
The justification provided by Meta in its earnings reports and investor calls have focussed on, “increased competition for people’s time”. This means that more social media users today prefer native video sharing platforms such as TikTok to Facebook, or even Instagram Reels.
The second reason is contained within the press release accompanying Meta’s financial results and states, “ We will overlap a period in which Apple’s iOS changes were not in effect and we anticipate modestly increasing ad targeting and measurement headwinds from platform and regulatory changes”.
This essentially means that Meta, an advertising company, is facing challenges targeting its users due to privacy protections and regulations on data protection. The most prominent has been due to technical changes in iPhones after iOS 14. 5, which lets users disable ad-tracking.
The response to these “headwinds” has been a mix of an intermediate solution and long-term product strategy. Immediately, Meta is focussing on video, and group messaging features to counter challenges from TikTok and similar platforms. It’s also devising new ways of ad delivery that are contextual and operate within the boundaries of ad-tracking blockers as those devised by Apple.
The longer term response is building a Metaverse. This will be possibly a constellation of immersive virtual reality environments that will serve as the next generation of social media interactions. While market analysts are forecasting uncertain capital expenditures and user adoption as concerns, there is a greater reason to consider privacy and data protection challenges.
Any immersive virtual reality environment is likely to have greater adhesion to users leading to greater data collection. For instance, take a user’s eye as an example. It is one of our many organs that will be digitised and then rendered within the Metaverse.
As per a framework released by XRSI, a non-profit organisation working on rights around virtual reality environments, tracking in the Metaverse may include, “eye opening and closure; eye movements; eye health; pupil properties; iris characteristics; eyelid and skin properties”. This list is far from exhaustive but neatly captures the scale, granularity and extent of data collection possible through the Metaverse.
To allay such concerns a founder’s letter by Mark Zuckerberg emphasises that, “Privacy and safety need to be built into the Metaverse from day one. So do open standards and interoperability. ” However, this intent may not be implemented in engineering design or business practises if the core economic model of serving ads through data collection does not change. Similar human rights concerns and larger business impacts will manifest in time if the core business that powered Facebook is adopted by Meta.
Continuing a harmful, tired approach would also mean taking on most regulators and national governments that are devising or enforcing privacy regulations.
Also, social media-generated problems like abuse, disinformation and social polarisation will be likely more severe in a virtual reality environment like the Metaverse, which will have the ability to render more vivid experiences and alter our sense of reality.
This strategy comes at a time when user trust in Meta is low thanks to regular public scandals, including revelations by whistleblower Frances Haugen in several complaints to the US Securities Exchange Commission. In her subsequent testimony to the US Senate she has stated that, “I’m here today because I believe Facebook’s products harm children, stoke division and weaken our democracy. ”
To avoid repeating the same mistakes, and therefore avoid user disapproval, Meta needs to look at the first principles around which social media was built and Metaverse will be built. Unless the business model changes, the Metaverse may be Metaworse for both Meta’s users as well as shareholders.
Date:09-02-22
राजनीति स्वच्छ कैसे हो जब बाहुबली ही वोटरों की पसंद संपादकीय
एडीआर की रिपोर्ट में एक अजीब तथ्य नजर आता है। वे उम्मीदवार ज्यादा जीतते हैं, जिन पर आपराधिक मुकदमे हैं। शायद यही कारण है कि अपराधियों/बाहुबलियों को टिकट देना दलों की मजबूरी हो गई है। नतीजतन लोकसभा में पिछले दस वर्षों में आपराधिक मुकदमे वाले ‘माननीयों’ का प्रतिशत बढ़कर 30 से 43 हो गया और संगीन अपराध वर्ग में आने वाले सांसद 14 से 29 प्रतिशत हो गए। इस काल में आपराधिक मामलों वाले उम्मीदवारों के जीतने की उम्मीद भी बिना आपराधिक मामलों वाले उम्मीदवार के मुकाबले साढ़े तीन गुना ज्यादा रही। जाहिर है वोटरों को बाहुबलियों या अपराधियों से गुरेज नहीं है बल्कि उन्हें लगता है कि ऐसे लोग चुनना बेहतर होगा, जो ‘दबंगई’ वाला व्यक्तित्व रखते हों। आंकड़े यह भी बताते हैं कि वर्तमान राजनीतिक परिदृश्य में राष्ट्रीय स्तर पर कांग्रेस और क्षेत्रीय स्तर पर अन्नाद्रमुक ही ऐसी पार्टियां हैं, जिसके गैर-आपराधिक मामलों वाले ज्यादा उम्मीदवार जीतते हैं, जबकि भाजपा सहित सभी अन्य दलों- यहां तक कि वाम दलों- के मतदाता भी आपराधिक मामलों वाले उम्मीदवारों को ज्यादा चुनते हैं। इनमें सबसे आगे महाराष्ट्र है, जहां दोनों क्षेत्रीय दलों- शिव सेना और एनसीपी- के आपराधिक मामलों वाले उम्मीदवार के जीतने की संभाव्यता क्रमशः सात गुना और चार गुना ज्यादा होती है। भाजपा के भी आपराधिक मामलों वाले प्रत्याशी ज्यादा जीतते हैं। संभव है कि राजनीतिक विद्वेष पिछले कुछ वर्षों में बढ़ा हो और जो कार्यकर्ता आक्रामक तरीके से सरकारों का विरोध करते हों, उन पर फर्जी मुकदमे ठोके जाते हों। लेकिन जिन पर हत्या या दुष्कर्म जैसे संगीन मुकदमे हैं, वे जनता की पसंद कैसे बनते हैं? शायद नाकारा सिस्टम से परेशान जनता अपने नेता को ‘रोबिनहुड’ की तरह देखना चाहती है, जिसके बारे में अतार्किक कहावत थी कि वह धनिकों को लूटता है पर गरीबों पर रहमदिल है।
Date:09-02-22
हिजाब के सवाल पर राष्ट्रीय बहस की जरूरत डॉ. वेदप्रताप वैदिक, ( भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष )
मुस्लिम छात्राएं हिजाब (शिरोवस्त्र) पहनें या न पहनें, इस मुद्दे को लेकर कर्नाटक में जंग छिड़ गई है। मामला उडुपी जिले के एक कॉलेज में गरमाया है। मंगलवार को कर्नाटक के ही एक अन्य कॉलेज में हिजाब पहनकर आई एक मुस्लिम छात्रा को घेरकर नारेबाजी भी की गई, जो गलत है। पर यह मुद्दा ऐसा है, जिस पर राष्ट्रीय बहस की जरूरत है। कर्नाटक की भाजपा सरकार ने कहा है कि 1983 में पारित एक शिक्षा कानून के तहत छात्र-छात्राओं की वेशभूषा क्या हो, यह सरकार या वह शिक्षण-संस्था तय करेगी। इस प्रावधान के विरुद्ध कुछ लोगों ने अदालत में याचिका भी दायर कर दी है। उनका कहना है कि ऐसा प्रावधान नागरिकों के मूलभूत अधिकारों का हनन करता है। कोई आदमी क्या खाए, क्या पहने, किस करवट सोए- इस सबकी उसे स्वंतत्रता है। यह तर्क मोटे तौर पर ठीक ही लगता है लेकिन इसकी बारीकियों में उतरेंगे तो इसके कई पहलुओं से सहमत होना मुश्किल है।
यदि हर नागरिक को खाने, पहनने और बोलने की असीम स्वतंत्रता हो तो वह किसी भी हद तक जा सकता है। लेकिन हिजाब पहनने की स्वतंत्रता किसी खतरनाक श्रेणी में नहीं आती है। हिजाब क्या है? हिजाब सिर और सीने पर ढके जाने वाले कपड़े को कहते हैं। कभी-कभी उससे चेहरा भी ढक लिया जाता है और सिर्फ आंखें खुली रहती हैं। वह लगभग वैसा ही होता है, जैसे आजकल सभी लोग- औरत और मर्द- मुखपट्टी या मास्क लगाए रखते हैं। औरतें हिजाब, बुर्का और नकाब धारण करें, यह परंपरा अरबों में इसलिए चली थी कि वे अंग-प्रदर्शन से बचें। लगभग ऐसी ही परंपरा भारत के सभी धर्मावलंबियों में भी रही है, जिसे पर्दा और घूंघट की प्रथा कहा जाता है।
लेकिन अब हिजाब जैसी परंपरा का पालन इस्लामी देशों में भी घटता जा रहा है। अब से 50-55 साल पहले जब मैं काबुल विश्वविद्यालय में अनुसंधान कर रहा था तब मैं देखता था कि अफगान छात्राएं शॉर्ट स्कर्ट पहनकर आती थीं। वैसे स्कर्ट मैंने रूस, यूरोप और अमेरिका में भी नहीं देखे। ऐसे में वेशभूषा पर सवालों का उठना स्वाभाविक हो सकता है। लेकिन घूंघट और हिजाब को इस श्रेणी में नहीं रखा जा सकता है। घूंघट और हिजाब का प्रावधान किसी भी धर्मग्रंथ में नहीं है। कुरान शरीफ में कहा गया है कि अपने घर की महिलाओं से कहिए कि जब वे बाहर निकलें तो अपने अंगों को ढककर रखें ताकि लोग उन्हें तंग न करें। वे बाहरी लोगों के सामने अपनी नज़रें नीची रखें। कुरान में यह जो कहा गया, वह बिल्कुल उचित था, क्योंकि उस वक्त के अरब देशों में मर्द अपनी मर्यादा का उल्लंघन करने में ज्यादा संकोच नहीं करते थे। वेशभूषा में परिवार की स्त्रियों को विशेष सावधानी बरतने के लिए इसलिए भी कहा जाता था, क्योंकि उस जमाने में इसे स्वेच्छाचारिता से जोड़ दिया जाता था।
भारत में पर्दा-प्रथा कहां थी? यह भी कुछ सदियों पहले ही चली। खास तौर से विदेशी आक्रमणकारियों के काल से! कई संत कवियों और महर्षि दयानंद ने पर्दा-प्रथा का डटकर विरोध किया था। लेकिन आधुनिक काल में जब हम स्त्री-पुरुष समानता की बात करते हैं तो सिर्फ स्त्रियों पर इस तरह के अतिरंजित बंधन क्यों थोपना चाहते हैं? यहां इसे दोनों तरह से देखा जा सकता है। कुछ लोग कह सकते हैं कि स्त्रियां अपने अंगों का प्रदर्शन न करें यही ठीक है, इसी तरह इस मत के विरोधी पूछ सकते हैं कि वे अपनी पहचान भी क्यों छिपाएं? बुर्का, घूंघट, पर्दा, हिजाब और नक़ाब तो उनके चेहरे को भी ढक लेते हैं।
यदि कोई कुछ नहीं पहनकर बाहर निकले तो वह आपत्तिजनक जरूर है (दिगंबर संतों के अलावा), लेकिन कोई किसी भी रंग, शैली, आकार, कीमत का कपड़ा पहने तो उसमें आपत्ति का कारण नहीं बनता। यदि मुसलमान स्त्रियां बुर्का पहनें, हिंदू स्त्रियां घूंघट काढ़ें और माथे पर सिंदूर लगाएं, हिंदू पुरुष चोटी रखें, जनेऊ पहनें तो किसी को भी आपत्ति नहीं होनी चाहिए। भारत में धोती, पाजामा, लुंगी, पेंट, चादर, अंगोछा आदि अधोवस्त्रों के कई रूप प्रचलित हैं। लेकिन शिक्षा-संस्थाओं को जाति, पंथ या मजहब की डोंडी पीटने वाले ऐसे प्रकट-चिह्नों से मुक्त रखा जा सके तो अच्छा है। इसीलिए भारतीय गुरुकुलों में समस्त ब्रह्मचारियों की वेशभूषा एक जैसी ही होती थी। यूनान के दार्शनिक प्लेटो की ‘एकेडमी’ और अरस्तू की ‘लीसीएम’ में छात्रों की वेशभूषा भी एक जैसी होती थी। चाहे वे किसी राजपरिवार के ही क्यों ना हों। सांदीपनि आश्रम में क्या कृष्ण और सुदामा अलग-अलग वेशभूषा में रहते थे?
कोई आदमी क्या खाए, क्या पहने, किस करवट सोए- इस सबकी उसे स्वंतत्रता है। यह तर्क मोटे तौर पर ठीक ही लगता है लेकिन इसकी बारीकियों में उतरेंगे तो इसके कई पहलुओं से सहमत होना मुश्किल है। यदि हर नागरिक को खाने, पहनने और बोलने की असीम स्वतंत्रता हो तो वह किसी भी हद तक जा सकता है। हिजाब पहनने की स्वतंत्रता किसी खतरनाक श्रेणी में नहीं आती है। लेकिन अब हिजाब जैसी परंपरा का पालन इस्लामी देशों में भी घटता जा रहा है।
लोग अपने घर और बाजार में जैसी वेशभूषा पहनना चाहें, पहनें। उन्हें इससे भला कौन रोक सकता है? लेकिन शिक्षा-संस्थाओं में सबकी वेशभूषा एक जैसी हो तो उसके कई लाभ हैं। बचपन से लोगों में समता और सादगी का भाव पनपेगा। अमीरी की उच्चता ग्रंथि और गरीबी की हीनता ग्रंथि का भाव बच्चों में आपस की दूरियां पैदा नहीं करेगा। लेकिन जब लड़कियां हिजाब पहनेंगी, तो फिर भगवा दुपट्टा और नीला गुलूबंद भी दिखाई पड़ेगा। यह अलगाववाद चाहे मजहबी हो, जातीय हो या आर्थिक हो, शिक्षा-संस्थाओं में तो नहीं होना चाहिए। यदि मुस्लिम लड़कियां हिजाब नहीं पहनेंगी तो क्या उनके इस्लामी होने में कुछ कमी आ जाएगी? मैं जब इंदौर के क्रिश्चियन कॉलेज में पढ़ता था तो ब्रह्मचारी के नाते खड़ाऊ पहना करता था। जब प्राचार्य सी. डब्ल्यू. डेविड ने उसकी खट-खट पर आपत्ति की तो मैं उसे उतारकर नंगे पांव ही कालेज में प्रवेश करने लगा था। तब क्या मेरा ब्रह्मचर्य भंग हो गया था?
हम छात्रों की वेशभूषा एक जैसी कर लें, तब भी अलगाव की समस्या रहेगी। उसे घटाने के लिए यह भी किया जा सकता है कि सारे भारतीय अपने खान-पान और नामकरण में भी मोटी-मोटी एकरूपता लाने की कोशिश करें। इसका अर्थ यह नहीं कि सभी धोती-कुर्त्ता पहनें, दाल-रोटी खाएं और अपने नाम संस्कृत या हिंदी में रखें। विविधता कायम रहे लेकिन मुसलमानों के नाम सिर्फ अरबी, ईसाइयों के नाम सिर्फ इंग्लिश और यहूदियों के नाम सिर्फ हिब्रू में क्यों रहें? वे अरबों, अंग्रेजों और इजराइलियों की नकल क्यों करें? वे अपने नाम अपनी मातृभाषाओं में क्यों नहीं रखें? ऐसा होगा तो देश में अंतरजातीय व अंतरधार्मिक विवाहों की संख्या बढ़ेगी और एकता इस्पाती बनेगी। मैंने इंडोनेशियाई मुसलमानों के नाम संस्कृत में देखे हैं। उनके राष्ट्रपति का नाम सुकर्णो था व उनकी बेटी का नाम मेघावती है। कुछ ही महीनों पूर्व सुकर्णो की एक अन्य पुत्री सुकमावती ने हिंदू धर्म स्वीकार किया है और इसे इंडोनेशिया के मानवाधिकार और राजनीतिक चिंतकों ने अपने देश में धार्मिक बहुलतावाद का ही एक प्रमाण बतलाया था। बहरहाल, हिजाब वाले मामले पर कर्नाटक हाईकोर्ट सुनवाई कर रहा है और माननीय न्यायालय के निर्णय से ही तस्वीर साफ हो सकेगी।
Date:09-02-22
खाद्य तेल आयात में कमी जरूरी संपादकीय
वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने अपने बजट भाषण में कहा था कि खाद्य तेलों के आयात पर निर्भरता कम करने के लिए तिलहन का उत्पादन बढ़ाने पर जोर दिया जाएगा। परंतु महज कुछ ही दिन के भीतर सरकार ने तिलहन और खाद्य तेल की स्टॉक होल्डिंग पर रोक बढ़ाने का निर्णय लिया है। यह निर्णय उस चेतावनी की भी अनदेखी करता है जो आर्थिक समीक्षा में दी गई थी और कहा गया था कि अनिवार्य वस्तुओं की कीमतों में उतार-चढ़ाव से जुड़े ऐसे कदम उत्पादकों को गलत संकेत देते हैं। यह कदम कई वजहों से गलत समय पर उठाया गया है। मिसाल के तौर पर गत अक्टूबर में जब भंडारण सीमा की घोषणा की गई थी तभी से अधिकांश खाद्य तेलों की कीमत या तो स्थिर है या उसमें गिरावट का रुख है। बहरहाल, छह राज्यों उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, हिमाचल प्रदेश, तेलंगाना, राजस्थान और बिहार ने केंद्र सरकार के निर्देशों का पालन किया और उस स्टॉक को अधिसूचित किया जो कारोबारी रख सकते हैं। अब सरकार ने एक कदम आगे बढ़कर शेष राज्यों पर भी प्रतिबंध लागू करने की घोषणा कर दी है। इससे पहले भी एक गलत कदम उठाते हुए आयात शुल्क समाप्त करने और खाद्य तेलों पर लगने वाले कृषि उपकर को 20 फीसदी से कम करके केवल पांच से 7.5 फीसदी करने की घोषणा की गई थी।
इस मोड़ पर व्यापार प्रतिबंधों की जरूरत इसलिए भी नहीं है क्योंकि रबी सीजन में तिलहन का बंपर उत्पादन होने की आशा है। रबी सीजन में तिलहन की प्रमुख फसल सरसों का रकबा 23 फीसदी अधिक होने का अनुमान है और अनुकूल मौसम होने के कारण फसल भी बहुत अच्छी होने की आशा है। शुरुआती अनुमानों के मुताबिक सरसों का उत्पादन 1.1 करोड़ टन से अधिक होगा जो पिछले वर्ष के 85 लाख टन से काफी अधिक है। ऐसे में अगर भंडारण पर कोई रोक लगाई जाती है तो खरीदार बाजार से दूर हो जाएंगे। इसका फसल कटाई के बाद के मौसम में कीमतों पर बुरा असर होगा जो उत्पादकों के लिए अच्छा नहीं होगा।
अगर किसानों को कमजोर कीमत मिलती है तो किसान अगले खरीफ सत्र में भी तिलहन की खेती करने से हिचकिचाएंगे और विदेशों से खरीद पर निर्भरता बनी रहेगी। पशुओं के भोजन के लिए इस्तेमाल होने वाले जीन संवद्र्धित सोयामील के आयात का हालिया निर्णय भी स्थानीय उत्पादन को हतोत्साहित करने वाला है। हमारा देश पहले ही दुनिया का सबसे बड़ा खाद्य तेल आयातक बन चुका है। हम अपनी 2.5 करोड़ टन तेल की आवश्यकता पूरी करने के लिए सालाना करीब 1.4 से 1.5 करोड़ टन खाद्य तेल का आयात करते हैं।
व्यापक खपत वाली खाद्य तेल जैसी वस्तु के मामले में आयात पर इतनी अधिक निर्भरता उचित नहीं है क्योंकि ज्यादातर पाम ऑयल इंडोनेशिया और मलेशिया से आयात किया जाता है। आपूर्ति में किसी भी तरह की बाधा भारत के लिए दिक्कत पैदा कर सकती है। इतना ही नहीं, हमारे देश में अपनी जरूरत का तिलहन और खाद्य तेल उत्पादित करने की पर्याप्त क्षमता है। सन 1980 के दशक के मध्य में तिलहन प्रौद्योगिकी मिशन की स्थापना की गई थी जिसने इस दिशा में राह दिखाई थी। इसके तहत बाजार में तब तक किसी तरह का हस्तक्षेप करने से इनकार किया गया जब तक कि कीमतें एक तय दायरे में रहें और उत्पादकों तथा ग्राहकों के बीच संतुलन कायम रखें। बहरहाल, सन 1990 के दशक में इस नीति को त्याग दिया गया और मिशन का अच्छा काम अधूरा रह गया। एक बार फिर ऐसी ही नीति की आवश्यकता है ताकि घरेलू उत्पादन बढ़ाकर तिलहन एवं खाद्य तेल क्षेत्र के सभी अंशधारकों को लाभान्वित किया जा सके। इसमें उत्पादक, प्रसंस्करण करने वाले और उपभोक्ता सभी शामिल हैं।
Date:09-02-22
प्रतिभा की जगह संपादकीय
अब इस बात पर उचित ही गर्व करते देखा जाता है कि सदियों से समाज के हाशिए पर डाल दी गई महिलाएं भी अपनी प्रतिभा के बल पर पुरुषों के समकक्ष खड़ी देखी जाने लगी हैं। इस क्रम में दुनिया की अनेक महिलाओं के उदाहरण दिए जाते हैं। मगर हमारे देश में अक्सर इस बात को लेकर असंतोष भी जताया जाता रहता है कि प्रतिष्ठित प्रतिष्ठानों के शीर्ष पदों पर महिलाएं नहीं पहुंच पातीं। इसमें पुरुष प्रधान समाज की मानसिकता को भी दोषी ठहराया जाता है। मगर अब ऐसी शिकायतें भी धीरे-धीरे छंटनी शुरू हो गई हैं। पिछले दिनों सर्वोच्च न्यायालय में प्रधान न्यायाधीश की कतार में महिला न्यायाधीशों के खड़े होने से काफी संतोष और खुशी व्यक्त की गई। इसी क्रम में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की नई कुलपति के रूप में शांतिश्री पंडित के चयन को भी देखा जा सकता है। वे इस विश्वविद्यालय की पहली महिला कुलपति होंगी। चूंकि देश का यह प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय है, उस पर सबकी नजर रहती है। कई बार दबी या मुखर जबान में सवाल पूछे जाते रहे हैं कि क्या वहां कोई ऐसी एक भी महिला प्रोफेसर नहीं हुई, जिसे वहां का कुलपति बनाया जा सके। दूसरे विश्वविद्यालय से ही सही, शांतिश्री पंडित के इस पद पर चयन से निस्संदेह ऐसे सवाल करने वालों को कुछ संतोष मिला होगा।
विश्वविद्यालय स्वायत्तशासी संस्थान होते हैं। इसलिए किसी भी विश्वविद्यालय की साख स्वाभाविक रूप से उसके कुलपति से जुड़ जाती है। कुलपति का नजरिया ही परिसर के परिवेश में दिखाई देता है। वहां होने वाली नियुक्तियों, शिक्षा सत्र और पढ़ाई-लिखाई के वातावरण, व्यवस्था आदि में कुलपति का व्यक्तित्व ही देखा-परखा जाता है। क्योंकि आखिरकार विश्वविद्यालयों की संपत्ति वहां के अकादमिक लोग ही होते हैं। मगर पिछले कुछ सालों से जिस तरह विश्वविद्यालयों और उच्च शैक्षणिक संस्थानों में नियुक्तियों आदि को लेकर गुणवत्ता से समझौता होते देखा जाने लगा है, उससे कुलपतियों की नियुक्ति पर अक्सर सवाल उठते रहते हैं। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय की नई कुलपति भी विवाद से परे नहीं मानी जा सकतीं। इस पद की जिम्मेदारी संभालने से पहले ही वे अनेक बार विवादों में घिरी रही हैं। महाराष्ट्र के सावित्रीबाई फुले विश्वविद्यालय में वे राजनीति विज्ञान की आचार्य हैं। वहां रहते हुए उन्होंने गांधी और गोडसे प्रसंग में ट्विटर पर एक तरह से गांधी-विरोधी टिप्पणी कर दी थी, जिसे लेकर उन्हें तीखे विरोधों का सामना करना पड़ा था। इसी तरह उन्होंने नागरिकता संशोधन विधेयक के विरोध में विरोध कर रहीं, धरने पर बैठी मुसलिम महिलाओं को फिदायीन कह दिया था। कृषि कानूनों का विरोध कर रहे किसानों की अगुआई करने वाले नेताओं को परजीवी कह दिया था।
यह ठीक है कि संविधान में सबको अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता है, मगर जब समाज का कोई जिम्मेदार माना जाने वाला व्यक्ति हल्की बातें करता है, तो उस पर विरोध का स्वर उभरना स्वाभाविक है। शांतिश्री पंडित के पहले दिए गए उनके बयानों से उनकी विचारधारा और चीजों को देखने की दृष्टि का अंदाजा तो लगाया ही जा सकता है। इसलिए अंगुलियां सरकार पर भी उठनी लाजिमी हैं कि उन्हें क्यों इस पद की जिम्मेदारी सौंपी गई। खैर, मनुष्य के स्वभाव और सोच को लेकर उम्मीद की खिड़की कभी बंद नहीं होती। कई बार ऐसा भी देखा गया है कि किसी जिम्मेदार पद पर पहुंच कर व्यक्ति के कामकाज का तरीका पहले के अपने ढंग से उलट हो जाता है। उम्मीद की जानी चाहिए कि नई कुलपति विश्वविद्यालय की गरिमा को अक्षुण्ण रखेंगी।
Date:09-02-22
संकट में छोटे उद्यम सरोज कुमार
करोड़ों हाथों को काम देने वाले देश के छोटे उद्यम लंबे समय से कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं। हर आने वाले दिन के साथ उनकी मुश्किलें बढ़ी हैं। नोटबंदी, जीएसटी जैसे आर्थिक सुधारों ने उन्हें उजाड़ने का ही काम किया। महामारी ने छोटे उद्यमों को मृतप्राय कर दिया। सरकार की ओर से अभी तक किए गए बचाव के उपाय अपेक्षित परिणाम नहीं दे पाए हैं। नए बजट से उम्मीदें थीं। लेकिन यहां भी उधार की उम्मीदें हैं। जबकि अभूतपूर्व बेरोजगारी के समय में छोटे उद्यमों को तत्काल आक्सीजन की जरूरत है।
सरकार अब इस बात को मानने लगी है कि सूक्ष्म, लघु एवं मझौले (एमएसएमई) उद्यम क्षेत्र पर महामारी का असर हुआ है। लेकिन असर का आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। असर के आकलन के लिए पिछले साल नवंबर में निविदा आमंत्रित की गई थी। चयनित एजेंसी को दो महीने में एमएसएमई क्षेत्र की पिछले पांच साल की तस्वीर बतानी थी कि कितनी इकाइयां बीमार हैं, या बंद हुईं और कितनी नई खुली हैं। इस दिशा में कितनी प्रगति हुई, फिलहाल कोई जानकारी नहीं है। इस बीच लघु उद्योग विकास बैंक (सिडबी) के एक सर्वेक्षण में पता चला है कि वित्त वर्ष 2020-21 में कोविड के दौरान सड़सठ फीसद एमएसएमई तीन महीनों तक अस्थायी रूप से बंद रहे, लगभग छियासठ फीसद इकाइयों का मुनाफा घट गया। 27 जनवरी, 2022 को आई इस सर्वे की रपट एमएसएमई मंत्री नारायण राणे ने तीन जनवरी, 2022 को लोकसभा में एक प्रश्न के उत्तर में साझा की। लेकिन सीमित दायरे के कारण यह रपट एमएसएमई क्षेत्र की पूरी तस्वीर पेश नहीं करती कि कितनी इकाइयां बीमार हैं या कितनी बंद हो गईं।
बीमार एमएसएमई इकाइयों की संख्या अंतिम बार 2017 में बताई गई थी। एमएसएमई राज्य मंत्री हरिभाई पार्थीभाई चौधरी ने 11 अप्रैल, 2017 को लोकसभा में एक प्रश्न के लिखित उत्तर में कहा था कि पिछले चार वर्षों में बीमार एमएसएमई इकाइयों की संख्या दोगुनी हो गई। जवाब में आरबीआइ के आंकड़े के हवाले से कहा गया था कि वित्त वर्ष 2012-13 के दौरान बीमार एमएसएमई इकाइयों की संख्या दो लाख बाइस हजार दो सौ चार थी, जो 2015-16 के दौरान बढ़ कर चार लाख छियासी हजार दो सौ इक्यानवे हो गई। ध्यान रहे, यह आंकड़ा नोटबंदी से पहले का है। एमएसएमई इकाइयां ज्यादातर नकदी में कारोबार करती हैं, लिहाजा आठ नवंबर, 2016 को लागू हुई नोटबंदी से यह क्षेत्र बुरी तरह प्रभावित हुआ था। लेकिन प्रभाव का कोई प्रामाणिक आंकड़ा उपलब्ध नहीं हो पाया। सरकार ने कोई आंकड़ा दिया नहीं, निजी एजेंसियों के आंकड़े को वह खारिज करती रही है। इसका एक अर्थ यह है कि एमएसएमई क्षेत्र की बीमारी को लेकर नीति-नियंता गंभीर नहीं थे। अब जब आंकड़े जुटाने की कवायद शुरू हुई है तो गंभीरता की बात समझ में आती है, और थोड़ी उम्मीद भी जगी है।
फिलहाल, एमएसएमई क्षेत्र की बीमारी का अंदाजा एनपीए के आकार से लगाया जा सकता है। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) के आंकड़े बताते हैं कि एमएसएमई क्षेत्र का एनपीए वित्त वर्ष 2021 में बढ़ कर एक लाख अट्ठाइस हजार पांच सौ दो करोड़ रुपए हो गया, जो इसके पहले के वित्त वर्ष में एक लाख आठ हजार सात सौ चार करोड़ रुपए था। जबकि इसी अवधि के दौरान बैंकों का कुल एनपीए 7.1 फीसद नीचे आया और यह सात लाख अस्सी हजार पिच्चासी करोड़ रुपए हो गया है। बीमार इकाई उसे कहते हैं, जिसकी उधारी का खाता तीन महीने या इससे अधिक समय से एनपीए हो, या उसका नुकसान कुल पूंजी का पचास फीसद या उससे अधिक हो चुका हो।
सरकार ने बगैर किसी आंकड़े के ही बीमार एमएसएमई के इलाज के लिए महामारी के बीच मई 2020 में इमरजेंसी क्रेडिट लाइन गारंटी स्कीम (ईसीएलजीएस) जैसे उपाय किए। भारतीय स्टेट बैंक (एसबीआइ) की छह जनवरी, 2022 को आई एक शोध रपट के अनुसार, ईसीएलजीएस के जरिए लगभग 13.5 लाख एमएसएमई खाते बचाए गए, जिनमें से 93.7 फीसद सूक्ष्म और लघु इकाइयों (एमएसई) के थे। परिणामस्वरूप एक लाख अस्सी हजार करोड़ रुपए मूल्य का कर्ज एनपीए होने से बच गया। रपट में यह भी कहा गया है कि यदि ये खाते एनपीए हो जाते तो डेढ़ करोड़ श्रमिक बेरोजगार हो जाते। उल्लेखनीय है कि ईसीएलजीएस का लाभ पंजीकृत एमएसएमई ही ले पाते हैं, जबकि छह करोड़ तीस लाख एमएसएमई में से नब्बे फीसद से अधिक पंजीकृत नहीं हैं। अब इन गैर पंजीकृत इकाइयों में कितने बेरोजगार हुए होंगे, अंदाजा लगा लीजिए। आरबीआइ का ही दिसंबर 2021 का एक आंकड़ा कहता है कि सितंबर, अक्तूबर और नवंबर में एमएसएमई की बैंक ऋण वृद्धि दर नकारात्मक रही, जो क्रमश: -2.2 फीसद, -0.5 फीसद और -2.6 फीसद दर्ज की गई थी। यानी उद्यमों ने कर्ज लिया ही नहीं।
तमाम एमएसएमई इकाइयां अभी भी लाभ नहीं कमा पा रही हैं। ऐसे में इस क्षेत्र को नए बजट से उम्मीद थी कि उन्हें कारोबार चलाने में मदद के लिए कोई सीधा लाभ दिया जाएगा। लेकिन एक बार फिर उन्हें उधारी की उम्मीद पकड़ा दी गई। ईसीएलजीएस की मियाद मार्च 2023 तक बढ़ा दी गई और गारंटी कवर की सीमा साढ़े चार लाख करोड़ रुपए से बढ़ा कर पांच लाख करोड़ रुपए कर दी गई। इसमें पचास हजार करोड़ रुपए आतिथ्य क्षेत्र और संबंधित उद्यमों के लिए है। सीजीटीएमएसई (सूक्ष्म एवं लघु उद्यम क्रेडिट गारंटी ट्रस्ट) योजना में आवश्यक धनराशि डाल कर उसे मजबूत करने की घोषणा की गई और कहा गया कि इस योजना के तहत एमएसई के लिए दो लाख करोड़ रुपए की अतिरिक्त ऋण सुविधा उपलब्ध होगी। योजना का लाभ वे एसएमई ले पाएंगे, जो ईसीएलजीएस के तहत ऋण के पात्र नहीं हैं। ईसीएलजीएस के तहत वही उद्यम कर्ज ले पाते हैं, जिनके ऊपर पहले का कोई कर्ज बकाया हो।
बजट में एमएसएमई की लागत घटाने के उपाय किए गए हैं। कच्चे माल पर सीमा शुल्क में छूट दी गई है या उसे घटाया गया है। वहीं, तैयार वस्तुओं पर सीमा शुल्क बढ़ा दिया गया है। जैसे इस्पात स्क्रैप पर पिछले साल सीमा शुल्क में दी गई छूट एक साल के लिए बढ़ा दी गई है, जबकि छातों पर सीमा शुल्क बढ़ा कर बीस फीसद कर दिया गया है और इसके कल-पुर्जे पर सीमा शुल्क छूट वापस ले ली गई है। लागत घटाने के ही उद्देश्य से एमएसएमई उत्पादों की सरकारी खरीद में लगने वाले बैंक गारंटी के विकल्प स्वरूप जमानती बांड स्वीकारने की सुविधा दी गई है।
बजट में सिर्फ आरएएमपी कार्यक्रम को छोड़ दिया जाए, तो बाकी घोषित सभी पहलें पहले से ही चल रही हैं, जिन्हें विस्तार भर किया गया है। प्रश्न उठता है कि जब ये पहलें अभी तक एमएसएमई क्षेत्र के लिए कुछ खास कर नहीं पाईं तो आगे की उम्मीद का आधार क्या है? आखिर दिक्कत कहां है? दरअसल, उठाए गए सभी कदम संगठित या पंजीकृत एमएसएमई पर केंद्रित हैं। ऐसी इकाइयों को इनसे लाभ भी हुआ है, आगे भी हो सकता है। लेकिन पंजीकृत इकाइयां हैं कितनी? दस फीसद से भी कम। फिर नब्बे फीसद का क्या होगा? जबकि इन्हीं नब्बे फीसद को मदद की सबसे अधिक जरूरत है। एमएसएमई मंत्रालय के आंकड़े के अनुसार, देश में लगभग छह करोड़ तीस लाख एमएसएमई में से मात्र सत्तावन लाख सड़सठ हजार सात सौ चौंतीस ही उद्यम पोर्टल पर पंजीकृत हैं। यदि गैर पंजीकृत उद्यमों की मदद नहीं की गई तो यह क्षेत्र कैसे बचेगा? फिर रोजगार कहां मिलेगा? देश की जीडीपी में लगभग उनतीस फीसद योगदान करने वाले, लगभग ग्यारह करोड़ लोगों को रोजगार देने वाले एमएसएमई क्षेत्र की यह हालत देश की अर्थव्यवस्था के लिए अपशकुन है।
Date:09-02-22
बेवजह का विवाद अवधेश कुमार
पिछले कुछ समय में केंद्र और राज्यों के बीच एक ऐसे महत्त्वपूर्ण मामले पर विवाद बना हुआ है जो सामान्य तौर पर नहीं होना चाहिए। यह विषय है, अखिल भारतीय सेवाएं यानी भारतीय प्रशासनिक सेवा या आईएएस, भारतीय पुलिस सेवा या आईपीएस और आईएफएस या भारतीय वन सेवा के अधिकारियों के केंद्र में प्रतिनियुक्ति। केंद्र सरकार ने हाल में अधिकारियों की प्रतिनियुक्ति के नियमों में कुछ बदलाव प्रस्तावित किए थे, जिसे लेकर कई राज्य आगबबूला हैं और इसे राज्यों के अधिकार का हनन मान रहे हैं। अनेक लोगों ने इस महत्त्वपूर्ण विषय को गहराई से समझें बिना टिप्पणियां करनी शुरू कर दी।
देश को यह पता होना चाहिए कि इस समय केंद्र सरकार अपने लिए अधिकारियों की कमी से जूझ रही है। हाल में प्राप्त आंकड़ों के अनुसार आईएएस श्रेणी के इस समय कुल 223 अधिकारी प्रतिनियुक्ति पर हैं। सन 2011 में इनकी संख्या 309 थी। इस तरह एक दशक में 83 अधिकारियों की कमी हुई है। यह बहुत बड़ी संख्या है। बताया गया है कि आंकड़ा 25 प्रतिशत से घटकर 18 प्रतिशत रह गया है। पुलिस सेवा में भी भारी संख्या में पद रिक्त हैं। वास्तव में केंद्रीय पुलिस संगठनों में अधिकारियों की कमी हो गई है। उदाहरण के लिए सीमा सुरक्षा बल यानी बीएसएफ में डीआईजी स्तर पर भारतीय पुलिस सेवा के 26 पद स्वीकृत हैं, जिनमें से 24 खाली है। कल्पना कर सकते हैं क्या स्थिति होगी? सीआरपीएफ यानी केंद्रीय रिजर्व पुलिस में भी डीआईजी के 38 में से 36 पद खाली पड़े हैं। चाहे सीबीआई हो आईबी सभी केंद्रीय पुलिस संगठनों में यही स्थिति है। तो क्या यह संपूर्ण देश के लिए चिंता का विषय नहीं होना चाहिए?
वस्तुत: प्रत्येक राज्य में एक केंद्रीय प्रतिनियुक्ति रिजर्व होता है। उच्च पदों का यह 40 प्रतिशत है। इसी निर्धारित प्रतिशत से अधिकारी केंद्र में काम करने के लिए जाते हैं। परंपरा के अनुसार केंद्र सरकार हर वर्ष ऐसे अधिकारियों की सूची मंगाता है जो केंद्र में आने की चाहत रखते हैं। बहुत सारे अधिकारी स्वयं भी केंद्र में जाना चाहते हैं और वो नियमानुसार राज्यों को अपनी इच्छा से अवगत कराते हैं, जो सूची केंद्र के पास पहुंचती है; उनमें से आवश्यकता अनुसार वे चयन करते हैं। पिछले कुछ वर्षो में राज्यों की ओर से इस सूची में काफी कमी की गई है और समस्या का यही कारण है। एक आंकड़ा उप सचिव और निदेशक स्तर के अधिकारियों का है। इस समय उनकी संख्या 1130 है। 2014 में इनकी संख्या 621 थी, लेकिन प्रतिनियुक्ति पर आए अधिकारियों की संख्या केवल 114 है, जबकि 2014 में 117 था। भारतीय पुलिस सेवा यानी आईपीएस के बारे में बताया गया है कि कुल स्वीकृत पद 4984 है। इस समय 4074 अधिकारी उपलब्ध हैं। इनमें से केवल 442 अधिकारी प्रतिनियुक्ति पर हैं जबकि नियमानुसार इनकी संख्या 1075 होनी चाहिए। इस तरह देखें तो आईपीएस में 633 अधिकारी कम है। राज्यों द्वारा की गई कटौतियों को देखें तो पश्चिम बंगाल ने 16 प्रतिशत, हरियाणा ने 16.13 प्रतिशत, तेलंगाना ने 20 प्रतिशत और कर्नाटक कर्नाटक 21.7 प्रतिशत अधिकारियों की कटौती कर दी है। अगर कटौती इतनी बड़ी संख्या में होगी तो इसका असर पड़ेगा। ऐसे में केंद्र के पास चारा क्या है?
केंद्र के पास रास्ता यही होता है कि वह राज्यों से सूची बार-बार मांगे। सूची न आने पर कुछ अधिकारियों का नाम अपनी ओर से भेजे ताकि राज्य उन्हें प्रतिनियुक्ति के लिए मुक्त कर सकें। राज्य इसके लिए तैयार नहीं हो तो फिर केंद्र के पास नियम बदलने के अलावा दूसरा चारा नहीं बचता। सच यह है कि केंद्र की ओर से राज्यों को बार-बार लिखा गया, लेकिन कई राज्य अधिकारियों को मुक्त करने के लिए तैयार नहीं है। वास्तव में अनेक अधिकारी केंद्र में जाने के इच्छुक हैं, लेकिन राज्य सरकारें उन्हें मुक्त करने के लिए तैयार नहीं। इससे टकराव की स्थिति पैदा हो गई है। 11 राज्यों ने केंद्र सरकार के ताजा प्रस्ताव (अधिकारियों को बुलाने का) का त्वरित विरोध करते हुए कहा कि यह संघीय ढांचे पर प्रहार है। ध्यान रखने की बात है कि इस पत्र में यह भी कहा गया था कि कितने अधिकारियों को केंद्र में प्रतिनियुक्ति पर जाना है इस बारे में भारत सरकार राज्य सरकारों से सलाह करने के बाद ही निर्णय करेगी।
यह सोचने वाली बात है कि जब प्रतिनियुक्ति पर जाने वाले अधिकारियों की सूची छोटी कर दी जाएगी तो केंद्र को नियम में बदलाव करना पड़ेगा और वह यही हो सकता है कि आप निश्चित समय सीमा में जो स्वीकृत पद हैं उसके लिए अधिकारियों को मुक्त करें। हां, इस पर सलाह-मशविरा हो सकता है। राज्य सहमत नहीं हो रहे हैं। 20 दिसम्बर 2021 के बाद 12 जनवरी और 17 जनवरी को केंद्र की ओर से दो अलग-अलग पत्र लिखे गए। 12 जनवरी का पत्र थोड़ा ज्यादा मुखर था। इसमें लिखा गया कि कुछ विशेष परिस्थितियों में केंद्र अगर राज्यों से किसी विशेष अधिकारी की जरूरत बताता है तो राज्यों को उस अधिकारी को उपलब्ध कराना होगा। इसका विरोध ज्यादा हुआ है। यह विचित्र स्थिति है कि केंद्र सरकार को अपने ही देश में अपने लिए आवश्यकतानुसार अधिकारियों को लेने में समस्या हो रही है। यह ऐसा विषय है जो सामान्य तौर पर एक सहज स्वाभाविक चक्र के अनुसार जारी रहना चाहिए था। स्थापित नियम और परंपराएं हैं। देश केंद्र और राज्य दोनों के संतुलन से चलता है। यह संतुलन हर विषय में होना चाहिए। रास्ता यही है कि राज्य सरकारें नियमों के तहत अधिकारियों की जो संख्या निर्धारित है उन्हें केंद्र को उनकी आवश्यकता के अनुसार उपलब्ध कराना चाहिए।
दुर्भाग्य से राज्य ऐसा नहीं कर रहे हैं, जबकि रास्ता यही है। बहुत सारे अधिकारी भी एक बार राज्य में स्थापित हो जाने या कुछ राजनीतिक नेतृत्व से संबंध बन जाने के कारण बाहर जाना नहीं चाहते। यह भी गलत है। उनकी नियुक्ति अखिल भारतीय सेवा के लिए हुई है और सेवा देने के पीछे उनके अंदर यही भावना होनी चाहिए। वस्तुत: इस विषय पर टकराव और विवाद जितनी जल्दी खत्म हो उतना ही अच्छा होगा। किसी अधिकारी को लेकर समस्या हो तो केंद्र राज्य बैठकर उसका रास्ता निकालें। यह प्रशासनिक आवश्यकता व दक्षता का मामला है जो सीधे-सीधे जनता के हितों से जुड़ा है।
Date:09-02-22
आत्मनिर्भरता की तरफ बढ़ते कदम अभिषेक कृष्ण दुबे, ( लेखक भाजयुमो की राष्ट्रीय कार्यकारिणी के सदस्य हैं )
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के कुशल दिशा-निर्देश और दूरगामी नीतियों का ही परिणाम है कि दो वर्ष कोविड महामारी से जूझने के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था दुनिया में सबसे तेज गति से विकास करने वाली अर्थव्यवस्था बनी हुई है। आगे भी विकास की रफ्तार ऐसी ही बनी रहे, यह बजट सौ वर्ष की सबसे भयंकर आपदा के बीच विकास के नये विश्वास की लकीर खींचता है। मोदी सरकार का यह बजट न सिर्फ विकास की दूरगामी सोच को परिलक्षित करता है अपितु अर्थव्यवस्था को मजबूती देने के साथ ही आम जनता के लिए अनेक अवसर पैदा करने वाला है।
सही मायनों में देखें तो बजट तत्कालीन आवश्यकताओं का भी समाधान करता है और देश के युवाओं के उज्ज्वल भविष्य को भी सुनिश्चित करता है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में आधुनिकता व टेक्नोलॉजी की अनिवार्यता को पूरा करने का प्रयास वित्त मंत्री ने इस बजट में किया है। किसान ड्रोन, वंदेभारत ट्रेन, डिजिटल करेंसी, डिजिटल बैंकिंग इकाइयां या फिर 5जी सेवाओं की शुरुआत, अंतत: सबका लाभ देश के युवा, मध्यम वर्ग और समाज के निचले तबके में रहने वाले वंचित लोगों को मिलेगा। सामाजिक विकास की दिशा में आगे बढ़ते हुए सरकार ने गरीब कल्याण पर बजट में पूरा जोर दिया है। इस बजट ने गरीबों की आवास की आवश्यकता को पूरा करने की दिशा में मजबूत कदम उठाया है। केवल घर ही नहीं, बल्कि प्रधानमंत्री की सोच के मुताबिक प्रत्येक गरीब को शुद्ध पेयजल की पूर्ति नल से हो, उसके पास शौचालय हो, गैस की सुविधा हो, इन सभी मूल आवश्यकताओं पर बजट में विशेष ध्यान दिया गया है। बजट में मुख्यत: बड़ा जोर इंफ्रास्ट्रक्चर पर है। गतिशक्ति मिशन के तहत बुनियादी ढांचे के विकास पर जोर दिया गया है। भारतीय जनता पार्टी की सरकारों का हमेशा इंफ्रास्ट्रक्चर पर फोकस रहा है। इस बार भी वित्त मंत्री ने सड़क, रेल, एयरपोर्ट, शिपिंग, बंदरगाह जैसे सात क्षेत्रों के विकास पर जोर दिया है। इसीलिए वित्त मंत्री ने पीएम गतिशक्ति को सरकार की प्राथमिकता बताया है। इस संदर्भ में बजट के प्रावधानों से स्पष्ट है कि सरकार अब इसमें निजी क्षेत्र की और भागीदारी बढ़ाना चाहती है। अर्थव्यवस्था की आधुनिक सोच के लिहाज से यह सही भी है कि सरकार को बिजनेस करने में नहीं उसे रेगुलेट करने तक सीमित रहना चाहिए। सरकार की इस सोच को वित्त मंत्री ने इस बार के बजट में भी आगे बढ़ाया है। यही नहीं सरकार ने अपने बजट में पहाड़ी क्षेत्रों के विकास पर भी जोर दिया है। बजटीय घोषणाओं में इस बात पर पूरा ध्यान दिया गया है कि हिमालय के समस्त क्षेत्र में जीवन आसान बने और वहां से लोगों का पलायन रु के। हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर और पूर्वोत्तर भारत जैसे क्षेत्रों के लिए पहली बार देश में ‘पर्वतमाला योजना’ शुरू करने का ऐलान बजट में किया गया है। यह योजना पहाड़ों पर परिवहन और कनेक्टिविटी की आधुनिक व्यवस्था का निर्माण करेगी। यही नहीं बजट में मां गंगा की सफाई के साथ-साथ किसानों के कल्याण के लिए एक महत्त्वपूर्ण कदम उठाया गया है। उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, पश्चिम बंगाल, इन राज्यों में गंगा किनारे, नैचुरल फॉर्मिंग को प्रोत्साहन दिया जाएगा। इससे गंगा की सफाई का जो अभियान है, उसमें गंगा को केमिकल मुक्त करने में भी बहुत बड़ी मदद मिलेगी। इस बार के बजट में कृषि को हाइटेक बनाने के साथ-साथ प्राकृतिक खेती पर भी फोकस है। बजट के प्रावधान यह सुनिश्चित करते हैं कि किसानी लाभप्रद हो, किसानों को नये अवसर मिलें। बजट में प्रस्तावित नये एग्रीकल्चर स्टार्टअप्स को प्रोत्साहन देने के लिए विशेष फंड और फूड प्रोसेसिंग उद्योग के लिए नया पैकेज जैसे प्रस्तावों से किसानों की आय बढ़ाने में बहुत मदद मिलेगी। इतना ही नहीं किसान आंदोलन में मुद्दा बने एमएसपी के लिए वित्तमंत्री ने किसानों के खाते में सवा दो लाख करोड़ रु पये से भी ज्यादा की राशि सीधे ट्रांसफर करने का प्रावधान किया है। साथ ही फर्टिलाइजर सब्सिडी को 79 हजार करोड़ से बढ़ाकर सीधा 1 लाख 5 हजार करोड़ रुपये किया गया है।
केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह के नेतृत्व में केंद्र में अलग से सहकारी मंत्रालय बनने का ही नतीजा है कि इस बार बजट में सहकारी क्षेत्र को टैक्स में राहत मिल गई है। अभी तक सहकारी समितियों को 18 प्रतिशत वैकल्पिक कर जमा करना होता था, जबकि निजी कंपनियों के लिए इस कर की दर 15 प्रतिशत थी। इस बार के बजट में सरकार ने सहकारी क्षेत्र को निजी कंपनियों के बराबर ला दिया है। सहकारी समितियों को सरचार्ज के रूप में भी अब 12 प्रतिशत की बजाये केवल सात प्रतिशत सरचार्ज का भुगतान करना होगा। छोटे और मझोले उद्योग देश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ हैं। कोरोना काल में छोटे उद्योगों की मदद और उनकी सुरक्षा के लिए देश ने बीते दो वर्ष में कई निर्णय लिये हैं। कई तरह से इन उद्योगों को मदद पहुंचाई गई है। इस बजट में भी क्रेडिट गारंटी में रिकॉर्ड वृद्धि के साथ ही कई अन्य योजनाओं का ऐलान किया गया है। रक्षा क्षेत्र में खरीद का 68 प्रतिशत घरेलू उद्योगों के लिए आरक्षित करने का लाभ भी इन छोटे उद्योगों को मिलेगा। यह आत्मनिर्भरता की तरफ बहुत बड़ा मजबूत कदम है। यह बजट भारत को ‘आत्मनिर्भर’ बनाने के साथ ही स्वतंत्रता के 100वें वर्ष के नये भारत की नींव डालेगा।
Date:09-02-22
देश विविधताओं से भरा, फिर कॉलेजों में विविधता क्यों नहीं गौतम भाटिया, ( अधिवक्ता, सुप्रीम कोर्ट )
बीती 5 फरवरी को कर्नाटक सरकार ने एक आदेश जारी किया, जिसमें कहा गया कि कॉलेज विद्यार्थियों को अनिवार्य रूप से वही पोशाक पहननी होगी, जिसे कॉलेज प्रशासनिक बोर्ड तय करेगा, और जहां ऐसी कोई यूनिफॉर्म निर्धारित नहीं हो पाती है, वहां वे कपडे़ नहीं पहने जा सकते, जिनसे ‘समानता, अखंडता और कानून-व्यवस्था के भंग होने’ का खतरा हो। यह आदेश विभिन्न कॉलेजों में घटी उन घटनाओं के संदर्भ में आया है, जिनमें हिजाब पहनने वाली छात्राओं को कॉलेज परिसर में प्रवेश करने से रोक दिया गया था। इन घटनाओं के बाद कुछ लोगों का तर्क था कि हिजाब पहनना इस्लामी रवायत का एक जरूरी हिस्सा है, और इसकी मनाही संविधान से मिले ‘धार्मिक स्वतंत्रता’ संबंधी अधिकार का हनन है। तो, कॉलेज प्रशासन के फैसले के समर्थकों की दलील आई कि कॉलेज परिसरों को धर्म के किसी तरह के सार्वजनिक प्रदर्शन से मुक्त रखना चाहिए। इस तर्क को बल तब मिला, जब कई कॉलेजों में हिजाब की प्रतिक्रिया में कुछ हिंदू छात्रों ने भगवा गमछा पहनना शुरू कर दिया।
हालांकि, हिजाब और मजहब के दायरे में इस पूरे मसले को देखने वाले एक अहम बात को नजरंदाज कर रहे हैं, और वह बात है राज्य की ताकत; एक सार्वजनिक संस्कृति, और सार्वजनिक जीवन में स्वीकार्य पदानुक्रमिक समान विचार थोपने की राज्य व राज्य स्तरीय संस्थानों की ताकत। इसे अधिक ठोस रूप से कहें, तो यह सार्वजनिक जगहों पर वयस्कों (कुछ छात्र 18 से 20 साल के भी होते हैं) पर ‘ड्रेस कोड’ थोपने की राज्य संस्थानों की शक्ति का मसला है। हालांकि, मैं यहां स्पष्ट कर दूं कि मैं सार्वजनिक जगहों पर ‘सब कुछ’ की मंजूरी की कतई वकालत नहीं करने जा रहा। मसलन, राज्य के संस्थानों को यह अधिकार होना ही चाहिए कि वे ऐसे कपड़ों पर रोक लगाएं, जिन पर अशालीन या भड़काऊ नारे छपे हों, या जो शैक्षणिक संस्थान के लक्ष्यों से मेल नहीं खाते।
यहां सबसे अहम बात यह है कि हिजाब की एक सामाजिक प्रतीक के तौर पर कहीं भी व्याख्या नहीं की गई है। कुछ मामलों में निश्चय ही यह धार्मिक दबदबे की अभिव्यक्ति है, और खुद चुनने से अधिक जबर्दस्ती थोपा गया प्रतीत होता है। मगर यह कहना कि हरेक औरत जबर्दस्ती हिजाब पहनती है या उनका ‘ब्रेनवाश’ किया गया है, पूरी मुस्लिम स्त्री-बिरादरी के वजूद को नकारना होगा। हिजाब पहनने के कई जटिल (और परस्पर विरोधी) कारण मौजूद हैं, जैसे- मुश्किल वक्त में अपनी पहचान छिपाने के लिए, परंपरा आदि। यकीनन, कुछ कारण मजहब से जुडे़ होंगे, लेकिन कुछ का धर्म से कोई लेना-देना नहीं है। लिहाजा, राज्य के लिए व्यक्तिगत स्तर पर यह सुनिश्चित करना कि वास्तव में असंभव है कि कोई किस वजह से हिजाब पहनता है?
यह तर्क हमें मूल मुद्दे पर वापस लाता है। यानी, हिजाब भेदभाव, असमानता या हिंसा का पोषण नहीं करता, जिसके आधार पर राज्य और उसके संस्थान किसी पोशाक को प्रतिबंधित करते हैं। एक तर्क यह भी सुनने में आता है कि शैक्षणिक संस्थानों में एक सीमा तक समानता की दरकार है। हालांकि, इस तर्क में भी कोई दम नहीं है, क्योंकि क्या यह उचित नहीं है कि हमारे शिक्षण संस्थान भी भारत की विविधता, बहुलता और विभिन्नता को प्रतिबिंबित करें, बजाय इसके कि इनको एकरूप बनाकर भारत के नैसर्गिक गुण को खंडित किया जाए? हमें तो अपने दैनिक जीवन में भी उन लोगों के साथ की दरकार होती है, जो हमसे दिखने में भिन्न होते हैं, अलग कपडे़ पहनते हैं और अलग जायके का खाना खाते हैं। तो फिर शिक्षण संस्थानों में यह विविधता बंद क्यों होनी चाहिए?
इन्हीं कारणों से कॉलेजों में हिजाब पर प्रतिबंध के बाद यह सवाल पूछा जा रहा है कि परिधान जैसे नितांत निजी मामलों में राज्य लोगों पर अपनी कितनी ताकत का प्रयोग कर सकता है? हमारा संविधान ऐसे व्यक्तिगत मामलों में सभी को ‘स्वतंत्रता’ की गारंटी देता है, जब तक कि इस आजादी से सामाजिक स्तर पर कोई बड़ा नुकसान न हो या सामाजिक भेदभाव को बढ़ावा न मिले। हिजाब के मामले में हमें ऐसा कोई नुकसान होता नहीं दिखता। इसीलिए, कानून की कसौटी पर ऐसे प्रतिबंध खरा नहीं उतरते।
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बैंकरों का डर को दूर करने के लिए बनाया गया बैड बैंक, अब स्वयं ही समस्याओं के जाल में घिर गया है।
कुछ मुख्य बिंदु –
समस्या का कारण जुडवां कंपनी का सेटअप है। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के साथ एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी लिमिटेड या आम तौर पर जिसे एआरसी कहा जाता है, का मेल करके केंद्र सरकार ने बैड बैंक की रचना की। इसके साथ ही इंडिया डेट रिसॉल्युशन कंपनी लिमिटेड को भागीदार बनाया गया, जिसका काम स्ट्रेस्ड एसेट या तनावग्रस्त सम्पत्तियों को बाजार में बेचना था।
ऐसा माना जाता है कि बैड बैंक की इस रचना में आरबीआई के साथ पर्याप्त परामर्श नहीं किया गया था। अब सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक चाहते हैं कि बैड बैंक में संलग्न निजी कंपनी को आरबीआई विनियमित करे, जिससे ऋण समाधान मामलों में सीबीआई जैसी जांच एजेंसियां सवाल न उठाएं। लेकिन कानून एक निजी कंपनी के विनियमन के लिए आरबीआई को अनुमति नहीं देता है।
आरबीआई चाहता है कि उसने जिस एआरसी को बैड बैंक के लिए लाइसेंस दिया था, वह एन पी ए या गैर निष्पादित संपत्ति के अधिग्रहण की पूरी जिम्मेदारी ले।
इस पूरी समस्या से निपटने के लिए वित्त मंत्रालय को प्रमुख हितधारकों के साथ चर्चा करनी चाहिए। आरबीआई और बैंको को स्वीकार्य हो, ऐसा बैड बैंक बनाया जाना चाहिए।
‘द इकॉनॉमिक टाइम्स’ में प्रकाशित संपादकीय पर आधारित। 20 जनवरी, 2022
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Date:08-02-22
End Nativism Haryana’s, & other states’, job quotas for locals violate fundamental rights. Courts must say so TOI Editorials
This week the Supreme Court is expected to begin hearing a case that will test the constitutionality of Haryana’s new law that reserves 75% of private sector jobs for locals, subject to a monthly salary cap of Rs 30,000. Haryana is not alone in an attempt to promote nativism by making it mandatory for private sector entities to reserve jobs for locals. Andhra Pradesh’s assembly passed a similar law and last year Jharkhand’s assembly followed suit. Punjab is set to replicate Haryana’s approach with this idea catching on as one of the many election promises.
Other than the legal premise underpinning domicile reservation, Haryana’s law has other alarming features. Its scope covers not just corporations but also trusts, societies and partnerships. Moreover, a “designated officer” is empowered to interpret matters in a way that is straight out of India’s discredited licence-permit-quota raj playbook. There are serious flaws in this law and similar ones passed by other states. Domicilebased reservation in the private sector violates fundamental rights of citizens from other states. There is no legal case for it. From an economic standpoint, domicile-based reservation wholly undermines the spirit of other laws that seek to create a common market in India.
Labour mobility is as essential as that of goods and services. Employers need the right to choose their workforce. It’s an integral part of creating a competitive economic environment. GoI’s schemes such as production-linked incentives (PLI) to promote manufacturing through private investments are incompatible with attempts by states to erect barriers to labour mobility. It’s one reason why GoI’s solicitor general arguing Haryana’s case made for poor optics. It’s GoI’s duty to push back against nativism and attempts to erect barriers to labour mobility. However, when the solicitor general argues Haryana’s case, it will only encourage would-be nativists.
Given the controversy that governors often generate, it’s inexplicable why some of them give their assent to legislations that violate fundamental rights. The apex court should resolve this matter soon by upholding fundamental rights. India’s path to economic prosperity depends on giving the private sector the space to make appropriate choices. And migration is what runs the labour market and keeps wages competitive. Nativism, therefore, is against both labour and capital – just what an economy recovering from the pandemic doesn’t need. Therefore, Haryana’s misguided attempt must be rejected. States need to work with industry on programmes that impart skills and make local youth more employable. In that way, everyone will gain.
Date:08-02-22
Don’t Get Spooked By Our Own Cultures ET Editorials
The issue of a government pre-university college in Udupi, Karnataka, suddenly barring six students entry into classrooms last week because they wore the hijab is an unnecessary complication. By invoking Section 133(2) of the Karnataka Education Act, 1983 — enforcing compliance of rules in state educational institutions, adherence to uniform, in this case — the authorities have fuelled a controversy that had no spark to start with. As if on cue, a section of students has staged a protest — and approached the court — while a saffron scarves-wearing ‘counter-protest’ has come out of the woodwork. This must be nipped in the bud.
India is not, say, France, where not only is the idea of secularism based on the constitutional principle of ‘laïcité’ by which all religious symbols and practices are kept outside public affairs, but where the hijab also remains a symbol of the ‘outsider’. In India, secularism is constitutionally based on equal treatment of all religions under Article 25 (1), which the Karnataka government insists it has not violated. Legally, it stands on weak ground — a 2017 Kerala High Court verdict and a 2018 Bombay High Court judgment allowed candidates and a student to wear the headscarf while appearing for an entrance exam and attending lectures, respectively. What is ironic is that being concerned about the hijab — as attire that, according to the Karnataka government, ‘disturb[s] equality, integrity and public law and order’ — is more of a ‘western problem’ where hijabs, turbans and caste marks are somehow seen as threatening the social fabric.
One hopes the Karnataka High Court scheduled to hear the matter today rescinds the ban. We are in secular India, which doesn’t need to be spooked by its own multicultures.
Date:08-02-22
सेवा क्षेत्र ही देगा रोजगार को सहारा भरत झुनझुनवाला, ( लेखक आर्थिक मामलों के जानकार हैं )
गत सप्ताह पेश बजट में कई सार्थक पहल की गई हैं। इनमें डिजिटल करेंसी पर बहुत चर्चा हुई है। यह स्वाभाविक भी है, क्योंकि दुनिया भर में मुद्रा के स्तर पर नए तकनीकी परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं। इसका ही एक स्वरूप डिजिटल मुद्रा है। पारंपरिक मुद्रा के लिए सरकार को नोट छापने पड़ते हैं। इसका खर्च देश पर पड़ता है। आपको नोट को अपनी जेब में रखना पड़ता है। नोट खराब भी हो जाते हैं। डिजिटल करेंसी में यह खर्च और जोखिम कम हो जाता है। जैसे नोट पर एक नंबर छपा होता है, उसी प्रकार डिजिटल करेंसी का एक नंबर रिजर्व बैंक बनाएगा। आप रिजर्व बैंक को भुगतान कर वह नंबर ले सकते हैं। वह नंबर रिजर्व बैंक के कंप्यूटर में दर्ज हो जाएगा कि इस नंबर की डिजिटल करेंसी अमुक व्यक्ति की है। जब वह व्यक्ति उसे किसी को हस्तांतरित करेगा तब रिजर्व बैंक का कंप्यूटर पुष्टि कर देगा कि डिजिटल करेंसी वास्तव में उस व्यक्ति की ही है। उसके बाद वह नंबर पाने वाले के खाते में चढ़ जाएगा। कागज बनाने, नोट छापने, गाड़ियों से देश भर में पहुंचाने और बैंक से वितरित करने आदि पर आने वाला खर्च भी घट जाएगा। हालांकि इससे अर्थव्यवस्था की मूल स्थिति में विशेष सुधार नहीं होगा, परंतु पारदर्शिता जरूर बढ़ेगी, क्योंकि इसे आसानी से ट्रैक किया जा सकता है।
पारंपरिक मुद्रा की जानकारी आरबीआइ के पास नहीं होती। जैसे रिजर्व बैंक यह जानना चाहे कि अमुक नंबर का नोट किस व्यक्ति के पास है तो उसका पता लगना मुश्किल है। वहीं डिजिटल करेंसी का नंबर कंप्यूटर में धारक के खाते में दर्ज हो जाएगा और यह पता लग सकेगा कि अभी इस नोट का मालिक कौन है? इससे भ्रष्टाचार पर रोक लगाने में मदद मिल सकती है। इनकम टैक्स विभाग चेक कर लेगा कि किसने कितनी रकम किसको दी? वैसे भ्रष्टाचार करने वाले इसका भी कोई तोड़ निकालने का प्रयास कर सकते हैं।
वित्त मंत्री ने बजट में मेक इन इंडिया को सहारा दिया है। केमिकल्स इत्यादि जिन वस्तुओं के उत्पादन की भारत में भरपूर क्षमता है, उन पर आयात कर बढ़ाए गए हैं। सरकार चाहती है कि जो माल हम बना सकते हैं, वह हम स्वयं बनाएं और उसका आयात न करें। रक्षा क्षेत्र में पिछले साल 58 प्रतिशत घरेलू खरीद थी, जिसे इस साल 68 प्रतिशत किया गया है। यह बहुत ही सकारात्मक संकेत है। उन कच्चे माल का आयात सरल किया गया है, जिससे देश में उत्पादन बढ़े। जैसे मोबाइल फोन बनाने में एक परेशानी कैमरा लेंस की आती है। अब इस लेंस का आयात सरल किया गया है ताकि हम मोबाइल फोन बना सकें। यह भी सकारात्मक कदम है। इन कदमों के बावजूद अर्थव्यवस्था के रफ्तार पकड़ने में संशय है। बाजार का चक्का घुमाने को दो तरह की नीति चाहिए होती है। एक डिमांड साइड पालिसी और दूसरी सप्लाई साइड पालिसी। इसे ऐसे समझिए कि आलू की बिक्री बढ़ाने के दो उपाय हैं। यदि उसकी मांग बढ़ जाए तो किसान ज्यादा आलू ले आएंगे, क्योंकि सब बिक जाएगा। यह डिमांड साइड पालिसी हुई। दूसरा उपाय यह कि आलू की सप्लाई बढ़ जाए और उसका दाम घट जाए तो जो खरीदार अभी तक आलू नहीं खरीद रहे थे, वे भी आलू खरीदने लगेंगे। इससे भी आलू बिक जाएगा। यह सप्लाई साइड पालिसी हुई। दोनों तरह से बाजार चल सकता है। अंतर यह है कि डिमांड साइड पालिसी में निश्चिंतता ज्यादा होती है। आलू की मांग होगी तो विक्रेता कहीं न कहीं से आलू ले ही आएगा, लेकिन सप्लाई साइड पालिसी में अनिश्चितता बनी रहती है। सप्लाई बढ़ गई और दाम घट गए तो जरूरी नहीं कि खरीदार आ ही जाएगा। ऐसे तमाम उदाहरण हैं। इसलिए डिमांड साइड पालिसी को अपनाना चाहिए, लेकिन सरकार उसी सप्लाई साइड पालिसी को लागू कर रही है, जो अनिश्चित रहती है।
सरकार छोटे उद्योगों के लिए कर्ज सस्ता कर रही है। उद्योगों को ‘प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव’ दिया गया है। इससे माल सस्ता हो गया, लेकिन बाजार में मांग ही नहीं है। इसलिए ऐसे कदम अपेक्षित सफलता नहीं दिला पाएंगे। जैसे आलू सस्ता हो गया, लेकिन खरीदार नहीं है तो सस्ता आलू किस काम का? हमारी आर्थिक वृद्धि दर कोविड से प्रभावित है और इसी कारण सरकार मांग नहीं पैदा कर पा रही है। आम आदमी के हाथ में क्रय शक्ति नहीं दे पा रही है। सरकार कह रही है कि लोगों की क्रय शक्ति कम है तो हम माल सस्ता कर देंगे। गरीब आदमी बोलता है कि मेरे पास पैसे नहीं है और जब आटा ही नहीं खरीद पा रहा हूं तो मैं कपड़े का क्या करूंगा? यह बजट की मौलिक कमी है। यह विषय रोजगार से भी जुड़ा है। यदि आपको बाजार में मांग पैदा करनी है तो आम आदमी को रोजगार देना होगा। उसे वेतन मिलेगा तो वह बाजार से कपड़ा खरीदेगा। बजट में रोजगार पैदा करने की ठोस नीति नहीं दिखती।
रोजगार पैदा करने के लिए सेवाओं के बाजार का विस्तार करना होगा। आने वाला समय इंटरनेट का है। युवाओं को अपनी उन कुशलता को बेचने का रास्ता सरल करना होगा, जिन्हें वे इंटरनेट के माध्यम से भुना सकें। अपने यहां गणित में बीएससी करने वाले लाखों युवा बेरोजगार हैं। पूरी दुनिया में गणित के अध्यापकों का अभाव है। यदि वे इंटरनेट के माध्यम से गणित पढ़ा सकें तो घर बैठे ही काम कर सकते हैं। इन्हें आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से भी खतरा नहीं है। टीचिंग में अध्यापक और विद्यार्थी का वन टू वन कनेक्शन होता है। हमारे तमाम एमबीए 15 से 20 हजार रुपये की नौकरी कर रहे हैं। वे टेलीमेडिसन बेच सकते हैं। गृहिणी अच्छा खाना बना लेती हैं तो वे र्कुंकग कोर्स दे सकती हैं। सरकार को इस दिशा में बुनियादी ढांचे को मजबूती देनी होगी, लेकिन बजट में बड़े उद्योगों के लिए लाभप्रद संरचना जैसे हाईवे और हवाई अड्डों पर जोर दिया गया है। इससे बाजार में मांग बढ़ना संभव नहीं दिखता और अर्थव्यवस्था की गति सपाट रह सकती है।
डिजिटल करेंसी और मेक इन इंडिया इस बजट का प्लस प्वाइंट है। रोजगार इस बजट का माइनस प्वाइंट है। सरकार को सोचना चाहिए कि 2014 से आज तक रोजगार के वादे किए जा रहे हैं। कोरोना के पहले भी और बाद में भी, लेकिन रोजगार की स्थिति संभल नहीं रही है। आंकड़े बता रहे हैं कि मैन्यूफैक्र्चंरग में रोजगार बढ़ने के बजाय घट रहे हैं। इसलिए आम आदमी के लिए उपयोगी सेवा क्षेत्र की बुनियादी संरचना को और मजबूत करना चाहिए।
Date:08-02-22
निजी रोजगार में आरक्षण संपादकीय
हरियाणा का वह विवादास्पद कानून अब सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष है जिसमें उसने प्रावधान किया है कि 30,000 रुपये से कम के मासिक वेतन वाले रोजगारों में से 75 प्रतिशत राज्य के मूल निवासियों के लिए आरक्षित रहेंगे। इस मामले में राज्य सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष अपील की है जो पंजाब और हरियाणा उच्च न्यायालय द्वारा 3 फरवरी को लगाए गए स्थगन आदेश के खिलाफ है। उच्च न्यायालय का स्थगन आदेश औद्योगिक समूहों की ओर से लगायी गयी रिट याचिकाओं पर आया है। महान्यायवादी तुषार मेहता ने सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष जल्द सुनवाई का आग्रह करते हुए कहा कि उच्च न्यायालय ने महज 90 सेकंड के भीतर निर्णय सुना दिया जबकि तब तक वह दो वाक्य भी नहीं बोल पाए थे। बहरहाल उच्चतम न्यायालय के समक्ष यह एक अहम मसला है कि क्या कोई राज्य मूल निवास के आधार पर निजी क्षेत्र में भी रोजगार को रोक सकता है।
यह सवाल केवल हरियाणा तक सीमित नहीं है बल्कि कई अन्य राज्य भी इससे जुड़े हुए हैं, ऐसे में सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय देश में लोगों को काम पर रखने के कानूनों के लिए काफी अहम होगा। यह सच है कि स्थानीय स्तर पर रोजगार आरक्षण संविधान के अनुच्छेद 16 का उल्लंघन करते हैं। इस अनुच्छेद में कहा गया है कि रोजगार के मामले में देश के नागरिकों के बीच धर्म, नस्ल, जाति, लिंग, वंश परंपरा, जन्म स्थान, निवास आदि के आधार पर भेद नहीं किया जा सकता। परंतु बीते कुछ वर्षों में कई राज्यों ने ऐसे कानून बनाए हैं। आंध्र प्रदेश, झारखंड और मध्य प्रदेश ने 70 से 75 फीसदी कोटा तय करने वाले कानून पारित किए हैं।
अहम बात यह है कि तेलंगाना जिसने अगस्त 2020 में निजी क्षेत्र के अद्र्धकुशल रोजगार में 80 फीसदी तथा कुशल रोजगारों में 60 फीसदी स्थानीय लोगों के लिए आरक्षित करने का कानून बनाया था, उसका हृदय परिवर्तन हो गया है। एक वर्ष बाद राज्य के सूचना प्रौद्योगिकी तथा उद्योग मंत्री के टी रामाराव ने विधानसभा को बताया कि राज्य सरकार रोजगार में आरक्षण के खिलाफ थी। उनकी दलील का संवैधानिक अधिकारों से लेनादेना कम था और निवेश खासकर सूचना प्रौद्योगिकी क्षेत्र में निवेश की दिक्कतों से ज्यादा। जैसा कि रामा राव ने कहा भी, एक प्रतिस्पर्धी विश्व में गूगल, एमेजॉन अथवा कोई भी निजी कंपनी ऐसे राज्य में निवेश नहीं करेगी जहां उसके रोजगार विकल्प स्थानीय लोगों तक सीमित हों। इसके बजाय राज्य स्थानीय युवाओं को बाजार मांग के अनुरूप कौशल सिखाने की नीति पर काम कर रहा है ताकि उन्हें निजी औद्योगिक नौकरियों में सरकार के कोटा के बिना भी रोजगार मिल सके।
तेलंगाना सरकार को बहुत जल्दी समझ में आ गया कि राजनीति से प्रेरित उपराष्ट्रवाद में कई दिक्कतें हैं। उसने इस मसले से निपटने के लिए जो हल निकाला है उससे अन्य सरकारों को भी मजबूत संदेश मिलना चाहिए। यह सही है कि हरियाणा के उप मुख्यमंत्री दुष्यंत चौटाला के नेतृत्व वाली जननायक जनता पार्टी इस कानून से राजनीतिक फायदा लेना चाहती थी और अब उसे बेरोजगारी की बड़ी समस्या का सामना करना पड़ सकता है क्योंकि राज्य का जीवंत स्टार्टअप और विनिर्माण क्षेत्र राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के अपेक्षाकृत अनुकूल पड़ोसी इलाकों दिल्ली और नोएडा में स्थानांतरित हो सकता है। हरियाणा में पहले ही बेरोजगारी बहुत ज्यादा है और ऐसा हुआ तो राज्य के लिए बहुत मुश्किल होगी। सर्वोच्च न्यायालय का निर्णय चीजों को स्पष्ट करेगा लेकिन यह भी अहम है कि राज्य भी इसे समझें कि भीषण बेरोजगारी के इस दौर में भारत ऐसी सूक्ष्म अति राष्ट्रीयता झेल नहीं पाएगा।
Date:08-02-22
दागी जनप्रतिनिधि संपादकीय
राजनीति के अपराधीकरण को लेकर लंबे समय से चिंता जताई जा रही है और इस फिक्र को सार्वजनिक करने में देश की लगभग सभी पार्टियां आगे रहना चाहती हैं। लेकिन क्या व्यवहार में यही राजनीतिक दल इस बात के लिए सचेतन प्रयास करते हैं कि आपराधिक तत्त्वों का राजनीति में और खासतौर पर विधायिका में प्रवेश न हो? इसके उलट पिछले कई दशक इस बात के गवाह रहे हैं कि राजनीति में अपराधियों के बढ़ते दबदबे को एक गंभीर समस्या बताए जाने के बावजूद लगातार वैसे लोग जनप्रतिनिधि के तौर पर संसद और विधानसभाओं में अपनी जगह बनाते रहे हैं, जिनका अतीत आपराधिक घटनाओं में संलिप्त होने का रहा है। सांसदों और विधायकों के खिलाफ मामलों के शीघ्र निपटारे और विशेष अदालतों के गठन के मामले में अदालत की सहायता के लिए नियुक्त न्याय मित्र ने बीते हफ्ते उच्चतम न्यायालय को बताया कि सांसदों और विधायकों के खिलाफ लंबित मामलों की संख्या दो साल में 4,122 से बढ़ कर 4,984 हो गई है। इनमें 1,899 मामले पांच वर्ष से ज्यादा पुराने हैं। रिपोर्ट के मुताबिक दिसंबर 2018 तक कुल लंबित मामले 4,110 थे और अक्तूबर 2020 में ये 4,859 थे।
इससे साफ पता चलता है कि इस प्रवृत्ति की रोकथाम के दावों के बरक्स आपराधिक पृष्ठभूमि वाले काफी लोग अब भी संसद और विधानसभाओं की सीटों पर कब्जा कर रहे हैं। आखिर क्या वजह है कि एक ओर सभी पार्टियां अपने प्रतिपक्षियों को इस बात के लिए कठघरे में खड़ा करती हैं कि उन्होंने आपराधिक अतीत या छवि वाले लोगों को टिकट देकर समस्या को जटिल बनाया है, जबकि अक्सर मौका मिलने पर ऐसा करने में वे खुद भी पीछे नहीं रहती हैं। यह बेवजह नहीं है कि आज संसद और विधानसभाओं में ऐसे लोग जनता के नुमाइंदे बन कर बैठे हैं, जिनके अपराधों से आम लोग कभी परेशान रहे होते हैं। हर अपराध के खिलाफ बढ़-चढ़ कर बोलने और अपराधियों पर लगाम लगाने का दावा करने वाली पार्टियां आखिर किन वजहों से ऐसा कर पाती हैं? क्या इसके पीछे एक बड़ा कारण यह नहीं है कि उन्हें न केवल आपराधिक छवि वाले लोगों से पार्टी का कोष मजबूत करने में मदद मिलती है, बल्कि उनके इलाके में भय पर आधारित समर्थन भी हासिल होता है? इसका एक मतलब यह भी हो सकता है कि राजनीतिक दल अपराधियों के प्रभाव वाले इलाकों में जनता के बीच अपने सिद्धांतों, विचारों के जरिए लोगों के बीच अपने लिए समर्थन हासिल करने में नाकाम होते हैं और इसलिए उन्हें वोट हासिल करने का यह आसान रास्ता दिखाई देता है।
सवाल है कि देश की नियति तय करने वाली राजनीतिक पार्टियों के ऐसे रुख की वजह से राजनीति के अपराधीकरण का जो खमियाजा आम जनता को उठाना पड़ता है, समूचे शासन का स्वरूप प्रभावित होता है, उसकी जिम्मेदारी किस पर आती है! मसले की जटिलता का अंदाजा इससे लगाया जा सकता है कि सार्वजनिक रूप से चिंता जताए जाने के साथ-साथ सांसदों-विधायकों के खिलाफ मामलों के निपटारे के लिए कुछ राज्यों में विशेष अदालतों के गठन किए जाने और कुछ अन्य राज्यों में संबद्ध क्षेत्राधिकार की अदालतों में सुनवाई के बावजूद दागी नुमाइंदों की तादाद संसद और विधानसभाओं में बढ़ी ही है। एक मुश्किल यह भी है कि ऐसे मामलों की सुनवाई करने वाली अदालतों के पास कई स्तरों पर कुछ बुनियादी सुविधाओं का अभाव है और इस बारे में अब तक केंद्र सरकार की ओर कोई ठोस पहल नहीं हुई है। जाहिर है, इस समस्या से निपटने के लिए अदालतों में तेजी से सुनवाई के साथ-साथ सिर्फ दिखावे के वादों और दावों के बरक्स सभी पार्टियों को अपने स्तर पर आपराधिक पृष्ठभूमि वाले लोगों को चुनावों में उम्मीदवार बनाने से बचना होगा।
Date:08-02-22
हिजाब पर हंगामा संपादकीय
कर्नाटक में कुछ छात्राओं के हिजाब पहनने को लेकर विवाद गंभीर होता जा रहा है। उडु़पी के एक जूनियर कालेज से शुरू हुए इस विवाद में राजनीति शुरू हो जाने से माहौल बिगड़ रहा है और इसके सांप्रदायिक रूप ले लेने का खतरा है। विवाद अन्य कालेजों तक फैलने लगा है। जिले में कुंड़ापुर के कई जूनियर कॉलेज में हिजाब के जवाब में भगवा शॉल निकल आई हैं। दो कॉलेज के विद्यार्थियों ने राज्य शिक्षा विभाग के ड्रे़स कोड़ अनिवार्य करने वाले आदेश की अवहेलना करने की कोशिश की। शहर के वेंकटरमण कॉलेज के छात्रों का एक समूह भगवा शॉल पहने जुलूस निकालते हुए कॉलेज पहुंचा। छात्रों का कहना था कि कि यदि छात्राओं को हिजाब पहनकर कक्षाओं में आने की अनुमति दी जाएगी‚ तो वे भी शॉल पहनेंगे। सरकारी पीयू कॉलेज में भी प्राचार्य ने हिजाब पहनकर आई छात्राओं को सरकार का ड्रे़स कोड़ समझाया‚ लेकिन छात्राएं हिजाब हटाने पर राजी नहीं हुई‚ इसके बाद उन्हें एक निर्धारित अलग कक्ष में भेज दिया गया। आहिस्ता–आहिस्ता यह विवादास्पद मुद्दा राज्य भर में फैलता जा रहा है। विजयपुरा जिले के इंडी शहर में‚ मुस्लिम छात्राओं के हिजाब पहनने के विरोध में शांतेश्वर पीयूसी कॉलेज और जीआरबी कॉलेज के हिंदू छात्र भगवा शॉल पहनकर आए। स्थिति की संवेदनशीलता को देखते हुए दोनों कॉलेजों के प्रबंधन ने छुट्टी घोषित कर दी। विजयपुरा को भाजपा का गढ़ माना जाता है और यह सांप्रदायिक रूप से भी संवेदनशील है। भद्रावती में भी सरकारी कॉलेज में छात्रों ने हिजाब के खिलाफ भगवा गमछा पहन कर विरोध जताया। हिजाब विवाद के बारे में परेशान करने वाली घटनाओं के बारे में खुफिया एजेंसियां और शिक्षा विभाग हाई अलर्ट पर हैं। उडुपी पुलिस ने 5 फरवरी को हिजाब–केसर शॉल विरोध के दौरान चाकू दिखाने के आरोप में दो लोगों को हिरासत में लिया है। कर्नाटक उच्च न्यायालय मंगलवार को हिजाब विवाद पर मुस्लिम छात्राओं की याचिकाओं पर सुनवाई करेगा। राज्य सरकार ने कहा है कि उच्च न्यायालय के आदेश के बाद वे यूनिफॉर्म पर एक नीति तैयार करेंगे। राज्य में हिजाब पहनने पर विवाद की शुरुआत जनवरी महीने में हुई थी। उडुपी जिले के प्री–यूनिवर्सिटी कॉलेज में 7 छात्राओं को हिजाब पहनने के कारण कक्षा में प्रवेश नहीं दिया गया था। एकाएक शुरू हुआ यह विवाद उचित नहीं है। पढ़ाई में परंपरा के नाम पर खिलवाड़ नहीं होना चाहिए। सभी राजनीतिक दल इस मामले में निष्पक्ष रवैया अख्तियार करेंगे‚ यही उम्मीद है।
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तमिलनाडु राज्य सरकार ने हाल ही में राजभवन को भेजी गई फाइलों पर एक निश्चित समय सीमा के भीतर निपटारे पर जोर दिया है। इस मामले पर विधानसभा अध्यक्ष ने स्पष्ट कहा है कि कभी-कभी राज्यपाल, किसी कानून पर लंबे समय तक न तो सहमति देते हैं, और न ही उसे वापस भेजते हैं। ज्ञातव्य हो कि इसके चलते सत्तारूढ़ द्रमुक पार्टी अपने चुनावी वादे के कुछ कार्यों को पूरा करने में नाकाम रही है।
तमिलनाडु के मुख्यमंत्री का इसपर कहना है कि जब विधानसभा अपने अधिकार का उपयोग करते हुए कोई कानून बनाती है, तो राज्यपाल को इसका सम्मान करना चाहिए और अपनी स्वीकृति देनी चाहिए। ऐसा न करने पर यही समझा जाता है कि वे वस्तुतः राज्य के लोगों की इच्छा को खारिज कर रहे हैं।
राज्यपाल की भूमिका को लेकर राज्यसभा में मांग
हाल ही में तमिलनाडु के इस मुद्दे को द्रमुक सांसद पी. विल्सन ने यह कहते हुए उठाया है कि राज्यपालों के लिए विधेयकों पर कार्रवाई के लिए समय-सीमा तय करने हेतु संविधान में संशोधन किया जाना चाहिए। संवैधानिक कार्यों की पूर्ति में की जाने वाली अनुचित देरी पूर्णतया असंवैधानिक है।
तमिलनाडु विधानसभा में न केवल राज्यपाल के इस कार्य को, बल्कि राष्ट्रपति द्वारा विधायी कार्यों में सहमति न देने या स्वीकृति में किए गए बहुत अधिक विलंब पर भी सवाल उठाया है। 2017 में, राष्ट्रपति ने तमिलनाडु विधानसभा द्वारा पारित दो नीट छूट विधेयकों पर सहमति रोक दी थी, जिसके कारण अज्ञात हैं।
राज्यपालों और राष्ट्रपतियों के विधायी कार्यों पर कार्रवाई सुनिश्चित करने के लिए की गई इस मांग को आगे बढ़ाने की आवश्यकता है।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित डी. सुरेश कुमार के लेख पर आधारित। 18 जनवरी, 2022
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Date:07-02-22
The Voice Of India In an ever-changing country, Lata Mangeshkar seamlessly knitted our past with our present TOI Editorials
Since Independence, Lata Mangeshkar has been inseparable from the soundtrack of our everyday lives. At kasbah roundabouts, in village fairs, at paan shops, in middle-class drawing rooms, her democratising voice was ever-present like the air we breathe. Like the Ganga and the Himalaya, she was always there. In antaksharis, college fests, home celebrations – rakhi, kirtan, ladies sangeet – there was a song by her for every occasion, season and reason; and in almost every Indian language. She transcended generations. At 60, she sang ‘Dil deewana’ for heroine Bhagyashree, then 20, in Maine Pyar Kiya (1989). Even at 92, she had nearly 15 million followers on Twitter. In an everchanging country, Lata seamlessly knitted our past with our present.
In its core, every voice carries a code we must decipher to understand what it culturally represents. Lata’s voice encapsulated sweetness, purity and simplicity – traits matching the mood and predilections of the times when she rose to prominence. It didn’t convey power and muscle. Much like her persona, her voice embodied quiet strength and resolve. No surprise, she fought and succeeded in the male-dominated film industry on her own terms. The singer also represented, like film director Satyajit Ray and actor Dilip Kumar, an unwavering dedication towards attaining excellence. Uncompromising work ethic, devotion to meticulousness and unmatched talent combined to ensure that even the most demanding of songs was perfected and delivered with care. For decades, every aspiring singer wanted to sing like her; aptly reflected in the number of clones that subsequently emerged.
Lata was a cultural icon like few others were or will be and a global ambassador for India. Her listener-base extended way beyond the diaspora. Her voice was the courier and the carrier of Hindi cinema’s “soft power” in large swathes of Africa and Asia, way before the term, Bollywood, was coined. In 1974, Michael Foot, the British Labour Party leader, introduced her as “the voice of India” before her famous Royal Albert Hall performance in London. For many, India and Lata were synonymous.
It is well known that Lata’s rendition of ‘Ae mere watan ke logon’, made Nehru weep. Not many remember she often sang at charity shows for the jawans, the World Cup winning cricket team in 1983, and the film industry workers after the major strike in 1986. In an interview to the TOI back in 2009, director Shyam Benegal had said that with the possible exception of Egypt’s Umm Kulthum, no other singer represented the singing voice of her country like Lata. He was right. The songs of India and Lata will forever be intertwined as the country marches towards its 75th year of Independence. The singer passed away on Sunday but she will come alive every time we hear her song somewhere.
Date:07-02-22
Tere Bina Zindagi Se Without Lata Mangeshkar, Indian film music wouldn’t have sounded the same, actresses wouldn’t have looked so beautiful on screen and the stories would have been insipid Vishal Bhardwaj, [ Composer and filmmaker ]
When I first came to Mumbai, I had two dreams: The first was to do a song with Gulzar Saab and the second was to have Lata ji sing a composition of mine. The first dream was realised in 1992 when I composed a song that was penned by Gulzar Saab – the Jungle Book song ‘Chaddi Pehen Ke Phool Khila Hai’.
To realise my second dream, I had to wait for some time as Lata ji had become particular about the songs she chose. On one occasion, Gulzar Saab spoke to her on my behalf about a song that I had composed and she asked him to send the song on tape to her. After listening, she called me personally to tell me that the song was beautiful and that she would sing it. Although the film was eventually shelved and the song remained unreleased, this was the beginning of my relationship with her.
I had worked with almost all the big singers of the time except Lata ji and I was amazed at our first recording session. For this first song of mine, she was so well prepared – she had learnt and prepared the entire song and had it written by hand. Her homework was excellent and this was something rare.
By that time, the multitrack recording system had come into play and singers would sing maybe 1-2 lines at a time but never the full song in one go as they would not be prepared. (Today, the singers sometimes do 1 word at a time. ) However, Lata ji came fully prepared and did the full song in one go.
In our first recording session, I was overwhelmed by her and very nervous. So she called me to the recording booth and asked me to relax and treat her like a newcomer. This was the greatness of Lata Mangeshkar. To give confidence to a newcomer, she became one herself.
In a recording session, first she would sing a little away from the mic and when she came to the mic to sing, it was pure magic. She even had a very unique way of appreciating the composer and his composition. Every song has a special section which makes it unique. Lata ji instinctively recognised this section and when that section would arrive, she would smile so subtly that only the composer would understand that gesture.
She was a very precise artist, totally dedicated to her craft. Every syllable and word was well-measured before being delivered. So once she had sung the song, and you asked for one moretake, she would bring her reading glasses down to the tip of her nose, stare penetratingly at you and ask “Why?”, a stare that would rattle even stalwarts. After I had gotten to know her better, I asked her about her infamous stare. She explained that once she had delivered her best, she needed to know what was missing in order to do another take.
I came to know her better as a person as I continued working with her and soon came to know that she had a great and sharp sense of humour. We used to look forward to her recordings because she would always come with two great jokes every time. One joke before the recording and one joke after the recording, both of which would crack us up for half an hour at least.
Anothersignature of herswasthekeychain, the chaabi ka guchcha, that would hangonhersariand wouldchime with the slightest movement of her hand. Initially, in mixing the song, we would filter it out but later, I realised how musical and mysterious it made the song sound so we stopped filtering it out from the song.
What separated her from all the rest was that she was not just a playback singer there to do a day’s job. She had an acute understanding of the drama of the song, the mental state of the character. This allowed her to contribute beautifully to the music.
A year back, I chanced upon a goldmine where I found the long-lost tape of a recording of Lata ji, which was done 26 years ago. The film was shelved and the song remained unreleased. It was a multitrack recording and we were able to retrieve her voice. I rearranged the song and planned to release it on her 92nd birthday in 2021. Before doing so I had to get her approval and in the process, I had a chance to speak to her after a very long time.
She heard the song, titled ‘Theek Nahi Lagta’ and immediately called me. She started by saying that the song was very good but the lyrics were wrong. I was baffled as I had no way of altering her voice or the lyrics. I asked her what was wrong in it. And she replied – “The song is very nice so why am I repeatedly saying ‘Theek Nahi Lagta’?” I cracked up, But she didn’t stop at that. She had a bouquet of jokes ready for me.
Her sense of humour had gotten even sharper with age. She was going to be 92 a few days later but she sounded like a 9-year-old. There was a child in her that never lost her innocence. And that’s why she remained so full of life till the end.
She remains with us every day on all occasions – no matter whether we are sad or happy. Recently, I discovered another dimension of the Nightingale. On shoots, when things are chaotic and everything is going crazy, I put on my headphones and listen to one of her songs. I am immediately transported to another world and even though I am physically in the chaos, I am still completely disconnected.
For us, Lata ji is a goddess. Without her, Indian film music wouldn’t have sounded the same, the actresses wouldn’t have looked so beautiful on screen and the stories would have remained insipid. And that’s not just because of her voice or training or the craft but because of her soul, which she poured into the song along with her technique.
Science says that there are billions of suns in our galaxy, but our Earth witnesses only one. Many singers may come and go but this Earth will only witness one Lata Mangeshkar.
I feel so fortunate that I lived in the times in which Lata Mangeshkar lived. And I know I can be with her whenever I want, through her songs. And that makes me say today, “Tere bina zindagi se koi, shikwa, to nahi … tere bina zindagi bhi lekin, zindagi, to nahi. ”
Date:07-02-22
Counting On Digital Currency RBI, prepare a CBDC roll-out blueprint ET Editorials
Now that India has announced the launch of a central bank digital currency (CBDC) in the coming fiscal, RBI must swiftly prepare a blueprint for its phased roll-out. A CBDC could provide households and businesses a convenient electronic form of central bank money with the safety and liquidity that it would entail, giveentrepreneurs a platform on which to create new financial products and services, support faster and cheaper cross-border payments across jurisdictions. Already, RBI is examining whether CBDCs should be used in retail or wholesale payments, what the underlying technology (distributed or centralised ledger) and validation mechanism (tokenor account-based) should be.
The decline in the use of cash has prompted some central banks to consider issuance of a retail CBDC. In India, despite the surge in digital payments, there is, according to an RBI pilot survey on digital payment habits, sustained interest in the use of cash for small value transactions. It would appear that a CBDC at the gross settlement level would be manageable, easing settlements and compatible with other CBDCs enabling accelerated international settlements. This will also give time for the underlying technology to stabilise.
Technical clarity must be ensured to decide on the underlying technologies that can be trusted to be safe and stable. Giventhepace of innovation,that maynotbeeasy. The pros and cons of underlying technologies are yet to be scrutinised for large-scale rollout, given the energy consumption constraints reported so far. The next step is to build a comprehensive CBDC ecosystem, with its operation mechanisms, institutions and rules that coexist with the current currency, through whatever means. The two will coexist for a long time. As India wants to leverage its fintech startup spaceand reap the benefits of a digital currency —even as it seems to have decided to recognise CBDC as the only digital currency — it would do well to exercise the same degree of caution while moving forward to roll out a CBDC.
Date:07-02-22
India’s ‘return’ to Central Asia While the gains from engaging Central Asia may be minimal, non-engagement could be costly Happymon Jacob is Associate Professor, Centre for International Politics, Organization and Disarmament, School of International Studies, Jawaharlal Nehru University, New Delhi
The inaugural India-Central Asia Summit, the India-Central Asia Dialogue, and the Regional Security Dialogue on Afghanistan in New Delhi — all held over the past four months — collectively indicate a renewed enthusiasm in New Delhi to engage the Central Asian region. India has limited economic and other stakes in the region, primarily due to lack of physical access. And yet, the region appears to have gained a great deal of significance in India’s strategic thinking over the years, particularly in the recent past. India’s mission Central Asia today reflects, and is responsive to, the new geopolitical, if not the geo-economic, realities in the region. More so, India’s renewed engagement of Central Asia is in the right direction for the simple reason that while the gains from an engagement of Central Asia may be minimal, the disadvantages of non-engagement could be costly in the longer run.
Great power dynamics
One of the factors driving this engagement and shaping it is the great power dynamics there. The decline of American presence and power in the broader region (due primarily to the U.S. withdrawal from Afghanistan) has led to a reassertion by China and Russia seeking to fill the power vacuum. While China dominates the geo-economic landscape, Russia is the dominant politico-military power in the region. But in the end, geo-economics might gain more traction. A somewhat anxious Moscow considers India to be a useful partner in the region: it helps it to not only win back New Delhi, which is moving towards the U.S., but also to subtly checkmate the rising Chinese influence in its backyard.
For the U.S., while growing India-Russia relations is not a welcome development, it recognises the utility of Moscow-New Delhi relations in Central Asia to offset Beijing’s ever-growing influence there.
As for China, India’s engagement of the region and the growing warmth in India-Russia relations are not a cause for concern yet, but they could be eventually.
For New Delhi, it’s about breaking out of a continental nutcracker situation it finds itself in. In the wake of the U.S. withdrawal from Afghanistan, New Delhi faces a major dilemma in the wider region, not just in the pre-existing theatres like the Line of Control and the Line of Actual Control. There are growing and legitimate concerns within the Indian strategic community that India in the region might get further hemmed in due to the combined efforts by China, Pakistan and Taliban-led Afghanistan. If so, it must ensure that there is no China-led strategic gang up with Pakistan and the Taliban against India in the region, which, if it becomes a reality, would severely damage Indian interests.
Focus on Afghanistan
India’s engagement of Central Asia would also help it to consolidate its post-American Afghan policy. U.S. withdrawal from Afghanistan has landed India in a major dilemma – it has very limited space to engage Taliban 2.0 despite the current relationship whose future depends on a number of variables. During the Hamid Karzai and Ashraf Ghani governments, given their proximity to India and the presence of the U.S. forces in Afghanistan, India was able to engage Kabul without too much hardship, despite Pakistani resistance. Now that the Taliban have returned to Kabul, New Delhi is forced to devise new ways of engaging Afghanistan. That’s where the Central Asian Republics (CARs) and Russia could be helpful. For instance, given its location bordering Afghanistan as well as its close geographical proximity to Pakistan-occupied Kashmir, Tajikistan holds immense geopolitical significance for India (incidentally, India helps maintain an airbase in the country). One has to wait and see how far India will innovate to engage CARs in pursuit of its interests in Afghanistan. The announcement of a Joint Working Group on Afghanistan during the summit between India and the CARs is surely indicative of such interest.
In India’s current vision for a regional security architecture, Russia appears prominent. President Vladimir Putin’s meeting with Prime Minister Narendra Modi and the earlier meeting between Russian National Security Adviser General Nikolai Patrushev and Mr. Modi are indications of the growing relationship. A cursory glance at the various issues being discussed between the two sides also indicates a new joint thinking on regional security. Of course, New Delhi expects the U.S. to understand that in the wake of the latter’s withdrawal from the region leaving India in the lurch, New Delhi has no choice but to work with the Russians.
By courting Russia — its traditional partner, also close to China and getting closer to Pakistan — to help it re-establish its presence in the Central Asian region, India is seeking to work with one of the region’s strongest powers and also potentially create a rift between China and Russia, to the extent possible. The two countries recently exchanged a ‘non-paper’ on how to increase their joint engagement in Central Asia. Both India and the CARs use Russian defence equipment, and the non-paper has reportedly explored the possibility of joint Indo-Russian defence production in some of the existing Soviet-era defence facilities in the CARs to meet local and Indian demands. The non-paper also reportedly discusses potential trilateral defence exercises among India, Russia and the CARs. In any case, joint defence production by India and Russia has been on the rise and the CARs could play a key role in it. This growing India-Russia partnership also explains India’s non-critical stance on the developments in Ukraine and Kazakhstan.
Challenges
That said, India’s ‘return’ to Central Asia is not going to be easy. For one, China, which shares a land border with the region, is already a major investor there. China is the region’s most important economic partner, a reality that worries Russia and sharpens India’s relative irrelevance in the region.
An even bigger challenge for India may be Iran. India’s best shot at reaching the CARs is by using a hybrid model – via sea to Chabahar and then by road/rail through Iran (and Afghanistan) to the CARs. So, for New Delhi, the ongoing re-negotiations on the Joint Comprehensive Plan of Action (or the Iran nuclear deal) are of crucial importance. If there is a deal, it would bring Tehran back into the Western fold and away from China (and Russia), which will be favourable to India. While Iran getting close to the West is not preferred by Russia (but preferred by India), if and when it becomes a reality, India would be able to use it to its advantage and join Russia in engaging the CARs. India’s ongoing outreach to Iran and the now-postponed visit of the Iranian foreign minister to New Delhi help repair some of the damage done to the relationship over the years.
But finally, perhaps most importantly, will India walk the talk on its commitments to Central Asia? Does it have the political will, material capability and diplomatic wherewithal to stay the course in the region?
Date:07-02-22
उनको सुनकर जी उठते थे यतींद्र मिश्र , ( कला समीक्षक )
देश के लिए कल का दिन सबसे बेसुरा रहा। हम सबकी अपनी और बेहद आदरणीय पार्श्व गायिका लता मंगेशकर का निधन भारतीय जनमानस के लिए उन सबसे कष्टप्रद क्षणों में एक है, जिसकी कल्पना कोई शायद ही कभी करना चाहता था। भारतीय उप-महाद्वीप की सबसे सुरीली उपस्थिति का लोप, एक ऐसी कलात्मक विपन्नता है, जो इस शताब्दी में शायद ही पूरी हो सके।
लता मंगेशकर सिर्फ एक आवाज, एक किरदार, एक कलाकार का नाम नहीं है, बल्कि यह आजाद भारत की सांस्कृतिक विकास-यात्रा के समानांतर चलने वाला वह प्रतीक भी है, जिसके होने से संगीत और सिनेमा की दुनिया में तब उजाला फैलना शुरू हुआ, जब सन 1947 में फिल्म आपकी सेवा में उनकी आमद हुई थी। क्या संयोग है कि इस देश को आजाद हुए जितना समय बीता है, उतने ही लंबे कालखंड में लता दीनानाथ मंगेशकर की जीवंत आवाज की सुरीली यात्रा जारी रही है।
हिंदी फिल्म संगीत के इतिहास पर निगाह डालते हुए कुछ ऐसे गाने याद आते हैं, जिनको आज दशकों बाद याद करते हुए आंखों में आंसू आते हैं। मदन मोहन के संगीत में बागी (1953) के लिए उनका गाया हमारे बाद अब महफिल में अफसाने बयां होंगे, हेमंत कुमार की कंपोजीशन में दुर्गेशनंदिनी (1956) का कहां ले चले हो बता दो मुसाफिर, सितारों से आगे ये कैसा जहां है और रोशन की संगीतबद्ध ममता (1966) में रहें न रहें हम महका करेंगे तो आज भी जितने प्रासंगिक हुए जाते हैं, उनकी कालातीत अभिव्यक्ति प्रसन्न करने की जगह इस वक्त दुख दे रही है। यह हममें से किसी भी संगीतप्रेमी ने कभी न सोचा होगा कि एक ऐसा समय भी आएगा, जिसमें हम लता जी की अनुपस्थिति की चर्चा करेंगे, जबकि हम यह जानते हैं कि जीवन के साथ मृत्यु एक ऐसा सत्य है, जिसे गरिमा और आदर के साथ हर किसी को स्वीकारना ही पड़ता है। संयत रहते हुए और लता जी के विराट जीवन को संपूर्णता से देखने के बावजूद कबीर की यह सूक्ति झुठलाने का मन करता है- हम न मरब मरिहैं संसारा/ हमको मिला जियावनहारा!
लता जी की गायिकी और उनकी सहेजी हुई सांगीतिक थाती उसी जियावनहारा की तरह है, जो एक आम व्यक्ति को उसके सबसे नाजुक और तकलीफ भरे क्षणों में राहत के पल मुहैया कराती है। इस बात से कौन इत्तिफाक नहीं रखेगा कि उसके जीवन में लता मंगेशकर का गाया हुआ कोई न कोई ऐसा गीत जरूर रहा है, जिसने उसे प्रभावित किया, तकलीफ के मौकों पर संबल प्रदान किया या किसी आत्मीय और उल्लास वाले समय में उसके आनंद में वृद्धि की। लता मंगेशकर एक ऐसा करिश्मा रही हैं, जिनको भारतीय जनमानस ने बड़े स्तर पर जाति, पंथ, मजहब व सरोकारों से ऊपर उठकर सराहा और प्यार किया। एक पारंपरिक मराठी ब्राह्मण परिवार की बेटी की आवाज में खुदा की इबादत का सलाम बेकस पे करम कीजिए सरकारे-मदीना गाते हुए किसकी आंखें नहीं भीगी होंगी? मीराबाई की करुण पुकार का पद सखी री लाज बैरन भई हो या मराठी फिल्म अमर भूपाली की प्रार्थना घनश्याम सुंदरा श्रीधरा अरुणोदय झाला, लता जी हर जगह अप्रतिम थीं, उनका भाव अपूर्व था, आवाज अतुलनीय रही।
लता मंगेशकर की उपस्थिति का अवदान अब व्यापक अर्थों में शोध का भी विषय है। जैसे, उनके होने में दक्षिण एशियाई स्त्री की गरिमा और पहचान, उसकी उन्मुक्त आकांक्षा का स्वप्न और संघर्ष, पारंपरिक ढंग से जीवन जीते हुए अपनी कला में शिखर अर्जित करने का मुकाम, सभी कुछ प्रेरणा की तरह भविष्य में देखे-समझे जाएंगे। उन्होंने सिनेमा जैसे माध्यम में रहते हुए ढेरों मानक तय किए। जब आवाज की दुनिया को बहुत सम्मान नहीं दिया जाता था, उस दौर में भी उन्होंने यह सुनिश्चित किया कि रेडियो पर फिल्मी गीतों को बजाने से पूर्व पार्श्व गायकों-गायिकाओं के नाम भी प्रसारित किए जाएं। खान मस्ताना जैसे गायक की आर्थिक दशा से विचलित होकर उन्होंने यह लड़ाई लड़ी कि गायकों को भी अन्य लोगों की तरह फिल्म और रेकॉर्ड कंपनियां उचित लाभांश (रॉयल्टी) प्रदान करें। इसके साथ उन्होंने यह भी अपनी जिद पर संभव किया कि सिनेमा में अश्लील और द्विअर्थी बोलों वाले गीतों को कभी नहीं गाएंगी।
उन्हीं के इसरार पर यह एक परिपाटी सी बनी कि लता जी की रिकॉर्डिंग के दौरान दिग्गज साहिर लुधियानवी, मजरूह सुल्तानपुरी और शैलेंद्र जैसे गीतकार भी स्टूडियो में मौजूद रहते थे, ताकि किसी गीत को रिकॉर्ड करते समय लता जी को कोई परेशानी आड़े आती है, तो शब्द वहीं दुरुस्त किए जा सकें। फिल्मफेयर पुरस्कारों में उनके मना करने पर कि सर्वश्रेष्ठ संगीत के लिए दिए जाने वाले पुरस्कार में वह अपनी आवाज नहीं देंगी, क्योंकि यह सम्मान गायकी के लिए नहीं है, संगीतकार अपनी धुन बजा दें, फिल्मफेयर को पार्श्व गायन के लिए एक नई श्रेणी आरंभ करनी पड़ी, जिसका फायदा लता मंगेशकर को ही नहीं, बाद की पीढ़ी को भी मिला। ऐसी ढेरों मिसालें हैं, जिनसे लता मंगेशकर की जिजीविषा, उनकी सैद्धांतिकी और संघर्ष की आंच को कुंदन बनते देखा जा सकता है।
यह लता ही थीं, जिनके कारण तीन मिनट के गीतों में हम रागदारी की शुद्धता, मींड़ और गमक का असाधारण काम और शब्दों के बीच ध्वनित होने वाले अर्थों को उसकी शुद्ध साहित्यिक आभा के कारण सुन सकते हैं। पंडित कुमार गंधर्व ने उन पर एक लेख लिखा और यह स्थापित करने की पहल की कि लता का स्थानापन्न शास्त्रीय गायिकी में भी संभव नहीं। पंडित जसराज का यह कहना कि भला हुआ, लता फिल्म संगीत में हैं, नहीं तो हम लोगों का क्या होता, दरअसल ये अतिरंजित कथन नहीं हैं, बल्कि एक करिश्माई किरदार के प्रति वह आभार और कृतज्ञता ज्ञापन हैं, जो पिछली शताब्दी में इस सुरीली गंधर्व-सेविता को हासिल हुए हैं।
मेरा पक्का विश्वास है कि गंधर्व-सेविताएं मरती नहीं, बल्कि अपने लोक को छोड़कर दूसरे लोक को सुरीला करने जाती हैं। अब पृथ्वी पर मौजूद यह स्वर देवलोक चला गया है, जहां से ढेरों राग-रागिनियां अपनी सबसे उदात्त अभिव्यक्ति में सुर का एक प्रतिसंसार रच रही होंगी। हम यहां उनके न रहने पर उन्हीं की आवाज में तड़पते रह जाएंगे, जो आज से बरसों पहले उन्होंने गाकर अभिव्यक्त किया था- खुदा निगहबान हो तुम्हारा/ धड़कते दिल का पयाम ले लो/ तुम्हारी दुनिया से जा रहे हैं/ उठो हमारा सलाम ले लो!
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पिछले सात वर्षों से चुनाव आयोग पर सत्ताधारी दल का पक्ष लेने का आरोप लगाया जा रहा है। कुछ समय पहले ऐसी खबर मिली थी कि मुख्य चुनाव आयुक्त ने प्रधानमंत्री द्वारा बुलाई गई एक अनौपचारिक बैठक में भी भाग लिया था। इन घटनाओं ने भारत के चुनाव आयोग की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर नए सिरे से ध्यान केंद्रित कर दिया है।
चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति पर सवाल –
इस दृष्टि से चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया में बदलाव किया जाना चाहिए। चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति संविधान के अनुच्छेद 324 (2) के दायरे में आती है। इसमें एक खंड है, जो प्रावधान देता है कि चुनाव आयुक्तों की संख्या और कार्यकाल, “संसद द्वारा उस संबंध में बनाए गए किसी भी कानून के अधीन होंगे, जो राष्ट्रपति द्वारा बनाया जाएगा।’’ इस खंड का उद्देश्य ही यह था कि चुनाव आयुक्तों को कार्यकारीणी के प्रभाव से निष्पक्ष रखा जा सके। जहाँ तक इस पर कानून बनाने का प्रश्न है, तो 1991 में आयुक्तों की संख्या एक से तीन किए जाने के बाद से संसद ने नियुक्ति प्रक्रिया पर कोई कानून बनाने का प्रयास नहीं किया है।
संसद की निष्क्रियता के बाद अब न्यायपालिका से उम्मीद की जा रही है कि वह इस प्रक्रिया में कुछ सुधार करे। न्यायपालिका में दायर तीन रिट याचिकाएं ये दलील देती हैं कि चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति की वर्तमान प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 324 (2) का उल्लंघन करती हैं। इन याचिकाओं में पिछले विधि आयोगों और विभिन्न समितियों की रिपोर्टों द्वारा अनुशंसित नियुक्ति प्रक्रिया को लागू करने की मांग की जा रही है। अर्धन्यायिक संस्था में अकेले कार्यकारिणी द्वारा की जाने वाली नियुक्तियों के विरोध का एक मामला रोजर मैथ्यू बनाम साउथ इंडियन बैंक लिमिटेड है।
चुनाव आयोग की स्वतंत्रता को बनाए रखने के लिए एक बहु-संस्थागत एवं द्विदलीय समिति बनाई जानी चाहिए। मुख्य सूचना आयुक्त, लोकपाल, केंद्रीय सतर्कता आयुक्त एवं केंद्रीय जांच ब्यूरो के निदेशक जैसे अन्य संवैधानिक और वैधानिक प्राधिकरणों के संबंध में इस तरह की प्रक्रिया का पहले से ही पालन किया जा रहा है।
चुनाव आयोग के कार्यों की अर्ध-न्यायिक प्रकृति उसकी नियुक्ति प्रक्रिया को सख्त लोकतांत्रिक सिद्वांतों के अनुरूप बनाने की ओर इंगित करती है।
अनूप बरनवाल बनाम कानून एवं न्याय मंत्रालय भारत सरकार के मामले में बैठी संवैधानिक पीठ का भी मानना था कि चुनाव आयोग के लिए कोलेजियम सिस्टम हो। केंद्र सरकार से उम्मीद की जा सकती है कि वह इस पर शीघ्र ही ध्यान देगी।
‘द हिंदू’ में प्रकाशित एम. वी. राजीव गौडा एवं आईमन हाशमी के लेख पर आधारित। 13 जनवरी, 2022
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Date:05-02-22
Go cold on China India right to diplomatically boycott Winter Games TOI Editorials
India did well to join leading democracies in diplomatically boycotting the Beijing Winter Olympics. And China made the decision easy – by making a PLA regiment commander involved in the 2020 Galwan clashes a torchbearer in the Olympic relay. China, therefore, politicised the Games even though it has been levelling that charge against other nations. Before India, the US and UK, Canada, Australia, Estonia, Lithuania, Belgium, Kosovo and Denmark had all announced diplomatic boycotts of the Games citing China’s human rights violations.
Put together, these countries constitute a sizeable 35% of the global GDP. Add to this, countries with well-performing economies like Japan and those in the Asean grouping who have also seen their relations with China become turbulent in recent years. Therefore, the larger message for China is that its political and security misadventures may not be costless economically. China may draw comfort from the Olympic attendance of some prime ministers, heads of state and royalty. But note that many of these dignitaries come from authoritarian countries. And more, the difference between global admiration for China during the 2008 Summer Olympics and the cold shoulder from key countries in these Winter Games should tell Beijing where it’s going wrong.
That India aligned with other major democracies on this issue – the US welcomed the decision – also shows the future course. New Delhi, inside and outside Quad, must liaise with other powers for coordinated responses whenever possible. Xi’s China is a bully – and bullies understand strength. That Putin and Xi – the two met before the Winter Games began – may cosy up does make it a little tricky for India, given we still need Moscow’s weapons. But Russia needs India’s arms orders, too. So, this may not be too tough a conundrum to solve as India chalks out its China strategy.
Date:05-02-22
Haryana Against Free Market, Self-Interest Runs against One Nation, One Ration Card, GST ET Editorials
The Haryana government’s obduracy to implement reservation for locals in private jobs is unfortunate. Its appeal against the stay order of the Punjab and Haryana High Court will vitiate matters. The apex court should declare the law unconstitutional and one that will hurt economic prospects of the state. The Haryana State Employment of Local Candidates Act reserves 75% of jobs in the private sector, with a monthly salary of ₹30,000 or less for locals. The category ‘locals’ is defined as persons who are permanent residents or domiciled in the state. To qualify for domicile status, a person must have lived in the state for at least 15 years. It effectively sets up barriers to employment for any person living in another part of the country, even neighbouring Punjab or Delhi. It undermines the rights guaranteed in the Constitution — equality of law irrespective of place of birth (Article 14), against discrimination in (public) employment (Article 15), and free movement to all Indian citizens across India (Article19).
It runs counter to efforts being made by GoI to ease and promote inter-state movement of people, such as provision of portability of social security benefits in the labour codes and the ‘One Nation, One Ration Card’. It goes against the rationale of the goods and services tax (GST) of creating a unified market. If that is not enough, precedent established in Charu Khurana vs Union of India (2014) — a trade union had debarred a worker as she had not lived in Maharashtra for ‘at least five years’ — establishes that domicile cannot be used to bar employment.
Free movement of people allows business and industry to hire the best talent. The diversity of the labour force adds to its competitiveness. The state’s sustained growth attracts the most innovative business to the state, which, in turn, attracts more talent to the state. Shutting the door to ‘outside’ talent could see businesses move out, impacting the state’s economy. This law is not in Haryana’s interest. If the state government does not understand it, the Supreme Court should make it.
Date:05-02-22
Interrogating the false merit-reservation binary The Supreme Court’s recent order advances an interpretation that is consistent with the ideals of equality, social justice Yogendra Yadav is among the founders of Swaraj India and the Jai Kisan Andolan. Prannv Dhawan is a final year student at the National Law School of India University, Bengaluru
The Supreme Court of India’s recent ruling on an all India quota deserves closer attention for a reason other than its impact on post graduate medical admissions. This judgment has the potential to settle a long, fractious and futile debate in our country: merit versus reservations. The order of the two-judge Bench, comprising Justice D.Y. Chandrachud and Justice A.S. Bopanna, lays to rest a popular misconception of merit while advancing an interpretation that is consistent with our constitutional ideals of equality and social justice. The judgment should have far-reaching consequences for judicial orders, public policy, and, hopefully, public discourse.
Limited case
The case before the Court was very limited: an expeditious resolution of the issues around the implementation of Other Backward Classes (OBC) and economically weaker sections (EWS) quotas in the National Eligibility cum Entrance Test (NEET)-All India Quota (AIQ) admissions to medical colleges. AIQ refers to a judicially created category where 15% of undergraduate seats and 50% of post graduate seats are filled on a domicile-free, all-India basis.
The Government had recently decided to extend the existing Scheduled Caste and Scheduled Tribe reservations within this category to provide for OBC reservations as well. Writ petitions had challenged this order on the grounds that the implementation of OBC reservation would affect professional merit and cause reverse discrimination against general category candidates. Another set of writ petitions had challenged the notification of EWS reservation even as the hearings on the 103rd Constitutional Amendment Act were pending. Another set of writ petitions had challenged the tenability of ₹8 lakh as the income limit for EWS reservation. The Court, in view of the public health implications of the delay in medical admissions, upheld the admissions notice, and listed for March the hearing on the validity of the ₹8 lakh limit.
Fresh ground
The Court took this opportunity to directly address the issue of merit versus reservations at some length (paragraphs 17 to 28). For the longest time, critics of affirmative action have argued that reservations violate merit. The defenders of reservation too often concede this but argue that affirmative actions serve other goals such as social representation. This is where the judgment, authored by Justice Chandrachud, breaks fresh ground. It builds on a long tradition of progressive jurisprudence on this issue, but takes it in a new direction.
The judgment begins by recalling and reaffirming the principle of substantive equality, rather than formal equality, that underlies our constitutional promise of equality of opportunity. Relying on the debates in the Constituent Assembly, the Court reminds us that the intent of the framers was to remedy real structural barriers that prevented the realisation of equality of opportunity. The Court builds on landmark cases such as State of Kerala vs N.M. Thomas, K.C. Vasanth Kumar (1985), and Indra Sawhney vs Union of India (1992) to reiterate sharply that the provision of reservations in Article 16(4) of the Constitution is not an exception to but an extension of the principle of equality enunciated in Article 16(1). Reservations are crucial to achieving the aspirational goal of genuine equality of opportunity and status amongst all citizens. ‘Reservation is one of the measures that is employed to overcome these barriers. The individual difference may be a result of privilege, fortune, or circumstances but it cannot be used to negate the role of reservation in remedying the structural disadvantage that certain groups suffer’ (paragraph 22).
Second, the judgment contributes to the specification of the mechanisms through which social privileges work. Justice Chinnappa Reddy in K.C. Vasanth Kumar vs State of Karnataka (1985) had critiqued the purely economic understanding of claims for reservation by emphasising the embedded and rigid nature of the socio-cultural institution of caste.
The present order notes Marc Galanter’s insight that processes of resource accumulation impact the performance of candidates in examinations. Taking this understanding forward, it draws upon the work of K.V. Shyamprasad to recognise, perhaps for the first time, the role of cultural capital. The order holds: ‘The cultural capital ensures that a child is trained unconsciously by the familial environment to take up higher education or high posts commensurate with their family‘s standing. This works to the disadvantage of individuals who are first-generation learners and come from communities whose traditional occupations do not result in the transmission of necessary skills required to perform well in open examination…’ (paragraph 24) The judgment is also attentive to the exclusionary implications of this processes as meritocratic discourse legitimises consolidation of ‘family habitus, community linkages, and inherited skills’. In addition to ‘reaffirming social hierarchies’, this obsession with scores in an examination ‘serves to denigrate the dignity of those who face barriers in their advancement which are not of their own making’ (paragraphs 24-25).
Stereotypes and skills
Third, it exposes social prejudices that masquerade as concerns about ‘efficiency of administration’ and the anxieties about the dilution of merit. It recognises that there is a need to rectify prejudicial stereotypes about the skills of persons belonging to weaker sections.
It relies on the 2019 decision in B.K. Pavitra vs State of Karnataka, also authored by Justice Chandrchud, which held, ‘The benchmark for the efficiency of administration is not some disembodied, abstract ideal measured by the performance of a qualified open category candidate. Efficiency of administration in the affairs of the Union or of a State must be defined in an inclusive sense, where diverse segments of society find representation as a true aspiration of governance by and for the people.’
Examinations and merit
Finally, the judgment goes to the heart of the matter and questions examinations as a measure of merit. It cites Ashwini Deshpande’s study highlighting a stark separation between what examinations claim to measure, and what they actually do. It elaborates by citing Satish Deshpande’s research that shows that often what examinations measure have an indirect and weak link to the tasks the candidate is supposed to perform. He argues that the prestige of competitive entrance examinations and the unimpeachability of its evaluator standards are a manufactured construct. Satish Deshpande calls these examinations ‘traumatic bloodbaths’ that are administered to jealously guard the social prestige of the professional class.
Thus, Deshpande concludes that if the examinations were to be any less ruthless, their main social function of persuading ‘the vast majority of aspirants to consent to their exclusion’ would be stymied. Drawing upon this, the judgment opines that exams can ‘only reflect the current competence of an individual but not the gamut of their potential, capabilities or excellence’. Foregrounding the importance of individual character, lived experiences, and subsequent training, the judgment emphasises that examinations are exclusionary, though convenient, methods of resource allocation and that our constitutional ideals should inform our cautious appreciation of these processes (paragraph 25).
This critique of the widespread misconception about merit — the common sense of the upper caste elite — can have far-reaching consequences.
Claims of reverse discrimination by candidates from the unreserved category would have to be justified under the paradigm of substantive equality. This implies that a crude disparity in cut-off marks would not be construed in isolation of the structural inequalities perpetuated by a competitive examination. This invites a stringent judicial review of the constitutionality of EWS reservations since it overlooks the role of cultural capital for general category EWS candidates and fixes the same income limits for ‘creamy layer’ OBC and EWS. In the policy realm, this judgment opens the way for designing examinations that are free of linguistic, class, school boards, and regional bias. Justice A.K. Rajan’s report on NEET, cited in this judgment, could be a potential blueprint for democratising access to higher education. The recognition of social privileges that hide behind merit also buttresses the demand for caste census that can document the dynamics of privilege accumulation and caution against oligarchic and conservative policy demands for Savarna Aayogs (or Commission for Unreserved Classes) and Brahmin Schemes that are mushrooming across our political landscape.
Is it too much to hope that this reasoning — written in the language and style preferred by our elite — coming from the highest court of the land would open the eyes of our upper-caste opinion-makers to the reality of inherited caste privileges that masquerade as merit? Would this reshape the complacent and condescending drawing-room conversations about “reserved category”?
Date:05-02-22
हम एक समाज की मौलिक जरूरतें नहीं पूरी कर पा रहे संपादकीय
एक धनी परिवार की सात वर्षीय बेटी से परीक्षा में गरीब पर लेख लिखने को कहा गया। उसने लिखा ‘एक गरीब आदमी था। वह इतना गरीब था कि उसका घर भी गरीब था, उसका ड्राइवर भी गरीब था, उसका माली भी गरीब था।’ भारत में 70 साल से प्रजा का शासन है जिसे संविधान ‘हम भारत के लोग’ का नाम देता है। इसमें पहचान, आर्थिक स्थिति या रंग-जाति या धर्म को लेकर कोई भेद नहीं है। फिर भी इतने समय बाद भी एक दलित महिला एक उच्च जाति की महिला की तुलना में अपने जीवन में 15 वसंत कम देखती है। कारण है कुपोषण। क्या कल्याणकारी राज्य, जिसकी कल्पना आजादी मिलते वक्त की गई थी और उस अवधारणा के तहत 17 बार जनमतों से बनी सरकारें इतना भी सुनिश्चित नहीं कर सकतीं कि सात दशकों में कम से कम कुपोषण दूर किया जा सके? उनके बच्चों में जन्म के पांच साल में मरने, नाटे या दुबले होने की संख्या भी उच्च जाति के बच्चों के मुकाबले ज्यादा होती है। इन सबका कारण एक ही है कुपोषण। जीवन में उनकी उत्पादकता भी कम होती है लिहाजा आय में भी कमी। यानी हर आयाम पर पूरी जिंदगी वे गरीब या अभावग्रस्त ही रहते हैं। भारत में स्वास्थ्य पर खर्च बजट का मात्र 3.5% होता है, जबकि ब्राजील में 9.5%, दक्षिण अफ्रीका में 8.25%और चीन में 5.35% प्रतिशत। अगर इतने लंबे समय में हम एक समाज की मौलिक जरूरतें पूरी नहीं कर सके तो प्रजा का तंत्र कैसे हुआ? हां, अगर जनमत अशिक्षित है तो उसे भ्रमित करना आसान होगा और मुफ्त का राशन उसे यथास्थितिवादी बनाता रहेगा।
Date:05-02-22
आत्मनिर्भरता को बल देता बजट जयजित भट्टाचार्य, ( लेखक सेंटर फार डिजिटल इकोनमी पालिसी रिसर्च के प्रेसिडेंट हैं )
मंगलवार को पेश हुए आम बजट की मीमांसा जारी है। इसमें कई बिंदु उभरकर आ रहे हैं। फिर भी अगर उसके सार तत्व की बात की जाए तो यह पारंपरिक परिपाटी से इतर ताजगी का अहसास कराने वाला बजट है, जो आसन्न चुनौतियों से निपटने एवं दस्तक दे रही संभावनाओं को भुनाने की आधारशिला रखता है। डिजिटल मोर्चे को और मजबूत करने की सरकारी रणनीति से यह साबित भी होता है। मोदी सरकार इसके लिए निश्चित रूप से सराहना की पात्र है कि उसने चुनावी दौर में लोकलुभावन घोषणाओं का मोह न करते हुए प्रौद्योगिकी, डिजिटल बुनियादी ढांचे से लेकर भौतिक बुनियादी ढांचे पर केंद्रित एक ऐसा बजट प्रस्तुत किया, जो आत्मनिर्भर भारत के संकल्प को पूरा करने में सहायक सिद्ध होना चाहिए। इसके लिए सरकार ने राजनीतिक जोखिम लेने से भी गुरेज नहीं किया।
आदर्श जीवन का मूल मंत्र यही माना जाता है कि अपने दायरे का विस्तार करने से पहले अपनी विद्यमान क्षमताओं को उनके उच्चतम स्तर तक पहुंचाना श्रेयस्कर होता है। बजट में सरकार ने इसी दर्शन को आत्मसात किया। उसने मात्रा बढ़ाने के बजाय गुणवत्ता पर ध्यान केंद्रित किया। सामाजिक बुनियादी ढांचे से जुड़ी आंगनवाड़ी जैसी पहल को ही लें, सरकार ने ऐसे और केंद्र स्थापित न कर मौजूदा आंगनवाड़ी केंद्रों के उन्नयन को प्राथमिकता दी। रेलवे में भी इसी नजरिये की झलक मिलती है, जहां उच्च गुणवत्ता वाली तेज रफ्तार 400 नई वंदे भारत ट्रेन चलाई जाएंगी। ये रेलगाडिय़ां भारत की विनिर्माण क्षमता और आत्मनिर्भरता का उद्घोष करने वाली हैं। वहीं रिजर्व बैंक के माध्यम से डिजिटल मुद्रा की घोषणा दर्शाती है कि सरकार नए वक्त की धुन के साथ ताल मिलाने की आवश्यकता और उसमें नागरिकों के हितों के संरक्षण को बखूबी समझती है।
बजट में बुनियादी ढांचे और विनिर्माण गतिविधियों को गति देने पर विशेष जोर है। इसमें राज्यों को भी आगे आने का अवसर दिया है, जो केंद्र-राज्य सहयोग बढ़ाने का सूत्र बन सकता है। इसी कड़ी में केंद्र राज्य सरकारों के साथ औद्योगिक भूमि बैंक बनाने का प्रस्ताव लाया है। इससेविनिर्माण गतिविधियों को बढ़ाकर न केवल रोजगार की चुनौती का समाधान निकलेगा, बल्कि आयात पर निर्भरता घटने एवं निर्यात बढऩे का मार्ग खुलेगा। सरकार की नई पहल विशेष आर्थिक क्षेत्र यानी सेज जैसी अनुत्पादक योजना के मुकाबले काफी संभावनाशील लगती है। पूंजीगत व्यय में भारी बढ़ोतरी के उच्च गुणक प्रभाव से भी आर्थिक मोर्चे पर बड़ा लाभ होने की उम्मीद बढ़ी है। प्रधानमंत्री गति शक्ति योजना के अंतर्गत 25,000 किमी राजमार्ग निर्माण की महत्वाकांक्षी परियोजना खासी महत्वपूर्ण है। इसका अर्थ होगा कि रोजाना 70 किमी राजमार्ग का निर्माण। यह ऐसा लक्ष्य है जिसे चीन ने भी अपने बुनियादी ढांचा विकास के चरम में कभी हासिल नहीं किया। चीन का अधिकतम औसत 35 किमी राजमार्ग प्रतिदिन निर्माण का रहा है। मल्टी माडल कनेक्टिविटी के लिए 100 लाख करोड़ रुपये की योजना भी गेमचेंजर साबित हो सकती है। इसमें नदी मार्ग, एयर कार्गो, शिपिंग और रेलवे को भी शामिल किया गया है। इसके तहत विकसित किए जाने वाले 100 कार्गो टर्मिनल बेहतर लाजिस्टिक दक्षता सुनिश्चित करेंगे।
क्लीनटेक मैन्यूफैक्चरिंग और इंफ्रास्ट्रक्चर भी सरकार के प्राथमिक एजेंडे में शामिल हैं। इसमें बैटरी स्वैपिंग जैसे कदम उठाए गए हैं। ऐसे इंफ्रास्ट्रक्चर से संबंधित परियोजनाओं को सुगम बनाने के लिए पूंजीगत वस्तुओं पर आयात शुल्क घटाकर 7.5 प्रतिशत किया गया है। स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में पालीसिलिकान सौर माड्यूल निर्माण के लिए उत्पादन-लिंक्ड प्रोत्साहन (पीएलआई) योजना के अंतर्गत 19,500 करोड़ रुपये आवंटित किए गए हैं। इलेक्ट्रिक व्हीकल यानी ईवी निर्माण को प्रोत्साहन हेतु 31 मार्च, 2024 तक नई घरेलू विनिर्माण सुविधा की स्थापना के लिए 15 प्रतिशत की रियायती कर व्यवस्था का विस्तार ईवी और ईवी घटकों में अधिक निवेश को आकर्षित करेगा। इसके अतिरिक्त बजट डेटा केंद्रों के साथ-साथ ऊर्जा भंडारण प्रणालियों को बुनियादी ढांचे का दर्जा देता है, ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि क्लीनटेक बुनियादी ढांचे और डिजिटल बुनियादी ढांचे के लिए आसानी से वित्तपोषण उपलब्ध हो।
वित्त मंत्री ने कृषि बुनियादी ढांचे पर भी पर्याप्त ध्यान दिया है। कृषि आपूर्ति शृंखला एवं लाजिस्टिक को सशक्त बनाने के लिए इस क्षेत्र में स्टार्टअप्स को वित्तीय संसाधन उपलब्ध कराने की व्यवस्था की गई है। कृषि क्षेत्र में घरेलू आत्मनिर्भर विनिर्माण को प्रोत्साहन देने की दिशा में आवश्यक उपकरणों पर आयात शुल्क को भी तार्किक बनाया गया है। देश को रक्षा उत्पादन की दृष्टि से आत्मनिर्भर बनाना मोदी सरकार का प्रमुख लक्ष्य रहा है। इस दिशा में घरेलू रक्षा उपकरण उत्पादन के लिए पूंजीगत व्यय में 68 प्रतिशत की अभूतपूर्व वृद्धि अपेक्षित परिणाम लाएगी। इसके अतिरिक्त रक्षा शोध एवं विकास की 25 प्रतिशत राशि निजी क्षेत्र, स्टार्टअप्स और अकादमिक वर्ग के लिए आवंटित की गई है। इससे रक्षा उत्पादन में बौद्धिक संपदा अधिकारों-पेटेंट को बढ़ावा मिलेगा। घरेलू रक्षा उत्पादन बाजार की पहुंच अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी बढ़ेगी।
कोरोना महामारी ने आनलाइन शिक्षा की महत्ता को रेखांकित किया है, परंतु इसके साथ ही कुछ चुनौतियां भी उभरी हैं। इसमें आवश्यक संसाधनों की कमी एक अहम पहलू है। खासतौर से ग्रामीण क्षेत्रों में प्रभावी एवं किफायती ब्राडबैंड सेवाओं की उपलब्धता। इस दिशा में बजट में विशेष प्रयास किए गए हैं। देश भर में आप्टिक फाइबर बिछाने के लिए भारत नेट परियोजना के लक्ष्य को दोहराने के साथ ही 2025 तक इस डिजिटल बुनियादी ढांचे के निर्माण का वादा किया गया है। दूरदर्शन पर नए चैनलों से भी शैक्षणिक गतिविधियों को बल मिलेगा। आगामी वित्त वर्ष में 5जी सेवाओं की शुरुआत की जाएगी, जो डिजिटल क्रांति को नए क्षितिज पर ले जाएगी। कुल मिलाकर यह बजट वर्तमान की कई चुनौतियों का समाधान करते हुए भविष्य में तकनीकी मोर्चों पर आ रहे परिवर्तनों की वास्तविकता को स्वीकार कर देश को प्रगति के नए पथ पर ले जाने का रोडमैप तैयार करने वाला है।
Date:05-02-22
प्रगाढ़ होती इजरायल – भारत मैत्री नाओर गिलोन, ( लेखक भारत में इजरायल के राजदूत हैं )
इन दिनों हम इजरायल और भारत के राजनयिक संबंधों के 30 वर्ष पूरे होने का जश्न मना रहे हैं। पिछले वर्ष सितंबर में इजरायल के राजदूत के रूप में अपनी रोमांचक यात्रा शुरू करने के लिए मैं नई दिल्ली पहुंचा था। इजरायल के राजनयिकों के लिए भारत सबसे दिलचस्प और महत्वपूर्ण स्थानों में से एक है, क्योंकि भारत में इजरायल के कई मित्र हैं। दोनों देशों के लोगों के बीच बहुत प्रेम, आदर और गहरी दोस्ती है। 29 जनवरी, 1992 को औपचारिक रूप से राजनयिक संबंधों की स्थापना के बाद से इजरायल और भारत ने मिलकर जो हासिल किया है, वह अभूतपूर्व है। हमारी दो प्राचीन सभ्यताओं के बीच का संबंध हजारों वर्ष पुराना है। भारत का यहूदी समुदाय इन संबंधों की आधारशिलाओं में से एक है। यहूदी पीढिय़ों से भारत में शांति के साथ रह रहे हैं। उन्हें कभी भी उत्पीड़न या विरोध का सामना नहीं करना पड़ा। सबको अपनाने वाला भारतीय समाज उन्हें फलने-फूलने और अपना अभिन्न अंग बनने की इजाजत देता है। इसे ही हम ‘अतुल्य भारत’ के रूप में जानते हैं।
बीते 30 वर्षों के दौरान भारत के साथ इजरायल के द्विपक्षीय संबंध कई क्षेत्रों में प्रगाढ़ हुए हैं। स्वास्थ्य, कृषि, जल, व्यापार, विज्ञान एवं तकनीक, अनुसंधान एवं विकास, रक्षा, कला-संस्कृति, पर्यटन एवं अंतरिक्ष इनमें प्रमुख हैं। भारत हमारा अब केवल घनिष्ठ मित्र ही नहीं है, बल्कि एक सामरिक साझेदार भी है। दोनों देशों के राष्ट्रपतियों और प्रधानमंत्रियों के साथ अनेक उच्च स्तरीय दौरों से यह स्पष्ट भी हो जाता है। आने वाले वर्षों में और अधिक उच्च स्तरीय दौरों की योजना है।
हिंद प्रशांत क्षेत्र में भारत हमारे प्रमुख साझेदारों में से एक है। आज हमारे द्विपक्षीय संबंध जिन क्षेत्रों में केंद्रित हैं, वे हिंद प्रशांत में समग्र रूप से इजरायल के निरंतर हितों का प्रतिनिधित्व करते हैं। वैश्विक महामारी कोविड पर काबू पाना, आतंकवाद से लड़ना, व्यापार का विस्तार और जलवायु परिवर्तन से पैदा होने वाले खतरों से निपटना दोनों देशों की आज प्राथमिकता है। महामारी की शुरुआत के बाद से इजरायल ने कई संयुक्त योजनाओं पर भारत के साथ मिल कर काम किया है। इस दौरान हमने चिकित्सा उपकरणों का भी आदान-प्रदान किया। साथ ही नि:शुल्क महिला स्वास्थ्य क्लिनिक की व्यवस्था की है। दोनों देश वैक्सीन प्रमाणपत्रों की आपसी मान्यता पर भी सहमत हुए हैं। इससे दोनों देशों की आपसी समझबूझ और मजबूत हुई है। इसकी बदौलत हम स्वास्थ्य सेवा एवं सार्वजनिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में अपने सहयोग को और मजबूत बनाना जारी रख सकते हैं। हमने रक्षा समेत सहयोग के अन्य क्षेत्रों में भी निरंतर प्रगति की है।
भारतीय सैन्य अधिकारियों ने इजरायल की कई उच्च स्तरीय यात्राएं करने के साथ इजरायली वायु सेना द्वारा आयोजित ब्लू फ्लैग सैन्य अभ्यास में भागीदारी की। ‘मेक इन इंडिया’ अभियान के शुरू होने से पहले से ही इजरायल ‘मेक इन इंडिया, मेक विद इंडिया (भारत में बनाओ, भारत के साथ बनाओ)’ के पक्ष में रहा है। वास्तव में दोनों देश समझ चुके हैं कि लंबे समय तक दोस्ती बनाए रखने के लिए साझेदारी की जड़ों को निरंतर पोषित करना होगा। इसे अकादमिक सहयोग के स्तर पर भी प्रोत्साहित किया जाना चाहिए। हमें एक दूसरे को समृद्ध करते हुए अपने साझा ज्ञान के क्षितिज का विस्तार करना चाहिए। इजरायल में 10 प्रतिशत विदेशी छात्र भारतीय हैं। इसमें और बढ़ोतरी कैसे हो, इस पर बात चल रही है। और अधिक युवा छात्रों तक पहुंचने के लिए हम अगले पांच वर्षों में नई दिल्ली के आसपास के इलाकों में मोबाइल कक्षा की सुविधा प्रदान करने वाली बस को प्रायोजित करेंगे। इजरायल एक स्टार्टअप राष्ट्र है। हमारे पास प्रौद्योगिकी में भारत से साझा करने और सीखने के लिए बहुत कुछ है। हमने दोनों देशों की स्टार्टअप्स और टेक कंपनियों के बीच व्यावसायिक उपक्रमों में पर्याप्त वृद्धि भी देखी है।
हरित ऊर्जा भी एक और ऐसा क्षेत्र है, जहां हमें सहयोग को मजबूत बनाने पर गर्व है। हाल में इजरायल भारत नीत अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन में शामिल हुआ है। दोनों देश मिलकर जलवायु परिवर्तन के खिलाफ वैश्विक युद्ध में अहम भूमिका निभा सकते हैं। कृषि और जल भारत के साथ हमारी साझेदारी के महत्वपूर्ण पहलू हैं। ड्रिप सिंचाई तकनीक भारत में कृषि विकास में अहम भूमिका निभा रही है। भारत-इजरायल कृषि परियोजना के तहत इसे विकसित किया गया है। यह विश्व की सबसे बड़ी कृषि परियोजना है, जिसमें इजरायल की सरकार शामिल है। जल के क्षेत्र में भारत में इजरायल नीत कई परियोजनाएं चल रही हैं। बुंदेलखंड, उत्तर प्रदेश की प्रमुख जल परियोजना सबसे हाल की है। कई इजरायली कंपनियां पहले से ही आधुनिक तकनीक के माध्यम से भारत में जल प्रबंधन में परिवर्तन ला रही हैं। जल के क्षेत्र में अपने सहयोग को और बढ़ाने के लिए हमने पहली बार जल संसाधन प्रबंधन के विशेषज्ञ के रूप में एक विशेष दूत को नियुक्त किया है, जो भारत में सरकारी अधिकारियों और उद्योगों के साथ मिल कर काम करेगा। ऐसे में यह जरूरी है कि हम अपने संबंधों को और प्रगाढ़ बनाना जारी रखें और द्विपक्षीय सहयोग के असीमित दायरे का पूरा उपयोग करते रहें। हमारे युवा, ज्ञान आधारित समाज और अर्थव्यवस्थाएं हमें द्विपक्षीय लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए मानव और भौतिक संसाधन प्रदान कर रहे हैं। हमारे संबंधों की नींव काफी मजबूत है। इस पर हम अपने रिश्ते की ऊंची इमारत खड़ी कर सकते हैं।
Date:05-02-22
चीन को जवाब संपादकीय
बेजिंग में शुरू हुए चौबीसवें शीतकालीन ओलंपिक खेलों के उद्घाटन समारोह का बहिष्कार कर भारत ने उचित ही कदम उठाया। भारत इसके समापन समारोह में भी हिस्सा नहीं लेगा। खेलों के आयोजन में भी चीन ने जिस तरह का कुटिलता भरा दांव चलते हुए भारत को नीचा दिखाने की कोशिश की, यह उसी का करारा जवाब है। वरना क्या खेलों के आयोजन में भी कोई देश ऐसी क्षुद्र हरकत करता है? यह ताजा विवाद तब खड़ा हुआ जब चीन ने ओलंपिक मशाल उस सैनिक को सौंपी जिसने गलवान में भारतीय सैनिकों पर हमला किया था। गौरतलब है कि जून 2020 में गलवान घाटी में भारतीय सैनिकों पर चीनी सैनिकों ने हमला कर दिया था, जिसमें चौबीस भारतीय जवान शहीद हो गए थे। उस टकराव में चीनी सेना का कमांडर क्वी फाबाओ गंभीर रूप से जख्मी हो गया था। अब उसी जवान को चीन ने ओलंपिक की मशाल सौंप कर इस आयोजन को राजनीतिक रंग दे डाला। निश्चित ही यह चीन की ऐसी हरकत है जिसका मकसद भारत को चिढ़ाने के अलावा और कुछ नहीं हो सकता। जाहिर है, भारत के लिए यह जरूरी हो गया था कि चीन को उसी की भाषा में जवाब दिया जाए।
अगर दो देशों के बीच किसी मुद्दे या कुछ मुद्दों को लेकर कोई विवाद या तनातनी हो भी, तो उसका असर खेल जैसे आयोजनों पर तो जरा भी नहीं दिखना चाहिए। पर चीन ने इसे समझा कहां, बल्कि उसने भारत को उकसाने वाली चाल चल कर अपनी दुर्भावना वाली प्रवृत्ति का ही फिर से परिचय दिया। उसने यह भी नहीं सोचा कि भारत ने अमेरिका और यूरोपीय देशों के दबाव को दरकिनार करते हुए शीतकालीन ओलंपिक चीन में करवाने का समर्थन किया था। गौरतलब है कि पिछले साल 26 नवंबर को रूस और चीन के विदेश मंत्रियों के साथ बैठक में भारत ने चीन में शीतकालीन ओलंपिक खेल करवाने पर सहमति देकर अपनी ओर से सहृदयता का परिचय किया था। भारत का साफ मानना था कि सीमा विवाद व अन्य विवाद अपनी जगह हैं और खेल अपनी जगह। इसलिए शीतकालीन ओलंपिक चीन में हो जाएं तो क्या हर्ज! अगर तब भारत चाहता तो चीन की तरह ही शत्रुता का भाव दिखाते हुए इस आयोजन का विरोध कर सकता था। लेकिन भारत ने तब भी ऐसा कुछ नहीं किया जिससे यह संदेश जाए कि हम चीन के खिलाफ हैं। पर चीन ने गलवान घाटी संघर्ष में शामिल जवान को ओलंपिक मशाल सौंप कर एक तरह से भारत की संप्रभुता को चुनौती देने की कोशिश की। उसने यह भी नहीं सोचा कि भारत उसका बड़ा व्यापारिक साझेदार भी है!
चीन में मानवाधिकारों के उल्लंघन को लेकर अमेरिका और यूरोप के कई देश पहले ही से उसके खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं। आस्ट्रेलिया, ब्रिटेन, कनाडा, डेनमार्क, बेल्जियम, एस्तोनिया और लिथुआनिया जैसे कई देश हैं जो नहीं चाहते थे कि शीतकालीन ओलंपिक चीन में हों। इन देशों का चीन विरोध इसलिए नहीं है कि चीन से उनका कोई निजी विवाद है, या अमेरिका जैसे देश के दबाव में चीन का विरोध करना कोई मजबूरी है, बल्कि आज दुनिया के ज्यादातर देश देख रहे हैं कि चीन कैसे अपने पड़ोसियों खासतौर से भारत को डराने-धमकाने वाली गतिविधियों को अंजाम दे रहा है। बेहतर होता कि चीन मशाल वाहक के लिए किसी खिलाड़ी या अन्य को चुनता। एक सैनिक ऐसे सैनिक को मशाल सौंप कर जो भारतीय जवानों पर हमले को अंजाम देने की साजिश में शामिल रहा हो, चीन ने रिश्ते बिगाड़ने की दिशा में एक और कदम बढ़ाया है।
Date:05-02-22
कैदी और सजा संपादकीय
राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के ताजा आंकड़ों के अनुसार पिछले सात सालों में देश की विभिन्न जेलों में बंद कैदियों की संख्या में तीस फीसद की वृद्धि हुई है। विचाराधीन कैदियों की संख्या सबसे अधिक उत्तर प्रदेश, बिहार और मध्यप्रदेश में है। यह हमारी न्याय व्यवस्था पर गहरा प्रश्न चिह्न है। विचाराधीन कैदी यानी ऐसे लोग जिन्हें किसी जुर्म के आरोप में जेल में डाल दिया गया है और वे न्याय की आस लगाए बैठे हैं। विचाराधीन कैदियों में एक बड़ी संख्या ऐसे लोगों की होती है, जो मामूली अपराध के चलते जेलों में डाल दिए जाते हैं और फिर फैसले के इंतजार में वर्षों गुजार देते हैं। ऐसे अनेक मामले हैं, जिनमें बीस-पच्चीस साल तक जेल की सजा काटने के बाद जब अदालत का फैसला आता है, तो लोग निर्दोष बता दिए जाते हैं। कई लोग तो जवानी में जेल भेजे जाते हैं और निकलते हैं तो बुढ़ापे की दहलीज पर होते हैं। इस तरह उनकी पूरी जिंदगी विचाराधीन कैदी के रूप में गुजर जाती है। इन स्थितियों पर अनेक बार चिंता जताई जा चुकी है और कहा गया कि जिन लोगों पर गंभीर आरोप नहीं हैं, उन्हें बेवजह लंबे समय तक जेलों में बंद करके रखना न्याय संगत नहीं। कई लोग तो विचाराधीन कैदी के रूप में इतना समय गुजार जाते हैं, जितना उन्हें वास्तव में अपराध सिद्ध होने पर भी सजा नहीं दी जाती। इसकी भरपाई उन्हें कभी नहीं मिल पाती।
जेलों में विचाराधीन कैदियों की बढ़ती संख्या की एक बड़ी वजह अदालतों में मुकदमों का अंबार, लंबी-लंबी तारीखें मिलना और न्यायाधीशों की कमी है। देश की सारी अदालतें जरूरत से काफी कम जजों से काम चला रही हैं। इसलिए मामलों की सुनवाई जल्दी नहीं हो पाती और मामले लंबे समय तक लटके रहते हैं। इस तरह विचाराधीन कैदियों को जेलों से बाहर निकलने का रास्ता नहीं मिल पाता। यों भी भारतीय जेलों पर कैदियों का बोझ बहुत अधिक है। कई जेलों में उनकी क्षमता से तीन गुना अधिक कैदी रखे गए हैं, जिसके चलते न तो उन्हें ठीक से रहने की जगह बन पाती है, न उनके भोजन, स्वास्थ्य आदि का समुचित ध्यान रखा जा पाता है। इस भीड़ के चलते शातिर और खूंखार किस्म के अपराधियों पर नजर रखने में भी मुश्किलें पेश आती हैं। इसलिए जेलों पर से बोझ कम करने के लिए विचाराधीन कैदियों के मामले में कोई उदारवादी तरीका निकालने की सिफारिश की जाती रही है।
हकीकत यह भी है कि जेलों में सजायाफ्ता कैदियों से कहीं अधिक संख्या विचाराधीन कैदियों की है, जो अपने पर लगे अपराध की सिद्धि का इंतजार कर रहे हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने एक बार कहा भी कि इस तरह लंबे समय तक लोगों को विचाराधीन कैदी के रूप में जेलों में बंद रखना उन्हें अपराध के लिए सजा देने से कहीं अधिक यातनादायी हो जाता है। एक सभ्य और लोकतांत्रिक देश में बिना दोष सिद्धि के लोगों को लंबे समय तक जेल में डाले रखना उचित नहीं। मगर आतंकवाद, राष्ट्रीय सुरक्षा आदि से जुड़े कानूनों में शक के आधार पर भी गिरफ्तारी का प्रावधान होने की वजह से बहुत सारे लोग विचाराधीन कैदी के रूप में जेलों के अंदर हैं। यह ठीक है कि जेलों में दोषियों की संख्या घटी है, पर विचाराधीन कैदियों की संख्या बढ़ना चिंता का विषय है। इस पर गंभीरता से विचार करने और व्यावहारिक उपाय तलाशने की जरूरत है।
Date:05-02-22
चीन को करारा सबक संपादकीय
खेलों में भी राजनीति को शामिल करना चीन को भारी पड़ गया है। चीन की कुटिल चालों से वैसे तो पूरी दुनिया परेशान है‚लेकिन इस बार उसने भारत को उकसाने वाली जो हरकत की है उसने भारत को बेहद नाराज कर दिया है। बीजिंग के शीतकालीन ओलंपिक की मशाल रिले में पूर्वी लद्दाख के गलवान में भारतीय सैनिकों के साथ हुई झड़प में बुरी तरह घायल हो चुके पीएलए के एक सैनिक कमांड़र की फाबाओ को शामिल करने की भारत में तीखी प्रतिक्रिया हुई है। परिणामस्वरूप भारत ने शीतकालीन ओलंपिक खेला के उद्घाटन और समापन समारोहों का राजनयिक बहिष्कार कर दिया है। भारत और अमेरिका सहित दुनिया के कई देशों के बहिष्कार के बीच ये खेल शुक्रवार से शुरू हो गए। भारत के आधिकारिक प्रसारक प्रसार भारती ने भी इन खेलों का प्रसारण न करने की घोषणा की है। ड़ीड़ी स्पोर्ट्स चैनल खेलों के उद्घाटन और समापन समारोह का सीधा प्रसारण नहीं करेगा। चीन की इस भड़काने वाली हरकत से लगता है कि भारत के खिलाफ उसका आक्रामक सूचना युद्ध जारी है। गलवान संघर्ष में अपने सैनिकों के मरने के बारे में जानकारी देने में तो उसे काफी समय लगा था‚ लेकिन की फाबाओ को मशालवाहक बनाने में उसने बड़ी तत्परता दिखाई। पीएलए कमांडर को प्रतिष्ठित शीतकालीन ओलंपिक खेलों के मशालवाहक के रूप में इस्तेमाल करना चीन के उन कई कदमों में से एक है‚ जो गलवान में हुई झड़प को सुर्ख़ियों में बनाए रखने के लिए उठाए गए हैं। ये खेल चीन की राजनीति का जरिया बन गए हैं‚ लेकिन दुनिया भर में चली जा रही चीन की चालें पलटकर उसे ही भारी पड़ने लगी हैं। भारत ही नहीं दुनिया के कई देशों ने इन खेलों का बहिष्कार किया है। अमेरिका ने चीन के शिनिजयांग में उइगुर मुसलमानों की प्रताड़ना को मुद्दा बनाते हुए खेलों का बहिष्कार किया है‚ बहुत से यूरोपीय समुदाय के देश भी अमेरिका का साथ दे रहे हैं। जर्मनी के चांसलर भी बीजिंग नहीं पहुंचे। 20 जून 2020 को लद्दाख की गलवान घाटी में हिंसक मुठभेड़ के बाद से ही भारत और चीन के संबंधों में तनाव लगातार बना हुआ है। लाख छुपाने के बाद भी संघर्ष में हुए नुकसान पर भी चीन बेनकाब हो गया है। वक्त आ गया है कि दुनिया भी चीन से निपटने में भारत जैसी सख्ती दिखाए।
Date:05-02-22
कब बदलेगा जेलों का रवैयाॽ भगवती प्र. डोभाल
पिछले दिनों दिल्ली के जेलों की ऐसी तस्वीर सामने आई है‚जिससे लगता है दक्षिण एशिया के सबसे बडे परिसर तिहाड में कैदी मुक्त घूम रहे हैं और उन्हें वह सारी सुविधाएं उपलब्ध हैं‚जो एक आलीशान बंगले में दी जाती हैं। ऐसा मामला अभी सर्वोच्च अदालत के संज्ञान में आया है। इससे पता चलता है कि सुरक्षा की जेल में बहुत सारी चूक हो रखी हैं।
इसमें बिल्ड़र यूनिटेक का मसला है‚जिसमें हवाला के मामले में चंद्रा भाईयों को जेल परिसर में रखा गया है‚ परंतु वहां उन्हें वीवीआईपी सुविधाएं दी जा रही हैं। दूसरी ओर जेल में सुरक्षा की बदइंतजामी पर सर्वोच्च अदालत के न्यायाधीश डी. वाई. चंद्रचूड और एम.आर. शाह ने दिशा–निदश दिए हैं कि जेल की सुरक्षा पर केंद्र और दिल्ली सरकार को दिल्ली पुलिस कमिश्नर की सिफारिशों को लागू करना चाहिए। जैसे पहला; फोन जैमर को जेल परिसर में प्रयोग के तौर में स्थापित करें। वैसे जनवरी 2020 से मंडोली जेल परिसर में फोन जैमर लगाया जा चुका है और तिहाड जेल परिसर में तीन टावर नवम्बर 2021 में लगाए जा चुके हैं‚लेकिन उनकी रेगुलर मॉनिटरिंग की जरूरत है। दूसरा; डीजी कारावास को–पूरी बॉडी एक्स–रे मशीन लगानी चाहिए। तीसरा; 7 हजार सीसीटीवी कैमरों को 16 जेलों में लगाया गया है।
गृह मंत्रालय ने शपथ–पत्र पीठ को देते हुए कहा है कि दो केंद्रीय नियंत्रण कक्ष स्थापित किए गए हैं– एक तिहाड जेल के मुख्यालय में और दूसरा मंडोली मुख्यालय में। यह सब बातें सर्वोच्च अदालत की दो जजों की बेंच में सुनवाई के दौरान सामने आई हैं। बेंच दिल्ली की इन जेलों की सुरक्षा को पुख्ता करने के आदेशों को बार–बार देने का प्रयास कर रही है। यह सब इसलिए भी है कि कारागार में हो रहे गलत कार्यों पर रोक लगाई जा सके। क्योंकि कारागार का पिछला इतिहास अच्छा नहीं है। बहुत सारी ऐसी घटनाएं आए दिन हो रही हैं। किरण बेदी एक समय तिहाड जेल की इंस्पेक्टर जनरल थीं। बेदी ने अपने कार्यकाल में बहुत सारे सुधार तिहाड जेल में करवाए थे। गांधीजी कहा करते थे कि कारावास का काम सुधार गृह का होना चाहिए‚ ताकि कैदी नई जिंदगी जीने के काबिल हो सके। कुछ मायने में तिहाड जेल अन्य जेलों के लिए मॉडल का काम करती है। समय–समय पर किए जा रहे प्रयोगों से सुधार गृह में तब्दील होने की राह पर भी तिहाड जेल है। यह एक संस्थान की तरह विकसित भी हो रहा है। कारागार का मुख्य ध्येय कैदियों को शिक्षित और जागरूक करना है‚ ताकि उन्हें सुधार कर आम नागरिक की तरह बनाया जा सके। इसके अतिरिक्त कैदियों को कानूनी जानकारी दी जाती है‚जिससे वह भविष्य में अपराध की ओर बढने से पहले‚उसके दुष्परिणामों को समझ सके। साथ ही कैदियों को पुनर्वास भी कराने की व्यवस्था है‚ जिससे अपनी सजा समाप्त होने पर वह जेल से बाहर जाकर अच्छा जीवन भी जी सकने लायक बन जाएं। जेल के भीतर महिला कैदियों की स्वास्थ्य का विशेष ध्यान रखा जा रहा है। साथ ही उनके बच्चों की देख–रेख का काम जेल प्रशासन कर रहा है‚बच्चों को शिक्षा देने में भी जेल काम कर रहा है। यही नहीं जेल के भीतर बहुत सारे उद्योग कैदियों द्वारा चलाए जा रहे हैं। कैदियों द्वारा निर्मित माल को भी बेचने का प्रबंध जेल प्रशासन कर रहा है। सभी विचाराधीन कैदियों के साथ अक्सर वैसा ही व्यवहार किया जाता है‚जैसा सजा प्राप्त कैदी के साथ होता है। तिहाड जेल में 6250 कैदियों को रखने की सुविधा है‚लेकिन 14,000 से अधिक कैदियों को ठूंस कर रखा गया है। जेल में दोषी कैदियों और विचाराधीन कैदियों को रखा जाता है। विचाराधीन कैदियों की संख्या ज्यादा है‚क्योंकि कोर्ट में समय सीमा तय नहीं है किसी विचाराधीन कैदी को सजा देने या उन्हें मुक्त करने की। यह भी एक वजह है कैदियों की कारावास में अधिक संख्या होने की। मंडोली कारावास में कुछ कमरों में सीमित कैदी हैं। रोहिणी जेल भी कैदियों से भरा हुआ है। कोरोना के दौरान कैदियों को पैरोल पर छोडा गया था। कुछ तो लौट आए हैं‚और कुछ लापता हो गए हैं।
कारावास में बहुत सारे गैंग अवैध ढंग से काम कर रहे हैं। 2016 में पूर्व गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने नये कारावास मैनुअल को जारी किया था‚ जिसके भीतर 32 अध्याय हैं। यह सब अंतरराष्ट्रीय कानूनी मानकों के अनुसार हैं‚ पर व्यवहार में कितने आ रहे हैं‚ वह देखने की बात है। 2018 में तिहाड जेल मैनुअल में बदलाव करके लंबी अवधि की सजा काट रहे कैदियों को कुछ सुविधाएं दी गइ‚लेकिन यह सुविधाएं उन्हें मिलती हैं‚जिनका व्यवहार जेल मैनुअल के आधार पर अच्छा माना जाता है। दिल्ली की मंडोली 6 जेलों वाली है। यहां दो जेल ऐसे हैं जहां क्षमता से कम कैदी हैं। देश के हर जेल की दशा सुधारने की जरूरत है। कम–से–कम यहां से सजा पाकर मुक्त हुए कैदी अपराध की ओर न जाएं‚ ऐसा कार्य राज्य सरकारों को भी करने की जरूरत है।
Date:05-02-22
स्थानीय को रोजगार संपादकीय
हरियाणा सरकार ने हार नहीं मानी है। प्रदेश सरकार ने पंजाब एवं हरियाणा उच्च न्यायालय के उस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है, जिसमें निजी क्षेत्र में स्थानीय लोगों के लिए 75 फीसदी आरक्षण को स्थगित कर दिया था। यह कानून नवंबर में पास हुआ था और इस साल 15 जनवरी से लागू हुआ है। जब इस कानून का विधेयक विधानसभा में पेश हुआ, तभी से निजी क्षेत्र की कंपनियां और उनके संगठन इसका विरोध कर रहे हैं। बाद में इन सभी ने इसे हाई कोर्ट में चुनौती दी और बृहस्पतिवार को अदालत ने इस पर रोक लगा दी थी। हरियाणा सरकार इसके अगले ही दिन जिस तरह सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई, वह बताता है कि यह मामला उसकी प्राथमिकता सूची में कितना ऊपर है। उच्च न्यायालय से रोक का फैसला आते ही राज्य के उप-मुख्यमंत्री दुष्यंत चैटाला ने ट्वीट करके इसका इरादा उसी समय जता दिया था। दुष्यंत चैटाला की जननायक जनता पार्टी ने अपने चुनाव घोषणापत्र में स्थानीय लोगों को आरक्षण देने का वादा किया था। उनकी पार्टी भाजपा के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार का दूसरा सबसे बड़ा घटक है।
यह पहली बार नहीं है, जब किसी राज्य में स्थानीय लोगों को इस तरह का आरक्षण देने का मामला उठा हो। ऐसी कोशिशें कई राज्यों में कई बार हुई हैं। 1995 में गुजरात सरकार ने ऐसा ही कानून बनाने की कोशिश की थी। महाराष्ट्र में शिव सेना के घोषणापत्र में भी रोजगार में स्थानीय लोगों को ही प्राथमिकता देने की बात होती रही है और वहां भी ऐसा कानून बनाने की कोशिशें हुई हैं। क्षेत्रीय दलों के लिए यह एक आसान राजनीतिक फॉर्मूला है। उन्हें लगता है कि स्थानीय लोगों को रोजगार देने की बात करके वे जनमत अपने पक्ष में करने में कामयाब हो जाएंगे। पर निजी क्षेत्र हमेशा ही ऐसी किसी भी पाबंदी का विरोध करता रहा है। किसे काम पर रखना है और किसे नहीं, इसे लेकर निजी उद्योग पूरी स्वतंत्रता चाहते हैं। इसमें सरकारी पाबंदियां उनके लिए कई तरह की परेशानियां खड़ी करती हैं। हालांकि, आमतौर पर निजी क्षेत्र की पहली प्राथमिकता स्थानीय लोग ही होते हैं, क्योंकि उसके लिए भी यह सुविधाजनक होता है। लेकिन उनका पहला मकसद यह होता है कि अधिक से अधिक ऐसे लोगों को रखा जाए, जो उसके काम के अनुकूल अधिकतम कुशलता रखते हैं। ऐसे पदों पर स्थानीयता ज्यादा महत्वपूर्ण नहीं होती। यह सच है कि हरियाणा इस समय देश के उन राज्यों में से एक है, जहां बेरोजगारी दर सबसे ज्यादा है। लेकिन इसे दूर करने का सबसे अच्छा तरीका क्या निजी क्षेत्र में आरक्षण ही है? अगर शिक्षा और कौशल विकास पर ध्यान दिया जाए, तो हरियाणा के बच्चों के लिए अपने राज्य में ही नहीं, दूसरे प्रदेशों में भी रोजगार के बहुत सारे रास्ते खुल सकते हैं।
अभी पता नहीं कि अदालतों में यह मामला कहां तक जाएगा। उच्च न्यायालय ने भी सिर्फ स्थगन ही दिया है, वहां से कोई अंतिम फैसला नहीं आया है। सुप्रीम कोर्ट में की गई अपील इसी स्थगन को खत्म कराने के लिए है। लेकिन यह उम्मीद तो की ही जानी चाहिए कि जब इस मामले में अंतिम फैसला आएगा, तो वह देश के उन अन्य राज्यों और क्षेत्रीय दलों के लिए भी नजीर बनेगा, जो स्थानीय लोगों को आरक्षण का वादा करके अपना कर्तव्य पूरा मान लेते हैं और रोजगार के मोर्चे पर ठोस काम या व्यवस्था नहीं करते।
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