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वसंत को उसने अपने ह्रदय के रक़्त से पाला; पर वह पर लगते ही उड़ गया और वह फिर एकाकी रह गयी ...
वह बेग़ुनाह अपराधी - हंसा गर्ग
"सौरभ जानना चाहता था की उसने ऐसा क्या ग़ुनाह किया था, जिसकी सज़ा उसे आज तक मिल रही है । उसके पत्र का एक एक शब्द सौम्या के मन पर विचारों और सवालों का बोझ बढ़ाता जा रहा था । "
लेखक - श्री अशोक कुमार छाबड़ा
"जो अच्छा होता है, क्यों वह कष्ट में नज़र आता है? क्यों बुरे लोग मज़े लूटते दिखते हैं? मेरे अंतर्मन में ये सवाल कौंध रहे थे। लेकिन जब मौसम बदला तो जवाब मिल गए।"
"मैं कभी कभी बहुत डर जाता था और रोता था। अपने जीवन में अचानक मुझे कोई एक बहुत खाली - बिलकुल खाली जगह दिख जाती थी। यह बहुत डरावना होता था। उस दिन माँ ने मुझे बुलाया। बाहर मैदान में घास का रंग गहरा हरा था। बादल बहुत थे और हवा में भार था। वह भीगी हुई थी।"
दोस्तों,
मैं माफ़ी चाहूंगा की मेरे पास इस कहानी का शीर्षक और लेखक का नाम अभी नहीं है, पर पता चलते ही मैं ज़रूर यहाँ अपडेट कर दूंगा ।
कहानी सुनने के लिए धन्यवाद !!